Incest पाप ने बचाया - Page 5 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest पाप ने बचाया

मेरे सभी readers को एक बार फिर से प्यारे प्यारे कमैंट्स करने के लिए मेरी तरफ से बहुत बहुत शुक्रिया
 
Update- 35

अगले दिन रोज की तरह जब रजनी सुबह 4 बजे सोकर उठी तो उसने देखा कि कमर के नीचे के जिस्म चादर के अंदर पूर्ण नग्न था रात में जो उसके पिता ने साड़ी और साया उसके बदन पर रख दिया था वो करवट बदलते हुए इधर उधर गिर गया था, यह देखकर वो अपने आप में ही शर्मा गयी और बगल में पड़ी पैंटी को उठाकर पहले लेटे लेटे ही पैरों में डालकर जाँघों तक चढ़ाया फिर उठ बैठी और पैंटी पहन ली, खड़ी होकर फिर उसने साड़ी और साया भी पहन लिया, चटाई पर ढेर सारी गुलाब की पंखुड़ियां फैली हुई थी जो रात में हुए बाप बेटी के अत्यंत कामुक पापलीला को बयाँ कर रहे थे, रजनी ने उन्हें हाथ में उठाकर बड़े ही मादक ढंग से सूंघा और मुस्कुरा पड़ी।

आज पांचवा दिन था एकाएक रजनी की नज़र बगल में पड़े कागज पर पड़ी, उसने दिया जलाया और कागज खोला, उसमे लिखा था-

"ऐसी वो तो तुम्हारी माँ की भी नही थी मेरी रानी बेटी, मुझे ऐसी ही वो चाहिये थी, धन्य हो गया मैं तुझे पाकर, अब बर्दाश्त नही हो रहा मेरी बिटिया, आज पांचवी रात होगी और हाय मुझे आज अपनी बेटी के नीचे के होंठ खाने को मिलेंगे"

रजनी मन ही मन पढ़कर मुस्कुरा उठी और सोचने लगी बाबू बर्दाश्त तो अब मुझसे भी कहाँ हो रहा है

उसने फिर एक कागज लिया उसमे मुस्कुराते हुए कुछ लिखा और कल की तरह काकी के हाँथ से उदयराज के तकिए के नीचे रखवा दिया, काकी ने आज वो कागज लेते हुए रजनी को मुस्कुराते हुए देखा तो रजनी शर्मा गयी, काकी को ये तो शक था कि कर्म में कुछ तो रसीला लिखा हुआ है, जो ये बाप बेटी कर रहे हैं, पर एक बड़ी बुजुर्ग होने के नाते उसने बस अभी रजनी और उदयराज के कर्म को सुरक्षा देना ही उचित समझा, वो जानती थी कि एक न एक दिन रजनी उसे ये भेद बताएगी।

उदयराज रोज की तरह उठा और अत्यंत खुशी से बिस्तर समेटने लगा तो कल की तरह आज भी उसे तकिए के नीचे कागज मिला, उसने वो कागज आज भी धोती में ये सोचते हुए खोंस लिया को खेत में अकेले में पढ़ेगा एकांत में।

रोज की तरह फटाफट तो फावड़ा लेकर खेत में पहुँच गया, आज बैल का कोई काम नही था तो वो बस गुड़ाई के लिए फावड़ा लेकर खेत चला गया, बड़ी बेसब्री से उसने वो कागज खोला-

मेरे प्यारे बाबू, अम्मा की कैसी थी कैसी नही ये तो मुझे नही पता, पर मैं अम्मा की जगह नही लेना चाहती, मैं आपकी बिटिया हूँ और बेटी रहकर ही आपका वो प्यार पाना चाहती हूं, मैं हमेशा आपको केवल पिता के रूप में ही सोचकर अत्यंत उत्तेजित हुई हूँ, और आप मेरे बाबू है ही, मुझे आपसे बाबू वाला यौनसुख चाहिए तभी तो ये महापाप फलित होगा न बाबू, और हमारे कुल की रक्षा हो पाएगी, हमे पाप करना है बाबू पाप, और मेरे शुग्गु मुग्गु बाबू उसको बूर बोलते है बूर, अभी कल भी बताया फिर भूल गए उसका नाम। आपकी बेटी की बूर है वो जो आज रात आपको खाने को मिलेगी, मैं बेसब्री से इंतज़ार करूँगी अपने बाबू का। आपकी तरह मैं भी पगला गयी हूँ।

उदयराज ने खुश होते हुए वो कागज मोड़कर रख लिया और खड़े होते हुए लंड को संभाला, दिन भर खेतों में काम करके शाम को घर आया और रोज की तरह सबकुछ वैसे ही बीता और देखते देखते रात हो गयी, सब सो चुके थे आखिर वो पल आ ही गया, उदयराज चुपचाप धीरे धीरे घर में पहुँचा, कोठरी के सामने आके खड़ा हुआ, रजनी को आहट लगते ही वो कसमसाई, आज अपनी बेटी उसे और भी गदराई लग रही थी, बगल में आज भी एक और दिया रखा हुआ था, आज उदयराज बहुत बेसब्र था, रोज की तरह आज भी रजनी ने कोठरी को सुहागरात की तरह सजाया हुआ था, गुलाब के फूलों से सुसज्जित कोठरी अलग ही शोभा बढ़ा रही थी और उफ्फ ये गुलाब और कपूर की महक, दिल खुश कर दे रही थी।

उदयराज बेसब्रों की तरह रजनी की कमर के पास दायीं ओर बैठ गया, कोठरी में बाहर जल रहे दिए कि हल्की रोशनी आ रही थी।

उदयराज ने सबसे पहले पैरों की तरफ से चादर को हटाकर कमर तक कर दिया, आज भी रजनी ने दूसरी लाल साड़ी ही पहनी थी, चादर कमर से ऊपर तक हटते ही नाभि और आस पास का हिस्सा दिखने लगा, नाभि खुलते ही किसी भूखे की तरह उदयराज उस पर टूट पड़ा, एकाएक उसने कई चुम्बन ताबड़तोड़ नाभि पर अंकित कर दिए, रजनी चिहुकते हुए हंस पड़ी अपने बाबू की बेसब्री देखकर, और फिर सिसकने भी लगी, कुछ देर नाभि को चूमने के बाद उसने अपनी जीभ नाभि में घुसेड़ दी, रजनी का पूरा शरीर हिल गया, नाभि का रसपान करने के बाद उदयराज ने आज अपनी बेटी की साड़ी को पैरों की तरफ से ऊपर उठाकर उसे नग्न करके उसका यौवन चखने की सोची, उसने अपनी बेटी के पैरों को बहुत प्यार से निहारा और उन्हें ही देखकर इतना मदहोश हो गया की झुककर अपनी बेटी के पैरों की उंगलियों, अंगूठे और एड़ी को चूमने और चाटने लगा, रजनी एक बार फिर अपने बाबू की इस तड़प पर खिलखिलाकर सिसकते हुए हंस दी और अपने पैर की उंगलियों को आपस में वासना से बेकाबू होकर रगड़ने लगी।

फिर जैसे ही उदयराज ने पैर के पास साड़ी को उठाने के लिए पकड़ा, रजनी ने अपने दाहिने पैर के पंजे को "ना" में हिलाते हुए इशारा किया। (जैसे हम सर हिलाकर ना करते हैं)

उदयराज अपनी बेटी की इच्छा को समझ गया की वो चाहती थी कि साड़ी को ऊपर की तरफ से खोलकर कल की तरह खींचकर पूरा निकाल दें ताकि पैर से लेकर नाभि तक का पूरा हिस्सा बिल्कुल नग्न हो जाये और पूरे पैर अच्छे से फैलाये जा सकें, उदयराज अपनी बेटी की इस कामुक इच्छा को भांपते ही बड़े प्यार और दुलार से उसके दाहिने पैर जो की "ना" का इशारा करते हुए हिल रहे थे, ताबड़तोड़ चूमने लगा, रजनी फिर हंस पड़ी अपने बाबू के इस प्यार और दुलार पर।

आख़िरकर उदयराज ने साड़ी को ऊपर से खोलने के लिए हाथ बढ़ाया और साड़ी के अंदर हाथ डालकर नाड़े को खींचकर खोल दिया फिर रजनी के दोनों पैरों के बीच आकर साड़ी को साये समेत कमर से पकड़कर नीचे खींच दिया, आज रजनी ने पैंटी नही पहनी थी। रजनी ने अपने भारी गुदाज नितम्ब उठाकर साड़ी को निकल जाने में अपने बाबू की भरपूर मदद की।

बाहर जलते दिये कि हल्की रोशनी में एक बेटी की मदमस्त फाँकों वाली कसी कसी कमसिन, वासना में फूली हुई, हल्का हल्का काम रस छोड़ती हुई बूर उसके पिता की नज़रों के सामने उजागर हो गयी। उदयराज आंखें फाड़े कुछ देर अपनी सगी बेटी की बूर निहारता रहा, उसकी बनावट और आकार, उसकी आभा देखकर वासना से भर गया, कैसी फूली हुई बूर थी, मोटी मोटी दोनों मांसल जांघों के बीच वो अंग्रेजी के वी "\!/" जैसा आकार लिए करीब पांच पांच इंच लंबे दोनों फांक आपस में सटे हुए थे, मानो बूर के अंदर रखे असीम सुख के खजाने की रक्षा कर रहे हों। हल्के काले काले बालों से बूर हल्की छिपी हुई सी लगती थी।

उदयराज ने अपनी सगी बेटी की बूर को अभी कल ही देखा था आज दूसरा दिन था फिर भी उसे ऐसा लग रहा था जैसे पहली बार देख रहा हो।

आज अपनी बेटी के पैंटी न पहनने पर उदयराज उसकी मंशा जान गया और बेताब होते हुए उसने एक ही झटके में साड़ी और साये हो खींचकर पैर से निकाल कर बाहर कर दिया।

और फिर बिना समय गवाये वासना से वशीभूत शेर की तरह दहाड़ता हुआ अपनी सगी बेटी की बूर पर टूट पड़ा, उसने अपने होंठों से अपनी सगी बेटी की बूर पर एक बहुत जोरदार और कामुक चुम्बन जड़ दिया, खुद आज उसके मुँह से बड़ी ही मादक आवाज में aaaaahhhhhhhhhh bbbbbbeeetttttiiii निकला।

अपने बाबू का अचानक अपने बूर पर जोरदार चुम्बन पा के रजनी का बदन सर से लेकर पाँव तक सरसराहट में हिल गया, अंग अंग थरथरा उठा, बड़ी ही तेज और मादक आवाज में उसने भी aaaaaaaaaahhhhhhhhhh.....bbbbbbbbbaaaaaaaabbbbbbbbuuuuuuu

बोलते हुए अपने पैरों को हवा में जितना हो सके फैलाते हुए अपनी कसी कसी मांसल जाँघों को खुलकर अपने बाबू के लिए खोल दिया, जिससे उनकी बूर उभरकर उदयराज के मुंह के सामने आ गयी और दोनों फांकें खुलकर फैल गयी, हल्के दीये कि रोशनी में उदयराज अपनी सगी बेटी की फैली हुई बूर को देखकर और भी पागल हो गया और उसने अपनी लंबी सी जीभ निकाली, फिर जीभ को बूर के नीचे अंतिम छोर पे गांड की छेद के पास लगाया और सर्रर्रर्रर्रर से पूरी बूर को चाटता हुआ नीचे से एकदम ऊपर तक आया, अपने बाबू के ऐसा करने से रजनी बौखला गयी और मदहोशी में अपनी आंखें बंद करके अपने होंठों को दांतों से काटते हुए बड़ी जोर से सिसकी और uuuuuuiiiiiiiiiiiiii mmmmmaaaaaaaaaaaaaa बोलते हुए

पूरे बदन को धनुष की तरह ऊपर को मोड़ती चली गयी, उसकी विशाल चूचियाँ तनकर ऊपर को उठ चुकी थी और निप्पल तो इतने सख्त हो गए थे कि वो खुद ही उन्हें हल्का हल्का मसल रही थी।

बूर की पेशाब और काम रस की गंध से उदयराज पागल हो चुका था, उसने इसी तरह कई बार पूरी पूरी बूर को नीचे से लेकर ऊपर की तरफ विपरीत दिशा में लप्प लप्प करके चाटा, जब उदयराज बूर के ऊपरी हिस्से पर पहुचता तो बूर के ऊपर बालों में अपनी जीभ फिराता और फिर जीभ को फैलाके गांड की छेद के पास रखता और फिर सर्रर्रर्रर्रर्रर्रर से लपलपाते हुए पुरी बूर पर जीभ फिराते हुए ऊपर की ओर आता और कभी तो वो ऊपर आकर बूर के ऊपर घने बालों पर जीभ फिराता कभी जहां से दरार शुरू होती है वहां पर जीभ को नुकीली बना कर दरार में डुबोता और भगनासे को जी भरकर छेड़ता, फिर भगनासे के किनारे किनारे जीभ को गोल गोल घूमता।

रजनी की पूरी बूर उदयराज के थूक से गीली हो चुकी थी, उसकी बूर से निकलता काम रस उदयराज बराबर अपनी जीभ से चाट ले रहा था, पूरी कोठरी में हल्की हल्की चप्प चप्प की आवाज के साथ दोनों बाप बेटी की सिसकियां गूंजने लगी।

उदयराज ने फिर एक बार अपनी जीभ को नीचे गांड के छेद के पास लगाया और इस बार उसने जीभ को नुकीला बनाते हुए जीभ को अपनी बेटी की बूर की दरार में नीचे की तरफ डुबोया और दरार में ही डुबोये डुबोये नुकीली जीभ को नीचे से खींचते हुए ऊपर तक लाया, पहले तो एक बार जीभ रजनी की बूर के संकरी छेद में घुसने को हुई पर फिर फिसलकर ऊपर चल पड़ी और भगनासे से जा टकराई, फिर उदयराज ने वहां ठहरकर भगनासे को लप्प लप्प करके कई बार चाटा।

रजनी के बदन की एक एक नस आनंद की तरंगों से गनगना उठी, बड़ी ही तेज तेज उसके मुँह से अब सिसकियां निकल रही थी मानो अब लाज, संकोच और डर (की कोई सुन लेगा) जैसे हवा हो चुका था, अपने पैरों को मोड़कर उसने अपने बाबू की पीठ पर रख लिया था, गनगना कर कभी वो अपने बाबू को पैरों से जकड़ लेती कभी ढीला छोड़ देती। बेतहासा कभी अपना सर दाएं बाएं पटकने लगती, कभी अपने हांथों से चूचीयों को कस कस के मीजती, चादर उसका उनके चेहरे से हट चुका था पर वो नीचे की तरफ नही देख रही थी, उसकी आंखें अत्यंत नशे में बंद थी, कभी थोड़ी खुलती भी तो वो हल्का सा कोठरी की छत को देखती।

उनकी सांसे बहुत तेज ऊपर नीचे हो रही थी, लगातार उसके बाबू उसकी बूर को एक अभ्यस्त खिलाड़ी की भांति चाटे जा रहे थे, जीवन में पहली बार ढंग से किसी मर्द की जीभ उसकी बूर पर लगी थी और वो भी खुद उसके सगे पिता की, आज पहली बार वो अपने बाबू से अपनी बूर चटवा रही थी, इतना परम सुख उसे कभी नही मिला। उदयराज की मर्दाना जीभ की छुअन से रजनी नशे में कहीं खो गयी थी।

नियति भी इन बाप बेटी के धैर्य को देखकर चकित थी, दोनों ने ही अपने कामोन्माद को किस तरह काबू किया हुआ था, कोई और होता तो अब तक सब भूल कर संभोग कर चुका होता, क्योंकि सगे बाप बेटी के रिश्ते में छुप छुप के हुए इस व्यभिचार में ख़ुद को इतना संभाले रहना सबके बस की बात नही।

पूरी कोठरी में बूर चाटने की चप्प चप्प आवाज सिसकियों के साथ गूंज रही थी। एकएक उदयराज को कुछ कमी महसूस हुई वो और ज्यादा गहराई से अपनी सगी बेटी की बूर को खाना चाहता था, उसने रजनी के बूर से मुँह हटाया तो उसके होंठों और रजनी की बूर की फाँकों के बीच लिसलिसे कामरस और थूक के मिश्रण से दो तीन तार बन गए, उदयराज ने बड़ी मादकता से उसे चाट लिया और उठने लगा।

रजनी ने झट से चादर चहरे पर डाल लिया और असमंजस में सोचने लगी कि क्या बाबू आज इतनी जल्दी चले जायेंगे? नही नही, इतनी जल्दी नही जाना चाहिए बाबू को, मुझे अभी और चुम्बन चाहिए अपनी बूर पर, वो थोड़ा दुखी हो गयी, उदयराज झट से कोठरी से बाहर गया, रजनी ने उदासी से ये सोचकर अपने पैर नीचे कर लिए की आज बस इतना ही, वो ऐसे ही चटाई पर जांघ फैलाये पैर नीचे किये लेटी रही, लेकिन उसका दिल कह रहा था कि उसके बाबू गए नही हैं, जरूर कोई बात है, क्योंकि जाते तो वो अपनी बेटी की बूर को ढककर जाते, सम्मान दे के जाते, आखिर वो इंतज़ार करने लगी उनके आने का। उसने अपनी बूर को स्वयं ढका भी नही वैसे ही बूर खोले लेटी रही।

उदयराज कोठरी से निकलकर अपना दहाड़ता हुआ खड़ा लंड लेकर बरामदे में अंधेरे में तकिया ढूंढने लगा पर उसे वहाँ तकिया मिला नही।

फिर उसे अपने बिस्तर का ध्यान आया कि उसके बिस्तर पर तकिया रखा हुआ है, वो अपना तना हुआ लंड लेकर धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर गया, बाहर गुप्प अंधेरा था, दरवाजे की हल्की सी खुलने की आहट से रजनी एक बार फिर पूरी तरह उदास हो गयी उसे लगा कि बाबू तो सच मे चले गए, पर फिर भी उसका मन नही माना और वो इंतज़ार करती रही, उसे विश्वास था कि उसके बाबू ऐसे नही जा सकते।

उदयराज धीरे से अपने बिस्तर से बेहद मुलायम तकिया उठा लाया और घर का दरवाजा खोल अंदर आ गया, रजनी दुबारा दरवाजे के खुलने की आहट से प्रफुल्लित हो उठी और चादर को अच्छे से ओढ़ लिया।

उदयराज ने रजनी के पैर को उठाया तो रजनी ने स्वयं ही पैर हवा में उठा कर जाँघों को पूरा फैलाकर अपनी प्यारी फूली हुई बूर एक बार फिर अपने बाबू के सामने खोलकर परोस दी।

उदयराज ने जब रजनी की गांड के नीचे हाथ लगा के उसे गांड को ऊपर उठाने का इशारा किया तो रजनी ने एकदम से अपनी गांड को ऊपर उठा लिया, उदयराज ने जब गांड के नीचे तकिया लगाया तब रजनी को समझ आया कि उसके बाबू तकिया लेने गए थे ताकि बूर और खिलकर ऊपर को उठ सके, वो मंद मंद मुस्कुरा उठी।

अब वो गांड के नीचे तकिया लगाए अपने दोनों पैर हवा में विपरीत दिशा में फैलाये, अपनी जाँघों को अच्छे से खोले और बूर को एकदम से ऊपर उठाकर अपने बाबू के सामने मदरजात नंगी पड़ी थी, तकिया लगने से उसकी कमर का हिस्सा ऊपर उठ गया था और अब नीचे से उसकी गांड का काफी हिस्सा भी दिख रहा था।

उदयराज ने बगल में पड़े दिए को भी जला दिया

अब तो रजनी ने शर्म की वजह से अपना चेहरा अपने हाथों से ढक लिया क्योंकि उसकी बूर अब पूरा उभरकर उसके बाबू के सामने आ गयी थी और अब कोठरी में रोशनी भी ज्यादा हो गयी थी।

दिये कि तेज रोशनी में जब उदयराज ने अपनी बेटी की मोटी मोटी गोरी शख्त फैली हुई जाँघे, पैर, कमर और नाभि तथा नाभि के आस पास का हिस्सा, जाँघों के नीचे तकिए पर भारी भारी उन्नत मांसल नितम्ब का कुछ निचला हिस्सा, और काम रस तथा थूक से सनी, फूली हुई काले काले हल्के बालों वाली गोरी गोरी बूर जिसकी फांकें फैलने की वजह से हल्की खुली हुई थी और भगनासा खिलकर बाहर निकला हुआ था, देखा तो उदयराज दुबारा पागल होने लगा।

उसने दहाड़ते हुए अपनी दो उंगलियों से अपनी बेटी की बूर की फांकों को अच्छे से चीरा, एक तो जांघे फैलने से बूर पहले ही खुली हुई थी ऊपर से उदयराज ने उंगलियों से फांकों को और चीर दिया जिससे बूर का लाल लाल संकरी छेद और भगनासा दीये की रोशनी में चमक उठा, उदयराज लपकते हुए बूर पर बेकाबू होकर टूट पड़ा और जीभ से बूर के लाल लाल कमसिन कसे हुए छोटे से छेद को बेताहाशा चाटने लगा।

रजनी का बदन अचानक ही बहुत तेजी से थरथराया और रजनी ने aaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhh, uuuuuuuuuiiiiiiiiiiiiiiiiimmmmmmaaaaaaaaaaaaaaaa कहते हुए बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज को सिसकते हुए दबाया।

उदयराज लप्प लप्प जीभ से अपनी बेटी की बूर के छेद को चाटे जा रहा था, रजनी फिर से तड़प तड़प कर अपना सर दाएं बाएं पटकती, पूरा बदन ऐंठती, गनगना जाती, अपनी मुठ्ठियों को कस कस के भीचती, तो कभी अपने स्तन भींच लेती, अपने पैरों को उसने फिर से अपने बाबू की पीठ पर लपेट दिया और जब जब उसका बदन थरथराता वो अपने पैरों से अपने बाबू को जकड़ लेती।

उदयराज ने थोड़ी देर अपनी बेटी की बूर के छेद को चाटा फिर अपनी जीभ को नुकीला किया और बूर के नरम नरम छोटे से लाल लाल छेद के मुहाने पर गोल गोल घुमाने लगा, रजनी अब जोर जोर से काफी तेज तेज छटपटाने और सिसकने लगी, उसे क्या पता था कि उसके बाबू बूर के इतने प्यासे हैं, वो बूर के इतने अच्छे खिलाड़ी हैं, वो बूर चाटने में इतने माहिर है, ऐसा सुख तो उसके पति ने कभी सपने में भी नही दिया, उसे पता लग चुका था कि उसके बाबू अपनी सगी बेटी की बूर के कितने भूखे हैं। कोठरी में काफी तेज तेज सिसकारी गूंजने लगी।

उदयराज ने एक बार फिर से पूरी बूर को नीचे से ऊपर की ओर अपनी जीभ से लपलपा के चाटा, उदयराज का अब इरादा था अपनी जीभ अपनी बेटी के बूर की छेद में डालने का पर इतने भर से ही रजनी अब काफी त्राहि त्राहि करने लगी, उसके मुँह से अब थोड़ी ज्यादा जोर से hhhhhhhhhaaaiiiiiiiiiiiii. bbbbbaaabbbbuuuuu.........uuuuuuuufffffff. bbbbbbaaaaaabbbbbbuuuuuuu, mmmmaaaaarrrrrrr jjjjaaauuungggiii bbaaaabbuuu सिसकते हुए निकलने लगा।

उदयराज को अपनी प्यारी बेटी पर तरस आया, वो सोचने लगा की अगर वो और ज्यादा करता है तो ये उसके साथ अन्याय होगा क्योंकि वो क्या पता बर्दाश्त न कर पाए और कर्म का नियम तोड़ बैठे।

उसकी प्यारी बेटी जब उसे प्यार से अपना यौवन चखा रही है तो उसे उसकी तड़प का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इस वक्त वो उसकी प्यारी सी कमसिन सी दहकती बूर में अपना 9 इंच का फ़ौलादी लंड घुसाके उसे चोद तो सकता नही, और न ही इस वक्त रजनी योनि चुम्बन से झड़ना चाहती है, (वो जानता था कि उसकी सगी बेटी भी कई वर्षों से लंड की प्यासी है और वो झडेगी तो सिर्फ अपने बाबू के लंबे और मोटे लंड की रगड़ से)

तो हद से ज्यादा तड़पाकर उसकी दिमाग की नसों पर ज्यादा जोर डालना अच्छी बात नही।

ये सोचते हुए उसने अपनी बेटी की बूर से धीरे से अपना मुँह हटाया, पर फिर एकदम से सटा कर कुछ देर ऐसे ही लेटा रहा, काम रस रजनी की बूर से रिसता रहा और उदयराज उसे धीरे धीरे चाटता रहा, रजनी की उखड़ती सांसे धीरे धीरे थोड़ी कम हुई, एक अंतिम चुम्बन लेते हुए उदयराज उठ बैठा, रजनी ने अपने पैर चटाई पर अपने बाबू के अगल बगल रख दिये, उदयराज ने रजनी की साड़ी और साया उठाया और अपनी बेटी की बूर को सम्मान पूर्वक ढक दिया, रजनी समझ गयी कि अब उसके बाबू जा रहे हैं, अपने बाबू द्वारा दिये जाने वाले सम्मान से वो गदगद हो गयी, उसकी बूर से अभी भी रस बह रहा था, बदन अभी भी हल्का हल्का कामवेग से थरथरा जा रहा था।

उदयराज ने बगल में रखा दिया बुझा दिया और रजनी की गांड के नीचे से तकिया निकाला और आज कागज पर बिना कुछ लिखे उसको वहीं छोड़कर तकिए पर लगे काम रस को सूंघता हुआ कोठरी से बाहर निकल गया।
 
आप सभी लोगों का comments करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।
 
Update- 36

उदयराज तकिए को नाक से लगाये सूंघता हुआ घर से बाहर निकला और धीरे से जाकर कुएं के पास अपनी खाट पर औंधे मुंह लेट गया काफी देर तक वो अपनी बेटी की बूर का काम रस लगा तकिया सूंघता रहा, जब जब आंख बंद करता ऐसा लगता रजनी की बूर ठीक उसके मुंह के सामने है उन नरम नरम लज़्ज़त भारी फांकों की छुअन, हल्के हल्के बूर के बाल और लिसलिसे काम रस की महक उसके मन मस्तिष्क पर चढ़ गई थी, काफी देर तक तो वो पागलों की तरह तकिए को ही दुलारता रहा फिर उससे रहा नही गया और वह खाट पर पेट के बल लेट गया, उसने लेटे लेटे रात के अंधेरे में अपना फौलाद हो चुका 9 इंच लंबा और 4 इंच मोटा लंड धोती में से निकालकर, बेटी की बूर का काम रस लगा तकिया ठीक लंड के नीचे रखा और काफी देर तक हौले हौले धक्का मारते मारते ये सोचते हुए की उसका फ़ौलादी लंड अपनी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर में डूबा हुआ है सो गया।

इधर रजनी भी बदहवास सी अपनी उखड़ती सांसों को संभालती लेटी रही, काफी देर तक उसकी बूर हल्का हल्का संकुचित होती रही और हल्का कामरस रिस रिसकर उसकी जाँघों में गिरता रहा, उसे ऐसा लग रहा था कि उसके बाबू की मर्दाना जीभ अब भी उसकी बूर को नीचे से ऊपर लपलपा के चाट रही है, किस तरह उसके बाबू उसकी बूर चाट रहे थे, haaaaiiiiiii अब तो अपनी बेटी की बूर का एक एक कोना उन्होंने अच्छे से देख लिया, छू लिया और चूम लिया है, फिर सिसकते हुए, मंद मंद मुस्कुराते हुए वो भी धीरे धीरे सो गई।

सुबह करीब 4:30 तक रजनी एक मादक अंगडाई लेकर उठी तो देखा कि कमर से नीचे से तो वो निवस्त्र है केवल चादर ही उसके तन पर पड़ा था, रोज की तरह उसने जल्दी से अपनी साड़ी बांधी और रात की बात याद आते ही बूर में उसके फिर से हलचल सी होने लगी, अपने को बड़ी मुश्किल से संभालते हुए उसकी नज़र कागज कलम पर पड़ी।

उसने देखा कि कल रात बाबू ने उसके लिए कुछ लिखकर छोड़ा नही, और आज 6ठे दिन का ध्यान आते ही रजनी का मन अंगडाई लेकर झूम उठा, क्योंकि आज होना था उल्टा, इस ख्याल से ही रजनी का बदन सुबह सुबह भोर में ही गनगना गया, आज उसे वो देखने, छूने, सहलाने और चूमने को मिलेगा जिसकी कल्पना मात्र से ही वो सिरह जाती थी, सोचते ही शर्म के मारे उसका चेहरा लाल हो गया, आखिर एक बेटी अपने ही सगे पिता के उस अंग को कैसे खोलेगी, कैसे देखेगी, कैसे छुएगी और फिर कैसे चूमे......। कितनी शर्म आएगी, आखिर वो उसी से पैदा हुई है, देखने में कैसा होगा वो, न जाने कितना लंबा और मोटा होगा वो।

ये सोचते ही बदन उसका पुनः गनगना गया, निप्पल सख्त होने लगे, अभी तक जो हुआ उसे ही बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था और आज जो होगा......uuuuufffff, कहीं वो अपना नियंत्रण न खो बैठे, पर अभी पूरा दिन बाकी था।

रजनी ने कुछ सोचकर कागज कलम उठाया और शर्माते हुए कुछ लिखने लगी, तब तक 5 बज चुके थे उसने चुपके से बाहर जा के वो कागज काकी को दिया, काकी उसको देखकर मुस्कुराने लगी तो वो भी शर्मा गयी और आज के कर्म के बारे में समझाते हुए बोली- काकी आज रात मैं बाहर सोऊंगी और बाबू अंदर। काकी मंद मंद मुस्कुराती रही फिर रजनी का हाथ अपने हाथों में लेकर बोली- मेरा आशीर्वाद तुम दोनों के साथ है, महात्मा द्वारा बताया गया कर्म पूर्ण रूप से फलित हो, मुझे ये तो नही पता कि कर्म में क्या लिखा था पर जो भी हो उसमे तू मेरी तरफ से निश्चिन्त रहना मेरी बच्ची, हर वक्त मैं तुम दोनों के साथ हूँ, रजनी गदगद होकर काकी से लिपट गई, काकी कुछ देर रजनी के सर को सहलाती रही फिर बाहर आ गयी।

बाहर हल्का अंधेरा था, अपनी बेटी को लेकर राजनी घर में आ गयी, उसके बाबू जहां लेटे थे उस तरफ उसने देखा भी नही।

काकी जब वो कागज उदयराज के पास खाट पे रखने आयी तो देखा उदयराज पेट के बल सो रहा था और तकिया उदयराज के सर के पास न होकर जांघ के नीचे दबा हुआ है, काकी ने सोचा पहले तो कभी उदयराज को ऐसे सोते हुए देखा नही, कुछ तो हलचल है इन बाप बेटी की जिंदगी में पर जो भी होगा अच्छा ही होगा, ये सोचकर उसने वो कागज वहीं सिरहाने की तरफ बिस्तर के नीचे डाल दिया और दबे पांव आ गयी।

उदयराज कुछ देर बाद जब अंगडाई लेता हुआ उठा तो उसने देखा कि धोती उसकी अस्त व्यस्त है और तकिया जाँघों के पास है फिर रात का ध्यान आते ही हल्की सी वासना की खुमारी उसके बदन में दौड़ गयी और आज तो छठा दिन था, काफी देर खाट पे ही बैठे बैठे वो मुस्कुराते हुए सोचता रहा कि उसका किसी और चीज़ में मन नही लग रहा, अब हर वक्त अपनी सगी बेटी रजनी का ही ख्याल रहता है मन मस्तिष्क में, सोकर उठते ही और फिर रात को जब तक सो न जाओ हर वक्त उसका मुस्कुराना, हंसना, उसके होंठ, होठों की लाली, उसका गदराया यौवन, उसकी मांसल जाँघे, उसके उन्नत स्तन और हाय उसकी मक्ख़न जैसी कमसिन बूर। मेरी जिंदगी को उसने रंगों से भर दिया है, कितना मजा है अपनी ही सगी बेटी के साथ छुप छुप कर उसका साथ पाते हुए, उसकी मर्जी से किये गए इस पाप के आनद में। मुस्कुराते हुए वो आज की आने वाली रात को याद करते हुए उठा और अपनी धोती पहले सही की फिर बिस्तर समेटने लगा जैसे ही उसने बिस्तर उठाया उसके नीचे कागज पड़ा था, कागज उठा के उसने धोती में खोंस लिया और काकी की तरफ देखा, काकी उस वक्त बैलों और गायों को चारा डाल रही थी, बिस्तर समेटकर वो नित्यकर्म से फारिग हुआ, तब तक 7 बज चुके थे।

उदयराज ने जल्दी जल्दी नाश्ता किया और बैल व हल लेकर खेतों की तरफ निकल गया आज उसे कुल वृक्ष के पास वाले खेत की जुताई करनी थी वह खेत कुल वृक्ष से करीब 100 मीटर की दूरी पे था, खेत में पहुचते ही उसने हल को बैलों के बीच सेट किया और उनको वहीं छोड़कर खेत की मेड़ पर बैठ गया, धोती में खोसा हुआ कागज जल्दी से निकाला उसमे लिखा था-

"मेरी प्रिय बाबू, मेरे शुग्गु मुग्गु, मेरे राजा, आज मैं बाहर सोऊंगी और आप अंदर, मैं रात का खाना बनाकर और जब सब लोग खा लेंगे तो कुछ देर के लिए दालान की तरफ टहलने चली जाउंगी और आप फिर घर में चले जाना और मेरा इंतज़ार करना। बस आज की रात और सब्र करना है हमे।"

उदयराज के मन में मानो हज़ारों शहनाइयाँ एक साथ बजने लगी, खुशी खुशी वो उठा और खेत जोतने लगा, फिर शाम को घर वापिस लौटा रास्ते में जब वो नीलम के घर के पास से गुजर रहा था तो उसने नीलम को उसके घर के आगे कच्ची सड़क के पास लगे धतूरे के पौधों से उसकी पत्तियां तोड़ते देखा।

उदयराज- अरे नीलम बिटिया क्या हुआ?, धतूरे के पत्ते का क्या काम आ गया, सब ठीक तो है।

नीलम- बड़े बाबू नमस्ते (नीलम ने पलटकर उदयराज को देखा तो नमस्ते किया)

उदयराज- नमस्ते मेरी बिटिया, क्या हुआ?

