अपडेट 155
कठपुतली
लगभग 2 घंटे तक गहरी नींद लेने के बाद प्रीती की आँख खुली तोह शरीर में मीठे दर्द के साथ चेहरे पर वही गुलाबी रंग उभर आया जो अक्सर सुहागरात को याद करके नयी ब्याहता के चेहरे पर अगली सुबह दीखता है. बिस्टेर को छोड़ कर पूरा कमरा एकदम साफ़ सुथरा था. सिरहाने रखा वो बॉक्स नजरो के पास देख कर प्रीती ने थोड़ा शरीर हिलाया तोह वही मीठा दर्द सीने तक आ गया.
'उफ़.. ये अर्जुन भी न.. सचमुच अलग सी आग लगा दी है हर तरफ.' शरीर सीने तक चादर में ढाका था और थोड़ा सरकने से वो अर्धगोलाकार गोर सतांन निप्पल तक निर्वस्त्र हो गए जिस पर प्रीती ने कोई ध्यान न दिया. पैकेट को खोलते हे उसमे ये काले रंग की खूबसूरत ड्रेस थी, बिना ब्याह की और घुटने से 2-3 इंच निचे लम्बाई तक.
'लंच डेट', अंदर रखे कागज पर यही लिखा था और उसके बाद 34-स की जालीदार ब्रा. कोई पंतय उस पैकेट में न देख प्रीती थोड़ा हैरान हुई लेकिन जैसे तैसे करके वो बिस्टेर से निचे उतरी तोह योनि में वो भयंकर दर्द न हुआ जो सोने से पहले महसूस किया था जब अर्जुन ने उसको फर्श पर खड़ा करते हुए ाचे से साफ़ किया था.
'तोह इडियट ने पेनकिलर खिला दी anti-pregnancy बता कर.', वो मुस्कुराती हुई धीमी चाल से अपनी माँ के बाथरूम में आयी तोह यहाँ भी सबकुछ साफ़ सुथरा था. न बाथटब में कोई phool-wine के निशाँ, न वो कैंडल्स और उसकी गीली ड्रेस. साफ़ टोलिया जरूर एक तरफ टेंगा था जो ख़ास प्रीती के लिए हे अर्जुन ने कल लिया था मार्किट से. आईने में खुद का चेहरा देख वो कुछ पल के लिए खो सी गयी थी.
एक बार में हे अर्जुन से मिलान करके चेहरे पर अलग हे चमक आ चुकी थी और वो काजल की कालिख जैसे काले बद्र पूनम के चाँद पर. निचला होंठ थोड़ा फूल चूका था और सीने पर भी हलके लाल निशाँ हर तरफ थे दोनों चुचो के.
'इडियट. पता नहीं क्या निकलने लगे थे इनसे जबकि पता है टच करते हे बेबी नहो हो जायेगा.', अपनी बात पर खुद हे हंसती हुई वो फुहारे के निचे कड़ी हो गयी. आज ये पानी भी प्यार की ठंडक से भरा महसूस हुआ प्रीती को. शरीर से बचा खुचा दर्द भी हवा हो गया और जहा जहा अर्जुन नई प्यार के निशाँ बनाये थे, ठन्डे पानी का एहसास वह कुछ अलग हे जादू दिखने लगा. योनि पर ये तेज सिहरन ऐसी थी जैसे अर्जुन ने फिर से वह होंठ टिका दिए हो.
'शहहह.. आज क्या हो रहा है मेरे साथ? बी गॉड ये फीलिंग सचमुच जान हे ले कर रहेगी. ठीक कहती थी ऋतू दीदी, प्यार के बाद जब पानी भी लगेगा तोह यही महसूस होगा अर्जुन पानी बन्न कर तड़पा रहा हो जैसे.', 10 मिनट बाद हे प्रीती हलके हाथो से शरीर पौंछती अपनी माँ के कमरे में लगे बड़े दर्पण के सामने स्टूल पर बैठी थी. ब्रा मुलायम होने के बावजूद स्टैनो को उत्तेजित कर रही थी लेकिन प्रीती ने जैसे तैसे ड्रायर की मदद से अपने बाल सुखाये और वो काली ड्रेस पहन ने के बाद बिस्टेर की चादर समेत कर उपहार वाले बॉक्स में पैक कर के एक तरफ रख दी. अगले 10 मिनट में ये पूरा कमरा वैसा हे हो चूका था जैसा रोमिला ने जाने से पहले छोड़ा था.
'कमरे में हे पंतय पहनती हु चल कर. और देखु तोह ये जनाब कहा गायब हुए है और कबसे?', प्रीती जैसे हे पैकेट लिए कमरे से बहार निकली अर्जुन रसोई से एक ट्रे लिए उसके सामने आ खड़ा हुआ.
"वाओ. पहले से भी कही ज्यादा हे सुन्दर लग रही है मेरी मानो (बिल्ली). उम्म्म्म.. ी लव यू.", अर्जुन ने एक तरफ से कमर में ब्याह डालते हुए प्रीती की तारीफ करने के साथ हे उसके होंठो पर छोटा सा चुम्बन अंकित करते हुए कहा तोह प्रीती भी थोड़ा कस के लिपट गयी.
"ी लव यू तू जान. वैसे सचमुच कुछ अलग हे हुआ है पर पता नहीं कैसे. ये जूस किस लिए?", अर्जुन को ट्रे टेबल पर रखते देख प्रीती ने साथ चिपके हुए हे पुछा.
"मुझे पता है तुम्हे इसकी अभी बहोत जरुरत है. और जूस पीने के बाद तुम ये टेबलेट ले लेना मैं घर से कपडे बदल कर थोड़ी देर में वापिस आता हु. हो सके तोह निचे पंतय मैट पहन न क्योंकि प्रॉब्लम होगी. कोई आरामदायक स्लीपर्स पहन लो, फिर हम लंच पर बहार चल रहे है.", अर्जुन ने माथे पर चुम्बन करने के बाद अलग होते हुए वो गोली और जूस प्रीती के हाथ में पकड़ाया और उसके हाथ से चादर वाला पैकेट ले लिया.
"तुम बहार गए थे?", प्रीती ने सिर्फ इतना हे पुछा
"हाँ. जाना तोह था हे क्योंकि बहोत कुछ साफ़ करना था और गाडी पर लगवाए फ्लावर्स भी हटवाने थे. ये मेडिसिन लेनी भी जरुरी थी प्रीती और निश्चिंत रहो, बाकी सब भी क्लीन कर दिया है. आंटी के कैमरा वाला सामान डी ड्राइव में आवर फोल्डर के नाम से साफल्य cut-paste कर दिया. अब तुम तैयार हो जाओ मैं भी 10 मिनट में आता हु.", अर्जुन इस वक़्त प्रीती को बिलकुल परेशां नहीं करना चाहता था. कैमरा वाली बात सुन्न कर प्रीती के गाल फिर से लाल होते देख वो तुरंत बहार निकल गया.
'बुद्धू कही के. हमारी तस्वीर भी न लू क्या फर्स्ट टाइम की? और पंतय के बिना लंच पे ले जा रहे हो, वाह..', प्रीती ने तुरंत वो गोली निगलि और छोटे छोटे घूँट जूस के लेती हुई अपने कमरे में चली आयी. अलमारी खोल कर पहले माथे पर एक छोटी सी सफ़ेद बिंदी लगाने के बाद आँखों में काजल लगाती वो आज खुद की खूबसूरती को हे निहार रही थी. दोनों कानो में अर्जुन के दिलवाये बूंदे पहन कर प्रीती ने आईने को चूमा और निचली दराज से वो पत्तियों वाली काली सैंडिल पहन कर ऊपर से निचे तक खुद को देखने लगी.
'अभी भी कुछ तोह कमी है. ये ड्रेस इतनी भी छोटी नहीं है के पंतय दिखे.. उम्म्म.. बँगलेस (चूड़ियां)..', कलाई से वो लाल चूड़ियां अर्जुन ने खुद हे निकाल दी थी संसर्ग के बाद. कुछ सोच कर प्रीती ने वो चांदी रंग की ख़ास चूड़ियां निकाल कर 6-6 दोनों कलाई में पहनी और गले वाला लॉकेट ड्रेस से बहार निकाल लिया. आज वो किसी भी आधुनिक खूबसूरत युवती को पानी भरने पर मजबूर कर रही थी इस एक साधारण सी पोशाक और न बराबर make-up के साथ.
