Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 137 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 151

वह मन ही मन ईश्वर को इतनी सुंदर काया देने के लिए धन्यवाद कर रही थी । आखिरकार उसने अपनी आंखों पर सफेद रुमाल को लपेटकर जैसे ही मोनी ने गांठ बंधी उसकी आंखों के सामने के दृश्य ओझल होते गए। उसे इतना तो एहसास हो रहा था कि कमरे में अब भी रोशनी थी परंतु आंखों से कुछ दिखाई पड़ना संभव नहीं था।

वह चुपचाप बिस्तर पर बैठ गई अपनी जांघें एक दूसरे से सटाए वह अपने परीक्षक का इंतजार कर रही थी।

अबआगे

उधर बनारस में

सरयू सिंह अब सुगना के घर में पूरी तरह सेट हो चुके थे कजरी पदमा और सुगना तीनों मिलजुल कर रहते। यह एक संयोग ही था की सरयू सिंह तीनों ही स्त्रियों से संभोग सुख प्राप्त कर चुके थे।

जहां पद्मा ने सरयू सिंह की युवा अवस्था में उनसे संभोग किया था वही कजरी उनकी भाभी होने के बावजूद पूरे समय तक उन्हें पत्नी का सुख देती रही थी और सुगना….आह … वो तो सरयू सिंह के जीवन में एक सुगन्ध की तरहआई और सरयू सिंह के जीवन को जीवंत कर दिया।

सुगना के साथ बिताया वक्त और कामुक पल ने सरयू सिंह की वासना को एक नए आयाम तक पहुंचाया और उन्होंने सुगना को जैसे अपनी वासना विरासत में दे दी थी। नियति एक पिता से उसकी वासना अपनी पुत्री में स्थानांतरित होते हुए देख रही थी।

परंतु यह सरयू सिंह का दुर्भाग्य ही था कि उन्हें सुगना और अपने बीच के रिश्ते का सच मालूम चल गया अन्यथा वह आज भी जी भर कर सुगना को भोग रहे होते और शायद सुगना भी इसे सहर्ष स्वीकार कर रही होती। सुगना और सोनू के करीब आने में सरयू सिंह की अहम भूमिका थी न तो वह सुगना के आगोश से बाहर जाते और न हीं उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए सोनू सुगना के और करीब आजाता।

बनारस आने के बाद सरयू सिंह की उत्तेजना शिथिल पड़ रही थी। एकांत का समय कम ही मिल पाता। दिन भर बच्चे उन्हें घेरे रहते और सूरज तो उन्हें बेहद प्यार था वह उसे पढ़ते लिखाते और तरह-तरह के ज्ञान देते। एक गुसलखाना ही ऐसी जगह थी जहां वह अपनी काम पिपासा को गाहे बगाहे शांत करते और इसमें इनका साथ देती सोनी…

यद्यपि सरयू सिंह को यह बखूबी अहसास था कि सोनी से संभोग वह सिर्फ अपनी कल्पनाओं में ही कर सकते थे ऐसा कोई भी कारण या निमित्त न था जिससे उन्हें सोनी को भोगने का अवसर प्राप्त होता। उन्हें कभी-कभी अपनी किस्मत पर भरोसा होता कि जैसे ईश्वर ने सुगना को उनके करीब ला दिया था कभी ना कभी हो सकता है सोनी स्वयं ही उनके करीब आ जाए.. पर विचार मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से कम न थे।

सपने उम्मीद की पराकाष्ठा होते हैं जिस उम्मीद की रूपरेखा ना हो वह सपनों में तब्दील हो जाती है।

बहरहाल सरयू सिंह की कामवासना को जिंदा रखने में अब सिर्फ सोनी का ही योगदान था उनकी तीनों परियां अब उनकी वासना का साथ छोड़ चुकी थी परंतु उनका ख्याल रखने में कोई कमी नहीं थी। वह घर के हीरो थे और एक धरोहर की भांति उनकी सेवा होती थी। वो सभी का स्नेह पाते पर उनका लंड स्त्री स्पर्श और कसी हुई बुर के लिए तरसता रहता।

शाम सोनू और लाली जौनपुर से बनारस आने वाले थे..

शाम की चाय का वक्त था सुगना चाय बनाकर लाई और पूरा परिवार चाय पीने लगा तभी सरयू सिंह ने कहा.

“सोचा तनी कल सलेमपुर चल जाई”

कजरी ने उत्सुकता बस पूछा

“काहे का बात ?”

“अरे खेत के मालगुजारी खाती कुछ कागज देबे के बा”

“ आप कहा बस से जाईब सोनू आज आवता सुगना के लेकर चल जाए हमरो कुछ सामान लेके आवेके बा” कजरी ने सरयू सिंह से कहा अब कजरी की वाणी में एक अधिकार महसूस होता जो उम्र के साथ पत्नी की आवाज में महसूस होता है।

सुगना के मन में लड्डू फूटने लगे सोनू का साथ उसके लिए बेहद रोमांचक और कामुक होता था और अब सुगना सोनू के साथ एकांत का इंतजार करती थी। उसने झटपट कजरी की हां में हां मिलाई और बोली

“बाबूजी हम कल सोनू के साथ चल जाएब आप सूरज के ध्यान राख लेब”

तभी पदमा भी बोल उठी

“ओहिजा से तनी सीतापुर भी चल जईहे हमार बक्सा से साल ले ले आईहै”

सुगना को एक पल के लिए लगा जैसे सारा समय आने जाने में ही बीत जाएगा वह थोड़ा सकुचाई परंतु अपनी मां की बात काटने का साहस न जुटा पाई..

सुगना को क्या पता था कि उसकी मां ने उसे जो काम बताया था वह सुगना की मां की लालसा पूरी करने वाला था।

“ठीक बा कॉल तनी जल्दी निकल जाएब..” सुगना मन ही मन बेहद प्रसन्न थी।

पदमा और कजरी शाम के खाने की बातें करने लगी और कुछ ही देर बाद में उनकी तैयारी में लग गई। सुगना ने हमेशा की भांति सोनू के आगमन की खुशी में स्नान किया अपनी मुनिया को धो पोंछ कर चमका दिया खुद को सजाया संवारा। उसे पता था सोनू कुछ पलों के साथ में भी कामुक हो सकता था इसलिए वह हमेशा खुद को सोनू के लिए तैयार रखती थी।

जितना प्यार सोनू अपने दहेज से करता था सुगना को इसका बखूबी अहसास था। सोनू के होंठ सुगना के निचले होठों से मिलन के लिए हमेशा आतुर रहते थे और सुगना अपने सोनू को कतई निराश नहीं करना चाहती थी।

वह अब जानबूझकर सोनू की उपस्थिति में अपनी पैंटी का परित्याग कर देती थी। सोनू और सुगना का साहस बढ़ता जा रहा था उन्हें यह आभास नहीं था कि उनके बीच के कामुक संबंध कभी पकड़े भी जा सकते हैं। सुगना सज धज कर एक ताजा खिले फूल की तरह इधर-उधर मर्डर रही थी उसने संध्या आरती की और घर में चारों तरफ आरती की थाल घूमाने लगी..

सुगना सोनू और लाली का इंतजार कर रहे थी वह बार-बार दरवाजे की तरफ जाती और सोनू की गाड़ी की आहट सुनने के लिए उसके कान तरस रहे थे…

नियती ने सुगना को निराश ना किया कुछ ही देर में गाड़ी की आवाज सुनाई पड़ी और सुगना हाथों में आरती का थाल लिए भागती हुई दरवाजा खोलने गई।

सुगना ने एक हांथ से दरवाजा खुला और सामने मनोहर को देखकर थोड़ा उदास हो गई उसे सोनू का इंतजार था मनोहर का आना अप्रत्याशित था.. वह एक कदम पीछे हटी और तुरंत ही अपने हाथों में पकड़ी आरती की थाल मनोहर के आगे कर दी।

बेहद सलीके से पारंपरिक साड़ी में तैयार हुई, और हाथों में आरती का थाल लिए सुगना.. एक आदर्श स्त्री की भांति मनोहर के सामने खड़ी थी। खूबसूरत बदन, कामुक काया, चमकती त्वचा और बेहद सुंदर मासूम चेहरे के साथ सुगना एक आदर्श युवती की भांति दिखाई पड़ रही थी। मनोहर सुगना को एक टक देखा ही रह गया..

उसके हाथ आरती लेने के लिए आगे बढ़े पर नज़रें सुगना के चेहरे से नहीं हट रही थी। सुगना ने अपनी पलके झुका ली और आरती की थाल के ऊपर घूमते मनोहर के मजबूत हाथों को देखने लगी।

स्थिति आशाए होते हुए देखकर सुगना सतर्क हुई और बेहद संजीदगी से बोली…

“अंदर आइए ……मां मनोहर जी आए हैं” आखरी वाक्यांश कहते हुए सुगना की आज आवाज स्वाभाविक रूप से थोड़ा ऊंची हो गई थी।

मनोहर अंदर आ गया उसने पूछा

“अरे लाली और सोनू अभी तक पहुंचे नहीं क्या ?”

सुगना ने मनोहर को बैठने का इशारा किया और बोली “आते ही होंगे हम लोग भी इंतजार ही कर रहे हैं”

मनोहर स्वयं अपनी आतुरता पर अब खुद को कोस रहा था आखिर इतनी भी क्या जल्दी थी सुगना के घर आ धमकने की परंतु मन ही मन वह सुगना को देखना चाहता था उससे बात करना चाहता था शायद इसीलिए वह अपनी अधीरता पर काबू न कर सका और झटपट सुगना के घर आ धमका था।

सुगना ने रसोई में जाकर अपनी मां पदमा और कजरी को मनोहर के आने की सूचना दी और गिलास में पानी लेकर मनोहर के पास आ गई। जैसे ही सुगना पानी देने के लिए आगे झुकी मनोहर की आंखों ने वह दृश्य देख लिया जिसके बारे में न जाने उसने कितनी बार कल्पना की थी सुगना के दुग्ध कलश जो ब्लाउज के भीतर कैद होने के बावजूद अपने आकार और कोमलता का प्रदर्शन कर रहे थे वह मनोहर की आंखों के सामने नृत्य करने लगे।

मनोहर की आंखें बरबस सुगना की चूचियों पर टिक गई आज पहली बार सुगना में मनोहर की कामुक निगाहों को अपने बदन पर महसूस किया और तुरंत ही अपनी साड़ी का आंचल ठीक किया और दुग्ध कलश पर एक झीना ही सही परंतु मजबूत आवरण डाल लिया

सुगना अपनी आंखें मनोहर से नहीं मिला सकी। मनोहर अब तक उसकी निगाहों में छिछोरा नहीं था वह एक काबिल , संजीदा और सम्मानित व्यक्ति था परंतु आज सुगना ने मनोहर में एक कामुक पुरुष को देखा था। वह तुरंत ही सचेत हो गई। जैसे ही मनोहर ने पानी का गिलास पकड़ा वह खड़ी हो गई और वापस रसोई घर की तरफ चली गई।

कुछ ही देर में उसकी मां पदमा मनोहर के पास आ चुकी थी। सुगना ने बखूबी अपनी मां पदमा को मनोहर से बातें करने के लिए लगा दिया था और किचन में अपनी सास कजरी के साथ रसोई के कार्य में लग गई।

थोड़ी ही देर बाद सोनू और लाली भी पहुंच गए और एक बार फिर सुगना का घर गुलजार हो गया। जब जब सोनू सुगना के आसपास रहता सुगना के पूरे बदन में आनंद की तरंगे दौड़ रही होती। वह सचेत रहती उसे यह बखूबी अहसास रहता है कि सोनू कभी भी उसे अपने आलिंगन में ले सकता है …उसकी चूचियां मीस सकता है उसके होंठ चूम सकता है और अपना बना हुआ लंड उसके नितंबों से सटा सकता है ।

सोनू क्या करेगा यह अप्रत्याशित रहता परंतु कुछ ना कुछ करेगा जरूर सुगना यह बात भली भांति जानती थी।

उधर बच्चों की मौज हो गई थी। सब एक दूसरे से मिलकर शोर शराब करने लगे। सरयू सिंह भी अपना हाट बाजार घूम कर वापस आ चुके थे।

शहर में भी गांव सा माहौल हो गया था घर की भीड़भाड़ बरबस ही गांव की याद दिला देती है।

बातचीत का क्रम आगे बढ़ा और तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ सरयू सिंह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए और मनोहर से बोल बैठे.

“बेटा मनोहर आगे कब तक अकेले रहने का इरादा है…जो हुआ उसे भूल जाना ही उचित होगा यह जीवन है इसे तो जीना ही है एक साथी रहेगा तो यह जीवन आसानी से सुखद रूप से बीतेगा..”

सोनू भी यह वार्तालाप सुन रहा था वह सरयू सिंह का इशारा बखूबी समझ चुका था उसने भी सरयू सिंह की हां में हां मिलाई और बोला ।

“हां यह बात सच है आपको दूसरा विवाह कर लेना चाहिए…आखिर एक से दो भले”

मनोहर मन ही मन प्रसन्न हो रहा था यद्यपि सरयू सिंह और सोनू की बातों में कहीं भी सुगना का जिक्र न था परंतु मनोहर के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ सुगना घूम रही थी वह हर बात को सुगना से ही जोड़कर देख रहा था उसका अंतर्मन इस कल्पना मात्र से खुश हो रहा था।

“हां चाचा जी कभी-कभी सोचता हूं देखता हूं कब कोई उचित जीवनसाथी मिलता है”

अचानक सुगना गरम पकोड़े लेकर उनके बीच हाजिर थी।

क्या अनूठा संयोग था सुगना एक-एक करके पकौड़े अपने पूर्व प्रेमी सरयू सिंह वर्तमान प्रेमी सोनू और अपने मन में सुगना का भविष्य बनने की लालसा लिए मनोहर.. की प्लेट में डाल रही थी।

मुस्कुराती हुई अपनी अल्हड़ जवानी को समेटने की नाकाम कोशिश करती हुई सुगना मनोहर और सोनू दोनों के लंड में जान डालने में कामयाब रही थी सरयू सिंह का तो जैसे स्विच ही ऑफ हो गया था।

सुगना की उपस्थिति में आगे बात करना कठिन था। सरयू सिंह ने बात बदल दी और नरसिम्हा राव के बारे में वार्तालाप करने लगे। बात आई गई हो गई।

सरयू सिंह और मनोहर थोड़ा टहलने के उद्देश्य से गली में चल कमी कर रहे थे

सुगना और लाली दोनों लाली के कमरे में हंसी ठिठोली कर रही थी। सोनू बच्चो के साथ खेल रहा था। तभी सोनू ने लाली को अपने कमरे से निकाल कर बाथरूम की तरफ जाते देखा।

इधर लाली ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया और उधर सोनू पलक झपकते ही सुगना के पास था। लाली और सुगना दोनों अपनी साड़ी अपनी जांघों तक उठा रहे थे लाली का उद्देश्य सर्वविदित था और सुगना सोनू का इशारा समझ चुकी थी और कुछ ही पलों में सोनू के अधरों को उसके दहेज पर घूमते महसूस कर रही थी।

सोनू के पास ज्यादा वक्त ना था लाली के कदमों के आहट के साथ ही वह सतर्क हो गया.. सोनू को पता था उसके पास वक्त कम था पर वो उसका सदुपयोग करने में सफल रहा था।

जब तक लाली कमरे के दरवाजे तक पहुंचती सोनूअपने लंड में उत्तेजना लिए कमरे से बाहर निकल रहा था। होंठो पर सुगना की बुर से चुराया मदन रस चमक रहा था। सुगना और सोनू दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी और धड़कनें तेज थी और गर्दन के दाग पर भी इसका कुछ असर आ गया था. ऐसा प्रतीत होता था जैसे गर्दन का दाग काम आनंद के अनुरूप और समानुपातिक था।

लाली को एक बार फिर शंका हुई परंतु नतीजा सिफर था… सुगना ने लाली के चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश की और बोला

“का सोचे लगले ?”

