Incest Pyaar - 100 Baar - Page 9 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 54

कौन क्या है (1)


10 बजे रामेश्वर जी अर्जुन और संजीव के साथ मुख्या कचहरी के प्रवेश द्वार पर थे. आज सुबह 9 से पहले हे वह बाकी सदस्यों के साथ अपने घर लौट आये थे जहा नाश्ता पानी करने के बाद कुछ file-kagaaj के साथ वह गाडी से सीधा यहाँ चले आये थे. नोटरी से एक हलफनामा तैयार करवाता संजीव बेहद शांत था. वही अर्जुन बड़े ध्यान से देख रहा था के उसके दादा जी को कितने हे लोग देख रहे थे और कई तोह उनके पास आ कर हाथ जोड़ मिल रहे थे.

"नमस्कार पंडित जी. आपने यहाँ आने का कष्ट किआ? कभी हमे भी काम दे दिए कीजिये?", काले कोट में चस्मा लगाए ये अधेड़ उम्र के व्यक्ति इतनी व्यस्त जगह पर भी झुक कर उसके दादा के पाँव छू रहे थे.

"अरे सरदाना जी आप अभी ड्यूटी पर है और सरकारी वकील हो भाई. वैसे भी बहुत दिन हो गए थे इधर आये और ऊपर से सुना है के आज वह सैनी मर्डर केस का ट्रायल शुरू हुआ है.", गले से लगाने के बाद रामेश्वर जी ने उन 'सरदाना' उपनाम के वकील से कहा. अर्जुन का तोह ये पहला अनुभव था ऐसी जगह आने का. किसी सरकारी हॉस्पिटल से ज्यादा लोग तोह यहाँ थे. 35-40 नोटरी तोह घने पेड़ के नीचे अपनी दुकान लगाए बैठे थे. कही पुलिस वाले किसी मुजरिम को ला रहे थे कही ले जा रहे थे. एक तरफ चलन की खिड़की पर इतनी लम्बी कतार थी की dhakka-mukki जैसा माहौल था.

"पंडित जी आपका तोह आखिरी केस था वह जहाँ तक याद है. इन्दर सैनी के कटत में तोह उस समय बरी हो गया था लेकिन फिर सबूत हाथ लगे तोह इतने साल तक पुलिस से बचता रहा था. कहा तोह उस समय तक जितेंदर सिर्फ फिरौती और कब्जे के काम करता था. देखिये 11 साल में इतना नामी बदमाश बन गया है की एक डोज़ेन पुलिस वाले घेर कर लाये है उसको और उसके भाई विष्णु को. बंसल साहब नहीं थे अपने, डिफेन्स कॉलोनी वाले. उनकी बेटी का रपे भी रपे इन्होने किआ है लेकिन वह मेडिकल कारवाही समय ले रही है.", अर्जुन ये दोनों हे नाम सुनकर चौंक गया था. जितेंदर उर्फ़ काला और विष्णु उर्फ़ बिल्लू. मतलब पक्के हे गुनेहगार थे वह दोनों लेकिन पुलिस अभी तक सबूत हे जूता रही थी. रामेश्वर जी के चेहरे पर सार्ड से भाव आ गए थे.

"बंसल ने हे पैरवी की थी उस समय और उसका वही lok-dal वाला बाहुबली पैसे भर रहा था इनके. कितनी प्यारी बची थी उसकी और पिता के पाप का भोज उसको सहना पड़ा.", रामेश्वर जी का पोलिसिअ लेजहज़ा आज देख रहा था अर्जुन. ऐसी आवाज से तोह अपराधी के रोंगटे खड़े हो जाए.

"पंडित जी, उन्हें भी लकवा मार गया है पिछले साल. याद है मुझे वह केस, आपने हे मुझे जूनियर वकील को केस दिलवाया था लेकिन मैं भी इन्साफ न दिला पाया था."

"कोई बात नहीं भाई. वह जाने से पहले सभी इन्साफ हो जाते है यही इस धरती पर.", एकदम से हे चेहरे पर मुस्कान लाते उन्होंने इन वकील साहब को आसमान की तरफ इशारा करते कहा तोह वह भी हंस दिए. 5-6 पुलिस के सितारा-3 सितारा कर्मी भी उधर आ खड़े हुए थे और जैसे हे पंडित जी की निगाह उनपे पड़ी तोह सभी ने वही उपक्रम किआ पाँव छूने का और हाथ पीछे करके खड़े हो गए. रामेश्वर जी तोह जैसे उनके लिए पिता सामान हे थे. और वह भी सभी कर्मियों को उनके प्यार के नाम या आखिरी नाम से बुलाते बात करने लगे थे. फिर एक इंस्पेक्टर पड़ का व्यक्ति थोड़ा करीब आया तोह हाथ के इशारे से बाकी सभी को रुकने का बोल कर उसके साथ आगे चल दिए.

"कहो कमलकांत. परेशां हो बहोत." रामेश्वर जी थोड़ा आगे चलते आ खड़े हुए थे.

"सर, वह दबाव भी आ रहा है और सबूत भी मिटाये जा रहे है. आपके समय तोह सारा सिस्टम आपस में जुड़ा था. हॉस्पिटल से लेकर सभी सरकारी विभाग पुलिस के काम में पूरा साथ निभाते थे. अभी हालत कुछ और हे है. वह समो मल्होत्रा और डॉ गुलाटी शायद इनका मेडिकल परचा क्लियर न कर दे. आप हे मशवरा दे सकते हो या सीधा कहु तोह मदद कर सकते हो. डिपार्टमेंट की तरफ से सारा प्रेशर मेरे ऊपर है और वही Lok-dal वाला मंत्री इनके सबूत साफ़ करवाने में लगा है. हमरे रिमांड में विष्णु तोह टूट गया था और उसने काबुल भी किआ था 1 हत्या और 5 बलात्कार लेकिन आज यहाँ वह मुकर गया, अभी 10 मिनट हे पहले. जितेंदर तोह घाघ है उसको टॉड नहीं पाए.", अपनी वर्दी वाली टोपी उतार कर काख में दबा ली थी इंस्पेक्टर ने और चेहरा बता रहा था के हड्डी गले में फांसी है.

"डॉक्टर मैं संभल लूंगा और उनका खुद फ़ोन आ जायेगा तुम्हारे पास. लेकिन विष्णु ने सारे इल्जाम खुद पर ले लिए तोह सबूत तोह तुम्हे फिर भी जुटाने हे होंगे जितेंदर के खिलाफ. कितना रिमांड बढ़ाया है?", रामेश्वर जी ने शांत भाव से हे कहा.

"सर 5 दिन का माँगा था लेकिन 2 हे दिन का मिला है. परसो फिर पेशी है. सबूत पता होते हुए भी ला नहीं सकते क्योंकि परचा बनवाया तोह बड़े नाम बीच में आएंगे और उल्टा रास्ता तोह फिर .. ", रामेश्वर जी के चेहरे पर कुछ अलग भाव आ रहे थे. एक बार उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा जो आराम से एक पत्थर के बेंच पर बैठा दूसरी तरफ देख रहा था और संजीव से नजरे मिली जो वहीँ नोटरी वाले को पैसे देता अपने दादा को देख रहा था. दोनों की आँखें मिली तोह उन्होंने पलके झपकाई. संजीव भी चुपचाप अर्जुन की पीठ की तरफ से घूमता हुआ उनकी पास आ खड़ा हुआ.

"कमलकांत, सबूत. और फिर परसो वो दोनों भागने की कोशिश करेंगे.", सबूत बोलते हुए उन्होंने संदिग्ध इशारा संजीव की तरफ किआ और आखिरी बात पर कमलकांत का भी चेहरा चमक उठा. संजीव उनके हाथ में वह नोटरी से बनवाया हरे रंग का परचा पकड़ता कमलकांत के साथ गाडी में बैठ गया बात करने के लिए और पंडित जी फिर अर्जुन को कुछ परिचित लोगो से मिलवाते हुए उसका ध्यान वही लगाए रहे.

"दादा जी. एक बात पूछनी थी आपसे. बस सोच रहा हु कैसे पुछु." दोनों अब एस्टीम कार के अंदर बैठे थे.

"बेहिचक." रामेश्वर जी ने दूसरा हरा पन्ना पढ़ते हुए कहा, एक बार अपने पोते का चेहरा देखते हुए.

"वो जो वकील अंकल थे, और उन्होंने ने जो 2 नाम लिए थे उनके बारे में मैंने पढ़ा था कुछ दिन पहले. अभी उन्हें यहाँ से जीप में बिठा कर भी ले जाया गया है. 4 मर्डर और 2 रपे के चार्जेज के बाद भी वह अंकल कह रहे थे की सबूत के अभाव में वह दोनों बरी हो सकते है."

"बीटा, ये जो अदालत है न इसका एक असूल है. जैसे हर संस्था का होता है. यहाँ पक्के साबुत, गवाह और अपराध के साथ अपराधी का रिश्ता साबित करना जरुरी होता है. सिर्फ कह देने भर से उन्हें सजा नहीं मिल सकती. और वह 7 कतल, 15 से ज्यादा रपे और अनगिनत फिरौतियाँ कर चुके है. लेकिन जैसे गेंहू साफ़ नहीं होती उसमे भी घुन होता है वैसे हे हर विभाग में ये होता है. कुछ भ्रष्ट लोग थोड़े से धन या ताक़त के नशे में बहोत सरे साफ़ लोगो का भी काम खराब कर देते है. इन्हे भी सजा मिलेगी. वैसे तुम्हे बड़े ाचे से खबर याद रह गई इन दोनों की? और तुमने वकील की बात भी सुन ली?", उनकी आखिरी बात पर एक पल के लिए अर्जुन के चेहरे पर शिकन आई लेकिन वह संभल गया.

"बस अखबार में ाचे से पढ़ी थी खबर और नाम भी वही थे तोह वकील अंकल की बात की और ध्यान चला गया." अर्जुन अब अगली सीट पर बैठ कर नजरे बचता सामने देखने लगा था. लेकिन रामेश्वर जी को इशारा मिल चूका था और उन्होंने शान्ति रखते हुए बस फिर से एक नजर उन कागजात पर डाली इधर संजीव भी कार में ड्राइवर सीट पर आ बैठा.

"साथ वाले रजिस्ट्रार के दफ्तर.", उनकी बात पर संजीव भैया ने बिना कुछ कहे बस कार सामने से हे घूमते हुए बताई जगह पर ले ली थी. ये भी एक परिसर हे था कचहरी के अंदर हे. जहाँ jameen/ghar/plot के कागजात का काम होता था.

सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आये तोह सामने हे लोगो की क़तर लगी थी लेकिन पंडित जी को देखते हे एक बाबू सा व्यक्ति नमस्कार करता अपने साथ ले चला और पीछे उनके दोनों पोते. कुछ देर तक अर्जुन और संजीव पीछे लगी कुर्सियों पर बैठे रहे और रामेश्वर जी 2 अधिकारीयों से अपनी मंत्रणा करते रहे. वो दोनों भी रामेश्वर जी की लाइ फाइल और सभी कागज़ को ध्यान से देख रहे थे और उनसे जुडी बातें कर रहे थे.

"कहाँ ले आये भैया आप भी आज. दिन ख़राब हो गया पूरा.", अर्जुन ने हलकी नाराजगी में ये बात कही तोह सनीव भैया मुस्कुरा दिए.

"मेरा रोज का काम है. अब बोरियत की ऐसी आदत हो गई है के पूछ हे मत. ये शुक्र कर यहाँ दादाजी साथ है नहीं तोह वह नीचे कतार देखि थी न. अभी वही खड़े होते और 3 बजे तक नंबर आता फिर ये लोग भी नहीं मिलने थे.", संजीव भैया की बात सुनकर अर्जुन को अब समझ आया के दादाजी के साथ आने का क्या फायदा है. वह थोड़ा सा आराम से बैठ गया था.

"संजीव, बीटा इन कागज पर दस्खत कर दो. और अर्जुन जितनी जगह नीले पेन की लकीर लगी है वह तुम भी कर दो. और ये 2 जगह अपना अंगूठा भी लगा देना.", कोई एक घंटे बाद उन्होंने 500-1000 की चाप वाले 10-12 पैन उसके सामने कर दिए तोह अर्जुन अपनी जगह से खड़ा होता टेबल पर कागज रख दस्खत करने लगा. पढ़ने की कोई कोईशिष नहीं की थी. वही काम संजीव भैया ने भी किआ, थोड़ा उस से जल्दी और फिर अपने दादा को दोनों ने वह कागज दे दिए. संजीव भैया ने एक प्लास्टिक का बड़ा सा बैग थोड़ी देर बाद ला कर वही टेबल पर रखा तोह एक और अधिकारी उधर आया जिसके साथ 2 और लोग थे. अर्जुन का ध्यान जैसे हे उस बैग पर गया तोह आँखें फटी रह गई. 100-500 के नीले नोटों की गड्डियां ऊपर तक आई हुई थी बैग में. वह 3 लोग कोई अगले आधे घंटे तक उँगलियाँ गीली करते वह गिनते रहे.

"पूरे है चन्दन जी.", सभी बण्डल वापिस सही से बैग में डालने के बाद उन्होंने रामेश्वर जी के सामने बैठे अधिकारी कहा तोह उसने इशारे से पैसे ले जाने को कहा.

"वैसे पंडित जी, घर की जमीन और घर के हे लोगो के नाम थी. फिर भी इतनी रेगिस्टरी की फीस आपने जाया कर दी.", उनकी बात पर पंडित जी मुस्कुरा भर दिए.

"ऐसा है भाई. हम तोह खुद सरकारी गुलाम थे, फिर बचे भी वैसे हो गए. इधर संजीव ने साफ़ मन कर दिए कुछ सँभालने से. अब साड़ी जमीन ये पट्ठा हे संभालेगा और सबको हिसाब देगा. यही तोह खली है घर में.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते उन्होंने इतना कहा तोह भैया के साथ वह सामने वाले भी हंसने लगे.

"सही है वैसे आपका ये लड़का भी. शंकर भाई से भी 3-4 उंगल ऊपर निकल गया. वैसे सुना है संजीव बिज़नेस जमा रहा है, कुछ jama-punji हमारी भी लगवा दीजिये पंडित जी.", उनकी बात पर रामेश्वर जी ने संजीव की तरफ देखा.

"मैं परसो आता हु अंकल आपके पास. बैठ के बात करेंगे और फिर ये सभी कागज भी दर्ज करके फाइल भी ले जाऊंगा.", संजीव भैया ने आराम से हे कहा और फिर खड़े हो गए नमस्कार करते हुए. पंडित जी भी वैसे हे मिलते हुए बहार आने लगे तोह वह दोनों अधिकारी साथ हे नीचे आये उनके. जाने क्या बात करने में लगे थे और भैया तोह अर्जुन को लेकर आगे हे निकल चले थे.

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"आपने फिर कही जाना है क्या भैया? आजकल तोह आप घर रहते हे नहीं.", अर्जुन की भोली बात पर संजीव भैया ने हँसते हुए कहा.

"क्या है न छोटे, एक उम्र के बाद फिर घर की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है. काम ज्यादा हो गया है और अब 6 शहर देखने पड़ते है मुझे. ये भी सच है के तेरे साथ रहना भी मुझे पसंद है. चल आज शाम को तू और मैं बहार चलेंगे और फिर मैं इस सप्ताह के अंत में दोनों दिन तेरे साथ हे घर रहूँगा.", उन्होंने बाल सहलाते कहा तोह दरवाजा खोल कर अंदर बैठते रामेश्वर जी भी बोल पड़े, जो शायद उनकी बात सुन चुके थे शीशा खुला होने की वजह से.

"हाँ भाई, सही बात है. समय साथ बिताना भी चाहिए तुम दोनों को. क्या पता कल को ये बैलबुद्धि ऐसा हे न रह जाए.", उन्होंने ठहाका लगते कही तोह भैया बस मुस्कुरा दिए लेकिन अर्जुन ने नखरे से चेहरा दूसरी तरफ कर लिए.

"अर्जुन तोह समझदार बचा है मेरा. संजीव का दिमाग काम चलता है न तोह उसको हे बैलबुद्धि कह रहा था मैं. और हाँ, वह आज स्टेडियम मत जाना तुम, जोगिन्दर दिल्ली गया है 5 दिन के लिए. कल तोह वैसे भी तू अपनी नानी के यहाँ जा रहा तोह ाची हे बात है.", पीछे से हे अर्जुन के बाल बिखरते हुए उन्होंने सब बात बता दी थी.

"वहां दिल नहीं लगेगा मेरा आपके बिना. फिर कभी चला जाऊंगा न दादाजी. आप भी तोह पहले गाँव फिर दादी के साथ उनके घर चले गए थे. इतने दिन बाद आपके साथ रहूँगा न.", संजीव भैया कार को आराम से कचहरी से बहार निकल रहे थे. रामेश्वर जी जब भी कार में होते थे तोह संजीव कभी भी गाने की कैसेटटे नहीं बजता था. ऐसा सिर्फ शंकर जी हे करते थे क्योंकि वह जानते थे के उनके पिताजी को कैसे गाने पसंद है और कब.

"मेरे बेटे, एक रिश्ते में बांधकर कोई राम नहीं बनता. सभी का दायित्व निभाना जरुरी है, जिस से एक भरपूर परिवार और लोग हमेशा जुड़े रहे. तेरे Nana-Naani और मां लोग भी तोह अपने इस एक चिराग की प्रतीक्षा देख रहे होंगे. कितने साल उन्होंने बिता दिए तेरी राह में.", किसी गहरी सोच में डूब गए थे वह अपने सम्बन्धियों के परिवार को याद करते हुए. बड़े हे nek-sampann लोग है वह और अनुशाशन पसंद साफ़ तबियत के.

"हाँ भाई. तुझे जाना चाहिए वह और मैं भी तोह जाता रहता हु अपने ननिहाल. ाचा लगेगा जब थोड़ा बहार निकल कर अपने bhare-poore परिवार को पहचानेगा. फिर तुझे मैं अपने साथ हमारे गांव भी लेकर जाऊंगा, गर्मी की छुट्टियों में.", संजीव भैया ने सेक्टर के पास वाला मदद लेते हुए कहा. अर्जुन ने तोह वैसे हे कहा था लेकिन दोनों ने हे कितना समझा दिए था उसको. अपनी माँ के साथ जाना वह कैसे छोड़ सकता था. फिर मुस्कुराते हुए उसने जाने की हामी भर दी.

"संजीव, कल इसके स्कूल का परचा भरवा देना समय निकल कर. और बाकी काम भी करना है उसपर भी ध्यान देना.", कार से उतर कर संजीव भैया ने दादा जी के लिए दरवाजा खोला और इधर अर्जुन अंदर दौड़ गया था.

"मैं सब संभल लूंगा दादा जी. आप भरोसा रखिये वह खुद पीछे हट जायेगा. ठीक किआ आपने मुन्ना को यहाँ से 4 दिन के लिए भेजकर.", संजीव वापिस गाडी में बैठ कर निकल लिए, अपनी अनजान मंजिल की तरफ.

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"ये तेरी बड़ी बहिन है, रूपाली और रूपाली बीटा ये है हमारा अर्जुन और तेरा छोटा भाई. अगले सोमवार से दोनों साथ हे स्कूल जाओगे और हाँ अर्जुन बीटा, इसका ध्यान ाचे से रखना.", कौशल्या जी ने अर्जुन को अपने पास बिठाते हुए कहा. वही बीएड पर दादी के दूसरी तरफ खामोश सी वह लड़की अर्जुन को देख रही थी. गहरी आँखें, गूँथी हुई लम्बी छोटी और शरीर पर एक हलके नीले रंग का सलवार कमीज. शकल से हे एकदम मासूम और गंभीर लड़की थी वह. बस थोड़ी दुबली लग रही थी.

"हाँ तोह रूपाली दीदी, सबसे पहले तोह हम चलते है आपको मार्किट लेकर. यहाँ दादी की बगल में बैठने तोह शहर देखने से रही आप. स्कूल ड्रेस, कपडे और किताबे भी लेनी है." अर्जुन ने बड़ी आत्मीयता से ये बात कही तोह एक पल को रूपाली ने नजरे ऊपर करते उसको देखा फिर कौशल्या जी की तरफ.

"बिलकुल ठीक बात है. चल वह मंदिर के पास से जरा मेरा पर्स दे. और तुम दोनों पहले अपने ग्याहरवी के विषय भी समझ लो एक दूसरे से.", अर्जुन ने पर्स ला कर दादी की तरफ बढ़ा दिए. और बैठने लगा लेकिन उन्होंने फिर उसको उठा दिए.

"ओह बैलबुद्धि, ये छोटे वाला नहीं. वह वाला दे कपडे का.", उन्होंने उस छोटे पर्स से भी पैसे निकलते हुए कहा तोह अर्जुन दादी को एक बार हँसते हुए देख फिर से बैग जैसा पर्स उठा के ले आया.

"देखो दीदी, हमारे स्कूल में 3 हे विभाग है. कॉमर्स, मेडिकल और Non-medical... " अर्जुन की बात अधूरी हे रह गई थी और हैरान भी हुआ जब रूपाली ने कहा.

"मुझे मेडिकल में दाखिला लेना है.", कितनी प्यार आवाज थी रूपाली की. अर्जुन तोह जैसे खो सा गया था. और ऊपर से मेडिकल सुनकर वह हैरान भी हो गया था.

"आपका दसवीं का परिणाम आ गया क्या?"

"हाँ 2 साल पहले हे आ गया था.", अब थोड़ा सा रूपाली बोलने लगी थी. शायद पढाई करना उसको पसंद था और गाँव में उसको आगे पढ़ने को नहीं मिला था

"तोह कितने परसेंटेज थे आपके उसमे?", अर्जुन समझना चाहता था के मेडिकल हे क्यों और फिर कही नंबर हे न हुए इतने तोह फिर कैसे संभल पाएगी ये दीदी.

"85% थे. लेकिन विज्ञान में 98 नंबर थे और वह बड़ा स्कूल नहीं था मेडिकल के लिए.", अर्जुन तोह नंबर सुनकर कभी उनको तोह कभी दादी को देखने लगा था.

"मेरी बची तेरे जैसी बैलबुद्धि नहीं है. इसको पता है के कोनसे सब्जेक्ट लेने है कोनसे नहीं. एक तू हैं जिसको खुद नहीं पता के क्या पढ़ना है." दादी की बात सुनकर अर्जुन हँसते हुए बोलै.

"ये बैलबुद्धि दीदी से ज्यादा नंबर लेकर आएगा. और मैं ले रहा हु Non-Medical लेकिन अभी कोई ये नहीं पूछेगा के बाद में मई क्या बनूँगा. हाँ", अर्जुन अपनी दादी के हाथ से 100 के नोटों की गद्दी लेते हुए अपनी जेब में रखता बोलै.

"खाना खा लेते है फिर चलेंगे.", अर्जुन ने ये बात कही तोह दादी ने मन कर दिए.

"दोपहर में नहीं. 5 बजे जाना तुम दोनों और हाँ ाचे कपडे दिला के लाना बाकी मैं तारा या ऋतू को इसके साथ भेज दूंगी. संजीव ले जायेगा.", अर्जुन सोचता सा बहार निकल गया. इधर रूपाली को भी अर्जुन का साधारण सा व्यक्तित्व ाचा लगा था. भोला लेकिन तमीज से बात करने वाला उसका ये नया छोटा भाई.

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"आप तोह मुझे भूल हे गई न?", अर्जुन ऋतू दीदी को पीछे से बाहों में लेते हुए बोलै. वह उनके कमरे में आ गया था जहाँ ऋतू दीदी दिवार पर लगी एक तस्वीर को साफ़ कर रही थी. ये शायद आज हे लगाईं थी उन्होंने.

"तू तोह मरने के बाद भी मेरे अंदर रहेगा रे.", खुश होती वह मुड़ती हुई सामने से उसको गले लगा के कड़ी हो गई थी. उनकी ये जानलेवा मुस्कराहट और महकता जिस्म, अर्जुन तोह तस्वीर देखना भूल कर आँखें बंद किये खड़ा हो गया था.

"मतलब लोग आजकल जगह भी नहीं देखते.", ये आवाज कान में पड़ी तोह अर्जुन ने वैसे हे ऋतू दीदी को गले लगाए दरवाजे से अंदर आती अलका दीदी को देखा जिनके साथ हे प्रीती भी थी. ऋतू भी वैसे हे गले लगी मुस्कुरा रही थी.

"अब दीदी को गले लगाने के लिए मैं जगह, समय और मुहूर्त तोह नहीं देखूंगा.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अलका दीदी की तरफ कदम बढ़ाये हे थे की बहार से ताऊ जी की आवाज सुनाई दी. "अलका, ऋतू को लेकर आ जाओ बीटा. खाना खिलाओ माँ और पापा को." उनकी बात सुनकर दोनों हे बहार निकल गई लेकिन उनके पीछे जाती प्रीती का हाथ अर्जुन ने पकड़ते हुए वही रोक लिए.

"कहा भाग रही हो? मैं तोह यही हु.", अर्जुन की बात सुनकर और ऐसे खुले दरवाजे हाथ पकड़ने से थोड़ी घबराहट सी हो गई थी प्रीती को.

"वह तोह पता है के तुम यहाँ हो. लेकिन हम कहा है ये देखा है क्या तुमने.", प्रीती अपना चेहरा उसकी और करती बोलने लगी हे थी की एक हाथ से दरवाजा ढालता वह दूसरे से उसको अपने सीने से लगाए खड़ा हो गया.

"एक तोह पास नहीं आती ऊपर से फिर ये सब हिदायते देने लगती हो. लो अब दरवाजा भी बंद हो गया.", अर्जुन की बात और ऐसे गले लगने से प्रीती भी मुस्कुराने लगी थी.

"जब पास आती हु तोह देखा है के कैसे पत्थर बन जाते हो. और इतना हे दिल करता है मुझसे मिलने को तोह घर क्यों नहीं आये 2 दिन?", प्रीती की शिकायत अर्जुन को जायज लगी थी. वो सच में इन 2 दिनों में उसके पास नहीं गया था.

"वो घर पे भी सबकुछ देखना जरुरी था न. और तुम तोह हमेशा हे साथ होती हो.", अर्जुन समझने के लहजे से बोल रहा था. अपनी गलती उसको पता चल गई थी.

"ाचा वह सब हम दोनों देख लेंगे. पहले ये फोटो देखो जरा जो ऋतू दीदी ने लगाईं है.", अर्जुन की बाहों से निकलते हुए अर्जुन ने वापिस ध्यान दिलाया उसको दिवार पर लगी इस नै तस्वीर का.

अर्जुन के तीसरे जन्मदिन की फोटो थी वह जिसमे उसका मुंडन हो रखा था और रेणुका बुआ केक कटवा रही थी और उसकी सभी बहने भी दूसरी तरफ थी. प्रीती की नीली आँखें और हद्द से ज्यादा gol-matol गुलाबी चेहरा साफ़ दिख रहा था.

"वाह. ये कहा से मिल गई थी और किसने बड़ा करवाया इसको?", अर्जुन उस तस्वीर को हाथ लगता हुआ निहार रहा था.

"हमारे कैमरा की रील में थी और बुआ ने 5 दिन पहले हे दादू को बोलकर लैब से धुलवाने और बड़ा करवाने के लिए कहा था. आज घर पर दे गया था Color-lab वाला. ऐसी 2 और भी है. एक मेरे कमरे में और एक अलका दीदी वाले में.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रख वह साथ कड़ी खुद भी देख रही थी की कैसे अर्जुन ने उस समय भी एक हाथ से उसको पकड़ा हुआ था और उलटे हाथ से केक काट रहा था जिक्सो रेणुका ने पकड़ा हुआ था.

"तुम न बिलकुल अंग्रेज हे थी, जैसे वह जॉनसन पाउडर वाले होते हैं.", अर्जुन ने तस्वीर में हे छोटी प्रीती के गाल को हाथ लगते कहा तोह अपने पंजो पर कड़ी हो प्रीती अर्जुन का गाल चूमत कर बहार दौड़ गई.

"तुम तब भी टिंडे हे थे.", दरवाजे से इतना बोल कर वह हंसती सी गायब हो गई और अर्जुन वही मुस्कुराता सा बस फिर से फोटो को देखने लगा.

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मेनका अपने मायके आई हुई थी 2 दिन अपनी माँ और बड़े भाई के पास रहने. भाभी पेट से थी शायद सातवा महीना चल रहा था उनका लेकिन फिर भी वह अपनी सास के साथ घर का लगभग काम कर लेती थी. मेनका की भाभी सरिता एक bholi-bhali औरत थी और गाँव से हे थी तोह मेहनती भी थी. उनके पहले एक लड़की थी जो 4 साल की हो चुकी थी और मेनका के बड़े भाई दूसरा बचा चाहते थे, बीटा. दिन में उनका भाई खेत पर हे रहता था क्योंकि फसल कड़ी थी और दोपहर का खाना ज्यादातर मेनका की माँ लेकर जाती थी अपने बेटे के लिए. आज उनके पाँव में थोड़ा दर्द था और बहु को गर्भावस्था में घर से बहार जाना मन था, इसलिए मेनका हे खाने का डब्बा और लस्सी बोतल लेकर खेत की तरफ चल दी. रोज के समय से आज खाना कोई एक घंटा पहले हे तैयार था तोह जा भी जल्दी हे रहा था.

'धुप तोह है लेकिन इसमें चुभन बिलकुल नहीं है. वैसे भी तोह आधा कोस तोह खेत है.', मेनका ने पीला सूट पहना था और गाँव आने के बाद जूती पहन ली थी. सलवार हलकी ढीली और कमीज ाचे से कैसा हुआ था जिसमे ऊपर का शरीर ाचे से नुमाया हो रहा था. चुन्नी से सर और होंठ ढकती वह कच्ची पगडण्डी पर सब तरफ देखती आगे बढ़ रही थी. दोनों तरफ फसल लेलहा रही थी और कही कही घने पेड़ लगे थे. खेतो में किसानो ने छोटे कमरे भी बनाये हुए थे, सामान रखने और रात सोने के लिए. पहले भी मेनका यही से गुजरती थी जब भाई को खाना देने जाती थी.

9 साल हो चुके थे उसकी शादी को और अभी तक वह माँ नहीं बन्न पाई थी. इधर 6 साल में उसके भाई ने सरिता भाभी को दूसरी बार पेट से कर दिए था. मेनका को इस बात से कोई शिकवा या जलन नहीं थी बस अपने माँ न बन पाने से वह आहात थी. कितना देखते थे लड़के उसको जब वह कॉलेज में थी. आज भी शहर में कई लोग उसका शरीर घूरते रहते थे जब भी वह कभी बहार निकलती थी. लेकिन एक उसका पति था जो साल में एक बार कुछ दिनों के लिए हे आता था और अगर रात को कभी कुछ करने भी लगता था तोह 2-3 मिनट में फारिग हो कर करवट बदल लेता था. शादी के पहले साल हे बस कुछ तनाव आता था उसके लिंग में और थोड़ी उमंग भी रहती थी मेनका के साथ लेकिन कुछ न हो पाया था. ऐसे हे सोचो में खोई वह अपने खेत तक आई तोह वह शांति थी. साफ़ पानी से भरी हौद के पास लगे घने पेड़ो के बीच मोटर का कमरा था जिधर वह चल दी यही सोच कर की भैया आराम कर रहे होंगे. लेकिन 10 कदम दूर से हे उसको पाजेब और चूड़ियों की लगातार खनकने की आवाज कमरे से आती लगी. कदम और चाल शांत हो गई थी मेनका की ये सुनकर. वह भली भांति जानती थी की ऐसी आवाज का क्या मतलब होता है. कमरे के बहार लगे लकड़ी के फत्ते पर जैसे हे उसने नजर गड़ाई तोह साँसे थम्म गई.

"भूरी, तू बड़ी दुमदार है ऋ.. आह. आज भो तेरा छूट भोसड़ा नहीं बानी है 2 बच्चों के होने के बावजूद.", अंदर जमीन पर गद्दा के ऊपर उसका भाई एक 24-25 साल की औरत का घाघरा पेट पर चढ़ाये उसकी छूट में लुंड जोरदार धक्को से अंदर बहार कर रहा था. उस औरत के गोल चुचुए दोनों हाथों में पकड़े वह मशीन सा कमर हिलने में लगा था. वह औरत भी अपने हाथ उसके भैया के कंधो पर रखे मजे से सिसक रही थी. 7 इंच के लगभग वह कला कठोर लुंड बड़े आराम से छूट में जड़ तक उतरता और निकलता देख बहार कड़ी मेनका के चुके हिलने लगे थे. साँसे भारी हो गई थी इस दृश्य को देख कर. कहा तोह उसके भैया इतने शरीफ थे सबकी नजरो में और कहा इस कमरे के अंदर वह अपने से 12-13 साल छोटी किसी पराये आदमी की बीवी को राउंड रहे थे.

"मेरी छूट को भी ऐसे हे दुमदार लुंड से चैन आता है जमींदार जी. मेरा खसम तोह 4-5 मिनट से ज्यादा नहीं चलता लेकिन आप तोह 15 मिनट तक ऐसी चुदाई करते हो की ये पूरा दिन दुखती है, मजे में. आह.. आह. और वह आपका दोस्त भी जब होता है तोह मजा दुगना हो जाता है.. कास के मारो न आह.. तीसरा बचा भी हो जाये तोह मैं तैयार हु.", जहाँ उसके बड़े भैया उस औरत की बातों से मजे में उत्तेजित हो रहे थे वही मेनका तोह स्तब्ध हे थी ये सुनकर की भैया कैसे इंसान है जो अपने दोस्तों के साथ मिलकर लड़की भोगते है. और ये औरत उन्ही से गर्भवती भी होना चाहती है.

"अरे भूरी, गांड मारना ाचा नहीं लगता मुझे. वह तोह बुनती हे पागल है तेरे पिछवाड़े के लिए और तभी हमारी तीनो को जमती है. लेकिन तीसरा बचा नहीं ऋ, अभी तोह एक साल बिलकुल नहीं. सरिता की छूट तोह मिलने से रही अभी एक साल. बचे के बात वापिस कसने में इतना समय तोह लगेगा हे. तब तक तू हे मेरा सहारा है.. ाः.. ", एक दूध पर झुक कर पीने लगा था मेनका का भाई और वह बहार कड़ी बस हैरत और उत्तेजना में कड़ी थी.

"क्यों झूठ बोलते हो जमींदार जी. बुनती की भाभी की चुदाई करते मैंने देखा है आपको, और फिर मेरी छोटी बहिन की सील तोड़ने के बाद हर महीने बुलवाते हो उसको वह क्या है? बेचारी की शादी नहीं हुई अभी तक और आपने उसका अभी कबाड़ा कर दिए है. और कितनी तोह ऐसी हैं जो चारा काटने आती है लेकिन आपका लुंड पिलवा के जाती है.", भूरी ने इतने नाम गिनवा दिए थे की मेनका के जबड़े चिपक गए थे. उसके भैया तोह बहोत बड़े वाले रंडीबाज निकले. यही सोच रही थी वह.

"आह.. भूरी तेरी बहिन बिलकुल तेरे जैसी है ऋ. याद है पहली बार में कितना खून बहाया था तूने? लेकिन मेरी पक्की वाली तोह तू हे है हमेशा से. आह.. होने वाला है मेरा.", गुर्राते हुए जब मेनका के भैया ने जड़ तक लुंड भूरी की छूट पर चिपकाया तोह चेहरा लाल हो गया था उनका और भूरी भी चिपक चुकी थी. कुछ देर बाद सिकुड़ा हुआ लुंड धोती के अंदर करते उसके भैया दिवार से तक लगा के बैठ गए तोह भूरी ने भी अपनी चोली सही की और घाघरे से हे छूट को साफ़ करती उनकी और देखने लगी.

"ले ये रख और माँ आती होगी खाना लेके तोह तू भी निकल अब यहाँ से.", 100-100 के 7-8 नोट उन्होंने भूरी की तरफ बढ़ाये तोह उन्हें अपनी चोली में रखती वह कड़ी हुई इधर मेनका चपलता से वापिस पगडण्डी की और दौड़ गई. दरवाजा खुलने तक तोह वह कोई 50-60 कदम दूर हो चुकी थी. फिर वैसे हे शांति से एक बार फिर वह मोटर की और बढ़ी तोह भैया को बहार आते देखा. भूरी दूसरी और से निकल गयी थी अगले खेतो में.

"आज तू खाना लेके आई है मेनका? मैं हे घर आ जाता.", उसके भैया ने सोचा वह bal-bal बचे है आज तोह उन्हें क्या मालुम था के मेनका सब देखने के बाद हे ये नाटक कर रही थी.

"हाँ. वह माँ के पाँव में दर्द था तोह मैं हे खाना ले आई. आप खा लीजिये डब्बा शाम को लेते आना, मैं वापिस जा रही हु.", पानी की हौद की दिवार पर खाना और लस्सी की बोतल रखती वह बस एक पल रुक कर चेहरा पोंछती कड़ी हो कर बोली और फिर भैया का जवाब सुने बिना पलट गई.

"ाची बात है. मैं ले आऊंगा शाम को. वैसे अभी कितने दिन है तू यहाँ?", भैया पानी से हाथ और मुँह धोने के बाद बोले.

"आज शाम को हे वापिस जाना है तोह 4 बजे वाली बस से निकल जाउंगी. अगली बार आउंगी तब रुक कर जाउंगी.", मेनका को अब वह रुकना कटाई मंजूर न था. जिस भाई ने उसके लिए इतना कुछ किआ था उसको bhala-bura तोह वह कह नहीं सकती थी इसलिए बेहतर समझा की दूर हे रहे. तेज कदमो से वह वापिस घर की और निकल चली थी. आज उसने जाना था के पुरुष कैसे होते है. किसी dangar-janwar की तरह बस उन्हें भी हर औरत एक गाये -बछड़ी हे दिखती है जिस पर चढ़ने को वह हमेशा तैयार रहते है. कहाँ उसकी भाभी एकदम भोली और पतिव्रता महिला है और कहा उसके बड़े भैया जाने कितनी हे aurato-ladkiyon से सम्बन्ध बनाये हुए. उसको बस अब जल्दी से अपने नए घर हे जाना था. 4 दिन बाद हे.

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पंडित जी के घर में बिलकुल शांति थी इस समय. Khana-peena होने के बाद अभी दोपहर के समय हर कोई आराम कर रहा था अपने अपने कमरे में. सुबह जल्दी गाँव से निकले थे और सफर की भी थकान थी तोह रामेश्वर जी बैठक में दीवान पर सुस्ता रहे थे. कौशल्या जी के साथ रूपाली और आरती लेती थी. ऋतू और अलका तोह रेणुका बुआ से बतियाने प्रीती के घर गयी हुई थी, जाने क्या क्या बातें करने लगी थी अब वह उनसे भी. रेखा जी अपने बंद कमरे में कपडे पैक करती हुई बस हल्का हल्का मुस्कुराये जा रही थी. सबसे खुश थी आज वह इस घर में, अपने बेटे का प्यार मिलने से जैसे उनकी ज़िन्दगी को एक नया सवेरा मिल गया था.

प्रियंका दीदी लगी हुई थी कोमल दीदी के साथ कर्रम बोर्ड खेलने, जो दोनों का सबसे पसंदीदा खेल था. बेशक कोमल दीदी को ज्यादा बातें करना पसंद न था लेकिन ये खेल उन्हें बचपन से पसंद था और थी भी वह इसमें माहिर. पिछले आधे घंटे में दूसरी बार प्रियंका हार चुकी थी लेकिन बाकी सबसे वह बेहतर हे खेल रही थी उनके साथ.

"यार तुझे शर्म नहीं आती क्या जरा भी? बारी तोह आने दिए कर 2-3 बार. ऐसे खेलने लग जाती है जैसे पैसे लगे हुए हो.", नए खेल को शुरू करने से पहले प्रियंका गिट्टियां लगाती बोल रही थी और कोमल बस प्लास्टिक के स्ट्राइकर को बोर्ड पर घिसती पाउडर मलने में लगी हुई थी. प्रियंका की बात पर हलकी सी मुस्कर तैर आई थी उनके खूबसूरत चेहरे पर.

"चल ठीक है तोह पहले 3 बारी में मैं गिट्टी नहीं डालूंगी और सिर्फ 50 को हे मारूंगी.", कोमल की बात सुनते हुए प्रियंका भी हंसती सी उसके खूबसूरत चेहरे को देख रही थी.

"यार मैंने कभी न इतने गौर से नहीं देखा था तुझे. मतलब देखा तोह था लेकिन सच कहु तोह तू आरती और ऋतू से भी सुन्दर है. ऐसा नहीं के आरती, ऋतू, अलका सुन्दर नहीं है लेकिन अगर मैं पूरी ख़ूबसूरती की बात करू तोह तू उनसे 21 हे है और वह 18-19 हे होंगी.", कोमल के चेहरे से नीचे उसकी gol-lambi गर्दन, गोरा फक्क सीना और कमीज में क़ैद एक दम गोल उभार वहीँ बाहें भी एकदम गोरी और baal-vihin. भरे गुलाबी होंठो के पास एक टिल और कोई आधा इंच लम्बी पलके. कोमल एक बेहतरीन दिल के साथ एक haseen-tareen लड़की थी.

"चल चल अब ये सब बातें नहीं करनी. खेलना है तोह ठीक नहीं तोह मैं सोने लगी हु.", कोमल ने हलकी मुस्कान और शर्म के साथ इतना कहा तोह प्रियंका ने स्ट्राइकर लेते हुए बारी चली. हर तरफ kaali-peeli गिट्टियां बोर्ड पर फैल गई लेकिन कोई अंदर न गई थी. कोमल ने लाल गिट्टी को देखा जो लाइन से पीछे वाले बाए गोले के पास पड़ी थी. सीधा स्ट्राइकर तोह उसपर लगने वाला नहीं थी तोह सामने से कोण बनती वह थोड़ा आगे को झुकी और प्रियंका को कमीज के अंदर हलके से दर्शन हो गए थे उसके गोर और पूरी तरह से सख्त उभारो के. आपस में चिपके वह दोनों बता रहे थे की वह बेजोड़ है और उनमे कोई ढीलापन नहीं था.

"वैसे जिसके साथ तेरी शादी होगी वह नसीबवाला हे होगा कोमल.", प्रियंका ने इतना हे कहा था के कोमल ने 50 की गिट्टी को अंदर दाल दिए था और फिर से स्ट्राइकर उठाने के बाद काली गिट्टी से कवर लेती वह चुपचाप खेल पर हे लगी थी. अगले 3-4 मिनट में 24 में से 23 गिट्टियां वह से गया कर चुकी थी कोमल और इस आखिरी वाली को भी अपने पाले में सुरक्षित करने के बाद हे वह बोली.

"शादी किस से होगी, कब होगी और होगी भी या नहीं ये सब मैं नहीं सोचती प्रियंका. लेकिन सच कहु तोह मैं इस घर में खुश हु और मैं यहाँ से जाना नहीं चाहती किसी दूसरे घर में. फ़िलहाल तोह 2-3 साल नहीं.", कोमल की बात पर प्रियंका ने सभी गिट्टियां और स्ट्राइकर प्लास्टिक के डब्बे में रखते हुए बोर्ड के साथ अलमारी के पीछे रख दिया. और फिर दोनों हे ऐसी हलकी फुलकी बातें करती लेट गई थी. लेकिन एक कमरा छोड़कर अगले कमरे में 2 लोग जाग रहे थे.

राजकुमार जी ने अपनी धर्मपत्नी की साड़ी ऊपर चढ़ा राखी थी और खुद पजामा नीचे करते उनकी जांघो के बीच लुंड टिकाये बैठे हुए थे. ललिता जी के चेहरे पर हलकी मुस्कान थी क्योंकि आज उनके पति बिना कहे हे प्रेम दिखा रहे थे. दोनों हे एक तरह से पूरे कपडे शरीर पर लिए थे, दिन का वक़्त था इसलिए. जल्द हे मुस्कान गायब हो गई उनकी जब 2 मिनट बाद हे राजकुमार जी के लुंड ने उलटी कर दी उनके छूट के अंदर. एक खिसियानी सी हंसी देते वह एक तरफ लुढ़क गए और मैं में बड़बड़ाती हुई ललिता जी उनके पानी जैसे वीर्य को कच्ची से साफ़ करने के बाद एक तरफ पलट कर लेट गई. अर्जुन की याद आ गई थी उन्हें, कैसे वह उन्हें जम्म के पेलता है और तक़रीबन 30-40 मिनट तक नहीं छोड़ता. फिर शांत होती वह भी आँखें बंद करके सो गई थी.

"आह भाई.. आह्ह्ह्हह ऐसे हे कर उम्.. ", ऊपर बाथरूम में दिवार से लगी माधुरी अपने पीछे जड़ तक लुंड पेलते अर्जुन के हर धक्के पर मचल रही थी. दोनों फुटबॉल से मॉटे चुके दबोचे वह भी अपना विकराल लुंड अंदर बहार कर रहा था. गदराई और फूली गांड हर धक्के पर 'thap-thap' की आवाज पैदा करती और अर्जुन के धक्के ज्यादा जोर से पड़ने लगते थे.

"दीदी, आप किसी दिन फसवा डौगी हम दोनों को. आह.. ऐसे हे दिन में.. ", निप्पल मरोड़ता वह उनकी छूट का आकर बढ़ने में लगा था. पिछले 20 मिनट से वह ये चुदाई कर रहा था और माधुरी दीदी की गरम छूट एक बार पहले हे खाली हो चुकी थी.

"आह.. उम्म्म.. जबसे ये आठ.. मेरी छूट के अंदर गया.. उम्म्म.. उस दिन से बस इसके लिए हे तड़पती है रे.. आह.. रात को.. पिछले छेड़ भी ले लिओ.", उनकी सिसकारियां और बात सुनकर अर्जुन कूल्हे पर एक हलकी चपत लगते हुए निचे झुकाने लगा. गांड की दरार को फैलता वह अब अंधाधुन्द उन्हें पेले जा रहा था..

"आहाआआ." माधुरी दीदी ने लुंड को कस के पकड़ा था और इधर अर्जुन का मोटा सूपड़ा भी अपनी हद्द से ज्यादा फूल कर ठुमकने लगा था. माधुरी दीदी खुद को नीचे गिरती लुंड को निकल बैठ सी गई और उनकी पीठ पर गरम गधा वीर्य किसी बारिश सा टपकने लगा था. कुछ देर तक अर्जुन बस दिवार को पकडे खड़ा रहा और जब माधुरी दीदी कड़ी हो कर सामने आई तोह उनके भूरे निप्पल सूज कर बड़े हो चुके थे. अर्जुन को होंठो को चूमकर वह खुद को साफ़ करने लगी तोह अर्जुन ने भी लुंड धोने के बाद कपडे पहने और अपने कमरे में आ कर लेट गया था.

'ओह्ह.. कितनी चौड़ी कर दी है इस घोड़े ने.. आह.. इसको अब किसी और लुंड से चैन नहीं आने वाला.' शीशे में अपनी छूट का फैला हुआ छेड़ देखती माधुरी खुश हो रही थी. अंदर तक उसकी लाली दिख रही थी और 8 आने के सिक्के जैसा मुँह खुल्ला हुआ था उसका.

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साढ़े 3 बजे हे अर्जुन बिस्टेर से उठ खड़ा हुआ और jeans-tshirt पहन कर वह मोटरसाइकिल ले बहार निकल लिए. बिना किसी को कुछ बताये.
 
अपडेट 55

कौन क्या है (2)


"ये?", अर्जुन ने एक फोटो की तरफ इशारा करते हुए आकांक्षा से पुछा. घर पे कुछ करने को खास नहीं था और अर्जुन ने आकांक्षा को उसके घर आने का वादा भी किआ था इसलिए वह उसके यहाँ आ गया था. आकांक्षा की माँ सुषमा तोह 6 बजे के बाद हे आती थी और बाप विनय और भी देरी से. दोनों हे घर के ड्राइंग रूम में बैठे थे और अर्जुन उसके शानदार घर को भी देख रहा था. वही टेलीविज़न के पास एक लकड़ी की छोटी अलमारी पर राखी फोटो की और देखते उसने पुछा था.

"ये मेरे पापा और मम्मी है. तुम बैठो मैं कुछ लेके आती हु हम दोनों के लिए.", अर्जुन को वही छोड़ वह तितली सी उड़ती रसोईघर में चली गई. विनय तनेजा ने ाचा खासा पैसा खर्च किआ हुआ था घर पे. लाठर के बड़े सोफे, 29 इंच का रंगीन टेलीविज़न, कांच के डिज़ाइन वाली टेबल और दुनिया भर की चीजें सजावट के साथ राखी गई थी. नीचे फर्श पर भी एक आलिशान कालीन बिछा था. लेकिन इन सबसे अधिक ध्यान अर्जुन का उस फोटो पर था जहा चस्मा लगाए मुस्कुराता हुआ तनेजा अपनी हसीं बीवी सुषमा के साथ फ्रेम में लगा हुआ था. अर्जुन कुछ देर तक उसको देखता गहरी सोच में था और इधर आकांक्षा कांच के दो बड़े गिलास रसना के बनती ट्रे में ले आई थी.