"मैडम, 20 मिनट हो गए है आपको. मान लिया आज सबकी नजरे मेरी जान पर हे रहने वाली है पर ऐसा जुल्म भी न करो की कमरा बंद करने पर मजबूर हो जाऊ.", अर्जुन ने पीछे से प्रीती को बाहों के घेरे में लेते हुए गर्दन पर होंठ रख दिए. एक नीली जीन्स और सफ़ेद कमीज में वो हमेशा की तरह उतना हे आकर्षक लग रहा था जितना प्रीती की मौजदगी में दीखता था. इन दोनों का हे कुछ अलग सा कनेक्शन ठीक Ritu-Arjun की तरह.
"पता नहीं जान आज तोह खुदसे से रश्क होने लगा है. क्या ये सिर्फ एक बार के मिलान से हुआ है या कुछ और बात है?", प्रीती दोनों का अक्स आईने में देखती हुई बोली. उसको अलग हे सुख मिल रहा था इस तरह खुदको अर्जुन की बाहों में देख कर.
"अब तुम परदे से बहार हो प्रीती. यहाँ तुम्हे अपनी ख़ूबसूरती को छिपा कर रखने की अब कोई जरुरत नहीं. अब मैं से ये ख़याल हमेशा के लिए निकाल दो की तुम्हे हिंदुस्तानी रंगत या वैसा हे दिखना है. चलो आज तुम्हे एक ख़ास जगह लंच करवाता हु.", अर्जुन ने पीछे से उसके बाल एक तरफ करते हुए गाल पर चुम्बन किया और बहार टेबल से घर की चाबी उठा कर कार की तरफ बढ़ चला. प्रीती इस सुहाने मौसम से जहा खुश थी वही अब उसको इस बात से अलग डर लग रहा था की गली में किसी ने उसको इस ड्रेस में अर्जुन के साथ बहार जाते देखा तोह क्या होगा.
"चली आओ मैडम. जो सोच रही हो उस से हमको फरक नहीं पड़ना चाहिए. तुम मेरी हो और पूरी फॅमिली की भी.", अर्जुन अपनी काली लांसर का दरवाजा खोल कर बिना किसी की परवाह करता प्रीती को बैठने के लिए बोलै तोह एक बार प्रीती की नजर सामने एक घर छोड़ कर बहार सफाई करती सरोज भाभी पर पड़ी जो ऊँगली और अंगूठे के इशारे से उसको बता रही थी की वो कितनी गजब दिख रही है.
"तुम्हे डर नहीं लग रहा अर्जुन? सरोज भाभी भी मजे ले रही है देखो.", प्रीती हिचकिचाते हुए अगली सीट पर बैठी तोह दूसरी तरफ से अपनी सीट पर जाता अर्जुन सरोज भाभी को हाथ हिला कर 'bye' करता दिखा.
"भाभी है वो हमारी और सबसे बड़ी बात है के तुम आज ऐसा इसलिए सोच रही हो क्योंकि अब हमारे बीच रिश्ता पूरी तरह बन्न चूका है. तुम्हे ध्यान है न मैं कैसे तुम्हे निक्कर टीशर्ट में छोटे दादू और आंटी के सामने हे मोटरसाइकिल पर मौसी को छोड़ने ले गया था.? यहाँ सबको पता है हम कौन है तोह इतना सोचना बंद करो.", अर्जुन की बात को समझते हे प्रीती एकाएक सहज हो कर मुस्कुरा उठी.
"सच कह रहे हो. मैं जो फील कर रही थी वो इन्हे तोह नहीं पता न. चलो अब बेफिक्र हो कर जहा चलना है चलो. लेकिन जल्दी हे वापिस आना होगा हमे सबके लौटने से पहले.", प्रीती ने अपना काले रंग का हैंडबैग पिछली सीट पर रखते हुए अर्जुन के गियर बदलते हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.
"सबके आने के बाद हे वापिस आएंगे डार्लिंग. चाबी दो इधर.", अर्जुन कार को आगे बढ़ाते हुए सरोज भाभी के करीब रोक कर शिक्षा निचे करते हुए कहने लगा.
"भाभी, ये प्रीती के घर की चाबी है. हम मार्किट जा रहे है तोह जब घरवाले वापिस आये तोह हमारी चाबी के साथ ये भी उन्हें दे दीजियेगा.", अर्जुन आज सरोज भाभी के साथ उन्मुक्त तरीके से बात कर रहा था और वो भी मुस्कुराती हुई करीब आ कर गीले हाथ से अर्जुन का गाल सहलाती हुई बोली.
"आराम से आना देवर जी. देवरानी पहली बार तोह जाती देख रही हु तुम्हारे साथ. प्रीती, जेब खाली करवाए बिना वापिस मैट आना मेरे देवर की.", प्रीती होंठ दबती हुई बुरी तरह झेंप गयी थी उनकी बात सुन्न कर.
"कहो तोह आपको हे ले चालू भाभी जी.", अर्जुन ने जैसे ये कहा सरोज तुरंत चाबी ले कर पीछे हट गयी.
"होली दूर है देवर जी, इतने भाभी हाथ नहीं आने वाली. ाचा एन्जॉय करना और मैं बता दूंगी तुम्हारे घर, दोनों मार्किट गए है.", भाभी के बात बदलने की वजह घर के अंदर का दरवाजा खुलने की आवाज थी. अर्जुन भी थैंक यू बोल कर अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चला. पूरी तरह से बंद कार के भीतर इस वक़्त ये गाना बज रहा था,
'इस जहां की नहीं है तुम्हारी आँखें..
इस जहां की नहीं है तुम्हारी आँखें..
आसमान से ये किसने उतारी आँखें..
2 जहां दे के ले लू तोह सस्ती हैं ये..
2 जहां से भी प्यारी तुम्हारी आँखें..
आसमान से ये किसने उतारी आँखें..
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बेहद हे आलिशान से महल सरीखे इस बड़े घर के इस उतने हे शाही कमरे में ये खूबसूरत युवती नरम बिस्टेर पर बैठ कर लैपटॉप में खोयी थी. दरवाजे पर दस्तक होते हे जो भी बहार तोह उसको अंदर आने की अनुमति देने के साथ साथ बिस्टेर की बगल में लगे स्विच को दबा कर कमरा रोशन कर दिया.
ये शबनम मिर्ज़ा का निजी कक्ष था और वो जबसे इंडिया से वापिस अपने घर लौटी थी, ज्यादातर इस कमरे में या इस महलनुमा घर से बहार आगे खूबसूरत उपवन में हे समय बिताने लगी थी. घंटो वो घने वृक्षों के सामीप्य में नदी किनारे विचरण करती थी या अपने पिता के मौजूद होने पर उनके आसपास रहती. मिर्ज़ा साहब भी अपनी बेटी के साथ समय बिता कर ाचा महसूस करने लगे थे और हर शाम वो भोजन शबनम के साथ हे करते.
हमेशा अपनी माँ के साये टेल रहने वाली शबनम को अब अपने अतीत से हे घुटन होने लगी थी लेकिन अर्जुन द्वारा दिया ये नया जीवन वो व्यर्थ न करते हुए अब पूरी कोशिश करती थी अपने आसपास के माहौल को सकरात्मक रखने की. इतने साल अपने सौतेले पिता के समीप रहने के बावजूद उसने कभी उन्हें वक़्त या बेटी वाला प्रेम न दिया था. लेकिन घर में ये नयी शबनम पूरे मिर्ज़ा खानदान को भा गयी थी. Tej-taraar व्यक्ति जब अपनों से प्यार भी करता है तोह वो पूरा समर्पित हो जाता है अपने स्वभाव के विपरीत. यही नयी शबनम ने किया था इन चाँद दिनों.
"आ जाएँ माँ. आपको नॉक करने की जरुरत कबसे होने लगी?", 10 फ़ीट ऊँचे वो नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे के पार कड़ी ये महिला भी सौन्दर्य की मिसाल हे थी लेकिन चेहरे पर ख़ूबसूरती जैसे भाव बिलकुल न थे. रेशमी सफ़ेद कला सलवार कमीज और सर पे भी दोरंगा दुपट्टा करने से लिए बड़ी नजाकत से चलती बिंदिया उर्फ़ फरज़ाना बेगम अंदर चली आयी. कमरे के फर्श पर महंगा कालीन अपने आप में इस घर के रसूखियात बता रहा था. सुनहरी शहतीर की बानी उस आकर्षक कुर्सी पर बैठते हुए बिंदिया चाँद लम्हे अपनी बेटी को देखती रही जो ढीली टीशर्ट और वैसे हे पाजामे में अपने लम्बे बालो का जुड़ा बनती हुई उसमे क्लिप लगा रही थी.
