Incest पहाडी मौसम - Page 12 - SexBaba
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Incest पहाडी मौसम

सूरज के कानों में तो उसकी मां की कुर्सी निकलने वाली पेशाब की सिटी की मधुर धुन सुनाई दे रही थी जिसमें वह पूरी तरह से मत हुआ जा रहा था कि तभी उसकी मां की चीख सुनाई दी सूरज एकदम से घबरा गया था वह जिस तरह से चीखी थी अगर गांव में इस तरह की ची मुंह से निकाली होती तो पूरा गांव इकट्ठा हो गया होता,, लेकिन इस वीरान सुनसान सड़क पर उसकी चीख सुनने वाला केवल सूरज ही था सूरज भी एकदम से घबरा गया था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिरकार ऐसा क्या हो गया कि उसकी मां इतनी जोर से चीखने लगी,,, सूरज को अपनी मां की चिंता हो रही थी क्योंकि इस तरह से वह कभी चीखती नहीं थी जरूर कोई बात थी।





सूरज जल्दी से दौड़ता हुआ अपनी मां के पीछे आकर खड़ा हो गया और बोला।

क्या हुआ मां क्यों चीख रही हो,,,,,,, (अभी तक के की वजह से सूरज का ध्यान अपनी मां के ऊपर ठीक से गया नहीं था लेकिन जैसे ही अपने शब्द पूरे करने के बाद वह अपनी मां की तरफ देखा तो देखा ही रह गया साड़ी कमर तक उठाए हुए वह पेशाब करने बैठी थी उसकी बड़ी-बड़ी नंगी गांड झाड़ियां में भी खूबसूरत आभा बनाई हुई थी एकदम आसमान के चांद की तरह चमक रही थी,,, और सूरज के लिए मजे की बात यह थी कि उसकी मां चीखने के बावजूद भी अपने आप को व्यवस्थित नहीं की थी अपने कपड़ों को दुरुस्त नहीं की थी उसकी नंगी गांड सूरज की आंखों के सामने थी सूरज अपनी मां की गोरी गोरी गांड देखकर पागल हुआ जा रहा था,,, लेकिन तभी उसकी मां एकदम घबराते हुए स्वर में धीरे से बोली।

सांप ,,सांप,,, (सुनैना एकदम घबराई हुई थी उसकी सांस अटक रही थी वह अपने बदन को एकदम स्थिर की हुई थी और सूरज ने गौर किया था कि उसकी मां की बुर से निकलने वाली सीधी की आवाज भी एकदम शांत हो चुकी थी मतलब साफ था कि उसकी मां पेशाब नहीं कर रही थी,,,,, सांप का जिक्र होते ही सूरज की घबरा गया और एकदम से बोला,,,)

सांप कहां है सांप,,,,! (सूरज इधर-उधर देखता हुआ बोला था उसकी मां बोले नहीं बल्कि उंगली के इशारे से एकदम घबराए हुए दिखाने लगी ज्यादा नहीं सिर्फ इतना ही बोली,,,)





यह देख,,,, (सुनैना उंगली से अपने पैर की तरफ इशारा कर रही थी,,, और जब सूरज ने देखा तो उसके भी होश उड़ गए थे क्योंकि उसकी मां जहां पर पेशाब करने बैठी थी उसके पैर वहां पड़े हुए थे जहां पर सांप बैठा हुआ था और गोलाई बनाया हुआ था,,, सांप काफी बड़ा लग रहा था इसलिए सुनैना बड़े आराम से उसके बनाए हुए गोलाई में अपने पैर रखकर बैठ चुकी थी और उसे एहसास तक नहीं हुआ था कि वह कहां बैठी है,,,, वह तो पेशाब करने में ही मस्त थी,,,, सूरज भी यह देखकर हैरान हो गया था कि वाकई में चिंता वाली बात हो गई थी वह जानता था कि अगर उसकी मां उठने की कोशिश करेगी तो हलन चलन से सांप एकदम इधर-उधर होने लगेगा जो कि इस समय सूरज को साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मां का एक पर गोली में था और उसे सांप का पूरा शरीर आगे झाड़ियां में था इसका मतलब साफ था की वह आराम कर रहा था,,, सूरज को समझ में आ गया था कि इसी डर के मारा उसकी मां की पेशाब रोक रही थी और वह पेशाब नहीं कर पाई थी,,,,, सूरज भी अपनी मां की तरह ही उसके पास बैठ गया था ठीक उसके पीछे ,,,डर के मारा सुनैना को इस बात का अहसास तक नहीं था कि वह किस अवस्था में बैठी है। सूरज की आंखों के सामने उसकी मां की नंगी गांड थी एकदम गदराई हुई ,,, जिसे देखने के लिए सूरज दिन रात तड़पता था और आज आलम यह था कि उसकी मां नंगी गांड उसकी आंखों के सामने परोसे हुए बैठी थी और उसे अहसास तक नहीं था,,,,,, इस डर के माहौल में इतनी सूरज अपने आप को अपनी मां की नंगी गांड देखने से रोक नहीं पा रहा था। और शायद यही औरत की खूबसूरत अंगों का आकर्षण होता है जिसमें मर्द पूरी तरह से खो जाता है भले ही वह कैसी भी हालत में हो,,,,।





घबराहट से पूरा माहौल एकदम शांत हो चुका था सुनैना की कान फाड़ देने वाली चीख शांत हो चुकी थी,,, क्योंकि उसे पूरा यकीन करके उसका बेटा जरूर कुछ ना कुछ करेगा क्योंकि अब वह कुछ कर सके ऐसी उसकी हालत बिल्कुल भी नहीं थी वह भी हार मान चुकी थी इसलिए तो अपने बेटे की तरफ आस भरी नजर से देखते हुए बोली,,,।

अब क्या करूं सूरज मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है,,,,,।

तुम चिंता मत करो मैं हूं ना बस हिलना डुलना बिल्कुल भी नहीं,,,, मुझे लग रहा है कि सांप आराम कर रहा है इसलिए वह शांत है वरना अभी तक तो,,, (इतना कहकर वह शांत हो गया और कुछ सोचने लगा,,,, यह मुश्किल की घड़ी भी सूरज के लिए आस भरी सुनहरी कीरन लेकर आई थी,,,, सूरज कभी अपनी मां के पैर की तरफ देखा तो कभी अपनी मां के खूबसूरत चेहरे की तरफ तो कभी उसकी बड़ी-बड़ी गांड की तरफ ऐसी मुश्किल घड़ी में भी सूरज को उसकी मां की बड़ी-बड़ी गांड आकर्षित कर रही थी और सुनैना अपने बेटे की तरफ देख रही थी तो कभी अपने पैर की तरफ उसे भी एहसास हो रहा था कि वाकई में सांप को ज्यादा ही लंबा था,,,,,, सूखे हुए पत्तों के बीच वह सांप अपने अस्तित्व को छुपाया हुआ था ताकि उसे भी भारी जंगली जानवर उस पर हमला न कर दे,,, लेकिन इस समय सुनैना मुश्किल घड़ी में थी मुसीबत में थी जिसमें से सूरज को बाहर निकालना था। सूरज कुछ देर तक शांत बैठा रहा वह सोच रहा था कि कैसे इस मुसीबत से अपनी मां को बाहर निकाला जाए,,,, लेकिन सुनैना से सब्र नहीं हो रहा था वह अपने बेटे की तरफ देखते हुए बोली,,,)





कुछ कर सूरज मुझे बहुत डर लग रहा है।

डरने वाली बात तो है ही अगर तुम खड़ी हो जाती हो तो सूखे हुए पत्तों में हलन चलन होगी और सांप एकदम से बाहर आ सकता है और काट सकता है।

तो अब क्या करूं,,,,,।

रुको तुम्हें कुछ नहीं करना है जो करना है मुझे ही करना है,,,,,।

कुछ भी कर लेकिन जल्दी कर,,,,।

(अपनी मां की यह बात सुनकर सूरज अपने मन में ही बोला साला मेरा मन तो तुम्हें चोदने को कर रहा है कहो तो चोद दुं,,, साली इतनी मस्त गांड मेरी आंखों के सामने है लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता हूं कोई और होता तो इस समय डाल चुका होता ,,,,, अपने मन में अपनी मां के प्रति इस तरह की बात सोचते हुए और वह भी ऐसी हालत में वह आगे की युक्ति सोच रहा था और फिर धीरे से अपनी मां की तरफ बैठे-बैठे ही सरक गया जैसे कि वह भी किसी औरत की भांति पेशाब करने बैठा हो,,, और देखते ही देखते वह एकदम से अपनी मां के करीब पहुंच गया था,,,,, और अपना दोनों हाथ आगे बढ़कर नीचे से अपनी मां का पैर पकड़ लिया और उसके हाथ में उसकी मां की पायल भी पकड़ गई थी जो की हल्का सा शोर मचाने लगी थी यह देखकर वह अपनी मां के पैरों को थोड़ा जोर से पकड़ लिया था और बोला।)

तुम्हारी पायल कुछ ज्यादा ही शोर मचाती है,,,।

तुझे पायल की पड़ी है यहां मेरी जान सूख रही है।

चिंता मत करो अभी सब कुछ ठीक हो जाएगा,,,,।

लेकिन तू कर क्या रहा है,,,, देखना तेरा हाथ सांप से स्पर्श न हो जाए वरना वह जाग जाएगा,,,,।

इसीलिए तो संभाल कर तुम्हारा पैर पकड़ा हूं,,,,, (सूरज की हालात दोनों तरफ से खराब थी एक तरफ सांप का डर उसके मन में बना हुआ था और दूसरी तरफ उसकी मां की गदराई गांड जो की पूरी तरह से हाहाकार मचा रही थी और उसकी हालत को खराब कर रही थी,,,, सूरज नजर भर कर अपनी मां की गांड को देख रहा था गांड की फांकों के बीच के कटाव की पतली दरार इतनी गजब की थी मानो जैसे हरियाली से भरा हुआ रास्ता और यह हरियाली पेड़ पौधों जंगल की नहीं बल्कि जवानी की हरीयाली थी,,,, सूरज को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसकी मां जिस तरह से बड़ी तीव्रता के साथ पेशाब कर रही थी उसकी बुर से निकलने वाली पेशाब के छिंटे उसके पैर पर भी पड़े थे जो कि ईस समय सूरज के हाथों में लग रहे थे लेकिन सूरज को इसका एहसास पूरी तरह से उत्तेजित कर दे रहा था। सूरज कस के अपनी मां के पैर को पकड़ा हुआ था और उस गोलाई में से अपनी मां के पर को निकालना चाहता था इसलिए जोर लगाकर वह ऊपर की तरफ उठाने लगा और बोला,,,)

ईस पैर का भार थोड़ा कम करो और जैसे मैं उठा रहा हूं खुद भी उठने की कोशिश करो तभी इस मुसीबत से निकल पाओगी,,,, और जल्दी करो कहीं ऐसा ना हो कि इधर से चूहे गुजरे और उन्हें पकड़ने के चक्कर में हम लोगों का नुकसान हो जाए,,,,,,।

(ऐसा कहते हुए सूरज दम लगाकर अपनी मां के पर को ऊपर की तरफ उठा रहा था और उसकी मां भी अपने बदन के भार को उठाने की कोशिश कर रही थी,,, लेकिन सुनैना से ठीक से हो नहीं पा रहा था तो सूरज ही उससे बोला,,,)

एक काम करो तुम एक हाथ पीछे की तरफ लाकर मेरे कंधे पर रखकर सहारा ले लो तब आराम से उठ पाओगी,,,,,।

(जल्द ही सुनैना अपने बेटे की बात मान गई और अपना एक हाथ पीछे की तरफ लाकर अपने बेटे के कंधे पर रख दी और उसे पर दबाव बनाते हुए खुद उठने की कोशिश करने लगी और नीचे से सूरज अपनी मां के पैर को उठा ही रहा था,, धीरे-धीरे सूरज की मेहनत रंग लाने लगी,,, सुनैना की भी कोशिश कामयाब हो रही थी वह अपने पैर को उठाने में कामयाब हो गई थी सांप की गोलाई में से सुनैना का पेर ऊपर की तरफ उठ चुका था लेकिन अभी भी वह सुरक्षित नहीं थी क्योंकि अगर इस तरह से सूरज छोड़ देता तो फिर से मुसीबत खड़ी हो सकती थी इसलिए सूरज इस बार अपना एक हाथ,,, मौके का फायदा उठाते हुए नीचे से अपनी मां की गांड पर रखती है और उसे पर सहारा बनाकर अपनी मां की गांड को भी ऊपर की तरफ उठाने लगा,,,, अपनी मां की गांड पर हाथ रखते हैं सूरज की हालत एकदम से खराब हो गई थी उसके पजामे में उसका लंड पूरी तरह से अकड़ चुका था इस मुसीबत की घड़ी में भी उसकी आंखों में वासना के डोरे साफ नजर आ रहे थे,,,, और वाकई में मदद की आंखों के सामने जब इतनी खूबसूरत जवानी से भरी हुई औरत हो तो मुसीबत की घड़ी में भी वह मर्द उसे औरत के साथ संबंध बनाना चाहेगा,,, और यह हाल इस समय सूरज का भी था,,, अपनी मां की गांड के निचले हिस्से पर अपनी हथेली रखकर वह ऊपर की तरफ उठा रहा था और उसकी मां भी अपने बेटे का इस तरह का सहारा पाकर अपने वजन पर काबू पाते हुए ऊपर की तरफ उठ रही थी।

लेकिन सूरज के मन में कुछ और चल रहा था वह इस मौके को अपने हाथ से गंवाने नहीं देना चाहता था । भले ही वह अपनी मां की चुदाई नहीं कर सकता था लेकिन इस समय वहां अपनी मां के खूबसूरत अंग को छुकर उसका आनंद ले सकता था इसलिए वह अपनी मां की गांड के नीचे अपनी हथेली रखकर उसे ऊपर की तरफ उठाते हुए धीरे से अपनी हथेली को अपनी मां की बुर की तरफ बढ़ाने लगा और अगले ही पल जैसे ही उसे एहसास हुआ कि उसकी हथेली उसकी मां की गर्म बुर पर एकदम से सट गई है तो ,,, वह एकदम से मौके का फायदा उठाते हुए अपनी मां की बुर को एकदम से अपनी हथेली में दबोचते हुए बोला,,,,।

बस एकदम से खड़ी हो जाओ,,,, साथ में मैं भी खड़ा होता हूं,,,, (यह वह पल था जिसमें सूरज अच्छी तरह से जानता था कि अफरातफरी में उसकी मां कुछ समझ नहीं पाएगी,,,,, और ऐसा ही हुआ उसकी मां भी पूरा जोर लगाकर खड़ी होने की कोशिश करने लगी साथ में सूरज भी खड़े होने लगा लेकिन इस दौरान वह अपनी हथेली का दबाव अपनी मां की बुर पर बनाया हुआ था और बुर के ऊपर के हल्के-हल्के बालों में अभी भी पेशाब की बूंदे लगी हुई थी जिससे उसकी हथेली गीली हो रही थी,,,,, इस अद्भुत पल का आनंद लेते हुए मां बेटे दोनों खड़े हो चुके थे लेकिन सूरज अभी भी झुका हुआ था क्योंकि उसके एक हाथ में अभी भी उसकी मां का पैर था,,,, और फिर जब कुछ सब कुछ सही नजर आने लगा तब वह अपनी मां का पर खुद ही धीरे से दूसरी तरफ रख दिया,,,,,। वैसे तो यह सब कुछ बिल्कुल आसान लग रहा था लेकिन सूरज के मन में इस बात का डर था कि सूखे हुए पत्तों में जरा सा भी हलचल हुआ तो वह सांप तुरंत पलट कर इसी तरफ आएगा और ऐसे में वह काट भी सकता है इसलिए वहां बिल्कुल भी खतरा मोल नहीं लेना चाहता था,,, सुनैना उसे सांप की गोलाई से तकरीबन 2 फीट की दूरी पर खड़ी हो चुकी थी,,, सांप अभी भी ज्यो का त्यों बैठा हुआ ही था,,,, सांप की तरफ देखते हुए सुनैना बोली,,,)

दैया रे दैया आज तो बच गई मुझे तो लगा था कि आज मेरी जान ही चली जाएगी,,,।

मेरे होते हुए भला ऐसे कैसे हो सकता है,,,।

तो सही कह रहा है अगर आप तो मेरे साथ नहीं होता तो आज कुछ ना कुछ गजब हो जाता,,,, (सुनैना अभी भी गहरी गहरी सांस लेते हुए सांप की तरफ देखते हुए बोल रही थी और वह भूल चुकी थी कि अभी भी उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी नितंबों का उभार जिस तरह का था उसे उभार पर उसकी साड़ी टिक गई थी और उसकी नंगी गांड पीछे से एकदम साफ दिखाई दे रही थी यह देखकर सूरज हल्के से मुस्कुरा दिया और अपनी मां से बोला,,,,)

अपने कपड़े तो ठीक कर लो अभी भी दिख रहा है,,,।

(अपने बेटे की बात पर गौर करते ही वह एकदम से हड़बड़ा गई और तुरंत अपनी साड़ी को व्यवस्थित करने लगी लेकिन इस बात को वह भी जानती थी कि अब कोई फायदा नहीं है क्योंकि उसे एहसास हो रहा था कि जिस तरह से वह पेशाब करने बैठी हुई थी उसके बेटे ने सब कुछ देख लिया था और वह अपने मन में सोच रही थी आज का दिन ही कुछ अलग ही है तैयार होते समय भी उसका बेटा उसे पूरी तरह से नंगी देख चुका था और इस समय भी उसे पेशाब करते हुए देख चुका था और यह एहसास उसे शर्म से पानी पानी किया जा रहा था वह अपने बेटे से नजर नहीं मिल पा रही थी अपने कपड़ों को दुरुस्त करके वह बोली,,,)

अब हमें चलना चाहिए काफी देर हो चुकी है,,,,।

बात तो सही है लेकिन थोड़ा इधर आ जाओ,,,, इसे थोड़ा भगा दु वरना आते-जाते किसी का पैर पड़ गया तो गजब हो जाएगा,,,(खुद को और अपनी मां को सुरक्षित दायरे में करते हुए वह छोटा सा पत्थर उठाया और उसे और धीरे से फेंक दिया जिससे तुरंत वह सांप एकदम से उठकर खड़ा हो गया ठीक उसी तरफ जहां पर उसकी गोलाई था,,, यह देखकर सूरज अपनी मां से बोला,,,)

देख रही हो ना यही डर था मेरे मन में अगर जरा सा भी हलचल होता तो वह इसी तरह से फुंफकारने लगता और काट भी लेता,,

तू एकदम ठीक कह रहा है,,,,(सुनैना को विश्वास का एहसास हो रहा था कि उसके बेटे ने जो कुछ भी किया था उसी में उसकी भलाई थी,,,,, और अगले ही पल वह सांप भी झाड़ियों के अंदर चला गया,,,, मां बेटे फिर से बाजार के रास्ते जाने लगे लेकिन सूरज चलते हुए ही तुरंत अपनी मां से बोला,,,)

वह तो गनीमत थम की सांप के ऊपर पेशाब नहीं करने लगी वरना गजब हो जाता,,,(यह वाली बात सूरज जानबूझकर बोला था और अपने बेटे के मुंह से यह बातें सुनकर सुनैना के चेहरे पर शर्म की लाली जाने लगी वह कुछ बोल नहीं पाई और बिना कुछ बोले खामोश चलती रही थोड़ी देर में दोनों बाजार पहुंच चुके थे,,,,,, सुनैना बाजार में जरूर का सामान खरीद रही थी काफी महीनों बाद वह बाजार आई थी,,,, इसलिए वह ज्यादा खुश थी अपनी मां को राशन का सामान खरीदना हुआ देखकर सूरज भी आगे निकल गया था और अपने मनपसंद का सामान खरीद कर उसे अपने पजामे में रख लिया था जिसके बारे में उसने अपनी मां को नहीं बताया था। शाम के समय बाजार की रौनक बढ़ जाती थी लोगों की काफी भीड़ नजर आ रही थी लोग अपने-अपने जरूरत का सामान खरीद रहे थे,,,,,, थोड़ी देर में सुन ना खरीदी कर चुकी थी और फिर सूरज के साथ एक छोटी सी समोसे की दुकान पर पहुंच गई थी जहां पर वह खुद के लिए और अपने बेटे के लिए समोसे और जलेबी खरीद कर खा रही थी,,,,, और रानी के लिए भी ले ली थी।

मां बेटे दोनों एक टूटी हुई लंबी सी कुर्सी पर बैठकर जलेबी और समोसे का मजा लूट रहे थे वहीं पास में दो लड़के भी खड़े थे वह दोनों उन्ही की तरफ देख रहे थे इसलिए सुनैना उन दोनों बच्चों को अपने पास बुलाई और उन्होंने दोनों के लिए भी जलेबी और समोसे खरीद कर उन्हें दे दी और वह लोग खाने लगे वह समोसे और जलेबी खा ही रहे थे कि तभी वहां पर उनकी मां आ गई,,, और अपने बच्चों को समोसे और जलेबी खाता हुआ देखकर बोली,,,,।

तुम दोनों को यह किसने दिलाया,,,,,।

चाची ने,,,,(वह दोनों बच्चे सुनैना की तरफ इशारा करते हुए बोले तो सुनैना मुस्कुराने लगी और उनकी तरफ देखकर वह औरत भी बोली)

इसकी क्या जरूरत थी दीदी यह दोनों बहुत जीद्दी हैं अभी इन्हें दिलाने ही वाली थी,,,,।

कोई बात नहीं मैं दिलाओ या तुम दिलाओ बात तो यही है और बच्चे तो बच्चे होते हैं,,,,।

(अभी दोनों की बातचीत हो ही रही थी कि सूरज को लग रहा था कि उसने ईस औरत को कहीं देखा है अपने दिमाग पर बहुत जोर देने के बाद उसे याद आ गया कि इस औरत को वह कैसे जानता है लेकिन इसके बारे में कुछ बोला नहीं और थोड़ी देर में शाम ढलने लगी थी सूरज अपनी मां के साथ सामान वाला थैला लेकर गांव की तरफ निकल गया था,,,, लेकिन अब धीरे-धीरे अंधेरा बढ़ने लगा था यह देखकर सूरज अपनी मां से बोला,,,)

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाओ देर हो चुकी है।

जानती हूं उस सांप के चक्कर में देर हो गई वरना अब तक हम लोग घर पहुंच गए होते।

कोई बात नहीं वैसे भी ज्यादा देर नहीं हुई है लेकिन अब अंधेरा होने लगा है इसलिए समय पर घर पहुंच जाना जरुरी है।(मां बेटे दोनों कच्ची पगडंडी से होते हुए जल्दी-जल्दी आगे की तरफ निकल रहे थे कि तभी कुछ लोगों की आवाज सुनाई देने लगी जो आपस में ही बात करते हुए पीछे से उनकी तरफ ही आ रहे थे,,,,,, जिस तरह से वह लोग बातें कर रहे थे सूरज को समझते देर नहीं लगी थी कि वह लोग ठीक इंसान नहीं थे,,,,,, लेकिन सुनैना के मन में ऐसा कुछ नहीं था इसलिए वह अपने बेटे से बोली,,,)

लगता है गांव के कुछ लोग आ रहे हैं रुक जाओ उन्हीं लोग के साथ चलते हैं,,,,।

धीरे बोलो यह क्या कर रही हो,, वह लोग गांव के लोग नहीं है चोर बदमाश है,,,,,

(चोर बदमाश का नाम सुनते ही सुनैना की तो हालत खराब होने लगी उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें लेकिन सूरज उसका हाथ पकड़ कर बोला)

जल्दी से इधर आओ,,,,, (सूरज अपनी मां का हाथ पकड़े हुए एकदम से झाड़ियां के बीच बड़े से पेड़ के पीछे लेकर चला गया जहां से वह दोनों छुपकर देखने लगे की यह लोग हैं कौन)
 
मां बेटे दोनों बड़े से पेड़ के पीछे घनी झाड़ियों में छुप गए थे,,, और इसके सिवा दोनों के पास कोई रास्ता भी नहीं था वैसे तो सुनैना को बिल्कुल भी एहसास नहीं था कि उनके पीछे जो लोग आ रहे हैं वह कौन है उन्हें तो वह गांव वाला ही समझ रही थी लेकिन सूरज अच्छी तरह से जानता था वह तुरंत अपनी मां को सचेत करते हुए बड़े से पेड़ के पीछे लेकर छुप गया था और देख रहा था कि वह लोग हैं कौन,,,, जिस तरह से सूरज ने अपनी मां का हाथ पकड़ कर घने पेड़ के पीछे ले गया था, यह देखते हुए सुनैना भी समझ गई थी कि मामला गंभीर है इसलिए वह भी पूरी तरह से खामोश हो चुकी थी उसके तन-बदन में भी डर का माहौल बना हुआ था,,,,।





तुम बिल्कुल भी शांत रहना कुछ मत बोलना,,,,, (पेड़ के पीछे मां बेटे दोनों खड़े थे लेकिन सूरज अपनी मां के पीछे खड़ा था एकदम ठीक पीछे ऐसे माहौल में भी वह कोई भी मौका अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था क्योंकि जिस तरह से वह खड़ा था उसका बदन उसकी मां के बदन से एकदम सटा हुआ था,,,, अपने बेटे की बात सुनकर वह सच में कुछ बोल नहीं रही थी बस हां मैं सर हिला दी थी,,,,, फिर भी सूरज अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,) हमें थोड़ा जल्दी निकल जाना चाहिए था अंधेरा हो गया है इसलिए ऐसे माहौल में थोड़ा डर लगता है ।

लेकिन यह लोग हैं कौन,,, और अभी तक दिखाई भी नहीं दिए हैं,,,,।

चुप रहो बिल्कुल भी शोर मत करो वह देखो,,,,, (सूरज उन लोगों को देख चुका था जो उसी रास्ते से आ रहे थे,,,, सुनैना को भी साफ दिखाई दे रहा था तभी उनमें से एक बोला,,,)

यार कहीं दिन हो गए हैं कोई चिड़िया हाथ नहीं लग रही है,,,।

हां यार तू सच कह रहा है,,, (हाथ से हिला हिला कर हाथ दुखने लगा है,,,,, दूसरे का इतना कहना था कि तीसरा भी झाड़ियां के पीछे से निकलता हुआ बोला,,)





मैं भी यही सोच रहा था काफी दिन हो गए जुगाड़ हुए इस वक्त यहां से कोई गुजरता भी नहीं है,,,, इसमें कोई औरत मिल जाती तो रात भर मजा करते,,,,,,।

(ईतना कहकर तीनों हंस रहे थे और उन तीनों की बात सुनकर सुनैना की हालत खराब हो रही थी,,,, उसे अपने बेटे की बात पर विश्वास हो गया था अगर वह अपने बेटे की बात नहीं मानती तो शायद आज वह खुद इन तीनों का शिकार बन जाती क्योंकि जिस तरह से पीछे से आवाज आ रही थी उसे ऐसा ही लग रहा था कि गांव वाले ही हैं लेकिन सही मौके पर सूरज को एहसास हो गया था कि वह लोग बदमाश हैं इसलिए तो वह उसका हाथ पकड़ कर पेड़ के पीछे झाड़ियों में छुप गया था, मां बेटे दोनों पूरी तरह से खामोश हो चुके थे, और सुनैना डर के मारे अपने बेटे से और सटी जा रही थी,,,, सूरज को अपनी मां के नितंबों का एहसास अपने आगे वाले भाग पर बहुत अच्छे तरीके से हो रहा था,,,,, वह दोनों खामोशी से उन तीनों की तरफ देख रहे थे और उन दिनों के निकल जाने का इंतजार कर रहे थे लेकिन वह तीनों वहीं पर आकर रुक गए थे,,,, तभी उनमें से एक बोल पड़ा,,,,)

पहले तो गांव से किसी औरत को उठा कर ले आते थे और रात भर यही चुदाई करते थे,,,, लेकिन जब से अपना साथी अलग हुआ है वह सुख भी हाथ से चला गया है,,,,।





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सही कह रहा है तू वही औरतों को उठाकर लाता था बदले में उसे भी मजा मिल जाता था वह थोड़े पैसे भी मिल जाते थे उसके ना होने से हम तीनों का लंड सिर्फ खड़ा रहता है किसी की बुर में घुस नहीं पाता,,,,, (दूसरे ने कहा और उसके हाथ में शराब की एक बोतल भी थी,,, जिसे वह बार-बार घूंट भर भर कर पीरहा था जहां एक तरफ मां बेटे दोनों डरे हुए थे वहीं दूसरी तरफ डर के बावजूद की सूरज उन तीनों की बातें सुनकर मस्त हो रहा था क्योंकि वह तीनों खुलकर औरत की बुर की और लंड की बातें कर रही थी चुदाई की बातें कर रही थी और उसे समय उनकी बातों को सुनने के लिए सूरज के साथ उसकी मां भी थी और इसीलिए सूरज को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उनकी बातें उसकी मां भी सुन रही है और उसके बदन में भी कुछ ना कुछ तो जरूर होता ही होगा,,,, और सूरज का सोचना बिल्कुल ठीक ही था सुनैना भी उन तीनों की बातें सुनकर दंग रह गई थी वह तीनों एकदम बेशर्म और बदमाश थे सुनैना को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि वाकई में अगर इस समय कोई औरत तो नहीं मिल जाए तो तीनों बिल्कुल भी देर नहीं करेंगे उसकी चुदाई करने में,,,, और फिर यह सोचकर एकदम से सिहर उठी कि आज अगर उसके साथ उसका बेटा ना होता तो शायद उन तीनों के नीचे वह पड़ी होती,,,,,,,,, वह तीनों वहीं पर बड़े से पत्थर पर बैठ गए थे,,,, और बारी-बारी से बोतल में से दारु पी रहे थे तभी उनमें से एक अपने पजामे मैं रखा हुआ बीड़ी का छोटा सा बंडल और एक दिया सलाई निकाला और उसमें से तीन बीड़ी निकाल कर एक साथ उसे सुलगाने लगा,,,, यह देखकर सुनैना का दिल और जोरो से धड़कने लगा था उसकी घबराहट बढ़ने लगी थी क्योंकि वह तीनों वहीं बैठ गए थे और कितनी देर बैठे रहेंगे इस बात का अंदाजा किसी को नहीं था।





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सूरज भी यह सब देख रहा था,,,, उसे भी अपनी मां की तरह ही एहसास हो रहा था वह तो सोच रहा था कि जल्दी से तीनों निकल जाए तो वह अपनी मां को लेकर गांव की तरफ जल्दी से निकल जाए लेकिन अभी यह मुमकिन दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन इस दौरान उसका लंड पूरी तरह से खड़ा होने लगा था क्योंकि उसके आगे वाला भाग उसकी मां के पीछे वाले भाग से पूरी तरह से सटा हुआ था,,,,, बीड़ी जलाने के बाद वह एक-एक बीड़ी अपने दोनों साथी को दे दिया और खुद बीड़ी को फुंकने लगा,,,, तभी उनमें से एक बीड़ी का कश लेते हुए बोला,,,)

साला सच में औरत का नाम लेते ही लंड खड़ा हो जाता है देख तो सही मेरा एकदम से खड़ा हो गया,,, (वह एकदम से अपनी धोती को हटाते हुए अपने साथियों को अपने लंड दिखाते हुए बोला जो कि वाकई में एकदम खड़ा था,,,, उसके दोनों साथी उसके लंड की तरफ देखकर हंसने लगे और यह सब सूरज और सुनैना भी देख रही थी ना चाहते हुए भी सुनैना की नजर उसके धोती के अंदर से दिख रही है उसके लंड की तरफ चली गई थी और एक अजीब सी सनसनाहट उसके बदन में होने लगी थी। तभी उनमें से हंसता हुआ दूसरा आदमी बोला,,,,)





साले मेरी भी तो यही हालत हुई है ले देख,,, (और इतना कहकर वह भी अपनी धोती हटाकर अपने लंड को दिखाने लगा जो की अभी पूरी तरह से खड़ा नहीं था ढीला डाला था यह देखकर तीसरा बोला,,,,)

सालों तुम दोनों से तो मेरा ही लंबा और मोटा है,,, यह देखो,,, (वह एकदम से पत्थर पर से नीचे उतर कर खड़ा हो गया और अपने धोती को ऊपर उठा दिया वाकई में उसका लंड लंबा और मोटा था और इस समय खड़ा भी था यह देखकर वह दोनों भी हंसने लगे और बोले,,,,)

फिर भी कोई फायदा नहीं तभी तो तेरी बीवी छोड़कर भाग गई,,,,, (इतना कह कर वह दोनों हंसने लगे,,, उन दोनों की बातें और उन दोनों की हंसी सुनकर वह गुस्सा दिखाते हुए बोला,,,)

अरे मादरचोदो वह इसकी वजह से ही भाग गई क्योंकि रात भर मैं उसे सोने नहीं देता था,,,,।

अच्छा यह बात है,,,, सुन रहा है तू,,,, बोल रहा है कि इसकी वजह से वह भाग गई पिछली बार की घटना तुझे याद है ना जब खेत में हम तीनों पड़ोस के गांव की औरत की चुदाई कर रहे थे शुरुआत किसने किया था यही सबसे पहले चढ़ा था और दो ही झटके में ढेर र हो गया था,,,

(इतना कहने के साथ वह हंसने लगा और उसके साथ उसका दूसरा साथी भी हंसने लगा और वह इसके बारे में वह दोनों बोल रहे थे और हंस रहे थे वह थोड़ा शर्मिंदा हुआ लेकिन फिर भी अपना बचाव करते हुए बोला)





सालों उस दिन तो मेरी तबीयत थोड़ा खराब थी आज किसी की दिला दो फिर देखना उसकी बुर का भोसड़ा बना दिया तो मेरा नाम भी मंगरु नहीं।

दूसरा नाम सोचना शुरू कर दे,,, (उन दोनों में से एक बोला और दोनों जोर-जोर से हंसने लगे उन सब की बातें मां बेटे दोनों की हालत खराब कर रही थी एक तरफ दर का माहौल था दूसरी तरफ मदहोशी का माहौल था सुनैना भी पल भर के लिए सब कुछ भूल गई थी कि वह कहां पर है पेड़ के पीछे झाड़ियों में छुपकर वह तीनों के लैंड को देख रही थी एक साथ वह पहली बार तीन लंड देख रही थी,, उसकी बुर में अजीब सी हलचल हो रही थी उसे ऐसे डर के माहौल में भी उत्तेजना का अनुभव हो रहा था,,, और उत्तेजना के चलते अपने आप ही उसकी गांड अपने बेटे से सटी जा रही थी और धीरे-धीरे सुनैना को अपने बेटे के लंड के कड़कपन का एहसास होने लगा था,,,, सूरज की तो हालत खराब हो रही थी उन तीनों की बातें और अपनी मां की भारी भरकर गांड का स्पर्श उसे पागल बना रहा था और इस तरह का माहौल जो की पूरी तरह से डर से भरा हुआ था और मदहोशी से भी भरा हुआ था सूरज उत्तेजित हुआ जा रहा था और उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मां उन तीनों के लंड को बड़े गौर से देख रही थी। यह देखकर सूरज की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी और उसे अच्छा लग रहा था कि उसकी मां इस तरह से प्यासी नजरों से उन तीनों के लंड को देख रही थी,,,,।





वह तीनों कुछ देर और उसी तरह से बातें करते रहे,,,, लेकिन सूरज को अब मजा आ रहा था क्योंकि वह दोनों जिस जगह पर चुप कर खड़े थे वह पूरी तरह से सुरक्षित जगह थी वहां पर उन तीनों की नजर बिल्कुल भी पहुंच नहीं पा रही थी और ऐसे में डर के मारे जिस तरह से उसकी मां का हाल था वह पूरी तरह से अपनी मां के पीछे सटा हुआ था और उसका खड़ा लंड उसके पजामे में तनकर उसकी मां की गांड के बीचोंबीच साड़ी सहित अंदर धंसा हुआ था। और इसका एहसास सुनैना को अच्छी तरह से हो रहा था जिस तरह का नजारा वह अपनी आंखों के सामने देख रही थी और जिस तरह का अनुभव उसे अपने पिछवाड़े में हो रहा था इसके चलते उसके बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी उसे भी अच्छा लग रहा था उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी,,,,, तभी जो अभी भी धोती उठाएं नीचे खड़ा था वह धीरे-धीरे इस बड़े से पेड़ के करीब जाने लगा इसके पीछे मां बेटे दोनों छुपे हुए थे और जब सुनैना और सूरज दोनों उसको अपनी तरफ आते हुए देखे तो दोनों की सांस ऊपर नीचे होने लगी दोनों की सांस अटक गई कि अब क्या होगा लेकिन तभी तकरीबन एक हाथ की दूरी पर ही वह खड़ा हो गया पेड़ के बिल्कुल करीब जहां से सूरज और उसकी मां दोनों को वह आदमी एकदम साफ दिखाई दे रहा था और उसका लंड के साथ दिखाई दे रहा था जो की हवा में झूल रहा था डर के मारे सुनैना की जहां हालत खराब थी वहीं दूसरी तरफ उसे आदमी के ऊपर नीचे हिलते हुए लंड को देखकर उसकी बुर में अजीब सी हलचल हो रही थी। सुनैना गहरी गहरी सांस ले रही थी जिसका एहसास सूरज को हो रहा था सूरज को भी इस बात का अच्छी तरह से पता था कि उसकी मां क्या देख रही है। वैसे भी सूरज अपनी मां के बदन में उत्तेजना को जागना चाहता था उसकी जवानी के जोश को बढ़ाना चाहता था ताकि उसके लिए कोई मौका बना सके।





देखते ही देखते हैं वह आदमी पेशाब करने लगा और सुनैना उस आदमी के लंड से निकलने वाली पेशाब की धार को देख रही थी और वह आदमी अपने लंड को पकड़ कर ऊपर नीचे हिलाते हुए पेशाब कर रहा था यह सुनैना के लिए एक अद्भुत पल था डरो उत्तेजना दोनों का मिला-जुला असर उसके चेहरे पर दिखाई दे रहा था,,,,, तभी अचानक सुनैना की जांघ में ऐसा लगा कि जैसे चींटी ने काट लिया हो उसे खुजली होने लगी और वह खुजलाने के लिए अपना हाथ नीचे लाकर खुजलाने लगी,,,, लेकिन इसी के साथ ही उसके चूड़ियों के खनकने की आवाज आने लगी और वह आदमी एकदम से चौंक गया वह इधर-उधर देखने लगा और वह वहीं पर खड़े-खड़े पेशाब करता हुआ ही अपने साथियों की तरफ देखते हुए बोला।

अरे तुम लोगों को कोई आवाज सुनाई दी,,,, (उसे आदमी की बात सुनते ही सूरज समझ गया और वह तुरंत ही अपना दोनों हाथ अपनी मां के दोनों हाथ पर उसकी चूड़ियों पर रखकर उसे एकदम से दबा दिया ताकि उसकी चूड़ियों की आवाज ना आ सके, सुनैना भी समझ गई थी इसलिए वह एकदम शांत हो गई थी लेकिन जिस तरह से सूरज ने अपनी मां के दोनों हाथों को पकड़ा था उसकी चूड़ियों के खनकने की आवाज को दबाया था ऐसा करते हुए वह और भी ज्यादा अपनी मां के बदन से सट गया था जिसके चलते साड़ी सहित सुनैना को अपनी बेटी का लंड उसकी गांड के बीचों बीच एकदम से धंसता हुआ महसूस हो रहा था,, और एक बार फिर से सुनैना को साफ-साफ महसूस हो रहा था कि उसके बेटे का लंड पजामे में होने के बावजूद भी साड़ी सहित उसके बुर के मुख्य द्वार तक पहुंच गया था और दस्तक दे रहा था,,,, सुनैना एकदम से मदहोश हो गई थी पल भर के लिए मदहोशी में उसकी आंखें बंद हो गई लेकिन फिर से वह अपनी आंखों को खोलकर उसे आदमी को देख रही थी जो अपने साथियों को बता रहा था तभी उसकी बात सुनकर उन दोनों में से एक बोला,,,)





कैसी। आवाज,,,!

