Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 20 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

अपडेट - 123 ~ उनटैंग थे कनोट्स (2)

अब तक...

लड़की : एंड व्हाट अबाउट योर प्रेय?

आदमी : ओह्ह्ह!!!

उसने अगले hi पल वह सिगरेट निकाल के सीधे फेकि,

और मुस्कुराते हुए अपने कोट में हाथ दाल वह से पलट गया,

"फेस्टिवल इस अप्प्रोअचिंग स्वीटी! फेस्टिवल इस अप्प्रोअचिंग...!"


अब आगे...

*नॉक* *नॉक*

"काव्य!!! काव्य जल्दी बाहर निकल!!!"

वीर ने जोरर से वाशरूम के बाहर से काव्य को आवाज़ लगाते हुए बुलाया. पिछले एक घंटे से वह वाशरूम में घुसी हुई थी. पता नहीं नाहा रही थी या अंदर hi सो गयी थी.

"आ रही हु न! बिलकुल चेन्न नहीं है आपको. हम्फ! गंदे भैया!" अंदर से उसकी प्यारी सी रूठी हुई आवाज़ आयी.

सब लोग नाहा धो के फुर्सत हो चुके थे. और यहाँ बचे थे तोह सिर्फ वीर और काव्य. दोनों के बीच पहले वाशरूम जाने की बहस शुरू हुई तोह आरोही ने उन् दोनों को रॉक, पेपर, सकिसोर खेलने का सुझाव दिया. जो जीतेगा, वही पहले वाशरूम में जायेगा.

नतीजा? वीर वाशरूम के बाहर एक घंटे से खड़ा हुआ था.

"हम्म्म~ लालललललला~ हम्म्म~" काव्य गाना गुनगुनाते हुए नहाने का पूरा लुत्फ़ उठा रही थी. और जैसे वह जान बूझ के वीर को सत्ता रही थी. ट्रैन में मिली हुई स्पैकिंग का बदला ले रही थी वह.

वीर : काव्या??? काव्य! जल्दी बाहर आ. मुझे भी नहाना है.

काव्य : हाँ तोह रुको थोड़ी देरर. हम्फ~ पहले में अच्छे से नहाउंगी उसके बाद hi बाहर आउंगी.

वीर : काव्या!!!! एक घंटा से घुसी हुई हो अंदर तुम. बाहर आओ!

वीर बेहेस के मूड में नहीं था. शाम होने को आ रही थी और अभी तक खाना भी नहीं हुआ था. सभी उसके नाहा के आ जाने की राह देख रहे थे. पर इधर ये मैडम अपने अलग मज़्ज़े में लगी हुई थी.

तभी वीर के मैं में एक आईडिया आया. और उसके होंठो पर एक कुटिल मुस्कान सज्ज गयी.

'हहहहए!'

वीर : तोह ठीक है. नहाती रह तू आराम से. में चला!

वीर थोड़ी दूर तक जोरर से अपने परर पटकते हुए चल के गया और धीरे से ृक्क गया. फिर वह दबे पाँव वापस दरवाज़े के बगल से आके छुप गया.

इधर अंदर बाथिंग स्टूल पर बैठी काव्य को जैसे hi वीर के जाने की आहात हुई वह सोच में पद गयी.

'हम्म? अरे! ये सच में चले गए क्या? ये भैया भी न~ हम्फ~ सारा प्रैंक मेरा खराब कर देते है.'

नहाना तोह उसका पहले hi समाप्त हो चूका था वह तोह बेफालतू में hi ऐसे time-pass कर रही थी. अपने कोमल गोर गोर भीगे बदन पर सफ़ेद टॉवल बांधे हुए वह अपने कपडे उठा के फ़ौरन hi दरवाज़े के पास आयी.

*क्लिक*

धीरे से उसने चटकनी खोली और चुपके से झांकते हुए वह बाहर का जायज़ा लेने लगी पर तभी अचानक,

"बहहहहहह~"

वीर जो इस पल का इंतज़ार hi कर रहा था वह बगल में से बाहर आते hi काव्य पर किसी भूके भेड़िये की तरह लपक पड़ा.

"Aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa!!!!"

काव्य इतनी जोरर से दर्री की वह चींख उठी. बेचारी की हालत hi टाइट हो गयी. ऐसा लगा जैसे प्राण hi निकल गए हो.

परन्तु वीर ने उससे जैसे hi दबोचा, उस बीच एक गड़बड़ी हो गयी.

हर्र औरत जो अब तक नाहा के बाहर आयी थी, वह अंदर से कपडे पेहेन के hi बाहर निकली थी. सिवाए काव्य के...!

वीर : हँ?

काव्य : !!!!!!??

और इस झपटा झपटी में जो बिलकुल भी नहीं होना चाहिए था. वही हो गया!

टॉवल सरक गयी.

माजरा कुछ ऐसा था की काव्य के बदन से टॉवल खुलने से, वह पूरी नग्न थी. ऊपर से उसका भीगा बदन. वीर उसके ठीक ऊपर लेता हुआ था. दोनों की आँखें एक दूसरे से टकराई हुई थी.

काव्य के गीले बालो और चेहरे पर सजी पानी की बूंदे ऐसी लग रही थी जैसे सुबह सुबह किसी सुन्दर से फूल की पत्तियों पर ोास की बूंदे सजी हो.

वीर जो अपनी छोटी बहिन के नंगे भीगे जिस्म के ऊपर लेता हुआ था, वह सब कुछ महसूस कर पा रहा था. खासकर उसकी छथि से दबता हुआ वह उभार. कुछ शान तक बस दोनों एक दूसरे को ख़ामोशी में देखते रहे जैसे मानो कुछ हुआ hi न हो.

और फिर ठीक उसके बाद,

"ीीीीीिययययआआआआ~"

काव्य जोरर से चिल्लाई और उसका हाथ सीधा आके उसके वीर भैया के गाल पे तपाक से पड़ा.

*चाताआआकककककककक*

"...."

वीर का मुँह बाए से दाए हो गया. वह काव्य के ऊपर से भी हट गया. बेचारी काव्य इधर हड़बड़ाते हुए अपनी टॉवल उठायी और खुद को धक् के सेहमी हुई चुहिया की तरह वही दुबक के बैठ गयी.

वह नम्म आँखें लिए अपना मुँह फुला के वीर को घूर रही थी.

'फुखकक! ये क्या हो गया!?'

उससे लगा था काव्य भी अंदर से कपडे पेहेन के hi बाहर आएगी पर यहाँ तोह...!

वह पलट के माफ़ी मांगने के लिए जैसे hi हुआ तोह फिर वही जम्म के रह गया. और फिर शर्माते हुए उसने अपना सर्र मोड़ लिया.

वीर (ब्लशेस) : P-Pagli! सब कुछ दिख रहा है.

उसने जैसे hi ये कहा. काव्य कन्फ्यूज्ड हो गयी. फिर जैसे उससे कुछ ध्यान आया. उसने तुरंत hi सर्र नीचे कर अपनी टांगो के बीच देखा तोह...!

उसके गालो का रंग अपने आप लाल हो चला. वह बैठ तोह गयी थी टॉवल ओढ़ के. पर नीचे से उसकी प्यारी प्यारी क्लीन शवेद फुद्दी, साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी.

"ीीीियय्यआआअ~" वह फिर चींखी और उसने वही ड्रेसिंग टेबल पर राखी आयल की शीशी, पाउडर का डिब्बा सब कुछ उठा उठा के वीर की ऑर्डर फेकना शुरू कर दिया.

काव्य : G-Gande भैयाआ! *स्निफ्फ* ी हेट यू!!!! *स्निफ्फ* उन्न्नध्ह्हः~

*थुड़* *थुड़*

वीर : O-Oyyyeee! पागल!

वीर इधर से उधर डॉज कर सीधा अंदर वाशरूम में घुस गया. ये सब क्या हो गया था?

इधर काव्य गुस्से में वाशरूम के दरवाज़े के पास आयी और बाहर से चटकनी को लगा के वह से निकल गयी.

तभी तेज जो पहले से hi रेडी होक बाहर बैठी थी वह काव्य की बार बार चींख सुन्न के अंदर आ गयी.

तेज : ारी क्या हुआ? क्यों चिल्ला रही हो? और हहहह!!!? Y-Ye? तुम ऐसे क्यों घूम रही हो?

काव्य (ब्लशेस) : अहहं! D-Didi! M-Mein बाहर hi कपडे पहनती हु. वाशरूम में मुझे नहीं बनता. गीले हो जाते है.

तेज : ओह्ह्ह! पर वह आवाज़-

काव्य : M-Mein चलती हु. मुझे चेंज करना है.

वह फटाफट अपना लाल मुँह छिपा के वह से भाग गयी. उसके दिल की धड़कने बेहद तेज़्ज़ थी. हे भगवान्! ये क्या हो गया? उसके बड़े भाई ने उससे आज नंगा देखा. उसकी नंगी योनि को देखा. और तोह और उसके नंगे बदन के ऊपर लेता हुआ था. ये सब सोच सोच के hi बेचारी काव्य का तापमान बढ़ता जा रहा था.

इधर तेज हैरत में बाहर आ गयी. पर अभी कुछ देरर hi हुई थी की,

*नॉक* *नॉक*

"काव्याआ!! काव्य गेट खोल!!! काव्याआ!!!"

तेजल को वाशरूम के अंदर से वीर की आवाज़ सुनाई दी. वह तुरंत वह पहुँच जैसे hi दरवाज़ा खोली, उसकी आँखें आश्चर्य में फेल गयी.

वीर अपनी कमर पर टॉवल बांधे पूरा भीगा हुआ था. और उसका पूरा गठीला बदन, उसके रिप्पड एबीएस और बॉडी देख तेजल के होश hi उड़द गए.

हाँ देखे थे उसने कई लड़के. लड़को को बिना शर्ट के भी देखा हुआ था उसने ेष्कावतिओं साइट्स के दौरान. कई लोगो की वेल बिल्ट बॉडीज देखि थी उसने. पर अभी जो वह अपनी आँखों के सामने देख रही थी. वह जैसे अलौकिक था उसके लिए. उसने अपने पूरे जीवन काल में ऐसा जिस्म नहीं देखा था.

वह भी इतने नज़दीक से. वीर के बदन से साबुन की वह खुस्भु तेजल को जैसे पागल कर रही थी. उसकी गीली ज़ुल्फो की वह लट्टे जो उसकी आँखों के सामने आके लटक रही थी. गीली बौहो पर सजी हुई पानी की बूंदे और वह भीगा बदन. तेजल के दिल ने इस दृश्य को देख एक धड़कन फांद ली,

*बेदुम्प*

वह लड़खड़ा के दो क़दम पीछे हो गयी.

वीर ने सोचा था वह काव्य से माफ़ी मांगेगा अपनी हरकत के लिए. पर अब उसका इरादा बदल चूका था. उसकी गलती hi क्या थी आखिर? वह काव्य पे इसलिए झपटा क्युकी काव्य एक घंटे से वाशरूम के अंदर टाइम वास्ते कर रही थी. और गलती काव्य की थी जो वह बिन कपड़ो के बाहर आयी. ये उसका घर थोड़ी था.

ऊपर से थप्पड़ भी खाया उसने और तोह और वह दरवाज़ा बंद करके भी भाग गयी!?

आईटी वास् तू मच!

वीर जो पहले माफ़ी मांगने की सोच रहा था वह उल्टा अब खुद गुस्से में आ गया. अब तोह काव्य खुद उस से माफ़ी मांगे. यही उसकी डिमांड थी. अगर वह अड़ियल थी तोह वीर ये बतलाना चाह रहा था की वह भी अपनी अकड़ दिखाना जानता है.

इधर न चाहते हुए भी, तेजल की आँखें बार बार वीर के एबीएस पर जा के टिक रही थी. वह भी एक करते प्रैक्टिशनर थी. उसके खुद के थोड़े बहुत एबीएस थे. इसलिए वह भली भाति ये बात जानती थी की ऐसी बॉडी बनाने में कितनी म्हणत लगती थी.

आज उससे सही से बोध हो रहा था की कैसे उसके भाई ने चुटकियो में प्रांजल को सबक सीखा दिया था.

बिकॉज़ हे वास् दमन स्ट्रांग!!!

वीर ने जब देखा की उसकी बड़ी बहिन टास से मास्स भी नहीं हो रही तोह वह खराश लेते हुए बोलै,

वीर : एहम! थैंक्स! कैन यू लीव नाउ? ी हैवे तो चेंज!

तेज (होश में आते हुए) : H-Huhh!? ओह्ह! Y-Yeah! सूरे!

वह झटपट वह से बाहर निकल गयी. उसके जाते hi वीर ने एक आह चोरर कपडे pehan'na शुरू किये. लेकिन तेज जो बाहर गयी थी वह अब भी दरवाज़े की एंट्रेंस से सब कुछ देख पा रही थी.

कैसे वीर की फुल स्लीवेद टी शर्ट उसके बदन से कस के चिपकी, कैसे वह जीन्स उसके पेर्रो पर बंधी हुई थी, कैसे वह अपने बाल सवार रहा था. क्या क्या चीज़ें वह उपयोग कर रहा था तेज हर एक हरकत अपने भाई की जैसे मैं में नोट कर रही थी.

वीर उसके बाद बाहर आया और तेज से चलने को कह कर निकल गया. इधर तेज उसके जाते hi सीधे वाशरूम में घुसी और उसकी नज़र सबसे पहले वीर के उस साबुन पर गयी.

वह पास गयी. उसने आगे बढ़ उस सफ़ेद रेक्टेंगुलर से दिखने वाले साबुन को सूंघा और उसकी खुशबू फिरसे पाते hi उसकी आँखें अपने आप बंद हो गयी.

ये किस तरह का साबुन था? वह जानती थी हर्र एक साबुन के नाम. पर इस तरह की सुगंध तोह आज तक उसने कभी नहीं ली थी.

ऊपर से साबुन पर की गयी ब्रांडिंग हट चुकी थी. क्युकी साबुन वीर के बदन से रगड़ लेने के बाद काफी घिस चूका था. तेज अपने निचले होंठ को दातो टेल दबाये वह से बाहर आ गयी. वह jaan'na चाहती थी की उसका भाई कौन सा साबुन लगाता था. जैसे वह हर्र छोटी छोटी चीज़ अपने भाई की jaan'na चाहती थी. फिर चाहे वह साबुन hi क्यों न हो. उसके लिए ये जैसे पहला क़दम था नज़दीक आने का. अपने भाई की पसंद नापसंद के बारे में jaan'na.

हार मानते हुए वह बाहर आयी. वह एक बात नहीं जानती थी. वह ये की वो साबुन यहाँ का साबुन नहीं था. एक इंटरनेशनल ब्रांड का था. जो वीर को सुहाना ने लॉस वेगास में दिलवाया था. ज़ाहिर है की तेज उससे पहचान न सकीय.

खर्र! यहाँ बाहर सभी लोग डाइनिंग टेबल पर विराजमान थे.

वीर भी बैठा हुआ था, काव्य उसके ठीक सामने थी. दोनों ने जैसे hi एक दूसरे को देखा,

"हम्फ~" वह दोनों hi अकड़ दिखाते हुए एक दूसरे से मुँह फेरर लिए. पर इधर काव्य के गालो में थोड़ी लाली भी थी. आज पहली बार उसने अपने भैया के ऊपर हाथ उठाया था. जिसके लिए वह शर्मिंदा भी थी.

किन्तु गलती उसके भैया की hi थी. फिर से अपने निर्णय को सही मान वह मुँह फुला के खाना खाने जुट गयी.

आँखों hi आँखों की इस अदला बदली को देखते hi आरोही ने एक बार में hi अनुमान लगा लिया.

आरोही : तुम दोनों! झगड़ा हुआ है न?

और उसका अनुमान एक दम सटीक निकला.

काव्य : हम्फ~

वीर : क्या फ़र्क़ पड़ता है?

आरोही : हम्म! तोह झगड़ा हुआ है. ी वास् राइट!

आरोही ने उसके बाद आगे कुछ नहीं कहा. और न hi तेजल ने. आरोही जानती थी की ये दोनों भाई बहिन जल्द hi फिरसे एक दूसरे के साथ सलाह कर लेंगे. इसलिए उसने दोनों को समय देने का सोचा.

टेबल पर खाना लगते hi सभी खाने में व्यस्त हो गए और साथ hi बातो का सिलसिला भी जारी हुआ.

भावना (स्माइल्स) : खाना बहुत अच्छा बना है श्याम! गौरी के हाथो में सच में जादू है.

श्याम : बस! बना लेती है. ः! आपसे बेहतर थोड़ी है दीदी.

भावना : नहीं! सच में बहुत अच्छा बना है. गौरी एक बेहद सही जीवन साथी है तुम्हारे लिए.

गौरी पीछे कड़ी टुकुर टुकुर अपने पति को देख और अपनी तारीफ सुन्न खुश हो गयी.

उसकी समझ में नहीं आ रहा था की ये लोग कौन थे और उसका पति इतनी इज़्ज़त से क्यों पेश आ रहा था उनसे. पर एक बात वह जान गयी थी वह ये की, ज़रूर कोई बड़े लोग hi थे ये सब. वर्ण उसका पति इस क़दर पेश नहीं आता. और इसलिए उसने चुप रहना hi बेहतर समझा.

श्याम : फिर? अब आपका क्या कार्यक्रम है दीदी?

भावना : बस! हम खा के सीधा यहाँ से निकल जायेंगे.

श्याम : ये आप क्या कह रही हो दीदी?

पूर्वी जो वही बैठी हुई थी वह भी इस चर्चा में जुड़ गयी,

पूर्वी : ये तोह भावना hi जाने. मुझे भी कुछ बताया नहीं है.

श्याम : नहीं दीदी! अभी तोह आप लोग आये हो. लम्बे सफर से थक गए होंगे सब. और वैसे भी शाम हो चुकी है. कुछ देरर में रात हो जाएगी. आज आप कही नहीं जाएँगी. आप सब हमारे मेहमान है. इस गरीब पर मेहरबानी कीजिये और चाँद दिन हमारे घर में गुज़ारिए.

भावना : चाँद दिन? नहीं नहीं! श्याम! में किसी उद्देश्य से निकली हु. इन् दोनों को देख रहे हो?

भावना ने अपनी दोनों सन्तानो की ऑर्डर इशारा करते हुए कहा. उसके इतना कहते hi सबकी नज़रे वीर और तेज पर टिक गयी.

श्याम : ???

भावना (स्माइल्स) : इन् दोनों को कुछ भी नहीं पता है अतीत के बारे में. उसी लक्ष्य को लेकर निकली हु में. इन्हे इनके और मेरे अतीत से परिचित कराने.

श्याम : समझा दीदी! लेकिन फिर भी. आज जाना जल्दबाज़ी होगी. काम से काम आज की रात तोह आपको यहाँ गुज़ारनी hi होगी.

भावना : P-Par...!

पूर्वी (स्माइल्स) : ठीक है न भावना. वैसे भी वह सही hi कह रहा है. ट्रैन के सफर से सभी थके हुए है. और फिर ट्रैन में नींद भी कहा hi लगती है. आज की रात सब ठीक से सोयेंगे तोह कल सुबह हम आगे का सफर अच्छे से कर पाएंगे. ृक्क भी जाओ.

सुमन (स्माइल्स) : मेरा भी यही maan'na है. दीदी!

भावना : अब...!

भावना अपने बेटे को देखि. वीर भी चुप चाप उससे hi देख रहा था. और फिर एक थकान भरी आह चोरर वह बोली,

भावना : ठीक है! आज रात हम यही ठहरेंगे. लेकिन सिर्फ आज की रात.

श्याम (खुश होते हुए) : ये हुई न अब बात!!! गौरी!! सेवा में कोई कमी नहीं रेहनी चाहिए. दीदी और बाकी सभी हमारे मेहमान है.

गौरी (स्माइल्स) : J-Jii!

इधर वीर किसी चिंतन में डूबे चीज़ो का आकलन कर रहा था. उसकी नज़रे श्याम पर थी.

'श्याम की फवौराबिलिटी बढ़ गयी है मेरे प्रति पारी!!!'

[Yes!]

'रिलेशनशिप में मास्टर और सर्वेंट लिखा हुआ था उसके स्टेटस में. I'm ासुमिंग की वह माँ के घराने की सेवा करता रहा होगा? या उसके पिता जी? जिस वजह से वह भी इस का हिस्सा रहा हो?'

[Yes! Aap sahi ho jaha tak mujhe lagta hai.]

'वही सुमन के स्टेटस में मास्टर और स्लेव का रिलेशनशिप है. इसका मतलब...!'

[Shyaam ka role alag hai.]

'एक्साक्ट्ली!'

[Maybe a home servant? Or a care taker?]

'थोड़ा समय और. जल्द hi इन् राज़ो से पर्दा हट जायेगा पारी.'

[Hmm! Make sure ki aap missions par bhi dhyaan dete chale. Kaera ka mission bacha hua hai. Remember? One month ki limit hai usme. Aur abhi sirf 22 days bache hai. Yaha pata nahi kitna samay hume lag sakta hai.]

'ी क्नोव पारी! जल्द से जल्द यहाँ से निकलना होगा. में मिस करा को नहीं खो सकता. अगर मेने कुछ न किया तोह वह हमेशा हमेशा के लिए अपने इमोशंस...!'

[Yes! Then stay focused.]

'राइट!'

समय गुज़रा और श्याम और गौरी के दो बच्चे जो स्कूल में पढ़ने गए हुए थे वह भी घर में प्रवेश किये. बातो hi बातो में और एक दूसरे से परिचय होने में ये समय गुज़र गया.

सूरज ढला, अँधेरा हुआ और रात्रि का आगमन भी हो गया.

अब सब के सोने की व्यवस्था तय होनी थी.

श्याम : दीदी! अंदर कमरे में जो डबल बीएड है उस पर आप दोनों सो जाइये.

श्याम ने पूर्वी और भावना से कहा.

भावना : नहीं! वह डबल बीएड बैडरूम का है. तुम दोनों मिया बीवी का. उस पर तुम दोनों hi लाइटोगे.

भावना की बात सुन्न, पीछे खड़े गौरी शर्मा गयी.

श्याम : माफ़ कीजिये दीदी! काश मेरा घर थोड़ा और बड़ा होता. काम से काम आप लोगो के सोने का बंदोबस्त अच्छे से तोह कर पाटा. फिलहाल ये एक hi डबल बीएड है हमारे यहाँ. अब और शर्मिंदा मत कीजिये. आप दोनों उस पर सो जाइये. तब तक में बाकी सभी का प्रबंध करता हु.

भावना (स्माइल्स) : हरगिज़ नहीं! पूर्वी! श्याम से कह दो की उस बीएड पर सिर्फ ये और गौरी hi सोयेंगे. और दोनों बच्चे भी.

पूर्वी (स्माइल्स) : बिलकुल!

श्याम : D-Didi!!! आप दोनों मेरे लिए काम और मुश्किल कर रही है.

पूर्वी : सही कह रही है वह श्याम. पति पत्नी को तोह साथ में hi सोना चाहिए. अपने बच्चो के साथ तुम दोनों अंदर बैडरूम में जाओ. हम अपना देख लेते है.

श्याम : पर-

भावना : पर वर कुछ नहीं. वीर?

वीर : हम्म?

भावना : बाहर दो दीवान डेल है न? देखो! उस पर लेटने का प्रबंध करो.

वीर : हम्म!

वीर बाहर गया तोह दो दीवान और एक सोफे रखा हुआ था वह. जो तीन से चार लोगो के लिए पर्याप्त था.

पर अब वह कौन सोयेगा? इसका फैसला होना था.

सुमन : में सोफे पर सो जाउंगी!

भावना : पक्का?

सुमन : जी! दीदी!

भावना : छोटा तोह नहीं पड़ेगा?

सुमन (स्माइल्स) : में इतनी भी मोती नहीं दीदी!

भावना (स्माइल्स) : ठीक है! और बीटा आरोही?

आरोही : J-Jii!?

भावना : क्या तुम और काव्य उस बड़े वाले दीवान पर लेत जाओगी?

आरोही : जी! तै जी!

भावना : कोई दिक्कत तोह नहीं होगी न? दो बन जाओगी?

आरोही : नहीं तै जी! हमे आदत है.

भावना (स्माइल्स) : बढ़िया! और आखिरी वाले दीवान पे...!

भावना ने कहते हुए श्वेता को देखा. तोह वीर ने भी उससे देखा. श्वेता की समझ में न आया की वह क्या कहे अब. वह बस वीर को देखती रही. फिर वीर ने hi उसकी जगह उत्तर दे दिया,

वीर : वह लेत जाएँगी!

भावना : हम्म? पक्का?

वीर : हम्म!

श्वेता ने वीर के उत्तर सुन्न एक हामी भरी. अगर उसका बीटा कह रहा था तोह वह कैसे मन करती? वह राज़ी हो गयी.

भावना : ठीक है! तोह पूर्वी!?

पूर्वी : हम्म?

भावना : चलो! यहाँ नीचे बिस्तर लगाते है. तुम और में नीचे सो जायेंगे.

श्याम : दीदी??? आप नीचे...!?

भावना : तोह? नीचे सोने में क्या बुराई है? घर में गद्दे तोह ज़रूर होंगे न?

श्याम : गड्डो की कोई कमी नहीं है दीदी पर-

भावना : बस फिर! ये तय रहा. पूर्वी चलो!

श्याम : आप मुझ पर पाप चढ़वाओगी दीदी!

पूर्वी : ऐसा कुछ नहीं है. तुम जल्दी से गद्दे लगवा दो श्याम!

श्याम भी जैसे हार मान गया. और उसने फटाफट गद्दे निकालते हुए नीचे बिछा दिए.

चादर को उस पर डालते हुए पूर्वी और भावना नीचे बैठ गयी.

भावना : नीचे सोने में अपना अलग मज़ा है.

पूर्वी (स्माइल्स) : बिलकुल!

अब बचे थे तोह सिर्फ तेजल और वीर.

वीर : में भी नीचे गद्दा बिछा के सो जाऊंगा. कोई दिक्कत नहीं है.

तेजल : में नहीं वीर. हम!!!

वह प्यार से बोली!

एक अजीब सी अनुभूति उन् दोनों के अंदर जाएगी. जब उन्हें बोध हुआ की वह दोनों साथ में hi सोने वाले थे.

श्याम ने बगल वाले कमरे में जहा डाइनिंग टेबल थी, उसी के पास से गद्दे बिछाये और चादर दाल तकिये रख के वह उनका इंतज़ाम कर वह से चला गया. अंत तक वह बेचारा उन्हें मनाता रहा की वह डबल बीएड पर सो जाए. परन्तु भावना ने उसकी एक न सुनी.

रात के 11:30 बज रहे थे और सभी अपनी अपनी जगह पर लेत चुके थे.

वीर और तेजल एक दूसरे के अगल बगल सभी लोगो से अलग लेते हुए थे.

दोनों के बीच एक तकिये बराबर गैप था. और दोनों hi जाग रहे थे. लेकिन कह कुछ भी नहीं रहे थे.

हिम्मत करके तेजल ने hi इस ख़ामोशी को तोडा,

तेज : V-Veer!?

वीर : हम्म्म!

जैसे hi वीर की आवाज़ उससे सुनाई पड़ी, वह खुश हो गयी. वीर भी जाग रहा था. अँधेरा था तोह उससे वीर का चेहरा ठीक से नज़र नहीं आया. इसलिए ये बताना मुश्किल था की वह जाग रहा है या नहीं!?

तेज : सो गए क्या?

वीर : नौपे!

तेज : कल रात भी ट्रैन में नींद नहीं लगी थी. है न?

वीर : येह!

तेज : मेरी भी...! U-Uss बच्चे ने... सोने नहीं दिया.

वह हल्का सा मुस्कुरा के बोली.

वीर : राइट!

तेज वीर की ऑर्डर करवट लेके मुड़ी,

तेज : तुम्हे क्या लगता है? M-Mom आखिर ऐसा क्या राज़ हमसे छिपाए हुए है?

उसकी इस बात ने वीर का ध्यान खींचा और वीर भी उसकी ऑर्डर करवट लेके मुद गया.

वीर : होनेस्त्ली, मुझे नहीं पता. कोई आईडिया नहीं है. और में अभी कोई गेस्सिंग लगाना भी नहीं चाहता.

तेज : स्टिल...! क्या तुम्हे घबराहट नहीं हो रही? की ऐसा क्या हुआ था? जो वह तुम्हे चोरर के चली गयी. क्या ये सब सही हो रहा है? माँ के वह बोल...! की भले hi में क्यों न मिट जाऊ. मुझे बहुत बेचैनी हो रही है भाई!

तेज के भाई पुकारते hi वीर ने उससे देखा. आज पहली बार उसकी इस बहिन ने उससे भाई कहके पुकारा था. उसका हाथ अपने आप उठ के तेजल के गाल पर चला गया. तेज भी चौंकी पर बोली कुछ नहीं. उसने वीर के उस हाथ को थामा. स्पर्श होते hi दोनों के दिल की धड़कने तेज़्ज़ हो गयी.

वीर : ये बात तोह में भी नहीं जानता. पर एक बात सच है.

तेज : क्या?

वीर : की राज़ बहुत बड़ा है. और छुपाने लायक भी. शायद इसलिए उन्होंने...!

तेज : हम्म! और इसलिए एक बेचैनी है. माँ को कुछ होएगा तोह नहीं न?

वीर : उन्हें कुछ नहीं होएगा. में उन्हें कुछ होने hi नहीं दूंगा.

*साइलेंस*

तेज वीर की आँखों में देखि. वह बता नहीं सकती थी की वह इस वक़्त कितनी खुश थी.

तेज : वीर!

वीर : ??

तेज : थैंक यू!

वीर : किस लिए?

तेज : फॉर बीइंग हेरे!

और एक बार फिर ख़ामोशी छा गयी.

तेज : क्या में? तुम्हारे क़रीब आ सकती हु?

उसने बिलकुल मद्धम आवाज़ में पूछा.

वीर : ममम!

और वीर की हामी पाते hi तेज उसके क़रीब सरक के बिलकुल उसके नज़दीक आ गयी. दोनों hi शर्मा भी रहे थे पर जैसे और पास भी आना चाहते थे. दोनों उस चुम्बक की तरह थे जो बस कुछ hi दुरी पे थे जोरर से आपस में चिपकने के लिए.

वीर : एक सवाल पुछु?

तेज : हम्म!

वीर : आपने वह सब क्यों किया?

तेज : क्या?

वीर : बिना किसी को बताये, यु प्रांजल के घर जाना, उस से मार पीट करना. ये सब क्या था?

तेज : सच कहु या झूठ?

वीर : ये भी कोई पूछने वाली बात है? सच कहिये! झूठ क्यों सुनूंगा में? आपने ऐसा सवाल hi क्यों पूछा?

तेज : ताकि ये बातो का सिलसिला लम्बा चल सके.

उसके इतना कहते hi वीर शर्म के मारे अपनी नज़रे फेरर लिया. और वह अकेला नहीं था. तेज खुद ये बोलने के बाद शर्मा उठी.

वीर: कहिये! सच बताइये!

तेज : उसके पीछे 2 रेअसोंस थे.

वीर : कौन कौन से?

तेज : पहला ये की...! जब मुझे पता चला उस हराम खोर ने तुम्हारे साथ ऐसी ऐसी हरकते की है. वह भी एक भाई होते हुए. तोह मुझसे रहा न गया. मेरा खून खौल उठा.

वीर : और दूसरा?

तेज (ब्लशेस) : में दिखाना चाहती थी! की में तुम्हारी बड़ी बहिन हु. तुम्हारा ख़याल रखूंगी. तुम्हे इम्प्रेस करना चाहती थी. दिखाना चाहती थी की तुम अकेले नहीं हो. तुम्हारी परवाह के लिए हम भी है. पर उल्टा...! तुमने मुझे बचाया. सोचा था वैसा कर के तुम्हारे दिल में एक छाप चोरर दूंगी. बूत ी फेल्ड.

वीर : यू didn't!

वीर के कहते hi तेज झट्ट से उससे देखि. उसके गाल गुलाबी हो पड़े.

तेज : तहत मीन्स...!?

वीर (स्माइल्स) : आप ने तोह पहले दिन से hi मेरे दिल में एक छाप चोरर दी थी.

वीर ने उससे ेगीपत का टूर याद दिलाते हुए कहा.

तेज (ब्लशेस) : ओह्ह गॉड! तहत वास् सो ऐम्बर्रासिंग...! तब मुझे पता भी नहीं था. की तुम मेरे वही भाई हो जिसकी मुझे तलाश थी. ओह्ह्ह! राइट!!! तुम वह क्या कर रहे थे?

वीर (स्माइल्स) : माँ को ढूंढने hi तोह आया था.

तेज (सुरप्रीसेड) : वेट! तोह तुम्हे पता था हम वह है? तुम्हे कैसे सब कुछ पता चला? काव्य तोह कह रही थी की घर में माँ की कोई डिटेल्स नहीं थी. फिर तुम्हे कैसे-

वीर : लम्बी कहानी है. आपके अंसवेरस धीरे धीरे मिलते जायेंगे.

तेज (शिघ्स) : फाइन!

वीर : अब हमे सो जाना चाहिए. सुबह जल्दी-

तेज : हे!

वीर : हम्म?

तेज : C-Can ी किश यू?

वीर भौंचक्का सा तेज को देखता रह गया. उसके मुँह से कुछ न निकला. और उसकी ख़ामोशी को हाँ का इशारा समझ तेज आगे बढ़ी, वीर के गले से लगी और,

*पूछ*

वीर के बाए गाल को उसने प्यार से चूम लिया. इतना शर्मा रही थी वह, फिर भी हिम्मत कर के उसने ये कर hi दिया.

तेज के होंठो का स्पर्श महसूस करते hi वीर के अंदर जैसे कुछ हुआ. लगा की जोरर से उससे बाहो में भर ले. पर खुद को नियंत्रण में रख उसने अपने हाथ आगे नहीं बढाए.

वीर की चुप्पी देख तेज निराशा में बोली,

तेज : I'm सॉरी िफ़ आईटी बोथेरेद यू!

