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तै का बदन पूरा मूट से चमक गया तब जाकर ताऊजी और अनुज का मूट बंद हुआ, इसके बाद औरतें कैसे पीछे रह जाती, भाभी आगे बड़ी और अपनी मम्मी के चेहरे के आगे थोड़ा झुककर अपनी छूट से सीटी के साथ धार छोड़ी जो तै के चेहरे और चूचियों को भिगोने लगी,
पद्मिनी तै भी अपनी बेटी के मूट का स्वाद लेकर और उत्तेजित हो गयी थी, भाभी के बाद मंजू तै ने भी अपनी संधान को मूट से नहला दिया
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पद्मिनी तै तो बेचारी पूरी तरह से नाहा चुकी थी, हम लोग भी झड़ने के बाद आराम से बैठ गए, पद्मिनी तै नहाने के लिए घुस गयी वहीं भाभी सबसे पूछने लगी की खाने में क्या बनेगा आज तो तै ने कहा की जो मन हो तेरा वो बनाले,
में- चलो भाई मैं इन्हे बुलाने आया था और यहीं रह गया,
मंजू- अरे तो का हुआ, ये भी तो घर है,
अनुज- अरे पर वो दोनों लैला मजनू तो अंदर घुसे पड़े हैं,
प्रेमा- अरे ते रहने दो भैया लाडो hi समझा देगी अचे से,
मंजू- और का मज़े लेने दो दोनों को,
में- चलो ये भी ठीक है,
सागर और लाडो को वहीं छोड़कर हम दोनों घर आ गए, जहाँ खाना पीना बन चूका था और हमारे आते hi हमें मिल भी गया सबने खाना खाया,
मामी ने मुझसे सागर के बारे में पूछा तो मैंने उनको धीरे से बता दिया की तुम्हारा लड़का बड़ा हो रहा है, जिस पर वो शर्मा गयी,
खैर मैंने देखा की मां सबको कुछ अजीब नज़रों से देख रहे हैं, तो मैंने मौसी से पुछा की मां को क्या हुआ तो मौसी ने जवाब दिया की अपनी बड़ी बहन को छोड़ा है रात भर साथ hi जीजी ने सबकुछ बता भी दिया है,
में- अरे वाह तभी खोये खोये से हैं, बेचारे सीधे साढ़े आदमी को अचानक से बहन छोड़ने को मिल जाये तो ये hi हालत होती है,
मौसी- कहीं सीधा नहीं है तेरा मां, सुबह सो रही थी सोते हुए hi मुँह में लुंड ठूंस दिया था,
में- फिर तो और बढ़िया है जल्दी घुल मिल जायेंगे सबसे, वैसे नाना के क्या हाल हैं?
मौसी- बाबा ने रात भर पेला है अपनी छोटी को, मौसी हंसी दबती हुई बोली,
में- अरे वाह,
मौसी- और इतना hi नहीं सुबह बाबा जीजी को भी बस चढाने वाले थे की बहार से तुम लोग आ गए,
में- अरे वाह मौसी बड़े तेज़ है नाना एक बेटी रात में दूसरी सुबह,
इतने में किरण भी हमारे पास आकर बैठी और बोली- क्या बातें कर रहे हो छुप कर,
मौसी- बताउंगी तू चल मेरे साथ कपडे फैलवा छत पर.
किरण- चलो बुआ,
वो लोग चले गए, इधर अनुज सोने चल दिया क्यूंकि रात भर का जगा हुआ था, खैर नींद तो मुझे भी आ रही थी, तभी मेरा फ़ोन बजा और मैंने उठाया, देखा तो ठेकेदार का था, जो हमारा मकान बना रहा था बाघ में,
उसे कुछ पूछना था तो मैंने रुकने को कहा और फ़ोन काट कर पापा से बोलै की ठेकेदार आया है, तो पापा मौसा बाघ में जाने लगे साथ में मां भी हो लिए तो मौसा ने नाना से भी बोल दिया की बाबा एक बार तुम भी देखलो कोई बात हो तो बताना,
खैर वो सब लोग चले गए और मैं अपने कमरे में बिस्तर पर जाकर सो गया, करीब आधा घंटा hi सो पाया होऊंगा की दोबारा फ़ोन बजा मैंने नींद में देखा किसका है और जैसे hi स्क्रीन पर नज़र गयी तो तुरंत उठ कर बैठ गया, क्यूंकि अंजलि का नाम दिखा रहा था,
मैं तुरंत फ़ोन उठाया,
में - Hello.
अंजलि- कहाँ हो?
में- घर पर...
अंजलि- अभी गाडी लेकर घर आ सकते हो,
में- हाँ बिलकुल.
अंजलि- जल्दी आओ,
इतना कहकर उसने फ़ोन रख दिया और मैं भी तुरंत कपडे बदले और घर से निकल गया, बाघ में जाकर मैंने मौसा से चाभी ली और निकल गया गैंदपुर की और रस्ते भर यही दिमाग में रहा की आखिर अचानक क्यों बुलाया है अंजलि ने,
मैं गैंदपुर के मैं रोड पर पहुँच कर जैसे hi उनकी गली में गाडी मोड़ने वाला hi था की वो उसकी मम्मी पापा सब गली के बहार hi दिख गए, अंजलि ने भी मुझे देख लिए मैंने गाडी रोकी तो वो जल्दी से मेरे बगल में बैठ गयी और पीछे उसके मम्मी पापा भी,
अंजलि- कर्मा गाडी घुमाओ हमें शहर जाना है,
मैंने उसका चेहरा देखा तो समझ गया कुछ गड़बड़ है क्यूंकि उसकी आँखों से आंसू बाह रहे थे साथ hi उसकी मम्मी भी रो रही थी,
मैंने गाडी घुमाई और उससे पूछा - क्या हुआ तुम रो क्यों रही हो? सब ठीक तो है न,
मैंने उसके पापा की और देखते हुए कहा,
अंजलि- वो वो भैया को पकड़ लिए है,
में- मतलब?
मैंने गाडी भागते हुए पूछा,
ससुरा- पियूष को मतलब इसके भाई को पुलिस ने पकड़ लिए है, बहु का फ़ोन आया था कुछ झगड़ा हुआ था किसी से,
में- कौनसे ठाणे में है?
ससुरा- गुलाब नगर के,
में- ठीक है, तुम लोग परेशां न हो सब ठीक हो जायेगा,
मैंने गाडी चलते हुए कहा, गुलाब नगर हमारे पास वाले शहर के 28 किलोमीटर आगे थे तो ज़्यादा समय तो नहीं लगने वाला था फिर भी जाम वगेरा को झेलते हुए हम करीब एक घंटे में पहुँच गए, गुलाब नगर के ठाणे में पहुँच कर मैं भी उनके साथ अंदर गया तो साला एक कांस्टेबल ने झड़प दिया की इतने सरे लोग कहाँ घुसे आ रहे हो, ऐ लड़के क्या काम है,
साला बेइज़्ज़ती कही भी हो जाये बाँदा सह जाये पर साला ससुराल वालो के सामने तो और ज़्यादा लगती है,
मुझे भी लगी, मैंने उसे घूरा, उसने मुझे घूरा इतने में ससुरा बोल पड़ा- भाई साब हमारा बीटा है यहाँ फ़ोन आया था,
इतने में अंजलि भी बोल पड़ी- भाभी और भाग कर एक औरत जो बेंच पर बैठी थी उससे लिपट गयी,
हवलदार- ाचा तो उस लड़ाई वाले कांड में आये हो तुम,
में- हाँ, क्यों बंद किआ है लड़के को?
हवलदार- तू कौन है?
में- उनके घर से हूँ,
हवलदार- तो क्या सर पे चढ़ेगा हमारे, चुपचाप बैठ अभी साहब आते होंगे,
साला हवलदार मुझे चमकाए जा रहा था,
में- बैठ तो जाऊंगा पर क्यों पकड़ा है उसे क्या मामला है कुछ बताओ तो,
हवलदार- बोलै न साहब आके बताएँगे,
में- तुम hi बता दो,
हवलदार- क्यों मंत्री है तू?
में- बन भी सकता हूँ,
हवलदार- तो जब बन जाये तब पूछ लियो अभी बैठ चुपचाप.
ससुरा मुझे चुप करने की कोशिश कर रहा था, और मुझे बैठने को बोल दिया,
मैं ससुरा की बात मान कर बैठ गया, दूसरी बेंच पर अंजलि उसकी माँ और भाभी बैठी थी,
मुझे हवलदार पर खुन्नस आ रही थी,
पर अभी क्या कर सकता था करीब 15 मिनट्स बीत गए ऐसे hi बैठे हुए,
में- कब आएंगे साहब?
हवलदार- ज़्यादा जल्दी है क्या तुझे,
में- जल्दी की बात क्या है? खुद कुछ बता नहीं रहे बस बैठने को बोले जा रहे हो,
हवलदार- तो क्या हो गया, बोलै न बैठ उधर साहब आएंगे तो बुला लूंगा,
मैं उसे बिना कुछ कहे वहां से हैट गया और मौसा को फ़ोन किआ उन्हें पूरी बात बताई, उनकी पुलिस के कुछ अचे अधिकारीयों से जान पहचान थी, मौसा ने थाना पूछा और फिर फ़ोन काट दिया, फिर 5 मिनट बाद मौसा का फ़ोन आया और बोले की जो अभी ड्यूटी पर है उससे बात करा,
मैं तुरंत फ़ोन लेकर हवलदार के सामने पहुँच गया और उसे बोलै- लो बात करो.
पर वो साला भी अलग hi अकड़ में था, बोलता है मैं नहीं करता किसी से फ़ोन पर बात,
मन तो हुआ सेल को पेल दूँ यही, मैंने मौसा को बोलै तो जो अधिकारी उनके साथ लाइन पर था उसने भी सुना, और बोलै- बीटा 5 मिनट दो मैं करता हूँ बात,
इधर फ़ोन कटा और दो मिनट बाद hi हवलदार का फ़ोन बजा, उसने उठाया और बात करने लगा कुछ hi पलों में उसके चेहरे के भाव बदलने लगे, और एक पल को तो चेहरा बिलकुल सफ़ेद सा पद गया, फिर फ़ोन पर hi हाँ साब जी साब करने लगा, ससुरा मुझे थोड़ा हैरानी से देखने लगा,
हवलदार ने फ़ोन काटा और बोलै- कर्मा बीटा आप hi हो?
में- हाँ ग,
तो बत्तीसी निकल कर हँसता हुआ बोलै- अरे बीटा पहले बताते आप बड़े साहब के घर से हो,
में- अरे वो क्या बताना आप उनको भैया को निकालिये न,
हवलदार- हाँ हाँ आओ,
फिर हम सबको उसने बड़े साहब के केबिन में बिठाया कुछ hi देर में पियूष यानि अंजलि के भाई को भी हमारे सामने ले आया.
हवलदार- लो कर्मा बीटा ले जाओ भैया को बाकि साडी लिखा पढ़त मैं देख लूंगा, बाकि अभी क्या मांगों चाय ठंडा?
में- अरे नहीं नहीं बस अब निकलते हैं, बहुत बहुत धन्यवाद् आपका,
हवलदार ने मुझे थोड़ा अलग में आने का इशारा किआ और अलग लेजाकर बोलै - बीटा, वो जो पहले हुआ साहब से मत कहना,
में- अरे बिलकुल नहीं, चिंता मत करो आप,
खैर हम ठाणे से निकल कर बहार आये, अंजलि उसकी मम्मी और भाभी ससुरा सब खुश थे, सब के चेहरे पर अब शांति थी और सब hi मुझे बड़े प्रेम से देख रहे थे,
सविता (अंजलि की मम्मी)- बहुत ाचा किआ बच्चा जो तुम हमारे संग आ गए, नहीं तो हम न जाने कैसे छुड़ाते बेटे को,
रानी( अंजलि की भाभी)- सही में भैया, कल से चक्कर काट काट के परेशां थी, सुन hi नहीं रहा था कोई, सुबह परेशां होकर पापाजी को बताया,
में- अरे कोई बात नहीं भाभी जी, चची जी, हम एक दुसरे के काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा,
ससुरा- वो बात तो है बीटा, पर सही में बहुत मदद हो गयी, नहीं तो पुलिस के चक्कर तुम जानते हो न जाने कितना इंतज़ार करवाते, तुम्हारा बहुत धन्यवाद् है इतनी आसानी से इस मुश्किल से निकल लिए,
पहली बार ससुरे को अपने साथ प्यार से बात करते देख दिल खुश हो गया,
में- अरे चाचाजी आप भी, आपके बच्चे की तरह हूँ, वैसे भी जो हुआ सो हुआ, अभी चलते हैं कुछ कहते हैं, भैया ने भी कुछ नहीं खाया होगा,
मैंने अंजलि के भाई पियूष की और इशारा करते हुए कहा,
पियूष- हाँ भाई भूख तो मुझे भी लग रही है,
पियूष ने हँसते हुए बोलै,
फिर हम सब पास के hi रेस्टोरेंट में गए जहाँ सब ने अपनी पसंद का खाना खाया, बीच बीच में मैं अंजलि की और देखता तो वो मुझे अब भी थोड़ा अनदेखा कर रही थी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट ज़रूर थी, खैर खाना खाने के बाद ससुरे ने बिल दिया, उधर गाडी के पास आते हुए अंजलि और भाभी आपस में कुछ हंसी ठिठोली कर रहे थे वो भी मुझे देख देख कर hi, उसी वक़्त मेरा ध्यान भी अंजलि की भाभी पर गया, यार ये घर है या माल गाडी, साला अंजलि जैसा पटाखा, उसकी माँ भी क्या मस्त गदराई हुई और फिर उसकी भाभी भी किसी मामले में काम नहीं थी,
रीना भाभी

