Incest पाप ने बचाया - Page 6 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

Dear Readers

आगे जो कहानी की मांग होगी, कहानी के मूल अस्तित्व के हिसाब से जो सही बैठेगा वही होगा, अब वो किसी के मन का हो भी सकता है और नही भी, तो ये तो आगे कहानी में ही पता चलेगा।

धन्यवाद आप सबका
 
प्रिय पाठकों

अगला अपडेट कल तक आएगा। थोड़ा आज व्यस्त हो गया था किसी काम में, कल दूंगा अपडेट। थोड़ा wait और कर लीजिए वैसे मैं माफी चाहुंगा की आप लोगों को कभी कभी थोड़ा ज्यादा wait करना पड़ जाता है। कल update देने की पूरी कोशिश करूंगा।

धन्यवाद आप सबका।
 
Update- 41

बारिश अब तेज होने लगी, उदयराज अपनी सगी बेटी की बूर में अपना लंड डाले उसपर लेटा रहा, रजनी भी अपने बाबू को सहलाते चूमते उनके नीचे लेटी सिसकती रही, रजनी के चेहरे पर बारिश की तेज बूंदें पड़ने लगी, उदयराज ने आँखें खोली और अपने चेहरे से अपनी बेटी के चेहरे को ढकते हुए उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये, दोनों बाप बेटी एक बार फिर तेज बारिश में भीगते, एक दूसरे के होंठों को चूसते हुए एक दूसरे में खोने लगे, लंड फिर से बूर में सख्त होने लगा, उसे महसूस कर रजनी की बूर फिर से चुदाई के लिए संसनाने लगी।

तेज बारिश से खेत की मिट्टी गीली होने लगी, अंगौछा काफी भीग चुका था, होंठों को चूसते हुए सिसक कर रजनी धीरे धीरे पलटकर अपने बाबू के ऊपर चढ़ने लगी और उदयराज साइड में गीली मिट्टी में लेटने लगा, तभी तेज बिजली कड़की, रजनी अपने बाबू को देखते हुए उनके ऊपर पलटकर चढ़ती गई, और इस अदला बदली में लंड पक्क़ की आवाज करते हुए बूर से निकल गया, रजनी मचल उठी।

लंड उछलकर सीधा हो गया, वासना में फिर से झटके खाने लगा, सुपाड़ा उसका खुला ही हुआ था, अपनी बेटी के काम रस में वो पूरी तरह सना हुआ था, रजनी ने अपने बाबू के ऊपर बैठते हुए अपने एक हाँथ की उंगलियों से अपनी बूर को चीरते हुए दूसरे हाँथ से अपने बाबू का लंड पकड़कर अपनी बूर की छेद पर कराहते हुए लगाया और खुद ही गच्च से लंड पर बैठती चली गयी, रजनी सीत्कारते हुए

हहहहहाहाहाहाययययययय............मेरे सैयां.........मेरे बाबू.........आआआआआआआहहहहहहहहहह......

करने लगी

एक बार फिर से उदयराज का फ़ौलादी लंड अपनी बेटी की रसभरी मखमली बूर के छेद को चीरता हुआ अत्यंत गरम गरम गहराई में समा गया, रजनी और उदयराज की मस्ती में अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह हहह करते हुए आँहें निकल गयी। लंड को बूर में पूरा लेते हुए रजनी बड़ी मस्ती में अपने बाबू के ऊपर उनके मुँह में अपनी बड़ी बड़ी मदमस्त चूचीयाँ भरते हुए लेटती चली गयी, उदयराज ने मुँह खोलकर गप्प से एक चूची को मुँह में भर लिया और बड़ी तन्मयता से चूसने लगा, रजनी अपने गांड को हल्का हल्का ऊपर नीचे हिलाते हुए हाय हाय करके सिसियाने लगी, धीरे धीरे अपने भारी नितम्ब को खुद ही ऊपर नीचे करते हुए अपने बाबू के ऊपर बैठी अपनी बूर को उनके विशाल लंड पर उछलते हुए चोदे जा रही थी, उदयराज ने अपनी बेटी के भारी गुदाज चौड़े नितम्ब को हाँथ बढ़ा कर अपने दोनों हथेली में भर लिया और नीचे से हौले हौले अपनी बेटी को मिट्टी में लेटे लेटे चोदने लगा।

रजनी- आआआआआहहहहह.......मेरे पिता जी....…...मेरे बाबू......चोदो अपने लंड से अपनी बेटी की बूर..........ओओओओओहहह हहह..............ऊऊऊऊऊऊऊऊईईईईईईईईई.........माँ............ कैसे आपका मोटा सा लंड मेरी बूर में जा रहा है.........कितना मजा है चुदाई करने में................मुझे उछाल उछाल के चोदो न पिता जी, मेरे बाबू.......पेलो अपनी सगी बेटी को.............ऊऊऊऊईईईईई........आआआ आआआआहहहहहहहह..............और गहराई तक डालो बाबू...........हाँ ऐसे ही.........ओओओओओहहहहह................कैसे गच्च गच्च की आवाज आ रही है चुदाई की..........हाय बाबू।

अंगौछा बगल में पड़ा भीग रहा था, रजनी और उदयराज अब मिट्टी में आ चुके थे, रजनी अपने बाबू के ऊपर उनका लंड अपनी बूर में जड़ तक घुसेड़े हुए आधी झुकी हुई अपनी चूची चुसवाती और गांड को हल्का उछाल उछाल कर अपने पिता से चुदती हुए बहुत ही मादक लग रही थी, उदयराज पागलों की तरह रजनी की दोनों चुचियों को भर भरकर चूसे और दबाए जा रहा था। बारिश अपने जोरों पर थी, बीच बीच में बिजली कड़क जाती थी, तेज बारिश बाप बेटी के पूरे बदन को भिगो रही थी।

एकाएक नशे में आंखें बंद किये रजनी को एक खेल सूझा उसने सिसकते हुए अपने बाबू से कहा- मेरे बाबू, मेरे सैयां

उदयराज ने सैयां शब्द सुनते ही कराह दिया और बोला- हां मेरी बिटिया, मेरी सजनी, मेरी रजनी।

रजनी- इस हसीन अंधेरी बरसात की रात में खेत की गीली मिट्टी में अपनी बेटी को लिटा लिटा कर प्यार करो न बाबू, ये मौका क्यों छोड़ते हो मेरे राजा।

उदयराज अपनी बेटी की मंशा समझते ही मुस्कुरा दिया और रजनी को मिट्टी में पलट दिया और उसके ऊपर चढ़ गया ऐसा करने से लंड फिर पक्क़ से बूर से निकल गया तो रजनी सिसकारी लेती हुई बोली डालो न, निकलना नही चाहिए मेरे सैयां का लंड उसकी बेटी की बूर से।

ये सुनते ही उदयराज बावला हो गया, उसने झट रजनी के दोनों पैर हवा में किया और रजनी ने फट से दोनों हाँथ से बूर की फाँकों को चीर दिया, उदयराज से अपना मूसल जैसा 9 इंच का दहाड़ता लन्ड बूर की छेद पर लगाया और एक ही बार में पोजीशन बनाते हुए अपनी बेटी की बूर में जड़ तक उतार दिया, रजनी अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह हह......बाबू कहकर कराह उठी, कुछ देर बूर में लन्ड पेले अपनी बेटी के ऊपर चढ़े रहने के बाद उदयराज ने रजनी को बड़ी सावधानी से अपने ऊपर लिटा लिया और नीचे से बूर में दो चार कस कस के गच्चे मारे, रजनी सिरह उठी, अब रजनी और उदयराज एक दूसरे से अमरबेल की तरह लिपटे खेत की अत्यंत गीली हो चुकी मिट्टी में इस तरह लोटने लगे कि बूर में से लंड न निकले, बारिश दनादन होती जा रही थी, कभी थोड़ा कम होने लगती फिर कभी तेज हो जाती, इस खेल के असीम आनंद में दोनों ही डूब चुके थे, रजनी का गदराया गोरा बदन खेत की गीली मिट्टी में जो अब कीचड़ का रूप ले चुकी थी सनने लगा, उदयराज का भी पीछे का सारा हिस्सा मिट्टी में सन चुका था, चुदाई का मजा तो मानो अब आसमान छू रहा था, दोनों ही जोर जोर से सिसकते कराहते एक दूसरे को बेताहाशा चूमते सहलाते बारिश में मिट्टी में सने हुए चोदे जा रहे थे, एक दूसरे को बाहों में भरे वो खेत में इधर उधर लोटने लगे, मानो बेड पर लेटकर लोट रहे हों।

जब रजनी अपने बाबू के ऊपर आती तो वो अपनी मदमस्त गांड उछाल उछाल के अपने बाबू को हाय हाय करते हुए चोदती और जब उदयराज ऊपर आता तो कुछ देर ठहरकर अपनी बेटी की दोनों जाँघों को अच्छे से फैलाकर जड़ तक लन्ड प्यासी बूर में पेल पेल के उसको हुमच हुमच के चोदता, रजनी हर बार कराह उठती, मिट्टी में बच्चों की तरह लोटने की वजह से उनका लगभग पूरा बदन पीछे की तरफ से सन गया था पर तेज बारिश की वजह से धुल भी जा रहा था, जब रजनी ऊपर आती तो उसकी मादक गदराई पीठ धुल जाती और जब उदयराज ऊपर आता तो उसकी पीठ धुल जाती, एक दूसरे से लिपटकर कीचड़ में लोटने की वजह से पलटते वक्त लन्ड कभी कभी बूर से बाहर आने लगता तो रजनी सिसकते हुए अपने बाबू की गांड पर हाथ लेजाकर दबा कर इशारा करती मानो जैसे उदयराज को पता ही न हो कि लन्ड बूर से निकलने वाला है, तो उदयराज अपनी बेटी की इस अदा पर कायल होकर जोरदार गच्च से धक्का मरता और लंड फिर से बूर में जड़ तक समा जाता, रजनी की जोर से असीम आनंद में अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह हहह निकल जाती।

उधर बारिश होने की वजह से काकी भी उठकर बच्ची को लेकर बरामदे में आ जाती है, बच्ची चुपचाप सो ही रही थी, काकी मन में सोचती है कि बारिश अचानक इतनी तेज होने लगी वो लोग कहीं बारिश में भीग न रहे हों, खैर कहीं रुक गए होंगे जरूर, लगता है अब सुबह तक ही आएंगे।

तेज बारिश से अब खेत में हल्का हल्का पानी भी इकठ्ठा होने लगा, मिट्टी का कीचड़ तो हो ही गया था, रजनी ने अचानक मिट्टी को मुठ्ठी में लिया और बड़ी शरारत से अपने बाबू के सीने पर रगड़ दिया और मिट्टी लिया और बाजुओं पर भी हंसते और सिसकते हुए लगा दिया, उदयराज को भी शरारत सूझी तो उसने भी मिट्टी को उठाकर रजनी के कमर , पेट, नाभि, कंधे, बाजुओं तथा मस्त मस्त फूली हुई चूचीयों पर मसलने लगा, रजनी मस्ती में हसने लगी, अपने पूरे बदन पर मिट्टी लगे अपने बाबू के हाथ पड़ने से रजनी मचलने लगी और अपनी गांड तेज तेज उछाल कर लंड को बूर में कस कस के लेने लगी, काफी देर तक यही खेल चलता रहा और अब खेत में काफी पानी भर गया था, उदयराज का अंगौछा, तेल की शीशी, दीया और डलिया अब पानी में तैरने लगे थे, उदयराज ने रजनी से कहा -बिटिया चल तुझे नदी में ले चलूं, एक बार नदी में करेंगें।

रजनी सिसकते हुए जानबूझ कर पूछती है- क्या? क्या करेंगे मेरे बाबू?

उदयराज रजनी के कान में- चुदाई, तुझे नदी में चोदुंगा।

रजनी- तुझे कौन बाबू? मैं क्या हूँ आपकी?

उदयराज- तू मेरी सगी बेटी है और क्या?

राजनी- तो सगी बेटी लगा के बोलो न, आधा अधूरा क्यों बोलते हो मेरे बाबू, दुबारा बोलो अच्छे से।

उदयराज- अपनी सगी बेटी को नदी में ले जाकर चोदने का मन कर रहा है, अपनी सगी बेटी को, अब ठीक मेरी बिटिया।

राजनी-ओओओओओहहहहह.......बाबू..........तो ले चलिए न अपनी सगी बेटी को, जैसे मर्जी वैसे चोदिये, खूब चोदिये, आपकी सगी बेटी आपसे खुद चुदना चाहती है, उसकी बूर सिर्फ आपके लिए है, चोदिये मेरे बाबू, ले चलिए मुझे.....मेरे राजा पर मेरी बूर खाली नही होनी चाहिए अब, जब तक मैं तीसरी बार तृप्ति न पा लूं, कुछ इस तरह ले चलो अपनी बेटी को नदी तक, समझ गए।

उदयराज बनते हुए- नही तो।

राजनी- अरे ओ मेरे बुद्धू सैयां, अपनी इस बेटी को नदी तक इस तरह ले चलो की आपका मूसल जूस लंड उसकी कमसिन सी बूर से न निकले।

उदयराज- ओह! मेरी जान, मेरी बच्ची, मेरी रानी बिटिया, जैसा तेरा हुक्म।

फिर उदयराज रजनी को गोद में लिए लिए उठ बैठा, बैठने से लंड बूर में और धंस गया, उसके बाद उदयराज रजनी को लिए लिए खड़ा हो गया, उदयराज काफ़ी बलशाली था रजनी उसकी इस ताकत पर और भी कायल हो गयी, उदयराज ने रजनी को उठाकर गोद में बैठा लिया और अपने दोनों हांथों से नितम्बों को थाम लिए, रजनी ने अपनी दोनों टांगें अपने बाबू के गोद में चढ़कर उनकी कमर पर कैंची की तरह लपेटते हुए, उनसे कस के लिपटते हुए, कराहते हुए, जोर से सिसकारते हुए, उनके कंधों पर मीठे दर्द की अनुभूति में काटते हुए उनके विशाल लन्ड पर अपनी रस टपकाती बूर रखकर बैठती चली गयी, लन्ड फिसलता हुआ बूर की गहराई के आखरी छोर पर जा टकराया, क्योंकि रजनी के मखमली बदन का पूरा भार अब केवल लंड पर था, इतनी गहराई तक लन्ड शायद ही अभी तक घुसा हो, दोनों ही बाप बेटी काफी देर तक उन अंदरूनी अनछुई जगहों को आज पहली बार छूकर परम आनंद में कहीं खो से गये।

उदयराज और रजनी झमाझम बारिश में एक दूसरे में समाए सिसकते कराहते भीग रहे थे, उदयराज खेत के बीचों बीच अपनी सगी बेटी को उसके नितम्बों से पकड़कर अपनी कमर तक उठाये उसकी रसभरी बूर में अपना लन्ड घुसेड़े, उसकी बूर की मखमली अंदरूनी नरम नरम अत्यंत गहराई का असीम सुख लेता हुआ खड़ा था पानी और मट्टी में उसके दोनों पैर डूबे हुए थे, इसी तरह रजनी अपने बाबू की कमर में अपने पैर लपेटे उनके लंड पर बैठी, उनसे कस के लिपटी हुई परम आनंद की अनुभूति प्राप्त कर कराहे जा रही थी।

कुछ देर ऐसे ही अपनी बेटी के यौन मिलन के आनंद में खोए रहने के बाद उदयराज खेत से बाहर निकलने लगा, चलने से लन्ड और इधर उधर हिल रहा था जिससे रजनी बार बार चिहुँक चिहुँक कर हाय हाय करने लग जा रही थी। नदी वहां से 40 मीटर की दूरी पर ही थी।

उदयराज अपनी सगी बेटी को अपनी गोद में बैठाये नदी की ओर चलने लगा, चलने से लंड बूर की गहराई में अच्छे से ठोकरें मारने लगा, रजनी सिस्कार सिस्कार के बदहवास सी हो गयी, उसे अपनी बूर की गहराई में गुदगुदी सी होने लगी, एक बार तो ऐसा लगा कि वह थरथरा कर झड़ जाएगी तो उसने अपने बाबू से कहा- ओओओओओओओओहहहहहहहहहहहहह.......... मेरे बाबू थोड़ा रूको।

उदयराज रुक गया

रजनी अपने बाबू को कस के पकड़कर सिसकते हुए अपनी जाँघे भीचते हुए अपने को झड़ने से रोकने लगी, उदयराज समझ गया कि उसकी बेटी झड़ते झड़ते रह गयी, उसने अपने आपको मेरे साथ झड़ने के लिए रोके रखा है, उदयराज फिर चलने लगा और नदी तक पहुँचा तो रात के अंधेरे और तेज बारिश में देखा कि पानी का बहाव ज्यादा था, नदी में ज्यादा अंदर जाना ठीक नही था, उदयराज रजनी को गोद में लिए लिए पानी में उतर गया, बारिश में इतनी दूर तक आते आते उनके शरीर की काफी मिट्टी धूल चुकी थी और नदी में तब तक अंदर गया जब तक पानी उनके कंधों तक नही आ गया।

उसने रजनी को धीरे से पानी में उतारा, पानी ठंडा था, दोनों एक दूसरे को बाहों में लिए बहुत नजदीक से एक दूसरे को देखने लगे और देखते देखते रजनी के होंठ अपने बाबू के होंठों से मिल गए, काफी देर एक दूसरे के होठों को चूमने चूसने के बाद, उदयराज ने अपनी बेटी से कहा- बेटी, मेरी जान, क्या तुम्हारी बूर एक पल के लिए भी खाली हुई?