"सॉरी. वह मुझे और तोह कुछ बनाना नहीं आता लेकिन रसना में पानी और बर्फ मिला लेती हु.", प्यारी मुस्कान के साथ उसने टेबल पर ट्रे रखते कहा तोह अर्जुन भी वैसे हे उसकी तरफ मुस्कुराता देखने लगा. काले रंग के इस लाल फूलो वाले टॉप और सफ़ेद half-pant में वह कमल की लग रही थी. झुकने पर उसके छोटे कैसे उभर कुछ हद्द तक दिख गए थे, जो अंदर भी एक काली ब्रा में क़ैद थे और कूल्हों पर कासी पंत आकांक्षा का ुंहर ाचे से दिखा रही थी.

"वैसे भी मैं इधर आने से पहले खाना खा कर हे आया था. और इसके लिए थैंक यू, मानगो मेरा भी फवौरीते है.", अर्जुन अभी भी खड़ा था तोह आकांक्षा प्यार से उसका हाथ थामती सोफे पर ले आई और जुड़ कर बैठते हुए खुद हे एक गिलास उठा कर उसकी और बढ़ाया.

"मेरे तोह दोनों हे फवौरीते है.", अर्जुन को अपनी बिल्लोरी आँखों से देखते उसने कहा तोह अर्जुन भी उसके आकर्षक चेहरे में हे खो गया. ये लड़की भी अलग हे थी बिलकुल. हर पल खिली सी रहती थी और आधुनिक होने के साथ हे बड़ी सलीके से रहने वाले. दोस्त तोह थे हे नहीं शायद कुछ इसकी इतनी ख़ूबसूरती की वजह से और कुछ इसलिए की ये खुद उन्हें दूर रखती थी. गर्दन से कुछ नीचे तक करने से कटे हुए सीधे रेशमी भूरे बाल और वैसी हे चमकती आँखें, गोल प्यारा चेहरा जिसपर उसके गुलाब से तराशे हुए होंठ बेहद दिलकश थे, जितना शरीर उजागर था वह gora-sunehari और baal-vihin. हलकी गुलाबी nail-polish लगे साफ़ लम्बे नाख़ून.

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(आकांक्षा तनेजा)

"ऐसे कब तक देखोगे? ये गरम हो जायेगा.", आकांक्षा को आज अर्जुन का उसको ऐसा देखना बड़ा भा रहा था लेकिन वह चाहती थी की दोनों बातें भी करे, जबतक वह उसके पास है. पहली बार तोह वह खुद से आया था.

"सॉरी. तुम्हारी आँखें सच में सुन्दर है आकांक्षा.", थोड़ा झेंपते हुए अर्जुन ने गिलास को मुँह लगाया तोह स्वाद ाचा था. एक और घूँट भरते हुए उसने गिलास वापिस ट्रे में रख दिए.

"सॉरी क्यों बोलते हो. मैं तोह चाहती हे यही हु लेकिन बस तुम्ही हमेशा मेरे से दूर रहते हो. देखो इतने महीने मैंने स्कूल में इन्तजार किआ. आखिरी दिन अगर मैं हिम्मत नहीं करती तोह तुम्हे तोह पता भी नहीं था के ये लड़की तुम्हे कितना प्यार करती है. और छुट्टियां भी ऐसे हे निकल दी, बिना मुझसे मिले या बातें करे.", बड़े प्यार से वह अर्जुन की ब्याह थामे उसके साथ लगी बैठी थी. अर्जुन को भी इसका साथ ाचा लग रहा था. उसने महसूस किआ था के कितना अकेली है ये लड़की और लोग कुछ भी कहते रहते है.

"संदीप को कैसे जानती हो तुम? स्कूल की वजह से?", अर्जुन ने अब आकांक्षा के कंधे से हाथ करते हुए खुद हे अपने से लगते पूछा. कुछ सोचने के बाद हे उसने ये कहा था.

"नहीं तोह. और तुम ऐसा वैसा कुछ मत सोचना प्लीज. अगर वह तुम्हारा दोस्त न होता तोह मैंने कभी बात नहीं करनी थी उस से. वह तोह मेरे mummy-papa का उनके घर थोड़ा aana-jana है तोह कभी कभी संदीप भी हमारे घर आता है. तुम्हे बुरा लगा हो तोह मैं कभी उसका नाम भी नहीं लुंगी.", अर्जुन के सवाल से आकांक्षा जैसे डर गई थी. सच में हे तोह उसको संदीप से कोई मतलब नहीं था. बस अर्जुन की वजह और दोनों परिवार में बोलचाल से उसने उसकी मदद ली थी.

"पागल हो तुम बिलकुल. मुझे भी पता है के तुम बड़ी प्यारी और ाची लड़की हो. इन आँखों में मैंने सिर्फ खुदको हे देखा है.", अर्जुन ने उसके गाल को दूसरे हाथ से सहलाते हुए कहा. आकांक्षा भी अब सोफे पे पसरी सी उसके सीने पर सर रखे बैठी थी. अर्जुन का यु हाथ लगाना दिल में तरंग सी उठा रहा था.

"जब पता है तोह फिर क्या मुझे तंग करने के लिए पुछा था?", आकांक्षा ने भोलेपन से ये कहा और अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"नहीं तुम्हे ऐसे तोह मैं तंग नहीं करूँगा. बस वैसे हे jaan-na चाहता था. मेरे परिवार वाले भी जानते है और संदीप मेरा ाचा दोस्त भी है. मैंने सोचा तुम ज्योति दीदी की दोस्त होगी.", गिलास को उठा कर आकांक्षा को देने के बाद अपने गिलास से भी एक घूँट लेने के बाद उसने ये कहा. आकांक्षा ने अपना गिलास वापिस नीचे रखते हुए अर्जुन वाले से हे अपने होंठ लगाए तोह पतले कांच पर उसके गुलाबी होंठो की पकड़ देख कर अर्जुन के चेहरे पर अलग सी मुस्कान आ गई और इधर आकांक्षा भी पलके झुकाती sharmati-muskurati धीमे धीमे पी रही थी. फिर गिलास अर्जुन के हाँथ में वापिस देते हुए बोली.

"वह मुझे कभी ठीक नहीं लगी. पहले तोह thik-thak बातें करती थी लेकिन फिर जब भी मिलती तोह idhar-udhar टच करने लगती. और एक दिन तोह गन्दी बात करने लगी तोह मैंने उन्हें ाचे से सुना दिए की आइंदा मुझे टच करने और ऐसी बातें मेरे साथ करने की जरुरत नहीं. मम्मी भी नहीं बुलाती उन्हें.", आकांक्षा से अर्जुन को ऐसी हे उम्मीद थी और उसको अब लगा के ज्यादा हे बहार वालो की बातें कर ली है उसने आकांक्षा से. तोह अपने हाथ से वह गिलास उसके होंठो से लगा के उसकी आँखों में देखने लगा तोह इस बार एक छोटी सी घूँट लेने के बाद आकांक्षा ने गिलास अर्जुन की तरफ किआ तोह अर्जुन ने ठीक वही अपने होंठ रखे जहा से आकांक्षा ने गिलास को छुआ था.

"ज्यादा मजे नहीं ले रहे तुम?", गिलास को हाथ से लेकर ट्रे पर रखती वह थोड़ा आगे सरक कर अर्जुन को देखने लगी और अर्जुन ने वैसे हे देखते हुए उसको होंठो पर एक छोटा सा चुम्बन जड़ दिए. फिर खुद वापिस संभल कर बैठ गया उसको थोड़ा हैरान और शर्म देते हुए.

"देखो इतने में हे शांत हो गई तुम.", अर्जुन ने मजे लेते हुए आकांक्षा को चड्डा तोह इस बार वह भी मस्ती से उसकी गॉड में हे आ बैठी.

"मैं बताऊ तुम्हे की मई कितनी शांत हु या शरारती?", टीशर्ट को हल्का सा अपनी तरफ खींचते हुए आकांक्षा ने अपने वह सुर्ख होंठ खुद हे अर्जुन के लबो से जोड़ दिए. इस बार अर्जुन ने उसके बदन की महक ली थी और उसके ठोस कूल्हों को भी महसूस किआ था. अपने सीने पर आकांक्षा के ठोस उभर महसूस करते हे अर्जुन ने एक बार उसको बाँहों में लिए और फिर 30 सेकंड के इस चुम्बन के बाद हे दोनों अलग हुए.

"मैं चलता हु अभी कुछ काम से जाना है. और अब शायद स्कूल में हे मिलेंगे क्योंकि कल मुझे अपनी माँ के साथ ननिहाल जाना है.", एक बार फिर अर्जुन ने उसके गोर गालो को छु कर कहा. उसको आकांक्षा की आँखों में फिर से अकेलापन दिखने लगा था. "जल्दी आऊंगा और इस बार तुम्हे अपने साथ हे स्कूल लेकर चलूँगा.", गाल चूमते हुए वह उठा तोह आकांक्षा ने फिर एक बार गले से लगने के बाद मुस्कुराते हुए कहा.

"देखते हैं की इस बार सच में स्कूल में मिलते हो या नहीं. साथ तोह जाना मुश्किल है मुझे पता है. और अपना ध्यान रखना.", वो फिर उसको गेट तक छोड़ने आई और अर्जुन अपनी रानी को स्टार्ट करता सीधा घर हो लिए.

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"चल छोटे तू अगर हाथ मुँह धोना चाहता है तोह जल्दी फारिग हो जा. मैं भी नाहा के नीचे हे मिलता हु. मार्किट चलना है तुम्हारे साथ मुझे भी.", संजीव भैया अंदर वाले आँगन में हे मिल गए थे अर्जुन को. कहा तोह वह सोच रहा था के मार्किट से सामान कैसे लेकर आएगा रूपाली के साथ और कहा अब वह चिंतामुक्त हो चूका था. तभी रेखा जी भी रसोईघर से एक बड़ा दूध का गिलास और वही दवा वाले लड्डू लेकर चलती आई.

"और फिर तुझे वह समय लग जायेगा न. चल पहले ये ख़तम कर ले और मैं पैसे लेकर आई तेरी किताबों के और स्कूल ड्रेस के.", वह सर पर हाथ फेरती जाने लगी तोह 2 तरफ से एक हे आवाज आई. "पैसे हैं", सीढ़ियों पर जाते संजीव भैया ने और दूध का गिलास पकडे अर्जुन ने एक साथ यही बात कही तोह रेखा जी दोनों को बरी से देखती मुस्कुराती हुई अंदर चल गई.

"भैया दादी ने मुझे पैसे दिए हुए है.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा

"छोटे मुझे भी दादाजी ने तुम दोनों के लिए 10-10 हजार दिए है अभी तोह तू तेरे वाले अपने पास हे रख और जल्दी से अपना खाना पीना ख़तम कर.", वह भी हँसते हुए ऊपर चले गए. लेकिन इधर रेखा जी भी एक 100 के नोटों की गद्दी हाथ में लिए वह टेबल पर आई और अर्जुन से बोली.

"ऋतू के हाथ भेजे थे तेरे पापा ने और कहा था के अर्जुन को देने है. अब ये संभल और अगर वह से कुछ पसंद आये तोह फिर ले आना. अपने नाना जी से मिलने भी तोह जाना है.", जबरदस्ती हे उन्होंने वह पैसे अर्जुन को पकड़ा दिए थे. अर्जुन ने जल्दी से अपनी माँ का गाल चूम लिए और फिर मुस्कुराते हुए दूध का गिलास मुँह से लगा पीने लगा.

"माँ, ये नहीं बड़ा होने वाला कभी. आप न इसको शीशी से हे दूध लगा दिए करो ज्यादा ठीक रहेगा.", ऋतू दीदी अर्जुन के दूसरी तरफ आ कर बैठ गई और उसके बाल ख़राब करती बोली.

"जैसे मेरा बीटा कहे वैसे ठीक है.", रेखा जी ने पहली बार कुछ ऐसी बात कही थी लेकिन ऋतू को तोह कुछ समझ नहीं आया. फिर अर्जुन के सामने पड़े पैसे उठती हुई बोली.

"अब ये इतना बड़ा हो गया की 500 से सीधा हजारो में जेबखर्ची मिलने लगी? मुझे कॉलेज जाने के लिए 500 मिलते हैं.", ऋतू को भी पता था के वह पैसे किस लिए है. क्योंकि वही तोह लेके आई थी.

"दीदी, आपको देने के लिए हे तोह रखे थे यहाँ मैंने. मेरे पास पहले से हे है तोह मुझे जरुरत नहीं. अपने लिए हे ले लेना आप भी कुछ.", अर्जुन ने एक हाथ से लड्डू उठाते हुए कहा और दूसरे हाथ से ऋतू की उंगलिया नोटों के ऊपर बंद करते बोलै.

"पागल है क्या? ये तेरे हे लिए हैं और पापा ने दिए थे.", ऋतू मुस्कुराती हुई वापिस करने लगी और इधर माँ के बराबर हे chai-coffee की ट्रे लेकर कोमल दीदी आ बैठी

"ाचा फिर ऐसा करते है.", अर्जुन ने बीच से गद्दी के 2 भाग करते हुए एक हाथ कोमल दीदी और दूसरा ऋतू दीदी की और कर दिए. "और आप दोनों को अगर मेरे से जरा सा भी प्यार है तोह फिर ये पकड़ लेंगी. माँ आप कह दीजिये दीदी से.", अर्जुन की इस हरकत पर दोनों बहने हे एक दूसरी की तरफ हैरानी से देख रही थी लेकिन रेखा जी ने कोमल के सर पर हाथ फेरा और ऋतू को भी पैसे लेने के लिए हाँ कह दी.

"पर.. माँ ये तोह.." ऋतू दीदी ने इतना कहा तोह रेखा जी ने हे जवाब दिए.

"हाँ. लेकिन इसको अपनी दादी और दादाजी से इतने हे 2 बार मिल चुके है. और जहा तक मुझे पता है इसके पर्स में और भी होंगे. प्यार से दे रहा है तोह रख लो.", ऋतू दीदी का चेहरा शांत होते हे फिर से कुटिल मुस्कान से भर गया.

"इसको बोलो की 2000 और दे फिर तोह. हम 8 लोग है न तोह 1500 हरेक के. माधुरी, प्रियंका, कोमल, आरती, तारा, अलका, मैं और रूपाली.", ऋतू की बात पर कोमल दीदी भी मुस्कुराने लगी और इधर दादी के साथ हे रूपाली भी उधर हे आ गई थी.

"लाओ जरा मुझे दो ये.", संजीव भैया भी शांति से चलते आये और Komal-Ritu से aadhi-aadhi गद्दी लेकर उन्होंने एक तरफ से बड़ी लोहे की पिन अलग की फिर 100 के 10 नोट निकल कर अपनी जेब में रख लिए. दादी भी देख रही थी की उनका बड़ा पोता क्या कर रहा है लेकिन अर्जुन आराम से लड्डू खाने में लगा था.

"8 नहीं 10 लोग है और मैंने मेरे 1000 ले लिए. अब तुम 9 लोग अपने बराबर बराबर 1000 बाँट लेना.", और बाकी 9000 ऋतू के हाथ में पकड़ते बहार चल दिए उन दोनों को जल्दी आने का कहते हुए.

"हम 9 कैसे हुए और ये भैया 1000 ले गए. कितने चालक हैं." ऋतू नखरे से बोली तोह कौशल्या जी ने साथ बैठते हुए कहा.

"हर समय जिसके साथ रहती है उसको तू भूल गई? लेकिन तेरा बड़ा भाई याद रखता है.", उनकी बात पर सुनते हुए ऋतू वापिस से खुस हो उठी की सबको पता है के प्रीती भी उनमे से हे एक है. जल्दी से 10 नोट रूपली की तरफ बढ़ाते हुए ऋतू ने कहा.

"लो जी अपने भाई की तरफ से पहली रिश्वत में आपका हिस्सा.", रूपाली कौशल्या जी की तरफ देखने लगी तोह पीछे से आई ललिता जी ने उसको अपने साथ लगते हुए वह पैसे पकड़ कर रूपाली के हाथ में थमा दिए.

"ये सभी शैतान है और अब तुम भी इनमे से हे हो तोह जल्दी आदत दाल लो नहीं तोह ये हिस्सा देना तोह दूर उल्टा ले जरूर लेंगी.", उनकी बात पर कौशल्या जी के साथ हे रेखा जी भी मुस्कुरा दी.

"ाचा ये अकेली इनके साथ जायेगी तोह ठीक नहीं रहेगा. 2 मिनट रुक रूपाली मैं भी आई और फिर साथ हे चलते है.", ऋतू सरे पैसे वही रख अपने कमरे में दौड़ गई और अर्जुन हैरानी से देखने लगा के ये क्या हो रहा है. कहा तोह पहले वह और रूपाली जाने वाले थे. अब संजीव भैया के साथ हे ये ऋतू दीदी भी तैयार हो गई. वह सर पे हाथ रखता बहार निकला तोह सजीव भैया कार के शीशे पर कपडा लगा रहे थे.

"रूपाली नहीं आई?"

"आ रही है साथ में ऋतू दीदी भी.", अर्जुन ने मुँह बनाते हुए कहा तोह संजीव भैया ने कपडा लगाना बंद किआ और बड़ी गाडी की तरफ बढ़ गए.

"अब आपको क्या हुआ? दूसरी गाडी क्यों साफ़ करने लगे?", अर्जुन भी उनके पीछे सफारी तक आ गया.

"तारा के साथ अलका पहले से बहार कड़ी है. तू मेरे ख्याल से अपनी मोटरसाइकिल पर भी कपडा मार हे ले.", गाडी के अंदर से एक और कपडा अर्जुन को थमते हुए उन्होने कहा तोह वो वही खड़ा सोचने लगा के भैया को क्या हो गया. लेकिन जब गलियारे से आती रूपाली के साथ ऋतू दीदी, प्रियंका, आरती और माधुरी दीदी को देखा तोह चुपचाप मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ चला. 'क्या मुसीबत है ये?'

"मैं आगे बैठूंगी." तारा चहकती सी अगली सीट पर बैठ गई और प्रियंका, आरती, माधुरी दीदी एक साथ बीच वाली सीट पर. अलका ने प्रीती का हाथ भी खींचा लेकिन वह पिछली सीट पर नहीं चढ़ी लेकिन अंदर ऋतू और रूपाली एक साथ बैठ चुकी थी.

"ाचा तोह फिर यही रह तू.", अलका ने थोड़े गुस्से से कहा और दरवाजा बंद करने लगी लेकिन प्रीती ने वह पकड़ लिए.

"रुको तोह दीदी, इतनी जल्दी क्या है.", और उसके पीछे से रेणुका बुआ अंदर आ बैठी तोह प्रीती हँसते हुए दरवाजा बंद करती हाथ हिलने लगी.

"बुआ आप पीछे कम्फर्टेबले हो?", संजीव भैया भी थोड़ा हैरान थे के ये भी साथ चलेंगी.

"हाँ संजीव मई बिलकुल ठीक हु यहाँ और सीट भी बिलकुल सही है. वैसे तुम्हे बता दू की ये सारा प्लान अलका और ऋतू ने बनाया था थोड़ी देर पहले.", उनकी इस बात पर ऋतू और अलका भी हंस दी.

"ाची बात है न बुआ जी. इस बहाने आप लोग एक साथ घूम लोगे नहीं तोह रूपाली भी क्या पता कम्फर्टेबले होती या नहीं. वैसे अर्जुन ने आज सभी को jeb-kharchi दी है", संजीव भैया ने अपनी जेब से वह 1000 निकल कर तारा को दिए तोह उसने वह पीछे प्रियंका दीदी को थमाए और उन्होंने वह रेणुका बुआ को.

"लेकिन मैं क्यों जेब खर्ची लेने लगी अर्जुन से?"

"रख को बुआ, सबको दिए है उसने ये मार्किट में खर्चने के लिए.", ऋतू ने शरारत से कहा और उनको आँख मार दी.

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"आज तुम सूट में?", मोटरसाइकिल पर प्रीती को लिए अर्जुन धीमी गति से शहर की और बढ़ रहा था. सफ़ेद कुर्ती और लाल सलवार में वह पारी सी लड़की अर्जुन के पीछे बैठी मुस्कान बिखेर रही थी.

"वह क्या है की सूट में तुम ज्यादा शरारत नहीं कर सकते इसके लिए मैंने यही पहन लिए.", होंठ चबाती प्रीती बोल रही थी और अर्जुन गोल शीशे में उसका दमकता चेहरा देख रहा था.

"वैसे ये क्या मामला था जो तुम सभी लोग एक साथ vaanar-sena की तरह चल दिए.?", अर्जुन ने मजाक करते कहा तोह एक बार तोह प्रीती ने गाल फुलाये लेकिन फिर अर्जुन को हँसता देख वह भी अदा से बोल पड़ी.

"रूपाली दीदी ऋतू दीदी से बोलै के वह अकेली नहीं जाएगी मार्किट. उन्होंने अलका दीदी के साथ मुझे और रेणुका बुआ को रेडी किआ. तुम्हारे घर जब मैं आई थी तोह तुम नहीं थे लेकिन अलका दीदी ने संजीव भैया से जिद्द की हमको लेकर जाने की और उन्होंने कहा के वह फिर सभी को हे लेकर जाएंगे ऐसे आधे लोग जाएंगे तोह वह नहीं जायेंगे. तोह अब रह गए थे तुम तोह हमने तुम्हे सुप्रिसे देना हे ठीक समझा. वैसे बुआ ने मन कर दिए था लेकिन फिर वह आखिर में तैयार हो हे गई.", अर्जुन को अब पता चला था के आज उसको हे उल्लू बनाया गया और इस सबमे संजीव भैया भी इन सबके साथ थे. और तोह और आज फिर वह बड़ी गाडी में नहीं बैठ पाया था. लेकिन प्रीती साथ थी और वह इस बात से हे ज्यादा खुश था.

"वैसे तुम लोग करने क्या वाली हो अब यहाँ? मई तोह स्कूल ड्रेस, बुक्स हे लेने आया हु."

"आज झूलों का आखिरी दिन है, कपड़ो पर भी डिस्काउंट है और गर्मी के नए कपडे भी आ गए होंगे. तोह सबने यही कुछ लेना है. हाँ वह tikki-golgappe जैसा भी कुछ बोल रही थी बुआ और ऋतू दीदी.", अर्जुन सोच रहा था के उसको ये तोह ये भी नहीं पता के वह क्या लेगा और यहाँ ये सब 2 घंटे पहले हे सब तैयारी करे बैठे थे. फिर वह हलकी masti-majaak करता प्रीती के साथ हे बड़ी मार्किट पहुंच गया. भैया की गाडी बहार नहीं थी तोह अपनी मोटरसाइकिल को सीधा गोल चौक हे ले चला और यही गाडी के बहार सजीव भैया अकेले खड़े थे.

"प्रीती वह सामने हे गई है वो सब और बोल कर गई है तुम्हे भी वह भेजने के लिए." भैया की बात सुनकर प्रीती भी उधर हे चल दी जहा सड़क के पार दुकाने सजी थी.

"मतलब आपने भी इन सबके साथ मिलकर मेरा उल्लू बनाया?", अर्जुन वैसे हे बैठा था अभी तक मोटरसाइकिल पर. संजीव भैया ने हँसते हुए उसकी तरफ देखा और फिर पीछे बैठ गए.

"चल लेमन पीते है वह फिर बात करेंगे. मैं भी तोह देखु इस पर बैठ के कैसा लगता है.", उनकी बात पर अर्जुन भी हँसता सा मार्किट से आगे बढ़ चला उनके बताये gali-sadak से होता. कुछ हे देर बाद दोनों इधर मार्किट से परे एक पनवाड़ी की दूकान पर थे जहाँ अर्जुन jeera-lemon की बोतल मुँह से लगाए था और उसके भैया सिग्रेटे.

"अब गाँव से आने के बाद थोड़ा ध्यान रखना घर पे. रूपाली को भी उतना हे प्यार देना जितना सभी बहनो से करता है. रिश्ते के हिसाब से तोह वह हमारी बुआ हे लगती है लेकिन दादी ने उन्हें गॉड ले लिए है तेरे पापा की तीसरी बेटी के तौर पर. जल्दी हे नाम आ जायेगा राशन कार्ड पर.", अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ उनकी ये बात सुनकर.

"बुआ? कैसे"

"वह दादी के भाई की बेटी है. तोह उनके भाई हमारे लगे दादा और उनकी बेटी?"

"हाँ बुआ लगी फिर. लेकिन गॉड क्यों?", अर्जुन ध्यान से भैया को देख रहा था.

"क्योंकि अब उनके maa-baap तोह रहे नहीं. ऊपर से 19 साल की छोटी सी लड़की तोह है रूपाली. यहाँ उसको ये पूरा परिवार मिलेगा और शंकर चाचा भी अपने मां को बहोत प्यार करते थे. ये समझ ले की जैसे तू मुझसे और मैं तुझसे करता हु. और मैं जानता हु के रूपाली को वही इज़्ज़त्त और प्यार देगा जो Alka-Ritu या बाकी सभी को देता है.", सिग्रेटे को पाँव से भुजते हुए उन्होने एक chewing-gum मुँह में डालते हुए कहा. अर्जुन ने भी बोतल ख़तम करके बहार लगे लकड़ी के कैरट में रख दी. पैसे देने के बाद दोनों हे वापिस उस और चल दिए.

"थोड़ा आगे ले, मनचंदा बुक स्टोर हैं वह. पहले ये काम निपटा लेते हैं.", गाडी से थोड़ा और आगे मोटरसाइकिल बढ़ने के बाद एक बहुत हे बड़ी दुकान के सामने अर्जुन ने रोका तोह वह ये देख के हैरान था की इतनी बड़ी दूकान और कितने सारे लोग थे उधर.

"ज्यादा सोच मत और ये भीड़ अभी बढ़ेगी. चल जल्दी से एक तरफ लगा इस हाथी को और अंदर आजा.", भैया तोह सीधा हे अंदर चले गए और लोहे की ग्रिल के पास मोटरसाइकिल लगते हुए वह भी अंदर चल दिए. अंदर तोह जैसे अलग हे दुनिया थी. हर तरफ किताबे, स्टेशनरी का सामान और कितने हे काउंटर पर 20 से ज्यादा दूकान पर काम करने वाले लोग.

"******* स्कूल की मेडिकल और non-medical का एक सेट, कक्षा ग्यारह का.", संजीव भैया की आवाज सुनकर वह आगे बढ़ा जहाँ और भी लोग थे. दुकान का मालिक एक अधेड़ सा बीच से गांजा व्यक्ति था. हल्का मोटापा लेकिन चमकदार चेहरे वाला. यहाँ तोह बिल के लिए भी मशीन लगी थी जिसपर वह बड़ी व्यस्तता में लगा था.

"भैया, पूरे शहर में एक हे दूकान है क्या?", अर्जुन ने धीमी आवाज में कहा लेकिन संजीव भैया के जवाब देने से पहले हे पीछे खड़े एक अंकल ने कहा.

"बीटा, दूकान तोह बहोत है पूरे शहर में. लेकिन बस एक ये हे जगह है जिसकी छत्त के नीचे सभी स्कूल की हरेक किताब उचित दाम में मिलती है. हर स्कूल के नोटिस बोर्ड पर नाम लिखा होगा 'मनचंदा बुक स्टोर'., अर्जुन उनकी बात पर सर हिलता फिर काउंटर पर देखने लगा जहाँ motti-motti किताबो के 2 सेट वह लड़का रखने के बाद उन्हें एक बार देख रहा था.

"हांजी भैया. ये तोह हो गए 2 सेट आपके. और ये रही ******* स्कूल रजिस्टर कापियां.", एक डोज़ेन उसके स्कूल का नाम लिखे रजिस्टर भी उसने साथ हे रख दिए.

"बिल करवा दो और फिर ड्रेस का भी पता बताओ जरा." भैया ने इतना कहा तोह इस लड़के ने दूसरे वाले को इशारे से किताबे मुख्या काउंटर पर ले जाने को कहा और एक पर्ची पर कुछ लिखने लगा.

"गोल चौक के ठीक सामने है ये 'आल सीजन' नाम की दूकान. वैसे तोह रेडी मेड भी मिल जाएँगी लेकिन इसके नाप की तोह बनवानी हे पड़ेगी.", उस दरम्याने कद्द के लड़के की बात पर भैया हंस दिए और अर्जुन झेंप गया. सच में हे वह इस समय इस भीड़ भरी दूकान में सबसे अलग हे दिख रहा था.

"धन्यवाद् भाई." संजीव भैया इतना बोलकर प्रवेश द्वार वाले काउंटर पर आ गए. अर्जुन भी उनके ठीक पीछे हे था और उनकी किताबे भी वही राखी थी जिनके बिल वह अंकल बनाने में लगे थे.

"कितना हुआ इनका मनचंदा जी.", संजीव भैया ने उनके आखिरी नाम से बुलाया तोह नजर ऊपर करके वह अंकल उन्हें देखने लगे. यहाँ वैसे तोह ाची खासी कतार थी लोगो की और ये व्यक्ति भी व्यस्त थे लेकिन संजीव भैया को देखते हे वह खड़े हो गए अपनी कुर्सी से.

"अरे संजीव भाई. कैसे हो यार तुम तोह दीखते भी नहीं अब?", उनकी जगह अब शायद उनका हे जवान भाई आ कर बैठ गया था कुर्सी पर और ये महाशय एक लड़के को पास बुलाते खुद बहार आ गए.

"मैं बिलकुल ठीक हु और आजकल काम शहर के बहार हे रहता है तोह आना नहीं हो पता. आप बताओ, घर और धंदा कैसे हैं?", मनचंदा जी तोह हाथ पकड़ के भैया का बहार आ गए इधर अर्जुन और वह लड़का भी पीछे आये. लड़के के हाथो में किताबे थी जिन्हे संभाले वह बस प्रतीक्षा कर रहा था के कब मालिक हुकुम दे की इनका क्या करना है.

"छोटू ये साहब की गाडी में रखवा दे और फिर दराज से चेकबुक लेता आइओ. भाई संजीव ये काम तोह तुम्हे भी पता है के बहुत ाचा है और घर परिवार भी कुशल है. लेकिन उसका कुछ करो यार, पहले तोह महीने में एक बार हे था लेकिन आजकल हर हफ्ते डिमांड आ जाती है. गर्ग के लिए इतना कुछ कर दिए जरा अपने पुराने लोगो की मदद भी कर दो.", संजीव भैया ने उनकी बात सुनकर अर्जुन की तरफ देखा. वह बस कुछ हे कदम दूर खड़ा था.

"छोटे, तू इस भाई को गाडी तक ले जा. पीछे रखवा देना सब सामान और मैं वही आ रहा हु. मोटरसाइकिल आखिरी में उठा लेंगे. ये छोटा भाई है मनचंदा जी.", संजीव भैया ने इतना कहा तोह दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन किआ और अर्जुन कुछ सोचता सा वह से चल दिए.

'गर्ग कही सुधीर के चाचा तोह नहीं?', इतना ध्यान में आते हे वह आगे कड़ी सफारी का पिछले दरवाजा खोलता किताबे सीट के नीचे रखवा कर वही खड़ा हो गया.

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"मनचंदा जी, देखिये मुझे कुछ नहीं चाहिए. आपका काम समझो कानूनी काम के साथ हे हो गया है. आधा तोह आज मैं कर आया हु और बाकी कल हो जायेगा. वह किसी से अब hafta-mahina कुछ नहीं लेगा. गर्ग से तोह len-den था एक जमीन का और उसने कीमत अदा कर दी थी जमीन उसके नाम करवाने की. आप अपने हो और अपनों के साथ व्यापार नहीं होता. कल के बाद कोई फ़ोन नहीं आएगा इस Lok-dal का.", संजीव की बात पर इन व्यक्ति के चेहरे पर शान्ति सी आ गई थी. वह संजीव के कंधे पर हाथ रखते हुए सामने लगी ग्रिल तक आ खड़े हुए और इधर वह छोटू एक चेकबुक और पेन लेकर उनके पास आ खड़ा हाउ. मनचंदा जी ने पेन से रकम लिखते हुए दस्तखत किये और संजीव भैया के हाथ में जबरदस्ती रख दिए.

"भाई ले लो यार. मेरी तरफ से गौशाला में दान समझ कर रख लो.", संजीव भैया हैरानी से उन्हें देखने लगे. ये बात अभी घर तक हे तोह थी.

"ज्यादा सोचो मत संजीव भाई. वह ठेकेदार आया था दोपहर को अपने बचो के साथ और उसने हे बताया के शंकर जी ने जल्द काम शुरू करने को कहा है किसी गौशाला का ##### गाँव वाली जमीन पर. बस छोटी सी भेंट समझ लो यार. मुझे पता है तुम पैसे काम के तोह लोगे नहीं. और जरा हमको भी मिलाओ पंडित जी के छोटे नवाब से.", संजीव भैया ने मुस्कुराते हुए वह चेक अपने बटुए में रखा और इशारे से अर्जुन को अपनी और बुलाया.

"अर्जुन, ये हैं अपने मनचंदा जी. राजेंदर मनचंदा मॉडल टाउन वाले. परिवार के पुराने हितेषी और नरेंदर चाचा के बचपन के दोस्त. और मनचंदा जी अर्जुन पहले हॉस्टल में हे था और एक साल से हे घर पर है. इसके लिए हे किताबे ली गई है.", चाचा के दोस्त है सोचकर अर्जुन ने उनके पाँव की हाथ लगाने की कोशिश की तोह इन्होने खुद हे अर्जुन को रोक दिए.

"जीते रहो बीटा लेकिन पाँव छूने का पाप न करो. पंडित जी के घर का खून हमारे पैरो के हाथ नहीं लगा सकता. और school-college का कोई कैसा भी काम हो तोह तुम हे खुद आ जाना, बिना हिचक के. अपनी हे दुकान समझना." अर्जुन ने बस गर्दन हाँ में हिला दी. इतने में हे दुकान के बहार से एक लड़के की आवाज आई तोह संजीव भैया ने हाथ जोड़ कर जाने की इजाजत ली. दोनों ने एक बार हाथ मिलाये और ये व्यक्ति ख़ुशी के साथ अंदर चल दिए.

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"शहर में ऐसा कोई है जो नहीं जानता हो अपने परिवार को भैया?", अर्जुन को हैरानी थी के आखिर उसका परिवार कैसा है.

"भाई देख ज्यादातर जो पुराने लोग है न अपने शहर में, वही बस दादाजी की वजह से जानते है. और मेरा काम भी है कॉर्पोरेट इन्शुरन्स देने का तोह ये बड़े लोग है जिनकी आमदनी ाची है इसलिए कभी कभी थोड़े ज्यादा पैसे के लालच में इन्शुरन्स क्लेम करवा लेते है, अपनी जगह या प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचा कर. अभी ये गर्ग, जिसके बारे में बात हो रही थी, इसकी गट्टे की फैक्ट्री में आग लग गई थी तोह उसका 3 करोड़ दिलवाया था उसको. काम है तोह लोग पहचान लेते है और थोड़ी बहोत इज़्ज़त करते है.", अर्जुन ने उनकी बात से सहमति जाता दी और फिर दोनों अपने बहनो की तरफ चल दिए.

"रूपाली, गुड़िया जरा हमारे साथ सामने तक चलो. तुम्हारी स्कूल ड्रेस भी लेनी है.", सभी लड़कियां गोलगप्पे और भेलपुरी वाले 2 ठेलो को घेरे कड़ी थी. बुआ आज भी तीखे पानी वाले गोलगप्पे खाने में व्यस्त थी और बाकी सब भी. कुछ लड़के आसपास से गुजरते हुए देख भी रहे थे उनको. कोई मोटरसाइकिल पर तोह कोई स्कूटर वाले. अर्जुन को उन लोगो का ऐसा घूरना ाचा नहीं लग रहा था लेकिन वह शांत था भैया की वजह से. रूपाली का चेहरा भी बता रहा था की उसको भी इधर आ कर ाचा लगा था. फिर ये दोनों बाकी सबको बोलकर वही पार्क के सामने स्तिथ 'आल सेअसोंस' नाम की उस दूकान पर चले गए. यहाँ पर रूपाली के नाप की तोह ड्रेस तुरंत मिल गई थी लेकिन अर्जुन का माप लिए गया. शरिवार के लिए लगने वाली सफ़ेद वर्दी की एक जोड़ी और बाकी दिनों पर लगने वाली neeli-safed kameej/Neeli पंत और स्कर्ट की 2-2 जोड़ी का भैया ने भुगतान कर दिए. पता लिखवाने के बाद 2 दिन बाद आ कर लेने का बोल कर तीनो हे वापिस गाडी की तरफ आ पहुंचे.

"आप सभी का हो गया हो तोह चले क्या?", अर्जुन ने जैसे हे ये बात कही तोह सभी उसको देखने लगी.

"झूले नहीं लिए है अभी. और हम झूलो के लिए हे तोह आये है.", अलका दीदी की बात पर अर्जुन ने अपने सर पर हाथ रख लिए. 7 बज चुके थे और इन्हे अभी झूले भी लेने थे.

"मुझे नहीं लेने और मैंने सभी सामान ले लिए है.", रूपाली ने बताया तोह अर्जुन को कुछ याद आ गया.

"भैया आप इन सभी को झूले दिलवा के जल्दी फारिग करो मैं रूपाली दीदी के साथ जरा माँ का सामान लेकर आया.", बिना रूपाली से इजाजत लिए अर्जुन ने कहा तोह एक पल के लिए वह भी उसको देखने लगी. फिर याद आया के वह उसका छोटा भाई है तोह सहज हो गई. 'दीदी, एक मिनट आप यही रुकिए मैं मोटरसाइकिल लेकर आया."

संजीव भैया सभी लड़कियों और बुआ के साथ पार्क में चले गए और इधर अर्जुन मोटरसाइकिल पर रूपाली को लेकर अपने दोस्त सुधीर की दुकान पर आ गया.

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"अंदर आ जाइये दीदी. हमे थोड़ा समय लग सकता है यहाँ पर.", दरवाजा खोलकर उसने रूपाली को अंदर बुला लिए और फिर अपने दोस्त से हाथ मिलते हुए मिला.

"भाई, ऐसा है कल मैं माँ के साथ गाँव जा रहा हु. दोनों में से कोई भी चीज तैयार हुई क्या? मुझे मालूम है तूने कल के लिए बोलै था लेकिन मुझे लगा के अगर सूट नहीं भी हुआ होगा तोह ब्लाउज तोह मिल हे जायेगा.", अर्जुन ने काउंटर पर झुकते हुए सुधीर से कहा तोह वह मुस्कुराने लगा.

"ऐसा है भाई. तू न किस्मत वाला है. टेलर आंटी कल से छुट्टी पर जा रही है तोह उन्होंने कल रात भी ओवरटाइम किआ और आज सुबह से भी वह ग्राहकों का आर्डर पूरा कर रही है. मैं देख कर आया के तेरा कितना बाकी है. उनके साथ 3 और लोग भी सिलाई करते है तोह शायद एक काम तोह हो हे गया होगा.", इतना बोलकर वह अंदर की तरफ चला गया और मीणा वह आ कड़ी हुई.

"Hello सर. मैडम के लिए कुछ लेने आये है आज?", उसने शिष्टाचार से ये बात कही तोह अर्जुन ने हाँ में सर हिला दिए और रूपाली जो पहले यहाँ इतने ाचे कपडे लगे देख रही थी उसकी बात और अर्जुन का जवाब सुनकर हैरत में पड़ गई.

"दीदी, ऋतू दीदी लोगो के साथ आपने शायद कुछ कपडे लिए होंगे घर के लिए. आप यहाँ से भी अपनी पसंद के सूट ले लीजिये. दादी ने कहा था इसलिए मैं आपको ले आया. जो भी आपको ाचा लगता हो.", अब रूपाली को बात समझ आई थी की bua/daadi ने अर्जुन को बोलै होगा. फिर थोड़ा सकुचाती सी वह मीणा के साथ चली गई. इधर सुधीर भी मुस्कुराता हुआ आ गया और उसके साथ हे ट्रे में पानी लेकर छोटू भी.

"भाई ब्लाउज तोह सुबह हे हो गया था और सूट के गले की तुरपाई हो रही है फिर 10 मिनट में वह भी मिल जायेगा. और छोटू, ये हमरे दोस्त है. इनके लिए जूस ले आओ और दीदी के लिए भी. अर्जुन भाई बस 5 मिनट बैठ मैं आया.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए सर हिला दिए और वही एक तरफ वाले सोफे पर बैठ गया जहाँ से मीणा और रूपाली दीदी दिख रही थी. रूपाली एक peele-safed सूट को ध्यान से देख रही थी लेकिन फिर उसको एक तरफ रखते हुए साधारण सा हल्का साफ़ सा सूट एक तरफ रख लिए. ऐसे हे वह कुछ सूट ध्यान से देखती लेकिन फिर किसी साधारण से फीके रंग के सूट को अपनी तरफ रख लेती. 3 सूट पसंद करने के बाद वह मीणा को बोलकर अर्जुन के पास चली आई.

"भाई मैंने वह 3 पसंद किये है और आप भी उन्हें देख लो जरा.", गाँव के परिवेश से थी तोह उसमे भी झिझक थी की शायद उसको ऐसे हे सूट लेने चाहिए.

"ाचा तोह आपने ये पसंद किये है?", अर्जुन ने वह तीनो हे सूट नीचे दराज की और रखते हुए एक तरफ के ढेर से 5 सूट निकाल लिए और मीणा की तरफ देखा जो अर्जुन को हे देख रही थी. उसकी पेनी नजर पर मीणा भी खुश हो रही थी.

"मीणा जी, ये 5 सिल्वा दीजिये और मैं सुधीर से बात कर लेता हु. हाँ इनके साथ अगर और कुछ भी आता हो तोह आप दीदी को साथ लेजा कर अपनी मर्जी से दे दीजियेगा. पर्ची सुधीर के पास ले आना.", अर्जुन इतना बोलकर वह से अपने दोस्त की पास चल दिए और रूपाली हैरान सी उसको देखती रही. ये लड़का है क्या चीज जो उसकी पसंद को इतने बड़े ढेर में भी सफाई से निकल लाया.

"मैडम, ये सर हमारे छोटे मालिक के ाचे दोस्त और रेगुलर कस्टमर है. आपकी दीदी और माँ को भी लेके आये है पहले और कुछ रिश्तेदारों को भी. फशीन की ातच समझ है इन्हे.", महिलाओ के अंतरवस्त्रो के उस छोटे से काउंटर, जहा पुरुषो की मनाही थी वह रूपाली को उधर ले आई. रूपाली अभी तक चुप हे थी.

"आपका साइज मैडम?", मीणा की बात पर जब रूपाली ने ना में गर्दन हिलाई तोह वह चेहरे को साधारण रखते हुए हे िंचितपे से रूपाली का माप लेने लगी. रूपाली को इस सबमे बड़ी शर्म आ रही थी. उसके शरीर को एक परै लड़की हाथ लगा रही है जो उसने सोचा भी नहीं था.

"32-बी आपका सीना है मेरी समझ से और 34 हिप्स है. 26 वैस्ट है तोह कॉटन इलास्टिक की पंतय और ऊपर आप सफ़ेद ब्रा पहन सकती है इन ज्यादातर सूट के साथ. ये जो black-red वाला है इसके साथ मेरे हिसाब से ब्लैक ब्रा हे ठीक रहेगी.", बिना रूपाली की रजामंदी लिए मीणा अर्जुन की बात का हे अनुसरण करती 2 सफ़ेद ब्रा और एक काली के साथ 3 के पैकेट वाली बढ़िया गुणवत्ता की पंतय भी एक काले बैग में दाल कर काउंटर से बहार आ गई.

"ये सब यहाँ सबके सामने हे लोग खरीद लेते है यहाँ?", रूपाली ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की. नजर जमीन पर हे गाड़ी थी.

"मम, शोरूम में सारा सामान जरूर है लेकिन ये लेडीज सेक्शन है तोह यहाँ सिर्फ महिलाये हे आ सकती है. और फिर एक लड़की का दूसरी लड़की से शर्माना किस बात का? आप अपने कपडे ले रही है और मैं वह दिखा कर आपकी पसंद के आपको बेच रही हु. चलिए अब आप अपना माप दे दीजिये.", रूपाली सर हलके से हिलती अंदर आ गई थी उधर सुधीर के साथ अर्जुन दूकान से बहार एक कोने में बातें कर रहा था.

"भाई ये बता के तुम्हारी कोई गट्टे की फैक्ट्री भी थी क्या?" अर्जुन की बात पर सुधीर ने हाँ में जवाब दिए.

"लेकिन भाई तुझे ये कैसे पता? वह तोह कब की बंद हो चुकी है, आग लगने की वजह से.", सुधीर की बात पर अर्जुन अब मुस्कुरा दिए था.

"भाई वह जो तू कह रहा था न तेरे चाचा वाली बात. उन्हें फैक्ट्री का इन्शुरन्स का क्लेम मिला था. और फिर जहा तक मुझे लग रहा है तुम्हारे चाचा ने वह पैसा फिर कही लगाया है. किसी जमीन या कारोबार में. और जिनको तूने देखा था उनके ऑफिस में वह मेरे बड़े भाई है. मुझे शक था थोड़ा उनपे लेकिन आज पता चला के वह ये सब काम करते है.", अर्जुन को बड़े ध्यान से सुधीर देख रहा था और उसकी बात पर विचार कर रहा था.

"लेकिन इतना पैसा 3-4 बार कही भेजना और फिर मेरे पूछने पर सही से जवाब नहीं देना तोह अलग बात हुई न भाई. बाकी मैं भी पता लगता हु और तू भी हो सके तोह मेरी बात की गहराई को समझना. हो सकता है ये आधा हे सच हो.", शीशे से अंदर की तरफ नजर डाली तोह रूपाली शायद अर्जुन को हे ढून्ढ रही थी. दोनों हे अब अंदर आ गए लेकिन अर्जुन को भी उसका ऐसे सुधीर को ये सब बताना जल्दबाजी हे लगा. उसकी बात बिलकुल ठीक थी की क्लेम हुआ तोह पैसे आने चाहिए थे लेकिन इधर तोह वह पैसे गए थे.

"5 कॉटन के सूट और इनरवेअर. सिलवाई समेत हुए भाई 5500. 900 के हिसाब से सूट और बाकी 1000 रुपये का सामान अलग.", रूपाली को सोफे पर बैठने के बाद अर्जुन काउंटर पर हिसाब करवाने लगा तोह सुधीर ने सब बताया. "और भाई ये सूट मिलेंगे 4 दिन के बाद."

"दीदी, 4 दिन के बाद मिलेंगे ये सब. ठीक है न?", अर्जुन ने थोड़ी दुरी पर हे बैठी रूपाली से आराम से हे पुछा था.

"हाँ. ठीक है.", इतना बोलकर रूपाली वही कड़ी मीणा से कुछ पूछ भी रही थी, लेकिन धीमी और गंभीर आवाज में.

"ाचा फिर भाई मिलते है. अभी तोह मैं भी 4 दिन के लिए अपने ननिहाल जा रहा हु. आने के बाद मैं हे ले जाऊंगा ये सूट.", सुधीर ने रेखा जी के ब्लाउज और सूट को ाचे से पैक करवा दिए था. अर्जुन ने भी 10000 की गद्दी से 55 नोट गईं कर सुधीर को थमाए और फिर मीणा को भी 200 रुपये पकड़ते हुए धन्यवाद् किआ. सुधीर ने भी ले लेने का इशारा किआ तोह मीणा खुद थैंक यू बोलती मुस्कुरा दी.

"चलो दीदी और ये भी आपको पकड़ना होगा. माँ के कपडे है.", अर्जुन ने वह पैकेट रूपाली को पकड़ते हुए मोटरसाइकिल स्टार्ट की तोह कुछ पल रुक कर रूपाली भी बैठ गई.

"भाई, आराम से चलना. मुझे बैठना नहीं आता ाचे से.", एक हाथ से मोटरसाइकिल का करियर पकड़ती वह बैठी तोह अर्जुन ने वैसे हे पीछे मुड़कर देखा.

"आप न एक हाथ से मुझे पकड़ लो और सामान गॉड में रख के उलटे हाथ वह रख लो.", मुस्कुरा कर उसने कहा तोह रूपाली उसकी बात सुनकर संकोच के साथ बस हलके से उसकी कमर पर हाथ रख के बैठ गई. ये उसके लिए बिलकुल अलग था. सुबह से वह मुश्किल में थी की जाने कैसा परिवार होगा लेकिन इधर तोह सब उसका ऐसे ख़याल रख रहे थे जैसे वह छोटी बची हो. ऋतू तोह उसको अलग हे नहीं करती थी और प्रीती ने तोह आज उसको जाने क्या क्या दिला दिए था. गाँव में वह पढाई और चूल्हे के साथ हे थी और ज्यादा से ज्यादा कभी वह aas-pados में अपनी सहेली से बतिया लेती थी.

"दीदी, देखो घर पे तोह अब आप सबसे मिल हे चुकी हो लेकिन आपको जो भी चाहिए हो या कही जाना हो तोह हमारी माँ, कोमल दीदी और दादी से कह देना. मैं तोह सामने हे रहूँगा लेकिन शायद आप मुझसे झिझकत हो तोह शायद न कहो. अब हमारी माँ भी एक हे है तोह फिर फरक मत समझना.", अर्जुन आराम से मोटरसाइकिल चला रहा था लेकिन पीछे बैठी रूपाली की आँखों से jhar-jhar आंसू टपक रहे थे जिन्हे वह रोक नहीं पा रही थी. वह गली ख़तम होने हे वाली थी की अर्जुन को हिचकी की आवाज आई. मोटरसाइकिल एकदम रोकते हुए वह सामने से पाँव घूमता उतरा और साइड स्टैंड पर लगी मोटरसीले पर बैठी रूपाली का चेहरा देखने लगा.