नीलम- अरे बाबू, मेरी ही गलती की वजह से मेरे बाबू को हाथ में थोड़ा गुम चोट लग गयी है। वो तो नीचे खाट थी नही तो काफी चोट लग सकती थी।

उदयराज- कैसे?

नीलम- अरे वो द्वार पर जो जामुन का पेड़ है न उसमे बहुत मीठे मीठे जामुन लगे हैं, उसदिन अपने भी तो देखा था।

उदयराज- हाँ हाँ, फिर

नीलम- आज सुबह मेरा मन था जामुन खाने का तो मैंने बाबू को सुबह बोला, नही तो वह फिर कहीं चले जाते काम से, पहले तो बाबू ने बोला कि ठीक है मैं तोड़ देता हूँ पर फिर मैं ही जिद करके पेड़ पर चढ़ गई और बाबू नीचे खाट डालकर उसके पास खड़े थे मैं जामुन तोड़ तोड़ के नीचे खाट पे फेंक रही थी कि अचानक मेरा पैर फिसला और मैं सीधा बाबू के ऊपर गिरी, वो तो खाट थी तो हम दोनों ही खाट पर गिर पड़े नही तो काफी चोट लग जाती, और तो और डाल भी टूट गयी पर गनीमत थी कि डाल हमारे ऊपर नही गिरी आधी टूटकर लटक गई, तो अम्मा ने बोला कि जा हल्दी और फिटकरी गरम करके धतूरे का पत्ता ऊपर से लगा के हाथ में बांध दे, दो तीन बार दिन में बदल बदल के बांध सही हो जाएगा, तो दिन में सुबह एक बार बांधी थी और फिर अभी बांधने जा रही हूं।

उदयराज- लो इतना कुछ हो गया और हमे पता भी नही, चल जरा देखूं कैसा है बिरजू।

फिर उदयराज नीलम के साथ उसके घर गया बिरजू को देखने, तो उसको शाम तक काफी आराम था, सीधे वाले हाँथ में पूरे हाँथ में सूजन थी, पर अब थोड़ा कम हो गयी थी, फिर उदयराज कुछ देर वहां रुका और हाल चाल पूछकर घर आ गया।

(नीलम और बिरजू की ये कहानी और विस्तार से अगले कुछ आने वाले updates में दूंगा, अभी चलते हैं आगे की ओर)

उदयराज बिरजू को देखने चला गया था इस वजह से घर शाम 7 बजे तक पहुचा तो काकी को बताने लगा।

काकी भी चकित रह गयी और बोली- इतना बड़ा हादसा होते होते बच गया और हमे कुछ पता भी नही चला, इस जामुन के चक्कर में किसी दिन अपना और दुसरों का भी हाथ पैर तुड़वा बैठेगी ये लड़की, बताओ शादीशुदा जवान लड़की का भारी भरकम शरीर इतने ऊपर से गिरेगा तो चोट तो लगेगी न, वो तो गनीमत है कि खाट थी, जामुन की डाल वैसे ही नाजुक होती है, चढ़ना ही नही चाहिए था, खैर काल जाउंगी दिन में रजनी को लिवा के देखने।

उदयराज- हां जरूर चली जाना। वैसे अब काफी आराम है।

काकी- चल अब तू नहा ले थोड़ी गर्मी भी है आज, रजनी खाना बना रही है, बैलों को मैं चारा डाल देती हूं।

उदयराज नहाने चला गया फिर आ के काकी के ही पास आकर खाट पर लेट गया, दालान के पास लालटेन हल्की रोशनी फैला रहा था, आज अमावस्या से एक दिन पहले की रात थी।

सब कुछ प्लान के मुताबिक ही हुआ, पहले तो काकी ने उदयराज को बाहर खाना ला के दिया उसने खाना खाया, फिर काकी और रजनी ने घर में खाना खाया, खाना पीना होने के बाद काकी के इशारे से कहने पर उदयराज कुएं की तरफ चला गया और रजनी घर से बाहर आकर दालान की तरफ चली गयी, फिर उदयराज घर में चला गया और रजनी काकी के पास आकर बाहर खाट पर लेट गयी।

रजनी आज पूरे 5 दिन बाद बाहर लेट रही थी, ठंडी ठंडी हवा उसके गदराए बदन से टकराकर अंदर तक झुरझुरी पैदा कर रही थी, बेटी उसकी सो चुकी थी, पर उसकी आँखों में नींद का नामो निशान नही था। काकी ने उसको नीलम और बिरजू की बात बताई तो वो भी चकित रह गयी और उसने भी काकी के साथ कल दिन में उसके घर चलने को कहा। रजनी ने काकी के पास अपनी बेटी को पहले ही उठाकर लिटा दिया और काकी ने उसके ऊपर अपना आँचल डाल दिया, धीरे धीरे 11 बज गए, जैसे जैसे वक्त नजदीक आता जा रहा था रजनी की सांसें बढ़ती जा रही थी साथ ही साथ उसे अपनी बूर में चीटियाँ सी रेंगती महसूस हो रही थी, मदहोश होकर वो कभी पेट के बल तो कभी पीठ के बल खाट पर लेटती रही, धीरे धीरे काकी बात करते करते नींद के आगोश में चली गईं।

वक्त आ गया था अब घर में अपने बाबू के पास जाने का, रजनी खाट से उठी और दालान के पास जाके जल रहे लालटेन को बुझा दिया और आके एक बार काकी और अपनी बेटी को देखा फिर बेचैनी से घर के दरवाजे की तरफ बढ़ी, दरवाजे पर हल्का सा हाथ रखते ही वो हल्का सा आवाज करते हुवे खुल गया, उदयरक चटाई पर लेटा था अपनी बेटी के घर में दाखिल होने की आवाज सुनकर उसने चादर ओढ़ लिया, कोठरी रोज की तरह सजाई हुई थी

पर आज गुलाब और सफेद चमेली के फूलों से सजी कोठरी अलग ही मदहोशी का माहौल बना रही थी और ऊपर से उदयराज ने आके जब कपूर जलाया था तो कोठरी अत्यंत महक उठी थी।

रजनी बरामदे से गुप्प अंधेरे में होती हुई आंगन तक धीरे धीरे चलते हुए अपनी पायल खनकाते हुए पहुँची, कोठरी के आगे रखा दिया हल्की रोशनी चारों तरफ फैला रहा था, पायल की छन्न छन्न करती हुई रजनी कोठरी के दरवाजे तक पहुँची तो अंदर देखा कि उसके बाबू चादर ताने चटाई पर लेटे हुए हैं। बगल में रोज की तरह एक दिया और रखा है।

रजनी की सांसें थोड़ी तेज हो चली थी, उदयराज ने जब देखा कि उसकी बेटी उसके पास आ चुकी है तो उसने अपना ध्यान जान बूझ कर थोड़ा इधर उधर लगाया ताकि उसका लन्ड पहले ही हाहाकार न करने लगे, पर होनी को कौन टाल सकता है लाख कोशिश के बाद भी उसके लन्ड में थोड़ी हलचल तो होने ही लगी थी।

रजनी धीरे से आके अपने बाबू के बगल में दायीं ओर कमर के पास बैठ गयी, अभी केवल बाहर का दिया जल रहा था तो कोठरी में रोशनी काफी हल्की थी।

थोड़ी देर तक वो अपने बाबू के बलिष्ट शरीर को चादर के ऊपर से निहारती रही फिर एकाएक उसने अपना हाथ उठा कर अपने बाबू की जांघ पर रखना चाहा पर झट से पीछे हटा लिया और बाबू के मुंह की तरफ देखने लगी, उदयराज ने चादर पूरा सर से पांव तक तान के ओढ़ रखा था और अंदर धोती में उसका बलशाली लन्ड हिचकोले ले रहा था।

रजनी ने इस बार अपना हाँथ चादर के अंदर डाला और सीधे पैर के ऊपर घुटनों से नीचे जहां पर धोती खत्म हो रही थी वहां रखा।

अपनी सगी बेटी का हाथ और उसकी नरम नरम उंगलियां अपने सीधे पैर पर पड़ते ही उदयराज का लन्ड लाख रोकने के बाद भी फ़नफना ही गया, बेटी की छुअन से उदयराज का रोवाँ रोवाँ खड़ा हो गया।

लंड इतना शख्त हो गया कि चादर तना हुआ होने के बाद भी उसके ऊपर से दिखने लगा, रजनी की जब नजर उसपर पड़ी तो वो तो शर्म से लाल हो गयी।

अभी तक इतना कुछ हो चुका था फिर भी कभी रजनी ने चुपके से भी अपने बाबू के लंड की तरफ नही देखा था, एक आदर्श और शालीन नारी का परिचय अभी तक रजनी सभ्यता से देती चली आयी थी, बाप बेटी में भले ही रिश्ते की मर्यादा की लाज रखते हुए धीरे धीरे ही सब आगे बढ़ रहा था पर रजनी ने कभी उस लाज को तोड़कर एकदम से अपने कदम आगे नही बढ़ाये थे, चाहे इसे एक बेटी का अपने पिता के प्रति लज़्ज़ा कहो या आदर्श जो भी था पर था तो जरूर।

पर आज पहली बार अपने बाबू का लंड चादर के ऊपर से ही देखकर, ये देखकर की लन्ड इतना बड़ा है कि चादर तना हुआ होने के बाद भी लंड ने चादर को और ऊपर तंबू की तरह तान दिया है, वासना से भर गई, उसने धीरे धीरे अपना हाथ ऊपर को सरकाया उदयराज के पैर के बाल उसके हाथ में लगने से उसकी बूर झनझना गयी।

उदयराज आंखें बंद किये अपनी बेटी के ऊपर को सरकते नरम नरम हाथ को महसूस कर उत्तेजित होता जा रहा था।

रजनी के एकाएक अपना हाथ धोती में डाल दिया और ऊपर को सरकाते हुए जाँघों तक ले आयी, रजनी की हालत बुरी हो चली थी उसे बहुत शर्म आ रही थी पर मन भी आगे बढ़ने के लिए बहुत बेचैन था।

फिर रजनी ने अपना हाथ जाँघों पर रखा और वहां अपना हाथ फेरने लगी, जाँघों के जोड़ से लेकर घुटने तक वह अपना हाथ धीरे धीरे फेरने लगी, अपने सगी बेटी का मुलायम नरम हाथ अपनी जाँघों पर रेंगते हुए महसूस कर उदयराज का लंड और भी टनटना गया। धोती बंधी हुई होने की वजह से रजनी को अपना हाथ जाँघों तक पहुचाने में थोड़ी सी दिक्कत हो रही थी, कोठरी में तेज सांसे और हल्की हल्की हांथों की चूड़ियों की खनखनाहट गूंज रही थी।

रजनी ने जाँघों को सहलाते हुए अपनी उंगलियां अपने बाबू के मोटे मोठे बालों से भरे अंडकोषों पर रख दी, तो पहले तो वो खुद ही चिहुँक सी गयी, इतने बड़े आंड भी हो सकते हैं उसने सोचा नही था और उनपर वो काले काले बाल, उनकी छुवन, दो माध्यम आकार के अमरूद जैसे बड़े बड़े आंड को अपने हाथ में लेते ही रजनी शर्म और अति उत्तेजना से पानी पानी होती चली गयी, उदयराज के मुँह से भी काफी तेज aaaaaaahhhhhhhhhhh की आवाज निकल गयी जिसने रजनी के रोये रोये को खड़ा कर दिया।

उसका बदन गनगना गया, कैसे वो आज अपने सगे पिता के आंड को छू रही थी, अपने आप में ही वो वासना से रोमांचित हो उठी।

फिर एकाएक वो अपनी सांसे थामे कर्म के नियम का पालन करते हुए अपने हाथ से दोनों आंड को हौले हौले सहलाने लगी, उदयराज ने अपनी दोनों जाँघे खोल दी और अपनी ही सगी बेटी के हाथ को अपने आंड पर पाकर उसका लंड तेजी से स्पंदन करने लगा। (स्पंदन एक छोटा छोटा झटका होता है)

रजनी अपने बाबू के दूसरी जांघ पर भी हाथ फेरने और सहलाने लगी, अब उसकी लज़्ज़ा धीरे धीरे थोड़ी कम हुई और उत्तेजना और वासना उसपर हावी होती गयी। कभी वो आंड को सहलाती तो कभी दोनों जांघ को, पर लंड को उनसे अभी भी नही छुआ था परंतु हाथ इधर उधर करते हुए हाथ की कलाई और चूड़ियों से मोटा शख्त लन्ड टकरा ही जा रहा था। चूड़ियों की खनखनाहट बराबर कोठरी में गूंज रही थी।

अचानक रजनी ने अपना हाथ लंड की जड़ पर रखकर उसको मुठ्ठी में भर ही लिया, घने बालों से भरा हुआ था उसके बाबू का फ़ौलादी लंड। रजनी की जोरदार सिसकी निकल गयी, oooooooohhhhhhh bbbbbbaaabbbuuu बोलते हुए उसकी सांसे उखड़ने लगी।

अपनी ही सगी बेटी द्वारा लंड को मुठ्ठी में पकड़ते ही उदयराज कराह उठा और उसके लंड ने तो मानों जोरदार अंगडाई लेते हुए बगावत कर दी हो, रजनी की बूर अब रिसने लगी, सांसे धौकनी की तरह चलने लगी, रजनी ने कुछ पल लंड को मुठ्ठी में पकड़े रहा फिर एकाएक अपनी उंगलियां अपने बाबू के लंड के ऊपर घने बालों में चलाने लगी,उसको सहलाने लगी (जैसे उसकी नाक की लौंग उसमे गिरखर खो गयी हो और वो उसको ढूंढ रही हो), फिर एकाएक दुबारा से उसने मोटे लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपना हाथ ऊपर तक लाके लंड की पूरी लंबाई और चौड़ाई का जायजा सा लिया, अपने ही सगे बाबू के लगभग 9 इंच लंबे और 4 इंच मोटे लंड, जिसपर चारों ओर कईं नसें उभरी हुई थी, को अपने हांथों में लेकर रजनी बदहवास हो गयी, बूर में उसकी अनगिनत चीटियाँ रेंगने लगी, एक पल को उसे वो लंड उसकी बूर की अनंत गहराई में उतरता हुआ महसूस हुआ तो वो थरथरा गयी, और झट से हाथ बाहर खींच लिया, थूक का एक बड़ा घूंट उसके गले से उतर गया, आंखें बंद कर कुछ पल अपनी सांसों को समेटती रही, अपनी जाँघों को उसने एक दो बार भींचकर अपनी बूर को दबाया।

फिर रजनी ने अपने बाबू के तने हुए चादर को पैर की तरफ से हटाया और कमर तक पलट दिया, धोती में तंबू बना हुआ था, उसे देखकर वह वासना में मुस्कुरा उठी वो, फिर उसने अपने नरम हांथों से अपने बाबू की धोती के छोर को जो कमर के पीछे घुमाकर धोती में ही खोसी हुई थी, कमर के नीचे हाथ डालकर खींचकर खोला उदयराज के कमर उठा कर उसकी मदद की, रजनी ने उखड़ती सांसों के साथ धोती की छोर पकड़कर लपेटी हुई धोती को खोलकर ढीला किया और फिर कमर से पकड़कर नीचे सरकाने लगी। रजनी अब बगल से उठकर उदयराज की दोनों टांगों के बीच आ गयी।

धोती ढीली होने के बाद बड़े आराम से नीचे सरकने लगी, अपने कोमल हांथों से अपने बाबू की कमर के पास दोनों ओर धोती पकड़कर रजनी ने धोती को नीचे जाँघों तक सरका दिया, उदयराज का लंबा मोटा शख्त लंड एक बार को धोती में खड़ा होने की वजह से फंसा फिर तुरंत उछलकर सामने आ गया।

दिये कि हल्की रोशनी में अपने सगे पिता का काले काले बालों वाला हल्का काला सा लगभग 9 इंच लंबा और 4 इंच मोटा लंड, जिसपर कईं नसें अति उत्तेजना की वजह से उभर आई थी, देखकर रजनी की सांसें हलक में अटक गई, लंड इतना भी बड़ा और मोटा हो सकता है उसने सोचा नही था, उसने तो आजतक बस अपने पति का करीब 6 इंच लंबा लंड ही देखा था वो भी बहुत कम, उसके सगे पिता इतने बड़े लंड के मालिक हैं ये देखकर वो वासना से सराबोर होकर गनगना उठी, रोम रोम उसका संभोग के लिए तड़प उठा, बूर से उसकी काम रस की धारा बह निकली।

उदयराज वासना में आंखें बंद किये लेटा रहा, काफी देर तक रजनी अपने बाबू का विशाल लंड उस पर उगे बाल, नीचे दो बड़े बड़े आंड और जाँघे निहारती रही, किस तरह लंड रह रह कर फुदक रहा था, छोटे छोटे झटके ले रहा था मानो वो अपनी ही सगी बेटी की बूर मांग रहा हो, कितना लंबा था उसके बाबू का लंड और उसकी मोटाई तो देखो, अम्मा कैसे झेलती होंगी बाबू को और मैं कैसे.....और ऊपर का मुँह तो देखो लंड का कितना बड़ा और गोल सा है, बूर की गहराई में जाकर जब ये ठोकर मरेगा तो कितना मजा आएगा, पर इतना मोटा मेरी बूर में जायेगा कैसे? पर जैसे भी जाएगा मेरी आत्मा तृप्त कर देगा और ये सोचते हुए रजनी की आंखों में वासना के डोरे तैरने लगे।

लंड को देखकर रजनी की लज़्ज़ा काफी हद तक कम हुई और वासना उसकी आँखों में नजर आने लगी, उसके धोती को खींचकर पूरा पैर से बाहर निकाल दिया, उदयराज अब कमर से नीचे मदरजात नंगा हो गया।

रजनी ने बगल में रखा दिया जैसे ही जलाया, उसकी रोशनी में अपने बाबू का चमकता लंड देखकर और मचल उठी, हल्का काला, लंबा और मोटा लंड लोहे की रॉड की तरह सीधा खड़ा था, टांगें उदयराज ने दूर दूर फैला ली थी।

रजनी ने अपने बालों में लगी क्लिप को खोलकर अपने बालों को बंधन से आजाद कर लिया और आंख बंद कर सर को दाएं बाएं हिलाकर अपने दोनों हांथों से बालों की लटों को खोलते हुए बालों को हवा में लहराया, हाथ ऊपर करने से रजनी के ब्लॉउज में कसी कसी भारी चूचीयाँ उभरकर ऊपर को उठ गई।

फिर एक मादक मुस्कान बिखेरते हुए आंखें फाड़े अपने सगे बाबू के खड़े लन्ड को किसी जन्मों जन्मों से प्यासी नारी की भांति घूरने लगी, अपने मुलायम हांथों से उसने लंड को पकड़ लिया और हौले हौले पूरे लंड पर सिसकते हुए हल्के हाँथ फेरने और सहलाने लगी, उदयराज की अब मस्ती में आहें निकलने लगी वो aaaahhhhhhhhhhh mmmmeeerrriiii bbbbbeeettttiiii, aaaaaahhhhhhh mmmmmeeerrrriiiiiI rrraaaannniiiii bbbbbiiiitttttiiiyyyyyyaaaaaa, aaaiiiiisseeeee hhhhhiiiiiiiii, aaaaaaahhhhhhhhh

रजनी अपने बाबू की आहें और सिसकारी सुनकर और उत्तेजित होती चली गयी और खुद भी सिसकते और आहें भरती जा रही थी, कभी वो दोनों आंड सहलाती, कभी दोनों जाँघों पर हाथ फेरती, कभी पेट को सहला देती फिर अपने नरम नरम हाथों से लंड को पकड़कर पुरा नीचे से ऊपर तक सहलाती। रजनी लंड को सहला तो रही थी पर उसने लंड की चमड़ी को पीछे नही होने दिया था, वो इतने हल्के हांथों से सहला रही थी कि लंड के सुपाडे को उसने अभी तक खुलने नही दिया था, पर अपने बाबू का मोटा सुपाड़ा देखकर वो मदहोश हो गयी थी, हल्के हांथों की रगड़ से लंड की चमड़ी बिल्कुल हल्का सा नीचे हो गयी थी और थोड़ा सा लंड का सुपाड़ा दिख रहा था, लंड के मूत्र का छेद देखकर रजनी की बूर की गहराई में कई तार बज उठे।

पूरी कोठरी में उसके बाबू के लंड से आती मूत्र की हल्की गंध फैल गयी जो कि रजनी की चुदास को बढ़ा रही थी।

तभी रजनी से रहा नही गया और उसने अपनी नाक अपने बाबू के लंड के सुपाडे पर लगाई और उसे सूंघने लगी, अपने बाबू के विशाल लंड की पेशाब और काम रस की तेज गंध उसे अपने रोम रोम में समाती हुई महसूस हुई, अपनी बेटी की सांसों की गर्मी अपने लंड के सुपाड़े पर महसूस कर उदयराज हिल गया, वासना में वो जल रहा था।

रजनी काफी देर सुपाड़े को सूंघती रही फिर पूरे लंड और दोनों आंड को सूँघा और घने घने बालों में भी अपनी नाक फिराई। अपनी सगी बेटी की गर्म उत्तेजित साँसों को अपने लंड, आंड और बालों पर महसूस कर उदयराज पगला गया।

फिर एकाएक रजनी ने वो किया जो उदयराज ने सोचा भी नही था, रजनी ने अपने दोनों हाथ अपने बाबू की कमर के अगल बगल रखे और लंड पर झुक गयी, बाल उसके खुले थे तो उसके बाबू का कमर वाला हिस्सा ज्यादातर रजनी के बालों से ढक गया। उसकी दोनों जाँघों पर रजनी के घने बाल थे झुकने की वजह से रजनी की चूचीयाँ ब्लॉउज से मानो कूदकर बाहर ही आ जाने को हो रही थीं।

रजनी अपने बाबू के विशाल खड़े लंड के ऊपर एक वासनात्मक मुस्कान लेकर झुकी और अपने होंठों को गोल बनाया मानो वह शीटी बजा रही हो, फिर अपने बाबू के सुपाडे पर, जो ऊपर से बिल्कुल थोड़ा सा खुला था बस खाली मूत्र छेद दिख रहा था और उस पर भी काम रस लगा हुआ था, अपने होंठ रखे और धीरे धीरे अपना मुँह खोलती और साथ ही साथ सुपाडे कि चमड़ी को नीचे सरकाती चली गयी, बरसों से सुपाडे की चमड़ी जो खुली नही थी चिरचिराकर खुलती और नीचे सरकती चली गयी, रजनी ने अपना पूरा मुँह गोल गोल फाड़े अपने बाबू का सुपाड़ा अपने मुँह में भर लिया।

उदयराज aaaaaaaahhhhhhhhhhhhh, hhhhhhhhhaaaaaaiiiiiiiiiii,,,bbbbbbbeeeetttttttiiiiii करके सीत्कार उठा उसकी

तो सांसे ही थम सी गयी और आंखें अत्यंत नशे में बंद हो गयी, उसकी बेटी इतनी माहिर निकलेगी उसने सोचा नही था, ऐसा मजा उसे आजतक आया ही नही, हालांकि उसकी पत्नी भी लंड कभी कभी थोड़ा चूस लेती थी पर ये अदा, ufffffff उदयराज तो अपनी बेटी का कायल ही हो गया। रजनी ने तीन चार बार ऐसा ही किया और हर बार उदयराज का पूरा बदन हिल जा रहा था, पूरी कोठरी में आह और सिकारियाँ गूंज रही थी।

अपने बाबू का पूरा लंड तो रजनी अपने मुँह में अभी नही ले सकी पर फिर भी बहुत ही कामुक अदा से और सिसकते हुए वो मोठे फूले हुए सुपाड़े को जी भरके चाटने लगी और आधे से ज्यादा लंड अपने मुँह में धीरे धीरे भरकर चूसने लगी।

उदयराज हाय हाय करने लगा, रजनी का झटके से पूरा लंड मुँह में भरना फिर अपने होंठों को सुपाडे तक ले जाना, फिर सुपाडे को मुँह में लेकर लोलोपोप की तरह चूसना उदयराज को सातवें आसमान में ले गया, उदयराज ने जैसा सोचा था, उससे कहीं ज्यादा मजा आया था उसको, रजनी ने जैसे ही सुपाडे को मुँह में भरकर पूरे सुपाड़े पर गोल गोल जीभ घुमाई उदयराज को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे ऊपर आसमान में ले जाकर छोड़ दिया हो और वो बड़ी तेजी से धरती की तरफ गिर रहा हो।

रजनी ने फिर अपनी जीभ गोल नुकीली बनाई और अपने बाबू के लंड के छेद पर जहां से बार बार चाट लेने के बाद भी काम रस की बूंदें निकलकर बाहर आ जा रही थी, फिराने लगी और हल्का हल्का अपनी जीभ लंड के मूत्र छेद में घुसेड़ने सी लगी, जीभ की नोक से वो काम रस की बूंदों को चाट ले रही थी और ऐसा करते हुए खुद भी hhhhhhhhhhhaaaaaaaiiiiiiiiiiiiii,,,,,,,,,bbbbaaaabbbbuuuuuuuu,,,,ooooooohhhhhhhhh...... bbbbbbbbaaaaabbbbbuuuuu धीरे धीरे कहते हुए सिसके जा रही थी।

दोनों सगे बाप बेटी महापाप के असीम आनंद में डूबे हुए थे।

रजनी ने फिर कई बार अपने बाबू के सुपाड़े की चमड़ी को पहले अपने हांथों से ऊपर चढ़ा कर सुपाड़े को ढका और फिर अपने होंठो को गोल गोल बना कर सुपाड़े पर रखकर अपने लाली लगे रसीले होंठों से खींचकर पूरा नीचे तक बड़े ही मादक ढंग से सिसकते हुए खींचा।