भाभी को ताड़ते हुए मैं गाडी तक पहुंचा और फिर सब लोग गाडी में बैठ गए,
सविता- ऐ पियूष बीटा बहु अब तुम लोग भी हमारे साथ घर hi चलो,
पियूष- मम्मी अचानक कैसे,
सविता- अचानक कुछ नहीं अभी चलो अपने कपडे उठाओ और घर चलो दोनों, जो करना गाओं में रहकर करना,
रानी - पर मम्मी जी इनकी नौकरी,
अंजलि- हाँ अचानक से नौकरी कैसे छोड़ सकते हैं,
ससुरा- सब हो सकता है, मैं भी यही चाहता हूँ सब साथ रहे, गाओं में hi कुछ काम कर लेंगे, बस अब अलग नहीं रहना,
पियूष- पर पापा,
ससुरा- कोई पर वॉर नहीं चलो.
फिर क्या था ससुरे ने आदेश दे दिया था तो हम लोग पहले उनके घर गए, घर क्या एक कमरा और हॉल वाला फ्लैट था किराये पर ले रखा था, जहाँ से डुबो ने कपडे पैक किये, बाकि सामान के लिए तय हुआ की बाद में एक दिन आकर ले जायेंगे,
फिर से सफर शुरू हुआ, इस बार सब लोग चहक रहे थे, पियूष और रानी भी खुश थे,
पियूष- पता नहीं सही फैसला है की गलत पर मेरा मन भी यही कर रहा है की गाओं में सबके साथ रहूं,
अंजलि- बिलकुल सही फैसला है भैया,
रानी- मैं भी मानती हूँ, अकेले बड़ी परेशां हो जाती थी मैं,
इसी तरह बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे, रस्ते में पियूष ने पूरा मामला बताया की कैसे रोड पर एक ज़रा सी बात ठाणे तक पहुँच गयी, रास्ते में पेट्रोल पंप पड़ा तो ससुरे ने ज़िद्द करके तेल डलवाया कहने लगा की उनके काम के लिए गया ये हमारा फ़र्ज़ है, खैर थोड़ी देर में hi गाडी उनके घर के सामने थी, सब उतर कर अंदर जाने लगे ससुरा और साला कपड़ों से भरे बैग उतरने लगे, मैं नीचे उतरा तो सासु माँ ने पकड़ लिए और बोली- बीटा तुम्हारा जितना धन्यवाद् करूँ उतना काम है, और अब तुम्हे अपनी मम्मी को लेकर आना hi होगा,
में- बिलकुल चची, और बेटो को धन्यवाद् नहीं करते आशीर्वाद देते हैं,
सासु माँ ने मेरे हाथ पकड़ कर दोनों हथेलियों को चूमा और फिर से मम्मी को लेन की बात बोलकर घर अंदर चली गयी,
अब बस मैं अकेला बचा था और गाडी में बैठा इतने में अंजलि पीछे से आई और बोली- एक छोटा बैग रह गया गाडी में पीछे की तरफ.
मैं उतरा और पीछे वाला दरवाज़ा खोला और देख कर बोलै यहाँ तो कुवह भी नहीं है,
अंजलि- अरे वहीं था,
ये कहते हुए वो भी गाडी के इस और आई और अंदर झांक कर देखने लगी और वाली वो देखो,
मैंने भी उसके बगल में होते हुए सर दाल कर देखा कुछ नहीं दिखा,
में- कहाँ हैउमममममनननहहहहहह.
मैं इतना hi बोल पाया की अंजलि के होंठ मेरे होंठो पर थे और फिर एक पल बाद hi वो अलग हुई और भाग कर घर में घुस गयी मुझे समझ भी नहज आया की अचानक हुआ क्या, पर जो भी हुआ मज़ा आया,
खैर मैं गाडी लेकर घर की और चल पड़ा रस्ते में hi पंहुचा था की फ़ोन बजा देखा की अंजलि का था, मैंने उठाया और बोलै- hello.
अंजलि- हेल्लो,
में- अब भी कुछ रह गया क्या गाडी में?
अंजलि- हाँ रह तो गया.
में- क्या?
अंजलि- ी लव यू....
उससे ये सुनकर मैं सुन्न पद गया मैंने अचानक से ब्रेक मार कर गाडी रोकी, मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या बोलूं?
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद वो दोबारा बोली- Hello क्या हुआ ाचा नहीं लगा क्या?
कुछ पल बाद मेरी ज़ुबान बापिस आई तो मैं बोलै- नहीं वो पता नहीं क्या हुआ कुछ बोल hi नहीं पा रहा था मैं,
अंजलि- अच्छा इतना बुरा लगा,
में- अरे नहीं यार छेड़ो मत अभी,
अंजलि- छेड़ कहाँ रही हूँ मुझे तो बुरा लग रहा है की तुम मुझसे प्यार नहीं करते...
में- क्या ऐसा किसने कहा,
अंजलि- तुमने, मैंने तुम्हे ी लव यू बोलै, तुमने कोई जवाब नहीं दिया,
में- मैं भी तुमसे बहुत ज़्यादा प्यार करता हूँ, हद से ज़्यादा सबसे ज़्यादा,
अंजलि- सच्चीईई...
में- muchhhhhiiiiiiiiii,
तभी पीछे से किसी की आवाज़ आई तो वो बोली- सुनो बाद में बात करुँगी थोड़ी देर में घर पहुँच कर मुझे मश्ग कर देना,
में- ठीक है,
अंजलि- Bye लव यू ढेर सारा,
में - लव लव यू तू
अंजलि- मिलती हूँ बाद में.
ये कहके उसने फ़ोन रख दिया, और ाचा hi किआ क्यूंकि मुझे भी थोड़ा समय चाहिए था, जो हुआ उसे अपने अंदर सामने के लिए, मैं ख़ुशी से पागल हुआ जा रहा था,
इधर मेरे जाने के थोड़ी देर बाद मौसा और पापा नाना से बोले- बाबा तुम चाहो तो घर चले जाओ हमें यहाँ समय लगेगा,
नाना तो इसी इंतज़ार में बैठे थे वो जल्दी से अपनी बड़ी बिटिया के साथ रहना चाहते थे,
इधर मां को राजन चाचा अपने साथ ले गए थे कुछ काम निपटने,
मां- जीजा बड़े छुपे रुस्तम निकले तुम बताया नहीं कुछ इतना खेल हो रहा है चोदामपुर में,
मां ने फावड़ा चलते हुए कहा,
चाचा- अरे सेल हर चीज़ का सही समय होता है, अब देखो हमने नहीं बताया तभी तो अपनी बड़ी बहन की छूट मिली तुम्हे. मज़ा आया न?
मां- अरे जीजा बहुत, इतना मज़ा कभी नहीं आया,
चाचा- जानते हैं भाभी जैसा माल पूरे गाओं में नहीं है, क्या छूट क्या कासी हुई गांड है तुम्हारी बहन की
मां- हहहह बताओ तुम हमारी बहन के बारे में ये सब बोल रहे हो हमें ाचा लग रहा है.
चाचा- जब बहन छोड़ बन जाओ तो सब ाचा लगता है जमुना बाबू, खासकर बहन की छूट और उसकी बातें,
मां- सही कह रहे जीजा हेहेहे,
चाचा- और छुपा रुस्तम हम हैं या तुम हो जो चुपचाप अपनी बहन को पेल दिए,
मां- नहीं जीजा छुपे रुस्तम तो तुम hi हो, बताओ हमसे छुपके हमारी बीवी और बिटिया को भी छोड़ दिया तुमने तो,
इस पर चाचा हंसने लगे, इसी तरह बातें चलती रही और खेत का काम चलता रहा,
नाना जल्दी से घर पहुंचे देखा माँ आंगन में बैठी कपडे धो रही थी आंगन में hi पड़ी खत पर बैठ गए और बोले- अरे बोतिया बाकि सब कहाँ हैं?
माँ- कर्मा तो बहार गया है, सागर भी आज गायब hi है बाकि अनुज और किरण सो रहे हैं बाबा,
नाना- चाह, और बहु और छोटी,
माँ- वो दोनों भी सो रही हैं आज पूरे घर में आलस फैला पड़ा है हेहेहे,
नाना ने ये सुना तो उनके कान खड़े हो गए ऐसे hi मौके की तलाश में तो थे नाना जब माँ के साथ अकेले समय मिले और वो सुबह का अधूरा काम निपटा सकें,
नाना तुरंत खड़े हुए और माँ जो अभी कपडे दीवार पर दाल रही थी उन्हें पीछे से पकड़ लिया,
माँ- अह्ह्ह्ह बबआह क्या हुआ, कुछ चाहिए का?
नाना- आह्ह्ह्हह बित्याहहहह हमें तो बस तू चाहिए,
नाना ने माँ के कंधे को चूमते हुए कहा साथ hi उनके हाथ माँ के कामुक बदन पर फिरमे लगे,

