Incest मेरी बीवियां, परिवार..…और बहुत लोग… - Page 8 - SexBaba
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Incest मेरी बीवियां, परिवार..…और बहुत लोग…

40th Update (लता की कामुकता)

दीपू: तो मैं क्या करूँ?

वसु: करना क्या है? जैसे तेरा मन करे वो कर... तू जो भी निर्णय लेगा उसमें मेरी सहमती होगी. तू उसकी चिंता मत कर.


अब आगे..

दिन ऐसे ही गुज़रते रहते है जहां ऑफिस में दीपू अपने काम से busy था तो वहीँ घर में भी अपनी २ बीवियां की खूब बजाता था. वसु का पेट अब थोड़ा फूलने लगा था और उसे आराम ही करने दिया करते थे. दिव्या और कविता ही दीपू का ख्याल रखती थी जैसे एक दिन रात को दीपू किचन में पानी पीने जाता है तो वहां दिव्या अपनी गांड मटकाते हुए दीपू के पास आती है. वो एकदम नंगी ही थी बस एक छोटी पैंटी पहने हुई थी.

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दीपू उसको देख कर कहता है: क्यों जानू कमरे में मेरा इंतज़ार करती. मैं वहीँ आ रहा था.

दिव्या: रह नहीं गया जानू इसीलिए यहाँ आ गयी और ऐसा कहते हुए वो दीपू को चूम लेती है जिसमें दीपू भी उसका पूरा साथ देता है. दोनों एक गहरी चुम्बन में जुड़ जाते है.

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थोड़ी देर बाद दीपू कहता है...जानू चलो कमरे में. अब तो मुझसे भी रहा नहीं जा रहा है और फिर उसे कमरे में ले जाता है जहाँ पर उसकी खूब बजाता है और दिव्या को पूरा थका देता है.

बात एक और थी की घर में सब को एक तरह से पता चल ही गया था की लता की हालत भी बुरी है और वो भी चुदाई के लिए बहुत तरस रही है क्यूंकि हर रात वो उनकी सिसकारियां सुनकर अपनी चूत ही मसलते रहती थी. उसकी हालत को देख कर वसु को भी थोड़ा दया आती थी क्यूंकि उसे भी पता था की औरत जब तन की आग में झूल रही है तो कैसा महसूस होता है.

एक दिन वसु दीपू से इस बारे में बात करती है तो दीपू कहता है की वो अपने तरफ से कोई कोशिश नहीं करेगा. अगर बुआ खुद उसके पास आये तो वो भी उसका साथ देगा. तभी जाकर बात कुछ आगे बढ़ सकती है.


ऋतू के घर में:

वहीँ दूसरी ओर ऋतू के घर में भी हालत कुछ ऐसे ही थे. जब से ऋतू ने दीपू का खड़ा लण्ड देखा था तब से वो एक तरह से बेचैन भी हो गयी थी. वो काफी बार सोचती है की निशा को बता दे लेकिन वो बात बताने से घबरा रही थी की आखिर निशा क्या सोचेगी उसके बारे में.

एक दिन रात को जब दोनों अपने आप को शांत कर के एक दुसरे की बाहों में सोये हुए थे तो निशा कहती है: क्या बात है माँ.... कुछ दिनों से देख रही हूँ की आपकी आग तो बहुत भड़क रही है. पहले तो ऐसा नहीं था. मैं कितना भी चूस लो आपको.... फिर भी आप काफी गीली रहती हो. क्या बात है? किसीको देख लिया है क्या? और ऐसा कहते हुए वो ऋतू की तरफ देख कर हस देती है.

ऋतू को अब लगता है की उसे निशा को बता देना चाहिए और क्या पता वो ही कुछ समाधान निकाल दे उसकी उत्तेजना के बारे में...

ऋतू कुछ सोचते हुए कहती है: क्या बताओं बेटी...पता नहीं तू मेरे बारे में क्या सोचेगी....

निशा ऋतू की तरफ आश्चर्य से देखते हुए कहती है... क्या बात है और मैं क्या सोचूंगी...

ऋतू: बात ये है बेटी की कुछ दिन पहले ऑफिस में कुछ काम के लिए मैं दीपू के कमरे में गयी थी तो वो फ़ोन पे बात कर रहा था शायद तुम्हारी माँ से.

निशा: तो इसमें बात क्या है?

ऋतू: बात ये ही बेटी की जब मैं उसके कमरे में गयी तो दीपू बहुत उत्तेजित और उत्साह लग रहा था और जब मेरी नज़र थोड़ी नीचे गयी तो देखा की उसका लण्ड उसके पैंट में पूरा तना हुआ है. इतना बड़ा लण्ड मैंने आज तक नहीं देखा और वो तो एक हथोड़े के माफ़िक़ लम्बा भी नज़र आ रहा था. जब से मैंने वो नज़ारा देखा है तब से मुझे भी चैन नहीं मिल रहा है.

निशा जब ये बात सुनती है तो तो आश्चर्य से अपना मुँह खोले हुए ऋतू को देखती रहती है और ऋतू भी शर्म से अपना सर घुमा लेती है.

निशा ऋतू के चेहरे को अपनी तरफ कर के: अब मुझे समझ में आया की आप इतनी उत्तेजित क्यों रह रही हो और आप हमेशा आपकी चूत से पानी क्यों निकल रहा है.

ऋतू इस बात पे कुछ नहीं कहती तो निशा कहती है... इसमें मेरा सोचना क्या है? बस यही की हम दोनों एक ही नाव पे सवार है... जितनी आग में मैं जल रही हूँ उतनी ही आग में आप भी जल रहे हो. फरक इतना है की आप काफी सालों से ऐसे हो और मुझे जब लगा की घर में खुशियां आएगी तो मेरा भी आप जैसे ही हाल हो गया है और उसकी आँखों से आंसू आ जाते है.

ऋतू निशा को देख कर वो भी रो देती है और कहती है.... कुछ नहीं बेटा..क्या पता ऊपर वाले ने हमारे लिए कुछ अच्छा सोच रखा होगा और ऐसा कहते हुए वो निशा को चूम लेती है तो निशा भी उसका पूरा साथ देते हुए दोनों एक दुसरे का रस चूस लेते है. अब ऋतू का मन हल्का हो गया था.

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निशा: एक बात कहूँ अगर आप बुरा ना माने तो.

ऋतू: अब बुरा क्या मानना है जब इतना कुछ हो गया है तो.

निशा: अगर आपको दीपू पसंद है तो...और इतना बोलते हुए निशा रुक जाती है जिसका मतलब दोनों समझ जाते है.

ऋतू निशा की ओर सवालिया नज़र से देखती है तो निशा हाँ में सर हिलाती है और कहती है: हम दोनों की हालत एक जैसी ही है. जितनी आग आप ने अपने अंदर छुपा राखी है शायद उतनी ही आग मेरे अंदर भी जल रही है. और जैसे में पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ की आप अपनी ये आग ज़बरदस्ती अपने अंदर रखे हुए है... अगर वो नहीं निकला तो आप ऐसे ही तड़पते रहोगे और ऐसा कहते हुए निशा ऋतू को अपने गले लगा लेती है.

ऋतू: तेरी बात तो सही है लेकिन पता नहीं दीपू या तुम्हारी मम्मी क्या सोचेगी और फिर दुनिया वाले क्या कहेंगे? और वैसे भी मेरी उम्र भी तुम्हारी माँ के उम्र के बराबर है.

निशा: दुनिया वालो की तो आप बात ही मत करो. रही बात आपकी उम्र की तो आपको तो पता ही है की अब दीपू ने आपकी उम्र के बराबर माँ से शादी भी कर लिया है और अब वो प्रेग्नेंट भी है. तो आप उम्र की बात ही ना करो. मैं भी एक बार माँ से बात करती हूँ. देखते है माँ क्या बोलती है. इस बात पे ऋतू कुछ नहीं कहती और फिर दोनों एक दुसरे की बाहों में सो जाते है.


दीपू के घर:

२ दिन बाद दीपू के घर में रात को सब खाना खा रहे होते है तो दीपू कविता को इशारा करता की वो उसके साथ सोने वाला है. कविता भी इशारे में हाँ कर देती है जो की दिव्या दोनों को देख लेती है और मन में सोचती है की आज कविता के बदन की टूटने की बारी है. खाना खा कर सब सोने की तैयारी करते है तो दीपू दिव्या से कहता है की वो वसु के साथ सोये. अगर उसे रात को कुछ ज़रुरत पड़ेगी तो वो उसकी मदत कर सकती है. दिव्या कुछ नहीं कहती और वो वसु को लेकर कमरे में सोने चली जाती है. वो वसु को कमरे में सुलाकर कहती है की वो २ Min में आएगी और दिव्या बाहर आकर दीपू को एक कोने में ले जाकर कहती है...

दिव्या: मैंने देखा है की तुम कविता को इशारा कर रहे थे. आज उसका पूरा बदन तोड़ देना और कल वो चलने के लायक नहीं रहे और ऐसा कहते हुए वो दीपू को आँख मार देती है.

दीपू: तुम तो मेरी एकदम समझदार बीवी निकली हो जा और वो दिव्या को चूम लेता है.

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दिव्या: अब और ज़्यादा नहीं और ऐसा कहते हुए वो दीपू को धक्का देकर अलग करती है और वसु के कमरे में गांड मटकाते हुए चली जाती है.

दीपू उसकी मटकती गांड को देख कर मन में सोचता है... क्या जानलेवा गांड है इसकी....

दीपू भी फिर कविता को लेकर दुसरे कमरे में चला जाता है और शायद दरवाज़ा बंद करना भूल जाता है. कमरे में जाते ही दोनों शुरू हो जाते है और दीपू कविता को लण्ड चूसने को कहता है तो कविता भी जैसे उसी का इंतज़ार कर रही थी और वो अपने घुटनों पे आकर दीपू का लण्ड बड़े जोश से चूसती रहती है.

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ठीक उसी वक़्त लता भी किचन में पानी पीने आती है और पानी पीकर जब वो अपने कमरे में जा रही थी तो वो दीपू और कविता को देख लेती है जहां कविता दीपू को खुश करने में लगी हुई थी. दीपू का बड़ा लण्ड देख कर लता की आँखें बड़ी हो जाती है और वो सोचती है की कितना बड़ा लण्ड है उसका और उसको याद करते हुए अपनी चूत मसलते रहती है.

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अंदर की वो दृश्य को देख कर उसकी उत्तेजना और भी बढ़ती जा रही थी. लता को तो एक बार लगा था की वो भी कमरे के अंदर चली जाए लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कमरे के अंदर जाने की और बाहर ही खड़े होकर अपनी चूत मसलते रहती है.

तभी लता को अपनी कमर पर हाथ का स्पर्श महसूस हुआ लता ने तुरंत चौंक कर देखा तो दिव्या थी जो उसे देखते हुए मुस्कुरा रही थी. हुआ यूं था की भले ही दिव्या वसु के साथ थी लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी (वसु गेहरी नींद में चली गयी थी)और सोची थी की एक बार वो भी दीपू के पास जा कर थोड़ा मजे ले ले.

लता तो दिव्या को देख कर उसके होश उड़ गए थे. उसे क्या कहना है समझ में नहीं आ रहा था क्यूंकि उसने सोचा नहीं था की दिव्या उसे रंगे हाथ इस हालत में उसे पकड़ लेगी. वो कुछ कहने वाली थी कि दिव्या ने उसे मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया.

दिव्या ने लता को थोड़ा एक तरफ किया और खुद कमरे के अंदर का नज़ारा देखा तो उसको हसी आ गयी, लेकिन उसकी चूत में भी नमी आने लगी। दिव्या ने कुछ पल देखा और फिर उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई, उसने तुरंत चेहरा हटाया और लता को देखा. लता उसे ही देख रही थी, दोनों के बीच जैसे आँखो में ही सब बातें हो गईं और इस बार दिव्या ने पहल करते हुए आक्रामकता दिखाते हुए लता को दीवार की ओर ढकेल दिया और उसके होंठों पर टूट पड़ी।

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लता को तो कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है. लता जब अपने होंठ बंद ही रखी थी तो दिव्या अलग हो कर कहती है... मुझे पता है बुआ की आप भी बहुत प्यासी हो और हम सब को देख कर आप भी अपनी आग में जल रही हो. हम सब को इस बारे में पता है. लता ये बात सुनकर थोड़ा शर्मा जाती है तो दिव्या कहती है: इसमें शर्माने की क्या बात है? हमें तो अब भी आश्चर्य है की आप अब तक अपने आप को संभाल कर राखी हो. और वैसे भी एक बात बताऊँ?

लता: क्या?

दिव्या: यही की दीपू को भी ये बात पता है की आप बहुत प्यासी हो लेकिन हमारा पति थोड़ा संस्कारी है. वो आपके पास नहीं आएगा. आपको ही उसके पास जाना है और लता की साडी के अंदर हाथ दाल कर उसकी चूत को सहलाते हुए कहती है...आप ना भी बोलो तो आपकी चूत बता रही है की आप भी अंदर जाना चाहती हो और फिर ऐसा कहते हुए दिव्या फिर से लता के होंठों पे टूट पड़ती है.

लता भी तुरंत इस बार उसका साथ देने लगी, दोनों पागलों की तरह एक दूसरे के होंठों को चूस रही थीं और अंदर दीपू और कविता अपने उत्तेजना में लगे थे.

लता और दिव्या बाहर एक दूसरे को चूसते हुए अपनी उत्तेजना को संभालने की कोशिश कर रहीं थी और तब तक चूसती रहीं जब तक दोनों के लिए सांस लेना तक मुश्किल नहीं हो गया.. फिर जाकर दोनों के होंठ अलग हुए.

