Incest Pyaar - 100 Baar - Page 31 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

आप सभी के सकरात्मक जवाब देखने से खुद को थोड़ा बुरा भी लग रहा है दोस्तों. बस बात ऐसी है की बिज़नेस से वह नौकरी करने वालो का घर चलता है कुछ मेरी जेबखर्ची के साथ और मेरी जमा पूँजी यही 7 महीने में की गयी 24 पेंटिंग्स रही है जिनके बिकने की प्रतीक्षा मैं पिछले एक महीने से कर रहा था क्योंकि इन्हे बनाने के लिए घर से भी दूर था और तक़रीबन 7 महीनो में से 3 महीने सिर्फ इन्ही पर लगाए हैं. अब कल के बाद कुछ सुकून मिलेगा और फिर से चित्रकारी शुरू कर सकूंगा. धन्यवाद स्थिति समझने के लिए ?
 
अपडेट 156

डर

"प्रीती, अब ये क्या बात करने लगी हो तुम? अर्जुन ने मुझे अपना दोस्त बनाया न और सच कहु तोह हमारा ये दोस्ती का रिश्ता मुझे ज्यादा पसंद है.", आकांक्षा ने अर्जुन के कुछ भी कहने से पहले ये जवाब दिया तोह प्रीती ने पलट कर उसको ध्यान से देखा. चेहरे पर कुछ भी झूठ न था उस प्यारी सी लड़की के.

"सच कहु तोह मैं पहले इस सब में यकीन नहीं करता था. मेरी ज़िन्दगी के वो लक्ष्य जिनके लिए दादा जी मुझ पर इतनी म्हणत कर रहे थे, वही सबकुछ था मेरे लिए. आकांक्षा मेरे साथ पढ़ती भी है ये 10 महीने तक तोह मुझे पता भी नहीं था. पहली बार जब हमारी थोड़ी बात हुई तोह वो इम्तिहान का आखिरी दिन था प्रीती. इस बराबर बैठा मैं सिर्फ इसके भूरे बालो को देखता रहा जैसे ये किसी अपने की याद दिला रहे हो.", अर्जुन ने कार घर ले जाने की जगह धीमी गति से विपरीत दिशा में मदद ली. दोनों हे लड़कियां उसके गभीर चेहरे और लफ्जो पर केंद्रित थी.

"फिर वापसी में तोह अलग सा हे दर्द होने लगा था क्योंकि जिसको याद करने की कोशिश कर रहा था वो कहा होगी और क्या वो मुझे भी याद करती होगी? इन सवालों से सर दुखने लगा तोह मैं खुद से हे भागने लगा. गेट से पहले हे वृक्षों के पास दूर कड़ी आकांक्षा को देख कर भी मैं अनदेखा करने की कोशिश कर रहा था लेकिन कदम इसके करीब चले हे गए. मुझे बस वो दर्द दिखा और उसका कारण मैं खुद. प्यार के बदले मैंने दोस्ती को चुना क्योंकि मैं खुद हे नहीं जानता था की मेरा भविष्य क्या है. एक मासूम दिल को तोड़ने का बोझ मैं अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं था और प्यार कबूल नहीं कर सकता था क्यूंकि ऐसे हे सुनहरी भूरे बालो वाली लड़की ज़िन्दगी की शुरुआत से मेरे दिल में बस चुकी थी.", प्रीती इतना सुन्न कर नीचे देखने लगी थी और आकांक्षा आज बड़े ध्यान से उस अर्जुन को देख रही थी जो पहली बार इतना गंभीर और व्यथित था. कार अपनी हे धीमी गति से नए सेक्टर वाली खाली सड़क पर चलने लगी.

"उसके बाद कितने हे दिन हम दोनों की मुलाकात हे न हुई. जब पता लगा के दोनों कितने करीब रहते है तोह मिलना शुरू हुआ. कुछ समय बाद मेरी चाहत भी वापिस आ चुकी थी जहाँ सफर हम दोनों हे थोड़ा कतराते हुए आगे बढ़ा रहे थे. इस दौरान मुझे जिसने खींचा वो था आकांक्षा का गहरा खालीपन और थोड़ी बहोत ख़ुशी की वजह मेरा उस से मिलना. पता भी नहीं चला के इसके अधूरेपन में मैं खुद कब शामिल हो गया. इस बार मैंने प्यार का इजहार किया था प्रीती और उसके बाद मुझे अंशु अपनी जिम्मेवारी लगने लगी जिस वजह से मैंने अंकल आंटी के साथ थोड़ी सख्ती से बात करके इसको समय देने के लिए कहा. अंशु के अकेलेपन के साथ साथ ऐसा करने की दूसरी वजह थी की मैं फैंसला हे नहीं ले प् रहा था की हमारे रिश्ते की मंज़िल भी है या नहीं. फिर अंशु ने जैसे सब जान लिया था और इसको दोस्ती का नाम दे दिया.", अर्जुन ने बात पूरी करने के साथ हे अपनी तरफ का शिक्षा थोड़ा निचे कर दिया. बहार अभी भी हलके बादल छाये थे और ऐसा हे कुछ हाल अर्जुन के मस्तिष्क का भी था. लेकिन इस ख़ामोशी में प्रीती ने मुस्कुराते हुए अर्जुन का गाल चूम कर जैसे कार की भीतर पसरा माहौल भांग कर दिया.

"इसलिए तोह तुमसे मैं इतना प्यार करती हु मेरे buddhu-ram. तुम सबकी परवाह करते हो और सबसे ज्यादा उसकी जो तुम्हे प्यार करता हो. मैं आकांक्षा को तबसे जानती हु जब इसके माँ हमारे घर आते थे पापा को राखी बांधने. बस उस समय हम दोनों की कभी बानी हे नहीं क्योंकि ये नकचढ़ी थी और मैं होती थी तुम्हारे साथ. वैसे ये बहोत मोटी सी थी और खेलने वेलने से दूर हर वक़्त एक हाथ में शीशी और दूसरे में अपने जैसी एक डॉल लिए बिस्टेर पर पसरी रहती थी.", प्रीती की बात सुन्न कर अर्जुन जहाँ अभी भी थोड़ा असहज था वही आकांक्षा के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट छा गयी थी.

"मैं इतनी भी मोटी नहीं थी प्रीती बस ये khel-kood पसंद नहीं था. और ये साहब या तोह तुम्हारे साथ हे चिपके रहते थे या फिर todd-fodd के साथ बस गुस्से में मुँह फुलाए किसी न किसी ने नाराज. पता होता के ये वही अर्जुन है तोह नजदीक भी नहीं आती. वैसे तुम बिलकुल बदल हे गए हो अर्जुन. और ये बदलाव सबको पसंद है.", आकांक्षा की बात पर प्रीती दरवाजा खोल कर हंसती हुई कार से उतर गयी. पिछली सीट से उस छोटे से पिल्लै को लेती वो बहार घांस में टहलने लगी.

"मैं प्रीती के साथ जीवनभर जीने वाला हु अंशु लेकिन सच कहु तोह मैं तुम्हारा दोस्त भी नहीं हु. तुम्हारे साथ रहने मिलने से जो प्यार हुआ है उसको दरकिनार नहीं कर सकता.", अर्जुन ने एक नजर बहार टहलती प्रीती पर करने के बाद पीछे बैठी इस खूबसूरत बिल्लोरी आँखों की स्वामिनी को देखते हुए कहा.

"फैंसले वक़्त भी करता है अर्जुन और मैं प्यार में विश्वास करती हु न की वाडे और फ्यूचर में. फिलहाल 7-8 साल तोह मेरे पास ये आजादी है हे और उसके बाद जहाँ mom-dad कहेंगे वह मेरी शादी. लेकिन पहला प्यार तुम्ही हो और जितना चाहे वक़्त प्रीती को दो, बस महीने में 2-3 बार मुझसे मिल लोगे तोह वही बहुत है मेरे लिए. हाँ ये दोस्ती वाली बात भी गलत नहीं है. तुम बस अकेले में मेरी चाहत हो और सबके सामने मेरे बेस्ट फ्रेंड.", आकांक्षा को इस तरह सबकुछ मानते देख अर्जुन के दिल में चल रही उथल पुथल एक पल में हे शांत हो गयी. टकटकी लगाए वो बस उसको हे देखता रहा. कितने आराम से उसने ये कह दिया था की जीवन में प्रीती को हे हम रखे और उसको दोस्त बन्न कर जीने में भी परेशानी नहीं.

"उमाह.. तुम सचमुच ख़ास हो अंशु, बहोत ख़ास.", अर्जुन ने इस बार प्रीती की परवाह किये बिना हे आकांक्षा के गाल चूम लिए. वो भी सुर्ख गुलाबी होंठो से मुस्कुराती उतने हे प्यार से उसको देख रही थी.

"पता है न मैं साली भी लगती हु तुम्हारी अब? तुम कार घुमा लो, फिर मुझे प्रीती के घर हे रुकना है.", आकांक्षा ने समय का ध्यान करवाया और अर्जुन भी माहौल को समझते हे कार स्टार्ट करके प्रीती के करीब ले चला.

"ड्राइवर, सीधा सामने हे देखो. कार हमको देख कर चलना महंगा पड़ सकता है.", प्रीती भी पिछली सीट पर आकांक्षा की बगल में हे बैठ गयी. अर्जुन ने सर घुमा कर उसकी तरफ देख तोह ये जवाब सुन्न कर झेंपता हुआ आगे देखने लगा.

"जी मेमसाब. वैसे लगता है अब टोपी भी लेनी हे पड़ेगी, ड्राइवर वाली.", अर्जुन की बात पर दोनों हे खूबसूरत बालाएं खिलखिला उठी. दोनों हे एक जैसे अनुपात की और वैसे हे कंधे से कुछ निचे भूरे बालो वाली. अर्जुन पहली बार अपनी दोनों बिल्लियों को एक साथ देख रहा था वो भी पक्के दोस्तों के रूप में. कलयुग है और यहाँ कुछ भी मुमकिन हो सकता है.

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"हाँ तोह नवाब साहब के पास समय हो तोह ये गरीब आपकी आज्ञा से चाँद अल्फाज कह सकता है?", अर्जुन नहाने के बाद अभी निचे आया हे था और बहार बगीचे से पहले हे अपने दादा जी से मुलाकात कर बैठा. पंडित जी चाय से फारिग हो कर अभी अंदर हे चले थे और अर्जुन को देखते हे जैसे कुछ याद आ गया था उन्हें.

"क्या बौ जी. आप ऐसे मैट कहा करो, ाचा नहीं लगता. चलो आपके कमरे में हे बात करते है.", अर्जुन लाड से अपने दादा जी के एकतरफ लगते हुए उनके साथ हो लिया. रामेश्वर जी भी अपने पौटे की मोहब्बत्त देख मुस्कुराते हुए बैठक से होते हुए अपने कमरे में आये तोह वह पहले हे कौशल्या जी, पूर्णिमा जी, शालिनी और रेणुका को बैठे पाया. सभी ने कपडे बदल लिए थे और अब बातें करते हुए थोड़ा आराम हे कर रही थी.

"हम लोग जरा साथ वाले कमरे में हैं कौशल्या.", रामेश्वर जी ने एक नजर सभी को देखने के बाद मेहमान कक्ष का रुख किया तोह अर्जुन भी उनके पीछे हो लिया. शालिनी बुआ के चेहरे पर आयी वो हलकी सी चमक फिर से धूमिल हो गयी. घर आये 2 घंटे हो चुके थे लेकिन जब अर्जुन दिखा भी तोह एक पल में हे ओझल हो गया. सिर्फ रेणुका हे ये देख पायी थी जिसकी पिंडलियों पर हलके हाथो से कौशल्या जी मालिश करते हुए माँ की तरह देखभाल में लगी थी. वही अर्जुन भी थोड़ा सजग हो गया था अपने दादा के यूँ कमरा बंद करने पर.

"आओ, यहाँ बैठो जरा. तुम सोच रहे होंगे के कमरा बंद करके हम क्या बात करने वाले है? बात जरुरी भी है और समय के साथ हालात के हिसाब से हमको ये चर्चा करनी हे चाहिए.", इस कमरे में बिस्टेर दूसरी दिवार से लगा था जिस वजह से साथ वाले कमरे से फांसला अधिक हो जाता. अर्जुन सर हिलता अपने दादा जी के हे करीब एक कुर्सी पर बैठ गया. रामेश्वर जी को अपने पौटे की शारीरिक भाषा और तरीका पसंद आया.

"मैं भी आपके साथ बहोत साड़ी बातें करना चाहता था दादा जी. संजीव भैया ने कहा था के मेरे पंजाब से वापिस आने पर आप हम दोनों के साथ हे बात करेंगे. बस शायद समय का अभाव रहा होगा जिस वजह से इतना वक़्त लग गया. लेकिन भैया?", अर्जुन अभी आगे भी बात करता उस से पहले आँगन वाले दरवाजे को खोल कर संजीव भी अंदर चला आया. जाली और लकड़ी के दोनों दरवाजे बंद करने के बाद संजीव ने एक फाइल अपने दादा जी को देने के साथ दूसरी कुर्सी खिसका कर अर्जुन के करीब हे तशरीफ़ राखी.

"लो, तुम्हारे सारथि भी आ गए वत्स.", रामेश्वर जी ने हँसते हुए वो फाइल खोली और संजीव के हाथो कलम लेते हुए कुछ ख़ास अक्षरों को रेखांकित करना शुरू कर दिया. संजीव भैया को देख अर्जुन भी खुश था.

"तोह तुम सिर्फ एक हादसे की वजह से चारो दिशाए खंगालने लगे और आज उस गुत्थी को सुलझाने से बस एक कदम दूर हो जिसके सामने हम भी नाकाम हे रहे थे. कुछ chhaan-bin कर भी लेते लेकिन फिर ख़ास वजह से अपने आप हे रुकना पड़ा. शायद तब भी सुलझा न पाते.", रामेश्वर जी के मुस्कुराते चेहरे पर एकेका थोड़ी गंभीरता आ गयी.

"आप सुलझा सकते थे दादा जी और मैं ये सब उस हादसे की वजह से नहीं कर रहा जहा मेरी मुलाकात सुशीला बुआ से हुई थी. वजा कुछ और थी लेकिन जिसकी तलाश में निकला था वो रास्ता ये राह भी दिखायेगा, मुझे जरा भी पता न था. परिणाम सोच कर हे मुझे खुद को रोकना पड़ा और मैं अब रुकना चाहता हु.", अर्जुन ने उनकी अपेक्षा के विपरीत अपने हथियार हे गिरा दिए थे और इस वजह से संजीव भैया जैसे नाराज लगे थे अपने छोटे भाई से.

"संजीव, ये जो कह रहा है वो तुम्हे तोह समझना चाहिए बेटे. ये रुकना चाहता है इसका यही मतलब हुआ के अर्जुन खुद को ख़ास तरीके से तैयार कर रहा है. वैसे तुम जानते हो अर्जुन की तुम्हारी तहकीकात में बहोत से गलत नाम भी शामिल है. इतने लोगो पर संदेह जाताना तुम्हारे अंदर काम अनुभव को दर्शाता है. शायद जल्दबाजी में या छोटी मोती बात पर हे तुमने इन्हे अपने संदेह के घेरे में ले लिया.", रामेश्वर जी की हैरानी पर अब दोनों हे भाई एक दूसरे को रहस्यमयी अंदाज में देख रहे थे.