औरत के चूड़ियों के खनकने की आवाज,,,

( ईतना सुनते ही वह दोनों एक साथ बोल पड़े,,,)

पागल हो गया है क्या तू यहां फिर आने में औरत के चूड़ी की आवाज तुझे सुनाई दे रही है लगता है तेरे को ज्यादा हो गई है,,,,।

अरे नहीं यार मुझे एकदम साफ सुनाई दी थी।

लेकिन हम लोगों को तो नहीं सुनाई थी,,,,।

अरे मुझे सुनाई दी,,,,

अच्छा रुक हम दोनों भी वही आते हैं देखु तो सही आवाज आ रही है कि नहीं,,,,, (इतना कहने के साथ वह दोनों भी उसकी तरफ आने लगी है देखकर मां बेटे के मन में फिर से घबराहट होने लगी,,,, सुनैना को इस बात कर रहा था कि अगर तीनों में से किसी एक की भी नजर उसे पर पड़ गई तो आज उसकी खैर नहीं है वह तीनों के लंड को देख चुकी थी और बारी-बारी से तीनों रात भर उसकी चुदाई करेंगे यह सोचकर ही उसके बदन में कंपकंपी महसूस हो रही थी। और सूरज को भी इस बात का डर था कि वाकई में अगर वह दोनों पकड़े गए तो दोनों की खैर नहीं होगी फिर भी सूरज तो जैसे तैसे मार खाकर भी चलेगा लेकिन वह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की इज्जत नहीं बच पाएगी क्योंकि वह जितना दम है उतना तो उन तीनों का सामना कर सकता है लेकिन उसकी जीत होगी यह उसे निश्चित नहीं था। ऐसे में बहुत अपनी आंखों के सामने अपनी मां की चुदाई होते हुए नहीं देख सकता था। इसलिए वह भी घबरा रहा था और अपनी मां को कस के पकड़ लिया था ताकि डर के मारा उसकी मां के बदन में हलन चलन ना हो, क्योंकि वह जानता था कि उसकी मां के बदन में जरा भी हलन चलन होगा तो उन तीनों की नजर पड़ सकती है। इसलिए वह कस के अपनी मां को पकड़ कर स्थिर हो गया था,,,,।





लेकिन इस दौरान इस स्थिति में मां बेटे दोनों मदहोश भी हो रही थी दोनों के बदन में उत्तेजना की दर उठ रही थी जिस तरह से सुनैना अपने आप को अपने बेटे की बाहों में महसूस कर रही थी वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी उसे एहसास हो रहा था कि उसके बेटे की मजबूत भुजाएं औरत को प्यार देने के लिए समर्थ हो चुकी थी,,, उसे अपने बेटे की भुजाओं में अच्छा लग रहा था और उसे एहसास भी हो रहा था कि उसके बेटे की भुजाएं कितनी मजबूत है, और यह भी सोचकर वह गुनगुना जा रही थी कि उसके बेटे की भुजाओं से भी ज्यादा मजबूत और ताकतवर तो उसका लंड महसूस कर रहा है वह कभी सोच भी नहीं सकती थी की स्थिति में खड़े रहने की स्थिति में कपड़ों सहित उसका लंड उसकी गांड की गहराई तक पहुंच जाएगा और उसकी बुर के द्वार पर दस्तक देगा इसी से वह अंदाजा लगा ली थी कि वाकई में उसके बेटे का लंड कितना दमदार है उसकी आंखों के सामने दिखाई दे रहे तीनों मर्दों के लंड से कहीं ज्यादा मजबूत और तसल्ली देने वाला लंड उसके बेटे का है,,,,। वह दोनों भी वहीं पर आकर खड़े हो गए थे और खड़े होते हुए वह दोनों की फिर से अपनी धोती उठा लिए थे और अपने लड़के को पकड़कर हिलाने लगे थे और पेशाब करने लगे,,,, तभी उनमें से एक बोला।

मुझे तो यहां कोई आवाज नहीं आ रही है,,,,।





अरे मैं क्या झूठ बोल रहा हूं क्या चूड़ी के खनकने की आवाज आई थी,,, सच कहूं तो यार चूड़ी की आवाज सुनते ही मेरे लंड की अकड़ बढ़ने लगी थी।

लेकिन हमें तो कोई आवाज नहीं आ रही है।(उन दोनों में से एक बीड़ी का काश लेते हुए और अपने लंड को दोनों हाथ से पकड़ कर हिलाते हुए साथ ही पेशाब करते हुए बोला यह सब सुनैना और उसका बेटा देख रहा था सुनैना तो अपनी आंखों के सामने एक साथ पहली बार तीन तीन मर्द का लंड देख रही थी और तीनों को एक साथ पेशाब करते हुए देख रही थी जिसे देखकर उसकी बुर पानी पानी हो रही थी,,,, और पीछे से उसके बेटे का लंड उसकी बुर में तबाही मचाया हुआ था बिना घूसे ही उसकी बुर का पानी झड़ने के करीब आ गया था,,,,)

अरे यार मैं झूठ थोड़ी बोल रहा हूं।

अगर तू झूठ नहीं बोल रहा है तो तू ही सोच इतनी बिरने में तुझे औरत दिखाई देगी तू ही सोच इतनी बिरने में एक गांव की औरत क्या करेगी उसकी चूड़ी की आवाज सुनाई देगी पागल हो गया है तू मुझे तो लगता है इस पेड़ में ही चुड़ैल होगी जो हमें डरा रही है।

(इतना कहने के साथ ही तीनों पेड़ के ऊपर की तरफ देखने लगे तीनों थोड़े घबरा भी गए थे तभी उनमें से एक बोला)

अरे हो सकता है कि इसमें चुड़ैल हो और हमें यहां पेशाब भी नहीं करना चाहिए था यहां पर रुकना ठीक नहीं है,,,,, हमें चलना चाहिए।

सूरज के लंड की हालत





तू सच कह रहा है,,,,, ऐसा करते हैं पड़ोस वाले गांव चलते हैं,,,,,, आज की रात वहीं पर रुकेंगे,,,,,।

हां यार चलो मुझे भी लगने लगा है कि सच में इस पेड़ में चुड़ैल ही है,,,,,,।

(इतना कहने के साथ ही तीनों वहां से चलते बने लेकिन अभी भी मां बेटे दोनों पेड़ के पीछे छुपे हुए थे क्योंकि सूरज ने अपनी मां को रोक दिया था वह देखना चाहता था कि वह तीनों किसी और जाते हैं अगर इस रास्ते पर जाने लगे तो उन लोगों के लिए यह भी ठीक नहीं था क्योंकि उन दोनों को भी उसी रास्ते से जाना था इसलिए सूरज उन तीनों को जाते हुए देखने लगा कि कहां से जाते हैं तभी वह तीनों एक टूटी हुई पगडंडी से रास्ता बदल दिए और दूसरी तरफ जाने लगेगा देखकर मां बेटे दोनों की जान में जान आई सूरज अपनी मां से अलग होता हुआ बोला,,,)

बाप रे सही समय पर अगर पेड़ के पीछे ना छुपते तो आज तो काम तमाम हो जाता,,,,।

जिस तरह की स्थिति थी उसे देखते हुए सुनैना कुछ बोल नहीं पाई और शर्म से पानी पानी में जा रही थी वह सिर्फ इतना ही बोल पाई,,,

चल अब जल्दी से यहां से,,,, मुझे तो डर लग रहा है कि कहीं वह तीनों फिर ना आ जाए,,,,.

अब वह तीनों नहीं आने वाले,,, (इतना कहने के साथ है सूरज खेल जिसे वह जमीन पर दिया था उसे उठाकर अपने कंधे पर टांग लिया और जल्दी से झाड़ियां के बीच से दोनों बाहर आ गए और जल्दी-जल्दी गांव की तरफ जाने लगे)
 
सूरज उन तीनों के जाने के बाद अपनी मां को झाड़ियों के बीच से बाहर ले आया था और जल्दी-जल्दी गांव की तरफ चल दिया था और थोड़ी ही देर में वह दोनों सही सलामत गांव की पहुंच चुके थे लेकिन आज दोनों एक नए अनुभव के साथ घर पहुंच रहे थे सुनैना के तन बदन में अभी भी उत्तेजना की लहर उठ रही थी जो कुछ भी आज बाजार जाते समय हुआ था और आते समय हुआ था वह सुनैना के मानस पटल पर एक अविस्मरणीय छाप छोड़ गई थी,,, घर पर पहुंचते ही रानी एकदम से गुस्सा दिखाते हुए बोली।

कहां रह गए थे तुम लोग मैं कब से तुम लोगों का इंतजार कर रही हुं पता है मेरे मन में कैसे-कैसे विचार आ रहे थे तुम दोनों को तो कब से आ जाना चाहिए था तो इतनी देर कहां लग गई।

सूरज की चाहत अपनी मां के साथ





अरे कहीं नहीं बस आज बाजार में थोड़ा भीड़ ज्यादा थी तो सामान खरीदने में देर हो गई,,, (सुनैना एकदम सहज होते हुए बोली तो सूरज समझ गया कि उसकी मां बाजार में जो कुछ भी हुआ है वह रानी से छुपाना चाहती है भले ही वह सांप वाली बात हो या तीन बदमाश वाली,,,, इसलिए सूरज भी अपनी मां की हां मैं हां मिलाता हुआ बोला,,,)

मां सही कह रही है आज कुछ ज्यादा ही भीड़ थी,,,, लेकिन बाजार में भीड़ होती है तो मजा भी ज्यादा आता है,,,,।

अच्छा तुम दोनों यह बताओ कि मेरे लिए कुछ खाने के लिए लाए की नहीं,,,।

अरे समोसे और जलेबी तो हम लोग दुकान पर ही भूल गए,,,,,

(सूरज की बात सुनते ही रानी एकदम से मुंह फुला ली और अपने दोनों हाथ बात कर खड़ी हो गई तो सुनैना मुस्कुराते हुए बोली)

नाराज मत हो वह मजाक कर रहा है ठेले में तेरे लिए जलेबी और समोसे लेकर आए,,,।

जलेबी और समोसे,,,,( रानी एकदम उत्साहित होते हुए बोली और भागते हुए ठेले में से जलेबी और समोसे निकाल कर खाने लगी और सुनैना रसोई घर की तरफ देखी तो थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए रानी से बोली)

अभी तक चूल्हा नहीं चला है कम से कम चूल्हा जलाकर रोटियां ही पका दी होती,,,,।

तुमको लगता है कि मेरा मन चुल्हा जला कर रोटी बनाने को नहीं हो रहा था,,, शाम ढलते ही मैं सोची कि तुम्हारे आने से पहले रोटी बना देता हूं लेकिन फिर थोड़ी साफ सफाई करने लगी और धीरे-धीरे अंधेरा हो गया और जैसे-जैसे तेरा होने लगा तुम लोगों को ना देख कर मेरा मन घबराने लगा और फिर तुम लोग का इंतजार करने में ही समय निकल गया मैं कभी घर के अंदर तो कभी घर के बाहर तो कभी नुक्कड़ तक देख कर आ रही थी लेकिन तुम दोनों का तो कहीं आता पता नहीं था मैं कितना घबरा गई थी मालूम है और तुम कह रही हो की रोटी बना दी होती,,,।

चल अच्छा महारानी अब गुस्सा मत कर मैं बना देता हूं बस थोड़ा सा हाथ बंटा दे वैसे भी ज्यादा देर हो गई है,,,(इतना कहकर सुनैना अपनी साड़ी को कमर में खोंसकर अपने हाथ पैर धोई और फिर सीधा रसोई घर में चली गई चूल्हा जलाने लगी,,,,, सूरज पर हाथ पैर धोकर कोई अपने मां के पास ही बैठ गया क्योंकि जो कुछ भी बाजार जाते समय हुआ था और आते समय हुआ था उसके चलते वह अपनी मां के करीब अपने आप को महसूस कर रहा था उसे अपनी मां का करीब रहना बहुत अच्छा लग रहा था वह बार-बार मुस्कुरा कर सुनैना की तरफ देख ले रहा था सुनेना शर्मा कर अपनी नजरों को नीचे कर ले रही थी,,,, देखते ही देखते सुनैना रोटियां पकाने लगी और सूरज अपनी मां के पास बैठकर आज सब्जी काट रहा था यह देखकर सुनैना को भी अच्छा लग रहा था लेकिन रानी अपने भाई की हरकत को देख कर मंद मंद मुस्कुरा रही थी क्योंकि अंदर ही अंदर उसे एहसास हो रहा था कि उसका भाई अपनी मां की मदद क्यों कर रहा था,,,, उसे सब पता था कि उसका भाई उसकी मां की दोनों टांगों के बीच पहुंचना चाहता है,,,, और इस बात से उसे हैरानी नहीं हो रही थी वह तो चाहती थी कि जल्द से जल्द उसका भाई उसकी मां की जवानी पर विजय प्राप्त कर ले ताकि उसका भी रास्ता एकदम साफ हो जाए और उसकी मां के कदम बाहर न भटक पाए,,,,)

आज इतनी मदद क्यों कर रहा है,,,?(सुनैना मुस्कुराते हुए सूरज की तरफ देखते हुए बोली)

आज कहीं जाना नहीं है तो सोच रहा हूं की मदद ही कर दो क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है क्या मेरा मदद करना।

नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है तूने कभी इस तरह से मदद किया नहीं है ना इसलिए कह रही हूं।

मैं तो हमेशा तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हूं बस तुम ही मौका नहीं देती,,,,,।

(अपने बेटे की बातें सुनकर सुनैना एकदम से शक पका गई,,, और उसे झाड़ियों वाली बात याद आ गई की कैसे पेड़ के पीछे उसे अपनी बाहों में लेकर उन तीनों बदमाश से छुपा हुआ था लेकिन इस दौरान उसका मोटा लंड एकदम से उसकी गांड के बीचों बीच धंसा जा रहा था,, सुनैना इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि एक मर्द का लंड कब खड़ा होता है उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसे समय सहज या औपचारिकता तो बिल्कुल नहीं थी क्योंकि डर के माहौल में मर्द एकदम शिथिल पड़जाता है खास करके डर के माहौल में तो बिल्कुल भी उसका लंड खड़ा नहीं होता लेकिन उसके बेटे के साथ ऐसा बिल्कुल भी नहीं था शायद उसकी जवानी की गर्मी डर के माहौल में भी उसके बदन में मर्दानी की गर्मी फैला रही थी जिसके चलते उसके बेटे का लंड खड़ा हो गया था।

सुनैना अपने मन में ही बोले कि जब इतनी खूबसूरत औरत किसी जवान लड़के की बाहों में होगी तो भला घर के माहौल में भी वह जवान लड़का कैसे अपने आप को रोक पाएगा,,, उसे अच्छी तरह से याद था जब वह बदमाश उसके चूड़ियों के झांकने की आवाज से एकदम चौकन्ना हो गया था अपने साथी को औरत की चूड़ियों की आवाज आने की बात कही थी तब सूरज एकदम से उसके दोनों हाथों को अपनी हथेली में दबोच लिया था ताकि उसकी चूड़ियों की आवाज ना आए इस समय सुनैना को उसकी मर्दानगी का एहसास हो गया था उसकी हथेलियों का कसाव अपनी कलाई पर महसूस करके वह पानी पानी हो गई थी,,,, इतना तो सुनैना अच्छी तरह से जानती थी कि जो कुछ भी हुआ था वह अनजाने में बिल्कुल भी नहीं हुआ था इसमें उसके बेटे की मर्जी पूरी तरह से शामिल थी वरना उसका लंड कभी खड़ा ना होता इसका मतलब साफ था कि उसका बेटा पूरी तरह से उसके प्रति आकर्षित है उसके खूबसूरत बदन के प्रति आकर्षित है और इस बात का अहसास होते ही उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी चेहरे पर शर्म की लालिमा छाने लगी,,,, और वह तवे पर रोटी को पलटते हुए बोली,,,)

कोई बात नहीं अब से तू मेरी मदद कर देना। लेकिन तुझे कैसे पता चलेगा कि मुझे मदद की जरूरत है।

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मा मैं समझ जाऊंगा कि तुमको मदद की जरूरत है।,,,

लेकिन तू कैसे समझ जाएगा कि मुझे तेरे मददकी जरूरत है और वह भी बिना कहे।

बहुत आसान है देखो ना जब तुम अगर खाना पका रही होगी तो मैं इसी तरह से सब्जी काटकर आटा गूथ कर तुम्हारी मदद कर दूंगा और अगर जैसे तुम बर्तन मांज रही हो तो उसमें भी मैं तुम्हारी मदद कर दूंगा बर्तन धोकर और अगर कपड़े साफ कर रही हो तो मैं उसमें भी तुम्हारी मदद कर दूंगा तुम्हारे साथ कपड़े धोकर अगर घर की सफाई कर रही हो तो मैं भी झाड़ू लगा दूंगा खेत का काम तो हम दोनों मिलकर करते हैं और अगर तुम कमरे के अंदर हो तो,,,,,(इतना कहकर हुआ एकदम से खामोश हो गया मानो के जैसे अपनी मां को इशारा कर रहा हो कि आगे का मतलब तुम समझ जाओ और शायद सुनैना अपने बेटे के खाने के मतलब को समझ भी गई थी क्योंकि उसके चेहरे पर एकदम से शर्म की आभा झलकने लगी थी उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई थी जिससे साफ पता चल रहा था कि सूरज की बातें उसे अच्छी लग रही थी लेकिन फिर भी वह बोली,,,)

कमरे के अंदर,,,, कमरे के अंदर कैसी मदद करेगा,,,,, (ऐसा कहते हुए सुनैना की सांस गहरी चलने लगी थी जिसके साथ उसकी छतिया भी ऊपर नीचे हो रही थी और इस समय सब्जी काटते हुए सूरज की नजर उसकी मां की भारी भरकम छातियां पर भी घूम जा रही थी जिसका एहसास सुनैना को भी अच्छी तरह से हो रहा था,,,, अपनी मां की बात सुनकर सूरज को समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस तरह का जवाब दे लेकिन फिर भी वह सोच समझ कर बोला,,,)

कमरे के अंदर भी मदद करने का बहुत सर तरीका है जैसे कि तुम दिन भर काम करती हो सोते समय तुम्हारा बदन दर्द करता होगा तो हमें दबा सकता हूं तुम्हारे पैर दबा सकता हूं कमर दबा सकता हूं ताकि तुम्हें आराम मिल सके और गर्मी पर ज्यादा लग रही है तो मैं हवा देने के लिए पंखी घूमा सकता हूं ताकि तुम आराम से सो सको,,,,,, (इतना कहकर हुआ अपने मन में ही बोला अगर तुम्हारी बुर ज्यादा पानी छोड़ रही है तो तुम्हारी बुर में अपना लंड डालकर तुम्हारी प्यास भी बुझा सकता हूं,,,, ऐसा हुआ मन में कह रहा था लेकिन अपनी मां के सामने ऐसा कहने की उसकी हिम्मत अभी नहीं थी अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना मंद मुस्कुराने लगे वह अपने बेटे के कहने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी,,,, एकदम से उसे बाजार जाते समय वाली घटना याद आ गई जब वह पेशाब करने के लिए बैठी थी और इस समय उसका पैर सांप की गोलाई के बीचों बीच था,,,, उसे पाल को याद करके सुनैना एकदम से उत्तेजना से गनगनाने लगी,,,, वह समझ सकती थी कि वह पर डर के माहौल से भरा हुआ भी था और मदहोशी और उत्तेजना से भी भरा हुआ था क्योंकि वह पेशाब करने के लिए बैठी हुई थी उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी और उसकी मदद करने के लिए उसका बेटा तुरंत आ गया था और वह अपने बेटे की आंखों के सामने भी उसी अवस्था में बैठी हुई थी उसकी नंगी गांड उसकी आंखों के सामने चमक रही थी।

सुनैना अच्छी तरह से जानती थी कि भले ही वह घबराई हुई थी भले ही सांप के काटने का डर पूरी तरह से बना हुआ था लेकिन उसी की मदद करते समय सुनैना निश्चित तौर पर कह सकती थी कि उसके बेटे की नजर उसकी जवानी से भरी हुई गांड पर ही टिकी हुई थी वह जानती थी कि उसका बेटा नजर भरकर उसकी गांड को देख रहा था और जिस तरह से मदद करने के बहाने उसके टांग को उठाया था वह उसकी कहानी से बेहद करीब था और उसे अच्छी तरह से एहसास था कि उसने जानबूझकर अपनी हथेली को उसकी गुलाबी पर से सटकर उसे मसल दिया था वह एहसास अभी तक उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार पर महसूस हो रही थी और बार-बार यही सोच कर उसकी बुर पानी छोड़ दे रही थी,,,, यह सब देखते हुए वह समझ सकती थी कि कमरे में उसका बेटा किस तरह से उसकी मदद करना चाहता है बस वह अपने मुंह से बोल नहीं रहा है लेकिन उसका खाने का मतलब यही है और इस बात को सोचकर सुनैना उत्तेजना से सिहर उठी कि उसका बेटा उसे ही चोदना चाहता है,,,, अपने आप को सहज करते हुए सुनैना बोली,,,)

अच्छा ठीक है कर देना तू मेरी मदद बस,,,,,

क्या अभी भी तुम्हारी कमर दुख रही है,,,।

(इतना सुनकर तो सुनैना के होश उड़ गए वह समझ गई कि उसके बेटे का इरादा उसके प्रति कुछ गलत करने को है इतना तो वह जानती थी लेकिन वह जल्दबाजी दिख रहा था,,,,, इसलिए वह एकदम से बोली,,,)

नहीं नहीं आज मेरी कमर नहीं दुख रही है और नहीं बदन दर्द कर रहा है जिस दिन दुखेगी उस दिन तुझे बोल दूंगी बस,,,,,, (इतना कहकर सुनैना खुद अपनी बातों से शर्मिंदा हो गई थी कि यह उसे क्या हो रहा है यह सब तो उसकी तरफ से उसके बेटे को खुला निमंत्रण देने वाली बात हो गई थी,,, और एक मां होने के नाते यह कितनी शर्मनाक बात है नहीं नहीं ऐसा वह बिल्कुल भी नहीं कर सकती भावनाओं में बहकर वह अपने बेटे की इच्छा को पूरी नहीं कर सकती,,,, अगर सच में किसी दिन ऐसा हो गया तो वह अपनी नजर में ही गिर जाएगी की पति कुछ महीनो के लिए छोड़ कर क्या चल गया जवानी की गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई और अपने बेटे के साथ ही हम बिस्तर होने लगे नहीं नहीं मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहती कि समाज में इस तरह की बातें हूं या खुद की नजर में गिर जाऊं मुझे अपनी बेटी को यह सब करने से रोकना होगा लेकिन कैसे खुले तौर पर तो मैं यह कह नहीं सकती कि तू यह सब मत कर मैं जानती हूं कि तू मेरे साथ गलत संबंध बनाना चाहता है इस तरह से कहना भी तो गलत होगा नहीं हमेशा में नहीं होने दूंगी मैं खुद ही उससे दूरी बनाकर रहूंगी,,, और अपने मन में ऐसा सोच कर वह अपने बेटे से बोली,,,) चल अच्छा अब रहने दे यह सब रानी कर लेगी तू जाकर बैठ,,,,,, रानी जरा सब्जी काट देना तो तुझे भी शर्म नहीं आ रही है कि बड़ा भाई सब्जी काट रहा है और तू आराम सेबैठी है।

अब मैं क्या कर सकती हूं मां भैया तो खुद ही सब्जी काट रहे थे तो मैं सोची चलो मैं आराम कर लेती हूं।

बढ़िया यार आप करने वाली चल जल्दी-जल्दी काम कर आज ज्यादा देर हो गया है।

(सूरज अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया और रानी वहीं पर आकर बैठकर सब्जी काटने लगी तब तक सूरज अपने मन में सोचा कि चलो तब बाहर ही घूम कर आ जाऊं और इतना अपने मन में सोच कर वह घर से बाहर निकल गया,,,,, उसके जाते ही सुनैना राहत की सांस लेने लगी उसे खुद को समझ में नहीं आ रहा था कि अपने बेटे की मौजूदगी में उसे न जाने क्या होने लगता है,,,

सूरज घूमता घूमता सोनू के घर के करीब पहुंच गया था,,,, घर के बाहर खटिया डालकर सोनू के चाचा और सोनू के पिताजी दोनों बातें कर रहे थे लेकिन वहां पर सोनू नहीं था,,,, अब इस समय उसके घर में जाना भी ठीक नहीं था और वैसे भी घर में सब लोग मौजूद थे इसलिए यहां पर काम बनने वाला नहीं था लेकिन उसे बड़े जोरों की पेशाब लगी हुई थी इसलिए वह सोनू के घर के पीछे की तरफ जाने लगा जहां पर घर के पीछे खेत ही खेत थे,,,, चांदनी रात थी इसलिए सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था वह घर के पीछे पहुंचकर धीरे से अपने पजामे को नीचे किया और अपने लंड को बाहर निकाल कर हाथ में पकड़ कर उसे हिलाते हुए पेशाब करने लगा कुछ देर पहले जिस तरह की वार्तालाप उसकी मां के साथ हुई थी उसको लेकर उसके लंड का तनाव बरकरार था और वह अपनी पूरी औकात भी खड़ा था वह निश्चित होकर पेशाब कर रहा था इस बात से बेखबर की चार-पांच कदम की दूरी पर ही झाड़ियां में कोई औरत बैठकर सोच कर रही थी और सूरज की हरकत को देख रही थी सूरज के लंड को देखकर उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी थी,,, उसका मुंह खुला का खुला रह गया था और यह औरत कोई और नहीं सोनू की मां थी,,, सूरज को पहचानने में सोनू की मां ने बिल्कुल भी देर नहीं की और वह अपने मन में ही बोली,,,,।

हाय दइया यह तो सुनैना का बेटा है इसका इतना मोटा और लंबा लंड मैंने तो आज तक ऐसा लंड नहीं देखी,,,, जिस किसी की भी बुर में जाएगा तबाही मचा देगा,,, बाप रे मेरी तो देख कर ही हालत खराब हो रही है,,,,,, झाड़ियों मैं सोच करते हुए वह सूरज के लंड को देख रही थी और अपने मन में इस तरह की बातें कर रही थी,,,,, और सूरज था की जुगाड़ ना होने की वजह से पूरी तरह से बौखलाया हुआ था उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था जिसे वह बार-बार पकड़ कर हिला भी दे रहा था और मुठीया भी दे रहा था,,,, और जब-जब वाला अपने लंड को मुठीयाता था तब तब सोनू की मां की बुर में सुरसुराहट होने लग रही थी,,,,, सोनू की मां यह सब देखकर पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी उसे अच्छी तरह से मालूम था कि सोनू के पिता का लंड इससे आधा भी नहीं था अब तक वह केवल अपने पति से ही चुदवाती आ रही क्या इसलिए वह अपने पति की लंड की चुदाई के एहसास में ही थी,,, लेकिन अनजाने में ही सूरज के मोटे तगड़े लंबे लंड को देखकर उसे एहसास होने लगा कि अगर सूरज का लंड उसकी बुर में जाएगा तो उसे कैसा महसूस होगा कैसा लगेगा छोटे से लंड से जब वह इतनी मस्त हो जाती है तो इतना मोटा और लंबा लंड जाएगा तो वह तो पागल ही हो जाएगी,,, सोनू की मां के मन में कुछ और चल रहा था पर जल्दी-जल्दी धीरे से आवाज किए बिना ही साथ में लाए हुए डब्बे के पानी से अपनी गांड धोने लगी और गांड धोने के बाद एकदम से उठकर खड़ी हो गई और उसके खड़े होने के साथ ही सूरज की नजर भी उसे पर पड़ी वह एकदम से हड़बड़ा गया,,,,, सूरज कुछ बोल पाता इससे पहले ही सोनू की मां बोल पड़ी,,,,

अरे सूरज तु यहां क्या कर रहा है,,,,? (वह सूरज को बिल्कुल भी मौका देना नहीं चाहती थी इसलिए इतना कहने के साथ ही हुआ तुरंत झाड़ी के बाहर आ गई और सूरज सोनू की मां को देखता ही रह गया वह अपने लंड को पजामे में अंदर नहीं कर पाया,,,, तब तक सोनू की मां फुर्ती दिखाते हुए उसके करीब पहुंच गई और एकदम से जानबूझकर उस पर गुस्सा दिखाते हुए बोली,,,)

तुझे शर्म नहीं आती रे एक औरत के सामने आकर खड़ा हो गया और पेशाब करने लगा,,,

चचचचचच,,,, चाची,,,

क्या चाची,,,,,, (इतना कहकर अपनी नजर को नीचे करके सूरज के लंड की तरफ देखते हुए) हाय दइया यह क्या है,,,,,,, (वह आश्चर्य से सूरज के लड को देखने लगी तब सूरज को एहसास हुआ कि वह जल्दबाजी और हड़बड़ाहट में अपने लंड को पजामे के अंदर करना भूल गया था,,, और अब उसे अंदर करने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि सोनू कि मैं उसे अपनी आंखों से देख ली थी और सूरज ने गौर किया था कि उसकी मां हैरान थी उसके लंड को देखकर,,,)

हाय दइया क्या है रे,,,,

मममम,,,, मेरा लंड है चाची,,,,, (औरतों को समझ सकते के कारण उसे एहसास हो रहा था कि इस समय सोनू की मां के मन में क्या चल रहा है इसलिए वह घबराते हुए बोला)

वो तो में भी देख रही हूं लेकिन इतना लंबा और मोटा मैं तो आज तक ऐसा नहीं देखी,,,, (ऐसा कहते हुएसोनू की मां अपना हाथ सूरज के लंड की तरफ ले गई और उसे अपनी मुट्ठी में भर ली,,, और मुट्ठी में भरने के साथ ही सूरज ने देखा कि सोनू की मां के चेहरे का हवा एकदम से बदल गया वह एकदम से सिहर उठी और बोली,,,) हाय दइया इतना गरम और इतना मोटा,,, (इतना कहने के साथ ही उत्तेजना में वहां उसके लंड को अपनी मुट्ठी में दबा दी सूरज एकदम से मस्त हो गया और आंखें बंद हो गई वह समझ गया कि सोनू की चाची की तरह ही सोनू की मां भी उसके लंड की दीवानी हो गई है लेकिन अभी दोनों में ज्यादा कुछ बातचीत हो पाती से पहले ही सोनू उधर आ गया और सोनू को देखते ही उसकी मां एकदम से सूरज के लंड पर से अपना हाथ पीछे खींच ली और सूरज अपने पजामे को ऊपर कर लिया सूरज ने यह सब बड़ी जल्दबाजी से किया था सोनू देख नहीं पाया था,,,, लेकिन घर के पीछे अपनी मां और सूरज को देखकर वह थोड़ा हैरान हो गया और उन दोनों के करीब आकर बोला,,,)

तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो,,,, मां तुम यहां क्या कर रही हो और सूरज,, तु,,,,, यहां,,,,।

(अब ना तो इसका जवाब सोनू की मां के पास था और नहीं सूरज के पास लेकिन सूरज एकदम से बोल पड़ा,,,,)

वो वो,,,,,,, कहना कि मैं किसी काम से वह सामने वाले गांव में गया था वहां थोड़ी देर हो गई तो मैं यहीं से लौट रहा था मैं सोचा यहां से जल्दी पहुंच जाऊंगा तो यहां चाची मिल गई तो थोड़ी बातचीत होने लगी,,,,,।

ओहहह यह बात है,,,, (सोनू एकदम सहज होता हुआ बोला)

लेकिन तू यहां क्या करने आया है,,,,।

पागल हो गया है क्या मैं यहां पेशाब करने के लिए आता हूं और पेशाब करने के लिए ही आया था,,, तो तुम दोनों को देखा तो,,,,,।

अच्छा ठीक है सोनू तुम दोनों बातें करो मैं जा रही हूं देर हो रही है,,,,।(इतना कहकर सोनू की मां एकदम से वहां से घर की तरफ चल दी,,,,, सोनू की मां के जाते ही,,, सूरज सोनू को छेड़ते हुए बोला,,,,)

यार सोनू तेरी मां तो तेरी चाची से भी ज्यादा खूबसूरत है तू बेवजह अपनी चाची के पीछे पड़ा है अगर इतनी मेहनत अपनी मां के पीछे करता तो अब तक तो तु उसे चोद भी लेता,,,,

बक भोसड़ी के,,,,, वह मेरी मां है,,,,।

तो क्या हुआ मादरचोद तेरी चाची भी तो तेरी मां जैसी है लेकिन तू उसे चोदने के लिए तड़पता है कि नहीं,,,,, जैसे तेरी चाची के पास बुर है मुझे पूरा यकीन नहीं की तेरी मां की बुर उससे भी ज्यादा खूबसूरत और कसी हुई होगी,,,,।

देख सूरज अब मजा नहीं आ रहा है तो इस तरह की बातें करेगा तो हम दोनों की दोस्ती टूट जाएगी,,,।

इसे दोस्ती का क्या वास्ता तू ही सोच तू अपनी चाची के पीछे न जाने कब से पड़ा है जबकि तेरी चाची से भी ज्यादा खूबसूरत और गदराई जवानी की मालकिन तेरी मां है,,,, तुझे यकीन नहीं आता तो यह देख,,,(एकदम से अपना पजामा आगे की तरफ खींचकर सोनू को अपना लंड दिखाता हुआ) तेरी मां से सिर्फ बात करके ही है इतना खड़ा हो गया है तू ही सोच तेरी मां कितनी खूबसूरत है मैं तो कहता हूं सच में अपनी चाची को छोड़कर अपनी मां के पीछे पड़ जा तेरे पिताजी भी अब बूढ़े हो चुके हैं और तेरी मां जिस तरह से कसे बदन वाली है उसे जवान और तगड़ा लंड चाहिए,,,,,

सूरज की बातें सुनकर सोनू के दिमाग में भी सनसनी मच गई थी जिस तरह से सूरज उसकी मां के बारे में गंदी बातें कर रहा था उसे सुनकर सोनू के तन-बाद में उत्तेजना की लहर उठ रही थी और अनजाने में उसकी आंखों के सामने उसकी मां का नंगा बदन नाचने लगा था और तो और सूरज के खड़े लंड को देखकर उसकी हालत और ज्यादा खराब हो गई थी,,,, लेकिन फिर भी झूठ मूठ का गुस्सा दिखाते हुए वह बोला।

देख सूरज की अच्छी बात नहीं है मेरी मां के बारे में तो इतनी गंदी गंदी बातें कर रहा है अगर मैं भी तेरी मां के बारे में गंदी बातें करु तो,,,,

तो करना तुझे रोका किसने है,,,, अगर तुझे मेरी मां खूबसूरत लगेगी तो तू भी इस तरह की बातें करेगा मुझे तो तेरी मां बहुत अच्छी लगी,,,, देख यह छुपी बात नहीं है अगर मुझे मौका मिला ना तो मैं सच में तेरी मां को चोद दूंगा,,,, तब मुझे मत कहना और तुझे तो खुश होना चाहिए कि तेरी मां इस उम्र में भी हम जैसे लड़कों का लंड खड़ा कर देती है,,,,।

(सूरज की बातें सुनकर सोनू की हालत खराब हो रही थी वह भी अपने मन में यही सोच रहा था कि अब तक तो उसने अपनी मां पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया था वह अब तक अपनी चाची के ही पीछे हाथ धोकर पड़ा था अगर सूरज कह रहा है तो सच में उसकी मां बेहद खूबसूरत होगी तभी तो उसका लंड एकदम से खड़ा हो गया और उसे एहसास हो रहा था कि इस समय उसकी भी यही हालत है लेकिन फिर भी सूरज के सामने अपनी मां के बारे में गंदी बातें नहीं कर सकता था इसलिए वह सूरज से बोला,,,)

चल रहने दे तू जा यहां से मुझे इस बारे में बिल्कुल भी बात नहीं करनी,,,,।

(सूरज सोनू को ज्यादा परेशान नहीं करना चाहता था इसलिए हंसते हुए वहां से चला गया लेकिन जाते-जाते सोनू के मन में उसकी मां की प्रति उत्तेजना की चिंगारी को भड़का गया बर्बादी वहां पर पेशाब करते हुए अपनी मां के बारे में सोच कर अपना लंड हिला कर मुठ मारने लगा,,,।

सूरज रानी और उसकी मां तीनों साथ में खाना खा चुके थे,,,, और थोड़ी बहुत सफाई के बाद वह लोग अपने-अपने कमरे में जा चुके थे,,, रोज की तरह रानी अपने कमरे का दरवाजा खुला छोड़ रखी थी समय के मुताबिक सूरज अपने कमरे से बाहर निकाला लेकिन रानी के कमरे की तरफ जाने के बजाय वह अपनी मां के कमरे की तरफ जल्दी आओ धीरे से जाकर दरवाजे के पास खड़ा हो गया और अंदर की तरफ देखने लगा अंदर लालटेन जल रही थी,,, वह देखना चाहता था कि बाजार जाते समय और बाजार से आते समय जो कुछ भी हुआ था उसका उसकी मां के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है और जैसे ही सूरज की नजर कमरे के अंदर चारपाई पर पड़ी तो उसके होश उड़ गए उसे पूरा यकीन हो गया था कि,,, जो कुछ भी आज हुआ था उसका असर उसकी मां के मन पर कुछ ज्यादा ही गहरा पड़ गया था क्योंकि चारपाई पर वह पूरी तरह से नंगी थी उसकी दोनों टांगें खुली हुई थी,,, लालटेन की पीली रोशनी में उसका नंगा बदन चमक रहा था इसका एक हाथ उसकी बड़ी-बड़ी चूची पड़ती है और दूसरा हाथ उसकी बुर पर थी और उसकी दो उंगलियां उसकी बुर की गहराई नाप रही थी जो की गहराई नापने में असमर्थ थे उसके चेहरे के हाव-भाव पूरी तरह से मदहोशी में डूबे हुए थे,,,, अपनी मां को इस अवस्था में देखकर सूरज का लंड खड़ा होने में एक पल की भी देरी नहीं लगाया।

अंदर से हल्की हल्की सीसकारी की आवाज आ रही थी जिसे सूरज सुनने की कोशिश कर रहा था और उसके कानों में उसकी मां की गरमा गरम शिसकारी की आवाज बड़े आराम से पहुंच रही थी,,,, शायद यह आवाज और भी तेज हो सकती थी लेकिन उसकी मां अपनी आवाज पर काबू किए हुए थी ताकि यह उसकी सिसकारी की आवाज को कोई सुन ना सके। लेकिन वह नहीं जानती थी कि दरवाजे पर खड़ा होकर उसका बेटा उसकी काम लीला को अपनी आंखों से देख भी रहा है और उसकी मदहोशी भरी आवाजों को सुन भी रहा है,,,, सूरज की हालत खराब हो रही थी वह अपनी मां की नंगी जवान को देख रहा था उसे अपनी उंगली से अपनी जवानी की प्यास बुझाते हुए देख रहा था वह जानता था कि ऐसे उसकी प्यास बुझने वाली नहीं है बल्कि और ज्यादा बढ़ जाने वाली है और यही वह चाहता भी था,,,। वह बड़े गौर से अपनी मां की कम लीला को देख रहा था तभी उसके कानों में जो आवाज सुनाई थी उसे सुनकर उसके कान के साथ-साथ उसके लंड की अकड़ भी एकदम से बढ़ गई।

ओहहह सूरज बेटा तेरा लंड कितना मोटा और लंबा है,,,आहहहहहह ,,,,,, तू मेरी मजबूरी क्यों नहीं समझता,,,,सहहहहह आहहहह,,,,,

(इतना सुनते ही सूरज का गला उत्तेजना से सूखने लगा वह पूरी तरह से पागल होने लगा क्योंकि उसकी मां अपनी बुर में उंगली डालते हुए उसका जिक्र कर रही थी और इस अवस्था में उसके जिक्र करने का मतलब था कि इस समय उसकी मां को उसकी जरूरत थी)