अंदर अब दीपू कविता को बिस्तर पे सुला कर उसकी चूत पे टूट पड़ता है और अपनी जुबां से उसकी चूत को चूसते हुए अपना एक ऊँगली उसकी गांड में भी दाल देता है. कविता भी उत्तेजना में आकर दीपू का सर अपनी चूत पे दबा देती है और वो ज़ोर ज़ोर से आंहें भर्ती रहती है...

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कविता: तुम जितनी बार भी मेरी चूत चूसते हो तो ऐसा लगता है की पहली बार तुम मेरी चूत चूस रहे हो. तुम तो मेरी चूत चूस कर ही मुझे झडा देते हो और इस बार भी कोई अलग नहीं है और ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी जुबां और मेरी चूत के बीच एक चुम्बक और लोहे का रिश्ता है. मेरी चूत देखते ही तुम्हारा मुँह उस पर लगा देते हो... लेकिन एक बात कहूँ तो मुझे भी बहुत अच्छा लगता है और ऐसे ही मेरी चूत चूसते रहो और ऐसा कहते हुए कविता फिर से झड़ जाती है और उसका पानी दीपू बड़े चाव से पी जाता है.

दीपू: जानू मेरा भी कुछ ऐसे ही हाल है... जितनी बार भी तुम मुझे अपनी चूत का पानी पिलाती हो उतना ही मुझे पीने का मन करता है.

अंदर की तरह कमरे के बाहर भी उत्तेजना अभी भी चरम पर थी दिव्या ने लता के पल्लू को नीचे सरका दिया था. लता का नंगा पेट और ब्लाउज़ में बंद उसकी मोटी मोटी चूचियां उसके सामने थीं. दिव्या लता के आगे बैठी थी और उसके मांसल कामुक पेट को चाट और चूम रही थी, लता भी दिव्या के चूमने चाटने से मचल रही थी आहें भर रही थी

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लता की साँसें भारी हो चुकी थीं। दिव्या उसके पेट को चूमते-चाटते हुए नीचे झुकी हुई थी और लता की आँखें आधी बंद हो गई थीं। उसकी मोटी चूचियाँ ब्लाउज़ में तनी हुई थीं और पेट पर दिव्या की गर्म साँसें पड़ रही थीं।

“ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई... दिव्या...” लता की आवाज़ काँप रही थी और धीरे धीरे सिसकारियां ले रही थी “अह्ह्ह्ह बहुत अच्छा कर रही है तू अह्ह्ह्ह... थोड़ी नीचे जा और चाट जा मेरी चूत को ..

दिव्या लता की बात का इंकार करते हुए उसकी जीभ को लता की गहरी नाभि के चारों ओर घूम रही थी — धीरे-धीरे, स्वाद लेते हुए। उसने नाभि में जीभ घुसा दी, फिर बाहर निकाली और पेट की नरम मांसलता को चूमने लगी। लता की उत्तेजना अब चरम पर थी।

थोड़ी देर बाद लता की बात मानते हुए उसके पेट को चूमते हुए थोड़ा नीचे जाती है तो देखती है की उसकी चूत की जगह उसकी साडी थोड़ी भीगी हुई है जो बता रहा था की लता की चूत अपना रस छोड़ रही है.

दिव्या: क्या बात है बुआ... आपकी चूत तो बहुत पानी छोड़ रही है.

लता: हाँ क्यों नहीं... अंदर का दृश्य ही ऐसा है... ऐसे दृश्य तो मैं रोज़ देखती हूँ तुम सब की... तो मेरी चूत तो गीली होगी ही ना. इस बात पे दिव्या हस देती है और फिर बड़े प्यार से लता की चूत को साडी के ऊपर से ही चूसने लग जाती है.

लता: ऐसे ही चाट मेरी चूत को... बहुत दिनों से परेशान कर रखी है इसने. आह्ह...

अंदर कविता भी ऐसे ही सिसकियाँ ले रही थी जहाँ दीपू उसकी चूत और गांड को चाट रहा था. अब दोनों जगह माहौल बहुत गरम हो चूका था... जहाँ दीपू अपनी बीवी को खुश कर रहा था तो वहीँ दिव्या भी अपनी बुआ को खुश कर रही थी.

कविता: हाँ जानू ऐसे ही... तुम जितनी भी मेरी चूत और गांड चाटते हो मेरा मन नहीं भरता है... अह्ह्ह.. आह्ह्ह.. ओहहह ओहहह.”

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दिव्या फिर साडी को ऊपर कर के अपनी जीभ को लता की चूत में डालते हुए कहती है… सोचा नहीं था की आपका पानी इतना मीठा और थोड़ा खट्टा भी रहेगा. दीपू को पीने में मजा आएगा. दिव्या जब ये बात कहती है तो लता एकदम आश्चर्य से दिव्या की तरफ देखती है जैसे पूछना छा रही हो की क्या बात कर रही हो..

लता: क्या बोल रही है तू?

दिव्या: देखते जाओ आगे क्या होता है और फिर से दिव्या लता की चूत को चाटने लगती है और इस बार अपनी २ उंगलियां उसकी रस से बहती चूत में दाल देती है जो की बड़ी मुश्किल से अपनी उंगलियां अंदर दाल पाती है. लता की तो जैसे सांस ही रुक गयी थी. बहुत दिनों बात किसीने उसकी चूत से खेला और खोला था... उसकी चूत तो जैसे एकदम बंद ही हो गयी थी.

दिव्या: क्या बात है बुआ आपकी चूत तो बहुत टाइट है... मेरी उंगलियां को बड़ी मुश्किल से अंदर दाल पायी.

लता: जब इतने दिनों से ये चूत से बंद थी और सिर्फ अपनी उँगलियों से काम चला रही थी तो टाइट तो होगी ही ना... लता भी अब आहें भरने लगती है… अह्ह्ह्ह... आह्ह...

लता की आँखें और भी ज्यादा मुंद गईं। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी सुकून दिख रहा था — शर्म, उत्तेजना और एक अंधेरी इच्छा का मिश्रण।

“अह्ह्ह्ह... कितना मजा आ रहा है दिव्या... मैं भी इसी ख़ुशी के लिए तरस रही थी.

दिव्या: ये ख़ुशी तो कुछ नहीं है बुआ... अलसी ख़ुशी तो अंदर कविता ले रही है... देखो.. और फिर दोनों अंदर देखते है जहाँ अब दीपू कविता की टांगों को अपने कन्धों पर रख कर ज़ोरदार कविता की चुदाई कर रहा था. कविता तो जैसे आसमान में पहुँच गयी थी.

दिव्या: अंदर जो देख रही हो बुआ... उसे असली ख़ुशी कहते है. आपको भी लेना है ऐसी ख़ुशी? लता इस बात पे कुछ नहीं कहती. दिव्या फिर लता का सर पकड़ कर उसके होंठ पे टूट पड़ती है और दोनों में एक ज़ोरदार और गहरा चुम्बन होता है.

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दिव्या भी अब अंदर का नज़ारा देख कर बहुत बेहक गयी थी और वो भी अब रुकने वाली नहीं थी।

उसने लता की मोटी-मोटी चूचियों को जोर से मसलना शुरू कर दिया — ब्लाउज़ के ऊपर से ही। चूचियाँ बहुत टाइट थी । वो उन्हें दबाती, मसलती, और फिर अंगूठे से निप्पलों को दबाती। लता के मुँह से आहें निकल रही थीं।

“आह्ह्ह... दिव्या... आह्ह्ह...”

दिव्या के हाथ अब लता के ब्लाउज़ के बटनों पर आ गए और एक-एक करके बटन खोलने लगी।

और देखते ही देखते उसने लता का पूरा ब्लाउज खोल दिया और ऊपर से उसे नंगा कर दिया.

लता ने खुद ही ब्लाउज़ को अपनी बाजुओं से निकाल कर नीचे गिरा दिया।

लता की मोटी-मोटी चूचियाँ — भारी, गोल, निप्पल खड़े हो चुके — दिव्या के सामने थे। पेट नंगा, नाभि गहरी, और नीचे साड़ी अभी भी कमर पर बँधी हुई।

दिव्या ने लता को देखा — पूरी तरह नंगी ऊपर से — और फिर से उसके होंठों पर टूट पड़ी।

इस बार चुम्बन और भी आक्रामक था।

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दोनों के होंठों की कुश्ती कुछ देर चली। दिव्या और लता एक-दूसरे के होंठों को चूस रही थीं, जीभें आपस में लिपट रही थीं, साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं। चुम्बन गहरा और गीला था — होंठों से निकलती चूसने की आवाज़ें अब धीरे धीरे वहां भी हलकी गूँज रही थी । दिव्या के हाथ लता की नंगी कमर को कसकर पकड़े हुए थे और लता के हाथ दिव्या की पीठ पर घूम रहे थे। दोनों के बदन गर्म हो चुके थे.

कुछ देर बाद अब बारी थोड़ी पलट गयी थी. लता ने दिव्या की मोटी मोटी चूचियों पर हमला बोला.

उसने दिव्या की एक भारी चूची को दोनों हाथों से पकड़ लिया — उसकी चूची मोटी तो थी (और ये सब दीपू के कारनामे का नतीजा था) लेकिन एकदम ठोस और तनी हुई थी और उसमें कोई ढीलापन नहीं था. वो उसे जोर-जोर से मसलने लगी, उंगलियाँ उसकी नरम मांसलता में धँसती जा रही थीं। निप्पल खड़ा हो चुका था और लता ने उसे अंगूठे और तर्जनी के बीच दबाकर घुमाना शुरू कर दिया। दिव्या के मुँह से एक गहरी आह निकली।

लता ने दिव्या की दूसरी चूची को भी हाथ में लिया और एक-एक करके मसलते हुए दोनों को बारी-बारी से चूसना शुरू कर दिया। पहले बाईं चूची को मुँह में भर लिया जो एकदम गर्म और नरम थे. वो जोर से चूस रही थी, जीभ से निप्पल को घुमाती हुई, कभी हल्के से दाँतों से दबाती हुई। फिर दूसरी चूची पर चली गई। एक को मसलती, दूसरी को चूसती, और फिर बदल कर दूसरी को मसलने लगती।

दिव्या का बदन काँप रहा था। उसके मुँह से लगातार आहें निकल रही थीं।

“अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह बुआ जी... अह्ह्ह्ह ऐसे ही चूस ले मेरा सारा दूध अह्ह्ह्ह... कुतिया... काट मत...” दिव्या की आवाज़ काँप रही थी.. लेकिन उसमें एक गहरी इच्छा थी। (लता और दिव्या इतनी जोश और गरम हो चुकी थी की उसे इस बात का एहसास भी नहीं हुआ की उत्तेजना में उसने कुतिया कहा था.)

लता ने दिव्या की बातें सुनकर और भी जोश में आ गई। अब दोनों की चूत में गर्मी और बढ़ गई। दिव्या की “कुतिया” वाली बात ने उसे और उत्तेजित कर दिया। वो बिना रुके दिव्या की चूचियों को मसल रही थी — जोर-जोर से दबाती, मसलती, और फिर मुँह से चूसती। एक चूची को पूरी तरह मुँह में लेकर चूसती, जीभ से निप्पल को चाटती, और दूसरी को हाथों से मसलती। फिर बदल कर दूसरी चूची पर हमला बोल देती। दिव्या की चूचियाँ अब लाल हो चुकी थीं, निप्पल चूसने से और भी खड़े और नुकीले हो गए थे ।

ऐसा ही कुछ दृश्य अंदर कमरे में भी था. अब कविता दीपू के लण्ड पे सवारी कर रही थी. दीपू बिस्तर पे लेता हुआ था और कविता उसके लण्ड पे बैठ कर उछल उछल कर चुद रही थी.

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बाहर लता ने भी दिव्या का ब्लाउज़ उतार दिया था। अब दोनों ही ऊपर से बिल्कुल नंगी थीं। दिव्या की मस्त चूचियाँ हवा में झूल रही थीं और लता के हाथ उन पर घूम रहे थे। लेकिन दोनों के होंठ फिर से एक-दूसरे में समाए हुए थे — और भी गहरा, और भी गीला चुम्बन चला दोनों का । दोनों अपने हाथ को एक दुसरे की चूचियों और गांड पे घुमा रहे थे।

दोनों की जीभ एक दुसरे के साथ गुथम घुता हो रहे थे... मतलब दोनों एक दुसरे का रस चूस और चाट रहे थे. दोनों की साँसें भारी थीं और चुम्बन की गीली आवाज़ें अब और भी तेज़ हो चुकी थीं।

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दोनों एक-दूसरे को ऐसे चूम रही थीं जैसे बरसों पुरानी प्रेमिकाएँ हों — गहरा, धीमा और भूखा चुम्बन। उनके होंठ आपस में दब रहे थे, जीभें धीरे-धीरे लिपट रही थीं और चूसने की गीली आवाज़ें कमरे के बाहर हल्की-हल्की गूँज रही थीं। साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं और दोनों के बदन गर्मी से चिपक चुके थे।

लता भी खुलकर आनंद ले रही थी क्यूंकि बहुत दिनों के बाद उसे ये एहसास और ख़ुशी मिल रही थी. दिव्या ने लता के होंठों को छोड़ा। दोनों की साँसें भारी थीं। दिव्या ने लता को धीरे से पलटा दिया — अब लता की पीठ उसकी ओर थी।

दिव्या ने उसके बदन को साड़ी के ऊपर से ही मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ लता की पीठ से शुरू होकर कमर तक फिसलते गए. फिर ऊपर आकर कंधों को दबाने लगे। लता आहें भरने लगी — हल्की, काँपती हुई आहें।

“आह्ह्ह... दिव्या …आआआआ”

दिव्या ने लता का सर अपनी ओर घुमा दिया और फिर उसकी चूची को मसलते हुए फिर से उसके होंठों पे टूट पड़ी. अब लता पे दोहरा हमला हो रहा था... होंठों पे और चूचियों पे. लता ये दोहरा हमला झेल नहीं पायी और दिव्या के इस हरकत से ही उसका पानी निकल गया जो की जांघ से बेह रहा था.

