Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 19 - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

अपडेट 118 - ा मेमोरी

अब तक...

कुछ शान के लिए जैसे वक़्त थम गया तेजल के लिए.

और जैसे hi उसने अपना सर्र ऊपर कर देखा तोह,

वह चेहरा! जिससे देखने के लिए वह कबसे इतना तड़प रही थी. वह सामने था. उसके होंठो पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी.

और फिर उसके मुँह से कुछ शब्द निकले, जिससे सुन्न, तेजल की आँखें अपने आप पानी पानी हो गयी,

"It's बीन ा व्हिले...! सीस!!"



अब आगे...



तेज, जो प्रांजल द्वारा लात से धकेल दिए जाने पर सीढ़ियों से नीचे गिरने वाली थी, उससे दो मज़बूत हाथ जकड़े हुए थे.

उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी जब उसने सर्र ऊपर कर उस शख्स को देखा जो उससे जोरर से भींचे हुए था.

वीर! उसका सागा छोटा भाई! इसी इंसान को तोह वह पिछले एक साल से dar-dar भटक के ढूंढ रही थी. और आज वह उसकी बाहो में थी.

वीर के होंठो में एक रहस्यमयी मुस्कान थी. इसका मतलब क्या था? वह समझ नहीं पा रही थी. उसकी सूरत मनमोहक भी थी पर साथ hi में एक अजीब सा भय फैला रही थी.

और तभी उसके कानो में वही जानी पहचानी आवाज़ पड़ी,

"It's बीन ा व्हिले...! सीस!"

तेज के होंठ खुले पर एक भी शब्द बाहर न आ पाया. वीर की नज़र अकस्मात् पैनी हुई और तेज के चोटिल हाथ पर गयी.

प्रांजल ने केचि मारते हुए उसके हाथ को घायल कर दिया था. तेज देख पा रही थी. कैसे वीर उसके हाथ के ज़ख्म को देख रहा था.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

उसकी धड़कने तेज़्ज़ हुई. क्या करेगा अब वीर? उसका छोटा भाई? क्या करेगा वह अपनी बड़ी बहिन को ऐसे हाल में देखने के बाद? ये सारे सवाल उसके मैं में आने लगे.

"स्टे हेरे!" वीर की पुनः बुलंद और कमांडिंग टोन सुन्न, तेज के बदन में एक सिहरन दौड़ गयी. वह अपने चोटिल हुई खुनी बाज़ू को थामे बस वीर को देखती रही जो उसके आगे बढ़ घर के अंदर चला गया.

जब प्रांजल की नज़र वीर पर पड़ी, तोह वह तोह जैसे पगला hi गया. उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गयी,

प्रांजल : आए वीर!!! आ गया तू??? तेरा hi इंतज़ार कर रहा था में साले! आज सारा खेले ख़तम hi कर देते है. हाहाहा!

इस बार प्रांजल अपना कपटिपन्न नहीं छिपा रहा था. हस्ते हुए वह वही केचि लिए खड़ा हो गया लड़ने के लिए. और वीर के होंठो पर जो मुस्कान थी वह अगले hi पल गायब हो गयी.

*वहुवूसस्शह्ह्ह्ह*

"हहह?"

एक झटके में वीर हवा के झोके की तरह उसके सामने आया, प्रांजल की कलाई आलरेडी उसके हाथ में आ चुकी थी. और अभी प्रांजल ने ये रीलीज़ किया hi था की अचानक,

*क्रैक*

एक दर्द भरी चींख हॉल में गूँज गयी,

"अअअअअअअअअरररररगगगगठ्ठ्ठ!"

जिस हाथ में प्रांजल केचि लिए हुए था, जिस हाथ से उसने तेज को घायल किया था. उसी हाथ को वीर ने मरोड़ दिया था. हड्डी टूट चुकी थी. किस्मत थी प्रांजल की जो वीर ने लीम्बो का इस्तेमाल नहीं किया था.

*थुड़*

प्रांजल की साड़ी हेकड़ी निकल गयी इस एक हमले से. वह दर्द के मारे अपने घुटनो पर गिर पड़ा.

*डिंग*

[Intimidating Presence has been equipped.]

[Master...!]

एक बेहद hi अलग आवाज़ वीर के मैं में गूंजी. पारी की ये नयी पर्सनालिटी बेहद अलग सी थी. वीर की खुद की बात इस वाली पारी से ज़्यादा नहीं हुई थी. काम बोलती थी, और जितना बोलती थी वह सिर्फ ज़रूरी जानकारी के लिए. वीर समझ नहीं पा रहा था की आखिर ये किस तरह की पर्सनालिटी है. पर इतना ज़रूर जान गया था वह की ये पर्सनालिटी एकदम हटके थी. काफी दिलचस्प!

[The time has come! Dikhaiye isse! Master! Tell him that he should never mess with someone like you.]

प्रांजल जो सर्र उठाये वीर को गुस्से से घूर रहा था वह खुद डर के मारे काँप उठा.

वीर अपने जेब में हाथ डाले उससे ऐसे देख रहा था जैसे वह एक ज़मीन पर रेंगने वाले कीड़े को देख रहा हो. और वह कभी भी उससे अपने पेर्रो के नीचे मसल सकता है.

"तक्छःह!"

दांतो को मीस्ते हुए वह गुस्से में वीर को देखता रहा. ये सब हो क्या रहा था?

बचपन में वह वीर को जब चाहे तब थपड़िया देता था, जब चाहे तब उसके बाल नोच देता था, लतिया देता था. वीर तोह उसके लिए एक पंचिंग बैग था. जिसपर जब चाहे तब अपना गुस्सा निकाल दो.

फिर आज? आज उसी पंचिंग बैग से इतना डर क्यों लग रहा था उससे? वीर की पेनी नज़र ऐसा लग रहा था जैसे उसकी अंदर की आत्मा को घूर रही थी. इतना तेज था उन् आँखों में. वह आँखें, उसके ज़हन को चीरते हुए उसकी रूह में झांक रही थी.

नहीं! वह भला ये कैसे सेहेन कर सकता था? वीर? और उससे इस तरह से देखे? कभी नहीं!!!

"माआदारचुआड़द्द!!!" वह गुर्राया,

*बाआआममममममम*

और एक लात तभी आके उसकी ठुड्डी पर पड़ी जिसके चलते वह हवा में उड़ते हुए पीछे जा गिरा.

[Nice one!]

*क्रआआस्स्सह्ह्ह्ह*

एक लात खाने के बाद hi प्रांजल को अंदाजा लग गया था की वह वीर से कितना कमज़ोर था. पर कैसे??

"ये सब कैसे हो सकता है??? केसीई??"

*चात्तट्ठाआयकककक*

उसके शब्द मुँह में hi रह गए जब एक तेज़्ज़ रफ़्तार से झापड़ आके उसकी कनपटी पर पड़ा. बेचारे के कान सुन्न पद गए.

प्रांजल (स्क्रीम्स) : वीईईइरररररर!!!!!

वीर : तेरी साड़ी करतूते जानता हु में प्रांजल! साड़ी करतूते! तू जितने ज़ुल्म मुझ पर करता आया है. उन् ज़ुल्मो ने तेरे पाप के घड़े को भर दिया है. उसका सबक आज तू चुकाएगा.

प्रांजल की आवाज़ अगले hi पल रुवासी हो गयी. पर गरज अभी भी बाकी थी,

प्रांजल (स्क्रीम्स) : तूने hi किया है सब!!! तूने hi...!

वीर : हम्म?

प्रांजल : तेरी...! तेरी वजह से वह चली गयी. तेरी वजह से...! M-Mein तुझे कभी माफ़ नहीं करूँगा. कभी माफ़ नहीं करूंगा!!! हआ~"

वह उठा और एक बार फिर वीर को मारने की कोशिश किया पर नतीजा वही. वीर के एक पंच ने hi उससे धेरर कर दिया. पर ये क्या बड़बड़ाये जा रहा था?

'वह चली गयी? कौन?' वीर खुद से सवाल कर असमंजस में पद गया. ये चुटिया प्रांजल किसकी बात कर रहा था? वीर को कोई क्लू नहीं था.

वीर : कौन चली गयी? किसकी बात कर रहा है तू?

प्रांजल : हराआम खोर्रर्र!!! ुररगह्ह्ह!!! मुझे नीचे दिखा रहा है?? हाँ? मुझे नीचे दिखा रहा है?? क्या में जानता नहीं तूने क्या किया था? तेरे कारण वह चली गयी इस शहर से. सिर्फ तेरे कारण.

वीर : थे फ़क...!?

[Look into your memories master! Look into it!]

वीर : क्या नाम था उसका?? बोल!!!

प्रांजल : चोरर मुझे हराम खोर!!! चोरर! भाड़ में जा तू!! अब न वह वापस आएगी और न hi समय पहले जैसा हो सकता है. तेरे कारण...! काश तू पैदा नहीं हुआ होता मादरचो-

*बाआआममममममम*

"ुरररग्ग्घहहहह!!!"

वीर : शट थे फ़क उप! बोल! कौन थी वह? क्या नाम था उसका? जिसके चलते तू घर में भेड़िया बन्न के भेद की खाल pehan'na शुरू कर दिया. बोल!!!

प्रांजल : ठहणु! निकल साले...! चल निकल!!! बड़ा आया...! ऐसे दिखा रहा है जैसे तुझे कुछ याद नहीं. और चोरर मुझे...! चोरर!!

'थे फ़क इस हे तलकीन' अबाउट?'

[Master! Apni yaaddaasht par zorr daaliye aur yaad karne ki koshish kariye. Jo ghatit hua hai, woh saamne aayega hi. Go! And search for it.]

पारी की बात मान वीर ने आँख बंद कर अपनी मेमोरी के अंदर झाका. और मैं रुपी समुन्दर में उन् गहरी यादो में तैरते हुए वह प्रांजल से जुडी हर्र याद को खोजने लगा.

बेशक, एक याद उसके सामने आयी.

वह मौसम था ताप्ती गर्मी के आगमन का. अप्रैल का महीना ख़तम हो रहा था और स्कूल में बच्चो की गर्मियों की छुट्टिया लग्न शुरू होने वाली थी.

आखिर दिन, जब स्कूल से बच्चे छूटे तोह उनके चेहरों पर ख़ुशी की लेहेर थी. आखिरी दिन था और अब दो महीने की लगातार छुट्टिया पद रही थी. अब उनके मौज hi मौज थे. पर सबको ये खुशिया कहा हासिल होती थी?

"ए पकड़ पकड़!!! मार साले को! हाहाहाहा!!"

"मार बी!! मार!! वह पडीई!! हाहाहाहाहा!!"

"एक और मार....!!! हाहाहाहा!!!"

स्कूल के बाहर hi तीन से चार लड़के एक सीधे साढ़े लड़के पर पानी से भरे गुब्बारे फेक कर मार रहे थे. माना की मौसम गर्मी का था. और इस बात का किसी भी बच्चे को उतना बुरा नहीं लग्न चाहिए. आखिर दोस्तों में ये सब चलता है. और यही समझ के आस पास के लोग उन्हें बस देख hi रहे थे.

पर ये कोई नहीं जानता था. की ये दोस्ती नहीं थी. ये ज़्यादती थी. वह तीन चार लड़के मिल के रोज़ उस लड़के को प्रताड़ित करते. और आज आखिरी दिन भला कैसे जाने दे सकते थे वह उससे? उनके स्कूल का लास्ट डे आखिर एंटरटेनमेंट से गुज़ारना चाहिए. ये अंधरुनि बात कोई नहीं जानता था.

वह बच्चा, भयभीत होते हुए, इधर से उधर बचते हुए भागता रहा, पर कोई फायदा नहीं. अब तक उस पर 4-5 गुब्बारे मार दिए गए थे. उस बेचारे के कपडे पूरे गीले हो चुके थे.

उसका लक्ष्य अभी के लिए सिर्फ अपने ऑटो तक पहुचना hi था. जैसे hi वह अपने ऑटो के पास पहुचा, वह उन् लड़को से बच चूका था.

क्युकी, अब वह तीन चार लड़के उससे परेशान नहीं कर सकते थे. एक राहत की सास लेते हुए वह ऑटो के अंदर बैठ गया.

पर क्या ये अंत था? बिलकुल भी नहीं! बल्कि असली डर तोह इस ऑटो में hi था.

वह मासूम सा बच्चा चुप चाप बैठे अपने हाथो से hi पानी को अपने चेहरे और पेर्रो पर से पोछने लगा. क्युकी उसका रुमाल तोह पहले hi उन् लड़को ने ले लिया था. न जाने क्या किया होगा उसका? या तोह कीचड में फेक दिया होगा या उसकी बॉल बना कर कैच कैच खेल रहे होंगे.

"वीर बाहर तोह आओ! बाहर आओ!! हाहाहाहा!!!"

अचानक hi उन् लड़को ने ऑटो में झांकते हुए उससे आवाज़ दी तोह वीर की धड़कने ट्रैन के माफिक तेज़्ज़ हो गयी. एक बोहोत भयानक डर ने उससे घेर लिया.

वह भय के मारे अपना सर्र पीछे किये खुद को बाकी बच्चो की आध में छुपाने लगा. आँखें बंद किये वह बस मिन्नतें मांग रहा था.

'चले जाओ! प्लीज! चले जाओ!'

"वीर! आओ तोह...! हम कुछ नहीं करेंगे! हेहेहे~"

"हाँ भाई आ तोह! अरे एक सीक्रेट बात है. सुन्न न!"

"हाँ! अबे ma'am ने बताया है लास्ट में कुछ. तूने सुना hi नहीं."

वह उससे बातो में फसाते हुए बुलाने लगे,

वीर : K-Kya?

"हाँ भाई! आ तोह सही. सही में कुछ नहीं करेंगे. देख अब तोह बैलून्स भी ख़तम है."

"आ न!"

"आ भाई जल्दी!!"

पर वीर ने अपना सर्र न में हिला दिया. और ये देखते hi वह तीनो लड़के भड़क उठे.

"साले डरपोक!!!"

"अब तू पिटेगा ma'am से. हमारा क्या?"

"अबे जाने दो बे इसको. जाने दो. बाद में यही पिटेगा तोह समझ आएगा इसको."

"हाँ बी! चलो चलो! जा साले!"

वह तीनो पालते और निकलने लगे. ज़ाहिर है वह यहाँ ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते थे. ऑटो वाला ड्राइवर थोड़ी दूर पे hi स्कूल के गेट के पास खड़ा हुआ था. और साथ hi ऑटो के अंदर वीर के अलावा भी कई बच्चे थे.

वह जैसे hi वीर की नज़रो से ओझल हुए, वीर ने अंततः एक चेन्न की सास ली. आस पास बैठे बच्चे उससे hi देख रहे थे. पर किसी ने उसका सपोर्ट नहीं किया. क्युकी ये उनका मामला नहीं था. और न hi तब बच्चो में उतना सेंस होता था. वह तोह बस सामने चल रहे सन को देखा करते थे.

पर तभी एकदम से,

"साले! बिना मम्मी का लड़का!!! हाहाहाहाहा!!"

उनमे से एक वापस आया और वीर को चिढ़ा के नौ दो ग्यारा हो गया. वीर बस अपनी मुट्ठी को कस्ते रह गया. क्या करता? कुछ भी नहीं! सिवाए सेहेन करने के, उसके पास कोई ऑप्शन नहीं था.

कुछ hi देररि में ड्राइवर आया और सभी बच्चो को बैठा के निकलने के रेडी हो गया.

और इन् आखिर में आये हुए बच्चो में वह भी थे. प्रांजल, आरोही और काव्य!!

सब के सब एक hi ऑटो में जाते थे और एक hi स्कूल में पढ़ते थे.

वीर सीट पर पहले आ चूका था तोह ज़ाहिर है सीट पर बैठने का हक़ उसका हो चूका था. और अब कोई चाह के भी उससे नहीं उठा सकता था. क्युकी यही ऑटो का नियम था.

प्रांजल देररि से आया तोह जहा सीट पर उससे बैठना चाहिए था वह वीर पहले hi बैठ चूका था. मजबूरन उससे सीट के सामने उस पटिये पर बैठना पड़ा.

आरोही, और काव्य का भी यही हाल था. वह भी पटिये पर बैठी हुई थी.

पर उन् दोनों को इसमें कोई ऐतराज़ नहीं था. सिवाए प्रांजल के. गुस्से के मारे उसका पूरा मूड ख़राब हो चूका था.

"ोये तुम लोग को पता है?" वह अचानक hi सब से बोलै,

"क्या क्या???"

"क्या भैया?"

"हम्म?"

और उसने सभी का ध्यान बड़ी hi चतुराई से खींच लिया.

"अरे तुम लोग को एक मज़ेदार चीज़ दिखाऊ?" उसने पूछा.

तोह सभी बच्चे हाँ में सर्र हिलाते हुए एक्ससिटेड हो गए. भला ऐसी कौन सी मज़ेदार चीज़ दिखाने जा रहा था ये?

पल भर के लिए वीर भी उससे देखने लगा. और तभी,

"तोह ये देखो!!!! हाहाहाहाहा!!!"

प्रांजल ने अगले hi शान वीर के हाफ पंत को ऊपर उठाया और अंदर की चीज़ सबको दिखा दी.

वीर के हाफ पंत के अंदर एक और हाफ पंत था. जिससे देख के सब की हस्सी निकल गयी.

"ाररी हहहहहहहह!!!"

"ए दो दो पंत!!! हहहहहहह!!!"

"भैया ये दो दो पंत पहना है हाहाहाहाहा!!"

"फिरसे!!! हहहहए! फिरसे दिखाओ!!! हाहाहाहा!"

"फिरसे देखना है??? ये देखो!!! हाहाहाहा!!"

सारे बच्चे. चाहे लड़के हो या लड़किया. वीर की उस हालत पर हस्स रहे थे. उसका मज़ाक उड़ा रहे थे. और न चाहते हुए भी,

*ड्रिप*

वीर की आँखों से ासु अपने आप पनप उठे. क्या वह जानता नहीं था? ये सब किसका किया धरा था?

क्या वह जान बूझ के ये पहना हुआ था? कभी नहीं! उसकी मजबूरी थी. जो उसकी साड़ी अंडरवियर गीली पड़ी हुई थी.

जबकि कल तक वह साफ़ सुथरी धूल के सूखी हुई थी. तोह फिर आज सुबह सुबह कैसे गीली हो गयी सब? सामने बैठे उस लड़के की हस्सी देख वह सब कुछ जानत था. सब जानता था ये काम किसका था. किसने उसकी ुंडेरवेअर्स को गीला किया था.

अपने मुँह को लड़कियों से छुपाये वह रोटा रहा. अपने ासु पोछता रहा. पर प्रांजल हर्र थोड़ी देरर में उसका पंत उठा के उससे हस्सी का पात्र बना देता.

रास्ते भर यही सिलसिला चलता रहा जब अचानक hi काव्य रोने लगी.

और काव्य को रोटा देख प्रांजल डर गया. वह जानता था अगर इसने घर में कंप्लेंट की तोह उसकी शामत आणि पक्की थी. काव्य से अब ये सेहेन न हुआ. वह तोह बस इसलिए रो पड़ी क्युकी वीर रो रहा था. उससे नहीं पता था की प्रांजल क्या खेल खेल रहा था. वह बेचारी जब वीर को इस तरह रोटा देखो तोह उसकी खुद की रुलाई चूत गयी.

पंत अभी भी ऊपर खिसका हुआ था वीर का.

"अच्छा अच्छा अब नहीं कर रहे ठीक? ठीक काव्य? अब रौ मत! देखो! भैया नहीं कर रहे अब."

कहते हुए प्रांजल चुप चाप बैठ गया. काव्य के डर से. और काव्य सिसकने के थोड़ी देरर बाद चुप हो गयी.

आरोही ने वीर के पंत को पकड़ा और वापस से नीचे कर उसके अंदर के पंत को धक् दिया. और कुछ इसी तरह वीर का स्कूल में दो महीनो की छुट्टियों से पहले का आखिरी दिन गुज़रा.

घर आते hi, प्रांजल अपने खेल कूद में लग गया था. पर वीर?

वह तोह अपने कमरे को अंदर से बंद कर बस रोटा रहा.

कभी प्रांजल उसकी स्लीपर लेकर भाग जाता तोह वीर उसका पीछा करता. और जान बूझ के प्रांजल उससे घर के बाहर पड़ी गिट्टियों पर भगाता. जो ताप्ती धुप में शोलो की तरह गरम जल रही होती थी.

जैसे तैसे वीर जब कमरे में लौटता तोह फिर वही रूटीन. उसकी रुलाई चूत पड़ती. कहा चली गयी थी उसकी माँ? कहा थी वह? कब तक अकेला रहेगा वह? प्रांजल, काव्य और आरोही की मम्मी थी तोह उसकी क्यों नहीं? कोई उसकी बाते क्यों नहीं मानता था? ये सारे सवाल वह खुद से रो रो के पूछा करता था.

आरोही आती, उसके दरवाज़े पर खड़े उससे देखती, वो नीचे ज़मीन पर बैठ रोया करता था. और अपना हाथ बढ़ा के वह क्रीम का तुबे उससे थमा जाती. वह क्रीम जो उसके पेर्रो के छालो के उपयोग में आती.

यही वीर की दिनचर्या थी. जब एक दिन,

प्रांजल किसी के साथ खेल रहा था. वीर को अपने कमरे से आवाज़ें सुनाई दे रही थी.

सुबह से प्रांजल उससे 25 बार खेलने के लिए बुला चूका था. पर वीर ने हर्र बार मन कर दिया था.

अब ये नयी आवाज़ सुन्न के वीर थोड़ा हैरत में था. ये कौन था भला?

उसने बाहर निकल जब देखा तोह पाया की कोई एक और जनन था. एक और लड़का. जो प्रांजल के संग खेल रहा था. उससे देखते hi वीर पहचान गया.

वीर ने इससे पहले भी प्रांजल के साथ देखा हुआ था. पर उससे नाम नहीं पता था. वह जानता था की ये लड़का अक्सर घर आया करता था.

जैसे hi उस लड़के की नज़र वीर पर पड़ी तोह वीर भागते हुए अपने कमरे में घुस गया.

लड़का : हँ? वीर था न?

प्रांजल : कहा? ओह हां!! तुम उससे चोर्रो न! आओ हम खेले!

लड़का : नहीं! मुझे वीर से दोस्ती करनी है. उससे बुलाओ न!

प्रांजल : पर में तोह हु न तुम्हारे साथ. वीर पागल है. तुम उस से दोस्ती मत करो.

लड़का : नहीं! मुझे दोस्ती करनी है. उससे बुला के लाओ न. वर्ण में जाऊ?

प्रांजल : ारी नहीं! में बुलाता हु! तुम रुको!

वह फिरसे गया! और दरवाज़ा पीट के उससे बुलाने लगा. पर वीर नहीं निकला. ऐसा उसने 4-5 बार किया. पर वीर तब भी नहीं निकला.

लड़का : क्या हुआ?

प्रांजल : मेने कहा न वह पागल है. वह नहीं आ रहा. चलो न हम खेलते है.

लड़का : नाहीईई!!!

प्रांजल : तोह तुम खुद बुला लो! देख लो! वो नहीं आएगा.

लड़का : Th-Theek है!

छोटे क़दम भरते हुए वह लड़का वीर के दरवाज़े के पास आया और उसने जैसे hi दरवाज़ा khat-khataaya,

"चले जाआऊवो!!!!!!!!!"

दरवाज़ा अपने आप hi अगले पल खुला और वीर की ज़ोरदार चींख पूरे कमरे में फेल गयी.

"A-Ahhh!!!"

"हँ???"

जब वीर की नज़र सामने पड़ी तोह उसने पाया की ये प्रांजल नहीं था. ये तोह-

वही लड़का था. जिसकी आँखों में ासु थे. और वह अगले hi पल भागता हुआ वह से निकल गया,

प्रांजल : अह्ह्ह! R-Rukoo!!

वीर की जब कुछ समझ में नहीं आया तोह उसने दरवाज़ा बंद कर लिया. पर बाहर क्या हुआ, इस से वह अनजान था.

प्रांजल : R-Ruko!! रुको मत जाओ न!!! रुको!!

"में जा रही हु!!! हूउउउउ~"

वह लड़का, असल में लड़का था hi नहीं. वह तोह एक लड़की थी. चुकी वह बॉय कट राखी हुई थी और लड़को जैसे कपडे पहनती थी, बेचारा वीर आये दिन यही समझता था की प्रांजल किसी लड़के के साथ खेलता है. पर उससे क्या पता था की यही लड़की प्रांजल के दिल में ख़ास जगह बनाये हुए थी.

प्रांजल : मत जाओ न!! प्लीज!!! सरररययय!!! सरररययय न!! वीर को में खूब मारूंगा. आओ! चले हम!!

लड़की : नाहीई!!! में जा रही हु!!! *स्निफ्फ* अब में कभी नहीं आउंगी.

और वह भाग के निकल गयी. पड़ोस में hi थोड़ी दुरी पर उसका घर था. प्रांजल चाह के भी कुछ न कर पाया.

और उसकी बदक़िस्मती ये, की अगले दिन hi वह लड़की उसका शहर चोरर के जा चुकी थी. उसका जाना जैसे एक रहस्य बन्न गया था प्रांजल के लिए. वह सिवाए उस लड़की के नाम के अलावा कुछ नहीं जानता था उसके बारे में. न जाने कितना ढूंढने का प्रयास किया उसने. पर प्रांजल उससे ढूंढ न पाया.

वह लड़की...! जा चुकी थी!

जब वीर की आँखें खुली, तोह उन् आँखों में नमी थी. पुरानी दर्द भरी यादो को याद कर उसकी मुट्ठी गुस्से में कस गयी.

[Sheesha aur zakhm ek jese hote hai. Ek baar agar sheeshe me daraar aa jaaye toh usse kabhi bhi pehle jesa nahi kiya jaa sakta. Wese hi, dil par pohuchaye gaye zakhmo ko na hi kabhi chhupaya jaa sakta hai aur na hi unhe dabaaya jaa sakta hai. Woh wahi rehte hai...! Andar! Gehraayi me...! Master!]

एक लम्बी सास चोरर वीर ने प्रांजल को देखा. इस चूतिये पर वीर को अब और भी ज़्यादा गुस्सा आ रहा था. ये जहातु इंसान इस छोटी सी बात के पीछे अब तक पड़ा हुआ था?