लाली के पास कोई उतरना था उसके मन में जो वहम था उसे होठों पर लाना कठिन था पाप था।

लाली और सुगना इधर-उधर की बातें कर रहे थे तभी लाली ने अचानक ही एक नया सुर छेड़ दिया…

ए सुगना अब तेरा मन नहीं करता है क्या?

सोनू से विवाह के पश्चात लाली और सुगना कभी भी अंतरंग नहीं हुईं थीं। और शायद इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। फिर भी सुगना ने लाली का इशारा समझ लिया और मुस्कुराते हुए बोली..

काहे का?

लाली ने उसकी चूचियों को मीसते हुए बोला..

“मेरे साथ रजाई में…”

सुगना ने लाली को अपने आलिंगन में कसते हुए कहा

“जब सोनू छोड़ी तब नू….”

दोनों सहेलियां एक दूसरे के आलिंगन में आ गई और लाली ने सुगना के कान में कहा

“आज तू हमारा भीरी सुतिहा”

सुगना ने इशारों ही इशारों में अपनी मौन स्वीकृति दे दी..

तभी सुगना का पुत्र सूरज …कमरे में प्रवेश कर रहा था सुगना लाली से तुरंत ही दूर हो गई…और अपने पुत्र को गोद में लेकर प्यार करने लगी।

कुछ ही देर बाद रात्रि के खाने की तैयारी होने लगी…मनोहर और सुगना की नजरे कई चार हुई और हर बार सुगना ने मनोहर की आंखों में कुछ अलग देखा उसने अपनी नज़रें झुका ली परंतु मनोहर का यह व्यवहार उसे असहज कर रहा था।

घर के तीनों बुजुर्ग जिस प्रकार मनोहर से घुल मिलकर बात कर रहे थे उससे मनोहर को काफी अपनापन महसूस हो रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे वह इस परिवार का ही एक हिस्सा हो..

सुगना को लेकर मनोहर के मन में भावनाएं हिलोरे लेने लगी थी। उधर घर के तीनों बुजुर्ग मनोहर को लेकर अब संजीदा हो चुके थे वह अपने ईश्वर से इस जोड़ी को एक करने की मन ही मन गुहार लगा रहे थे…

यह बात अभी सबके मन में ही थी इस पर ना तो अभी लाली से चर्चा हुई थी और ना ही सोनू से। और सुगना तो इस पूरे घटनाक्रम से ही अनभिज्ञ थी।

खाना खाने के पश्चात मनोहर वापस जा चुका था। लाली और कजरी मिलकर किचन में बर्तन साफ कर रही थी तभी कजरी ने अपने मन की बात कह दी..

“ए लाली मनोहर दोसर बियाह ना करिहें का?”

“काहे का बात बा?”

लाली को यह प्रश्न बिल्कुल भी आउट ऑफ सब्जेक्ट लगा।

“कुछ ना …असही पूछता रहनी हां अतना सुंदर और सुशील लइका बाड़े पूरा जीवन अकेले कैसे कटिहें?”

“लेकिन चाची तू ई बात काहे पूछत बाड़ू?”

कजरी लाली के पास गई और उसके कान में धीरे से कहा..

“सोचत बानी की सुगना के भी दोसर बियाह कर दीहल जाओ.. रतन के आवे के अब कोनो उम्मीद नईखे”

लाली के दिमाग में घंटियां बजने लगी उसके लिए यह वार्तालाप कल्पना से परे था इससे पहले की लाली कुछ बोल पाती सुगना रसोई घर में आ धमकी और उसने कजरी को लाली के कान में कुछ बोलते देख लिया और अपनी सास कजरी से बोली..

“अरे कान में क्या बोलत बाड़ू? साफ-साफ बोल”

कजरी ने तुरंत बाद पलट दी और बोली

“कल तोरा सलेमपुर जाए के बा नू इहे बतावत रहनि हा”

अब चौंकने की बारी लाली की थी..

कजरी ने बिना प्रश्न पूछे दोबारा अपनी बात दोहराई

“कल सुगना के सोनू के साथ सलेमपुर जाए के बा कुछ कागज के काम बाटे “

लाली को पिछली बार सुगना और सोनू के एक साथ जाने और लौटने का वक्त याद आ गया जब उसने सुगना के इत्र की खुशबू सोनू के लंड से महसूस की थी.. औरतों और उसके गर्दन का दाग उसे दिन चरम पर था।

लाली तपाक से बोल उठी

“कल हम भी जाएब मां बाबूजी से मिले बहुत दिन हो गइल बा”

लाली ने जिस दृढ़ता से यह बात कही थी उसकी बात काट पाना मुश्किल था। सुगना ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए कहा

“ठीक बा तू भी चल चलीहा”

सुगना एक पल के लिए तो उदास हो गई परंतु उसे अपनी मां पदमा की बात याद आ गई उसे सीतापुर भी जाना था सुगना मन ही मन मुस्करा उठी इस बार सोनू के साथ अपने इस घर में जिसमें वह जवान हुई थी उसे घर से उसकी किशोरावस्था और बचपन की कई यादें जुड़ी थी सुगना मन ही मन अपनी किशोरावस्था के दिन याद करने लगी।

सुगना को आज लाली के साथ सोना था.. लाली ने स्वयं सुगना के साथ आज अंतरंग होने की इच्छा व्यक्त की थी दोनों सहेलियां पहले भी एक दूसरे की बाहों में अपनी कामुकता शांत करती आईं थी पर सोनू से विवाह होने के बाद यह पहला अवसर था।

सुगना बच्चों और सोनू को दूध देने के लिए उनके कमरे में गई और उसने सोनू के कान में कुछ ऐसा कहा जिससे सोनू के चेहरे पर चमक आ गई उसने सुगना का हाथ चूम लिया। सोनू रात का इंतजार करने लगा।

धीरे-धीरे सभी अपने-अपने शयन कक्ष की तरफ बढ़ चले।

शयन व्यवस्था आज बदली हुई थी.. सोनू सुगना के बच्चों के साथ उसके कमरे में सो रहा था. लाली और सुगना दोनों आज एक ही बिस्तर पर पड़े गप्पे मार रहे थे कुछ देर तक कजरी और पदमा भी उनके साथ थी परंतु थोड़ी ही देर बाद उन्हें नींद आने लगी और वह अपनी अपनी जगह पर सोने चली गई इस वक्त कल तीन लोग जाग रहे थे लाली और सुगना और उन दोनों का प्यारा सोनू….

सोनू को सुगना का इंतजार था और लाली को सुगना का…

कुछ होने वाला था...
 
आपने कहानी पर कई प्रश्न उठाए हैं एक एक करके उत्तर देता हूं..

"उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।"

उपरोक्त वाक्यांश इस कहानी की प्रस्तावना जो हर पेज के टॉप में लिखा गया है से लिया गया है। इस कहानी में सिर्फ और सिर्फ सेक्स परोसन मेरा उद्देश्य कभी नहीं रहा है। इसीलिए हर पुरुष और हर स्त्री में जोड़ी बनाऊं और उन्हें बारी बारी एक बिस्तर पर पहुंचा दूं यह लिखना कठिन है।

सुगना व्याभिचारिणी है या नहीं यह आपकी अपनी समझ है। सरयू सिंह और सोनू से उसका मिलान किन परिस्थितियों में हुआ यह कहानी में बेहद विस्तार से समझाया गया है। वैसे भी सुगना ने सोनू से संबंध तभी बनाए जब वह सरयू सिंह से पूरी तरह अलग हो चुकी थी।

आपने लिखा है की सरयू सिंह मोनी की जवानी से आसक्त थे परंतु कहानी में यह कहीं नहीं लिखा। सरयू सिंह सोनी पर आसक्त थे वह भी उसके उत्तेजक आधुनिक पहनावे को लेकर।

रही बात आपने जो लिखा है की लेखक भी सरयू सिंह और सुगना जैसी दोहरी मानसिकता में जी रहा है तो यह सिर्फ आपकी अपनी सोच है।

मेरा काम तो किरदार गढ़ना है और कहानी की रूपरेखा को नागे बढ़ाना है। अभी तक मैंने जितनी भी कहानी लिखी हैं उसमें कम से कम 20-25 किरदार होंगे उन सब की मानसिकता लेखक से मेल खाए यह कठिन है।

आपकी इच्छा मैं भली भांति समझ रहा हूं और समय-समय पर शायद आपको अपनी सोच और अपेक्षा के हिसाब से कंटेंट मिल जाए।

तब तक के लिए जुड़े रहिए और हो सके तो पर्सनल कमेंट करने से बचीये यह उचित नहीं है।
 
भाग 152

धीरे-धीरे सभी अपने-अपने शयन कक्ष की तरफ बढ़ चले।



शयन व्यवस्था आज बदली हुई थी.. सोनू सुगना के बच्चों के साथ उसके कमरे में सो रहा था. लाली और सुगना दोनों आज एक ही बिस्तर पर पड़े गप्पे मार रहे थे कुछ देर तक कजरी और पदमा भी उनके साथ थी परंतु थोड़ी ही देर बाद उन्हें नींद आने लगी और वह अपनी अपनी जगह पर सोने चली गई इस वक्त कल तीन लोग जाग रहे थे लाली और सुगना और उन दोनों का प्यारा सोनू….

सोनू को सुगना का इंतजार था और लाली को सुगना का…



कुछ होने वाला था…

अब आगे…

सुगना ने आगे की कमान संभाली उसने लाली को आज अपने कमरे में सोने के लिए आमंत्रित कर लिया यद्यपि पहले लाली और सुगना ने लाली के कमरे में सोने की बात की थी परंतु सुगना ने लाली को अपने सयन कक्ष में सोने के लिए मना लिया।

सुगना की वासना में डूबा सोनू लाली के कक्ष में बच्चों के साथ सोने चला गया। आज पूरा परिवार एकत्रित था ऐसी अवस्था में सोनू और सुगना का मिलन कठिन था। घर में जितने कमरे थे शायद सोने वाले उससे ज्यादा थे। पर सुगना ने स्वयं मन बना लिया था उसने स्वयं चुदने के लिए बिसात बिछा ली थी। आखिर वह घर की मालकिन थी और इस परिवार में सरयू सिंह के बाद सबसे ज्यादा सम्मानित। उसकी बात काटने का साहस किसी में नहीं था ऐसा नहीं की डर की वजह से अपितु सभी उसका सम्मान करते थे।

रात के 11:00 बज चुके थे सभी अपने-अपने कक्ष में आराम कर रहे थे तभी लाली अपने कक्ष से सुगना के कक्ष में जाने के लिए निकली वह एक खूबसूरत नाइटी पहनी हुई थी। तभी कजरी ने उसे सुगना के कमरे जाते हुए देख लिया सुगना अपने बिस्तर पर अकेली थी कजरी को कुछ अटपटा सा लगा उसने आखिरकार लाली से पूछ ही लिया अरे

“ इतना राति के कहां जात बाड़े”

लाली अचानक आए प्रश्न से घबरा गई परंतु तभी अंदर से सुगना ने आवाज दी

“ अरे कुछ ना कई दिन हो गैल हमनी के बतियवला रऊआ सूत् रही हम लोग रात भर बतियाएब जा”

“ बच्चा सब कहां बा?” कजरी ने सुगना के बच्चों के बारे में पूछा

“सब अपना मामा साथ सुतल बा “

कजरी अब तक समझ चुकी थी कि सुगना और लाली ने आज सचमुच रतजगा करने का प्लान बना लिया था उसने और सवाल ना किया और अपनी आंखों में नींद लिए अपने कमरे की तरफ चली गई।

पूरा घर एक बार फिर रात के सन्नाटे में था लाली और सुगना बिस्तर पर आ चुके थे उधर सोनू सुगना के बारे में सोचता हुआ अपनी नींद से युद्ध कर रहा था।

पूरी तरह थके होने के बावजूद उसे जो मिलने वाला था उसकी आस में उसकी आंखें जाग रही थी।

सुगना बिस्तर पर थी और उसने अब भी साड़ी ब्लाउज पहना हुआ था लाली ने उसे इस अवस्था में देखते ही पूछा “अरे कपड़ा ना बदल लेले हा”

सुगना में अपनी नशीली आंखों से लाली की तरफ देखा और अपने ब्लाउज का हुक स्वयं अपनी उंगलियों से खोलते हुए बोली

“मैडम कपड़े की क्या जरूरत है?

लाली समझ चुकी थी सुगना आज मूड में थी हिन्दी में बोलकर सुगना ने लाली को अपने चुलबुले पान से मोहित कर लिया था। कुछ ही देर में दोनों सहेलियां पूरी तरह नग्न लिहाफ के अंदर एक दूसरे की बाहों में थी।

नंगी सुगना को अपनी बाहों में भरने का जो सुख सोनू उठता था उसकी बीवी भी उसे कमतर न थी लाली को सुगना को बाहों में भरना बेहद पसंद था।

लाली ने सुगना को अपने आलिंगन में भर लिया और अपनी दाहिनी जांघ सुगना की जांघों के बीच के जोड़ पर धीरे-धीरे रगड़ने लगी। अपनी हथेलियां से वह सुगना की पीठ सहलाए जा रही थी और अपनी चूचियों से उसकी चूचियों को महसूस कर रही थी।

ऐसा नहीं था की लाली और सुगना आज पहली बार एक दूसरे से अंतरंग हो रही थी पर आज कुछ अनोखा था।

लाली की वासना सुगना से जागृत थी सुगना की सोनू से और सोनू उसका तो कहना है क्या सुगना ने जो उसे आश्वासन दिया था वह उसे सोच कर ही मगन था और सुगना के इशारे का इंतजार कर रहा था।

लाली और सुगना का आलिंगन धीरे-धीरे और कामुक होता गया…लाली की उंगलियों ने सुगना के बुर के होठों को फैलाते हुए..कामुक स्वर में पूछा..

“ए सुगना तोर मन ना करेला का?

सुगना जो लाली के स्पर्श का आनंद ले रही थी अचानक सचेत हुए बोली..

“काहे के…?”

लाली ने कुछ कहा नहीं परंतु सुगना की चिपचिपी बुर में अपनी दो उंगलियां आगे पीछे करके इशारे से अपनी बात कही…

सुगना ने हाथ बढ़ाकर लाली को रोकने की कोशिश की.. और अपनी कामुक आवाज में का कहा

आह…तनी धीरे से…

लाली रुकी नहीं और उसकी बुर की दरार में अपनी उंगल को बड़ी अदा से घूमाते हुए बोली..

बोल ना मन ना करेला का?

अब मन करबो करी तो का करी?

अब तू भी दोसर ब्याह कर ले…रतनवा वापस ना आई ई पक्का बा।

लाली ने अपनी बात स्पष्ट कर दी।

सुगना को अब तक आभास नहीं था कि घरवाले उसके और मनोहर के बारे में ख्याली पुलाव पका रहे हैं और अब कजरी ने लाली को भी अपनी तरफ कर लिया था।

सुगना अनजान थी उसने लाली की बात को हल्के में लिया और बोला

अच्छा बड़ा ब्याह करावे के सोच ले बाडू केकरा से कर ली…सुगना ने लाली की चूचियों को मसलते हुए आगे कहा

चल तोरा से ही कर लेत बानी….. सुगना ने लाली को अपने आलिंगन में कसकर दबा लिया।

सुगना जब कामुक होती थी तो उसके आगोश में चाहे मर्द हो या स्त्री दोनों में उत्तेजना भर जाती थी आज लाली भी सुगना की कामुकता में खो गई थी दोनों सहेलियां एक दूसरे में गुत्थमगुत्था हो गई और उनकी उंगलियां एक दूसरे का स्खलन करने का प्रयास करने लगी।

लाली के दिमाग में अब भी कजरी की बातें घूम रहीं थीं..वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाई और एक बार फिर बोल उठी

ए सुगना साच बोल ना दोसर बियाह करबे?