"पता है दादी कहती है के रोना तभी चाहिए जब दर्द सेहन न हो. और हमे दर्द होने से पहले हे उसका हल खोज लेना चाहिए. आपका ये भाई एक दिन पुराण जरूर है लेकिन ये भी आपकी आँखों में ये आंसू नहीं देख सकता. प्लीज आप खुद को शांत करिये और हम घर चल कर बात करेंगे. आज से आपकी आँखों में आंसू नहीं आने चाहिए. इस से ये महसूस होता रहेगा के आपने अभी तक हमको परिवार नहीं मन.", खुद हे बड़ी आत्मीयता से वह उनके गाल साफ़ करता बोलै तोह खामोश सी रूपाली के चेहरे पर भी छोटी सी मुस्कान तैर गई.

"अब लगती हो आप बंदरिया. जैसे ऋतू दीदी लगती है रोने के साथ हे हंसती हुई.", उनके सर पर हाथ फेरता वह भी खुद की कही बात पर हँसता हुआ वापिस उधर आ गया जहा गाडी कड़ी थी. लेकिन अभी भी वह कोई नहीं आया था.

"चलो देखे इनके झूले ख़तम क्यों नहीं हुए.", उनका हाथ पकड़ के अपनेपन के साथ वह पार्क के अंदर आया तोह खुद संजीव भैया भी हवा में झूलती नाव में सवार हुए झूलो का मजा ले रहे थे. ये तोह शायद किसी ने नहीं देखा था. अर्जुन बस मुस्कुराता उन्हें देख हे रहा था के साथ में आ कड़ी हुई ऋतू दीदी बोली.

"शर्त हार गए थे लेकिन देखो कैसे मजे ले रहे है अब भैया भी. कमरे वाले से हमने फोटो उतरवा ली है उनकी.", अर्जुन हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा.

"शर्त? कैसी शर्त?"

"प्रीती के साथ ice-cream की शर्त थी भैया की. भैया ने कहा था के 'गुड़िया क्या कीड़ी की तरह खा रही है, तेरे से जल्दी यहाँ कोई भी खा लेगा.' प्रीती ने शर्त लगाई थी की अगर वह उस से पहले 5 कप खा जायेंगे तोह वह कभी ice-cream नहीं खायेगी." ऋतू दीदी ने हँसते हुए कहा और पास कड़ी रेणुका बुआ ने भी हामी भर दी. उधर संजीव भैया झूले वाले को और तेज करने को बोलते हुए इस तेज गति से हवा में झूलती बड़ी नाव पर बाकी सबके साथ मजे ले रहे थे. प्रियंका और माधुरी दीदी तोह डर के चीख रही थी वही अलका, प्रीती और तारा हल्ला मचा रही थी छोटे बचो की तरह.

"मतलब प्रीती ने 5 कप खा लिए थे?", अर्जुन ने दोनों की तरफ देखा.

"भैया ने 8 और प्रीती ने 11 कप. 5 कप तक तोह दोनों हे बराबर थे लेकिन उसके बाद प्रीती डबल स्पीड से शुरू हो गई थी. भैया भूल गए थे की उसका आधा खून बहार का है.", ऋतू दीदी की बात पर रेणुका बुआ ने हँसते हुए ऋतू की ब्याह पर चुनती काट दी थी बहार के खून वाली बात पर.

"11? सच में? ये तोह आधी प्लेट पुलाव भी आधे घंटे में खाती है और इतनी तेज? भैया 10 मिनट में 5 रोटी ख़तम कर लेते है. फिर प्रीती ने झूले की सजा दी?", अर्जुन की उत्सुकता बढ़ गई थी और उधर झूले की रफ़्तार भी.

"नहीं. सजा तोह थी की जैसे वह स्कूल में झूला झूलते हुए मजे लेते थे वैसे हे लेना होगा. और ये उनका चौथा झूला है.", ऋतू दीदी की बात ख़तम होने के बाद बस वह सभी झूले के तरफ हे देखने लगे थे. कोई 5-6 मिनट के बाद वह लोग नीचे उतरे तोह अर्जुन ने भाग कर अगले काउंटर पर जाते संजीव भैया को पकड़ा.

"रुको रुको. 8 से ऊपर टाइम हो गया है और आपने अभी भी झूले लेने है.?", अर्जुन की बात पर वह तोह रुक गए लेकिन प्रीती ने 12 टिकट ले लिए लम्बे ड्रैगन वाले झूले के.

"अभी ये आखिरी है तोह इस पर सभी चलेंगे. और जिसका दिल कमजोर है वह नीचे रह जाए यही.", उसकी बात सुनकर ऋतू दीदी और रेणुका बुआ भी उन सबके साथ हो लिए. और संजीव भैया ने तोह जाना हे था जिन्हे आज इतना मजा आ रहा था अपनी बहनो के साथ ऐसे हंसने खेलने में. वह रह गए बस अर्जुन और रूपाली तोह अर्जुन भी उनका हाथ पकड़ कर उस बड़े झूले की तरफ आ गया जहा सब क़तर में थे और प्रीती टिकट दिखती ऋतू दीदी के साथ सबसे पहले ऊपर चल दी.

"मुझे डर लगता है और मैं पहले कभी नहीं बैठी हु.", रूपाली ने धीमी आवाज में ये बात कही थी. वह सच में हे एक saaf-dil और भोली सी लड़की थी. दुनिया से बिलकुल अनजान और अपने जीवन के 19 साल बस अपने गाँव में बिताने वाली.

"डरो मत दीदी. मैं आपके साथ हे हु और वैसे भी ये बस एक झूला है.", उन्हें हिम्मत देता वह पहले उन्हें ऊपर चढाने के बाद खुद भी आ गया. 2-2 के क्रम से सभी लोग बैठ गए थे सीट पर और फिर एक गोल पटरी, जो हवा में 6-7 फ़ीट ऊँची थी उसपर वह ड्रैगन रेलगाड़ी की तरह गोल चलने लगा. अभी तक तोह सभी ठीक हे थे लेकिन 2 मिनट के बाद हे माधुरी दीदी की चीखने की आवाज आई जो आरती से चिपकी हुई थी. उनके साथ हे और लोग जो कमजोर दिल के थे वह शुरू हो गए थे. लेकिन संजीव भैया अपनी जगह से उठ कर बीच की खली जगह में खड़े हो कर तारा, अलका के साथ हल्ला करने लगे थे. ये शायद 100 की रफ़्तार से घूमने लगा था और गोल चक्कर की वजह से ज्यादातर लोगो के सर घूमने लगे थे. रूपाली तोह डर के मारे अर्जुन की ब्याह से चिपक गई थी लेकिन हिम्मत करके वह चीख नहीं रही थी.

"डरो मत. देखो ये एक सिर्फ गोलाई में घूमती गाडी हे है. आप सिर्फ इधर मुझे देखने की कोशिश करो और नजरे मत हटाना.", रूपाली कोशिश करने लगी थी उसकी बात सुनकर. पहले लोगो की आवाज और ड्रैगन के घूमने की तरफ ध्यान था लेकिन अब वह खुद को काबू में रखते हुए अर्जुन को देखने में लग गई थी. कुछ हे पल में जब झूला रुक गया तोह रूपाली का ध्यान अलग हुआ. सच में उसका डर ख़तम हो चूका था. सभी नीचे उतर आये तोह घर जाने की जल्दी में सीधा गाडी की और भाग लिए. अर्जुन पीछे संजीव भैया और रूपाली के साथ आ रहा था.

"आज फिर कैसा लगा आपको?", अर्जुन ने ये बात कही तोह संजीव भैया हंस दिए.

"लगा के शायद मैं भी ज़िंदा हु. 10 साल बाद मैंने ये सब किआ है. पहले मैं, माधुरी, प्रियंका, ऋतू और अलका आये थे आखरी बार. उस समय तुझे घर हे छोड़ के आये थे. खूब मजे लिए थे हमने उन झूलो के और वह शायद मेला था दिवाली से पहले बड़े ग्राउंड में.", संजीव भैया की बात सुनकर अर्जुन भी कुछ सोचता सा बोलै.

"आप परिवार में रह कर भी ऐसे जी रहे थे और मैं परिवार से दूर रहकर. शायद हमारी हालत एक हे जैसी थी भैया. लेकिन परिवार से ज्यादा ख़ुशी कही मिल नहीं सकती. खुद हे देखिये इन सबको, सारा दिन घर के काम. कोई कॉलेज कोई roti-khaane में हे दिन निकल लेती हैं. आज हम सब यहाँ है तोह वैसा हे लग रहा है जैसे एक साथ पार्क में जाते थे गोल छोटे झूले को आप तेज घूमते थे और Alka-Ritu दीदी हल्ला करती, माधुरी दीदी रोकने के लिए गिड़गिड़ाती थी. समय नहीं बदलता भैया बस जिम्मेदारियां आने के साथ हम खुद में छुपे उस बचपन को मार लेते है. इसका ज़िंदा रहना हे ज़िन्दगी है.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल पर चाबी लगाई तोह संजीव भैया एकटुक अपने इस छोटे भाई को देखने लग गए थे जो इतनी बड़ी बात आराम से कहता आगे चल दिए था.

"सच कह रहा है तू भाई. मैंने क्या सोच कर ऐसा किआ था वह तोह पता नहीं लेकिन अब वैसे हे रहूँगा जैसे तू कह रहा है. ज़िम्मेदारियों से समय निकाल कर अकेला बहार रहने से ाचा वही करूँगा जिसमे मुझे मजा आता था बचपन से. थैंक यू.", गाडी के अंदर बैठ कर उन्होंने खुद हे कद प्लेयर का बटन दबा दिए था.

"आप भी बैठ जाओ यहाँ मेरे पीछे. वह सब पूरे हो गए हैं.", अर्जुन ने रूपाली दीदी को बैठने को बोलै क्योंकि प्रीती ने उसको हाथ हिला कर बता दिए था के वह गाडी में बैठ गई है. रूपाली इस बार वैसे हे बैठी जैसे अर्जुन ने पहले बताया था.

"मेरा सामान गाडी में हे है जो पहले ख़रीदा था."

"गाडी हमारे घर हे जायेगी दीदी. आप बेफिक्र रहो और घर जाने के बाद आपका दिल करे तोह आप मेरा कमरा ले सकती हैं. मैं संजीव भैया के या पिछले 3 कमरे में से किसी में भी चला जाऊंगा.", दोनों हे मार्किट से बहार आये तोह सड़क पर बीच में रौशनी जगमग थी. स्ट्रीट लाइट की कतार से दोनों तरफ की सड़क संत्री रौशनी से भरी हुई थी, जहा अभी तक ाचा खासा ट्रैफिक था.

"नीचे कमरों में कोण कोण रहता है?", रूपाली ने ये बात पूछी तोह अर्जुन ने सारे घर का नक्शा बता दिए. ये भी की बैठक किसी का भी कमरा नहीं है और dada-dadi के बगल वाला कमरा मेहमानो के लिए या फिर जब बुआ आती है तोह उनके लिए रहता है. ऊपर 3 कमरे पीछे और अब 3 आगे थे. ड्राइंग रूम को तारा के लिए कमरा हे बना दिए था.

"वैसे मेरा कमरा जरूर है लेकिन मैं पूरे घर में जहा दिल करता है वही सो जाता हु. वह सिर्फ मेरे कपडे और सामान हे रहता है.", अर्जुन बात कर रहा था और रूपाली उनके साथ हे चल रहे स्कूटर पर आगे कड़ी एक छोटी लड़की और अपनी पति के पीछे बैठी औरत को देख रही थी. इस दृश्य से उसकी आँख से हल्का सा पानी आ गया था जिसको अर्जुन ने शीशे से देख लिए था. नए शहर को जाते पुल्ल पर से गुजरते हुए अर्जुन ने रफ़्तार हलकी करते हुए कहना शुरू किआ.

"दीदी, मुझे नहीं पता के किसी इंसान को खोने का दर्द क्या होता है. और अंदर से क्या महसूस होता है ये भी नहीं पता. हम अपने परिवार से प्यार करते है और हर सदस्य सबकी परवाह करता है. लेकिन हम सब जानते है के ये जीवन अनंत नहीं है और कभी भी सांस रुक सकती है. आपके पिता हे आपके लिए आपकी दुनिया थे. उन का आपकी दुनिया से चले जाना एक तरह से असहनीय हे है. लेकिन ये भी उतना हे सच है के अगर आप उनसे प्यार करते हो तोह वह हमेशा आपके दिल में हे रहेंगे और जब तक आपकी सांसें है वह जिन्दा रहेंगे. आपके रोने से या दर्द महसूस करने से क्या उन्हें ाचा लगता होगा? मैं आपको नहीं रोकूंगा रोने से क्योंकि आपने बहोत कुछ खोया है लेकिन बस इस बात पर विचार करना के दुनिया आपके सामने है. उनका नाम रोशन करना चाहती हो आप या फिर खुद को कष्ट देती रहकर उन्हें दुःख देना.", पुल्ल से नीचे उतर कर अर्जुन ने मोटरसाइकिल रोकते हुए अपना रुमाल उनके सामने कर दिए. रूपाली के गालो से आंसू टपक रहे थे लेकिन फिर खुद हे वह उन्हें पोछती हुई अर्जुन के गले से लग गई. एक सहारा हर टूटे इंसान की जरुरत होती है और रूपाली को वह मिल चूका था इस छोटे समझदार भाई के रूप में. उन्हें चुप करने के बाद अर्जुन ने एक बार फिर ाचे से उनका चेहरा साफ़ किआ और सब सामान सही से उन्हें पकड़ने के बाद फिर से घर की और चल दिए.

"वह भी बापू से सिर्फ रात को हे तोह बात होती थी. सच कहु तोह मुझे याद भी नहीं के कभी उनके पास भी मैं सोइ होउंगी. फसल के समय तोह वह खेत पर हे सोते थे और मेरी ताई या उनके बचे हमारी तरफ आते हे कहा थे. मोती था एक हमारा कुत्ता उसको भी किसी ने मार दिए था 2 साल पहले तोह फिर अपने बापू के लिए खाना बनाने और किताबे पढ़ने में हे समय निकल गया. वह प्यार बहोत करते थे लेकिन कहते नहीं थे. और माँ जाने का गम और मेरे खुद को संभाल लेने के कारण उन्होंने एक तरह से घर से दुरी बना ली थी. मुझे प्यार भी बहोत करते थे लेकिन..", रूपाली इतना बोलती बस अर्जुन की पीठ से लग के शांत हो गई थी. अब उसको डर नहीं लग रहा था और उसने सोच लिए था के ज़िन्दगी कैसे जीनी है.
 
एक अपडेट से से काम नई चलेगा भाई
 
अपडेट 56

कौन क्या है (3)


"दीदी, ये माँ को दे देना आप. और एक बार ये भी देख लेना की रूपाली दीदी कहा सोयेंगी.", अर्जुन ने अपनी माँ के कपड़ो का वह बैग कोमल दीदी की तरफ बढ़ाते हुए कहा. सारा सामान गाडी से निकल कर अंदर टेबल पर रख दिए था संजीव भैया और बाकी बहनो ने. अर्जुन अंदर आया तोह रोसिघार के सामने हे टेबल पर बैठ गया था. सभी लोग खाना हे खा रहे थे जितने भी मार्किट गए थे. रेणुका बुआ और प्रीती अपने घर जा चुके थे क्योंकि छोल साहब भी शाम को वापिस आ गए थे.

"ाचा मैं ये उनके कमरे में रख के आती हु. और रूपाली आज मेरे साथ सो जाएगी हमारे कमरे में क्योंकि ऋतू तोह माँ के साथ हे सोने लगी है.", कोमल दीदी ने ये बात ऋतू दीदी की तरफ देखते हुए कही जो मुस्कुराती हुई खाना खा रही थी. रूपाली शायद दादी के कमरे में थी और उन्हें अपने सब कपडे और सामान दिखने में लगी थी.

"ठीक है फिर यही सही. जब मैं वापिस आ जाऊंगा तोह मैं दूसरी मंजिल के किसी भी पिछले कमरे में अपना सामान लगा लूंगा.", अर्जुन ने प्लेट अपनी तरफ करते हुए कहा.

"मिस्टर. वह हम लोग कल हे अपना सामान लगाने लगी है. एक मेरा और अलका का कमरा होगा, दूसरा फ़िलहाल प्रियंका दीदी और आरती का तोह तीसरे वाले में होगी मशीन. नीचे कोमल दीदी के साथ रूपाली रहेगी और माधुरी दीदी का अब अकेली का कमरा. तोह जहाँ पर अभी तक तुम्हारा सामान है उसको वही रहने दो.", ऋतू दीदी ने चम्मच से दाल खाने के बाद कहा और अर्जुन को सभी परेशानियों से निजात मिल गई थी जैसे. कोमल दीदी के साथ हे रूपाली सबसे सही रह पायेगी.

"थैंक यू दीदी. वैसे आज आप माँ के पास क्यों सो रही है? मतलब वह तोह मेरी जगह है न?", अर्जुन ने छेड़ते हुए कहा तोह साथ बैठे संजीव भैया ने उसकी पीठ पर चपत लगाईं.

"तेरा ठीक है भाई. जहा बिस्टेर दिखे वह तेरी जगह. मेरा कमरा, ड्राइंग रूम, बैठक, दादी का बिस्टेर, Komal-Maadhuri का कमरा और चाची का भी. बाथरूम बच गया है वह एक बिस्टेर लगवा देते है क्योंकि वही सोना बाकी रह गया तेरा.", सजीव भैया से ऐसे जवाब की आशा नहीं थी. लेकिन अर्जुन को छोड़कर टेबल पर खाना खाते सभी हंसने लग पड़े.

"हाहाहा.. ये बात हुई न भैया. अर्जुन ने तोह जैसे हरेक कमरे में अपना हिस्सा समझा हुआ है. इसके कमरे में कोई नहीं सो सकता लेकिन ये हरेक के कमरे में पसर जाता है.", अलका दीदी की बात पर ऋतू दीदी ने भी ताली दी और तारा भी खाना छोड़कर हंसने लगी थी. घर के सभी बचे हे थे खाने की टेबल पर.

"तोह फिर इसमें गलत क्या भाई.? ये है हे सबका बराबर से और तुम सभी हो जिन्होंने इसको इतना प्यार दिए और इतना हक़.", कौशल्या जी रूपाली के साथ बहार आई और अर्जुन के सर पर दुलार करती फिर उसकी जेब में पैसे डालने लगी. अर्जुन ने मन भी किआ लेकिन उन्होंने फिर भी उसको आँखें दिखते वह पैसे जेब में दाल दिए.

"तू मेरा सबसे ाचा बचा है. ये नहीं कहती की संजीव काम है लेकिन तू बस अपने आप में एक हे है. और रूपाली ने मुझे सब बता दिए की तुझे अपनी इस प्यारी बहिन की परवाह है. जग जग जीता रहे मेरा बचा.", कौशल्या जी इतना बोलकर उसका माथा चूमती आशीर्वाद देने लगी. इधर तारा ने अपनी कुर्सी खाली करते हुए खुद हे रूपाली को वह बिठा दिए.

"और रूपाली यहाँ कमरे में खाना वही खता है जो नाराज हो या उसको लोग पसंद नहीं हो. अब नानी के कमरे में बस खाना खाती नहीं दिखनी चाहिए.", पीछे से रूपाली के गले में बाहें दाल कर वह भी प्यार से बोली. साथ बैठ अलका ने जल्दी से प्लेट में सब्जी और दाल की कटोरी रखते हुए आँखों से खाने का इशारा किआ.

"संजीव बीटा, अब हर काम तोह तू हे करता है इस बैलबुद्धि को सिर्फ बातें हे आती है. यहाँ 8 कुर्सियां है तोह इनके साथ की 2 और मंगवा लेना. ाचा लगता है ऐसे सबको एक साथ बैठे देख कर.", दादी की बात पर आज संजीव भैया ने मुस्कुराते हुए हाँ कहा तोह उन्होंने सभी बचो के सर पर हाथ फेरा और घर को बुरी नजर से बचाये रखने की कामना की.

"नानी, वह शायद माँ आएँगी शुक्रवार तक और हो सकता है इस बार कुछ दिन रहेंगी भी.", तारा ने टेबल से प्लेट्स लेकर रसोईघर में जाते हुए कहा तोह कुछ देर तक शांति सी चा गई इस बात पर. फिर एक एक कर सभी वह से उठने लगे और कोमल दीदी अपनी प्लेट लेकर उधर बैठ गई.

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"तुम कल जा रहे हो? मेरा ख्याल कोण रखेगा.?", तारा अर्जुन के कमरे में थी और दूसरी मंजिल पर इस समय कोई नहीं था.

"जब तक तुम ठीक होगी मैं आ जाऊंगा न वापिस और सिर्फ 4 दिन की तोह बात है.", अर्जुन ने तारा को बाहों में भरते हुए होंठो को चूमा और फिर एक हाथ से उसके बाल पीछे करते हुए कहा. प्रतिउत्तर में तारा ने भी एक गरम चुम्बन उसके होंठो पर जड़ दिए.

"माँ पता है क्यों आ रही है?", तारा की बात पर अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी. वैसे भी पूरा घर खौफ खता था मधु शर्मा और उनके नखरो के सामने. अर्जुन को भी थोड़ी हैरानी हुई थी की ऐसे कैसे उसकी बुआ ने आने का विचार बना लिए.

"उन्होंने कोई लड़का देखा है मेरा लिए. एक्चुअली, देखा तोह पापा ने है क्योंकि वह उनके दोस्त का हे बीटा है. कोई प्लाईवुड की फैक्ट्री हे यहाँ अपने शहर में हे उनकी और जहाँ तक मई जानती हु वह लोग नानाजी को भी जानते है. लेकिन..", इतना सब कहने के बाद वह बस गले लग गई और आँखों में आंसू आ गए थे तारा के.

"तुम्हे ये शादी नहीं करनी?", अर्जुन ने गले लगाए हे कहा. "और अभी तोह तुम्हारी उम्र भी कितनी काम है.", अर्जुन ने अपनी बात पूरी की. सच हे तोह था के तारा अभी 19-20 साल की हे तोह थी.

"एक बात ये भी है लेकिन मुझे वह लड़का पसंद नहीं और ये ज्यादा जरुरी बात है. आज नहीं तोह कल शादी तोह होगी हे लेकिन मैं इस लड़के से और फ़िलहाल तुम्हारे हे पास रहना चाहती हु.", तारा ने अपने दिल का हाल अर्जुन को बता दिए.

"तोह फिर बुआ को मैं संभल लूंगा. अब शादी तभी होगी जब लड़का तुम्हे पसंद होगा और जब तुम्हारी मर्जी होगी. काम से काम 2-3 साल तोह नहीं.", अर्जुन ने ये बात क्या सोच कर कही थी वो खुद उसको भी शायद नहीं पता था. वह उस इंसान का फैंसला बदलवाने का निश्चय कर चूका था जिसके सामने खुद उसके पिता भी ठन्डे रहते थे. कुछ देर ऐसे हे तारा को बाहों में लिए वह उसके बदन को सहलाता शांत करता रहा और एक बार फिर तारा के मुलायम होंठ चूमकर बहार चल दिए. सीढ़ियों से नीचे आने के बाद अपनी माँ के कमरे में आया जहा इस समय कोमल दीदी और ऋतू दीदी भी बैठी थी अपनी माँ रेखा के साथ.

"साड़ी और सूट. वाह. वह भी इतने सुन्दर दिलवाये है माँ को. लेकिन शायद हमारे भाई को अपनी बहने नहीं दिखती.", ऋतू दीदी माँ के साथ बैठी वह नए कपडे खोल कर देख रही थी और कोमल दीदी गोल टेबल के साथ लगी कुर्सी पर बैठी माँ के कपडे बैग में सलीके से रख रही थी.

"ाचा ये बताओ के आप ज्यादा सुन्दर हो या माँ?", अर्जुन ने भी कोमल दीदी के साथ जुड़कर बैठते हुए एक तरफ से उन्हें अपने साथ लगते हुए ऋतू दीदी से कहा.

"हाँ तोह माँ तोह है हे सबसे खूबसूरत और प्यारी.", ऋतू दीदी ने माँ के गले लगते हुए कहा, जो इन बचो की बात पर कपडे तेह लगाती मुस्कुरा रही थी.

"कोमल दीदी, इंसान खूबसूरत हो तोह फिर उसपे तोह हर कपडा ाचा लगता है न? जैसे अभी आप खुद को हे देख लो, ये सिंपल सा कॉटन का सूट कितना ाचा लग रहा है क्योंकि आप हो हे इतनी सुन्दर. वही ऋतू दीदी का ये महंगा टॉप पहने हुए देखो कैसी लग रही है.", अर्जुन ने दीदी को आँख मारते हुए कहा तोह कोमल दीदी जोर से हंस पड़ी और ऋतू अपनी माँ से लिपट कर शिकायत करने लगी थी.

"देख लो माँ. ये अब अपनी बड़ी बहिन के साथ कैसा बर्ताव करने लगा है? मैं इतनी बुरी दिखती हु क्या.?"

"बीटा इसके कहने से क्या होता है? मेरी सबसे प्यारी बेटी तोह तू हे है.", रेखा जी ने प्यार से माथा चूमते हुए ऋतू से कहा तोह उसने भी अर्जुन की तरफ आँख मारते हुए इशारा किआ.

"इतराओ मत दीदी. माँ ने आपको प्यारा कहा है जैसे हर माँ अपने बचो को कहती है. अभी भी उन्होंने ये नहीं कहा के आप खूबसूरत हो.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और खुद हे कोमल दीदी के हाथ को पकड़ते हुए ताली मार दी. कोमल दीदी तोह बस अपने छोटे bhai-behan की ये नकली लड़ाई का लुत्फ़ ले रही थी माँ के साथ.

"माँ, सच में आपका यही मतलब था क्या?", नौटंकी करती ऋतू ने गंभीर चेहरे के साथ रेखा जी से पुछा.

"ये पागल है जो तुझे परेशां कर रहा है. तू तोह घर में सबसे ज्यादा सुन्दर है, कोमल से भी ज्यादा."

"ले देख ले अब तू भी के मैं कितनी सुन्दर हु.", जीभ निकलते हुए ऋतू दीदी ने उसको चिडया.

"ाचा ये सब छोड़ो आज आप यहाँ माँ के बिस्टेर पर कैसे? यहाँ तोह मैं सोऊंगा.", अर्जुन ने ये बात कही और खड़ा होने लगा तोह ऋतू जल्दी से सीढ़ी लेट गई.

"माँ, इसको बोलो के ये यहाँ नहीं सो सकता. आज मेरा दिल है यहाँ सोने का तोह मैं हे सोऊंगी.", किसी छोटे बचे की तरह पूरे बिस्टेर पर हाथ पाँव पसारती वह बोली तोह अर्जुन दरवाजे की तरफ जाते हुए रुक कर बोलै.

"ऐसा है न दीदी, मुझे दादी बताती थी की माँ का दूध आपने ज्यादा नहीं पीया और मैंने सबसे ज्यादा. आज चलो आप हे पी लेना.", जीभ निकाल कर बहार भाग गया वह लेकिन इस बात से जहा कोमल दीदी हंस रही थी वही रेखा जी का तोह दिल धड़क गया एक बार जोर से. ऋतू मुँह चिढ़ाती हुई बोलने लगी पीछे से.

"हाँ तोह पी लुंगी.", कोमल दीदी भी अब वही बिस्टेर पर आ कर बैठ गई थी और तीनो बातें करने लगी.

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"सुधीर सिंह, टीम भेज दो यहाँ से.", मॉडल टाउन में एक पीसीओ बूथ से संजीव भैया ने एक नंबर मिलाने के बाद इतना कहा और फ़ोन काट दिए. जेब से पेजर निकलते हुए फिर उन्होंने उसपर चलता वह एक लाइन का सन्देश पढ़ा और एक मुस्कान तेरी गयी उनके चेहरे पर.

"यार संजीव, पेग पीने का बड़ा मैं कर रहा है. तू तोह पीयेगा नहीं लेकिन मुझे एक लगवा दे और घर छोड़ दे.", लकी अरोरा बहार स्कूटर पर बैठा सिग्रेटे का काश लगा रहा था. रात के 10 बजे दोनों इस सुनसान सी पार्किंग में लगे पब्लिक टेलीफोन के पास थे.

"तू पेग बना दोनों के लिए और बस मुझे बस एक और फ़ोन करना है 2 मिनट बाद.", संजीव ने स्कूटर की डिक्की से एक ग्रीन लेबल का अद्धा निकलते हुए कहा. वही एक ठन्डे पानी की बोतल, प्लास्टिक के 2 गिलास, सोडा और आलू भुजिआ का पैकेट भी उन्होंने स्कूटर की लम्बी सीट पर रख दिए.

"भाई तू तोह तैयारी के साथ आया है. पहले नहीं बोल सकता था एक हमको रात काली करनी है?", लकी ने दोनों गिलास में शराब, फिर सोडा और पानी डालते कहा. लेकिन संजीव भैया फिर से उस बूथ में जा कर सिक्का डालने के बाद नंबर मिलाने लगे. 2 घंटी जाने के बाद फ़ोन उठाया गया दूसरी तरफ से.

"संजीव 7-8", संजीव ने बस इतना कहा

"कमलकांत पंडित जी", दूसरी तरफ से भी परिचय मिला

"आप सबूत उठा सकते है अभी. ##### के चौक पर आपको 11 बजे मेरा व्यक्ति मिल जायेगा. बस अपना वादा याद रखियेगा. पंडित जी की बात पूरी होनी चाहिए.", संजीव ने ये बात ऐसे लहजे में कही थी की कमलकांत के कानो में सीसा पिघल आया हो.

"दोनों का एनकाउंटर. याद है. धन्यवाद्." और दोनों तरफ से 30 सेकंड बाद फोनेलिने कट कर दी गई थी.

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"भाई यार क्या ज़िन्दगी है साली? दिन भर ड्रामा चलता रहता है लेकिन कभी ये काम और कभी वो काम. और साला तेरा ठीक है पत्नी भी मिल रही है तोह पुलिस वाली.", एक घंटे बाद दोनों हे दोस्त 3-3 पेग लगा चुके थे. शराब का अद्धा खाली होने के बाद लकी उसको सड़क के बीच ले जा कर रखता हुआ बोलै. संजीव बस चिरपरिचित अंदाज में मुस्कुराता हुआ सिग्रेटे का धुआं उड़ने में लगा था.

"ाची भली तोह ज़िन्दगी है यार. परिवार है, ाचे दोस्त है और प्यार भी है. हाँ होने वाली अगर पुलिस अफसर है तोह ये भी फायदे की बात हे तोह है.", संजीव की बात सुनता लकी स्कूटर के पायदान पर बैठा उस कांच के अद्धे को हे देख रहा था.

"यार बहनचोद माँ चूड़ी पड़ी है साली. 1 साल ट्रेनिंग के बाद सोचा था के लाल बत्ती की जिप्सी में घूमेंगे लेकिन पिछले 4 साल से अंडरकवर का तमगा लिए इस स्कूटर पर ज़िन्दगी गुजर रही है. इस I.G. निर्मल सिंह की माँ को छोड़ू, बहनचोद क्या बना के छोड़ दिए साले ने.", लकी अरोरा परेशां था और आज 3 पेग ने हे उसको अपनी गिरफ्त में ले लिए था. संजीव ने एक खाली गिलास में पानी डालने के बाद कुछ पाउडर सा डाला तोह थोड़ी झाग ऊपर आई. गिलास लकी के सामने करते हुए उसने बोलना शुरू किआ. लकी ने भी एक सांस में वह खींच लिए था.

"देख भाई, ये ऑपरेशन पूरा हो हे गया है आज रात. फिर कल तुझे तेरी पोस्ट मिल जाएगी, ले लिओ मजे जिप्सी के तू भी. मेरा तोह अभी कुछ पता हे नहीं की आगे कोनसा काम मिलने वाला है.", संजीव बात ख़तम करने के साथ हे लकी का मुँह धुलवाने लगा जो उलटी करने के बाद बेहतर महसूस कर रहा था. फिर दोनों ने हे चेहरा धोया और इस बार लकी के पेजर की बीप सुनाई दी. उसने बिना देखे हे वह संजीव के सामने कर दिए. दोनों हे मुस्कुरा दिए और एक बार फिर टेलीफोन बूथ में खड़ा संजीव सिक्का डालने के बाद नंबर दबाने लगा.

"सभी का बैकअप लिए था कमलकांत को देने के बाद?", हलकी आवाज में सामने वाले से संजीव ने पुछा

"जी सर, जैसा आपने कहा था. फाइल में भी लगा दिए है और यादव सर जीप से आपके पास आने हे वाले होंगे. जय हिन्द"

"जय हिन्द."

.

.

इधर इतनी हे देर में पुलिस की गश्ती जिप्सी से उतर कर एक हवलदार ने लकी की गर्दन पकड़ ली थी.

"अरे बहनचोद पुलिस की गाडी के नीचे बोतल फोड़ता है? तेरी माँ का मारु", लेकिन पीछे से एक हाथ जब इस हवलदार की गर्दन पर कस गया तोह उसने गाला छोड़ते हुए इस व्यक्ति की तरफ देखा.

"तमीज से भाई साहब, तमीज से.", संजीव ने गर्दन से पकड़ ढीली करने के बाद उस हवलदार से कहा. इतने में हे एक 2 सितारा पुलिस वाला भी गैप्से से उतर कर 2 सिपाही लिए उनकी तरफ आ खड़ा हुआ.

"तू िब तमीज सिखावेगा के म्हणणे. अरे दयाल पकड़ इन शराबिया ने आरर दाल गाडी के भीतर.", इस S.I. ने भी शायद ज्यादा हे चढ़ा राखी थी लेकिन था तगड़े शरीर का और रोबीला. उसकी बात पर वह दोनों हे सिपाही आगे बढे लेकिन हवलदार ने उन्हें रोकने का इशारा किआ फिर भी वह दोनों संजीव और लकी की ब्याह पकड़ के खड़े हो गए.

"पब्लिक प्लेस पर दारु पीने के बाद पुलिस की सरकारी गाडी को नुकसान पहुंचाया और S.I. इस बदतमीजी का चरगा लगा के रात भर ठुकाई करूँगा न सालो की तोह baap-daade पाँव पकड़ेंगे लेकिन बहनचोद छोड़ूंगा नहीं. ले चलो रे इन्हे.", जरुरत से ज्यादा हे बोल गया था ये पोलिसवाले शराब और वर्दी के घमंड में.

"जनाब.", हवलदार ने इतना कहा हे था की एक और जिप्सी वह आ कर रुकी.

"तेरी तोह रात हे खराब है चोर्रे. और भी आशिक़ आ गए तेरी गांड मरने क लिए.", दांत दिखता वह संजीव की ठुड्डी पकड़ते बोलै लेकिन गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ते हे साड़ी हंसी गायब हो गई थी इस Sub-Inspector की. दोनों तरफ हे काली वर्दी में गनमैन खड़े थे और थप्पड़ लगाने वाला ये तगड़ा सा अधेड़ उम्र का आदमी एक सफ़ेद कमीज और पतलून में था जिसके चेहरे पर जहां भर का गुस्सा था.

"सर, जय हिन्द. ये दोनों लोग सर हल्ला कर रहे थे और इन्होने हवलदार से बदसलूकी की तोह मैं ...."

"सुरिंदर सफाई पसंद नहीं मुझे गलती करने पर. अपने से बड़े अधिकारी की गर्दन पर हाथ रखने की सजा जानते हो.?", कड़क आवाज में इन जनाब ने उसकी बात बीच में हे काट कर कहा और फिर संजीव को सलाम करते हुए एक फाइल अपने साथ आये दूसरे व्यक्ति से लेते हुए आगे कर दी. सुरिंदर नाम के उस पोलिसिये की तोह हवा ख़राब हो गई थी ये देख कर की दसप क्राइम ब्रांच इस लड़के को सलूट कर रहा था.

"सर, ये पूरी फाइल है. रिकवरी और बाकी सबूत आपके ऑफिस पंहुचा दिए है. कमलकांत ने धन्यवाद् कहा है आपको."

"यादव जी आप बेहतरीन अफसर है. पता नहीं क्यों सिस्टम आपको पूरी पावर नहीं देता लेकिन मैं बात करता हु I.G. सर से सुबह हे. कोशिश रहेगी की लक्समन और आप ये डिस्ट्रिक्ट संभाले." संजीव वह फाइल लेकर स्कूटर की डिक्की में रखने लगा तोह यादव जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

"सही बात है यादव जी, मतलब 24 शातिर अपराधियों का एनकाउंटर करने वाला और 3 बार गोली खाने के बाद भी हमेशा ड्यूटी पर रहने वाला व्यक्ति क्राइम ब्रांच में बिना रिवॉल्वर? मैं तोह चाहता हु आप हे मुझे लीड करना और राइड मारना सिखाये.", लकी अरोरा ने उन्हें गले से लगते हुए कहा और सुरिंदर ये सब देखने के बाद सर झुकाये खड़ा था. वह दोनों सिपाही अभी भी सदमे में हे थे जैसे.

"कहा सर. आप लोगो को मैं राइड करना कैसे सीखा सकता हु? आपने हे तोह ये टीम बना कर मुझे काम पर लगवाया. 2 महीने ससपेंड रहा और 4 महीने रहने वाला था लेकिन आपकी वजह से डिपार्टमेंट में वापिस वर्दी और इज़्ज़त्त मिली है. और इनका क्या करना है, सर.?", यादव जी ने हाथ जोड़कर पहले तोह दोनों का धन्यवाद किया फिर सख्त आवाज में सुरिंदर और बाकी पुलिस वालो की तरफ देखते हुए कहा.

"पब्लिक प्लेस पर दारु पीकर अपने से बड़े अधिकारी की गर्दन पकड़ना और अपशब्द कहने पर क्या कानून है संजीव भाई.?", लकी की बात पर संजीव हँसते हुए स्कूटर पर बैठ गया.

"इसको टेलीफोन सेल में लगा दो यादव जी. बात करना सीख जायेगा और बाकी सबको कल से S.P. लक्समन अरोरा की ड्यूटी पर.", संजीव ने हँसते हुए स्कूटर की किक लगते हुए कहा तोह लकी भी मुस्कुराता हुआ उसके पीछे बैठ गया. यादव जी हाथ हिलाते हुए उनको जाते देखने लगे.

"सुरिंदर देख लिए इनका दिल? वर्दी उतार सकते थे तुम्हारी लेकिन सिर्फ महकमा बदल कर गए है. वो भी कुछ सोच कर और तुम्हारी भलाई के लिए. अब निकलो तुम सब और फैक्स मिल जायेगा थाने में कुछ देर बाद तुम्हारी ड्यूटी का.", अपने गनमैन और बाकी लोगो के साथ जिप्सी में बैठ कर दसप यादव भी वह से निकल लिए.
 
अपडेट 57

वो कौन थी?


पूरा घर शांत था और सभी अपने कमरों में सोये थे. अर्जुन प्रवेश द्वार को टाला लगाने के बाद पानी की बोतल लिए हलके कदमो से तीसरी मंजिल की छत्त पर जा रहा था. संजीव भैया ने आज रात घर नहीं आना था जैसा वह बोल कर गए थे घर से निकलने से पहले. ताईजी ने जरूर अर्जुन से पुछा था रात को उसके कमरे में आने के लिए लेकिन अर्जुन ने मन कर दिए था क्यों की ताऊजी आज घर पर हे थे और ये सब करना खतरनाक भी था.

कोमल दीदी के साथ रूपाली सो गई थी और ऋतू दीदी अपनी माँ के साथ उनके कमरे में थी. एक बार तारा की तरफ नजर मारने के बाद हे अर्जुन नीचे गया था टाला लगाने के लिए. तारा भी आज जल्दी सो गई थी, कुछ थकान और कुछ शायद मासिक चक्र की वजह से. छत्त पर आने के बाद हलकी ठंडी हवा से उसका मैं प्रसन्न हो गया था. सब और शांति चाय थी, साफ़ आसमान में आज भी चाँद नदारद था. छत्त के बीच में हे 2 गद्दे बिछाये हुए माधुरी दीदी एक पतली निघ्त्य पहने हुए अर्जुन का हे इन्तजार कर रही थी.

"आपको देख कर लगने लगा है कही हम दोनों हे बहक न गए हो.", अर्जुन बोतल जमीन पर रखते हुए उनके पास हे आ बैठा तोह माधुरी दीदी अपनी भरी कूल्हे उठती हुई उसकी गॉड में आ बैठी.

"मुझे पता है लेकिन ये आग बहोत बढ़ सी गई है अर्जुन और मैं कोशिश करुँगी इसको कम् करने की लेकिन बस मेरी ये वाली इत्छा भी आज रात पूरी कर दे.", अर्जुन की जांघो में अकड़ते उसके लुंड पर अपनी गांड को रगड़ती वह होंठो से होंठ मिला रही थी. पतले कपडे के अंदर अकड़े हुए उनके निप्पल अर्जुन की नंगी छाती पर जैसे चुबने लगे थे. एक जेर्सी गाये से गदराई और सुडोल माधुरी सच में हे एक ऐसी युवती थी जिसको बस एक जंगली घोडा हे संतुष्ट कर सकता था. किसी देसी सांड की बारीक तलवार ऐसी गाये को गर्भवती तोह कर सकती थी लेकिन संतुष्ट नहीं.

"तभी तोह मैं यहाँ आपके पास हु दीदी. सच कहु तोह आपके ये कूल्हे हैं भी जानलेवा. पहली बार हे मेरा दिल इनपे आ गया था लेकिन तब मुझे पता नहीं था के आप कभी इस तरह का सेक्स पसंद करेंगी या नहीं.", उनके कूल्हों का मांस अपने पंजो से बहार की तरफ दबाते हुए अर्जुन ने उनके पहले गाल अपने होंठो से चूमने के बाद कहा. वह निरंतर उनके कूल्हों को फैला रहा था. माधुरी दीदी ने अपने लम्बे बालो को सिर्फ के रबर से बंधा हुआ था सर की तरफ से. नीचे कमर तक लम्बे उनके बाल खुले थे.

"लेकिन पहले एक बार आगे से..", माधुरी दीदी इतना बोल पाई थी की अर्जुन ने उनका वह एक मात्रा झीना सा परिधान शरीर से निकल कर एक तरफ रख दिए. खजुराहो की मूरत से उनके वह साधारण से कहीं बड़े दूध के कलश निर्वस्त्र उसकी आँखों के सामने थे. पूरे गोल और दोनों हाथ में एक भी न समां सके इतने विशाल चुके थे माधुरी के. दोनों हाथ से उनका अगला भाग पकड़ कर एक छोटे मटर के दाने सामान निप्पल को मुँह में भरते हुए अर्जुन पीने लगा और वैसे हे दूसरे वाले को ungli-angute से मसलता माधुरी की वासना को और हवा देने में लग गया था. नंगे कूल्हे लगातार उसके फौलादी लुंड पर घर्षण कर रहे थे और माधुरी खुद अर्जुन का सर अपने उस बड़े सतांन पर दबती सिसकियाँ ले रही थी.

"दीदी, जब इनमे दूध भर जायेगा तोह ये और बड़े हो जायेंगे. आपकी माप की ब्रा नहीं मिलने वाली फिर.", अर्जुन ने दूसरे सतांन को पीने से पहले उनको छेड़ते हुए कहा तोह वह मुस्कुराती हुई बस अपने होंठ काटने लगी थी..

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"आठ.. तब भी मैं इन्हे तेरे हे मुँह में भरूंगी रे. उम्म्म्म.. मुझे भी उस चुदाई का मजा लेना है.. आठ.. जब इनसे दूध टपके और उम्म्म.. तू इन्हे दबाता पीछे से मेरी जम्म के चुदाई करे.. ", उनकी ऐसी बातें सुनकर अर्जुन भी अपना सैय्याम खो कर अब अकेले एक सतांन को दोनों हाथो से दबाता पीने में जुट गया था. इस निप्पल को वह हलके हलके काटने लगता तोह दोनों तरफ टाँगे किये बैठी माधुरी अपनी छूट को और अंदर दबती 'सीई' की मदहोश आवाज निकलने लगती.

"पहले ये खम्बा बहार निकल.", एक तरफ हटने के बाद माधुरी दीदी ने खुद हे अर्जुन का पजामा खींचते हुए उसको निर्वस्त्र किआ. वह भी सीधे पाँव पसरे हाथो को गद्दे पर तिकया 120 डिग्री के कोण सा बैठा था लेकिन निर्वस्त्र होते हे 90 डिग्री की मुद्रा में आसमान की और सूपड़ा किये उसका वह साढ़े 8 इंच से भी ऊपर, फूला हुआ लुंड भयंकर दिख रहा था. माधुरी ने अपने छोटे भाई के इस असाधारण अंग को जड़ से पकड़ा और गौर से देखने लगी.

"ये पहली बारी से कही मोटा और लम्बा लग रहा है. अब तोह जैसे ये खाल में समता हे नहीं होगा.", अपनी हथेली को उसके ऊपर चलती वह देख रही थी की सूपड़ा इतना मोटा था जैसे पका हुआ बड़ा टमाटर हो. हाथ पर सख्त लुंड पर उभरी हुई नस्से भी महसूस हो रही थी. कैसे वह इतना बड़ा मूसल ले गई थी इस बात को याद करती खुद हे अपनी छूट पर ऊँगली फेरने लगी. लेकिन छूट के फैले हुए होंठ मुक्कम्मल बता रहे थे जो भी उन्होंने सहा था.

"पता नहीं दीदी. मुझे तोह वैसा हे लगता है जैसे पहले था बस आजकल जल्दी और ज्यादा खड़ा होने लगा है.", अर्जुन ने उनका दूध कास के दबाते हुए दीदी को अपने ऊपर खींचते हुए कहा.

"एक मिनट तोह रुक जरा.", माधुरी ने पास में राखी प्लाटिक की छोटी शीशी से तेल को अर्जुन के सुपडे पर टपकते हुए कहा. ये शीशी अर्जुन को ललिता जी ने हे दी थी रोज एक बार मालिश करने के लिए. तेल टपकने के बाद उसको हाथो से मसलती वह फिर खुद हे अपने कूल्हे निचे झुकाती सुपडे पर बैठने लगी थी. एक पल को छूट के होंठो पर उसकी मोटाई और गर्मी को महसूस करती वह अर्जुन के कंधे पकड़ती रुकी लेकिन फिर एक झटके से नीचे हो गई.

"आह्ह्ह्ह.. माआआआ.. मर्डर गई री...", दहकता हुआ वह लुंड आधे से अंदर छूट की गहराई में गायब हो गया था लेकिन हर बार उसको अंदर लेने में ये परेशानी तोह होती हे थी. गले से हलकी सी कराह निकलती वह कांपते पंजो के साथ अर्जुन के कंधे पर सर टिकती रुक गई थी. लेकिन फिर एकदम से सारा भार नीचे को लाती वह अर्जुन की गॉड में हे बैठ गई. 8 इंच लुंड उनकी मुलायम गरम छूट में धंस चूका था और जितना बचा था वह उनके नरम मॉटे कूल्हों की गहरी खाई में बच गया था.

"सच कहती हो आप.. आह.. मेरा हे ये मोटा हो गया है थोड़ा. आपकी छूट कितनी गीली है अंदर से लेकिन सख्ती से मेरे इसको दबोचे हुए है. आह.. दीदी.", अर्जुन उन्हें बाहों में लिए अपना मुँह उन विशाल चुचो पर टिकाये उनकी छूट की गर्मी का मजा अपने लुंड पर लेने में लगा था. गदराई और भारी शरीर की युवती सही मायने में ऐसा भारी और मजबूत लुंड झेल सकती थी. किसी नाजुक पतली लड़की का तोह बेहोश होना तय हे था ऐसे लुंड के पहले वॉर पर.

"आह... उम्म्म.. खा जा रे इन निगोडो को. सारा दिन मेरी सीने में खुजली सी रहती है लेकिन जब तू इन्हे ाचे से निचोड़ता और पीटा है तोह 2-3 दिन आराम रहता है इन्हे. उम्.. माँ.. वैसे सच में तेरा ये घोड़े का हे है.. ऐसे तोह एक दिन ये सवा बिलांत को हो जायेगा तोह तुझे कुंवारी छूट मिलने से रही. पेट तक पहोच रहा है.. आह..", कंधे पर हाथ रखती माधुरी खुद हे अपने गांड ऊपर नीचे करने लगी, धीरे धीरे और अर्जुन दोनों bhari-bharkam चुचो को आपस में भिड़ा कर एक साथ हे दोनों निप्पल मुँह में लिए पी रहा था. एक अलग हे अनुभूति और नशा सा चा रहा था उसको और फिर एक हे सतांन को मुँह में भरने के बाद वह माधुरी दीदी की गांड को दोनों हाथो से फैलता अपनी ऊँगली उनकी गांड के छेड़ पर गाड़ने लगा. कूल्हे कितनी नरम और गुदगुदे थे माधुरी दीदी के जैसे वह सिर्फ नरम लचीला रबर हे लगा हो. माधुरी को भी अपनी गांड पर अर्जुन की उंगलिया मजा दे रही थी. अब वह सुपडे तक ऊपर उठती पूरा लुंड अंदर लेने लगी थी. तेल की मालिश हाथो की जगह छूट से करवाना अर्जुन और उसके लुंड को भी पसंद आया. इसके साथ हे हांफती हुई माधुरी अपने छोटे भाई के लुंड पर गिरती हुई तेज तेज साँसे लेने लगी थी. और छूट के अंदर बच्चेदानी तक भिड़ते लुंड पर गरम पानी का बहाव अर्जुन को भी महसूस हो गया था. दीदी झाड़ चुकी थी और उनकी छूट लुंड को जकड़ने के बाद फिर कुछ ढीली सी हो गई.

