Incest Pyaar - 100 Baar - Page 11 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 67

शीघ्रपतन और मुन्नी


"कुछ कह रही थी आप अभी? हम बात कर सकते है और मैं कुछ हद्द तक जानता भी हु सब.", अर्जुन ने गेहूं की एक बाल टॉड कर दाने तोड़ते हुए आगे भड़ते हुए कहा और उसके साथ हे फिर सकुचाती हुई मुन्नी चलने लगी. चेहरे पर हलकी घबराहट अब न थी लेकिन सोच जरूर गहरी थी.

"वैसे मैं जानता हु वह आंटी क्यों गई है अंदर. और शायद आपके साथ भी उस दिन कुछ aisa-waisa किआ होगा छोटे नाना ने.", अर्जुन ने चुप्प देखते हुए मुन्नी को कहा. वह चाहता था के मुन्नी उसके साथ अपने मैं की बात कहे. दोनों अब उस तरफ आ गए खेत के जहा एक 6 फ़ीट चौड़ी कच्ची सड़क के उस पर भी खेत थे. ये भी उन्ही के थे जिनके बीच से ये रास्ता दिया गया था.

"नहीं नहीं. मैं कोरी हु एब्ब तक्क. वह उस दिन थारे नाना ने महारा मुँह गन्दा किआ था और जोर लगावे थे के मैं कोड्डी हो जाऊ लेकिन मैं मरना पसंद करू उनके नीचे ाँ की जगह.", मुन्नी देहाती लड़की थी और मेहनती भी. शरीर patla-charhara और चाल में तेजी थी, जैसा अक्सर काम करने वाली गाँव की जवान लड़किया होती है. वह अर्जुन को बता रही थी की उसके नाना ने जबरदस्ती करने की कोशिश की थी लेकिन सिर्फ मुँह में हे लिए था उसने.

"मन कर सकती थी तोह किया क्यों नहीं? और जब तुम्हारी रिश्ते की बुआ उनके साथ ये सब कर सकती है तोह ...", अर्जुन आगे न बोल सका इस से. दोनों अब इस अगले खेत में आ गए थे जहा tara-meera लगा था, हलके पीले फूल और हरियाली फसल. सीमेंट के चौकोर 23 फ़ीट ऊँची टंकी पर अर्जुन ने बैठते हुए मुन्नी को भी वही बैठने को कहा लेकिन वह साफ़ जमीन पर 2 ेंट रखती उनपर बैठ गई.

"महारी फूफा, माँ, भाभी और पड़ोस की 4-5 लुगाई और भी काम करे है आड़े. और सब जाए भी करे है थारे नाना के कमरे में. ऐब मैं मन कर दू तोह इतने लोग काम तेह बहार हो जावेंगे. लेकिन फेर महारी भी ज़िन्दगी है किम्मे. यु किसे बुड्ढे से तोह कोणी करू मैं अपना सौदा.", अर्जुन को अब समझ आया के वह क्यों ये सब कर रही थी. इतने लोगो के रोजगार की वजह से. मतलब नाना गलत करते है जो किसी की मर्जी के खिलाफ ये सब कर रहे है.

"मतलब मेरे नाना गंदे आदमी है जो बिना किसी की मर्जी के साथ ये सब करते है? मैं सीधे तोह नहीं लेकिन अपने हिसाब से ये बात बड़े नाना को जरूर कहूंगा.", अर्जुन को ठेस लगी थी ये पता लगने पर. मजबूर करके शरीर संसर्ग मत्लाप मौन बलात्कार हे हुआ.

"ऐसी बात कोणी छोटे जिमिदार जी. महारी माँ और फूफा के खसम कोन्या और थारे नाना उनका ख़याल भी करे है, ज्यादा पैसे देके. और लुगाई भी लालच करती खुद कोड्डी होव है. गाल जरूर काढ़े है साड़ी क्योंकि थारे नाना की बन्दुक कड़ी होते बैठ जावे है लेकिन फेर बाकी सुख तोह वही देवे है न सबने.", मुन्नी ने बिना पक्षपात के तस्वीर साफ़ कर दी थी अर्जुन के मैं में. अर्जुन शांत सा अपने पाँव हिलता जमीन देख रहा था वही मुन्नी भी नीचे बैठी तिनके से मिटटी में लकीरे घड रही थी.

"तुम्हे लालच नहीं दिए उन्होंने?"

"लालच तोह भतेरो दियो थो. तुम (सोने की चैन) दिवा दंगो, पैसा दंगो और न जाने के के. लेकिन थे महारे से छोटे होंगे तोह एक बात बता डीयू हु के कोई भी छोर्री ार लुगाई एहसा मरद मांगे है जो शरीर ने ठंडा करदे. प्यार दे ार संतुष्टि दे. और जिमिदार जी न प्यार कर सके है और न ठंडा. महारी भाभी गई है 3 बार लेकिन हर बार गाल काढ़ती आई वापस. उसने हे बताया के शिग्रपतन से थारे नाना के ार वह 1 मिनट न ठीके है.", देहाती थी और ताज़ी जवान हुई अनपढ़ लड़की थी मुन्नी. इसलिए ज्यादा पता भी नहीं था के बात क्या और कैसे करनी है. अर्जुन पहली बार मुस्कुराया था इस दौरान.

"हासो के हो जी? बुढ़ापे में भी बुढऊ जक्क कोणी लेवे और थारी हांसी आवे है.", मुन्नी का sanwla-salona चेहरा और ऐसी बेफिक्र बातें अर्जुन को बड़ी ाची लग रही थी. कपड़ो के नीचे अंगवस्त्र तोह थे हे नहीं लेकिन शरीर जरुरी जगह से ाचे से गदराया हुआ था.

"कुछ नहीं, ऐसे हे. तुम बातें बड़ी ाची करती हो और बिलकुल बेपरवाह सी हो. वैसे नाना की गलती नहीं की वह तुम्हे पाने की इत्छा रखते है.", अर्जुन को अपने कहे शब्दों पर खुद यकीन नहीं हो रहा था. और पहली बार उसने मुन्नी के चेहरे पर शर्म की लाली देखि थी. लम्बी घनी पलके झुकाये वह भी हल्का मुस्कुरा उठी थी.

"के मतबल?", इतना हे पूछ सकीय. अर्जुन जैसे उसको देख रहा था अब नजरे ऊपर करने की हिम्मत जैसे जवाब दे गई थी.

"मतलब यही की तुम ाची लड़की हो. जरा भी मैं में मेल नहीं, कितनी साफ़ बात करती हो. और सारा दिन धुप में काम करने के बावजूद ाची दिखती हो. इसलिए हे तोह नाना चाहते होंगे के वह तुम्हारे साथ वो करे जो शायद वह सपने देखते हो.", अर्जुन ने भी नजर फेरते हुए पानी की टंकी में उंगलिया चलनी शुरू कर दी. वह अब मुन्नी को अनचाहे परेशां नहीं करना चाहता था.

"गाम की माटी में मिलावट न होती छोटे जिमिदार जी. ऐब यही सिख्या से के जो देखो वो मानो, जो गलत वह गलत और जो ठीक लगे वह करो. छोर्री हु तोह महारा भविस भी बेरा से. लेकिन मुँह पे कह दू हु के थारे नाना की जगह थाम कहो तोह एब्बी सलवार खोल द्यौ लेकिन फेर तोह मैंने महारा बींद हे दबावेगा.", सच बात थी मुन्नी की. साधारण जमीन से जुड़े लोग fareb-jhooth कहा करते है. वह किसी बहते जल से साफ़ और एक दिशा में अपना काम करते रहने वाले लोग होते है. न कोई chall-kapat, न हे कोई बड़ी hera-pheri. हालात के मारे थोड़े गरीब हो तोह अपने मालिक को हे दुनिया मान लेते है. बस मुन्नी में वही सब था लेकिन वह मनोहरलाल जी के भोगने की वास्तु नहीं ban-na चाहती थी. और ऐसे खुलेआम अर्जुन को निमंत्रण देना बताता था के वह कैसा व्यक्ति चाहती है अपने लिए.

"पागल हो. मैं ऐसा नहीं के तुम्हारी मज़बूरी का गलत फायदा लू. यहाँ खेतो में इतना काम करती हो, उस से भी तोह हमे हे फायदा होता है. और तुम्हारी बात बिलकुल सच है. गरीब मेहनती लोग कभी झूठ नहीं बोलते या कोई hera-pheri नहीं करते."

"न्यू तोह मैं कई बार चोरी चिप्पे अनार टॉड लिए करू हु और कड़े कड़े गणना भी. पकड़ी जाऊ तोह फेर सजा भी मिल जाये करे है. थारे नाना ने कई बार महारे पिछवाड़े पे चट्टू मारे है.", अर्जुन ने मैं में हे अपने नाना को ठरकी कहा. कैसी सजा और वह भी इस छोटी सी बचो वाली हरकत पर. फिर मुन्नी ने आगे कहा, "छोटे जिमिदार जी, मैं मज़बूरी में कोन्या कह रही. कई बार देखि है मैंने भी ghoda-ghodi. थारे नाना, महारे बड़े भाई, और भी जानने झोपडी, मोटर आरर खेत में लुगाई या छोर्री के साथ. महारा भी दिल करे है लेकिन भाभी ने कहा था के तगड़ा जवान हे पहला सुख दे सके है.", मुन्नी अपने दिल की बात कर रही थी अर्जुन के साथ. उसने यहाँ बहोत से लोगो को मिलान करते देखा था और उसके bhaiya-bhabhi को भी. भाभी ने हे उसको कहा था के अगर ब्याह होने से पहले ये करने का दिल करे तोह काम से काम वह लड़का ऐसा हो जो पूरा सुख दे सके.

"मर्डर जाओगी अगर मेरे साथ किआ तोह. और शादी के लिए बचा कर रखो खुद को. कल को इस वजह से हे कही तुम्हारा होने वाला पति छोड़ न दे.", अर्जुन इतनी भली और साफदिल लड़की के साथ ये सब नहीं करना चाहता था. और शायद मुन्नी को पता भी नहीं था के वह क्या करने के लिए कह रही है. उसने जो भी सम्भोग दृश्य देखे होंगे वह उन लोगो में हे हुए होंगे जो पहले से कर रहे होंगे. किसी कुंवारी कच्ची लड़की का दर्द उसको अभी पता नहीं होगा.

"मैं मरी कोंनी जा रही थारे से कारन ने. व बात और है के थाम ाचे लागे ार मैं सोच्या के शायद विषा हे करोगे जिस तरया भाभी कहवे थी. नहीं तोह भूरा बहोत दिन से आगे पीछे घूमे है मेरे. 2 दिन पहले चची भी मरोड़ दी थी लेकिन मैं सपोड़ मार आई उसके गाल पे. बाकी थाम जानो जे मैं बुरी लागू हो तोह. मैं तोह पहले हे दिन सोचु थी के मरद हो तोह एहसा पहलवान जिह्सा था शरीर है. ार दिखो भी सुथरे हो, नहीं कोई इतनी बात कोणी करे मजदुर छोर्री से.", मुन्नी कहने को एक बार दिखा रही थी की वह अर्जुन की दीवानी नहीं है. लेकिन साथ हे बता भी रही थी की वह उसको कितना पसंद करती है जिस तरह से वह उस से बात कर रहा है और जिस तरह से उसका बढ़िया शरीर है. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अब उसको अपने पास बैठने को कहा. मुन्नी इस बार हिम्मत करती वह ऊपर दिवार पर बैठ गई. पाँव में काला धागा बंधा था जो यहाँ बैठने के बाद दिखा था.

"कितने साल की हो वैसे? कभी बड़ी दिखती हो जैसे उस दिन नाना के कमरे से निकली थी तब और कभी काम उम्र लड़की जैसे आज.", अर्जुन ने उसकी ताम्बे बाहे निहारते हुए कहा.

"21 की हो चुकी हु, माँ बतावे थी. और फेर बापू न है तोह ब्याह न हुआ मेरा ऐब तक. क्यों पुछया?", अर्जुन को उंगलिया पानी में फिरते देख और कभी खुद को निहारते पा कर वह भी नजरे बदल रही थी.

"वैसे हे पूछ लिए. उस दिन घाघरे में थी आज salwar-kameej में हो. ाची लग रही हो इसमें भी.", अर्जुन ने उसकी लम्बी उंगलिया जो वह एक तरफ बंधी चुन्नी में फंसा रही थी देखि. फिर उसकी निगाह उस चुन्नी के साथ हे ऊपर जाने लगी. छाती सुडोल और तन्न के उभरी हुई थी मुन्नी की. उस गंडमें रंग के कमीज में वह जाँच रही थी.

"वैसे तोह न पूछता कोई. वजह बता दो के बेरा मैं कोई हल कर द्यौ.", छाती पे अर्जुन की नजर महसूस करती वह हिम्मत करती थोड़ा अर्जुन की तरफ घूम गई. उसके पाँव जब अर्जुन से टकराये तोह दोनों की नजरे 4 हुई. अभी धुप में वह आँखें भी भूरी चमक बिखेर रही थी.

"हर काम की एक उम्र होती है.", अर्जुन ने आगे लगे घने पेड़ो की तरफ देखते हु संजीदगी से जवाब दिए. मुन्नी भी नजरो का पीछा करती उधर हे देखने लगी.

"आओ छोटे जिमिदार जी, किम्मे दिखाऊ.", चहकते हुए वह दिवार से उछलती सी आगे की तरफ सावधानी से बढ़ी. उसका सीना भी किसी टेनिस गेंद की तरह शरीर के साथ हे uchal-kood करता दिखा. अर्जुन उस मस्तानी नवयुवती के पीछे वैसे हे सावधानी से. दोनों हे फसल के बीच से निकलते इन घने 5-6 वृक्षों के पास आ गए. काफी बड़ा और घाना नीम का पेड़ सबसे पहले था और उस से आगे हे बरगद और शीशम के पेड़ लगे थे.

मुन्नी ने होंठो पर ऊँगली रखते हुए अर्जुन को चुप्प रहने को कहा और दबे पाँव नीम के उस चौड़े तन्ने के पीछे सत् कर कड़ी हो गई. अर्जुन ठीक पीछे हे था तोह थोड़ा सा दुरी पर रुकते हुए हरकत देखने लगा के मुन्नी किस वजह से लाइ है और ऐसे क्यों चिप्प रही है. गर्दन थोड़ी सी बहार करती वह कुछ देखने लगी और फिर दबे पाँव नीम से भी चौड़े बरगद के पीछे आ कड़ी हुई. अर्जुन ने भी उसका अनुसरण किआ और साथ हे पहले की भांति उस से कुछ दुरी पर पीछे खड़ा हो गया. मुन्नी ने रहस्यमई मुस्कान से उसको देखा और अपने पास आने को कहा. दोनों हे अब एक दूसरे के साथ सत् कर खड़े थे.

"शीशम की जांदी के आगे देखो जरा. किम्मे बोलिओ न बस देखियो.", हलके से वह उसके चेहरे के करीब होती फुसफुसा रही थी. मुन्नी की गरम मादक सांस सीधा अर्जुन के गाल को सेक रही थी. इतने करीब उस उसके वह लरजते होंठ देख कर अर्जुन एक पल तोह वैसे हे रह गया लेकिन पलट कर मुन्नी ने वापिस अपनी नजरे आगे की तोह वह भी बरगद के तन्ने पर रखे मुन्नी के हाथ के पास हे अपना हाथ टिकते उसके सर के ऊपर से वही देखने लगा.

यहाँ भरपूर छाया और ाची खासी ओट थी जिस वजह से अंदर दूर से तोह दिख नहीं सकता था लेकिन जहा वह खड़े थे उनके ठीक सामने शीशम के पेड़ को पकडे एक औरत घोड़ी बानी कड़ी थी और ठीक पीछे एक 26-27 साल का आदमी उसका लेहंगा कमर तक ऊपर किये पीछे से धक्के लगा रहा था. कोण थोड़ा टेढ़ा था तोह दोनों को हे उस व्यक्ति का लुंड उस बालो से भरी छूट में अंदर बहार होता दिख रहा था.

उस आदमी ने नीचे हाथ बढ़ाते हुए चोली पीछे खींच कर दोनों चुके आजाद कर दिए और उन्हें मुट्ठी में दबाते वैसे हे कमर हिलने लगा. इधर मुन्नी और अर्जुन के शरीर भी चिपक गए थे इस दृश्य को देखते हुए. सलवार के ऊपर से हे मुन्नी के नरम लेकिन मेहनत से तराशे हुए गोल कूल्हों पर अर्जुन के लुंड की रगड़ लगने लगी. मुन्नी ने खुद हे अपनी गांड पीछे करते हुए उसके लुंड के साथ जोर से चिपका दी.

"मेरी भाभी ार मेरा भाई से. देख किस तरिया लग्गे हुए जमा kutta-kutti की तरह.", हलके हलके कूल्हे हिलती वह ाचे से अर्जुन के मॉटे औजार को अपनी गरम दरार में घिस रही थी. मर्दो के औजार को मुन्नी ने देखा भी था और अर्जुन के छोटे नाना का लुंड तोह पकड़ा भी चुकी थी. लेकिन जिस तरह का आकार और रगड़ उसको अपने कूल्हों पर पता चल रही थी, उसकी उत्सुकता और भद्द गई थी.

"घर में नहीं कर सकते क्या ये दोनों जो यहाँ खुल्ले में?", अर्जुन ने उसके गाल के पास मुँह लाते हे हलकी आवाज में सर्गोईशि की. उसको भी मुन्नी के सख्त लेकिन गदराये चूतड़ अब मजा दे रहे थे. मुन्नी की आँखें उत्तेजना से थोड़ी बंद हुई और अपने गोल नितम्भ उसने अर्जुन के मजबूत डंडे से पूरे चिपका दिए जैसे वह कपडे के ऊपर से हे इस तगड़े लुंड को गांड में ले हे लेगी. अर्जुन ने भी हालत को समझते हुए पीछे से हे उसके सीने पर हाथ करते हुए दोनों पहले हुए ठोस चुके दबोच लिए.

"आठ... माँ भी तोह होव है महारी. खाट की charr-charr तेह बचन के चक्कर में यहाँ ghoda-ghodi कहल लेवे है दोनो. लेकिन तेरा तोह सत्ता भोत बड़ा लागे है रे. आराम से दबा मेरे. आठ..", संतरे जितनी बड़ी मुन्नी की ठोस चूचियों पर निप्पल औसत से कुछ ज्यादा हे लम्बे और नुकीले थे. अर्जुन उन्हें कपडे के ऊपर से हे हलके हलके मसल रहा था और कूल्हों में अपना लुंड भी धसा रहा था. उधर हाँफते हुए वह आदमी अब औरत के छूट से लुंड निकल कर कपडे से उसको साफ़ कर रहा था और बालो से भरी वह लाल चीरे वाली छूट सफ़ेद पानी टपका रही थी. लुंड साफ़ करते हे मुन्नी का भाई आगे की तरफ निकल गया और उसकी बीवी अपनी छूट को साफ़ करने के बाद घूम कर वापिस पिछले खेत की और. अर्जुन और मुन्नी को तोह जैसे अब इनसे कुछ लेना देना हे न था.

"छोटे जिमिदार जी, पेल दो ऐब फेर कोई बुलाएं आ सके है.", नाडा खुद हे खोलते हुए सलवार ढीली कर दी मुन्नी ने तोह अर्जुन ने भी एक कबूतर से अपना हाथ हटा कर अपनी ज़िप खोलते हुए उस भयंकर लुंड को मुश्किल से बहार निकला. भूरे गदराये मुलायम कूल्हों को दबाते हुए अर्जुन ने झुक कर मुन्नी की छोटी सी गुलाबी लकीर पर वह फूला हुआ लाल सूपड़ा घिसय हे था के मुन्नी सिसक उठी. छूट शायद चुदाई देखने और अर्जुन द्वारा शरीर सहलाने से पर्याप्त चिकनी हो चुकी थी क्योंकि सूपड़ा अपने आप हे उन फांको में फिसल रहा था.

"थूक लगा ल्यो थोड़ा. न तोह कसुता काम हो जे गए. आह.. ", अर्जुन ने सुपडे को पीछे करते हुए सटीक निशाने से अपना थूक लुंड पर टपकाया और फिर से छूट पर रगड़ते हुए और भी चिकना किआ. मुन्नी तोह मजे से हे दोहरी हो चुकी थी और उसकी चिकनी छूट की गर्मी से अर्जुन भी उतावला.

"आह्हः.. मार दियो रे.. बेटीचोद जिमिदार थारी भान की छूट कोणी आह्ह्ह्ह.", लुंड सररसराता हुआ आधा उस पनियाई गीली छूट में घुस गया और मुन्नी का मुँह पेड़ के तन्ने पर. उत्तेजना शायद अलग हे रंग दिखा रही थी आज. रुकने की जगह अर्जुन ने झटके से बाकी लुंड भी अंदर दे मारा और खेत की मिटटी पर tapp-tapp खून गिरने लगा. मुन्नी की छूट का पूरा सत्यानाश हो गया था इन 3 धक्को में और बालो से घिरी वह पहली छूट फ़ैल कर कुप्पा हो अब उस कलाई से मॉटे लुंड पर चिपक चुकी थी.

"आज के बाद कभी दर्द न होगा... अह्ह्म्म.. बहोत टाइट है.", अर्जुन ने आधा लुंड खींच कर फिर से अंदर पेल दिए और चुके ऐसे दबोच लिए कपडे पर से जैसे वह मांस के टुकड़े भर हो. Neeli-hari नसों वाला वाला उसका भयंकर लुंड हर धक्के पर मुन्नी को अनादर तक दर्द दे रहा था.

"बच्चू कोणी लग्गे है आज. दर्द की माँ छुड़ाओ पत्र थारा लौड़ा बहार निकालो... माँ ऋ.. मरी मई तोह .. आह. बुड्ढे तेह चुड़ लियुंगी थे निचे न आती.", दर्द में वह चीख रही थी और कुछ हे दुरी पर खड़े मनोहरलाल जी पेड़ की आउट से ये रासलीला देख रहे थे. कैसे उनके दोहते का वह फौलादी लुंड इस कुंवारी की छूट लहूलुहान किये था. अभी थोड़ी देर पहले हे वह झड़े थे लेकिन इस कामलीला को देखने के बाद उनकी धोती में फिर उफान आने लगा था. उनका प्यारा दोहता अर्जुन कैसे उस लड़की की चुदाई करने में लगा था जिसको वह खुद हे सोने की चैन देने को तैयार थे.

"आठ.. एक बार खुल गई हो न... फिर कभी दर्द नहीं होगा.. उम्म्म..", अर्जुन का लुंड खड़ा तोह पहले से हे था और अभी इस 16-17 मिनट की तेज चुदाई से वह फटने की कगार पर आ गया था. मुन्नी की छूट ने भी हाथ जोड़ते हुए जब गरम पानी की धार छोड़ी तोह अर्जुन ने बिना हे बहार निकले अपना सारा जोश उसकी छूट में भर दिया. मुन्नी जमीन पर बैठ गई जैसे हे गुलुप की आवाज करता वह रक्तरंजित भयंकर लुंड उसकी नाजुक छूट से बहार आया. पेड़ के तन्ने से शायद शरीर भी थोड़ा चिल गया था और ऐसे खड़े चुदाई से ज्यादा बुरा हाल था. लेकिन अर्जुन की मर्दानगी की वह कायल हो गई थी.

"माँ.. छोटे जिमिदार जी. जोश में बोल गई किम्मे बी. पत्र कसुते आदमी हो आप जो छूट का भोसड़ा बना दिए. आह.. अगली बार आराम ते करेंगे बस छूट बख्श दियो मेरी.", अर्जुन का जोश थोड़ा ठंडा हुआ तोह उसको भी अब दया आने लगी थी मुन्नी पर. कैसे उसने बिना परवाह किये जानवर जैसे उसके साथ व्यवहार और सम्भोग किआ था.

"गलती से बहक गया था. माफ़ कर देना मुझे."

"अरे जिमिदार जी. एक बात याद रखियो.. आह.. या छूट है नई, इसकी जितनी ठुकाई करोगे उतनी पाछे आवेगी. छोड़ के चौड़ी कर डीओ नहीं तोह कोई और करेगा.", मनोहरलाल जी ये सब देख कर कुछ पीछे चले गए और खेत के उस पार से हे आवाज लगाई जिसको सुनकर अर्जुन ने उनके पास आने का जवाब दिए.

"आया नाना जी", इतना बोलकर वह मुन्नी के होंठ पहली बार चूम कर फिर से मिलने का वडा कर पीछे चल दिए. मुन्नी तोह चलने की हालत में न थी लीकन उसको मजा आ गया था के आज उसकी छूट खुल हे गई थी. और वह भी उस लुंड से जिसका मुकाबला हे न था.
 
17तह नोव से 23 देश तक हर रोज अपडेट करूँगा भाई. फिर एक वीक का ब्रेक लूंगा लेकिन उसके बाद 10 फेब तक कोई ब्रेक नहीं होगा. अभी 17-18 हॉर्स एक्टिव वर्किंग हु और इंटरनेट पर आना पॉसिबल नहीं एक दिन और. ईमेल से आप सभी के रिलीज दिखे तोह ये बताना जरुरी लगा.

बस इतना कहूंगा की कहानी कुछ समय रुकी है लेकिन बंद नहीं हुई. और न हे बंद होगी.
 
अपडेट 68

शंकर शर्मा - ी


"बीटा, वह तेरा मां घर जा रहा है मेरा खाना लेने. तोह याद आया के तुम्हे भी तोह उसके साथ जाना होगा, इसलिए आवाज लगाई. लेकिन लगता है तुम ज्यादा दूर थे.", मनोहरलाल जी कह तोह रहे थे अर्जुन को लेकिन मैं में वह बस चकित थे की उनका दोहता कैसे उस लड़की की पिलाई कर रहा था पेड़ के साथ झुका कर. एक तोह इतनी कम् उम्र और ऊपर से ऐसा वजनदार लौड़ा था जितना उन्होंने भी कभी न देखा था. कैसे मुन्नी की कमसिन छूट उस कलाई से मॉटे लुंड को झेलती खून बहा रही थी. और तोह और 20 मिनट तोह उन्होंने खुद हे देखा था ये समागम, कितनी देर तक चुदाई करता होगा अर्जुन. एक जगह उन्हें दुःख था के जिस लड़की पर उनकी नजर थी उसका कौमार्य अर्जुन ने भोग लिए लेकिन वही दूसरी तरफ वह बहोत खुश थे की वह उनके बेटो की तरह न था.

"हाँ. वह घूमते हुए थोड़ा आगे निकल गया था न नाना जी. मुझे लगा के आपको समय लगेगा मोटर और कमरे की सफाई करवाने में, इसलिए. ाचा नाना जी फिर मैं निकलता हु उनके साथ घर के लिए. अगर आप शाम को आएंगे तोह ाचा लगेगा.", उधर उसके कैलाश मां भी आ गए थे घर जाने के लिए. फिर वह दोनों हे बातें करते खेतो से बहार निकल चले जहा कार कड़ी थी और मनोहर जी फसल के बीच धीमी चाल से जाती मुन्नी को देख रहे थे.

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"बीटा खाना हो जाये तोह एक बार मेरे कमरे में आना.", दोपहर के 3 बज रहे थे और घर के सभी सदस्य दिन का भोजन करने के बाद या तोह सुस्ता रहे थे या फिर अपने अपने कमरों में थे. सिर्फ अर्जुन हे था जो अभी खाना खा रहा था और उसकी मामी पूजा बड़े स्नेह से उसको खाना परोस रही थी. गरम चपाती लेने जब वह ऊपर गई तोह रेखा जी ने अपने बेटे से सिर्फ इतना हे कहा और वह भी दूसरे रस्ते से ऊपर अपने कमरे में चली गई अर्जुन को वही खाना खाते छोड़कर.

"फिर आज रात को तुम्हारा क्या इरादा है.?", पूजा मामी की इस बात पर अर्जुन ने थाली से नजर ऊपर करते हुए उनके सुन्दर चेहरे को देखा जहा एक मुस्कान के साथ हे शर्म भी थी. ये देख कर अर्जुन भी मुस्कुरा दिए. अभी यहाँ सिर्फ ये 2 लोग हे थे.

"मामी, मेरे कमरे में या आपके? वैसे मेरा दिल तोह आज कुछ और हे है.", अर्जुन ने पानी का गिलास उठाते हुए कहा और रहस्यमई मुस्कान देख पूजा जी के चेहरे पर भी वैसे हे भाव आ गए.

"छत्त पर? या फिर कुछ अलग सोच रहे हो?", पूजा जी को तोह जैसे अब सबकुछ मंजूर था. बस अर्जुन का साथ चाहिए थे उन्हें.

"छत्त पर और वह भी दोनों तरफ से, सुबह तक.", अर्जुन ने पानी ख़तम करने के बाद कपडे से हाथ साफ़ करते हुए कहा और उठकर मुँह धोने चला गया. पूजा मामी ने ख़ुशी से हामी भर दी थी और वह भी थाली उठा कर ऊपर चली गई. यहाँ घर में अर्जुन का अब मंजू के साथ तोह कुछ संभव था नहीं क्योंकि वह पहले हे समय के साथ उसके कमरे में जा चुकी थी. और स्वाति के साथ कंचन ड्राइंग रूम में कोई फिल्म देखने में लगी थी.

अर्जुन mooh-haath धोने के बाद अपनी माँ के कमरे में चल दिए. जाने क्या काम होगा उन्हें जो अर्जुन को वह बुलाया था उन्होंने. समय के कमरे का दरवाजा लगा था और उसके साथ हे रेखा जी का कमरा था. बिना शोर किये वह दरवाजा खोल अंदर आ गया जहा इस वक्त उसकी माँ कोई किताब पढ़ रही थी एक करवट लिए. अर्जुन की नजर अपनी माँ के उन बड़े तरबूज जैसे कूल्हों पर पड़ी तोह पाँव वही ठिठक गए. रेखा जी का चेहरा विपरीत दिशा में और पीठ उसकी तरफ थी. सलवार में क़ैद वह हसीं नितम्भ बहोत थे अर्जुन को उत्तेजित करने के लिए.

दरवाजे को आराम से बंद करते हुए उसने चिटकनी चढ़ाई और जैसे हे पलटा तोह अपनी बेपनाह खूबसूरत माँ को मुस्कुराते देख वह खुद हे उनकी और खिंचा चल दिए.

"तोह समय अब मिला है तुम्हे?", सीने पर कोई दुपट्टा न था और ऐसे करवट बदलने से कमीज पूरे जिस्म पर ज्यादा हे फंस गई थी. अर्जुन के सामने अब वह 2 विशाल खरबूजे थे जिन्हे वह जितना प्यार करता उसकी तड़प और अधिक बढ़ जाती थी. कमीज के गले से वह गहरी गली एक हद्द तक नजर आ रही थी जिसके ऊपर अब अर्जुन की नजर जम्म चुकी थी.

"आप हे तोह व्यस्त थी फिर मैं क्या करता.?", अर्जुन ने अपनी टीशर्ट उतार कर एक तरफ रखते हुए अपनी माँ के बराबर लेट कर कहा. रेखा का गुलाबी चेहरा और वह भरे होंठ लरज गए थे अर्जुन को अपने से यु 6 इंच दूर देख कर. पूरे अधिकार से अर्जुन ने उनकी कमर पर एक हाथ कस्ते हुए खुद से लगाया और रेखा जी की आँखें खुद बा खुद हे बंद हो गई. दोनों के कमर के भाग जुड़ गए थे और अर्जुन उस अप्सरा से खूबसूरत स्त्री को बस निहार रहा था. फिर अपने आधार उनके लबो पर रखते हुए उसने पूरी तरह अपनी माँ को गिरफ्त में ले लिए.

"आठ.. मैं सबके सामने तोह नहीं कह सकती थी न.", 2 मिनट तक चले गहरे चुम्बन के टूटने के बाद रेखा जी ने बड़ी धीमी आवाज में जवाब दिए. अर्जुन का हाथ कमीज के अंदर से उनके निर्वस्त्र चुके को मसलने लगा था. मुलायम होने के साथ हे इस उम्र में भी उसकी माँ के चुके जवान दुल्हन से सख्त थे. दूध दबाते हुए हे अर्जुन ने उन्हें पीठ के बल कर दिए और खुद पूरी तरह से अपनी माँ के शरीर को ढकता हुआ उनपर चा गया था. सलवार ढीली करते हुए अब वह होंठ चूसने के साथ हे उनकी मांसल और नरम छूट को बेहिचक मसल रहा था.

"आठ.. उम्म्म्म.. पहले इन्हे तोह खाली कर न.. आह्हः..", होंठ छुड़ाते हुए उन्होंने अपने रिस रहे दूध की तरह इशारा करते हुए कहा. अर्जुन भी उनकी बात मानता एक तरफ हुआ और शरीर से दोनों हे वस्त्र हटते हुए उस दूधिया जिस्म को निहारने लगा. रेखा जी के चेहरे पर सिर्फ एक प्रेयसी वाले भाव थे, कामुकता के साथ हे समर्पण वाले भाव. अर्जुन को उन्हें यु निहारना और सहलाना दिल को अलग हे सुकून दे रहा था. जब उनकी नजर हटी तोह देखा अर्जुन भी वैसी हे हालत में उनके बराबर आ रहा था. एक हफ्ते पहले देखा लुंड आज कुछ ज्यादा हे मोटा और बड़ा प्रतीत हो रहा था रेखा को.

अपने होंठो में वह भूरा गोल निप्पल दबाते हुए अर्जुन ने एक हाथ उनकी बगल से गुजरते हुए अपने करीब कर लिए और दूसरे से उनके गद्देदार कूल्हों को मसलने लगा. गरम दूध की धार मुँह में घुलते हे अर्जुन का लुंड स्प्रिंग सा हिलने लगा था. ये दर्शाता था के वह कैसे अपनी माँ के प्रति जुड़ा था और उनका साथ उसके लिए क्या मायने रखता था. रेखा जी ने भी अपने bete-premi का वह विशाल अंग थाम लिए था. उनके कोमल गोर पंजे में वह मोटा गुलाबी लुंड बेहद आकर्षक लग रहा था.

