Incest Pyaar - 100 Baar - Page 30 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

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अपडेट 153 (स)

अंतर्मनन और प्रेम (2)


बाथरूम के दरवाजे से खुद को निहारती उन निगाहो ने प्रीती को सिमटने पर मजबूर सा कर दिया. घुटनो की लम्बाई तक का वो जिस्म से चिपका पारदर्शी वस्त्र असफल रहा इस अपरोदिते के मादक सुंदरता को छिपाने में. गोरी लम्बी और सुडोल टाँगे आपस में सत्ता कर प्रीती जांघो के बीच छिपे उस खजाने को अर्जुन के नजरो की तपिश से भरसक बचा रही थी.

कटाव लिए वो उन्नत नितम्भ इस प्रयास में और उभर कर अपना सौन्दर्य प्रदर्शित करने लगे. अर्जुन 8 फ़ीट दुरी से अपलक प्रीती को ऐसे देख रहा था जैसे अपनी हे किस्मत से रश्क हो. अप्रतिम सौन्दर्य के साथ वो मासूमियत भरा खूसबसुरत तराशा चेहरा. ऐसी प्रेयसी के लिए तोह इंसान देवता से भी टकरा जाए. प्रीती के वो गुलाबी आधार कुछ कहने के लिए जरा सा फड़कने हे लगे थे और अर्जुन की आवाज ने वो पल वैसे हे रोक दिया.

"तुम्हारी ख़ूबसूरती का बयान करके मैं गुस्ताख़ नहीं कहलाना चाहता. हर कानन में जैसे बस तुम्हारा समावेश है प्रीती. अपने आसपास हे देखो, इस दृश्य को जिवंत करने वाली सिर्फ तुम हो. ये पानी भी तुमसे लिपट कर तुम्हारा हो गया और फैली हुई महक भी. मैं नहीं जानता की हम बचपन में क्या थे लेकिन उस गुड़िया से मेरा जहां था और तुमसे जीने की सांस. मैं भी तुम में मिलना चाहता हु प्रीती, जिस से मेरा अस्तित्व तुम्हारे साथ ho.",Arjun के अल्फाज कहने भर को जुबान से निकल रहे थे. प्रीती ने हाथ फैलते हुए अर्जुन को आने का इशारा किया और कुछ कदम चलता वो एक बार फिर से प्रीती को बाहों में भरता हुआ उसको अपने सीने पर लिटाये था.

"प्रीती अर्जुन शर्मा का वजूद भी आपकी इनायत से है मालिक. कुछ ज्यादा हे गहरी बातें नहीं करने लगे? कहने की जगह बस प्यार करो. आज कोई डर नहीं कोई बंदिश नहीं.", प्रीती ने वो झीना वस्त्र निकलने की कोशिश की तोह अर्जुन ने होंठ चूमते हुए उसके दोनों हाथ पकड़ लिए.

"जिस्म से प्यार नहीं है प्रीती, आत्मा से है. लेकिन जानता हु तुम्हारी बहोत अनदेखी हो चुकी है और आज मेरे जिस्म पर तुम्हारा हक़ सौंपता हु.", अब भी अर्जुन खुद पहल करने की जगह कमान प्रीती के सुपुर्द कर रहा था. प्रीती को तोह वस्त्र उतरने से उसने रोक लिया लेकिन खुद प्रीती ने हे उसकी निक्कर सरकते हुए टब से बहार फेंक दी.

"आगे क्या इरादा है जान?", प्रीती दोनों तरफ पाँव फैलाये जैसे अर्जुन को उकसा रही थी और पानी के अंदर निर्वस्त्र लिंग उसकी चिकनी गोलाइयों की तलहटी में फडकता हुआ निमंत्रण स्वीकार करता दिखा.

"उफ़... तुम शैतान हो पूरी..", अर्जुन ने इस एहसास से एक पल आँखें बंद की और फिर कांच की वो बड़ी बोतल खोलते हुए गुलाबी वाइन प्रीती की गर्दन से गिरते हुए टब में घोलने लगा. एक पल तोह ये नया एहसास प्रीती को भी कामुक लगा लेकिन तुरंत बोतल हाथ से लेते हुए उसने अपने होंठो पे लगा ली. एक घूँट मुँह में भर कर अब वो ये तरल अर्जुन के चौड़े सीने पर गिरती उसके होंठो के करीब आ रुकी. पलके झपकाती प्रीती की इस अदा पर अर्जुन भी पीछे न हटा. इस बार के चुम्बन में अलग कशिश थी. होंठो को खोल कर एक दूसरे का रास चुसकते हुए वो कही ज्यादा मदहोश हो चले.

"उह्ह्ह.. मुझे बिस्टेर पर ले चलो अर्जुन.", प्रीती की नीली आँखों में अलग हे ऊष्मा थी और काम्पटी आवाज गुहार लगा रही थी की अब वो bandan-mukt होना चाहती है. सर्वस्व एक दूसरे को समर्पित करते हुए. वो बड़ी बोतल भी अब टब में कुछ पल तैरने के बाद डूब चुकी थी. बड़ी कुशलता से उस गोर गुलाबी बदन को बाहों में उठाये अर्जुन धीमे कदमो से अपनी मेहबूबा को लिए चल दिया.

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इस विशालकाय प्राचीन मंदिर में आज कही भारी जमघट लगा था. एक खाली मैदान सिर्फ गाड़ियों से भरा था जहा सुरक्षा के पूरे इंतजाम थे. हर तरफ लोगो का जमघट और मंदिर के प्रांगण में गूंजती मंत्रोचारण की आवाज. एक सामान्य मंगलवार की सुबह किसी पर्व में तब्दील हो चुकी थी. Mantri-santri से ले कर जाने कितने हे गणमान्य व्यक्ति यहाँ pooja-paath में शामिल थे. पंडित जी के परिवार के साथ साथ उनके सभी शुभचिंतक शामिल थे और आज के सभी कार्य में संजीव, माधुरी को प्रमुख रखा गया था.

सिन्दूर चढ़ी बालाजी की विशाल प्रतिमा के सामने बड़े बड़े थाल लड्डू से भरे थे और कितने phal-phool का भोग लगाया गया था. घर का हर सदस्य इस मांगलिक कार्यक्रम में दिल से शामिल था. किसी के चेहरे पर कुछ अलग भाव न थे सिवाए निष्ठां और प्रार्थना के. 6 बजे करीब शुरू हुआ ये mangal-gaan अगले डेढ़ घंटे तक निरंतर चलता रहा.

आरती के समय हर व्यक्ति सर ढके वही दोहरा रहा था जो पुजारी जी गए रहे थे. माहौल हर तरह से असीम आनंद और ऊर्जा से भरा था जहा बारी बारी से हर व्यक्ति आरती का थाल से लौ ले कर नतमस्तक हो रहा था.

"प्रभु हमेशा समस्त जनन पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखे. जिस seva-bhaav से आज प्रार्थना की गयी है, प्रभु उसको पूर्ण करे. रामेश्वर जी, आप दोनों बचो के हाथो प्रभु चरणों में अर्पित प्रशाद का भोग उपस्थित गांव को करवाए.", ये पुजारी बुजुर्ग होने के बावजूद तेज से परिपूर्ण थे. उनकी बात सुन्न कर तुरंत हे संजीव के pita-chachao ने वो बड़े बड़े थाल उठा लिए. मंदिर प्रांगण में उपस्थित सभी को प्रशाद देने के बाद वो लोग बहार निकले तोह पिता की आवाज सुनी.

"इस काम में सभी बचो को भी शामिल करो. धर्मवीर भाई, आप भी भेज दीजिये मरीना, अवि और गुड़िया को. रुचिता बिटिया तुम भी रेणुका, शालिनी के साथ सभी को phal-prashaad दो. ये कार्य सभी के लिए है सिर्फ भजन (कम) को छोड़ कर. इन्हे तोह यहाँ भी अपनी बहिन के पल्लू से बंधे रहना है.", रामेश्वर जी की बात पर तुरंत अमल हुआ हंसी के थःके के साथ और भजन जी भी झेंपते हुए अपनी दीदी (कौशल्या) के साथ सेवा में जुट गए.

"पंडित जी, आपने तोह कहा था पारिवारिक लोग होंगे. यहाँ 150 से ऊपर आमंत्रित है.", बड़े सांगवान जी नंगे पाँव हे पंडित जी के साथ चलते हुए बहार निकल रहे थे. उनके साथ हे कुन्दनलाल जी अपने दोनों भाइयो के साथ थे और छोल साहब भी.

"डॉ साहब, अपने पंडित जी का परिवार हे तोह है ये. हाँ इनके नवाब नहीं है नहीं तोह 150 भी 251 हो जाता.", कुन्दनलाल जी की बात पर सभी के चेहरों पर हंसी आ गयी. सांगवान जी को भी ख़ुशी थी की पंडित जी की नजर में हर व्यक्ति जो उनसे जुड़ा था वो परिवार के सदस्य सामान था. प्रांगण से बहार आते हे मुलाकात हुई आचार्य प्रमोद शास्त्री जी से. ये भी अपने पूरे परिवार के साथ पधारे थे.

"लो अब 251 को 1008 कर लो सभी. बहोत ख़ुशी हुई शास्त्री जी आपको यहाँ देख कर.", रामेश्वर जी पूर्ण िज्जात्त और मान देते हुए इनसे मिले थे और आचार्य जी ने भी उनसे गले लगने के बाद वैसा सभी के साथ किया.

"आपके darshan-abhilashi है हम पंडित जी और आपने इतने मान से हमे घर आ कर आमंत्रित किया तोह gair-haajir होने का जोखिम नहीं उठा सकते. वैसे आप शायद अर्जुन के नाना जी होंगे.", कुन्दनलाल जी तोह हैरान हे थे इन महानुभाव को अपने सामने साक्षात् देख और उनके सवाल पर बस हाँ में सर हिला पाए.

"अरे कुंदन भाई, ये कहने को हमारे मित्र है लेकिन इनके यहाँ होनी की वजह वही नाम है जिसको आपके साथ जोड़ रहे है. शास्त्री जी, जब आप और अर्जुन एक दिव्या रिश्ते में बांध हे चुके है तोह आप हमारे भाई हुए. घर में पर्व साथ मिल कर हे मनाया जाता है.", इस चर्चा के साथ हे सभी का आपसी परिचय हुआ और टहलते हुए वो लोग मंदिर का जायजा भी लेने लगे.

"तुम प्रिंसेस हो न?", मरीना यहाँ ऋतू के साथ शामिल हुई थी सबको phal-prashaad बांटने में और जैसे हे हिमानी ऋतू से गले लग कर मिली तोह उसके चेहरे को देख कर मरीना के मुँह से न्यास हे निकल गया. उतनी हे हैरान हिमानी भी थी की ये लड़की देसी है या जो दिख रही है वही है.

"यार मैं तोह थोड़े समय पहले हे ज़िंदा हुई हु लेकिन तुम कोई रुस्सियन प्रिंसेस जरूर लगती हो. मेरी हस्की आईज देख कर ऐसा कहा न? ऋतू और प्रीती ने मेरी ऐसी आँखें कर दी.", इस बात पर जहा ऋतू जोरो से हंसने लगी थी वही मरीना थोड़ा शर्माने लगी.