"हो गया?", अर्जुन ने उनका सर सहलाते हुए पुछा तोह माधुरी ने होंठ चूमकर मुस्कुराते हुए बस 'हां' कहा और फिर आराम से उसके खड़े लुंड पर से उतरने के बाद कुछ देर के लिए सीढ़ी लेट गई. अर्जुन भी उनके ऊपर झुकता दोनों स्टैनो का मर्दन कर रहा था और छूट के होंठो पर लुंड घिसता हुआ उन्हें चूम रहा था.

"ले इसको पीछे ाची तरह से लगा लेकिन उस से पहले मुझे तेरा ये साफ़ करने दे.", अर्जुन के हाथ में एक तुबे देने के बाद पानी की बोतल से पतला सा साफ़ कपडा गीला करने के बाद माधुरी दीदी ने अर्जुन के लुंड को 1-2 मिनट तक बड़े प्यार से साफ़ किआ. सुपडे को भी गीले कपडे से साफ़ करने के बाद अपना पूरा मुँह चौड़ा करती वह उस पर झुकती चली गई. मुँह पूरा भर गया था सिर्फ सुपडे को अंदर लेने भर से लेकिन वह कास के लुंड को पकड़ती अपना सर ऊपर नीचे करने में लगी रही.

"आह्हः.. स्सीइ.. दीदी.. आपने सीख लिए.. आह..", अर्जुन तोह मजे में कही और पहोच गया था और लुंड पर झुकी माधुरी दीदी के दोनों तरफ हाथ करते हुए वह हवा में झूल रहे उनके पपीते दबाता लुंड चूसै का सुख लेने लगा. जब लुंड का सूपड़ा थूक से पूरा नाहा कर चमकने लगा तोह माधुरी ने उसको बहार निकला. सांसें उखड़ी हुई थी और आँखों में हलकी नम्म. फिर अपना भरी पिछवाड़ा अर्जुन की तरफ घूमती वह तकिये पर सर टिका कर अर्जुन की प्रतीक्षा करने लगी.

"ये तुबे अलग सी है.", अर्जुन ने देख लिए था के ये वही तुबे है जो ताईजी की अलमारी में थी और यही लगवा कर उन्होंने अपनी गांड मरवाई थी.

"हाँ. ये माँ के कमरे से मुझे मिली थी और ऐसी हे तुबे मैंने एक फिल्म में देखि थी जिसको लगा कर लड़का लड़की की पीछे से चुदाई कर रहा था. शायद पापा भी माँ की करते होंगे.", अर्जुन उनकी बात पर मुस्कुराता तुबे को उनकी गांड के छेड़ से लगाने के बाद उसमे वह भरने लगा. आधी ऊँगली के लगभग वह ठंडी क्रीम जब गांड के सिकुड़े नरम छेड़ में उतर गई तोह थोड़ी सी क्रीम अपनी पहली ऊँगली पर रखते हुए वह थोड़ा आगे सरक आया. घुटनो के बल वह इस चौड़ी गांड के पीछे खड़ा हुआ अब अपनी ऊँगली से उस तंग छेड़ को महसूस करता खोलने लगा. मांस मुलायम था वह का और रबर जैसा भी. कुछ म्हणत के बाद पूरी ऊँगली गांड में अंदर बहार होने लगी और माधुरी खुद हे औंधे मुँह पड़ी अपने हाथ से छूट के होंठ सहलाती इसका मजा लेने में लगी रही. शरीर पर काम का बुखार चरम पर पहुँच गया था. अर्जुन ने वही क्रीम लुंड के सुपडे पर ाचे से लगाई और दोनों हाथो से गांड के कपट खोलते हुए अपने भयंकर सुपडे को उस दरार से गुजारते हुए बिंदी से छेड़ पर टिका दिए.

"दीदी, छेड़ को ढीला करो और हौंसला रखना.", उनकी गांड थपथपते हुए उसने चेताया तोह उन्होंने बस 'हूँ' कहा और हवा में उठे 40 इंच के कूल्हे स्थिर रखते हुए गांड का छेड़ ढीला कर लिए.

अर्जुन ने भी एक हाथ से दरार फैलाये हुए दूसरे से लुंड को जकड कर कमर का दबाव उस चिकने छेड़ पर बढ़ा दिए. Mutra-chedd जब उस चले को चूमता गांड में हल्का सा घुसकर रुका तोह माधुरी की धड़कन तेज हो गई. पीछे वाला उसका छेड़ इस कलाई से मॉटे लुंड को कैसे झेलेगा. वह यही सोच रही थी की सूपड़ा सभी रुकावट तोड़ता और गांड को फैलता हुआ अंदर उतर कर अटक गया. और गांड ने गर्दन दबा दी थी इस मॉटे लुंड की.

"कमीने कुत्ते.. आठ.. निकाल इसको बाहर मैं मर्डर गई रे.. निकाल.", माधुरी दीदी की आँखें एक बार तोह फ़ैल गई थी लेकिन अगले हे पल दर्द से तड़पती वह आगे को भागने की कोशिश करने लगी लेकिन अर्जुन ने उनकी कमर कास के पकड़ राखी थी जिस से वह बाल भर न हिल सकीय.

"शांत हो जाओ.. ये चला गया अंदर. अब और नहीं दुखेगा. बस ढीला करो", अर्जुन वैसे हे उनकी कमर को जकड़े हुए बोलै. माधुरी की गांड से खून की 3-4 बूँद गद्दे पर टपक चुकी थी लेकिन दोनों हे इस से अनजान थे अभी तक.

"एक बार इतना बड़ा अपने पीछे लेकर देख.. आह.. मैं हे पागल थी जो फिल्म का सन करवाने के चक्कर में अपने पिछवाड़े को फ़तवाने इस जंगली के नीचे आ लेती.. माँ.", भड़कती हुई भी वह गांड को ढीला करती फिर से तकिये में मुँह दबा के अर्जुन के अगले दर्द को देने की प्रतीक्षा करने लगी. लेकिन गांड के चले की खासियत यही होती है के वह एक बार सूपड़ा अंदर लेने के बाद आगे की अँधेरी गुफा में उतना नहीं दुखता. बेशक चला हे दर्द करता है हर बार लुंड लेते समय लेकिन ऐसी भारी कूल्हों वाली स्त्री हे गांड मरवा सकती है.

अर्जुन भी अब हौले हौले चिकने लुंड को आगे सरकने लगा था. गांड का चला भी अंदर को धंसता सा जाता जैसे जैसे ये गरम खंजर इस सख्त मक्खन में उतरता जाता. आधा लुंड अंदर करते करते अर्जुन की कनपटी पर भी पसीने की बुँदे आ चुकी थी. इतना कैसा लुंड पहले कभी किसी छेड़ में नहीं उतरा था. ऐसी हे दुर्गति माधुरी की हो रही थी, बेचारी की आँखों में आंसुओं की झरि लगी हुई थी और गांड में ऐसा दर्द की जैसे तजा जख्म पर किसी ने मिर्चे रगड़ दी हो.

"बस इतने से हे करूँगा." अर्जुन ने अब आराम से सुपडे को अंदर रखते हुए लुंड बहार खींचा और फिर वैसे हे अंदर तेल दिए. लेकिन क्रीम के बावजूद लुंड का ये हिस्सा हल्का दुःख रहा था, शायद गांड की कसावट और उसकी इतनी मोटाई से. तेल को पूरे लुंड पर गिरते हुए उसने ाचे से चुपड़ने के बाद फिर अंदर ठेला तोह इस बार मजे की सिसकारी निकली.

"आराम से कर न मैं भागी नहीं जा रही.. ाहीईई..", माधुरी ने याचना करते हुए कहा लेकिन अब लुंड के चिकना हो जाने से अर्जुन पर भी इस अध्भुत कसाव का नशा हो चला था. वह लगातार हलके धक्के लगता माधुरी दीदी की गांड का छेड़ ढीला करने में लग गया. 10 मिनट आधे लुंड से चुदाई करने के बाद पूरा उनके ऊपर झुकता वह दोनों बड़े गुब्बारे मुठी में भरते हुए कास के जड़ तक अपना मूसल अंदर थोक कर रुक सा गया.

"आह दीदी.. ये तोह बेहतरीन चुदाई है. मजा आ रहा है आपके यहाँ करने में.", निप्पल को रगड़ते हुए वह गहरी साँसे लेता खुद को ठीक करने लगा था. माधुरी उसके दैत्याकार शरीर को संभाले अब अपनी फैल चुकी गांड में इस मूसल की गर्माहट ले रही थी. अर्जुन का ऐसे उनका दूध दुहने का उपक्रम करना बड़ा आनंद दे रहा था. दूसरे हाथ की अपनी 2 उँगलियाँ उनकी छूट में दाल कर इस बार अर्जुन ने लम्बे धक्के लगाने शुरू किये.

"आह.. रे. दुखता भी ही.. आठ.. और मजा भी दे रहा है.. मसल ऐसे हे .. उम्म्म.. छूट को मसलता रह.. और फाड़ दे पिछले छेड़ को.. आह.", इन गहरे धक्को के साथ अर्जुन का इस तरह छूट को मसलना और एक उभार को दुहना अब माधुरी को भी ाचा लगने लगा था. वह भीषण लुंड उनके पिछले ांचुहे छेड़ को भरपूर खोलता सटासट अंदर बहार हो रहा था और अर्जुन कुशलता से बिना थक्के कमर हिलता उनपर चढ़ा हुआ था.

"आप पलट जाओ नहीं तोह सुबह उठ नहीं सकोगी, दुखते घुटनो की वजह से.. आह.", लुंड को जैसे हे उसने बहार खींचा 'पुक्क' की आवाज के साथ वह किसी छोटी गेंद सा सूपड़ा एक दर्द देता हुआ निकल आया.

"आह.. तू फिर यही दर्द देगा रे.", माधुरी दीदी तड़प कर सीढ़ी हुई तोह अर्जुन भी उन्हें करवट के बल करता पीछे आ चिपका. बिना मौका दिए एक बार फिर उसने अपना चिकना लुंड गांड की फांके फैलते हुए अंदर भर दिए. 'आह..... ये सचमुच सबसे मजेदार है." कमर को आगे पीछे करता वह उनके उभर बेदर्दी से मसलने लगा था. माधुरी को भी चाहत थी ऐसी हे जंगली चुदाई की और यही घोडा उनको ये सुख दे सकता था. जब इस बार फिर छूट ने पानी बहाया तोह सूपड़ा भी अंदर फूल गया था. गरम वीर्य की 5-6 पिचकारियां उनकी अँधेरी सुरंग में खाली करता वह कास के उनके नरम जिस्म से लिपट गया था.

"आह दीदी. आह्हः.. ", हुंकारता सा वह अपने अंडकोष तक उनकी गांड पर भिड़ा चूका था. वही माधुरी भी जैसे जन्नत में थी सब भूल कर और उसकी बहून में लिपटी वह अपनी साँसे दुरस्त करती अर्जुन के लुंड पर गांड चिपकाये पड़ी रही.. कुछ देर बाद हे अर्जुन ने जैसे लुंड खींचा तोह दोनों को होश आया.

"मार दिए रे तूने आज अपनी दीदी को. सच में गांड दुःख रही है और ये बहार निकाल कर जैसे तूने सुराख खोल कर छोड़ दिए हो. आह मेरी माँ.. प्यार भी कैसे इंसान से हुआ मुझे जो जान ले लेता है.", पेट पर हाथ रखती वह सीने के बल लेट गई थी. गांड से सफ़ेद पानी छूट की और बेहटा चादर पर रिस रहा था और दूसरी तरफ अर्जुन आसमान की और मुँह किये ननगा पड़ा था, आँखें बंद किये. दोनों बिना hil-hujjat के ऐसे हे लेते रहे. 2 आँखें ये सब देखती फिर वापिस नीचे चली गई.

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"माँ, ये यहाँ से गिला कैसे है?", ऋतू ने अपनी माँ की छाती पर बने दो गहरे गोल निशान देखते हुए पुछा. रेखा जी बस शर्म से गाड़ी जा रही थी अपनी बेटी की बात पर.

"इनमे अभी भी दूध आता है और जब ज्यादा हो जाये तोह फिर ऐसे कपडे खराब करने लगता है. रुक मैं थोड़ा खाली करती हु.", बिस्टेर के पास पड़ी कटोरी उठती रेखा जी ने बेटी से करवट बदल कर जब निघ्त्य की चैन खोल कर एक उभर बहार निकला तोह ऋतू खुद को रोक न पाई. ऊपर से उचक कर वह देखने लगी के माँ क्या करती है और क्या सच में अभी तक दूध आता होगा. फिर एक हलकी सी आवाज उस स्टील की कटोरी में हुई तोह ऋतू हैरान हो गई थी.

"आपके सच में अभी तक दूध आता है.", उसकी बात पर बस रेखा जी मुस्कुरा दी.

"दर्द भी होता है जब ज्यादा भर जाये.", सही में उनकी आँखे बंद हो जाती थी जब वह अपने हे सतांन को दबती दूध बहार निकलने की कोशिश करती. बचा मुँह लगा कर पीये तोह वह अलग बात होती है लेकिन ऐसे दबाना पीड़ादायक हे था.

"माँ, इधर देखो न.", ऋतू ने अपनी माँ को अपनी तरफ पलटते हुए कहा तोह कटोरी बिस्टेर पर एक तरफ रखती रेखा जी ने खाली आँखों से अपनी इस प्यार बेटी का चेहरा देखा. जीरो की रौशनी में दोनों maa-beti अप्सरा सी लग रही थी. ऋतू ने अपने कांपते हाथ से उनका वह निर्वस्त्र सतांन छुआ तोह हल्का करंट सा लगा उसको. लेकिन फिर कुछ सोचकर अपने होंठ उसने उस दूध की बूँद से सजे gulabi-bhoore निप्पल पर रख दिए. एक बार हल्का सा चूसा और मीठी बूंदे मुँह में आ गई. स्वाद अलग था और दूध से लेकिन ऋतू को ये ाचा लगा और वह भी अपनी माँ से चिपकती इत्मीनान से आँखें बंद कर अर्जुन की तरह हे उनका दूध पीने लगी. रेखा जी जो अभी तक किसी हलके सदमे में थी अपनी बेटी के इस समय भोले चेहरे को देख थोड़ी निश्चिन्त हो गई थी.

19 साल की लड़की अपनी माँ का दूध किसी छोटी बची सा पी रही थी. और माँ सिर्फ उसका सर सहलाती अपने आप हे लोरी सुनाने में लग गई, जो वह पहले ऋतू के साथ न कर पाई थी. ऋतू नींद के आगोश में ऐसे चली गई थी जैसे वह सच में कोई नवजात बची हो और फिर जब रेखा जी को लगा के दूध काम आने लगा है तोह उन्होंने खुद हे अपना दूसरा सतांन अपनी बेटी के मुँह में लगा दिए.

"ये शायद तेरे हिस्से का भी है मेरी बची. जब पैदा हुई थी तोह पीला न सकीय लेकिन भगवन ने फिर से जैसे मेरी छोटी सी पारी वापिस दे दी है.", ऋतू कभी अपने माँ के करीब नहीं थी लेकिन आज वह उनके सीने से किसी बची सी लिपटी नींद में दूध पी रही थी. रेखा जी की आँखों से 2 बूँद निकलती गिरी तोह नींद में हे ऋतू ने जाने कैसे उनका चेहरा साफ़ किआ और फिर अपना हाथ दूसरे सतांन पर रखती वैसे हे उसको चुभलाने के बाद शांत हो गई. रेखा जी भी गहराती रात के साथ अब चैन से आँखे मूंदे सो चुकी थी.
 
अपडेट 58

ननिहाल की और


कोई 4 बजे के आसपास हलकी ठंडक से माधुरी की आँख खुल गई. अभी आसमान में अँधेरा हे था लेकिन वह दोनों हे निर्वस्त्र थे. माधुरी ने अपने शरीर को हिलाया, खड़े होने की कोशिश में तोह रीढ़ की हड्डी के नीचे हल्का करंट सा लगा.

'आह. जानवर से ने पूरा शरीर नाकारा हे कर दिए.', हिम्मत करती वह कड़ी हो गई. बड़े चुचो पर हलकी हवा लगी तोह उनके रोये खड़े हो गए लेकिन इस सब को नजर अंदाज करती वह एक बार अपने कूल्हों पर हाथ रखने के बाद हलके कदम लेती दिवार की तरफ चल दी. कुछ देर दिवार पर हाथ रखने के बाद वह दिवार को पकड़ती नीचे बैठने का उपक्रम करने लगी. भरी चौड़े कूल्हे अगर इस समय उजाले में दीखते तोह किसी का भी दिल धड़कना रुक जाता, यक़ीनन. कोई 15-16 बार माधुरी ने यही किआ जैसे uthak-baithak कर रही हो.

"उम्म्म.. अब प्रियंका को यकीन हुआ होगा के अर्जुन कैसे प्यार करता है. आह.. यकीन करवाने के चक्कर में अपना काण्ड करवा लिए.. सी..", खुद से बात करती वह फिर गद्दे की तरफ आई और अपना वह गाउन पहन कर सोये हुए अर्जुन के होंठो पर एक चुम्बन करने के बाद चादर ुधा कर नीचे चली गई. सीढिया उतरने में भी पिछवाड़े के लहू लुहान छेड़ में तीस सी मचने लगती लेकिन हिम्मत से वह अपने कमरे में आ हे गई. एक कोने पर आरती सो रही थी और उसके साथ हे प्रियंका. माधुरी ने अलमारी से कच्ची निकल कर पहन ने के बाद गाउन निकल कर एक पुराणी ब्रा भी पहन ली. फिर टीशर्ट कमीज से खुद को ाचे से ढकने के बाद प्रियंका की बगल में हे लेट गई. चुदाई लम्बी हुई थी और शरीर भी दुःख रहा था तोह जल्द हे वह प्रियंका के साथ चिपकती सो गई थी.

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साढ़े 6 बजे के करीब अर्जुन सुबह की सैर और शास्त्री जी से मुलाकात करने के बाद घर आया तोह सीधा बाथरूम में घुस गया, बहार तार पर से टोलिया उठाने के बाद. उसके मामाजी ने आना था उन्हें लेना तोह वह तैयार हे रहना चाहता था. समय तोह पता नहीं था उनके आने का. फुहारे के नीचे खड़े होने पर भी घर के अंदर आती कार की आवाज सुनाई दे गई थी. मतलब संजीव भैया घर आ गए थे. जल्दी से शरीर साफ़ करने के बाद सिर्फ टोलिया लपेटे वह ऊपर अपने कमरे में दौड़ गया और उसको ऐसा करते रामेश्वर जी भी देख रहे थे.

"ये नई सुधरेगा कभी. पट्ठा गबरू हो गया लेकिन दिमाग से बैल हे है कौशल्या.", उनकी धर्मपत्नी जी तोह दूध फेंटने में लगी थी अपने इस पोते के लिए और बस मुस्कुरा रही थी. संजीव चुपचाप उनके सामने बैठा था और अपने दादा जी को हे देख रहा था.

"ाचा कौशल्या अंदर जाओ और अर्जुन वही आ जायेगा.", उनकी बात पर अब कौशल्या जी का चेहरा शांत हो गया था और वह बिना कुछ कहे अंदर चली गई.

"हाँ तोह मेरे लायक बचे बताओ फिर क्या खबर है.?", रामेश्वर जी भी उसके बराबर हे उठकर कुर्सी पर बैठ गए. संजीव ने शायद इधर आने से पहले हे दाढ़ी बनाई थी, जैसा रोज का हे नियम था और ऊपर से नीचे तक साफ़ सुथरे प्रेस किये कपड़ो और चमकते जूते बता रहे थे की अनुशाशन कूट कूट के भरा था.

"सुबह 5 बजे जेल से हॉस्पिटल ले जाते समय दोनों ने भागने की कोशिश की. एक सिपाही का कन्धा जख्मी करते हुए दोनों by-pas की तरफ दौड़ गए. पीछे भागते कमलाकांत और सुब इंस्पेक्टर की गोलियां पीठ में दिल की तरफ और दूसरे के सर पर लग गई. अँधेरा था तोह सावधानी से निशाना नहीं लग पाया. सरकारी हॉस्पिटल तक लाते समय हे दोनों ने दम टॉड दिए. पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट दोपहर बाद हे आएगी.", एक हे सांस में संजीव ने जैसे कोई ratti-rattaai रिपोर्ट पढ़ दी थी.

"वो ऐसे हे बनेगी. अब काम की बात बताओ. Lok-Dal और भान सिंह के बारे में.", एक बार आगे पीछे नजर दौड़ते हुए उन्होंने फिर संजीव के चेहरे की तरफ देखा.

"भान सिंह के फार्महाउस से 27 करोड़ का कॅश बरामद हुआ है, जिसमे से 9 करोड़ हे असली था. लेकिन किसी भी पैसे का हिसाब नहीं मिला है. साथ हे स्पेशल परमिशन से घर और guest-house की तलाशी में कुछ हथियार, तक़रीबन 31 किलो सोने के बिस्कुट, नेपाली मोहर वाले भी कल रात को रिकवर किये गए. कुछ कैसेटटे टेप, पैसो का len-den की फाइल्स और सबसे ख़ास चीजें जो मिली वह हैं बलात्कार का वीडियो कैसेट और 5 हत्याओं में प्रयोग हुए चाक़ू, देसी कट्टा और 2 लड़कियां. लड़कियों को रात हे डॉ गुलाटी की निगरानी में हॉस्पिटल भेज दिए गया है. रिपोर्ट थोड़ी देर तक मिल जाएँगी. वैसे कल शाम से हे वह नजरबन्द है अपने फार्महाउस पर लेकिन कोशिश करेगा वह गड़बड़ करने की.", संजीव इतनी बात करने के बाद शांत हो गया. अर्जुन उधर आया तोह दोनों को बैठे देख पहले अपने दादाजी से मिला और फिर भैया से गले लगता हुआ बोलै.

"आप घर का ख्याल रखना फिर मैं 4 दिन बाद हे आऊंगा.", भैया उसकी बात पर मुस्कुरा दिए और वैसे हे रामेश्वर जी भी.

"जी सर. जैसा आप कहे. ाचा अंदर दादी बुला रही है तुझे मैं भी आता हु वही.", संजीव भैया की बात सुनकर अर्जुन भी हँसता हुआ अंदर दौड़ गया.

"पता है के भान सिंह किसके पास जायेगा. लेकिन पहले खबर अखबार में डलवा दो फिर देखते है कोण सामने आता है. Police-Mantri या व्यापारी.", रामेश्वर जी ने हाथ में पकड़ा अखबार गोल कर लिए था. आवाज में हल्का गुस्सा था लेकिन वह धीमी हे थी.

"और छोल अंकल की तरफ से खबर?", संजीव ने अब अपने दादाजी से सवाल किआ.

"शंकर ने तोह पहले हे कह दिए था के हम उसको रोक नहीं सकेंगे. शाम को सतीश ने तार दिखा दिए था मुझको. बात अभी बहार नहीं आई है लेकिन मेजर कौशल के साथ हे लूटिनैंट अजीत सिंह की लाश मिली है उनकी रेजिमेंट को. पहली नजर में तोह यही सामने आया है की राइफल से कौशल के सर पर गोली मारी गई है और फिर सिंह ने अपनी 0.9 से खुद को शूट किआ. आईटी इस ान इनसाइड जॉब सो आर्मी विल नेवर एक्सेप्ट थिस एंड विल डेफिनाटेली मेक आईटी नक्सल अटैक." रामेश्वर जी का चेहरा खामोश और आँखें नम्म हो चुकी थी. संजीव भी हताश सा उनके चेहरे को देखने के बाद जमीन देखने लगा था. कुछ देर शांति बरकरार रही. फिर संजीव ने हलकी उत्तेजना में लेकिन धीमी आवाज में हे कहा.

"चाचा की इतनी अंदर तक पहोच है? और उन्हें क्या मिला ये सब करके? जान की कीमत क्या होती है नहीं पता जरा भी उन्हें. आपने रोकने की कोशिश नहीं की?", जवान था और पोलिसवाले भी, इसलिए इतना बोल गया. रामेश्वर जी शान्ति से अपने इस पोते के चेहरे पर उम्दा दर्द, गुस्सा और जज्बात देख रहे थे. फिर उन्होंने जो बात कही उसको सुनकर संजीव खुद शर्म से सर झुका के बैठ गया.

"उसकी पहोच hum-tum और पुलिस से आगे है. कोशिश की थी न लेकिन ट्रायल का कहने के बाद उसने तोह दोनों हे गायब कर दिए. और शंकर को जान की कीमत नहीं पता तोह वह सबसे काबिल चिकित्सक कैसे है? हाँ मेरा एक सुपुत्र और है जिसने अंडरकवर हे 20 कतल कर दिए है जिनमे एक तोह मेरे दोस्त का भतीजा भी था. कोई फरक नहीं है इस मामले में तुझमे और उसमे. परिवार के किसी की आँख में आंसू न तू देख सकता है न वह तोह फिर दोनों एक दूसरे को गलत कैसे कह रहे हो? तू मेरी तरह शांत और धैर्यवान है लेकिन हम दोनों से शांत शंकर है. जो बेदाग सफ़ेद कोट में कितने धब्बे छुपाये रहता है और चल तोह तू भी उसके कदमो पर हे रहा है. ये अकेलापन है न दिल का मेरे बचे, शराब और jinda-gosht इसको ठंडा नहीं कर पायेगा.", वह चुपचाप अपने कमरे की और चल दिए लेकिन संजीव उनकी बात sunn-ne के बाद गर्दन झुका कर उनके हर लफ्ज़ को दिल में उतरता रहा.

सच हे तोह कहा था उन्होंने की चाचा और वह एक हे जैसे तोह है. बस संजीव जिस्म को अँधेरे में अनजान लड़की के साथ ठंडा करता था और चाचा जिसको पसंद कर लेते थे उसके साथ. कतल दोनों ने हे किये थे और दोनों हे अपने हाथ साफ़ रखते थे. बस संजीव का नेटवर्क वैसा नहीं था जैसा उसके चाचा का था. 'इस बार ये जरूर सीखूंगा.', खुद से ितं कहने के बाद वह बाथरूम से मुँह धो कर अंदर आ गए जहा अर्जुन बस दूध ख़तम करने के बाद अलका और कोमल से बातों में लगा हुआ था.

"दीदी, नानी के घर से आप दोनों के लिए क्या लौ? आप बताओ मई पक्का लेकर आऊंगा. और फिर मैं वह से फ़ोन करके भी बताऊंगा के क्या क्या उधर मिलता है.", वह सही में खुश था आज घर से बहार अपने nana-naani के घर जाने को लेकर. कोमल दीदी उसके सर पर हाथ फेरती प्यार जाता रही थी वही अलका हंस रही थी.

"ये जमा हे बैलबुद्धि है. वह जो भी मिलता होगा वह तोह यहाँ भी होगा हे न. फिर वह तोह हम यहाँ भी ले सकते है.", अलका दीदी ने मुस्कुराते हुए ये बात कही.

"दीदी, जरूर मिलता होगा और शायद ाचा भी हो. लेकिन वह प्यार, वह एक दूसरे शहर की याद और जज्बात तोह नहीं आएंगे न सिर्फ ऐसे हे यहाँ से खरीदी हुई चीज में? वैसे भी हर शहर, जमीन और पानी का स्वाद अपने आप में हे अलग होता है तोह वह की भी कुछ ख़ास चीज होगी हे.", अर्जुन की इतनी गहरी बात पीछे खड़े संजीव भैया ने भी सुनी और वह उसके गले में हाथ डालते हुए बोले.

"वह की न चमड़े की जूती सबसे मशहूर है. और फिर है वह मिलने वाले लाख के बने खिलोने और चूड़ियां. लेकिन rabdi-jalebi जैसी वह मिलती है मैंने आजतक नहीं खाई कभी. और जब जंगल जाएगा न तोह लकड़ी के छोटे हिरण, मोर और बहोत हे खूबसूरत कलाकृत्य मिलती है. मेरे लिए तोह भूरे रंग की जूती, एक डब्बा rabdi-jalebi और सूती पाजामे कुर्ते का कपडा जरूर लेते आना. और दिल करे तोह जो तुझे पसंद हो जंगल से उसकी याद लेते आना.", संजीव भैया ने पहली बार अपने भाई का माथा चूमा था और अर्जुन ने भी उन्हें बैठ हुए हे गले से लगा लिए था. संजीव भैया फिर बिना कुछ कहे ऊपर अपने कमरे में चले गए सोने का बोलकर और दरवाजा बंद कर लिए था.

"ाचा फिर हमारे लिए भी तू लाख के कड़े और नोक वाली जूती लेते आना. मैं कागज़ पे पंजा चाप कर लेके आती हु. मेरा और ऋतू का भी.", अलका दीदी भाग कर ऋतू के कमरे में गई लेकिन वह वह नहीं थी. बहार आ कर उन्होंने ऋतू को आवाज भी लगाई लेकिन जवाब नहीं आया.

"वह अभी तक सो रही है अलका, जा उसको जगा दे मेरे कमरे से.", रेखा जी ने चाय का बर्तन साफ़ करते हुए कहा तोह अलका हैरानी से देखती उनके कमरे में चल दी जहा ऋतू अभी तक सिकुड़ी हुई सोइ पड़ी थी.

"मेरी जाएं..", अलका ने कान में सरगोशी की तोह ऋतू ने आँखें बंद किये हे मुस्कुराते हुए कहा.

"तू गाला क्यों फाड़ रही थी? नींद खराब कर दी न मेरी."

"ोये मैडम. साढ़े 7 बज चुके है और अभी अर्जुन ने चले जाना है. तू सोती रहियो और मई चली उसके पास. " अलका भागने लगी तोह हाथ पकड़ कर ऋतू ने बिस्टेर पर गिरा लिए.

"वह खुद यही आएगा देख लिओ. 2 मिनट बहार मत जा.", अपने साथ हे अलका को लिटटी ऋतू बोली और नीचे वाले हाथ से उसका एक उभार मसल दिए.

"कमीनी. सुधर जा कही भी शुरू हो जाती है. वैसे रात तू चाची के साथ कैसे सो गई.?", अलका ने भी अपने नीचे वाले हाथ से ऋतू का उभर हलके से महसूस करते कहा. दोनों हे चेहरे से शांत और एक दूसरी को देख रही थी.

"यार सच कहु तोह नींद तोह कल रात हे आई मुझे. सच में माँ के सीने से लगने के बाद कुछ याद हे नहीं रहा. 11 से 7 बजे तक तू खुद हे सोच मैंने करवट हे नहीं बदली.", ऋतू के चेहरे पर अलग हे चमक आ गई थी याद करके की कैसे वह साड़ी रात माँ से चिपकी दूध पीती रही थी. सुबह कोई 5 बजे के पास माँ ने उसके ऊपर चादर करते हुए खुद को अलग किआ था.

"अब ये भी बता दे की ये चमक की कहानी क्या है? चाची के चेहरे पर ऐसी चमक देखि है मैंने लेकिन तू तोह आज पहली बार उनके जैसे दिख रही है.", अलका कुरेदना चाहती थी लेकिन ये भी पता था के ऋतू कुछ नहीं छुपाती उस से. इधर अर्जुन दोनों के पाँव पकड़ कर खींचता हुआ बोलै.

"उठाने आई थी आप और फिर खुद इनके साथ सो रही हो. माँ देखना इन्हे दोनों को.", अर्जुन की बात पर ऋतू दीदी खिलखिला कर हंसने लगी वही अलका दीदी उसको पाँव छोड़ने को बोल रही थी. फिर अर्जुन ने भी हँसते हुए दोनों के पाँव छोड़ दिए और वही बैठ गया बिस्टेर के किनारे पर.

"तोह फिर कब आएंगे मामाजी?", ऋतू ने भी बैठ कर अपने कपडे ठीक किये और अर्जुन को हसरत भरी निगाहो से देखा.

"10 बजे. वैसे आप भी कपडे रख हे लो अगर मेरी बात मानो तोह.", अर्जुन ने भी गुजारिश की थी उनका मैं पढ़ते हुए.

"नहीं भाई. गर्मी की छुट्टियों में देखेंगे. और फिर अभी तू हे जा, हमको काम भी है बहोत. 3-4 दिन ाचे से अपने नोट्स और नेक्स्ट ईयर की बुक्स रिव्यु कर लेंगी हम दोनों.", ऋतू का दिल था अपने भाई के साथ कुछ पल बिताने का लेकिन अभी भी वह ऐसा समय सिर्फ अकेले में हे बिता सकती थी. बेशक प्रीती या अलका से कोई राज न छुपा था लेकिन ये तोह सहज होने की बात हे थी. अलका का भी दिल था की अर्जुन जाने से पहले उनके साथ रहे लेकिन वह भी खामोश हे थी.

"ाचा आप अब कड़ी हो जाओ और मैं बहार हे मिलता हु.", अर्जुन को ऐसे वह बैठना ाचा नहीं लग रहा था. और वह बिना कुछ सुने हे बहार निकल लिए.

"तुझे भी उसके साथ समय चाहिए था न.?", अलका की इस बात पर ऋतू भी मुस्कुरा हे दी.

"जब दोनों को हे वही चाहिए हो तोह एक हे समय में तोह मुश्किल हे होगा.", हलकी शर्म के साथ ऋतू ने ये बात कही लेकिन अलका के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई थी.

"जरा सोच तोह सही एक हे बिस्टेर पर तू, मैं और प्रीती अर्जुन के साथ. हाय."

"चुप कर कामिनी. कैसी बातें करने लगी है तू. मैं बाथरूम जा रही हु और तू मेरी कॉफ़ी बना ले इतने.", अलका की बात सुनकर ऋतू भाग हे गई थी.

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"दीदी, 3 सवाल हैं?", अर्जुन ने अलमारी ठीक करती माधुरी दीदी से इतना कहा तोह एक पल के लिए वह खामोश सी होती उसका चेहरा देखने लगी.

"आप पहले सवाल तोह सुन लीजिये. पहला. आपने छत्त पर खुद गद्दे लगाए थे और फिर मुझे पानी लेने नीचे भेजा. जबकि वह तोह पहले हे एक बोतल राखी थी. दूसरा. आप नीचे आ कर सो गई थी जबकि आपको शायद मेरे बाद हे आना चाहिए था. तीसरा. कौन है जो अब हम दोनों के बारे में जानता है."

तीनो हे सवाल सटीक थे और माधुरी का चेहरा नीचे झुक गया. वह कुछ कह न पाई बस कपडे पर अपनी उंगलिया उलझने लगी थी. वही अर्जुन शांत सा उनको ाचे से टटोल रहा था.

"मतलब ये हुआ की जब मैं ऊपर पानी लेकर आया तोह कोई और था जिसको इसकी जानकारी थी. दूसरा जवाब. आप नीचे आ गई पहले हे क्योंकि आपको भी पता था के मैं गद्दे ऊपर हे छोड़कर बहार घूमने चला जाऊंगा तोह शायद कुछ निशाँ पुख्ता मिल सकते है हमारे मिलान के. तीसरा. अलका, रूपाली और कोमल दीदी साथ सोइ थी, ऋतू दीदी माँ के साथ तोह बची Priyanka-Aarti दीदी जिसमे से आरती दीदी तोह कटाई ऐसी नहीं होंगी क्योंकि उन्हें मैं शायद सबसे बेहतर जानता हु. तोह आपने ये सब प्रियंका दीदी के साथ साँझा किआ. आप बड़ी है तोह आपने ये सब कुछ सोच के हे किआ होगा लेकिन एक पल भी नहीं सोचा के इस सबका परिणाम क्या हो सकता है?", अर्जुन के स्वर में न गुस्सा था न हे नाराजगी और वही माधुरी के आँखें हलकी दबदबा गई थी क्योंकि अर्जुन ने हर बात को स्पष्ट बता दिए था. बेशक माधुरी और प्रियंका के बीच पक्की दोस्ती और राज होंगे लेकिन ऐसे अर्जुन का उनसे सफाई मांग लेना एक तरह से विश्वास तोडना हे थे माधुरी का उसके लिए. अर्जुन फिर आगे कुछ कहे बिना बहार निकल गया जहा टेबल पर खाना लगा हुआ था.

'प्रियंका तेरी जिद्द ने ये क्या करवा दिए? खुद हे अपने छोटे भाई की नजरो में गिर गई मैं.' माधुरी की आँखों से वह रुके हे आंसू किसी नदी की तरह बहने लगे थे और वह बिस्टेर के किनारे अपना चेहरा हाथो में लिए बैठ गई थी. अब खुद उन्हें बुरा लग रहा था के जरुरत से ज्यादा करना कितना गलत होता है. प्रियंका कुछ देर बाद अंदर आई तोह माधुरी की आँखों में आंसू देख दरवाजा बंद करती उनके सर पर हाथ फेरने लगी.

"क्या हुआ?"

"अर्जुन को सब खुद हे पता चल गया और अब उसकी नजरो में मैंने उसका विश्वास टॉड दिए है. मेरी भी गलती है प्रियंका जो मैंने इस हद्द तक हम दोनों को तेरे सामने नंगा कर लिए की अब सच में हे खुद पर घिन्न आ रही है. तू हे राजदार थी न मेरी और सब देखना था न, तोह अब जा और फिर सब तू हे ठीक कर. अर्जुन रूत गया तोह मैं जानती हु वह फिर मुझे अपने करीब कभी नहीं आने देगा.", लगभग प्रियंका को बहार धकेलते हुए माधुरी ने कहा और तकिये में मुँह दबती वह लेती गई. प्रियंका का तोह चेहरा पीला पड़ गया था अर्जुन का सामना करने की सोच कर हे. वह कैसे खुद जा कर क़बूल करे की वह देखना चाहती थी की अर्जुन उसके साथ वह सब करेगा तोह वह सेहन कर पाएगी या नहीं? कैसे कहे की वह प्रथम मिलान का दर्द देखना चाहती थी जिसके लिए उसकी सबसे ख़ास बहिन और दोस्त ने अपना पीछे का रास्ता सिर्फ उसकी ख़ुशी के लिए खुलवा लिए था.? वह अर्जुन की नजरो का सामना नहीं कर पायेगी... फिर कुछ सोचती हुई प्रियंका बहार निकली और ऋतू के कमरे से एक कागज़ पर कुछ लिखने के बाद खाने की टेबल तक आ कड़ी हुई.

अर्जुन तोह बिलकुल स्वभावी रूप से बैठा hansta-bolta खाना खा रहा था और उसके साथ हे बैठी ऋतू कॉफ़ी पी रही थी. आज वह रूपाली खाना खिलने में लगी थी और ललिता जी के साथ कोमल दीदी खाना बना रही थी. प्रियंका ने हिम्मत दिखते हुए सीधा अर्जुन के पास जा कर वह पर्ची सामने कर दी.

"ये सामान ला देगा अर्जुन मेरे लिए, जरुरी है.", अर्जुन ने भरपूर निगाह उस एक लकीर पर डाली. '5 मिनट के लिए अपने कमरे में मिलो खाने के बाद, रिक्वेस्ट है.'

"हाँ ला देता हु दीदी. बस मेरा खाना हो गया है तोह मैं बस बहार हे जा रहा हु.", अर्जुन ने आखिरी गराई मुँह में डालने के बाद प्लेट सरका दी रूपाली की तरफ. इधर ये दोनों अनजान थे उस शख्स से जिसका नाम अलका था. अलका ने प्रियंका दीदी को वह थोड़ा सा फटा हुआ कागज मुट्ठी में बंद कर बहार निकलते देख लिए था और प्रियंका के वह से जाने के बाद सीधा अंदर चल दी जहा वह खुली रफ़ नोटबुक डेस्क पर राखी थी और एक पेन खुला हुआ वही पड़ा था. ज्योमेट्री से जल्दी से पेंसिल निकल कर अलका ने फाड़े गए पैन के पिछले पैन पर उसी जगह पेंसिल को चलाया तोह एक लाइन उभर आई '5 मिनट के लिए अपने कमरे में मिलो खाने के बाद, रिक्वेस्ट है.' और इसको पढ़ने के बाद वह मुस्कुराती हुई ऋतू के पास आ बैठी जहाँ न अर्जुन था और न प्रियंका.

"जल्दी चल मेरे साथ बहार वाले रस्ते से ऊपर.", कान में हौले से उसने इतना कहा तोह ऋतू की आँखे भी चमक गई. दोनों हे आराम से गलियारे से बहार आ निकली.

"क्या चक्कर है ये प्रियंका और अर्जुन का?", ऋतू ने ये सवाल किआ तोह अलका ने होंठो पर ऊँगली रखते हुए आँख मार दी.

"चुप रहियो. और चप्पल यही उतार दे." अलका की बात पर ऋतू ने भी वैसा हे किआ और ये दोनों जेम्स बांड कुछ हे पल बाद अर्जुन के दरवाजे से एक तरफ कदम करती दवराजे पर हे कान लगाए थी. पाँव इसलिए दूर किये थी वह अर्जुन की नजर परछाई पर पड़ सकती थी.

"अर्जुन, माधुरी को मैंने हे कहा था ये सब करने के लिए. प्लीज मेरी बात समझ और उनकी बात का बुरा मत मान.", प्रियंका अंदर बिस्टेर पर बैठी थी और थोड़ी घबराई भी हुई थी. लेकिन अर्जुन बस आराम से बैठा था.

"आप क्या देखना चाहती थी ऐसे.?"

"वह मैं नहीं बता सकती लेकिन इतना वादा है के ये बात कभी मेरी जुबान पर नहीं आएगी. मेरी उत्सुकता थी बस देखने की. माधुरी की इसमें गलती नहीं है मैंने कसम दी थी तोह वह बड़ी मुस्खिल से राजी हुई थी."

"दीदी, आप जितने पूरा सच नहीं बताएंगी मैं कुछ कहने वाला नहीं और फिर एक घंटे बाद मैं चला जाऊंगा. आपके पास 2 मिनट है क्योंकि 3 ख़तम हो चुके.", अर्जुन ने कलाई घडी देखते हुए कहा तोह प्रियंका बिलकुल खामोश हो गई थी. सच बोलने के सिवा कोई रास्ता नहीं था उसके पास और झूठ अर्जुन पकड़ हे लेगा. जैसा उसने देख हे लिए था के माधुरी कैसे फस्स गई थी.

"मैं.. मैं.. मैं तेरे साथ करने से पहले देखना चाहती थी की ये सब कैसे होता है और कितना दर्द होता. माधुरी ने मेरे कहने पर हे पीछे से करवाया था क्योंकि आगे से पहले हे हो चूका था. और उसने ये भी कहा था के इतना हे खून निकलेगा जितना मुझे चादर पर दिखेगा. और यही सब सच है. इसके बाद मैं तेरी नजरो में गिर जाउंगी लेकिन मैं माधुरी से इतना प्यार करती हु की मुझे ये मंजूर है.", सब बात ख़तम करने के बाद प्रियंका सर झुका के वही बैठ गई थी.

"आपको पता है न की मैं किसी को दुःख नहीं दे सकता और फिर आप बहिन हो मेरी, बड़ी. ये बात जिस तरह से हुई है वैसे इसका गलत हे मतलब निकलता है न.? आप खुद आई थी मेरे पास लेकिन मैंने आपको उतना हे प्यार दिए था. कोई जबरदस्ती नहीं तोह फिर जब आप यही मेरे साथ करना चाहती थी तोह मैं तब भी प्यार से हे करता. चलो कोई बात नहीं, समझदार लोगो से भी ऐसा हो हे जाता है. अब उनको बोल देना की इस बार वह देखेंगी और उनकी जगह आप होंगी, अगले रविवार उस जगह वैसे हे रात में.", अर्जुन ने प्रियंका का चेहरा ऊपर करके आराम से होंठ चूमने के साथ हे उनका बड़ा उभार दबा दिए. प्रियंका इतने में हे सिसक गई और बहार कड़ी अलका के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई.

"अर्जुन तू अंदर है क्या? चची नीचे बुला रही है.", और दोनों नीचे भाग गई. इधर प्रियंका भी शर्माती हुई पिछले रस्ते से बहार चली गई तोह अर्जुन हँसता हुआ अपनी अलमारी से पर्स और पैसे लेने लगा. संजीव भैया का दरवाजा हलके से धकेला तोह वह बंद हे था. उन्हें सोया छोड़ कर वह बहार से हे नीचे उतर आया.

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"जय हिन्द सर.", तेजपाल शर्मा ने बैठक में अंदर आने के बाद रामेश्वर जी को सलाम करते हुए कहा. छोल साहब भी उनके साथ हे बैठे थे.

"आओ भाई पहले आराम से बैठो. ये अपना घर है और मैं रिटायर्ड आदमी हु. रिश्तेदार हो अभी तुम तेजपाल, हाँ अगर गिरफ्तार करने आये हो तोह भाई इज्जत मत दो.", व्यंग से रामेश्वर जी ने उनका स्वागत करते हुए बैठने को कहा तोह छोल साहब ने कास के उनसे हाथ मिलाया और सोफे पर अपने पास हे बैठने को कहा. अपनी टोपी को वही टेबल पर रखते हुए तेजपाल जी भी बैठ गए.

"अंकल जी आपको देखने के बाद हाथ खुद हे सलाम के लिए उठ जाता है. आप रिटायर हो चुके है ऐसा तोह आज भी नहीं लगता.", छोल साहब भी इस बात पर मुस्कुरा उठे.

"भाई ये बात तोह सौ आने सही कही. भाई साहब हर दूसरे तीसरे दिन हे शहर का दौरा करते दीखते है. जैसे आजतक सभी फाइल और केस वही चल रहे हो जो 10 साल पहले इन्होने छोड़े थे.", तीनो हे लोग मुस्कुरा दिए थे.

"वैसे अंकल जी, अब सबसे अनुभवी और दक्ष है ये अपने काम में की खुद आला अधिकारी कहते रहते है के हम लोग इनके जैसे बन्न नहीं पाएंगे. जो maan-dand आप बना कर गए है असल में तोह वही लक्ष्य सा है हर अधिकारी का.", तेजपाल की लफ्ज़ो में साफ़ प्रशंसा और आदर था. जिसको ये दोनों बुजुर्ग मान भी रहे थे.

"देखो यार तेजपाल, ये खुद हफ्ते में 6 दिन कैंट में जाता है और मुझे व्यस्त कहता है. वैसे आज भी कोई खबर चल रही है शायद.", रामेश्वर जी की बात से तेजपाल के मुस्कुराते चेहरे पर गंभीरता के बाव आ गए थे.

"जी अंकल. जो हुआ है वह एक तरह से सही हुआ है. लेकिन लगता है के इस बार बात कुछ बड़ी और पेचीदा हे है. Jitender-Vishnu के जुर्म की दास्तान भान सिंह के घर से जुडी है और कुछ देर पहले 4 रिपोर्ट भी आई थी. खैर मेरे स्टेशन का इस से कुछ लेना देना नहीं लेकिन अपने कमलकांत जी सीनियर होने के साथ हे पुराने दोस्त है तोह उन्होंने मुझे भी सिविल हॉस्पिटल बुलाया था." तेजपाल थोड़ा चुप हुआ तोह छोल साहब ने उनका चेहरा देखा.

"वह अधिवक्ता बंसल की बेटी का रपे क्लियर हो गया है. साथ हे भान सिंह का दोनों के साथ रिश्ता भी एक फाइल ने खोल दिए है. पुलिस के 2-3 लोग भी थे जिन्होंने वारदात में इस्तेमाल हुए चाक़ू, काटते और बलात्कार के सबूत गायब करके भान सिंह के सुपुर्द कर दिए थे. कमलकांत का कहना है के वह सभी बेशक अभी गुमनाम है लेकिन कुछ अंडरकवर उनके पीछे लगे हुए है.", तेजपाल की बात पर रामेश्वर जी ने थोड़ी सी हैरानगी जताई.

"अंडरकवर? पोलिसवाले भान सिंह को सबूत भिजवा रहे थे?", उन्होंने ये बातें प्रश्नात्मक तरीके से कही तोह तेजपाल का चेहरा भी वैसा हे बना हुआ था.

"लेकिन अंकल जो बात मुझे पिछले 2 घंटे से सत्ता रही है वह इनसे अलग है. मैंने दोनों मुजरिमो की बॉडी देखि थी आज मोर्चरी में. जहाँ तक गोली का सवाल है तोह वह कोई रेगुलर सर्विस रिवॉल्वर की गोली नहीं थी. जर्मन प7 semi-automatic पिस्तौल हे ऐसे मार सकती है. ग्लोक या 9मम का निशाँ और जखम वैसा नहीं होता. और कामकान्त जी के पास ऐसा कोई हथियार नहीं है, मेरी नजर में.", रामेश्वर जी अपने बेटे के साले से बड़े प्रभावित हुए थे.