प्रांजल ने बचपन में hi यही देखा था की वीर की वजह से वह लड़की गयी. और बस, तब से लेकर आज तक, वह वीर को hi दोषी मानता आया था.

*चटाककककककक*

वीर : चूतिये!! मुझे तोह उस लड़की का नाम भी नहीं पता है. मुझे तोह अब ये पता चला है की जिससे में लड़का समझता आया था वह असल में एक लड़की थी.

प्रांजल : थूऊ!! कुत्ते!! किस्से बेवक़ूफ़ बनाता है!?? मार ले हराम खोर!!! मार ले!! एक दिन में तेरी रंडी म-

*चटाककककककक*

"ुरररग्ग्घहहहह!"

वीर : अहिंदा से एक शब्द भी तूने गलत बोलै. तोह तेरी जुबां खींच लूंगा. समझा? बोल! हु वास् शी? कौन थी वह? उसका नाम क्या था?

प्रांजल : नहीं बताऊंगा साली!!! भाड़ में जाआ!!! बहनचोद!!! तेरी माँ की---

*बाआआममममममम*

और वीर जो अब तक सिग्मा इंस्टिंक्टस को कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहा था. माँ शब्द आते hi, उसने अपना आप खो दिया.

एक झटके में उसने प्रांजल के बाल पकडे,

"आआअह्हह्हंणन्न!!!"

और उससे घसीटते हुए वह अंदर ले गया. तेज जो अब तक बाहर कड़ी सब कुछ आँखें फाड़े देख रही थी वह भी घबराते हुए अंदर आयी,

उसकी सासें जोरर जोरर से चल रही थी. उसका ये छोटा भाई! कुछ ज़्यादा hi आक्रामक नहीं था?

वीर : नहीं बताना है तुझे!? देखता हु कैसे नहीं बताएगा!

वीर के इर्द गिर्द अब वह कूल और कलम और नहीं था. बल्कि अब उसके चलने का ढंग, उसका अंदाज़, उसकी आवाज़ सब कुछ ज़्यादा hi अग्रेसिव हो चुकी थी. और तेज, ये देख के डर रही थी. आगे क्या होने वाला था?

प्रांजल को घसीट के वीर वाशरूम में उससे ले गया.

*थुड़*

"चोररर दिए!!! चोरर दी कुत्ते...!!" वह दर्द में बिलबिलाता रहा. उसके बाल इतनी जोरर से खींचे हुए थे की दर्द के मारे अब उसकी आवाज़ भी फटने लगी थी.

वीर ने उससे बालो सहित उठा के सीधा सामने लगे कमोड में उसका सर्र घुसेड़ा. अपनी एक लात उठा के उसने प्रांजल के सर्र पर राखी और दबाव बनाया. और अगले hi पल,

*Flushhhhhhhhhh*

वीर ने फ्लश चालू कर दिया.

तेजल ने जैसे hi ये सन देखा तोह वह भौचक्की सी होक वही जम्म के रह गयी.

तेजल : अह्ह्ह!

वीर (ग्लान्सेस) : फिल्थ मस्ट बे क्लीनेड. Don't यू थिंक?

उसकी नज़रो को देख तेजल का सर्र अपने आप हाँ में हिल गया.

वीर (स्माइल्स) : गुड!

प्रांजल, कमोड से निकले पानी के बहाव में अपनी सास रोकने के चक्कर में बस अपने हाथ परर चलाता रहा. पर वीर के परर का दबाव इतना ज़्यादा था की वह कुछ न कर पाया.

और सबसे गन्दगी भरी बात ये थी, की अभी थोड़ी देरर पहले hi प्रांजल ने उसमे अपनी गरमा गरम मूट से भरी टंकी खली की थी.

ऐसा खतरनाक एक्सपीरियंस शायद hi किसी ने लिया होगा. ये तोह जैसे मौत से भी बत्तर था. प्रांजल तोह जैसे सदमे में जा चूका था. वह न कुछ बोल रहा था और न hi कुछ कर रहा था. बस आँखें खोले एक जगह देखे जा रहा था.

[Looks like, he has gone mad!]

वीर का ऐसा रूप देख के तेज की खुद की बोलती बंद हो चुकी थी.

वीर : बोल अब! कौन थी वह लड़की!! बोल!!!!!

और इस बार वाक़ई प्रांजल के मुँह से एक नाम धीरे से निकला. जिससे सुन्न वीर की बॉहे हैरानी के मारे सिकुड़ उठी.

माधुरी!!!!

[It might be her!!!]

इस नाम को अपने ज़हन में रखे, वीर ने बिना समय गवाते हुए प्रांजल को एक hi हाथ से किसी सूटकेस के भाति उठाया और बाहर निकल उसने कचरे की तरह उससे पीछे की सीट पर फ़ेंक दिया.

घर को लॉक कर वह कार में अंदर आके बैठा,

वीर : आप आ रही है न?

उसने चका चौंध हो राखी तेज को देख पूछा,

तेज: हहहह?? H-Haan!!!

और वह भी आगे वीर के बगल वाली सीट पर आके बैठ गयी.

कार में बैठ निकलते hi वीर ने कार में लगा एयर फ्रेशनर ों कर दिया. पीछे कचड़ा जो पड़ा हुआ था. बॉस तोह आएगी hi.

रास्ते भर, तेजल की नज़रे वीर के मुखड़े पर तिकी रही. दोनों में से कोई भी कुछ नहीं कह रहा था. शायद दोनों अभी अभी हुए सन से थोड़ा संकोच में पद गए थे की आखिर बात करे तोह कैसे करे!?

वीर ने जब कार रोकी तोह तेज को ध्यान आया.

तेज : ये हम!? कहा है?

वीर : आइये!

वह तेज को एक घर की ऑर्डर ले गया. प्रांजल तोह सदमे में अभी भी गाडी के पीछे hi लेता हुआ था. बोहोत भारी मानसिक असर हुआ था शायद उस पर.

और दरवाज़ा खुलते hi एक चेहरा वीर और तेज के सामने आया,

"अरे?? T-Tum?"

वीर (स्माइल्स) : जी! अंदर आने नहीं कहेंगी?

"H-Haan! आओ न!"

ये घर था ऊनि शख्स का. मृणाल!! वही डॉक्टर लेडी जिसने वीर का इलाज पहले किया था. वही डॉक्टर लेडी जो कारन से परिचित थी.

तेज पूरे समय, बस वीर को निहारती रही. जब उसके हाथ की ड्रेसिंग हो रही थी तब भी उसका ध्यान वीर पर hi था. न की अपनी चोट पर.

कुछ भी उसके अकॉर्डिंग नहीं हो रहा था. आखिर ये किस्मत उसके साथ केसा खेल खेल रही थी?

पहले वह खुद को और अपनी माँ को दोष देती रही. की उसका परिवार नहीं था. और जब अपने परिवार के बारे में पता लगा तोह उससे एक जलन ने घेर लिया. आखिर उसका भाई इतने मज़्ज़े में no जी रहा होगा. बाद में उससे पता चला की उसका वही भाई उस भी बत्तर ज़िन्दगी जी रहा था.

और जब वह अपने इस भाई को प्रोटेक्ट करने निकली तोह,

उससे पता चला, की वीर को तोह किसी प्रोटेक्शन की ज़रुरत hi नहीं थी. उल्टा वह खुद अभी उससे प्रोटेक्ट कर रहा था. सब कुछ मैं की इच्छा के विपरीत hi हो रहा था उस बेचारी के साथ.

मृणाल जी के घर से निकल वीर ने सीधा अपनी गाडी पुराने घर की ऑर्डर लगा दी.

और कार का शोर सुन्न, सभी घर वाले बाहर निकल आये.

काव्य : भैया???

आरोही : वीर!!!!

परन्तु, वीर अपनी बहनो की बाते अभी sunn'ne नहीं रुका. पीछे का गेट खोल जैसे hi उसने प्रांजल को बाहर निकाला वह खड़े लोग हैरान रह गए.

वीर : घर का कचड़ा बाहर गन्दगी फैला रहा था. फिलहाल आप hi सम्भालिये!

और उसने बस इतना बोल प्रांजल के घर की छवि उसके ऊपर फेकि और अभी वह सबके सामने उससे एक लात जड़ने hi वाला था जब अचानक से कोई आके प्रांजल को धाक लिया.

वीर की लात अपने आप hi हवा में ृक्क गयी.

नीचे, सुमित्रा आसुओ से सजा चेहरा लिए वीर से मैं hi मैं गुहार कर रही थी.

"टच! लकी बास्टर्ड!"

उसके मुँह से बस इतना hi निकला. और अपने परर को पीछे कर वह पलट के वह से जाने लगा.

पीछे से उससे कई आवाज़े आयी जो रुकने के लिए कह रही थी. पर वह नहीं रुका.

"वीईएएरररर!!!" यहाँ तक की बृजेश भी चिल्ला उठा.

"वह लड़की कौन है??? कौन थी वह???" उसने फिरसे चीखते हुए पूछा.

पर वीर न hi रुका और न hi उसने कोई जवाब दिया. उसके होंठो पर बस एक मज़ाक से भरी फ़र्ज़ी मुस्कान थी.

'खुद की औलाद की खबर नहीं. हैः~'

[Leave it! Master!]

वीर : Let's जो!

तेज : *नॉड्स*

*वरररररओओओओओओओओमममममम*

और दोनों वह से निकल गए. उन् लोगो को धेरर सारे प्रश्नो में चोरर के.

वीर पूरे समय गुस्से में गाडी ड्राइव करता रहा. माँ! ऐसी क्यों होती थी भला?

जिस लड़के ने इतने घिनोने काम किये. इतने ज़ुल्म किये. ये जानते हुए भी की वह पूरी तरह से एक बिगड़ी हुई संतान है. गलत राह पर जा चूका है. फिर भी,

एक पल नहीं लगा. एक पल नहीं लगा उस माँ को सामने आके अपनी औलाद को पीते जाने से बचाअण के लिए.

और इसलिए...! इसलिए वीर गुस्से में था.

'आप कहा थी तब!!?' उसने मैं में hi कहा. जब उससे सबसे ज़्यादा अपनी माँ की ज़रुरत थी. तब कहा थी वह???

आज उससे जलन हो रही थी. हम्म! सही सुना! जलन! वह भी प्रांजल से. उसके पास माँ जो थी.

"तसकककक!!!"

[Calm down!]

पारी की आवाज़ उससे जैसे तैसे शांत करि. जैसे hi वीर तेज के द्वारा बताये गए एड्रेस पर पहुचा.

पूर्वी के घर में ताला लगा हुआ था.

वीर : लॉक्ड है!

तेजल : हँ?

तेजल ने फौरन अपना फ़ोन निकाला और स्क्रीन देखते hi उसकी सांस hi अटक गयी.

तेजल : ओह्ह्ह no!!! 16 मिस्ड कॉल्स?? फ़ोन साइलेंट में था. ी didn't इवन...!

वीर : कॉल करके बुलाइये उन्हें.

तेजल : T-Tum...! तुम जा तोह नहीं रहे न? P-Please! स्टे!

वीर : फाइन! कॉल करिये!

तेजल : राइट.

तेजल ने कॉल कर जैसे hi अपनी स्थिति पूर्वी को बताती तोह उस ऑर्डर से जोरर से दांत सबसे पहले भावना की hi उससे पड़ी. वह दोनों उससे hi ढूंढने निकली थी अभी अभी. उसने फिर घर को स्पेयर के से अनलॉक किया और वीर को अंदर बैठा के वह उसके लिए कॉफ़ी बनाने लगी.

उसकी कुछ समझ नहीं आ रहा था की आखिर बात शुरू कैसे करे. आ तोह गया भाई! था तोह वह उसकी नज़रो के सामने. पर अब क्या? अब तोह जैसे जीरो बाटे सन्नाटा हो चूका था.

कॉफ़ी को गैस पे चढ़ा के वह डाइनिंग टेबल पर आके बैठी. उसके ठीक सामने वीर था.

तेजल : I-I हैवे क़ुएस्तिओन्स.

वीर (स्माइल्स) : ओह्ह्ह! एंड सो दो ी...!

तेजल : में-

*क्लिक*

पर तभी हॉल का मैं गेट खुला और एक आवाज़ गुस्से में चिल्लाते हुए सुनाई पड़ी,

"मेने तुम्हे कितनी बार समझाया है की ऐसे बिना बताये तुम-"

वह आवाज़ बीच में hi ृक्क गयी जब उस आवाज़ की शख्सियत ने सामने बैठे व्यक्ति को देखा.

भावना के क़दम वही स्थिर रह गए. उसकी सासें जैसे पल भर के लिए थम गयी.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

धड़कने तेज़्ज़ हो उठी.

और फिर, कानो में वही आवाज़ सुनाई दी. जो उसने कुछ महीनो पहले सुनी थी,

"ओह्ह्ह!!! कौन आया है? हम्म! व्हाट शुड ी कॉल यू? माँ? या फिर...!? मिस गीता????"

और ये सुनते hi भावना के पूरे जिस्म में रौंगटे खड़े हो गए.

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आज के लिए इतना hi गाइस!

इस अपडेट को तैयार करने में काफी दिक्कतें आयी है. ट्रस्ट में! ये अपडेट मोरे थान 4.9क वर्ड्स का है. तोह ऑलमोस्ट 5क वर्ड्स. एक मेगा अपडेट जितना hi समझ लो. तोह लाइक्स थोक के जाने का. और रेवोस रखने का. एंड अस ी टोल्ड यू, ा सर्टेन पास्ट है बीन शौन नाउ.


धन्यवाद! ✨
 
अपडेट - 119 ~ रीयूनियन

अब तक...

भावना के क़दम वही स्थिर रह गए. उसकी सासें जैसे पल भर के लिए थम गयी.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

धड़कने तेज़्ज़ हो उठी.

और फिर, कानो में वही आवाज़ सुनाई दी. जो उसने कुछ महीनो पहले सुनी थी,

"ओह्ह्ह!!! कौन आया है? हम्म! व्हाट शुड ी कॉल यू? माँ? या फिर...!? मिस गीता????"

और ये सुनते hi भावना के पूरे जिस्म में रौंगटे खड़े हो गए.


अब आगे...

कुछ बंधन ऐसे होते है, जो कभी नहीं टूटते. उन्ही बंधनो में से एक बंधन होता है एक माँ और उसकी औलाद के बीच. एक ऐसा रिश्ता जिसकी कोई तुलना नहीं हो सकती.

अतुलनीय!

वैसा hi एक खून का रिश्ता था वीर और भावना के बीच.

आज दोनों माँ बेटे एक दूसरे के सामने थे. सूरज ढल चूका था और चाँद की चांदिनी अँधेरे में जगमगा रही थी.

भावना पूर्वी के साथ तेजल को ढूंढ़ने ऐसी रात में hi निकल गयी थी. दिन भर से वह गायब थी और न तोह फ़ोन उठा रही थी और न hi कोई जवाब दे रही थी. एक माँ थी भावना. चिंता तोह होएगी hi न अपनी संतान की?

पर थोड़ी देरर पहले आये तेजल के फ़ोन ने उसकी चिंता दूर कर दी. पता चला की वह तोह घर लौट चुकी थी.

उसकी लापरवाही पर भावना चिल्लाते हुए घर में प्रवेश कर hi रही थी जब सामने बैठे शख्स को देख उसके परर वही जम्म गए.

20 साल पहले उसका खून जो उस से बिछड़ गया था, उसका अपना लल्ला उस से दूर था, आज वह उसकी आँखों के सामने बैठा हुआ था.

और तब उसके बोल भावना के कानो में पड़े, "ओह्ह्ह!!! कौन आया है? हम्म! व्हाट शुड ी कॉल यू? माँ? या फिर...!? मिस गीता????"

भावना का बदन काँप उठा. वीर के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी, जो शायद फ़र्ज़ी थी. अंदर बेहद दर्द समाया हुआ था जैसे.

"ये लड़की भी बिलकुल अजीब है. सच में बिलकुल तुम पे गयी है. अब तोह तुम hi इससे-!!??"

अपने पर्स में गाडी की छवि डालते हुए पूर्वी जैसे hi घर के अंदर आयी, उसका भी हाल कुछ कुछ भावना की hi तरह हो गया.

क़दम थम गए और सासें तेज़्ज़ हो गयी.

"वीर...!?" उसके मुँह से हैरानी में निकला.

बारी बारी सब पर नज़र फिराते हुए वह वही दरवाज़े की देहलीज़ पर hi ठहर गयी. कई सारे सवाल थे उसके मैं में पर फिलहाल सामने का ये दृश्य ज़्यादा ज़रूरी था.

सिर्फ वीर hi बैठा हुआ था, बाकी वह तीनो कड़ी उससे hi देख रही थी.

वीर : आपने बताया नहीं? हाउ शुड ी एड्रेस यू? माँ? या फिर...!? मिस गीता?

तेज : वीर!?

पूर्वी : वीर?? वीर ये तुम-

इसके पहले की पूर्वी कुछ कह पाती, भावना ने अपना हाथ उठा के उससे रोक दिया.

ये सब क्या हो रहा था? भावना ने कभी नहीं सोचा था की उसका अपना बच्चा उस से कभी ऐसा सवाल करेगा. वह इतनी नादान कैसे हो सकती थी?

अब उससे समझ आ रहा था. बेशक! उसके बेटे का उस से नाराज़ होना तोह बनता hi था. आखिर, वह उससे चोरर के जो आ गयी थी. तोह फिर क्यों नहीं नाराज़ होएगा वीर उस से? एक माँ होने के नाते, किया hi क्या था उसने अपने बेटे के लिए? तोह नाराज़गी तोह बनती hi थी न?

जब भावना ने इस बारे में अब सोचा तोह उससे खुद के ऊपर hi हस्सी आ गयी. उसने सोच भी कैसे लिया की उसका लाडला उससे पहचानते hi उसकी बाहो में आ गिरेगा? उस पर प्यार लुटा देगा? शायद इससे hi कहते थे, ख़याली पुलाव पकाना! आज वह जान गयी थी.

वह बिना कुछ कहे, आगे बढ़ी. उसके हर्र क़दम पर उसकी पायल की chham-chham की आवाज़ कमरे में गूंजने लगी. इतनी ख़ामोशी थी वह.

हर्र बढ़ते क़दम पर भावना को ेगीपत के वो पल याद आने लगे. जब वीर, विक्रम के रूप में उस से मिला था. वह हसीं लम्हे जहा विक्रम ने एक गहरी छाप छोर्री थी उसके मैं में. और बाद में उससे जब ये पता चला की वही उसका अपना खून था तोह भावना के अंदर जो एक आस थी वह पुनः जाग उठी.

फासला सिर्फ थोड़ी दुरी का था दोनों के बीच. फिर भी ऐसा लगा जैसे भावना को वीर तक पहुचने में काफी देरर लग गयी. वीर खुद भी शांत न रह सका. उसकी सासें तेज़्ज़ थी. हार्ट रेट बढ़ा हुआ था. और पारी ये बात अच्छे से जानती थी की ऐसा क्यों था. पर वह मौन hi रही.

वीर के सवाल का भावना ने कोई उत्तर न दिया. वह बस वीर के क़रीब पहुची, और पास आते hi,

उसने वीर, जो कुर्सी पर बैठा हुआ था उसके चेहरे को अपने हाथो में थाम लिया.

वह स्पर्श! वह पहला स्पर्श होते hi, दोनों के दिलो ने जैसे एक धड़कन फांद ली.

कहते है अतीत में जो खो जाता है, वह दुबारा नहीं मिलता. पर आज भावना को मिल गया था.

उसका अपना चिराग! सच hi तोह कहा था पूर्वी ने. कितना सोना था उसका लाडला.

पल भर में hi भावना की आँखों ने आसुओ का सैलाब ला दिया. और उसके thar-tharaate होंठो ने पुकारते हुए उससे बुलाया,

"V-Veeeerr??"

वीर की नज़रे अपनी माँ पर hi थी. यही वह माँ थी, जो उससे 20 साल पहले उस नर्क सामान घर में अकेला चोरर के चली गयी थी. आज वह उसके सामने थी. पर आज...! आज तोह वह उससे पुचकारने में लगी हुई थी. उसके अल्फा इंस्टिंक्टस इस हमदर्दी को कैसे स्वीकार कर सकते थे?

वीर : वीर? या विक्रम?

भावना : में जानती नहीं क्या की तू क्या कर रहा है? *स्निफ्फ* नाराज़ है मुझसे. है न? *स्निफ्फ* A-Aur क्यों नहीं होगा? तेरी माँ ने काम hi ऐसा किया है. हम्म...!? में तोह वह अपराधी माँ हु न जो अपने लल्ला को चोरर के भाग गयी थी. है न? तेरी नज़रो में तोह में वही हु. क्यों?

वीर : तोह क्या बाकियो की नज़रो में आप कुछ और है?

वीर की वह मुस्कान भावना को सब कुछ बया कर रही थी. वह जैसे उसके सच को झूठ साबित करवाना चाह रही थी.

भावना : A-Aisa नहीं है मेरे बच्चे! ऐसा नाहीइ हैई!!! *स्निफ्फ* ओह्ह्ह!!! मेरे लाल!!!

उसने वीर के चेहरे को थामे hi अपनी ऑर्डर खींचा और अपने पेट से उसके पूरे चेहरे को कस के लगा लिया.

वीर ने कोई विरोध नहीं किया. वह अपनी माँ के पेट से लगे शांत बैठा रहा. भावना लगातार उसके बालो पर हाथ फिराए जा रही थी. पेट से लगे लगे hi वीर को ध्यान आया. यही वह गर्भ था, जिसमे 9 महीने वह पनपा था. इसी गर्भ से उसका जन्म हुआ था.

पीछे कड़ी पूर्वी और तेज की भी आँखें नम्म हो गयी. ये एक बहुत बड़ा मिलान था. एक माँ और बेटे का.

"मेरा बच्चा...!!!!" भावना रोये जा रही थी.

"पूर्वी देखो मेरा लाल!!! अह्ह्ह!! मुझे मिल गया...! *स्निफ्फ* मेरा बीटा मिल गया पूर्वी!!! *स्निफ्फ* T-Tej! देख तेरा भाई!!! आ जा इधर. लगा ले इससे अपने सीने से तेज!! A-Ab कही नहीं जायेगा ये!!! H-Haan! यही तेरा सागा छोटा भाई है तेज! आजा मेरी बच्ची!!!! आजा!!!"

वह नहीं जानती थी की तेज पहले hi वीर के कुछ राज़ो से वाक़िफ़ थी.

"अब में कही नहीं जाने दूंगी अपने लाडले को. K-Kahi नहीं! *स्निफ्फ* तुम्हारी माँ!!! तुम्हे अपने पास रखेगी वीर!!! अपने पास...!"

वह कहती तोह जा रही थी पर वीर की आँखें जो की त्यों एक जगह पर अडिग थी. भावना उसके बगल से बैठी और अपने बेटे के मुख को निहारने लगी,

भावना : सही कहा था तुमने पूर्वी! एकदम सही! मेरे बच्चे को देखने के बाद, मैं करता है की दुनिया भर का प्यार उस पर लुटा दू. पूरे मुख को चूम लू... सच में!

बोल कर वह आगे बढ़ी और उसके कोमल होंठ वीर के गाल से लग गए. पर इस बार...! इस बार स्पर्श होते hi...!

वीर की आँखों से ासु उमड़ आये.

और उसकी लड़खड़ाती आवाज़ ने बस इतना hi पूछा, "कहा थी आप?"

सवाल तीन शब्द का था. पर उसकी अहमियत का भार नापा भी नहीं जा सकता था. वह जानती थी वीर के इस सवाल का कारण. वह क्या jaan'na चाह रहा था. वह जानती थी.

कहा थी वह इतने साल? सवाल इतना सा था. पर उसका जवाब देने की हिम्मत तक नहीं उठा पा रही थी भावना.

भावना : M-Mein मजबूर थी मेरे बच्चे! में मजबूर थी...! *sniff*l

वीर (स्माइल्स) : इतनी मजबूर की अपने बेटे को 20 साल तक अपने से जुड़ा राखी रही? अगर में खुद से पहल न करता तोह शायद-

उसके बोल वही थम गए जब भावना ने अपना हाथ उसके मुँह पर रख उससे चुप करवा दिया,

भावना : नहहीइइइइइइ!!! नाहीइ!! ऐसा नहीं है मेरे लाल!!! ऐसा नाहीइ हीी~

वीर : क्या मेने सच नहीं कहा? अगर में नहीं आता तोह शायद-

भावना (स्क्रीम्स) : नाहीइइइइइइ!!!!! माँ हु तेरी मेरे बच्चे!! तुझे जन्म दिया है मेने!!! तुझे 9 महीने अपनी इस कोख में रखा है. में कैसे तुझ से जुड़ा हो सकती हु???

वीर : तोह?

भावना : M-Mein मजबूर थी! में मजबूर थी... *स्निफ्फ*

भावना फूट फूट कर रोने लगी.

पूर्वी : भावना!!!

वह पुकारते हुए आगे आयी और भावना की पीठ पर हाथ फेरर उसके बगल से बैठ गयी.

वीर कुछ देरर शांत रहा. और जब उससे लगा की शायद उससे उसके सवाल का जवाब नहीं मिलेगा. वह उठा और दरवाज़े की ऑर्डर जाने लगा. तोह ये देख भावना घबरा उठी,

भावना : वीइरररर!!!

वीर : ी गेस आप उत्तर देने से रही. रात काफी हो रही है. और वैसे भी...! घर पर मेरे कुछ "अपने" मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे.

उसने "अपने" शब्द पर हल्का सा जोरर देते हुए कहा.

भावना : और में??? *स्निफ्फ* क्या में तुम्हारी अपनी नहीं??? क्या तुम्हारी ये असली माँ अपनी नहीं? हाँ? बोल!!!

वीर (स्माइल्स) : ये सवाल...! आप खुद से क्यों नहीं पूछती?

*बेदुम्प*

भावना का दिल इतनी जोरर से धड़का मानो जैसे अभी hi बाहर आ जायेगा. वीर का प्रश्न उसके दिल को खंजर की तरह चीयर के रख दिया.

उसका mamta-mayi और karuna-mayi दिल कुछ हद्द तक तोह वीर के कटु और कड़वे शब्दों के लिए तैयार था. पर इतने तीखे शब्द? शायद नहीं! ऐसे वारो का प्रहार उसके बुलबुले जैसे कमज़ोर दिल के कवच को एक झटके में नष्ट कर उससे अंदर से घायल करते जा रहा था.