वीर : N-Nahi! ऐसी कोई बात नहीं.

तेज (ब्लशेस) : W-Woh- तुमने कुछ कहा नहीं इसलिए मुझे लगा-

वीर : अब में एक बात पुछु?

तेज : हँ!!?

वीर : क्या में आपको...! तेजू दी कहके पुकार सकता हु?

*बेदुम्प*

एक बार फिर! आज दिन में ये दूसरी बार था जब तेज के दिल ने धड़कन फांदी हो. वह स्तब्ध सी वही जैम के रह गयी.

तेजू दी! शब्द शहद के भाति इतना मीठा प्रतीत होक जैसे उसके कानो में घुल गया.

लेकिन उसकी चुप्पी वीर को बेचैन कर गयी.

वीर : I'm सॉरी िफ़ आईटी बोथेरेद यू!

तेज : न्यूऊऊऊ!!

वह अचानक hi ख़ुशी के मारे चिल्लाई और कस के वीर के गले से लग गयी. आँखें नम्म भी थी.

तेज : कभी किसी ने...! किसी ने भी आज तक मुझे इस नाम से नहीं पुकारा. तेजू दी! *स्माइल्स* आईटी साउंड्स सो लवली.

और इस बार बिना झिजक के उसने वीर के गाल को पुनः चूम लिया. उसके अंदर का aatm-vishvaas जाग गया. चीज़ उसकी hi थी, 20 साल से परायी थी. हक़ जताने में संकोच महसूस कर रही थी तेज. लेकिन वीर के बोलो ने जैसे उसके अंदर संकोच की दीवार को तोड़ के रख दिया.

वह अपने छोटे भाई से जोरर से लग के उसके साथ चिपक के hi लेती रही.

और इसी तरह दोनों कब नींद की वादियों में चले गए दोनों को hi नहीं पता चला.

***

नेक्स्ट डे...

मुंबई

मॉर्निंग ~ 9:20 ऍम

*सक्रियकछहहहह*

रागिनी के घर के बाहर एक कार आके रुकी. और उसमे से लोग निकल के उसके दरवाज़े के पास पहुचे.

*डिंग डाँग*

घंटी बजी और रागिनी दरवाज़ा खोलने को हुई. उसने जैसे hi दरवाज़ा खोला, बाहर खड़े लोगो को देख वह दांग रह गयी.

रागिनी : A-Aap सब?

उसके सामने मनोरथ, बृजेश, और विवेक खड़े हुए थे. विवेक को देखते hi रागिनी की बॉहे सिकुड़ गयी. सुबह सुबह ये उसने किस का मुँह देख लिया था?

मनोरथ : बिटिया! हमारे पास समय नहीं है. जल्दी से कहो वीर कहा है?

रागिनी : वीर तोह- घर पर नहीं है. क्यों?

बृजेश : कहा है वह? वह लड़की कहा है?

रागिनी : H-Huhh??

मनोरथ : बीटा! वीर कहा गया है?

रागिनी : वह तोह- वह तोह सबके साथ गया हुआ है. आप को नहीं पता?

मनोरथ : काव्य और आरोही बिटिया ने सिर्फ इतना बताया था की वह दोनों तुम्हारे घर रहने आ रही है.

रागिनी (चौंकते हुए) : क्याआ?

मनोरथ : हाँ बीटा! ऊपर से फ़ोन भी नहीं उठायी है एक भी. और वीर को फ़ोन किया तोह उसने भी फ़ोन नहीं उठाया है. इसलिए यहाँ आये है. कहा है वह सब?

रागिनी : वह तोह...! वीर तोह अपनी माँ की जन्मभूमि गया है.

बृजेश : इसका मतलब...! पापा जी! वह यही थी!

मनोरथ : भावना यही थी!!!

बृजेश : पापा जी!

मनोरथ : हाँ! हाँ! जन्मभूमि गयी है न सभी?

रागिनी : H-Haan!

मनोरथ : हम्म! बृजेश!!!!!

बृजेश : जी पापा जी!

मनोरथ : गाडी निकालो फ़ौरन!!! हम अभी के अभी जयपुर निकल रहे है.

वह कहते हुए वह से पलट के जाने लगे. और पीछे पीछे बृजेश भी चल दिया.

मनोरथ : मेरा अनुमान सही था मतलब. काव्य और आरोही ने झूठ कहा था.

वह दोनों वह से निकल गए. पर विवेक अब भी रागिनी के सामने खड़ा हुआ था. रागिनी उससे देखि और बिना कुछ कहे उसने दरवाज़ा सीधा विवेक के मुँह पे hi बंद कर दिया.

विवेक बस वह खड़ा खड़ा अपनी मुट्ठी बांधता रह गया.

बृजेश : विवेक??? चलो जल्दी!

विवेक (गुस्से को छिपाते हुए) : आया ताऊ जी!

और उनकी गाडी कुछ hi पालो में वह से रवाना हो गयी.

.

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस.

अगेन, ये अपडेट 5क वर्ड्स का है. नार्मल उपदटेस की लेंथ hi कितनी बढ़ी हुई है. तोह दिल से लिखे थोक के जाने का मित्रो. और रेवोस रखने का. आने वाले उपदटेस काफी कुछ रेवेअल करने वाले है.


धन्यवाद! ✨
 
अपडेट - 124 ~ बेअरिंग थे शामे पैन

अब तक...

विवेक बस वह खड़ा खड़ा अपनी मुट्ठी बांधता रह गया.

बृजेश : विवेक??? चलो जल्दी!

विवेक (गुस्से को छिपाते हुए) : आया ताऊ जी!

और उनकी गाडी कुछ hi पालो में वह से रवाना हो गयी.


अब आगे...

Surya-uday हुआ और सुबह सुबह इस ताज़गी भरे मौसम में श्याम के घर अफरा तफरी का माहौल मच गया. सभी अपनी अपनी पैकिंग करने में जुट गए.

पूर्वी : वीर? सारा सामान रख लिया?

वीर : जी! और आप लोगो ने?

पूर्वी : सब रेडी है.

वीर : Okay!

श्याम खुद उनकी मदद करवाने में लगा हुआ था. और गौरी ने सबसे पहले सुबह उठ के उन् सब के लिए खाना बना के पैक कर दिया रहा.

अब जाके वीर को समझ आ रहा था की क्यों उसकी माँ यहाँ पर पहले लेके आयी थी. श्याम का ट्रेवल्स का बिज़नेस था. उसकी गाड़िया चलती थी किराए पर. और वीर समेत बाकी सभी को गाड़िया तोह लगनी hi थी इस सफर में. भावना ने पहले से hi सब कुछ प्लान कर के रखा था.

भावना : श्याम! दो गाडी हो जाएँगी न?

श्याम : ये भी कोई पूछने की बात है दीदी? ये आपका hi घर है. गाड़िया भी आपकी hi है. आपको जितनी लगे, ले जाइये. आपको तोह सिर्फ हुक्म देना है दीदी!

भावना : नहीं श्याम! हमे सिर्फ 2 गाड़िया hi चाहिए. क्या उनका इंतज़ाम हो जायेगा?

श्याम : क्यों नहीं दीदी? बिलकुल!

वीर (पास आते हुए) : तोह इसलिए आप यहाँ पहले हमे लेके आयी?

भावना : हम्म! सिर्फ यही कारण नहीं है बीटा. श्याम से मिले हुए भी बहुत समय हो गया था. और...!

वीर : और?

भावना (स्माइल्स) : कुछ नहीं!

वीर : ...!?

श्याम ने फ़ोन कर अपनी दूकान पर बैठे आदमी से फटाफट 2 कार बुलवाई. और दोनों hi कार कुछ hi देरर में वह आ गयी.

श्याम : में ड्राइवर भी करवा दू दीदी? अरे में hi चला लूंगा एक तोह.

भावना : नहीं श्याम! तुम्हारा घर पर रहना ज़रूरी है. धंधा कौन देखेगा? तुम्हारी बीवी भी है और बच्चे भी. किसी एक पुरुष का होना यहाँ ज़रूरी है. क्युकी तुम्हारे माता पिता भी बाहर है.

श्याम : दीदी!!!

भावना (मुड़ते हुए) : वीर?

वीर : हम्म?

भावना : तुमसे कार चलाते-

वीर : हम्म! में ड्राइव कर लूंगा.

भावना (स्माइल्स) : गुड! एक तुम कर लोगे और एक तेज कर लेगी.

तेज : Okay!

वीर : एक मिनट! आपके हाथ में लगी है. आप कैसे ड्राइव कर सकती हो?

अपने भाई की अपने प्रति चिंता देख तेज का दिल खुश हो गया.

तेज : It's okay भाई! में चला लुंगी. वैसे भी काफी हील हो गया है वोँड.

वीर : फिर भी-

तेज : Don't वोर्री बाबा!

वीर : फाइन! लेकिन अगर आपको ज़रा सा भी दर्द उठे तोह आप वही रुक जाना. Okay?

तेज (स्माइल्स) : Okay!

वीर : आपको बोलता नहीं. पर इन् दोनों मोहतरमा लोगो से ड्राइव करते आता नहीं है.

उसने palat'te हुए आरोही और काव्य की ऑर्डर इशारा किया तोह दोनों ने शर्मा के नज़रे फेरर ली.

काव्य (bhun-bhunaate हुए) : हम्फ~ मुझको कोई सिखाता नहीं है तोह में कैसे चला पाऊँगी.

आरोही (ब्लशेस) : M-Mein जल्द hi सीखूंगी.

तेज (स्माइल्स) : कोई बात नहीं. अब में हु न? इन् दोनों की बड़ी बहिन! में सीखा दूंगी!

काव्य : क्याआ?? सच्ची डीडीई???

तेज (स्माइल्स) : मुछि!!

काव्य : ओह्ह्ह वऊवववव!!! हाहाहा~

वीर : आप भी न दी!

तेज : ः! It's okay! It's okay!

अपने दोनों बच्चो की आपस में बनते देख, भावना दूर कड़ी मंद मंद मुस्कुरा उठी. देख के खुश थी की उसकी दोनों सन्तानो के बीच आपस में अच्छी बन्न रही थी. भलाई, एक माँ और बेटे का रिश्ता अभी ठीक नहीं था. पर काम से काम एक भाई और बहिन का रिश्ता तोह पनपना शुरू हो गया था. उसके लिए फिलहाल यही काफी था.

जब सामान रखने की बारी आयी तोह वीर ने तेज को बैठा के सारा सामान दोनों कार्स में लोड करना शुरू कर दिया.

श्याम चलते हुए भावना के बगल से आ के खड़ा हुआ और बोलै,

श्याम : वीर बाबू कितने बड़े हो गए है. बहुत hi अध्भुत अनुभूति महसूस हो रही होगी दीदी आपको. है न? इतने सालो बाद आप दोनों का मिलान हुआ है.

भावना : पूछो मत श्याम! सच me!Aisa लग रहा है की अभी भी किसी सपने में हु. लगता है जैसे...! जैसे वह दिन आ गया है.

उसने वीर को देखते हुए आहिस्ता से कहा.

श्याम : इसका मतलब आप-!?

भावना : हाँ! अब वही होगा. फिर जहा भी ये तक़दीर ले जाए.

श्याम : मुझे साथ ले चलिए दीदी, अगर कोई अनहोनी हो गयी तोह-

भावना : नहीं श्याम! तुम्हारा यहाँ रहना ज़्यादा ज़रूरी है.

श्याम : P-Par-

भावना : में तुम्हारी एक नहीं सुनूंगी. समय हो रहा है. अब में चलती हु. अगर भगवान् ने चाहा, तोह हम फिरसे मिलेंगे. और अगर नहीं-

श्याम : डीडीई!!!!

भावना (स्माइल्स) : और अगर नहीं, तोह वीर और तेज की देख भाल करना. उनका ख़याल रखना. ठीक है?

श्याम : दीदी आप-

भावना : रखोगे न?

श्याम बेचारा मौन रह गया. भावना की आँखों में एक अजीब सी शान्ति थी. वह बस हामी hi भर सका. बदले में भावना मुस्कुरायी, और पलट के जाते हुए एक बार ठहर कर बोली,

भावना : हमारी इतनी खातिरदारी करने के लिए शुक्रिया श्याम. चलती हु!

श्याम : दीदी!!! अब आप शुक्रिया कहेंगी? खातिरदारी? किस काम की वह खातिरदारी जहा में आपको एक बिस्तर तक नहीं उपलब्ध करा सका?

भावना : श्याम!

श्याम : !!!?

भावना (स्माइल्स) : इस से पहले मुझे कभी किसी घर में इतना अपनापन्न महसूस नहीं हुआ, जितना कल यहाँ महसूस हुआ.

उसके एक वाक्य ने श्याम की बोलती hi बंद कर दी. और बेचारे का गाला रूंध गया. ऐसा लगा जैसे वह अभी यही रो देगा.

परन्तु, समय हो चूका था. भावना फिर न रुकी. वह आगे बढ़ सीधे कार की आगे वाली सीट में बैठ गयी.

ड्राइवर सीट पर वीर बैठा हुआ था. और पीछे वाली में पूर्वी और आरोही. तोह वही दूसरी कार में तेज समेत सुमन. और पीछे काव्य और श्वेता.

पूर्वी : अब हम निकलेंगे श्याम! इतनी सेवा की तुमने हमारी. उसके लिए धन्यवाद!

श्याम : अब तोह पराया हो गया हु न. तभी तोह आप सब बार बार शुक्रिया ऐडा कर रही है.

पूर्वी (मुस्कुराते हुए) : अरे! ाहः! ठीक है. नहीं कहूँगी! और गौरी!

गौरी : J-Jii?

पूर्वी (स्माइल्स) : खाना बहुत अच्छा था कल. और आज सुबह सुबह हमारे लिए इतना सब करने के लिए-

कहते हुए वह बीच में hi ृक्क गयी जब उसने श्याम को पुनः देखा,

पूर्वी (मुस्कुरा कर) : नहीं कह रही हु शुक्रिया. गौरी! ध्यान रखना! ठीक है?

गौरी : J-Jii! आप सब आते रहिएगा! मुझे भी बहुत अच्छा लगा आप सब से मिल कर.

वीर जो अब तक शांत बैठा था, उसने जोरर से बोलै की सभी को सुनाई दे सके.

वीर : आप लोग ऐसे बेहवे कर रहे हो जैसे हम ये गाड़िया लौटाने आएंगे hi नहीं.

पूर्वी : अरे रे!! हाहाहा~ ये भी सही है. चलो अच्छा! अब हम निकलते है ठीक?

श्याम : J-Jii!

और एक दूसरे को नमस्कार कर वीर संग सभी वह से विदा ले लिए.

***

जयपुर से चले अभी आधे घंटे से ऊपर हो चूका था. और गांव का इलाका लग्न भी अब शुरू हो गया था. जगह जगह खेत और चारा चबाती गाय दिखाई पद रही थी. हवा में वह गांव की सुगंध भी अब आने लगी थी.

ये संकेत था, की अब वीर और बाकी सभी असली गावो के क्षेत्र में क़दम रख चुके थे.

कही बकरिया अपने झुण्ड में निकलती हुई दिखाई पड़ती तोह कही खेतो में ट्रेक्टर चलते हुए, तोह कही फसल पर स्प्रिंकलर पानी फेकते हुए. समय समय पर कच्चे घरो के मकान भी दिखाई पड़ते.

वीर की कार आगे चल रही थी और तेजल की ठीक उसके पीछे. अब वीर को तोह कोई तकलीफ नहीं हुई ड्राइविंग में लेकिन तेज के लिए यही बात कहना थोड़ा मुश्किल था.

तेज : ओह्ह्ह गॉड! Y-Ye रास्ता! और ये जानवर बीच सड़क में ऐसे hi आते रहेंगे क्या?

सुमन (स्माइल्स) : ये गांव है तेजल जी! ये तोह होना hi है. लेकिन फिर भी, शहर में रोड की भीड़ से तोह समझदार hi है ये जानवर! फुफु~ आपकी क्या राय है?

तेज : उग्गहह!! मेरी कोई राय नहीं है. M-Mujhe तोह ये बड़ी कार चलाने की आदत नहीं.

सुमन : अगर आपको कही भी दिक्कत लगे तोह मुझे बेझिजक बता दीजियेगा. माल-!!! एहम! मेरा मतलब है वीर जी! वीर जी ने मुझे स्पष्ट कहा हुआ है की आपके स्वास्थ और हालत पर विशेष ध्यान दू.

तेज : हँ!!? O-Ohhh!

एक बार फिर तेज के दिल में जैसे ख़ुशी की एक पतंग उचाई में उड़द गोते मारने लगी. उसका भाई सच में कितनी परवाह कर रहा था. क्या यही होता है? एक भाई का होना? ये फीलिंग कितनी नयी थी. वह मुस्कुरा उठी. फिर जैसे उससे कुछ याद आया,

तेज : अरे! वह आप क्या कह रही थी अभी?

सुमन : J-Jii?

तेज : वह...! माल?? माल कुछ कह रही थी न आप अभी?

सुमन (झेपते हुए) : हँ? N-Nahi तोह! M-Mein तोह बस...! हाँ! में कह रही थी की ka-Maal के जानवर है ये. तोह ज़रा संभल के चलिएगा.

तेज : ओह्ह्ह! हाँ! बूत ये- ुर्गघ! कार को सही एंगल से काटना hi तोह मुश्किल है. गॉड! ी हेट सुवस.

काव्य : ओह्ह! वववव! वह देखो पीकॉक!

इतने में काव्य एक मोर देख चहक पड़ी.

सुमन : हम्म? हाँ! बेहद सुन्दर है.

काव्य : अरे ये पंख क्यों नहीं खोला है?

सुमन : फुफु~ उसका मैं नहीं है अभी.

काव्य : क्या सुमन आंटी आप भी...! अरे? एक मिनट! ये तोह कितना अलग है!

सुमन : हम्म? पर सारे मोर तोह एक जैसे hi होते है!? इसमें अलग क्या है?

काव्य : अरे मोर नहीं!

सुमन : तोह?

काव्य : ये! ये गांव. मुझे तोह लगा था की राजस्थान में पानी नहीं होता. हर्र जगह डेजर्ट होगा. पर यहाँ तोह-

सुमन : पफ्फफ्टत्त~ हाहाहाहाहा~

उसकी इस चंचल सी बात पर सुमन खिल खिला के हस्स पड़ी. फिर हस्सी रोकते हुए बोली,

सुमन (स्माइल्स) : राजस्थान का मतलब सिर्फ रेगिस्तान नहीं होता काव्य. अभी अभी हम श्याम जी के यहाँ से होक आये न?

काव्य (नॉड्स) : हाँ!

सुमन : तोह बताओ वह केसा था?

काव्य : ओह्ह हैं!!! वह तोह एक सिटी थी पूरी. जयपुर! पिंक सिटी! इसका मतलब हर जगह डेजर्ट नहीं है. राइट?

सुमन : बिलकुल सही! जहा रेगिस्तान है. सिर्फ उनसे लगे हुए छेत्रो में कभी कभी पानी की दिक्कतें होती है. और गर्मियों में अक्सर. पर ऐसा भी नहीं है की इंसान जी hi न पाए. देश बहुत तेज़्ज़ी से आगे बढ़ रहा है काव्य. गांव भी अब आधुनिक हो रहे है. बस प्रकृति के आगे हमे कभी कभी झुकना पड़ता है.

काव्य : ऊऊऊऊओ~ आपको तोह बहुत नॉलेज है सुमन आंटी!

सुमन मुस्कुरायी. वह एक अच्छी अध्यापिका की तरह काव्य को पाठ पढ़ा रही थी और काव्य भी एक अच्छे विद्यार्थी की तरह पाठ पढ़ रही थी.

काव्य : ओह्ह्ह नूवो! ारररीी! ये में कैसे भूल गयी???

सुमन : अब क्या हुआ?

काव्य : ाररी! वीर भैया का b'day आ रहा है.

इस बात को सुन्न न सिर्फ सुमन बल्कि श्वेता और तेज दोनों के hi कान खड़े हो गए.

तेज : क्या कहा? वीर का b'day?

काव्य : हां दी!!! वीर भैया का!

तेज (ब्लशेस) : K-Kab है काव्य?

काव्य : ेहठ? आपको नहीं-!? अरे हाँ! आप सब तोह अभी अभी मिले हो. कैसे पता होगा. वैसे आपकी मम्मी को याद होगा. पर फिर भी में बता देती हु. भैया का b'day...! हँ!!? अरे बाप रे!!!!

तेज : अब क्या हुआ?

काव्य : अरे!!! वीर भैया का b'day तोह इस बार दिवाली वाले दिन hi पद रहा है.

सुमन (एक्सक्लैम्स) : अरे हाँ!!!

काव्य : मतलब इस बार की दिवाली यही मनाएंगे हम सुमन आंटी?

सुमन : लगता तोह कुछ ऐसा hi है.

तेज : दिवाली वाली डेट को हँ...! ी सी!

वीर के जन्मदिन का ज़िक्र आते hi, श्वेता अपने खयालातों में डूब गयी. न जाने क्या सोच रही थी. पर शायद विषय वीर hi था.

तेज (स्माइल्स) : इस बार उसका जन्मदिन यादगार होगा उसके लिए.

काव्य (नॉड्स) : हम्म! हम्म!

सुमन : वैसे! इन् बातो को अलग रखते हुए. अगर आपको तकलीफ हो रही हो, तोह एक बात बता देना चाहती हु की इधर श्वेता जी से भी गाडी चलना आता है. क्यों है न? श्वेता जी?

सुमन पीछे मुड़ते हुए बोली. तोह यहाँ श्वेता जो अपनी सोच में घूम थी वह हड़बड़ा के उठ गयी,

श्वेता : हहहयहहह? K-Kyaa??

सुमन : मेने कहा की आपको भी गाडी चलना आता है. है न? में सही हु न?

श्वेता : यह! H-Haan! हाँ!

तेज : अरे वाह! ये तोह सुखद समाचार है. तोह इनसे कहिये की अपनी गाडी उठाये, और मेरे भाई की ज़िन्दगी से U-turn मारते हुए निकल जाए!!

एक तीखा और अपने नाम के भाति तेज तर्रार वार किया उसने अपने शब्दों से.

श्वेता : K-Kya?

तेज : हम्फ! सुनाई नहीं दिया? मेने कहा अपना बोरा बिस्तर बांधिए और निकल जाइये मेरे भाई की ज़िन्दगी से. में और उसकी असली माँ है यहाँ उसका ख़याल रखने के लिए.

सुमन (फ्रोंस) : तेजल जी-! इन् बातो की क्या आवश्यकता थी?

श्वेता जो अब तक खामोश थी, उससे भी अब ये बात पचि नहीं. पिछली बार वह ट्रैन में अकेली पद गयी थी जिस वजह से तेज उस पर हावी हो गयी थी. पर आज तोह तेज अकेली थी कार में. इस बात को ध्यान में रखते हुए, श्वेता ने दुबक कर छिपने की बजाये हमला कर दिया.

श्वेता : O-Oh अच्छा? देखो तोह बोल कौन रहा है? वह बहिन जीसस अपने भाई का जन्मदिन तक याद नहीं.

तेज का माथ ठनका.

तेज : Y-You-!!!

श्वेता : हम्फ!!

सुमन : आप दोनों??!! सशह्ह्ह! क्या बच्चो की तरह. अब सब शांत रहेंगे थोड़ी देरर.

उसकी बात सुन्न, काम से काम अभी के लिए थोड़ी शान्ति छायी वह.

तोह वही इधर वीर की कार में अलग चर्चा का विषय भिड़ा हुआ था.

वीर : तोह ये गांव जहा हम जा रहे है. यही आपकी जन्मभूमि है?

उसने अपने बगल में बैठी अपनी माँ की ऑर्डर देखते हुए कहा. भावना उससे देखि और बोली,

भावना : हम्म!

वीर ने मैं में फिर पारी से जयपुर और साथ hi उसकी माँ की जन्मभूमि की जानकारी ली.

चुकी अब सिस्टम गूगल की तरह भी काम करता था तोह वीर को अलग से फ़ोन में सर्च करने की ज़रुरत नहीं थी.

वीर : तोह! एक अर्चेओलॉजिस्ट होते हुए, आपने यहाँ के आस पास के एरियाज में भी साइट्स एक्स्प्लोर की हुई होंगी?

भावना (स्माइल्स) : बिलकुल!

वीर : तोह? कहा कहा अपनी इन्वेस्टीगेशन की है? ी मैं रिसर्च.

भावना : मेने तोह राजस्थान की हर्र प्रसिद्द जगह को एक्स्प्लोर किया है बेटे. इवन हौन्टिंग साइट्स.

वीर : हौन्टिंग साइट्स?

भावना (स्माइल्स) : हम्म! फिर चाहे वह भानगढ़ का भूतिया किला हो, कुलधरा का श्रापित गांव, नाहरगढ़ किले में राजा का भूत, या राणा खम्भा के छिपे राज़ हो, या फिर जगतपुरा में चुड़ैलों का वास. मेने हर्र एक साइट पर समय गुज़ारा है.

वीर : और ऐसी जगहों के नाम आप मुस्कुरा के बता रही हो?

भावना (लौघ्स) : हाहाहाःहाहा!

वीर : तोह...! आप का क्या टेक है इसमें?

भावना : किस्मे?

वीर : ी मैं...! आप इन् भूत प्रेतों पर यकीन करती हो?

भावना (स्माइल्स) : अभी तक आँखों के सामने नहीं देखा है.

वीर : तोह यकीन नहीं करती?

भावना (स्माइल्स) : मेने ऐसा तोह नहीं कहा!?

वीर : हँ?

भावना (शिघ्स) : करती भी हु और नहीं भी.

वीर : में कुछ समझा नहीं?

भावना : बीटा! बिना आँखों के सामने कुछ देखे और कानो से सुने, चीज़ो पर विशवास करना मूर्खता है. इसलिए अभी इन् को स्पष्ट रूप से माना नहीं है मेने. पर न जाने कितने वर्षो से ये बातें चली आ रही है. कुछ तोह सच्चाई होगी इनके पीछे? इसलिए पूरी तरह इससे इग्नोर भी नहीं करती हु.

वीर : ी सी! तोह आपने ऐसी जगहों पर भी इन्वेस्टीगेशन की है.

भावना (स्माइल्स) : रातें भी रुकी है.

वीर : आपको...! डर नहीं लगा?

भावना : में अकेली नहीं होती थी. टीम होती थी.

वीर : और तेजू दी?

भावना (स्माइल्स) : उससे में कभी भी हौन्टिंग साइट्स पर लेके नहीं गयी.

वीर : ओह्ह्ह!

भावना मंद मंद मुस्कुरा के अपने बेटे को बगल से देख रही थी. सोच के खुश हो रही थी की उसका बीटा इतना इंटरेस्टेड था इन् सब चीज़ो को लेकर. और एक माँ होने के नाते अपने बेटे के संग वह खूब अच्छे से अपना ज्ञान बाँट रही थी.

वीर : तोह ये जो जगह जहा हम चल रहे है. Y-Yaha क्या हुआ था? और क्या है यहाँ पर?

भावना ने अपने बेटे पर से नज़रे फ्री और बाहर देखते हुए चुप हो गयी.

वीर ने उसकी ख़ामोशी को एक ना का इशारा समझा और फिर आगे कुछ नहीं कहा. पर अगले hi शान उससे भावना की आवाज़ सुनाई पड़ी,

भावना : जो कुछ भी है. वह जा के सब पता लग जायेगा तुम्हे और तेज को.

वीर : ...

***

कुछ दुरी तय कर लेने के बाद वह सभी रुके, गौरी के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना उन् सभी ने के खाया. तोह वही थोड़ी थोड़ी चाय की चुस्की भी ली.

काव्य और वीर के बीच अभी भी वह लड़ाई जारी थी. दोनों एक दूसरे को देखते और मुँह फेरर लेते.

वीर जान बूझ के तेजल और आरोही से हस्सी ख़ुशी बात कर रहा था जिस से बेचारी काव्य और जल भून गयी. वह देख पा रही थी की कैसे तेजल और आरोही घुल मिलके वीर के और क़रीब आ रही थी. पर इधर उसकी लड़ाई चल रही थी अपने भाई से. मुँह फुला के वह औरतो के बीच जा बैठी.

जब दुबारा से सफर आगे बढ़ा तोह वीर और बाकी सभी फिर न रुके. और लगातार आगे बढ़ते रहे. तेजल भी अब थक चुकी थी. उसके बात को आराम देना ज़रूरी था. इसलिए बची कुछ दुरी के लिए श्वेता ने वह से कार चलाना कंटिन्यू किया.

और देखते hi देखते कैसे ये लम्बा समय काट गया, इसका पता hi नहीं चला. वह सभी अपनी मंज़िल पर पहुँच चुके थे.

जैसे hi गांव के अंदर मुड़ने का रास्ता उन्हें नज़र आया तोह भावना ने उन्हें टोक दिया,

भावना : अंदर नहीं! बगल वाली रोड लो.

वीर : पर! गांव के अंदर जाने की रोड तोह यही है न?

भावना : जैसा कह रही हु वैसा करो.

वीर : हम कही और चल रहे है?

भावना : कुछ ऐसा hi समझ लो बीटा.

पूर्वी : बीटा! तुम तोह मोड़ लो. ये तुम्हारी माँ भी पता नहीं क्या क्या सोच के चल रही है. बस जैसा ये कहती जाए तुम करते जाओ.

वीर : वेल! Okay!

वीर ने फिर बिना कोई सवाल किये कार दूसरे रास्ते में मोड़ दी.

ये गांव से अलग रास्ता था. एक साथ दो बड़ी बड़ी कार आते देख सड़क पर चलने वाले व्यक्ति सभी उन्हें टकटकी लगा के देखने लगे.

भावना की आँखें विंडो से बाहर hi इधर उधर होक किसी चीज़ को धुंध रही थी. और जैसे hi उससे वह नज़र आया,

भावना : वह!!! वह उस मकान के सामने रोक लेना गाडी.

वीर ने ठीक वैसा hi किया. सभी उतर के जब बाहर आये तोह भावना hi आगे थी. उस मकान के दरवाज़े के पास वह पहुची. दरवाज़ा खुला hi हुआ था.

काव्य : ये हम कहा आये है?

आरोही : मुझे थोड़ी पता है. और घर से लगातार कॉल आ रहा है. मेने फ़ोन नहीं उठाया है. तुमने?

काव्य : नहीं मेने भी नहीं. पर मम्मी चिंता कर रही होंगी न?

आरोही : हम्म! पर अब तक भाभी को कॉल कर उन्हें सब पता लग गया होगा.

काव्य : ओह्ह! तोह अब हम बात कर सकते है?

आरोही : बात नहीं करनी है. सिर्फ अपना हाल चाल बता के फ़ोन कट कर देना. Okay?

काव्य : Okay!

यहाँ भावना be-jhijak सीधे उस मकान के अंदर चली गयी. उससे तभी दिखाई दिया. की नीचे ज़मीन पर बैठी एक बूढी औरत चूल्हे में खाना बनाने में लगी है.

उससे देखते hi भावना की पलके भीग गयी, आँखें नम्म हो चली.

भावना : काकी...!!

वह बूढी औरत पलट के भावना को देखि तोह पीछे खड़े इतने लोगो को देख दांग रह गयी. वह बेचारी भावना को पहचान न पायी. तभी नज़दीक आते हुए भावना ने उसके हाथ को अपने दोनों हाथो में थाम लिया.

भावना : काकी!! में...! भावना!! आपकी लाडो!

और बस उसका इतना hi कहना था की वह बूढी औरत हैरत में उससे देखने लगी, फिर उससे एहसास हुआ. और फिर वह भावुक हो गयी.

रट हुए उसने भावना को अपने गले से लगा लिया. कुछ बोल नहीं रही थी वह. पूर्वी जो पीछे कड़ी थी उसका रवैय्या भी कुछ ऐसा hi था. बूढी औरत को देखते hi वह दौड़ के उसके समीप आके साथ में बैटन गयी.

वीर ने एक पल में hi उस औरत को चेक किया. और जैसा की वह अनुमान लगा hi चूका था. ये बूढी औरत भी उसकी सर्वेंट hi निकली.

सब बारी बारी अंदर आये और फिर सभी के लिए उस औरत ने नीचे कपडा बिछाया. सब वही बैठ के बस इंतज़ार करने लगे.

भावना : तुम सब! ये अभिलाषा काकी है.

पूर्वी : हाँ बच्चो! ऐसा समझ लो की ये तुम्हारी नानी जैसी है.

भावना : हम्म!

वीर : तोह अभी?

भावना : हम यही ठहरेंगे.

वीर : पर यहाँ-

वीर ने अगल बगल छोटी सी जगह को देख अपनी चिंता व्यक्त की.

भावना : क्या तुम यहाँ नहीं रुक पाओगे?

वीर : ऐसी बात नहीं है. में बीच जंगल में भी सो सकता हु. पर बाकियो को ध्यान में रख कर ये कहा.

भावना : मानती हु की जगह छोटी है और कुछ ख़ास सुविधाएं नहीं है. पर यहाँ आज रुकना बेहद ज़रूरी है.

वीर : यहाँ पर hi क्यों?

भावना (स्माइल्स) : क्युकी काकी के अलावा अब मेरा और कोई नहीं.

उसने जैसा hi ये कहा, वीर समेत तेजल दोनों को hi एक बड़ा झटका लगा.

तेज : क्या मतलब?

भावना : वही जो तुमने सुना बीटा. श्याम का परिवार और काकी hi है बस अब. और तुम भी सुमन!

सुमन : *स्माइल्स*

भावना : इसलिए हम कही और नहीं जा सकते. अब ये गांव मेरे लिए अनजान है. काकी hi एकमात्र है.

वीर : ठीक है. तोह में सामान अंदर रख देता हु.

वीर ने बारी बारी सारा सामान अंदर रखा और किवाड़ को बंद कर वह सभी नीचे hi इखट्टा हो गए.

और अब जा के अभिलाषा ठिठुरती हुई आवाज़ में बोली,

अभिलाषा : लाडो!!! तुम यहाँ!?

भावना : हाँ काकी! इन् दोनों देख रही हो? ये मेरे बच्चे है.