"तुम ठीक तोह हो न शबनम? अब मेरी बेटी के पास अपनी माँ के लिए इतना भी वक़्त नहीं की dukh-sukh हे बतला ले? जबसे वापिस आयी हो एक बार भी ठीक तरह से मुझसे बात तक नहीं की. समाज के लिए मैं जो भी हु शबनम लेकिन तुम तोह मेरा सबकुछ हो.", बिंदिया अपनी बात कहते हुए बड़ी आस भरी निगाहो से शबनम को देख रही थी जिसके चेहरे पर ख़ास भाव न थे.
"हो गया आपका माँ? आपने अभी अभी जो कहा है वो एक बार फिर से कहिये, मेरे सर पर हाथ रख कर. वैसे उसका भी फायदा नहीं कुछ, मरने के लिए तोह छोड़ हे दिया था आपने मुझे. लेकिन मुझे अपने किये का जरा भी दुःख नहीं है, माँ के लिए किया था न सबकुछ. वो अलग बात है के माँ ने कुछ नहीं किया अपनी इस नाजायज़ औलाद के लिए.", शबनम द्वारा 'नाजायज़' शब्द कहना बिंदिया के दिल पर हथोड़े की तरह प्रहार कर गया. शबनम के आवाज में कही कोई दुःख या गुस्सा न था. किसी आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह वो शांत थी लेकिन बिंदिया तड़प उठी थी. आँखों में एक पल में हे मोटी मोटी बुँदे उभर आयी आंसुओं की.
"हाँ मैं बदचलन औरत हु शबनम, बेगैरत जो अपनी बेटी को भी ाची परवरिश देने की जगह उस दलदल में ले गयी जहाँ से वापिस आना नामुमकिन था. मजबूर थी, गुस्सा थी और बदले की भावना ने मुझसे जाने कितने पाप करवा दिए जिसकी सजा एक जनम में तोह मिल भी नहीं सकती. लेकिन मैंने तुमसे हमेशा दिल से प्यार किया है और कभी तुम्हारे लिए 'नाजायज़' लफ्ज़ जुबान पर नहीं आने दिया. मेरे पहले प्यार की निशानी को सीने से लगाए आयी थी यहाँ और शादी की सहमति भी तुम्हे पहली बेटी के दर्जा देने पर हुई. मेरी मजबूरी किसी को समझ नहीं आ सकती शबनम लेकिन मैं अब अपनी बेटी को हमेशा पास रखना चाहती हु. क्या एक मौका दे सकती हो अपनी माँ को?", बिंदिया से जवाब देते नहीं बन्न रहा था क्योंकि एक बात कहने पर शबनम के 3-4 सवाल करना तये था.
"मैं अर्जुन नहीं हु माँ जो अपनी हे मौत के सौदागर को माफ़ कर दू. आपको पता है इस बदले की भावना में आपकी बेटी का चरित्र वैश्य जैसा हो गया? वह जिनकी सुरक्षा में भेजा था उन भेड़ियों ने मेरे शरीर के साथ साथ आत्मा को नीलाम किया लेकिन आप खामोश रही. त्याग भी उसके लिए ाचा लगता है माँ जो dev-swaroop हो. नरिंदर जी के साथ आपने इतना कुछ किया तब प्यार कहा था? एक पल तोह अपने ताऊ जी के नीचे आने वाली थी उस समय आप कहा थी? छोड़िए ये सब बातें, मेरे कर्मो की जो भी सजा मुझे मिली है वो मैंने कबूल कर ली. अब जीवनभर न मुझे किसी से बदला लेना है और न किसी से नाराजगी है. आपके सामने हु और आप हमेशा मेरे लिए मेरी माँ हे रहेंगी.", शबनम ने 2 टूक बता दिया था की अब जीवन शांत और तनावरहित रखने की हे मंशा है.
"मैं एहसानमंद हु अर्जुन की और मुस्कान से भी मैंने माफ़ी मांग ली है शबनम. अब तुम जैसा चाहती हो वैसा हे करुँगी बेटी लेकिन बस एक बार अपनी माँ के साथ वैसी हो जाओ जैसी बचपन में थी."
"हाँ वो टार्चर दे कर मुझे सख्त और इमोशनलेस बनाने वाला बचपन भूलना बहोत मुश्किल काम है माँ लेकिन उसकी याद अब दर्द नहीं देती. मुस्कान मासूम है और अर्जुन के साथ ने उसको कही ज्यादा समझदार बना दिया. मैं थोड़ी ढीठ हु न तोह समय लगेगा मुझे. वैसे आप चाह कर भी खुद को ठीक नहीं कर सकती, खुद का दिल रखने के लिए चाहे बोल लीजिये.", शबनम के ये सूक्ष्म तीर बुरी तरह आहात कर रहे थे उसकी माँ को.
"क्या मतलब है शबनम तुम्हारा? मेरे दिल से पूछो इसमें कितना दर्द है और तुम्हारे लिए मैं सब भुला कर अलग ज़िन्दगी जीने को भी तैयार हु. नहीं रखूंगी किसी से भी वास्ता. न अतीत से और न वह मौजूद किसी इंसान से.", बिंदिया की आँखों से बहते आंसू ठुड्डी से उसकी गॉड तक गिर रहे थे.
"मत बेहलाओ न माँ. जानती हो अर्जुन कहता है के मेरी माँ तोह हमेशा बस मोहरा भर रही है इन खुनी खेल का. उसके लिए तोह आप एक नादान पीड़ित औरत हो जिसका उपयोग किया गया लेकिन क्या बताती मैं उसको की मेरी माँ तोह शरीर का सौदा करने में एक पल व्यर्थ नहीं करती अगर बात अर्जुन के परिवार को नुक्सान पहुंचने की हो. हर वो गलत इंसान जो ऐसा कर सकता है, मेरी माँ अपने साथ साथ अपनी बेटी को भी उसकी गॉड में बैठा देती है. आज आप कह रही हो की सुधर जाओगी लेकिन हर शनिवार आपके कदम फिर उस जगह पहुंचेंगे जहा एक खानदानी औरत के नहीं होने चाहिए.", शबनम का इशारा छोटे मिश्रा की तरफ था.
"वो जा चूका है और अब मुझे किसी की परवाह नहीं है शबनम. मेरी ज़िन्दगी को वो लोग बीच बाजार भी नीलाम कर दे तोह भी मैं उनका किसी गलत काम में साथ नहीं दूंगी. जानती हु कोई गंगा मेरे पाप नहीं धो सकती लेकिन मैं इस घर में अपनी बेटी और पति के साथ बाकी ज़िन्दगी चैन से गुजरना चाहती हु. सिवाए दुःख और दर्द के मुझे कुछ भी नहीं मिला आजतक. अब अगर मौत भी आये तोह अपनों के बीच हे आये.", बिंदिया दोनों हाथ जोड़ने हे लगी थी की शबनम ने फुर्ती से अपनी माँ को ऐसा करने से रोक लिया.
"काम से काम उस इंसान से तोह माफ़ी मांग लो माँ जिसने तुम्हे आजाद करवाया है उन खून चूसने वाले जानवरो से.", शबनम पहले बार थोड़ा नाराजगी से पेश आयी थी. बिंदिया हैरत से भीगी आँखों के साथ अपनी बेटी को अपलक देखने लगी. कैसी आजादी और कौनसे जानवर?
"आजाद करवाया है?"
"राजकुमारी अनामिका की बेटी उतनी भी समझदार नहीं है जितना अक्सर शाही लोग होते है. अर्जुन बात तोह की है तुमने कुछ दिन पहले लेकिन अपना सच उस से भी छिपाया जो तुम्हारे लिए अपनी जान डाव पर लगा गया. क्यों नहीं नीलिमा का पता दिया उसको? लाजवंती नानी के इशारो पर ज़िन्दगी भर नाचती रही हो आप लेकिन उनसे आजाद करवाने वाले के प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं. एक 18-19 साल का युवक आपकी िज्जात्त के लिए जाने किस किस से लड़ रहा है और उसको सिर्फ अपनी बेटी वापिस भेजने के लिए धन्यवाद कहा?", अपना पूरा सच तोह खुद बिंदिया को भी पता नहीं था.