रजनी शर्माते हुए- ना मेरे सैयां, मेरे राजा, अब चोदो मुझे इसी नदी में कस कस के बाबू, जल्दी चोदो अपनी बेटी को फिर से प्यास लगी है।

नीचे लंड बूर में घुसा ही हुआ था, नदी का पानी कलकल करके बह रहा था, बारिश भी तेजी से हो ही रही थी।

उदयराज ने रजनी को फिर से बाहों में उठाया और थोड़ा किनारे एक बड़े पत्थर पर आ गया वो पत्थर आधा नदी में डुबा था आधा बाहर था, उदयराज ने धीरे से अपनी बेटी को उसपर लिटाया, रजनी आराम से उसपर सेट होकर लेट गयी, रजनी के पैर आधा पानी के अंदर थे, उदयराज का लंड इस प्रक्रिया में रजनी की बूर में से आधा बाहर आ गया था कि तभी रजनी ने अपने हाथ अपने बाबू की गांड पर ले जाकर हल्का सा आगे दबाया तो उदयराज ने एक करारा धक्का मारकर लन्ड को गच्च से पूरा बूर में डाल दिया, रजनी की तेज से आह निकल गयी और ठीक उसी समय तेज बिजली कड़की और दोनों ने एक दूसरे को देखा तो मुस्कुरा पड़े, उदयराज ने अपनी बेटी के ऊपर झुककर उसको चोदना शुरू किया, लंबे लंबे तेज तेज धक्के रजनी को अपनी मखमली बूर में लगने से रजनी जोर जोर से सिसकने लगी, उदयराज ने अपनी बेटी के एक पैर को उठाया और अपने कंधों पर रख लिया और दूसरा पैर फैला हुआ पानी के अंदर ही था, उदयराज पोजीशन बना कर अपनी बेटी को एक लय में तेज तेज धक्के लगाते हुए घचा घच्च चोदने लगा, पानी की बहती आवाज के साथ साथ उसकी भी जोरदार सिसकारियां गूंजने लगी, बारिश थोड़ी हल्की हुई पर बीच बीच में तेज बिजली चमक रही थी, तेज बिजली चमकने से दो सेकंड के लिए तेज उजाला हो जाता जिसमे उदयराज अपनी बेटी को चोदते हुए उसे सिसकते और कराहते हुए देखता और फिर और उत्तेजित हो जाता, तेज धक्कों से रजनी की चूचीयाँ लगातार ऊपर नीचे उछल उछल कर हिल रही थी।

उदयराज अब रजनी को तेज तेज गांड उछाल उछाल के उसकी बूर में दनादन घस्से मारने लगा, कभी गांड को गोल गोल घुमा कर लंड को बूर के अंदर गोल गोल घुमा घुमा कर धक्के मरता तो कभी तेज तेज हुमच हुमच कर चोदता।

अचानक रजनी को उसके बदन में एक सनसनाहट सी महसूस हुई, काफी देर बारिश में भीगते रहने के बाद उसे जोर से पेशाब लगने लगी उसने अपने बाबू की कमर को थामकर रोकते हुए कहा।

रजनी- बाबू, रुको न, सुनो न

उदयराज- बोल न मेरी बिटिया, क्या हुआ? झड़ने वाली है क्या मेरी बेटी?

रजनी शर्माते हुए- अरे अभी नही बाबू, मुझे पेशाब आ रहा है जोर से।

उदयराज खुश होते हुए- अरे तो तू मूत न मेरी रानी, मैं धीरे धीरे तुझे चोदता हूँ तू मूत, बहुत मजा आएगा चुदते हुए मूतने में।

राजनी शर्मा गयी फिर बोली- ठीक है बाबू, आप हौले हौले चोदिये मुझे मैं मूतती हूं।

फिर उदयराज बहुत धीरे धीरे अपना लन्ड बूर में अंदर बाहर करने लगा, अंधेरा होने की वजह से ज्यादा तो कुछ दिख नही रहा था, उदयराज नीचे झुककर देखने की कोशिश कर रहा था पर उसे अंधेरे में उसका मोटा सा लन्ड बूर में बड़े प्यार से आता जाता दिख रहा था, तभी रजनी ने पेशाब की तेज धार गनगनाते हुए छोड़ दी। सर्रर्रर्रर्रर से तेज पेशाब की धार निकली और उदयराज के लंड, जांघ को भिगोती चली गयी, तेजी से गर्म गर्म पेशाब बूर से निकलकर लंड से टकराता हुआ दोनों की जाँघों पर फैलने लगा और बहकर पत्थर पर फिर पानी में मिलने लगा। अपनी सगी बेटी के गर्म गर्म पेशाब के अहसास से उदयराज की आंखें नशे में बंद हो गयी, रजनी भी ओओओओओहहहहह बाबू करते हुए आंखें बंद कर मूतती रही।

उदयराज ने अपनी बेटी की बूर से लंड बाहर निकाला और अपने लन्ड को पेशाब की धार में भिगोने लगा फिर एकाएक उसने झुककर बूर को मुँह में भर लिया और अपनी बेटी का पेशाब मुँह में भरने लगा, बेटी के गरम गरम पेशाब की गंध ने उदयराज को मदहोश कर दिया।

जब मुँह भर गया तो उसने पिचकारी मारते हुए मुँह में भरा रजनी का पेशाब पानी में थूक दिया, बूर से पेशाब निकल ही रहा था कि उसने दुबारा बूर की फांकों को खोला और सरसराते हुए पूरा लन्ड अंदर पेल दिया। रजनी वासना में मचल उठी, उसका पेशाब अब बंद हो चुका था, उदयराज फिर से फच्च फच्च चोदने लगा, धक्के इतने तेज थे कि रजनी पूरा बदन हिल जा रहा था, बारिश होती रही, बिजली कड़कती रही और उदयराज हुमच हुमच के नदी के पानी में घुटनो तक खड़ा अपनी बेटी को लगातार 15 मिनट तक चोदता रहा, रजनी भी नीचे से अपने नितम्बों को उछाल उछाल कर अपने बाबू का चुदाई में साथ देती रही।

रजनी- आआआआआहहहहह.......मेरे राजा......चोदो ऐसे ही तेज तेज चोदो.........ओओओओओहहह हहह..............ऊऊऊऊऊऊऊऊईईईईईईईईई.........माँ............ कस कस के पेलो लन्ड बाबू.........कितना मजा है चुदाई करने में................अब रुकना मत बाबू, पिता जी, मेरे बाबू.......पेलो अपनी सगी बेटी को.............ऊऊऊऊईईईईई........आआआ आआआआहहहहहहहह..............और गहराई तक घुसाओ बाबू...........हाँ ऐसे ही.........ओओओओओहहहहह..............हाय मेरी बूर.............हाय बाबू।

उदयराज- आआआआआहहहहह.........मेरी बेटी.............क्या बूर है तेरी..............हाय.............. कितना मजा है तेरी बूर में...........आआआआआहहहहह.............सच में अपनी सगी बेटी को चोदने में बहुत मजा है..........इतना मजा आजतक कभी नही आया.........आआआआआहहहहह।

अब रजनी और उदयराज के बदन में सनसनी होने लगी एकाएक दोनों बाप बेटी गनगना कर जोर जोर से हाँफते हुए एक दूसरे से कस के लिपटकर झड़ने लगे। रजनी की बूर से एक बार फिर ज्वालामुखी फूट पड़ा था, वो थरथरा कर अपने बाबू से लिपट कर झड़ रही थी, उसकी बूर पूरा अपने बाबू के लंड को लीले संकुचित हो होकर रस छोड़ रही थी, उदयराज भी आंखें बंद किये झटके खाता हुआ अपनी बेटी की बूर में झड़ रहा था, लंड और बूर की रगड़ से निकला चुदाई का रस जाँघों से होता हुआ नीचे पत्थर पर और फिर नीचे जाकर नदी के पानी में मिलने लगा।

असीम चरमसुख की अनुभूति का अहसास दोनों बाप बेटी को मंत्र मुग्द कर गया काफी देर तक उदयराज और रजनी उस पत्थर पर एक दूसरे से लिपटे लंड और बूर मिलाए हुए लेटे रहे, उदयराज और रजनी दोनों ही काफी थक चुके थे, अपने बाबू द्वारा लगातार तीन बार धुँवाधार चुदाई से मानो रजनी की जाँघे जवाब दे गई हों, वो बेसुध सी हो गयी थी, बारिश अब हल्की हो चुकी थी, उदयराज ने रजनी को गोद में उठाया और नदी से निकलकर कुल वृक्ष के चबूतरे तक आया, अभी लगभग 3:30 हुए होंगे, उदयराज का अंगौछा और बाकी समान तो खेत में ही तैर रहा था तो उसने अपनी धोती जो तने के पास होने की वजह से ज्यादा खास गीली नही हुई थी उसको बिछाया। रजनी उस पर बैठ गयी और लेट गयी, उदयराज ने अपनी बेटी की साड़ी उठायी और अपनी बेटी के बगल लेटते हुए उसको बाहों में लेकर दुलारते हुए साड़ी ओढ़ ली और रजनी के कानों में बोला- बेटी, मेरी रानी, मैं जानता हूँ तुम बहुत थक चुकी हो, सुबह होने में अभी 2 घंटे हैं, तब तक सो जाओ।

रजनी- हाँ मेरे बाबू, मेरे सैयां, आप भी सो जाइए।

उदयराज ने रजनी के सर के नीचे अपना हाथ तकिया बना कर रख लिया, और उसको बाहों में लेकर सोने लगा, कुछ ही देर में दोनों बहुत थके होने की वजह से नींद की आगोश में जाने लगे, साड़ी के अंदर दोनों निवस्त्र थे, रजनी अपने बाबू से बिल्कुल चिपकी हुई थी, उदयराज का सुस्त पड़ चुका लंड रजनी की बूर की फांकों के बीच अब भी सटा हुआ था, दोनों कुछ देर के लिए सो गए।
 
Update- 42

इत्तेफ़ाक़ देखो उजाला होने के ठीक आधे घंटे पहले बिजली कड़की और रजनी की आंख खुल गयी, नियति आज बहुत प्रसन्न थी मानो उसी ने बिजली कड़काकर उन्हें जगाने की कोशिश की हो, बारिश थम तो गयी थी पर ऐसा लग रहा था कि महापाप का शुभ आरंभ होने की खुशी में आज मेघा पूरे दिन ही बरसेंगे। बरसों से चली आ रही जकड़न आज टूट चुकी थी, जंजीर आज टूट चुकी थी, एक नया सवेरा हो चुका था।

रजनी ने आंखें खोली तो उसकी आंखें कच्ची नींद में उठ जाने की वजह से काफी लाल थी, उसने आंखें मली और एक नज़र अपने बाबू पर डाला और बीती रात को क्या क्या हुआ ये सोचते हुए मुस्कुरा दी, उसने अपना चेहरा आगे कर अपने बाबू को धीरे से चूम लिया और धीरे से बोली- उठो बाबू सवेरा होने वाला है, उठो मेरे सैयां, इससे पहले की इधर कोई आ जाये चलो घर चलें।

रजनी के मीठे चुम्बन और नशीली आवाज से उदयराज की भी आंखें खुली तो उसने अपनी बेटी को बड़े प्यार से देखा जो उनकी आंखों में ही देखने की कोशिश कर रही थी क्योंकि अंधेरा अब भी था तो ज्यादा कुछ दिख नही रहा था, उदयराज ने रजनी को अपने ऊपर लेकर बाहों में भरकर चूम लिया, रजनी सिरह उठी और अपने बाबू की बाहों में समा गई, दोनों पूर्ण निवस्त्र थे, बस ऊपर से रजनी की साड़ी ओढ़ रखी थी वो भी इधर उधर से खुल ही गयी थी सोते वक्त।

रजनी- बाबू, अब उठो नही तो देर हो जाएगी, कोई भी इस तरफ आ सकता है।

उदयराज- हाँ, बेटी, चलो

रजनी उठी और एक अंगडाई ली, उदयराज ने लेटे लेटे अपनी बेटी को पहले तो अंगडाई लेते हुए देखता रहा फिर उठकर उसकी पीठ पर दो चार चुम्बन अंकित कर दिए, रजनी फिर सिसक गयी पर उदयराज आगे नही बढ़ा, अगर बढ़ता तो देर हो जाती, वो और रजनी जल्दी से उठे और अपने अपने कपड़े अंधेरे में पहने, हल्के बादल गरज रहे थे, बारिश फिर होने वाली थी।

रजनी- बाबू आपका अंगौछा, खेत में ही रह गया न, और डलिया और तेल भी।

उदयराज- हां, बेटी तू यहीं बैठ मैं लेकर आता हूँ।

उदयराज जल्दी से गया और खेत के पानी में तैर रहा अपना अंगौछा, डलिया और तेल की शीशी उठा लाया।

अब हल्का हल्का रोशनी होनी शुरू हो चुकी थी, हालांकि बादल छाए होने की वजह से सूरज की रोशनी खुलकर नही आई थी पर अंधकार मिटना शुरू हो चुका था।

उदयराज और रजनी ने एक दूसरे को देखा तो रजनी शर्मा गयी और उदयराज ने अपनी बेटी की इस अदा पर उसको अपनी बाहों में भर लिया।

उदयराज- थक गई न

रजनी ने शर्मा कर हाँ में सर हिलाया फिर पूछा- आप नही थके क्या बाबू?

उदयराज- रात भर मक्ख़न खाया है, मक्ख़न खाने से तो और ताकत आती है तो थकूंगा कैसे? हम्म

रजनी ने शर्माते हुए एक हल्का मुक्का अपने बाबू की पीठ पर मारा- बदमाश! बाबू, बहुत बदमाश बाबू हो आप, मेरा तो सारा मक्ख़न खा गए आप एक ही रात में (रजनी ने शरारत से कहा)

उदयराज- अभी सारा कहाँ खाया मेरी बेटी, अभी तो बस आगे की रसोई में रखा मक्ख़न खाया है। पीछे वाली रसोई को तो अभी ठीक से देखा भी नही। (ऐसा कहते हुए उदयराज ने रजनी के भारी नितम्ब साड़ी के ऊपर से दबा दिए)

रजनी अपने बाबू की बात का अर्थ समझते ही फिर शर्मा गयी, एक मुक्का और पीठ पर मारा- गन्दू, गन्दू बाबू, बदमाश! अच्छे बच्चे सिर्फ आगे की रसोई में घुस के खाना खाते है।

उदयराज- वो तो मैं खा चुका हूं न मेरी रानी बेटी, अभी तो आगे की रसोई में खाना खत्म।

रजनी- हां तो और बन रहा है न मेरे बाबू, जैसे ही पक जाएगा मैं अपने बाबू को खुद ही खिलाऊंगी। मेरे बाबू पीछे की रसोई न खाली देखने में बड़ी है, कुछ नही है उसमे और उसका तो दरवाजा भी बहुत छोटा है बाबू, कैसे जाओगे आप अंदर? (रजनी ने अपने बाबू को चिढ़ाते हुए कहा)

उदयराज- दरवाजा तो आगे वाली रसोई का भी छोटा ही था न मेरी रानी, कैसे मैंने तुम्हारी मदद से तीन बार अंदर जा के खूब मक्ख़न खाया, वैसे ही तुम अगर पीछे वाली रसोई का ताला तोड़ने में मदद करो तो हम दोनों मिलकर उसमे रखे असीम आनंद को लूटेंगे, और रही बात दरवाजे की तो उसकी फिक्र तुम न करो मेरी बिटिया रानी, क्या मुझे मेरी अपनी पीछे वाली रसोई में जाने का हक़ नही? (उदयराज ने ये बात रजनी के नितम्ब को सहलाते हुए कहा)

रजनी शर्माते हुए- ऐसे क्यों बोल रहे हैं मेरे बाबू, मेरा तो तन मन सबकुछ आपका है, मैं तो बस मजाक कर रही थी, मैं तो अपने बाबू को हर चीज़ का सुख दूंगी, जो उनको चाहिए।

उदयराज ने रजनी को और भी कस के गले लगा लिया- ओह मेरी बेटी, मैं कितना भाग्यशाली हूँ जो मुझे तुम जैसी बेटी मिली, जो मुझे इतना प्यार करती है।

रजनी- भाग्यशाली तो मैं भी हूँ बाबू, जो मुझे ऐसे बाबू मिले जिन्होंने मुझे इतना प्यार दिया कि मेरा तन और मन दोनों तृप्त हो गए।

उदयराज- आगे वाली रसोई में खाना दुबारा कब तक तैयार हो जाएगा? (उदयराज ने रजनी से वसनात्मय होते हुए कहा)

रजनी शर्माते हुए- हाहाहाहायययय .....बाबू! जल्द ही हो जाएगा बाबू, जैसे ही होगा मैं आपको इशारा कर दूंगी, तब तक आप पीछे वाली रसोई का ताला तोड़कर उसमे घुसकर असीम आनंद ले लेना।

उदयराज- सच्ची

रजनी- मुच्ची, मेरे बाबू सच्ची मुच्ची। पर पीछे वाली रसोई में डाका दिन में डालोगे तो और भी मजा आएगा, वो कहावत है न "दिन दहाड़े डाका डालना" (रजनी ने अपने मन की बात कही)

उदयराज- दिन में, मतलब मैं समझा नही।

रजनी- अरे मेरे बुद्धू सजना, मेरे बाबू, अपनी बेटी की पीछे वाली रसोई में डाका डालना है तो दिन में डालना, क्योंकि रात को तो आगे वाली रसोई में खाना खाया था न।

उदयराज- हाँ तो ठीक है, जैसी मेरी बेटी की इच्छा, पर कहाँ किस जगह, किस कमरे में, क्योंकि दिन में तो काकी भी रहेंगी न।

रजनी तपाक से- बाहर पेड़ के नीचे

उदयराज सन्न होते हुए- बाहर।

रजनी- हाँ मेरे बाबू बाहर।

उदयराज एक पल के लिए रजनी के साहस को देखता रह गया कि रजनी क्या बोल रही है, उसके अंदर ये कैसा रोमांच आ गया है वो किस तरह का रोमांच लेना चाहती है, मन में तो उसके भी गुदगुदी सी हुई कि दिन में ही, किसी ने देख लिया तो, फिर उसने सोचा कि छोरी छिपे कितना रोमांच आएगा जरूर इसी रोमांच को महसूस करने के लिए रजनी ये चाह रही है।

उदयराज- बाहर कहा, जब तुम इतना कह रही हो तो कोई जगह भी सोची होगी तुमने जरूर, मेरी जान।

रजनी- हाँ सोची है न मेरे राजा जी, दालान के बग़ल में जो अमरूद का पेड़ है उसके नीचे खाट बिछा के, वही पीछे वाली रसोई का खाना परोसुंगी अपने बाबू को।

उदयराज- और काकी आ गयी तो, या किसी ने देख लिया तो, अनर्थ हो जाएगा

रजनी- अब ये तो हमारी काबिलियत पर है बाबू की हम सबकी नजर बचा कर कैसे रोमांच का रसपान करें, और मुझे नही लगता कि मेरे बाबू इस बात से डरते होंगे।

उदयराज- वो तो अब वक्त ही बताएगा, चल अब (ऐसा कहते हुए उदयराज ने अपनी बेटी को बाहों में उठा लिया)

राजनी- ऊई मां, बाबू आप भी तो थक गए हो न, रहने दो मैं चल लूँगी धीरे धीरे।

उदयराज- अपनी रानी बेटी को अब मैं पैदल नही चलने दूंगा, जो मुझे मक्ख़न खिलाये उसको मैं भला पैदल चलने दूंगा।

रजनी खिलखिला कर हंस दी- अच्छा तो इतनी मेहनत मक्ख़न के लिए हो रही है।

उदयराज- हाँ और क्या, सेवा करेंगे तभी तो मेवा मिलेगा खाने को।

रजनी- बेटी का मेवा, सगी बेटी का

उदयराज- हां सगी बेटी का

रजनी फिर खिलखिलाकर हंस दी- बदमाश! बाबू, कोई सुन लेगा।

उदयराज- अभी तो हल्का हल्का अंधेरा है, अभी इस तरफ कोई नही आएगा, तब तक हम पहुँच जाएंगे, देखो बादल भी फिर से कितने छा गए हैं, लगता है आज बारिश ही होगी पूरे दिन।

