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कौन क्या है (1)
10 बजे रामेश्वर जी अर्जुन और संजीव के साथ मुख्या कचहरी के प्रवेश द्वार पर थे. आज सुबह 9 से पहले हे वह बाकी सदस्यों के साथ अपने घर लौट आये थे जहा नाश्ता पानी करने के बाद कुछ file-kagaaj के साथ वह गाडी से सीधा यहाँ चले आये थे. नोटरी से एक हलफनामा तैयार करवाता संजीव बेहद शांत था. वही अर्जुन बड़े ध्यान से देख रहा था के उसके दादा जी को कितने हे लोग देख रहे थे और कई तोह उनके पास आ कर हाथ जोड़ मिल रहे थे.
"नमस्कार पंडित जी. आपने यहाँ आने का कष्ट किआ? कभी हमे भी काम दे दिए कीजिये?", काले कोट में चस्मा लगाए ये अधेड़ उम्र के व्यक्ति इतनी व्यस्त जगह पर भी झुक कर उसके दादा के पाँव छू रहे थे.
"अरे सरदाना जी आप अभी ड्यूटी पर है और सरकारी वकील हो भाई. वैसे भी बहुत दिन हो गए थे इधर आये और ऊपर से सुना है के आज वह सैनी मर्डर केस का ट्रायल शुरू हुआ है.", गले से लगाने के बाद रामेश्वर जी ने उन 'सरदाना' उपनाम के वकील से कहा. अर्जुन का तोह ये पहला अनुभव था ऐसी जगह आने का. किसी सरकारी हॉस्पिटल से ज्यादा लोग तोह यहाँ थे. 35-40 नोटरी तोह घने पेड़ के नीचे अपनी दुकान लगाए बैठे थे. कही पुलिस वाले किसी मुजरिम को ला रहे थे कही ले जा रहे थे. एक तरफ चलन की खिड़की पर इतनी लम्बी कतार थी की dhakka-mukki जैसा माहौल था.
"पंडित जी आपका तोह आखिरी केस था वह जहाँ तक याद है. इन्दर सैनी के कटत में तोह उस समय बरी हो गया था लेकिन फिर सबूत हाथ लगे तोह इतने साल तक पुलिस से बचता रहा था. कहा तोह उस समय तक जितेंदर सिर्फ फिरौती और कब्जे के काम करता था. देखिये 11 साल में इतना नामी बदमाश बन गया है की एक डोज़ेन पुलिस वाले घेर कर लाये है उसको और उसके भाई विष्णु को. बंसल साहब नहीं थे अपने, डिफेन्स कॉलोनी वाले. उनकी बेटी का रपे भी रपे इन्होने किआ है लेकिन वह मेडिकल कारवाही समय ले रही है.", अर्जुन ये दोनों हे नाम सुनकर चौंक गया था. जितेंदर उर्फ़ काला और विष्णु उर्फ़ बिल्लू. मतलब पक्के हे गुनेहगार थे वह दोनों लेकिन पुलिस अभी तक सबूत हे जूता रही थी. रामेश्वर जी के चेहरे पर सार्ड से भाव आ गए थे.
"बंसल ने हे पैरवी की थी उस समय और उसका वही lok-dal वाला बाहुबली पैसे भर रहा था इनके. कितनी प्यारी बची थी उसकी और पिता के पाप का भोज उसको सहना पड़ा.", रामेश्वर जी का पोलिसिअ लेजहज़ा आज देख रहा था अर्जुन. ऐसी आवाज से तोह अपराधी के रोंगटे खड़े हो जाए.
"पंडित जी, उन्हें भी लकवा मार गया है पिछले साल. याद है मुझे वह केस, आपने हे मुझे जूनियर वकील को केस दिलवाया था लेकिन मैं भी इन्साफ न दिला पाया था."
"कोई बात नहीं भाई. वह जाने से पहले सभी इन्साफ हो जाते है यही इस धरती पर.", एकदम से हे चेहरे पर मुस्कान लाते उन्होंने इन वकील साहब को आसमान की तरफ इशारा करते कहा तोह वह भी हंस दिए. 5-6 पुलिस के सितारा-3 सितारा कर्मी भी उधर आ खड़े हुए थे और जैसे हे पंडित जी की निगाह उनपे पड़ी तोह सभी ने वही उपक्रम किआ पाँव छूने का और हाथ पीछे करके खड़े हो गए. रामेश्वर जी तोह जैसे उनके लिए पिता सामान हे थे. और वह भी सभी कर्मियों को उनके प्यार के नाम या आखिरी नाम से बुलाते बात करने लगे थे. फिर एक इंस्पेक्टर पड़ का व्यक्ति थोड़ा करीब आया तोह हाथ के इशारे से बाकी सभी को रुकने का बोल कर उसके साथ आगे चल दिए.
"कहो कमलकांत. परेशां हो बहोत." रामेश्वर जी थोड़ा आगे चलते आ खड़े हुए थे.
"सर, वह दबाव भी आ रहा है और सबूत भी मिटाये जा रहे है. आपके समय तोह सारा सिस्टम आपस में जुड़ा था. हॉस्पिटल से लेकर सभी सरकारी विभाग पुलिस के काम में पूरा साथ निभाते थे. अभी हालत कुछ और हे है. वह समो मल्होत्रा और डॉ गुलाटी शायद इनका मेडिकल परचा क्लियर न कर दे. आप हे मशवरा दे सकते हो या सीधा कहु तोह मदद कर सकते हो. डिपार्टमेंट की तरफ से सारा प्रेशर मेरे ऊपर है और वही Lok-dal वाला मंत्री इनके सबूत साफ़ करवाने में लगा है. हमरे रिमांड में विष्णु तोह टूट गया था और उसने काबुल भी किआ था 1 हत्या और 5 बलात्कार लेकिन आज यहाँ वह मुकर गया, अभी 10 मिनट हे पहले. जितेंदर तोह घाघ है उसको टॉड नहीं पाए.", अपनी वर्दी वाली टोपी उतार कर काख में दबा ली थी इंस्पेक्टर ने और चेहरा बता रहा था के हड्डी गले में फांसी है.
"डॉक्टर मैं संभल लूंगा और उनका खुद फ़ोन आ जायेगा तुम्हारे पास. लेकिन विष्णु ने सारे इल्जाम खुद पर ले लिए तोह सबूत तोह तुम्हे फिर भी जुटाने हे होंगे जितेंदर के खिलाफ. कितना रिमांड बढ़ाया है?", रामेश्वर जी ने शांत भाव से हे कहा.
"सर 5 दिन का माँगा था लेकिन 2 हे दिन का मिला है. परसो फिर पेशी है. सबूत पता होते हुए भी ला नहीं सकते क्योंकि परचा बनवाया तोह बड़े नाम बीच में आएंगे और उल्टा रास्ता तोह फिर .. ", रामेश्वर जी के चेहरे पर कुछ अलग भाव आ रहे थे. एक बार उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा जो आराम से एक पत्थर के बेंच पर बैठा दूसरी तरफ देख रहा था और संजीव से नजरे मिली जो वहीँ नोटरी वाले को पैसे देता अपने दादा को देख रहा था. दोनों की आँखें मिली तोह उन्होंने पलके झपकाई. संजीव भी चुपचाप अर्जुन की पीठ की तरफ से घूमता हुआ उनकी पास आ खड़ा हुआ.
"कमलकांत, सबूत. और फिर परसो वो दोनों भागने की कोशिश करेंगे.", सबूत बोलते हुए उन्होंने संदिग्ध इशारा संजीव की तरफ किआ और आखिरी बात पर कमलकांत का भी चेहरा चमक उठा. संजीव उनके हाथ में वह नोटरी से बनवाया हरे रंग का परचा पकड़ता कमलकांत के साथ गाडी में बैठ गया बात करने के लिए और पंडित जी फिर अर्जुन को कुछ परिचित लोगो से मिलवाते हुए उसका ध्यान वही लगाए रहे.
"दादा जी. एक बात पूछनी थी आपसे. बस सोच रहा हु कैसे पुछु." दोनों अब एस्टीम कार के अंदर बैठे थे.
"बेहिचक." रामेश्वर जी ने दूसरा हरा पन्ना पढ़ते हुए कहा, एक बार अपने पोते का चेहरा देखते हुए.
"वो जो वकील अंकल थे, और उन्होंने ने जो 2 नाम लिए थे उनके बारे में मैंने पढ़ा था कुछ दिन पहले. अभी उन्हें यहाँ से जीप में बिठा कर भी ले जाया गया है. 4 मर्डर और 2 रपे के चार्जेज के बाद भी वह अंकल कह रहे थे की सबूत के अभाव में वह दोनों बरी हो सकते है."
"बीटा, ये जो अदालत है न इसका एक असूल है. जैसे हर संस्था का होता है. यहाँ पक्के साबुत, गवाह और अपराध के साथ अपराधी का रिश्ता साबित करना जरुरी होता है. सिर्फ कह देने भर से उन्हें सजा नहीं मिल सकती. और वह 7 कतल, 15 से ज्यादा रपे और अनगिनत फिरौतियाँ कर चुके है. लेकिन जैसे गेंहू साफ़ नहीं होती उसमे भी घुन होता है वैसे हे हर विभाग में ये होता है. कुछ भ्रष्ट लोग थोड़े से धन या ताक़त के नशे में बहोत सरे साफ़ लोगो का भी काम खराब कर देते है. इन्हे भी सजा मिलेगी. वैसे तुम्हे बड़े ाचे से खबर याद रह गई इन दोनों की? और तुमने वकील की बात भी सुन ली?", उनकी आखिरी बात पर एक पल के लिए अर्जुन के चेहरे पर शिकन आई लेकिन वह संभल गया.
"बस अखबार में ाचे से पढ़ी थी खबर और नाम भी वही थे तोह वकील अंकल की बात की और ध्यान चला गया." अर्जुन अब अगली सीट पर बैठ कर नजरे बचता सामने देखने लगा था. लेकिन रामेश्वर जी को इशारा मिल चूका था और उन्होंने शान्ति रखते हुए बस फिर से एक नजर उन कागजात पर डाली इधर संजीव भी कार में ड्राइवर सीट पर आ बैठा.
"साथ वाले रजिस्ट्रार के दफ्तर.", उनकी बात पर संजीव भैया ने बिना कुछ कहे बस कार सामने से हे घूमते हुए बताई जगह पर ले ली थी. ये भी एक परिसर हे था कचहरी के अंदर हे. जहाँ jameen/ghar/plot के कागजात का काम होता था.
सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आये तोह सामने हे लोगो की क़तर लगी थी लेकिन पंडित जी को देखते हे एक बाबू सा व्यक्ति नमस्कार करता अपने साथ ले चला और पीछे उनके दोनों पोते. कुछ देर तक अर्जुन और संजीव पीछे लगी कुर्सियों पर बैठे रहे और रामेश्वर जी 2 अधिकारीयों से अपनी मंत्रणा करते रहे. वो दोनों भी रामेश्वर जी की लाइ फाइल और सभी कागज़ को ध्यान से देख रहे थे और उनसे जुडी बातें कर रहे थे.
"कहाँ ले आये भैया आप भी आज. दिन ख़राब हो गया पूरा.", अर्जुन ने हलकी नाराजगी में ये बात कही तोह सनीव भैया मुस्कुरा दिए.
"मेरा रोज का काम है. अब बोरियत की ऐसी आदत हो गई है के पूछ हे मत. ये शुक्र कर यहाँ दादाजी साथ है नहीं तोह वह नीचे कतार देखि थी न. अभी वही खड़े होते और 3 बजे तक नंबर आता फिर ये लोग भी नहीं मिलने थे.", संजीव भैया की बात सुनकर अर्जुन को अब समझ आया के दादाजी के साथ आने का क्या फायदा है. वह थोड़ा सा आराम से बैठ गया था.