सहहहह आहहहहह मेरे लाल तू तो अच्छी तरह से जानता है कि तेरा बाप कितना निकम्मा निकल गया मुझे भरी जवानी में छोड़कर ना जाने किसके साथ मुंह काला कर रहा है,,,,,आहहहहहह जैसे तू मेरी हर काम में मदद करना चाहता है इस काम में मेरी मदद क्यों नहीं करता क्यों नहीं अपने लंड को मेरी बुर में डाल देता,,,,,आहहहहहह कितना मजा आएगा रे तेरे लंड से चुदने में,,,,ऊमममममम मैं तो रात भर तुझ से चुदवाना चाहती हूं,,,,,आहहहहह,,,,,सहहहहहहहह ऊमममममम (ऐसा कहते हुए वह जोर-जोर से अपनी उंगली को अंदर बाहर कर रही थी जिसे देखकर सूरज की उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच चुकी थी उसे एहसास हो गया था कि उसकी मां भी उससे चुदवाना चाहती है बस झिझक रही थी,,,, और यही झिझक सूरज को खत्म करनी थी सूरज पूरी तरह से पागल हो गया अपनी मां की हरकत और उसकी बातों को सुनकर एकदम से चुदवासा हो गया था मन तो उसका कर रहा था कि इसी समय दरवाजा तोड़कर वह कमरे में दाखिल हो जाए और अपनी मां की टांगों के बीच पहुंचकर उसकी बुर में अपना लंड डाल दे,,,, लेकिन इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि यह उचित समय नहीं था लेकिन इतना तो साफ हो गया था कि उसकी मां भी यही चाहती है लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां उसके बेटे के बारे में बात कर रही थी कि कितना मोटा और लंबा है सूरज को यह समझ में नहीं आ रहा क्योंकि उसकी मां उसकी लंड को कब देख ली,,,, जबकि आज तक ऐसा कुछ हुआ भी नहीं फिर वह अपने मन में सोचने लगा कि शायद वह अपने मन में धारणा बना रही होगी कि उसके बेटे का इतना ही मोटा और लंबा होगा और यह सोचकर वह खुश होने लगा।

लेकिन जिस तरह की उत्तेजना उसके बदन में उसे जकड़ रही थी वह देखते हुए वह ज्यादा देर तक अपनी मां के कमरे के बाहर खड़ा नहीं रह सका और तुरंत दरवाजा खोलकर अपनी बहन के कमरे में दाखिल हो गया और बिना कुछ बोले ही जमकर उसकी चुदाई करने लगा,,,,, और अपने मन में निर्धारित करने लगा कि अब वह अपनी मां को पूरी तरह से बदल कर रहेगा जिसकी शुरुआत वह सुबह से ही करना चाहता था वह बाजार से अपनी मां के लिए चूड़ियां खरीद कर लाया था और वह उसे अपने हाथों से पहनाना चाहता था।
 
सुबह जब सूरज की नींद खुली तो उसके चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान तैर रही थी,,,, क्योंकि अब उसे पूरा यकीन हो गया था कि उसकी मां भी उसके लिए तड़प रही है यह एक अच्छी शुरुआत थी अब उसे लगने लगा था कि उसकी मां जल्द ही उसकी बाहों में आने वाली है और जल्द ही उसके नीचे आने वाली है क्योंकि धीरे-धीरे उसकी मां की तड़प बढ़ रही थी जैसे-जैसे पति का वियोग उसके मन में घर कर रहा था वैसे-वैसे मर्द के लिए उसकी तरफ बढ़ती जा रही थी और वह मर्द कोई और नहीं था बल्कि वह खुद था इस बात का एहसास उसके तन बदन में एक अलग ही उत्तेजना का संचार भर रही थी। जिसे वह दिलो जान से चाहता था जिसे पाने के लिए रोज नए तरकट रचता था,,, अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं था जब उसकी मंशा पूरी होने वाली थी वह अपनी मां के बारे में सोच करना जाने कितनी बार अपने हाथ से हिला कर काम चलाया था लेकिन वह अच्छी तरह से जानता था कि जिस तरह से उसकी मां की बेलगाम जवानी है उसे पूरी तरह से भोगने में ही असली सुख प्राप्त होगा। खाली ख्यालों में अपनी मां के बारे में सोच कर हाथ से हिला कर अब कोई फायदा नहीं था।





सूरज नींद से जागकर अपनी खटिया पर बैठ गया था तभी उसे रात वाली घटना याद आने लगी जब वह सोनू के घर गया था,,, सोनू के घर तो वह किसी और काम के लिए गया था किसी और से मिलने की चाह में गया था लेकिन वहां पहुंचने पर कुछ और ही हो गया थाऔर रात वाली घटना याद आते ही अपने आप ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी क्योंकि उसे लगने लगा था कि अब एक और चिड़िया उसकी जाल में पूरी तरह से फंस चुकी है वह कभी सोचा नहीं था कि सोनू की मां उसके लंड को देखकर पागल हो जाएगी और जो कुछ भी हुआ था जाने में हुआ था वह तो पेशाब करने के लिए उसके घर के पीछे चला गया था लेकिन उसे नहीं मालूम था कि वही थोड़ी दूर पर सोनू की मां बैठकर सोच कर रही थी और उसे पेशाब करते हुए देख रही थी सोनू इस बात से ज्यादा खुश था कि उस समय अच्छा हुआ कि उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था और खड़े लंड को देखकर ही सोनू की मां का ईमान डोल गया था,, पहले तो वह सोनू की मां को देखकर एकदम से घबरा गया था और अपने मन में सोच रहा था कि का सोनू की मां की जगह सोनू की चाची होती तो मजा आ जाता लेकिन फिर भी जिस तरह से उसने एकदम से उसके लंड पर हाथ रख दी थी सूरज के तन बदन में मदहोशी का रस घुलने लगा था और उसे यकीन हो गया था कि एक और चिड़िया उसके जाल में फंस गई है अगर सही समय पर सोनू वहां ना आ गया होता तो शायद बात और कुछ आगे बढ़ जाती।





सूरज के मन में अब सोनू की चाची के साथ-साथ सोनू की मां का भी ख्याल घूमने लगा था। सूरज अपने कमरे से बाहर निकल आया था और आंगन में रानी झाड़ू लगा रही थी उसकी गोलाकार गांड को देखकर सूरज मुस्कुराने लगा क्योंकि रात भर उसने जमकर उसकी लिया था और वह रोज ही लेता था लेकिन हर एक बार उसे नया ही एहसास प्राप्त होता था पास में ही पानी से भर लोटा उठाकर वह पानी पीने लगा और पानी पीने के बाद दोबारा रानी से बोला,,,

मां कहां गई,,,,,?

बाहर ही होगी बाहर झाड़ू लगा रही थी,,,

ठीक है,,,,(इतना कहकर सूरज लोटा वही नीचे रख दिया और घर के बाहर आ गया लेकिन बाहर उसकी मां कहीं दिखाई नहीं दे रही थी,,,, सोनू अच्छी तरह से जानता था कि बाजार जाते समय जिस तरह से उसने अपने पिताजी का जिक्र किया था और यह भी कहा था कि हो सकता है कि उसके पिताजी का किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर चल रहा हो इस बात को सुनकर उसकी मां के चेहरे पर जिस तरह की क्रोध की भावना आई थी वह सूरज के लिए आशा की किरण थी और इसीलिए वह अपने पिताजी के चरित्र को अपनी मां के सामने पूरी तरह से गिरा देना चाहता था ताकि उसकी मां के मन में उसके लिए जगह बन सके वह घर के बाहर खड़ा होकर इधर-उधर देखने लगा तो कहीं भी उसकी मां उसे नजर नहीं आई और उसे बड़े जोरों की पेशाब भी लगी हुई थी इसलिए वह धीरे से घर के पीछे की तरफ जाने लगा,,,,, और जैसे ही घर के पीछे पहुंचा तो आंखों के सामने झाड़ियों के बीच का नजारा देखकर एक बार फिर से उसके पजामे में हरकत होने लगी क्योंकि झाड़ियों में उसकी मां बैठकर पेशाब कर रही थी लेकिन उसे अहसास तक नहीं हुआ था कि पीछे उसका बेटा आ चुका था,,,, अपनी मां की नंगी गांड देखकर उसकी उत्तेजना फिर से चरम शिखर पर पहुंच चुकी थी वह झाड़ियां के बीच बैठी थी उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी और उसकी बुर से सिटी की आवाज एकदम साफ तौर पर उसके कानों में पड़ रही थी जिसकी मधुर ध्वनि सुनकर उसकी उत्तेजना और भी ज्यादा बढ़ रही थी। अपनी मां को पेशाब करता हुआ देखकर उसके मन में कुछ और सुझने लगा और वह तुरंत दबे पांव पीछे आने लगा और अपने घर के घूम कर दूसरी तरफ से जाने लगा क्योंकि अब वह कुछ और करने के फिराक में था।





दूसरी तरफ से घर के पीछे आने मेंउसे बिल्कुल भी समय नहीं लगा हुआ तुरंत घर के पीछे पहुंच चुका था और झाड़ियों के पास पहुंच चुका था,,,, उसने देख लिया था कि उसकी मां अभी भी बैठकर पेशाब कर रही थी और वह सीधा वहीं पर पहुंच चुका था जहां पर उसकी मां झाड़ियां में बैठकर पेशाब कर रही थी और वह झाड़ियों की दूसरी तरफ था उसे अच्छी तरह से मालूम था कि उसकी मां की नजर उसके ऊपर जरूर पड़ेगी वह घनी झाड़ियां के बीच खड़ा हो गया था झाड़ियां इतनी घनी थी की झाड़ियां के पीछे बहुत ध्यान देने पर ही दिखाई देता था और इसी का फायदा उठाते हुए वह ठीक अपनी मां के सामने तकरीबन डेढ़ मीटर की दूरी पर खड़ा हो चुका था और जैसा वह अपने मन में सोच रहा था वैसा ही हुआ सुनैना को भी उसका बेटा झाड़ियां के बीच दूसरी तरफ खड़ा दिखाई दिया तो उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी क्योंकि वह अपने कुर्ते को ऊपर करके अपने पजामे को नीचे करने जा रहा था। और यह एहसास होते ही की उसका बेटा पेशाब करने वाला है और कुछ ही क्षण में उसे उसके बेटे का लंबा मोटा लंड एकदम पास से देखने को मिलेगा इस बात की खुशी से उसकी बुर उत्तेजना के मारे फूलने पिचकने लगी,,,, सुनैना का दिल जोरो से धड़कने लगा अब सूरज अपनी मां को देखने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि अब उसकी मां उसे देखने की पूरी कोशिश करेगी और उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी मां अभी भी अपनी जगह पर ही बैठी हुई थी।

अगले ही पल सूरज अपने पजामे को नीचे करके अपने टनटनाए लंड को बाहर निकाल लिया जोकी उसकी मां की वजह से ही उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था,,, अगले ही पल सूरज अपने लंड को हाथ में पकड़ कर ही जाते हुए पेशाब करना शुरू कर दिया था और यह देखकर सुनैना का दिल एकदम से धड़कना बंद कर दिया था वह आंखें फाड़े अपने बेटे के लंड को बेहद करीब से देख रही थी,,,, उस दिन तो दोनों के बीच थोड़ी दूरी थी लेकिन आज ठीक आमने-सामने दोनों थे झाड़ियों के उस पार उसकी मां बैठकर पेशाब कर रही थी और झाड़ी के इस पार सूरज खड़ा होकर पेशाब कर रहा था,,,,, सूरज को तो उसकी मां की बुरे नहीं दिखाई दे रही थी लेकिन उसकी मां को उसके बेटे का लंड एकदम साफ दिखाई दे रहा था अपने बेटे के लंड से निकलने वाली पेशाब की धार को देखकर उसकी बुर पनीया रही थी,,,, सूरज जानबूझकर अपने लंड को ऊपर नीचे करके हिला रहा था वह अपनी मां को दिखा रहा था कि उसका मर्दाना अंग कितना जानदार और शानदार है जो एक बार अगर वह अपनी बुर में ले लेगी तो महीनो की प्यास एक ही बार में बुझ जाएगी,,,, ऐसा करते हुए सूरज की भी हालात पूरी तरह से खराब हो रही थी क्योंकि वह अपने सपनों की रानी की आंखों के सामने अपने लंड को हिला रहा था जिसकी बुर में वह अपना लंड डालना चाहता था जिसे अपनी बाहों में भरकर जोर-जोर से अपनी कमर हिला कर अपने मन की तड़प बुझाना चाहता था।

दूसरी तरफ सुनैना की हालत एकदम खराब होती जा रही थी अपने बेटे के लंड को वह ललचाई आंखों से देख रही थी उसकी बुर से पेशाब निकलना बंद हो चुका था लेकिन फिर भी वह बैठी हुई थी अपने बेटे के लंड को देखकर मदहोश हो रही थी,,, सूरज यह हरकत जानबूझकर किया था लेकिन सुनैना को ऐसा ही लग रहा था कि जो कुछ भी हो रहा है वह अनजाने में हो रहा है वह पेशाब करने के लिए झाड़ियां में खाना है उसे क्या मालूम कि उसकी मां ठीक उसके सामने बैठी है ,,,,,, सुनैना बड़ी मासूमियत से यह सोच रही थी जबकि उसे इस बात की भनक तक नहीं थी कि इसी मौके का फायदा उठाकर उसका बेटा उसकी आंखों के सामने पेशाब करने के बहाने उसे अपने लंड के दर्शन करा रहा है और अनजान बनने की कोशिश कर रहा है। अपनी मां की तड़प और ज्यादा बढ़ाने के उद्देश्य से सूरज अपने लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया, और मुठीयाना शुरू कर दिया,,,, लंड को हाथ में पकड़ कर पेशाब करना और मुट्ठी में भरकर मथियाना दोनों अलग-अलग क्रिया है इस बात को सुनैना अच्छी तरह से समझती थी,,,, लंड को हाथ में पकड़ कर पेशाब करना साहजिक होता है लेकिन लंड को मुठ्ठी में भर कर मुठीयाना यह मर्दों की उत्तेजना को दर्शाता है और इस समय सुनैना अच्छी तरह से समझ रही थी कि उसका बेटा पूरी तरह से मस्त हो चुका था ना जाने किस ख्यालों में खोया हुआ था कि उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था,,,,।

सूरज जानबूझकर अपनी मां की उत्तेजना को उसकी तरफ को बढ़ा रहा था उसे अच्छी तरह से मालूम था कि उसकी मां उसके लंड के लिए तड़प रही थी रात को ही उसे इस बात का एहसास हुआ था जब उसकी मां उसका नाम लेकर अपनी बुर में उंगली अंदर बाहर कर रही थी। सूरज अपनी मां की तड़प को बढ़ा रहा था सुनैना को अपने बेटे के लंड का मोटा सुपाड़ा एकदम साफ दिखाई दे रहा था जब जब वह उत्तेजना से उसे मुठीयाता तो उसका सुपाड़ा पूरी तरह से ढंक जाता और फिर पीछे हथेली लेने पर फिर से खुल जाता यह नजारा देखकर तो सुनैना की बुर पानी फेंक रही थी,,, अपनी आंखों के सामने इस तरह का उत्तेजना से भरा हुआ मदहोश कर देने वाला नजारा देखकर सुनैना का ईमान डोल रहा था। और अपने आप ही उसकी हथेली उसकी बुर पर पहुंच गई थी जिसे वह हल्के हल्के मसल रही थी। लेकिन यह नजारा ज्यादा देर तक देख पाना शायद इस समय सुनैना की किस्मत में नहीं था क्योंकि सूरज पेशाब कर चुका था और अपनी मां की तड़प को और ज्यादा बढ़ाने के लिए उसकी उत्सुकता को ज्यादा बढ़ाने के लिए वह तुरंत अपने पजामे को ऊपर चढ़ा लिया और वहां से चलता बना,,,, सुनैना केतन बदन में उत्तेजना का तूफान उठ रहा था वह धीरे से अपनी एक उंगली को बैठी अवस्था में ही अपनी बुर में डालकर और उसे अंदर बाहर करने लगी ताकि उसकी जवानी की गर्मी शांत हो सके और थोड़ी देर में अपनी जवानी की गर्मी शांत करने के बाद वह फिर से घर में आ गई,,,,।

थोड़ी देर बाद सूरज भी घर पहुंच गया,,और देखा तो उसकी मां सब्जी काट रही थी,,,, वहां रानी मौजूद नहीं थी और यही सही समय था अपनी मां से बात करने का,,,, वह तुरंत अपनी मां के पास गया और बोला।

कहां चली गई थी मां में कब से तुम्हें ढूंढ रहा था,,,,,

(अपने बेटे की तरफ देख कर उसकी आंखों के सामने उसका खड़ा लंड लहराने लगा और वह एकदम से अपनी नजर को नीचे झुका ली और बोली,,,,)

यही तो थी मैं कहां चली गई थी। (सब्जी काटते हुए सुनैना बोली,,,)

यहां तो तुम बिल्कुल नहीं थी कब से तो तुम्हें ढूंढ रहा था,,,

हां बस ऐसे ही पड़ोस में चली गई थी।

(अपनी मां की बात सुनकर सूरज अपनी मम्मी ने बोला कितना झूठ बोल रही है कितने मजे लेकर मेरा लंड देख रही थी,,, तभी वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,) लेकिन तू क्यों मुझे ढूंढ रहा था।

तुमसे एक काम था,,,

मुझसे लेकिन मुझसे क्या काम था,,,,,।

(इतना कहना था कि तभी रानी वहां पर आ गई और सूरज अपने मन की बात अपनी मां को नहीं बता पाया,,,, रानी के वहां पहुंच जाने पर सुनैना भी कुछ पूछ नहीं पाई उसके दिमाग से वह बात ही निकल गई और वह खाना बनाने में व्यस्त हो गई,,, थोड़ी देर में मां बेटे दोनों खेत में कटाई करने के लिए निकल गए और वैसे भी अब खेत में ज्यादा काम नहीं रह गया था दो-तीन दिन का काम और बचा था,,,, काम करते समय सुनैना की आंखों के सामने बार-बार उसके बेटे का खड़ा लंड लहराने लगता था,,,, वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि इतना मोटा और लंबा लंड भी किसी का हो सकता है और किसी का क्यों उसके बेटे का ही,,, और इस बात से वह गर्म महसूस करने लगी थी कि उसके घर में पूरा मर्द मौजूद है जो किसी भी औरत की प्यास बुझा सकता है। सुनैना कटाई करते समय अपने बेटे के बारे में ही सोचती रह गई और सूरज बाजार से लाई हुई चूड़ियां अपनी मां को अपने हाथ से पहनाना चाहता था लेकिन मौका नहीं मिल पा रहा था।

दोपहर हो चुकी थी मां बेटे दोनों पेड़ के नीचे बैठकर खाना खा रहे थे और खाना खाते समय सूरज अपनी मां से बोला,,,,।

तुम्हारा हाथ खाली खाली अच्छा नहीं लगता,,,,।

ऐसा क्यों,,,?

जब तक तुम्हारे चूड़ियों की खनकने की आवाज नहीं आती तब तक कुछ अच्छा नहीं लगता,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना शर्मा गई लेकिन कुछ बोल नहीं पाई बस शर्म से अपनी नज़रें नीचे झुका कर रोटी और सब्जी मुंह में भरकर चबाती रही धीरे से अपने बेटे को जवाब देते हुए बोली,,,)

अब इसमें मैं क्या कर सकती हूं काम करते-करते चूड़ियां टूट जाती है,,, और फिर चूड़ियां खरीदने का पैसा भी तो नहीं है।

इसीलिए तो,,,,

क्या इसीलिए तो,,,, (हैरानी से सूरज की तरफ देखते हुए सुनैना बोली)

मैं कह रहा हूं कि इसीलिए तो मैं तुम्हारे लिए कल बाजार से चूड़ियां खरीदा था,,,, (इतना कहने के साथ ही सूरज अंदर झोपड़ी में गया और अंदर से चूड़ियां ले आया जिसे वह खेत में काम करने से पहले अंदर रख दिया था ताकि चूड़ियां टूटे ना और चूड़ियां ला करके अपनी मां के सामने बैठ गया और उसे चूड़ियां दिखाने लगा लाल हरी चूड़ियां देखकर उसकी मां की आंखों में चमक आ गई वह खुश होने लगी,,, और बोली,,)

तूने कब खरीद लिया और तेरे पास पैसे आए कहां से,,?

क्यों मैं कमाने नहीं लगा मैं बहुत दिनों से देख रहा था तुम्हारे कलाइयों को एकदम सुनी थी मुझे अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए मैंने कुछ पैसे बचा कर कल बाजार से खरीद लिए,,,।

ओहहह तू मेरा कितना ख्याल लगता है सच में तेरे बाबूजी मेरा बिल्कुल ऐसा ही ख्याल रखते थे। लेकिन न जाने किसकी नजर लग गई।

वह सब छोड़ो,,,,, जल्दी से जो हाथ धोकर आओ मैं तुम्हें चूड़ियां पहना देता हूं,,,,।

अरे नहीं घर पर मैंपहन लूंगी,,,, (एकदम से शरमाते हुए सुनैना बोली)

नहीं नहीं जाओ जल्दी से हाथ धोकर आओ मैं पहन देता हूं इसलिए तो खरीद कर लाया हूं ताकि मैं अपने हाथ से तुम्हें चूड़ी पहना सकूं,,,,,।

(अपने बेटे की जीद देखकर सुनैना कीर्तन बदन में अजीब सी लहर उठने लगी क्योंकि जिस तरह की वाजिद कर रहा था उस तरह की जीद सुनैना का पति ही करता था इसलिए अपने बेटे की जीद देखकर वह शर्म से पानी पानी हो रही थी लेकिन वह कुछ कर भी नहीं पाई और धीरे से अपने हाथ धोने लगी उसका दिल जोरो से धड़क रहा था अपने बेटे के हाथों से चूड़ी पहनने के एहसास से ही उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में न जाने कैसी हलचल हो रही थी)
 
मां बेटे दोनों खाना खा चुके थे दोनों पेड़ की छांव में नीचे बैठे हुए थे,,,, सूरज किसी भी तरह से अपनी मां को पाना चाहता था उसकी गर्म जवानी का रस चखना चाहता था और इसीलिए वह अपनी तरफ से पूरी कोशिश में लगा हुआ था अपनी मां को खुश करने के लिए उसने बाजार से रंग बिरंगी चूड़ियां लेकर आया था अपनी मां की सुनी कलाई देखकर उसे रहा नहीं जा रहा था और इसीलिए बाद अपनी मां के लिए चूड़ी लेकर आया था और उसे खुद अपने हाथों से पहनना चाहता था वैसे तो सुनैना अपने बेटे के हाथ से चूड़ी नहीं पहनना चाहती थी लेकिन अपने बेटे की जीद के आगे वह मजबूर हो गई,,, इसलिए वह अपने बेटे की बात मानकर जल्दी से गई हाथ धोकर आ गई और फिर से खटिया पर बैठ गई थी।





सुनैना का दिल जोरो से धड़कने लगा जब सूरज अपना हाथ आगे बढ़कर उसकी कलाई थाम लिया सूरज अपनी मां की कलाई को अपनी हथेली में कस के पकड़े हुए था वह इस तरह से अपनी मां को एहसास दिलाना चाहता था कि वह अब एकदम सुरक्षित हाथों में है एक मर्द के हाथ में जिसके द्वारा उसे हमेशा सुख और संतुष्टि ही प्राप्त होगी कभी निराश नहीं मिलेगी,,,,, सूरज अपनी मां की कलाई पकड़ कर उसे थोड़ा ऊपर उठाते हुए इधर-उधर करके देखते हुए बोला।

पहले से तुम कमजोर पड़ गई हो,,,,

अब क्या करूं खेत में काम करना पड़ता है ना,,,।

मैं जानता हूं खेत में काम करना पड़ता है लेकिन यह भी जानता हूं कि अंदर ही अंदर तुम्हें एक दुख खाए जा रहा है,,,, (ऐसा कहते हुए सूरज अपनी मां के हाथ में चूड़ी डालकर उसे पहनाने लगा,,,, एक तरफ से मैंने कभी जोरों से धड़कने लगा था क्योंकि इस तरह से उसने आज तक सिर्फ एक चूड़ी हरा से ही चूड़ी पहनी थी,,,,तब उसकी स्थिति एकदम सामान्य ही रहती थी लेकिन आज अपने बेटे के हाथ में अपनी कलाई देकर उसके तन-बदन में अजीब सी उलझन और उत्तेजना का अनुभव हो रहा था खास करके उसकी दोनों टांगों के बीच की उलझन कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी थी लेकिन वह अपने बेटे के कहने के मतलब को समझ नहीं पा रही थी इसलिए बोली )

मैं कुछ समझी नहीं तु क्या कहना चाह रहा है।





(अपनी मां की बात सुनकर सूरज गहरी सांस लेता हुआ फिर से चूड़ी पहनानें लगा और बोला,,,)

तुम्हें बाबूजी की फिक्र सता रही है,,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना एकदम से नजर नीचे झुका ली कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही,,, तब तक सूरज धीरे-धीरे करके अपनी मां के हाथ में चूड़ी पहन चुका था और दूसरे हाथ की कलाई थाम लिया था एक तरफ सुनैना अपने बेटे की बात सुनकर दुख का अनुभव कर रही थी तो दूसरी तरफ अपने बेटे की हरकत से उसके तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी उसे पूरी तरह से एहसास हो रहा था कि उसकी बुर से मदन रस का बहाव हो रहा था,,,,, सूरज दूसरे हाथ में भी चूड़ी पहनानें लगा,,, और कुछ देर की चुप्पी को तोड़ता हुआ बोला,,,,)

लेकिन तुम खामखा बाबूजी के पीछे परेशान हो रही हो उनकी चिंता में अपना शरीर खराब कर रही हो,,,,

मैं कैसे तेरे बाबूजी की चिंता ना करु कैसे फिकर ना करु,,,,, आखिरकार तेरे बाबूजी मेरे पति हैं महीनों से उनकी कोई खबर नहीं है,,,,, तू अगर लायक होता तो अपने पिताजी को ढूंढ कर लाता उनका पता कहीं से भी खोज कर निकाल लाता,,,, लेकिन मैं देख रही हूं तुझको ही तेरे बाबूजी की बिल्कुल भी फिक्र नहीं है।

(अपनी मां की इस तरह की बात सुनकर सूरज एकदम से हैरान हो गया उसे उम्मीद नहीं थी कि उसकी मां इस तरह से उससे बात करेगी और इशारों ही इशारों में उसे नालायक साबित कर देगी जबकि उसके पिताजी के जाने के बाद वही घर को संभाल रहा था वह एकदम से अपनी मां की तरफ देखने लगा और कुछ देर खामोश रहने के बाद वह फिर से अपनी मां की कलाई में चुडी पहनाते हुए बोला,,,,)





मुझे मालूम था कि तुम ऐसा ही कुछ बोलोगी,,,,,(धीरे-धीरे करके सूरज अपनी मां के दोनों हाथों में चूड़ी पहन चुका था उसकी सुनी कलाई फिर से हरी हो चुकी थी,,,, वह एक साथ अपनी मां के दोनों हाथ पकड़ कर थोड़ा ऊपर उठाते हुए अपनी मां की कलाई में सजी हुई चूड़ियों को बजने लगा और मुस्कुरातेहुए बोला,,,,) देख रही हो फिर से तुम्हारी सुनी कलाई कितनी खूबसूरत हो गई है,,,,(सुनैना भी नजर उठा कर अपनी कलाइयों की तरफ देखने लगी वाकई में उसकी कलाई आज खूबसूरत लग रही थी महीनों गुजर गए थे उसने चूड़ियां नहीं पहनी थी। उसे अपनी कलाई देखकर खुशी महसूस हो रही थी लेकिन जिस तरह से उसने अपने बेटे से बात की थी उसे लेकर अब उसके मन में थोड़ा दुख होने लगा था कि उसका बेटा उसके बारे में इतना सोचता है और वह अपने बेटे को भला बुरा कह दी थी,,,,, सुनैना कुछ बोल नहीं पा रही थी इसलिए सूरज ही अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

मैं जानता था कि तुम्हें बाबूजी का दुख खाया जा रहा है और तुम्हें शायद ऐसा ही लग रहा था कि मैं पिताजी की खोज खबर नहीं लिया तुम्हें शायद नहीं मालूम है कि मैं कितना भटका हूं दिन-रात पिताजी का ठिकाना ढूंढने के लिए एक गांव से दूसरे गांव दूसरे गांव से तीसरे गांव घूमता फिर रहा था कितने लोगों से पूछा लेकिन कहीं कोई अता पता नहीं मिला,,,,, तुम्हारा दुख मुझसे देखा नहीं जा रहा था और वैसे भी अपने घर की हालत खराब ही थी क्योंकि पिताजी रहते थे तो सबको सही चलता था घर में किसी बात की कमी नहीं थी लेकिन उनके जाते ही घर में तकलीफें बढ़ाना शुरू हो गई थी उससे ज्यादा तकलीफ तो मुझे तुम्हारा उदास चेहरा देता था इसलिए मैं दिन रात एक कर दिया पिताजी का पता लगाने के लिए लेकिन हर जगह से नाकामी हासिल हुआ। लेकिन कुछ दिनों बाद मुझे पिताजी के बारे में एक शराबी ने बताया जहां पर वह अक्सर शराब पिया करते थे मैं वहां पर पिताजी का पता लगाने के लिए गया था तो वहीं पर ही कुछ लोग पिताजी के बारे में बातें कर रहे थे और उन लोगों की बातें सुनकर मेरे तो होश उड़ गए थे।

(सूरज किस तरह की बातें सुनकर सुनैना की उत्सुकता बढ़ने लगी थी उसके चेहरे पर अजीब से हाव-भाव बना रहे थे वह अपने पति के बारे में जानना चाहती थी इसलिए वह बोली)

क्या सुना तूने,,,,?

अब क्या बताऊं,,,,,,।

नहीं मुझे बता मैं भी जानना चाहती हूं कि तेरे बाबूजी कहां है क्या कर रहे हैं क्या तू सच में जानता है तेरे बाबूजी कहां है,,,?

जानता तो हूं लेकिन अब कोई फायदा नहीं है,,,,

तू जानता है,,(एकदम हैरान होते हुए) तू ही जानता है तेरे बाबूजी कहां है क्या कर रही है और तू इतने दिनों से खामोश था मुझे कुछ बताया नहीं,,,,,

क्या बताता,,,,,, मुझे शराब के ठेके पर पता चला कि पिताजी कहां पर है किसके साथ है वह अपने गांव का कल्लु है ना बदमाश,,,, उसकी संगत में पिताजी एकदम शराबी हो गए,, हैं,,,,,(कल्लू का जिक्र आते ही सुनैना के सामने वह सब दृश्य नाचने लगा जब वह नदी में नहाने के लिए गई थी,,,, कल ने उसे नदी के किनारे नदी में नहाते हुए नग्न अवस्था में देख लिया था उसकी नंगी जवान को देखकर उसकी आंखों में वासना की चमक दिखाई देने लगी थी वह उसे पाना चाहता था उसके साथ संबंध बनाना चाहता था,,,, लेकिन सुनैना के दृढ़ निश्चय के आगे उसकी दाल नहीं गली थी,,,, सुनैना को अच्छी तरह से मालूम था कि कर लो कितना बदमाश और निर्लज्ज इंसान है इसलिए वह हैरान होते हुए बोली,,,)

क्या तेरे पिताजी कल्लू के साथ रहते है वह गांव का छंटा हुआ बदमाश,,,,

उसकी ही संगत में पिताजी एकदम शराबी हो गए हैं दिन रात शराब के नशे में डूबे रहते हैं,,,, उस दिन शराब के ठेके पर मुझे पता चला कि पिताजी गांव के दूसरे ठेके पर रोज शराब पीते हैं शाम ढल चुकी थी अंधेरा हो रहा था लेकिन फिर भी मैं पिताजी को ढूंढने के लिए दूसरे गांव की ओर चल दिया और जब ठेके पर पहुंचा तो वाकई में मैंने देखा कि पिताजी कल के साथ दोनों हाथ में बोतल लिए शराब पी रहे थे मैं तो एकदम से हैरान हो गया पिताजी की हालत देखकर वह नशे में एकदम झूम रहे थे। मुझे तो पहले यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह पिताजी हैं उनकी बोली भाषा भी एकदम बदल चुकी थी एकदम गाली से बात करते थे,,,,।

क्या सच में तेरे पिताजी एकदम शराबी हो गए तेरे बाबूजी तुझसे मिले,,,।

नहीं,,,,, मैं कुछ देर तक वहीं खड़ा होकर सब कुछ देखता रहा पिताजी कल को किसी के पास चलने के लिए कह रहे थे,,,,।

किसके पास,,,,?(सुनैना हैरान होते हुए बोली)

दूर से मुझे भी ठीक से पता नहीं चल रहा था लेकिन वह दोनों उठकर जाने लगे तो मैं भी उन दोनों के पीछे-पीछे जाने लगा,,,,, वह दोनों खेत में से होकर एक निर्जन जगह पर पहुंच चुके थे जहां पर एक बड़ा सा गोदाम था।

बड़ा सा गोदाम,,(हैरान होते हुए)

हां मां बड़ा सा गोदाम मुझे बाद में पता चला कि वह किसी राजा साहब का गोदाम था।

फिर क्या हुआ,,,,?

(अपनी मां की उत्सुकता देखकर सूरज को अंदर ही अंदर खुशी महसूस हो रही थी वह अपने पिताजी की बात को और बढ़ा चढ़ा कर बताना चाहता था वह अपने पिताजी के चरित्र को अपनी मां की नजरों से एकदम गिरा देना चाहता था क्योंकि वह जानता था कि उसके पिताजी का चरित्र उसकी मां की नजरों में गिरने का मतलब था कि वह खुद अपनी मां के करीब पहुंच सकता था और उसे ऐसा होता हुआ दिखाई भी दे रहा था इसलिए वह बोला,,,)

मैंने देखा कि दोनों गोदाम का दरवाजा खोलकर गोदाम के अंदर घुस गए और गोदाम का दरवाजा खुला ही छोड़ दिए दोनों अंदर बैठकर बातें कर रहे थे उन दोनों की बातें सुनकर मुझे पता चला कि वह दोनों किसी औरत के आने का इंतजार कर रहे थे।

औरत का,,,?(चेहरे पर एकदम से दर्द का भाव आ गया और सुनैना एकदम परेशान होते हुए बोली)

हां औरत का और कल्लू से ज्यादा इंतजार तो पिताजी को उस औरत का था,,,,।

क्या ,,,?

हां मैं सच कह रहा हूं,,,,, और वह औरत शायद रोज ही वहां आती थी दोनों के लिए खाना लेकर,,,,

खाना लेकर,,,,,, मतलब दोनों खाना खाने के लिए वहां जाते थे,,,,।

मुझे भी ऐसा ही लगता था लेकिन आगे तो सुनो जब मुझे पता चला कि वह दोनों किसी औरत का इंतजार कर रहे हैं तो मैं सब कुछ अपनी आंखों से देख लेना चाहता था मैं देखना चाहता था कि पिताजी आखिरकार घर क्यों छोड़ दिए हैं,,,, मैं भी मौका देखकर गोदाम के अंदर घुस गया था क्योंकि मैं जानता था कि अगर वह औरत आ गई तो फिर दरवाजा बंद हो जाएगा और ना ही में कुछ देख पाऊंगा और ना ही कुछ सुन पाऊंगा इसलिए मैं वही जाकर छुप गया,,,,,, और थोड़ी ही देर में वह औरत भी वहां पर आ गई वह अपने साथ मछली और रोटी लेकर के आई थी,,,,, उसे औरत को देखकर जो खुशी मैं पिताजी के चेहरे पर देखा था वैसी खुशी मैं आज तक नहीं देख पाया था वह उस औरत को देखकर एकदम खुश हो गए थे।

क्या तू सच कह रहा है,,,?

किसी से मैं सुना नहीं हूं बल्कि अपनी आंखों से देखा हूं इसलिए बता रहा हूं।

कौन थी वह औरत,,,,!

यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन उन दोनों की बातों से इतना पता चला था कि वह बगल के गांव की कोई औरत थी उसका पति नहीं था और दो बच्चे थे जिसका भरण पोषण कल्लू और पिताजी मिलकर करते थे,,,,।

क्या उसके बच्चों का भरण पोषण तेरे पिताजी और कल्लु मिलकर करतेथे (सुनैना एकदम से हैरान होते हुए बोली,,)

हां उन दोनों की बातें सुनकर मुझे सब समझ में आ गया था,,,,,, वह औरत एकदम खुश होकर दोनों के बीच में बैठ गई थी और खाना परोसने लगी थी,,,,, लेकिन मैं एकदम हैरान हो गया यह देख कर कि जब वह औरत खाना परोस रही थी तब पिताजी,,,,

पिताजी,,,,, क्या कर रहे थे तेरे बाबु जी,,,,।

अब मैं कैसे बताऊं मुझे तो बताते की शर्म आ रही है इसीलिए मैं सब कुछ तुम्हें नहीं बताता था आज तक अपने अंदर यह राज छुपा कर रखा था लेकिन जब तुम ही मुझे नालायक बोल रही हो तो मुझे बताना पड़ रहा है,,,,,।

मैंने तुझे कब नालायक बोली,,,,।

अभी कुछ देर पहले ही तो बोली थी कि अगर लायक होता है तो अपने पिताजी का पता लगा कर था इसका मतलब क्या हुआ तुम मुझे नालायक ही बोल रही है,,,(ऐसा कहते हुए सूरज जानबूझकर रुंवासा हो गया था,,,, यह देखकर सुनैना को बहुत दुख हुआ और वह बोली,,,)

मैं तुझे ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहती थी जिससे तुझे दुख पहुंचे वह तो गुस्से में मेरे मुंह से निकल गया था,,,,, अच्छा यह बता क्या किया तेरे बाबूजी ने।

अब मैं कैसे बताऊं मुझे शर्म आती है मुझे समझ में नहीं आता कि यह सब मैं तुम्हें कैसे बताऊं,,,,(जानबूझकर शर्माने का नाटक करते हुए सूरज बोला और उसकी बात सुनकर सुनैना अपने मन में बोली उसे दिन शर्म नहीं आ रही थी जब साड़ी उठाकर अपने लंड को गांड पर रगड़ रहा था और आज बताने में तुझे शर्म आ रही है,,,,, फिर सुनैना अपने मन में सोची कि शायद वह नींद में थी इसलिए उसकी नींद में होने का फायदा उठाकर उसके बेटे ने इस तरह की हरकत किया था और जरूर गोदाम में कुछ ऐसा वैसा हुआ था जिसे बताने मुझे कर महसूस हो रही है वह अपने बेटे को एकदम सहज करना चाहती थी ताकि वह सब कुछ बता सके इसलिए वह बोली,,,)

देख तो घर में सबसे बड़ा है तेरे पिताजी के जाने के बाद एक जिम्मेदार आदमी की तरह तो मर्द बनकर खड़ा है और अब तो गांव के लोग भी जरूरत के समय तुझे ही बुलाते हैं क्योंकि जानते हैं कि तेरे पिताजी नहीं है ऐसे में उनकी जिम्मेदारी तेरे सर पर हीं है,,,, इसलिए मैं चाहती हूं कि तु बिना शर्माए मुझे सब कुछ बता दे ताकि मुझे भी तो पता चले कि आखिर तेरे बाबूजी कैसे इंसान है जिसके लिए मैं अपनी जिंदगी बर्बाद कर रही हूं जिनकी याद में मैं अपना शरीर खराब कर रही हूं और झूठी आप लेकर बैठी हूं कि आज नहीं तो कल तेरे पिताजी घर वापस लौट कर आएंगे।





(अपनी मां की बात सुनकर सूरज मन ही मन प्रसन्न हो रहा था,,, अपनी मां की उत्सुकता देखकर उसे एहसास हो रहा था कि,,, यही सही मौका है उसकी मां के मन में उसके पति के प्रति नफरत भर देने की और इस बात की खुशी भी सूरज के चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी कि अब वह अपनी मां से खुले शब्दों में अपने बाप की करतूत बता पाएगा,,,,

जहां एक तरफ खड़ी दुपहरी में सूरज मौके का फायदा उठाकर अपनी मां की सुनी कलाइयों को चूड़ियों से भर रहा था और उसे खुश कर रहा था वहीं दूसरी तरफ गर्मी की वजह से अपने कमरे में आराम कर रही सोनू की मां सूरज के ख्यालों में खोई हुई थी। रात वाली घटना उसकी आंखों से एक पल के लिए भी ओझल नहीं हो रही थी बार-बार उसकी आंखों के सामने सूरज का लंबा मोटा टनटनाया लंड नाचने लगता था,,,, वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि किसी का लंड इतना मोटा और लंबा भी हो सकता है,,, क्योंकि हकीकत यही थी क्योंकि उसने अपने जीवन में कभी भी इतने मोटे तगड़े लंबे लंड को देखी तक नहीं थी इसलिए वह पूरी तरह से हैरान थी कि सूरज के पास इतना तगड़ा लंड है।





सोनू की मां बिल्कुल भी नहीं जानती थी कि उसे सूरज के लंड के दर्शन हो जाएंगे वह तो औपचारिक रूप से घर के पीछे झाड़ियां में बैठकर सोच कर रही थी उसे क्या मालूम था कि यहां वहां भटकता हुआ सूरज ठीक उसके सामने आकर खड़ा हो जाएगा। और उसके सामने अपना लंड बाहर निकाल कर पेशाब करने लग जाएगा,,, सोनू की मां कभी भी इस तरह से बहकी नहीं थी जैसा पिछली रात को बहन गई थी और वह भी सूरज के लंड को देखकर और बिना कुछ बोले उसके पास पहुंच गई थी और सीधा अपने हाथ को उसके लंड पर रखकर उसे हल्के-हल्के मुठीयाने लगी थी,,, यह भी परवाह किए बिना की सूरज उसके बारे में क्या सोचेगा वह तो अपनी दुनिया में मस्त हो चुकी थी लेकिन उसे पूरा विश्वास था कि उसकी हरकत से सूरज भी मदहोश हो गया था,,, क्योंकि उसने सूरज के चेहरे पर उत्तेजना की मदहोशी को देखी थी। और इसलिए वह इस समय बेकाबू हुए जा रही थी उसकी आंखों की नींद उड़ चुकी थी दिल का चैन खो चुका था उठते बैठते बस सूरज ही उसे दिखाई दे रहा था।

वैसे भी दोपहर के समय सोनू के घर में सब आराम ही करते थे अपने-अपने कमरे में इसलिए सोनू की मां भी अपने कमरे में आराम कर रही थी लेकिन दरवाजा बंद करके और उस पर कड़ी लगाकर ताकि उसे कोई हैरान ना कर सके,,,, सूरज का मर्दाना अंग पहले से ही उसकी हालत खराब किए हुए था इसलिए वह दरवाजे की कड़ी लगाने के साथ ही अपने कपड़े उतारना शुरू कर दी। और देखते ही देखते वह पूरी तरह से नंगी हो गई,,,,, और अपनी चारपाई पर आकर लेट गई वह अपने हाथों से अपनी चूचियों से खेल रही थी और एक हथेली अपनी गुलाबी बुर पर रखकर उसे हौले हौले से सहला रही थी,,,, उसकी आंखों में चार बोतलों का नशा दिखाई दे रहा था जवानी की खुमारी छाई हुई थी। वैसे तो वह जिस तरह की उत्तेजना का अनुभव कर रही थी वह अपने पति के साथ हम बिस्तर हो सकती थी लेकिन वह जानती थी कि उसकी प्यास उसके पति से बुझने वाली नहीं है और वैसे भी अपने पति से शारीरिक संबंध बनाएं उसे एक डेढ़ साल गुजर चुके थे क्योंकि कामकाज में उसका इस और ध्यान ही नहीं जाता था और वैसे भी उसका पति उम्र के हिसाब से आप उसे लायक नहीं रह गया था कि उसकी जवानी की आग को शांत कर सके इसलिए उसे अपने हाथ से ही काम चलाना था अपनी उंगलियां का ही सहारा बनाना था।





अपनी आंखों को बंद करके वह पूरी तरह से कल्पनाओं की दुनिया में खोने लगी और कल्पना में वही चली गई जहां पर उसने सूरज को पेशाब करते हुए देखी थी और अपनी कल्पना के घोड़े को वहीं से दौड़ाने लगी जहां पर छोड़ रखी थी,,, आंखों को बंद करता हुआ पूरी तरह से खोने लगी मदहोशी के सागर में डुबकी लगाने लगी वह कल्पना कर रही थी कि वह इस तरह से झाड़ियां में बैठकर सोच कर रही है और इस समय सूरज उसकी आंखों के सामने आकर पेशाब करने लगता है उसके मोटे लंड को देखकर उसकी हालत एकदम से खराब हो गई कुछ देर तक वह वहीं पर बैठे-बैठे सूरज के लंड को देखते रह गई। जब उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो वह अपनी जगह से उठकर एकदम से खड़ी हो गई और उसे इस तरह से झाड़ियों में खड़ी देखकर सूरज एकदम से घबरा गया वह अपने पजामे को ऊपर करने ही वाला था कि सोनू की मां बोली,,,।

रुक जा अंदर मत करना मैं भी तो देखु तेरे लंड को,,,(और इतना कह कर वह झाडीयों से बाहर आने लगी,,,, सूरज घबरा रहा था और देखते ही देखते सोनू की मां उसके करीब आ गई वह मुस्कुरा रहे थे उसकी मुस्कुराहट देखकर सूरज की घबराहट काम हो गई और अगले ही पल सूरज ने अपने लंड पर सोनू की मां की हथेली को महसूस करके एकदम मस्त हो गया और वह एकदम से बोल पड़ा)

यह क्या कर रही हो चाची,,,?

कुछ नहीं बस देख रही कि यह खड़ा क्यों है,,,!

क्यों खड़ा है चाची,,(मदहोश होता हुआ)

क्योंकि यह मेरी बुर में जाना चाहता है,,,,।

यह क्या कह रही हो चाची कोई देख लेगा तो गजब हो जाएगा,,,।

कोई नहीं दिखेगा,,,,, पहले बोल इसे डालना चाहता है ना मेरी बुर में,,,,(सोनू की मां की बात सुनकर सूरज बोल कुछ नहीं बस हां मैं सिर हिला दिया,,, सोनू की मां की कल्पना इतनी अद्भुत थी कि उसे सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे हुआ इस कल्पना को जी रही हो वह लगातार अपनी चूची को एक हाथ से मसल रही थी और दूसरे हाथ से अपनी बुर को रगड़ रही थी। और अपनी कल्पनाओं की दुनिया में मत हो रही थी,,,, सोनू की मां की बात सुनकर सूरज बोला,,,)





लेकिन कहां पर,,,?

यही झाड़ियों में यहां थोड़ी ना कोई आने वाला है,,, और अंधेरा भी है कोई आ भी जाएगा तो दिखाई नहीं देगा,,,,,,,,(इतना कहने के साथ ही मस्त होते हुए सोनू की मां सोनू के लंड को पकड़कर उसे झाड़ियों में ले जाने लगी,,,, सुरज एकदम मस्त हो गया था,, देखते-ही-देखते वह झाडीयो में पहुंच चुका था,,,,, सूरज बहुत खुश नजर आ रहा था,,,, सोनू की मां बिल्कुल भी देर नहीं करना चाहती थी,,,,, वह दोनों एक सुरक्षित झाड़ियों में थे सोनू की मां पूरी तरह से मजा लेना चाहती थी इसलिए देखते ही देखते वह अपने सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगी हो गई,,, सूरज सोनू की मां की नंगी जवानी देखकर पूरी तरह से उत्तेजित हो गया और उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर हाथ रखकर सहलाने लगा,,,,, सोनू की मां मस्त हो रही थी पागल हो रही थी पर देखते ही देखते हो वह झुक कर घोड़ी बन गई उसकी बड़ी-बड़ी गांड सूरज की आंखों के सामने चमक रही थी,,,,, अपनी बड़ी गांड सूरज के आगे परोसते हुए वह बोली,,,)

डालते सूरज अपने लंड को मेरी बुर में,,, मस्त कर दे मुझे,,,।

(इतना सुनते ही सूरज अपने खड़े लंड को सोनू की मां की बुर में डालने लगा और दूसरी तरफ वास्तविक में सोनू की मां अपनी दो उंगली को अपनी बुर में डालकर उसे अंदर बाहर करने लगी,,,, और सूरज कल्पना में उसकी कमर पकड़ कर अपनी कमर को हिलाना शुरू कर दिया वह सोनू की मां की चुदाई करना शुरू कर दिया था सोनू की मां कल्पना में भी पूरी तरह से मस्त हो गई थी क्योंकि वह कल्पना करते हो अपनी दो उंगली अपनी बुर के अंदर बाहर कर रही थी,,,,,





सोनू की मां खटिया पर तड़प रही थी अभी दोनों टांगें खोलकर वह पागलों की तरह अपनी दोनों उंगलियों को अपनी बुर के अंदर डालकर सूरज की कल्पना में खोई हुई थी और देखते ही देखते वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी और अगले ही पल वह भलभला कर झड़ने लगी।
 
सुनैना की तरफ से सूरज को हरी झंडी मिल चुकी थी सुनैना सबको सुनना चाहती थी जो कुछ भी सूरज ने अपनी आंखों से देखा था और यही सही मौका भी था सूरज के लिए कि वह खुले शब्दों में अपने बाप प की करतूत अपनी मां से बता दे ताकि उसकी मां का झुकाव उसकी तरफ बढ़ने लगे,,,, हालांकि धीरे-धीरे सूरज अपनी मां की सुनी कलाइयों को चूड़ी से भर चुका था और अब सुनैना की खूबसूरती में चार चांद लग गया था क्योंकि अब उसके जरा सा हाथ हिलाने से चूड़ियों के झांकने की आवाज पूरे वातावरण में गुजारने लगती थी जिसे सुनकर सूरज की मदहोशी बढ़ने लगी थी,,,, अपनी मां की तरफ से इशारा पाकर सूरज अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला।





वह औरत पिताजी के लिए और कल के लिए रोटी और मछली लेकर आई थी वह औरत उन दोनों की बीच में बैठकर दोनों को खाना परोस रही थी कि तभी पिताजी,,,,, उसके साड़ी के पल्लू को अपने हाथ से पड़कर उसकी छाती से नीचे गिरा दिए,,,,।

क्या,,,? (एकदम से हैरान होते हुए सुनैना बोली,,,,)

हां पिताजी ने ऐसा ही किया और उसके साड़ी के पल्लू को उसकी छाती से हटाते हुए बोले,,,,।

कमला रानी तुम जब हमारे साथ रहा करो तो थोड़ा ढंग से रहा करो,,,,,।

अच्छा तो उसका नाम कमला रानी है,,,

नाम तो उसका कमला है लेकिन पिताजी उसे प्यार से कमला रानी कहते हैं,,,,।

ओहहहहह ,,,, (मायूस होते हुए और इसी का फायदा उठाते हुए सूरज भी अपनी मां के मन को टटोलते हुए बोला,,,)

क्या पिताजी ने कभी तुम्हें इस तरह से प्यार से बुलाए है,,,,।

बहुत बार लेकिन यह सब पहले की बात है,,,,, अच्छा यह बात आगे क्या हुआ वह औरत कुछ बोली नहीं,,,।

वह क्या बोलेगी उसका तो काम ही यही है,,, वह तो मुस्कुरा रही थी और धीरे-धीरे दोनों को खाना परोस रही थी लेकिन इसी बीच जो पिताजी ने किए उसे देखकर तो मुझे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ,,,

क्या किया तेरे पिताजी ने,,,

मुझे तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं कैसे बताऊं,,,।

देख तूने जो कुछ भी देखा है वह सब कुछ मुझे बता दे ताकि मुझे भी तो पता चले कि इसके लिए हमें दिन-रात तड़प का इंतजार कर रही हूं और वह क्या गुल खिला रहा है जिसे मैं अपना देवता समझ रही हूं वह शैतान का भी बाप है,,,,।





मैं तुम्हें यह सब बताना नहीं चाहता था लेकिन मैं मजबूर हो गया हूं क्योंकि मुझे तुम्हारी उदासी नहीं देखी जाती,,,,, पहले तो सच कहूं मुझे भी अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था लेकिन झुठलाने वाली कोई बात ही नहीं थी कोई अगर बताता तो शायद मुझे उसकी बातों पर भरोसा नहीं होता लेकिन यहां तो मैं सब कुछ अपनी आंखों से देखा था मैंने देखा कि उसके साड़ी का पल्लू हटा देने के बाद पिताजी तुरंत एक हाथ उसकी छाती पर रख दिए,,,।

क्या ,,,,,?(सुनैना की आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गई वह इस तरह से सूरज को देखने लगी मानो कि जैसे सूरज को नहीं बल्कि अपने पति की करतूत को देख रही हो)

हां मैं सच कह रहा हूं पिताजी ब्लाउज के ऊपर से ही उसकी छाती को दबा रहे थे और छाती को दबाते हुए बोले,,,,। कमला रानी तेरी चचचच,, चुची में तो बहुत दूध भरा है,,,,(एकदम हिम्मत करके सूरज ने अपनी मां के सामने चुची शब्द का प्रयोग किया था जिसकी वजह से उसके तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी थी और सुनैना भी अपने बेटे के मुंह से इस शब्द का प्रयोग सुनकर एकदम से उसकी तरफ देखने लग गई थी,,,,, लेकिन सूरज उत्तेजना में भी अपने दिमाग से कम लेता है इसलिए वह एकदम से सहज बनते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,,,,) और उसकी छाती को जोर-जोर से दबाने लगे और यही क्रिया कल्लू भी दूसरी छाती के साथ करने लगा और कल्लू बोला,,,)





भोला सही कह रहा है कमला रानी अगर तुम आज खाना नहीं पिलाता तो तुम्हारी चूची से दूध पी पीकर हम दोनों अपना पेट भर लेते,,,,। दोनों की बातें सुनकर कमला बोली

चलो रहने दो तुम दोनों अब इनमें दूध नहीं निकलता हां अगर मजा लेने के लिए पीना है तो पी सकते हो,,,।

(मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह औरत इतनी बेशर्म होगी मुझे तो लगा था उन दोनों की हरकत पर हुआ थोड़ा नाराजगी दिखाएगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था बल्कि वह औरत तो जैसे उन दोनों के हौसले को और ज्यादा बढ़ा रही थी और सूरत की बात सुनकर पिताजी एकदम से उत्साहित हो गए और मुस्कुराते हुए बोले,,,,,

तब तो कमला रानी मुझे रहा नहीं जा रहा है और इतना कहने के साथ ही पिताजी उसके ब्लाउज का बटन खोलने ही वाले थे कि वह उसे रोकते हुए बोली।

अभी रुक जाओ पहले खाना तो खा लो उसके बाद जो करना ही कर लेना वरना खाना ठंडा हो जाएगा तो मजा नहीं आएगा,,,(कमला मुस्कुराते हुए बोली और उसकी बात सुनकर पिताजी बोले)

खाना ठंडा हो जाए चलेगा लेकिन तुम ठंडी मत हो जाना तुम जितनी ज्यादा गर्म रहती हो उतना ज्यादा मजा आता है,,,,। पिताजी की बात सुनकर वह औरत बोली,,,।

गरम करना तो तुम दोनों का काम है,,,, क्योंकि मुझे भी मालूम है औरत ज्यादा गर्म होती है तभी मर्दों को ज्यादा मजा देती है अगर तुम दोनों को ज्यादा मजा लेना है तो मुझे ज्यादा गर्म करना होगा,,,,,,।

(सूरज की बातों को सुनैना बड़े ध्यान से सुन रही थी और हैरानी से उसके चेहरे के हाव-भाव हर पल बदलते जा रहे थे,,,,, ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी आंखों के सामने सब कुछ घटित हो रहा हो सूरज इस तरह से बात ही रहा था कि उसे उसकी बातें किसी नाटक की तरह दिखाई दे रही थी,,,,, सूरज की बातों को सुनकर सुनैना बोल पड़ी)

सुरज की कल्पना





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बाप रे इतनी बेशर्म औरत उसे जरा भी लाज शर्म नहीं है,,,,, और वह भी एक साथ दो दो मर्द के साथ,,,,।

उसका क्या है उसका तो काम ही है यह लेकिन उसकी करनी का फल तो हम लोग भुगत रहे हैं,,,, अगर वह इस तरह से पिताजी को अपनी जाल में ना फंसाती तो शायद हम लोगों को भी यह दिन ना देखना पड़ता।

फंसाती,,,,,,(व्यंग्यात्मक रूप से) तेरा बाप क्या कोई छोटा बच्चा है जो वह फंसा ले गई तेरे बाप की ही लंगोट ढीली है तभी तो घर छोड़कर उस रंडी के साथ एेस कर रहा है,,,,,

(पहली बार सूरज ने देखा था कि उसकी मां के शब्दों में उसके पिताजी के लिए घृणा पैदा हो रही थी अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रही थी जबकि ऐसा आज तक नहीं हुआ था लेकिन इस बात से सूरज मैन ही मन खुश हो रहा था क्योंकि सूरज यही चाहता था वह जानता था कि उसके पिताजी से जितनी नफरत उसकी मां करेगी उतना ही प्यार एक न एक दिन वह उससे करने लगेगी,,,, सूरज अपनी बातों से अपनी मां के मन में अपने लिए रास्ता बना रहा था जगह बना रहा था और उसकी यह युक्ति काम भी कर रही थी,,,,, कुछ देर सोचने के बाद उसकी मां फिर से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) इसके बाद क्या हुआ,,,,?





इसके बाद क्या,,,,, वह तीनों मिलकर खाना खाने लगे और देखने वाली बात यह थी कि ,,, कमला को पिताजी अपने हाथों से खिला रहे थे,,,,, यह सब देखकर तो मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था मन कर रहा था किसी समय उन तीनों के बीच पहुंच जाऊं और उस औरत के बाल पकड़ कर उसे जोर-जोर से दो-चार थप्पड़ लगा दु क्योंकि उसे कोई हक नहीं है हम लोगों की जिंदगी बर्बाद करने का,,,,,,, लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि मैं जानता था कि पिताजी अब पहले वाले पिताजी नहीं रह गए थे उनके मन में अब हम तीनों के लिए कोई जगह नहीं क्योंकि हम तीनों की जगह तो अब उस औरत ने ले ली थी,,,,, अंदर जो कुछ भी हो रहा था आप मुझसे देखा नहीं जा रहा था लेकिन दरवाजा भी बंद हो गया था इसलिए मैं जा भी नहीं सकता था और मजबूरी मुझे सब कुछ देखना पड़ा और जो कुछ भी मैंने देखा वह सब बताने में भी शर्म आ रही है।

तुझे क्यों शर्म आ रही है जब तेरे बाप को शर्म नहीं आई करने में तो तुझे बताने में क्यों शर्म आ रही है,,,,, देख सूरज अब मुझे कुछ भी मत छुपाना जो कुछ भी वहां पर हुआ है सब कुछ मुझे एक-एक शब्द बताना ताकि मैं उसे इंसान से बदला ले सकूं जब कभी वह लौट कर आए तो,,,, उसे अच्छा सबक सिखा सकूं,,,,

(सुनैना गुस्से में बोल रही थी और अपनी मां को गुस्से में यह सब बोलते देखकर सूरज मन ही मन प्रसन्न हो रहा था क्योंकि सूरज चाहता भी यही था कि अब उसके पिताजी लोट कर ना आए तो अच्छा है,,,, फिर भी अपनी तसल्ली के लिए सूरज अपनी मां से बोला,,,)





तो क्या जो कुछ भी वहां पर हुआ है मैं सब कुछ तुम्हें बता दूं वह सब ना बताने लायक है ना तुमसे सुना जाएगा,,,,, एक पत्नी के लिए अपने पति की काली करतूत सुनना किसी डरावने सपना की तरह होता है और हकीकत यही है कि सपना तो फिर भी सपना होता है लेकिन जब वही सपना हकीकत बन जाता है तो पत्नी के लिए कितना दर्द भरा होता है मैं इसीलिए तुम्हें आगे कुछ नहीं बताऊंगा चलो अब काम करते हैं,,,(इतना कहकर सूरज खटिया पर से उतरने लगा तो सुनैना उसे रोकते हुए बोली)

कहां जा रहा है तू,,,

कटाई करने,,,, आराम करने का समय बीत गया है,,,,।

और जो आग लगाया है मेरे सीने में उसे बुझाएगा कौन तुझे क्या लगता है कि मैं कमजोर हूं अपने पति की काली करतूतों को मैं सुन नहीं सकती,,,,, मैं सुन सकती हूं मैं सबको सुन सकती हूं कटाई गई भाड़ में,,,, तू आज मुझे अपने पिताजी की हकीकत को बताएगा,,,,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर सूरज के तन बदन में मदहोशी छा रही थी,,,, यही सब तो वह चाहता था वह अपनी मां को खुलकर बताना चाहता हूं औरत के अंगों को मर्दों के अंगों को उनके नाम को उनके बीच के संबंध को खुलकर बताना चाहता था उनके बारे में कुछ भी छुपाना नहीं चाहता था और यही सही मौका भी था लेकिन फिर भी सूरज अपनी तरफ से अपनी मां को समझाते हुए बोला,,,,)





नहीं मा तुम ईस समय गुस्से में हो इसलिए ऐसा बोल रही हो,,,,, सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बाद मुझे भी बहुत गुस्सा आया था लेकिन फिर भी मैं वह सब अपने सीने में दबा ले गया था मैं भी चाहता था तुमसे सब कुछ बताना लेकिन वह सब बताने लायक नहीं था,,,,।

क्यों बताने लायक नहीं था मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूं मुझे तु बता सकताहै,,,,।

लेकिन एक बेटा अपनी मां से इस तरह की बातें कैसे कर सकता है कैसे उन बातों को बता सकता है जो चार दिवारी के अंदर मर्द और औरत के बीच होता है कैसे खुले शब्दों में बता सकते हैं तुम इतना समझ लो की औरत और मर्द के बीच जो कुछ भी होता है सब कुछ पिताजी और उसे औरत के बीच उस रात को हुआ था बस इतना ही,,,,,।

नहीं तुझे सब कुछ बताना होगा तू घर का बड़ा है तेरी जिम्मेदारी होती है मुझे सब कुछ बताना इस समय तो भूल जा कि मैं तेरी मां हूं और तू मेरा बेटा है इस समय तो यही समझा कि मैं तेरे लिए एक अंजान औरत हूं और तू एक ऐसा मर्द है जो मेरी बदनसीबी को जानता है और इस समय तुझे इस औरत के पति की काली करतूत को बताना ही बेझिझक,,,,,।

तुम मुझे मजबूर कर रही हो मां,,,,,, मैं अगर सब कुछ खुले शब्दों में बात भी दिया तो शायद तुम मुझसे नफरत करने लगोगी तब क्या होगा कल को तुम कह सकती हो कि मैं कितना बेशरम हूं कि अपनी मां से सब कुछ खुले शब्दों में बता दिया,,,,।





मैं तुझे कुछ भी कहने वाली नहीं हूं क्योंकि जो कुछ भी हुआ है वह तो तेरे पिताजी ने किया है तू तो सिर्फ बता रहा है मेरी आंखों को खोल रहा है मेरी आंखों पर बंधी काली पट्टी को खोल रहा है,,,,, तु मुझे सब कुछ सच-सच बता दे और वैसे भी तूने इतना तो बात ही दिया है कि मेरा पति कितना हारामी है तो उसके बारे में सब कुछ बताने में क्या हर्ज है एक तरह से तू मेरी मदद कर रहा है तू ही सोच अगर कल को वह आदमी वापस आ गया और मेरे साथ फिर से उसी तरह से रहने लगा तब तो मैं कभी समझ ही नहीं पाऊंगी कि तेरे पिताजी कितने हारामी है मैं तो पहले की तरह उनके साथ रहने लगूंगी लेकिन मुझे क्या पता कि वह कितना बड़ा बेवफा है,,,,।

मुझे यह सब बताना ही नहीं चाहिए था ताकि कल को पिताजी वापस लौटते तो फिर से हम लोग आराम से रह पाते ।

तू आराम से रह पाता सूरज सच-सच बता तूने तो सब कुछ अपनी आंखों से देखा है ना तेरे दिमाग में तो वह औरत नाचती होगी तेरे बाबूजी ने परिवार के साथ कितनी बड़ी गद्दारी कीए है यह सब तु कैसे भूल जाएगा,,,, क्या तू अपने पिताजी को कभी माफ कर पाएगा,,,, कभी नहीं कर पाएगा बस वह एक समाधान होगा,,,, मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि तू पहले की तरह अपने पिताजी को इज्जत नहीं दे पाएगा उनके सामने खड़ा नहीं रह पाए क्या और जब जब तू मेरे साथ अपने पिताजी को देखेगा तो तेरी आंखें गुस्से में लाल हो जाएंगे तो मेरे साथ अपने पिताजी को देखना पसंद नहीं करेगा और मैं यह नहीं चाहती इसलिए सब कुछ बता दे,,,,।





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(सूरज तो पहले से तड़प रहा था सब कुछ बताने के लिए बस सिर्फ अपनी तरफ से औपचारिकता निभा रहा था ताकि उसकी मां को ऐसा ना लगे की उसका बेटा ही बेशर्म है सब कुछ अपना रास्ता साफ करने के लिए अपने पिताजी के बारे में गंदी-गंदी बातें बता रहा है जो की हकीकत ही थी लेकिन कोई बेटा इस तरह से अपनी मां को नहीं बताता लेकिन अब सब कुछ साफ हो चुका था उसकी मां खुद आतुर थी सबकुछ सुनने के लिए अपनी मां की जिद देखकर सूरज फिर से खटिया पर बैठ गया और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,,)

तो तुम्हारे कहने पर मैं सब कुछ बता रहा हूं लेकिन मेरे बारे में कभी गलत मत समझना वह तीनों मिलकर खाना खा रहे थे और खाना खाने के दौरान जैसा कि मैं तुम्हें बताया कि पिताजी अपने हाथों से उस औरत को खाना खिला रहे थे और वह औरत अपनी बेशर्मी दिखाते हुए पता है क्या कर रही थी,,,।

क्या कर रही थी,,,?

पिताजी के धोती में हाथ डाल दी थी और धोती में हाथ डालकर उनका दबा रही थी पड़ रही थी चल रही थी और उसकी हरकत से पिताजी के चेहरे पर जो भाव दिख रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे उन्हें बहुत मजा आ रहा है,,,,,, यही क्रिया वह कल्लू के साथ भी कर रही थी,,,,,, कुछ देर तक यह सिलसिला ऐसे ही चला रहा पिताजी उसे अपने हाथों से खिलाते रहे और वह अपने हाथों से पिताजी को मस्त करती रही,,,,, फिर खाना खा लेने के बाद पिताजी ने तुरंत उसके कमर में दोनों हाथ डालकर उसे पकड़ कर उसे अपनी जांघों पर बिठा लिए,,,,।(ऐसा कहते हुए सूरज अपनी मां के चेहरे को देख रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी मां भी अपनी आंखों से सब कुछ देख रही है उसके चेहरे के बदलते भाव बता रहे थे कि वह कितने गुस्से में थी,,,, सूरज की बात सुनकर वह धीरे से बोली)

वह औरत कुछ बोली नहीं,,,,

वह क्या बोलती वह तो खुश हो रही थी हंस रही थी,,,,, और हंसते हुए बड़ी बेशर्मी से उसने बोली,,,।

दूध पियोगे मेरे राजा,,,,, इतना सुनकर पिताजी मुस्कुराते हुए बोले नेकी और पूछपूछ,,,,, मैं सच कह रहा हूं मां यह सब सुनकर मेरा दिमाग खराब हो रहा था मुझे उसे दिन की एक-एक बात याद है मैं भूल नहीं सकता कि उसे दिन क्या हुआ था,,,,,, इतना कहने के साथी पिताजी खुद अपने हाथों से उसके ब्लाउज का बटन खोलने लगे और ईतनी तेजी से ब्लाउज का बटन खोल रहे थे कि मानो के जैसे वह औरत कहीं भाग जाएगी,,,,, अगले ही पल तो उसके बदन से उसका ब्लाउज उतरकर एक तरफ रख दिए थे और फिर उसकी,,,,नननन,,,,, नंगी ,,चचचचचच चूचियों को अपने हाथ में लेकर दबाना शुरू कर दिए थे,,,,(जानबूझकर शर्माने का नाटक करते हुए नंगी और चुचियों का शब्द प्रयोग करते हुए सूरज अपनी नजरों को नीचे झुका ले रहा था,,,,,, ताकि उसकी मां को लगेगी वह यह सब कहने पर शर्मिंदा हो रहा है,,,, फिर अपनी मां से माफी मांगते हुए भी वह बोला,,,) मुझे माफ करना इस तरह के शब्द का प्रयोग में करना नहीं चाहता था लेकिन मजबूरन मुझे यह सब कहना पड़ रहा है और उसके आश्चर्य के बीच उसकी मां बोली)

कोई बात नहीं तुम मुझसे कुछ भी मत छुपाना एक-एक शब्द बताना,,,,(ऐसा कहते हुए सुनैना अपने बेटे का हौसला बढ़ा रही थी ताकि वह उसे दिन की घटना का एक-एक शब्द का वर्णन कर सके जहां एक तरफ उसे अपने पति की करतूत सुनने के बाद गुस्सा आ रहा था वही अपने बेटे के मुंह से औरतों के अंगों के बारे में सुनकर उसकी टांगों के बीच हलचल सी होने लगी थी,,,,,, और वह उत्सुकता दिखाते हुए बोली,,,) फिर क्याहुआ,,,,?

फिर क्या देखते ही देखते पिताजी और कल दोनों मिलकर उसकी दोनों चूचियों को बारी-बारी से अपने मुंह में लेकर पीना शुरू कर दिए दबाना शुरू कर दिए,,,, और वह औरत अभी भी दोनों की धोती में हाथ डालकर उन दोनों के अंग से खेल रही थी,,,(सूरज अपनी मां के सामने लंड बोलना चाहता था लेकिन ऐसा बोलने में उसके पसीने छूट जा रहे थे पर वह ना जाने क्यों बोल नहीं पा रहा था)

सब कुछ ऐसा ही हुआ था,,,?

बिल्कुल सब कुछ ऐसा ही हुआ था मैं वह रात कभी भूल नहीं सकता,,,, कुछ देर तक तीनों इसी तरह से मजा लेते रहे लालटेन की पीली रोशनी में मुझे सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था अगर लालटेन वहां ना होती तो शायद में यह सब देख नहीं पाता उसे औरत की हरकत से शायद पिताजी को रहा नहीं जा रहा था और वह अपने हाथों से अपनी धोती खोलकर एक तरफ रख दिए वह कमर के नीचे एकदम नंगे हो चुके थे पूरी तरह से नंगे और उनका,,,,(इतना कहकर सूरज खामोश हो गया तो उसे खामोश देखकर उसकी मां बोली)

क्या उनका,,,,?

अरे वही जिसे वह औरत खेल रही थी,,,,

तो साफ-साफ बोलना उनका इनका क्या कर रहा है,,,,।

(यह सुनैना की तरफ से मंजूरी थी सुरज के लिए इसलिए सूरज भी एकदम से हिम्मत दिखाते हुए बोला,,,)

उनका,,,,लललल ,,,,,,लंड,,,,(इतना कहकर सूरज गहरी गहरी सांस लेने लगा अपने बेटे की हालत को देखकर सुनैना समझ रही थी कि उसे क्या हो रहा है और वाकई में अपनी मां के सामने लंड शब्द का प्रयोग करते हुए उसकी हालत एकदम से खराब हो गई थी यहां तक की उसका खुद का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा हो चुका था,,,, सूरज अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) मैं पहली बार पिताजी को इस हालत में देख रहा था कमर के नीचे एक नंगे थे लेकिन थोड़ी देर के लिए क्योंकि ऊपर से भी उनके कुर्ते को वह औरत अपने हाथों से निकाल कर उन्हें पूरा नंगा कर दी कल्लू तो अपने हाथ से ही अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया था लेकिन एक बात था कल्लू में और पिताजी में,,,,।

क्या,,,?(हैरान होते हुए सुनैना बोली)

अब पता नहीं मैं कैसे बताऊं,,,, वह क्या है ना कि जब मैं पिताजी का देखा और कल्लू का देखा तो दोनों में जमीन आसमान का फर्क था।

कैसा फर्क,,,,?(आश्चर्य से सूरज की तरफ देखते हुए सुनैना बोली)

मतलब कि कल से ज्यादा दमदार पिताजी का लंड था और इसीलिए वह औरत पिताजी के लंड से कुछ ज्यादा ही खेल रही थी,,,,।

हरामजादी, (अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना गाली देते हुए बोली)

और कुछ देर बाद तीनों एकदम नंगे हो गए थे,,,,, पिताजी की हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी उनके सर पर जैसे दीवानगी छाई हुई थी वह घुटनों के बल बैठकर अपने लंड को पकड़ कर हिला रहे थे और एक हाथ उसके सर पर रखकर उसके सर को अपनी टांगों के बीच की तरफ ला रहे थे पहले तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जैसे ही कमला ने अपने होठों को खोली तो मै हैरान हो गया,,,,,(सुनैना समझ गई थी कि क्या होने वाला है इसलिए वह कुछ बोली नहीं बस अपने बेटे की बात सुनती रही,,, अपनी मां के सामने इस तरह की बात करने में उसे बेहद उत्तेजना का अनुभव हो रहा था सूरज का खुद का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था,,,, जिसे वह खुद बार-बार अपने हाथ से व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहा था और उसकी इस हरकत को उसकी मां देख रही थी यह देखकर उसके तन बदन में भी उत्तेजना की चिंगारी भड़कने लग जा रही थी और सूरज अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,) उसके बाद तो जो हुआ मैं देख कर हैरान हो गया मैं कभी सोचा नहीं था की औरतें इस तरह से भी करती हैं,,,, वह तो पूरा का पूरा अपने मुंह में लेकर चुस रही थी,,, मैं एकदम हैरान था मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था और पीछे से कल्लू उसकी दोनों टांगों के बीच अपना मुंह डालकर चाट रहा था यह सब देखकर तो मेरी हालत खराब हो रही थी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं मैं वहां से चला जाना चाहता था क्योंकि यह सब देखकर न जाने मुझे क्या होने लगा था लेकिन दरवाजा बंद था इसलिए जा भी नहीं सकता था,,,,

फिर क्या हुआ,,,?(सुनैना गहरी सांस लेते हुए बोली अपने बेटे की बातें सुनकर उसके तन बदन में भी मदहोशी का रंग अच्छा रहा था उसकी आंखों में भी नशा छाने लगा था वह बड़े गौर से अपने बेटे की बात सुन रही थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी आंखों के सामने कोई नाटक चल रहा हो जिसे वह अपनी आंखों से देख रही है)

फिर क्या था कुछ देर तक यह खेल ऐसे ही चला रहा और फिर सबसे पहले पिताजी ने हीं कमान संभाला,,,

कैसा कमान,,,?

मेरा मतलब है कि पिताजी कमला को लेटा कर उसकी दोनों टांगें खोल दिए और उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपनी तरफ खींच कर अपनी जांघों पर चढ़ा लिए और फिर मैं देखा कि उनकी कमर बड़ी तेजी से हिलने लगी,,,,, और फिर यही क्रिया कल्लू ने भी किया वह तो पहली बार में ही एकदम पस्त हो गया था लेकिन पिताजी का मन शायद भर नहीं रहा था एक बार करने के बाद वह दोबारा कमला को घोड़ी बना दिए और पीछे से करने लगे,,,,, मैं वहीं बैठ रहा छुपकर,,,,, थोड़ी देर में वह दोनों वहीं पर गहरी नींद में सो गए और वह कमला रानी,,,,(अपनी मां की तरफ देखते हुए) मेरा मतलब है कि वह औरत अपने कपड़े पहन कर वहां से चलती बनी,,,, जाते समय उसने दरवाजा बाहर से बंद नहीं की थी इसलिए मैं भी मौका देखकर वहां से बाहर निकल गया,,,,,.