माहौल भावुक हो उठा. अभिलाषा ने दोनों वीर और तेजल के मुख को चूम उन्हें प्यार किया.

और उसके बाद वह सब को बैठा के चाय बनाने में लग गयी. ज़िद्दी भी बहुत थी. काम खुद hi करना है मतलब खुद hi करना है. कोई और उसका काम नहीं करेगा.

हमेशा की तरह अपनी काकी की ज़िद्द के आगे हारते हुए भावना मुस्कुरा के बस वही बैठ गयी.

वीर : तोह...! आज रात यही?

भावना : हम्म!

श्वेता : हम सब सोयेंगे कैसे वीर?

वीर : में वही सोच-

तेज : ओह्ह c'mon फॉर god's सके!!!!

तेज जो अब तक शांत थी वह भड़क उठी. पूरे सफर में वह कार चलाने में नाकामयाब रही थी. और बची कुछ दुरी श्वेता ने तय की थी. श्वेता जैसे जान बूझ के ड्राइव कर के ये बता रही थी की ड्राइविंग में वह उस से बेहतर थी. जिस कारण से तेज का दिमाग और गरम हो गया था.

उसकी बात सुबते hi वह उस पर चढ़ गयी.

श्वेता (फ्रोंस) : ये तुम बार बार क्यों-

तेज : कैन यू प्लीज शट उप? मेहरबानी कर के चली क्यों नहीं जाती यहाँ से? हाँ? ये ड्रामा बंद क्यों नहीं कर देती. It's ऐम्बर्रासिंग!!

श्वेता : में कोई ड्रामा नहीं कर रही.

तेज : ओह्ह! तोह क्या कर रही हो आप???

श्वेता : सिर्फ अपने वीर के लिए आयी हु यहाँ.

तेज : अपने वीर? हाँ? तोह ठीक है. उसी वीर के लिए आप यहाँ से चले जाइये! Okay?

श्वेता : T-Tumhari बात क्यों मानु में? अगर वीर चाहेगा तोह चली जाउंगी में.

तेज : वीर! कह दो की अभी के अभी ये यहाँ से चली जाए.

वीर : तेजू दी! शांत रहिये!

तेज : व्हाट? पर वीर ये औरत..! ये औरत तुन्हे बेवक़ूफ़ बना रही है वीर. ये तुम्हे बर्बाद करने आयी है यहाँ.

"बस करूऊ!!!!!" इस बार श्वेता जोरर से चिल्ला उठी.

उसकी सासें तेज़्ज़ थी. वह घबराई, सेहमी हुई भी थी पर साथ hi गुस्से में भी थी. बार बार उस पर आरोप लगाया जा रहा था. अब बस और नहीं.

श्वेता : में कहती हु बंद करो!!!

तेज : ओह्ह! ये देखो! ये नया ड्रामा शुरू!

श्वेता : कोई ड्रामा नहीं है ये!!! समझी?

तेज : हम्फ~ आप चुप रहो तोह hi बेहतर है. झूठ तोह ऐसे निकलता है आपके मुँह से की मुझे घिन आती है आपकी हर्र एक बात से.

श्वेता : शट ुप्प्प!!! शट ुप्प्प!!

तेज : Y-You...!

श्वेता : इतना hi बहिन बताती फिरती हो तोह कहा थी अब तक? हाँ? कहा थी? कहा थी ये माँ बहने?? क्यों चोरर के चली गयी वीर को? हाँ!? जवाब दो!!!

तेज : Don't यू डरे-

श्वेता : कोई जवाब है hi नहीं!!! *स्निफ्फ* पूछो ज़रा अपनी माँ से. तुम मुझे दोष देती हो...! काम से काम में वीर के पास तोह थी. तुम्हारी माँ की तरह नहीं जो बचपन में अपने बेटे को चोरर के चली आयी.

तेज : हाउ डरे यू-!??

श्वेता : हाँ! *स्निफ्फ* अब मुझ पर गुस्सा दिखा लो. क्युकी ये करना आसान है न? *स्निफ्फ* दूसरे पर आरोप लगाना आसान hi होता है. *स्निफ्फ*

तेज : तुम जानती hi क्या हो मेरी माँ के बारे में? शट उप!!!

श्वेता : यू शट उप!! तुम क्या जानती हो मेरे बारे में?

तेज : ...

श्वेता : अपनी कोख से बच्चा खोया है मेने...! *स्निफ्फ* अपने hi घर से निकाल दी गयी. Dar-dar भटकती रही. *स्निफ्फ* अपने hi पति से धोका मिला...! दुबारा माँ न बन्न सकू ऐसा अभिशाप मिला...! अकेले hi एक बच्ची को पाला पोसा!! समाज की गालिया खायी. *स्निफ्फ* उसके बाद भी जब वीर जैसा हीरा मिला तोह उससे नकार दिया मेने. क्युकी अंधी थी!!! अंधी हो गयी थी सिर्फ अपनी बेटी के भविष्य और उस डर को लेकर...!

सभी चुप चाप उसकी बातें सुनते रहे.

श्वेता : क्या बुरा किया मेने अगर में अपनी बेटी के बारे में सोच रही थी तोह? हाँ?? क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हे पालते वक़्त तुम्हारे लिए ये सब नहीं किया था? बोलो!!! *स्निफ्फ* क्या गलत किया मेने अगर पैसो की भूक थी मुझे. क्या इंसान को आज पैसे की भूक नहीं? मानती हु की में गलत थी वीर के संग. पर उसकी सजा में भुगत रही हु. *स्निफ्फ* और कभी उस से माफ़ करने के लिए भी नहीं कहूँगी. इतनी खुदगर्ज़ नहीं में!! *स्निफ्फ*

इस बार न सिर्फ किसी ने उससे ताने मारे बल्कि सभी वह बैठे दांग रह गए. और थोड़े भावुक भी. तेज ने बस मुँह फेरर लिया गुस्से में. तोह वही पूर्वी कड़ी हुई और भीगी आँखें लिए उसके नज़दीक आयी.

पूर्वी : आपने भी अपनी संतान खोयी है?

'भी' शब्द सुनते hi वीर और बाकी सभी के कान खड़े हो गए. सिवाए भावना के. सब स्तब्ध निगाहो से उससे घूरने लगे.

मायूस आँखें लिए पूर्वी ने श्वेता को थामा. ऐसा लगा जैसे दो इंसान जो एक दर्द से पीड़ित थे वह एक दूसरे को सहारा दे रहे हो.

पूर्वी (ासु बहते हुए) : तोह आपने भी ये दर्द सहा है. हाँ?

श्वेता : !!??

पूर्वी (नम्म आँखों से) : फ़र्क़ सिर्फ इतना है. की में इतनी बदक़िस्मत नहीं थी. मुझे दुबारा माँ bann'ne का अवसर मिला. और जब मेने अपनी संतान खोयी थी. तोह उस ग़म को दूर करने के लिए वीर मेरे आलिंगन में हुआ करता था. आपका दर्द में समझ सकती हु.

वह palat'te हुए मायूस आँखें लिए भावना को देखि.

भावना ने गर्दन हिलायी. वीर उठ के श्वेता के नज़दीक आया और उसने अपना रुमाल निकाल के आगे किया. न सिर्फ तेज बल्कि उसकी इस हरकत पे भावना भी अपनी आँखें फाड़े उससे देख रही थी.

पर रुमाल को चोरर, श्वेता सीधे जोरर से वीर की बाहो में गिर गयी. उसकी टी शर्ट को कस के पकडे वह अपने ासु उसके सीने में hi पोछने लगी.

ये देख भावना उठी और वही राखी एक खाट पर जाके बैठ गयी. फिर उसकी आवाज़ सुनाई दी,

भावना : तोह तुम jaan'na चाहते हो न? सब कुछ!!!?

वीर को देख वह बोली. एक सन्नाटा सा छा गया उधर.

वीर ने श्वेता को बिठाया और खुद भी बैठ गया.

एक गहरी सांस भावना ने ली और अपने दोनों बच्चो को उसने देखा. फिर बोली,

"तोह सुनो
!!"

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस.

पास्ट विल बिगिन फ्रॉम थे नेक्स्ट अपडेट. नेक्स्ट उपदटेस को ध्यान से पढियेगा. उनमे hi अंसवेरस मौजूद रहेंगे. और लाइक्स थोक के जाने का और रेवोस रखना का. तब तक के लिए,


धन्यवाद! ✨
 
अपडेट - 125 ~ हिस्ट्री ुनफोल्ड्स (1)

अब तक...

भावना : तोह तुम jaan'na चाहते हो न? सब कुछ!!!?



वीर को देख वह बोली. एक सन्नाटा सा छा गया उधर.

वीर ने श्वेता को बिठाया और खुद भी बैठ गया.

एक गहरी सांस भावना ने ली और अपने दोनों बच्चो को उसने देखा. फिर बोली,



"तोह सुनो!!!"

अब आगे...



राजस्थान!

राजाओ का स्थान!

एक ऐसी भूमि, जहा किसी दौर में एक से एक सर्वश्रेष्ट महाराजा शासन किया करते थे.








तब की दुनिया आज की आधुनिक दुनिया से बेहद अलग थी. तब का इंसान इतना विद्वान था, फिर चाहे वह कारीगिरी हो, या गणित. अर्थशास्त्र हो या कला. युद्ध के लिए ran-neetiya रचना हो या koot-neetiya. उन् सभी में आगे था.

यह वह दौर था, जहा किसी भी दिन जुंग चिढ जाय करती थी. युद्ध हो जाय करते थे. ये युद्ध, एक शतरंज के खेल के सामान हुआ करते थे. जहा एक एक पैदा अपनी अलग भूमिका निभाता था.

सीधे राजा पर हमला न कर के, पहले सेनापति को मौत के घात उतारा जाता था. सलाहकार को क़ब्ज़े में लिया जाता था. ठीक वैसे hi जैसे एक शतरंज में एक एक करके आरोही क्रम में बढ़ा जाता है.

कुछ ऐसा hi हाल था तब के दौर का. महाराणा प्रताप, राणा सांग, उड़ाई सिंह, अमर सिंह आदि. ये वो व्यक्ति थे जिनका नाम hi आज आदर के साथ लिया जाता है. वो राजपूत जो अपनी वीरता, बहादुरी, ढृढ़ता और अपने तप के लिए जाने जाते थे.

ये तोह थे वह महाराज जो उच्चतम श्रेणी में आते थे. पर इसका मतलब ये नहीं था की केवल यही एकमात्र थे.

कई अन्य राजा महाराजा भी अपने अपने स्थान के संरक्षक थे. और इन्ही में से एक थे परम वीर सिंह.

जो आज अपने सामने कड़ी भारी विपक्षी सेना को देख रहे थे. भले hi उनका राज्य नया था और इतना प्राचीन नहीं था. तोह क्या हुआ? कही भी उनकी आँखों में भय नहीं था.

"महाराज! दुश्मनो की सेना की मात्रा हमारी सेना से अधिक है. ये हमारी कल्पना से भी ज़्यादा निकली."

परम वीर सिंह के समीप खड़े जब उनके सेनापति ने ये बात कही, तोह महाराज की बॉहे एक चिंतन में सिकुड़ गयी.

"हम अपनी rann-neeti के अनुसार hi आगे बढ़ेंगे." उन्होंने बिना दर्रे कहा.

"जी महाराज!" सेनापति इतना बोल शांत हो गया.

अभी महाराज हमले के लिए साड़ी सेना के साथ बढ़ने hi जा रहे थे की इतने में पीछे से उनके एक बूढ़े सलाहकार ने आके उन्हें रोक लिया,

"रुकिए महाराज!!"

"???" जब महाराज ने प्रश्नभरी निगाहो से अपने सलाहकार को देखा तोह उसने बताया.

"महाराज! चाहे कुछ भी हो जाए, किन्तु आप नील मणि को अपने तन से जुड़ा होने मत देना. वर्ण अनर्थ हो जायेगा."

महाराज जैसे इस विषय पर पहले भी चर्चा कर चुके थे. इसलिए अपना सर्र उन्होंने हाँ में हिलाया और आगे बढ़ गए.

फिर अगले hi शान, युद्ध भूमि में दोनों hi तरफ से सेनाये आपस में जा भिड़ी.

परन्तु किस्मत को जैसे कुछ और hi मंज़ूर था. भिड़ंत के दौरान, जब महाराजा परम वीर सिंह अपने विपक्ष के राजा के संग युद्ध कर रहे थे तोह उनका घोडा घायल हो गया और वह ज़मीन पर गिर पड़े.

*व्हूश*

तेज़ धार वाली तलवार उनके सीने को चीरने आयी पर उन्होंने समय पर पीछे होक खुद को बचा लिया. बस एक गलती हो गयी.

जब वह पीछे हुए, तोह उनके सीने में लटका नील मणि हवा में दोर्र से बंधे लहराया और तलवार की तेज़्ज़ धार से लगते hi, उनके गले में लटकी वह दोर्र बीच में से काट गयी. उनका नील मणि, ज़मीन पर जा गिरा.

वह अपना नील मणि उठाते की इस से पहले hi उनके दुश्मनो ने उन्हें घेर लिया. फिर क्या था? उन्हें समर्पण करना पड़ा. और समय के साथ, उनकी मृत्यु भी हो गयी.

और वह नील मणि? वह वही उस युद्ध भूमि में रेट में कही दफन होक रह गया. राजा परम वीर सिंह के वंशज भी धीरे धीरे ख़तम हो गए. एक इतनी बेहतरीन पीढ़ी का दुखद अंत.

नील मणि गुज़रते समय के साथ गायब हो गया. ठीक वैसे hi, जैसे राजा परम वीर सिंह इतिहास के पन्नो में कही गायब हो गए.

समय निकलता गया, और उस रेट के साथ साथ इतिहास पर भी नए समय की पार्टी और चादरे चढ़ती चली गयी.

इतिहास ने दोनों hi राजा परम वीर सिंह और नील मणि को भुला दिया.

और यही भूमि आज, बिजईपुर के नाम से जानी जाती है.

कहते है की समय का पहिया कोई रोक नहीं सकता. बात सत्य थी. यहाँ प्रवेश होते है फिर अँगरेज़. जो करने तोह व्यापार आये थे भारत में. पर जब उन्होंने देखा की यहाँ तोह raaj-tantrakal शासन है. न hi सरकार है और न hi कोई व्यवस्था.

तोह उन्होंने भोले भाले राजाओ को भिड़वाना शुरू किया. वह कमज़ोर का पक्ष लेते और उन्हें जितवा के उन् राजाओ को अपने अनुसार चलाते. शासन करने वाले तोह राजा hi होते थे पर नियम उन् अंग्रेज़ो के चलते.

ऐसे hi छल का सहारा और आपस में लोगो को भिड़वा भिड़वा कर उन्होंने ठान लिया. की नहीं, अब हम सिर्फ व्यापार hi नहीं, बल्कि शासन भी करेंगे.

और इसी दौरान, शुरू होता है वह समय काल, जिसने बिजईपुर को फिरसे आज़ादी दिलवाई.

जब जब अँगरेज़ यहाँ आते तोह वह बड़े बड़े सेठो और गांव के प्रधान से hi अक्सर मिला करते थे. मजबूरन हर एक को उनके इशारो पर नाचना पड़ता.

अपने hi अपनों के दुश्मन बन्न रहे थे. लेकिन इन्ही दुश्मनो के बीच एक परिवार ऐसा था, जो दिखने में भलाई दुश्मन था. पर असल में था लोगो का रक्षक, उनका करता धर्ता. उनका भगवान्!!!

वह हवेली जो अंग्रेज़ो की नज़रो में अपने hi लोगो की शत्रु थी. पर असल में पीठ पीछे वह अंग्रेज़ो के साथ न रह के अपने गांव के लोगो की मदद कर रही थी.








उस हवेली के लोगो को सभी पूजते थे. ये वह थे जो अंग्रेज़ो के सामने एक आध बन्न के उन् सभी को बचाये हुए थे. एक प्रकार से वह थे...

डबल एजेंट्स!!!

अँगरेज़ समझते थे की इस हवेली के बड़े सेठ उनके अनुसार चल रहे है. पर असल बात तोह ये थी की वह अंग्रेज़ो की इंटेल अपने लोगो में बाँट रहे थे. और ऐसी hi कर कर के, न सिर्फ अँगरेज़ भारत चोरर भाग निकले बल्कि बिजईपुर की इस भूमि को काम से काम खून बहाना पड़ा.

सिर्फ और सिर्फ, उस एक हवेली के लोगो के कारण.



ईयर 1997~



आज उसी बड़ी हवेली में झूले पर झूलते हुए एक 56-57 साल के बुज़ुर्ग अपना चश्मा कपडे से पोछने में लगे हुए थे.

बड़ा सा आँगन था और वही पर उनकी पसंदीदा बैठक थी.








Naam tha Dharam Singh. Jesa naam wesa kaam. Apne dharm ka paalan hi karte the.

"Prabha? Re Prabha???" Unhone andar awaaz lagaayi.

Toh ek aurat gatheele badan ki takreeban 38-40 saal ki andar ki rasoyi se haath me chai ka cup lete hue baahar aayi.

"Ye lijiye bade saahab." Usne chai dete hue kaha.

Dharam Singh abhi apni chai ki chuski ka aanand le hi rahe the ki itne me,

*Dhoom* *Dhadaam*

*Thud*

Baahar se zorr se thokne peetne ya kuch girne ki awaaz aayi.

*Cough* *Cough*

Aur chaukne ke chalte unhe phanda lag gaya. Prabha ne unki peeth thap-thapayi toh woh thoda shaant hue.

Dharam Singh : Ye zaroor meri beti hi hogi!

Unka anumaan ek dum sahi tha. Baahar se tezz qadmo ke saath ek khubsoorat ladki andar pravesh kii. Haatho me bada sa bag tha.

Dharam Singh : Ab kya ho gaya? Kya gira diya?

Ladki : Kya gira diya? Wahi aapka ghatiya toota foota tractor ka hissa. Jab jab aati hu, uss se ek na ek baar bhidti hi hu. Mein kahe deti hu pita jii. Kal agar ye khataara tractor mujhe firse dikha na toh mein isse khud nikaal ke fek dungi.

Dharam Singh (sighs) : Theek hai bhai theek hai! Shaam ko Jaydev se kehke hatwa dunga. Ab khush?

Ladki : Hmph! Aaj maa hoti toh aapko itne din woh khataara ghar me rakhne nahi deti.

Dharam Singh : Woh toh nahi hai ab par tu toh maaf karde meri maa! Kaha toh! Jaydev se hatwa dunga.

Ladki : Hmm!

Dharam Singh : Aur tumhare uska kya hua?

Ladki : Kiska?

Dharam Singh : Arre bhai uska...! Kya kehti ho tum usse?

Ladki : Research?

Dharam Singh : Haan wahi! Re... Resach!

Ladki : Resach nahi pita jii! Ree-seaarchhh!!!

Dharam Singh : Ye sab hatao. Angrezi mere palle na padti. Hmm! Ye kesa hai? Sanshodhan? Kyu? Sahi hai na?

Ladki (smiles) : Sahi hai!

Dharam Singh : Toh kya hua fir?

Ladki : Hona kya tha? Khudaayi jaari hai.

Dharam Singh : Arre jaldi se kyu nahi karti. Tumhe pata hai na, bina anumati ke ye sab ho raha hai. Abhi gaav ke logo ko pata chalega toh pradhaan samet poori panchayat yahi baithak baitha legi. Aur fir mujhe bolenge sab ki bade saahab aap apni beti ko sambhaalna nahi jaante.

Ladki (smiles) : Kisi ki itni majaal nahi ki woh aapke khilaaf kuch bol sake. Samast gaav jaanta hai ki hamaari peedhi kya karti aayi hai. Agar hum na hote toh angrezo ke shaasan ke chalte ye aadhe parivaar pehle hi gaayab ho gaye hote.

Dharam Singh : Hmm! par ab harr baar hum iska gungaan toh nahi kar sakte na? Tum jald se jald waha apna kaam khatam kar lo.

Ladki : Theek hai!

Dharam Singh : Warna koi na koi aake rai ka pahaad bana daalega iska.

Ladki : Sirf zameen hi toh khodi hai thodi sii, kaun sa koi khoon kar rahe hai kisi ka.

Dharam Singh : Zameen khodi hai par bina anumati ke.

Ladki : Arre par-!?

Dharam : Mmmm!!! Bas! Ab iss baare me aur charcha nahi.

Ladki : Hmph! Dekh lena! Jab kuch bada mere haath lagega na tab aap kahoge ki 'jug jug jiyo meri beti. Jug jug jiyo!'

Dharam Singh (smiles) : Bitiya rani ye tum apne pichle 7 sanshodhano me bhi keh chuki ho. Par phooti kaudi haath nahi lagi hai.

Ladki (blushes) : W-Woh! Tab mein seekh rahi thi pita jii! Aur wese bhi, shuruaat toh apni hi zameen, yaani ki apne hi gaav se karni chahiye na? Baad me desh videsh ghoomungi mein. Dekhna aap.

Dharam Singh : Dekhte hai bhai! Dekhte hai. Filhaal toh aisa lag raha hai mein kahi galat jagah kharcha toh nahi kar raha?

Ladki : Pitaaaaa jiiiiii!!! Kya aap bhi!!! Kya aapko kabhi ye jaan'ne ki iccha nahi hoti, ki ye kila wagarah, ye mandir masjid, ye puraani imaarato ke avshesh, kesi bani hongi? Unki deewaaro ne apne kaal me kya kya nahi dekha hoga? Keval bol nahi sakti hai ye. Par na jaane kya kya inhone tab dekha hoga. Hai na? Hai na? Kya aapko jaan'ne ka mann nahi karta? Ki ye sab kese bane honge? Kaarigiri inki kese hui hogi? Log tab kese jeete honge? Haan? Kahiye! Kahiye!

Dharam Singh : Hmm? Filhaal jo mein sabse zyaada jaan'ne ke liye icchuk hu woh ye hai ki pichle maah me aa jaane waala paisa, abhi tak Tilakram vyapaari ke yaha se aaya nahi hai. Hmm! Yaad dilaana hoga usse.

Ladki (chillaate hue) : Pitaaaaa jiiii!!! Aap bhi na!!

Dharam Singh : Hahahahahaha!

Aur inki hassi mazaak ki charcha jab khatam hui toh kuch derr baad woh ladki firse boli,

Ladki : Prabha Kaaki? Suman kaha hai?

Prabha (smiles) : Ghar par hai choti maalkin. Khaana bana rahi hogi apna aur apni iss maa ka.

Ladki : Kya aap bhi! Abhi woh choti hai. Sirf 14 ki hi hai. Usse inn sab kaamo me kyu lagaayi ho. Mere saath bhej diya karo. Kuch seekh liya karegi.

Prabha (smiles) : Ab kisi na kisi ko toh banana hi padega na choti maalkin.

Abhi ye sab baat kar hi rahe the ki itne me baahar se ek cheh-chahaati awaaz sunaayi padi.

Ek aur sundar aur pyaari sii ladki haveli ke andar bhaagte hue aayi,

"Bhhhaaaavvvnnnnaaaaa!!!!"

Woh bhaagte hue aayi aur apne saamne khadi ladki ko pakad gol gol ghoom firki lene lagi.

Aur ye ladki koi aur nahi, Bhavna ki ekmaatr saheli, Purvi thi.

Aur woh ladki jo Dharam Singh ki beti thi woh koi aur nahi Bhavna hi thi.

Bhavna : Arre!!? Arre chorr toh sahi. Aa gayi tum?

Purvi : Haan! Woh kaksha ka chorra aaj fir muh lada raha tha. Collar pakad ke jo do mene raseede hai na? Poore sehpaathi dekhte reh gaye. Hehehehe!!

Tabhi uske peeche se ek aur vyakti shirt pant pehne haveli me pravesh kiya,

"Ye kya tareeqa hai Purvi? Mene kaha hai na tumse ki Bhavna tumse 6 saal badi hai. Usse didi kehke bulaaya karo. Kya yahi sanskaar diye hai mene tumhe?"

Bhavna (smiles) : Mahesh chacha rehne dijiye! Iski toh aadat hai ab. Aise nahi jayegi.

Mahesh (sighs) : Tumne hi bigaad diya hai beta isse. Dheel de rakhi hai.

Bhavna (smiles) : Hum dono ki maa nahi hai. Toh aapas me judaav toh rahega hi na kaaka?

Mahesh : Ye...! *sighs* Sahi kaha beta!

Purvi : Hum dono ek dusre ki pakki saheli hai. Aur haan, mein Bhavna ko hamesha bhavna keh ke hi bulaungi. Koi maayi ka laal mujhe zabardasti didi nahi kehlwa sakta bhavna ke liye. Hmph!!!

Apni beti ki baato ko sunn, Mahesh bas muskura diya.

Dharam Singh : Mauhar lag gayi Mahesh?

Mahesh : Hmm? Jii bade saab! Ye dekhiye!

Aur woh aage badh kuch zaroori kaagzaat

Dharam Singh ko dikhaane laga.

Par abhi bhi jese yaha log kam the jo baahar se ek pandit jii bhi aa gaye. Jinhe befaaltu hassne ki ek beemaari thi.

Pandit jii : Mene kaha ram ram sa Bade saab!!! Hahahahahaha!

Dharam Singh : Arre aaiye aaiye! Pandit jii! Viraajiye!

Pandit jii : Hahahaha! Haan zaroor zaroor!

Dharam Singh : Bhavna ki kundli toh dekh hi lii hogi aapne fir. Jaydev ke haatho bhijwaayi thi mene.

Pandit jii : Arre ussi silsile me toh aaye hai bade saab! Hahahahahaha! Aur bhavishyavani bhi shuru kar dii hai mene.

Dharam Singh : Pehle Bhavna ke baare me toh bataiye kuch.

Pandit jii : Bhai kundli toh bohut badhiya hai Bade saab. Thodi dikkatein aa sakti hai aane waale varsho me. Sambhal kar rehna hoga. Lekin baad ka kaal accha maalum padta hai.

Dharam Singh : Hmm!

Aur aaj jese sabhi ne ek hi samay par ek saath milne ka tay kar rakha tha. Haveli ke ek hisse ka bada sa darwaaza khula aur andar se do vyakti baahar nikle.

Ek naujavaan aur ek aurat.

Bhavna ne jese hi uss naujavaan ko dekha toh muh fula lii aur khuspusaate hue apne aap me boli, "Ho gayi inki suprabhaat! Aurat ke saath!"

Bhale hi uss naujavaan ne Bhavna ki poori baatein na suni. Par usse andaaza zaroor lag gaya tha ki uski ye choti behan zaroor usse gaaliya hi bak rahi thi.

Woh muskura ke saamne bistar par baitha aur rakhi hui chai ko utha ke usse peene laga.

Dharam Singh : Aa gaye tum?

Bhavna ne dekha ki uske bade bhai ke sang baahar aayi woh aurat kese apne kapde theek karte hue baahar jaa rahi thi.

Aur ye dekh uska poora mood bekaar ho gaya.

Ladka : Jii pita jii!

Dharam Singh : Dekho pandit jii aaye hue hai. Bhavna ki kundli dikhaayi hai mene inhe. Tumhari bachi hai. Zara laa ke dikha do pandit jii ko. Aur pandit jii! Ye hai mera eklauta beta! Vijay! Zara iska bhi shaadi ka yog dekh ke bata dijiye!

Pandit ji : Arre laiye! Abhi bata deta hu haha! Wese toh jis varsh shani aur guru dono saptam bhaav ya lagn ko dekhte ho, tab hi vivaah ke yog bante hai. Par kundli laa dijiye. Usme sab samajh aa jayega. Aur bhavna bitiya ka toh bata hi raha hu Hahaha! Bitiya ki shaadi issi saal ho sakti hai. Aur agar nahi hui toh agle saal toh pakka hi hogi.

Dharam Singh : Accha! Pandit jii! Aap woh kuch bhavishyavani ka bhi bata rahe the?

Pandit jii : Arre haan! Mein kya kehta hu bade saahab. Meri bhavishyavani galat nahi ho sakti. Haha!

Bhavna : Aur sahi bhi nahi ho sakti.

Pandit jii : *cough* *cough* B-Beta zara paani laana toh!

Bhavna : Prabha kaaki!

Prabha : Jii! Choti maalkin! Abhi laati hu.

Dharam Singh : Toh pandit jii! Aap bataate kyu nahi ki Bhavna ki shaadi kis se hoegi?

Bhavna : Kya aap bhi pita ji?? Bhavishyavani karna pandit jii ka kaam nahi hai. Aap khamakha unko-

Pandit jii : Arre beta mene ye bhi shuru kar diya hai taaza taaza. Abhi bata deta hu. Hahaha!

Bhavna toh jese jaanti thi ki ye waale pandit jii se bhavishyavani nahi aati thi. Harr koi aise thodi bhavishya dekh sakta tha bhala.

Pandit jii : Bade saahab! Bhavna bitiya ki shaadi kis se hogi ye toh nahi bata sakta. Haan lekin 'ब' (ba) shabd se naam shuru hone waale vyakti se hi bitiya ki shaadi hoegi.

Bhavna : Mein nahi maanti! Hmph! Chal Purvi!!!

Aur Purvi ka haath thaame Bhavna waha se rafu chakkar ho gayi.

***

Par kehte hai na, jab kisi jagah par ek samay par kuch ghatit ho raha hota hai toh ussi samay par kisi aur jagah kuch aur chal raha hota hai.

Aisa hi kuch haal tha Bijaipur ke bagal se lage hue gaav ka. Harr sikke ke do pehlu hote hai. Agar Dharam Singh ki haveli jaani jaati thi apne nek kaamo, imaandaari, gaurav aur gaav waalo ki raksha ke liye.

Toh wahi iss gaav ki badi haveli jaani jaati thi apni beimaani, namak-harami aur apne bhrashtachaar ke liye.

Par vidambna dekhiye. Dono hi parivaar panpe, aur dono hi parivaar ka aadar satkaar hota tha.

Farq itna tha, ki ek ke liye tareef dil se nikalti thi aur dusre ke liye darr se.

Inn haveliyo ke dono hi mukhiya ke haatho me chaaku thi. Antar sirf itna tha ki,

Dharam Singh ki peedhi ek doctor ke bhaati chaaku ko chalaate hue apne logo ka ilaaj kar rahi thi. Toh wahi dusri haveli ki peedhi ek daaku ke samaan chaaku chalaate hue apne logo ko thikaane par laga rahi thi.

Aur iss badi haveli ke vartmaan ke mukhiya the ~ Harikiran Singh!!!

Ghumaavdaar muuche, sarr par rajasthani pagdi aur rajasthani bol chaal.

Haveli ke andar ke ek kamre se ek naujavaan nikla. Ye Harikiran ka suputr hi tha ~ Bhanu Prataap Singh!!!

Apne bete ko baahar jaate dekh woh usse tok diye,

Harikiran Singh : Kathe jaa rhya ho? (Kaha jaa rahe ho?)

Bhanu pratap : Mitra mandal ke saath yahi gaav ka chakkar maarne. Abhi aa jaunga.

Itna bol woh nikal gaya ghar se.

Mitro ki toli ko ikhatta kar woh sabhi gaav ki chhoriyo ko ghoorte, unhe alag alag naamo se pukaarte. Ye uss zamaane ki flirting hua karti thi.

Ladka 1 : Arre bhai! Chhorri ho toh saala bagal ke gaav ki Bhavna jesi!! Kya mast roop, mast chaal, mast adaa aur kya mast banawat hai.

Ladka 2 : Oye! Woh waha ki badi haveli ki iklauti beti hai. Agar bade saab ko pata chala na toh tere ko udaa denge.

Ladka 3 : Bade saab ke pehle toh hamara Bhanu hi uda dega isse. Hahahaha!

Ladka 2 : hahaha! Haan bhai! Ye toh puri duniya jaanti hai ki Bijaipur ki haveli aur hamare yaha ki badi haveli ke beech kitni badi takraar hai.

Ladki 1 : Sahi kaha! Par bhanu bhai bhi meri baat se sehmat honge. Kyu hai na? Kya Bhavna jesi chhorri ki baat alag nahi bhai?

Bhanu Pratap : Hmm! Baat alag toh hai. Usse bistar par litaane me ek alag maza aayega.

Ladke : Hahahahahaha!!!

Ladka 1 : Toh fir hum rishta pakka samjhe kya bhai?? Kab aana hai byaah me? Hahahaha!

Ladka 2 : Arre woh sab chorro!! Mene suna hai woh Bhavna gaav ke baahar khaali ilaako me khudaayi karwa rahi hai. Uski woh...! Kya kehte hai usse...! Re.. research ke liye.

Ladka 3 : Research? Ab ye kis bala ka naam hai?

Bhanu Prataap : Research maane sanshodhan! Jaach padtaal!

Ladka 1 : Bhanu bhaiya ko sab gyaan hai! Hahaha!

Bhanu Prataap (garv se collar chadhaate hue) : Hmm!!!

Ladka 3 : Toh usme kya?

Bhanu Prataap : Agar aisa hai! Toh hum kal hi Bijaipur me uss se waha mil ke aayenge.

Ladke : Hahahaha! Kya khoob soch rahe ho bhai. Bilkul! Bilkul!

Aur wo sabhi waha se fir ravaana ho gaye.

Par ye akele nahi the. Koi aur bhi tha jo iss waqt Mumbai ke station se ravaana ho raha tha.

"Sab rakh liya na theek se Birjesh??"

Manorath khade hue apne bete se puche. Unke saamne khada naujavaan, Brijesh unka bada ladka unke charan sparsh kiya aur bola,

Brijesh : Jii papa jii!

Uske saath hi uska chota bhai uska samaan rakhwa raha tha.

Karunesh : Bhaiya ho gaya hai sab! Aao baith jao!

Brijesh : Arre mein chala jaunga! Aap log nikal jaiye ab!

Tabhi ek aurat dheere dheere chal uske paas aayi,

"Sambhal ke jaana theek? Theek beta?"

Brijesh : Maa! Mene tumko kaha hai na ki itni chinta mat kiya karo! Aur khamakha aap sab yaha aaye. Mein akele aa sakta tha.

