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आँखों के सामने घाना अँधेरा छाया हुआ था ,कुछ आवाजे अभी भी मेरे कानो में आ रही थी ,कुछ रोने की आवाजे ,कुछ चिल्लाने की आवाजे, मैं अपनी आंखे खोलकर इन सबको देख पाने में असमर्थ था ,मेरे सरे शरीर में इतने घाव पद चुके थे की मुझे इनके दर्द का अहसास भी होना बंद हो चूका था ,धीरे धीरे मैं बेसुध हो गया ………
मैं सपनो की एक नयी दुनिया में खो चूका था ,जंहा मेरे पिता हाथो में लम्बी सी चमकदार तलवार लिए खड़े हुए दिखाई दिए ,उनका पूरा शरीर चमक रहा था ,माँ उनके बांहो में रक्षा का धागा बांध रही थी ,उनकी मूंछे पुरे सबाब में उठी हुई थी ,मर्दानगी उनके जिस्म से hi नहीं बल्कि उनके रोम रोम से फुट रही थी ,वो गर्व से भरे हुए नजर आ रहे थे ,इतनी भीड़ और शोर शराबे में भी उनके चेहरे में एक शिकन तक नहीं थी ,मरने का कोई दर कही भी दिखाई नहीं दे रहा था ,आँखों में चमक थी और उनकी नजरे मेरे उप्पेर गई उनके चेहरे की मुस्कान और भी गाडी हो गई जैसे वो मुझसे कह रहे हो की आने वाले दिन में उनकी ये जगह मुझे लेनी है …….
“नर्स तुरंत इंजेक्शन बनाओ इसकी धड़कन धीमी हो रही है “
मेरे कानो में ये आवाज आयी ,मुझे अभी ये खबर hi नहीं थी की मैं अभी कहा था ,कुछ देर पहले मेरे जिस्म में ना जाने कितने वॉर किये गए थे ,तलवारो से मेरे पिता जी मेरे दोनों चाचा और मुझे चिर दिया गया tha,pta नहीं शायद मैं भी कुछ hi देर का मेहमान था ……..
ये सब किसने किया था ???
मुझे उसका नाम कुछ कुछ सुनाई दे रहा था जब पिता जी ने उसे ललकारा था …सुलभ सिंह ..
साहनपुर के मुखिया का भाई …
घुघर का मैदान ,और हमारे परिवार का एक बहुत hi महत्वपूर्ण दिन ,घुघर का मैदान दो गांवो के बिच में था, एक था साहनपुर तो दूसरा था लखनपुर ,दोनों गांवो में ना जाने कितने ज़माने से दुश्मनी का माहौल था ,और दोनों hi गांवो के बिच था घुघर गांव ,घुघर गांव पहले शिकारियों का गांव होता था ,शिकारी जो अपनी कला को लेकर प्रसिद्ध तो थे hi साथ hi साथ और भी कई अजीबो गरीब प्रथाओं के लिए प्रसिद्धः थे ,यही गांव था साहनपुर और लखनपुर के बिच की दुश्मनी का कारण ,घुघर के मैदान में बानी शिकारियों के देवता का मंदिर, हर 10 सालो में यंहा मेला होता था ,मेला भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि इसे खुनी मेला कहा जाता था, खुनी मेला इसलिए क्योकि यंहा खून की होली खेली जाती थी ,वो भी बस 2 परिवारों के बिच लखनपुर और साहनपुर के मुखिया के परिवारों के बिच ये दोनों परिवार सालो से एक दूसरे के कट्टर दुशमन थे ,और दुशानि की वजह थी घुघर के मैदान में बने शिकारी के मंदिर पर अधिकार ,इसके लिए एक मेले का आयोजन किया जाता था जिसमे दोनों परिवारों के लोगो के बिच एक जंग होती थी खुनी जंग, जो जित जाता उसे मिलता था 10 सालो के लिए पूजा का अधिकार ..
मैं भी उसी परिवार में से एक का सदस्य था, मई लखनपुर के चौधरी परिवार के इस पीडाही का इकलौता मर्द था ,मेरे पिता जी लखनपुर के मुखिया थे और उनके 2 और भाई थे ,मेरा नाम है अजय ,मेरे पिता विनय चौधरी की लड़ाई आज साहनपुर के मुखिया तरसिंघ से होने वाली थी ,दोनों hi परिवार दांतो में उंगली दबाकर बैठे हुए तमाशा देख रहे थे ,सबको पता था की दोनों में से एक hi जीतेगा और दूसरा या तो 10 सालो तक पराजय की आग में जलेगा या फिर वही अपनी जीवन लीला को समाप्त कर देगा ..