माँ- ुहम्म बबाहहह बिटिया के साथ ये सब नहीं करते,
नाना- आह्ह्ह्हह बित्याहहहह तेरे जैसी हो तो बाप को सबसे पहले ये hi करना चाहिए, पिता का हक़ होता है
नाना ने माँ के पल्लू को नीचे कर दिया और नंगे पेट को मसलते हुए बोले.
माँ- बबाहहह पर बित्याहहहह पर उसके पति का हक़ होता है,
माँ भी अपनी गांड नाना के लुंड पर घिसते हुए बोली,
नाना- आह्ह्ह्हह बित्याहहहह पटी का हक़ तो बाद में होताहहह है पहले बाप का होता है,
नाना ब्लाउज के ऊपर से hi माँ की चूचियों को मसलने लगे,
माँ- ुह्ह्ह्ह बबाहहह ताऊ क्यायहहह अब पूराआअह हक़ वसूलोगे,
नाना- हांण बित्याहहहह पूराआअह अब्ब्ब इंतज़ार नाहीइ होताहहह,
माँ- अह्ह्ह्ह कोई आए गयाःह तुह्हः.
नाना- आआ जाने दे बित्याहहहह अब्ब हमसे इंतज़ार नहीं होताहहह,
माँ- अह्ह्ह सच्चीईई सबके सामने अपनी बित्याहहहह के साथ प्यार करोगे?
नाना- हांण बित्याहहहह बिलकुल, सबके सामने hi करूँगा आह, बेटी पर बाप का हक़ सबके सामने भी होताह है,
नाना हर पल उत्तेजित होते हुए माँ का बदन मसलते हुए बोल रहे थे,
माँ- अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह और कर्मआहह के पापा आ गए टोह्हह्ह,
नाना- तू भी अपना हक़ तो वसूल के hi रहेंगे हम बित्याहहहह...
नाना और उत्तेजित होते हुए बोले साथ hi उन्होंने माँ को वहीं चबूतरे पर लिटा लिए और माँ के बदन को जगह जगह चूमने लगे, कभी उनकी गर्दन चूमते तो कभी पेट, माँ भी अपने बाबा की हरकतों से उनके नीचे लेती हुई मचल रही थी,

माँ- अह्ह्ह्ह बबआह एक अजीब सा एहसास होता है जब तुम छूटे हो तुह्ह्ह्ह,
नाना- यही अह्हह्ह्ह्ह तो बाप बेटीईई क्या प्यार है बिटियाः, अलग तो लगेगा hi...
माँ- तो और प्यार करो न बबाहहह, आज सारा प्यार लुटादो अपनी बिटियाः पर,
नाना- हाँ बित्याहहहह आज पूरा प्यार लुटाहहह कर hi रहेंगी तुझ पर, तू भी अपने बबाहहह को अपना सारा प्यार देगी नाह,
माँ- हाँ बाअबाआहठ बिलकुल तुंहारा हक़ है तो पूरा हक़ ले लो अपनेआहहह,
नाना- सही कहा बेटीई बिलकुल सही कहाहहह, और सबसे पहले तो मैं तेरे इन रसीले होंठो का स्वाद लूंगा,
ये कहकर नाना ने अपना चेहरा आगे कर अपने होंठों को माँ के होंठों पर रख दिया और अपनी बेटी के होंठों को चूसने लगे, माँ भी नाना का पूरा साथ दे रही थी, नाना को अपनी बड़ी बेटी के होंठों को चूसने में एक अलग hi एहसास हो रहा था, बाप बेटी पागलों की तरह एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे, कुछ hi देर के बाद नाना ने अपनी जीभ माँ के मुँह में घुसा दी तो माँ उसे कुल्फी की तरह चूसने लगी, अपने पिता के साथ माँ को भी एक अलग hi आनंद आ रहा था,
कुछ देर जीभ की कुश्ती के बाद अलग हुए तो नाना ने माँ के बदन पर नीचे की और सफर शुरू किया और उनकी गर्दन छाती और पेट को चूमते हुए नीचे बढ़ने लगे,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह कहा जाओ आज बितीयआह्ह्ह्ह के बदन को,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh
नाना माँ के पेट को चूमते हुए बोले और फिर अपनी जीभ माँ की नाभि में घुसड़ी जिससे माँ मचलने लगी,
माँ- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हाइये दिया आअह्ह्ह्ह बबआहहह तुम्हे तो साआरीई तरीके पता हैं तडपाआहहहहहने की,
नाना लगातार माँ की नाभि को चूसे जा रहे थे, आंगन में बाप बेटी का ऐसा कामुक खेल चल रहा था जो की बिरला hi कुछ घरों में खेला जाता था,
इधर जैसा की माँ ने कहा था की किरण और अनुज सो रहे थे तो उसमे भी आधी सच्चाई थी, क्यूंकि पहले तो अनुज और किरण एक hi बिस्तर पर सो रहे थे पर दो जवान बदन एक hi बिस्तर पर कितनी देर सो सकते थे, अनुज ने जैसे hi किरण का बदन अपने साथ महसूस किआ वैसे hi खुद को उससे चिपका लिए, और पीछे से हाथ डालकर किरण के पेट पर हाथ फिरने लगा, कुछ पल बाद किरण की टीशर्ट को ऊपर करके अनुज उसके नंगे कोमल पेट पर हाथ फिरने लगा, किरण अब भी थोड़ी नींद में थी तो उसने अनुज की हरकतों पर ध्यान नहीं दिया और सोती रही, अनुज उसके कोमल जवान बदन से आराम से खेल रहा था इस बात से अनजान की आंगन में उसकी माँ के साथ भी कुछ वैसा hi खेल उसके नाना खेल रहे थे,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह ओह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कीटनाआआआ माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आए रहा है, अह्हह्ह्ह्ह बहुत्तत्तृत अच्छी से चटटी हो तुम,
माँ ने नाना का सर अपनी जांघों के बीच दबाते हुए कहा, नाना की जीभ माँ की छूट में घुशी हुई थी, माँ की साड़ी और पेटीकोट कमर तक उठा हुआ था, और नाना ऊपर से नंगे होकर एक बार फिर से अपनी बितीयआह्ह्ह्ह का छूट रास चाट रहे थे उसकी छूट से और माँ उनके नीचे तड़प रही थी