"हिमानी शास्त्री, अर्जुन की बहिन.", हिमानी ने हाथ बढ़ाते हुए अपना परिचय दिया और मरीना ने भी नजाकत से हाथ मिलाया.

"मरीना सांगवान, अर्जुन की बहिन.", इस बार दोनों ख़ुशी से मुकुरै और दुगने जोश से सभी लोगो में शामिल हो गयी. कुछ लोग बड़े मैदान में लाल लम्बी दरिया बिछा रहे थे और परिवार की महिलाये मंदिर के एक तरह बन रहे भोजन के बड़े बड़े patilo-kadhai का निरिक्षण कर रही थी. सबकुछ एक गजब taal-mel के साथ हो रहा था.

सभी लोगो को भोजन कारवां के बाद vasta-daan भी किया जाना था और उसके बाद गरीब बस्ती में भी ये खाना पहुंचाया जाना था. अंदर जहा माहौल इतना hara-bhara था वही इसके बहार suraksha-karmiyo की हवा टाइट थी. इतने बड़े बड़े लोग और प्रमुख हस्तिया उपस्थित थी यहाँ और एक छोटी सी चूक भी घातक हो सकती थी. लेकिन इनसे कही ज्यादा चौकस थे अंदर आने के द्वार पर खड़े सांगवान जी के 2 ख़ास श्वान, मिली और तीसों.

"भाई, आज पहली बार अपने साहब को काम करते देख रहा हु. तुम किसके साथ हो?", एक सुरक्षा वाला अपने करीब खड़े दूसरे वाले से पूछ रहा था.

"कम साहब के साथ और वो अक्सर ऐसे काम तभी करते है जब उनकी ये दीदी साथ होती है. पूछ हे मत दोस्त क्या ज़िन्दगी है अपनी. ऐसे काम हे क्यों करते है ये बड़े लोग जिस से इनकी जान को खतरा होता है.", ये दूसरे वाला थोड़ा रुखा था अपनी दिनचर्या से.

"मित्र, ये लोग बड़े काम न करे तोह हजारो लोग बेरोजगार हो जाए. किसान, बचो, युवको को रोजगार, पैसा और शिक्षा न उपलब्ध हो. मैं भी एक कारोबारी का बॉडीगार्ड हु और उनके पास 1500 परिवार पालते है. लोग समझते नहीं की इंसान बड़ा क्यों है क्योंकि वो उसकी आलिशान ज़िन्दगी और दौलत देखते है. खतरा उन लोगो से होता है जो लोगो की भलाई नहीं चाहते, लालची होते है या उन्हें गलत तरीके से बड़ा bann-na होता है.", ये सुरक्ष कर्मी मुस्तैद भी था और समझदार भी. बाकी दोनों को अपनी गलती का एहसास हुआ.

"हाँ भाई मेरे घर भी चूल्हा इनके यहाँ नौकरी करने से जलता है. Holi-diwali भरपूर िज्जात्त के साथ उपहार भी देते है. बस एक तरह की दिनचर्या से दिमाग खराब हो हे जाता है.", सबके अपने दुःख और अपनी शिकायते थी लेकिन यहाँ खुद रामेश्वर जी इन्हे प्रसाद देने आये तोह उस समझदार व्यक्ति ने अपनी बन्दूक को लॉक लगते हुए दिवार पर रखा और पंडित जी के चरण स्पर्श करने के बाद प्रसाद लिया.

"कैसे हो मलकीत बीटा? आज भी नियमो के पक्के हो ये देख कर ाचा लगा. अपनी roji-roti को ऐसे हे मान देते रहना.", रामेश्वर जी के मुँह से ये लफ्ज़ सुनते हे मलकीत ने दोनों हाथ जोड़ दिए.

"जिस दिन गलती हुई उस दिन इसको फिर से हाथ नहीं लगाऊंगा पंडित जी. आपकी मेहरबानी से ghar-pariwar संपन्न है और नौकरी ने भरपूर maan-sammaan दिया है. बीटा ंदा में सेलेक्ट हो गया है और ट्रेनिंग जाने से पहले एक बार आपसे मिलवाने की चाहत है."

"हम मिलने खुद हे आ जायेंगे भाई. सतीश को ख़ुशी होगी ये जान कर, उसको भी साथ ले कर आयंगे.", रामेश्वर जी चाँद शब्द कहने के बाद आगे बढ़ गए. जीवन का सही अर्थ बाकी दोनों व्यक्तियों को अभी पता चला था. करम और ईमान सर्वोपरि है. वही आज दूसरी तरफ माहौल पूरी तरह बदल चूका था.

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"मुझे पता है की तुम्हारी क्या चाहत है प्रीती. आज तुम्हे मैं ठीक वैसे हे अपनांना चाहता हु जैसे तुम चाहती हो.", प्रीती अपनी माँ के कमरे में अब बिलकुल विपरीत अवस्था में थी और जो अर्जुन कर रहा था उसको देख कर शर्म के साथ हे गर्व भी कर रही थी. वो लाल साड़ी की चुन्नटते बनता हुआ अर्जुन अपने हाथो से हे प्रीती की दैविक काया को सजा रहा था. प्रीती के अंगवस्त्रो से ले कर हरेक वस्त्र खुद अर्जुन ने पहनाया था और अभ भी वो उसकी गोरी पतली कमर पर, नाभि से निचे साड़ी की प्लेट्स बना कर जिस तरह मखमली पेट के अंदर कर रहा था प्रीती को रह रह कर सूख्स्म करंट के झटके लग रहे थे.

"क्या हमारा एकसाथ इन कपड़ो में बहार जाना सही रहेगा अर्जुन?", अर्जुन अब साड़ी पहना चूका था और गले के नेकलेस को सही करता वो अपने हाथो से प्रीती के माथे पर एक छोटी सी लाल बिंदी लगाने के बाद कान की पिछली तरफ नजर टिका लगा चूका था.

"तुम्हारे भगवान् के साथ मेरी कोई गहरी दोस्ती तोह नहीं है लेकिन आज मैं तुम्हारे साथ हे चलूँगा. रही बहत सही या गलत की जैसा तुम्हे गली में देखे जाने की परवाह है तोह कार मैं आँगन में लगा दूंगा. ये लाल चूड़ियां तुम्हे खुद पहन नई है जान. मैं कार लेने जा रहा हु.", अर्जुन ने जाने से पहले रोमिला के कैमरा का एक बार फिर प्रयोग करते हुए प्रीती की वो दिलकश तस्वीर उतार ली जिसमे वो बिना मांग भरे हे दुल्हन लग रही थी.

"अब इन्तजार नहीं हो रहा है अर्जुन, जल्दी आना.", कुछ वक़्त पहले जहा दोनों नग्न बाथटब में एक दूसरे को सेहला रहे थे अब हालत विपरीत हो चुकी थी. अर्जुन उस ताम्बे कुर्ते और सफ़ेद पाजामे में hu-ba-hu पौराणिक राजकुमार सा लग रहा था. आज उसके शरीर की आभा कोई तीसरा देखता तोह यकीन नहीं करता के ऐसा युवक कलयुग में मौजूद हु. वही प्रीती उसके समकक्ष किसी देवी सी दमकती हुई दोनों को एक दूसरे का पूरक बना रही थी.

"चाहता तोह ये हु की तुम्हे बाहों में भर कर इस कमरे में क़ैद राहु. ऐसा भी जल्द होगा प्रीती, तुम हो तोह मेरी हे. अभी आता हु.", अर्जुन चांदी की जारी वाली मोजरी पहने बहार निकल चला तोह प्रीती ने दर्पण में खुद को देखते हुए सिर्फ इतना हे कहा.

'दीदी, आप ने यही चाहा था और देखिये मैं आपके और करीब हो गयी.'

"मैडम, विचारो से बहार आइये और इजाजत हो तोह आपको बाहों में उठा सकता हु?", अर्जुन जल्द हे वापिस आ गया था लेकिन इतनी देर से प्रीती अपने हे विचारो के मंथन में डूबी हुई थी. कुछ समझती उस से पहले हे अर्जुन उसको बाहों में उठाये हॉल से निकल कर कार तक चला आया. प्रीती की आंखें कार को देखते हे फैल हे गयी. कौनसा ऐसा खूबसूरत फूल होगा जो उस काली कार पर सुसज्जित न था. अर्जुन ने इसके बाद प्रीती को पिछली सीट पर बैठाया तोह वो हैरानी से देखने लगी.

"अपनी बीवी को ले जा रहा हु उसके घर से, ऐसे तोह नहीं ले जा सकता न.", अर्जुन ने जबसे प्रीती का श्रृंगार किया था एक भी ऐसी हरकत न की थी जिसमे उसके चूमा हो या किसी अंग को सहलाया हो. प्रीती अवाक सी बस ये देख रही थी की आज अर्जुन के तरकश में ऐसे कितने तीर है जिनका उसको पता हे नहीं. वो अपनी सोच से तभी बहार आयी जब कार मुख्या सड़क पर सरपट दौड़ने लगी. सुबह के 7 बजे माहौल शांत था और अभी तक सूरज का ताप आंदोलित नहीं हुआ था.

"ी लव यू मर शर्मा. सोच रही थी की आज कुछ भी ऊंच नीच की तोह तुम्हे कच्चा चबा जाउंगी. पता होता की तुम इतना ख़याल रखने वाले हो तोह वो सब बाथटब में नहीं करती.", प्रीती की बात सुन्न कर अर्जुन पीछे देखने वाले आईने में मुस्कुराते हुए बोलै.

"अभी तोह दिन ठीक से शुरू भी नहीं हुआ मरस शर्मा. सेकंड वाइफ के लिए अभी बहोत कुछ बाकी है. वैसे जितना तुम्हे देखता हुआ उठा हे अधिक पाने की चाहत बढ़ रही है. ज़िन्दगी में बस इतना याद रखना की दूसरी पत्नी जरूर कहा है लेकिन दोनों में कोई अंतर नहीं."

"इसलिए हर याद संजो रहे थे? वैसे तुम अभी पिछड़े हुए हो शर्मा जी, कैमरा की तस्वीर डेवेलोप करने से रहे. मेरे पास हमारे वीडियो है जो मेरी बड़ी बहिन की फरमाइश थी. घबराना नहीं, इरेस हो जायेंगे. और बता देती हु की मंदिर सिर्फ इसलिए जा रहे है क्योंकि न ऋतू यहाँ है और न ये समय है माँ (रेखा) का आशीर्वाद लेने का. वैसे अंदर आने की जरुरत नहीं है, तुम्हारी दोस्ती नहीं है उनसे और बैर भी नहीं. इन्तजार करना बस.", प्रणामी मंदिर के बहार पहुंचते हे अर्जुन ने कार एक तरफ लगाने के साथ प्रीती के लिए दरवाजा खोला और यहाँ भी वो अगली सीट पर उसकी पूजा का पूरा सामान लिए आया था.

"अगर तुम कहो तोह मैं अंदर कदम रखने को तैयार हु प्रीती.", अर्जुन साथ चलने के लिए ऐसा कह रहा था और प्रीती ने एक शांत मुस्कान से ना में गर्दन हिला दी.

