Incest मुझे प्यार करो,,, - Page 116 - SexBaba
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Incest मुझे प्यार करो,,,

रात के धमाकेदार चुदाई से मां बेटे दोनों मस्त हो चुके थे,,, छत पर चुदाई करने का मजा ही कुछ और था इस बात का एहसास सुगंधा को भी था और अंकित को भी,, चार दिवारी के अंदर चुदाई करने में जितना मजा आता है उससे कहीं ज्यादा मजाक खुले आसमान के नीचे छत पर करने में आता है अंकित इसी बात से बेहद खुश नजर आ रहा था और सुबह-सुबह जिस तरह से एक बार फिर से सुगंधा अपनी जवानी की बरसात अपने बेटे पर करके गई थी उसे अंकित पूरी तरह से संतुष्ट हो गया था और उसे यकीन हो गया था कि उसकी मां पूरी तरह से छिनार बन चुकी है,,,,,, सुगंधा भी छत पर से अपने कपड़े समेट कर नीचे चली गई थी लेकिन वह कपड़े नहीं पहनी थी ऐसे ही चली गई थी और यह देखकर अंकित मंद मंद मुस्कुरा रहा था हालांकि वह भी कपड़ा पहनना जरूरी नहीं समझ रहा था।



अपनी मां की तरह अंकित भी अपने कपड़ों को हाथ में लेकर नीचे पहुंच चुका था नीचे पहुंच कर देखा तो उसकी मां नंगी ही घर की सफाई करने में लगी हुई थी यह देखकर अंकित मुस्कुराते हुए बोला,,,।

क्या बात है कपड़े क्यों नहीं पहनी,,,

मुझे नहीं लगता कि अब तेरे सामने कपड़े पहनने की मुझे जरूरत पड़ेगी,,, (सुगंधा झाड़ू लगाते हुए बोली,,,)

बात तो तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो तब तो आज दिन भर ऐसे ही रहना और सच कहूं तो बिना कपड़ों के और भी ज्यादा खूबसूरत लगती हो,,,।

वह तो मुझे पता ही है कि यह तो किस लिए कह रहा है ताकि जब तेरा मन करे तब मेरी चुदाई कर ले ताकि कपड़े उतारने का झंझट ही खत्म हो जाए,,, ।

(अपनी मां की बात सुनकर अंकित हंसने लगा क्योंकि उसकी मां सच कह रही थी अंकित के मन में कुछ ऐसा चल रहा था और वैसे भी अब जिस तरह का दोनों के बीच रिश्ता बन चुका था दोनों के बीच बिल्कुल भी झिझक नहीं रह गई थी अंकित जब चाहे तब अपनी मां की चुदाई कर सकता था इस तरह का दमखम वह अपनी मां के सामने दिखा चुका था,,, अंकित अपने कपड़ों को वही धोने के लिए छोड़ दिया और बाथरूम में चला गया वैसे तो अपनी मां को नंगी देखकर एक बार फिर से उसके लंड ने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया था लेकिन अब हाथ से हिलाना उचित बिल्कुल भी नहीं था जब चोदने के लिए इतनी खूबसूरत औरत पास में हो तो फिर हाथ से हिलाना मतलब पूरी तरह से बेवकूफी दिखाना और अंकित इस समय कोई भी बेवकूफी दिखाना नहीं चाहता था।



घर की सफाई करने के बाद सुगंधा भी नहा कर तैयार हो चुकी थी और खाना बना रही थी की तभी दरवाजे पर दस्तक होने लगी,,,, सुगंधा खाना बनाते हुए अंकित को आवाज लगाते हुए बोली,,,)

देख तो अंकित कौन है,,,?

ठीक है मम्मी,,, (इतना कहकर अंकित अपने कमरे में से बाहर निकला और दरवाजा खोलने लगा वैसे नहाने के बाद दोनों ने कपड़े पहन लिए थे,,, इसलिए इस समय कोई दिक्कत पेश नहीं आ रही है वरना किसी के आने पर जल्दी-जल्दी में कपड़े पहनना पड़ता अंकित तुरंत जाकर दरवाजा खोला तो सामने सोचा आंटी खड़ी थी जिसे देखते ही अंकित के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी और यह मुस्कान उसके चेहरे पर क्यों तैर रही थी इस बात को सुषमा अच्छी तरह से जानती थी और वह भी जवाब में मुस्कुरा दी,,,,, वैसे जब से उसने अंकित से चुदवाई थी और यह सिलसिला दो बार हो चुका था लेकिन दोनों बार अंकित ने स्वर्ग की शेर उसे कराया था जिसके साथ में वह दिन रात डूबी रहती थी और इस समय यहां पर आने का खास मकसद भी उसका यही था कि अगर घर में वह अकेला होता तो एक बार फिर से वह अपनी टांगें खोल देगी इसलिए अंकित को दरवाजे पर देखते ही वह बोली,,,)



सुगंधा घर पर है क्या,,,,? (बहुत धीरे से और उत्सुकता दिखाते हुए सुषमा ने यह बात बोली थी जिसका मतलब अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था वह जानता था कि समय कुछ होने वाला नहीं है फिर भी वह थोड़ा मजा लेना चाहता था वह देखना चाहता था कि सुषमा उसका जवाब सुनकर कैसा बर्ताव करती है इसलिए अंकित बोला,,,)

नहीं,,,,,,,।

(इतना सुनते ही सुषमा एकदम से खुश हो गई और घर में घुस गई अंकित भी एकदम से मौके का फायदा उठाते हुए अपना एक हाथ सुषमा की खबर में डाला उसे अपनी तरफ खींचकर उसके होठों पर अपने होंठ रख दिया क्योंकि वह जानता था कि उसकी मां को रसोई घर से अगर बाहर निकलना हुआ तो थोड़ा समय तो लग जाएगा और उसके चूड़ियों की खनक की आवाज से वह जान जाएगा अंकित की हरकत से सुषमा एकदम पानी पानी हो गई दो बार तो उसने अंकित की मर्दानगी को देख चुकी थी,,, लेकिन इस समय जिस तरह की पूर्ति उसने दिखाया था उससे उसकी पर पानी छोड़ने लगी थी क्योंकि एकदम से उसे अपनी तरफ खींच कर उसके होठों का चुंबन करने लगा था सुषमा भी उसकी पूरी तरह से सहकार देती इससे पहले ही रसोई घर से आवाज आई,,,)

कौन है अंकित,,,?