"हम्म.. सही बात है. और तुम तोह वैसे भी फिरैरंस में 5 साल गुजार चुके हो तोह मुझे कोई संदेह नहीं इस बात पर की तुम जो कह रहे हो वह गलत होगा. लेकिन फिर वही बात आती है के ऐसा क्यों हुआ.", छोल साहब अपने दोस्त को भी जानते थे और उनके पोलिसिअ मैं को भी. वो बस चुप्प हे थे. और इधर कोमल दीदी ट्रे में पानी चाय लेकर आई और फिर अपने बड़े मां से आशीर्वाद लेने के बाद बहार चली गई.

"देखिये अंकल, मुझे इन सबसे ऐतराज नहीं है. काम विभाग का हे है और किआ भी अपने हे किसी व्यक्ति ने है. जहा तक सवाल है एनकाउंटर और भान सिंह का तोह साफ़ हैं की ये इसलिए हुआ की फिर किसी तरह ये दोनों न बच निकले उसकी ताक़त की वजह से. और इतना बड़ा काण्ड raato-raat किआ तोह मेरे जैसा एक 2 सितारा आदमी कुछ समझने लायक हे नहीं क्योंकि ये हुआ तोह सभी बड़े अधिकारीयों की नजर में हुआ है. बस ऐसे लूपहोल हे मुझे परेशां कर रहे है.", रामेश्वर जी को भी अब समझ आ गया था के ये ईमानदार और साफदिल व्यक्ति अपने डिपार्टमेंट की छोटी गलतियों से दुखी है.

"हो जाता है बीटा. कई बार जब समय काम हो और काम बहोत ज्यादा तोह प्यादो की चिंता छोड़कर वजीर के पीछे हाथी पागल हो जाता है. लेकिन ये गलत शतरंज है जो इस बार खेली गई है. तुम्हारी बात से सहमत हु मैं और बात करूँगा जरूर ये. अब जरा अपनी बहिन और बाकी बचो से भी मिल लो. अपने पिताजी को मेरा स्नेह देना और शहर वापिस आने पर इतिल्ला करना. कुछ काम है तुम्हारे थाने के पास.", उनकी बात पर तेजपाल जी ने दोनों के पाँव छु कर आशीर्वाद लिए और फिर अपनी टोपी उठाते हुए कौशल्या जी का प्यार लेते अंदर वाले डाइनिंग टेबल के पास आ खड़े हुए.

अर्जुन इस बार बिलकुल अलग तरह से मिला था. उछलता हुआ वह सीधा उनके सीने जा लगा और वह भी अपने भांजे को देख vardi-ghar सब भूल गॉड में उठा खड़े हो गए.

"ोये कपूत, क्यों अपने मां की जान लेने पर तुला है. बैलबुद्धि उतर गॉड से.", कौशल्या जी ने डांटा तोह अर्जुन हँसता हुआ अलग हुआ. फिर ऋतू, अलका के साथ बाकी सब भी मिले उनसे और रेखा जी ने भी भाई से औपचारिक गले लगने के बाद एक चाय का कप टेबल पर रख दिए. कौशल्या जी ने बूंदी के लड्डू, बिस्कुट और मेवे रखते हुए फिर से तेजपाल के सर पर हाथ फेरा और साथ बैठ गई. अर्जुन भी उधर हे बैठा था लेकिन रेखा जी अपने कमरे में चली गई थी कोमल और ऋतू के साथ.

"तेरे से मेरी नाराजगी काम नहीं होने वाली बिट्टू. तू शहर में है और इस बुढ़िया को देखने का समय नहीं तेरे पास.", बिट्टू उन्हें सिर्फ उनकी माँ, पिताजी और कौशल्या जी हे कहती थी. तेजपाल का भी प्रेम था उनके साथ बस रिश्ता ऐसा था की ज्यादा आ नहीं सकते थे.

"माजी, हमेशा आपके कदमो में हे तोह हु. मेरे हर थाने का पता सबसे पहले जीजा और आपके हे पास होता है. आप बस बोल दिए कीजिये या कभी समय निकल कर इस बेटे के घर को भी धन्य कर दे.", इज़्ज़त और मान से उन्होंने अपना प्यार दिखाया.

"हाँ तेरा जीजा है न, कुछ ज्यादा हे काम करवाता है तुझसे. चल कोई नई इस बार गर्मी की छुट्टियों में मैं जाउंगी तेरे घर. सुनंदा से शिकायत भी लागू जरा तेरी. कितनी बार कह चुकी के तू मेरा बीटा है, अपनी बहिन का घर मत समझा कर. ऊपर से तेरे अंकल तोह खुद याद करते रहते है तुझे. अब ये बता बहु को कब ला रहा है?"

"माजी, आपका हे घर है वह भी. माँ तोह बहोत याद करती है लेकिन आप 2 साल से आये हे नहीं मिलने. बस रिंकू और मोनू की शादी वाले दिन आये थे. अब तोह घर भी थोड़ा ठीक करवा दिए है पहले से. आपको ाचा लगेगा देखने के बाद. और पूजा आएगी मेरे साथ जब रेखा को छोड़ने आऊंगा वापिस. फ़िलहाल तोह घर हे है दोनों बेटियों के इम्तिहान हो गए थे तोह maa-pitaji के पास चली गई.", तेजपाल बड़ी आत्मीयता से बात कर रहा था. इधर संजीव भैया ने सारा सामान गाडी में रखवा दिए तोह वह खुद चलते आये और तेजपाल जी आशीर्वाद लेने के बाद वही बैठ गए.

"मामाश्री, आपने तोह कसम खाई है के नहीं आना जैसे साल में एक बार से ज्यादा.", संजीव भैया अब मुस्कुराना सीख गए थे. बचो के जैसे एक लड्डू प्लेट से उठा कर आधा अर्जुन को देते और आधा खुद कहते वह बोले तोह तेजपाल जी भी चाय की चुस्की लेते हंस दिए.

"संजीव यार तू खुद जानता है मेरे साथ क्या किआ गया है. भाई 24 घंटे वाली ज़िन्दगी हो चुकी है. अब तोह याद भी नहीं कब पतंग उड़ाई थी तेरे साथ आखिरी बार.", कौशल्या जी भी इनकी बातों पर मुस्कुरा रही थी. पता चल रहा था के ये पोलिसवाले आदमी एक जिंदादिल इंसान था.

"इस बार शिमला घूम के आते है. 2 महीने से ज्यादा की छुट्टियां पड़ी होंगी आपकी तोह दिक्कत नहीं आने वाली.", संजीव की बात का कुछ मतलब समझते हुए बस आँखों से हे हाँ कहा इतने में हे ऋतू की आवाज आई.

"मामाजी, सामान रख दिए.", तेजपाल जी भी बिना देरी किये उठ खड़े हुए और एक बार फिर ललिता जी और कौशल्या जी के पाँव छूने के बाद संजीव से गले मिलने लगे. इधर एक पूजा की थाली से कौशल्या जी ने उन्हें तिलक करते हुए 1100 दिए, जैसे वह हमेशा करती थी.

"माजी?", उन्होंने इतना हे कहा था के कौशल्या जी ने घूर कर देखा. मुस्कुराते हुए वह भी अपने भांजे और बहिन के साथ बहार निकल गए. टेबल पर छोड़ गए थे 10 लिफाफे जिनपर संजीव के साथ हे कौशल्या जी की भी नजर पड़ी.

'संजीव, माधुरी, प्रियंका, कोमल, अलका, ऋतू, तारा, आरती, श. रामेश्वर जी, माजी.' यही नाम लिखे थे हरेक कागज पर एक नाम. उन्हें शायद रूपाली का पता नहीं था. कौशल्या जी ने संजीव को उसका लिफाफा दिए और अपने वाला खोलकर उसमे रखे शगुन के 1100 रूपाली को पकड़ा दिए जो बहार से अंदर आ रही थी.

"ये तेरे मां देकर गए है. तेरे लिए.", उन्होंने इतना कहा तोह रूपाली एक हलकी मुस्कान से दूसरी मुट्ठी में रखे 2100 उन्हें दिखती बोली.

"मामाजी ने अभी बहार हे ये दिए है ऐसा बोलकर की पिछली राखी के नहीं दिए थे तोह जुर्माने के साथ ये मेरे है.", कौशल्या जी के दिल में तेजपाल की ये छोटी सी प्यारी बात गहरा असर कर गई थी. लिफाफा भूल गया लेकिन प्यार देना नहीं.

"ाची बात है लेकिन ये भी तू हे रख ले.", उन्होंने देने चाहे तोह संजीव भैया ने वह पैसे पकडे और आराम से अपनी जेब में रखते दादी को देखते बहार निकल गए.

"ले मार गया डाका वह तेरे पैसे पर.", और दोनों हंस पड़ी.

इधर अर्जुन सभी से मिलने के बाद एक बार फिर संजीव भैया के गले लग गया.

"चल नौटंकी, वह फ़ोन भी होगा. मैं शाम को घर हे रहा करूँगा तोह फ़ोन कर लिओ. अब जा नहीं तोह फिर यही रोक लूंगा.", अपने भाई को कास के गले लगाने के बाद फिर गाडी का दरवाजा खोल के अंदर किआ और फिर घर में आ गए.

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शहर से बहार सड़क के दोनों हे तरफ ाची हरियाली थी. अर्जुन आगे अपने मां के साथ बैठा बस नजारा करने में लगा था वही उसकी माँ अपने बड़े भाई से बातें कर रही थी. ये सड़क वही थी जहा आगे मंजूबाला का भी गाँव था. कोई आधे घंटे बाद वह भी पार हो गया तोह अर्जुन को याद आया बुधवार को मंजूबाला से उसका मिलने का लेकिन वह तोह अब ननिहाल जा रहा था. मुश्किल से 20 मिनट बाद हे वह लोग इस छोटे शहर में आ गए थे जहा makaano-dukano से ज्यादा हरियाली थी और शान्ति. ये उसका ननिहाल था. चेहरे पर मुस्कान तेरी गई थी अपनी माँ से ये जान कर की उसका ननिहाल कोई इतना दूर न था.

"ले बीटा हम आ गए अपने घर. बस चुप रहना और पीछे चलना, देखते है कोण पहचानता है तुझे.", अपने बड़े मां की बात पर अर्जुन हंस दिए. फिर तेजपाल जी ने खुद हे 2 बैग उठाये और रेखा के साथ अंदर चल दिए. अर्जुन उनके पीछे चलता इस महल से घर को देख रहा था. उनके घर के जैसा हे बड़ा बगीचा था लेकिन ठीक उसके बाद कतार से कड़ी 5 गाड़िया. घर के बराबर हे खुल्ला आँगन था ये और एक तरफ थोड़ा कच्चा तीन की चादर से बना gaaye-bhainso का बड़ा. मकान की तरफ सारा फर्श सफ़ेद संगमरमर से बना था. लेकिन कोई दिखाई नहीं दे रहा था. इतने में हे एक भालू से बालो वाला झबरीला कुत्ता भागता आया और रेखा जी के सामने दोनों पाँव ऊपर करता खड़ा हो गया.

"मेरा बचा. कैसा है टाइगर?", उन्होंने तोह जैसे बाहों में हे भर लिए था इस शिकारी कुत्ते को और फिर बरामदे का दरवाजा खुला तोह 7-8 चेहरे ek-ek करते बहार आ निकले. हाथ में आरती का बड़ा थाल लिए वह बुजुर्ग औरत साक्षात् उसकी माँ सी लग रही थी. बाल बस कुछ चांदी का रंग लिए लेकिन लम्बाई माँ से भी 3 इंच ऊपर और दूध सी गोरी. ये अर्जुन की नानी सुनंदा थी जो अपने दोनों बचो को छोड़ सीधा अर्जुन के सामने आ कड़ी हुई थी. उनके पीछे हे 6 फ़ीट के तंदरुस्त से लेकिन सफ़ेद बाल और सफ़ेद दादी वाले व्यक्ति मुस्कुराते हुए अर्जुन को हे देख रहे थे. पंडित कुंदन शर्मा, अर्जुन के नानाजी.

"मैं कहती थी न जी आपसे के मेरा अर्जुन आएगा तोह उसमे सबकी झलक मिलेगी. ये मेरा बीटा है.", तिलक करने के बाद थाली रेखा को देती वह जोर से अर्जुन के गले जा लगी और कई देर तक वैसे हे कड़ी रही. उधर रेखा जी अपने पिता से मिलने के बाद अपनी भाभी और उनके बचो से मिलने लगी थी. टाइगर उनके पीछे पीछे हे घूम रहा था. अर्जुन का दिल इतने सुकून से भर गया था अपनी नानी के गले लगने से जैसे वह उनका हे हिस्सा था जो आज मिल गया हो वापिस.

"भाग्यवान, जरा हमको भी नापने दो हमारी नाती की सेहत.", उनकी बात पर ये खूबसूरत महिला भीगी आँखों से मुस्कुराती एक तरफ हुई तोह कुंदन जी ने अर्जुन को अपने सीने से लगा लिए. इस उम्र में भी वह खूब तगड़े थे और अर्जुन के लिए भी उनके मैं में वही विचार आये.

"नाना से भी लम्बा हो गया ये तोह. वाह बीटा जब पहले देखा था तोह इतना सा था और अब देखो जरा.", फिर उसके कंधे पर हाथ रख वह उसको अपने साथ हे अंदर ले आये तोह उनके साथ हे नानी भी आ गई और अर्जुन को सबसे मिलवाने लगी.

"बीटा ये है तेरी छोटी नानी (सुमित्रा), बड़ी मामी (पूजा), Bittu(Tejpal) की अर्धांगिनी. ये है ममता, राजू (राजेश) की बीवी. और ये दोनों हैं तेरी बड़ी बहने और बिट्टू की जान. समय और कंचन, तेरे हे शहर में डिग्री कर रही है. तेरे बड़े नाना तोह मंडी गए है लेकिन बड़ी नानी अभी मंदिर से आने वाली होगी. मोनू और रिंकू खेत पर है छोटे नाना के साथ लेकिन तेरी दोनों छोटी मामियां ऊपर काम में लगी है बस आती हे होंगी. ममता की बिटिया (स्वाति) बस पास में गई है स्कूटी लेकर तोह उस से भी मिल लियो. और ये है इस घर का सबसे छोटा सदस्य टाइगर.", अर्जुन ने सभी के पाँव छुए थे लेकिन सभी ने उसको गले हे लगाया. समय और कंचन दीदी ने भी बेझिझक अपने छोटे भाई को गले लगते हुए प्रशंशा हे की थी. लेकिन जब टाइगर नाम लिए नानी ने तोह ये जर्मन शेफर्ड अर्जुन से वैसे हे मिला जैसे वह रेखा जी से मिला था और अर्जुन ने बिना डरे, स्वाभाविक हे उसके सर को प्यार से थपथपाया. सभी लोग अंदर आ गए थे इस बड़े हाल में जहा विलासिता की हर चीज उपलब्ध थी.

"चची मैं जरा नहाने जा रहा हु. आप ये सामान रखवा दीजियेगा रेखा का उसके कमरे में और चाचा जी खाने के बाद मंडी हे चलते है.", तेजपाल जी ने इतना कहा और फिर अंदर की तरफ चले गए.
 
अपडेट 59

ननिहाल के चरित्र


रेखा के पिताजी और 3 भाई थे और तीनो हे एक साथ रहते थे.

1. सोहनलाल शर्मा (70 साल)- बड़े सुलझे और पढ़े लिखे व्यक्ति हैं. सरकारी अफसर थे और रिटायरमेंट के बाद से हे अपने मंझले भाई के साथ मंडी में अपनी बड़ी आधात की दूकान सँभालते है. हरयाणा के इस हिस्से की ये सबसे बड़ी अनाज मंडी की सबसे बड़ी दूकान इन्ही की थी जो इनके पिताजी ने शुरू की थी. सोहनलाल जी अब बूढ़े हो चुके हैं लेकिन शरीर अभी ाची हालत में है. इनकी धर्मपत्नी शमत अंजना देवी धार्मिक होने के साथ हे समझदार औरत है. यहाँ घर के अंदर स्त्रियों को पल्ला रखने की बंदिश नहीं है और ये आजादी इन्ही ने दी थी. घर के सभी बचे इन miya-biwi से हे फरमाइश करते है जो भी उन्हें चाहिए हो. इन दोनों के प्यार की निशानी है घर का बड़ा बीटा तेजपाल शर्मा (47 साल), हरयाणा पुलिस में sub-inspector है फ़िलहाल और अपनी ईमानदारी की कीमत चूकते रहते है. निडर, हंसमुख और आज्ञाकारी औलाद मिली थी सोहनलाल और अंजना देवी को. घर की बेटी के विवाह के बाद हे तेजपाल की शादी हुई थी पूजा गौर(43) से, जिनके पिता jaane-maane ठेकेदार थे और आज परिवार एक प्रतिष्ठित निर्माण संस्था बन चूका है. विवाह के पहले कुछ साल प्यार भरपूर रहा तोह इनकी 2 बेतिया भी हो गई थी. समय शर्मा (20) और कंचन (18). दोनों हे लड़किया ाची शिक्षा ले रही थी कॉलेज में और घर में आजादी के बावजूद दोनों हे अनुशाषित एवं सर्वगुण संपन्न थी. अल्हड पूजा और तंदरुस्त तेजपाल के गुण इन दोनों में भी दीखते. गोरी, लम्बी और सुडोल थी दोनों हे लड़किया, साथ हे घर के सभी काम कर लेती थी. सोहनलाल जी के दूसरे सुपुत्र राजेश शर्मा (44), थोड़े उलझे हुए व्यक्ति हैं. ये साहब साल भर में यदा कड़ा हे दिखाई देते है और सर्कार के हर विभाग में इनकी kam-jyada पहुंच है. अपने जीजा शंकर शर्मा से अटूट सम्बन्ध है जो कितना गहरा है वह किसी को नहीं पता. घरवालों ने इनका विवाह जल्दी करवा दिए था ये सोच कर की शायद ये इंसान काबू में आ जाये, लेकिन ममता (42) की ख़ूबसूरती और प्यार भी इन्हे बाँध न पाया. जहा भी रहे लेकिन होली, दिवाली और करवाचौथ को ये अपनी श्रीमती के पास पहुंच जाते है. इन दोनों की बेटी है स्वाति (18), जो कंचन के साथ हे पढ़ती है और swabhav-dimag से भी बिलकुल उसके हे जैसी है.

2. कुन्दनलाल शर्मा (66 साल)- ये व्यक्ति थे जो शहर में वैसे हे प्रसिद्ध थे जैसे इनके समधी रामेश्वर जी अपने शहर में थे. 6 फ़ीट लम्बे और चुस्त शरीर के कुंदन जी की खासियत थी उनके चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कराहट. अनाज मंडी के प्रधान भी थे और aas-pas के इलाके के प्रमुख जमींदार भी, क्योंकि बड़े भाई सोहनलाल तोह 40 साल नौकरी पर हे थे तोह पहचान इन्ही की थी. इनके पिताजी इनकी जवानी में कुंदन जी को बहार नहीं जाने देते थे आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से. और फिर इनका विवाह भी जिनके साथ हुआ वह इनसे भी 2 कदम ऊपर हे थी. शमत सुनंदा (65) अपने समय की आधुनिक महिला थी और एक प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से थी. कुंदन जी के पिताजी ने इन्हे देखते हे अपने बेटे के लिए पसंद कर लिए था और फिर दोनों परिवारों में कुछ मुलाकातों के बाद शादी हो गई थी दोनों को. इनकी सास और जेठानी ने इन्हे विवाह के पहले 5 बरस घर से बहार नहीं निकलने दिए था, क्योंकि वह ख़ूबसूरती में बेजोड़ थी और ऊपर से शहर से ब्याह कर एक कसबे में आई थी. ाचे व्यवहार और मिलनसार व्यक्तित्व की वजह से इन्हे घर की जान कहा जाता था. फिर विवाह के एक साल बाद हे इन्होने जनम दिए था रेखा को, जो अपने maa-baap की हे सम्पूर्ण झलक थी. पंडित रामेश्वर जी इस इलाके में जब बतौर थानेदार आये थे तोह उन्होंने पहली नजर में हे रेखा को अपने मंझले बेटे शंकर के लिए मांग लिए था. सोहनलाल जी और कुन्दनलाल जी ने ाचे से परिवार जांचने के बाद हे अपनी बेटी का हाथ सौपा था शंकर शर्मा को. लेकिन फिर सम्बन्ध ऐसे बने थे की कुन्दनलाल जी और रामेश्वर जी एक दूसरे को भाइयो सा सम्मान देने लगे थे. वैसा हे रिश्ता था सुनंदा जी और कौशल्या जी का. परिवार बढ़ गए तोह जरूर मिलना काम हुआ लेकिन हफ्ते में निरंतर फ़ोन पर बात होती रहती थी. रेखा के बचो को भी यहाँ भरपूर प्यार मिला था क्योंकि घर की वह अकेली बेटी थी.

3. मनोहरलाल शर्मा (63)- Maa-baap की लाड़ली संतान थे और स्कूल जाने से कतराते रहने की वजह से फिर kheti-baadi हे संभाल ली थी इन्होने. दब्बू किस्म के थे लेकिन अपने बड़े भाइयो के लाडले भी थे. ठीक समय पर इनकी शादी भी सुमित्रा (58) जी से हो गई थी, जो एक bhari-puri समझदार औरत थी. लेकिन मनोहरलाल जी को छोटी उम्र में हे जवानी का चस्का ऐसा लगा था के इन्होने 2 बेटे हो जाने के बाद फिर कभी अपनी धर्मपत्नी के साथ बिस्टेर साँझा न किआ था. खेत में रहने की यही इनकी बड़ी वजह भी थी. गाँव की औरते और एकांत हे बस इनकी ज़िन्दगी थी. साथ हे उम्दा किसान भी थे तोह फसल भी भरपूर पैदा करते थे. इनके दोनों हे बेटे समझदार और हाजिर जवाब थे. बड़ा बीटा मनोज (32) पिता के साथ हे खेती देखता था क्योंकि जमीन अधिक थी और छोटा बीटा कैलाश (30) अपने बड़े दादा के साथ मंडी में दूकान के काम देखता था. दोनों की हे शादी एक साथ 3 साल पहले हे हुई थी क्योंकि कही न कही इनमे एक दब्बूपन और झिजक थी stree-sannidhya को लेकर. मनोज का विवाह संगीता (27) और कैलाश का अनीता (25) से हुआ था. विवाह तोह दोनों हे नहीं करना चाहते थे लेकिन अपना पल्ला झड़ने के चक्कर में बस हाँ कर दी थी. वैसे इन दोनों की बीवियां थी बहोत मेहनती और घर के सभी कामो में निपुण. संगीता और अनीता ने कभी अपनी जेतनियो को चूल्हे के पास नहीं आने दिए था पिछले 2 साल में. ज्यादा से ज्यादा chai-doodh हे गरम करने को मिलता था बड़ी बहुओ को.

12 कमरों का 2 मंजिला घर था शायद आधे एकड़ जगह में शर्मा परिवार का. कुछ 3 साल पहले हे ऊपर का हिस्सा भी नया करवाया गया था. बहार ऊँची दिवार के बाद एक बड़ा बगीचा जिसके आगे खुला आँगन और एक तरफ 2 भैंस और 1 गए भी राखी हुई थी. साथ हे एक कमरा उनके चारे का था और इधर एक बाथरूम भी बनाया हुआ था. पक्के आँगन से अंदर आते हे 3 तरफ दरवाजे थे घर में अंदर जाने को और एक तरफ चौड़ा गलियारा था. पहले दोनों दरवाजे एक बड़े ड्राइंग रूम और छोटी बैठक के थे. तीसरे से घर के भीतर जाया जाता था. 'ल' के अकार में 2 कमरे एक तरफ जिनके बाद एक स्टोर और 3 कमरे दूसरी तरफ थे यहाँ. बीच में बड़ा खुला आँगन जहा फूलो के गमलो के साथ हे पानी का हाथ से चलने वाला नलका लगा था. यहाँ पर गलियारे से भी आया जा सकता था. और उधर से आने पर हे सामने दीखते थे 2 बाथरूम और वह पक्के फर्श पर लगा लोहे का बड़ा नलका. आँगन के बीच में हे एक बड़ा तुलसी का गमला रखा था जिसपर संगमरमर से char-diwari खींची हुई थी एक दिया रखने की जगह के साथ हे. नीचे 2 कमरे साथ लगते थे सोहनलाल जी और कुंदन जी के, जहा वह दोनों हे अपनी धर्मपत्नियो के साथ रहते थे. 3 कमरे जो उनसे आगे और ठीक बैठक के पिछली तरफ थे वह पहला कमरा सुमित्रा जी का था और उनके साथ हे Manoj-Sangita, Kailash-Anita के कमरे थे. मनोहरलाल अगर घर सोने भी आते तोह बैठक में हे सोते थे. ड्राइंग रूम लगभग 3 कमरों की लम्बाई का हे था जिधर खाने की बड़ी टेबल एक हिस्से में और दूसरी तरफ एक दीवान और 3 लम्बे सोफे लगे थे जिनके बीच में कांच की टेबल और कुछ दुरी पर 29 इंच का रंगीन टेलीविज़न लगा था.

ठीक ऐसे हे घर का ऊपरी भाग भी था लेकिन यहाँ 5 कमरे वैसे हे थे जैसे नीचे लेकिन उनके सामने से 6 फ़ीट का गलियारा 'ल' के अकार में हे घूमा हुआ था. ऊपर के सभी कमरों में से 2 में बाथरूम जुड़ा था और बाकि 3 वैसे हे बंद रहते थे. जहा नीचे ड्राइंग रूम था यहाँ ऊपर एक बड़ा रसोईघर जिसके ऊपर 3 फ़ीट का छज्जा बहार निकला हुआ था और बाकी खुली छत्त थी. इधर की नीचे से आती सीढिया ऊपर बड़ी खुली छत्त तक जाती थी जहा सिर्फ पानी की 3 बड़ी टंकिया बानी हुई थी, सीमेंट की. एक पक्की सीढ़ी इस मजिल की दूसरी तरफ से नीचे के आँगन में भी जाती थी. स्वाति अपनी माँ ममता के साथ एक कमरे में रहती थी और दूसरे में पूजा और तेजपाल, अगर वह इधर होते थे तब. पिछले 3 कमरों में से पहला तभी खुलता था जब समय और कंचन को जरुरत हो या घर में कोई खास आया हो. बाकी 2 कमरे घर के बेटी के लिए हे थे. जिन्हे इस बार मुक्कम्मल तरीके से बड़ा किआ गया था और नया bister-television रखवाया गया था उधर.

इस घर की ख़ास बात थी की यहाँ कोई मुखिया नहीं था और कोई हिस्सा नहीं हुआ था परिवार में कभी. वसीयत जरूर कहती थी की तीनो भाइयो के पास बराबर जमीन और दूकान है लेकिन यहाँ सभी एक हे परिवार थे. बस एक हे बार जमीन का कुछ हिस्सा रेखा के नाम किआ गया था ##### गाँव की 50 किल्ले जमीन जो बाद में अर्जुन के नाम हे करवा दी गई थी. घर के सभी फैंसले तीनो भाई और उनकी पत्नियों की मौजूदगी में हे लिए जाते थे, किसी एक के इंकार पर वजह जायज होने पर बाकी 5 भी मानते थे. यही राज था इस bhare-pure परिवार का जहा अर्जुन आज आया था. अपने ननिहाल. बहोत कुछ अभी और देखने को मिलने वाला था उसको इन अगले चार दिनों में.

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"बीटा, तेरा मां तोह वापिस चला जायेगा अभी ड्यूटी पर और मैं भी कुछ देर दूकान पर काम देख के आऊंगा. तेरा अगर दिल करे तोह मेरे साथ चल और आराम करना है तोह फिर पूरा घर तेरे सामने है.", कुंदन जी बैठक में अपने नाती के साथ बैठे थे और सुनंदा जी अपने हाथो से अर्जुन को kheer-choorma खिला रही थी.

"क्यों जी? हम नहीं हैं क्या घर पर? इतने सालो बाद तोह मेरे चाँद को देख रही हु. आज कही बहार नहीं जायेगा ये. क्यों बीटा?", थाली को एक तरफ टेबल पर रखती वह अर्जुन का मुँह कपडे से साफ़ करने के बाद बोली. इतनी देर से सुनंदा जी बस अर्जुन के हे साथ थी. सिर्फ उसकी बड़ी नानी ने जरूर कुछ प्यार किआ था लेकिन अभी तक अंदर नहीं जा पाया था जहा उसकी माँ और बाकी लोग थे.

"हाँ नाना जी, आज आप जाइये मैं घर हे रहूँगा नानी के साथ. अभी तोह मैं बाकी सभी से मिला हे नहीं हु.", भोलेपन से उसने ऐसे कहा तोह कुंदन जी एक चाबी उसकी तरफ करते मुस्कुरा कर बोले.

"अगर फिर भी दिल करे कही जाने का तोह ये पकड़ो तुम्हारी सवारी. कंचन, स्वाति या समय कोई भी तुम्हे दुकान, मार्किट या खेत दिखा लाएंगी. वैसे रेखा का पता है के शाम होते हे वह भी कहेगी जाने को. तोह अब शाम को मिलते है बीटा वह तुम्हारे बड़े नाना अकेले होंगे.", माथे को चूमते हुए वह उठने लगे तोह अर्जुन हैरानी से उन्हें और उस चाबी को देखने लगा जो नानाजी ने उसको पकड़े थी.

"हाँ ये वैसी हे है, जैसी तेरे पास उधर है. कल हे लेके आया था मैं और चलने भी ाची है बस मुझे ये चार छक्के वाली मोटर ज्यादा पसंद है.", सुनंदा जी ने भी मुस्कुराते हुए अर्जुन को अपने साथ हे खड़ा किआ और गिलास से पानी पिलाने के बाद कुंदन जी के पीछे हे बहार लेती आई. गलियारे में तिरपाल के नीचे वह मोटरसाइकिल कड़ी थी जिसकी चाबी अर्जुन को मिली थी. खुद हे कुंदन जी ने वह तिरपाल उतार कर एक तरफ फेंक दिए. ये बिलकुल वैसी हे थी जैसी अर्जुन की रानी थी बस यहाँ चंडी के रंग के साथ कला रंग था लाल की जगह.

"वाह. ये तोह मेरे वाला मॉडल हे है. लेकिन आपको कैसे पता?", अर्जुन ने हैरानी से अपने नाना को देखा और चाबी मोटरसाइकिल में लगा कर छोड़ दी.

"एक बीटा हमारा पुलिस में भी है. उसने बता दिए था हमे पहले हे. पहले तोह लगा था के ये कुछ ज्यादा हे भरी चीज है बचे के हिसाब से लेकिन बिट्टू सही था के तुम इस से काम कुछ चला न पाओगे.", अपने सीने से लगते वह बहार आँगन में आ खड़े हुए. इधर सुनंदा जी घर के अंदर दाखिल हो गई.

"नानाजी, आप कभी हमारे उधर तोह आये नहीं. मैं तोह एक साल से आया हुआ हु हॉस्टल से.", अर्जुन ने वैसे हे भोलेपन से कहा.

"बीटा, बस उतना समय नहीं लगा और वैसे भी बेटी का घर है. हाँ तुम्हारे दादाजी से मिलना हुआ इस बीच 3-4 बार. रामेश्वर जी और सतीश जी दोनों हे आये थे अभी 2 महीने पहले.", अर्जुन ध्यान से सुन्न रहा था उनकी बात. उसको नहीं पता था के दादा और नाना आपस में मिलते है.

"अरे समधी काम और मेरे दोस्त ज्यादा है वह. इतना मत सोचो. और वह जमीन तुम्हारे नाम चढ़वाई थी तोह उसकी एक कॉपी देने आये थे.", बगीचे की तरफ अर्जुन को ले जाते वह बता रहे थे. छत्त पर से अनीता मामी के साथ कड़ी कंचन और समय भी दोनों को देख रही थी. उन्होंने भी अर्जुन को आज हे देखा था. बचपन की थोड़ी बहोत यादें हे थी कंचन और समय की उसके साथ.

"जमीन?", अर्जुन फिर हैरान हो गया. "कितनी जमीन नाम होगी मेरे? अभी थोड़े दिन पहले भी हुई थी.", अर्जुन ने ये बात कही तोह कुंदन जी मुस्कुरा दिए. सच में उनकी मुस्कान दिल में उतर जाती थी. गोर लाल तोह थे हे वह साथ हे बाल कही से झड़े न थे लेकिन पूरे बर्फ से और सफाई से काटे गए थे.

"बीटा वह तोह रामेश्वर जी का मसला है. फ़िलहाल तोह ##### गांव में अपनी कुछ 50 एकड़ जमीन थी रोड पर, तेरी मम्मी के नाम जो अभी तेरे हो गई है. यहाँ से तोह 13-14 किलोमीटर हे है रोड पर. शायद आते हुए बिट्टू ने दिखाई हो", अर्जुन को एक और झटका लगा उनकी इस बात को सुनकर.

"##### गांव में रोड के साथ लगती हुई? जहाँ वह बस रुकने का स्टैंड बना है बरगद के नीचे?", अर्जुन ने मंजूबाला वाली जमीन का नक्शा बताया था अपने नाना को. वह देखना चाहता था के ये कोनसी जमीन है. ऊपर से अब उसको याद ये भी आया के मंजू ने कहा था उसका घर अपने Mausa-Chacha के गाँव से 15 किलोमीटर आगे हैं. ये बात सुनकर उसकी आँखों में अलग हे चमक सी आ गई थी.

"नहीं नहीं वह 30 एकड़ का टुकड़ा तोह अपने दलीप सिंह और उसके छोटे भाई का है. अपना उसके साथ वाला टुकड़ा है. बीच में बस सफेदे और नीम के पेड़ लगे है.", इतने में हे सुनंदा जी एक चाबी, बटुआ और प्रेस किआ हुआ रुमाल लिए बहार आ गई. मुस्कुराते हुए कुंदन जी ने चाबी हाथ में राखी और batua-rumaal हलकी भूरी पतलून की जेब में रखते फिर नीले रंग की इले कार में जा बैठे. दोनों को हाथ हिलने के बाद कार को पीछे करने लगे तोह अर्जुन ने देखा के एक आदमी बड़ा गेट खोल कर पहले हे खड़ा था और उसने टाइगर के गले में अब चैन दाल राखी थी. नानाजी तोह 1 मिनट बाद हे आँखों से ओझल हो गए लेकिन अर्जुन वही खड़ा बहार देख रहा था.

"ये प्रकाश है और अपने यहाँ हे काम करता है. इसकी बीवी बिंदिया और ये हे घर के बहार की सफाई, दूध निकलने का काम देखते है. इधर ये गाये जहा बंधी है इसके पीछे भी sabji-phalon का बगीचा है और इन दोनों का कमरा भी.", सुनंदा जी ने अपने नाती को सब समझते हुए कहा और फिर साथ लगाए हे अंदर ले आई. ऊपर कड़ी वह 3 yuvtiya-maami अब नदारद थी.

"लो Sangita-Anita, देख लो अब अपने इस भांजे को. तुम्हारे ससुरजी हे नहीं छोड़ रहे थे मेरे बचे को.", यहाँ अंदर आया तोह अर्जुन इतना बड़ा और खुला आँगन देख कर हैरान हो गया. ये सच में हे बेहतरीन ढंग से बनाया हुआ घर था. आँगन में छज्जे के नीचे हे 2 तख़्त लगे हुए थे जहा उसकी माँ अब salwar-kameej में अपनी भाहियो और भतीजियों के साथ बैठी थी. बड़ी नानी आराम करने अपने कमरे में जा चुकी थी क्योंकि दोपहर का 1 बज चूका था और वह इस समय आराम करती थी. छोटी नानी सुमित्रा जी एक जवान सी औरत को कुछ समझा रही थी, जो कपडे के मशीन चलने में लगी थी. सांवली लेकिन भरे शरीर की वह औरत यक़ीनन बिंदिया हे थी, अर्जुन के दिमाग ने कहा और उसने ध्यान वापिस अपने सामने कड़ी इस पतली लेकिन आकर्षक महिला पर लगा लिए, जो उसको हे ध्यान से देख रही थी.

"माजी ये तोह बिलकुल बड़े पापा जैसा दीखता है, शायद उनसे हल्का सा लम्बा.", संगीता एक चुस्त safed-kaale प्रिंट वाले सूट में किसी कॉलेज की युवती सी लगती थी. देख कर लगता हे नहीं था के इसका ब्याह हो गया हो, सिर्फ मांग में बिंदी सा सिंधुर और गले में kaale-sunheri मंगलसूत्र की चैन को छोड़ कर. इधर अर्जुन हाथ जोड़ता जैसे झेंप गया वही उसकी माँ रेखा और दोनों नानी मुस्कुरा उठी. प्लास्टिक की कुर्सी पर खम्बे के पीछे बैठी समय नजरे चुराती सी देख रही थी अर्जुन को और तख़्त पर बैठी अनीता ममी जैसे धीमी आवाज में कुछ कह रही थी जिस पर बस वह मुस्कुरा रही थी.

"हाँ बस थोड़ा सा फरक है. मेरे चाँद के बाल ज्यादा सुन्दर है और ये अभी तक मासूम है. मैंने तोह तेरे बड़े पापा को मन कर देना था अगर ये उनका भाई होता उस समय तोह.", हंसती सी वह जा बैठी अपनी बेटी के पास और अर्जुन भी उधर हे हो लिए. संगीता मामी ने एक कुर्सी आगे की तोह धन्यवाद करता वह भी बैठ गया सभी के पास.

"नानी वैसे अभी तक तोह मैं माँ को हे सबसे खूबसूरत मानता था. लेकिन आज पता चला के वह इतनी सुन्दर कैसे है.", अर्जुन की बात पर उसकी बड़ी माम्मिया भी अर्जुन को देखती हंसने लगी. लेकिन सुनंदा जी शर्मीली मुस्कान के साथ रेखा को गले लगाती कान में कुछ कह कर चुप हो गई.

"तेरी ये नानी बिलकुल रेखा जैसी हे थी जब मैं घर में ब्याह के आई थी. लेकिन आज भी ये वैसी हे है और रेखा थोड़ी भरी हो गई.", सुमित्रा जी भी इधर आ गई तोह अनीता मामी अपनी जगह से उठ कर अर्जुन के बराबर हे कुर्सी ले कर बैठ गई.

"रहने दे सुमित्रा, वह पुराणी बातें थी. लेकिन मैं इसको कुछ दिखती हु. पूजा वह छोटी वाली एल्बम लेकर आ जरा टेलीविज़न के नीचे से.", बड़ी मामी जब उठी तोह अर्जुन ने ध्यान से उन्हें देखा. वह एक कैसे हुए neele-hare सूट में थी जो उनके उभारो पर से कुछ ज्यादा हे उठा था और गोल पिछवाड़ा बिलकुल वैसे हे पीछे निकला हुआ था. पेट समतल सा लेकिन आकर्षक. कूल्हे मटकती वह करीब से निकल गई तोह अर्जुन ने साथ बैठी अनीता मामी की तरफ देखा. वह भी उसको हे देख रही थी. इन्होने भी एक उम्दा कॉटन का हल्का पीला कमीज और सफ़ेद सलवार पहना हुआ था. गले में दुपट्टा भी सफ़ेद था. पतले लेकिन सुडोल शरीर के साथ हे चेहरे भी उजला और बेदाग़ था.

"मामी आप कॉलेज में हैं क्या?", अर्जुन ने देख लिए था के वह उसको हे गौर से देख रही थी. लेकिन चालाकी से अर्जुन ने उनकी हे प्रशंशा कर दी थी. जिसपर वह एक बार अपनी जवान दोनों भतीजियों को देख कर फिर मुस्कुराती हुई अर्जुन को देखने लगी.

"कॉलेज ख़तम किये 5 साल हो जायेंगे 2 महीने बाद. माजी आप कहती हो ये भोला है देखो सबके सामने हे कैसे मजे ले रहा है.", हंसती हुई तोह वह और दिलकश लगती थी. चमकते साफ़ दांत और हलकी लाली लिए धनुष से होंठ. अर्जुन जवाब भूलकर बस उनके चेहरे को देखने में खो गया था और उसकी ये नजर खुद पर महसूस करते हे अनीता मामी भी मुस्कुराती हुई हलकी शर्म से दूसरी तरफ देखने लगी.

"हाँ तोह तू जैसी लगती है वैसे हे तोह कहा इसने भी. ये उम्र से बड़ा दीखता है और तू अभी भी जैसी घर में आई थी वैसी हे है.", सुमित्रा जी ने कहा क्योंकि सुनंदा जी तोह अपनी बेटी से जैसे कोई गहरी बात हे करने में लगी थी. ममता मामी बिलकुल हे शांत बैठी थी. और अर्जुन को जैसे ये बात खटकने लगी तोह उठ कर उन्ही की और चल दिए, उनके करीब हे इस दूसरे तख़्त पर सुमित्रा जी, कंचन बैठी थी.

"छोटी नानी, ये मामी जी बोलती नहीं क्या?", अर्जुन अपनी छोटी नानी के साथ जुड़कर बैठा तोह उसकी बात पर ममता जी झेंप गई और सुमित्रा जी के साथ हे कंचन और समय भी मुस्कुरा उठी.

"नहीं मेरे लाल. ये तेरी मामी बड़ी सबर वाली है. ये चाहती थी की तू खुद इसके पास आये और सिर्फ इस से बात करे.", सुमित्रा जी ने अपनी बहु का भी पक्ष रखते हुए ऐसा कहा. इधर अर्जुन के वह से उठ कर जाने से अनीता मामी जरूर थोड़ी बेचैन सी हो गई थी.

"माजी, ऐसी बात नहीं है. अर्जुन तोह वैसे भी रात मेरे पास हे सोने वाला है तोह फिर बेहतर है पहले सभी लोग बात कर ले.", एक प्यार मुस्कान देती ममता मामी ने अर्जुन को सर पर दुलार किआ और उनकी बगल में हे अब पूजा मामी भी आ बैठी. उनके हाथ में एक छोटी सी पुराणी एल्बम थी.

"जरा ये देखो फिर बताना.", पूजा मामी की बात पर अर्जुन ने वह 12-13 पन्नो की छोटी सी पतीली एल्बम ली और जैसे हे पहला पन्ना पलटा वह 2 shwet-shyaam फोटो थी. वह तोह उन्हें देख कर हैरान हे हो गया था. एक में साड़ी पहने जैसे ऋतू दीदी कड़ी थी लेकिन ज्यादा भरी हुई और हलके घुंघराले बालो वाली. यही 2 चीज बस ऐसी थी जो ऋतू दीदी से अलग थी. और दूसरी फोटो तोह और हैरान कर देने वाली थी. ऋतू के साथ हे जैसे उसकी खुद की फोटो हो. आँखों और बालो का हे फरक था. और फोटो वाले चेहरे पर दाढ़ी के निशाँ थे, लम्बी कलम थी.

"ये तोह जैसे मेरी और ऋतू दीदी की फोटो हो. बस हम दोनों के हे बाल अलग है और ये नानाजी की आँखें मेरे या ऋतू दीदी जैसी भूरी नहीं है शायद. नानी ऐसी लगती है जैसे ऋतू दीदी में कोमल दीदी को मिला दिए हो, चेहरा माँ से भी ज्यादा चमक वाला है. ये पुराणी फोटो में ऐसा था तोह सच में आप कितनी सुन्दर रही होंगी नानी.?", अर्जुन हैरान था ऐसे संयोग से लेकिन बाकी सभी बड़ी महिलाये मुस्कुरा रही थी.

"दामादजी की आँखें भूरी है और बार भी तुझे उनसे हे मिले है. बाकी सब समझ ले मेरे से तेरी माँ को और आगे तुम बचो को. इसलिए तोह कह रही थी की तू तेरे नानाजी का एक बेहतर संस्करण है. दामादजी भी तोह काम नहीं कुछ लेकिन तू मेरे बचे अपने नाना और पिता, दोनों से हे आगे है. बस दिमाग और दिल भी उनसे बेहतर हे रहे.", सुनंदा जी ने तख़्त पर राखी काजल की डिब्बी से हलकी कालिख लेते हुए आगे बढ़ कर अर्जुन के कान के पीछे टिका लगा दिए.

"वैसे अब तू खुद हे सोच ले के तेरी नानी कैसी होगी? ऋतू के जैसे शैतान या फिर कोमल जैसी शांत?", रेखाजी ने ये बात कही तोह सुनंदा जी अपनी बेटी का कान खींचने का नाटक करने लगी..

"माँ, नानी जी न घर में कोमल दीदी जैसी समझदार होंगी और बहार ऋतू दीदी जैसे tej-taraar सबकी खातिरदारी करने वाली रही होंगी.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर खुश होती सुनंदा जी ने उसका चेहरा अपने सीने से लगा लिए. यही बस ये गलती कर गई थी अनजाने में. जो अभी तोह पता नहीं चली थी.

"देख ले जरा मेरे बेटे को. बेशक 10 साल बाद मिला है लेकिन आज भी नानी का हे सागा है ये. ाचा अब बहोत देर हो गई लड़कियों, दोपहर का खाना भी देख लो जरा. जीजी उठने वाली होंगी और उन्होंने अभी सुबह से निवाला नहीं तोडा है.", उनकी बात पर रेखा जी भी कड़ी होती अपनी छोटी भाभी ममता का हाथ पकड़ ऊपर की और चल दी.

"खाना मैं और ममता बना लेंगे माँ और भाभी आप भी ऊपर हे आ जाओ.", हंसती हुई पूजा भी अपनी ननद की बात पर तेजी से सीढ़ियों की और बढ़ गई.

"ये लड़की अभी भी वैसी हे है. जाने वह क्या करती होगी?", सुमित्रा जी घर की एकलौती बेटी को जाती देख बोली तोह सुनंदा जी भी हंसती हुई बिंदिया की तरफ चल दी, जो अब कपडे बाल्टी में लिए तार पर डालने में लगी थी.

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"Hello, मैं याद हु क्या?", सौम्य ने अर्जुन से हाथ मिलते हुए कहा. अब यहाँ पर सिर्फ कंचन, सौम्य और अनीता हे बैठे थे अर्जुन के पास.

"आप हो सौम्य दीदी. ये है कंचन दीदी लेकिन अभी भी एक दीदी गायब है, चुटकी दीदी", अर्जुन स्वाति को इस नाम से हे बचपन में बुलाता था. लेकिन उसको आये 4 घंटे हो गए थे और अभी तक उसने स्वाति को नहीं देखा था.

"वाह. सच बताऊ मैंने तोह नहीं पहचाना था तुम्हे.", सौम्य ने अभी तक अर्जुन का हाथ थमा हे हुआ था. जैसे वह ाचे से उसका स्पर्श महसूस करने में लगी हो. फक्क गोरी, गहरी आँखों और रेशमी सीधे काले बालो वाली सौम्य भी जवानी के उफान पर थी. बिंदियो वाले लाल कमीज और पंजाबी सलवार पहने वह दमकती लड़की शायद ज्यादा हे तेजी से अर्जुन की तरफ आकर्षित हो रही थी. 2 जोड़ी निगाहे और भी इन्हे देख रही थी.

"पहचानोगी कैसे आप? न हे ये निक्कर में है और न हे इसके हाथ में डंडा है जो लेके ये आपके पीछे पड़ा था.", कंचन की बात सुनकर अर्जुन तोह हंसने लगा लेकिन सौम्य शर्माती सी हाथ खींच कर बैठ गई.

"वैसे आप कैसी है कंचन दीदी? अब तोह अंगूर गायब नहीं करती न आप बैल से? वैसे चुटकी दीदी कहा है?", अर्जुन की ऐसी बात पर दोनों हे बहने मुस्कुरा उठी. थोड़ा हैरान थी की कैसे इसको अभी तक वह पुराणी बातें याद है.

"नहीं. अब वह बैल भी नहीं रही और न वह उम्र. वैसे चुटकी ऊपर कमरे में सो रही है, स्कूटी पंक्चर हो गई थी तोह वह दुकान पर कड़ी करके रिक्शा से आ गई थी. तुम दादाजी के साथ बैठे थे और उसको भी नहीं पता था तोह वह अपने कमरे में चली गई थी.", तीनो बातें करने में लगे थे और अनीता जाने कोनसी हसरत से बस लगातार अर्जुन को देख रही थी.

"ाचा फिर मैं उन्हें जगाता हु जा कर.", अर्जुन उठने हे लगा था के अनीता मामी बोल पड़ी.

"उसको नीचे हे ले आना और अगर तुम्हे ठीक लगे तोह किसी के भी साथ जा कर खाना दे आओगे खेत पर? स्कूटी नहीं है न लेकिन खेत यही थोड़ी हे दूर है.", सौम्य गौर से अपनी चची को देखने लगी थी इस बात पर लेकिन जाने कैसा इशारा किआ था इन्होने के वह खामोश हे रही.

"कोनसी बड़ी बात है. आप खाना बंधवा दीजिये मैं जो भी जाना चाहे उसके साथ चला जाऊंगा.", अर्जुन की बात पर कंचन ने वही से स्वाति का कमरा समझा दिए और वह तीनो वही बैठी रही और इधर अर्जुन दूसरी तरफ की सीढ़ियों से ऊपर चल दिए.