"जिस दिन ये सर अपनी मर्जी के बिना झुका वो शायद मेरी कमी होगी. आप यहाँ तक ले आये, मैं इस से हे बहुत खुश हु. मैं यही चाहती थी की माँ जहा पर आपके लिए प्रार्थना करने आती है मैं उस भगवन को साक्षी मान कर अपने और ऋतू दीदी के लिए अपनी सुहाग पूजा करू. इनसे हे माँ ने आपको पाया है तोह इन्हे बताना भी जरुरी है. बस आप कुछ पल इन्तजार कीजिये.", आज पहली बार प्रीती ने उसको 'आप' कहा था. अर्जुन समझ चूका था की आज रिश्ता स्वरुप ले चूका है.

"मैं यही हु प्रीती, तुम जाओ और मिल लो अपने भगवान् से. ऋतू पहले हे विवाहित है मुझसे."

"सिन्दूर तोह देना होगा न आपके नाम का? पता है के उनकी मंजिल मुश्किल है लेकिन यकीन रखिये मुझसे पहले हमेशा वही होंगी. आती हु.", आज तोह प्रीती ने रही सही कसार पूरी कर दी थी अर्जुन के दिल को पूरी तरह से जीतने की. अर्जुन वही बहार सीढ़ियों पर बैठ चूका था. सचमुच उसको जो सपने आते थे उसकी बगल में हमेशा ऋतू या प्रीती हे दिखी थी. अलका जब भी दिखी सीने पर.

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"मैं यहाँ एलान करता हु की मेरे बाद पार्टी की बागडोर उमेद रघुबीर सिंह संभालेगा और इस साल के चुनाव में मेरी सीट पर यही आपका प्रत्याक्षी भी होगा. मेरे भांजे के लिए मैं किसी से भी maan-manuhaar नहीं करूँगा लेकिन आप सभी जानते है की प्रदेश की हर लड़की जो बेसहारा है उसका संरक्षक पंडित जी का ये दत्तक पुत्र और भतीजा है. आशा रहेगी की आप इस पर मेरा साथ देंगे.", भजन अपनी आदत से मजबूर बेशक था लेकिन आज यहाँ हजारो लोगो की उपस्थिति में भोजन से पहले जो घोषणा उसने की थी इसकी आशा किसी को भी नहीं थी. इस हलके ने हे उसको मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बनाया था.

स्वयं उमेद सिंह भी हैरत से इस घोषणा को सुन्न रहा था और उतने हे हैरान वो लोग थे जिन्हे कभी ऐसी आशा हे न था. शंकर ने अपने धरम भाई के कंधे पर हाथ रखा तोह वो जैसे नींद से जाएगा.

"भोले, ये क्या है बे? मैं राजनीति में और वो भी सीधा प्रदेश अध्यक्ष की तरह?", लेकिन तभी दूसरी आवाज भी माइक पर गूंजी जिस से तालियों की गड़गड़ाहट हर सीमा लांघ गई.

"उमेद सिंह.. इस मिटटी का हे एक तोह जो सबके लिए जल के सामान निर्मल और वक़्त पड़ने पर उसकी ताक़त का भी एहसास करवा देता है. जिसके एक तरफ शंकर हो और दूसरी तरफ स्वयं इंदरजीत. साये भी पंडित जी और स्वरज्ञीय रघुबीर सिंह जैसे. पालन मेरी भभ कौशल्या जी और पूर्णिमा जी ने किया हो तोह वो व्यक्ति कैसे कोई अविवेकी कार्य कर सकता है.? ये राजनीति में नहीं आना चाहता लेकिन आएगा नहीं तोह भला कैसे करेगा. मैं आपका अपना प्रमोद शास्त्री इस बात पर मोहर लगता हु की बदलाव और विकास की जरुरत है. डॉक्टर, वकील और पुलिस भी तभी सही काम करती है जब राजनेता सही हो. मेरी क्सक्सक्सक्स गाँव की समस्त 60 एकड़ जमीन श्री रघुबीर सिंह के चरणों में अर्पित करता हु.", ये आचार्य जी के शब्द थे और उमेद को घबराहट होने लगी.

"भोले, ये तोह नया हे कार्यक्रम हो गया रे भाई. मैं तोह पार्षद हु और यहाँ इस भजन मां के साथ हंस जी ने मुझे टांग हे दिया.", उमेद कुछ और भी कहता लेकिन अगली आवाज सुन्न कर शंकर और नरिंदर भी हैरान हो उठे.

"मैं और मेरी बहिन रेखा, इस पहल का समर्थन करते है. मेरे पिताजी की चाहत देख कर मैं भी उमेद जीजा जी के साथ maan-niya मुख्यमंत्री जी के न्योते को स्वीकार करते हुए क्सक्सक्सक्स सीट पर अपना नाम रखता हु. प्रदेश सेवा में हमेशा उमेद जीजा जी और भजन जी के चरणों में रहने का वचन.", राजेश ने एक सीढ़ी सीट उमेद की झोली में दाल दी थी जहा मनोहरलाल जी की अनुमति से हे मला या ंप का चुनाव होता था. लेकिन इस से बड़ी हैरानी की बात थी स्वयं रेखा जी का माइक पर आना वो भी अपने पिता के साथ.

"मंदिर का जीर्णोद्वार मेरे पिता श्री रामेश्वर जी के हवाले है और उन्ही की अनुमति से मेरे प्रथम पिता आपके शहर के साथ साथ हमारे शहर में भी अपने दोनों कॉलेज सरकारी कर रहे है. मेरे पति डॉ शंकर शर्मा जी की तरफ से निशुल्क साप्ताहिक चिकित्सा का लाभ अब हर जिले को मिले इसका प्रारम्भ अतिशिग्रह होगा. मैं रेखा शंकर शर्मा अपनी तरफ से पूर्ण योगदान दूंगी.", आज पहली बार शंकर जी की आँखें तरल होने लगी थी.

"बाप रे. शंकर ये ले तेरा एक सपना तोह भाभी ने पूरा कर दिया. मतलब पता है तुझे? उन्होंने वो जमीन तेरे हवाले कर दी.", नरिंदर कुछ कह रहा था लेकिन शंकर ने सिग्गट की डिब्बी जेब से निकाल का जमीन पर फेंक दी. वैसी हे हालत बहुतो की थी और सभी हैरान थे. ऋचा तोह ये जान कर हे आँखे फाड़े ऋतू को देख रही थी की उसकी माँ ने 120 एकड़ जमीन बेच कर सिर्फ यही मुहीम पर पैसा दान करने का फैंसला ले लिया था.

"तुम्हारी माँ कितनी अमीर ऋतू?", ऋचा ने ये बात आहिस्ता से कही थी.

"मेरी नानी इतनी अमीर है दीदी की सड़क तक उनकी माँ की जमीन से गुजरती है. माँ जो दान कर रही है वो कोमल दीदी और मेरा हिस्सा है. सुनंदा शर्मा मेरी नानी जो है कहने को वो यहाँ से होंगी, लेकिन जहा से है मैं बता नहीं सकती. ाचा है न पापा गरीबो के लिए यही चाहते थे.", ऋतू ने चेहरा मंच की तरफ रखते हुए जवाब दिया जहा अब उसके दादा जी आगे बढ़ रहे थे.

"आया तोह मैं यहाँ प्रसाद हे बांटने हु वैसे. खैर अब क्या हे कहु. घर में साला और आला नहीं होने चाहिए लेकिन मेरे तोह दोनों हे किस्मत से बढ़िया mile.",Is कहावत में जोरो से हंसी की आवाज गूँज उठी.

"आप सभी सदर आमंत्रित है मेरे पौटे और पौती के विवाह भोज पर जो 22 तारिख को आपके हे हलके में होने वाला है. इस से पहले की कोई और राजनैतिक बात कही जाए, मैं शुक्रिया करता हु आप सभी का जो यहाँ पधारे. उमेद मेरा नहीं आप सभी का है जैसे मैं खुद. लेकिन आवश्यक बात केहनी जरुरी है क्योंकि कुछ लोग कैमरा लिए भी खड़े है.", यहाँ रामेश्वर जी के इशारे को वो सिटी चैनल वाले भी समझ गए जो यहाँ बड़ी आस से आये थे.

"हाँ इनको भी जानकारी चाहिए भाई. आज मैं खुद को विमुक्त करता हु आप सभी की सेवा से. भाग कही नहीं रहा हु, बेफिक्र रहिये. ये उमेद संभल रहा है सबकुछ और मैं साथ हु मेरे बाकी बचो के साथ. भजन, धर्मवीर भाई, कुन्दनलाल जी और सतीश भाई के साथ सभी ऐसे हे आपकी सेवा में रहेंगे." पंडित जी ने इस बार माइक पकड़ कर एक गहरी सांस लेते हुए अपने बेटे राजकुमार और शंकर की तरफ निगाह की.

"अर्जुन आज बड़ा हो गया है. उमेद के संरक्षण में इन 3 ज़िलों की सेवा संजीव और अर्जुन करेंगे लेकिन फिलहाल अर्जुन पढ़ाई में व्यस्त रहने वाला है और गृहस्थी में भी. मैं व्यवस्था का वादा करता हु आपसे लेकिन बिना किसी नाम के. चुनाव मायने नहीं रखता इसलिए मेरे बचो को वही नौकरी पर भरोसा दिलवाया जिस से वो jan-kalyaan कर सके. भजन और उमेद को ख़ारिज कर सकते है. कोई दबाव नहीं और सच कहु तोह पार्टी की जगह प्रदेश का हिट करने वाले को चुनिए. अब से कुछ हे देर बाद भोजन शुरू होने वाला है. बीटा बेटी को आशीर्वाद दीजियेगा.", रामेश्वर जी के इस कथन पर अब तालियों की गड़गड़ाहट कही ज्यादा हे तेज हो चुकी थी. दोपहरी के इस समय भी यहाँ 40 गाँव और पूरे शहर के लोग उपस्थित थे. ये सिर्फ सामान्य pooja-archana का कार्यक्रम नहीं था, जनता को साथ ले कर चलने का समय था.

आज उमेद सिंह के साथ साथ शंकर शर्मा का एक नया अस्तित्व प्राप्त हुआ था. संजीव और अर्जुन को भी दर्शाया गया था आने वाले सेवक के रूप में.
 
आज सभी के दिमाग का सही जरूर करूँगा ये पहले हे बता देता हु. और Tony stark भाई के सभी सवालो के जवाब खुद रामेश्वर जी देंगे. Mahesh007 भाई को आज वाला अपडेट 2 बार पढ़ना पड़ेगा.

वैसे firefox420 भ्राता अर्जुन ने सिर्फ इत्छा जताई थी अगर प्रीती की चाहत हो उसको ले जाने की अपने साथ. वैसे सुनंदा जी बाप की तोह एकलौती औलाद थी पर उनके चाचा भी पिता के साथ राजनैतिक व्यक्ति रहे है. वो ज़मीन पिता से सुनंदा जी को मिली जो आगे सिर्फ बेटी के पास जाने का फैंसला था.

हाँ घोषणाये तोह बहुत हुई लेकिन उनके पीछे की मंशा भी इस अपडेट में मिलेगी.
 