"संजीव, बीटा इन कागज पर दस्खत कर दो. और अर्जुन जितनी जगह नीले पेन की लकीर लगी है वह तुम भी कर दो. और ये 2 जगह अपना अंगूठा भी लगा देना.", कोई एक घंटे बाद उन्होंने 500-1000 की चाप वाले 10-12 पैन उसके सामने कर दिए तोह अर्जुन अपनी जगह से खड़ा होता टेबल पर कागज रख दस्खत करने लगा. पढ़ने की कोई कोईशिष नहीं की थी. वही काम संजीव भैया ने भी किआ, थोड़ा उस से जल्दी और फिर अपने दादा को दोनों ने वह कागज दे दिए. संजीव भैया ने एक प्लास्टिक का बड़ा सा बैग थोड़ी देर बाद ला कर वही टेबल पर रखा तोह एक और अधिकारी उधर आया जिसके साथ 2 और लोग थे. अर्जुन का ध्यान जैसे हे उस बैग पर गया तोह आँखें फटी रह गई. 100-500 के नीले नोटों की गड्डियां ऊपर तक आई हुई थी बैग में. वह 3 लोग कोई अगले आधे घंटे तक उँगलियाँ गीली करते वह गिनते रहे.
"पूरे है चन्दन जी.", सभी बण्डल वापिस सही से बैग में डालने के बाद उन्होंने रामेश्वर जी के सामने बैठे अधिकारी कहा तोह उसने इशारे से पैसे ले जाने को कहा.
"वैसे पंडित जी, घर की जमीन और घर के हे लोगो के नाम थी. फिर भी इतनी रेगिस्टरी की फीस आपने जाया कर दी.", उनकी बात पर पंडित जी मुस्कुरा भर दिए.
"ऐसा है भाई. हम तोह खुद सरकारी गुलाम थे, फिर बचे भी वैसे हो गए. इधर संजीव ने साफ़ मन कर दिए कुछ सँभालने से. अब साड़ी जमीन ये पट्ठा हे संभालेगा और सबको हिसाब देगा. यही तोह खली है घर में.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते उन्होंने इतना कहा तोह भैया के साथ वह सामने वाले भी हंसने लगे.
"सही है वैसे आपका ये लड़का भी. शंकर भाई से भी 3-4 उंगल ऊपर निकल गया. वैसे सुना है संजीव बिज़नेस जमा रहा है, कुछ jama-punji हमारी भी लगवा दीजिये पंडित जी.", उनकी बात पर रामेश्वर जी ने संजीव की तरफ देखा.
"मैं परसो आता हु अंकल आपके पास. बैठ के बात करेंगे और फिर ये सभी कागज भी दर्ज करके फाइल भी ले जाऊंगा.", संजीव भैया ने आराम से हे कहा और फिर खड़े हो गए नमस्कार करते हुए. पंडित जी भी वैसे हे मिलते हुए बहार आने लगे तोह वह दोनों अधिकारी साथ हे नीचे आये उनके. जाने क्या बात करने में लगे थे और भैया तोह अर्जुन को लेकर आगे हे निकल चले थे.
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"आपने फिर कही जाना है क्या भैया? आजकल तोह आप घर रहते हे नहीं.", अर्जुन की भोली बात पर संजीव भैया ने हँसते हुए कहा.
"क्या है न छोटे, एक उम्र के बाद फिर घर की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है. काम ज्यादा हो गया है और अब 6 शहर देखने पड़ते है मुझे. ये भी सच है के तेरे साथ रहना भी मुझे पसंद है. चल आज शाम को तू और मैं बहार चलेंगे और फिर मैं इस सप्ताह के अंत में दोनों दिन तेरे साथ हे घर रहूँगा.", उन्होंने बाल सहलाते कहा तोह दरवाजा खोल कर अंदर बैठते रामेश्वर जी भी बोल पड़े, जो शायद उनकी बात सुन चुके थे शीशा खुला होने की वजह से.
"हाँ भाई, सही बात है. समय साथ बिताना भी चाहिए तुम दोनों को. क्या पता कल को ये बैलबुद्धि ऐसा हे न रह जाए.", उन्होंने ठहाका लगते कही तोह भैया बस मुस्कुरा दिए लेकिन अर्जुन ने नखरे से चेहरा दूसरी तरफ कर लिए.
"अर्जुन तोह समझदार बचा है मेरा. संजीव का दिमाग काम चलता है न तोह उसको हे बैलबुद्धि कह रहा था मैं. और हाँ, वह आज स्टेडियम मत जाना तुम, जोगिन्दर दिल्ली गया है 5 दिन के लिए. कल तोह वैसे भी तू अपनी नानी के यहाँ जा रहा तोह ाची हे बात है.", पीछे से हे अर्जुन के बाल बिखरते हुए उन्होंने सब बात बता दी थी.
"वहां दिल नहीं लगेगा मेरा आपके बिना. फिर कभी चला जाऊंगा न दादाजी. आप भी तोह पहले गाँव फिर दादी के साथ उनके घर चले गए थे. इतने दिन बाद आपके साथ रहूँगा न.", संजीव भैया कार को आराम से कचहरी से बहार निकल रहे थे. रामेश्वर जी जब भी कार में होते थे तोह संजीव कभी भी गाने की कैसेटटे नहीं बजता था. ऐसा सिर्फ शंकर जी हे करते थे क्योंकि वह जानते थे के उनके पिताजी को कैसे गाने पसंद है और कब.
"मेरे बेटे, एक रिश्ते में बांधकर कोई राम नहीं बनता. सभी का दायित्व निभाना जरुरी है, जिस से एक भरपूर परिवार और लोग हमेशा जुड़े रहे. तेरे Nana-Naani और मां लोग भी तोह अपने इस एक चिराग की प्रतीक्षा देख रहे होंगे. कितने साल उन्होंने बिता दिए तेरी राह में.", किसी गहरी सोच में डूब गए थे वह अपने सम्बन्धियों के परिवार को याद करते हुए. बड़े हे nek-sampann लोग है वह और अनुशाशन पसंद साफ़ तबियत के.
"हाँ भाई. तुझे जाना चाहिए वह और मैं भी तोह जाता रहता हु अपने ननिहाल. ाचा लगेगा जब थोड़ा बहार निकल कर अपने bhare-poore परिवार को पहचानेगा. फिर तुझे मैं अपने साथ हमारे गांव भी लेकर जाऊंगा, गर्मी की छुट्टियों में.", संजीव भैया ने सेक्टर के पास वाला मदद लेते हुए कहा. अर्जुन ने तोह वैसे हे कहा था लेकिन दोनों ने हे कितना समझा दिए था उसको. अपनी माँ के साथ जाना वह कैसे छोड़ सकता था. फिर मुस्कुराते हुए उसने जाने की हामी भर दी.
"संजीव, कल इसके स्कूल का परचा भरवा देना समय निकल कर. और बाकी काम भी करना है उसपर भी ध्यान देना.", कार से उतर कर संजीव भैया ने दादा जी के लिए दरवाजा खोला और इधर अर्जुन अंदर दौड़ गया था.
"मैं सब संभल लूंगा दादा जी. आप भरोसा रखिये वह खुद पीछे हट जायेगा. ठीक किआ आपने मुन्ना को यहाँ से 4 दिन के लिए भेजकर.", संजीव वापिस गाडी में बैठ कर निकल लिए, अपनी अनजान मंजिल की तरफ.
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"ये तेरी बड़ी बहिन है, रूपाली और रूपाली बीटा ये है हमारा अर्जुन और तेरा छोटा भाई. अगले सोमवार से दोनों साथ हे स्कूल जाओगे और हाँ अर्जुन बीटा, इसका ध्यान ाचे से रखना.", कौशल्या जी ने अर्जुन को अपने पास बिठाते हुए कहा. वही बीएड पर दादी के दूसरी तरफ खामोश सी वह लड़की अर्जुन को देख रही थी. गहरी आँखें, गूँथी हुई लम्बी छोटी और शरीर पर एक हलके नीले रंग का सलवार कमीज. शकल से हे एकदम मासूम और गंभीर लड़की थी वह. बस थोड़ी दुबली लग रही थी.
"हाँ तोह रूपाली दीदी, सबसे पहले तोह हम चलते है आपको मार्किट लेकर. यहाँ दादी की बगल में बैठने तोह शहर देखने से रही आप. स्कूल ड्रेस, कपडे और किताबे भी लेनी है." अर्जुन ने बड़ी आत्मीयता से ये बात कही तोह एक पल को रूपाली ने नजरे ऊपर करते उसको देखा फिर कौशल्या जी की तरफ.
"बिलकुल ठीक बात है. चल वह मंदिर के पास से जरा मेरा पर्स दे. और तुम दोनों पहले अपने ग्याहरवी के विषय भी समझ लो एक दूसरे से.", अर्जुन ने पर्स ला कर दादी की तरफ बढ़ा दिए. और बैठने लगा लेकिन उन्होंने फिर उसको उठा दिए.
"ओह बैलबुद्धि, ये छोटे वाला नहीं. वह वाला दे कपडे का.", उन्होंने उस छोटे पर्स से भी पैसे निकलते हुए कहा तोह अर्जुन दादी को एक बार हँसते हुए देख फिर से बैग जैसा पर्स उठा के ले आया.
"देखो दीदी, हमारे स्कूल में 3 हे विभाग है. कॉमर्स, मेडिकल और Non-medical... " अर्जुन की बात अधूरी हे रह गई थी और हैरान भी हुआ जब रूपाली ने कहा.
"मुझे मेडिकल में दाखिला लेना है.", कितनी प्यार आवाज थी रूपाली की. अर्जुन तोह जैसे खो सा गया था. और ऊपर से मेडिकल सुनकर वह हैरान भी हो गया था.
"आपका दसवीं का परिणाम आ गया क्या?"
"हाँ 2 साल पहले हे आ गया था.", अब थोड़ा सा रूपाली बोलने लगी थी. शायद पढाई करना उसको पसंद था और गाँव में उसको आगे पढ़ने को नहीं मिला था
"तोह कितने परसेंटेज थे आपके उसमे?", अर्जुन समझना चाहता था के मेडिकल हे क्यों और फिर कही नंबर हे न हुए इतने तोह फिर कैसे संभल पाएगी ये दीदी.
"85% थे. लेकिन विज्ञान में 98 नंबर थे और वह बड़ा स्कूल नहीं था मेडिकल के लिए.", अर्जुन तोह नंबर सुनकर कभी उनको तोह कभी दादी को देखने लगा था.
"मेरी बची तेरे जैसी बैलबुद्धि नहीं है. इसको पता है के कोनसे सब्जेक्ट लेने है कोनसे नहीं. एक तू हैं जिसको खुद नहीं पता के क्या पढ़ना है." दादी की बात सुनकर अर्जुन हँसते हुए बोलै.
"ये बैलबुद्धि दीदी से ज्यादा नंबर लेकर आएगा. और मैं ले रहा हु Non-Medical लेकिन अभी कोई ये नहीं पूछेगा के बाद में मई क्या बनूँगा. हाँ", अर्जुन अपनी दादी के हाथ से 100 के नोटों की गद्दी लेते हुए अपनी जेब में रखता बोलै.
"खाना खा लेते है फिर चलेंगे.", अर्जुन ने ये बात कही तोह दादी ने मन कर दिए.
"दोपहर में नहीं. 5 बजे जाना तुम दोनों और हाँ ाचे कपडे दिला के लाना बाकी मैं तारा या ऋतू को इसके साथ भेज दूंगी. संजीव ले जायेगा.", अर्जुन सोचता सा बहार निकल गया. इधर रूपाली को भी अर्जुन का साधारण सा व्यक्तित्व ाचा लगा था. भोला लेकिन तमीज से बात करने वाला उसका ये नया छोटा भाई.
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"आप तोह मुझे भूल हे गई न?", अर्जुन ऋतू दीदी को पीछे से बाहों में लेते हुए बोलै. वह उनके कमरे में आ गया था जहाँ ऋतू दीदी दिवार पर लगी एक तस्वीर को साफ़ कर रही थी. ये शायद आज हे लगाईं थी उन्होंने.