काहे पूछत बाड़े? सुगना लाली के प्रश्नों को अब गंभीरता से ले रही थी।

सुगना ने जिस प्रकार अपनी आंखों को बड़ी कर या प्रश्न पूछा था लाली खुद एक बार के लिए सकपका गई उसे एक पल के लिए लगा शायद उसे इस प्रश्न पर अभी इस वक्त इतना जोर नहीं देना चाहिए था।

छोड़ जाए दे…लाली ने बात बदलते हुए कहा।

पर अब सुगना की उत्तेजना मैं व्यवधान आ चुका था उसने लाली को उकसाते हुए कहा

“बताओ ना कहे पूछता बा?”

लाली भी कम चतुर ना थी उसने बड़ी संगीदगी से कहा..

“सोनू के हमारा हमारा झोली में डालकर ते ता हमार जिंदगी सवार दिहले…. ते जिंदगी भर अकेले रहबे का…? भतार के सुख तोरा जीवन में कब आई हम ईहे चिंता करेनी”

सुगना ने एक बार फिर लाली को अपने आलिंगन में भरा और उसके होठों को चुमते हुए बोली…

“जब तक हमर लाली और सोनू हमरा के अपन परिवार मनीहे हमारा केहू के जरूरत नइखे”

सोनू का नाम सुनते ही लाली के दिमाग में एक बार फिर उसका शक घूमने लगा सुगना के सुहाग के इत्र की खुशबू उसने सोनू के लंड से वह पहले ही सूंघ चुकी थी जिसका माकूल उत्तर उसे अब तक नहीं मिला था। सोनू और सुगना दोनों भाई बहन बड़ी चतुराई से उसे दिन लाली के प्रश्नों का अधूरा उत्तर देकर बच निकले थे।

अच्छा सुगना एक बात पूछी…लाली ने सुगना की सहमति लेने की कोशिश की।

ते ता मजा लेवल छोड़कर सवाल जवाब करे लगले…पूछ का पूछे के बा? सुगना ने अपनी आंखें बड़ी करते हुए लाली के चेहरे पर अपनी प्रश्नवाचक निगाहें केंद्रित कर दीं..

ते सोनू के सच में माफ कर देले बाड़े…

काहे खातिर? सुगना को लाली का यह प्रश्न पूरी तरह बेमानी लगा ..

“ऊ जवन दिवाली के रात तोहरा संग कईले रहे” लाली ने हिम्मत जुटाकर अपनी बात कह दी।

सुगना के दिमाग में उसे दीपावली की काली रात की यादें ताजा हो गई जब सोनू ने पहली बार उसे जबरदस्ती चोदा था परंतु अब उस काली रात का दाग सुगना के जीवन में सुरों का राग बिखेर गया था। सोनू और सुगना को करीब लाने में उसे रात की अहम भूमिका थी जो नहीं होना था वह घटित हुआ था और उसने धीरे-धीरे पहले सुगना और सोनू को दूर किया और फिर इतना करीब ला दिया की ना तो सोनू सुगना के बिन रह सकता था और ना ही सुगना सोनू के बिन।

“का सोचे लगले?” लाली ने सुगना की तंद्रा भंग की…

सुगना सोनू के बारे में सोचकर पूरी तरह गर्म हो चुकी थी उसने लाली को फिर अपने आगोश में भर लिया और अपने घुटनों को लाली की बुर से रगड़ने लगी..

बोल ना..लाली ने अपनी उंगलियों को उसकी बुर को अंदर से कुरेदते हुए पूछा..

जाए दे अब माफ करे के अलावा चारा भी का बा.. ओकर मन तू ही बढ़वले रहलू हमारा सब मालूम बा…

सुगना ने अपनी उत्तेजना पर काबू करते हुए कहा पर प्रत्युत्तर में अपनी हथेली से लाली की लिसलिसी बुर को घेर लिया…

दोनों सहेलियां एक दूसरे को स्खलित करने में लग गयी। दोनों सहेलियां सोनू को अपने-अपने परिपेक्ष में देख रही थी। एक दूसरे के काम अंगों से खेलते हुए दोनों सहेलियां एक दूसरे को पहले स्खलित करने का प्रयास करने लगीं।

हमेशा की तरह लाली हार गई उसकी जांघें उसकी बुर को सिकोड़ सिकोड़ कर मदन रस उत्सर्जित करने लगीं। सुगना अपनी उत्तेजना और कामुकता से स्त्री और पुरुष दोनों को पूरे उत्साह और उमंग के साथ स्खलित करने की क्षमता रखती थी।

लाली के मुंह से आ…आह….आई…..हम्ममम की कराह आने लगी सुगना ने तुरत अपने होंठ उसके होंठों से सटा दिए और उसकी आवाज को बाहर आने से रोक लिया।

सुगना लाली के स्खलन को और भी आनंददायक बनाने के लिए अपनी उंगलियां लाली की बुर में थिरकाए जा रही थी ..

स्खलन चेतना शून्य कर देता है …लाली झड़ रही थी उसने न जाने कब अपनी उंगलियां सुगना की बुर से हटा दी और सुगना के मदमस्त कूल्हों को अपने हाथों से महसूस करते हुए उसे अपनी तरफ खींचने लगी।

वासना का तूफान थम चुका था लाली धीरे-धीरे नरम पड़ती गई और कुछ ही पलों में वह पीठ के बल लेटे लेटे अपनी सांसों को नियंत्रित करने का प्रयास करने लगी..

सुगना लाली की चूचियों को धीरे-धीरे सहलाई जा रही थी…

लाली की सांसों को सहज होते हुए देख सुगना ने लाली के कान में कहा

तनी आराम कर हम पेशाब करके आवत बानी…

सुगना उठी उसने लाली की नाइटी पहन ली। अपना साड़ी ब्लाउज वह पहले ही खोलकर एक तरफ रख चुकी थी और तुरंत साड़ी पहनना कठिन था। सुगना ने ऐसा जानबूझकर किया था ताकि वह लाली को अचानक कमरे से बाहर आने से रोक सके उसकी नाइटी उसने स्वयं पहन ली थी।

सुगना धीरे से कमरे से बाहर निकली पर दरवाजे तक पहुंचते पहुंचते उसे अचानक ही खांसी आई यह अप्रत्याशित था और हो भी क्यों ना सुगना पूरी तरह स्वस्थ थी अचानक खांसी का आना अनायास ही नहीं था सुगना ने सोनू के कान में जो कहा था शायद यह उसका संकेत ही था इधर सुगना गलियारे से होते हुए बाथरूम की तरफ बड़ी परंतु बाथरूम ना जाकर रसोई घर में चली गई बाहर खिड़की से आ रही रोशनी में उसने अपने सधे हुए हाथों से किचन के स्लैब पर रखे इक्का-दुक्का बर्तनों को व्यवस्थित किया इससे पहले कि वह अपना कार्य पूर्ण कर पाती सोनू रसोई में आ चुका था और अगले पल उसे अपने आलिंगन में भर चुका था।

सोनू ने सुगना को पीछे से आलिंगन में भर रखा था उसके हाथ सुगना की चूचियों को अपनी हथेलियां में थामे हुए थे और सोनू अपने गाल सुगना के गालों से उसके कानों से और अपनी टुड्डी सुगना के गर्दन पर रगड़ रहा था।

सुगना की वासना भी चरम पर थी और सोनू का लंड तो न जाने कितनी बार सुगना के इंतजार में खड़ा हो रहा था और फिर सुगना के सिग्नल के इंतजार में नरम गरम हो रहा था।

“सोनू अब जल्दी से कर ले आज घर में सब केहू बा कभी भी कोई आ सके ला” सुगना ने बेहद धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए कहा..

“का कर ली?”

सोनू ने सुगना को छेड़ते हुए वह गंदी बात बोलने के लिए उकसाया जिससे सुगना हमेशा बचना चाहती थी। आखिर वह किस्म से अपने छोटे भाई को उसे चोदने के लिए बोलती

समय कम था उसे सोनू का मन रखना था उसने अपनी गर्दन घुमाई उसके कानों पर अपने होंठ लगाएं और इसी दौरान अपनी हथेलियां को नीचे ले जाकर सोनू के तने हुए लंड को अपनी हथेलियां से थाम लिया और उसके कान में बेहद उत्तेजक अंदाज में बोला।

“बदमाश अपना दीदी के रस में डूब के अपना गर्दन पर फेर से दाग लगा ले…”

.सुगना मुस्कुराने लगी।

सुगना को मुस्कुराते हुए देखना किसी भी मर्द की उत्तेजना को चरम पर पहुंचने के लिए काफी था। सोनू का लंड भी थिरक उठा.. सुगना ईसी दौरान पलट कर सीधी हो गई थी और सोनू की हथेलियां उसके नितंबों को सहलाने लगी।

वासना चरम पर थी। एक ही झटके में सोनू ने सुगना को उठाकर किचन के स्लैब पर बैठा दिया नाइटी न जाने कब सुगना के नितंबों के ठीक नीचे आ चुकी थी और सुगना की जांघें खुल चुकी थी सोनू ने अपने लंड से अपनी सुगना दीदी की उस सुनहरी गुफा को जांचने की कोशिश की जिसे सुगना ने सोनू को दहेज स्वरूप दे दिया था।

सोनू ने अपने लंड से सुगना की बुर के होठों को चूमने की कोशिश की और उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा होठों पर आई लार सोनू के पारखी लंड ने तुरंत महसूस कर ली और सोनू का दिल बाग बाग हो गया सच में सुगना दीदी भी उसका उतना ही इंतजार कर रही थी जितना वह स्वयं।

इधर सोनू के लंड ने सुगना की बुर को चुम्मा उधार सोनू एक बार फिर सुगना के अधरों को चूमते हुए बोला।

“तु हूं इंतजार एक करत रहलु हा का?”

सोनू मैं अपने होठों पर मुस्कुराहट लाते हुए बोला उसे सच में यह यकीन नहीं था कि सुगना इतनी उत्तेजित होगी।

सुगना शर्मा गई…पर सोनू को काहे..

सोनू अपने लंड से सुगना के की बुर का जायजा लेते हुए बोला..

ई ता लार टपकावत बिया….

सोनू अपना लंड सुगना की बुर पर रगड़कर सुगना की उत्तेजना को और भी ज्यादा बढ़ा रहा था।

सुगना को इंतजार था कि कब सोनू का लंड उसकी बुर को चीरता हुआ है उसकी नाभि को चूम ले परंतु सोनू की यह छेड़छाड़ उसे बेचैन कर रही थी।

एक तो समय कम था दूसरा सोनू की यह हरकत उसे पसंद तो आ रही थी पर वह समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी। वह अपने दोनों हाथ स्लैब पर रख अपनी जांघों को उठाए अपने कूल्हे को स्लैब के किनारे रख सोनू का लंड लेने को तैयार थी परंतु सोनू की छेड़छाड़ को रोकने के लिए उसने अपना एक हाथ ऊपर उठाया और सोनू के गालों पर मीठी चपत लगाते हुए बोली

“ सोनू अब जल्दी से कर ले “

“का कर ली” सोनू रुकने वाला नहीं था। उसने एक बार के लिए लंड के सुपाड़े को सुगना की बुर में थोड़ा सा घुसा दिया पर तुरंत ही निकालकर उसे फिर से सुगना के भगनासे पर रगड़ने लगा।

“बदमाश जल्दी से अपना दीदी के बुर……के……चो………

सुगना अपना वाक्य पूरा कर पाती इससे पहले सोनू का लंड गर्म रॉड की तरह सुगना की बुर में धंसता चला गया सोनू के होठों में सुगना के होठों को अपने आगोश में ले लिया और अगले ही पल सोनू की कमर आगे पीछे होने लगी ।

दोनों भाई बहन अपने अंदर तूफान संजोए हुए थे कुछ कहने सुनने को बाकी ना था सोनू के कूल्हे और कमर तेजी से आगे पीछे हो रही थी सुगना असीम आनंद में डूबी हुई अपने अंदर भराव महसूस कर रही थी.. सुगना एक तो पहले ही गर्म थी और अब सोनू के मजबूत लंड को अपने अंदर समाहित कर तृप्त हो चुकी थी। सुगना अमरबेल की भांति सोनू से लिपट चुकी थी और अपनी बुर को सिकोड़ कर उसके लंड को पूरी तरह अपनी और खींचे हुए थी। यह आत्मीय संभोग ज्यादा देर न चल सका उत्तेजना दोनों में चरम पर थी।

सुगना स्खलन को तैयार थी उधर सोनू भी पिछले कुछ समय से सुगना का इंतजार करते हुए अपना लावा इकट्ठा कर चुका था यह पहला अवसर था की सोनू सुगना के इंतजार में इतना गर्म हो चुका था कि वह कुछ ही पलों में झड़ने को तैयार था। सुगना और सोनू दोनों की सांस तेज चल रही थी और उतनी ही तेजी से सोनू का लंड सुगना की बुर में में और गहरे और गहरे तक उतर जाना चाह रहा था ।

सोनू के अंडकोष किचन की स्लैब से टकरा रहे थे पर लंड सुगना की बुर की नमी और गरम गुफा में डुबकियां लगा रहा था।

वासना के आवेग की तीव्रता और उससे भी ज्यादा तीव्र थी सोनू के लंड से निकलती वीर्य की धार। सुगना की गर्भाशय पर सोनू के लंड ने जितनी कोमल चोट पहुंचाई थी अब अपने वीर्य की धार से उसे पुचकार रहा था और सुगना की बुर भी प्रेम रस उत्सर्जित कर जैसे सोनू के लैंड को तसल्ली दे रही हो।

सोनू और सुगना एक हो चुके थे सुगना अपने हाथ किचन स्लैब से उठाकर सोनू की गर्दन पर लपेट चुकी थी वासना का आवेग थमते ही सुगना ने स्वयं को व्यवस्थित करने की कोशिश की पर अपने हाथ पीछे वक्त करते वक्त अचानक उसका हाथ किचन स्लैब पर दूर रखें एक गिलास से टकरा गया और वह नीचे गिर पड़ा। रात्रि के सन्नाटे में बर्तन गिरने की आवाज उन सभी तक पहुंची जो अर्ध जागृत थे

कजरी की आवाज आई

“का भईल”

सुगना और सोनू दोनों झटपट अलग हुए दोनों में से किसी ने उत्तर नहीं दिया तभी कजरे की आवाज दोबारा आई

के बा रसोई में ?

जब तक सुगना स्वयं को व्यवस्थित कर जवाब देती तब तक कजरी गलियारे में आ चुकी थी सोनू किचन से गलियारे में निकल रहा था उसने कहा

“कोनो बात नईखे रसोई में पानी पिए गइल रहनि हा दीदी टकरा के गिलास नीचे गिर गईल हा

सोनू ने बात बना ली थी । परंतु सोनू की आवाज अंदर लाली के कमरे में लिहाफ ओढ़ के पड़ी नंगी लाली ने सुन ली। सुगना तो बाथरूम गई थी वह रसोई घर कैसे पहुंच गई लाली कुछ सोच पाने की स्थिति में नहीं थी इतने में सुगना ने कमरे में प्रवेश किया।वह अभी भी अपनी सांसों पर काबू पाने का प्रयास कर रही थी

“का भईल काहे आतना देर हो गईल हा?”