"आप के पास आने भर से हे जैसे मुझे कुछ होने लगता है. मैं फिर मैं नहीं रहता.", अर्जुन ने एक फूले हुए निप्पल को मींजते हुए करवट लिए हे अपनी माँ के सुर्ख चेहरे को देखते हुए कहा. अर्जुन द्वारा की गई इस हरकत और उसकी बात सुनकर रेखा सिसकती हुई भी बंद आँखों से मुस्कुरा उठी. पूरा यौवन दमक रहा था अपने बेटे के बाहुपाश में और उनकी बंद आँखे देख कर अर्जुन ने अपने होंठ फिर से उनके मुँह पर रखते हुए खुद को सही तरीके से अपनी माँ के गदराये शरीर पर करते हुए जांघो के जोड़ के बीच उस कॉमर्स टपकती छूट पर लुंड का स्पर्श करा दिए. वो मूसल सा लुंड रेखा अभी भी एक हाथ से थामे थी लेकिन अपनी छूट पर उसकी चुहान मिलते हे खुद हे जाँघे फैलाती वह उस मॉटे सुपडे को दिशा दिखने लगी.

"मुझे भी बस तेरे साथ हे खुद के औरत होने का एहसास होता है. ये रिश्ता बेशक गलत है लेकिन फिर भी मंजूर है क्योंकि ये जिस्म जैसे तुझे हे अधिकार देता है इसको प्यार करने का.", रेखा ने अपने बेटे के नंगे कूल्हे पर एक हाथ रखते हुए अपना दूसरा हाथ लुंड से हटते हुए पीठ पर रखा. इसके साथ हे अर्जुन ने अपने चिकने लिंगमुण्ड को अंदर ठेलते हुए दोनों उभार कास के दबा लिए. सफ़ेद दूध दोनों हे चुचो से छलकता हुआ रिसने लगा और shanay-shanay आधा लुंड उस madhu-ras बहती गरम गुफा में समां गया.

"आठ... मुझे पूरा भर दे.. उम्मम्मम्म.. आअह्ह्ह्हह..", अर्जुन को भी अपनी माँ की मादक सिसकी उत्साहित कर रही थी. प्रथम मिलान में जहा उन्होंने उसका विशाल लिंग एक हे बार में पूरा झेल लिए था आज उनकी वही छूट रबर सी कासी लिपट रही थी उसके लुंड के ird-gird. एक चुके का दूध मुँह में भरते हुए अर्जुन ने कमर को एक बार और आगे बढ़ाया जिसके साथ हे दोनों के मुँह से एक और भरपूर सिसकारी निकल गई. छूट के बाहरी गुलाबी होंठ लुंड की जड़ से चिपक चुके थे और अंडकोष कूल्हों पर.

"माहहह.. आप जैसे मुझे अंदर खींच रही हो.", अर्जुन ने उनके दूध छोड़कर gaal-chehra चूमना शुरू कर दिए था. वह कैसे हुए उरोज अब उसकी चौड़ी मजबूत छाती से जैसे दबते हुए कुचले जा रहे थे और कुछ हे पालो में दोनों के शरीर भरपूर हरकत करने लगे. जड़ तक लुंड अंदर जाता और निकल रहा था, वही अपनी माँ की मांसल जंघे ऊपर उठाये अर्जुन भी पूरे जोश से अपनी माँ को ये स्वर्गिक आनंद दे रहा था.

"आप पलट जाओगी?", अर्जुन ने 10 मिनट तक अपनी माँ को ऊपर लेते हुए संतुष्ट करने के बाद कहा. दोनों हे इस शांत दोपहर में भारी सांस से एक दूसरे के जिस्म को तोड़ने में लगे थे लेकिन जैसे हे रेखा जी की छूट ने पानी बहाया तोह अर्जुन ने उनकी खूबसूरत आँखों में निवेदन से देखते हुए कहा. उसको डर था के कही उसकी माँ ऐसी मुद्रा के लिए मन हे न कर दे. लेकिन अनुमान के विपरीत अपने खुले बाल ठीक करती वह मुस्कुराते हुए पलट गई. अर्जुन इस रौशनी में अपनी माँ के उन्नत और भारी सुडोल कूल्हे देख जैसे सबकुछ भूल चूका था. बेदाग़ और फक्क गोर उनके चुत्तड़ बिलकुल चिकने और बालरहित थे. ऐसे बिस्टेर पर उनका चौपाया होना उसके लिए आज तक का सबसे मादक दृश्य था. गोल मुलायम जाँघे, किसी मटके से तराशे गोल चुत्तड़ और उनके आगे वह अंदर को होती कमर. बिस्टेर की और मुँह लटकाये 5-5 किलो के वह दुग्ध कलश और वह पीछे मुड़कर अर्जुन को देखती सम्मोहक आँखें और मुस्कान.

"कहा खो गया? समय नहीं है अपने पास और ये हमारा कमरा नहीं है.", अपनी माँ की बात पर जैसे उसको होश आया तोह अर्जुन घुटने के बल होता झेंपता सा उन चौड़े कूल्हों के पीछे आ गया. जाने क्या सोच कर पहले तोह उसने दोनों हाथो से चिकने चुत्तड़ो को सहलाया फिर नीचे झुकते हुए मुलायम दरार को फैलते हुए छूट को चूम लिए. रेखा जी अपने बेटे की इस हरकत से बुरी तरह कांप गई लेकिन चेहरे को तकिये में दबती वह आवाज को रोक चुकी थी. अर्जुन ने और न तड़पते हुए बहार को निकले उन गुलाबी गद्देदार होंठो के बीच लुंड टिकते हुए सूपड़ा सही से लगाया और एक हे धक्के में उन खूबसूरत कूल्हों से अपनी कमर चिपका दी.

"आठ.. इस्सस...", छूट जैसे इस तरह ज्यादा हे कासी महसूस हो रही थी और लुंड पूरी तरह फंसा हुआ छूट में जा रहा था. रेखा के मुँह से निरंतर सिसकिया निकल रही थी और पीछे से अर्जुन निरंतर अपनी कमर चलता उन मादक कूल्हों पर कमर भिड़ाता हुआ अपनी माँ की पीठ से चिपकता हुआ दोनों उरोजों को दबाते हुए जैसे दुहने लगा था. हरेक धक्के पर छूट के अंदर की लालिमा लुंड के अंदर बहार होते हुए दिख रही थी. लुंड इतना फूल चूका था के अर्जुन को कहने का मौका हे नहीं मिला के वह होने लगा है. और एक गहरे धक्के के साथ हे वह गांड से चिपकता हुआ अपना गरम वीर्य उनकी छूट की गहराई में बरसाने लगा.

"उन्हहहहह..", दहाड़ता हुआ वह बुरी तरह कांप रहा था और रेखा भी छूट की गहराई में सिकाई करते वीर्य को महसूस करती हुई झड़ने लगी. असीम सुख और प्यार, बस यही था जो उनके शरीर के साथ आत्मा तक जा रहा था. नीचे बिछी चादर पर दूध के धब्बे बन्न चुके थे और उनके ऊपर गिरी रेखा के ऊपर उनका बीटा अपनी साँसे दुरुस्त कर रहा था. पौने घंटे चला उनका मिलान दोनों को निचोड़ कर रखने के लिए बहोत था. 2 मिनट बाद हे दोनों एक दूसरे से लिपटे आराम कर रहे थे. हलकी नींद में भी अर्जुन अपनी माँ के मुलायम शरीर को सेहला रहा था और उसका वीर्य छूट से बेहटा अब जांघो को भिगो रहा था. कोई 30 मिनट बाद रेखा ने उठते हुए कपडे पहन कर खुद को दुरुस्त किआ और अर्जुन पर चादर दाल कर कमरा ठीक किआ. अपने बेटे के माथे को चूम कर वह बहार से दरवाजा लगाती बाथरूम चली गई.

शाम को 7 बजे हे अर्जुन की आँख खुली. खुद को चादर से ढंका देख उसको याद आया जो भी उस कमरे में हुआ था. मुस्कुराते हुए उसने कपडे पहने और फिर मुँह हाथ धोने बहार चल दिए. नीचे आँगन में आवाजे बता रही थी की घर की महिलाये महफ़िल जमाये बैठ चुकी थी. आज ननिहाल में उसकी ये आखिरी रात थी तोह स्वाभाविक था के उसकी माँ भी अब व्यस्त होंगी.

"उठ गया तू कुम्भकरण?", अपने कमरे में तोलिये से चेहरा पोंछता अर्जुन साफ़ कपडे पहन चूका था. और स्वाति की आवाज सुनते हे टोलिया टेबल पर रखते हुए अर्जुन ने पलट कर देखा.

"तुम कहो तोह हम फिर से सो सकते है.", अर्जुन ने चुहलबाजी करते हुए स्वाति के समीप जाते हुए कहा. एक पल को तोह स्वाति का पूरा चेहरा शर्म से लाल हो गया उसकी बात सुनते हे. नजरे झुकाती वह वही कड़ी रह गई लेकिन जैसे हे अर्जुन ने उसकी कमर पर हाथ रखा तोह बिजली की फुर्ती से उसके चंगुल में आने से पहले हे वह दौड़ती हुई बहार निकल आई.

"मजनू कही के, नीचे चलो. आये बड़े सोने वाले.", आवाज धीमी रखते हुए बड़ी अदा से स्वाति ने कहा और जल्दी से सीढ़ियां उतरती नीचे चली गई. अर्जुन वैसे हे उसको जाता देख खुश हो रहा था.

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आँगन में इस समय तीनो नानी के साथ हे मंजू और सरोज मौसी भी बैठी थी. उनके हे साथ रेखा जी बातों में लगी थी की अर्जुन नमस्ते करता वही जा बैठा.

"मौसी आप तोह बड़ी जल्दी आ गई?", अर्जुन की बात पर उन्होंने उसका सर दुलारते हुए जवाब दिए.

"अरे बीटा, वह काम जल्दी निपट गया तोह रुकने का फायदा नहीं था. फिर अब काम भी बहोत है और समय भी काम है तोह मैं आ गई तेरे मौसा के साथ हे. फिर तू भी तोह कल चला जायेगा. इसलिए आना तोह था हे.", मंजू भी देख रही थी की उसकी माँ कितना प्यार कर रही थी अर्जुन को और उसको भी ख़ुशी थी की जिस इंसान से उसने प्यार किआ था वह कोई अनजान नहीं था. और उसकी आँखों की चमक और मुस्कान रेखा जी से छिपी न रह सकीय लेकिन कुछ सोचते हुए वह शांत रही.

"वैसे आज की दावत यही है सबकी, दलीप को तेरे काका ने कह दिए है तोह खाने के बाद हे घर जाने का नाम लेना.", सुनंदा जी ने भी अपनी बात सुना दी थी. सरोज जी ने इस बात का कोई अनादर न किआ और कुछ देर बाद रेखा जी के साथ हे ऊपर रसोईघर की तरफ चल दी, जहा पूजा, ममता और अनीता थे. समय गलियारे से अंदर आई तोह उसके साथ हे संगीता जी भी थी.

"अर्जुन के दूध का समय हो गया है बहु, जरा रसोई से उसका दूध गरम करवा ला और समय बिटिया इसके कपडे लगा दे बैग में. कल सुबह हे ये लोग जा रहे है क्योंकि फ़ोन आया था कौशल्या दीदी का.", सुनंदा जी ने उन्हें देखते हे आदेश दे दिए. उनकी बात सुनते हे संगीता जी चुपचाप ऊपर चली गई और समय अर्जुन की तरफ एक गहरी मुस्कान देने के साथ हे मंजू को अपने साथ लेकर ऊपर चली गई.

"दादी ने और भी कुछ कहा था क्या नानी जी?", सुनंदा जी ने भी बड़े प्रेम से जवाब दिए.

"वो तेरे स्कूल भी शुरू हो गए है और फिर उन्होंने बताया था के कुछ दिन के लिए संजीव भी बहार जा रहा है. घर पे किसी का होना जरुरी है. और अब तोह तुझे ननिहाल का रास्ता पता चल हे गया होगा.?", उनकी बात पर अर्जुन समझ गया था के दादी ने क्यों बुलाया होगा. साथ हे रस्ते वाली बात सुनकर दिल में हलचल भी उठ गई थी. सच हे था के अब वह यहाँ आने से खुद को रोक तोह नहीं पायेगा. तीन मामिया, बिंदिया, मुन्नी और फिर मंजू भी तोह यही की थी.

"और नहीं तोह. सही कहा काकी, ये अब इतना बड़ा तोह हो हे चूका के खुद से हे आ सकता है हमसे मिलने eitwaar-tyohaar पर. वैसे आपका घर इसके आने से और ज्यादा khush-haal लग रहा है.", रसोईघर से दूध का गिलास और लड्डू ला कर सरोज ने स्टूल पर रखे और फिर अपनी भारी छाती से एक बार अर्जुन को लगाने के बाद सरोज जी ने प्रेमवश उसका माथा चूम लिए. और इतना कह कर करीब हे बैठ गई.

"ये खुशिया बड़े समय बाद नसीब हुई है सरोज. याद है आखिरी बार कब तेरी गॉड में बैठा था ये? कब घर में सभी बचे एक साथ दिखे थे? ये आया है तोह लगता है 10 साल पहले वाले दिन शुरू हो गए है. बस अब मेरा बचा इतना बड़ा हो गया के सबको गॉड में उठा ले.", सुनंदा जी की बात पर साथ में बैठी अंजना जी ने प्यार से ब्याह पर चपत लगाईं. चेहरे पर बहरपुर ख़ुशी थी सभी के बस अर्जुन उनकी बात से शर्मा गया था.

"कुछ भी बोलती रहती है तू सुनंदा. लेकिन बड़ा ाचा लगा के अर्जुन घर में आया और फिर से यहाँ सबकी आवाज sun-ne को मिली. सरोज, रेखा को बुला के ले आ जरा मेरे कमरे में. फिर अगर सो गई मैं तोह उसका सामान देना याद नहीं रहेगा.", अंजना जी तख़्त का किनारा पकड़ती कड़ी हुई और अपने कमरे की और चल दी. अर्जुन अब वह अकेला अपनी नानी सुनंदा जी के पास था. सुमित्रा देवी भी अपनी बड़ी जेठानी का अनुसरण करती कमरे की तरफ चल दी क्योंकि उन्होंने भी जो कुछ देना था वह अपने कमरे से लेकर वह अंजना जी के पास हे जाने वाली थी.

"आप हमारे वह कब आएँगी नानी?", अर्जुन ने लड्डू ख़तम करने के बाद आखिरी दूध का घूँट लिए और फिर कहा.

"आउंगी बीटा, जल्दी हे तुम्हारे शहर आना है. बिट्टू कुछ दिन के लिए बहार जायेगा अभी 4-5 दिन बाद तोह फिर वही रुकूंगी. इसी बहाने तू भी मिलने आ जाना वह अपने मां के घर. ाचा अब थोड़ी देर तू अपने नाना से भी मिल ले वह सभी बहार बैठे है और तबतक मैं भी फारिग हो जाऊ.", जाने से पहले उन्होंने भी अर्जुन को गले लगते हुए प्यार दिए और फिर हाथ धो कर तुलसी पर दिया जलने के बाद अंदर कमरे में चली गई. अर्जुन कुछ देर वही अकेला बैठा रहा लेकिन फिर वह भी बहार बैठक में चल दिए अपने सभी नाना से मिलने.

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"अरे वाह बीटा. जैसा सुना था उस से भी कही बढ़कर निकले. बहुत खूब, जग जग जियो.", बैठक में मदिरा का दौर चल रहा था जहा इस वक़्त कुन्दनलाल जी के साथ उनके छोटे भाई मनोहरलाल और सरोज जी के पति, दलीप सिंह जी बैठे थे. कुन्दनलाल जी ने हे दलीप जी का परिचय अर्जुन से करवाया और उसको देखते हे दलीप सिंह ने गले से लगाने के बाद भरपूर नजर डाली थी अर्जुन के lambe-chaude शरीर पर. वह सच में इतने ज्यादा प्रभावित हुए थे उसको देख कर की उनकी नजर इस नए जवान हो रहे लड़के से हट नहीं रही थी. दलीप सिंह खुद भी लम्बे तगड़े शरीर के थे, रंग कुछ पक्का और बड़ी मूछे उनके व्यक्तित्व को निखार हे रही थी.

"नमस्कार मौसा जी.", अर्जुन ने उनके घर पर फोटो में देखा था के वह कैसे दीखते है इसलिए ज्यादा परिचय की जरुरत न पड़ी थी. फिर दलीप जी ने उसको अपने समीप हे बिठा लिए.

"क्यों दलीप, हैं न विदेशी पहलवान सा मेरा दोहता?", मनोहरजी का ठेठ लहजा भी बड़ा मजेदार हे होता था.

"सही बात कही काकाजी. सहधू जी तोह है हे bhare-poore लेकिन ये तोह अपने बड़े काका जी से भी 21 है.", हँसते हुए उन्होंने एक बार फिर देखा अर्जुन को और फिर जाम में बची शराब एक हे बार में गटकते हुए प्याज का टुकड़ा मुँह में दाल चबाने लगे. बाकी दोनों ने भी अपने गिलास खाली किये और मनोहर जी ने तीनो गिलास में बराबर शराब उड़ेलने के बाद स्टील के जग से ठंडा पानी भर दिए. मूंगफली की गिरिया खाते हुए वह अपने व्यापार की कुछ बातें कर रहे थे और साथ हे अर्जुन से भी बातचीत हो रही थी. लेकिन दलीप जी थोड़ी थोड़ी देर बाद एक नजर जरूर अर्जुन पर डालते थे.

"दलीप बीटा, जो तू सोच रहा है वह है तोह सही लेकिन कुछ हो नहीं सकता ये सबको पता है.", कुन्दनलाल जी ने हँसते हुए कहा तोह वह झेंपते हुए मुस्कुरा दिए. बोतल भी इस वक़्त 3/4 ख़तम हो चुकी थी लेकिन देख कर पता चल रहा था के उन्हें उतना नशा जैसा कुछ न हुआ था.

"काका, मैं भी इत्तफ़ाक़ रखता हु इस बात से की कुछ नहीं हो सकता अब. लेकिन अगर एक साल पहले में इस से मिला होता तोह बेशक बात कुछ और होती.", चेहरे पर सकरात्मक भाव हे थे उनके.

"ना.. वह बात ऐसी है के इसका काम अपने पंडितजी ने पहले हे निबटा दिए था. इतनी पहले की जब ये निक्कर पहनता होगा या वह भी नहीं. ऐसा न होता तोह मेरी खुद की इत्छा वही थी जो तेरी है. और ऊपर से अपने गोपाल जी तोह आज हे रूपया पकड़ने लगे थे इसके लिए.", अर्जुन के उनकी बातें कुछ पल्ले पड़ रही थी कुछ ऊपर से जा रही थी. लेकिन बाकी सभी मुस्कुरा रहे थे.

"पंडित जी का जीकर आ गया तोह बात हे ख़तम हो गई जी. वो जो करते है सही करते है. जरूर कुछ दूर की सोच या उनसे प्यार होगा जो इसकी छोटी उम्र में हे उन्होंने ऐसा फैंसला लिए होगा.", अगले 20-25 मिनट तक ये दौर चलता रहा और बोतल भी अब समाप्त हो चुकी थी. साथ हे सोहनलाल जी की आवाज सुनकर सभी खाने के लिए हाथ मुँह धोने चले गए थे. अर्जुन को छोड़कर सभी पुरुष सदस्यों ने वही खाना किआ. अंदर भी रेखा जी, सरोज, सुनंदा जी और सुमित्रा जी भोजन कर चुकी थी. अगले एक घंटे में ज्यादातर लोग khaa-pee कर अपने काम में लगे थे. अर्जुन की दोनों छोटी मामिया, स्वाति और अर्जुन का हे भोजन बचा था.

जाने से पहले दलीप जी ने अर्जुन को गले लगा के शुभकामनाये दी और एक छोटी सी डब्बी जबरदस्ती पकड़ते हुए वह बहार बैठक में आ गए थे. वैसे हे सरोज जी ने भी अपनी सहेली से विदा लेने के बाद अर्जुन को शगुन के साथ प्यार दिए. लेकिन उसके बाद जो हुआ उसको देख कर तोह एक पल के लिए ज्यादातर लोग हैरान हो गए थे लेकिन फिर सभी मुस्कुरा दिए. हुआ यु था के अपनी मौसी से मिलने के बाद हे अर्जुन ने मंजू को भी गले लगा लिए था.

"अब आप लोग ऐसे क्यों देख रहे हो.? मौसी की बेटी है और अब तोह हम दोनों दोस्त भी है.", अर्जुन की बात से हे सबके चेहरे पर हंसी आ गई थी लेकिन मंजू तोह शर्म से दोहरी हो गई थी उसकी इस हरकत से.

"हाँ तोह ठीक तोह कह रहा मेरा बीटा. और भगवान् का भला है के मेरी बेटी को शर्म तोह आने लगी.", सरोज जी ने भी माहौल को और गुलाबी कर दिए था. फिर कुछ हे देर बाद वह अपने घर को निकल लिए और अनीता मामी ने अर्जुन के साथ हे अपना और Swati-Sangita जी का खाना लगा दिए था, आँगन में बिछे तख़्त पर हे.

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"क्या लगता है तुम्हे? वो सबूत मैंने तुम्हे छोड़ने को क्यों कहा होगा?", विदेशी शराब का गिलास हाथ में लिए शंकर शर्मा का चेहरा एकदम गंभीर था. उनके साथ हे बैठा संजीव बड़े ध्यान से उनकी बात सुनता हुआ वैसा हे गिलास पकडे बैठा था. एक प्राइवेट हॉस्पिटल के कमरे में सिर्फ वही दोनों थे और उनके बीच वह चौकोर लकड़ी का टेबल.

"जाहिर सी बात है के आप चाहते थे की शक्क मेरे ऊपर जाए और मैं पुलिस में हु तोह विभाग की करवाई भी नहीं होगी क्योंकि श्रेय तोह दूसरा अधिकारी हे लेगा. लेकिन बस जो बात समझ नहीं आई वह ये की आप खुद क्यों इस सब में पड़े?", संजीव ने अपनी बात साफ़ करने के बाद एक हलकी सी चुस्की ली और अपने चाचा के चेहरे पर नजरे जमा ली. शंकर जी भी निश्चिन्त बैठे उस शराब का स्वाद ले रहे थे. 2 घूँट लेने के बाद उन्होंने गाला साफ़ करते हुए जवाब दिए.

"एक तोह उन्होंने बलात्कार किआ था, दूसरा वही लोग थे जो पापा के समय से बचे हुए थे लेकिन सबसे जरुरी बात ये थी की उन्होंने मेरे बेटे पर हाथ डालने की कोशिश की थी, बेशक वह अकेला हे उनपर भारी पड़ा लेकिन उन्हें ये बताना जरुरी था के इतनी गलतियां माफ़ करने वाला मैं कोई रामेश्वर पंडित नहीं हु. और ठीक बात है तुम्हारी की शक्क जानबूझ कर तुम्हारी तरफ किआ नहीं तोह थानेदार साहब के पास एक और परचा दर्ज हो जाता मेरे नाम का.", उनके चेहरे की मुस्कान में बेपनाह संवेदना थी जब वह सबकुछ बयान कर रहे थे. और संजीव हैरान था के अर्जुन पर उन दोनों मुजरिमो ने हमला कब कर दिए. किआ भी तोह ये बात उस से पहले चाचा को कैसे पता चल गई.

"परेशां मत हो संजीव. बात तोह मुझे भी नहीं पता लेकिन इतना मालूम चला था के बारिश की रात सड़क के बीच हवलदार प्रदीप ने अर्जुन को हे देखा था जितेंदर का हाथ तोड़ते हुए लेकिन स्टैंड के नीचे भी कोई खड़ा था और जबतक वह पार्क के पीछे से जिप्सी लेकर वापिस आया तोह वह सिर्फ 2 लोग जमीन पर बेहोश थे, विष्णु और जितेंदर. वैसे कमलकांत तोह खुश हो गया होगा?", संजीव को अब मामला समझ आया और फिर आखिरी बात सुनकर वह मुस्कुरा दिए. दोनों के जाम खाली हो चुके थे तोह उसने 2 बर्फ के टुकड़े दोनों गिलास में डालने के बाद 1/3 माप तक शराब से भर दिए. नमकीन काजू की प्लेट अपने चाचा की और करते हुए उसने बात आगे बधाई.

"वह मेजर कौशल वाला किस्सा शायद दादाजी कुछ ज्यादा गंभीरता से ले गए है. ध्यान दीजियेगा आप. वैसे अभी तक समझ नहीं आया के ये सब आपने किआ कैसे और फिर दूसरे व्यक्ति को भी मरवाने की क्या जरुरत थी?"

"देख यार, जब बात इज़्ज़त्त, परिवार और नाम पर आ जाये तोह मुझे सिर्फ एक सजा हे देनी आती है. छोल जी अगर पिताजी से बढ़कर नहीं है तोह मेरे लिए वह उनसे कम् भी नहीं है. कौशल इंसान ाचा नहीं था ये बात मुझे पता थी लेकिन एक तरह से रेणुका मेरी बहिन हे हुई और उसकी दुर्गे देख चाचा जी के आंसू मैं झेल नहीं पाया. और वह दूसरा भी कोई निर्दोष इंसान नहीं था, वह अलग बात है के उसका वजूद भी मेरी वजह से हे था. लेकिन उसके परिवार की देखभाल मैं वैसे हे करूँगा जैसे अभी तक निर्दोष परिवारों की हम करते आये है. चल ये सब छोड़ और अब अगले काम पर आजा. मैं दिल्ली जा निकल रहा हु आज रात, एक ऑपरेशन है और फिर मीटिंग. तू जरा ये रोशन मट्टू पर नजर रखना और सुना है के के रामेहर गुज्जर का दोहता कोई पहलवान है. रिपोर्ट तैयार करना उसकी, बिजेन्दर नाम है.", अपनी बात ख़तम करके के बाद बैटरी से चलने वाली घंटी का बटन उन्होंने दबाया तोह 2-3 मिनट बाद हे एक gori-patli 22-23 साल की नर्स नीली kameej-safed सलवार में अंदर आ गई. संजीव समझ गया था के ये इशारा है उसको जाने के लिए कहने का. मुस्कुराता हुआ वह एक बार दोनों को देख कर बहार निकल चला, पीछे दरवाजे को बंद करने के बाद. और वह नर्स बड़ी अदा से चलती शंकर जी के पत् पर आ बैठी थी.

क्रमश...
 
दोस्तों अपडेट ऑलमोस्ट लिखे चूका हु लेकिन बिज़नेस नया है तोह अभी 12:30 तक यही रहूँगा. अपडेट घर जाने के बाद पोस्ट करूँगा. होप यू गाइस अंडरस्टैंड. नाउ ी हैवे स्टार्टेड ओन फर्म एंड स्पेंडिंग 13-14 हरष हेरे. बूत स्टिल एनफ टाइम तो व्रिठे थिस स्टोरी. बस जागना मत क्योंकि सेहत जरुरी है. अपडेट पोस्ट कर दूंगा
 
अपडेट 69

शंकर शर्मा ी


रात गहरा चुकी थी जब तक संगीता ने रसोईघर का काम निपटाया और दिन भी थकान की वजह से वह सीधा अपने कमरे में चली गई. उसका दिल तोह बहोत था आज रात अर्जुन के साथ एक बार फिर से prem-sansarg करने का लेकिन अभी मुमकिन न था ये हो पाना. कुछ ऐसा हे हाल अनीता का भी था जो अपने शरीर की गर्मी ठन्डे पानी को दाल कर काम करने की कोशिश करने के बाद सोने लगी थी. रात के 11 बजे हे सभी कमरे बंद हो चुके थे और बहार आँगन में भी टाइगर का कोई चिन्ह न था क्योंकि वह भी अपनी जगह आराम कर रहा था.

मनोहरलाल हुक्का गुदगुदाने के बाद अब सोने की तैयारी में थे क्योंकि बिंदिया ने साफ़ मन कर दिए था मासिक की वजह से और इस घर में उन्हें खेत जैसी सुविधा तोह थी नहीं जहा उनके इशारे पर दर्जन से ज्यादा छूट तैयार रहती थी. इतने सन्नाटे में बस ममता और रेखा हे बंद कमरे में बातों में लगी थी. पूजा भी अपनी छोटी बेटी कंचन के साथ सो चुकी थी, आज कुछ सरदर्द था इसलिए नींद की दवा खा ली थी उन्होंने. स्वाति ने समय दीदी का बहाना किआ था अपनी माँ से लेकिन इस समय पूरे घर में ये हे दूसरा कमरा था जहा 2 और लोग जाग रहे थे. स्वाति एक आरामदायक निक्कर और बिना बाजू की वैसे हे कपडे की टीशर्ट में अर्जुन के बगल में लेती उसकी कमर पर हाथ रखे बातों में लगी थी. अर्जुन भी उसकी तरफ करवट लिए चेहरे पर आते बालो को पीछे करता उसकी बातें सुन्न रहा था. बस एक सफ़ेद रौशनी वाला लैंप कमरे में जल रहा था जो एक दूसरे को निहारने के लिए बहोत था.

"ाचा फिर वह पर तुम मेरे साथ समय बिताओगे या अनजान बने रहोगे, जैसे इतने सालो तक रहते आये हो?", स्वाति, जो हर समय चंचल रहती थी और अर्जुन के साथ भी hansi-thitholi करती रहती थी अभी बिलकुल विपरीत लग रही थी. चेहरे पर गंभीरता और शब्द बहोत धीमे थे.

"तुम्हे क्या लगता है?", अर्जुन ने एक बार गाल सहलाने के बाद स्वाति का हे अनुसरण करते हुए अपना ऊपर वाला हाथ उसकी पतली कमर पर रखते हुए थोड़ा सा अपने करीब करते हुए कहा. स्वाति को दिल हे दिल में अर्जुन की ये हरकत बड़ी प्यारी लगी थी लेकिन अपने स्वर को पहले सा हे संयतत रखते हुए उसने जवाब दिए.

"जब तुम्हारे पास पहले से हे इतनी गर्लफ्रेंड है तोह मुझे यही लगता है के वह तुम्हारे पास मेरे लिए तोह समय होने नहीं वाला. और देखो खुद जवाब देने की जगह कैसे सामने से हे सवाल कर रहे हो.", स्वाति ने महसूस किआ था के अर्जुन के शरीर का हर भाग मासपेशियो से उभरा और सख्त था, कमर के पीछे वाला हिस्सा भी. लेकिन त्वचा चिकनी थी. उसकी पतली लम्बी उंगलिया वह अपनी हरकत दिखा रही थी इस बातचीत के दौरान. अर्जुन ने भी स्वाति को अपने बाजू के घेरे में लेते हुए खुद के सीने से चिपका सा लिए था उसकी बात सुनकर. कच्चे संतरे सी सख्त और गोल स्वाति की छट्टियाँ अब उसके चौड़े मजबूत सीने से टकरा रही थी.

"तुम भी जानती और समझती हो मेरे इस सवाल के पीछे छुपे जवाब को. पहले नहीं पता था लेकिन अब जब तुम भी वह होगी तोह एक वादा करता हु की हफ्ते में एक बार तोह जरूर तुम्हारे साथ रहा करूँगा. और कहोगी तोह यहाँ छोड़ने भी आ जाया करूँगा, जब भी तुम्हारा दिल करेगा.", टीशर्ट के अंदर स्वाति ने और कुछ नहीं पहना था और अर्जुन के शरीर की गर्मी से उसके चने के दाने जितने निप्पल खड़े हो कर अब अर्जुन के शरीर पर चुभ रहे थे. स्वाति ने कोई और सवाल जवाब किये बिना अर्जुन की नंगी पीठ को जोर से दबाते हुए अपने होंठ उसके होंठो से मिला दिए. आज वह खुद हे उसके होंठो का स्वाद ले रही थी और अर्जुन भी अपना हाथ टीशर्ट के अंदर करता उसकी मखमली पीठ को सहलाता स्वाति के नरम होंठो का रस चूस रहा था.

मजे की अधिकता बढ़ने लगी तोह स्वाति ने अपनी एक टांग उसके ऊपर रखते हुए अपना yoni-sthal अर्जुन के फूले हुए कमर के निचले हिस्से से मिला दिए. स्वाति ने निचला हाथ भी अर्जुन की पीठ पर करना चाहा तोह बिना चुम्बन तोड़े अर्जुन पीठ के बल हो गया और अपने ऊपर स्वाति को किसी चादर की तरह करने के बाद वैसे हे बदस्तर उन रसभरे होंठो को मुँह में और अंदर भरता हुआ मांसल कूल्हों को दबाने लगा. स्वाति एक पल के लिए तोह सिहर उठी जब उसने अपनी छूट के नीचे उस गोलाकार मॉटे गरम डंडे को महसूस किआ लेकिन सबकुछ भूल कर वह भी अर्जुन से लिपट कर तब तक उसके मुँह में जीभ घूमती रही जब तक सांस उखड न गई.

"तुम बहोत बुरे हो. गंदे कही के.", होंठो के जुड़ा होने के बाद वह थोड़ा सा नीचे सरक कर उसकी छाती पर सर रखती हलके नखरे और शर्म से कह रही थी. वही अर्जुन के हाथ उस इलास्टिक वाली निक्कर के अंदर से स्वाति के मुलायम और चिकने कूल्हों की फांके मसल रहे थे. वह उनका मर्दन ऐसे कर रहा था जैसे मॉटे चुचो को मसल रहा हो और स्वाति को इस सबमे भी बड़ा मजा आ रहा था. आज उसको बुरा नहीं लग रहा था अर्जुन का यु उसके निर्वस्त्र कूल्हों को मसलना. शर्म जरूर आ रही थी लेकिन उसने मैं बना लिए था अर्जुन के साथ वह सब करने का जो उसने कभी किसी मर्द के साथ करने के बारे में सोचा न था.