उदयराज अपनी बेटी को बाहों में लिये कंधों पे उठाये अंधेरे में चल दिया अपने घर की ओर।

उदयराज और रजनी ऐसे ही बातें करते हुए घर के पास बाग तक पहुँच गए तो उदयराज ने रजनी को उतार दिया और रजनी अपने भारी नितम्ब को मटकाते हुए आगे आगे चलने लगी, अब उजाला हो चुका था।

रजनी और उदयराज के घर पहुचते ही काकी ने उन्हें देखा तो मुस्कुरा पड़ी और बोली- अरे मेरे बच्चों भीगे तो नही, सारी रात बारिश हुई आज तो और देखो अब भी बदल छाए है लगता है दिन भर बरसेंगे।

रजनी- हाँ काकी, बारिश की वजह से कुछ देर वहीं रुकना पड़ा, फिर आंख लग गयी और वहीं सो गए, गुड़िया रोई तो नही रात में।

काकी- नही, लेकिन अब उसको भूख लगी है जोर से, ले दूध पिला दे, तब तक मैं तुम दोनों के लिए नाश्ता बनाती हूँ।

रजनी- काकी रुको जरा मेरे कपड़े गीले हैं, मैं जरा बदल लूं।

काकी- हाँ जरूर, उदयराज तू भी कपड़े बदल ले

उदयराज और रजनी ने अपने कपड़े बदले, काकी रसोई में चली गयी नाश्ता बनाने, रजनी ने अपने बाबू को मुस्कुराकर दिखाते हुए अपना ब्लॉउज खोल के दायीं चूची निकाली और बच्ची के मुँह में डाल दी, उदयराज कुछ देर अपनी बेटी की मोटी सी गोल चूची देखता रहा फिर उसने इशारे से उसको ढक लेने के लिए कहा क्योंकि बच्ची दूध पी रही थी,रजनी ने आँचल से स्तन को ढक लिया।

उदयराज उठा और घर का काम करने लगा, जानवरों को चारा दिया और फिर जाकर नहाया, रजनी भी नहा धोकर फ्रेश हो गयी और सबने मिलकर नाश्ता किया।

काकी- मुझे मालूम है की रात भर तुम लोग बारिश की वजह से जागे हो तो जाकर आराम कर लो।

रजनी- जी काकी, लेकिन खाना आप मत बनाना मैं दिन में बनाउंगी, आप परेशान मत होना।

काकी- ठीक है बेटी तू पहले सो ले जा के ठीक से।

रजनी घर में सोने चली गयी, उदयराज भी बरामदे में लेटकर सो गया, काकी बच्ची को खिलाने लगी, बादल एक बार फिर बरसने लगे। काकी मन ही मन मुस्कुरा रही थी।
 


Update- 43

(तो चलिए उदयराज और रजनी को सोने देते हैं और चलते हैं नीलम के घर, यहां कहानी में थोड़ा पीछे आना पड़ेगा, आइए थोड़ा पीछे जाकर नीलम की जिंदगी में देखें क्या क्या घटित हुआ।)

उस दिन अपनी माँ को वचन देने के बाद, कि कभी भी बाबू को ऐसा कुछ हुआ तो मैं वही करूँगी जो आपने सपने में देखा था, नीलम बहुत खुश थी, एक तो वो इस बात से खुश थी कि उसकी माँ ने ऐसा सपना देखा और सपने में जैसा हुआ था उसे समस्या का समाधान मानके अपनी बेटी से वैसा ही करने का वचन लिया, दूसरा उसकी माँ इस तरह की बातें आज जीवन में पहली बार करके उसके मन के और नजदीक आ गयी थी, परंतु उसने फिर सोचा कि नही वो अपने बाबू बिरजू को खुद ही अपना रसीला यौवन दिखा दिखा के रिझाएगी, आखिर कभी तो उसके बाबू उसपर टूट पड़ेंगे तब आएगा मजा, आखिर एक प्यासा मर्द कब तक अपने आप को रोकेगा। अपने बाबू की मन की हल्की हल्की मंशा को नीलम जान चुकी थी और वो ये भी जानती थी कि उसकी अम्मा अब बाबू को अपना मक्ख़न नही दे पाती हैं खाने को और बिना मक्ख़न के मर्द कैसे और कब तक रहेगा।

उस दिन छत पर गेहूं फैलाते वक्त जब से उसने अपने बाबू बिरजू का काला खुला हुआ लन्ड देखा था, तभी से वो बहुत विचलित थी और कामाग्नि में जल रही थी, बिरजू को तो ये बात पता भी नही थी कि उसकी बेटी उसका क्या देख चुकी है, पर जब छुप छुप के बाहर काम करते हुए वो अपने बाबू को निहारती और बिरजू द्वारा देख लिए जाने पर जान बूझ कर मुस्कुराते हुए इधर उधर देखने लगती तो बिरजू को भी कुछ कुछ होता था।

नीलम रंग में रजनी से बस हल्का सा कम थी पर शरीर में थोड़ा सा भारी थी, नीलम की मस्त चूचीयाँ कयामत ला देने वाली चूचीयों की श्रेणी में आती थी और नैन नक्श में वो रजनी को बराबर का टक्कर दे देती थी, उसकी लंबाई रजनी से थोड़ी कम थी जिस वजह से वो रजनी से थोड़ा ज्यादा भारी दिखती थी, जब वो चलती थी तो उसकी भारी गांड देख के उसके बाबू का मन डोल ही जाता था, अपनी सगी शादीशुदा बेटी पर उसका मन आसक्त होता था और नीलम यही तो चाहती थी।

नीलम की शादी हुए चार साल हो चुके थे पर अभी तक उसको बच्चा नही हुआ था, बच्चे के लिए मन ही मन वो बहुत तरसती थी, इस वजह से उसने नियमित रूप से पूजा पाठ भी शुरू कर दिया था, जैसा भी जो लोग करने के लिए बोलते थे वो उसको नियम से करती थी, अपने पति से उसका इस बात को लेकर कभी कभी मनमुटाव और हल्का फुल्का झगड़ा भी हो जाता था, और जब उसका दिमाग ज्यादा खराब होता तो वो ससुराल से मायके आ जाती थी और तीन चार महीने रहकर ही जाती थी। नीलम का अपने पति से बच्चे को लेकर इसलिए झगड़ा होता था क्योंकि नीलम को बहुत अच्छे से पता था कि उसके पति का वीर्य बहुत पतला था और वो इसी को इसका कारण मानती थी, अपने पति को वो इसका इलाज कराने के लिए बोलती तो उसका पति अपनी मर्दानगी पर लांछन समझकर चिढ़ जाता था और अक्सर झगड़ा कर लेता था हालांकि नीलम से वो डरता था, नीलम उसपर भारी पड़ती थी, उसपर ही क्या वो अपने ससुराल में दबदबा बना कर रहती थी, पर दिल की बहुत अच्छी थी, ससुराल में जब भी रहती सारा घर संभाल कर रखती थी, उसकी सास भी उससे ज्यादा बहस नही करती थी, पर वो ये मानने को तैयार नही होती थी कि उसके बेटे में कमी है, खैर नीलम भी अपनी सास के सामने कभी इस बात का जिक्र नही करती थी और न ही करना ठीक समझती थी, पर चिंता तो सबको ही थी, नीलम की सास को भी और नीलम की माँ को भी, बस चिंता नही थी तो उसके पति को, वो बोलता था कि जब जो होना होगा हो जाएगा, मैं क्या करूँ और नीलम इस बात से चिढ़ भी जाती थी और अक्सर वो अपने मायके आ जाती थी उसके ससुराल में भी काम धाम संभालने वाली उसकी देवरानी और उससे बड़ी जेठानी थी तो उसकी वजह से वहां काम रुकता नही था, जिस वजह से वो अक्सर अपने मायके में रह लेती थी।

एक दिन नीलम की माँ ने नीलम से कहा- बेटी तेरे नानी के यहां एक बुढ़िया है जो ओझाई का काम करती है छोटा मोटा, लोग कहते हैं कि वो कुछ जड़ी बूटियां देती है जिससे बच्चे न होने की समस्या हल हो जाती है, पता नही कितना सच है कितना झूट, मेरा तो मन कर रहा है कि किसी दिन तेरे नानी के घर जा के मिल कर आऊं उस बुढ़िया से, तू ठीक लगे तो बोल मैं जाती हूँ किसी दिन।

नीलम- अम्मा, जो भी जैसा भी लोग बोलते हैं मैं सब करती हूं, अगर आपको ऐसा लगता है तो किसी दिन चली जाओ और मेरी जरूरत पड़े तो मैं भी चलूंगी।

नीलम को माँ- अभी नही पहले मैं जाउंगी अकेले फिर देखो वो क्या बताती है, क्या कहती है, काफी पहले मैंने सुना था उसके बारे में, पता नही अब वो बुढ़िया जिंदा भी है या नही।

नीलम- अम्मा मेरा मन तो नही मानता की मेरे अंदर कोई कमी है, वैसे भी हमारे गांव में बच्चे जल्दी होते कहाँ हैं ये बात तो आप भी जानती हो न, क्या पता वही असर हो, इसी समस्या का हल ढूंढने के लिए तो रजनी दीदी और बड़े बाबू देखो तीन चार दिन कितना डरावना सफर करके महात्मा से मिलकर उस समस्या का हल लेकर आये हैं अब वो जैसे ही यज्ञ करेंगे सब ठीक हो जाएगा और एक बात और भी है जो मैं तुम्हे बता चुकी हूं, मैं उन्हें बहुत बोलती हूँ इलाज़ कराने के लिए पर वो मेरी सुनते ही कहाँ हैं, उन्हें तो जैसे कोई चिंता ही नही है।

नीलम की माँ- देख बेटी वजह चाहे जो भी हो पर कहीं कुछ पता चलता है जो जाकर कर लेने में क्या हर्ज है, तू चिंता न किया कर, तेरी कोख भी ईश्वर जल्द ही भरेंगे मेरा दिल कहता है, तू खुश रहा कर, ईश्वर सबकी सुनता है। मैं जाती हूँ किसी दिन तेरे नानी के घर। वो नही ध्यान देता तो छोड़ तू उसको, तेरी सास तो तेरे को लांछन नही देती न।

नीलम- नही अम्मा लांछन तो नही देती पर वो मुझे कम मानती है, देवरानी और जेठानी को ज्यादा मानती हैं, हालांकि कभी वो सीधा मुझसे नही कहती पर उनके हाव भाव से मुझे लग जाता है।

नीलम की माँ- तू चिंता न कर सब ठीक हो जाएगा मेरी बच्ची।

ऐसा कहकर नीलम की माँ उसको गले लगा लेती है।

नीलम के घर के आगे द्वार पर एक बहुत बड़ा जामुन का पेड़ था और जामुन था भी मीठा वाला, बड़े बड़े और काले काले जामुन लगते थे उनमे, गांव के बच्चे अक्सर जामुन के चक्कर में वहीं डेरा जमाए रहते थे, ज्यादातर बच्चे पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते कि पेड़ पर चढ़कर अच्छे अच्छे जामुन तोड़ेंगे, नीचे गिरकर जामुन बेकार हो जाते हैं, मीठे जामुन होने की वजह से ततैया भी उन्हें खाने ले लिए पेड़ पर मंडराती रहती थी, बच्चे नीलम की मां से डरते थे क्योंकि वह पेड़ पर चढ़ने से डांटती थी, जब भी वो देखती की बच्चे पेड़ पर चढ़ रहे है और ज्यादा शरारत कर रहे है या शोर मचा रहे हैं तो डंडा लेकर उन्हें खदेड़ लेती थी, हालांकि वह ज्यादा फुर्ती से भाग नही पाती थी पर जामुन के पेड़ पर नजर रखती थी कहीं बच्चे उसपर चढ़े न और अपने हाँथ पांव न तुड़वा बैठें।

नीलम ये सब देखकर खूब हंसती थी, अपने घर पे बच्चों के इस तरह आकर खेलना, जामुन खाना और उनका जेब में भर भर के अपने घर ले जाना नीलम को बहुत अच्छा लगता था। बच्चे अक्सर नीलम से ही जामुन खाने और तोड़ने की आज्ञा मांगते थे और जब नीलम बोल देती थी कि जाओ खा लो, तोड़ लो, तो सीना चौड़ा करके जमीन पर पेड़ के नीचे गिरे सारे जामुन बिन लेते थे, कुछ बच्चे बड़ी सी लग्गी लेके आते और अच्छे अच्छे जामुन तोड़कर नीलम को भी देते खुद भी खाते और घर भी ले जाते, नीलम को ये सब देखकर बहुत सुकून मिलता था, इन प्यारे प्यारे मासूम बच्चों और बच्चियों को देखकर। नीलम खुद छोटी छोटी बच्चियों को लग्गी से अच्छे अच्छे जामुन तोड़कर देती थी और जब वो बच्चियां घर से कुछ लेकर नही आई होती थी तो उनकी फ्रॉक के आगे के हिस्से को उठाकर जामुन उसमे भर देती थी, वो छोटी छोटी बच्चियां अपने फ्रॉक को आगे से उठाए उसमे जामुन भरे हुए नन्हे नन्हे कदमों से चलकर अपने घर जाती तो देखकर बहुत अच्छा लगता, नीलम तो उन्हें देखकर बहुत खुश होती थी। नीलम की मां भी बच्चों के मामले में खड़ूस नही थी पर वो उन्हें इसलिए डांटती थी कि कहीं पेड़ से गिर कर चोट न लगा लें।

तो जब तक नीलम के घर के आगे जामुन के पेड़ पर जामुन लगे रहते तब तक उसके घर पेड़ के नीचे गांव के बच्चों का जमावड़ा अक्सर शाम को या दोपहर को लगा रहता था। नीलम भी उनके साथ खाली वक्त में अपना मन बहलाने के लिए या जामुन तोड़ने में उनकी मदद करने के लिए हँसती खिलखिलाती लगी रहती थी, हर उम्र के छोटे बडे बच्चे वहां आते थे जामुन खाने। सब बच्चे नीलम को दीदी कहकर बुलाते थे।

एक दिन नीलम की माँ ने नीलम से और उसके बाबू बिरजू से अगले दिन शाम को नीलम की नानी के घर जाने के लिए कहा तो बिरजू बोला- हाँ ठीक है चली जाओ पर जल्दी आ जाना एक दो दिन में।

नीलम की माँ- अरे नीलम के बाबू मैं कल शाम को जाउंगी और उसके अगले दिन ही आ जाउंगी, मुझे रुकना थोड़ी है वहां। वो तो मैं किसी काम से जा रही हूँ।

बिरजू- कैसा काम?

नीलम की माँ- है कुछ काम, जरूरी है तुम्हे पहले से ही सब बताऊं, जब सफल हो जाएगा तो बता दूंगी, कुछ काम औरतों वाले भी होते हैं मर्दों को नही बताये जाते पहले।

बिरजू हंसता हुआ नीलम को देखकर- अच्छा बाबा ठीक है, जाओ।

अपने बाबू को अपनी तरफ देखते हुए देखकर नीलम शर्मा गयी।

रात को खाना खाने के बाद जब बिरजू बाहर सोने चला गया तो नीलम ने अपनी माँ से कहा- अम्मा अपने जामुन के पेड़ में बहुत जामुन लगे हैं तो तुम कल जामुन भी लेते जाना नाना नानी और मामा मामी के लिए, मैं तोड़ दूंगी।

नीलम की माँ ने पहले तो मना किया फिर नीलम की जिद पर मान गयी।

अगली सुबह नीलम ने अपने बाबू बिरजू को अपना मदमस्त यौवन दिखाने की सोचकर उनके किसी काम से निकलने से पहले ही उसने बोली- बाबू आप जा रहे है काम से।

बिरजू- हाँ बिटिया, क्या हुआ, मेरी बेटी को कुछ काम है क्या मुझसे?

नीलम- हां है तो

बिरजू- तो बोल न शर्माती क्यों है।

नीलम की मां उस वक्त सुबह सुबह लायी हुई घास मशीन के पास बैठकर पीट रही थी। (गांव में क्या होता है कि खेत से घास छीलकर लाने के बाद उसको किसी छोटे डंडे से पीटते हैं ताकि उसकी मिट्टी निकल जाए, फिर उसको मशीन में लगाकर छोटा छोटा काटते हैं और फिर उस घास में भूसा मिलाकर जानवर को खाने को देते हैं तो नीलम की माँ उस वक्त घास को डंडे से पीट रही थी)

नीलम ने आज नहा कर जानबूझ कर घाघरा चोली पहना हुआ था और नीचे काली रंग की पैंटी पहनी हुई थी।

बिरजू अपनी बेटी को आज घाघरा चोली में देखकर निहारे जा रहा था, नीलम मंद मंद अपने बाबू को चोर नज़रों से घूरते हुए देखकर सिरह सिरह जा रही थी और उसे बड़ा मजा आ रहा था।

नीलम- बाबू मेरी जामुन तोड़ने में मदद करो न, अकेले कैसे तोडूं, अम्मा आज नाना के घर जाएंगी तो मैंने सोचा था कि अपने यहां के अच्छे पके हुए जामुन तोड़कर भेजूंगी पर बिना आपके कैसे होगा?