"चाची, आपके मैं में क्या चल रहा है? देखो ये बहोत हे ाचा लड़का है और सबसे प्यार करता है. आप कुछ भी जबरदस्ती मत करना या ऐसा कुछ जिस से इस बेचारे की इज़्ज़त पर बात आ जाये.", सौम्य का स्वर चिंतित था और उसका लहजा बता रहा था के ये तीनो हे घनिष्ट थी आपस में.

"सिर्फ रास्ता दिखा रही हु यार. सच कहु तोह ये लड़का वैसा हे है जैसा मैंने सपना देखा था. यकीं रख अगर मुझे कुछ भी गलत लगा तोह मैं खुद हट जाउंगी. 3 साल से मैं और संगीता नामर्दो से ब्याही हुई है. तुझे ये बुरा लग रहा है तोह फिर मैं यही रुक जाती हु.", अनीता दुखी आवाज में कहती फिर नीचे देखने लगी थी.

"ओह चची दीदी का ये मतलब नहीं था. आपने कभी कुछ गलत नहीं किआ, हम दोनों जानती है. न हे संगीता चची ने किआ कभी ऐसा कुछ. बस इनकी बात ध्यान में रखना की ये बुआ का बीटा बाद में लेकिन इस घर का भी उतना हे है जितना बुआ के घर का. वैसे कोण जा रहा है खेत अर्जुन के साथ.", कंचन ने बात बिलकुल सही तरीके से की थी बिना पक्षपात के.

"सौम्य या तू हे जाना. स्वाति का बचपना अभी तक बरक़रार है.", इतना बोलकर वह अंदर वाली सीढ़ियों से ऊपर रसोईघर की तरफ चल दी. ये दोनों बस एक दूसरे को देख रही थी.

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मासूम से हलके सांवले चेहरे वाली ये लड़की करवट लिए तकिया दबोचे सो रही थी. नींद गहरी थी तोह कमरे के अंदर कोण आ खड़ा हुआ ये पता नहीं था. अर्जुन कुछ देर तक इस हसीं लड़की का दीदार करता खड़ा रहा. बादामी रंग का कमर से नीचे तक का टॉप और saleti-kaali जीन्स पहन कर सोइ हुई स्वाति का roop-lavanya भी निराला हे था. कंधे से नीचे तक गहरे भूरे बाल, कोई 26-27 शायद कमर होगी और 32 के लगभग सीना, लेकिन उभर दुरुस्त थे. वैसे हे लम्बी पतली सुडोल टाँगे और हलके से गदराये कूल्हे.

फिर अर्जुन आराम से चलता इस साफ़ और आरामदायक बिस्टेर पर उसकी बगल में जा लेता. एक हाथ से चेहरे पर आई जुल्फों को पीछे करता वह उस मासूम चेहरे को सहलाने लगा तोह कुछ हे पल में वह बड़ी बड़ी काली आँखें खोलती उस चेहरे को देखने लगी जो 7-8 इंच दूर बस उसको हे देख रहा था. कुछ पल ऐसे हे देखने के बाद खुद हे तकिया हटती वह अर्जुन से लिपट कर आँखें मूंदे फिर लेट गई. अर्जुन थोड़ा हैरान सा हो गया था स्वाति की सी हरकत पर.

"ोये तेरी आँखें वही रहेंगी. वैसे हैंडसम हो गया है तू.", स्वाति जकड़ती हुई नीचे मुँह किये हे बोल रही थी. नींद की खुमारी से तोह बहार आ गई थी लेकिन शरीर में हल्का आलस सा बाकि था.

"तू कहा बदली है? आज भी कैसे दिन में हे सो रही है अकेली. पहले भी यही करती थी और मैं धुप में तेरा इन्तजार करता सब जगह ढूंढ़ता रहता था.", इस बार अर्जुन ने भी स्वाति के ऊपर हाथ रख लिए था.

"मैं तेरे से बड़ी हु लेकिन तू अभी भी tu-tadaak हे करता है.", नखरा करती वह मुँह ऊपर करती बोली और अर्जुन ने माथा चूम कर खड़े होते हुए कहा.

"तू मेरे लिए वही रहेगी चुटकी."

"तू लम्बा हे इतना हो गया है. वैसे ाचा लग रहा है.", स्वाति का एक बार दिल धड़क गया था अर्जुन के चूमने से लेकिन जब उसका वैसा हे शांत चेहरा देखा तोह वह भी मुस्कुराती हुई एक मिनट में आने का बोलकर बाथरूम में घुस गई.

"दरवाजा बंद मत करना, कनखजूरा आ जायेगा.", अर्जुन ने पीछे से आवाज लगाई तोह वह हंसती हुई बोली.

"मैं मुँह धोने के लिए आई हु और ये कच्चा वाला बाथरूम नहीं जा तेरे बिच्छू, कनखजूरे आते रहेंगे.", फिर टूंटी चला कर ाचे से चेहरा धोने के बाद वह बहार आई और एक बार फिर से उसके गले मिलकर साथ हे नीचे उतर आई.

"वैसे जल्दी याद नहीं आ गई तुझे मेरी?", शिकायत थी आवाज में उसकी.

"मुझे थोड़ी पता था के ये घर इतनी पास होगा मेरे यहाँ से. मैं तोह कबका आ जाता मिलने मोटरसाइकिल पर, 45 मिनट का हे रास्ता है. आज पता चला मुझे.", कंधे पर हाथ रखे वह वही तख़्त पर आ बैठा. यहाँ अभी सिर्फ कंचन हे थी.

"आ गए दोनों शरारती?", कंचन ने फीकी मुस्कराहट के साथ कहा. अर्जुन का ऐसे स्वाति के साथ लगे हुए बैठना पसंद नहीं आया था शायद कंचन को.

"सच में मेरे बचे तू कितना बड़ा हो गया है इतनी जल्दी हे.", ये बड़ी नानी थी जो अर्जुन के एक तरफ आ कर बैठ गई थी. सर को पकड़ती वह अर्जुन के माथे को चूमने के बाद गले लगा कर अपने इस एकलौते नाती को महसूस कर रही थी. अर्जुन ने भी अलग होने से पहले अपनी नानी के गाल को चूम लिए.

"नानी आप तोह अभी तक वैसी हे हो जैसी जब मैं छोटा था तब थी.", मस्ती करते उसने इतना कहा तोह खाने की थाली लाती सुनंदा जी भी सुर में सुर मिलते हुए बोली.

"वही मैं कहती हु बीटा. जीजी अब बहाना करने लगी है बस आराम करने का. आज तू आया है तोह बहार आ गई अपनी छठा बिखेरती नहीं तोह बस कमरे में हे मिलेंगी.", थाली उनके सामने रखती वह पानी का गिलास छोटे स्टूल पर रखने लगी तोह सिर्फ क्षण भर के लिए अर्जुन की नजर अपनी इस खूबसूरत नानी के स्टैनो की खाई पर पड़ गई. जल्दी से वह नजर हटा कर कंचन से बात करने लगा.

"दीदी, छोटे नाना और मां का खाना बांध गया हो तोह ले आइये. मैं चुटकी के साथ हे दे आता हुआ.", सुनंदा जी ने अर्जुन की बात सुनी तोह फिर अपनी दोनों पोतियों को देखा.

"दादी स्कूटी पंक्चर है. तोह मैंने पुछा था अर्जुन से अगर वह दे आये मेरे साथ.", कंचन ने इतना हे कहा. उसको पता था के उसकी दादी नाराज हो सकती है अगर अर्जुन को काम बताया तोह.

"ठीक है अगर ये जाना चाहता है तोह. लेकिन अनीता को बोल वह चली जाएगी इसके साथ.", सुनंदा जी ने स्पष्ट कर दिए था.

"हाँ तोह सही कहा सुनंदा. Khet-khalihan में वही जाती ठीक है अर्जुन के साथ. ये बच्चियां कहा दोपहरी में ताव सहेंगी.", बड़ी नानी ने भी सब्जी को चखते हुए कहा.

"रेखा ने बनाई है न ये दूध वाली तुरई की सब्जी.? कोई ऐसी नहीं बना सकता इस घर में."

"जीजी, रहने दो आप. खुद हे सिखाया था उसको आपने तोह फिर कोई और क्यों नहीं बना सकता? मैं रोटी लेकर आती हु.", वह जाने लगी तोह कंचन ने अपनी दादी के हाथ से खली प्लेट लेते हुए कहा.

"आप यही बैठिये दादी, मैं ले आती हु और चची को बता देती हु के खाना लेकर वह अर्जुन के साथ चली जाये.", बिना हे जवाब सुने वह निकल चली उधर.

"दादी, कल अर्जुन के साथ वन्न देखने चले जाये क्या हम लोग?", स्वाति ने बड़ी दादी से ये बात कही थी क्योंकि सुनंदा जी तोह मन कर भी सकती थी. और वह देखे भी ऐसे हे रही थी अपनी इस सबसे छोटी पौती को.

"हाँ, चली जाना और रेखा को भी ले जाना. लेकिन या तोह सुअभ 9 बजे नहीं फिर शाम को 4 बजे. दोपहर में नहीं जाना.", स्वाति अर्जुन की गर्दन ब्याह में लेती हिलने लगी थी.

"चल फिर अपना कल का प्रोग्राम सेट. अब तू फंसा न, देख तेरी कैसी कसरत करवाती हु.", चहकती सी वह बोल रही थी लेकिन अर्जुन तोह अपने सीने से रगड़ खाते उसके उभर को महसूस करता असहज होने लगा था. इतने में हे कंचन रोटी लेती आ गई और उसके पीछे हे सर पर दुपट्टा ठीक करती अनीता चच्ची हाथ में एक जुटे का बैग जिसमे खाने का डब्बा, ठन्डे पानी की बोतल और लस्सी की बोतल राखी थी, लिए थी.

"ाचा अभी खाना मत शुरू करना. साथ में खाएंगे तू मैं, कंचन दीदी और सौम्य दीदी.", अर्जुन खड़ा होता उसके बाल खिलेर्टा भाग निकला. स्वाति झूठा गुस्सा दिखती अपनी दादी को देखने लगी. जो मुस्कुरा रही थी बचो की हरकतों पर.

"शुक्र है दोनों वैसे हे हो. जैसे वह शांत बैठा था मुझे ाचा नहीं लग रहा था. लेकिन काम से काम तेरे साथ वह आज भी बचपन जैसा हे है.", सुनंदा जी तख़्त पर करवट के बल लेट टी हुई बोली.

"दादी, आपको उसकी साड़ी शरारत पसंद हे आती है. लेकिन अगर मैंने उसके एक लगा दिए तोह फिर मेरी जान आप बस निकल हे देती हो."

"तू भी उसकी हे सगी है. रहने दे.", सुनंदा जी आँखें बंद करती आराम करने लगी तोह संगीता जी उनके पाँव दबाने लगी थी.

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"कार नहीं आती क्या?", बहार टाइगर से मिलने के बाद अर्जुन मोटरसाइकिल के पास आ खड़ा हुआ तोह अनीता मामी ने मोटरसाइकिल देख कर कहा. पता तोह उन्हें भी था के इस पर हे जाना है.

"खेत में आप कार से जाएगनि मामी?", अर्जुन ने कहा तोह वह मुस्कुराती सी एक तरफ हो गई और अर्जुन भी वैसे हे हँसता हुआ इस नयी मोटरसाइकिल को पीछे करता आँगन में ले आया. मीटर बता रहा था के ये सिर्फ शोरूम से घर हे आई होगी. 19 किलोमीटर हे चली थी अभी.

"बैठ जाइए आप. और संभल कर.", अर्जुन ने पायदान की तरफ इशारा करते कहा तोह अनीता चपलता से पाँव रखती वह बैग उलटे हाथ में पकड़ गौड़ में रखती सीधा हाथ अर्जुन की कमर में डालती बैठ गई. किक मारते हे घर में chir-parichit dug-dug-dug की आवाज गूँज गई थी.

"इसलिए कार कह रही थी मैं"

"मामी, इसका भी अलग मजा है वैसे. ये आवाज भी सुकून देती है. वैसे आप रास्ता बता देना.", एक तरफ के गेट से मोटरसाइकिल बहार निकलता अर्जुन बोलै और इधर अनीता और भी सत् कर बैठ गई थी. कंधे पर सर रखती जैसे वो सामने देखने का नाटक कर रही थी.

"ये सीढ़ी सड़क से उलटे हाथ पर ले लेना. बस 2 किलोमीटर के बाद हे हद्द ख़तम हो जाएगी और वह से आगे मैं बता दूंगी.", उनके माध्यम लेकिन तन्ने हुए उभर ऐसे बैठने से अर्जुन की पीठ में डाब रहे थे. लेकिन वो रिश्ते का लिहाज करता शान्ति से मोटरसाइकिल चलता इस शहर की ख़ूबसूरती का नजारा करता रहा.

"मामी, कितना बड़ा होगा ये शहर?", उसने बात शुरू की.

"एक सीढ़ी सड़क के दोनों तरफ हे है. 5 किलोमीटर लम्बाई मान लो और ऐसे हे दोनों तरफ डेढ़-2 किलोमीटर. 70 हजार आबादी है साड़ी लेकिन जंगल, khet-khalihan बहोत है इधर. कुछ हवेलिया भी है, वह तोह अपने घर के बिलकुल पास हे है.", अनीता का हाथ अब ाचे से लिपट गया था अर्जुन की कमर से. दूसरे हाथ से वह बैग मजबूती से थामे थी.

"हाँ. हवेलिया है दूसरी तरफ लेकिन तब छोटा था तोह जाने नै दिए कभी उधर लेकिन कोमल दीदी डरती थी मुझे वह की बातें सुना कर.", यादों के झरोखे में जाता वह बोल रहा था. इधर दोनों हे अब इस पतली सड़क पर आ चुके थे.

"यहाँ से वह अगले बाए रास्ते पर ले लेना. और वह हवेलिया सुनसान जरूर है लेकिन हैं बड़ी ाची. तेरे मां के साथ देखने गई थी मैं एक बार. वैसे हे अनपढ़ लोगो ने अफवाह फैलाई हुई है और कुछ नहीं है.", इधर हलके झटके लगने लगे तोह अब अर्जुन का औजार भी हल्का तनाव में आने लगा था. 5 फ़ीट की पगडण्डी मजबूत तोह थी लेकिन हलकी ubad-khaabad थी जिस से दोनों हे एक दूसरे से घर्षण कर रहे थे. एक हल्का सा गद्दा आया तोह अनीता का हाथ हिलता हुआ अर्जुन के एक तरफ को उभर आये लुंड से जा लगा. हथेली भी उधर हे थी जिधर अर्जुन का विशाल लिंग तनाव लिए मुदा हुआ था.

'ओह बाप रे. ये वही है जो मुझे महसूस हुआ?' मैं में सोचती वह अचंभित थी लेकिन अब ध्यान खेतो में कड़ी फसल पर लगाया तोह अपनी जमीन भी नजर आ गई.

"आ गए हम. बस इस अगले नीम के पेड़ के नीचे गाडी रोक दे.", इशारे से बताया तोह अर्जुन ने 100 मीटर दूर लगे पेड़ की चाय टेल मोटरसाइकिल रोकते हुए बंद किआ और स्टैंड लगा के मामी के उतरने के बाद खुद भी उतर आया. सामने दूर तक बस फसल कड़ी थी और कही कही ikka-dukka कमरे बने थे खेतो के बीच. अनीता मामी वही कड़ी अर्जुन के चलने का इन्तजार कर रही थी.

"खेत में तोह कोई दिखाई नहीं दे रहा मामी.", अर्जुन ने अंदर की तरफ जाती उस संकरी पगडण्डी पर कदम भड़ाते हुए कहा. इधर की तरफ गेंहू की फसल लहलहा रही थी और दूर आगे सूरजमुखी के ऊँचे फूल से जमीन जैसे सुनहरी हे हो चुकी थी. कही कही शहतूत, शीशम के पेड़ लगे थे. साथ में चलते हुए अनीता का शरीर अपने भांजे से रगड़ भी ले जाता लेकिन वह वैसे हे कूल्हे मटकती चल रही थी.

"ये आगे एक मोटर है और उधर भी सब्जी लगी है. यही कही होंगे तुम्हारे मां और छोटे नाना.", अदा से देखती वो इतना हे बोली थी की फसल के बीच से एक औरत जो की थोड़ी सांवली और भारी शरीर की थी उठती कड़ी हुई.

"नमस्ते छोटी मालकिन. आज आप आई है खाना लेकर.?", ये खेत में काम करने वाली प्रवासी महिला थी. और अनीता से बात करती गौर से अर्जुन को देख रही थी.

"पिताजी किधर है अंगूरी?", अनीता ने उतावलेपन से कहा तोह एक पल के लिए अंगूरी इधर उधर देखने लगी.

"वो थोड़ी देर पहले सब्जी की बगीची देखने गए रहे. और छोटे मालिक डीजल लेने गए है पंप पर अभी 15 मिनट हुए. कहकर गए थे के आधे घंटे तक आ जायेंगे.", आधी हे बात सुनती अनीता तेज कदमो से अगली मोटर की तरफ चल दी और पीछे घाघरे की गांठ लगाती अंगूरी बस देखती रह गई छोटी मालकिन और इस लड़के को.

"मामी, हमारी कोनसी जमीन है.? अर्जुन भी उनके हे पीछे चलता पूछने लगा.
 
अर्जुन के ननिहाल वाले घर की रूपरेखा ाचे से समझा नहीं पाया आप लोगो को. इस लिए यहाँ पर एक कच्चा सा नक्शा दिखा रहा हु दोस्तों, जिस से शायद मदद मिले. और कहानी का अगला अपडेट थोड़ा लम्बा है लेकिन यक़ीनन मजेदार रहेगा. कुछ अभी लिख रहा हु, कुछ कल सुबह लिखूंगा. आज आप आराम से बाकी कहानियां पढ़िए और नींद का मजा लीजिये.

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ज्यादातर लोग देखेंगे यहाँ पर मैंने फर्स्ट फ्लोर और सेकंड फ्लोर लिखा है. लेकिन ये आदत वश लिखा है. फर्स्ट मतलब यहाँ जमीन वाला और सेकंड मतलब उसके ऊपर वाली मंजिल. शायद इस से कुछ मदद मिले.

बाकी आपके जो भी सवाल हैं बेझिझक पूछ सकते है.

गूडनिघत एंड स्लीप वेल.
 
अपडेट 60

सरोज मौसी


"साड़ी हे हमारी है ये जितनी दिख रही है. इधर गेहूं कड़ी है और 2 हफ्ते में कटाई हो जाएगी. उधर छोलिया (चना) काटने लग रहा है जहा शायद मजदुर अभी रोटी खाने लगे होंगे. गणना और सूर्यमुखी का मौसम तोह पूरा साल हे रहता है तोह वह उस तरफ सिर्फ वही है. आगे भी गेहूं लगी है. लेकिन पहले चल छोटे नाना को देख ले के वह कोनसा पानी दे रहे है.", जमीन तोह इतनी थी की जहाँ तक नजर आ रही थी वह साड़ी हे उनकी थी लेकिन आखिरी बात ने अर्जुन का दिमाग हिला दिए था के छोटे नाना कोनसा पानी दे रहे है. इधर एक कमरा पक्का बना हुआ था और साथ हे खपरैल का एक झोपड़ा भी बना हुआ था. कोई ek-chauthai एकड़ के इस भाग पर पानी की मोटर, सब्जियों की क्यारी और ये कमरे हे थे. दोनों हे कमरे से अभी 10-12 कदम दूर थे की तिन्न की चादर का दरवाजा खोल कर कपडे सही करती एक 23-24 साल की महिला बिना हे उनकी तरफ देखे सीमेंट की खुले मुँह की टंकी पर झुकती मुँह धोने लगी. गले के पास कुछ सफ़ेद कतरे रिसने लग रहे थे जो अनीता और अर्जुन दोनों को पता था के वह क्या थे लेकिन दोनों एक दूसरे के सामने कुछ बोल नहीं रहे थे. इतनी हे देर में दरवाजे से बहार ये बुजुर्ग आकृति निकली.

सफ़ेद धोती, वैसा हे कुरता और पाँव में जूती पहने ये मनोहरलाल हे थे जो हाथ में एक साफा लिए इस जवान औरत की गांड को हसरत से देख रहे थे.

"पिताजी, खाना लाये है.", अनीता ने मुँह दूसरी तरफ करते हुए थोड़ी ऊँची आवाज में ये बात कही थी. अर्जुन और अनीता को यु देखकर एक बार तोह वह चौंक गए लेकिन फिर थोड़ा सँभालते हुए दोनों के नजदीक आ खड़े हुए.

"ये है मेरा दोहता, हैं? पहलवान हो गया है रे तू तोह.", आँखों में साफ़ ख़ुशी थी अब जहाँ पहले उस औरत को देखते समय सिर्फ हवस थी. उन्होंने जोर से अपने नाती को गले लगाया तोह अर्जुन ने भी उतने हे प्यार और जोश से अपने छोटे नाना को बाँहों में भर लिए. म्हणत करने की वजह से मनोहरलाल का जिस्म बिलकुल ढीला तोह नहीं पड़ा था लेकिन इस जवान लड़के की बाँहों में उन्हें असीम ताक़त का अनुभव जरूर हुआ था.

"वाह बीटा. दिल खुश हो गया तुझे देख कर. सोचा था पंडित जी के घर शंकर जैसा कोई नहीं होगा, लेकिन तू कुंदन भैया से भी उंगल भर ऊँचा और अपने बाप से भी तगड़ा हो गया है रे.", कंधे पर हाथ रखते हुए वह अर्जुन को अपने साथ लिए उस घने आम के पेड़ के नीचे आ गए. यहाँ सन्न की बनी खाट पर दोनों बैठ गए तोह अर्जुन ने बड़े प्यार से कहा.

"नानाजी, पहले खाना शुरू कीजिये मैं यही बैठा हु आपके पास. वैसे आप अकेले हे इतनी बड़ी जमीन देखते है?", अनीता को ये बात शायद ाची नहीं लगी थी लेकिन फिर मोटर की पास हे बानी सीमेंट के फर्श जैसी जगह पर खाने के डब्बे रखती वह अंदर के कमरे से प्लेट, गिलास और कटोरी लेती बहार आ गई. सरे बर्तन पानी से एक बार साफ़ करने के बाद कपडे से पौंछकर उन्होंने सब्जी, रोटी और लस्सी परोस कर अपने ससुर के सामने रख दी.

"बीटा, ाचा लगा तुम्हे बरसो बाद देख कर. और मैं शुरू से हे देहाती आदमी हु तोह अपनी जमीन से हे प्यार है और एक दिन फिर इसमें हे तोह जाना है.", घर में सिर्फ इनके हे लम्बी मूछें थी, जो अब सफ़ेद हो चुकी थी. अर्जुन इतना समझदार तोह था हे के उसके नाना पहले क्या कर रहे थे समझ सके. लेकिन जो बात उसको ाची लगी थी वह ये के उन्होंने अपनी बहु की तरफ एक बार भी आँख उठा कर नहीं देखा था.

"अभी तोह आप जवान पड़े हो फिर इसमें समाने की बात मत हे कीजिये. और मामी जी आप कड़ी क्यों हैं? बैठ जाइये न और इधर नहीं बैठना तोह वह कुर्सी ला देता हु.", अर्जुन ने नाना से बात करते हुए फिर अपनी छोटी मामी को देखा जो चारपाई के पीछे हे कड़ी थी.

"नहीं नहीं. बस मैं ठीक हु. पिताजी वह मैं आगे जा कर आती हु, कुछ अनार पके होंगे तोह टॉड लुंगी. वह माजी ने कहा था के रेखा दीदी को पसंद है.", अनीता एक तरफ देखती बोली जहा कुछ हिस्से में 8-10 पपीते के पेड़ और कुछ अनार के झाड़ भी लगे हुए थे, सूर्यमुखी की फसल के बराबर के तिकोने से हिस्से पर.

"हाँ देख लो बिटिया और संभल कर जाना थोड़ा वह बहार वाली मदद टूटने की वजह से जमीन कही कही ज्यादा गीली हो गई है.", लस्सी का घूँट लेने के बाद उन्होंने कहा तोह इधर खेत की पगडण्डी से आता हुआ आदमी आवाज देता बोलै.

"इधर अकेली कैसे आ गई अनीता?", ये कैलाश मां थे अर्जुन के, नीली कमीज और हलकी सलेटी पंत पहने. कमीज बहार को निकली हुई थी. शरीर भी बस thik-thak हे था. जैसे घर के बाकी सदस्य अर्जुन ने अब तक देखे थे वह बिक्लुल वैसे न थे.

"इधर देख जरा तोह पता चलेगा के किसी साथ आई है.", उनके पिताजी की आवाज की दिशा में देखने पर hatta-katta मुस्कुराता चेहरा देख कैलाश भी तेजी से उधर आ खड़ा हुआ. अर्जुन ने पाँव चुने की कोशिश की लेकिन बीच में हे उसको पकड़ कर मां ने अपने से दुगनी सेहत वाले भांजे को गले लगते हुए कहा.

"अरे जमा खागड हो गया है तू तोह. पहले साइकिल के डंडे पर बैठ के मेरे साथ घूमता था और अब लगता है साइकिल का टायर हे फट जाये तेरे नीचे. वाह भांजे जी खुश हो गया.", कैलाश भी अपने बाप की तरह khet-khalihan में रहा था तोह भाषा भी देहाती थी लेकिन इनका भी बड़ा प्रेम प्यार था अपने भांजे से.

"वह छोड़ो लेकिन आपकी सेहत को क्या हुआ? मुझे तोह जहा तक याद है घर में आप और मनोज मां उस समय भी कसरत किआ करते थे. इस बार पतंग जरूर उड़ाएंगे साथ में.", अर्जुन अलग होने के बाद ध्यान से अपने मां को देखते हुए बोल रहा था. अनीता मामी ने भी अब अपने पति के लिए खाने की थाली लगा दी थी. और अर्जुन ने भी उन्हें चारपाई पर बिठा दिए था.

"शादी हो गई भाई अब हमारी. और kaam-dhande में इतनी कसरत हो जाती है के फिर शरीर मिटटी में मिटटी होता रहता है. आजा खाना खा ले पहले.", कैलाश मां के खाने के न्योते पर अर्जुन ने मुस्कुराते हुए ना में गर्दन हिला दी.

"वह मामी के साथ जरा अनार टॉड लौ. आपके साथ खाना रात में हे खाऊंगा. वैसे आप डीजल लेने गए थे तोह क्या नहीं मिला क्या.?", अर्जुन ने 2 कदम दूर होने के बाद खाली कनस्तर पर नजर डालते हुए कहा.

"अरे नहीं रे, डीजल दाल कर हे इधर आया हु. पानी उधर वाले खेत की मोटर से लगा रहे है न. ये फसल तोह तैयार है लेकिन उधर जमीन तैयार की है अभी.", अर्जुन को अब समझ आया के मां मोटरसाइकिल की तरफ से नहीं आया था. वह खेत के बीच से हे उसी पगडण्डी पर आ गए थे जो बहार वाली से बीच में हे जुड़ती थी. फिर अर्जुन उन्हें खाना खाते छोड़ हाथ पौंछती अनीता मामी के तरफ आ गया.

"चलो मामी मैं हे टॉड दूंगा आपके लिए अनार.", उसकी बात सुनकर पलट कर बस मुस्कुरा उठी. ये मुस्कान अलग सी थी, कुछ राज हो जैसे इसके पीछे. फिर दोनों हे उस और चल दिए फसल के किनारे से होते हुए. कुछ हे दुरी पर अर्जुन को वह कीचड सा दिखा पेड़ो से पहले हे बानी इस मिटटी की लकीर के पास. थोड़ा संभल कर एक तरफ से वह उछाल कर निकल गया तोह पीछे मुड़कर अपनी मामी को देखने लगा. अप्रैल शुरू हे हुआ था लेकिन ये धुप ऐसी तीखी भी न थी. आकर्षक चेहरे वाली उसकी ये जवान मामी कुछ सोचती सी उस पार कड़ी थी अर्जुन से, कोई 4 फ़ीट दूर.

"अब ये मेरे बस का नहीं.", वह उस गारे को देख रही थी जो बता रहा था के सतह ाची गीली थी और फिसलना पक्का हे था. अर्जुन उनकी हालत देख मुस्कुरा दिए बस. इस तरफ जमीन समतल करने के काम आने वाला लकड़ी का एक फुट से अधिक चौड़ा फटता दिखा तोह उसको सीधा उनकी तरफ जमीन पर रखते अर्जुन ने कहा.

"मामी, अब तोह हो जायेगा न आपसे? या उधर आ कर ले जाना पड़ेगा?", अर्जुन को ये करते देख वह भी हंस दी. और फिर सलवार को थोड़ा ऊपर चढ़ती सी फत्ते पर पाँव रखती आगे हुई तोह वह हल्का सा अंदर धंस गया लेकिन अनीता ने जल्दबाजी में हे दूसरा कदम आगे ले हे लिए, जिस से अब ये लकड़ी का फटता कीचड में समाने लगा. अर्जुन ने फुर्ती दिखते हुए मामी को आगे बढ़कर अपनी तरफ खींच लिए. ये सब इतनी जल्दी हुआ के वह सीधा उसके सीने से जा लगी. अनार के पेड़ से दूर हे अर्जुन के चौड़े सीने से ये कच्चे अनार जा लगे तोह अनीता की सिसकी निकल गई. ऐसा पथरर सा कठोर जिस्म पहली बार टकराया था उनके जिस्म से. लेकिन सब नजरअंदाज करते अर्जुन उनका हाथ थामे हे इस थोड़ी नीचे वाले बगीचे सी जगह में आ खड़ा हुआ. इधर से शायद हे वह दोनों नजर आते वह दूर बैठे मनोहरलाल जी या कैलाश जी को.

अनीता मामी चुपचाप सी सब तरफ देख रही थी. यहाँ जमीन पर हर पेड़ के नीचे गोलाई की गई थी और खाद मिटटी दाल कर पानी भी दिया हुआ था. खेत की मिटटी से कुछ अलग थी यहाँ की जमीन, शायद इन पेड़ो को ध्यान में रखते हुए हे ऐसा किआ गया था. पपीते के पेड़ पर ज्यादातर हरे हे पपीते लगे थे लेकिन नीचे की तरफ कुछ बड़े और पीले फल थे. अनार के झाड़ 5-6 फ़ीट ऊँचे लेकिन ाचे से फैले हुए थे. कुछ अनार तोह ज्यादा पकने की वजह से खुल चुके थे.

"ाचा मामी बताओ जरा कोनसे वाले तोड़ने है?", अर्जुन ने एक घने झाड़ के पास खड़े होते हुए अपनी मामी को देखते हुए कहा.

"ये भी नहीं पता के अनार कोनसा पका होता है और कोनसा कच्चा?", हंसती सी वह भी बराबर आ गई थी.

"बहार से तोह सभी ज्यादातर laal-gulabi हे हैं. हाँ जो ज्यादा छोटे है उनका पता है के वह कच्चे हे होंगे.", अर्जुन झेंपते हुए बोलै और फिर एक टहनी को नीचे झुकाते हुए उस पर लटक रहे 2 बड़े अनारो को टॉड कर मामी को पकड़ने लगा.

"रुक जरा.", अपना दुपट्टा सर से हटाने के बाद उन्होंने वह फैलाया तोह दोनों फल अर्जुन ने उसमे रख दिए. अब सीना भी ाचे से दिख रहा था उनका. एक पल नजर दाल कर वह वापिस ध्यान से पके अनार तलशने लगा.

"अर्जुन ये जो ठीक झाड़ के ऊपर है, वह अनार पका हुआ है.", सच में हे वह एक बड़ा अनार था जिसमे दरार आ चुकी थी. अंदर का रक्तिम रंग साफ़ दिख रहा था. लेकिन ये तोह झाड़ के ठीक ऊपर था जहा अर्जुन का हाथ सीधा नहीं पहुंचने वाला था, झाड़ की अधिक गोलाई की वजह से.

"मामी क्यों मजे लेती हो आप? वह हाथ नहीं जाने वाला. अगले झाड़ पर देखते है.", अनीता को इस बात से हलकी निराशा सी हुई लेकिन वह मैं मारती सी उसके साथ आगे चलने लगी.

"वैसे एक बात पूछ सकता हु? बुरा न माने तोह?", अर्जुन इधर आगे चला आया था जहा ऊँचा जामुन का भी पेड़ लगा था लेकिन उसपर सिर्फ हरे पत्ते हे थे.

"हाँ तोह बुरा तभी लगेगा जब बात बुरी करोगे. लेकिन लगता नहीं के कुछ ऐसा तुम्हारे मैं में होगा.", हंसती सी वह बोली और अर्जुन कुछ सोचकर फिर अनार देखने लगा. इधर भी 2-3 ाचे अनार दिखे तोह उसने उनमे से भी एक बेहतर वाला टॉड कर दुपट्टे में दाल दिए. वह खामोश हे था और उसकी बात पर अनीता एकटुक देखे जा रही थी. फिर एक लटकती दाल को जामुन के पेड़ से तोड़ते हुए अर्जुन ने ख़ामोशी से उसको साफ़ किआ तोह अनीता मामी खुद हे बोल पड़ी.

"तुम जो भी पूछना चाहते हो पूछ सकते हो. मैं बुरा नहीं मानूंगी. ज्यादा से ज्यादा यही होगा के मैं वह बात ख़तम कर दूंगी अगर ठीक न लगी तोह.", उथल पुथल मच गई थी ऐसे अर्जुन को खामोश देख कर.

"ये छोटे नानाजी क्या खेत में यही सब करते है? और कैलाश मां को पता है ये सब?", अर्जुन ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा था जो अनीता को पता न हो. लेकिन उसके शब्द बड़े नपेतुले और स्वच्छ थे. अनीता को भी उसका इस तरह से बात रखना ाचा लगा था.

"जब आई थी तोह मुझे नहीं पता था के वो ऐसे है क्योंकि ज्यादातर तोह वह खेत हे रहते है. लेकिन एक दिन रात को नींद नहीं आ रही थी, कोई 2 साल पहले की बात है ये. तोह मैं पहले तोह अंदर वाले आँगन में टहलने लगी रही फिर कुछ देर बाद बहार की तरफ चली आई गलियारे से. उस दिन ससुर जी बैठक में हे रुके थे रात को क्योंकि शाम में बारिश होने की वजह से खेत पर रहना तोह मुमकिन नहीं था. लेकिन जब इधर आई तोह आँगन में उनका हुक्का सुलग रहा था लेकिन वह नहीं थे.", एक लम्बी सांस लेने के बाद वह आगे कहने लगी. अब तक अर्जुन ने वह टहनी साफ़ करते हुए एक तरफ से हक्क जैसी बना ली थी. जिसको लेकर वह पहले वाले अनार के झाड़ की तरफ चल दिए था.

"फिर थोड़ा आँखों को हर तरफ घुमाया तोह कुछ दबी दबी से आवाजे आ रही थी भैंस के बाड़े के पीछे से. जिज्ञासा में उस तरफ गई तोह वह देख लिए जिसकी वजह से आज तुम ये सवाल कर रहे हो.", और इतना कह कर वह जमीन पर गिरा वह पका हुआ अनार उठाने लगी जिसको अर्जुन ने पहले नहीं तोडा था. लेकिन साथ हे अर्जुन भी झुक गया था उनकी बातें सुनता उस अनार को उठाने. हलके से दोनों के सर टकराये तोह दोनों हे मुस्कुरा दिए.

"मैं उठा रहा था न मामी.", अपनी मामी के माथे को सहलाता वह उनके साथ हे खड़ा हुआ. "मेरा सर पथरर सा है तोह आपको लगी होगी.", अर्जुन की इस बात पर मुस्कुराती वह ना में गर्दन हिला कर अनार को वापिस दुपट्टे में डालने लगी.

"वैसे आपने बताया नहीं के कैलाश मां को ये सब पता है? और क्या वह उन्हें मन नहीं करते?", अर्जुन के कहा गया हर लफ्ज़ जैसे सुई सा चुभा है अनीता को लेकिन इस अंदर के दर्द को बर्दाश्त करती वह फीकी मुस्कान के साथ हे बोली.

"जो खुद कुछ नहीं करते वह दुसरो को रोक नहीं सकते.", अर्जुन को कुछ समझ आया कुछ नहीं. और वह निरंतर अपनी मामी के चेहरे को गौर से देखता रहा. जिसको वह भी समझ गई थी की इस बैलबुद्धि को शायद ाचे से समझ नहीं आया.

"तेरे मां किसी काम के नहीं है. अपनी बीवी से बच कर वह इधर आते है फिर अपने पिता के कहने पर खेत के दूसरे कोने में चले जाते है उन्हें आराम से अपनी पसंद की औरत भोगने के लिए.", अर्जुन अवाक रह गया ऐसी कड़वी सचाई सुनकर. चेहरे पर बेयक़ीनी के भाव आने जाने लगे थे.

"तोह कही आप भी छोटे नाना..", अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हो गया था लेकिन तीर कमान से निकल चूका था.

"सॉरी मामी, गलती से ये बात निकल गई. मैं जानता हु आप कटाई ऐसी महिला नहीं होंगी.", अपनी नजरे झुकता सा वह बहार की तरफ जाने लगा. अनीता पहले हैरान हुई थी लेकिन अर्जुन को ऐसे खुद से निराश हो कर जाते देख वह भी तुरंत उसके पीछे चल दी.

"तेरी मामी के इतने बुरे दिन भी नहीं आये अभी. बेशक मुझे पति का प्यार नहीं मिला लेकिन मुझ में सबर है. दूसरी बात भी ाचे से याद रखना, तेरे छोटे नाना जो हैं वह बेशक ये सब करते है और शायद खेत में काम करने वाली 50 होंगी जिनसे उनके सम्बन्ध हो, लेकिन घर के लिए वह पूरे संजीदा और निष्ठावान इंसान है.", वही मदद के पास वह रुकी तोह अर्जुन पीछे मुड़कर उन्हें खड़ा देखने लगा.

"वैसे इस बार और फटता नहीं है. हाँ बुरा न मानो तोह मई हे पार करा देता हु.", अनीता अभी तक अर्जुन की बात सही से समझ पाती की अर्जुन ने अपना पंजा उस धसे हुए फत्ते पर रखते हुए मामी को बाहों के जोड़ से किसी बची की तरह पकड़ते हुए एक हे पल में उठा कर इधर ला खड़ा किआ. अनीता को तोह समझ भी नहीं आया था के अभी क्या हुआ. क्योंकि न तोह अर्जुन ने और कही हाथ लगाया था और न हे अपने जिस्म से उनका जिस्म लगाया था. 52-53 किलो की महिला को कैसे कागज सा उठा कर इधर खड़ा कर दिए था. वह गहरी निगाह डालती अर्जुन को देखने लगी जो उनसे कुछ कदम आगे निकल गया था.

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"नानाजी फिर शाम को मिलता है हम. आज घर हे आएंगे आप मां के साथ.", अर्जुन ने उनके पास आते हुए कहा. दोनों हे कुछ बातें कर रहे थे और बर्तन साफ़ एक तरफ रखे हुए थे.

"हाँ बीटा. आज तोह मैं वही रहूँगा अपने बेटे के हे साथ. रेखा के से भी मिलूंगा इतने समय बाद. मेरी बिटिया के लिए सामान भी लेना है कैलाश. तू गाडी साफ़ कर ले इतने फिर वक़्त से मार्किट भी चलेंगे.", अर्जुन के सर पर हाथ फेरने के साथ हे उन्होंने अपने बेटे को भी कहा. अर्जुन उनकी बात पर इधर उधर देखने लगा. यहाँ कोनसी गाडी है.

"नानाजी आप कोनसी गाडी के बात कर रहे हो? इधर कहा गाडी है?", अर्जुन की बात पर वह हंस दिए लेकिन कैलाश मां विपरीत दिशा में चलते हुए बोलने लगे.

"बीटा खेत के 2 तरफ और भी सड़क है और ये इधर का सारा हिस्सा हमारा हे है. गाडी इस तरफ से सड़क के पास हे कड़ी है.", वह इतना बोलकर निकल लिए. और अर्जुन भी फिर अपनी मामी के साथ पगडण्डी पर बढ़ लिए. वह नवयुवती जिसको उसके छोटे नाना भोग चुके थे अब डराती से चोलिये की फसल काट रही थी और बहुत से औरत और पुरुष भी वही काम कर रहे थे.

"मामी, यहाँ तोह बहोत लोग होते है कटाई के समय.", अर्जुन ने मदद की घटना के बाद अभी बात की थी अनीता से. जबकि वह तोह तभी से बस इस purn-purush को देख रही थी. कमाल का लड़का था ये जो अभी से इतना मजबूत, समझदार और हंसमुख था. जहा अनीता को पुरुष संसर्ग की तलाश थी वही अब उसका दिल आ गया था इस लड़के पर. वह उसका चेहरा देखते बस चली जा रही थी.

"मामी, मेरी हरकत का बुरा लगा हो तोह माफ़ करना. और कुछ समझ नहीं आया था तोह मैंने वही किआ जो ठीक लगा.", अर्जुन को लगा था के शायद अभी भी वह नाराज होंगी उसकी हरकत से.

"नहीं रे. मैंने कब ऐसा कहा के बुरा लगा. बस विश्वास नहीं हो रहा के एक इतनी काम उम्र का लड़का मुझे रूई की तरह ऐसे उठा के पलभर में हे इधर से उधर रख सकता है.", अभी भी सम्मोहन बरकरार हे थे उनपर. और अर्जुन मुस्कुरा दिए था क्योंकि उसको अब इतनी समझ तोह आ हे चुकी थी लड़की के 2 हे भाव होते है ऐसे पल में. Gussa-Pyaar. और खुद उन्होंने हे कहा था के गुस्सा नहीं है तोह मतलब था के मामी को प्यार हो हे गया था.

"कहो तोह यहाँ से मोटरसाइकिल तक गॉड में हे ले चालू आपको? वैसे इतनी हलकी हो के घर तक भी ले जा सकता हु.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह पहली बार वह शर्माती सी उसकी ब्याह पर मारने के बाद तेज कदमो से आगे भाग चली. पीछे अर्जुन उनके वह सूट में थिरकते हलके सुडोल नितम्भ देख रहा था. कैसे किसी अल्हड़ लड़की सी शर्माती भागी थी. 'ये वह जा रही है जहा से शायद वैसी हे हालत में इंसान वापिस नहीं आ पता. ममी, जो भी करना बस सोच समझ कर करना.' खुद से हे इतना कहता वह भी उनके पीछे हे चल दिए.

"तुम गाडी क्यों नहीं चलते?", अनीता मोटरसाइकिल के पास हे कड़ी बोली.

"मामी वह ऐसा है न के ये कही भी आ जा सकती है और फिर मेरे जैसे लड़के के लिए तोह ऐसी हे चीज ठीक है न. न कोई जगह का झंझट और सड़क का.", अर्जुन किक लगाने से पहले बोलै.

"जगह बहोत है हमारे पास. बस तुम लेके जाने वाले बनो.", होंठ kaat-ti वह पीछे बैठ कर बोली तोह जान कर भी अर्जुन अनजान बनते हुए पीछे देखता हुआ बोलै.

"कहा लेके चालू आपको? और कोनसी जगह दिखाएंगी आप?", अनीता शर्म से पानी हो गई लेकिन वैसे हे अंदाज में उसकी कमर में हाथ डालती बैठ गई.

"आप बता नहीं रही?", अर्जुन ने फिर से पुछा मोटरसाइकिल आगे बढ़ाते हुए.

"कल देखते है अभी घर चलो पहले. वह सभी खाने पर इन्तजार कर रहे होंगे.", आवाज में हलकी सी कम्पन्न थी अनीता मामी के इस समय और वो बस अर्जुन के मजबूत शरीर को महसूस करती बैठी रही. दोनों हे शांत थे और ये रास्ता कुछ मुश्किल भी न था समझने के लिए. सीधे हाथ मोड़ने के बाद जब वह मुख्या सड़क तक आये जहा से उनके घर की तरफ वाली रोड जाती थी अर्जुन ने ध्यान से देखना शुरू कर दिए. ये उनके घर के तरफ जाती गली हे थी जहा वह अभी धीमी गति से मुदा था.

पीले रंग का ये मकान जहा तार पर टोलिया सूखती लड़की उसकी आँखों के समां चुकी थी और अर्जुन का ध्यान बस वही लगा था. झटके खाती मोटरसाइकिल एकदम से उस घर से पहले वाले के सामने हे बंद हो गई. लेकिन अभी भी अर्जुन का ध्यान वही लगा था.

"अरे क्या हुआ तुझे? तेल ख़तम हो गया क्या इसमें?", अनीता मामी नीचे उतरती बोली और अर्जुन को होश आया के वह कहा है और किसके साथ है. लेकिन उधर से भी उस लड़की ने तार पर बाकी कपडे डालने के बाद जैसे हे झुकने के बाद नजरे सीढ़ी की तोह भौचक्की सी देखती रह गई. एक पल को तोह लगा वह सपना हे देख रही हो जैसे.

"अगर तेल ख़तम हो गया है तोह इधर कड़ी कर दे. तेरे मां ले जायेंगे बाद में यहाँ से, अपनी पहचान का हे घर है. अररि मंजू, ये अंदर करवा तुम्हारे घर. तेरे चाचा ले जायेंगे अपने आप.", उनकी बात पर वह सेहमी हुई सी सफ़ेद सलाखों वाला दरवाजा ऊपर से खोलती कड़ी हो गई.

"ओह मामी, तेल नहीं ख़तम हुआ है. वह शायद स्पीड काम थी तोह बंद पड़ गई है. ऐसे हे किसी का भी घर खुलवा लेती हो आप.", अर्जुन बहोत धीमी आवाज में बोल रहा था. उसने मोटरसाइकिल की टंकी को हिलाते हुए कान लगा के सुना था के अभी तेल बहोत था उसमे.

"चची लगा दीजिये आप अंदर और चाहे तोह पापा का स्कूटर ले जाइये.", उधर से मंजूबाला ने थोड़ा संभल कर ये कहा लेकिन अर्जुन ने आँख मारते हुए मोटरसाइकिल स्टार्ट कर ली. गली में फिर से dug-dug की आवाज गूँज गई.

"ये मेरा भांजा है. अभी शायद गाडी चलना सीख हे रहा है तोह गलती से बंद हो गई होगी इस से. चल कोई बात नहीं तू दरवाजा बंद कर ले. और शाम को आ जइयो घर में दीदी को लेकर. बता डीओ रेखा दीदी आई है.", अनीता जी वापिस बैठ टी हुई बोली और उनकी आवाज ऐसे थी जैसे 5-6 घर आराम से सुन सके. मंजू हंसती हुई सी अंदर भाग गई. और अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ मोटरसाइकिल घर की और ले चला.

"बड़ा हंस रहा है तू?", जैसे हे वह दरवाजे के पास पहुंचे गेट खोलती अनीता चची बोली. प्रकाश अभी वह नहीं था लेकिन जैसे हे दरवाजा खोला टाइगर उछलता हुआ बहार आ गया.

"सोच रहा था के आप कही भी मजाक उदा सकती है. देखो जरा एक अनजान के सामने मुझे नौसिखिया बता दिए आपने. मन के मोटरसाइकिल अभी 2 हफ्तों से हे चला रहा हु लेकिन ाची चला लेता हु.", अंदर लगते हुए वह स्टैंड पर कड़ी करने के बाद उतरा और फिर टाइगर को बैठ कर सहलाने लगा. टाइगर भी मस्ती कर रहा था.

"अरे अनजान नहीं है वह लोग. मैं यहाँ 3 साल से हु लेकिन उनका परिवार शुरू से हे है इधर. और तेरी बहनो से भी ाची दोस्ती है इसकी. वैसे रहती शहर में हे है उधर और बड़ा नाम ऊँचा किआ इसने हमारे शहर का पूरे राज्य में.", अंदर कदम बढाती वह जा रही थी और अर्जुन उनकी बात सुनता बस पीछे चल रहा था. अंदर के दरवाजे पर वह अचानक हे रुकी और अपनी सोचो में गुम्म अर्जुन उनके पिछवाड़े से जा लगा.

'आउच.. कहा ध्यान है तेरा?", अपना सीना सहलाती वह दरवाजा खोल भीतर आँगन में आई, उनका सीना इस टक्कर से दरवाजे पर टकरा गया था.

"सॉरी, वह आपकी बात सुन रहा था और इतने में आप हे रुक गई.", अर्जुन झेंपते हुए आगे बढ़ा और इधर स्वाति फिर से उसकी ब्याह पकड़ती साथ हो ली. अनीता मामी ने भी बैग से अनार तख़्त पर रखते हुए चेहरा साफ़ किआ.

"किसकी बातें हो रही थी चची.?", स्वाति वैसे हे अर्जुन से सत् कर बैठी पूछने लगी. इधर संगीता मामी के साथ सौम्य और कंचन खाना वही दोनों तख़्त पर रखती बैठ गई थी. बाकी सब शायद अपने कमरों में थे रेखा जी के साथ. ड्राइंग रूम में औपचारिक खाना जैसे उन्हें पसंद नै था.