"तुम बहोत ाची हो और प्यारी भी.", अर्जुन ने कूल्हों को अपने पंजो की गिरफ्त से आजाद करते हुए कहा. हाथ सरक कर अब टीशर्ट को ऊपर कर रहे थे और कुछ हे पल बाद वह कपडा अब बिस्टेर पर एक तरफ पड़ा था लेकिन स्वाति अपने ऊपरी भाग के बेपर्दा होने की वजह से अब जोर से अर्जुन के सीने से लिपट चुकी थी. उसके अकड़े हुए चुके अर्जुन की छाती से डब्ब रहे थे और पूरा शरीर अलग हे मजे से फड़क रहा था. झीने कपडे की निक्कर के अंदर नंगी छूट भी गरम लुंड से निहाल हो रही थी.

"शर्म नहीं आती मुझे ऐसे नंगा करते हुए? और ये नीचे क्या चुभ रहा है?", स्वाति का शरीर बेशक पतला था लेकिन चुके और कूल्हे एकदम सही अनुपात में और बिलकुल सांचे में ढले थे. अर्जुन अपने से आधे वजन की लेकिन उस भरपूर नवयौवना के शरीर को सहलाते हुए उत्तेजिट हो रहा था लेकिन उसको भी डर था स्वाति के लिए. वह शायद अभी तैयार नहीं थी ये सब करने के लिए और अगर कर भी लिए तोह सुबह किसी भी हाल में कड़ी तोह नहीं हो सकती थी.

"सिर्फ देखने के लिए हे तोह किआ है. ज्यादा कुछ नहीं करूँगा तुम्हारे साथ अभी. और जो तुम्हे चुभ रहा है वह तुम्हे ाचे से पता है के क्या है.", बाहुपाश में भरते हुए अर्जुन ने स्वाति को पीठ के बल बिस्टेर पर लिटा लिए और खुद उसके ऊपर आने के बाद उन निर्वस्त्र चुचो को बड़े ध्यान से देखने लगा. उनका आकर इतना था के अर्जुन के बड़े पंजो में सही से आ सके और उनके ऊपर उबरे निप्पल पर्याप्त नुकीले थे, जो बता रहे थे के आजतक उनपर किसी का भी स्पर्श नहीं हुआ है. पतले निप्पल को मुँह में लेने का लालच वह न छोड़ सका और एक सतांन के ऊपर झुकते हुए उसने आधे चुके को अपने मुँह में भर लिए. अर्जुन की गरम सांस और गीला मुँह अपने सतांन पर महसूस करते हे स्वाति का शरीर हिल गया.

"आह्ह्ह्ह.. उम्म्म्म.. क्याआ कररर रहे हूऊऊ.. aahhhh..ssiiiii", उसकी मद्दम सी सिसकारी और आहे साफ़ बता रही थी की शरीर का सबसे संवेदनशील भाग उसके चुके हे थे. अर्जुन भी उसके ऊपर चाय हुआ था लेकिन कोई दबाव दिए बिना वह बस उस पतली कमर को पकडे स्वाति के चुचो को दूध की शीशी की तरह पीने में लगा था. और स्वाति मजे में अपनी कमर ऊपर उठती इस सुखद एहसास को जी रही थी. 5 मिनट तक ाचे से एक चुके को पीने के बाद अर्जुन ने अब दूसरे के साथ भी वही सब दोहराया और इस बीच स्वाति की छूट ने 3-4 बूँद पानी बहार निकलते हुए पतली निक्कर पर एक छोटा सा धब्बा बना दिए था.

"प्यार कर रहा हु क्योंकि तुम्हारा शरीर खुद यही पुकार रहा है. तुम्हे ाचा नहीं लग रहा क्या?", अर्जुन अब स्वाति की फैली हुई टांगो के बीच बैठा था और स्वाति के आनंदित चेहरे को देखता हुआ कह रहा था.

"आह्हः.. तुम्हारा जो भी दिल करे वह करो न. बस मुझे आज रात अपनी बाहों में भर कर सोना.", स्वाति सीधा नजरे नहीं मिला रही थी लेकिन अर्जुन को अपने ऊपर बुला रही थी. जिस से वह खुल कर उसको प्यार करे और जो आग उसके शरीर में लग चुकी थी उसको ाचे से भुजा दे. लेकिन अर्जुन ने कुछ सोचकर स्वाति की लम्बी टांगो से वह निक्कर खींच कर उतार ली. स्वाति शायद ये सोच रही थी की अर्जुन ऐसा तब करेगा जब उसके ऊपर होगा, लेकिन सामने बैठकर वह उसकी योनि को बेपर्दा करेगा ये नहीं सोचा था. दोनों जाँघे जोड़ने की कोशिश व्यर्थ हे गई क्योंकि बीच में अर्जुन अब सही से बैठ चूका था और उसकी टाँगे अर्जुन के दोनों और फैली हुई थी.

हलके भूरे बाल इस रौशनी में काले हे दिख रहे थे. और वह भी छूट से कोई एक इंच ऊपर उलटे त्रिकोण के अकार में थे. बीच में पतला चीरा और फूली हुई बंद छूट, स्वाति ने यहाँ शायद हे कभी ऊँगली की हो. बिना संकोच किये अर्जुन ने झुकते हुए अपने होंठ एक बार हलके से उस geele-naram भाग पर रखते हुए एक छोटा सा चुम्बन किआ, स्वाति की इसमें हे आह निकल गई. और अगले हे पल दोनों जांघो को थामते हुए अर्जुन ने उस कच्ची छूट को मुँह में भरते हुए चूसना शुरू कर दिए.

"ममममम.. सससस.. एई गलायततततत हीी.. आअह्ह्ह लेकिन उम्म्म्म.. मजा आ रहा है.. उईईईईई माँ..", अर्जुन ने जीभ को तीखा करते हुए जब छूट के छेड़ में थोड़ा सा घुसाया तोह स्वाति की टाँगे उसके सर पर कस्ती चली गई. अर्जुन ने भी अब अपने दोनों हाथो में वह सख्त चुके दबोचते हुए जीभ को लुंड की तरह चलना शुरू कर दिए. बीच बीच में वह पूरी छूट को ाचे से गीला करता और मुँह में भर के चूस लेता. सिर्फ 5 मिनट में हे स्वाति की छूट ने अपना amrit-ras त्याग दिए और वह अकड़ती हुई हवा में कमर उचकने के बाद धम्म से बिस्टेर पर गिर गई.

स्वाति को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी आत्मा छूट के रास्ते बहार निकल गई हो. कुछ पल के लिए वह बिस्टेर पर बेजान से पड़ी अपनी सांसें दुरुस्त करती रही और फिर उसको खुद का एहसास हुआ जब अर्जुन ने अपनी बाहों में भरते हुए खुद से लगा लिए. हैरान होने वाली बात थी की अब उसके शरीर पर निक्कर थी और अर्जुन बिना कुछ और किये उसका सर सेहला रहा था.

"तुम्हारा तोह कुछ हुआ नहीं. और तुमने मेरे साथ सकुच नहीं किआ तोह रुक क्यों गए?", उसके बचकाने प्रश्न पर अर्जुन ने उसका माथा चूमने के बाद कहा.

"प्यार करने लगी हो मेरे से? मुझे पता है बेशक तुम अगर मन भी कर दो. और फिर तुम्ही ने तोह कहा था के कोई जल्दी नै होगी. मैं नहीं चाहता के हम दोनों इतनी जल्दी वह मिलान कर ले जिसके बारे में तुम्हे सही से पता भी नहीं. और जरुरी तोह नहीं के मेरा हो. अब आराम करो.", अर्जुन ने थोड़ा अलग होने के बाद टीशर्ट भी स्वाति के शरीर पर पहना दी और फिर से साथ लेट गया.

"ी लव यू सो मच. उम्म्म्माःह्ह्ह्ह.", स्वाति ने हलके भर्राये गले से ये कहा और गीले होंठो से अर्जुन को चूमने के बाद कास के खुद से लगा लिए. अर्जुन ने भी वही किआ और पीठ सहलाते हुए उसको जैसे सुलाने लगा था.

"सब जाने क्या क्या कहते थे की लड़के ऐसे होते है, वैसे होते है. हर मर्द बस लड़की को भोगना हे जानता है. इसलिए मैं कभी इन चक्करो में नहीं पड़ी. एक बार तोह मुझे तुम भी बुरे लगे क्योंकि तुमने चची के साथ वह सब किआ था. लेकिन तुम बहोत प्यारे और अलग हो अर्जुन. मुमकिन तोह नहीं लेकिन फिर भी जितना हो सके मुझे प्यार करते रहना. ी लव यू मोरे थान एनीथिंग.", आँखों से 2 बूँद चालक आई थी लेकिन वह मुस्कुराती हुई अर्जुन से लिपटी रही और अगले 5 मिनट में वह वैसे हे सो चुकी थी. अर्जुन की बाहों के सुरक्षित घेरे में, उस इंसान की बाहों में जिसने कोई फायदा न उठाया था जबकि स्वाति तोह खुद को सौंप चुकी थी तन्न से. लेकिन उसके प्यार ने अब मैं से भी अर्जुन को अपना मान लिए था.

ममता पिछले 15 मिनट से अपनी नजरे टिकाये थी खिड़की के उस 1 इंच लगभग खुल्ले भाग से जहा दिवार के उस पार उसकी अपनी हे बेटी रिश्ते के भाई के साथ अब सुकून से चिपकी सो रही थी. जब ममता ने अंदर देखना शुरू किआ था उस समय अर्जुन छूट से मुँह लगाए था लेकिन उसके बाद जो कुछ भी इस लड़के ने किआ वह देख कर उसकी उखड़ी धड़कन एक हद्द तक संभल चुकी थी. ममता खुद एक औरत थी और उसको भी पुरुष चरित्र का भली भांति ज्ञान था लेकिन उसकी नजरो ने आज एक अलग हे नजारा देख लिए था. एक जवान लड़का अपने सामने नंगी बिछी लड़की को सिर्फ मुँह से शांत करने के बाद कैसे कपडे पहना कर बाहों में लिए लेट गया था. वह लड़की बेशक उसकी अपनी बेटी थी लेकिन ममता को इस मिलान का परिणाम देख कर कुछ ख़ास चिंता न हुई. कहा तोह जब उसकी नजरे पहले दृश्य पर पड़ी थी तोह वह कमरे के अंदर घुस कर उन दोनों को मारना चाहती थी और कहा अब धड़कन शांत और दिमाग ठंडा हो चूका था.

वैसे भी खुद ममता को रेखा से हद्द से ज्यादा प्यार था और उतना हे स्नेह उसके दिल में अर्जुन के लिए भी था. उसकी अपनी बेटी भी तोह जीने की एकमात्र वजह थी ममता के लिए. ये सब सोच कर हे वह खुद को रोक पाई थी दरवाजा खोलने से और सही किआ उसने क्योंकि ये बदनामी घर में सेहन नहीं हो पाती. जब दोनों हे सो चुके तोह वह भी दबे पाँव अपने कमरे में आ गई.

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पतली सी वह नर्स अब पूरी तरह निर्वस्त्र सोफे का हत्था पकड़ के झुकी थी और उसके पीछे किसी सांड की तरह छूट को रौंदते हुए शंकर के माथे पर पसीना आ चूका था. दर्द और मजे से निकलती सीत्कार पूरे कमरे में गूँज रही थी लेकिन यहाँ इन दोनों के सिवा और कोई न था. छोटे चुके किसी बड़े अमरुद जितने थे और छूट में धंसा वह मोटा लुंड बता रहा था के इस से पहले वह मुश्किल से 2-3 बार हे लुंड ले चुकी थी.

"आह्हः.. सर.. बस.. मा.. बस कीजिये.. आह्हः...", उसकी मिमियाती आवाज सुनकर शंकर ने दोनों छोटे चुके मुट्ठी में भरते हुए जोर जोर से 10-12 गहरे धक्के लगाए और गांड से चिपक गए. लड़की के गुलाबी शरीर पर जगह जगह निशाँ बन चुके थे और इन आखिरी धक्को ने तोह जैसे साड़ी हड्डियां हिला दी थी. छूट में धंसा लुंड अब गुलाबी निरोध में वीर्य भर रहा था और 20-22 मिनट लम्बी इस चुदाई से थक्क कर शंकर शर्मा अलग होते हुए सोफे पर आ कर पसर गए. नर्स अपनी दुखती छूट को दबती दूसरी तरफ बैठ गई. वो गुलाबी निरोध गांठ लगाने के बाद शंकर जी ने नीले रंग के छोटे से कूड़ेदान में फेंका और अपने कपडे सही करने लगे.

"परसो वापिस आऊंगा और फिर पूरी रात तुम मेरे कमरे में रहोगी. परसो दिन में आराम कर लेना ाचे से.", इतना बोलकर वह अंदर हे बने बड़े बाथरूम में घुस गए.

'जानवर है पक्के. क्या हाल किआ है छूट का.. आठ.. अब तोह 2 दिन आराम हे करना पड़ेगा और परसो पूरी रात .. माँ..' खुद से हे वह कह रही थी और अपनी सूजी हुई छूट को सहलाती फिर वह भी कपडे पहन कर लड़खड़ाती हुई बहार निकल गई. इधर शंकर जी कोई 15 मिनट बाद बहार निकले तोह वह अब सफ़ेद कमीज और सलेटी coat-pant में पूरी तरह तैयार नजर आ रहे थे.

"आओ गुलाटी. ाचा है के तैयार हो कर आये हो.", काले फ्रेम का चस्मा लगाए ये एक अधेड़ लेकिन आकर्षक व्यक्तित्व वाला डॉक्टर था जो शंकर जी का बचपन का दोस्त और हंसाया था. दोस्ती के साथ हर काम में बराबर हिस्सेदार थे दोनों और शंकर जी के चेहरे पर ऐसी ख़ुशी और कही नहीं दिखती थी जैसी अभी अपने दोस्त से मिलते हुए थी.

"तू भी अलग हे अंदाज़ में रहता है यार. मतलब जब भी हम किसी केस पर निकलते है तेरा ये शराब पीने के बाद चुदाई करना कोई असूल है क्या?", हँसते हुए वह इतना कह कर एक बार गले मिला और दोनों हे लोग बहार निकल गए. 5 मिनट बाद हे इस प्राइवेट हॉस्पिटल के बहार कंपाउंड में कड़ी चमचमति मर्सिडीज़ बेंज कार की पिछली सीट पर दोनों तरफ से दरवाजा खोलते वह बैठे तोह अगली सीट पर ड्राइवर के बराबर बैठे व्यक्ति ने सर घूमते हुए गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

"सालो तुम दोनों तोह अपना मजा ले लेते हो और मैं रह जाता हु हर बार. ये गुलाटी गांड मारता रह जायेगा और तू दारु पीटा, लेकिन मेरी मत सोचना कभी.", स्वर मजाकिया था और लहजा तल्खी भरा.

"तू चुटिया हे रहेगा सांगवान. अब काम जब दिमाग का हो तोह शरीर को खुराक देना जरुरी है जिस से ये भटके नहीं लेकिन तू पूरा मुर्गा खाये बिना अपनी गांड हिलने से रहा. और भुप्पी, जल्दी गाडी चला जरा नहीं तोह सुबह 6 बजे हे पहुंचेंगे हम.", ड्राइवर का नाम भुप्पी था और जिस तरह से वह उसके सामने ये सभी बातें कर रहे थे तोह ये तोह पक्का था के वह सिर्फ ड्राइवर नहीं था. शंकर की बात सुनकर सांगवान नाम का ये hatta-katta 6 फ़ीट लम्बा व्यक्ति भी चहक उठा था.

"वैसे के बात तोह बता यार शंकर, ये साला नया पन्गा है क्या? मेरी तोह झांट में खाज हो रही पिछले 12 घंटे से लेकिन न तूने कुछ बताया न इस पंजाबी ने.", गुलाटी की तरफ इशारा करते हुए वह बात मजाक में हे कह रहा था लेकिन शब्द सटीक थे.

"भुप्पी गाने बंद कर जरा.", शंकर की बात का फुर्ती से अंजाम करते हुए भुप्पी ने स्टेरो बंद हे कर दिए. गाडी अब शहर से बहार निकलती चौड़ी सड़क पर अँधेरे में दौड़ रही थी.

"मंगत कुमार और शुभंकर याद है तुझे?", शंकर द्वारा लिए दोनों नाम सुनते हे सांगवान की शकल सख्त हो गई लेकिन सिर्फ गर्दन हिलाते उसने आगे बोलने का इशारा किआ.

"दोनों हे मेहरोली में है एक प्राइवेट हॉस्पिटल में. गुलाटी ने कहा था के उसको नींद नहीं आती उन दोनों की वजह से. और मुझे लगा तेरा भी वही हाल होगा, तोह सोचा के तेरे जन्मदिन से पहले ये तोहफा दे दू. लेकिन बस एक बात याद रखना की होश में रहना. वो सरकारी तौर पर भी वंचित है और कही ऐसा नहीं लग्न चाहिए के कोई मसला हुआ हो उनके साथ."

"माँ छोड़ दूंगा उन दोनों की तोह मैं. ये बात पहले बोलती थी शंकर, बहनचोद मैं तोह पिस्तौल भी न लाया.", सांगवान गुस्से में तमतमा चूका था.

"ठण्ड रख खागड़.. शंकर के पास पूरा जुगाड़ है. लेकिन प्रोग्राम ये है के वह तड़प के मरेंगे बंद कमरे में और फिर अपना हे दिल्ली वाला दोस्त करेगा पोस्टमॉर्टम. बाकी अगर jaat-buddhi चलनी है तोह फिर यही उतर जा और रोडवेज में आ जैव, तबतक हम रिपोर्ट लेके खड़े मिलेंगे सफदरजंग के पास.", गुलाटी ने हँसते हुए सांगवान के सर पर हाथ फेरा.

"वैसे ये काम तोह कोई भी कर लेता यार लेकिन मैंने सोचा के सांगवान को रुस्सियन टास्ते किये बहोत टाइम हो गया होगा और ताज में तोह स्विमिंग पूल भी मिलेगा.", शंकर ने भी चुहल करते हुए गुलाटी से ताली मिले.

"बहनचोद, बेरा है थाम दोनुआ ने के ेब मेरा खड़ा न होता देसी के सामने हर रोज और वह टक्कर भी न देती रुस्सियन बरगी. लेकिन एक बात याद रखिये मैं उन नेशी आदमिया के थप्पड़ तोह जरूर मारूंगा, हाँ नहीं तोह. बाकी यो स्विमिंग पूल ाली बात साची है के?", सांगवान का गुस्सा फुर्र हो चूका था और उसकी बात सुनकर दोनों लोग मुस्कुरा रहे थे.

"तेरे टी कोई जोहड़ में न नहान दे और तू खाब देखे है स्विमिंग पूल के.", मस्ती करते गुलाटी ने इतना हे कहा के शंकर जी ने हँसते हुए उसका हाथ दबा दिया.

"यो पंजाबी किसे भी दिन मेरे ते पिटेगा रे शंकर. बहनचोद पचीस लाख की गाडी में बैठ के भी यो भुण्डा बोले है. ेब देखिये, काम निपटान के बाद नहीं स्विमिंग पूल में रुस्सियन छोड़ी तोह मैं महारे गाम की नई."

"सांगवान तू भाई अपने घरवालों का है. पूरे गाँव का नहीं. और हाँ टेंशन न ले वह सब पहले से हे तैयार मिलेगा. गुलाटी ने हे सेटिंग बिठाई है तेरे जन्मदिन के लिए साड़ी." शंकर की ये बात सुनते हे सांगवान उछाल हे पड़ा और गुलाटी भी हंसने लगा.

"मेरे टी बेरा है बामन. यो पंजाबी जिससे भी है, मेरी जान है. 5 साल तोह मेरे गइल था हॉस्टल में. व बात और से के थोड़ा सा चुटिया जरूर है."

"चल अब सोने दे भाई बहोत काम है फिर. और वापिस डॉक्टर बन जा अब. Mahara-thara बंद कर और गुलाटी तुम दोनों खाना खा लेना आगे कोई ढंग का ठिकाना देख के.", एक सफ़ेद बड़ा रुमाल चेहरे पर डालते हुए शंकर उस चौड़ी चमड़े की सीट पर पसर गया. कोट सामने की सीट के पिछवाड़े टंगे थे. कार वैसे हे तेज गति से अँधेरी रात में आगे बढ़ी जा रही थी.

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साढ़े 3 बजे के आसपास पूजा की आँख खुली तोह अपने बिस्टेर पर कंचन बिटिया को सोते देखने के बाद टेबल पर राखी रेडियम वाली अलार्म घडी में समय पर नजर डाली. वह अब तारो तजा महसूस कर रही थी इस ाची नींद के बाद. बाल ठीक करने के बाद गाउन में हे वह बिना आवाज किये बाथरूम में चली गई, जो कमरे के हे एक तरफ था. मूट की धार ने जैसे हे उसकी छूट की फांको से बहार निकलना शुरू किआ वैसे हे एक तेज सुरसुराहट छूट से दिल तक दौड़ गई पूजा के. अर्जुन.. बस यही नाम याद आया और छूट को जल्दी से ठन्डे पानी से साफ़ करती वह दबे पाँव कमरे से बहार निकली और अर्जुन के कमरे की और चल दी. घर में इस मंज़िल पर कोई भी साढ़े 4 या 5 से पहले कभी नहीं उठा था तोह पूजा के पास एक घंटा तोह था हे अर्जुन से अपनी छूट कुटवाने का और फिर जाने कब अगला मौका नसीब हो.

जैसे हे वह कमरे के पास आई तोह ध्यान से हर तरफ नजर दाल कर देखने लगी की कही कोई देख तोह नहीं रहा. सब सुनिश्चित करने के बाद जब दरवाजा खोलना चाहा तोह वह अंदर से बंद था. थपथपाने की आवाज ऐसे माहौल में हर तरफ हो जाती इसलिए वह कोई और उपाए सोचने लगी. न्यास हे खिड़की की झिरी से आती हलकी रौशनी ने बता दिए था के वह खुली हुई है और पूजा की आँखें चमक उठी ये रास्ता देख कर. हलके से खिड़की के कपाट खोलते हुए अंदर नजर डाली तोह बिस्टेर पर एक तरफ स्वाति तकिये पर हाथ रखे लेती थी और अर्जुन कुर्सी पर बैठा टेबल लैंप की रौशनी में कुछ पढ़ने में व्यस्त था.

'ये क्या चक्कर है? कही स्वाति के साथ? नहीं नहीं.. दोनों भाई बहिन है तोह ऐसा नहीं करेंगे. और स्वाति झेल नहीं सकती अर्जुन को अभी इस उम्र में. और ये महाराज इतनी सुबह क्या पढ़ रहे है.' सब सोचती हुई पूजा ने खिड़की में मुँह करते हुए बहोत हे धीमी आवाज में अर्जुन को पुकारा, जो अगले हे पल गर्दन घुमा कर आवाज की दिशा में देखने लगा था. बिना समय व्यर्थ किये वह सिर्फ पजामा पहने हे चुपचाप अपनी कुर्सी से उठा और वैसे हे दरवाजा खोलते हुए बहार आने के बाद फिर से दरवाजा सही कर अपनी बड़ी मामी के करीब आ खड़ा हुआ.

"आपको नींद नै आ रही थी क्या?", अर्जुन ने फुसफुसाते हुए कहा तोह पूजा मामी उसका हाथ पकड़ कर इधर वाली सीढ़ियों की और चल दी. दोनों साढ़े कदमो से इस अँधेरे में सीढ़ियां चढ़कर तीसरी मंज़िल पर खुली छत्त पर आ खड़े हुए.

"नींद के लिए तोह गोली लेनी पड़ी थी. लेकिन जैसे हे आँख खुली तोह बस तेरी और खींची चली आई. आज वैसे भी तोह तू जा रहा है और फिर जाने तुझे कब याद आये अपनी मामी की.", अर्जुन उनकी बात सुनकर समझ गया था के वह अपनी आग से परेशां है. वह भी रात से अपने खड़े लुंड को काबू किये जा रहा था और जब मुश्किल होने लगी थी तोह किताब पढ़ने लगा था.

"फिर समय बर्बाद मत कीजिये, जो करना है करके वापिस कमरे में चलते है.", अर्जुन ने बिना hil-hujjat किये उन्हें अपनी बाहों में कस लिए. जोरदार चुम्बन होठो पर करते हुए वह निघ्त्य के अंदर चुप्पे उनके भारी नितम्भो का मर्दन करते हुए अपना लुंड उनके पेट से भिड़ने लगा. अगले हे पल पूजा मामी बनेरे की दिवार पकड़ कर कड़ी थी और उनकी निघ्त्य का कपडा कमर से ऊपर सरका कर अर्जुन अपने सख्त लुंड को उनकी मोटी जांघो के बीच से दिखती फूली हुई छूट पर दबाते हुए अंदर ठेलने लगा. सूपड़ा कसता हुआ उस धधकती छूट में दाखिल हुआ तोह दोनों की सीत्कार निकल गई.

"आह्हः.. गीला तोह कर लेता.."

"मामी, पहले से हे आपकी इतनी गीली है. लो हो गया बस.", इतना कहते हे उसने एक करारा झटका जड़ते हुए पूरा साढ़े 8 इंच से लम्बा और आलू सा मोटा लुंड जड़ तक थोक दिए. ये करने से पहले हे उसने पूजा मामी का मुँह दबा लिए था और वह बस 'goon-goon' करती रह गई और अर्जुन का लुंड उनकी छूट की पूरी गहराई मापता बच्चेदानी से जा लगा.

पूजा मामी के साथ पिछली बार करने से हे अर्जुन को पता चल गया था के वह अलग हे स्त्री है. उन्हें बिस्टेर में जोरदार चुदाई और जंगलीपन पसंद था. अर्जुन ने भी सब वैसे हे दोहराते हुए उनके झूलते मॉटे खरबूजे पीछे से पकड़ कर निचोड़ने शुरू कर दिए. हर धक्के और इतनी जोरदार चुदाई से ना चाहते हुए भी पूजा मामी की मद्धम सिसकारियां फूट रही थी. उनके थिरकते कूल्हों के बीच अर्जुन का लुंड सरपट andar-bahar होता भरपूर मजा दे रहा था दोनों को.

"मामी, आप तोह हो गई लेकिन मेरा नहीं हुआ.", जैसे हे पूजा का सखलन हुआ वह दिवार पर सर रखती अर्जुन के लुंड को छूट में जकड शांत पड़ गई. छूट में से पानी बेहटा हुआ बहार निकल रहा था जो बता रहा था के ये चरमसुख अध्भुत हे था. लेकिन अर्जुन की परवाह करते हुए पूजा ने बिना कुछ कहे हाथ पीछे किआ और लुंड बहार निकल कर थोड़ा ऊपर सरका कर बता दिए की उसको अब कहा डालना है. गांड का गरम छोटा छेड़ सुपडे पर लगते हे अर्जुन भी खुश हो गया. सुपडे को अचे से छूट के पानी से चिकना करते हुए उसने थोड़े ज्यादा हे दबाव से चिकना ling-mund उस दरदरे छेड़ में धकेल दिए. सच में गांड का चला इतना लचीला था के आधा सूपड़ा तोह आराम से अंदर बैठ गया और बाकी अर्जुन के जोर देने से. बस पूजा मामी की दर्द से कराह निकल गई थी.

"एक बार में थोक दे रे इसको अंदर.. आह्ह्ह्हह. पूरा अंदर.. ाअम्म्मम्म्म्म और फाड़ दे इसको.. ", अर्जुन भी उनकी बातों में आते हुए उस तंग गली में अपना घोडा दौड़ने लगा. 3 धक्को में वह उनकी छूट पर अपने बड़े अंडकोष भिड़ा चूका था. फिर अगले 10 मिनट तक अर्जुन बेलगाम घोड़े सा उस मक्खन से नरम गांड को फैलता रौंदता रहा और साथ हे उसके हाथ अपनी मामी के नरम कूल्हों और चुचो को भँभोङते दर्द देते रहे. गांड मरवाते हुए भी पूजा की छूट ने एक और बार पानी बहा दिए लेकिन साथ हे अर्जुन का ling-amrit उनकी अँधेरी गुफा में एकत्रित हो चूका था. 'पुक्क' की आवाज से लुंड बहार निकला तोह दोनों बिना जमीन की साफ़ सफाई की परवाह किये वही नीचे पसर गया. एक दूसरे से कुछ दुरी पर. सांसें धोंकनी की तरह चल रही थी और माथे पर पसीना था.

सुनंदा जी ने सारा कार्यक्रम अपनी आँखों से 20 मिनट से देखा था. और पूजा की गांड में लुंड जाने से पहले हे उन्हें झलक मिली थी अर्जुन के उस हथियार की जो किसी भी हाल में कलाई से लेकर कोहनी की लम्बाई से कम् न था. उनकी छूट में प्राकृतिक पानी कोई 10 साल बाद हलके से रिसा था और जब उन्होंने ने दोनों को हुंकार भरते देखा था दबे पाँव नीचे चल दी थी. बस यही सोचती की एक नादान लड़के का इतना बड़ा कैसे हो सकता है और दूसरा ये की उनकी सभी बहु ऐसा औजार अपने अंदर ले कैसे पाई. जवाब आसानी से मिल नहीं सकता था और सीधा वह पूछ नै सकती थी. अनीता ने बताया था के अर्जुन भरपूर मर्द है लेकिन वह ऐसा तगड़ा घोडा होगा ये उन्होंने आज देखा.

क्रमश.....
 
समय भरपूर था दोस्तों. लेकिन शरीर और दिमाग सही नहीं था. क्षमा चाहता हु आप सभी से की कहानी को इतना रोक दिए. हालात बयान नहीं कर सकता लेकिन परसो से कहानी लिखूंगा और अपडेट भी पोस्ट करूँगा. ज्यादा न सही लेकिन हफ्ते के 3 अपडेट जरूर लिखूंगा.
 
अपडेट 70

घर वापसी


साल 2012

समय कभी किसी के लिए नहीं रुका. ये अपनी हे गति से निरंतर चलता रहता है. तेज इंसान के लिए धीमा और सुस्त के लिए तेज. किसी मजबूत को कमजोर और कमजोर को मजबूत कब बना दे ये सिर्फ समय के हे वश में है.

शाम के धुन्दल्के में इस बंद कमरे में नजर के चश्मे के पीछे से 2 जोड़ी आँखें बस दिवार पर लगी उन खूबसूरत तस्वीरो को हे देख रही थी, जिनके ऊपर अब हार चढ़े थे. जवान मुस्कुराते चेहरों पर ये हार जितने दुखदाई थे उतना हे दुखी ये शख्स था. हलकी रौशनी में खड़ा ये सफ़ेद घुंघराले बालो व्यक्ति एकदम असहाये सा बस सामने मुस्कुराती लड़की और लड़के की तस्वीर में जैसे वह गुजरा जमाना खोज रहा था जो अब कही अस्तित्व में न था. 2 बूँद चश्मे के पीछे वाली आँखों से ढलक आई तोह असहाये सा वह पास में राखी कुर्सी पर बैठ गया. एक महंगे कांच का गिलास जो आधा भरा था उस नारंगी तरल से जिसको शराब कहते है. बूढी कमजोर उँगलियों से गिलास को उठाते हुए अपने सूखे लबों पर लगते हे वह बदस्तूर सा बस आंसू बहाये जा रहा था.

"मेरी गलती की सजा मेरे बच्चों को मिली. मैं घर वापिस न आ पाया.", खुद से इतना हे कह पाया था के फिर गर्दन उस लकड़ी के मेज पर लुढ़क गई.

साल 1998

"हाँ तोह सभी से मिल लिया न अब गाडी में बैठ बीटा.", रेखा जी ने अर्जुन को आवाज लगाई तोह उसकी तन्द्रा भांग हुई. अपनी प्यारी नानी से एक बार फिर गले लगने के बाद वह भी अपनी माँ के पास हे कार में आ बैठा. आज यहाँ से 2 कार जा रही थी वापिस शहर. एक में तेजपाल जी का परिवार और स्वाति थे और इस कार में सरकारी ड्राइवर के साथ सिर्फ रेखा जी और अर्जुन.

रेखा ने इन पिछले 4 दिन में अपने पहले परिवार में बहोत खुशिया पाई थी लेकिन उन्हें कोई दुःख न था जाने का यहाँ से क्योंकि अब तोह उनका असल परिवार और बचे दूसरे शहर में जो थे. सुनंदा जी ने भी अपनी बेटी और दोहते को ख़ुशी से विदा किआ था. 7 बजे के करीब जब कार ने इस शहर की सीमा लांगी थी तोह अर्जुन की आँखे भी सुबह की ठंडी हवा से khud-ba-khud बंद हो गई थी. साड़ी रात की म्हणत और इस खुशनुमा मौसम ने अपना असर दिखाया था. रेखा जी भी अपने दुलारे को ऐसे सोया देख बस मुस्कुरा रही थी.

एक घंटे बाद दोनों हे गाड़िया उनके शहर के बहार वाले पुलिस लाइन के गेट पर रुकी तोह पिछली कार से सिर्फ रेखा जी हे उतरी. पूजा से गले मिलने के बाद तीनो लड़कियों के भी सर पर हाथ फेर कर उन्होंने से सभी को उनके घर आने का न्योता दिए. तेजपाल जी भी अपनी गाडी के ड्राइवर को सभी हिदायते देने के बाद अपनी बहिन के साथ उन्ही के कार में बैठ गए. अर्जुन अभी भी बेखबर सोया हुआ था और Somya/Swati किसी आस भरी नजरो से उसको देखने की असफल कोशिश करने के बाद अपने घर की तरफ चल दी.

"ये कैसे सो गया?", तेजपाल जी ने धीमी आवाज में हे पीछे मुड़कर अर्जुन को देखने के बाद अपनी बहिन से पुछा.

"इसका कुछ नहीं पता. घर में भी ये कभी भी और कही भी सो जाता है. वैसे भी नींद लेता हे कितनी है.", प्यार से अपने बेटे के घुंगराले बालो में उंगलिया फिरती रेखाजी उसके चेहरे के नूर को हे देख रही थी.

