Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 36 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

साथियों मुझे खेद है कि अपडेट देने में कुछ ज्यादा ही विलंब हो चुका है परंतु इस समय मेरी व्यस्तता जरूरत से ज्यादा है और आप सब को पता ही है की कहानी लिखना फुर्सत और समय काटने का उपाय जो इस समय मेरे पास बेहद कम है आप सब जुड़े रहे मैं बीच-बीच में कुछ घटनाक्रम लिख रहा हूं परंतु उन्हें जोड़कर प्रस्तुत करने लायक अपडेट बनाने में देर हो रही है
 
भाग-70

दोनों पति पत्नी एक दूसरे की बाहों में निढाल पड़ गए विधि के अनुसार रतन को सुगना की बुर चोदते हुए उसे स्खलित करना था परंतु सुगना और रतन दोनों ही झड़ चुके थे वासना का फूला हुआ गुब्बारा अचानक ही पिचक गया था रतन के हाथ सुगना की चुचियों पर घूमने लगे…

"ई बताव 4 साल हम तोहरा के कितना दुख देले बानी, हमरा के माफ कर द, ई बेचारी तरस गईल होइ" रतन का हाथ सुगना की बुर पर आ गया।

न सुगना बेचारी थी न हीं उसकी बुर। जिस स्त्री को सरयू सिह का प्यार और कामुकता दोनों प्राप्त हो वह स्वतः ही तृप्त होगी।

"आप ही त भाग गइल रहनी"


रतन ने सुगना को अपनी बाहों में खींच लिया और उसके हाथ सुगना के कोमल नितंबों को सहलाने लगे धीरे धीरे वासना जवान होने लगी नसों में रक्त भरने लगा और रतन का लंड खड़ा हो चुका था..

अब आगे...

सुगना रतन के लण्ड को अपने हाथों से सहला रही थी और मन ही मन उसकी तुलना सरयू सिंह के लण्ड से कर रही थी।

जिस तरह एक स्त्री किसी पराए सुंदर बच्चे को अपनी गोद में पूरी तन्मयता से खिलाती है परंतु आलिंगन में वह आत्मीयता नहीं होती जो अपनी कोख से जन्म लिए के बच्चे के साथ होती है।


यही हाल सुगना का था। सुगना रतन के लण्ड को देखकर मोहित और आकर्षित अवश्य थी परंतु उसका अंतर्मन अब भी सरयू सिंह के लण्ड को याद कर रहा था। रतन अधीर हो चुका था उसने सुगना के नितंबों को सहलाते-सहलाते सुगना को उठा लिया और एक बार फिर उसी पलंग पर सुगना को बिछा दिया जिस पर सुगना ने अपनी जवानी की रंगरेलियां मनाई थी रतन उसकी जांघों के बीच आ गया।

सुंदर स्त्री जब अपनी जाँघे फैलाए संभोग को आतुर होती है तब स्त्री और पुरुष के बीच में संबंध गौड़ हो जाते हैं और वासना सारे संबंधो को भूलने पर मजबूर कर देती है।

आज रतन और सुगना अपनी पुरानी गलतियों को भूल संभोग करने को तत्पर थे । दीए की रोशनी में सुगना का कुंदन बदन चमक रहा था। रतन धीरे-धीरे सुगना पर झुकता गया और रतन का लण्ड सुगना की बुर के होंठ से सट गया। एक पल के लिए सुगना सिहर उठी उसके निचले होठों पर आज किसी पराये मर्द के लंड ने दस्तक दी थी।


उसके दिलो-दिमाग में प्रेम भी था पर दिमाग के किसी कोने में अपने बदचलन होने का एहसास भी। सुगना ने अपने मन को समझाया और अपनी एड़ी जो अब रतन के नितंबों के ठीक ऊपर थी उसे खींचते हुए रतन को स्वयं में समाहित कर लिया। जांघों के बीच छुपी पनियाई और फूली हुई पुर पूरी तरह फैल गई और रतन का लंड अपने म्यान में घुसने का प्रयास करने लगा।

सुगना एक अद्भुत महिला थी जाने वह कौन से जतन करती थी उसकी बुर का कसाव किसी किशोरी से कम न था। रतन का लण्ड अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था।

पुरुष का यही अंग बुर् के सारे विरोध और कसाव को धता बताकर गर्भाशय को चूमने को आतुर रहता है रतन के लण्ड में रक्त का बहाव और बढ़ गया तथा रतन अपनी सारी ताकत अपनी कमर में लगाते हुए लण्ड को सुगना की बुर में ठासता गया। सुगना चिहुँक उठी और उसके मुंह से बरबस ही निकल गया


"आह .....तनी धीरे से.. दुखाता"

रतन ने उसकी आंखों को में देखा और उसके आंखों और फिर होठों को चूम कर उसे तसल्ली देने की कोशिश की परंतु उसका लण्ड कोई मुरव्वत करने को तैयार न था। वह एक एक पिस्टन की बात अपने सिलेंडर में आगे पीछे होने लगा।


रतन के मन में सुगना को लेकर प्यार तो अवश्य था परंतु उसके गदराए हुए बदन को भोगने की इच्छा पिछले कई महीनों में बलवती थी वासना प्रेम पर हावी थी। परिणाम…. रतन अब सुगना को कस कर चोद रहा था दिमाग का सारा ध्यान कमर के नीचे केंद्रित था और सुगना का अंतर्मन तड़प रहा था...सरयू सिह रह रह कर उसके ख्यालों में आ रहे थे।

सुगना का पलंग आज उसकी अद्भुत चुदाई का गवाह बन रहा था। रतन की चुदाई और सरयू सिंह के प्यार दोनों में अंतर स्पष्ट था। जहां सरयू सिंह सुगना को प्यार करते करते चोदते थे और वह हंसते खेलते स्खलित हो जाती वही रतन का ज्यादा ध्यान चुदाई पर केंद्रित था।