Manorath : Brinda!!! Baith jao! Dekho saans foolne lagi hai tumhari.

Brinda : Kya karu ab...! Dama ki beemaari jo hai mujhe. Bhaag nahi sakti iss se mein.

Karunesh : Maa tum idhar kinaare aa jao!

Brinda : H-Haan!

Train ki seeti baji toh Manorath Karunesh aur apni patni Brinda ko leke train se baahar aa gaye.

Aur dekhte hi dekhte, train chal dii!! Brijesh pehli baar akele aise itni door jaa raha tha. Wese toh woh kayi baar safar kar chuka tha. Par ye safar uske liye kuch anokha sa tha. Usse andar se ye mehsoos ho raha tha.

***

Jab agla din hua toh idhar Bijaipur me Bhavna ki subah hi umang ke saath hui. Aaj usse andar se kuch anubhooti ho rahi thi. Jese aaj jo usse chaahiye tha woh milne waala tha. Aaj behad sakaraatmak mehsoos kar rahi thi woh.

Fatafat apna samaan baandhe, kuch pustake apne jhole me rakhte hue woh Jaydev ke saath subah subah hi gaav ke uss khudaayi waale hisse me pohuch gayi.

Jaydev (smiles) : Mein toh kehta hu aap bekaar me mehnat kar rahi ho choti maalkin!

Bhavna : Woh kaise bhala?

Jaydev : Iske pehle aapke saath mein 7 baar aur jagah khudaayi karwa chuka hu. Par hamaare hath kuch bhi nahi laga hai.

Bhavna : Arre toh! Toh mehnat lagti hai! Dekhna! Iss baar zaroor kuch na kuch milega.

Jaydev : Pichli 7 baar se dekh raha hu choti maalkin!!

Bhavna : Ufffff ooo!! Aap sawaal jawaab bohut karte hai kaaka! Aur Shyaam kya kar raha hai?

Jaydev (smiles) : Shyaam ghar pe hai. Pareeksha ki taiyaari kar raha hai.

Bhavna : Oooo!!! Kherr! Aaiye! Arre waah! Aapke log toh itni jaldi pohuch gaye sawere! Haha! Sab acche rang me hai aaj haan!?

Jaydev ne order dete hue jab aadmiyo ko aur gehra khodne kaha toh khudaayi firse jaari ho gayi.

Pehle hi woh log itna gehra alag alag jagao par khod chuke the. Par mila kuch nahi tha.

Woh aadmi toh apni umeed pehle hi chorr ke aaye the. Lekin aaj jese unki kismat rang laane waali thi.

Khudaayi ke dauran achanak hi aisa ek pal aaya jab aadmiyo me chillaa ke Bhavna aur Jaydev ko bulaaya.

Jese hi Bhavna waha pohuchi usne fauran hi unhe auzaar chaalaane se rok diya.

Bhavna : Rukooo! Rukooo! Auzaar mat chalaana! Mujhe dekhne do!

Apne jhole me se kuch keemti chote chote auzaar nikaal Bhavna iss avshesh ke paas pohuchi. Ek akaarheen patthar the ye. Jiske baahar se kuch lohe ki dorri sii latak rahi thi.

Dheere dheere thok peet ke Bhavna ne uss patthar ki halki halki parat hataana shuru kii!

Usse ye karne me na jaane kitna waqt beet gaya. Par jese hi parat hati, aur woh chhipi hui cheeez uske saamne aayi.

Uski aankhein hairat aur khushi ke maare felti chali gayi.

Woh zorr se cheenkhi,

"Kaaaaaakaaaaaaa!!!!" Jaydev bhaagte hue uske sameep aaya. Aur aate hi waha jamm sa gaya. Uska bhi haal wahi tha jo abhi Bhavna ka ho rakah tha.

Bhavna ke kaanpte hue haatho ne uss cheez ko badi hi savdhaani se uthaaya. Uski aankho me ek chamak thi.

Aur haatho me...!

Neel mani!!!!!

***

"Fir kya hua? Fir kya hua????"

Kavya ki chanchal awaaz ne unn sabhi ko hosh me laaya. Bhavna ki baat sunte sunte woh kab iss ateet me kho gaye the, unhe iss baat ka pata hi na chala.

Woh Suman ki goad par sarr rakh ke laiti hui thi. Bhavna abhi bhi ussi khaat par maujood thi.

Toh wahi Veer deewaar se tik ke zameen par baitha hua tha. Aur uske kandhe par sarr rakh ke Tejal sab kuch sunn rahi thi.

Arohi aur Shweta bhi ek kone me baithe hue the. Aur Purvi Abhilasha kaaki ke saath chai ko chhaan rahi thi jo bann ke taiyaar thi.

Kavya : Bataiye na! Fir kya huaaa????

Bhavna Kavya ki utsukta dekh bas neeche dekh muskuraayi.

Veer ke maathe par ye dekh kuch lakeere bann gayi. Aisa laga jese uski maa niraasha me muskuraayi ho. Kuch chhipa the jese uss muskaan ke peeche.

Aur antatah Bhavna ke muh se kuch derr baad nikla,

"Fir kya hua? Fir...! Uss traasdi ki shuruaat hui beta!"

.

.

.

.

.

.

.

.

Aaj ke liye itna hi guys!

Ye updates bohut bareeki se likhe jaane waale hai. Aur inhe likhne me jo stress

hota hai. Woh sirf mein hi jaanta hu. Haha! Par aap logo ko mazaa zaroor aayega. Anyways, like thokna nahi bhuliyega. Aur revos dena bhi. And as always, keep supporting!

Dhanyavaad! ✨

 
मेगा अपडेट

अपडेट - 126 ~ हिस्ट्री ुनफोल्ड्स (2)


अब तक...

काव्य : बताइये न! फिर क्या हुआए????

भावना काव्य की उत्सुकता देख बस नीचे देख मुस्कुरायी.

वीर के माथो पर ये देख कुछ लकीरे बन्न गयी. ऐसा कागा जैसे उसकी माँ निराशा में मुस्कुरायी हो.

और अंततः भावना के मुँह से निकला,

"फिर? फिर...! उस त्रासदी की शुरुआत हुई बीटा!"


अब आगे...



सुबह का समय था. तकरीबन 7:30 बज रहे थे. अपने घर में हरिकीर्तन सिंह तखत पर बैठे आज का अखबार पढ़ रहे थे जब उनके दरवाज़े की देहलीज़ पर किसी ने दस्तक दी.

"क्या में अंदर आ सकता हु ताऊ जी?"

आवाज़ सुन्न, हरिकीर्तन सिंह ने जैसे hi ऊपर सर्र कर सामने खड़े शख्स को देखा तोह उनकी बॉहे ऊपर को चढ़ गयी. पर अगले hi पल वो मुस्कुराये और बोले,

हरिकीर्तन : अरे!!? ये में क्या देख रहा हु? मेरा भतीजा आया है? हाहाहाहा! आओ आओ!

सामने खड़ा व्यक्ति कोई और नहीं, बृजेश hi था.

मुस्कान लिए बृजेश अपना सामान उठा कर अंदर को आया और फ़ौरन hi हरिकीर्तन के पाँव पड़ने लगा.

हरिकीर्तन : अरे! बस बस! जीतो रह जीतो रह. ः! अरे खबर कर दी होती. भानु को भेज देता में. तकलीफ नहीं होती न!

बृजेश : इसमें तकलीफ की क्या बात ताऊ जी! घर तोह पता hi था. और स्टेशन से यहाँ आने के लिए सारे साधन तोह रहते hi है. फिर सोचा अचानक पहुँच के आप सब को भी आश्चर्य चकित कर दूंगा.

हरिकीर्तन : आश्चर्य चकित तोह कर दिया बीटा, सच में आश्चर्य चकित कर दिया.

उसने अपनी मूछ को घुमा कर बृजेश को घूरते हुए कहा.

बृजेश (स्माइल्स) : कोई और दिखाई नहीं दे रहा?

हरिकीर्तन (चिल्लाते हुए) : री सुनती हो??? देखो ज़रा कौन आया है!

उसके बुलावे पर अंदर से एक औरत बाहर निकल के आयी. ये थी हरिकीर्तन की धर्मपत्नी. उमा!

उमा : क्या हुआ? क्यों शोर मचा रहे हो?

बाहर आते हुए जब उसने भी बृजेश को देखा तोह चकित रह गयी. बृजेश ने उसके पाँव पड़े तोह मुस्कुरा कर उमा ने उससे आशीर्वाद दिया.

उमा : ये क्या अकेले आये हो? बाकी सब?

बृजेश (स्माइल्स) : बाकी सब घर पे है तै जी! सिर्फ में आया हु.

उमा : लो! ये क्या? सब को लाना चाहिए था न!

बृजेश : अरे अब...! ः!

हरिकीर्तन : हम्म! अच्छा किया आ गए. सही समय पर आये हो. खेती हुई है. तोह अच्छी ताज़ी ताज़ी सब्ज़िया और फल लेके जाना.

बृजेश : अरे...! इनकी क्या ज़रुरत हाहाहा!.

हरिकीर्तन : बस बस! बैठो! भूलो नहीं की हरिकीर्तन सिंह के घर पे हो तुम. वर्ण मनोरथ बोलेगा की खाली हाथ भेज दिया भैया आपने बृजेश को.

बृजेश : अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं हाहाहाहा!

हरिकीर्तन : हम्म!

बृजेश : भानु नज़र नहीं आ रहा कही. और अनु दीदी भी.

हरिकीर्तन : अनु का क्या है? सो रही होगी घोड़े बेचकर. और भानु तोह आज सुबह सुबह hi ये कह के निकल गया की खेत के चक्कर लगाने जा रहा है.

जब बृजेश ने ये बात सुनी तोह उसने भी खेत में जाने की ठान ली. वह और भानु ham-umr के थे. और एक व्यक्ति को हमेशा अपनी उम्र वालो से बात करना hi सुविधा जनक लगता है. बृजेश का भी यही हाल था.

बृजेश : में फिर होक आता हु खेत में. उससे ले भी आऊंगा.

उमा : अरे अभी अभी आये हो बैठो तोह सही.

बृजेश : आता हु न!

उमा : अरे पर...!

पर वो न माना. और दौड़ लगाते हुए वह से निकल गया. जवानी का समय था. जोश और उत्साह ज़्यादा भरा हुआ था.

मनोरथ और हरिकीर्तन! ये दोनों सेज भाई नहीं थे. मनोरथ के पिता और हरिकीर्तन के पिता आपस में कौसिन्स थे. जिस कारण से इनकी पीढ़ी भी उसी रिश्ते के हिसाब से चल रही थी.

बृजेश और भानु भी आपस में कौसिन्स hi थे. बिलकुल वैसे hi जैसे मनोरथ और हरिकीर्तन.

चलते चलते बृजेश खेतो में पहुचा तोह उससे खबर लगी की भानु तोह बगल के गांव में गया हुआ है. बिना आलस दिखाते हुए बृजेश भानु के बच्चे को पकड़ने के लिए जोश जोश में बगल के गांव hi चल दिया.

और खबर पाते पाते वह एक जंगल के इलाक़े में पहुँच गया. पर अभी वह घने पेड़ पौधे के बीच से निकल बाहर आया hi था की,

*धड़ाम*

"ाआररग्गहह!!!"

वह एक गड्ढे में जा गिरा. जैसे तैसे उसने खुद को बाहर निकाला. उसका हाथ चोटिल हो गया था. गिरते वक़्त हथेली रगड़ खायी तोह छील गयी. और खून निकलने लगा.

"टच!! क्या मुसीबत है!!!"

चोट पर ध्यान न देते हुए वह आगे बढ़ गया.

***

इधर बिजईपुर के बाहरी इलाके में जंगलो से थोड़ा पहले, भावना और जयदेव ने कुछ ऐसी खोज कर ली थी जिसके बारे में जान कर hi वह दांग थे. नीला चमकता हुआ वह बेशक़ीमती मणि.

भावना नहीं जानती थी की ये क्या था. कहा से आया था और इसके पीछे की कहानी क्या थी. पर वह इतना ज़रूर जानती थी की ये मणि बेहद hi कीमती था.

भावना : K-Kaaka???

उसके होंठ thar-tharaaye.

जयदेव : Y-Ye तोह...! ये तोह किसी प्रकार का मणि लगता है. K-Kya में इससे हाथ में थाम सकता हु?

भावना : क्यों नहीं! L-Lijiye! देखिये इससे छी के.

जयदेव ने जैसे hi उससे हाथ में थामा. उसकी सासें तेज़्ज़ हो गयी. मणि भारी था. मतलब ये जो कुछ भी था, नकली नहीं था. एकदम असली था.

जयदेव : B-Baap रे! ये क्या हाथ लग गया हमारे?

भावना की आँखों में एक चमक आ गयी. वह भारी जिज्ञासा लिए बोली,

भावना : काका! शायद हमने कोई बहुत बड़ी खोज की है. में बता सकती हु की ये जो कुछ भी है बहुत कीमती है.

जयदेव : जल्द से जल्द बड़े साहब को खबर देनी होगी छोटी मालकिन. ये तोह गजब हो गया है.

भावना : P-Pita जी देख के खुश हो जायेंगे. कहते थे न की ये लड़की क्या कर रही है. ये लो!!! इतनी बड़ी खोज कर दी है मेने आज. काका!!! आप जाइये और खबर दीजिये. में आती हु पीछे पीछे. इस पर से ये मिटटी निकालना ज़रूरी है. सावधानी का काम है ये.

जयदेव : जी! छोटी मालकिन!

उसके जाते hi,

"भाअवववनाआ!!!"

एक और फुलझड़ी का आगमन हुआ. पूर्वी भागते हुए उसके पास आयी. जब उससे पता चला की भावना ने नील मणि की खोज कर ली है तोह वह भी ख़ुशी से पहली न समायी.

पूर्वी : Y-Ye तुमने क्या ढूंढ निकाला? ये कितना चमकीला है. नीला रंग कितना ख़ूबसूरत लग रहा है. है न?

भावना : ज़रूर ये किसी बड़े इंसान की अमानत रहा होगा. इसके बारे में और तहकीकात करनी होगी पूर्वी. ये कई राज़ समेटे हुए है.

पूर्वी : तोह वह तुम्हे कैसे पता चलेंगे?

भावना (स्माइल्स) : समय के साथ सब पता चल जायेगा. और ये लो, हो गया ये साफ़.

मणि को धुल मिटटी से पूरी तरह आज़ाद करने के बाद, भावना अपना सारा ज़रूरी सामान बाँध कर पूर्वी को अपने साथ ली और चल पड़ी.

पर कहते है न की जब भी आप अच्छे काम के लिए कही जा रहे हो, तोह कोई न कोई अड़ंगा बन्न के आपके सामने ज़रूर हाज़िर हो जाता है.

"अरे मेरी दिलरुबा!!! मेरी jaan-e-mann! जाती कहा है अकेले लेके ये गरम बदन?"

पीछे से एक खराब सी आवाज़ ने उन्हें रोक लिया.

मुद के देखा तोह भावना के सामने वह मौजूद था जिससे वह कभी भी देखना पसंद नहीं करती थी.

भानु प्रताप सिंह!

ये लड़का चरित्र में तोह था hi नीच और गिरा हुआ, पर उस से भी बुरी बात ये थी की वह विरोधी दाल का था.

यानी भावना का परिवार और भानु का परिवार कई सालो से एक दूसरे के खिलाफ थे. अभी तक कोई बड़ी mat-bhed तोह नहीं हुई थी परन्तु mann-bhed ज़रूर था दोनों hi परिवारों के बीच.

चिंगारी लगी हुई थी बस एक हवा के झोके की ज़रुरत थी.

और शायद वह हवा का झोका आज hi लगने वाला था.

भानु अपने एक साथी के साथ भावना के जिस्म को ऊपर से नीचे तक घूर घूर के देख रहा था.

भानु : हाय क्या अदा है! क्या जिस्म है! क्या खूबसूरती है. क्या कहती है jaan-e-mann? बन्न जा मेरी! हम्म?

पूर्वी ने जब भानु की घिनौनी नज़र देखि तोह उसका खून खौल उठा, वह भावना के सामने आके अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे उससे छैक के कड़ी हो गयी,

पूर्वी : ोये! अपनी 2 कौड़ी की भद्दी शायरी कही और दिखाना. चलो फोटो यहाँ से.

भानु (गुस्से में) : ए लड़की! चल किनारे हट! अभी तोह तू बच्ची है. बड़ी हो जा! फिर बाद में तुझे भी लोल्लिपोप दूंगा. हाहाहाहा!

लड़का : हाहाहाहाहा!

पूर्वी : K-Kya बोलै...!!!!

भानु : अरे सुनाई नहीं दिया?? पहले अपने अंगूरों को संतरे बना ले. फिर आना!

लड़का : हाहाहाःहाहा!

पूर्वी : संतरे?

पूर्वी को तोह तब कुछ समझ न आया. भोली जो थी अभी. पर भावना को सब समझ आ चूका था. भानु प्रताप की घिनौनी बातो से उसका मुँह बिगड़ गया. गन्दी नाली के कीड़े से भी बत्तर था वह. उससे एक अकबकाई सी महसूस होने लगी.

पूर्वी का हाथ थाम उसने उसको अपने पीछे किया. और अपने झोले को कस के पकड़ के निडरता से कड़ी हो गयी.

भावना : दिमाग ठिकाने पर है या नहीं? शर्म नहीं आती! ऐसी बाते करते हुए?

भानु : बेशर्मो को किसी शर्म दिलरुबा?

भावना : सीधे ढंग से कहती हु. इस से पहले की मेरे गांव वाले तुम्हे यहाँ बदतमीज़ी करते हुए देख ले. सीधे तरीके से यहाँ से निकल जाओ वर्ण...!

कोई किसी को धमकाए तोह गुस्सा तोह आता hi था. और भानु प्रताप तोह अपने गांव के सबसे बड़े व्यक्ति का एकमात्र बीटा था. उसके सामने कड़ी ये नाज़ुक सी लड़की उससे धमकाए, वह ये कैसे सेहेन कर सकता था?

वह गुस्से में आगे बढ़ा,

भानु : वर्ण? वर्ण क्या? हाँ? वर्ण क्या? मारोगी? हाँ? मारोगी? लो! मारो! लो...! लो मारो न!

अपना गाल आगे कर वह एकदम उसके समीप आ गया.

उसके नज़दीक आते hi भावना को शराब की बू आयी. सुबह सुबह hi ये दुष्ट नशा कर के घूम रहा था. भावना की बॉहे वह गंध पाते hi सिकुड़ गयी.

भानु : मार न!! ारी मार न!

गुरूर तोह भावना में भी था. आखिर वह भी अपने गांव की सबसे बड़े परिवार की इकलौती लड़की थी. किसी की मजाल थी उस से इस तरह बात करने की? बस फिर क्या था.

*चाताआआकककककक*

जड़ दिया भावना ने एक रसीद के.

भानु का चेहरा इधर से उधर हो गया और थप्पड़ की गूँज भी वह फेल गयी. इतना जोरर का तमाचा था. उसका साथी जो अब तक हस्स रहा था वह भी शांत हो गया. और पूर्वी जो अब तक शांत थी वह अपना मुँह हाथ से धक् khil-khila उठी.

घनघोर बेइज़्ज़ती!!!

आग बबूला आँखें लिए उसने भावना को देखा और फिर उसका गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच गया.

भानु : तेरी तोह...!!

भावना : आअह्हह्ण!!!

भावना का हाथ थाम उसने एक झटके में मरोड़ दिया.

पूर्वी ये देख उससे चुर्राने आयी पर भानु ने उससे धक्का देके गिरा दिया. और उसका साथी भी उससे पकड़ के खड़ा हो गया.

पूर्वी : भाअवववणन्नआ!! Ch-Chorroooo मुझे!!!!

इस भिड़ंत में भावना का झोला गिर गया और उसमे से आधा सामान भी बाहर को आ निकला.

भावना : N-Naaahhhhiiiiii?!!!!

जिसका सबसे अधिक भय था वही हो गया. नील मणि भानु के सामने आ गया. उससे देखते hi उसकी आँखें चमक उठी.

और भावना को चोरर वह नील मणि पर झपटा.

भानु : ओह्ह्ह्ह!!! तोह इसके लिए इतनी जल्दबाज़ी हो रही थी हाँ!!! हाहाहाहा! लगता है तुमने खुदाई में से पाया है इससे है न?

भावना : कुट्टी!!! वापस कर उससे! वापस कर!!! वह मेरा है!

भानु : जिसने पाया! उसका हुआ! अब चुकी इससे मेने पा लिया है तोह ये मेर-

वह इस से पहले की कुछ कह पाटा, भावना ने अपने झोले से एक हसिया निकाल उसके हाथ की ऑर्डर फेक मारी. वह ये अपनी हिफाज़त के लिए रख के घूमती थी.

इधर हसिया हवा में उड़द घुमते हुए आके भानु के हाथ को लगी और चमड़ी को चीरते हुए अंदर धस्स गयी.

"Aaaaaaaaaaaaaaarrrrrggghhhhh!!"

एक बिलबिलाती हुई चींख वह जोरर से गूँज गयी. उसका साथी घबराते हुए पूर्वी को चोरर उसके पास आया. खून इतनी तेज़्ज़ी से बाहर आ रहा था की पूरा कपडा लालम लाल होता जा रहा था.

"ाआररग्गहह! मर्डर गया...! मेरा हठ्ठ!!!! कुटियाआ!!!!"

ज़मीन पर उलट पुलट कर भानु घबराहट में चीखता चिल्लाता रहा. और अपने हाथ से खून निकलता देख उसकी जान और सूख गयी.

भावना : पुऊररववववीईई!!! भागगग!!! कमीनी!! यही तेरे किये की सजा है...!!

अपना झोला और नील मणि उठा के भावना पूर्वी का हाथ थाम वह से भाग निकली.

शायद यही वह हवा का झोका था. जो अब चिंगारी को आग में तब्दील करने वाला था.

सासें और धड़कने तेज़, फुर्ती में भागते हुए वह लगातार पीछे की ऑर्डर देखती रही. कही उसका कोई पीछा तोह नहीं कर रहा था?

और इस भाग दौड़ में,

भावना : अह्ह्ह्णण!!!!

वह भागते भागते बिना सामने देखे hi किसी से जा ताजराई.

दोनों जब गिरे तोह दोनों ने एक दूसरे को देखा.

भावना : हहह!?

उसके सामने कोई नया लड़का था. पहनावे से किसी शहर का प्रतीत हो रहा था.

उठाते हुए माफ़ी मांग कर उस लड़के ने भावना को भी उठाया.

पूर्वी : ोये! देख कर नहीं चल सकते क्या? और कौन हो तुम?

लड़का : में बृजेश!!! एक बार फिरसे माफ़ी चाहता हु.

भावना उसकी इन् बातो को सुन्न, उससे देखने लगी. गलती उसकी थी परन्तु फिर भी ये सामने खड़ा व्यक्ति उस से माफ़ी मांग रहा था. तोह वही बृजेश का भी कुछ ऐसा hi हाल था. सामने मौजूद इस ख़ूबसूरत लड़की को देख उसका मैं मचल उठा.

जब पूर्वी ने उसका नाम सुना तोह वह भावना को चिकोटी kaat'te हुए उसके कान में बोली,

"इसका नाम तोह 'बा' से आता है. हेहेहे! पंडित जी कही इसकी hi बात तोह नहीं कर रहे थे? क्यों?"

उसकी बात पर भावना शर्मा के रह गयी और तपाक से पूर्वी की पीठ पर उसने एक गुम्बा दे मारा.

*बमंम*

पूर्वी : ैईयू!!!!

भावना : दरअसल! गलती हमारी है. तोह हम माफ़ी मांगते है. और ये क्या? आपके हाथ से तोह खून बह रहा है!

बृजेश : ओह्ह! ये! हाँ! वह में गिर गया था. शहर में ऐसे गड्ढे छिपा के कोई नहीं रखता न.

भावना (स्माइल्स) : फसल को बड़े जानवरो से बचाने के लिए है वह. रुकिए ज़रा!

अपने झोले से एक रुमाल निकाल भावना बृजेश के हाथ में बाँधने लगी. दोनों hi पल पल एक दूसरे को देख रहे थे और दोनों की hi धड़कने तेज़्ज़ थी. आज ये पहली बार था जब दोनों अपने से विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित थे.

विडंबना भी देखो. एक लड़के के हाथ से खून बहा के आयी थी भावना. और अब दूसरे लड़के के हाथ से खून बहने पर उससे अपना रुमाल बाँध रही थी.

बृजेश : वैसे आप दोनों बड़ी जल्दी में लग रही थी. क्या हुआ?

भावना : अहहं! W-Woh! वह हमारे पीछे जंगली जानवर पद गया था. इसलिए!

बृजेश : ओह्ह्ह!

भावना : अरे नहीं! H-Hum जल्दी में है. हमे निकलना होगा.

बृजेश : आपने अपना नाम नहीं बताया!?

भावना : में...! भावना!

पूर्वी : हाँ! और में पूर्वी! बिजईपुर के सबसे बड़े घराने से है हम. समझे? नाम याद रखना और- मममपहहहह???

इस से पहले की पूर्वी पूरी पंचायत बघराती, भावना ने उसका मुँह हाथ से बंद किया और उससे पकड़ वह से भाग निकली.

इधर बेचारा बृजेश अपने हाथ में बंधे उस रुमाल को hi देखता रह गया.

***

घटना हो तोह गयी थी. पर इतने बड़े इस हादसे की खबर सनसनी की तरह फेल गयी. जैसे hi हरिकीर्तन सिंह को ये बात पता चली तोह उनका गुस्सा किसी सुटली बेम की तरह पहात उठा.

"धरम सिंघहहहह!!!!!!!"

चिल्लाते हुए उन्होंने अपने बिस्तर के पास राखी बन्दूक उठायी और नौकरो और लौंडो को इखट्टा कर सीधा बिजईपुर के लिए रवाना होने लगे.

उमा : कहा जा रहे है आप बन्दूक ताने? बिटवा यहाँ मर्डर रहा है और...!

हरिकीर्तन : तुम चुप रहो!!! और ए डॉक्टर...!!

डॉक्टर : J-Jiii!!!?

हरिकीर्तन : हमारे बेटे को कुछ हुआ तोह तुम नाही बचोगे! समझे?

डॉक्टर : J-Jii! K-Kuch नहीं होगा. मेने इलाज कर दिया है. B-Bas आराम की ज़रुरत है.

हरिकीर्तन : घर में खबर कर दे की जब तक मेरा बीटा ठीक नहीं हो जाता तू यही रहेगा. समझा? और तेरा रहने और खान पान की व्यवस्था हम करेंगे. समझा?

डॉक्टर : J-Jii!

जो मेल नर्स था वह भी काँप के बृजेश के हाथ में पट्टी बाँधने लगा.

बृजेश : ताऊ जी! में भी चलता हु!

हरिकीर्तन : तुम चलने लायक हो?

बृजेश : बिलकुल! बस छोटी सी खरोच है.

हरिकीर्तन : ठीक है!

बृजेश बेचारा इस बात से अभी तक अनिभिज्ञ था की जिनके घर में वह धावा बोलने जा रहे थे उसी घर की इकलौती पुत्री वही भावना थी.

तभी, भानु का वही दोस्त दौड़ते हुए अंदर आया और हाथ जोड़ के खड़ा हो गया,

लड़का : S-Sarkaar! सरकार! जल्दी जल्दी में और भानु भैया को बचाने के चक्कर में में आपको एक बड़ी बात बताना भूल गया. माफ़ कीजियेगा!

हरिकीर्तन : किसी बात? जल्दी कहो!!!

लड़का (कांपते हुए) : J-Jii! W-Woh! उस धरम सिंह की लड़की को खुदाई में से एक बेहद कीमती नील पत्थर मिला है. शायद उसकी कीमत लाखो में होगी.

हरिकीर्तन (फ्रोंस) : हम्म? नीला पत्थर?

लड़का : J-Jii!

हरिकीर्तन : ठीक है! तुम जा सकते हो!

कहते हुए वह खुद भी तेज़्ज़ क़दमों के साथ आंधी की तरह वह से निकल गए.

उमा : न जाने अब क्या होगा.

जब दो बड़े घराने एक दूसरे से टकराते थे तोह यही होता था. फिर ना hi पुलिस कुछ कर पाती थी और न hi गांव का प्रधान या पंचायत. वह बस किनारे से घटना को घटते हुए hi देखते थे फिर.

***

इधर भावना के घर में ख़ुशी का माहौल था. जयदेव ने खबर दे दी थी और सभी भावना का इंतज़ार कर रहे थे. सभी उस नील मणि को देखने के लिए आतुर थे.

जैसे hi भावना हफ्ते हुए घर में आयी, धरम सिंह ख़ुशी से उठ खड़े हुए और अपनी बेटी को गले से लगा के हस्सन लगे.

धरम सिंह : हाहाहाहा! अरे में क्या समझता था और क्या हो गया आज! भाई तुमने तोह कमाल कर दिया बिटिया रानी! चलो! अब जल्दी से दिखाओ, उस नीले पत्थर को! कहा है वह?

भावना ने अपनी सासे दुरुस्त कर जैसे hi वह नील मणि दिखाया तोह धरम सिंह और गदगद हो उठे. खबर भी पुख्ता थी और नील मणि भी.

धरम सिंह : हाहाहाहा! भाई वाह! अगर मेरी पारखी नज़र सही है तोह इसकी कीमत लाखो में होगी!

भावना : Y-Ye बेचने के लिए नहीं है पिता जी!

वह चिढ़ते हुए बोली.

धरम सिंह : अरे हाँ भाई हाँ हाहाहाहा!

अंदर hi अंदर भावना बेहद घबराई हुई थी. एक बड़े काण्ड को वह अंजाम देके आयी थी. पर कही न कही एक आश्वासन भी था की भला उसके परिवार से भिड़ने का डैम आखिर किस्मे है? किसी में नहीं!

विजय जो वही बैठा हुआ था उसने भी जब मणि देखा तोह वह भी हैरत में रह गया.

विजय : पिता जी! ये सच में बेहद कीमती लगता है. कही राजाओ महाराजाओ का तोह नहीं ये? जो हमारी भावना ने खोज निकाला हो?

धरम सिंह : हो भी सकता है बीटा! हो भी सकता है. इसकी जांच hi बता पायेगी इसका सच.

भावना : अब तुम क्यों आ गए हाँ? जाओ अपनी सुप्रभात मनाओ रोज़ की तरह.

विजय (स्माइल्स) : अरे छोटी बहना, इतना नाराज़ क्यों रहती हो मुझसे.

भावना : हम्फ!

धरम सिंह : बल्कि, मेरा ख़याल कुछ और है.

भावना : क्या?

धरम सिंह : रुको ज़रा!

अंदर जाते हुए वह बाहर एक दोर्री लेकर आये. और उस नील मणि को उसमे बाँध के उन्होंने विजय के गले में दाल दी.

विजय : ये!?

भावना : पिता जी???

धरम सिंह : क्या पिता जी??? देखो कितना जांच रहा है ये इसके गले में. हाहाहा!

अभी कुछ देरर hi हुई थी की अचानक hi,

"'धरम सिंघहहहह!!!!"

"बाहर निकल!!!!"

क्रोध से भरी एक दहाड़ ने पूरे घर को हिला दिया.

हरिकीर्तन अपने आदमियों के साथ और बृजेश को लेके सीधा धरम सिंह की चौखट पर आ धमका.

*थुड़*

एक साथ इतने आदमियों को देख भावना संग सभी स्तब्ध रह गए. ये अचानक क्या हो रहा था?

हरिकीर्तन : हराममम खोर्रर्र!! तेरी ये मजाललल???

विजय : ज़बान संभाल के बात करो मेरे पिता जी से!!! और हिम्मत कैसे हुई इस घर में क़दम रखने की?

हरिकीर्तन : चुप कर मादरचोद!!! कहा है तेरी वह छिनाल बेटी?

जब ऐसे शब्द विजय ने सुने तोह वह चिल्लाते हुए हरिकीर्तन पर कूद पड़ा.

विजय : ख़बरदाहाररर!!!! एक शब्द भी मुँह से निकाला तोह-

पूरी चौखट में एक कोहराम मच गया. विजय ने हरिकीर्तन की कल्लोर पकड़ उससे दबोचा हुआ था.

"ैय्यिययीईइ!!!" और दोनों hi पक्षों के आदमी आपस में शोर करते हुए भीड़ गए.

बृजेश जैसे hi पीछे से घर के अंदर आया तोह सब कुछ देख चौंक गया.

पर सबसे बड़ा झटका उससे तब लगा जब उसकी नज़र उस शख्स पर जा कर तिकी.

भावना!

'N-Nahiii!!!'

दोनों ने एक दूसरे को देखा और दोनों को hi अनेको अनुभूतिया उस एक पल में महसूस हो गयी.

दुबारा मिलने की ख़ुशी, इस तरह मिलने का ग़म, दोनों विपक्षी थे उसकी पीड़ा, और फिरसे न मिल पाने का एक डर.

आँखों hi आँखों में जैसे हज़ारो बातें बया हो गयी.

और तभी,

*बंग* *बंग*

गोली चल गयी.

*साइलेंस*

एक ख़ामोशी वह छा गयी. हरिकीर्तन ने दो राउंड हवा में अपनी बन्दूक से फायर कर दिए थे.

पर वह अकेला नहीं था. धरम सिंह के हाथ में भी अब एक बन्दूक थी. भय का माहौल बन्न चूका था.

हवेली के बाहर भारी मात्रा में भीड़ जमा हो गयी. हर्र आदमी बाहर खड़े अंदर हो रहे हाल के बारे में jaan'ne के लिए इच्छुक था. पर किसी की हिम्मत नहीं थी की एक कदम भी आगे बढ़ा के देख सके.

ये थी ताक़त वह के दोनों परिवारों की.

हरिकीर्तन : चुप!!! एकदम चुप!!!! अपनी बेटी को सामने ला धरम सिंह!!!!