दिव्या फिर भी लगी रही और लता की मोटी मोटी चूचियों पे हमला बोल दिया और जोर-जोर से दबाती, मसलती, और उँगलियों से निप्पलों को महसूस करती.

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लता दिव्या की बाहों में पूरी तरह पिघल रही थी। उसका बदन ढीला पड़ चुका था, सिर थोड़ा पीछे झुका हुआ, और आँखें आधी बंद। हर मसलने पर उसके मुँह से हल्की-हल्की आहें निकल रही थीं।

“आह तेरी ये चूचियां अह्ह्ह्ह बुआ जी...” “जी करता है इन्हें पूरा निचोड़ लूं...”

लता अब गहरी सांसें लेते हुए और उत्तेजित होते हुए:“आह्ह्ह्ह... ओह्ह्ह... निचोड़ लो न आह्ह... किसने रोका है...”

दिव्या ने और जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ अब और आक्रामक हो चुके थे।

“आह निचोडूंगी... पूरा निचोड़ लूंगी... आज आपकी पूरी कसर और आग पूरी तरह से मैं अपनी ओर से निकाल दूँगी..”. और बाकी का काम दीपू करेगा और ऐसा कहते हुए दिव्या उसके चूचियों को और ज़ोर से दबाती और मसलती रहती है”

लता का बदन और भी ज्यादा काँप उठा। उसकी चूत में गर्मी और बढ़ गई।

“अह्ह्ह्ह हां सीईईई दिव्या... मेरे बदन से खेलो... मसलो मुझे...”

अब लता अपने आप को दिव्या को समर्पण कर चुकी थी क्यूंकि उसकी आग इतनी भड़क चुकी थी.

अंदर का हाल भी कुछ ऐसा ही था. दीपू अब कविता को घोड़ी बना कर उसके बाल पकड़ कर पीछे से उसे चोद रहा था और कविता पूरी ज़ोर से सिसकारियां लेते हुए मजे ले रही थी.

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दीपू भी काफी देर से कविता को चोद रहा था और अब उससे भी रहा नहीं जाता और फिर ज़ोर से घुर्राते हुए वो दिव्या की चूत में ही अपना पूरा पानी गिरा देता है.

क्यूंकि दीपू के घुर्राने से लता और दिव्या अपना काम रोक कर कमरे में देखते है और वो दोनों दीपू का झड़ना देख लेते है . उसको देख कर दिव्या लता के कान में कहती है: देख रही हो बुआ... दीपू का माल... कितना गाढा है और कितना पानी छोड़ रहा है. बोलो अपनी उसका पानी लेना चाहोगी?

लता तो अब और भी उत्तेजित हो गयी थी.

“अह्ह्ह दिव्या... ओह्ह्ह... इतना पानी निकाला है उसने... मैंने कभी सोचा नहीं था... अब मुझे भी पता चल की वसु इतनी जल्दी पेट से कैसे हो गयी. उसका गाढा पानी जिस किसीकी चूत में जाएगा वो तो गाभिन हो ही जायेगी..”

लता ने दिव्या की बाहों में मचलते हुए कहा।

अब लता ने भी दिव्या को पूरा नंगा कर दिया और उसकी चूचियों को मसल और काट खा रही थी.

लता : तूने भी तो दीपू का रस चखा है ना.. तूने भी तो उसका पानी अपनी चूत में लिया है ना... तू अब तक गाभिन क्यों नहीं हुई? लता की बात सुनकर अब दिव्या भी काफी उत्तेजित हो गयी थी.

दिव्या: चिंता मत करो बुआ जी... वो दिन भी ज़्यादा दूर नहीं जब मेरे पेट में भी हम दोनों का बच्चा पलेगा और ऐसा कहते हुए लता को अपने सीने से लगा कर एक चूची उसके मुँह में ठूस देती है.

लता ने दिव्या के नंगे बदन को और भी जोर से मसलना शुरू कर दिया। उसके हाथ दिव्या की कमर से नीचे फिसलते हुए मोटे चूतड़ों तक पहुँच चुके थे। वो उन्हें दबाती, मसलती, और उँगलियों से गोलाई को महसूस करती हुई पूछी : तूने कभी गांड मरवाई है दीपू से?

लता की ये बात सुनकर ही दिव्या अपनी परम सुख में पहुँच गयी और वो भी अपना पानी छोड़ दिया. दिव्या लता की तरफ देख कर उसका हाथ ले जाकर अपनी चूत पे रख दिया. दिव्या का गीला और पानी छोड़ता हुआ चूत को महसूस कर के ही लता को पता चल गया था की दीपू ने दिव्या की गांड भी मारी है.

दिव्या: लगता है आपकी गांड को भी दीपू के लण्ड की ज़रुरत है. दिव्या की ये बात सुनते ही लता के बदन में एक ज़लज़ला पैदा हो गया और उसकी आँखों में एक तरफ से चमक आ गयी..

दिव्या: मेरी चूत तो एकदम गीली हो रही है यही सोचके की दीपू का लण्ड जब आपकी की गांड की सैर करेगा तो आपकी क्या हालत होगी? जब उसने पहली बार मेरी गांड मारी थी... उसने तो मेरे होश ही उदा दिए थे. तब से हर रोज़ जब भी दीपू मुझे चोदता है तो मेरी गांड ज़रूर मारता है.

दिव्या की ये बात सुनते ही लता की आँखों के सामने तुरंत वो दृश्य घूम गया जो अभी कुछ देर पहले दिव्या ने बताया था... की दीपू का लण्ड लता की गांड में गया तो वो क्या करने वाली है.

लता दीपू के लण्ड को याद करते हुए गहरी आह भर रही थी। आँखों में उत्तेजना और इच्छा साफ़ नज़र आ रही थी.

अब दोनों इतनी कामुक बातें और अंदर का नज़ारा देख कर इतने बेहक गए थे की उन्हें पता भी नहीं चला जब वो दोनों नंगी हो गयी और एक दुसरे की बदन को सेहला रहे थे उत्तेजित हुए..

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दिव्या जब अपना हाथ लता की चूत पे रखती है तो वो पाती है की लता की चूत भी उसकी चूत की तरह एकदम बेह रही है और एकदम गीली हो गयी है.

दिव्या: बुआ जी, आपकी चूत तो सच में सुलग रही है...

लता ने दिव्या की बाहों में और भी ज्यादा पिघलते हुए जवाब दिया: हां दिव्या मेरी चूत प्यासी है अहहुह्ह.. जब से तूने बताया है और मैंने भी दीपू का लण्ड देखा है मुझे नहीं लगता की मैं अब रह पाऊँगी.

लता: दिव्या जो आग इतने दिनों तक मेरे अंदर मैंने छुपा रखी थी लगता नहीं अब मैं और छुपा पाऊँगी. अगर दीपू का लण्ड नहीं लिया तो.... लता इतना ही बोलती है की दिव्या उसका मुँह बंद कर देती है और कहती है.... चिंता मत करो... जल्दी ही वो काम भी पूरा हो जाएगा.

लता की इतना ही कहना था की दिव्या झटके से कमरे के अंदर आ जाती है और वो भी पूरी नंगी. लता को कुछ समझ नहीं आता की दिव्या क्या कर रही है. दिव्या को ऐसा नंगा देख कर दोनों दीपू और कविता भी दांग रेह जाते है और उन्हें भी कुछ समझ नहीं आता की क्या हो रहा है और दिव्या ऐसे नंगी अंदर क्यों आयी है.

दिव्या: क्यों पति जी कविता को ठोक कर आराम कर रहे हो और जैसे लगता है की तुम मुझे भूल ही गए हो.

दीपू: अरे तुम्हे आज माँ के पास सोने को कहा था ना... सोचा आज अपनी इस बीवी को प्यार करूंगा और कल तुम्हे. तुम्हे तो पता है की अब माँ के साथ कोई होना चाहिए ना.

दिव्या: तुम्हारी बात भी सही है पति जी.... लेकिन लगता है आज तुम्हारी किस्मत बड़ी अच्छी है. आज तो आपको एक बम्पर ऑफर है.

दीपू को कुछ समझ नहीं आता तो वो और कविता दोनों एक दुसरे को देखते है और सवालिया नज़र से दिव्या को देखते है.

तब तक दिव्या कमरे से बाहर जाती है और और एक Min बाद लता जैसे कमरे में गिर जाती है. दिव्या कमरे से बाहर जाकर लता को अंदर जाने को केहती है तो लता मना कर देती है.

दिव्या हस देती है और केहती है... लगता है आप ऐसे नहीं मानोगे और वो लता को कमरे के अंदर धक्का दे देती है. लता अपने आप को संभालते हुए जब वो खड़ी हो जाती है तो तब तक देर हो गयी थी. वो दीपू के कमरे के अंदर आ गयी थी और वो भी दिव्या की तरह एकदम नंगी ही थी दोनों दीपू और कविता के सामने.

लता को ऐसे उनके सामने देख कर दोनों दीपू और कविता की आँखें फटी की फटी रह गईं।

उन्हें समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है.

दिव्या फिर पीछे से आती है और केहती है: मैंने कहा था ना पति जी... आज यह है तुम्हारा बम्पर ऑफर. तुम्हे तो पता है इस घर में तीन नहीं बल्कि चार औरतें है. तुम तो तीनो को बहुत खुश रखते हो और कविता की तरफ देख कर... जैसे कुछ देर पहले तुमने मेरी सौतन को खुश किया था.

लेकिन शायद चौथी के बारे में भूल ही गए.

दीपू: क्या कह रही हो तुम? ठीक तो हो ना?

दिव्या: मुझे पता है दीपू... तुम्हारी गलती नहीं है... इसीलिए तो हम सब तुमसे इतना प्यार करते है. तुम्हे भी पता है की लता भी तुम्हारे प्यार के लिए तड़प रही है लेकिन कभी भी तुमने उनकी ओर गलत नज़र से नहीं देखा.

दिव्या कविता की तरफ देख कर: क्या केहती हो कविता?

कविता: सब को देख कर... प्यार से दीपू को चूमते हुए... दिव्या तू सही कह रही हो. हम सब को इस बात का पता है. लता ये सब सुनकर सब को देख रही थी लेकिन कुछ नहीं कहती.

दिव्या: तो आज रात आप खूब मस्ती करो. मैं चलती हूँ. अगर वसु उठ गयी और मुझे वहां नहीं पाया तो घबरा जायेगी.

हाँ एक और बात.... तुम्हे शायद पता ना हो.... लेकिन बुआ जी की चूत एकदम गीली और रस छोड़ रही है. तुम्हारा डंडा इसके बिल में आसानी से चला जाएगा. ऐसा बोल कर उसे आँख मार देती है और दिव्या कमरे से चली जाती है लेकिन जाने से पहले कमरे का दरवाज़ा बंद कर देती है. अब कमरे में सिर्फ तीनो ही रह गए थे. भले ही तीनो नंगे थे... दीपू और कविता ने अपने आपको चादर से ढका हुआ था तो वहीँ लता उन दोनों के सामने एकदम नंगी खड़ी थी.

दीपू फिर खड़ा हो कर लता की तरफ आता है और उसकी आँखों में देखते हुए पूछता है... दिव्या जो केह रही थी... क्या वो सच है? लता थोड़ा शर्माते हुए हाँ में सर हिला देती है तो दीपू उसके चेहरे को पकड़ कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला देता है. लता को तो जैसे इसका ही इंतज़ार था. काफी देर से वो भी उत्तेजित थी जो कमरे के बाहर उसके और दिव्या के बीच जो कुछ हुआ था. लता भी दीपू के होंठों को चूसने लगती है और दोनों एक प्रगढ़ और गहरी चुम्बन में जुड़ जाते है जो काफी देर तक चलता रहा.

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उन दोनों को देख कर कविता भी गरमा जाती है और वो भी उठकर उन दोनों के पास आती है. अब लता भी कविता को देख कर अपनी शर्म दूर कर देती है और वो भी थोड़ा खुल जाती है. जब कविता उसके पास आती है तो वो दीपू को छोड़ कर वो कविता के होंठों को अपने होंठों से जोड़ देती है और दोनों फिर से एक गहरे चुम्बन में जुड़ जाते है और उसे चूमते हुए उसके हाथ को कविता की कमर पे घुमाते रहती है.

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उन दोनों को देख कर दीपू बिस्तर पे बैठ कर अपने लण्ड को हिलाते रहता है और देखते ही देखते उसका लण्ड भी अपनी पूरी औकात में आ जाता है. उन दोनों को चूमते चाटते देख कर दीपू कहता है: इस कमरे में मैं भी हूँ. कविता उसको झूटी गुस्से से देख कर केहती है... कुछ देर पहले तो तुमने मेरी जम के मारी है. फिर से तैयार हो गए? पहले मुझे बुआ जी के साथ प्यार करने दो.

दीपू: यहां आकर मेरे लण्ड से भी प्यार कर सकते हो ना.

दोनों फिर एक दुसरे को देखते है और हस्ते हुए दीपू के पास आते है. कविता ने पहले ही दीपू का लण्ड चूसा था तो वो लता को इशारा करता है तो लता भी समझ जाती है और घुटनों पे बैठ के दीपू के लण्ड को देखती है जो की पूरा खड़ा था और वो जैसे लता को सलामी दे रहा था.

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दीपू के खड़े लण्ड को देख कर लता से भी रहा नहीं जाता और उसके लण्ड को पकड़ कर पूरे चाव से चूसने लगती है.

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लता काफी देर तक दीपू का लण्ड चूसती है और थोड़ी देर बाद केहती है की उसके घुटने दुःख रहे है तो दीपू को दया आती है और दोनों को बिस्तर पे ले जाता है और इस बार दोनों दीपू के लण्ड को बारी बारी से चूमते चूसते और चाटते है.