(अगले ही पल यह सब सुनकर सुनैना की आंखों से आंसू निकलने लगे,,,, अपने बेटे के मुंह से अपने पति की अय्याशी की कहानी सुनकर वह पूरी तरह से टूट चुकी थी वह कभी सोची नहीं थी कि उसका पति उसे इस तरह से धोखा देगा उससे इस तरह से बेवफाई करेगा,,,,, पहले उसे ऐसा ही लगता था कि शायद उसका पति कहीं कमाने के लिए निकल गया है लेकिन जैसे-जैसे समय बिता गया उसे इस बात का डर मन में होने लगा कि कहीं उसका पति दूसरी औरत के चक्कर में तो नहीं पड़ गया है और आज वह बात उसकी शंका एकदम सच साबित हुई थी,,,, अपनी मां को रोता हुआ देखकर सूरज एकदम से मायूस हो गया और अपनी मां को समझाने की कोशिश करता हुआ बोला,,,,)

बेवजह तुम्हें ऐसे इंसान के लिए आंसू बहा रही हो जो तुम्हारे बारे में कभी सोचता ही नहीं है इतनी खूबसूरत औरत को छोड़कर दूसरी औरत के पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा है,,,,,(सूरज बात ही बात में अपनी मां की खूबसूरती की तारीफ भी कर रहा था जिसे सुनकर सुनैना को थोड़ा राहत भी महसूस हो रही थी सूरज अपना हाथ आगे बढ़कर अपनी मां के आंसू को पोछते हुए बोला) इसे बहा कर कोई फायदा नहीं है और वह भी ऐसे इंसान के लिए मैं तो कहता हूं भूल ही जाओ,,, अगर उन्हें परिवार की फिक्र होती तो जरूर आ जाते हैं लेकिन तुम अच्छी तरह से जानती हो कि पिताजी को गए काफी महीने गुजर चुके हैं उन्हें तो यह भी चिंता नहीं है कि हम लोगों का गुजारा कैसे होता होगा,,,,,,, तुम घर में सती सावित्री बनकर अपने पति के आने का इंतजार कर रही हो और तुम्हारा पति है कि बाहर गुलछर्रे उड़ा रहा है,,,,,(इतना सुनते ही सुनैना एकदम से फफक कर रोने लगी और उसे सहारा देने के लिए सूरज खटिया पर ही घुटनों के बाल आगे बढ़ गया उसे अपने सीने से लगा लिया सुनैना को भी शहर की जरूरत थी अपने बेटे के छाती पर सर रखकर वह जोर-जोर से रोने लगी और सूरज उसे चुप कराने की कोशिश करते हुए उसकी पीठ पर हाथ रखकर सहलाने लगा,,,, ऐसा वह सहज रूप से कर रहा था लेकिन उसकी चिकनी पीठ पर घूमने लगी थी और पल भर में उसे उत्तेजना का एहसास होने लगा था वह अपनी हरकत जारी रखते हुए अपनी मां को समझाते हुए बोला,,,)

तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है मैं हूं ना अगर मैं ना होता तो शायद तुम्हें चिंता करना पड़ता लेकिन मेरे होते हुए तुम्हें किसी भी बात की फिक्र करने की जरूरत नहीं है,,,,।

मैं कभी सोचा नहीं थी कि तेरे बाबूजी ऐसे निकल जाएंगे,,,,,।(फफक कर रोते हुए)

मुझे भी कहां यकीन हो रहा है कि सच में मेरे पिताजी ऐसे निकल गए हैं,,,,, लेकिन औरत का चक्कर होता ही ऐसा है पिताजी उसे कमल के चक्कर में पड़कर तुम्हारी जैसी खूबसूरत औरत को छोड़ दिए हैं,,,, चमकते शीशे के टुकड़े को भी वह हीरा समझ रहे हैं जबकि उनकी झोली में अमूल्य हीरा था,,,,, तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो,,, हम लोग घर को संभाल लेंगे और उन्हें दिखा देंगे कि तुम्हारे बिना भी हम लोग जी सकते हैं और वह भी अच्छे तरीके से जी सकते हैं,,,,,(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना को राहत महसूस हो रही थी लेकिन धीरे-धीरे उसे यह भी महसूस होने लगा था कि उसके बेटे की हथेली उसकी पीठ से होकर के उसकी कमर तक पहुंच गई थी,,, जिसे वह होल होल सहला रहा था और न जाने क्यों सूरज की हरकत उसे भी अच्छी लगने लगी थी,, सुनैना की दोनों टांगों के बीच की पतली दरार पिघल रही थी जो उसे साफ महसूस हो रहा था,,, और सूरज को इस बात से राहत महसूस हो रही थी कि उसकी मां उससे बिल्कुल भी अलग नहीं हो रही है पजामे में तो उसका लंड गदर मचाने को तैयार था लेकिन तभी वह अपने आप को अपनी भावनाओं को काबू में करते हुए धीरे से अपने बेटे से अलग हुई और अपने आंसू अपनी साड़ी से पोंछकर,,,, फिर से इस स्थिति में बैठ गई सूरज जानता था कि आप काम होने वाला नहीं है क्योंकि काफी समय गुजर गया था,,,,,, इसलिए कुछ देर वहीं बैठे रहने के बाद मां बेटे दोनों घर की तरफ निकल गए। सूरज ने अपनी मां के मन को काफी हद तक बदल दिया था। और यह बदनाम सूरज के लिए फायदेमंद होने वाला था। जिसका सूरज को बेसब्री से इंतजार था।
 
सूरज अपनी मां के मन में नफरत का बीज बोने में कामयाब हो चुका था वैसे तो वह जो कुछ भी बोला था वह गलत नहीं था उसमें सच्चाई ही थी लेकिन वह जानबूझकर अपनी मां को अपने बाप की अय्याशी की कहानी बताया था,, ताकि उसकी मां अपने ही पति से नफरत करने लगे और उसके करीब आने लगे,,, जिसकी शुरुआत हो चुकी थी, औरत के मन को समझ सकते की क्षमता अब सूरज में पूरी तरह से विकसित हो चुकी थी अपनी मां को चूड़ियां पहनाते समय वह जिस तरह से उसकी कलाई को पकड़ ले रहा था ऐसी हालत में उसकी मां की मां की स्थिति और चेहरे का हावभाव जिस तरह से बार-बार बदल रहा था उसे देखकर समझ गया था कि अब वह भी उसकी मां की नजर में छोटा बच्चा या उसका बेटा नहीं रह गया था वह पूरी तरह से मर्द बन चुका था तभी तो उसकी मां बार-बार शर्मा भी जा रही थी और मदहोश भी हो जा रही थी उत्तेजना उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी और यही सब बदलाव तो वह अपनी मां के चेहरे पर देखना चाहता था जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब हो चुका था।

अपने पति की रंगीन दास्तान को सुनकर और वह भी अपने ही बेटे के मुंह से वह पूरी तरह से हैरान रह गई थी जिस तरह से खुले शब्दों में सूरज ने अपनी मां को अपने बाप की सारी रंगीनियत भरी कहानी को बताया था उससे वह हैरान भी थी और अपने पति की बेवफाई से नाराज भी हो चुकी थी अपने पति के लिए उसके मन में अब नफरत ही थी और अपने पति के लिए नफरत का मतलब था कि अपने बेटे के प्रति उसका झुकाव,,,, जो सीधे-सीधे यह दर्शाता था कि वह किसी भी समय अपने बेटे की बाहों में जा सकती थी। वैसे उसे भी मर्द की जरूरत थी और वह खुद अपने बेटे की तरफ आकर्षित होती चली जा रही थी अपने आप को वह संभालने की बहुत कोशिश करती थी हालांकि वह सामने तो इस तरह की कोई हरकत नहीं करना चाहती थी लेकिन चार दिवारी के अंदर एकांत में वह अपने बेटे को याद करके अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश कर रही थी जिसे खुद सूरज अपनी आंखों से देख चुका था इसलिए तो यह सब देखकर उसकी आंखों की चमक बढ़ गई थी। और इसीलिए वह अपनी मां को किसी भी कीमत पर पाना चाहता था इसलिए तो अपनी मां के मन में अपने आप के प्रति नफरत भर देना चाहता था और जिसे वह कामयाब होता नजर आ रहा था इसमें गलती उसके बाप की ही थी जो की महीनों गुजर चुके थे अब तक घर नहीं लौटा था।





अपने बाप के बारे में अपनी मां से सारी कहानी का देने के बाद वह दो-तीन दिन शांत रहा,,, अपनी मां के करीब वह बिल्कुल भी नहीं चाहता था बस काम भर की बात करता था वह देखना चाहता था कि उसकी मां के मन में क्या चल रहा है उसे करीब ना देख कर उसके मन में भी कुछ हलचल होती है कि नहीं,,, और उसे इस बात की खुशी थी कि उसके ना होने पर उसकी मां की नजरे उसे ही ढूंढती रहती थी। एक दिन शाम को तो खाना खाते समय उसकी मां बोल ही दी।

अब देख रही हूं कि तू घर पर ज्यादा टीकता नहीं है,,,, लगता है तुझे घर पसंद नहीं है।

नहीं नहीं ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है ऐसा क्यों कह रही हो मां,,,,।(निवाला मुंह में डालते हुए सूरज बोला)

नहीं ऐसा ही है पहले तो थोड़ी बहुत मदद भी कर दिया करता था लेकिन अब तो बस खेत में काम करने के बाद दिखाई ही नहीं देता,,,।

वह क्या है ना की,,,, अब फसल की कटाई तो पूरी होने वाली है इसलिए दूसरा काम ढूंढ रहा हूं और इसीलिए मैं घर पर नहीं रह पाता,,,,, तुमको तो मालूम है मां,,, घर चलना है पैसे इकट्ठे करने हैं तभी तो रानी का विवाह अच्छे तरीके से कर पाएंगे,,,,,।(पास में ही बैठकर खाना खा रही रानी की तरफ देखते हुए सूरज बोल तो रानी उसकी तरफ देखकर अपनी आंखों को नचाने लगी और बोली,,,)

मैं कहीं नहीं जाने वाली मुझे यही अच्छा लगता है,,,।





अरे अच्छा लगता है तो क्या जिंदगी भर यही रहेगी शादी करके अपने घर नहीं जाएगी आखिरकार एक-दो साल में तेरी भी शादी करनी ही पड़ेगी,,,,(सुनैना रानी की तरफ देखते हुए बोली,,,, तभी बीच में सूरज बोल पड़ा)

पिताजी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते तो क्या हो गया मैं तो हूं ना और घर का बड़ा होने की नाते मुझे तो सब कुछ करना ही होगा रानी का भी ख्याल रखना होगा तुम्हारा भी ध्यान देना होगा,,,,,(ऐसा हुआ जान तुझको बोल रहा था वह अपनी मां को दिखाना चाहता था कि वह अपने परिवार का कितना ख्याल रखना है अपनी बहन का अपनी मां का और ऐसा कहकर वह अपनी मां के दिल में अपने लिए जगह बनाना चाहता था,,,,, अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना सूरज की तरफ देखने लगी और बोली)

सच में सूरज अगर तू ना होता तो पता नहीं हम दोनों का क्या होता है तेरे पिताजी के जाने के बाद तो वही है जो घर को संभाल कर रखा हुआ है,,,,।

यह तो मेरा फर्ज है मां,,, पिताजी ना सही मैं तो हूं ना तुम दोनों की जरूरतों को पूरा करनेके लिए,,,।

( सूरज बोल तो सही रहा था लेकिन उसके शब्दों के दो मतलब नहीं कर रहे थे और दूसरे मतलब को सुनैना भी अच्छी तरह से समझ रही थी इसलिए तो अपने मन में सोचने लगी की घर की जरूरतों को तो पूरा करना है मेरी जरूरत को कब पूरी करेगा,,,, उसका ऐसा कहना जायज हो चुका था क्योंकि हर रात वह अपने बेटे के बारे में सोचकर अपनी बुर में उंगली किया करती थी और ऐसे भी उसकी उम्र ढली नहीं थी वह पूरी तरह से जवानी से भरी हुई थी इस उम्र में उसे मर्द की जरूरत कुछ ज्यादा ही महसूस हो रही थी और अंदर ही अंदर वह ईस बात को भी महसूस कर चुकी थी कि उसकी जरूरत को पूरा करने वाला उसके बेटे के सिवा दूसरा कोई हो ही नहीं सकता इसका एक कारण यह भी था कि वह जानती थी कि अगर अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए अगर उसके कदम बहक गए तो उसकी बदनामी भी हो सकती है बरसों की बनी बनाई इज्जत माटी में मिल सकती है इसीलिए वहां अपने मन में यही सोचती थी कि उसका संबंध उसके बेटे के साथ बन जाए तो घर की बात घर में ही रह जाएगी और उसकी जरूरत भी पूरी होती रहेगी,,,,, वैसे तो सूरज लगभग अपने इरादे में कामयाब हो चुका था बस मंजिल तक पहुंचना बाकी था,,,,,)





सुबह दातुन करते हुए जब वह गांव में इधर से उधर घूम रहा था तो चौपाल पर कुछ लोगों की भीड़ लगी हुई थी सूरज दातुन करते हुए वहीं पहुंच गया सूरज को देखते ही गांव के लोग एकदम से खुश हो गए और बोले,,,,,।

लो हमारा खिलाड़ी आ गया,,,, अब तो गांव की इज्जत इसके ही हाथों में है,,,,।

(उसकी बात सुनकर सूरज को कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह हैरान था इसलिए हैरान होते हुए वह बोला)

यह क्या कह रहे हो चाचा गांव की इज्जत मेरे हाथों में मैं कुछ समझा नहीं,,,।

अरे बेटा,,,(तब तक दूसरा आदमी बोल बैठा) 2 दिन बाद गांव में कबड्डी का दंगल है और बगल वाले गांव के लोग चुनौती देकर गए हैं कि यह दंगल जीत कर दिखाओ तो जाने,,,,, और बात गांव की इज्जत की थी तो हम लोगों ने भी हां बोल दिया लेकिन हमें पूरा भरोसा है तुम पर,,,, कि तुम गांव की इज्जत हमेशा बचाओगे और इस बार भी गांव की जब तुम्हारे हाथ में है इससे पहले तुम्हारे पिताजी कबड्डी का दंगल लड़ा करते थे और जीत कर ही आते थे,,,,,।

यह बात है,,,, तब तो मैं तैयार हूं,,,,,,(इतना कहकर सूरज अपने मन में सोचने लगा कि जब बात पिताजी पर आ चुकी है तो मुझे यह दंगल जितना ही होगा क्योंकि वह हर मामले में अपने पिताजी की जगह लेना चाहता था चाहे घर में हो या बाहर चाहे खेती का काम हो या अपनी मां को खुश करने का वह हर जगह अपने पिताजी की जगह लेना चाहता था इसलिए वह भी एकदम उत्साहित होता हुआ गांव वालों को बोल दिया,,,,)

देखो बेटा सूरज दो दिन बचे हैं तुम अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर लो ताकि यह दंगल जीतकर गांव का नाम रोशन कर सको,,,,,।





(अभी यह सब बात हो ही रही थी कि सामने से मुखिया जी अपनी बीवी के साथ आते हुए दिखाई दिए सूरज भीड़ में से बाहर निकाल कर उन दोनों की तरफ बढ़ने लगा मुखिया सूरज को देखते ही बोले)

अब तक तो तुम्हें समझ में आ ही गया होगा,,,,

जी मालिक,,,,।

तो इतना समझ लो की मुखिया होने के नाते मेरी भी जिम्मेदारी बनती है कि गांव की इज्जत न जाने पाए जब राजा साहब ने कबड्डी के दंगल के लिए चुनौती दिए तो सबसे पहले मुझे तुम्हारा ही नाम याद आया क्योंकि इससे पहले तुम्हारे पिताजी ही कबड्डी के हर दंगल को जीते थे आए और गांव का नाम रोशन करते आए हैं अभी जिम्मेदारी तुम्हारी बनती है,,,,।

मुझे तो पूरा विश्वास है कि इस कबड्डी के दंगल को सूरज जरूर जीत कर दिखाएगा,,,,, वैसे भी कोई भी दंगल हो उसमें जीत सूरज की ही होती है। (मुखिया की बीवी मुस्कुराते हुए बोली तो सूरज भी मुखिया की बेटी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोला)

आप लोगों का आशीर्वाद रहा तो जरूर मैं जीत कर दिखाऊंगा,,,,।

देखो सूरज अगर यह कबड्डी का दंगल तुम जीत गए तो इनाम तो मिलेगा ही मेरी तरफ से भी तुम्हें इनाम दिया जाएगा,,,,।

जी मालिक मैं पूरी कोशिश करूंगा,,,।

अच्छा सूरज अब यहां तक आई हूं तो चलो थोड़ा तुम्हारे घर पर भी तुम्हारी मां से मिल लुं,,,,,, आप यही बैठिए में जाकर आती हुं,,,,।

ठीक है जल्दी आना,,,,।

(मुखिया की बात सुनते ही लोगों ने मुखिया जी के बैठने की व्यवस्था कर दिया और सूरज मुखिया की बीवी के साथ अपने घर की तरफ निकल गया अपने मन में यह सोचता हुआ कि काश घर में इस समय कोई ना हो तो मजा आ जाए,,,, मुखिया की बीवी भी यही सोच रही थी और मुस्कुराते हुए सूरज से बोली)





खटिया पर तो तु कोई दंगल नहीं हारता,,,, इस दंगल को भी जीत जाना तुझे खुश कर दूंगी,,,,,

क्या बात है मालकिन खुश तो तुम हमेशा ही करती हो इस बार क्या नया है इस बार कहीं गांड मारने तो नहीं दोगी,,,,।

धत् हरामी,,,,, बहुत शैतान हो गया है तू,,,, उस बारे में तु सोचना भी मत,,,,।

क्या करूं मालकिन अब तो दिन रात उसी के बारे में सोचता रहता हूं कि जिस दिन में तुम्हारी गांड में अपना लंड डालूंगा तो कितना मजा आएगा,,,,।

(सूरज की बातें सुनकर शर्म के मारे मुखिया की बीवी जबरदस्ती लगी कि कहीं कोई सुन तो नहीं रहा है क्योंकि वह जानती थी कि अगर इस तरह की बातें कोई सुन लेगा तो गजब हो जाएगा क्योंकि मुखिया की बीवी होने के नाते कोई इस तरह से उससे बातें करें यह बदनामी वाली बात थी इसलिए वह इधर-उधर देख रही थी सूरज की बातें सुनकर उसके चेहरे पर शर्म की लाली छा गई थी,,,, सूरज की बात का वह कुछ जवाब नहीं दे पाई,,,, थोड़ी देर में वह सूरज के साथ उसके घर पहुंच चुकी थी सूरज ने देखा कि दरवाजा बंद था और उसे पर कड़ी लगी हुई थी जिसका मतलब साफ था कि इस समय घर पर ना तो उसकी बहन थी और ना ही उसकी मां थी,,,,, दरवाजा बंद देखकर मुखिया की बीवी बोली,,,)





दरवाजा तो बंद है,,,, लगता है तुम्हारी मां घर परनहीं है,,,(मुखिया की बीवी मुस्कुराते हुए बोली थी उसकी मुस्कुराहट को देखकर सूरज समझ गया था इसलिए वह भी मुस्कुराते हुए बोला)

यह तो हम दोनों के लिए ही अच्छा है,,,,, आओ जल्दी से अंदर,,,, मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि तुम चुदवाने आई हो,,,,, तुम्हारी बुर में चीटियां रेंग रही है,,,(इतना कहने के साथ ही सूरज दरवाजे की कड़ी खोल दिया और दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल होने लगा सूरज जो कुछ भी बोला था इसमें झूठ कुछ भी नहीं था इसलिए मुखिया की बीवी मुस्कुराने लगी और वह भी सूरज के पीछे उसके घर में दाखिल हो गई,,,,, अंदर पहुंचते ही सूरज में धीरे से दरवाजा बंद किया और मुखिया की बीवी को एकदम आंगन में ले आया,,,,, लेकिन आते समय दरवाजे के किनारे एक बाल्टी रख दिया ताकि कोई दरवाजा खोले तो बाल्टी गिर जाए जिसकी आवाज से दोनों को पता चल जाए की कोई आ रहा है,,,, आंगन में आने के साथ ही सूरज एकदम से उसे अपनी बाहों में दबोच लिया और उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर अपने दोनों हाथ रखकर जोर-जोर से दबाने से शुरू कर दिया साड़ी के ऊपर से ही मुखिया की बीवी की नरम नरम गांड दबाने पर वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया और अगले ही पल वह उसे एकदम से पलट दिया वह जानता था कि इस समय इन दोनों के पास समय नहीं है,,, इसलिए मुखिया की बीवी भी अपनी इच्छा को जाहिर नहीं कर रही थी क्योंकि वह जानती थी कि इस समय केवल मुख्य ध्येय को ही प्राप्त करना था,,,,।

सूरज ने भी उसकी साड़ी कमर तक उठाने में बिल्कुल भी देर नहीं किया,,,,, मुखिया की बीवी की नंगी गांड कैसे करें उसकी आंखों की चमक एकदम से बढ़ गई और एक चपत उसकी गोरी गोरी गांड पर लगा दिया,,,, जिससे मुखिया की बीवी की आह निकल गई,,,, और वह बोली,,,।





अरे हरामजादे यह सब किसी और दिन कर लेना,,,, पहले डाल दे अंदर,,,,, आज सुबह से तेरी बहुत याद आ रही थी इसलिए तो मुखिया जी के साथ यहां आ गई,,,,,।

(इतना सुनते ही सूरज अपने पजामे को एक झटके में नीचे सरका दिया,,,, और अपने खड़े लंड को उसकी गांड की दरार के बीचों बीच ले जाता हुआ,,,बोला,,,)

बोलो ना मालकिन अगर मैं यह दंगल जीत गया तो क्या दोगी,,,,।

तुझे खुश कर दूंगी,,,(दोनों हाथ को दीवार पर सटकर अपनी नजर को पीछे की तरफ घूमर अपनी बड़ी-बड़ी गांड की तरफ देखते हुए मुखिया की बीवी बोली जो कि वह थोड़ा सा बाहर को निकाली हुई थी,,,,)

बोलो ना अगर जीत गया तो क्या गांड मारने दोगी,,,,।

हरामजादे पहले जो कर रहा है वह तो कर,,,, कोई आ गया तो यह सब भी करने से रहा,,,,।

वह तो मैं जानता ही हूं,,,,(अपने लंड को उसके गुलाबी छेद में डालते हुए) इस समय तुम्हारी चुदाई करने में बिल्कुल भी देर नहीं होगी लेकिन यह तो बताओ गांड मारने दोगी कि नहीं,,,,.

बिल्कुलभी नहीं,,,(इतना कहने के साथ ही वह खुद ही अपनी गांड को पीछे की तरफ ठेलते हुए बोली) मादरचोद अपनी बर तो दे रही हूं गांड के छोटे से छेद के लिए क्यों तड़प रहा है,,,।

क्योंकि तुम्हारी गांड बहुत खूबसूरत है इसलिए मैं तुम्हारी गांड मारना चाहता हूं,,,,,,(ऐसा कहते हुए सूरज एकदम उत्तेजित हो गया था और वह मुखिया की बीवी की कमर पकड़ कर अपनी कमर को जोर-जोर से ही लाना शुरू कर दिया था उसे इतना मजा आ रहा था कि अब इससे ज्यादा वह कुछ बोल भी नहीं पाया और वह तब तक मुखिया की बीवी को चोदता रहा जब तक की उसका पानी नहीं निकल गया,,,, लेकिन जब वह झड़ रहा था एकदम मदहोश हो रहा था तभी बाल्टी के गिरने की आवाज आई और वह एकदम से चौकन्ना हो गया,,,, वह तुरंत मुखिया की बीवी की बुर में से अपना लंड बाहर निकाल लिया वैसे भी उन दोनों का काम बन चुका था और वह एकदम से मुखिया की बीवी की साड़ी को नीचे गिरा दिया,,,, मुखिया की बीवी भी मौके की नजाकत को समझते हुए एकदम से आंगन में पड़ी खटिया को खुद ही नीचे गिराई और उस पर बैठ गई,,,, और सूरज तुरंत जहां पर बर्तन रखे हुए थे वहां पर पहुंचकर अपने हाथ में एक लोटा ले लिया और उसे यूं ही साफ करने का नाटक करने लगा तब तक आंगन में सुनैना पहुंच चुकी थी सुनैना को देखते ही मुखिया की बीबी एकदम से बोल पड़ी,,,)

अरे सुनैना कहां चली गई थी मैं तो तुमसे मिलने आई थी लेकिन देख रही हूं तुम यहां पर हो ही नहीं,,,,।

(इतना सुनते ही सूरज भी लौटा धोते हुए अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला)

क्या मन कहां चली गई थी मालकिन कब से तुम्हारा इंतजार कर रही है,,,,,।

(मुखिया की बीवी को अपने आंगन में बैठी देखकर सुनैना खुद एकदम हैरान थी लेकिन दोनों की बात सुनकर वह बोली)

मेरा इंतजार लेकिन क्यों?,,,

अरे तुम नहीं जानती दो दिन बाद कबड्डी का दंगल है और पूरे गांव की इज्जत तुम्हारे बेटे के सर पर है,,।

कबड्डी का दंगल,,,(एकदम हैरान होते हुए सुनैना कभी मुखिया की बीवी तो कभी अपने बेटे की तरफ देख रही थी)

हां कबड्डी का दंगल यह तो तुम जानती हो कि इससे पहले जितने भी कबड्डी के दंगल हुए हैं उसमें सूरज के पिताजी ने हमेशा गांव का सर उंचा रखा है,,,, लेकिन उनकी गैर मौजूदगी में यह जिम्मेदारी सूरज के सर पर है जिस पर पूरे गांव में मोहर लगा दिए तुम्हारे बेटे को भी तुम्हारे पति के नक्शे कदम पर चलना है और गांव का नाम रोशन करना है,,,,।

(इतना सुनकर सुनैना अंदर ही अंदर खुश होने लगी क्योंकि उसे एहसास होने लगा था कि सूरज वाकई में अब पूरा मर्द बन चुका था मुखिया की बीवी की बात सुनकर सुनैना बोली।)

मालकिन यह तो बहुत अच्छी बात है लेकिन क्या सूरज कबड्डी का दंगल जीत पाएगा,,,,।

क्यों मां मुझ पर भरोसा नहीं है क्या,,,?

तुम खामखा परेशान हो रही हो सुनैना तुम्हारा बेटा जरूर कबड्डी का दंगल जीतेगा मुझे पूरा विश्वास है,,,,। और हां अब तो फसल की कटाई भी पूरी होने वाली है,,, फसल की कटाई पूरी हो जाए तो देखती हूं कोई और काम होगा तो बताऊंगी,,,,,(इतना कहकर मुखिया की बीवी अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई यह देखकर सुनैना बोली)

आप बैठीए मैं चाय बना देती हुं,,,,।

नहीं नहीं रहने दीजिए मैं तो तुमसे मिलने के लिए आई थी और वैसे भी मुखिया जी चौपाल पर इंतजार कर रहे हैं मुझे जाना होगा,,,,,(इतना कहकर मुखिया की बीवी मुस्कुराते हुए घर से बाहर निकल गई और कुछ दूरी तक सुनैना भी उसे छोड़ने के लिए आई,,,, उसके जाते ही मां बेटे घर में आकर सुनैना बहुत खुश थी क्योंकि धीरे-धीरे उसके बाप की जिम्मेदारी उसके बेटे के सर पर आ चुकी थी,,,, इस खुशी में वह एकदम से अपने बेटे को अपने गले लगा ली,,,,, अपनी मां की खुशी देखकर सूरज से भी रहने दिया और वह अभी एकदम से अपनी मां के गले से लग गया लेकिन जिस तरह से वह अपनी मां के गले लगा था उसके तन बदन में उत्तेजना का तूफान उठने लगा अभी कुछ देर पहले ही वह मुखिया की बीवी की चुदाई करके जाता था लेकिन अपनी मां के सीने से लगते ही उसके लंड में हरकत होना शुरू हो गया और वह तुरंत अपने दोनों हाथों को अपनी मां की कमर पर रख दिया,,, सुनैना खुश होते हुए बोल रही थी,,,)

तू सच में बड़ा हो गया है रे तू तो धीरे-धीरे अपने आप की जगह ले रहा है,,,, जैसे तेरे पिताजी पर पूरे गांव को भरोसा था वैसे वही भरोसा तेरे पर है यह भरोसा बनाए रखना टूटने मत देना,,,,।

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मां,,,, अपने सर पर आई जिम्मेदारी को मैं बखूबी निभाऊंगा,,,,(इतना कहने के साथ ही उत्तेजना और अनजाने में उसकी दोनों हथेलियां अपने आप ही उसकी मां के नितंबों पर आ गई उसकी गोली को अपनी हथेली में महसूस करते ही सूरज एकदम मदहोश हो गया और उसका लंड सीधा उसकी मां की बुर पर दस्तक देने लगा जिसका एहसास सुनैना को भी एकदम से होने लगा और वह एकदम से मदहोश हो गई,,,,,, लेकिन वह जल्दी से अपने बेटे से अलग हो गई और चोर नजरों से उसके पजामे की तरफ देखी तो हैरान दे गई क्योंकि उसके पजामे में तंबू बना हुआ था,,,,,,।

सूरज को अभी बहुत सारी तैयारी करनी थी इसलिए वह गांव में घूम-घूम कर जो मजबूत और कबड्डी के खिलाड़ी थे उन्हें इकट्ठा करने लगा और जल्द ही उसने उन लड़कों को इकट्ठा कर लिया जो कबड्डी के दंगल में उसका साथ दे सकते थे।

आखिरकार कबड्डी के दंगल की शुरुआत हो चुकी थी गांव के बाहर एक खुली जगह पर सामीआना तान दिया गया था,,,,, गांव के लोग इकट्ठा हो चुके थे औरतें बच्चे बूढ़े नौजवान सभी इकट्ठा हो चुके थे और दोनों गांव के लोगों के साथ-साथ आज पड़ोस के गांव के लोग भी इकट्ठा हो चुके थे एक तरह से मेला सा लग गया था,,,, और कुछ लोग कबड्डी के दंगल में जुटी भीड़ का अच्छा खासा फायदा उठाने के लिए वहीं पर समोसे जलेबियां बेचना शुरू कर दिए थे,,,,, कबड्डी का दंगल देखने के लिए सूरज की मां और उसकी बहन दोनों आई थी,,,, वहीं दूसरी तरफ सोनू की चाची और सोनू की मां भी वहीं मौजूद थी अपने बेटे सोनू के साथ,,,।

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बस थोड़ी ही देर में कबड्डी के दंगल की शुरुआत होने वाली थी,,,, घने पेड़ के नीचे राजा साहब और गांव के मुखिया कुर्सी लगाकर बैठे थे, साथ में मुखिया की बीवी और उसकी दोनों लड़कियां भी पास में ही खड़ी थी,,। जो,,,जो सूरज को जानता था वह तो सूरज को अच्छी रहा था जो औरतें सूरज को नहीं जानती थी वह भी सूरज कोई देख रही थी क्योंकि हर एक औरत का सपना होता है कि एक गठीले बदन वाला मर्द उनका साथी हो,,, और वह सारी खूबियां सूरज में थी जैसा कि हर एक औरत और लड़कियां चाहती थी। शालू नीलू मुखिया की बीवी सूरज की मां सूरज की बहन सोनू की चाची सोनू की मां यह सबसे तो सूरज का अच्छा खासा रिश्ता बन चुका था और यह लोग सूरज को देखकर मन ही मन मुस्कुरा भी रही थी।





सरसों के तेल में सना हुआ सूरज का बदन सूरज की सुनहरी धूप में चमचमा रहा था,,, खड़े-खड़े सूरज वहीं पर कसरत भी कर रहा था जिससे औरतों का ध्यान उसकी तरफ और ज्यादा आकर्षित हो रहा था उसकी बलिबिष्ट भुजाएं,,, काफी दमदार थी,, उसकी मोटी मोटी जांघें एकदम कसी हुई और आकर्षक दिखाई दे रही थी जिस पर हर नारी का दिल मोह जा रहा था,,, दोनों तरफ के खिलाड़ी केवल छोटा सा लंगोट बंधे हुए थे अपने मर्दाना उनको छुपाने के लिए बाकी सब का पूरा शरीर खुला हुआ था लेकिन सब खिलाड़ियों से ज्यादा कृषक सूरज ही दिखाई दे रहा था और उसके लंगोट में उसके अंदर का औजार काफी उभरा हुआ दिखाई दे रहा था जिस पर ना चाहते हुए भी न जाने कितनी औरतें की नजर पहुंच जा रही थी। और ऐसा स्वाभाविक ही है मर्द की तरफ और वह भी खास करके जब मरद पूरी तरह से आकर्षक हो तो ना चाहते हुए भी औरतों की नजर उसे पर पढ़ी जाती है और यही हाल मर्दों की भी होती है मर्दों की तो कैसे भी हालत में औरतों पर नजर पड़ ही जाती है जैसे मर्द की नजर औरतों में सबसे पहले उसकी उभरी हुई बड़ी-बड़ी चूचियां ,,, और बड़ी-बड़ी गांड पर पड़ती है वैसे औरतों की भी नजर मर्दों की बलिष्ठ भुजाएं और उसके मर्दाना अंग पर सबसे पहले पड़ती है।





राजा साहब और मुखिया आपस में कुछ बात करने लगे उसके बाद मुखिया ने अपनी एक इंसान कोई सारे से अपनी तरफ बुलाया और कबड्डी का खेल शुरू करने के लिए बोला,,,, वह मैदान में गया और खेल शुरू करने का इशारा किया दोनों तरफ के खिलाड़ी लोग एकदम सतर्क हो गए,,,,, पहली पारी राजा साहब के तरफ के खिलाड़ियों से शुरू की गई उनमें से एक खिलाड़ी आया बड़ी फुर्ती दिखाता हुआ पहली बार में ही सूरज के पक्ष के दो खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया यह देखकर सूरज के गांव के लोगों में सन्नाटा फैल गया और वहीं दूसरी तरफ राजा साहब के गांव के लोग जोर-जोर से चिल्ला रहे थे और अपने खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे थे,,,,, पहली बार में ही इस तरह की स्थिति को देखकर सूरज की मां भी परेशान हो गई थी ,, लेकिन इन सबके बीच सोनू की मां सूरज को ही देख रही थी उसे घूर रही थी उसकी बलिष्स्ट भुजाओं में अपने आप को महसूस कर रही थी,,, उसके मर्दाना अंग की गर्मी को तो वह पहले से ही अपनी हथेली में महसूस कर चुकी थी जिसकी याद में वह न जाने कितनी बार अपनी उंगली से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश कर चुकी थी। इसलिए उसे हार जीत दिखाई नहीं दे रही थी बस उसे सूरज दिखाई दे रहा था जिसके साथ वह संबंध बनाना चाहती थी।





पहली बार में ही मिली सीकस्त से सूरज परेशान हो गया था और वह अपने पक्ष के एक अच्छे खिलाड़ी को सामने पांच के खिलाड़ी की तरफ जाने के लिए बोला और वह भी एकदम तैयार होकर कबड्डी कबड्डी बोलता हुआ दुश्मनों की भीड़ में घुस गया वह अपने आप को ज्यादा चालाक समझ रहा था वह सोचा था कि वह पहली बार में ही उनके पक्ष के दो खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाकर वापस लौट आएगा लेकिन सारा मामला उलटा पड़ गया था उनमें से एक खिलाड़ी पूर्ति दिखाता हुआ एकदम से सूरज के पक्ष के खिलाड़ी की टांग को बड़े जोर से पकड़ लिया था और सूरज के पक्ष का खिलाड़ी पूरी ताकत से अपने पक्ष में आने की कोशिश कर रहा था और वह गिरकर अपने हाथ को सफेद लकीर पर रखने वाला था कि तभी दूसरे साथी एकदम से आगे बड़े और उसे पीछे की तरफ खींच लिए और वह ज्यादा देर तक टिक नहीं सका और वह भी बाहर का रास्ता देख लिया यह सब देखकर सूरज के पक्ष के खिलाड़ी के साथ-साथ सूरज के गांव वाले भी हैरान हो गए थे मुखिया के चेहरे पर भी हवाई या उड़ने लगी थी क्योंकि इज्जत का सवाल था और वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था क्योंकि अब तक कबड्डी के दंगल को मुखिया जीते आ रहा था और अभी सूरज के बाप के बदौलत लेकिन आज सूरज का आप इस खेल में मौजूद नहीं था और सारा दामोदार सूरज के ही कंधे पर था लेकिन जिस तरह से सूरज के पक्ष के खिलाड़ी बाहर का रास्ता देख रहे थे उसे देखकर मुखिया एकदम चिंतित हो गया था और राजा साहब एकदम खुश नजर आ रहा था। राजा साहब को खुश देख कर मुखिया के साथ-साथ सूरज को भी गुस्सा आ रहा था लेकिन वह कर क्या सकता है एक बार फिर से खेल की शुरुआत हुई।





सामने के पक्ष का खिलाड़ी कबड्डी बोलता हुआ सूरज के पश्चिमी घुस गया लेकिन इस बार ना तो इस तरह की कोई नुकसान हुआ और ना ही उसे तरफ कोई नुकसान हुआ वह इस तरह से अपने पक्ष में वापस चला गया,,,,,, सूरज के तीन खिलाड़ी बाहर बैठ चुके थे तभी सूरज ने अपने साथी पक्ष में से एक खिलाड़ी को चुना और उसे सामने पक्ष में जाने के लिए बोला वह एकदम पूर्ति दिखाता हुआ अंदर घुस गया और इस बार उसे सफलता हाथ लगी वह एक खिलाड़ी को बाहर का रास्ता दिखा चुका था यह देखकर सूरज के गांव वाले खुश होने लगे और जोर-जोर से शोर मचाने लगे इस बार मुखिया के चेहरे पर भी थोड़ी बहुत राहत दिखाई दे रही थी मुखिया की बीवी तो सूरज को देखकर खुश हो रही थी और वह भी जोर-जोर से सूरज सूरज चिल्ला रही थी लेकिन पास में ही खड़ी नीलू अपनी मां को देखकर मन ही मन उसे भला बुरा कह रही थी क्योंकि वह अपनी आंखों से अपनी मां को सूरज के साथ चुदवाते हुए देखी थी,,,, इसलिए इस समय अपनी मां के मुंह से सूरज का नाम सुनकर उसे गुस्सा आ रहा था हालांकि वह भी सूरज के साथ मजे ले चुकी थी लेकिन वह कभी सोचा नहीं क्योंकि उसकी मां भी उसकी राह पर चल पड़ेगी जबकि वह यह नहीं जानती थी कि उससे पहले ही उसकी मां सूरज के साथ चुदाई का सुख भोग चुकी थी। इन सबके बीच अपनी मां के पास खड़ी रानी की नजर राजा साहब के पास खड़े कुंवर के ऊपर पड़ी तो वह कुंवर को ही देखने लगी कुंवर के भी नजर रानी पर पड़ चुकी थी कुंवर को देखकर रानी के मन में थोड़ा गुस्सा का भाव हो रहा था लेकिन कुंवर ने इशारे से उसे बाहर निकालने के लिए बोला लेकिन रानी नहीं मानी क्योंकि उसके मन में कुंवर के प्रति थोड़ा गुस्सा था क्योंकि वह वादा करके उससे मिलने नहीं आया था। लेकिन कुंवर के बार-बार इशारा करने पर रानी अपने कदम पीछे लेने लगी तो कुंवर भी अपनी जगह से पीछे हटने लगा और थोड़ी देर बाद दोनों गांव के लोगो की जुटी भीड़ से अलग हो गए,,, कुंवर रानी का हाथ पकड़कर उसे खेत की तरफ ले जाने लगा जहां पर उन दोनों को कोई देख ना सके,,,,,, रानी झूठ मुट का गुस्सा दिखाते हुए अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली।





छोड़ दो मेरा,, हांथ अब क्या लेने आए हो?