धरम सिंह : आज पहली बार किसी ने इस घर में इतनी हिम्मत दिखाई है. दाद देता हु. पर अब अगर एक भी अपशब्द मेरे परिवार के किसी भी सदस्य के लिए निकला तोह सर्र धड़ से अलग कर दूंगा हरिकीर्तन सिंह!!!!!

हरिकीर्तन (चिल्लाते हुए) : धरम सिंघहहहह!!!!! अपनी बेटी को सामने ला!!! वक़्त जाया मत कर!!!

धरम सिंह : आवाज़ और बन्दूक नीचे हरिकीर्तन सिंह! नीचे...!

मजबूरन हरिकीर्तन सिंह ने अपनी बन्दूक नीचे कर ली.

हरिकीर्तन : जल्दी! अपनी बेटी को सामने लाओ.

धरम सिंह : भावना? सामने आओ! बताओ क्या हुआ है!?

पीछे से भावना सामने आयी तोह हरिकीर्तन का सीना गुस्से में ऊपर नीचे होने लगा.

हरिकीर्तन : तुम्हे खबर भी है की तुम्हारी इस बेटी ने क्या किया है?

धरम सिंह : भावना! कहो! क्या हुआ?

भावना : P-Pita जी! मेरी कोई गलती नहीं है. इनका बीटा भानु प्रताप सिंह, शराब के नशे में धुत्त होक मुझे और पूर्वी को चढ़ रहा था. पूर्वी को धक्का भी दिया. और नील मणि छिना लिया था हमसे. खुद को बचाने के लिए मेने वह हसिया उसके हाथ पर फेक दी. बस!

हरिकीर्तन : बस? पागल लड़की! तू जानती भी है की तू क्या कह रही है? मेरा बीटा वह खून से लथपथ घर लौटा है. और बिस्तर पर बेहोश डाला हुआ है. अगर उससे कुछ हुआ तोह तेरी ये बेटी भगवान् को प्यारी हो जाएगी धरम सिंघ्ह!!!!

धरम सिंह : उससे छी कर तोह दिखाओ. हाथ उखाड़ के फेक दूंगा.

विजय : अपने आदमियों को लेके दफा हो जाओ यहाँ से.

हरिकीर्तन : धरम सिंघहहह!!!! मेरे गुस्से का अंजाम जानता नहीं है तू!!!!

धरम सिंह : और तुम मेरे गुस्से का. हिम्मत कैसे हुई तुम्हारे बेटे की मेरी बेटी से बदतमीज़ी से पेश आते हुए?

हरिकीर्तन : धरमममम सिंघ्ह!!

इस बार जब वह चिल्लाया तोह दोनों hi पक्ष फिर से भीड़ गए. हाथ चलने लगे और मार पीट शुरू हो गयी.

चींखें फेल गयी और सामान अस्त व्यस्त हो गया. अफरा तफरी मच गयी.

हरिकीर्तन : अगर ऐसा है तोह ठीक है धरम सिंह!!!

*क्लच*

विजय : हहहहहह???

हरिकीर्तन ने एक झटके में hi विजय के सीने से वह नील मणि निकाल लिया.

और इधर,

*बंग*

"अअअअअरररग्घहहहहहह!!!!!"

धरम सिंह के हाथ से बन्दूक चल गयी. गोली जाके हरिकीर्तन की जांघ पे लगी और वह धड़ाम से गिर गया.

फिर क्या था? आदमी लोग भिड़े और हरिकीर्तन के नज़दीकी उससे जीप में बैठा कर वापस ले गए.

सिवाए एक शख्स के.

बृजेश!!

बृजेश : आज जो कुछ भी हुआ, वह अच्छा नहीं हुआ. मेरी आप से गुज़ारिश है की इस बात को आगे न बढ़ाइएगा प्लीज.

धरम सिंह : निकल जाओ यहाँ से. इस से पहले की मेरी बन्दूक दुबारा चले.

बृजेश : N-Nahi!! मेरा एक प्रस्ताव है. सुनिए तोह!

धरम सिंह : कहो!

बृजेश : एक तरीक़ा है जिस से ये सब कुछ रुक सकता है.

धरम सिंह : K-Kya?

***

समय का पहिया आगे बढ़ा और सब कुछ बृजेश के उस प्रस्ताव के हिसाब से hi हुआ.

प्रस्ताव क्या था?

प्रस्ताव था...! बृजेश और भावना की शादी.

दोनों एक दूसरे के संग इस प्रेम की दोर्र से बांध चुके थे. पर ये सब इतनी आसानी से थोड़ी हुआ. बहुत बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ था.

हरिकीर्तन को जब ये पता चला की बृजेश भावना को बया करवा के लाया है तोह सब के सामने उससे दो तमाचे जड़ दिए थे. पर अब होनी को कौन ताल सकता था?

न hi उसके हाथ मणि लगा, न hi भावना, और तोह और खुद को और बेटे को भी घायल होना पड़ा.

बदले की भावना उसके ज़हन में बैठ चुकी थी. आज नहीं तोह कल, वह ये बदला लेने hi वाला था. फिर चाहे मनोरथ के खिलाफ hi क्यों न जाना पड़े.

आज रात्रि के इस प्रीती भोज में वह सभी शामिल थे. सर्र पर पल्लू दाल भावना, घर की नयी बहु hi सब को खाना परोस रही थी.

हरिकीर्तन और भानु प्रताप भी बैठे हुए थे. पर उनका मक़सद यहाँ आके harsh-o-ullaas से जश्न मनाना नहीं था. बधाईया देने नहीं आये थे वह यहाँ. उनका मक़सद कुछ और hi था.

देरर रात जब सोने की बात आयी तोह दोनों बाप बेटे अपने कमरे में खुसुर फुसुर करने में लगे हुए थे.

इत्तेफ़ाक़ था जो भावना उसी वक़्त वह से गुज़री और उसने ये खुसपुसाहट सुन्न ली.

किवाड़ के बाहर खड़े होक जब उसने कान लगा के सुना, तोह उसके पेर्रो टेल ज़मीन खिसक गयी.

भानु : पिता जी! आगे क्या करना है?

हरिकीर्तन : करना क्या है? मेरे बेटे को हानि पोहुंचायी है उस धरम सिंह ने. भुला नहीं हु में!!! हम भी वही करेंगे! पर उसके बेटे के साथ नहीं...!

भानु : तोह?

हरिकीर्तन (स्माइल्स) : उसके पोते के साथ!!!

भानु : मतलब?

हरिकीर्तन : भावना जिस बच्चे को जन्म देगी उससे हम-

भानु ये समझते hi थोड़ा घबरा गया.

भानु : पर हम फसेंगे नहीं?

हरिकीर्तन : नहीं! वह सब तुम मुझपे चोरर दो.

भानु : पर पिता जी! अगर हमारी आपसी बात किसी ने सुन्न ली और वह भांप गया तोह? अगर उस भावना ने घर में सबको बता दिया तोह?

हरिकीर्तन (स्माइल्स) : तोह ये हमारे लिए और भी आसान होगा! हमे उस पर हावी होने का एक मौका मिल जायेगा. में मनोरथ को भड़का दूंगा की तुम्हारी बहु ऐसी है. पहले hi भवन तुम पर हमला कर चुकी है. ज़रा सोचो! फिर क्या होगा इस बंधन का?

भानु (स्माइल्स) : ये रिश्ता टूट जायेगा! और भावना अकेली....!

हरिकीर्तन : बिलकुल सही समझे हो! हाहाहाहा!

भानु : कमाल कर दिया पिता जी आपने!! हाहाहा!

जब भवन के कानो में ये बातें गयी तोह उसका पूरा शरीर काँप उठा. किस तरह के लोग थे ये? इंसान थे या जानवर? नवजात को मारने की साज़िश उसके hi घर में रची जा रही थी.

ऊपर से अब वह बृजेश को खबर भी नहीं दे सकती थी. कही उस हरिकीर्तन का अनुमान सही निकल गया तोह? कहा जाएगी फिर वह...!?

उसका हाथ अपने आप अपने पेट पर गया. एक नयी जान पहले hi उसके अंदर जन्म ले चुकी थी.

'N-Nahii!! ये नहीं हो सकता!!! में इससे कुछ नहीं होने दे सकती!!'

और फिर उसने अपने जीवन का सबसे बड़ा कदम उठाया!!

संशोधन कार्यो में उसकी नौकरी लग चुकी थी. ये बहाना बना के की वह एक वर्ष के लिए विदेश में रिसर्च करने जा रही है. वह मुंबई चोरर के निकल गयी.

कितनी hi लड़ाई हुई उसकी बृजेश से पर परिस्थितिया ऐसी थी की सबसे अच्छा कदम यही था.

बृजेश को बिना बताये की वह प्रेग्नेंट है वह मुंबई चोरर निकल गयी. एक साल के लिए. ये कह के की वह विदेश जा रही है. पर थी वह भारत में hi. और इसी अन्तरकाल में हुआ जन्म एक नन्ही सी पारी का.

जिसका नाम उसने रखा...!

तेजल!!!

पर दो घटनाएं और जन्म ली इसके तहत.

पहली, बृजेश की माँ बृंदा का बीमार पड़ना. और दूसरी, भावना के मायके में हरिकीर्तन सिंह का वापस से हावी होना.

"पूर्वी!!! तुम इसका ध्यान रखना!!! में जल्द hi लौटूंगी!!"

अपनी कुछ महीनो की बच्ची को पूर्वी के हवाले चोरर, वह वापस से मुंबई जाने को तैयार थी. सबसे ये बात छिपी रही की उसने एक बच्ची को जन्म दे भी दिया है.

पूर्वी : ये बोहोत छोटी है भावना!! इसके दूध का पोषण इससे कैसे मिलेगा? में माँ नहीं हु. तुम जानती हो!

भावना : में जानती हु! पर तुम्हे चिंता करने की ज़रुरत नहीं. बगल में hi जो पडोसी है. मेने उनसे बात कर ली है. एक माँ मेरी hi तरह, तेज को दूध पिलाने के लिए तैयार है. तुम इससे रोज़ ले जाय करना. और ध्यान रखना इसका. हाँ? मेरी जान है ये!

भावुक होते हुए उसने तेज के माथे को चूम लिया.

भावना : जल्द लौटूंगी मेरी बच्ची! बोहोत जल्द!!

और अपने ासु पोछते हुए वह वह से निकल गयी. अपनी छोटी सी बच्ची को उसी हाल में चोरर.

पर कहते है न, जान है तोह जहाँ है.

भले hi उससे इस बात को छिपाना पड़ा. पर आज उसकी बच्ची सही सलामत थी.

मुंबई पॅहुचते hi उसने वापस से अपना पत्नी धर्म निभाना शुरू किया. बृंदा की सेवा, बृजेश को खुश रखना, मनोरथ के साथ कभी कभी फलसफा की बातें, अपनी देवरानी सुमित्रा के साथ अच्छे से घुलना मिलना.

उसने जैसे इस एक साल की जरर मौजूदगी के बदले अब सबका दिल जीत लिया था.

पर रातें हमेशा चिंताओं में गुज़रती. हर्र रात वह तेजल के लिए बेचैन रहती.

तोह वही पूर्वी की मुलाक़ात वही अरुण से हुई और दोनों में प्रेम जाग गया. हुआ वही जो नियति को मंज़ूर था.

दोनों अपने अनुराग के चलते एक साथ hi रहने लगे. पूर्वी के पिता को ये खबर लग चुकी थी. पर शुरू से hi वह एक खुले विचार के व्यक्ति थे. और उस से ज़्यादा उनकी ज़रुरत धरम सिंह के घर में थी. तोह उन्होंने भी इस बात को जाने दिया.

परन्तु,

एक हादसे ने सब कुछ बदल के रख दिया.

हरिकीर्तन सिंह जिससे अंजाम देना चाहता था. वह हो गया.

इससे आज भी सारा बिजईपुर मौत की रात के नाम से याद रखता है.

वह हादसा जिसने सब को हिला के रख दिया.

भावना को भी जैसे बस कुछ पालो देरर से खबर लगी. क्युकी उसके सामने था,

ये दृश्य!!!





"N-Nahiiiiiiii!!!!"

अपने पेर्रो पर गिर वह बेसुध सी वही जम्म गयी. कुछ पालो की देररि थी बस. और ये हो गया.

उसके बगल से सुमन, जयदेव, और अभिलाषा काकी कड़ी हुई थी.





बरामद हुई थी तोह बस एक चीज़!

नील मणि!!!

यही वह चीज़ थी जिससे हरिकीर्तन सिंह ढूंढ न पाया. आग किसने लगवाई थी. ये बात भी सभी जानते थे.

भावना ने क्या कुछ नहीं खो दिया? इस वक़्त कोई भी शब्द या वर्णन उसकी हालत को बता नहीं सकते थे.

एक बाप, एक भाई, और काका काकी. सभी को खो दिया. तोह वही सुमन ने भी अपनी माँ को उस झुलसती हवेली में खो दिया जो आग की गर्म लपटों से लगातार जल रही थी.

सारा गांव देखता रहा. पर सब मौन थे. और विपदा का रूप देके सभी ये बात भुला दिए.

पर भावना ने नहीं...!

कापते हाथो से उसने नील मणि को अपने सामने किया. अपनी खुद की जलती हुई हवेली के सामने. उन् आग की लपटों की ज्वालायें उस चमकीला पत्थर पर प्रतिबिंबित हो रही थी.

"आज में भावना सिंह, धरम सिंह की पुत्री और विजय सिंह की बहिन ये प्रतिज्ञा लेती हु!!! की एक दिन...! जिस तरह इन् सब ने मेरे परिवार को मारा है!!! उसी तरह में भी इनके परिवार को ख़त्म करुँगी!!! "

रट रट सुमन उसके सीने से लग गयी.

"डीड्डडीई!!!"

भावना : काकी! काका! अब कुछ शेष नहीं रहा. सब ख़तम हो गया! चलिए!

अपने आसुओ को पॉच वह मुद के निकल गयी. जैसे एक अलग इंसान की आत्मा उसके अंदर प्रवेश कर गयी हो. यही वह समय था, जब चंचल चुलबुली भावना मर्डर चुकी थी. और उसकी जगह जन्म ली, एक समझदार, प्रौढ़, और निडर भावना!

***

कर भला हो भला! Sunn'ne में अच्छा था. परन्तु भावना के लिए व्यवहारिक नहीं था. इस बीच भावना को एक संतान और प्राप्त हुई.

वीर!

पर समय था सभी के सामने हरिकीर्तन की असलियत सामने लाने का. घर पे उसने हरिकीर्तन पर इलज़ाम लगाना शुरू किये. अब था hi क्या उसके पास खोने को?

पर भगवान् को जैसे अब भी कुछ और hi मंज़ूर था.

हरिकीर्तन : ये देखो! ये देखो! मनोरथ! में न कहता था! की ये लड़की दिमाग से पागल है. देखो ज़रा अब क्या बकवास कर रही है ये!

भानु (खुसपुसाते हुए) : पिता जी! ये तोह हमारे hi गले पद रही है.

हरिकीर्तन (खुसपुस कर) : मूर्ख देखता जा! ठोस दीवार को तोड़ने के लिए एक दरार ढूंढनी पड़ती है. जो मेरे हाथ लग गयी है.

भानु : मतलब?

भावना अपना गाला पहाड़ पहाड़ के आरोप पे आरोप लगा रही थी की इतने में बृजेश अंदर से आग बबूला होक बाहर आया और भावना को पकड़ के जोरर से एक तमाचा दे मारा...!

सारे वह हैरत में रह गए.

भावना : ????

बृजेश : तुम मुझे ये बताओ पहले की ये क्या है??

कहते हुए उसने कुछ तस्वीरें उसके मुँह पे फेक के मारी!!!

जब भावना ने उन्हें ज़मीन से उठाया और देखा तोह उसकी जान हलक में आ गयी. हाथ thar-tharaane लगे.

उस ज़माने में एल्बम वाली फोटोज हुआ करती थी. और वैसी hi एक तस्वीर में भावना बिस्तर पर लेती हुई थी पर उसके बगल से एक अधनंगा आदमी भी लेता हुआ था.

जो की...!

बृजेश नहीं था!!!

8 से 10 तस्वीरें जब भावना ने देखि, तोह उसके पेर्रो टेल ज़मीन खिसक गयी.

बिर्जेश का दिल ऐसे टूटा जैसे नाज़ुक से कांच के शीशे पर किसी ने पत्थर दे मारा हो!!!

हरिकीर्तन : उल्टा चोर कोतवाल को डांटे! हम्फ!

भावना : Y-Ye सब इसी की चाल है!! *स्निफ्फ* मेरी बात सुनिए! Y-Ye सब झूठ है!!! मुझे तोह पता भी नहीं है की ये आदमी कौन है. और ये...!

बृजेश : बस करो भावना! बस करो! में hi मूर्ख था जो तुम्हारी प्यार में पद गया. और कितना झूठ बोलोगी तुम? तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलती भावना!!!

उससे भावना की शक्ल देख के hi अब घिन आ रही थी. और क्यों न आती? जब ये दिख जाए की खुद की बीवी तस्वीर में किसी जरर मर्द के साथ सो रही है.

भावना : N-Nahi ऐसा मत कहिये! *स्निफ्फ* एक आप hi तोह है, मेरा विशवास करने वाले अगर आप hi-

बृजेश : करता था भावना! करता था! जो मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी भूल थी!!

भावना : N-Nahhhiii!!! में आपके परर पड़ती हु...! *स्निफ्फ* इस सब इन् बाप बेटे की मिली भगत है! मेरा विशवास कीजिये!

*चाताआआकककककक*

एक और छाते ने सारे सवालों के उत्तर दे दिए. मनोरथ चाह के भी कुछ न कर सका. तस्वीरें झूठ नहीं बोल रही थी.

भावना बिलखती रही, पर कोई भी उसके कंधे पर हाथ रखने आगे न बढ़ा. सुमित्रा आगे जाना चाहती थी पर करुणेश की नज़रो ने उससे रोक दिया.

बृजेश : अपना सामान बांधो! और निकल जाओ इस घर से...! हमेशा..! हमेशा के लिए!

दिल पर पत्थर रख उसने ये वाक्य भी कह दिए. पूरा चूर चूर हो चूका था उसका ह्रदय!

भावना भागती हुई अंदर को गयी. अपनी सबसे कीमती अमानत के पास.

उसका लाडला!

जो नींद की वादियों में दीं दुनिया से बेखबर था.

उस नवजात को प्यार से चूम के उसने अपने गले से लगा लिया.

"मेरा बच्चाअ!!!!" चाह के भी वह उससे अपने साथ नहीं ले जा सकती थी.

पालती कैसे? एक और बच्ची उसका वह इंतज़ार कर रही थी.

"मेरे लल्ला! मेरे पास तुम्हे देने के लिए कुछ नहीं है!!! सिवाए इसके!!!"

कहते हुए उसने एक सोने की चैन में ज्यादा वह नील मणि, अपने बेटे के गले में पहना दिया. एक आखिर बार उससे चूम अजर उसके सोने से मुखड़े को देख वह अपना सामान लेके वह से लज्जित करती हुई निकाल दी गयी.

बृजेश इस ग़म में इतना टूट गया की उसने भावना से जुडी साड़ी यादो को जला कर राख कर दिया. उस से जुडी हर्र एक चीज़ तेहेस महेस कर दी. यहाँ तक की घर में उसका नाम भी वर्जित कर दिया. जिस्ले लिए उसमे इतना सब किया, उसने hi उससे इतना बड़ा धोका दिया था.

भावना की छवि तक का ख़याल नहीं आने देना चाहता था अब वह!

बेचारी अकेली भावना जैसे तैसे पूर्वी के पास पहुची, और उससे साड़ी खबर दी!

पूर्वी के ऊपर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. अब जाके उससे पता चल रहा था की उसके प्यारे बापू जा चुके थे. वह टूट के बिखर गयी. उसके भी पेट में एक नन्ही जान पल रही थी.

भावना : खुद को संभालना पूर्वी!!! खुद को संभालना! अरुण! यहाँ से पूर्वी को ले जाओ! ले जाओ यहाँ से! और तेज को अब मेरे हवाले कर दो!!

और इस घटनाक्रम के बाद दोनों अपने अपने रास्ते चल दिए!!!

***

"और यही है तुम्हारी इस माँ की दासता! वीर!!!"

भावना के आखिरी बोल उस कमरे में गूँज उठे.

एक बार फिर उन्हें एहसास हुआ की वह सभी अतीत में थे! सभी की आँखों में ासु थे जिसका उन् सभी को बोध न हुआ.

यहाँ तक की श्वेता भी खामोश थी. और इस अतीत को sunn'ne के बाद उसके अंदर की इंसानियत जानती थी की भावना के साथ बेहद बुरा हुआ था.

भावना अपने ासु पॉच फिर मुस्कुरायी और अपने बेटे और बेटी को देख बोली,

"तोह क्या तुम...! अब भी मुझ से नाराज़ हो? वीर? तेज?"

तेज उठ के सीधा अपनी माँ के गले से लग गयी. पर वीर वही दीवार से ठीके अपनी एक टांग मोड बैठा रहा.

आँखों को बंद किया और,

*डिंग*

[Sigma male instincts have become stronger.]

*डिंग*

[Alpha and Sigma male instincts have been balanced.]

*डिंग*

[Host's new personality has been awakened.]

*डिंग*

[Mission : Revenge

Description : Complete Bhavna's pledge.

Rewards : 1) ??? Points

2) ??? Fame Points

3) Fixed favourability of 100 for Bhavna, Tejal and Purvi.

4) A 50% probability for a legendary skill. (One time use only)

Mission failure penalty : 1) Losing Bhavna and Tejal.

2) Fame Points reduction.

3) 20,000 points reduction.

Time Limit : 3 days.]

वीर की जब आँख खुली तोह पल भर के लिए उनमे लाली सी दिखाई पड़ी, और फिर गायब हो गयी.

उसके मुँह से फिर एक hi आवाज़ निकली, जिसने न सिर्फ भावना को, बल्कि वह बैठे सभी को कापने पे मजबूर कर दिया.

"हरिकीर्तन और भानु प्रताप सिंह!!!! कहा मिलेंगे ये दोनों?"

.

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस.

यस जानता हु लेट है अपडेट. सॉरी फॉर थे इनकन्वेनियंसेस. परन्तु परिष्तीत्ती के चलते ये लेट hi आ पाया. बाकी, जो लोग अपना काम नहीं भूलने का. लिखे ठोकने का और अपनी प्रतिक्रिया रखने का.

धन्यवाद! ✨
 
रमैनिंग कमैंट्स के रिलीज समय मिलते hi. :फाइव:
 
मेगा अपडेट

क्रिसमस स्पेशल



अपडेट - 127 ~ रिवेंज

अब तक...

वीर की जब आँख खुली तोह पल भर के लिए उनमे लाली सी दिखाई पड़ी, और फिर गायब हो गयी.

उसके मुँह से फिर एक hi आवाज़ निकली, जिसने न सिर्फ भावना को, बल्कि वह बैठे सभी को कापने पे मजबूर कर दिया.

"हरिकीर्तन और भानु प्रताप सिंह!!!! कहा मिलेंगे ये दोनों?"


अब आगे...



*थुड़*

किवाड़ खुला, और अभिलाषा काकी धीरे धीरे ठिठुरती हुई बाहर निकल दरवाज़े की देहलीज़ के पास एक जलता हुआ दिया रखने आयी.

पीछे से उन्हें भावना की आवाज़ सुनाई दी, "दिया बाहर काकी?"

अभिलाषा : भूल गयी क्या लाडो? आज धनतेरस है.

काकी की बात सुनते hi भावना चकित रह गयी. इन् सब में वो इतना व्यस्त हो गयी थी की उससे आज के दिन का पता hi न चला.

आज धनतेरस की रात थी. देखते hi देखते इतना बड़ा त्यौहार नज़दीक आ चूका था. नीचे बैठा हुआ वीर भी ये सुन्न तुरंत उठा और बाहर को जाने लगा,

वीर : अगर ऐसा है. तोह ये दिवाली, हरिकीर्तन और भानु प्रताप...! दोनों hi नहीं देख पाएंगे.

वह आंधी की तरह बाहर निकला पर तभी भावना दौड़ते हुए आयी और उसके हाथ को पकड़ उससे रोक ली,

भावना : ठहरो! कहा जा रहे हो तुम?

वीर : क्या आप नहीं जानती की कहा जा रहा हु में?

भावना : जानती हु. पर sunn'na नहीं चाहती.

वीर : तोह चोरडिये. और मुझे अपना काम करने दीजिये.

भावना : नहीं!!!

वीर : आप यहाँ मुझे इसलिए तोह लायी नहीं थी. है न? सिर्फ अपना अतीत सुनाने? किसी मक़सद से hi लायी थी न आप मुझे यहाँ.

वीर की बात सुन्न, भावना अपने निचले होंठ को दातो टेल दबायी और अपनी नज़रे उसके चेहरे पर से फेरर ली.

वीर (स्माइल्स) : देखा? में सही था. आप यही चाहती थी. की में आपका बदला लू.

भावना (धीमे से) : A-Aisa नहीं है.

वीर : ऐसा hi है. और यही में करूँगा भी.

भावना : पहले अंदर चलो! प्लीज!

वीर : एक शर्त पर!

भावना : कहो!

वीर : मुझे अभी भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले है. उनके उत्तर मुझे अभी चाहिए.

उसकी बात पर भावना ने आहिस्ता से सर्र हाँ में हिलाया,

भावना : Th-Theek है! अब चलो अंदर!

वीर : और ये..! इसका रहस्य भी मुझे आपके मुँह से hi sunn'na है.

उसने अपने गले में लटका पेंडंट हाथ में पकड़ते हुए कहा. नील मणि उसी पेंडंट में स्थित थी.

भावना : इसके बारे में, में ज़्यादा नहीं जानती बीटा. मेरा विशवास करो.

वीर : आपने खोजै है इससे. कुछ तोह जानती hi होंगी आप इसके बारे में.

भावना : मेने सालो इसके रहस्यो को ढूंढ़ने में बिठाये है बीटा. पर में सिर्फ एक चीज़ hi जान पायी हु.

वीर : बताइये!

भावना : वह ये की...!

वीर : ???

भावना : ये श्रापित है!

वीर (हैरानी में) : क्याआ?

भावना : हाँ! में इसी कन्क्लूसिओं पर आके रुकी हु.

वीर : श्रापित? वह कैसे? कही आपका मतलब-

भावना : हाँ! जब मुझे ये मिला था. तोह ज़ाहिर है की किसी न किसी वंश का सर्वनाश हुआ होगा. तभी ये इस तरह ज़मीन के नीचे दफन हो गया था. इस बात का कोई सबूत तोह नहीं है पर ये मेरा अनुमान है. और उसके बाद...! मेने अपना परिवार खोया. ये सिर्फ इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता बीटा. जब जब ये किसी के गले से उतरा है, तब तब त्रासदी hi आयी है.

वीर : तोह-

भावना : इस से ये बात स्पष्ट है की जब भी ये गले से उतरता है, तोह विपदा आती hi है. दूसरे शब्दों में, एक श्रापित पत्थर है ये.

वीर : तोह फिर आपने ऐसे में-

भावना (स्माइल्स) : तुम्हे क्यों पहनाया? यही न?

वीर : हम्म!

भावना : क्युकी मुझे यकीन है की अगर इसकी एक बुराई है. तोह कही न कही एक अच्छाई भी है.

वीर : आप इतना यकीन के साथ कैसे कह सकती है?

भावना : मेने इसके कंस्टीटूशन के ऊपर रिसर्च की है बेटे! हलाकि, मुझे कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला. पर जो कुछ भी खोजै था मेने, उसके आधार पर मुझे ये अनुभूति हुई. की ये एक और बड़ा राज़ छिपाए हुए है.

वीर : आप मुझे ऐसा खतरनाक मणि पहना के गयी थी? अगर में गलती से इससे उतार लिया होता तोह?

भावना (स्माइल्स) : क्या तुमने इससे कभी उतारा?

वीर : N-Nahi!

भावना (स्माइल्स) : क्यों?

वीर : जब से मुझे बचपन में ये पता चला था की ये आपकी निशानी के रूप में आपने मुझे पहनाया है. तब से ये मेरे गले में है. कभी मेरा मैं नहीं किया इससे उतारने का.

भावना (स्माइल्स) : हम्म! में जानती थी. ज़रा अब उतार के देखो.

वीर : हहह?

भावना (स्माइल्स) : चलो! कोशिश करो!

अपनी माँ की मुस्कान देख वीर ने फिर भावना से सवाल न किया. पेंडंट को थामा और जैसे hi उसने उतारने का प्रयास किया, पेंडंट की चैन उसके माथे पर आके अटक गयी. और उसके ऊपर नहीं गयी.

वीर : ये...!?

भावना पुनः मुस्कुरायी.

भावना : इस चैन को मेने बहुत ध्यान में रख के बनवाया है बीटा. चाह के भी ये तुम्हारे गले से नहीं निकलेगी. हाँ अगर चैन को काट दिया जाए तोह बात अलग है. पर कभी भी वीर...! कभी भी! इससे अलग होने मत देना.

वीर (नॉड्स) : हम्म्म!

भावना : बस! इतने सालो में सिर्फ यही पता कर पायी हु. शायद और कुछ पता चल जाता. अगर ये मणि मेरे पास होता.

वीर : और इसका दूसरा राज़?

भावना : में नहीं जानती. बस एक अनुमान है.

वीर : तोह बताइये!

भावना : नहीं! ये में तुम्हारे हवाले करती हु. इसके दूसरे राज़ की खोज में तुम्हे सौपती हु वीर!

कहते हुए वह आगे आयी और वीर के गले से लग गयी. वीर का मैं जो अब तक अस्थिर था, वह माँ के आलिंगन में आते hi, एक पल में शांत हो गया.

पर चाँद की रौशनी में ज़मीन पर पद रही उन् दोनों के मिलान की छाव को अंदर बैठी श्वेता चिंतित नज़रो से देख रही थी. न जाने क्या सोच रही थी.

भावना जब वीर को अंदर पकड़ के दुबारा लायी. तोह वीर पुनः ज़मीन पर बैठ गया.

वीर : मासी!!!

पूर्वी : हाँ?

वीर : मुझे आपसे भी कई सवाल है.

पूर्वी : पूछो मेरे बच्चे!

वीर : आप तोह मुंबई में hi रहती थी न? फिर आज तक आप मुझसे मिलने क्यों नहीं आयी कभी? आपको मेरे घर का एड्रेस कैसे नहीं पता था? और उसके बाद भी आप कह रही हो की आपने मुझे बचपन में अपना दूध पिलाया है? ये कैसे मुमकिन है?

पूर्वी (स्माइल्स) : हाँ! पिलाया है! झूठ थोड़ी बोलूंगी!

वीर : पर जब आपको मेरा घर hi-

पूर्वी (स्माइल्स) : मेरे नादान बच्चे!

वीर : ???

पूर्वी : क्या तुम्हे लगता है की मेने और भावना ने तुमसे मिलने की कोशिश नहीं की?

वीर : ...

पूर्वी : हे भगवान्! तुम सच में यही समझ रहे थे? पागल लड़के! एक छाता दूंगी न. तुमने सोच भी कैसे लिया ऐसा? तुझ से मिलने की हज़ार कोशिशे की थी हमने.

वीर : पर-

पूर्वी : शठ! पहले मेरी बात पूरी सुनो! तुम्हे क्या लगता है? क्या तुम्हारी माँ और मुझे तुम्हारी फिक्र नहीं थी? बीटा! में hi जानती हु की तुमसे मिलने के लिए भावना और तुम्हारी ये मासी कितना तदपि है.

वीर : तोह फिर आप आयी क्यों-

पूर्वी : क्युकी हम तुमसे नहीं मिल सकते थे.

वीर : क्यययूउउउ???

पूर्वी : क्युकी हरिकीर्तन सिंह ने अपने आदमी लगाए हुए थे बीटा!

वीर समेत सभी को वह एक झटका लगा. आदमी? कैसे आदमी?

वीर : मतलब-

पूर्वी : में और अरुण तब नागपुर में रहते थे. भावना और मेने जब अपना परिवार खोया. तोह भावना तेज को लेने नागपुर आयी थी. वो एक छोटा सा किराए का घर था. इसलिए तब तुम्हारी माँ उसी घर में ठहर गयी. और मेने अरुण को कहा की आप अपना तबादला मुंबई करवा लो.

वीर : ...

पूर्वी : जब हम मुंबई आये तोह में पेट से थी. पर इमोशनली उन्स्तब्ले थी. पिता जी को जो खो दिया था. अंतिम बार देख भी न पायी उन्हें. कितनी अधूरी बातें थी हमारे बीच. जो अधूरी hi रह गयी. और ये ग़म मेरी डिलीवरी पे असर दाल गया. मेने अपनी पहली संतान खो दी.

वीर : ी...!

पूर्वी (स्माइल्स) : पर कहते है न? अगर कुछ बुरा होता है, तोह उसके बाद कुछ अच्छा भी होता है.

वीर : क्या हुआ था फिर?

पूर्वी : एक नवजात का सबसे पौष्टिक आहार उसकी माँ का दूध होता है. भावना ये जानती थी की तेज को तोह वह अपना दूध पीला देगी. पर तुम्हे तुम्हारा आहार ठीक से नहीं मिल पायेगा. क्युकी घर में सुमित्रा जी अपने बच्चो की परवरिश में लगी होंगी. इसलिए जब उससे मेरे बच्चे के ख़तम होने की खबर लगी, तोह उसने सुमित्रा जी से टेलीफोन पर बात करि.

वीर : !!!?

पूर्वी (स्माइल्स) : और उसके बाद...! सुमित्रा जी तुम्हे लेकर मेरे घर आयी.

वीर : सुमित्रा चची!??

पूर्वी (स्माइल्स) : हम्म!

काव्य : इसका मतलब मम्मी वीर भैया को ले कर जाती थी?

पूर्वी (स्माइल्स) : हाँ! सुमित्रा जी रोज़ आती और में तुम्हे अपनी गॉड में लिटा के अपना दूध पिलाती थी.