"वैसे हमारे पास पुख्ता सबूत है ज्यादातर के खिलाफ दादा जी. बस आप नाम लीजिये, हम आपको संभावित जानकारी जरूर देंगे.", संजीव के हम दर्शाने पर रामेश्वर जी ने फाइल एक तरफ रख दी. उन्हें संजीव पर पूरा यकीन था और अर्जुन के काम अनुभवी बात भी एक तरह से उनका खुद को हे समझने की कोशिश थी.

"यहाँ जितने प्रमुख नाम है वो सभी हैरानी वाले है. कुछ इस वजह से की तुम दोनों उन के बारे में जान कैसे गए और बाकी सभी तोह अपने हे लोग है जिन पर संदेह करना शायद गलत होगा.", रामेश्वर जी ने इस बार अपने छोटे पौटे की तरफ निगाह की थी अपनी बात कहते हुए.

"लेट में तेल्ल यू ओने थिंग ग्रांडफादर. ठोस हु हर्ट उस अरे मोस्टली फाउंड तो बे आवर डरेस्ट. यहाँ सिर्फ 3 नाम है जिनकी वजह से आप गंभीर है क्योंकि एक संदिग्ध है कृष्ण चाँद शर्मा उर्फ़ कृष्णेश्वर शर्मा, आपके छोटे भाई है जिनसे मैं सही से मिला भी नहीं कभी. एक आपकी बड़ी भाभी और मेरी बड़ी दादी श्रीमती चंद्रो देवी जी है जिन्होंने मुझे भी कभी अलग नहीं समझा और वो तीसरा नाम सबसे बड़े अपराधी का है, लाजवंती देवी पत्नी स्वर्गीय महेन्दर सिंह - स्वर्गीय ईश्वर सिंह और मिस्ट्रेस ऑफ़ कुंवर सारंग. जैसा भैया ने कहा है, सबूत है हमारे पास लेकिन छोटे दादा जी पर संदेह है और बस इस वजह से मैं रुकना चाहता था.", अर्जुन ने इन तीनो नामो के साथ जो खुलासा किया था वो सुन्न कर रामेश्वर जी का वजूद हिल गया. उनके भाई के साथ साथ लाजवंती को सारंग की रखैल कह दिया था अर्जुन ने.

"इस बात को यही ख़तम करते है अर्जुन. बाकी तुमने जो यहाँ मधुलता और सरपंच की बीवी रेशमा का उल्लेख किया है तोह मैं इस से सहमत हु. साथ हे बिंदिया की माँ को भी मैं अपराधी मान सकता हु. अवधेश, लोहान, सोमबीर सिंह के बेटे और बाकी सभी तोह इस दुनिया से जा चुके है. हाँ तहसीलदार रमाकांत भी जैसे मेरी भूलवश यहाँ से निकल गया.", रामेश्वर जी की यही आदत थी की वो अपने बचो पर गुस्सा नहीं करते थे. वो आहात हुए थे अर्जुन के शब्दों से लेकिन वैसी प्रतिक्रिया न दी जो वो किसी बहार वाले को देते.

"ये तस्वीर देखिये बौ जी. जानते है आप इन्हे?", संजीव ने एक 60-65 वर्षीया महिला की पासपोर्ट अकार की तस्वीर अपने दादा जी के सामने की तोह वो बड़े ध्यान से देखने लगे. कुछ पल देखने के बाद उन्होंने वो तस्वीर वापिस की तोह संजीव ने एक shwet-shyaam 5क्ष7 इंच की तस्वीर अपने दादा जी सामने कर दी. रामेश्वर जी तुरंत बिस्टेर से उछाल हे पड़े इस चेहरे को देखते हे.

"अनामिका!.. ये तुम्हे कहा से मिली संजीव? ये मर्डर चुकी है जितना हम जानते है और इसका क्या सम्बन्ध है उस छोटी तस्वीर से?"

"दोनों एक हे है दादा जी. आपने तोह कभी विधवा दमयंती को देखा नहीं लेकिन चलो कुमारी अनामिका को आपने पहचाने में गलती नहीं की.", ये बम अर्जुन ने फोड़ा था अपने दादा जी पर. रामेश्वर जी उस तस्वीर को थाम कर ख़ामोशी से बैठ गए. उनकी नजर बस उस चेहरे में हे खो चुकी थी जैसे.

"वैसे एक कहानी तोह आपकी भी है दादा जी जो शायद यहाँ किसी को पता नहीं. आप आर्मी में शाही कोटा से थे और उसके बाद फिर सीधा पुलिस में. एक साल आप ट्रेनिंग पर रहे थे आर्मी से आने के बाद और उस बीच पंजाब के raaj-pariwar में कुछ उथल पथल मची थी. आप छोटे दादा जी से 5 साल बड़े है लेकिन दोनों की शादी लगभग एक साथ हे हुई. गौर किया आपने कभी इस सब पर?", अर्जुन के अगले खुलासे पर रामेश्वर जी से कुछ कहते हे न बना था. वो तस्वीर एक तरफ रख कर अपने पौटे को ऐसे देख रहे थे जैसे वह कुर्सी पर कोई दूसरी दुनिया का व्यक्ति बैठा हो.

"दादा जी, आपके और कृष्ण दादा जी के बीच शायद एक बहिन भी थी. बस उसके बारे में कुछ पता नहीं लग पाया.", संजीव ने अलग हे पहेली रख दी थी अपने दादा जी के सामने. आज खुद रिटायर्ड और tej-tarraar सप निशब्द था इन दोनों बचो के सामने.

"मेरी शादी कुमारी लक्षिका से होने वाली थी बचो और फ़ौज में इसलिए भेजा गया था की वह से आते हे मैं शाही परिवार में शामिल हो सकू. लेकिन उस से पहले हे एक षड़यंत्र के तहत राजमाता प्रभा देवी, लक्षिका और मेरी बहिन मिनाक्षी, जो राजमाता की बहु थी और रघुबीर सिंह की सगी बहिन उनकी हत्या कर दी गयी. बहोत कुछ हुआ था और उस घुटन से दूर होने के लिए मैं तुम्हारी दादी से विवाह करके इधर चला आया. वैसे इतनी गहरी पड़ताल तुम दोनों कर कैसे गए.? और ये दमयंती हे कुमारी अनामिका है इसका सबूत?", रामेश्वर जी के लहजे में एकाएक भावुकता और नरमी आ चुकी थी. आज जैसे उनके अतीत के बंद कमरे को इन दोनों बचो ने खोल दिया था.

"आपने तोह फिर कभी बिंदिया या शबनम को ाचे से देखा हे नहीं दादा जी. वैसे आप ऐसा कर भी नहीं सकते थे क्योंकि वो गाँव की बहु और फिर उनकी बेटी इतने बरसो बाद आधुनिक अवतार में आपके सामने थी. लेकिन शायद आप वो बात नहीं बता रहे जिसकी वजह से आपने अज्जू चाचा वाला केस रोक हे दिया. मैं भी अटक गया हु रमाकांत और नीलिमा पर. और फिर एक चिंता मुझे कह रही है के अब रुकना हे बेहतर है.", अर्जुन जैसे अपने दादा का मैं खंगाल रहा था इस वक़्त. संजीव ने हे सिखाया था उसको ये पैंतरा जिस से चेहरे के भाव और जवाब समझा जा सके.

"अज्जू के हाथ में शाही कंगन मिला था हमे. वो आज भी हमारे पास है बीटा लेकिन तुम्हारी दादी के वचन ने हमको बाँध दिया था की वह हम कभी पुलिस वाले के रूप में जा कर पूछताछ न करे. मैं वो कंगन दिखा सकता हुआ अगर तुम चाहो तोह. लेकिन तुम खामख्वाह कृष्ण को इस सबमे खींच रहे हो. वैसे अभी तक मैं बड़ी भाभी वाली बात से भी सहमत नहीं हु.", रामेश्वर जी तोह चंद्रो देवी को सबसे बेहतर समझते थे इन दोनों से.

"मान तोह आप ये भी नहीं रहे की आपकी एक बहिन भी थी दादा जी. चलो फिलहाल मैं अर्जुन की बात आगे बढ़ता हु. नीलिमा की माँ raaj-gharane से हे तोह थी और रमाकांत के ख़ास दोस्त सारंग और कृष्ण दादा जी. वैसे इस फोटे में ये गोला छोटे दादा जी पर हे होगा और चाहो तोह आप बाकी सबके नाम भी बता सकते है.", ये वही तस्वीर थी जिस पर एक शख्स के चेहरे पर गोला था लेकिन रामेश्वर जी तोह संजीव की बात पर हे हतप्रभ थे. रमाकांत, सारंग और उनके हे छोटे भाई की दोस्ती को ले कर. संजीव ने अँधेरे में निशाना लगाया था यहाँ क्योंकि ये तोह अर्जुन को भी पता न था.

"सीमा लांघ रहे हो तुम दोनों लेकिन अगर सबूत है तोह आगे बात करो.", रामेश्वर जी मैं हे मैं चाह रहे थे के ये दोनों यही रुक जाए.

"आपको लगता है की हम गलत रस्ते जा रहे है तोह ठीक है दादा जी. हम इस बारे में अब और कोई बात नहीं करेंगे.", यहाँ उनके हिसाब से जवाब दिया था संजीव ने लेकिन अर्जुन जो भरा बैठा था वो चुप न रह सका.

"सुनिए जरा मेरी बात दादा जी. भैया जो भी बोले लेकिन बस आप मेरी सोच सुनिए. मैं खुद हे आगे कुछ नहीं करूँगा. आपको अज्जू चाचा के हाथ में शाही कंगन मिला, नीलिमा जी से प्यार करते थे अज्जू चाचा और उनकी माँ भी शाही परिवार से थी. लाजवंती का अतीत अगर शाही घराने में सेवादार का था तोह आप की नजर पड़ने से रही. कौन विधवा बचे को जनम देती है किसी दूसरे गाँव में जहाँ उनके पति का नाम हे पता न हो किसी को? क्यों सारंग हे उनको ले कर गया और क्यों चंद्रो देवी ने एकदम हे बिंदिया की शादी कबूल करि उनके घर में? कैसे छोटे दादा जी की शादी एकदम हे कर दी गयी और आपकी दुखती राग को जानते हुए सब हुआ? आप ये भी नहीं समझ रहे की रेशम के हाथो अवधेश मिश्रा, तोमर, बिंदिया तक फ़ोन गए लेकिन उस औरत की असलियत क्या थी? लाजवंती को कैसे भूल सकते है जो अब यहाँ नहीं है और न हे रेशमा? सरपंच शायद अब जिन्दा भी न हो क्योंकि वो वह शादी में भी नहीं दिखा. क्यों छोटे दादा जी आज तक इस घर नहीं आये या ये कहु की विनोद चाचा जी से भी आपको नफरत है?", अर्जुन ने खड़े होते हुए इतने सवाल जड़ दिए थे की खुद संजीव भी हैरान था. दरवाजे पर खाने के लिए दस्तक हो चुकी थी जिसके साथ अर्जुन वो फाइल ले कर बहार वाले दरवाजे से निकल चला.

"ये क्या कह गया अभी संजीव?", रामेश्वर जी ने दरवाजे की दस्तक को नजर अंदाज करते हुए बस इतना हे पुछा था. उनका बड़ा पौता थोड़ा हताश दिखा इस सवाल से.

"उसके लिए इस सबमे छोटे दादा जी, सारंग, लाजवंती, चंद्रो देवी और आपकी अनदेखी भी शामिल है दादा जी. आपने शाही कंगन वाली बात बोल कर उसको सही स्थिति का ज्ञान करवा हे दिया. मतलब नीलिमा की माँ वही थी जब अज्जू चाचा की हत्या की गयी और बिंदिया वह भी उन्हें बचा रही थी. जड़े तोह आपके अतीत से हे जुडी है दादा जी लेकिन आप उपस्थित न थे शायद उस घटनाक्रम के वक़्त. अर्जुन को आपने एक नाम बताया जिसको वो ढून्ढ रहा था आपकी सगी बहिन के रूप में. रघुबीर जी इतना बखेड़ा सिर्फ आपके लिए हे करते, एक भाई अपनी बहिन की मृत्यु पर बहोत कुछ कर सकता था लेकिन शायद मिनाक्षी आपकी बहिन थी क्योंकि ये 2 परिवार उस से पहले से भी घनिष्ठ थे. अर्जुन अब आगे काम नहीं करेगा.", संजीव अर्जुन की नाराजगी बहोत ाचे से समझ चूका था और अब उसने वो वजह अपने दादा को भी बता दी थी.

"और कुछ.?"

"हाँ उसके रडार पर खुद शंकर चाचा भी है लेकिन एक अपराधी के तौर पर नहीं. वो उन्हें स्टडी कर रहा है और उनके साथ साथ अर्जुन अपने ननिहाल और दादी जी के पैतृक गाँव की chhaan-bin में भी लगा है. मेरे पास भी विनोद चाचा के खिलाफ कुछ सबूत है लेकिन शायद उतने हे सबूत शंकर चाचा के हाथ लग चुके है. वो काम से बहार जा चुके है उमेद चाचा के साथ. अर्जुन वैसे खुद को कण्ट्रोल कर सकता है.", संजीव ने सभी तस्वीरें उठानी शुरू की तोह रामेश्वर जी ने दमयंती उर्फ़ अनामिका और लक्षिका वाली तसवीरे अपने पास रख ली.

"वो तेज रफ़्तार जा रहा है संजीव. रोक लो कुछ समय अगर रोक सकते हो."

"वो रुक हे तोह गया है दादा जी. एक आप हे हैं जिसको वो दुःख नहीं पंहुचा सकता नहीं तोह कबका वो सारंग के सामने खड़ा होता. अर्जुन को राज्यवर्धन, पुष्पक, इंद्रनील के साथ साथ उनकी बीवी और बचो तक की भी खबर है जो उसने मुझसे भी जाहिर नहीं की. आपने आज जो वह मंदिर में करवाया है वो ये सब पहले हे मुझे बता चूका था की आपको अब ताक़त की जरुरत पड़ेगी. सॉरी, इस से ज्यादा मैं नहीं कह सकता. वो मेरे लिए सबकुछ है और इस शादी के बाद अर्जुन गाँव चला जायेगा जबतक स्कूल नहीं खुलते.", संजीव ने धमाका हे कर दिया था अर्जुन के यहाँ से जाने की बात बता कर. लेकिन अगले जवाब की ऐसी उम्मीद नहीं थी उसको भी. दरवाजा खटखटाना वो व्यक्ति बंद कर चूका था जो भी खाने के लिए बुलाने आया था.