उससे अंदाजा हो रहा था की उसका बीटा उस से किस हद्द तक नाराज़ था. ये बेरुखी कही अब उसकी जान न लेले.

"नहहहहयईईईई!!!!!"

वह चीखते हुए अपने बेटे के पेर्रो पर गिर गयी,

भावना : N-Nahhhiiiiii!!!! मत जा मुझे चोरर कर...!! मत जा वीएररर!!! मत जा मेरे लाल!! *स्निफ्फ* मत जा!!! वर्ण में मर्डर जाउंगी तेरे बिना...! में तेरे परर पड़ती हु...! मत जा अपनी इस माँ को चोरर के ...! में नहीं जी पाऊँगी वीर. *स्निफ्फ* में नहीं जी पाऊँगी! ऐसे रूठ के मत जा!!!

उसकी इस हरकत पर वीर khil-khila के हिस्सा,

वीर : हाहाहा~ Didn't यू सर्वाइव 20 इयर्स विथाउट में? I'm सूरे यू कैन जो फॉर ानोथेर 20.

उसके हर्र बोल भावना के ासु और जोरर से बहाने पर उससे मजबूर कर देते. पर भावना ने अपनी पकड़ ढीली नहीं की.

अभी तेज कुछ कहने hi वाली थी की इतने में हॉल का दरवाज़ा खुला और एक आदमी बड़े hi प्रसन्न मैं से सब्ज़ी का एक थैला हाथो में पकडे अंदर आया,

"अरे देखती हो? हाहाहा~ आज मंडी में क्या मिल गया? ः! इनके पराठे बनेंगे आज तोह और-!?"

कहते हुए वह वही ृक्क गया.

ये कोई और नहीं, अरुण था. पूर्वी का पति. यानी वीर के मुँह बोले मौसा जी!

अरुण की वाणी को विरहां लग गया. उसने जैसे hi सामने देखा, तोह पाया की माहौल बेहद ग़मगीन था. भावना एक लड़के के परर पकडे रो रही थी तोह वही उसकी पत्नी और तेजल की आँखों में भी ासु थे.

वह स्कूल में अध्यापक था. स्थितियों को बारीकी से परखना उसके लिए आसान था. उससे पता था की भावना और पूर्वी किसकी तलाश में इतने दिनों से लगी हुई थी. आखिर पूर्वी अपने पति से कभी कुछ नहीं छिपाती थी. तोह अरुण को एक झलक में देख के hi पता लग गया था की माजरा क्या था. स्थिति बिगड़े न इसलिए उसने फ़ौरन hi समझदारी दिखाई,

"ओह्ह्ह! M-Mein कुछ भूल गया! उससे लेकर आता हु."

और इतना बोल वह वह से तुरंत निकल गया.

पूर्वी को मैं hi मैं अपने पति की सूझ बूझ पर नाज़ हुआ लेकिन उसके बाद उसके चेहरे पर गुस्सा झलक उठा और वह भावना पर जमकर बरसी,

पूर्वी : देख क्या रही हो भावना? तुम अब भी इतनी ज़िद्दी कैसे हो सकती हो? बता क्यों नहीं देती सच? बोलो!!! बोल दो वर्ण तुम अपने जिगर के टुकड़े को हमेशा हमेशा के लिए खो डौगी भावना!!!! और में भी... में भी अपने बेटे को खो दूंगी. हम सब के रिश्ते जुड़े हुए है. बोलो भावना!!! बोलु!!!!

पूर्वी की बात सुन्न, बेचारी भावना का दिल दहल गया. खो देगी? क्या मतलब वह अपने बच्चे को खो देगी? N-Nahi!!! वह ऐसा कैसे होने दे सकती थी? अभी अभी तोह उसका प्यारा मुन्ना वापस उसके पास लौटा था. तोह अपने से कैसे जुड़ा होने दे सकती थी वह अब.

मैं hi मैं बेसुध सी भावना वीर के पेर्रो पर hi पड़ी थी, जब वीर के आगे बढ़ने की हलचल उससे वापस से होश में लायी,

भावना : नहहीईई!!! *स्निफ्फ* वीएररर!! मत जा!!! मत जा मेरे बच्चे!!! *स्निफ्फ* में मर्डर जाउंगी!!! में तेरे हाथ जोड़ती हु, परर पड़ती हु मेरे लल्ला...! *स्निफ्फ* तुझे जो सजा देनी है इस माँ को दे ले...! पर मुझसे दूर मत जा! मुझसे दूर मत जा रे!!!

तेजल : वीएररर!!!

बहिन के thar-tharaate होंठो ने उससे जब पुकारा तोह वीर वही ृक्क गया.

नीचे अपनी माँ को ऐसे देख उसका गुस्सा और बढ़ गया. सुमित्रा का वह प्रांजल को बचाना. वह पल बार बार याद आते hi उसे और कष्ट पहुचा रहे थे.

अपने बेटे की आँखों में ासु देख भावना उठी और वीर को चेहरे को पकड़ अपने अंगूठो से उसके ासु बड़े hi प्यार से पोची, और दुबारा अपने सीने से लगा ली.

भावना : मेरा बच्चा!!!! *पूछ* मेरा बीटा...! *पूछ* मत जा!! मत जा मुझे चोरर के! तेरे लिए कितना तदपि हु ये सिर्फ में hi जानती हु. सिर्फ में!

वीर : ...

पूर्वी : भावना बता दो उससे सच!!! बता दो में कह रही हु. इस से पहले की अब और देरर हो जाए.

पूर्वी की बातें उसके दिमाग में गूंजने लगी. और उसने एक गहरी सास लेते हुए निर्णय ले लिया. अपने बेटे को देख, वह अब तैयार थी. पूर्वी सही थी. अगर उसने अब देररि की, तोह वह अपने लाल को हमेशा के लिए खो देगी.

पूरे मुख को प्यार से चूमने के बाद भावना वीर से पीछे हटी. और उसकी आँखों में आँखें डालते हुए देखि,

भावना : तुम सब jaan'na चाहते हो न? तेज तुम्हारे भी सवाल थे न?

तेज ने अपनी माँ के प्रश्न पर हामी भरी.

भावना : T-Toh ठीक है. तुम दोनों भाई बहिन को वह सब बताया जायेगा जो अब तक तुमसे छुपाया गया है.

वीर : हँ!?

तेज : आपका मतलब!?

भावना : मेरा अतीत!! तुम दोनों का अतीत! सब कुछ...!

तेज : T-Toh??

भावना : पर उसके लिए...! हमे एक लम्बा सफर तय करना होगा. क्युकी वही पे तुम्हे तुम्हारे प्रश्नो के उत्तर मिलेंगे.

उसने पूर्वी को देखते हुए कहा. और पूर्वी भावना की बात सुनते hi घबरा गयी,

पूर्वी : Bh-Bhavna?? Y-Ye क्या कह रही हो? मेने सिर्फ सच बताने कहा था? W-Waha ले जाने नहीं. तुम ऐसा कैसे-!?

भावना : क्यों!? तुमने hi तोह कहा था न पूर्वी. की सब कुछ ठीक है. तुम्हे कोई भी गलत एहसास नहीं हुआ. सब कुछ शांत लग रहा था. क्या तुमने ये नहीं कहा था?

पूर्वी ये सुनते hi कल रात अपनी वीर से मुलाक़ात को याद करने लगी. जब वह बार बार होटल के आस पास देख रही थी.

पूर्वी : H-Haan मेने कहा था पर वह जाना-

भावना : तोह बस फिर! और वैसे भी, में इन् दोनों को अपने स्थान ले जा रही हु. न की वह!

पूर्वी : P-Par अगर वह-

भावना : नहीं पूर्वी! अब और नहीं! में अपने दोनों बच्चो को अब नहीं खोना चाहती. भले hi में अपने आप को खो दू...!

तेज : M-Mom??

वीर : ??

भावना : पूर्वी! क्या तुम चल रही हो?

पूर्वी : भावना तुम ठन्डे दिमाग से काम लो. वह जाने की ज़रुरत नहीं है. वीर को तोह सच्चाई तुम वैसे भी-

भावना : हां या न पूर्वी!? तुम चल रही हो या नहीं?

पूर्वी अपनी बॉहे सिकोड़े भावना को निराशा में देखती रही पर फिर एक गहरी आह चोरर वह बोली,

पूर्वी : ठीक है! इन् दोनों के अतीत में, मेरी भी भूमिका है. चलूंगी में...! तुम सब के साथ.

एक मुस्कान के साथ भावना अंदर गयी और तेज का लैपटॉप लाते हुए वह उसमे कुछ करने लगी.

तेज : माँ आप!?

भावना : टिकट्स!

तेज : टिकट्स? कहा की?

भावना ने सर्र ऊपर कर अपनी बेटी की आँखों में देखा और कुछ शान बाद बोली,

भावना : मेरी जन्मभूमि पर जाने की...!

"हहहह???" वीर और तेज दोनों के hi मुँह से निकला. दोनों भाई बहिन टोटली क्लोएलेस्स थे.

वीर के मैं में खूब सारे सवाल थे पर एक एक करके उनके उत्तर मिलने hi थे. इसलिए उसने ज़्यादा इस बारे में सोचना ठीक न समझा.

भावना जब तक लैपटॉप में लगी रही तब तक तेज समेत वीर और पूर्वी आपस में एक दूसरे को देख वही खड़े रहे. और एक अनचाहा मौन उनके बीच जन्म ले उठा.

पर तभी,

तेज : O-Ohhh!! No!!! कॉफ़ी!!!!

वह तोह भूल hi गयी थी. गैस पे चढ़ा के आयी थी.

अच्छा हुआ जो गैस लौ फ्लेम पर थी. कॉफ़ी बाहर तोह नहीं आयी पर हाँ, दो कप की कॉफ़ी, एक कप की ज़रूर हो गयी थी.

वीर ने जैसे hi कॉफ़ी का रंग देखा तोह वह समझ गया की कॉफ़ी के साथ क्या घातक घटना हुई थी.

वीर : *स्माइल्स*

उसने एक घुट पी,

तेज : अच्छी नहीं है न?

वीर (स्माइल्स) : हमारी पहली मुलाक़ात से तोह...! ये कई गुना बेहतर है!

उसके इतना कहते hi तेज के गाल लाल हो गए. उससे वह मंज़र याद आ गया जब वह पहली बार वीर से ेगीपत में मिलने पर किस तरह से पेश आयी थी.

पूर्वी अपनी जगह से उठ के वीर के पास आके बैठी, तोह उसने तेज की चोट पर अब गौर किया.

पूर्वी : Y-Ye हाथ को क्यों हुआ तुम्हारे?

तेज : लम्बी कहानी है!

वह अभी अपनी माँ पर ज़्यादा ध्यान दे रही थी. कई सवाल थे उसके मैं में. पर न चाहते हुए भी, तेज को अपने मैं में उठ रहे प्रश्नो को विरहां देना hi पड़ा.

पूर्वी ने इधर प्यार से वीर को अपने सीने से लगाया और उसके गालो को चूम लिया,

पूर्वी : थोड़ा वक़्त दो बीटा भावना को. हम्म? में सब जानती हु. पर बेहतर यही होगा की तुम उसके hi मुँह से सब सुनो. वह बोहत तदपि है तुम्हारे लिए वीर. सच में! मेने देखा है. उसने क्या कुछ नहीं झेला है वीर. क्या कुछ नहीं...! उससे थोड़ा समय दो.

वीर (स्माइल्स) : मेने तोह अभी कुछ कहा hi नहीं!?

पूर्वी : में जानती हु तुम्हारे मैं में क्या चल रहा है. सब समझती हु. ये भी जानती हु तुम क्या क्या पूछना चाहते हो. एक एक करके तुम्हारे सारे सवालों के जवाब मिलते जायेंगे तुम्हे बीटा.

सच में! पूर्वी थी तोह बोहत केयरिंग.

पूर्वी : और अगर तुम्हे जहा भी परेशानी हो, बस मुझसे बात कर लेना.

वीर : हम्म!

पूर्वी : तुम एक माँ के लिए तरसे हो...!

वीर : ….....

पूर्वी (स्माइल्स) : पर आज देखो! तुम्हे एक नहीं. दो दो माँ मिल गयी. बचपन में, मेने भी तुम्हे अपना दूध पिलाया है. तुम्हे अपनी गॉड में खिलाया है.

वीर खामोश रहा. और पूर्वी जानती थी की इस सब में समय लगेगा.

भावना : टिकट्स हो चुकी है. कल!!! हम सब...! चल रहे है. कल इधर आ जाना बीटा! यही से हम रवाना होएंगे. में सब तुम्हे टेक्स्ट कर दूंगी.

वीर : ऑलराइट थें!

वीर वह से अगले hi पल उठ गया,

वीर : ी गेस, मेरा अब यहाँ और कोई काम नहीं!

उसकी बात अभी भी कड़वी थी. बुरा तोह सबको लगा, पर सबसे ज़्यादा पूर्वी को लगा था. ये उसका घर था. और वीर का ये कहना जैसे उसके ऊपर एक वार था. की उसके घर में वीर की जैसे कोई जगह नहीं थी.

पूर्वी : ये घर तुम्हारा hi मेरे बच्चे!

वीर : I'll कीप तहत इन मंद. चलता हु!

वीर बाहर आया तोह भावना के क़दम अपने आप बढ़ hi गए थे पर उसने खुद को रोक लिया. दातो टेल अपने निचले होंठ को दबाये वह खुद को कण्ट्रोल की. अभी नहीं! धीरे धीरे सब कुछ तोह पता चल hi जाना था. वह इंतज़ार करेगी. और धीरे धीरे अपने रिश्ते को सुधारेगी. ये सोच के भावना अपने कमरे में चली गयी.

पर तेज ने जैसे hi वीर को बाहर जाते देखा वह फ़ौरन दौड़ के उसके पीछे पीछे चली गयी.

तेज : वीईएएररर!!!

वीर : हम्म?

तेज : ...

वीर : ....

तेज ने आवाज़ तोह दे दी थी. पर अब क्या कहे? क्या बोले अपने भाई से? उसके मुँह में तोह जैसे दही जम्म गया था.

वीर : कहिये!?

तेज : ी...

वीर : ???

तेज : ...

वीर : कल मिलते है थें...!

तेज : O-Ohhh! O-Okay!

वीर हलकी मुस्कान लिए वह से निकल गया. और उसके जाते hi तेज अपने hi ऊपर भड़क उठी. क्या हो गया था उससे? मौन क्यों रह गयी थी वह? वह तोह ऐसी थी hi नहीं. फिर उसकी बोलती क्यों बंद हो गयी थी अपने भाई के सामने. शायद, इसमें और समय लगने वाला था.

वीर जब रास्ते में hi था, तभी उसके मैं में सिस्टम के नोटिफिकेशन्स पॉप उप हुए,

*डिंग*

[Mission : Secure Tej has been completed]

*डिंग*

[You have been rewarded 1000 points.]

यही वह मिशन था, जिसकी बदौलत वीर समय पर तेज के पास पहुँच पाया था. पर उसका ध्यान अभी इन् सब पर नहीं था. और पारी ने भी उस से बात कर उसका ध्यान नहीं खींचा.

गाडी चलाते में hi उसका फ़ोन बजा. कॉलर था बलहार!

वीर : Hello!?

बलहार : काम हो गया है बॉस!

वीर : ी सी!

बलहार : उस आदमी की वह हालत करि है की पूछिए मत. अब तोह सड़को भी भीक मांग रहा होगा अपनी माँ के साथ. घर आपके नाम कर दिया है. और जैसा की आपने कहा था. बाकी की प्रॉपर्टी आपकी भाभी के नाम पर करवा दी है. इसमें थोड़ा और समय लगेगा पूरी तरह से क्लेम करने में. आपको एक बार आना होगा.

वीर : हम्म!

बलहार : उसकी गाडी, घर, बाकी सब हमने हड़प लिया है. कॅश भी और गोल्ड भी.

वीर : गुड!

बलहार : उम्! ग्रहस्ती का सामान भी है.

वीर : गरीबो में बाँट दो!

बलहार : ठीक है!

वीर : हम्म!

और वीर ने कॉल कट कर दिया.

अतीत में जो उसने खुद से कहा था.

'न सिर्फ में अपने 50 लाख उस से वापस लूंगा बल्कि उसका सब कुछ छीन लूंगा.'

वह आज वीर ने कर दिखाया था. रजत...! कही का नहीं बचा था.

इतने सारे घटनाक्रम को अंजाम देने के बाद वीर बीएड पर जाते hi सो चूका था.

रागिनी और श्वेता के हाथो का खाना खाने के बाद जो नींद उससे आयी, तोह उसने अपने कपडे भी चेंज नहीं किये और वह सीधा लेत के नींद की वादियों में चला गया.

और आज भी...! मौका देखते hi श्वेता उसके कमरे में घुसी. वह तोह जानती तक नहीं थी की वीर अपनी असली माँ और बहिन से मिल चूका था. क्या होगा जब उससे ये पता चलेगा?

वह आके वीर के बगल से लेती और उस से चिपक के उससे प्यार करने लगी.

कुछ hi पल में उसके ब्लाउज के हुक्स खुले और ब्रा भी नीचे को हो गयी. वह अपने बड़े बड़े थानों को हवा में नंगा किये वीर के चेहरे को पकड़ी और उससे अपने दोनों दूध के बीच में देदी.

"अह्ह्ह!!! मेरा मुन्ना!!! *पूछ* थक गया है आज तू. है न? में जानती हु. माँ हु न अब. सब समझ गयी थी जब तूने खाना काम खाया. मेरा बीटा थक गया था. कोई बात नहीं. मां आ गयी है. *पूछ* मेरे बेतु!!! ये लो! तुम्हारे मैं पसंद दूध मेरे बच्चे!"

उसने अपनी एक छुच्छी पकड़ के जैसे hi एक दूध का निप्पल वीर के मुँह के अंदर किया. हर्र बार की तरह इस बार भी, कुछ देरर के अंदर hi वीर का मुँह अपने आप चलने लगा. वह निप्पल को कतरने लगा और श्वेता की दबी सिसकिया उस कमरे में फेल गयी. वह निप्पल को काट काट के चूस रहा था. और उसके ऐसा करते hi श्वेता के चेहरे पर ख़ुशी की लेहेर दौड़ गयी.

"आआअह्ह्ह्ह!!! मेरा बच्चा!!! में जानती थी. में जानती थी मेरे बेतु को दूध चाहिए था. चिंता नहीं मेरे बच्चे...! उम्म्म्म!!!! सससस!! मां यही रहेगी रात भर. जितने चूसना है चूस. मां रात भर तुझे अपने सीने से चिपकाए रहेगी. ंन्नाःह्ह्ह!!!"

पर वीर की शर्ट श्वेता को परेशान कर रही थी. उसने धीरे धीरे उसकी शर्ट के बटन्स खोले और उसके बदन से हटा दी. अपने बेटे के गठीले बदन और रिप्पड सीने को देख उसकी नज़रे वही जम्म के रह गयी. फिर उसके होंठो पर एक गर्व भरी मुस्कान आयी. और ऊपर से दो नंगे जिस्म एक दूसरे से चिपक गए.

श्वेता की नग्न थैलिया वीर के चेस्ट में धस्स गयी और वह लगातार उसके बालो में हाथ फर्टी रही, "ंग्ग्गहह!!! मेरा बेतु~"

और वीर के लिए ये रात कुछ इस तरह गुज़री.

***

लॉस वेगास

हॉस्पिटल

मॉर्निंग ~ 9:10 ऍम

एक ख़ूबसूरत औरत एक बिस्तर पर बैठी हुई थी. न जाने क्या सोच रही थी.






"ओह्ह! उठ गयी तुम!?"

एक आवाज़ पीछे से आयी तोह उसने मुद के देखा. सामने उसकी सबसे पुरानी और एकमात्र सखा कड़ी हुई थी.

दिव्या!!

सुहाना ने उससे देख एक हामी भरी.

दिव्या : कॉफ़ी?

सुहाना : ब्रश भी नहीं हुआ है अभी.

दिव्या : नर्स आएगी न. तोह करवा देगी.

सुहाना : मेरे हाथ परर चलते है. अपाहिज नहीं हुई हु में. और कितने दिन मुझे यहाँ रहना होगा?

दिव्या : बुलेट लगी थी तुम्हे यू दुफर. किसी ने तपली नहीं मारी थी पीठ पे. समझी? अभी यही रखा जायेगा तुम्हे. रिकवरी पर बोहत ध्यान दिया जायेगा. क्युकी आफ्टर रिकवरी सब कुछ सही से फंक्शन होना चाहिए.

सुहाना : हम्फ!

दिव्या : ज़िद्दी अस उसुअल...!

सुहाना : S-Sonu कहा है?

दिव्या : सो रही है. रात में देरर तक जाएगी थी.

सुहाना : वह ये सब क्यों कर रही है? कहो न उस से मेरे लिए की ये सब करने की कोई ज़रुरत नहीं है. यहाँ लगी रहेगी तोह कैसे अपने ड्रीम को अचीव करेगी? यहाँ डॉक्टर्स तोह है hi और तुम भी हो तोह-

दिव्या : मेने कहा था कल रात hi. और पता है उसका क्या जवाब था?

सुहाना : ???

दिव्या (स्माइल्स) : उसने कहा की भाड़ में गया ऐसा ड्रीम. क्या फायदा ऐसे ड्रीम को अचीव करने का जिसमे मेरी दी मेरे साथ न हो?

सुहाना (ब्लशेस) : हहह!!!? P-Pagal है वह!

दिव्या : हाहाहाहाहा~ ओह्ह्ह्हह! हाउ लकी यू अरे! बहिन का प्यार!!! ममम!!

सुहाना (ब्लशेस) : स्टॉप आईटी!

दिव्या : हाहाहाहा! फाइन फाइन! वैसे..!

सुहाना : ??

दिव्या : अभी ज़्यादा दिन नहीं गुज़रे..! एंड I'm आलरेडी किन्दा... मिसिंग हिम!

दिव्या के होंठो पर हलकी सी मुस्कान आयी एक शख्स को याद करके. और सुहाना की पलके ये सुनते hi नीचे झुक गयी.

वीर!!!

सारे आखिरी पल उसके सामने फिरसे आने लगे. ख़ास कर वह...!

उसका हाथ अपने आप अपने होंठो पर गया और उसके गाल अगले hi शान लाल हो गए.

उससे लगा था वह अब बचेगी नहीं. इसलिए जाने से पहले उसने अपने दिल की ख्वाइश को hi चुना. जो चीख चीख के उससे वीर को चूमने को कह रही थी.

पर अब? अब तोह वह ज़िंदा भी थी. सही सलामत भी और ऊपर से वह अपनी चुम्मी भी दे चुकी थी.

'ओह्ह्ह गॉड!!! व्हाट दीद ी दो?' शर्म के मारे उसके गालो का तापमान बढ़ उठा.

उससे ऐसा लग रहा था की जैसे कही गहराई में जाके अपने मुँह को छिपा ले. ये क्या कर दिया था उसने. काम से काम वह चली गयी होती तोह ये शर्मिंदगी नहीं होती. पर अब? अब तोह इस से भागने का कोई चारा नहीं था.

दिव्या : वैसे...! ी गेस उससे मेरा गिफ्ट तोह मिल hi गया होगा.

सुहाना के कान तुरंत hi खड़े हो गए,

सुहाना : G-Gift?






दिव्या : येह! गिफ्ट! अरे वही पैसे! ी गेस उससे अकाउंट में मिल गए होंगे.

सुहाना : O-Ohhh!

दिव्या : उसने इतना किया यहाँ पे मेरे लिए. ी मैं हम सब के लिए. और बदले में में उससे कुछ दू भी न? ये तोह ज़्यादा हो गया यार. इतनी भी खड़ूस नहीं हु में.

तोह दिव्या ने पैसे भेजे थे. पर उसने? सुहाना को जब ध्यान आया की उसने वीर को कुछ नहीं दिया था बदले में तोह वह किसी सोच में पद गयी.

सुहाना : गिफ्ट हँ!!?

वह अपने खयालातों में डूब गयी.

दिव्या : क्या हुआ? क्या सोचने लगी?

सुहाना (स्माइल्स) : नथिंग!

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आज के लिए इतना hi गाइस!

परेशानियों के चलते उपदटेस में विलम्भ हो जाता है. साथ बनाये रखियेगा.

लिखे ठोकना न भूले और रेवोस देना भी.


धन्यवाद! ✨
 
अपडेट - 120 ~ ा ट्रिप तो थे विलेज (1)

अब तक...

दिव्या : उसने इतना किया यहाँ पे मेरे लिए. ी मैं हम सब के लिए. और बदले में में उससे कुछ दू भी न? ये तोह ज़्यादा हो गया यार. इतनी भी खड़ूस नहीं हु में.

तोह दिव्या ने पैसे भेजे थे. पर उसने? सुहाना को जब ध्यान आया की उसने वीर को कुछ नहीं दिया था बदले में तोह वह किसी सोच में पद गयी.

सुहाना : गिफ्ट हँ!!?

वह अपने खयालातों में डूब गयी.

दिव्या : क्या हुआ? क्या सोचने लगी?

सुहाना (स्माइल्स) : नथिंग!


अब आगे...

सुबह के 9 बज रहे थे और वीर जल्दी उठ के अपने कामो में लगा हुआ था. अभी से hi पैकिंग उसने शुरू कर दी थी क्युकी वह जानता था की दिन भर के कामो में उसका वक़्त निकल जायेगा.

बलहार से भी उससे मिलना था, कारन से भी, अगर करा मिली तोह उस से भी और निधि ma'am और जूही से भी. और समय था काम.

रात में ट्रैन की टिकट्स उन् सब की हो चुकी थी. और पूर्वी ने मैसेज करते हुए साड़ी जानकारी उसके फ़ोन पे hi भेज दी थी. इन फैक्ट, पूर्वी ने उससे अपने घर बुलाया था पर वीर ने कह दिया की सीधे स्टेशन पर hi मुलाक़ात होगी.

तोह ऐसे में जब रागिनी समेत बाकी सभी ने उससे व्यस्त देखा तोह ज़ाहिर है, सवाल तोह उठने hi थे.

रागिनी : सुबह सुबह कहा जा रहे हो वीर? ये पैकिंग क्यों कर रहे हो?

वीर : कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हु. कब आऊंगा अभी बता नहीं सकता भाभी!

और ऐसे में जो सबसे पहले भड़का, वह न तोह सुमन थी और न hi रागिनी. पीछे डाइनिंग टेबल पर बैठे नाश्ता ठूस रही सोनाली मुँह में खाना भरे भरे hi हड़बड़ी में वीर के पास भागती हुई आयी,

सोनाली : O-Oyyyyeee!! उम्म्म फररर शाल्ल्ल एईईएई!!!