जल्दी hi नाना की ज़ुबान की कारीगरी ने कुछ ऐसा असर दिखाया की माँ का पूरा बदन थरथराने लगा और माँ अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह करती हुई सिसकियाँ लेकर जल्दी hi झड़ने लगी और नाना के मुँह में अपना काम रास बहाने लगी,
नाना भी बितीयआह्ह्ह्ह की छूट का रास ऐसे चाट गए जैसे जलेबी की चासनी हो,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कितना चाटोगे बिटिया की छूट को,
नाना- तेरी छूट hi इतनी मीठी है बिटिया की पूरे जीवन चाटते रहे हम तो,
नाना ने अपने होंठों को जीभ से चाटते हुए कहा,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबा बहुत लालची होते जा रहे हो,
नाना- जब बिटियाः तेरे जैसी गदराई हुई हो तोह मन में लालच तो आएगा hi, नाना ने पीछे होते हुए माँ की आधी खुली सारी को उनके बदन से अलग करते हुए बोले, साथ hi साड़ी को अलग कर नाना ने अपने कड़क लुंड को भी कच्चा सरका कर बहार निकल लिए, नाना के मन में यही दर था की सुबह की तरह उनके साथ धोखा न हो जाये इसलिए जल्द से जल्द वो अपनी बिटिया की छूट में अपना लुंड घुसा देना चाहते थे,
माँ ने ये देखा तो उठ कर बैठ गयी और नाना को बोली- बबाह अब तुम लेटो हमें तुम्हारी सेवा करने दो,
और माँ ने नाना को अपनी जगह पर लिटा दिया और खुद बगल में बैठ कर नाना के कच्चे को उनके बदन से पूरी तरह अलग कर दिया, नाना अब अपनी बेटी के आगे बिलकुल नंगे थे,
आंगन में माँ ने अपने ब्लाउज के पैट खोल दिए थे और अपनी चूचियों को ब्रा से बहार निकल लिया था, नाना ये सब देख कर hi तड़पने लगे, वहीं माँ ने हाथ बढाकर नाना के कड़क लुंड को पकड़ा तो नाना सिहर उठे और उनके लुंड के टोपे पर रास की बूँदें उभर आई,
माँ- देखो तो बाबा कैसे कड़क करके रखा है इसे बिटिया के लिए,
माँ नाना की आँखों में देखते हुए उनके लुंड को मुठियाते हुए बोली,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह तुझे देखते hi ये हाल हो जाता है, अह्ह्ह अब और मत तडपाठ अपने बाप को,
माँ- नहीं बबाह अब नहीं तड़पाऊंगी अपने बाबा को और ना hi उनके लुंड को,
माँ नाना के लुंड क्र टोपे पर अपनी जीभ फिरते हुए बोली,
नाना- ahhhhhhhhhh बितीयआह्ह्ह्ह, अह्हह्ह्ह्ह..
माँ ने टोपा छाता और फिर अपना मुँह पीछे कर लिया और बोली...
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह बचपन की तरह मैं तुम्हारी गोदी में खेलूं? अह्हह्ह्ह्ह खिलाओगे अपनी बितीयआह्ह्ह्ह को अपनी गॉड में,
नाना बेचारे हर पल तड़प रहे थे क्या बोलते- हाँ बितीयआह्ह्ह्ह बिलकुल khilayenge,ahhhh आजा अपने बाबा की गोदी में,
नाना की बात सुनकर माँ ने बड़े कामुक ढंग से अपने दोनों पेअर नाना की कमर के दोनों और रखे और अपना पेटीकोट फैलाकर नीचे बैठ गयी नाना के ऊपर, बैठते हो दोनों के मुँह से आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,
क्योंकि नाना का कड़क लुंड माँ की जांघों के बीच उनकी छूट के नीचे दान गया था,
नाना अपने लुंड पर बेटी की छूट की गर्मी का एहसास पाकर मस्त होने लगे वही हाल माँ का भी था,
माँ- अह्ह्ह्हह्हह बाबा देखो मैं तुम्हारी गोड़ीई में बैठ गयी, एक बार फिर से बचपन की तरह, कितना ाचा लग रहा है न,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh बहुत अच्छा लग रहा है, एक बाप को ऑरररर क्या चहियेटी,
माँ- बबआहहह पर मुझे चाहिए बताओ डोज क्याहहह??
कमरे में अनुज और किरण की कहानी भी आगे बढ़ चुकी थी और अभी किरण वैसे hi लेती थी जैसे पहले लेती थी अपने सीधे हाथ पर करवट लेकर बस फ़र्क़ इतना था जी की अभी उसकी टीशर्ट उसकी चूचियों से ऊपर थी वहीं एक छुच्छी पर अनुज का हाथ था, जो उसकी नयी जवानी में उभरती हुई चुकी को मसल रहा था, वहीं नीचे उसकी कमर से पजामा गायब था और कच्ची भी घुटनो से नीचे पैरों में थी और उसके पीछे अनुज था जिसका लुंड धीरे धीरे से उसकी जवान छूट ने अंदर बहार हो रहा था,

किरण की आँखें अब भी बंद थी पर उसके होंठ खुले थे जिनस्व बार बार अह्हह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह की सिसकियाँ निकल रही थी, किरण की सिसकियों के बीच अनुज को बहार की भी कुछ आवाज़ें सुनाई दे रही थी, और सुनाई देती भी क्यों नहीं बहार आंगन में बाप बेटी का प्यार पूरे जोश से जारी था,
माँ- बस एक चीज़ और करनी है बाबा,
माँ नाना के ऊपर hi धीरे धीरे से अपनी कमर घूमते हुए बोली, जिससे नाना के लुंड से उनकी छूट के होंठ घिस रहे थे और दोनों को hi एक अलग कामुक एहसास मिल रहा था, साथ hi ये एहसास वो सिर्फ महसूस कर प् रहे थे क्यूंकि माँ के पेटीकोट की वजह से सब छुपा हुआ था तो इस कारन इसका मज़ा एक तरह से और बढ़ रहा था..
नाना- हाँ बितीयआह्ह्ह्ह क्या चाहिए सब देंगी तुझे,
नाना अपने लुंड पर माँ की गरम छूट का घिसाव पाकर पागल हो रहे थे उत्तेजना से,
माँ- याद है बचपन में, मैं तुम्हारी गोदी में अह्ह्ह कैसी उछाल उछाल कर खेलती थी, अब भी मुझे वैसे hi खेलनाअहहहह हैईईई,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह तो खेल नाहहहह बिलकुल खेल, उछाल अपनी बाबा के ऊपर,
माँ- सच्ची फिरर तो मज़ा आएर्गाः, बस एकककक चीज़ ऑररररर,
माँ ने ये कहते हुए अपना हाथ पेटीकोट के अंदर घुसाया और थोड़ा सा उठकर नाना के लुंड को पकड़ा और सीधा किआ और फिर अपनी छूट के द्वार पर उसका टोपा लगाकर नाना की आँखों में देखते हुए बोली- तैयार हो जाओ babaaaahhhhhhhhhhhhhhh,
ये कहते हुए माँ नीचे हो गयी और नाना का लुंड उनकी छूट को चीरता हुआ अंदर घुस गया, कुछ hi पलों में नाना का लुंड जड़ तक उनकी बेटी की छूट में घुसा हुआ था..
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh हाय माहहहह अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह अह्हह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह कीत्नीईईई गरमममन haiiiiiiiiiii अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह..
नाना ने जैसे hi अपने लुंड पर माँ की छूट को महसूस किआ उनका तो पूरा बदन hi सिहरने लगे, उनका बादब थरथराने लगा, कमर भी खुद बा खुद चलने लगी और जब तक नाना को एहसास होता क्या हो रहा है उनका लुंड माँ की छूट में अपना रास छोड़ने लगा,
नाना माँ की छूट में लुंड घुसकर इतने उत्तेजित हो गए की उनके लुंड ने बेटी की छूट में रास की पिचकारियां मरना शुरू कर दिया, और वो सिर्फ सिसकियाँ लेते रह गए,
माँ को भी ये एहसास हुआ की उनकी छूट उनके बाबा ने अपने रास से भर दी है तो बोली- अह्हह्ह्ह्ह babaaaahhhhhhhhhhhhhhh तुमने बिटिया की छूट को अपने रसससस से भर दिया अह्ह्ह्हह ऐसी hi हक़ चाहिए थाहा न तुम्हे,
नाना जो थोड़े शांत हुए बोले- अह्हह्ह्ह्ह बिटिया ओह्ह्ह पहली बार किसी छूट में लुंड घुसते hi झाड़ा हूँ अह्हह्ह्ह्ह क्या छूट है टेरिइइइइइइइइ,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबा तुम्हारा लुंड भी तो कमाल का है बिटिया की छूट में झड़ने के बाद भी देखो पहले की तरह बिलकुल कड़क है,
नाना ने भी ये एहसास किआ की उनका लुंड बिलकुल कड़क है झड़ने के बाद भी,
नाना- यी सब तेरई छूट का कमाल है बिटिया,
माँ- छूट का कमाल तो अब दिखाउंगी बाबा,
ये कहते हुए माँ ने नाना के लुंड पर उछालना शुरू कर दिया, नाना भी माँ के झटको से सीसीएनए लगे, माँ अपने चूतड़ों को नाना के लुंड पर पटकने लगी तो नाना भी माँ की कमर पकड़ कर नीचे से धक्के लगाने लगे,

नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh ऐसी hi कोउद अह्हह्ह्ह्ह अपनी बाबा के लुंड पर,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बबाहहहहह अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन, छोड़ते रहो अह्हह्ह्ह्ह ऐसी hi अब रुकना मत्तत्तत अह्हह्ह्ह्ह,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह अब चाहेंगे तो भी नहीं रुक पाएंगे, अह्हह्ह्ह्ह, अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह,
माँ- बाबा नंगाहहह करो अपनी बिटिया कोहहह अह्ह्ह अनगनणन में नंगा कर के छोडोऊ खूब,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह हांण बिटिया अभी लिए,
ये कह नाना ने माँ का ब्लाउज और ब्रा पूरी तरह से उनके बदन से अलग कर दिया, और फिर पेटीकोट भी बदन से निकल दिया माँ भी नाना की तरह बिलकुल नंगी हो गयी, इसी बीच माँ का उछालना लगातार जारी था,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह खत पर चलते हैंण्ण्न,
माँ ने नाना के लुंड से उठाते हुए कहा पर उठते हुए भी माँ ने अपने होंठ नाना के होंठों से जोड़ दिए तो दोनों एक दुसरे को चूमते हुए hi खत तक आये और फिर माँ अपनी पीठ पर खत के किनारे लेट गयी इधर नाना ने अपना लुंड माँ की छूट में दोबारा घुसा दिया तब जाकर दोनों के होंठ अलग हुए,
नाना एक बार फिर से अपनी बिटिया की छूट में धक्के लगाने लगे, हर धक्के पर माँ के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थी वहीं नाना की नज़र तो माँ की नाचती हुई चूचियों पर थी जो की अद्भुत नज़ारा पेश कर रही थी, फिर नाना ने सोचा की बिटिया का पूरा बदन hi एक सुन्दर कम्यून नज़ारा है और उसे देखते हुए तेज़ी से धक्के लगाने लगे,