"तू तोह मरने के बाद भी मेरे अंदर रहेगा रे.", खुश होती वह मुड़ती हुई सामने से उसको गले लगा के कड़ी हो गई थी. उनकी ये जानलेवा मुस्कराहट और महकता जिस्म, अर्जुन तोह तस्वीर देखना भूल कर आँखें बंद किये खड़ा हो गया था.
"मतलब लोग आजकल जगह भी नहीं देखते.", ये आवाज कान में पड़ी तोह अर्जुन ने वैसे हे ऋतू दीदी को गले लगाए दरवाजे से अंदर आती अलका दीदी को देखा जिनके साथ हे प्रीती भी थी. ऋतू भी वैसे हे गले लगी मुस्कुरा रही थी.
"अब दीदी को गले लगाने के लिए मैं जगह, समय और मुहूर्त तोह नहीं देखूंगा.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अलका दीदी की तरफ कदम बढ़ाये हे थे की बहार से ताऊ जी की आवाज सुनाई दी. "अलका, ऋतू को लेकर आ जाओ बीटा. खाना खिलाओ माँ और पापा को." उनकी बात सुनकर दोनों हे बहार निकल गई लेकिन उनके पीछे जाती प्रीती का हाथ अर्जुन ने पकड़ते हुए वही रोक लिए.
"कहा भाग रही हो? मैं तोह यही हु.", अर्जुन की बात सुनकर और ऐसे खुले दरवाजे हाथ पकड़ने से थोड़ी घबराहट सी हो गई थी प्रीती को.
"वह तोह पता है के तुम यहाँ हो. लेकिन हम कहा है ये देखा है क्या तुमने.", प्रीती अपना चेहरा उसकी और करती बोलने लगी हे थी की एक हाथ से दरवाजा ढालता वह दूसरे से उसको अपने सीने से लगाए खड़ा हो गया.
"एक तोह पास नहीं आती ऊपर से फिर ये सब हिदायते देने लगती हो. लो अब दरवाजा भी बंद हो गया.", अर्जुन की बात और ऐसे गले लगने से प्रीती भी मुस्कुराने लगी थी.
"जब पास आती हु तोह देखा है के कैसे पत्थर बन जाते हो. और इतना हे दिल करता है मुझसे मिलने को तोह घर क्यों नहीं आये 2 दिन?", प्रीती की शिकायत अर्जुन को जायज लगी थी. वो सच में इन 2 दिनों में उसके पास नहीं गया था.
"वो घर पे भी सबकुछ देखना जरुरी था न. और तुम तोह हमेशा हे साथ होती हो.", अर्जुन समझने के लहजे से बोल रहा था. अपनी गलती उसको पता चल गई थी.
"ाचा वह सब हम दोनों देख लेंगे. पहले ये फोटो देखो जरा जो ऋतू दीदी ने लगाईं है.", अर्जुन की बाहों से निकलते हुए अर्जुन ने वापिस ध्यान दिलाया उसको दिवार पर लगी इस नै तस्वीर का.
अर्जुन के तीसरे जन्मदिन की फोटो थी वह जिसमे उसका मुंडन हो रखा था और रेणुका बुआ केक कटवा रही थी और उसकी सभी बहने भी दूसरी तरफ थी. प्रीती की नीली आँखें और हद्द से ज्यादा gol-matol गुलाबी चेहरा साफ़ दिख रहा था.
"वाह. ये कहा से मिल गई थी और किसने बड़ा करवाया इसको?", अर्जुन उस तस्वीर को हाथ लगता हुआ निहार रहा था.
"हमारे कैमरा की रील में थी और बुआ ने 5 दिन पहले हे दादू को बोलकर लैब से धुलवाने और बड़ा करवाने के लिए कहा था. आज घर पर दे गया था Color-lab वाला. ऐसी 2 और भी है. एक मेरे कमरे में और एक अलका दीदी वाले में.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रख वह साथ कड़ी खुद भी देख रही थी की कैसे अर्जुन ने उस समय भी एक हाथ से उसको पकड़ा हुआ था और उलटे हाथ से केक काट रहा था जिक्सो रेणुका ने पकड़ा हुआ था.
"तुम न बिलकुल अंग्रेज हे थी, जैसे वह जॉनसन पाउडर वाले होते हैं.", अर्जुन ने तस्वीर में हे छोटी प्रीती के गाल को हाथ लगते कहा तोह अपने पंजो पर कड़ी हो प्रीती अर्जुन का गाल चूमत कर बहार दौड़ गई.
"तुम तब भी टिंडे हे थे.", दरवाजे से इतना बोल कर वह हंसती सी गायब हो गई और अर्जुन वही मुस्कुराता सा बस फिर से फोटो को देखने लगा.
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मेनका अपने मायके आई हुई थी 2 दिन अपनी माँ और बड़े भाई के पास रहने. भाभी पेट से थी शायद सातवा महीना चल रहा था उनका लेकिन फिर भी वह अपनी सास के साथ घर का लगभग काम कर लेती थी. मेनका की भाभी सरिता एक bholi-bhali औरत थी और गाँव से हे थी तोह मेहनती भी थी. उनके पहले एक लड़की थी जो 4 साल की हो चुकी थी और मेनका के बड़े भाई दूसरा बचा चाहते थे, बीटा. दिन में उनका भाई खेत पर हे रहता था क्योंकि फसल कड़ी थी और दोपहर का खाना ज्यादातर मेनका की माँ लेकर जाती थी अपने बेटे के लिए. आज उनके पाँव में थोड़ा दर्द था और बहु को गर्भावस्था में घर से बहार जाना मन था, इसलिए मेनका हे खाने का डब्बा और लस्सी बोतल लेकर खेत की तरफ चल दी. रोज के समय से आज खाना कोई एक घंटा पहले हे तैयार था तोह जा भी जल्दी हे रहा था.
'धुप तोह है लेकिन इसमें चुभन बिलकुल नहीं है. वैसे भी तोह आधा कोस तोह खेत है.', मेनका ने पीला सूट पहना था और गाँव आने के बाद जूती पहन ली थी. सलवार हलकी ढीली और कमीज ाचे से कैसा हुआ था जिसमे ऊपर का शरीर ाचे से नुमाया हो रहा था. चुन्नी से सर और होंठ ढकती वह कच्ची पगडण्डी पर सब तरफ देखती आगे बढ़ रही थी. दोनों तरफ फसल लेलहा रही थी और कही कही घने पेड़ लगे थे. खेतो में किसानो ने छोटे कमरे भी बनाये हुए थे, सामान रखने और रात सोने के लिए. पहले भी मेनका यही से गुजरती थी जब भाई को खाना देने जाती थी.
9 साल हो चुके थे उसकी शादी को और अभी तक वह माँ नहीं बन्न पाई थी. इधर 6 साल में उसके भाई ने सरिता भाभी को दूसरी बार पेट से कर दिए था. मेनका को इस बात से कोई शिकवा या जलन नहीं थी बस अपने माँ न बन पाने से वह आहात थी. कितना देखते थे लड़के उसको जब वह कॉलेज में थी. आज भी शहर में कई लोग उसका शरीर घूरते रहते थे जब भी वह कभी बहार निकलती थी. लेकिन एक उसका पति था जो साल में एक बार कुछ दिनों के लिए हे आता था और अगर रात को कभी कुछ करने भी लगता था तोह 2-3 मिनट में फारिग हो कर करवट बदल लेता था. शादी के पहले साल हे बस कुछ तनाव आता था उसके लिंग में और थोड़ी उमंग भी रहती थी मेनका के साथ लेकिन कुछ न हो पाया था. ऐसे हे सोचो में खोई वह अपने खेत तक आई तोह वह शांति थी. साफ़ पानी से भरी हौद के पास लगे घने पेड़ो के बीच मोटर का कमरा था जिधर वह चल दी यही सोच कर की भैया आराम कर रहे होंगे. लेकिन 10 कदम दूर से हे उसको पाजेब और चूड़ियों की लगातार खनकने की आवाज कमरे से आती लगी. कदम और चाल शांत हो गई थी मेनका की ये सुनकर. वह भली भांति जानती थी की ऐसी आवाज का क्या मतलब होता है. कमरे के बहार लगे लकड़ी के फत्ते पर जैसे हे उसने नजर गड़ाई तोह साँसे थम्म गई.
"भूरी, तू बड़ी दुमदार है ऋ.. आह. आज भो तेरा छूट भोसड़ा नहीं बानी है 2 बच्चों के होने के बावजूद.", अंदर जमीन पर गद्दा के ऊपर उसका भाई एक 24-25 साल की औरत का घाघरा पेट पर चढ़ाये उसकी छूट में लुंड जोरदार धक्को से अंदर बहार कर रहा था. उस औरत के गोल चुचुए दोनों हाथों में पकड़े वह मशीन सा कमर हिलने में लगा था. वह औरत भी अपने हाथ उसके भैया के कंधो पर रखे मजे से सिसक रही थी. 7 इंच के लगभग वह कला कठोर लुंड बड़े आराम से छूट में जड़ तक उतरता और निकलता देख बहार कड़ी मेनका के चुके हिलने लगे थे. साँसे भारी हो गई थी इस दृश्य को देख कर. कहा तोह उसके भैया इतने शरीफ थे सबकी नजरो में और कहा इस कमरे के अंदर वह अपने से 12-13 साल छोटी किसी पराये आदमी की बीवी को राउंड रहे थे.
"मेरी छूट को भी ऐसे हे दुमदार लुंड से चैन आता है जमींदार जी. मेरा खसम तोह 4-5 मिनट से ज्यादा नहीं चलता लेकिन आप तोह 15 मिनट तक ऐसी चुदाई करते हो की ये पूरा दिन दुखती है, मजे में. आह.. आह. और वह आपका दोस्त भी जब होता है तोह मजा दुगना हो जाता है.. कास के मारो न आह.. तीसरा बचा भी हो जाये तोह मैं तैयार हु.", जहाँ उसके बड़े भैया उस औरत की बातों से मजे में उत्तेजित हो रहे थे वही मेनका तोह स्तब्ध हे थी ये सुनकर की भैया कैसे इंसान है जो अपने दोस्तों के साथ मिलकर लड़की भोगते है. और ये औरत उन्ही से गर्भवती भी होना चाहती है.
"अरे भूरी, गांड मारना ाचा नहीं लगता मुझे. वह तोह बुनती हे पागल है तेरे पिछवाड़े के लिए और तभी हमारी तीनो को जमती है. लेकिन तीसरा बचा नहीं ऋ, अभी तोह एक साल बिलकुल नहीं. सरिता की छूट तोह मिलने से रही अभी एक साल. बचे के बात वापिस कसने में इतना समय तोह लगेगा हे. तब तक तू हे मेरा सहारा है.. ाः.. ", एक दूध पर झुक कर पीने लगा था मेनका का भाई और वह बहार कड़ी बस हैरत और उत्तेजना में कड़ी थी.
"क्यों झूठ बोलते हो जमींदार जी. बुनती की भाभी की चुदाई करते मैंने देखा है आपको, और फिर मेरी छोटी बहिन की सील तोड़ने के बाद हर महीने बुलवाते हो उसको वह क्या है? बेचारी की शादी नहीं हुई अभी तक और आपने उसका अभी कबाड़ा कर दिए है. और कितनी तोह ऐसी हैं जो चारा काटने आती है लेकिन आपका लुंड पिलवा के जाती है.", भूरी ने इतने नाम गिनवा दिए थे की मेनका के जबड़े चिपक गए थे. उसके भैया तोह बहोत बड़े वाले रंडीबाज निकले. यही सोच रही थी वह.
"आह.. भूरी तेरी बहिन बिलकुल तेरे जैसी है ऋ. याद है पहली बार में कितना खून बहाया था तूने? लेकिन मेरी पक्की वाली तोह तू हे है हमेशा से. आह.. होने वाला है मेरा.", गुर्राते हुए जब मेनका के भैया ने जड़ तक लुंड भूरी की छूट पर चिपकाया तोह चेहरा लाल हो गया था उनका और भूरी भी चिपक चुकी थी. कुछ देर बाद सिकुड़ा हुआ लुंड धोती के अंदर करते उसके भैया दिवार से तक लगा के बैठ गए तोह भूरी ने भी अपनी चोली सही की और घाघरे से हे छूट को साफ़ करती उनकी और देखने लगी.