मैं तुम्हें लेने आया हूं तुम्हारा प्यार लेने आया हूं,,,

उसे दिन कहां थे जब मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी,,,।

वही तो समझाने के लिए आया हूं,,,

क्या समझाने के लिए आए हो,,,, तुम जरा भी नहीं सोचे कि किसी को इंतजार करने के बाद वहां पर न पहुंचना सामने वाले पर क्या गुजरेगी।

मैं जानता हूं रानी मुझसे गलती हो गई लेकिन उसे दिन में बहुत मुसीबत में पड़ गया था मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं,,,।

क्यों ऐसा क्या हो गया था,,,,, ‌।

पारिवारिक उलझन में पड़ गया था,,,।

झूठ तुम झूठ कह रहे हो,,,,,,।

अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊं कि मैं सच कह रहा हूं,,,, मैं तुमसे नदी में डूब कर करने की बात भी नहीं कह सकता क्योंकि मुझे तैरना आता है,,,,, तुम नहीं जानती उसे दिन जब मैं वादा करके तुम्हारे पास नहीं पहुंचा तो मुझे कितना बुरा लग रहा था आज तक मुझे बुरा लग रहा था मैं तुमसे यहां पर मिलने के लिए ही आया हूं ना की दंगल देखने के लिए मुझे पूरा विश्वास था कि तुम यहां जरूर आओगी और मेरी नज़रें तुम्हें ही ढूंढ रही थी,,,,।





(एक तरफ रानी को मनाने में कुंवर लगा हुआ था और दूसरी तरफ दंगल में नीलू अपनी मां को देखकर गुस्सा हो रही थी नीलू को अपनी मां और सूरज का संबंध बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा था,,,,, वही सोनू की मां के दिल में कुछ कुछ हो रहा था सोनू की मां प्यार भरी नजरों से सूरज को देख रही थी सूरज को कम उसके देह लालीत्य को कुछ ज्यादा ही देख रही थी। खास करके लंगोट में उभरे हुए उसके उभार को जिसे वह अपने हाथ में लेकर उसका अच्छे तरीके से जायजा ले चुकी थी,,,, और यही हाल सुनैना का भी था सुनैना की नजर में भी प्यास भरी हुई थी वासना की प्यास जोकि अपने ही बेटे को देखकर बार-बार उमड़ रही थी,,,, सोनू की मां की तरह उसकी नजर भी अपने बेटे के लंगोट में फंसी हुई थी वह अच्छी तरह से जानती थी कि उसके बेटे का लंड बेहद बम पिलाट था। जिसे लेने के बाद वह पूरी तरह से तर्र हो जाने वाली थी। अपने बेटे का इस तरह से नेतृत्व करना उसे बहुत अच्छा लग रहा था उसे अपने पति भोला की याद आ रही थी। भोला भी इसी तरह से कबड्डी के दंगल में अपने साथी खिलाड़ियों को समझाया करता था कैसे कब क्या करना है ठीक उसी तरह से उसका बेटा भी सबको समझा रहा था ना जाने क्यों उसे अपने बेटे में अपने पति की झलक दिखाने लगी थी। और उसे यकीन होने लगा था कि जैसे वह घर की जरूरत को पूरी कर रहा है एक दिन वह उसकी भी जरूरत को पूरी करेगा।

दोनों दोनों पक्षों के गांव वाले जोर-जोर से शोर मचा रहे थे,,,। खेल आगे बढ़ रहा था,,,, तभी सामने पक्ष का का खिलाड़ी तेजी से आया और आते ही किसी को कुछ समझ में नहीं आया उसने भी तो खिलाड़ी को मैदान से बाहर कर दिया और खुश होता हुआ अपने पक्ष में चला गया उसकी चालाकी और चपलता को देखकर उसके पक्ष के लोग उसे कंधे पर उठा लिए,,, एक बार फिर से सूरज के पक्ष में सन्नाटा छा गया था गांव वालों के चेहरे पर फिर से निराश दिखाई देने लगी थी मुखिया को तो लगने लगा था कि इस बार उसकी नाक कट जाएगी जिसे भोला ने अब तक बरकरार रखा था। सूरज भी चिंतित था क्योंकि यह पहला मुकाबला था जिसमें पूरे गांव की इज्जत उसकी जीत पर टिकी हुई थी उसे भी अपनी बाप की इज्जत रखनी थी,,,,, वह बार-बार अपनी मां की तरफ देख ले रहा था सूरज को अपनी मां की आंखों में हारने का डर एकदम साफ दिखाई दे रहा था और वह अपनी मां के सामने बिल्कुल भी हारना नहीं चाहता था क्योंकि उसे भी पूरा विश्वास था की जीत के साथ ही वह अपनी मां की टांगों के बीच का रास्ता तय करेगा क्योंकि वह साबित कर चुका होगा कि वह पूरी तरह से उसके बाप की ही तरह है।





जैसे तैसे करके खेल आगे बढ़ता रहा और एक-एक करके सूरज के सभी खिलाड़ी बाहर होते रहे,,,,, अब सूरज अकेला बच गया था हार तय थी निराशा के बदले पूरी तरह से छाए हुए थे मुखिया का दिल टूट गया था मुखिया या खेल देखना ही नहीं चाहता था लेकिन वह मजबूर था क्योंकि वह राजा साहब के सामने अगर चला जाता है तो ऐसे ही उसकी बदनामी हो जाती मुखिया की बीवी भी परेशान हो चुकी थी क्योंकि सूरज ने उससे कहा था कि अगर यह दंगल जीत जाएगा तो वह उसे गांड मारने देगी,,,, जिसमें उसकी भी चाहत छिपी हुई थी,,,, इसलिए वह भी चाहती थी कि सूरज यह दंगल जीत जाए लेकिन जिस तरह का माहौल था हालात बने हुए थे उसे देखकर वह भी पूरी तरह से उदास हो चुकी थी और यह देखकर नीलू मन ही मन खुश हो रही थी। दूसरी तरफ कुंवर अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा था रानी को मनाने के लिए लेकिन रानी मानने को तैयार नहीं थी इसलिए वह रानी से आखरी मर्तबा बोला।)

देखो रानी मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर लिया तुम्हें मनाने की तुम्हें बताने की कि मेरी क्या मजबूरी थी लेकिन तुम समझने की तैयार ही नहीं हो तो अब मैं क्या कर सकता हूं,,,, लेकिन मैं तुम्हें इतना बता दो कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता इसलिए मैं यह ऊंची पहाड़ी से कुछ कर जान देने जा रहा हूं अगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए जरा से भी जगह हो तो मुझे रोक लेना वरना यह तुमसे मेरी आखिरी मुलाकात होगी।

हां तो जाओ मर जाओ,,,,।





(इतना सुनकर कुंवर खातिर एकदम से टूट गया और वह ऊंची पहाड़ी की तरफ जाने लगा उसे जाता हुआ देखकर रानी खड़ी रही उसे लग रहा था कि कुमार मजाक कर रहा है लेकिन देखते-देखते वह ऊंची पहाड़ी पर चढ़ चुका था उसकी पीठ रानी की तरफ थी पल भर के लिए रानी एकदम से घबरा गई क्योंकि वह यह सब मजाक समझ रही थी लेकिन कुंवर जिस तरह से बर्ताव कर रहा था उसे लगने लगा कि वह सच में अपनी जान दे देगा,,,, इसलिए रानी एकदम तेजी से कुमार की तरफ भागने लगी उसे आवाज देने लगी लेकिन कुंवर सुनने को तैयार नहीं था। कुंवर पहाड़ी से कूदने वाला था की रानी एकदम से उसे पीछे से अपनी बाहों में भर ली,,,,, उसकी सांसे बड़ी तेजी से चल रही थी,,,,, और वह रोते हुए बोली।

मुझे तुम पर पूरा भरोसा है कुंवर लेकिन तुम यह क्या करने जा रहे थे,,,,।

तुम्हें मुझ पर भरोसा ही नहीं था तो मैं क्या करता तुम्हारे बिना जी भी तो नहीं सकता इसलिए जान देने जा रहा था,,,,।

(कुंवर की बात सुनकर रानी एकदम से उसे अपनी तरफ घुमा ली और उसकी आंखों में देखने लगी,,,, और एकदम से अपनी होठों को उसके होठों पर रखकर चुंबन करने लगी कुंवर एकदम से तमतमा गया उसे उम्मीद नहीं थी की रानी इस तरह की हरकत करेगी और उसके जीवन का यह पहला चुंबन था इसलिए वह पूरी तरह से मदहोश हो गया रानी चुंबन करना जानती थी वह चुंबन करते हुए कुंवर के होठों को अपने वोट में लेकर चूसने शुरू कर दी उम्र के तन बदन उत्तेजना की लहर उठने लगी और अपने आप को रोकने की बहुत कोशिश कर रहा था लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसके दोनों हाथ अपने आप ही रानी की कमर के ईर्द गिर्द लिपट गई और वह रानी की कमर को कस के पकड़े हुए वह भी रानी के होठों का रसपान करने लगा,,,,, इन सबके बावजूद भी रानी की आंखों से आंसू गिरे जा रहे थे थोड़ी देर बाद चुंबन करने के बाद दोनों अलग हुए रानी गहरी सांस लेते हुए बोली।)





मैं भी तुम्हारे बिना नहीं की शक्ति कुंवर,,,,।

ओहहह रानी (इतना कहने के साथ ही कुंवर खुद उसे अपनी बाहों में भर लिया और फिर से अपने होठों को उसके होठों पर रखकर रसपान करने लगा,,,,, रानी भी उत्तेजित होने लगी मदहोश होने लगी अपने भाई के बाद वह पहली बार किसी गैर मर्द को इस तरह से अपने बदन को छूने दे रही थी स्पर्श करने दे रही थी उसकी भावनाएं भी बहक रही थी,,,, लेकिन वह अपने आप को रोके रह गई,,,, वह कुंवर के साथ इतनी जल्दी आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी खास करके अपनी तरफ से क्योंकि वह कुंवर को बिल्कुल भी एहसास नहीं करना चाहती थी कि वह पहले भी इस तरह का सुख भोग चुकी है इसलिए वह धीरे से अलग हुई और बोली,,,)

अब हमें चलना चाहिए कहीं ऐसा ना हो की मां मुझे खोजते हुए यहां तक आ जाए।

तुम ठीक कह रही हो रानी,,,,, लेकिन क्या तुम मुझसे मिलने आओगी।

मैं तो आती ही हूं लेकिन तुम नहीं आते।

अब आऊंगा वही नदी के किनारे,,,,।

ठीक है मैं जरूर आऊंगी,,,,,।





(इतना कहकर दोनों फिर से कबड्डी का दंगल देखने के लिए वापस लौट आए वहीं दूसरी तरफ सुनैना की नजर कल्लू पर पड़ी यह वही बदमाश था जो सुनैना की इज्जत लूटना चाहता था सुनैना को सब कुछ याद आ गया और उसे यह भी याद आ गया कि उसके पति कल के साथ ही घूमते हैं। कल्लु को देखते ही सुनैना की आंखें इधर-उधर घूमने लगी क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि अगर कल इधर है तो उसका पति भी आसपास ही होगा लेकिन चारों तरफ नजर घुमा कर देखने के बाद भी उसे अपना पति कहीं नजर नहीं आया यहां तक कि वह चारों तरफ घूम-घूम कर देख रही थी लेकिन उसके पति का वहां कोई पता ठिकाना नहीं था क्योंकि भोला वहां आया ही नहीं था,,,,, तभी सुनैना नहीं देखी कि कल्लु भी उसे ही देख रहा था और उसे देखते हुए राजा साहब के कान में कुछ कह रहा था,,। कल्लु राजा साहब के कान में बोला,,,)

वह देख रहे हो राजा साहब,,(उंगली से सुनैना की तरफ इशारा करते हुए)

कहां,,,,?

वह पीले रंग की साड़ी में जो खड़ी है,,,,,।

वह पेड़ के नीचे,,,(राजा भी उस तरफ देखते हुए)

हां तो,,,,

अरे वह अपने भोला की बीवी है,,,,।

भोला की बीवी है,,,,, दिख तो बहुत सुंदर रही है।

सुंदर नहीं बहुत सुंदर है राजा साहब मैं तो देख चुका हूं,,,,।

मतलब तुम उसकी चुदाई कर चुके हो और मुझे दिखा रहे हो बेवकूफ,,,।





अरे नहीं नहीं आप समझ नहीं रहे हैं मैं उसकी जवानी में उसकी खूबसूरती देख चुका हूं नदी में जब वह नहा रहीथी,,,, बिना कपड़ों के एकदम गोरी बदन पर एक भी दाग नहीं है सच कहूं तो उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर मेरा ईमान डोल गया था लेकिन साली हाथ ही नहीं लगाने दी।

मतलब तीखी मिर्च मसाला है,,,।

धुआ धुआ कर देगी राजा साहब,,,,,।

तब ले आओ कभी मेरे बिस्तर पर हम भी तो देखें की कितनी जवानी भरी है इसके अंदर,,,,।

साली हाथ नहीं आएगी,,,।

कोई जुगाड़ लगाओ कल्लु अब तो मेरा भी खड़ा होने लगा है इसे देखकर,,,,।

जरूर मालिक मेरे हाथ भले नहीं आई लेकिन तुम्हारे बिस्तर पर जरूर लेकर आऊंगा इस साली को बहुत घमंड है अपनी जवानी पर,,,,।





(कल्लु का इस तरह से देखना सुनैना को कुछ समझ में नहीं आ रहा था सुन ना अंदर ही अंदर घबरा रही थी क्योंकि वह जानती थी कि वह पूरी तरह से बदमाश है,,,,, और उसे समझ में नहीं आ रहा था कि भाई इशारा करके राजा साहब को क्या दिखा रहा है। लेकिन तभी दोनों गांव के लोग जोर-जोर से शोर मचाने लगे क्योंकि अब आखरी दांव था,,,,, मुखिया के गांव की हार निश्चित थी। बरसों की बनाई शाख आज मिट्टी में मिलने वाली थी इस बात का गम मुखिया के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था। और यही हाल सूरज के सभी गांव वालों का था वह लोग आपस में बात भी कर रहे थे कि सूरज के पिताजी थे तब तक कभी हार का सामना नहीं करना पड़ा था लेकिन आज यहां से हार कर ही जाना पड़ेगा,,,,, सुनैना मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि उसका बेटा जीत जाए लेकिन हालात देखते हुए उसे भी लग रहा था की जीत नामुमकिन है,,,,,,, राजा साहब बहुत खुश हो रहा था वह बड़ी गौर से खेल को देख रहा था क्योंकि वह जानता था कि आज उसकी जीत है आज उसके गांव का नाम रोशन होने वाला है। मुखिया की बीवी की एकदम शांत हो चुकी थी कोई शोर शराबा नहीं वह शांत होकर खेल को देख रही थी तब तक वही रानी और कुंवर भी आ चुके थे कुंवर अपने दल की तरफ आगे बढ़ गया था और रानी अपनी मां के पास आकर खड़ी हो गई थी लेकिन कुंवर मन ही मन यही चाहता था की जीत सूरज की हो।





सूरज एक बार अपनी मां की तरफ देखा और जैसे आपकी इशारे में उसे कह रहा हूं कि तुम हिम्मत मत हारना मैं जीत कर दिखाऊंगा,,,, और सूरज एक बार धरती को छूकर प्रणाम किया,,, और कबड्डी कबड्डी बोलता हुआ सामने दल में घुस गया सामने पक्ष में भी केवल पांच लोग ही बचे थे सूरज बड़ी चालाकी से इधर-उधर कबड्डी कबड्डी करते हुए उन खिलाड़ियों को छूने की कोशिश कर रहा था लेकिन सभी बच रहे थे किसी की नजर उसकी टांग पर थी तो किसी की हाथ पर कोई पीछे से दबोचना चाहता था तो कोई उसे पर कुछ जाना चाहता था चारों तरफ से सूरज गिर चुका था लेकिन तभी वह एक खिलाड़ी को छूकर अपने दल की तरफ आकर बढ़ाने के लिए भाग तो दूसरे ने उसे पकड़ कर वही गिरा दिया लेकिन फिर भी सूरज कबड्डी बोलता हुआ धीरे-धीरे सरक कर लकीर के करीब आ रहा था,,,, यह देखकर बाकी के सभी लोग उसे पर टूट पड़े और उसे दबोच दिए उसे दबओछ लिए किसी भी तरह से उसे आगे बढ़ने नहीं देना चाहते थे,,,, यह देख कर सुनैना का दिल दहल उठा क्योंकि उसके बेटे के ऊपर पांच लोग ताकत दिखा रहे थे उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह सिर्फ प्रार्थना कर रही थी कि कैसे भी करके सूरज वहां से निकल जाए,,,,,,, सूरज भी पूरी तरह से जीद पर अड़ा हुआ था वह कबड्डी कबड्डी बोलकर अपनी सांस तोड़ने को तैयार नहीं था क्योंकि सांस तोड़ने का मतलब था अपनी हार स्वीकार कर लेना और वह अपनी मां के सामने बिल्कुल भी हारना नहीं चाहता था खास करके तब जब वह पद उसके पिताजी का हो क्योंकि वह हर जगह पर अपना हक जमाना चाहता था जहां पर उसके पिताजी का हाथ था भले ही समझ में हो या घर में इसलिए वह सांस नहीं तोड़ रहा था।





मुखिया और राजा साहब बड़े गौर से खेल को देख रहे थे सबकी सांस अटकी हुई थी राजा साहब को तो पूरा विश्वास था कि सूरज जीतने वाला नहीं है लेकिन फिर भी धीरे-धीरे सूरज आगे बढ़ रहा था। उसका हाथ आगे की तरफ बढ़ रहा था वह धीरे-धीरे सरक रहा था पांच खिलाड़ियों के नीचे दबे होने के बावजूद भी वह अपना दम दिखा रहा था अपनी मर्दानगी दिखा रहा था यह देखकर सूरज के गांव वालों का हौसला बढ़ने लगा वह जोर-जोर से सूरज सूरज कहकर चिल्लाने लगे,,,,,,, गांव वालों का हौसला देखकर सुनैना का भी हौसला बढ़ने लगा और वह जोर-जोर से अपने बेटे का नाम लेकर चिल्लाने लगी सूरज,,,सूरज यह देखकर सूरज में न जाने कहां से इतनी ज्यादा हिम्मत आ गई कि वह एकदम से आगे की तरफ सदका और अपनी हथेली को लकीर पर रख दिया,,,,, और इसी के साथ सूरज के गांव वाले जोर-जोर से चिल्लाने लगे शोर मचाने लगे खुशियां मनाने लगे क्योंकि अपने आप की तरह ही सूरज अपने गांव का नाम रोशन कर दिया था उसे डूबने नहीं दिया था हारने नहीं दिया था उसने अपनी सूझबूझ और अपनी मर्दाना ताकत के बल पर कबड्डी का दंगल जीत गया था एक बार फिर से राजा साहब परास्त हो चुका था। साथी खिलाड़ियों ने सूरज को कंधे पर उठा लिया यह देखकर सुनैना की आंखों में आंसू आ गए वह गदगद हो गई कुंवर भी बहुत खुश था भले ही उसके जीजा की हार हुई थीलेकिन उसका साला जीत गया था। कुंवर अभी से ही रानी के परिवार को अपना परिवार समझने लगा था रानी को अपनी बीवी समझने लगा था उसकी मां को अपनी सास और सूरज को अपना साला समझने लगा था।





वादे के मुताबिक तय की हुई इनाम की रकम सूरज के हाथों में राजा साहब ने खुद दिया और उसे इस जीत की बधाई भी थी लेकिन राजा साहब के चेहरे पर दुख और हार की निराशा साफ दिखाई दे रहीथी,,, मुखिया का सर एक बार फिर से ऊंचा हो गया था इसलिए मुखिया भी खुश होकर सूरज को इनाम दिया और सूरज इनाम लेकर मुखिया की बीवी की तरफ देखने लगा तो मुखिया की बीवी सूरज के इशारे को अच्छी तरह से समझ गई और शर्मा कर वहां से हट गई क्योंकि वह समझ गई थी कि अब सूरज को उसकी गांड देना ही पड़ेगा। पूरे गांव में खुशी का माहौल था गांव वाले बहुत खुश थे क्योंकि एक बार फिर से भोले की तरह भोला के बेटे ने गांव का नाम रख लिया था उसका नाम डूबने नहीं दिया था। इनाम की रकम अपने साथी खिलाड़ियों में बराबर बताकर जो ज्यादा रकम थी वह सूरज अपनी मां के हाथों में थमा दिया उसकी मां बहुत खुश नजर आ रही थी और खुश होते हुए बोली।

मैं तो डर गई थी मुझे लगा ही नहीं था कि तू जीत पाएगा,,,,।

मैं तो डर ही गई थी मुझे लगा कि तू हार जाएगा।

ऐसे कैसे हार जाता आखिरकार बेटा किसका हूं,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना प्रसन्न हो गई सूरज की नजर मुखिया की बीवी को ढूंढ रही थी लेकिन मुखिया की बीवी शर्मा कर वहां से चली गई थी,,,, लेकिन सूरज किस बात की चिंता नहीं थी क्योंकि आज नहीं तो कल मुखिया की बीवी मिलने ही वाली थी,,,,।





दूसरे दिन सोनू की मां बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी क्योंकि सोनू को कबड्डी खेलता हुआ देख कर उसके तन बदन में आग लगी हुई थी खास करके उसका लंगोट देख कर उसकी बुर बार-बार पानी छोड़ रही थी सोनू की मैन किसी भी तरह से अपनी बुर में उसके लंड को लेना चाहती थी,,,, इससे पहले कभी भी उसकी मां इस तरह से मचला नहीं था,,, उसने कभी भी दूसरे मर्दों के बारे में सोची नहीं थे लेकिन सूरज को पेशाब करता हुआ देखकर उसके मोटे तगड़े लंड को देखकर उसकी भावनाएं बहकने लगी थी उसका इरादा बदल चुका था। और खास करके कबड्डी का दंगल देख कर तो उसकी हालत और भी ज्यादा खराब हो गई थी क्योंकि बिना कपड़ों के सूरज को देखकर उसकी मर्दाना ताकत और उसकी भुजाओं का बल देखकर बार-बार उसके तनबदन में सूरज को लेकर गंदे गंदे विचार आ रहे थे लेकिन उनके विचार को लेकर उसके तन बदन में जिस तरह की उत्तेजना का तूफान उठ रहा था उसे वह संभाल नहीं पा रही थी अपने आप पर काबू नहीं कर पा रही थी इसीलिए वह सूरज का इंतजार कर रही थी वह जानती थी कि सूरज रोज इसी रास्ते से आता जाता था,,,, दिन ढलने वाला था शाम होने वाली थी सोनू की मां अपने मन में क्या करना है सब कुछ तय करके रखी थी तभी उसे सामने से सूरज आता हुआ दिखाई दिया सूरज को देखते ही वह अपनी जगह पर बैठ गई और सूरज का इंतजार करने लगी दूर से ही सूरज ने भी सोनू की मां को देख लिया था। उसे दिन सोनू के घर के पीछे जो कुछ भी सोनू की मां ने की थी उसे लेकर उसके दिल में भी सोनू की मां के प्रति गंदे विचार आने शुरू हो गए थे और वह यह जान गया था कि सोनू के मां के मन में क्या चल रहा है इसीलिए वह अभी मौका ही ढूंढ रहा था इसलिए सोनू की मां के पास आते ही वह बोला।





अरे चाची यहां क्या कर रही हो,,,,?

अरे सूरज मैं तेरा इंतजार कर रही थी मेरा मतलब है कि मैं किसी के आने का इंतजार कर रही थी,,,।(एकदम से अपनी बात पर काबू लाते हुए वह बोली,,)

लेकिन क्यों मुझसे कहो मैं आ गया हूं,,,,।

अरे खेत में तो बोरी धान पड़ा है उसे मेरे घर पर लाना था तू तो जानता यह की सोनू के बस का है नहीं,,,,।

(सोनू की मां की बात सुनकर सूरज अपनी मन नहीं बोला कि सोनू के बस का कुछ भी नहीं है,,, सोनू की मां की बात सुनकर वह बोला,,,)

तो चलो मैं चलता हूं,,,,, आखिरकार में किस दिन काम आऊंगा,,,,,।

तब तो बहुत अच्छा है बेटा चल मेरे साथ,,,(इतना कहकर सोनू की मां खुश होते हुए अपनी जगह से ऊठ कर खड़ी हो गई और खेत के अंदर की तरफ जाने लगी लेकिन खेत में जाते समय वह चारों तरफ नजर घूमाकर देख लेना चाहती थी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है लेकिन इस समय कोई देख नहीं रहा था इसलिए वह प्रसन्न होकर खेत के अंदर जाने लगी और पीछे पीछे सूरज भी जाने लगा,,,, सूरज अच्छी तरह से जानता था कि दोबोरी धान उठाने का तो खाली बहाना है,,, लेकिन इसमें सूरज कहीं फायदा था इसलिए सूरज बिना कुछ बोले उसके पीछे-पीछे चल दिया था आगे आगे चलते हुए सोनू की मां खुश होते हुए बोली,,,।





तु मुतने के लिए मेरे घर के पीछे आता है,,,(आगे आगे चलते हुए वह सूरज की तरफ देखे बिना ही बोली)

नहीं चाची ऐसी कोई बात नहीं मैं तो सोनू से मिलने आया था लेकिन तभी मुझे बड़े चोरों की पेशाब लग गई थी और मुझे तुम्हारे घर के पीछे जाना पड़ा,,,(औरतों के मन को सूरज अच्छी तरह से समझता था इसलिए वह समझ गया था कि सोनू की मां के मन में क्या चल रहा है इसलिए वह भी उसी तरह से जवाब दे रहा था और फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बेझिझक बोला,,,) लेकिन मुझे क्या मालूम था कि तुम झाड़ियों में बैठकर पेशाब कर रही होगी,,,,।

(जिस तरह से बिना शर्माए सूरज ने पेशाब करने वाली बात बोला था उसे सुनकर उत्तेजना के मारे सोनू की मां की बुर कचोरी कि तरह फूल गई,,,,, और वह भी बोली,,,)

तो मुझे थोड़ी ना पता था कि तू भी वहां पर आ जाएगा,,, वैसे सच एक बात बताना,,,,

क्या,,,?

कौन से तेल से मालिश करता है,,,,?(इतना कहकर सोनू कि मैं वहीं पर रुक गई क्योंकि खेत के बीच में बनी झोपड़ी भी आ चुकी थी और यही आखरी मंजिल भी थी

(सोनू की मां के कहने के मतलब को सूरज इसी तरह से समझ गया था इसलिए मन ही मन खुश भी हो रहा था लेकिन फिर भी अनजान बनता हुआ बोला)

मैं कुछ समझा नहीं चाची तुम क्या कह रही हो,,,?

अब नादान बनने की कोशिश मत कर तो अच्छी तरह से जानता है कि मैं किस बारे में बात कर रही हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही बिना कुछ आगे बोले सोनू की मन एकदम से पहचाने के ऊपर से ही सूरज के लैंड को पकड़ ली और बोली) मैं इसके बारे में बात कर रही हूं तुझे नहीं लगता कि तेरा कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा है,,,,





सहहहह यह क्या कर रही हो चाची कोई देख लेगा तो गजब हो जाएगा,,,,(सूरज जानबूझकर मस्त होता हुआ इधर-उधर देखते हुए बोला)

बेवकूफ इधर कोई नहीं आने वाला इसलिए तो तुझे इधर लेकर आई हूं,,,,।

मे कुछ समझा नहीं चाची,,,,,!(अनजान बनता हुआ सूरज बोला,,,)

जल्द ही समझ जाएगा,,,,, अब जल्दी से अपना पजामा उतार मैं फिर से तेरे लंड को देखना चाहती हूं,,,,,।

लेकिन क्यों चाची,,,,,(मदहोश होता हुआ और थोड़ा घबराने का नाटक करता हुआ सूरज बोला)

तू उतार तो सही,,,,।

लेकिन चाची यह तो सोनू के पास भी है,,,।

अरे बेवकूफ जो मैं तेरे साथ करने जा रही हूं वह मैं अपने बेटे के साथ नहीं कर सकती।

लेकिन क्या करने जा रही हो,,,?

अभी सब समझ में आ जाएगा,,, जल्दी से उतार,,,,,।

(इतना सुनते ही सूरज ने तुरंत अपने पजामा को नीचे कर दिया और अगले ही पर उसका लहराता हुआ लैंड सोनु की मां की आंखों के सामने अपनी अदाकारी दिखाने लगा,,, सूरज के लंड को देखकर सोनू की मां की हालत एकदम से खराब हो गई वह पागलों की तरह उसके लंड को देखने लगी,,,,, वह एकदम से सूरज के लंड को पकड़ ली उसे रहा नहीं जा रहा था और वह सीधे मुद्दे की बात पर आते हुए बोली,,,)

कभी किसी की चुदाई किया है,,,,,,।अब तुझे इस मेरी बुर में डालना है,,।





(सोनू की मां की बात सुनकर सूरज समझ गया था कि इसने आज तक सिर्फ इतना ही कर दिया यह बस टांगे खोल दिए और अंदर डलवा दिए पूरा मजा इसे मिला नहीं है और सूरज अच्छी तरह से जानता था कि अगर वह इसके सामने नादान बनने की कोशिश में लग रहा तो असली मजा वह ले नहीं पाएगा बस डालकर निकालना ही होगा इसलिए वह बिना कुछ बोले सोनू की मां की बाहों को पकड़ लिया जो कि नीचे बैठ चुकी थी और वह भी अपने घुटनों के पास वह सिर्फ देखने के लिए बैठी थी सूरज को लग रहा था कि शायद वह उसे अपने मुंह में लेकर चूसेगी लेकिन उसकी बात को सुनकर सोनू सब समझ गया था इसलिए वह बिल्कुल भी देर नहीं किया और सोनू की मां को खड़ी करके एकदम से उसकी आंखों में देखते हुए अपने होंठ को उसके होंठ पर रख दिया,,, सोनू की मां एकदम से गनगना गई,,, क्योंकि आज तक किसी ने उसके होठों पर इस तरह से चुंबन नहीं किया था लेकिन सूरज तो उसे अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया था और तुरंत उसे अपनी बाहों में कस के अपने दोनों हथेलियां को सीधा उसके नितंबों पर रखकर जोर-जोर से दबाना शुरू कर दिया था जो की काफी बड़ी थी। सोनू की मां को कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह कुछ समझ पाती से पहले ही वह मदहोश होने लगी सूरज की हरकतों से वह मदहोश होकर मदहोशी के सागर में डुबकी लगाने लगी,,,,। सूरज एक साथ अपनी हरकतें दिख रहा था काम कला में अपनी कलाबाजियां दिख रहा था उसकी हर एक कलाबाजी से सोनू की म मस्त हुई जा रही थी उसे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस मजा ही मजा आ रहा था,,।





कुछ देर तक उसकी बड़ी-बड़ी गांड को अपने हथेली से दबाते हुए मसलते हुए उसे मजा दे रहा था उसके बाद धीरे से उसकी कमर को दोनों हाथों से दबोच कर उसे अपने बदन से और ज्यादा सटा दिया और उसका खड़ा लंड साड़ी के ऊपर से ही उसकी बुर पर दस्तक देने लगा यह सब सोनू की मां के लिए बिल्कुल नया था वह पूरी तरह से पागल हुए जा रही थी साड़ी के ऊपर से ही सूरज के मोटे तगड़े लंड को अपनी बुर पर महसूस करके वह पानी पानी हो रही थी,,,,, सूरज उसे बोलने का मौका ही नहीं दे रहा था क्योंकि लगातार वह उसके होठों का रसपान कर रहा था सोनू की मां भी मस्त बदन वाली थी थोड़ी सी मोटी थी थोड़ा सा पेट निकला हुआ था लेकिन चेहरे का बना कितना खूबसूरत था कि सूरज इस समय उसके लाल-लाल होठों को छोड़ ही नहीं रहा था,,,,, कमर को अच्छी तरह से अपनी हथेलियां में दबोचा रहने के बाद वह एक हाथ ऊपर की तरफ ले आया और ब्लाउज के ऊपर से ही उसकी चूची को दबाना शुरू कर दिया,,,, सोनू की मां एकदम से चुदवासी हो गई थी,,, सूरज को वह नादान समझ रही थी लेकिन वह हैरान थी सूरज की कलाबाजिया देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि सूरज में इस तरह का खेल खेल चुका है लेकिन इस तरह का खेल हुआ पहली बार खेल रही है वह यही सोच रही थी खेत में जाते ही वह सूरज के लंड को अपनी बुर में डलवा कर शांत हो जाएगी लेकिन यहां तो सूरज नहीं उसे पूरी तरह से मस्त करने का मन बना लिया था उसे पूरी तरह से पागल बना रहा था जिसमें सोनू की मां को अत्यधिक आनंद की प्राप्ति हो रही थी।





लाल-लाल होठों का रसपान करते हुए ही सूरज धीरे-धीरे अपने दोनों हाथों से सोनू की मां के ब्लाउज का बटन खोलने शुरू कर दिया सूरज की हरकत से अब सोनू की मां शर्म से पानी पानी हो रही थी उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी आंखों के सामने सूरज खड़ा है जिसे वह नादान समझती थी और जिसके नादानी का वह पूरा फायदा उठा लेना चाहती थी इसीलिए तो वह खेत में लेकर आई थी लेकिन यहां तो सूरज की हरकत को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह खुद उसके भोलेपन का फायदा उठा रहा था लेकिन जो कुछ भी कर रहा था उसमें सोनू की मां को मजा ही आ रहा था अपने हाथों से उसके ब्लाउस को खोलकर तुरंत ब्लाउज को भी उसके बदन से आजाद कर दिया उसकी नंगी बड़ी-बड़ी चुचीया खरबूजे की तरह दिखाई दे रही थी। उम्र के हिसाब की वजह से उसकी चूचियां थोड़ा सा लटक गई थी लेकिन सूरज अच्छी तरह से बेजान चुचीयों में जान डालना जानता था,,,, वह धीरे से अपने होठों के बीच में से सोनू के मां के लाल-लाल होठों को अलग किया और गहरी सांस लेता हुआ सोने की मां की आंखों में देखने लगा सोनू की मां भी सूरज कोई देख रही थी और दोनों की नजर आपस में टकराई तो शर्म के मारे उसकी नजर अपने आप ही नीचे झुक गई,,,, इस शर्म की एक वजह थी क्योंकि वह सूरज को अपना बेटा ही समझते थे क्योंकि वह उसके बेटे के ही उम्र का था लेकिन आज हालात ने उसे मजा लेने के लिए सूरज को ही चुना था इसलिए जब उसे हिसाब सुबह की सूरज तो उसके बेटे के ही उम्र का है उसके बेटे का दोस्त है तो वह शर्म से पानी पानी हो गई लेकिन जो आनंद उसे मिल रहा था अब वह अपने कदम को पीछे नहीं लेना चाहती थी सूरज सोनू की मां की आंखों में देखते हुए बोला।





चाची कसम से तुम्हारी चुचीया कितनी खूबसूरत है।

अब इसमें पहले वाली बात कहां देख नहीं रहा है लटक गई है,,,,(शर्म से नजरे झुकाए हुए ही वह बोली)

इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है चाचा इसमें गलती चाचा की है क्योंकि उन्होंने तुम्हारी जवानी का पूरा लाभ नहीं लिया है इसलिए तुम्हारी चुची की हालत हुई है लेकिन तुम घबराओ मत में अभी तुम्हारी च को एकदम दुरुस्त कर देता हूं तुम खुद अपनी चूची को देखकर शर्मा जाओगी।(और इतना कहने के साथ ही सूरज सोनू की मां की दोनों चूचियों को हाथ में पकड़ कर एक चूची को मुंह में लेकर पीना शुरू कर दिया जैसे ही सूरज ने सोनू की मां की चूची को अपने मुंह में लिया सोनू की मां एकदम से गदगद हो गई,,, क्योंकि उसे अच्छी तरह से याद था की सोनू के पिताजी ने इस तरह से उसकी चूचियों से कभी नहीं खेला था कभी इस तरह से प्यार नहीं किया था बस साड़ी उठाया और डाल दिया और अब तो वह भी करने के लायक नहीं रह गए थे इसीलिए तो इस समय सोनू की मां सूरज की हरकतों से साथी आसमान पर पहुंच चुकी थी सूरज बारी से दोनों चूचियों को मुंह में लेकर पी रहा था दोनों चूचियों को पल भर के लिए भी छोड़ने को तैयार नहीं था,,,, सूरज की मेहनत रंग ला रही थी सोनू की मां की चूचियां धीरे-धीरे उत्तेजना की स्थिति में बढ़ रही थी बड़ी हो रही है थी तन रही थी इसका एहसास सोनू की मां को भी हो रहा था,,,, कुछ देर और दोनों चूचियों को जी भर कर दबाने और चूसने के बाद दोनों हाथों में लेकर सूरज सोनू की मां से बोला।





अब देखो चाची कितनी खूबसूरत लग रही है तुम्हारी च एकदम खरबूजे की तरह गोल-गोल,,,,।

(सूरज की बात सुनकर सोनू की मां शरमाते हुए अपनी छतिया की तरफ देख तो वह भी तंग रह गई वाकई में उसकी चूचियां एकदम गोल हो गई थी एकदम तनी हुई ऐसा लग ही नहीं रहा था कि इनमें जरा भी लटक पन है,,,,, उत्तेजना से गहरी सांस लेते हुए वह सोनू से बोली,,,)

तू तो सच मेंजादूगर है रे आज तक तेरे चाचा ने ऐसा कभी नहीं किया तूने तो मुझे पूरा मस्त कर दिया है।

यह तो मेरा फर्ज है चाचा क्योंकि तुमने मुझ पर भरोसा जो जाते हैं इस भरोसे पर मैं जरूर खरा उतरुंगा,,,(और इतना कहने के साथ हुआ फिर से दोनों चूचियों को मुंह में लेकर पीना शुरू कर दिया इस बीच अपने आप ही सोनू की मां का हाथ नीचे आया और वह सूरज के नंगे लंड को पकड़कर हिलाना शुरू कर दी उसे बहुत मजा आ रहा था,,,, उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि वाकई में असली मर्द सूरज ही है, कल जिस तरह से कबड्डी के दंगल में उसने दमखम दिखाया था उसे देखकर सोनू की मां को पूरा भरोसा था कि आज वह उसकी बुर में पूरी तरह से धमाल मचा देगा। सोनू की मां जिस तरह से सूरज के लंड को पकड़ कर हिला रही थी सूरज से रहा नहीं जा रहा था सूरज तुरंत सोनू की मां की साड़ी को खोलना शुरू कर दिया,,,, और देखते ही देखते वह सूरज की मां की साड़ी को खोलकर एक तरफ रख दिया,,,, इस समय सोनू की मां उसकी आंखों के सामने केवल पेटीकोट में खड़ी थी यह देखकर सूरज गहरी सांस लेता हुआ बोला ,,,,,,,)





चाची यहां कोई आएगा तो नहीं,,,,।

(सोनू की मां समझ गई थी कि सूरज क्या करना चाहता है वह जानती थी कि सूरज उसे पूरी तरह से नंगी करना चाहता है और वह भी यही चाहती थी इसलिए वह अपने मुंह से तो कुछ शर्म तुम्हारी बोल नहीं पाई बस सर हिला कर ना में जवाब दी,,, जिसे सुनकर सूरज का होता एकदम बुलंद हो गया और वह एकदम से अपना हाथ आगे बढ़कर सोनू की मां की पेटिकोट का नारा पकड़ लिया और उसे कर से खींच दिया एकदम से कमर पर कसी हुई पेटिकोट ढीली हो गई,,,,, सोनू की मां की सांस ऊपर नीचे हो रही थी वह उत्तेजना से मरी जा रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस मजा आ रहा था,,,, और अगले ही पल सूरज अपने दोनों हाथों का उपयोग करते हुए कमर पर कई हुई पेटीकोट को अपनी उंगलियों से खींचकर ढीला किया और कमर से ही उसे नीचे की तरफ छोड़ दिया कुछ पल के लिए सोनू की मां का पेटीकोट उसकी बड़ी गांड के सहारे टीका और फिर नीचे उसके कदमों में जाकर ढह गया,,, सोनू की मन एकदम से नंगी हो गई सूरज की आंखों के सामने वह पूरी तरह से नंगी खड़ी थी सोनू की मां शर्म से पानी पानी हो रही थी क्योंकि उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि वह अपने बेटे के दोस्त की आंखों के सामने नंगी थी लेकिन जो मजा सूरज ने दिया था उससे वह मदहोश भी हो गई थी। सोनू की मां को पूरी तरह से नंगी देखने के बाद सूरज मुस्कुराते हुए बोला।)





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बाप रे तुम तो सच में बहुत खूबसूरत हो चाची,,,, मैंने तो आज तक कपड़े उतारने के बाद इतनी खूबसूरत औरत पुरे गांव में नही देखा,,,,।

इसका मतलब तो और भी औरतों के कपड़े उतार चुका है,,,।

तो क्या हो गया चाची आज उसी का नतीजा है कि मैं तुम्हें पूरी तरह से मजा दे रहा हूं,,,,, अंदर खटिया है कि नहीं,,,,(झोपड़ी की तरफ देखते हुए सूरज बोला तो सोनू की मां केवल हां में सर हिला दे और फिर क्या था सूरज तुरंत सोनू की मां को अपनी गोद में उठा लिया यह देखकर सोनु की मा एकदम से घबरा गई लेकिन कुछ बोल नहीं पाई,,,, और सूरज सोनू की मां को गोद में उठाए हुए ही झोपड़ी के अंदर पहचान नहीं लगा उत्तेजना और खुशी के मारा सोनू की मां पूरी तरह से गदगद हुए जा रही थी। जिस तरह से उसने अपनी गोद में उसे उठाया था उसे हैरानी नहीं थी क्योंकि वह सूरज के दमखम को दंगल में देख चुकी थी। अगले ही पल सूरज सोनू की मां को लेकर झोपड़ी में चला गया था और वहां पर उसे झोपड़ी में लिए हुए ही अपने पैर के सहारे से खटिया को नीचे गिरा दिया और खटिया पर सोनू की मां को लेट दिया वह पूरी तरह से नंगी थी और उसकी दोनों टांगें खोलकर जी भरकर उसकी बालों वाली बुर को देखने लगा,,,,, यह देखकर की सूरज उसकी बुर को देख रहा है सोनू की माध्यम से शर्मा गई और अपनी नजरों को दूसरी तरफ घुमा ली,,,,, लेकिन अब शर्माने से कोई फायदा नहीं था अब तो बेशर्म बनने का समय आ गया था और फिर सूरज खटिया के नीचे घुटनों के बल बैठ गया और सोनू की मां की दोनों टांगों को उसकी मोटी मोटी जांघों से पकड़ कर फैलाया,,,,, सोनू की मां को लग रहा था कि सूरज उसे नजर भर कर देख रहा है लेकिन वह नहीं जानती थी कि सूरज क्या करने जा रहा है और अगले एक पल सूरज ने जो हरकत किया उसे देखकर तो सोनू की मां एकदम से मदहोश हो गई एकदम से मस्त हो गई मानव के जैसे उसके बदन में मदहोशी का नशा घुल गया हो आंखों में चार बोतलों का नशा छाया हो,,,, सोनू की मां कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि कोई मर्द औरत के साथ इस तरह की हरकत भी करता होगा क्योंकि उसे आज तक इतना ही मालूम था कि औरत की बुर केवल पेशाब करने के लिए और मर्द का लंड अंदर लेने के लिए ही होता है,,,,, लेकिन यहां तो सूरज में उसे पूरी तरह से चारों खाने चित कर दिया था।