इतने बैर होने के बाद भी दोनों गांव के लोगो में एक नियम था की महिलाओ और बच्चो पर कोई हाथ नहीं उठता था, एक दूसरे से लड़ने वाले की और उसके मौत की भी इज्जत की जाती थी ,इस मंदिर में ऐसा क्या खास था ये तो अभी मेरे नौजवान दिमाग के बहार था ,लेकिन मैं अपनी माँ और चाचा- चहियो और बहनो के साथ बैठा हुआ उत्सुकता से पिता जी को जीतते हुए देखना चाहता था ..
सामने तारा सिंह का परिवार बैठा हुआ था ,उसका भाई सुलभ सिंह बहुत hi उत्तेजित दिखाई पद रहा था ,साथ hi एक मेरे hi उम्र की कन्या पर मेरा धायण जैम गया ,ये थी तारा सिंह की बेटी रिद्धिमा ..हम दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा उठे क्योकि हम एक hi क्लास में पड़ते थे ,कभी बात नहीं की थी लेकिन एक दूसरे को देखा करते थे ,जी है तीनो गांव के बच्चे एक hi स्कूल ,एक hi कॉलेज में पढ़ते थे ,एक hi मंदिर में पूजा किया करते थे ,एक hi बाजार से सामान लिया करते थे ,और तीनो चीजे एक hi जगह पर थी वो था घुघर गांव ..बस कॉलेज 3no गांवो से थोड़े दूर बादलखेड़ा शहर में था जंहा मैं मेरी बहन (चहका की लड़की) शिरीन और रिद्धिमा पढ़ते थे, लेकिन बादलखेड़ा जाने का रास्ता भी घुघर से होकर hi गुजरता था …
अजीब बात थी की लड़ाई तो 10 सालो में एक बार hi होती थी लेकिन दुश्मनी हमेशा hi बरकरार रहती थी …
लड़ाई शुरू हो चुकी थी मेरी माँ ने पिता जी की पूजा की ,बांहो में एक धागा बंधा और एक चमचमाती हुई तलवार उन्हें दी ,पिता जी का विशाल मजबूत देह तेल लगने से चमक रहा था ,वो सिर्फ एक धोती पहने हुए थे ,साइन में उगे हुए घुंघराले बल , चौड़ी छाती और विशाल भुजाये उनके मर्दानगी की गवाही चीख चीखकर दे रहे थे..
मंदिर की घंटी बजने लगी और साथ hi नंगाड़ों की आवाज भी आने लगी थी मतलब युद्ध का समय आ चूका था और मैं और सभी की सांसे जैसे रुक सी गयी थी , एक बार मेरी नजर फिर से रिद्धिमा पर गयी , हम जवान थे एक दूसरे के क्लास में पढ़ते थे , कभी कभी नजन भी मिल जाया करती थी, हमारे बिच वो दुश्मनी की दिवार नहीं थी जो हमारे परिवारों के बिच थी लेकिन फिर भी हमारे घर वालो ने हमें बात करने से मन कर रखा था , लेकिन यौवन की भूख क्या चाहता है , एक छोटी सी ख्वाहिस हम दोनों के दिलो में थी नौजवान जिस्मो और मन की एक प्यारी सी भूख … शायद दोस्ती की भूख या शायद प्रेम की भूख ???
रिद्धिमा ने मुझे आल था बेस्ट वाला इशारा किया , उसने अपना अंगूठा उठाकर ये इशारा किया था, जवाब मैंने भी उसे वही दिया .. हमें नहीं पता था की ये कोई खेल नहीं था ये अभिमान की लड़ाई थी , और एक छोटे से इंसान जिसकी इस दुनिया में कोई भी वैल्यू नहीं है उसके अभिमान की कीमत उसके लिए सबसे ज्यादा होती है …
मेरे पिता और तरसिंग अपनी चमचमाती हुई तलवार लिए मैदान में थे , सारा गांव चिल्ला रहा था उधर साहनपुर वाले भी चिल्ला रहे थे बिच में बैठे हुए शिकारी वाले गांव घुघर के लोग भी चिल्ला उठे थे , वंहा भी मेरे कई दोस्त थे जो मुझे देख रहे थे कुछ जाने पहचाने चेहरे जिनके साथ मैं रोज पढ़ने जाया करता था ..