वीर : मुँह का खाओ पहले!

शर्म के मारे सोनाली ने जल्दी जल्दी पलट के पहले मुँह में मौजूद खाना निगला और वापस मुड़ते हुए बोली,

सोनाली : तुम- तुम फिर चल दिए? हाँ? मुझे अकेला चोरर के? में फ़ूड ट्रक में सड़ती रहूंगी क्या? देखो! में बता देती हु, मेरे से ये सब अकेले नहीं होगा.

वीर : हँ? एक मिनट! मेने तुम्हे कहा है न? की अब तुम्हे ये सब करने की कोई ज़रुरत नहीं है!

सोनाली : हाँ तोह मेरी पढ़ाई की बात भी कहा की है तुमने?

'ओह्ह्ह फ़क!!!'

वीर को याद आया. वह निधि ma'am से मिल तोह आया था. लेकिन सोनाली के लिए बात करना भूल गया था.

तभी उससे एक व्यक्ति का ध्यान आया.

[Kya aap uss aadmi ke baare me soch rahe hai?]

'हम्म!'

[Woh zaroor Sonali ko accept kar lega.]

'P-Par...!'

[Aapka ego aur self-respect beech me aa rahi hai.]

पारी की बात सुन्न, वीर मौन रह गया. वह सही थी. असल में जिस व्यक्ति के बारे में वीर सोच रहा था वह कोई और नहीं बल्कि अरुण था. पूर्वी का पति.

जिससे कल उसने पहली बार hi देखा था. भले hi अरुण ने अपनी सूरत सिर्फ चाँद सेकण्ड्स के लिए दिखाई थी. पर वीर को तोह मात्र 2 सेकंड hi लगने थे उससे चेक करने के लिए.

वह जान गया था की पूर्वी का पति एक सरकारी अध्यापक था. तोह ऐसे में सोनाली की पढ़ाई के लिए वह एक बढ़िया रास्ता बता सकता था. पर...!

जैसा की पारी ने कहा, उसका ईगो और सेल्फ रेस्पेक्ट बीच में आ रहे थे. अभी पूर्वी और भावना से उसके सम्बन्ध पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. और ऐसे में जाके वह उनसे मदद मांगे? कभी नहीं!!!

इस बार अल्फा नहीं, बल्कि सिग्मा इंस्टिंक्टस उससे ये करने से रोक रहे थे. उस पर हावी हो रहे थे. वह नाराज़ था उनसे. उन्हें आना चाहिए उससे मनाने. न की वह हाथ फैला के जाए. क्या उसकी इतनी भी पहचान नहीं की सोनाली के लिए पढ़ाई का band-o-bast कर सके?

उसने फ़ौरन hi निधि को कॉल लगाया,

वीर : Hello?

निधि : कहो वीर!

वीर : सोनाली को आगे पढ़ना है. और में उससे पढ़ाना चाहता हु. पर उससे शुरूआती स्टारर पे एक अच्छे हिंदी प्रोफेसर की ज़रुरत है. क्या आपकी पहचान में है कोई ऐसा?

निधि : क्या उससे कोई डिग्री प्राप्त करनी है या-

वीर : नहीं! वह स्कूल कॉलेज नहीं जाना चाहती. उससे नॉलेज चाहिए है. जो हिंदी में उससे सब कुछ पढ़ा सके. और फिर हिंदी को काम से काम बेसिक इंग्लिश तक ला सके ताकि वह थोड़ी बोहोत निपुड़ हो जाए उसमे.

निधि : क्या वह मुझसे पढ़ लेगी?

वीर : A-Aap?

निधि : हाँ! क्यों नहीं? में हिंदी में सब समझा सकती हु उससे. अगर उससे ऐतराज़ न हो तोह!? A-Aur अगर तुम्हे-

वीर : मुझे क्यों ऐतराज़ होगा भला? वह हाँ कह रही है. तोह कहिये? कब से आ सकती है वह? और फीस क्या है?

निधि : शाम को आ जाए वह. 7 बजे! में भी तब तक कॉलेज से आके फ्री हो जाउंगी. और फीस? किसी फीस? सोनाली से क्यों फीस लुंगी में भला? वह आ जाए रोज़ और में अच्छे से उससे पढ़ा दिया करुँगी.

वीर : जी नहीं! सोनाली नहीं फीस देगी. क्युकी उसकी पढ़ाई का खर्चा में उठा रहा हु. तोह फीस तोह आपको लेनी hi पड़ेगी. अब बताइये!

निधि : बिलकुल नहीं! में फीस नहीं लुंगी-

वीर : फीस लेनी hi पड़ेगी! फ्री में नहीं पढ़वाऊंगा में उससे.

निधि : नहीं लुंगी!

वीर : लेना होगा!

निधि : नहीं!

वीर : हाँ!

निधि : तुम फिर से मुझपे तरस खा रहे हो वीर!? हाँ?

वीर (फ्रोंस) : आप बात को पलट रही है.

निधि : और नहीं तोह क्या? ये तुम पहले भी कर चुके हो. पैसो से रिलेटेड जब भी बात आती है तुम हमेशा मुझपे तरस दिखाते हो वीर! क्या में खर्चा नहीं उठा सकती अपना?? तुमने 50 लाख भी दिए. उससे भी जोड़ रही हु में. जब जब पैसो का ज़िक्र होता है तुम मुझे ऐसे देखते हो जैसे में कुछ नहीं कर सकती. जैसे में-

वीर : आप राइ का पहाड़ बना रही हो. कहा की बात कहा लेके जा रही हो.

निधि : बस यही तोह है. A-Ab जब में सच कह रही हु तोह तुम बात घुमा रहे हो! में-

वीर : ये धंधा होता है मैडम! आप अगर फैसिलिटीज प्रोवाइड कर रही हो तोह में बदले में आपको उसका रेस्पेक्टिवे अमाउंट दूंगा. सिंपल! ऐसे hi दुनिया चलती है. कॉलेज में अगर सोनाली जाती तोह में फीस भरता. किसी और टूशन में जाती तोह वह पेमेंट करता. तोह फिर-

निधि : तोह में क्यों लू? सोनाली क्या कोई परायी है क्या? तुम्हारी भाभी के घर में उठना बैठना अक्सर होता है हमारा और सोनाली से भी मिलती रहती हु. तोह-

वीर : ये उतना बैठना आप मेरे hi कारण तोह करती हो न? क्यों? आप मेरी hi वजह से फीस नहीं ले रही न? बोलिये!

वीर की इस बात पे निधि पूरी तरह से चुप हो गयी. आखिर सच बात थी. सत्य था ये. वह वीर को जानती थी, वीर उसका ख़ास था इसलिए तोह सोनाली से फीस नहीं ले रही थी वह. अब जब वीर ने ये बात राखी तोह निधि के होंठ एकदम सील पैक हो गए. और कुछ देरर बाद उसने कहा,

निधि : K-Kaun कर रहा है तुम्हारे कारण? M-Mein तोह- में तोह सोनाली को जानती हु इसलिए-

वीर (स्माइल्स) : ओह्ह अच्छा? जानती तोह आप बगल वाली गुड़िया को भी हो. इतने अच्छे रिलेशन है आपके. फिर भी फीस लेती थी न? तोह यहाँ ऐसा क्या बांड बन्न गया आपका सोनाली के साथ? और वैसे भी, सोनाली कोई इतनी महान हस्ती थोड़ी है जो-

सोनाली : हहह? O-Oyyee! क्या बोलै???

निधि : W-Woh!! वह सब में नहीं जानती. में फीस नहीं लुंगी.

वीर : तोह आप पक्का फीस नहीं लेंगी?

निधि : नहीं!

वीर : तोह ठीक है! में किसी और से बात करता हु. थैंक यू फॉर योर काइंड सर्विस.

निधि : H-Huhhh!??

वीर : आप फ्री में hi पढ़ाइये सब को.

निधि : T-Tum...! फाइन! देख लो जहा तुम्हे भेजना हो.

और उसने कॉल कट कर दिया.

वीर ने एक थकान भरी लम्बी सास ली,

"थी वीमेन...!"

रागिनी : व्हाट वुमन?

वीर : ओह्ह! आपको नहीं कहा.

रागिनी : हँ? तुम मुझे वुमन नहीं मानते? वीएररर???

वीर : अरे नहीं!!! वह बात नहीं है!

'फूऊकक्ककककककककक!!!!'

रागिनी : क्या मतलब वह बात नहीं है? तुमने अभी कहा न!? की आपको वुमन नहीं कहा. तोह?

'फुसक्कककककक!!! मेरी गांडू किस्मत...!!!'

[Mere paas iss situation ko handle karne ka best solution hai.]

'हहह? K-Kya? बोलो पारी! बोलो!! जल्दी बताओ!'

[The solution is-]

'हाँ हाँ बोलो! I'm लिसनिंग! से आईटी!'

[RUN!]

'फूऊकक्कककककककक!!!'

इस से पहले की वह रागिनी को जवाब दे पाटा, उसका फ़ोन फिरसे बजा. कॉलर निधि hi थी.

वीर : कहिये!

निधि : शाम को 7 बजे भेज देना उससे. एंड ी विल टेक थे फीस!!! हम्फ!!

*कॉल एंड्स*

'व्हाट थे-!?'

[You can never win over a woman in conversation.]

शायद इसलिए कहा जाता था की औरतो को समझना मुश्किल hi नहीं, नामुमकिन है. आज वीर को पता चल गया था.

रागिनी जो बगल में कड़ी हुई थी, वह अचानक hi khil-khila के हस्स पड़ी,

वीर : हँ?

रागिनी : फुफु~ अरे में तोह तुम्हारी टांग खींच रही थी. बस! तुम तोह घबरा hi गए वीर ः~ अच्छा! वह सब चोर्रो! और अब जल्दी से बताओ. की कहा जा रहे हो?

वीर : में...! *सिघ* में माँ के साथ उनकी जन्मभूमि जा रहा हु.

रागिनी : माँ?

वीर : हम्म! मेने आपको बताया था न? मेरी माँ...! वह यही पर है. मेरी बड़ी बहिन भी. कल दोनों से मुलाक़ात हुई मेरी. अतीत को लेके जो भी बातें है. उसके लिए वह मुझे अपनी जन्मभूमि ले जा रही है. तोह मुझे जाना होगा भाभी!

*क्लाआनंनगगगगगग*

"?????"

वीर के इतना कहते hi पीछे से बर्तनो के जोरर से गिरने का शोर हुआ. सब ने पलट के देखा तोह पाया की श्वेता स्तब्ध सी कड़ी हुई थी. उसके हाथो से खली बर्तन छुटक के गिर गए थे.

श्वेता : K-Kya...!?

श्वेता के तोह जैसे पेर्रो टेल ज़मीन खिसक गयी. इन् बीते दिनों में वह कोई कसार नहीं चोरर रही थी वीर के दिल में अपनी जगह बनाने के लिए. रोज़ सुबह अपने हाथो से प्यार से नाश्ता बनाना, रोज़ उसका ध्यान रखना, उसके खाने पीने की डाइट पर ध्यान देना, उसके सामान को व्यवस्थित रखना, और ख़ास कर रात में अपने थानों से उससे दूध पिलाना.

इतना सब वह कर रही थी. पर आज मिला क्या उससे? उससे ये sunn'ne मिला की वीर की असल माँ और बहिन यही थी और ऊपर से वीर उनसे मिल भी आया था.

श्वेता का जी अचानक hi घबरा उठा. उससे लगा जैसे उसके हाथो से किसी ने उसकी mann-pasand चीज़ छीन ली हो. केसा लगेगा आपको अगर आप बड़े मैं से अपने लिए कोई खाने का व्यंजन बना रहे हो. और जैसे hi आप खाने के लिए बैठने वाले हो, कोई और आके उससे आपसे छिना के खा जाए. कैसा लगेगा? कुछ ऐसा hi हाल अभी श्वेता का था.

वह भागते हुए वीर के पास आयी,

श्वेता : K-Kya कहा?

वीर : वही जो आपने सुना!

पीछे बैठी भूमिका भी अपनी माँ की स्थिति जानती थी. उससे अपनी माँ के लिए हमदर्दी महसूस हुई. कितना कुछ कर रही थी उसकी माँ वीर के लिए. और अब अचानक से वीर की सगी माँ आ धमकी.

सुमन और आभा आपस में कड़ी हुई थी. वह दोनों hi शांत थी. परन्तु, सुमन की आँखों में एक अलग hi चमक थी. ख़ास कर वीर की उन् बातो को सुन्न कर,


"मेरी माँ...! वह यही पर है. मेरी बड़ी बहिन भी."

न जाने वह क्या सोच रही थी.

अभी श्वेता आगे कुछ और कह पाती की तभी,

"भैयाआआआ!!! भैयाआ!!????"

बाहर से एक आवाज़ आयी और एक लड़की भागते हुए अंदर हॉल में घुसी,

वीर : काव्य?

वह सीधा आयी और दौड़ के वीर के गले से लग गयी.

काव्य : भैयाआआ!!

वीर : क्या हुआ?

काव्य : भैय्या!!! K-Kaun थी वह दीदी?? कहा है वह?? कह रही थी की वह आपकी सगी बड़ी बहिन है!!! उन्होंने मुझे और दी को गले लगाया था. कौन है वह?? A-Agar वह हमारी दीदी है तोह अब तक कहा थी भैया?? और घर में किसी ने कुछ बताया क्यों नहीं!! भैया!!! बोलो न!!! कहा गयी वह? और भावना कौन है!?? दादा जी ऐसा क्यों बोल रहे थे?? भैय्याअ!!!

वीर : एक मिनट! एक मिनट! सांस तोह लो पहले काव्य! और तुम यहाँ हो तोह ी गेस...

उसने अपनी नज़रे दरवाज़े पर दौड़ाई और बेशक,

वीर : ी कनेव आईटी!

अंदर आरोही आ रही थी.

आरोही : हम कल hi आते. पर रात ज़्यादा हो गयी थी. घर का माहौल बोहत बिगड़ा हुआ है.

रागिनी : क्या हुआ?

आरोही (वीर को देखते हुए) : कल जब तुम प्रांजल को चोरर के गए थे तोह डैड की साड़ी पोल खुल गयी.

वीर : ी सी!

रागिनी : K-Kya हुआ? कोई मुझे बताएगा कुछ?

आरोही : आल्सो बिकॉज़ ऑफ़ में...! मेने hi तेजल दी को...! अमृत निवास का पता दिया था.

वीर : क्योऊ???

आरोही : K-Kyuki...! उन्होंने पूछा था. वह बोहत डेस्पेरेट थी. S-Sab ठीक तोह है न?

जब वीर ने प्रांजल को घर पर फेका था तोह तेज गाडी के अंदर hi सवार थी. जिस वजह से आरोही और बाकी सभी ये नहीं जानते थे की तेज का हाथ चोटिल था.

वीर : सब ठीक है!

आरोही : O-Okay!

वीर : घर में क्या?

आरोही : दादा जी को सब पता चल गया है. डैड ने प्रांजल को छिपाया था. तोह वह गुस्से में थे. रात भर बहस हुई है इस बात को लेकर. और...! काव्य कल hi आना चाहती थी. मेने जैसे तैसे उससे समझाया. इसलिए सुबह लायी हु इससे. रुक hi नहीं रही थी. आल्सो, मेरे मैं में भी कई सवाल है.

काव्य : भैयाआ!! बताइये न!!!!

वीर : क्या बताऊ काव्य?

काव्य : सब कुछ!!!

वीर (शिघ्स) : हम्म! कल जिनसे तुम मिली थी वह मेरी बड़ी बहिन है. और तुम्हारी और आरोही दी की भी. उनका नाम तेजल है. साथ hi जिन भावना की तुम बात कर रही थी वह मेरी असली माँ है काव्य! में उन् दोनों से कल मिला था. और इस बारे में और jaan'ne के लिए hi में उनके साथ उनकी जन्मभूमि जा रहा हु.

एक बार फिर ये सुन्न के श्वेता का बदन ठिठुर उठा.

काव्य : K-Kyaaa? कहा जा रहे हो आप? M-Mujhe भी चलना है.

वीर : काव्य...!

काव्य : नहहीईई!!! में भी जाउंगी!! M-Mujhe भी सब कुछ jaan'na है. में भी चलूंगी. आपको अकेले नहीं जाने दूंगी.

काव्य उसके हाथ को जोरर से पकडे छोटी बच्ची की तरह ज़िद्द पर ऐड गयी.

वीर ने फ़ौरन hi आरोही को देखा और उस से बोलने hi वाला था की आरोही खुद hi बोल पड़ी,

आरोही (नॉड्स) : हम्म! हम्म! That's राइट! ी विल जो तू!

'दफक????'

वीर तोह सोच रहा था की आरोही बड़ी होने के नाते काव्य को समझाएगी पर यहाँ तोह उल्टा वह hi आने की ज़िद्द पर ऐड गयी.

वीर : मुझे लगा था काम से काम आप तोह समझेंगी?

आरोही (ब्लशेस) : ी... ी वांट तो जो अस वेल! मुझे भी सब कुछ jaan'na है काव्य की तरह. सो...!

वीर अभी दोनों को मन करता की इतने में सुमन मुस्कुराती हुई काव्य के पास आयी और उसके प्यारे से चेहरे को अपने हाथो में थामते हुए बोली,

सुमन (स्माइल्स) : क्यों नहीं? आखिर वीर जी का राज़ आपके घर से भी जुड़ा हुआ है. है न? आप दोनों को तोह जाना hi चाहिए!

काव्य : अहह? है न? आप को भी लगता है न सुमन आंटी? मुझे जाना चाहिए न? है न?

सुमन : बिलकुल मेरी प्यारी बच्ची! बिलकुल जाना चाहिए! फुफु~

काव्य : यायययय!!! थैंक यू सुमन आंटी!!! *छू* आप बेस्ट हो...! देखा भैया!! मुझे भी जाना चाहिए!

सुमन : फुफुफु~ यही तोह फ़र्ज़ है एक बहिन होने का.

काव्य : हम्म! हम्म!

वीर बस सवालिया नज़रो से सुमन को देखने लगा.

सुमन : और...! *स्माइल्स* आखिर में भी तोह जा रही हु.

काव्य : ेहठ?

रागिनी : हहह?

वीर : ????

ये बोल के जैसे सुमन ने वह सबकी नज़रे अपने ऊपर बिखेर ली.

वीर : ारी! सुमन जी? ः! आप?

सुमन (स्माइल्स) : ओह्ह क्यों नहीं? वीर जी! इसी बहाने में अपने गांव भी हो आउंगी. घर में रह रह के मेरा जी मिचलाने लगा था. क्या मेने कुछ गलत कहा?

वीर : हँ??

उससे अंदाजा हुआ, की सुमन का गांव भी तोह वही था.

'फुसक्ककककक!!! ये मेरे दिमाग से कैसे निकल गया? पर सुमन को कैसे?'

[Suman ne aapke phone par Purvi ka message check kiya hai probably.]

'हहह!? सुमन!!!!!'

मैसेज में साफ़ साफ़ डेस्टिनेशन लिखी हुई थी. डेस्टिनेशन थी ~ जयपुर!!

जिधर के रूट वीर एक बार अपना चूका था.

काव्य : आपका गांव? किधर है सुमन आंटी?

सुमन (स्माइल्स) : ओह्ह! जयपुर के पास.

काव्य : ओह्ह वववव!!! जयपुर? पिंक सिटी न? ययययय!! दी!! Let's जो~

वीर : सॉरी बूत रेसेर्वशन्स हो गए है!

काव्य : क्याआ???? बिलकुल नहीं!!! आप अभी के अभी रेसेर्वशन्स करवाओ हमारे.

आरोही : हम्म!

सुमन : वीर जी?

जब तीनो की निगाहें उस पर पड़ी, तोह हार मान के वीर ने बलहार को कॉल लगा hi दिया,

वीर : Hello?

बलहार : कहिये बॉस!

वीर : तीन टिकट्स करवानी है आज जयपुर तक की. ट्रैन का नाम क्सक्सक्सक्सक्स है. एक- ी में. ध्यान रहे सीट्स अगल बगल hi हो. जितना जल्दी हो सके-

वीर अभी कह hi रहा था जब श्वेता ने अचानक hi उसकी जांघ थाम ली.

वीर : ???

वीर चिढ़ते हुए अभी श्वेता को कुछ अनाप शनाप कहने hi वाला था लेकिन जैसे hi उसने श्वेता की आँखों में देखा वह वही ृक्क गया. उन् आँखों में नमी थी. और न जाने ऐसी कौन सी दृढ़ता लिए हुए थी की वीर भी कुछ न कहने के लिए विवश हो गया.

श्वेता : M-Mein भी चलूंगी!!! P-Please!!!

उसने अपने हाथो से जोरर से वीर के जीन्स को भींच लिया. जैसे एक गुहार लगा रही हो.

और न चाहते हुए भी, वीर के मुँह से निकल गया,

वीर : Ch-Chaar टिकट्स कर देना!

बलहार : हम्म? चार? Okay! हो जाएँगी! रखता हु. कुछ और काम हो तोह बता दीजियेगा!

*कॉल एंड्स*

वीर : नहीं वह--!!

पर तब तक देरर हो चुकी थी. क्युकी बलहार ने कॉल कट कर दिया था. और इधर वीर की नज़रे श्वेता की आँखों में hi थी. दोनों एक दूसरे को hi देख रहे थे.

"Th-Thank यू!"

श्वेता के मुँह से इतना hi निकला और वह झटपट भागते हुए अपने कमरे में जा कर रात की तैयारी में लग गयी.

काव्य : ईपी!!! दी हम भी चल रहे है. हहहहए~

काव्य ख़ुशी से झूमते हुए आरोही का हाथ पकड़ गोल गोल घूमने लगी. उससे इस बात की सबसे ज़्यादा ख़ुशी थी की वह वीर के संग कही आउट ऑफ़ टाउन जा रही थी. एक नए सफर के बारे में सोच कर hi वह खूब एक्ससिटेड थी. अंदर hi अंदर आरोही का भी यही हाल था. बस दिखा नहीं रही थी.

आरोही : H-Hum पैकिंग करने जा रहे है. घर में भी बताना होगा.

वीर ने हामी भरी, तोह दोनों बहने फ़ौरन hi वह से वापस चली गयी.

इधर रागिनी जो अब तक खामोश थी वह पलटी और बिना कुछ कहे hi अपने कमरे में चली गयी.

'हम्म्म?'

[Jaaiye!]

'किधर?'

[Ragini ko manaane!]

'हँ?'

[She's mad!]

'वेट! क्यों?'

[Khud se puchiye! Harr baar yahi hua hai. Jab jab wo paas aane ki koshish karti hai tab tab aap baahar chale jaate ho. Ek baar aap Jaipur gaye the. Fir Delhi, fir Las Vegas. Aur ab firse Jaipur. Sochiye harr baar kya beet'ti hogi uss par. Just give her an answer.]

'येह! You're राइट!'

पारी की बात मान वीर आगे बढ़ने के लिए हुआ तोह देखा सुमन अजीब सी मुस्कान लिए उससे आँख मार अंदर किचन में चली गयी.

वह पीछे पीछे गया. ये औरत सच में एक भूचाल थी. एक ऐसी औरत की अगर इससे पा लिया तोह ये क्या कुछ कर दे तुम्हारे लिए पर अगर इससे दुश्मन बना लिया तोह न जाने क्या क्या कर दे. अपने आप में एक मिस्ट्री थी ये.

वीर ने पॅहुचते hi एक झटके में सुमन का गाला पकड़ा,

"अहहह्ण~"

"डर नहीं लगता? आखिर तुम्हारा सच भी तोह इन्ही सब से जुड़ा हुआ है. क्या होगा अगर तुम साथ चली तोह? क्या डर नहीं? की तुम्हारा सच सामने आ जायेगा?"

वीर ने उसके कान की ऑर्डर झुकते हुए पूछा.

"अठ्न्न~ ससस~ ओह्ह! में तोह चाहती hi यही हु की आप जल्द से जल्द मेरे राज़ पर से पर्दा हटा दो."

कहते हुए उसने पीछे खड़े वीर की ऑर्डर मुद के देखा और उसके गाल को चूम लिया.

*पूछ*

पीछे से वीर को सुमन की दो पहाड़ो के बीच की घाटी साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी. उसने बिना किसी झिजक के एक हाथ आगे बढ़ा के अंदर डाला और पूरी ताक़त के साथ उसकी एक छुच्छी को दबोच लिया,

"नंनगहःहः~"

एक सिसकी सुमन ने उत्तेजना में भरी.

वीर का लुंड तैयार था उससे यही रगड़ने के लिए. पर ये समय नहीं था.

"मुझसे ज़्यादा इंतज़ार कोई और कर रहा है अभी आप के लिए!"

वह मुस्कुरा के पीच मुड़ी और वीर को प्यार से अपने पास से धकेलते हुए इशारा की,

"जाइये! जहा आपको होना चाहिए अभी!"

इशारा साफ़ था. यह औरत वीर की हर्र बात जानती थी.

'सुमन इस दमन डेंजरस!'

[I agree!]

वीर उससे चोरर जब रागिनी के कमरे में पहुचा तोह वह अंदर से लॉक्ड था.

*नॉक* *नॉक*

वीर : भाभी?

पर अंदर से कोई जवाब न आया.

*नॉक* *नॉक*

वीर : भाभी!?

और फिर उससे कुछ हलचल होने की आवाज़ आयी.

*क्लिक*

दरवाज़ा खुल गया. रागिनी ने वीर से नज़रे नहीं मिलाई. वह वापस अपने बीएड पर जा कर बैठ गयी.

पारी सही थी. रागिनी उदास थी.

वीर ने अंदर आते हुए कमरे को बंद किया और वह रागिनी के बगल से बैठ गया.

वीर : नाराज़ हो! है न?

रागिनी : कौन?

वीर : आप!

रागिनी : में क्यों नाराज़ होउंगी भला?

वीर : क्युकी हर्र बार आप कुछ कहने को होती हो और में बाहर चला जाता हु.

रागिनी : नहीं तोह! ऐसा तोह नहीं है.

वीर : आपकी टोन hi बता रही है की आप नाराज़ हो.

रागिनी : तुम ज़्यादा सोच रहे हो!

वीर : सी! वर्ण आप मुझसे ऐसे बात नहीं करती कभी. और नज़रे भी नहीं मिला रही.