महेंद्रा बोलेरो चलाने वाले आदमी के हांथ xuv 700 कार आ चुकी था। रतन बिना इंजन की आवाज सुने लगातार स्पीड बढ़ाए जा रहा था। सुगना की गाड़ी किस गियर में है उसका उसे एहसास भी न था।

सुगना भी आनंद में थी परंतु उसके मन मस्तिष्क में उसके बाबूजी की कमी स्पष्ट कर रहे थे. शरीर के अंग अलग अलग ढंग से बर्ताव कर रहे थे।

दिमाग में चल रहे द्वंद्व कामोत्तेजना में भटकाव पैदा करते हैं यही स्थिति सुगना की थी वह रतन के साथ संभोग का आनंद तो ले रही थी परंतु जब जब उसके मन में सरयू सिंह का का ख्याल आता उसके विचार भटक जाते, और दिमाग में चल रही कामोत्तेजना का रूप बदल जाता।


उधर रतन अपने जीवन के सबसे सुखद क्षण भोग रहा था जिस सुंदरी की कल्पना वह पिछले 1 वर्षों से कर रहा था आज उसे भोगने के अद्भुत सुख का आनंद ले रहा था। कमर की गति लगातार बढ़ रही थी वह सुगना की चुचियों को बेतहाशा मीस रहा था। अपनी चुचियों को जोर से मीसे जाने से वह कराह उठी..

"ए जी तनी धीरे से…. दुखाता"

बच्चों के मुख से जिस तरह कुछ वाक्यांश सिर्फ उनके माता-पिता को अच्छे लगते हैं उसी प्रकार सुगना के यह वाक्यांश सरयू सिंह को बेहद पसंद थे और हम सब पाठकों को भी परंतु रतन इन शब्दों की गहराई नहीं जानता था उसे इससे कोई सरोकार ज्यादा न था।


रतन ने सुगना की चुदाई जारी रखी और अंततः वही हुआ जैसा अति कामोत्तेजक पुरुषों के साथ होता है रतन के लंड ने ने सुगना की चूत में उल्टियां कर दीं।

संभोगातुर स्त्री को स्खलित किये किए बिना पुरुष स्खलन एक अवांछित अपराध की श्रेणी में आता है पुरुषों को यह भली-भांति समझना चाहिए कि स्त्री तो स्खलित होने के पश्चात भी आपको चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने के लिए अपनी चूत उपलब्ध करा सकती है परंतु पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है।

..रस बाहर तो दम बाहर..

रतन निढाल होकर सुगना के ऊपर ही लेट गया वह बेतहाशा हांफ रहा था सुगना तड़प रही थी और अपनी कसी हुई बुर से रतन के दम तोड़ रहे लंड को पकड़ने का प्रयास कर रही थी। परंतु जैसे जैसे वह अपना दबाव बढ़ाती रतन के लण्ड में भरा हुआ रक्त वापस उसके शरीर में फैली जाता।

लंड सिकुड़ कर एक लाचार मरी हुयी मछली की तरह बाहर आ गया।


सुगना थोड़ा उदास हो गयी। उसे गुरुजी की बात अब भी याद थी आज की रात पति और पत्नी दोनों को ही संभोग करते हुए स्खलित होना अनिवार्य था जिसमें सुगना असफल रही थी। रतन भारी शरीर लिए हुए उसके सीने पर पड़ा था।। धीरे-धीरे रतन उसके बगल में सरक गया और कोठरी की छत की तरफ देख कर बोला

"जाएदा चिंता मत कर... अभी रात बहुत बाकी बा" सुगना थकी हुई थी परंतु वह आज के विशेष अवसर और पूजा को सफल बनाने के लिए स्खलित होना चाहती थी आखिर उसका भी आने वाला जीवन रतन से ही जुड़ा था।

कुछ समय बाद अपनी चुचियों को रतन के गालों पर रगड़ते हुए वह बोली

"गुरुजी पुड़िया में कवनो दवाई दे ले रहले हा नु?"

सुगना की कामुक अदाओं रतन के मन में उत्साह भर गया..

रतन की बांछें खिल उठी। उसे सारा गुरुजी की बातें याद आ गयीं। वह झटपट उठा और गुरु जी द्वारा दी गई पोटली में से शिलाजीत की 2 गोलियां निकालकर निगल गया।

रतन दवा तो खा चुका था परंतु उसे यह बात सताने लगी थी कि आज उसने कमरे में आने से पहले हस्तमैथुन क्यों किया था। दरअसल रतन अपने प्रथम संभोग को यादगार बनाना चाह रहा था और वह यह बात जानता था कि वह अपने प्रथम मिलन सुगना की कामुक अदाओं और मुखमैथुन के सामने ज्यादा देर तक नहीं पाएगा इसलिए उसने बुद्धिमत्ता दिखाते हुए स्वयं को पहले ही स्खलित कर लिया था। निश्चय ही इस कार्य से उसे सुगना के साथ प्रथम संभोग में अत्यधिक आनंद की प्राप्ति हुई थी परंतु वह सुगना को स्खलित न कर सका था।

पर अब यही बुद्धिमत्ता भारी पड़ गई थी रतन को एक एक बार फिर सुगना को स्खलित करते हुए स्वयं भी स्खलित होना था। जो कि एक दुरूह कार्य था।

शिलाजीत के असर से रतन के लंड में फिर शक्ति भर गई पर अंडकोषों का क्या…? वो हड़ताल पर चले गए। रतन इस बात से अनजान सुगना पर एक बार फिर चढ़ गया। सुगना का पलंग एक बार फिर हिलने लगा और सुगना के मन में आने वाले जीवन को लेकर एक बार फिर सुखद हिलोरे उठने लगी। रतन एक बार फिर सुगना को उत्तेजित करने में कामयाब रहा था। परंतु अपने अत्यधिक और व्यग्र परिश्रम से वह सुगना के आकर्षण का केंद्र बन गया था। सुगना उसके चेहरे और शरीर से गिर रहे पसीने को देखती और मन ही मन उसके मर्दाना शरीर और उसके भागीरथी प्रयास की प्रशंसा करती वह स्वयं अपनी बुर को आगे पीछे कर स्खलित होना चाह रही थी।