"इस बार बड़ा ाचा लगा के अर्जुन ने भी हमारे साथ समय बिताया. माँ तोह बहार आ हे न सकीय इसके वापिस जाने की बात पर.", तेजपाल भी अपने भांजे को एक बार फिर से भरपूर देखने के बाद बोले.

"अब इसने ननिहाल देख लिए है तोह फिर ये खुद हे चला जाया करेगा. यहाँ का तोह आपको पता हे है के हमको इतना समय कहा मिलता है. लेकिन अब शहर में हो और पूजा के साथ हे बचे भी है तोह आप जरूर चक्कर लगा लीजियेगा.", बातें हो हे रही थी की इनकी कार अपनी मंज़िल पर आ रुकी थी. अर्जुन अभी भी वैसे हे सोया था लेकिन ड्राइवर के साथ हे तेजपाल जी ने सारा सामान उतरवा कर घर के आँगन में ाचे से रखवाया. गलियारे में कड़ी ऋतू ने जैसे हे देखा वह सीधा भगति अपनी माँ के गले आ लगी. तेजपाल जी भी शिष्टाचार से बगीचे में बैठे पंडित जी और छोल पूरी से चरणस्पर्श करते हुए मिले.

"अरे बीटा, आओ बैठो यहाँ. ऋतू बीटा, अपने मामाजी के लिए भी chai/sharbat लेकर आओ.", अपने दादाजी की बात सुनकर ऋतू ने एक बार हर तरफ गौर से देखा जैसे कुछ ढून्ढ रही हो लेकिन जब नजर नहीं आया तोह उलझे मैं से अंदर चली गई. रेखा जी भी mand-mand मुस्कुराती अपनी बेटी के साथ हे घर में आ गई थी. अपनी सास और जेठानी से मिलने के बाद वह भी अपने कमरे में हो ली, वस्त्र बदलने के लिए.

"माँ, मुन्ना कहा है?", ऋतू ने बहार पानी का गिलास अलका के हाथ भिजवाने के बाद अपनी माँ के कमरे में दाखिल होते हे बस यही पुछा. पीछे हे कोमल दीदी भी आ गई थी उनके लिए पानी लेकर.

"बीटा उसको तेरी नानी ने आने नहीं दिया अभी. 3 दिन बाद हे अब आएगा वह.", रेखा जी ने भी अपनी लाड़ली बेटी को थोड़ा परेशां करते हुए कहा और अगले हे पल ऋतू बिना कुछ बोले अपने कमरे के बिस्टेर पर औंधे मुँह जा गिरी. उसको कितना बेसब्री से इन्तजार था अपने भाई का. उस प्यार का जिसके बिना 4 दिन वह कितना तदपि. और अर्जुन ने एक फ़ोन करके भी ये बताना जरुरी न समझा. इतना सोचते हे जैसे उसकी आँखें नम्म हो चली थी.

"अलका, परेशां मत कर अभी. मेरा मूड ख़राब है. आने दे उसको वापिस फिर देख मई क्या हाल करुँगी उसका.", ऋतू को अपने पाँव पर हलकी ुंलियो से गुड़गुड़ाहट महसूस हुई तोह वह बिना हे सर उठाये बोल पड़ी.

"क्या हाल करोगी जरा अभी बता दो फिर मैं तैयार रहूँगा 3 दिन बाद.", अर्जुन जल्दी से अपनी दीदी का गाल चूमकर बहार भाग गया. ऋतू के शरीर में तोह जैसे बिजली भर उठी थी. ख़ुशी से वह भी बिस्टेर से निकल कर बहार दौड़ पड़ी जहा अर्जुन संजीव भैया के पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा था.

"भैया, आप इसको नहीं बचाओगे. ये बहोत गन्दा है और आज इसको वो मार पड़ेगी की याद करेगा.", ऋतू को झूठा गुस्सा दिखते देख संजीव भैया भी मुस्कुरा दिए. साथ हे खाने की टेबल पर बैठे सभी लोग, जिनमे छोल साहब और पंडित जी भी थे.

"आते हे मेरे बचे के पीछे पड़ गई ये तोह. अरे जरा देख तोह लेने दे की वह इसकी ाचे से देखभाल हुई भी या नहीं. फिर सजा दे लेना.", कौशल्या जी ने अपने लाडले पौटे को गले लगते हुए ऋतू से कहा. फिर अर्जुन ने भी दादी से मिलने के बाद अपनी प्यारी बहिन को गले लगा लिए.

"ये न मैं पहले से हे सोच के चला था. और माँ को भी मैंने हे कहा था 3 दिन बाद वाली बात कहने के लिए.", अर्जुन इतना बोल कर फिर से भाग कर ऊपर वाली मंजिल पर हो लिए.

"देख लो जी. सच हे है के घर में सभी थे लेकिन मुन्ना के बिना घर इतना खुशाल नहीं लगता. भगवान् हमेशा इसको दुरुस्त रखे और घर को khush-haal.", कौशल्या जी ने रामेश्वर जी और छोल साहब की थाली में गरम रोटी रखते हुए जैसे नज़र भी उतारी. उनकी बात पर दोनों लोगो ने समर्थन दिए.

"सही कहा भाभी जी आपने. अर्जुन की मौजूदगी भर मैं शांत हो जाता है. और मैंने तोह संजीव को भी मुस्कुराते देख लिए आज.", छोल पूरी की इस आखिरी बात पर संजीव भैया भी झेंपते हुए कुर्सी पर बैठ गए.

"संजीव की भी तोह जान बस्ती है अपने छोटे भाई में. एक वही है जिसके लिए ये भी घर आ जाता है.", अपनी दादी की इस बात को सुनकर संजीव की वही मुस्कान और गहरी हो चली थी.

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#### गांव में हत्ता कट्टा बिजेन्दर कोई दर्ज़न भर लोगो के साथ gaye-bhainso के बड़े से नोहरे में बैठा था सुबह के इस समय. 3-4 अधेड़ उम्र के व्यक्ति, जो गांव की वेशभूषा में हे थे हुक्का गुदगुदा रहे थे. माहौल थोड़ा सा गंभीर हे थे.

"बीटा, इस बार कोई ऐसी हरकत न कार्यो के फेर कोरट (कोर्ट) कचेहरी के चक्कर लगाने पड़े. तेरा मकसद पहलवानी नहीं है सिर्फ.", ये एक 50 साल से ऊपर का तगड़ा अधेड़ व्यक्ति था जिसके सर पर पगड़ी और हाथ में हुक्के की पाइप थी.

"मां बेरा है मैंने के मेरा मकसद के है. लेकिन फेर पहलवान का दिमाग कड़े कड़े हिल हे जा है. ेब कोणी होव कुछ ऐसा.", बिजेन्दर की हर लफ्ज़ में एक saaf-goi थी. और उसकी बात वह बैठा हर व्यक्ति ध्यान से सुन्न रहा था.

"मेरी बहिन जिस उम्र में विधवा हुई थी व उम्र तू कोणी समझे है. और वो इंसान देख आज कितनी बड़ी हस्ती बना घूम रहा जो इस सबका कारण है. तेरा दादा सोमबीर कोई छोटी हस्ती न था लेकिन मैंने देखा था के उसका क्या हाल हुआ था. तेरा मकसद सिर्फ एक हे है इस ज़िन्दगी में. जिस दिन तू शंकर की छाती में पीतल भरेगा न उस दिन तेरी माँ को मैं उसके ससुराल भेजूंगा. पता चलना चाहिए पंडित के परिवार को के बदला के होव है और घर में इतनी मौत होव तोह लकड़ी कैसे इकट्ठी करनी पड़े है. शुरुवात करनी है इन दोनों से.", उस आदमी ने अपने कुर्ते की जेब से 2 फोटो सामने करते हुए बिजेन्दर की तरफ बधाई जिन्हे वह बड़े ध्यान से देख रहा था.

"ये रोशन ने भिजवाई थी कल. ध्यान से देख ले और फिर आंच में बाल दे इन्हे. एक है शंकर का भतीजा और दूसरा है राजबीर सिंह का लोंदा उमेद सिंह. उमेद पे हाथ बात में उठाना है क्योंकि ेब वह बड़ा बिज़्नेस्मेन है साथ हे पार्षद भी. लेकिन शंकर का भतीजा कोई नौकरी करे है बिमा पोलिकीय की. थोड़े दिन तू गाँव में हे रह और सेहत के साथ स्कीम लगा. रेकी करवा इस लड़के की और जब सही समय लगे तोह स्वर्ग भेज डीओ, बामन है न तोह नरक नहीं मिलेगा इसने.", इस इंसान के आवाज हर शब्द के साथ कठोर हो रही थी. आँखों में इतना गुस्सा उभर आया था के हाथ में पकड़ा हुक्के का स्टील का पाइप अपनी जगह से उखड गया था.

"मां, एक महीने में यो छोरा ऊपर गया समझ. और फिर बारी उमेद और शंकर की.", बिजेन्दर भी बदले की आग में झुलस रहा था. दोनों तस्वीर उपलों की आग में डालते हुए वह ऊपर वाली तस्वीर पर छपे सजीव शर्मा के आंच से जलते चेहरे को देख रहा था. कुछ हे पल में दोनों हे तस्वीर रख बन चुकी थी.

"और चोर्रो, पता लगाओ के मेरे भांजे पे जिसने वॉर किआ था वो लड़के कोण थे. विकास को कोई हाथ न लगाए ध्यान रखिओ. वो लड़का खिलाडी है और उसको इस लड़ाई में न घसीटना. बदला लेना भी होगा तोह बिजेन्दर खुद अखाड़े में लेगा उस से.", यहाँ बिजेन्दर के पीछे हे बैठे 6-7 लड़को को आदेश देते हुए इस चौधरी ने इतना कहा और गले में अपना गमछा लपेट कर ये 6 फुट का बलिष्ट व्यक्ति बहार की और निकल लिए. पीछे हे उसके 3 hum-umar आदमी भी.

"बात घनी सीरियस हो गई बिजेन्दर भाई. हमने तोह कड़ी कतल (मर्डर) जिसे काम कोन्या करा. ार तेरा मां देख के चाहे है.", एक तगड़े से नौजवान पहलवान ने बिजेन्दर की बलिष्ट भुजा पर हाथ रखते हुए कहा.

"देख गोलू, यो बात मेरे baap-chacha और दादा के sare-aam कतल की है. मेरी माँ ने कितने साल सफ़ेद रंग में कांड दिए, पूरा परिवार उजाड़ दिया महारा और आज मैं भी अगर मेरी माँ के सुहाग का बदला ने ले सकू तोह फेर तू बता के मेरी इस ज़िन्दगी का के मतलब. मेरी बहिन का ब्याह न होया अब तक क्योंकि वह भी चाहे है के पहला मैं महारे असली घर में पगड़ी पहन के जाऊ. मेरा दादा एक दिलेर आदमी था लेकिन शंकर ने 50 आदमी लेके मेरे दादा, पिता और चाचा ने देखे से मार के सारे मरद ख़तम कर दिए परिवार के. ेब मैं भी उसके परिवार की जड़ काट के रहूँगा.", बिजेन्दर की आँखों में आंसू आ गए थे अपनी बात कहते हुए. उसका ये दोस्त गोलू भी पूरी बात सुनकर उसको गले से लगते हुए इतना हे कह पाया.

"मिल कर फसल काटेंगे भाई. मिलकर."

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ननिहाल से मिले सभी उपहार अपनी बहनो को उनकी पसंद से सौंपते हुए कोमल दीदी बड़ी खुश लग रही थी. इतने कपडे और saaj-sajja का सामान भेजा था उनकी naani-maamiyo ने की 3 बड़े बैग भरकर यहाँ ऊपर वाले बैठक में वह सभी लड़कीअ घेरे बैठी थी.

"देख रुपाली ये तेरे पे खूब जंचेगा. और मौसम के हिसाब से हे भी आराम दायक रहेगा.", एक शिफॉन का हलके आसमानी रंगो वाला टॉप और साथ हे गहरे रंग की लड़कीओ वाली लेग्गिंग पजामी रुपाली को देते हुए कोमल दीदी ने कहा तोह रुपाली ने भी खुश होते हुए वह कपडे का पैकेट पकड़ लिए. कुछ हे दिनों में रुपाली ने इस घर को अपना लिए था और घर के सभी सदस्यों ने भी.

"थैंक यू दीदी. ये बहोत सुन्दर है.", रुपाली ने इतना हे कहा और खोलकर कपडे देखने लगी.

"वैसे इसके लिए तुझे नए पिंजरे भी लेने पड़ेंगे.", अलका ने ये बात कही तोह ऋतू दीदी ने हँसते हुए उसकी ब्याह पर चपत लगा दी.

"कुछ भी बोलती है तू भी अलका. और रूपाली तुम भी जवाब दे हे दिए करो नहीं तोह अलका ने पीछा नहीं छोड़ना तुम्हारा.", ऋतू की हरकत और अलका के कहने का मतलब समझते हे रुपाली का चेहरा गुलाबी हो गया था. उसने कुछ कहा नहीं बस कोमल दीदी के साथ चिपक गई.

"वैसे नया पिंजरा तोह मुझे भी लेना पड़ेगा. देख प्रियंका ये कैसा लग रहा है?", एक बिना ब्याह का लम्बा सा गाउन दिखते हुए माधुरी दीदी ने प्रियंका से कहा. प्रियंका के साथ हे बाकी सभी की निगाहे भी इस झिलमिलाते हुए रेशमी गाउन पर गई जो रात को kshayan-kaksh में पहन ने के हिसाब से था.

"वाह दीदी. ये तोह बड़ा हे कमाल का है. लेकिन इसके साथ कोण पहनता है प प पिंजरा..?", प्रियंका ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा और इधर ऋतू ने पीछे से प्रियंका की कमर को दबाते हुए कान में सरगोशी की.

"तुम पहन कर दिखाना मुझे, जैसे तुमने कहा है वैसे हे.", ऋतू की इस बात पर सभी के ठहाके और हंसने की आवाज से कमरा गूँज उठा.

"मार खायेगी तू मेरे से. और मेरे पास कुछ अलग है क्या तेरे से.?", प्रियंका की इस बात पर जवाब आरती ने दिए.

"सबके हे तोह अलग होते है दीदी. यहाँ इतने लोग है आप बताओ किसके एक जैसे है.?", प्रियंका बस झेंपती सी मुस्कुरा रही थी और रुपाली वह से शर्माती हुई जाने लगी तोह कोमल दीदी ने उसको खुद से लगते हुए सभी को ऐसा मजाक बंद करने को कहा.

"इसको अगर शर्म आ रही है तोह प्लीज ऐसी बातें मत करो.", कोमल दीदी की बात पर ऋतू और अलका के साथ हे आरती के चेहरे पर भी कुटिल मुस्कान आ गई.

"वो दीदी, मैं कमरा बंद करने जा रही थी. अभी शायद कोई बहार से निकला है.", रुपाली की इस बात को सुनते हे एक बार फिर सभी के हंसने की आवाज से कमरा भर गया और शर्माती हुई रुपाली ने बैठक का ये लकड़ी वाला कमरा अंदर से बंद कर लिए.

तारा अभी पड़ोस वाले घर में थी प्रीती के पास. उसको भी अब प्रीती और अपनी सभी बहनो के साथ रहना ाचा लगने लगा था. जैसे वो कभी इनसे अलग थी हे नहीं. लेकिन यहाँ माहौल थोड़ा शांत हे था. रेणुका अपने कमरे में बिस्टेर पर आराम कर रही थी और पारवती उनके तलवो की मालिश. तारा और प्रीती भी वही बैठे थे लेकिन दोनों हे किताबो में खोई हुई थी.

"तुम दोनों क्या नौटंकी कर रही हो इतनी देर से?", रेणुका जी ने दोनों की तरफ देखते हुए पुछा.

"कुछ भी तोह नहीं. बुक पढ़ रहे है.?", प्रीती ने किताब पर हे नज़र जमाये हुए जवाब दिए. तारा ने भी नजर किताब पर हे राखी.

"काफी देर से नौटंकी देख रही हु मई तुम दोनों की. एक नौकरी कर रही है और दूसरी का कोई इम्तिहान नहीं. फिर भी किताबे लेकर मेरे कमरे में बैठी हो. अगर तुम दोनों यहाँ इसलिए बैठी हो के मैं तुम्हारे साथ बड़े पापा के घर चलूंगी तोह अभी मेरा दिल नहीं है. अपना समय न ख़राब करो और बाकी सबके पास जाओ.", रेणुका जी कुछ दिनों से जैसे अब अकेले हे रहना चाहती थी. अपने कमरे से बहार निकलना जैसे अब उन्हें ाचा नहीं लगता था.

"मौसी, अब देखो न आप 3 दिन से यही पड़ी हो. और नानी के बुलाने पर भी आप हमारे घर नहीं चल रही. ऐसे कब तक रहोगी. अब तोह छोटी मामी (रेखा) ने भी आपको बुलाने के लिए मुझे भेजा है और आप हो के बिस्टेर से उठने का नाम नहीं ले रही.", छोटी मामी का जीकर सुनते हे रेणुका का सोया दिमाग जाग गया. जैसे शरीर में खून का संचार फिर से शुरू हो गया हो. मतलब अर्जुन भी वापिस आ गया था.

"पहले बोल देती की छोटी भाभी ने बुलाया है. बस करो पारवती और तुम दोनों चलो मैं भी आती हु चेहरा ठीक करने के बाद.", प्रीती और तारा ने एक दूसरे को मुस्कुरा कर देखा और फिर चुपचाप बहार निकल गई. उनके पीछे हे पारवती भी.

"दर्द की दवा मिल गई बुआ को, हाँ.", प्रीती ने तारा से ड्राइंग रूम से अपने कमरे में जाते हुए कहा और दोनों प्रीती के कमरे में घुस गई. प्रीती ने भी कपडे बदले और चेहरे साफ़ करके वापिस ड्राइंग रूम में बैठ गई. रेणुका जी के इन्तजार में.

"चलो अब.", कोई 10 मिनट बाद हे रेणुका जी कमरे से बहार आई. हल्का हरा रंग का कमीज और सफ़ेद पजामी के साथ सफ़ेद चुन्नी लिए वह बहार आई तोह अब वह बिलकुल भी वैसी नहीं दिख रही थी जैसे निर्जीव सी अपने कमरे में थी. इसके साथ हे तीनो लोग घर से निकल कर पंडित जी के यहाँ आ गए.

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"कैसी है मेरी बची? कितनी बार कहा है के यही रहा कर लेकिन तुझे तोह जैसे हमसे कुछ लेना देना हे नहीं.", कौशल्या जी ने अपनी बाहों में भरते हुए रेणुका का माथा चूम लिए. उन्हें भी पता था के बेशक जैसा भी हो लेकिन एक औरत का दर्द सिर्फ औरत हे समझ सकती है.

"ऐसा कुछ नहीं है बड़ी माँ. वह बस अकेले रहने से मैं थोड़ा हल्का हो जाता है. अब आ गई हु न.", यहाँ कौशल्या जी के कमरे में ललिता जी और रेखा जी भी बैठे थे. रेणुका ने उनसे भी गले लग कर अभिवादन किआ और बिस्टेर पर हे बैठ गई, सिरहाने से तक लगा के. सामने राखी कुर्सी पर तारा बैठी तोह प्रीती कान में कुछ बोलकर भीतर आँगन में निकल गई. ये महिलाये अभी haal-chaal हे पूछ रही थी की सजीव भैया के साथ अर्जुन भी कमरे में दाखिल हुआ और सीधा बिस्टेर पर चढ़ते हुए बैठी हुई रेणुका जी के गले लगने के बाद उनकी हे गॉड में सर रख कर लेत गया. संजीव भैया चुपचाप बैठक में निकल गया.

"ोये बैल. ये कैसे मिलना हुआ अपनी बुआ से? और इतना बड़ा हो गया लेकिन अभी तक बचपना नहीं गया. चल मेरे पास बैठ और मेरी बची को परेशां मत कर.", कौशल्या जी को अर्जुन के ऐसा करने से कोई हैरानी नहीं हुई थी लेकिन उनको लगा शायद अर्जुन को कुछ पता नहीं और वह कही रेणुका के दर्द को ज्यादा न कर दे.

"बड़ी माँ, एक यही तोह है जो अपनी बुआ को समझता है. और मेरे लिए तोह हमेशा हे छोटा मुन्ना हे रहेगा.", अपनी गॉड में सर टिकाये अर्जुन को प्यार से निहारती रेणुका के चेहरे पर एकदम से असीम शांति और हलकी चमक आ गई थी. साथ हे उनके हाथ स्वतः हे अर्जुन के घुंगराले बालो में चलने लगे थे.

"देख लिए न दादी. बुआ को मैं परेशां नहीं करता लेकिन आप न हमेशा मुझे दांत हे लगाती रहती हो. हाँ नहीं तोह.", अर्जुन के भोलेपन से ऐसा कहने पर सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई और साथ हे रेणुका की आँखों से 2 बूंदे टपक कर अर्जुन के चेहरे पर आ गिरी. ये देख कर एक हे पल में जैसे उसका दिल थम्म सा गया. लेकिन जल्द हे रेणुका ने चुन्नी से आँखे साफ़ करते हुए अर्जुन का भी चेहरा साफ़ किआ.

"कौन दांत लगा रहा है भाई मेरे शेर को?", छोल पूरी की आवाज को सुनते हे रेखा जी और ललिता जी आराम से बिस्टेर से उठ कर भीतर वाले आँगन की और चल दी. छोल साहब के साथ हे अंदर रामेश्वर जी भी आये तोह अर्जुन को ऐसे रेणुका की झोली में लेते देख मुस्कुराने लगे.

"छोटे दादू ये न मेरी दादीजी अब मुझसे उतना प्यार नहीं करती. देखो मैं इधर बुआ के पास मिलने आया हु और दादी ने आते हे गुस्सा करना शुरू कर दिए."

"अरे ओह निखट्टू. मैंने कब दांत लगाई. ऊपर से खुद को देख ढाई मैं (100 किलो) का तू इस फूल सी बची की गॉड में पसरा हुआ है.", कौशल्या जी ने कान खींचते हुआ अर्जुन को घुड़की दी.

"देखो भाई ये मामले में हम नहीं पड़ने वाले. ये दादी पौता कब एक हो जाते है पता नै और रही बात इसके रेणुका की गॉड में पसारने की तोह ये Bua-bhatije जाने. और तारा बिटिया, जरा एक प्याली चाय पीला दे फिर मैं चलता हु.", छोल साहब भी एक कुर्सी पर बैठ गए और रामेश्वर जी बिस्टेर पर अपनी जगह. तारा सर हिलती हुई अंदर आ गई रसोईघर में.

"चाय मैं बना लती हु पापा.", रेणुका जी ने उठने का उपक्रम किआ तोह अर्जुन ने उन्हें बैठे रहने को कहा.

"क्यों मरवा रही हो बुआ. दादी यही बैठी है और अभी शामत आ जाएगी सभी की अगर उनकी बेटी से किसी ने काम करवाया तोह.", नासमझी से कही इस हलकी से बात को सुनकर रेणुका ने कौशल्या जी की तरफ देखा और उन्होंने भी बड़े स्नेह से रेणुका को अपने साथ लगा लिए.

"देखा न. मेरी दादी न सबसे ाची है. लेकिन आजकल पता नहीं मुझे प्यार नहीं करती.", अर्जुन ने एक बार फिर से छेड़ते हुए कहा और इस बात कौशल्या जी ने उसके कूल्हों पर एक चपत जमाते हुए कहा. "चल उठ अब मेरी फूल सी बची की गॉड से और जा कर अपनी मोटरसाइकिल पर कपडा लगा. हफ्ते हो गए उसको कड़ी हुई को.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन फुर्ती से उछाल खड़ा हुआ.

"अरे ये तोह मैंने ध्यान हे नहीं दिए.", और भागता हुआ सा वह बहार आँगन में आ खड़ा हुआ जहा उसकी रानी एक नीले तरपाल से ढंकी कड़ी थी. बड़े प्यार से अर्जुन ने वह प्लास्टिक का तरपाल उठाया तोह लाल रंग की बुलेट ऐसे चमक रही थी जैसे कुछ हे देर पहले उसको साफ़ किआ हो. अपना खुद का अक्स उसकी चमक में देख कर वह जैसे कुछ पल के लिए खो सा गया था.

"आधा घंटा लगता है इसको चमकाने में. तुम्हे तोह सिर्फ बैठ कर चलनी आती है.", इस आवाज को सुनते हे अर्जुन ने सामने देखा तोह दोनों बाहें अपने पेट पर जोड़े प्रीती गंभीरता से उसको हे देख रही थी. गुलाबी चेहरा और वह hari-neeli आँखें. लाल अनार से रक्तिम होंठ और सामने हलके हलके हिलते वह सुनेहर भूरे बाल. अर्जुन को ऐसा लग रहा था जैसे कितने हे सालो बाद वह देख रहा था इस लड़की को, जिसको वह अपनी रूह से ज्यादा प्यार करता था. दिमाग शुन्य में चला गया था उसका और प्रीती भी समझ गई थी की अर्जुन को क्या हुआ है.

"थककक", चुटकी की आवाज करती ऋतू ने अर्जुन का गाल थपथपाया तोह वह जैसे सपने से बहार आया. अब प्रीती वह नहीं कड़ी थी लेकिन गलियारे से निकलती वो मुस्कुराती हुई अंदर चली गई.

"ोये तू न सुधर जा. आते हे nain-matakka शुरू तेरा.", उनकी बात सुनकर एक पल के लिए अर्जुन झेंप गया फिर अगले हे पल उसके चेहरे पर वही मुस्कान आ गई.

"वह तोह मैं आपके भी साथ करता हु. अब जरा बैठो मेरे पीछे, देखे ये वैसे हे चलती है क्या.", अर्जुन ने जैसे हे किक लगाई चाबी घूमने के बाद वह पहली हे बारी में चालू हो गई. आराम से सीट पर बैठ कर मोटरसाइकिल घूमने के बाद उसने ऋतू दीदी को पीछे बैठने का इशारा किआ तोह गर्दन ना में हिलती ऋतू दीदी ने सिर्फ इतना कहा. "अभी तू अकेले घूम कर आ, हम दोनों शाम को चलेंगे." और अर्जुन ने जैसे हे मोटरसाइकिल का गियर डाला के संजीव भैया पिछली सीट पर बैठ गए.

"चल मैं भी साथ चलता हु."

"निम्बू लेमन पिलाओगे तभी चलूँगा.", अर्जुन ने शोखी से ब्रेक दबाते हुए पुछा तोह हँसते हुए संजीव भैया ने पीठ थपथपाई. दोनों हे dug-dug कर बुलेट पर सवार घर से बहार निकल चले. ऋतू मुख्या द्वार बंद करती हंसती हुई घर के अंदर.

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"कल से फिर स्कूल जाना है?", संजीव भैया पार्किंग में लगी लोहे की ग्रिल पर बैठे सिग्रेटे का काश लगते हुए बोले.

"हाँ भैया. कल से स्कूल और स्टेडियम.", अर्जुन ने गिलास से सोडा की घूँट भरने के बाद जवाब दिए.

"तू समझदार है लेकिन फिर भी एक सलाह देता हु. स्कूल की ज़िन्दगी घर तक नहीं लेके आना. और घर की स्कूल में नहीं. वह तुझे अपना अलग नाम बनाना है. और बाकी तू जैसा है वैसा हे रहिओ मेरे भाई."

"आपका मतलब शायद रूपाली दीदी से भी है न?", अर्जुन की कही बात पर संजीव बस मुस्कुरा दिए और जवाब में अर्जुन भी.

"उसको भी अपने दोस्त बनाने की आज़ादी देनी है और ाचे है की तरह उसका ध्यान रखना बस."

"वह तोह मई करूँगा हे. लेकिन क्या मैं स्कूल में मोटरसाइकिल नहीं ले जा सकता?"

"बिलकुल नहीं. स्कूल है हे कितना दूर. और फिर ऐसे में रुपाली को भी तोह सब पता चलेगा न के aas-pas क्या है, उसकी भी सहेलिया बनेंगी जो शायद अपने हे सेक्टर से हो. और हाँ, जरा संभल कर रहना.", आखिरी बात का मंतव्य समझते हुए अर्जुन के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई.

"आप निश्चिंत रहिये. स्कूल में सभी बचे हे तोह होंगे तोह मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला.", अर्जुन की बात पर संजीव भैया उस से भी बड़ी मुस्कान देते हुए बोल पड़े.

"वह तेरे हिसाब से सभी बचे हे होंगे लेकिन साथ हे मैडम भी होती है. जो शायद तेरे साथ की हो सकती है."

"क्या भैया. ऐसा कुछ नहीं होने वाला. बस मेरा ध्यान ऐसी किसी चीज पर नहीं जाने वाला. पिछले साल भी इस स्कूल में हे था मई.", गिलास ख़तम करते हुए उसने वह दूकान वाले को दिए और दोनों भाई ऐसे हे बातें करते शहर में घूमने निकल पड़े. जहा संजीव भैया को कुछ काम थे और अर्जुन भी कुछ न कुछ ढून्ढ हे रहा था जहा भी वह मोटरसाइकिल रोकते थे. तक़रीबन 7 बजे शाम को दोनों घर वापिस आये तोह मुख्या द्वार पर हे माधुरी दीदी को किसी महिला से बातें करते देख अर्जुन ने बुलेट को बंद किआ. भैया अंदर चले गए लेकिन वह वही खड़ा कभी माधुरी दीदी तोह कभी उस महिला को देख रहा था. जिसका सिर्फ पृष्ट भाग हे दिख रहा था इधर से.

"ये मेरा छोटा भाई है, अर्जुन.", माधुरी दीदी ने बड़े प्यार से उस महिला से इतना कहा तोह पीछे मुड़कर जब उन्होंने अर्जुन को देखा तोह एक अदा से हाथ जोड़ कर अर्जुन से मुखातिब हुई. ये कश्यप जी की बहु सरोज थी, जिसके दमकते दांत और मुस्कराहट जैसे अर्जुन को व्यंग कर रहे थे.

"नमस्ते.", अर्जुन शर्माता हुआ चाबी निकल कर अंदर दौड़ गया. आज पहली बार उसने इतने ध्यान से सरोज को देखा था. पहले या तोह सड़क के पर या फिर अँधेरे में हे देख पाया था लेकिन आज जब इतने करीब से देखा तोह पाया था की ये नवब्याहता स्त्री थी बड़ी कामुक और दिलकश.

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"ाचा मैं चलता हु दादाजी, शुक्रवार तक हे वापिस आऊंगा.", सभी खाने की मेज पर थे जब संजीव भैया अपने सूटकेस उठाये उधर आये और अपने दादा के पांव छु कर बहार चल दिए. रामेश्वर जी ने भी आशीर्वाद देने के बाद अपना ध्यान सामने राखी थाली पर केंद्रित कर लिए.

"अब ये कहा चला गया इतनी रात में?", कौशल्या जी, जो साथ हे बैठी थी ने इतना हे पूछ लिए.

"भैया की कंपनी ने उन्हें सर मैनेजर बना दिए न तोह वह aas-pas के ज़िलों में काम करेंगे 5 दिन. आपको शायद पता नहीं दादी की उनकी कितनी बड़ी पोस्ट है.", अर्जुन ने जब ये बात कही तोह रामेश्वर जी को खाना खाते हुए हंसने की वजह से ठसका लगा. कौशल्या जी ने उन्हें पानी देते हुए अर्जुन से कहा.

"मुझे न बता उसकी पोस्ट का. अब सभी घर से बहार रहने लगे तोह फिर घर पे कोनसा मर्द रहेगा. तेरा बाप और ताऊ तोह पहले हे जाने कोनसे स्किन्टिस बने हुए है जो घर की खबर नहीं, ऊपर से ये भी अब हफ्ते में 5 दिन बहार रहने लगा है."

"दादी वह साइंटिस्ट होता है और फिर मैं और दादाजी तोह है हे घर में, मर्द.", अर्जुन ने ये जवाब दिए और बाकी सबका भी हँसके बुरा हाल हो गया. रेखा जी और ललिता जी भी सर पे पल्लू लिए रोटी बनती हंस पड़ी.

"देख लो जी अपने इस मर्द को. ये मुझे सीखा रहा. अरे नासपीटे पहले 12 जमात पार कर ले. कल तक तेरे कपडे मैंने हे बदले है. आया बड़ा. और चुपचाप खाना खा मैं तेरे बाप की खबर ले लू जरा फ़ोन कर के.", दादी बड़बड़ाती हुई अंदर चली गई और उनके पीछे हे कोमल दीदी उनके खाने की थाली लेकर.

"मत सताया कर थानेदारनी को. देख अब कैसे वह अपने बेटे से सबकी शिकायत करेगी, आधा घंटा. चल खाने के बाद थोड़ी सैर कर लेना और समय से सो जाना. कल स्कूल भी है तेरा.", रामेश्वर जी ने कपडे से हाथ साफ़ करने के बाद कुर्सी खाली की और अंदर चले गए. अर्जुन सामने बैठी तारा और आरती को देखता खाना खाने लगा. ऐसे हे कुछ देर तक सभी का खाना हो गया तोह ललिता जी और रेखा जी उनके कमरे में चले गए अपना भोजन करने और sukh-dukh बतलाने के लिए.

"तू कहा सोयेगा?", तारा ऊपर अर्जुन के कमरे में दाखिल हुई तोह वह अभी कपडे बदल कर बिस्टेर पर हे बैठा था.

"फ़िलहाल तोह पता नहीं. शायद संजीव भैया के कमरे में या फिर छत्त पर.", अर्जुन ने मजे लेते हुए जवाब दिए तोह तारा चुपचाप वापिस अपने बैठक वाले कमरे में चली गई. अर्जुन फिर से किताब में ध्यान लगाने लगा. रात के तक़रीबन साढ़े 10 बज चुके थे और इस समय सभी अपने अपने कमरों में हे थे.