नाना मन hi मन खुश हो रहर थे और अपने आप को दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान मान रहे थे, क्योंकि उन्हें अपनी दोनों गदराई बेटियों को छोड़ने का उनके बदन को भोगने का मौका जो मिल रहा था, साथ hi ऐसा दृश्य बेटी सामने नंगी पड़ी हुई है और वो उसे छोड़ रहे हैं,
छोड़ते हुए hi अचानक से नाना की नज़र एक तरफ गयी तो अचानक से नाना सुन्न पद गए, उनका दिमाग चकराने लगा, उन्हें सब कुछ ख़तम होता दिखाई दिया,
जारी रहेगी
पद्मिनी तै भी अपनी बेटी के मूट का स्वाद लेकर और उत्तेजित हो गयी थी, भाभी के बाद मंजू तै ने भी अपनी संधान को मूट से नहला दिया
अपडेट 223
पद्मिनी तै तो बेचारी पूरी तरह से नाहा चुकी थी, हम लोग भी झड़ने के बाद आराम से बैठ गए, पद्मिनी तै नहाने के लिए घुस गयी वहीं भाभी सबसे पूछने लगी की खाने में क्या बनेगा आज तो तै ने कहा की जो मन हो तेरा वो बनाले,
में- चलो भाई मैं इन्हे बुलाने आया था और यहीं रह गया,
मंजू- अरे तो का हुआ, ये भी तो घर है,
अनुज- अरे पर वो दोनों लैला मजनू तो अंदर घुसे पड़े हैं,
प्रेमा- अरे ते रहने दो भैया लाडो hi समझा देगी अचे से,
मंजू- और का मज़े लेने दो दोनों को,
में- चलो ये भी ठीक है,
सागर और लाडो को वहीं छोड़कर हम दोनों घर आ गए, जहाँ खाना पीना बन चूका था और हमारे आते hi हमें मिल भी गया सबने खाना खाया,
मामी ने मुझसे सागर के बारे में पूछा तो मैंने उनको धीरे से बता दिया की तुम्हारा लड़का बड़ा हो रहा है, जिस पर वो शर्मा गयी,
खैर मैंने देखा की मां सबको कुछ अजीब नज़रों से देख रहे हैं, तो मैंने मौसी से पुछा की मां को क्या हुआ तो मौसी ने जवाब दिया की अपनी बड़ी बहन को छोड़ा है रात भर साथ hi जीजी ने सबकुछ बता भी दिया है,
में- अरे वाह तभी खोये खोये से हैं, बेचारे सीधे साढ़े आदमी को अचानक से बहन छोड़ने को मिल जाये तो ये hi हालत होती है,
मौसी- कहीं सीधा नहीं है तेरा मां, सुबह सो रही थी सोते हुए hi मुँह में लुंड ठूंस दिया था,
में- फिर तो और बढ़िया है जल्दी घुल मिल जायेंगे सबसे, वैसे नाना के क्या हाल हैं?
मौसी- बाबा ने रात भर पेला है अपनी छोटी को, मौसी हंसी दबती हुई बोली,
में- अरे वाह,
मौसी- और इतना hi नहीं सुबह बाबा जीजी को भी बस चढाने वाले थे की बहार से तुम लोग आ गए,
में- अरे वाह मौसी बड़े तेज़ है नाना एक बेटी रात में दूसरी सुबह,
इतने में किरण भी हमारे पास आकर बैठी और बोली- क्या बातें कर रहे हो छुप कर,
मौसी- बताउंगी तू चल मेरे साथ कपडे फैलवा छत पर.
किरण- चलो बुआ,
वो लोग चले गए, इधर अनुज सोने चल दिया क्यूंकि रात भर का जगा हुआ था, खैर नींद तो मुझे भी आ रही थी, तभी मेरा फ़ोन बजा और मैंने उठाया, देखा तो ठेकेदार का था, जो हमारा मकान बना रहा था बाघ में,
उसे कुछ पूछना था तो मैंने रुकने को कहा और फ़ोन काट कर पापा से बोलै की ठेकेदार आया है, तो पापा मौसा बाघ में जाने लगे साथ में मां भी हो लिए तो मौसा ने नाना से भी बोल दिया की बाबा एक बार तुम भी देखलो कोई बात हो तो बताना,
खैर वो सब लोग चले गए और मैं अपने कमरे में बिस्तर पर जाकर सो गया, करीब आधा घंटा hi सो पाया होऊंगा की दोबारा फ़ोन बजा मैंने नींद में देखा किसका है और जैसे hi स्क्रीन पर नज़र गयी तो तुरंत उठ कर बैठ गया, क्यूंकि अंजलि का नाम दिखा रहा था,
मैं तुरंत फ़ोन उठाया,
में - Hello.
अंजलि- कहाँ हो?
में- घर पर...
अंजलि- अभी गाडी लेकर घर आ सकते हो,
में- हाँ बिलकुल.
अंजलि- जल्दी आओ,
इतना कहकर उसने फ़ोन रख दिया और मैं भी तुरंत कपडे बदले और घर से निकल गया, बाघ में जाकर मैंने मौसा से चाभी ली और निकल गया गैंदपुर की और रस्ते भर यही दिमाग में रहा की आखिर अचानक क्यों बुलाया है अंजलि ने,
मैं गैंदपुर के मैं रोड पर पहुँच कर जैसे hi उनकी गली में गाडी मोड़ने वाला hi था की वो उसकी मम्मी पापा सब गली के बहार hi दिख गए, अंजलि ने भी मुझे देख लिए मैंने गाडी रोकी तो वो जल्दी से मेरे बगल में बैठ गयी और पीछे उसके मम्मी पापा भी,
अंजलि- कर्मा गाडी घुमाओ हमें शहर जाना है,
मैंने उसका चेहरा देखा तो समझ गया कुछ गड़बड़ है क्यूंकि उसकी आँखों से आंसू बाह रहे थे साथ hi उसकी मम्मी भी रो रही थी,
मैंने गाडी घुमाई और उससे पूछा - क्या हुआ तुम रो क्यों रही हो? सब ठीक तो है न,
मैंने उसके पापा की और देखते हुए कहा,
अंजलि- वो वो भैया को पकड़ लिए है,
में- मतलब?
मैंने गाडी भागते हुए पूछा,
ससुरा- पियूष को मतलब इसके भाई को पुलिस ने पकड़ लिए है, बहु का फ़ोन आया था कुछ झगड़ा हुआ था किसी से,
में- कौनसे ठाणे में है?
ससुरा- गुलाब नगर के,
में- ठीक है, तुम लोग परेशां न हो सब ठीक हो जायेगा,
मैंने गाडी चलते हुए कहा, गुलाब नगर हमारे पास वाले शहर के 28 किलोमीटर आगे थे तो ज़्यादा समय तो नहीं लगने वाला था फिर भी जाम वगेरा को झेलते हुए हम करीब एक घंटे में पहुँच गए, गुलाब नगर के ठाणे में पहुँच कर मैं भी उनके साथ अंदर गया तो साला एक कांस्टेबल ने झड़प दिया की इतने सरे लोग कहाँ घुसे आ रहे हो, ऐ लड़के क्या काम है,
साला बेइज़्ज़ती कही भी हो जाये बाँदा सह जाये पर साला ससुराल वालो के सामने तो और ज़्यादा लगती है,
मुझे भी लगी, मैंने उसे घूरा, उसने मुझे घूरा इतने में ससुरा बोल पड़ा- भाई साब हमारा बीटा है यहाँ फ़ोन आया था,
इतने में अंजलि भी बोल पड़ी- भाभी और भाग कर एक औरत जो बेंच पर बैठी थी उससे लिपट गयी,
हवलदार- ाचा तो उस लड़ाई वाले कांड में आये हो तुम,
में- हाँ, क्यों बंद किआ है लड़के को?
हवलदार- तू कौन है?
में- उनके घर से हूँ,
हवलदार- तो क्या सर पे चढ़ेगा हमारे, चुपचाप बैठ अभी साहब आते होंगे,
साला हवलदार मुझे चमकाए जा रहा था,
में- बैठ तो जाऊंगा पर क्यों पकड़ा है उसे क्या मामला है कुछ बताओ तो,
हवलदार- बोलै न साहब आके बताएँगे,
में- तुम hi बता दो,
हवलदार- क्यों मंत्री है तू?
में- बन भी सकता हूँ,
हवलदार- तो जब बन जाये तब पूछ लियो अभी बैठ चुपचाप.
ससुरा मुझे चुप करने की कोशिश कर रहा था, और मुझे बैठने को बोल दिया,
मैं ससुरा की बात मान कर बैठ गया, दूसरी बेंच पर अंजलि उसकी माँ और भाभी बैठी थी,
मुझे हवलदार पर खुन्नस आ रही थी,
पर अभी क्या कर सकता था करीब 15 मिनट्स बीत गए ऐसे hi बैठे हुए,
में- कब आएंगे साहब?
हवलदार- ज़्यादा जल्दी है क्या तुझे,
में- जल्दी की बात क्या है? खुद कुछ बता नहीं रहे बस बैठने को बोले जा रहे हो,
हवलदार- तो क्या हो गया, बोलै न बैठ उधर साहब आएंगे तो बुला लूंगा,
मैं उसे बिना कुछ कहे वहां से हैट गया और मौसा को फ़ोन किआ उन्हें पूरी बात बताई, उनकी पुलिस के कुछ अचे अधिकारीयों से जान पहचान थी, मौसा ने थाना पूछा और फिर फ़ोन काट दिया, फिर 5 मिनट बाद मौसा का फ़ोन आया और बोले की जो अभी ड्यूटी पर है उससे बात करा,
मैं तुरंत फ़ोन लेकर हवलदार के सामने पहुँच गया और उसे बोलै- लो बात करो.
पर वो साला भी अलग hi अकड़ में था, बोलता है मैं नहीं करता किसी से फ़ोन पर बात,
मन तो हुआ सेल को पेल दूँ यही, मैंने मौसा को बोलै तो जो अधिकारी उनके साथ लाइन पर था उसने भी सुना, और बोलै- बीटा 5 मिनट दो मैं करता हूँ बात,
इधर फ़ोन कटा और दो मिनट बाद hi हवलदार का फ़ोन बजा, उसने उठाया और बात करने लगा कुछ hi पलों में उसके चेहरे के भाव बदलने लगे, और एक पल को तो चेहरा बिलकुल सफ़ेद सा पद गया, फिर फ़ोन पर hi हाँ साब जी साब करने लगा, ससुरा मुझे थोड़ा हैरानी से देखने लगा,
हवलदार ने फ़ोन काटा और बोलै- कर्मा बीटा आप hi हो?
में- हाँ ग,
तो बत्तीसी निकल कर हँसता हुआ बोलै- अरे बीटा पहले बताते आप बड़े साहब के घर से हो,
में- अरे वो क्या बताना आप उनको भैया को निकालिये न,
हवलदार- हाँ हाँ आओ,
फिर हम सबको उसने बड़े साहब के केबिन में बिठाया कुछ hi देर में पियूष यानि अंजलि के भाई को भी हमारे सामने ले आया.
हवलदार- लो कर्मा बीटा ले जाओ भैया को बाकि साडी लिखा पढ़त मैं देख लूंगा, बाकि अभी क्या मांगों चाय ठंडा?
में- अरे नहीं नहीं बस अब निकलते हैं, बहुत बहुत धन्यवाद् आपका,
हवलदार ने मुझे थोड़ा अलग में आने का इशारा किआ और अलग लेजाकर बोलै - बीटा, वो जो पहले हुआ साहब से मत कहना,
में- अरे बिलकुल नहीं, चिंता मत करो आप,
खैर हम ठाणे से निकल कर बहार आये, अंजलि उसकी मम्मी और भाभी ससुरा सब खुश थे, सब के चेहरे पर अब शांति थी और सब hi मुझे बड़े प्रेम से देख रहे थे,
सविता (अंजलि की मम्मी)- बहुत ाचा किआ बच्चा जो तुम हमारे संग आ गए, नहीं तो हम न जाने कैसे छुड़ाते बेटे को,
रानी( अंजलि की भाभी)- सही में भैया, कल से चक्कर काट काट के परेशां थी, सुन hi नहीं रहा था कोई, सुबह परेशां होकर पापाजी को बताया,
में- अरे कोई बात नहीं भाभी जी, चची जी, हम एक दुसरे के काम नहीं आएंगे तो कौन आएगा,
ससुरा- वो बात तो है बीटा, पर सही में बहुत मदद हो गयी, नहीं तो पुलिस के चक्कर तुम जानते हो न जाने कितना इंतज़ार करवाते, तुम्हारा बहुत धन्यवाद् है इतनी आसानी से इस मुश्किल से निकल लिए,
पहली बार ससुरे को अपने साथ प्यार से बात करते देख दिल खुश हो गया,
में- अरे चाचाजी आप भी, आपके बच्चे की तरह हूँ, वैसे भी जो हुआ सो हुआ, अभी चलते हैं कुछ कहते हैं, भैया ने भी कुछ नहीं खाया होगा,
मैंने अंजलि के भाई पियूष की और इशारा करते हुए कहा,
पियूष- हाँ भाई भूख तो मुझे भी लग रही है,
पियूष ने हँसते हुए बोलै,
फिर हम सब पास के hi रेस्टोरेंट में गए जहाँ सब ने अपनी पसंद का खाना खाया, बीच बीच में मैं अंजलि की और देखता तो वो मुझे अब भी थोड़ा अनदेखा कर रही थी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट ज़रूर थी, खैर खाना खाने के बाद ससुरे ने बिल दिया, उधर गाडी के पास आते हुए अंजलि और भाभी आपस में कुछ हंसी ठिठोली कर रहे थे वो भी मुझे देख देख कर hi, उसी वक़्त मेरा ध्यान भी अंजलि की भाभी पर गया, यार ये घर है या माल गाडी, साला अंजलि जैसा पटाखा, उसकी माँ भी क्या मस्त गदराई हुई और फिर उसकी भाभी भी किसी मामले में काम नहीं थी,
रीना भाभी