पर नियति को यह मंजूर न था रतन को पसीने से लथपथ देखकर सुगना के मन में मन में वही ख्याल आने लगे जब उसके बाबूजी उसे चोदते चोदते गिर पड़े थे।

सुगना बार-बार अपना ध्यान उस बात से हटाती परंतु रतन के कंधे और सीने से बह रहा पसीना उसे बार-बार उसके दिमाग में वही दृश्य ला देता।

नकारात्मक विचार स्खलन की सबसे बड़ी बाधा है सुगना अपनी उत्तेजना को चरमोत्कर्ष के करीब ले जाकर भी स्खलित ना हो पाई। आधे पौन घंटे की गचागच चुदाई के दौरान सुगना ने आनंद तो लिया परंतु स्खलन पूर्ण ना हुआ।


सुगना स्खलन की अहमियत जानती थी। उसने स्वयं का ध्यान सरयू सिंह से भटकाने के लिए कामुक आवाजे निकालना शुरू कर दी…

" हां हां… आसही और जोर से आह….." कभी वह रतन के होठों को चूमने का प्रयास करती कभी अपने ही हाथों से अपनी चुचियों को मसलती रतन की पीठ पर अपनी उंगलियों को गड़ाती।


उसके इस उत्तेजक के रूप ने रतन की उत्तेजना में चार चांद लगा दिए परंतु नियति ने जो उनके भाग्य में लिखा था उसने सुगना को स्खलित होने से पहले रतन को एक बार और स्खलित कर दिया।

रतन एक बार फिर दो बूंद वीर्य सुगना की फूली और संवेदनशील हो चुकी बूर् पर छिड़कते हुए सुगना को निहार रहा था अपने लंड के सुपारे को सुगना की बुर पर पटकते हुए भी दो-चार बूंद से ज्यादा वीर्य बाहर न निकाल पाया सुगना उसके चेहरे की तरफ देख रहा था।

सुगना उसे अपने तृप्त और स्खलित होने का एहसास करा रही थी यद्यपि सुगना के अभिनय में वह मौलिकता न थी पर रतन आश्वस्त हो गया की सुगना स्खलित हो चुकी है वह एक विजयी योद्धा की तरह अपने अपने लण्ड को निचोड़ कर सुगना की बुर पर रगड़ रहा था।


सुगना के चेहरे के हावभाव विरोधाभास पैदा कर रहे थे एक पल के लिए उसे लगा जैसे वह उसे चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने में नाकाम रहा है रतन अपनी खींझ मिटाते हुए बोला..

" तू का सोचे लाग तालु हा?

सुगना ने कोई उत्तर न दिया । सुगना ने रतन को यह अहसास तो करा दिया कि वह स्खलित हो चुकी है परंतु वह मन ही मन बेहद घबराई हुई थी आज की पूजा आसफल हो रही थी और उसके मन में भविष्य को लेकर कई प्रश्न उठा रहे थे ।

अपने अथक प्रयास करने के पश्चात भी जब सफलता हाथ नहीं लगती तो मनुष्य परिस्थितियों से समझौता करने लगता है और विधि के विधान पर प्रश्न चिन्ह भी उठाने लगता है.

यही हाल सुगना का था वह गुरु जी की बात से इतर यह सोचने लगी की हो सकता है पूजा का यह विधान आदर्श परिस्थितियों में ही कारगर होता वह परंतु आज का दिन उसके और रतन के प्रथम मिलन का था और ऐसा आवश्यक नहीं की प्रथम मिलन में ही स्त्री पुरुष दोनों एक साथ स्थगित हों..यह तो संभोग की आदर्श स्थिति है। सुगना अपनी उधेड़बुन में खोई हुई थी तभी

बाहर से कजरी की आवाज आई

"सुगना बेटा उठ जा किरण फूट गईल"

सुगना ने उत्तर तो न दिया पर पलंग से उतरने की आवाज सुनकर कजरी आश्वस्त हो गई और वह दरवाजे से हट गई। सुगना उठी उसने अपनी जांघों के बीच एक अजीब सा तनाव महसूस किया।


उसकी बुर की इतनी बेरहम चुदाई आज से पहले कभी नहीं हुई थी। प्रथम मिलन में भी उसकी दुर्गति नहीं हुई थी जबकि वह दो तीन बार स्खलित भी हुई थी।

यही सरयु सिंह का जादू था पर उनका भतीजा रतन सुगना की बुर का पूजन न कर पाया था और

" अनाड़ी चूदइया बुर् का सत्यानाश" वाली कहावत को चरितार्थ कर दिया था।

सुगना के दोनों पैरों के बीच एक अजीब सा अंतर आ चुका था वह अपने पैर फैला कर चल रही जिसे कजरी में ताड़ लिया और सुगना की कमर सहलाते और मुस्कुराते हुए बोली

"रतनवा ढेर परेशान क देले बा का"

सुगना क्या कहती.. उसने मुस्कुराकर कजरी की बातों की लाज रख ली. कजरी उसके पास आई और उसे अपने आलिंगन में भरते हुए कि माथे को चूमा और बेहद प्यार और आत्मीयता से बोली


"दुनो पति-पत्नी हमेशा खुश रह लोग"

आशीर्वाद का क्या? वह तो बुजुर्ग हमेशा में बच्चों की भलाई के लिए ही देते हैं परंतु भाग्य और नियति ने जो सुख दुख उनके हिस्से में संजोया होता है उसे रोकना असम्भव होता है।