अरे सोनूआ प्यासल रहल हा उ हो रसोई में पानी पिए आ गइल हा…

सुगना ने जो बात कही थी वह सच थी सोनू प्यासा था पर पानी के लिए नहीं अपित सुगना की जांघों के बीच उस सुनहरी गुफा से रिस रहे अमृत रस का…

सुगना ने सूरज का मन रख लिया था और अपना वादा पूरा कर दिया था। सुगना ने जो हिम्मत दिखाई थी उसका यकीन सोनू को नहीं था कैसे घर की सबसे चहेती सुगना ने भरे पूरे परिवार जनों के बीच आज सोनू के साथ अपने ही घर में संभोग कर उसे आश्चर्यचकित कर दिया था।

धीरे-धीरे सुगना और सोनू के मिलन अब स्वाभाविक रूप से होने लगे परंतु सोनू और सुगना के बीच जब भी कभी सेक्स होता उसमें हर बार नयापन होता सुगना अपनी वासना की परतें एक-एक करके खोलती और सोनू उसमें और उलझ जाता। सोनू ने भी सुगना के साथ हर उसे जगह और अवस्था में संभोग किया जिसकी परिकल्पना उसने अपनी युवा अवस्था में की थी शायद उसके सपने लाली भी पूरे नहीं कर पाती परंतु सुगना ने तो जैसे सोनू के लिए बनी थी। उसने अपना जीवन सोनू के कुर्बान कर दिया था।

सोनू के गर्दन का दाग उनके मिलन का एकमात्र गवाह था जो बार-बार सोनू और सुगना को याद दिलाता की कुछ गलत हो रहा था पर वासना में डूबे सुगना और सोनू उसे नजरअंदाज कर इस दलदल में और गहरे तक उतरते जा रहे थे।

समय बीतता गया सुगना और सोनू के मिलन की यादें उनके दिलों दिमाग में एक अमिट छाप बनती गई यह यादें महत्वपूर्ण थी आने वाले समय में सुगना के पास इन यादों का ही सहारा था और शायद सोनू के पास भी।

कुछ वर्षों बाद ही सोनू और सुगना की खुशियों पर ग्रहण लग गया परिवार में कुछ ऐसा हुआ जिसे सब कुछ तहस-नहस कर दिया वासना का अतिरेक सुगना के परिवार को अचानक वासना विहीन कर गया यह अवांछित घटना थी

सरयू सिंह की मृत्यु।

सरजू सिंह की मृत्यु कैसे हुई यह प्रश्न उतना ही कठिन था जितना कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा पर कुछ प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में दफन होते हैं नियति इस कामुक किताब के पन्ने पलट रही थी और इस जटिल प्रश्न का उत्तर ढूंढ रही थी।

शेष अगले भाग में

 
प्रिय पाठकों,

सच कहूं तो अब इस कहानी को लिखने के लिए मेरे पास समय की कमी है मैं कभी-कभी कुछ अध्याय लिखनेकी कोशिश करता हूं परंतु उसकी उपयोगिता अब शायद मेरी नजर में कुछ कम हो गई हैं।

अब तक का साथ अच्छा रहा जब कभी समय मिला तू कहानी के बाकी एपिसोड भी लिखने की कोशिश करूंगा और जब कुछ अपडेट रेडी हो जाएंगे तब आप सब के बीच प्रस्तुत होऊंगा।

आप सबको हुई सुविधा के लिए खेद है।
 
भाग 153

समय बीतते देर नहीं लगती। आज नियति सुगना और सोनू को पुनः याद कर रही थी। जहां उसने उन्हें रंगरलियां मनाने के लिए छोड़ा था वहां से जीवनधारा आगे बढ़ चुकी थी। बारह वर्षों से ऊपर का वक्त बीत चुका था। सुगना का परिवार भी अब बदल चुका था और बनारस का शहर भी।

गंगा किनारे एक खूबसूरत सी हवेली अपने पट खोल, अपनी कथा सुनने को तैयार थी। हवेली की खूबसूरती देखते ही बनती थी। सामने बड़ा सा घास का मैदान आधुनिक साज सज्जा से सुसज्जित पुष्प वाटिका हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। विकास के पिता ने यह हवेली बड़ी लगन और मेहनत से अपने परिवार के लिए बनाई थी, लेकिन विधि का विधान ही कुछ ऐसा था कि वो उस हवेली का सुख नहीं भोग पाए ।

दरअसल उनका पूरा परिवार सड़क दुर्घटना में खत्म हो गया था शायद विधाता ने उन्हें अपने पास बुला लिया था, और उनकी पूरी दुनिया एक झटके में खत्म हो गई। बच गए तो सिर्फ विकास और सोनी।

यह संयोग कहिए या विडंबना इस हवेली को आने वाले समय में कई पापों का गवाह बनना था।, यह हवेली दो लोगों के लिए किसी किले से कम नहीं थी। सोनी को यह हवेली अकेले काटने दौड़ती थी। अंततः, विकास ने अपने मित्र सोनू, सुगना और लाली को अपनी हवेली में रहने के लिए सादर आमंत्रित किया। दरअसल, यह कहना ज्यादा उचित होगा कि वह अनुरोध था। और अंततः लाली और सुगना अपने परिवार के साथ हवेली में रहने आ गए। सोनू ने भी अपनी सहमति दे दी। विकास और सोनू अक्सर काम के सिलसिले में बाहर ही रहते पर परिवार को साथ रहने का अवसर मिला गया था।

आज कई वर्षों बाद, इस कहानी के पात्रों में स्वाभाविक बदलाव आ चुका था बच्चे जवान हो गए थे। दीपावली की छुट्टियों में आज परिवार के सभी बच्चे आए हुए थे। संयोग से आज विद्यानंद के आश्रम से एक उनके एक शिष्य हवेली में पधारे थे। पूरे परिवार ने उनका अभिवादन किया और आलीशान बैठक में उन्हें बैठने के लिए स्थान दिया गया। छुट्टी का दिन होने के कारण पूरा परिवार घर पर ही था और धीरे-धीरे सभी बैठक में उन शिष्य से मिलने के लिए एकत्रित हो गए।

सोनी, जो अब लगभग 36-37 वर्ष की अधेड़ महिला बन चुकी थी, हवेली की मालकिन तो थी ही, और इस समय घर की मुखिया भी बन चुकी थी। यद्यपि वह सुगना का बहुत आदर करती थी , लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन गईं कि सुगना ने स्वेच्छा से परिवार के मुखिया के लिए सोनी को ही उत्तरदायित्व दे दिया था जो लाली को भी स्वीकार्य था। अब पूरे घर का दारोमदार सोनी पर आ चुका था, और वह इसे बखूबी निभा भी रही थी। सोनी कुछ कुछ आज की तमन्ना भाटिया की तरह दिखाई पड़ने लगी थी। उसकी गदर जवानी अब भी कामुक मर्दों में ताजगी भरने को तत्पर थी। पर विकास अब तृप्त हो चुका था और वासना से परे हो चुका था। अथक प्रयास करने के बावजूद वह सोनी को गर्भवती नहीं कर पाया था। और सोनी के गर्भ धारण के लिए उचित अनुचित सभी प्रयास विफल हो चुके थे।

सोनी ने विद्यानंद के शिष्य से मुखातिब होते हुए कहा, "महाराज, आपका हमारे निवास पर स्वागत है। पहले मैं आपका परिचय अपने परिवार से करवा दूं।" शिष्य अब भी भवन की आलीशान सजावट से प्रभावित था और उसकी निगाहे एक बड़े आदमकद चित्र पर अटकी हुईं थी। पर अब उसने अपना ध्यान सोनी पर केंद्रित कर लिया।

सोनी एक खूबसूरत और प्रभावशाली महिला थी, जिसका दमकता हुआ चेहरा और अमीरों जैसा हाव-भाव उसे और भी प्रभावशाली बना रहे थे। सोनी ने शिष्य का ध्पास बैठी एक सौम्य महिला की और आकर्षत करते हुए कहा, "महाराज, यह मेरी दीदी सुगना हैं।"

शिष्य ने देखा, और उसे एक बेहद सुंदर, दमकती चेहरे पर बच्चों जैसी मासूमियत लिए श्वेत साड़ी में लिपटी सुगना दिखाई दी। सुगना, जो लगभग 40 वर्ष की उम्र में भी अब भी उतनी ही प्यारी और आकर्षक दिखाई पड़ रही थी। वो एक दिव्य आत्मा की तरह श्वेत वस्त्रों में सुसज्जित थी। पर चेहरा और शरीर उसकी उमर को धोखा देते हुए उसे अब भी युवा दर्शा रहे थे पर श्वेत पहनावा उसके व्यक्तित्व में वैराग्य का अंश अवश्य दिखा रहा था। उसका रूप लावण्य अब भी देखने लायक था। सुगना ने शालीनता से शिष्य को अभिवादन किया और चुप हो गई। शिष्य अब भी सुगना के बारे में सोच रहा था।

ये लाली दीदी है। शिष्य ने एक अधेड़ महिला की तरफ देखा जो सुगना के समीप बैठी थी।


लाली अब पूरी तरह से बदल चुकी थी। उसके भाव, चाल-ढाल, सब कुछ सेठानी जैसे हो चुके थे। उसने अपनी शारीरिक बनावट पर शायद उतना ध्यान नहीं दिया, जिससे उसकी खूबसूरती पर निश्चित तौर पर असर पड़ा था। लेकिन लाली के चेहरे पर खुशी की झलक थी, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं थी। सोनू के साथ बिताए गए पिछले कई वर्षों में उसे बहुत खुशी मिली थी, और अब वह अकेली ही सोनू के साथ समय बिता रही थी।

लेकिन सुगना और सोनू के बीच कुछ ऐसा था, जिसे किसी की नजर लग गई थी अन्यथा हरदम खुश और खिलखिलाती सुगना शायद इतनी संजीदा कभी ना होती।

अब बारी युवा पीढ़ी की थी सबसे पहले एक सुंदर सी तरुणी जो कुछ-कुछ आज की हीरोइन अन्नया पांडे की तरह दिखाई पड़ती थी। लंबी छरहरी और कमनिय काया लिए शिष्य की तरफ देख रही थी। रंग कुछ सांवला ही था उसने विद्यानंद के शिष्य को प्रणाम किया और बोला मैं “मालती”

पुत्री आपके पिता का नाम क्या है “जी रतन” पर अब वह यहां नहीं रहते न जाने क्यों उन्होंने संन्यास ले लिया है। शिष्य रतन को भी जानता था कि रतन उनके ही आश्रम में विद्यानंद का शिष्य बन चुका था। और अब आश्रम में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहा था।

मालती के ठीक बगल रीमा बैठी हुई थी वह भी अब जवान हो चुकी थी वह कुछ-कुछ जानवी कपूर जैसे दिखाई पड़ रही थी। रीमा शायद सभी पाठकों को याद नहीं हो इसलिए बताना चाहूंगा कि यह कि वह लाली और स्वर्गीय राजेश (लाली के पूर्व पति) की पुत्री थी।

इसके ठीक बगल दूसरे सोफे पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसा दिखाई पढ़ने वाला और चेहरे पर एक शातिर मुस्कान लिए अपनी नज़रें झुकाए अपने पैरों से मजबूत संगमरमर को कुरेदने की कोशिश करता हुआ राजा बैठा था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे वह इस घर का ही नहीं था इस घर के बाकी सदस्य जितने शालीन और सुसंस्कृत दिखाई पड़ते थे राजा ठीक उनसे उलट था रंग रूप से और अपनी हरकतों से वह एक छपरी की भांति दिखाई पड़ता था फिर भी परिवार उसे बर्दाश्त करता आ रहा था। राजा वही था जो सुगना के गर्भ से ज़रूर जन्म लिया था पर उसके DNA में राजेश के अंश था। नियति स्वयं विस्मित थी कि फूल जैसी सुगना के गर्भ से यह कैसा पाप विधाता ने इस धरती पर लाया था।

राजा के ठीक बगल में रणबीर कपूर जैसी सुगठित शरीर और मासूम चेहरा लिए सूरज बैठा था। शिष्य ने एक नजर सूरज को देखा और अगले ही पल उसकी नज़रें एक बार फिर उसे आदम का चित्र की तरफ चली गई। सूरज हूबहू सरयू सिंह की तरह दिखाई पड़ने लगा था। शिष्य के मन में संशय उत्पन्न होता इससे पहले ही सोनी बोल उठी

“ वह सूरज के दादाजी हूं सरयू सिंह।”

शिष्य सूरज को एकटक देखता ही रह गया कितना सुंदर कितना मासूम और कितने तेजस्वी शरीर का मालिक था सूरज ईश्वर ने जैसे उसे बड़े सलीके से बनाया था और हो भी क्यों ना? सरयू सिंह जैसे तेजस्वी मर्द और फूल जैसी सुगना के गर्भ से जन्मा सूरज हर दिल अजीज था और सभी लड़कियों और युवतियों के लिए कामदेव का अवतार था।

इसी समय हवेली की बैठक में एक युवा युगल ने प्रवेश किया। लगभग 25 26 वर्ष की उम्र का हट्टा कट्टा मर्द , और साथ में बेहद शालीन और सुकुमार जवानी की दहलीज पर कदम रख रही किशोरी मधु। यह शख्स लाली और राजेश का पहला पुत्र राजू था और उसके साथ आई लड़की सुगना की पुत्री के रूप में पल रही मधु थी..

इस घर में युवा पीढ़ी में मधु शायद सबसे खूबसूरत थी अपने भाई सूरज से भी ज्यादा पर मर्द और औरत की खूबसूरती में तुलना करना कठिन था दोनों एक से बढ़कर एक थे। मधु सोनू और लाली के मिलन से जन्मी मधु ने यद्यपि लाली के गर्भ से जन्म लिया था परंतु वह शुरू से ही सुगना की पुत्री के रूप में पल रही थी। उसने सोनू की खूबसूरती पाई थी और सुगना के लालन-पालन से उसमें स्त्री सुलभ सारे गुण थे। अपनी कमनीय काया और मासूम चेहरे तथा कसे हुए बदन से वह एक आदर्श किशोरी की भांति दिखाई पड़ रही थी। मधु ने घर में अपरिचित व्यक्ति को देखकर तुरंत ही अपना दुपट्टा ठीक किया और तुरंत ही हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया।

सोनी ने एक बार फिर मधु और राजू का परिचय कराया धीरे-धीरे विद्यानंद के आश्रम से जुड़ी कई सारी बातें होने लगी पर शिष्य क्या ध्यान अब भी उस आदम का चित्र पर अटका हुआ था।

सरयू सिंह के आदमकद तस्वीर पर चढ़ी हुई रंग बिरंगी माला यह साबित कर रही थी कि वह अब इस दुनिया में नहीं है परंतु उनके जैसे तेजस्वी पुरुष की इस अवस्था में मृत्यु अकल्पनीय थी ऐसे बलिष्ठ और मर्दाना व्यक्तित्व के धनी सरयू सिंह की अकाल मृत्यु क्यों हुई यह प्रश्न बार-बार विद्यानंद के शिष्य को विचलित किए हुए था परंतु उसे पूछ अपने की हिम्मत शायद वह नहीं जुटा पा रहा था इधर परिवार के सदस्य बार-बार उसका ध्यान अपनी बातों से विद्यानंद के आश्रम के बारे में खींच लेते थे और वह मजबूरन अपनी जिज्ञासा को काबू कर सुगना और लाली के परिवार के बच्चों की जिज्ञासाओं को बुझाने में लग जाता।

इसे हवेली में पल रहे युवा जैसे-जैसे जवान हो रहे थे उनमें कामुकता का आना भी स्वाभाविक था लाली और राजेश का पुत्र राजू जो घर में सबसे बड़ा था न जाने कब उसका दिल मालती पर आ गया था। मालती जो जो रतन और बबीता की पुत्री थी और इस समय सुगना के परिवार में उसकी पुत्री के रूप में पल रही थी। राजू धीरे-धीरे मालती की ओर आकर्षित होता गया और दोनों एक दूसरे के करीब आते गए यद्यपि उनके इन संबंधों की भनक किसी को भी नहीं थी और परिवार में अब भी सब एक दूसरे के समक्ष मुंहबोले भाई बहन की तरह ही थे परंतु मौका पाते ही राजू और मालती एक हो जाते। राजू और मालती एक दूसरे से अपने जिस्मानी प्यास भी बुझाने लगे थे। राजू सोनू की ही भांति सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा था वह मालती को अपनी पत्नी बनने के लिए आतुर था परंतु बिना किसी उचित पद और अपने पैरों पर खड़े हुए वह यह बात अपने परिवार के समक्ष नहीं रख सकता था तब तक के लिए उसने मालती को मुंह बोली बहन जैसा ही रहने दिया पर वासना पूर्ति के दौरान दोनों एक दूसरे के लिए प्रेमी-प्रेमिका की तरह ही हो गए थे।