(और इतना सुनते ही सुषमा के तो होश उड़ गए वह एकदम से घबरा गई और अंकित से अलग हो गई,,, और अंकित मुस्कुराते हुए बोला,,,)

सुषमा आंटी है मम्मी,,,,।

हरामजादी तुझे शर्म नहीं आती,,, मम्मी घर पर है और तू इस तरह की हरकत कर रहा है,,,(सुषमा एकदम धीरे से बोली तो अंकित भी जवाब देते हुए बोला,,,)



क्या करूं आंटी तुम्हें देखकर मुझे रहा नहीं गया,,,,,।

रहा तो मुझे भी नहीं जा रहा है इसीलिए तो यहां पर आई थी लेकिन तेरी मां तो घर पर ही रहती है,,,,,(सुषमा धीरे से बोल ही रही थी कि तभी रसोई घर से आवाज आई,,,,,)

सही समय पर आई हैं,,,, ले चाय नाश्ता तैयार है ले जाकर दे दे तो,,,,,

रुको मैं अभी आता हूं,,,,,(अंकित मुस्कुराते हुए रसोई घर में चला गया और सुषमा उसे देखकर मन ही मन उसे बहुत सारी गालियां दे रही थी,,,, क्योंकि अंकित में उसके चेहरे पर छाई खुशी को पल भर में ही दुख में बदल दिया था अंकित के साथ एक बार फिर से शारीरिक संबंध बनाने की खुशी अंकित ने हीं उसके हाथों से छीन लिया था,,,, और सबसे ज्यादा डर सुषमा को इस बात का था कि जो कुछ भी हुआ था उसे सुगंधा ने अपनी आंखों से देख नहीं ली वरना गजब हो जाता,,,, सुषमा इस बात को अच्छी तरह से जानती थी की उम्र में वह सुगंधा से चार-पांच साल बड़ी थी सुगंधा उसका सम्मान करती थी और अगर अपनी आंखों से वह उसके ही बेटे के साथ इस तरह के अस्त-व्यस्त हालत में देख लेती तो उसके मन पर क्या गुजरती,,, अगर यह सब होता भी तो अंकित के ही कारण होता उसने सच-सच जो नहीं बताया था,,,, सुषमा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें यहां से वह इस तरह से जा भी नहीं सकती थी क्योंकि वह सुबह-सुबह उसके घर आई थी और इस बात को सुगंधा जान गई थी अगर वह इस तरह से ही चली गई तो वह क्या सोचती,,, इसलिए सुषमा भी पीछे-पीछे रसोई घर के दरवाजे पर पहुंच गई,,,,, उसने देखी तो अंकित कप में चाय निकल रहा था और कटोरी में थोड़ी नमकीन लिया हुआ था,,,, यह देखकर सुषमा बोली,,)



अरे इसकी क्या जरूरत थी मैं तो ऐसे ही आ गई थी क्योंकि तीन-चार दिन से तुमसे मुलाकात नहीं हुई इसलिए खबर पूछने आ गई थी,,,।

अरे मैं बिल्कुल ठीक हूं,,,,(रोटी बेलते हुए सुगंधा बोली,,,, यह सुनकर सुषमा भी मुस्कुराते हुए बोली,,,)

भगवान करें तुम इसी तरह से मुस्कुराती रहो खुश रहो,,,,।

बस तुम अपना आशीर्वाद बनाए रखना हम लोग इसी तरह से खुश रहेंगे क्यों अंकित,,,,।(अंकित की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली वैसे सुगंधा के कहने का मतलब कुछ और था जो कि अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था इसलिए वह भी मुस्कुराते हुए बोला)

क्यों नहीं सुषमा आंटी अगर आपका आशीर्वाद रहा तो हम लोग इसी तरह से मजा करते रहेंगे खुश रहेंगे,,,,।

(सुगंधा भी जानती थी कि उसका बेटा किस लिए बोल रहा है,,,,,, अंकित आगे कुछ बोल पाता सुगंधा ही बोल पड़ी)

अच्छा अंकित एक काम कर यहां सारा सामान बिखरा पड़ा है ,,,, यहां पर कहां बैठकर चाय नाश्ता करेंगे यहां सही नहीं लग रहा है तू अपने कमरे में ले जा और वहीं पर अपनी सुषमा आंटी को चाय नाश्ता करा दे,,,।

अरे सुगंधा में बोल रही हूं इसकी क्या जरूरत है,,, मैं तो ऐसे ही आई थी बता तो रही हूं,,,,(सुषमा औपचारिकता निभाते हुए बोली उसकी बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)



अरे तो क्या हो गया तुम हमारी शुभचिंतक हो और सुबह-सुबह इस तरह से हमारे घर आए हो यह तो बहुत खुशी की बात है और वैसे भी तुम्हारी मैं बहुत इज्जत करती हूं इस तरह से सुबह-सुबह बिना कुछ खिलाएं वापस भेजना ठीक नहीं है। (तवे पर रोटी रखते हुए सुगंधा बोली)

मम्मी ठीक कह रही है सुषमा आंटी,,,,(हाथ में चाय नाश्ते की प्लेट लेते हुए अंकित बोला और सुषमा अंकित की तरफ देखकर सुगंधा से नजर बचाकर अंकित को गुदगुदाने लगी वह गाली दे रही थी जिसे अंकित समझ गया था और मुस्कुरा रहा था सुषमा समझ गई थी कि चाय पिलाए बिना ये लोग मुझे वापस भेजने वाले नहीं है इसलिए वह बोली,,,)



तुम भी चलो ना सुगंधा,,,, साथ में चाय पीते हैं,,,।

फिर किसी दिन अभी मुझे बहुत कम है और देख रही हो रोटी बना रही हूं अगर ऐसे ही छोड़ दी तो गुंथा हुआ आटा खराब हो जाएगा,,,।

चलिए ना आंटी मम्मी चाय पीने की यही खड़े-खड़े चाय ठंडी हो गई तो पीने में मजा नहीं आएगा।

अंकित ठीक कह रहा है जो अंकित के कमरे में बैठकर पी लो यहां सारा सामान बिखरा पड़ा है,,,।

ठीक है तुम मां बेटे चाय पिलाए बिना भेजोगे नहीं,,,(इतना कहकर सुषमा अंकित के कमरे की तरफ जाने लगी औरअंकित भी प्लेट लेकर रसोई घर से बाहर निकल गया और सुगंध सुषमा की बात कर मुस्कुरा रही थी,,,,, सुषमा अंकित के कमरे में प्रवेश कर चुकी थी और अंकित भी पीछे-पीछे चाय नाश्ते की प्लेट लेकर अपने कमरे में पहुंच चुका था,,, अंकित को देखते ही एकदम गुस्से से सुषमा अंकित पर गुस्सा दिखाते हुए बोली,,,)



हरामजादे तुझे शर्म नहीं आती, अगर तेरी मां हम दोनों को देख लेती तो क्या सोचती,,,।

इसमें सोचने का क्या है मम्मी को भी लगता कि सुषमा की बुर में कुछ ज्यादा है जवानी फूट रही है,,,,।(चाय नाश्ता की प्लेट को अपने बिस्तर पर रखते हुए अंकित बोला तो उसकी इस तरह की बात को सुनकर सुषमा एकदम से हैरान होते हुए बोली।)

बाप रे बाप तू इतनी गंदी बातें भी करता है,,,।

क्यों क्या लगता हैं जब तुम्हारी बुर में लंड डालकर चोद सकता हूं तो इस तरह की बात नहीं कर सकता,,,।

हाय दैया इतना हरामि हो गया है तो मैं तो तुझे एकदम सीधा-साधा समझती थी और तुझे एक नंबर का हरामि निकला रे,,,,।

क्यों तुम्हें क्या लगता है सीधा-साधा रहता तो तुम्हारी बुर में लंड डालता,, और हां तुम बना बनाया काम क्यों बिगाड़ रही थी,,,,।