धीरे धीरे सुबह हो गई और घर के आंगन की शांति महिलाओं के कोलाहल में बदल गई सभी सुगना और रतन के बारे में बातें कर रहे थे बाहर सरयू सिह के दिमाग में भी वही दृश्य घूम रहे थे परंतु अब वह सुगना को पुत्री मान चुके थे और उसके बारे में कोई गलत ख्याल नहीं लाना चाह रहे थे। परंतु उनका अवचेतन मन कभी-कभी सुगना की कामुक काया को अपने मन में गढ़ लेता और अपने जीवन की सबसे सुंदर स्त्री के कामुक अंगों के बारे में सोचते हुए उनके लंगोट में हलचल होने लगती।

आखिरकार विदाई का वक्त आ गया सुगना और रतन वापस बनारस जाने के लिए तैयार होने लगे कुछ ही देर में रतन सोनू सुगना लाली और छैल छबीली सोनी बनारस के लिए निकल पड़े... पुरानी जीप धूल उड़ आती हुई नजरों से ओझल हो गयी और सरयू सिंह कजरी तथा पदमा के साथ अपना हाथ हिलाते रह गए

आने वाले कई दिनों तक रतन और सुगना एक दूसरे के साथ राते बिताते रहे पर परिणाम हर बार एक ही रहा रतन वासना के अधीन होकर सुगना को तरह-तरह चोदता पर सुगना स्खलित ना होती। मुखमैथुन के दौरान एक दो बार सुगना स्खलित भी हुई परंतु संभोग के दौरान जाने उसे क्या हो जाता?

सरयू सिंह ने उसकी बुर पर न जाने कौन सा जादू कर दिया था वह रतन के अथक प्रयासों के बाद भी स्खलित न होती। सुगना के मन में उसके बापू जी के साथ विदाई गई रातें बार बार घूमती। रतन ने सुगना से अपने कामुक अरमान हर हद तक पूरा किये। वह कभी वह सुगना को बिस्तर पर लिटा कर चोदता कभी पेट के बल लिटा कर । कभी डॉगी स्टाइल में कभी गोद में परंतु हर चुदाई का एक ही अंत होता रतन का लंड अपनी सारी ऊर्जा सुगना की बुर में भर देता पर सुगना को स्खलित न कर पाता।

ख्यालों में खोई हुई सुगना की आंख लग गई और उसके दिमाग में द्वंद चालू हो गया अंदर से आवाज आई

" सुगना रतन तेरे लायक नहीं है तू सरयू सिह के लिए ही बनी है वह तुझे दिलो जान से प्यार करते हैं.."

" पर मैंने तो उनके कहने से ही रतन को अपनाया है मैंने उनकी ही बात मानी है"

"वह तो उन्होंने तेरे भले के लिए यह बात कही पर उनका अंतर्मन तुझे अब भी प्यार करता होगा पर तू उन्हें भूल गई"

" मैं उन्हें नहीं भूली उन्होंने ही मुझे खुद से दूर किया और अंतरंग होने के लिए मना किया"

" एक बात भली-भांति जान ले तुझे काम सुख तेरे किसी अपने से ही मिलेगा"

"क्या...क्या…"

सुगना प्रश्न पूछती रही परंतु कोई उत्तर ना मिला सुगना चौक कर बिस्तर से उठ गई..

किसी अपने से? यह वाक्यांश उसके दिलो-दिमाग पर छप से गए..

छी… ये कैसे हो सकता है। अचानक सोनी भागती हुई कमरे में आए और बोली दीदी

" तू सपना में बड़बड़ात रहलू हासब ठीक बानू?

"हा चल चाह पियबे"

अपना बिस्तर से उठी और सोनी के साथ रसोई घर में चली गई


नियति ने सुगना के भाग्य में क्या लिखा था। क्या जो सुगना अपने पुत्र सूरज के अभिशप्त होने और उसे उस अभिशाप से मुक्त करने के लिए अथक प्रयासों और मन्नतों के वावजूद पुत्री को जन्म न दे पाई थी वह क्या स्वयं अभिशप्त थी?

शेष अगले भाग में ...
 
आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद मैंने जो पाठक गण अभी भी चंद लाइनें लिखने में शर्म आ रहे हो वह भी हिम्मत जुटाकर अच्छा या बुरा कुछ भी लिखकर अपनी उपस्थिति का एहसास कराते रहें

एक बार पुनः धन्यवाद जुड़े रहें और आनंद लेते रहे
 
भाग -71

" मैं उन्हें नहीं भूली उन्होंने ही मुझे खुद से दूर किया और अंतरंग होने के लिए मना किया"



" एक बात भली-भांति जान ले तुझे काम सुख तेरे किसी अपने से ही मिलेगा"

"क्या...क्या…"

सुगना प्रश्न पूछती रही परंतु कोई उत्तर ना मिला सुगना चौक कर बिस्तर से उठ गई..

किसी अपने से? यह वाक्यांश उसके दिलो-दिमाग पर छप से गए..

छी… ये कैसे हो सकता है। अचानक सोनी भागती हुई कमरे में आए और बोली दीदी

" तू सपना में बड़बड़ात रहलू हासब ठीक बानू?

"हा चल चाह पियबे"

अपना बिस्तर से उठी और सोनी के साथ रसोई घर में चली गई



नियति ने सुगना के भाग्य में क्या लिखा था। क्या जो सुगना अपने पुत्र सूरज के अभिशप्त होने और उसे उस अभिशाप से मुक्त करने के लिए अथक प्रयासों और मन्नतों के वावजूद पुत्री को जन्म न दे पाई थी वह क्या स्वयं अभिशप्त थी?