हर बार उदयराज की जोरदार आँहें निकल गयी। उदयराज का पूरा लंड, आंड, जाँघे और चटाई भी रजनी के कामुक थूक से सन गए थे, दिए कि तेज रोशनी में थूक से सना काला मोटा लंड मानो अंगडाई लेकर और भी चमक उठा। उदयराज का लंड अपनी सगी बेटी की करीब 10 मिनट की चुसाई से इतना शख्त हो गया था की मानो अभी उसकी नसें फट जाएंगी, मानो गरज गरज कर वो बूर मांग रहा हो, वो भी अपनी सगी बेटी की बूर।

रजनी भी मदहोशी में बदहवास हो गयी थी, हाय हाय करे वो भी लंड चूमे और चूसे जा रही थी पर काफी देर दोनों हांथों के बल झुके झुके उनके हांथों में भी दर्द होने लगा था। फिर एकाएक उसने मुँह से अपने बाबू का लंड निकाला और लंड के मुँह से निकलते ही "पक्क़" की आवाज पूरी कोठरी में गूंज गयी, उदयराज के मुँह से जोर की सिसकी निकल गयी।

रजनी उठ बैठी, आंखें उसकी मादकता और वासना से बंद थी, थूक में सना दहाड़ता हुआ लंड दीये की रोशनी में हल्के झटके खाते हुए हिल रहा था, रजनी ने अपने बाबू के विशाल लंड और लटकते आंड को वासना भरी और ललचाई नज़रों से देखते हुए अपने बाल समेटे और क्लिप लगाकर बांध दिए।

समय भी हो चुका था, कर्म के नियम का पालन भी करना था, उसका मन बिल्कुल भी नही था जाने का, बूर ने तो उसकी लंड देखकर बगावत कर दी थी, बिल्कुल जिद पर अड़ गयी थी बच्चों की तरह कि बस लंड चाहिए तो चाहिए, बहुत हो गया, वो उसे लाख समझाती रही कि मेरी प्यारी सी बच्ची मान जा, बस एक रात और एक दिन की बात है, पर वो नही मानी, बहुत दिन से वो मान रही थी रजनी की बात पर आज मानने को तैयार नही थी, थोड़ा तो उसे चाहिए था, जरूर चाहिए था, जैसे कोई रेगिस्तान का प्यासा बस दो बूंद पानी की मांगता है बस वैसे ही रजनी की बूर अब लंड मांग रही थी।

फिर रजनी को एक बात सूझी की नियम के अनुसार नीचे का हिस्सा तो अब छू सकते हैं, समझ आते ही राजनी के मुख पर एक मादक मुस्कान फैल गयी। उसने बड़ी अदा से अपनी बूर को एक हल्का सा चांटा लगाया।

कुछ देर सोचने के बाद रजनी से झट से बगल में जलता हुआ दिया बुझा दिया और कोठरी में अंधेरा हो गया, उदयराज ने सोचा कि उसकी बेटी अब जाएगी, उसका भी मन थोड़ा उदास हो गया पर तभी चूड़ियों की खनखनाहट हुई।

रजनी ने अपने बाबू के ऊपर झुककर अपना बायां हाथ उनके कमर के बगल में थोड़ी दूर पर रखा और कमर तक आधा अपने बाबू के ऊपर झुक गयी, उदयराज असमंजस में सोचता रहा को मेरी बिटिया क्या कर रही है? रजनी ने कमर से ऊपर का शरीर का भार अपने दाएं हाथ पर टेक लिया और बाएं हाथ से अपनी साड़ी ऊपर करने लगी, अपनी साड़ी को उसने कमर तक खींचकर ऊपर चढ़ाया, आज उसने काले रंग की पैंटी पहनी थी, साड़ी कमर तक उठने से भारी भारी गुदाज नितम्ब बाहर जलते दिए की रोशनी में उजागर हो गए, काली रंग की पैंटी में गोर गोर कसे हुए मांसल नितम्ब किसी को भी उन्हें हथेली में भरकर मसलने के लिए उकसा देते।

फिर रजनी ने बैलेंस संभालते हुए जल्दी से अपने दाएं हाथ से अपनी पैंटी को भी सरका के जाँघों तक कर दिया, उसकी भारी भरकम गुदाज गोरी गांड उछलकर बाहर आ गई, उदयराज चादर के अंदर बहुत असमंजस में था कि उसकी बेटी क्या कर रही है? पर उसे थोड़ा तो अंदाजा हो गया कि रजनी उसके ऊपर झुकी हुई है।

पैंटी खुलने से राजनी की तड़पती बूर से गरम गरम काम रस की कई बूँदें उदयराज की जाँघों पर जब गिरी तब उदयराज को आभास हुआ कि उसकी बेटी ने अपनी बूर खोली है, इसका अहसास होते ही उदयराज का लंड और हाहाकार मचाने लगा। तभी राजनी ने वो किया जिसके बारे में उदयराज ने उस वक्त सोचा भी नही था।

राजनी ने धीरे से दाएं हाथ से अपने बाबू के फ़ौलादी लंड के सुपाड़े को उसकी चमड़ी नीचे करके खोला और खड़े लंड को नीचे की तरफ टेढ़ा करके तेजी से aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh......bbbbbbbbaaaaaaaabbbbbuuuuuu की मादक आवाज निकालते और सिसकते हुए

अपनी प्यारी सी मक्ख़न जैसी काम रस से सनी हुई बूर की फांकों के बीच लगा दिया, बूर की फांकों को वो चीर नही पाई क्योंकि उसने दूसरे हाथ से बैलेंस बनाया हुआ था।

जैसे ही उदयराज के लंड का सुपाड़ा रस टपकाता हुआ अपनी सगी बेटी की बूर की मक्ख़न जैसी फूली हुई भीगी भीगी फाँकों से टकराया, उदयराज, अत्यंत नरम नरम और गरम गरम फांकों की कोमलता के अहसास से झनझना गया, उसके मुँह से aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh,,,........mmmmmmeeeeeeerrrrrrriiiiiiiiii.....bbbbbbbbeeeeettttttiiiiiiiiiiii........tttttteeeerrrrrriiiiiiii.....bbbbbooooooooooorrrrrrrrrrr

सिसकते हुए बहुत तेज़ी से निकला।

उदयराज ने अपना हाथ राजनी की भारी गांड पर रखकर उसको मसलना और नीचे को दबाना चाहा पर मुठ्ठी भींचकर त्राहि त्राहि कर उठा, क्या करता नियम से जो बंधा था।

रजनी की आंखें असीम आनंद में बंद हो चुकी थी, आज जीवन में पहली बार उसके सगे पिता का मोटा लंड अपनी सगी शादीशुदा बेटी की धधकती बूर से छू चुका था।

अपने बाबू के लंड को उसने अभी भी अपने हाथ से पकड़ रखा था, उदयराज के लंड का सुपाड़ा काफी मोटा था राजनी की प्यारी सी कमसिन सी बूर वासना में फूलकर काफी रस छोड़ रही थी, राजनी ने लंड को हाथ से पकड़े पकड़े अपनी बूर की फांकों में आगे पीछे दाएं बाएं घुमा घुमा कर रगड़ा और खुद ही हाय हाय करने लगी और फिर एकाएक उसने अपना दूसरा हाथ भी लंड को छोड़कर अपने बाबू ले कमर के बगल में रख लिया और पूरा बैलेंस बनाते हुए अपनी गांड को हल्का सा नीचे की ओर दबाया, लंड फांकों में और धंस गया, राजनी ने अपनी गांड को कस कस के आगे पीछे दाएं बाएं कई बार हिलाया।

लंड का सुपाड़ा बूर की फांकों के बीच खिलकर बाहर आ चुके भग्नासे से जब अच्छे से रगड़ खाने लगा तब राजनी ने जोर से सिसकते हुए और oooooooooohhhhhhhhhh bbbbbbbbbbaaaaaaabbbbbbbbuuuuuuuuu की तेज मादक आवाज निकलते हुए

अपनी गांड को उछाल उछाल कर अपनी बूर के भग्नासे को अच्छे से पांच सात बार अपने बाबू के सुपाड़े और पूरे लंड पर रगड़ा और कराहते हुए उठ बैठी, लंड पक्क़ की आवाज के साथ उछलकर फिर टनटना कर खड़ा हो गया और झटके खाने लगा।

उदयराज मदहोश हो चुका था, oooohhhhhh...bbbbbeeeettttiiiiii, hhhhaaayyy mmmmeerrriiii rrraaaaannnniii धीरे धीरे उसके मुँह से निकल रहा था।

राजनी ने फट से धोती उठायी और लंड पर रखने से पहले लंड के सुपाडे को जिस पर अब उसकी बूर का रस भी लगा हुआ था मुँह में एक बार फिर भर कर जोर से चूस लिया, फिर दोनों आंड को मुँह में भरकर चूसा और फिर धोती से अपने बाबू के लंड को ढककर अपनी पैंटी पहनी और साड़ी नीचे कर बेमन से कोठरी से निकल गयी।

 
Update- 37

रजनी बदहवास सी कोठरी से निकलकर अपनी पायल से छम्म छम्म की आवाज करती हुई बरामदे को अंधेरे में पार कर घर के दरवाजे तक आयी और धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर आ गयी, दरवाजे को धीरे से सटाया, संभोग की तीव्र इच्छा से बदन में उठ रही गर्मी से निकलते पसीने पर जब बाहर की ठंडी ठंडी पुरवैया हवा रात के गुप्प अंधेरे में पड़ी, तो बदन में एक ठंडी लहर दौड़ गयी, बदहवास सी वो आके अपनी खाट पे पेट के बल तकिए में मुँह गड़ाए हांफती हुई लेट गयी, पेट के बल लेटी अपनी तेज तेज चलती साँसों को वो काफी देर तक संभालती रही।

अपने बाबू के लंड का वो आगे का मोटा सा खुला और फूला हुआ चिकना चिकना सुपाड़ा मानो अब भी उसकी बूर की नरम नरम फांकों के बीच रगड़ रहा हो, संभोग की तीव्र इच्छा की उठती तरंगों से बेबस होकर वो बार बार अपनी जाँघों को भींचकर अपनी बूर को दबा दे रही थी, पर बूर भला अब मानने को कहां तैयार थी एक बार दहाड़ते लंड को छू जो लिया था उसने, पेट के बल लेटे लेटे ही रजनी ने अपना सीधा हाँथ नीचे ले जाकर साड़ी के ऊपर से ही अपनी दहकती बूर पर रखा और उसको अपनी हथेली में भरकर मानो समझाती मनाती रही।

पेट के बल लेटने से गहरे गोल गले के ब्लॉउज में से उसकी पीठ का काफी हिस्सा खुला हुआ था जिसपर पुरवईया की ठंडी ठंडी हवा लग रही थी मानो हवा भी दौड़ती हुई आकर उसकी मादक पीठ और जिस्म को बार बार चूम रही हो। तेज हवा बहने से ऊपर नीम के पेड़ की डालियां हिल रही थी, उसकी हल्की नरम नरम पत्तियां हवा से हिलकर आपस में टकराकर सर्रर्रर सार्रर्रर की आवाज पैदा कर रही थी और कभी कभी पकी हुई नीम की छोटी छोटी कुछ निम्बोली टूटकर रजनी की नंगी खुली हुई पीठ पर गिरती तो राजनी का कामाग्नि में जलता बदन और दहक उठता।

कुछ देर पेट के बल लेटने के बाद वो पलटकर पीठ के बल लेट गयी और जैसे ही उसने अपना चेहरा ऊपर किया नीम की एक छोटी पकी हुई निम्बोली उसके रसीले नशीले निचले होंठ पर आकर गिरी और वो मंद मंद मुस्कुरा दी, मानो ऐसा लगा कि कमाग्नि में सुलगते हुए उसके बदन से निकलने वाली मादक महक हवा के साथ बहकर धीरे धीरे प्रकृति के कण कण में घुल गयी हो और प्रकृति भी मदहोश होकर उसके अंग अंग को किसी न किसी बहाने से चूम रही हो।

तभी न जाने कैसे उसकी बेटी उठ गई, काकी उसे थपथपाने लगी परंतु रजनी ने उसे उठाकर गोदी में ले लिया, काकी फिर आस्वस्त होकर सो गई, रजनी अपनी बेटी को दूध पिलाते हुए खाट पे लेट गयी और अपना आँचल बेटी के सर पर डाल दिया, फिर धीरे धीरे वो भी नींद की आगोश में जाती गयी।

उधर कोठरी में अपनी बेटी के जाने के बाद उदयराज काफी देर तक यूँ ही अपने खड़े दहकते, झटके मारते हुए लंड पर धोती रखे लेटा रहा, सांसें उसकी भी तेज चलते हुए धीरे धीरे काबू में आ रही थीं। वो मन में अपनी बेटी के बारे में सोचने लगा कि रजनी ने आज अपने आप जो किया वो कितना उत्तेजित कर देने वाला है, इसका मतलब वो बहुत तड़प रही है।

उदयराज ने मन में एक कसम ली-

"कसम है मुझे मर्दानगी की कि अपनी बेटी को मैंने परम चरमसुख नही दिया तो मेरा नाम भी उदयराज नही।"

इतना सोचते हुए वो सोने की कोशिश करने लगा एकाएक उसे लगा कि उसके लंड का सुपाड़ा उसकी बेटी की मखमली बूर की फाँकों में टच हो रहा है एकदम से उसकी आंखें खुल गयी और उसने अपने हाथ से लंड को मसल दिया और फिर सोने की कोशिश ये सोचकर करने लगा कि कल अमावस्या की रात है, नियम कानून अब खत्म हो जाएंगे, कल मेरी बेटी दिन में अपने दिल का हाल और आगे क्या होगा इस सब को एक कागज पर लिखकर घर में कहीं छुपकर रखेगी मुझे वो ढूंढकर पढ़ना है और फिर उसी अनुसार काम करना है, देखता हूँ मेरी बेटी क्या चाहती है?

तभी उसके मन के कोने से एक आवाज आती है कि उदयराज पहले तू वो कागज तो ढूंढ के दिखाना, न जाने कहाँ छुपकर रखेगी रजनी, कल तो सारा घर छान मारना पड़ेगा मुझे और फिर वो मुस्कुराते हुए सोने की फिर कोशिश करने लगा फिर धीरे धीरे उसको नींद आ ही गयी।

सुबह रजनी की नींद सबसे पहले खुली, वो मादक सी अंगडाई लेती हुई उठी और उठते ही सबसे पहले अपने बाबू का चेहरा उसकी आँखों में घूम गया और फिर कल रात क्या क्या हुआ ये सोचते ही पूरे बदन में ख़ुशी की तरंगें बहने लगी, और आज...आज थी अमावस्या की रात वाला 7वां दिन। मंद मंद मुस्कुराते हुए रजनी खाट से उठकर खड़ी हुई और सीधे घर में गयी, बरामदे में रखे कागज कलम को उठाया और चुपचाप कुछ देर तक कुछ लिखती रही फिर उस कागज को गोल गोल किया और दरवाजे की कुंडी में अंदर से फंसा कर बाहर निकल गयी।

जब बाहर आई तो काकी उठ चुकी थी, रजनी की बेटी अभी सो ही रही थी। रजनी ने काकी को बोला कि जब बाबू घर से बाहर आएं तो वो उसे इशारा करके बता देंगी।

उदयराज सोकर उठा और जल्दी जल्दी अपनी धोती बांधी हल्का हल्का उजाला होना शुरू हो गया था, उदयराज ने कोठरी से बाहर आकर बरामदे की तरफ कदम बढ़ाया, अभी बरामदे में अंधेरा था, जैसे ही उसने दरवाजे की कुंडी में हाथ लगाया, रजनी का लिखा हुआ कागज उसके हाथ में आ गया, वो समझ गया कि रजनी ने ही यहां ये लगाया होगा, उसने वो कागज धोती में खोसा और दरवाजा खोलकर पहले एक बनावटी खांसी खाँसा, ताकि अगर र

रजनी कहीं बाहर सामने हो तो समझ जाएं और हुआ भी ऐसे ही, रजनी अपने बाबू की आवाज सुनते ही दालान के बगल में अमरूद के पेड़ के नीचे चली गयी और उदयराज सामने कुएं पर चला गया, कुएं से पानी निकाला और मुँह धोने लगा।

रजनी फट से आई और घर में चली गयी। काकी बड़ा सा झाड़ू लेकर द्वार बहारने लगी, क्योंकि रात में काफी हवा चलने से द्वार पर नीम की काफी पत्तियां और पकी हुई निम्बोली फैली हुई थी, द्वार बहार कर काकी ने जानवरों को चार डालना शुरू कर दिया।

रजनी घर के अंदर नाश्ता तैयार करने लगी।

उदयराज ने मुँह धोकर नीम की दातुन तोड़ी और दातून करके मुँह धोकर तरोताजा हो गया। फिर उसने एकाएक धोती में खोसा हुआ कागज निकाला और कुएं पर बैठकर सड़क की ओर मुँह करके पढ़ने लगा-

"मेरे बाबू मेरे शुग्गु मुग्गु, मेरे राजा, कल मैं बहुत बेसब्र हो गयी थी और मुझसे रहा नही गया, मुझे यह लिखते हुए बहुत शर्म भी आ रही है, आज 7वां दिन है और अमावस्या की रात है, सुर्यास्त के बाद हमारे सारे बंधन खत्म हो जाएंगे, मैं दिन में अपने मन की बात और आगे का कर्म जो मेरी मर्जी पर निहित है कागज पर लिखकर घर में कहीं छुपा कर काकी के साथ नीलम के घर चली जाउंगी, मैं नियम के अनुसार आपको जरा भी अंदाजा नही दे सकती कि मैं वो कहाँ छुपाउंगी, आपको ही वो अपनी मेहनत और बुद्धि से उसे ढूंढना है, मेरे बाबू ये क्रिया एक तरीके से हमारे आने वाले सुखमय जीवन की चाबी है अगर आप इसे सूर्यास्त से पहले पहले ढूंढ लेते हो तभी ये ताला खुलेगा।




एक पल को मैं डर भी रही हूं कि कहीं आपको मेरा छुपाया हुआ कागज नही मिला तो......मैं जीवन भर आपका प्यार पाने के लिए तड़पना नही चाहती, एक बेटी अपने पिता के प्यार के लिए तरसना नही चाहती, यह एक कठिन परीक्षा है आपकी और मेरी भी, इसमें असफल मत होना मेरे बाबू, नही तो आपकी बेटी आपके लिए तरस कर रह जायेगी और आप भी उसके लिए तड़पकर रह जाओगे, ये नियति ने कैसा खेल खेला है सबकुछ देकर भी बीच में एक ऐसी गहरी खाई रखी है जिसको कैसे भी करके पार करना ही है। मैंने पहले इसके विषय में ज्यादा गौर नही किया था पर अब समझ आ रहा है कि ये कितनी कठिन स्थिति और कितना कठिन मोड़ है, सबकुछ इसी मोड़ पर निर्भर है, मान लो वो कागज आपको सूर्यास्त से पहले नही मिल पाया तो सारी मेहनत, सारी उम्मीद, सारी खुशी यहीं पर रुक जाएगी, नियम के अनुसार हम आगे ही नही बढ़ पाएंगे। कैसे अपने कुल के लोगों की जान बचाएंगे और कैसे सबका भविष्य सुरक्षित करेंगे।

महात्मा जी ने भी कैसा रहस्मयी कर्म बताया है?

नीलम के घर मैं दोपहर 12:30 तक जाउंगी और सूर्यास्त से पहले 6:30 तक आ जाउंगी और आकर मैं सीधे घर में उस जगह जाउंगी जहां मैंने कागज छुपाया होगा और जब मुझे वो कागज वहां नही मिलेगा तो मैं समझ जाउंगी की आप और मैं जीत चुके हैं आगे बढ़ने के लिए।



मेरे बाबू मुझे पूरा भरोसा है कि आप अपनी बेटी को जीतकर पा लेंगे, आपकी बेटी सिर्फ आपकी है, सिर्फ आपकी।

उदयराज ने वो कागज मुस्कुराते हुए दुबारा अपनी धोती में खोंस लिया। उदयराज ने मन में सोचा- मेरी बेटी तू उस कागज को जहन्नुम में भी छुपा देगी तो भी मैं ढूंढ निकालूंगा, मेरी तो तू है ही, तुझे मुझसे अब कोई दूर नही कर सकता, तेरे यौवन के महासागर में तो मुझे गोता हर हाल में लगाना है, हर हाल में।

पर वो मन में सोचने लगा कि कैसी विडंबना है अपने ही हाथ से उसे वो काम करना पड़ रहा है जिससे वो डर भी रही है, पर तू डर मत मेरी बेटी, डर मत। घर में ही तो छुपायेगी, पूरा घर छान मारूंगा।

उदयराज कुएं से उतरकर द्वार पर आके सामने खाट पर बैठ गया, काकी ने उसको नाश्ता ला के दिया उसने नाश्ता किया और आज ये सोचकर बैल लेके खेतों में चला गया कि दोपहर 12 बजे तक आ जायेगा।

खेत में जाते वक्त वो बिरजू से एक बार मिलकर गया।

रजनी ने घर का सारा काम किया और शेरु और बीना को भी उसने खाना दिया, तभी उसने ध्यान से देखा तो पाया कि बीना गर्भवती है और वो किससे गर्भवती हुई थी ये सोचकर तो उसकी बूर में फिर से चीटियाँ सी रेंगने लगी उसने जोर से काकी को आवाज लगाई- काकी ओ काकी, इधर तो आओ।

काकी- हाँ राजनी बेटी क्या हुआ?

रजनी- देखो जरा बीना गर्भवती है न?

काकी- हाँ है तो। आखिर हो ही गयी गर्भवती और हो भी क्यों न प्यार जो मिला है इतना उसको अपने बाबू का (काकी ने चुटकी लेते हुए कहा)

रजनी और काकी ने एक दूसरे को मुस्कुरा के देखा और रजनी शर्मा गयी।

रजनी ने मन में सोचा आखिर शेरु ने अपनी सगी बेटी बीना को चोद चोद के गर्भवती कर ही दिया और वो इस बात से सिरह गयी कि कैसे एक सगे बाप ने अपनी ही सगी बेटी को चोद चोद के गर्भवती किया।

शेरु और बीना ने खाना खाया फिर इधर उधर चले गये।

तब तक दिन के 11:30 हो चुके थे रजनी ने अब बरामदे में रखे कागज कलम को उठाया और एक बार को आंखें बंद की फिर मुस्कुराते हुए आंखें खोली और थोड़ा सा कागज का टुकड़ा फाड़ा फिर उसमें कुछ लिखा और उसको घर में ही कहीं अपने दिल पर पत्थर रखकर (बहुत भारी मन से) छिपा दिया।

12 बजे तक उदयराज आया, रजनी रसोई में थी, काकी ने उदयराज को खाना परोसा और फिर उदयराज ने मुस्कुराते हुए खाना खाया फिर बाहर चला गया, रजनी और काकी ने भी खाना खाया।

कुछ देर बाद काकी ने बाहर आकर उदयराज को बोला कि अब वो और रजनी नीलम के घर जा रहे हैं और फिर 12:30 तक दोपहर में काकी और रजनी उदयराज की नज़र बचा के नीलम के घर चले गए।
 
डिअर रीडर्स,

प्लीज गिव में ात लीस्ट ओने डे फॉर थिंकिंग एंड क्रिएटिंग फैबुलस मोमेंट्स फॉर थिस स्टोरी, एक्चुअली अस यू आल क्नोव ी ऍम नई एंड स्टोरी इस रनिंग ात वैरी सेंसिटिव पॉइंट्स, सो ी हैवे तो थिंक वैरी वैरी डीप फॉर मेकिंग आईटी वैरी इंटरेस्टिंग, एंड आईटी टैक्स टाइम ी होप यू अरे आल अंडरस्टैंड थिस स्पेशलय वरिटेरस. प्लीज गिव में ात लीस्ट ओने डे गैप फॉर थिंकिंग बेस्ट ऑफ़ बेस्ट फॉर थिस स्टोरी बिकॉज़ नाउ डे बी डे आईटी इस गोइंग लिटिल डिफिकल्ट देय तो सम इतर वर्क ऑफ़ लाइफ. ी होप यू अरे आल अंडरस्टैंड माय पॉइंट.

थैंक यू आल माय रीडर्स.
 
Update- 38

रजनी के जाने के तुरंत बाद ही उदयराज लग गया छुपाया हुआ कागज खोजने में, बरामदा, उत्तर का कमरा, दक्षिण का कमरा, पश्चिम का कमरा, उन सब कमरों की छत पर बने तहखाने, सारी अलमारियां, रसोई, यहां तक कि गुसलखाना, सारी किताबें, ढूंढते ढूंढते उसे 4 घंटे हो गए थे, माथे पर अब उसके हल्की शिकन आने लगी, फिर वह कोठरी में गया और वहां सब छान मारा पर कहीं कुछ नही मिला, उदयराज थोड़ी देर आंगन में बैठ गया, घर की ज्यादातर चीज़ें अस्त व्यस्त हो गयी थी, घर के सारे बक्से, सन्दूकें, जिस कमरे में भूसा और अनाज रखा रहता था वो भी छान मारा, पर कागज नही मिला, फिर भी उदयराज निराश नही हुआ वह आंगन में रसोई के दरवाजे पर बैठ गया।

अब उदयराज के पूर्वज द्वारा लगाए गए सदियों पहले मंत्र ने अपनी विपरीत शक्ति दिखानी चालू कर दी, उसे अपनी काट बर्दाश्त नही हो रही थी, वो मंत्र अपना जोर लगाने लगा ताकि ये कर्म सफल न हो, पर उसके ऊपर अब जो मंत्र महात्मा द्वारा लगाया गया था वो उसे टस से मस नही होने दे रहा था और उसे समाप्त करने में लगा हुआ था, जैसे जैसे उदयराज और रजनी अपना कर्म करते जा रहे थे महात्मा के मंत्र को असीम बल मिलता जा रहा था और वो उस पूर्वज द्वारा लगाए गए मन्त्र को काटता जा रहा था, पर अभी उसे पूर्ण शक्ति नही मिली थी क्योंकि वो पूरी तरह पाप पर निर्भर था जैसे ही पाप होगा वैसे ही महात्मा जी का मंत्र उस पूर्वज के मंत्र को काट कर नष्ट कर देगा।

क्योंकि अभी चौथी कील नही गड़ी थी और वो आज रात ही गढ़नी थी, चौथी कील कुल वृक्ष की जड़ में गाड़नी थी क्योंकि उस पूर्वज ने एक मंत्र वहां लगाया था और दूसरा गांव के सरहद पर, गांव के सरहद पर और घर के दरवाजे पर तो कील गड़ चुकी थी पर कुल वृक्ष पर कील न गड़ने की वजह से अभी शिकंजा पूरा लगा नही था और इसी एक रास्ते के सहारे उस पूर्वज के मंत्र ने अपने एक छोटे से भाग को चूहे का भेष देकर गुसलखाने की नाली जो घर के बाहर कुल वृक्ष की दिशा की ओर निकलती थी के रास्ते घर में दाखिल करा दिया।

जहां पर वो कागज रखा था वो उसे कुतरने जाने लगा पर तभी जंगल में खड़े पीले पेड़ के रूप में शैतान ने अपनी शैतानी आंखें खोली, तेज हवाएं चलने लगी, वो इस कर्म में महात्मा के मंत्र का साथ देने के लिए प्रतिबद्ध था क्योंकि इसके लिए उसने स्तनपान कराती किसी मनुष्य योनि की स्त्री का दूध मांगा था जो उसे बखूबी अर्पित किया गया था, शैतान, दानव, देवता, यक्ष, प्रेत, जिन्न आदि लोग अपने वचन के बहुत पक्के होते है ये दिए हुए अपने वचन से कभी पीछे नही हटते। शैतान ने तुरंत एक काले नाग का भेष लिया और फटाक से चुपचाप चूहे के पीछे पीछे गुसलखाने की नाली से घर में दाखिल हो गया, चूहा आगे आगे शैतान चुपचाप पीछे पीछे।

उदयराज आंगन में ये सोचने की लिए बैठा था कि अब ढूंढने के लिए क्या बचा है, उसकी पीठ कोठरी के दरवाजे की तरफ थी, चूहा कोठरी के दरवाजे की तरफ बढ़ रहा था, जैसे ही चूहे ने पलट कर पीछे देखा अपने पीछे काले नाग को देखकर डर के मारे पीला पड़ गया, उसकी घिग्गी बंध गयी, शैतान सांप का भेष लिए बड़ी ही डरावनी शक्ल बना कर चूहे को घूरे जा रहा था मानो जैसे कह रहा हो "साले मेरे होते हुए आखिर तेरी हिम्मत कैसे हुई घर में घुसने की, तुझे डर नही है मेरा, मैंने पहले भी तुझे औकात में रहने की चेतावनी दी थी।"

एकाएक नाग ने चूहे को झपटकर मुँह में भर लिया और चूहा छटपटाते हुए चूं चूं करने लगा पर काला नाग पलटकर चलता बना कि तभी चूहे की आवाज सुनकर उदयराज ने पलटकर पीछे देखा तो उसकी नजर काले नाग पर पड़ी, ये देखते ही वो चौंक कर खड़ा हो गया कि घर के अंदर नाग कहाँ से आ गया, आज तक तो कभी ऐसा हुआ नही, पहले तो बिना सोचे समझे उसने उसे मारने के लिए लाठी उठायी पर फिर अचानक रुक गया, ये सोचने लगा कि उसके मुँह में चूहा था, जरूर कोई तो बात है, उसने अपने हाथ नीचे कर लिए और हाथ जोड़कर माफी मांगी, तब तक काला नाग जहां से आया था वहीं से चुपचाप धीरे धीरे बाहर निकल कर चूहे को निगलते हुए गायब हो गया।

उदयराज कोठरी के दरवाजे के पास ही लाठी लिए खड़ा था कि तभी उसकी नजर कोठरी के दरवाजे पर उल्टा करके रखे मिट्टी के दीये पर गयी, उसके दिमाग में बत्ती जली और उसने झुककर वो दिया उठाया तो उसमें एक कागज मोड़कर बैठाया हुआ था, उसको देखते ही उदयराज के मन में हजारों घंटियां एक साथ बजने लगी, और उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गयी, वह खुशी से झूम उठा, उसने एक बार पीछे पलट कर काले नाग को देखा जहां से वो आया था उसने मन ही मन उसको धन्यवाद किया और उस कागज को उस दिये में से निकाल लिया और उस दिये को वैसे ही वहीं पर रख दिया।

उधर रजनी का भी मन लग नही रहा था उसे बस यही फिक्र हो रही थी कि पता नही बाबू को वो कागज मिला कि नही?