"ले ये रख और माँ आती होगी खाना लेके तोह तू भी निकल अब यहाँ से.", 100-100 के 7-8 नोट उन्होंने भूरी की तरफ बढ़ाये तोह उन्हें अपनी चोली में रखती वह कड़ी हुई इधर मेनका चपलता से वापिस पगडण्डी की और दौड़ गई. दरवाजा खुलने तक तोह वह कोई 50-60 कदम दूर हो चुकी थी. फिर वैसे हे शांति से एक बार फिर वह मोटर की और बढ़ी तोह भैया को बहार आते देखा. भूरी दूसरी और से निकल गयी थी अगले खेतो में.
"आज तू खाना लेके आई है मेनका? मैं हे घर आ जाता.", उसके भैया ने सोचा वह bal-bal बचे है आज तोह उन्हें क्या मालुम था के मेनका सब देखने के बाद हे ये नाटक कर रही थी.
"हाँ. वह माँ के पाँव में दर्द था तोह मैं हे खाना ले आई. आप खा लीजिये डब्बा शाम को लेते आना, मैं वापिस जा रही हु.", पानी की हौद की दिवार पर खाना और लस्सी की बोतल रखती वह बस एक पल रुक कर चेहरा पोंछती कड़ी हो कर बोली और फिर भैया का जवाब सुने बिना पलट गई.
"ाची बात है. मैं ले आऊंगा शाम को. वैसे अभी कितने दिन है तू यहाँ?", भैया पानी से हाथ और मुँह धोने के बाद बोले.
"आज शाम को हे वापिस जाना है तोह 4 बजे वाली बस से निकल जाउंगी. अगली बार आउंगी तब रुक कर जाउंगी.", मेनका को अब वह रुकना कटाई मंजूर न था. जिस भाई ने उसके लिए इतना कुछ किआ था उसको bhala-bura तोह वह कह नहीं सकती थी इसलिए बेहतर समझा की दूर हे रहे. तेज कदमो से वह वापिस घर की और निकल चली थी. आज उसने जाना था के पुरुष कैसे होते है. किसी dangar-janwar की तरह बस उन्हें भी हर औरत एक गाये -बछड़ी हे दिखती है जिस पर चढ़ने को वह हमेशा तैयार रहते है. कहाँ उसकी भाभी एकदम भोली और पतिव्रता महिला है और कहा उसके बड़े भैया जाने कितनी हे aurato-ladkiyon से सम्बन्ध बनाये हुए. उसको बस अब जल्दी से अपने नए घर हे जाना था. 4 दिन बाद हे.
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पंडित जी के घर में बिलकुल शांति थी इस समय. Khana-peena होने के बाद अभी दोपहर के समय हर कोई आराम कर रहा था अपने अपने कमरे में. सुबह जल्दी गाँव से निकले थे और सफर की भी थकान थी तोह रामेश्वर जी बैठक में दीवान पर सुस्ता रहे थे. कौशल्या जी के साथ रूपाली और आरती लेती थी. ऋतू और अलका तोह रेणुका बुआ से बतियाने प्रीती के घर गयी हुई थी, जाने क्या क्या बातें करने लगी थी अब वह उनसे भी. रेखा जी अपने बंद कमरे में कपडे पैक करती हुई बस हल्का हल्का मुस्कुराये जा रही थी. सबसे खुश थी आज वह इस घर में, अपने बेटे का प्यार मिलने से जैसे उनकी ज़िन्दगी को एक नया सवेरा मिल गया था.
प्रियंका दीदी लगी हुई थी कोमल दीदी के साथ कर्रम बोर्ड खेलने, जो दोनों का सबसे पसंदीदा खेल था. बेशक कोमल दीदी को ज्यादा बातें करना पसंद न था लेकिन ये खेल उन्हें बचपन से पसंद था और थी भी वह इसमें माहिर. पिछले आधे घंटे में दूसरी बार प्रियंका हार चुकी थी लेकिन बाकी सबसे वह बेहतर हे खेल रही थी उनके साथ.
"यार तुझे शर्म नहीं आती क्या जरा भी? बारी तोह आने दिए कर 2-3 बार. ऐसे खेलने लग जाती है जैसे पैसे लगे हुए हो.", नए खेल को शुरू करने से पहले प्रियंका गिट्टियां लगाती बोल रही थी और कोमल बस प्लास्टिक के स्ट्राइकर को बोर्ड पर घिसती पाउडर मलने में लगी हुई थी. प्रियंका की बात पर हलकी सी मुस्कर तैर आई थी उनके खूबसूरत चेहरे पर.
"चल ठीक है तोह पहले 3 बारी में मैं गिट्टी नहीं डालूंगी और सिर्फ 50 को हे मारूंगी.", कोमल की बात सुनते हुए प्रियंका भी हंसती सी उसके खूबसूरत चेहरे को देख रही थी.
"यार मैंने कभी न इतने गौर से नहीं देखा था तुझे. मतलब देखा तोह था लेकिन सच कहु तोह तू आरती और ऋतू से भी सुन्दर है. ऐसा नहीं के आरती, ऋतू, अलका सुन्दर नहीं है लेकिन अगर मैं पूरी ख़ूबसूरती की बात करू तोह तू उनसे 21 हे है और वह 18-19 हे होंगी.", कोमल के चेहरे से नीचे उसकी gol-lambi गर्दन, गोरा फक्क सीना और कमीज में क़ैद एक दम गोल उभार वहीँ बाहें भी एकदम गोरी और baal-vihin. भरे गुलाबी होंठो के पास एक टिल और कोई आधा इंच लम्बी पलके. कोमल एक बेहतरीन दिल के साथ एक haseen-tareen लड़की थी.
"चल चल अब ये सब बातें नहीं करनी. खेलना है तोह ठीक नहीं तोह मैं सोने लगी हु.", कोमल ने हलकी मुस्कान और शर्म के साथ इतना कहा तोह प्रियंका ने स्ट्राइकर लेते हुए बारी चली. हर तरफ kaali-peeli गिट्टियां बोर्ड पर फैल गई लेकिन कोई अंदर न गई थी. कोमल ने लाल गिट्टी को देखा जो लाइन से पीछे वाले बाए गोले के पास पड़ी थी. सीधा स्ट्राइकर तोह उसपर लगने वाला नहीं थी तोह सामने से कोण बनती वह थोड़ा आगे को झुकी और प्रियंका को कमीज के अंदर हलके से दर्शन हो गए थे उसके गोर और पूरी तरह से सख्त उभारो के. आपस में चिपके वह दोनों बता रहे थे की वह बेजोड़ है और उनमे कोई ढीलापन नहीं था.
"वैसे जिसके साथ तेरी शादी होगी वह नसीबवाला हे होगा कोमल.", प्रियंका ने इतना हे कहा था के कोमल ने 50 की गिट्टी को अंदर दाल दिए था और फिर से स्ट्राइकर उठाने के बाद काली गिट्टी से कवर लेती वह चुपचाप खेल पर हे लगी थी. अगले 3-4 मिनट में 24 में से 23 गिट्टियां वह से गया कर चुकी थी कोमल और इस आखिरी वाली को भी अपने पाले में सुरक्षित करने के बाद हे वह बोली.
"शादी किस से होगी, कब होगी और होगी भी या नहीं ये सब मैं नहीं सोचती प्रियंका. लेकिन सच कहु तोह मैं इस घर में खुश हु और मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती किसी दूसरे घर में. फ़िलहाल तोह 2-3 साल नहीं.", कोमल की बात पर प्रियंका ने सभी गिट्टियां और स्ट्राइकर प्लास्टिक के डब्बे में रखते हुए बोर्ड के साथ अलमारी के पीछे रख दिया. और फिर दोनों हे ऐसी हलकी फुलकी बातें करती लेट गई थी. लेकिन एक कमरा छोड़कर अगले कमरे में 2 लोग जाग रहे थे.
राजकुमार जी ने अपनी धर्मपत्नी की साड़ी ऊपर चढ़ा राखी थी और खुद पजामा नीचे करते उनकी जांघो के बीच लुंड टिकाये बैठे हुए थे. ललिता जी के चेहरे पर हलकी मुस्कान थी क्योंकि आज उनके पति बिना कहे हे प्रेम दिखा रहे थे. दोनों हे एक तरह से पूरे कपडे शरीर पर लिए थे, दिन का वक़्त था इसलिए. जल्द हे मुस्कान गायब हो गई उनकी जब 2 मिनट बाद हे राजकुमार जी के लुंड ने उलटी कर दी उनके छूट के अंदर. एक खिसियानी सी हंसी देते वह एक तरफ लुढ़क गए और मैं में बड़बड़ाती हुई ललिता जी उनके पानी जैसे वीर्य को कच्ची से साफ़ करने के बाद एक तरफ पलट कर लेट गई. अर्जुन की याद आ गई थी उन्हें, कैसे वह उन्हें जम्म के पेलता है और तक़रीबन 30-40 मिनट तक नहीं छोड़ता. फिर शांत होती वह भी आँखें बंद करके सो गई थी.
"आह भाई.. आह्ह्ह्हह ऐसे हे कर उम्.. ", ऊपर बाथरूम में दिवार से लगी माधुरी अपने पीछे जड़ तक लुंड पेलते अर्जुन के हर धक्के पर मचल रही थी. दोनों फुटबॉल से मॉटे चुके दबोचे वह भी अपना विकराल लुंड अंदर बहार कर रहा था. गदराई और फूली गांड हर धक्के पर 'thap-thap' की आवाज पैदा करती और अर्जुन के धक्के ज्यादा जोर से पड़ने लगते थे.
"दीदी, आप किसी दिन फसवा डौगी हम दोनों को. आह.. ऐसे हे दिन में.. ", निप्पल मरोड़ता वह उनकी छूट का आकर बढ़ने में लगा था. पिछले 20 मिनट से वह ये चुदाई कर रहा था और माधुरी दीदी की गरम छूट एक बार पहले हे खाली हो चुकी थी.
"आह.. उम्म्म.. जबसे ये आठ.. मेरी छूट के अंदर गया.. उम्म्म.. उस दिन से बस इसके लिए हे तड़पती है रे.. आह.. रात को.. पिछले छेड़ भी ले लिओ.", उनकी सिसकारियां और बात सुनकर अर्जुन कूल्हे पर एक हलकी चपत लगते हुए निचे झुकाने लगा. गांड की दरार को फैलता वह अब अंधाधुन्द उन्हें पेले जा रहा था..
"आहाआआ." माधुरी दीदी ने लुंड को कस के पकड़ा था और इधर अर्जुन का मोटा सूपड़ा भी अपनी हद्द से ज्यादा फूल कर ठुमकने लगा था. माधुरी दीदी खुद को नीचे गिरती लुंड को निकल बैठ सी गई और उनकी पीठ पर गरम गधा वीर्य किसी बारिश सा टपकने लगा था. कुछ देर तक अर्जुन बस दिवार को पकडे खड़ा रहा और जब माधुरी दीदी कड़ी हो कर सामने आई तोह उनके भूरे निप्पल सूज कर बड़े हो चुके थे. अर्जुन को होंठो को चूमकर वह खुद को साफ़ करने लगी तोह अर्जुन ने भी लुंड धोने के बाद कपडे पहने और अपने कमरे में आ कर लेट गया था.
'ओह्ह.. कितनी चौड़ी कर दी है इस घोड़े ने.. आह.. इसको अब किसी और लुंड से चैन नहीं आने वाला.' शीशे में अपनी छूट का फैला हुआ छेड़ देखती माधुरी खुश हो रही थी. अंदर तक उसकी लाली दिख रही थी और 8 आने के सिक्के जैसा मुँह खुल्ला हुआ था उसका.
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साढ़े 3 बजे हे अर्जुन बिस्टेर से उठ खड़ा हुआ और jeans-tshirt पहन कर वह मोटरसाइकिल ले बहार निकल लिए. बिना किसी को कुछ बताये.