भाभी को ताड़ते हुए मैं गाडी तक पहुंचा और फिर सब लोग गाडी में बैठ गए,
सविता- ऐ पियूष बीटा बहु अब तुम लोग भी हमारे साथ घर hi चलो,
पियूष- मम्मी अचानक कैसे,
सविता- अचानक कुछ नहीं अभी चलो अपने कपडे उठाओ और घर चलो दोनों, जो करना गाओं में रहकर करना,
रानी - पर मम्मी जी इनकी नौकरी,
अंजलि- हाँ अचानक से नौकरी कैसे छोड़ सकते हैं,
ससुरा- सब हो सकता है, मैं भी यही चाहता हूँ सब साथ रहे, गाओं में hi कुछ काम कर लेंगे, बस अब अलग नहीं रहना,
पियूष- पर पापा,
ससुरा- कोई पर वॉर नहीं चलो.
फिर क्या था ससुरे ने आदेश दे दिया था तो हम लोग पहले उनके घर गए, घर क्या एक कमरा और हॉल वाला फ्लैट था किराये पर ले रखा था, जहाँ से डुबो ने कपडे पैक किये, बाकि सामान के लिए तय हुआ की बाद में एक दिन आकर ले जायेंगे,
फिर से सफर शुरू हुआ, इस बार सब लोग चहक रहे थे, पियूष और रानी भी खुश थे,
पियूष- पता नहीं सही फैसला है की गलत पर मेरा मन भी यही कर रहा है की गाओं में सबके साथ रहूं,
अंजलि- बिलकुल सही फैसला है भैया,
रानी- मैं भी मानती हूँ, अकेले बड़ी परेशां हो जाती थी मैं,
इसी तरह बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे, रस्ते में पियूष ने पूरा मामला बताया की कैसे रोड पर एक ज़रा सी बात ठाणे तक पहुँच गयी, रास्ते में पेट्रोल पंप पड़ा तो ससुरे ने ज़िद्द करके तेल डलवाया कहने लगा की उनके काम के लिए गया ये हमारा फ़र्ज़ है, खैर थोड़ी देर में hi गाडी उनके घर के सामने थी, सब उतर कर अंदर जाने लगे ससुरा और साला कपड़ों से भरे बैग उतरने लगे, मैं नीचे उतरा तो सासु माँ ने पकड़ लिए और बोली- बीटा तुम्हारा जितना धन्यवाद् करूँ उतना काम है, और अब तुम्हे अपनी मम्मी को लेकर आना hi होगा,
में- बिलकुल चची, और बेटो को धन्यवाद् नहीं करते आशीर्वाद देते हैं,
सासु माँ ने मेरे हाथ पकड़ कर दोनों हथेलियों को चूमा और फिर से मम्मी को लेन की बात बोलकर घर अंदर चली गयी,
अब बस मैं अकेला बचा था और गाडी में बैठा इतने में अंजलि पीछे से आई और बोली- एक छोटा बैग रह गया गाडी में पीछे की तरफ.
मैं उतरा और पीछे वाला दरवाज़ा खोला और देख कर बोलै यहाँ तो कुवह भी नहीं है,
अंजलि- अरे वहीं था,
ये कहते हुए वो भी गाडी के इस और आई और अंदर झांक कर देखने लगी और वाली वो देखो,
मैंने भी उसके बगल में होते हुए सर दाल कर देखा कुछ नहीं दिखा,
में- कहाँ हैउमममममनननहहहहहह.
मैं इतना hi बोल पाया की अंजलि के होंठ मेरे होंठो पर थे और फिर एक पल बाद hi वो अलग हुई और भाग कर घर में घुस गयी मुझे समझ भी नहज आया की अचानक हुआ क्या, पर जो भी हुआ मज़ा आया,
खैर मैं गाडी लेकर घर की और चल पड़ा रस्ते में hi पंहुचा था की फ़ोन बजा देखा की अंजलि का था, मैंने उठाया और बोलै- hello.
अंजलि- हेल्लो,
में- अब भी कुछ रह गया क्या गाडी में?
अंजलि- हाँ रह तो गया.
में- क्या?
अंजलि- ी लव यू....
उससे ये सुनकर मैं सुन्न पद गया मैंने अचानक से ब्रेक मार कर गाडी रोकी, मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या बोलूं?
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद वो दोबारा बोली- Hello क्या हुआ ाचा नहीं लगा क्या?
कुछ पल बाद मेरी ज़ुबान बापिस आई तो मैं बोलै- नहीं वो पता नहीं क्या हुआ कुछ बोल hi नहीं पा रहा था मैं,
अंजलि- अच्छा इतना बुरा लगा,
में- अरे नहीं यार छेड़ो मत अभी,
अंजलि- छेड़ कहाँ रही हूँ मुझे तो बुरा लग रहा है की तुम मुझसे प्यार नहीं करते...
में- क्या ऐसा किसने कहा,
अंजलि- तुमने, मैंने तुम्हे ी लव यू बोलै, तुमने कोई जवाब नहीं दिया,
में- मैं भी तुमसे बहुत ज़्यादा प्यार करता हूँ, हद से ज़्यादा सबसे ज़्यादा,
अंजलि- सच्चीईई...
में- muchhhhhiiiiiiiiii,
तभी पीछे से किसी की आवाज़ आई तो वो बोली- सुनो बाद में बात करुँगी थोड़ी देर में घर पहुँच कर मुझे मश्ग कर देना,
में- ठीक है,
अंजलि- Bye लव यू ढेर सारा,
में - लव लव यू तू
अंजलि- मिलती हूँ बाद में.
ये कहके उसने फ़ोन रख दिया, और ाचा hi किआ क्यूंकि मुझे भी थोड़ा समय चाहिए था, जो हुआ उसे अपने अंदर सामने के लिए, मैं ख़ुशी से पागल हुआ जा रहा था,
इधर मेरे जाने के थोड़ी देर बाद मौसा और पापा नाना से बोले- बाबा तुम चाहो तो घर चले जाओ हमें यहाँ समय लगेगा,
नाना तो इसी इंतज़ार में बैठे थे वो जल्दी से अपनी बड़ी बिटिया के साथ रहना चाहते थे,
इधर मां को राजन चाचा अपने साथ ले गए थे कुछ काम निपटने,
मां- जीजा बड़े छुपे रुस्तम निकले तुम बताया नहीं कुछ इतना खेल हो रहा है चोदामपुर में,
मां ने फावड़ा चलते हुए कहा,
चाचा- अरे सेल हर चीज़ का सही समय होता है, अब देखो हमने नहीं बताया तभी तो अपनी बड़ी बहन की छूट मिली तुम्हे. मज़ा आया न?
मां- अरे जीजा बहुत, इतना मज़ा कभी नहीं आया,
चाचा- जानते हैं भाभी जैसा माल पूरे गाओं में नहीं है, क्या छूट क्या कासी हुई गांड है तुम्हारी बहन की
मां- हहहह बताओ तुम हमारी बहन के बारे में ये सब बोल रहे हो हमें ाचा लग रहा है.
चाचा- जब बहन छोड़ बन जाओ तो सब ाचा लगता है जमुना बाबू, खासकर बहन की छूट और उसकी बातें,
मां- सही कह रहे जीजा हेहेहे,
चाचा- और छुपा रुस्तम हम हैं या तुम हो जो चुपचाप अपनी बहन को पेल दिए,
मां- नहीं जीजा छुपे रुस्तम तो तुम hi हो, बताओ हमसे छुपके हमारी बीवी और बिटिया को भी छोड़ दिया तुमने तो,
इस पर चाचा हंसने लगे, इसी तरह बातें चलती रही और खेत का काम चलता रहा,
नाना जल्दी से घर पहुंचे देखा माँ आंगन में बैठी कपडे धो रही थी आंगन में hi पड़ी खत पर बैठ गए और बोले- अरे बोतिया बाकि सब कहाँ हैं?
माँ- कर्मा तो बहार गया है, सागर भी आज गायब hi है बाकि अनुज और किरण सो रहे हैं बाबा,
नाना- चाह, और बहु और छोटी,
माँ- वो दोनों भी सो रही हैं आज पूरे घर में आलस फैला पड़ा है हेहेहे,
नाना ने ये सुना तो उनके कान खड़े हो गए ऐसे hi मौके की तलाश में तो थे नाना जब माँ के साथ अकेले समय मिले और वो सुबह का अधूरा काम निपटा सकें,
नाना तुरंत खड़े हुए और माँ जो अभी कपडे दीवार पर दाल रही थी उन्हें पीछे से पकड़ लिया,
माँ- अह्ह्ह्ह बबआह क्या हुआ, कुछ चाहिए का?
नाना- आह्ह्ह्हह बित्याहहहह हमें तो बस तू चाहिए,
नाना ने माँ के कंधे को चूमते हुए कहा साथ hi उनके हाथ माँ के कामुक बदन पर फिरमे लगे,