उदयराज ने वो कागज खोला उसमे लिखा था-

---बूर बहुत प्यासी है---

---कुल वृक्ष के नीचे पाप का पहला भोग---

---2 महीने तक हर अमावस्या---

उदयराज कागज में लिखी बात को पढ़कर समझते ही खुशी से झूम उठा उसने वो कागज चार पांच बार चूम लिया और फिर उसने वो कागज धोती में गांठ बांध लिया।

उदयराज ने अस्तव्यस्त हुए घर को बचे 2 घंटे के अंदर व्यवस्थित कर दिया और जब रजनी के आने का वक्त हुआ तो कुएं के पास जाकर कुएँ की दीवार (कुएं के ऊपर जो चार पिलर होते हैं) कि ओट में सड़क की तरफ मुँह करके बैठ गया।

रजनी जैसे जैसे वक्त नजदीक आता गया काफी बेचैन हो गयी थी जब वक्त हुआ तो वो नीलम के घर से चल दी काकी ने बोला कि तू चल मैं थोड़ी देर में गुड़िया को लेके आऊंगी, ये अभी यहीं सो रही है तो सोने दे मैं ले आऊंगी, रजनी भारी मन से घर की तरफ चल दी, रास्ते में सोचे जा रही थी कि न जाने बाबू कहाँ होंगे घर में या बाहर, ठीक 6:30 हो रहे हैं 10-15 मिनट बाद सुर्यास्त हो जाएगा उससे पहले कहीं में उनके सामने न पड़ जाऊं, जैसे ही रजनी दालान के बगल से चलती हुई अपने द्वार पर आयी एक बार उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई, फिर आगे बढ़कर घर के दरवाजे तक गयी तो देखा कि दरवाजा सटाया हुआ था और उसकी कुंडी में एक कागज गोल गोल घुमा के फसाया हुआ था रजनी ने वो कागज खोला तो उसमें लिखा था कि बेटी मैं कुएं पर बैठा हूँ तुम घर में चली जाना, रजनी उसको पढ़कर मुस्कुरा उठी और झट से घर में जाकर कोठरी के दरवाजे पर गयी तो देखा कि दीया वैसे ही रखा हुआ था जैसा वो छोड़कर गयी थी उसने झट से दीया उठाया और पलटकर देखा तो उसमें वो कागज नही था, ये देखते ही मारे खुशी से उसका बुरा हाल हो चुका था, चेहरा शर्म से बिल्कुल लाल हो गया, दिन भर की बेचैनी से जो मन भारी हो चुका था वो बिल्कुल शांत और खुश हो चुका था, रजनी मारे खुशी के झूम उठी, ओह्ह बाबू आपने आखिर मुझे जीत ही लिया, मेरे बाबू, ये बोलते हुए उसका मन मयूर खुशी से फूला नही समा रहा था।

अभी सुर्यास्त होने में पांच सात मिनिट बाकी थे, रजनी और उदयराज ने बड़ी ही बेचैनी से वो पल काटे और जैसे ही सुर्यास्त हुआ रजनी भागकर घर के दरवाजे तक आयी और वहीं खड़ी होकर एकदम चहकते हुए उसने जोर से आवाज लगाई- बाबू! ओ बाबू

सुर्यास्त तो हो चुका था परंतु अभी अंधेरा नही हुआ था

उदयराज ने एकदम पलट के पीछे देखा तो अपनी प्यारी बिटिया को उतनी दूर से देखकर ही खुशी के मारे उछल पड़ा मानो 6 दिन नही 6 युग बीत गए हों रजनी को देखे।

रजनी इतना बोलकर मुस्कुराती हुई घर में भाग गई, उसने आज वही लाल रंग की साड़ी और ब्लॉउज पहना हुआ था।

उदयराज कुएं से भागता हुआ घर में आया उसे अहसास हो गया कि काकी अभी नही आई हैं उसने दरवाजा अंदर से सटा दिया और देखा तो बरामदे में रजनी नही थी फिर आंगन में देखा वहां भी नही थी, फिर रसोई में देखा वहां भी नही मिली फिर एकदम से कोठरी की तरफ बढ़ा और कोठरी के दरवाजे पर आकर रुक गया, रजनी दरवाजे की तरफ पीठ किये अपना मुँह अपने हांथों में छिपाए कोठरी के बीचों बीच खड़ी थी उसकी सांसे शर्म और लज़्ज़ा से ये सोचकर, की बीती 6 रातों में मैंने बाबू को और बाबू ने मुझे कैसे कैसे प्यार किया, तेज तेज चल रही थी।

अपनी बेटी के गदराए बदन के पिछले हिस्से, ब्लॉउज में उसकी पीठ का खुला हिस्सा और मादक उभरे हुए भारी भारी नितम्ब को देखकर उदयराज अधीर हो गया।

उदयराज धीरे से कोठरी के अंदर आया और रजनी के सामने खड़ा हो गया, रजनी उसके माथे तक आती थी, उदयराज ने थोड़ा सा नीचे झुककर अपने दोनों हांथों से रजनी के दोनों हांथों को चेहरे से हटाया तो रजनी ने शर्म से अपनी आंखें बंद कर ली उसके प्यासे होंठ हल्का सा हिल गए, रजनी की तेज चलती साँसे उदयराज के चेहरे से टकराई, उदयराज ने अपने सीधे हाथ से रजनी की ठोढ़ी पकड़कर उसके चेहरे को ऊपर किया और धीरे से बोला न जाने कितने युगों के बाद मुझे अपना चांद देखने को मिला है, राजनी ने धीरे से अपनी आंखें खोलकर अपने बाबू को देखा और सिसियाकर ooooooooohhhhhhhhhh.....bbbaaaaaabbbbbuuuuuuu

बोलते हुए उदयराज से कस के लिपट गयी, उदयराज ने भी अपनी बेटी को कस के अपनी बाहों में भर लिया, दोनों बाप बेटी अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपट गए, रजनी ने उदयराज के कानों में धीरे से बोला-आखिर आपने मुझे और मैंने आपको पा ही लिया न बाबू।

उदयराज रजनी के गदराई गुदाज बदन को बेताहाशा सहलाते हुए- हाँ मेरी बेटी, अब तेरे बिना रह पाना नामुमकिन है।

उदयराज ने एकदम से रजनी की गुदाज गांड को कस कस के भीचते हुए अपने से और सटा लिया, रजनी चिहुकते हुए जोर से सिसक उठी।

रजनी भी बेताहाशा अपने बाबू के बदन से लिपटी उनकी पीठ, कमर, गर्दन, और बालों को सहलाये जा रही थी, तभी बाप बेटी एक दूसरे के आंखों में वासनामय होते हुए बड़े प्यार से देखने लगे तो उदयराज बोला- काकी नही आई है न अभी?

रजनी ने बडे मादक अंदाज में कहा-ऊँ..ऊँ..ऊँहुंक, वो थोड़ी देर में आएंगी।

उदयराज ने एक बार फिर रजनी की ठोढ़ी को हल्का सा ऊपर उठाया तो राजनी ने आंखें बंद कर ली उदयराज अपनी बेटी के प्यासे होंठों को देखने लगा उनके चेहरों के बीच करीब पांच इंच की दूरी होगी, उदयराज ने अपनी बेटी के पूरे चेहरे को गौर से बड़े ध्यान से देखा, उसका माथा, आंखें, दोनों गाल, नाक और नाक की लौंग को तो उसने थोड़ा झुककर चूम ही लिया, राजनी मस्त हो गयी, फिर उदयराज ने लिपिस्टिक लगे नरम नरम हल्के थरथराते हुए होंठों को बड़े गौर से देखा रजनी ने आंखें बंद ही कर रखी थी, कितनी सुंदर और कितनी गोरी थी रजनी, उदयराज जैसे उसे पहली बार देख रहा हो, फिर उदयराज बोला- बेटी

राजनी- हूँ

उदयराज- उस कागज में तुमने क्या क्या लिखा है?

अब रजनी शर्मा गयी और जैसे ही अपने बाबू के सीने में शर्माकर मुँह छुपाने को हुई उदयराज ने दुबारा से उसकी ठोढ़ी को पकड़कर उसका चेहरा हल्का ऊपर को उठा लिया, रजनी ने शर्म से फिर आंखें मूंद ली और उसके होंठ थरथरा उठे।

उदयराज ने फिर खुद ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा- पहला भोग मेरी बेटी को कुल वृक्ष के नीचे चाहिए?

रजनी ने इस बार शर्माकर हाँ में सर हिलाते हुए उदयराज के चौड़े सीने में अपना चेहरा छुपा ही लिया।

उदयराज ने एकदम से उसका चेहरा उठाया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिये, राजनी सिरह गयी उदयराज अपनी बेटी के रसीले और नशीले होंठों को चूमने और चूसने लगा और साथ ही साथ उसके भारी नितंबों को अपनी दोनों हथेली में लेकर मसलने लगा, रजनी ने भी अपने नितम्ब उठा कर अपने बाबू को परोस दिए उसको भी बहुत आनंद आने लगा, तभी उदयराज ने रजनी के होंठों को चूसते हुए अपनी जीभ मुँह में डालने की कोशिश की तो रजनी तड़पकर बोली- फिर आप बहकते चले जाओगे बाबू और मैं भी, इस वक्त ये सही समय नही काकी कभी भी आ सकती है मेरे बाबू।

उदयराज- बस थोड़ा सा मुझे तेरी जीभ छूनी है थोड़ी देर मेरी जान, मेरी बेटी।

राजनी ने फिर बड़े प्यार से अपनी जीभ बाहर निकाल ली और उदयराज ने उसकी जीभ को मुँह में भरकर किसी icecream की तरह खूब चूसा, रजनी तो मदहोश ही हो गयी, अजीब सी वासनात्मक गुदगुदी उसके बदन को गनगना गयी। एकाएक उदयराज रजनी से बोला- कल रात को क्या हो गया था कोठरी से जाते जाते?

रजनी ये सुनते ही फिर से सुर्ख लाल हो गयी और शर्माकर उदयराज से लिपट गयी वो समझ गयी कि उनके बाबू बूर पर लंड रगड़ने वाली बात कह रहे हैं।

इतने में उदयराज ने फिर रजनी के कान में उसके नितम्ब को भीचते हुए कहा - एक बार फिर वैसे ही छुवा दो अपनी उससे। बहुत तरस रहा है ये।

ये कहते हुए उदयराज ने अपने लोहे के समान खड़े लंड को अपनी बेटी की दहकती हुई बूर पर साड़ी के ऊपर से ही दबा दिया। अपने बाबू का शख्त लंड के धक्के का अहसास अपनी बूर पर होते ही रजनी उछल सी गयी और शर्माते हुए बोली- कहीं काकी न आ जाएं

मन तो रजनी का भी कर रहा था

उदयराज बोला- जल्दी से कर दो, अभी काकी नही आई हैं।

रजनी ने कोठरी में नज़र दौड़ाईं वहां कोने में एक सरसों की खली की 50 किलो की बोरी रखी थी, रजनी ने अपने बाबू के कान में धीरे से कहा- बोरी के पास चलो बाबू।

उदयराज और रजनी जैसे ही कोठरी के कोने में बोरी के पास आये उदयराज ने दुबारा से अपनी बेटी को बाहों में भर लिया और उसे चूमने लगा, रजनी ने सिसकते हुए अपना दायां पैर उठाकर बोरी पर रख लिया, कोठरी में अब थोड़ा अंधेरा हो चुका था क्योंकि ये सब करते करते लगभग 10 मिनट हो चुके थे, उदयराज रजनी को ताबड़तोड़ चूमे जा रहा था, रजनी मादक सिसकारियां लिए जा रही थी, एकाएक रजनी ने अपनी साड़ी दोनों हाँथ से जाँघों तक उठायी फिर दूसरे हाथ से अपने बाबू का दहकता 9 इंच लम्बा लंड वासना में कंपते हुए धोती के नीचे से बाहर निकाला, उदयराज ने अपनी बेटी के होंठों को अपने होंठों में भर लिया, राजनी ने एक बार धीरे से aaaaaaaahhhhhhh bbbbbaaaabbbbbbuuuu करते हुए अपने बाबू का पूरा दहकता लंड अपने हाथों में लेकर बड़ी मादकता से सहलाया, उदयराज के मुँह से कराह निकल गयी, रजनी एक हाथ से लंड को सहलाती रही और दूसरे हाथ से उसने साड़ी को जाँघों के जोड़ तक बटोर लिया, एक पैर उठाकर बोरी पर रखने की वजह से साड़ी ऊपर होकर रुक गयी और उसकी दायीं मांसल गोरी गोरी जांघ नग्न हो गयी, रजनी ने फिर हाथ नीचे ले जाकर अपनी काली रंग की पैंटी को थोड़ा साइड कर बूर को खोला, एक पैर ऊपर होने की वजह से तड़पती बूर की नरम नरम महकती फाँकें थोड़ी खुल गयी थी, रजनी ने पैंटी को अच्छे से साइड कर अपनी दो उंगलियों से बूर की प्यारी प्यारी फाँकों को थोड़ा और चीर दिया फिर दूसरे हाँथ से लंड को सहलाते हुए उसकी आगे की चमड़ी को पीछे खींचकर अपने बाबू के लंड को अपनी बूर की दहकती फाँकों के बीच जैसे ही लगाया उदयराज ने जोर से सिसकते हुए लंड को चार पांच बार धक्का देकर अपनी बेटी की नरम नरम दहकती बूर की फांकों के बीच रगड़ दिया, रजनी की भी जोर से aaaaaaahhhhhhh निकल गयी और वो थरथरा कर सब छोड़कर अपने बाबू से लिपट गयी और आंखें बंद कर अपने बाबू को कस कस के चूमने लगी, उदयराज भी अपनी बेटी की साड़ी को पीछे से अच्छी तरह उठाकर उसके मोटे मोटे नितंबों को सहलाते, भींचते और आगे की ओर धक्का देते हुए अपने लंड को बूर की फांकों में हाय हाय करता हुए रगड़ता हुआ रहा, लंड बूर की छेद पर और भग्नासे पर जब ठोकर मारता तो मारे सरसराहट के रजनी के पैर कांप जाते और गनगना कर वो अपने बाबू के ऊपर झुककर झूल सी जाती।

अपने बाबू के मोटे लंड का सुपाड़ा रजनी को अपनी बूर की फाँकों के बीच ऊपर ऊपर गच्च गच्च ठोकर मारता हुआ जन्नत का सुख दे रहा था और वो खुद अब अपनी गांड को आगे की तरफ हल्का हल्का उछाल रही थी, काम रस से बाप बेटी के लंड और बूर सराबोर हो जाने की वजह से और धीरे धीरे गच्च गच्च धक्का मारने की वजह से कोठरी में बूर और लंड के मिलन की चप्प चप्प आवाज हल्की हल्की गूंजने लगी थी कि एकाएक रजनी को लगा कि बहुत ज्यादा हो जाएगा और काकी कभी भी आ सकती है तो उसने उदयराज के कान में धीरे से कहा कि बाबू अब बस, काकी आती होंगी।

उदयराज ने तरसते हुए रजनी को छोड़ा और अपना मूसल जैसा लंड धोती के अंदर किया, रजनी ने बोरी से पैर हटा कर नीचे किया और साड़ी तथा पैंटी को ठीक किया, पैंटी उसकी काम रस से सराबोर हो चुकी थी।

रजनी कोठरी से निकलकर जाने लगी तो उदयराज ने एक बार फिर उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींच लिया रजनी झटके से उदयराज की बाहों में आ गयी, उदयराज ने अपना होंठ रजनी के होंठ पर रखकर एक जोरदार चुम्बन जड़ दिया और बोला एक बार मुझे मेरी जन्नत को दिखा तो दो, मन नही मान रहा।

रजनी- बाबू, काफी देर हो जाएगी, काकी कभी भी आ सकती है मेरे बाबू, अभी खाना भी बनाना है, अब जो भी देखना है वहीं चलकर अच्छे से देखना और खाना।

उदयराज- ठीक है मेरी बेटी, जल्दी जल्दी खाना बना ले, काकी को अपने हिसाब से बता देना ताकि वो गुड़िया को रात में संभाल लें।

राजनी- हाँ मेरे बाबू, मैं उन्हें अपने हिसाब से अच्छे से समझा दूंगी आप चिंता न करो।

तब उदयराज घर से बाहर आ गया और रजनी खाना बनाने की तैयारी करने लगी। बाहर आके देखा तो काकी आ चुकी थी। उदयराज ने बैलों को चारा डाला और नहा कर फ्रेश हो गया और अपनी नातिन को लेकर बाग में घुमाने लगा।

काकी रसोई में गयी और रजनी की मदद करने लगी, रजनी ने खाना बनाते बनाते काकी को बता दिया कि काकी मुझे और बाबू को कुल वृक्ष की जड़ में रात को 12 बजे कील गाड़ने जाना पड़ेगा तो तुम गुड़िया को संभाल लेना वैसे वो रोयेगी नही, दिन में ज्यादा सोई नही है तो सो जाएगी रात में।

काकी ने कहा- हाँ मेरी बेटी जरूर, कर्म और उपाय तो पूरा करना ही है, तुम दोनों निश्चिन्त होकर जाओ। फटाफट खाना बनाया गया और सबने आज एक साथ खाना खाया। 10:30 बज चुके थे उदयराज और काकी खाना खा के बाहर आ गए और रजनी बर्तन धोने लगी, उदयराज काकी के ही बगल में द्वार पर खाट पे लेट गया, काकी भी लेट गयी और बच्ची को सुलाने लगी। राजनी ने एक बांस की बनी छोटी सी डलिया ली और उसमे सरसों के तेल की शीशी, एक मचिस और मिट्टी का दिया और बाती रख ली, उदयराज ने एक बड़ा अंगौछा लिया और अंतिम कील रख ली, कुल वृक्ष करीब 3 किलोमीटर घर से दूर दक्षिण की दिशा में था।

रजनी और उदयराज घर से लगभग रात को 11 बजे निकले, काकी बच्ची को लेकर सो चुकी थी, अंधेरी रात थी, लगभग गांव के सभी लोग नींद की आगोश में जा चुके थे। कुल वृक्ष तक जाने के दो रास्ते थे एक तो पश्चिम की तरफ से गांव के अंदर से होकर जाता था और दूसरा रास्ता बाग की तरफ से खेतों से होकर जाता था, बाग की तरफ वाला रास्ता थोड़ा लम्बा था पर था सुनसान और आज अमावस्या की काली रात को तो वो और भी सुनसान सा हो गया था, राजनी और उदयराज ने बाग वाले रास्ते से ही जाने का निश्चय किया और घर से निकल गए। उदयराज ने हाथ में एक लाठी ले रखी थी और उसके कंधे पर एक बड़ा अंगौछा था, राजनी लाल रंग की साड़ी पहने हाँथ में डलिया लिए हुए थी जिसमे एक सरसों के तेल की शीशी, दीया और माचिस रखा हुआ था। बाग तक तो रजनी आगे आगे और उसके पीछे पीछे उदयराज लाठी लिए चलता रहा।
 
Dear Readers

अभी update आने में थोड़ा वक्त लगेगा, ये update story का एक ऐसा update है जिसका सभी को काफी दिनों से बेसब्री से इंतज़ार है, और सभी के साथ साथ मुझे भी, तो कृपया मुझे थोड़ा वक्त दें ताकि मैं इसको बहुत बड़ा सा महा update बना सकूँ, और छोटी छोटी चीजों के अच्छे से संजो सकूँ, अगर आप जल्दबाज़ी करेंगे तो हो सकता है मैं भी जल्दबाज़ी में कई चीज़ें भूल जाऊं और मजा खराब हो जाये तो कृपया थोड़ा इंतज़ार करें और वक्त दें।

धन्यवाद आप सबका
 
Update- 39

बाग को पार करते ही खेत शुरू हो गए, खेतों के बीच मिट्टी की कच्ची सड़क पर रजनी आगे आगे चल रही थी, सड़क के किनारे दोनों तरफ काफी दूर दूर तक खेत ही खेत थे, कईं खेत खाली थे तो कइयों में फसल खड़ी थी, नज़र उठा कर दूर तक देखने पर गांव के कुछ एकाद घर ऐसे थे जिनमें लालटेन जल रही थी जिनकी रोशनी एक छोटे से तारे की तरह नज़र आती थी, क्योंकि अपने गांव का रास्ता उदयराज और रजनी को बखूबी पता था इसलिए वो अंधेरे में भी बेधड़क चले जा रहे थे, अंधेरा तो था पर पास की चीज़ें हल्की हल्की दिखती थी, ठंडी हवा सर्रर्रर सर्रर्रर चल रही थी जिससे खेतों में खड़ी फसल भी लहलहा रही थी।

उदयराज तेज कदमों से चलकर रजनी के नज़दीक आया और बोला- बेटी ये लाठी पकड़।

रजनी- क्या हुआ बाबू? सूसू लगी है क्या? (रजनी इतना कहते ही मजे लेते हुए खिलखिलाकर हंस दी और लाठी पकड़ ली)

उदयराज ने झट राजनी को अपनी दोनों मजबूत बाहों में उठाते हुए बोला- सूसू लगेगी भी तो अब अकेला थोड़ी न करूँगा।

अचानक बाहों में उठा लेने से रजनी चिहुँक गयी फिर जल्दी से अपनी बाहें अपने बाबू के गले में डालकर फंसा लिया, लाठी और डलिया उदयराज की पीठ की तरफ आ गए क्योंकि वो दोनों रजनी के हांथों में थे। उदयराज ने अपनी जवान सगी बेटी के गदराए बदन को अपनी मजबूत बाहों में थामा हुआ था।

रजनी- अच्छा, तो सूसू किसके साथ करोगे?

उदयराज - अपनी प्यारी बेटी के साथ?

राजनी- iiiiiiiiisssssshhhhhhhhhh, सूसू भी मेरे साथ।

उदयराज- हां बिल्कुल, और वो भी उसको देखते हुए। करोगी मेरे साथ सूसू?

राजनी- सोच के बताऊंगी (रजनी ने जानबूझ कर अपने बाबू को तडपाने के लिए कहा)

उदयराज- सोचकर?, सूसू के वक्त इतना सोचा नही जाता, जब तक सोचोगी तब तक तो सूसू निकल जायेगा।

रजनी (जोर से हंसते हुए)- तो क्या अभी लगी है मेरे बाबू को जोर से।

उदयराज- नही नही, मैं तो ऐसे ही बोल रहा था, और मान लो लगी ही होती तो?

रजनी- तो कर लेती साथ में, पर मान लो मुझे ही नही लगी होती तो।

उदयराज- तो तुम वैसे ही खोलकर सामने बैठ जाना, मैं उसको देखते हुए कर लिया करूँगा।

रजनी ने धीरे से कान में कहा- किसको?

उदयराज ने रजनी को बाहों में उठाये उठाये चलते चलते धीरे से कान में कहा- अपनी सगी बेटी की बूर को।

रजनी dhattttttt, बदमाश! बोलते हुए अपने बाबू से लिपट गयी।

उदयराज ने फिर रजनी के कान में धीरे से कहा- मुझे थोड़ा सा चखना है और निकलते हुए देखना है।

राजनी- क्या? क्या चखना है बाबू और क्या निकलते हुए देखना है?(राजनी ने बहुत धीरे से कान में कहा)

उदयराज ने बहुत मादक अंदाज़ में कहा- अपनी बेटी का गरम गरम चूत और मूत दोनों।

रजनी ने लाठी और डलिया को बाएं हाँथ में पकड़ा और दाएं हाँथ से पीठ में चिकोटी काटते हुए बोली- बदमाश! गंदे बाबू!

उदयराज ने अब रजनी को घुमा के कंधे पर उठा लिया तो राजनी बोली- बाबू अब मुझे उतार दो न, आप थक जाओगे।

रजनी की मोटी मोटी चूचीयाँ उदयराज के कंधों पर दब गई। अपनी बेटी के गदराए बदन को अपनी बाहों में उठाये और दबोचे उदयराज मदहोशी में चले जा रहा था।

उदयराज- नही, अपनी रानी बेटी को मैं अपनी बाहों में उठाकर सेज तक ऐसे ही ले जाऊंगा।

रजनी- सेज, कौन सा सेज?

उदयराज- कुलवृक्ष का चबूतरा, वहीं तो सेज है आज हमारी आज रात।

रजनी ये समझते ही फूली नही समाई पर फिर बोली- नही बाबू, आप थक जाएंगे, मैं नही चाहती कि मेरे बाबू पहले ही कुछ थक जाएं।

अब उदयराज अपनी बेटी का अर्थ समझ गया और मुस्कुरा दिया फिर बोला - क्यों तेरे बाबू इतने कमजोर हैं क्या की अपनी बेटी को सेज तक न ले जा सकें।

रजनी- ना बाबा ना, मैन ऐसा कब कहा, मेरे बाबू जैसा तो कोई नही, पर मैं उनकी तनिक भी ताकत कहीं और नही बांटना चाहती। समझें अब मेरे बाबू।

उदयराज- ह्म्म्म तो बात ये है, लो मैं तुम्हे फिर उतार देता हूँ।

और उदयराज ने रजनी को उतार दिया।

ऐसे ही वासनात्मक बातें करते करते उदयराज और रजनी आखिर कुल वृक्ष तक पहुँच ही गए। उनको अंधेरे में वहां पहुँचते पहुँचते लगभग 40 मिनट लग गए। कुल वृक्ष के आस पास कईं और पेड़ भी थे और खेत भी थे, पास ही नदी थी, काफी सन्नाटा था, हर जगह अंधेरा पसरा हुआ था, हल्की हवा चल रही थी, थोड़ा जंगल जैसा ही था वहां, रात में कई तरह के कीड़ों के बोलने की आवाज़ें आ रही थी, रजनी ने लाठी और डलिया चबूतरे पर रखा, उदयराज ने झट पीछे आकर अपनी बेटी को बाहों में भर लिया, रजनी की aaaaaaahhhhhhhh निकल गयी। उदयराज ने गालों को चूम लिया और रजनी ने चेहरा उठा कर चुम्बन दिया। उदयराज ने फिर रजनी को छोड़ा क्योंकि समय हो चुका था कील गाड़ने का। रजनी ने कुल वृक्ष के तने की ओट में मिट्टी का दिया सरसों का तेल डालकर जला दिया, कुल वृक्ष के चबूतरे भर में थोड़ी रोशनी हो गयी। उदयराज पास से ढूंढकर एक पत्थर लाया और कील निकाली।

उदयराज और रजनी चबूतरे से उतरकर पत्थर ढूंढने लगे, उदयराज को एक मोटा पत्थर मिल गया, फिर उसने कील को पत्थर से कुल वृक्ष के तने में ठोक दिया, रजनी ये सब देखती रही, उदयराज ने पत्थर फेंक दिया, अब रजनी की बारी थी जैसे ही रजनी आगे बढ़कर चबूतरे पर चढ़ने को हुई, उदयराज ने उसे बाहों में उठा लिया, रजनी अपने बाबू के गले में बाहें डाले झूल गयी, उदयराज उसे लेकर चबूतरे पर चढ़ गया और कील के पास उसको अपनी गोदी में लेकर बैठ गया, दिये कि हल्की रोशनी में सब दिख रहा था, रजनी अपने बाबू की गोदी में बैठी मदहोश हो गयी, रजनी के गुदाज नितम्ब अपनी जाँघों और गोदी में महसूस कर उदयराज का लंड हलचल करने लगा, रजनी को अपने बाबू का लंड फूलकर अपनी गांड में चुभता महसूस हुआ और वो बेचैन हो उठी-

आआआआआआहहहहहहह.......बाबूबूबूबू

उदयराज ने पीछे से अपनी बेटी के गर्दन पर चूमते हुए उसके ब्लॉउज के बटन खोलने शुरू किए, रजनी ने अपनी दोनों बाहें पीछे ले जाकर अपने बाबू के गर्दन में जोर से सिसकते हुए लपेट दी।

उदयराज पहले तो ब्लाउज के बटन खोलने लगा फिर अचानक रुककर दोनों हांथों से ब्लॉउज के ऊपर से ही अपनी बेटी की मोटी मोटी चूचीयों को अपने हथेली में भर भरके बेसब्रों की तरह दबाने और मसलने लगा, उदयराज- aaaaaahhhhhhhhh mmmmeeerrriiiii bbbeeettttiii

रजनी - aaaaaahhhhhhhhhh hhhhhaaaaiiii....bbbbbaaaaabbbuuuuu, uuuuuiiiiiiiiiii....mmmmmmaaaaaaaaaaaa......ddddhhhhhiiiiiirrrreeeee.......sssseeee.......bbbaaaabbbbbbuuuuu

उदयराज पूरी तरह खुलकर रजनी की दोनों मदमस्त चूची को मसलने लगा और अंगूठे और तर्जनी उंगली से फूलकर सख्त हो चुके निप्पल को भी मसलने लगा।

रजनी हाय हाय करते हुए मचल उठी।

रजनी ने सिसकते हुए कहा- बाबू वक्त निकल जायेगा पहले कील पर दूध डाल दो।

उदयराज ने मदहोशी की हालत में ब्लॉउज के बटन खोल डाले, राजनी ने झट पूरा ब्लॉउज खोलकर चबूतरे पर बगल में रख दिया, दिए कि रोशनी में अपनी सगी बेटी का ऊपरी हिस्सा केवल ब्रा में देखकर उदयराज पागल सा हो गया, एक पल के लिए बालों को हटा कर उसने अपनी बेटी की नंगी पीठ देखी, गोरे गोरे कंधों पर ललचाई नज़र डाली, गोरी मदमस्त बाहों को कुछ देर घूरा और फिर पीठ पर चुम्बनों की बरसात कर दी, रजनी सिसक उठी-