इस बात पर रागिनी ने फ़ौरन hi वीर की आँखों में देखते हुए कहा,

रागिनी : तुम बस ज़्यादा सोच रहे हो. और कुछ नहीं!

वीर (शिघ्स) : आपको आंसर चाहिए न? फाइन थें! में वह से लौटने के बाद आपको आपका आंसर दे दूंगा.

रागिनी : व्हाट आंसर?

जानती तोह रागिनी भी थी फिर भी वह अनजान बन्न रही थी.

वीर : आंसर की में आपके बारे में अपने दिल में क्या सोचता हु. और आपके साथ केसा रिश्ता रखना चाहता हु.

पल भर के लिए रागिनी के बदन में सिहरन दौड़ गयी. मैं में विचार आया. कही वीर ने उससे अलग कर दिया तोह? कही वीर ने उसका प्यार नहीं स्वीकार किया तोह? तोह क्या करेगी वह? फिर उसकी ज़िन्दगी में क्या होगा? एक प्रश्न चिन्ह पर आके अटक गयी वह.

वीर : आपको आपका आंसर में वह से आने के बाद hi दे दूंगा. अब तोह गुस्सा थूक दीजिये!

रागिनी : M-Mein कहा गुस्सा हु?

वीर : भाभी! समझिये! इस बार मेरा जाना बोहत ज़रूरी है.

रागिनी : M-Mein तोह कुछ कह hi नहीं रही वीर. जाओ! जिधर भी जाना है.

वीर : कह नहीं रही हो इसलिए तोह चिंता में हु भाभी. वर्ण आप तोह सवाल पे सवाल खड़े करती थी. वही भाभी चाहिए मुझे. ये वाली नहीं.

रागिनी : पहले नादान थी. अब समझती हु. तुम्हारी भी लाइफ है. जाओ! कोई कुछ नहीं कह रहा.

वीर : आप ऐसे नहीं मानोगी!

रागिनी : ??

वीर ने एक झटके में उससे कंधे से पकड़ा और धक्का देके बीएड पे hi नीचे पटक दिया,

रागिनी : अह्ह्ह!!! V-Veeee- मंममपहहहह????

वह कुछ बोल भी न पायी. उसके होंठ वीर की गिरफ्त में जा चुके थे. अचानक हुए हमले से वह खुद को चुर्राने की कोशिश करती रही पर वीर की जीभ उसके अंधरुनि जबड़े और जीभ को टटोल टटोल के चाटने और चूसने में जैसे hi व्यस्त हुई, रागिनी का विरोध काम होता चला गया.

और फिर गायब hi हो गया. ऐसी खुमारी उसपे चढ़ी की वीर के बालो को हाथ में जकड़े वह खुद उसका साथ देने लगी.

"ममममममम~~"

*स्लुर्प* *स्लुर्प*

"नंनगहहहहह~ वीरररर!!!"

*पूछ* *छू~* *स्लुर्प*

वीर का एक हाथ उसके उरोज पर और दूजा उसकी चुत्तड़ पे अच्छे से जमा हुआ था और दोनों अंगो का स्वाद ले रहा था.

"अह्हह्ह्ह्ह!!! वीएररर!!!"

देखते hi देखते वीर कब उसकी साड़ी और पेटीकोट उठा के उसकी टांगो को खोल दिया रागिनी को पता hi नहीं चला.

"अह्ह्ह्ह??? Y-Ye क्या कर रहे हो वीर? K-Koi आ जायेगा! Ch-Chorro! और चलो यहाँ से."

उससे ध्यान आया की घर में सभी मौजूद थे. पर वीर तोह जैसे अपनी hi धुन में था आज.

"आज आपको काम से काम अच्छे से थोड़ा तृप्त कर दू."

"Wh-Whaaatt?? आआअह्हह्ह्ह्ह!!!"

बेचारी रागिनी सकपका के रह गयी. उसकी पंतय जो नीचे उतर चुकी थी.

"वीएररर!!! ये क्या कर रहे हो??? चोरररूओ!!!"

"मुझे रोकिये मत भाभी!!!"

कहते हुए उसने रागिनी की टांगो को खोल के देखा,

"ओह्ह? यहाँ तोह काफी हरियाली है."

वीर के मुँह से अपने गुप्तांग के बारे में ये सुन्न कर बेचारी रागिनी का पूरा चेहरा लाल टमाटर की तरह लाल पद गया.

"अह्ह्ह!!! V-Veeer!"

अपने चेहरे को अपने दोनों हाथो से छिपाए वह खुद को वीर के हवाले कर दी. ये उसके जीवन का सबसे शर्म भरा पल था.

उसका अपना देवर, उसकी टाँगे खोले उसकी छूट देख रहा था. उस से और भी ज़्यादा शर्मनाक बात ये थी की वीर ने अभी अभी ये कह दिया की काफी हरियाली है यहाँ.

ज़ाहिर है, वह उसके गुप्तांग के बालो की बात कर रहा था. इस वक़्त तोह रागिनी किसी गड्ढे में मुँह देके खुद को पूरी दुनिया से छुपा लेना चाहती थी.

वीर ने प्यार से जैसे hi उस कोमल छूट के बालो पर हाथ फेर्रा तोह,

"E-Eeeekkkkkk!!"

रागिनी झटका लेके उचक पड़ी.

"हाहाहा! अगर ऐसे hi आप आवाज़ निकलती रही तोह no डाउट कोई न कोई आ जायेगा."

वीर ने उससे चिढ़ाते हुए कहा और फिर डुबकी मारने के लिए तैयार हो गया.

*पूछ*

"अह्ह्ह्णण!"

मखमली दूध जैसी गोरी जांघो को चूमते हुए वह अपनी मंज़िल पर चला.

हर्र चुम्बन पे, रागिनी का जिस्म ठिठुर रहा था.

अपने एक हाथ से वीर ने फाइनली छूट के होंठ अलग किये और अंदर के गुलाबी हिस्से को देखा.

"बोहत सुन्दर है भाभी!"

"E-Ehhh?"

रागिनी अपने चेहरे से हाथ हटा के प्रश्न भरी नज़रो से वीर को देखि. किस सुंदरता की बात कर रहा था वीर?

"आपकी छूट!" उसने मुस्कुराते हुए कहा तोह फिर रागिनी के गाल लाल हो गए.

"V-Veeeer!!! धत्तत्त!!!" हाथ से बच्चो की तरह वीर की ब्याह पर मारते हुए वह शर्मा के मुँह फेरर ली.

और अगले hi शान,

वीर टूट पड़ा. अपने सामने मौजूद लज़ीज़ डिश की ऑर्डर.

*स्लुर्प* *किश*

"आआअह्ह्ह्णण mmmmmmmmmm!!!!!!???"

वह इतनी जोरर से चींखी पर समय रहते hi उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया.

बेचारी रागिनी की पूरी कमर हवा में उठ गयी. वीर ने पहले छूट के सिर्फ बाहरी हिस्से को चूमा और छाता. और तब तक वह ये करता रहा जब तक रागिनी एकदम पागल न हो गयी.

जब उसने देखा की रागिनी अपनी चरम स्टेज पर है तभी उसने एक ऊँगली छूट में डाली और अपना मुँह सीधे उसके छूट के दाने पर दे दिया.

"!!!!???????"

महीनो तक रागिनी सेक्स से दूर रह रही थी. यहाँ तक की वह मस्टुर्बते भी नहीं करती थी ज़्यादा. और ऐसे में अचानक से कोई मर्द उसके साथ ऐसा कर दे? स्वाभाविक था की उसने साथ क्या होना था.

ऊँगली बार बार अंदर बाहर अंदर बाहर होते और वीर का मुँह उसके भगनासे को काटते, चूमते और चूसते hi, रागिनी की छूट ने जवाब दे दिया.

और एक ऐसा सैलाब आया जिसने वीर को पूरा भिगो के रख दिया.

*हफ़* *हफ़* *हफ़*

"अब काम से काम आप गुस्सा तोह नहीं रहोगी? ी गेस?"

वीर कहते हुए उसके ऊपर hi लेत गया. और वह सही था.

***

रात हो रही थी और वीर और बाकी सभी अपने निकलने की तैयारी कर रहे थे. आरोही और काव्य भी घर hi आ गयी थी. चुकी वीर उनके साथ था. तोह घरवाले आखिर कैसे मन कर सकते थे? ख़ास कर मनोरथ के रहते हुए!?

पर वह क्या खिचड़ी असल में पाक रही थी ये बात दोनों बहने अभी नहीं जानती थी.

काव्य : भैया चले?

वीर : हम्म!

वह सभी बाहर निकले की इतने में...!

*Vrooooooooooom*

वीर : हहहह??

एक बेहद ख़ूबसूरत वाइट कलर की लक्ज़री रोल्स रोये घोस्ट वीर के घर के सामने आके ृक्क गयी.

काव्य : W-Wooowww!

कार से एक लड़का उतरा और वीर की तरफ आया,

लड़का : मिस्टर वीर?

वीर : में hi हु!

और लड़के ने बिना कुछ कहे कार की के थमाते हुए वीर को देदी.

वीर : ये क्या?

लड़का : आपका गिफ्ट!

वीर : गिफ्ट?

लड़का : आपको मैसेज नहीं आया?

वीर : मैसेज?

वीर ने फ़ौरन hi अपना फ़ोन निकाला तोह सामने hi स्क्रीन के नोटिफिकेशन में ेल मसाज डाला था.

उसने जैसे hi अप्प ओपन कर मैसेज देखा तोह,

वह मैसेज था सुहाना का. जिसमे लिखा हुआ था,

'दिव्या गावे यू योर गिफ्ट. बूत ी didn't. इतना कुछ तुमने हमारे लिए यहाँ किया सो ी गेस यू डेसेर्वे समथिंग. I'm सेंडिंग समथिंग. टेक आईटी!'

टेक आईटी तोह ऐसे लिखा हुआ था जैसे मानो आर्डर था. उस मैसेज को पढ़ते hi वीर की आँखें अपने आप नम्म हो गयी. ये नादान औरत!! सुहाना!

उससे अब तक याद था. वीर जब पहली बार दिव्या की कार में लॉस वेगास में बैठा था तोह उसने कार की कीमत सुहाना से पूछी थी. 7 करोड़ के आस पास की कार थी. और आज वही कार उसकी नज़रो के सामने थी.

सुहाना ने सोचा नहीं इतना महंगा गिफ्ट देने से पहले. ऊपर से उसके लिए बुलेट भी ली थी अपने ऊपर.

'Don't मेक में फॉल फॉर यू! थैंक यू!' वीर ने लिखते हुए भेजा.

और मैसेज तुरंत hi सीन कर लिया गया. पर रिप्लाई न आया.

वीर ने गाडी अंदर रखवाई और खुद की कार में वह सभी चल दिए स्टेशन की ऑर्डर.

इस बार रागिनी काफी खुश थी. वीर ने उसके साथ ये किया इसका मतलब तोह यही था न की वह उसके प्यार को एक्सेप्ट करेगा? वह मैं hi मैं प्रफ्फुलित हो उठी.

पर श्वेता? उसकी तोह जैसे हालत बत्तर होती जा रही थी. बीच बीच में वह कुछ कुछ बड़बड़ाने लगती थी.

घर पर सिर्फ आभा, सोनाली, और भूमिका रुकी थी. रागिनी बस चौररने साथ चल रही थी. क्युकी कार वापस लाने के लिए उसका जाना ज़रूरी था.

स्टेशन पॅहुचते hi वीर ने सारा सामान उतारा और थोड़ा थोड़ा सामान उठाते hi वह मुंबई सेंट्रल के अंदर चल दिए.

*डिंग डाँग*

"यात्री गण कृपया ध्यान दे. मुंबई से दिल्ली जाने वाली ट्रैन क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स कुछ hi समय में प्लेटफार्म क्रमांक क्सक्स पर आ रही है."

*डिंग डाँग*

जगह जगह अनाउंसमेंट हो रहे शोर के बीच से होते हुए वीर और बाकी सभी निर्धारित प्लेटफार्म पर पहुचे.

वीर का फ़ोन उसके कान पर hi लगा हुआ था. पूर्वी का hi कॉल आ रहा था.

और पूर्वी के बताये गए स्थान पर जैसे hi वह सभी पहुचे. तोह,

देखा की वह तीन शख्स खड़े हुए थे. या तीन औरते!

पूर्वी समेत भावना, तेजल दोनों ने hi वीर को आते देखा.

पर...!

दो ऐसी नज़रे थी जो आपस में जा के इतनी जोरर से टकराई की आस पास के लोगो को भी उनकी भिड़ंत महसूस हुई.

और उन् दो नज़रो की मालकिन थी.

भावना और श्वेता!!!!

.

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आज के लिए इतना hi गाइस!

ये अपडेट 5.2क वर्ड्स का है. एक मेगा अपडेट hi है भाई. सफर शुरू हो गया है. ध्यान रहे ये part 1 है. अगला अपडेट part 2 रहेगा इसका. तोह लाइक्स दिल से थोक के जाने का भाई लोग और अपने अपने रेवोस ज़रूर रखने का. काफी मज़ा आने वाला है इसमें. कोशिश रहेगी मेरी पूरी जल्द से जल्द उपदटेस देने की.


धन्यवाद! ✨
 
मेगा अपडेट

अपडेट - 121 ~ ा ट्रिप तो थे विलेज (2)

अब तक...

देखा की वह तीन शख्स खड़े हुए थे. या तीन औरते!

पूर्वी समेत भावना, तेजल दोनों ने hi वीर को आते देखा.

पर...!

दो ऐसे नज़रे थी जो आपस में जा के इतनी जोरर से टकराई की आस पास के लोगो को भी उनकी भिड़ंत महसूस हो गयी.

और उन् दो नज़रो की मालकिन थी.

भावना और श्वेता!!!!


अब आगे...

जब संसार में एक जगह पर कुछ घटित हो रहा होता है तोह वही दूसरी जगह पर भी कुछ न कुछ चल रहा होता है. यही तोह दुनिया है. अलग अलग इंसान एक hi समय पर अलग अलग परिश्थितियों से होकर गुज़रते है.

कुछ ऐसा hi हाल अरुण का था. पूर्वी तेजल और भावना के साथ निकल गयी थी. शाम को तोह उसने फ़ोन करके बताया था पर निकलते वक़्त एक बार भी नहीं जताया.

जब अरुण अपने घर पर काम काज से लौटा तोह ताला देख के उसने बस एक थकान भरी आह भरी. जब औरते आपस में मिली भगत बैठा लेती थी न तोह फिर तोह वह मर्दो को ऐसे इग्नोर करती थी जैसे जेठालाल िएर को करता है.

अरुण जब ताला खोल घर के अंदर आया तोह बगल में hi टेबल पर चिपका एक स्टिकी नोट उससे दिखाई दिया. उसमे लिखावट साफ़ साफ़ पूर्वी की थी,

'में जा रही हु. कब आउंगी वह सब फ़ोन पर बता दूंगी. सुबह शाम माइड आएगी, झाड़ू पोछा बर्तन के लिए. खाना आप बना के खा लेना. बाहर का मत खाना मेरी जरर हाज़िरी में. माइड एडवांस में पैसे मांगे तोह एक रूपया भी नहीं देना. कह देना जब दीदी आएँगी तोह हिसाब करेंगी. दवाई वगैरह सब टीवी वाले शोकेस के राइट ड्रावर में है. और कुछ हो तोह कॉल कर लेना. Bye!'

इतना सब पढ़ के अरुण बस मैं hi मैं मुस्कुरा के बैठ गया.

"बताओ भाई! मुझसे ज़्यादा चिंता तोह इन्हे काम वाली की है. चल भाई अरुण! लग जा काम पर. खाना बनाना है. आज समझ आ रहा है की खाना बनाना कितना मुश्किल होता है. *सिघ* "

और अरुण हाथ मुँह धो के लग गया अपने कामो में.

वही यहाँ रागिनी वीर और बाकियो को जब चोरर के आयी तभी उससे कार में बैठे बैठे hi एहसास हुआ,

'हे भगवान् ये मेने क्या कर दिया?'

वह घबराते हुए अपने सीने में हाथ राखी. पिछली बार वीर जब लॉस वेगास गया था तोह जाने से पहले इतनी चुम्मा छाती हुई थी उनकी, और रागिनी ने फिर वह दिन कैसे काटे थे ये सिर्फ वही जानती थी.

इस बार तोह सीधे उसकी छूट को चूस के गया था वीर. भला अब कैसे समय कटेगा उसका?

'नाहीईई!!! Y-Ye मेने क्या कर दिया? सब इस वीर की गलती है. ओह गॉड!!!'

वह अपनी छूट पर हाथ रखते हुए खुद को आने वाले दिनों के लिए तैयार करने लगी. क्युकी हर्र रात अब उससे वीर की याद hi सताने वाली थी.

ये तोह था स्वदेश का हाल. पर वही देश के बाहर किसी दूसरे देश में एक ख़ूबसूरत महिला हॉस्पिटल पर बैठी बैठी अपने मोबाइल को घूर के देख रही थी.

उसका अपना तापमान बढे या न बढे पर उसके गालो का तापमान ज़रूर बढ़ा हुआ था.

'Don't मेक में फॉल फॉर यू! थैंक यू!'

बार बार वह लाइन पढ़ के सुहाना का दिल जोरर जोरर से धड़कने पर मजबूर हो रहा था.

'व्हाट दीद हे मैं बी तहत? P-Pagal है क्या? I'm- I'm मैरिड आलरेडी.'

"डिनर इस हेरे~"

दरवाज़ा खुला और सोनिआ एक ट्रे में खाना लेते हुए अंदर आयी. अपनी छोटी बहिन को देख सुहाना हड़बड़ा गयी और उसने फ़ौरन hi वीर का मैसेज अपनी चाट से डिलीट कर दिया.

सोनिआ : हँ? क्या हुआ?

सुहाना : K-Kuch नहीं! तुम फिरसे ले आयी? नर्स लोग है तोह न यहाँ?

सोनिआ : नर्स से hi लेके आयी हु. चलिए अब फटाफट खाइये. और ये फ़ोन में क्या देख रही थी?

सुहाना : कुछ नहीं!

सोनिआ : Don't लिए तो में! आप कुछ देख रही थी.

उसने आगे बढ़ सीधे सुहाना का फ़ोन hi छिना लिया,

सुहाना : सोनुउउउ!!???

सोनिआ : हँ? ओह्ह्ह! वीर? आप वीर से बात कर रही थी?

सुहाना : ी...

सोनिआ : हम्म? गिफ्ट भेजा है आपने? क्या भेजा है?

सुहाना : कुछ नहीं! बस ऐसे hi...

सोनिआ : बताइये न!

सुहाना : मेने कहा न कुछ नहीं है. वह तोह उसने यहाँ हेल्प की थी इसलिए मेने भेज दिया. It's नथिंग. लाओ मुझे खाना दो!

सोनिआ : O-Okay!

शर्माते हुए सुहाना एक राहत की सांस लेते हुए खाने में लग गयी. अच्छा हुआ जो सही समय पर उसने वीर का मैसेज डिलीट कर दिया था. वर्ण...!

***

मुंबई सेंट्रल

नाईट ~ 10:45 पं






*डिंग डाँग*

स्टेशन के शोर ने जैसे सब को होश में लाया. भावना और श्वेता दोनों एक दूसरे को देख रही थी. ऐसा लगा जैसे वक़्त hi थम गया हो. दोनों एक दूसरे को पहली बार देख रही थी, फिर भी दोनों को जैसे आभास हो गया था. अपने प्रतिद्वंदी का.

'थिस इस बाद...!'

वीर ने ये देखते hi खुद को कोसना शुरू कर दिया. क्या सोच के उसने श्वेता को साथ चलने के लिए हाँ कहा था? उसकी अकाल तब क्या घास चरने चली गयी थी?

*डिंग*

[Intimidating Presence has been equipped.]

एक राजा के और में नहाते हुए वीर बिना देररि किये आगे बढ़ा और उन् दोनों माओ के बीच आया. उसने बारी बारी दोनों को देखा. वह का वातावरण तंग हो रखा था. और ये सभी महसूस कर पा रहे थे.

वीर : मुझे स्टेशन पर कोई विवाद नहीं चाहिए. सबके मैं में क़ुएस्तिओन्स है ी क्नोव. एक बार अपनी अपनी सीट्स पर हम बैठ जाए उसके बाद hi कोई चर्चा होगी. इस तहत क्लियर?

जब उसकी कमांडिंग टोन उन् सभी ने सुनी, तोह सब के बदन में एक सिहरन दौड़ गयी. उन् सभी औरतो के बीच अकेला मर्द था वह. और जो तेज उसकी आँखों में था, जिस क़दर वह अपनी बुलंद आवाज़ में उन्हें निर्देश दे रहा था, उसकी सूरत, उसकी अदा, सभी कड़ी औरते वह हामी भरने पर मजबूर हो गयी. एक छू तक नहीं निकली किसी के मुँह से.

कमाल था इंटिमीडेटिंग प्रजेंस का. जैसा नाम वैसा काम.

सब ने हाँ में अपनी गर्दन हिलायी और उसके तुरंत बाद hi उनकी ट्रैन का अनाउंसमेंट हुआ, जो जल्द hi निकलने वाली थी.

वीर : चलो!

बारी बारी एक एक करके वह सभी वीर के पीछे चल दी. उसके दोनों कंधो पर बैग्स थे, साथ hi दोनों हाथो में भी. आरोही और काव्य पीछे से उससे देख के hi मैं hi मैं उसकी तारीफों के पल बाँध रही थी.

इतना सब कुछ उठाने के बाद भी उसकी पीठ ज़रा भी नहीं झुकी. वीर के लिए तोह जैसे ये उसकी छींगली का काम था.

सुमन की नज़रे एक तक भावना पर hi तिकी हुई थी. उसकी आँखों में चमक थी. भावना भी कई बार उससे असमंजस में देखि पर जैसे वह कन्फ्यूज्ड सी प्रतीत हो रही थी. और सुमन ये देख बस मैं hi मैं हस्स रही थी.

पीछे चल रही तेज भी अपना ट्राली बैग घसीटते हुए कभी अपनी माँ को देखती तोह कभी उस अनजान औरत को.

श्वेता!!

वह जैसे समझ गयी थी तुरंत hi की ये औरत कौन थी.

तेज : आपने उससे रोका क्यों नहीं कल? हाँ?

वह अपनी माँ के पास आते हुए विरोध में बोली,

भावना : क्या?

तेज : वीर को! उससे रोका क्यों नहीं आपने घर में hi?

भावना : तुम्हे लगता है की वह रुकता?

तेज : क्यों नहीं? आप माँ हो. अगर आपने मनाया होता तोह-

भावना (तेज को देखते हुए) : वह नहीं रुकता.

तेज : कैसे?

भावना : माँ हु उसकी! जानती हु क्यों नाराज़ है मुझसे. वाक़िफ़ हु उसकी उदासी से. और ये भी जानती हु की कब तक वह मुझसे रूठा रहेगा.

तेज : A-Aap समझ नहीं रही है. देखा न आपने? कौन कौन आया है उसके साथ. आप कुछ नहीं जानती है माँ अपने बेटे के बारे में. लिटेराल्ल्य, 20 साल बाद मिल रहे हो आप एक दूसरे से.

भावना : अच्छा? और तुम मुझसे ज़्यादा जानती हो?

उसकी बात पर तेज को निधि द्वारा बतायी गयी वीर की साड़ी बातें याद आयी. और वह गुरूर में अपनी माँ से बोली,

तेज : बिलकुल! में कुछ ऐसी बाते जानती हु जो आप भी नहीं जानती.

भावना : ओह्ह्ह!?

तेज : इसलिए कह रही हु. आप ने मनाया होता तोह...! वह ृक्क जाता. आप सच में कुछ नहीं जानती! एक बार कोशिश तोह-

भावना जो चल रही थी वह अचानक hi ृक्क गयी.

तेज : हँ?

तेज भी साथ में रुकते हुए अपनी माँ को प्रश्न भरी निगाहो से देखि.

भावना : तेज!

तेज : हम्म?

भावना : तुमसे 9 महीने ज़्यादा जानती हु में उससे.

बस! ये वाक्य hi काफी था तेज को सब कुछ बताने के लिए. वह एक वाक्य जैसे तेज के सारे बोलो पर हावी पद गया. माँ थी वह वीर की. तोह क्या हुआ अगर वह उस से 20 साल बाद मिल रही थी. क्या हुआ अगर उनके बीच वह कम्युनिकेशन नहीं था अभी. इसका मतलब ये तोह नहीं की वीर अब उसकी संतान होना चोरर चूका था?

वह बिना कुछ कहे फिरसे आगे बढ़ गयी. और तेज बस वही कड़ी रही.

"टच!" निचले होंठ को दातो टेल दबाये अंततः वह भी पीछे पीछे चल दी.

भीड़ तोह थी.






लोगो की भीड़ से इधर उधर होते हुए इधर वीर अपने सेकंड एक के कम्पार्टमेंट के दरवाज़े पर जब पहुचा.

"ले चाय चाय चाय चाय~" एक चाय वाला रुकी ट्रैन में फटाफट भागते हुए एक कम्पार्टमेंट से दूसरे कम्पार्टमेंट में घुसा.

*डिंग डाँग*

और फिर से अनाउंसमेंट हुआ,

"यात्री गण कृपया ध्यान दे. मुंबई से जयपुर जाने वाली ट्रैन क्सक्सक्सक्सक्स कुछ hi समय में प्लेटफार्म क्रमांक क्सक्स से चलने वाली है."

वीर : भीड़ काफी है. पहले आप लोग अंदर होइए. में आता हु फिर.

सुमन : जी माली- J-Jii! वीर जी!

सुमन सबसे पहले अंदर गयी तोह उसी के पीछे आरोही और काव्य भी अंदर हो ली.

भावना जब वीर के सामने आयी तोह वीर ने उससे देखा,

वीर : हमारा कम्पार्टमेंट ये लेफ्ट वाला है. और बाकी इन् लोगो का राइट वाला.

भावना : हम्म!

बलहार ने रिजर्वेशन तोह आराम से करवा दिया था. पर कम्पार्टमेंट अगल बगल वाले मिले थे. यानी अलग अलग कोच.

भावना ऊपर चढ़ी तोह उसके पीछे hi पूर्वी भी चढ़ते हुए अंदर हो गयी. पर जाने से पहले वह वीर पे एक नज़र डालना नहीं भूली.