बना बनाया काम में कुछ समझी नहीं,,,(आश्चर्य जताते हुए सुषमा बोली,,,)

मम्मी को क्यों बुला रही थी साथ में चाय पीने के लिए।

ले इसमें क्या हो गया अगर बुला दी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा,,,,।

तुम समझ नहीं रही हो मम्मी को रोटी बनाने में 10 मिनट तो लगेगा ही और 10 मिनट तक अगर हम दोनों इस कमरे में अकेले हैं तो सोचो,,,,,।

(अंकित के कहने के मतलब को सुषमा समझ गई थी और वह बोली)

पागल हो गया है क्या,,,? तेरी मम्मी घर पर ही है नहीं नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं मैं तो सोचा तू अकेला होता तो मजा करेंगे लेकिन तेरी मम्मी भी साथ में है और जब तेरी मम्मी घर में है तो इस तरह की बातें सोचना भी नहीं,,,,

क्या आंटी क्यों घबरा रही हो ऐसा कुछ नहीं होगा,,,,। मैं मम्मी को अच्छी तरह से जानता हूं जब वह रोटी बनाती है तो रोटी बिना बने वह कहीं भी नहीं जाती और ना ही घर का छोटा सा काम कर सकती है। (ऐसा कहते हुए अंकित हीरे से दरवाजे को बंद कर दिया लेकिन कड़ी नहीं लगाया क्योंकि वह जानता था की कड़ी लगाना उचित नहीं है उसकी मां को शक हो सकता था और वह तुरंत फिर से उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपनी तरफ खींच लिया और एक बार फिर से उसे अपने बदन से सटा लिया अंकित की हरकत से सुषमा एकदम से घबरा गई वह अंकित की खेत से आजाद होना चाहती थी इसलिए वह उसकी बाहों में कसमसाते हुए उससे अलग होने की कोशिश करते हुए बोली,,,)

बेवकूफी मत कर बाद में कभी कर लेंगे अभी जाने दे,,,।

ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित सुषमा के होठों पर फिर से अपने होंठ रखकर उसके होठों का रसपान करने के साथ-साथ उसकी चूची को ब्लाउज के ऊपर से पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया,,,, सुषमा उसकी पकड़ से छूटने की कोशिश लगातार कर रही थी लेकिन अंकित की हरकत से उसके बदन में भी सुरसुराहट होने लगी थी वह अंकित की कैद से आजाद तो होना चाहती थी क्योंकि वह जानती थी कि अगर ऐसी हालत में सुगंध एवं दोनों को देख लिया तो वह सुगंधा की नजर से एकदम से गिर जाएगी क्योंकि एक पड़ोसन होने के नाते सुगंधा और उसका बहुत अच्छा रिश्ता था सुगंधा हमेशा उसका सम्मान करती थी,,, और वह नहीं चाहती थी कि उसकी मां इस हालत में उसे देखें इसलिए मजबूर होकर वह ना चाहते हुए भी अंकित की बाहों की पकड़ से आजाद होना चाहती थी लेकिन अंकित पूरी तरह से उसके ऊपर छत चला जा रहा था एक हाथ से उसकी चूची दबाते हुए दोनों हाथों से ब्लाउज के ऊपर से उसकी दोनों चूचिया पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया था। जिससे ना चाहते हुए भी सुषमा के बदन में शुरूर छाने लगा था आंखों में मदहोशी छाने लगी थी। फिर भी वह छूटने की कोशिश करना तो छोड़ दी थी लेकिन मुंह से बोली,,,)

रहने दे अंकित फिर कभी कर लेना तेरी मां देख ले तो गजब हो जाएगा मेरा घर से बाहर निकलने दुभर हो जाएगा,,,, मत कर जाने दे मुझे,,,,।

ऐसे कैसे जाने दु चाची,,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित कुर्ती दिखाते हुए एकदम से सुषमा को दीवार की तरफ घुमा दिया और दीवार से सटाकर जल्दी-जल्दी सुषमा की साड़ी को ऊपर की तरफ उठने लगा और अंकित को सुषमा की साड़ी कमर तक उठाने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी जैसे ही साड़ी कमर तक उठी उसकी बड़ी-बड़ी गांड एकदम से झलक और यह देखकर अंकित की आंखें मदहोशी से भरने लगी कि सुषमा चड्डी नहीं पहनी थी और यही देखकर अंकित उत्तेजित होता हुआ उसकी गोरी गोरी गांड पर दो-चार चपत लगाते हुए बोला,,)

हाय मेरी जान पूरी तैयारी से आई थी अंदर चड्डी भी नहीं पहनी हो,,,,।

आई तो तैयारी से ही थी लेकिन अब मुझे जाने दे,,,।

ऐसे कैसे जाने दुं,(और इतना कहने के साथ ही साड़ी को कमर तक उठाए हुए एक हाथ से पकड़े हुए अंकित अपने पेंट की बटन खोलने लगा और तुरंत उसे अपने घुटनों तक नीचे खींच दिया,,, सुषमा की बुर में जाने के लिए अंकित का लंड पूरी तरह से तैयार था। और देखते ही देखते अंकित ने अपने लंड को सुषमा की गुलाबी बुर में डाल भी दिया क्योंकि उसकी बुर भी अंकित की हरकतों से पूरी तरह से गीली हो चुकी थी इसलिए इस स्थिति में भी बड़े आराम से अंकित का मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर में धीरे-धीरे अंदर तक घुस गया था और अंकित तुरंत सुषमा की कमर पकड़ कर अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया था,,,।

सुगंधा की उपस्थिति में सुषमा यह सब नहीं करना चाहती थी वह जानती थी कि सुगंधा घर पर ही है रोटी बना रही थी ऐसे में अंकित उसे अपने कमरे में चाय पिलाने के बहाने ले जाकर उसकी चुदाई कर रहा था डर तो अभी भी सुषमा को बहुत लग रहा था लेकिन जिस तरह से अंकित का लंड उसे मजा दे रहा था वह पूरी तरह से मस्त होने लगी थी। उसकी आंखें बंद होने लगी थी दीवार से सटी हुई वह मजे लेते हुए अब धीरे-धीरे अंकित का सहकार करने लगी थी उसे मदद करने लगी थी और एवज में वह अपनी बड़ी-बड़ी गांड को बाहर की तरफ निकल दी थी ताकि आराम से अंकित उसकी चुदाई कर सके अंकित पागलों की तरह अपनी कमर को हिला रहा था क्योंकि वह जानता था कि उसके पास समय काम है और वह इस कम समय का भी भरपूर आनंद लेना चाहता था,,,, अंकित के हर धक्के के साथ सुषमा स्वर्ग का आनंद ले रही थी वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी अंकित की कमर किसी मशीन की तरह चल रही थी,,, मस्त मदहोश होते हुए सुषमा के मुंह से हल्की-हल्की शिसकारी की आवाज निकल रही थी जिसे वह काबू में किए हुए थी क्योंकि वह जानती थी कहीं यह आवाज सुगंधा में सुन ली तो गजब हो जाएगा,,,,,,,

एकाएक अंकित बिना कुछ बोले अपने लंड को सुषमा की बुर से बाहर निकाल लिया यह देखकर सुषमा धीरे से बोली,,,।

क्या हुआ,,,?