लेकिन मैदान का नजारा कुछ अलग hi था मेरे पिता और तारा सिंह भी एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे , दोनों hi दिखने में बलसाली थे, भुवाजो की ताकत साफ़ साफ़ पता चल रही थी , एक शंख जोरो से बजाय गया , नंगाड़े बज उठे और दोनों hi एक दूसरे पर टूट पड़े , जो ध्यान इधर उधर भटका था वो सब अब मैदान पर आ गया था , चारो तरफ बस शांति छ गयी थी , तलवारो की टक्कर से पूरा माहौल hi गूंज उठा था …
“इसकी धड़कन वापस आ रही है ..”डॉ. की आवाज फिर से मेरे कानो में पड़ी ,
“माँ ..” मेरे मुँह से पहला शब्द निकला था एक इंजेक्शन मेरे साइन में लगाया गया था और मेरी सांसे फिर से चलने लगी थी ,
“मैं यही हु बीटा तुझे कुछ नहीं होगा “ मेरी रोटी हुई माँ की आवाज मेरे कानो में पड़ी ..
मैं फिर सपनो के शहर में शेर कर रहा था …
तलवारो की छोट से लोगो के मुँह से निकली हुई आह ..
दोनों hi एक दूसरे को काट डालने को तैयार थी और पूरी ताकत लगा रहे थे , मेरे पिता के बाजु को तारा सिंह की तलवार ने काट दिया था ..
“नहीं ….” मेरी माँ बोल उठी थी लेकिन मेरे पिता के चेहरे पर अभी भी को शिकन तक नहीं था ..
“भाभी डरो नहीं भैया जित जायेंगे “ मेरे चाचा ने कहा कहा , मेरे दोनों चाचा और चचिया भी वही अपने मुँह में उंगली दबाये हुए बैठे थे , मेरी तीनो बहने मेरे पिता की चोट से बस सुबकने लगी थी ..
“पापा मारो उसे ..” आया बोल उठी , आया मेरी दीदी थी मुझसे 2 साल बड़ी थी
“बड़े पापा जित जायेंगे ..” ये बोलने वाली शिरीन और ऋतू थी ये दोनों मेरे चाचा की बेतिया थी , दोनों hi मुझसे छोटी थी
ऋतू मेरे कंधे पर अपना हाथ रखे उछाल रही थी , इधर मेरे पिता जी भी पूरी म्हणत कर रहे थे , युधः पुरे शबाब पर पहुंच चूका था ..
अचानक तारा सिंह की तलवार चली और मेरे पिता के कंधे में जा लगी , वो जख्मी हो चुके थे , सारा लखनपुर शांत हो चूका था वही साहनपुर वाले जोश में चीला उठे थे , मैं भी आंखे फाडे ये सब देख रहा था ..
“पिता जी घुमा कर मारिये “ मैं खड़ा होकर चिल्ला उठा , मेरे पिता ने एक बार प्यार भरी निगाहो से मुझे देखा और एक बार पूरा घूमकर तलवार चला दी …
तलवार सीधे तारा सिंह के गले में जा लगी , खून का एक फुहारा फुट पड़ा था जो साहनपुर वाले अभी जोश में भरकर चिल्ला रहे थे वो सभी अचानक से शांत हो चुके थे ,, सभी शांत हो चुके थे ये वार hi ऐसा था की सबको चुप करवा दे ..
तारा सिंह लड़खड़ाता हुए निचे बैठ गया था , उसके गले से खून की धार बाह गयी थी , मेरे पिता को भी जैसे गलती का अहसास हुआ वो तारा सिंह के पास जाकर बैठ गए , वो उससे पूछ रहे थे की क्या वो ठीक है ..
तारा सींग का जिस्म कमजोर हो चूका था लेकिन इरादे नहीं, उसने एक बार मेरे पिता को देखा और मुस्कुरा उठा ..
“चौधरी आज या तो तू जिन्दा जायेगा या फिर मैं “तारा सींग जोरो से लेकिन मुस्कुराते हुए बोल उठा , मेरे पिता ने भी उसके हिम्मत की कदर की और उसे हाथ बढाकर उठा लिया , क्या प्यारी सी दुश्मनी थी जो एक दूसरे के हिम्मत की भी इज्जत करते थे ..
“तारा आज तेरी भी इक्छा पूरी कर देता हु , देखते है की सीकरी बाबा के मंदिर में आज दिया कौन जलाता है “ मेरे पिता ने उसे उठाते हुए कहा ..