"हम अपने शेर को नाराज नहीं करेंगे संजीव. ये रिवॉल्वर अब पतलून से पाजामे तक साथ रहेगी. रही बात कृष्णेश्वर की तोह मेरे भाई को इस सबसे दूर रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है. लेकिन इन 5 लोगो की तहकीकात मैं खुद करूँगा. अर्जुन शायद अभी भी पूरी बात नहीं बता कर गया."

"उसके निशने पर तोह आप और शंकर चाचा जी भी है. क्योंकि किसी को तोह आपकी खबर रहती हे होगी. वैसे वो पीछे इसलिए हटा है क्योंकि नतीजा पता है उसको. वो यहाँ से चला जायेगा दादाजी. आप 2 साल ताक़त बढ़ाओ और वो स्किट दिल्ली निकल जायेगा. पता नहीं कैसे आप संभालेंगे ये सब और अब तोह मैं भी डरता हु अर्जुन से क्योंकि उसकी पकड़ कहा तक हैं आप सोच भी नहीं सकते."

"कहा तक?", रामेश्वर जी हैरानी से अपना नाम और अपने बेटे का सुन्न कर बस यही कह सके.

"संजय और लोहान तक उसके लिए काम कर रहे. गौर कंस्ट्रक्शन पर भी वो निगाह लगाए बैठा है और इसके साथ साथ सारंग के परिवार के पीछे आपने बेशक दलीप अंकल को लगाया हो लेकिन वो मजबूर करने वाला अर्जुन है वालिए सर को. अर्जुन ख़ामोशी से बैठा इतना बड़ा खेल खेल रहा है जिसमे बस नीलिमा की कमी है. शायद उमेद चाचा भी उसके लिए काम कर रहे है और कम के साथ साथ डॉ सांगवान जी भी. पंजाब कनेक्शन नहीं पता लेकिन वह भी इसने कमाल तोह कुछ किया हे है.", संजीव सब कुछ उस फोल्डर में रखते हुए खड़ा हुआ तोह रामेश्वर जी ने नए रूप के बावजूद एक दरख्वास्त की.

"शादी तक उसको संभाल लो संजीव. मैं इस सारे मामले को अब खुद देखूंगा."

"आप शादी संभल लीजिये दादा जी, उसके बाद अर्जुन जितने यहाँ दिखेगा वो आपका वही नादान सा बैलबुद्धि दिखेगा. वो इन्तजार में है शादी के और कैसे भी कर के आप बस यहाँ किसी को उभरने मैट देना. विनोद चाचा की हरकत अर्जुन सेहन कर गया लेकिन आप नहीं जानते दादा जी की वो थोड़ा अलग है. कुछ भी अगर गलत हुआ घर के सदस्यों के साथ तोह फिर वो सिर्फ ऋतू के रोके रुकेगा. पता नहीं लेकिन अर्जुन एक गलत समय में सिर्फ ऋतू से हे रुकता है. जो भी मेहमान आये हमको यही ध्यान रखना होगा की अर्जुन व्यस्त भी रहे और खली हो तोह ऋतू के करीब.", आज संजीव ने वो बात कह दी थी जो खुद उसको नहीं पता थी लेकिन इसका कारण रामेश्वर जी को पता था.

"वह की सिक्योरिटी 200% कर दूंगा मैं संजीव और रही बात काम की तोह अर्जुन को बस घर हे रहने दो. हाँ अगर बचो के साथ कोई हरकत होती है तोह आये मेहमानो के साथ वो कुछ भी करे गलत नहीं करेगा. आजाद रहने दो और ये फाइल यही छोड़ दो.", रामेश्वर जी बहोत कुछ सोच चुके थे इस अंतराल में लेकिन फिर भी उन्हें उम्मीद नहीं थी की वो किसका सामना कर रहे है. सच सामने आने पर गलत होना स्वाभाविक हे था.

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सभी लोग अपने हिसाब से खाना खा चुके तोह सबसे आखिरी में 10 बजे अब टेबल पर उमेद, शंकर, नरिंदर, राजकुमार और अर्जुन हे थे. समय आज कही ज्यादा हे हो गया था क्योंकि ये सभी लोग अपने पीने के कार्यक्रम में व्यस्त थे वही अर्जुन कुछ और हे मसले में उलझा था जो 10 बजे भोजन के लिए यहाँ आया था.

घर में इस वक़्त बस रेखा जी और उनके साथ ऋतू, बबिता और शालिनी हे जाग रही थी. इन सबको खाना खिलते हुए 30 मिनट लगभग लगे थे और बबिता ने नलके पर हाथ धोते हुए अर्जुन से कुछ कान में कहा और ऊपर सीढ़ियां चढ़ गयी. अर्जुन ने गहरी सांस लेते हुए एक पल बबिता को जाते हुए देखा और उसके भारी नितम्भ देख मुस्कुरा उठा.

"चलो, 10:30 हो गए अब सोने चलते है.", शालिनी बुआ ने सीधा उसको ये बात कही तोह अर्जुन अलग हे तरीके से उन्हें देखने लगा. शालिनी को गलती महसूस हुई तब तक अर्जुन अपनी माँ की तरफ बढ़ चूका था.

"उम्माह.. स्लीप वेल माँ. सुबह मिलते है, दीदी सो रही है आपके पास.", अर्जुन ने जैसे रेखा जी को गाल पर चूमा था वो देखने वाले के लिए बेशक maa-bete का स्पर्श था परन्तु ये दोनों हे जानते थे के यहाँ वो प्रेमी थे. वैसा हे चुम्बन रेखा जी ने किया था और इस वक़्त बाकी लोग जा चुके थे.

"कल रात ऋतू नहीं आएगी. मैं इन्तजार करुँगी.", रेखा ने अपने कमरे में जाने से पहले ये इशारा दिया और अर्जुन हाथ साफ़ करने के बाद शालिनी बुआ की तरफ देखने लगा.

"आप कह रही थी न हम चले? वैसे मेरे बिना भी जा सकती थी.", अर्जुन ने सीढ़ी पर कदम रखते हुए कहा और शालिनी चपलता से उसके करीब आ रुकी.

"नहीं वो बात नहीं है. विनोद की बीवी खर्राटे बहोत लेती इसलिए मैं तुम्हारे कमरे में सोना चाहती थी.", अर्जुन इस बात पर मुस्कुरा भर दिया. उसको बबिता का पता था की वो छत्त पर जरूर आएगी और शालिनी बुआ की नींद बस इन्तजार कर रही है. लेकिन अब नाम 2 लोगो के एक जैसे थे और अनामिका का हाथ हे क्यों उसके छोटे दादा ने माँगा ये बात उसको एकदम से करंट की तरह लगी. भाव साधारण रखता वो अपने कमरे में चला आया.

"बुआ, वैसे सच कहु तोह यहाँ एक नहीं है.", अर्जुन ने आखिरी चाल चली थी शालिनी को दूर करने की और आते हुए वो देख चुके थे की साथ वाला कमरा कितना ठंडा है जहा अनामिका चची सो रही थी अपने बेटे के साथ. देखा नहीं तोह वो ये की संजीव भैया वाले कमरे में विन्नी जाग रही थी सोने का बहाना करके.

"तुम 2 मिनट दो मैं कपडे बदल कर आयी. एक मुझे पसंद नहीं.", अब अर्जुन समझ चूका था के आज रात उसकी चाहत की बगैर हे कुछ होने वाला है. उधर बबिता बोल कर गयी थी, यहाँ विन्नी ने खुद मोर्चा लगाया था और ये शालिनी बुआ जैसे नया हिसाब लिए आ गयी. जाने अब क्या होने वाला था. बस डर ने दस्तक जरूर दे दी थी.
 
निधि के लाडले यहाँ मनहूस से महान तक चला रहे. चलाओ भाई बस कंफ्यूज न करना
 
भाइयों ये 1700 पेज बस आप लोगो का हे प्यार और आपस का जुड़ाव है. मैंने 170 अपडेट दिए लेकिन एक अपडेट के बदले आप सभी ने 10-10 पेज पर जो अपना प्यार, और लगाव जाहिर किया है वो कल्पना से भी परे है. रेश्यो 1:9 की तोह कही देखने को हे नहीं मिली ?

आप सभी का शुक्रिया और आने वाले दिन जैसे भी हो, आपका ये dost-bhai इस कहानी को लिखता रहेगा.

❤️?
 
अपडेट 157

चाल (1)

"आप इतने साल में एक बार भी नीलिमा जी से नहीं मिली बुआ?", अर्जुन भी अपने सोने वाले वस्त्रो में बिस्टेर पर लेता था और दूसरे हिस्से में उसकी तरफ करवट लिए शालिनी बुआ बड़े स्नेह से बस उसको निहार रही थी. दोनों के बीच कुछ फांसला खुद अर्जुन ने हे तये किया था बुआ को बताये बिना. आज भी काली निघ्त्य में शालिनी का वो छरहरा शरीर अपनी आभा अनुरूप प्रज्वल था. अर्जुन की आवाज से ये निहारना बंद करती हुई वो खुद हे थोड़ा आगे सरक गयी, शायद बात धीमी आवाज में करने का इशारा करते हुए.

"नीलिमा ने शादी नहीं की अर्जुन और जब घरवालों ने ज्यादा दबाव बनाया तोह वो एक दिन कॉलेज के बाद घर वापिस हे नहीं आयी. उस वक़्त तक मेरी शादी हो चुकी थी और आइशा भी 1 साल की थी. तुम्हारे चाचा (उमेद) की वजह से उसके घरवालों ने मुझसे कुछ पूछताछ नहीं की और मैं तोह खुद राजस्थान थी इसलिए उन्हें यकीन था के वो मेरे संपर्क में नहीं होगी.", शालिनी के इस खुलासे से एक पल के लिए अर्जुन के चेहरे पास निराशा के भाव आये जिन्हे उसने तुरंत हे जज्ब कर लिया.

"फिर उसके बाद से हे वो लापता है?", अर्जुन को अभी जैसे उम्मीद थी और शालिनी के चेहरे पर आयी ख़ुशी ने इस बात को पुख्ता कर दिया.

"बताया था न के उसकी सिर्फ एक हे सहेली रही है जीवनभर और वो मैं हु? घरवालों की बातें वो मुझे काफी समय से बता रही थी और जिस दिन उसका माँ का आखिरी इम्तिहान हुआ वो उसी दिन क्सक्सक्सक्स शहर से दिल्ली निकल गयी. इन्होने (शालिनी के पति) मेरी रिक्वेस्ट पर नीलिमा के लिए वह महिला कॉलेज में प्रबंध करवा दिया. नीलिमा ने वही रह कर आगे Ph.D पूरी की और फिर प्रोफेसर के तौर पर पक्की नौकरी करने लगी.", अर्जुन के लिए ये बेहद हे जरुरी जानकारी थी लेकिन अभी भी उसके मैं में बहुत सी आशंकाए थी.

"बुआ, सब इतनी आसानी से कैसे हो सकता है? जितना मुझे पता है नीलिमा जी का परिवार कही ज्यादा पहुंच रखता था और आज भी ाचा नाम है. एक लड़की वो भी आज से 18-19 साल पहले घर से गायब हो जाये तोह क्या वो लोग ढून्ढ नहीं निकालेंगे?"

"बात तुम्हारी भी गलत नहीं है अर्जुन लेकिन जब सबकुछ एक ऐसे प्लान से किया जाए जिसकी कानो कान खबर न हो किसी को तोह ये भी मुमकिन है. दिल्ली तक की तोह वो लोग सोच भी नहीं सकते थे और खुल कर ये बात बोलना शायद उन्हें अपने हे सम्मान के खिलाफ भी लगा था. Chhan-bin बहोत हुई थी जिसमे पुलिस और गुप्तचरों की मदद भी ली गयी. लेकिन जब तक वो लोग दिल्ली के बारे में सोचते तब तक नीलिमा का नाम बदल चूका था. 2 महीने वो सिर्फ खुद को नजरबन्द किये रही और उसके बाद नए नाम से नयी ज़िन्दगी.", शालिनी बातें करते करते कब अर्जुन के इतना करीब चली आयी इन दोनों को हे पता न लगा. अब दोनों के हे सीने के बीच कुछ इंच की हे दुरी थी और अर्जुन का भी एक हाथ शालिनी की हथेली के पिछले हिस्से पर टिका था.

"तोह अब भी वो एक प्रोफेसर हे है? बुआ आपको मेरी मदद करनी पड़ेगी क्योंकि नीलिमा जी हे अब कुछ बता सकती है. लेकिन आप बेफिक्र रहिएगा, मैं आप पर आंच भी नहीं आने दूंगा और उनकी निजता भी वैसी हे बरकरार रहेगी.", अनजाने हे अर्जुन और शालिनी के हाथ परस्पर सत् चुके थे. इन दोनों के बीच बस यही दुरी थी. शालिनी जहा बाहरी तौर पर अर्जुन से बातें कर रही थी वही उसके स्पर्श से रोम रोम में एक अलग हे एहसास भरने लगा था.

"नीलिमा का उलट दो तोह उसका नया नाम जान जाओगे तुम. वैसे अब वो विभाग प्रमख है कॉलेज की और तुम्हारे लिए उस तक पहुंचना आसान नहीं होगा. आज भी वो कॉलेज के क्वार्टर्स में एक शांत जीवन जी रही है और सिर्फ महिलाओ का कॉलेज है तोह तुम खुद हे सोच लो कैसे पहुंचोगे नीलिमा तक.", अर्जुन इतना सुन्न कर कुछ पल आँखें बंद किये लेट गया जैसे विचार कर रहा हो. अब उसका हाथ अपनी इस बुआ की पतली कमर पर रखा था जिस से शालिनी भी सुकून पाती हुई अर्जुन के सीने से सत् कर आराम करने लगी.

"मालिनी होड़, वीमेन कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी. देख लेंगे बुआ जब आपने ये मिलने वाली चुनौती दे हे दी है तोह. वैसे इतना मुश्किल नहीं होता अगर आप उन्हें फ़ोन करके मेरे बारे में बता देती तोह.", अर्जुन भी बुआ के सामीप्य में अलग हे आनंद प्राप्त कर रहा था. वो ख़ास महक जो शालिनी के चेहरे और गर्दन के आसपास से उभर रही थी, उसका असर किसी खुमार सा था. 40 वर्षीया शालिनी का जिस्म आज भी किसी नयुवति सा सांचे में ढला था, पूरी कसावट लिए. जैसे इसको कभी purn-tripti नसीब हे न हुई हो. लेकिन अर्जुन के मजबूत बदन के सान्निध्य में वो खुद हे पिघलने लगी थी. बरसो बाद ये अलग सी चाहत दिल जन्मी थी शालिनी के और बस वो एक सीमा में रह कर ये पल याद रखना चाहती थी. अर्जुन की बात सुन्न कर आँखें खोली तोह दोनों के सांसें एक दूसरे के चेहरे से टकराती लगी.

"उन्न्नध्ह.. साबित करो खुद को. मैंने तुम्हारे हर सवाल का जवाब दिया है अर्जुन लेकिन अब इस से आगे तुम्हे हे करना होगा सबकुछ. बस मेरी सहेली के सम्मान और निजता पर नकरात्मक असर नहीं होना चाहिए. मैं तुम पर विश्वास करती हु अर्जुन लेकिन जो भी करो पूरी सावधानी से करना.", शालिनी को ज्यादा समझने की जरुरत नहीं थी क्योंकि उसको भी पता था अर्जुन ये सब समझता है.