अपडेट 154 (ा)

दिव्या प्रेम की अनुभूति (2)

"ये सब क्या था पापा? हम तोह यहाँ sava-mani और daan-karam करने आये थे लेकिन आपने तोह बिना बताये हे बड़े फैंसले कर दिए. वो भी इतनी जनता के सामने. और ये रेखा ने क्या कहा?", फिलहाल लोगो को भोजन परोसने में वक़्त था और मंदिर के पीछे बने बड़े हाल में रामेश्वर जी, धर्मवीर जी, कुन्दनलाल जी, आचार्य जी, भजन कम, छोल साहब के साथ साथ आचार्य जी भी फर्श पर बिछाये गड्डो पर बैठे कुछ बातचीत कर रहे थे.

यही उनकी बातचीत भांग हुई जब राजेश, शंकर, नरिंदर, दलीप और उमेद अंदर चले आये. आते हे शंकर ने अपने पिता से वही सब जान न चाहा जो कुछ समय पहले बहार घोषित हुआ था. इस बड़े हॉल में इनके पीछे हे कौशल्या जी के साथ सुनंदा जी और पूर्णिमा जी ने भी कदम रखे.

"शंकर जरा ये बताओ के आजकल तुम्हारा रूटीन क्या है?", ये बात सांगवान जी ने कही तोह शंकर से जवाब देते न बना.

"बहोत हुआ जो अब तक किया अपने खाली समय में लेकिन हफ्ते के दोनों अवकाश तुम्हे जनसेवा में देने होंगे. रेखा से बात कुंदन जी ने कहलवायी है क्यूंकि वो जगह free-hospital के सुनंदा भाभी ने दान में देने की इत्छा जताई थी. दूसरी बात उमेद से जुडी है. इसके सभी पेट्रोलपंप और प्लाईवुड का बिज़नेस एक संस्था की तरह सुचारु चलता है लेकिन सबसे उल्लेखनीय काम अनाथ बचो और वृद्धाश्रमों का बना कर किया गया. अब से उमेद सुनंदा जी के परिवार की तरफ से वही काम राजनीति के साथ बड़े स्तर पर करेगा.", सांगवान जी ने एक गहरी सांस ली अपनी बात ख़तम करते हुए.

"हाँ उमेद, हम भी यही चाहते है की तुम जनसेवा ऐसे हे करो लेकिन सरकारी तंत्र को भी तुम्हारी जरुरत है. यहाँ अपनी सीट मैं खुद तुम्हे दे रहा हु और मैं दूसरी जगह से चुनाव लडूंगा. राजेश की धर्मपत्नी भी अपने ससुराल से इलेक्शन में भाग लेंगी क्योंकि राजेश पहले हे देशसेवा में है और उसको बेहतर काम करने में मदद होगी. शंकर का पदोन्नति का समय आने वाला है इसलिए ये अपने हुनर को गरीबो की भलाई में लगाए.", भजन मां की बात सुन्न कर उमेद और शंकर वही उनके सामने बैठ गए.

"मतलब मुझे सपोर्ट सुनंदा माँ जी के परिवार से मिलेगी और इनका खंडन जो पहले हे राजनीती में प्रमुख है वो? शंकर सरकारी मुलाजिम हो कर ये प्रैक्टिस कैसे करेगा?", उमेद के सवाल अपनी जगह बिलकुल सही थे और शंकर ने भी इसके जवाब जान ने की चाहत दिखाई.

"तुम अब वारिस हो एक तरह से हमारे पिता जी के और इसका एलान हम खुद कर देंगे उमेद. वह हमारे चचेरे भाई अकेले है और उनके आगे पीछे भी अब कोई नहीं रहा. और शंकर बीटा, तुम सभी काम सरकारी आदेश पर हे कर रहे हो. ये दान हमने भाई साहब (भजन) की पार्टी को नहीं, प्रदेश को दिया है जिस पर खुद भजन भाई साहब सरकारी मोहर लगा कर जल्द शुरू करवा देंगे. एक तरह से जल्द हे तुम चिकित्सा प्रमुख होने जा रहे हो.", सुनंदा जी के जवाब ने दोनों की उत्तेजना शांत कर दी लेकिन नरिंदर अभी आचार्य जी को देख रहा था जो मुस्कुरा उठे.

"इंद्रजीत, तुम सोच रहे होंगे के भाई हम इस सबमे कहा फिट हो गए? हाहाहा.. ये जमीन मेरे किसी काम की नहीं है बेटे और मैं राजनीती से कोसो दूर हु जैसा की यहाँ बैठे ज्यादातर लोग है. हमारी इत्छा थी की उस जमीन का सही प्रयोग हो और पंडित जी ने वह किसानो के लिए कृषि अनुसन्धान बनाने का विचार दिया. इनके जानकार है धर्मपाल नाम से और वो सरकारी कर्मचारी भी है तोह उनकी देखरेख में ये नेक काम होगा. हमने जो भी प्राप्त किया है वो समाज से हे किया है लेकिन समाज को वापिस देना भी हमारा फ़र्ज़ है.", आचार्य जी के विचार सुन्न कर नरिंदर ने उनके चरण स्पर्श किये.

"सच कहता हु शास्त्री जी, आप जैसा इंसान क्रान्ति ला सकता है. आप एकदम प्रैक्टिकल इंसान हो और वो भी डाउन तो एअर्थ. तोह भजन मां, sadak-vadak भी बनवा हे दो जरा gaanv-dehat की. ठेकेदार तोह सभी हरामखोरी करने वाले है जिनको टेंडर आँख बंद करके बाँट दिए जाते है.", अब नरिंदर के इस कटाक्ष से सभी मुस्कुराये तोह वो खुद इधर उधर देखने लगा.

"अरे उतना मैट सोचो, हम तुम्हे नहीं कुछ काम दे रहे. बात ऐसी है की ये काम सेंट्रल मिनिस्ट्री के है और इसको वैसे हे जाने दो. हाँ, जरुरी विभागों की मीटिंग जल्द हे होगी और तुम्हे मैं एक बार साथ ले कर चलूँगा. शंकर कह रहा था न के यहाँ daan-karam करने आये है तोह ये सब. बीटा, जीजा जी ने अपने दो बेटे हे दान कर दिए सेवा में और बाकी सभी ने भी वही किया है अगर ध्यान दिया हो तोह.", अब उमेद एक तरफ से अपने चाचा से लिपट गया.

"माफ़ करना चाचा जी, हमको लगा की आप हमारी चाहत पूरी करने के लिए ऐसा कर रहे हो और वो भी dharam-karam जैसे काम के वक़्त. कही और होता तोह हमको शंका न होती लेकिन अब समझ आया की आपने यहाँ भी अपनी दौलत बिना बताये हे लुटा दी.", उमेद के ऐसा कहने पर पंडित जी जहा मुस्कुरा रहे थे वही कौशल्या जी ने इस भीमकाय व्यक्ति के सर को सहलाते हुए कहा.

"तू भी तोह चाहता था के मंत्री बन कर गलत करने वालो से भी सही काम करवाए. तेरे पिता का भी सपना था ये और वो अकेले होने की वजह से इसको बड़े स्तर पर न कर सके. अब ये काम मेरे दोनों बेटे करेंगे. चल अब बहार जा कर अपने लोगो से मिल और भोजन करवा."

"माँ, ये गज्जू और शंकर के हाथ में इतनी जिम्मेवारी दे कर कही बन्दर के हाथ तलवार जैसी बात न हो जाये. और राजेश की लुगाई मला बानी तोह ये भी छलांग लम्बी लगाने लगेगा. बाकी आप लोग इन्हे ाचे से जानते हो, मैं तोह अभी भी बचा हे हु.", नरिंदर इतना कहते हे तुरंत पूर्णिमा चची के पीछे जा खड़ा हुआ.

"ठहर जरा तू, बन्दर बोलता है हम दोनों को.", उमेद किसी बचे की तरह उसकी तरफ लपका लेकिन नरिंदर कही ज्यादा फुर्ती से बहार दौड़ गया. उसके पीछे हे बाकी बेटे.

"अब हम ाचे से अपना काम कर सकेंगे. इन्हे काम में पूरी तरह व्यस्त रख कर हे ऐसा किया जा सकता था धर्मवीर जी. भजन, तुम्हे कोई शिकायत तोह नहीं?", पंडित जी के ऐसा कहने पर उन्होंने तुरंत 'ना' में गर्दन हिला दी.

"वैसे शास्त्री जी, आप खामख्वाह परेशानी ले रहे है इस सब में पड़ कर. बात बहुत दूर तक भी जा सकती है और सियासत के साथ साथ आपराधिक कार्य भी घटित सकते है आने वाले समय में. आप एक गुरु है और समाज में अलग हे प्रतिष्ठा है आपकी. छवि धूमिल भी हो सकती है.", ये चिंता छोल साहब ने जताई थी और सांगवान जी के भी यही विचार थे.

"यहाँ मैं अकेला हे ऐसा व्यक्ति हु सतीश जी जो कही से भी गुरु श्रेणी में नहीं आता. आप सभी लोग jan-kalyaan से जुड़े है और मैं तोह बस लोगो को अध्यात्म और योग सीखा कर खजाना भरे जा रहा हु. जबसे हमको पंडित जी ने बताया है की मामला कुंवर सारंग से जुड़ा है तोह अब इसमें हमारी निजी दिलचस्पी हो गयी है. पहले तोह मैं कुछ न कर सका जब मेरी बेटी ऑस्ट्रेलिया में घुट्ट घहटत कर मर्डर गयी लेकिन अब मैं खुद मोक्ष मार्ग की तरह इस पर चलने वाला हु. कुंवर राज्यवर्धन हमारी बेटी के अपराधी है और उस व्यक्ति से चाँद सवाल करने के लिए हम हमारा सबकुछ लुटाने को तैयार है.", बात कहते कहते आचार्य जी आवाज सख्त होने बावजूद भर्राने लगी तोह कौशल्या जी ने बड़ी भाभी के नाते उनके हाथ पर हाथ रख दिया.

"देवर जी, बात बेटी की है तोह आपके bhai-sahab उसको na-muraad को आपके कदमो में खुद घसीट कर लाएंगे. और इनसे भी न हुआ तोह इनके पास खुदसे बेहतर भी 2 लोग है जो इनकी बात को वचन मानते है."

"नहीं भाभी जी, वो मासूम इस सब से दूर हे रहना चाहिए. आपका ये देवर इतना भी कमजोर नहीं बस पहले कही इतना साथ नहीं मिला था और प्रशाशन जबतक हमारे लायक हुआ तोह हमारे पास कोई सबूत नहीं उनके खिलाफ. हिमानी को तोह सामने नहीं कर सकता न? पंडित जी की rann-neeti श्रेष्ठ है. ताक़त भी बढ़ाओ और खरपतवार भी सफाई से हटते चलो. क़िले को भेदने की नीति एक अनुभवी दिलेर सेनापति हे कर सकता है. चलिए अब इजाजत दीजिये, आज जरा बचो के साथ अगले शहर भी जाना है. बहु के मायके से कुछ लोग आये हुए है.", आचार्य जी खड़े होने के बाद सभी से हाथ जोड़ कर विदा लेने के बाद जाते जाते कौशल्या जी के charan-sparsh कर गए. वो कुछ न कर सकीय सिवाए हैरत से देखने के.

"कौशल्या, तुम जो कहना चाहती हो हमे पता है. विवाह होने के बाद हम अपने हिसाब से सब देख लेंगे. फ़िलहाल आप लोग बहार के कार्य देखिये, यहाँ थोड़ी चर्चा बाकी है अभी.", रामेश्वर जी अपनी धर्मपत्नी की नजरो में झाँक कर वो गुजारिश देख चुके थे.