अब आगे

सलेमपुर मैं हुई पूजा के पश्चात सुगना और रतन करीब आ गए थे। उनका शारीरिक मिलन अक्सर होने लगा यद्यपि सुगना स्खलित ना होती परंतु वह स्खलित होने का भरपूर प्रयास करती उसे अब भी उम्मीद थी कि वह अपने पति रतन के साथ सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत कर पाएगी।

बनारस में सुगना के घर में अक्सर रंगरलिया मनतीं। उसकी बहन सोनी उन कामुक चुदाई की गवाह बनती। रतन धीरे धीरे सुगना से और खुलता गया और बिना सोनी की उपस्थिति की परवाह किए सुगना को दिन में भी चोद देता सोनी का ध्यान बरबस ही रतन और सुगना की कामक्रीड़ा पर चला जाता और वह तरुणी मचल जाती।

नियति ने उस में कामुकता पहले से भरी थी जो अब धीरे-धीरे परवान चढ़ रही थी। सुगना और रतन के मिलन और उनके बीच चल रही खुल्लम-खुल्ला चुदाई ने उसकी वासना को भडाका दिया और एक दिन ….

सोनी अपने नर्सिंग कॉलेज से बाहर निकल रही थी साथ में चल रही उसकी सहेली ने कहा

" सोनी देख गेट पर कौन खड़ा है हम लोग की तरफ ही देख रहा है "

सोनी ने अपनी निगाहें उठाकर देखा और अपनी सहेली से बोली..

"अरे वह मेरा दूर का रिश्तेदार है मुझे लेने आया है मैं चलती हूं"

सोनी की सहेली को यकीन ना हुआ आज से पहले उसने विकास को नहीं देखा था जब तक सहेली सोनी और विकास के संबंधों का आकलन कर पाती सोनी विकास की राजदूत पर बैठ चुकी थी.

सोनी समझदार थी वह राजदूत पर अपने दोनों पैर एक तरफ करके बैठी थी। सोनी की सहेली के मन में आ रहे प्रश्न शांत हो गए और मोटरसाइकिल गुररर गुर्रर्रर करती धुआं छोड़ते हुए आगे बढ़े गई.

मोटरसाइकिल पर बैठने की वजह से उसे हल्की ठंड लग रही थी और इस ठंड ने सोनी के मूत्राशय में मूत्र विसर्जन के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। वैसे भी सोनी आज शरारत के मूड में थी। उसने विकास के कान में कहा

"मुझे सुसु करनी है "

"अरे यहां कहां करोगी? सड़क पर वाहन आ जा रहे हैं"

"अरे किसी पगडंडी पर ले लो थोड़ी दूर जाकर खेत में कर लेंगे" सोनी वैसे भी खेतों में मूत्र विसर्जन करने की आदी थी उसे खुली हवा में मूत्र विसर्जन करना बेहद पसंद था।

"ओह तो तुम्हारी मुनिया को हवा खाने का मन है"

सोनी ने उसकी पीठ पर एक मुक्का मारा और मुस्कुराते हुए बोली

" जब तुम्हें सुसु आती है तब तो कहीं खड़े होकर कर लेते हो और मुझे ताने मार रहे हो"

विकास ने उत्तर न दिया अपितु अपनी मोटरसाइकिल एक पगडंडी पर मोड़ ली। कुछ ही दूर पर सरसों के पीले खेत लहलहा रहे थे। हरी चादर पर टंके पीले फूल बेहद आकर्षक प्रतीत हो रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे धरती ने कोई बेहद सुंदर दुपट्टा ओढ़ रखा हो।

सोनी सरसो के खेत की तरफ बढ़ गई।। विकास सोनी के मादक शरीर को लहराते और सरसों के खेत की तरफ जाते देख रहा था। सोनी ने खेत के करीब जाकर पीछे पलट कर देखा विकास एक टक उसे देखे जा रहा था। सोनी ने अपने हाथों से इशारा कर उसे पीछे पलटने को कहा और विकास में अपनी दोनों आंखों पर अपनी हथेलियां रखकर खुद को पीछे घुमा लिया।

सोनी मुस्कुराते हुए अपने सलवार का नाडा खोल रही थी। मन ही मन वह चाह रही थी कि विकास पलट कर उसे देखें और वह एक बार फिर पलटी उसकी निगाहें विकास से टकरा गई जो एक बार फिर सोने की तरफ देख रहा था सोनी मुस्कुराते हुए मुड़ गयी और मन ही मन साहस जुटाकर अपने दोनों मदमस्त नितंबों को खुली हवा में लहराते हुए नीचे बैठ गई .

जाने सोनी की मनोदशा में क्या था? वह अपनी पीठ विकास की तरफ की हुई थी। जबकि उसे विकास की तरफ अपना चेहरा रखना चाहिए था ताकि वह विकास पर नजर रख सकें। परंतु शायद लड़कियों को योनि को छुपाना ज्यादा तर्कसंगत सकता है बनिस्बत अपने नितंबों के….

विकास भी शरारती था वह पलट चुका था और सोनी के नंगे नितंबों को नीचे आते देख रहा था। एक पल के लिए उसकी आंखों ने सोनी के गोरे नितंबों के बीच काला झुरमुट देख लिया सोनी की कुंवारी बुर की पतली लकीर उस कालिमां में खो गई थी।

जब तक की सोनी अपने नितंब नीचे कर पाती मूत्र की धार निकल पड़ी। मंद मंद बहती बयार ने उस मधुर संगीतमय ध्वनि ..शी….सू….सुर्र्रर्रर को विकास के कानों तक पहुंचाया जो पूरे ध्यान से सोनी को देख रहा था।

सोनी ने अपनी कमीज के पिछले भाग को जमीन से छूने से बचाने के लिए उसे अपने पेट की तरफ मोड़ लिया था और अनजाने में ही अपने नितंबों को विकास की नजरों के सामने परोस दिया था।