श्वेता आयी और वीर को एक बार देख वह भी चढ़ के दाए वाले कोच में चली गयी. वह जैसे कुछ कहना चाहती थी. पर बाहर खड़े और भी लोगो के कारण वह बिना कुछ कहे hi भीतर चल दी.

आखिर में तेज जो सबसे पीछे चल रही थी वह भी आ गयी.

वीर : रुकिए!

तेज : ???

वीर : सूटकेस मुझे दे दीजिये!

तेज : अरे नहीं! में रख लुंगी.

वीर : चोट लगी है आपको! भूलिए मत!

उसके कहने पर तेज चुप चाप अपने भाई को देखने लगी. उसके भाई को इस बात का अभी भी ख़याल था.

तेज : It's- It's रियली okay!

वीर : नहीं! आप अंदर जाइये! में लेके आता हु.

तेज : No वे! तुम्हारे पास पहले hi इतना है. और में इतनी कमज़ोर नहीं हु की एक छोटा सा-

वीर : बात कमज़ोरी की नहीं है.

वह कहते हुए उसके कान के पास झुका और धीरे से बोलै,

"ी क्नोव यू अरे स्ट्रांग. पर बात चोट की है. प्रेशर से वोँड खुल सकता है फिरसे. अंदर चलिए! में लाता हु!"

वीर के बोल सुन्न तेज को ऐसा लगा जैसे kap-kapaati ठण्ड की sheet-leher में किसी ने उससे गर्म कम्बल ुधा दिया हो.

एक गर्म सा एहसास, वह गर्माहट, तेज ने जैसे अपने दिल में महसूस की. और अपने भाई की बात मान वह अंदर चल के बाए कोच की ऑर्डर मुद गयी.

उसने पलट के देखा तोह वीर पीछे पीछे hi आ रहा था. और वह ये देख खुश हो गयी.

अंदर भावना और पूर्वी दोनों अपनी सीट नंबर्स देख जगह ढूंढ़ने में लगी थी. और कुछ देररि के बाद hi उन्हें अपनी जगह मिल गयी.

भावना : ओह्ह! ये वाली है.

पूर्वी : हम्म? हाँ! ये दोनों ऊपर नीचे की अपनी है. सामान रख देते है पहले.

फटाफट अपना सामान बर्थ के नीचे डालते हुए दोनों hi वीर और तेज का इंतज़ार करने लगी.

तेज खाली हाथ आयी तोह भावना ने उस से उसके बैग का पूछा, जिसका जवाब उससे अगले hi शान मिल गया वीर को देखते हुए.

वीर ने कुछ भी कहे बिना तेज का सूटकेस भी अंदर किया और फिर आहिस्ता से बोलै,

वीर : में ये बाकी सामान रख के आता हु.

तेज (नॉड्स) : हम्म!

और वह निकल गया. उसके जाते hi तीनो स्त्री अपनी सीट्स पर विराजमान हो गयी. वीर ने ऐसा अगर कहा है की वह आएगा तोह ज़ाहिर है वह उनके साथ hi सफर करने वाला था. न की अपने उन् परिवार वालो के साथ. ये सोच के मैं hi मैं तेज समेत भावना और पूर्वी भी काफी खुश हो गयी.

इधर वीर इस कोच से निकल जब बगल वाले कोच में जैसे hi आया. तोह पहले hi उससे काव्य की khil-khilaati हुई आवाज़ सुनाई पद गयी,

'ये लड़की भी! कितनी जोरर से हस्ती है.'

[Par uske baad bhi aap kabhi nahi bhadakte uss par.]

'वेल...!'

[Kyuki woh aapki chaheeti hai.]

'Y-Yeah!'

[Aur aap usse pyaar bhi karte ho.]

'हम्म!'

[Aur-]

'That's आईटी! एहम! हम बाद में बात करेंगे इस पर.'

[ :स्माइल2: ]

"अरे! वीर भैया आ गए हाहाहा~"

काव्य अपनी बर्थ पर बैठे पाँव को लटका के जोरर से हिलाते हुए बोली.

काव्य : भैया! ये चारो अपनी सीट्स है हहै~ पूरी फुल! ऊपर नीचे अगल बगल. लाइन से है हमारी!

वीर : हाँ तोह? टिकट में लाइन से hi नंबर्स दिए है. तोह ऑब्वियस्ली लाइन से hi मिलेगी.

काव्य (ब्लशेस) : O-Ohh!

आरोही : तुम इतनी एक्ससिटेड हो काव्य? ऐसी क्या बात है?

काव्य : ओह्ह c'mon दी! अरे में कितने सालो बाद ट्रैन में सफर कर रही हु. जब छोटी थी तब गयी थी. उसके बाद कही जाने नहीं मिला. मां की शादी में भी आप लोग हो आये थे पर मुझे नहीं ले गए थे. हम्फ~ और उसके बाद आज जा रही हु. वह भी एक अननोन गांव में. वह भी वीर भैया के साथ. और वो भी बिना मम्मी पापा के. अकेले! हहहहए~

उसका एक्ससिटेमेंट उससे देख के hi पता चल रहा था. उससे ऐसे देख वीर जो अब तक तेनसेद था वह खुद मुस्कुरा बैठा.

काव्य : पर एक मिनट! ेहठ? भैया आपकी सीट?

वीर (स्माइल्स) : मेरी सीट बगल वाले कोच में है.

काव्य : व्हाटट??? क्यूँउउउ????

वह जोरर से चिल्लाई!

वीर : ाररी?? क्यों क्या? रिजर्वेशन मेरा पहले उन्होंने कर दिया था तोह सीट उस हिसाब से मिली. मुझे क्या पता था तुम सब लोग भी बाद में कूद पड़ोगे?

काव्य : B-But-

इधर श्वेता ने जैसे hi वीर के मुँह से 'उन्होंने' शब्द सुना. उसकी मायूस आँखों में जैसे एक चमक आ गयी. एक उमंग जाएगी जैसे.

वीर ने 'माँ' कह के नहीं बुलाया भावना को. क्या ये संकेत था? क्या उसके पास अभी भी मौका था? वह टकटकी लगाए वीर को hi देखने लगी.

सुमन (स्माइल्स) : कूद पड़ोगे से आपका क्या मतलब है वीर जी? क्या आप नहीं चाहते थे की हम सब आये?

काव्य : हाँ! बोलिये बोलिये! जवाब दीजिये! वे वांट तो क्नोव! नेशन वांट्स तो क्नोव...!!!

काव्य की बात पर आरोही हलके से हस्सी. और बेचारा वीर,

वीर : में-

खामोश रह गया!

सुमन (स्माइल्स) : खर्र चोरडिये! आप सामान तोह रख दीजिये! कब से लिए हुए है!

वीर : ओह्ह राइट!

वीर ने सारा सामान बर्थ के नीचे किया और फिर वह सीट पर बैठ गया.

काव्य ने इतने में एक चिप्स का पैकेट खोला तोह वीर के बगल से बैठ वह उसके साथ शेयर करते हुए खाने लगी.

आरोही भी वीर के बगल से बैठी हुई थी. वह विंडो सीट पर थी. उससे सिघ्त सीइंग बेहद पसंद थी. इसलिए विंडो सीट hi लेती थी वह. और साथ में हाथो में एक बुक होती थी. हर्र सफर में ये उसकी आदत थी.

*मंच* *मंच*

काव्य : भैया! *नाम* *नाम* हम कब तक पहुचेंगे?

वीर : दिन में!

काव्य : हहह? दिन में?

वीर : लगभग 15 घंटे का रूट है. तोह तुम खुद गईं लो!

काव्य : हम्म! 11 बजे निकलेगी न ट्रैन!? 11 तोह बज गए. *मंच*

वीर : बस चलती hi होगी.

और उसके कहते hi ट्रैन ने एक धक्का खाया और अपना संकेत दे दिया.

वीर : लो! चल दी!

आरोही : वीर?

वीर : हम्म?

आरोही : वैसे! हम फ्लाइट से भी तोह जा सकते थे न??

वीर : ी don't क्नोव! उन्होंने ट्रैन की टिकट्स की तोह फिर आपकी भी वही करि मेने.

आरोही : ओह्ह!

वीर : और तुम ये हर्र बार लैस का ग्रीन फ्लेवर क्यों लाती हो?

काव्य : बिकॉज़ it's थे बेसटटटट फ्लेवर!!!! *नाम* *नाम*

आरोही (स्माइल्स) : क्या तुम्हे पसंद नहीं!?

एक चिप वह पैकेट से निकालते हुए पूछी.

वीर : वेल! उतना नहीं जितना डार्क ब्लू वाला होता है.

आरोही : ओह्ह! यू लिखे स्पाइस!!? हँ!!

वीर को पता नहीं क्या हुआ पर उसने आरोही की आँखों में देखा और तपाक से बोल दिया,

वीर : यस! ी लव स्पाइस!

जिस क़दर उसने ये कहा था, ऐसा लगा जैसे उसका इशारा कही और भी था. और इससे भांपते hi आरोही के गाल लाल हो गए. वह फ़ौरन hi मुँह फरते हुए बाहर देखने लगी.

'फ़क! व्हाट दीद ी जस्ट-!??'

मैं पलटने के लिए उसने अपना फ़ोन निकाल रागिनी को एक मैसेज डाला की ट्रैन चल दी है. और फिर वह उठ गया.

वीर : ऑलराइट! में चलता हु. अगर कोई भी दिक्कत हो तोह बस बता देना. Okay?

काव्य : एहहहह!!? भैया???

वीर (स्माइल्स) : व्हाट?

काव्य : आप यही रुकिए न!!!

वीर : सडली, मुझे जाना है वह.

काव्य : अह्ह्ह! राइट राइट! वह दीदी!! मुझे भी उनसे मिलना है.

वीर : हँ?

आरोही : मुझे भी!!!

वीर : वेट!

सुमन : क्यों नहीं? शुरू से hi ये सफर अटपटा सा लग रहा है. अगर हम उनसे बात नहीं करेंगे तोह आगे का सफर और भी अटपटा हो जायेगा हम सब के लिए.

काव्य : ओह्ह! सुमन आंटी आप सच में सबसे बेस्ट हो!!!!

वह उठ के सुमन से चिपक गयी.

सुमन : फुफुफु~ तोह चले?

काव्य : यस यस!!!

दोनों बहने उठ के वह से निकल गयी. और श्वेता अकेली वह रह के घबरा उठी.

श्वेता (उठाते हुए) : M-Mein भी-

उसके उठाते hi सुमन ने उससे पकड़ के वापस बैठा दिया,

सुमन : आप यही रुकिए तब तक! में मिल के आती हु न. यहाँ पे किसी का होना भी तोह ज़रूरी है न? में हो औ, फिर आप चली जाना?

श्वेता : P-Par-

सुमन (स्माइल्स) : चलिए वीर जी!

बिना श्वेता को बोलने का मौका दिए, सुमन वीर के आगे चल दी.

उसने वीर का हाथ थामा हुआ था. ऐसा लग रहा था जैसे एक बीवी अपने पति के संग चल रही हो.

वीर : उम्...! सुमन!

सुमन : हम्म?

वीर ने इशारा जब अपने हाथ की ऑर्डर किया तोह सुमन ने एक पल में hi उसका हाथ चोरर दिया.

वीर : वह! ी थिंक सब गलत समझेंगे तोह-

सुमन (नज़रे झुकाते हुए) : माफ़ कीजिये मालिक! भावनाओ में बह गयी थी.

कहते हुए वह पलट के फिरसे जाने लगी पर अचानक hi ृक्क गयी. उसकी मुलायम ब्याह को वीर जो जकड़े हुए था.

सुमन : मालिक?

वीर : No! सॉरी! तुम मेरी हो! लोग क्या सोचेंगे, फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए मुझे. चलो!

उसकी ब्याह को चोरर वीर ने उसकी हथेली को पकड़ा और आगे चल दिया. सुमन के होंठो पर प्यारी सी एक मुस्कान सज्ज गयी.

इधर आरोही और काव्य दोनों hi तेजल पूर्वी और भावना की बर्थ के पास पहुँच गयी थी.

काव्य : उम्...!

तेज (स्माइल्स) : अरे? काव्य? आरोही? आओ न!

वह दोनों hi आके बैठ गयी.

तेज : माँ!!! आपको पता है ये दोनों कौन है? मेरी बहने!!! ये आरोही और ये काव्य!

उसने उठ के दोनों को अपने गले से लगा लिया.

काव्य : उम् में-

तेज (स्माइल्स) : ये तुम दोनों की तै जी है! मेरी और वीर की माँ!

काव्य : O-Ohh! नमस्ते तै जी! उम्-

आरोही : N-Namaste!

भावना (स्माइल्स) : नमस्ते! तुम दोनों...! सुमित्रा की बेटी हो?

काव्य : अह्ह्ह? आप मम्मी को जानती हो?

भावना (स्माइल्स) : क्यों नहीं जानूँगी? इधर आओ मेरी बच्चियों!

उसने अपनी ब्याह खोल दोनों को बुलाया तोह दोनों उसके पास आयी. और दोनों को hi भावना ने अपने गले से लगा लिया.

भावना : बोहत प्यारे बच्चे है सुमित्रा के. *मुआह*

उसकी इस बात पे तेजल का मुँह बिगड़ गया. प्रांजल कमीने की जो याद आ गयी थी उससे. अगर अभी वह प्रांजल की करतूते बता देती तोह शायद उसकी माँ अपने शब्द वापस ले लेती.

काव्य : T-Tai जी? आप? आप फिर घर में क्यों नहीं थी? घर में आपके बारे में कोई बाते क्यों नहीं करता? हमे तोह कुछ पता hi नहीं था आपके बारे में. एक फोटो तक नहीं है आपकी. अगर आप वीर भैया की मम्मी हो तोह आप कहा थी अब तक?

उसने बेबाक अंदाज़ में सब पूछ लिया.

भावना : बीटा! ये लम्बी कहानी है.

काव्य : में सुन्न लुंगी!

भावना (स्माइल्स) : उसी के लिए तोह हम सब इस सफर पर जा रहे है.

आरोही : पास्ट में कुछ बड़ा हुआ था. है न?

आरोही की बात पर भावना ने पेनी नज़र से उससे देखा. ये लड़की होशियार थी.

भावना (नॉड्स) : हम्म!

आरोही : K-Kya...!? क्या इसलिए आपने ताऊ जी को चोर्रा?

भावना (शिघ्स) : नहीं! वह घटना अलग है. पर हाँ! वह घटना भी साथ hi जुडी हुई है. तुम दोनों चल रही हो तोह सब पता चलेगा तुम्हे. वैसे!? सुमित्रा किसी है?

आरोही : वह ठीक है!

भावना (स्माइल्स) : हम्म! अपनी मासी से तोह मिल लो!

दोनों ने मुद के सामने बैठी पूर्वी को देखा जो पहले से hi मुस्कुरा के अपनी बाहे फैलाये उनका इंतज़ार कर रही थी. दोनों ख़ुशी से उठ के पूर्वी के पास गयी तोह पूर्वी ने प्यार से उन्हें अपने सीने से लगा लिया.

पूर्वी (स्माइल्स) : तुम दोनों बोहत प्यारी हो!

काव्य : थैंक यू! हहै! अहह! भैया आ गए!!

इतने में वीर भी सुमन के साथ आ चूका था.

सुमन दोनों भावना और पूर्वी को नमस्ते कर एकदम भावना के सामने बैठ गयी. और उससे hi देखने लगी,

भावना : ???

बेचारी भावना की समझ नहीं आ रहा था की भला ये औरत उससे ऐसे क्यों देख रही थी? पर कही न कही जैसे उसका मैं भी उससे कुछ संकेत देने की कोशिश कर रहा था.

भावना : आप? क्या में आपको जानती हु?

और अब सुमन से जैसे न रहा गया. उसकी आँखों से अचानक hi ासु निकल पड़े. वीर हैरत में बगल में बैठे सब देख रहा था.

और तभी,

सुमन : दीदी!!!!

कहते हुए सुमन आगे बढ़ सीधे भावना के गले से लग गयी.

'व्हाटटटटट???'

स्तब्ध हुए वीर सामने के दृश्य को देख रहा था. दीदी? पर सुमन का तोह कोई रिश्ता hi नहीं था भावना से. फिर दीदी? क्या मुँह बोली दीदी माना था उसने?

'जस्ट व्हाट इस गोइंग ों????'

[Tamaasha dekhte rahiye! Don't stop them. When it crosses the limit. Only then cease them!]

वीर चुप चाप बैठे सब कुछ घटित होता देखने लगा. और बाकी सब भी. ये सब चल क्या रहा था?

भावना : हहह??

सुमन नम्म आँखें लिए पीछे हुई और अपनी छथि पर हाथ रखते हुए बोली,

"M-Mein...! में सुमन दीदी!!!"

भावना : S-Suman? हहहहह??!!

पहले तोह भावना की कुछ समझ न आया. पर उसके बाद hi जैसे उसके दिमाग में कुछ आया और वह भौचक्की सी सुमन को देख चिल्लाई,

भावना : सुमंन्त्र???!!!!

सुमन (नॉड्स) : हाँ दीदी!!! सुमन!!! में सुमन! आपकी सुमन!!!!

उसके इतना कहते hi भावना ने उससे कस के अपने सीने से लगा लिया.

भावना : हे भगवाननं!!! सुमंत्र!!!

सुमन : डीडीईई!!! *स्निफ्फ*

'ये दोनों? एक दूसरे को इतने अच्छे से जानती है? आखिर माजरा क्या है?'

[Just witness!]

भावना :T-Tum यहाँ? मुझे विश्वास नहीं हो रहा. तुम! तुम यहाँ क्या कर रही हो? हाँ? M-Mein तोह पहचान hi न पायी तुम्हे.

सुमन (स्माइल्स) : कैसे पहचानती आप? तब में छोटी थी. *स्निफ्फ* और अब लगभग 20 साल बाद देख रही है आप मुझे. पर आप अभी भी उतनी hi ख़ूबसूरत है. बिलकुल भी नहीं बढ़ी है आपकी उम्र.

सुमन को इस तरह भावुक होते वीर ने बोहत hi काम देखा था. मतलब साफ़ था. सुमन और भावना के बीच एक गहरा रिश्ता था.

भावना : अच्छा तोह? और खुद को तोह देखो? हाँ? कहा है बाल बच्चे? शादी हो गयी है न?

सुमन : एक बेटी है. सोनाली! वह घर पे है. और...! मेने अपने पति को चोरर दिया है.

भावना : K-Kyu??

तोह सुमन उसके कानो में झुकी और धीरे से बोली, "मालिक के होते मुझे किसी और मर्द की क्या ज़रुरत?"

सुनते hi भावना का शरीर काँप उठा. एक सनसनी भरा विचार उसके मस्तिष्क से होते हुए गुज़रा.

भावना : I-Iska मतलब!?

उसने एक झटके में वीर की ऑर्डर देखा.

वीर : हम्म?

और फिर सुमन को. जो रहस्यमयी तरीके से मुस्कुरा रही थी. और अगले hi पल उससे सारा माजरा समझ आ गया. उसका सर्र नीचे झुक गया.

भावना : सुमन t-tum...!?

सुमन (स्माइल्स) : हम्म?

वीर इधर पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड था.

'व्हाट थे-!?? व्हाट वास् तहत लुक? वह मुझे ऐसे क्यों देखि?'

[Shayad...!]

'शायद?'

[Shayad unhe pata chal gaya.]

'क्या???'

[Ki aapne Suman ke saath sex kiya hai.]

'व्हाटटटटटटटट???'

[Hmm! That look says it all. She seems disappointed.]

'फुसक्कखकक!!! P-Par एक मिनट! सुमन ने क्यों?'

[Suman ne kuch soch rakha hoga. I don't know. I'm trying to calculate everything. Rokiye mat unhe. Jo ho raha hai hone dijiye filhaal. We'll get clues.]

'शीत्तत्त!!!'

वीर उन् दोनों को बारीकी से देखने लगा.

भावना : पर तुम-!?

सुमन : में यहाँ कैसे?

भावना : हाँ!

सुमन : लम्बी कहानी है. सफर में आगे बताउंगी. जैसे जैसे आप अपने अतीत को खोलेंगी, वैसे वैसे मेरे अतीत के पैन भी सामने आते जायेंगे.

भावना (फ्रोंस) : T-Tum!!

सुमन : पर आपको स्वस्थ देख बोहत अच्छा लगा. अब लग रहा है जैसे सब कुछ ठीक हो जायेगा.

भावना (शिघ्स) : मुझे पहले से hi अंदाजा हो जाना चाहिए था.

सुमन : आप कितना hi खिलाफ क्यों न हो ले. इसके विरोध में क्यों न चली जाए. ये होक hi रहेगा.

भावना : Sh-Shayad तुम सही हो!

वीर को उनकी बाते ज़रा भी समझ नहीं आ रही थी. और वीर hi क्या? वह बैठे किसी को भी समझ नहीं आ रही थी सिवाए पूर्वी के.

पूर्वी : और मुझसे नहीं मिलोगी?

सुमन : A-Aap?

पूर्वी (स्माइल्स) : अंदाजा क्यों नहीं लगाती?

सुमन ने जब असमंजस में भावना को देखा तोह भावना ने मुस्कुरा के कहा,

भावना : ये पूर्वी है!

सुमन : अह्ह्ह!!?! दीदी!? A-Aap भी?

पूर्वी (स्माइल्स) : हम्म!

और दोनों सहेलियों की तरह एक दूसरे से लिपट गयी.

तेज : कोई मुझे बताएगा की यहाँ क्या हो रहा है? हाँ?

सुमन (स्माइल्स) : बस ये समझ लीजिये! की सहेलिया आपस में मिल रही है.

तेज : M-Mom??

भावना : हम्म! फिलहाल यही कहना सही होगा.

तेज : ुर्घः!!

और इस तरह सुमन पूर्वी और भावना की आपस में पुरानी यादो को लेकर बाते होने लगी. पर वीर की कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. उससे इतना ज़रूर पता था की सुमन भावना और पूर्वी के साथ अतीत में जुडी हुई थी. पर कैसे?? इसका जवाब hi उससे ढूंढ़ना था. उसने एक और बात नोटिस की थी. वह ये की पूर्वी और भावना दोनों hi उससे अब कुछ ज़्यादा hi छुप छुप के देख रही थी.

रात के 11:50 हो चुके थे. और धीरे धीरे अब ट्रैन की लाइट्स बंद होनी शुरू हो गयी थी. लोग खा पी के अपनी अपनी बर्थ पर सोने जा रहे थे.

भावना ने इतने में बैग से एक टिफ़िन निकाला और उससे खोल के उन् सब को देखते हुए बोली, ख़ास कर वीर से.

भावना : बीटा! ये लो! थोड़ा सा तुम सब खा लो!

टिफ़िन में उसके हाथ का बनाया हुआ खाना था. वीर ने जैसे hi देखा उसका मैं सच में ललचा गया. अपनी माँ के हाथ का खाना.

काव्य : ओह्ह ओह्ह! क्या है?

भावना (स्माइल्स) : पूरी और आलू की सब्ज़ी!

काव्य : ओह्ह! अचार भी?

भावना : हाँ हाँ! आम का मिर्ची का दोनों का है. लो न!

काव्य : हाँ में लुंगी! मुझे रोल कर के दो न तै जी!

भावना (स्माइल्स) : क्यों नहीं!

आरोही (ब्लशेस) : काव्य? हम घर से खा के hi आये थे न?

काव्य : हाँ पर मुझे फिरसे भूक लग गयी.

जहा आरोही शर्मा रही थी तोह वही भावना और पूर्वी दोनों hi काव्य के रवैय्ये से बेहद खुश थी.

भावना : V-Veer!? तुम-

वीर : नहीं! मेने घर में खा लिया था.

भावना : O-Ohh!

तेज : वीर???

पूर्वी : थोड़ा सा खा लो बीटा?

वीर : मुझे वाक़ई भूक नहीं है. मासी!

पूर्वी ने उदासी में भावना को देखा. जैसे कहना चाह रही हो की मेने कोशिश की, पर तुम्हारा लड़का नहीं माना.

वीर : और आप!

तेज : हँ?

वीर : आपकी आज ड्रेसिंग बदलनी है. में लेके आया हु. चलिए!

तेज : नहीं! इसकी कोई ज़रुरत नहीं है!

वीर : बिलकुल नहीं! मृणाल जी ने कहा था की याद से ड्रेसिंग बदल देना.

तेज : पर...!

वीर : दिखाइए!

तेज : तोह अब टॉप उतारू यहाँ?

वीर : ....

तेज (स्माइल्स) : ऐसे ऊपर नहीं होगा.

तेज ने अपने फुल स्लीवेद मैरून टॉप की तरफ इशारा करते हुए कहा. ऊपर करना आसान नहीं था.

आरोही : क्या हुआ?

तेज : ओह्ह कुछ नहीं!

वीर : प्रांजल ने हाथ में केचि मारी थी इन्हे.

काव्य और आरोही : K-Kyaaaaa????

वीर : हम्म! उसी रात फिर में उससे घर पर चोरर के गया था.

आरोही : तोह ये सब हुआ था? I'm सो सरररययय!!!

काव्य : S-Sorryyyy!!!

वह दोनों सर्र झुका के तेज से माफ़ी मांगी.

तेज : अरे अरे? इसमें तुम माफ़ी क्यों मांग रही हो? It's रियली okay! I'm फाइन!

आरोही : ी जस्ट-

वीर : आरोही दी! इन्हे वाशरूम में ले जा कर प्लीज इनकी ड्रेसिंग चेंज करवा दीजिये!

आरोही : हाँ! क्यों नहीं!

तेज : बूत-

आरोही : नहीं! आप चलिए! अभी!

वह तेज को पकड़ के मेडिक बॉक्स के साथ सीधे उससे वाशरूम में ले गयी.

सुमन : अब मुझे भी चलना चाहिए! कोई और भी है, जो बेताब है यहाँ आने के लिए. इजाज़त दीजिये!

सुमन उठ के भावना और पूर्वी की तरफ हामी भर वह से फ़ौरन hi निकल गयी.

तोह वही श्वेता जो अब तक अकेले बैठी हुई थी. उसके मैं में न जाने कैसे कैसे दृश्य आ रहे थे.

एक दृश्य में उसने देखा, की भावना वीर को अपने गले से लगाए उससे चूम रही है. और उसकी तरफ देख के हैवानो वाली हस्सी हस्स रही है.