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जहाँ कविता दीपू का लण्ड चूसती है तो लता भी दीपू की गोटियों को चूसते रहती है. दीपू के तो मजे ही मजे थे. वो तो जैसे जन्नत पे पहुँच गया था.

काफी देर तक जब दोनों दीपू के लण्ड को चूसते रहते है तो दीपू को लगता है की अगर वो उन्हें नहीं रोका तो वो झड़ जाएगा. और उसे पता था की इस बार वो झड़ गया तो फिर उसे भी थोड़ी मुश्किल होगी उसके लण्ड को फिर से खड़े करने में भले ही २ कामुक महिलाएं उसके साथ है.

थोड़ी देर बाद दीपू कहता है: तुम दोनों ने मुझे जन्नत की सैर कराई है. अब मेरी बारी है की तुम दोनों को भी ऐसा मजा दूँ. ऐसा कहते हुए दीपू लता को सुला देता है और उसकी चूत को चूसने लग जाता है. काफी सालों बाद किसी पुरुष ने लता की चूत को चूसा था और वो कोई नहीं वो उसका भांजा ही था जो उसे चूस कर मजा दे रहा था. कविता भी दीपू के सर को पकड़ कर उसकी चूत पे ठूस रही थी. अब कमरे में ज़ोर ज़ोर से सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी. आह... अह्ह्ह... अहह... दीपू... ऐसे ही चूस... बहुत अच्छा लग रहा है.

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दीपू लता की चूत को चूस रहा था तो वहीँ कविता भी फिर से गरम हो जाती है और इस बार वो झुक कर लता को चूमती है. लता के तो जैसे मजे ही मजे थे.

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दीपू के चूसने से ही लता झड़ जाती है और ज़ोर ज़ोर से सांसें लेने लगती है. वो अपने आप को दुरुस्त कर के कविता को चूमने लगती है. थोड़ी देर बाद...

लता: दीपू अब मुझे और मत तड़पा.... मैं इस पल के लिए बहुत दिनों से तरस रही थी... अब और रहा नहीं जाता. अपने लण्ड से अब मुझे भी आबाद कर के.

लता के मुँह से ये बात सुनकर दीपू को हसी आ जाती है और फिर अपने लण्ड में थोड़ा थूक लगा कर लता की चूत पे रगड़ता है. लता इस रगड़ से सेहर जाती है और केहती है.... थोड़ा धीरे से डालना दीपू. बहुत दिनों बाद चुद रही हूँ.

दीपू: चिंता मत करो बुआ. मैं आराम से ही करूंगा और वो कविता को इशारा करता है तो कविता दीपू का इशारा समझ कर लता के चेहरे पे बैठ जाती है और अपनी रस से बहती चूत को लता के मुँह पे रख देती है.

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लता को इस बात का पता नहीं था अब उसपे केहर धा ने वाला है क्यूंकि जब लता कविता की चूत चूस रही थी तो दीपू अपने लण्ड को लता की चूत पे रख कर एक ज़ोरदार धक्का मारता है. धक्का इतना ज़बरदस्त था की पहली बार में ही उसका पूरा लण्ड लता की चूत की जड़ तक पहुँच जाता है. लता की तो जैसे आँखें बाहर आ जाती है. कविता उसके मुँह पे बैठी थी इसीलिए उसकी चीक कविता की चूत पे ही दब जाती है वरना शायद वो इतना ज़ोर से चिल्लाती की वो आवाज़ बगल वाले घर में भी सुनाई देता.

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दीपू को भी लगता है की शायद उसने बाहर ज़ोर से उसे ठोका है. वो झुक कर लता की चूचियों को चूसते है और वहीँ कविता भी उसके सर पे हाथ रख कर उसे थोड़ा सहारा देती है. दीपू भी थोड़ी देर ऐसे ही अपने लण्ड को उसकी चूत पे रख कर थोड़ा वक़्त गुज़ारता है और कुछ नहीं करता. जब लता को थोड़ी राहत मिलती है तो फिर से वो कविता की चूत को चूसने लगती है. ये एक तरफ से उसका इशारा था की वो अब थोड़ी ठीक है. दीपू भी समझ जाता है और अपने लण्ड को बाहर निकल कर अब धीरे धीरे उसे पेलने लगता है.

अब लता को भी मजा आने लगता है. अब कविता भी उसके ऊपर से उठ जाती है और लता के ऊपर सो जाती है. अब लता और कविता दोनों ६९ पोजीशन में थे और दोनों एक दुसरे की चूत को चाट रहे थे और दीपू लता को पेले जा रहा था.

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लता भी बेहकते हुई चिल्लाते रहती है अब... “अह्ह्ह्हः अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह लल्ला अह्ह ओह्ह्ह मार डाला अह्ह्ह्ह आराम से ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह मैं आने वाली हूं अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह!”

काफी देर तक लता को पेलने के बाद लता केहती है... मुझे ही पलोगे क्या? कविता तू क्यों नहीं चुदती?

कविता: नहीं बुआ जी.... आज रात आपकी बारी है.. आप ही मजे करो. आपके आने से पहले तो मेरा नंबर लग ही गया था और शायद ये बात आपको भी पता है.

फिर दीपू बिस्तर पे सो जाता है और लता उसके खड़े लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत पे घुसा देती है और एक तरह से उसपे बैठ जाती है.

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दीपू भी उसकी कमर को पकड़ कर अपने लण्ड को उसकी चूत में घुसाते हुए उसकी चुदाई करते रहता है और लता भी उसके लण्ड पे झूलते रहती है. अब कमरे में माहौल बहुत गरम हो गया था. जब दीपू लता को चोद रहा था तो वहीँ कविता बगल में बैठ कर अपनी चूत को मसलते रहती है. थोड़ी देर बाद अब दीपू से भी रहा नहीं जाता तो वो भी कहता है की उसका भी होने वाला है.

लता: २ Min रुको मेरा भी होने वाला है... लेकिन एक Min के अंदर ही लता भी अपना पानी छोड़ देती है. आखिर में दीपू से भी रहा नहीं जाता और वो भी झड़ने के करीब आ जाता है. जब वो बोलता है तो लता भी उसके लण्ड से उठ जाती है और दोनों कविता और लता उसके लण्ड को चूसती है. दीपू भी गुर्राते हुए अपना पानी दोनों के ऊपर गिरा देता है तो दोनों भी उसका पूरा पानी पी जाते है.

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दीपू भी अब बहुत थक गया था और वो भी हफ्ते हुए बिस्तर पे गिर जाता है और दोनों लता और कविता दोनों उसके बगल में अपना सर रख कर सो जाते है. लता दोनों की तरफ देख कर ख़ुशी से केहती है.... अब मुझे समझ में आया तुम सब इतने खुश कैसे रहते हो. वो दीपू की तरफ देख कर केहती है... जब इतना समझदार पति और इतनी प्यारी पत्नियां हो तो घर में खुशियां ही रहेगी... दीपू ये बार सुनकर हस देता है और मन में सोचता है की वो सच में बहुत किस्मतवाला है.... और फिर तीनो थोड़ी देर बाद सो जाते है...


Note: अपडेट की देरी के लिए माफ़ी. लेकिन वक़्त की कमी, काम और स्वास्थय के कारण उपदटेस में देरी हो जाती है. इसीलिए हर अपडेट मैं लम्बा ही लिखने की कोशिश करता हूँ जो की एक तरह से देरी के लिए भरपाई हो
 
Latest Updated posted on Pg 421. Look forward to your likes, comments and reviews.

 
बहुत धन्यवाद Vakharia भाई आपके कमेंट के लिए. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. दिल से आभार!!! आपने अपने रिव्यु में सही कहा है की मैं इस कहानी में घर में लोगों के बीच प्यार ही दिखाया है लेकिन ये भी सच है की हर बार ऐसा मुमकिन ना हो.

Btw , yesterday only I posted my new update (Pg 421). I could not match your 10k+ update...but 7k long update is also not bad :)




Much Thanks once again for your kind words and review.



 
Madam, Thank you...keep supporting...

likhte to aap bhi accha hai...ismein koi doubt nahi hai...meri to just koshish hi rehti hai ki accha likhoon :)

 
41st Update (घर में मजे जारी)

वो दीपू की तरफ देख कर केहती है... जब इतना समझदार पति और इतनी प्यारी पत्नियां हो तो घर में खुशियां ही रहेगी... दीपू ये बार सुनकर हस देता है और मन में सोचता है की वो सच में बहुत किस्मतवाला है.... और फिर तीनो थोड़ी देर बाद सो जाते है...

अब आगे..

अगली सुबह वसु जल्दी उठ जाती है और फ्रेश होकर किचन में चाय बना रही होती है. इतने में दिव्या भी उठ जाती है और वो भी फ्रेश होकर किचन में वसु के पास जाती है.

दिव्या: क्या दीदी कल रात को तो आप घोड़े बेच कर सो गयी. लगता है बहुत जल्दी नींद आ गयी आपको.

वसु: हाँ अभी मुझे थोड़ा आराम की ज़रुरत है. अब महीने भी गुज़र रहे है और बच्चा भी पल रहा है तो आराम ही करना पड़ेगा ना. तू चिंता मत कर... जब तू भी पेट से हो जायेगी ना तो तू तो और भी घोड़े बेच कर सोया करेगी.

दिव्या: मैं भी तो उसका ही इंतज़ार कर रही हूँ की मैं भी कब पेट से हो जाऊं. दीपू तो मेरी गांड के पीछे ही पड़ा रहता है. अब तो वो बिना मेरी गांड मारे सोता नहीं है ना ही मुझे सोने देता है.

वसु भी दिव्या को अपनी बाहों में लेकर अपना हाथ दिव्या की उठी हुई गांड पे रख कर कहती है... तू सही कह रही है. तेरी गांड तो बहुत उभर के हो गयी है. तेरी ये गांड देख कर तो किसका भी मन डोल जाए... फिर हमारे ठरकी पति क्यों नहीं डोलेंगे... और ऐसा कहते हुए वसु दिव्या को चूम लेती है.

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दिव्या भी थोड़ा शर्मा जाती है लेकिन वो भी वसु को चूम लेती है और उसके उठे हुए पेट पे हाथ रख कर कहती है... जल्दी ही बच्चा हो जाए तो मैं उसे अपनी आँखों से दूर नहीं करूंगी.

वसु: वो तो ठीक है लेकिन जब तेरा बच्चा होगा तो तुम मेरे बच्चे को भूल ही जाओगी.

दिव्या: ना दीदी ऐसा कभी होगा ही नहीं. वैसे एक बात कहूँ?

वसु: क्या?

दिव्या: आज आपको एक सरप्राइज मिलने वाला है.

वसु: क्या?

दिव्या: थोड़ा सबर करो... आपको ही पता चल जाएगा.

इतने में कविता भी आ जाती है और फिर तीनो चाय पीते है लेकिन अब तक दीपू का पता नहीं था. वो तो अभी भी सो ही रहा था. दिव्या कविता की ओर देख कर आँख मार देती है और वसु से केहती है थोड़ा शरारती पने से: अपने होने वाले बच्चे के बाप को उठाओ. लगता है वो भी आप की तरह ही घोड़े बेच कर अभी भी सो रहा है.

वसु जब ये बात सुनती है तो वो दिव्या को प्यार से उसके पीठ पर मारती है और कहती है... मेरे होने वाले बच्चे का बाप है तो वो तेरा कुछ नहीं है क्या? वो दिव्या की गांड को दबाते हुए कहती है... मेरे होने वाले बच्चे का बाप वही है जो रोज़ तेरी पीछे से बजाता है.

जब तेरा बच्चा होगा तो देखना तेरा क्या हाल करती हूँ. दिव्या फिर उसे चिड़ाती है और ऐसे ही हँसी मजाक करते हुए वसु को दीपू के कमरे में भेज देते है और वसु के बिना जाने वो भी बिना कोई आवाज़ किये हुए वसु के पीछे जाते है.

वसु दीपू का कमरे में जाकर दीपू को आवाज़ देने ही वाली थी की सामने का नज़ारा देख कर उसकी आँखें बड़ी हो जाती है और वो कुछ केह नहीं पाती... क्यूंकि उसकी आँखों के सामने दीपू बिस्तर पे नंगा सो रहा था. वो तो ठीक ही था क्यूंकि वसु ने भी दीपू को पहले भी ऐसा देखा था. उसकी आँखें बड़ी हो जाती है जब वो देखती है की लता भी उसकी बाहों में नंगी ही उसे लिपटे हुए सो रही थी.

वो अपना मुँह खोले हुए देखती रहती है तो इतना में पीछे से दिव्या और कविता आ जाते है और उसे पीछे से पकड़ कर दिव्या कान में कहती है... मैंने आप से कहा था ना की आज आपको सरप्राइज है. और वो सरप्राइज यही है. हाँ आप जो देख रही हो वो सही है. कल रात को जब आप गहरी नींद में थी तो दीपू का लण्ड भी लता की चूत का गेहरा पन नाप रहा था और प्यार से वसु के गाल चूम लेती है. कल रात को ये लोग काफी शोर कर रहे थे लेकिन आप सोई हुई थी.

वसु: मैंने तो शायद ये सोचा नहीं था की इतना जल्दी हो जाएगा. हाँ मुझे पता है लता भी दीपू को चाहने लगी थी और मुझसे केह भी रही थी... लेकिन मैंने उसपे ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. ये सब कैसे हो गया?

कविता: वो सब छोडो वसु और दोनों को उठाओ. देखते है लता का क्या रिएक्शन होता है.

वसु दीपू को आवाज़ देकर उठाने की कोशिश करती है लेकिन उसकी आवाज़ से लता की नींद खुल जाती है और अंगड़ाई लेकर नींद की ही आवाज़ में केहती है: अभी क्यों उठा रही हो? थोड़ी देर और सोने दोना.