रुपाली, अलका और आरती एक कमरे में, माधुरी, प्रियंका और कोमल दीदी अलग कमरे में बातें कर रही थी और ऋतू अपनी माँ रेखा से चिपकी उनसे बातें कर रही थी. आज बस ललिता जी हे अकेली थी अपने कमरे में और उन्होंने भी नींद की एक गोली खा ली थी सोने से पहले. अर्जुन ने बहार गेट को टाला लगाने के बाद एक बाद ाचे से जायजा लिए और फिर चुपचाप बहार वाले रस्ते से हे अपने कमरे में आने के बाद दरवाजा बंद कर लिए. तारा के कमरे में जहां सन्नाटा पसरा था और ऐरकण्डीशनर की ठंडक में एक चादर ओढ़े वह करवट लिए लेती थी.

"उम्म्म...", तारा की नींद में हे मस्ती से आह निकल गई जब अर्जुन के हाथ ने उसका एक पूरा नरम उभार अपनी हथेली में दबोचते हुए गर्दन पर होंठ चिपका दिए. चादर के अंदर वह सिर्फ अपने chir-parichit 2 कपड़ो में हे थी. निक्कर और बनियान जैसी टीशर्ट में. उसका मखमली बदन अर्जुन के सान्निध्य में आते हे जैसे तपने लगा था और नरम पड़ चुक्के चूचक किसी तीर की तरह एक हे क्षण में कड़े हो गए थे.

"तुम्हे पता था न के संजीव भैया का कमरा भी खली रहने वाला है और ऊपर छत्त भी.", अर्जुन ने दूसरे हाथ को भी तारा के नीचे से लाते हुए दूसरा उभार भी अपने हाथो में भर लिए था. मदहोश होती तारा ने अपने कूल्हे अर्जुन के उभरे हुए अंग से सताते हुए गर्दन पलट कर उसको देखा.

"ये भी पता था के तुम आओगे मेरे पास.", और फुर्ती से पलट कर वह अर्जुन की कमर पर आ बैठी. तारा ने खुद हे अपनी टीशर्ट उतारते हे ऊपरी भाग निर्वस्त्र किआ और झुकती हुई उसके होंठो को चूमने लगी. नीचे पूरी तरह अकड़ा हुआ लिंग तारा की योनि की नर्माहट से जैसे और भी फूलने लगा था. नरम ठोस चूचे अब अपनी पूरी उठान पर थे जिन्हे अर्जुन हथेली और उंगलियों से बड़े प्यार से मसल रहा था.

"फिर तोह मेरा ये सरप्राइज ख़राब हे गया.", एक चूचक को मुँह में लेने से पहले अर्जुन ने इतना कहा और जैसे हे उसके होंठो ने वह गोल दाना मुँह में भारः तारा की एक मजे की सीत्कार निकल गई.. "आह्हः.. कितना तड़पते हो न.. ुम.. बस जल्दी से एक बार मुझे भरपूर प्यार करो अर्जुन.. आह.", तारा की कामाग्नि अपने चरम पर थी. और बिना एक पल जाया किये उसने अर्जुन का पजामा निचे सरकने के बाद अपनी निक्कर भी उचक कर निकल फेंकी. तारा का तरल के सामान चिकना शरीर अब पूरी तरह से बेपर्दा था और अर्जुन का प्रचंड लिंग भी अपनी असल अवस्थ में सर उठाये खड़ा था. एक बार कस कर उसको मुट्ठी में भरने के बाद तारा ने घुटनो के बल हे खड़े होते हुए खुद को उस agra-bhaag पर टिकते हुए अपनी गुदाज योनि पर फिराया तोह कॉमर्स से भरी उसकी छोटी सी छूट की फांको ने भी पानी बहते हुए लिंगमुण्ड को पूरी तरह चमका का बता दिए के वो कितनी तैयार थी उसको अपने में सामने के लिए.

"अब नहीं तड़पाऊंगा.", अर्जुन ने तारा का सर निचे झुकाते हुए होंठो को मुँह में दबाया और अपनी कमर को ऊपर उछाल सा दिए. 'पुक्क' की आवाज से उसका वह 2-ढाई इंच लम्बा और विशाल सूपड़ा छूट के नरम मांस को फैलता तारा की छूट में पेवस्त हो गया. छूट में भरपूर चिकनाहट महसूस करते हे अर्जुन ने बिना रुके अगला धक्का भी लगा दिए और तारा का जिस्म किसी कटे पेड़ की तरह उसके ऊपर बिच सा गया. तारा ने कमाल की हिम्मत दिखाई जो अपनी चीख को गले में हे जज़्ब कर लिए.

"मारना चाहते हो क्या? आह.. अभी 2 बार हे किआ हमने वह भी समय समय के बाद.. ुयी मा.. फट गई है जैसे.", छूट की नरम मांसपेशिया पूरी तरह से उस मॉटे डंडे से चिपक सी गई थी. और लुंड भी कोई 7 इंच अंदर बैठ चूका था. संभालती हुई तारा के गाल चूमते हुए अर्जुन उसके कूल्हों को भी प्यार से मसलते हुए होंसला दे रहा था.

"आदत हो जाएगी तुम्हे जल्दी हे. बस 2-3 बार लगातार करेंगे तोह फिर आराम से होने लगेगा.", तारा के जिस्म की ख़ास बात उसका पर्याप्त सुडोल और नरम होना हे था. अर्जुन का ऐसे प्यार से थपकना, सहलाना जैसे सारा दर्द गायब कर रहा था. उतने हे लुंड को लिए तारा खुद हे हल्का हल्का शरीर आगे पीछे हिलने लगी थी. पीड़ा जरूर हो रही थी लेकिन अर्जुन की बात सही थी की आदत डालनी हे पड़ेगी.

"लेकिन ये पहले से कुछ ज्यादा हे मोटा लग रहा है और ज्यादा हे सख्त भी. उम्... मुझे हे करने देना.. आह.", कमर को अब वह अर्जुन के लुंड पर ठीक से घिस रही थी और साथ हे नंगे सतांन अर्जुन की चौड़ी छाती पर खासी रगड़ खा रहे थे. हर झटके के साथ वह सीत्कार करती अर्जुन की गर्दन, कान और गाल चूम रही थी.

"अभी तोह शायद डेढ़ या 2 इंच बाकी है तारा. लेकिन लगता नहीं के पूरा अंदर जायेगा.", अर्जुन ने तारा के नरम कूल्हों की फांके दोनों हांथो से फैलते हुए अपनी उंगलिअ अंदर धंसते हुए कहा. दोनों हे तरबूज सी बड़ी फांके नरम आते सी गूंथ रहा था वह और तारा की छूट से बेहटा पानी अब लुंड को ाची खासी फिसलन दे रहा था. बड़े आराम से अब वह 2-3 इंच लुंड को अंदर बहार करने लगी थी और कुछ 14-15 धक्को के साथ हे तारा का जिस्म बुरी तरह अकड़ गया. उसने जोर से अर्जुन के कंधे दबाते हुए अपनी छूट का कसाव लुंड पर बढ़ा दिए था. हलके हलके संकुचन करती छूट इस भयंकर सखलन से कांप रही थी. सब शांत हो गया था कुछ पल के लिए और फिर जैसे हे दोनों ने एक दूसरे की आँखों में देखा, तारा नीचे और अर्जुन अब उसके ऊपर आ चूका था. इस बार दोनों में हे दोगुना जोश था. अर्जुन की कमर में टाँगे लपेटे तारा उसका भरपूर साथ देती निरंतर नीचे से कमर चला रही थी और ऊपर अर्जुन भी उसकी बाहों के नीचे से हाथ किये सटासट लिंग अंदर बहार करते हुए छूट को लुंड के आकर का अभ्यस्त करा रहा था. फिर एक समय ऐसा आया के अर्जुन ने तारा का धड़ ऊपर उठाते हे बैठे हुए हे उसको गॉड में ले लिए और किसी कामशास्त्र की किताब सा आसान लिए वह अब उसकी बच्चेदानी के मुँह पर सूपड़ा भिड़ा रहा था. शरीर दोनों के नमी से भर चुके थे, कमरे में ठानी हवा के बावजूद और जब अंडकोष भारी होने लगे तोह तारा भी अपने चरम पर आ चुकी थी. जोर से गर्दन पर दांत गड़ाती तारा ने लुंड को पूरी तरह छूट की गिरफ्त में ले लिए. जैसे वह उसकी गर्दन टॉड देना चाहती हो. गरम बौछार जब छूट की अंदरूनी दीवारों पर गिरने लगी तोह दोनों हे एक दूसरे से कस के लिपट गए.

"आह..", निढाल होती तारा बिस्टेर पर पीठ के बल लुढ़क गई तोह छूट भी उस विशाल लुंड को छोड़ कर मुँह खोले हुए अर्जुन का वीर्य टपकती अलग हो गई.

"पता भी है अभी क्या हुआ?", अर्जुन ने सांसें दुरुस्त करते हुई खड़े हो कर कहा.

"कुछ नहीं हुआ. टेंशन मत लो और मैं खुद ये अपने अंदर महसूस करना चाहती थी. सेफ टाइम है मेरा.", तारा ने भी हिम्मत करते हुए खड़े हो कर कहा और अर्जुन का गाल चूम कर हल्का सा लड़खड़ाती बाथरूम में घुस गई. अर्जुन ने भी उसका ौंसरन किआ और खुद को बाथरूम में साफ़ करने के बाद अपने कमरे में जा कर लेट गया. रात के 12 बज चुके थे और सुबह उठना भी था. घर वापसी के दिन की ये एक सुखद समाप्ति थी. तारा भी अपनी जांघो को हल्का फैला कर मुस्कुराती हे अपने बिस्टेर में जा चुकी थी.
 
अपडेट 71

विद्यालय - एक आरम्भ


खून से साणे हाथ और कंधे पर संजीव भैया को उठाये अर्जुन उस घने अँधेरे से निकलता हुआ बस आगे हे बढ़ता जा रहा था. संजीव के चेहरे पर तीखे ज़ख्म और उनसे रिस्ता खून अँधेरे में हे जमीन को लहूलुहान करता जा रहा था. तभी एक हाथ ने मजबूती से अर्जुन के आगे बढ़ते हुए एक पाँव को जकड लिए. यहाँ चाँद की हलकी रौशनी में वह बस ये देख पाया था की फौलाद सा ये हाथ जिस व्यक्ति का था उसका भी चेहरा बुरी तरह से कटा हुआ था और पहचान में नहीं आ रहा था लेकिन जरुरत से ज्यादा हे मजबूत और बेजोड़ पकड़ थी इस हाथ में. अर्जुन चाह कर भी खुद को उस हाथ से छुड़ा न सका था. कंधे पर संजीव भैया और दूसरा हाथ जख्मी. अगले हे पल वह घुटनो के बल जमीन पर था.

"हहहहहह..", पसीने से tar-batar अर्जुन सीधा उठ खड़ा हुआ. खुद को नियंत्रित किआ था साँसें अभी भी धोंकनी की तरह चल रही थी और वह अपने हे कमरे में था. खुद के शरीर पर ाचे से हाथ फिरने के बाद जब संयतत हुआ तोह पता लगा के वह सिर्फ एक सपना हे था. लेकिन ये सपना ऐसा था जैसे सबकुछ असलियत में हे उसके साथ हुआ हो. उसने वह पीड़ा और दर्द भी महसूस किआ था. खड़े हो कर लाइट जलाई तोह बिस्टेर के सिरहाने पड़ा अलार्म 4:10 बजा रहा था. अलमारी के शीशे में अपना अक्स ध्यान से देखने पर अर्जुन ने पाया के पहली बार उसको इतना पास्यां आया था. जैसे नाहा कर निकला हो. लम्बे बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे और बलिष्ट शरीर पर सभी नस्से उभर आई थी. फिर खुद को शांत करता वह खुद से कहने लगा, "सपने भी न पता नहीं क्या कुछ दिखा जाते है. वैसे शरीर में बदलाव ाचा आ गया है."

साढ़े कदमो से बाथरूम में घुस कर फुहारे के नीचे खड़े हो कर खुद को ाचे से साफ़ किआ और ट्रैक पजामा, जूते और आधी ब्याह की काली टीशर्ट पहन कर वह आराम से नीचे उतर आया. गली इस अँधेरे में पूरी सुनसान थी और खम्बे पर लगा बल्ब अभी भी हलकी रौशनी दे रहा था. सामने कश्यप जी के घर पर नज़र दौड़ाई लेकिन कोई नजर न आया. अर्जुन हलके कदमो से दौड़ता हुआ आगे बढ़ चला.

अप्रैल के महीने में आज मौसम कुछ घुटा हुआ सा था, कुछ विपरीत सा. लेकिन बहार फिर भी मैं हल्का था अब और कदमो ने भी रफ़्तार पकड़ ली थी. अगले 15 मिनट तक वह एक सामान गति से दौड़ता वही अपने जंगल से स्थान पर आ पंहुचा था. शरीर को ाचे से खोलने के बाद वही कटे हुए तन्ने पर पाँव रखते हुए वह 100 समानांतर दंड पेलने के बाद वही बैठ गया. कितना सुकून था इस जगह पर. शायद यही एक जगह थी जहा वह सबसे ज्यादा अपने आप को महसूस कर सकता था. ऐसे बैठे हुए हे वह dhyaan-mudra में लीं हो गया.

अब हर आवाज, हर हरकत और हवा के सटीक गति वह महसूस और सुन्न प् रहा था. पूरा चित्त हल्का हो गया और फिर साइकिल की बजती घंटी से उसका ध्यान भांग हुआ तोह आँखें खोलते हुए देखा के सामने दूर से हे साधू सिंह दूध के कनस्तर लिए आ रहे थे. स्फूर्ति से खड़ा होता वह उनकी हे और चल दिए.

"राम राम अंकल जी."

"राम राम बीटा. बहुत समय बाद दिखे हो. सब कुशल मंगल है न बीटा?", बड़े स्नेह से साधू सिंह ने अर्जुन से मुलाकात की और अर्जुन ने भी पाँव छु कर शिष्टाचार दिखाया.

"सब ठीक है अंकल जी. ननिहाल गया हुआ था और कल हे वापिस आया हु. और आज से हे स्कूल भी खुल रहे है.", साधू सिंह बड़े इत्मीनान से अपने इस नौजवान दोस्त की बातें सुन्न रहा था.

"बड़ी ाची बात है बीटा. आज पहला दिन है तोह पूरी तैयारी कर ली होगी तुमने.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन का माथा थांनका. बैग, किताबे, वर्दी सभी चीजों का जायजा नहीं लिए था उसने अभी तक. लेकिन फिर ध्यान आया के समय हे क्या हुआ और अगर अभी वापिस जाए तोह सब तैयारी हो सकती है आराम से.

"अभी आपके हे साथ वापिस चलूँगा न तोह बस्ता और ड्रेस तैयार कर लूंगा.", साधू सिंह भी समझ गए थे अर्जुन को और दोनों ऐसे हे बातें करते हुए पैदल हे चल दिए. साढ़े 5 का समय था और अर्जुन घर के बहार वाले आँगन में बैठा अपन doodh-laddu भोग रहा था. तसल्ली हो गई थी की उसकी बहनो ने पहले से हे सब काम कर दिए थे अर्जुन के. वह से फारिग हो वह चुपचाप अपनी माँ के कमरे में दाखिल हो गया. रेखा जी अभी बाथरूम गई थी नहाने के लिए तोह काम से काम 15 मिनट तोह उन्हें लगने हे थे. और अर्जुन के लिए इतना समय बहोत था अपनी प्यारी बड़ी बहिन को सताने के लिए.

छुईमुई सी ऋतू किसी छोटे बचे सी बिस्टेर पर करवट लिए सो रही थी. इतना शांत और मोहक चेहरा जो बेखबर था साड़ी दुनिया से. अर्जुन ने ध्यान से इस खूबसूरत पारी को देखा और चेहरे पर झुकते हुए ऋतू के मुलायम गाल पर अपने होंठ रख दिए. ऋतू इस स्पर्श से हल्का सा हिली और फिर वैसे से नींद में मगन लेती रही. अर्जुन ने बराबर लेट कर चादर के ऊपर से हे कमर में हाथ डाला और अपनी बहिन के महकते बालो को सूंघने लगा. उसको खुद पता न चला के कब उसकी आँखें बंद हो गई और जब आँख खुली तोह ऋतू बस उसके हे चेहरे को देख रही थी. दोनों हे मुस्कुरा दिए और ऋतू जल्दी से उसके होंठो पर प्यार भरा चुम्बन देती बिस्टेर से उठ कड़ी हुई.

"गुड मॉर्निंग. और अब तैयार होना है या ऐसे हे लेते रहना है.", ऋतू की बात ख़तम हुई हे थी की कमरे में बाल सूखती रेखा जी भी दाखिल हो गई.

"मुन्ना कब आया यहाँ? और ये क्या सोने लगा है?", अपने बेटे को देख वह प्रसन्न तोह हुई साथ हे प्रश्न भी कर दिए.

"अभी आया ये यहाँ और मुझे उठा कर खुद पसर गया. बोलो इसको के नाहा ले और तैयार हो के जाए पढ़ने लिखने.", ऋतू इतराते हुए कह रही थी और अर्जुन भी हँसता हुआ अंदर वाले बाथरूम में चल दिए.

कोई आधे घंटे बाद रूपाली और अर्जुन, दोनों हे खाने की मेज पर बैठे हुए थे. जहा रुपाली अपनी उम्र से छोटी, हलकी फुलकी लग रही थी वही अर्जुन स्कूल की शर्ट में लम्बा चौड़ा पहलवान सा. शर्ट उसकी बाजू पर फांसी हुई थी और जब भी वह खाने के लिए हाथ मुँह तक लेके जाता तोह बाजू की मछलियां और उभर कर बहार निकल आती. प्रियंका बड़े ध्यान से ये देख रही थी और अलका इन दोनों को. फिर चुपके से प्रियंका के बराबर कड़ी होते हुए उसने धीमी आवाज में कहा.

"देख रही हो कैसा है ये?", अलका की इस सरगोशी से और अर्जुन को इतने ध्यान से देखने पर प्रियंका के शरीर में करंट सा दौड़ रहा था. पेट के नीचे जैसे उथल पुथल मची हुई थी. गुलाबी चेहरा लिए प्रियंका बिना जवाब दिए वापिस कमरे में चली गई.

"एक और लग गई लाइन में. सच में कैसा लड़का है ये. आने दो जरा आज इसको वापिस स्कूल से.", अलका मैं में ये सब कहती अपना होंठ kaat-ti हुई अर्जुन के हे बराबर बैठ गई.

"माँ कॉफ़ी दे दो मुझे भी और ऋतू भी आ रही है बस.", अलका ने टेबल पर रखा अखबार उठाया और देखने लगी. ऋतू भी बराबर आ कर बैठ गई और दोनों जाने क्या गुपचुप बातें करती रही धीमी आवाज में और फिर थोड़ी देर बाद उठ कर कमरे में चली गई.

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दोनों के बैग अपनी साइकिल के हैंडल में टाँगे हुए अर्जुन रूपाली से बातें करता हुआ जा रहा था. रूपाली को भी अर्जुन का ऐसे उस से बातें करना और परवाह करना खूब भ रहा था. अर्जुन के रूप में उसको एक प्यारा भाई मिल गया था और अब वह परिवार में सबसे हिलमिल गई थी. बातें करते हुए दोनों जब आकांक्षा के घर के पास पहुंचे तोह अर्जुन ने देखा के वह अपने घर के बहार एक खूबसूरत गुलाबी बैग लिए शायद उसका हे इंतज़ार कर रही थी. पास आते हे अर्जुन ने उसको hello बोलै और फिर जल्दी से रूपाली का परिचय एक हे लाइन में करा दिए.

"Hello आकांक्षा, इनसे मिलो ये है मेरी सिस्टर रूपाली और ये भी हमारी क्लास में हे दाखिल हुई है, मेडिकल स्ट्रीम में. और दीदी ये है आकांक्षा, लास्ट ईयर से मेरी क्लास मात.", अर्जुन को ऐसे अपनी बहिन का परिचय करते देख आकांक्षा की हंसी चूत गई. वैसे तोह एक पल के लिए वह भी परेशां हो गई थी अर्जुन को एक लड़की के साथ हँसते हुए बातें करते आते देख. लेकिन अब उसको तसल्ली हो गई थी और chir-parichit मुस्कान उसके गोर मुखड़े पर बता रही थी सबकुछ.

"Hello रूपाली. ाचा लगा आपसे मिल कर.", आकांक्षा ने भी हाथ मिलाया और घर से निकलने के 5 मिनट बाद हे रूपाली को एक सहेली मिल गई थी. यहाँ से स्कूल का रास्ता 5 मिनट का हे और था लेकिन पूरे रस्ते वह दोनों लड़किया अपनी हे बातें करती रही और अर्जुन चुपचाप उनके पीछे चलता बस यही सोच रहा था, "ये लड़किया"

स्कूल के बड़े गेट पर हे अर्जुन को संदीप दिख गया और अभी स्कूल शुरू होने में 15-20 मिनट का वक़्त था तोह अर्जुन ने रूपाली को आकांक्षा के साथ अंदर जाने को बोलै और खुद संदीप के साथ एक तरफ लगे अशोक और सफेदे के वृक्षों के पास खड़ा हो गया.

"क्या बात है भाई आज पहले हे दिन 2-2 लड़कियों के साथ.", संदीप की इस बात पर अर्जुन हँसते हुए बोलै

"वो मेरी बहिन है रूपाली और अब से वह भी यही पढ़ने वाली है.", बात तोह अर्जुन ने संदीप से की थी लेकिन एक और आवाज उसके पीछे से आई.

"बहिन हे बनता रहिओ तू झंटू. और तेरे बस में है क्या? शरीर बड़ा और लुंड मूंगफली.", ये सनी था जो इन दोनों से सीनियर था और संदीप इसका ाचा खासा चेला था. लेकिन सनी का अर्जुन को ऐसे कहना उसको भी बुरा लगा.

"सनी भाई ये मेरा दोस्त है. थोड़ा तोह लिहाज किआ करो.", संदीप ने बेबसी से कहा और इसके साथ हे 5-6 लड़को की ये टोली उनके साथ हे आ कड़ी हुई.

"रहने दे भाई, कोई बात नहीं. मजाक कर रहे है हमारे से और सीनियर की बात का क्या बुरा maan-na.", अर्जुन ने माहौल को वैसे हे ठंडा रखते हुए कहा और फिर अंदर चल दिए. अपनी क्लास और सेक्शन भी देखना था उसको नोटिस बोर्ड से. और अंदर ाची खासी भीड़ थी आज. सभी एक जैसी ड्रेस में.

"देखा मुकेश मैंने कहा था न के शरीर से हे बड़ा है वह लेकिन जिगरा लुंड जितना और लुंड शायद है हे नहीं उसका. और ये संदीप सारा टाइम उसकी गांड में घुसा रहता है.", सनी ने ये बात संदीप के पिछवाड़े पर हाथ फेरते हुए कही और सभी हंसने लगे.

"सनी भाई मुझे तोह शक है कही संदीप हे तोह उसका यार नई है. इसको लड़की मिलने से रही और वह तोह खस्सी है हे.", मुकेश की इस बात पर वह सभी 7-8 लोग जोर से ठहाके मार रहे थे और फिर अपने टीचर्स को आते देख अंदर चल दिए. संदीप को गुस्सा तोह आ रहा था लेकिन वह अकेला था और वैसे भी सनी और मुकेश स्कूल के बदनाम लड़के होने के साथ हे maar-peet में दक्ष थे. वो अकेला भी उनमे से किसी का कुछ नहीं बिगड़ सकता था. डूबे दिल से वह भी नोटिस बोर्ड की तरफ चल दिए जहा अर्जुन खड़ा कुछ और स्टूडेंट्स से बातें कर रहा था.

"तेरा सेक्शन स है भाई और मेरा ा. और मेडिकल वालो का तोह सेक्शन हे एक हे है. सबसे ज्यादा कॉमर्स और हमरे 3-3 सेक्शन है.", अर्जुन ने पास आते संदीप को देख कर जानकारी दी.

"मैं अपना सेक्शन चेंज करवाता हु भाई प्रिंसिपल मैडम से बात करके. तेरे हे सेक्शन में आता हु.", संदीप ने सुना तोह उसको दुःख हुआ क्योंकि पिछली क्लास में तोह वह दोनों एक सेक्शन में हे थे. इस बार अलग कैसे हो गए सेक्शन. दोनों यहाँ से पहली मंजिल में बने क्लास्सरूम्स की तरफ चल दिए. एक क्लासरूम के बहार लिखा था N.M. 11 ा तोह अर्जुन उसमे दाखिल हो गया और एक क्लास छोड़कर अगले वाले में संदीप. आकांक्षा भी अर्जुन के हे सेक्शन में थी और अभी वह वही पर थी जब अर्जुन अंदर आया. एक दूसरे को देख दोनों में इशारा हुआ और अर्जुन ने गेट के पास हे सबसे आगे वाले बेंच पर अपना बैग रख दिए. आकांशा उसके साथ हे बीच वाली कतार के सबसे पहले बेंच पर बैग रखे थे. दोनों हे बहार निकल आये प्रार्थना के लिए ग्राउंड जाने को और उनसे पहले वाले क्लासरूम से निकली रूपाली भी साथ हे चल दी.

संदीप का पूरा सेक्शन हे शरारती या औसत (%) बचो वाला था. सभी उसकी पहचान के थे तोह वह भी उनके साथ हे बहार हो लिए.

"स्टूडेंट्स, I'm विद्या वर्मा एंड योर क्लास इंचार्ज एंड मैथमेटिक्स टीचर. आप सभी का आज पहला दिन है तोह हम आज सिर्फ इंट्रोडक्शन लेंगे और रूटीन मॉडल डिसकस करेंगे. आप सभी स्टूडेंट्स के डेली 5 पीरियड्स होंगे और सैटरडे सिर्फ 3. 4 सब्जेक्ट्स कंपल्सरी और एक चॉइस सब्जेक्ट रहेगा, जैसा आपने फॉर्म में भरा होगा. एडिशनल डेवलपमेंट के लिए 2 दिन कंप्यूटर क्लास रहेंगे. चलिए यहाँ से शुरू करते है और फिर सभी स्टूडेंट्स अपना इंट्रोडक्शन सीरीज में देते जायेंगे.", ये एक मर्यादित पहनावे वाली कोई 40 साल के करीब महिला थी. कंधे तक सलीके से काटे हुए काले बाल और एक महंगे फ्रेम वाला नजर का चस्मा लगाए. आकर्षक व्यक्तित्व और मीठी लेकिन अनुशाषित आवाज वाली खूसूरत महिला. कॉटन की सलीके से बंधी safed-hari साड़ी और बिना ब्याह का गहरा हरा ब्लाउज खूब जाँच रहा था विद्या मैडम पर. कानो में सोने के बारीक टोपस जिनमे हरे रंग का पन्ना भी जैसे कपड़ो से मेल खा रहा था. 24 स्टूडेंट्स की इस क्लास में सभी की नजर अपनी क्लास इंचार्ज पर हे थी और बात ख़तम होते हे सबसे आखिरी कतार में बैठे हुए पहले लड़के ने अपना परिचय दिए. 3 कतार और हर कतार में 4 डेस्क पर 2-2 स्टूडेंट थे.

जैसे जैसे सभी अपना परिचय, पसंद का सब्जेक्ट और पसंद का काम बताते जा रहे थे वैसे वैसे सभी एक दूसरे के बारे में जान प् रहे थे. कुछ विद्यार्थी पहले से एक दूसरे को जानते थे और कुछ नए थे जो आपस में मेल जो बढ़ा रहे थे.

"माइसेल्फ अर्जुन शर्मा, ी लिखे रीडिंग बुक्स एंड माय फवौरीते सब्जेक्ट इस अन्सिएंट लिटरेचर एंड माइथोलॉजी.", जैसे हे अर्जुन ने ये कहा तोह कही से हंसी और कही कुछ स्टूडेंट बड़ी हैरानी से उसको देख रहे थे. विद्या मैडम ने ध्यान से सुना लेकिन तुरंत कुछ न कहते हुए साथ में बैठे लड़के को इशारा किआ.

"माय नाम इस दिनेश गर्ग. ी लव प्लेइंग क्रिकेट एंड माय फवौरीते सब्जेक्ट इस मैथमेटिक्स.", अर्जुन ने भी ध्यान से अपने सहपाठी को सुना और उसके बैठने के बाद दोनों ने हाथ मिलाया और फिर बाकी बचे 6 लोगो ने भी अपना परिचय दिए.

"Okay That's आल फॉर टुडे. आप सभी को बहोत शुभकामनाये और हम कल मिलते है मैथ की Part 1 बुक के साथ.", समय से पहले हे विद्या मैडम क्लास से चली गई सबको आपस में मेलजोल बढ़ने का बोल कर और मर्यादा में रहने के लिए. वैसे भी 10 हे मिनट तोह बाकी थे.

"भाई मेरा नाम धर्मेंदर है और इसका सुशिल.", पिछले डेस्क वाले लड़के ने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया तोह अर्जुन ने दोनों से हे गर्मजोशी से हाथ मिलाया. दिनेश ने भी वही दोहराया. आपस में एक दूसरे को अपने बारे में थोड़ा बहोत बतया तोह पीरियड की घंटी बज उठी और साथ हे दरवाजे पर कड़ी एक लम्बी गोरी पंजाबी सी महिला, जो हलके गुलाबी कमीज और सफ़ेद पजामी पहने थी, क्लास में आ गई. सभी स्टूडेंट्स ने खड़े हो कर गुडमॉर्निंग कहा तोह हाथ के इशारे से सबको बैठने का बोल कर वह भी बोर्ड के सामने राखी डेस्क से जुडी कुर्सी पर बैठ गई.

तक़रीबन 5'9" लम्बाई, यौवन से भरी और कश्मीरी सेब सी लाल ये टीचर पहले तोह ख़ामोशी से पूरी क्लास का जायजा लेती रही फिर रजिस्टर उठा कर अटेंडेंस लेने का उपक्रम शुरू कर दिए. तक़रीबन 5 मिनट बाद हाजरी पूरी होते हे सफ़ेद चाक उठा कर बोर्ड पर तारीख लिखने के साथ हे chapter का नाम लिखा और बोलना शुरू.

"एनर्जी"

"हम किसी एक chapter को फॉलो नहीं करेंगे और पहले हफ्ते सिर्फ बेसिक्स पर बात करेंगे जिस से सभी को पहले हे क्लियर हो जाये और बाद में कोई प्रॉब्लम न हो. इस से ये भी पता लग जायेगा की आप सभी ने टेंथ क्लास में कितना पढ़ा है और कितना अभी बाकी है. आज का टॉपिक है एनर्जी और इसके टाइप्स. कोई बता सकता है के एनर्जी की सही डेफिनेशन क्या है?", इन्होने जैसे पूरी क्लास के बचो को कोई अहमियत दिए बिना हे पढ़ना शुरू कर दिए. और पहले हे शब्द पर सवाल जिसके लिए पूरी क्लास ने हाथ ऊपर उठा लिए सिवाय अर्जुन के और जब मैडम की नजर उसपर पड़ी तोह उसने भी हाथ डेस्क पर रखते हुए उठा लिए.

"यस यू. और हाथ इतना लेट क्यों उठाया?"

"वो मम इसका आंसर तोह पूरी क्लास को पता है लेकिन मुझे ये पूछना है के आपका नाम क्या है और आप कोनसा सब्जेक्ट पढ़ने वाली है?", एक बार तोह पूरी हे क्लास हंस हंस के लोटपोट हो गई लेकिन जैसे हे इन मैडम की सार्ड और तीखी आवाज सुनाई दी सभी के सभी सेहम कर सीधा बैठ गए.

"अरे यू फूल.? ऊपर लिखा हुआ देख कर पता नहीं चला के क्या सब्जेक्ट है? एंड माय नाम इस नॉट इम्पोर्टेन्ट अस ऑफ़ नाउ. गेट आउट ऑफ़ माय क्लास.", उनकी बात सुनकर अर्जुन चुपचाप अपनी जगह से खड़ा हुआ तोह एक बार साड़ी क्लास की नजर इस 6 फ़ीट से ऊँचे लड़के पर चली गई, जिस पर पहले किसी का ऐसे ध्यान नहीं गया था. और इस मैडम ने भी बड़े गौर से देखा की कैसे ये चुपचाप उनके पास से हो कर बहार निकल गया, नजरे नीचे किये हुए हे.

"सुच बेहेवियर इस नॉट अक्सेप्टबले इन माय क्लास. जस्ट लुक ात हिज ऐटिटूड. सॉरी भी नहीं कहा क्योंकि मेरी क्लास इतनी इम्पोर्टेन्ट नहीं है बूत ट्रस्ट फिजिक्स के बिना कोई भी इंजीनियर तोह क्या इलेवेंथ क्लास भी पास नहीं कर पायेगा.", उनकी बात सुनकर क्लास के बहार खड़ा अर्जुन बस मुस्कुरा रहा था और गलियारे में से गुजर रहे teachers/students को भी देख रहा था. अगले 10-15 मिनट तक बस अंदर से इन मैडम की आवाज और बोर्ड पर एनर्जी के बेसिक्स पर डिस्कशन होता रहा.

"ओह पहलवान, पहले हे दिन क्लास से बहार निकल गया? किसकी क्लास है?", ये एक छरहरी सी मैडम थी कोई 25-26साल की, बेहतरीन स्पोर्ट्स टीशर्ट और स्पोर्ट्स pajama/shoes पहने हुए. रंग गोरा गेंहुआ लेकिन चमकदार और बाल सलीके से एक रबर में बंधे, कंधे से कुछ नीचे तक. होंठो के ऊपर एक छोटा सा काला टिल. अर्जुन को ऐसे स्कूल के गलियारे में क्लास के बहार देख कर वह सीधा उसके सामने आ कड़ी हुई.