(लेकिन उसके क्या का जवाब अंकित देना नहीं चाहता था वह तुरंत उसका हाथ पकड़ कर एकदम से बिस्तर पर ले आए और चाय वाली प्लेट को हाथ से पकड़ कर जमीन पर रख दिया और तुरंत उसकी दोनों टांगों को खोलकर एकदम से उसके ऊपर झुक गया और पागलों की तरह उसे बांहों में लेकर धक्के पर धक्का लगाने लगा,,,, सुषमा का मजा और भी ज्यादा बढ़ गया हुआ पूरी तरह से पागल होने लगी और वह भी अंकित को अपनी बाहों में कस ली तकरीबन 5 मिनट की जबरदस्त चुदाई के बाद अंकित के अंदर से उसका गरम लावा सुषमा की बुर को भिगोने लगा। सुषमा भी झड़ रही थी उसे भी अद्भुत आनंद की प्राप्ति हुई थी वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी।

अंकित धीरे से अपने लंड को सुषमा की बुर से बाहर निकाला और उसे उसके ही पेटीकोट से साफ करके पेंट पहन लिया और सूचना भी अपने कपड़ों को व्यवस्थित करके बिस्तर पर बैठ गई और चाय की चुस्की लेने लगी अभी तो ही चुस्की और चाय की ली थी कि तभी सुगंधा की दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई और यह देखकर सुषमा एकदम से घबरा गई थी और यह सोचकर खुश हो रही थी कि अच्छा हुआ जल्द ही काम खत्म हो गया और अंकित ने दरवाजे की कड़ी नहीं लगाया था। अपनी मां को दरवाजे पर देख कर अंकित के चेहरे पर भी थोड़ी घबराहट आ गई थी लेकिन सब कुछ ठीक था इसलिए वह निश्चिंत हो गया था। सुगंधा भी कुछ देर तक वहीं बैठी रही इधर-उधर की बातें करती रही और फिर सुषमा जब उठ कर चली गई तब वह फिर से काम में लग गई।)
 
एक बार फिर से अंकित मौके का फायदा उठाते हुए सुमन की मां की चुदाई कर चुका था वैसे तो सुमन सबसे पहले लाइन में थी लेकिन सुमन की चुदाई अभी तक उसने नहीं किया था लेकिन उसकी मां की चुदाई वह तीन बार कर चुका था और तीनों बार उसे तृप्त कर चुका था भले ही वह उचित समय उसकी मां को नहीं दे पाया था लेकिन कम समय में ही सुमन की मां अंकित की चुदाई से तृप्त हो चुकी थी और बार-बार उसे एहसास होता था कि जैसे अभी भी उसके गुलाबी गली में अंकित का लंड चहलकदमी कर रहा हो,,, सुमन की मा जा चुकी थी लेकिन जाते-जाते एक अद्भुत अनुभव और आनंद अपने जेहन में समेटे गई थी,,, ।



लेकिन वह इस बात से हैरान थी कि अंकित वाकई में जैसा दिखता है वैसा बिलकुल भी नहीं है वह अंकित को बेहद सीधा-साधा लड़का समझती थी लेकिन तीन मुलाकातों में ही उसकी सोच पूरी तरह से बदल चुकी थी उसे समझ में आ गया था कि अंकित भले ही दिखता सीधा-साधा है लेकिन अंदर से तो एक मर्द ही है और एक मर्द औरत को किस तरह से खुश रखता है उसका हुनर वह बेखुबी जानता था,,, सुमन की महेश बात से भी हैरान थी कि उसने कभी भी अंकित के मुंह से असली शब्द नहीं सुने थे लेकिन वह कैसा बेशर्मों की तरह उसके सामने चुदाई की बातें कर रहा था लंड की बातें कर रहा था उसे बिल्कुल भी परवाह नहीं था कि वह क्या सोचेगी,, और शायद इसलिए भी की अंकित उसकी दो बार चुदाई कर चुका था और वाकई में जब औरत की चुदाई कोई मर्द करने लगता है तो उसे औरत के सामने वह पूरी तरह से बेशर्म बन जाता है और उसके सामने कुछ भी कहने से बिल्कुल भी नहीं हीचकीचाता,,,, और वही हाल अंकित का हो गया था। सुमन की मां अंकित की हिम्मत की मां ही मन दादा दे रही थी क्योंकि वह कभी सोची नहीं थी कि अपनी मां की उपस्थिति में वह इस तरह की हरकत कर बैठेगा जबकि वह खुद डर रही थी,,, एक औरत होने के नाते इस तरह के कदम उठाने में वह बेहद घबरा रही थी और उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिसके कैमरे में वह चाय पीने के लिए जा रही है उसी के कमरे में उसकी चुदाई होने वाली है जबकि वह अंकित से चुदवाने ही आई थी,, लेकिन सुगंधा की उपस्थिति में वह हिम्मत नहीं कर पाई थी। और अपने अरमानों के पंख को वह समेट चुकी थी,,,, वह थोड़े गुस्से में थी वह घर से निकल जाना चाहती थी लेकिन जिस तरह से सुगंधा ने उसे चाय पीने के लिए रोक ली थी वह जा भी नहीं सकती थी।



लेकिन जितना वह अंकित को समझती थी उससे कहीं ज्यादा वह चालक और औरतों के मामले में एकदम लंपट था,,,, उसे अच्छी तरह से याद था कि जब वहां का उसके घर आया था सुमन से परीक्षा के बारे में कुछ सलाह लेने के लिए तो वह बाथरूम का दरवाजा खोलकर एकदम नंगी नहा रही थी और उसकी नजर उसे पर पड़ गई थी तो वह एकदम से शर्मा गया था लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि इस एक पल के दीदार के बदले में अंकित बेझिजक उसकी चुदाई करने लगेगा,,,, सुमन की मां अपने मन में यह सोचकर हैरान हो रही थी कि कैसे अपनी मां के सामने सीधा-साधा बनाकर चाय और नाश्ते की प्लेट को लेकर के वह उसे चाय पिलाने के लिए अपने कमरे में लेकर गया था और बड़ी चालाकी दिखाते हुए दरवाजे को बंद करने के बाद उसने कड़ी भी नहीं लगाया था शायद इस बात को वह जानता था कि अगर दरवाजा अंदर से बंद रहेगा तो उसकी मां को शक होगा कि ऐसा क्या हो रहा है जो अंकित ने दरवाजा बंद कर लिया है क्योंकि वह तो चाय पिलाने के लिए अपने कमरे में लेकर गया था। और जब अंकित अपनी मनमानी करने पर उतारू हो गया था तो सुमन की वॉइस बात से डर रही थी कि कमरे का दरवाजा तो खुल ही है अगर सुगंधा आ गई तो गजब हो जाएगा,,, लेकिन उसकी बात ना मानते हुए अंकित अपने ही मन की कर रहा था वह दरवाजे पर कड़ी नहीं लगाया था और अपनी हरकतों से उसे पूरी तरह से मदहोश कर दिया था जबकि वह इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी और वह भी सुगंधा की उपस्थिति में,,,।