बिरजू- हां तो बेटी चल न तोड़ देता हूँ, इतना कहने में तुझे संकोच क्यों हो रहा है वो भी अपने बाबू से।

नीलम- मुझे लगा क्या पता आप मना कर दो।

बिरजू- मना क्यों कर दूंगा, अपनी प्यारी बेटी की हर इच्छा पूरा करना बाप का फर्ज होता है, चाहे छोटी चीज़ हो या बड़ी।

नीलम- अच्छा तो फिर ठीक है, अब नही शरमाउंगी बोल दूंगी जो भी इच्छा होगी, पूरा करोगे न। (नीलम ने डबल मीनिंग में बोला पर बिरजू अभी समझ न पाया)

बिरजू- क्यों नही करूँगा, मेरी तू ही तो प्यारी सी बेटी है, ऐसा कभी मत सोचना अब ठीक है, चल।

सवेरे की खिली खिली धूप निकल आयी थी, नीलम एक खाट लेके आयी और उसको जामुन के पेड़ के नीचे बिछा दिया और उसपर एक पुराना चादर डाल दिया फिर अपने बाबू से बोली- बाबू आप न इस खाट के बगल में खड़े रहो, मैं पेड़ पर चढ़ती हूँ।

ये सुनकर बिरजू बोला- अरे नही बेटी तू यहीं खाट के पास रह मैं पेड़ पर चढ़कर तोड़ देता हूँ पर नीलम मानी नही क्योंकि उसको पेड़ पे चढ़कर अपने बाबू को कुछ दिखाना था, घाघरा उसने इसी लिये पहना था आज।

नीलम नही मानी, बिरजू ने एक बार नीलम की माँ को देखा जो बैठकर घास पीटने में व्यस्त थी, उसको तो पता भी नही था कि नीलम और बिरजू कर क्या रहे हैं, वो बस डंडे से पट्ट पट्ट की आवाज करते हुए घास पीटे जा रही थी पीछे क्या हो रहा था उसे पता नही और लगातार डंडे ही आवाज से उसे कुछ सुनाई भी नही दे रहा था।

नीलम जामुन के पेड़ पर चढ़ने के लिए अपनी चुन्नी को कमर पर बांधने लगी, बिरजू अपनी बेटी की सुंदरता को मंत्रमुग्द होकर देखे जा रहा था, उसके भीगे बालों की लटें, माथे पे छोटी सी बिंदिया, मांग में सिंदूर, कान की हिलती हुई झुमकियाँ, लाली लगे रसीले होंठ और वो गज़ब के मस्त मोटे मोटे तने हुए, चोली में कसे हुए दोनों जोबन और अपनी कमर में चुन्नी बांधते हुए वो कितनी खूबसूरत लग रही थी, कमर में कस कर चुन्नी बांधने से उसकी दोनों उन्नत चूचीयाँ और भी उभरकर बाहर आ गयी थी।

नीलम ने जैसे ही कमर में चुन्नी बांधकर अपने बाबू की तरफ देखा तो वो उसे ही मंत्रमुग्ध सा देख रहा था, एक पल के लिए नीलम मुस्कुरा उठी अपने बेटी से नज़र मिलते ही बिरजू भी मुस्कुरा दिया तो नीलम धीरे से बोली- ऐसे क्या देख रहे हो बाबू,।

बिरजू- अपनी बेटी की सुंदरता, आज क्या बला की खूबसूरत लग रही है मेरी बेटी इस घाघरा चोली में।

नीलम का चेहरा शर्म से लाल हो गया क्योंकि बिरजू ने आज से पहले कभी ऐसा नही कहा था, नीलम के छोड़े गए तीर सही जगह पर जा जा के लग रहे थे।

नीलम- अच्छा जी, बाबू आज से पहले तो आपने कभी ऐसा नही कहा, क्या मैं तब सुंदर नही थी।

बिरजू- सुंदर तो तू मेरी बेटी हमेशा से ही है पर मैंने आज तुझे ध्यान से और.........

बिरजू रुककर नीलम की माँ की तरफ देखने लगता है नीलम भी एक नज़र अपनी माँ पर डालती है जो मस्त मौला बेखबर होकर घास पीटे जा रही थी।

नीलम- बोलो न बाबू आज अपने मुझे ध्यान से और.....और क्या? बोलो न.... अम्मा तो घास पीट रही है नही सुनेगी, बोलो न धीरे से।

बिरजू- और...... दिल से देखा है, पता नही क्यों, तू सच में बहुत खूबसूरत है

नीलम- सच बाबू, आपको मैं इतनी अच्छी लगने लगी हूँ, ऐसा क्या है मुझमें, मैं तो आपकी बेटी हूँ न, सगी बेटी।

बिरजू- हाँ है तो मेरी बेटी, मेरी सगी बेटी, पर तू मुझे अच्छी लगती है तो क्या करूँ, तू सच में बहुत......

नीलम- बहुत क्या बाबू.....बोलो न

बिरजू ने एक बार फिर नीलम की माँ की तरफ देखा तो नीलम भी फिर अपनी माँ को देखने लगी।

बिरजू- बाद में बताऊंगा और कहकर नीलम की आंखों में देखने लगा।

नीलम- जब अम्मा नानी के यहां चली जायेगी।

बिरजू- हाँ

नीलम- तो आप जल्दी घर आ जाना आज, मैं आपका इंतजार करूँगी, आपकी बेटी आपका इंतजार करेगी आज रात।

इतना कहकर नीलम का चेहरा वासना में लाल हो गया और वो अपने बाबू की आंखों में देखकर मुस्कुराने लगी।

बिरजू को भी आज इतना अच्छा लग रहा था की वो आसमान में उड़ने लगा, अपनी ही सगी बेटी से उसे मोहब्बत होती जा रही थी और उसकी बेटी के मन में भी यही था अब ये उसे थोड़ा थोड़ा आभास हो गया था।

दोनों मंत्रमुग्द से एक दूसरे को देखते रहे कि तभी नीलम बोली- बाबू चलो मुझे पीछे से सहारा देकर पेड़ पर चढ़ाओ नही तो मैं चढ़ नही पाऊंगी, देखो कितना मोटा है इसका तना।

बिरजू- हाँ चल, तू चढ़ मैं तुझे पीछे से तुझे उठाता हूँ।

नीलम ने अपने दोनों हांथों से जामुन के पेड़ के तने को पकड़ा और अपना सीधा पैर उठा कर तने पर चढ़ने के लिए लगाया जिससे उसकी भारी विशाल गांड की चौड़ी चौड़ी गोलाइयाँ बिरजू को पागल कर गयी और नीलम ये बात जानती थी उसने ये सब प्लान जानबूझकर बनाया ही था इसलिए उसने जानबूझकर भी अपनी गांड को और भी पीछे को निकाल लिया, बिरजू अपनी बेटी की गांड बहुत नजदीक से देखता रह गया, नीलम समझ गयी कि उसके बाबू की नज़र कहाँ है, वो मंद मंद मुस्कुराते हुए बोली- बाबू हाँथ लगाओ न, ऐसे ही देखते रहोगे क्या, जो भी देखना है बाद में देख लेना, अभी मुझे चढ़ाओ पेड़ पर।

नीलम ने ये लाइन "जो भी देखना है बाद में देख लेना" जानबूझकर धीरे से बोली और उदयराज अपनी सगी बेटी के इस निमंत्रण पर अचंभित सा रह गया और धीरे से बोला- बाद में कब?

नीलम मुस्कुराते हुए- जब अम्मा चली जायेगी नानी के घर तब रात में।

बिरजू की सांसें ये सुनकर अब तेज चलने लगी नीलम की भी सांसे ये सोचकर काफी तेज चलने लगी कि आज वो ये क्या क्या कर और बोल रही है, उसके अंदर इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई है, बोलते बोलते उसका चेहरा भी शर्म से लाल हो गया था, पर नीलम ने सोचा था कि वो पहल जरूर करेगी ताकि उसके बाबू को आगे बढ़ने के लिए सिग्नल मिल सके, पर वो इस द्विअर्थी बातों से खुद भी बहुत उत्तेजित होती जा रही थी।

एकाएक बिरजू ने नीलम की पतली मखमली कमर को अपने दोनों हाँथ से पकड़ा और ऊपर को उठाने लगा, कमर को पकड़ते ही बिरजू को जैसे बिजली का झटका सा लगा, अपनी जवान सगी शादीशुदा बेटी के मखमली बदन को वो आज पहली बार उसकी जवानी में छू रहा था, बेटी के जवान हो जाने के बाद वो केवल बेटी नही रहती वो एक स्त्री भी हो जाती है और जवान होने के बाद पिता अपनी बेटी के बदन से इसलिए दूर भी रहता है क्योंकि कामभावना जागने का डर रहता है फिर चाहे वो सगी बेटी ही क्यों न हो, यही हाल इस वक्त बिरजू का था आज पहली बार उसने जब अपनी सगी बेटी नीलम के बदन को छुवा तो उसकी कामवासना जाग गयी।

बिरजू ने नीलम को कमर से पकड़कर ऊपर को उठाने की कोशिश की पर नीलम भारी बदन की मलिका थी, सिर्फ कमर पर हाँथ लगाने से आसानी से उठ जाती ये तो मुमकिन ही नही था, नीलम ने भी पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की पर फिसलकर फिर नीचे आ गयी।
 
Update- 44

नीलम ने पलटकर अपने बाबू को देखा और फिर अपनी माँ की तरफ देखा फिर बोली- बाबू ठीक से पकड़कर उठाओ न, दम लगा के ऐसे तो मैं चढ़ ही नही पाऊंगी, उस डाल तक उठा दो बस वो पकड़ में आ जाये फिर तो मैं चढ़ जाउंगी।

बिरजू ने भी एक बार पलटकर नीलम की माँ को देखा, वो अपने काम में मस्त थी, बिरजू ने नीलम को बोला थोड़ा इधर आ इस तरफ से चढ़, बिरजू और नीलम पेड़ के तने के दायीं ओर आ गए और पेड़ के मोटे तने के पीछे छुप से गये, वहां से नीलम की माँ दिख नही रही थी, पेड़ से ओट हो गया था।

नीलम ने फिर कोशिश की, बिरजू ने जैसे ही कमर को हाँथ लगाया नीलम ने अपने बाबू का हाँथ खुद ही पकड़कर अपने विशाल चूतड़ पर रख दिया और बोली- बाबू कमर पर नही यहां हाँथ लगा के उठाना, और अपने बाबू को देखकर हंस दी फिर बोली- अब तो अम्मा भी नही दिख रही यहां से, अब मुझे सहारा दो अच्छे से।

बिरजू भी हंस दिया और बोला- ठीक है चल, जल्दी कर।

नीलम ने एक पैर पेड़ के तने पर रखा और दोनों हांथों से तने को पकड़ा, बिरजू ने जैसे ही अपना एक हाँथ नीलम की कमर पर लगाया और दूसरा हाँथ उसकी चौड़ी मांसल गांड पर लगाया, नीलम और बिरजू दोनों एक साथ सिरह उठे, क्या मस्त गुदाज गांड थी नीलम की, बिरजू बावला सा हो गया, बिरजू के हाँथ की उंगलियाँ मानो नीलम की गुदाज फूली हुई गांड में धंस सी गयी।

नीलम- ऊऊऊऊईईईईईई.....बाबू.....हाँ ऐसे ही उठाओ, जोर लगाओ, पकड़े रहना, बस वो डाली पकड़ लूं मैं।

नीलम ने थोड़ा ऊपर चढ़कर अपने हाँथ से उस डाली को पकड़ने की कोशिश की, वो डाली उसकी पहुंच से सिर्फ एक फुट ऊपर थी।

बिरजू तो मस्त हो चुका था अपनी सगी बेटी के मांसल बदन को छूकर और उसकी मदमस्त चौड़ी गांड को दबोचकर।

बिरजू- हाँ चढ़ बेटी, मैंने पकड़ा है नीचे से, गिरेगी नही।

ऐसा कहते हुए बिरजू ने अपना दूसरा हाँथ भी कमर से हटा कर नीलम के दूसरे चूतड़ पर रख दिया और अब दोनों हांथों से उसके चूतड़ के दोनों उभार थाम लिए, अपनी बेटी के मादक गरम गुदाज गांड की लज़्ज़त और नरमी का अहसास मिलते ही बिरजू के लंड में हलचल होने लगी। उसने एक पल के लिए आंखें बंद कर ली। नीलम भी सिरहते और शर्माते हुए डाली को पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

बिरजू का मन कर रहा था कि अपना हाँथ अपनी बेटी की गांड की महकती दरार पर रख दे पर संकोच उसे रोक ले रहा था, तभी नीलम बोली- बाबू और जोर लगाओ न, और उठाओ मुझे, इसलिए बोलती हूँ दूध पिया करो ताकत रहेगी, पीते तो हो नही, उठाओ और जोर से मुझे। (नीलम ने double meaning में कहा)

बिरजू अपनी बेटी की बात का अर्थ समझ गया और बोला- दूध है ही कहाँ जो पियूँ बेटी, तुझे तो पता है गाय बूढ़ी हो गयी है अब कहाँ दूध होता है उसको।

नीलम- अच्छा, बहाना मत करो, जिसको दूध पीने की इच्छा होती है न वो कैसे न कैसे करके घर में या बाहर से दूध की व्यवस्था कर ही लेता है, गाय बूढ़ी हो गयी तो क्या हुआ उसकी जवान बछिया तो है न। (नीलम ने double meaning में खुला निमंत्रण सा दिया अपने बाबू को और ये बोलकर वो खुद सिरह गयी, शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया, हालांकि उसका चेहरा ऊपर की तरफ था)

(नीलम के घर में सच में एक गाय थी जो बूढ़ी हो चुकी थी और इत्तेफ़ाक़ से उसकी एक जवान बछिया भी थी पर अभी उसकी मैचिंग किसी बैल से नही हुई थी तो उसको कोई बच्चा नही हुआ था और जब बच्चा ही नही हुआ था तो उसको दूध कैसे होता, इसी गाय और बछिया को लेकर नीलम और बिरजू डबल मीनिंग में कामुक बातें करने लगे)

बिरजू- पर बछिया को दूध आता ही कहाँ है बेटी, जब तक उसको बच्चा नही होगा वो दूध नही देगी और बाहर का दूध मैं पियूँगा नही।

नीलम- सच, आप बाहर का दूध नही पियोगे।

बिरजू- नही, बिल्कुल नही।

नीलम- तब तो फिर बछिया को जल्दी बच्चा देना होगा, पर वो बेचारी अकेली तो बच्चा कर नही सकती न, अब तो किसी बैल को बुलाना होगा न बाबू।

(और इतना कहती हुई नीलम खिलखिलाकर अपने बाबू को नीचे की तरफ देखती हुई हंस दी, बिरजू भी नीलम की गुदाज गांड को अपने दोनों हांथों से पकड़े पकड़े हंस दिया, दोनों के चहरे और कान वासना की गर्माहट से लाल हो चुके थे, दोनों ने एक बार फिर पेड़ की ओट से झांककर नीलम की माँ को देखा तो वो बस घास ही पीटने में लगी थी)

बिरजू- हाँ अगर दूध पीना है तो उसको बैल के पास तो ले जाना ही पड़ेगा।

नीलम- इस पर हम बाद में बात करेंगे, क्योंकि आपकी सेहत की बात है और मैं अपने बाबू की सेहत से समझौता नही कर सकती।

बिरजू- कब बात करेगी मेरी बेटी इस विषय में।

नीलम- जब अम्मा नही रहेंगी तब, रात को....ठीक, रुक क्यों गए ऊपर को ठेलों न मुझे बाबू, लटकी हुई हूँ बीच में मैं, उठाओ जोर से।

जैसे ही बिरजू ने तेज जोर लगाने के लिए दम लगाया, न जाने कहाँ से एक लाल ततैया आ के बिरजू के हाँथ पर बैठ गयी और बिरजू ने हाँथ तेज से झटका, ततैया तो फुर्र से उड़ गई पर ऊपर को चढ़ने की कोशिश कर रही नीलम का बैलेंस बिगड़ा और वो सीधे नीचे सरक कर अपने बाबू पर इस तरह गिरी की उसकी भारी गुदाज गांड बिरजू के चहरे पर बैठ गयी, बिरजू की नाक सीधे नीलम की मक्ख़न जैसी मुलायम गांड की दरार में जा घुसी।

नीलम- अरेरेरेरेरे.......ऊऊऊऊऊईईईईईईईई.......... बाबू........अरे मैं गिरी.....पकड़ो मुझे........बाबू........आआआआआआआआह हहहहहहहहहहहह......बाबू आपको लगी तो नही।

लगने की बात तो दूर, बिरजू ने ये सोचा भी नही था कि अचानक ऐसा हो जाएगा आज जीवन में पहली बार ये क्या हो रहा था, पर जो हो रहा था उसमें वो खो गया, आखिर इस लज़्ज़त को भला वो कैसे जाने देता जिसके लिए वो मन ही मन तरसता था। ये समझ लो की नीलम अपने बाबू के चेहरे पर अपनी भारी गांड रखकर बैठ चुकी थी, अपनी ही जवान सगी शादीशुदा बेटी की इतनी गुदाज गांड की दरार में एक दिन अचानक उसका मुँह घुस जाएगा ये बिरजू ने कभी सोचा नही था और न ही नीलम ये सोचा था।

नीलम की रसभरी चौड़ी गांड की मदहोश कर देने वाली भीनी भीनी महक को बिरजू सूंघने लगा, उसने जानबूझ के अपनी नाक को और नीलम की गांड की दरार में घुसेड़ दिया और अच्छे से अपनी सगी शादीशुदा बेटी की गांड की महक को जी भरकर सूंघने लगा, नीलम धीरे से शर्माते हुए अपनी मोटी गांड और मांसल जांघे आपस में भींचते हुए चिहुँक उठी, एकाएक अपने बाबू की नाक और मुँह अपनी गांड की गहराई और बूर के पास महसूस करके नीलम चौंक सी गयी और चिहुँकते, शर्माते हुए

ऊऊऊऊईईईईईई.......माँ की कामुक आवाज निकलते हुए सिरह उठी और कुछ देर तो वो खुद ही मदहोशी में अपने बाबू के मुँह पर अपनी गांड और बूर रखे बैठी सिसकती रही उसे काफी गुदगुदी भी हो रही थी।

फिर वो समझ गयी कि उसके बाबू दीवाने हो चुके है और उसकी गांड और बूर के छेद को कपड़ों के ऊपर से ही सूंघने में लगे हुए हैं, बिरजू ने दोनों हाँथों से नीलम की कमर को पकड़ रखा था, नीलम के दोनों पैर पेड़ के तने पर ही थे और हांथों से नीलम ने तने को घेरा बना के कस कर पकड़ा हुआ था, नीलम अब शर्म से गड़ी जा रही थी, अपनी गांड की मखमली दरार में और बूर पर उसे अपने बाबू की नाक और दहकते होंठ महसूस हुए तो वो फिर से चिहुँक उठी और उसके मुँह से भी जोर से मादक सिकारियाँ निकल गयी, ये सब इतनी जल्दी हुआ कि न तो नीलम ही संभाल पाई और न ही बिरजू और जो होना था वो हो चुका था, अपनी सगी बेटी की गांड और बूर की खुशबू और उसका अच्छे से अहसास करके बिरजू बेकाबू सा होने लगा।

नीलम ने समय की नजाकत को समझते हुए, शर्माते हुए, अपने को बेकाबू होने से संभालते हुए अपनी अम्मा की तरफ एक नज़र घुमा के पेड़ की ओट से देखा और अपने चौड़े चूतड़ और बूर की खुशबू लेकर मदहोश हो चुके अपने बाबू से उखड़ती सांसों से बोला- बाबू.....अम्मा देख लेगी...बस करो न...बाद में कर लेना ऐसा.....बस करो न बाबू।

बिरजू ने जब ये सुना तो उसकी बांछे खिल गयी और फिर उसने नीलम के दोनों चूतड़ पर अपने हाँथ लगा के ऊपर को उठा दिया और तेज चल रही सांसों को संभालते हुए बोला- बाद में कब बेटी? मुझे तेरे बदन से आ रही ये मदहोश कर देने वाली खुशबू लेना है, कितनी अच्छी है ये, खुशबू लेने देगी मुझे?