"इस सबमे बहोत टाइम बाकी है बुआ. अब हमको सोना चाहिए और आप तोह वैसे भी सारा दिन से थकी हुई है.", अर्जुन ने उस चाँद से माथे को हलके से चूमने के साथ हे शालिनी बुआ को अपने साथ पूरी तरह लगा लिया. इतने सुखद आगोश और अर्जुन के ऐसे प्यार जताने पर शालिनी भी उसके पहले में सिमट गयी. कुछ पल तक दोनों हे एक दूसरे की धड़कन महसूस करते रहे और बंद आँखों से मुस्कुराती शालिनी जल्द हे मीठी नींद में डूब गयी. अर्जुन भी कुछ वक़्त आँखें बंद किया आराम करता रहा.

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विन्नी बड़े हे साढ़े कदमो से संजीव भैया वाले कमरे से निकलती हुई बाकी दोनों कमरों में विद्यमान हलकी रौशनी में माहौल देखने लगी. थकान की वजह से उसकी सचमुच हे आँख लग गयी थी और अभी रात का 1 बजने को था. हॉल कमरे में अनामिका अपने बेटे के साथ सुकून से सो रही थी और वही शालिनी बुआ करवट लिए 2 तकियों पर हाथ रखे गहरी नींद में थी. मतलब साफ़ था की अर्जुन यहाँ से गायब है और पूरे घर में इस वक़्त वो सिर्फ छत्त पर हे हो सकता था. विन्नी ने एक बार सीने पर हाथ रखते हुए खुद को शांत किया जैसे वो अपने हे घर में डाका दाल रही हो.

'ये लड़का भी समझ से परे है मेरी. कहा तोह लग रहा था के ये कही बुआ को हे न लपेट ले और यहाँ वो उन्हें सुला कर खुद हे गायब है. उस तरफ तोह वो जाने से रहा तोह बस छत्त हे एक जगह है. लेकिन वह किसकी साथ? शायद अकेला हे हो!', अपने आपको हे सांत्वना देती विन्नी बड़ी सावधानी से दरवाजा खोलती हुई कमरे से बहार आयी तोह गहरा सन्नाटा पसरा मिला. यहाँ इतना अन्धकार था और सिर्फ चाँद की हलकी रौशनी में सीढ़ियों तक का सलेटी मार्ग प्रशस्त.

विन्नी जैसे हे दबे पाँव उन सीढ़ियों पर बढ़ने लगी तोह धड़कन न चाहते हुए भी तेज हो हे गयी. आगे घुमाव पर जैसे हे इस छिपी हुई शक्शियत को देखा तोह जुबान खुलते खुलते बची. ये ऋचा थी जो 4 सीढ़ी पहले हे आउट में डुबकी हुई सामने खुली छत्त पर चल रही कारवाही पर नजर गड़ाए थी.

'शहीइ.. मैं हु.', विन्नी भी उसकी बगल में हे बैठ कर बहोत धीमी आवाज में बोली तोह ऋचा ने दिल पर हाथ हे रख लिया. उसको अभी हृदयाघात होने हे वाला था जैसे. फिर इशारा करके कुछ देखने को कहा तोह विन्नी भी हैरान हो उठी. उनसे 20 कदम दूर अलग हे घमासान चल रहा था. जमीन पर 2 गद्दे बिछाए अर्जुन पीठ के बल और उसके ऊपर दोनों पाँव फैलाये अपनी कमर हिलती बबिता खुद हे चुदाई करवा रही थी.

इतने बड़े और मॉटे चुके हिलते हुए अलग हे चलचित्र प्रस्तुत कर रहे थे और इनकी ये निर्भीक चुदाई देख इन दोनों के कटी प्रदेश में पसीना आ गया.

'उह.. आराम से डार्लिंग.. आठ.. तेरा सत्ता (डंडा) सीधा दिवार पे लगे है.. आज तोह तबियत से हिला दिया सबकुछ... उम्म्म', बबिता आवाज धीमी रखती हुई खुद हे अपने चुचो को अर्जुन से मसलवटी हुई कामासक्त उछाल रही थी. अर्जुन का वो भयंकर लिंग अपनी फूली हुई मांसल छूट में लिए बबिता को 20 मिनट से अधिक वक़्त हो चूका था लेकिन दोनों निरंतर एक दूसरे के शरीर को मसलते हुए ये लम्बी चुदाई जारी रखे थे.

'आह्ह्ह्ह.. फेर से गयी रे मेरी माँ.. अर्जुनंनं.. दत्त (रुक).. आह्हः.', बबिता निढाल होती हुई अर्जुन के सीने पर पसरी तोह इतनी देर में पहली बार अर्जुन ने कुछ कहा था. वो बड़े प्यार से बबिता की पीठ सहलाते हुए बोलै.

'सचमुच कमाल हे हो आप. 3 बार होने के बाद भी रुकी नहीं और आज तोह ज्यादा शोर भी नहीं किया अंदर लेते हुए. चलो अब आप मेरी पसंद वाले पोज़ में आओ.', अर्जुन ने धीमी आवाज में ये कहते हुए एक मॉटे चुत्तड़ का लचीला मांस पकड़ कर दबाया और बबिता को आराम से अपनी बगल में लिटा कर खड़ा हो गया. बबिता भी जानती थी की इस तरह वो सचमुच किसी घोड़े की तरह उसकी भरपूर चुदाई करता है और यही तोह पसंद था उसको.

'तेरी याद में ऊँगली लगाने से भी डर लगे था मुझे. ये शांत भी इस बिन्दे (बांस) से होव है और तू है भी पूरा घोडा.. आठ.. बक्सीडे पार्किंग करनी है?', बबिता ने वो भरी भरकम पिछवाड़ा उस चाँद की रौशनी में उभार कर सही मुद्रा धारण की और अर्जुन को अपने कूल्हे निहारते देख ये दिलेरी दिखा दी.

'यहाँ मुश्किल है बब्बू डार्लिंग. छूट में तोह तुम फिर भी काम शोर करती हो लेकिन इधर किया तोह पक्का कोई न कोई जाग जाएगा. उफ़.. पूरी नदी बना राखी है यहाँ.', अर्जुन ने पिछवाड़े के निचले हिस्से में हाथ लगा कर उस रास बहती मुनिया को सहलाया तोह बबिता की भी सीकरी निकल गयी. कमर को थाम कर अर्जुन ने एक जोरदार धक्के में पूरा 9 इंच जड़ तक बबिता की पनियाई छूट में बैठा दिया. दोनों की हे मजे से आह निकल गयी और बबिता ने मुँह तकिये में दबा लिया. गीली सुरंग इतनी भी ढीली नहीं थी की ऐसे वार की अभ्यस्त हो. अब लटकते खरबूजों को बुरी तरह मसलता अर्जुन तीव्र गति से बबिता की तगड़ी चुदाई में जुट चूका था और सीढ़ियों में छिपी ये दोनों युवतिया बड़ी हैरत से मुँह फाड़े ये घमासान दृश्य देख रही थी.

इस मंद रौशनी में वो चमकता मूसल जिस तरह से बबिता के अंदर बहार हो रहा था ऋचा का गाला सूखने के लिए बहोत था. विन्नी तोह इन दोनों के बीच चल रही जोर आजमाइश देख अपने नाजुक बदन की अर्जुन के नीचे कल्पना करती हुई घबराने लगी थी. कैसे वो बुरी तरह उन मॉटे चुचो को masalta-kheenchta हुआ इतने करारे धक्के लगा रहा था. बबिता जैसी bhari-bharkam घोड़ी भी हर धक्के पर सिसकती हुई आगे सरक जाती.

'उम्.. अर्जुन.. आठ.. बक्सीडे कर ले डार्लिंग.. क्रीम लगा राखी है और तेरा हथियार भी चिकना है अभी.. आठ.. छूट न झेल रही अब इस से ज्यादा..', बबिता ने दबी आवाज में जब गुदाद्वार का न्योता फिर से दिया तोह अर्जुन ने तर्जनी ऊँगली से वो नरम छेड़ सेहला कर देखा. चुदाई फिलहलु रुकी हुई थी और अर्जुन ने हलके दबाव से ऊँगली अंदर थैली तोह वो आराम से उस चिकने छेड़ में उतर गयी.

'मुँह तकिये में दबा लो मैडम. एक बार तोह दर्द होगा हे.', अर्जुन ने चुत्तड़ो पर थपकी देते हुए छूट से अपना मूसल बहार निकला तोह कुछ और कॉमर्स भी बहार निकल आया. बबिता ने एक मादक सिसकी लेते हुए अपना चेहरा तकिये में दबा लिया. इतना मोटा सूपड़ा लेना किसी के लिए भी आसान न था बस बबिता के पास इसको सहने के लिए पर्याप्त गहराई और लचक थी, भरपूर मॉटे कूल्हों के साथ. इतनी ज्यादा चिकनाई और अर्जुन के अनुभव से जल्द हे सूपड़ा उस कासी हुई गहराई में उतर गया. बबिता का पूरा जिस्म दर्द से तड़फा और ये देख कर विन्नी का चेहरा सफ़ेद पड़ चूका था. इस अप्राकृतिक चुदाई की कल्पना भी नहीं थी इन दोनों को और अर्जुन ने अगले एक मिनट में अपना पूरा खूंटा उस उपजाऊ जमीन में गाड़ दिया.

'उम्.. सच कहु तोह इसका भी अलग मजा है रे अर्जुन.. आठ.. जबसे तेरा पीछे लिया है, मेरी चाली सेक्सी हो गयी.. ummm..aahhhh. चुके क्यों छोड़ दिए? मसल इन्हे फिर तू बाप बनेगा तोह इनका बंटवारा हो जाना.. आठ..', बबिता ने ये बात कहते हुए अर्जुन को खुशखबरी सुना दी. उन रसीले खरबूजों में दूध भरने की कल्पना मात्रा से वो बुरी तरह उत्तेजित होता उन्हें थाम कर बबिता का गुदाद्वार भी ढीला करने जुट गया. हर धक्के पर अब thapp-thapp की आवाज गूँज रही थी लेकिन इन्हे तोह जैसे परवाह हे न रही. बबिता इस दुगने हमले से एक बार फिर ढेर होने वाली थी.

'बब्बू डार्लिंग, सच कह रही हो? आह्हः... लेकिन इनका बंटवारा नहीं होगा. ये बचो के हे रहेंगे और कभी मौका लगा तोह बस तुम्हारी चुदाई के साथ इन्हे दबा कर दूध निकलना है. आह्हः.. मैं होने हे वाला हु... उम्म्म.', 7-8 मिनट गुदाद्वार को तबियत से पेलने के बाद अर्जुन गुर्राता हुआ बबिता से बुरी तरह चिपक गया. वो भी थक्क कर गद्दे पर चुचो के बल पसारती निढाल हो चुकी थी. लुंड अभी भी पिछले हिस्से में फंसा रह रह कर वीर्य भर रहा था और इनकी गहरी सांसें बता रही थी की विन्नी और ऋचा के लिए अब कुछ नहीं बचा. नंगे पाँव होने का लाभ उठती वो दोनों हे झुकती हुई निचे उतर चली.

'मेरे साथ हे आजा उस कमरे में.', विन्नी ने ऋचा को अपने साथ संजीव भैया के कमरे आने का कहा तोह वो भी बिना hil-hujjatt के दबे पाँव अंदर चली आयी. यहाँ सबकुछ पहले हे जैसा था और दोनों ने भैया वाले कमरे में आते हे दरवाजे की चिटकनी चढ़ा दी. समय डेढ़ बज चूका था और इन दोनों ने अब कही चैन से सांस ली. बिस्टेर पर पसरते हे विन्नी ने बात शुरू की.

"तुम कितनी देर से वह बैठी थी?"

"तुम्हारे आने से कुछ आधा घंटे पहले. यार विन्नी मेरी तोह आँखों में अभी तोह वो सब घूम रहा है. सच कहु तोह बबिता दीदी हे झेल सकती है ऐसा कुछ. वैसे तुम कैसे चली आयी?", ऋचा ने दोनों हाथ पीठ पर करते हुए अपनी ब्रा ढीली की, जो जाने कबसे पसीने में भीगी हुई उसके सीने को कैसे हुई थी. ब्याह से वो सफ़ेद ब्रा निकाल कर तकिये के निचे रखती ऋचा ने अपना पजामा भी कुछ ढीला किया.

"सच कहु तोह मैं अर्जुन को अपने पास सुलाना चाहती थी लेकिन इन्तजार करते हुए नींद हे आ गयी. तुम जो कह रही हो मैं भी वैसा हे महसूस कर रही हु यार. उफ़.. कितना बड़ा पेनिस है उसका और वो दोनों कर भी कितने वाइल्ड तरीके से रहे थे. ध्यान दिया था कैसे उसने बबिता दीदी के अनुस (गांड) में वो इतना मोटा और लम्बा part पूरा घुसा दिया था.?", विन्नी ने पहले हे ब्रा और पंतय उतार राखी थी और वो बस ढीली टीशर्ट और 3/4 पजामा पहने ऋचा की तरफ करवट किये अपने सीने पर हाथ रखे थी. चूचक पैने हो कर साफ़ उभर आये थे कपडे से.

"तुम तोह ले भी लोगी जैसे तैसे क्योंकि ऊपर और नीचे का साइज ाचा है लेकिन सच कहु तोह बिजेन्दर भैया अर्जुन से थोड़े भारी होंगे पर उनका भी इतना बड़ा था. पता नहीं दीदी कैसे इतनी मस्ती में वो पूरा ले रही थी.", ऋचा ने हथेली से 6-7 इंच का निशाँ बनाया तोह विन्नी भी सोच में पड़ गयी.

"महसूस तोह मैंने भी किया था अर्जुन का लेकिन तब मुझे उसकी लम्बाई का पता नहीं चला था. सच में यार जितनी बुरी तरह दीदी मसलवा रही थी और वो भी उन पर चढ़ कर वो सब कर रहा था, मेरी देख कर हे हालत खराब हो गयी. न बाबा, ये रिस्क लेने की हिम्मत अब मुझमे तोह नहीं है.", विन्नी ने हाथ खड़े किये तोह ऋचा ने उसकी कमर पर हाथ रखते हुए समझाया.