कविता: बुआ जी सुबह हो गयी है और सब उठ गए है. फिर लता अपनी आँखें मलते हुए उठी है तो देखती है की सामने तीनो खड़े हो कर हस रहे है और लता जब अपने आप पर नज़र डालती है तो पाती है की वो एकदम नंगी है और बगल में दीपू अभी भी सोया हुआ है. अपने आप को नंगी देखकर और वो भी दीपू के बगल में तो लता एकदम शर्मा जाती है और झट से अपने आप को कम्बल में ओढ़ने की कोशिश करती है.

इतने में दीपू की भी नींद खुल जाती है और वो जब देखता है की सामने उसकी तीनो बीवियां खड़ी है और बगल में लता एकदम नंगी तो उसकी भी नींद उड़ जाती है. वो कुछ बोलने की कोशिश करता है तो वसु उसे रोक देती है और केहती है की दोनों तैयार होकर चाय पीने आ जाए और दोनों को बोलकर तीनो हसते हुए अपनी गांड मटकाते हुए कमरे से बाहर निकल जाते है.

जब दोनों फ्रेश होकर बाहर आते हस तो दिव्या लता को अलग कर के धीरे से कान में पूछती है .. क्यों बुआ जी रात को मज़ा आया क्या? आपकी चूत कैसी है? अभी भी सूजी हुई हस क्या? चलने में कोई तकलीफ़ तो नहीं हो रही है ना?

लता: मत पूछो यार... इतना मजा आया की मत पूछो यार... दीपू का लण्ड तो एकदम दमदार है और इतना मजा दिया की मैं बता नहीं सकती. चूत तो अभी भी दुःख रही है लेकिन मैं इस दुःख को लेने के लिए ही मैं बहुत तड़प रही थी.

दिव्या: अच्छी बात है बुआ जी. अच्छा लगा की आपको भी मज़ा आया. किचन में जाईये... दीदी वहीँ पे है.

दिव्या फिर दीपू के पास आ जाती है और वो चाय के इंतज़ार में बैठा हुआ था.

दिव्या: क्यों पति जी रात को मज़ा आया के नहीं?

दीपू: मुझे तुम जैसी बीवी मिली... मुझे और क्या चाहिए. वैसे बहुत मजा आया. कितना मजा आया आज मैं तुमको बताता हूँ और ऐसे कहते हुए वो दिव्या को अपनी गोद में बिठा कर उसकी चूची को दबाता है. आह.. आह... ये तो अब बहुत बड़े हो गए है और उसके कान में केहता है... चिंता मत करो... जल्दी ही इसमें दूध आएगा और मुझे दूध पिलाएगी ना? दिव्या शर्मा जाती है ये बात सुनकर और दीपू को चिड़ाते हुए उसकी गोद से उठकर बगल में बैठ जाती है.

वहीँ लता किचन में जाती है जहां वसु दीपू के लिए चाय बना रही थी. वसु को देख कर लता शर्मा जाती हस लेकिन कुछ नहीं कहती. वसु लता को देख कर केहती है... मुझे नहीं लगा था की तुम इतनी जल्दी दीपू के पास चली जाओगी. लता थोड़ा हिचखिचाते हुए.. मैं तो शायद ना ही जाती लेकिन दिव्या ने मुझे दीपू के कमरे में धकेल के भेज दिया और फिर पिछली रात को जो भी हुआ था... लता सब वसु को बता देती है.

वसु फिर लता को अपनी बाहों में लेकर... चलो तुम्हे मजा तो आया ना.. तुम खुश रहो.. यही मैं भी चाहती हूँ. दीपू का लण्ड ही है इतना ज़बरदस्त... क्यों ठीक कहा ना? लता हाँ में सर हिला देती है तो वसु उसको चूम लेती हूँ और उसकी गांड को दबा कर केहती है... देखते है इसे कितने दिन बचा के रखती हो... और फिर अलग होकर हस देती है और फिर दोनों चाय लेकर बाहर आ जाते है जहां सब बैठे हुए थे.

फिर सब लोग चाय बाते करते हुए चाय पीते है जिसमें लता थोड़ा चुप ही थी. फिर सब अपने काम में लग जाते है और दीपू भी काम पे चला जाता है. जब वो ऑफिस जाता है तो ऋतू पहले से ही वहां आ गयी थी लेकिन उसका मन नहीं लग रहा था और जब वो दीपू को देखती है तो उसका मन और भी भड़कने लगता है. ऋतू की परेशानी दीपू समझ जाता है और पूछता है की उन्हें कुछ परेशानी है क्या. ऋतू सब ठीक है करके बोलती है और फिर दिनेश अपने ऑफिस के लोगों से मिलने चला जाता है. वैसे उस दिन ऋतू जब ऑफिस आने के लिए तैयार होती है तो निशा केहती है की वो अपने माँ के घर जाना चाहती है तो ऋतू भी केहती है की वो बात भी अच्छी है और वो भी अपने माँ से मिलकर आये.

दो दिन बाद निशा अपने घर आती है और निशा को देख कर सबसे ज़्यादा वसु खुश हो जाती है. वसु निशा को गले लग कर केहती है: बहुत दिनों बाद आयी हो बेटी. कैसी हो?

निशा: मैं ठीक हूँ माँ. आप लोग तो मेरे पास आते नहीं तो मैंने ही सोचा क्यों ना आपसे मिल आऊं.

वसु: ऐसी बात नहीं है बेटी. अब मैं ज़्यादा बाहर नहीं जा सकती और तेरा भाई को अपने काम से फुर्सत मिले तब वो तुम्हारे पास आएगा.

निशा को देख कर बाकी तीनो भी बहुत खुश हो जाते है और फिर उसका हाल चाल पूछते है. जब वो घर आयी थी तो उस वक़्त दीपू अपने काम से ऑफिस गया था.

निशा वसु को देख कर हस्ते हुए पूछती है: लड़का चाहिए या लड़की? वसु थोड़ा शर्माते हुए... जो भी हो...

दिव्या: तेरी सास कैसी है?

निशा: ठीक है.... वो भी दिनेश की याद में खोयी रेहती है और उसकी आँखों से २ बूँदें आंसूं आ जाते है.

दिव्या निशा को गले लगा कर... मैं समझ सकती हूँ बेटा. चिंता मत कर. वक़्त ही सब ज़ख्मों का हल है. और फिर सब खाना खा कर आराम करते है.

शाम को जब दीपू घर आता है और जब वो कमरे में जाता है तो देखता है की निशा सोयी हुई है.

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उसको वैसे सोया हुआ देख कर एक बार तो उसका मन डोल जाता है की उसकी बेहन कितनी सेक्सी लग रही है. उसकी गांड एकदम उभरी हुई दिख रही थी और उसकी जांघें भी एकदम चिकनी और लाजवाब दिख रही थी. लेकिन अगले ही पल वो ये ख़याल अपने मन से निकाल लेता है और फिर प्यार से निशा के बगल मैं बैठ कर उसे उठाता है.

दीपू के हलचल से निशा भी उठ जाती है और फिर दीपू को देख कर वो भी उसे प्यार से गले मिलती है और फिर दोनों एक दुसरे का हाल चाल पूछते है.

उस रात निशा अपनी माँ वसु के साथ सोने चली गयी थी. वसु ने दीपू और सब से कहा था की उसकी बेटी बहुत दिनों बाद आयी है तो वो उसके साथ ही सोयेगी और माँ बेटी के बीच बातें होगी और कोई ना आये. इस बात पे सब मान जाते है और जहां वसु और निशा उनके कमरे में चले जाते है वहीँ हॉल में बैठ कर दीपू टीवी देख रहा था तो दुसरे कमरे में दिव्या और लता सोने की तैयारी कर रहे थे.


वसु के कमरे में:

वसु: बेटा सब तो ठीक है ना वहां पर?

निशा: हाँ ठीक है. क्यों? कुछ हुआ क्या?

वसु: नहीं ऐसे ही पूछ रही थी. मैंने भी ऋतू से बात किये हुए काफी दिन हो गए है. जल्दी ही किसी दिन मैं भी उससे बात करती हूँ.

निशा कुछ सोचती है बोलने के लिए वो बोल नहीं पाती. वसु निशा को देख कर पूछती है की वो क्या बोलना चाहती है. निशा फिर वसु की तरफ देख कर धीरे से हस्ते हुए केहती हैं... हमारे दीपू में ऐसा क्या हाई की सब उसे देख कर घायल हो जाते है? वसु को कुछ समझ नहीं आता तो केहती है की वो क्या केहना चाहती है...

निशा: लगता है तुम्हारी दोस्त भी दीपू के लिए पागल हो रही है. जब निशा ये बात केहती हाई तो वसु निशा की तरफ देखती रहती है. उसे समझ मैं नहीं आता की निशा कए केह रही है.

वसु: तुम क्या केह रही हो मुझे समझ नहीं आ रहा है.

निशा: इसमें समझने की क्या बात है? तुम्हारी दोस्त यानी मेरी सास भी दीपू पे मर मिटने लगी हाई और उन दोनों के बीच जो बात हुई थी वो सब निशा वसु को बता देती है.

निशा: तो उस दिन दीपू आपसे क्या बात कर रहा था की वो उतना उत्तेजित हो गया था?

वसु: याद नहीं है की उस दिन हम क्या बात कर रहे थे. और वैसे भी जैसे तूने कहा हमारा दीपू ऐसा ही हैं. सब को पसंद आता है. क्यों ठीक कहा ना मैंने?

निशा वसु की तरफ देख कर... उसको सब पसंद करते है या...ऐसा बोल कर वो रुक जाती है क्यूंकि वो केहना चाहती थी की औरतें दीपू का लण्ड देख कर घायल हो जाती है.

वसु उस बात को समझ जाती हाई और केहती है... तू जो सोच रही है वो भी सच है. देख उसकी वजह से ही आज मेरा पेट अब इतना फूल गया है और जल्दी ही तुझे एक भाई या बेहन मिलने वाली है और लगता है जल्दी ही उसकी और दोनों बीवियों का भी यही हाल होने वाला है.

ये बात सुनकर निशा भी शर्मा जाती हाई लेकिन कुछ नहीं कहती. फिर दोनों ऐसी ही बातें करते हुए सो जाते हैं.

वसु की ये बातें अब निशा के मन में भी बैठ गयी थी और वो भी ना जाने कब दीपू के बारे में और उसके लण्ड के बारे में भी सोचने लगती है. उसे भी ऋतू की बात याद आती है जब उसने दीपू के बारे में बताया था और ना जाने कब उसका हाथ उसकी चूत पे चल जाता है और दीपू के बारे में सोचते हुए अपनी चूत मसल लेती है.

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वहीँ दुसरे कमरे में:



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दिव्या और लता दोनों खुसुर फुसुर कर रहे थे. दिव्या लता को अपनी बाहों में लेकर: क्यों बुआ जी आज आप दीपू के पास नहीं जाओगी?

लता: ना बाबा ना... कल रात तो उसने मेरी हड्डी पसली एक कर दी थी. इतनी देर पेला की मेरी चूत तो सूझ ही गयी है. आज मेरी हिम्मत नहीं हाई उसके पास जाने की. तुम क्यों नहीं चले जाती उसके साथ सोने के लिए?

दिव्या: सोचा आज भी कविता तो भेज दूँ और जो कल पूरा आपके साथ नहीं हुआ आज मैं वो पूरा करने वाली हूँ.

लता: मतलब?

दिव्या उसके कान में केहती है: आपकी चूत कितनी सूजी हुई हाई देखना हाई और आपको चखना भी है. कल तो सिर्फ ऊपर से ही हाथ लगाया था. आज तो आपके गुफे में सैर करना हाई और ऐसा कहते हुए दिव्या लता को आँख मार देती है.

लता: मैं भी आज तुझे छोड़ने वाली नहीं हूँ और फिर से दिव्या को चूम लेती है.

इतने में कविता कुछ काम के लिए किचन में जाती हाई तो उसे जाते हुए देख उसके पीछे दिव्या आती है और बाहर आकर दीपू को इशारा करती है की कविता किचन में जा रही है. वो दीपू के पास आकर धीरे से उसके कान में केहती है की आज वो लता का ख्याल रखेगी और वो कविता पे ध्यान दे.

दीपू: वो तो ठीक हाई लेकिन जान और ऐसा कहते हुए वो दिव्या की चूत पे हाथ रख कर कहता है... इसका भी बहुत दिनों से ख्याल नहीं रखा है.

दिव्या प्यार से उसको चूमते हुए... मुझे पता हाई और मेरी चूत भी बहुत खुजला रही है तुम्हारे लण्ड के लिए लेकिन आज की रात तुम कविता को देख लो. जल्दी ही मैं तुम्हारे पास आती हूँ और ऐसा बोलकर फिर से दीपू को चूम कर वो लता के पास चली जाती हाई और दीपू किचन की तरफ चले जाता है.

जब दीपू किचन में जाता हाई तो देखता हाई की कविता वहां कुछ साफ़ सफाई कर रही थी. दीपू पीछे से जाकर उसको बाहों में लेकर उसकी चूची दबाते हुए उसके गले को चूमता हैं.

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कविता तो ये पता नहीं था की दीपू उसके पीछे ही है. दीपू उसकी चूची को दबाते हुए उसके ब्लाउज के बटन्स को खोलने की कोशिश करता है.

कविता: क्या कर रहे हूँ जानू यहाँ पर?

दीपू: क्या कर रहा हूँ... देख नहीं रही हो? और फिर से उसकी चूची को दबाते हुए उसका ब्लाउज निकाल देता हाई और ऊपर से उसे नंगा कर देता है.