ओओओओओओहहहहहहह.......हाय.....दैया........बाबू......ईईईईईशशशशशश........... ऊऊऊऊऊईईईईईई......माँ

उदयराज ने फिर ब्रा के ऊपर से ही दोनों चूचीयों को पकड़कर हौले हौले दबाया फिर गर्दन और गालों को चूमने लगा। रजनी फिर से सिसकी लेती हुई अपने बाबू से सट गयी, उदयराज ने रजनी की ब्रा का हुक खोलने की कोशिश की पर उससे जल्दी खुला नही तो रजनी ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया, ब्रा ढीला होकर उदयराज के हांथों में आ गया, उदयराज ने ब्रा को एक साइड में ब्लॉउज के साथ रख दिया और अब रजनी ऊपर से बिल्कुल निवस्त्र हो गयी, रजनी की नंगी पीठ अपने बाबू के सीने से सट गयी, अपनी सगी बेटी की जवान गोरी पीठ अपने सीने से सटते ही उदयराज ने मस्ती में आंखें बंद करते हुए अपने दोनों हाथों से रजनी की नंगी गोरी गोरी नरम स्पॉन्ज जैसी फूली फूली चूचीयों को अपने हाथों में भर लिया, निप्पल से दूध की बूंदें टपकने लगी और वो कमाग्नि में कड़क हो चुके थे, रजनी के मुँह से लगातार सिसकियां निकले जा रही थी, उदयराज ने रजनी के नंगे कंधे पर अपने ठोड़ी को रखकर ऊपर से रजनी की विशाल चूचीयों को मसलते हुए देखा। रजनी की बूर रिसने लगी।

उदयराज ने अपनी बेटी के दोनों निप्पल को ठीक कील की सीध में किया और चूचीयों को दबा कर दोनों निप्पल से एक साथ दूध की पतली धार ससर्रर्रर से निकालते हुए कील पर गिरा दी, राजनी की aaaaahhhhhhhhhh निकल गयी, उदयराज अब अपनी बेटी की चूचीयों को जोर जोर से दबाने लगा, रजनी अपने बाबू के हाथ की ताकत अपनी चूचीयों पर अच्छे से महसूस कर हाय हाय करने लगी-

ओओओओहहहहहह ... ..बाबू...हाँ.... ऐसे ही दबाओ.......आआआआहहहह....और मीजो चूची को.......उउउउईईईईईई।

चूचीयों से निकलते दूध ने उदयराज के हाथों को भिगो दिया और दूध पूरी चूचीयों पर भी अच्छे से लग गया था, उदयराज तो मदहोश ही हो गया।

रजनी ने उदयराज से धीरे से वासना भरी आवाज में कहा- बाबू, दुद्धू पी लो न।

उदयराज अपनी बेटी के वसनात्मय आग्रह को सुनकर उसको ताबड़तोड़ चूमने लगा कि तभी रजनी ने सिसकते हुए अपने बाबू को रोका और गोदी से उठ खड़ी हुई, एक मादक अंगडाई लेकर उसने अपने बालों को पीछे की ओर झटका, उदयराज एक टक लगाए अपनी सगी बेटी के अर्धनिवस्त्र बदन को दिए कि हल्की रोशनी में देखता रह गया और उफ्फ रजनी की ये अदा, बालों को पीछे झटकने से कैसे रजनी की दोनों विशाल भारी चूचीयाँ जोर से हिली थी, कितनी गोरी गोरी मोटी मोटी चूचीयाँ थी रजनी की, उसपर वो तने हुए दोनों गुलाबी निप्पल और निप्पल के किनारे किनारे करीब एक इंच तक फैला गुलाबी घेरा (areola), उदयराज एक टक लगाए अपनी बेटी के इस रूप को निहारता रहा, उसे विश्वास ही नही हो रहा था कि उसकी रजनी बेटी अंदर से इतनी सुंदर है, उसका यौवन इतना मदहोश कर देने वाला है की मुर्दे में भी जान डाल दे, और वो कितना भाग्यशाली है कि आज उसको उसकी सगी बेटी अपना पूर्ण यौवन का रसपान करा देगी, उसका लंड तो चिंघाड़ते हुए धोती में खड़ा हो चुका था रजनी भी एक टक लगाए मुस्कुराते हुए अपने बाबू के गठीले बदन और धोती में खड़े लंड को निहारने लगी।

तभी रजनी ने बड़ी ही कातिल मुस्कान के साथ अपने दोनों हाथ को झूठे ही पीछे ले जाकर अपने बालों को मानो बंधने लगी ताकि वह अपने बाबू को कमर से ऊपर का पूरा निवस्त्र हिस्सा और कांख के हल्के बाल दिखा सके और हुआ भी वही ये सब देखकर उदयराज हाय हाय कर उठा, रजनी की गोरी गोरी कमर, नाभि, उसके ऊपर उन्नत खड़ी सख्त दोनों चूचीयाँ, गुलाबी निप्पल और उनसे रिसता हल्का हल्का दूध, उसकी नंगी बाहें और बाहों की गहराई में वो हल्के हल्के बालों वाली कांख, उदयराज से नही रहा गया और उसने झट अपनी बाहें फैला कर अपनी बेटी को उसकी गोदी में बैठकर उसमे समा जाने के लिए बुलाया, रजनी झट से तड़पती हुई, बालों को छोड़कर अपनी साड़ी को बटोरकर जाँघों से भी ऊपर उठाते हुए अपने बाबू को अपनी मोटी मोटी गोरी गोरी मांसल जांघे व काली पैंटी दिखाते हुए, अपने बाबू की गोद में इस तरह आकर बैठी की उसकी दहकती मचलती रिसती बूर उदयराज के मूसल जैसे धोती के अंदर खड़े लंड पर सेट हो गयी, रजनी और उदयराज की जोर से आआआआआआआहहहहहहह निकल गयी। रजनी ने अपने दोनों पैर अपने बाबू के कमर के पीछे क्रोस मोड़ लिए और अपनी जाँघों से उदयराज की कमर को कस लिया।

जैसे ही रजनी ने पैंटी में छिपी अपनी रिसती बूर को धोती में खड़े अपने बाबू के लंड पर रखा दोनों बाप बेटी जोर से कराह उठे और एक दूसरे को कस के बाहों में भींच लिया, उदयराज अपना कुर्ता पहले ही निकाल चुका था, ऊपरी हिस्सा उसका भी निवस्त्र था, उसके मांसल पीठ और कमर पर उसकी बेटी के हाँथ रेंगने लगे, रजनी अपने बाबू की पीठ कमर और गर्दन जोर जोर से सहलाने लगी, उदयराज भी अपनी बेटी को गोदी में बैठाए कस कस के सहलाने और भीचने लगा, दोनों की आंखें मस्ती में बंद हो गयी थी, दोनों ही जोर जोर से कराह और सिसक रहे थे, आस पास कुछ दूर तक उनकी सिसकियां गूंज रही थी। उदयराज के लंड और रजनी की बूर के बीच सर्फ धोती और पैंटी की दीवार थी, रजनी खुद ही अपने बाबू की गोदी में बैठी अपनी पनियाती बूर को उनके लंबे मोटे लंड पर अपनी भारी गांड बहुत धीरे धीरे आगे पीछे करके रगड़ रही थी और वासना की चढ़ती खुमारी में सिसके जा रही थी।

कितना कामुक दृश्य था एक सगे बाप बेटी सुनसान जगह पर अमावस्या की अंधेरी रात में एक बड़े कुल वृक्ष के नीचे चबूतरे पर अर्धनिवस्त्र होकर एक दूसरे की गोदी में समाए बेताहाशा एक दूसरे को वासना से सराबोर होकर सिसकते हुए चूम और सहला रहे थे।

रजनी की नंगी चूचीयाँ उदयराज के सीने से दबी हुई थी और उदयराज के सीने पर निप्पल से दूध हल्का रिस रिस कर लग रहा था, एकाएक उदयराज ने रजनी की बायीं चूची को मुँह मे भर लिया और पागलों को तरह चूसने लगा।

राजनी uuuuuuuuiiiiiiiiiiiii aaaammmmmmmaaaaaa, hhhhaaaaaaaiiiiii bbbbaaaaaabbbuuu, meeerrreeee raaajjjjjaaaa कहते हुए कराहने लगी।

उदयराज मुँह भर भर के अपनी बेटी की मखमली गुदाज खरबूजे के समान गोल गोल चूची को पिये जा रहा था, दूसरे हाँथ से वो दूसरी चूची को भी मसलने लगा, कभी जीभ को निप्पल पे घुमाता, कभी बच्चे की तरह चूसने लगता, फिर कभी निप्पल के किनारे किनारे जीभ घूमता, कभी जीभ को निप्पल के किनारे किनारे घुमाते हुए गोले को बड़ा करता जाता और जब जीभ एक बड़ा गोल बना कर चूची पर घूमने लगती तो गप्प से पूरी चूची को मुँह में भरकर चूसने लगता, ऐसे ही वो कुछ देर अपनी सगी बेटी की चूचीयों से खेलता रहा।

राजनी- aaaahhhhhhhhhhhh........ mmmmeeerrrreeeeee bbbbbaaaaabbbuuuuu..... पियो अपनी बेटी की चूची ऐसे ही.............मैं बहुत तरस गयी थी आपको पिलाने को............. aaaaaaaahhhhhhhhh dddddaaaaaiiiiiiiiyyyyyaaaaaa............... सारा दूध पी लो मेरे बाबू।

उदयराज अपनी बेटी के मुँह से आज ये बात सुनकर और जोश में आ गया और चूची बदलकर पीने लगा, काफी मात्रा में दूध भर भर के रजनी की चूची से निकलकर उदयराज के मुँह में जाने लगा, दूध की कुछ मात्रा उदयराज के होंठों के किनारों से निकलकर रजनी की जाँघों पर भी गिर जा रही थी, वासना ने दोनों बाप बेटी को अपने आगोश में ले लिया था, चूची में दूध की इतनी मात्रा उतर आई कि उसकी नसें हल्की हल्की दिखने लगी, उदयराज ने करीब 30 मिनिट रजनी को अपनी गोदी में बैठाए मदहोशी में उसकी मदमस्त चूचीयों को बदल बदलकर पीता और मसलता रहा, रजनी अब इतनी मदहोश हो चुकी थी कि वह खुद ही अपनी चूची को अपने हाथों में लेकर एक एक करके अपने बाबू के मुंह में भरने लगी और धीरे धीरे गांड उछाल उछाल के अपनी महकती फूली हुई बूर को अपने बाबू के फौलाद हो चुके लंड पर रगड़ती रही।

उदयराज ने एक हाथ रजनी की गांड के नीचे लेजाकर अपनी बेटी की गांड को पकड़ा और उछालकर उसे अपनी गोद में और ऊपर चढ़ाते हुए अपने दहाड़ते लंड से उसकी कमसिन बूर पर एक जोरदार घस्सा मारा, रजनी की बूर पर लगे मोटे लंड के करारे झटके से रजनी जोर से aaaaaaaahhhhhhhhhhhh bbbbbaaaaabbbbuuuuu.... करते हुए चिहुँक गयी।

काफी देर तक अपनी बेटी की चूचीयों को पीने और मसल मसल कर लाल कर देने के बाद उदयराज उसे बेताहाशा चूमने लगा, रजनी भी अपने बाबू को तड़पते हुए चूमने लगी, दोनों एक दूसरे को कंधे, गर्दन, गाल और माथे पर जोश में कांपते हुए चूमने लगे, एकाएक उदयराज ने रजनी के चेहरे को अपने हांथों में लिया और उसकी वासनामय आंखों में देखने लगा, रजनी भी बड़े प्यार से, मदहोशी से अपने बाबू को देखने लगी फिर एकएक उदयराज ने अपने होंठ अपनी सगी बेटी के होंठों पर रख दिये, रजनी की सिसकते हुए आंखें बंद हो गयी एक हाथ से उदयराज उसकी सख्त चूची को फिर से सहलाने लगा और अपने होंठों में अपनी बेटी का निचला नरम होंठ लेकर चूसने लगा, कभी नीचे के होंठ चूसता तो कभी ऊपर के होंठ चूसता, रजनी भी कहाँ पीछे रहने वाली थी वो भी अपने बाबू के होंठों को चूसने में डूबी हुई थी, दोनों एक दूसरे के होंठों को भर भर के खा जाने वाली स्थिति में चूसने लगे, कभी कभी उदयराज हल्का काट भी लेता तो रजनी सिसक पड़ती और बोलती- ओह्ह बाबू धीरे से।

और कभी रजनी भी जोश में आ के काट लेती तो उदयराज सिसक उठता

तभी रजनी ने अपना हाथ अपने बाबू के दहकते लंड पर रख दिया और उसे ऊपर से नीचे तक सिसकते हुए सहलाने लगी पर सिसकी उसकी दब जा रही थी क्योंकि उदयराज लगातार होंठों को चूसे जा रहा था।

काफी देर अपनी बेटी के होंठों को चूसने के बाद रजनी ने स्वयं ही अपनी जीभ अपने बाबू के मुंह में डाल दी और उदयराज के पूरे मुँह में घुमाने लगी, उदयराज अपनी बेटी की गरम गरम और नरम नरम जीभ अपने मुँह की गहराई में अंदर तक घूमते हुए महसूस कर निहाल हो गया और उसे जी भरके चूसने लगा काफी देर चूसने के बाद फिर उदयराज ने अपनी जीभ अपनी बेटी के मुँह में अंदर तक घुसेड़ दी और उसके मुँह का चप्पा चप्पा मानो अपनी जीभ से छूकर चूम लिया। रजनी के बदन में वासना की तरंगें चरम पर पहुँच गयी और उसकी बूर भट्टी की तरह दहकने लगी, एक तो काफी देर से बूर लंड पर रगड़ खा रही थी। रजनी से रहा नही गया तो उसने अपने बाबू को लेटकर प्यार करने का हल्का सा इशारा किया। उदयराज ने पास में रखा अंगौछा रजनी को गोदी में लिए लिए कुल वृक्ष के तने के नज़दीक चबूतरे पर एक हाँथ से बिछाया और अपनी बेटी को गोद में लिए लिए उसपर पीठ के बल लिटाते हुए खुद उसपर चढ़ता चला गया।

रजनी ooooooohhhhhhhhhh....mmmmmmeeeeeerrrrrreeeee......bbbbbaaaaaabbbbbbuuuuuu कहते हुए नीचे लेटती चली गयी

उदयराज अपनी सगी बेटी पर चढ चुका था दोनों एक दूसरे को बाहों में भरकर आंखों में देखते हुए मुस्कुराते रहे फिर मस्ती में आंखें बंद कर ली, उदयराज अपनी बेटी के ऊपर पूरा पूरा अच्छे से चढ़ गया, उदयराज ने अपने कुर्ते को मोड़ा और रजनी के सर के नीचे रख दिया, रजनी का हर अंग उसके बाबू के अंग से सटा हुआ था, रजनी की चूचीयाँ उदयराज के सीने से दबी हुई थी, नाभि के ऊपर नाभि थी, बूर के ऊपर लंड कपड़े के ऊपर से ही मानो बूर में धंसा जा रहा था, घुटनों पर घुटने थे और पैर के पंजों को उदयराज के पैर के पंजे छेड़ रहे थे, रजनी पूरी तरह चित लेती अपने बाबू के नीचे थी उसके दोनों हाँथ चबूतरे पर फैले हुए थे उसकी उंगलियों में उदयराज की उंगलियां फंसी हुई थी। कितना नरम स्पॉन्ज की तरह मखमली बदन था रजनी का, कितना गुदाज।

रजनी ने एकाएक जलते दिये को बुझा दिया और अब पूरी तरह अंधेरा छा गया, रजनी अपने और अपने बाबू के तन के मिलन को एक बार रात के अंधेरे में प्रकृति के बीच चुपचाप महसूस करना चाहती थी, उदयराज को भी ये बहुत पसंद आया। अब गुप्प अंधेरा था, हल्की हल्की हवा चल रही थी, पास ही नदी के पानी की बहने की आवाज आ रही थी।

उदयराज ने अपने दोनों हाँथ रजनी की पीठ के नीचे ले जाते हुए उसको कस के बाहों में भर लिया और रजनी ने भी अपने पैर उदयराज की कमर पर क्रॉस बांधते हुए अपनी बाहें उनकी पीठ पर लपेटते हुए उदयराज को बाहों में कस लिया, उदयराज का मुँह रजनी की गर्दन पर कान के पास था, उदयराज ने गर्दन पर चूमते और चाटते हुए कपड़े के ऊपर से ही अपने लंड से अपनी बेटी की अत्यंत प्यासी बूर पर तीन चार कस कस के धक्के मारे, रजनी मुस्कुराते हुए चिहुँक उठी और जोर से सिसकी- आआआआआआआआहहहहहहहह............हहहहहहहाहाहाहाहाहायययययययय..........बाबू

उसका पूरा शरीर धक्कों से हिल जा रहा था, रात के गुप्प अंधेरे में उदयराज अपनी बेटी को उसकी दायीं गर्दन की तरफ, कान पर, कान के नीचे कई गीले चुम्बन करता हुआ, गर्दन पर चूमते हुए बायीं तरफ जाने लगा और फिर बाएं कान की झुमकी, कान पर, कान के नीचे, कई चुम्बन लिए, रजनी मदहोश होकर अपने बाबू के गीले गीले होंठ की छुअन जोर जोर से सिसकते हुए अपने गर्दन के चारों ओर और कान के आस पास महसूस करती रही, जब जब उदयराज अपनी बेटी के कान को और उसके आस पास चूमता और जीभ से चाटता, जीभ रगड़ता तब तब रजनी का पूरा पूरा बदन थरथरा जाता, कभी कभी बीच बीच में उदयराज सूखे धक्के भी मारता तो रजनी हर धक्के पर aaaaahhhhh......aaaaahhhhhhhh करने लगती। रजनी का बदन गरम हो चुका था।

उदयराज रजनी को उसके गाल, नाक, होंठ और लगभग पूरे चेहरे पर ताबड़तोड़ चूमने लगा, रजनी वासना में बेचैन होकर बेताहाशा अपने बाबू को सहलाने लगी, एकाएक रजनी ने सिसकते हुए अपने बाबू के कान में कहा- बाबू, औरत के लिए तरस गए थे न आप।

उदयराज- हाँ मेरी बेटी।

रजनी प्यार से दुलारते हुए अपने बाबू के बालों को सहलाने लगी, फिर उदयराज बोला- तू भी तो एक मर्द के लिए तरसती थी न।

रजनी- मैं बस आपके लिए, अपने बाबू के लिए तरसती थी, एक मजबूत मर्द के लिए और वो सिर्फ मेरे बाबू हैं मेरे बाबू।

उदयराज ने ये सुनकर तीन चार धक्के ऊपर से ही बूर पर मारे और रजनी चिहुँकते हुए हल्का सा हंस दी, उसका बदन पूरा हिल गया।

रजनी ने फिर रात के गुप्प अंधेरे में धीरे से अपने बाबू के कान में बोला- लंड, मोटा सा, लंबा सा लंड।

दरअसल अब वासना इस कदर रजनी पर हावी हो चुकी थी कि उसका गंदी गंदी बातें करने का मन कर रहा था। वो कहते हैं न कि स्त्री की लज़्ज़ा एक सीमा तक होती है उसके बाद वो खुद ही खुलने लगती है। रजनी का अब वही हाल हो चुका था।

उदयराज ये सुनकर पहले तो कुछ देर सोचता रहा की आखिर रजनी ने उसके कान में बड़ी मादकता से ये क्या बोल दिया। तभी रजनी ने दुबारा बोला- आप नही बोलोगे बाबू?

उदयराज- क्या?

राजनी- वही जो मेरे पास है, जिसके लिए आप तरस रहे हो कबसे।

उदयराज समझ गया कि रजनी क्या चाहती है और वो अपने होंठ राजनी के कान पे रखकर बोला- bbbooooooooorrrrrrrrrrrr

रजनी बिल्कुल अपने कान पर अपने बाबू के मुंह से ये सुनकर गनगना गयी और जोर से सिसक उठी कुछ देर बाद फिर बोली- किसकी बूर बाबू?

उदयराज- मेरी अपनी बेटी की bbbbbbooooooorrrrrrrr

राजनी फिर जोर से aaaahhhhhhh करते हुए- सगी बेटी की

उदयराज- हां मेरी सगी बेटी की बूबूबूबूररररर

राजनी धीरे से- चाहिए

उदयराज- हाँ

राजनी- किसलिए?

उदयराज- घच्च घच्च चोदने के लिए, अपना लंड उसमे डालकर अच्छे से चोदने के लिए। अपने लंड की प्यास बुझाने के लिए।

राजनी जोर से सिसकते हुए- अपनी बेटी को चोदोगे, सगी बेटी को, अपनी ही सगी बेटी को।

उदयराज- हाँ, अपनी प्यारी सी सगी बेटी की बूर को लंड से रगड़ रगड़ कर खूब चोदने का मन कर रहा है।

रजनी धीरे से सिसकते हुए- सगी बेटी की बूर चोदने में बहुत मजा आता है न बाबू।

उदयराज- हां मेरी बेटी, सबसे ज्यादा।

रजनी- पत्नी से भी ज्यादा।

उदयराज- हां, पत्नी से भी बहुत ज्यादा।

राजनी aaaaahhhhhhh bbbbbaaaabbbbuuuu - तो चोदो न मेरी बूर को बाबू, अपनी सगी बेटी की बूर को खूब कस कस के चोद दो, बहुत प्यासी है ये, अब रहा नही जाता बाबू, ओह्ह मेरे बाबू, अब अपनी इस बेटी को चोद दो न।

उदयराज ने रजनी की पीठ से अपने दोनों हाथ निकाल कर उसके नितंबों को हथेली में थाम लिया और भारी गुदाज नितम्ब को रगड़ रगड़ कर सहलाने लगा और बोला- हाँ मेरी बेटी मुझसे भी अब नही जा रहा पर पहले मुझे अपनी दहकती बूर का पानी पिला दे।

रजनी समझ गयी कि उसके बाबू मूत पीने की बात कर रहे हैं तो वो ये सोचकर ही सिरह गयी।

उदयराज उठ बैठा और बगल में पड़े दिए को जला दिया और उसमे थोड़ा सा सरसों का तेल और डाल दिया, रजनी का दूधिया बदन एक बार फिर चमक उठा और वो उदयराज को और उदयराज उसको देखते रह गए अभी कुछ देर पहले अंधेरे में जो गंदी बात की थी रजनी ने, अपने बाबू से नज़रें मिलते ही राजनी लजा गयी और उदयराज ने उसके दोनों चूचीयों को हाथों में दबोचते हुए अपनी ओर खींच लिया और रजनी अपने बाबू से लिपट गयी।

कुछ देर दोनों ऐसे ही एक दूसरे को महसूस करते रहे फिर उदयराज मोड़े हुए कुर्ते पर सर रखके लेट गया, रजनी बड़ी ही मादकता से, धीरे से दोनों पैर अपने बाबू के दोनों कंधों के बगल रखते हुए, और अपनी साड़ी को दोनों हांथों से ऊपर उठाते हुए अपनी जाँघों को अच्छे से खोलकर अपने बाबू को अपनी पैंटी दिखाते हुए उनके सीने पर हल्के से बैठ गयी, उदयराज एक टक हल्के दिए कि रोशनी में अपनी बेटी की केले के तने के समान मोटी चिकनी गोरी गोरी दोनों जाँघों और बीच में कसी पैंटी में छुपी उभरी हुई गीली गीली महकती बूर को देखता रह गया, रजनी ने दिया उठाकर और पास रख लिया। काफी देर तक रजनी अपने बाबू को अपनी पैंटी में छिपी बूर और मांसल जाँघों को दिखाती रही फिर एकाएक खड़े होकर साड़ी के अंदर हाथ डालकर अपनी पैंटी को निकाल कर बगल में रख दिया और धीरे से पैर फैलाते हुए साड़ी को ऊपर उठाते हुए अपने बाबू के सीने पर बड़ी मादकता से सिसकते हुए बूर खोले बैठती चली गयी, उदयराज का सर कुल वृक्ष के बिल्कुल तने के पास था और दिया बिल्कुल बगल में था, रजनी अपने बाबू को बड़ी मादकता से देख रही थी और उदयराज रजनी की रिसती बूर को घूर घूर के देख रहा था, फिर रजनी ने अपनी बूर को देखा और अपनी फैली हुई बूर को देखकर खुद ही सिसक उठी। बैठने की वजह से बूर फैल गयी थी, बूर की फांकों के बीच भगनासा साफ चमकने लगा जो कि खिलकर बाहर आ चुका था।

उदयराज अपनी बेटी की नंगी बूर और जाँघों को देखकर बेहाल हो गया, मोटे मोटे रसीले लंबे फांकों और काले काले हल्के बालों के बीच लाल लाल छेद वाली मखमली दहकती बूर, रस टपका रही थी, रजनी ने सिसकते हुए धीरे से आगे बढ़कर अपनी धधकती बूर को अपने बाबू के होंठों पर रख दिया और बड़ी जोर से aaaaaaahhhhhhhhhhh mmeeeerrrreeee bbbaaabbbbuuuu कहकर कराह उठी।

उदयराज ने लप्प से अपनी बेटी की लगभग पूरी बूर को अपने मुंह में भर कर बड़ी कस के चूस लिया, राजनी एकदम से चिहुँक उठी, उसके नितम्ब थरथरा कर हिल गए, पूरा बदन सनसना गया, आंखें नशे में बंद हो गयी, उदयराज पूरी जीभ निकाल निकाल के लप्प लप्प अपनी बेटी की फैली हुई बूर को चाटने लगा, पूरी जीभ को नीचे से ऊपर तक पागलों की तरह बूर पर फिरा फिरा के चाटने लगा, बूर रस और मूत्र की गंध उदयराज के नथुनों से होकर पूरे शरीर के अंदर फैलने लगी, राजनी uuuuuuiiiiiiimmmmmaaaaa.....oooooooooooohhhhhhhh.........iiiiiiiiiiiiiiiissssssssshhhhhhhhhh..........hhhhhhaaaaaaiiiiiiiiiii.....bbbbbaaaaabbbbuuuuuuuuu, aaaiiiseeeee. hhhhhhiiiiiiii...cchhhaaaaatttttooooo,,,,uuuuufffffff....aaaammmmmaaaaaaaaaaa कह कह कर सिसियाने लगी और अपनी दो उंगलियों से अपनी बूर की फांकों को अच्छे से फैला दिए जिससे रजनी की बूर का छोटा सा छेद साफ दिखने लगा, उदयराज अपनी बेटी का वो गुलाबी छोटा सा दहकता छेद देखकर बेकाबू सा हो गया और अपनी जीभ गोल गोल नुकीली बना कर उसमे रख दिया, रजनी जोर से सीत्कारती हुई aaaaaahhhhhhhhhh....hhhhhhhhhhaaaaaaaaaaaaiiiiiiiiiiiiiii.......aaaaammmmmaaaaaaaa कहती हुई अपनी चूतड़ आगे पीछे दाएं बाएं गोल गोल घुमा कर जीभ पर रगड़ने लगी, रजनी ने छः सात धक्के अपनी भारी गांड को हिला हिला कर अपने बाबू की जीभ पर मारे और एकदम से दिया नीचे रखकर अपने बाबू के मुँह पर बैठ गयी, उसने अपने बाबू का सर बहुत प्यार से पकड़कर अपनी फूली हुई कसमसाती बूर पर दबा दिया, उदयराज की जीभ रजनी की बूर के छोटे से छेद में कुछ हद तक घुस गई थी, अंदर से बूर बिल्कुल भट्टी बनी हुई थी, रजनी कुछ देर तक अपनी बूर को हाय हाय करते हुए अपने बाबू की जीभ से अपनी गांड उछाल उछाल के चोदती रही और फिर एकाएक उसने ooooohhhhhhhh bbbaaaabbbbuuuu कहते हुए अपनी दो उंगलियों से बूर की फाँकों को अच्छे से चीरते हुए पेशाब की धार हल्के से छोड़ी और दूसरे हाँथ से फिर दिया उठाकर रोशनी को बढ़ाया, उदयराज ने लप्प से मुँह खोला और राजनी अपने बाबू के मुँह में मूतने लगी, काले काले बालों वाली दहकती बूर की फांकों के बीच से चिरर्रर्रर्रर्रर की आवाज के साथ गरम गरम रजनी का मूत उदयराज के मुँह में जाने लगा, मूतते मूतते वो बीच बीच में अपनी बूर को उदयराज के होंठों से रगड़ दे रही थी जिससे पेशाब उदयराज के गालों और गले पर भी गिर जा रहा था, उदयराज का मुँह रजनी के गर्म पेशाब से भर गया, और वो उसे मदहोश होकर पीने लगा, रजनी ये देखकर पगला सी गयी और लगातार कुछ देर तक अपनी प्यासी बूर अपने बाबू के मुँह पर रगड़ती रगड़ती मूतती रही, उदयराज आंखें बंद किये मदमस्त होकर बूर से निकलता मूत पीता रहा फिर रजनी के बूर से मूत आना रुक गया और उदयराज सारा मूत पी गया उसके बाद उसने अपनी बेटी की बूर पर लगे पेशाब को जीभ से चाट चाट के साफ कर दिया, रजनी मदहोशी में आंखें बंद किये अपनी बूर अपने बाबू से काफी देर चटवाती रही फिर आंखें खोलकर वासना भारी नजरों से अपने बाबू को देखा और मुस्कुरा पड़ी, उदयराज भी मुस्कुरा दिया।

रजनी ने झुककर कान में कहा- बाबू और पीना है।

उदयराज- हाँ, पिला दो न।

रजनी- पर अब तो खत्म, जब फिर आएगा तब

उदयराज- ठीक है मेरी रानी बेटी।

राजनी- पर आपने तो बोला था कि पियूँगा नही, फिर भी पी गए।

उदयराज- मुझे होश ही नही था, क्या चीज़ है मेरी बेटी।

राजनी- गन्दू, पर अब नही पीना, ठीक।

उदयराज - जो आज्ञा मेरी रानी।

रजनी फिर मुस्कुराई और अपने बाबू के पेशाब से सने होंठों को चूम लिया।

उदयराज अब रजनी को पलटकर उसपर चढ़ गया और उसकी साड़ी को खोलकर निकाल दिया, साड़ी को बगल में रखते हुए वो रजनी के सम्पूर्ण बदन को निहारने लगा, रजनी अब मदरजात नंगी हो गयी थी, उसके तन पर अब एक भी वस्त्र नही था, उदयराज उठ खड़ा हुआ और एक झटके में अपनी धोती खोल डाली, फनफनाता हुआ मूसल जैसा दहाड़ता लंड उछलकर रजनी की आंखों के सामने आ गया,