"वैसे तुम वह शुरू से नहीं थी विन्नी इसलिए पूरी बात नहीं पता. दीदी ने याद है न क्या बताया था? अर्जुन अगर खुदसे प्यार करता है तोह बहोत ध्यान रखता है अपने पार्टनर का और कही भी जोर नहीं लगता. आज जब ये दोनों एक दूसरे के साथ शुरू हुए तोह दीदी ने हे कहा था की वो आज उन्हें बुरी तरह रगड़े जिस से 5-6 दिन तक उन्हें कमी महसूस न हो. अर्जुन तोह उन्हें बहोत हे प्यार से किश कर रहा था और ब्रैस्ट भी सिर्फ सेहला रहा था जब शुरू हुआ तोह. इसलिए मैं सिर्फ बबिता दीदी की वजह से हैरान हु और अर्जुन के साइज की वजह से. दोनों एक घंटे से ज्यादा साथ रहे जिसमे उनका सेक्स वाला part 30-40 मिनट रहा होगा. और अभी भी वो दोनों निचे नहीं आने वाले जैसा दीदी ने बताया था की अर्जुन सिर्फ सेक्स नहीं करता, वो सब होने के बाद भी बहोत देर तक प्यार करता है.", ऋचा का डर सिर्फ अर्जुन के अकार और ताक़त की वजह से था. वो गाँव में पलने के बावजूद हमेशा राजकुमारी सी रही थी, शरीर नरम और उचित भराव वाला.

"हाँ ये पता है मुझे ऋचा की अर्जुन दर्द नहीं देगा लेकिन उसका वो तोह तभी लिया जा सकता है जब पूरी प्राइवेसी हो. पहली बार में तोह बबिता दीदी की भी चीखें निकली थी जैसा उन्होंने बताया था. और अब तोह मुझे सबसे पहले सही जगह का इंतजाम करना होगा अगर वो पहली बार वाला दर्द झेलना है toh.",Vinni भी जिद्द की पक्की हे थी जो डरने के बावजूद अर्जुन के प्रति आसक्त थी. ये दीवानगी शायद आज ज्यादा हे बढ़ चुकी थी बबिता की ख़ुशी देख कर.

"फिर तोह कल अपने साथ इसको हवेली हे ले जा. हाहाहा.. वह तेरी चीखने की आवाज भी कोई नहीं सुनेगा और जितना दिल करे उतना करना.", ऋचा ने कहने को तोह ये बात कह दी थी मजाक में लेकिन विन्नी को अलग घर से कुछ और हे याद आ गया.

"ये पिछले वाला घर भी तोह रेडी है न ऋचा? अर्जुन बता रहा था के वह भी नए बीएड, एक और बाकी सबकुछ लगवा दिया गया है. कैसे भी करके अब वही जाना है. हवेली तोह पॉसिबल हे नहीं क्योंकि कल बुआ, माँ, दादी लोग वापिस चले जाएंगे. यहाँ भी रिस्क लिया जा सकता है इन सबके जाने के बाद लेकिन फिर भी पहली बार थोड़ा प्राइवेसी हे ठीक रहेगी. चल अब सो जा, बाकी बात कल करेंगे.", विन्नी ने जैसे कुछ सोच लिया था और अब बस भरपूर नींद की जरुरत थी और ऐसा हे हाल ऋचा का था.

"हाँ सोना हे ठीक रहेगा यार. पता नहीं सुबह आँख कब खुलेगी, 2 तोह अभी बज चुके है.", ऋचा ने आँखें बंद करते हुए चिंता जताई तोह विन्नी ने उसको अपने साथ लगा लिया.

"कौनसा ससुराल में है जो सबकी चाय बनानी पड़ेगी 5 बजे. चल अब आराम कर.", दोनों हे thaki-haari युवतियां कल्पनाओ के सागर में रंगीन सपने देखती जल्द हे सो गयी.

अर्जुन भी लगभग उसी समय अपने कमरे में वापिस आ कर निर्भीकता से शालिनी बुआ से लिपट कर सोने लगा था. कमरे में आते हे उसने सबसे पहले अपनी अलमारी से वो पेजर निकाल कर उस पर कुछ वक़्त पहले आया सन्देश जरूर पढ़ता. शालिनी की मासूमियत में सब भूल कर वो अपनी इस अनकही प्रेमिका को सुकून देने लगा. नींद में शालिनी बुआ शायद असली स्पर्श का अभाव महसूस कर रही थी और अर्जुन के साथ चिपकते हे वो ऊपर एक टांग चढ़ती हुई अमरबेल सी उस लिपट गयी.

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तक़रीबन ढाई घंटे बाद हे लड़कियों की व्यायामशाला (गयम) में अर्जुन अपने शरीर को गरमाने के बाद बड़ी सावधानी से 150 किलो वजन के साथ अगले पौने घंटे तक वर्जिश और आभास करता रहा. शरीर पसीने में नाहा कर स्वर्णिम आभा बिखेर रहा था और जननांग (जेनिटल) तक कटाव झलक रहे थे. ये शरीर जो पहले सिर्फ hatta-katta था उसका पूरी तरह स्वरुप बदलते हुए अर्जुन ने इसको तराश दिया था.

कंधे और सीने की कसरत करने के बाद जब वो शरीर पांच कर नीचे आँगन में आया तोह सवा 5 बज रहे थे. इस वक़्त तक यहाँ अमूमन 5-6 लोग जाग चुके होते थे लेकिन आज कुछ अलग था. बाथरूम से अपनी माँ को नाहा कर बहार आते देख अर्जुन के चेहरे पर अलग हे ख़ुशी छा गयी. वो रसोई में उनसे पहले हे उनका काम कर रहा था.

"छोड़ ये सब अर्जुन. मैं करती हु ये, तुम अपने टाइम टेबल पर ध्यान दो.", रेखा जी इस वक़्त एक उजली पीली रंग की साड़ी और वैसे हे ब्लाउज में खुद खरा सोना लग रही थी. खुले बाल सिर्फ इस वजह से नहीं बाँध सकीय क्योंकि अर्जुन रसोई में काम करता दिख गया था. लेकिन शायद उन्होंने बीच में आ कर अपने लिए हे परेशानी बढ़ा ली. ताजा नहाया शरीर गुलाब सा महकता देख अर्जुन ने बिना संकोच उन्हें अपने सीने से लगा लिया.

"मेरा बस चले तोह मैं आके हाथ झूठे बर्तन पर भी न लगने दू माँ. उमाहहह.. बहोत प्यारी लग रही हो आप.", अर्जुन के इस आक्रमण से रेखा की धड़कन इतनी बढ़ चुकी थी की छुपने के लिए वो उसके हे सीने में चेहरे छुपाने लगी. अर्जुन के हाथ फंसलटे हुए उनकी निर्वस्त्र चिकनी कमर से होते हुए कब पुष्ट उभारो पर आ रुके उन्हें ज्ञात न हुआ.

"आह्हः. गंदे बचे, कहा न बस करो. ये टाइम देखो और चलो अब बहार. जब तुम्हारे ऊपर देपेंद होउंगी तब देखूंगी क्या करवाते हो क्या नहीं. उम्माह्ह्ह.", वो बात आगे बढाती उस से पहले उनके दोनों मांसल कूल्हों को दबा कर अर्जुन ने बिना लाली के भी सुर्ख होंठो को चूम कर उन्हें आजाद किया.

"अभी सब लोग सो हे रहे है माँ. मैं जाने से पहले पापा को जगा दूंगा, चाय आज आप हे पूछना उन तक.", ये अर्जुन भी अजीब खेल खेलने में लगा था अपनी माँ के साथ. घर में सिर्फ रामेश्वर जी और कौशल्या जी हे जागे थे इन दोनों के साथ फ़िलहाल. और अर्जुन अपने पिता के पास माँ को भेज रहा था जो उन्हें कटाई मंजूर न था. लेकिन बेटे की बात वो ताल भी न सकीय क्योंकि आज मुँह मीठा करते हुए उसने एहसास करवा दिया था के अब रेखा पर वो अधिकार रखने लगा है.

"रेखा, मिलिट्री में नहीं है तू जो हर रोज रसोई में नियत समय हे आना है. चाय बना तोह दी लेकिन उठा भी है कोई? वैसे आज तू आज कुछ ज्यादा हे खूबसूरत लग रही है.", अर्जुन के जाते हे pooja-path से फारिग हो कर कौशल्या जी इधर चली आयी थी. उनके हाथ में अभी एक गड़वी (लौटा) थी जिस से उन्होंने तुलसी में जल अर्पण किया था. बहु को आज भी समय पर रसोई में देख वो चिंतित हो गयी लेकिन उसकी ख़ूबसूरती देख गर्व भी हुआ.

"माँ जी, मैं तोह 5 मिनट पहले हे नाहा कर आयी हु. ये तोह आपका लाडला करके गया है जिस से मेरा काम आसान हो जाए. अब उसको मन भी किया तोह वो कहा सुनता है मेरी. पापा पाठ से फारिग हो गए हो तोह आप उनकी चाय ले जाए. मैं इन्हे (शंकर) और देवर जी को उठा देती हु.", रेखा जी चाय छान रही थी लेकिन कौशल्या जी करीब आती ना में सर हिलती मुस्कुराने लगी.

"वो दादा पौटे अभी बहार निकले है इसलिए तोह मैं यहाँ चली आयी. अर्जुन उन्हें सवा 4 बजे हे जगा गया था रेखा और जाने क्या गुटरगूँ करते फिर रहे है ये दोनों. चल मैं पूर्णिमा के साथ चाय पीती हु, तू उठा दे शंकर को नहीं तोह वो और उमेद बिस्टेर हे तोड़ते रहेंगे. रात भी तेरे 12 तोह बाजवा हे दिए होंगे इन्होने खाना जब 11 के आसपास तक चलता रहा.", कौशल्या जी ने 2 कप चाय लेने से पहले अपनी बहु के सर को आशीर्वाद स्वरुप सहलाया और फिर रसोई से निकल गयी. उनके बाद रेखा जी भी गलियारे से एक ट्रे में 3 कप चाय और gilas-paani की बोतल लिए बैठक की तरफ आ गयी. संजीव अभी तक अपने दादा के मेहमान कमरे वाले बिस्टेर पर सोया था जो 7 बजे हे उठने वाला था.

यहाँ तोह शंकर जी कुछ पल तक बस इस दिव्या स्वरुप को हे निहारते रहे जब रेखा ने उन्हें जागते हुए चाय के लिए कहा. ये ताड़ना ज्यादा देर तक न चला क्योंकि बाकी दोनों भी उठ गए थे इस मधुर आवाज से.

"ओह भाभी, यहाँ देवर लोग भी है और अगली होली आप ऐसे हे तैयार मिलना. सच कहता हु 10 बाल्टी पक्का रंग न डाला तोह अपने इस देवर का नाम बदल देना. लगता है कल मंदिर से सिर्फ आपको हे वरदान मिला है.", आदतन नरिंदर जी तोह उठने के साथ हे शुरू हो गए और उमेद भी एक पल अपनी भाभी को देख नजरे चुराने लगे थे. वाकई वो अभिभूत थे इस दिन प्रति दिन निखरती अपनी भाभी के सौंदर्य से.

"इत्तेफ़ाक़ रखता हु मैं इन्दर की बात से भाभी. होली खेले भी अब 9 साल हुए आपके साथ. खैर धनतेरस पर बस भोले के साथ हवेली कदम रख देना आप.", िज्जात्त और मान के साथ साथ उमेद ने भी दबे छिपे रेखा जी की प्रशंशा कर हे दी. तीनो लोगो ने चाय के कप उठाये तोह रेखा जी ने आज पहली बार इतने खुल कर जवाब दिया.

"फिलहाल तोह शादी और बाकी कार्यक्रम आने वाले है देवर जी. हल्दी के साथ साथ गहने खरीदी भी होगी. आप लोग घर होंगे तोह ाचा हे लगेगा ऐसे अवसर पर. आप भी हफ्ते के लिए एप्लीकेशन दे दीजिये.", रेखा जी ने इस बार शंकर जी से ये कहा था और वो तोह सम्मोहित से बस सर हाँ में हिला कर अपनी बीवी को देखते रहे. रेखा के वह से जाने के बाद अब दोनों भाई शंकर को देख रहे थे.

"वाह भोले, आज तोह तू भी हाँ कर रहा था. वैसे सच कहु तोह कितने सालो बाद आज भाभी को खुश देखा है यार. जल्दी निबटते है ये आखिरी काम और इस बार ऐसा रंग जमाएंगे इस ब्याह में की बस पूरा शहर याद रखेगा. तू 16 से 23 तक छुट्टी लेले और इन्दर तू भाई ये ध्यान रखियो के हर कार्यक्रम किया जाए. हल्दी, संगीत, दारु पार्टी, महिलाओ का आजादी से अपना गीत संगीत और शादी की धमक दिल्ली तक जाए. मैं साथ हु तेरे और भाभी ने सही कहा है के गहना खरीदी मतलब हर सदस्य की ख्वाहिश पूरी करना हमारा फ़र्ज़ है.", उमेद ने बात ख़तम करते हुए चाय का घूँट भरा तोह वो अलग हे थी, बेहतरीन जिसमे इलाइची और अदरक के साथ लौंग का स्वाद था.

"सभी बचो की जिम्मेवारी मेरी और बड़ो को अर्जुन देख लेगा उमेद. मैं सभी बचो को उनकी पसंद की हर चीज और कपडे खुद साथ जा कर दिलवाऊंगा. लहंगे तोह वैसे भी कल आ हे जाने है इन लड़कियों के लेकिन अब 4-5 दिन का प्रोग्राम है तोह फिर आज हे बैंक से पति भर लेता हु. इन्दर तू ये कम्युनिटी सेण्टर बुक कर दे अपने सेक्टर वाला और 3 दिन दज भी वही रहेगा और हर प्रोग्राम भी.", शंकर भी उत्तेजित हो गया था और अब ठान लिया था के छोटे मॉटे कार्यक्रम भी पूरी आजादी के साथ ghul-mil कर करेंगे. वही आज दादा पौता उस छोटे से पिल्लै को लिए सोलंकी के घर के सामने वाले पार्क में बैठे थे.

"ये रॉटवेलर भी अलग हे प्रजाति होती है अर्जुन. सबके हाथ रहे तोह सबके साथ लेकिन पिंजरे में बंद रख कर सिर्फ एक हे इसकी देखभाल करे तोह सिर्फ उसका हे सागा. इंसान भी कुछ ऐसा हे होता है, जैसा दायरा वैसी हे सोच.", रामेश्वर जी के ये शब्द दिल की गहराई से निकले थे लेकिन जैसे अर्जुन के पास इसका अलग हे जवाब था.

"आप ठीक कह रहे है दादा जी लेकिन मैंने रॉटवेलर को कुछ स्वाभाविक करते देखा है. अपनी जगह और अपने लोगो की सुरक्षा करते हुए. वो भी बिना कुछ सिखाये. आप जिसकी बात कर रहे है वो नेसल सिर्फ इंसानो की हे होती है. इनके पास लालच या ख्वाहिश नहीं होती न हमारी तरह. आप इसको सभी में शामिल कर रहे है और मैंने आज तक इसको सिर्फ एक बार हे छुहा है. देखिये जरा.", अर्जुन का कथन अपनी तरह से बिलकुल सही था और चुटकी बजाते हे उस छोटे से पिल्लै ने दौड़ कर उसके पाँव के बीच खुद को फंसा लिया. रामेश्वर जी बड़े गौर से देख रहे थे. उनके बुलाने पर भी वो पिल्ला न हिला.

"तोह तुम सुनिश्चित हो अपनी बात से?"