नीलम- रात को जब अम्मा चली जायेगी, तब कर लेना जो भी करना हो (नीलम ने ये बात बहुत उत्तेजना से धीरे से बोली)

बिरजू- सच, करने दोगी।

नीलम- हाँ बाबू, बिल्कुल, क्यों नही, पर अभी अम्मा देख सकती है जब वो चली जायेगी तब।

ये कहकर नीलम शर्म से लाल भी होती चली गयी।

बिरजू की तो ये सुनकर मानो लॉटरी लग गयी थी, दिल में हज़ारों घंटियाँ एक साथ बजने लगी, अपनी ही सगी शादीशुदा बेटी के यौवन का रसपान उसे अपने ही घर में चुपके चुपके करने को मिल जाएगा, इस बात को सोचकर ही वो फूला नही समाया और जोश में आकर उसने नीलम को कस के उसकी दोनों गांड पकड़के इतनी तेज उठाया की नीलम ऊऊऊऊईईईईईई करते हुए ऊपर को उचकी और उसने अब वो डाल पकड़ ली, और फिर पैर ऊपर रखते हुए दूसरे हाँथ से दूसरी डाल पकड़ते हुए जामुन के पेड़ पर चढ़ गई। बिरजू वासना भारी नजरों से अपनी सगी बेटी के मादक गदराए बदन को पेड़ पर चढ़ते हुए निहारता रहा।

नीलम पेड़ पर डाल पकड़ पकड़ कर ऊपर चढ़ने लगी, पैर फैला कर जब नीलम ने आगे बढ़ने और ऊपर चढ़ने के लिए एक डाल पर रखा तो नीचे खड़े बिरजू को अब जाकर फैले घाघरे के अंदर वो दिखा जिसको देखने के लिए उसकी आंखें तरस रही थी, घाघरे के अंदर नीलम को गोरी गोरी टांगें जाँघों तक दिख गयी, बिरजू अवाक सा रह गया, कितनी मांसल जाँघे थी नीलम की, लार ही टपक पड़ी उसकी अपनी ही बेटी की जाँघे देखकर, तभी नीलम ने अपना दूसरा पैर उठा कर दूसरी डाल पर रखा और एक मोटी डाल पर वहीं बैठ गयी, घाघरा नीचे लटका हुआ था, दोनों गोरे गोरे पैर और जाँघों का निचला हिस्सा देखकर बिरजू सनसना गया, एकटक लगाए वो अपनी बेटी के घाघरे में ही झांकने की कोशिश कर रहा था, नीलम ने नीचे अपने बाबू को देखा तो उसने पाया कि उसके बाबू की प्यासी नज़रें कहाँ है, समझते उसे देर नही लगी और वो मुस्कुरा दी, उसने एक जामुन तोड़ा और खींच कर अपने बाबू के ऊपर फेंका, जामुन सीधा बिरजू के सर पर लगा और फूटकर फैल गया, बिरजू की तन्द्रा भंग हुई तो नीलम खिलखिलाकर हंसने लगी और बोली- बाबू खाट को खींचकर मेरी सीध में लाओ ताकि मैं जामुन तोड़कर उसपर फेंकती रहूँ।

बिरजू को होश आया तो वो झेंप सा गया फिर जल्दी से उसने खाट को खींचकर नीलम की सीध में नीचे किया, और ऊपर देखने लगा, नीलम की नजरें अपने बाबू से मिली तो दोनों मुस्कुरा दिए, नीलम अभी डाली पर घाघरे को समेटकर जानबूझ कर बैठी थी वो जानती थी खड़े होने पर बाबू को घाघरे के अंदर का नज़ारा अच्छे से दिख जाएगा पर वो अपने बाबू को कुछ देर तड़पाकर उनकी हालत देखना चाहती थी, बिरजू भी बार बार सर उठाये अपनी बेटी के घाघरे के अंदर झांकने की कोशिश करता और जो भी थोड़ा बहुत दिख रहा था उसे ही बड़ी वासना भरी नजरों से देखता।

नीलम ने बिरजू से इशारे से पूछा कि अम्मा क्या कर रही है क्योंकि ऊपर पत्तियों की आड़ से नीचे दूर साफ दिख नही रहा था, बिरजू ने एक नजर नीलम की माँ पर डाली तो देखा कि वो घास को बड़ी टोकरी में भरकर बगल में कुएं पर ही बने बड़े से हौदे में धोने के लिए डाल रही थी, उसने नीलम को ग्रीन सिग्नल का इशारा किया, नीलम और बिरजू दोनों मुस्कुराने लगे।

नीलम ने नीचे अपने बाबू को देखते हुए एक हाँथ से डाल पकड़े, डाल पर बैठे बैठे ही आस पास लगे जामुनों के गुच्छों में से अच्छे पके पके जामुन तोड़कर नीचे खाट पर फेंकना तो दूर पहले तोड़कर खुद ही खाने लगी, ऊपर जामुनों की भरमार थी, पूरा पेड़ जामुन से लदा हुआ था, आस पास पके पके बड़े बड़े काले काले जामुनों को देखकर नीलम से रहा न गया और वो खिलखिलाकर हंसते हुए अपने बाबू को नीचे देख देखकर रिझाकर जामुन तोड़कर खाने लगी।

अब बिरजू ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए अपनी कमर पर दोनों हाँथ रखकर खड़ा हो गया और बोला- तू वहां जामुन तोड़ने गयी है कि खाने गयी है।

नीलम- अरे बाबू यहां पर आ के कितना अच्छा लग रहा है देखो न कितने बड़े बड़े मीठे मीठे काले काले जामुन है ऊपर, नीचे से तो ये दिखते ही नही है, अच्छा लो आप मुँह खोलो, आ करो आपके मुँह में मैं यहीं से फेंककर मरती हूँ जामुन, देखना सीधे मुँह में जायेगा।

बिरजू- तेरी मां ने देख लिया न तो हम दोनों का जामुन निकाल देगी (बिरजू ने बनावटी गुस्से से कहा, पर वो चाहता था कि उसकी बेटी अच्छे से अपने मन की कर ले)

नीलम- अरे बाबू आप अम्मा से कितना डरते हो, उनको मैं देख लुंगी आप मुँह खोलो, खोलो तो सही, एक बार बाबू......बस एक बार....खोलो न मुँह अपना...जोर से आ करो, खूब जोर से, यहीं से डालूंगी आपके मुँह में सीधा जामुन।

बिरजू को भी नीलम की शरारते बहुत भा रही थी, उसने बड़ा सा मुँह खोला, नीलम ने एक अच्छा सा जामुन तोड़कर तीन चार बार अच्छे से निशाना लगाया और खींचकर अपने बाबू के मुँह की तरफ फेंका, जामुन सीधा बिरजू के गाल पर जा के पट्ट से लगा, फुट गया, जामुन का जमुनी रस गाल पर फैल गया।

बिरजू- लो! यही निशाना है तेरा, बस अब रहने दे तू, खिला चुकी तू जामुन अपने बाबू को (बिरजू ने double meaning में कहा)

नीलम- जामुन तो मैं खिला के रहूँगी अपने बाबू को, देख लेना, बाबू एक बार और, एक बार और न बाबू, देखो एक दो बार तो इधर उधर हो ही जाता है, फिर आ करो न, करो न बाबू, इस बार ठीक से फेंकूँगी, देखो मैं कितनी ऊपर भी तो हूँ, पर इस बार पक्का सीधा मुँह में डालूंगी।

बिरजू अपनी बेटी की इस बचपने और जिद पर निहाल होता जा रहा था आज नीलम उसे जवानी और बचपन हर तरह का प्यार दे रही थी, उसने फिर से आ किया, बड़ा सा मुँह खोला।

नीलम ने अपने आस पास सर उठा के एक अच्छा सा बड़ा सा जामुन देखा और तोड़कर पांच छः बार निशाना लगाया फिर खींच कर अपने बाबू के मुँह में फेंका, इस बार जामुन सीधा बिरजू के मुँह में गप्प से चला गया और बिरजू उस रसभरे मीठे जामुन को खाने लगा।

नीलम- देखा बाबू! है न मेरा निशाना अच्छा, खिलाया न आपको जामुन, मीठा है न बहुत, बोलो ना।

बिरजू- नही तो ज्यादा मीठा तो नही था, बाकी निशाना तो तेरा बहुत अच्छा है। (बिरजू ने जानबूझकर ये बोला कि जामुन मीठा नही है वो देखना चाहता था कि नीलम अब क्या करेगी, क्योंकि वो सबसे ज्यादा पका हुआ अच्छा जामुन था)

नीलम- क्या बाबू, कितना अच्छा मीठा जामुन खिलाया आपको मैंने और आप कह रहे हैं कि मीठा ही नही था, तो और कैसे मीठा होगा? (तभी नीलम को ये बात click कर गयी, वो समझ गयी उनके बाबू ने ऐसा क्यों बोला), अच्छा रुको अब मैं तुम्हे सच में बहुत मीठा जामुन खिलाती हूँ, एक बार फिर से मुँह खोलो।

बिरजू ने फिर मुँह खोला- नीलम में एक और बड़ा सा जामुन तोड़ा और अपने बाबू को दिखाते हुए उसे थोड़ा सा काटकर जूठा किया, ये देखते ही बिरजू की आंखें खुशी से चमक गयी, वो अपनी बेटी की समझ को समझ गया, नीलम ने जामुन जूठा करके निशाना लगा के सीधा अपने बाबू के मुँह में फेंका, इस बार भी जामुन सीधा मुँह में गया और वाकई में इस बार के जामुन में बेटी के होंठों की मदहोश कर देने वाली खुशबू थी, बिरजू उसे आंखें बंद करके नशे में खाने लगा तो ऊपर से नीलम उन्हें देखकर हंस दी, नीलम और बिरजू दोनों के ही बदन में अजीब सी सुरसुरी दौड़ गयी। बिरजू ने वो जामुन खा लिया फिर आंखें खोलकर ऊपर देखा तो नीलम उसे ही बड़े प्यार से देख रही थी।

नीलम ने पूछा- ये वाला मीठा था?

बिरजू- बहुत, बहुत मीठा, तेरा प्यार जो था इसमें, ये दुनिया का सबसे मीठा जामुन था।

नीलम- मेरे छूने से इतना मीठा हो गया बाबू।

बिरजू- हाँ और क्या, तू है ही इतनी मीठी।

नीलम- मैं मीठी हूँ?

बिरजू- बहुत

नीलम- सिर्फ इतने से पता लग गया आपको?

बिरजू- थोड़ा थोड़ा तो पता लग ही गया, बाकी का..........

नीलम- बाकी का क्या?.....बाबू बोलो न रुक क्यों गए।

बिरजू- बोल दूँ।

नीलम धीरे से-हम्म्म्म

बिरजू- बाकी का तो तुझे पूरा चख के पता लगेगा, होंठों का तो पता लग गया बहुत मीठे होंगे।

नीलम- हाय दैय्या, धत्त बाबू, बेशर्म.... कोई सुन लेगा तो क्या सोचेगा, धीरे बोलो, अम्मा भी घर पर ही हैं (नीलम अपने बाबू के इस खुले बेबाक जवाब से बेताहाशा शर्मा गयी, बदन उसका गनगना गया, पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी, वासना की तरंगें उठने लगी, क्योंकि वो ऊपर पेड़ पर थी तो उसने झट से बात को बदला), अच्छा बाबू और खाओगे जामुन?

बिरजू- मन तो बहुत है मेरी बेटी पर अब अभी नही।

नीलम- तब कब?

बिरजू- वही, तेरी अम्मा के जाने के बाद।

नीलम मुस्कुरा दी- रात को खिलाऊंगी फिर।

बिरजू- हाँ बिल्कुल, और बचा के रख लेना जामुन सारा मत भेजना नाना के यहां।

नीलम- ठीक है बाबू।

नीलम और बिरजू दोनों एक दूसरे को कातिल मुस्कान से देखने लगे दोनों की आंखों में वासना भर चुकी थी।
 
Update- 45

नीलम जमुन के पेड़ की डाल पर बैठी आस पास लगे मोटे मोटे पके हुए काले काले जामुनों को गुच्छों सहित तोड़कर नीचे खाट पर फेंकने लगी, बिरजू नीचे खड़ा अपनी बेटी को मंत्रमुग्ध सा देखता रहा, जब खाट पर काफी जामुन हो गए तो बिरजू ने उन्हें एक बाल्टी में पलट लिया, फिर ऊपर देखने लगा, नीलम जिस डाल पर बैठी थी वहां आस पास और थोड़ा दूर दूर उसने हाँथ बढ़ा कर सारे अच्छे अच्छे पके हुए जामुन तोड़ लिए। नीलम अपने बाबू को देखते हुए उस डाल से उठी और दूसरी डाल पर चली गयी, बिरजू नीचे से नीलम को निहार रहा था।

नीलम इस वक्त जहां पर थी वहां दो मोटी मोटी डाल थी, नीलम को यही तो चाहिए था, जामुन तो वो अच्छे खासे तोड़ चुकी थी अब उसे बिरजू को कुछ अच्छे से दिखाना था उसने अपना एक पैर अच्छे से खोलकर फैलाकर दूसरी डाल पर रख दिया, घाघरा पूरा फैल गया, नीलम के ठीक नीचे बिरजू खाट के पास खड़ा किसी चकोर की तरफ एक टक लगाए अपनी बिटिया को निहार रहा था, जैसे ही नीलम ने अपने पैर ऊपर डाली पर रखकर फैलाये घाघरे के अंदर नीलम की वो गोरी गोरी टांगें, मादक मोटी मोटी जाँघे और उसमे फंसी काली पैंटी साफ दिख गयी, उसके विशाल गुदाज दोनों नितम्ब कैसे पतली सी पैंटी में कसे हुए थे और उफ़्फ़फ़फ़ वो दोनों जाँघों के बीच वो मोटा सा फूला हुआ हिस्सा जो चीख चीख के कह रहा था कि हां यहीं है वो महकती हुई मखमली सी जवान प्यासी बूर, इसलिए दोनों जाँघों के बीच पैंटी यहां उभरी हुई है, उस जगह पर पैंटी इतनी पतली थी कि बस उसने किसी तरह केवल मखमली बूर को ही ढका हुआ था, ऐसा लग रहा था कि वो काली पैंटी नीलम की मदमस्त जवानी को, उसके गुदाज, मांसल जाँघों को, मस्त चौड़े नितम्ब को संभाल पाने में असमर्थ है।

बिरजू अपनी ही सगी शादीशुदा बेटी की मदमस्त जवानी को देखकर वासना से लाल होता चला गया उसका लंड धोती में हिचकोले खाने लगा उसने जैसे तैसे नज़रें बचा कर उसे ठीक किया, एक टक वो पैंटी के अंदर अपनी सगी बेटी की बूर और मोटी मोटी जाँघे, मदमस्त गोरी टांगें घूरे जा रहा था, कई बार उसने अपने सूख गए होंठो पर जीभ फेरा और अपनी बेटी की नग्नता के दर्शन करते हुए अपनी सांसों को काबू करने की कोशिश करने लगा। नीलम अपने बाबू की मनोदशा देख देखकर जामुन तोड़ तोड़कर नीचे फेंकते हुए चुपके से मंद मंद मुस्कुराते जा रही थी।

नीलम ने एक बार फिर काफी जामुन तोड़ तोड़ कर खाट पर इकठ्ठे कर दिए, बिरजू ने उसे भी बाल्टी में पलट दिया, नीलम ने अब अपने बाबू को तरसाने के लिए अपने दोनों पैर एक ही डाल पर रख लिए, बिरजू मन मकोस कर रह गया, अपने बाबू की हालत देख नीलम हंस पड़ी और बोली- क्या देख रहे थे बाबू?

बिरजू- यही की तू जामुन कैसे तोड़ रही है?

नीलम- पक्का यही देख रहे थे।

बिरजू- हाँ

नीलम ने बड़ी अदा से कहा- सच्ची बोलोगे तो दुबारा.........

बिरजू ने बड़ी वासना से नीलम को देखा फिर बोला- सच, दुबारा

नीलम- ह्म्म्म, बिल्कुल, सच बोलने का इनाम मिलेगा न।

बिरजू- अच्छा! और क्या क्या मिलेगा?

नीलम- क्या क्या चाहिए मेरे बाबू को?

बिरजू- मुझे..... मुझे तो पूरी की पूरी नीलम ही चाहिए।

नीलम जोर हंसते हुए शर्मा गयी और बोली- धत्त, पगलू, बेटी हूँ न मैं आपकी, वो भी सगी, अपनी ही सगी बेटी चाहिए मेरे बाबू को, कोई जान जाएगा तो क्या सोचेगा, बदमाश? (नीलम ने बड़ी अदा से धीरे से कहा)

बिरजू- कोई जानेगा कैसे? तुम बताओगी क्या किसी को?

नीलम- मैं, मैं तो कभी नही बताऊंगी, किसी को भी नही, मैं भला क्यों बताऊंगी?

बिरजू- फ़िर, और मैं तो बताने से रहा, तो कोई जानेगा कैसे?

नीलम- फिर भी कभी किसी ने देख लिया तो?

बिरजू- चुपके चुपके, छुप छुप कर...समझी। तो फिर कोई कैसे देखेगा?

नीलम शर्म से लाल हो गयी फिर बोली- लेकिन सच सच बताओगे तब, की आप क्या देख रहे थे?