अपनी मासी को मुस्कुरा के ये बात कहता देख वीर नीचे देखने लगा. पूर्वी उसकी शर्माहट देख और khil-khilaayi और फिर वीर की आँखों में आँखें दाल बेहद प्यार से उस से बोली,

पूर्वी : और सच कहु! तोह तुमने hi मुझे उस अत्यंत पीड़ा से आज़ाद किया है वीर. तुम जब जब मेरी छथि से लग के पोषण लेते थे. तब तब में तृप्त हो जाती थी. में तुम्हारी जीवन भर आभारी रहूंगी वीर.

वीर : I-I सी! पर वो एड्रेस का क्या?

पूर्वी : हम्म! तुम्हारे घर का एड्रेस कभी सुमित्रा जी ने दिया hi नहीं. और न hi भावना ने मुझे कभी बताया.

आरोही और वीर : क्यों???

पूर्वी : क्युकी वह मुझे मेहफ़ूज़ रखना चाहती थी. हरिकीर्तन के आदमी तब भावना को बाज की नज़रो से धुंध रहे थे बीटा. वह हराम खोर जानता था की भावना अपने बच्चे से मिलने ज़रूर आएगी. इसलिए तुम्हारे घर के आस पास आदमियों को छिपा के रखता था. कभी कोई आदमी किराए के घर से आस पास रह रहा होता, तोह कही कोई आस पास की दुकानों में फ़र्ज़ी पहचान बना के काम कर रहा होता था.

वीर : तोह फिर इसका पता कैसे चला?

पूर्वी : तुम्हारी माँ, तुम्हे चौररने के बस कुछ hi दिनों बाद तुमसे मिलने आ गयी थी वीर. सिर्फ कुछ hi दिनों बाद. बदक़िस्मती से, हरिकीर्तन के आदमी ने भावना को खोज लिया था. यहाँ तकदीर थी भावना की जो वह बच के निकल गयी. ऐसे एक नहीं, अथक प्रयास किये थे भावना ने. पर हर्र बार कोई न कोई तुम्हारे आस पास संदिग्ध सा होता hi था. और वह हार मान के अपने क़दम पीछे कर लेती थी.

वीर : समझा! एक मिनट...! तोह क्या इसलिए आप हमारी पहली मीटिंग के समय उस दिन होटल में बार बार पीछे देख रही थी?

एक सनसनी खेज जानकारी उसके मैं में अचानक आयी. पूर्वी ऐसा hi तोह कर रही थी. वह होटल में जब मिली थी तोह अक्सर बार बार इधर उधर देख रही थी. तब वीर को कुछ पल्ले नहीं पड़ा था.

पूर्वी (स्माइल्स) : हाँ बीटा! डर था की कही अभी भी वह भावना के पीछे तोह नहीं लगे? पर शायद अब हरिकीर्तन ने भी आस चोरर दी है. इसलिए आज हम सब यहाँ इखट्टा है.

वीर : समझ गया! एक सवाल अभी मुझे और चाहिए...! सुमन!!!!

वीर ने जोरर से सुमन का जब नाम लिया तोह वह कड़ी सभी औरते, सिवाए भावना और पूर्वी के हैरान रह गयी. वीर ने सुमन को उसके नाम से पुकारा? क्या उन्होंने अभी अभी सही सुना था?

तोह वही सुमन अपने होंठो पर शरारत भरी मुस्कान सजाये हुए थी. ऐसा लग रहा था वह बरसो से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी.

वीर : तुमने मुझसे कहा था की तुम वचन बढ़ हो. क्या अब भी वचन बढ़ हो?

वीर की आँखों का तेज देख सुमन का जिस्म काँप उठा. पर साथ hi एक उत्तेजना भी हुई. सामने उसके मालिक बैठे हुए थे. उसकी छूट कसमसा उठी. इतने लोगो के बीच, आज सब के सामने उसके मालिक ने उससे उसके नाम से पुकारा. एक jhur-jhuri पूरे बदन में फेल गयी. मैं किया की काश मालिक आगे बढ़ उससे दबोच के उससे निचोड़ने लग जाए.

सुमन : जी हाँ! मालिक!

*बूम*

सुमन भी अब बेबाक बोल पड़ी. सभी के सामने वीर को मालिक बुला दिया उसने.

श्वेता : हहह??

तेज : वीर? Y-Ye...!? मालिक? ये तुम्हे मालिक क्यों बुला रही है?

आरोही : वीर???

सभी की नज़रे वीर के ऊपर थी.

वीर : और कब तक वचन बढ़ रहोगी तुम?

सुमन : जब तक दीदी मुझे इस वचन से आज़ाद नहीं कर देती.

उसने भावना को देखते हुए कहा. जब वीर ने अपनी माँ को देखा तोह मजबूरन भावना ने एक हामी भर सुमन को उस वचन से आज़ाद कर दिया.

वीर : अतीत को sunn'ne के बाद इतना तो में जान गया हु की तुम्हारा परिवार बरसो से इस परिवार की सेवा करता आया है.

सुमन : जी! और में जानती हु आप क्या jaan'na चाहते है. तोह में खुल के कह देती हु. जैसे नील मणि का राज़ ये है की उससे उतारने वाला मौत के घात उतर जाता है. वैसा hi हमारी पीढ़ी के साथ भी है कुछ.

वीर : क्या मतलब?

सुमन : मतलब ये की...! हमारा परिवार, आपके परिवार की सेवा करने के लिए बाध्य है.

वीर : ...

सुमन : सही सुना है आपने. पीढ़ियों से यही चला आ रहा है मालिक. हमारा युग आपके परिवार की सेवा करने के लिए hi जन्मा है.

वीर : और तुम्हारी माँ? अतीत में पता चला की वह मेरे नाना जी के संग रहती थी. तोह क्या-

सुमन : जी नहीं! में उनकी पुत्री नहीं. पर अगर आप ये jaan'na चाह रहे है की क्या आपके नाना जी के मेरी माँ के साथ यौन सम्बन्ध थे? तोह हाँ! सम्बन्ध थे! यहाँ तक की, आपके मां के भी सम्बन्ध थे उनके साथ.

वीर तोह था hi स्तब्ध पर,

तेज : व्हॉट थे हेलललल??? क्या चल क्या रहा है ये सब?

सुमन : आपको समझना होगा तेजल जी! हम बाध्य है. हम भाग नहीं सकते. सालो पहले पिता जी ने ये प्रथा तोड़ने की कोशिश की थी. नतीजा? मेरा भाई और पिता जी! दोनों मारे गए. चुकी में और माँ इस विचार धरा के प्रति समर्पित थी. हम पर कोई हानि नहीं आयी. इसलिए...! उस दिन आपके गले में नील मणि देखते hi में उससे पहचान गयी थी. और मुझे पता था मुझे क्या करना है. परन्तु, दीदी ने मुझे उस जलती हुई हवेली वाली रात को वचन बढ़ कर दिया था.

वीर : तोह ये सब था...!

सुमन : हम्म! मेरी माँ कहती थी. की हम तन मैं धन, हर्र तरफ से इस परिवार की सेवा करने के लिए जन्मे है. अगर इस से भागेंगे, तोह विपदा आएगी. अब आपको समझ आया? की क्यों मेने आभा को इसमें शामिल किया? क्युकी वह अब मेरे परिवार का हिस्सा थी. समझ आया? की क्यों में सोनाली को आपसे तमीज से बात करने कहती हु. और क्यों उससे आपके पास धकेलती हु?

वीर का दिमाग फटता जा रहा था. एक के बाद एक झटके लग रहे थे उससे. अब उससे समझ आ रहा था की ये सब बेफालतू में नहीं था. हर्र एक चीज़ के पीछे कोई न कोई कारण छिपा हुआ था.

पर वही दूसरी ऑर्डर, तेज आरोही और काव्य के होश उड़ते जा रहे थे.

आरोही : क्या कहा आपने? क्या आपने कहा की आभा और वीर के यौन सम्बन्ध है??

सुमन (स्माइल्स) : सिर्फ आभा? मालिक के सम्बन्ध तोह मेरे से भी है. बल्कि, सबसे ज़्यादा तोह मेरे से hi है.

इस बात ने जैसे वह सबको हिला दिया. बस भावना और पूर्वी hi थी जो शांत थी परन्तु उनकी बॉहे भी सिकुड़ी हुई थी. वह नाखुश थी.

सुमन : ये सदियों से चला आ रहा है. पर दीदी को शुरू से hi ये पसंद नहीं है. फुफु~

तेज अपना मुँह खोले हाथो से उससे ढकी हुई थी. उससे यकीन नहीं हो रहा था. तोह वही आरोही और काव्य hairat-angez में वीर को घूर रही थी. उनका भाई एक औरत और उसकी बेटी के संग रातें रंगीन करता था?

वीर जानता था उससे सब किसी नज़रो से घूर रहे थे. पर उसने खुद पर फ़र्क़ पड़ने न दिया.

वीर : सब समझ गया. कुछ क़ुएस्तिओन्स और है. पर फिलहाल उन्हें बाद के लिए चोररटा हु. अभी हरिकीर्तन मेरा मक़सद है!

भावना : नहीं!!! कही नहीं जाओगे तुम अभी.

वीर : बाते मत बनाइये! में जानता हु आप उसी प्रतिज्ञा को सच करने मुझे यहाँ लायी है.

भावना : W-Woh- नहीं! ऐसा नहीं है! बेवक़ूफ़ हु? जो अपने 20 साल बाद मिले बेटे को मौत के मुँह में धकेलूँगी?

वीर : अंदर से आपको भरोसा है एक. जिसके चलते आपने इतना बड़ा रिस्क लिया है. गलत हु? तोह कह दो!

भावना मौन रह गयी. वीर सही था.

वीर : मेरी फिक्र करने की ज़रुरत नहीं है आपको. आप बस मुझे उसका पता दीजिये. और फिर बस गिनती gin'na शुरू कर दीजिये.

भावना : में तेरे हाथ जोड़ती हु. ठहर जा! रुक जा यही! मत जा आज! कल में तुझे नहीं रोकूंगी. अब खुश? बात मान ले अपनी इस माँ की वीर...!

अपनी माँ की आँखों में जब उसने नमी देखि तोह वीर ने अपना गुस्सा शांत कर लिया.

वीर : ठीक है! कल नरक चतुर्दशी है न! कल hi वह दोनों नरक जायेंगे. हमेशा...! हमेशा के लिए!

रात के रुकने की व्यवस्था तोह ठीक ठाक थी नहीं. तोह आरोही, तेज और काव्य तीनो लड़कियों को कार में hi सोने को कह दिया गया.

जो एकमात्र बिस्तर था, उस पर अभिलाषा काकी ने अपनी ज़िद्द कर भावना को लिटा दिया. और खुद उसके बगल से नीचे दरी बिछा के लेत गयी. बचे थे तोह सिर्फ पूर्वी, वीर, श्वेता और सुमन.

वीर ने एक चादर नीचे बिछाई और उसमे पूर्वी को लित्वा दिया. और खुद ज़मीन पर एक दीवार से टिक के बैठ गया. उसके बाए से सुमन बैठी तोह दाए से श्वेता विराजमान हो गयी.

'पारी? क्या-'

[Aisa sochna bhi mat! Galti se bhi aisa sochna mat.]

'H-Hey! मेने तोह अभी कुछ कहा भी नहीं.'

[Mein jaanti hu aap kya soch rahe the. Yahi ki kya mera neel mani se koi rishta hai?]

'उम्! येह!'

[Seriously? Aapne socha bhi kese? Please don't disrespect me Master. You cannot compare me with it. Uss piddi se patthar se meri tulna nahi ho sakti. I'm so much more than that. Aise agar hazaar patthar bhi ikhattha ho jaaye toh bhi mera aur unka koi comparison nahi hai.]

'ऑलराइट! ऑलराइट! ी गोत आईटी!'

वीर ने हाथ खड़े कर दिए. पारी इस चलने से गुस्सा हो गयी थी. और अब ये भी स्पष्ट हो गया था की नील मणि का सिस्टम से कोई लेना देना नहीं है. कुछ और hi है ये.

सुमन : मालिक! आप सर्र रख के सो जाइये. में दीवार से टिक के सो जाउंगी.

सुमन ने अपनी जांघ पर हाथ thap-thapaate हुए कहा.

वीर : पक्का?

सुमन (स्माइल्स) : पक्का!

वीर उसकी जांघ पर अपना सर्र करके लेता तोह श्वेता उन् दोनों को चिंता में देखने लगी. जब तक वीर सो नहीं गया तब तक एक आवाज़ नहीं निकली उनकी.

सुमन प्यार से अपने मालिक के सर्र हाथ फर्टी जा रही थी. और वीर के सोते hi,

श्वेता : T-Tum! तुम घर में रह के इतनी बड़ी बात हम सब से छिपा रही थी?

सुमन : में मजबूर थी. वचन बढ़!

श्वेता : पर! यौन सम्बन्ध बनाने के बाद तो किसी ने कोई वचन नहीं दिया था न? तोह?

सुमन : अगर बता देती तोह आफत आ जाती फुफु~ यही सही समय था.

श्वेता : तोह अब...! क्या इसके बाद भी-?

सुमन : बिलकुल! मालिक मुझे जब चाहेंगे तब भोगेंगे. फिर चाहे मेरी बेटी हो, या बहु. हम सब उनके प्रति समर्पित रहेंगे. उनकी दासी जो है.

श्वेता की ये सुनते hi सास तेज़ हो गयी.

श्वेता : T-Tumhe शर्म नहीं आती? अपनी बेटी, बहु को संग लाते हुए. उनसे नज़रे मिलाते हुए?

सुमन (स्माइल्स) : कैसी शर्म? आभा तोह मेरे साथ रह के मालिक के संग सम्भोग करती है.

श्वेता (भौचक्की होते हुए) : M-Matlab तुम तीन जनन-?

सुमन : आगे 4 भी हो सकते है. या उस से अधिक भी! *स्माइल्स*

बेचारी श्वेता की धड़कने रेलगाड़ी के माफ़िक़ तेज़्ज़ हो गयी. घर में ये सब चल रहा था. और किसी को कानो कान खबर नहीं थी.

सुमन : मालिक जवान हो रहे है. उन्हें औरत की आवश्यकता पड़ती है. औरत का जिस्म hi उन्हें शांत करता है. और एक दासी होने के नाते, हमारा ये पहला कर्त्तव्य रहता है की मालिक को शारीरिक सुख प्रदान कर सके.

श्वेता : तुम बेशरम हो!

सुमन (स्माइल्स) : शुक्रिया!

श्वेता : ये तारीफ नहीं थी.

सुमन (स्माइल्स) : पर मुझे बेशरम होना पसंद है.

श्वेता : T-Tum!

सुमन : कभी कभी आप पे सच में बहुत तरस आता है.

श्वेता (फ्रोंस) : क्या मतलब?

सुमन : आप इतनी कोशिश करती हो, इतनी सेवा करती हो, उसके बाद भी मालिक के दिल में एक माँ की जगह नहीं बना पायी हो आप.

श्वेता : एक न एक दिन वह भी आएगा.

सुमन : पता है? आपको उसके लिए कुछ बड़ा करना होगा.

श्वेता : हहहह?

सुमन (स्माइल्स) : समय आने पर समझ जाओगी आप.

***

*स्क्रीीीीछहहहहहहह*

गाडी रुकी, और रात के अँधेरे में तीन लोग गाडी से बाहर निकले.

ये बृजेश, मनोरथ और विवेक hi थे.

बृजेश : गाडी क्यों रोक दी? पापा जी और में और सफर कर सकते है, चलने दो!!!

विवेक : आप सफर कर सकते है ताऊ जी पर गाडी नहीं. इंजन गरम हो गया है. थोड़ा आराम गाडी को भी देना होगा.

बृजेश : टच!!

विवेक : तब तक आइये कुछ खा पी लेते है. चाय पी लीजिये!

बृजेश : नहीं मुझे कुछ नहीं पीना है.

मनोरथ : विवेक ठीक कह रहा है बृजेश. जयपुर हमारे शहर से दूर है. कितना समय लगता है बीटा विवेक?

विवेक : 20 घंटे के आस पास. वो भी बिना रुके. सब्र रखिये! हम पहुँच जायेंगे.

बृजेश : हमे कही देररि न हो जाए.

विवेक : इतनी जल्दी क्यों है आप सब को?

मनोरथ : तुम नहीं जानते बीटा!

विवेक : ओह्ह्ह!

वह सभी थोड़ा थोड़ा खाये और फिर चाय पी के वह से निकल पड़े.

***

नरक चतुर्दशी की रात हो रही थी. गांव के छोटे से पहाड़ी इलाके में पूरी तरह अँधेरा फैला हुआ था.

और उसी पहाड़ी की एक जगह पर वीर घनघोर अँधेरे में अकेले खड़ा हुआ था. दूर से hi उससे गांव की एकमात्र बड़ी हवेली नज़र आ रही थी. मंद मंद हवाएं चल रही थी जो उसके बालो को अलग अलग लेहेर दे रही थी.

आज भी भावना उससे जाने नहीं दे रही थी. बेटे को खोने के डर से. वह चाहती थी बदला ले पर ऐसे बेटे को अकेले भेज के नहीं. परन्तु वह ये कहा जानती थी की वीर कोई आम इंसान नहीं था.

वीर को एड्रेस की ज़रुरत hi नहीं थी. मिशन अपडेट हो चूका था. लोकेशन उससे अपने आप मिल चुकी थी. गाडी उठा के सरपट भगाते हुए वह सीधा बगल के गांव आ गया. जैसे उसकी माँ के परिवार को रात के अँधेरे में मारा गया था. वह भी इन् हरामियों को रात में hi उनकी चेन्न की नींद सुलाने वाला था.

भावना और उसकी बहने, सभी उससे रोकती रही. तेज खुद आने की ज़िद्द करती रही. पर उसने उन्हें एक मौका नहीं दिया. उससे ये भी पता चल गया था की बृजेश और मनोरथ यहाँ आ रहे थे.

रागिनी का फ़ोन आया तोह वह इतना भड़क रही थी. उसने बताया की काव्य आरोही में से कोई उसका फ़ोन नहीं उठा रहा था. और दोनों बिना बताये गयी है.

वीर ने एक मेन्टल नोट बना लिया था. काव्य के पिछवाड़े फिरसे लाल होने थे. पर समय अभी इस चीज़ पर ध्यान देने का नहीं था.

सामने hi उससे उसका लक्ष्य दिखाई दे रहा था. वह बड़ी हवेली!

[Aap jaante hai na iske consequences.]

'हम्म! अपने hi दादा जी के भाई और उसके बेटे को मारने जा रहा हु.'

[Aur aap calm ho?]

'तुम भी जानती हो और में भी जानता हु पारी. की इन् हाथो में पहले से hi खून चढ़ चूका है.'

[Yes! So don't hesitate.]

'ी won't!'

[Let's go Master!]

*Whoooooooooooosshhhhhhh*

वीर एक हवा के झोके की तरह वह से गायब हो गया.

हवेली के अंदर हरिकीर्तन सिंह पुराने गीतों का मज़ा लेते हुए तम्बाखू खाने में लगा हुआ था. ये न जानते हुए की उसकी मौत तेज़्ज़ी से उसकी ऑर्डर आ रही थी.

हवेली के बाहर चारो ऑर्डर सुरक्षा के लिए आदमी पहरा दे रहे थे. समय बदल चूका था. अब ये गांव प्रधान या पंचायत से नहीं. बल्कि, हरिकीर्तन की मर्ज़ी na-marzi से चलता था. प्रधान और पंचायत बस छोटे मसलो और नाम मात्र के लिए थे. चलती तोह हरिकीर्तन की hi थी.

पूरे गांव को उसने अपने शिकंजे में क़ैद कर के रखा हुआ था. लोग पीड़ित थे. पर कुछ कर भी नहीं सकते थे. पुलिस आती तोह हरिकीर्तन उनके सामने पैसो की गद्दी फेक देता. और वह भी उसके सामने अपनी दम हिला के उसके हिट में काम करते.

जो पिस्टे थे वह थे गांव के आम लोग. जिनका शोषण होता था.

पहरा दे रहा एक आदमी हाथो में डंडा लिए इधर से उधर टहल रहा था. जैसे hi वह इस बार पीछे मुदा, एक आवाज़ उससे सुनाई दी.

बिल्ली या कुत्ता समझ वह अंदर पीछे की ऑर्डर गया. धीरे धीरे झांकते हुए उसने अपना सर्र दीवार के आगे किया. पर...!

उससे कुछ भी दिखाई न दिया. राहत की सास लिए वह मुदा. पर मुड़ते hi,

इस से पहले की वह चिल्ला पाटा, उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया.

उससे बेहोश कर दिया गया. उसके शरीर को किसी ने खींच के छुपा दिया. न सिर्फ एक बल्कि हर्र एक आदमी के साथ यही होता गया. और पल भर में सब आदमी गायब हो चुके थे.

जो मैं गेट पर दो आदमी अपना डंडा लिए बैठे थे उन्होंने भी इस बात को गौर किया. की अब पहरा देने एक भी आदमी टहल के नहीं गुज़र रहा है.

आदमी 1 : देख तोह सही! सबरे भाग गए क्या?

दूसरा आदमी उठ हवेली के बगल में गया. और अंदर जाने लगा. इस बात से अनिभिज्ञ की उसके साथ भी वही होने वाला था.

काफी देरर हो जाने के बाद जब वह वापस नहीं आया तोह पहला वाला भी उठ के गया. और फिर बस...! वह भी उन् गिनतियों में शामिल हो गया.

"जीना यहाँ मरना यहाँ,

इसके शिव जाना कहा.

जी चाहे जब हमको आवाज़ दो,

हम है वही, हम थे जहा,

जीना यहाँ मरना यहाँ...!"

टीवी पर गीत चल रहा था और हरिकीर्तन अपनी मुंडी हिलाते हुए लुत्फ़ उठा रहा था जब,

उससे किसी के आने की आहात हुई.

सामने देखा तोह पूरा मैं दरवाज़ा खुला हुआ था. और एक नौजवान उसके सामने खड़ा हुआ था जो बाज की नज़रो से उससे घूर रहा था.

हरिकीर्तन : कौन हो तुम? और अंदर कैसे आये? क्यों री??? कौन है ये लड़का?

उसने चिल्लाते हुए बाहर के आदमियों को आवाज़ लगाई. पर सब कुछ व्यर्थ था.

वीर : उन्हें आवाज़ देने का कोई फायदा नहीं. वह अभी नींद में है.

इस बार हरिकीर्तन के माथे पर लकीरे छा गयी. और हथेली से तम्बाखू गिराते हुए वह उठ के बैठ गया. उम्र भी हो चुकी थी. वह इस लड़के के इरादों को भांप गया था. लड़ने के लिए उसका शरीर नहीं था अब. ऊपर से बन्दूक उसके ऊपर के कमरे में राखी हुई थी.

हरिकीर्तन (फ्रोंस) : क्या चाहिए तुझे?

वीर (स्माइल्स) : तुम्हारा खून!

हरिकीर्तन (घबराते हुए) : K-Kya बकवास कर रहा है? J-Jaanta है हराम खोर में कौन हु? पूरा गांव thar-thar कापता है मेरे नाम से. किसी की हिम्मत नहीं की सर्र उठा के हरिकीर्तन सिंह से बात कर सके.

वीर : तू जानता है में कौन हु?

हरिकीर्तन : मुझे क्या करना जान के. होगा कोई गन्दी नाली का कीड़ा.

वीर : में उसी भावना का लड़का हु जिसके परिवार को तूने जला के मार दिया.

*बूम*

एक विस्फोट हुआ जैसे हरिकीर्तन के मैं में. वह टकटकी लगाए भौचक्के हुए वीर को ताड़ता रहा. पर फिर जैसे उसके होंठो पे मुस्कान सज्ज गयी.

हरिकीर्तन : हां! ः! हाहाहाहाहा! लड़के तूने यहाँ आके सबसे बड़ी गलती कर दी. तुझे तोह जीवन दान दिया था मेने. वह औरत नहीं तोह तू hi सही. भाड़ में गया मनोरथ! हाहाहा! तुझे मार के hi अपने इतने सालो की खुन्नस को शांत करूँगा में. साला बहुत छकाया है तेरी रंडी-

इसके पहले की वह पूरा शब्द बोलता,

*बाआआममममममममम*

"बलुउररग्ग्घहहहहहह!!!!"

एक तेज़्ज़ तर्रार लात आके सीधे उसके पेट पर पड़ी. पूरा तम्बाखू और थूक उसका बाहर आ गया. हरिकीर्तन गिरती हुई पतंग की तरह दूर जाके धड़ाम से गिर गया.

शोर सुन्न अंदर से फिर वह बाहर आया. भानु प्रताप सिंह!!!

"K-Kya हुआ??? पिता जी??"

उससे देखते hi वीर ने उससे चेक किया. और नाम पढ़ते hi, उसकी आँखें लाल हो चली.

"तेरा hi इंतज़ार था कमीने!!!"

*Whoooooooooooosshhhhhhh*

भानु : हहहह?

*बाहाम्म्म्मम्म्म्म*

भानु : ायर्र्घः!!!!

पेट पर घुसा खाते hi भानु प्रताप को ऐसा लगा जैसे उसकी अतड़िया hi अंदर से पंक्चर हो गयी हो.

अंदर से उसकी बीवी भी बाहर आ गयी. वंदना!!!

उसने जैसे hi बाहर का माजरा देखा तोह घबरा गयी. चीखते चिल्लाते हुए वह बस सब कुछ रोकने की गुहार लगाने लगी. पर वीर को कोई फ़र्क़ नहीं पद रहा था.

मौके का फायदा उठाते हुए, हरिकीर्तन सिंह ऊपर को भागा.

वीर ने देख लिया. भानु को चोरर वह भी ऊपर गया. हरिकीर्तन ने जैसे hi बन्दूक निकाली, वीर दरवाज़े पर hi था.

हरिकीर्तन : आज तू नहीं बचेगा मादरचोद!!!!

*बाजआनंणगगगगगग*

पर हरिकीर्तन ने गोली मिस कर दी. वीर डॉज कर चूका था.

भानु इतने में नीचे से दहाड़ मारते हुए ऊपर आया और वीर के ऊपर कूद गया. उससे कमर से पकड़ वह दौड़ते हुए सीधे छत की रेलिंग के पास ले गया. और,

*क्लाआंनगगगग*

वीर को पलटा दिया.

*थूऊडड़ड़ड़*

पहली मंज़िल से गिरते हुए वीर सीधा आके नीचे गिरा. नीचे पहरा दे रहे आदमी की प्लास्टिक की कुर्सी थी जो टूट के बिखर गयी.

और तभी उसके कानो में,

"बहहहाआईईयाआआआ!!!!"

काव्य की चींख सुनाई दी. उसके बिजईपुर से जाते hi भावना ने तेज को गाडी थमा के सीधा चलने को कह दिया था.

अभिलाषा को चोरर के वह सभी इधर आ चुके थे. और सामने का दृश्य देख उनकी सासें hi अटक गयी.

वीर जैसे hi ऊपर से गिरा, उन् सब की हालत पतली हो गयी.

सबसे ज़्यादा तोह भावना, तेज और काव्य की. काव्य गेट खोलते हुए भाग कर वीर के पास आयी और उससे पकड़ रोने लगी.

"भहहीियैया!! भैय्या उठो!!!"

शोर शराबे से गांव के लोग इखट्टा होने लगे. और इतने में hi,

*स्क्रीीीीछहहहहहहह*

एक और गाडी आके थम गयी. अंदर से तीन लोग निकले.

सभी का ध्यान उन् पर गया. भावना का भी. और जैसे hi दो शख्सों की आँखें ेल दूसरे से भिड़ी, दोनों वही जम्म ले रह गए.

बृजेश और भावना!!

पर ये समय नहीं था. भावना ने वीर को झंझोरते हुए हिलाया. तेज आके भी नीचे बैठ गयी.

वीर बस चिल कर रहा था. उसने एक्सपेक्ट नहीं किया था की भानु एकदम से आके उससे नीचे धकेल देगा. पूठ में थोड़ा सा दर्द था उससे. उस से कुछ नहीं. पर मज़ा उससे काव्य की रोटी सूरत देख के आ रहा था. और कही न कही अंदर से लहूशी भी हो रही थी. बेहेस के बाद भी उसकी ये लाड़ली बहिन सबसे पहले आके उस से चिपक गयी.

वीर : चल हट काव्य! उठने दे!

काव्य : ??? *स्निफ्फ* भैया?

वीर (स्माइल्स) : हम्म! में ठीक हु!

तेज : ओह्ह थैंक गॉड!!! चेयर ने फॉल से बचा लिया. के! जल्दी! उठो!

वीर : आप सब यहाँ क्यों आ गयी?

भावना : बेवकुफो वाले सवाल मत करो! मेने तुम्हे मन किया था न?

वीर उठा और जवाब न दिया. ऊपर से हरिकीर्तन और भानु नीचे आ गए. उनके हाथ में बन्दूक थी.

पीछे से मनोरथ ये देख घबरा गया. वह सब चलते हुए आगे आये.

मनोरथ : Y-Ye सब? ये सब क्या हो रहा है?

हरिकीर्तन : घेरर लो इस औरत और इस लड़के को.

उसने अपने अन्य आदमियों को आदेश दिया तोह धेरर सारे गांव में से hi आदमी आके भावना और वीर को घेरर लिए.

हरिकीर्तन : कहा कहा नहीं ढूंढा था तुझे. आज तू अपने आप आ गयी. हाहाहाहा!

पर उसकी हस्सी ज़्यादा देरर तक न गूंजी. अगले hi शान कुछ और धेरर सारे आदमी आये और हरिकीर्तन और उनके आदमियों को घेरर के खड़े हो गए.

"दीदी!!!!"

पीछे से तभी एक जानी पहचानी आवाज़ आयी. भावना ने मुद के देखा तोह,

भावना : श्याम????

श्याम : में समझ गया था आप ये क़दम उठाने जा रही है. अकेले कैसे आने दे सकता था आपको? वर्ण मेरे बापू मुझे ज़िंदा न चोररटे. *स्माइल्स*

श्याम आदमियों को लेके सही समय पर पहुँच चूका था. और अब जो होना था वह था...!

हरिकीर्तन : अरे सूअर के बच्चो खड़े क्या हो. हमलाआआ करूऊओ!!!!!!

वह गुर्राया!

और हल्ला हो गया. आपस में सभी भीड़ गए. वीर ने सभी को कवर लेने को कहा और फिर उसने अपना खेल शुरू किया.

*डिंग*

[Beowulf's blessings has been turned ON.]

उसके बाद तोह वीर ने ऐसा केहर ढाया. की सबकी सासें अटक गयी. तेज, आरोही और काव्य उससे हैरानी में देखती रह गयी. वह mantra-mugdh सी होक रह गयी.

यही हाल भावना, पूर्वी, और श्वेता का भी था. सुमन के चेहरे पर तोह उत्साह था. और एक कुटिल मुस्कान.

तोह वही बृजेश और मनोरथ दांग थे. और विवेक भयभीत.

वीर कभी इस ऑर्डर से उचकता तोह हवा में कलाबाज़ी खा के दूसरी ऑर्डर पालक झपकते पहुँच जाता. उसका एक हाथ पड़ते hi आदमी ऐसे गिर रहे थे जैसे मानो उनमे कोई वज़न hi न हो. और इतना खूंखार था उसका लड़ने का ढंग. सबके रौंगटे खड़े हो गए थे.

ऐसे कौन लड़ता था? कही किसी के हाथ टूटने की आवाज़ सुनाई पद रही थी तोह कही परर. किसी का जबड़ा टेढ़ा हो रहा था तोह कही धड़ाम से गिरने पटकने की आवाज़ें आ रही थी.

हरिकीर्तन बार बार एआईएम करता, पर वीर इतनी तेज़्ज़ी से मूव कर रहा था की वह एक जगह स्थिर रह hi नहीं रहा था.

इतने आदमी होने के बावजूद, ये ओने मन आर्मी शो बन्न के रह गया था.

और जब वीर रुका तोह वह सीधा हरिकीर्तन के गले की ऑर्डर झपट पड़ा.

बकरी की तरह हरिकीर्तन मिंया रहा था. पर वीर एक हाथ से उससे और दूसरे हाथ से भानु प्रताप को जकड़े हुए था.

वीर : बोल!!! बोल जल्दी!! अपनी करतूते सामने ला. इसके पहले की में तुझे मौत के घात उतारू.

मौत के डर से, लहू लुहान होने के बाद, हरिकीर्तन ने सब कुछ कह डाला. साड़ी सच्चाई. सब कुछ. बस एक hi चीज़ उसने छिपाई हुई थी. वह फोटो वाली बात.

पर जब वीर ने उससे झापड़ मारा. तोह हरिकीर्तन ने वह भी बता दिया.

और नाम सुनते hi, उन् सब के पेर्रो टेल ज़मीन खिसक गयी. गुस्से के मारे वीर की मुट्ठी इतनी जोरर से चटकी की लगा अभी किसी का क़त्ल कर देंगी.

बृजेश और मनोरथ, दोनों hi ज़मीन पर गिर पड़े. ये सब कुछ दिमाग के झेलने के लिए कही ज़्यादा था. मनोरथ तोह अपने दिल पर हाथ रखे खुद को दिल के दौरे से बचा रहा था. ये राज़ सुन्न, पता नहीं उसका दिल इससे झेलने के लिए तैयार था भी या नहीं.

तोह वही बृजेश जैसे सदमे में जा चूका था. उससे अब भी विशवास नहीं हो रहा था. विवेक एक गहरी चिंता में डूब गया. और एक घबराहट जन्म ले उठी. उस नाम को sunn'ne के बाद.

हरिकीर्तन और भानु को वीर दो कठपुतलियो की तरह उनके बालो से पकड़ा हुआ था. लीम्बो से उसने पहले उन् दोनों नमूनों के हाथ तोड़े. उसके बाद दोनों के पेर्रो पर रस्सिया बाँधने लगा.

भावना चुप चाप अपने बेटे को देख रही थी. सब के अंदर एक खौफ बैठा हुआ था. गांव की जनता भी एकत्र हो गयी थी.

वीर ने फिर अपने जेब से एक लाइटर निकाला और वह बाहर बने कूए के पास गया.