"नहीं दादा जी लेकिन जिस बात पर मैं गंभीर हु वो गलत भी नहीं है. आपने कभी मेरी और पापा की आँखें देखि है?", अर्जुन अलग हे बात कर रहा था और पंडित जी ने हाँ में सर हिला दिया.

"हाँ, तुम शंकर जैसी आँखों के साथ अपनी माँ के चेहरे मोहरे से परिपूर्ण हो. मेरी आँखों का इस सबमे क्या? ये शायद उसको अपनी माँ से मिली है, तुम्हारी दादी से."

"दादा जी, आपकी और बिंदिया या शबनम की आँखें एक जैसी है. लेकिन मुस्कान की अलग और इस तरह से देखा जाए तोह छोटे दादा जी की भी आँखें आप जैसी हे होंगी. एक और बात जिसके बारे में मैं कल बता नहीं सका वो ये है की एक हे पल में छोटे दादा जी ने अपनी बहु का चुनाव कैसे कर दिया? नाम के सिवा क्या ख़ास होगा अनामिका चची में? इंसान यादों को बड़ी तवज्जो देता है दादा जी. और सच कहु तोह मैं खुद चाहता हु मैं गलत साबित हो जाऊ.", अर्जुन ने उस पिल्लै को उठा कर अपनी गॉड में रखा तोह रामेश्वर जी इस खुलासे से मुस्कुरा दिए. वो जानते थे की अर्जुन उनका हे सही स्वरुप है.

"मैं कुछ समय वह मौजूद नहीं था बेटे जब हादसा हुआ. उसके बाद वचनबद्ध मैं सबकुछ छोड़ कर निकल आया. लेकिन मिनाक्षी मेरी धरम बहिन हे थी और रघुबीर की सगी."

"आपमें और रघुबीर दादा जी में सगी या नागि जैसा तोह कुछ था हे नहीं दादा जी. शालिनी बुआ के लिए तोह आप हे उनके पिता सामान हो. वो सब छोड़ कर बस ये तोह देखा जा सकता है न की क्यों वो परिवार इधर चला आया? इल्जाम िज्जात्त पर लगाया गया था इसका मतलब खिलवाड़ सोच समझ कर हे किया गया. वैसे अगर आप चाहे तोह शादी के बाद मैं एक गुत्थी तोह सुलझा हे सकता हु.", अर्जुन का आशय अज्जू चाचा से था.

"न बीटा. अब तोह तुम पूरी गुथी सुलझाओ, मैं तुम्हारे साथ हु. लेकिन कृष्णेश्वर को सीधा शामिल मैट करना क्योंकि वो सरल इंसान है जिसके साथ एक भी बातचीत बहोत कुछ बदल देगी. तुम्हे शायद श्रेष्ठ का भान हो चूका है रॉटवेलर के साथ रह कर.", रामेश्वर जी सब जानते हुए भी कुछ सोच कर नाराज नहीं थे.

"मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा दादा जी. बस आप समझना की उनकी अनुपस्थिति में क्या कुछ होता है. मैं अभी तक आप जैसा कण्ट्रोल नहीं रख सकता. वैसे सुना है आपसे बेहतरीन शिकार और शिकारी कुत्ते कोई साध नहीं सकता?", अर्जुन ने अपनी इत्छा जताई तोह रामेश्वर जी ने उसकी पीठ थपका दी.

"गली के कुत्ते से समझदार कोई नहीं होता बेटे. तुम सही समय आने दो फिर तुम्हे मैं वो सिखाऊंगा जो शायद तुमसे पहले की पीढ़ी में किसी को पता भी नहीं. खेल तुम मुझसे बेहतर समझ चुके हो लेकिन दुश्मनो के बीच अल्फा को बीटा कैसे बना के भेजते है मैं सिखाऊंगा. उसके बाद उसकी तबाही और वो नकली शोर सुन्न कर सबका मौत की तरफ भागना.", आज रामेश्वर जी कुछ ठान कर हे आये थे और अर्जुन yudh-neeti उनसे बेहतर किसी से सीख भी नहीं सकता था.
 
अगले अपडेट में मिलवाते है कुमार सारंग से सभी को. जरा इनके भी विचार देख लीजियेगा
 
देखो जीवन कहानी बने ऐसा कुछ करना...

कहानी हे जीवन बन्न जाए तोह गलत बात है..

queen divya थिस नेक्स्ट अपडेट इस डेडिकेटेड तो यू बूत ट्रीट में अस ा बरोथेर हु वांट्स यू तो अचीव योर गोल्स. बेस्ट विशेष फॉर योर एक्साम्स एंड गाइस टुनाइट ी विल पोस्ट ा मेल्लो अपडेट. थिस लिटिल कीड़ो शुड नॉट गेट हर्टेड बूत it's आवर मोरल ड्यूटी तो छोपे उप.

सरहदी भाई, कहानी के बाकी अपडेट अब से दोपहर में आया करेंगे. जिस से सभी को पर्याप्त समय मिले अपनी पढाई का.
 
अपडेट 158

डर (2)

थार रेगिस्तान के बारमेर और जैसलमेर इलाके में जितना नाम कारोबारी कस का मशहूर था उतनी हे दहशत थी उस व्यक्ति की जिसका नाम कुंवर सारंग सिंह था. दोनों एक हे व्यक्ति थी लेकिन उच्च व्यापारी वर्ग में जहा इन्हे कुमार साहब के नाम से जाना जाता था वही निचले तबके और जनता में कुंवर सारंग सिंह सिर्फ और सिर्फ निर्दयी शाशक था. प्रदेश की सरकार से अलग हे सरकार चलने वाला सारंग 60 बरस पार होने के बावजूद आज भी घोड़े की लगाम दबा कर उसको घुटने टेकने पर मजबूर कर देता था.

सवा 6 फ़ीट की ऊंचाई के साथ हे शरीर अभी तक ताड़ के वृक्ष सा सीधा और लोखंड सा मजबूत था सारंग का. इनके जीवन का सबसे ख़ास व्यक्ति था इनका अयाश छोटा भाई राज्यवर्धन सिंह. 2 बेटे इंद्रनील और पुष्पक जहा देश में कारोबार देखते थे वही विदेशी जमीन पर राज्यवर्धन ये बागडोर संभालता था. ख़ूबसूरती का रसिया और पसंद आये हर फूल को मसलने वाला ये व्यक्ति भी अपने बड़े भाई सा जल्लाद हे था. आज वो इस शाही महल में अपने भाई के साथ कुछ गहरी चर्चा में व्यस्त दिखा.

"राज, हम कुछ समय से देख रहे है की जितना कारोबार तुमने बहार बढ़ाया है उसके बराबर हम अपने देश में नहीं कर पाए. हम चाहते है की अब यहाँ की खदान और ताम्बे का सारा कारोबार तुम्ही देखो. इंद्रनील को बहार भेज देते है जिस से वो वह की मार्किट समझ सके.", 65 वर्षीया सारंग और उसके छोटे भाई में 7 वर्ष का अंतर था लेकिन उम्र जैसे उतना असर न कर सकीय थी इस व्यक्ति पर. अपने बड़े भाई की बात सुन्न कर राज्यवर्धन भी खुश हो गया.

"मैं तोह खुद यही चाहता हु भाई साहब. बहोत बर्बाद कर लिया विदेश में अपना जीवन, अब जरा यहाँ सुकून से रहने की तमन्ना है.", छोटे भाई के इस कथन पर सारंग का चेहरा भावहीन हे दिखा और राज्यवर्धन से ये बात छीप्प न सकीय.

"परेशानी क्या है कुंवर सा?", एकाएक वो अपने भाई के सामने घुटने पर बैठ गया. दोनों हाथ सारंग के गुंटनो पर रखता राज्यवर्धन बेहद गंभीर और चिंतित दिख रहा था और इस से एक बात साफ़ थी की जितना पर्दा सारंग अपने भाई की गलतियों पर डालता था उतना हे प्रेम राज्यवर्धन इनसे करता था.

"हम आज भी अपने प्रदेश की आखिरी हद्द तक नहीं पहुंच पाए बनना. न रामेश्वर भाई को कुछ कह सकते है और न उनकी aas-pas वालो को जख्म दे सकते है. शेखावत नाम का हे मुख्यमंत्री है और वो भी हमारी मदद नहीं कर प् रहा. हम उनके प्रदेश में काम करना तोह दूर राजगढ़ तक हुकूमत नहीं कर प् रहे."

"इस साले रामेश्वर पंडित...

"खामोश... खामोश राज्यवर्धन सिंह. अपनी हद्द में रहो अन्यथा तुम भी जानते हो के तुमसे प्यार करने के साथ साथ हम दुश्मनी को भी उतनी हे िज्जात्त देते है. राजा को सिर्फ राजा मात देगा हमारे उसूल के हिसाब से. तुम्हे हमने उनसे जुड़े लोगो को कमजोर करने के लिए यहाँ बुलवाया है. रामेश्वर भाई साहब अपना कद्द बढ़ा रहे है जो संकेत है की आने वाले वक़्त में वो इस जगह भी आ खड़े होंगे. हमारे 100 से ज्यादा आदमी पिछले 2 साल में या तोह मारे गए या फिर हमसे दूर हो गए.", इस तेज आवाज से जहाँ राज्यवर्धन की रूह काँप गयी थी वही अपने बड़े भाई की पूरी बात सुन्न कर चेहरा गंभीर हो चला था.

"चिंता मैट कीजिये कुंवर सा, ये Punjab-Haryana क्या हम दिल्ली की हुकूमत तक दखल देंगे. आप बेशक पंडित जी को मेरे हाथ नहीं लगने दे लेकिन बाकी जड़े मैं जरूर काटूंगा. अकेला कमजोर राजा आपके सामने होगा तोह फिर जो चाहे कीजिये."

"हाहाहा.. तुम जानते नहीं राज की हम क्यों पंडित रामेश्वर को इतना मान देते है. वो अकेले हुए तोह भी तुम जैसे होनहार को ऐसी मौत देंगे की शरीर से आत्मा निकलने की गुहार लगाएगी और वो आजाद तभी करेंगे जब उनके सवाल ख़तम होंगे. वैसे वो बूढ़े हो चुके है इसलिए अपनी ताक़त बढ़ा रहे है. मैं चाहता हु की तुम भी संयंम से काम लो और उनके परिवार पर पेनी नजर रखो. हो सके तोह खुद थोड़ा दूर रहना क्योंकि उनकी औलाद भी जल्लाद है.", सारंग ने अपने भाई को वापिस उस शाही कुर्सी पर बैठते हुए कहा और महल की उस बड़ी खिड़की से बहार देखने लगे.

"मुझसे बड़ा जल्लाद तोह नहीं होंगी उनकी औलाद. आपने अगर मुझ पर भरोसा दिखाया है तोह मैं वादा करता हु भाई साहब की उस परिवार की बुनियाद तक मिटा दूंगा.", जोश में शायद राज्यवर्धन अपनी औकात से ज्यादा बोल गया था. वो बेशक हे कुकर्मी और पथरदिल इंसान था लेकिन पंडित जी की औलादो से परिचित न था पूरी तरह.

"जो उमेद सिंह है वो हमारे सामान है राज लेकिन फिर उस से बढ़कर पागल है डॉ शंकर शर्मा. जानते हो उसने सोमबीर सिंह के बेटो पर से इतनी बार जीप फिराई थी की शरीर बचा हे नहीं था. वो सभी देखने में शंकर से कही तगड़े और खूंखार थे. और इन सबसे ऊपर है इंद्रजीत, ये नाम अपने आप में हे ख़ास है. पंजाब से हमारे हर व्यक्ति को इसने ऐसे साफ़ किया था जैसे भूखा रोटी को करता है. उसको तोह इंसानी खून पीने से भी गुरेज नहीं. तुम बस इन तीनो पर नजर रखो और सही समय आने पर इस इंद्रजीत के पास सुनेहरा हिरन भेजो. शिकार उसका रेगिस्तान में हे करेंगे. लेकिन कोई जल्दी नहीं करना इस मामले में. जरा सी चूक और फिर हम नजर में आ जायेंगे.", सारंग जानता था की वो नरिंदर और शंकर हे थे जिनकी दहशत की वजह से वो कभी हरयाणा में वापिस कदम न रख सका था.

"आप तोह ऐसे बखान कर रहे हो भाई साहब जैसे वो इंसान हे नहीं कोई राक्षश हो. इन सभी के बचे नहीं है क्या?", राज्यवर्धन ने बचो का जीकर किया तोह सारंग के चेहरे पर शर्मिंदगी सी छ गयी.

"एक बचे को मैं दबाव में ख़तम करवा चूका हु राज. अब बचो से खिलवाड़ नहीं करना. वक़्त बदल चूका है और सच कहु तोह जुंग हिसाब से हे करनी है. शंकर का बीटा जीवित है हमारे 5 बार के प्रयास से भी लेकिन वो सब उस समय की मांग थी. औरत और बचे बीच नहीं आने चाहिए इस मामले में.", सारंग के शाही चेहरे पर अलग हे दुःख था इस वक़्त जैसे वो जीवन में कुछ गलतियों पर पचता रहा हो.

"शंकर के सिवा बाकी दोनों का कोई लड़का नहीं है क्या?"

"नहीं, एक है तोह सही लेकिन वो बड़े भाई राजकुमार का है जो आम जिंदगी जी रहा है. बाकी उस पीढ़ी में कोई मर्द नहीं है. मेरे दोस्त का बीटा तोह पहले हे हमारे आदमी के साथ साले का रिश्ता रखे है. हाँ अगर तुम्हे लगे की राजकुमार के बेटे को हटाना या प्रयोग करना ठीक है तोह कर लेना. वैसे वो कुछ ख़ास नहीं है लेकिन ये शंकर के बेटे को उसकी बाप की हत्या का पता लग्न चाहिए. एक को मार कर 100 को झुकना हे raaj-paat का नियम है जो हम तुम्हे सिखाएंगे.", सारंग बहार नजर घूमने के बाद वापिस अपनी जगह बैठ गया. सुनहरी और सफ़ेद केतली से दोनों के लिए चाय कप में दाल कर ये दासी वापिस चली गयी.

"नाम क्या है इस शंकर के पिल्लै का भाई साहब? इसको जिन्दा हे रखुगा लेकिन शायद यही शिकार करवा दे बाकी सब का.", राज्यवर्धन की ये कुटली कमीनी हंसी देख अब पहली बार सारंग हंसा था.

"अर्जुन नाम है उसका और अपने बाप दादा से अलग वो शांत लड़का है जितना हमे पता है. उसको मारने की कोशिश भी की गयी थी नवासी द्वारा लेकिन उमेद बचा गया था. ाचा हे हुआ, मुखाग्नि देने वाला तोह बचा उनके खानदान में. करो जो भी ठीक लगे लेकिन सामने तभी आना जब अपने शिकार को दबोच लो. अवधेश मिश्रा और लोहान भी ऊपर पंहुचा दिए है इंद्रजीत और उमेद ने. एक गलती और फिर तुम्हे वापिस देश से बहार जाना पड़ेगा.", सारंग ने हिदायत देते हुए कहा तोह राज्यवर्धन अलग हे तरह मुस्कुरा दिया.