"एक बार और सोच लीजिये आप. शंकर और उमेद को शामिल करना ठीक रहेगा बजाये उन्हें दूर करके.", कौशल्या जी की बात पर उन्होंने ना में गर्दन हिला दी.

"इसमें मैं उमेद, शंकर या किसी भी उस बेटे को शामिल नहीं कर सकता जिनकी माँ की ज़िन्दगी वो लोग हो. पहले हे 2 को खो चूका हु और अब और नहीं.", रामेश्वर जी का इशारा Shillu-Ajju से था. और साथ हे वो भुप्पी, मेहुल और परम के साथ राजेश को भी इस सबसे किनारे करने का फैंसला ले चुके थे.

"बुद्धो को कभी कभी मजबूत कंधो का सहारा लेना हे पड़ता है जी."

"हमारे पास इन्दर, संजीव और कुछ ख़ास लोग है कौशल्या. यहाँ जोश की जगह होश वालो की जरुरत है. हर मुसीबत kaat-peet से हे दूर हो सकती तोह धरती पर इंसान बचते हे कहा. अब इस बारे में खामोश रहने की गुजारिश कर सकता हु बस.", अपनी पति की बात समझते हुए वो सर हिलती हुई बहार चली गयी.

"तोह अब पंडित रामेश्वर जी की जगह क्या वही राम दिखने वाले है जिनकी चर्चा भी अतीत के पन्नो में खो गयी?", ये बात जब छोल साहब ने कही तोह रामेश्वर जी के चेहरे पर अलग सी सार्ड मुस्कान तैर गयी.

"सतीश, अब समय के हिसाब से बदलने का वक़्त आ चूका है. राजमाता प्रभा जी के साथ उनकी बहु को तोह नहीं बचा सका था लेकिन अब उस से बदतर हालत मैं उनकी करूँगा जो सब उसमे शामिल थे. रघुबीर सिंह को जलील किया था न और वो भी हमारी बहिन के daah-sanskaar तक से दूर रख कर. मैं दिखता हु उन्हें की चण्ड रघुबीर से भी बुरा शिकारी रामेश्वर क्यों था.", ये बात शायद यहाँ उपस्थित कोई व्यक्ति नहीं जानता था सिवाए छोल सतीश के.

"कैसा शिकार पंडित जी और रघुबीर भाई की बहिन कौन थी?", सांगवान जी ने ये बात जैसे हे कही छोल साहब ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

"मिनाक्षी देवी पंडित जी और रघुबीर भाई साहब की बहिन थी धर्मवीर जी. शादी तोह राजपरिवार में हुई थी उनकी लेकिन शायद कुछ पता लग गया था उन्हें और राजमाता जी को जिस वजह से दोनों के साथ साथ 4 और लोगो का बेरहमी से कतल कर दिया गया था. पंडित जी का विवाह उस वक़्त हुआ नहीं था और ये फ़ौज से पुलिस की नौकरी में आये थे बस. परन्तु कोई जांच या कार्यवाही नहीं हुई थी और उसके बाद रघुबीर भाई साहब के परिवार पर भी आरोप लगे थे.", छोल साहब ने बात का पूरा खुलासा नहीं किया जैसे वो कुछ गहरा राज जानते हो.

"साफ़ साफ़ बता दो सतीश, यहाँ कोई गैर मौजूद नहीं है. हम भी कुछ छिपाना नहीं चाहते.", पंडित जी के ऐसा कहते हे कुन्दनलाल जी के साथ साथ भजन और धर्मवीर जी भी छोल साहब की तरफ देखने लगे जो चेहरे पर आये पसीने को साफ़ करने लगे.

"राजमाता भाई साहब को अपने बेटे से बढ़ कर मानती थी. इनका विवाह भी वो अपनी बड़ी बेटी कुमारी लक्षिका से करने वाली थी जिस पर राजा साहब को भी ऐतराज न था. ट्रेनिंग के बाद इनके वापिस आने पर हे राजमाता इस रिश्ते को पक्का करने वाली थी उनसे छोटी 2 रानियों और उनके बचो को ये बात पसंद नहीं आयी, जैसा की संदेह है. उसके बाद लक्षिका के साथ साथ राजमाता और मिनाक्षी का कतल ऐसे किया गया जैसे वो लोग कुछ गलत करने जा रही हो और उन्हें मारने वाले भी उनके साथ कतल कर दिए गए, जो की आपराधिक प्रवर्ति के लोग थे. बात ऐसे प्रस्तुत की गयी जैसे ये राजपरिवार पर एक बड़ा धब्बा हो और इसको छिपाये रखना हर नागरिक का कर्त्तव्य अपने राजा के प्रति.", अब बाकी सभी के चेहरे सफ़ेद पड़ चुके थे ये सब सुन्न कर. इस घटना की थोड़ी बहोत जानकारी धर्मवीर जी को भी थी जैसे.

"ये बात दबे स्वर में बहुत दूर तक गयी थी सतीश भाई. ऐसा सुन्न ने में आया था के वह takhta-palat करने और सबको हटाने की साजिश थी प्रभा देवी की. उस से पहले तोह उन्हें हमेशा Devi-swaroop बताया जाता था. बहोत हे घिनोना षड़यंत्र था इसका मतलब."

"षड़यंत्र ऐसे हे बनाये जाते है धर्मवीर भाई बस मुझसे भारी चूक हो गयी उस वक़्त. लेकिन जिस तरह से उन्होंने रघुबीर सिंह और चाचा जी को अपमानित किया वो आज भी दिल में कसक है. आप तोह समझते हे होंगे जब एक बड़े घराने को बेदखल कर दिया जाए समाज से तोह क्या बीत टी है उस इंसान पर जिसका जीवन हे सिर्फ िज्जात्त और सम्मान हो. मेरे भाई को न्याय तोह क्या मिलना था, वनवास दे कर बहार हे कर दिया. राजा जी और अपने पिता जी की वजह से उस वक़्त मैं कुछ न कर सका और फिर मैं भी सब छोड़ कर इस तरफ आ गया.", रामेश्वर जी ने खुद हे बात को थोड़ा खोल कर बताया तोह सभी के चेहरे पर दुःख साफ़ झलक उठा. खुद को दुरुस्त करते हुए वो आगे कहने लगे.

"दौलत तोह चाचा जी के पास भी बहोत थी और जहा अब हवेली है ये कभी कभी आरामगाह जैसा निवास भर था. फिर हम दोनों के विवहा हो गए तोह कौशल्या से मैंने अपने दिल की स्थिति का हाल जाहिर किया. उसने भी सबकुछ मान लिया लेकिन वचन के बदले. मैं राजपरिवार की देहलीज पर कभी कदम नहीं रखूँगा, बदले की भावना से और वैसा हे हाल रघुबीर का हुआ. बहार के जितने लोग शामिल थी उन्हें तोह हमने सजा दी लेकिन जो गुनेहगार थे उन तक हम कभी न जा सके.", रामेश्वर जी के दर्द को सभी समझ रहे थे और उन्हें भी लगता था की कौशल्या जी ने वो वचन भी सोच कर माँगा होगा.

"सारंग के साथ आपका रिश्ता कैसा था पंडित जी? मतलब वो तोह इस तरफ भी आता रहा है काफी साल पहले तक. इतना सब होने के बाद तोह आप लोगो के बीच कुछ भी सही नहीं रहा होगा.", धर्मवीर जी का प्रश्न वाजिब था और बाकी सभी जान ने को उत्सुक थे इस रिश्ते के बारे में.

"हाँ हम लोग साथ हे बड़े हुए है और वो कृष्णेश्वर का ख़ास मित्र था काफी समय तक. मेरे से भी ाची बोलचाल थी और कई बार रघुबीर भी शिकार या महफ़िल में साथ रहा. उस हादसे के बाद बहोत समय तोह सारंग मित्र की तरह रहा और हवेली तक भी आया करता था 2-3 महीने में. सोमबीर भाई साहब के घर भी उसके रिश्ते ाचे बन्न गए थे. फिर कुछ विवाद हुए जिसमे उसके असली चरित्र को थोड़ा पहचाना लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. हरयाणा अलग बन्न चूका था उस वक़्त तक और 70 के दशक की शुरुवात में रघुबीर को एक षड़यंत्र में फंसा कर उसने जो घिनोना अपमान किया उसके बाद कोई दोस्ती न रही. मुझे मामले की समझ भी नहीं थी और खुद रघुबीर ने हाथ जोड़ दिए थे मजबूरी में. माहौल गरमा गया जब मैंने कुछ लोगो को उनके कर्मो की सजा दी. फिर तोह बचो ने जो उत्पात मचाया बस कुछ समझ हे नहीं आया. सारंग का हाथ मेरे 2 बेटो की हत्या में भी रहा है जिसका मुझे बाद में पता लगा. राजघराने में उसको बेदखल कर दिया गया था कुछ बड़े अपराध होने पर तोह वो अपने ननिहाल का मालिक बन्न बैठा. अब वही करता धर्ता है उधर लेकिन इतनी समझ उसमे भी है की आज की तारीख में वो इस तरफ फ़ौज ले कर भी नहीं आ सकता. लेकिन मैं उसको वापिस वही आने पर विवश कर दूंगा जहा उसने वो मौत का घटिया खेल रचाया था अपनी माँ के साथ मिल कर.", रामेश्वर जी ने अतीत का हर पन्ना खोल कर रख दिया था और सभी समझ चुके थे की शंकर इन्दर उमेद सचमुच इस व्यक्ति के सामने कुछ भी नहीं है.

"सतीश भाई का भी जैसे बहोत कुछ खोया है इस दौरान?", कुन्दनलाल जी की बात पर छोल साहब के चेहरे पर फीकी हंसी आ गयी.

"हाँ इसने तोह अपनी सरु (बीवी) को हे खो दिया लेकिन तब वो हादसा लगा था जिसको ये सबसे छिपा गया. िज्जात्त की नौकरी पर भी धब्बा लगाने की तगड़ी कोशिश की गयी थी लेकिन शंकर अपने इस चाचा के प्यार में इतना पागल है के पूरी इन्वेस्टीगेशन टीम हे जमीन में दफ़न कर दी जो सतीश को घेर रही थी. सच कहु तोह शंकर के ऐसा करने के बाद उस तरफ से फिर कोई ऐसी हरकत नहीं हुई. वैसे भी वो इंसान की कदर तभी करता है जब वो उसका अपना हो या गरीब. नहीं तोह दिमाग हल्का सा घूमा और डॉक्टर साहब जिस औजार से जीवन बचते है उसी से शरीर को kshat-vishat करने का मजा लेने लगते है. इसका जिम्मेवार भी कही न कही मैं हे हु पर वो एक जिम्मेवार बीटा है और होनहार डॉक्टर जिसमे धर्मवीर भाई ने भी पूरी म्हणत की.", ये तोह साफ़ था की शंकर अपने पिता के लिए अमूल्य था और उन्हें उसकी सबसे अधिक परवाह थी.

"चलो भाई साहब इन बातों को विराम देते है. बहार हमारा होना भी उतना हे जरुरी है जितना बचो का. कल गोल्फ के समय करेंगे इस सबकी चर्चा. राजस्थान कौनसा दूसरे गृह पर है.", छोल साहब इन सब बातो पर विराम लगाना चाहते थे और शायद उन्हें भी अपनी बीवी की याद आ गयी थी जीकर होने पर.