माँ- ुहम्म बबाहहह बिटिया के साथ ये सब नहीं करते,
नाना- आह्ह्ह्हह बित्याहहहह तेरे जैसी हो तो बाप को सबसे पहले ये hi करना चाहिए, पिता का हक़ होता है
नाना ने माँ के पल्लू को नीचे कर दिया और नंगे पेट को मसलते हुए बोले.
माँ- बबाहहह पर बित्याहहहह पर उसके पति का हक़ होता है,
माँ भी अपनी गांड नाना के लुंड पर घिसते हुए बोली,
नाना- आह्ह्ह्हह बित्याहहहह पटी का हक़ तो बाद में होताहहह है पहले बाप का होता है,
नाना ब्लाउज के ऊपर से hi माँ की चूचियों को मसलने लगे,
माँ- ुह्ह्ह्ह बबाहहह ताऊ क्यायहहह अब पूराआअह हक़ वसूलोगे,
नाना- हांण बित्याहहहह पूराआअह अब्ब्ब इंतज़ार नाहीइ होताहहह,
माँ- अह्ह्ह्ह कोई आए गयाःह तुह्हः.
नाना- आआ जाने दे बित्याहहहह अब्ब हमसे इंतज़ार नहीं होताहहह,
माँ- अह्ह्ह सच्चीईई सबके सामने अपनी बित्याहहहह के साथ प्यार करोगे?
नाना- हांण बित्याहहहह बिलकुल, सबके सामने hi करूँगा आह, बेटी पर बाप का हक़ सबके सामने भी होताह है,
नाना हर पल उत्तेजित होते हुए माँ का बदन मसलते हुए बोल रहे थे,
माँ- अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह और कर्मआहह के पापा आ गए टोह्हह्ह,
नाना- तू भी अपना हक़ तो वसूल के hi रहेंगे हम बित्याहहहह...
नाना और उत्तेजित होते हुए बोले साथ hi उन्होंने माँ को वहीं चबूतरे पर लिटा लिए और माँ के बदन को जगह जगह चूमने लगे, कभी उनकी गर्दन चूमते तो कभी पेट, माँ भी अपने बाबा की हरकतों से उनके नीचे लेती हुई मचल रही थी,

माँ- अह्ह्ह्ह बबआह एक अजीब सा एहसास होता है जब तुम छूटे हो तुह्ह्ह्ह,
नाना- यही अह्हह्ह्ह्ह तो बाप बेटीईई क्या प्यार है बिटियाः, अलग तो लगेगा hi...
माँ- तो और प्यार करो न बबाहहह, आज सारा प्यार लुटादो अपनी बिटियाः पर,
नाना- हाँ बित्याहहहह आज पूरा प्यार लुटाहहह कर hi रहेंगी तुझ पर, तू भी अपने बबाहहह को अपना सारा प्यार देगी नाह,
माँ- हाँ बाअबाआहठ बिलकुल तुंहारा हक़ है तो पूरा हक़ ले लो अपनेआहहह,
नाना- सही कहा बेटीई बिलकुल सही कहाहहह, और सबसे पहले तो मैं तेरे इन रसीले होंठो का स्वाद लूंगा,
ये कहकर नाना ने अपना चेहरा आगे कर अपने होंठों को माँ के होंठों पर रख दिया और अपनी बेटी के होंठों को चूसने लगे, माँ भी नाना का पूरा साथ दे रही थी, नाना को अपनी बड़ी बेटी के होंठों को चूसने में एक अलग hi एहसास हो रहा था, बाप बेटी पागलों की तरह एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे, कुछ hi देर के बाद नाना ने अपनी जीभ माँ के मुँह में घुसा दी तो माँ उसे कुल्फी की तरह चूसने लगी, अपने पिता के साथ माँ को भी एक अलग hi आनंद आ रहा था,
कुछ देर जीभ की कुश्ती के बाद अलग हुए तो नाना ने माँ के बदन पर नीचे की और सफर शुरू किया और उनकी गर्दन छाती और पेट को चूमते हुए नीचे बढ़ने लगे,

माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह कहा जाओ आज बितीयआह्ह्ह्ह के बदन को,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh
नाना माँ के पेट को चूमते हुए बोले और फिर अपनी जीभ माँ की नाभि में घुसड़ी जिससे माँ मचलने लगी,
माँ- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हाइये दिया आअह्ह्ह्ह बबआहहह तुम्हे तो साआरीई तरीके पता हैं तडपाआहहहहहने की,
नाना लगातार माँ की नाभि को चूसे जा रहे थे, आंगन में बाप बेटी का ऐसा कामुक खेल चल रहा था जो की बिरला hi कुछ घरों में खेला जाता था,
इधर जैसा की माँ ने कहा था की किरण और अनुज सो रहे थे तो उसमे भी आधी सच्चाई थी, क्यूंकि पहले तो अनुज और किरण एक hi बिस्तर पर सो रहे थे पर दो जवान बदन एक hi बिस्तर पर कितनी देर सो सकते थे, अनुज ने जैसे hi किरण का बदन अपने साथ महसूस किआ वैसे hi खुद को उससे चिपका लिए, और पीछे से हाथ डालकर किरण के पेट पर हाथ फिरने लगा, कुछ पल बाद किरण की टीशर्ट को ऊपर करके अनुज उसके नंगे कोमल पेट पर हाथ फिरने लगा, किरण अब भी थोड़ी नींद में थी तो उसने अनुज की हरकतों पर ध्यान नहीं दिया और सोती रही, अनुज उसके कोमल जवान बदन से आराम से खेल रहा था इस बात से अनजान की आंगन में उसकी माँ के साथ भी कुछ वैसा hi खेल उसके नाना खेल रहे थे,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह ओह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कीटनाआआआ माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आए रहा है, अह्हह्ह्ह्ह बहुत्तत्तृत अच्छी से चटटी हो तुम,
माँ ने नाना का सर अपनी जांघों के बीच दबाते हुए कहा, नाना की जीभ माँ की छूट में घुशी हुई थी, माँ की साड़ी और पेटीकोट कमर तक उठा हुआ था, और नाना ऊपर से नंगे होकर एक बार फिर से अपनी बितीयआह्ह्ह्ह का छूट रास चाट रहे थे उसकी छूट से और माँ उनके नीचे तड़प रही थी