"मैंने को तोह मैं पकड़वा हे लूंगा भाई साहब. आपके लोग वह से गायब हुए होंगे, मेरे कुछ परिचित अभी भी उधर है. रही बात शंकर इंदरजीत की तोह सांप जितना मर्जी जेह्रीला हो, जूती के निचे आराम से कुचला जाता है. वैसे खदान पर जाने से पहले जरा समीप के गाँव की ख़ूबसूरती देख लू, इजाजत हो गर कुंवर सा की?", अपने छोटे भाई का आशय समझते हुए सारंग भी हंस दिया.

"कर लो भाई अपने दिल की. हमको तोह इस सबमे मजा नहीं आता और हमारे बेटे गोरी चमड़ी का शिकार है. ाचा हे है, लगान वसूलने से वो सभी अपनी औकात नहीं भूलेंगे. बेपरवाह जाओ.", सारंग जानता था की उसका छोटा भाई अब यहाँ आया है तोह आसपास के गाँवों की जाने कितनी हे कुंवारी लड़कियां अपने निचे लाएगा. कहुआफ बरकरार रखने का ये तरीका भी उसके हिसाब से गलत न था.

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श्रीमती वालिए जी अपने घर के आँगन में बने छोटे से बगीचे और गमलो में इस समय पानी दे रही थी और वालिए जी बहार गाडी पर कपडा मारने में मसरूफ थे. अर्जुन और रामेश्वर जी को करीब आते देख वो तुरंत सब काम छोड़ पंडित जी को प्रणाम करने लगे.

"धनभाग सद्दे जे बड़े साहब ने दर्शन दित्ते (हमारी खुशकिस्मती जो बड़े साहब के दर्शन हुए).", इतना कह कर वो पाँव छूने का उपक्रम करने हे लगे थे की मुस्कुराते हुए रामेश्वर जी ने उनका हाथ अपने दोनों हाथो में थाम लिया.

"सरदार जी अब इतना पाप भी मैट चढ़ाओ. आज बस अपने इस शेर के साथ निकले थे सैर पर और इस बहाने जनाब के भी दर्शन हो गए. अर्जुन ये अपने ...", रामेश्वर जी आगे कुछ कहते उस से पहले आंटी जी ने बहार आते के साथ उन्हें नमस्ते करके अर्जुन को अपने साथ लगा लिया.

"दादा जी ये अपने बड़े सरदार जी और ये मेरी प्यारी आंटी जी है. हर रोज हे मिलता हु मैं आंटी जी से.", अर्जुन ने हँसते हुए खुद हे दोनों का परिचय अपने हिसाब से दिया तोह आंटी जी ने उसका कान पकड़ लिया.

"बड़ा आया हर रोज वाला. कल तोह दिखाई देने तोह दूर फ़ोन तक नहीं किया तुमने.", इनका ये आपसी maa-bete का प्यार देख वालिए जी जहा सर हिलाते हुए मुस्कुरा रहे थे वही पंडित जी भी हैरान थे अपने लाडले की इन कारगुजारियों पर.

"भाई मुझे तोह ये बस अभी पता चला के ये उल्लू इतना समझदार भी है. और ये बड़े सरदार जी तुम्हारे ताऊजी सामान है अर्जुन.", रामेश्वर जी ने पिल्ला अर्जुन को सौंपते हुए समझाया तोह वालिए साहब ने असहमति दिखाई.

"नहीं पंडित जी, हमारे लिए तोह ये बस हमारा छोटा बीटा और मेरी धर्मपत्नी का दोस्त, बीटा और खालीपन का साथी है. पिछले एक महीने में हमने अपनी सर्दी जी के हाथो से इतनी चाय नहीं पी होगी जितनी अर्जुन इनके लिए बना चूका है. दोनों बचे तोह अब इंग्लैंड है और इस सुनसान से घर में बस हमारा मेहरबान अर्जुन हे बचा है. चलिए आज की चाय हमारे साथ पी कर थोड़ा इस घर की रौनक भी बढ़ा दीजिये.", वालिए जी का आमन्त्रर पंडित जी ठुकरा नहीं सकते थे लेकिन कुछ जरुरी बात और भी थी.

"माफ़ करना बेटे ये चाय उधार रही तुम्हारी तरफ. आज पहले हे हमे 2 घंटे हो चुके है घर से निकले हुए और 7 बजे किसी जरुरी काम से निकलना था जो अब आधा घंटा देरी से होगा. अर्जुन खाली है फिलहाल तोह."

"नहीं दादा जी, मैं आंटी जी के पास दिन में आ जाऊंगा. अभी उमेद चाचा जी ने वापिस जाना है तोह उनसे मिल भी लूंगा नाश्ते पर और उनके साथ बाकी सभी से. आंटी जी मैं दोपहर में आता हु खाने पर आपके पास. अंकल से तोह कल हे मिलूंगा.", अर्जुन की बात पर दोनों मिया बीवी ने उतनी ख़ुशी जताई जितनी हर माँ बाप अपने बेटे की समझदारी पर दिखते है.

"कोई गल्ल नई पुत्तर. आज तेरी आंटी की सेवा कर, हम कल शाम को शतरंज की बाजी लगा लेंगे. घरवाली बात हे है पंडित जी, आपके पास जब समय हो मिलने जरूर आइयेगा.", वालिए जी ने एक और बार हाथ जोड़ कर कहा तोह पंडित जी ने भी कन्धा थपथपाते हुए हामी भरी.

"वैसे जल्द हे तुम नियम से हमारे घर आने वाले हो. अब इजाजत दो भाई, कही इसकी दादी बेचैन हे न हो जाए इस बूढ़े को गायब देख कर. हाहाहा.", इस तरह सभी ने हँसते हुए विदा ली और दोनों dada-pauta अपने घर की तरफ बढ़ चले. अर्जुन इस kaale-bhoore पिल्लै को सहलाता हुआ अपने दादा जी के साथ अलग हे चर्चा में जुट गया जिस पर वो हँसते हुए उसकी बातें सुन्न रहे थे. कुछ 3-4 मिनट बाद हे दोनों घर के भीतर दाखिल हुए तोह अब चहल पहल थी.

"ह को इधर दो और दादी बुला रही है तुम्हे. कसरत करके खाली पेट निकल गए थे न आज?", ये चलती फिरती आग थी अलका मैडम. नाहा धो कर सुर्ख लाल कमीज और सफ़ेद पटिआला सलवार पहने वो इतनी हसीं लग रही थी की एक पल के लिए अर्जुन आसपास का माहौल भुला बैठा.

"ोये... चल भी जरा अंदर.", अलका ने इस बार ये बात दबी आवाज में कही थी और अर्जुन सकपकाता हुआ बिना कुछ कहे उसके साथ बढ़ गया. पंडित जी बाथरूम जा चुके थे हाथ मुँह धोने के लिए.

"नाश्ते के बाद तुम्हे मेरे साथ चलना है. कोई न नुकुर नहीं और क्यों जाना है वो मैं तभी बताउंगी.", अलका ने गलियारे के ख़तम होते हे अर्जुन की ब्याह छोड़ दी. यहाँ खाने की मेज पर इतनी सवेरे हे नाश्ते पर आधा दर्जन लोग बैठे दिखे.

"चलो हाथ मुँह धो लो तुम और doodh-laddu लो. जब नाश्ते का दिल करे तोह बता देना लल्ला.", ललिता जी ने अर्जुन को नलके पर हाथ धोने का कहा और टोलिया लेने चली गयी. काली साड़ी में शालिनी बुआ का वो लम्बा छरहरा शरीर अलग क़यामत ध रहा था. बड़ी शालीनता से नाश्ता करती वो अर्जुन ने नजरे चुरा रही थी और अर्जुन मंद मंद मुस्कुराता हुआ अपनी ताई जी से टोलिया ले कर चेहरा साफ़ करने के बाद बुआ की बगल में हे आ बैठा.

"यार तुम तोह नियम के बड़े पक्के हो जो अँधेरे में कसरत भी कर लेते हो और फिर चाचा जी के साथ 2 घंटे सैर करने भी चले गए.", उमेद जी ने अपने भतीजे से बातचीत शुरू की तोह राजेश्वरी जी के साथ साथ आइशा और नरिंदर जी भी इस तरफ देखने लगे. शालिनी बहार से बेशक ठीक होने का दिखावा कर रही थी लेकिन अर्जुन का यु करीब होना उनके जिस्म में असंख्य विस्फोट पैदा कर रहा था.

"ऐसा कुछ नहीं है चाचा जी. ये शरीर एक बार हमारे कण्ट्रोल में हो जाए तोह नींद भी 30 मिनट में पूरी और थकान भी 30 मिनट में दूर. आज बाउजी कह रहे थे की वो भी अबसे थोड़ा बहार की ताज़ी हवा में घूमने चला करेंगे इसलिए उन्हें भी ले गया. वैसे विन्नी दीदी बता रही थी की आपकी हवेली में तोह पूरा race-course और बाग़ है, स्विमिंग पूल के साथ.", अर्जुन ने चर्चा को अलग हे दिशा में घुमा दिया था आइशा को यु अपनी तरफ देखते पा कर.

"तुम चलो हमारे साथ मां जी की हवेली पर फिर खुद हे देख लेना. मां जी के पास 6 हॉर्सेज और 10 बड़े डॉग्स भी है वह. मम्मी के लिए तोह अलग से ओपन फिश टैंक भी है स्टेप्स (सीढ़ी) वाला, बिलकुल स्विमिंग पूल जैसा. हाँ वह बस इतने सारे फॅमिली मेंबर्स नहीं है और अब तोह विनीता दीदी भी शादी तक यही रहने वाली है.", अभी ऐसा ने ये न्योता दिया हे था और विन्नी अपना एक छोटा सा बैग लिए इधर चली आयी.

"शादी के बाद हे आऊंगा मैं हवेली पर. फिर तुम दिखा देना वह क्या क्या है और इस बहाने मैं पहली बार चाचा जी का घर भी देख लूंगा. वैसे ये आप तैयार हो कर कहा चली विन्नी दीदी?", अर्जुन अपनी बात कहते हुए अचानक विन्नी को देख चौंक गया. नीले सलवार कमीज में हमेशा की तरह खूबसूरत विन्नी गीले बालो के साथ कही ज्यादा दिलकश नजर आ रही थी.

"मैं भी घर हे जा रही हु अर्जुन. कल आइशा ने अपने घर चले जाना है तोह आज का दिन इसके और बुआ के साथ रहूंगी. कल तुम आ जाना लेने और इस बहाने आइशा के साथ हवेली भी देख लेना. क्यों सही है न पापा?", अर्जुन ने तोह कोई जवाब न दिया क्यूंकि हवेली पर जब आजतक उसको किसी ने बुलाया नहीं था तोह वो कैसे बड़ो की मर्जी बिना ये न्योता स्वीकार कर लेता.

"हाँ ये भी सही है और वैसे भी कल दोपहर मैं तुम्हारी बुआ के साथ हे काम पर निकलने वाला हु तोह अर्जुन तुम्हे वापिस लेता आएगा. वैसे तुम्हारी वापसी कबकी है शालिनी?", उमेद जी पराठा खाते हुए रुक रुक कर बोल रहे थे और वही नरिंदर जी का पूरा ध्यान मटर के पराठो और सफ़ेद मक्खन पर हे था. शालिनी बुआ ने अपने भाई से अपना नाम सुना तोह बेध्यानी में हाथ से चम्मच निचे गिर गया. इसके बाद तोह अर्जुन और शालिनी के हाथ एक साथ टकराये चम्मच उठाते हुए और शालिनी को ऐसा लगा जैसे उसने बिजली का तार छू लिया हो.

"Wo...Wo भैया अभी ये जरा बहार जा रहे है 5 दिन के लिए तोह इनके आने के बाद हम सभी लोग एकसाथ हे शादी में शामिल होंगे. हाँ अर्जुन तुम भी आना कल मिलने हमसे.", शालिनी ने भी धड़कते दिल के साथ अर्जुन को आने का निमंत्रण दे दिया वो भी नजर बचते हुए. अर्जुन ख़ामोशी से हंस रहा था और दूसरी तरफ बैठी आइशा बड़े गौर से पूरा घटनाक्रम देख रही थी. इसके बाद कुछ ज्यादा बातें न करते हुए सबने नाश्ता ख़तम किया और अर्जुन इन सबसे पहले हे यहाँ से उठ कर अपने कमरे में जा चूका था. अभी वो थोड़ा आराम करने के बाद नहाने वाला था और नाश्ता संजीव भैया के साथ करना था 9 बजे.

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"विनोद का फ़ोन तोह उम्मीद से भी पहले हे आ गया जीजा. वो कह रहा था के कल शाम हे मीटिंग कर ले और वो अपने हिस्सेदारों को भी आमंत्रित कर चूका है. अब आप हे बताओ के उसका नुन्नू कटेगा या बचेगा?", हॉस्पिटल के केबिन में इस वक़्त सिर्फ जीजा साला हे उपस्थित थे. दलीप काम की वजह से राजस्थान निकल चूका था और उमेद परिवार को लिए हवेली.

"हाँ, कल का दिन बिलकुल ठीक है राजेश. वैसे कुछ और पता लगा क्या तुम्हे इन हिस्सेदारों के बारे में?", शंकर अभी शांत था क्योंकि एक ऑपरेशन सवेरे आते हे करना पड़ा था और जब भी वो काम करता था, दिल में सुकून रहता था.

"ये कागज़ आप हे देख लो जीजा. साला ये तोह सोच से कही ज्यादा हे कमीने लोग निकले और शायद विनोद को भी इनके बारे में पूरी जानकारी नहीं है. पप शर्मा का पैसा राजस्थान से आ रहा है और जानकारी ये भी है की इसके सम्बन्ध कस ग्रुप से है. एक ये व्यक्ति है विमल कपूर, कहने को होटल व्यवसायी लेकिन काम अफीम और garam-gosht का करता है. दिल्ली में भी ये ऐसे काम करके जेड मजबूत कर रहा है. आप हे सोचो की अफीम का सबसे बड़ा केंद्र कौनसा है.?", राजेश ने कागज और 3 तस्वीरें शंकर के सामने रख दी.

"राजस्थान हे है. और ये कस मतलब सारंग? बात बढ़ सकती है राजेश अगर वो लोग शामिल है इस सब में. ऐसे में दलीप भी उनके क्षेत्र में है."

"जीजा, दलीप संभल लेगा खुद को. वो वैसे भी बहरूपिया है जो अब तक कही का राजपूत बन बैठा होगा. लेकिन मुझे लगता है की इस से सही मौका नहीं हो सकता सारंग की गांड से पसीना निकलने का. काम ऐसा होना चाहिए की वो फार्महाउस तोह सबकी नजरो में आये हे और हमारे काण्ड के बाद जो खून की होली का नजारा वह बने, वो जाया न हो. पप शर्मा आपका जीजा लगता है तोह उसको मैं सम्भालूंगा. साला एक नंबर हरामी आदमी है वो जीजा. यहाँ से लड़कियां गायब हो कर बारमेर में मरी हुई मिलती है और हो न हो निवेदिता भी किसी अमीर की हवस में मारी गयी.", ये बात सुन्न कर शंकर से कुछ कहते तोह न बना लेकिन फैंसला लेना भी जरुरी था.