पर वह गलत थी की अंकित नादान है दो बार उसने जरूर उसकी चुदाई किया था उसे ऐसा लग रहा था कि उसके कहने पर उसकी प्यास को देखते हुए अंकित ने ऐसा किया था लेकिन उसका भ्रम एकदम से टूट गया था जब उसके ना चाहने के बावजूद भी उसके इनकार करते हुए भी अंकित अपनी हरकतों से उसे पूरी तरह से मदद कर दिया था जो कि इस बात का सबूत था कि अंकित औरतों को खुश करने का हुनर अच्छी तरह से जानता था और उसकी हरकतों से मदहोश होकर सुमन की मां इनकार नहीं कर पाई थी। और कमरे का दरवाजा खुला होने के बावजूद भी उसके हाथों की कठपुतली बनकर वह उससे चुदवाने लगी थी,,, और वह हैरानी इस बात से भी थी कि इन सबके बावजूद भी उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी अंकित ने जिस तरह से उसे दीवार से सटाकर पीछे से उसकी चुदाई किया था और फिर थोड़ी ही देर बाद उसे बिस्तर पर लेट कर जमकर अपनी कमर हिला कर उसे अद्भुत सुख की प्राप्ति करवाया था वह काबिले तारीफ थी इसलिए मन ही मन वह अंकित को धन्यवाद देते हुए सुगंधा के घर से चली गई थी और इस बात की भनक घर में होने के बावजूद भी सुगंधा को बिल्कुल भी नहीं हो पाई थी।



मां बेटे दोनों घर में काम लीला का प्रचंड खेल खेल रहे थे जिसकी कोई सीमा नहीं थी जब भी दोनों को मौका मिलता दोनों एक दूसरे में समाने की पूरी कोशिश करते थे और कामयाब हो जाते थे, क्योंकि घर में उन दोनों के सिवा कोई था भी नहीं उन दोनों को रोकने रोकने वाला कोई नहीं था इसलिए दोनों को किसी बात का डर भी नहीं था। और कभी-कभी तो मां बेटे दोनों घर में नंगे ही घूमते थे खाना बनाना,,, खाना खाने से लेकर के दिनचर्या के हर जरूरत को वह बिना कपड़ों के ही पूरा करते थे और उन्हें बिना कपड़ों में घर में रहना बहुत अच्छा भी लगता था लेकिन अंकित कोई बात की तकलीफ हो जाती थी कि बार-बार उसका लंड अपनी मां की जवानी देखकर खड़ा हो जाता था। और फिर अपनी मां की बुर में डालने के नाम से से रहा नहीं जाता था इस बात से सुगंधा भी परेशान थी लेकिन उसे बहुत मजा आता था। अंकित पूरी तरह से स्वर्ग का शुख भोग रहा था और वाकई में उसे ऐसा लगता था कि जीवन में इससे बड़ा सुख कोई हो ही नहीं सकता और कुछ हद तक यह बात सही ही थी क्योंकि कुछ महीने पहले वहां औरत के साथ संभोग रत होने की सिर्फ कल्पना किया करता था,,, और आज वह जब चाहे तब अपनी मां की बुर में लंड डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझा सकता था लेकिन धीरे-धीरे यह प्यास बढ़ने लगी थी।



ब्लाउज की डिलीवरी लेने से पहले एक दिन शाम को मां बेटे दोनों बैठकर चाय पी रहे थे अंकित के मन में कुछ और चल रहा था वह चाय की चुस्की लेते हुए कुछ सोच रहा था यह देखकर सुगंधा बोली।

क्या सोच रहा है,,,,?

मैं सोच रहा था कि कुछ अलग करते हैं,,,,।

अब जो कुछ भी हम लोग कर रहे हैं इससे अलग क्या होगा,,,।

करना तो यही है लेकिन कुछ अलग तरीके से,,, अच्छा एक बात बताओ उस दिन दर्जी की दुकान में तुम्हें मजा आया था कि नहीं।

बिल्कुल आया था उसे दिन तो मेरी बुर बार-बार पानी छोड़ रही थी,,, खासकर के दर्जी की आंखों के सामने जो कुछ भी हो रहा था उससे तो मेरी हालत और ज्यादा खराब हो रही थी।

और दर्जी की हालत,,,!

सच कहूं तो वह तो पागल हुआ जा रहा था मेरी जवानी देखकर हालांकि वह कुछ करने लायक तो था नहीं लेकिन फिर भी उसके भी अरमान मचल रहे थे यह उसका चेहरा देखकर साफ पता चल रहा था।

और सोचो मम्मी अगर उसे दिन में उसे दरजी के सामने तुम्हारी साड़ी उठाकर तुम्हारी चुदाई करने लगता तो,,,।



हाए हाए काश ऐसा हो पाता कितना मजा आता ,,,,(सुगंधा एकदम से रंगीन ख्यालों में खोते हुए बोली)

बस यही तो मैं कहना चाहता हूं,,,,।

क्या कहना चाहता हैं,,,,!(सुगंधा आश्चर्य से हाथ में चाय का कप लिए हुए अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

अच्छा एक बात बताओ तुम उस दरजी को पहले से जानती हो।

बिल्कुल भी नहीं मैं तो पहली बार उसकी दुकान पर गई थी इसके बारे में कुछ महीने पहले एक औरत ने मुझे बताई थी,,,।

इसका मतलब है कि उस दर्जी से कोई मेलजोल नहीं है वह ना तो तुम्हें जानता है और ना ही तुम उसे जानती हो और वह यह भी नहीं जानता कि तुम कौन हो कहां रहती हो क्या करती हो।

हां बिल्कुल,,,, ना तो मैं उसके बारे में कुछ जानती हो नहीं वह मेरे बारे में कुछ जानता है और तूने देखा तो वह दुकान भी कितनी दूर है वहां पर हम लोगों का आना-जाना भी नहीं होता।

बस तब तो बात बन गई,,,(अंकित एकदम से खुश होता हुआ बोला)

यह तु क्या बोल रहा है,,,, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है,,,,।



मैं तुम्हें समझता हूं जब मर्द और औरत के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो जाता है और वह दोनों बार-बार चुदाई का सुख भोगते हैं तो मर्द और औरत अपने यह सुख को और भी बढ़ाने की सोचते हैं,,,, अच्छा सच बताना तुम भी इस मजे को और भी ज्यादा बढ़ाना चाहती हो कि नहीं ताकि और ज्यादा मजा आए,,,।

हां क्यों नहीं मैं क्या कोई भी औरत इस मजे को बढ़ाना ही चाहिए बल्कि कम थोड़ी ना करना चाहेगी।

बस यही तो मैं कहना चाहता था और अभी-अभी तुम कहीं की अगर मैं उसे दिन दरजी के सामने तुम्हारी साड़ी उठाकर तुम्हारी चुदाई करने लगता तो तुम्हें और भी ज्यादा मजा आता।

हां तो,,,?(सुगंधा फिर से हैरान होते हुए अपने बेटे की तरह देखते हुए बोली,,,,)