"तुम्हारी नानी का नाम दमयंती है शबनम और मान लिया के लाजवंती मौसी के पास कुछ ऐसा है जिस से वो मेरी माँ की िज्जात्त खराब कर सकती है. मेरी भी कुछ गलतियों के सबूत मौसी और लता के पास है जिस से कभी कभी मज़बूरी में मुझे उनका साथ देना पड़ा लेकिन पंडित जी के परिवार ने मुझे सिर्फ दुःख पहुंचाया है और कुछ नहीं. ये अर्जुन ाचा लड़का हो सकता है और तुम्हारे एवज में मैंने उसका शुक्रिया भी किया लेकिन बाकी सभी दोषी है. मैं तुम्हारे लिए उन्हें भी माफ़ करने को तैयार हु."
"उस परिवार की एक ईंट नहीं हिला सकती आप और आपके सो कॉल्ड वेल विशेर्स. वैसे नाजायज़ तोह आप भी है या फिर किसी के प्यार की निशानी. चन्दर की मौत के बाद अर्जुन ने आपकी मौसी और मां के घर में सेंध लगा दी, जहाँ बहोत कुछ मिला था उसको. करम मां की मौत के बाद वो सब उसने उनके घर बाकी सबूतों के साथ मिला कर सही ठिकाने भी पंहुचा दिया है. अब किसी मिश्रा, मुन्नी या लाजो से डरने की जरुरत नहीं आपको. हाँ बाप का नाम वो भी ढून्ढ रहा है आपके. सही करने वालो को आप माफ़ भी कैसे कर सकती है? वैसे अर्जुन अब आपके असली मां के पीछे लगा हुआ है, कुमार सारंग के. अब नानी से पूछने के लिए आपके पास बहुत से सवाल थे माँ लेकिन आपकी गलती से वो भी सारंग के पास है.", शबनम ने जो इतना बड़ा विस्फोट किया था बिंदिया के दिल और दिमाग पर, वो सफ़ेद हे पड़ गयी. शबनम अपनी माँ को खामोश देख कर तुरंत उन्हें हिलनी लगी तोह जैसे बिंदिया की चेतना लौटी और वो फफक कर निरंतर आंसू बहाने लगी.
"मेरी बची मुझे कुछ समझ हे नहीं आया कभी. कुमार हमेशा हमारे लिए अन्नदाता जैसे रहे जैसा माँ ने बताया था के तुम्हारे नाना उनके ख़ास व्यक्ति थे जिनकी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी. सच कहती हु शबनम ये सब मुझे नहीं पता था सिवाए इसके की नीलिमा मेरी मौसी की बेटी थी जिनके घर से हमारे कोई तालुक्क नहीं बचे थे. अर्जुन ने कोशिश भी की थी मुझसे बात करने की लेकिन मैं अपनी जिद्द में सही से बात हे न कर सकीय. तुम्हारी नानी को वापिस लाना होगा शबनम, उन्हें वापिस लाना होगा. कही इस बार उनकी जान के बदले हमे फिर से कुछ गलत न करना पड़ जाए.", फफक फफक कर रोटी हुई बिंदिया को शबनम अपने साथ चिपकाये कड़ी रही. इस समस्या का समाधान तोह उसके पास भी न था.
"वो अपने भाई के पास है माँ और सारंग उन्हें तोह कुछ होने नहीं देगा. मैं इतना तोह जानती हु की कही न कही अर्जुन ने आपको और नानी को लाजवंती के हाथो आजाद करवा कर आपके मां पर एहसान हे किया है. लेकिन अर्जुन का टकराव कुमार सारंग से सुनिश्चित है देर सावेर. आपको ये फैंसला करना होगा की इस बार आप किसका साथ देंगी. उस इंसान का जिसने काबिल होने के बावजूद नानी और आपको अंधेर ज़िन्दगी दी और वो चुनिंदा लोगो के सामने मजबूर हो गया या फिर उसकी जो कहने को आपका कुछ नहीं लेकिन मेरा और उसका खून का अटूट रिश्ता है. अब आप कठपुतली नहीं हो माँ, जो धागो से बंधी है. आप आजाद है और देखा जाए तोह हमारा ये परिवार रामेश्वर दादा जी के परिवार के साथ मिल कर सबकुछ सही कर सकता है. फैंसला आपके हाथ में है माँ लेकिन मैं अर्जुन के साथ हु आखिरी सांस तक.", शबनम ने कुछ हे समय में अपनी माँ के दिल से कालिख को खुरच दिया था और बिंदिया के अंतर्मन में भी अर्जुन का नाम इस कदर बैठाया था की अब वो चाह कर भी पंडित जी के परिवार से नफरत नहीं कर सकती थी.
"मैं अपनी बेटी के पास कुछ पल सुकून से सो सकती हु शबनम? मेरा दिल घबरा रहा है बेटी और अब मेरी जरा भी हिम्मत न होगी तेरे पापा और भाई का सामना करने की.", बिंदिया द्वारा तेरे पापा का मतलब साफ़ साफ़ नरिंदर जी से था और जिसको वो भाई बता रही थी उसने तोह उनकी बेटी के दिल में कुछ अलग हे चाहते भर दी थी जिसका किसी और को भान न था.
"आप यही आराम करो माँ और मैं खुद आपकी बात करवाउंगी अर्जुन से. वो भी बहोत कुछ बता सकता है आपको आपके बारे में. शायद मेरा वो सब जानकारी देना सही न होगा.", बिंदिया को अपने नरम बिस्टेर पर साथ लगा कर सुलाते हुए शबनम उनकी पीठ भी सेहला रही थी. ये आंसू अभी कुछ पल और भी बहने थे और शबनम इन्हे रोकना भी नहीं चाहती थी. उसकी माँ अब किसी की कठपुतली नहीं थी.
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सबसे milne-julne के बाद और सभी काम निबटा कर जबतक पंडित जी फारिग हुए तोह दोपहर के 2 बज चुके थे यहाँ मंदिर में. बड़े बुजुर्गो ने तोह व्यस्तता के साथ कुछ घडी आराम भी किया था लेकिन शनकर इत्यादि को चैन लेने नहीं दिया गया था. अभी वो सब शहर की बस्तियों में भोजन आदि बाँट कर मंदिर के प्रांगण में बैठे हे थे की कौशल्या जी की आवाज सुनी.
"बीटा, घर चल के आराम कर लियो. अर्जुन भी अकेला है और फिर प्रीती क्या हे खाना पकाएगी उसके लिए.", कौशल्या जी की फ़िक्र देख कर उमेद तोह फर्श पर लेट हे गया.
"चची, उसके पास कार है, पैसे है और फिर अगले की होने वाली बीवी है प्रीती. होटल वोटेल में खाना खाएने दोनों और आप हमको कमर सीढ़ी तोह करने दो. उसकी फ़िक्र है जिसके पास सबकुछ मौजूद है लेकिन अपने बेटे की नई जो सवेरे 3 बजे से अभी तक चैन से 2 घडी सांस न ले सका. उन्हें हे देख लो किस तरह हंस खेल रही है.", उमेद ने लड़कियों की तरफ अपनी चाची का ध्यान करवाया जो कैमरा के सामने अलग अलग तरह से तस्वीरें निकलवा रही थी एक दूसरी के साथ. एक नजर शंकर ने भी देखा और फिर मुँह पर रुमाल रख कर वो भी अपनी चची की गॉड में सर रखते हुए वही पसर गया.
"ढेला हो गया है इनका पूर्णिमा. ये जो बोल रहे न चैन से सांस लेने की बात, बहार भी तफरी मारते रहे और इधर भी. गाडी चलने के नाम पर देख कैसे केंचुए की तरह बिखर के फर्श पर. अपने आप हे देखे इनके baap-chacha. अब तेरी गॉड से ये तोह उठने से रहा.", पूर्णिमा जी आदतन मुस्कुराती हुई शंकर का सर थपकने लगी.
"करने दे इन्हे भी कमर सीढ़ी कौशल्या. काम तोह किया है है इन्होने और फिर आधी अधूरी नींद के बावजूद एक बार भी जवाब न दिया. वैसे तू खामख्वाह हे चिंता करती है अर्जुन की. वो समझदार है और ध्यान रखना ाचे से जानता है. बाकी सब तोह चले हे गए है, जब तक ये बचे हंस खेल रहे है इतने इन्हे भी आराम करने दे.", पूर्णिमा जी की बात सुन्न कर खम्बे के साथ पीठ टिकाये आराम करता नरिंदर अपनी माँ की तरफ देख मुस्कुराने लगा जैसे उन्हें चिढ़ा रहा हो.