विकास ललच रहा था वह उन नितंबों को अपने हथेलियों से छूने के लिए लालायित था।

सोनी मूत्र विसर्जन कर चुकी थी। नीचे बड़ी हुई घास उसकी बुर के होठों से छू रही थी और उसके शरीर में एक अजब सी सनसनी पैदा कर रही थी। सोनी कभी अपने नितंबों को उठाती और अपनी बुर को उन घासों से ऊंचा कर लेती परंतु कुछ सी देर में वह वापस अपनी बुर को घांसों से छुआते हुए उस अद्भुत उत्तेजना का आनंद लेती। बड़ी हुई घांस कभी उसकी बुर को कभी उसकी कसी हुई गांड को छूती।

यह संवेदना एक अलग किस्म की थी सोनी उसके आनंद में खो गई।विकास भी अपनी पलकों को बिना झुकाए यह मधुर दृश्य देख रहा था हल्की हल्की बह रही हवा सोनी के बुर में ठंडक का एहसास करा रही थी जो मूत्र विसर्जन में भीग चुके थे।

कभी-कभी कुछ घटनाएं अप्रत्याशित होती हैं। आकाश में छाए तितर बितर हल्के बादल अचानक कब सघन हो गए विकास और सोनी को यह एहसास तब हुआ जब आसमान पर चमकदार धारियां खींच गई जिन की रोशनी धरती पर भी दिखाई पड़ी। दिन के उजाले में भी यह चमक स्पष्ट थी। कुछ ही देर बाद बादलों के कड़कने की आवाज ने सोनी को डरा दिया वह झटपट उठ खड़ी हुई और विकास की तरफ पलटी। सोनी यह भूल गई कि उसकी सलवार अभी भी नीचे थी। जब तक वह संभल पाती जांघों के बीच का वह मनमोहक त्रिकोण विकास की निगाहों में आ गया।

सोनी ने विकास की नजरों को ध्यान से देखा जो उसकी जांघों के बीच थी।

सोनी ने झटपट अपनी सलवार ऊपर की और भागते हुए विकास के पास आ गयी।

"जल्दी भागो यहां से लगता है बारिश होगी"

"हां हां बैठो"

जब तक सोनी मोटरसाइकिल के पीछे बैठती बारिश प्रारंभ हो गयी। छोटी-छोटी बूंदे कब बड़ी हो गई पता भी न चला इतनी जबरदस्त बारिश की कुछ ही मिनटों में दोनों युवा प्रेमी पूरी तरह भीग कर लथपथ हो गए।

विकास और सोनी बारिश से बचने के लिए कोई आसरा ढूंढने लगे। कुछ ही दूर पर उन्हें एक ट्यूबवेल का कमरा दिखाई पड़ा जिसके आगे छप्पर लगा हुआ था विकास ने अपनी मोटरसाइकिल रोड के किनारे खड़ी की और दोनों भागते हुए उस छप्पर के नीचे आ गए।

"बाप रे कितनी जबरदस्त बारिश है तुम तो पूरी भीग गई" विकास ने सोनी के युवा बदन पर नजरें फिराते हुए कहा ।

बारिश की वजह से कपड़ा भी सोनी के बदन से चिपक गया था और सोनी के शरीर के उभार और कटाव स्पष्ट दिखाई पढ़ने लगे थे। सोनी ने जब यह महसूस किया उसने अपने कपड़ों को अपने शरीर से अलग करने की कोशिश की। परंतु गीले होने की वजह से कपड़े पुनः सोनी के शरीर से चिपक गए। सोनी ने अपने हाथों से अपनी समीज का निचला भाग निचोडने की कोशिश की और बरबस ही अपनी सलवार के पीछे का भाग विकास को दिखा दिया विकास सोनी के पास गया और बोला..

"यहां दूर-दूर तक कोई नहीं है और इस मूसलाधार बारिश में किसी के आने की संभावना भी नहीं है तुम अपने कपड़े खोल कर सुखा लो" यह देखो रस्सी ही बंधी है

नियति ने सोनी का ध्यान छप्पर के नीचे बंधी हुई रस्सी पर केंद्रित किया। ऐसे तो सोनी अपने कपड़े उतारने के लिए कभी तैयार ना होती परंतु छप्पर के नीचे दबी रस्सी को देखकर उसे यह भाग्य का खेल नजर आया और वह अपने कपड़े सुखाने की सोचने लगी। परंतु क्या वह विकास के सामने नग्न होगी"

यह संभव न था उसमें विकास से कहा कि

"मैं अपने कपड़े कैसे उतारूं? यहां पर तो तुम भी हो"

" मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं"

" तो क्या 1 घंटे तक अपनी आंखें बंद किए रहोगे? " सोनी ने हंसते हुए पूछा.

अचानक विकास में अपने गले में बाधा गमछा निकाला और उसे रस्सी पर टांगता हुआ बोलो

"लो तुम उस तरफ खड़ी हो जाना और मैं इस तरह अब तो ठीक है"

सफेद गमछा जो पानी में भीग चुका था परंतु फिर भी आग और फूंस के बीच एक आवरण देने के प्रयोग में लाया जा रहा था। नियति मुस्कुरा रही थी और सोनी अपने कपड़े उतार रही थी।

कुछ ही देर में काली पेंटी में सोनी की कुंदन काया चमकने लगी। परंतु उसके दर्शन झोपड़ी की छत से चिपकी हुई छिपकली ने किए कि जो स्वयं इस अप्रत्याशित मौसम के बदलाव से दुखी थी। यह कहना मुश्किल है की कौन ज्यादा डरा हुआ कौन था सोनी या वह छिपकली परंतु किसी अप्रत्याशित घटना का डर दोनों के चेहरे ही देखा जा सकता था।

स्वयं को विकास के गमछे के पीछे छुपाए हुए सोनी ने अपने कपड़े रस्सी पर टांग दिए । उसने कपड़ों को भली भांति में डाल दिया ताकि हवा के झोंके से वह जल्दी ही सूख जाएं।