तोह दूसरे दृश्य में उससे दिखाई दिया. की उससे तेज और पूर्वी पकड़ी हुई है. और भावना ट्रैन में वीर के साथ बैठ के रवाना हो रही है. वह जोरर जोरर से गुहार लगा रही है. पर तेजल और पूर्वी हस्ते हुए उससे चौररने का नाम नहीं ले रही.

"N-Nahiiii!!!!"

वह झटका मारते हुए आँख खोल के बैठ गयी. पूरा चेहरा उसका पसीने से भीगा हुआ था.

"H-Hey भगवान्! नहीं! मेरा बच्चा!!!"

तब तक सुमन भी आ पहुची.

सुमन : अब आप जा सकती है.

श्वेता : H-Haan!

फटाफट वह कुछ सामान उठा के वह से निकल गयी.

तोह वही यहाँ से आरोही और तेज भी वापस आ चुकी थी. और वह भी अब वह से अपने कोच के लिए निकल गयी.

अभी उन्हें गए थोड़ी देरर hi हुई थी की श्वेता हफ्ते हुए उनके कोच में आ धमकी.

और बस, दो नज़रे फिरसे आपस में जा टकराई.

श्वेता और भावना की!

श्वेता जानती थी की उसके सामने ये बैठी वीर की असली माँ थी. और उसकी सौतन. पर भावना नहीं जानती थी की ये औरत वीर की सौतेली माँ है.

वीर : आप यहाँ?

श्वेता : H-Haan में ये! B-Beta! में ये पुलाव लायी थी. सबके लिए थोड़ा थोड़ा बनाया था. Th-Thoda खा लो.

वीर : उम्! मुझे भूक नहीं है असल में.

श्वेता : अहह?

उसकी नज़र अचानक hi वही साइड टेबल पर रखे टिफ़िन पर पड़ी. जो भावना के पास रखा हुआ था. इसका मतलब? इसका मतलब वीर ने भावना के हाथ का खाना खा लिया था?

खुद से hi मैं में सोच वह इतना उदास हो गयी की उससे रोना आ गया.

तेज : आइये आइये! बैठिये!!! माँ! आप जानती है ये कौन है?

तेज जैसे इंतज़ार hi कर रही थी इस औरत के आने का. उसकी नज़रे आग फेक रही थी.

भावना : ???

तेज : ये है हमारे वीर की दूसरी माँ!! उसकी सौतेली माँ!! क्यों? मेने सही कहा न?

श्वेता : M-Mein-

श्वेता इतना डर गयी की उसका बदन तक हिलने लगा. इन् सभी के बीच वह एक अकेली फस्स गयी थी. ऊपर से वीर भी कुछ नहीं कह रहा था.

तेज : वीर!

वीर : हँ?

तेज : मेने सोचा था में तुमसे परमिशन लुंगी उसके बाद hi ये सब बताउंगी. पर अब मुझसे और चुप रहा नहीं जायेगा.

वीर : ???

तेज जो सफर की शुरुआत से hi एक खराब मूड में थी. श्वेता को देखने के बाद वह सीधा भड़क उठी.

तेज : कुछ पूछ रही हु आपसे! आप मेरे भाई की सौतेली माँ है या नहीं?

श्वेता : H-Haan! M-Mein हु! P-Par-

तेज (स्माइल्स) : माँ! अब जो में आपको बताने जा रही हु. आप ध्यान से सुनियेगा!

पूर्वी : तेज? आराम से! शोर नहीं बीटा!

तेज : नहीं मासी! अब और चुप नहीं रह सकती. वाहियात गिरी की भी हद्द होती है.

भावना : तेज??

तेज : ये औरत!!! आपको पता है इसने क्या किया था? क्या क्या कर के बैठी है ये?

भावना : ???

वीर को एक आभास हुआ. शायद तेज कोई भांडा फोड़ने वाली थी. वह उठने hi वाला था की,

[Wait Master!]

'पारी? मुझे रोकना होगा तेजल दी को. वर्ण वह कुछ-'

[No! Abhi nahi! Hone do jo ho raha hai. Just watch!]

'सहित!!!'

मजबूरन वह ृक्क गया.

तेज : जब आप वीर को चोरर के गयी थी माँ!! तोह ये औरत!! ये औरत कुछ साल बाद हमारे वीर की ज़िन्दगी में आयी. और पता है इसने क्या किया माँ?? मेरे भाई की ज़िन्दगी नर्क बना दी इसने! नर्क!!!

भावना : !!!??

पूर्वी : तेज धीरे!!

तेज (भावुक होते हुए) : ये औरत ने...! माँ! मुझसे कहा भी नहीं जा रहा है. इस औरत ने इतने दर्द और इतने कष्ट दिए है हमारे वीर को की गिनाने पर भी गईं नहीं पाओगी आप.

भावना : तेज??

तेज : माँ!!! इस औरत ने षडियंत्र रचा था. Y-Ye षडियंत्र कर रही थी हमारे वीर के खिलाफ. उससे जायदाद से बाहर करने के लिए. इसी की वजह से भाई डर डर भटकता रहा. घर से बाहर निकलवा दिया था इसने माँ वीर को. एक नंबर की झूठी, मक्कार और कपटी औरत है ये...!

श्वेता : नहहीइइइइइ!!!!

श्वेता काँप उठी. उसकी आँखों से ासु धार बन्न के बहने लगे. हर्र एक शब्द उससे उसकी बुरी हरकतों की याद दिला रहा था. वह घिनौनी करतूते जो उसने अतीत में की थी. कैसे वह साज़िशों का हिस्सा थी. उसी की ग्लानि के भार से तोह अब तक उभर नहीं पा रही थी वह. और इधर तेज एक के बाद एक वार करती जा रही थी.

तेज : देखिये इससे! देखिये कैसे नाटक कर के वीर को बहलाने फुसलाने आयी है. ताकि हमसे वीर को दूर कर सके माँ! यही इसका लक्ष्य है. शर्म नहीं आयी आपको एक बार भी? थू है आपके ऊपर!! खुद का बीटा नहीं था तोह जलन के मारे सौतेले बेटे को घर से बाहर फिकवा दिया? अरे भगवान् भी माफ़ नहीं करेगा आपको. मेरी है लगेगी आपको!

श्वेता : N-Nahhhiiii!!! चुप हो जाओ!! भगवान् के लिए...! *स्निफ्फ*

तेज : चुप हो जाऊ? क्यों चुप हो जाऊ?? ऐसी घिनौनी हरकत करने वाली औरत को तोह जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए. उसके बाद भी मेरे भाई का बड़पन्न तोह देखो. माँ!! इन्हे और इनकी बेटी को वीर बचाने गया. जान जोखिम दाल के. ऊपर से इन् मैडम को रहने की जगह भी दिलवाई. फिर भी स्यानपन्ति तोह देखो!! यू अरे नॉट ओनली ा डिस्ग्रेस तो थे फॅमिली. बूत you're ा डिस्ग्रेस तो योरसेल्फ अस वेल!!!

उसके इतने कड़वे शब्द सुन्न श्वेता बेचारी का दिल दहल गया. वह तोह यहाँ बस प्यार से वीर को टिफ़िन खिलाने आयी थी. एक के बाद एक जैसे उस से साड़ी चीज़े छिनती जा रही थी.

तेज : माँ! इस औरत के कारण मेरे भाई को घर से निकाल दिया गया. वह रात में बारिश में भीगता कोई ठिकाना ढूंढ़ता रहा पर कोई न आया उसकी मदद के लिए. उसका इतना दर्दनाक हादसा हुआ की िक में कुछ दिन एडमिट था. पर एक इंसान उस घर से देखने नहीं आया माँ हमारे वीर को!!! एक इंसान भी नाहीइ!!! भला हो उन् निधि ma'am का! जिन्होंने वीर को पनाह दी. तब जब वह एकदम अकेला था!! पर ये- ये तोह- सच में...!

तेज और हमले करती की इतने में भावना ने इशारे से रोक दिया. वह हफ्ते हुए गुस्से में शांत होक बैठ गयी. श्वेता अपना मुँह अपने हाथो से छिपाए बस सिसक सिसक के रोये जा रही थी.

तभी भावना ने बस एक सवाल पूछा,

"क्यों?"

उसके गाल से एक ासु की बूँद बह के नीचे गिरी. पूर्वी का भी यही हाल था.

भावना : क्यों किया? मेरे बच्चे के साथ ऐसा?

और श्वेता आत्म ग्लानि में और डूब गयी. वह फफकारते हुए रोने लगी. बेचारी का हाल बेहाल था.

ये सवाल तोह जैसे और उसके दिल को तोड़े जा रहा था. और सच में, श्वेता के पास इसका कोई जवाब नहीं था.

बस! बहुत हुआ!

वह उठी और रट हुए भागते हुए वह से अपना मुँह छिपा के निकल गयी.

उसके जाते hi पूर्वी ने वीर को गले से लगा के चूम लिया.

पूर्वी : और क्या कहा था तूने मुझसे? की घर में सब मेरा ख़याल रखते है? सब बढ़िया है! ये ख़याल रखते है तेरा? *स्निफ्फ* हाँ? बोल? झूठ बोलता है अपनी मासी से? इतने दर्द छिपाए क्या सोच रहा था? की कभी माँ और मासी को पता नहीं चलेगा? बोल?

वीर : में-

भावना तुरंत hi उठ के आयी और पूर्वी के हाथो से वीर का चेहरा लेते हुए अपने पेट से लगा लिया.

भावना : अहिंदा से ऐसा कभी नहीं होना चाहिए. K-Kabhi नहीं! गलती मेरी है. जो उस दलदल में तुझे चोरर गयी. मुझे क्या पता था की वह सब-

वीर : ...

तेज : इतने अत्याचार किये है न उन् लोगो ने मेरे भाई पर. मैं तोह करता है की-

वीर : It's okay!

भावना ने प्यार से इस बार पूरे गर्व से अपने बेटे को चूमा और उसके बगल से बैठ गयी.

वीर : में एक मिनट! आता हु!

तेज : कहा जा रहे हो? अब ये मत कहना की तुम्हे उनकी चिंता हो रही है वीर!?

वीर : बस देखने जा रहा हु. चेक करने! उन्हें किसी चीज़ की ज़रुरत तोह नहीं.

भावना ने उससे नहीं रोका. और तेज ने भी.

वीर जैसे hi उठा, वह पूरी तेज़्ज़ी में दूसरे कोच की ऑर्डर जाने लगा. पता नहीं क्यों पर उसका दिल जैसे पसीज गया. उससे एक घबराहट भी हो रही थी.

वह जैसे hi दूसरे कोच में जाने के लिए वाशरूम के पास तक आया तोह सामने का दृश्य देख उसकी सांस hi अटक गयी.

"N-Noo!"

श्वेता बस एक क़दम दूर थे दरवाज़े से नीचे गिरने के लिए.

वह बेसुध सी वही कड़ी हुई थी. तेज़्ज़ रफ़्तार में ट्रैन चलती जा रही थी और ज़ररदार हवाएं की लहरें उसकी ज़ुल्फो को उड़ाती जा रही थी. उससे न होश था न हवास.

और अगले hi पल,

उसका एक परर अपने आप आगे बढ़ गया.

उसका शरीर गिरते हुए हवा के झटके से बायीं ऑर्डर इतने तेज़्ज़ी से गया. पर तभी,

"हहह!??"

एक मज़बूत हाथ उसके पेट के इर्द गिर्द लापता और एक hi झटके में उसके बदन को खींचते हुए अंदर कर लिया.

श्वेता जैसे अपनी बेसुध हालत से जाएगी. गालो पर ासु सजाये वह उस हाथ के मालिक के चेहरे को जब देखि तोह,

"पागल हो गयी हो क्या आप??"

"ये क्या हरकत थी?? दिमाग है या नहीं आप में? कुछ सोचती भी हो या नाहीइ? हाँ? एक बार भी भूमिका दी के बारे में नहीं सोचा? अकाल कहा थी आपकी ये करते वक़्त??? हाँ? बोलो???"

वीर उससे लगातार दाते जा रहा था. पर श्वेता? वह खुश थी. ख़ुशी के मारे उसके ासु नहीं रुक रहे थे.

वीर की दांत के बोल भी आज जैसे उससे अमृत सामान लग रहे थे.

वह फुट फुट कर रट हुए उसके सीने से लग गयी. उसने उसकी टी शर्ट को इतनी कस के भींचा हुआ था की वीर खुद वही मूर्ति सा जम्म के रह गया.

और तब श्वेता ने उसके सीने पर कान लगाए उसकी धड़कने सुनी.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

सुनते hi उसके ासु और ज़र्रों से निकल पड़े. क्युकी ये सबूत था.

हे करेड़! हे एक्चुअली करेड़!

वीर को उसकी परवाह थी. फिक्र थी. तभी तोह इतना डाट रहा था. तभी तोह उसके पीछे पीछे आया. तभी तोह उससे बचाया. और तभी तोह उसकी धड़कने... इतनी तेज़्ज़ थी.

श्वेता के thar-tharaate होंठो से फिर बस इतना hi निकला,

"Th-Thank यू!!!"

और अंततः...! वीर की बाहे अपने आप श्वेता के इर्द गिर्द लेपित गयी. एक थकान भरी आह चोरर वह अपनी सौतेली माँ के साथ आलिंगन में वही खड़ा रहा.

आज ये हाल था. न जाने वह पहुचने पर क्या क्या होने वाला था!?

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस.

ये अपडेट है मोरे थान 6.8क वर्ड्स का. It's ा हूजे मेगा अपडेट. मेने काफी डिटेलिंग में लिखा है इससे. क्युकी मेरा मैं था इस हिस्से को बड़े अच्छे से दर्शाने का. ी होप आप को पसंद आया होगा. तोह लाइक्स ज़रूर ठोकने का और रेवोस रखने का गाइस.

धन्यवाद! ✨
 
इंडेक्स है बीन अपडेटेड! ✨

और जैसा की आप सभी जानते है. रमैनिंग कमैंट्स के रिलीज समय मिलते hi. :डी :फाइव:

बाकी, इसके रेवोस रुकने नहीं चाहिए. ये नहीं की पिछले वाला का रिप्लाई नहीं आया तोह नया रेवो नहीं डोज. रिलीज सबके मिलेंगे. मुझे जैसे hi समय मिलता जायेगा. में रिप्लाई करता जाऊंगा. टिल थें एन्जॉय! :थैंक्स:
 
अपडेट - 122 ~ उनटैंग थे कनोट्स (1)

अब तक...

श्वेता के thar-tharaate होंठो से फिर बस इतना hi निकला,

"Th-Thank यू!!!"

और अंततः...! वीर की बाहे अपने आप श्वेता के इर्द गिर्द लेपित गयी. एक थकान भरी आह चोरर वह अपनी सौतेली माँ के साथ आलिंगन में वही खड़ा रहा.

आज ये हाल था. न जाने वह पहुचने पर क्या क्या होने वाला था!?


अब आगे...



*यौन*

पलके झपकाते हुए वीर अपनी नींद से जाएगा. बड़ी मुश्किल से उससे सिर्फ 2-3 घंटे की नींद नसीब हुई थी. जो बगल वाले की वजह से खराब हो गयी. यानी की बगल वाले लोगो में से एक कपल अपना बच्चा लाया हुआ था. और हर्र थोड़ी देरर में वह बच्चा ऐसे रोटा जैसे उसका कुछ लूट लिया हो किसी ने.

खर्र, वह सब तोह ठीक था पर रात में तोह जैसे ये ट्रैन के दो कोच युद्ध भूमि में तब्दील हो चुके थे. श्वेता को कल वीर ने काफी डांटा भी था उस बाद वाली हरकत के लिए.

जैसे तैसे वह सब समाप्त हुआ और सभी अपनी अपनी बर्थ पर आ कर सोये. वीर को नींद बड़ी hi देरर से लगी थी. जिसका कारण पारी जानती थी.

[Why are you taking so much stress Master? Sehat ke liye ye sahi nahi.]

सुबह सुबह hi वह उस पर चढ़ गयी.

'व्हाट? अब क्या हुआ?'

[Aap stress le rahe ho. Woh bhi bohut zyada.]

'ऐसा कुछ नहीं है.'

[Aisa hi hai. Stress is not good for health. Kya mein nahi jaanti? Aap kya kya sochte ho? Apni mom ko leke stress, Shweta ko lekar alag chinta, Nidhi ma'am se leke Ragini tak. Unn sab ki chinta alag. Behno ki fiqr. Apne dosto ki tension. Business ke baare me sochna. Suhana aur Kaera ke prati regret. Aur sabse khaas...]

'???'

[Uss unknown aadmi ki dii hui jaan se maar daalne ki dhamki.]

उस इंसान का ज़िक्र आते hi वीर की अधखुली आँखें पूरे से खुल गयी और एक बार फिर उसके बोल उसके कानो में गूँज गए.



"सिस्टम...! सिर्फ तुम्हारे पास नहीं है वीर!!"



उसकी वह अजीब सी मुस्कान और पहली मुलाक़ात का वह मंज़र वीर की आँखों के सामने आ गया.








'शीत्तत्त!!!'

[See! Agar aap ki jagah koi aur hota then I'm sure woh pressure ke chalte hi do teen baar hyperventilate kar chuka hota. Stay Calm! I'm with you at all times.]

'ी...'

[I know aap uss unknown person ko lekar tension me ho bohut. Aur aapko apne se zyaada apne logo ki chinta hai. But listen to me carefully.]

'??'

[Uske baare me sochne se abhi koi fayda nahi hai. Focus here for now. Aap jitna engage rahoge yaha, ho sakta hai zyada se zyada missions mil sake yaha. That'll be beneficial for our stats. Aur hume yahi karna bhi hai. Accumulate points Master.]

'येह! तुम सही हो पारी. उस बारे में सोचने से टेंशन और बढ़ेगी. जब समय आएगा तब देखा जायेगा.'

[Yes!]

'थैंक यू पारी!'

[Mention not!]

वह एक लम्बी सास लेते हुए जैसे hi पलटा,

'हहह!?'

ऊपर बगल वाली बर्थ में तेज लेती हुई मुस्कुरा के उससे hi देख रही थी.

तेज (स्माइल्स) : उठ गए?

वीर : उम्! हाँ!

तेज : नींद नहीं आयी?

वीर : आयी! लेकिन थोड़ी देरर की.

तेज (स्माइल्स) : शामे हेरे!

वीर : ओह्ह! ट्रैन रुकी हुई है?

तेज : हम्म!

वीर ने अपनी स्मार्टवॉच में टाइम देखा तोह सुबह के 7 बज रहे थे.

तेज : में भी जस्ट अभी उठी. कोई स्टेशन आया है शायद.

वीर : ओह्ह्ह!

तभी उससे नीचे से दो जानी पहचानी आवाज़े सुनाई दी. तोह वह अपनी बर्थ पे उठ के बैठा और आगे झुक उसने नीचे देखा.

और नीचे देखते hi, वीर अपने फैसले पर पछताया. क्यों वह आगे बढ़ नीचे देखा?

दरअसल, ऊपर से नीचे देखते समय पूर्वी ठीक उसके नीचे वाली बर्थ पर बैठी हुई थी. तोह ऊपर से अपनी मासी के बड़े बड़े पहाड़ो के बीच की घाटी वीर भली भाति देख पा रहा था.

'फुक्कखकक!!!'

न चाहते हुए भी उसकी नज़रे पूर्वी के क्लीवेज पर जा तिकी. क्या करे? ये दृश्य होते hi ऐसे है की एक मर्द उन्हें देखने पर मजबूर हो hi जाता है.

भावना जो पूर्वी के ठीक सामने विराजमान थी वह वीर के हिलने डुलने की आहात पाते hi उससे ऊपर की ऑर्डर देखि,

भावना : बीटा? उठ गए? आओ! आओ नीचे आ जाओ! हाथ मुँह धो लो, ब्रश कर लो. ट्रैन रुकी है अभी. ये लो! चाय लेलो और बिस्किट्स भी है.

वीर ने देखा की पूर्वी और उसकी माँ दोनों एक एक कप चाय का लिए बैठी थी और साथ में hi नमकीन बिस्किट्स भी लिए हुए थी.

पूर्वी : अरे? सोने दो न उससे. बीटा??? सो जाओ तुम. अभी बहुत रास्ता बाकी है. दिन में पहुचेंगे हम. आराम से सो लो. कोई काम थोड़ी है.

जहा एक तरफ भावना उससे उठा रही थी. तोह वही दूसरी तरफ उसकी मासी पूर्वी उससे और बिगाड़ने में लगी हुई थी.

भावना : अरे पर!? अब उठ hi गया है तोह आके नाश्ता कर लेगा न.

पूर्वी : तुम तोह और...! खामखा बच्चे की नींद बिगाड़ दी. अभी कौन सा जयपुर आ गया है. सोने दो बच्चो को आराम से.

वीर आगे बढ़ नीचे झुका. एक बार फिर उससे पूर्वी के गोर गोर आधे दूध झलके. उसने देखा की पूर्वी के दाए दूध पर अंदर एक छोटा सा टिल भी था. जो उसके उरोजों की सुंदरता को एक अलग hi आकर्षण दे रहा था.

'फूऊकककककक!!!'

और जिसका डर था वही हुआ.

मॉर्निंग वुड! सुबह लुंड का खड़ा होना एक हष्ट पुष्ट लड़के की निशानी होती है. और ये सन देखने के बाद वीर का लुंड अपने पूरे जोश में आ चूका था. घर में तोह सुमन चूस के उससे हल्का कर देती थी. या सीधे छूट या गांड में hi ले लेती थी. पर अब यहाँ? यहाँ कौन उससे ब्लोजॉब देने आने वाला था?

वीर फटाफट नीचे उतरा. अच्छी बात ये थी की उसने जीन्स डाली हुई थी. ज़्यादा समझ में नहीं आया उसका उभार. वर्ण अगर जोग्गेर या लोअर होता तोह नीचे बैठी दोनों महिलाये चीख उठती.

पूर्वी : अरे? बीटा सो लेते थोड़ी देरर और.

वीर : नहीं मासी! अब नींद नहीं आएगी.

पूर्वी : क्यों भला?

'अब कैसे बताऊ मासी!??'

भावना (स्माइल्स) : उठ गए हो तोह जाओ बीटा, पहले ब्रश कर लो. और आके चाय पी लो. नाश्ता कर लो.

वीर : H-Haan! वह में वाशरूम hi जा रहा था. वैसे कौन सा स्टेशन आया है?

पूर्वी : रतलाम जंक्शन पड़ा है बीटा. अभी यही रुकेगी काम से काम 10-15 मिनट. तोह जल्दी से हो आओ.

वीर : ओह्ह! Okay!

वीर फटाफट वह से निकला और दूसरे कोच में आया जहा उससे सभी लोग सोते हुए दिखाई दिए. श्वेता को नीचे सोता देख उसने एक चेन्न की सांस ली. वही काव्य भी ऊपर घोड़े बेच के सो रही थी. आरोही सर्र के ऊपर चादर डाले नींद की वादियों में थी.

उन्हें चोरर वीर सीधा नीचे लेती सुमन के पास गया. वही उसका इलाज कर सकती थी अभी. वही उससे इस समस्या से निजात दिला सकती थी. क्युकी लुंड था जो बैठने का नाम hi नहीं ले रहा था.

वीर : सुमन!!!! सुमन!!! टच!!!

सुमन : ममम?

खुशकिस्मती की बात थी जो सुमन जाएगी हुई थी. वीर के बुलाते hi वह आँख खोल उससे देखि,

सुमन : मालिक?

वीर ने बिना कुछ कहे hi अपने पंत की ऑर्डर इशारा किया. तोह सुमन फ़ौरन hi सारा माजरा समझ गयी.

सुमन (स्माइल्स) : मेरे पास एक उपाय है मालिक.

वीर : पहेलियाँ मत बुझाओ अभी सुमन. ी नीड रिलीफ. जल्द से जल्द इसका कुछ करो.

सुमन : तोह सुनिए! में बाथरूम में जाती हु. और आप कुछ देरर यहाँ ृक्क के आइयेगा. दो बार दरवाज़े को खत खतना और में समझ जाउंगी की आप हो. दरवाज़ा खोल के में आपको अंदर आने दे दूंगी. कहिये?

वीर : रिस्की है. बूत फ़क तहत. I'll टेक थे रिस्क. तुम जाओ फ़ौरन!

सुमन (स्माइल्स) : इंतज़ार रहेगा आपका मालिक!

वह उठी, अपनी संदल पेहेन सीधे अंदर वाशरूम में घुस गयी. वीर यहाँ बस यही दुआ कर रहा था की श्वेता, आरोही या काव्य में से कोई जाग न जाए.

घडी में टाइम देख, वह वही कुछ देरर बैठ रहा. जब 2-3 मिनट गुज़र गए तोह वह उठा और सीधा वाशरूम की ऑर्डर चल दिया.

पर अभी वह उठ के दो क़दम चला hi था की इतने में कोच का दरवाज़ा खुला और एक खूब बुज़ुर्ग बूढी औरत हिलते हिलते अंदर आयी. धीरे धीरे वह आगे बढ़ रही थी,

'फूऊक्ककककक!!! अम्मा जल्दी करो!!!' वीर मैं में चिल्लाया.

पर बेचारी बुढ़िया तोह अपने स्लो मोशन में थी. वह कहा नौजवानो की तरह फर्राटे से चल फिर सकती थी?

"अलोक?? ए अलोक! माला भूक लागली आहे!" वह कांपते हुए बोली.

"ीकडे ये आई!!" अलोक उसका लड़का जो श्वेता के बगल वाले ब्लॉक में बैठा था वह उठाते हुए बोलै.

"हूँ! हूँ!" और वह अम्मा धीरे धीरे उसकी तरफ जाने लगी. उसका पूरा शरीर चालु जनरेटर की तरह हिल रहा था.

वीर : Y-Ye आपके साथ है?

अलोक : हाँ!!

वीर : इन्हे बंद कौन करेगा?

अलोक : ेहठ?

वीर : K-Kuch नहीं!

हिलती हुई बुढ़िया के जाते hi वीर खुद को कोस हड़बड़ा के फिरसे गेट की ऑर्डर भागा की,

*थुड़*

गेट फिरसे खुला और,

"ैय्ये! फ्रूटी है, पानी की बोतल है, पेप्सी, तुम्प्स उप, स्लाइस, माज़ा. लोगे क्या बॉस?"

अपनी पूरे कंटेनर को सॉफ्ट ड्रिंक्स और कोल्ड ड्रिंक्स से सजाये एक लड़का आते हुए वीर से बोलै.