पल भर में ही सूरज सोनू की मां पर छा चुका था उसकी जवानी को अपने कब्जे में कर लिया था सोनू की मां चारपाई की दोनों पाटी को पकड़कर उत्तेजना के हमारे अपने सर को दाएं बाएं पटक रही थी और अपनी जीभ को जितना अंदर हो सकता था उतना अंदर डालकर उसकी मलाई को चाट रहा था। सूरज की मदहोशी पूरी तरह से सोनू की मां को पागल बना रही थी सूरज पागलों की तरह सोनू की मां की बुर की चटाई कर रहा था सोनू की मां सपने में भी नहीं सोची थी कि अपने बेटे की उम्र के लड़के के साथ वह इस तरह से मजा लौटेगी वह तो जिंदगी में वैसे भी मजा लेना भूल ही गई थी अगर सूरज के लंड को अपनी आंखों से ना अच्छी होती तो उसके मन में भी एक काम भावना कभी प्रज्वलित ना होती लेकिन आज वह जीवन के असली सुख को प्राप्त कर रही थी औरत होने के असली सुख को भोग रही थी। सोनू की मां अपना एक हाथ सूरज के सर पर रखकर उसे अपनी बर पैर दबा रही थी क्योंकि उसे भी अब मजा आ रहा था। सूरज भी उसके आनंद को और ज्यादा बढ़ाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़कर उसकी चूची को एक हाथ से पकड़ कर दबा रहा था एक साथ दोनों तरफ से उसे मजा दे रहा था और सोनू की मां दोनों तरफ से मजा ले भी रही थी और दे भी रही थी।





लेकिन सूरज की कलाबाजियों के आगे सोनू की मां ज्यादा देर टिक नहीं पाई उसके बदन में एकदम से सनसनाहट फैलने लगी वह एकदम से मदहोश होने लगी और सूरज के बाल को कस के पकड़ कर अपनी बर पैर दबाते हुए झड़ने लगी उसकी बुर से मदन रस की बौछार होने लगी जिसे सूरज अपनी जीभ से चाट चाट कर अपने गले के अंदर उतार रहा था,,,, सोनू की मां चारों खाने चित थी,,,गहरी गहरी सांस ले रही थी एक बार झड़ने के बाद कुछ देर के लिए उसका शरीर एकदम से सुस्त पड़ गया था लेकिन फिर भी सूरज अपनी हरकत को जारी रखे हुए लगातार उसकी बुर को चाट रहा था क्योंकि वह जानता था कि अभी थोड़ी देर बाद फिर से सोनू की मां चुदवासी हो जाएगी,,,, और ऐसा ही हुआ एक बार फिर से झोपड़ी के अंदर सोनू की मां की गरमा गरम सिसकारियां गुंजने लगी,,,, बिना रुके सूरज एक बार फिर से सोनू की मां को छोड़ने के लिए तैयार कर चुका था सोनू की मन हैरान थी सूरज की मर्दानगी और उसकी कलाबाजिया देखकर एक औरत को खुश करने की कला सूरज अच्छी तरह से जानता था इस बात का एहसास सोनू की मां को हो गया था और वह अपने मन ही मन ही सोच रही थी कि सच में असली मर्द तो सूरज ही है। गहरी गहरी सांस लेते हुए सोनू की मां की खूबसूरती और उसकी जवानी की मादकता और ज्यादा बढ़ गई थी,,,, उसकी बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां उसकी सांसों की गति के साथ ऊपर नीचे हो रही थी जिसे देखकर सूरज की भी हालत खराब हो रही थी एक बार फिर से सोनू की मां को तैयार करने के बाद सूरज धीरे से अपने होठों को सोनू की मां की बुर से अलग कर दिया जो कि उसके मदन रस से पूरी तरह से डूबी हुई थी जिसमें से उसका मदन रस उसके होठों से नीचे टपक रहा था यह देखकर सोनु की मां फिर से शर्मसार हो गई और अपनी नजर को दूसरी तरफ घुमा ली।





सूरज धीरे से उठकर खड़ा हो गया था और अपने पजामा कुर्ता को निकाल कर एकदम से नंगा हो गया था और अपने नंगे लंड को पकड़ कर हिलाते हुए सोनू की मां की तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था। सूरज की हरकत को देखकर सोनू की मां को ऐसा ही लग रहा था कि अब सूरज इसकी बुर में लंड डालेगा लेकिन एक बार फिर से हुआ हैरान थी क्योंकि सूरज उसका हाथ पकड़ कर खटिया पर बैठा दिया था और अपने लंड को सीधा उसके गाल पर रगडना शुरू कर दिया था यह सोनू की मां को काफी मदहोश कर देने वाली हरकत लग रही थी,,,, लेकिन अभी तो सूरज का असली मकसद बाकी था वह धीरे से अपने आलू बुखारे जैसे मोटे सुपाड़े को उसके लाल-लाल होठों पर रगड़ना शुरू कर दिया,,,, और सोनू की मां अपने चेहरे को इधर-उधर घूमने लगी क्योंकि उसे थोड़ा घिन्न आ रहा था,,,,, सूरज समझ गया और धीरे से बोला,,,)

अपने होठों को खोलो चाची,,,,।

(यह सुनकर सोनू की मां एकदम से हैरान हो गई और सूरज की तरफ देखने लगी सूरज सोनू की मां की हैरानी को अच्छी तरह से समझ रहा था और फिर से अपने सुपर को उसके होठों के बीच ले जाने की कोशिश करता हुआ बोला)





इसे चूसो,,,,,(इतना सुनकर सोनू की मां फिर से हैरान हो गई और आश्चर्य से सूरज की तरफ देख रही थी क्योंकि वह नहीं जानती थी की मर्द का लंड मुंह में लेकर चूसा जाता है इसलिए उसकी गलतफहमी को दूर करते हुए सूरज अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,,) देख क्या रही हो इसे मुंह में लेकर चूसो जैसे मैं तुम्हारी बुर को चाटा तो तुम्हें कितना मजा आया,,,,,,।

लेकिन,,,,,(इतना कहने के लिए वह अपने होठों को खोली और मौका देखकर सूरज ने तुरंत अपने सुपाड़े को उसके होठों के बीच रखकर अंदर की तरफ ठेलना शुरू कर दिया,,,,,, सोनू की मां समझ गई थी कि सूरज उससे यह कार्य करवा कर ही रहेगा उसे थोड़ा अजीब लग रहा था लेकिन थोड़ी ही देर में मोटे सुपाड़े को अपने मुंह के अंदर महसूस करके उसे भी मदहोशी छाने लगी,,,, और वह मजे लेकर चूसना शुरू कर दी सूरज एकदम पागल हुआ जा रहा था वह अपनी कमर पर हाथ रखकर और एक हाथ उसके सर पर रखकर अपनी कमर को धीरे-धीरे दिला रहा था यह कार्य सोनू की मां के लिए एकदम नया था लेकिन इस नए कार्य में उसे इतना मजा आने लगा था कि पूछो मत उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि वाकई में इस तरह की भी हरकत मर्द और औरत के बीच होती है,,,, सूरज की हालत खराब हो रही है सोनू की मां भले ही लंड चूसने में नादान थे लेकिन अपनी हरकतों से सूरज को पूरी तरह से पागल बना दे रही थी। सोनू की मां अभी दिल जान से सूरज के लंड को चूस रही थी चाट रही थी उसे अपने गले तक उतार कर मजा ले रही थी और सूरज अपने हाथ को नीचे की तरफ ले जाकर के उसके दोनों खरबुजो को पकड़कर जोर-जोर से दबा रहा था। जिससे सोनू की मां को भी मजा आ रहा था,,,, कुछ देर तक इसी तरह से सूरज सोनू की मां के साथ अपनी मनमानी करता रहा सोनू की मां को एक अद्भुत आनंद देने के प्रयास में लग रहा एक नए अनुभव को पाकर सोनू की मां भी गदगद हो गई थी लेकिन अब समय आ गया था उसकी चुदाई का उसकी नाजुक बुर में अपना मोटा तगड़ा लंड डालकर उसे एहसास कराने का की असली मर्द किसे कहते हैं। इसलिए सूरज सोनू की मां के मुंह में से अपने लंड को धीरे से बाहर निकाला,, लंड के बाहर निकलते ही सोनू की मां का मुंह उसके लाल-लाल होठ गोलाई में बन चुके थे यह देखकर सूरज बोला।





ज्यादा मोटा है ना,,,(उसकी बात सुनकर सोनू की मां फिर से शर्मा गई और कुछ बोल नहीं पाई अगले ही पर सूरज उसकी दोनों टांगों को फैला कर उसे लेटा दिया और फिर अपने मोटे तगड़े लंड को उसके बालों के झुरमुटों में से होते हुए उसके गुलाबी छेद पर अपना सुपाड़ा लगाया,,,, सुपाड़े की गर्मी पाते ही सोनू की मन एकदम से गदगद हो गई वह उतेजना से एकदम से भर गई और अपनी गर्दन उठाकर अपनी नजरों को अपनी दोनों टांगों के बीच स्थिर कर दी और सूरज के लैंड को अपनी बुर में घुसता हुआ देखने लगी,,,,। धीरे-धीरे सूरज की मेहनत रंग ला रही थी सूरज को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि सोनू की मां की बुर में बहुत दिनों से या यूं कह लो की बरसों से कोई लंड घुसा नहीं था और इस बात की तसल्ली करने के लिए सूरज अपने लंड को उसकी बुर में डालने की कोशिश करते हुए बोला,,,)

क्या चाची लग रहा है कि बहुत दिनों से पेलवाई नहीं है।





तु सही समझ रहा है,,,(शर्मा कर अपनी नजरों को दूसरी तरफ करते हुए वह बोली) तेरे चाचा की हालत तो तू देखता ही है मुझे नहीं लगता है कि अब वह मेरी कभी चुदाई कर पाएंगे और वैसे भी घर के कामकाज में इस काम को करने के लिए समय ही नहीं मिलता और ना ही इस तरफ ध्यान ही जाता है जब मजा नहीं आता तो ध्यान कैसे जाएगा)

तुम सच कह रही हो चाची लेकिन अब मैं तुम्हें मिल गया हूं चिंता मत करना अब रात दिन में तुम्हारी बुर की सेवा करूंगा एकदम से फिर से हरी हो जाएगी,,,,(और इतना कहने के साथ ही सूरज कच कचा कर धक्का मारा और उसका आधा लंड सोनू की मां की बुर में घुस गया सोनू की मन एकदम से तड़प उठी क्योंकि वाकई में सुरज का लंड कुछ ज्यादा ही मोटा था लेकिन फिर भी वह अपने दर्द को दबाने के लिए खटिया की पाटी को पकड़ ली यह देखकर सूरज उसे दिलासा देतेहुए बोला,,,)

बस बस चाची हो गया थोड़ा सा और,,,,(और इतना कहने के बाद फिर से दूसरा प्रहार किया इस बार पूरा का पुरा लंड सोनु की मां की बुर में घुसा हुआ था लेकिन इस बार उसका लंड उसके बच्चेदानी से टकरा गया था जिससे उसकी चीख निकल गई थी। सूरज फिर से उसे समझाते हुए बोला,,,)

बस बस हो गया चाची देखो पूरा का पूरा तुम्हारी बुर में घुस गया औरतुम कहती हो ज्यादा लंबा है,,,।

अरे हरामजादी तेरा लंड मेरे बच्चेदानी से टकरा गया ज्यादा लंबा नहीं है तो और क्या है।





तो क्या हुआ चाची मजा भी तो आ रहा है ना,,,, और इतना कहने के साथ ही सूरज सोनू की चाची की चुदाई करना शुरू कर दिया वह उसकी कमर पकड़ कर अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया था उसे चोद रहा था,,,,, सोनू की मन एकदम से हवा में उड़ रही थी उसे बहुत मजा आ रहा था वाकई में उसे यकीन नहीं हो रहा था की चुदाई में इतना ज्यादा मजा आता है वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,, सूरज धीरे-धीरे सोने की मां की चुदाई कर रहा था लेकिन देखते ही देखते वह अपनी रफ्तार को थोड़ा-थोड़ा बढ़ने लगा था क्योंकि उसका लंड बड़े आराम से सोनु की मां की बुर के अंदर बाहर होना शुरू हो गया था सोनू की मां को सूरज के लंड की रगड़ एकदम साफ महसूस हो रही थी बुर की अंदरूनी दीवारें एकदम मदहोश होकर पानी छोड़ रही थी। यह एहसास सोनू की मां के लिए बिल्कुल नया था वह इस पल को पूरी तरह से जी लेना चाहती थी वह अपनी आंखों को खोलकर इस पल का मजा लेना चाहती थी और सूरज भी सोनू की मां को पूरा मत कर देना चाहता था इसलिए सोनू की मां के ऊपर झुक कर उसके लाल-लाल होठों को फिर से अपने होठों में भरकर उसे अपनी बाहों में लेकर धक्का लगना शुरू कर दिया इससे सोनू की मां और भी ज्यादा मतवाली हो गई वह एकदम से मचल रही थी उसका बदन उत्तेजना से थरथरा रहा था। वह कभी सोची नहीं थी कि अपने बेटे की उम्र के लड़के के साथ इस तरह से मजा लुटेगी। यह उसके जीवन का पहला अनुभव है जब वह किसी गैर मर्द के साथ इस तरह से चुदवा रही थी। वह खुशी और उत्तेजना से फुली नहीं समा रही थी वह भी अपने दोनों हाथों को सूरज की नंगी पीठ पर रखकर सहला रही थी उसका उत्साह बढ़ा रही थी और उसके साथ ही उसके नितंबों पर दोनों हथेली रखकर उसे जोर-जोर से दबा भी रही थी।













कुछ देर इसी तरह से चुदाई करने के बाद सोनू की मां का अपनी दूसरी बार निकल चुका था लेकिन सूरज अभी भी बरकरार था इसलिए वह धीरे से अपने लंड को सोनू की मां की बुर से बाहर निकाला और फिर उसे घोड़ी बनने के लिए बोल दिया इतना तो सोनू की मां अच्छी तरह से जानती थी और वह तुरंत घोड़ी बन गई चारपाई के नीचे खड़ा होकर सूरज सोनू की मां की बड़ी-बड़ी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर एक बार फिर से अपने लंड को उसकी बुर में पेल दिया और फिर उसकी कमर पकड़ कर अपनी कमर जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया इस तरह से सोनू की मां को भी अत्यधिक आनंद की प्राप्ति हो रही थी और तकरीबन हर धक्के के साथ उसकी चीख निकल जा रही थी वह कभी ऐसी चुदाई करवाई ही नहीं थी या यूं कह लो कि इस तरह से उसे चोदने वाला कोई था ही नहीं,,,,, हर धक्के के साथ सूरज भी उसकी गांड पर जोर-जोर से चपत लग रहा था देखते ही देखते उसकी गोरी गोरी गांव टमाटर की तरह लाल हो गई थी लेकिन इसका गम सोनू की मां को बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि सूरज उसे दर्द के साथ-साथ मजा भी बहुत दे रहा था,,,, और फिर देखते ही देखते दोनों की सांस ऊपर नीचे होने लगी सोनू की मां का बदन अकड़ने लगा और सूरज उसे पीछे से अपनी बाहों में जकड़ कर झड़ना शुरू कर दिया,,, सोनू की मां और सूरज दोनों एक साथ झड़ रहे थे दोनों पूरी तरह से मस्त हो चुके थे,,,, कुछ देर तक सूरज इस स्थिति में उसके ऊपर ही लेता रहा फिर धीरे से उसके बदन से अलग हुआ झोपड़ी के बाहर देखा तो अंधेरा हो गया था दोनों को यहां आए काफी समय हो गया था सोनू की मां को डर था कि कहीं कोई उसे ढूंढने के लिए ना निकल जाए इसलिए वह जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहने लगी सूरज भी अपने कपड़े पहन कर खेत में कुछ दूर तक साथ में आया और फिर सूरज ही अपना रास्ता बदलकर दूसरी तरफ चला गया था कि इस समय कोई दोनों को एक साथ ना देख ले।



 
कबड्डी का दंगल जितना सूरज के लिए बहुत फायदेमंद सिद्ध हो रहा था। उसकी भुजाओं की ताकत उसकी चपलता और चतुरता देख कर बहुत सी औरतों की टांगों के बीच की पतली दरार में से मदन रस बह चुका था,,, सोनू की मां तो पूरी तरह से सूरज के ऊपर न्योछावर हो गई थी और इसी के चलते वह जल्द ही सूरज को लेकर खेत में घुस गई थी और अपनी मनमानी करके संतुष्ट हो करके वापस अपने घर चली गई थी सूरज भी सोनू की मां की चुदाई करके अपने घर जा चुका था लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था क्योंकि सोनू की मां की चुदाई करने के बाद उसका लंड खड़ा का खड़ा था। इसलिए वह अंधेरा होते ही फिर से सोनू के घर के चक्कर लगा रहा था। दरवाजे पर कोई नहीं दिखा तो वह घर में जाने की सोच लेकिन फिर वह घर के पीछे की तरफ चला गया क्योंकि यह वही समय हो रहा था जब वह पीछे जाकर पेशाब कर रहा था और सोनू की मां अचानक आकर उसका लंड पकड़ ली थी उसे पूरा यकीन था कि सोनू की मां सौच करने के लिए घर के पीछे जरूर जाएगी।





और उसका धैर्य बहुत ही जल्द रंग लाया घर के पीछे हाथ में डब्बा लिए हुए सोनू की मां चली आ रही थी उसे नहीं मालूम था कि घर के पीछे सूरज उसका इंतजार कर रहा है,,,। झाड़ियों के पास आते ही सूरज एकदम से पेड़ के पीछे से बाहर निकाला और उसका हाथ पकड़ कर एकदम से अपने बदन से सटा लिया,,, अंधेरे में सोनू की मां को कुछ दिख नहीं वह एकदम से घबरा गई उसके हाथ में से पानी का डब्बा भी नीचे गिर गया वह चिल्लाने वाली थी कि तभी सूरजउसके मुंह पर अपना हाथ रखकर धीरे से बोला।

क्या कर रही हो चाचा शोर क्यों मचा रही हो मैं हूं,,,।

(इतना सुनकर सोनू की मां की जान में जान आया,,,, सूरज ने धीरे से उसके मुंह पर से हाथ हटाया तो गहरी सांस लेते हुए सोनू की मां बोली)

अरे हरामजादे इस तरह चोर की तरह पकड़ने की क्या जरूरत है बता दिया होता कि मैं हूं,,,, लेकिन तू इस समय यहां क्या कर रहा है?

यह कैसी बात कर रही हो चाची एक जवान लड़का एक खूबसूरत औरत का इंतजार इस समय घर के पीछे क्यों करेगा बताओ तो सही,,,,।

(सूरज की बात सुनकर सोनू की मां के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी और वह मुस्कुराते हुए बोली)

बड़ा बदमाश हो गया है तू मैं तो तुझे एकदम सीधा समझती थी,,, लेकिन तूने अपने सीधे डंडे से मेरी पूरी सोच ही बदल दिया,,,,।

क्यों अब क्या सोचती हो मेरे बारे में,,,।





बड़ा मादरचोद है तु,,,,,(सोनू की मां मुस्कुराते हुए बोली,,,, सोनू की मां के मुंह से अपने लिए मादरचोद शब्द सुनकर सूरज का तन बदन एकदम से गनगना गया,,,, वह मादरचोद के मतलब को अच्छी तरह से समझता था लेकिन फिर भी जानबूझकर सोनू की मां से बोला,,,)

यह मादरचोद का मतलब क्या होता है चाची,,,,

जो अपनी मां को चोदता है,,,(एकदम से गहरी सांस लेते हुए और तुरंत अपना ही कहा था आगे बढ़कर पजामा के ऊपर से ही सूरज के लंड को पकड़ते हुए बोली,,,)

धत्,,,, मैं थोड़ी ना मादरचोद हूं,,,, मैं अपनी मां के बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकता,,,,।

लेकिन मैं भी तो तेरी मां जैसी हूं और तु मेरी चुदाई कर चुका है तो हुआ ना मादरचोद,,,।

तब तो तुम भी छिनार हो,,, क्योंकि अपने पति को छोड़कर मेरा लंड अपनी बुर में लेती हो,,,,,।

(सूरज की बातें सुनकर खास करके अपने लिए छिनार शब्द सुनकर सोनू की मन एकदम से अपने मुंह पर हाथ रख ली और बोली,,,)





हाय दइया,,,, तु सच में एकदम मादरचोद है,,,,रे,,, हरामी तेरे जैसा मोटा तगड़ा लंड अगर हो तो कोई भी औरत छिनार बन जाए,,,(उत्तेजित होते हुए पजामा में हाथ डालकर उसके लंड को पकड़ ली और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली) देखना अगर किसी दिन तेरी मां ने तेरे लंड को देख ली तो होगी तेरे लंड को अपनी बुर में ले लेगी और एकदम से छिनार बन जाएगी,,,,।

(अपनी मां के बारे में गंदी बात सुनकर सूरज पूरी तरह से उत्तेजित हो गया और एकदम से सोनू की मां की कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपने बदन से सटा लिया और एकदम से उसके लाल-लाल होठों को अपने मुंह में भरकर चूसना शुरू कर दिया सोनू कि मां एकदम से मस्त हो गई,,, उसके हथेली का दबाव उसके लंड पर बढ़ता चला जा रहा था,,, दोनों मदहोश हुए जा रहे थे,,,, सोनू की मां शाम को ही सूरज से जमकर चुदवाई थी,, लेकिन अभी भी उसका मन भर नहीं था उसकी बुर से मदन रस टपक रहा था और सूरज अपने हाथ को उसकी कमर से हटकर सीधा उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर रख दिया और उसे अपने लंड से सटा दिया जो कि अभी भी सोनू की मां के हाथ में था सोनू की मां मचल उठी थी उसे अपनी बुर में लेने के लिए,, अगले ही पल सूरज सोनू की मां के होठों को अपने होठों से अलग करके तुरंत उसके ब्लाउज का बटन खोलने लगा उसे ब्लाउज का बटन खोलने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी और अगले ही पल उसकी दोनों नंगी चूचियों को अपने दोनों हाथ में लेकर जोर-जोर से दबाते हुए उसके छुहारे को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया सूरज की ईस हरकत से सोनू की मां एकदम से मस्त हो गई,,, और गहरी गहरी सांस लेने लगी। सूरज बारी-बारी से उसकी खरबूजे जैसी दोनों चुचियों का रस पी रहा था उम्र के हिसाब से ईस समय तो उसमें से दूध निकलने से रहा लेकिन फिर भी सूरज इस तरह से चूस रहा था मानों जैसे अभी भी उसमें से दूध की धार निकल रही हो।





सूरज की हर एक हरकत सोनू की मां के लिए मदहोशी का सबब बन रही थी अपनी पूरी जवानी में उसने इस तरह से मजा नहीं लूटी थी जितना की एक ही दिन में सूरज ने उसे उत्तेजित और मदहोश बना दिया था सोनू की मां खुद अपनी छाती को दाएं बाएं करके उसके मुंह में डाल रही थी और सूरत धीरे-धीरे उसकी साड़ी कमर तक उठाकर उसकी नंगी गांड को अपने दोनों हाथों से मसलना शुरू कर दिया था एक साथ वह सोनू की मां के हर एक अंग से मजा ले रहा था चुचियों पर तो उसका मुंह उलझा हुआ था लेकिन दोनों हाथों की हथेलियां कभी उसकी नंगी गांड तो कभी कमर तो कभी उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार पर घूम रही थी एक साथ सूरज की इतनी सारी हरकतों से सोनू की मां अत्यधिक मदहोश हो गई थी वह अपनी उत्तेजना को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और गहरी गहरी सांस लेते हुए हल्की-हल्की सिसकारी की आवाज भी निकाल रही थी। सूरज उत्तेजना के चलते उसकी चूची को मुंह में भरकर काट भी ले रहा था लेकिन इसका विरोध सोनू की मां बिल्कुल भी नहीं कर रही थी क्योंकि उसे अच्छा ही लग रहा था,,, सोनू की मां की भारी भरकम गांड को अपने दोनों हथेलियां में लेकर दबोचते हुए सूरज अत्यधिक उत्तेजित हो गया था वह जल्द से जल्द अपने लंड को सोनू की मां की बुर में डाल देना चाहता था लेकिन अभी थोड़ा और मजा लेना चाहता था।





इसलिए वह चूचियों को छोड़कर वह दोनों हाथों से उसके कंधों को पकड़ कर नीचे की तरफ बैठाने लगा एक ही बार में सोनू की मां को समझ में आ गया था कि अब उसे क्या करना है,,, शाम की चुसाई से वह भी पूरा मजा ली थी इसलिए बिल्कुल भी देर ना करते हुए वह तुरंत अपने लाल-लाल होठों को खोलकर आलू बुखारे जैसे सूरज के लंड के सुपाड़े को मुंह में भरकर चूसना शुरू कर दी सूरज एकदम से मत हो गया और अपनी आंखों को बंद करके एक हाथ उसके सर पर रखकर अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया,,,, सोनू की मां इस बात से ज्यादा खुश थी कि सूरज जैसा जवान लड़का उसकी जवानी का दीवाना हो गया था तभी तो वह एक बार चुदाई करने के बाद भी इस समय उसे चोदने के लिए ही यहां पर आया था। सोनू की मां सूरज के लंड की अच्छे से चुसाई कर रही थी वह सूरज को पूरी तरह से मस्त कर दी थी,,, उसका मुंह भरा हुआ था और वह जबरदस्ती उसे अपने गले तक उतार ले रही थी मोटे तगड़े लंबे लंड की खुशी उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी उसे तो उम्मीद नहीं थी कि इस उम्र में वह कभी चुदाई का सुख भोग पाएगी लेकिन,,,ईस समय वह अपनी कीस्मत पर ईतरा रही थी,,, क्योंकि वह इस समय एक मोटे तगड़े जवान लंड को अपने मुंह में लेकर चूस रही थी और थोड़ी देर में उसे अपनी बुर में लेने वाली थी। इस उम्र में जहां कामाग्नि शांत हो जाती है वहीं सोनू की मां की कमाग्नि भड़क चुकी थी।





कुछ देर इसी तरह से चुसाई करने के बाद,,, सूरज सोनू की मां को खड़ी किया और फिर से उसकी साड़ी को कमर तक उठा दिया और उसकी एक टांग पकड़ कर खड़े-खड़े उसे अपनी कमर से लपेट लिया,,,, सूरज की हरकत से सोनू की मां गिरते गिरते बची थी लेकिन सूरज से संभाल लिया था उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपने बदन से सटा लिया था और इसी के साथ एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर उसके गुलाबी छेद में डाल दिया था और खड़े-खड़े ही वह उसकी चुदाई करना शुरू कर दिया था इस आसन से सोनू की मन एकदम से मदहोश हो गई थी यह सब कुछ उसके लिए नया-नया था उसने आज तक खड़े-खड़े कभी चुदवाई नहीं थी। लेकिन सूरज धरती उम्र में उसे हर तरह का सुख दे रहा था सूरज का मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर की गहराई को नापते हुए उसके बच्चेदानी पर ठोकर मार रहा था जिसे सोनू की मां एकदम अच्छे से महसूस कर रही थी।

सहहहहह आहहहह,,,,, मेरे राजा तेरा मन नहीं भराक्या,,,?





मन भर गया होता तो यहां क्यों आता खेत में जो तुमने मजा दी थी उसे पाकर मेरा लंड शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था,,, इसीलिए तो तुम्हें चोदने के लिए फिर से यहां आना पड़ा,,,,(ऐसा कहते हुए सूरज जोर-जोर धक्के लगा रहा था और उसके धक्के से मदहोश होती हुई वह प्रसन्न हो रही थी और धीरे से बोली)

तुम मुझे चोदने के लिए मेरे घर तक आ गया तुझे डर नहीं लगता अगर कोई देख लिया तो।

यह कौन देखनेवाला है,,,?

अरे मेरा बेटा सोनू है सोनू की चाची है सोनू के पापा है उसके चाचा है ,कीसी की भी नजर पड़ गई तो गजब हो जाएगा,,,,।

सबको मैं संभाल लूंगा और रही बात सोनू की चाची की तो तुम्हारी तरह उनकी भी चुदाई कर दूंगा।

वह चुदवाएगी तेरे से,,,,?

क्यों नहीं अभी तुम ही तो बोली कि मेरे जैसा मोटा तगड़ा लंड देखकर कोई भी औरत छिनार बन जाएगी,,, तो सोनू की चाची को भी दिखा दूंगा वह भी तुम्हारी तरह टांग उठा कर लेना शुरू कर देगी।

साल पक्का बदमाश हो गया है तू,,,,,आहहहहह,, थोड़ा धीरे कर जोश में होश खो देता है।

क्या करूं चाचा तुम्हारी बुर इस उम्र में भी इतनी कसी हुई और गर्म है कि पूछो मत लगता ही नहीं कि इसमें से सोनू निकला है,,।





धत् बदमाश कहीं का,,,(सूरज की बात सुनकर वह एकदम से शर्मा गई,,, और अगले ही पल सूरज,, अपने लंड को उसकी बुर में से बाहर निकाल लिया सोनू की मां कुछ समझ पाती ईससे पहले ही, वह तुरंत उसे घूमाकर झुका दिया और घोड़ी बना दिया और पीछे से उसकी चुदाई करना शुरू कर दिया,,,,, दोनों पूरी तरह से मत हो चुके थे। सूरज ताबड़तोड़ धक्के पर धक्के लगा रहा था और देखते ही देखते दोनों झड़ने लगे,,,,, और जैसे ही सूरज ने अपने लंड को उसकी बुर में से बाहर निकाला वैसे ही उसके कानों में आवाज आई,,,,।

कौन है वहां,,,, कौन है,,,, जल्दी बताओ नहीं तो मैं शोर मचा दूंगा,,,,,

(सूरज और वह दोनों एकदम से घबरा गए क्योंकि आवाज सोनू की थी सोनू 5 मीटर की दूरी पर ही उन्हें देखकर जोर-जोर से बोल रहा था सोनू की मन एकदम से अपनी साड़ी को कमर से नीचे गिरा दी और अपने कपड़ों को व्यवस्थित करने लगी दूसरी तरफ मुंह करके वह अपने ब्लाउज का बटन जल्दी-जल्दी से बंद करने लगी,,, सूरज भी जल्दी से अपने पजामे को ऊपर कर लिया,,,ओर वह भी जोर से बोला,,,)

कौन है,,,,?





अरे सूरज तू मैं सोनू हूं लेकिन तू यहां क्या कर रहा है,,,?(सूरज की आवाज पहचान कर सोनू वही खड़ा खड़ा ही बोला,,,)

यार पहले तो यह बात की इतनी जोर से क्यों चल रहा है ऐसा चल रहा है कि जैसे हम लोग चोर हैं,,,,, मैं तो यहां चाची का झुमका ढूंढने के लिए आया था।

चाची कौन चाची,,,,?

तेरी मां बेवकूफ,,,,,,

ओहहह तो यह मां है,,,,,।(सोनू की मां एकदम घबराई हुई थी,,,, और घबराहट भरे स्वर में बोली)

हां हां मैं हूं सोनू बेटा,,, मेरा झुमका गिर गया था वही ढूंढ रही थी,,,,।

Sonu ki ma Suraj ko mast karti huyi





सोनू तू सच में बेवकूफ है तेरी मां इतने दिन से परेशान है और तू है कि उनका झुमका भी नहीं ढूंढ पाया,,,,,।

लेकिन खोया कब ये तो मुझे मालूम ही नहीं है,,,,(चलता हुआ सूरज की तरफ आते हुए सोनू बोला)

अरे उस दिन जब मैं पीछे पेशाब करने के लिए आया था और चाचा यही मिल गई थी तभी उनका झुमका यही गिर गया था मुझे जब बोली तो मुझे थोड़ा-थोड़ा याद आया और मुझे लगा यही होगा तभी हम दोनों यही ढूंढ रहे थे और,,,

मिला क्या झुमका,,,,?

हां मिल गया मैं सफल हो गई मैं तो चाची से कह रहा था कि अब खीर पूरी खिलाओ इतनी कीमती चीज जो मैंने ढूंढ कर दे दिया हूं।

अरे हां रे,,,, तू तो खीर पुरी के लिए ही मरा जा रहा है अगरिया झुमका मुझे नहीं मिलता तो शायद मैं मर जाती,,,, तुझे जरूर खीर पूरी खिलाऊंगी बस,,,,(सोनू की मां भी एकदम से सहज होते हुए नाटक करते हुए बोली,,,, अब सूरज का वहां रुकना उचित नहीं था,,,, वह तो अच्छी तरह से जानता था कि सोनू बेवकूफ है इसलिए उसे बेवकूफ बना दिया अगर उसकी जगह कोई और होता तो उसे पढ़ते देर नहीं लगती की हम दोनों यहां क्या कर रहे हैं इसलिए वह बोला)

चलो ठीक है किसी दिन आऊंगा तब खीर पुरी बनाना अभी तो मुझे घर जाना पड़ेगा,,,,।

Sonu ki ma





चल कोई बात नहीं,,,, जिस दिन तेरे पास समय हो उसे दिन बताना मैं खीर पूरी अपने हाथों से बना कर खिला दूंगी बस सोनू और तेरे में मेरे लिए कोई फर्क नहीं है जैसा सोनू वैसा तू,,,,,(अपनी मां की बात सुनकर सोनू खुश हो रहा था उसे नहीं मालूम था कि उसके पीठ पीछे सूरज उसकी मां की चुदाई कर चुका था,,,,, सूरज मुस्कुराता हुआ वहां से निकल गया सोनू की मां भी राहत की सांस लेते हुए अपने बेटे को लेकर घर में आ गई,,,,

सूरज घर पहुंचा तो खाना बनकर तैयार हो चुका था। तीनों साथ में बैठकर खाना खाए और फिर तीनों अपने कमरे में चले गए सुनैना की आंखों के सामने उसके बेटे का कसरती बदन ही घूम रहा था,,, बार-बार वही दृश्य सामने आ रहा था जब वह कबड्डी में पूरा दमखम लगा रहा था उसका कसरती बदन चौड़ी छाती मोती जांघें यह सब सुनैना के मन को विचलित कर रहे थे वह मदहोश हो रही थी और फिर उसकी वह बातें जो उसने अपने पिता के बारे में बताई थी यह सब याद करके सुनैना का मन कभी उदास हो जा रहा था तो कभी मदहोश हो जाना था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या हो रहा है लेकिन इतना तो उसे एहसास हो रहा था कि उसका झुकाव उसके बेटे के प्रति बढ़ता जा रहा था। यह सब सोचकर उसके बदन में सुरूर छा रहा था। उसकी सांसे गहरी हो रही थी और टांगों के बीच थरथराहट बढ़ रही थी और रोज की तरह वह फिर से अपनी उंगली का सहारा लेकर अपने आप को शांत करके सो गई।

सुबह उठकर वह झाड़ू लगाने लगी,,,, तभी सूरज भी अपने कमरे से उठकर बाहर आ गया,,, अपनी मां का भारी भरकम पिछवाड़ा देखकर जो की झुकने की वजह से कुछ ज्यादा उभरा हुआ दिखाई दे रहा था उसे देखकर वही खटिया पर बैठ गया और पास में ही पड़ा पानी का लोटा उठाकर पीने लगा यह देखकर सुनैना मुस्कुराते हुए बोली,,,।

उठ गया तू,,,,।

हां,,,,,,

Suraj or sonu ki ma





पूरे गांव में बस तेरी ही चर्चा हो रही है जहां जा रही हूं बस तेरी ही बातें हो रही है।

मेरी बातें,,,!

हां तेरी बातें कबड्डी के दंगल में जो तूने कमाल दिखाया है वह पूरी तरह से सबको अचंभित कर दिया है दूसरों का क्या कहूं मैं खुद ही हैरान हो गई थी तेरी कलाबाजी देखकर मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि तू कबड्डी का दंगल जीत जाएगा। लेकिन जिस तरह से तूने पासा पलटा था उसे देखकर तो मै हैरान हो गई थी,,,,।

तुम्हें मजा आया ना,,,।

बहुत और मुझे तुझ पर गर्व भी है मुझे तो लगा था कि गांव की नाक कट जाएगी लेकिन तूने इज्जत बचालिया,,,।

(अपनी मां को खुश देखकर सूरज बहुत खुश हो रहा था और वैसे भी उसने कबड्डी के दंगल को सबसे ज्यादा अपनी मां के लिए जीता था वह अपनी मां की नजर में पूरी तरह से उसके बाबूजी की जगह ले लेना चाहता था और अपनी मां को खुश देखकर उसे ऐसा लग रहा था कि जल्द ही उसे वह सुख मिलने वाला है जो सुख उसकी मां उसके पिताजी को देती थी,,, पानी पीने के बाद लोटे को नीचे रखते हुए वह बोला,,,)





आज तो खेत में थोड़ा ही काम बचा है ,,,,, आज तुम नहीं जाओगी तो भी चलेगा मैं पूरा काम कर लूंगा। (ऐसा कहकर सूरज देखना चाहता था कि उसकी मां का झोका उसकी तरफ है कि नहीं और जैसे ही सूरज की यह बात वह सुनी वह तुरंत बोली)

नहीं नहीं मैं भी चलूंगी,,,,, तू अकेला थक जाएगा,,,,।

मैं कभी थकता नहीं चाहे जैसा भी काम हो,,,,

(अपने बेटे की बात सुनकर वह एकदम से खुश होते हुए बोली,,,)

बेटा किसका है पूरा मर्द बन चुका है,,,,(ऐसा कहते हुए वह सूरज के करीब गई और उसके सर पर हाथ फेर कर दुलार करने लगी लेकिन सूरज की नजर एकदम से अपनी मां की गोल गहरी नाभी पर चली गई जिसे वह प्यासी नजरों से देख रहा था उसका मन कर रहा था इसी समय अपनी चीभ उसमें डालकर उसकी चटाई कर दुं,,,,, सुनैना की भी नजर अपने बेटे की नजर पर पड़ी तो एकदम से शर्मा गई लेकिन अपने बेटे के सामने वह साड़ी से अपनी नाभि ढकने में हिचकीचा रही थी क्योंकि ऐसा करने पर उसका बेटा समझ जाएगा कि उसकी मां साड़ी से अपनी नाभि क्यों ढक रही है,,,। इसलिए वह शर्म के मारे साड़ी से अपने नाभि को ढक नहीं पाई और सूरज प्यासी नजरों से उसे देखता ही रह गया और सुनैना की टांगों के बीच सुरसुराहट होने लगी,,,,, अपने ध्यान को दूसरी तरफ करते हुए सुनैना बोली,,,)

Sonu ki ma kuch is tarah se





तूने अपने पिताजी का नाम रोशन कर दिया,,,।

पिताजी का नहीं तुम्हारा जो पिता दूसरी औरत के चक्कर में अपना परिवार छोड़कर चला गया हो उसे में पिता नहीं मानता मैंने जो कुछ भी किया तुम्हारे लिए किया,,,, और तुम भी बहुत दयालु बनती जा रही हो इतना कुछ सहने के बाद भी अभी भी तुम्हारा ध्यान पिताजी पर है,,,,, और अपनी सौतन के बेटे को ही समोसे खिला रही थी,,,,(सूरज को एकदम से कमल की याद आ गई जो बाजार में मिली थी और उसके बारे में उसने अभी तक अपनी मां से कोई जिक्र नहीं किया था अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना भी एकदम से हैरान हो गई और वह बोली)

सौतन के बेटे समोसे में कुछ समझी नहीं तु यह क्या कह रहा है,,,,।

लो अब तुम कहोगी कि मुझे कुछ याद भी नहीं है,,,, मुझे तो लगता है कि अगर पिताजी वापस आ गए थे तुम उनकी गलतियों को माफ करके फिर से उन्हें अपना लोगी,,,,।

यह तु कैसी बातें कर रहा है सूरज लेकिन यह तो बता कि मैंने कब किसे समोसे खिलाएं,,,।

भूल गई बाजार में जब हम दोनों बैठकर समोसे खा रहे थे तभी तो बच्चे वहीं खड़े थे तुमने उन्हें भी समोसे और जलेबी खरीद कर दी थी खाने के लिए फिर उसके बाद एक औरत आई थी पता है जिसके वह दोनों बच्चे थे मैं तो भूल गया था लेकिन एक मुझे याद आ गया कि वह औरत ही कमल है जिसके साथ पिताजी मजे कर रहे थे और उसी के चक्कर में अपना परिवार भूलकर उसका घर बसा लिए हैं,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना एकदम से कुछ याद करने लगी और उसे सब कुछ याद आने लगा उसे याद आ गया कि वाकई में बाजार में उसके पास ही दो बच्चे खड़े थे जिसे वह समोसे और जलेबी दिलाई थी और तभी एक औरत उनके पास आई थी और मुस्कुरा कर उन दोनों बच्चों को लेकर वहां से चली गई थी,,,, वह एकदम से सूरज से बोली,,,)





हां मुझे याद आ गया बाजार में मैं उन बच्चों को समोसे दी थी खाने के लिए और उन्हें एक औरत लेकर चली गईथी,,,।

तो,,,, याद आ गया ना सब कुछ औरत कोई और नहीं तुम्हारे पति की दूसरी बीवी है मतलब कि तुम्हारी सौतन,,,,, और सामाजिक भाषा में कहा जाए तो मेरी सौतेली मां,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना एकदम से तड़प उठी यह सब सूरज जानबूझकर कह रहा था क्योंकि वह किसी भी तरह से अपनी मां के मन में से अपने बाबूजी की छवि को पूरी तरह से खराब कर देना चाहता था,,,,)

तो वह औरत वही थी जिसने मेरी जिंदगी खराब कर दी वह बच्चे उसी के थे जिनके चलते वह अपने बच्चों को भूल गए,,,,।

उसे औरतें तुम्हारी जिंदगी खराब नहीं की बल्कि तुम्हारे पति ने खुद तुम्हारी जिंदगी खराब कर दी क्या कमी थी उन्हें उससे भी ज्यादा खूबसूरत तो तुम हो फिर भी न जाने क्यों कौन से शराब के नशे में उस औरत के दीवाने हो गए।





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तूने मुझे यह बात उसी समय क्यों नहीं बताया,,,?