राजू और मालती का संबंध चाहे सबसे छिपा हो परंतु घर के सबसे हरामी इंसान राजा से छुपा रहना असंभव था उसे यह भनक लग चुकी थी।

सुगना और लाली बखूबी इस बात को जानते थे कि आग और फूंस एक दूसरे के समक्ष नहीं रखे जा सकते वह दोनों स्वयं ऐसे कामुक संबंधों की गवाह थी जो परिवार के बीच बड़ी आसानी से बन गए थे उन्हें इस बात का अंदेशा बखूबी था अतः उन्होंने घर की जो व्यवस्था बनाई थी उसके हिसाब से राजा और राजू को एक कमरा दिया गया था। ऐसा नहीं था कि घर में कमरों की कमी थी परंतु सुगना और लाली ने किसी को भी ऐसा एकांत नहीं देना चाहती थी जो उनके बीच कामुक संबंधों को बढ़ाने में मदद करें।

जहां एक तरफ राजू एक गंभीर और संजीदा व्यक्ति था वहीं दूसरी तरफ उसका छोटा भाई राजा अव्वल दर्जे का हरामि था उसका ना तो पढ़ाई में मन लगता और नहीं अपने व्यक्तित्व को निखारने में उसका तो जन्म जैसे छिछोरी हरकतें करने में के लिए ही हुआ था शायद सुगना और लाली ने राजू और राजा को साथ रखने का फैसला भी इसीलिए किया था ताकि राजा राजू से कुछ सीख सके और शायद पटरी पर वापस लौट सके।

इसी प्रकार मालती और राजू की बहन रीमा दोनों एक कमरे में रहती थी। मालती यह स्वीकार कर चुकी थी कि उसे आने वाले समय में एक ग्रहणी के रूप में ही रहना है और उसने अपनी पढ़ाई धीरे-धीरे कॉरेस्पोंडेंस कोर्स में कन्वर्ट कर ली थी वह अक्सर घर पर ही रहती और कॉलेज जाने के झंझट से बच चुकी थी दूसरी तरफ रीमा एक आधुनिक लड़की थी जो इस समय कॉलेज में पढ़ रही थी और अपनी जवानी को कॉलेज के लड़कों से बचाते हुए धीरे-धीरे और भी मादक बन रही थी रीमा अब तक पुरुष संसर्ग से अछूती थी परंतु स्त्री और पुरुष के बीच होने वाले समीकरण से पूरी तरह वाकिफ थी उसे पता था युवा और कामुक मर्दों से किस प्रकार डील करना है कितना समीप आना है और कितना दूर जाना है अपनी वासना पूर्ति के लिए उसने अभी खुद पर ही भरोसा कायम रखा था और उसके लिए हस्तमैथुन आम था वह अब अपने वांछित पुरुष की तलाश में अब भी भटक रही थी।

सूरज को जब-जब वह देखती उसे अपना आदर्श पुरुष दिखाई पड़ता पर सूरज उम्र में उससे छोटा था और घर में तीनों बहनों का प्यार था। पर दिल का क्या रीमा की कामुक कल्पनाओं में सूरज बरबस ही आ टपकता और वासना के उन्माद में रीमा उसे नहीं रोकती और न जाने क्यों उसका स्खलन पूरे उन्माद और आनंद के साथ पूर्ण होता।


रीमा को इस बात के लिए कोई आत्मग्लानि नहीं थी आखिर यह एक कल्पना थी वैसे भी सूरज उसका अपना सगा भाई नहीं था इसलिए कम से कम वह अपनी कल्पनाओं में इस काल्पनिक सुख को जी रही थी। वैसे उसका व्यवहार सूरज के प्रति एक हम उम्र छोटे भाई की तरह ही था। सूरज बात को इस बात का कतई इल्म नहीं था कि रीमा दीदी उसके बारे में ऐसा कुछ सोचती है।

मधु जो सुगना की सबसे लाडली थी और भविष्य में विद्यानंद की कही गई बातों के अनुसार सूरज की मुक्ति का मार्ग थी उसे सुगना ने बड़े नाजों से पाला था वह हमेशा उसे अपने साथ सुलाती और अपने साथ ही रखती मधु धीरे-धीरे जवान हो रही थी सुगना जब-जब मधु को देखती उसे आने वाले समय की कल्पना बरबस ही करनी पड़ती जब उसे अपने पुत्र सूरज और मधु के बीच होने वाले संभोग की गवाह बनना था शायद यही सूरज की मुक्ति का मार्ग था। सुगना ने न जाने मधु को पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थी और कितनी मनौतिया मांगी थी।

सुगना भली भांति यह जानती थी की यह दुष्कर कार्य उसे सफल करना था अन्यथा सूरज की मृत्यु के लिए उसे स्वयं घृणित पाप से गुजरना होगा जो वह कतई नहीं चाहती थी। अपने पुत्र से साथ संभोग………सुगना यह बात सोच भी नहीं सकती थी पर विधि के विधान को पढ़ने में वह अक्षम थी मधु उसकी पहली और आखिरी उम्मीद थी जिससे वह अपने पुत्र कॉल शाप मुक्त कर सकती थी।

बहरहाल नियति ने अपनी भी साथना बढ़ा दी थी आने वाले समय में उसे विधाता द्वारा लिखी गई लिखे गए सुगना के परिवार के भाग्य को मूर्त रूप लेते हुए देखना था।

लाली और सोनी का अपना अलग-अलग कमरा था वह दोनों अपने पतियों के साथ रहती थी पर अक्सर उन दोनों के पति बाहर ही रहते थे सोनू की पोस्टिंग बनारस से हटकर इलाहाबाद में थी और विकास अक्सर अपने व्यवसाय के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में घूमता रहता था।

घर में सिर्फ सूरज ही था जिसे एक अलग कमरा दिया गया था शायद सबका विश्वास सूरज पर था और इस पर किसी ने आपत्ति भी नहीं की थी। सूरज डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था वह एक होनहार लड़का था और सर्वगुण संपन्न था पर हाय रे दुर्भाग्य न जाने उसे कौन सा शाप लगा था युवावस्था की दहलीज पर पहुंचने के बावजूद भी उसके कामांग में कोई हलचल नहीं थी। सूरज खुद डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ने के बावजूद इस बात का उत्तर ढूंढ नहीं पा रहा था कि क्यों उसके लिंग में कोई उत्तेजना क्यों नहीं होती? ऐसा नहीं था कि उसका लण्ङ सामान्य नहीं था अपितु उसका लंड बेहद ही आकर्षक और सुडौल था पर उसमें तनाव नहीं आता था। शायद यह शाप का ही असर था । परंतु सूरज इस शाप से कतई अनजान था । लिंग में तनाव नहीं आने से बात उसे बार-बार खा जा रही थी।

उसके मन में अब यह धीरे-धीरे तनाव का कारण बन रहा था परंतु यह बात ऐसी थी कि उसे वह किसी से साझा भी नहीं कर सकता था अपने मृदुल स्वभाव गठीले शरीर और सुंदर तेजस्वी चेहरे से कई लड़कियों काचहेता था परंतु वह अपनी कमी को जानता था और किसी भी लड़की के समीप आने से घबराता था यद्यपि इस समय उसे पढ़ाई का सहारा था जिसके सहारे वह अपना समय व्यतीत करता परंतु मन के होने किसी ने किसी कोने में यह बात उसे खा जा रही थी।

बैठक कक्ष से बच्चे एक-एक करके अपने अपने कार्यों में तल्लीन हो गए और विद्यानंद के शिष्य से बात करने के लिए अब सिर्फ सोनी और सुगना ही कमरे में बच गए थे लाली चाय पान के प्रबंध के लिए रसोई कक्ष में थी।

शिष्य विद्यानंद के शिष्य से अब और उत्सुकता बर्दाश्त नहीं हुई उसने अपना ध्यान एक बार फिर सरयू सिंह के चित्र की तरफ किया और पूरी संगीदगी से सुगना से पूछा

इन दिव्य पुरुष की अकाल मृत्यु कैसे हुई …कृपया मुझे सच बताइएगा। सुगना और सोनी को शिष्य से अंतिम शब्द की उम्मीद नहीं थी उसने सच शब्द पर विशेष जोर दिया था।

कमरे में जैसे सन्नाटा पसर गया सोनी और सुगना एक दूसरे को देख रहे थे उनके होंठ अचानक सूख गए…

इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन था जो उत्तर अब तक परिवार बाकी सब को देता आया था वह बात न जाने क्यों आज सोनी और सुगना के मुख से नहीं निकल रही थी।

दोनों एक दूसरे को क्यों किमकर्तव्य विमूढ़ भाव से देख रहे थे हलक से आवाज निकलने को तैयार न थी तभी लाली कमरे में अपने हाथों में छाया की तश्तरी लिए हुए अंदर आई और सोनी और सुगना को इस विषम स्थिति से बचा लिया विद्यानंद के शिष्य को चाय देते हुए कहा…

महाराज रतन जी के बारे में बताइए कैसे हैं वह। विद्यानंद का शिष्य लाली के प्रश्न में उलझा गया। उधर सुगना का कलेजा धक-धक कर रहा था उसे दीपावली का वह कल दिन याद आ रहा था जब सरयू सिंह ने अंतिम सांस ली थी सुगना का कलेजा मुंह को आने लगा। सोनी की भी हालत खराब थी सुगना से और बर्दाश्त नहीं हुआ वह बैठक कब से उठकर अपने कक्ष की ओर जाने लगी उसने शिष्य से अनुमति लेना भी उचित न समझा । लाली ने सुगना की स्थिति को महसूस कर सोनी से पूछा क्यों क्या हुआ सुगना की तबीयत ठीक तो है ना। सोनी ने लाली के प्रश्न का फायदा उठाया और वह स्वयं उठती हुई बोली देखकर आती हूं ….सोनी सुगना के पीछे-पीछे उसके कक्ष में आ गई।

लाली के प्रश्न का उत्तर देने के बाद शिष्य ने जो प्रश्न सुगना और सोने से किया था उसने वही प्रश्न लाली के समक्ष दोहरा दिया।

लाली मैं इधर-उधर देखा और धीमे स्वर में सरयू सिंह के निधन का कारण शिष्य को बताने लगे..

लाली सच्चाई से अनभिज्ञ थी उसे उतना ही ज्ञात था जितना सभ्य समाज के लिए जरूरी था सरयू सिंह के पाप सोनी और सुगना के हृदय में दफन थे.. जो अपनी यादों में कोई उस काले दिन को याद कर रही थी। जिसने उनका पूरा जीवन ही बदल दिया था।

शेष अगले भाग में…
 
भाग 154

लाली के प्रश्न का उत्तर देने के बाद शिष्य ने जो प्रश्न सुगना और सोने से किया था उसने वही प्रश्न लाली के समक्ष दोहरा दिया।

लाली मैं इधर-उधर देखा और धीमे स्वर में सरयू सिंह के निधन का कारण शिष्य को बताने लगे..

लाली सच्चाई से अनभिज्ञ थी उसे उतना ही ज्ञात था जितना सभ्य समाज के लिए जरूरी था सरयू सिंह के पाप सोनी और सुगना के हृदय में दफन थे.. जो अपनी यादों में कोई उस काले दिन को याद कर रही थी।


अब आगे..

हवेली में विद्यानंद का शिष्य अब प्रस्थान की तैयारी में था उसने जो प्रश्न पूछा था उसका उत्तर उसे अब तक नहीं मिला था लाली ने जो उसे बताया था वह अधूरा सत्य था बहरहाल उसे दान दक्षिणा देकर विदा कर दिया गया पर उसने लाली और सुगना के मन में खलबली मचा दी थी।

“दीदी विद्यानंद के शिष्य आखिर उ सब कहे पूछता रहले ……. सोनी ने आज आशंकित मन से पूछा।

“हमारा का मालूम…” सुगना सच में अनभिज्ञ थी कि अचानक विद्यानंद का शिष्य आज कई वर्षों बाद उनके घर पधार और उसने यह प्रश्न किया। उसके सच शब्द पर विशेष जोर देने का आशय निश्चित ही गूढ़ था परंतु सुगना और सोनी दोनों इसका आशय नहीं समझ सकी।

सरयू सिंह की मृत्यु कैसे हुई यह बात सिर्फ सुगना और सोनी को पता थी उनकी आंखों के समक्ष उस दिन की घटनाएं एक-एक करके घूम गई परंतु उनके आधर न खुले।

विद्यानंद के शिष्य का हवेली में आगमन सुगना के मन में बीते समय की कई स्मृतियाँ जगा गया। विद्यानंद की शिक्षाएँ, उनके सिद्धांत और उनसे जुड़ी भविष्यवाणियाँ एक बार फिर उसके मन में गूंज उठीं। सुगना के लिए संसार में यदि कुछ सबसे महत्वपूर्ण था, तो वह था उसका पुत्र सूरज। अब उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि सूरज एक सामान्य, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सके तथा अपने वंश को आगे बढ़ा सके।

सूरज अब युवावस्था की दहलीज़ पर कदम रख चुका था। पढ़ाई में वह सदैव अव्वल रहा, शरीर से भी सुदृढ़ और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। परंतु उसके भीतर एक ऐसा मौन संघर्ष चल रहा था, जिसे वह न तो किसी से कह पाता था और न ही स्वयं पूरी तरह समझ पाता था। मित्रों के बीच जब किशोरावस्था और युवावस्था से जुड़ी सामान्य बातें होतीं, तो वह चुपचाप स्वयं को अलग कर लेता।

सूरज की कद काठी और सुडौल शरीर उसे एक मजबूत युवा के रूप में दर्शाते परंतु जांघों के बीच वह न जाने किस श्राप से ग्रसित था कि एक खूबसूरत लिंग का स्वामी होने के बावजूद अब तक वह उसमें तनाव या संवेदना महसूस नहीं कर पाया था।


ऐसा नहीं है कि उसने अपने हाथों से लिंग मर्दन की कोशिश नहीं परंतु जब लिंग में उत्तेजना ही ना हो तो मैं मैथुन का प्रश्न ही नहीं उठता। सूरज मन ही मन परेशान हो चुका था उसने तरह-तरह की किताबें पड़ी अपने प्रोफेसर से इस प्रकार की समस्या के बारे में बात करने की कोशिश की। अपनी पहचान छुपाए रख कर उसका इलाज खोजना दुरूह कार्य था। कोई भी उपाय काम नहीं आ रहा था समय बीतता गया और अब यह सूरज के तनाव का कारण बनने लगा था।

सूरज को कभी-कभी अपने बचपन की धुंधली याद आती जब उसकी नून्नी उसकी मौसी सोनी के अंगूठा सहलाने के कारण तनाव में आ जाती थी और फिर न जाने कैसे शांत हो जाती। यह यादें इतनी धुंधली थी कि सूरज को उन पर यकीन भी नहीं था।

उसने पुस्तकों में समाधान खोजने की कोशिश की, शिक्षकों से परोक्ष रूप से प्रश्न करने का साहस भी जुटाया, किंतु अपनी पहचान और संकोच के कारण वह कभी खुलकर बात नहीं कर सका। समय बीतता गया और यह अनिश्चितता धीरे-धीरे उसके मन पर बोझ बनने लगी।

उधर सुगना, जिसने स्वयं वैराग्यपूर्ण जीवन अपना लिया था, अपने पुत्र के मन में चल रहे इस द्वंद्व को समझ नहीं पा रही थी। उसे इतना आभास अवश्य था कि विद्यानंद द्वारा कही गई कुछ बातें अभी अधूरी थीं और समय आने पर उसे अपनी आंखों के समक्ष वह पाप घटित होते हुए देखना होगा। पर वह समय अभी दूर था। सूरज अपनी पढ़ाई में व्यस्त था और सुगना उसके भीतर उठ रहे प्रश्नों से अनजान।

इधर कॉलेज में परीक्षा परिणाम घोषित होने का दिन आ पहुँचा। पूरे परिसर में उत्साह और आशंका का मिला-जुला माहौल था। आज सूरज के कॉलेज में विद्यार्थीयो की की गई मेहनत का रिजल्ट आने वाला था सभी के मन में उत्साह था और जो कमजोर थे उनके मन में भय। जैसे ही रामू चपरासी नोटिस बोर्ड की ओर अपने हाथों में कुछ कागज लिए आगे बढ़ा विद्यार्थियों ने उसे घेर लिया । उसने अपने हाथ झटक और बोला

चुपचाप दूर खड़े जाओ वरना फिर वापस चला जाऊंगा

उसकी झल्लाहट स्वाभाविक थी। जिस तरह से बच्चों ने उसे घेर रखा था उसे रिजल्ट को नोटिस बोर्ड पर चिपकाने में दिक्कत महसूस हो रही थी। आखिरकार बच्चों ने अपना गोल घेरा थोड़ा बड़ा किया और रामू चपरासी ने एक-एक करके सारे पन्ने नोटिस बोर्ड पर लगा दिए।

एक बार फिर सूरज ने पूरे कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया। शिक्षक और विद्यार्थी सभी उसे बधाइयाँ देने लगे।

वह सचमुच ईश्वर की विशेष कृति प्रतीत होता था—तेज़ बुद्धि, आकर्षक व्यक्तित्व और गंभीर स्वभाव। वह कम बोलता था, पर उसकी उपस्थिति ही बहुत कुछ कह जाती थी। कॉलेज में बूढ़े बरगद के नीचे बैठी कुछ लड़कियां आपस में बातें कर रही थी

“यार, यह सूरज किसी से दोस्ती क्यों नहीं करता?”