वीर : फूऊक्कखकक!!!

लड़का : ेहठ? बॉस ये तोह नहीं है अपने पास. पेप्सी नहीं चलेगी क्या?

वीर : T-Teri तोह-

[ :लाफ: ]

लड़का : आइये! J-Jaata है में. भड़कता काये को है? कमाल आदमी है.

वह डर के मारे साइड हट फिरसे चिल्लाते हुए निकल गया. आखिर कार वीर अपनी मंज़िल तक पहुचने में कामयाब हुआ.

उसने ठीक वैसा hi किया जैसा सुमन ने बताया था. और उसके khat-khataate hi सुमन ने अंदर से चटकनी खोल दी.

*क्लिक*

दरवाज़ा खुलते hi वीर धड़ल्ले से अंदर घुसा और पलट के उसने अंदर से लॉक कर दिया.

वीर : शुक्र है किसी ने देखा नहीं. ये इन् लोगो को कितनी पंचायत रहती है सही में.

सुमन (स्माइल्स) : क्या हुआ?

वीर : कुछ नहीं! सुमन! जल्दी!

अपने मालिक की हालत का अनुमान लगाते हुए वह बिना देररि किये नीचे झुकी. फटाफट अपने मालिक के पंत को उतार उसने लुंड बाहर निकाल फ़ौरन hi मुँह में लेके उससे गीला करना शुरू कर दिया.

वीर : ओह्ह फुक्कखकक!!!!

सुमन के सर्र पर हाथ रख वीर उससे सहलाता रहा और सुमन अपने मालिक के औज़ार की खिदमत में लगी रही.

चुसाई के बाद सुमन ने सीधे अपनी साड़ी पेटीकोट के साथ ऊपर की और पंतय को नीचे उतार अपनी छूट के दर्शन दिए.

सुमन (स्माइल्स) : आइये मालिक! पर ध्यान रहे, आज आपको खड़े खड़े hi धक्के लगाने होंगे.

उसने अपनी छूट पकड़ जोरर से ऊपर खींचते हुए फांको को अलग कर अंदर के छेड़ को दिखाते हुए कहा.

वीर : उफ़! सुमन!!

और वीर से अब और रुका न गया. लुंड को छूट पे सेट कर उसने जोरर से उससे अंदर पेल दिया.

सुमन : ाननंग्गहह~

वीर : शीत्तत्त!!!

जल्दबाज़ी में उसने सुमन की छथि से ब्लाउज खोला और उसकी भारी भरकम छुछिया बाहर निकाली. उनके बाहर आते hi वीर ने उन् निप्पल्स पे अपना मुँह दे दिया.

*सल्लूरररप्प* *सूचक* *किस्स्स*

वीर : उफ्फ्फ~ तुम्हारे ये दूध सुमन!!

सुमन (खिलखिलाते हुए) : Y-Ye तोह आपके पसंदीदा है. है न? हाहाहा~ उम्म्म~ स्स्स्सस्स्स्स~ आह्ह्ह्ह मालिक!!!!

वीर अपने बाकी दोनों हाथो को उसके पीछे ले जा कर सुमन के नंगे कूल्हों को दबोचते हुए दबाव बना के उससे आगे धकेल कर छोड़ने लगा.

सुमन : अह्ह्ह्णण~

वीर : फुककक! फुककक! फुक्ककक! सुमन!!!

सुमन : ूउम्मम्मम~ हाँ मालिक!!!

*फैट* *फट्ट्ट्ट*

धक्के वीर पूरी ताक़त से नहीं मार रहा था. ऐसा करना काफी रिस्की था. फिर भी जितना हो सकता था वीर उतना प्रयास कर रहा था.

सुमन : ओह्ह्ह मालिककक!!! M-Mein आने वाली हु~ ाहहननन मा~

*फट्ट्ट्ट* *फट्ट्ट्ट*

वीर : शीत्तट!!! शीत्तत्त! शीत्तट!! में भी नज़दीक हु सुमन!!!

ये परम आनंद का अनुभव जल्द hi अपनी चरम सीमा पर पहुचा और,

सुमन : माहाळीीकककक!!! नंनगहःहः~

सुमन इस से पहले की जोरर से चींखती उसने अपने मुँह पर हाथ रख अपनी चींख रोक ली और इतनी जोरर से झरि की उसका बदन thar-tharaane लगा.

वीर भी उसी समय उसके कुछ सेकण्ड्स बाद hi जहर गया और सारा का सारा माल उसने सुमन की छूट में hi उड़ेल दिया.

वीर : ाररग्घ! फाइनली!!

एक आह भरते हुए उसने लुंड बाहर निकाला. तोह सुमन उससे मुँह से साफ़ करने में लग गयी. सारा बचा कुछ माल वह जीभ से चाट के गुटक गयी. उसके बाद पानी से भी उसने लुंड को धो दिया.

सुमन : मालिक! ये लीजिये! पर-

वीर : हँ?

सुमन : आपके जूते थोड़े गीले हो गए है. वह-

वीर (स्माइल्स) : अब तुम इतना पानी बहाओगी तोह गीले तोह होंगे hi न?

सुमन (ब्लशेस) : सब आपके कारण!

ये पहली बार था जब वीर ने सुमन को शर्माते हुए देखा था. वह मुस्कुराया और बाहर निकल गया.

सुमन कुछ देरर बाद बाहर आयी और आके अपने स्थान पर बैठ गयी. और कुछ इसी तरह ये सफर अपने अंत पर पहुँच गया.

दिन के 1:50 हो रहे थे और ट्रैन जयपुर पहुचने hi वाली थी. वीर समेत सभी अपने अपने बैग्स निकाल के उतरने की तैयारी में लगे हुए थे.

वीर : आप लोग ज़रा रुकिए. में तब तक उधर देख के आता हु सभी को.

पूर्वी : हाँ! उन्हें भी इस वाले गेट पे ले आओ न वीर!

वीर : हाँ वही कर रहा हु.

वीर निकल के श्वेता और बाकियो के पास पहुचा तोह देखा की काव्य अभी तक ऊपर लेती हुई थी.

वीर : ये लड़की अब तक सो रही है?

आरोही : में कब से उठा रही हु. हर्र बार कहती है जब स्टेशन आने वाला होगा उसके 2 मिनट पहले उठाना.

वीर बिना कुछ बोले आगे बढ़ा. काव्य का गोल गोल बूम उससे साफ़ साफ़ अपनी नज़रो के सामने दिखाई दे रहा था. और बिना देररि किये,

*चाताआआकककककक*

वीर ने बेचारी काव्य के पिछवाड़े में एक प्यार भरी थपकी दे मारी.

"आआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह!!!!"

काव्य अचानक से अपने बट पर चमाट पड़ते hi हड़बड़ा के उठी.

काव्य : B-Bhaiyyyaaaa!!???

वीर : ये कोई टाइम है सोने का? स्टेशन आने वाला है.

काव्य : A-Aapne मारा? ऐसे कोई उठाता है क्या किसी को? बुध्हूऊऊऊ~

वीर : अभी एक और दूंगा! जल्दी नीचे आओ! चलो!

काव्य : आआआ~ जाओ! गंदे कही के.

वीर : हम्म! हु में गन्दा! खुश! अब नीचे उतरो.

काव्य बड़बड़ाते हुए भिन्न मैं के नीचे उत्तरी तोह वीर सभी को लेके गेट के पास पहुचा. और वह से तेज और बाकी सब भी आ चुकी थी.

साथ में आते hi एक बार फिर तेज की निडर और तीखी नज़रे श्वेता पर टिक गयी. और बेचारी श्वेता सेहम के अपनी निगाहो को हटा ली.

जयपुर के स्टेशन में उतारते hi उन्हें वह की अलग हवा का एहसास हुआ. नया शहर, नए लोग, नयी सभ्यता, नयी परंपरा. सब कुछ जैसे उनके लिए नया था.

सिवाए कुछ के. वीर भी एक बार यहाँ आ चूका था. आखिरी बार जब वह सुमन को लेके यहाँ से निकला था. तब अपनी माँ के दर्शन उससे सबसे पहले यही पे तोह हुए थे. और आज वही माँ उसके साथ थी.

किस्मत भी क्या hi खेल खेलती है. सुमन ने धीरे से उसकी कोहनी को टटोला और उसके कान में बोली,

सुमन (स्माइल्स) : इधर से hi आप मुझे भगा के ले गए थे.

वीर : भगा के!?

सुमन (स्माइल्स) : अपना बना के!

वीर मुस्कुराया.

सुमन : और...! वह याद है न आपको?

वीर : ???

सुमन : ट्रैन की वह रात. जहा आपने बाथरूम में मेरे साथ वह किया था...!

वह आँख मारते हुए बोली. वीर को जैसे hi याद आया. वह थोड़ा शर्मा गया. जो किंकी गेम उस रात उसने सुमन के साथ खेला था, वह भला कैसे उससे भूल सकता था?

सुमन : अब भी अगर आप वह मेरे साथ करना चाहो. तोह कर सकते हो. मर्ज़ी आपकी है!

वह इतना बोल, एक रहस्यमयी मुस्कान लिए आगे बढ़ गयी.

'ये औरत भी!!'

हर्र बार सुमन वीर को सरप्राइज करने का कोई मौका नहीं चोररटी थी.

स्टेशन के बाहर आते hi कुली के शोर और ऑटो वालो की भीड़ ने उन्हें घेर लिया.

वीर : अभी? क्या रूट है? कहा चलना है पहले?

वीर ने अपनी माँ भावना को देखते हुए पूछा.

भावना : इधर से सबसे पहले हम श्याम के घर चलेंगे.

वीर : कौन श्याम?

भावना (स्माइल्स) : है कोई! अभी तोह ऑटो hi करना पड़ेंगे.

वीर : ऑटो में तोह सिर्फ तीन hi बनेंगे. तोह ऐसे में...!

पूर्वी : कोई दिक्कत नहीं है. तीन कर लेते है न.

वीर : ठीक है!

वीर ने तीन ऑटो को जल्द से जल्द बुक किया और एक में उसने सबसे पहले पूर्वी, भावना और तेजल को बैठाया. तोह वही दूसरे में काव्य, आरोही बैठ गयी.

सुमन इस से पहले की श्वेता को ऑटो में घुसेड़ अपने मालिक के साथ अकेले पल बिताती, श्वेता एक क़दम आगे निकली. उसने खुद hi तपाक से पहले बोल दिया.

श्वेता : S-Suman! तुम बच्चियों के साथ निकलो. में और वीर पीछे पीछे आते है.

सुमन : ओह्ह्ह! J-Jii! ठीक है.

बात का बुरा न मानते हुए सुमन दूसरे ऑटो में सवार हो गयी. और बच गए तोह सिर्फ वीर और श्वेता. सौतेले माँ और बेटे!

वीर (शिघ्स) : चले?

श्वेता : H-Haan!

अंदर घुसते हुए वह बैठी तोह वीर भी बैठ गया. ड्राइवर ने सामान उठा के पीछे लादा और सीट पर आके बैठ ऑटो चालु कर वह सभी वह से निकल पड़े.

*वररररओओओओओममममम*

श्याम के घर की ऑर्डर.

आधे रास्ते तक वीर और श्वेता दोनों के बीच अजीब सी खामोशी छायी हुई थी.

और जब श्वेता से और न रहा गया तोह वह बोल उठी,

श्वेता : W-Woh-

वीर : हम्म?

श्वेता : M-Mein-

वीर : जो कहना है साफ़ साफ़ कहिये.

श्वेता : H-Haan! वो m-mein...! S-Sorry!

वीर : हँ? किस बात के लिए?

श्वेता : K-Kal के लिए.

वीर : ओह्ह!

श्वेता : कल में वह सब नहीं करना चाहती थी. P-Par पता नहीं कैसे!? एकदम जैसे सोचना समझना भूल चुकी थी कुछ देरर के लिए. और मेरे परर अपने आप hi...!

वीर : जो हुआ सो हुआ. अहिंदा से ऐसा मत करना.

श्वेता : H-Haan! कभी नहीं!

वह नज़रे नीचे झुकाते हुए मुस्कुरायी. उसके होंठो से मुस्कान हटने का नाम नहीं ले रही थी.

और फिर,

वीर : हहहह????

श्वेता बगल से झुकते हुए वीर की ब्याह पे सर्र रख के टिक गयी. पर फिर उससे ध्यान भी आया.

'हे भगवान्! ये मेने क्या कर दिया?' भावनाओ में बहते हुए वह ये कर बैठी. पर अब क्या? क्या वीर उससे खुद से दूर कर देगा? क्या होगा अब? चिंता के मारे वह वही जम्म के रह गयी.

लेकिन जैसा उसने सोचा वैसा कुछ भी न हुआ. उल्टा एक चौकाने वाला किस्सा जन्म लिया.

वीर ने कुछ भी नहीं कहा. वह रास्तो और नए शहर को देखने में व्यस्त था. हाँ हैरान ज़रूर था, पर कहा कुछ भी नहीं. श्वेता की तोह जैसे किस्मत hi चमक गयी. मैं hi मैं मुस्कुरा के वह आँखें बंद कर इस अध्भुत एहसास में डूब गयी.

केसा शहर? कौन से रास्ते? उससे कोई मतलब नहीं था इन् सब से. उसका तोह पूरा संसार उसके बगल से बैठा हुआ था. फिर काहे के लिए बाहर देखना?

और एक बार फिर श्वेता के मैं में जो उमंग थी वह और मज़बूत हो गयी.

रास्ते भर फर वह कुछ न बोली. बस वीर की ब्याह पर सर्र रख के बैठी रही. पर ये सफर भी कभी न कभी ख़तम होना hi था. जैसे hi वह सभी बताये गए एड्रेस पर पहुचे, मैं मार के श्वेता को वीर से अलग होना hi पड़ा.

सभी ऑटो वालो को पैसे वीर ने दिए. पूर्वी उससे देने नहीं दे रही थी पर वीर ने अपनी मासी की एक न चलने दी इधर.

सभी एक मैं चौराहे के नज़दीक खड़े हुए थे.

वीर : इधर से कहा? भीड़ काफी है और सामान भी है. ऐसे रस्ते में खड़े रहे तोह-

भावना : यही से अंदर hi है.

वीर : आपने उनको बताया तोह है न की हम सब आ रहे है?

भावना : नहीं!

वीर : Okay! आप पहले कभी आयी है यहाँ?

भावना : हाँ!

वीर : हास्सश्ठ! कब आयी थी?

भावना : लगभग 18 साल पहले...!

अपनी माँ की बात सुनते सुनते वीर अभी रस्ते पर hi लड़खड़ा के गिर जाता. क्या कहा उसकी माँ ने? 18 साल पहले?

वीर : आप जो बोल रही है, वह आपके कानो में तोह-

भावना (स्माइल्स) : हाँ बाबा! तुम चलो तोह सही.

वीर : F-Fine!

सभी भावना को फॉलो करते हुए एक गली से अंदर चलते चले गए.

आस पास के लोग उन्हें hi घूर के देख रहे थे. यहाँ तक की जानवर भी.

काव्य सेहम के थोड़ा वीर के पास चलते चलते आ चिपकी.

काव्य : भैया!? ये सब हमे ऐसे क्यों देख रहे है? H-Hum कोई एलियंस थोड़ी है.

वीर : अब मेरे पास क्यों आयी है? में तोह गन्दा हु न?

काव्य अभी बोलने वाली थी की 'हाँ हो आप गंदे.' पर जैसे hi एक कुत्ता उसकी टांगो के पास आके उससे सूंघने लगा तोह बेचारी काव्य की हालत hi खराब हो गयी.

वह उचक के अपने वीर भैया से चिपक गयी.

काव्य : अह्हह्हंणहहहहह!!! भैय्यियाआ!!!

वीर : ....

काव्य : भैय्याहा!!!

वीर : ...

काव्य : Y-Youuu!!! ठीक है!! N-Nahi हो आप गंदे. S-Sorrrryyyyy!!! देखो न उस डोगग्य को...! हटाओ न...! E-Eeeekkkkkk!!!!

वीर भी ज़्यादा देरर तक मराज़ न रह सका. आखिर उसकी लिटिल प्रिंसेस थी काव्य. जब इतनी बार सॉरी बोलै तोह वीर ने परर पटकते हुए उस स्ट्रीट डॉग को दर्रा के एक झटके में दूर कर दिया.

काव्य एक बार फिर, हो न हो अपने भैया से इम्प्रेस होक रह गयी.

काव्य : Th-Thank यू! हट hi नहीं रहा था.

वीर : तुम्हे तोह डॉग्स पसंद है न?

काव्य : है! पर सिर्फ पालतू वाले. स्ट्रीट डॉग्स नहीं. वह काट सकते है.

वीर : वाह!!!

और ऐसे hi करते करते वह एक घर के सामने आ पहुचे.

घर बड़ा था. इतना बड़ा भी नहीं था, पर एकदम छोटा भी नहीं था.

भावना ने आगे बढ़ गेट khat-khataaya, तोह अंदर से क़रीब 35-36 साल की एक औरत बाहर आयी.

औरत : हाँ जी?

भावना : क्या श्याम घर पर है?

औरत : Sh...yaam? ओह्ह्ह्ह!!! ज़रा रुकिए!!

वह अंदर गयी और कुछ देरर में एक आदमी के साथ बाहर निकली जो दिखने में 36-38 साल का प्रतीत हो रहा था.

वीर ने औरत को भी चेक किया पर उससे कुछ ख़ास जानकारी नहीं मिली. लेकिन उस आदमी को चेक करते hi,

*डिंग*

[Name : Shyaam

Age : 39

Bio : Shyaam, Prasad lal aur Shanti ka suputr. Travels ka business hai jo uske pita Prasad lal ne shuru kiya tha. Ab woh isse sambhaalta hai. Nature me accha hai aur apne bado ke prati aadar, sammaan rakhta hai. Host ki maa ke ghar me pehle kaam kiya karta tha. Par 24 saal pehle jo hua, uske baad se saara parivaar yahi par hai.

Favourability : 10

Relationship : Master/ Servant]

वीर ने जैसे hi ये पढ़ा, उसके मैं में कन्फूसिओं और बढ़ता hi जा रहा था. आखिर चल क्या रहा था ये सब?

24 साल पहले आखिर ऐसा क्या हुआ था? और ये मास्टर सर्वेंट?

वीर ने खामोश रहना hi बेहतर समझा. ये सोच के की उसकी माँ ज़रूर कुछ hi देरर में उसके कुछ डॉब्टस क्लियर करेंगी.

श्याम बाहर आया और सभी को हैरत में देखने लगा.

श्याम : J-Jii आप सब?

भावना (स्माइल्स) : भूल गए क्या श्याम?

उसने भावना को ऊपर से नीचे गौर से देखा और कुछ शान में hi उसके हाव भाव बदल गए.

श्याम : D-Didii??? आप हो????

भावना ने हस्ते हुए हाँ में सर्र हिलाया,

भावना : हाँ! में! भावना!

और नाम सुनते hi श्याम हाथ जोड़ के गेट खोल के खड़ा हो गया.

श्याम : धन्य हो गए हम जो आप पधारी यहाँ!

कहते हुए वह सीधे भावना के चरणों में गिर पड़ा.

वीर : हम्म??

[Aisa lagta hai ki aapki mom ek badi family se belong karti hai.]

'उसमे मुझे कोई डाउट नहीं है पारी. साड़ी बाते वही इशारा कर रही है.'

श्याम के परर पर गिरते hi भावना ने उससे उठाया.

भावना : अरे अरे? ठीक है! इसकी कोई ज़रुरत नहीं.

श्याम : ज़रुरत कैसे नहीं है दीदी? आपका आशीर्वाद hi ले रहा हु. P-Par आप यहाँ? ऐसे? बिन बताये? अरे एक फ़ोन तोह किया होता दीदी?

भावना (स्माइल्स) : शुक्र मनाओ जो मुझे काम से काम ये घर याद था. कितने सालो पहले आयी थी यहाँ. अब तोह काफी बड़ा बन्न गया है.

श्याम : सब आपकी hi तोह कृपा है.

भावना : ऐसा तोह कुछ भी नहीं है श्याम!

उसकी आवाज़ में इस बार जैसे थोड़ी उदासी थी.

श्याम : A-Aisa hi है दीदी!

श्याम हाथ जोड़े हुए कहा. बदले में भावना बस मुस्कुरा उठी.

श्याम : ारी में भी क्या!? आइये! आइये न आप सब. गौरी!! जल्दी! सबको अंदर लेके जाओ. ये सब हमारे मेहमान है.

गौरी : H-Haan!!

गौरी, श्याम की पत्नी सामने हो रही घटना को समझ पाती की श्याम ने उससे काम थमा दिया. वह अपने पति की बात मानते हुए सभी को अंदर ले गयी. और बचे कूचे बैग्स श्याम और वीर ने तुरंत hi अंदर कर दिए.

हॉल में बैठे सब थकान के बाद एक राहत की सांस ले रहे थे. और गौरी उन्हें पानी सर्वे करने में लगी हुई थी.

श्याम : बैठाइये दीदी अब! इस तरफ अचानक कैसे आना हुआ?

भावना : हम्म! पर उसके पहले, इस से नहीं मिलोगे श्याम?

उसने अपने बेटे वीर की ऑर्डर इशारा किया.

श्याम : उम्! में इन्हे पहचाना नहीं दीदी!

भावना (स्माइल्स) : बीटा है मेरा! वीर!

उसने इतने गर्व से कहा की उसकी ख़ुशी साफ़ साफ़ उसके चेहरे पर झलक रही थी.

श्याम : हुह्ह्हह्ह?? M-Matlab?

भावना (नॉड्स) : हाँ! पर अभी इससे कुछ भी पता नहीं है. और ये है मेरी बड़ी बेटी! तेजल!

तेजल (हाथ जोड़ते हुए) : जी! नमस्ते!

श्याम अपनी जगह से उठाते हुए सीधे वीर और तेजल के पास आया जो अगल बगल hi बैठे हुए थे. और आके झुक के उनके सामने हाथ जोड़ लिया,

श्याम : आज तोह सच में में धन्य हो गया. इस छोटे से घर में आप सब के क़दम जो पद गए.

वीर : हाथ मत जोड़िये! वैसे hi आप बड़े है हमसे उम्र में.

वीर की बात सुन्न भावना और गर्व से मुस्कुरायी.

श्याम : बिलकुल! पूरे आपने अपने संस्कार दिए है मुन्ना को.

पर श्याम की बात आते hi भावना की बॉहे सिकुड़ गयी. संस्कार देने के लिए वह थी hi कहा अपने बेटे के पास?

भावना : श्याम! वीर और में अब जाके मिल रहे है.

श्याम : ???? मतलब!!?

भावना : वह मुझसे तब से बिछड़ा हुआ था.

श्याम : हे भगवान्! माफ़ कीजियेगा. मुझे लगा की-

भावना : कोई बात नहीं!

श्याम एक समझदार व्यक्ति था. ऐसी बातो से माहौल बिगड़े न इसलिए उसने तुरंत hi बात पलट दी,

श्याम : अगर अभी पिता जी यहाँ होते तोह कहते, "म्हारे तोह भाग्य खुल गए जो सक्छात देवी जी पधारी म्हारे घर." हाहाहा!!

उसके हस्ते hi गौरी और भावना भी हस्स पड़ी.

भावना : क्यों? कहा गए है पिता जी?

श्याम : पिता जी और माता जी दोनों को मेने तीर्थ यात्रा पर भेजा हुआ है. छोटा भाई भी उनके hi साथ गया है. मेने कहा अभी उम्र है भाई. चल फिर लेते हो. अभी घूम आओ. क्युकी बाद में नाज़ुक हालत में में अपनी आँखों से दूर नहीं होने दूंगा. हाहाहाहा!

भावना (स्माइल्स) : अच्छा किया!

पूर्वी जो अब तक शांत थी वह भी फिर खुद से बोली,

पूर्वी : भावना? हम से नहीं मिलवाओगी?

भावना (स्माइल्स) : इसमें मिलवाना क्या? श्याम तुम्हे भूलेगा थोड़ी!

श्याम : ेहः!? में...!

भावना : अरे पूर्वी है ये!

श्याम : क्या बात कर रही हो दीदी?

पूर्वी : हाँ भाई! अब तोह हमे भी भूल जाओ.

पुनः वह हाथ जोड़ते हुए पूर्वी के पास आके परर पड़ा.

श्याम : एक के बाद एक झटके दे रही हो आप तोह दीदी!

भावना (स्माइल्स) : बस! इतने hi झटके है.

श्याम : ठीक है जी! बाकी बाते बाद में तोह. आप सब थक गए होंगे. में आपके नहाने धोने का इंतज़ाम करता हु. बस 10 मिनट दीजिये दीदी मुझे. उसके बाद हम सब मिलके बात करेंगे. और आज से आपकी इच्छा तक, आप हमारे मेहमान रहेंगे.

वीर और उसकी पल्टन फिलहाल के लिए तोह यहाँ आराम फार्मा सकते थे. पर न जाने आगे क्या होने वाला था.

***

नई यॉर्क

नाईट ~ 11:34 पं

संसार की सबसे महंगी और अमीरो वाली इस सिटी में किसी एक क्लब के बगल से एले में एक आदमी और एक औरत आपस में खड़े बात कर रहे थे.

उस आदमी के हाथ में एक जलती हुई सिगरेट थी. तोह वही उसके सामने मौजूद उस लड़की के हाथ में भी.

लड़की : व्हाट नाउ?

आदमी : ऑफ़ कोर्स! ा प्राइस मस्ट बे पेड.

लड़की : सो? व्हाट विल यू दो नाउ?

आदमी ने एक काश लगाया और उस ख़ूबसूरत लड़की को देखा,

आदमी : I'll थिंक अबाउट आईटी.

लड़की : एंड व्हाट अबाउट योर प्रेय?

आदमी : ओह्ह्ह!!!

उसने अगले hi पल वह सिगरेट निकाल के सीधे फेकि,








और मुस्कुराते हुए अपने कोट में हाथ दाल वह से पलट गया,

"फेस्टिवल इस अप्प्रोअचिंग स्वीटी! फेस्टिवल इस अप्प्रोअचिंग...!"

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आज के लिए इतना hi गाइस!

थिस अपडेट कंसिस्ट्स ऑफ़ 4.8क वर्ड्स. हर्र अपडेट बड़ी लेंथ का आ रहा है गाइस. तोह लिखे ठोकना नहीं भूलने का. और रेवोस रखना भी. कीप सपोर्टिंग!


धन्यवाद! ✨
 
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