मैं चाहता हूं कि तुम्हें मैं वह सुख दूं,,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा कुछ देर सोचने लगी और जैसे ही अपने बेटे की बात के कहने का मतलब को वह समझ पाई हो एकदम से हैरान हो गई और तपाक से बोली)

पागल हो गया क्या तू मैं किसी अनजान के सामने साड़ी उठाकर तुझसे चुदवाऊं,,,,, नहीं नहीं यह मुझे बिल्कुल भी नहीं होने वाला और अपने इस घटिया से युक्ति को अपने मन में ही रख।



मेरी बात समझने की कोशिश करो अनजान के सामने चुदवाने के लिए बोल रहा हूं किसी अनजान से चुदवाने के लिए नहीं मेरे से चुदवाने के लिए बोल रहा हूं।

नहीं नहीं मुझे यह बिल्कुल भी नहीं हो पाएगा पागल हो गया है क्या तू किसी ने हमें देख लिया तो गजब हो जाएगा और वह दर्जी अगर वह दर्जी कुछ करने लगा तो।

तुम्हें लगता है वह कुछ कर पाएगा बल्कि वह तो मजा ले रहा था उसे भी देखने में मजा आएगा,,,,, मम्मी मान जाओ ना बहुत मजा आएगा सारी जिम्मेदारी मेरी रहेगी।

(अपने बेटे की बात सुनकर जहां एक तरफ वह हैरान हो रही थी वहीं दूसरी तरफ उसकी युक्ति से उसके मन में भी गुदगुदी होने लगी थी वह तो अपने मन में कल्पना भी करने लगी थी कि कैसे सब कुछ होगा उसे कल्पना में सबको साथ दिखाई दे रहा था कि वह दर्जी की दुकान में है और उसका बेटा उसकी साड़ी कमर तक उठाकर काउंटर पर झुककर पीछे से उसकी चुदाई कर रहा है और वह दर्जी पागलों की तरह उसे देखकर अपने धोती के ऊपर से अपने लंड को मसाला है जो की बेजान सा पड़ा हुआ था। इस तरह की कल्पना से उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी लेकिन फिर भी इसमें डर भी बहुत था किसी के देखे जाने का डर था किसी के द्वारा पकड़े जाने का डर था समझ में बदनामी का डर था इन सब के बावजूद भी अंकित अपनी मां को मनाने की पूरी कोशिश कर रहा था और बोला।)



कुछ नहीं होगा मम्मी तुम एक बार मान तो जाओ,,, देखी थी ना कितनी देर तक हम दोनों उसके दुकान में थे लेकिन एक भी ग्राहक नहीं था। एकदम खाली दुकान थी और वह दर्जी भी कुछ नहीं कर पाएगा

अरे जरूरी है,,,, कि उस दिन भी दुकान में कोई ना हो,,,,, अगर कोई दुकान में हुआ तब क्या करेंगे,,,,।

(अपनी मां की यह बात सुनकर अंकित के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी थी क्योंकि उसने जिस तरह से यह बात की थी कि अगर कोई दुकान में हुआ तब क्या करेंगे इसका मतलब साफ था कि वह भी मन ही मन तैयार थी,,,, इसलिए अंकित खुश होता हुआ अपनी मां से बोला,,,)

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो अगर दुकान में कोई हुआ तो हम दोनों जैसा बिल्कुल भी नहीं करेंगे बस मौका मिलेगा तो ही यह सब करना है जरूरी नहीं है कि जो काम की मन में ठान कर जा रहे हैं उसे किसी भी हालत में पूरा ही करना है,,,,।

लेकिन यह सब होगा कैसे,,,,,(कुछ देर सोचने के बाद वहां हाथ में लिया हुआ कप टेबल पर रखते हुए बोली,,,) मेरा मतलब है कि हम दोनों साथ में जाएंगे तो क्या उसे शक नहीं होगा...?

मैं जानता था तुम यही कहोगी मैं अपने मन में सब सोच रखा हूं हम दोनों साथ में जाएंगे ही नहीं मैं तकरीबन अर्धा घंटा पहले ही दुकान पर पहुंच जाऊंगा और दर्जी को सबकुछ समझा दूंगा,,,, कोई दिक्कत नहीं होगी,,,,।



मुझे तो बहुत डर लग रहा है,,,!

इसमें डरने की कोई जरूरत नहीं है जरा यह सोचो अगर हम दोनों सफल हो गए तो कितना मस्त अनुभव होगा जिंदगी भर याद रहेगा और यह भी तो सोचो तुम अपनी गर्म जवानी से उस दर्जी की हालत खराब कर दोगी,,,,,।

अगर वह भी कुछ करने की कोशिश किया तो।

साले का मुंह तोड़ दूंगा तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो,,,,। कल ही डिलीवरी लेने जाना है कुछ में मन में फिट कर लिया हूं कैसे क्या करना है तुम बस एक ग्राहक के तौर पर ही वहां जाना बाकी सब कुछ में संभाल लूंगा,,,।

अंकित मुझे तो डर लग रहा है तो कुछ ज्यादा ही नहीं हवा में उड़ रहा है।

कल तुम्हें पता चलेगा की हवा में उड़ने में कितना मजा आता है तुम्हारी जवानी का जोश ही मुझे पागल बना रहा है,,,(अंकित एकदम से हाथ आगे बढ़कर अपनी मां की चूची को ब्लाउज के ऊपर से दबाते हुए बोला)

तू सच में बहुत पागल हो गया है,,,,।

क्या करूं तुम्हारी गदराई जवानी का नशा ही कुछ ऐसा है कि एक बार दिमाग पर चढ़ जाता है तो उतरने का नाम ही नहीं लेता,,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा हंसने लगी उसे इस बात की खुशी थी कि उसका बेटा पूरी तरह से उसकी जवानी की कैद में गिरफ्त हो चुका था,,, उम्र के ईस पड़ाव पर पहुंच चुकी औरत को और क्या चाहिए जब एक जवान लड़का पूरी तरह से उसकी जवानी के नशे में डूब गया हो दिन रात उसे पाने की कोशिश करता हो और उसमें अपना सुख ढूंढता हो यही तो सुगंधा को भी चाहिए था,,,,,,,, अपने बेटे की बात सुनकर सुगंध चाय का खाली कप टेबल पर से उठाते हुए और खुद भी कुर्सी से उठते हुए बोली,,,)

Ankitor uski ma



चल अच्छा रहने दे जब देखो तब अपनी मनमानी पर उतारू रहता है,,,,, किसी दिन किसी को पता चल गया ना तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा,,,,

(सुगंधा हाथ में चाय का खाली कब लिए हुए उसे घर के पीछे की तरफ ले जाने लगी क्योंकि कुछ बर्तन वहां भी रखे हुए थे धोने के लिए,,,,, लेकिन वहां पर पहुंचते ही वह,,,, झूठे बर्तन में चाय का कप रखते हुए अपनी साड़ी उठाकर पेशाब करने के लिए बैठ गई तब तक पीछे से अंकित भी पहुंच गया था अपनी मां को पेशाब करते हुए देखकर उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखते ही उसकी आंखों में मदहोशी छाने लगी और वह एकदम से, अपनी मां के पीछे पहुंच गया और अपना एक हाथ उसकी दोनों टांगों के बीच से ले जाते हुए अपनी हथेली को एकदम से उसकी बुर पर रख दिया जिससे उसकी पेशाब रुक गई और पेशाब की धार उसकी हथेली को पूरी तरह से भिगो दी अंकित की ईस हरकत पर सुगंधा एकदम से चौंक गई और बोली,,,)