परंतु हवा का झोंका जहां कपड़ों को सुखा रहा था वही सोनी के शरीर में सिहरन पैदा कर रहा था। उसने अपने दोनों हाथ से अपनी चुचियों से सटा लिए थे और स्वयं को कुछ गर्मी देने का प्रयास कर रही थी।

पानी में भीगी कटीली सोनी की सुंदर और कमनीय काया को विकास की नजरों से एक झीने पर्दे की दूरी पर थी । सोनी के शरीर का कटाव और उभार के एहसास ही उसके लंड को खड़ा करने के लिए काफी था।

पर्दे के पीछे उसकी प्रेमिका लगभग नग्न अवस्था में अपनी चूचियां समेटे खड़ी हुई थी। एक पल के लिए विकास के मन में आया कि वह यह गमछा हटा दे परंतु वह सोनी को दिया वादा न तोड़ना चाहता था। परंतु आज नियति उन दोनों को मिला देना चाहती थी। हवा का एक और झोंका आया और गमछा लहरा गया। दो प्रेमी एक अर्धनग्न और एक लगभग पूर्ण लगन एक दूसरे के सामने खड़े थे। रही सही कसर बिजली के कड़कने ने पूरी कर दी और सोनी विकास के आलिंगन में आ गयी।

जब तक बिजली कड़कती रही विकास की हथेलियां सोनी की पीठ पर अपना कसाव बढ़ाती रहीं। और जब तक बादलों की गड़गड़ाहट कम होती सोनी के अंतर्मन में उत्तेजना और डर दोनों में द्वंद हुआ और विजय उत्तेजना की हुयी।

विकास ने होठों ने सोनी के कंपकपाते होठों को छू लिया। होठों पर चुंबन की प्रगाढ़ता बढ़ती गई सोनी की मुह में गुलाबी गहराइयों के बीच विकास की जीभ जगह बनाने लगी।

चुंबन भी एक अजीब कला है जब प्रेमी और प्रेमिका पूरे मन से चुंबन करते हैं तो चुंबन की गहराई बढ़ती जाती यही हाल सोनी और विकास का था उन दोनों में प्यार की कमी न थी। इस प्यार में भी वासना ने अपनी जगह तलाश ली थी । यह स्वाभाविक भी था। विकास के हाथ लगातार सोनी की निचली गोलाइयों को सहला रहे थे और उंगलियां सोनी की बुर की तलाश में लगातार अंदर की तरफ बढ़ रही थीं।

विकास को अपने गीले पैंट के अंदर तने हुए लंड का एहसास हुआ और उसमें अपने हाथ से उसे आजाद कर दियाम सोनी के हाथों को अपने लंड पर ला कर उसने अपनी उंगलियां सोनी की पैंटी में फंसा धीरे धीरे सोनी की पैन्टी को नीचे करता गया।

चुम्बन में खोई हुई सोनी अपने नग्न होने का एहसास तो कर रही थी पर न तो वह प्रतिकार कर पा रही थी और न हीं विकास के हाथों को रोकने की कोशिश।

विकास धीरे-धीरे सोनी को ऊपर की तरफ खींच रहा था और अपनी कमर को नीचे की तरफ। उसका तना हुआ लंड सोनी के हाथों में था परंतु उसका सुपाड़ा सोनी की नाभि के नीचे उसके पेडु पर दस्तक दे रहा था। अचानक उसने सोनी को ऊपर खींचा और लण्ड ने सोनी के भग्नासे को छू लिया।

पनियायी बुर ने लण्ड के सुपारे को खींचने की कोशिश की पर सोनी के कौमार्य और बिना चुदी बुर के कसाव ने अपना प्रतिरोध कायम रखा। बुर को अपने लंड से छूते ही एक पल के लिए विकास को लगा जैसे उसने जन्नत छू ली। यदि थोड़ा समय वह उसी अवस्था में रहता तो झटका देकर उसका लंड पहली बार बुर में प्रवेश कर गया होता परंतु ऐसा ना हुआ।।

कुवारी सोनी ने अपनी उत्तेजना पर काबू पाया और विकास को दूर ढकेलते हुए बोली।

"यह सब शादी के बाद" एक पल के लिए सोनी अपने सामान्य रूप में आ गई उसकी उत्तेजना पानी के बुलबुले की तरह फूट कर विलुप्त हो गयी।

उसने अपने हाथों से अपनी चड्डी ऊपर की और स्वयं को विकास से दूर कर वापस गमछे को दोनों के बीच कर लिया। विकास के उतरे हुए चेहरे को देख उसने विकास को आश्वस्त करते हुए कहा

"बस कुछ दिन की बात है हम लोग शादी कर लेंगे और फिर यह खजाना तुम्हारा….. जी भर कर कर लेना"

विकास का मूड खराब हो चुका परंतु वह सामान्य होने की कोशिश कर रहा था उसने सोनी को छेड़ते हुए कहा

"क्या कर लेना?"

"वही जो हमेशा चाहते हो"

" क्या साफ-साफ बताओ ना?"

सोनी अपने होंठ उसके कान के पास ले गई। उस ने मुस्कुराते हुए कहा

"चो……...द लेना" वह कह कर शर्मा के पीछे मुड़ गयी। विकास ने एक पल की भी देर ना की। उसने अपने हाथ आगे किये और अपने हांथ आगे कर सोनी की चुचियों को पकड़ लिया और अपने तने हुए लंड को उसके नितंबों से सटा दिया और मुस्कुराते हुए बोला

"मेरी जान अभी कर लूं शादी ?"