दीपू के इस छेड छाड़ से अब कविता भी गरम होने लगी थी. दीपू फिर अपने घुटनों पे बैठ के कविता की साडी को उठाता है तो उसके सामने उसकी मस्त गांड उभर कर दिख रही थी क्यूंकि अभी वो सोने जाने वाली थी तो उसने पैंटी नहीं पहनी थी. उसकी नंगी गांड को देख कर दीपू से रहा नहीं जाता और अपने मुँह उसकी गांड में घुसा देता है और चूत से लेकर गांड तक चाटने लग जाता है. पहले उसकी चूत को पूरा अपने मुँह में लेकर चाटता है और फिर अपने हाथ से उसकी गांड की पाटों को फैला कर उसके भूरे और रस से भरे हुए गांड को चाटने लगता है. कविता अब ज़ोर ज़ोर से सांसें लेने लगती है और अपना हाथ पीछे ले जाकर दीपू के सर को अपनी गांड में दबा देती है. अब उसे भी बहुत मजा आ रहा था.

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5-10 Min तक उसकी गांड और चूत को चाटता हाई जिसमें वो अपनी पानी भी छोड़ देती है.

कविता: आह्ह..... आह्ह..... ओह..... ओह..... ऐसे ही चाटो जानू.... मेरा होने वाला हाई और फिर से कविता अपना रस छोड़ देती हाई जिसे दीपू बड़े प्यार से पी जाता है. फिर वो उठ कर कविता को पलटा कर अपने होंठ उसके होंठों से मिला देता है और दोनों एक गहरे और प्रगाढ़ चुम्बन में जुड़ जाते हाई जहां दोनों अपनी जुबां को मिला कर एक दुसरे को चूसते है.


वहीँ दिव्या के कमरे में:

दिव्या दीपू से बात कर के कमरे में आती हाई और लता को बिस्तर पे पटक कर उसके ऊपर आकर उसके होंठों पे टूट पड़ती है.

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लता भी इसका ही इंतज़ार कर रही थी और वो भी दिव्या का पूरा साथ देते हुए वो भी उसे चूम रही थी. दोनों एक दुसरे का रस निकालने में लगे हुए थे और देखते ही देखते दोनों एक दुसरे के कपडे निकाल कर दोनों नंगे हो जाते है. दोनों की मस्त भारी भारी चूचियां एक दुसरे से रगड़ जाती हाई और फिर दिव्या उसके होंठों को छोड़ कर उसके गाल गले को चूमते हुए उसकी चूचियों को चूमती हाई. लता भी काफी उत्तेजित हो गयी थी और उसके निप्पल्स भी अब तन एक एकदम खड़े हो गए थी जिसे दिव्या भी महसूस करती हैं.

दिव्या: वाह बुआ जी ये निप्पल्स तो ऐसे खड़े हाई जैसे मुझे दावत दे रहे है. लता भी अब बहुत गरम हो गयी थी और वो भी उसी लय में बोलती है...

लता: जब ये दावत दे रहे हाई तो स्वीकार करना... देरी क्यों कर रही है?

दिव्या को तो जैसे लता की बात का पूरा केहने से पहले ही उसकी एक चूची को अपने पूरे मुँह में भर कर उसकी आधी चूची को चूसने लगती हाई जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की चूची से दूध पी रहा हो. और वैसे ही अपने दुसरे हाथ से उसकी दूसरी चूची को दबाती रेहती हैं. लता भी आंहें भरते हुए अपने हाथ दिव्या के सर के पीछे लेजाकर उसे अपनी चूचियों पे दबा देती है.

लता: ऐसे ही पी जा मेरे दूध को.... इतने दिन तक इसने काफी परेशानी किया है. आज इसकी पूरी कसर निकाल दे.

दिव्या: चिंता मत करो बुआ जी... आज अपनी पूरी कसर मैं निकाल दूँगी और देखना जब आपको दीपू रोज़ चोदता रहेगा तो एक दिन इसमें भी दूध आ जाएगा. तब तो इसे पीने में और मजा आएगा...

दिव्या की इस बात से लता और भड़क जाती हाई और उसके सर को उठा कर उसकी आँखों में देखते हुए केहती है: अगर ये सच हो गया तो दुनिया की मैं सबसे बड़ी खुश किस्मत औरत समझूंगी और ऐसा कहते हुए फिर से वो दिव्या को होंठों को ज़ोर से चूस लेती हाई और उसकी जुबां को पूरा अपने मुँह में लेकर चूसती है.

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2 Min बाद फिर से लता दिव्या को अपने सीने पे झुका देती हाई जहां इस बार दिव्या लता की दूसरी चूची को चूसते हुए पहले वाले को दबाती रेहती हैं.

(शायद दोनों आग में इतने बेहक गए थे की शायद दिव्या को भी पता नहीं चला की उसने लता से क्या बात कहा था.)

दिव्या लता के चूचियों को अच्छे से मर्दन करने के बाद नीचे जाकर उसकी गहरी नाभि को चूमती हाई जिससे लता से रहा नहीं जाता और आंहें लेते हुए फिर से एक और बार झड़ जाती है.

लता: तूने तो मेरी चूत के बिना छुहे ही मेरा पानी निकाल दिया.

दिव्या: बुआ जी देखते जाओ और क्या क्या होता है. आज तो आपकी चूत से बाढ़ आने वाला हाई और ऐसा कहते हुए वो नीचे झुक कर उसके रस से भरे हुए चूत को देखती हाई जो बहुत चिकनी और आकर्षित लग रही थी.

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दिव्या: अच्छा किया की आपने अपनी चूत को एकदम साफ़ रखा है. हम सब को और दीपू को भी चिकनी चूत ही पसंद है. चूसने में मजा आता हाई और ऐसा कहते हुए दिव्या लता की चूत को चूसने लगती है.

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पूरे ऊपर से नीचे तक उसकी चूत से गांड तक चूसने लगती है जैसे वो उसके मुआवना कर रही हो. लता के तो अब हाल एकदम बुरा हो गया था और वो अपनी जाँघों को दिव्या के सर पे पूरा दबा देती है जो एक तरह से उसका इशारा था की दिव्या बहुत अच्छे से उसका सेवन कर रही हैं. वो अपने हाथ दिव्या के बाल में ग़ुस्सा कर उसकी चूत पे दबा रही थी.

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दिव्या भी अब अपनी २ उंगलियां उसकी चूत में डाल कर उसकी चूत को उँगलियों से भी चोद रही थी. लता को तो बहुत मजा आ रहा था.... वो तो जैसे जन्नत में पहुँच गयी थी.

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उँगलियों से चोदने से और जुबां से चाटने से लता का तो हाल बेहाल हो गया था और वो फिर से एक और बार झड़ जाती हाई और उसे थोड़ी राहत मिलती है.

लेकिन ये राहत कुछ ही मिनट की बात थी क्यूंकि दिव्या लता का रस पीने के बाद ऊपर आकर अपने होंठ फिर से लता से मिला देती हाई और लता को ही अपनी पानी का स्वाद देती है.

दिव्या: कैसे लगा आपके पानी का स्वाद?

लता उसकी आँखों में देखते हुए अपनी जुबां को अपने होंठों पे रख कर चूसती है जैसे बता रही हो की बहुत अच्छा लग रहा है उसे.

दिव्या: बुआ जी... इस बात पे लता उसको रोक देती हाई और केहती है... जब हम बिस्तर पे एक दुसरे को मजा दे रहे है तो नाम से बुलाया कर... ये बुआ जी बोल कर ऐसा लगता हाई की मैं इस घर की औरत नहीं हूँ.

दिव्या: ऐसी बात नहीं हाई बुआ जी.... और प्यार से लता... तुम भी तो इस घर की ही हो और हम सब के साथ हो.

लता: ये हुई ना अच्छी बात जो तुमने मुझे नाम से बुलाया है.

दिव्या: अभी तक तुमने जो मजा लिया है ना... उससे २ गुना ज़्यादा मजा अभी तुम्हे मिलने वाला है.

दिव्या की ये बात सुनकर लता उसको देखती हाई तो दिव्या लता को पलटा देती हाई और नीचे आकर उसकी गांड को अलग कर के उसकी गांड को चाटने लगती है. ऐसा तो लता ने भी कभी नहीं सोचा था की दिव्या कुछ ऐसे करेगी. लता की तो जैसे आँखें बाहर ही आ गयी थी. दिव्या उसकी गांड चाटते रेहती है.

दिव्या: तुम्हारी गांड तो बहुत टाइट है.

लता: हां रे ये तो कुंवारी ही है.

दिव्या: तभी तो कहूँ...मेरी जुबां भी ठीक से अंदर नहीं जा रही है. दीपू को तुम्हारी गांड मारने में बहुत मजा आएगा... और जब तुम्हारी गांड खुल जायेगी ना तो तुम रोज़ उससे अपनी गांड ही मरवाओगी और ऐसा कहते हुए दिव्या उसकी गांड में थूक लगा कर पूरी तरह से चाट जाती है. उसकी गांड चाटने से ही लता एक और बार झड़ जाती हाई और गहरी सांसें लेते हुए केहती है...अब मुझसे रेह नहीं जाएगा दिव्या. दिव्या फिर उठ कर उसको पलटा कर फिर से अपनी जुबां उसके मुँह में डाल देती हाई और फिर से दोनों एक दुसरे का रस चूसते है.


वहां किचन में:

दीपू कविता को अच्छे से छकने के बाद कविता को चूमते हुए उसे नीचे बिठा देता है जिसे कविता समझ जाती हाई और उसके पैंट को निकल कर देखती है की उसका लण्ड तो पहले से ही खड़ा हैं.

कविता: तुम्हारा लण्ड कभी बैठता नहीं है क्या? जब देखो खड़ा होकर सलामी देते रेहता है?

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दीपू: जब घर में इतनी गदरायी बीवियां है तो ये बैठे कैसे रहेगा? तुमको भी तो ये खड़े रेहना ही पसंद है ना? बोल सही केह रहा हूँ ना?

कविता: ये तो हम सब की जान है. ये ऐसे ही खड़े रेहना चाहिए और ऐसा कहते हुए कविता दीपू के लण्ड को अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर देती हैं.

दीपू: ये बात हुई ना जान... अब तो तुम भी लण्ड चूसने में एक्सपर्ट हो गयी हो जैसे तुम्हारी दोनों सौतनें.

कविता: वो तो होना ही था... इतने दिन से रोज़ जो लण्ड चुसवाते हो तो एक्सपर्ट तो हो ही जाऊँगी ना... और फिर कविता भी बड़ी शिद्दत से लण्ड चूसने लग जाती है. दीपू भी अब कविता का सर पकड़ कर अपने लण्ड को उसके मुँह में ठूसते रहता है और एक तरह से प्रहार दोनों तरफ से हो रहा था.

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जहां कविता लण्ड चूस रही थी वहीँ दीपू भी उसको मुँह को चोद रहा था. काफी देर तक लण्ड और गोलियां चूसने के बाद दीपू को लगता है की ऐसे ही और थोड़ी देर चला तो झड़ जाएगा वो अपने लण्ड को कविता के मुँह से निकाल देता है. कविता उसको देखती रेहती है जैसे किसीने उसके मुँह से लोल्लिपोप छीन लिया हो. दीपू हस्ते हुए केहता है: मैं जानता हूँ तुम और मेरा लण्ड चूसना चाहती हो लेकिन अब ये तुम्हारी गुफा में सैर करने के लिए तैयार हाई और ऐसा कहते हुए दीपू कविता को किचन के स्लैब में बिठा कर अपना लण्ड को पहले से ही तना हुआ और गीला था बिना देरी किया एक ही झटके में कविता की चूत में पूरा घुसेड़ देता है. कविता की तो जैसे आँखें बाहर आ गयी थी...

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उसने सोचा नहीं था की दीपू एक बार में ही अपना पूरा लण्ड उसकी चूत की जड़ तक घुसा देगा. कविता थोड़ी रोनी सूरत से दीपू को देखती हाई तो दीपू झुक कर उसके होंठ चूमते हुए केहता है... कभी कभी ऐसा भी लण्ड लेना चाहिए... हर बार प्यार से धीरे धीरे से नहीं और हस्ते हुए अपने लण्ड को पूरा बाहर निकाल कर फिर से एक मस्त शॉट मारता है और इस बार भी उसका 8.5 inch लण्ड पूरा कविता की चूत की जड़ में समा जाता है.

5 Min की ऐसी चुदाई के बाद कविता केहती है की उसके पैर दर्द कर रहे है तो दीपू उसे स्लैब से उठा कर उसे खड़े खड़े ही चोदने लगता है जहां वो उसके पैर को उठा कर चोदने लगता है.

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ऐसे पोजीशन में कविता कभी नहीं चुदी थी और उसे भी अब मजा आने लगा था. वो ना जाने कितनी बार झड़ चुकी थी लेकिन वो भी थकने का नाम नहीं ले रही थी. आखिर में एक पैर पे खड़े होकर छोड़ने में उसे भी तकलीफ हो रही थी तो दीपू उसे किचन के स्लैब पे घोड़ी बना कर पीछे से ठोकने लगता है.

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अब किचन में ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें और सिसकारियां आने लगती है. वो तो अच्छा था की वसु और निशा दोनों गहरी नींद में थे वरना उनकी आवाज़ दोनों को सुनाई देती.

10 Min की ऐसी दमदार चुदाई के बाद अब दीपू से भी रहा नहीं जाता और वो केहता है की उसका भी पानी निकलने वाला है तो कविता केहती है की उसकी चूत में ही वो भी झड़ जाए. दीपू भी ४- ५ ज़बरदस्त शॉट मार के आखिर में वो भी कविता की चूत में ही अपना गाढ़ा पानी छोड़ देता है.

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दोनों थक कर हाँफते हुए एक दुसरे के ऊपर गिर जाते है. थोड़ी देर बाद दीपू केहता है की वो कमरे में चले जाए और उसके कान में केहता है...कमरे में जाकर तुम्हारी गांड मारूंगा.

कविता: ना बाबा... अब तो मैं बहुत थक गयी हूँ. जान भी नहीं बची है. तुम चाहो तो अपनी तीसरी बीवी की गांड मार लो. बहुत दिनों से वो बच रही हाई तुमसे. दीपू: हाँ पता है...चिंता मत करो... तुमने जो कहा है वो जल्दी ही पूरा करूंगा और फिर दोनों उठकर कमरे में चले जाते है.