काले काले झांटों के बीच 9 इंच लंबा और करीब 4 इंच मोटा दहाड़ता लंड देखकर रजनी की आंखें चमक गई, दिए कि हल्की रोशनी में भी लंड की उभरी हुई नसें लन्ड की विकरालता को और बढ़ा रही थी, रजनी उसे देखते ही उठ बैठी और अपने बाबू की बालो भारी जाँघे लंड को देख देख कर चूमने और सहलाने लगी, जाँघों पर इधर उधर चूमते हुए वो विकराल लन्ड के करीब पहुँची और बड़े बड़े आंड को मुँह में भर लिया और लोलोपोप की तरह मदहोश होकर चूसने और चाटने लगी, अंडकोषों पर हल्के हल्के बाल थे जिसकी वजह से रजनी और कामातुर हो रही थी, काफी देर तक आंड को चूसने, सहलाने मसलने के बाद उसने लंड पर हाँथ फेरा और पूरे लंड को सहलाते हुए मुठिया दिया।

रजनी ने अपने बाबू के लंड को सहलाते हुए अपने मुँह के सामने सीधा किया और अपने होंठों को गोल करके लंड के सुपाड़े के ऊपर रखकर अपने होंठों से ही लंड की चमड़ी को नीचे सरकाते हुए सुपाड़ा खोलकर मुँह में भर लिया और लबालब चूसने लगी, उदयराज अपनी बेटी के नरम होंठ आने लंड पर पड़ते ही जोर से कराह उठा और सिसकने लगा-

आआआआआआहहहहह..... .मेरी बेटी ऐसे ही.......ऐसे ही चूस........ओओओहहहह.......कितना अच्छा लग रहा है...... .... तेरे नरम नरम होंठ मेरे लंड पर........आआआहहह......चूस मेरी रजनी.... मेरी बेटी......मेरी बच्ची.........चाट चाट के इसकी बरसों की प्यास बुझा दे...........आ आ आह ह ........हाहाहाहाहायययय......तेरी अम्मा ने तो कभी इसको ठीक से चूस ही नही..........तू कितना अच्छा चूस रही है मेरी बेटी...........चाट अपने बाबू का लंड ऐसे ही........ ..बुझा दे मेरी प्यास मेरी बच्ची.......मेरी बिटिया.. ..... आआआहहहहह......हाहाहाहाहायययय.....और मुंह में भर भर के चूस मेरी रानी...चूस.....मेरे लंड की खुशबू अच्छी लगी न......ऐसे ही चूस.....आआआहहहहह।

अपने बाबू के लन्ड की भीनी भीनी महक रजनी की अंतरात्मा तक समाती चली गयी, काम रस की खुशबू और पेशाब की महक रजनी को इतनी भा रही थी कि वो वासना से अब जल उठी और कस कस के अपने बाबू का ज्यादा से ज्यादा लंड अपने मुँह में भर भरकर चूसने चाटने लगी, उदयराज मस्ती में आंखें मूंदे अपनी बेटी का सर पकड़कर अपने लंड पर दबाता रहा और ज्यादा से ज्यादा उसके मुंह में डालता रहा इतनी कोशिश करने के बाद भी रजनी अपने बाबू का आधे से थोड़ा ज्यादा ही लंड अपने मुँह में ले पाई थी। लंड चूसने की चप्प चप्प आवाज सिसकियों के साथ वातावरण में गूंजने लगी, रजनी ने काफी देर मुँह में भर भर के अपने बाबू का दहकता लंड चूसा और फिर पक्क़ से लंड को बाहर निकाला, अपनी जीभ निकालकर लंड के मूत्र छेद पर बड़ी मादकता से रगड़ने लगी फिर जीभ से लन्ड को ऊपर से नीचे तक icecream की तरह चाटने लगी, अपनी बेटी के नरम नरम मुँह में अपना लंड भरकर और जीभ से लन्ड चटवाकर उदयराज त्राहि त्राहि कर उठा।

रजनी भी सिसकते हुए -

आआआआहहहह मेरे बाबू........डालो अपना लंड मेरे मुंह मे.....आज आपकी सारी प्यास बुझा दूंगी....... आपको तड़पता हुआ नही देख सकती आपकी ये बेटी.......आआआआआआहहहह...............हहहहाहाहाहाहाययययय........क्या लंड है आपका.......कितना लंबा और मोटा है मेरे बाबू..........अपने सुपाड़े को मेरे होंठों पर रगड़ो बाबू............अपने लंड से मेरे मुँह को चोदो.......चोदो बाबू

उदयराज अपनी बेटी के आग्रह पर अपना लंड उसके मुँह में जितना भी आ सकता था डालकर अंदर बाहर करके मुँह को हल्का हल्का चोदने लगा, रजनी के सर और बालों को पकड़कर वह सहलाने लगा, रजनी भी आंखें बंद किये पूरा पूरा मुँह खोलकर गपा गप्प लंड मुँह में लेने लगी, मस्ती में उदयराज की आंखें बंद हो गयी, उदयराज के विकराल लंड का खुला हुआ सुपाड़ा रजनी के मुँह में हर जगह ऊपर नीचे अगल बगल टकराने लगा और रजनी मदहोश होती चली जा रही थी, उसने अपने बाबू का 4 इंच मोटा लंड आधे से ज्यादा ही मुँह में भर लिया था उसका मुँह पूरा खुला हुआ था, उदयराज हौले हौले मुँह में लंड लगभग गले तक हाय हाय करता हुआ पेले जा रहा था, लंड की नसें फूलकर और भी उभर गयीं और रजनी को अपने होंठों पर साफ महसूस होने लगी, उसका पूरा लंड अपनी बेटी के थूक से दिए कि हल्की रोशनी में चमक रहा था, उसने अपने लंड को पकड़कर फिर पक्क़ से मुँह से बाहर निकल और रजनी के गालों, माथे और ठोढ़ी तथा होंठों पर खूब रगड़ा, रजनी सिसकते हुए आंखें बंद किये अपने बाबू के गरम थूक से सने लंड को अपने चेहरे के हर हिस्से पर महसूस करती रही और जब लंड होंठो पर आता तो जीभ निकाल के उसे चाट लेती।

एकाएक उदयराज से अब बर्दाशत नही हुआ उसने दिया उठाकर चबूतरे के किनारे रखा और वासना में मदहोश रजनी को चबूतरे के एकदम किनारे अंगौछा बिछा के पैरों को नीचे लटका के लिटाया, रजनी अपने बाबू का इरादा समझ गयी, चबूतरे की ऊंचाई ठीक कमर तक ही थी, उदयराज अब कूदकर चबूतरे से नीचे उतरा और अपनी मदहोश बेटी के पैरों को खोलकर मोटी मोटी जाँघों के बीच आ गया, रजनी ने खुद ही अपने बाबू की इच्छा के अनुसार खुद को सही कर लिया, दिया पास में ही जल रहा था।

उदयराज ने अपनी बेटी की जाँघों को खोलकर उसकी बूर को अच्छे से देखा, दिया ऊपर जांघ की बगल में था इसलिए बूर पर थोड़ा अंधेरा था तो रजनी ने दिया उठा कर बूर के नजदीक कर दिया ताकि उसके बाबू अपनी सगी बेटी की बूर को अच्छे दे देख सकें, उदयराज ने अपनी बेटी के पूरे नग्न बदन को अच्छे से निहारा और फिर जाँघों को फाड़कर प्यासी बूर को मुँह में भरकर चाटने लगा।

रजनी हाहाहाहाहाहाययययययय..........बाबू................ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़..................... ..............आआआआआआहहहहहहहहहह

करने लगी,

रजनी ने दिया बगल में रखकर सिसियाते हुए अपने बाबू के सर को अपनी बूर पर दबाने लगी, रजनी के दोनों पैर हवा में दोनों तरफ फैले हुए थे, उदयराज बड़ी सी जीभ निकाले अपनी बेटी की महकती रस छोड़ती बूर को, उसकी फाँकों को, भग्नासे को लबालब चाटने लगा, रजनी अपने बाबू के बालों को सहलाते हुए हाय हाय करने लगी, उदयराज अपने दोनों हांथों से कभी रजनी की चुचियों और निप्पल को मसलता तो कभी भारी चूतड़ को हथेली में उठाकर थोड़ा और ऊपर कर देता। वो अपनी पूरी जीभ को गांड के छेद पर ले जाता और फिर बूर की फैली हुई दरार में अपनी जीभ को नीचे से ऊपर तक सरसराता हुआ लाता और ऊपर आ के भग्नासे को चूस लेता, राजनी का पूरा बदन वासना में अब कांप रहा था, एकाएक ईश्वर ने उसे इतना सुख दे दिया था कि वो बर्दाश्त नही कर पा रही थी, उससे रहा नही गया तो उसने अपने बाबू के चेहरे को थाम कर ऊपर की ओर खींच लिया और बहुत वासनात्मक आवाज में धीरे से बोली- बाबू अब मुझे चोदिये, बर्दाश्त नही होता अब, चोदिये अपनी रजनी बेटी को, अपनी सगी बेटी को, आपके सगी बेटी वर्षों से आपके लंड की प्यासी है।

रजनी के अपने बाबू को अपने ऊपर खींचने से उदयराज का लंड रजनी की बूर और जाँघों पर टकराने लगा तो रजनी और मचल उठी, उदयराज ने अपनी बेटी के होंठों का एक जोरदार चुम्बन लिया और अपने विकराल हो चुके लंड को पकड़कर पहले तो रजनी की जाँघों और गांड के निचले हिस्से पर और फिर बूर की फाँकों पर बहुत अच्छे से रगड़ा, इतना मोटा लंड अपनी अंदरूनी और बाहरी जाँघों, गांड की दरार और बूर की फांकों पर लोटता हुआ सा महसूस करके रजनी और भी ज्यादा गनगना गयी और सिसकते हुए बूर में लंड मांगने लगी।

उदयराज ने रजनी की बायीं टांग को उठाकर अपने कंधे पर रखा और दायीं टांग को फैलाकर अपने कमर से लपेट दिया और खुद अपना सीधा पैर उठाकर चबूतरे पर रख लिया और रजनी के ऊपर थोड़ा झुकते हुए एक हाँथ से अपने विशाल दहकते लंड को पकड़ा, उसका सुपाड़ा खोलकर चमड़ी को पीछे किया और धीरे से अपनी सगी बेटी की खुली हुई बूर की फांक में चिकने फूले हुए सुपाड़े को लगाया, दहकता हुआ लंड जब दहकती हुई बूर से छुआ तो रजनी की जोरों से aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh

निकल गयी।

उदयराज ने कुछ देर अपने लंड के सुपाड़े को अपनी बेटी की बूर की रिसती फांकों में ऊपर नीचे दाएं बाएं रगड़ता और हल्का हल्का डुबोता रहा, फिर एकाएक उसने लंड के सुपाड़े को अपनी बेटी के दहकते लाल लाल छोटे से छेद पर लगाया, रजनी की बूर का छेद पैरों को काफी फैलाने के बाद भी करीब एक इंच तक ही खुल पाया था, और लन्ड का सुपाड़ा लगभग फूलकर पूरा 3.5 या 4 इंच का हो गया था, इस बात से साफ दिखता था कि एक बच्ची को जन्म देने के बाद भी रजनी बिल्कुल कुँवारी जैसी ही थी, कई वर्षों से उसकी बूर में लन्ड गया ही नही था जिससे उसका छेद और भी संकरी हो गया था, बूर के छोटे से छेद से काम रस लगातार रिस रहा था। लन्ड के दहकते सुपाड़े को अपनी बूर के छेद पर महसूस कर रजनी असीम आनंद में खो गयी।

फिर एकाएक आंखें खोलकर अपने बाबू से उखड़ती आवाज में बोली- बाबू जरा रुको।

उदयराज- क्या हुआ मेरी बेटी?

रजनी- मुझे इसका खाना परोसने दो, आप जब रसोई में आते हो तो मैं आपको खाना परोसती हूँ न?

उदयराज अपनी बेटी को देखता हुआ- हां, बिल्कुल, मेरी प्यारी बिटिया।

रजनी ने बड़ी वासना भरी आवाज में कहा- तो ये आपका प्यारा सा लंड अपना खाना खुद लेके क्यों खायेगा ? पहले मैं परोस दूंगी तब खायेगा।

उदयराज अपनी बेटी की इस अदा को देखता रह गया और अपने लंड को थोड़ा पीछे किया, रजनी ने चूड़ियां खनकाते हुए अपने हाथों को आगे बढ़ाया और अपने दोनों हांथों की उंगलियों से अपनी दहकती बूर की फांकों को अच्छे से चीरकर बूर के लाल लाल छेद को अपने बाबू के सामने परोस दिया और बोली- लो अब खाओ अपनी बेटी की बूर को अपने लंड से बाबू।

उदयराज ने अपनी बेटी की इस अदा से कायल होके दहाड़ते हुए अपने फ़ौलादी लंड के सुपाड़े को बूर के छोटे से छेद से भिड़ा दिया और फिर राजनी ने वहां से आनंद में आंखें बंद करते हुए और कराहते हुए अपने हाथ हटा लिए, बूर की दोनों फांकें grip की तरह लंड के चारों ओर लिपट गयी और उदयराज और रजनी दोनों के ही मुँह से जोर से aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh की सिसकारी निकल गयी।

उदयराज ने बूर पर लन्ड से हल्का सा दबाव बढ़ाया तो रजनी के माथे पर शिकन आ गयी उसे दर्द होना शुरू हुआ, उदयराज ने हल्का सा दबाव और बढ़ाया तो रजनी का सारा आनंद दर्द में बदलने लगा और उसने इशारे से ना में सर को हिलाते हुए अपने बाबू की कमर को वहीं पर थाम लिया, उदयराज मुस्कुराया, वो जानता था कि ऐसा होगा, जानती तो रजनी भी थी, पर क्या करे बिना चुदाई के रह भी नही सकती थी, उदयराज ने लंड को थोड़ा पीछे किया और लन्ड के सुपाड़े को बूर की फांकों की दरार में ऊपर नीचे रगड़ने लगा साथ ही साथ वो बीच बीच में भग्नासे को भी अच्छे से रगड़ने लगा, रजनी को अब फिर असीम आनंद की अनुभूति होने लगी, उदयराज ने झुककर रजनी की चुचियों को पीना और निप्पल को छेड़ना शुरू कर दिया साथ ही साथ अपने लंड को रिसती बूर की फांकों में ऊपर नीचे रगड़ता जा रहा था।

रजनी अब aaaaahhhhhhh, aaaaahhhhhhhhhh..................aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhh करती हुई वासना के महासागर में फिर गोते लगाने लगी, उदयराज ने रजनी का सीधा हाँथ पकड़ा और नीचे लेकर अपने आंड उसकी हथेली में दे दिए, रजनी के हाँथ में आंड आते ही वो आंखें बंद किये सिसकते हुए उन्हें सहलाने लगी, उदयराज ने अपने लंड को बूर की दरार में ऊपर नीचे रगड़ते हुए एक बार फिर बूर की छेद पर लगा दिया और अपनी बेटी की जाँघों को और कस के फैलाया, बूर थोड़ी और खुल गयी, रजनी से रहा नही गया उसने असीम आनंद में आंखें बंद किये अपने हाँथों को चूड़ियां खनकाते हुए अपनी बूर के पास लायी और दोनों हांथों की उंगलियों से बूर की फांकों को दुबारा अच्छे से चीर दिया और पकड़े रही, उसके बाबू का विकराल लंड छेद पर भिड़ा हुआ था।

बूर से लिसलिसा काम रस रिस रहा था जिसने छेद को बहुत चिकना बना दिया था, लंड का फूल हुआ सुपाड़ा उस लिसलिसे रस में भीगकर और भी चिकना हो गया था, उदयराज ने अब हौले हौले बहुत छोटे छोटे धक्के बूर की छेद पर लगाना शुरू किया, रजनी अब बिल्कुल adjust हो गयी थी, वो मस्ती में अपनी आंखें बंद किये अपने हाथों से अपनी बूर की फांकों को फैलाये अपने बाबू के मोटे लंड के छोटे छोटे धक्कों का आनंद ले रही थी कि

तभी

एकाएक उदयराज ने अपनी टांगों को ठीक से सेट करके एक दमदार जोर का धक्का बूर में मारा और मोटा सा दहकता चिंघाड़ता विकराल लंड कमसिन सी प्यारी सी दहकती बूर के संकरी लाल लाल नरम नरम छेद को फाड़ता हुआ लगभग एक चौथाई बूर में घुस गया।

रजनी एकाएक दर्द से सीत्कार उठी, उसके मुँह से uuuuuuuuuuuuuuuiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii. aaaaaaaaammmmmmmaaaaaaaaaaaaaaaa...........hhhhhhhhhhhhaaaaaaaaaaaaiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.......dddddddddddaaaaaaaaiiiiiiiiiiiiiiyyyyyyyyyyaaaaaaaaaaa.......kitna mota hai aapka. mere bbbbbbbbaaaaaaaaaaaaabbbbbbbbuuuuuuuuu

इतनी जोर से निकला कि मानो सृष्टि के रग रग में, प्रकृति के कण कण में उसकी सीत्कार गूंज उठी हो, राजनी ने झट से बूर से हाथ हटाकर अपने बाबू के कमर को रोककर थाम लिया मानो वो डर रही हो कि कहीं वो लगातार दूसरा धक्का न मार दें।

सुनसान अंधेरी रात में बहुत दूर तक रजनी की आवाज गूंजी थी पर उदयराज ने उसके मुँह को अपनी हथेली से नही ढका, क्योंकि वो जानता था कि उसकी बेटी कितना भी जोर जोर से सीत्कारेगी उसकी आवाज गांव वालों तक तो हरगिज़ नही पहुँचेगी।

रजनी हाय हाय करते हुए अपनी जांघे फैलाये अपनी धधकती बूर में लगभग एक चौथाई अपने बाबू का लंड लिए हुए छटपटा रही थी, उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी बूर को अच्छे से चीरकर किसी ने उसमे गरम गरम लोहे का मोटा खूँटा ठोंक दिया हो, इतनी पीड़ा होगी उसे इसका अंदाजा नही था जबकि काम रस छोड़ छोड़ के बूर उसकी काफी चिकनी हो गयी थी, लंड इतना भयंकर भी हो सकता है आज जाके उसको पता चला, लंड का मोटा सुपाड़ा और कुछ भाग पूरा बूर में घुस चुका था, बूर का प्यार सा छेद एकदम किसी रबड़ के छल्ले की तरह फैलकर लंड के चारों तरफ कस चुका था।

उदयराज ने अपने दोनों हांथों से रजनी की जाँघों के ऊपरी और निचले हिस्से को तथा हाँथ नीचे लेजाकर उठी हुई पूरी भारी उन्नत मांसल गांड को अच्छे से बहुत प्यार से काफी देर तक सहलाया फिर अपनी बेटी के ऊपर झुककर उनके गालों, कान के नीचे और कान पर, गर्दन पर काफी देर चूमता रहा, काफी देर गर्दन पर अपनी जीभ फिराता रहा, चूमता रहा फिर उसने होंठों को अपने होंठों में भरकर चूमना और पीना शुरू कर दिया, रजनी को इससे बहुत राहत मिलती गयी, उसकी जोर जोर से निकलती चीख और दर्द भरी सीत्कार धीरे धीरे वसनात्मय सिसकियों और कराह में बदलने लगी फिर उसकी आंखें धीरे धीरे असीम आनंद के नशे में बंद होने लगी।

बूर उसकी अब धीरे धीरे लंड के आकार के हिसाब से खुलने लगी और थोड़ा adjust हुई, काम रस बराबर रिस ही रहा था जिसे चिकनाई बरकरार थी, उदयराज ने उतना ही लंड बूर में घुसेड़े हुए लंड को धीरे धीरे आगे पीछे करना शुरू किया पहले तो रजनी दुबारा दर्द से थरथरा गयी पर कुछ ही पल बाद उसको लंड की हल्की हल्की रगड़ से सुख की अनुभूति होने लगी और वो भी अपने नितम्ब को हल्का हल्का ऊपर को उचकाने लगी, उदयराज अब समझ गया कि यहां तक मामला अब सेट हो चुका है उसने अब ज्यादा देर नही की और लंड से बूर को धीरे धीरे चोदते हुए दो जोरदार धक्के लगातार और मार दिए। इस बार उदयराज का विकराल लंड एकदम से बूर की कई वर्षों से सूनी पड़ी अंदर की मखमली दीवारों को फाड़ता हुआ सीधा बच्चेदानी तक पहुँच गया, रजनी का दर्द के मारे पूरा गदराया बदन ही ऐंठ गया, आंखों से उसके आंसू बह निकले, uuuuuuuuuuiiiiiiiiiiiiiii aaaaaaaaaaaaammmmmmmmmmmmmmmmmaaaaaaaaaaaaaaaa.....mmmmmmaaaarrrrr......ggggaaayyyyiiiiii......mmmmeeeeerrrrreeee...bbbbbaaaaabbbbuuuuuu,,,,,,kitna lamba aur mota hai aapkaaaaa....land.......hhhhaaaaiiiiiii...aaammmmmmmaaaaaaa

बोलते हुए वो पहले तो कुछ देर दर्द से सीत्कारती रही फिर एकाएक उसने अपने बाबू के कमर को थाम लिया। उदयराज रजनी के ऊपर अब पूरी तरह झुक चुका था, लंड बूर में एक तिहाई तक घुस चुका था, बूर चिरचिराकर फट चुकी थी, मोटा सा धधकता फूला हुआ सुपाड़ा रजनी को अपनी बूर की गहराई में आखिरी छोर तक ठोकर मारता हुआ महसूस होने लगा, उसकी कमसिन सी प्यारी सी मखमली फांकों वाली महकती हुई बूर अपने बाबू का लगभग एक तिहाई फ़ौलादी लंड लील चुकी थी, पर दर्द से रजनी का बुरा हाल था, आज पहली बार उसकी बूर फटी थी वो भी उसके सगे पिता के लंड से, उदयराज रजनी के ऊपर पूरी तरह चढ़ चुका था उसका एक पैर अब भी नीचे और दूसरा चबूतरे पर था, रजनी का एक पैर उदयराज के कंधों पर तथा दूसरा उसकी कमर पे कसा हुआ था, उदयराज को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसने अपना लंड किसी गरम मक्ख़न के डिब्बे में पूरा डुबो दिया हो, इतनी नरम बूर थी रजनी की, उसने रजनी के आंसू बड़े प्यार से पोछे और उसको दुबारा सहलाना, चूमना दुलारना चालू कर दिया, काफी देर तक वो रजनी के बदन के एक एक अंग को सहलाता, चूमता और दुलारता रहा, वो उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर बड़े प्यार से काफी देर चूमता रहा, होंठों को चूसता रहा, बड़ी बड़ी मादक मदमस्त चुचियों को काफी देर तक पीता रहा, निप्पल से खेलता रहा, गांड को सहलाता रहा, कभी नाभि को सहलाता तो रजनी हल्का सा चिहुँक भी जाती, अब रजनी का भयंकर दर्द धीरे धीरे कम होने लगा, उसे सुकून मिलने लगा, दुबारा से दर्द अब आनंद में बदलने लगा।

रजनी के मुँह से अब दुबारा हल्की हल्की सिसकारियां निकलने लगी,

आआआआहहहह...बाबू....हाहाहाहाहायययय...मेरी बूर....कितना लंबा है आपका लंड.... बाबू.....कितना मोटा है आपका लंड... ...हाहाहाहाययययययय ....मेरी बूर...फाड़ डाली इसने........कितने अंदर तक घुसा हुआ है.......ओओओओहहहहह...... अम्मा...... हाहाहाहाययययययय.... बाबू.....ईईईईईईईईईशशशशश..................आआआआआआहहहहहहहह

उदयराज और रजनी ने एक दूसरे को बाहों में कस के भर लिया और एक दूसरे की आंखों में बड़े प्यार से देखने लगे फिर मुस्कुरा दिए, रजनी शर्मा गयी और रजनी अपने बाबू के बालों को सहलाने लगी उसका दर्द अब काफी हद तक खत्म हो चुका था, रजनी की बूर का नन्हा सा छेद अब तीन गुना ज्यादा फटकर फैल चुका था और किसी रबड़ के छल्ले की तरह लंड के किनारे किनारे बिल्कुल कसा हुआ था, रजनी ने धीरे से अपने बाबू के कान में कांपते हुए कहा- बाबू आपने तो आज मुझे पूर्ण औरत बना दिया, कितना लंबा और मोटा लंड है आपका, पता है बूर में कितनी अंदर तक घुसा हुआ है। मेरी तो बूर ही फाड़ के रख दी आपने, अपनी सगी बेटी की बूर में कोई इतना मोटा और लम्बा लंड ऐसे पेलता है, हम्म, बोलो, पगलू

उदयराज- मेरी प्यारी बेटी अगर ऐसे नही करता तो ये अंदर कैसे जाता और फिर बिना अंदर डाले मैं तुमको चोद चोद कर तुम्हारी और अपनी बरसों की प्यास कैसे बुझाऊंगा, मेरी बेटी केवल मेरा लंड ही मोटा और लम्बा नही है, तुम्हारी प्यारी सी बूर भी तो कितनी गहरी है।

रजनी शर्मा गयी और अपने बाबू की पीठ कर चिकोटी काटते हुए बोली- आखिर आपकी बेटी की बूर है, अपने बाबू का लंड अच्छे से नही खाएगी तो किसका खाएगी, जितना मर्ज़ी अच्छे से अंदर डालो बाबू अपनी बेटी की बूर में अपना समूचा मोटा लंड।

उदयराज- तुम्हे पता है अभी भी पूरा लंड तुम्हारी बूर में पूरा नही घुसा है अभी थोड़ा बाकी है।

इतना सुनते ही रजनी चौक गयी- क्या?