"कुछ नहीं वह अपनी मंजू के घर के बहार इसकी मोटरॉयचले बंद हो गई थी. फिर उसके परिवार के बारे में हे बता रही थी मैं इसको.", हाथ धोने वह उठती हुई आँगन के दूसरे कोने में चली गई और अर्जुन भी उनको देखने के बाद खुद हाथ धोने चल दिए. कंचन यहाँ नलका चलती उसके हाथ धुलवा रही थी. कैसे कमीज में उसके छोटे उभर बता रहे थे के वह इतने छोटे भी नहीं थे. अर्जुन कुछ को संभालता वापिस सबके पास आ गया.

"मेरी ाची सहेली है वह लेकिन आजकल इधर काम हे दिखती है. परसो तोह उनका परिवार यहाँ नहीं था चची.", समय ने ये बात अर्जुन को बताते हुए फिर अपनी छोटी चची से पुछा.

"शनिवार को वह यहाँ से गए थे ##### गाँव. कोई पूजा थी ऐतवार को तोह फिर वही से कल वापिस आये थे. वैसे भी दीदी प्रशाद देने आयंगी हे तोह वह भी साथ आएगी.", संगीता मामी ने अर्जुन की प्लेट में दाल की कटोरी रखते हुए कहा. अर्जुन उसमे पड़े घी को देख हैरान हो गया.

"खा ले बीटा, तेरे जैसे हे शरीर वाले झेल सकते है असली खुराक.", इस बार गहरी नजर से उन्होंने देखते हुए ये बात कही थी. अर्जुन हैरान था के ये मामी तोह बड़ी चुपचाप थी सारा दिन से लेकिन यहाँ सिर्फ ये हे बोल रही है और अनीता मामी तोह खामोश है.

"मामी आप लोग भी तोह म्हणत करते हो इतनी फिर अपनी भी खुराक बढ़ाओ थोड़ी. देखो जरा अभी भी इतनी पतली हो.", अर्जुन ने ये ऐसे हे कहा था. लेकिन समय और अनीता मामी उसकी इस बात पर हंस दी थी. फिर वह सभी खाना शुरू करते हुए हलकी फुलकी बातें करने लगे. स्वाति और कंचन अर्जुन के साथ हे खा रही थी. उसको भी ये देख ाचा लगा के उसकी बहने अभी भी वैसी हे है.

"तुझे मिलवाउंगी मंजू से. देखना कितनी tej-tarrar लड़की है वह लेकिन साथ हे दिल की भी ाची है. बस उनके हे साथ जिन्हे वह ाचे से जानती है.", समय ने ये बात बोली और कंचन हंसने लगी.

"कही ऐसा न हो के इसका भी गाल न सेक दे कोई शरारत करने पर. याद है न दीदी उस कैसेटटे की दुकान वाले की क्या धुलाई की थी मंजू दीदी ने?", खिलहिलाती हुई स्वाति ने इतना कहा तोह अर्जुन ने घूर के देखा उसको.

"बस भी करो इतनी बातें जिनको मैं जनता भी नहीं. और रही बात tej-tarrar होने की तोह वादा रहा के उसकी बोलती बंद नहीं कर दी तोह मेरा नाम भी अर्जुन शंकर शर्मा नहीं.", उत्तेजना में और मजाक में उसने ये सब कहा था लेकिन उसकी बात पर समय दीदी के साथ बाकी चरों भी हंसने लगी.

"बीटा, देख तू पहलवान जैसा है ये ाची बात है. लेकिन वह लड़की तेरे हे कद्द की और चलती फिरती आग हे है. बेशक तुझे हाथ न लगाए क्योंकि इस घर पे है तू लेकिन अगर कोई utt-patang हरकत की तोह कान खींचे बिना तोह नहीं छोड़ने वाली तुझे वह.", अनीता मामी ने इतना कहा इधर कंचन भी बोल उठी.

"भाई, चल तू भी क्या याद करेगा. आज न तू बस एक काम करके दिखा डीओ तोह फिर तू जो बोलेगा वह मैं करुँगी. एक बार हाथ पकड़ के दिखा डीओ उसका.", कंचन की बात पर स्वाति ने भी स्वर मिलाया.

"ऐसा कर दिए और उसने कुछ नहीं कहा तोह मैं भी यही वादा करती हु."

"तुम सब मिलकर इसको पहले हे दिन पिटवाने में लग गई. कोनसी दुश्मनी निकाल रही हो इसके साथ? और हाथ पकड़ना सरासर गलत बात है बीटा.", संगीता जी ने ये बात कहते हुए अपनी प्लेट छोड़ दी. जिसको बिंदिया ने उठाते हुए बाकी प्लेट भी समेत ली थी.

"मामी जी. आप भी देखना फिर अपने इस भांजे को जिसको सब बचा बोल रहे है. बस ये बात बड़ो तक नहीं जानी चाहिए.", अर्जुन ने वैसे हे शान्ति से कहा

"बस तू हे अपनी मम्मी के पास रट हुए मत जाना.", समय ने हँसते हुए कहा और वह बाथरूम की और चली गई.

"भाई तू एक बार मेरे साथ चल जरा. स्कूटी ले आते है न मेरी. और इस बार तू वापिस मेरे साथ हे चलना जिस से स्कूटी शहर ले जा सके. दीदी को उनकी सहेली ले जाती है लेकिन मुझे और कंचन को ऑटो या फिर रिक्शा से जाना पड़ता है कॉलेज.", स्वाति के ऐसे प्यारे निवेदन पर अर्जुन भी उठ खड़ा हुआ. दोपहर के साढ़े 3 बज चुके थे. फिर कंचन ने भी स्वाति को कुछ लाने के लिए कहा तोह दोनों बहार आ गए.

"अब मुझे क्या पता के कहा जाना है? बता मार्किट किस तरफ है?", मोटरसाइकिल के आवाज सुनकर सुनंदा जी बहार आ निकली.

"ये क्या, फिर से बहार जा रहे हो तुम लोग? बीटा तू आराम कर ले ये लड़किया तोह आफत करती हे रहेंगी.", उन्होंने बड़ी परवाह से कहा तोह अर्जुन अपनी इस खूबसूरत नानी को हँसते हुए देख कर कहने लगा.

"नानी जी, मैं कोई लम्बा सफर नहीं करके आया हु इधर. अब देखना हर हफ्ते या महीने में 2 बार तोह मैं आपसे मिलने हे आया करूँगा. और अभी सिर्फ इस चुटकी की स्कूटी लेकर आ रहे है.", सुनंदा जी थोड़ी अनुशाशन वाली महिला थी लेकिन अपने नाती का ये प्रस्ताव सुनकर खुश हो गई थी. वह कितने अपनेपन से बोलै था के अब यहाँ आने के लिए उसका रास्ता पता लग चूका था.

"संभल के जाना इसके साथ. ये जाती जिस काम से है उसके साथ और कही चल देती है.", दरवाजा लगाती वह अंदर चली गई इधर दोनों हे घर से बहार चल दिए. स्वाति सभी raste-galiya समझती रही और कुछ हे देरी में वह इस ाची खासी मार्के में आ गए थे. अर्जुन देख रहा था के यहाँ सच में दोपहर में भी रौनक थी. दुकाने इस लम्बी चौड़ी सड़क एक दोनों हे और थी.

"ये यहाँ की छोटी मार्किट है. सब्जी मंडी रोड बोलते है. बड़ी मार्किट तोह जहा अपनी दूकान है उस से पहले है. चल आजा.", एक दूकान में घुसती वह अर्जुन को बताने लगी. ये को बेकरी जैसी दुकान थी.

"भैया 4 डैरीमिल्क, एक मिल्कीबार और 2 पिकनिक दे दो. और चल तू पैसे निकल.", अर्जुन स्वाति के ऐसे कहने पर हँसता हुआ पर्स निकल कर खड़ा हो गया. फिर दुकानदार के बताये पैसे देता वापिस मोटरसाइकिल की तरफ आया तोह स्वाति ने हाथ से पकड़ते हुए आगे की तरफ चलना शुरू कर दिए.

"ऐसे नहीं बचेगा तू इतनी जल्दी. और मैंने देखा कितने पैसे रखने लगा है तू. अब पहले हम यहाँ वाडीलाल वाले से एक आइसक्रीम का डब्बा लेंगे फिर, वापिस रस्ते से स्कूटी.", स्वाति का ऐसे हक़ जमाना और अर्जुन को अपने साथ लिए चलना उसको भी ाचा लग रहा था. कुछ दुकान आगे हे दोनों इस बड़े ice-cream पार्लर पर खड़े थे. बहार सोफ्टी की मशीन लगी थी और अंदर बड़े फ्रिज.

"एक बटरस्कॉच की ब्रिक देना भैया और एक चॉक्लेट वनीला कोन.", इस बार अर्जुन ने इतना बोलै और स्वाति चहक उठी. पैसे देने के बाद ice-cream खुद पकड़ कर सोफ्टी स्वाति देते हुए वह मुस्कुराने लगा.

"तू न वैसी हे प्यारी छोटी बची है."

"और तू मेरा सबसे प्यारा दोस्त है.", स्वाति ने भाई नहीं कहा था और अर्जुन भी बस उसको वो सोफ्टी जल्दी जल्दी खाते देखने लगा.

"चल अब पहले स्कूटी लेले. पीछे बैठ कर हे खा लिओ तू.", अर्जुन वापिस वही ले आया और एक हाथ में चॉक्लेट और डब्बा पकडे वह दूसरे हाथ से आराम से बैठ सोफ्टी खाने लगी.

"यार ये सामान तू आगे हे हैंडल पर लटका ले. ऐसे न पकड़ सकूंगा न खा.", अर्जुन ने भी वह सभी सामान एक पॉलीथिन में करते हुए हैंडल पर लटका लिए. स्वाति उलटे हाथ से कहती दूसरे हाथ से उसकी कमर पकड़े चिपकती हुई बैठी रही. एक छोटी सी मिस्त्री की दूकान के पास रोकने का बोल कर वह फिर मोटरसाइकिल रुकने पर उतर कड़ी हुई. बची खुची सोफ्टी ख़तम करने के बाद वह अर्जुन को देखने लगी.

"भैया हो गई ये स्कूटी? कितने हुए?" अर्जुन ने खुद हे उतारते हे उस छोटे से कद के व्यक्ति से पुछा जो एक साइकिल की तुबे पानी के तसले में डूबते हुए देख रहा था.

"हो गई है भाई. 20 रुपये हुए.", अर्जुन ने जेब से 20 का नोट निकल कर आगे बढ़ा दिए. चाबी स्कूटी में हे लगी थी तोह मुस्कुराती हुई स्वाति ने उसको स्टार्ट किआ और अर्जुन की प्रतीक्षा करने लगी.

कुछ हे पल बाद दोनों हे साथ साथ चल रहे थे. अब सामान स्कूटी के आगे टेंगा हुआ था और अर्जुन थोड़ी थोड़ी देर बाद स्वाति का चेहरा निहारता सब तरफ देख कर 20-30 की रफ़्तार से चल रहा था. स्वाति भी मंद मंद मुस्कुराती सी इसका मजा ले रही थी.

"आगे भी देख लो थोड़ा बहोत. तुम्हारे लिए ये रस्ते नए है.", खुद भी सामने देखती वह मुस्कुरा रही थी.

"तुम्हे तोह पता है न रस्ते? बस फिर मुझे क्यों दिक्कत होने लगी.", अर्जुन भी मजे लेने लगा था स्वाति के. दोनों ऐसे हे घर के बहार पहुंच गए थे. इस बार सब सामान ड्राइंग रूम से निकलते अंदर के रस्ते में रखे फ्रिज के अंदर रखती वह सीढ़ियों से हे अर्जुन को ऊपर ले आई.

"चलो तुम्हारा कमरा भी दिखा दू तुम्हे." 2 कमरों को पार करती वह इधर आ गई थी जहा ये तीन कमरे थे.

"ये पहला वाला है दीदी का और साथ वाला बुआ का. ये आखिरी वाला है तुम्हारा.", कमरा खोलने पर अर्जुन ने पाया के ये बड़ा हे व्यवस्थित और नया कमरा था. उम्दा बिस्टेर, दोनों तरफ 2 लैंप लगे थे छोटी स्टूल पर, लकड़ी की जमीन से छत्त तक जाती बड़ी अलमारी और छोटी टेबल के दोनों तरफ 2 कुर्सियां. बिस्टेर के हर तरफ ाची खासी जगह भी थी.

"ये तोह जैसे बिलकुल नया है." अर्जुन ने साथ में कड़ी स्वाति को कहा

"पहली बार तुम हे आये हो रहने इसमें. अभी तक कोई नहीं आया था.", अलमारी खोलती स्वाति ने उसको कपडे दिखाए जो अर्जुन घर से लेके आया था लेकिन अब यहाँ सही तरह से रखे थे.

"ऊपर टेलीविज़न यहाँ सभी कमरों में है सिर्फ इसको छोड़कर. लेकिन ये जरूर है.", दूसरी अलमारी खोलकर स्वाति ने दिखाया कोई 100 से ज्यादा किताबे राखी थी वह.

"वाह ये हुई मेरे काम की चीज.", अर्जुन भी उसके बराबर खड़ा उन्हें देखने लगा. किताबे पढ़ना तोह उसका सबसे पसंदीदा काम था. लेकिन इधर जैसे हे स्वाति घूमी उसके ये थिरकते माध्यम से सतांन अर्जुन की ब्याह से ाचे से रगड़ गए. वह तोह जैसे वही जम्म गई थी.

"वैसे तुम्हारी कमजोरी मिल हे गई मुझे.", अर्जुन ने हलके से कमर में हाथ रखते हुए कहा तोह स्वाति नादान से चेहरे से उसको देखने लगी. अर्जुन ने आँखों को नीचे करते फिर उसके चेहरे को देखा तोह स्वाति के गाल लाल हो गए और वह तितली सी उसकी गिरफ्त से निकलती बहार भाग गई. अर्जुन भी अपनी इस हरकत पर मुस्कुराता हुआ बिस्टेर पर गिर गया. अब हलकी थकन महसूस होने लगी थी. तकिया एक हाथ के नीचे दबाये वह वैसे हे उल्टा लेट गया था. दरवाजा बंद करने की कोई जेहमत नहीं की थी.

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रेखा जी का भी सारा समय अपनी माँ, tai-chachi और भाभियो के साथ हे बीत गया था. कुछ देर उन्होंने घर पे अपनी सास, बेटियों से भी बात की थी. खाना खाने के बाद वह ऊपर हे ममता के कमरे में पूजा और ममता के साथ हे बिस्टेर पर लेती sukh-dukh सांझे कर रही थी. अपने मायके आकर वह बिलकुल हे अलग लग रही थी. सलवार कमीज में khili-khili से वह आज फिर से नै उमंग से भरी औरत थी. 5 से ऊपर का कुछ समय हुआ तोह नीचे से उनकी चाची सुमित्रा जी की आवाज सुनाई पड़ी.

"कमरे में हे बंद रहोगी क्या दिन भर? रेखा, तुझसे मिलने सरोज आई है.", तीनो हे औरते ast-vyast सी पसरी थी बिस्टेर पर. बातें करती जैसे सो हे गई थी लेकिन पूजा ने अपनी ननद को उठाते हुए कहा.

"दीदी, चलो आपका बुलावा आया है. अब रात को सो लेना साथ में. वैसे भी आपके भाई तोह आने से रहे.", हंसती हुई वह कमीज ठीक करने के बाद hath-mooh ठीक करने बाथरूम में चली गई. इधर ममता भी उठ गई और रेखा जी भी.

"आप साथ वाले कमरे में जा कर तैयार हो जाओ. मैं दीदी के आने के बाद हो जाउंगी.", ममता की बात पर रेखा जी साथ वाले कमरे में चली गई. कुछ हे देर बाद तीनो हे महिलाये नीचे वही तख़्त पर बैठी थी जो अब आँगन के बीच में रखे थे. अपनी सहेली सरोज से रेखा जी गले लग के मिली थी और वही सुनंदा जी भी कुर्सी लेकर आ गई थी.

"दीदी मैं चाय बना के लाती हु, आप लोग बैठ कर बातें कीजिये.", ममता ने इतना कहा लेकिन उन से पहले हे संगीता जी ने अपनी जेठानी को वापिस बैठा दिए जिसपर बाकी सब भी हलके से हंस दिए.

"रेखा तू न बूढी होने को आई. एक तोह पहले हे आंटी ने बुढ़ापे को धोखा दिए हुआ ऊपर से तू वही जवानी में रुकी पड़ी है.", ये आंटी जी की आवाज साफ़ और प्यारी थी. लेकिन लम्बाई जैसे रेखा जी और सुनंदा जी से भी 2-3 इंच ऊपर हे थी.

"माँ की बात तोह सही कही लेकिन मैं देख कितनी मोटी हो गई हु. न ये ममता चर्बी चढ़वा रही न तू.", रेखा जी ने अपनी सहेली की प्रशंशा के साथ अपनी माँ और भाभी का भी जीकर कर दिए था.

"सुना है गुड्डी भी आई हुई है?", सुमित्रा जी ने मिठाई और मेवे की थाली वह तख़्त पर रखते हुए कहा.

"हाँ. चची वह छुट्टियां थी अभी कॉलेज की और स्टेडियम में भी एक हफ्ता उसकी प्रैक्टिस नहीं थी. फेर वह अपनी मौसी के घर भी रह आई 2 दिन तोह कल रात हे आ गए थे उसको लेकर. बहार हे बैठी है वह और पता नई क्या खिचड़ी पका ऋ है साड़ी मिलके. ले रेखा ये प्रशाद का डब्बा तू खोल. सवामणी लगाई थी बालाजी के परसो.", सब बताती सरोज ने वह लाल पन्नी से ढाका बड़ा मिठाई का डब्बा अपनी सहेली की तरफ बढ़ाया जिसको रेखाजी ने भी हाथ जोड़ कर लेने के बाद खोला. बूंदी के लड्डू से थोड़ा सा टुकड़ा लेने के बाद उन्होंने वह अपनी भाभी की तरफ कर दिए.

"बुला तोह जरा मेरी बिटिया को. देखु कैसी हो गई है. और अब बाल कटवाने बंद कर दे उसके.", रेखा जी ने हाथ मारते हुए ये कहा इधर सुनंदा जी ने आवाज दी और फिर खुद हे अपनी बेटी को बताने लगी.

"सरोज की लड़की 10 लड़को पे भरी है रेखा. 3 साल पहले देखा था तूने लेकिन अभी जरा देखियो.", इतनी हे देर में समय के साथ हे मंजू अंदर आई लेकिन चेहरे पर अलग हे चमक थी उसके. जो थोड़ा हैरान करने वाली थी सब देखने वालो को.

"ये मंजू है?", रेखा जी ने देखा इस लड़की को जो लाल कढ़ाई किये हुए सफ़ेद सलवार कमीज में थी. बाल कंधे से नीचे और शरीर में भरपूर लचक. बेदाग त्वचा और 6 फ़ीट लम्बी. वो हाथ जोड़ने लगी तोह रेखाजी ने उसको पहले तोह गले लगाया फिर अपने हे साथ बिठा लिए. ममता जी उधर से कड़ी होती हुई ऊपर रसोईघर की तरफ चल दी थी.

"तेरे तोह भाग हे खुल गए सरोज, ऐसी लड़की नसीब से हे मिलती है.", रेखा जी ने माथा चूमते हुए एक काजू खुद हे मंजू के मुँह में दाल दिए.

"नसीब? क्या बताऊ तुझे. 5 महीने में 3 लड़के देख चुके लेकिन इसके कद्द का और पसंद का न मिला कोई. ऊपर से इसका बापू तोह पहले बोल देता है के शादी के बाद भी उसकी बेटी खेलती रेहनी चाहिए.", सरोज जी तोह जैसे संकट में हे थी.

"ऊपर इस इसका गुस्सा देख ले तोह रही सही कसार पूरी."

"जल्दी मत कर. जब ठीक समय होगा तोह अपने आप सब ठीक हो जायेगा. ाचा बीटा तुम यहाँ हम औरतों में बोरियत महसूस करोगी. हम बाद में मिलते है तुम पहले अपने सहेलियों से मिल लो.", रेखा जी ने इसको शरमाते देखा तोह एक बार फिर से गले लगते हुए समय के साथ विदा किआ. दोनों हे सीढ़ियों से ऊपर चल दी.

यहाँ इनका ये gup-shup चलता रहा इधर ऊपर कमरे में मंजू अपना दुपट्टा एक तरफ फेंकती हुई बिस्टेर पर आ बैठी. समय और कंचन वह पहले से हे थी.

"ोये तू रात को आ गई थी तोह सुबह से क्या कर राइ थी घर पे.?" समय दीदी ने भी एक कोने पर बैठ कर कहा.

"मौसी सुबह गई है और फिर आज माँ ने कपडे भी धुलवा दिए मेरे से.", स्वर में थोड़ा रोष सा था.

"तू नीचे शर्मा रही थी, अब तू कपडे भी धोने लगी है. चक्कर क्या है?" समय ने उसका हाथ पकड़ते हुए पुछा.

"कुछ नहीं रे. माँ पीछे पड़ी है मेरी शादी के, पापा तोह फिर भी मान जाए लेकिन मौसी और माँ हर समय बस रट्टा लगाए बैठी है. काम सीखना, कपडे ऐसे पहन न और न जाने क्या क्या. तू बता क्या चल रहा है? और ये दोनों क्या खिचड़ी पका रही है.", मंजू आराम से पूछ रही थी. अभी वह आराम से थी जैसे अपनी सहेलियों के साथ वह होती थी.

"हमारा वही है दीदी जो होता है. उधर कॉलेज और इधर घर में जितनी मिलती है उतनी मस्ती.", कंचन ने तकिया गॉड में रखते कहा.

"आजकल वह शहर में भी नहीं मिलती आप तोह? इस बार एक बार भी नहीं आई?" स्वाति के प्रश्न पर मंजू सोच में डूब गई फिर जल्दी से बोली.

"ट्रायल थे यार तोह टाइम नई लगा. वैसे कल जाना पड़ेगा एक बार लेकिन दोपहर तक आ जाउंगी.", ये इधर सभी बातें कर रही थी की अनीता जी chai-coffee की ट्रे लेती अंदर चली आई.

"हाँ तोह हमारी गब्बर सिंह सुना है आजकल घर के काम करवाए जा रहे है?", उन्होंने हँसते हुए ट्रे बिस्टेर पर रखते हुए एक कुर्सी खींच ली.

"चची, आज देख तोह लिए आपने. अब ढिंढोरा पीटेगी.", मंजू भी हंसती हुई जवाब दे गई.

"ाचा यार तू इधर बैठी एक काम कर जरा. वह ये आखिरी कमरे में बिस्टेर पर एक किताब पड़ी है जरा लेती आ. तुझे कुछ काम की चीज दिखानी थी.", समय ने गंभीर चेहरे से मंजू को ये कहा तोह वह बिना सोचे हे बहार निकल गई. न चप्पल न दुपट्टा लिए था, क्योंकि यहाँ और तोह कोई होता नहीं था. अर्जुन अभी हे बाथरूम में गया था तोह कमरा खली था. मंजू ने इधर उधर ध्यान से देखा लेकिन किताब नहीं मिली. कुछ सोचती सी वह अलमारी की तरफ बढ़ी और दरवाजा खोल कर देखने लगी जहा इतनी किताबे पड़ी थी.

'पता नई कोनसी किताब होगी. बोल देती हु खुद हे ले लेगी.', लेकिन ये बात मैं में कहती वह पलट हे रही थी की पीछे से अर्जुन ने उसको बाँहों में भर लिए. दिल जैसे धक् के साथ रुक हे गया था मंजू का.

"मेरे हे कमरे में चली आई. बड़ी हिम्मत वाली हो तुम.", गर्दन को चूमते हुए अर्जुन ने छोड़ दिए लेकिन वह वही कड़ी साँसे दुरुस्त करती रही. कुछ पल बाद जब मुड़ी तोह अर्जुन बिस्टेर पर पाँव नीचे लटकाये उसको निहार रहा था.

"तुम इधर?", इतना है पुछा मंजू ने

"मेरे नाना का घर है. वैसे ाचा लगा तुम्हे ऐसे अपने कमरे में देख कर.", अर्जुन को पता था के घर में यहाँ सभी है और कुछ ऐसा वैसा करना मुमकिन नहीं होगा.

"कल जा रही हु शहर लेकिन दिन में वापिस आ जाउंगी.", वह बहार निकल कर जाने लगी तोह अर्जुन ने हाथ पकड़ लिए. मंजू खामोश कड़ी अर्जुन के इस स्पर्श का एहसास ले रही थी.

"मिली नहीं किताब? अर्जुन ये क्या कर रहा है.?", समय दीदी की आवाज पर अर्जुन ने मुस्कुराते हुए हाथ छोड़ दिए लेकिन मंजू वह से भाग गई थी. दीदी वही कड़ी बस अर्जुन को देख रही थी.

"लो फिर अपनी बात मैंने पूरी की और शायद आपकी सहेली के गाल हे लाल हो गए होंगे.", अर्जुन खड़ा होता हुआ अलमारी से कपडे निकल समय को हैरान वही छोड़ कर बाथरूम में नहाने चला गया.

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"उसको तूने कुछ नहीं कहा? और हाथ क्यों पकड़ा था उसने तेरा?", समय इधर अंदर आई जहा मंजू खामोश सी नजरे झुकाये बैठी थी लेकिन शायद ये शर्म और प्यार की वजह से था.

"ऐसा कुछ नहीं हुआ था. वह किताब नहीं मिली लेकिन फिर उसने मेरा हाथ पकड़ कर किताब अलमारी से लेने को कहा पर मैं बहार आ गई. और क्या मैं ऐसे हे हरेक के साथ लड़ती रहती हु क्या?", मंजू की इस बात पर स्वाति और कंचन एक दूसरे को देख कर परेशां सूरत बनाये बैठी थी.

"दीदी, आपके ऊपर तोह हमने अर्जुन से शर्त लगा ली थी की आप उनका गाल लाल कर डौगी. काम से काम पलट को दांत तोह डौगी हे. यहाँ आप उल्टा भीगी बिल्ली सी चली आई.", स्वाति के स्वर में नाराजगी का पट था.

"सेर को सवा सेर मिलता हे है. इस शेरनी को भी मिल गया लगता है.", अनीता जी की बात पर जहा सभी हंस दिए वही मंजू खुद को संयत करती सी उन्हें देखने लगी.

"ऐसा कुछ नई है चची. हरकत या कुछ बुरा नहीं कहा तोह मैं कैसे कुछ कहती. ाचा आप सुनाओ क्या मजे चल रहे आपके. आज इसके हे साथ तोह आ रही थी दिन में आप तोह मेरे साथ क्यों उलझा रही थी इसको?"

"चची खेत गई थी अपने साथ लेके अर्जुन को खाना देने. तू ये बता जरा के उस लड़के का क्या हुआ जिसके बारे में तू कॉलेज में बता रही थी की पहली बार कोई लड़का ठीक लगा तुझे?", समय ये पूछ हे रही थी की अर्जुन सफ़ेद kurta-pajama पहन कर अपने गीले बाल सही करता हुआ अंदर आ बैठा स्वाति को आगे धकेलता सा.

"किस लड़के की बातें हो रही है?", अर्जुन ने स्वाति के साथ थोड़ा सही से बैठते हुए एक बार मंजू को देखा और फिर समय दीदी की तरफ.

"तेरी हे बात हो रही थी और तू आ गया.", इस बात पर मंजू थोड़ा हंस हे पड़ी. सच भी था के यही वह लड़का था जिसके बारे में उसने समय से बात की थी लेकिन अभी तक नाम नहीं लिए था.

"ाचा जी. वैसे आपका थैंक यू मिस. आपने मेरी हेल्प की इन दोनों से शर्त जितने में.", उसकी बात पर सब अर्जुन को हे देखने लगे जैसे वह क्या कह रहा है.

"अरे. ये स्वाति और कंचन दीदी अब दोनों हार चुकी है. वादे के मुताबिक मैं जो भी कहूंगा वह ये दोनों करेंगी.", इधर ये बातें कर रहे थे की संगीता जी गेट पर आ कड़ी हुई.

"वह पिताजी आ गए है और अर्जुन तुम्हे नीचे बुलाया है.", अर्जुन झट्ट से वह से उठता नीचे दौड़ गया.

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अगले ek-dedh घंटे वह अपने तीनो नाना के साथ हे बैठ था ड्राइंग रूम में जहा सोहनलाल जी चाय पी रहे थे और कुन्दनलाल जी अपने छोटे भाई मनोहर के साथ व्हिस्की. उनका ये रूटीन था के शाम को सलाद के साथ वह 2 पेग लगते थे और फिर खाना खाने के बाद समय से सो जाया करते थे. अभी साढ़े 7 बजे उन्होंने पीना शुरू हे किआ था और वही अर्जुन उनके सामने बैठा वह 2 लड्डू और दूध पी रहा था. यहाँ भी उसको ये खाने पड़ रहे थे.

"तोह मुन्ना, इस साल ग्यारह जमात में हो जाओगे. फिर क्या सोचा है उसके बाद.", सोहन जी ने अपने नाती के पीठ पर हाथ रखते हुए कहा.

"बड़े नाना जी, अभी तोह बस 2 साल ाचे से पढ़ना है बस. साथ हे बॉक्सिंग और कसरत भी करते रहना है. बाहरवीं के बाद देखूंगा के आगे क्या करना है. अभी जो सामने है वही बहोत है."

"ाची बात है बीटा. आँखे तरसा दी तूने लेकिन आज देख रहा हु कितना समझदार और गुणवान बचा बन चूका है 9 साल म्हणत के बाद. कुंदन, एक बार इसको दूकान भी दिखा देना भाई जरा कल. और तुम अपना ये कार्यक्रम करो मैं बिटिया से मिल लेता हुआ अंदर.", उन्होंने उठते हुए कहा और फिर सर पे हाथ फेरते बहार निकल कर गलियारे से और अर्जुन अपने बाकी 2 नाना के साथ रह गया इधर.

"कल थोड़ा शहर घूम लेना और अपनी बहनो के साथ वन्न भी देख आना. परसो हम चलेंगे बीटा. और हाँ ये ाचा है के तुम खुराक समय से लेते हो.", कुंदन जी ने सलाद खाते हुए कहा.

"वैसे भैया, एक पल तोह जब मुन्ना को देखा तोह लगा 45-46 साल पहले वाले तुम हे आ खड़े हुए मेरे सामने. लेकिन ये आपसे भी चौड़ा और लम्बा है अभी से.", मनोहर जी की बात पर वह हंस दिए और अर्जुन शर्मा गया.

"सही कहा भाई. ये सच में हे मेरी और शंकर की झलक देता है लेकिन दोनों से अधिक हे है. वैसे जमीन तोह दिखाई न इसको.?", कुंदन जी ने अपने छोटे भाई को देखते हुए कहा. उन्हें भी ख़ुशी थी की आज महीने भर के बाद उनका भाई भी घर पे था.

"न. इसको तोह वही दिखाई दिए जितना खाने के समय देख पाया लेकिन मैं कल दिखा लाऊंगा इसको. वैसे अभी चने की फसल उठने लगेगी और फिर गेहूं की. कहते तोह नए बीज लेने बड़े शहर हो आता.", एक सांस में बाकी का पेग ख़तम करते उन्होंने मूंछे साफ़ करते हुए बताया.

"अभी बिटिया आई है तोह अगले 4 दिन तोह नहीं. फिर देखेंगे जाते समय. ाचा अर्जुन बीटा दलीप की धर्मपत्नी और बिटिया को जरा घर तक छोड़ आओ. फिर आने के बाद बातें करते है. और ये Kailash-Manoj कहा रह गए आज.?", अर्जुन खड़ा हुआ और मनोहर जी ने जवाब दिए.

"बिटिया के लिए Rabri-jalebi लेने भेजा था. दोनों आ जायेंगे 8 बजे तक.", ये बात बहुत नरमी से उन्होंने कही लेकिन शायद कुंदन जी को पसंद न आई थी.

"दोनों को कह दो के घर में बहोत जगह है. छत्त है, बैठक है और उनके कमरे भी है. बस यहाँ उन्हें रोकने वाले है तोह बहार जितना दिल करे उतना पी लेना शायद उन्हें सकूं देता होगा.", अर्जुन उनकी ये बात सुनकर सोचता सा बहार आँगन में आ गया.

"ये है मेरा बीटा अर्जुन, तूने तोह देखा हे है लेकिन तब ये 6-7 साल का हे था. मंजू बिटिया को शायद याद हे न हो क्योंकि वह तोह कभी खेली नहीं थी इसके साथ.", अर्जुन ने भी सरोज जी को नमस्कार करते हुए पाँव छुए लेकिन जैसे हे खड़ा हुआ तोह उन्होंने दोनों बाजु पकड़ते हुए जी भर के उसकी नजर की. आँगन में सफ़ेद तुबे जगमग थी लेकिन अंधेर भी हो गया था.

"रेखा, कुछ भी लेकिन लड़का तेरा मुझे हे देदे.", अर्जुन उनकी इस तरह खुली बात सुनकर झेंप गया और अपनी माँ को देखने लगा जो हंस रही थी.

"तेरा हे है और तूने तोह मालिश भी बहोत की है इसकी बचपन में.", उन्हें भी अपनी सखी की बात बुरी नहीं लगी थी.

"न ऋ. देख तोह जरा deel-daul इसकी. कहा तू फूल सी और कहा ये पहलवान सा लेकिन शकल से कच्चा हे है. जीजाजी का असर तोह हुआ लेकिन ठिकाने ज्यादा लगा दिए जो उनसे बड़ा हो गया.", ठहाका लगाती वह बोली इधर अर्जुन की तोह कुछ समझ नहीं आ रहा था. फिर कुछ देर बाद उसने हे कहा.

"माँ, नानाजी ने कहा है आंटी को घर तक छोड़ के आने को."

"बीटा मौसी है ये तेरी. और चल जा छोड़ आ. इस से भी मिल ले ये मंजू है, मेरी गुड़िया.", नजर का टिका लगती रेखा जी ने भी उसको गले से लगाया. मंजू को भी ऐसे उनसे मिलना ाचा लगा था.

"फिर ये आज वही रहेगा, मैं नहीं आने देती वापिस.", बहार की तरफ जाती वह बोलने लगी लेकिन रेखा जी ने आवाज दी.

"आज नहीं सरोज, परसो शाम को हम दोनों हे आएंगे. कुछ देर इसका दिल करे तोह बैठ जायेगा वह वैसे भी खाना तोह 3-4 बजे खाया है इन्होने.", रेखा जी टाइगर को अपने साथ अंदर ले गई और वह तीनो बहार चले गए.

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"बीटा, तुम्हारे हे शहर में है ये मंजू भी. बास्केटबॉल खेलती है कॉलेज के साथ हे. कभी वक़्त लगे तोह मिल आया कर और फिर मेरा तोह चक्कर लगता नहीं. अकेली उधर जाने कैसे रहती होगी.", घर के गेट पर हे खड़े थे वह तीनो लेकिन मंजू कुंडा खोलती बस मुस्कुरा रही थी पीठ के पीछे.

"जी मौसी जी. वैसे मैं भी रोज 2 घंटे स्टेडियम जाता हु बॉक्सिंग के लिए. तोह कभी मिल हे सकता हु. आप भी आना कभी हमरे घर.", अर्जुन ने आखिरी बात दोनों की तरफ देखते कही थी.

"ये तोह और भी बढ़िया है. और तू अंदर तोह आजा पहले.", सरोज जी ने प्यार से उसका बाजु पकड़ते हुए कहा लेकिन अर्जुन ने नरमी से हे मन किआ.

"कल पक्का आऊंगा मैं आपके घर. अभी देखिये न मैं घर में सभी से मिला नहीं हु. मां आने वाले होंगे तोह कुछ देरी वह भी बैठूंगा. लेकिन कल मैं खुद हे आपसे मिलने आऊंगा."

"कल तोह मंजू ने शहर जाना है कुछ काम से.", सरोज जी ने मंजू की तरफ देखते हुए कहा.

"मौसी, मैंने कहा है के कल मैं आपसे मिलने आऊंगा. इनसे नहीं. ाचा अब चलता है. Bye.", इतना बोलकर वह उनके पाँव चुने के बाद मंजू को हाथ हिलता घर वापिस चल दिए.

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"ये बिरादरी का झमेला न होता न तोह रेखा से तेरे लिए हे मांग लेती इसको. जितने लड़के अभी तक देखे सब तेरे से 19 थे लेकिन ये 25 हे है.", एक आह सी भर्ती सरोज jaati-biradari को कोसती हुई वापिस गेट लगाती बेटी के पीछे चलती अंदर आ गई. मंजू बस खुश थी और किस्मत पे यकीन नहीं हो रहा था के ये लड़का और परिवार उनके इतने करीब निकलेगा. अब उसको आशा होने लगी थी की वो दोनों अब थोड़ा ज्यादा ाचे से मिल सकते हैं.

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मनोज और कैलाश घर में आये तोह दोनों एक हद्द तक बस सम्भले हुए थे. हल्का सुरूर था दोनों को जिस वजह से आँगन में लगे नलके पर पहले हाथ मुँह धोया. इधर अनीता जी ने अपने पति और जेठ को टोलिया पकड़ाया तोह दोनों हे खुद को पौंछते हुए अपने अपने कमरे में चले गए. कुछ देर बाद साफ़ कपडे पहने और पहले से ाची हालत में बहार निकल कर अपनी बड़ी बहिन से मिलने के बाद दोनों हे मां ने अपने भांजे को laad-pyaar किआ. ज्यादा कुछ ख़ास नहीं था बस सबने शांति से खाना खा लिए था अभी और उसमे हे रात के 10 बज चुके थे. रेखा जी तोह थोड़ी देर अपने maa-papa के कमरे में वक्त बिताने चली गई लेकिन अर्जुन कुछ देर वही आँगन में बैठा था.

"आज तोह मैं तुम्हारे कमरे में सोने वाली हु. बातें करेंगे देर तक.", स्वाति ने चोचलाते खाते हुए अर्जुन से कहा जो उसकी और हे देख रहा था.

"आज चची नहीं सो रही क्या तेरे साथ?", कंचन ने दखल देते हुए कहा.

"बुआ माँ और ताईजी का एक साथ सोने का प्रोग्राम है."

"ठीक है फिर तोह. काम से काम आज तोह बिना माँ के सोयेगी तू.", चिढ़ाते हुए कंचन ने कहा लेकिन स्वाति ने मुस्कराहट से हे उसको देखा.

"चलो अब सब सोने की तैयारी करो. उठो उठो.", संगीता जी की आवाज पर वह दोनों हे उठ कड़ी हुई और अर्जुन भी एक बार अपने nana-nani से मिलने के ऊपर आ गया.

"स्वाति मैं थोड़ी देर छत्त पर टहलने जा रहा हु. अगर तुम्हे आना हो तोह आ जाओ. लेकिन अगर नहीं तोह फिर जब फ्री हो जाओ तोह आवाज लगा लेना.", अर्जुन को हाँ कहती वह अपने कमरे में चली गई रात के कपडे बदलने और अर्जुन छत्त पर आ खड़ा हुआ. यहाँ से dur-dur तक टिमटिमाते बल्ब दिख रहा थे और बीच बीच में कही pedd-andhera दीखता था.

"ाचा लगता है न ये सन्नाटा?", पीछे से आती इस आवाज पर अर्जुन ने सिर्फ सर हे घुमाया. हाथ अभी भी दिवार पर ठीके थे. यहाँ से बहार का आँगन भी साफ़ दीखता था जहा अभी लाइट जल रही थी.

"सन्नाटा नहीं शांति ाची लगती है मामी. सन्नाटा थोड़ा नक्र्तमक प्रतीत होता है. वैसे आप सोने नहीं गई? मां तोह कबके कमरे में चले गए थे."

"उन्हें नींद आ रही थी वह सो गए. मुझे नहीं आ रही थी तोह ऊपर आ गई. तुम्हे ाचा नहीं लगा मेरा आना.?", अनीता जी की आवाज में हल्का दर्द था और कम्पन्न

"आप आ गई है तोह बेहतर लग रहा है. वैसे वह रोज हे ऐसे सो जाते है, इतनी जल्दी?", अर्जुन अब दिवार के पास बानी टंकी के साथ सत् के खड़ा था.

"आज तोह फिर भी कुछ देरी से सोये है. नहीं तोह लोग तोह घर में खाना खा रहे होते है और इधर मेरे पति और जेठ बेखबर बिस्टेर पर पड़े होते है."

"मामी, आपको दुःख नहीं होता? और नाना या नानी उन्हें समझते नहीं क्या?", अर्जुन हैरान था इस बात से. कैसे कोई पति हर रोज ऐसा कर सकता है. दोनों की जब बीवियां भी इतनी सुन्दर और ाचे स्वाभाव की हो.

"दुःख भी कुछ समय बाद बंद हे हो जाता है होना. ये परिवार बहोत प्यार देने वाला है अर्जुन. मुझको कभी ऐसा नहीं लगा के मैं यहाँ ब्याह कर आई हु बस ..", आसमान में उस नए चाँद को देखती वह बात अधूरी छोड़ कर खामोश हो गई. अनीता जी के हाथ अब वही दिवार पर थे जहा कुछ देर पहले अर्जुन खड़ा था. यु लगातार सामने देखती अनीता जी की आँखों में उभर आई वह पानी की बुँदे अर्जुन से छिप न सकीय. एक कदम दूर कड़ी ये नवयुवती इस कदर दर्द सेहती जी रही है और कोई उन्हें इस दर्द से निजात नहीं दिलाता.? दिन भर कैसे hansti-batiyati रहती है लेकिन उनको सन्नाटे में कोई कन्धा नहीं देता.

"आप बड़ी हिम्मत वाली हो मामी. कोई और होती तोह शायद ये सब बेड़िया टॉड चुकी होती.", अर्जुन ने उनके बराबर खड़े होते आँखों में आई वह 2 बुँदे साफ़ करते कहा. उसका ऐसे करना अनीता की आँखों के बांध खोलना साबित हुआ. दोनों आँखों से पानी टपकने लगा तोह अर्जुन ने उन्हें सीने से लगा लिए.

"मैंने सिर्फ एक बात सीखी है मामी. सबको उनका हक़ मिलना चाहिए, बगावत जरुरी नहीं. आप रो लीजिये जितना चाहे बस कल से ये दर्द अंदर मैट भरना"

कुछ देर वह लिपटी सिसकती रही उसकी बाहों में. अनीता को भी अर्जुन का ऐसे खुद से लगये रखना बेहतर महसूस करवा रहा था. कुछ पल बाद जब वह ठीक हुई तोह धीमी आवाज में बोली

"तुम्हारी मामी ने शायद आज तुम्हारी ये पहली रात ख़राब कर दी अपने ननिहाल में."

"मुझे लगता है ये आज का सबसे बेहतर पल था मेरे लिए.", अर्जुन ने वैसे हे उनकी कमर पर एक हाथ रखे कहा.

"मेरे दिल ने आज बगावत कर दी थी. तुमसे झूठ नहीं कहूँगी लेकिन शादी के बाद आज पहली बार जीवन में एक पुरुष का स्पर्श हांसिल हुआ है. जिसको परवाह है मेरी.", अनीता के चेहरे पर आई शर्म बेशक न दिख रही थी लेकिन उसका इस तरह से अपना सर अभी तक अर्जुन के कंधे से लगाए रखना बहोत कुछ कह रहा था.

"तोह आप आज इसलिए मेरे साथ खेत गई थी?"

"नहीं. सिर्फ ये देखने की तुम सच में समझदार हो या वैसे हे एक अल्हड लड़के. लेकिन मुझे पता चल गया की तुम हरेक मर्द जैसे नहीं हो.", अर्जुन अब उनकी पीठ सेहला रहा था.

"Arjun-Arjun" स्वाति की आवाज से दोनों अलग हुए जो नीचे से हे आवाज दे रही थी.

"ाचा कल मिलते है.", अनीता जाने लगी तोह अर्जुन ने उनका हाथ अपनी और खींचते हुए एक छोटा सा चुम्बन गालो पर किआ.

"नींद न आये तोह हम रात में भी मिल सकते है.", इतना बोलकर वह नीचे भाग गया और ऊपर अनीता पहले हैरान और फिर हंसती हुई सी एक तरफ को चल दी.

"कितना तेज चीखती हो यार.", स्वाति के पास पहुंचते हुए उसने कहा जो एक पजामा टीशर्ट पहने हाथ में तकिया लिए उसके दरवाजे के बाहर हे कड़ी थी.

"इतनी देर से इन्तजार कर रही थी लेकिन नीचे हे नहीं आ रहे थे. अब चलो अंदर", हाथ पकड़ कर वह कमरे में आने के बाद दरवाजा लगाती बिस्टेर की दूसरी तरफ लेट गई. अभी लाइट जल रही थी तोह स्वाति ने अपनी तरफ का लैंप जला दिए.

"वह का भी जला दो और लाइट बंद कर के आ जाओ.", अर्जुन ने उसकी बात सुनकर अपना कुरता उतार कर एक तरफ टेबल पर रखा और लैंप जलने के बाद बड़ी लाइट बंद करता बिस्टेर पर स्वाति की तरफ करवट कर के लेट गया.

इस माध्यम रौशनी, जिसमे सिर्फ बीएड हे प्रकाशित था दोनों एक दूसरे को देख रहे थे.
 
अपडेट 61

शतरंज की बिसात

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(मंजूबाला)


"परेशां हो क्या?", स्वाति ने थोड़ा पास आके हलके घुटने मोड़ते हुए अर्जुन से पुछा. जो गहरी सोच में था लेकिन नजरे स्वाति के चेहरे पर हे थी.

"नहीं तोह. ऐसा लगा क्या?", अर्जुन ने हलकी मुस्कान से कहा. स्वाति बेशक फक्क गोरी न थी. लेकिन वह कोई सांवली लड़की भी नहीं थी. रंग जरूर गेहुअन था लेकिन चेहरा और बाकी शरीर बेदाग चमकदार था. ऊपर से काळा घने बाल और ये मोटी मोटी काली आँखें. ऊपर वाला तराशा होंठ और नीचे वाला भरा हुआ. आकर्षक नाक और सबसे अलग थी उसकी तराशी हुई बोहेन.

"बस वैसे हे पूछ रही हु. मेरे साथ कबसे चुपचाप रहने लगे तुम.?"

"देख रहा था के तुम कैसी होती थी लेकिन अब बिलकुल बदल गई हो.", अर्जुन ने वैसे हे चेहरे पर नजर किये कहा. दोनों ने हे कोई चादर नहीं ली हुई थी. एक तरफ जहा अर्जुन का ऊपरी भाग चौड़ा और निर्वस्त्र था वही स्वाति की इस सफ़ेद छोटी बाँहों वाली टीशर्ट में उसके उभर थोड़ा लुढ़के हुए थे. हलकी सी कमर नुमाया हो रही थी और घुटने मोड़ने की वजह से कूल्हे बहार को उभरे हुए थे.

"बुरी लगने लगी हु? कंचन और समय दीदी जैसी गोरी नहीं हु न.", स्वाति जिंदादिल लड़की थी लेकिन अभी वह जानबूझ कर अर्जुन से मस्ती कर रही थी. उसको पता था के अर्जुन जरूर कुछ सोच रहा है.

"पागल हो क्या? खुद हे सोचो मैं इतनी देर से ये चेहरा देख रहा हु लेकिन ऐसा लग हे नहीं रहा के वही स्वाति है. तुम्हारी ये आँखें और चेहरा सच में बड़ा आकर्षक है. गोरा होना कोई सुंदरता का प्रतीक नहीं लेकिन ये इतने खूबसूरत nain-naksh जरूर हैं.", अर्जुन ने उसका गाल इस बार छुआ तोह खुद स्वाति की भी आँखें बंद हो गई थी उसके इस स्पर्श से. बेशक वह दोनों सबसे अधिक घनिष्ट थे इस घर में और एक दूसरे के गले लग्न, kheench-taan करना या शारीरिक chedd-chaad दोनों के लिए आम बात हे थी लेकिन इस हलकी रौशनी में इतनी देर से अर्जुन का यू टकटकी बांधे देखना और फिर ऐसे गाल सहलाना जैसे बहोत कुछ बयां कर गया था.

"तुम दिल से कह रहे हो?", अपना हाथ वही अर्जुन के हाथ के ऊपर रखती स्वाति ने प्रश्न किआ. जहा थोड़ी देर पहले तक दोनों के बीच करीब 2 फ़ीट जगह थी अभी शायद 6-7 इंच हे दूर थे. स्वाति की नजरो ने भी भरपूर देखा था उस विशाल चौड़े सीने और मांसल छातियों को. अर्जुन पहला पुरुर्ष था उसकी ज़िन्दगी में और आज हे उसने ये सब देखा था.

"ये तुम्हे हे बताना चाहिए. वैसे तुम्हारे साथ तोह मैं be-dilli बात करता भी कहा हु. सॉरी.", एकाएक अर्जुन ने हाथ हटा लिए और सीधा हो कर ऊपर पंखे की तरफ देखने लगा. स्वाति को उसका ऐसे अचानक हाथ हटा के नजरे फेरना गवारा न हुआ. ऊपर से सॉरी.