पहली लड़की ने कहा।

“करता तो है, तुझसे बात नहीं करता क्या?”


दूसरी ने जवाब दिया।

“अरे, मैं वैसी वाली दोस्ती की बात कर रही हूँ। आज तक मैंने उसे किसी लड़की के साथ अकेले नहीं देखा।”

तभी तीसरी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई,


“हाँ, यह बात तो सच है। आज तक मैंने सूरज की गर्लफ्रेंड के बारे में कुछ नहीं सुना।”

“लगता है सूरज को आसमान से उतरी अप्सरा चाहिए, तभी उसने आज तक किसी लड़की को प्रपोज़ तक नहीं किया।”

“रोजी, एक बार तू ही उससे दोस्ती बढ़ा न। वैसे भी तू इस कॉलेज की सबसे हॉट लड़की है, और मुझे पता है तू कहीं-न-कहीं यही चाहती है। आजकल लड़का ही क्यों, लड़की भी तो सामने से कदम बढ़ा सकती है।”

रोजी वाकई बेहद खूबसूरत थी—गोरा रंग, नीली आँखें, कंधों तक लहराते भूरे बाल, गालों पर हल्की लाली और चेहरे पर आत्मविश्वास। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि किसी भी लड़के की हिम्मत नहीं होती थी कि वह आसानी से उसके पास जाकर नज़दीकियाँ बढ़ाने की कोशिश करे।

रोजी ने एक लंबी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोली,


“मैं खुद से तो नहीं जाऊँगी, पर अगर वह आया तो रोकूँगी भी नहीं।”

यह कहते हुए उसके चेहरे पर हल्की लालिमा फैल गई।

फिर वह उठ खड़ी हुई और बोली,


“चलो, क्लास का टाइम हो रहा है। वैसे भी सूरज का नाम ले-लेकर तुम लोगों ने इसकी बेचैनी बढ़ा दी है।”

रोजी ने उस लड़की के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, जो अब तक चुपचाप सब सुन रही थी और मन-ही-मन सूरज के बारे में सोच रही थी। उसकी बुर पनिया चुकी थी पर उसे पता था कि उसका प्यार एकतरफा है और सूरज शायद उसके भाग्य में नहीं।

उस लड़की ने शर्माते हुए रोजी के पेट पर हल्का सा मुक्का मारा और बोली,


“ज़्यादा मत बन, अभी तेरी हालत भी मेरी जैसी ही है।”

बात कुछ हद तक सच थी। रोजी सूरज के बारे में सोचती ज़रूर थी, पर वह आत्मसम्मान से भरी हुई थी और खुद आगे बढ़कर उसे प्रपोज नहीं करना चाहती थी।

क्लास का समय होने पर सब अपनी-अपनी जगह बढ़ चले। सूरज हमेशा की तरह शांत और गंभीर मुद्रा में आगे बढ़ गया—अपने भीतर के प्रश्नों और बाहर की दुनिया की अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता हुआ।

परिणाम के दिन के बाद कॉलेज का वातावरण फिर से अपनी सामान्य गति में लौट आया, पर सूरज के भीतर कुछ बदल चुका था। प्रथम आने की खुशी क्षणिक थी; उसके पीछे छिपी बेचैनी अब और स्पष्ट होने लगी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी सफलता, उसका अनुशासन और उसका गंभीर व्यक्तित्व—सब कहीं न कहीं किसी अनकहे भय को ढँकने का प्रयास भर हैं।

उस शाम वह देर तक कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा रहा। किताबों की कतारें, शांत वातावरण और पन्नों की सरसराहट—यह सब जो उसे सुकून देते थे आज उसका मन उसमें नहीं लग रहा था। उसने मनोविज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी कुछ किताबें निकालीं। शब्दों के बीच वह अपने ही प्रश्न ढूँढ रहा था, पर उत्तर अब भी धुंधले थे। वह बार-बार ही सोच रहा था कि आखिर उसके लिंग में तनाव क्यों नहीं आता पर जितनी भी कामुक कल्पनाएं करता पर परिणाम यस का तस। जितना वह पढ़ता, उतना ही उसे एहसास होता कि कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं, जिनका समाधान केवल पुस्तकों में नहीं मिलता।

उधर हवेली में सुगना भी असमंजस में थी। सूरज के चेहरे पर बढ़ती गंभीरता उसने महसूस तो की थी, पर उसका कारण समझ नहीं पा रही थी। उसने कई बार चाहा कि बेटे से खुलकर बात करे, पर हर बार शब्द गले में अटक जाते। माँ होने के बावजूद कुछ प्रश्न ऐसे थे, जिन्हें पूछने का साहस वह भी नहीं जुटा पा रही थी।

उसे विद्यानंद के उपदेश की एक बात याद आ गई


“हर समस्या का समाधान समय पर नहीं, सही समय पर होता है।” यह वाक्य उसके मन में देर तक गूंजता रहा।

अगले दिन कॉलेज में रोज़ी ने पहली बार सूरज से स्वयं बात करने का निश्चय किया। यह कोई प्रस्ताव नहीं था, न ही कोई बड़ा कदम—बस एक साधारण-सी बातचीत। कैंटीन के पास उसने सूरज को अकेले खड़े देखा और पास जाकर बोली,


“कांग्रेसुलेशंस, सूरज। तुम हर बार सबको पीछे छोड़ देते हो।”

सूरज ने हल्की मुस्कान के साथ धन्यवाद कहा। उसकी आँखों में विनम्रता थी, पर वही परिचित दूरी भी। बातचीत कुछ मिनट चली—पढ़ाई, कॉलेज और आने वाले इंटर्नशिप के बारे में। रोज़ी को लगा कि सूरज बोलता कम है, पर जब बोलता है तो बहुत सोच-समझकर।

उस छोटी-सी बातचीत के बाद सूरज के मन में हलचल थी। आज पहली बार रोगी ने उसे अकेले में इतनी देर तक बात की थी। उसे एहसास हुआ कि लोग उससे जुड़ना चाहते हैं, पर वह स्वयं ही किसी अदृश्य दीवार के पीछे खड़ा रहता है। क्या यह दीवार उसने स्वयं बनाई है, या यह किसी पुराने डर की देन है—यह प्रश्न उसे भीतर से कचोटने लगा। आज दोपहर में उसने रोजी के बारे में सोचा उसे अपने ख्वाबों की अप्सरा बनाने की कोशिश की जो उसमें कामुकता जागृत कर सके पर परिणाम वही


ढाक के तीन पात

शाम को कमरे में लौटकर उसने खिड़की से बाहर देखा। आसमान में धीरे-धीरे अंधेरा उतर रहा था। उसे लगा जैसे उसका जीवन भी किसी संध्या काल में ठहरा हुआ है—जहाँ न पूरी रोशनी है, न पूरा अंधेरा।

उसी क्षण उसने एक निर्णय लिया। अब वह अपने प्रश्नों से भागेगा नहीं। चाहे समय लगे, चाहे रास्ता कठिन हो, पर उसे स्वयं को समझना होगा। यह केवल उसकी समस्या नहीं थी; यह उसकी पहचान, उसका भविष्य और उसके जीवन की दिशा से जुड़ा प्रश्न था।

दूर हवेली में बैठी सुगना भी उसी रात अनजाने भय से घिरी हुई थी। माँ और पुत्र—दोनों अलग-अलग जगह, अलग-अलग कारणों से—एक ही सत्य के करीब बढ़ रहे थे। समय धीरे-धीरे अपने रहस्य खोलने वाला था।


उधर रोजी……घटनाक्रम को अपनी निगाहों से देख रही थी.

सूरज से हुई वह छोटी-सी बातचीत रोज़ी के मन में अपेक्षा से कहीं ज़्यादा देर तक ठहरी रही। उसे हैरानी इस बात की नहीं थी कि सूरज गंभीर है—यह तो सब जानते थे—हैरानी इस बात की थी कि उसकी आँखों में एक ऐसी दूरी थी, जो किसी घमंड से नहीं, बल्कि किसी गहरे आत्मसंघर्ष से उपजी लगती थी।

रोज़ी स्वयं को जानती थी। कॉलेज में उसका आत्मविश्वास, उसकी हँसी, और उसका खुलापन उसे भीड़ से अलग करता था। लोग उसे “हॉट”, “बोल्ड” और “आउटगोइंग” कहते थे, पर बहुत कम लोग जानते थे कि वह सामने वाले की चुप्पी को भी पढ़ने की कोशिश करती है। सूरज की चुप्पी उसे आकर्षित नहीं—उसे परेशान कर रही थी।

क्लास में बैठी वह बार-बार उसकी ओर देख लेती। सूरज हमेशा की तरह सामने की बेंच पर बैठा, नोट्स बनाता हुआ, जैसे बाकी दुनिया से उसका कोई सीधा सरोकार ही न हो। न लड़कियों की हँसी, न दोस्तों की चुहलबाज़ी—कुछ भी उसे विचलित नहीं करता था।


“कोई इतना अलग कैसे हो सकता है?”

यह सवाल रोज़ी के मन में बार-बार उठ रहा था।

उसने खुद से पूछा—


क्या यह उदासीनता है?

या कोई ऐसा बोझ, जिसे वह किसी को दिखाना नहीं चाहता?

रोज़ी को याद आया कि बातचीत के दौरान सूरज ने आँख मिलाकर बात तो की थी, पर उनमें एक अनकहा संकोच था। जैसे वह हर शब्द बोलने से पहले तय करता हो कि कितना कहना सुरक्षित है। यह सोचकर रोज़ी के भीतर एक अजीब-सी संवेदना जागी—यह आकर्षण नहीं था, यह जिज्ञासा भी नहीं थी; यह किसी को समझने की चाह थी।

शाम को हॉस्टल के कमरे में वह अपनी सहेलियों की बातें सुन रही थी। कोई किसी नए रिश्ते की चर्चा कर रही थी, कोई भविष्य की योजनाओं की। रोज़ी खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। उसे लगा कि सूरज इन सब बातों से बहुत दूर है, जैसे वह अपने ही रास्ते पर अकेले चल रहा हो।

उसी क्षण उसने तय किया—


वह उसे बदलने की कोशिश नहीं करेगी।

वह उसे अपनी तरह बनाने की ज़िद नहीं करेगी।

पर अगर सूरज कभी बोलना चाहे, तो वह सुनने के लिए मौजूद रहेगी।

अगले दिन उसने जानबूझकर सूरज के पास वाली सीट चुनी। कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ—बस नोट्स साझा किए गए, एक-दो औपचारिक वाक्य। पर रोज़ी ने महसूस किया कि सूरज की कठोर-सी दिखने वाली दुनिया में भरोसे के लिए बहुत कम जगह है, और वही जगह सबसे कीमती होती है।

उस शाम लौटते समय रोज़ी के मन में एक स्पष्ट भाव था—


यह कोई प्रेम-कथा की शुरुआत नहीं है।

यह किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे समझे जाने की ज़रूरत है।

और शायद, अनजाने में, रोज़ी उस कहानी का हिस्सा बन चुकी थी।

दूर कहीं सूरज अपने ही विचारों में उलझा था, और हवेली में सुगना आने वाले समय की आहट महसूस कर रही थी।


तीन अलग-अलग मन, तीन अलग-अलग दिशाएँ—पर मंज़िल शायद एक ही थी सूरज का पुरुषत्व जागृत करना

उस दिन कॉलेज से लौटते समय मौसम में अजीब-सी नमी थी। आसमान पर बादल थे, पर बारिश नहीं—जैसे कुछ बरसने से पहले खुद को रोक रहा हो। रोज़ी और सूरज लाइब्रेरी से साथ निकले थे। बातचीत सामान्य थी, पर खामोशियों में कुछ नया पल रहा था।

कॉलेज के पुराने बरगद के पास आकर वे रुक गए। यहाँ अक्सर छात्र बैठा करते थे, पर उस समय जगह खाली थी। रोज़ी ने पहली बार महसूस किया कि सूरज की चुप्पी अब उसे अजनबी नहीं लग रही थी। उसमें एक भरोसा था—संकोच के पीछे छिपी हुई सच्चाई।

“तुम बहुत कुछ अपने भीतर रखते हो,”


रोज़ी ने धीरे से कहा।

सूरज ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। उस दृष्टि में प्रश्न भी था और अनुमति भी—जैसे वह कह रहा हो कि अगर कुछ कहना है, तो अभी।

रोज़ी ने एक क्षण का निर्णय लिया। न जल्दबाज़ी थी, न नाटकीयता। उसने धीरे से आगे बढ़कर सूरज के गाल को हल्के से छुआ और फिर उसके होंठों पर एक क्षणिक, सधा हुआ चुम्बन रख दिया।

वह चुम्बन छोटा था, पर उसका प्रभाव गहरा।

सूरज जैसे ठिठक गया। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं था—यह पहली बार था जब किसी ने उसकी दुनिया में बिना सवाल किए, बिना अपेक्षा रखे, इतनी निकटता दिखाई थी। उसके भीतर कोई दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। यह शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक जागरण था—अपने अस्तित्व को स्वीकार किए जाने का।

रोज़ी पीछे हटी। उसकी आँखों में कोई चुनौती नहीं थी, सिर्फ़ स्नेह और सम्मान।

“अगर तुम्हें असहज लगा हो, तो—”


उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

“नहीं,”


सूरज ने पहली बार तुरंत उत्तर दिया।

“ऐसा नहीं है।”