तू सच में एकदम हरामी हो गया है क्या कर रहा है मेरी पैसाब रोक दिया,,,, हटा अपनी हथेली,,,,।

मुझे बताई क्यों नहीं कि तुम मुतने जा रही हो,,,।

पागल हो गया क्या आप सब कुछ तुझसे बता कर करूंगी,,,,।

करना चाहिए था ना क्योंकि मेरा बड़ा मन कर रहा था तुम्हारी बुर चाटने को,,,,।

तो चाट लिया होता,,,, (सुगंधा भी अपने बेटे की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोली) इस तरह से पेशाब रोकने की जरूरत क्या है और अब हाथ हटा मुझे पेशाब करना है,,,,.



ऐसे नहीं पहले बताओ की बुर चटवाओगी कि नहीं,,,,

तू सच में पागल हो गया है मैंने कभी इंकार की हूं क्या,,,,?

यह हुई ना बात,,, (इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां की बुर पर से अपनी हथेली को हटा लिया लेकिन अपनी हथेली को अपनी मां की बुर के सिधान से बिल्कुल भी नहीं हटाया,,,,, और बोला,,,) अब मुतो,,,

(अपने बेटे की हरकत से उसकी बातों से सुगंधा उत्तेजना से गदगद हो गई थी उससे बड़े जोरों की पेशाब लगी थी जिसे उसके बेटे ने ही रोक दिया था इसलिए वह चाहते हुए भी अपनी पेशाब को नहीं रोक पाई और उसकी बुर से फिर से पेशाब की धार फूटने लगी क्योंकि उसके बेटे की हथेली पर पड़ने लगी सुगंध को समझ में नहीं आ रहा था कि इतने में उसके बेटे को कौन सा मजा मिल रहा है लेकिन यह तो अंकित ही जानता था कि अपनी मां की बुर से निकलने वाली पेशाब की धार को अपनी हथेली पर महसूस करके उसे कितना उत्तेजना का अनुभव हो रहा था उसका लंड खड़ा हो गया था,,,,, वह पूरी तरह से मस्त हो गया था,,, लेकिन सुगंधा शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी,,,, वह पूरी तरह से पेशाब नहीं कर पाई थी और अपनी पेशाब को रोक दी थी , क्योंकि उसे शर्म महसूस हो रही थी और वह अपने बेटे की हथेली पर मुतना नहीं चाहती थी,,, इसलिए अधूरे पर ही वह उठकर खड़ी हो गई,,,,, लेकिन अंकित का मन कहां मानने वाला था वह अपनी मां की बुर से पेशाब की बुंदो को चखना चाहता था उसके स्वाद का मजा लेना चाहता था,,,,, और जैसे ही उसकी मां उठ कर खड़ी हुई वह अपनी साड़ी को नीचे गिराती ईससे पहले ही अंकित अपनी मां की साड़ी को कमर से ही पकड़ लिया और उसे इस स्थिति में एकदम से दीवार से सटा दीया जहां पर उसकी मां पेशाब कर रही थी,,,,,

Ankit or uski ma



शाम का समय था घर के पीछे बड़ा सा मैदान था जो कि निचले स्तर पर था वहां पर कुछ बच्चे खेल रहे थे,,,,, जिनका शोर उन दोनों को एकदम साफ सुनाई दे रहा था लेकिन जिस तरह से अंकित ने अपनी मां की कमर पर ही उसकी साड़ी पकड़कर उसे दीवार से सटाया था,,, सुगंधा की सांसें ऊपर नीचे हो गई थी,,, वैसे भी इस समय वहां साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी इसलिए सारा काम आसान नजर आ रहा था सुगंधा की सांसों पर नीचे हो रही थी वह बेहद गहरी चल रही थी और गहरी जल्दी सांसों के साथ ही उसके ब्लाउज में तने हुए उसकी दोनों चूचियां भी ऊपर नीचे हो रही थी और जिस तरह से वहां अपने बेटे की तरफ देख रही थी उसकी आंखों में भी मदहोशी और जवानी का नशा एकदम साफ दिखाई दे रहा था। वह जानती थी कि इस समय उसका बेटा क्या करने वाला है लेकिन इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी बुर पर उसकी पेशाब की बूंदे अभी भी लगी हुई है और अगर उसका बेटा उसकी बुर चाटेगा तो उसकी पेशाब की बुंद को भी चाट जाएगा,,,, लेकिन वह ईस समय अपने बेटे को रोक नहीं सकती थी,,,,, और देखते ही देखते अंकित अपने घुटनों के बल बैठकर,,, अपने होठों को अपनी मां की गुलाबी बुर से सटा दिया,,।

और उसे चाटना शुरू कर दिया, अंकित विश्वास को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की बुर पर पेशाब की बुंद लगी हुई है और वह खुद उसका स्वाद लेना चाहता था इसलिए वह पूरी तरह से आनंद के सागर में डूबने लगा क्योंकि उसकी मां की बुर पर लगे हुए पेशाब की बूंद का स्वाद एकदम खारा नमकीन था वह तो पागलों की तरह अपनी मां की बुर को चाटना शुरू कर दिया अपने दोनों हाथों को उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर रखकर उसे दबाते हुए उसकी बुर चाट रहा था अपने बेटे की बुर चटाई से सुगंधा एकदम आनंदित हो उठी और तुरंत अपनी टांग उठा कर उसके कंधे पर रख दे और वह भी अपने दोनों हाथों से अपने बेटे का कर पकड़ कर उसे अपनी बुर पर दबाना शुरू कर दी,,,,, अपनी मां का जोश देखकर अंकित की हालत खराब हो रही थी और उसकी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी वह भी पागलों की तरह अपनी मां की बुर को चाटना शुरू कर दिया था जितना हो सकता था उतना अपना जीभ अंदर की तरफ ले जाकर उसकी मलाई चाट रहा था।

लेकिन तभी सुगंधा के बदन में सनसनाहट फैलने लगी उसे महसूस होने लगा कि वह अपने पेशाब को अधूरा ही छोड़ दी थी जो कि इस समय जोर मार रहा था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें और जिस तरह से उसका बेटा उसकी बुर चाट रहा था पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी,,,,, और उसे महसूस होने लगा था कि उसकी पेशाब अब हुई तब हुई ऐसे हालात पर पहुंच चुकी थी वह अपने आप पर बहुत काबू करने की कोशिश कर रही थी लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था क्योंकि उसके बेटे की थी उसकी बुर में सनसनी फैला रहा था जिससे वह बेकाबू हुई जा रही थी। और लाख रोकने के बावजूद भी वह अपने पेशाब के जोर को रोक नहीं पाई और अगले ही पल भर भला कर उसकी बुर से पेशाब की बार फूटने लगी जो सीधा उसके बेटे के मुंह में गिर रही थी,,,,, शुरू में तो अंकित को समझ में ही नहीं आया कि यह क्या हो रहा है लेकिन जैसे उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसकी मां की बुर से पेशाब की धार फुट रही है तो वह एकदम से तर गया वह एकदम से मदहोश हो गया और अपने मुंह को पूरी तरह से खोल दिया,,,,, और अपनी मां की बुर से निकलने वाली नमकीन धार को अपने गले के अंदर उतरने लगा यह सब सुगंधा अपनी आंखों से देख रही थी उसकी आंखों में मदहोशी खुमारी छा रही थी वह पूरी तरह से पागल हुए जा रही थी,,,,,