मैं खुद हैरान हूं उसे देखकर मुझे लगी रहा था कि मैं उसे कहीं देखा हूं लेकिन आज अचानक कि मुझे याद आ गया कि वह वही औरत थी जिसे वह गोदाम में देखा था कल्लू और पिताजी के साथ,,,,,, गोदाम थोड़ा दूर है नहीं तो मैं तुम्हें वही ले चला अपनी आंखों से तुम देख लेती तब तुम्हें यकीन होता कि पिताजी कितने बदल गए हैं कितने निर्लज हो गए हैं।

अगर सूरज तो मुझे वही बता देता मैं वही उसकी चोटी पकड़ कर बहुत मारती,,,,।

उसे मारने से कोई फायदा नहीं है बल्कि समाज में और ज्यादा अपनी ही बदनामी हो जाएगी जिसे नहीं मालूम है उसे भी पता चल जाएगा कि आखिरकार माजरा क्या है क्योंकि गांव वाले तो यही समझते हैं कि पिताजी कहीं कमाने चले गए हैं उन्हें क्या मालूम की दूसरी औरत के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे हैं,,,।

सूरज मुझे वहां ले चल मैं अपनी आंखों से देखना चाहती हूं उसे हरामजादे के करतूत को मैं उसे निर्लज से अपना सारा रिश्ता तोड़ लेना चाहती हूं,,,,।

(अपनी मां के मुंह से अपने पिताजी के लिए इस तरह की बातें सुनकर सूरज मैन ही मन खुश हो रहा था और वह अपनी मां से बोला)





जरूर ले चलूंगा पूरी तरह से पता चल जाएगी रात को वह लोग वही ठहरते हैं तो हमें तुम्हें जरूर ले चलूंगा,,,,,(यह सब सुनकर सुनैना एकदम से रोने लगी और अपने बेटे से लिपट गई सूरज अभी भी खटिया पर बैठा हुआ था और वह खड़ी थी सूरज अपनी मां को शांत बना देने के बहाने अपने दोनों हाथों को उसकी कमर पर रख दिया था कमर की चिकनाहट उसे उत्तेजित कर रही थी,,,,, और उसे शांत कराते हुए कब उसकी दोनों हथेलियां उसके नितंबों पर आ गई यह सुनैना को पता ही नहीं चला वह तो तब उसे एहसास हुआ जब सूरज हल्के से उसके नितंबों को दबाने लगा,,,, सुनैना को भी यह अच्छा लग रहा था वह मदहोश हो रही थी लेकिन इस बात का डर उसके मन में था की कहीं रानी यह सब देखना ले इसलिए वह धीरे से अलग हो गई,,,,,,।

इसके बाद वह खाना बनाने लगी नहाने का मन उसका बिल्कुल भी नहीं था और मां बेटे दोनों खाना लेकर खेत पर पहुंच गए।
 
आज खेत पर काम बहुत कम था और आज काम का आखिरी दिन भी था आज फसल की कटाई पूरी तरह से हो जानी थी। इसलिए मां बेटे दोनों निश्चिंत थे। अभी सुबह-सुबह जो कुछ भी घर में हुआ था उसका एहसास सुनैना के तन-बड़े उत्तेजना की लहर उठा रहा था इतना तो उसे समझ में आ गया था कि उसका बेटा उसमें एक औरत को तलाशता था,,, क्योंकि यह दोनों के रिश्ते को देखते हुए अच्छी बात नहीं थी तो उनके बीच पवित्र रिश्ता था मां बेटे का लेकिन सूरज की हरकत बेटे वाली बिल्कुल भी नहीं थी। लेकिन फिर भी सुनैना को न जाने क्यों यह सब अच्छा लग रहा था उसका बात बात में बदन का स्पर्श कर लेना इस तरह की बातें करना जो एक प्रेमी और प्रेमिका के बीच या तो पति और पत्नी के बीच होती है इस तरह की बातें सुनैना के तन बदन में अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी।





सुनैना को ईस बात का एहसास अच्छी तरह से था कि उसके जीवन में ऐसे पर बहुत बार आए थे जब उसका बेटा उसे शांत बना या दुलार करने के बहाने अपनी हथेलियां को उसकी कमर पर रख देता था और कमर पर से फिसलती हुई उसकी हथेलियां कब उसके नितंबों पर चली जाती थी यह पता ही नहीं चलता था,,, लेकिन उसकी हरकत पर एक अजीब सी खुमारी उसके तन बदन में छा जाती जिसका एहसास सुनैना को मदहोश बना देता था कुछ पल के लिए सुनैना सब कुछ भूल जाती थी लेकिन एक मां होने के नाते जल्द ही वह इस एहसास से बाहर आ जाती थी। लेकिन कितने दिन तक वह अपने आप को संभाल पाती यह सवाल उसके जेहन मैं हमेशा घूमता रहता था और यह सवाल उसे कुछ ज्यादा ही परेशान करता था क्योंकि वह जानती थी कि जिस तरह की हरकत उसका बेटा उसके साथ कर रहा था वह अपनी भावनाओं पर ज्यादा देर तक काबू नहीं कर पाएगी इसका एक कारण यह भी था कि वह अपने पति से दूर थी और पति से दूर हुए महीनों गुजर चुके थे। यह उसके जीवन का प्रमुख कारण था कि वह किसी भी पाल भावनाओं में बेहतर मां बेटे के पवित्र रिश्ते को अपने हाथों से कलंकित कर सकती थी क्योंकि इसमें भी उसे सुख मिलने वाला था वह सुख जो उसे अपने पति से मिलता आ रहा था। फिर भी वह जितना हो सकता था अपने आप को बचाने की कोशिश करती थी।





मां बेटे दोनों खेत पर पहुंच चुके थे। थोड़ी सी ही फसल रह गई थी लगभग लगभग दोपहर तक का काम था,,, दोनों आराम से फसल की कटाई कर रहे थे। सूरज बहुत खुश नजर आ रहा था क्योंकि लगभग लगभग उसने अपनी मां के सामने अपने मन की बात जाहिर कर दिया था और सूरज को यकीन था कि इतने से उसकी मां को समझ जाना चाहिए था कि वह क्या चाहता है और उसे किस चीज की जरूरत है। घर से निकलते समय भी उसने अपनी मां के लिए तंबू पर हाथ रखकर हल्का दबाव देकर अपनी इच्छा जाहिर कर दिया था जिसका एहसास उसकी मां को अच्छी तरह से हो गया होगा सूरज इस बात को अच्छी तरह से जानता था। और उसकी हरकतों का उसकी मां बिल्कुल भी ऐतराज नहीं कर रही थी ,इसलिए तो सूरज बहुत खुश नजर आ रहा था उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे और उसे पूरा यकीन था कि वह जरूर विजय प्राप्त करेगा। वह धीरे-धीरे फसल की कटाई कर रहा था बार-बार अपनी मां की तरह देख भी ले रहा था जो झुक कर फसल काट रही थी और उसकी इस स्थिति में सूरज की नजर बार-बार उसके घेराव दार नितंबों पर चली जा रही थी। और अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर बार-बार उसकी हालत खराब हो जा रही थी जिसका असर सीधा उसके लंड पर पड़ रहा था। सुनैना भी चोर नजरों से अपने बेटे की तरफ देख ले रही थी,, अपने बेटे के मुंह से अपने पति की बेवफाई की कहानी सुनकर कुछ-कुछ उसका हृदय परिवर्तन होने लगा था उसका झुकाव अपने बेटे की तरफ बढ़ने लगा था। अपने आप की काली करतूतों को जो उसने खुले शब्दों में बयां किया था उसे सुनकर जहां एक तरफ उसे अपने पति से घ्रणा होने लगी थी नफरत होने लगी थी वहीं दूसरी तरफ उसके असली शब्दों का ऐसा जादू छा रहा था कि उसकी खुद की बुर पानी छोड़ने लगी थी,,, उसे एहसास होने लगा था कि उसका बेटा वाकई में पूरी तरह से मर्द बन चुका था।





दोनों में चोरी छिपे ताका झांकी चल रही थी,,, दोनों अपना अपना काम कर रहे थे,,, धीरे-धीरे दोपहर हो गई और फसल की कटाई लगभग खत्म हो गई फसल की कटाई खत्म होने से वह दोनों काफी खुश नजर आ रहे थे। दोनों के खाना खाने का समय हो चुका था वह दोनों पेड़ की छांव के नीचे चारपाई पर बैठ गए,,, गर्मी का महीना होने से दोनों पसीने से तार बताते थे लेकिन हवा चल रही थी जिस पेड़ की छांव में उन्हें ठंडक महसूस हो रही थी,,,, रोटी और सब्जी खाते समय सूरज बात की शुरुआत करते हुए बोला।

अब तो तुम्हें राहत मिल जाएगी,,,

क्यों,,,?

काम जो खत्म हो गया है,,।

इसमें राहत वाली बात थोड़ी ना है काम मिलता रहता है तो पैसे भी बनते रहते हैं।

तुम उसकी चिंता मत करो मां मैं हूं ना सब संभाल लूंगा,,, ।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुनैना को काफी राहत महसूस होती थी,,, उसे इस तरह से दिलासा देना अच्छा लगता था। दोनों के बीच इसी तरह से बातचीत का दौर शुरू हो चुका था लेकिन इस बीच सुनैना इस बात का अनुभव कर रही थी कि उसके बेटे की नजर बार-बार उसकी दोनों गोलाईयों पर चली जा रही थी और उसकी ऐसी नजर से वह अपने आप को बेहद असहज महसूस कर रही थी वह अपने बेटे से नजर नहीं मिला पा रही थी,,,, जैसे तैसे करके उन दोनों ने खाना खत्म किया घर जाने का समय था लेकिन सूरज का जाने का मन नहीं कर रहा था मां बेटे दोनों चारपाई से नीचे उतर कर पानी पीने के लिए ट्यूबवेल के पास आए,,,, पानी के लिए बनी टंकी में पानी बिल्कुल भी नहीं था यह देखकर सूरज का दिमाग बड़ी तेजी से चलने लगा। इतनी तेज धूप में गर्मी को देखते हुए वह अपनी मां से तुरंत बोला।





गर्मी बहुत है क्यों ना नहा लिया जाए,,,,,।

यहां पर,, (हैरान होते हुए )

हां तो क्या हुआ,,,, आज तो तुम घर पर नही भी नहीं हो यहीं पर नहा लो,,,,

पागल हो गया है क्या यहां पर कैसे नहा लु कपड़े भी तो नहीं लाई हूं,,,,।

इसमें क्या हो गया यहां पर कोई देखने वाला भी तो नहीं है यहां पर तुम आराम से नहा सकती हो,,,, (इतना कहने के साथ ही वहां टूटी हुई झोपड़ी में चला गया जहां पर ट्यूबवेल की मशीन लगी हुई थी ,, सूरज को पूरा यकीन था कि उसकी मां जरूर नहाएगी भले ही समय उसके मन में कुछ और चल रहा हूं लेकिन वह अच्छी तरह से जानता था कि वह नहाने के लिए भी तैयार हो जाएगी इसलिए वह अपनी मां का जवाब सुन कि नहीं झोपड़ी में मशीन चालू करने के लिए चला गया था,,,, और सूरज ने मशीन चालू भी कर दिया था देखते ही देखते पाइप में से पानी निकालना शुरू हो गया था और पानी की टंकी भरने लगी थी,,, सूरज झोपड़ी में से बाहर आ गया था उसकी मां सूरज को ही देख रही थी सूरज अपनी मां के सामने ही अपना कुर्ता निकाल दिया था और उसे एक तरफ रख दिया था गुस्सा निकालते हैं इसकी चौड़ी छाती एकदम से दिखाई देने लगी जिसे देखते ही सुनैना के तन बदन में अजीब सी लहर उठने लगी,,,,, सूरज पानी की टंकी के करीब आया और बोला,,,)





मुझे तो बहुत गर्मी लग रही है मैं जा रहा हूं नहाने,,,,, (और इतना कहने के साथ ही वह पानी के टंकी में कूद गया और नहाने लगा पानी बहुत ठंडा था और इसे गर्मी में सूरज को राहत पहुंचा रहा था,,, सूरज अपनी मां की आंखों के सामने ही पानी में नहाने का मजा लूट रहा था और इस तरह से बर्ताव कर रहा था कि वाकई में उसे कुछ ज्यादा मजा आ रहा था वह बार-बार अपनी मां को उकसा रहा था नहाने के लिए और अपनी मां पर पानी की बौछार मारते हुए बोला,,,)

आ जाओ ना मां खड़ी क्यों हो बहुत अच्छा लग रहा है,,,,।

(वैसे तो इतनी तेज गर्मी में सुनैना कभी मन नहाने को कर रहा था लेकिन एक ही टंकी में वह अपने बेटे के साथ कैसे नहा सकती थी यही सवाल उसके मन में घूम रहा था इसलिए वह अपने बेटे से बोली,,,)

एक ही टंकी में भला में कैसे नहा सकती हूं,,,।

क्या बात तुम भी इस तरह की बातें करती हो या हम दोनों के शिवा देखने वाला है ही कौन डरो मत आ जाओ,,,,, आखिरकार नहाना ही तो है कुछ और थोड़ी ना करना है जो घबरा रही हो,,,, (इस तरह की बात सूरज जानबूझकर अपनी मां से बोल रहा था,,, और उसकी मां भी अपने बेटे के खाने के मतलब को समझ गई थी इसलिए शर्म से उसके गाल लाल हो चुके थे,,, कुछ और थोड़ी ना करना है इसके मतलब को वह अच्छी तरह से समझ रही थी,,,, सुनैना कभी मन नहाने को कर रहा था खास करके अपने बेटे के साथ एक ही टंकी में घुस कर,, यह अनुभव उसके लिए बेहद नया होने वाला था और वह इस अनुभव को महसूस करना चाहती थी लेकिन फिर भी वह शर्मा रही थी कुछ देर यूं ही खड़े रहने के बाद जब उसके बेटे ने फिर से अपनी मां से बोला,,,,)





आ जाओ ना शर्मा क्यों रही हो,,,, (ट्यूबवेल की पाइप के नीचे खड़े होकर जिसकी वजह से पानी किधर एकदम उसके सर पर गिर रही थी और उसे बहुत आनंद आ रहा था वह अपनी मां को नहाने के लिए उकसा रहा था अपने बेटे को आनंदित होता हुआ देखकर सुनैना का भी मन नहाने को कर रहा था पर जैसे ही उसके बेटे ने यह बात बोला वह तुरंत बोली)

लेकिन कपड़े,,,,?

निकाल दो यहां देखने वाला कौन है,,,,(सूरज शरारती अंदाज में एकदम हंसते हुए बोला तो उसकी मां शर्म से पानी पानी हो गई और वह थोड़ा जानबूझकर गुस्सा दिखाते हुए बोली)

धत् हारामी तुझे शर्म नहीं आती इस तरह की बात करते हुए,,,,।

अरे अब मैं क्या बोलूं तुम पूछ ही रही हो ऐसे सवाल तो मैं क्या जवाब दूं,,,,, तुम्हें तो खुद कैसे नहाना है समझ जाना चाहिए,,,,,, फिर भी मैं बता देता हूं साड़ी उतार कर रख दो ब्लाउज और पेटीकोट में आ जाओ,,,,,।

(सूरज जानता था कि आप अपनी मां को ऐसा तो नहीं कह सकता था कि सारे कपड़े उतार कर नंगी होकर आ जाओ इसलिए बाहर थोड़ी सी मर्यादा दिखाते हुए अपनी मां को साड़ी उतार कर एक तरफ रखने के लिए बोल रहा था और ब्लाउज और पेटीकोट में आने के लिए कह रहा था फिर भी सुनैना अपने बेटे के मुंह से यह शब्द सुनकर शर्म से पानी पानी हो रही थी क्योंकि कोई बेटा अपनी मां को यह नहीं कहता कि ब्लाउज और पेटीकोट में आ जाओ,,,,, अपने बेटे की बातों को सुनकर उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी और उसका भी मन कर रहा था अपने बेटे के साथ टंकी में नहाने के लिए ,,, इसलिए वह भी अब ज्यादा ना नूकर नहीं की,,, और पास में ही घनी झाड़ियों के करीब जाकर अपने बदन से साड़ी को उतारने लगी यह सब देखकर पानी के अंदर ही सूरज का लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था क्योंकि वह जानता था कि अब थोड़ी देर में इस टंकी में उसकी मां भी उतरने वाली है नहाने के लिए और उसकी मां का टंकी में उतरने का मतलब था कि दोनों का बदन नहाने के बहाने स्पर्श होने वाला था। साड़ी को एक तरफ रखकर सुनैना शर्म से पानी पानी होते हुए ब्लाउज और पेटीकोट में ही अपने बेटे के पास चली आ रही थी नहाने के लिए दूर से ही सूरज को अपनी मां की गहरी नाभि दिखाई दे रही थी जो किसी छोटी बुर से कम नहीं थी,,,, सुनैना टंकी के पास पहुंच चुकी थी यह देखकर सूरज मुस्कुराते हुए अपनी मां से बोला।)





अच्छा हुआ तुम भी नहाने के लिए आ गई,,, बहुत मजा आ रहा है ठंडा पानी में नहाने का,,,,।

(सुनैना टंकी के पास आकर खड़ी हो गई थी,,,, वह टंकी पर चढ़ नहीं पा रही थी इसलिए वह सूरज को सवालिया नजरों से देख रही थी सूरज समझ गया था कि उसकी मां के मन में क्या चल रहा है इसलिए वह तुरंत उसके लंड का आकार एकदम साफ दिखाई दे रहा था और पजामा का कपड़ा पतला होने की वजह से लंड का आकार ही नहीं बल्कि उसका पूरा स्वरूप झलक रहा था जिसे देखकर सुनैना की बुर उत्तेजना के मारे फूलने पिचकने लगी,,, अपने बेटे की हालत को देखकर उसके खड़े लंड को देखकर इतना तो सुनैना को एहसास हो रहा था कि इस समय उसके बेटे की हालत क्या है,,, इसलिए उसके मन में एक अजीब घर की भावना जगने लगी थी वह अपने बेटे के साथ टंकी में उतरने के लिए घबरा रही थी लेकिन अब वह कर भी क्या सकती थी क्योंकि जब तक वह कुछ सोच पार्टी से पहले ही सूरज उसके हाथ को पकड़ कर ऊपर की तरफ उठा दिया था और अगले ही पलवा टंकी के अंदर एक पांव उतारने लगी थी,,, पानी भरा हुआ था जिसकी वजह से जैसे ही वह अपने पांव को पानी के अंदर उतरने लगी वैसे ही उसकी पेटिकोट पानी की सतह पर गुब्बारे की तरह फुल कर कमर के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगी सुनैना अपना दूसरा पर भी पानी के अंदर उतर चुकी थी और उसकी पेटिकोट उसके कमर की सतह पर पानी के ऊपर गुब्बारा बनाकर फुल चुकी थी यह देखकर सूरज मुस्कुराने लगा और उसकी मुस्कुराहट की वजह से सुनैना शर्म से पानी पानी होने लगी,,,,,।





टंकी में पूरी तरह से पानी भरा हुआ था और ट्यूबवेल की पाइप में से पानी भी झर झर करके गिर रहा था जो कि दोनों के बदन को भिगो रहा था पल भर में ही सुनैना का ब्लाउज पानी से पूरी तरह से भीग चुका था,,, टंकी में इतना ज्यादा पानी था कि अपने आप ही सुनैना का बदन लहरा रहा था,,,, वह अपने पेटिकोट को पानी के अंदर करना चाहती थी लेकिन पानी की लहर के कारण वहां अपने बेटे से टकरा गई थी और इस टकराहट में सूरज के पजामे में तना हुआ उसका तंबू एकदम से अपने आप ही उसकी बुर पर दस्तक देने लगा इस स्पर्श इस रगड़ से सुनैना एकदम से मदहोश हो गई, क्योंकि कई दिनों बाद उसकी बुर पर कोई मर्दाना लंड की टक्कर हुई थी और वह भी किसी गैर की नहीं बल्कि उसके खुद के बड़े बेटे के लंड की,,, इस रगड़ से वह एकदम से पानी पानी हो गई। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें क्योंकि जो भी हो यह रगड़ उसके अरमानों को एक बार फिर से जगा दिया था। यह एहसास सूरज को भी हुआ था सूरज भी एकदम मस्त हो गया था सूरज पूरी तरह से तेज हो गया था मन तो उसका कर रहा था कि पानी के अंदर ही वह अपनी मां की चुदाई करते लेकिन वह अपने आप पर काबू किए हुए था वह इस बात को अच्छी तरह से जानता भी था कि अगर वह एक बार शुरू हो गया तो उसकी मां उसे इनकार नहीं कर पाएगी। फिर भी सूरज धैर्य से काम लेना चाहता था,,,,। मां बेटे दोनों नहा रहे थे हालांकि ऐसी हालत में दोनों काफी उत्तेजना का अनुभव कर रहे थे पानी में उठ रही लहर बार-बार दोनों के बदन को सटा दे रही थी ‌। जिससे दोनों के बदन से उत्तेजना की चिंगारी फुट रही थी। दोनों असहज महसूस तो कर रहे थे लेकिन मजा भी बहुत आ रहा था।





थोड़ी देर बाद सूरज अपने बदन पर साबुन लगाने लगा और सुनैना अपने हाथ से ही अपने बदन को मल रही थी मेल छुड़ा रही थी,,,, पानी में भीगा उसका बदन उसका ब्लाउज पूरी तरह से उसकी जवानी को उजागर कर रहा था,, सूरज की नजर साबुन लगाते हुए भी अपनी मां की चूचियों पर और इस बात का एहसास सुनैना को अच्छी तरह से हो रहा था इसलिए अपने बेटे के इतने नजदीक रहकर वह शर्म से पानी पानी हुए जा रही थी। सुनैना की सांस ऊपर नीचे हो रही थी और सांसों की गति के साथ उसकी दोनों गोलाईयां भी अपना असर दिख रही थी सूरज का तो मन कर रहा था किसी समय अपनी मां की दोनों चूचियों को पकड़ कर जोर-जोर से दबा दे लेकिन फिर भी अपने आप पर काबू किए हुए था। अपनी पसंद पर साबुन लगाने के बाद वह ट्यूबवेल की पाइप के नीचे खड़ा हो गया और गिरते हुए पानी का मजा लेने लगा,,,, अभी भी सूरज का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था जो बार-बार लहरा कर सुनैना के बदन से टकरा जा रहा था उसकी जांघों से उसकी टांगों से उसके नितंबों से और उसके जवानी के मुख्य द्वार से लेकिन जब जब उसकी रगड़ सुनैना को महसूस होती थी वह एकदम से उत्तेजना से सिहर उठती थी। साबुन हाथ में लेकर वह अपनी मां से बोला।





लाओ मां में अपने हाथों से तुम्हारी पीठ में साबुन लगा दुं,,,,, तुम्हारी गोरी गोरी पीठ पर मेल जमी हुई है,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर वह कुछ बोल नहीं पाई हो उसकी तरफ पीठ करके और टंकी की दीवार को पकड़ कर खड़ी हो गई हालांकि पानी की गहराई कुछ ज्यादा थी वह खड़ी नहीं हो पा रही थी उसका बदन अपने आप ही लहरा कर उसके बेटे की तरफ ही चला जा रहा था वह टंकी की दीवार को मजबूती से पकड़े हुए थी। और अपने बेटे से बोली,,,)

ले लगा दे वैसे भी पीछे तक मेरा हाथ नहीं पहुंच पाता,,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर तो सूरज मन ही मन प्रसन्न होने लगा और वहां अपनी मां की पीठ पर साबुन लगाना शुरू कर दिया,,, वैसे तो वह ब्लाउज पहनी हुई थी लेकिन फिर भी सूरज ब्लाउज के साथ ही उसके पूरे बदन पर साबुन लगा रहा था टंकी के पानी की लहर की वजह से सूरज को एहसास हो रहा था कि उसकी मां का पेटीकोट उसकी कमर तक उठाया था और नीचे से उसकी गांड एकदम से नंगी थी और यह एहसास होते ही उसके मन में सहारा सोचने लगी क्योंकि बार-बार पानी के लहर के कारण उसका खुद पजामे में बना हुआ था वह उसकी मां की गांड से स्पर्श हो जा रहा था रगड़ जा रहा था,,,, सूरज अपने मन से इस लालच को रोक नहीं पा रहा था की टंकी के अंदर उसकी मां उसके बेहद करीब थी और उसकी बेटी को उसके कमर से कोटि हुई थी मतलब की कमर के नीचे वह पूरी तरह से नंगी थी और यह लालच उसकी हिम्मत को बढ़ा रहा था इसलिए वह भी एक हाथ से धीरे से अपने पजामे को नीचे सरका दिया और उसका लंड पानी में टनटना गया,,, सूरज की सांस ऊपर नीचे हो रही थी क्योंकि आज दूसरी बार वह अपनी मां के साथ इस तरह की हरकत करने जा रहा था इस तरह की हरकत हुआ खेत में ही अपनी मां के साथ कर चुका था जब वह गहरी नींद में सो रही थी अपना लंड उसकी गांड से रगड़ रगड़ कर अपना पानी निकाल दिया था,,, ।





सूरज अपनी मां की पीठ पर साबुन लगाने के बहाने थोड़ा सा आगे सरक गया जिसकी वजह से उसका नंगा लंड एकदम से उसकी मां की नंगी गांड से टकरा गया रगड़ खाने लगा सुनैना के तन बदन में अजीब से हिचकोले होने लगे वह एकदम से मदहोश हो गई क्योंकि वह समझ चुकी थी कि इस समय उसकी नंगी गांड से उसके बेटे का नंगा लंड टकरा रहा था उसकी सांस ऊपर नीचे होने लगी उसे समझते देर नहीं लगी कि यह शर्त उसका बेटा जानबूझकर कर रहा था क्योंकि अभी तक उसके पजामे में बना तंबू ही टकरा रहा था लेकिन यह स्पर्श पजामे के साथ का नहीं था। लेकिन वह अपने बेटे को कुछ बोल नहीं पा रही थी और सूरज था कि उसकी पीठ पर साबुन लगाने के बहाने उसके बेहद करीब आ गया था यहां तक की उसका लंड पानी की गहराई में धंसता हुआ उसकी गांड की दरार की बीचो-बीच फंस चुका था सुनैना इस बात से हैरान थी कि उसके बेटे को बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ रहा था कि अगर वह कुछ कहेगी तो क्या होगा,,, सूरज भी काफी चला था वह बिल्कुल भी असहज नहीं हो रहा था वह ऐसा बर्ताव कर रहा था कि मानो जैसे कुछ हुआ ही ना हो,,,, वह साबुन लगाते हुए बड़े आराम से अपनी मां से बोला,,,।





अब खेत का काम तो खत्म हो चुका है तुम घर पर आराम करना मेरे लिए कुछ ना कुछ काम तो निकल ही आएगा।(ऐसा कैसे हुआ वह कंधे पर साबुन लगता हुआ और ज्यादा करीब आ गया जिसकी वजह से उसका लंड गांड की दरार को चीरता हुआ खड़े-खड़े ही उसके गुलाबी मुख्य द्वार पर दस्तक देने लगा अब सुनैना से आसानी हो रहा था उसकी सांस ऊपर नीचे हो रही थी उत्तेजना के मारे उससे ठीक से सांस भी नहीं लिया जा रहा था। वह शर्म से पानी पानी हो जा रही थी उसकी बुर फुलकर कचोरी की तरह हो चुकी थी,, जिस तरह के हालात थे वह अपने बेटे को कुछ जवाब भी नहीं दे पा रही थी बस उसी तरह से दोनों हाथों से पानी की टंकी की दीवार पकड़ कर खड़ी थी खड़ी क्या थी वह पानी की लहर में खुद लहरा रही थी सूरज तो अपना काम कर ही रहा था बाकी का काम पानी की लहर करते रही थी जिस तरह से ट्यूबवेल की पाइप से पानी नीचे गिर रहा था और पानी लहरा रहा था दोनों के बदन अपने आप ही इसको लेने रहे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों जैसे सूरज खुद अपनी कमर हिला रहा हो और सुनैना भी उसका साथ देते हुए पीछे अपनी कमर ठेल रही हो। लेकिन सुनैना ऐसा कुछ भी नहीं कर रही थी जो कुछ भी हो रहा था अपने आप हो रहा था और इसी वजह से वह और भी ज्यादा शर्मिंदगी महसूस कर रही थी।





सूरज तो उतेजना से मरा जा रहा था,, जो काम वह खुद नहीं कर पा रहा था वह कम पानी की लहर कर रही थी दोनों के बदन को हिलाते हुए सूरज का लंड धीरे-धीरे उसकी मां की बुर के गुलाबी होंठ खोल चुका था,,,,, और अंदर सरकने की तैयारी में था यह एहसास सूरज के साथ-साथ उसकी मां के तन बदन में आग लग रहा था,,,, सुनैना को तो समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें उत्तेजना के मारे वह बड़े कस के पानी की टंकी की दीवार को पकड़ के खड़ी थी। हालात पूरी तरह से बिगड़ते जा रहे थे सुनैना के हाथ में कुछ भी नहीं था जहां एक तरफ वह शर्म से मेरी जा रही थी वहीं दूसरी तरफ उसके मन के किसी कोने में यह एहसास यह प्यास दबी हुई थी कि उसका बेटा अपने पूरे लंड को उसकी बुर में डाल दे,,, लेकिन अपने मन के ईस एहसास को वह अपने होठों पर ला नहीं पा रही थी। सूरज अपनी मां की पीठ पर साबुन लगा चुका था लेकिन सिर्फ साबुन लगाने का आप नाटक कर रहा था क्योंकि वह अपनी हरकतों से अपने लंड को अपनी मां की बुर में थोड़ा और अंदर डालने की कोशिश कर रहा था और इसका एहसास सुनैना कभी हो रहा था सुनैना मदहोशी में अपनी आंखों को बंद कर चुकी थी क्योंकि उसे इस बात का एहसास हो गया था कि उसके बेटे का लंड कितना जानदार है। लेकिन सूरज की कोशिश नाकाम होती नजर आ रही थी और इसका एहसास सूरज को भी हो गया था सूरज को अब पता चल गया था कि ऐसी स्थिति में आगे बढ़ने से कोई फायदा नहीं था क्योंकि उसकी मां की बुर कसी हुई थी और ऐसी अवस्था में खड़े-खड़े उसकी बुर में लंड डालना बड़ा मुश्किल काम था। लेकिन फिर भी इतने से सूरज को संतोष था क्योंकि उसकी इस हिमाकत का जवाब उसकी मन बिल्कुल भी नहीं दिया था जिसका मतलब साफ था कि उसे भी यह सब अच्छा लग रहा था और यह सूरज के लिए बहुत अच्छी बात थी आगे का रास्ता साफ होता चला जा रहा था।





इसके बाद सूरज ने अपनी मां के साथ ज्यादा कुछ किया नहीं वह भी ट्यूबवेल की पाइप के नीचे खड़ी हो गई और गिरते हुए पानी में नहाने का मजा ले रही थी खड़ी दोपहरी में गर्मी के मौसम में नहाने का जो मजा उसे मिल रहा था और वह भी अपने बेटे के साथ वह पूरी तरह से मत हो चुकी थी सूरज ने धीरे से अपने पजामी को ऊपर कर लिया था ताकि उसकी मां को पता ना चले जबकि उसकी मां को सब पता था कि उसके बेटे ने उसके साथ कौन सी हरकत किया है। थोड़ी देर बाद पानी की टंकी में से नहा कर दो ना बाहर निकल गए अंकित का लंड अभी भी खड़ा था पजामे में तंबू बना हुआ था,,,, अंकित जानबूझकर झोपड़ी में चला गया था ताकि उसकी मां कपड़े बदलने के लिए झोपड़ी में ना आकर झाड़ियों में जाए ताकि वह देख सके,,,, और ऐसा ही हुआ अपने बेटे को झोपड़ी में जाता देखकर वह सामने की झाड़ियों में चली गई,,, झोपड़ी के अंदर टूटे-फूटे ईंट की दीवार में से वह बाहर झाड़ियों में ही देख रहा था,,,, लेकिन झाड़ियां काफी घनी थी सिर्फ उसके पर ही दिखाई दे रहे थे और जल्द ही उसे एहसास होने लगा कि उसकी मां उसका पेटिकोट उतार रही थी वह भी पर के सहारे क्योंकि घुटनों के नीचे का ही खाली उसका अंग दिख रहा था और अपने पैर से वह पेटीकोट को अपने बदन से अलग कर रही थी या देखकर अंकित का लंड बवाल मचाने को तैयार हो गया था।





यह नजारा देखकर अंकित से बर्दाश्त नहीं हुआ क्योंकि कुछ देर पहले उसका लंड उसकी मां की बुर में फंसा हुआ था यह एहसास ही उसे उत्तेजना के परम शिखर पर ले जा रही थी और वह अपनी मां को कपड़े उतारते हुए देखकर अपने लंड को पकड़ कर हिलाना शुरू कर दिया और तब तक हिलता रहा जब तक की उसमें से पानी नहीं निकल गया थोड़ी देर में वह झोपड़ी से बाहर आया उसने अपना वही पजामा पहन लिया था जो पूरी तरह से गिला था सिर्फ उसमें से पानी नहीं छोड़कर थोड़ा झटक कर उसे पहन लिया था क्योंकि वह जानता था कि गर्मी इतनी है थोड़ी देर में सूख जाएगा जब वह बाहर आकर देखा तो पेड़ के नीचे चारपाई पर उसकी मां बैठी हुई थी सिर्फ सारी लपेटकर और अपना ब्लाउज और पेटीकोट सूखने के लिए झाड़ियों पर डाल दी थी। अपने आप को सहज करते हुए वह अपने बेटे से बोली।

काम तो खत्म हो गया है जाकर मुखिया से हिसाब किताब कर लेना और पूछ भी लेना की कोई और काम हो तो बताना,,,।

तुम चिंता मत करो मां मैं सब कुछ कर लूंगा,,, और देखना इतनी जल्दी काम खत्म करने के बदले में थोड़ी बहुत बख्शीश भी ले लूंगा।

बहुत चालाक है तू,,,,(सुनैना मुस्कुराते हुए बोली और अपने मन में सोचने लगी कि चेहरे से कितना भोला भाला लगता है लेकिन मन से कितना गंदा व्यक्तित्व है अपनी ही मां को चोदने के फिराक में है। थोड़ी देर इधर-उधर की बात करने के बाद सुनैना चारपाई से उठी और झाड़ियां पर रखे हुए अपने कपड़ों को देखने लगी जो की तेज धूप में सूख चुके थे और वह फिर से झाड़ी में चली गई कपड़े पहनने के लिए,,,,, और सुरज चारपाई पर लेटा लेटा अपने आप से ही बात करते हुए बोला देखना बहुत ही जल्दी वह मेरे नीचे होगी,,,।





दूसरी तरफ नदी के किनारे रानी सज धज कर कुंवर से मिलने के लिए पहुंच चुकी थी कुंवर पहले से ही नदी के किनारे बड़े से पत्थर पर बैठकर उसका ही इंतजार कर रहा था उसे आता हुआ देखकर उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे और वह एकदम से खुश होता हुआ बड़े से पत्थर से नीचे उतर कर खड़ा हो गया रानी भी दूर से ही उसे देख ली थी वह भी काफी खुश नजर आ रही थी और जैसे ही दोनों पास आए कुंवर ने अपने दोनों बाजुओं को खोल दिया रानी भागते हुए उसके सीने से लग गई उसकी ऊपर नीचे होते हुए सांसों की गति के साथ-साथ उसकी नरम नरम संतरे जैसी चूचियां कुंवर के छाती में धंसने लगी कुंवर को एहसास पूरी तरह से उत्तेजित किए हुए था,, रानी तो उसकी बाहों से अलग नहीं होना चाहती थी लेकिन वही अपने उत्तेजना को संभाल नहीं पा रहा था और रानी को अपने बदन से अलग करते हुए मुस्कुरा कर बोला।)

मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं मुझे तो लगा कि तुम नहीं आओगी।

कैसे नहीं आती मैं तो उसे दिन भी आई थी जिस दिन तुम नहीं आए थे,,,।

अब उसे दिन के लिए रोज-रोज मुझे ताना मारोगी क्या,,,?

तुमने उसे दिन काम ही ऐसा कुछ किया था।

अच्छा बाबा मुझसे गलती हो गई दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी और इसीलिए तो मैं आज पहले ही आकर बैठ गया था,,,,।

पहले से ही आकर बैठ गए थे अगर कोई देख लेता तो क्या समझता,,,,।





समझने दो जिसको जो समझना है,,,,।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता चलो यहां से थोड़ा दूर चलते हैं नहीं तो किसी की नजर पड़ जाएगी और मुझे तुम्हारे साथ देख जाएगा तो गांव में तरह-तरह की बातें बनेंगी।

तुम समाज से डरती हो,,,।

कोन नहीं डरता सब तो डरते हैं,,,,। तुम भी तो डरते हो तभी तो उस दिन नहीं आए थे।

तुम फिर शुरू हो गई,,,।

अच्छा अब नहीं कहूंगी लेकिन चलो थोड़ा दूर चलते हैं यहां पर किसी की भी नजर पड़ सकती है दूर-दूर तक यहां से देखा जा सकता है,,,।

ठीक है,,,(इतना कहकर रानी खुद उसका हाथ पकड़ कर झाड़ियां में लेकर आई और वहीं पर पेड़ के नीचे बैठ गए दोनों इधर-उधर की बातें कर रहे थे रानी कुंवर के ईतने करीब आकर,,, मदहोश हो रही थी। कुंवर दूसरा व्यक्ति था जिसके ईतने करीब रानी थी वह कुमार से प्यार करती थी अपने भाई के साथ तो वह केवल अपनी वासना शांत करती थी कुछ देर तक दोनों के बीच इधर-उधर की बातें होती रही दोनों बात करते-करते हंस देते थे एक दूसरे की बातें उन्हें अच्छी लग रही थी लेकिन धीरे-धीरे शाम ढलने लगी थी अब दोनों के जाने का समय हो गया था कुंवर बेहद शर्मीला लड़का था इसलिए वह आगे से कुछ कर नहीं सकता था हालांकि उसे एहसास हो रहा था की रानी बेहद खूबसूरत लड़की थी इसलिए वह मन ही मन बहुत खुश हो रहा था दोनों झाड़ियों से बाहर निकल आए थे रानी कल भी उसे आने के लिए कह रही थी और कुंवर इसके लिए तैयार भी था और जैसे-जाते रानी एकदम से उसके गाल पर चुंबन करके वहां से भाग गई कुंवर उसे देखता ही रहा।)



 
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