जल्दी hi नाना की ज़ुबान की कारीगरी ने कुछ ऐसा असर दिखाया की माँ का पूरा बदन थरथराने लगा और माँ अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह करती हुई सिसकियाँ लेकर जल्दी hi झड़ने लगी और नाना के मुँह में अपना काम रास बहाने लगी,
नाना भी बितीयआह्ह्ह्ह की छूट का रास ऐसे चाट गए जैसे जलेबी की चासनी हो,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कितना चाटोगे बिटिया की छूट को,
नाना- तेरी छूट hi इतनी मीठी है बिटिया की पूरे जीवन चाटते रहे हम तो,
नाना ने अपने होंठों को जीभ से चाटते हुए कहा,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबा बहुत लालची होते जा रहे हो,
नाना- जब बिटियाः तेरे जैसी गदराई हुई हो तोह मन में लालच तो आएगा hi, नाना ने पीछे होते हुए माँ की आधी खुली सारी को उनके बदन से अलग करते हुए बोले, साथ hi साड़ी को अलग कर नाना ने अपने कड़क लुंड को भी कच्चा सरका कर बहार निकल लिए, नाना के मन में यही दर था की सुबह की तरह उनके साथ धोखा न हो जाये इसलिए जल्द से जल्द वो अपनी बिटिया की छूट में अपना लुंड घुसा देना चाहते थे,
माँ ने ये देखा तो उठ कर बैठ गयी और नाना को बोली- बबाह अब तुम लेटो हमें तुम्हारी सेवा करने दो,
और माँ ने नाना को अपनी जगह पर लिटा दिया और खुद बगल में बैठ कर नाना के कच्चे को उनके बदन से पूरी तरह अलग कर दिया, नाना अब अपनी बेटी के आगे बिलकुल नंगे थे,
आंगन में माँ ने अपने ब्लाउज के पैट खोल दिए थे और अपनी चूचियों को ब्रा से बहार निकल लिया था, नाना ये सब देख कर hi तड़पने लगे, वहीं माँ ने हाथ बढाकर नाना के कड़क लुंड को पकड़ा तो नाना सिहर उठे और उनके लुंड के टोपे पर रास की बूँदें उभर आई,
माँ- देखो तो बाबा कैसे कड़क करके रखा है इसे बिटिया के लिए,
माँ नाना की आँखों में देखते हुए उनके लुंड को मुठियाते हुए बोली,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह तुझे देखते hi ये हाल हो जाता है, अह्ह्ह अब और मत तडपाठ अपने बाप को,
माँ- नहीं बबाह अब नहीं तड़पाऊंगी अपने बाबा को और ना hi उनके लुंड को,
माँ नाना के लुंड क्र टोपे पर अपनी जीभ फिरते हुए बोली,
नाना- ahhhhhhhhhh बितीयआह्ह्ह्ह, अह्हह्ह्ह्ह..
माँ ने टोपा छाता और फिर अपना मुँह पीछे कर लिया और बोली...
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह बचपन की तरह मैं तुम्हारी गोदी में खेलूं? अह्हह्ह्ह्ह खिलाओगे अपनी बितीयआह्ह्ह्ह को अपनी गॉड में,
नाना बेचारे हर पल तड़प रहे थे क्या बोलते- हाँ बितीयआह्ह्ह्ह बिलकुल khilayenge,ahhhh आजा अपने बाबा की गोदी में,
नाना की बात सुनकर माँ ने बड़े कामुक ढंग से अपने दोनों पेअर नाना की कमर के दोनों और रखे और अपना पेटीकोट फैलाकर नीचे बैठ गयी नाना के ऊपर, बैठते हो दोनों के मुँह से आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,
क्योंकि नाना का कड़क लुंड माँ की जांघों के बीच उनकी छूट के नीचे दान गया था,
नाना अपने लुंड पर बेटी की छूट की गर्मी का एहसास पाकर मस्त होने लगे वही हाल माँ का भी था,
माँ- अह्ह्ह्हह्हह बाबा देखो मैं तुम्हारी गोड़ीई में बैठ गयी, एक बार फिर से बचपन की तरह, कितना ाचा लग रहा है न,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh बहुत अच्छा लग रहा है, एक बाप को ऑरररर क्या चहियेटी,
माँ- बबआहहह पर मुझे चाहिए बताओ डोज क्याहहह??
कमरे में अनुज और किरण की कहानी भी आगे बढ़ चुकी थी और अभी किरण वैसे hi लेती थी जैसे पहले लेती थी अपने सीधे हाथ पर करवट लेकर बस फ़र्क़ इतना था जी की अभी उसकी टीशर्ट उसकी चूचियों से ऊपर थी वहीं एक छुच्छी पर अनुज का हाथ था, जो उसकी नयी जवानी में उभरती हुई चुकी को मसल रहा था, वहीं नीचे उसकी कमर से पजामा गायब था और कच्ची भी घुटनो से नीचे पैरों में थी और उसके पीछे अनुज था जिसका लुंड धीरे धीरे से उसकी जवान छूट ने अंदर बहार हो रहा था,

किरण की आँखें अब भी बंद थी पर उसके होंठ खुले थे जिनस्व बार बार अह्हह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह की सिसकियाँ निकल रही थी, किरण की सिसकियों के बीच अनुज को बहार की भी कुछ आवाज़ें सुनाई दे रही थी, और सुनाई देती भी क्यों नहीं बहार आंगन में बाप बेटी का प्यार पूरे जोश से जारी था,
माँ- बस एक चीज़ और करनी है बाबा,
माँ नाना के ऊपर hi धीरे धीरे से अपनी कमर घूमते हुए बोली, जिससे नाना के लुंड से उनकी छूट के होंठ घिस रहे थे और दोनों को hi एक अलग कामुक एहसास मिल रहा था, साथ hi ये एहसास वो सिर्फ महसूस कर प् रहे थे क्यूंकि माँ के पेटीकोट की वजह से सब छुपा हुआ था तो इस कारन इसका मज़ा एक तरह से और बढ़ रहा था..
नाना- हाँ बितीयआह्ह्ह्ह क्या चाहिए सब देंगी तुझे,
नाना अपने लुंड पर माँ की गरम छूट का घिसाव पाकर पागल हो रहे थे उत्तेजना से,
माँ- याद है बचपन में, मैं तुम्हारी गोदी में अह्ह्ह कैसी उछाल उछाल कर खेलती थी, अब भी मुझे वैसे hi खेलनाअहहहह हैईईई,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह तो खेल नाहहहह बिलकुल खेल, उछाल अपनी बाबा के ऊपर,
माँ- सच्ची फिरर तो मज़ा आएर्गाः, बस एकककक चीज़ ऑररररर,
माँ ने ये कहते हुए अपना हाथ पेटीकोट के अंदर घुसाया और थोड़ा सा उठकर नाना के लुंड को पकड़ा और सीधा किआ और फिर अपनी छूट के द्वार पर उसका टोपा लगाकर नाना की आँखों में देखते हुए बोली- तैयार हो जाओ babaaaahhhhhhhhhhhhhhh,
ये कहते हुए माँ नीचे हो गयी और नाना का लुंड उनकी छूट को चीरता हुआ अंदर घुस गया, कुछ hi पलों में नाना का लुंड जड़ तक उनकी बेटी की छूट में घुसा हुआ था..
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh हाय माहहहह अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह अह्हह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह कीत्नीईईई गरमममन haiiiiiiiiiii अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह..
नाना ने जैसे hi अपने लुंड पर माँ की छूट को महसूस किआ उनका तो पूरा बदन hi सिहरने लगे, उनका बादब थरथराने लगा, कमर भी खुद बा खुद चलने लगी और जब तक नाना को एहसास होता क्या हो रहा है उनका लुंड माँ की छूट में अपना रास छोड़ने लगा,
नाना माँ की छूट में लुंड घुसकर इतने उत्तेजित हो गए की उनके लुंड ने बेटी की छूट में रास की पिचकारियां मरना शुरू कर दिया, और वो सिर्फ सिसकियाँ लेते रह गए,
माँ को भी ये एहसास हुआ की उनकी छूट उनके बाबा ने अपने रास से भर दी है तो बोली- अह्हह्ह्ह्ह babaaaahhhhhhhhhhhhhhh तुमने बिटिया की छूट को अपने रसससस से भर दिया अह्ह्ह्हह ऐसी hi हक़ चाहिए थाहा न तुम्हे,
नाना जो थोड़े शांत हुए बोले- अह्हह्ह्ह्ह बिटिया ओह्ह्ह पहली बार किसी छूट में लुंड घुसते hi झाड़ा हूँ अह्हह्ह्ह्ह क्या छूट है टेरिइइइइइइइइ,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबा तुम्हारा लुंड भी तो कमाल का है बिटिया की छूट में झड़ने के बाद भी देखो पहले की तरह बिलकुल कड़क है,
नाना ने भी ये एहसास किआ की उनका लुंड बिलकुल कड़क है झड़ने के बाद भी,
नाना- यी सब तेरई छूट का कमाल है बिटिया,
माँ- छूट का कमाल तो अब दिखाउंगी बाबा,
ये कहते हुए माँ ने नाना के लुंड पर उछालना शुरू कर दिया, नाना भी माँ के झटको से सीसीएनए लगे, माँ अपने चूतड़ों को नाना के लुंड पर पटकने लगी तो नाना भी माँ की कमर पकड़ कर नीचे से धक्के लगाने लगे,

नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह uhmmmmmmmmmmmmmmmaaaahhhhhhhh ऐसी hi कोउद अह्हह्ह्ह्ह अपनी बाबा के लुंड पर,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बबाहहहहह अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन, छोड़ते रहो अह्हह्ह्ह्ह ऐसी hi अब रुकना मत्तत्तत अह्हह्ह्ह्ह,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह अब चाहेंगे तो भी नहीं रुक पाएंगे, अह्हह्ह्ह्ह, अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह,
माँ- बाबा नंगाहहह करो अपनी बिटिया कोहहह अह्ह्ह अनगनणन में नंगा कर के छोडोऊ खूब,
नाना- अह्हह्ह्ह्ह हांण बिटिया अभी लिए,
ये कह नाना ने माँ का ब्लाउज और ब्रा पूरी तरह से उनके बदन से अलग कर दिया, और फिर पेटीकोट भी बदन से निकल दिया माँ भी नाना की तरह बिलकुल नंगी हो गयी, इसी बीच माँ का उछालना लगातार जारी था,
माँ- अह्हह्ह्ह्ह बाबाआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह खत पर चलते हैंण्ण्न,
माँ ने नाना के लुंड से उठाते हुए कहा पर उठते हुए भी माँ ने अपने होंठ नाना के होंठों से जोड़ दिए तो दोनों एक दुसरे को चूमते हुए hi खत तक आये और फिर माँ अपनी पीठ पर खत के किनारे लेट गयी इधर नाना ने अपना लुंड माँ की छूट में दोबारा घुसा दिया तब जाकर दोनों के होंठ अलग हुए,
नाना एक बार फिर से अपनी बिटिया की छूट में धक्के लगाने लगे, हर धक्के पर माँ के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थी वहीं नाना की नज़र तो माँ की नाचती हुई चूचियों पर थी जो की अद्भुत नज़ारा पेश कर रही थी, फिर नाना ने सोचा की बिटिया का पूरा बदन hi एक सुन्दर कम्यून नज़ारा है और उसे देखते हुए तेज़ी से धक्के लगाने लगे,

नाना मन hi मन खुश हो रहर थे और अपने आप को दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान मान रहे थे, क्योंकि उन्हें अपनी दोनों गदराई बेटियों को छोड़ने का उनके बदन को भोगने का मौका जो मिल रहा था, साथ hi ऐसा दृश्य बेटी सामने नंगी पड़ी हुई है और वो उसे छोड़ रहे हैं,
छोड़ते हुए hi अचानक से नाना की नज़र एक तरफ गयी तो अचानक से नाना सुन्न पद गए, उनका दिमाग चकराने लगा, उन्हें सब कुछ ख़तम होता दिखाई दिया,
जारी रहेगी

















