वह पूरी कोशिश की थी अपनी बुर से निकलने वाली पेशाब की धार को रोकने के लिए और उसकी यह कोशिश कुछ हद तक पेशाब की धार को रोकने में कामयाब होती नजर आ रही थी लेकिन धार इतनी बेकाबू थी कि वह सफल नहीं हो पाई रुक-रुक के उसके बेटे के मुंह में गिरती रही और जब उसे लगने लगा कि अब उससे नहीं संभल पाएगा तो वह एकदम से छूट गई और गहरी सांस लेते हुए अपनी पेशाब की धार को अपने बेटे के मुंह में गिरने लगी और उसका बेटा उसे अमृत की धार समझ कर अपनी गले के नीचे लेने लगा वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था मदहोश हो चुका था आज पहली बार उसे इस तरह से आनंद प्राप्त हो रहा था वरना वह अपने मां की बुर की चटाई तो बहुत बार कर चुका था लेकिन पहली बार उसके पेशाब का स्वाद ले रहा था और यह अनुभव सुगंधा के लिए भी पहली बार का था। मां बेटे दोनों पूरी तरह से मदहोश हो चुके थे सुगंधा के मुंह से तो शिसकारी की आवाज फूट रही थी,, और बड़े तेजी से फूट रही थी क्योंकि वह जानती थी कि इस समय उसकी शिसकारी की आवाज बच्चों के खेल के शोर में दब जाएगा,,,, इसलिए को खुलकर मजा ले रही थी।

पूरी तरह से तृप्त होने के बाद अंकित अपनी मां की बुर पर से अपने होठों को हटाया और गहरी सांस लेता हूं अपनी मां की तरफ देखने का मां बेटे दोनों की नजर आपस में टकराई और सुगंध शर्मा से पानी पानी होने लगी,,,, अपनी मां की दोनों जांघों को कस के पकडते हुए अंकित उठकर खड़ा हो गया,,,,, उसकी आंखों में चार बोतलों का नशा दिखाई दे रहा था,,,, वह पूरी तरह से उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंच चुका था जिसका एहसास सुगंधा को हो रहा था क्योंकि इस समय उसका हाथ उसके पेंट के आगे वाले भाग पर था ,जिसमें विशाल तंबू बना हुआ था,,,, अंकित अपनी मां के मुंह को अपने हाथ से पकडते हुए बोला,,,।

आज क्या पिला दी मेरी रंडी मेरा लंड पागल हुआ जा रहा है,,,, चल घूम जा,,,, (उसके कंधे पकड़कर उसे घूमाते हुए बोला सुगंधा भी बिल्कुल भी देर नहीं की दीवार की तरफ मुंह करके खड़ी होने में क्योंकि वह जानती थी कि आप उसका बेटा क्या करने वाला है उसकी बुर में भी आग लगी हुई थी,,, वह दीवार पकड़कर खड़ी हो गई थी उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी जिससे उसकी नंगी गांड एकदम से उजागर दिखाई दे रही थी और अंकित उस पर दो-चार चपत लगाता हुआ बोला,,,)

साली भोसड़ा चोदी तेरी गांड मुझे पागल बना देती है पता नहीं क्या हो जाता है मुझे,,,,,, (गांड पर चपत पर चपत लगाता हुआ अंकित बोले जा रहा था और सुगंधा नजर पीछे घूमर अपनी गांड की तरफ देखते हुए,, आहहहह आहहहहह,, ऊहहहहहह मां बोले जा रही थी,,,,,,, सुगंधा समझ गई थी कि उसका बेटा पूरी तरह से मदहोश हो चुका है आज उसकी जमकर चुदाई करने वाला है इसीलिए वह पीछे नजर घुमा कर अच्छी रही थी और अंकित अपने पेट की बटन खोलकर एक साथ अपनी अंडरवियर और पेंट को घुटनों तक नीचे खींच दिया,,,,, और उसका विशाल लंड फुंफकारने लगा,,,,, जिसे वह हाथ में पकड़ कर किसी हथौड़े की भांति अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड पर पटकने लगा जो कि इस समय चपत लगाने की वजह से टमाटर की तरह लाल हो चुकी थी,,,, अंकित जिस तरह से अपने मोटे लंड को अपनी मां की गांड पर पटक रहा था सुगंधा को अपनी गांड पर किसी हथोड़े के ही माफिक चलने का एहसास हो रहा था,,, वह मस्त हुए जा रही थी।

और फिर देखते ही देखते अंकित अपनी मां की गांड की एक भाग को पड़कर थोड़ा सा खींचते हुए उसके गुलाबी छेद को देखने लगा और जैसे ही उसकी गुलाबी गली नजर आई,, अंकित अपने मतवाले सांड को गली में घुसने के लिए उसे रास्ता दिखा दिया,,, और अगले ही पर गली गीली पाकर अंकित का लंड पहले प्रयास नहीं अंदर तक घुस गया और अंकित अपनी मां की कमर पकड़ कर उसे चोदना शुरू कर दिया,,,, एक बार फिर से अंकित घर के पीछे खुले में उजाले में अपनी मां की चुदाई कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि यहां पर भी उसे देखने वाला कोई नहीं था क्योंकि घर के पीछे बड़ा मैदान था और उसमें बच्चे खेल रहे थे उन बच्चों का शोर सुगंधा की मदमस्त शिसकारी की आवाज को दबा दे रही थी।

अंकित अपनी मां को हुमच हुमच कर चोद रहा था,,,, उसे बहुत मजा आ रहा था अपनी मां की जवानी का स्वाद उसके होठों पर अभी भी लगा हुआ था जिसे वह बार-बार अपनी जीभ बाहर निकाल कर अपने होठों से चाट ले रहा था। अंकित अपनी जवानी के जैसे अपनी मां को पूरी तरह से हिला दे रहा था, सुगंधा को भी मजा आ रहा था अपने बेटे का जोश देखकर वह भी अपनी बड़ी-बड़ी गांड को पीछे की तरफ दे मार रही थी,,,, तकरीबन 20 मिनट की जबरदस्त चुदाई के बाद मां बेटे दोनों झड़ने लगे,,,,,, दोनों मस्त हो चुके थे। दोनों संतुष्ट होने के बाद साथ में बैठकर बर्तन भी मांज रहे थे,,,, सुगंधा और उसका बेटा कल के दिन के लिए बेताब नजर आ रहे थे एक अलग अनुभव के लिए।
 
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