"हंस ले कपूत तू भी हंसले अपनी चची की शरण में. ये सारे बलूँगड़े न पूर्णिमा तुझे देख के हे ये मनमानी करते है.", अभी कौशल्या जी कुछ और बोलती उस से पहले हे ऋतू वह आ कड़ी हुई.
"दादी जी आप दोनों चलो हमारे साथ अभी के अभी.", ऋतू ने अपनी दादी का हाथ पकड़ कर उन्हें उठाते हुए कहा और साथ हे विन्नी और आइशा भी पूर्णिमा जो को खींचने लगी. शंकर जी इस आवाज को सुन्न कर हे एक तरफ पसर गए अपनी चाची को मुक्त करते हुए.
"अरे बता तोह दे डॉक्टरनी कहा ले जा रही है? बुढ़ापे में हाथ न हिला दियो जोड़ से मेरा.", कौशल्या जी ये सब ऊपरी तौर से कह रही थी और हँसते हुए अपनी लाड़ली के साथ उस तरफ हे चल पड़ी जहा ऋतू उन्हें ले जा रही थी. यहाँ 2 कुर्सियां ठीक मंदिर के सामने घने वृक्षों के बीच राखी थी.
"आप दोनों यहाँ बैठिएं और आपके पीछे हम सभी खड़े होंगे. भैया, इस फोटो में मंदिर भी पूरी तरह से आना चाहिए.", अब कही कौशल्या जी को समझ आया के ये सभी क्या कर रहे है. इन सभी बच्चों के साथ उनकी एक भी तस्वीर न थी जिसमे सभी शामिल हो. संजीव ने भी सभी को एक क्रम में पीछे खड़ा करने के बाद कुछ दुरी से 3-4 तस्वीरें उतारी. यहाँ जल्द हे माहौल पूरी तरह से बदल गया था.
"दादा जी आप और छोटे दादा जी भी बैठिये इधर अब.", अलका ने अब रामेश्वर जी को भी इस तस्वीर के खेल में शामिल कर लिया. दोनों बुजुर्ग dost-bhai इन बचो के सान्निध्य में मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवाने लगे. दृश्य कुछ ज्यादा हे बदल गया जब नरिंदर जी ने सभी को हटा कर अपने पापा और चाचा के साथ खुदकी तस्वीर खिंचवाई, दोनों कुर्सियों के बीच हाथी पर बैठ कर.
"आओ अब तुम भी आ जाओ Shankar-Umed.", छोल साहब ने इन दोनों को भी बुला लिया था और इस बार संजीव भैया को ऋतू ने इन सबके सामने बैठने का कह कर ये तस्वीर खींची. सिर्फ यही परिवार उपस्थित था और आगे तब तक ये दौर चलता रहा जबतक रील ख़तम हे न हो गयी. सबसे बड़ी तस्वीर खुद ऋतू ने खींची थी जिसमे पंडित जी का सम्पूर्ण संसार था, सिवाए Preeti-Arjun और तस्वीर खींचने वाली ऋतू के.
"चलो भाई अब चलते है घर वापिस, जाने में 2 घंटे तोह लगेंगे हे.", रामेश्वर जी ने जैसे हे चलने का आदेश दिया अब किसी ने भी इंकार न किया. इस घरेलु समारोह से सभी खुश हो चुके थे बस कोमल के चहरे पर आज कुछ गहरी सोच थी जिसको कृष्णा जी ने तुरंत पकड़ लिया.
"कोमल, क्या हुआ बेटी तू गुमसुम क्यों हो गयी एकदम से?", ये बात रेखा जी और ललिता जी ने भी सुनी तोह वो भी कोमल की तरफ देखने लगी.
"इसका लाडला भाई नहीं था न उस बड़ी तस्वीर में तोह भावुक हो गयी लगता है.", शालिनी बुआ से इस जवाब की उम्मीद वह किसी को भी न थी लेकिन कोमल के चेहरे के पर मुस्कान के साथ साथ 2 आंसू भी आ गए. कृष्णा जी ने अपनी भतीजी को अपने सीने से लगते हुए लाड किया तोह कोमल ने तुरंत चेहरा साफ़ कर लिया.
"सही कहा शालिनी तुमने. कोमल के लिए अर्जुन हे सबकुछ है और जहाँ ऐसे पूरा परिवार साथ हो लेकिन जान से प्यारा भाई हे बाकी रहे तोह कमी तोह महसूस होती हे है. कोई बात नहीं बीटा, शादी से पहले और शादी वाले दिन बड़े कैमरा से इतनी तस्वीरें उतरवाउंगी न पूरे परिवार की तुम ये वाली बात कभी याद हे नहीं करोगी. मुझे भी कमी लगती है मेरे बेटे की लेकिन तू दिल छोटा न कर इतनी सी बात पर.", कृष्णा जी ने इस बार कोमल को अपने साथ हे सीट पर बैठाया था और शालिनी बुआ को भी bhai-behno की ये चाहत देख दिल में वही दर्द सा उठा लेकिन वो तुरंत हे संभल गयी.
"अर्जुन को यहाँ मौजूद सभी लोग याद कर रहे है भाभी और अभी तोह घर से दूर हमे आधा दिन भी नहीं हुआ.", शालिनी अपनी भाई की कार में बैठने की जगह कृष्णा जी की बगल में हे आ बैठी. नरिंदर जी की बगल में रेणुका थी अब. सारा सिस्टम बदल चूका था जैसे जिसको जहा सीट दिखी वो उस कार में बैठ गया.
"याद उसको किया जाता है शालिनी जो दूर हो. अर्जुन यहाँ न हो कर भी सबके साथ है और रही बात आधा दिन की तोह यहाँ जितने भी है उनका वो आधा दिन काम से काम एक पल अर्जुन के साथ होता है. वो भी शामिल हो जाता जोर देने पर लेकिन ऐसा करना भी किसी को पसंद नहीं. वैसे तुम मिली हो ाचे से अर्जुन से अभी तक?", कृष्णा जी के इस सवाल पर शालिनी को ये गुजरी रात याद आ गयी. अब वो क्या कहती की कितने बरसो बाद उसके दिल को भी सुकून अर्जुन की बाहों में मिला था.
"हाँ थोड़ी बहोत बात तोह हुई है मेरी अर्जुन से कल. आज भी इधर वाले घर हे रुकना है तोह थोड़ा समय और मिलूंगी. ाचा लड़का है भाभी और आपकी बात भी सही है. जो साथ हे है उसको क्या भूलना और क्या याद करना. वैसे कोमल का तोह शायद सबसे ज्यादा हे गहरा लगाव है अपने छोटे भाई से.", इस बात पर कोमल मुस्कुराती हुई खिड़की से बहार देखने लगी.
"सारा दिन तोह लिए फिरती थी ये अपने ारु को. जब ऋतू थोड़ी समझदार हुई तोह वो अर्जुन के साथ और ये उन दोनों के. कितने बरस तक तोह ये उसको गॉड में बिठा कर खुद हे खाना खिलाती रही. बचपन में उसकी शैतानियों के पीछे अनगिनत बार दांत खायी लेकिन कभी अपने ारु पर बात न आने दी. प्यार तोह अर्जुन को सबने हे किया है शालिनी लेकिन मेरी इस पारी की जान उस ारु नाम के तोते में बसी है.", कृष्णा जी इतना कुछ कह रही थी तोह नरिंदर जी कहा चुप रहते. कार अपनी रफ़्तार से हाईवे पर दौड़ने लगी थी.
"हाँ सिर्फ कोमल की हे जान है वो शालिनी. तेरी भाभी ने तोह खामख्वाह हे 18 साल उसके जन्मदिन पर व्रत रखे है. जब भी यहाँ आती थी एक दिन उस से अलग न सोई ये कभी. और तोह और जब शहजादा मामूली सी बात पर हॉस्पिटल भर्ती हुआ तोह इतनी देर तंसुए (आंसू) बहाये जितने उसको छुट्टी न मिल गयी. बात करती है कोमल की जान अर्जुन में बसने की. वो शैतान भी अब मेरी लुगाई पे कब्ज़ा जमाये बैठा है, माँ माँ की ृत्त लगा कर.", ये सब नरिंदर जी मस्ती में कह रहे थे और बाकी सबके चेहरे पर बस मुस्कराहट थी.
"वैसे एक रेणुका हे है जिसके साथ अर्जुन का इतना व्यवहार नहीं है.", कृष्णा जी ने ये बात तोह इस मकसद से कही थी की रेणुका भी कुछ बोले लेकिन जो रेणुका ने एकदम से जवाब दिया उसकी उम्मीद कोमल ने भी न की थी.