कौन क्या है (1)
10 बजे रामेश्वर जी अर्जुन और संजीव के साथ मुख्या कचहरी के प्रवेश द्वार पर थे. आज सुबह 9 से पहले हे वह बाकी सदस्यों के साथ अपने घर लौट आये थे जहा नाश्ता पानी करने के बाद कुछ file-kagaaj के साथ वह गाडी से सीधा यहाँ चले आये थे. नोटरी से एक हलफनामा तैयार करवाता संजीव बेहद शांत था. वही अर्जुन बड़े ध्यान से देख रहा था के उसके दादा जी को कितने हे लोग देख रहे थे और कई तोह उनके पास आ कर हाथ जोड़ मिल रहे थे.
"नमस्कार पंडित जी. आपने यहाँ आने का कष्ट किआ? कभी हमे भी काम दे दिए कीजिये?", काले कोट में चस्मा लगाए ये अधेड़ उम्र के व्यक्ति इतनी व्यस्त जगह पर भी झुक कर उसके दादा के पाँव छू रहे थे.
"अरे सरदाना जी आप अभी ड्यूटी पर है और सरकारी वकील हो भाई. वैसे भी बहुत दिन हो गए थे इधर आये और ऊपर से सुना है के आज वह सैनी मर्डर केस का ट्रायल शुरू हुआ है.", गले से लगाने के बाद रामेश्वर जी ने उन 'सरदाना' उपनाम के वकील से कहा. अर्जुन का तोह ये पहला अनुभव था ऐसी जगह आने का. किसी सरकारी हॉस्पिटल से ज्यादा लोग तोह यहाँ थे. 35-40 नोटरी तोह घने पेड़ के नीचे अपनी दुकान लगाए बैठे थे. कही पुलिस वाले किसी मुजरिम को ला रहे थे कही ले जा रहे थे. एक तरफ चलन की खिड़की पर इतनी लम्बी कतार थी की dhakka-mukki जैसा माहौल था.
"पंडित जी आपका तोह आखिरी केस था वह जहाँ तक याद है. इन्दर सैनी के कटत में तोह उस समय बरी हो गया था लेकिन फिर सबूत हाथ लगे तोह इतने साल तक पुलिस से बचता रहा था. कहा तोह उस समय तक जितेंदर सिर्फ फिरौती और कब्जे के काम करता था. देखिये 11 साल में इतना नामी बदमाश बन गया है की एक डोज़ेन पुलिस वाले घेर कर लाये है उसको और उसके भाई विष्णु को. बंसल साहब नहीं थे अपने, डिफेन्स कॉलोनी वाले. उनकी बेटी का रपे भी रपे इन्होने किआ है लेकिन वह मेडिकल कारवाही समय ले रही है.", अर्जुन ये दोनों हे नाम सुनकर चौंक गया था. जितेंदर उर्फ़ काला और विष्णु उर्फ़ बिल्लू. मतलब पक्के हे गुनेहगार थे वह दोनों लेकिन पुलिस अभी तक सबूत हे जूता रही थी. रामेश्वर जी के चेहरे पर सार्ड से भाव आ गए थे.
"बंसल ने हे पैरवी की थी उस समय और उसका वही lok-dal वाला बाहुबली पैसे भर रहा था इनके. कितनी प्यारी बची थी उसकी और पिता के पाप का भोज उसको सहना पड़ा.", रामेश्वर जी का पोलिसिअ लेजहज़ा आज देख रहा था अर्जुन. ऐसी आवाज से तोह अपराधी के रोंगटे खड़े हो जाए.
"पंडित जी, उन्हें भी लकवा मार गया है पिछले साल. याद है मुझे वह केस, आपने हे मुझे जूनियर वकील को केस दिलवाया था लेकिन मैं भी इन्साफ न दिला पाया था."
"कोई बात नहीं भाई. वह जाने से पहले सभी इन्साफ हो जाते है यही इस धरती पर.", एकदम से हे चेहरे पर मुस्कान लाते उन्होंने इन वकील साहब को आसमान की तरफ इशारा करते कहा तोह वह भी हंस दिए. 5-6 पुलिस के सितारा-3 सितारा कर्मी भी उधर आ खड़े हुए थे और जैसे हे पंडित जी की निगाह उनपे पड़ी तोह सभी ने वही उपक्रम किआ पाँव छूने का और हाथ पीछे करके खड़े हो गए. रामेश्वर जी तोह जैसे उनके लिए पिता सामान हे थे. और वह भी सभी कर्मियों को उनके प्यार के नाम या आखिरी नाम से बुलाते बात करने लगे थे. फिर एक इंस्पेक्टर पड़ का व्यक्ति थोड़ा करीब आया तोह हाथ के इशारे से बाकी सभी को रुकने का बोल कर उसके साथ आगे चल दिए.
"कहो कमलकांत. परेशां हो बहोत." रामेश्वर जी थोड़ा आगे चलते आ खड़े हुए थे.
"सर, वह दबाव भी आ रहा है और सबूत भी मिटाये जा रहे है. आपके समय तोह सारा सिस्टम आपस में जुड़ा था. हॉस्पिटल से लेकर सभी सरकारी विभाग पुलिस के काम में पूरा साथ निभाते थे. अभी हालत कुछ और हे है. वह समो मल्होत्रा और डॉ गुलाटी शायद इनका मेडिकल परचा क्लियर न कर दे. आप हे मशवरा दे सकते हो या सीधा कहु तोह मदद कर सकते हो. डिपार्टमेंट की तरफ से सारा प्रेशर मेरे ऊपर है और वही Lok-dal वाला मंत्री इनके सबूत साफ़ करवाने में लगा है. हमरे रिमांड में विष्णु तोह टूट गया था और उसने काबुल भी किआ था 1 हत्या और 5 बलात्कार लेकिन आज यहाँ वह मुकर गया, अभी 10 मिनट हे पहले. जितेंदर तोह घाघ है उसको टॉड नहीं पाए.", अपनी वर्दी वाली टोपी उतार कर काख में दबा ली थी इंस्पेक्टर ने और चेहरा बता रहा था के हड्डी गले में फांसी है.
"डॉक्टर मैं संभल लूंगा और उनका खुद फ़ोन आ जायेगा तुम्हारे पास. लेकिन विष्णु ने सारे इल्जाम खुद पर ले लिए तोह सबूत तोह तुम्हे फिर भी जुटाने हे होंगे जितेंदर के खिलाफ. कितना रिमांड बढ़ाया है?", रामेश्वर जी ने शांत भाव से हे कहा.
"सर 5 दिन का माँगा था लेकिन 2 हे दिन का मिला है. परसो फिर पेशी है. सबूत पता होते हुए भी ला नहीं सकते क्योंकि परचा बनवाया तोह बड़े नाम बीच में आएंगे और उल्टा रास्ता तोह फिर .. ", रामेश्वर जी के चेहरे पर कुछ अलग भाव आ रहे थे. एक बार उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा जो आराम से एक पत्थर के बेंच पर बैठा दूसरी तरफ देख रहा था और संजीव से नजरे मिली जो वहीँ नोटरी वाले को पैसे देता अपने दादा को देख रहा था. दोनों की आँखें मिली तोह उन्होंने पलके झपकाई. संजीव भी चुपचाप अर्जुन की पीठ की तरफ से घूमता हुआ उनकी पास आ खड़ा हुआ.
"कमलकांत, सबूत. और फिर परसो वो दोनों भागने की कोशिश करेंगे.", सबूत बोलते हुए उन्होंने संदिग्ध इशारा संजीव की तरफ किआ और आखिरी बात पर कमलकांत का भी चेहरा चमक उठा. संजीव उनके हाथ में वह नोटरी से बनवाया हरे रंग का परचा पकड़ता कमलकांत के साथ गाडी में बैठ गया बात करने के लिए और पंडित जी फिर अर्जुन को कुछ परिचित लोगो से मिलवाते हुए उसका ध्यान वही लगाए रहे.
"दादा जी. एक बात पूछनी थी आपसे. बस सोच रहा हु कैसे पुछु." दोनों अब एस्टीम कार के अंदर बैठे थे.
"बेहिचक." रामेश्वर जी ने दूसरा हरा पन्ना पढ़ते हुए कहा, एक बार अपने पोते का चेहरा देखते हुए.
"वो जो वकील अंकल थे, और उन्होंने ने जो 2 नाम लिए थे उनके बारे में मैंने पढ़ा था कुछ दिन पहले. अभी उन्हें यहाँ से जीप में बिठा कर भी ले जाया गया है. 4 मर्डर और 2 रपे के चार्जेज के बाद भी वह अंकल कह रहे थे की सबूत के अभाव में वह दोनों बरी हो सकते है."
"बीटा, ये जो अदालत है न इसका एक असूल है. जैसे हर संस्था का होता है. यहाँ पक्के साबुत, गवाह और अपराध के साथ अपराधी का रिश्ता साबित करना जरुरी होता है. सिर्फ कह देने भर से उन्हें सजा नहीं मिल सकती. और वह 7 कतल, 15 से ज्यादा रपे और अनगिनत फिरौतियाँ कर चुके है. लेकिन जैसे गेंहू साफ़ नहीं होती उसमे भी घुन होता है वैसे हे हर विभाग में ये होता है. कुछ भ्रष्ट लोग थोड़े से धन या ताक़त के नशे में बहोत सरे साफ़ लोगो का भी काम खराब कर देते है. इन्हे भी सजा मिलेगी. वैसे तुम्हे बड़े ाचे से खबर याद रह गई इन दोनों की? और तुमने वकील की बात भी सुन ली?", उनकी आखिरी बात पर एक पल के लिए अर्जुन के चेहरे पर शिकन आई लेकिन वह संभल गया.
"बस अखबार में ाचे से पढ़ी थी खबर और नाम भी वही थे तोह वकील अंकल की बात की और ध्यान चला गया." अर्जुन अब अगली सीट पर बैठ कर नजरे बचता सामने देखने लगा था. लेकिन रामेश्वर जी को इशारा मिल चूका था और उन्होंने शान्ति रखते हुए बस फिर से एक नजर उन कागजात पर डाली इधर संजीव भी कार में ड्राइवर सीट पर आ बैठा.
"साथ वाले रजिस्ट्रार के दफ्तर.", उनकी बात पर संजीव भैया ने बिना कुछ कहे बस कार सामने से हे घूमते हुए बताई जगह पर ले ली थी. ये भी एक परिसर हे था कचहरी के अंदर हे. जहाँ jameen/ghar/plot के कागजात का काम होता था.
सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आये तोह सामने हे लोगो की क़तर लगी थी लेकिन पंडित जी को देखते हे एक बाबू सा व्यक्ति नमस्कार करता अपने साथ ले चला और पीछे उनके दोनों पोते. कुछ देर तक अर्जुन और संजीव पीछे लगी कुर्सियों पर बैठे रहे और रामेश्वर जी 2 अधिकारीयों से अपनी मंत्रणा करते रहे. वो दोनों भी रामेश्वर जी की लाइ फाइल और सभी कागज़ को ध्यान से देख रहे थे और उनसे जुडी बातें कर रहे थे.
"कहाँ ले आये भैया आप भी आज. दिन ख़राब हो गया पूरा.", अर्जुन ने हलकी नाराजगी में ये बात कही तोह सनीव भैया मुस्कुरा दिए.
"मेरा रोज का काम है. अब बोरियत की ऐसी आदत हो गई है के पूछ हे मत. ये शुक्र कर यहाँ दादाजी साथ है नहीं तोह वह नीचे कतार देखि थी न. अभी वही खड़े होते और 3 बजे तक नंबर आता फिर ये लोग भी नहीं मिलने थे.", संजीव भैया की बात सुनकर अर्जुन को अब समझ आया के दादाजी के साथ आने का क्या फायदा है. वह थोड़ा सा आराम से बैठ गया था.