"एक मिनट दीजिये सतीश भाई. मेरा एक सवाल है पंडित जी से.", ये बात संकोच के साथ कुन्दनलाल जी ने कही थी और उनकी शंका देख रामेश्वर जी ने पूछने की सहमति जाता दी.

"बुरा न मानिये, हम सम्बन्धी बाद में है पहले दोस्त है. लेकिन इस सबमे कही अर्जुन तोह शामिल नहीं? वो मुझे ये एहसास दिलाता है की जैसे वो हर इंसान से अलग भी है और उसका दिमाग वैसा बिलकुल नहीं है जैसा 18 साल के युवक का होता है, शरीर के साथ साथ. रेखा के जीवन की आखिरी ख़ुशी अर्जुन हे है भाई.", अब रामेश्वर जी कुछ पल खामोश हो गए और धर्मवीर जी भी आधा सच तोह जानते हे थे लेकिन जवाब जब रामेश्वर जी को हे देना था.

"हाँ कुंदन भाई आपकी शंका उचित है और सच कहु तोह वो यहाँ मौजूद सभी लोगो की सोच से कही आगे तक जा चूका है. उसके पास तोह यहाँ बैठे लगभग हर व्यक्ति की भी कुंडली होगी. उसको बस वो खुद हे रोक रहा है परिवार की वजह से नहीं तोह वो कभी का उस व्यक्ति तक पहुंच चूका होता जिसको घेरने की rann-neeti हम लोग बना रहे है. अर्जुन जनम से जितना गुस्सैल था अब वो उस से कही ज्यादा शांत और गहरा हो चूका है. उसका नेटवर्क और काम करने का तरीका मुझसे भी कही अलग और बेहतर है. शायद हम भी उसके हे लिए काम कर रहे हो जिसका खुद हमको नहीं पता. और दूसरी बात है दिमाग के साथ उसकी क्षमता. उसको शास्त्री जी भी वो सब सीखा चुके है जो शायद भली भाँती वो खुद भी न कर पाए हो. सोचा था वो मजबूत बनेगा और अपनी सुरक्षा कर सकेगा लेकिन वो उम्मीद से कई गुना आगे निकला.", रामेश्वर जी के जवाब से कुन्दनलाल जी अभी भी थोड़ी सोच में थे.

"फ़िक्र मैट कीजिये कुंदन भाई. अर्जुन अगर बहोत कुछ जान भी चूका है तोह वो सिर्फ इसलिए कुछ नहीं कर रहा क्योंकि वो पंडित जी और अपनी माँ के प्रेम से बंधा है. वो अपने दायरे जानता है बेशक वो हमारी सहायता ले किसी काम में लेकिन खुद वो परिवार में रहेगा.", धर्मवीर जी की बात पर कुंदन जी ने हामी भरी.

"आप मेरी बात को अन्यथा न ले धर्मवीर जी, मुझे चिंता अर्जुन की नहीं है. जो मोह और लगाव पंडित जी को अपने पौटे के साथ है और मेरी बेटी जिस वजह से खुश रहती है अगर उसको कोई क्षति पहुंची तोह सबसे ज्यादा दुःख इन्हे हे होगा. मुझे भी थोड़ी बहोत जानकारी मिलती रहती है अपने नाती की और वो बेलगाम हुआ तोह कोई कुछ कर भी नहीं पायेगा. आप खुद हे बताये क्या आप रोक सकते है उसको?", कुन्दनलाल जी की बात सुन्न कर जहा पंडित जी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी थी वही धर्मवीर जी ने तोह तुरंत ना में गर्दन हिला कर बता दिया की वो अर्जुन के मामले में कुछ नहीं कर सकते.

"एक बार के लिए शंकर को समझाना आसान है लेकिन जो पहले हे समझ कर बैठा हो उसके सामने हाथ खड़े है भाई अपने. वो रुकता भी उन्ही 2 व्यक्तियों से है जिनका आपने जीकर किया. या फिर संजीव उसके साथ हो तभी. वो गलत बात हे नहीं करता तोह कैसे रोक सकते है? चलो भाई अब दरवाजे पर भी दस्तक हो गयी.", धर्मवीर जी तुरंत हे उठ खड़े हुए और इधर कम का सलाहकार उन्हें किसी ख़ास काम की याद दिलवा रहा था. जिसका मतलब साफ़ था के अब वो यहाँ और नहीं रुकने वाले. बहार भी भोजन कार्यक्रम शुरू हो चूका था.

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"मांग लिया फिर सबकुछ अपने भगवन से?", अर्जुन ने प्रीती के लिए कार का दरवाजा खोलने के बाद साड़ी को भी सही से कार के अंदर करने के बाद अपनी सीट पर बैठते हुए पुछा. चेहरे से प्रीती अभी सहज लग रही थी और वो neeli-hari आंख्ने बता रही थी जैसे अब सब ठीक है.

"वैसे वह मांगने नहीं बताने गयी थी, बुधुराम. आपको पा लिया तोह और अब कोई ख्वाहिश नहीं.", प्रीती ने हाथो की चूड़ियां निचे करते हुए जवाब दिया. वो इस पल में इतनी दिलकश लग रही थी की सिर्फ देखने भर से जीवन के दुःख ख़तम हो जाए. अब माथे पर छोटी बिंदी के ऊपर कुमकुम का टीका लगा था.

"अभी तुम्हारी ख्वाहिश पूरी नहीं हुई मैडम. जो पहनाये है उन्हें उतरना भी बाकी है. वैसे सच कहु तोह बस तुम्हे देखते रहने का दिल कर रहा है. काश तुम्हारी माँ तुम्हे ऐसे देखे और अपने रंगो से वो तस्वीर बना दे जो बस मेरे कमरे मेरी नजरो के सामने रहे.", अर्जुन के अरमान तोह प्रीती को भी न पता थे जो वो उसके लिए संजोये था. हर पल में वो उसके साथ कुछ अलग चाह रखता था.

"दीवानगी की हालत बता रही है के जनाब की तबियत ठीक नहीं शायद. प्यार का भूत ाचे से उतार दूंगी एक बार बस 7-8 नंबर की बहु बन्न जाने दो. रही बात कपडे उतारने की तोह जिस परिवार से हु वह लड़की पर कोई हाथ भी लगाए तोह समझो गया काम से.", प्रीती की वही चुहल और शरारती चेहरा देख अर्जुन ने चलती हुई कार सड़क के एक किनारे रोक दी. वो कुछ देर तक इस खिलखिलाते चेहरे को देखता रहा और जल्द हे चमकती आखें शर्म से निचे झुक गयी.

"बस भी करो, ये बेशर्मी है अर्जुन.", प्रीती ने जैसे अर्जुन की आँखों में देख हे लिया था जो वो कभी जाहिर नहीं होने देता था.

"वो प्यार भी यहीं है और तुम भी वहीँ हो. आज मैं भी जान गया हु प्रीती की तुम ऋतू से अलग नहीं. अभी तुमने मेरा दिल पढ़ लिया, सच कह रहा हु न?", एक पल के लिए प्रीती थोड़ा सेहम सी गयी थी लेकिन तुरंत अपना हाथ अर्जुन के सीने पर रखती वो उसके चेहरे को देखने लगे. इस बार अर्जुन को बिना कुछ कहे जवाब मिल चूका था. जल्द हे कार फिर से अपनी मंजिल पर लौट आयी. इस दौरान दोनों ने और कोई बात न की. घर का दरवाजा बंद करने के बाद फिर से प्रीती को बाहों में लिए अर्जुन रोमिला के कमरे में लौट आया. अब प्रीती को पता था की आगे क्या होने वाला है और जिस पल के लिए वो इतने महीनो इन्तजार करती रही थी उसके बारे में सोच कर हे वो शर्म और अनजाने डर से नजरे झुकाये बिस्टेर के किनारे बैठ गयी.

अर्जुन कमरे में लगे गहरे पर्दो को बंद करता हुआ पूर्ण अन्धकार करने लगा तोह प्रीती की जैसे चेतना लौटी. वो अपनी माँ के बिस्टेर पर बैठी थी जहा तकिये के पास एक और पैकेट पड़ा था. अर्जुन की इजाजत के बिना उसने वो पैकेट न खोलने का विचार करते हुए फिर से ध्यान हटाया तोह कमरे की ठंडक में इजाफा हो चूका था. अर्जुन की चौड़ी पीठ देखती हुई वो फिर से जैसे उसमे हे खोने लगी.

"मैं सिर्फ तुम्हे दर्द देने से डरता था प्रीती लेकिन मैं गलत था. वो एक पल का दर्द न देने के चक्कर में मैंने जाने कितने हे प्यार के लम्हे तुमसे दूर कर दिए. अब ऐसा हरगिज नहीं होगा.", प्रीती को अर्जुन के होने का एहसास हुआ तोह वो उसकी बगल में बैठ कर दोनों हाथ प्रीती के चेहरे पर रखता बस उसको हे निहार रहा था.

"आपको जो दर्द हुआ वो शायद मेरे दर्द से कही ज्यादा है अर्जुन. मुझे सचमुच अपनी किस्मत पर गर्व है के इतना प्यार करने वाला जीवनसाथी मिला. इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता की जीवन में कौन आया या कौन गया. जो साथ है और जिस से प्यार है बस वही जरुरी है. उमाहहहह... ी लव यू अर्जुन, मैं सिर्फ तुम्हारी हु.", प्रीती ने खुद हे अपने आधार अर्जुन के होंठो से लगते हुए पहल की तोह ये चुम्बन वाकई अलग था. हर बार प्रीती भारी पड़ती थी लेकिन आज खुद उसके जिस्म में अर्जुन के स्पर्श से अलग सी लहर दौड़ रही थी.

"ी लव तू जान... उम्माह्ह्ह..", साड़ी का पल्लू एक तरफ करता अर्जुन प्रीती को बाहों में लिए पूरी तरह से बिस्टेर पर आ गया. अब दोनों हे एक दूसरे चिपके आलिंगन में बांध कर बस अधरपान कर रहे थे. अर्जुन के मजबूत हाथो के स्पर्श को अपनी निर्वस्त्र कमर पर महसूस करती प्रीती खुद हे अर्जुन के जिस्म में धंसने लगी. आज अर्जुन की सुरक्षा में अमोर्फी की काली का खिल कर फूल बन्न न निश्चित था.

प्रीती की सांसें एक बार भी बेतरतीब न होने दी अर्जुन ने. वो हर गहरे चुम्बन के बाद किसी एक आधार को कशिश से सहलाता हुआ उस लाल ब्लाउज की तलहटी में अपने हाथ से उसके जिस्म को पूर्ण जागृत करता रहा. इन सख्त कंधारी अनारो का रसपान इस से पहले हमेशा जोश या समय के अभाव में अधूरा हुआ था लेकिन आज कोई समय सीमा न थी.

"Ahhhhh..Ummm.. तुम्हे हे बेहतर प्यार करना आता है Arjun..issss.hhhh..", प्रीती ने आँखें कस के मूँद ली. अर्जुन उसकी गोरी नाभि में अंगूठे से हरकत करता हुआ पतली गर्दन को चूमने लगा. इस बदन की महक के सामने वो कस्तूरी भी नतमस्तक थी जो प्रीती के जिस्म से फूट कर अर्जुन को मदहोशी के नए आलम में लिए जाने लगी. चन्दन के वृक्ष से लिपटता भुजंग भी नहीं जानता की वो महक का सही स्त्रोत कहा है.