"अर्जुन का व्यवहार मेरे साथ भाभी? मुझे नयी ज़िन्दगी देने वाला अर्जुन मेरे लिए क्या मायने रखता है इसका जवाब मैं चाह कर भी नहीं दे सकती. जितनी परवाह अर्जुन ने मेरी की है और करता है वो बोल कर मैं उसका अपमान नहीं कर सकती.", कहने को तोह रेणुका ये सब कह गयी लेकिन फिर तुरंत हे सेहम गयी जब बगल में अपने बड़े भाई को हैरानी से अपनी तरफ देखते पाया. कोमल ने कुछ सोच कर तुरंत हे बात संभल ली.
"बुआ के साथ बहोत बुरा हो सकता था चची लेकिन अर्जुन ने इनकी िज्जात्त और ज़िन्दगी बचते हुए 2 बड़े क्रिमिनल्स को मरने की हालत में हॉस्पिटल पंहुचा दिया. थोड़ा वो भी जख्मी हुआ था उस वक़्त और एक बार बुआ के एक्स हस्बैंड के जीजा ने इनके साथ वैसी हे हरकत दोहरानी चाहि थी जब ये ससुराल की रिश्तेदारी में शादी में गयी थी. वह भी अर्जुन सही समय पर पहुंच गया था. अभिमन्यु नाम था न बुआ उस आदमी का?", कोमल ने जैसे हे ये राज खोला तोह नरिंदर जी का सीना चौड़ा हो गया अपने भतीजे की मर्दानगी पर.
"फ़र्ज़ है उसका और chot-vot लगती रहती है इस सब में. रेणुका, तुम्हे ये अभिमन्यु वाली बात पापा को बतानी चाहिए थी. खैर ाचा लगा ये जानकार की वो स्थिति संभाल सकता है.", नरिंदर जी अपने जज्बात खुलकर जाहिर न करते हुए अब इस अभिमन्यु के बारे में सोचने लगे थे. उनकी बहिन की िज्जात्त पर हाथ रखने वाले को अर्जुन द्वारा दी गयी सजा से संतोष नहीं मिला था.
"इन्दर भैया, भूल जाइये न. वो अब हमारे जीवन में दूर दूर तक नहीं हैं.", रेणुका ाचे से समझती थी शंकर और नरिंदर को. इनकी ये ख़ामोशी बहोत कुछ बता देती थी जो इनके करीब होता था. नरिंदर जी मुस्कुरा उठे क्योंकि माहौल सचमुच थोड़ा गंभीर हो गया था.
"वैसे सुना तोह मैंने ये भी है के अर्जुन ने आठवीं कक्षा में हे उमेद भाईसाहब को पटखनी दे दी थी.", कृष्णा जी ने मस्ती में ये नया खुलासा किया तोह उनके पति हंसने लगे लेकिन शालिनी हैरानी से देख रही थी. रेणुका आँखों से कोमल को धन्यवाद देती वापिस इस बात की चर्चा सुन्न ने लगी.
"सचमुच ऐसा हुआ था क्या इन्दर भैया? ये तोह पता है की अर्जुन के dharam-pita है उमेद भाई लेकिन ये अखाड़े वाली बात नहीं पता."
"गुड्डी भाभी के बेटे के बारे में नहीं सुना क्या तुमने शालिनी?", नरिंदर जी ने इस व्यक्ति का जीकर किया तोह शालिनी के चेहरे पर घृणा के भाव आ गए.
"वो सरफिरा राक्षश? कमीना सिर्फ इसलिए हमारे गाँव में टिका है क्योंकि वो ताई का पौता है. पता नहीं क्यों चंद्रो ताई के घर में कोई न कोई ऐसा बदमाश हमेशा रहा है."
"वो बिस्टेर पर पड़ा है शालिनी डेढ़ महीने से और डॉक्टर का कहना है के 6 महीने से पहले तोह वो ठीक होने से रहा. सिर्फ यही सुदर्शन के जैसे हे उसके 4 बदमाश साथी भी वैसी हे हालत में है और इस सबके karta-dharta हमारे छोटे साहबजादे अर्जुन जी है. गज्जू एक सुदर्शन को फिर भी संभल ले और शायद मैं भी लेकिन वैसे हे 5 दानव अकेले कोई नहीं संभल सकता. अर्जुन ने फिर भी होश नहीं खोया क्योंकि वो अपनी हद्द पहचानता है. ये भी छोडो, एक बार को तोह शीला काकी वाला वो सांड भीम हे देख लो. उसका गवाह तोह खुद गज्जू है जब उसके पाँव में थोड़े टाइम पहले गोली लगी थी. तब अपने चाचा के चक्कर में अर्जुन ने हे उस सांड को उठा कर ऐसा पटका था की शरीर की एक भी हड्डी साबुत न बची. हाँ बाद में गाजु ने उसके सर में गोली मार कर तड़पने नहीं दिया भीम को.", नरिंदर जी के ऐसे बखान सुन्न कर शालिनी ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया.
"Baap-chacha अपना वक़्त भूल गए. जवानी तोह आप लोगो की थी जहा सब be-lagaam से थे.", कृष्णा जी ने ज्यादा सवाल जवाब करने का मौका हे न दिया किसी को.
"हाहाहा. क्या यार कृष्णा तुम भी. हम मनमौजी थे और लड़ाई झगडे में कभी पड़े हे नहीं. हाँ शालिनी चुड़ैल थी मधु के जैसी, इसके नाखून हम सभी के हाथो पर आज तक छापे होंगे.", वो बातें और दिन याद करके शालिनी के चेहरे पर हंसी आ गयी.
"बहोत ज्यादा हे मस्ती करते थे आप लोग. कृष्णा भाभी सिग्गट की बात छुपाने के लिए इन्दर और उमेद भैया हर बार चाट या चूड़ियों के वाडे करते थे. कितनी हे बार मुझसे हे चिकन बनवाया इन्होने नोहरे में लेकिन काम होते हे ऐसे बेहवे करते थे जैसे मैं बस कामवाली भर हु. खैर मार तोह बहोत खायी है इन्होने मुझसे और मधु से. शंकर भैया हे बस हाथे नहीं चढ़ते थे.", शालिनी एकाएक फिर से भावुक हो गयी थी वो सब याद करते हुए. अज्जू भी तोह था उस यादों की किताब में, उसका सबसे प्यारा भाई जो हमेशा इस बहिन को पलकों पर रखता था. कृष्णा जी भी समझ गयी थी.
"जिस बात को हमने इस कार में बैठते वक़्त कहा था शायद तुम इतनी जल्दी वो भूल गयी शालिनी. जो दिल में है उसको न याद किया जाता है न भुलाया.", कृष्णा जी ने कह तोह दिया लेकिन कार चलते नरिंदर जी की आँखों की नमी भी शालिनी से छुप न सकीय थी.
"पूछो न भाई से फिर आप. इनकी ganga-jamuna की वजह क्या है?", शालिनी तोह तुरंत अपनी आँखें साफ़ कर ली क्योंकि अब वो उन यादों से आहात नहीं होना चाहती थी लेकिन उसको ये भी एहसास हो गया था के अर्जुन ने जो कहा था वो सच हे था. अज्जू के जाने का दुःख शालिनी जितना या उस से ज्यादा हे होगा कुछ लोगो को.
"आँखों में नमी कभी कभी मुस्कुराते चेहरे याद करके भी आती है शालिनी. हाँ मैं हर रोज याद करता हु उस समय को. किसी का कुछ बिगाड़ा भी नहीं था और अपनी दुनिया में हम सब कितने खुश थे. जानती हु आज भी वैसे खुशनुमा माहौल की वजह वही नाम है जिसकी याद कभी दिल से जुड़ा न हुई. लेकिन अतीत में जीवन भर खड़े रह कर मैं वर्तमान में न चल सकूंगा और न भविष्य के लिए तैयार रह सकूंगा. दिल में है और दिल में रहेगा.", नरिंदर जी ने भी चेहरा सही कर लिए था एक मुस्कराहट के साथ.