उदयराज- हम्म, खुद ही देख लो छूकर

रजनी ने तुरंत अपना सीधा हाँथ बूर पर ले जाकर लंड को छुआ तो वाकई में एक चौथाई लंड अभी भी बाहर था और बाकी का लंड बूर में समाया हुआ था, लंड और बूर बुरी तरह धधक रहे थे। रजनी ने वहां से हाँथ हटा कर अपने बाबू के कान में सिसकते हुए कहा- बाबू मुझे पूरा लंड चाहिए चाहे जो भी हो, डालो न पूरा, कब डालोगे, मुझे पूरी तरह एक होना है आपसे।

उदयराज- सच

रजनी- हां बाबू

उदयराज ने पोजीशन संभाला और अपनी बेटी की आंखों में देखते हुए एक बहुत ही जोरदार करारा धक्का मारा, बूर चिरचिरा के और फटी और पूरा का पूरा लंड रजनी की बूर में जड़ तक समा गया, बूर की गहराई में लंड बच्चेदानी

तक तो पहले ही पहुँच चुका था अबकी बार वो सबकुछ ठेलता हुआ दो इंच और अंदर तक समा गया। उदयराज के लंड और रजनी की बूर के ऊपर के काले काले बाल आपस में मिलकर एक हो गए।

रजनी जोर से कराह उठी और अपने बाबू से कस के लिपट गयी, उदयराज के कंधों और पीठ को रजनी ने इस कदर भींचा की उसके नाखून उदयराज की पीठ पर हल्का हल्का चुभ गए, पर फर भी रजनी को इस बार थोड़ा कम ही दर्द हुआ क्योंकि बूर अंदर से भी थोड़ा खुल चुकी थी।

अब उदयराज का 9 इंच लंबा और लगभग 4 इंच मोटा लंड उसकी सगी बेटी की दहकती बूर में जड़ तक समाया हुआ था, बूर की अंदर की मखमली दीवारें लंड से ऐसे चिपकी हुई थी मानो उसे चूम चूम के उसका स्वागत कर रही हों, उदयराज रजनी को फिर से ताबड़तोड़ चूमने लगा और रजनी फिर से सिसकने लगी, उसके हाँथ अपने बाबू की पीठ पर लगातार चलने लगे और अब उसने अपने पैर अपने बाबू के कमर में कैंची की तरह लपेट दिए जिससे रजनी की बूर खुलकर और ऊपर उठ गई, लंड और अच्छे से बूर में समा गया, काफी देर तक यूँ ही सगे बाप बेटी एक दूसरे में समाए एक दूसरे को सिसकते हुए चूमते सहलाते रहे, उदयराज ने तो चुम्बनों की झड़ी लगा दी थी, रजनी तो अपने बाबू के ताबड़तोड़ चुम्बनों से ही गनगना गयी थी। उदयराज का एक पैर जमीन पर और दूसरा चबूतरे पर था। एकाएक रजनी ने अपने बाबू की कमर को सहलाते हुए अपने हांथों को उनके दोनों चूतड़ों पर ले गयी और चूतड़ों को दोनों हांथों से हल्का सा आगे दबा कर अपने बाबू को अब बूर चोदने का इशारा किया।

उदयराज ने काफी देर से बूर में चुपचाप पड़े लंड को हल्का सा ऊपर खींचा और फिर जड़ तक गच्च से अंदर डाल दिया, रजनी सिसिया उठी uuuuuuuuuiiiiiiiiiiiiiiiiiii. bbbbbbaaaaaaaaabbbbbbuuuuuuuu. mmmmaaaaarrrrrrrr. gggaaaayyyyiiiiiii

उदयराज फिर धीरे धीरे ऐसा ही करते हुए अपनी बेटी की बूर को हल्का हल्का चोदने लगा, शुरू शुरू में रजनी को एक बार फिर से हल्का सा दर्द जरूर हुआ था पर वो दर्द मीठा मीठा था और अब जो दर्द हो भी रहा था उसमें हल्की सी मिठास थी। धीरे धीरे उदयराज ने अपनी बेटी की बूर में घुसे अपने लंड की रफ्तार को थोड़ा बढ़ाया और अब वो रजनी के लबों को चूमते हुए लगभग अपने आधे लंड को बूर से बाहर निकालने लगा और बार बार अच्छे से गच्च से जड़ तक घुसेड़ने लगा, धीरे धीरे रजनी जन्नत में जाने लगी उसकी आंखें अपने पिता की चुदाई के सुख से बंद हो चुकी थी, उदयराज अब अपनी सगी बेटी की बूर में अपना आधा लंड निकाल निकाल कर बार बार जड़ तक घुसेड़ने लगा, रजनी oooooooohhhhhhhhh. bbbbbaaaabbuuuuuuu. ccchhhooodddooo. mmmuuuujjhhheeeeeee........aaaaiiissseeeee.....hhhiiiiiiiii.......hhhhhaaaaayyyyyyy.....ddddaaaiiiiiiyyyyyaaaa.......kkkkiiiitttnnnnaaa...accchhhcchhhaaa....laaaagggg....rrraaahhhaaaaa..hhhhaaaaiiiii babu

कहते हुए मचलने लगी, उदयराज चुदाई के साथ साथ अपनी बेटी की चुचियों का भी जमकर मर्दन करता जा रहा था और झुक झुक कर होंठों को भी चूस ले रहा था।

जब उदयराज अपने दहाड़ते लंड को रजनी की बूर में घच्च से घुसेड़ता तो उसके दोनों आंड उछलकर रजनी को अपनी गांड पर टकराते तो रजनी और नशे में डूब जाती, करीब 20 मिनट तक ऐसे ही अपनी बेटी की बूर चोदने के बाद उदयराज ने अब और अपनी स्पीड बढ़ा दी और अब खुद उसकी आंखें नशे में बंद होने लगी, जितना उसने कभी सोचा था उससे कई गुना ज्यादा अपनी ही सगी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर को चोदने में मजा आ रहा था, अपनी सगी बेटी को चोदने में सच में कितना मजा आता है ये उदयराज को आज बखूबी महसूस हो रहा था, रजनी भी धीरे धीरे अपनी गांड ऊपर को उछाल उछाल कर अपने बाबू के ताल से ताल मिलाते हुए सोचने लगी कि सच में सगे पिता से चुदवाने में कितना असीम आनंद है, जब पिता का लंड अपनी ही सगी बेटी की बूर में जाता है तो कितना अच्छा लगता है, पिता के साथ चुदाई का जो मजा है वो किसी के साथ नही, हर बेटी को अपना खजाना कभी न कभी चुपके से अपने पिता के लिए खोलना चाहिए, कोई भी पिता कभी भी अपने कदम खुद तो आगे बढ़ाएंगे नही, तो बेटी को ही उनकी प्यास को समझ कर, उनके अनकहे दर्द को समझ कर चुपके चुपके उन्हे योनि का सुख देना चाहिए, अपनी बेटी को तो वो पाल पोसकर, जिंदगी का हर सुख देकर, बचपन से लेकर जवानी तक जबतक उसकी शादी नही हो जाती उसकी सारी जरूरतों को पूरा करते हुए एक दिन शादी करके उसे बिदा कर देता है, ये सब समाज के नियम निभाते निभाते वो उम्रदराज होने लगता है और उसकी पत्नी भी तब तक बूढ़ी सी ही हो चुकी होती है, तब ऐसे में जब उसे ठीक से योनि सुख नही मिलता तो उसका जीवन नीरस होने लगता है, समाज के डर से वो किसी से कुछ कह नही सकता, बस घुट घुट के जीता है तब ऐसे में बेटी को अपने पिता को जवान बूर का सुख देना चाहिए, ये भी तो एक तरह की सेवा ही है, इस छोटी से सेवा से पिता जीवन फिर से रंगीन हो जाएगा और वो कहीं इधर उधर बहकेगा भी नही, और पिता के साथ तो चुपके चुपके यौनसुख लेने में मजा ही मजा है, कितना असीम आनंद है इस मिलन में।

यही सब सोचते हुए रजनी अपनी गांड हल्का हल्का ऊपर को उछाल उछाल कर अपने बाबू से चुदवाने लगी।

उदयराज ने अब अपने धक्कों की रफ्तार और तेज कर दी उसने अपने हांथों से रजनी के भारी मांसल नितम्ब को थाम लिया और लगभग आधे से ज्यादा लंड बूर से निकाल निकाल कर गच्च गच्च अपनी बेटी की बूर में पेलने लगा, रजनी का अब पूरा शरीर धक्कों से हिल जा रहा था, बूर बिल्कुल खुलती जा रही थी पर छेद का कसाव बरकरार था बस बूर का छेद फैल जरूर गया था पर कसाव इतना था कि उदयराज को अपना पूरा लंड बाहर खिंचने में काफी कसाव महसूस हो रहा था और इस बात से वो और उत्तेजित होता जा रहा था, वो जानता था कि एक तरह से वो कुँवारी बूर ही चोद रहा है और कुँवारी बूर इतनी जल्दी ढीली नही होती, रजनी aaaaaahhhhhhh, uuuuiiiiii aaammmmaa, oooohhhhhhhh iiiisssssssss बाबू ऐसे ही चोदो कहते हुए गांड उछाल उछाल के अपने बाबू का चुदाई में साथ दिए जा रही थी।

एकाएक उदयराज ने जोर से कराहते हुए अपना पूरा पूरा लंड बूर से निकालकर अपनी बेटी की बूर में जड़ तक पुरा पूरा पेलना शुरू कर दिया, रजनी बड़ी तेज से सिसकने लगी ओओओओओओहहहहहहह..........बाबू.........आआआआहहहहहहह..........हाय दैय्या.......मेरी बूर.....फाड़ो.....बाबू......ऐसे ही......चोदो.......हाहाहाहाहाहायययययययय.......कितना.....मजा.....आ रहा है........कितना मजा है चुदाई में।

रजनी ने बड़ी मुश्किल से अपनी मदहोश आंखें खोलकर जलते दिए को अब बुझा ही दिया, क्योंकि दिए कि रोशनी थोड़ी आंख में लग रही थी और अब वो प्रकृति के बीच खुलकर अंधेरी गुप्प रात में अपने सगे पिता के साथ मिलकर इस महापाप का मजा गांड उछाल उछाल कर लेना चाहती थी।

दिया बुझते ही उदयराज और जोश में आ गया और वो अच्छे से पोजीशन संभालकर अपनी गांड को दनादन उछालते हुए अपनी पूरी ताकत से अपनी बेटी की बूर में अपना पूरा पूरा लंड डालकर उसको चोदने लगा, रजनी अपने बाबू का लंड एक बार पूरा पूरा बाहर जाते हुए महसूस करती फिर सट्ट से जड़ तक लंड को बूर में समाते हुए महसूस करती, लगातार अपने बाबू के हाहाकारी लंड का पूरा दहकती बूर में आवागमन रजनी को गनगना दे रहा था, जब जब बूर की गहराई के आखिरी छोर पर उसके बाबू का लंड टकराता, रजनी आनंद में सीत्कार उठती, दर्द न जाने कहाँ छू मंतर हो चुका था अब तो बस चारों तरफ कामसुख ही कामसुख फैल चुका था राजनी लगातार आनंद में सिस्कारे जा रही थी-

ऊऊऊऊऊऊऊईईईईईईईईई.....माँ........... ओओओओओफ़फ़फ़फ़फ़फ़फ़फ़.......बाबू......कस कस के ऐसे ही चोदो मुझे...........बहुत प्यासी हूँ.............. आपके लंड के लिए मेरी बूर तड़प रही थी...................................आआआआआ हहहहहहहहह.............बाबू.........मेरे राजा..

उदयराज अब काफी तेज तेज लंबे लंबे धक्के मारकर अपनी बेटी की बूर चोदने लगा, जब लन्ड सट्ट से अंदर जाता तो उदयराज के झांट के बाल फैली हुई बूर की फाँकों के बीच उभरे हुए भग्नासे से टकराते तो रजनी का शरीर बार बार उत्तेजना में और भी थरथरा जाता, अत्यंत उत्तेजना में बूर का भगनासा फूलकर खिल गया था और बिल्कुल बाहर आ चुका था, रजनी जोर जोर से सिसकारने लगी और गुप्प अंधेरे में उदयराज अपनी बेटी की बूर पूरी ताकत से घचाघच चोदने लगा, लंड और बूर काम रस से इतने सराबोर हो चुके थे कि चुदाई की फच्च फच्च, घच्च घच्च की मीठी आवाज और रजनी

का पूरा बदन हिलने से चूड़ियों की खन खन आवाज आस पास के वातावरण में गूंजने लगी, उदयराज कभी कभी सीधा सीधा लन्ड अपनी बेटी की बूर में पेलता तो कभी हल्का टेढ़ा करके side की मखमली दीवारों से सुपाड़े को रगड़ता हुआ गहराई में जड़ तज उतार देता, कभी कभी जोर जोर चोदते हुए अपनी गांड को गोल गोल घुमा के लंड को अपनी बेटी की बूर में डालकर गोलगोल घुमाता, रजनी इससे मचल मचल के कराह उठती और खुद भी अपनी गांड उछाल उछाल के अपने बाबू से चुदवाती, रजनी बराबर अपनी गांड उछाल उछाल के अपने बाबू की चुदाई की ताल से ताल मिला रही थी।

उदयराज चोदते चोदते बूर के मखमली अहसास से नशे में चूर होता जा रहा था उसके और रजनी के मुँह से बराबर सिसकियां निकल रही थी, उदयराज एकाएक और तेज तेज अपनी बेटी की बूर में लंड पेलने लगा, ताबड़तोड़ धक्कों से राजनी मानो खुले आसमान में उड़ने लगी, उसका बदन बीच बीच में थरथरा जा रहा था, एकाएक धुँवाधार चोदते हुए उदयराज ने रजनी के कान के नीचे गर्दन पर जीभ फिराना चालू कर दिया, रजनी के बदन में मानों सारी नसें झनझना गयी, वासना की तरंगें पूरे बदन में लगातार दौड़ रही थी, उदयराज घचाघच रजनी की बूर बहुत तेज तेज चोदे जा रहा था, आस पास के वातावरण में बाप बेटी की चुदाई की सिसकियां, चूडियों की खन खन और सीत्कार तथा लंड और बूर के मिलन की फच्च फच्च, घच्च घच्च की आवाज लगातार गूंजे जा रही थी, उदयराज की जाँघे धक्के मारते हुए रजनी के चूतड़ से टकराने से थप्प थप्प की आवाज भी गूंज रही थी। उदयराज ने अपने दोनों हांथों से रजनी के दोनों भारी नितम्ब थाम लिया और हल्का सा ऊपर को उठा लिया अब उसने अपनी बेटी की ताबड़तोड़ चुदाई शुरू कर दी, रजनी का पूरा बदन उसके बाबू के जोरदार धक्कों से आगे पीछे हिल रहा था, उसकी दोनों विशाल उन्नत फूली हुई शख्त चूचीयाँ तेज धक्कों की ताल से ताल मिला कर हिल रही थी, रजनी बदहवास सी जोर जोर सिसकारते हुए वासना से तरबतर होकर नशे में - हाय बाबू....ओह मेरे राजा....चोदो ऐसे ही........आआह....मेरी बूर.....ओओह...मेरे सैयां...मेरे साजन.......मेरे बलमा........मेरे बाबू.....फाड़ो मेरी बूर......अपनी... बेटी की बूर को और तेज तेज चोदो बाबू.....आआआहहहहह............क्या लंड है आपका.......कितना मोटा है........कितना मजा आ रहा है........चोद डालो आज......... .फाड़ डालो बूर को.......अपनी सगी बेटी की बूर को.......आआआआहहहहहहहह........... हाहाहाहाहाययययययय।

उदयराज अपनी बेटी के मुँह से पहली बार ऐसी कामुक सीत्कार सुन रहा था और सुनकर पूरी तरह मस्ती में भरता जा रहा था, अपने धक्कों की रफ्तार उसने इतनी बढ़ा दी थी कि अब जोर जोर से चुदाई की फचा फच्च, फच्च फच्च, घच्च घच्च आवाज आने लगी, रजनी की बूर रस छोड़ छोड़ के इतनी चिकनी हो गयी थी कि 9 इंच लंबा मोटा लंड तेजी से पूरा का पूरा अंदर बाहर हो रहा था, अपनी बेटी की बूर के काम रस में सना हुआ उदयराज का लंड चमक रहा था, रजनी की बूर का रिसता रस पी पी के लंड की नसें बहुत उभर चुकी थी और जब सट्ट से लंड बूर में जाता और बूर के अंदर दी दीवार लंड पर उभरी हुई नसों से सरसरा कर रगड़ खाती तो रजनी के मुँह से बड़ी तेज सिसकारी निकल जाती।

दिया बुझ जाने की वजह से अँधेरा था और दोनों सगे बाप बेटी अंधेरे में एक दूसरे को बाहों में जकड़े हुमच हुमच कर जोरदार ताबड़तोड़ धक्के लगाते हुए, सिसकारते हुए वासना में लीन एक दूसरे को चोद रहे थे। उदयराज भी बदहवासी में अपनी बेटी को चोदते हुए उसके कान में बस बोले जा रहा था-

ओओओहहहह....मेरी बेटी.....तुझे चोदने में कितना मजा आ रहा है.........कितनी मक्ख़न जैसी बूर है तेरी..........कितनी....नरम है बूर तेरी.....आआआआआआहहहहहहहहह...........................ओओओओओओओओहहहह हहहहहहह..........और कितनी गहरी है...बूर......तेरी......हहहहहहहाहाहाहाहायययययययययय......मेरी सजनी......मेरी...जान......मेरी....रानी........आआआआहहहह........मेरी बच्ची.....मेरी बेटी.....कैसे गच्च गच्च मेरा लंड तेरी बूर में जा रहा है.........हहहहहाहाहाहायययययय।

करीब 30 35 मिनट तक उदयराज रजनी की बूर को ताबड़तोड़ इसी लय के साथ जोर जोर धक्के मारकर चोदता रहा, लंड और बूर की लगातार रगड़ से तो मानो चिंगारियां निकल रही थी, दोनों इतने गरम हो चुके थे कि इसकी कोई सीमा नही थी, उदयराज और रजनी मदरजात नग्न थे, ठंडी हवा भी चल रही थी फिर भी पसीने पसीने होने लगे, एकाएक रजनी के पूरे बदन में चींटियां सी रेंगने लगी और मानो वो चींटियां धीरे धीरे चलती हुई बूर की तरफ जाने लगी, पूरी देह में सनसनाहट होने लगी, चुदाई के आनंद की मस्त तरंगे पूरे बदन में लगातार दौड़ रही थी, लंड गचा गच्च बूर में पूरा पूरा अंदर बाहर हो रहा था, उदयराज ने बरसों से बूर नही चोदी थी और आज उसे बूर मिली भी तो अपनी ही सगी बेटी की, तो वो कहाँ रुकने वाला था, लंबे लंबे धक्के वो पूर्ण रूप से खुल चुकी अपनी बेटी की बूर में जड़ तक लंड पेल पेल कर मारे जा रहा था, बीच में कभी कभी रुकता और अपने पैरों से जमीन में टेक लगाकर पूरी ताकत से लंड को बूर में जड़ तक घुसेड़ कर कुछ देर रुका रहता फिर अपनी गांड को गोल गोल घुमा कर बूर के हर कोने में लंड के सुपाड़े से ठोकर मारता, इसपर रजनी बदहवास ही आंखें बंद कर जोर जोर से सीत्कार करती हुई अपने पूरे बदन को ऊपर की तरफ धनुष की तरह मोड़ देती और हाय हाय करते हुए अपने बाबू की पीठ को इतनी कस के दबोचती की अपने नाखून अपने बाबू की पीठ में गड़ा देती, वो धुवांधार चुदाई से इतनी पागल हो गयी थी कि उसने कामांध होकर अपने बाबू के कंधे, कान, गाल, गर्दन और होंठों को कस कस के चूमना और दांतों से काटना शुरू कर दिया, उदयराज जोर से सिसक उठता था पर और उत्तेजित होकर और जोर जोर से रजनी की गांड को हाथों में उठा उठा के गच्च गच्च बूर चोदने लगता,

रजनी खुद अपने होंठों को भी अपने दांतों से चबा ले रही थी, लगातार ताबड़तोड़ चुदाई से रजनी की बूर में अत्यंत गर्मी होने लगी, बूर में उसकी चींटियां सी रेंगने लगी, बूर की अंदर की दीवारें लगातार लंड के रगड़ से तृप्त हो रही थी और उनके अंदर झनझनाहट होने लगी, उदयराज को अपनी बेटी को चोदते हुए लगभग 40 मिनट हो गए थे, लंड और बूर की घनघोर चुदाई और रगड़ से निकल रहा कामरस रिस रिस कर चबूतरे पर गिरने लगा।

अब उदयराज के बदन में भी मुलायम मुलायम बूर की रगड़ के अहसास से असीम आनंद की तरंगें उठने लगी, शरीर उदयराज का भी अब चुदाई के असीम सुख से झनझनाने लगा, एकाएक रजनी ने तेज तेज कराहते हुए अपने हाथ बढ़ाकर अपने बाबू की उछलती हुई गांड को थाम लिया और अपने हांथों से गांड को और दबाने लगी।

कि तभी

रजनी की बूर में तेज सनसनाहट हुई और वो एकदम से जोर से चीखते हुए अपने बाबू से प्रगाढ़ आलिंगन करके लिपट गयी, अपने बाबू के बदन से कस के लिपटे हुए, उनके गालों को

चीखकर काटते हुए अपनी गांड को जोर से ऊपर की ओर उछालकर लंड को कस कर बूर में भरते और चीखते हुए चरम सुख प्राप्त कर झड़ने लगी,

आआआआआआआआआहहहहहहहहहहहह..........बाबू.......मैं.......गयी..........हहहह हहहाहाहाहाययययययययययय अम्मा.......ओह...... दैय्या.........मैं.......झड़ी....... बाबू चोदो मुझे और कस कस के चोदो...............फाड़ो अपनी बेटी की बूर..................मैं......झड़...... रही......हूँ..................... हाय......... मेरी......बूर,,,,,,,ओओओओओफ़फ़फ़फ़फ़......बाबू.................हाय आपका लंड।

उसकी वर्षों की प्यासी बूर से मानो आज पहली बार गरम गरम लावा फूटकर झटके के साथ बह बह कर निकलने लगा, उसकी बूर बहुत तेजी से अपने बाबू का लंड लीले सिकुड़ने और फैलने लगी, उदयराज अपने मूसल जैसा लंड अपनी बेटी की बूर में ताबड़तोड़ पेलता रहा और अपनी बेटी को कस कस के गालों, गर्दन, होंठों और कान के पास चूमता रहा, चूचीयों को हल्का हल्का मर्दन करता रहा, अपनी रजनी को बड़े प्यार से दुलारता रहा, उसको देखता रहा, रजनी अपनी आंखें बंद किये थरथरा कर झड़ रही थी, झटके ले लेकर उसकी बूर सिकुड़ और फैल रही थी, जो कि उदयराज को साफ महसूस हो रहा था, चरम सुख का अहसास आज रजनी को जीवन में पहली बार अपने ही सगे पिता के दमदार लंड की रगड़ रगड़ कर चुदाई से मिला था। वो हांफते हुए थरथरा थरथरा कर अपनी बूर को लंड पर पटक पटक कर झटके खाते हुए झड़ रही थी, सांसे उसकी धौकनी की तरह चल रही थी, काफी देर तक झड़ने के बाद अपना सारा गरम गरम रस बूर से निकालने के बाद उसकी बूर अब धीरे धीरे शांत होना शुरू हुई, रजनी की दहकती बूर से निकला गरम गरम रस उदयराज के दोनों आंड, जो कि राजनी की बूर में मानो घुसने को तैयार थे, से बहकर लगने लगा और उदयराज की जाँघे, झांट, और आंड तथा आस पास का हिस्सा रजनी की बूर से निकले गरम गरम रस से भीग गया। रजनी की आंखें असीम चरमसुख प्राप्त कर मस्ती में बंद हो चुकी थी, उदयराज थोड़ी देर के लिए रुका, रजनी उससे अमरबेल की तरह लिपटी उसके पीठ को सहलाते हुए आंखें बंद किये हल्का हल्का मुस्कुरा रही थी, लंड का आवा गमन बहुत हल्के हल्के बूर में हो रहा था, रजनी ने कुछ पल बाद अपनी आंखें खोली और अपने बाबू से और कस के लिपटते हुए उन्हें चूमने लगी मानो अपने बाबू को दुलारकर इनाम दे रही हो और इनाम दे भी क्यों न, चुदाई में ऐसा चरम सुख उसे आजतक नही मिला था, पूर्ण तृप्त हो चुकी थी वो, आज उसके बाबू ने उसे अच्छे से रगड़ रगड़ कर चोदकर औरत बना दिया था, एक कमसिन कली से वो आज औरत बनी थी, यही इनाम वो अपने बाबू को चूम चूमकर देने लगी कि तभी उदयराज ने फिर से अपने धक्कों की रफ्तार बढ़ा दी, रजनी कुछ देर में फिर सिसकने लगी, उदयराज फिर से एक बार दहाड़ते हुए कस कस के अपनी बेटी की बूर में गचा गच्च जोरदार धक्के लगाने लगा, रजनी के एक बार झड़ जाने की वजह से बूर बिल्कुल चिकनी हो चुकी थी।

उदयराज का लंड रजनी की बूर के रस से बिल्कुल सराबोर हो गया था और अत्यंत तेज धक्कों से बहुत तेज तेज बूर चोदने की फच्च फच्च आवाज वातावरण में गूंजने लगी, रजनी को दुबारा खुमारी चढ़ने लगी, वो एक बार फिर से अपनी गांड उछाल उछाल के अपने बाबू को चूमते हुए साथ देने लगी, लंड बूर में सटासट फच्च फच्च की तेज आवाज के साथ अंदर बाहर हो रहा था।

करीब 40 45 जोरदार धक्कों के बाद उदयराज से अब रहा नही गया और उसने भी चिंघाड़ते हुए अपनी बेटी की बूर में एक अत्यंत जोरदार धक्का मारा, रजनी का पूरा बदन हिल गया और उसके मुँह से बड़ी तेज आआआआआआआहहहहहहहहहहह की आवाज निकली

और उदयराज थरथराकर अपनी बेटी की बूर में दहाड़ते हुए झड़ने लगा

आआआआआआआहहहहहहहहहहह...........बेटी..........मैं झड़ रहा हूँ...............हाय तेरी मुलायम मुलायम बूर...........मेरी बच्ची.........मेरी बेटी.........मेरी बिटिया.........मेरी रानी..............आआआआआआआहहहहहहहहहहह.............हहहाहाहाहाययययययययययय............कितना मजा है तेरी बूर में...........मेरी रजनी................हहहाहाहाहाययययययययययय...........आआआआआआआहहहहहहहहहहह...........अब तू मेरी है सिर्फ मेरी.............तेरी बूर के बिना अब नही रह सकता..............आआआआआआआहहहहहहहहहहह

बरसों से उसके अण्डकोषों में जमा गाढ़ा गरम गरम वीर्य दनदना कर पिचकारी की धार छोड़ते हुए रजनी की बूर की गहराई में झटके खा खा कर गिरने लगा और अपने बाबू के लंड से पिचकारी की तरह निकली वीर्य की गरम गरम धार को अपने बच्चेदानी के मुँह पर तेज तेज पड़ते ही रजनी भी दुबारा गनगना के हाय हाय करके झड़ने लगी, उसके बूर से भी रस की पिचकारी छूट पड़ी,लंड जड़ तक बूर में समाया हुआ था, रजनी की बूर कस कस के सिकुड़ और फैल रही थी, स्पंदन कर रही थी, रजनी बेताहाशा अपने बाबू को चूमते हुए उनसे लिपटकर झड़ रही थी। रजनी जोर से मादक सिसकारी लेते हुए आआआआआआआहहहहहहहहहहह.......बाबू..........कितना मजा आ रहा है...........मैं तो दुबारा झड़ गयी आपके लंड से...........आआआआआआआहहहहहहहहहहह............अपने बाबू के लंड का गरम गरम वीर्य अपनी बूर की गहराई में पाकर मैं तो गनगना कर दुबारा झड़ गयी बाबू....................हाय आपका लंड..............आआआआआआआहहहहहहहहहहह

उदयराज का बदन गनगना गया, विकराल 9 इंच लंबा लंड पूरा बूर में धसा हुआ झटके खा खा के मोटी वीर्य की गरम गरम धार रजनी की बूर में छोड़ रहा था, रजनी की बूर अपने बाबू के गर्म वीर्य से लबालब भर गई और वीर्य बाहर निकलकर रजनी की बूर के नीचे से बहता हुआ गांड की दरार में जाता हुआ रजनी को बखूबी महसूस होता गया, वीर्य इतना गाढ़ा और गर्म था कि रजनी गनगना गयी, उस वीर्य में रजनी की बूर का रस भी मिला हुआ था, बूर रस और वीर्य की मिश्रित एक धार रजनी की गांड से बहकर नीचे चबूतरे पर आ गयी और बहकर नीचे जमीन तक गयी। काफी देर तक उदयराज आंखें बंद किये हाँफता हुआ अपना लंड बेटी की बूर में जड़ तक घुसेड़े झटके ले लेकर झाड़ता रहा और फिर हाँफते हुए अपनी बेटी पर ढेर हो गया, रजनी ने मदहोशी में अपने बाबू को बाहों में कस लिया और बेताहाशा चूमने लगी, बालों को सहलाने लगी, दुलारने लगी, लंड अब थोड़ा शिथिल पड़ गया पर अब भी बूर में लगभग आधा समाया हुआ था, उदयराज ने अपना एक पैर जो चबूतरे पर था अब नीचे कर लिया था, रजनी ने अपने दोनों पैर अपने बाबू की कमर में क्रोस किये हुए थे, उदयराज अब रजनी के बदन पर पूरा चढ़ते हुए चबूतरे पर चढ़ गया, रजनी ने अपने पैर कमर से उतार लिए और चबूतरे पर फैला दिए, रजनी ने अपने बाबू को बाहों में कस लिया और अपने ऊपर पूरी तरह चढ़ा लिया, अपने बाबू की पीठ, कमर और सर के बालों को वो उनके गाल चूमती हुई बड़े प्यार से दुलार दुलार कर सहलाने लगी। लंड बूर में पड़ा पड़ा आराम करने लगा और बूर उसको धीरे धीरे संकुचित होकर चूम चूम के शाबाशी देती रही।

रजनी की बूर भी काफी देर तक संकुचित होने के बाद हल्की हल्की शांत होने लगी, दोनों बाप बेटी एक जोरदार चुदाई का आनंद लेकर चरम सुख की प्राप्ति के आनंद को आंखें बंद किये एक दूसरे की बाहों में पड़े महसूस करने लगे

(चुदाई अभी ख़त्म नही हुई, बाकी का अगले अपडेट में)
 
Update- 40

दोनों बाप बेटी कुछ देर तक अपनी उखड़ती सांसों को काबू करते हुए, एक दूसरे के तन को एक बार अच्छे से भोगकर उससे प्राप्त हुई असीम सुख की गहराई में एक दूसरे को बाहों में भरे आंखें बंद किये लेटे रहे, दोनों ही पूर्ण नग्न कुल वृक्ष के चबूतरे पर पड़े हुए थे।

रात के करीब 1:30 हो चुके थे, चारो तरफ गुप्प अंधेरा था, रात में कई तरह के कीड़ों की बोलने की आवाज अब आ रही थी क्योंकि अभी चुदाई की सिसकियां बंद थी, थोड़ी दूर नदी में बह रहे पानी की कलकल आवाज सुनाई दे रही थी।

उदयराज का लंड रजनी की बूर में बूर रस और वीर्य से सना अब भी घुसा हुआ था, उदयराज ने आंखें खोली और अंधेरे में अपनी रजनी बेटी के कान में फुसफुसाके बोला- मजा आया मेरी जान, मेरी बेटी।

अपने बाबू के मुँह से अपने लिए जान शब्द सुनकर रजनी हल्के से सिसकी और धीरे से कान में बोली- बहुत मेरी जान, मेरे बाबू।

उदयराज भी अपनी बेटी के मुँह से जान शब्द सुनकर गुदगुदा सा गया और उसका बूर के अंदर पड़ा थोड़ा सुस्त लंड फिर फूलने लगा।

रजनी को अपने बाबू का फूलता और बड़ा होता लंड अपनी बूर में अच्छे से महसूस हो रहा था।

उदयराज ने रजनी के कान में कहा- मेरी बेटी, मेरी जान, तेरी बूर बहुत मखमली है, ऐसा लग रहा है कि मेरा लन्ड गरम मक्ख़न के डिब्बे में डूबा हुआ है।

रजनी सिसकते हुए- हाय बाबू, ये मेरी मक्ख़न जैसी बूर अब सिर्फ आपकी है, जितना जी भरके खाना है खाइए और आपका लंड, इससे तो मैं तृप्त हो गयी, कितना मोटा और लम्बा है ये।

ऐसा कहते हुए रजनी ने अपनी गांड हल्का सा उछाल के लंड को बूर के अंदर और भर लिया, लंड अब धीरे धीरे फूलता ही जा रहा था, और बूर में फूलता और बड़ा होता लंड रजनी को फिर रोमांचित कर वासना को जगा रहा था।

उदयराज ने धीरे से लंड से बूर में एक गच्चा मारते हुए कान में फिर बोला- मेरी बेटी की बूर की प्यास बुझी?

रजनी शर्मा गई पर चुप रही

उदयराज ने फिर मादक अंदाज में एक और हल्का गच्चा मारते हुए पूछा।

रजनी बहुत धीरे से कामुक आवाज में- नही....... नही मेरे बाबू। इतनी जल्दी कैसे बुझेगी?

ये सुनते ही उदयराज वासना से भर गया और बोला- और चाहिए?

रजनी- हूँ

उदयराज- क्या और चाहिए?