भूरे रेशमी केशो में हाथ फिरता अर्जुन भी प्रीती के चेहरे पर हर तरफ अपने होंठो की छाप बनता अपनी चाहत भरपूर दिखने लगा. एक हे पल में लरजती सी वो कमनीय कहा अर्जुन के ऊपर आ गयी. प्रीती की धड़कन अब अनियंत्रित होने लगी अर्जुन द्वारा पीठ भर बांध ब्लाउज की डोरी खोलने पर. इस पहले वो निर्वस्त्र होने पर खुद अर्जुन पर सवार हो जाती थी लेकिन आज सीने से बाहरी वस्त्र खुलने भर से प्रीती का रोमांच कही ज्यादा बढ़ गया.

"तुम सचमुच शहद सी हो प्रीती और अब ये जिस्म अपनी नरमी वापिस पा चूका है. ये परिवर्तन भी उतना हे ाचा है जितना पहले वाला था. मेरे हाथो की सख्ती कही निशाँ हे न बना दे.", टेनिस बंद करने के बाद से हे प्रीती तरणताल के साथ साथ ऋतू की निगेहबानी में एक नरमी ले आयी थी अपने जिस्म में. दोनों उभार बेशक अभी तक अपनी सख्ती की परकाष्ठा पर ठीके थे लेकिन बाकी जिस्म किसी गुंथे हुए मैदे सा नरम और लचीला हो चूका था.

"आज खुद को हर बंदिश से आजाद कर दो अर्जुन. मैं तुम्हारे हर स्पर्श को अंतिम सांस तक आत्मा पर बरक़रार रखना चाहती हु. आह्हः..", प्रीती की आँखों में देखते हुए अर्जुन ने वो लाल वस्त्र भी खींच कर दोनों के बीच से जुड़ा कर दिया. 9 गज की साड़ी भी जिस्म से स्वतः हे ढीली होने लगी थी जिसकी तरफ दोनों का कोई ध्यान न था. लमस से भरपूर प्रीती की गोरी बाहों को फैलते अर्जुन ने उन बेदाग़ स्वर्णिम वक्षो की मुलायम घाटी में तपते होंठ टिकाये तोह प्रीती का स्वरुप धनुष हो गया.

ये जिस्म इस तपिश में पिघल कर अर्जुन में मिलना चाहता था लेकिन सफर अभी बाकी था तमन्ना पूरी होने का. पारदर्शी सुर्ख ब्रा में क़ैद दोनों कपोत अर्जुन से आजादी की मनुहार करते लगे लेकिन अर्जुन का सैय्याम उनकी सोच से कही ज्यादा गहरा था.

"मैं सच कहता हु प्रीती की तुम अपने आप में अलग हे कुदरत हो. इसकी तुलना करना हे नाइंसाफी होगी तुम्हारे साथ. आज कुछ कहना चहु तोह बुरा तोह नहीं मानोगी?", अर्जुन ने मखमली कंधो से दोनों लाल पत्तियां सरकते हुए उन बेमिसाल वक्षो को अनावृत करते हुए इतना कहा तोह प्रीती ने चेहरा घुमा लिया. वो समझ चुकी थी की अर्जुन ऐसे अंतरंग पालो में अब कुछ तोह ऐसी बात कहेगा जिसको सुन्न कर प्रीती नजरे नहीं मिला सकेगी.

"जानता हु तुम खुदसे नहीं कहोगी लेकिन तुम्हारे ये बहोत अलग है. पता नहीं वजह क्या है पर सचमुच जब भी इन्हे देखता हु तोह बड़ी मुश्किल से खुद को रोका है. बस आज ऐसा नहीं होने वाला.", प्रीती इधर उधर हिलती हुई भरसक कोशिश कर रही थी अर्जुन की गरम साँसों से अपने खूबसूरत वक्ष बचने की. लेकिन एक तेज सिसकारी ने बता दिया की उन्हें अर्जुन ने दबोच लिया है. गुलाबी रंगत लिए वो तना हुआ चूचक होंठो में भरते हे अर्जुन बेसब्र होने लगा. प्रीती के समतल मुलायम पेट इस वार को न सहते हुए अंदर धंसता दोनों स्टैनो को ऊपर उठाने लगा.

"उफ्फ्फ... आराम से बाबा.. तुम्हारा हे है सबकुछ बस ऐसी बातें न करो... आह्हः.. आज कुछ ज्यादा हे अलग लग रहा है.. अर्जुनंन.. उम्मम्मम..", अर्जुन कहा सुन्न प् रहा था ये सब. वो निरंतर एक उभर को दबाते हुए दूसरे को किसी भूखे बचे की तरह चूसक कर पीने में जूता रहा. अब जैसे प्रीती का भी सबर जवाब देने लगा था.

"आह्हः.. गलती हो गयी मुझसे.. अर्जुनंनं.. यहाँ से कुछ नहीं निकलेगा अभी..", कहने को तोह प्रीती ने बोल दिया लेकिन तुरंत आँखे बंद करती वो चेहरा छुपाने लगी. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए एक बार प्रीती के चेहरा को देखा और कमर में बंधी वो ढीली साड़ी भी जुड़ा कर दी. खोलने की जेहमत उठाना अब उसके भी बस में नहीं था. लाल पेटीकोट जो घुटनो तक उठ आया था, प्रीती के अनुपम खजाने के बीच एक वही दिवार बाकी थी. बिस्टेर पर नागिन सी बलखाई शर्माती प्रीती ने अपना एक हाथ दोनों भीगे हुए स्टैनो पर रखते हुए भरसक कोशिश की अर्जुन की नजरो से बचने के. अर्जुन बस उसकी आँखों के खुलने का घात लगाए इन्तजार करता रहा.

"मैट सताओ न अर्जुन.", प्रीती इतना कह कर पीठ के बल पलट गयी जो शायद एक और गलती साबित हुई. घुटनो तक ऊपर चढ़ा वो लाल वस्त्र और ऊपर सरकते हुए अर्जुन उन मांसल सुघड़ जांघो को सहलाता प्रीती की पूरी पीठ पर अपने होंठो की कलाकारी दिखने लगा. दोनों हाथ ऐसे हे रेंगते हुए मांस के उन गोलाकार बहार निकले हिस्से पर पहुंचते हे प्रीती के नितम्बो का भरपूर एहसास लेने लगे. उनकी नर्माहट और गोलाई को जांचता अर्जुन अब बड़ी शिद्दत्त से उन्हें दबाने लगा.

"वह से क्या निकलेगा प्रीती? मुझे बताओ न की ऐसा क्या करना होगा जिस से तुम्हारे ब्रेअस्ट्स से कुछ निकले.? आह्ह्ह्ह.. हर तरफ से तुम बस प्यार कारण के लिए बानी हो जान... उम्म्म्म.", प्रीती के पेटीकोट का नाडा कब खुल कर वो वस्त्र हटा ये देखने की जेहमत भी प्रीती ने न उठाई. अर्जुन के इस मरदाना स्पर्श की चाहत से रोम रोम सिहर रहा था. दिल कह रहा था अर्जुन आज ऐसे हे भरपूर prem-pradarshit करे लेकिन उसका ऐसा करना भी प्रीती को संकोच शर्म से बाँध रहा था. अर्जुन अपना कुरता उतार कर जैसे हे प्रीती को बाहों में लेने लगा, वो पलट कर सीढ़ी हो गयी.

"बहोत गंदे हो सच्ची.. आह्हः.. थोड़ी तोह शर्म करो न please..maaa....uff..",Preeti की जांघो के बीच उभरी उस कनक सामान गुलाबी योनि पर हथेली रखते हुए अर्जुन ने एक निप्पल फिर से मुँह में भर लिया. अब ये दोहरा वार और अर्जुन के चौड़े जिस्म का निर्वस्त्र स्पर्श प्रीती के जिस्म को उत्तेजना की परकाष्ठा पे ले चला. इस हद्द तक दोनों हे कई बार आ चुके थे लेकिन आज सबकुछ अलग था. आज प्रीती कसमसा रही थी और अर्जुन के नियंत्रण में वो सचमुच एक अर्धांगिनी सी अपने पहले मिलान की सेज पर हर गुजरते पल के साथ अपने आनंद को शर्म से छुपाने की कोशिश करती रही. जल्द हे शर्म ने अपने हथियार गिरा दिए.

"उफ़... आह्हः.. आराम से जान.. मैं एक बार हो चुकी हु..", अर्जुन ने उस सुनहरी योनि की फांको में क़ैद शहद को जिव्हा से चखने की कोशिश हे की थी और प्रीती के शरीर ने हर बंधन टॉड दिया. अर्जुन के सर को उसने खुद हे अपने kati-pradesh पर मजबूती से दबा दिया. रह रह कर जिस्म थिरकने लगा लेकिन अर्जुन इत्मीनान से इस यूनानी गुलाब के आरक का सेवन करता रहा. फूली हुई फांके जिव्हा स्पर्श और होंठो के दबाव में निरंतर संकुचित होती रही.

"उम्म्म.. सॉरी खुद को रोक नहीं सका प्रीती.", अर्जुन के चेहरे पर आयी शरारती मुस्कान देख प्रीती ने बड़ी अदा से मुँह बनाते हुए झूटी नाराजगी जताई. अभी भी उसकी योनि में स्पंदन महसूस हो रहे थे जो अपने पूर्ण मिलान की चाहत का इजार करने की भरसक चेष्टा करते रहे. पर उनकी आवाज सुनाई कहा देती.
 
अपडेट रात 10 बजे से पहले
 
अपडेट 154 (बी)

दिव्या प्रेम की अनुभूति (2)

आज मौसम भी पलटने लगा था जैसा होना कुछ अलग बात न थी. अक्सर गर्मी के दिनों में हलकी बारिश हो हे जाती थी. पहले से हे हलके अन्धकार में डूबे इस ठंडक भरे में कमरे में बाहर की बद्र ने कुछ इजाफा कर दिया. इस वक़्त प्रीती कुछ रहत में थी अपनी प्रेमी द्वारा दिए गए mukh-maithun से. अर्जुन बहोत हलके दबाव से दोनों उभारो को सहलाता फिर से प्रीती को आनंदित करने लगा था और इस बार करवट लिए प्रीती भी उसके सीने पर नजाकत से अपनी उंगलियों की कलाकारी दिखने लगी.

"कैसे कर लेते हो इतना कण्ट्रोल अर्जुन? सच कहु तोह मुझे लगा था तुम या तोह कुछ भी नहीं करने वाले या फिर बेसबर हो जाओगे.", अर्जुन ने मस्ती में एक उभार को थोड़ा दबाते हुए प्रीती के होंठो को चूमने के बाद कहा.

"तुम्हे क्या पता मैं सबर कर रहा हु? शायद मैं तुम्हे उतना उकसा रहा हु जिस से तुम फिर मुझे मन न करो.", प्रीती भी अर्जुन की इस शरारत भरी बात का मतलब बखूबी जानती थी. अपनी गोर्नी मांसल टांग अर्जुन के ऊपर रखती वो खुद हे अपना यौवन उसके असाधारण उभार से चिपकते हुए बोली.