ये कूया खाली था. वीर ने पहले hi जैसे सब कुछ प्लान कर के रखा था.

अंदर जैसे hi उसने लाइटर गिराया.

ज्वाला भड़क उठी. अंदर शायद पेट्रोल या तेल गिराया गया था. आग की लपटे इतनी तेज़्ज़ थी की बाहर खड़ा आदमी भी बता सकता था की कूए के अंदर कुछ जल रहा है.

एक हाथ से दोनों को धकेल उसने जैसे hi गिराया. तोह रस्सी के सहारे दोनों हवा में कूए के अंदर लटक गयी.

"Aaaarrrgghhhhhhhhhh!!!"

दोनों बिलखने लगे. वंदना घबराते हुए भावना के परर पर गिर पड़ी. गुहार लगाने लगी की उसके पति को चोरर दिया जाए. पर भावना ने कुछ न कहा. उसकी नज़रे बस अपने बेटे के चेहरे पर तिकी हुई थी.

मनोरथ समेत, किसी की भी हिम्मत नहीं हुई की वीर को कोई रोक सके.

वीर : मेने आपसे कहा था न? की ये दोनों! अगले दिवाली नहीं देख पाएंगे.

भावना सिर्फ सुन्न रही थी. कुछ कह नहीं रही थी.

हरिकीर्तन और भानु हवा में लटकते हुए चींख चींख कर चिल्लाते रहे. पर वीर एक हाथ से रस्सी को पकड़ दोनों को धीरे धीरे नीचे करता गया.

उनकी चींखे और तेज़्ज़ होती गयी. पूरे गांव के लोगो के बदन ठन्डे पद गए.

जैसे जैसे वह नीचे जा रहे थे. मौत उनके क़रीब आ रही थी. दोनों के बालो में आग लग hi चुकी थी. और जो चींखे वह कूए के अंदर से गूंजी, बाहर खड़ा आदमी उन्हें सुन्न हिल के रह गया.

भावना उठ के आयी और कूए के अंदर झांकी. इस तरह hi उसके पिता जी और भाई तड़पे होंगे. इस तरह hi काकी काकी लोग जले थे.

मुट्ठी कस्ते हुए वह बोली,

भावना : चोरर दो!

और वीर ने रस्सी चोरर दी!

"आयआरररररररररगजघ्हहहहह अअअअअअररघः ाअररघहहह aaaaaaaaaaa!!!!"

दोनों बाप बेटे आग ने झुलसने लगे. जैसे एक मुर्गी को पकाया जाता था. वैसे hi दोनों इंसान कूए में पाक रहे थे.

एक मौत की रात वह थी. और अब एक और मौत की रात ये होने वाली थी.

*साइलेंस*

लगातार चींखों के बाद, कुछ समय में hi अंदर सब कुछ शांत हो गया. और बस ज्वाला की लपटों की हलकी आवाज़ hi उनके कानो में पड़ती रही. जो हरिकीर्तन और भानु के मॉस को जला रही थी.

सब शांत हो चूका था.

और श्याम ने मौका देख नारा लगा दिया.

"वीर बाबू की!!!"

"जय!"

"वीर बाबू की"

"जय!!!"

"भावना दीदी की..."

"जय!!!"

गांव के लोग साथ देने लगे. सब ट्रस्ट हो चुके थे हरिकीर्तन के शासन से. भावना को लोग पहचान भी गए. और उनका समर्थन और बढ़ गया.

जब पुलिस आयी तोह लोगो ने खदेड़ के उन्हें भगा दिया. वंदना तोह बेहोश होक गिर चुकी थी.

श्याम : गांव वालो!!! आज एक नहीं. दो दो शैतानो का अंत हुआ है. सारा गांव इन् दो बाप बेटो से परेशान था. भावना दीदी, हमारे बिजईपुर की पूर्व बड़ी हवेली के स्वर्गीय धरम सिंह की एकमात्र लड़की है. आज उन्होंने और उनके एकमात्र पुत्र वीर बाबू ने मिलके हमे इन् दुष्टो से आज़ाद किया है. गांव वालो...! अब हमारा फ़र्ज़ बनता है की हम अपना पूरा योगदान भावना दीदी और वीर बाबू को दे...! तोह कहो! वीर बाबू की...!

"जय!"

"भावना दीदी की"

"जय!!!"

नारे लगने के बाद एक बार फिर शांत पद गया सब.

इधर बृजेश भावना के समक्ष खड़ा हुआ था. तोह उधर वीर अकेले दूसरी ऑर्डर चेहरा किये अकेले खड़ा हुआ था.

रात के 12 बज चुके थे.

और 12 बजते hi,

पीछे से उससे एक आवाज़ सुनाई दी,

"जन्मदिन मुबारक हो! मालिक!"

सुमन पीछे से आके उसके गले से लग गयी. चाहे वीर के हाथो में खून चढ़ा हो या कुछ और. सुमन तोह हमेशा hi उसके साथ रहने वाली थी.

सुमन (स्माइल्स) : समय आ गया है की अब आपको वह ले जाय जाए.

पूर्वी ने जैसे पीछे से ये सुन्न भांप लिया, वह हड़बड़ाते हुए उनके पास आयी.

पूर्वी : सुमन! N-Nahi! तुम ये नहीं कर सकती. वह नहीं!

सुमन (स्माइल्स) : क्यों नहीं? उनका हक़ है! अब तोह सब कुछ सामने hi है.

पूर्वी : N-Nahiii! सुमन नहीं!!! भावना और में इतना झेल सकते पर...!

सुमन (स्माइल्स) : मालिक का पूरा हक़ है उस पर.

वीर : किस पर?

पूर्वी : सुमन नहीं!!! आगे कुछ मत कहना...!

पर सुमन ने कह दिया,

सुमन (स्माइल्स) : पारिजात घर!

वीर : हहहह?

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस.

सभी को मेर्री क्रिसमस. और लाइक्स थोक के जाने का और रेवोस रखने का. अब एक या दो अपडेट में ये अर्च ख़तम है.


धन्यवाद! ✨
 
मेगा अपडेट

नई ईयर स्पेशल

अपडेट - 128 ~ पारिजात

अब तक...

सुमन (स्माइल्स) : मालिक का पूरा हक़ है उस पर.

वीर : किस पर?

पूर्वी : सुमन नहीं!!! आगे कुछ मत कहना...!

पर सुमन ने कह दिया,

सुमन (स्माइल्स) : पारिजात घर!

वीर : हहहह?


अब आगे...

रात के 1:30 बज रहे थे और सुमन वीर का हाथ थामे उससे खींचती हुई अँधेरी गलियों के रास्ते कही ले जा रही थी.

वीर : सुमन? सुमन कहा ले जा रही हो?

सुमन : मेने कहा न! आप बस पीछे पीछे चलते जाइये! कुछ देरर में सब पता लग जायेगा आपको!

हरिकीर्तन और उसके बेटे को ज़िंदा जलाये अभी कुछ वक़्त hi हुआ था की सुमन वीर और बाकी सभी को कार में बैठा के यहाँ ले आयी थी. वह सब उसके द्वारा दिखाई गयी दिशा की ऑर्डर बढ़ते जा रहे थे.

देरर रात आज क्या कुछ नहीं हुआ था. दिवाली का दिन लग चूका था. जैसे रावण को हरा के अच्छाई की बुराई पर जीत हुई थी. वैसा hi कुछ आज वीर ने कर दिखाया था. अन्याय पर न्याय की जीत, अधर्म पर धर्म की जीत, और असत्य पर सत्य की जीत.

जो पाप हरिकीर्तन, भानु प्रताप ने किये थे. उसका खामियाजा आज उनको भुगतना पड़ा था.

गांव वाले एक राक्षस के राज से मुक्त हो चुके थे. उन् सबने भावना को ख़ुशी ख़ुशी गांव के एक मुखिया के रूप में स्वीकार कर लिया था. परन्तु, भावना ने ये ज़िम्मेदारी श्याम को सौंप दी.

वंदना! जो भानु प्रताप की पत्नी थी. उससे भी श्याम के हाथो hi चोरर दिया भावना ने. दोनों आदमियों के मर्डर जाने के बाद किसी में अब इतनी हिम्मत नहीं थी की भावना के खिलाफ जा सके. रही बात वंदना और भानु के बेटे की? तोह वह पढ़ाई करने शहर गया हुआ था. चाह के भी वह वीर का कुछ उखाड़ नहीं सकता था.

ये तोह एक समस्या का हल था. परन्तु, उसके बाद एक दोर्र जो बरसो पहले टूट चुकी थी. उसके दो छोर्र आज पुनः एक दूसरे के सामने थे.

बृजेश और भावना!

बृजेश तेज़्ज़ क़दमों के साथ भावना के नज़दीक आया. कूए में अभी भी दो लाशें जल रही थी.

बृजेश : B-Bhavna!!!

कोई जवाब न आया.

बृजेश : भावना!!! भावना सुनो...! मुझे तुमसे कुछ कहना है.

भावना की पीठ बृजेश की ऑर्डर थी. वह कुछ नहीं बोली और आगे बढ़ गयी.

बृजेश : भहावंणआ!!!!

भावना : चिल्लाने से कुछ नहीं होगा. अब बात करने लायक कुछ नहीं रह गया बृजेश.

जब सीधे उसके नाम से भावना ने उससे सम्बोधित किया. तोह बृजेश को एक अनुमान लग गया की कोई भी पैतरा काम नहीं आने वाला था अब. फिर भी, आज उससे अपनी बात रखनी थी.

बृजेश : भावना..! भावना सुनो! भावना में...!

उसकी फिसलती ज़बान पर भावना khil-khilaayi.

भावना : मुझे माफ़ कर दो!

बृजेश : हँ?

भावना : यही न? यही कहना चाह रहे थे न?

बृजेश : में...!

एक बार फिर, बृजेश मौन रह गया. दूर खड़े वीर ने जब उन् दोनों को बाते करते देखा तोह वह उनसे और दूर चला गया.

भावना : बेहतर यही होगा की आप सब यहाँ से चले जाए.

बृजेश : भावना!! Y-Ye सब क्या हो गया? हम सब अन्धकार में थे?? इतना सब कुछ हो रहा था पीठ पीछे?

भावना (स्माइल्स) : अन्धकार? नहीं तोह! मेने तोह कितनी बार आपको सच दिखाने का प्रयास किया था. पर आप को आँखों पर पट्टी बांधना ज़्यादा पसंद है.

बृजेश : नहीं भावना! T-Tum जानती हो! तुम जानती हो की मेने हमेशा तुम पर विशवास किया है. पर जब ऐसी तस्वीरें किसी मर्द के सामने हो तोह वह कैसे शांत रह सकता है? मेरी जगह कोई भी होता तोह वह भी-

भावना (स्माइल्स) : यही तोह आपकी एक खराब आदत है.

बृजेश : ???

भावना : कभी भी अपनी गलती स्वीकार न करना.

बृजेश : N-Nahi! भावना ऐसा नहीं है. T-Tum गलत समझ रही हो. तुम hi बताओ! आखिर कौन था वह आदमी?

भावना (फ्रोंस) : में नहीं जानती.

बृजेश : नहीं जानती? क्या मतलब नहीं जानती भावना? वह तुम्हारे बगल से लेता हुआ था उस तस्वीर में. और तुम कह रही हो-

भावना : मेने कहा न! की में नहीं जानती. और ये सवाल...! आप अपने छोटे भाई से क्यों नहीं पूछते?

ये वाक्य उसके मुँह से निकलते hi, बृजेश का पूरा शरीर ठंडा पद गया. बेशक! हरिकीर्तन के मुँह से यही नाम तोह निकला था.

करुणेश!!!

जिससे सुन्न न सिर्फ वह बल्कि मनोरथ समेत सभी के पेर्रो टेल ज़मीन खिसक गयी थी. उसका hi छोटा भाई घर में उसके hi खिलाफ साज़िश रच रहा था. अपनी hi थाली में छेड़ किया था उसने. जी हाँ! भावना को फसाने वाला आदमी कोई और नहीं बृजेश का अपना hi छोटा भाई था.

बृजेश : P-Par क्यों? करुणेश आखिर...! क्यों?

भावना : ये मुझसे क्यों पूछ रहे है? जा के उसी से क्यों नहीं पूछते? कौन था वह आदमी? क्या दुश्मनी थी उसकी आप से? क्यों किया ऐसा? क्यों मुझे फसाया गया? यकीनन सारे सवालों के जवाब आपको मिल जायेंगे.

बृजेश को समझ आया की भावना तोह बस एक षडियंत्र का शिकार हुई थी. कही से भी उसकी कोई गलती नहीं थी. और अब बाढ़ के सामान ग्लानि उसके अंदर ाँ पड़ी.

बृजेश : A-Aur वह लड़की!?

उसका इशारा तेज की ऑर्डर गया.

भावना : लड़की? वह आपकी और मेरी बेटी है.

बृजेश : K-Kya???

भावना : हाँ! जब एक साल के लिए में बाहर गयी थी. तब में पेट से थी. तेजल वही जन्मी...!

बृजेश : P-Par ऐसा कैसे?

वह बौखला उठा. ये इतनी बड़ी लड़की, उसकी अपनी थी?

भावना : हरिकीर्तन और भानु प्रताप! दोनों हमारी पहली संतान को मारना चाहते थे.

बृजेश : Y-Ye तुम क्या कह रही हो?

भावना : सच कह रही हु. अब आपके ऊपर है की आप इससे सच माने. या फिरसे पट्टी pehan'na बेहतर समझे.

बृजेश : P-Par-

भावना : मेने अपने कानो से सुना था दोनों को साज़िश रचते.

बृजेश : तुमने मुझे बताया क्यों नहीं???

भावना : डर के कारण!

बृजेश : डर? कैसा डर??

भावना : वह डर...! जो मुझे एक साल तक दूर जाने पर मजबूर किया. वह दोनों हैवान इसकी भी तरकीब बनाये बैठे थे. और में जानती थी की अगर आपको बताती, तोह आप मेरी बात का विशवास नहीं करते.

बृजेश : क्यों नहीं करता में तुम्हारा विशवास भावना? तुमने ऐसा सोच भी कैसे लिया की-

भावना : क्युकी वह दोनों कान भरने में लगे हुए थे. और इसलिए...! हमारी पहली संतान को कुछ भी न होये. में पेट से थी! ये बात मेने आप सब से छिपाई. और नागपुर चली गयी.

बृजेश : T-Tum एक साल तक नागपुर में थी? मतलब वह विदेश में रिसर्च करने जाना वह एक-!??

भावना : हम्म! बहाना था. पूर्वी के घर तेजल जन्मी. इस एक साल की जरर मौजूदगी में उनका ध्यान मुझपे और हमारी संतान पर से तोह हट गया. पर मेरे परिवार पर से नहीं. इन्ही दोनों ने मिलके मेरा परिवार तबाह किया था. और आज..! मेरे बेटे ने...! मेरा बदला ले लिया.

बृजेश : T-Toh तेजल हमारी बेटी है! भावना! में-

भावना : अब समय बीत चूका है!

बृजेश : हँ?

भावना : न hi अब कोई माफ़ी काम आएगी और न hi कोई उपाय. आपके हाथो से समय राइट की तरह फिसल चूका है. जब ज़रुरत थी. तब ये मुट्ठी बंद कर ली होती, तोह शायद हाथ में कुछ शेष रह जाता. पर अब? सब खो चुके हो आप.

बृजेश : N-Nahi!! भावना ऐसा मत कहो! में तोह जानता भी नहीं था की क्या कुछ हो रहा था. भावना सुनो!! भावना! तुम जानती हो मेने तुम्हे कितना चाहा है! भावनाआ!!!

भावना (स्माइल्स) : वह चाहत नहीं थी बृजेश!!! वह चाहत नहीं थी!

बृजेश : ???

भावना : वह बस आपका मोह था. प्यार नहीं. एक आकर्षण था! प्यार होता, तोह भरोसा होता! पर बदक़िस्मती से, वह बस एक मोह था. मेरी सूरत का. मेरे रंग रूप का. हमारा रिश्ता बस एक समझौता था. जो जल्दबाज़ी में बन्न गया.

बृजेश : N-Nahi!! ऐसा मत कहो!

भावना : पर एक बात के लिए अब भी आपको शुक्रिया कहूँगी.

बृजेश : !!??

भावना : तेज और वीर को देने के लिए. क्युकी ये अकेले तोह संभव नहीं था. *स्माइल्स* आपका योगदान भी है. तोह उसके लिए शुक्रिया. में वह नहीं जो आपके चलते अपने बच्चो से नफरत करने लागु. या मेरा लगाव उनसे काम हो जाए. मेरी जान है दोनों! न जाने कितनी तक़लीफ़े मेरे वीर को झेलनी पड़ी है आपकी लापरवाही के चलते. अब और नहीं...!

बृजेश : नहीं भावना!! T-Tum सब गलत समझ रही हो-

भावना : मुझे जो समझना था वह समझ चुकी. समय आ गया है की में अब अपने बच्चो पर ध्यान दू.

बृजेश : भावना नहीं-

पर भावना न hi पलटी और न hi अब रुकी. वह आगे बढ़ गयी.

बृजेश : भावनंना!!!

बृजेश आगे जाने को हुआ पर तभी,

"ब्रिजेस्सस्स्स्शह्ह्ह्हह्ह!!!"

पीछे से उससे मनोरथ की हाफति हुई आवाज़ सुनाई पड़ी. जैसे hi नज़र दौड़ाई तोह पाया की मनोरथ अपने सीने पर हाथ रखे जोरर जोरर से साँसे ले रहे थे.

घबराकर बृजेश दौड़ के उनके पास आया,

बृजेश : P-Papa जी? पापा जी आप ठीक तोह है न?

मनोरथ : *हफ़* *हफ़* सीने में दर्द हो रहा है b-beta!!

ऐसे मंज़र को देख, और एक के बाद एक ज़ोरदार झटके खाने के बाद अच्छे से अच्छा की हालत बिगड़ गयी थी. तोह मनोरथ का ये हाल होना तोह लाज़मी था. इतने बड़े बड़े सत्य, एक के बाद एक उनका बुज़ुर्ग दिल भला कैसे झेल सकता था?

हालत ज़्यादा बिगड़े न इसलिए विवेक की सलाह पर मजबूरन बृजेश को मनोरथ को लेके वह से निकलना पड़ा.

और उन् सब के जाते hi भावना के ऊपर से जैसे एक भार और काम हो गया.

वह आगे बढ़ी. पूर्वी, सुमन और उसका बीटा वीर कुछ चर्चा कर रहे थे. तभी उससे ये भी ध्यान आया की आज तोह उसके लाडले का जन्मदिन था.

इस से पहले की पूर्वी उससे समझा पाती वह बिना कुछ सुने hi वीर के गले से लग गयी.

भावना : जन्मदिन मुबारक हो! मेरे बच्चे!

वीर : T-Thank यू!

बारी बारी सभी ने उससे विश किया.

दोनों माँ बेटे एक दूसरे को देख जैसे कही खो गए. वीर को वह पल याद आया, जब पहली बार उसने अपनी माँ को देखा था. जयपुर का hi वह स्टेशन था. इस ऑर्डर वह अपनी ट्रैन पकड़ घर जा रहा था तोह दूसरी ऑर्डर ट्रैन में उसकी माँ थी. तब दोनों मिल के भी मिल न सके थे.

और आज...! दोनों एक दूसरे की बाहो में थे. वीर भावुक हो गया. और उसकी आँखों से एक ासु की बूँद अपने आप छलक उठी. कितना तड़पा था वह अपनी माँ को पाने के लिए.

जैसे hi भावना ने अपने बेटे की आँख में ासु देखे, उसका जी घबरा गया. बेचैन होते हुए उसने फ़ौरन hi वीर के गाल से उसके ासु पोछे.

भावना : ये ासु कैसे मेरे बेटे?

वीर (स्माइल्स) : कुछ नहीं!

भावना : बोलता है या नहीं?

वीर : बाद में बताऊ तोह चलेगा?

भावना : याद से बता देना!

वीर (नॉड्स) : हम्म!

भावना : अब एक सवाल में करू?

वीर : करिये!

भावना : तुम्हारे अंदर क्या ज़रा भी डर नहीं आया? उन् दोनों की जान लेते वक़्त? एक आम इंसान न hi इस क़दर लड़ सकता है और न hi इतनी आसानी से किसी को मौत के घात उतार सकता है.

वीर : क्यों नहीं लड़ सकता? सालो साल दर्द सहने के बाद ये स्किल्स हासिल की है मेने.

भावना : और बिना भय के उन् दोनों की जान लेना? वह? उसके बारे में क्या कहना है?

वीर : क्या आप नहीं चाहती थी की में आपका बदला लू?

भावना : चाहती थी. पर जैसा मेने सोचा था वैसा नहीं हुआ.

वीर : क्या मतलब...?

भावना : मुझे लगा था मेरा बीटा उन्हें मारते वक़्त घबरा जायेगा. और संकोच करेगा. क्युकी कोई भी आम इंसान उस स्थिति में घबरा जाता. पर-! ऐसा हुआ नहीं! जो कई सवाल खड़े करता है. जवाब दो!!! क्या छिपा रहे हो मुझसे.

अपनी माँ की होशियारी देख वीर स्तब्ध रह गया. पर वह सच नहीं बता सकता था. नहीं बता सकता था की उसके हाथ पहले से hi खून से रेंज हुए है.

वीर : आप खामखा ज़्यादा सोच रही है.

भावना : क्या सच में?

वीर (नॉड्स) : हम्म!

उसने वीर की आँखों में झांक के देखा. वीर ने नज़रे नहीं फ्री. और कुछ देरर बाद, भावना ने एक गहरी सास चोरर ये चर्चा वही समाप्त कर दी. पर अंदर hi अंदर जैसे उससे अभी भी ज्ञात था की उसका बीटा कुछ छिपा रहा था.

लेकिन अभी के लिए इस विषय पर विरहां लग चूका था.

पूर्वी : भावना! उस से भी ज़रूरी बात ये है अभी की सुमन वीर को वह ले जा रही है.

भावना : कहा?

पूर्वी : अरे वही!!

भावना : अरे पर कहा?

पूर्वी (शिघ्स) : पारिजात घर!

नाम सुनते hi भावना की बॉहे सिकुड़ गयी.

भावना : क्या कहा?

पूर्वी : पारिजात घर! सुमन लेके जा रही है वीर को.

भावना : हरगिज़ नहीं!!!

भावना ने वीर का हाथ थामा और उससे खींच के ले जाती की इस से पहले hi सुमन ने उस रोक लिया.

सुमन : क्या आप उनका हक़ छीन रही है?

भावना : हहह? सुमन?

सुमन : भूलिए मत की मालिक का पूरा हक़ है उस घर पर.

भावना : N-Nahi! मेरा बीटा इन् सब से दूर रहेगा.

सुमन : बिलकुल भी नहीं! आप मालिक की माँ ज़रूर है. पर में केवल और केवल मालिक के हिट के बारे में सोचती हु. आप उनसे उनका हक़ नहीं छीन सकती.

भावना : सुमन! सुमन तुम समझती क्यों नहीं की-

सुमन : समझना आपको है दीदी! क्या होनी को कोई ताल सकता है? फिर क्यों व्यर्थ प्रयास करती हो? आज नहीं तोह कल वह होगा hi. और होना भी चाहिए. मालिक को हर्र सच्चाई से वंचित नहीं कीजिये. कही न कही ये आपकी गलती भी रही है.

भावना : S-Suman!!!???

सुमन : हाँ! मालिक कोई दूध पीते बच्चे नहीं है जो आप उनसे हर्र बात छिपाती चली आये. उनका हक़ है, तोह वह उन्हें मिलेगा hi मिलेगा. मालिक! आइये!

और कुछ इसी प्रकार सुमन उन् सब को लेकर इन् गलियारों में उपस्थित थी.

काव्य वीर का हाथ थामे हुए थी. कुछ देरर पहले की वारदात से वह इतना घबरा गयी थी की ठीक से कड़ी भी नहीं हो पा रही थी. भले hi उसके भैया ने हैवानो जैसा काम किया था उन् दो आदमियों को ज़िंदा जला कर. पर अभी भी काव्य को अपने भैया की hi ज़रुरत थी. क्युकी वही था जो उससे मेहफ़ूज़ होने का एहसास करवाता था. सिर्फ वीर का हाथ थाम के hi उसका डर गायब हो गया था.

सँभालने में उससे कुछ जानते लगने थे अभी. तोह वही तेज और आरोही भी चिंता में डूबी हुई थी. सब अचानक हुआ. और अब वह किसी कन्क्लूसिओं पर नहीं आ पा रही थी.

उनके भाई ने किसी की जान ली? कैसे देखे वह अब अपने भाई को? वही भाई सुमन और उसकी बहु के साथ रंग रेलिया मनाता था? अब कहा रखे उससे अपने दिल में? दोनों hi इन् बातो से जूझ रही थी. मैं में मंथन चल रहा था.

पर इसी के साथ वीर की अच्छाई भी थी. जिस प्रकार से वह लड़ा, उसकी आँखों में वह तेज और अपनों को बचाने की दृढ़ता. उससे याद करते hi दोनों के बदन में रुए खड़े हो गए.

और उन्हें ये समझ आया की चाहे कुछ भी हो जाए. वीर हमेशा उनके हिट के बारे में hi सोचेगा.

एक बड़ी बहिन होने के नाते, दोनों को जैसे बात समझ आ गयी. और दोनों ने कुछ करने का फैसला ले लिया.

वीर : सुमन! सुमन यहाँ बहुत अँधेरा है. काव्य वैसे hi घबराई है. तुम कहा लेके जा रही हो हमे.

सुमन : बस पहुँच गए मालिक!

ऐसा वह पिछले 10 मिनट से कहती आ रही थी. पीछे पीछे पूर्वी और भावना भी बेमानन से चल रही थी. श्वेता पूरी घटना में बाहर रही. न hi वो बृजेश से मतलब रखना चाहती थी और न hi उससे अभी कुछ समझ आ रहा था.

पर वीर को यु लोगो की जान लेते देख वह भी काफी डिस्टर्बेद थी.

सुमन : ये लीजिये! पहुँच गए हम!

सामने एक बड़ा सा किवाड़ मौजूद था. और रास्ते का अंत भी हो गया था. इसके आगे जाने के लिए अब वह दरवाज़ा खुलना ज़रूरी था.

*नॉक* *नॉक*

सुमन ने बड़ा सा लोहे का कुंडा उठा के khat-khataaya. पर अंदर से कोई जवाब न आया.

उसने 2-3 बार और khat-khataaya! तोह कुछ देरर बाद धीरे धीरे किवाड़ खुला और अंदर से एक आँख बेहद गुस्से में उन्हें घूरने लगी.

हाथ में बड़ी सी चाक़ू थी उसके. चाक़ू उठा के उसने सुमन की गर्दन के सामने करि.

ये एक लड़की थी.

लड़की : कौन हो तुम लोग? और क्या चाहिए? और यहाँ कैसे आये?

वह बेहद गुस्से में थी. परन्तु सुमन अब भी मुस्कुरा रही थी.

सुमन : में सुमन हु. हवेली के घराने से भावना दीदी लौट के आयी है. अंदर खबर दो की वह और उनके दो बच्चे आये हुए है. सब पता चल जायेगा.

लड़की : ठीक है! यही रुको!

एक बार फिर दरवाज़ा बंद हो गया. पर इस बार अंदर से काफी हलचल होने की आवाज़ सुनाई पड़ी.

वीर : क्या यही है? पारिजात घर?

सुमन : जी! यही है!

वीर : तोह ऐसा क्यों कहा तुमने की इस्पे मेरा हक़ है?

सुमन (स्माइल्स) : आप खुद जान जायेंगे अभी.

इस बार जब दरवाज़ा खुला, तोह वीर समेत सभी चकित रह गए. अंदर से 3 अन्य औरते उस लड़की के साथ निकली. और वह सभी उनको घूर रही थी. वीर ने एक पल भी नहीं गवाया उन्हें चेक करने में.

एक औरत बेहद गोरी चिट्टी थी. उम्र में करीबन 40 के आस पास. सुन्दर और बेहद कामुक सी प्रतीत हो रही थी. ये थी सुधा.

तोह वही दूसरी एकदम काली थी. पर कोई मूर्ख hi होगा जो उसकी सुंदरता को पहचान न पाए. भरा हुआ शरीर और वह नैन नक्श. करीब 45 उम्र के आस पास, ये थी मुक्त.

तीसरी, जिसका रंग गेहुआ सा था. बदन एकदम परफेक्ट. न कही ज़्यादा मोटापा, न कही ज़्यादा पतलापन्न. ऐसा लग रहा था की गांव की कोई भाभी हो. ये थी वर्षा.

और वह लड़की, जो एकदम काली थी. पता लगाना मुश्किल नहीं था की वह मुक्त की hi बेटी थी. माँ का रंग पाया था उसने. नाम था सैली.

सुधा ने जैसे hi भावना को देखा, वह भांप गयी.

सुधा : छोटी मालकिन!!?

भावना : सुधा? क्या ये तुम हो?

सुधा (ख़ुशी से) : हाँ छोटी मालकिन!!!

आगे बढ़ वह दोनों एक दूसरे के गले से लग गए.

जब सब अंदर आये तोह सुमन ने विस्तार से वीर को सब कुछ समझाया.

सुमन : मालिक! पारिजात घर आपका घर है. बरसो से ये चला आ रहा है.

वीर : !!?

सुमन : आपका घर हम जैसे छोटे परिवारों को संरक्षण देता था. हमे मेहफ़ूज़ रखता था. हमारा पालन पोषण करता था. और हम, तन्न मैं धन, हर्र रूप से घराने की लोगो की सेवा करते थे. इन् सब को आप देख रहे है? इन्हे भी आपका परिवार hi कभी रखता था. इनकी देख भाल का ख़याल रखता था. पर हवेली के जाने के बाद, ये बस भटकते रहे. हरिकीर्तन इनके भी पीछे पड़ा हुआ था.

वीर : फिर?

सुमन : फिर बचने के लिए इन्होने यहाँ ये जगह ढूंढी. पहले पारिजात घर हवेली के अंदर hi होता था मालिक.

सुमन की बात से वीर को याद आया की उसके मां विजय अतीत में किसी महिला के संग किसी दरवाज़े से बाहर आये थे. क्या वही पारिजात घर था?

सुमन : पर हवेली के मिटत जाने के बाद से यही इनका घर है. एक प्रकार से ये आपके hi इंतज़ार में थी.

तीनो औरते और वह लड़की सैली वीर को देखने लगी. उनके नए मालिक उनके सामने थे. और चारो के अंदर वीर को देखने के बाद ज़रा भी संशय नहीं रहा.

अब वीर को सब समझ आ चूका था की ये माजरा कहा जा रहा था.

सुमन (स्माइल्स) : समय आ गया है की आप इनपे अपना हक़ जताये.

भावना और पूर्वी दोनों की सासें तेज़्ज़ हो गयी.

तेज : नहीं!!! में सब जानती हु आप क्या करने की कोशिश कर रही है.

सुमन : हम्म?

आरोही : हाँ! वीर को इन् सब की ज़रुरत नहीं.

तेज : सही कहा! ये सब पहले होता होगा. पर अब नहीं. हमने गांव का सच जान लिया है. और अब हमे गांव से कोई लेना देना नहीं है. वीर और हम सब अब वापस शहर जा रहे है. यहाँ की चीज़ो से हमे कोई नाता नहीं रखना है.

सुमन (स्माइल्स) : आपको किसने कहा नाता रखने के लिए? आप नहीं रखेंगी. पर मालिक को तोह रखना hi होगा. आखिर ये सब मालिक के इंतज़ार में hi अब तक खुद को यहाँ रखे हुए थी.

तेज : बिलकुल नहीं!!! वीर ने नहीं कहा था इनसे यहाँ रहने के लिए! वह तोह जानता भी नहीं इनके बारे में. बेफालतू की ज़िम्मेदारी नहीं फेको उसके सर्र.

सुमन : क्या ये औरते आपको बेफालतू की ज़िम्मेदारिया लगती है?

तेज : वह...

आरोही : तोह ठीक है. ज़िम्मेदारी लेने हम तैयार है. पर वीर को उसके आगे बढ़ने की तोह कोई ज़रुरत नहीं है न?

सुमन : क्यों नहीं है? मेने कहा न! ये सब तन्न मैं धन हर्र तरफ से मालिक की सेवा करने के लिए बानी है.

तेज : आरोही! It's okay! ठीक है! पर अगर मेरा भाई hi मन कर दे तोह? हाँ?

सुमन : ओह्ह्ह!

तेज (स्माइल्स) : बोलो?

सुमन : फिर तोह वाक़ई कुछ नहीं हो सकता.

तेज और आरोही एक दूसरे को देख मुस्कुरायी. आगे बढ़ के तेज वीर के पास आयी और सुमन को गुरूर की नज़रो से देख बोली,

तेज : वीर! कह दो की तुम्हे इन् औरतो से कोई मतलब नहीं!

*साइलेंस*

एक ख़ामोशी वह फेल गयी. सभी वीर के मुँह से उसके उत्तर का इंतज़ार कर रहे थे. पर जवाब अभी तक नहीं आया. इतना समय क्यों लग रहा था वीर को? तेज की बॉहे सिकुड़ उठी और वह पलट के अपने भाई को देखि.

वीर चुप चाप उन् औरतो को देख रहा था. वह सब बेचैन थी. और घबराते हुए उससे देख रही थी. सालो से वह यहाँ हवेली के घराने के लोगो का इंतज़ार कर रही थी. और आज वह दिन आ चूका था. पर उनके मालिक की बहने उनके आधे में आ रही थी. एक डर उनके अंदर समां गया.

वीर : सॉरी तेजू दी! पर सुमन ठीक कह रही है. में इन्हे यहाँ इस हाल में नहीं चोरर सकता.

तेज : Wh-Whaaaattttt???

आरोही : वीर??

वीर : सुमन की hi तरह इन्होने भी इतने साल मेरी राह देखि है. में इन्हे इस हाल में नहीं चोरर सकता.

तेज : H-Haan तोह ठीक है. पर उस से ज़्यादा तोह कुछ करने की ज़रुरत नहीं है न?