वार गले में किया गया था खून बाह रहा था लेकिन तारा ने एक हाथो से अपने गले को दबा कर खून का बहकना काम कर रखा था और दूसरे हाथो से फिर से तलवार सम्हाल ली थी
“हार मान जा तारा तू लड़ने की हालत में नहीं है ..”
मेरे पिता ने उसकी हालत देख कर कहा
“अगर हार कर चला गया तो पूरा गांव ठु ठु करेगा “तारा ने अपनी बात राखी
“हम दोनों बचपन के दोस्त है मैं कैसे तुझे मार दू “
मेरे पिता की धीमी आवाज मेरे कानो में आ गयी , मेरे पिता शांत हो चुके थे लेकिन तारा मुस्कुराया था
“अगर दोस्त मंटा है तो चला दे तलवार , मुझे इज्जत की मौत दे दे , “ तारा सींग ने मेरे पिता को एक अजीब hi नजरो से देखा था , मैंने अपने पिता को इतना कमजोर कभी नहीं पाया , आज उनके हाथ काँप रहे थे
“बहुत हुई दुश्मनी तारा मैं तुझे नहीं मार सकता , इसे यही ख़त्म करते है ,मान ले अपनी हार छोड़ दे जिद 10 साल बाद हम फिर यही होंगे , अगर तुझे अभी इलाज नहीं मिला तो तू नहीं बच पायेगा , ये मुझसे क्या गलती हो गयी मैंने तुझे कहा मार दिया “
पहली बार मेरे पिता के आँखों में एक अफ़सोस सा दिखाई दिया , गांव वाले चिल्ला रहे थे लेकिन मैं अब भी उन दोनों की आँखों में छिपे उस प्रेम और सम्मान को देख प् रहा था जो शायद सिर्फ मुझे दिखाई दे रहा था ..
“नहीं विजय ये कोई खेल नहीं है , ये परंपरा है हमारे और तुम्हारे परिवारों के बिच शादियों से चली आ रही परंपरा , हम्मे इतनी हिम्मत नहीं की हम इसे तोड़ पाए .. शायद हमारे बच्चे इसे तोड़ पाए ..”
तारा ने एक बार मुझे देखा और एक बार रिद्धिमा को ..
“अगर हम इसे दोस्त होकर नहीं तोड़ पाए तो ये कैसे तोड़ेंगे “
मेरे पिता की आँखों में एक गीलापन ुबाहर आया था
तारा सींग का खून बहुत hi बाह चूका था वो और भी कमजोर हो रहा था
“मैं हार नहीं मानूंगा “
तारा सींग ने अपने को मुश्किल से खड़ा रखते हुए कहा
“ऐसा मत कर मान ले हार , देख तू लड़ने के काबिल भी नहीं रहा “
मेरे पिता ने उसे देखते हुए कहा था
“चला दे तलवार मार दे मुझे , मेरा भाई मुझे नामर्द समझे इससे तो अच्छा है की तेरे हाथो मारा जाऊ “
तारा के आँखों में एक चमक आ गयी थी , उसने एक बार अपने छोटे भाई सुलभ की और देखा .. जो की गुस्से से भरा हुआ मेरे पिता को देख रहा था ..
“ऐसे मत कर तारा “मेरे पिता ने फिर से कहा लेकिन तारा ने अपनी तलवार गुमा दी , मेरे पिता बच गए लेकिन तारा ने फिर एक जानलेवा हमला कर दिया
“या तो तू या मैं .. आज तो कोई एक hi जिन्दा जायेगा , फैसला तू कर ले “ तारा ये बोलते हुए फिर से मेरे पिता पर वार कर गया , उसके वार कमजोर थे लेकिन फिर भी मेरे पिता को बचाव करना पड़ा
“इतने दिनों की दोस्ती में बस एक चीज मांगूंगा , एक वार कर दे और मुझे ख़त्म कर “तारा बोलै और फिर से उसने तलवार चला दी , इस बार मेरे पिता की तलवार चल गयी जो सीधे तारा के गले से जा लगी , और तारा सींग का गाला हवा में उड़ गया …
“नहीं …” सैकड़ो लोग एक साथ चिल्ला उठे थे जिसमे एक रिद्धिमा भी थी …
मेरे पिता अपने घुटनो के बल बैठ चुके थे उनकी आँखों में आंसू था लेकिन उनके सरे गांव वाले उनकी जित पर चिल्ला उठे थे ………