"गुड मॉर्निंग मिस. और नाम पूछने की वजह से हे क्लास से बहार हु.", अर्जुन की बात सुनते हुए वह भी बड़े ध्यान से इस गठीले, lambe-chaude लेकिन मासूम सी शकल के लड़के को देख रही थी.

"ओह तोह आते हे मिस वालिए के हाथ चढ़ गए, फिजिक्स टीचर. चलो मई बोलती हु उनको और आगे से ऐसा वैसा कुछ मत करना इनकी क्लास में.", इतना बोलकर वह अर्जुन को लेकर अंदर दाखिल हुई तोह पहली बार फिजिक्स की मैडम के चेहरे पर पल भर के लिए हलकी सी मुस्कराहट आई और उन्होंने इन मैडम को विश किआ.

"आइये मिस सिंह. क्लास she's मिस चारुल सिंह, योर फिजिकल एजुकेशन फैकल्टी.", साड़ी क्लास ने खड़े हो कर उनका अभिवादन किआ तोह मिस सिंह ने सबको मुस्कुरा कर बैठने का इशारा किआ.

"अरे बस बस वालिए मम. आप क्लास कंटिन्यू कीजिये. मैं तोह इतना कहने आई थी के आज फर्स्ट डे है और ये लड़का अभी आपको जानता भी नहीं था. पहली गलती समझ कर माफ़ कर दीजिये और आगे भी इसने कोई कायदा तोडा तोह फिर मैं देखूंगी इसको.", उनकी बात सुनते हे मिस वालिए ने इशारे से अर्जुन को सीट पर जाने को कहा और फिर मिस सिंह उनसे बाद में मिलने का बोल कर बहार निकल गई.

"अगर किसी को कुछ डाउट है तोह वह पूछ सकता है और फिर मैं क्वेश्चन करुँगी.", मिस वालिए के इतना कहने के बाद किसी की मजाल नहीं हुई हाथ उठाने की. अर्जुन बस डेस्क पर हाथ रखे इस गुस्सैल खूबसूरत मिस वालिए को हे बड़े प्यार से देख रहा था. जब भी वह अर्जुन की तरफ देखती वह नजर बोर्ड पर कर लेता.

"Ok फाइन. नाउ माय क्वेश्चन इस, "व्हाट इस थे यूनिट ऑफ़ एनर्जी?", प्रश्न के साथ हे सबके हाथ ऊपर लेकिन अर्जुन ने हाथ नहीं उठाया.

"यस यू. स्टैंड उप एंड आंसर.", लेकिन आज जैसे टकराव लिखा हे अर्जुन के साथ था.

"थे जौल एंड इतस सिंबल इस 'ज'." अर्जुन ने आँखों में देखते हुए जवाब दिए जो बिलकुल सही था. लेकिन बात यहाँ रुकने वाली नहीं थी.

"एंड व्हाई वे कॉल आईटी जौल?", ये बेशक gair-jaruri क्वेश्चन था लेकिन अर्जुन पहली हे बार में खटक सा गया था इन मैडम को

"इन हॉनर ऑफ़ जेम्स प्रेस्कट जौल. देय तो हिज एक्सपेरिमेंट्स ों थे मैकेनिकल एक्विवैलेन्ट ऑफ़ हीट.", लेकिन अर्जुन शांतचित्त बस जवाब बताते हुए भी उन्हें हे देख रहा था. गोरा चेहरा थोड़ा सुर्ख होने लगा था लेकिन वह एक टीचर थी तोह खुद को ाचे से काबू किये थे.

"ेलबोरते फार्मूला ऑफ़ एनर्जी ऑफ़ मोशन.", मैडम ने थोड़ा सोच कर ये प्रश्न किआ और आकांक्षा कभी मैडम को तोह कभी अर्जुन को देख रही थी.

"के= 0.5 क्ष म क्ष व् स्क्वायर. वेयर 'म' इस मास्स, 'व्' इस स्पीड एंड के इस काइनेटिक एनर्जी और एनर्जी ऑफ़ मोशन.", अर्जुन का जवाब ख़तम होते हे पीरियड ख़तम होने की घंटी बज गई और मिस वालिए ने एक ठंडी आह भरी.

"क्लास वे विल कंटिन्यू आवर टॉपिक एंड डिस्कशन टुमारो. एंड माय नाम इस मिस अन्नू वालिए. हैवे ा गुड डे अहेड.", ये सब उनोहने जैसे मचिनी भाषा में कहा और फिर

तेज कदमो से क्लास से बहार निकल गई.

"मान गए गुरु. पहले हे दिन पन्गा भी हो गया और ऊपर से मैडम को क्या जवाब दिए भाई. मजा आ गया देख कर.", दिनेश ने अर्जुन को गर्मजोशी से पकड़ते हुए कहा और पीछे से भी दोनों लड़को ने उसकी पीठ थपथपाई. ऐसे हे कई जोड़ी आँखें भी उसको इज़्ज़त्त से देख रही थी और आकांक्षा तोह और भी मुरीद हो गई थी अर्जुन की.

"तुम्हे क्या लगता है क्या बात यही ख़तम हो गई? कल आते हे देखना वह मैडम पक्का तुम्हे हे खड़ा करेंगी.", ये एक चश्मे वाली लड़की थी जो आकांक्षा के पीछे बैठी थी और इन सभी की बातें सुन्न रही थी. साधारण से चेहरा, 2 गुंथी हुई चोटियां और आँखों पर पावर का चस्मा.

"मैं भी तोह यही चाहता हु के मिस अपने सभी सवाल मुझसे पूछ ले. इस बहाने शायद मैं कुछ ज्यादा सीख भी सकू.", अर्जुन ने भी मुस्कुरा कर उसको जवाब दिए.

"कोयल, कोयल ग्रोवर.", इस लड़की ने अगले हे पल अर्जुन के आगे हाथ बढ़ाया तोह उसने भी हलके हाथो से हाथ मिलते हुए अपना नाम बताया.

"सोच ाची है तुम्हारी.", कोयल ने इतना हे कहा और एक बार फिर साडी क्लास कड़ी हो गई थी.

ये कोई 60-61 साल के टीचर थे जिनका व्यक्तित्व बड़ा साधारण सा था. सफ़ेद कमीज और नीली पंत पहने हुए. शारीरिक भाषा किसी आर्मी के व्यक्ति जैसी.

"मेरा नाम है दर्शन सिंह, आपका नया सहपाठी समझ सकते हो क्योंकि साथ हे पढ़ना है लेकिन सब मुझे इंग्लिश का टीचर हे कहते है.", उनके ऐसे परिचय पर पूरी क्लास खुश हो गई और साथ हे वह भी.

"सो स्टूडेंट्स और बेटर ी कॉल यू माय यंग गन्स, थिस इस योर क्लास एंड ी ऍम ात योर सर्विस. Let's स्टार्ट विथ बेसिक इंट्रोडक्शन एंड वे विल टेक आईटी तो काम्प्लेक्स लेवल विथ एव्री पासिंग डे.", उनके कहने का अंदाज़ हे ऐसा था के सभी सकरात्मक ऊर्जा से भर उठे. अगले 40 मिनट कैसे बीत गए पता हे नहीं चला. और दर्शन सिंह का मजाक मजाक में पढ़ने का निराला तरीका सबको भ गया. कब घंटी बजी पता हे नहीं चला और जब दरवाजे पर मिस चारुल सिंह ने दस्तक दी तब कही सबका ध्यान भांग हुआ.

"सॉरी मम. ी ऍम वैरी सॉरी तहत ी फॉरगॉट माय लिमिटेड इंटरवल व्हिले लर्निंग ा लोट विथ माय नई फ्रेंड्स. प्लीज के एंड टेक योर सीट.", दर्शन जी ने जिस तरह से मिस चारुल सिंह का स्वागत किआ वह खुद भी हँसते हुए क्लास में आई और उनको बड़ी इज़्ज़त्त से प्रणाम करती बोर्ड के सामने आ कड़ी हुई. दर्शन जी सबको हाथ हिलने के बाद क्लास से निकल लिए, हँसते मुस्कुराते.

"हाँ तोह भाई सब लोग अब जोश में हो तोह जरा लाइन से ग्राउंड में चले? वैसे मेरा नाम चारुल सिंह है और मैं क्लास से सबको बहार निकलती हु अपना नाम बताने के बाद." ये बात उन्होंने अर्जुन को देखते हुए कही थी, जो सब समझने के बाद अब शर्मा रहा था. सभी बचे कतारबद्ध क्लास से बहार सीढ़ियां उतारते हुए बड़े ग्राउंड की तरफ चल दिए. ऐसा नहीं था के अर्जुन कोई अनजान था, लेकिन यहाँ इस स्कूल में 2 हिस्से थे. दसवीं तक के लिए और एक सीनियर क्लासेज के लिए. ऐसे हे खेलने के मैदान भी अलग थे यहाँ और साथ हे जो स्टूडेंट्स राज्यस्तर या नेशनल खेलते थे उनको अलग से प्रशिक्षण मिलता था. इसलिए अर्जुन के लिए पे की फैकल्टी मिस चारुल सिंह भी नयी हे थी.

सभी जब इस बड़े मैदान में आ गए तोह मिस चारुल ने सभी को अपनी मर्जी से खेलने की अनुमति दे दी. लकियन ग्राउंड के किनारे बानी सीढ़ियों पर बैठ बातें करने लगी तोह 7-8 लड़के फुटबॉल लेकर फुटबॉल नेट्स में चले गए. यहाँ फूटबाल के अलावा क्रिकेट की पिच और बास्केटबॉल के भी 2 ाचे दर्जे के कोर्ट थे. दिनेश, धरमिंदर और सुशिल की kadd-kathi भी ठीक थी और उन्होंने भी एक बास्केटबॉल उठाई और चल दिए कोर्ट पर. 2 और लड़के भी उनके साथ हो लिए. अर्जुन ध्यान से सब तरफ देख रहा था फिर जैसे हे उसने सुशिल की आवाज सुनी तोह वह भी कोर्ट की तरफ चल दिए.

"भाई, आजा एक गेम लगते है. 10-10 मिनट के 2 हाफ. तू, मई और ये है गौतम. और उधर दिनेश, धरमिंदर और सुकरात.", सुशिल ने अर्जुन को बताया और अर्जुन ने भी गौतम के साथ हे सुकरात से हाथ मिलाया.

"देखो भाई ये खेल ज्यादा आता नहीं मुझे बस थोड़े रूल पता है.", अर्जुन ने इतना हे कहा तोह बाकि सभी उस कोर्ट के बीच में बने गोले पर आ खड़े हुए.

"अरे भाई सिर्फ टीम हे पूरी करनी है. इधर तुझे खेलना नहीं आता और उधर धरमिंदर को. बस जितना आता है उतना हे करना. बॉल दोनों हाथो में लेके नहीं भागना, इस लाल पट्टी से बहार नहीं जाना और अगर मौका मिले तोह सामने वाले के बास्केट में बॉल से निशाना लगा देना.", सुशिल ने जितना समझाया अर्जुन को उस से तोह कही ज्यादा हे पता था. लेकिन वह खेल में अतिरिक्त खिलाडी की तरह बस बहार से खेल रहा था. सुकरात, गौतम और सुशिल की गेम ाची थी लेकिन दिनेश इन तीनो से हे तेज था. वही धरमिंदर बिलकुल हे नौसिखिया सा बस इधर उधर भाग रहा था. 5-6 मिनट ऐसे हे दोनों टीम भिड़ती रही की दिनेश ने 3 पॉइंट का बास्केट कर दिए. उसकी फुर्ती देखते हे बनती थी.

"भाई इतना बड़ा शरीर है तेरा, काम से काम इसके सामने हे आ जाया कर.", गौतम इस बार अर्जुन के पास आ कर बोलै. इतनी हे देर में बेचारो की कमीज पसीने से गीली हो चुकी थी. अर्जुन भी कुछ सोचता सुकरात के दाए तरफ आने लगा जिस से उसके पास बॉल न आ पाए. और हुआ भी ऐसा हे. धरमिंदर के हाथ गलती से बॉल आई लेकिन दिनेश को पास करने की जगह उसने सुकरात की तरफ उछाल दी. और यही अर्जुन चट्टान सा बीच में आ गया. तीन लोग पिछले हाफ में थे और सुकरात अर्जुन से 2 कदम पीछे. सामने सिर्फ धरमिंदर हे था.

अर्जुन ने बॉल को बास्केट की दिशा में करते हे दोनों कंधे के ज़ोर से एलिवेशन दी और सीधा बॉल चले के अंदर.

"5 पॉइंट भाई 5 पॉइंट.", ख़ुशी से उछलता हुआ सुशिल अर्जुन के गले लग गया.

"तुक्का लग गया तोह क्या हुआ. एक हे बार लगता है हर बार नहीं.", दिनेश ने रूखे अंदाज में कहा लेकिन अर्जुन ने भी उसका हे साथ दिए.

"हाँ भाई वह अपने आप हे दाल गई थी. मुझे आता नहीं ये खेल. और शरीर देखो मेरा कही से लगता है बास्केटबॉल या फुटबॉल जैसे खेल मई खेल भी सकता हु.", उसकी बात पर दिनेश भी हंस दिए.

"कुछ भी बोल भाई लड़का तू एक नंबर है. चल और नहीं खेलते. बहोत पसीने आ गए है और अभी 2 क्लास बाकि है इसके बाद. चलो मुँह हाथ धो के आते है साइकिल स्टैंड की तरफ.", दिनेश ने कहा तोह अर्जुन को छोड़ कर सभी वह से पानी के कूलर की तरफ चल दिए.

बॉल को कोर्ट पर ड्रिबल करता वह मुस्कुरा रहा था. हर ठप्पे पर बॉल अलग दिशा में घूमती, जैसे वह चाहता वैसे हे. और सेण्टर से आधे से भी ज्यादा दुरी पर कोर्ट के बहार खड़े हुए हे उसने नेट पर निशाना लगाया और इस बार भी बॉल बिना हे बोर्ड से टकराये सीधा बास्केट नेट के अंदर. लेकिन जैसे हे वह मुदा सामने मिस चारुल कड़ी मिली.

"हाँ तोह मर...

"जी अर्जुन शर्मा.", अर्जुन ने ज़मीन की तरफ देखते हुए अपना नाम बताया.

"कबसे खेल रहे हो ये गेम? अपने दोस्तों को शायद यही कह रहे थे के तुम्हे ज्यादा कुछ पता नहीं इसके बारे में लेकिन 2 बार इतने सटीक फाइव पॉइंटर वह भी एक तोह आउटसाइड ऑफ़ कोर्ट.", चारुल मैडम की आवाज बड़ी धर्यपूर्ण थी. जैसे वह इस लड़के की पहले न खेलने की और फिर मुस्कुराते हुए शूट करने की वजह जान न चाहती हो.

"एक साल से नहीं खेला लेकिन उस से पहले 4तह स्टैण्डर्ड से लेकर 9तह तक सिर्फ बास्केटबॉल और फुटबॉल हे खेला है. क्रिकेट भी खेलता रहा लेकिन ये गेम हाई एनर्जी है तोह ज्यादा पसंद थे. आज एक साल बाद मैंने बॉल पकड़ी है मम. लेकिन अब मैं ये खेलना नहीं चाहता. एक्सक्यूज़ में मम", इतना बोल कर वह पानी पीने की परमिशन लेकर वाटर कूलर्स की तरफ चल दिए. मिस चारुल सिंह गौर से उसकी शारीरिक भाषा पढ़ रही थी. इतनी ाची गेम होने के बावजूद कैसे ये लड़का कह गया के खेलना नहीं चाहता.

सभी वापिस आ गए तोह मिस चारुल ने भी उनको एक साथ वही किनारे बानी सीढ़ियों पर बैठा लिए. यहाँ चाय भी थी और थोड़ी ठंडक भी.

"अब सभी ध्यान से सुनो. वैसे तोह ये सबसे फालतू की क्लास है Non-medical और मेडिकल वालो के लिए. लेकिन जिसके पास ये चॉइस सब्जेक्ट है वह इसलिए है क्योंकि इसमें 70 नंबर प्रैक्टिकल और 30 राइटिंग के. मतलब अगर थोड़ा सा भी ध्यान दो तोह परसेंटेज यही सब्जेक्ट इम्प्रूव कर देगा. और अगर सीरियस लो किसी एक गेम को तोह इवनिंग में यही 4-6 के समय तक़रीबन 12 अलग गेम्स की कोचिंग भी अवेलेबल है. अगर कभी लगे की अपने कोर्स को पढ़ने के बावजूद तुम्हारे पास समय है तोह बिलकुल आ सकते हो. बाकी मेरे सब्जेक्ट में प्रैक्टिकल के नंबर सिर्फ म्हणत से हे मिलते है.", उनकी बात पर कुछ ने सर हिलाया और कुछ ने हामी भरी. आकांक्षा यहाँ भी अर्जुन को देख रही थी और जिस समय मिस चारुल की नजर अर्जुन पर पड़ी वह भी आकांक्षा को देख रहा था.

"अब जिसने जाना है वह घर जा सकता है क्लास से बैग लेकर. आज आप लोगो के केमिस्ट्री और कंप्यूटर, दोनों के हे फैकल्टी नहीं है तोह आखिरी पीरियड फ्री. अगर कोई खेलना चाहता है तोह वह खेल सकता है.", लगभग सभी बचे इतना सुनते हे क्लास की तरफ हो लिए. इस पीरियड में अभी भी 10 मिनट का समय पड़ा था. अर्जुन वही बैठा रहा तोह सबके जाने के बाद आकांक्षा ने उसको धीमी आवाज में कहा, "मेरे घर चले? रुपाली को वापिस आ कर ले लेना छुट्टी के टाइम."

अर्जुन को भी उसकी बात सही लगी. "पहले मई रुपाली को बता के आ जाता हु की स्कूल ख़तम होने पर वह मेरा इन्तजार करे गेट के पास हे."

"ठीक है तोह बैग भी ले आते है.", ख़ुशी आ गई थी आकांक्षा के चेहरे पर और उसकी बिल्लोरी आँखें ज्यादा हे चमकने लगी थी ये सोच कर की अर्जुन उसके साथ अगले एक घंटे के लगभग अकेले रहने वाला है. दोनों अपनी जगह से खड़े हुए और क्लास की और चल पड़े. एक और स्पोर्ट्स फैकल्टी से बातें करती मिस चारुल की नजर से अर्जुन और आकांक्षा बच न सके और वह बस एक रहस्य्मय मुस्कान के साथ उनको जाते देखने लगी.

रूपाली की क्लास में इस समय इंग्लिश का पीरियड चल रहा था और इसके बाद आखिरी पीरियड बायोलॉजी का था. दर्शन सर से आज्ञा लेने के बाद अर्जुन ने रूपाली को बता दिए के वह छुट्टी के समय बहार हे मिलेगा और फिर वह से निकल कर अपनी साइकिल चलता वह गेट पर आ गया जहा आकांक्षा पहले हे कड़ी उसकी राह देख रही थी.

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"तनेजा यार एक बार बुला दे बस उसको और मैं तेरा ये काम चुटकी बजाते हुए करवा दूंगा.", कांच के केबिन में बैठे ये 2 लोगो में से के विनय तनेजा और दूसरा उसका पार्टनर सोलंकी थे. दोनों हे अधेड़ उम्र के बिजनेसमैन थे लेकिन सोलंकी की कमजोरी थी जवान लड़किआं. और उसने तनेजा को एक बार ज्योति के साथ देखा था जिसका अभी वह यहाँ जीकर कर रहा था. दोपहर 12 बजे ये दोनों बैठे तोह एक डील के लिए थे लेकिन सोलंकी की ठरक ने इसको एक नया रुख दे दिए था.

"देख भाई तू मेरी बात को समझ. अब मेरा उसके साथ कोई lena-dena नहीं है और न हे अब मैं ऐसा कुछ करता हु. तू अपनी हिस्सेदारी 55% चाहता है इस डील में तोह कर ले. लेकिन मुझे ऐसे काम के लिए मजबूर मत कर जिसका होना भर हे बड़ी अनहोनी कर दे. मेरी बीवी और बेटी मुझे घर से बहार कर देंगे अगर कुछ भी ऐसा हुआ.", तनेजा अपना दुखड़ा बताते हुए जो भी ज्योति के घर हुआ सब याद कर रहा था.

"अबे तू तोह कभी ऐसा फत्तू न था. हुआ क्या ऐसा जो आज तू इतना बिदक रहा? पहले न जाने कितनी हमने साथ में रगड़ी बस एक यही लड़की हमने साथ में नहीं भोगी और आज तू कुछ और हे गाने गए रहा. हिस्सेदारी बराबर रहेगी तू टेंशन न ले. बस ये बता हुआ क्या और भूल जा जो भी मैंने कहा.", सोलंकी की ऐसी मीठी बातों में आ कर विनय तनेजा ने जो भी ज्योति के घर हुआ था वह सब बता दिए. बस शंकर शर्मा का नाम नहीं लिए और अर्जुन को भी अपनी बेटी का क्लासमेट हे बताया था.

"ओह तेरी. ये तोह सच में हे मामला गंभीर हो गया. लेकिन तू परेशां न हो और ये डील आज हे हो जाएगी. तू आगे का काम देख और भूल जा इस हादसे को. परिवार ज्यादा जरुरी है मेरे दोस्त.", तनेजा अपने भागीदार की इतनी नरमदिली देख गदगद हो उठा. धन्यवाद करता हुआ वह उसके केबिन से निकल अपने काम में लग गया.

'तनेजा, कोई बात नहीं अगर वह लड़की न मिली तोह. उसको तोह वैसे भी कैयो ने भोगा था. लेकिन तेरी बेटी पर मेरी नज़र तबसे है जब उसके 15 जन्मदिन पूरे हुए थे. अब वह भी मेरे नीचे आएगी तेरी वजह से, तेरी आफरीन बीवी भी और बाकी का 50% जो तू खुद देगा इस पूरे बिज़नेस का.' एक नंबर का काइयाँ इंसान था सोलंकी जिसको सिर्फ जिस्म और पैसे की हे भूख थी. अब उसकी नजर थी तनेजा की जवान हो रही बेटी आकांक्षा पर. मुस्कुराता हुआ वह कार की चाबी उठाने के बाद दफ्तर से बहार निकला अपने इस मकसद पर काम करने के लिए.

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"तुम बैठो मई ड्रेस बदल कर आती हु.", आकांक्षा अर्जुन के साथ अपने घर में दाखिल हुई तोह उसका हाथ पकड़ कर ड्राइंग रूम में लाती हुई बोली.

"रहने दो न. ये ज्यादा ठीक है.", अर्जुन ने उसका हाथ अपनी तरफ खींच कर खुद से चिपकते हुए कहा. साथ हे उसका दूसरा हाथ आकांक्षा की कमर को थाम चूका था.

"ऐसे हे कुछ और भी कपडे है, अगर तुम्हे यही पसंद है तोह.", आकांक्षा तोह जैसे कबसे इसके लिए तैयार थी. फिर भी बड़ी शोखी से उसने अपने होंठ अर्जुन के मुँह के पास करते हुए बताया.

"ऐसे में हम ज्यादा देर साथ रहेंगे.", अर्जुन ने अपने होंठ आकांक्षा के गुलाबी नाजुक लबों से मिलाने से पहले सिर्फ इतना हे कहा था और इधर आकांक्षा भी स्कूल की उसी स्कर्ट में ऊपर उचकती अर्जुन से लिपट गई. नरम गोल मटोल कूल्हों को अपनी कलाई पर टिकाये अर्जुन उसके चेहरे को सामने करते हुए इस लम्बे चुम्बन को अंजाम दे रहा था. जब दोनों के होंठ अलग हुए तोह आकांक्षा अपना सर पीछे करती हुई अर्जुन का मुँह अपनी छाती से चिपकने की नाकाम सी कोशिश करने लगी. उसकी मंशा भांपता अर्जुन ऐसे हे आकांक्षा को उठाये उस बड़े चमड़े के सोफे पर आ गया. आकांक्षा इस तरह अब उसकी गॉड में दोनों तरफ पाँव किये बैठी थी. बेदाग गोरा और बादाम सा चेहरा, लरजते होंठ और साँसों से निकलती गर्मी. आकांक्षा के ये रूप देख कर अर्जुन ने अपना मुँह उसकी गर्दन से लगा लिए जिस पर उसने भी अपनी जोरदार प्रतिक्रिया देते हुए अपने कूल्हे ाचे से अर्जुन के अंग पर धंसा से लिए.

अर्जुन उसके शरीर से निकलती इस भीनी खुसबू को अपनी साँसों में भर रहा था वही आकांक्षा बेसुध से हो चली थी. स्कूल की शर्ट के सामने के सारे बटन कब खुले दोनों को हे पता न चला और सफ़ेद गंजी के नीचे वैसे हे रंग की मखमली ब्रा में क़ैद आकांक्षा के कच्चे अनारो की गोलियां अब अर्जुन के होंठो का स्पर्श ले रही थी.

"उम्म्म.. आठ.. अर्जुन.. आह ऐसे हे प्यार करो न.", चिकनी जांघो पर फिरते अर्जुन के हाँथ आज उसको नए अलौकिक आनंद का अनुभव करा रहे थे. जैसे हे अर्जुन ने अपने दोनों पंजो से उसके नरम निर्वस्त्र कूल्हों को पूरा महसूस किआ आकांक्षा ने हलकी कमर उठाते हुए उन हाथो को पूरी इजजत्त दे दी और अब वो सफ़ेद बनियान नुमा गंजी जमीन पर थी, जिसको खुद आकांक्षा ने उतार कर फेंका था. स्कर्ट अर्जुन के पेंट के सामने से उसको ढके हुए थी लेकिन हाथ अंदर हे उन अनछुए रबर से कूल्हों पर कभी रेंगते तोह कभी उन्हें पकड़ कर उनके भराव का जायजा लेते. इस उम्र में हे आकांक्षा के शरीर का ये भाग भरपूर गोल और मांस से भर था. लेकिन सम्पूर्ण गोलाकार, जो सिर्फ नंगा होने पर पता लगता था. जब अर्जुन ने अपनी नजर आकांक्षा के चुचो पर डाली तोह कुछ देर तक वह बस उन्हें हे देखता रह गया. आधे कप की उस नरम कपडे वाली ब्रा में क़ैद 30 आकार के वह माध्यम लेकिन अर्धगोलाकार दूध बड़े आकर्षक लग रहे थे. कही भी लेश मात्रा रंगत में फरक न था और टेनिस बॉल से कठोर चुके खुद हे अर्जुन को न्योता दे रहे थे उन्हें मुँह में भरने के लिए.

"हमारा इस से आगे बढ़ना अभी ठीक नहीं होगा.", पसीने से दोनों भर चुके थे और आकांक्षा का गोरा चेहरा इस समय प्यार और शरीर की गर्मी से गुलाबी हो चूका था. सांसें धोंकनी सी चल रही थी. लेकिन अर्जुन का यु एकदम रुक जाना जैसे उसको खेलने लगा था.

"क्या होगा? ये सबकुछ सिर्फ तुम्हारा हे है. आज जब हम दोनों हे यहाँ है तोह रुकना क्यों.?", प्यार से उसके होंठो को चूमकर वह कमर हिलती अर्जुन को मानाने लगी थी.

"आकांक्षा, ये तभी ठीक रहेगा जब सिर्फ हम दोनों हो यहाँ. वह भी पूरा दिन अकेले. तुम्हारा शरीर सब बता देगा अगर हमने जल्दी में कुछ किआ तोह.", एक बार फिरसे उसको अपने सीने से लगते हुए अर्जुन समझने लगा था. आकांक्षा को भी उसकी बात ठीक लगी थी क्योंकि 3 बजे तक उसकी माँ भी आ जाती थी और अगर कुछ ऐसा वैसा हुआ तोह वह समझ जाएँगी. लेकिन एकदम से हे उसकी आँखें चमक उठी कुछ याद करते हे.

"ाचा बाबा ठीक है लेकिन अगर हमारे पास पूरा टाइम हो तोह फिर तुम मन नहीं करोगे.", अर्जुन के हाथ खुदसे हे अपने उभारो पर रखते हुए उसने आँखों में देखते हुए पुछा.

"पक्का. नहीं मन करूँगा.", अर्जुन ने भी उसके दोनों उभर हलके हाथो में पकड़ कर मुस्कुराते हुए कहा. उसको आकांक्षा का इस तरह प्यार करना भी खूब भ रहा था.

"कल न मम्मी और पापा दोनों हे जा रहे है बहार. मेरे स्कूल से आते हे निकल जायेंगे और आएंगे रात में देरी से, मतलब मेरे सोने के बाद हे. और अब तुम मुझे मन नहीं करोगे, बिलकुल भी.", अपनी चमकती भूरी आँखें हिलती वह अर्जुन को मुस्कुरा कर देख रही थी. शरीर में कामाग्नि तोह जैसे छु हो गई थी लेकिन प्यार ज्यादा उमड़ आया था.

अर्जुन ने भी उसके करने से कटे बालो को सहलाते हुए कहा, "ठीक है मैं दोपहर में सवा 2 या ढाई तक तुम्हारे पास आ जाऊंगा और जब तुम कहोगी तभी वापिस जाऊंगा."

दोनों को घर आये 40 मिनट हो चुके थे, जो सामने राखी घडी बता रही थी. अर्जुन ने वैसे हे आकांक्षा को गॉड में उठाते हुए खड़े हो कर कहा, "अब कपडे पहन लो. 5 दिन पहले मेरे एक छोटे से किश से इस लड़की को झटका लगा था और देख आज कैसे मेरी गॉड में बिना laaj-sharam के बैठी हुई है."

"उस दिन अगर नहीं भागते तब भी मैं तैयार हे थी और आज भी हु. जो तुम्हारा है वह आज क्या और परसो क्या.", लेकिन फिर अपनी हालत देखती वह खुद हे शर्माती हुई अंदर अपने कमरे में चली गई.

"रुको मैं आ रही हु जाना नहीं.", पीले रंग की टीशर्ट जल्दी से पहन कर स्कूल की स्कर्ट में हे वह वापिस बहार आ गई. एक बार फिर अर्जुन के गले लग कर ाचे से एक गहरा चुम्बन देने के बाद थोड़ी सी मायूसी उसके खूबसूरत चेहरे पर यक्यक हे आ गई.

"हे, अब ऐसे भेजेगी मुझे?", अर्जुन भी उसके दिल का हाल समझ रहा था लेकिन अभी वह खुद मजबूर था.

"नहीं तोह. वह तोह आज पहली बार तुम ऐसे मुझसे मिले हो तोह दिल भर्र आया. एक साल से हर रात सिर्फ तुम्हे हे सोचा और सपने देखे. एक बार तोह ऐसा लगा था के सब सपने हे रह जायेंगे. आज जब महसूस किआ तुम्हे अपने साथ तोह बस .. "इतना कहते हे उसकी आँखों में नमी चा गई. अर्जुन ने नीचे झुकते हुए दोनों आखों पर एक चुम्बन अंकित करते हुए वो शबनम से मोती पी लिए.

"मैं हु तुम्हारे पास. और अब तोह हर रोज हे मिलेंगे न. ाचा अपना ध्यान रखना.", अर्जुन जैसे हे आकांक्षा के गले लगने के बाद वह से निकला, उसके दिल में भी जैसे एक फांस सी चुभी. क्या है ज़िन्दगी और ऐसी हे क्यों है? प्रीती उसकी जान है, उतना हे वह प्यार ऋतू, अलका, कोमल और रेणुका से करता है. बेशक सभी के प्यार में एक अलग रंग है लेकिन उन सभी के दर्द को वह महसूस कर सकता है. ऐसा हे मंजूबाला के साथ भी है, जिसके साथ उसका रिश्ता बिना किसी वजूद के है क्योंकि वह भी 10 दिन बाद किसी और की बीवी होगी. लेकिन आज आकांक्षा के साथ इस आखिरी पल में ये दर्द कैसा था? वह एक ाची लड़की है जिसको खुद अर्जुन भी पसंद करता था. लेकिन वो पल ऐसा था जैसे दोनों की धड़कन एक हे दिल से चल रही थी.

इस सब के बीच में वह अपनी साइकिल लिए कब स्कूल के बहार पहुंच गया पता भी न चला. गेट के पास हे एक तरफ संदीप खड़ा था उन्ही लड़को के साथ और दूसरी तरफ रुपाली, अपनी एक नयी सहेली के साथ. अर्जुन को देखते हे दोनों उसकी और चलने लगे लेकिन संदीप को सनी ने कालर से पकड़ते हुए अपनी और वापिस खींच लिए.

"अबे तू भाई बहिन के बीच क्या करेगा? जाने दे इनको, तुझसे कुछ काम है मुझे.", सनी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी इस समय.
 
अपडेट 72

बारिश की वह रात


"दीदी कैसा रहा आपका पहला दिन?", अर्जुन रूपाली से बातें करता घर की और चल रहा था. रूपाली भी आज इतने दिन बाद कुछ ज्यादा हे खुश थी. उसको पढ़ना पसंद था और आज एक बार फिरसे उसकी शुरुआत हुई थी.

"बहोत ाचा और जल्दी हे शायद मैं भी माहौल को समझ जाउंगी. थोड़ा अलग स्कूल है यहाँ गांव से और अब ये ड्रेस भी उतनी खराब नहीं लग रही जितनी आज सुबह घर से निकलते समय लग रही थी.", अर्जुन ने गौर किआ तोह सही में रूपाली अब चलते हुए भरपूर विश्वास दिखा रही थी. अर्जुन को ाचा लगा ये देख कर की वह कितनी तेज थी माहौल में खुद को ढालने में.

"ख़ुशी हुई देख कर. बस ये ध्यान रखना के यहाँ शहर में लोग उतने सीधे नहीं होते जितने गाँव में होते है. यहाँ बात कुछ और करते है और दिल में कुछ और.", अर्जुन ने इतनी बड़ी बात जैसे दिल की रौ में बहते हुए कर दी थी लेकिन रुपाली को उसकी ये बात बड़ी भली लगी.