उसकी आवाज़ में कंपन था, पर डर नहीं। उस क्षण सूरज ने महसूस किया कि उसके भीतर बहुत समय से सोई हुई संवेदनाएँ—स्पर्श, अपनापन, और स्वीकार्यता—धीरे-धीरे जाग रही हैं। उसने आगे बढ़कर रोजी को अपने आलिंगन में ले लिया और उसके अधरों को बेतहाशा चूमने लगा । रोजी को इतने आत्मीय और गहरे चुंबन की आशा नहीं थी पर जब सूरज स्वयं आगे बढ़कर उसके अधरों को चूम रहा था रोजी ने भी उसका भरपूर साथ दिया । चुंबन की गहराई बढ़ती गई इसका असर रोजी पर तो हुआ पर सूरज के लिंग में उत्तेजना अब भी नहीं आई।

रोजी अपनी वासना पर काबू करते हुए सूरज से अलग हो गई वह इस स्थिति में अब एक पल भी रुकना नहीं चाहती थी उसका दिल तेजी से धड़क रहा था उसने अपनी गर्दन झुका ली अपना बैग गले में लटकाया और बोली

“फिर मिलती हूं “ वह तेज कदमों से सूरत से दूर होती गई… इधर सूरज का मन दुखी हो चला था आज रोजी ने जिस प्रकार उसका साथ दिया था और इतना गहरा चुंबन लिया था इसमें तो किसी भी युवा के लिंग में तनाव भर जाता पर सूरज का श्राप उसे खा जा रहा था। रोजी का यह गहरा और आत्मीय चुंबन भी सूरज के लिंग में उत्तेजना भरने में नाकामयाब रहा।

अगली सुबह दोनों फिर मिले वे दोनों कुछ देर चुप खड़े रहे। न कोई वादा, न कोई परिभाषा। सिर्फ़ एक समझ—कि कुछ बदला है, और यह बदलाव दबाव से नहीं, भरोसे से आया है।

रोज़ी मुस्कुराई।


“जब बोलना चाहो, मैं सुनूँगी,”

कहकर वह वहाँ से चली गई।

सूरज देर तक वहीं खड़ा रहा। बरगद के पत्ते हिल रहे थे।

बरगद के नीचे घटित उस क्षण के बाद सूरज देर तक वहीं खड़ा रहा। मन में हलचल थी—विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ—सब एक साथ उमड़ रही थीं। रोज़ी का चुम्बन कोई साधारण घटना नहीं था; उसने भीतर कुछ छुआ था, यह सूरज भली-भाँति महसूस कर रहा था।

पर उसी के साथ एक और सत्य भी उतना ही स्पष्ट था।

भावनात्मक स्पर्श के बावजूद, उसके शरीर ने कोई उत्तर नहीं दिया।

सूरज ने स्वयं को टटोलने की कोशिश नहीं की—उसे उसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी। वह जानता था। यह मौन, यह शून्य, उसके लिए नया नहीं था। बस इस बार, यह और अधिक स्पष्ट हो गया था।

कमरे में लौटकर वह देर तक आईने के सामने खड़ा रहा। वही चेहरा, वही सुदृढ़ काया—सब कुछ सामान्य था। फिर भी भीतर कहीं कुछ ऐसा था, जो प्रतिक्रिया देना भूल चुका था।


“क्या मेरे भीतर ही कोई कमी है?”

यह प्रश्न अब पहली बार डर के साथ नहीं, बल्कि स्वीकार्यता के साथ उठा।

उसने खुद से झूठ नहीं बोला। रोज़ी के प्रति आकर्षण था—सम्मान था, अपनापन था। उसका स्पर्श उसे अच्छा लगा था। मन ने प्रतिक्रिया दी थी, पर शरीर अब भी किसी अनजाने बंधन में बंधा हुआ था।

उस रात उसे नींद नहीं आई।

उसने फिर से चिकित्सा की किताबें खोलीं, पर इस बार पढ़ने का तरीका अलग था। अब वह समाधान नहीं, समझ ढूँढ रहा था। उसे एहसास होने लगा कि यह समस्या केवल शारीरिक नहीं हो सकती—यह कहीं गहरे जुड़ी है, स्मृतियों से, मन के कोनों में दबी किसी अनुभूति से।

दूसरी ओर, रोज़ी भी बेचैन थी।

उसने सूरज की आँखों में उस क्षण कुछ देखा था—घबराहट नहीं, झिझक नहीं—बल्कि एक शांत उलझन। उसे यह भी महसूस हुआ था कि सूरज पीछे नहीं हटा, अपितु आगे बढ़ा। सूरज ने आगे बढ़कर जिस प्रकार मुनि के आधारों पर गहरा चुंबन लिया था बल्कि लेते ही रहा था उसने स्वयं रोगी को उत्तेजित कर दिया था।

रोज़ी ने खुद से एक वादा किया—


वह जल्दबाज़ी नहीं करेगी। उसे स्वयं अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना था पर सूरज का साथ उसे अच्छा लगने लगा था।

हवेली में, उसी रात, सुगना को अचानक एक अजीब-सा भारीपन महसूस हुआ। बिना किसी स्पष्ट कारण के। उसने दीपक के सामने बैठकर आँखें मूँद लीं। विद्यानंद की आवाज़ जैसे उसके भीतर गूँज उठी—


“जब संकेत मिलने लगें, तब समझो समय निकट है।”

सूरज के भीतर भावनाएँ जाग रही थीं,


रोज़ी धैर्य सीख रही थी,

और सुगना को पहली बार लग रहा था कि जो वह टालती आ रही थी—अब उससे मुँह मोड़ना संभव नहीं।

यह चुप्पी स्थायी नहीं थी।


यह किसी परिवर्तन से पहले का मौन थी।
 
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भाग 155


हवेली में, उसी रात, सुगना को अचानक एक अजीब-सा भारीपन महसूस हुआ। बिना किसी स्पष्ट कारण के। उसने दीपक के सामने बैठकर आँखें मूँद लीं। विद्यानंद की आवाज़ जैसे उसके भीतर गूँज उठी—

“जब संकेत मिलने लगें, तब समझो समय निकट है।”

सूरज के भीतर भावनाएँ जाग रही थीं,

रोज़ी धैर्य सीख रही थी,

और सुगना को पहली बार लग रहा था कि जो वह टालती आ रही थी—अब उससे मुँह मोड़ना संभव नहीं।



यह चुप्पी स्थायी नहीं थी।

यह किसी परिवर्तन से पहले का मौन थी


अब आगे…

विद्यानंद के शिष्य ने सुगना को अपने अतीत में झांकने के लिए मजबूर कर दिया था……

उस दिन सलेमपुर में माहौल गमगीन था सलेमपुर के हीरो सरयू सिंह आज श्मशान घाट में कफन ओढ़े मुखाग्नि का इंतजार कर रहे थे सलेमपुर की सारी जनता अपने सम्मानित सरयू सिंह को विदा करने श्मशान घाट पर उमड़ी हुई थी। शायद यह पहला अवसर था जब श्मशान घाट पर इतनी भीड़ देखी जा रही थी पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी पहली बार श्मशान घाट पर उपस्थित हुई थी सुगना कजरी और पदमा का रो रो कर बुरा हाल था।

चिता सजाई जा रही थी सभी अपनी अपनी बुद्धि और प्रेम के हिसाब से सरयू सिंह को अंतिम सम्मान देने का प्रयास कर रहे थे कोई चिता के चरण छूता कोई फूल डालता… धीरे-धीरे मुखाग्नि का समय करीब आ रहा था।

संग्राम सिर्फ उर्फ सोनू अब भी दुविधा में था। वह एक तरफ पत्थर की शिला पर बैठा आंखे बंद किए धरती में अपने अंगूठे से न जाने क्या कुरेद रहा था और उसे छोटे से बने गड्ढे में न न जाने क्या देख रहा था…

गांव के सरपंच ने आखिरकार जन समाज के समक्ष यह बात रखी की सरयू सिंह को मुखाग्नि कौन देगा?

"सरयू सिंह कि कोई संतान तो है नहीं पर सोनू भैया इनके पुत्र जैसे ही हैं मुखाग्नि इन्हीं को देना चाहिए" गांव के एक युवा पंच ने अपनी बात रखी।

सोनू दूर बैठा यह बात सुन रहा था उसका कलेजा दहल उठा सोनू भली-भांति जानता था की सुगना सरयू सिंह की पुत्री है यह अलग बात थी की उसका जन्म सरयू सिंह के नाजायज संबंधों की वजह से हुआ था परंतु सुगना के शरीर में सरयू सिंह का ही खून था सोनू से रहा न गया सोनू ने पूरी दृढ़ता से कहा..

"सुगना दीदी ने जीवन भर एक पुत्री की भांति सरयू चाचा की सेवा की है मुखाग्नि सुगना दीदी देंगी.."

सोनू का कद और उसकी प्रतिष्ठा अब इतनी बढ़ चुकी थी कि उसकी बात काट पाने का सामर्थ गांव के किसी व्यक्ति में न था। सभी एक बारगी महिलाओं के झुंड की तरफ देखने लगे… बात कानो कान सुगना तक पहुंच गई..

सुगना पहले ही दुखी थी…यह बात सुनकर उसकी भावनाओं का सैलाब फुट पड़ा और एक बार वह फिर फफक फफक कर रोने लगी… अब तक सोनू उसके करीब आ चुका था उसने सुगना को अपने गले से लगाया और उसे समझाने के लिए उसे भीड़ से हटाकर कुछ दूर ले आया..

"सोनू ई का कहत बाड़े…? हम मुंह मे आग कैसे देब?

"काहे जब केहू के बेटा ना रहे ता बेटी ना दीही?"

सोनू ने स्वयं प्रश्न पूछ कर सुगना को निरुत्तर कर दिया।

"दीदी याद बा हम तहरा के बतावले रहनी की तू हमर बहिन ना हाउ "

सुगना को जौनपुर की वह रात याद आ गई जब सोनू ने संभोग से पहले सुखना के कानों में यह बात बोली थी और मिलन को आतुर सुगना को धर्म संकट से बाहर निकाल लिया था।

सुगना का कलेजा धक धक करने लगा…

रक्त का प्रवाह तेजी से शरीर में बढ़ने लगा परंतु दिमाग में झनझनाहट कायम थी सुगना सोनू की तरफ आश्चर्य से देख रही थी..

"दीदी सरयू चाचा ही ताहार बाबूजी हवे। तू उनकरे बेटी हउ “ एकरा से ज्यादा हमरा से कुछ मत पूछीह…"

सुगना के कान में जैसे पारा पड़ गया हो वह हक्की बक्की रह गई आंखें सोनू के चेहरे और भाव भंगिमा को पढ़ने की कोशिश कर रही थी परंतु कान जैसे और कुछ सुनने को तैयार ना थे।

"ते झूठ बोलत बाड़े ऐसा कभी ना हो सके ला?"

सोनू भी यह बात जानता था कि सुगना दीदी के लिए इस बात पर विश्वास करना कठिन होगा इसलिए उसने बिना देर किए सुगना के हाथों को अपने हाथों में ले लिया और बोला

" दीदी हम तोहार कसम खाकर कहत बानी .. तू सरयू चाचा की बेटी हाउ .. घर पहुंच गए हम तोहरा के डॉक्टर के रिपोर्ट भी दिखा देहब अभी हमारी बात मान ल।"

सुगना को यह अटूट विश्वास था कि सोनू उसकी झूठी कसम कतई नहीं कह सकता था जो बात सोनू ने कही थी उस पर विश्वास करने के अलावा सुगना के पास कोई और चारा ना था। जैसे ही सुगना के दिमाग में सरयू सिंह के साथ बिताए कामुक पलों के स्मृतिचिन्ह घूमें सुगना बदहवास हो गई…अपने ही पिता के साथ….वासना का वो खेल….. हे भगवान सुगना चेतना शून्य होने लगी… और खुद को संभालने की नाकामयाब कोशिश करते नीचे की तरफ गिरने लगी सोनू ने उसे सहारा दिया परंतु सुगना धीरे-धीरे जमीन पर बैठ गई…

कुछ दूर सोनू और सोनू को बातें करते वे देख रही महिलाएं भागकर सुगना की तरफ आई और उसे संभालने की कोशिश करने लगी सुगना के मुंह पर पानी के छींटे मारे गए और सुगना ने एक बार फिर अपनी चेतना प्राप्त की कलेजा मुंह को आ रहा था और आंखों से अश्रु धार फूट रही थी..

उसे सरयू सिंह का प्यार भरपूर मिला था एक ससुर के रूप में भी, एक प्रेमी के रूप में भी और बाद में एक पिता के रूप में भी…

सुगना को अंदर ही अंदर ही अंदर यह बात खाए जा रही थी कि आज सरयू सिंह की अकाल मृत्यु के पीछे कहीं ना कहीं कारण वह स्वयं थी…

सुगना पथराई आंखों से सरयू सिंह की चिता को धधकते हुए देख रही थी। जिसे अब तक उसके जीवन को एक खूबसूरत आयाम दिया था और सूरज के रूप में जीने का आधार दिया था वह यह लोग को त्याग कर परलोक की तरफ जाने के लिए हवा में विलीन हो रहा था।

सरयू सिंह के साथ बिताए गए पाल एक-एक करके उसकी आंखों के सामने घूम रहे थे …सरयू सिंह के साथ बिताए गए वह अंतरंग दृश्य पर अब उसे पाप स्वरूप प्रतीत हो रहे थे सोनू की बातें उसके दिमाग में हथौड़े की तरह प्रहार कर रही थी सरयू सिंह उसके पिता थे यह बात वह पचा ना पा रही थी आखिरकार जिस के साथ उसने प्यार और वासना का खेल जी भर कर खेल हो वह उसका पिता कैसे हो सकता था पर सुगना को क्या पता था वह स्वयं नियत के हाथों की एक कठपुतली थी….

सोनू कभी चिता को देखता कभी सुगना को…सुगना को इतना व्यग्र उसने कभी ना देखा था.

श्मशान घाट पर भीड़ धीरे-धीरे घट रही थी ज्यों ज्यों चिता कि अग्नि धीमी पड़ती गई शमशान घाट की भीड़ भी छटती गई।

चिता की आग शांत होते होते सरयू सिंह जैसा अद्भुत व्यक्तित्व और अद्भुत काया का धनी व्यक्ति हड्डियों के चंद टुकड़ों में तब्दील हो चुका था सुबकते हुए सोनू ने सरयू सिंह की अस्थियों को अस्थि कलश में एकत्रित किया और अपनी सुगना तथा परिवार के साथ थके हुए कदमों से वापस घर की तरफ चल पड़ा।

जहां सोनू और सुगना जा रहे थे वहां जाने का मन न तो सुगना का था और सोनू का। सलेमपुर का वह घर सरयू सिंह के बिना अधूरा था। सुगना के पैर तो जैसे पत्थर हो गए एक एक कदम पहाड़ जैसा लग रहा था सोनू बार-बार सुगना को आश्वस्त करता परंतु उसे सुगना और सरयू सिंह के बीच उन अंतरंग संबंधों की जानकारी न थी। सुगना अपराध बोध में और भी दब चुकी थी सोनी और सरयू सिंह के बीच जो हुआ था शायद वह एक और पाप था जिसकी भागीदार सुगना स्वयं बनी थी और शायद इसीलिए वह स्वयं को गुनाहगार मान रही थी। क्यों उसने सरयू सिंह को सोनी से मिलन के लिए तैयार किया? क्यों वह उम्र के इस अंतर को न समझ पाए तथा एक वृद्ध को इस अनावश्यक मिलन के लिए जिद कर तैयार किया और उनकी मृत्यु का कारण बनी।

नियति सुगना की मनोदशा समझ रही थी परंतु शायद सुगना उतनी गुनाहगार न थी जितना वह खुद को मान रही थी…

दरवाजे पर आहट हुई और सुगना अपनी यादों से बाहर आ गई सूरज घर में आ चुका था।

सुगना कई दिनों से सूरज को देख रही थी। उसका चुप रहना, आँखों में बसी उदासी और लोगों से दूरी बनाना उसे भीतर ही भीतर बेचैन कर रहा था। एक शाम जब सूरज आँगन में अकेला बैठा था, सुगना उसके पास आकर बैठ गई।

सुगना:

“बेटा, आजकल बहुत खामोश रहने लगा है। माँ से भी बात नहीं करेगा?”