"क्या हुआ तुम्हे? मुझसे कुछ गलती हो गई क्या?", वह खुद हे अब उसकी तरफ पूरी सरक कर आ गई थी. बिस्टेर पर राखी अर्जुन की ब्याह पर अपना सर टिकती वह थोड़ी पकड़ कर उसका मुँह अपनी और करने लगी थी. किसी बचे से जब उसका सबसे प्रिय खिलौना चीन लो वैसा हे स्वाति को अभी महसूस हो रहा था.

"कुछ नहीं स्वाति. थोड़ा इस पल में बह गया था और ध्यान नहीं रहा था के किस से क्या कह रहा हु. हो सकता है तुम बुरा मान ने के बावजूद चुप हो मेरी इस हरकत से. अब बचे नहीं है हम.", अर्जुन की ये बातें वह एक कान से सुनती दूसरे से निकल कोहनी के भार उसपर झुकती हुई उन आँखों को देखने लगी जो कुछ देर पहले सिर्फ उसमे हे डूबी हुई थी.

"तुम सब जानते हो. तुम्हे सब पता है. फिर भी अब मुझको सत्ता रहे हो न.? एक तुम हे तोह हो जो कभी भी मेरे पास आ सकते हो और हक़ जाता सकते हो. ऐसे नजरे फेरोगे अपनी स्वाति से?", शरारत से भरी रहने वाली ये लड़की अर्जुन की अनदेखी सेहन नहीं कर पाई थी.

"तुम समझ नहीं रही हो स्वाति. अभी जैसे मैं तुम्हे देख रहा था वह बहिन नहीं दिख रही थी.", इतना बोलकर अर्जुन फिर अपने ऊपर झुकी उन आँखों को देखने लगा था. दोनों तरफ से स्वाति के बाल उसके ऊपर हलके हलके बिखरे पड़े थे.

"मैं भी तोह यही चाहती हु के तुम मुझे सिर्फ वैसे हे नजर से देखो जैसे अभी देख रहे थे. जैसे सुबह मेरे कमरे में मुझे देख रहे थे या जब हम बहार थे. इस से पहले बेशक जब हम मिले थे तब बचपन था लेकिन आज सुबह से मैंने जब तुम्हे दादाजी के साथ बैठे देखा था तुम तभी मेरे दिल में घर कर चुके थे. लड़की हो कर मैं तुम्हारे कमरे में आई हु और तुम नजरे फेर रहे हो?", आवाज धीमी थी लेकिन उसमे रोष, प्यार और हल्का दर्द था स्वाति की.

"तुम बड़ी ाची लड़की हो स्वाति. ऐसी लड़की जो सिर्फ प्यार करने के लिए बानी है. लेकिन मेरा सच कुछ और है.", अर्जुन प्यार से उसकी पीठ सहलाता हुआ बोल रहा था.

"कोई और पसंद है तुम्हे? किसी के साथ रिश्ता हो चूका है या फिर वह कमजोरी वाली प्रॉब्लम है?", कमजोरी वाली बात सुनकर अर्जुन एक बार मुस्कुरा दिए.

"मेरी ज़िन्दगी में एक से ज्यादा लड़किया हैं स्वाति."

"ाची बात है न. शादी तोह होने से रही लेकिन तुम्हारे साथ कुछ पल तोह गुजर हे सकती हु.", इस बार बिना इजाजत स्वाति ने अर्जुन के होंठो पर हलके से अपना ऊपर होंठ रखते हुए फिर हटा लिए.

"लेकिन हम एक हद्द में रहेंगे. ये घर हमारा मिलान सेहन नहीं कर पायेगा.", अर्जुन ने अपने दूसरे हाथ से उसका गाल सहलाते हुए इतना कहा और स्वाति ने इस बार ाचे से नीचे लेते अर्जुन के दोनों होंठ चूम लिए.

"म्हणत करनी पड़ेगी उस मिलान के लिए. इतनी पागल भी नहीं हु मैं की एक दिन में हे तुम्हे दुनिया घुमा दू.", हलकी मुस्कान से स्वाति ने ये कहने के बाद खुद को पूरी तरह अर्जुन के ऊपर लिटा लिए. अर्जुन ने भी खुद से पहली बार उसके दोनों होंठ मुँह में लेकर चूसते हुए दोनों बाँहों में ले लिए था. अभी आँखें बंद थी और बस एकदूसरे को महसूस करने में लगे थे. किसी सेब के आकार की स्वाति की छट्टियाँ अर्जुन के नंगे सीने पर दबी थी. टीशर्ट के कपडे के बावजूद दोनों निप्पल मोटी सुई से उसके सीने पर चुभ रहे थे.

"मुझे तोह लग रहा था के तुम जैसे खुद हे मेरी इज़्ज़त लूट लोगी.", अर्जुन अब पाजामे के ऊपर से दोनों नरम कूल्हे सहलाते हुए बोलै और स्वाति अपना गाल अर्जुन की थोड़ी पर रखती एक तरफ देखने लगी. उसकी लम्बी टांगो के बीच में अर्जुन का हथियार दबा अंगड़ाई ले रहा था.

"कैसी बातें करते हो? शर्म नहीं आती क्या?", अपना मुँह फिर से सामने करती वह थोड़ा खुद को आगे से ऊपर उठती अर्जुन को देखती हुई बोली. ऐसा करने पर अब टीशर्ट कुछ खींच सी गई थी और नुकीले निप्पल अपना आकर बता रहे थे. अर्जुन ने एक निगाह वह पर डाली तोह स्वाति छाती पर हलके से हाथ मरती बोली

"पक्के बेशरम हो."

"देख हे तोह रहा हु. वैसे भी तुम्हे हे अंदर कुछ नहीं पहना.", अर्जुन ने हलके दबाव से कूल्हे पकडे तोह आंख्ने बंद करती वह सिसक उठी. 'सीईई'

"वह कुछ गड्ड रहा है.", अर्जुन स्वाति का मतलब समझते हुए झेंप गया था. स्वाति को अपनी बगल में लिटाते हुए उसने फिर से उसको चूमा और इस बार ाचे से दोनों होंठ बारी बारी से अपने मुँह में लिए. फिर सीने से लगते हुए आँखें बंद कर ली.

"सोने लगे हो?"

"अगर नहीं सोया तोह फिर वह सब हो जायेगा जो नहीं होना चाहिए. काम से काम अभी तोह नहीं होना चाहिए.", अर्जुन का सैय्याम देख कर वह हैरान हो गई थी. लड़की खुद उसकी बाहों में थी और वह मन कर रहा था.

"सच कह रहे हो के तुम कुछ करना नहीं चाहते?", स्वाति ने भी अर्जुन को बाहों में लिए हे कहा.

"स्वाति, हम दोनों जो करना चाहते है वह ऐसे मुमकिन नहीं. और सबसे बड़ी बात ये है के वह उतना जरुरी भी नहीं. तुमने कहा न के तुम्हे मुझसे प्यार है, तोह फिर खुद बताओ क्या मेरे आगोश में तुम्हे ाचा नहीं लग रहा? और क्या तुम चाहती हो के कल तुम पूरा दिन बिस्टेर से न उठ सको?", अर्जुन ने लाजवाब कर दिए था. वह कुछ बोल न सकीय थी.

"सुनो. एक बात कहु तुमसे.?" थोड़ा निचे सरक कर वह अब उसके सीने से लगी थी.

"हम्म"

"आज कुछ अलग देखा मैंने. पता नहीं कितना सच होगा कितना वहां.", स्वाति ने इतना बोलै तोह अर्जुन ने अब गौर से उसका चेहरा देखा.

"किसकी बात कर रही हो?"

"संगीता चची की. वह पहले तोह तुम्हे अजीब तरह से देख रही थी. फिर शाम को जब तुम दादाजी के पास थे तब वह अकेले में अनीता चची को हल्का दांत भी रही थी और फिर कुछ समझा भी रही थी. लेकिन अनीता मामी जैसे उन्हें मन करके निकल गई थी. फिर कुछ देर पहले जब तुम नीचे आये थे तोह शायद वही थी छत्त के ऊपर. मैंने उन्हें इधर वाली टंकी की तरफ से जहा तुम थे वह तक जाते देखा था." अर्जुन बस मुस्कुरा दिए था स्वाति की बात पर.

"तुम हंस रहे हो?"

"तुम ठीक कह रही हो. मैंने भी उन्हें खेत जाने से पहले पीछे खड़े देखा था शीशे में, खाना कहते समय भी वह जैसे आँखों से कुछ और हे कह रही थी. और जब मैं ऊपर था तोह मैंने महसूस किआ था के वह मेरे और अनीता मामी के अलावा भी कोई और है. लेकिन मैं में आया था के संगीता मामी को तोह मैं नीचे छोड़ कर आया था जब ऊपर आये थे तब. फिर अब तुम्हारे बताने पर ध्यान आया के हम इधर वाली सीढ़ियों से आये थे और कुछ देर यहाँ रुके बी थे. अनीता मामी मेरे बाद हे ऊपर आई थी मतलब पहले संगीता मामी ऊपर आ चुकी थी.", अर्जुन के इतनी सरलता से सब कह देने से स्वाति भी हतप्रभ सी थी.

"और तुम्हे किस बात का इन्तजार था फिर.?"

"तुम परेशां मत होना. जो भी होगा मैं जरूर तुम्हे बताऊंगा. बस ये पता लगाना है के वह चाहती क्या है.", इतना कहने के साथ हे इस बार अर्जुन ने अपना एक हाथ उस इलास्टिक वाले पाजामे के अंदर करते हुए स्वाति का नरम कुल्हा दबा लिए.

"आउच. क्या करते हो. हाथ निकालो बहार." नखरे से वह कहने लगी क्योंकि उसको लग रहा था के अर्जुन कुछ नहीं करने वाला.

"म्हणत हे तोह कर रहा हु.", फिर से एक गहरा चुम्बन करते हुए नीचे वाले हाथ से पूरा सतांन मुट्ठी में भरते हुए वह ऊपर वाले हाथ से अब कूल्हे को अचे से मसल रहा था. स्वाति भी जोर से लिपटी अपने शरीर पर इस मरदाना स्पर्श के मजे लेने लगी थी.

"आठ. गंदे कही के. ये दुःख रहा है. बस अब आज के लिए इतना बहोत हुआ.", अपना सतांन हलके सहलाते हुए वह शिकायत करती बोली और अर्जुन ने वह कड़ा निप्पल होंठो में दबाते हुए फिर से सतना शुरू कर दिए.

"ीे.. रुक जाओ न. आह. अब सोने दो मुझे तुम्हारे साथ लिपट कर.", अब ने भी बात मानते हुए मुस्कुरा कर एक चुम्बन किआ और फिर सीने से लगते हुए एक तरफ का लैंप बंद कर लिए. आराम से kamar-kulhe सहलाते हुए वह भी नींद के आगोश में खो गया था. एक परछाई उनके दरवाजे के पास से हिली और फिर आगे निकल गई.

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तक़रीबन 1 बजे हलकी आहात से अर्जुन की आँख खुल गई. मंद रौशनी में स्वाति का बोलै शांत चेहरा देखने के बाद वह चुपचाप बिस्टेर से उठता दबे कदमो से कमरे से बहार निकल आया. पूरे घर में जहां सन्नाटा पसरा था. बिना आवाज किये वह इस शान्ति को बरकरार रखते हुए इस गलियारे से होता पहले 2 कमरों तक आया जहा एक में तोह कोई न था और दूसरे में उसकी माँ अपनी दोनों भाभियो के साथ अब सो चुकी थी. यहाँ खड़े हो कर नीचे आँगन में भी नजर डालते हुए वह जैसे कुछ देखने की कोशिश में गहनता से निरिक्षण करने लगा था. कोने में बने बाथरूम का दरवाजा खुला था नीचे लेकिन कोई हलचल नहीं थी. मतलब जो भी कोई वह था वह अब जा चूका था.

कुछ सोचता हुआ वह अब दबे पाँव छत्त पर जाती इन सीढ़ियों पर चढ़ने लगा. ख़ामोशी इतनी गहरी थी की अर्जुन को खुदका सांस लेना भी सुनाई दे रहा था. लेकिन उसको यकीं था के कोई वहां नहीं हुआ, जरूर कोई उसके दरवाजे से गुजरा था लेकिन स्वाति के चक्कर में उसने थोड़ा देरी से हे कदम उठाये थे. छत्त पर पहुंचने से पहले हे उसने सर थोड़ा सा उचका कर पहले ाचे से छत्त का मुआयना किआ. यहाँ आसमान की हलकी रौशनी में उसकी आँखें ाचे से अभ्यस्त हो चुकी थी अँधेरे में देखने की. घर के सामने की दिवार की तरफ और उस बड़ी टंकी के पीछे जरूर कोई था. साथ हे हवा में एक बहुत हे हलकी से महक भी थी. जैसे कही दूर कुछ जल रहा हो.

बिना कोई आवाज किये वह इस तरफ चल दिए जो टंकी से पहले की मुंडेर थी. जो भी कोई उधर था वह हलकी हलचल जरूर कर रहा था और इस से उसका ध्यान बिलकुल भी अर्जुन की तरफ न गया. अब 6 फ़ीट ऊँची टंकी के इधर दिवार के साथ झुका अर्जुन अपनी निगाह सावधानी से एक बार उस तरफ खड़े शख्स पर करते देखने की कोशिस में था के वह कोण हो सकता है लेकिन जो भी वह था वह टंकी की पूरी आड़ में हे था. फिर नीचे नजर घुमाई तोह वह भी सब भूल गया की वह किसी को देखने आया था.

मनोहरलाल जी इस मध्य रात्रि के समय चारे वाले कमरे की पिछली दिवार पर अपनी कमर हिलने में लगे थे. 20 फ़ीट और वह एक तरफ जलते बिंदिया के कमरे के बहार लगे बल्ब की रौशनी में साफ़ पता लग रहा था के उनके आगे दिवार को पकडे घोड़ी बानी वह बिंदिया हे थी. लेकिन अर्जुन या तोह देरी से आया था या फिर मनोहर जी के शरीर में इतनी हे ताक़त थी की वह एक मिनट बाद हे अपना लुंड मुठियाते बिंदिया के पिछवाड़े पर 3-4 बूँद टपकते हुए झाड़ गए. वह भी अपना घाघरा नीचे करने के बाद चोली से बहार निकले सतांन अंदर करती वह से निकल गई.

"देख लिए? यहाँ ऐसे हे होता है.", अर्जुन इस आवाज से हड़बड़ा गया और पीछे मुड़ने पर चमकती आँखें लिए सुनीता मामी कड़ी थी.

"मुझे हे देखने आये थे न? फिर ये देख लिए. वो मर्द है तोह सबकुछ कर सकते है और घर के अंदर औरत तड़पती रहे इनको परवाह नहीं. वैसे अगर तुम सोच रहे हो के तुम देरी से आये हो और कुछ देखने को नहीं मिला तोह मैं बता दू की इनका हर बार इतनी हे देर का करक्याकरम होता है.", अब तक जितनी महिलाये अर्जुन ने देखि थी संगीता सबसे विचित्र थी. शायद गहरे जख्म थे दिल पर और मैं कुंठित हो चूका था. यही तोह कही कारण न था इनके अकेले रहने का.?

"आप इसलिए ऊपर आई थी? क्या मनोज मां आपका ाचे से ध्यान नहीं रखते? और नानाजी का ऐसा करना आपको पसंद नहीं क्या?", अर्जुन सिर्फ सवाल हे कर पाया था क्योंकि उसके पास यही तोह थे.

"इस घर में रात को भटकना हे आदत है अब मेरी. बाप ने नाकारा बेटे पैदा किये लेकिन खुद नाकारा होने की उम्र में भी सिर्फ अपना पानी निकलते घुमते है. तुम्हे मैं बुरी लग रही होउंगी लेकिन सच अभी तुमने भी देखा है. दूसरा सच मेरे कमरे में सो रहा है. क्या इसलिए किसी लड़की की ज़िन्दगी को बर्बाद किआ जाता है? तुम मेरी जगह होते तोह क्या करते?"

"मैं हालात से समझौता नहीं करता. उनको सही तरह बदलने में यकीन है मुझे. और जिन्हे आप नाकारा कह रही हो उनका इलाज भी तोह हो सकता है.", अर्जुन जिद्द पर था जैसे या फिर वह संगीता मामी का दर्द बहार निकलना चाहता था.

"बदल सकते हो मेरे हालात? मैं खुद कह रही हु तुम्हे. लेकिन अगर तुम नहीं बदल सकते या तुम भी ऐसे हे हो जैसे तुम्हारे मां और ये नाना तोह मेरा बात करना व्यर्थ हे है फिर.", संगीता मामी ने सीधे सीधे अर्जुन के पौरुष को हे चुनौती दे डाली थी. शातिर होने के साथ साथ शायद ये जानती थी की कैसे किसी को उकसाया जा सकता है.

"आपमें क्या कमी है? आप भी तोह बदल सकती हो. मैं नाकारा हु या क्या वह मैं साबित नहीं करना चाहता. बस तरस आ रहा है के आप कैसे खुद को हालात की मारी हुई दिखा रही हो.", अर्जुन शांत रहा. उसको परवाह नहीं थी की उसकी ये मामी उसको क्या बोल रही थी.

"बहार टाँगे खोल दी तोह इस घर की इज़्ज़त्त चली जाएगी."

"सड़क पर तोह नाना जी भी कुल लिए नहीं घुमते होंगे. आप टाँगे खोलने की बात कर रही है तोह बता देता हु की फिर वह आपको प्यार नहीं मिलने वाला. शादी से पहले कितनो के सामने आपने टाँगे फैलाई थी जो इन 3 सालो में ये टाँगे बंद रखना बर्दाश्त से बहार हो गया?", अर्जुन के शब्द तीखे थे इस समय. संगीता का अहम् तोड़ने के साथ हे वह stree-sulabh बातें करना भूल गया था. इसके साथ हे उसके गाल पर ये झन्नाटेदार तमाचा पड़ा. कुछ पल के लिए जैसे साड़ी शांति ख़तम हो गई थी लेकिन इस जगह ये आवाज सुन ने वाला कोई न था. संगीता का शरीर कांप रहा था और अर्जुन बस एक बार गाल सहलाने के बाद मुस्कुरा रहा था.

"मैं कुटिया नहीं हु जो हर गली के कुत्ते को अपने ऊपर आने दू.", उनका हर लफ्ज़ जैसे फंसता सा निकल रहा था.

"आपने हे तोह कही थी ये टाँगे खोलने वाली बात. मुझे लगा शायद तड़प ये करवा रही है तोह फिर इसकी वजह एक हे हो सकती है. ाचा ठीक है आपका जो दिल करे वह कीजिये मैं चलता हु. और मैं किसी से नहीं कहूंगा जो भी यहाँ हुआ.", अर्जुन ने जाने के लिए कदम बढ़ाया और इधर संगीता उसकी ब्याह कसके पकड़ती हुई जमीन पर बैठ गई.

"मानती हु मैंने जो कुछ भी कहा वह गलत है. मुझे गुस्सा है सब पर और खुद पर भी. नरक जैसी ज़िन्दगी है इधर. मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा सिवाए यहाँ से भाग जाने के या फिर मर्डर जाने के. जिस्म की आग से बढ़कर है एक औरत का माँ ban-na, उसका शरीर का वह बदलाव होना जिसके लिए वह औरत बानी है. लेकिन मेरे पास तोह कोई जवाब हे नहीं. सब पूछते है के माँ कब बनूँगी, किसी को पोता चाहिए तोह किसी को दोहता. 27 साल ज़िन्दगी के गुजारने के बाद भी कुंवारी रहना अपने आप में एक श्राप है. मैं भीख मांगती हु अगर तुम मेरे हालात बदल सकते हो तोह बदल दो. मैं इस घर के साथ देगा नहीं करना चाहती लेकिन मेरे पास रास्ता क्या है?", जब ये धीमे रोने की आवाज और कदमो में बिलखती गिरी हुई मामी की हालत अर्जुन से और न देखि गई तोह वह भी नीचे बैठता हुआ उन्हें गले लगा के चुप करने लगा.

"मैंने जो भी कहा उसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिये मामी. जानता हु बहोत कुछ सहा है आपने और आपको अपना हक़ मिला भी नहीं जो मिलना चाहिए था. लेकिन ये दर्द, गुस्सा और जलन निकल कर भी तोह हम बात कर सकते थे न? आप कभी कोई बात घुमा फिरा कर नहीं करेंगी और आपके दिल में जो भी बात हो उसको पहले उस इंसान से कीजिये जो करीब हो. वह हल नहीं करता तोह मैं हु आपके पास. अनीता मामी ने बताया था के दोनों मां में कमी है लेकिन आपने दूसरा रास्ता चुना. अब आप चुप हो जाइये, जैसा कहेंगी वैसा हे होगा. और यकीन मानिये आपका ये भांजा नाकारा नहीं है.", इतना कह कर अपने कंधे से सर हटते हुए अर्जुन ने अँधेरे में हे उनका चेहरा देखने का प्रयास किआ. आँखों में नमी थी और गालो पर गीलापन..

दोनों गाल को हलके से चूमते हुए अर्जुन ने संगीता के होंठो पर अपने होंठ टिकते हुए अपनी बात पर मुहर लगा दी थी. संगीता को साथ लिए हे वह अब खड़ा हुआ और एक बार फिर उनके चेहरे को देखते हुए बोलै.

"आप चाहती है?", अर्जुन ने बस इतना कहा तोह इस बार ये संगीता भी किसी आम नवयुवती सी शर्माती बस पलके झुका कर अपनी स्वीकृति देने लगी थी.

"यहाँ मुश्किल होगा. बिस्टेर नहीं है न.", अर्जुन ने इस गंभीर समय को हल्का करते हुए थोड़ी मस्ती से कहा तोह संगीता मामी उसके सीने से लगती वैसी हे धीमी आवाज में बोली.

"मैं ऊपर हे सोती हु. उधर बिस्टेर लगा है.", मामी को ऐसे लज्जते देख और बिस्टेर की दिशा में इशारा करने पर अर्जुन ने उन्हें बाहों में उठा लिए और अँधेरे में छत्त की उस चल दिए जिधर नीचे 2 कमरों के बाद स्टोर बना हुआ था. यहाँ पर एक साफ़ बिस्टेर जमीन पर लगा था. उजली चादर ाचे से दिख रही थी जिस से कुछ दुरी पर 'कछुआ अगरबत्ती' जल रही थी. वह जलने की महक इसकी हे थी जब वह ऊपर आया था और महसूस किआ था कुछ ऐसा हे.

"आप सुबह संभल लेंगी न?", अर्जुन उन्हें गद्दे पर लिटाते हुए उनपर झुका हुआ हे बोलै. ऐसे खुद को अर्जुन की मजबूत बाहों में खुद पर झुके देख संगीता बस 'हम्म' बोलती आँखें बंद कर लेती गई. अर्जुन ऊपर से तोह निर्वस्त्र हे था इधर संगीता मामी भी नहाने के बाद इस गाउन और अंगवस्त्रो में हे थी.

मामी की सहमति मिलते हे अर्जुन उनके ऊपर छाने लगा था. उनके हिलते लबों को अपने होंठो में भरता वह जब पूरी तरह उनके ऊपर आ गया तोह संगीता की धड़कन तेज हो गई. वो लड़की सी तोह थी हे और इधर अर्जुन का बड़ा शरीर जैसे उन्हें पूरी तरह नीचे समेटे थे. सिर्फ होंठ चूमे जाने भर से शरीर साथ छोड़ने लगा था. लेकिन अर्जुन यही रुकने वाला नहीं था. कपडे के ऊपर से हे जैसे उसने उनके दोनों उभर पकड़ते हुए गर्दन पर जीभ फिरै संगीता का शरीर ऐंठने लगा था. किसी मछली सी तड़प रही थी लेकिन उसके ऊपर झुका इंसान शरीर और ताक़त में बेमिसाल हे था.

"मामी, ये उतारो ऐसे मजा नहीं आता.", अर्जुन ने उनका गाउन खींचते हुए कहा तोह वह ना में गर्दन हिलने लगी, लेकिन इस ना में सिर्फ शर्म थी.

"ाचा फिर मैं चला.", अर्जुन भी हलकी मस्ती उठने लगा तोह घबराती सी कमर उचकती अगले हे पल सिर्फ ब्रा और एक पूरी पंतय में थी. ये कोई वैसी पंतय नहीं थी जैसी अर्जुन ने अब तक देखि थी. एक साधारण इलास्टिक वाली गहरे रंग की पंतय में बाकी शरीर gora-gudaj महसूस हो रहा था. एक तरफ मुँह करती संगीता मामी फिर से लेट गई थी और अर्जुन उनकी एक तरफ आते हुए चेहरे को देखने लगा.

"मामी इस पल में दोनों का होना जरुरी है. मैं तोह मस्ती कर रहा था, जा नहीं रहा था.", उनकी नंगी कमर पर हाथ रखते वह साथ जुड़ा तोह बेचैन आँखों से संगीता इस मुस्कुराते चेहरे को देखने लगी.

"वैसे हो आप बड़ी सुन्दर. लगता हे नहीं के मामी जैसी हो.", उनकी ब्रा के हुक खोलता वह प्यार भरी chedd-chaad करता बोल रहा था. संगीता का शरीर भी उसकी हरकतों पर गंगना रहा था.

"मामी जैसी नहीं लगती से क्या मतलब है?", थोड़ा सहज होती वह भी अर्जुन के सुडोल सीने पर हाथ रखती उसके सख्त शरीर को देख रही थी.

"आप न किसी लड़की जैसी हे तोह हो. जैसे school-college वाली. और ये देखो अभी तक कच्चे हे है.", इधर उनका वह माध्यम अकार का सतांन मुट्ठी में भरता अर्जुन शरारत से बोलै. संगीता का ध्यान जब इस तरफ गया तोह पूरा शरीर रोमांच से भर गया. वो ऊपर से कब निर्वस्त्र हुई पता भी नहीं चला था उन्हें. अर्जुन के मजबूत हाथ में उनका ये एक संतरे जितना सतांन अकड़ा हुआ था. 'आठ' मादक सिसकारी निकल गई उनके मुँह से जब अर्जुन ने उनका पतला निप्पल दो ुंलियों में भरते हुए दबाया.

"गंदे हो तुम.", शर्म से उसके सीने की तरफ जाने लगी तोह अर्जुन ने होंठो को मुँह में लेते हुए अपना हाथ उनके उभर पर जमाते हुए कुछ दुरी बनाये राखी. फिर ऐसे हे चूमते हुए उनके ऊपर चला आया. अब कही संगीता भी अर्जुन के होंठो से अपने जीभ लड़ा रही थी. आँखें मजे में बंद थी और जांघो की बीच कुछ गोल गरम और सख्त सा रगड़ रहा था उनके. अर्जुन ने दाए हाथ से कच्ची का सिरा पकड़ते हुए सरकना सुरु किआ तोह कुछ मुश्किल के बाद वह थोड़ा नीचे करने में कामयाब हो हे गया.

दोनों के सीने आपस में ऐसे रगड़ रहे थे की संगीता के निप्पल फूलने लगे थे और पेट से छूट तक जैसे मस्ती भर्ती जा रही थी.

"मामी जरा ऊपर उठाओ तोह.", थोड़ा ऊपर होता वह उनकी जांघो के बीच आया तोह संगीता ने अपनी टाँगे आपस में जोड़ने की कोशिस की लेकिन कर ना पाई. अर्जुन ने थोड़ा जोर से वह गहरे रंग की कच्ची दोनों हाथो से पकड़ कर शरीर से आजाद कर दी.

"शर्म नहीं आती अपनी मामी को ऐसे नंगा करते?", शर्माती सी वह करवट लेती छाती के बल हो गई. इधर अर्जुन ने भी अपना पजामा निकल दिए और उनके नंगे कूल्हों को दोनों हाथो से दबाते हुए बोलै.

"मामी, यहाँ से करने पर कुछ फायदा नहीं होने वाला. बस म्हणत ज्यादा लगेगी मेरी और आपकी. वैसे यहाँ से भी नजारा ाचा हे है.", अर्जुन की ऐसी बात सुन कर वह सिहर गई थी. अर्जुन का इशारा उनकी गांड की तरफ था और उन्हें पता था की ये सिर्फ मर्द को हे मजे देने के काम आता है. जल्दी से वह पलट कर छूट पर हाथ रखती उसको देखने लगी.

"मजाक कर रहा था. देखो न एक तोह आपको हे सुख चाहिए ऊपर से आप हे साथ नहीं दे रही. पहले तोह बहार टाँगे खोलने को तैयार थी यहाँ मेरे से हे शर्म", अर्जुन तंजज कस्ते हुए बोलै और उन्होंने हौले हौले अपने हाथ जांघो से हटा लिए.

"सच में गंदे हो तुम. बहोत ज्यादा गंदे. अब लड़की हु तोह शर्म तोह आएगी हे.", वह नजरे फेरते हुए बोल रही थी.

"मामी, देखो छोटा हु लेकिन बात बड़ी बताता हु. ये prem-milan होता है न इसमें दोनों का एक साथ होना जरुरी होता है. ऐसा नहीं लगेगा की फिर सिर्फ एक हे इंसान काम कर रहा है. पता है शर्म आती है लेकिन उतना हे जरुरी है आपस में प्यार करना. आप कोई कमजोर दबाव में आई लड़की नहीं हो और न हे मैं अपनी हवस मिटा रहा हु.", अर्जुन के ऐसे कहने पर वह ध्यान से इस लड़के को देखने लगी जो कितनी बड़ी बात कह गया था. वो उठकर उसको गले लगाती अब समझ रही थी अर्जुन की बात का मतलब. और कितनी समझदारी थी इसमें. अब नंगेपन का एहसास दूर हो चूका था संगीता का.

"ये मेरे पेट पर क्या लग रहा है.?", हलकी शर्म और मुस्कान से वह बोलती हुई वैसे हे गले लगी रही.

"ये वही है जो आपको औरत होने का एहसास कराएगा.", वापिस उन्हें नीचे धकेलता अर्जुन उनके साथ हे ऊपर लेट गया. संगीता मामी की दोनों टंगे फैलते हुए अब वह उनकी जांघो के बीच था निच्दे धड़ से.

"कुछ बड़ा नहीं है?", वह उसका चेहरा अपने गालो से रगड़ती बोलने लगी. और ये अंग था भी बड़ा हे बस अभी तक उन्होंने देखा नहीं था. अर्जुन ने कोई जवाब न देते हुए उनकी एक साइड आते हुए पतले निप्पल को मुँह में भर लिए. अब संगीता की एक टांग नीचे दबी थी और अर्जुन का हाथ उन हलके घुंगराले बालो में घूमने लगा था. मजे की शिद्दत्त में वह दूसरी टांग उसके ऊपर डालती अपने स्टैनो को चुस्वाति उस से किसी बैल सी लिपट रही थी. हाथ अब उस दरार के ऊपर आ चूका था जहा संगीता ने 27 साल में कोई पुरुष स्पर्श महसूस किआ था अभी.

'आह.. क्या कर रहे हो..' वह फुसफुसाती सी बोली और इधर ऊँगली का एक पूरा छूट की दरार में फिरने के बाद अर्जुन ने छेड़ पर दबा दिए. यहाँ थोड़ी चिपचिपाहट आ चुकी थी. ुंली को गोल घूमते हुए गिला करने के बाद अर्जुन ने अंदर तेल दिए.

"उम्म्म.. ाः.. नहीं.. ाः.", इस ऊँगली से हे उनकी जैसे जान निकलने लगी थी. लेकिन अर्जुन की ऊँगली का वह पूरा उस से आगे नहीं जा रहा था. मामी सच में अभी तक कुंवारी हे थी. स्टैनो की चुसाई रोकता अब वह फिर से उन्हें सीधा करता उनके ऊपर आ गया. छूट में पर्याप्त चिकनाई थी और समय की कमी भी दूसरी वजह थी इस मिलान को जल्दी करने की.

"मामी, कुछ चिकनाई है?", अर्जुन की बात पर वह इधर उधर देखने लगी. फिर बिस्टेर के एक तरफ राखी कटोरी सामने कर दी जिसमे मलाई राखी थी.

"ये क्या है.?"

"वह.. ये मैं रात को सोने से पहले अपने होंठो पर मलाई लगाती हु..", शर्म से इतना कह कर वह चुप हो गई लेकिन अर्जुन ने मुस्कुराते हुए उनके हाथ से वह कटोरी ले ली.

"तभी आपके होंठ मलाई जैसे है. मीठे और मुलायम.", 2 उंगलिओ से कुछ मलाई छूट की दरार में रगड़ते हुए अर्जुन ने ढिटाई से कहा. वह ऐसे हे मुस्कुराते हुए चाँद की मंद रौशनी में मामी का कामुक चेहरे, जहा आँखें शर्म और मजे से बंद थी को देखता बाकी चिकनाई अपने पूरे लुंड पर मसलने लगा.

"एक बार दर्द होगा. लेकिन संभाल लेना मैं बीच में नहीं रुकूंगा.", अर्जुन की बात पर उन्होंने 'हम्म्म' कहते हुए मुँह फेरना चाहा लेकिन दूसरे हाथ से उनका चेहरा सीधा करता वह एक हाथ से लुंड को वह मोटा सूपड़ा उनकी नाजुक और sheel-yukt छूट पर दबाते हुए नीचे झुकने लगा. लुंड की गर्मी छूट के छेड़ पर पड़ते हे जैसे संगीता की आँखें खुल गई. मैं में डर सा उत्पन्न हो गया था मॉटे सुपडे के दबाव से.

"एक बार अंदर जाने के बाद फिर दर्द नहीं होगा.', इतना कहते हे अर्जुन ने मजबूती से अपने होंठो में उनके होंठ भरते हुए कमर का भरपूर धक्का लगा दिए. जिस छेड़ में ऊँगली तक नहीं गई थी वह वह टमाटर सा मोटा सूपड़ा पहली रुकावट तोड़ता हुआ छूट को चीरते हुए अंदर आ बैठा. दर्द से संगीता की आँखें बहार को आ निकली लेकिन अब अर्जुन ने मजबूती से उनके दोनों कंधे पकडे हुए आवाज दबा के राखी. ऐसे हे एक और धक्का मरते हे आधा लुंड उस बंद सुरंग में उतार दिए था. खून की एक तेज लकीर छूट से निकलती बिस्टेर भिगोने लगी थी. संगीता ये दर्द न झेल पाने से अर्धमूर्छित अवस्था में पहुँचती शांत हो गई. अर्जुन एक पल के लिए डरता हुआ वही रुक गया लेकिन फिर थोड़ा दिमाग दुरुस्त करते हुए सिरहाने रखे पानी के गिलास से उनके मुँह पर छींटे मारने लगा. दूसरा हाथ अभी भी होंठो के करीब था.

"आह्हः.. मैं मर्डर गई मेरी मा... क्या दाल दिए छूट में.. आठ. नहीं करवाना.. हाथ जोड़ती हु निकल ले इसको.. आह.. ", वह किसी बचे की तरह रोने लगी थी लेकिन आवाज दबाये हुए हे वह अर्जुन के निचे chatt-pata रही थी.

"मामी, हो गया जो होना था. पहली बार में दर्द होता है. मैंने कहा था न आपको. अभी निकाल लिए तोह फिर आप कभी नहीं करवा पाओगी. 5 मिनट में ठीक हो जायेगा.", अर्जुन उन्हें समझा रहा था लेकिन सच तोह ये भी था के अर्जुन को खुदका लुंड भी ऐसे महसूस हो रहा था जैसे लोहे के शिकंजे में फंसा दिए हो. छूट बुरी तरह कासी हुई थी आधे लुंड को अंदर लिए. ये दृश्य दिन के उजाले में ऐसा दीखता जैसे किसी लकड़ी में मोटा किल्ला थोक दिए हो ऐसी जगह जहा मोरा न हो.

हिम्मत से काम लेते हुए अर्जुन ने एक घूँट पानी उन्हें पिलाया और फिर गिलास एक तरफ रखने के बाद दोनों स्टैनो को प्यार से सहलाते हुए उनका शरीर गर्माने लगा. वह भी थोड़ी मजबूती से उसका साथ दे रही थी बिना hile-dule. जब कुछ देर बाद अर्जुन को महसूस हुआ के निप्पल सख्त होने लगे है तोह उनपर पूरा झुकते हुए वह होंठो को चूसने लगा. इस दौरान हे हल्का सा लुंड बहार निकलते हुए वह वैसे हे अंदर करने लगा. इस हलके घर्षण पर भी दोनों को दर्द हो रहा था.

"इतना दर्द होता है चुदाई में? मेरी सहेलिया या बड़ी दीदी ने कभी नहीं बताया था. और ये तुम्हारा सच में हे बड़ा है अर्जुन.", दर्द से काम्पटी वह बस अर्जुन को करने दे रही थी जो वह कर रहा था.

"मामी, अभी दर्द हो रहा है लेकिन कल देखना खुद आप कहेंगी की आज फिर करते है.", 2-3 इंच लुंड अब इन 5 मिनट में थोड़ा ठीक से अंदर बहार हो रहा था. साथ हे अर्जुन चुचो को जोर से दबा कर दर्द do-tarfa करने लगा था. निप्पल, जो किसी काम उम्र लड़की से थे अब सुई से नोकीले हो चुके थे. अंगूठे और पहली ऊँगली से उन्हें मसलता वह उनके गाल मुँह में लिए अब हलके तेज धक्को से छूट का उतना हे हिस्सा ढीला करने में जुट गया.

"आह.. आह.. अभी दर्द के साथ कुछ ठीक लग रहा है. बस धीरे कर.. " पहली बार उन्होंने अपनी गांड हिलाई थी. अर्जुन ने भी उनकी इस प्रतिक्रिया को समझते हुए फिर से होंठो को मुँह में लेते हुए शरीर से शरीर मिला लिए. दोनों टाँगे अपने हाथो से फैलते हुए उसने ये अगला धक्का चिकनी छूट में लगाया और 7 इंच लुंड में हे संगीता की बच्चेदानी तक का सफर पूरा हो गया. शरीर एक बार फिर दर्द में ऐंठ कर दोहरा हो चूका था.

"सशः.. शांत रहिये. हो गया बस.", अर्जुन ने एक बार फिर से उनके वह अनार अपने एक हाथ से कसके दबाते हुए दूसरे हाथ से एक टांग ऊपर उठाये राखी. वह मखमली जांघ इस गहरे धक्के से कांप रही थी. इतना नरम मांस हाथ में पकडे वह इस खास मुद्रा को बरक़रार रखे अब संगीता मामी के गर्भ पर सूपड़ा भिड़ाये उन्हें उत्तेजित कर रहा था. हलकी ठंडक और गहरी रात जैसे आग में हवा का काम कर रही थी. आज ननिहाल की पहली हे रात में अर्जुन एक और जवान छूट खोल चूका था.

"कितना बड़ा है.. आठ.. पेट तक आ गया है.. नीचे उम्.. आह जैसे खून निकल रहा है.. माँ.. ", वह बस रोटी सिसकती सी अपनी फटी छूट में इस मूसल लुंड को लिए पड़ी रही. अर्जुन ने अब अपना मुँह नीचे लाते हुए एक चुके को चूसना शुरू किआ और दोनों हाथ से जाँघे छुडाते हुए लुंड निकल कर अंदर किआ. ये रगड़ उसको तोह मजा दे रही थी लेकिन संगीता जी को भयंकर पीड़ा हो रही थी.

"मामी, आपकी छूट इतनी गहरी नहीं के पूरा अंदर जा सके.", उनका निप्पल हलके से काटने के बाद थोड़ा ऊपर होते हुए अर्जुन ने जल्दी जल्दी 3-4 इंच लुंड अंदर चलते हुए छूट को लचीला करना शुरू किआ. वही इस अचानक dhakkam-pel से पहले तोह संगीता को बड़ा दर्द हुआ लेकिन 2 हे मिनट में उनकी छूट में भरपूर पानी आ निकला. दर्द में भी उनकी छूट गीली हो रही थी.

"आह.. जमा झोटा है रे तू... ाः... लेकिन मैं भैंस नहीं हु.. फाड़ दी है तूने.. धीरे कर न. मैं भाग नहीं रही.. माँ..", मस्ती के साथ दर्द का मजा संगीता ने पहली बार लिए था और इसके साथ हे जिस्म जैसे इकट्ठा हो गया था. 'माँ रीई... मई गई..' इतना कहती वह अर्जुन की नंगी छाती पर बुरी तरह दांत गदति छूट को सिकोड़ने लगी थी. रह रह कर छूट के अंदर संकुचन होने लगा और kaam-ras से वह पतली सुरंग भीग गई थी साथ हे लुंड भी.

अर्जुन की मज़बूरी थी की वह आसान बदल नहीं सकता था. कुछ पल रुकने के बाद फिर से इस बार वह किसी इंजन सा शुरू हो गया और अब लुंड और भी तेजी से संगीता की ताज़ी फटी छूट को चौडाता अंदर बहार होने लगा.

"मामी, इतनी कासी हो आप.. आह.. ये कूल्हे 2 महीने में भारी कर दूंगा आपके.", संगीता के जिस्म में जैसे किसी लड़की सा गठन था तोह स्वाभाविक हे उनके कूल्हे थे. पतली कमर कोई 26-27 इंच थी और कूल्हे भी 32-33 से ज्यादा न थे. लेकिन जितने भी थे इस पतले शरीर पर बड़े आकर्षक और गोल थे. चिकना लुंड हर बार उनके गरब पर ठोकर मार रहा था.

"कर देना ढीली.. आह. सच में उम्.. पिताजी को आह. देखा है. वह तोह 2 मिनट नहीं टिकते.. इधर तू 20-25 मिनट से दुर्गति कर रहा है.. कमर दुखने लगी है रे.", गांड तोह अर्जुन ने जैसे उनकी हवा में हे उठा राखी थी लेकिन छह कर भी वह लुंड पूरा नहीं कर पा रहा था.

"मामी, आप घूम जाओ न. ऐसे तोह आह.. मैं कर नहीं पाउँगा..", लुंड को झटके से बहार खींचा तोह संगीता जी की सीत्कार निकल गई. सीढ़ियों के उस तरफ कड़ी आकृति कोई 5 मिनट से ये सब देख रही थी. जैसे हे चमकता लुंड छूट से बहार आया तोह ये आकृति जो की एक महिला हे थी साड़ी के ऊपर से हे अपनी छूट खुजाने लगी थी. इधर संगीता मामी को घुटनो पर करते हुए अर्जुन ने पीछे से एक बार फिर लुंड छूट पर रगड़ने के बाद अंदर तेल दिए.

"आह माँ. दुखता है रे. आराम से कर. कितनी फाड़ेगा.", इस धक्के पर वह आगे को खिसक गई थी लेकिन लुंड उनकी गहराई में जा कर हे रुका. अर्जुन पीछे से दोनों उभर दबाते हुए उनकी पीठ चूमता सटासट पेलने लगा अपनी मामी को. लुंड इस मुद्रा में छूट के बहार वाले होंठो को कास के रगड़ रहा था. कॉमर्स जैसे कटरा कटरा टपकने लगा लेकिन धक्के उसके साथ हे तेज होने लगे. जब जब लुंड बच्चेदानी से टकराता तब तब अर्जुन उनके स्टैनो को कास लेता. ऐसे हे दबाते निचोड़ते 10 मिनट बाद लुंड फूलने लगा तोह अब हर धक्के पर छूट और भी ज्यादा चीरती महसूस होने लगी थी संगीता को

"ोोीी.. ये मोटो हो रहा है.. बचा ले भगवान्.. आह.." इस बार छूट में संकुचन होने से पहले हे अर्जुन ने उन्हें पीठ के बल पलटते हुए बिजली की रफ़्तार से लुंड घुसा दिए. वो मोटा सूपड़ा अपने भयंकर रूप में आ चूका था. गांड को ऊपर उचकाए वह तबियत से ये तगड़े धक्के लगा रहा था.

"मामी, आह. माँ ban-na है न?"

"हां मुझे माँ बना दे अर्जुन.. आह. जो कहेगा.. वह करुँगी.. आह.. मायआ..", खुद हे अपने सतांन जोर से दबती हुई वह होंठ काट कर ये चीख रोकने लगी थी और इधर अर्जुन छूट की गहराई में दनादन धक्के देने के बाद अब सारा लावा गर्भमुख पर उड़ेलने लगा था. ये गरम वीर्य छूट में महसूस करते हे वह कास के लिपट गई. बेदर्द चुदाई के बाद जैसे ये उनकी छूट के अंदर सिकाई करने का काम कर रहा था. संगीता बेसुध से अपने ऊपर अर्जुन को लिए नम्म आँखों से उसके होंठ पीती रही. गांड अर्जुन ने उनकी अभी तक उठा राखी थी.3-4 मिनट बाद लुंड बहार करता हुआ वो बोलै.

"नीचे मत करना अपने कूल्हे अभी.", तकिये को एक हाथ से दोहरा करते हुए उसने वो उनकी गांड के नीचे टिका दिए.

"थोड़ी देर ऐसे हे रहना. वीर्य अंदर रहेगा तोह चांस ज्यादा रहेंगे. अगली बार ये जंगल साफ़ जरूर कर लेना मामी.", उनके बराबर आकर लेट गया और एक दूध को प्यार से दबाते हुए फिर दोनों हे गहरे प्यार भरे चुम्बन करने लगे. जब थोड़ा बेहतर लगने लगा तोह अर्जुन के सवाल ने उनके होश उदा दिए.

"वैसे मामी, जब मैंने आपके साथ सब कर हे लिए है तोह काम से काम ये तोह बता दो की इस शतरंज के खेल में रानी कोण है? राजा तोह मैं हे हु और बाकी सब भी मुझे पता है कोण क्या है. सेना एक हे तरफ है तोह सबका पता होना चाहिए न.? क्या कहती हो मामिजान.?", उस पतले निप्पल को चुनती में भरते हुए वह ध्यान से अपनी मामी का चेहरा देखने लगा.

"वैसे आप इधर आ सकती है अनीता मामी.", अर्जुन ने बहोत हलकी आवाज में इतना हे कहा और दूसरी टंकी के पीछे से अनीता मामी सकुचाती सी उनकी तरफ आने लगी. अर्जुन ने पजामा पहना और संगीता मामी पर सिरहाने राखी चादर दाल दी.

"तुम्हे पता था के मैं ऊपर हु.?", वह कड़ी हे थी उनके पास.

"जब मैंने मामी को पलटने से पहले हल्का धक्का लगाया तोह वह थोड़ा तेज सिसकी थी लेकिन फिर भी आपकी चूड़ियों की हलकी आवाज आ गई थी मुझे. और आप शुरू से यहाँ नहीं थी क्योंकि दरवाजा खुलने की आवाज उस आवाज से कुछ पहले हे आई थी. मतलब आप ऊपर हे किसी कमरे में थी. शायद बड़ी मामी के कमरे में.", अनीता और संगीता दोनों हे हैरान थी. लेकिन सुनीता तोह बस आँखें बंद किये अपनी फटी छूट के दर्द और मजे में हे डूबी थी.

"संगीता मामी, मजा आया आपको? अगर हाँ तोह फिर अब बता हे दो के ये सब ज्ञान देने वाला कोण था.?", चादर के ऊपर से हे उनका सतांन दबाते हुए अर्जुन जैसे बिलकुल निश्चिन्त था इस समय. उसको कोई डर नहीं था के मामिया क्या सोचेंगी.

"ममता दीदी.", अनीता मामी ने इतना हे कहा था के अर्जुन चौंक उठा अपने मामी का जवाब सुनकर. बड़ी मामी ने कहा दोनों छोटो मामी को उसके साथ करने के लिए. और ऐसा किस बात पर? उनसे मई मिला हे कब बड़ा होने के बाद? कोई ऐसा जिसने कोई राज खोला हो? कोण हो सकता है?

मतलब साफ़ था के ममता मामी हे वजीर हैं लेकिन ये प्यादा कोनसा था जो इस पाले में पहोच गया.?

अर्जुन को इतना खामोश देखते हुए संगीता मामी थोड़ा करवट लेती उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए बोलने लगी.

"मुझे भी नहीं पता पूरी बात क्या है. लेकिन उन्होंने हे कहा था के अर्जुन पूरा मर्द है और घर की बात घर में हे रहेगी. उन्होंने 2 दिन पहले हे ये बात मुझसे की थी लेकिन मैं चाहती थी की पहले अनीता तेरे साथ करे और फिर मैं. लेकिन एक और बात हो गई इस बीच.", थोड़ा रुक कर वह गहरी सांस लेती एक बार अनीता की तरफ देखने के बाद बोली. "पूजा भाभी ने भी ये बात सुन ली थी. अब सब तुम्हारे ऊपर है की तुम हमे खुशिया देना चाहते हो या नहीं. कोई जोर जबरदस्ती नहीं क्योंकि यहाँ एक बात समझ आ चुकी है के प्यार से हे इसका सही तरीका है और कुछ नहीं.", अर्जुन उनकी बात पर बस गाल छूने के बाद खड़ा हो गया.

"मामी, चादर धुलवा देना और गरम पानी से इनकी सिकाई कर देना. अगला नंबर आपका हे है.", फिर हलके से अनीता मामी का उभार दबाते हुए वह नीचे चल दिए. अनीता की सिसकी निकल गई इस हरकत से. अर्जुन भी दिमाग को आराम देता अपने कमरे की तरफ चला गया सीढ़ियों से होते हुए. कही न कही उसको पता चल गया था के वह कोण है जिसने सलाह दी होगी. और असली रानी (वजीर) वही है.
 
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