"ाची बात कही तुमने. और ये भी पता लग गया के तुम भी कितनी सीढ़ी बातें करते हो.", कुछ और ऐसी बातें करते वह दोनों हे घर आ गए थे. घर के बहार हे अर्जुन ने रेणुका बुआ को उनके घर के बहार खड़ा देखा तोह वह रूपाली को अंदर जाने का बोल कर साइकिल लिए उन्ही की तरफ चल दिए.

"आप धुप में बहार कड़ी क्या कर रही है?", अर्जुन जैसे हे उनके सामने खड़ा हुआ, उसने चिंतावश पहले यही पुछा.

"माँ की तोह नहीं बानी मैं.", रेणुका का चेहरा भावहीन था जिसको देख अर्जुन कुछ समझ न पाया लेकिन अगले हे पल उसने साइकिल का साइड स्टैंड लगाया और उनका हाथ पकड़ कर पेड़ की छाँव के नीचे ले आया.

"माँ की मूरत को फिर से आकार दिए जा सकता है लेकिन एक इंसान को नहीं. अब बताओ ऐसे बहार कड़ी क्या कर रही थी.?", यहाँ अर्जुन की आवाज धीमी लेकिन हक़ से भरी थी. जैसे वह अपनी ब्याहता से सवाल कर रहा हो.

"पहले ऐसे नहीं बात कर सकते थे. यहाँ कोई और दिख रहा है तुम्हे? बस तुम्हारा हे इन्तजार कर रही थी मैं और अभी आ कर कड़ी हुई हु.", चेहरे पर मोहक सी मुस्कान देख अर्जुन के माथे का पसीना कुछ काम हो गया था.

"कोण कहता है आप बड़ी हो गई हो? ाचा बताओ ऐसे नजरे बिछाये मेरा इन्तजार करने की वजह?", अर्जुन ने प्यार से पुछा इस बार.

"आज दोपहर का खाना मेरे साथ और हमारे यहाँ है, तुम्हारा. कपडे बदल कर आ रहे हो या ऐसे हे.", उनकी ये बात सुनकर और प्यार देख कर अर्जुन कुछ ज्यादा न कह पाया बस वापिस आने का बोल कर मुस्कुराता हुआ अपने घर चल दिए. रेणुका जी भी अपने इस कृष्ण कन्हैया को जाता देख खुश थी क्योंकि वो वापिस आने वाला था.

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"कैसा रहा तेरा पहला दिन?", अर्जुन जैसे हे ऊपर अपने कमरे में पंहुचा तोह वह पर ऋतू और अलका दीदी को पहले से हे बैठा देख हैरान हो गया. दोनों हे उसके बीएड पर लेती हुई थी और ऋतू दीदी ने अपना पढाई वाला नजर का चस्मा लगाया हुआ था. बैग को अलमारी में रखता हुआ वह बोलै, "इतना भी बुरा नहीं था क्योंकि पहला हे दिन था न. ज्यादा कुछ नहीं हुआ. वैसे आप दोनों इस कमरे में वह भी बीएड पर?", अर्जुन ने अलमारी से एक हलके रंग की टीशर्ट निकली और नीली जीन्स. शर्ट को उतार कर अलमारी के अंदर वाले हक्क पर टांगने के बाद उसने दोनों की तरफ देखा.

"इतनी शांति और तोह कही होती नहीं इसलिए हम यही आ गई आराम करने. वैसे अलका ने कुछ बात करनी है तेरे साथ और अब तू आ गया है तोह तुम बातें करो मैं नीचे खाने की तैयारी में मदद करवाती हु. अलका बात करके आ जाना.", जाते हुए ऋतू ने अलका के सामने हे अर्जुन के गाल को चूमा और बालो में उंगलिया फिरने के बाद कमर मटकती बहार निकल गई. अर्जुन एक पल तोह उन थिरकते हुए कूल्हों में हे खो गया था लेकिन फिर अगले हे पल नजरे अलका दीदी की और करते हुए प्रश्नवाचक निगाह से उन्हें देखने लगा. पीले रंग के चुस्त टॉप और काले पाजामे में वह कमाल लग रही थी. बिना कोई साज सज्जा के भी जैसे इन दोनों के सामने बहार की अधिकतर खूबसूरत लड़कियां फ़ैल थी.

"ाची नहीं लग रही क्या?", अपने निचले होंठ पर दांत गदति वह अर्जुन से हे सवाल करने लगी.

"ऐसा कब हुआ जब आप ाची न लगी हो.? अब बताओ भी क्या मुद्दा हो गया जो ऋतू दीदी भी चली गई यहाँ से. उनसे तोह आप कुछ छुपाती नहीं.", अलका इस दौरान बस अर्जुन के चेहरे को हे देख रही थी.

"सोच रही हु के आज रात तेरी दिली ख्वाहिश पूरी कर दी जाये लेकिन उस से पहले ये पूछना भी जरुरी है के आज रात तेरा कोई और जरुरी काम तोह नहीं.", अर्जुन को अब बात समझ आ गई थी की दीदी क्या कह रही है.

"आपको पता है न घर में इस समय कितने लोग है. फिर ये कैसे मुमकिन होगा? नीचे सभी, यहाँ ऊपर तारा और छत्त का भरोसा नहीं.", अर्जुन ने अपने दिल का हाल बताया

"3 कमरे और भी है घर में जहा रात को तेरा इन्तजार रहेगा.", अलका ने खड़े होने के बाद अर्जुन को गले लगते हुए कान में साथ हे कहा, "शायद वो भी तैयार मिले जो अभी यहाँ से गई है." और अर्जुन को हैरान छोड़ कर वह भी वह से कुलांचे मारती निकल चली.

'ये क्या हो रहा है?', अर्जुन खुद से हे कहता कपडे बदलने के बाद हाथ मुँह धो कर ाचे से तैयार हुआ और बहार वाले रस्ते से हे प्रीती के घर चल दिए. आराम से खुद हे गेट को खोलकर अंदर दाखिल होते समय हे उसने देख लिए था के घर में छोल साहब की गाडी नहीं थी.

अंदर आया तोह रेणुका को सामने हे खड़ा पाया. इतनी सी देर में हे उन्होंने अपने कपडे बदल लिए थे और इस समय हलके रंग की एक साड़ी बड़े सलीके से नाभि से सिर्फ एक उंगल नीचे बंधे हुए वह सादगी के साथ हे बड़ी लुभावनी लग रही थी. घर में इस समय जैसे कोई भी नहीं था. इस शांति को भी रेणुका की खनकदार आवाज ने हे भांग किआ.

"आपका हे राह देख रही थी लेकिन लगा नहीं की जैसे आपको कोई आने में दिलचस्पी हे नहीं थी.", रेणुका भी कितनी अलग हे थी. कभी गंभीर औरत, कभी नाजुक और कमजोर. कभी अतृप्त प्रेयसी और कभी जैसे ा शालीन बीवी, जैसे वह फ़िलहाल थी. अर्जुन ने 2 कदम में हे बीच की दूरी पार करते हुए रेणुका को गले से लगा लिए. इसमें कोई मिलावट नहीं थी और न हे कोई जोर. बस जैसे दोनों के दिल यही चाहते हो.

"वजह नहीं पूछूंगा क्योंकि बात उतनी हे ख़ास होगी जितना तुम्हारा मेरे लिए हमारे एकांत में समर्पण है.", अर्जुन के कहे हर लफ्ज़ को महसूस करती रेणुका ने बदले में सिर्फ इतना हे कहा, "मेरी कोख में हमारे प्यार का अंश आ गया है."

कितनी छोटी सी बात थी अगर सिर्फ सुनी जाए. महसूस करने पर जैसे जहाँ छोटा लगे.

"क्या बात कर रही हो?", अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन अपने दिल के अनचाहे जज़्बात अंदर रखते हुए बड़े प्यार से रेणुका के माथे पर एक चुम्बन करते हुए हलके से वह नरम पेट भी सहलाने लगा जहा की रचना किसी भी जटिल विज्ञान से कही अधिक जटिल होती है लेकिन बहार से सब सपाट.

"अभी सबकुछ नहीं समझोगे लेकिन मैंने टेस्ट किआ था आज हे सुबह और वह पॉजिटिव आया. इतने दुखो में कितने हे साल जीने के बाद तुम्हारे साथ बिताये एक महीने में हे मुझे वह खुशियां मिली है जिनका कोई भी मोल नहीं.", इस बार बड़ी शिद्दत्त से एक गहरा चुम्बन अर्जुन को देने के बाद रेणुका रसोईघर में चली गई खाना लगाने. अर्जुन सोच रहा था के ज़िन्दगी जाने अभी और कितने रंग दिखाएगी. लेकिन अंदर हे अंदर उसको बेहद ख़ुशी थी की वह रेणुका को अपनी ज़िन्दगी ाचे से जीने की एक वजह दे रहा है.

कुछ देर बाद सामने बैठी रेणुका अपने हाथो से हे अर्जुन को खाना खिला रही थी. बीच बीच में वह भी रेणुका को खिलता लेकिन वह बस अपना ध्यान अर्जुन पर हे लगाए थी.

"कुछ देर आराम करना चाहो तोह हमारे कमरे में कर सकते हो.", ये बात नजरे झुकाये हुए कही रेणुका ने और अर्जुन ने एक बार फिर से गले लगते हुए जवाब दिए, "आज आप आराम करो, मैं जिस दिन हमारे कमरे में आऊंगा तब आराम नहीं करने दूंगा."

"इन्तजार रहेगा.", रेणुका ने दरवाजे के पीछे से हे इतना कहा.

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"सोलंकी भाई कल मई उपलब्ध नहीं रहूँगा, तुम जरा काम देख लेना. अंशु के स्कूल से वापिस आते हे सुषमा और मैं कल दोपहर हे दिल्ली निकल रहे है लेकिन देर रात तक वापिस आ जायेंगे.", विनय तनेजा अपने भागीदार सोलंकी को बता कर बस ऑफिस से निकलने हे लगा था.

"और बिटिया? उसको नहीं ले जा रहे साथ?", ये बात कहता सोलंकी मैं में खुश बहोत हो रहा था लेकिन बहार दुनिया भर की गंभीरता मुँह पे लिए था.

"नहीं भाई, अंशु के स्कूल भी शुरू हो गए है और वैसे भी उसको साथ नहीं ले जा सकता नहीं तोह फिर अगले दिन भी रुकना पड़ेगा. तुम यहाँ ऑफिस में एडजस्ट कर लेना. वैसे मैंने बचा हुआ काम निबटा दिए है."

"इत्मीनान से जाओ भाई. यहाँ मैं देख लूंगा.", हाथ मिलाने के बाद वह वापिस अपनी सीट पर बैठ गया और तनेजा को जाते देखने लगा.

'कल 2 बजे तेरी बेटी मेरे नीचे होगी तनेजा और उसके बाद तेरी बीवी खुद चलके आएगी उसी बिस्टेर पर. देख अब मेरा खेल. जिस लड़की को मैंने माँगा उसको तोह तू ला नहीं सका लेकिन अब उस लड़की का भाई मेरा तुरुप का एक्का बनेगा, जो वह खुद नहीं जानता.' सोलंकी ने कोई बड़ी गहरी साज़िश रची थी जिसका विनय तनेजा को रत्ती भर आभास न था.

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"मुन्ना, एक काम कर देगा मेरा?", कोमल दीदी ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हुए अर्जुन के पास आते हुए पुछा. उजला रंग, भरा भरा लेकिन आकर्षक जिस्म इस समय एक लाल कमीज सलवार में क़ैद था कोमल दीदी का. और जैसे हे उन्होंने अर्जुन के बराबर आते हे बात शुरू की, उनके शरीर की प्राकृतिक सुगंध अर्जुन के नथुनों से होते हुए सीधी मस्तिष्क को छु गई. कुछ पल वह बस उन्हें हे देखता रहा. कैसे उनके वह सुरक होंठ लरज़ रहे थे और सफ़ेद ek-saar मोतिओं से दांतो के चमक.

"मुन्ना, कहा खो गया?", उन्होंने खुद हे शरमाते हुए अर्जुन को हिलाया तोह जैसे वह नींद से जगा, सपना नहीं कोमल दीदी साक्षात् सामने कड़ी थी.

"कही नहीं दीदी. वो मई.. मई.. आप को कुछ काम था.", अर्जुन थोड़ा अटक रहा था लेकिन जल्दी से उसने खुद को संभाला.

"हे.. हे.. तू भी न. ाचा सुन्न. वो मुझे न 2 पेंटिंग ब्रश और एक ऐक्रेलिक रंगो का सेट चाहिए था. अगर तेरे पास आते हुए समय हो तोह मॉडल टाउन वाले स्टेशनरी से लेते आना.", 500 रुपये अर्जुन की तरफ बढ़ाते हुए कोमल दीदी ने अपनी बात ख़तम की.

"ले आऊंगा मैं याद से. और ये पैसे अपने पास रखिये. वैसे अगर इस कलर का कुछ और चाहिए तोह मैं वह भी ले आऊंगा.", ये बात बड़ी धीमी आवाज में अर्जुन से शरारत से कही जिसको सुनकर कोमल दीदी की नज़रे ज़मीन पर गड्ड गई थी. लेकिन फिर अपने लम्बी घनी पलके झपकती वह बोली.

"शनिवार को साथ हे चलेंगे लेने.", और इतना कहते हे वह अर्जुन के चेहरे पर भी मुस्कान छोड़ कर बैठक की तरफ चली गई. अर्जुन भी मोटरसाइकिल को स्टार्ट करता गेट से बहार आ गया. यहाँ प्रीती भी अभी आई थी और फिर दोनों स्टेडियम की और निकल चले.

"मेरे पास आने का जैसे अब दिल नहीं करता न तुम्हारा.", अर्जुन ने रफ़्तार काम करते हुए पीछे बैठी प्रीती से कहा.

"हांजी, जैसे तुम्हारे पास बड़ी फुर्सत रहती है मेरे लिए. कल से देख रही हु कितनी बार जो तुमने मुझसे बात की या नजर उठा के देखा हो.", प्रीती के इस तंज़ का क्या जवाब देता.

"फिर भी मैं 3 बार तुम्हारे घर आया था. और कल दिन में जब तारा के साथ तुम हमारे घर आई थी तब भी मैं तुम्हे इशारे से बुला रहा था लेकिन क्या मजाल जो मेरी तरफ देख भी लिए तुमने.", अर्जुन ने ऐसा कहा तोह प्रीती को अपनी गलती समझ आ गई थी. पीछे से कस के अपनी बाहे अर्जुन की छाती पर बांधती वह बिलकुल हे चिपक गई थी उस से.

"मेरी जान कुछ ज्यादा हे नहीं डिमांड करने लगी आजकल? वैसे मैं आज यही बात करने वाली थी की अभी 2-3 दिन थोड़ा माहौल ठीक हो जाने दो, फिर हम आराम से प्यार करेंगे. इतने टाइम हम स्टेडियम आते जाते हे साथ रह लेंगे.", अर्जुन उसकी ऐसी सीढ़ी बात पर मुस्कुरा रहा था.

"वैसे अब नीचे सब ठीक है तोह फिर मैं दिवार कूद कर भी तुम्हारे घर आ सकता हु, रात में.", अर्जुन ने ये बात पिछली बार वाले प्रीती के अरमान को याद करते कही.

"मार खाओगे. चुपचाप आगे देखो और चलाओ. आये बड़े.. और इतनी गन्दी बात करते हो तुम.", प्रीती लाज से उसकी पीठ पर मुँह छुपाती बस अर्जुन की उभरी हुई चौड़ी छाती पर उंगलिअ फिरने लगी.

दोनों हे अपने निस्चल प्यार में डूबे ऐसे हे बातें करते स्टेडियम आ गए और प्रीती अपने कोर्ट की तरफ निकल चली हिरानी सी कुलांचे भर्ती. अर्जुन मंद मंद मुस्कुराते हुए उसको देखता रहा उधर हे खड़ा.

"भाई, दिल भर गया हो तोह आज कुछ प्रैक्टिस कर ले? वैसे भाभी एक नंबर है.", बलबीर कब उसके पास आ खड़ा हुआ ये अर्जुन देख न सका. फिर दोनों गले मिले और अपने प्रैक्टिस करने की जगह चल दिए.

कसरत, मुक्केबाज़ी की स्टेपिंग करने के बाद दोनों हे जब पंचिंग बैग के पास आये तोह संधू जी एक सीनियर मुक्केबाज़ को कंधे पर हाथ रख कर कुछ सलाह दे रहे थे. उन्हें तंग करना मुनासिब न समझ दोनों हे बारी बारी से स्ट्रैट और उप्पेर कट पंच की प्रैक्टिस में लग गए. अर्जुन ने शायद खुद गौर न किआ था लेकिन इतने हे दिनों में उसके छाती के साथ की मासपेशिया बहार निकलने लगी थी और जितनी भी वासा थी वह वह से नदारद थी. भुजाये भी फौलाद सी तराशी हुई दिखनी शुरू हो चुकी थी और कुछ ऐसा हे हाल उसके कंधो और घुटने से नीचे की मांसपेशियों का था. संधू जी कब के फारिग हो चुके थे लेकिन पिछले 15 मिनट से बस वह इन्ही दोनों को देख रहे थे.

बलबीर आज अर्जुन से भी अधिक केंद्रित था अपने अभ्यास में, लेकिन अर्जुन भी सामान रफ़्तार से लगा रहा. जैसे हे दोनों के 20 मिनट पूरे हुए, संधू जी 2 तोलिये लिए उन दोनों के पास आ पहुंचे.

"वाह मेरे बचो, रूह खुश हो गई तुम दोनों की लगन देख कर. लगता नहीं की इतने समय अभ्यास नहीं किआ होगा तुमने. ोये छोटू, जरा फीता और वजन की मशीन लेके आ.", दोनों ने जब अपना पसीना पांच लिए तोह कोच ने खुद हे दोनों को ग्लूकोस की बोतल पकड़ा दी. इतनी देर में एक जूनियर लड़का वजन वाली मशीन और मापने वाला फीता ले आया.

"इसका क्या काम है सर?", अर्जुन ने वैसे हे ये पूछ लिए था लेकिन बलबीर बिना कहे मशीन पर खड़ा हो गया. फिर उसके बाद अर्जुन भी. ऐसे हे दोनों के कमर और छाती का माप लेने के बाद वह दोनों के साथ हे एक लम्बे बेंच पर बैठ गए.

"तू तैयार है बलबीर लाइट फ्लाई वेट के लिए बस वजन एक किलो भी और नहीं बढ़ाना. और अर्जुन बीटा वजन तोह तेरा 85 किलो है लेकिन छाती अब 46 और कमर 30 हो गई है. मतलब बॉडी फैट ाचा बुरण हो गया है. स्टैमिना तोह देख हे रहा हु लेकिन अब तुझे एडवांस वेट ट्रेनिंग और स्पीड इनक्रीस करनी है. बलबीर, अगले सोमवार तक यही रूटीन रखना फिर हम लेवल बढ़ाएंगे. अब तुम दोनों मौज मारो.", संधू जी बात तोह उन दोनों से हे कर रहे थे लेकिन उनके नजर बाज सी थी जो वह 2 अनजान से लड़को को वही बैठ देख गए. कोई 200 मीटर दूर खड़े वह दोनों लड़के अचानक की ओझल हो गए. और ऐसे हे संधू जी भी वह से उठ गए दोनों को आशीर्वाद देते हुए.

"छोटे भाई तूने देखा क्या कुछ? कोच साहब ऐसे अचानक गंभीर हो गए थे और हमारी और उनका ध्यान नहीं था आखिरी समय.", बलबीर ने चिंता जताई.

"हाँ, उन्होंने ने वह 2 लड़के देख लिए जो साइकिल स्टैंड से हमारे पीछे थे और जब हम प्रैक्टिस कर रहे थे तोह वह रेस ट्रैक के पास बैठ कभी हमे तोह कबि इधर उधर देख रहे थे.", अर्जुन जैसे काफी देर से वही देख रहा था.

"मतलब इसलिए आज तेरी स्पीड मेरे से काम थी?"

"नहीं, आप प्रैक्टिस दिल से कर रहे थे और मैं उन लोगो की हरकत देख रहा था. वो सिर्फ 2 नहीं थे जैसा मुझे लगता है और मैं उन्हें जानता नहीं इसका मतलब वह शायद आपके पीछे हो या किसी और के.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और बलबीर का हाथ पकड़ कर उसको अपने साथ लेकर कपडे बदलने की जगह चल दिए.

"तू मेरे स्वाद ले रहा है न छोटे भाई? बहनचोद मेरा तोह आजतक कोई लफड़ा न हुआ कभी और अब तोह विकास भाई भी यहाँ नहीं के हम किसी के साथ मुक़ाबला कर सके.", बलबीर ने निक्कर उतरने के बाद पजामा पहनते हुए कहा.

"अरे टेंशन बहोत लेते हो आप भैया. इतना बड़ा स्टेडियम है और लोग तोह आते जाते रहते है. मैं वैसे हे डरा रहा था आपको.", बलबीर ने उसकी पीठ पर एक ढोल ज़माने के बाद हँसते हुए कहा.

"ले ले बीटा मजे, तेरी उम्र है. चल थोड़ी देर ट्रैक का चक्कर लगते है.", अर्जुन भी यही चाहता था और वो दोनों दौड़ने वाले ट्रैक पर इधर उधर देखते चलने लगे. इस समय ज्यादा भीड़ नहीं क्योंकि ज्यादातर बचे अपने घर गए हुए थे, हॉस्टल वाले. ज्यादातर वही थे जो शहर के थे या फिर जो सारा साल प्रैक्टिस और टूर्नामेंट खेलते थे. बलबीर को कोई लड़की नई दिखी और अर्जुन को वह लड़के नहीं दिखे जिन्हे उसकी नजर ढून्ढ रही थी. बातें करते हुए दोनों हे जब स्टैंड की और पहुंचे तोह सामने से आती प्रीती को अर्जुन ने नजरो से हे इशारा किआ जो समझ गई और बिना उसकी तरफ आये अपनी सहेली डिम्पी का हाथ पकड़ कर मुख्या द्वार की तरफ चल दी.

"बलबीर भाई उन लड़को को जानते हो? इशारा मत करना और सिर्फ उधर देखो जहा नीला बोर्ड लगा है. सफ़ेद टीशर्ट वाला और उसके साथ लाल शर्ट पहने हुए दूसरा जो है.", अर्जुन ने चेहरा बलबीर की तरफ रखते हुए हे कहा जैसे देखने वाले को लगे के 2 दोस्त बस बातें कर रहे है. बलबीर ने भी समझदारी दिखते हुए कनखियों से अर्जुन की कही जगह देखा.

"एक है गोलू पहलवान और उसके साथ जो है वह मैं नहीं जानता लेकिन है वह भी पहलवान. ये गोलू हमेशा बिजेन्दर के साथ हे रहता है लेकिन जिस दिन लड़ाई हुई थी ये वह नहीं था. नहीं तोह फैंसला कुछ और हे होता. बदमाश है ये और दूसरा भी वैसा हे लग रहा है.", बलबीर को जहा इस मौके पर डर लग्न चाहिए था, वह बिलकुल निर्भीक खड़ा था.

"अपना ध्यान रखना आप पीछे से. मैं चलता हु.", अर्जुन ने हाथ मिलाने के बाद मोटरसाइकिल निकली और बलबीर को अलविदा कहते हुए बहार की तरफ चल पड़ा. उधर वह दोनों पहलवान भी अब उस जगह नहीं थे. गेट से बहार निकलते हे अर्जुन ने एक बार हर तरफ नजर घुमाई और फिर सीधा दूर कड़ी प्रीती के पास जा कर उसको पीछे बिठाते हुए निकल चला.

"बात क्या है कुछ बताओगे?", प्रीती भी जान गई थी की कुछ तोह हुआ है. अर्जुन मोटरसाइकिल को लाल बत्ती पर रोक कर खड़ा था.

"कुछ भी नहीं. बस बलबीर भाई से जरुरी बात कर रहा था इसलिए तुम्हे बहार जाने को कहा था." प्रीती ने अर्जुन से फिर कोई सवाल नहीं किआ. दोनों अब मॉडल टाउन की तरफ जा रहे थे. रह रह कर अर्जुन शीशे से पीछे जरूर देख रहा था. लेकिन अगले 7-8 मिनट पीछे को न देख वह अब आश्वस्त हो गया और प्रीती का मूड ठीक करने के लिए मॉडल टाउन की मार्किट में पहले "आर्चिज" नाम की दूकान के बहार बुलेट कड़ी करता उसको लेकर अंदर आ गया.

"यहाँ हम क्यों आये है?", प्रीती ने थोड़ा हैरानी से पुछा.

"वह ऐसा है न आज तुम कुछ ज्यादा हे प्यारी लग रही हो. सोचा एक भूत ले लेता हु तुम्हारे लिए जिस से कोई नजर न लगे तुम्हे.", हँसता हुआ वह प्रीती के साथ उस लम्बी बड़ी सी खिलोने और ग्रीटिंग कार्ड की दूकान में ध्यान से सब तरफ देखने लगा. एक जगह उसकी नजर ृक्क गई और बस वह उसको हे देखता रहा. Kaale-bhoore गोल धब्बे वाला सफ़ेद रंग का मुलायम भालू जाइए खिलौना (टेडी).

"ये उतार दीजिये जरा.", अर्जुन ने काउंटर के पीछे खड़े लड़के से कहा तोह लड़के ने भी बिना सवाल वह 2 फ़ीट के लगभग का खिलौना उतर कर काउंटर पर रख दिए.

"सत. बर्नार्ड है ये अगर तुम्हे नहीं पता तोह बता देती हु.", प्रीती के चेहरे पर अलग हे खुसी थी.

"हाँ पहले लगा के ये टेडी बेयर है अब इसके गले में ये हड्डी (बोन) देख कर पता लग गया के डॉग है.", अर्जुन ने जैसे हे उसको सहलाते हुए पेट पर हाथ रखा वाइज हे खिलोने से आवाज आई "ी लव यू", और ये देखते हे अर्जुन ने प्रीती की और चेहरा किआ.

"अब से ये तुम्हारे कमरे में रहने वाला है. नाम तुम्ही रखना. और भैया इसको पैक कर दीजिये. हम अभी आते हु ले लेंगे."

"1400 डिस्काउंट के साथ.", दुकान के मालिक ने वह बड़ा सा खिलौना नीचे से देखते हुए कहा और अर्जुन ने दूकान से बहार निकलने से पहले पैसे पकड़ा दिए.

"5 मिनट में आ रहे है."

"उसकी क्या जरुरत थी?", प्रीती अर्जुन का हाथ थाम कर हे चल रही थी. पीठ पर टेनिस का राकेट लटका था.

"दिल से खरीदना भी कुछ होता होगा. और मैं नहीं चाहता तुम अकेली रहो तुम्हारे कमरे में."

स्टेशनरी से कोमल दीदी का सामान लेने के बाद उन्होंने वह खिलौना भी उठा लिए जो अब गट्टे के डब्बे में बंद था और एक बड़े प्लास्टिके में पैक. एक साइड अपनी जांघ पर उसको रखे प्रीती चहकती हुई अर्जुन के पीछे बैठी थी.

"ी लव यू एंड थैंक यू सो मच फॉर थिस. ी रियली लव्ड आईटी."

"ी लव यू तू.", अर्जुन ने भी गोल शीशे में प्रीती को देखते हुए कहा.

"वैसे घर पर क्या कहूँगी?"

"बता देना के अर्जुन ने अपने बर्थडे का रेतुर्न गिफ्ट आज दिए है. वैसे अगर ये भी कहो के अर्जुन ने दिलाया है तब भी मुझे नहीं लगता के कोई कुछ कहेगा." सच बात थी ये भी के उसके उपहार देने पर भला कोई क्या कहता छोल साहब के घर. जैसे हे मोटरसाइकिल प्रीती के घर के बहार रोकी वह सीधा घर के अंदर भाग गई, कोमल दीदी के कलर्स भी साथ लेती हुई.

"ये मैं अपने आप दीदी को दे दूंगी.", अंदर वाले दरवाजे के पास एक बार ृक्क कर प्रीती ने जोर से कहा और फिर नजरो से ओझल.

"पागल लड़की.", अर्जुन बस हँसता हुआ यही कह पाया और घर आते हे अपने पुराने काम में लग गया. नहाना, दूध और फिर किताबे.

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"आंटी अर्जुन है?", रात के तक़रीबन 8:30 बजे संदीप ने अर्जुन के घर की घंटी बजे तोह बहार कौशल्या जी आई.

"अभी बुलाती हु बीटा अंदर आ जाओ."

"नहीं आंटी जी बस मुझे घर वापिस जाना है. वह अर्जुन से स्कूल की कुछ जरुरी बात करनी थी."

"अभी बुलाती हु बीटा."

3-4 मिनट बाद हे अर्जुन भी घर के गेट के बहार खड़ा था संदीप के साथ.

"भाई मेरे कमरे में हे आ जाता. बहार क्यों खड़ा है?", अर्जुन ने हैरानी से पुछा.

"नहीं भाई जो बात करनी है वह अंदर नहीं हो सकती थी. अगर तेरे पास 10 मिनट है तोह हम चलते हुए बात करते है.", अर्जुन का जवाब सुने बिना वह खुद के घर से दूसरी दिशा में चलने लगा और साथ हे अर्जुन भी.

"ऐसी क्या बात हो गई जरा बताएगा.?", अर्जुन अपने दोस्त को परेशां देख कर बोलै.

"वह सनी और मुकेश ने स्कूल की छुट्टी के बाद मुझे मारा और फिर कहा के अगर मैंने उनका काम नहीं किआ तोह वह ज्योति दीदी का नाम खराब कर देंगे.", संदीप जैसे मैं में कई देर से गुबार इकठ्ठा किये था जो इतना बोलते हे फफक कर रो पड़ा. अर्जुन अपने दोस्त को ऐसी हालत में देख स्तब्ध रह गया.

"पहले रोना बंद कर और पूरी बात बता. वडा करता हु के ये सनी और उसके दोस्त आइंदा कभी तेरे सामने नहीं आयंगे. पूरी बात बता.

"भाई जब तू रूपाली दीदी के साथ स्कूल से निकला तोह मैं भी तेरे साथ आने लगा था लेकिन उन्होंने मुझे रोक लिए था. पहले तोह वह जो हमेशा करते है वही मेरे साथ करते रहे. तेरा और मेरा मजाक उड़ाना, मेरे इधर उधर हाथ लगाना. लेकिन फिर मुकेश और सनी मुझे अपने साथ स्कूल से अगले वाले पार्क में ले गए. उन्होंने बिना बात करे हे पहले तोह मुझे ाचे से मारा और फिर अपना मकसद बताया."

"आगे बता भाई. और रोना बंद कर."

"मुकेश ने बोलै के स्कूल से छुट्टी होने पर कल मैं आकांक्षा के घर पर नजर राखु. और जैसे हे उसके मम्मी पापा घर से निकले तोह मैं इस नंबर पर पीसीओ से फ़ोन करके सिर्फ इतना बोलू के 'वो चले गए', अगर मैंने ऐसा नहीं किआ तोह वह मेरी पिटाई तोह करेंगे हे साथ हे उनका कोई अमीर दोस्त दीदी के साथ गलत काम करेगा. और वो सभी पूरे स्कूल में ज्योति दीदी के नाम पर मुझे रोज बदनाम करेंगे. अर्जुन भाई, अगर ऐसा कुछ हुआ तोह भगवन कसम मैं मर्डर जाऊंगा. मैंने बहोत बड़ी गलती करदी जो उनकी सांगत में पड़ गया. उन्होंने ये बात किसी को भी बताने से मन किआ था लेकिन मैं सपने में भी तेरे साथ देगा नहीं कर सकता. और जहा तक मुझे लगता है उनका वह अमीर दोस्त शायद आकांक्षा के चक्कर में है.", संदीप ने बात ख़तम की तोह अब आंसू रुक चुके थे.

"घबराता क्यों है मेरे भाई मैं हु न तेरे साथ. कोई कुछ नहीं करेगा, मेरा यकीन कर. ये कागज़ इधर दे और मेरे साथ चल हमारे घर. और हाँ पहले चेहरा साफ़ कर लिओ बहार वाले बाथरूम में.", अर्जुन ने वह कागज़ का टुकड़ा संदीप से लेते हुए कंधे पर हाथ रखा और उसको लेकर अपना घर आ गया. दोनों हे बहार वाले रस्ते से सीधा उसके कमरे में आ गए. अर्जुन ने तारा और उसके कमरे के बीचा वाला दरवाजा बंद किआ और संदीप को एक मिनट वही बैठने का बोल कर नीचे दादाजी वाली बैठक में आ गया. यहाँ टेबल पर रखने टेलीफोन के पास हे उनके ज़िले की टेलीफोन डायरेक्टरी पड़ी थी जो वह उठा कर वापिस चल दिए.

"ये क्या है भाई?", संदीप ने उसके हाथ में वो पतली सी किताब देख कर पुछा.

"उस अनजान तक पहुंचने का हमारा रास्ता. थोड़ी म्हणत का काम है लेकिन हम दोनों साथ में ढूँढ़ते है. ये नंबर है 24034 और किताब में अपने शहर के सभी नंबर लिखे है, नाम और पते के साथ.", अर्जुन की बात समझते हे संदीप के चेहरे पर थोड़ी उम्मीद आ गई थी. दोनों सत् कर बैठ गए और बाए तरफ का पन्ना अर्जुन देखने लगा और दाए वाला संदीप. दोनों हे फ़ोन के आखिरी नंबर पर उंगलिअ रखते हर लाइन को ाचे से खंगालने लगे.

"भाई ये देख.", संदीप ने अपनी ऊँगली उस नंबर पर रखते हुए कहा. '24034'

"वाह.. यही है. नाम और एड्रेस देख जरा इसका.", अर्जुन के कहते हे संदीप ने एड्रेस पढ़ना शुरू किआ.

"अजीत सोलंकी S/O आप सोलंकी, H.N. 126, सेक्टर क्सक्स.. भाई मैं जनता हु ये पता.", संदीप ने पढ़ते हुए ये कहा

"हमारे हे सेक्टर में घर है वह भी उधर पार्क के पास. 350 गज वाले प्लाट में.", अर्जुन ने इतना कहने के बाद संदीप की तरफ देखा.