"संजीव, बीटा इन कागज पर दस्खत कर दो. और अर्जुन जितनी जगह नीले पेन की लकीर लगी है वह तुम भी कर दो. और ये 2 जगह अपना अंगूठा भी लगा देना.", कोई एक घंटे बाद उन्होंने 500-1000 की चाप वाले 10-12 पैन उसके सामने कर दिए तोह अर्जुन अपनी जगह से खड़ा होता टेबल पर कागज रख दस्खत करने लगा. पढ़ने की कोई कोईशिष नहीं की थी. वही काम संजीव भैया ने भी किआ, थोड़ा उस से जल्दी और फिर अपने दादा को दोनों ने वह कागज दे दिए. संजीव भैया ने एक प्लास्टिक का बड़ा सा बैग थोड़ी देर बाद ला कर वही टेबल पर रखा तोह एक और अधिकारी उधर आया जिसके साथ 2 और लोग थे. अर्जुन का ध्यान जैसे हे उस बैग पर गया तोह आँखें फटी रह गई. 100-500 के नीले नोटों की गड्डियां ऊपर तक आई हुई थी बैग में. वह 3 लोग कोई अगले आधे घंटे तक उँगलियाँ गीली करते वह गिनते रहे.
"पूरे है चन्दन जी.", सभी बण्डल वापिस सही से बैग में डालने के बाद उन्होंने रामेश्वर जी के सामने बैठे अधिकारी कहा तोह उसने इशारे से पैसे ले जाने को कहा.
"वैसे पंडित जी, घर की जमीन और घर के हे लोगो के नाम थी. फिर भी इतनी रेगिस्टरी की फीस आपने जाया कर दी.", उनकी बात पर पंडित जी मुस्कुरा भर दिए.
"ऐसा है भाई. हम तोह खुद सरकारी गुलाम थे, फिर बचे भी वैसे हो गए. इधर संजीव ने साफ़ मन कर दिए कुछ सँभालने से. अब साड़ी जमीन ये पट्ठा हे संभालेगा और सबको हिसाब देगा. यही तोह खली है घर में.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते उन्होंने इतना कहा तोह भैया के साथ वह सामने वाले भी हंसने लगे.
"सही है वैसे आपका ये लड़का भी. शंकर भाई से भी 3-4 उंगल ऊपर निकल गया. वैसे सुना है संजीव बिज़नेस जमा रहा है, कुछ jama-punji हमारी भी लगवा दीजिये पंडित जी.", उनकी बात पर रामेश्वर जी ने संजीव की तरफ देखा.
"मैं परसो आता हु अंकल आपके पास. बैठ के बात करेंगे और फिर ये सभी कागज भी दर्ज करके फाइल भी ले जाऊंगा.", संजीव भैया ने आराम से हे कहा और फिर खड़े हो गए नमस्कार करते हुए. पंडित जी भी वैसे हे मिलते हुए बहार आने लगे तोह वह दोनों अधिकारी साथ हे नीचे आये उनके. जाने क्या बात करने में लगे थे और भैया तोह अर्जुन को लेकर आगे हे निकल चले थे.
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"आपने फिर कही जाना है क्या भैया? आजकल तोह आप घर रहते हे नहीं.", अर्जुन की भोली बात पर संजीव भैया ने हँसते हुए कहा.
"क्या है न छोटे, एक उम्र के बाद फिर घर की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है. काम ज्यादा हो गया है और अब 6 शहर देखने पड़ते है मुझे. ये भी सच है के तेरे साथ रहना भी मुझे पसंद है. चल आज शाम को तू और मैं बहार चलेंगे और फिर मैं इस सप्ताह के अंत में दोनों दिन तेरे साथ हे घर रहूँगा.", उन्होंने बाल सहलाते कहा तोह दरवाजा खोल कर अंदर बैठते रामेश्वर जी भी बोल पड़े, जो शायद उनकी बात सुन चुके थे शीशा खुला होने की वजह से.
"हाँ भाई, सही बात है. समय साथ बिताना भी चाहिए तुम दोनों को. क्या पता कल को ये बैलबुद्धि ऐसा हे न रह जाए.", उन्होंने ठहाका लगते कही तोह भैया बस मुस्कुरा दिए लेकिन अर्जुन ने नखरे से चेहरा दूसरी तरफ कर लिए.
"अर्जुन तोह समझदार बचा है मेरा. संजीव का दिमाग काम चलता है न तोह उसको हे बैलबुद्धि कह रहा था मैं. और हाँ, वह आज स्टेडियम मत जाना तुम, जोगिन्दर दिल्ली गया है 5 दिन के लिए. कल तोह वैसे भी तू अपनी नानी के यहाँ जा रहा तोह ाची हे बात है.", पीछे से हे अर्जुन के बाल बिखरते हुए उन्होंने सब बात बता दी थी.
"वहां दिल नहीं लगेगा मेरा आपके बिना. फिर कभी चला जाऊंगा न दादाजी. आप भी तोह पहले गाँव फिर दादी के साथ उनके घर चले गए थे. इतने दिन बाद आपके साथ रहूँगा न.", संजीव भैया कार को आराम से कचहरी से बहार निकल रहे थे. रामेश्वर जी जब भी कार में होते थे तोह संजीव कभी भी गाने की कैसेटटे नहीं बजता था. ऐसा सिर्फ शंकर जी हे करते थे क्योंकि वह जानते थे के उनके पिताजी को कैसे गाने पसंद है और कब.
"मेरे बेटे, एक रिश्ते में बांधकर कोई राम नहीं बनता. सभी का दायित्व निभाना जरुरी है, जिस से एक भरपूर परिवार और लोग हमेशा जुड़े रहे. तेरे Nana-Naani और मां लोग भी तोह अपने इस एक चिराग की प्रतीक्षा देख रहे होंगे. कितने साल उन्होंने बिता दिए तेरी राह में.", किसी गहरी सोच में डूब गए थे वह अपने सम्बन्धियों के परिवार को याद करते हुए. बड़े हे nek-sampann लोग है वह और अनुशाशन पसंद साफ़ तबियत के.
"हाँ भाई. तुझे जाना चाहिए वह और मैं भी तोह जाता रहता हु अपने ननिहाल. ाचा लगेगा जब थोड़ा बहार निकल कर अपने bhare-poore परिवार को पहचानेगा. फिर तुझे मैं अपने साथ हमारे गांव भी लेकर जाऊंगा, गर्मी की छुट्टियों में.", संजीव भैया ने सेक्टर के पास वाला मदद लेते हुए कहा. अर्जुन ने तोह वैसे हे कहा था लेकिन दोनों ने हे कितना समझा दिए था उसको. अपनी माँ के साथ जाना वह कैसे छोड़ सकता था. फिर मुस्कुराते हुए उसने जाने की हामी भर दी.
"संजीव, कल इसके स्कूल का परचा भरवा देना समय निकल कर. और बाकी काम भी करना है उसपर भी ध्यान देना.", कार से उतर कर संजीव भैया ने दादा जी के लिए दरवाजा खोला और इधर अर्जुन अंदर दौड़ गया था.
"मैं सब संभल लूंगा दादा जी. आप भरोसा रखिये वह खुद पीछे हट जायेगा. ठीक किआ आपने मुन्ना को यहाँ से 4 दिन के लिए भेजकर.", संजीव वापिस गाडी में बैठ कर निकल लिए, अपनी अनजान मंजिल की तरफ.
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"ये तेरी बड़ी बहिन है, रूपाली और रूपाली बीटा ये है हमारा अर्जुन और तेरा छोटा भाई. अगले सोमवार से दोनों साथ हे स्कूल जाओगे और हाँ अर्जुन बीटा, इसका ध्यान ाचे से रखना.", कौशल्या जी ने अर्जुन को अपने पास बिठाते हुए कहा. वही बीएड पर दादी के दूसरी तरफ खामोश सी वह लड़की अर्जुन को देख रही थी. गहरी आँखें, गूँथी हुई लम्बी छोटी और शरीर पर एक हलके नीले रंग का सलवार कमीज. शकल से हे एकदम मासूम और गंभीर लड़की थी वह. बस थोड़ी दुबली लग रही थी.
"हाँ तोह रूपाली दीदी, सबसे पहले तोह हम चलते है आपको मार्किट लेकर. यहाँ दादी की बगल में बैठने तोह शहर देखने से रही आप. स्कूल ड्रेस, कपडे और किताबे भी लेनी है." अर्जुन ने बड़ी आत्मीयता से ये बात कही तोह एक पल को रूपाली ने नजरे ऊपर करते उसको देखा फिर कौशल्या जी की तरफ.
"बिलकुल ठीक बात है. चल वह मंदिर के पास से जरा मेरा पर्स दे. और तुम दोनों पहले अपने ग्याहरवी के विषय भी समझ लो एक दूसरे से.", अर्जुन ने पर्स ला कर दादी की तरफ बढ़ा दिए. और बैठने लगा लेकिन उन्होंने फिर उसको उठा दिए.
"ओह बैलबुद्धि, ये छोटे वाला नहीं. वह वाला दे कपडे का.", उन्होंने उस छोटे पर्स से भी पैसे निकलते हुए कहा तोह अर्जुन दादी को एक बार हँसते हुए देख फिर से बैग जैसा पर्स उठा के ले आया.
"देखो दीदी, हमारे स्कूल में 3 हे विभाग है. कॉमर्स, मेडिकल और Non-medical... " अर्जुन की बात अधूरी हे रह गई थी और हैरान भी हुआ जब रूपाली ने कहा.
"मुझे मेडिकल में दाखिला लेना है.", कितनी प्यार आवाज थी रूपाली की. अर्जुन तोह जैसे खो सा गया था. और ऊपर से मेडिकल सुनकर वह हैरान भी हो गया था.
"आपका दसवीं का परिणाम आ गया क्या?"
"हाँ 2 साल पहले हे आ गया था.", अब थोड़ा सा रूपाली बोलने लगी थी. शायद पढाई करना उसको पसंद था और गाँव में उसको आगे पढ़ने को नहीं मिला था
"तोह कितने परसेंटेज थे आपके उसमे?", अर्जुन समझना चाहता था के मेडिकल हे क्यों और फिर कही नंबर हे न हुए इतने तोह फिर कैसे संभल पाएगी ये दीदी.
"85% थे. लेकिन विज्ञान में 98 नंबर थे और वह बड़ा स्कूल नहीं था मेडिकल के लिए.", अर्जुन तोह नंबर सुनकर कभी उनको तोह कभी दादी को देखने लगा था.
"मेरी बची तेरे जैसी बैलबुद्धि नहीं है. इसको पता है के कोनसे सब्जेक्ट लेने है कोनसे नहीं. एक तू हैं जिसको खुद नहीं पता के क्या पढ़ना है." दादी की बात सुनकर अर्जुन हँसते हुए बोलै.
"ये बैलबुद्धि दीदी से ज्यादा नंबर लेकर आएगा. और मैं ले रहा हु Non-Medical लेकिन अभी कोई ये नहीं पूछेगा के बाद में मई क्या बनूँगा. हाँ", अर्जुन अपनी दादी के हाथ से 100 के नोटों की गद्दी लेते हुए अपनी जेब में रखता बोलै.
"खाना खा लेते है फिर चलेंगे.", अर्जुन ने ये बात कही तोह दादी ने मन कर दिए.
"दोपहर में नहीं. 5 बजे जाना तुम दोनों और हाँ ाचे कपडे दिला के लाना बाकी मैं तारा या ऋतू को इसके साथ भेज दूंगी. संजीव ले जायेगा.", अर्जुन सोचता सा बहार निकल गया. इधर रूपाली को भी अर्जुन का साधारण सा व्यक्तित्व ाचा लगा था. भोला लेकिन तमीज से बात करने वाला उसका ये नया छोटा भाई.
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"आप तोह मुझे भूल हे गई न?", अर्जुन ऋतू दीदी को पीछे से बाहों में लेते हुए बोलै. वह उनके कमरे में आ गया था जहाँ ऋतू दीदी दिवार पर लगी एक तस्वीर को साफ़ कर रही थी. ये शायद आज हे लगाईं थी उन्होंने.