"वैसे सच कहु शालिनी, आज वाला अर्जुन कहता है के अतीत से अगर कुछ वर्तमान में लाना हो तोह बस वो यादें सँजोनि चाहिए जिसमे फूलो सी महक हो. टूटे हुए मुरझाये फूलो से कभी बगीचा आबाद नहीं होता. कितनी हे बार तोह मैंने शंकर भाई साहब को भी इनके साथ वह पंजाब में ये आंसू बहते देखा है जब छत्त पर दोनों अपनी महफ़िल लगते थे. वो बात अलग है मैंने ये इन्हे आज से पहले बताया नहीं.", कृष्णा जी की बात सुन्न कर नरिंदर जी अपने बालो में हाथ फिरने लगे. जैसे कोई मीठी सी चोरी पकड़ी गयी हो.
"उसके नाम का भी पेग बनाते थे कृष्णा, वो अलग बात है के महाराज शिकंजवी का जग पीने के शौक़ीन थे. अब महफ़िल लगेगी तोह 4 लोग तोह बैठेंगे हे चाहे दिखाई 2 दे. चलो अब ये सब छोडो और ये बताओ के रेणुका की होने वाली बिटिया का नाम क्या रखा जाएगा?", आदतन नरिंदर जी ये भी नहीं देखते थे की वो बहिन के साथ हे मजाक कर रहे है. रेणुका का चेहरा सुर्ख हो गया था उसके गर्भवती होने वाली बात पर.
"वाओ. तोह रेणुका इसलिए सबसे दूर दूर और मेरी चची के पास थी सारा समय. नहीं तोह रेखा भाभी या कृष्णा भाभी के पास. वैसे इन्दर भाई लड़का भी तोह हो सकता है?", शालिनी ने भी रेणुका को घेर लिया.
"रेणुका बुआ भी यही कह रही थी शालिनी बुआ. लड़का हे होगा लेकिन कोई और भी है जो कह रहा था लड़की होगी. वोट 2-2 हो गए हैं इस तरह तोह.", कोमल भी इस मस्ती में शामिल हुई तोह रेणुका ने चेहरे के सामने रुमाल कर लिया.
"बस करो आप सब भी, मेरी ये सबसे छोटी ननद ऐसी हे शर्मीली है. जो भी हो क्या फरक पड़ता है लड़का लड़की से. वैसे वो दूसरा कौन था कोमल?", न न करते हुए कृष्णा जी ने भी रेणुका को फांस हे लिए था.
"क्या भाभी, बस भी कीजिये आप सब. भैया आप बहोत गंदे हो, मैं बात नहीं करती आपसे.", रेणुका शर्माती हुई इन सबसे बचने के लिए गाडी से बहार देखने लगी. शीशे में एक पल शालिनी और रेणुका की नजरे टकराई तोह स्वतः रेणुका ने अपनी लम्बी पलके शर्म से झुका ली जैसे शालिनी के साथ कुछ जुड़ाव हो. समझ तोह शालिनी को भी नहीं आया बस मुस्कुरा दी. ये सफर ऐसे हे चलता रहा.
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अभी 4 बजने वाले थे और एक बेहतरीन लंच करने के बाद अर्जुन प्रीती का हाथ पकडे इस उद्यान में घूम रहा था जहा वो एक बार अपनी माँ रेखा जी के साथ आया था. सिर्फ प्रकृति और दूर जंगल से हिस्से में कुलांचे मारते वो ताम्बे रंग के छोटे बड़े हिरन. रह रह कर अर्जुन इधर प्रीती को अपने आगोश में भर ले रहा था. कभी गाल तोह कभी होंठो को चूमता हुआ वो उसको लिए यहाँ ख़ामोशी में इस घने वृक्ष की छाया में बैठ गया. प्रीती उसकी गॉड में सीने से पीठ लगाया सामने झील और जीवो को निहार रही थी.
"कभी चलेंगे ऐसी जगह अर्जुन जहा सिर्फ हम दोनों और बस नेचर हो. सुकून से तारो की छाव में खुले आसमान के निचे, बस हम दोनों. पता है ये जगह भी काम नहीं अगर बहार वाली तरफ वो पार्क की जगह सिर्फ जंगल होता. थैंक यू सो मच फॉर थिस लवली डे.. उमाठ.", पलट कर इस बात खुद प्रीती ने अर्जुन को चूमा था और अर्जुन उसके उभारो के निचले हिस्से दोनों हाथ बंधे इस एकांत का पूरा लुत्फ़ लेता दिखा.
"चलेंगे जान बस एक बार कॉलेज जाने दो मुझे. मेरा भी दिल है तुम्हारे साथ जिम कॉर्बेट या Nandan-kanan जाने का. वह जब भी वेकेशन होंगी तोह तुम्हे ले कर 2-3 गायब हो जाऊंगा इस दुनिया से दूर. Bheed-bhaad से अलग बस हम दोनों.", अर्जुन के भी अनकहे ढेरो सपने थे प्रीती के साथ. आज का दिन उसके लिए भी जीवन के चुनिंदा सुनहरे पालो में से एक था.
"वाह.. मैं भी ऐसा हे कुछ सोच रही थी. लेकिन मोटरसाइकिल पर तुम्हारे पीछे बैठ कर अनजान सड़क पर कभी पहाड़ो में तोह कभी रेगिस्तान या जंगलो में. कॉलेज वाला प्लान मस्त है वैसे. मेरे तोह 5 साल होंगे और तुम कॉलेज आओगे 2 साल बाद. इस तरह 3 साल तोह कॉमन हे रहेंगे हमारे. बाकी सैटरडे संडे वाला वादा भी है तुम्हारा इन 2 सालो में. शायद तुम्हारे कॉलेज से पहले हे हम 10-12 बार तोह ऐसा कर हे लेंगे."
"मुझे मरवाने का इरादा है क्या? हम दोनों 2 दिन ऐसे कही गायब हुए न तोह थानेदार साहब ने नाकेबंदी करवा देनी है. जो भी करेंगे सही तरीके से करेंगे. मैं यहाँ से स्कूल ट्रिप पर और फिर तुम्हे वह से रनिंग डे ले कर ट्रिप से अलग. उमाह.. वैसे रिस्की भी होगा लेकिन कर तोह लेंगे हे. तुम्हारे 38 जो करने है.", अर्जुन ने इस बार एक उभार दबाने के साथ हे ड्रेस के ऊपर से panty-viheen योनि सेहले तोह प्रीती तड़फती हुई पूरी तरह लेट हे गयी.
"सष्ठ.. गंदे कही के. चलो अब यहाँ से जल्दी. तुम्हारे इरादे न होटल से ठीक नहीं है. कार में भी यही सब कर रहे थे. देखो अब 4 बज चुके है और इस ड्रेस में मैं तोह माँ के सामने जाने वाली नहीं.", प्रीती तुरतं उठ कर एक तरफ भागने लगी तोह अर्जुन भी पीछे दौड़ गया.
"आराम से जान. चलो चलते है घर और बात सही है. बाकी सबको तोह ये कह दूंगा के लंच के लिए बहार गए थे पर आंटी या दादी ने हम दोनों को ऐसे देखा तोह समझ लो मैं गया. अगर वो लोग आ चुके होंगे तोह मैं तुम्हे तुम्हारे घर के बहार उतार कर आ जाऊंगा नहीं आये होंगे तोह कोई टेंशन नहीं."
"फत्तू हो पूरे के पूरे. ये नहीं बोल सकते थे की मेरे साथ अंदर चलोगे जिस से माँ मुझसे सवाल हे न करे.", प्रीती ने मुँह बनाते हुए कहा तोह अर्जुन ने फिर से हाथ थाम लिया.
"मजाक कर रहा था. वैसे भी आंटी को तोह ाचा हे लगेगा जब हम दोनों को साथ देखेंगी. चलो बैठो.", कार में बैठते हुए भी अर्जुन शैतानी से नहीं हटा. प्रीती के कूल्हों पर चपत लगता वो तुरंत अपनी तरफ आ बैठा.
"बाज आ जाओ मर अर्जुन शर्मा. ये मस्ती मजाक भारी पड़ जायेगा अगर मैं अपने वाली पर आयी. जानते हो न मुझे ज्यादा कुछ करना भी नहीं पड़ेगा फिर चीखते रहना.. ोोू प्रीती ोू प्रीती करते हुए.", इस बार सचमुच अर्जुन अपने बगले झाँकने लगा था प्रीती का गुस्सा देख कर. तुरंत गाडी रिवर्स करता वो mukhya-marg पर बढ़ लिया. प्रीती खिलखिला कर हंस रही थी अर्जुन की हालत पर.