वापिस दिव्या के कमरे में:

अब दिव्या के कमरे में scene बदल चूका था. दिव्या बिस्तर पे लेटी हुई थी और लता उसको मजा चखा रही थी.

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वो भी बड़ी शिद्दत से दिव्या की चूत और गांड चाट रही थी. ये उसका पहला अवसर था जब वो किसी औरत के साथ बिस्तर में दूसरी औरत को मजा दे रही थी. वो भी वैसे ही कर रही थी जैसे थोड़ी देर पहले दिव्या ने उसके साथ किया था. वो भी अपनी २ उंगलियां दिव्या की चूत में डाल कर उसे भी उतना ही मजा दे रही थी. जब वो दिव्या की गांड चाट रही थी तो उसने देखा की दिव्या की गांड का छेद थोड़ा खुला हुआ हाई और जब वो अपनी एक ऊँगली उसकी गांड में डालती है तो वो बड़ी आसानी से अंदर चले जाता है.

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लता दिव्या को देखते हुए: लगता है दीपू ने तुम्हारी बहुत गांड मारी है. मेरी ऊँगली तो बड़ी आसानी से चली गयी है इसके अंदर.

दिव्या: हां लता दीपू को हम सब की गांड बहुत पसंद हैं. एक भी गांड अब कुंवारी हाई हैं. चिंता मत करो...तुम्हारी गांड भी जल्दी ही खुल जायेगी. फिलहाल तुम मेरी गांड की तरफ ध्यान दो. लता अब अपनी २ उंगलियां उसकी गांड में डाल कर उसकी गांड की चुदाई करते रेहती है.

दिव्या को भी बहुत मजा आ रहा था इसमें. आखिर में वो भी झड़ जाती है और आन्हें भरते हुए ज़ोर ज़ोर से सांसें लेते हुए वो भी निढाल हो जाती है. लता फिर उसके ऊपर आकर उसके होंठ चूमती है और केहती है...धन्यवाद जो तुमने मुझे एक औरत के साथ भी मजा दे सकते है... ऐसा एहसास दिलाया हैं.

दिव्या: अभी तो तुम्हे बहुत कुछ सीखना बाकी हैं और ऐसा कहते हुए वो लता को बगल में सुला कर अपनी टांगें उसके सर के बगल में रख कर वो लता की चूत चूसने लगती है. ऐसा करने से लता के सामने दिव्या की रस बहाती चूत दिखती हैं और उससे भी रहा नहीं जाता और वो भी दिव्या की चूत चूसने लगती हैं. दोनों अब ६९ पोजीशन में दोनों एक दुसरे को मजे देते है. ये ही लता के लिए नया ही एहसास था.

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ऐसे ही दोनों काफी देर तक एक दुसरे को मजे देते है और फिर थक कर दोनों एक दुसरे की बाहों में सो जाते है.

ऐसे ही मस्ती में दिन गुज़रते रेहते है जहां सब मस्ती में रहते है. लता भी अब इस परिवार में एक तरह से जुड़ ही गयी थी. ..थोड़े दिन बाद उनके घर में फ़ोन आता है.....
 
भाई नया अपडेट Page ४३० पे पोस्ट किया है. कृपया पढ़े और आशा है की आपको पसंद आएगा. Like करे और आपके कमैंट्स का इंतज़ार भी रहेगा.

 
Latest update posted on Pg 430. Pls read, like and review. Look forward to your comments.

 
धन्यवाद भाई आपके कमैंट्स के लिए. आपने सही कहा है. मैं हिंगलिश में लिख कर सॉफ्टवेयर के ज़रिये हिंदी में कन्वर्ट करता हूँ. मैंने भी वो स्पेलिंग मिस्टेक्स देखे थे. वो कन्वर्शन में प्रॉब्लम था. इतना बड़ा अपडेट में कुछ जगह मेरी तरफ से corrections मिस हो गए थे. फिर से आपके कमेंट के लिए आभार!!
 
42nd Update (घर की खुशियाँ जारी)

ऐसे ही मस्ती में दिन गुज़रते रेहते है जहां सब मस्ती में रहते है. लता भी अब इस परिवार में एक तरह से जुड़ ही गयी थी. ..थोड़े दिन बाद उनके घर में फ़ोन आता है.....

अब आगे..

थोड़े दिन बाद उनके घर में फ़ोन आता है..... जब फ़ोन की घंटी बजती है तो कविता देखती है की वो कॉल मीना का था. वैसे मीना बहुत काम ही फ़ोन पे बात करती थी... तो जब मीना का फ़ोन आता है तो कविता को लगता है की फिर कुछ समस्या आ गयी है. कविता वो कॉल लेती है.

कविता: बोल बेटी क्या हाल है? कैसे फ़ोन किया? सब ठीक तो है ना?

मीना: हाँ माँ सब ठीक है. एक बात बतानी थी... या कहूँ तो खुश खबर देनी थी. कविता को लगता है की जो वो सोच रही है शायद वो ही बात है फिर भी वो मीना से ही पूछती है की क्या खुश खबर है.

मीना: माँ आप नानी बनने वाली हो. कल ही मैंने यहाँ डॉक्टर के पास गयी थी और उन्होंने बताया है की मैं पेट से हूँ और जल्दी ही माँ बन जाऊँगी. मीना की ये बात सुनते ही वो वसु को आवाज़ देती है जो अपने कमरे में आराम कर रही थी.

कविता: वसु जरा यहां जल्दी आना. वसु कविता की बात सुनकर जल्दी से उसके पास आती है और पूछती है की वो क्यों चिल्ला रही है और बात क्या है? कविता कुछ नहीं केहती और वसु को फ़ोन देती है.

वसु: किसका फ़ोन है?

कविता: तुम ही बात कर लो. वसु फ़ोन लेकर दूसरी तरफ से मीना की आवाज़ सुनती है और पूछती है की क्या बात है.

मीना: माँ जी आप दादी बनने वाली हो. मीना की बात सुनकर वसु भी एकदम खुश हो जाती है और केहती है: बेटा तुमने तो बहुत अच्छी खबर दी है. अपना ख्याल रखना और मैं तो केहती हूँ तुम भी यहां आ जाओ. तुमको भी थोड़ा आराम मिल जाएगा. मैं मनोज से बात करती हूँ और उससे केहती हूँ की तुम्हे यहां छोड़ जाए.

मीना: आप सही कह रही हो मा जी मैं भी वहाँ रह कर ही अपने बच्चे को इस दुनिया मैं लाना चाहती हूँ.

वसु: ये तो बहुत अच्छी बात है बेटा. अपना ख्याल रखना और मैं जल्दी ही मनोज से बात करती हूँ और दीपू को भी ये खुश खबर देती हूँ.

इतने में दिव्या, निशा और लता भी आ जाते है और वो भी उनकी बात सुनकर बहुत खुश हो जाते है और वसु जब मीना से बात कर रही होती है तो दिव्या वसु से फ़ोन छीन कर मीना से बात करती है और उसे भी बधाई देते हुए वहाँ उनके पास आने को केहती है.

निशा भी एकदम खुश हो जाती है और कविता को गले लगा कर... जल्दी ही नानी बनने की बधाई और वसु को भी गले लगा कर उसे भी बधाई देती है.

वसु: ये तो ठीक है लेकिन और ऐसा कहते हुए वो दीपू को फ़ोन करती है. जब वसु दीपू को फ़ोन करती है तो दीपू अपने काम में बिजी रहता है तो ऋतू फ़ोन उठाती है.

वसु: दीपू कहाँ है?

ऋतू: वो थोड़ा बाहर गया हुआ है काम से. बोल क्या हाल है तुम्हारा?

वसु: लगता है तुम तो हमें भूल ही गयी हो. निशा को तो घर भेज दिया. तुम क्यों नहीं आयी?

ऋतू: मैं भी आना चाहती थी लेकिन काम था तो नहीं आयी. मैं कुछ ही दिनों में तुम्हारे घर आती हूँ.

वसु: जल्दी आना... हमें भी अच्छा लगेगा. जब दीपू आ जाए तो उसे फ़ोन करने को कहना.

ऋतू: ठीक है कह देती हूँ. फिर निशा वसु से फ़ोन लेती है और आँखों से केहती है की वो ऋतू से बात करना चाहती है. वसु निशा की बात समझ जाती है और निशा ऋतू से बात करने लगती है.

जब निशा ऋतू से बात कर रही होती है तो बगल में कविता को चक्कर आ जाता है और वो अपने आप को संभालते हुए सोफे पे बैठ जाती है. सब लोग कविता को ऐसा सोफे पे बैठते हुए देखते है तो दिव्या जल्दी से किचन में जा कर पानी लाती है.

निशा भी कविता को परेशानी में देखती है और ऋतू से कहती है की वो थोड़ी देर बाद फिर से बात करेगी और फ़ोन काट देती है और कविता के बगल में बैठ कर उससे पूछती है की उसे चक्कर क्यों आया है.

वसु: क्या हुआ? ऐसे क्यों बैठ गयी?

कविता: पता नहीं वसु थोड़ा चक्कर से आने लगा और मैं गिरने वाली थी तो अपने आप को संभाल कर सोफे पे बैठ गयी.

वसु ये बात सुनकर थोड़ा घबरा जाती है और केहती है की एक बार डॉक्टर के पास चले जाओ. कविता मानती नहीं तो वसु भी नहीं मानती और लता और दिव्या को बोलकर वो उसे डॉक्टर के पास ले जाते है और वसु फिर से दीपू को फ़ोन करती है. दीपू ऑफिस वापस आ गया था और वो वसु को फ़ोन करने ही वाला था की वसु उसे फ़ोन कर देती है.

वसु: तू कहाँ गया था?

दीपू: मा में अपने काम से थोड़ा बाहर कोई ग्राहक से मिलने गया था. बोलो क्या हुआ?

वसु: लगता है की कविता की तबियत थोड़ी ठीक नहीं है. लता और दिव्या उसे डॉक्टर के पास ले गए है. तू भी एक बार चला जा.

दीपू: मैं अभी जाता हूँ माँ और फिर फ़ोन को कट करते हुए ऋतू को बताता है की कविता की तबियत ठीक नहीं है और वो हॉस्पिटल जा रहा है.

ऋतू भी थोड़ा घबरा जाती है और केहती है: तुम जाओ... मैं यहां देख लूंगी. अगर ज़रुरत पड़े तो मुझे फ़ोन करना. मैं आ जाऊँगी.

दीपू: ठीक है आंटी. मैं जाकर देखता हूँ की वो कैसी है और दीपू भी हॉस्पिटल की तरफ निकल जाता है.


हॉस्पिटल में:

लता और दिव्या कविता को एक लेडी डॉक्टर के पास ले जाते है. डॉक्टर कविता को चेक करती है और पूछती है की इनके पति कहाँ है?

दिव्या और लता एक साथ: क्यों क्या हुआ? कविता ठीक तो है ना?

डॉक्टर: घबराने की कोई बात नहीं है. एक खुश खबर है की वो पेट से है और जल्दी ही माँ बनने वाली है.

डॉक्टर की ये बात सुनकर दोनों लता और दिव्या एक दुसरे को देख कर एकदम खुश हो जाते है और बगल में बैठे कविता को देखते है तो वो शर्मा कर अपना सर नीचे कर लेती है और हस्ते रहती है.

डॉक्टर: इनका पति कहाँ पर है?

दिव्या फिर से दीपू को फ़ोन करती है और डॉक्टर से केहती है की वो रास्ते में है और जल्दी ही यहां आ जाएंगे. दोनों फिर कविता के पास जाकर उसको गले लगा लेते है और दोनों उसे बधाई देते है.

थोड़ी देर में दीपू भी वहाँ आ जाता है और पूछता है की कविता की तबियत कैसी है. डॉक्टर उसके देख कर केहती है की कोई परेशानी नहीं है बल्कि खुश खबरि है की वो जल्दी ही माँ बनने वाली है और वो उनका अच्छे से ख़याल रखे ताकि बच्चा भी अच्छा पैदा हो. दीपू डॉक्टर की बात सुनकर एकदम खुश हो जाता है और फिर अपने आप को संभालते हुए, क्यूंकि वो सब हॉस्पिटल में थे, कविता के पास जाकर उसको गले लगा लेता है और धीरे से कान में कहता है बधाई हो. मुझे फिर से बाप बनाने के लिए.

कविता शर्मा जाती है और देखती है की डॉक्टर लता और दिव्या से कुछ बात कर रहे है तो कविता भी धीरे से कान में केहती है: तुम तो और भी बहुत बच्चों के बाप बनने वाले हो.

और वो दीपू की आँखों में देख कर मुस्कुरा देती है. दीपू कविता को देखता है तो वो चुप रहने को केहती है. दीपू फिर डॉक्टर के पास जाकर कविता के बारे में बात करता है. डॉक्टर भी उसे अपनी पत्नी का अच्छे से ख़याल रखने को कहता है और फिर सब अपने घर के लिए निकल जाते है.


घर में:

जब सब घर वापिस आते है तो वसु और निशा उन तीनों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे की कविता को कुछ हुआ तो नहीं और उसकी तबियत कैसी है.

कुछ देर बाद जब सब घर आते है तो सब से रहा नहीं जाता और पूछते है की कविता तो क्या हुआ है.

दिव्या: इतनी भी जल्दी क्या है दीदी थोड़ा हमें सांस तो लेने दो. फिर निशा उन सब के लिए पानी लाती है और निशा दीपू से पूछती है की कविता तो क्या हुआ है. दीपू कुछ बोलने से पहले ही दिव्या बोल देती है.... आज तो बड़ा ख़ुशी का दिन है. कविता भी प्रेग्नेंट है और वो भी तुम्हारी तरह जल्दी ही माँ बन जायेगी और दीपू तीसरी बार बाप बनने वाला है. जब दीपू तीसरी बार की बात सुनता है तो वो दिव्या से कहता है तीसरा कैसे?