"तू तोह मरने के बाद भी मेरे अंदर रहेगा रे.", खुश होती वह मुड़ती हुई सामने से उसको गले लगा के कड़ी हो गई थी. उनकी ये जानलेवा मुस्कराहट और महकता जिस्म, अर्जुन तोह तस्वीर देखना भूल कर आँखें बंद किये खड़ा हो गया था.
"मतलब लोग आजकल जगह भी नहीं देखते.", ये आवाज कान में पड़ी तोह अर्जुन ने वैसे हे ऋतू दीदी को गले लगाए दरवाजे से अंदर आती अलका दीदी को देखा जिनके साथ हे प्रीती भी थी. ऋतू भी वैसे हे गले लगी मुस्कुरा रही थी.
"अब दीदी को गले लगाने के लिए मैं जगह, समय और मुहूर्त तोह नहीं देखूंगा.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अलका दीदी की तरफ कदम बढ़ाये हे थे की बहार से ताऊ जी की आवाज सुनाई दी. "अलका, ऋतू को लेकर आ जाओ बीटा. खाना खिलाओ माँ और पापा को." उनकी बात सुनकर दोनों हे बहार निकल गई लेकिन उनके पीछे जाती प्रीती का हाथ अर्जुन ने पकड़ते हुए वही रोक लिए.
"कहा भाग रही हो? मैं तोह यही हु.", अर्जुन की बात सुनकर और ऐसे खुले दरवाजे हाथ पकड़ने से थोड़ी घबराहट सी हो गई थी प्रीती को.
"वह तोह पता है के तुम यहाँ हो. लेकिन हम कहा है ये देखा है क्या तुमने.", प्रीती अपना चेहरा उसकी और करती बोलने लगी हे थी की एक हाथ से दरवाजा ढालता वह दूसरे से उसको अपने सीने से लगाए खड़ा हो गया.
"एक तोह पास नहीं आती ऊपर से फिर ये सब हिदायते देने लगती हो. लो अब दरवाजा भी बंद हो गया.", अर्जुन की बात और ऐसे गले लगने से प्रीती भी मुस्कुराने लगी थी.
"जब पास आती हु तोह देखा है के कैसे पत्थर बन जाते हो. और इतना हे दिल करता है मुझसे मिलने को तोह घर क्यों नहीं आये 2 दिन?", प्रीती की शिकायत अर्जुन को जायज लगी थी. वो सच में इन 2 दिनों में उसके पास नहीं गया था.
"वो घर पे भी सबकुछ देखना जरुरी था न. और तुम तोह हमेशा हे साथ होती हो.", अर्जुन समझने के लहजे से बोल रहा था. अपनी गलती उसको पता चल गई थी.
"ाचा वह सब हम दोनों देख लेंगे. पहले ये फोटो देखो जरा जो ऋतू दीदी ने लगाईं है.", अर्जुन की बाहों से निकलते हुए अर्जुन ने वापिस ध्यान दिलाया उसको दिवार पर लगी इस नै तस्वीर का.
अर्जुन के तीसरे जन्मदिन की फोटो थी वह जिसमे उसका मुंडन हो रखा था और रेणुका बुआ केक कटवा रही थी और उसकी सभी बहने भी दूसरी तरफ थी. प्रीती की नीली आँखें और हद्द से ज्यादा gol-matol गुलाबी चेहरा साफ़ दिख रहा था.
"वाह. ये कहा से मिल गई थी और किसने बड़ा करवाया इसको?", अर्जुन उस तस्वीर को हाथ लगता हुआ निहार रहा था.
"हमारे कैमरा की रील में थी और बुआ ने 5 दिन पहले हे दादू को बोलकर लैब से धुलवाने और बड़ा करवाने के लिए कहा था. आज घर पर दे गया था Color-lab वाला. ऐसी 2 और भी है. एक मेरे कमरे में और एक अलका दीदी वाले में.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रख वह साथ कड़ी खुद भी देख रही थी की कैसे अर्जुन ने उस समय भी एक हाथ से उसको पकड़ा हुआ था और उलटे हाथ से केक काट रहा था जिक्सो रेणुका ने पकड़ा हुआ था.
"तुम न बिलकुल अंग्रेज हे थी, जैसे वह जॉनसन पाउडर वाले होते हैं.", अर्जुन ने तस्वीर में हे छोटी प्रीती के गाल को हाथ लगते कहा तोह अपने पंजो पर कड़ी हो प्रीती अर्जुन का गाल चूमत कर बहार दौड़ गई.
"तुम तब भी टिंडे हे थे.", दरवाजे से इतना बोल कर वह हंसती सी गायब हो गई और अर्जुन वही मुस्कुराता सा बस फिर से फोटो को देखने लगा.
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मेनका अपने मायके आई हुई थी 2 दिन अपनी माँ और बड़े भाई के पास रहने. भाभी पेट से थी शायद सातवा महीना चल रहा था उनका लेकिन फिर भी वह अपनी सास के साथ घर का लगभग काम कर लेती थी. मेनका की भाभी सरिता एक bholi-bhali औरत थी और गाँव से हे थी तोह मेहनती भी थी. उनके पहले एक लड़की थी जो 4 साल की हो चुकी थी और मेनका के बड़े भाई दूसरा बचा चाहते थे, बीटा. दिन में उनका भाई खेत पर हे रहता था क्योंकि फसल कड़ी थी और दोपहर का खाना ज्यादातर मेनका की माँ लेकर जाती थी अपने बेटे के लिए. आज उनके पाँव में थोड़ा दर्द था और बहु को गर्भावस्था में घर से बहार जाना मन था, इसलिए मेनका हे खाने का डब्बा और लस्सी बोतल लेकर खेत की तरफ चल दी. रोज के समय से आज खाना कोई एक घंटा पहले हे तैयार था तोह जा भी जल्दी हे रहा था.
'धुप तोह है लेकिन इसमें चुभन बिलकुल नहीं है. वैसे भी तोह आधा कोस तोह खेत है.', मेनका ने पीला सूट पहना था और गाँव आने के बाद जूती पहन ली थी. सलवार हलकी ढीली और कमीज ाचे से कैसा हुआ था जिसमे ऊपर का शरीर ाचे से नुमाया हो रहा था. चुन्नी से सर और होंठ ढकती वह कच्ची पगडण्डी पर सब तरफ देखती आगे बढ़ रही थी. दोनों तरफ फसल लेलहा रही थी और कही कही घने पेड़ लगे थे. खेतो में किसानो ने छोटे कमरे भी बनाये हुए थे, सामान रखने और रात सोने के लिए. पहले भी मेनका यही से गुजरती थी जब भाई को खाना देने जाती थी.
9 साल हो चुके थे उसकी शादी को और अभी तक वह माँ नहीं बन्न पाई थी. इधर 6 साल में उसके भाई ने सरिता भाभी को दूसरी बार पेट से कर दिए था. मेनका को इस बात से कोई शिकवा या जलन नहीं थी बस अपने माँ न बन पाने से वह आहात थी. कितना देखते थे लड़के उसको जब वह कॉलेज में थी. आज भी शहर में कई लोग उसका शरीर घूरते रहते थे जब भी वह कभी बहार निकलती थी. लेकिन एक उसका पति था जो साल में एक बार कुछ दिनों के लिए हे आता था और अगर रात को कभी कुछ करने भी लगता था तोह 2-3 मिनट में फारिग हो कर करवट बदल लेता था. शादी के पहले साल हे बस कुछ तनाव आता था उसके लिंग में और थोड़ी उमंग भी रहती थी मेनका के साथ लेकिन कुछ न हो पाया था. ऐसे हे सोचो में खोई वह अपने खेत तक आई तोह वह शांति थी. साफ़ पानी से भरी हौद के पास लगे घने पेड़ो के बीच मोटर का कमरा था जिधर वह चल दी यही सोच कर की भैया आराम कर रहे होंगे. लेकिन 10 कदम दूर से हे उसको पाजेब और चूड़ियों की लगातार खनकने की आवाज कमरे से आती लगी. कदम और चाल शांत हो गई थी मेनका की ये सुनकर. वह भली भांति जानती थी की ऐसी आवाज का क्या मतलब होता है. कमरे के बहार लगे लकड़ी के फत्ते पर जैसे हे उसने नजर गड़ाई तोह साँसे थम्म गई.
"भूरी, तू बड़ी दुमदार है ऋ.. आह. आज भो तेरा छूट भोसड़ा नहीं बानी है 2 बच्चों के होने के बावजूद.", अंदर जमीन पर गद्दा के ऊपर उसका भाई एक 24-25 साल की औरत का घाघरा पेट पर चढ़ाये उसकी छूट में लुंड जोरदार धक्को से अंदर बहार कर रहा था. उस औरत के गोल चुचुए दोनों हाथों में पकड़े वह मशीन सा कमर हिलने में लगा था. वह औरत भी अपने हाथ उसके भैया के कंधो पर रखे मजे से सिसक रही थी. 7 इंच के लगभग वह कला कठोर लुंड बड़े आराम से छूट में जड़ तक उतरता और निकलता देख बहार कड़ी मेनका के चुके हिलने लगे थे. साँसे भारी हो गई थी इस दृश्य को देख कर. कहा तोह उसके भैया इतने शरीफ थे सबकी नजरो में और कहा इस कमरे के अंदर वह अपने से 12-13 साल छोटी किसी पराये आदमी की बीवी को राउंड रहे थे.
"मेरी छूट को भी ऐसे हे दुमदार लुंड से चैन आता है जमींदार जी. मेरा खसम तोह 4-5 मिनट से ज्यादा नहीं चलता लेकिन आप तोह 15 मिनट तक ऐसी चुदाई करते हो की ये पूरा दिन दुखती है, मजे में. आह.. आह. और वह आपका दोस्त भी जब होता है तोह मजा दुगना हो जाता है.. कास के मारो न आह.. तीसरा बचा भी हो जाये तोह मैं तैयार हु.", जहाँ उसके बड़े भैया उस औरत की बातों से मजे में उत्तेजित हो रहे थे वही मेनका तोह स्तब्ध हे थी ये सुनकर की भैया कैसे इंसान है जो अपने दोस्तों के साथ मिलकर लड़की भोगते है. और ये औरत उन्ही से गर्भवती भी होना चाहती है.
"अरे भूरी, गांड मारना ाचा नहीं लगता मुझे. वह तोह बुनती हे पागल है तेरे पिछवाड़े के लिए और तभी हमारी तीनो को जमती है. लेकिन तीसरा बचा नहीं ऋ, अभी तोह एक साल बिलकुल नहीं. सरिता की छूट तोह मिलने से रही अभी एक साल. बचे के बात वापिस कसने में इतना समय तोह लगेगा हे. तब तक तू हे मेरा सहारा है.. ाः.. ", एक दूध पर झुक कर पीने लगा था मेनका का भाई और वह बहार कड़ी बस हैरत और उत्तेजना में कड़ी थी.
"क्यों झूठ बोलते हो जमींदार जी. बुनती की भाभी की चुदाई करते मैंने देखा है आपको, और फिर मेरी छोटी बहिन की सील तोड़ने के बाद हर महीने बुलवाते हो उसको वह क्या है? बेचारी की शादी नहीं हुई अभी तक और आपने उसका अभी कबाड़ा कर दिए है. और कितनी तोह ऐसी हैं जो चारा काटने आती है लेकिन आपका लुंड पिलवा के जाती है.", भूरी ने इतने नाम गिनवा दिए थे की मेनका के जबड़े चिपक गए थे. उसके भैया तोह बहोत बड़े वाले रंडीबाज निकले. यही सोच रही थी वह.
"आह.. भूरी तेरी बहिन बिलकुल तेरे जैसी है ऋ. याद है पहली बार में कितना खून बहाया था तूने? लेकिन मेरी पक्की वाली तोह तू हे है हमेशा से. आह.. होने वाला है मेरा.", गुर्राते हुए जब मेनका के भैया ने जड़ तक लुंड भूरी की छूट पर चिपकाया तोह चेहरा लाल हो गया था उनका और भूरी भी चिपक चुकी थी. कुछ देर बाद सिकुड़ा हुआ लुंड धोती के अंदर करते उसके भैया दिवार से तक लगा के बैठ गए तोह भूरी ने भी अपनी चोली सही की और घाघरे से हे छूट को साफ़ करती उनकी और देखने लगी.