"ोये मेरा प्यारा प्यारा ारु गुस्सा हो गया? सुधरते नहीं हो न इसलिए तुम्हे ऐसे हे समझाना पड़ता है.. उमाहहह.", गाल चूम कर एक पल में हे प्रीती ने वापिस मन लिया अर्जुन को.
"वो बताया था न तुम जब पास होती हो तोह कण्ट्रोल करना मुश्किल हो जाता है. ाचा रात को तुम्हारा क्या प्लान है?", अर्जुन जैसे हे अपने सेक्टर की सड़क पर दाखिल हुआ 3 jaani-pahchani करो से घिर गया. प्रीती का ध्यान नहीं था उधर तोह वो वैसे हे बोलने लगी.
"ऋतू दीदी और अलका दीदी आज मेरे कमरे में सोने वाली है. शायद आरती और तारा भी आ जाये.", अर्जुन के चेहरे के उड़ते रंग देख प्रीती को कुछ समझ न आया लेकिन नजर आगे चलती टाटा सिएरा पर पड़ते हे उसकी भी हालत वैसी हे हो गयी.
"फस्स गए. ऐसी किस्मत लिखी है अपनी? कही और मदद लो अर्जुन, उस गाडी में दोनों दादा जी और दादजी है."
"नहीं घुमा सकता डार्लिंग. थानेदार जी के काफिले के बीच फंस चुके है. अपनी तरफ देखो जगह ऋतू पापा के पीछे बैठी इशारे कर रही है.", प्रीती इतना सुन्न कर हिम्मत न कर सकीय क्योंकि उस तरफ उसके ससुर थे और वो मुस्कुरा रहे थे इन दोनों को देख कर. पिछली 2 कार भी इनके हे घर की थी.
"सुनो, नेचुरल हे रहना और यही सभी गाड़ियां हमारे घर रुकने वाली है तोह मैं तुम्हारे घर के सामने रुकूंगा."
"रहने दो अब इतना मैट सोचो. सब अपने हे हैं और इनसे नहीं भाग सकते. लंच करने गए थे तोह गए थे.", प्रीती ने इस बार पलट कर ऋतू की तरफ हाथ हिलाया तोह ऋतू ने गॉड का इशारा किआ जैसे बचा खिलने को कह रही हो. अर्जुन तोह बुरी तरह सकपका गया ये देखते हे. प्रीती ने शंकर जी का ध्यान सामने देख आँख मार दी जैसे उसको समझ आ गया हो.
"रुकना मैट अर्जुन और गली से अपोजिट कार घुमा लेना. 'ह' को आकांक्षा के घर से ले कर चलेंगे इतने सभी अंदर जा चुके होंगे.", अर्जुन तोह हैरान हे रह गया इन दोनों का taal-mel देख कर. ऋतू के दिमाग के आगे सचमुच सभी फ़ैल थे. गली में जैसे हे सभी कार घूमी अर्जुन इंडिकेटर देता दूसरी तरफ चल निकला.
"थैंक गॉड. मुझे तोह कुछ और हे लगा था ऋतू का इशारा देख कर."
"हाहाहा.. बुद्धू हो पूरे", प्रीती की बात सुन्न कर अब ये नयी समस्या आ गयी थी. आकांक्षा नाम की ये बिजली कब टकरा गयी प्रीती के साथ? गाडी धीमी गति से आकांक्षा की गली में आयी तोह अर्जुन असहज होने लगा. वो आकांक्षा की भी पूरी परवाह करता था और इस वक़्त वो अपनी प्रेमिका के साथ उसके घर जा रहा था जो उस से दिलो जान से प्यार करती थी दोस्ती का दिखावा करती.
"जाओ ले आओ 'ह' को. मैं यही इन्तजार करता हु.", अर्जुन का ऐसा जवाब सुन्न कर प्रीती हैरत से देखने लगी.
"साथ चलो तुम भी. तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड है और आंटी तोह जितना gunn-gaan तुम्हारा करती है मुझे तोह लगता है तुम दोनों पक्के दोस्त नहीं होते तोह वो तुम्हे दामाद बना लेती. चलो अब अंदर चुपचाप.", प्रीती की बात सुन्न कर अर्जुन हिचकिचाता हुआ उसके साथ हो लिया. ये सुन्दै काले लिबास में केहर धा रही थी और जो अंदर थी वो भी अलग हे खूंखार बिल्ली थी आतंरिक पालो में.
"ओह मेरी बची. शुक्र है तुम आयी तोह सही.", सुषमा जी ने अभी सिर्फ प्रीती को हे देखा था और इस घर में ऐसे परिधान कोई बड़ी बात न थी. लेकिन जैसे हे नजर अर्जुन पर पड़ी वो प्रीती को छोड़ बड़ी गर्मजोशी से अर्जुन के गले जा लगी. उसको अपने साथ लगाए वो हॉल में आयी तोह आकांक्षा भी उछलती सी प्रीती से गले लग कर मिली. सुषमा जी के एक तरफ हटने पर यही सलूक अर्जुन के साथ हुआ.
"बच्चू अब आये हो तुम हमारे घर. माँ इन दोनों को आज डिनर के बिना जाने नहीं देना.", प्रीती तोह हंस रही थी लेकिन अर्जुन जो पहले से सुषमा जी के ठोस बड़े उभारो से गुमसुम था अब आकांक्षा की हरकत से बिलकुल सुन्न हो चूका था.
"आज नहीं आंटी जी लेकिन जल्दी हे मैं आकांक्षा के पास रात भी रुकूंगी. घरवाले भी अभी बहार से आये है और कुछ गेस्ट्स भी है तोह आज के लिए सॉरी. हाँ अंशु को मैं ले जाती हु अपने साथ.", अर्जुन को तोह ऐसे दृश्य की उम्मीद हे नहीं थी. कहा तोह वो इस घर की आँखों का तारा था और यहाँ सारा प्यार प्रीती लूट रही थी.
"हाँ तोह मैं बोर हे हो रही हु और ये भी कौनसा आता है मुझसे मिलने. शादी न हुई कोई महाभारत हो गयी.", अभी ये बातें हे कर रहे थे और बुआ सबके लिए शरबत ले आयी. 'ह' भी कालीन पर kood-faand कर रहा था जिसको प्रीती ने तुरंत लपक लिया.
"अर्जुन, कल टाइम मिले तोह एक बार आ जाना 10 बजे के बाद. तुम्हारे अंकल ने कुछ डिसकस करना है तुमसे.", सुषमा जी ने अर्जुन को अपने बगल में बैठने की चेष्टा की तोह ाकनसक्षा ने माँ को घूरते हुए अर्जुन को अधिकार से अपने साथ हे बड़े सोफे पर बैठा लिया.
"कैसे नहीं आएगा ये मैं भी देखु. और हाँ कल तोह पूर्वी दीदी भी ब्रेकफास्ट पर आ रही है.", प्रीती आकांक्षा की दूसरी तरफ आ बैठी उस पिल्लै को गॉड में लिए.
"हाँ तोह आ जाऊंगा आंटी जी. वैसे भी पूर्वी दीदी से परसो मिलना हे था तोह कल मिल लूंगा. तुम्हे कोई जरुरी काम है.", अर्जुन ने आकांक्षा को अपने साथ चिपक कर बैठते देख पुछा.
"कल हम लेहंगा सिलवाने देंगी तोह 5-6 दिन तोह लगेंगे हे न? तुमने अंशु को बोलै था वेडनेसडे जाने का.", प्रीती के याद दिलाने पर अर्जुन ने झिझकते हुए शरबत का गिलास उठा लिया.
"हाँ चलते है कल. मुझे वैसे भी कोई काम नहीं है.", अर्जुन ने अपनी ज़िन्दगी में आयी हर लड़की के बारे में कोमल दीदी को बताया हुआ था लेकिन आकांक्षा का जीकर ऋतू और प्रीती से वो कभी न कर सका था. आज मैं थोड़ा व्यथित होने लगा था उसका. कुछ पल साथ बिताने के बाद ये तीनो हे लोग बहार निकल आये तोह प्रीती ने आकांक्षा के लिए खुद हे पिछले दरवाजा खोला. तीनो बैठ चुके तोह अर्जुन ने कार आगे बधाई.
"इतनी प्यारी लड़की का प्रोपोज़ तुमने रिजेक्ट करने की हिम्मत कैसी की अर्जुन?", इतना सुनते हे अर्जुन की रीढ़ से भी पसीना निकल गया. प्रीती ने वो सवाल कर दिया था जिसका दूर दूर तक वो अंदाजा न लगा सका. कार के अंदर जैसे मौत हे पसर गई थी.