बिरजू- अच्छे से तो रात को बताऊंगा अभी तो बस यही कहूंगा कि जो मेरी बेटी मुझे दिखा रही थी वही देख रहा था।

नीलम ये सुनकर शर्मा गयी और अपने बाबू की आंखों में देखने लगी फिर उसने अपना एक पैर खोलकर दूसरी डाली पर रख दिया और दिखावे के लिए जामुन तोड़ने लगी, घाघरा एक बार फिर फैल गया और बिरजू ने दोनों आंखें फाड़े घाघरे के अंदर अपनी सगी बेटी की नग्नता के अच्छे से दर्शन किये, क्या बदन था नीलम का, हाय वो कसी हुई पैंटी, वो मोटी मोटी जाँघे, पैंटी के अंदर कसमसाती बूर.....ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़

बिरजू तो हिल गया, नीलम भी शर्म से लाल होती रही, अपनी नग्नता अपने ही सगे बाबू को दिखाने में उसे अजीब सी गुदगुदी और शर्म के साथ साथ वासना की तरंगें पूरे बदन में उठती हुई महसूस हो रही थी, ये सोचकर वो गनगना जा रही थी कि कैसे उसके बाबू उसके घाघरे के अंदर एक टक लगाए उसकी टांगों, जाँघों, नितम्बों और पैंटी को देख रहे थे, कितनी शर्म भी आ रही थी उसको, काफी देर वो इसी तरह अपने बाबू को अपने हुस्न का खजाना दिखाती रही फिर उसने धीरे से बोला- अब बस करो बाबू, अब बाद में, अभी के लिए बस, ज्यादा नही, कोई देख लेगा बाबू।

नीलम ने अपने दोनों पैर एक डाल पर रखे और जैसे ही वो सीधी खड़ी हुई पूरी डाल कड़कड़ा कर टूटी, नीलम लगभग 14-15 फुट ऊपर से नीचे गिरी। नीलम के मुँह से एक पल के लिए डर के मारे चीख निकल गयी, नीलम की तेज चीख और डाल टूटने की कड़कड़ाहट सुनकर नीलम की माँ ने भी कुएँ से पलट के देखा, और चिल्लाते हुए पेड़ की तरफ भागी।

बिरजू ने लपकक्कर अपनी बेटी नीलम को जल्दी से अपनी बलशाली भुजाओं में थाम लिया और भाग्यवश बगल में ही मजबूत खाट होने की वजह से दोनों उस खाट पर धड़ाम से गिरे, और खाट की एक पाटी मजबूत होने पर भी कड़ाक से टूट गयी, करीब 14-15 फुट ऊपर से नीलम गिरी और बिरजू उसे थामते हुए लेकर खाट पर गिरा तो पाटी तो टूटनी ही थी, नीलम का मदमस्त गदराया बदन अपने बाबू की मजबूत बाहों में झूल गया, बिरजू नीलम को लेके अपने दाएं हाँथ के बल खाट पे गिरा और सारा भार उसके हाँथ पर आ गया जिससे उसके हाँथ में गुम चोट लगी, ईश्वर की कृपा थी कि बस यही एक चोट बिरजू को लगी थी, नीलम बिल्कुल सुरक्षित बच गयी थी, अपने बाबू से वह बुरी तरह लिपटी उनके ऊपर पड़ी थी, उसका गदराया बदन, मोटी मोटी चूचीयाँ बिरजू के सीने पर दब गई, बिरजू को चोट के दर्द और अपनी बेटी के गदराए बदन का मीठा मीठा मिला जुला अहसाह हो रहा था। डाल पूरी तरह टूटी नही थी बस आधी टूटकर झूल गयी थी अगर डाल पूरी टूटकर अलग हो गयी होती तो वो भी साथ में गिरती और फिर डाल से भी काफी चोट लग सकती थी, पर ये ईश्वर की दूसरी गनीमत थी।

जामुन की डाल भले ही देखने में मोटी हो पर वो ज्यादा मजबूत नही होती ये बात नीलम जानती तो थी पर उस वक्त अपने बाबू के साथ वो वासना में डूबी हुई थी उसे ये बिल्कुल ध्यान ही नही आया कि डाल टूट सकती है और वही हुआ, जमीन पर काफी जामुन झटका लगने से टूटकर गिर गए थे, बगल में दो बाल्टी भरकर जामुन पहले ही रखे हुए थे जो नीलम ने तोड़े थे।

नीलम की माँ कुएँ पर से ही देखकर चिल्लाई- हाय मेरी बच्ची....नीलम, अरे नीलम के बाबू बचाओ उसे, पकड़ो उसे, गयी मेरी बच्ची आज, हे भगवान, टूट गयी न डाल

इसीलिए मैं बोलती हूँ कि पेड़ पर मत चढ़, गांव के बच्चों को भी डांटती रहती हूं, मैंने बोला था कि जामुन नही चाहिए रहने दे, पर ये जिद्दी माने तब न, और ये भी इसी के साथ दीवाने हुए रहते हैं, जो कहेगी बस कर देना है, सोचना समझना नही है, अरे तुम्ही चढ़ जाते पेड़ पे, उसको चढ़ाने की क्या जरूरत थी, बताओ भगवान का लाख लाख शुक्र है कि बच गयी मेरी बच्ची, आज हाथ पैर टूट ही जाते उसके, जामुन तो लग्गी से भी तोड़ी जा सकती थी पेड़ पे चढ़ने की क्या जरूरत थी, ये लड़की सच में किसी दिन हाथ पैर तुड़वायेगी अपना।

अपनी माँ को बड़बड़ाते हुए अपनी तरफ आते देखकर नीलम हड़बड़ा के अपने बाबू को देखते हुए धीरे से उनके ऊपर से उठी और बोली- मेरे बाबू आपको लगी तो नही, आज आप न होते तो मुझे कौन बचाता?, आप तो ठीक तो हो न मेरे बाबू?

बिरजू- हाँ मेरी बेटी मैं बिल्कुल ठीक हूँ, हम बच गए, बस थोड़ा सा इस सीधे हाँथ में गुम चोट आ गयी है, बाकी तो सब ठीक है (बिरजू ने हल्का सा दर्द की वजह से कराहते हुए कहा)

नीलम की आंखों से आँसू बह निकले और वो लिपटकर उनके हाँथ को देखने लगी- कहाँ बाबू कहाँ लगी मेरे बाबू को दिखाओ जरा, हे भगवान ये तो सूज गया है यहां पर हाँथ, सब मेरी वजह से हुआ न बाबू, न मैं ऐसा करती न होता।

बिरजू- नही मेरी बेटी कुछ नही हुआ मुझे, तू भी न, और तू रोने क्यों लगी हे भगवान, ये तो बस इस खाट की पाटी की वजह से दबाव पड़ गया उसकी वजह से गुम चोट लगी है बस, तू तो रोने भी लगी इतनी जल्दी, बस कर मेरी बिटिया रानी।

बिरजू ने नीलम के आँसू पोछे और गले से लगा लिया।

नीलम- आपके होते हुए मुझे कुछ हो सकता है बाबू, आज मैं ये जान गई कि आप ही मेरे रक्षक हो, आप उठो चलो बरामदे में।

तभी नीलम की मां आ गयी और नीलम को बाहों में भर लिया- मेरी बच्ची तुझे कहीं लगी तो नही, तुझे कितनी बार मना किया है न कि पेड़ पर मत चढ़ मत चढ़, पर तु माने तब न, तुझे कुछ हो जाता तो ससुराल वालों को क्या जवाब देती मैं, कितने ऊपर से गिरी है तू, लाख लाख शुक्र है ईश्वर का की बच गयी मेरी बच्ची आज, अब मत चढ़ना कभी पेड़ पर।

नीलम- अम्मा मुझे तो बाबू ने बचा लिया, मुझे चोट नही लगी पर बाबू को हाँथ में गुम चोट लग गयी है, आज वो न होते तो मुझे बहुत चोट लगती, मेरे बाबू ने मुझे बचाया है।

नीलम की माँ- कहाँ लगी तुम्हे दिखाओ, हे भगवान देखो कितनी सूजन हो गयी है, चलो बरामदे में लेटो मैं धतूरे के पत्ते में हल्दी गरम करके बांध देती हूं शाम तक सूजन उत्तर जाएगी, आज सुबह सुबह यही सब होना था।

बिरजू- अरे नीलम की माँ तू ज्यादा परेशान मत हो ये सब तो होता ही रहता है जिंदगी में, ज्यादा नही लगी है बस यहीं बाजू में लगी है थोड़ी सी, वो तो खाट थी तो बच गए वरना ज्यादा लग जाती।

नीलम और उसकी माँ बिरजू को सहारा देकर बरामदे में लाये और बिस्तर पर लिटाया, नीलम दौड़ कर गयी धतूरे के पत्ते तोड़कर लायी और माँ को दिया उसकी माँ रसोई में हल्दी, लहसन, फिटकरी मिलाकर सरसों के तेल में पकाकर पेस्ट बनाने ले लिए चली गयी।

नीलम अपने बाबू की आंखों में बड़े प्यार से एकटक देखने लगी और बोली- सब मेरी वजह से हुआ न बाबू, न मैं जिद करती और न ये सब होता, देखो चोट लग गयी न आपको, मुझे तो बचा लिया अपने पर मेरी वजह से आपको चोट लगी न बाबू।

बिरजू ने नीलम के चहरे को हाँथों में थाम लिया और बोला- तू अपने को क्यों कोस रही है पगली, कभी कभी कुछ दर्द भरी घटना अगर अच्छे के लिए हो तो वो घटना अच्छी ही मानी जाती है, तेरे लिए तो मैं कुछ भी कर जाऊंगा ये छोटा सी चोट क्या चीज़ है,आज तूने मुझे इतना प्यार दिया और इतना आनंद दिया, उसका भी तो अपना अलग ही मजा था, तू ये सब न करती तो भला तू मुझे आज मिलती कैसे, तुझे पता है आज तू मुझे मिल गयी है, तुझे आज पाया है मैंने, अपनी बेटी को आज पाया है मैंने, आज मैं कितना खुश हूं तुझे नही पता, और इसके बदले में ये छोटा सा दर्द तो बहुत कम है मेरी बेटी, बहुत कम, तू अपने को मत कोस ये होना था और अच्छे के लिए होना था।

नीलम इतना सुनते ही भावुक होकर अपने बाबू के गले लग गयी और बोली- ओह बाबू आज अपने मेरा दिल जीत लिया, सच पूछो तो दीवानी तो मैं आपकी बहुत पहले से थी पर आज मैं पूरी तरह आपकी हो गयी सिर्फ आपकी, आज मैं भी इतनी खुश हूं कि मैं बयान नही कर सकती।

ऐसा कहकर नीलम और बिरजू एक दूसरे की आंखों में देखने लगे, दोनों की आंखों में प्यार और प्यास दोनों साफ नज़र आ रहा था अपनी बेटी के तरसते होंठों को वो लगतार देखे जा रहा था, कभी पूरे चेहरे को निहारता, कभी लाली लगे हुए होंठो को देखता, कभी आंख और नाक तथा नाक की प्यारी सी लौंग को देखता, बिरजू को हाथ में दर्द भी हो रहा था। इतने में वो बोला- अब आज तो तेरी अम्मा जाने से रही नाना के घर, तो हम गाय और बछिया के बारे में बात कैसे करेंगे और तुम मुझे जामुन कैसे खिलाओगी?

नीलम मुस्कुराते हुए- आप अपनी बेटी को कम समझते हैं क्या बाबू, देखते जाइये मैं कैसे अम्मा को नाना के यहां भेजती हूँ और हाँ अगर आज नही मानी तो कल तो पक्का भेजूंगी, अपने बाबू को जामुन तो खिलाकर रहूँगी वो भी बहुत मीठा वाला।

बिरजू- हाय! सच

नीलम- हाँ सच, देखते जाइये।

बिरजू- ये तो मुझे पता है कि मेरी बेटी बहुत तेज है।

नीलम- आपकी बेटी हूँ, तेज तो होऊंगी ही न।

इतने में नीलम की माँ धतूरे के पत्ते में पकाया हुआ गरम हल्दी का पेस्ट लेकर आती हुई जान पड़ी तो दोनों बाप बेटी अलग हो गए, नीलम की माँ ने वो पेस्ट बिरजू के चोट पर लगा कर पत्ते से बांध दिया और ऊपर से पट्टी बांध दी और बोली- अब ऐसे ही लेटे रहो, आज कहीं जाना नही, ये घरेलू दवाई शाम तक सारा दर्द खींच लेगी और सूजन भी कम हो जाएगी, शाम को एक बार और बांध दूंगी, आराम करो अब।

नीलम की माँ ने पेड़ के नीचे रखी जामुन से भरी दोनों बाल्टी उठाकर घर में रख दी और बिखरे हुए जामुन भी बटोर लिए, टूटी खाट उठा कर बगल में रख दी, डाल पेड़ पर लटकी झूल ही रही थी उसे देख बिरजू नीलम की माँ से बोला- देखना किसी गाँव के बच्चे को पेड़ के नीचे मत खेलने देना ये डाल कभी भी टूटकर गिर सकती है, मुझे थोड़ा आराम हो जाये तो मैं इसे खींचकर गिराता हूँ।

नीलम की माँ- अरे अभी तुम आराम करो, करना बाद में जो भी करना हो, जरा सा चैन नही है, चोट लगने पर भी।

नीलम अपने बाबू को देख कर मुस्कुराने लगी बिरजू भी उसे देखकर मुस्कुरा दिया।

(ये वही 6ठा दिन था जब उदयराज ने शाम को खेत से आते वक्त नीलम को रोड के पास धतूरे के पत्ते तोड़ते हुए देखा था और पूछा था कि क्या हो गया, फिर नीलम ने उसे जब बताया कि बाबू को चोट लग गयी है तब वो उसी वक्त बिरजू को देखने गया था और उसे फिर थोड़ा देर भी हो गयी थी, इसी के बाद था 7वां दिन अमावस्या की रात)
 
कृपया comments जरूर करें, आप लोगों से यही गुजारिश है मेरी।
 
Update- 46

दोपहर को नीलम ने अपनी माँ से कहा- अम्मा शाम को कितने बजे निकलोगी नाना के घर जाने के लिए।

नीलम की माँ- अब आज कहाँ जाउंगी बेटी, तेरे बाबू को चोट जो लगी है, अब उन्हें आराम हो जाये तो मेरे मन को तसल्ली होगी तभी जाउंगी, आज तो मुश्किल है कल ही जाउंगी।

नीलम- अरे अम्मा फिर वो जामुन तो कल तक खराब हो जाएंगे न, इतनी मेहनत से तोड़ा है मैंने और बाबू ने।

मां- हाँ वो तो देखा है मैंने कितनी मेहनत से तोड़ा है तूने, हाँथ पैर तुड़वा के बैठ गयी, बोल रही थी की रहने दे जामुन मत तोड़ फिर भी, अब तो कल ही जाउंगी, जामुन को गीले सूत की बोरी में लपेट के रख दे, कल सुबह ही निकल जाउंगी, तब तक खराब नही होगा।

नीलम- अम्मा तू गुस्सा क्यों होती है, ठीक है तेरा मन कल है तो कल ही जाना, पर गुस्सा मत हो, हो गया जो होना था मैंने कोई जानबूझ के थोड़ी न किया, मुझे क्या पता था।

ये सुनकर नीलम की माँ का छोटा सा गुस्सा शांत हो गया- अरे नही मेरी बिटिया गुस्सा नही हो रही, पर चिंता तो होती है न, मैं चली गयी और पीठ पीछे कुछ दिक्कत हो तो मेरा मन भी तो नही लगेगा न वहां, इसलिए बोल रही थी कि तेरे बाबू को कल तक काफी आराम हो जाएगा तो कल चली जाउंगी सुबह।

नीलम ने भी ज्यादा जोर नही दिया, एक रात की ही तो बात थी, कर लेगी कैसे भी बर्दाश्त, काट लेगी एक रात करवट बदल बदल कर, जब इतनी रातें काटी हैं तो एक रात और सही, ज्यादा जोर देती तो उसकी माँ को भी शक होता, इसलिए उसने ज्यादा कुछ बोल नही।

दिन भर बिरजू खाट पर लेटा रहा, नीलम की माँ और नीलम घर का और बाहर का सारा काम करती रही, बिरजू लेटे लेटे उन्हें देखता रहा, नीलम काम से फुरसत निकाल कर अपने दीवाने बाबू के पास कभी कभी बीच बीच में आकर बैठ जाती और दोनों एक दूसरे को नीलम की माँ से नजर बचा कर निहारते, एक टक लगा कर एक दूसरे को देखते। नीलम अपनी माँ की नज़र बचा कर अपने बाबू की खाट पर बिल्कुल सटकर बैठ जाती, बिरजू उसके हाँथ को अपने हाँथ में ले लेता और नरम मुलायम उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा कर धीरे धीरे उसकी आँखों में देखता हुआ सहलाता, नीलम शर्मा जाती और मदहोशी में अपने बाबू के बदन की छुअन को महसूस कर आंखें बंद कर लेती।

ऐसे ही एक बार नीलम कोई काम करके दुबारा आयी और खाट पर बिरजू के बगल में झट से बैठ गयी, बिरजू ने हल्का सा सरककर उसको बैठने की जगह दी, बिरजू ने नीलम के हाँथ को अपने हाँथ में लिया और प्यार से सहलाने लगा और बोला- तेरी अम्मा कहाँ है?

नीलम- पीछे खेत में गयी है अम्मा, कुछ देर में आएंगी (नीलम ने ये बात जोर देकर कही), बाबू आपका दर्द कैसा है धीरे धीरे आराम हो रहा है न (नीलम बिरजू की आँखों में देखते हुए बोली)

बिरजू- अब मेरी प्यारी बिटिया मुझे बार बार आ के प्यार देगी और छुएगी तो धीरे धीरे तो आराम होगा ही।

नीलम- मेरा बस चलता तो आपका सारा दर्द एक चुटकी में गायब कर देती।

बिरजू- वो कैसे?

नीलम ने अपना चेहरा बिरजू पर झुकाया और धीरे से बोली- आपको पूरी तरह अच्छे से छूकर।

बिरजू- हाय, तो रोका किसने है मेरी बिटिया, मेरी जान।

नीलम- अभी तो फिलहाल अम्मा ने रोक रखा है (नीलम का अर्थ ये था कि अभी अम्मा घर पे हैं)

बिरजू- लेकिन वो तो पीछे खेत में गयी है न, तो फिर।

नीलम- कभी भी आ सकती है बाबू (फिर नीलम ने बहुत धीरे से बोला)- बेटी को बहुत तसल्ली से धीरे धीरे प्यार करना चाहिए, समझें बुध्धू राम, जल्दबाज़ी में नही। किसी चीज़ को जल्दबाज़ी में खाओगे तो पूरा मजा कैसे मिलेगा, बोलो, सही कहा न (और वो कहकर खिलखिला कर हंस दी)

बिरजू- ठीक है मैं अपनी बेटी की चिज्जी को धीरे धीरे ही खाऊंगा और बिरजू ने नीलम का हाँथ दबा दिया तो वो सिसक उठी फिर बोली- बेटी की चिज्जी?