रजनी अपने बाबू के कान में- आपका लंड, मेरे बाबू का लंड।

उदयराज ने जैसे ही एक दो धक्के हल्के हल्के लगाये रजनी ने बड़े प्यार से उनकी कमर पर हाथ रखकर रोका और बोली- बाबू...अब यहाँ नही।

उदयराज- यहां नही तो फिर कहाँ मेरी रानी बेटी।

रजनी- अपने खेत में खुले आसमान के नीचे।

उदयराज ने ये सुनते ही रजनी के गालों और होंठों पर कई चुम्बन लिए और बोला- अपने खेत की मिट्टी में लेटकर असली कील थोकूँ।

रजनी सिसकते हुए- हां बाबू, अपनी बेटी को वही ले चलकर प्यार करो।

ये सारी बातें बाप बेटी अंधेरे में ही कर रहे थे, उदयराज फिर मुस्कुराते हुए अपनी बेटी के ऊपर से उठा, फूली हुई महकती चिकनाहट से भरी बूर में लंड एक बार फिर से जड़ तक समा चुका था, उदयराज ने लंड को बूर से बाहर खींचा लंड पक्क़ की आवाज करते हुए बूर से बाहर आ गया पर जोश में झटके मारे जा रहा था, जैसे ही लन्ड कसी हुई बूर से बाहर निकला, रजनी की आआआआआहहहहहह की हल्की सी आवाज निकल गयी।

उदयराज चबूतरे से नीचे उतरा, उसका सुपाड़ा खुला लंड इधर उधर हिल रहा था, लंड अपना विकराल रूप धारण कर चुका था, जैसे ही उदयराज ने अपने खेत की मिट्टी में खुले आसमान के नीचे अपनी सगी बेटी की चुदाई के बारे में सोचा उसका लंड फ़नफना गया, रजनी भी उठ बैठी, उसकी बूर भी अब दुबारा रिसने लगी, उसकी भारी चूचीयों में दुबारा मस्ती भरने लगी, उदयराज ने अपनी बेटी को अपनी बाहों में उठाया तो रजनी ने अपने बाबू के कान में धीरे से कहा- बाबू रुको! दिया और तेल भी ले लूं।

और रजनी ने दिया, तेल और माचिस डलिये में रखा और हांथों में ले लिया, उदयराज ने अपना अंगौछा कंधे पर रखा, कपड़े उन्होंने वहीं चबूतरे पर बिल्कुल कोने में समेटकर छोड़ दिये, कुल वृक्ष बहुत घना था, रजनी की साड़ी, साया, ब्रा और ब्लॉउज तथा उदयराज का कुर्ता और धोती वहीं रखी थी।

उदयराज ने अपनी बेटी को बाहों में भरकर उठा लिया, रजनी के मादक गदराए बदन को उदयराज बाहों में उठाये अंधेरे में ही चल दिया अपने खेत की तरह जो कि कुल वृक्ष से करीब 100 मीटर दूर था, उदयराज के खेत के चारो तरफ दूसरे के खेत थे, खेत के तीन तरफ दूसरे खेतों में ,बाजरा और मक्के की फसल लगाई गई थी जो कि बड़ी होकर काफी ऊपर तक हो गयी थी, नदी वाले हिस्से की तरफ खुला था, उदयराज का खेत खाली था अभी कुछ दिन पहले ही उसने उसे जोतकर छोड़ दिया था, जोतने से मिट्टी काफी नरम हो गयी थी।

रजनी को बाहों में उठाये मस्ती में उसके गालों और होंठों को चूमता हुआ वो अपने खेत की तरफ चल दिया, उदयराज के प्रगाढ चुम्बन से रजनी बार बार सिरह जा रही थी और मादक सिसकियां ले रही थी, दोनों पूर्ण नग्न थे, उदयराज के चलने की वजह से उसका खुला तना हुआ लंड इधर उधर हिल रहा था और रजनी की चूचीयाँ भी वासना में सख्त होकर तन गयी थी और इधर उधर हिलकर उदयराज को अत्यधिक उत्तेजित कर रही थी, चलते चलते उदयराज ने अपनी बेटी की एक चूची को मुँह में भर लिया और पीने लगा, एक पल के लिए वो रास्ते में खड़े होकर अपनी बेटी को बाहों में उठाये उसकी चूची पीने लगा।

रजनी सिसकते हुए थोड़ा हंस पड़ी और बोली- बाबू अंधेरे में गिर जाओगे, थोड़ा सब्र करो मेरे बाबू आआआआआहहहह.....जी...भरकर पी लेना खेत में पहुँचकर।

और ऐसा कहते हुए उसने खुद भी अपना एक हाँथ नीचे ले जाकर अपने बाबू का खडा 9 इंच फ़ौलादी लंड पकड़ लिया और थोड़ी देर सहलाया, लंड फुंकारने लगा।

उदयराज फिर चलने लगा और कुछ ही देर में अपने खेत में पहुँच गया, जुते हुए खेत की हल्की नमी वाली भुरभुरी ठंडी मिट्ठी में जब उदयराज ने रजनी को बाहों में लिए हुए अपने नंगे पांव रखे तो बड़ी ठंडक महसूस हुई, क्योंकि रात के वक्त मिट्टी ठंडी हो गयी थी, उदयराज खेत के बिल्कुल बीचों बीच आ गया, रजनी को चूमते हुए उसने उतारा, रजनी ने डलिया खेत में रख दिया, उतरते ही एक अंगडाई ली और हाँथ पीछे करके अपने बालों को हल्का सा समेटा। अंधेरे में भी वह अपने बाबू के नग्न शरीर और हल्के दिख रहे खड़े लंड को देखकर मचल उठी, रजनी ने एक नजर ऊपर आसमान में डाली तो देखा तारे टिमटिमा रहे थे मानो सब तारे आज इकट्ठा हुए हों बाप बेटी की रसभरी चुदाई देखने के लिए और बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हो शुरू होने का, रजनी उन्हें देखकर मुस्कुरा पड़ी।

उदयराज ने अपना अंगौछा खेत के बीचों बीच उभरी हुई मिट्टी को पैरों से थोड़ा समतल करके उसपर बिछाया, खेत में चारो तरफ सन्नाटा था, बगल के खेतों में खड़ी फसल लहलहा रही थी, तीन तरफ से खेत फसलों से ढका था।

उदयराज अंगौछा बिछाकर बगल में खड़ी अपनी बेटी की तरफ पलटा और दोनों ने एक दूसरे को सिसकते हुए अंधेरे में बाहों में भर लिया, उदयराज का लंड रजनी की महकती बूर और जाँघों के आस पास टकराने लगा जिसको महसूस कर राजनी की सांसे तेज होने लगी।

दोनों एक दूसरे को बाहों में भरकर झूम उठे, उदयराज ने अपनी बेटी के होंठों पर सिसकते हुए होंठ रख दिये रजनी की आंखें नशे में बंद होने लगी, उदयराज के हाँथ रजनी के पूरे गुदाज बदन पर रेंग रहे थे, होंठों को चूसते हुए वो हांथों से बालों को सहलाता हुआ हाँथ नीचे ले जाने लगा, पीठ को सहलाया फिर कमर पर हाँथ डाला तो रजनी सिसक पड़ी, काफी देर कमर को सहलाने के बाद रजनी के निचले होंठों को चूसते हुए उसकी गुदाज मोटी मोटी

जाँघों को आगे और पीछे पीछे की तरफ से सहलाता रहा, कितनी चिकनी जाँघे थी उसकी बेटी की, जाँघों को आगे की तरफ से सहलाते समय वह अपना हाँथ अपनी बेटी की फूली हुई बूर पर ले गया फिर बूर को हथेली में भरकर दबा दिया, रजनी उउउउउउउउउउईईईईईईई.......मां कहकर मचल उठी।

उदयराज ने बूर की दरार में अपनी बीच की उंगली डालकर कुछ देर ऊपर नीचे रगड़ा, रजनी हाय हाय करने लगी।

रजनी की बूर काफी रिस रही थी, रजनी की बूर का चिकना लिसलिसा काम रस उदयराज की उंगली में लग गया तो उसने उंगली को मुँह में भरकर चटकारे ले लेकर चाट लिया।

रजनी सिसकती रही अपने बाबू के हाथों को अपने बदन पर महसूस करके, फिर उदयराज गुदाज मोटी मोटी गांड को हथेली में भरकर कस कस के मीजने लगा, अपनी बेटी की चौड़ी मस्त गुदाज गांड के दोनों उभार को उदयराज अपने सख्त हांथों में भर भरकर दबाने और सहलाने लगा, सहलाते सहलाते वो बीच बीच में गांड की फांकों को अलग करके दरार में पूरा हाँथ फेरने लगता और गांड के छेद को उंगली से सहलाता तो रजनी मादकता से सिसकते हुए चिहुँक उठती और अपने नाखून कस के अपने बाबू की पीठ में अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह हहह.......बाबू कहते हुए गड़ा देती।

उदयराज ने रजनी के मुँह में अपनी जीभ डाल के घुमाने लगा और अपने हांथों से उसकी गांड के छेद को सहलाते हुए अपनी उंगलियां थोड़ा आगे धधकती बूर पर ले गया, बूर पर हाँथ पड़ते ही रजनी ने जोर से कराहते हुए अपनी गांड को उचका के टांगों को और चौड़ा कर लिया ताकि उसके बाबू उसकी प्यासी बूर को पीछे से अच्छे से छू और सहला पाएं, उदयराज रजनी के मुँह में अपनी जीभ डालकर उसकी जीभ से खेलते हुए पीछे से हाँथ लेजाकर उसकी बूर की फाँकों को सहलाने लगा, अत्यंत नशे में रजनी की आंखें बंद हो गई, निप्पल उसके शख्त होकर उदयराज के सीने में चुभने लगे। धीरे धीरे सिसकारियां गूंजने लगी, काफी देर उदयराज ऐसे ही रजनी की बूर को छेड़ता रहा, बूर अब पूरी पनिया गयी। इधर आगे की तरफ से उदयराज का खड़ा लंड बूर की दरार में रगड़ खा रहा था, कभी बूर की फांकों से टकराता, कभी भग्नासे से टकराता कभी दोनों जाँघों पर छू जाता, अपने बाबू के दहकते लंड को महसूस कर रजनी की वासना का पारा आसमान छूने लगा वो हाय हाय करके अपने बाबू से बार बार जोर जोर से लिपटने लगी उन्हें सहलाने लगी, खड़े खड़े वासना से तरबतर होकर उसके पैर काँपने लगे तो उसने बड़े प्यार से अपने बाबू के कान में कहा- बाबू, सुनो, सुनो न

उदयराज- हाँ मेरी बिटिया।

रजनी ने बड़ी ही वासना भरे अंदाज में धीरे से कहा- लेटकर अपनी सगी बेटी की बूर का मजा लो न, बाबू।

ये सुनकर उदयराज कराह उठा और उसने रजनी को उठाकर अंगौछे पर चित लिटा दिया

अंगौछा ज्यादा चौड़ा नही था रजनी का पूरा पूरा बदन उसपर आने के बाद दोनों तरफ से दो दो बित्ता बाहर निकला हुआ था बस, और नीचे अंगौछा रजनी के घुटनो तक ही था, पैर उसके खेत की मिट्टी में थे। रजनी ने उठकर जल्दी से दिया जला दिया और उसपर डलिया उल्टा करके थोड़ा ओट कर दिया ताकि दीया हवा से बुझे नही, अब दिए कि बहुत हल्की रोशनी से काफी कुछ दिखने लगा, उदयराज और रजनी की आंखे मिली तो वो मुस्कुरा उठे और उनके होंठ आपस में मिल गए, काफी देर एक दूसरे को चूमने के बाद रजनी ने झट से तड़पते हुए अपने दोनों पैर को अच्छे से चौड़ा कर जाँघों को खोलते हुए अपने दोनों हांथों से अपनी बूर की फाँकों को चीरा और अपने बूर के मखमली रिसते छेद को अपने बाबू के सामने कराहते हुए परोस दिया।

अपनी बेटी के इस अंदाज से उदयराज बावला हो गया और दीये की हल्की रोशनी में एक बार फिर अपनी सगी बेटी का नंगा जिस्म, उसकी खुली फैली हुई नंगी मोटी मोटी गोरी जाँघे, पैर, नाभि, कमर और ऊपर को तनी हुई दोनों मोटी मोटी चूचीयाँ, उसपर वो सख्त खड़े दोनों निप्पल और खुली चीरी हुई महकती रिसती बूर और बूर का वो महकता लाल लाल छेद देखकर उदयराज मदहोश हो गया और अपनी बेटी की बूर पर टूट पड़ा। मखमली महकती रिसती बूर पर अपने बाबू का मुँह लगते ही रजनी बहुत जोर से सिसकी ओओओओओओओओहहहहहहहहहहहहह.......... मेरे बाबू......हाहाहाहाहाहायययय.........मेरी बूर........चाटो इसको अपनी जीभ से.............अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह................खा जाओ अपनी बेटी की बूर को आज बाबू...........मेरे राजा.............मेरे सैयां............अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह...

अपनी बेटी की इस कदर कामुक सिसकियां सुनकर उदयराज भूखे भेड़िये की तरह उसकी बूर अपनी जीभ से लपा लप्प चाटने लगा, रजनी जोर जोर से कराहते हुए हवा में अपने पैर फैलाये अपने हाथों से अपनी बाबू का सर अपनी बूर पर रह रहकर दबा रही थी। दीये की लौ ओट में टिमटिमा कर जल रही थी फिर धीरे धीरे पूरे वातावरण में रजनी की जोर जोर सिसकारियां गूंजने लगी।

रजनी- अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह...दैय्या................ओओओओओओओओहहहहहहहहहहहहह.......... मेरे बाबू......हाहाहाहाहाहायययय.........चाटो ऐसे ही बाबू............बहुत मजा आ रहा है मेरे राजा.........कब से प्यासी हूँ मैं..............अपनी बेटी की प्यास बुझाओ मेरे बाबू...................चूसो मेरी बूर............फैला फैला के चूसो.....अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह........जीभ डालके चोदो न बाबू...........थोड़ी देर जीभ बूर में डाल के जीभ से अपनी बेटी को चोद दो न मेरे राजा........ अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह।

उदयराज ने ये सुनते ही अपनी जीभ को गोल नुकीला किया और अपनी बेटी के मक्ख़न जैसे नरम बूर के छेद में डालने लगा, नुकीली जीभ बूर के छेद पर छूते ही रजनी गनगना गई और जैसे ही उदयराज ने जीभ को बूर में डालकर थोड़ा थोड़ा चोदना शुरू किया रजनी अपनी चूतड़ उछाल उछाल के हाय हाय करती हुई जीभ से चुदने लगी, उदयराज रजनी की बूर को जीभ से दनादन चोदे जा रहा था, बूर से लिसलिसा रस लगतार बह रहा था जो कि उदयराज के मुँह में भी चला जा रहा था, उदयराज जीभ से बूर को चोदता तो कभी कभी नुकीली बनाई हुई जीभ को बूर की दरार में सरसरा के रगड़ता, कभी भग्नासे को होंठों से पकड़कर रगड़ते हुए चूस लेता, रजनी तो जैसे फिर से जन्नत में पहुंच गई थी, अपने बाबू की मर्दाना थोड़ी सख्त जीभ के लगातार घर्षण से रजनी की बूर का कोना कोना चुदाई के आग में धधकने लगा।

उदयराज से भी अब रहा नही जा रहा था उसने झट बूर को चाटना छोड़ अपनी बेटी के पैरों को घुटनों से मोड़कर ऊपर छाती तक किया जिससे रजनी की गांड ऊपर को उठ गई और मदहोश कर देने वाली हल्के बालों से भरी गोरी गोरी मक्ख़न जैसी बूर उभरकर ऊपर को आ गयी, रजनी ने अपने दोनों हांथों की उंगलियों से अपनी फूली हुई बूर की फांकों को अच्छे से फाड़कर अपनी बूर अपने बाबू को सिसकारी लेते हुए परोसी।

उदयराज ने कराहते हुए अपने मूसल जैसे लंड को अपने सीधे हाथ में लिया और उसकी चमड़ी पीछे कर मोटे फूले हुए सुपाड़े को खोला फिर फैली हुई अपनी बेटी की बूर की दरार में पांच छः बार थपथपाया, रजनी सीत्कार उठी, फिर उदयराज ने अपने लंड को रजनी की बूर पर काफ़ी देर इधर उधर, ऊपर नीचे, दाएं बाएं रगड़ा, रजनी की बूर अब बिल्कुल पनिया चुकी थी, रजनी से रहा नही गया तो उसने उदयराज से भारी आवाज में कहा- बाबू डालो न अपना लंड मेरी बुर में।

उदयराज ने ये सुनते ही बिना देर किए तड़पते हुए अपना दैत्याकार 9 इंच लंबा लंड अपनी बेटी की बूर को सीध में ला के एक ही बार में जड़ तक बूर की गहराई के आखिरी छोर तक उतार दिया।

रजनी की बड़ी ही तेज से एक दर्दनाक सिसकी निकल गयी अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह...............अम्माअअअआआआ

उसका बदन दर्द से तड़पकर ऐंठ गया, सांसे उसकी कुछ पल के लिए मानो रुक सी गयी, कराहते हुए आंखें बंद हो गयी, बदन ऐंठकर ऊपर को उठ गया, हांथों से उसने अपने बाबू के कंधों को थाम लिया, पैरों को जल्दी से मोड़कर अपने बाबू की कमर में बांध लिया, इतना मोटा लम्बा लन्ड एक बार फिर उसकी दहकती बूर में बहुत अंदर तक समा चुका था, पर इस बार हो रहे दर्द में कुछ हद तक मीठापन था रजनी अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह...........बाबू.............ओओओओओओहहहह हहहहहह...... बाबू करते हुए सिसके जा रही थी। उदयराज ने झुककर उसको चूमा और उसकी तनी हुई चूचीयों को मसल मसल के दबाने लगा, मुँह में भरके पीने लगा, रजनी जोर जोर से कराहती रही सिसकती रही, इस बार उसे पहले की भांति भयंकर दर्द नही हुआ बल्कि दर्द के साथ साथ लज़्ज़त का भी अहसास हुआ था, उदयराज बूर में अपना पूरा लंड ठूसे अपनी बेटी के ऊपर लेटे लेटे उसे चूमे और सहलाये जा रहा था

तभी उसने रजनी से कराहते हुए पूछा- बेटी

रजनी वासना में सिसकते हुए- हाँ बाबू

उदयराज- मज़ा आया

रजनी- हाय बाबू, बहुत....अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह.....

रजनी की बात सुनकर उदयराज ने तड़पते हुए अपना पूरा समूचा लंड बूर से खींचकर बाहर निकाल लिया और रजनी को एक बार फिर position बनाने के लिए कहा।

रजनी अपने बाबू का इशारा समझ गयी उसने अपनी जाँघों को अच्छे से फैलाकर अपनी प्यासी बूर को अपने हांथों से फैलाकर बूर को आगे परोस दिया, उदयराज ने अपने लंड का सुपाड़ा अपनी बेटी की बूर पर रखा और हल्का सा झुककर दहाड़ते हुए एक करारा झटका मारा, लंड एक बार फिर सरसराता हुआ बूर की गहराई में समूचा समा गया, रजनी को एक बार फिर तेज से अत्यंत मीठा मीठा दर्द हुआ और वो तड़पते हुए अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह.......मेरे राजा बोलते हुए मचल उठी। उदयराज ने इसी तरह पांच छः बार अपना समूचा लंड निकाल के पोजीशन ली और रजनी ने अपनी बूर फैलाकर अपने बाबू को परोसी और हर बार उदयराज ने गच्च से बड़ी बेरहमी से पूरा पूरा लंड अपनी बेटी की बूर में उतारा, रजनी हर बार मीठे दर्द से तड़प कर कराह जाती, उसको ये मीठा दर्द बहुत भा रहा था, आखिर पांच छः बार ऐसे ही करने के बाद उदयराज ने अपने बेटी के भारी चूतड़ों को अपने हांथों में थामकर, थोड़ा ऊपर को उठाकर पूरा लंड पेल पेल के गचा गच्च अपनी बेटी की बूर चोदना शुरू कर दिया, रजनी भी मस्ती में अपनी गांड उछाल उछाल कर अपनी बूर में अपने बाबू के मोटे कड़क दहकते लंड की रगड़ का मजा कराहते हुए लेने लगी, हर तेज धक्के के साथ तड़प तड़प कर रजनी अपने बाबू ले लिपटकर उन्हें कस कस के सहलाने लगी, उनकी पीठ, कमर, गांड, सर तथा कंधों पर हाँथ फेरने लगी, उदयराज गचा गच्च अपनी बेटी की बूर में तड़प तड़प के धक्के लगाए जा रहा था, इस बार उसने जरा भी रहम रजनी पर नही दिखाया और किसी भूखे भेड़िया की तरह अपनी बेटी की बूर में लगातार लंबे लंबे धक्के मारकर बूर चोद रहा था।

रजनी को भी अब रहम की जरूरत नही थी उसको भी ये वहसीपन बहुत अच्छा लग रहा था, उदयराज तेज तेज बूर में धक्के लगाता, तो कभी रुककर गांड को गोल गोल घुमाकर लंड को बूर के अंदर बूर के चप्पे चप्पे से रगड़ता जिससे राजनी हाय हाय करती हुई गनगना जाती और खुद भी अपनी गांड उठा उठा के नचा नचा के अपने बाबू का लंड अपनी बूर में अच्छे से खाती।

उदयराज ने एकाएक रुककर अपनी रजनी से सिसकते हुए कान में कहा- बेटी

रजनी- हाँ मेरे सैयां, मेरे बलमा।

उदयराज- अपने बाबू से चुदवाने में कैसा लग रहा है?

रजनी ये सुनकर शर्मा गयी और उसकी बूर हल्का सा संकुचित हुई, रजनी कुछ देर चुप रही फिर धीरे से सिसकते हुए बोली- बहुत अच्छा मेरे बाबू, बहुत मजा आ रहा है, ऐसा मजा मुझे जिंदगी में कभी नही आया....अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह.........ऊऊऊईईईईईईई......माँ

उदयराज अपनी बेटी के मुँह से ये सुनकर झूम उठा और बहुत तेज तेज धक्के बूर में मारने लगा अचानक तेज हवा चलने लगी और डलिया पलटकर गिर गयी और हवा से दिया बुझ गया फिर एक बार गुप्प अंधेरा हो गया।

अंधेरा होते ही दोनों बाप बेटी तेजी से सिसकते हुए आपस में एक दूसरे से और लिपट गए और उदयराज ने ताबड़तोड़ धक्के मारने शुरू कर दिए, रजनी तेज तेज सिसियाने लगी, कराहने लगी, मचलने लगी गांड उछाल उछाल के धक्कों का साथ देती हुई खुद भी अपनी बूर लंड पर पटकने लगी, लंड बूर के रस से इतना सन गया था कि सटा सट्ट बूर में अंदर बाहर हो रहा था, बूर का भगनासा फूलकर बार बार लंड से रगड़ खा रहा था और जब जब ऐसा होता रजनी सिसकते हुए गनगना जाती, रजनी कभी अत्यंत गनगना कर अपने होंठों को दांतों से काटती कभी तड़प कर अपना सर दाएं बाएं हिलाती और कभी मस्ती में मचलते हुए अपने पूरे बदन को ऊपर को ऐंठ कर धनुष की तरह मोड़ लेती, उदयराज ताबड़तोड़ धक्के मारते हुए उसे चूमे जा रहा था।

तभी आसमान में हल्के हल्के बादलों की गर्जना हुई और कुछ ही देर में हल्की हल्की बूँदें पड़ने लगी, अभी तक तो तारे टिमटिमा रहे थे पर अचानक ही बादल छा गए थे, रजनी और उदयराज घनघोर चुदाई के आंनद में इतने खोए हुए थे कि ऊपर आसमान और आस पास के वातावरण का उन्हें होश ही नही था, जब बादल गरजे तो रजनी का ध्यान आसमान पर गया तारे गायब हो चुके थे ऊपर काला काला घनघोर अंधेरा छाया हुआ था, रजनी ये देखकर वासना में और मुस्कुरा उठी, उदयराज घचा घच्च अपनी बेटी को चोदे जा रहा था, तभी एकएक हल्की हल्की दो चार बूंदे गिरनी शुरू हुई, तेज हवाएं चल रही थी, उदयराज की पीठ और उछलती गांड पर और रजनी के चेहरे पर हल्की बारिश की दो चार बूंदे गिरने लगी मानो आज प्रकति उनका जल अभिषेक करने आ गयी हो, रजनी की खुशी और वासना का कोई ठिकाना नही रहा, उसने कराहते हुए वासना से वसीभूत होकर अपनी आंखें बंद कर अपनी गांड को और तेज तेज उछालते हुए अपने बाबू के धक्कों से ताल से ताल मिलाकर चुदवाने लगी। बारिश की बूंदें अभी बिल्कुल हल्की हल्की पड़ रही थी, एकाएक रजनी को अपने सम्पूर्ण बदन में झुरझुरी महसूस हुई और वो गनगना कर चीखते हुए अपने बाबू से लिपटकर झड़ने लगी, उदयराज ताबड़तोड़ धक्के मारता रहा, रजनी थरथराते हुए झड़ने लगी

अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह.........मेरे सैयां........मेरे बाबू.....मैं गयी मेरे राजा.............हाय मेरी बूर...........कैसे झड़ रही है बाबू आपका लंड पाकर...................अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह..........................कितना मजा आ रहा है.........................कितना आनंद है इस चुदाई मे........................... ओओओओओहहहहहह............अम्मा............ हाय.................अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह......................और चोदो बाबू. ............ अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह................ऐसे ही चोदते रहो मुझे............अपनी बेटी को................अपनी सगी बेटी को........... ...........ओओओओओओहहहह हहहहह............और गच्च गच्च पेलो मेरी बूर................उई माँ...............अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह।

रजनी का बदन ढीला पड़ गया बूर से उसकी रस की धारा बह निकली, उसकी बूर झटके खाते हुए संकुचित होकर काम रस की धार बहाने लगी, रजनी आंखें बंद कर असीम आनंद की अनुभूति करते हुए मानो हवा में उड़ने लगी, अपने ही खेत वह मदरजात नंगी लेटी अपने सगे बाबू की कमरतोड़ चुदाई से आनंदित होकर खुले आसमान के नीचे हल्की हल्की बारिश की बूंदों के साथ थरथरा कर झड़ रही थी आज की रात इससे सुखद और क्या हो सकता था रात के करीब 2:20 हो चुके थे।

उदयराज भी काफी देर से ताबड़तोड़ धक्के अपनी बेटी की बूर में लगाये जा रहा था, खेत में चुदाई की फच्च फच्च आवाज काफी तेज़ी से गूंज रही थी, रजनी के झड़ने से बूर उसकी बहुत फिसलन भरी हो गयी थी और उदयराज का लंड बेटी की बूर का रस पी पी के और भी हाहाकारी हो चुका था, बूर में अब वो गपा गप अंदर बाहर हो रहा था, उदयराज के दोनों आंड धक्कों के साथ सटा सट्ट रजनी की गांड पर उछल उछल कर लग रहे थे जो रजनी को और आनंदित कर रहे थे।

एकाएक उदयराज भी तेज धक्के लगाते हुए बड़ी तेजी से कराहते हुए अपनी बेटी की बूर में झड़ने लगा,

ओओओओओओओहहहहहहह...........मेरी प्यारी बेटी...............मैं भी झड़ रहा हूँ............हाय तेरी मखमली बूर.........मेरी रानी...............अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह..............कितनी नरम है ये.............हाय.........ऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़.........अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह............कितनी गहरी है तेरी बूर.................ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़..........मेरी बेटी.............अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह............सगी बेटी को चोदने में कितना मजा है.............अअअअअआआआआआआआहहहहहहहह।

उदयराज हाँफते हुए झड़े जा रहा था

अपने बाबू के लंड से निकली तेज गरम वीर्य की गाढ़ी धार अपनी बूर की गहराई में बच्चेदानी पर गिरते ही रजनी गनगना कर सिरहते हुए अपने बाबू से कसकर लिपट गयी, बारिश अब और तेज हो चुकी थी, उदयराज की पीठ बारिश की लगातार तेज बूँदें पड़ने से काफी भीग गयी थी, रजनी लगातार अपने बाबू को जोर जोर से सिसकते और कराहते हुए सहलाये दुलारे जा रही थी, उदयराज गरजते हुए झटके मार मार के अपनी बेटी की मस्त मखमली बूर में झड़ रहा था, उसका लंड रजनी की बूर में जड़ तक समाया हुआ बड़ी तेज तेज झटके ले लेकर झड़ रहा था।

रजनी ने बड़े प्यार और दुलार के साथ सिसकते हुए अपना हाँथ थोड़ा आगे बढ़ा कर अपने बाबू के गांड पर ले गयी और गांड को बूर पर हल्का हल्का दबाने लगी फिर हाँथ को थोड़ा और नीचे ले जाकर अपने बाबू के दोनों आंड को बड़े प्यार से सहलाने लगी साथ ही साथ वो बड़े प्यार से अपने बाबू को उनके गाल पर सिसकते हुए चूमने लगी।

बारिश तेज होने लगी, तेज तेज बारिश की मोटी मोटी बूँदें अब दोनों के पूर्ण नंगे बदन को भिगोने लगी, बारिश की तेज मोटी मोटी बूँदें उदयराज की पीठ, गांड, सर, पैर और रजनी के चेहरे पर पड़ने लगी, रजनी अब मस्ती में खिलखिलाकर हसने लगी, बारिश की तेज ठंडी बूंदें उसके माथे, आंख, नाक, गाल, होंठों पर जब पड़ती तो रजनी मस्ती में मचल उठती, बारिश तेज तेज होने लगी थी और उम्मीद थी कि और भी तेज होगी पर फिर भी उदयराज और रजनी उसी तरह चुदाई के सुख से मिले असीम आनंद में डूबे, बारिश की ठंडी ठंडी बूदों से भीगते हुए एक दूसरे से अमरबेल की तरह लिपटे, सिसकते हुए लेटे रहे।
 
Back
Top