"हट पागल "

कुछ देर दोनों प्रेमी प्रकृति की बारिश और कामुक्त बदनों से स्पर्श सुख की उत्तेजना का आनंद लेते रहे परंतु न उनकी हसरत पूरी हुई और न पाठकों की।

नियति के लिए अभी भी सुगना ही महत्वपूर्ण थी जो रतन की कामुकता का शिकार होकर डॉगी स्टाइल में गचागच चुद रही थी। तीनों बच्चे सूरज मधु और मालती बाहर हाल में खेल रहे थे वह बार-बार आकर दरवाजे पर दस्तक देते और सुगना धीमे से पुकारती

"रुक जा बाबू आवतानी" उसकी आवाज में एक अलग किस्म की लहर थी जो निश्चित ही रतन की बेतरतीब चुदाई कारण उत्पन्न हो रही थी। रतन पूरी ताकत से चोदते हुए स्खलित हो रहा था और सुगना हमेशा की भांति एक बार फिर तड़प रही थी और लाख कोशिशों के बावजूद एक बार फिर फेल हो गयी थी। उसकी फूल जैसी बुर बार बार मर्दन की शिकार होती पर उससे अमृत रूपी स्खलन का रस न मिल पाता।

दिन बीतते गए और सुगना काम सुख से दूर होती गयी। जिस कोमलांगी ने सरयू सिंह के साथ कामकला के सारे सुख भोगे थे वह धीरे-धीरे अपनी कामुकता में ठहराव आते हुए महसूस करने लगी।

अब उसका न तो चुदवाने का मन होता और नहीं कामुक अठखेलियाँ करने का। विरक्ति बढ़ रही थी और वह रतन के करीब रहते हुए भी दूर दूर रहने लगी। रतन ने यह बात महसूस की परंतु वह क्या करता है वह नियति के खिलाफ न जा सकता था उसके लाख प्रयास भी सुनना को चरम सुख से दूर रखते।

सुगना ने अंततः एक दिन और चुदने से मना कर दिया। रतनपुरी तरह हताश और निराश हो गया वह इस बात से बेहद क्षुब्ध था कि वह सुगना को चरम सुख ना दे पाया था यद्यपि उसमें रतन की कोई गलती न थी वह तो निष्ठुर नियति के हाथों का एक छोटा सा खिलौना था।

उसका दिलो-दिमाग उसे लगातार कोसता ना उसका काम धाम में मन लगता और नहीं बच्चों में। परिस्थितियों से क्षुब्ध हुआ मनुष्य किसी भी दिशा में जा सकता दिमाग के सोचने समझने की शक्ति निराशा में और कम हो जाती है। एक दिन आखिरकार वही हुआ जिसका डर था….

शेष अगले भाग में...
 
सर्वप्रथम तो आपको धन्यवाद कि कई दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया दिखाई पड़ी दूसरी बात सोनी का इस कहानी में प्रयोजन एक विशेष उद्देश्य के लिए किया गया है जिसका उचित समय पर जिक्र जरूर किया जाएगा बाकी कहानी में कुछ तो सामान्य रहने दीजिए अन्यथा इंसेस्ट कहानियां तो वैसे भी भरी पड़ी है यह कहानी इस केटेगरी में जरूर है पर निश्चित ही कुछ अलग रहे ऐसा मेरा प्रयास है जुड़े रहें

आपका स्वागत है धन्यवाद

धन्यवाद

बहुत-बहुत धन्यवाद शायद आपको भी मैं इस कहानी के पटल पर पहली बार देख रहा हूं जुड़े रहे और यूं ही प्रोत्साहित करते रहे

धन्यवाद जी

धन्यवाद
 
कभी-कभी मुझे लगता है यह कहानी शोले पिक्चर की तरह हो गई है जिसमें कभी कभार दर्शक आते हैं कुछ तो गूंगे बहरे की तरह बिना कोई प्रतिक्रिया दिए बाहर चले जाते है मैं भी इसीलिए कभी-कभी कुछ अनुच्छेद लिख लेता हूं और जब उनका संकलन पूर्ण होता है उसे पोस्ट कर देता हू।

इंतजार के लिए धन्यवाद
 
अरे आप तो शायद पहली बार इस कहानी के पटल पर दिखाई पड़ रहे हैं धन्यवाद आपने अपने विचार रखें वह भी पूरे 71 एपिसोड के बाद मेरी इस फोरम से यही शिकायत है मैं कहानी एक तरफा नहीं लिखना चाहता यदि पाठक सुस्त पढ़ते हैं कहानी भी सुस्त हो जाती है ...

मैं हमेशा से पाठकों के सक्रिय जुड़ाव की अपेक्षा रखता हूं मेरे लिए वह पाठक कोई विशेष मायने नहीं रखते जो गुपचुप तरीके से कहानी पढ़ते हैं और शुक्रिया अदा करने तथा अपनी सलाह रखने में भी कोताही करते हैं।

आपको धन्यवाद जुड़े रहे और बीच-बीच में आकर अपनी सलाह तथा प्रोत्साहन देते रहे।
 
मित्र। शायद ऐसा नहीं है। इस कहानी के कुछ चुनिंदा पाठक हैं मेरा अनुमान है 1500 से 2000 के बीच जिनमें 25- 30 पाठक सक्रिय है बाकी सब उदासीन।

कहानी लिखने का काम एक खाली समय काटने का उपाय है । पाठकों के उत्साह से लेखक समय निकाल कर भी कहानी आगे बढ़ाता है।

मैं भी इस कहानी को आगे बढ़ाता रहूंगा पर रफ्तार पाठकों के उत्साह पर ही निर्भर करेगी धन्यवाद जुड़े रहे
 
मुझ से जुड़ाव रखने वाले कुछ ही पाठक है बाकी

मित्र मैंने सिर्फ अपना पक्ष रखा था मैं आपके कमेंट से कतई आहत न था और नहीं कभी हो सकता हूं क्षमा मांग कर मुझे शर्मिंदा ना करें इस फोरम पर कुछ लोगों का साथ अच्छा लगता है और इसीलिए मैं बार-बार इंसिस्ट करता हूं कि लोग खुलकर सामने आए और अपनी बातें रखें बाकी सब अपनी अपनी दुनिया में मस्त रहें जुड़े रहे
 
जुड़ने के लिए धन्यवाद....
 
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