बिरजू- हाँ, मेरी प्यारी बेटी की प्यारी सी चिज्जी।

नीलम का चेहरा शर्म से लाल हो गया यहां तक कि उसके कान भी लाल हो गए जोश में, शर्मा कर उसने अपना चेहरा हाँथ से छुपा लिया और मंद मंद मुस्कुराने लगी,बिरजू उसे शर्माते हुए देखता रहा, हालांकि नीलम रजनी के मुकाबले काफी बिंदास थी पर फिर भी अपने सगे बाबू के मुँह से ये सुनके न जाने क्यों उसे बहुत शर्म आयी और वो वासना से भर गई, बदन उसका सनसना गया, कुछ देर हाथों में चेहरा छुपाये बैठी रही फिर एकएक एक उंगली को हल्का सा साइड करके झरोखा बना के अपने बाबू को देखा तो वो मुस्कुराते हुए उसे ही देख रहे थे, फिर उसने हंसते हुए दुबारा अपने चेहरे को हांथों से छुपा लिया और एकाएक जब बिरजू ने नीलम के चेहरे से हाँथ हटाया तो वो झट अपने बाबू के ऊपर लेटकर गले से लग गयी और कान में बोली- धत्त!......पर ये चिज्जी है क्या बाबू? आपकी प्यारी सी बेटी की प्यारी सी कौन सी चिज्जी, और ये है कहाँ? (नीलम ने जानबूझकर सिसकते हुए पूछा)

बिरजू तो पहले नीलम के बाहों में आने से ही उसके गुदाज मखमली बदन से मदहोश हो गया फिर कुछ देर बाद बोला- नाभि के रास्ते नीचे की तरफ चलते जाओ कुछ दूर जाने पर एक घना जंगल आएगा, जैसे ही उस जंगल को पार करोगे चिज्जी वहीं मिलेगी, बहुत प्यारी सी होती है वो, मीठी मीठी, देखने में ही मदहोशी सी आ जाती है और खाने लगो तो जैसे जन्नत में पहुँच गए हों, मक्ख़न जैसी होती है बिल्कुल, नरम नरम।

नीलम की सांसें धौकनी की तरह चलने लगी ये सुनकर फिर भी वो उखड़ती सांसों से बोली- उसको खाते कैसे हैं बाबू? बताओ न?

बिरजू भी बदहवास सा हो गया ऐसी बातें करके फिर बोला- उसको पहले तो मुँह में भरकर खाते हैं फिर बड़े से मूसल से खाते हैं, उस मूसल को उसमे डाल के उसको अच्छे से खाते हैं।

नीलम- उसमे डालते हैं वो मूसल बाबू?

बिरजू- हाँ मेरी बेटी, मेरी रानी। पूरा अच्छे से अंदर तक डालकर उस चिज्जी को खाते हैं।

नीलम ने उखड़ती हुई भारी सी आवाज में कहा- कौन सा मूसल बाबू?, कैसा मूसल?

बिरजू जैसे ही नीलम का हाँथ पकड़कर अपने धोती में खड़े दहकते लंड की तरफ ले जाने लगा तो नीलम समझ गयी और सनसना कर चौकते हुए हाँथ वापिस खींच लिया और एक मुक्का अपने बाबू के सीने पर हल्का सा मारा और बोली- ईईईईईईईईशशशशशशशशश......धत्त....बाबू.....कोई देख लेगा.....अभी नही और हंसते हुए उनके सीने में मुँह छुपाकर लेट गयी।

बिरजू- तुमने ही तो पूछा था की मूसल क्या होता है, तो मैं तो बस वही दिखा रहा था।

नीलम- बहुत गन्दू होते जा रहे हो आप, जल्दी जल्दी, संभालो खुद को। बेटी की चिज्जी को चुपके चुपके खाते हैं, कोई देख लेगा तो?

नीलम शर्माते हुए अपने बाबू से लिपटी रही।

दोनों की सांसें बहुत तेज चलने लगी, बिरजू ने अपने खड़े लंड को ठीक किया।

फिर कुछ देर बाद नीलम उठकर बैठ गयी और अपने बाल ठीक करते हुए अपने बाबू की आंखों में देखते हुए बोली-बाबू अम्मा तो कल सुबह ही जाएगी नाना के यहां आज तो नही जाएंगी।

बिरजू- लो तुम तो बोल रही थी कि मैं कैसे भी करके आज ही भेजके रहूँगी, मेरी बिटिया रानी।

नीलम- मैंने बहुत कोशिश की पर वो नही मानी फिर मुझे लगा कि उन्हें शक होगा, इसलिए मैंने ज्यादा जोर नही दिया।

बिरजू- कोई बात नही बेटी, एक रात और सही, पर जामुन तो कल तक खराब हो जाएंगे तो तुम खिलाओगी कैसे?

नीलम मुस्कुराते हुए- अभी तक आप ये समझ रहे हैं कि जो बाल्टी में भरकर रखा है वो आपका जामुन है। (नीलम ने बड़े अचरज से पूछा)

बिरजू- हाँ, वही तो है जामुन न।

नीलम अपने बाबू के और नज़दीक आयी और फुसफुसाके बोली- अरे मेरे बुध्धू बाबू, आपका जामुन तो ये है, उससे भी बहुत मीठा।

और ऐसा कहते हुए नीलम ने बहुत शर्माते हुए आज पहली बार अपने बाबू बिरजू की बाएं हाँथ की तर्जनी उंगली को पकड़ा और धीरे से अपनी चोली में कसी हुई बड़ी ही उन्नत दायीं चूची के निप्पल पर रख दिया, दोनों को एकाएक मानो करंट सा लगा, बिरजू ने ऐसा सोचा भी नही था कि उसकी सगी शादीशुदा बेटी एकाएक ऐसा कर देगी और न ही नीलम ने सोचा था, ये तो बस न जाने कैसे वासना में होता चला गया, बिरजू बदहवास सा नीलम को अपनी दोनों उंगली से उसके निप्पल को पकड़े देखता रह गया और नीलम भी अपने बाबू का हाँथ पकड़े कुछ देर उन्हें देखती रही फिर बिरजू ने जोश में आकर नीलम के निप्पल को उंगलियों से मसल दिया तो वो तेज से चिहुँक कर सिसक पड़ी फिर अचानक पीछे मुड़कर देखी की कहीं अम्मा न आ जाएं।

बिरजू कुछ देर अपनी बेटी के मोटे जामुन जैसे बड़े बड़े निप्पल चोली के ऊपर से ही बावला सा होकर धीरे धीरे दबाता मसलता रहा। नीलम सिसकते हुए बोली- बाबू बस, जामुन फूट जाएंगे.....अभी बस करो....आआआ आआआआआआआहहहहहहह.......अम्मा आ जायेगी रुको न..........अम्मा को जाने दो फिर सब कर लेना अपनी सगी बेटी के साथ जो जी में आये...............मैं तो आपकी ही हूँ न.....रुको न बाबू बस करो।

वाकई में नीलम के निप्पल किसी जामुन जैसे ही बड़े बड़े थे और इस वक्त वासना में फूलकर सख्त हो चुके थे उनका आकार भी बड़ा हो गया था, बिरजू अपनी सगी बेटी के मोटे मोटे निप्पल को आज छूकर होशो हवास खो बैठा, जब निप्पल इतने बड़े बड़े हैं तो चूची कितनी मस्त होगी, जब वो उसे खोलकर देखेगा, तो कैसा लगेगा, कैसी होगी चूची मेरी सगी बेटी की और निप्पल कैसे रंग का होगा, काला या गुलाबी.....हाय, खोलकर दोनों चूची जब वो लेटेगी मेरे सामने तो उसके सीने पर गोल गोल उठी हुई विशाल चूचीयाँ देखकर कैसा लगेगा मुझे, कहीं मैं पागल न हो जाऊं, यही सब सोचते हुए बिरजू का लंड धोती में फिर टनटना गया और जैसे ही नीलम की चौड़ी गांड पर चुभा, नीलम भी लंड की छुवन से बौरा सी गयी पर उसने अपने आपको काबू करने की कोशिश की, कहीं अम्मा न आ जाये। बिरजू ने एकाएक अपनी सगी बेटी की बड़ी सी मादक फूली हुई चूची को अपनी हथेली में भरकर दबा दिया, नीलम थोड़ा जोर से सीत्कार उठी, बिरजू हल्का हल्का मस्ती में आंखें बंद किये अपनी ही सगी बेटी की मखमली चूची दबाने लगा, नीलम शर्माते हुए सिसकने लगी, दोनों ही इस वक्त आगे नही बढ़ना चाहते थे पर न जाने क्यों खुद पर काबू ही नही हो रहा था जैसे तैसे नीलम ने अपने बाबू को रोका और समझाया, बिरजू ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को रोका और संभलते हुए बोला- कल साड़ी पहनोगी?

नीलम- हाँ मेरे बाबू जरूर, आप बोलो और मैं न पहनूँ ऐसा हो नही सकता, किस रंग की पहनूँ बोलो?

बिरजू- लाल रंग की।

नीलम मुस्कुराते हुए- लाल जोड़े में महसूस करना है अपनी बेटी को?

बिरजू- हाँ, एक दुल्हन की तरह।

दोनों एक दूसरे को बड़े प्यार से देखने लगे।

फिर नीलम बोली- और वो किस रंग की।

बिरजू जानबूझकर अनजान बनते हुए- वो क्या?

नीलम ने धीरे से कान में झुककर कहा- वही आखिरी वस्त्र...........कच्छी..….वो किस रंग की पहनूँ बाबू (नीलम ये बोलकर गनगना गयी)

बिरजू सिरह गया- काले रंग की, चिज्जी को काले कपड़े में छुपाकर रखना।

नीलम शर्माते हुए मुस्कुरा दी और फिर से एक मुक्का हल्के से अपने बाबू के सीने पर दे मारा- बदमाश! काले कपड़े में चिज्जी चाहिए, पगलू को, ठीक है बाबू आपकी ख्वाहिश आपकी ये बिटिया जरूर पूरा करेगी, अब मुझे छोड़ो अम्मा आती होंगी, बहुत देर हो गयी है।

तभी सच में नीलम की माँ चारा लेके आ गयी, दोनों झट से अलग हो गए।

शाम को नीलम ने जल्दी ही खाना बना लिया था, बिरजू को एक बार फिर पट्टी बदल दी गयी अब तक उसे काफी आराम हो चुका था दर्द तो बिल्कुल गायब हो चुका था बस थोड़ी सूजन थी, नीलम की माँ बोली- कल तक ये हाँथ ठीक हो जाएगा।

नीलम बरामदे में सोती थी, बिरजू और नीलम की अम्मा बाहर द्वार पर अगल बगल खाट बिछा कर सोते थे।

खाना खाने के बाद नीलम की माँ और बिरजू अपनी अपनी खाट पर अगल बगल लेटे थे, नीलम बरामदे में अपनी खाट पर लेटी तड़प रही थी, बर्दाश्त तो बिरजू से भी नही हो रहा था, तभी नीलम को एक तरकीब सूझी, लालटेन हल्की रोशनी देते हुए जल रही थी, नीलम ने देखा कि अम्मा और बाबू की खाट अगल बगल है और बीच में जगह है अगर मैं दोनों खाट के बीच जाकर पटरा लेकर बैठ जाऊं तो बाबू मुझे छू सकते हैं, नीलम का इतना मन कर रहा था कि उससे अब बर्दाश्त नही हो रहा था।

नीलम ने अपनी खाट से उठकर तेल की शीशी ली और एक हाथ में पीढ़ा लिया और अपनी अम्मा के पास पहुँच गयी, दोनों खाट के बीच आ के खड़ी हो गयी, आते हुए लालटेन को थोड़ा और मद्धिम कर आई थी।

नीलम ने एक नजर अपने बाबू पर डाली तो वो बड़ी बेचैनी से उसे ही देख रहे थे, नीलम को बिल्कुल खाट के पास बैठता देख बिरजू का मन मयूर झूम उठा, वो समझ गया कि उसकी बेटी उसे छुप छुप कर मजे देने आयी है, उसकी बेटी अब उसकी हो चुकी है पूरी तरह और वो भी तड़प रही है मस्ती करने के लिए, बिरजू उसे देखकर मुस्कुरा उठा, नीलम ने इशारे से थोड़ा रुकने के लिए बोला फिर दोनों खाट के बीच अपने बाबू की तरफ पीठ करके और अपनी अम्मा की तरफ मुँह करके नीचे जमीन पर पटरा रखकर बैठ गयी और अपनी अम्मा से बोली- अम्मा ला तेरे सर पे तेल रख दूँ, आज तूने बहुत काम किया है दिन भर, बाबू के हिस्से का भी काम किया है न तूने, काफी थक गई होगी, ला तेल से मालिश कर दूं, कल तो चली ही जाएगी तू नाना के घर।

नीलम की माँ- हाँ मैं तो कल बनवास जा रही हूं न 14 बरस के लिए आऊँगी थोड़ी लौट के, परसों ही आ जाउंगी मैं, रुकूँगी थोड़ी वहां, और मैं थकी वकी नही हूँ, चल सो जा जाके तू भी, नींद आ रही है मुझे अब।

नीलम- अरे अम्मा गुस्सा क्यों होती है, ठीक है तू परसों ही चली आना, मत रुकना वहां पर तेल तो मालिश करवा लें सर पे, तू सोती रह मैं कर देती हूं मालिश, ला अपना सर इधर रख।

नीलम की माँ- अरे बेटी मैं गुस्सा नही हूँ, तेरे से भला गुस्सा क्यों होऊंगी, वो तो मुझे नींद लग गयी है न इसलिए बोल रही हूं, तू भी खामख्वाह परेशान हो रही है, जा सो जा जाके, तू भी तो मेरे साथ साथ दिन भर लगी थी, जा सो जा रहने दे।

नीलम- लो माँ की सेवा करने में क्या परेशानी, तू भी तो मेरे लिए ही कल इतनी दूर अकेले नाना के घर जाएगी न।

अचानक ही नीलम के मुँह से ये निकल गया, तो वो झट से चुप हो गयी, नीलम की माँ ने दबी आवाज में फुसफुसाके बोला- धीरे बोल पगली तेरे बाबू एकदम पास में ही तो हैं, सुन लेंगे तो फिर पूछने लगेंगे की क्या बात है, अभी कल ही पूछ रहे थे तो मैंने उन्हें नही बताया बात टाल दी, और तू है कि कुछ भी झट से बोल पड़ती है।

नीलम- अरे अम्मा मेरे मुँह से एकदम से निकल गया, तू भी तो नही मान रही है न मेरी बात, कब से बोल रही हूं इधर सर कर, पर माने तब न।

नीलम की माँ- अच्छा बाबा ले, तू मानेगी थोड़ी, जिद्दी तो बचपन से है तू। (इतना कहते हुए नीलम की माँ ने अपना सर घुमाकर किनारे कर लिया)

नीलम- हाँ तो, जब तू जानती है फिर भी बहस करती है मुझसे (इतना कहकर नीलम धीरे से हंस पड़ी)

बिरजू चुपचाप आंखें मूंदे ऐसे लेटा था जैसे पानी में मगरमच्छ चुपचाप पड़ा पड़ा सही वक्त आने के इंतजार करता है।

नीलम की माँ- हाँ दादी अम्मा तेरे से अब बहस भी नही कर सकती मैं, पहले लालटेन तो बुझा दे।

नीलम- हाँ अम्मा, ये तो मैं भूल ही गयी।

और नीलम ने जाकर लालटेन बुझा दी, फिर आकर बैठ गयी, ये तो अब और ही नीलम और बिरजू के मन का ही हो गया था, अब काफी अंधेरा हो गया, बिरजू ने आंखें खोल ली और नीलम की मदमस्त पीठ देखने लगा, नीलम की पीठ बस एक फुट दूर थी। नीलम ने एक बार अपने बाबू को पलटकर देखा और अंधेरे में दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।

नीलम- अम्मा बाबू तो सो गए हैं, उन्होंने सुना नही होगा।

नीलम की माँ- चल अच्छा है नही सुना होगा तो, और तू अब बोल मत नींद आ रही है मुझे सोने दे, जल्दी से मालिश करके जा सो जा तू भी।

नीलम- ठीक है तू सो जा अम्मा, मैं मालिश करती हूं देख तुझे और भी अच्छी नींद आएगी।
 
Update- 47

नीलम की माँ एक तो वैसे ही थकी थी ऊपर से नीलम की बेहतरीन सर की तेल मालिश से जल्द ही चली गयी वो तगड़े नींद की आगोश में।

बिरजू एक टक अपनी बेटी की पीठ को कुछ देर अंधेरे में देखता रहा, नीलम बस एक फुट की दूरी पर ही थी, बिरजू ने एक हाँथ से पीठ पर लहरा रहे बालों को हटाया और दूसरा हाँथ उसकी पीठ पर रख दिया, नीलम गुदगुदा गयी, धीरे धीरे बिरजू के हाँथ नीलम की पीठ को सहलाने लगे, नीलम और बिरजू की आंखें बंद हो गयी, बिरजू ने बाल को हटा के अपनी बेटी के नग्न पीठ को थोड़ा आगे होकर चूम लिया, अपने बाबू के होंठ आज पहली बार अपनी पीठ पर लगते ही नीलम सिसक उठी, मस्ती में आंखें बंद थी उसकी, बदन में उठी अजीब सी सनसनी और गनगनाहट से उसने अपनी जाँघे भीच ली। बिरजू धीरे धीरे हौले हौले एक के बाद एक कई गीले चुम्बन अपनी बेटी के पीठ पर कई जगह मदहोश होते हुए अंकित करता गया, और नीलम अपने होंठ दांतों में दबाए आंखें बंद किये बहुत मुश्किल से अपनी सिसकी दबाती चली गयी।

कुछ एक पल बाद नीलम ने अपना हाँथ पीछे ले जा के अपने बाबू का एक हाँथ पकड़ा और उसे आगे की तरफ लाते हुए धीरे से अपनी मखमली दायीं चूची पर रख दिया, बिरजू खुशी से भर गया कि उसकी बेटी वाकई में निडर है और कितनी उतावली हो रखी है। उसका लंड खड़ा होने लगा, अपनी बेटी की दाहिनी चूची को वो चोली के ऊपर से भर भर के दबाने और सहलाने लगा, नीलम की हालत खराब होने लगी उसके निप्पल सख्त होने लगे, बीच बीच में बिरजू द्वारा निप्पल को तेज मसल देने से उसके मुँह से सी-सी की आवाज न चाहते हुए भी हल्के हल्के निकल ही जा रही थी, लेकिन ये बहुत रिस्की था, पर क्या करें मन मान भी तो नही रहा था दोनों का।

आँख बंद किये वो अपने सगे बाबू से अपनी चूची दबवाने का असीम आनंद ले रही थी कुछ देर ऐसे ही चलता रहा, नीलम के निप्पल फूलकर किसी जामुन की भांति बड़े हो चुके थे और बिरजू का लंड धोती में लोहा बन चुका था।

बिरजू कुछ देर अपनी बेटी की पीठ को लगातार चूमते हुए उसकी दायीं चूची को मीजता, दबाता और सहलाता रहा, फिर उसने थोड़ा सही से लेटते हुए अपने दूसरे हाँथ को भी आगे ले जाकर नीलम की दूसरी चूची को भी अपने हांथों में भर लिया और अब दोनों चूचीयों को हांथों में भर भर के मदहोशी में दबाने लगा, नीलम के लिए बहुत मुश्किल हो रही थी क्योंकि माँ बिल्कुल पास ही थी और अति आनंद में निकल रही सिसकी को वो अब रोकने में खुद को असमर्थ पा रही थी, बार बार जाँघों को आपस में सिकोड़ ले रही थी क्योंकि गनगनाहट अब पूरे बदन में दौड़ रही थी, जाँघों के बीच जब उसे तेज सनसनाहट महसूस होती तब वो तेजी से अपनी जाँघे भींच लेती।