"ले ये रख और माँ आती होगी खाना लेके तोह तू भी निकल अब यहाँ से.", 100-100 के 7-8 नोट उन्होंने भूरी की तरफ बढ़ाये तोह उन्हें अपनी चोली में रखती वह कड़ी हुई इधर मेनका चपलता से वापिस पगडण्डी की और दौड़ गई. दरवाजा खुलने तक तोह वह कोई 50-60 कदम दूर हो चुकी थी. फिर वैसे हे शांति से एक बार फिर वह मोटर की और बढ़ी तोह भैया को बहार आते देखा. भूरी दूसरी और से निकल गयी थी अगले खेतो में.
"आज तू खाना लेके आई है मेनका? मैं हे घर आ जाता.", उसके भैया ने सोचा वह bal-bal बचे है आज तोह उन्हें क्या मालुम था के मेनका सब देखने के बाद हे ये नाटक कर रही थी.
"हाँ. वह माँ के पाँव में दर्द था तोह मैं हे खाना ले आई. आप खा लीजिये डब्बा शाम को लेते आना, मैं वापिस जा रही हु.", पानी की हौद की दिवार पर खाना और लस्सी की बोतल रखती वह बस एक पल रुक कर चेहरा पोंछती कड़ी हो कर बोली और फिर भैया का जवाब सुने बिना पलट गई.
"ाची बात है. मैं ले आऊंगा शाम को. वैसे अभी कितने दिन है तू यहाँ?", भैया पानी से हाथ और मुँह धोने के बाद बोले.
"आज शाम को हे वापिस जाना है तोह 4 बजे वाली बस से निकल जाउंगी. अगली बार आउंगी तब रुक कर जाउंगी.", मेनका को अब वह रुकना कटाई मंजूर न था. जिस भाई ने उसके लिए इतना कुछ किआ था उसको bhala-bura तोह वह कह नहीं सकती थी इसलिए बेहतर समझा की दूर हे रहे. तेज कदमो से वह वापिस घर की और निकल चली थी. आज उसने जाना था के पुरुष कैसे होते है. किसी dangar-janwar की तरह बस उन्हें भी हर औरत एक गाये -बछड़ी हे दिखती है जिस पर चढ़ने को वह हमेशा तैयार रहते है. कहाँ उसकी भाभी एकदम भोली और पतिव्रता महिला है और कहा उसके बड़े भैया जाने कितनी हे aurato-ladkiyon से सम्बन्ध बनाये हुए. उसको बस अब जल्दी से अपने नए घर हे जाना था. 4 दिन बाद हे.
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पंडित जी के घर में बिलकुल शांति थी इस समय. Khana-peena होने के बाद अभी दोपहर के समय हर कोई आराम कर रहा था अपने अपने कमरे में. सुबह जल्दी गाँव से निकले थे और सफर की भी थकान थी तोह रामेश्वर जी बैठक में दीवान पर सुस्ता रहे थे. कौशल्या जी के साथ रूपाली और आरती लेती थी. ऋतू और अलका तोह रेणुका बुआ से बतियाने प्रीती के घर गयी हुई थी, जाने क्या क्या बातें करने लगी थी अब वह उनसे भी. रेखा जी अपने बंद कमरे में कपडे पैक करती हुई बस हल्का हल्का मुस्कुराये जा रही थी. सबसे खुश थी आज वह इस घर में, अपने बेटे का प्यार मिलने से जैसे उनकी ज़िन्दगी को एक नया सवेरा मिल गया था.
प्रियंका दीदी लगी हुई थी कोमल दीदी के साथ कर्रम बोर्ड खेलने, जो दोनों का सबसे पसंदीदा खेल था. बेशक कोमल दीदी को ज्यादा बातें करना पसंद न था लेकिन ये खेल उन्हें बचपन से पसंद था और थी भी वह इसमें माहिर. पिछले आधे घंटे में दूसरी बार प्रियंका हार चुकी थी लेकिन बाकी सबसे वह बेहतर हे खेल रही थी उनके साथ.
"यार तुझे शर्म नहीं आती क्या जरा भी? बारी तोह आने दिए कर 2-3 बार. ऐसे खेलने लग जाती है जैसे पैसे लगे हुए हो.", नए खेल को शुरू करने से पहले प्रियंका गिट्टियां लगाती बोल रही थी और कोमल बस प्लास्टिक के स्ट्राइकर को बोर्ड पर घिसती पाउडर मलने में लगी हुई थी. प्रियंका की बात पर हलकी सी मुस्कर तैर आई थी उनके खूबसूरत चेहरे पर.
"चल ठीक है तोह पहले 3 बारी में मैं गिट्टी नहीं डालूंगी और सिर्फ 50 को हे मारूंगी.", कोमल की बात सुनते हुए प्रियंका भी हंसती सी उसके खूबसूरत चेहरे को देख रही थी.
"यार मैंने कभी न इतने गौर से नहीं देखा था तुझे. मतलब देखा तोह था लेकिन सच कहु तोह तू आरती और ऋतू से भी सुन्दर है. ऐसा नहीं के आरती, ऋतू, अलका सुन्दर नहीं है लेकिन अगर मैं पूरी ख़ूबसूरती की बात करू तोह तू उनसे 21 हे है और वह 18-19 हे होंगी.", कोमल के चेहरे से नीचे उसकी gol-lambi गर्दन, गोरा फक्क सीना और कमीज में क़ैद एक दम गोल उभार वहीँ बाहें भी एकदम गोरी और baal-vihin. भरे गुलाबी होंठो के पास एक टिल और कोई आधा इंच लम्बी पलके. कोमल एक बेहतरीन दिल के साथ एक haseen-tareen लड़की थी.
"चल चल अब ये सब बातें नहीं करनी. खेलना है तोह ठीक नहीं तोह मैं सोने लगी हु.", कोमल ने हलकी मुस्कान और शर्म के साथ इतना कहा तोह प्रियंका ने स्ट्राइकर लेते हुए बारी चली. हर तरफ kaali-peeli गिट्टियां बोर्ड पर फैल गई लेकिन कोई अंदर न गई थी. कोमल ने लाल गिट्टी को देखा जो लाइन से पीछे वाले बाए गोले के पास पड़ी थी. सीधा स्ट्राइकर तोह उसपर लगने वाला नहीं थी तोह सामने से कोण बनती वह थोड़ा आगे को झुकी और प्रियंका को कमीज के अंदर हलके से दर्शन हो गए थे उसके गोर और पूरी तरह से सख्त उभारो के. आपस में चिपके वह दोनों बता रहे थे की वह बेजोड़ है और उनमे कोई ढीलापन नहीं था.
"वैसे जिसके साथ तेरी शादी होगी वह नसीबवाला हे होगा कोमल.", प्रियंका ने इतना हे कहा था के कोमल ने 50 की गिट्टी को अंदर दाल दिए था और फिर से स्ट्राइकर उठाने के बाद काली गिट्टी से कवर लेती वह चुपचाप खेल पर हे लगी थी. अगले 3-4 मिनट में 24 में से 23 गिट्टियां वह से गया कर चुकी थी कोमल और इस आखिरी वाली को भी अपने पाले में सुरक्षित करने के बाद हे वह बोली.
"शादी किस से होगी, कब होगी और होगी भी या नहीं ये सब मैं नहीं सोचती प्रियंका. लेकिन सच कहु तोह मैं इस घर में खुश हु और मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती किसी दूसरे घर में. फ़िलहाल तोह 2-3 साल नहीं.", कोमल की बात पर प्रियंका ने सभी गिट्टियां और स्ट्राइकर प्लास्टिक के डब्बे में रखते हुए बोर्ड के साथ अलमारी के पीछे रख दिया. और फिर दोनों हे ऐसी हलकी फुलकी बातें करती लेट गई थी. लेकिन एक कमरा छोड़कर अगले कमरे में 2 लोग जाग रहे थे.
राजकुमार जी ने अपनी धर्मपत्नी की साड़ी ऊपर चढ़ा राखी थी और खुद पजामा नीचे करते उनकी जांघो के बीच लुंड टिकाये बैठे हुए थे. ललिता जी के चेहरे पर हलकी मुस्कान थी क्योंकि आज उनके पति बिना कहे हे प्रेम दिखा रहे थे. दोनों हे एक तरह से पूरे कपडे शरीर पर लिए थे, दिन का वक़्त था इसलिए. जल्द हे मुस्कान गायब हो गई उनकी जब 2 मिनट बाद हे राजकुमार जी के लुंड ने उलटी कर दी उनके छूट के अंदर. एक खिसियानी सी हंसी देते वह एक तरफ लुढ़क गए और मैं में बड़बड़ाती हुई ललिता जी उनके पानी जैसे वीर्य को कच्ची से साफ़ करने के बाद एक तरफ पलट कर लेट गई. अर्जुन की याद आ गई थी उन्हें, कैसे वह उन्हें जम्म के पेलता है और तक़रीबन 30-40 मिनट तक नहीं छोड़ता. फिर शांत होती वह भी आँखें बंद करके सो गई थी.
"आह भाई.. आह्ह्ह्हह ऐसे हे कर उम्.. ", ऊपर बाथरूम में दिवार से लगी माधुरी अपने पीछे जड़ तक लुंड पेलते अर्जुन के हर धक्के पर मचल रही थी. दोनों फुटबॉल से मॉटे चुके दबोचे वह भी अपना विकराल लुंड अंदर बहार कर रहा था. गदराई और फूली गांड हर धक्के पर 'thap-thap' की आवाज पैदा करती और अर्जुन के धक्के ज्यादा जोर से पड़ने लगते थे.
"दीदी, आप किसी दिन फसवा डौगी हम दोनों को. आह.. ऐसे हे दिन में.. ", निप्पल मरोड़ता वह उनकी छूट का आकर बढ़ने में लगा था. पिछले 20 मिनट से वह ये चुदाई कर रहा था और माधुरी दीदी की गरम छूट एक बार पहले हे खाली हो चुकी थी.
"आह.. उम्म्म.. जबसे ये आठ.. मेरी छूट के अंदर गया.. उम्म्म.. उस दिन से बस इसके लिए हे तड़पती है रे.. आह.. रात को.. पिछले छेड़ भी ले लिओ.", उनकी सिसकारियां और बात सुनकर अर्जुन कूल्हे पर एक हलकी चपत लगते हुए निचे झुकाने लगा. गांड की दरार को फैलता वह अब अंधाधुन्द उन्हें पेले जा रहा था..
"आहाआआ." माधुरी दीदी ने लुंड को कस के पकड़ा था और इधर अर्जुन का मोटा सूपड़ा भी अपनी हद्द से ज्यादा फूल कर ठुमकने लगा था. माधुरी दीदी खुद को नीचे गिरती लुंड को निकल बैठ सी गई और उनकी पीठ पर गरम गधा वीर्य किसी बारिश सा टपकने लगा था. कुछ देर तक अर्जुन बस दिवार को पकडे खड़ा रहा और जब माधुरी दीदी कड़ी हो कर सामने आई तोह उनके भूरे निप्पल सूज कर बड़े हो चुके थे. अर्जुन को होंठो को चूमकर वह खुद को साफ़ करने लगी तोह अर्जुन ने भी लुंड धोने के बाद कपडे पहने और अपने कमरे में आ कर लेट गया था.
'ओह्ह.. कितनी चौड़ी कर दी है इस घोड़े ने.. आह.. इसको अब किसी और लुंड से चैन नहीं आने वाला.' शीशे में अपनी छूट का फैला हुआ छेड़ देखती माधुरी खुश हो रही थी. अंदर तक उसकी लाली दिख रही थी और 8 आने के सिक्के जैसा मुँह खुल्ला हुआ था उसका.
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साढ़े 3 बजे हे अर्जुन बिस्टेर से उठ खड़ा हुआ और jeans-tshirt पहन कर वह मोटरसाइकिल ले बहार निकल लिए. बिना किसी को कुछ बताये.