दिव्या फिर कविता की तरफ देखती है तो कविता शर्मा जाती है और कहती है: सुबह ही मीना का फ़ोन आया था. वो भी पेट से है और माँ बनने वाली है और एक तरह से तुम तीसरी बार बाप बनने वाले हो. इस बात को सुनकर दीपू भी बहुत खुश हो जाता है और कविता को अपने गले लगा लेता है और कहता है तुमने तो आज सच में बहुत अच्छी खबर दी है.

वसु कविता को देखते हुए:अब तुम्हे भी आराम की ज़रुरत है और दीपू की तरफ देख कर हस देती है. फिर सब थोड़ा आराम कर के अपने कमरे में जाने लगते है.

दीपू फिर कविता को आँखों से इशारा करता है और कविता चुपके से कमरे में जाती है तो दीपू भी उसके पीछे जाता है और फिर उसका चेहरा पकड़ कर कहता हैं: तुमने तो आज सच मैं बहुत बड़ी खुसी दी है और वो कविता को चूमता है तो कविता भी उसका पूरा साथ देती है और दोनों एक गहरे चुम्बन में जुड़ जाते है.

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२ मिन बाद कविता दीपू को हटा देती है और कहती है की मैं अभी सोने जा रही हूँ. बाद में कभी प्यार कर लेना.

दीपू: बाद में तुमको बहुत मेहंगा पड़ेगा. सोच लो.

कविता फिर उसको अपनी जीभ दिखा कर चिढ़ाते हुए वहां से निकल जाती है.

दीपू फिर ख़ुशी ख़ुशी दुसरे कमरे में जाता है तो दिव्या उसके पीछे कमरे में जाती है और अंदर दरवाज़े को बंद कर के दीपू को दीवार से सटा कर पूछती है... क्यों जानू तुमने तो दीदी और कविता को प्रेग्नेंट कर दिया. मुझे भी जल्दी ही माँ बनना है और उसके लुंड को पैंट के ऊपर से मरोड़ देती है और उसे चूम लेती है.

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दीपू: जानू अगर तुम भी प्रेग्नेंट हो गयी तो फिर तुम्हारे छोटू का ख्याल कौन रखेगा. अगर तुम भी प्रेग्नेंट हो गयी तो फिर तो तुम्हारी गांड ही मारनी पड़ेगी और ऐसा कहते हुए वो दिव्या की गांड को दबा देता है. दिव्या के मुँह से सिसकारी निकल जाती है लेकिन कहती है...ना बाबा ना...अगर तुम मेरी गांड ही मारते रहोगे तो मैं झेल नहीं पाऊँगी.

दीपू: चिंता मत करो.. अगर तुम्हारी और हम सब की किस्मत अच्छी रही तो तुम को जुड़वाँ बच्चे होंगे. बोलो कैसा रहेगा?

दिव्या ये बात सुनकर एकदम खुश हो जाती है और कहती है...अगर ऊपर वाले की मेहेरबानी है तो इससे अच्छा मुझे और क्या चाहिए और ऐसा बोलकर दिव्या फिर से दीपू को चूम लेती है तो दीपू भी इस बार उसका साथ देता है और देखते ही देखते दोनों एक गहरे चुम्बन में जुड़ जाते है और दोनों की जीभ एक दुसरे से कुश्ती करती रहती है.

दीपू भी एक हाथ से दिव्या की गांड दबाता है तो दुसरे से उसकी चूची. दिव्या दीपू को चूमते ही सिसकी लेती रहती है और ३-४ Min बाद अलग हो कर झूठे गुस्से से कहती है..तुम तो अपने हाथ को भी ठीक से रक नहीं सकते और उसको चिढ़ाते हुए कमरे से भाग जाती है.

दिव्या दुसरे कमरे में जाती है तो वहां कविता आईने के सामने खड़ी हो कर अपने आपको देखती रहती है और अपने पेट पे हाथ रख कर उसे एक सुकून सा महसूस होता है की वो फिर से माँ बनने वाली है. दिव्या कविता को ऐसे देख कर पीछे से उसे जकड लेती है और कहती है... तुमने तो आज बड़ी खुश खबर दी है. खुश हो ना? कविता पीछे पलट कर अपनी आँखों से इशारा करती है की वो बहुत खुश है तो दिव्या भी उसके होंठ चूम लेती है

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और कहती है की वो भी बहुत खुश है और उस दिन का इंतज़ार कर रही है जब वो भी प्रेग्नेंट हो जायेगी.

कविता: चिंता मत करो. वो दिन भी ज़्यादा दूर नहीं. तुमने तो देखा होगा की अपना दीपू का वीर्य कितना गाढ़ा है और जब वो तुम्हारी चूत में अपना माल डालेगा और ऐसा कहते हुए कविता दिव्या की साडी के ऊपर से ही उसकी चूत को दबाती है तो तुम भी ज़रूर प्रेग्नेंट हो जाओगी और प्यार से उसके होंठ चूम लेती है.

दिव्या: मैं भी तो यही चाहती हूँ कविता.

इतने में वहाँ लता भी आ जाती है और कहती है: दोनों सौतनें क्या बातें हो रही है?

कविता: कुछ नहीं दीदी. ये पूछ रही थी की मैं खुश हूँ ना और हाँ मैं भी बहुत खुश हूँ. कविता की इस बात से लता भी उसके पास आती है और उसके होंठ चूमते हुए कहती है..आज तो सच में ख़ुशी का दिन है. जहां तुम माँ बनने वाली हो वहीँ तुम नानी भी बन जाओगी. इससे अच्छा और क्या हो सकता है.

थोड़ी देर बाद ऋतू का फ़ोन आता है निशा ऋतू का फ़ोन पे नाम देख कर दुसरे कमरे में चली जाती है बात करने के लिए. ऋतू ये पूछने के लिए की वहाँ का क्या हाल है और कविता की तबियत कैसी है.

निशा हलकी आवाज़ में: माँ आज तो इस घर में ख़ुशी का ही माहौल है. कविता भी अब पेट से है और वो भी जल्दी ही माँ बनने वाली है. ये बात सुनकर ऋतू भी एकदम खुश हो जाती है लेकिन उसे लगता है की निशा कुछ उदास है.

ऋतू: क्या हुआ बेटी तुम खुश नहीं हो क्या?

निशा: नहीं माँ मैं भी बहुत खुश हूँ की दीपू फिर से बाप बनने वाला है लेकिन... और इतना बोलकर निशा रुक जाती है.

ऋतू को एहसास होता है और वो कहती है...मैं सोच सकती हूँ बेटा तुम क्या सोच रही हो. क्या तुम भी वही सोच रही हो जो मैं सोच रही हूँ?

निशा: आप क्या सोच रही हो?

ऋतू: यही ना की इस घर में तुमसे २ गुना ज़्यादा उम्र के लोग पेट से हो गए है और तुम जो अपनी जवानी के चरम में हो और तुम्हे कोई मर्द का सहारा नहीं है....तुम्हारे साथ ऐसा क्यों. ये तो ऊपर वाले का खेल है बेटा. अगर वो चाहे तो रास्ता ज़रूर निकल आएगा. तुम चिंता मत करो. मैं जल्दी ही वहाँ आती हूँ.

जब निशा फ़ोन लेकर कमरे में जाती है तो वसु देख लेती है और चुपके से बिना किसी के दिखे निशा के पीछे चली जाती है क्यूंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था की निशा किसीके साथ अकेले में बात करी थी और कमरे के बाहर से उन दोनों की बात सुन लेती है. उसे भी बहुत बुरा लगता है और जब ऋतू और निशा की बात हो जाती है तो निशा वहीँ बिस्तर पे बैठे हुए रोती रहती है.

निशा को ऐसे रोते देख कर वसु से भी रहा नहीं जाता और वो कमरे के अंदर आकर दरवाज़े को बंद करते हुए निशा के पास आती है उसको गले लगा लेती है और उसको देख कर वसु भी रो देती है.

वसु: मैं समझ सकती हूँ बेटा तेरे मन की दुविधा. मेरे नानी बनने के समय मैं मैं फिर खुद से माँ बन रही हूँ और अब तक तुझे भी माँ बन जाना था. निशा वसु दोनों एक दुसरे की आँखों से आंसूं पोछते है और फिर दोनों में एक अनजाना सन्नाटा छा जाता है और दोनों एक दुसरे की आँखों में देखते रहते है. जुबां को कुछ नहीं कह रही थी लेकिन आँखें बहुत कुछ कह रही थी.

निशा फिर वसु के उभरे हुए पेट पे हाथ रखती है और कहती है मेरा एक और भाई या बेहन जल्दी ही आने वाला है और ऐसा कहते हुए निशा हस देती है. वसु से भी अब हसीं नहीं रुक पाती और वो भी प्यार से निशा के गाल पे हाथ रखते हुए हस देती है.


निशा का जलता बदन:

निशा अपने आग में जलती रहती है क्यूंकि हर वक़्त अब वो घर में सब को खुश देख कर ये सोचती रहती है की उसे वो ख़ुशी कब मिलेगी (सिर्फ सोचना लेकिन कोई जलन नहीं) लेकिन वो कुछ नहीं कर पाती.

एक दिन सुबह उठ कर जब वो बाथरूम जाती है तो उस वक़्त दीपू नहा रहा होता है और नहाने के टाइम वो अपने लण्ड को हिलाते रहता है. वो भी बहुत उत्तेजित में अपने लण्ड को हिलाते हुए अपनी बीवियां को सोच कर एक तरह से मूठ मार रहा था.

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अनजाने में निशा बाथरूम का दरवाज़ा धकेल कर अंदर कदम रखती है और सामने का दृश्य देख कर उसके होश उड़ जाते है. दरवाज़े के धकेल ने की आवाज़ से दीपू भी उस तरफ देखता है और जब वो निशा को डेक्था है तो उसे भी बुरा लगता है और वो तुरंत पलट जाता है और सोचता है की वो दरवाज़ा कैसे खुल गया.

दीपू: मुझे पता नहीं था की दरवाज़ा खुला हुआ है. आय ऍम सॉरी. निशा कुछ नहीं कहती और दरवाज़ा बंद कर के बाहर निकल जाती है.

निशा दीपू के खड़े और लम्बे लण्ड को देख कर और उकसा जाती है. वो दोपहर को सोते हुए दीपू के लण्ड के बारे में ही सोचते हुए अपनी चूत पे हाथ रख कर मलते हुए वो दिनेश को याद करती है और बड़बड़ाती है: क्यों मुझे छोड़ के चले गए तुम और मुझे इस जलती आग में चैन नहीं मिल रहा है. वो ये सब सोचते हुए अपनी २ उंगलियां चूत में दाल कर अंदर बाहर करते हुए अपने आप को और आग को शांत करने की कोशिश करती है लेकिन एक लम्बे लण्ड के आगे उंगलियां क्या काम आएगी….

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शाम को ऋतू वसु के घर आती है क्यूंकि जब से उसने निशा से बात किया था उसे भी उसके लिए चिंता जता रही थी. जब वो घर आती है तो वसु उसे देख कर एकदम खुश हो जाती है और उसके गले लगती है. ऋतू धीरे से कान में: बधाई हो वसु...अब तो इस घर में खुशियों की भरमार आ गयी है.

वसु: तुम ठीक कह रही हो ऋतू लेकिन मुझे निशा को लेकर चिंता हो रही है.

ऋतू: मुझे भी..इसीलिए मुझसे रहा नहीं गया और मैं आ गयी.

वसु: बहुत अच्छा किया तुमने ऋतू.

ऋतू फिर सब से मिलती है और खासकर के कविता से और उसे भी बधाई देती है. लेकिन इस वक़्त निशा वहां नहीं थी और वो कमरे में ही बैठी थी. ऋतू दीपू को भी बधाई देती है और कहती है की वो निशा से एक बार मिल कर आएगी.

ऋतू जब निशा के कमरे में जाती है तो निशा उदासी से वहां बैठी होती है. ऋतू को देख कर निशा से रहा नहीं जाता और वो उठ कर उसके पास जाती है और गले मिलते हुए रोती है.

ऋतू: चुप कर बेटी. मैं समझ सकती हूँ तेरे पे क्या बीत रही है लेकिन होनी को कोई नहीं टाल सकता. दिनेश तो तेरा पति था लेकिन वो मेरा भी बेटा था ना. अगर तू ही ऐसे रहेगी तो फिर मेरी क्या हालत है तूने कभी सोचा है. निशा को फिर ऋतू की बात भी सही लगती है और अपने आंसूं पोछते हुए दोनों ऐसे ही बाहों में खड़े रहते है. दोनों एक दुसरे की आँखों में देखते है

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और ऋतू दरवाज़े की तरफ देखती है तो वहाँ कोई नहीं था और वो अपने होंठ आगे करती है तो निशा भी समझ जाती है और वो भी अपने होंठ आगे करती है और दोनों एक प्यार भरे चुम्बन में जुड़ जाते है जैसे एक दुसरे से कह रहे हो की वो दोनों एक दुसरे के लिए है.

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२ Min बाद दोनों अलग होते है और इस बार निशा की आँखों में कोई आंसूं नहीं थे. फिर वो दोनों कमरे से बाहर आ जाते है. निशा के चेहरे पे थोड़ी हसी देख कर वसु को भी राहत मिलती है और मन में सोचती है की वो एक बार ऋतू से बात करेगी की निशा कैसे थोड़ी ठीक हो गयी है.


वसु मन में सोचती है की ऐसी क्या बात है उन दोनों में की ऋतू के आते ही निशा थोड़ी ठीक हो गयी है…
 
Latest update posted on Pg 439. Pls read, like and comment. Look forward to your reviews.

I understand your point...but bhai, mere paas limited photos hi hai. Update ke hisaab se main wo photos add karta hoon...to kuch photos repeat ho jaate hai. I hope you can understand.

 
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