सुमन (स्माइल्स) : ज़रुरत क्यों नहीं है? एक मर्द को हमेशा एक औरत की ज़रुरत पड़ती है. मालिक! आइये!

इसके पहले की और बहस होती, सुमन उससे खींच के अंदर ले गयी.

"नहहीईई! वीएररर!!" तेज चिल्लाते हुए आगे बढ़ी पर,

सुमन : अंदर तभी आना! जब आप अपने भाई को नग्न अवस्था में देखने के लिए तैयार रहो!

और बेशक!! तेज के क़दम वही थम गए. वह गुस्से में सुमन को देखती रही. वीर को भी वह शिकायत भरी नज़रो से घूर रही थी. जैसे कहना चाह रही हो की क्यों किया ऐसा भाई? भावना और पूर्वी ने तोह पहले hi हार मान ली थी. अब कुछ नहीं हो सकता था.

भीतर जाते hi चारो औरते और सुमन वीर को घेरर के कड़ी हो गयी.

सभी ने बारी बारी खुद का परिचय दिया. वीर तोह पहले hi उन्हें चेक कर चूका था.

सुमन वीर के गोल गोल घूमने लगी. और उसके कानो में मंत्र मुग्ध कर देने वाली वाणी बोलना शुरू कर दी,

"देख क्या रहे है मालिक? आपके सामने तीन औरते है. जैसे चाहे, इनका इस्तेमाल करिये."

उन् गरम जिस्मो को देख वीर के लुंड ने एक झटका मारा. कैसे हुए ब्लाउज के अंदर उन् सभी के थान क़ैद थे. कोई जिस्म दूध जैसा गोरा सफ़ेद था. तोह कोई जिस्म एकदम चॉकलेट की तरह भूरा.

"सब आपकी hi है मालिक! और ख़ास बात बताऊ? सैली!! मुक्त की ये बेटी अब तक कुवारी है. अनछुई!"

एक झटका वीर के लुंड ने और मारा. एक वर्जिन लड़की!?

"तोह पहले किस्से छोड़ेंगे आप?"

सुमन के मुँह से अश्लील बातें सुन्न के न सिर्फ वीर जोश में आया बल्कि वह औरते भी गरम हो गयी. वीर जैसे नौजवान के साथ सम्भोग करना hi उनके लिए सपना था. और ऊपर से वही उनके मालिक भी थे. उनकी ख़ुशी का तोह कोई ठिकाना hi नहीं था.

सुमन ने अब तक अपने जिस्म से ब्लाउज उतार के अलग कर दिया था. और पीछे से उसने वीर की t-shirt भी उतार के फेक दी थी. वह अपनी बड़ी बड़ी दूध की नंगी थैलियों को उसकी पीठ पर चिपका के रगड़ने लगी.

"उफ्फ्फ्फ़ मालिक!! कितना गरम है आपका जिस्म!!! सससससस~ आह्ह्ह्णण!!!"

वीर सुमन के दूध के एहसास में डूब गया.

सामने कड़ी सुधा ने भी ये देख अपने बदन से ब्लाउज हटाया और उसके भी गोर गोर दूध नंगे हवा में झूल गए.

जब खुद hi औरते खुद को परोस रही थी तोह वीर भला कहा पीछे रहने वाला था?

सुधा की गदरायी कमर को थाम, वीर ने उससे जकड़ा और उसके होंठो का रस्सपान करने लगा. दोनों के होंठ भिड़ते hi आपस में जुंग करने लगे. आग उधर भी लगी हुई थी. और ये बरसो की आग थी.






आगे से सुधा और पीछे से सुमन! 4 दूध की थैलियों के बीच पीस रहा था वीर. जिसका आनंद hi अलग था.

"सुधा की बुर आपका लिंग अंदर लेने के लिया तड़प रही है मालिक!!"

वीर : आठ!!! सहित!!! सुमन-

*सलुउरररपपपप* *समूउकछ्ह*

थूक के मेल मिलाप के चलते वीर जम्म के सुधा को चूमता रहा. बीच बीच में आगे बढ़ के सुमन भी उनकी चुम्बन में शामिल होती और तीनो एक दूसरे के होंठो को चूमने लगते.

थूक पानी की तरह उनके मुँह से टपक रहा था पर तीनो आपस में चूमने में व्यस्त थे.

देखते hi देखते उनके बदन से कपडे अलग हो गए और तीनो नंगे हो गए. सुधा को नंगा देख के hi वीर का नाग फ़फ़कार मारने लगा. ज़ाहिर है किसी न किसी की पत्नी थी सुधा जो अब अकेली रह रही थी. सुमन जैसा hi हाल था उसका.

सुमन : आप इन्हे हलके में मत लेना मालिक!

वीर : हँ?

सुमन : ये सब सिर्फ तन्न से आपको संतुष्ट करने के लिए नहीं है.

वीर : !!??

सुमन : जानकारी के लिए बता दू की सुधा सिलाई करती है. और उसके जैसी सिलाई बिजईपुर तोह क्या आस पास के किसी भी गांव में किसी भी औरत में उसके जैसी योग्यता नहीं है.

वीर : ओह्ह!

सुमन : मुक्त जी रसोई में निपुड़ है. राजस्थानी खाने के स्वाद में उन्हें कोई भी पीछे नहीं चोरर सकता. सैली को भी वह सिखाती जा रही है.

वीर : !!!

सुमन : और वर्षा!! वर्षा उद्यान विद्या और साज सज्जा में निपुड़ है. पौधों और औषधियों का बहुत ज्ञान है उससे. आयुर्वेद का भी ज्ञान रखती है.

वीर (हैरान होते हुए) : ये सब इतना कुछ करना जानती है तोह-

सुमन : हम्म! पहले ऐसा नहीं होता था मालिक.

वीर : मतलब?

सुमन : क्या आपको पता है पारिजात घर की स्थापना कैसे हुई?

वीर : नहीं!

सुमन (स्माइल्स) : में बताती हु. बरसो पहले औरते सिर्फ हवेली के लोगो को शारीरिक सुख प्रदान करने के लिए होती थी. और तब पारिजात घर जैसा कुछ भी नहीं था.

वीर : फिर?

सुमन : फिर एक समय था जब आपके किसी पूर्वज पर हमला हुआ था. तब उनकी पसंदीदा दासी पारिजात ने उन्हें बचाया था. पर हमले में अपनी जान गवा दी. तोह उनकी याद में ये पारिजात घर को खोला गया. उसका निर्माड हवेली के अंदर hi कराया गया था.

वीर : तोह ये बात थी!

सुमन : और तभी से आपके पूर्वज ने उन् औरतो को न सिर्फ शारीरिक सुख देने के लिए रखा बल्कि उनकी शिक्षा भी शुरू की. जिसको जो पसंद था, जिसका जिसमे कौशल था, उन्हें वह करने की चूत मिली. यही कारण है की क्यों आज में और ये सब किसी न किसी क्षेत्र में निपुड़ है.

वीर : समझा सुमन!

सुमन : तोह आप इनका इस्तेमाल अच्छे से कीजियेगा मालिक! *स्माइल्स* शारीरिक ढंग से भी और सामाजिक ढंग से भी.

वीर : हम्म!

वीर ने मैं में आलरेडी एक प्लान बना लिया था.

सुमन : और अब काम की बात! देखिये! कैसे कुटिया बने सुधा की गोरी गांड आपका इंतज़ार कर रही है मालिक!

झुकते हुए सुमन ने गप्प से वीर का खड़ा लुंड मुँह में भर लिया. बगल से कड़ी वर्षा, मुक्त और सैली तेज़्ज़ सासें लेके सब कुछ होता देख रही थी. उनकी छूट भी कुलबुला रही थी.

*सलुउरररपपपप* *सछलीएकककक*

"ममममम!!! नननममम!!! *स्वववठुप्प* *सलुउररररपपप* उम्मम्मम!!"

"ओह्ह्ह फुकककक!!! सुमन!!!!"

उन् तीनो औरतो की आँखें वीर के लुंड को देख फटी की फटी हुई थी. विशाल लुंड को कितनी आसानी से सुमन मुँह में निगल रही थी.

अच्छी सी चुसाई हो जाने के बाद, सुमन कड़ी होक सुधा की गांड के पास गयी और उसकी दूध जैसी गांड के पतों को दोनों हाथ से चीयर के उसने अलग किया. तोह वीर को गांड का भूरा छेड़ नज़र आया. और छूट के होंठ भी.

वीर : तुम इनके बारे में इतना कैसे जानती हो सुमन?

सुमन (स्माइल्स) : क्युकी मेरी माँ पारिजात घर का hi एक अहम् हिस्सा थी. और में अक्सर घर में जाय करती थी. पर तब में 18 से नीचे की थी. सम्भोग नहीं कर सकती थी. सिर्फ औरतो से गप्पे लड़ाने और ज्ञान प्राप्त करने जाती थी.

वीर : समझा!

सुमन : तोह पहले किस छेड़ में डालना पसंद करोगे मालिक? ऊपर नीचे दो दो मौजूद है.

उसने उंगलियों से दोनों छेड़ को फैला के दिखाया तोह एक बार फिर वीर का लुंड झटका मार दिया.

सुमन (स्माइल्स) : में तोह कहती हु दोनों में hi दाल दो. सारे तोह आपके है.

सुधा : S-Suman! नहीं! S-Sirf बुर में अभी. मेने मॉल मार्ग में कभी नहीं डलवाया है.

सुमन (स्माइल्स) : ये मॉल मार्ग क्या होता है? गांड बोलो सुधा! और ये तोह अच्छी बात है की नहीं डलवाया है. मालिक hi उद्धघाटन करेंगे अब.

सुधा : ज़रूर! P-Par-...! पर आज नहीं सुमन!

*चाताआआकककककक*

सुधा : अह्ह्ह्णण!

सुमन : तुम कौन होती हो ये बताने वाली सुधा? मालिक का मैं होगा तोह वह अभी करेंगे!

सुधा : ाहन्नँ! Th-Theek!

वीर : नहीं!! अगर सुधा नहीं चाहती अभी तोह अभी नहीं. वैसे भी बाहर सभी मौजूद है. और उससे जल्दबाज़ी में नहीं कर सकते.

सुमन : हाँ! में तोह भूल hi गयी थी. गांड को छोड़ने के लिए पहले गांड के छेड़ को ढीला करना होगा. रोज़ एक ऊँगली डालने होगी. और धीरे धीरे एक से दो करनी पड़ेंगी. फिर बाद में तब आप इससे मार सकते हो मालिक. सुधा की गांड ढीली करने की ज़िम्मेदारी आप मुझ पर चोरर दो.

वीर ने अपना थूक निगलते हुए हाँ में सर्र हिलाया.

सुमन : अब आइये भी! कैसे पानी बहा रही है इस कुटिया की छूट. आइये! और अपनी इस रखेल की बुर का स्वाद चखिए मालिक.






वीर फिर न रुका. सुधा की फुद्दी पर लुंड सेट कर उसने धक्के देके लुंड पूरा अंदर पेल दिया.





बरसो बाद फिरसे छूट में लुंड पाते hi सुधा असीम आनंद की अनुभूति में डूब गयी. पर ये काफी विशाल था. इसका बोध उससे अगले hi पल हुआ. और हैरत के मारे फिर उसकी आँखें फेल गयी. लुंड जैसे जैसे अंदर जाता जा रहा था, सुधा की हालत पतली होती गयी और सिसकियों की आवाज़ गूंजती गयी.





"आआआह्ह्ह्हह्हहनननन! आह्हःन मायआ!!!! आआह्ह्हहननन!!!!! Uuuuuuuuuu!!!!"

*फट* *फट*

"अह्ह्ह्हहनननन स्स्सस्स्स्स~ "

*फट* *फट*

"हहहहहह! हहहह! उउउउउउउ!!!! सससस~ *हफ़* एईई माआआ~"

*फट* *फट*

ताबड़तोड़ धक्के मार मार कर वीर अपने चरम पर पहुचा. सुधा एक बार पहले hi जहर चुकी थी. ये उसका दूसरी बार पानी निकल रहा था.

और अगले hi शान,

"अअअअअरररग्ग्घहहहह!!!! फूऊकककककक!!!"

कराहते हुए वीर ने अपना लोड सुधा की छूट में उड़ेल दिया. बाहर जैसे hi लुंड निकाला, सुधा की फुद्दी से सफ़ेद मणि बाहर ाँ पड़ा.






और सुमन ने तुरंत hi अपनी ज़िम्मेदारी निभायी. वीर के लुंड को चूस के साफ़ करना.

बाहर सभी औरतो ने सब कुछ सुना था. एक एक चींख और एक एक सिसकिया उनके कानो को सुनाई दी थी. और हर्र एक औरतो के गाल शर्म और लज्जा से लाल थे. अंदर क्या हो रहा था वह सभी भली भाति जानती थी. पर एक बात और जान गयी थी की वीर बीएड में किसी जानवर से काम नहीं था. एक शादी शुदा औरत के मुँह से ये चींखे और सिसकिया सुन्न उन्हें अंदाजा लग गया था.

हालत सबसे ज़्यादा खराब किसी की थी तोह वह थी काव्य की. बेचारी का पूरा मुँह hi लाल टमाटर जैसा लाल हो रखा था. वह बेचारी न hi किसी से नज़रे मिला पा रही थी और न hi कुछ कह पा रही थी. बस शर्म के मारे नीचे नज़रे झुकाये ये सब कुछ ख़तम होने का इंतज़ार कर रही थी.

पर ये तोह शुरुआत थी.

सुधा की छूट से संतुष्ट हो जाने के बाद, सुमन ने गेहुआ जिस्म धारण करने वाली वर्षा को देखा.

और उससे अपनी ऊँगली के इशारे से नज़दीक बुलाया.

सुमन (स्माइल्स) : अब दूसरी रखेल की छूट में खुजली मच रही है मालिक. इससे भी शांत कर दीजिये!

धक्का देके उसने उन् दोनों को आपस में मिलाया और एक बार फिर शुरू हो गया रोलप्ले का खेल.

वीर ने उसके लाल ब्लाउज की ऊपर हाथ फेर उसके दूध के अकार का नाप लिया. क्या hi दुग्ध थे. दूध तोह वीर की कमज़ोरी थे. और मैं पसंद भी.






थानों को नंगा कर जैसे hi वीर ने उन्हें चूसा, तोह कुछ देरर बाद hi,

वीर : हहहहह???

वह हैरत में दूध चोरर वर्षा को देखा. उसके होंठो में सफ़ेद दूध की बूंदे लगी हुई थी. सुमन ने भी ये देखा,

सुमन : वर्षा??? T-Tum पेट से थी?

वर्षा (नॉड्स) : H-Haan!

सुमन : तोह तुम्हारा बच्चा?

वर्षा : वह ले गए!

सुमन : कौन ले गया?

वर्षा : बगल के गांव के व्यापारी सेठ.

सुमन : ये क्या कह रही हो तुम? पूरी बात बताओ!

वर्षा : में उनके घर में रहती थी. सेठ के बेटे की कोई औलाद नहीं थी. तोह किसी बच्चे को गॉड में लेने के बजाये मुझसे बच्चा पैदा किया. और रख लिया. उसके बाद सैली और मुक्त दीदी मुझसे जब मिली तोह मुझे वह से चुर्रा लायी.

सुमन : Y-Ye कैसे? उनकी इतनी मजाल! उन्हें तोह अभी-

वर्षा : नहीं सुमन दीदी!

सुमन : ???

वर्षा : सालो से उनका नमक खाया है. जानती हु उन्होंने ज़्यादती की है. पर ये बात झुटला नहीं सकती की अगर वह नहीं होते तोह में शायद आज ज़िंदा भी नहीं होती. रोज़ी रोटी तोह मेरी उसी घर से होती थी. भले hi मेरा शोषण कर संतान ले गए. पर अगर ज़िंदा हु तोह कही न कही उनके hi कारण!

सुमन : तुम दयालु मत बनो वर्षा!

वर्षा : नहीं! मुझे रहने का स्थान और अनाज चाहिए था. उन्होंने दिया. उन्हें संतान चाहिए थी. मेने उन्हें दी! इसके आगे अब कुछ नहीं. अब मालिक हमे मिल गए है. तोह अब में अपने आप को मालिक को समर्पित करती हु. मालिक? क्या आप मुझे स्वीकारेंगे? में सैली की तरह पवित्र तोह नहीं. पर आपकी सेवा पूरे मैं से करुँगी.

वीर वर्षा का डेडिकेशन देख खुश होइ गया. तोह क्या हुआ अगर वह वर्जिन नहीं थी . पर अब तोह वह उसकी hi था न.

चाँद पालो में hi वर्षा के बदन से उसके कपडे उतर गए और फिर उसके संग भी वही हुआ जो सुधा के संग हुआ था.

असली दिवाली मन रहा था आज वीर. एक छूट की सेरर करने के बाद, दूसरी छूट के मॉस में अपना लुंड दाल रहा था. अलग अलग छूट को महसूस कर रहा था.






वीर ने जी भर के वर्षा के दूध से दूध पिया. और उसको अच्छे से निचोड़ने के बाद उसने उसकी बुर में भी अपना मुट्ठ गिरा दिया. सुमन ने फिर वही किया. मालिक के गंदे लुंड को मुँह से साफ़ करना.

फिर जब सुमन की नज़र उन् काली कलूटी माँ बेटी पर गयी तोह मुक्त ने सर्र झुका लिया.

मुक्त : हमे क्यों देखती हो सुमन? हम काली कलूटी मुँह वाली को तोह आदमी देखता तक नहीं. और मालिक ठहरे शहरी nau-jawaan हट्टे काटते. हमारा मज़ाक न उड़ाओ.

सुमन : मालिक? आपका क्या ख़याल है?

वीर ऊपर से नीचे मुक्त के जिस्म को ताड़ रहा था. उसका लुंड इतना टाइट हो चूका था की परपेंडिकुलर बन्न गया था पूरा.

मुक्त और सैली भले काली थी. पर दोनों अपनी खूबसूरती से अनजान थी. मुक्त के पास हर्र एक डिपार्टमेंट में सही मॉस था. और सैली नैन नक्श और चेहरे की बनावट में इतनी सुन्दर थी की अच्छे से अच्छी मॉडल्स को पीछे चोरर दे.

वह एक ब्लैक ब्यूटी थी.

वीर : आगे आओ मुक्त!

अपने से छोटी उम्र के लड़के के मुँह से अपना नाम डायरेक्टली सुन्न, मुक्त का बदन काँप गया.

सुमन (स्माइल्स) : नंगी हो जाओ! मालिक आपको छोड़ना चाहते है.

मुक्त ये सुन्न स्तब्ध रह गयी.

मुक्त : K-Kyaaa? P-Par में-

सुमन : आपने सुना नहीं? मालिक आपको छोड़ना चाहते है.

एक बार फिर मुक्त का बदन ठिठुर गया. पहली बार आज किसी ने उसके जिस्म की सामने से मांग की थी. और वह भी उसके मालिक ने. लम्बी लम्बी उखड़ी सासें लिए वह अपनी बेटी के सामने hi अपना दुपट्टा हटा के वह नंगी होने लगी.

सैली : M-Maa???

सैली तेज़्ज़ धड़कन लिए सब कुछ देखती रही. और पल भर में उसकी माँ उसके सामने पूरी मादरजात नंगी कड़ी हुई थी. वीर चल के उसके पास आया और अपने से चिपका के पहले उसके काले नंगे जिस्म को महसूस किया.

वह नंगे काले थान, काली चुत्तड़, भूरे निप्पल, और गुलाबी छूट.

हर्र अंग को वीर ने दबा दबा के महसूस किया. और फिर उससे धक्का देके लिटाया. सुमन ने मौका देखते hi मुक्त की gaddi-daar गांड के पतों को फैलाया और छूट के काले होंठ वीर को दिखाए. हलकी हलकी झात भी मौजूद थी.

छूट के होंठो को जैसे hi उसने खोला तोह एकदम गुलाबी हिस्सा वीर की आँखों में आया. और एक छेड़ भी.

सुमन (स्माइल्स) : ये रहा! डालिये मालिक! तीसरी छूट तैयार है. आपका लिंग सूख गया है. में फिरसे चूस देती हु.

एक बार पुनः मुँह में भर, लुंड को गीला कर सुमन ने खुद hi मुक्त की छूट में लुंड सेट कर दिया. और फिरसे वही हुआ.






कमरे में सिसकियों की गूँज फेल गयी. चॉकलेट रंग की गांड को छोड़ने में आज वीर को एक अलग hi जोश चढ़ा हुआ था. एक साथ तीन तीन अलग अलग छूट का स्वाद चखा था उसने.

और तीनो के hi छूट में उसने अपना माल गिराया था.

बची थी सैली तोह अभी उसके साथ यहाँ करना सही क़दम नहीं था.

आज दिवाली के सही राकेट तोह वीर ने hi उड़ाए थे. जिनके फूटने की आवाज़ हर्र एक महिला ने बाहर सुनी थी.

सुमन को भी उसने फिर अच्छे से निचोड़ा. दोनों छेड़ो का लुत्फ़ लिया.

और करीबन 2 घंटे के ऊपर हो चुके थे जब वीर वापस आया. जन्मदिन का पूरा मज़ा उठाया था आज उसने.

पर बाहर आके अब समस्या सामने थी. सबकी अजीब नज़रो का सामने करना था उससे. खुद पर उसने इसका फ़र्क़ न पड़ने दिया. और खामोश hi रहा.

दिवाली की शाम लग गयी और पूजा पाठ की तैयारियां भी शुरू हो गयी. आज रात उनकी यहाँ आखिरी रात थी. इसके बाद सभी वापस लौटने वाले थे.

घर में hi पूजा कर जब सब खाना खा के फुर्सत हुए तोह वीर सोने से पहले बाहर टहलने गया. गहरी सोच में था.

और उसके पीछे से तब तेज की आवाज़ आयी,

"वीर??"

वीर : ओह्ह्ह!

वह उसके बगल से आके कड़ी हुई पर दोनों नज़रे नहीं मिला रही थी. एक जो रिश्ता सफर की शुरुआत में ट्रैन में शुरू हुआ था. वह जैसे अब बिखर रहा रहा. कुछ समझ नहीं आ रहा था दोनों को.

तेज : वीर!!

वीर : कहिये!

तेज : क्या तुम-!?

वीर : ??

तेज : क्या तुम्हे वाक़ई वो करने की ज़रुरत थी?

वीर : क्या?

तेज : तुम जानते हो में क्या कहना चाह रही हु.

वीर : यस!

तेज : क्यययूउउउउ????

वीर : वह मेरी रिस्पांसिबिलिटी है!

तेज : उनका देख भाल रखना? Okay ी अंडरस्टैंड! बूत... बूत... बूत सेक्स??! सीरियसली?

वीर : क्यों नहीं? एक मर्द हु में भी. ी नीड प्लेअसुरे एंड सटिस्फैक्शन.

तेज : तोह उसके लिए...! उसके लिए एक गफ ढूंढो वीर. खुद को उन् औरतो पर वास्ते क्यों करना? यू जस्ट-!!! व्हाई don't यू अंडरस्टैंड?? देखो खुद को! स्टड हो! हैंडसम हो! स्मार्ट हो! एक आइडियल लड़के के सारे पॉइंट्स है तुम्हारे पास. फिर-!!? वियय?? Y-You don't नीड थम वीर! J-Just! जस्ट गेट अवे विथ आईटी. कह दो की तुम्हे उनसे मतलब नहीं है. खर्चा हम दे देंगे बूत बाकी चीज़े में अपना हाथ ने घुसेड़े वह. और-

वीर : न्यू!

तेज : हहह?

वीर : सुमन की हालत मेने देखि है. वह सब मेरी ज़िम्मेदारिया है. और सुमन भले hi कुछ भी करे. वह मेरे हिट में hi हमेशा सब कुछ करती है. मुझे उस पर भरोसा है.

तेज : B-But...!

वीर : वह सिर्फ मेरी ज़िम्मेदारिया नहीं है.

तेज : ???

वीर : ी क्लेम थम आल!!!

बोल, वह उसके बगल से अंदर चला गया. तेज के बदन में रुए खड़े हो गए. कही न कही वीर ने उससे आज एक अल्फा की ज़ोरदार झलक दिखा दी थी.

तेज गुस्सा इसलिए नहीं थी की उसका भाई औरतो के साथ सेक्स कर रहा था. वह गुस्सा इसलिए थी क्युकी वह मिडिल एज्ड औरतो के संग सेक्स कर रहा था.

उसके अनुसार, तेरे वेरे मच बेटर एंड ब्यूटीफुल वीमेन.

वीर को असली सुन्दर लड़कियों पर ध्यान देना चाहिए. जैसे की वह...! कही न कही वह उन् औरतो से जल रही थी. क्युकी वीर का जो अटेंशन था, वह अब पहले की तरह उस पर नहीं था. उसका अटेंशन भटक गया था.

खीजते हुए वह अंदर चली गयी.

***

देरर रात माँ बेटे एक दूसरे के बगल से लेते हुए थे.

भावना : तोह तुमने इससे स्वीकार कर लिया!

वीर : हम्म! और आप और मासी नाराज़ हो.

भावना : N-Nahi! ऐसा नहीं है.

वीर : झूठ कहने की ज़रुरत नहीं. चेहरा साफ़ बता रहा है आपका.

भावना : तोह क्यों नाराज़ नहीं होउंगी? किस माँ को ख़ुशी होगी बेटे को ऐसे देख? ये सब भले hi तुम्हारी ज़िम्मेदारिया है. पर ये अच्छी बात नहीं है.

वीर : तोह पुरातन काल से इससे चलन में क्यों रखा हुआ है?

भावना : में हमेशा hi इस से naa-khush थी. इसके खिलाफ थी.

वीर : भूलिए नहीं की सुमन का पूरा परिवार हमारे परिवार से जुड़ा हुआ है. अगर आज में उससे अपने से अलग कर दू और कल को उसके साथ कोई हादसा हो जाए तोह क्या आप उसकी ज़िम्मेदारी लेंगी?

भावना अपनी कोहनी के बल उठाते हुए वीर की तरफ मुद उससे देखि,

भावना : मुझे और पूर्वी को भावना और उसके परिवार से कोई दिक्कत नहीं है.

वीर : तोह फिर?

भावना (फ्रोंस) : पारिजात घर में आने की क्या ज़रुरत थी?

वीर (स्माइल्स) : तोह आप चाहती है में सिर्फ एक घर के बारे में सोचु? क्या इनका परिवार नहीं था?

भावना : पर ये सभी सुमन की तरह हमसे जुडी नहीं है. ये आज़ाद है. तुम चाहो तोह-

वीर : वह मेरे संग रहना चाहती है.

भावना : पर तुम-

वीर : और में भी!

भावना मौन रह गयी. दोनों hi तरफ से इच्छा पूर्वक क़दम था ये. भावना इसमें हस्तक्छेप नहीं कर सकती थी.

वीर : एक बात बताइये!

भावना : ???

वीर : क्या अब आप खुद अन्याय नहीं कर रही?

भावना : हहह?

वीर : आप एक हिस्से को तोह अच्छे से देख रही हो पर दूसरे हिस्से का क्या? सुमन हमसे जुडी हुई है तोह आपको कोई परेशानी नहीं है. पर वही ये सभी नहीं जुडी है तोह आपको दिक्कत है. क्यों?

भावना : क्युकी-

वीर : हम्म?

भावना : क्युकी में नहीं चाहती की मेरा बीटा इन् सब में पड़े.

वीर : किन सब में? खुल के कहिये!

भावना : I-Inn सब में! शारीरिक आकर्षण में. हवस में! लोभ में! औरत के जिस्म के मोह में. अब समझे??

वीर : क्या आपको लगता है की में इन् सब में पद के अपनी बुद्धि भ्रष्ट कर लूंगा?

भावना (धीमे से) : H-Haan!

वीर : और अगर में आपको वचन दू की कभी भी मुझ में इन् सब के चलते कोई बुरा बदलाव नहीं आएगा तोह?

भावना : हहहह!?

वीर : कहिये?

भावना : अगर ऐसा करने में तुम सक्षम रहे तोह तुम्हे कभी नहीं तोकूँगी. और न hi रोकूंगी.

वीर : वादा?

भावना (लम्बी सास लेते हुए) : वादा!

वीर (स्माइल्स) : ठीक है फिर!

भावना : अब मुझे एक बात बताओ!

वीर : हम्म?

भावना : तुम्हारे मास्टर कौन है?

वीर : हँ?

वीर सोच में पद गया. मास्टर? कौन सा मास्टर?

[Master! Woh aapke uss imaginary master ki baat kar rahi hai.]

'हहह!?'

[Remember? Egypt ki trip me aapne apni mom se ye kaha tha ki aapke ek master hai jisne aapko puraane tatvo ki chhaan been la gyaan diya hai.]

वीर को याद आया. हाँ बहनचोद ऐसा कुछ तोह हुआ था. काहे का मास्टर? लुंड मास्टर था. कोई मास्टर नहीं था. वीर ने तोह झूठ कहा था. पर अब उसकी माँ उस अनजान मास्टर के बारे में पूछ रही थी जो असल में एक्सिस्ट hi नहीं करता था.

वीर : ओह्ह वह! वह सेक्लुसिओं में है.

भावना : कहा?

वीर : ाहः! K-Kaha? हाँ! मुझे नहीं पता. मुझे बता के नहीं गए न. गए होंगे किसी गुफा में खोज करने. और वही रह रहे होंगे. हु कनौस!?

भावना : ओह्ह्ह!

वीर : मुझे भी कुछ पूछना है!

भावना : पूछो!

वीर इस बार सीरियस वे में अपनी माँ को देखा,

वीर : अगर में ेगीपत नहीं आता तोह क्या आप मुझे ढूंढने आती? मुझे नहीं लगता की फिर आप मुझे-

भावना ने अगले hi शान उसके होंठो पर हाथ रख उससे चुप करा दिया.

भावना : खबरदार जो एक शब्द भी आगे कहा तोह. तेरा ख़याल हर्र पल मुझे रहा है. अगर तू नहीं आता. तोह में ज़रूर आती. भले hi समय लगता. पर आती ज़रूर!

बस यही sunn'na था वीर को. एक संतोषजनक मुस्कान उसके होंठो पर सज्ज गयी.

वीर : जयपुर से आप पिछले साल कही जा रही थी.

भावना (स्माइल्स) : हाँ!

वीर : *स्माइल्स*

भावना : हहहहह??? T-Tumhe कैसे पता?

वह अचानक झेप गयी.

वीर (स्माइल्स) : याद करिये! आप को उस समय स्टेशन पर पानी की बोतल की ज़रुरत थी. आपकी बैक में दर्द था शायद.

भावना : H-Haan! पर-

वीर (स्माइल्स) : तब आपने एक लड़के को बुला के उस से बोतल मंगवाई थी. और उससे बदले में चॉकलेट्स भी दी थी.

ये सुनते hi भावना की आँखें फटी रह गयी. उससे बोध हुआ. वह मुँह फाड़े वीर को देखने लगी. और वीर मुस्कुरा के अपनी माँ के रिएक्शन का लुत्फ़ लेता गया.

वीर (स्माइल्स) : वह में hi था!

*बूम*

एक विस्फोट हुआ भावना के मैं में. उसके होंठ कुछ बोलने के लिए जुड़े पर शब्द बाहर न निकले. प्रयत्न किया खूब पर आवाज़ बाहर hi नहीं आ रही थी.

वीर : और उस दिन भी मेरा जन्मदिन था!

*बूम*

एक और झटका लगा उससे. भावना इतनी ज़्यादा भावुक हो गयी की उसकी आँखों से ासु बाढ़ की तरह बहने लगे. वह झट्ट से अपने बेटे के गले से लग गयी. और रोने लगी.

भावना : B-Brijesh ने तोह मेरी तस्वीरें जला दी थी. *स्निफ्फ* F-Fir तुमने मुझे पहचाना-

वीर (झूठ कहते हुए) : आपकी एक तस्वीर घर में रह गयी थी. तोह पहचान गया था आपको. की आप hi मेरी माँ हो.

भावना : तोह फिर मुझे पुकारा क्यों नाहीईई????? *स्निफ्फ*

वीर (स्माइल्स) : जब तक ध्यान में आया. आपकी ट्रैन जा चुकी थी. और तबसे hi ठान लिया था. आपको धुंध निकालूंगा.

भावना फिर रो पड़ी.

भावना : M-Mujhe माफ़ कर दे! मुझे माफ़ कर दे बेतु!!!! *स्निफ्फ* I'm सॉरी!!! फॉर एवरीथिंग!!! *स्निफ्फ*

वीर (स्माइल्स) : It's okay...! माँ!!!

भावना को लगा था वह आसुओ को रोक लेगी. पर वीर के मुँह से आखिर शब्द सुनते hi...! अब उसके ासु न रुके. और वह लगातार सिसकी ले ले के रोटी चली गयी.

और ये दिवाली की रात भी वही समाप्त हो गयी.

.

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस.

थिस अपडेट कंसिस्ट्स ऑफ़ अराउंड 8क वर्ड्स. रूल जो लोग जानते hi हो. लाइक्स ठोकने का और रेवोस रखने का. तब तक के लिए,


धन्यवाद! ✨
 
रमैनिंग कमैंट्स के रिलीज जल्द hi मिल जायेंगे. ी क्नोव काफी रिलीज बचे हुए है. बूत अस यू आल क्नोव, जल्द hi उनके रिलीज दे दिए जायेंगे अस उसुअल. बस अब एक hi अपडेट बचा है इस अर्च का. 129तह अपडेट के बाद ये अर्च फिनिश हो जायेगा. और 130तह से नई अर्च ~ क्रिमसन अर्च शुरू होएगा. :डिक्लेअर:

पर उसके पहले. ी विल टेक ा ब्रेक. जो की हर्र अर्च के एन्ड के बाद में लेता हु. क्रिमसन अर्च को लेके चीज़े शूम उप करनी होंगी. काफी चीज़े और चेकपॉइंट्स क्रिएट करने होंगे. उनमे मुझे समय लगेगा. सो बेयर विथ आईटी. एंड कीप सपोर्टिंग! ✨
 
Back
Top