"लीड तुम कर रहे हो न राजेश तोह होगा भी तुम्हारे हिसाब से हे. उमेद से रात को बात कर लूंगा और तुम बाकी सब तैयारी रखना. अब बात औकात से बड़ा काम करने की है तोह फिर मुझे तोह दरिंदगी दिखने में मजा हे आएगा. वैसे ये तीसरा शख्स कौन है?", शंकर ने वो आखिरी तस्वीर राजेश के सामने करते हुए पुछा.

"इक़बाल सिंह नाम है इसका जीजा. ये आदमी इन सभी को सुरक्षा देता है एक तरह से. वह की वर्तमान सरकार में भी तगड़ी दखल है क्योंकि इसके आदमी एक आवाज पर अपनी जान देने को तैयार रहते है. 30 से ज्यादा मर्डर लेकिन सबके इल्जाम इसके चाहने वालो ने कबूल लिए. विनोद इसको अपनी कमाई का 33 प्रतिशत देता है जिस से वो बचा रहे. लड़कियां गायब हो या फिर चुप रहे, इक़बाल सिंह सब संभल लेता है. मतलब साफ़ है की कल वह मीटिंग में चाहे 6-7 लोग हो, सुरक्षा में 20 से ज्यादा होंगे. कहो तोह..."

"न.. अब तोह साला ये इक़बाल सिंह और इसके गुर्गे सिर्फ मैं देखूंगा. इसको आखिर तक ज़िंदा रखना है राजेश, ये लोगो में दहशत फ़ैलाने वाला अगर डर से न मारा तोह मेरा नाम भी शंकर जल्लाद नहीं. बहनचोद यही लोग है जो समाज में बवासीर है. कुछ भी हो जाए लेकिन इसकी मौत की वजह हार्ट अटैक हे होगा.", शंकर ने जैसे कुछ ठान लिया था इस तगड़े बदमाश से आदमी की तस्वीर देख कर.

"मैं तोह वैसे भी आपका हे शिष्य हु जीजा, उमेद जीजा न कही goli-bandook वाला खेल शुरू कर दे."

"निश्चिन्त रहो राजेश. उमेद भी अलग तरह का कसाई है. गोली वो इसलिए चलता है जिस से उसका कुरता पजामा न खराब हो. नहीं तोह दबोच कर गर्दन तोड़ने में जो उसका नशा मिलता है उसकी टक्कर नहीं. चल अब तू जरा दलीप की रिपोर्ट ले और ये फाइल्स जाते हुए सांगवान चाचा को पकड़ा देना.", शंकर ने वो लाल गट्टे की फाइल दराज से निकाल कर अपने साले को पकड़ाई तोह राजेश मजाक में सलाम ठोकता हुआ हँसते हुए निकल गया.

'सारंग, तुम्हारी गर्दन मैं कबका टॉड देता अगर मेरे पापा ने मुझे कसम न दी होती. तुझे भी एक दिन मैं उस डर का एहसास करवाऊंगा जो तुमने मुझे करवाया था और मेरे चाचा की बेइज्जत्ती का बदला वही रेगिस्तान में, तेरे आदमियों के सामने ठीक वैसे हे लूंगा. इन्तजार रहेगा तुम्हारे अगले कदम का कल मेरी दरिंदगी देखने के बाद.', आज जैसे शंकर ने कुछ अलग हे ठान लिया था और शायद राज्यवर्धन सिंह को जल्द हे अपनी औकात दिखने वाली थी.

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"हम जा कहा रहे है अलका? एक तोह आधे घंटे से शहर में इधर उधर घुमा रही हो और ऊपर से कुछ बता भी नहीं रही. अगर दिल है तोह हाईवे पर हे लोंगदरीवे पर चले?", अर्जुन ने अपनी काली कार पेट्रोल पंप पर रोकते हुए अलका से सवाल किया जो पिछले आधे घंटे में अर्जुन को 3 सेक्टर की सड़के नपवा चुकी थी. "टैंक फुल कर दो भैया."

"लोंगदरीवे पर नहीं जाना मुझे. बस तुम्हे दूर रख रही हु किसी से और अगर तुम चाहो तोह कार वही ले चलो जहाँ स्कूटी सिखाते थे. आज कार हे सीखा देना.", अर्जुन हैरानी से इस खूबसूरत बाला को देखने लगा जो अब बता रही थी की वो उसको किसी से दूर रख रही थी.

"किस से दूर रख रही थी मुझे?"

"बबिता से. वो दीदी कुछ अलग है अर्जुन और जबसे उठी है वो सबके सामने बस तुम्हे पूछ रही थी. कह रही थी की अगर संजीव भैया के पास टाइम नहीं है तोह तुम उन्हें गाँव छोड़ने चले जाओगे. और माँ से तोह ये भी कहा के अगर वो इजाजत दे तोह तुम आज का दिन उनके हे ससुराल में रुक जाओ. मुझे ाचा नहीं लगा और अगर तुम गुस्सा होना चाहते हो तोह हो जाओ. मेरे अर्जुन पर सबके सामने कोई और अधिकार जमाये तोह ये सेहन नहीं कर सकती. ऋतू और प्रीती भी ऐसा नहीं करती जब मैं तुम्हारे साथ हो. हाँ वो दोनों मुझसे अलग नहीं है लेकिन घर में इस तरह से प्रेमिका का अधिकार कोई जताये वो ठीक नहीं.", अलका के चेहरे पर हलकी नाराजगी और गुस्से से आयी लाली देख अर्जुन भी गदगद हो गया. वो सचमुच उसकी प्रेमिका हे थी जो किसी को भी झाड़ देती थी अगर बात सही न लगे. जगह की अनदेखी करते हुए अर्जुन ने उसको अपनी बाहों में लेते हुए गाल पर चूम लिया.

"वो जुबान से ऐसी हे है अलका मैडम. और आप हो मेरी गर्लफ्रेंड, तोह आपसे न गुस्सा हो सकते है और न नाराज. रही बात कार सीखने की तोह वो भूल जाओ. आज आपकी ड्राइविंग का टेस्ट कही और लेता हु और फिर देखता हु यही जोश बरकरार रहता है या फिर...", अर्जुन ने शीशे पर दस्तक होते हे 500 के 2 नोट पेट्रोल भरने वाले को पकड़ा दिए. अलका उसकी बात का अर्थ समझती हुई शर्माने लगी थी और एक डर ये भी था की वो दोनों घर से कुछ हे देर का बोल कर निकले थे.

"घर.?"

"वो तोह चलना हे है लेकिन शॉपिंग का बहाना हमेशा की तरह आज भी काम करेगा. आज देखता हु के मेरी गर्लफ्रेंड का जोश बंद कमरे में भी इतना हे रहता है या नहीं.", अर्जुन ने आँख मारते हुए कार को घूमते हुए सीढ़ी सड़क पर कर दिया. अलका तोह रोमांच से कुछ बोल हे नहीं प् रही थी. उसको पता था की अर्जुन को उसके पूरे जोश में सिर्फ वही पूरी तरह झेल सकती है. ऋतू ने भी अभी तक उतनी आगे कदम नहीं बढ़ाये थे जितना वो दर्द और मजे में अपना सबकुछ अर्जुन पर वार चुकी थी. खाली सड़क पर एकके ये कार 90 पर दौड़ने लगी.

"इतनी जल्दी भी क्या है अर्जुन? मैं संभल लुंगी अगर कोई सवाल करेगा. यहाँ बहोत से छुअरहे है और एक्सीडेंट हो सकता है.", अलका अभी और कुछ कहती उस से पहले अर्जुन की कार 110 पर जा चुकी थी और वो सड़क पर चील सी निगाह रखे अपने से 400-500 गज दूर जा रही उस तेज रफ़्तार कार पर हे केंद्रित रहा.

अलका की नजर जब उस तरफ पड़ी तोह वो भी खामोश हो गयी. वो काली एस्टीम बेशक अनजान थी लेकिन उसमे जरूर कुछ ऐसा था जिसकी वजह से अर्जुन सबकुछ भुला कर बस उसको पकड़ने में लग गया. उस कार का चालाक भी जैसे कुछ ज्यादा हे जल्दी में था और 120 से ऊपर दौड़ता हुआ वो दूसरे बिपास वाली सड़क पर आया तोह यहाँ naam-matra हे aava-jaahi थी लोगो. अर्जुन तबतक इस कार के बराबर आ चूका था और अलका का दिल देहल गया जब कार की पिछली सीट पर मूर्छित पड़ी युवती पर नजर गयी. ये मंजू थी और कार चलने वाला कोई देहाती सरदार और उसकी बगल में बैठा एक तगड़ा 35-40 की उम्र का रौबदार व्यक्ति. अर्जुन ने उस कार का रास्ता दबाते हुए ये भी फ़िक्र नहीं करि की उसकी बगल में बैठी अलका को भी कुछ हो सकता है. लेकिन इसका असर उस ड्राइवर पर जरूर हुआ क्योंकि जान बचने के लिए उसने अपनी कार की रफ़्तार काम करते हुए आखिर में ब्रेक लगा हे दी. और अर्जुन ने अपनी कार तिरछी कड़ी करते हुए सड़क जाम हे कर दी.

"अर्जुन!", अलका ने बस इतना हे कहा लेकिन देर हो चुकी थी. अर्जुन अपनी सार्ड चाल में उस कार के ड्राइवर तक पहुंच चूका था.

"बाहर निकल बहिन के लौड़े...", और इसके साथ हे तड़ाक की आवाज के साथ वो खिड़की का शिक्षा अपनी जगह से गायब हो चूका था. वो मजबूत ड्राइवर कब किसी रबर के गुड्डे की तरह सड़क के बीचो बीच आ गिरा ये न अलका को पता चला और न ड्राइवर की बगल में बैठे उस तगड़े आदमी को. बस अगले हे पल इसकी गुड्डी भी अर्जुन की कलाई में फांसी थी और वो किसी मैंने की तरह मिमियाता हुआ खुद को छुड़ाने में लग गया. अलका दिलेर निकली जो तुरंत पिछली सीट पर मूर्छित पड़ी मंजू तक जा पहुंची. दिन दिहाड़े ये सब हो रहा था और पंजाब की तरफ जाने वाले इस बिपास पर किस्मत से दूर दूर तक कोई वाहन न दिखा. ड्राइवर आराम से सड़क के कंकरीट सख्त गद्दे पर सोया सर से खून बहा रहा था और अर्जुन इस आदमी को बहार निकल एस्टीम के गरम बोनट पर लिटाते हुए चीखा.

"कौन है तू बहनचोद? एक गलत जवाब और तेरी सांसें फिर से फेंफड़ो में पंहुचा कर जाम कर दूंगा.", अर्जुन भयंकर गुस्से में भी अलका की मौजदगी से कुछ हद्द तक अपने हे स्वरुप में आ चूका था लेकिन गुस्सा शायद अलका भी कम् न कर सकती थी.

"तुम.. तुममम मारे जाओगे.. आह्हः..", आधे जवाब में हे अर्जुन ने उसका सर बड़े शीशे पर मारते हुए कांच चकनाचूर कर दिया था.

"बताता हु.. आह्हः.. विनोद जी ने 5 लाख दिए थे इसको अगवा करने के लिए और कल कोई डील होने वाली है जिसमे ये लड़की.. आठ.. इस लड़की को कब्जे में रख कर वो अपना काम करवाना चाहते थे. हम तोह पैसे के लिए ये सब करते है... छोड़ दो भाई..", विनोद की ये हरकत जैसे अब अर्जुन को मंजूर न हुई. ये आदमी सबकी सोच से कही ज्यादा घाघ निकला लेकिन अब अर्जुन के हाथ उसके गिरेबान तक पहुंचने से खुद रामेश्वर जी भी नहीं रोक सकते थे.

"विनोद को तुम जवाब देने लायक नहीं रहोगे माँ की छूट इस विनोद और उसके सपनो की.. याहहह..", अर्जुन ने जिस तरह से दोनों हाथो से इस आदमी की गर्दन पकड़ कर कार से उठा कर वापिस बोनट पर दे मारा था, उसकी चीख ने ये सन्नाटे भरी सड़क कोसो दूर तक गूंजा दी. लेकिन अर्जुन तबतक उसको कार पर उठा उठा कर पटकता रहा जब तक वो बेहोश हो कर शांत न हो गया. काली कार पर हर तरफ खून बिछाने के बाद भी जब अर्जुन को सबर न हुआ तोह वो उस ड्राइवर की तरफ लपका जो अभी भी बेहोश था.

"मंजू को हॉस्पिटल ले जाना जरुरी है अर्जुन.", अलका जरा भी दरी न थी इस वीभत्स दृश्य को देख कर. वो इतनी ताक़तवर न थी की मंजू को सावधानी से उठा कर उनकी कार में रख दे. अर्जुन ने स्थिति को समझते हुए मंजू की नब्ज़ देखि जो चल रही थी और उसको उठा कर पानी कार की पिछली सीट पर लिटा दिया.

"तुम इसका सर अपनी गॉड में रख लो अलका. मैं जरा इन्हे निभता दू.", अर्जुन ने एस्टीम को न्यूट्रल करते हुए सड़क से निचे धकेल दिया. ठीक उस 6 फ़ीट नीचे खड़े में गिरी कार के ऊपर अगला शरीर उस ड्राइवर का गिरा जिस से बचे खुचे शीशे भी धमाके से टूट गए. कार की छत्त सीट पर आ चुकी थी. अर्जुन ने वही अपनी कमीज उतार कर चेहरा और हाथो पर लगा खून साफ़ किया और जीन्स बनियान में हे कार की ड्राइविंग सीट पर आ बैठा.

"डार्लिंग, टेंशन मैट लेना. आज इस मंजू के बिस्टेर पर हे तुम्हे प्यार करने वाला हु. इतनी बड़ी गलती की थोड़ी सजा इसको भी मिलनी चाहिए. कहा था की मेनका जब घर से निकले तोह हमारे यहाँ चली आये.", अर्जुन का शरीर इतनी हे देरी में ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो 2 घंटे गयम में कसरत करके हटा हो. गोर मासूम चेहरे पर अब एक अलग हे कुटिल मुस्कान थी.

"तुम विनोद चाचा के साथ क्या करने वाले हो?", अलका ने बेझिझक हे सवाल किया था. दोपहर के 12 बजने वाले थे अभी.

"डर. इतना डर दूंगा की वो सोने के लिए भी दवा लेने वाले है और वजह पता न लगेगी. देखो अलका, अब अर्जुन शिकार किसको मेमना बना कर करेगा. लेकिन प्यार तुमसे पूरा करूँगा वो भी दिलोजान से.. उम्माह्ह्ह्ह.", कार चलते हुए जिस तरह से अर्जुन ने पीछे घूम कर लापरवाही से अलका के होंठो रास पीया एक पल तोह वो भी सिहर गयी. ये अलग अर्जुन था और शायद अब डर सबको लगने वाला था.
 
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