"हाँ. लेकिन मैं ाचे से जानता हु इस परिवार को. घर में 4 लोग है इनके. इसकी बीवी, एक बेटी जो अभी 12तह के पेपर देकर घर रहती है, एक बीटा है जो पिछले साल हे बोर्डिंग स्कूल में गया है और ये. विनय अंकल के साथ साँझा बिज़नेस है इसका.", संदीप एक सांस में ये बात कह गया.

"तुम्हारे घर भी आना जाना है?", अर्जुन ने साधारण आवाज में हे पुछा.

"नहीं भाई वह इसके पड़ोस वाले घर में मेरा एक दोस्त रहता है. और..." संदीप नीचे देखने लगा

"और तू अजीत सोलंकी की बेटी को देखने उधर जाता था.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा

"हाँ भाई. भाई मैंने 4 साल पहले इसकी बेटी को देखा था. हमसे 2 क्लास आगे थी वह और सच बताओ तोह सारे लड़के उसको पसंद करते थे.", संदीप ये कहते हुए झेंप रहा था.

"अब चल तू घर जा और आराम कर. जितनी जानकारी चाहिए थी वह हमे मिल गई.", अर्जुन हँसते हुए संदीप के साथ खड़ा हुआ और दोनों नीचे उतारते बहार गेट पर आ गए.

"अर्जुन भाई, एक बार इस बेटी पूर्वी सोलंकी को जरूर देखिओ. सच कहता हु.", संदीप का मैं अब हल्का हो चूका था इसलिए जाने से पहले वह ये बात कहता गया. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए उसकी पीठ पर हाथ मारा और गूडनिघत बोल कर वापिस कमरे में आ गया, जहा स्कूल की किताबे उसका इन्तजार कर रही थी.

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रात के 9 बजे थे और #### शहर में संजीव कार की पिछली सीट पर इत्मीनान से बैठा था. अगली सीट पर 2 और लोग थे, साडी वर्दी में पोलिसवाले. जगह थोड़ी शहर के बहार थी जहा ये शायद किसी पर नजर रखे थे. कांच के गिलास में बर्फ से ठंडी होती शराब की चुस्किया लेता संजीव बस एक हे तरफ देख रहा था, जहा एक लाइट जल रही थी और एक आदमी बहार खड़ा था. उनसे कोई 300 गज दूर.

"साहब, आप कहो तोह ये काम मैं करू? खतरा हो सकता है.", कंडक्टर साइड बैठे पुलिस वाले ने पीछे मदद कर संजीव से कहा.

"सुदीराम जी, आप भरे पूरे परिवार वाले है. और मैं नहीं चाहता के मेरी किसी गलती की सजा आपका परिवार भुगते.", एक सांस में गिलास खली करने के बाद संजीव ने सामने देखा था एक छोटी सी हरी रौशनी नजर आई. सीट पर एक तरफ राखी रिवॉल्वर और एक 12 इंच के फल वाला खंजर अपने कब्जे में लेते हुए संजीव गाडी से उतरता उस अँधेरे से रौशनी की तरफ चल दिए. जाने ये कोनसा मिशन था.

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आज भी घर में हमेशा वाला माहौल था. 11 बजे थे और रामेश्वर जी का घर जहां शांत था. तारा सो चुकी थी अर्जुन को पढाई करते देख और माधुरी दीदी भी छत्त पर सोने नहीं आ सकती थी क्योंकि आसमान घने बादलो से भरा था. दूसरी मंजिल के पिछले हिस्से वाले 2 कमरों में अन्धकार और एक में जीरो की हलकी सफ़ेद रौशनी प्रज्वल थी. अर्जुन हाथ में पानी की बोतल लिए ये उजाला देखने के बाद ऊपर खुली छत्त पर चल दिए, कुछ सोचता हुआ.

आसमान बिलकुल घुटा हुआ था. न कोई सितारा नजर आ रहा था और न हे हवा चल रही थी. ये भी धरती का संकेत था के घुटन के बाद हे हवा का महत्व और सूखे के बाद हे पानी की कदर पता चलती है. स्तिथि परिवर्तन जरुरी है किसी वरदान के महत्व को समझने के लिए.

किनारे किनारे छत्त पर टहलते हुए अर्जुन, पानी के छोटे घूँट ले रहा था. छत्त के बीच में आया तोह उसने पाया के एक गद्दा यही तेह किआ हुआ पड़ा था. शायद धुप लगाने के लिए ऊपर रखा होगा लेकिन कोई लेके जाना भूल गया होगा. गद्दे को उठा कर अर्जुन ने सीमेंट वाली पानी की टंकी के नीचे बानी खली जगह में रखा और छत्त से उतर कर निचली मंज़िल पर आ गया. सामने हे कड़ी अलका दीदी उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ पिछली तरफ के पहले कमरे में ले आई.

"कब से तेरा इंतज़ार कर रही थी. लाइट भी जलाये राखी जिस से तुझे पता चले मैं कहा हु.", हलकी आवाज में फुसफुसाती सी वह अर्जुन के बिलकुल चेहरे के सामने बोल रही थी.

"सब उस समय तक नहीं सोये थे लेकिन अब सो चुके है. इसलिए मैं अब आपके पास आ रहा था.", दोनों हाथ अलका की कमर में पीछे से डालते हुए अर्जुन ने उन्हें अपनी तरफ खींचते हुए कहा और इतनी हे देर में दोनों के होंठ आपस में उलझते से अठखेलिए करने लगे. घुटने तक का सिर्फ कमीज पहने अलका दीदी का पूरा जिस्म अंदर से निर्वस्त्र था. इतने दिनों की आग अब अपना पूरा रूप ले चुकी थी और अर्जुन के चूमने से ये और भी भड़क गई.

मांसल गोल कूल्हे मसलते हुए अर्जुन को महसूस हो रहा था के दीदी के निप्पल किस कदर सख्त हो चुके है. किसी पेंसिल की नोक की तरह तीखे वह दोनों चूचक उसकी छाती से ठीक नीचे चुभ रहे थे. शरीर से आती भीनी भीनी खुशबु बता रही थी की अलका दीदी ने ये सबकुछ बस अर्जुन से मिलान के लिए किआ है. जल्द हे अर्जुन के हाथ कमीज के निचले भाग से होते हुए उनके ठोस निर्वस्त्र कूल्हों की घाटी में उतर आये थे. नंगी फांके अर्जुन के हाथो की लम्बी उँगलियों से कभ जुड़ा होती तोह कभी वह उन्हें ाचे से दबा लेता.

5 मिनट तक बस उनका ये होंठो का द्वन्द चलता रहा. जैसे हे दोनों अलग हुए अर्जुन ने अपनी टीशर्ट और निक्कर दोनों उतार कर नए बिस्टेर के एक किनारे रख दिए और साथ हे अलका दीदी का वह एक मात्रा कपडा उतारते हुए उनके चांदनी से चमकते शरीर को बाहों में लेकर बिस्टेर पर आ गया.

दोनों चुप थे लेकिन अशांत और तभी अलका दीदी ने अर्जुन को नीचे किआ और खुद उसके पेट पर दोनों तरफ पाँव करती बैठ गई.

"आज जो हमारा दिल करेगा वह हम करेंगे. जो तुम्हे पसंद वह तुम और जो मुझे पसंद वह मैं.", इतना बोल कर वह सीढ़ी अर्जुन पर लेट गई. दोनों हाथ बिस्टेर पर मजबूती से पकडे अलका अर्जुन के गले को चूमती नीचे गर्दन पर दांत गाड़ने लगी. साथ हे वह अपनी मखमली छूट बीच बीच में अर्जुन के बेचैन लुंड पर भी घिस रही थी.

एक बार ाचे से अर्जुन की उन्नत फौलादी छाती का जायजा लेने के बाद पहले तोह अपनी कमर उठा कर छूट को लुंड के बीच वाले भाग पर टिकाया और फिर मुँह उसकी छाती पर झुकाती अर्जुन की छाती पर फिरने लगी. अर्जुन का छोटा सा निप्पल अपने होंठो में दबत वह कभी उसको गीला कर रही थी और कभी हलके से दांतो में दबा कर काटने का उपक्रम. अलका ये दोनों तरफ कर रही थी और दूसरी तरफ नरम छूट की गीली रगड़ से लुंड जैसे अब तक के अपने विशालतम रूप में आ चूका था.

अलका को जब महसूस हुआ के उसकी खुद की छूट अब भरपूर गीली हो चुकी है तोह अपनी मुद्रा बदलती वह उस कस्सी के डंडे से मॉटे लुंड को पकड़ कर उस पर खुद हे बैठने का उपक्रम करने लगी. लेकिन अभी भी ये इतना आसान न था. सूपड़ा बस छूट के संकरे छेड़ पर हे चिपक कर रुक चूका था. अपनी दीदी को ऐसे मझदार में देख अर्जुन ने खुद हे अपने हाथो से उनकी जांघो को थाम कर नीचे से अपनी कमर ऊपर उचका दिए. इधर लुंड का सूपड़ा उस मलमल सी छूट को भेदता हुआ अंदर और उधर अलका एक हाथ से अपना मुँह दबाये अर्जुन के ऊपर. हाथ हटा कर खुद हे उन्होंने अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए.

एक और धक्का लगते हुए अर्जुन ने आधे से ज्यादा लुंड अंदर उतरा तोह अलका ने हलके से उसका होंठ काट लिए.

"शठ... मर्डर गई.. उम्म्म.. आह.. मुझे लगा ये तैयार थी लेने के लिए.. आह." हलकी आवाज में बोलती वह दर्द जज्ब कर रही थी. और अर्जुन ने एक हाथ से पीठ सहलाते हुए इसमें मदद भी की.

"समय लगेगा अभी आपको. बस आराम से थोड़ा थोड़ा कमर को हिलाओ.", पीठ पर हाथ फिरता वह उन्हें समझा रहा था और अलका ने बात मानते हुए अपनी पतली कमर को हलके हलके आगे पीछे करना शुरू कर दिए. हर घर्षण पर सुपडे तक आ कर वह वापिस आधा लुंड अंदर करने लगी थी और 2 मिनट बाद हे अब उनकी छूट अर्जुन के अंडकोष के ऊपर तिकी थी.

"आह.. ये अब गया पूरा.. मममम.." मजे में सिसकती अलका ने हिम्मत दिखते हुए पूरा लुंड जड़ तक अंदर ले लिए था. बेशक इस कोशिश में छूट का चला अपनी औकात तक चौड़ा हुआ लुंड के गिर्द चिपका हुआ था.

"आप पहले भी 2 बार पूरा अंदर ले चुकी हो.", अर्जुन ने एक ऊँगली से उनकी गांड के चले को कुरेदते हुए कहा तोह वह थोड़ा जोर से सिसकती हुई पूरी तरह उस से लिपट गई...

"सीईई... ममम.. लेकिन ये अब पहले से ज्यादा टाइट और बड़ा लग रहा है. अंदर ये वह लग रहा है जहा शायद लिमिट ख़तम हो गई है.", अलका का मतलब था उसकी बच्चेदानी, जिधर अर्जुन का गरम और असाधारण रूप से मोटा सूपड़ा ठोकर लगा रहा था. अँधेरे में कुछ दिखाई तोह नहीं दे रहा था लेकिन फिर भी दोनों लिपटे हुए अपने शरीर आपस में एक दूसरे से रगड़ते हुए इस चुदाई का मजा ले रहे थे. अलका का सखलना जैसे हे शुरू हुआ एक तेज कराह के साथ ढेर सारा पानी उसने अर्जुन के लंग पर बरसा दिए. लेकिन वह एक पल रुकने के बाद फिर खुद हे ऊपर नीचे होते हुए अपने दूसरे चरम की तैयारी करने लगी.

"रुको आप.", अर्जुन ने पलट कर अलका दीदी को नीचे लिए और खुद ऊपर आ गया. उसको मालूम था के अगर दूसरा चरम हो गया तोह फिर ये संगम ज्यादा देर नहीं चलेगा.

बिस्टेर पर लिटाने के बाद हे अर्जुन ने अलका को पीठ के बल कर दिए. मोटी गद्देदार गांड अब ऊपर थी और अर्जुन के दोनों हाथो की पकड़ में.

"मुझे पता था के अब यही होगा. और मैं इसके लिए खुद तैयार हु.", अलका ने तकिये के पास हाथ से टटोलते हुए एक तुबे ढून्ढ कर अर्जुन को पकड़े और अपनी लम्बी टंगे विपरीत दिशा में फैला कर उसका काम आसान करने लगी.

अब तक जितनी भी लड़कीअ अर्जुन के ज़िन्दगी में आई थी उन सभी में अलका दीदी के खूबसूरत कूल्हे सबसे बेजोड़ थे. और उसकी दिली तमन्ना था इनमे अपना परचम लहराने की. नृत्य अभ्यास और कसरत का कमाल था जो अलका को खुद भी अपने थिरकते और बेदाग कूल्हों पर नाज था. ऊँगली के पोरे पर ाचे से क्रीम निकलने के बाद अर्जुन ने अलका के कूल्हों को फैलते हुए guda-dwar पर वह क्रीम लगनी शुरू की. पहले तोह बहार वाले रबर से चले को ाचे से नरम किआ और फिर पहले जितनी हे क्रीम ऊँगली पर लगते हुए बड़े आराम से वह उनकी गुदा में धंसा दी. तुबे एक तरफ रख कर अब वह एक हाथ से उनकी मुलायम छूट की फांके मसल रहा था और दूसरे हाथ की 2 उंगलिअ अब उनके पिछले हिस्से में आधी अंदर बहार होती हुई उसको नरम कर रही थी. आधी से ज्यादा तोह वह उंगलिअ जा भी नहीं सकती थी. कूल्हे इतने उभरे हुए थे के डेढ़ इंच तोह गहरी बस दरार थी.

अलका दीदी को अब पीठ के बल करते हुए अर्जुन ने उनके दोनों पाँव उठा कर कंधे पर रख लिए. कमर के नीचे एक तकिया लगाने से गांड और उभर के आगे आ चुकी थी. बुरी तरह अकड़ा हुआ लुंड 3-4 बार उनकी टपकती छूट पर फिरने के बाद अर्जुन ने मजबूती से पकड़ कर उनके उभरे हुए पिछले छेड़ पर टिक्का दिए. लुंड को भी महसूस हो गया था के ये बेहद ख़ास है. किसी पानी भरे बड़े गुब्बारे की तरह.

"दर्द होगा आपको शुरू में. बस थोड़ा अंदर जाने तक." अर्जुन ने अलका दीदी को आगाह किआ.

"इस से ज्यादा तैयार मैं कभी नहीं थी. मुझे भी महसूस करना है ये.", अलका दीदी की रजामंदी मिलते हे अर्जुन ने दबाव बढ़ाना शुरू किआ. एक पल को तोह सूपड़ा मामूली सा आगे हुआ लेकिन फिर वही ृक्क गया. अर्जुन को पता था के अब उसको सही जोर लगाना पड़ेगा. अगले हे क्षण अलका ने अपने दोनों हाथो से मुँह दबा लिए और कच्छ से वो ढाई इंच लम्बा सूपड़ा उनकी नरम गांड को फैलता अंदर धंस गया था. लेकिन अर्जुन अभी रुका नहीं था. उसको पता था के सबसे मोटा भाग जब अंदर प्रवेश कर गया तोह अब सिर्फ आगे खाली जगह है.

दोनों पत्तो फैलते हुए अर्जुन अलका दीदी के ऊपर आ गया और लुंड भी चिकनाई की वजह से धीरे धीरे अंदर सरकने लगा.

"बस अब हो गया जितना दर्द होना था.", अर्जुन ने इस पूरे मिलान के दौरान अब उनके वह मुलायम दूध पकडे थे. आराम से उन्हें दबाते मसलते वह आधा लुंड अंदर फसाये उनके शरीर को फिर से गरमा रहा था.

"ोीी माँ... पूरे बेरहम हो.. मेरी जैसे फट गई है वह से..", अलका की बात सुनकर अर्जुन ने ऊँगली से पिछले छेड़ को टटोला तोह वह पर्याप्त चिकना था लेकिन कही भी गीलापन नहीं था. मतलब खून नहीं निकला था.

"नहीं.. कुछ नहीं हुआ उधर. और अब भी नहीं होगा.", दोनों उरोज मुट्ठी में भारत हुए वह अलका के मीठे होंठ पीटा हुआ अब आधे हे लुंड से उनकी गुदा को भेद रहा था. 30-35 छोटे हलके धक्को के बाद अब आधा लुंड मक्खन की तरह अंदर बहार हो रहा था, बेशक मासपेशिओ की कसवत छूट से कही ज्यादा थी लुंड पर लेकिन क्रीम की वजह से वह फिसल रहा था.

"आह... आह.. थोड़ा तेज करो न.. आह..", अलका के भी सुर बदल गए जब वही मोटा लुंड अब दर्द की जगह मजा दे रहा था. टाँगे अपने आप ऊपर उठ गई थी और अर्जुन भी ये देख कर हर 5-6 धक्को के बाद थोड़ा लुंड अंदर कर देता. दोनों मॉटे चुचो को एक साथ जोड़ते हुए उसने दोनों निप्पल मुँह में भरे और पूरा लुंड जड़ तक गांड में उतार दिए. अलका की दर्द और मजे की सिसकारी बता रही थी की अब अर्जुन उसके साथ कुछ भी करे उसको सिर्फ इसमें मजा हे आने वाला है. पूरा लुंड जब अंदर जाता तोह हर धक्के पर उसके सांड से अंडकोष अलका के नितम्भ से टकराते. Thapp-thapp की आवाज अब एक ताल में पूरे कमरे में गूँज रही थी. अर्जुन का लुंड भी अब पूरा गरम हो कर फूलने लगा था और अपने धक्को की गति बढ़ाते हुए वह पूरा जोर लगते हुए अलका के पिछले भाग को रोड रहा था.

"आठ... मई गई रे.. आठ.. ये क्या हो रहा है...", अलका की छूट पानी के कतरे उछलने लगी थी और उसके बाद अर्जुन भी जड़ तक लुंड दाल कर जैसे कूल्हों से चिपक हे गया था. गुर्राते हुए वह अपना पानी अलका दीदी की गांड में खाली करता चला गया.

"Hmmm...ahh.mmm.. रुको अभी मत निकलना.", अर्जुन ने दीदी को पीछे होने से रोका और खुद वैसे हे घुटनो के बल खड़ा रहा. लुंड जब थोड़ा तिथिल हुआ तोह खुद हे अर्जुन ने बड़े ध्यान से उसको बहार खींच लिए. लेकिन तब भी सुपडे ने अपना असर दिखा हे दिए.

"एआइइइइ.." अलका की हलकी सी चीख निकल गई क्योंकि सूपड़ा बाकी हिस्से के मुकाबले ज्यादा हे मोटा था और पूरी चुदाई के दौरान एक बार भी बहार नहीं आया था.

"इसलिए मैं थोड़ा इन्तजार किआ था. नहीं तोह ज्यादा दर्द होता.", अर्जुन ने बगल में लेट कर अलका को बाहों में भरा और अपने ऊपर हे लिटा लिए. कूल्हे से लेकर गर्डर तक उनकी रेशमी त्वचा को सहलाता वह उनका दर्द भी काम कर रहा था. नरम चुके छाती में धंसे थे लेकिन अलका को ऐसे बड़ा सुकून मिल रहा था.

"मैं खुद को साफ़ करने जा रहा हु. आप भी कर लीजिये और फिर आराम कर लेना.", बिस्टेर से उठ कर अपने कपडे पहन कर बहार निकलने से पहले अर्जुन ने उनको होंठो को चूमते हुए एक निप्पल भी हलके से दबा दिए.

"आउच.. कमीने.. आह.. कर लुंगी साफ़. अब तुम जाओ.", अलका ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिए था. और इधर अर्जुन जैसे हे अपने कमरे की तरफ जाने लगा वह दरवाजे के पास पहले से हे ऋतू दीदी बैठी हुई थी.

"5 मिनट में ऊपर आ जाना.", इतना बोल कर वह कड़ी हुई और ऊपर वाली मंज़िल की सीढिया चढ़ गई.

'ये कब आई इधर.?' अर्जुन सोचता हुआ अंदर दाखिल हुआ तोह तारा गहरी नींद में चादर लिए सो रही थी. उसको देखने के बाद सीधा बाथरूम में घुसते हे ाचे से खुद को साफ़ किआ और शरीर पर पानी डालने के बाद सिर्फ पजामा पहन कर वह ऊपर चल दिए, दरवाजा ढाल के.

"गद्दा कहा रख दिए यहाँ से.?", ऋतू दीदी कमर पर हाथ रखे कड़ी थी और अर्जुन के ऊपर आते हे यही सवाल किआ.

"wo..woh आपने रखा था?", अर्जुन को अब समझ आया के वह गद्दा यहाँ क्यों पड़ा था और कौन लेके आया था. फिर बिना कुछ पूछे उसने वापिस वह गद्दा टंकी के नीचे से निकला और झाड़ कर वही बिछा दिए. लेकिन मुड़ते हे ऋतू दीदी सीधा उसके ऊपर और अर्जुन गद्दे पर पीठ के भार.

"कितना मुश्किल होता है खुद को संभालना जब तुम सामने दीखते रहते हो और मैं कुछ कर न सकू.", और ऋतू ने अर्जुन को अपने आगोश में ऐसे ले लिए जैसे वह अभी भाग जायेगा. दिल और धड़कन दोनों हे परस्पर जुडी थी दोनों की.

"मेरा बस चले तोह एक पल भी खुद को आपसे दूर न करू.", अर्जुन ने भी ऋतू को खुद से ाची तरह चिपका लिए था. लम्बे घने बाल अर्जुन का पूरा चेहरा धक् चुके थे. और महकती साँसे अर्जुन के चेहरे को गरम करती उस दुनिया में ले जाने लगी थी जहा सिर्फ इन 2 दिलो का हे वजूद था. आँखें बंद करते हुए वह बस ऋतू के इस सुखद आगोश में खुद को वार चूका था. हलके सूख चुके अर्जुन के होंठो से ऋतू के तपते नरम होंठ मिलते हे जैसे बंजर जमीन पर पानी की पहली बौछार होने लगी थी. अर्जुन खुद को पूरी तरह ऋतू के सुपुर्द कर चूका था.

अर्जुन के होंठो को खोलती ऋतू की जीभ जैसे हे मुँह में दाखिल हुई तोह amar-ras सा घुल गया उसके मुँह में. अधिक की आस में और मुँह खोलते हे खुद उसकी जीभ ऋतू के दांतो में क़ैद हो गई थी. जैसे आज वह अपने होंठो से हे अर्जुन की जान निकल कर अपने अंदर सममाहित्त कर लेने वाली थी. इस mookh-dwand के अंतराल अर्जुन के हाथो ने कोई हरकत न की थी. लेकिन उसकी धड़कन ऐसे चलने लगी थी जैसे किसी मरीज की अंतिम समय पर रुक रुक कर चलती है.

जाने कितना समय दोनों ऐसे हे जुड़े रहे और जब अलग हुए तोह ऋतू अपना सर उसकी छाती पर रखे बगल में लेती थी. एक हाथ अर्जुन की कमर पर रखा था और दूसरा सर के नीचे. पूरा आसमान कुछ क्षणों के लिए रौशनी से नाहा गया जब बादलो के टकराव से श्वेत चमक तेज गर्जना के साथ उत्पन्न हुई. लेकिन इस भयंकर गर्जना का भी ऋतू पर कोई असर न हुआ. इस रौशनी में दोनों ने बस एक दूसरे के चेहरे को ाचे से देखा और एक बार फिर ऋतू ने अपने होंठ अर्जुन से मिलते हुए उसकी कमर पर नाख़ून दबाने शुरू कर दिए. उसकी जांघो के बीच का नरम भाग अर्जुन की मजबूत जांघ से चिपका हुआ रगड़ रहा था. फिर खुद हे ऋतू ने अर्जुन को उठने का संकेत दिए और अपने दोनों वस्त्र उतार, पाँव फैलाये बैठ कर अपनी प्रेमी को देखने लगी. अब अर्जुन के शरीर भी अपनी janam-awastha में था. दोनों एक दूसरे के सामानांतर बैठे एक दूसरे को देख रहे थे. आसमान एक बार फिर चकचौंध हुआ और लगातार होता रहा.

सामने बैठी संगेमरमर सी तराशी हुई अप्सरा को निहारता उसका प्रेमी उसके अध्भुत्त सौन्दर्य में जैसे डूब कर बहार आना हे नै चाहता था. घनी काली फैली हुई जुल्फे भी आसमान की घटाओ के सामान थी, चमकती काली बड़ी बड़ी आँखें, तराशा हुआ नाक और उभरे हुए धनुषाकार होंठ. पतले सुराहीदार गले से नीचे 2 चंद्राकर यौवन से भरपूर अद्वित्य दुग्धकलेश.

हिम्मत करते हुए अर्जुन ने अपना एक कांपता हुआ हाथ ऋतू के पहले हुए दाए सतांन पर रख दिए. तन्न कर खड़ा हुआ गुलाबी अग्रभाग जैसे हाथ लगाने से और ज्यादा उभर आया हो. होंठ स्वतः हे जा कर उस लालायित कर रहे अंग पर जा लगे. हलके हलके चुसकते हुए अर्जुन ने दूसरा ठोस सतांन भी अपने हाथ में थम लिए. जहाँ पहले दोनों की साँसों का शोर था अब वह ऋतू की मादक आहें और रह रह कर निकलती सिसकिओन का. इन दोनों से परे जितना भी shor-garzana हो रही थी, ये उस से बेअसर अपने योग में डूबे हुए थे.

पता हे न चला कब ऋतू के दोनों सतांन पीने के बाद अर्जुन उसके ras-kutumb पर पहुंच गया. मेघो की गर्जना अब बरस रही थी. Tip-tip करती बारिश की बूंदो में अर्जुन बड़ी लगन से उस कॉमर्स को पी रहा था जो ऋतू की योनि से निकलता सीधा उसके होंठो में आ रहा था.

"आह... बास...", ऋतू साखालित्त होती रही लेकिन अर्जुन जब न हटा तोह खुद हे उसने अर्जुन को पीछे किआ. नंगे जिस्म पर तीखी बारिश भी फूल सामान लग रही थी. अर्जुन को गद्दे पर लिटाने के बाद खुद हे ऋतू ने उसका वह प्रचंड लिंग दोनों हाथो से थाम लिए. अपनी नाजुक उंगलिओ से 5-6 बार ऊपर नीचे करने के बाद नीचे झुक कर ऋतू ने पूरा सूपड़ा अपने मुँह में दबा लिए था. मुश्किल जरूर था लेकिन ऋतू ने कोई hil-hujjat किये बिना अपने मुँह को कुछ देर वैसे हे रखते हुए सांस दुरुस्त किआ और अगले हे पल अब सिसकारियां अर्जुन के मुँह से फुट रही थी.

गरम मुँह और गीली जीभ का कमाल दिखती ऋतू ने अर्जुन को मजबूर कर दिए था गद्दे को मुट्ठी में भरने के लिए. कुछ हे देर बाद ऋतू लगभग आधा अंग मुँह में अंदर बहार करने लगी थी और अर्जुन का हाथ अब उत्तेजना में उसका सर सेहला रहा था.

"आह्हः.. बसससससस...", अर्जुन ने आराम से ऋतू को हटते हुए इतना हे कहा. वह लम्बी साँसे लेते हुए बारिश में भीगती हुई ऋतू को हे देख रहा था. ऋतू ने आगे बढ़ते हुए अर्जुन को अपने ऊपर खींचना शुरू किआ तोह पूरी तरह उत्तेजिट वह उसकी दोनों टाँगे फैलते हुए ऋतू के ऊपर चा गया. अपनी टाँगे अर्जुन के कूल्हों की गिर्द लपेट कर उसने पूरी तरह अकड़ा हुआ वह मोटा लुंड अपनी पनियाई छूट के मुहाने लगा दिए.

"समां जाओ मुझमे.", दोनों के बदन इस बरसती रात में भीगे हुए थे और ऋतू के इस आमंत्रण पर अर्जुन ने बड़े प्यार से दबाव बनाते हुए धीरे धिरे अपना लुंड उस मखमली सुरंग डालना शुरू कर दिए. अर्जुन की पीठ पर नाख़ून गदति ऋतू ने उसकी छाती में अपना मुँह दबा लिए.

बुरी तरह गीली सुरंग में सूपड़ा उतारते हे अर्जुन ने अपने घुटने सही करते हुए ऋतू के दोनों अमृत कलश हाथो में ले लिए. हलके हलके चूसते हुए वह सुपडे से हे उसको मजा देने में लगा रहा. जब मस्ती में आहें तेज हुई तोह कमर के तेज प्रहार से एक हे बार में 4 इंच से ज्यादा हिस्सा और अंदर करते हे दीवांवर सा वह ऋतू के सूजे हुए होंठो को पीने लग पड़ा.

'दर्द की परवाह किसे है, मंजिल जब purna-aanand से भरी हो'

ऋतू ने भी कमर को उछलते हुए हर पड़ते धक्के से ताल मिलनी शुरू कर दी थी. छूट के फैल चुके होंठ इस अँधेरे में बेशक नहीं दिख रहे थे लेकिन कैसा हुआ अंदर बहार होता लुंड बता रहा था के ये साँचा बस अर्जुन के लिए हे बना है.

"आह्हः.. और जोर से.. उम्म्म... और तेज.. करो न.. मुझे ऐसे हे प्यार करो अर्जुन."

"हाँ जान.. आह.. तुम सिर्फ मेरी हो.. आह.. और मैं भी तुम्हारा..", अर्जुन कभी ऋतू के कूल्हों को सेहलता कभी गर्दन को चूमता और वैसे हे ऋतू भी कभी उसकी चौड़ी छाती से खुद को चिपका लेती और कभी अर्जुन गीले चेहरे से बारिश की बूंदे पीने लगती. हर गहरे धक्के से दोनों के शरीर लरज जाते. कितनी हे देर दोनों का ये समागम चलता रहा. तेज रफ़्तार बारिश अब एकसार हो रही थी और यहाँ इनके मिलान की रफ़्तार भी.

"ी लव यू अर्जुन. ... उम्म्म्म..", ऋतू के शरीर ने एक के बाद एक झटके खाने शुरू किये तोह बुरी तारक अकड़ती वह जमीन से एक फुट ऊपर उठती हुई अर्जुन से चिपक गई थी. और अर्जुन भी अपने चरम पर पहुँच चूका था. ऋतू के थमने के बाद उसने भी जल्दी से अपना लिंग बहार निकाल कर ऋतू के पेट पर गरम वीर्य की बौछार कर दी..

कुछ देर बाद दोनों के शरीर हे बारिश के पानी से साफ़ हो चुके थे और ऋतू ने कपडे पहन ने चाहे तोह अर्जुन ने सिर्फ उन्हें उठाने को कहा. नंगे बदन हे वह ऋतू को भी वैसी हे हालत में लिए सीढ़ियों से नीचे चलने लगा.

"चाचाजी की तरफ वाले अगले कमरे में.", ऋतू ने इतना हे कहा था और अर्जुन वैसे हे उसको अपनी बाहो में लिए अलका के साथ वाले कमरे में चल दिए. पाँव भिड़ते हे दरवाजा खुल गया और फिर से दरवाजा बंद करने के बाद अर्जुन ने ऋतू को बड़े प्यार से नीचे उतरा और अंदाजे से लाइट जलाते हुए सिर्फ जीरो वाला सफ़ेद बल्ब हे चालू रखा.

"शरीर पांच लीजिये पहले.", अर्जुन ने ऋतू दीदी से कहा तोह दरवाजे के पीछे लगे हुक से टोलिया उतार कर ऋतू ने पहले अर्जुन को सुखना शुरू किआ लेकिन अर्जुन ने एक तरफ से टोलिया पकड़ते हुए अपने साथ हे ऋतू को भी पोंछना शुरू कर दिए. ऋतू का निर्वस्त्र खूबसूरत जिस्म अब अर्जुन के सामने रौशनी में उजागर था.

"शब्द काम पड़ जायेंगे लेकिन ख़ूबसूरती बयान नहीं होगी.", अर्जुन ने ऋतू की आँखों में देखते हुए कहा.

"ये सिर्फ आपका हे है.", हमेशा की तरह ऋतू भी प्रेम के एकांत पालो में अर्जुन को pati-samman हे देती थी. दोनों ने के बार प्यार से चुम्बन किआ और फिर अर्जुन ने ऋतू को बिस्टेर पर बिठाते हुए नीचे का जायेगा लिए. छूट के गुलाबी होंठ थोड़े सूज गए थे और ऊपर निप्पल का भी यही हाल था.

"दर्द है?", अर्जुन के पूछने पर ऋतू ने मुस्कुराते हुए सिर्फ ना में सर हिलाया. दरवाजे के पीछे पहले से हे टेंगा एक कमीज ऋतू की तरफ बढ़ाया तोह उसने फिर से मन कर दिए.

"ऐसे हे सो जाइये मेरे साथ कुछ देर के लिए.", ऋतू के इस प्यार भरे आग्रह को अर्जुन मन न कर पाया लेकिन टोलिया लपेट कर 1 मिनट में वापिस आने का बोल कर वह कमरे से निकल गया. कुछ हे पालो के बाद वह कमरे में वापिस आ गया था. नीचे एक आरामदायक निक्कर पहने और ऊपर से खुला सीना. हाथ में एक झीना सा गाउन था जो खुद उसने हे ऋतू को पहनाया और लाइट बंद करने के बाद अपने साथ चिपकते हुए लेट गया.

"2 बज चुके है. सुबह उठाना मत मुझे.", अर्जुन ने ऋतू के एक उरोज को हाथ में भरते हुए होंठो पर होंठ टिकाये और दोनों कब एक दूसरे की बाहों में नींद के आगोश में चले गए पता न चला. बहार अभी भी बरसात जारी थी.
 
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