कुछ देर ऐसे ही दोनों बाप बेटी चुपके चुपके चूची मर्दन का आनंद लेते रहे फिर जब नीलम से अब बर्दाश्त नही हुआ तो उसने एक हाँथ से अपने बाबू के दोनों हांथों को पकड़ कर रुकने का इशारा किया, बिरजू रुक गया, कुछ देर के लिए उसने अपने हाँथ पीछे खींच लिए, नीलम की सांसें तेज चलने लगी थी।

बिरजू ने फिर से नीलम की पीठ को बेसब्री से चूमना शुरू कर दिया, पीठ का जितना भी खुला हिस्सा था वो बिरजू के थूक से भीग चुका था, नीलम सिरह सिरह जा रही थी।

एकाएक बिरजू ने अपने दोनों हाँथ नीलम के चहरे के सामने लाया नीलम अपने बाबू के हाँथ की उंगलियां आश्चर्य से देखने लगी की उसके बाबू क्या कर रहे हैं, बिरजू ने उल्टे हाँथ की तर्जनी उंगली और अंगूठे को मिलाकर गोल बनाया और सीधे हाँथ की तर्जनी उंगली को उस गोल छेद में डालकर अंदर बाहर करते हुए नीलम को दिखाकर ये इशारा किया कि लंड बूर चोदने के लिए बहुत तड़प रहा है।

नीलम ये देखते ही शर्म से पानी पानी हो गयी, मन में सोचने लगी उसके बाबू कितने बदमाश हो गए हैं, उनका चूत मारने का बहुत ही मन कर रहा है, ये इशारा देखकर मजा तो नीलम को भी बहुत आया पर वो शर्मा भी गयी, उसने पीछे पलटकर मुस्कुराते हुए अपने बाबू को देखा और फुसफुसाकर धीरे से बोली- बदमाश! सब्र करो, आज नही कल मिलेगी।

बिरजू- रहा नही जाता

नीलम- कैसे भी रहो, रहा तो मुझसे भी नही जा रहा, पर बर्दाश्त कर रही हूं न बाबू।

बिरजू- मुझे तेरे ऊपर लेटना है, चल न बरामदे में अपनी खाट पर।

नीलम- अम्मा जग जाएगी तो।

बिरजू- इतनी जल्दी नही जागेगी, गहरी नींद में है, चल न, बस एक बार, तेरे ऊपर लेटने का मन कर रहा है बहुत।

नीलम का भी मन डोल गया, उसे भी लगा मौका तो है, थोड़ा हिम्मत करें तो हो सकता है, वो फुसफुसाकर बोली- अच्छा बाबू ठीक है मैं जाती हूँ अपनी खाट पर तुम आना चुपके से।

और नीलम ने एक बार अपनी माँ को देखा तो वो सारे घोड़े सस्ते दाम पर बेंचकर सो रही थी, नीलम मुस्कुराई और धीरे से उठकर बरामदे में जाकर अपनी खाट पर लेट गयी।

थोड़ी देर बाद बिरजू धीरे से उठा और नीलम की खाट के पास जाने लगा, नीलम खाट पर चित लेटी बड़ी ही बेसब्री से अपने बाबू का इंतजार कर रही थी, नीलम को अपना इंतजार करता देख वासना से बिरजू की लार टपक गयी और वो धीरे से आआआआआआआआआआहहहहहहह.......मेरी बेटी बोलता हुआ उसके ऊपर चढ़ गया।

नीलम ने भी बाहें फैला के ओओओओहहहहहहहहह...........मेरे प्यारे बाबू......धीरे बोलो, बिरजू को अपनी बाहों में भर लिया।

आज पहली बार बिरजू अपनी सगी बेटी के ऊपर चढ़ा था वो भी शादीशुदा, नीलम को भी मानो होश नही था, शर्मो हया और वासना का मीठा मीठा मिश्रण पूरे बदन के रोएं खड़े कर दे रहा था, कैसा लग रहा था आज, एक शर्म, मर्यादा, लाज की एक आखिरी लकीर भी अब टूट चुकी थी, ये वही बाबू हैं जिनसे वो पैदा हुई है, जिस लंड से वो पैदा हुई है आज उसी बलशाली लंड को अपनी जिस्म की गहराई में अंदर तक महसूस करने के लिए तड़प गयी है, कैसी है यह वासना अपने ही सगे बाबू की हो चुकी है वो।

दोनों हल्का हल्का सिसकारी लेते हुए आंखें बंद किए एक दूसरे के बदन को महसूस कर अनंत आनंद में खोए रहे, बिरजू का लोहे समान दहाड़ता लंड नीलम की दोनों जाँघों के बीच घाघरे में छिपी बूर के ऊपर ठोकर मारने लगा तो नीलम अपने बाबू का मोटा लन्ड कपड़े के ऊपर से ही अपनी बूर पर महसूस कर व्याकुल हो गयी, मस्ती में आंखें बंद कर अपने होंठों को दांतों से दबा लेती।

आज अपनी ही सगी बेटी के ऊपर चढ़कर बिरजू सातवें आसमान में उड़ रहा था, कैसा होता है सगी बेटी का बदन ये आज उसे अच्छे से महसूस हो रहा था, अपनी ही सगी बेटी के साथ वासना का खेल खेलने में जो परम सुख मिलता है वो कहीं नही ये बात आज बिरजू को मतवाला कर दे रही थी, कितना मखमली बदन था नीलम का, कितना गुदाज, उसकी मोटी मोटी चूचीयाँ बिरजू के चौड़े सीने से दबी हुई थी।

नीलम और बिरजू ने एक बार सर घुमाकर बाहर थोड़ी दूर द्वार पर सो रही नीलम की माँ को देखा और फिर मदहोश आंखों से एक दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे, अंधेरा था इसलिए ज्यादा कुछ दिखाई नही दे रहा था, बिरजू ने धीरे से अपने होंठ आज पहली बार अपनी बेटी के होंठों पर रख दिये, नीलम ने तड़पकर अपने बाबू के होंठों का स्वागत करते हुए अपने होंठों में भर लिए और दोनों ही बाप बेटी एक दूसरे के होंठों को बेताहाशा चूमने लगे, बिरजू आज पहली बार अपनी सगी बेटी के होंठों को चूमकर बदहवास हो गया, क्या नरम नरम होंठ थे, बचपन से लेकर आज तक वो इन नरम नरम होंठों को देखता चला आ रहा था, जब नीलम बोलती थी तो कैसे उसके होंठ हिलते थे, जब हँसती थी तो कैसे उसके नरम नरम होंठ खुलकर फैलते थे। जिन होंठों को वो बचपन से देखता चला आ रहा है वो होंठ आज उसके होंठों में थे, दोनों के होंठ एक दूसरे को खा जाने वाली स्थिति में चूम और चाट रहे थे।

हल्की हल्की सिसकारियां और होंठ चूसने की चप चप आवाज़ें होने लगी तो नीलम धीरे से किसी तरह रुककर सिसकते हुए बोली- बाबू आवाज नही, बहुत धीरे धीरे।

बिरजू ने हंसते हुए उसके गालों को ताबड़तोड़ चूम लिया तो वो शर्मा गयी, बिरजू ने कपड़े के ऊपर से ही लंड से एक धक्का बूर पर मारा तो नीलम आआआआआहहहहह....बाबू कहते हुए मचल गयी, फिर बोली- बस बाबू, अभी नही, नही तो मैं बेकाबू हो जाउंगी, मेरे राजा।

और अपने दोनों पैर उठाकर बिरजू की कमर पर लपेट लिए कपड़े के ऊपर से ही बिरजू का दहाड़ता लंड नीलम की दहकती बूर पर रगड़ खाने लगा, नीलम अपने बाबू का लंबा मोटा लंड महसूस कर वासना से भर चुकी थी, जिस लंड को उसने कुछ दिन पहले देखा था और उसको पाने के लिए मिन्नतें की थी आज वही लंड सच में उसकी बूर में घुसने के लिए दहाड़ रहा था।

नीलम ने अपने को संभालते हुए बोला- बाबू, हाँथ की उंगलियों से क्या इशारा कर रहे थे उस वक्त?

बिरजू- मेरा चिज्जी खाने का मन कर रहा है बहुत, वही कह रहा था।

नीलम- ओओहह, बाबू, कल खा लेना चिज्जी, अच्छे से, अभी कैसे खिलाऊँ आपको चिज्जी, अम्मा है न।

बिरजू- तो फिर मुझे दिखा ही दो।

नीलम- चिज्जी को देखोगे भी कैसे बाबू, अंधेरा है न, कल दिन में दिखाउंगी अच्छे से, मान जाओ बाबू, मेरे प्यारे बाबू।

बिरजू ने फिर कहा- अच्छा तो फिर मुझे मेरे जामुन खिला दो, तुमने बोला था न कि आज जामुन खिलाऊंगी।

नीलम ने एक बार अपनी माँ की तरफ देखा फिर बोला- अच्छा ठीक है बाबू लो, धीरे धीरे खाना, आवाज मत करना।

और ऐसा कह कर नीलम अपनी चोली के बटन खोलने लगी और एक ही पल में सारे बटन खोल कर चोली के दोनों पल्लों को हटा कर इधर उधर कर दिया, ब्रा में उसकी कसी हुई बड़ी बड़ी दोनों चूचीयाँ दिखने लगी, बिरजू की अपनी सगी बेटी की इतनी बड़ी बड़ी चूचीयाँ ब्रा के ऊपर से ही देखकर आँखे फटी की फटी रह गयी।

नीलम ने हाथ पीछे लेजाकर ब्रा का हुक खोलकर ब्रा को ऊपर गर्दन की तरफ उठा कर अपनी कयामत ला देने वाली दोनों चूचीयों को अपने सगे बाबू के आगे निवस्त्र कर दिया, स्पॉन्ज की तरह दोनों गुदाज बड़ी बड़ी चूचीयाँ उछलकर बाहर आ गयी, अंधेरे में बस हल्का हल्का ही दिख रहा था फिर भी बिरजू आंखें फाड़े नीलम की दोनों चूचीयों को बदहवास सा देखता रह गया, वासना और जोश की वजह से दोनों चूचीयाँ किसी गोल गुब्बारे की तरह फूलकर सख्त हो गयी थी और उनकी गोलाइयाँ देखते ही बनती थी, आज पहली बार सगी बेटी की नंगी चूचीयाँ आंखों के सामने थी, दोनों की सांसें वासना में तेज तेज चल रही थी, तेज सांसें चलने से नीलम की दोनों उन्नत चूचीयाँ ऊपर नीचे हो रही थी, बिरजू ने धीरे से अपना बायां हाँथ उठाकर दायीं गोल चूची पर रखा तो नीलम थरथरा गयी आआआआआहहहहह....बाबू, आज पहली बार उसके बाबू ने उसकी नंगी चूची को अपने हांथों से छुआ था, क्या नरम नरम फूली हुई गोल गोल चूची थी नीलम की और उफ्फ उसपर वो जामुन के आकार का फूला हुआ सख्त निप्पल। नशे में बिरजू की आंखें बंद हो गयी, बिरजू ने दायीं चूची को हाथों में लिया और भर भर के दबाना शुरू कर दिया, नीलम हल्के हल्के सिसकने लगी फिर धीरे से कराहते हुए बोली- बाबू जल्दी से अपना जामुन थोड़ा सा खा लो, फिर कल अच्छे से खाना।

बिरजू ने ये सुनते ही दायीं चूची का जामुन जैसा मोटा सख्त निप्पल अपने मुँह में भर लिया और नीलम मस्ती में लहरा गयी, मुँह से उसके तेज से सिसकी निकली, बिरजू तेज तेज वासना में चूर होकर निप्पल पीने लगा और चूची को भी दबाने लगा, नीलम मस्ती में अपने दोनों पैरों को आपस में रगड़ने लगी जो उसने मोड़कर अपने बाबू की कमर से बांध रखे थे, मस्ती में भरकर उसकी आंखें बंद हो गयी और अपने हांथों से अपने बाबू के बालों को बडे प्यार से सहलाते हुए हल्के हल्के आआआहहह..........आआआ आआआहहहहह करने लगी।

बिरजू लपलपा कर अपनी सगी बेटी की चूची पिये जा रहा था, निप्पल चाटे और चूसे जा रहा था, कभी कभी दांतों से काट भी लेता तो नीलम दबी आवाज में कराहते हुए अपने नाखून पीठ को सहलाते हुए उसमे गड़ा देती, कैसे नीलम अपने सगे बाबू को अपनी चूची खोलकर पिला रही थी कितना मादक दृश्य था।

नीलम ने सिसकते हुए अपने दोनों हांथों से दोनों चूचीयों को पकड़ा और दोनों निप्पल को बिल्कुल पास पास कर दिया बिरजू ने दोनों निप्पल को एक साथ मुँह में भर लिया और नीलम कराह उठी, अपनी चूची को वैसे ही पकड़े रही और बिरजू एक साथ दोनों निप्पल मुँह में भरकर पीता रहा, नीलम दबी आवाज में सिसकती रही, एकाएक उसको लगा कि अम्मा करवट ले रही हैं तो उसने धीरे से बिरजू से कहा- बाबू बस, लगता है अम्मा उठेंगी।

और नीलम ने झट ब्रा को नीचे खींचकर दोनों चूची को ढक लिया और चोली के बटन लगाने लगी, दोनों बाप बेटी चुप करके एक दूसरे को बाहों में भरे नीलम की माँ की तरफ कुछ देर देखते रहे और जब ये आस्वस्त हो गए कि वो सो रही है तो बिरजू बोला- जामुन तो बहुत प्यारे और बहुत ही मीठे हैं मेरी बेटी के।

नीलम ने शर्माते हुए बिरजू की पीठ पर चिकोटी काट ली और बोली- बाबू सुन लेगी अम्मा जरूर, मीठे मीठे जामुन चुपचाप खा लेते हैं ज्यादा बोलते नही हैं पगलू।

बिरजू- नही सुनेगी मेरी रानी, वो सो रही है। अच्छा सुन

नीलम- हम्म, बोलो न बाबू

बिरजू- मुझे मेरी चिज्जी देखना है।

नीलम सिसकते हुए- कैसे देखोगे बाबू बहुत अंधेरा है, बत्ती जला नही सकते।

बिरजू- छू कर देखूंगा बस, जल्दी से

नीलम- ठीक है मेरे बदमाश बाबू, तुम मानोगे नही, तो छू लो थोड़ा सा।

और फिर बिरजू मुस्कुराते हुए नीलम के बगल में लेट गया और उसके तड़पते होंठों पर अपने होंठ रख दिये, नशे में फिर नीलम की आंखें बंद हो गयी, बिरजू ने लेटे लेटे अपने सीधे हाँथ से अपनी सगी बेटी के घाघरे को नीचे से उठाया और पैरों व मोटी मोटी जाँघों को सिसकते हुए सहलाने लगा, नीलम तड़प उठी, बिरजू आज पहली बार अपनी बेटी की मांसल जाँघों को छू और सहला रहा था, अपने बाबू के हाँथ अपनी जाँघों पर रेंगते हुए महसूस कर नीलम तड़प कर कराह उठी, कितनी मोटी मोटी मादक जांघे थी नीलम की, जाँघों को छूते और काफी देर सहलाने के बाद बिरजू ने पैंटी के ऊपर से ही अपनी बेटी नीलम की मखमली फूली हुई रसभरी महकती बूर को हथेली में भरकर दबोच लिया और नीलम कराह उठी, बड़ी मुश्किल से उसने अपनी आवाज को दबाया और

भारी सांसों से उसने बोला- बाबू जल्दी करो, छुओ न चिज्जी को,

इतना सुनते ही बिरजू ने नीलम की पैंटी की इलास्टिक को उठाते हुए हाँथ अंदर डाल दिया और अपनी शादीशुदा सगी बेटी की रस बहाती बूर पर हाँथ रख दिया, नीलम गनगना कर अपने बाबू से लिपट गयी और उनके सीने में शर्म से मुँह छिपा लिया, बिरजू धीरे से कान में बोला- यही है न चिज्जी?

नीलम शर्म के मारे कुछ नही बोली

तो फिर बिरजू ने दुबारा पूछा- बोल न, यही है न वो चिज्जी जिसको खाते हैं

इस बार नीलम ने बहुत शर्माते हुए धीरे से कान के पास मुँह ले जाकर बोला- हां मेरे बाबू यही है वो चिज्जी जिसको खाते हैं।

इतना सुनते ही बिरजू वासना में सिसक उठा और अपनी बेटी की बूर को हाँथ से सहलाने लगा, नीलम की बूर बिल्कुल पनिया गयी थी, वो अपने बाबू के सीने में मुँह छुपाये धीरे धीरे होंठों को भीचते हुए हाय हाय करने लगी, कितनी मोटी मोटी मखमली फांकें थी नीलम की बूर की, भगनासा कितना फूला हुआ और मुलायम सा था, हल्के हल्के बालों में छिपी अपनी बेटी की दहकती बूर को बिरजू मसलने लगा, नीलम से रहा नही जा रहा था तो उसने बिरजू का हाँथ पकड़ लिया और फुसफुसाके बोली- बाबू बस, अब बस करो, रहा नही जाता, अम्मा जग सकती है कभी भी, कल खूब प्यार कर लेना जी भरके, बस भी करो मेरे बाबू, मुझसे रहा नही जा रहा, बाकी की सारी चिज्जी कल खा लेना अच्छे से।

बिरजू ने तड़पते हुए अपनी बेटी को चूम लिया और बोला- ठीक है तू सो जा अब मैं अपनी खाट पर जाता हूँ, पर एक बार तो बता दे

नीलम - क्या बाबू?

बिरजू- इस चिज्जी को और क्या बोलते हैं।

नीलम पहले तो शर्मा गयी फिर कुछ देर बाद धीरे से कान में बोली - इसको...बूबूबूबूरररररर....बोलते हैं

और कहकर फिर शर्म से लाल हो गयी।

बिरजू- हाहाहाहाहाहायययययय.......….…..ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़ मेरी जान, और क्या बोलते हैं?

नीलम- अच्छा जाओ सो जाओ बाबू, मुझे शर्म आती है, अब मुझे नही पता।

बिरजू- बता न, बस एक बार और फिर चला जाऊंगा, जल्दी से बोल दे। बोल न

नीलम फिर शर्माते हुए कान में धीरे से- इसको चूचूचूचूचूतततत.....भी बोलते है, अब खुश।

बिरजू- हाय मेरी जान।

और नीलम फिर शर्मा जाती है, बिरजू नीलम को कस के होंठों पर एक चुम्बन लेता है और अपनी खाट पर जाकर लेट जाता है, कुछ देर तक तो नीलम और बिरजू तड़पते हुए एक दूसरे को अंधेरे में देखते रहते हैं फिर धीरे धीरे सो जाते हैं।
 
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