सूरज (नज़रें झुकाते हुए):

“ऐसी कोई बात नहीं माँ… बस मन थोड़ा भारी रहता है।”

सुगना:

“मन ऐसे ही भारी नहीं हो जाता, सूरज। ज़रूर कोई बात है। पढ़ाई की चिंता है या भविष्य की?”

सूरज:

“सब ठीक है माँ… आप बेकार में परेशान हो रही हो।”

सूरज उठकर जाने लगा, पर सुगना ने उसका हाथ थाम लिया।

सुगना (नरमी से):

“माँ को टालना आसान होता है, पर उससे छुपाना मुश्किल। बता दे, क्या डर है तुझे?”

सूरज कुछ पल चुप रहा। उसके होंठ काँपने लगे।

सूरज:

“माँ, मुझे खुद पर भरोसा नहीं रहा। मुझे लगता है मैं दूसरों जैसा नहीं हूँ… मुझमें कोई कमी है।”

सुगना (चौंकते हुए):

“कमी? कैसी कमी, बेटा?”

सूरज (धीमी आवाज़ में):

“शारीरिक…वो अंदरूनी मैं खुद को कमजोर महसूस करता हूँ। सूरज चाहकर भी अपनी मर्दाना कमजोरी के बारे में खुलकर नहीं बोल पा रहा था।मुझे डर लगता है कि लोग क्या कहेंगे, भविष्य में मैं कैसे निभा पाऊँगा?”

कुछ क्षणों तक सन्नाटा छा गया। सुगना ने सूरज को अपने पास खींच लिया।

सुगना:

“बेटा, क्या इसी बात ने तुझे इतना तोड़ दिया?”

सूरज (रोते हुए):

“माँ, सब कहते हैं कि मर्द को मजबूत होना चाहिए। मैं हर रोज़ खुद को कमतर महसूस करता हूँ।”

सुगना (दृढ़ स्वर में):

“ इंसान की कीमत उसके चरित्र और साहस से होती है।

तू मेरा बेटा है—जैसा है, वैसा ही पूरा है। अपनी मां पर विश्वास रख समय आने दे तेरी यह समस्या भी दूर हो जाएगी ”

सूरज ने पहली बार हल्की राहत की साँस ली।

सूरज अभी खुलकर अपनी समस्या सुगना को बताने में असहजमहसूस कर रहा था पर उसे शायद यह नहीं पता था कि उसकी मां सुगना विशेष थी उसे इसका अंदाजा पहले से ही था।

उस दिन सूरज के मन का भारी बोझ कुछ हल्का हो गया। माँ के विश्वास और संवाद ने उसमें फिर से उम्मीद की किरण जगा दी। कम से कम उसकी मां उसे इस रूप अपनाने को तैयार थी और उसकी कमी को नजर अंदाज कर रही थी। पर सूरज बार-बार यह बात सोच रहा था की क्या सुगना उसकी मनोस्थिति और उसकी कमजोरी को पूरी तरह समझ रही है?

सुगना इतनी भी ना समझ नहीं थी उसे यह एहसास हो गया कि विद्यानंद की बातें असर दिखाने लगी है।

सूरज का भविष्य संवारने और सुरक्षित करने का वक्त आ रहा था। सुगना को विद्यानंद की कही बातें ध्यान आने लगी। सूरज शापित् था और जब तक वह अपने पवित्र रिश्ते को कलंकित नहीं करता तब तक वह सामान्य पुरुष की भांति अपना गृहस्थ जीवन शुरू नहीं कर सकता था।

उसे अपनी बहन या मां….के साथ…सम्भोग…...ओह …सु सुगना तड़प उठी। वह मुसीबत में फंस चुकी थी। शायद उसने जो पाप किए थे या उसका ही परिणाम था परंतु अब कोई उपाय शेष न था। सुगना अपनी पुत्री मधु के युवा होने का इंतजार कर रही थी उसे अपने कलेजे पर पत्थर रखकर इस पवित्र रिश्ते को स्वयं कलंकित करने के लिए प्रेरित करना था तभी वह उस घोर पाप से बच सकती थी।

उधर सूरज से रोजी की नजदीकिया बढ़ रही थीं।

रोज़ी को सूरज की आँखों में छुपा अपनापन हमेशा से महसूस होता था। वह जब भी उससे बात करता, शब्द कम और भाव ज़्यादा बोलते थे। सूरज भी रोज़ी को मन ही मन चाहता था, पर उसके दिल में एक डर दीवार बनकर खड़ा था। वह जानता था कि उसके भीतर जो कमी वह महसूस करता है, वही उसे पीछे खींच लेती है।

एक शाम दोनों ने साथ फिल्म देखने का निश्चय किया। सिनेमा हॉल की हल्की रोशनी, पर्दे पर चलती कहानी और आसपास बैठे लोगों की हलचल के बीच दोनों एक-दूसरे के काफ़ी पास थे। रोज़ी की उँगलियाँ अनजाने में सूरज की उँगलियों को छू गईं। वह स्पर्श बहुत हल्का था, पर सूरज के दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

रोज़ी (धीमे स्वर में):

“तुम हमेशा ऐसे दूर क्यों रहते हो, सूरज? पास होकर भी जैसे कहीं और होते हो।”

सूरज ने कुछ नहीं कहा। उसने बस हल्की-सी मुस्कान दी और नज़रें पर्दे पर टिकाए रखीं।

फिल्म के बीच, भावुक दृश्य आया। रोज़ी अनजाने में सूरज के कंधे पर झुक गई। उस पल सूरज के भीतर चाहत और डर की जंग शुरू हो गई। उसका मन चाहता था कि वह उस पल को थाम ले, पर उसका डर उससे ज़्यादा ताक़तवर था।

सूरज थोड़ा खिसक गया।

रोज़ी (हैरानी से):

“क्या मैंने कुछ गलत किया?”

सूरज (संभलते हुए):

“नहीं… बस थोड़ा असहज लग रहा है।”

रोज़ी ने उसे ध्यान से देखा। उसकी आँखों में ठंडापन नहीं था, बल्कि कोई छुपा हुआ दर्द था।

रोज़ी:

“तुम मुझे चाहते हो न?”

सूरज ने पल भर की चुप्पी के बाद सिर हिला दिया,

“हाँ… बहुत।”

रोज़ी:

“तो फिर ये दूरी क्यों?”

सूरज की साँसें भारी हो गईं। वह सच कहना चाहता था, पर शब्द गले में अटक गए। उसने धीरे से कहा,

“कभी-कभी इंसान खुद से ही लड़ रहा होता है।”

फिल्म खत्म हो गई, पर दोनों के मन में चल रही कहानी अधूरी रह गई। बाहर निकलते समय रोज़ी ने उसका हाथ थाम लिया। सूरज ने हाथ तो नहीं झटकाया, पर उसकी पकड़ ढीली थी—जैसे वह पास रहना चाहता हो, पर डर रहा हो।

रोज़ी (नरमी से):

“जब भी तुम तैयार हो, मैं सुनने के लिए यहीं हूँ।”

उस पल सूरज की आँखों में नमी आ गई। पहली बार उसे लगा कि प्यार सिर्फ़ पास आने का नाम नहीं, बल्कि किसी के डर को समझने का भी नाम है।

वह जानता था—दूरी उसकी चाहत की नहीं, उसकी मजबूरी की वजह से है। और शायद, एक दिन वह साहस भी आ जाएगा जब वह रोज़ी से सब कह पाएगा।

सबकी अपनी-अपनी समस्याएं थी सोनी भी विद्यानंद के शिष्य के प्रश्न से परेशान हो गई थी सरयू सिंह की मृत्यु में कहीं ना कहीं वह भी भागीदार थी। सोनी की आंखों से आज नींद गायब थी मखमली और कोमल बिस्तर भी उसे निद्रा सुख देने में नाकाम हो रहा था उसके दिमाग में बार-बार सरयू सिंह के साथ हुए घटनाक्रम याद आने लगे थे।

उसे आज भी वह दिन याद था जब वह अमेरिका से पहली बार भारत आई थी और उसने सरयू सिंह के मजबूत हाथों को अपनी गोरी और नंगी पीठ पर महसूस किया था। इससे पहले सरयू सिंह हमेशा माथे को छूकर आशीर्वाद दिया करते थे परंतु उसे दिन न जाने क्यों जो कुछ हुआ वह अलग था सरयू सिंह की मजबूत हथेलियां ने सोनी की नंगी पीठ को ना सिर्फ छुआ अपित सहला दिया सोनी ने जो महसूस किया वह निश्चित ही वासना जन्य था।

बात आई गई हो गई परंतु सोनी ने इतना तो नोटिस कर लिया की सरयू सिंह उस लेकर कुछ अलग ही सोचते हैं वह पहले भी कई बार उनकी निगाहों को अपनी बदन पर घूमते महसूस कर चुकी थी पर उनकी उम्र की वजह से वह इसे नजरअंदाज कर दिया करती थी परंतु जब से उसने साउथ अफ्रीकी में लंबे और मजबूत लंड का आनंद लिया था वो सरयू सिंह को भूल नहीं पा रही थी।

उसे वह दिन याद आ रहा था जब वह अमेरिका से आने के बाद सोनू और सुगना के साथ सलेमपुर जा रही थी तभी जाते-जाते कजरी ने सुगना से कहा

बाबूजी के बक्सा से उनकर दवाई ले ले आईहे पीयर कपड़ा में बांधल होई

सुगना ने चाबी ले ली सुगना और उसे इस बात का आश्चर्य अवश्य हो रहा था की सरयू सिंह ने अपने बक्से की चाबी इतनी आसानी से कजरी को कैसे दे दी। वह तो हमेशा उसे अपने साथ रखा करते थे।

सलेमपुर पहुंचकर सोनी ने इस घर से जुड़ी अपनी यादें ताजा की अमेरिका से वापस लौटी सोनी गांव के सभी बड़े बूढ़े और बच्चों के लिए एक अजूबा बन चुकी थी सोनी ने भी सुगना की ही भांति ढेर सारी मिठाइयां खरीदी और बच्चों में बांटने लगी। सोनी और सुगना दोनों में यह गुण सराहनीय था गांव के बच्चे हंसी-खुशी और पूरी आत्मीयता से सोनी और सुगना का स्वागत कर रहे थे।

सरयू सिंह के घर में महिलाओं का आवागमन बढ़ गया था कुल मिलाकर माहौल खुशनुमा था। इधर सोनी महिला महिलाओं के झुंड में अपने विदेश प्रवास की बातें बता रही थी उधर सुगना ने मौका देखकर सोनू के गर्दन का दाग जीवंत कर दिया। सुगना की यही अदा सोनू को बेहद पसंद थी वह उसे खुश करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती थी और सोनू भी उसकी बात डालने का साहस कभी नहीं करता था उनकी जोड़ी अनोखी थी।

धीरे-धीरे वापस चलने का वक्त आ गया सुगना सरयू सिंह के बक्से से दवाई लेना भूल गई उसने सोनी को चाबी देते हुए यह काम सौंप दिया और स्वयं लाली की मां से मिलने चली गई। सोनी ने सरयू सिंह की कोठी में प्रवेश किया यह वही कोठरी थी जिसमें उसने विकास के साथ रंगरलियां मनाई थी और उसकी लाल रंग की रेशमी पैंटी जल्दी बाजी में यही छूट गई थी और बाद में लाख खोजने पर भी नहीं मिली थी।

सरयू सिंह का बक्सा सामने ही रखा था सोनी ने बक्सा खोल और वह पीली पोटली खोजने लगी परंतु यह क्या एक खूबसूरत लाल कपड़े में उसका ध्यान आकर्षित किया सोनी ने अपनी उंगलियों से वह कपड़ा उठाया उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा यह वही लाल पैंटी थी।

हे भगवान यह सरयू चाचा के बक्से में क्यों…सोनी न्यूज़ पेटी को उठाया और ध्यान से देखा उसमें जगह-जगह पर दाग लगे हुए थे सोनी अब विवाहित थी वो अब कपड़ों पर लगे दाग पहचानने लगी थी उसका कलेजा धक-धक करने लगा तो क्या सरयू चाचा …

इस कल्पना मात्र से की सरयू चाचा उसे को याद करते हुए उसकी पैंटी में स्खलित होते है.. सोनी गर्म होने लगी उसे यकीन नहीं हो रहा था परंतु प्रत्यक्ष को प्रमाण किया सोनी ने हिम्मत करके उसे पेटी को अपने नथुनों के करीब लाया अब भी उसके द्वारा प्रयोग किए गए इत्र की खुशबू कुछ कुछ उसके नथुनों तक पहुंच रही थी और साथ में वीर्य की एक अजब सी गंध।

वासना का आवेग घृणा को कम कर देता है। सोनी ने उस पेंटी की स्थिति से सरयू सिंह की मनोदशा काअंदाजा लगा लिया।

उसे सरयू सिंह पर तरस भी आ रहा था कैसे कोई अपनी पूरी युवावस्था तक बिना विवाहित रह सकता है। और किसी अविवाहित व्यक्ति द्वारा ऐसी कामुक कृत्य का किया जाना और स्वाभाविक नहीं था।

न जाने सोनी को क्या सूझा उसने अपना घाघरा उठाया और अंदर अपनी उंगलियों से अपनी पीली पेटी को नीचे खींचने लगी सोने के गदरए हुए कूल्हे अनावृत होने लगे धीरे-धीरे सोनी ने अपनी पीली पेटी को बाहर निकाल लिया।

सोनी ने ध्यान से देखा पिछले कुछ मिनट की उत्तेजना में ही पेटी का वह भाग गीला हो चुका था जो सोने की सुनहरी बुर को ढकने की कोशिश में लगा था।

सोनी मुस्कुराने लगी उसने सरयू सिंह की वासना में वह स्वयं घिर रही थी। उसने उसे पीली पेटी को सरयू सिंह के बक्से में डाल दिया उसकी होठों पर मुस्कुराहट आ गई उसने जानबूझकर सरयू चाचा के लिए एक कीमती उपहार रख छोड़ा । उसे पता था इसका हश्र भी उसकी लाल पेटी जैसा ही होना था परंतु वह सरयू सिंह को छेड़ना चाहती थी उसने उनकी चोरी पकड़ ली थी ।

सोनी ने वह गंदी लाल पैंटी को अपने हाथों से खींचा उसे झटकरा और फिर उसने अपने मन में कुछ सोचते सोचते मुस्कुराने लगी अचानक वह नीचे झुकी और उसने उस पेंटी को धारण कर लिया।

जैसे ही उस लाल पैंटी में सोनी की बुर को छुआ उसे ऐसा प्रतीत हुए जैसे सरयू सिंह के लंड ने उसकी बुर को छू लिया। सोनी सिहर उठी…सरयू सिंह के सूखे हुए वीर्य से उसे कोई घृणा नहीं थी। अपितु सोनी उस संवेदना को महसूस कर रही थी अचानक उसके मन में ख्याल आया काश इस सूखे हुए वीर्य में अब भी इतनी ताकत होती .. सोनी अब तक गर्भवती नहीं हो पाई थी और पिछले कई वर्षों से वह हर प्रयास कर रही थी।

सोनी की उंगलियां सरयू सिंह के वीर्य से सनी उस लाल पेटी को अपनी सुनहरी गुफा की ओर धकेलने लगी…

काश की वह सूखा हुआ वीर्य उसके गर्भ में एक जीवन का सृजन कर जाता….

शेष अगले भाग में..

 
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