"Don't ुँडेरेस्तिमाते में. ये तोह वक़्त हे बताएगा की मन कौन करेगा और फिर मेरा बेसब्रपन शायद सेहन भी न हो. 2 बार बुरी हालत हो चुकी है न ऋतू के साथ? लेकिन अब तुम्हारा दिन है तोह आज तुम्हारी चलेगी. आह्ह्ह्ह... इतना मैट मसलो इन्हे फिर ब्रा नहीं पहन sakungi...ummm..", प्रीती के हाथो का दबाव अपने कूल्हों पर बढ़ता देख अर्जुन भी समझ चूका था के अब सही वक़्त है आगे बढ़ने का. उसके दिल में हुक सी मची थी जब उसको प्रीती के कहने पर वो दृश्य याद आ गया जब अर्जुन छत्त पर ऋतू के साथ बेहोश हे हो गया था. उस रात सचमुच ऋतू भारी पड़ी थी उस पर.

"एक मिनट दो बस.", अर्जुन तुरंत उठ कर उस टेबल की तरफ लपका जहा रोमिला चित्र बनाया करती थी. ये ख़ास शीशी थी उस तरल की जिस में भरपूर चिकानी थी. अर्जुन बिस्टेर पर वापिस आते वक़्त अपना अंडरवियर भी उतार कर प्रीती की कमर के पास आ बैठा. इस अंधकार में दोनों एक दूसरे को देखने के अभ्यस्त हो चुके थे. शीशी खुलते हे गुलाब की भीनी भीनी महक से बिस्टेर का दयारा महकने लगा.

"इतना सबर जरूर है जान.. जब सोच हे लिया है के आज ये हद्द पार करनी है तोह मैं बस तुम्हारा दर्द काम करने की कोशिश तोह करूँगा हे.", उस पहली हुई योनि पर अर्जुन के हाथो से ये ठंडा तरल लगते हे प्रीती ने एक बार तोह दोनों मुट्ठियों सफ़ेद चादर को कस हे लिया. उसको अर्जुन पर इतना प्यार आ रहा था ऐसे परवाह करते देख की वो हर दर्द को हंस कर बर्दाश्त करने का फैंसला ले चुकी थी.

"आह्हः.. मुझे दर्द होगा इसलिए तुम परेशां हो न अर्जुन? ये कमरे का अँधेरा बहोत कुछ बता रहा है मुझे. तुम शायद मुझे दर्द में देखने के डर से हे उजाले से भाग रहे हो.. उम्म्म्म..", प्रीती के सत्यवचन सुन्न कर अर्जुन के हाथ योनि की मालिश करते हुए अपनी जगह एकके ृक्क गए. सचमुच अर्जुन इस बात को लेकर असहज था की वो प्रीती के आंसू कैसे देख पायेगा.

"बस आज ये अँधेरा रहने दो न प्रीती. मुझे भी पसंद है तुम्हे उजाले में देखना, निहारना और जी भर कर प्यार करना. लेकिन..", अपनी बात अधूरी छोड़ते हुए अर्जुन प्रीती के सामीप्य में लेट गया. अब हाथ की उँगलियाँ फिर से उस उमस भरे यौन कुंड को सहलाने लगी थी. अर्जुन जानता था की उसका ये विकराल अंग प्रीती के अछूते कौमार्य को बुरी तरह से भांग करने वाला है.

"बस ये अँधेरा तभी तक रखना जब तक तुम्हारा डर ख़तम न हो जाये. उमाठ.. वैसे सच कहती हु तुम मुझे काम आंक रहे हो अर्जुन.", प्रीती के हिम्मत देने से अर्जुन भी शांत हो कर अपने अंग को चिकने तरल से भिगोने के बाद अपनी प्रेयसी की जांघो के बीचा आ बैठा. अब दोनों के काम अंग पूरी तरह से तैयार और उत्तेज्जित थे बस अर्जुन की बढ़ी धड़कन को छोड़ कर.

"मैं जानता हु के बहोत तकलीफ होने वाली है तुम्हे.", अर्जुन के हाथ में हलकी कम्पन्न होने लगी थी अपना वो मोटा तगड़ा सूपड़ा उस अक्षत yon-dwaar पर लगते हुए. प्रीती ने हिम्मत दिखते हुए खुद हे इस हथियार को पकड़ कर अपनी बेकरार योनि पर चिपका दिया. सचमुच ये योनिमुख को पूरी तरह छिपा चूका था अपने बड़े अकार के पीछे. दोनों की हे एक मादक सिसकारी निकल गयी जैसे कनेक्शन बन्न कर करंट चालू हो गया हो.

"उम्म्म.. तकलीफ अगर अपने साथ ाचा परिवर्तन ले कर आती है तोह वो होनी जरुरी है अर्जुन. ख़ुशी पाने का सफर इतना आसान होता तोह दुनिया में कही भी दुःख होता क्या? और तुम मुझसे जब इतना प्यार करते हो तोह तकलीफ कैसे हो सकती है. अपनी प्रीती का पूरा कर दो अर्जुन.", इसके साथ हे प्रीती ने अपने आँखें मूँद ली. अर्जुन उसके ऊपर झुकता हुआ दबाव बनता चला गया. लिंग बाहरी फांको को बुरी तरह चौडाते हुए उस बारीक से छिद्र पर कुछ पल रुका रहा.

"आआह्ह्ह्ह..", ये आवाज दोनों के मुख से उभरी और प्रीती के हसीं चेहरे पर एक पल के लिए असहनीय दर्द की रेखा उभरने के साथ हे गायब हो गयी. गुलाबी छिद्र में वो दहकता मोटा सूपड़ा बुरी तरह फंस चूका था. इतना कसाव खुद अर्जुन को भी कमजोर करने लगा.

"रुक जाते है.", अर्जुन के इतना कहते हे प्रीती ने उसके कूल्हों पर नाखून गाड़ते हुए जैसे आगे बढ़ने का आदेश दे दिया.

"अब कुछ मैट बोलना अर्जुन. मैं सेह लुंगी.", प्रीती की आवाज में जरा भी कम्पन्न न देख अर्जुन हैरान था लेकिन अब उसने भी दिल मजबूत करते हुए प्रीती के होंठ अनुमानन हे अपने होंठो में भरते हुए कमर का तेज धक्का लगा हे दिया. वो जोरदार धक्का बिस्टेर को हिलने में कितना सखशाम था इसका अंदाजा प्रीती के फड़कते जिस्म से पता लगा. योनि से रिस्ता गरम लहू नतीजा था के हे धक्के में शील भांग होने का. प्रीती की योनि ने पहली बार में हे आधा लिंग खुद में उतार लिया था.

"आअह्ह्ह्हह.. सॉरी..", अर्जुन को तोह वो रिस्ता लहू अपना हे महसूस हुआ और उसके क्षमा मांगने पर गीली आँखों से प्रीती ने नजर मिलते हुए ना में गर्दन हिला दी. इतनी मजबूत वो कैसे हो सकती है, बस अर्जुन यही सोच रहा था. जिस्म कुछ थड़ा जरूर पड़ा था लेकिन जल्द हे प्रीती के हाथो ने अर्जुन की चिकनी चौड़ी पीठ को सेहला कर उत्साहित किया. अब दोनों के होंठ जो आपस में जुड़े तोह अलग न हुए. अर्जुन से ज्यादा हिम्मत दिखती प्रीती उस बुरी तरह फंसे जानलेवा हथियार की तरफ खुद हे कमर उठाने लगी.

मदहोशी के आलम में अर्जुन ने भी कसाव को भूलते हुए कुछ इंच लिंग बहार खींच कर फिर से अंदर भर दिए. एक नियंत्रित लाये में कमर हर धक्के पर कुछ और अंदर सरकने लगी और दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमते रहे. वो पल भी जल्द आ गया जब लुंड की पूरी असाधारण लम्बाई उस लचीले गर्भा से जा टकरई.

"उफ्फ्फ.. थिस इस थे बेस्ट फीलिंग इन थे वर्ल्ड अर्जुन... आह्ह्ह्ह.. कहा था न मैं बर्दाश्त कर लुंगी.. उम्म्म.. सचमुच काफी बड़ा है और कही टच हो रहा है.. आह्हः.. बूत it's हीवेनली.", अर्जुन उन ठोस छातियों को अपने मजबूत सीने से दबाये हैरत में था. सचमुच ये लड़की असाधारण हे तोह थी नहीं तोह इस मूसल ने तोह खेली खाई ब्याहताओं की भी चीखें निकलवा छोड़ी थी.

"तुम ठीक हो न प्रीती? मुझे खुद पता नहीं चला कब ये पूरा अंदर चला गया. ज्यादा दर्द है?", अर्जुन उसके माथे और गाल को प्यार से सहलाता हुआ जान न चाहता था की कही वो उसको खुश रखने के लिए हे तोह सब दर्द अंदर नहीं समेत रही.

"जान, जो दर्द था वो उतना ज्यादा भी नहीं था जितना तुमने इस दौरान प्यार दिया. ऐसा दर्द तोह मैं हर बार सहने को तैयार हु बस प्यार भी इतना हे मिलना चाहिए. अब भी अँधेरे में रहोगे?", प्रीती की आँखें बेशक आंसुओं से भरी थी लेकिन चेहरे पर शिकन तक न थी. उसकी बात सुन्न कर अर्जुन कस के लिपट गया अपनी चाहत से.

"तुम सचमुच मेरे लिए हे बानी हो प्रीती. अब ये प्यार हर लम्हे के साथ सिर्फ बढ़ेगा और जबतक मेरी सांसें चलेंगी तुम मेरी धड़कन बन्न कर दिल में रहोगी. तुम्हे पाने के बाद अब मेरी कोई और इत्छा नहीं है.", अर्जुन को भावुक होते देख प्रीती ने दर्द में भी मजाक कर हे दिया.

"डार्लिंग, हफ्ते में सिर्फ एक दिन मेरा है जबतक शादी नहीं हो जाती. इतनी लालची भी नहीं हु के बाकी सबका पत्ता साफ़ कर दू और वैसे भी मेरा फिगर खराब नहीं करवाना इतनी जल्दी. अब दर्द वाला काम हो चूका है न, ख़ुशी देने की बारी में क्यों रुके हो?", प्रीती की ऐसी बातें हे तोह थी जिनसे अर्जुन का प्यार इतना गहरा था उसके लिए. वो फैंसले काम लेती थी लेकिन सबको शामिल करके.

"उस एक दिन में हे तुम्हारी 34 से 38 कर दूंगा कॉलेज जाने तक.", अर्जुन ने बड़ी एहतियात से प्रीती की एक जांघ सहलाते हुए हाथ कूल्हे की निचे लगाया और आधा लिंग बहार खिंच कर बड़े प्यार से वापिस धकेल दिया. अब इस रगड़ ने दर्द के साथ साथ प्रीती को सितकरने पर मजबूर कर हे दिया.

"अह्ह्ह्ह.. सचमुच ये कुछ जायदा हे मोटा है जान.. ऐसे हे .. और भूल जाओ 34-38.. न ये पीने को मिलेंगे और न हे बैकडोर एंट्री शादी तक.. उम्..", वो हलके घर्षण प्रीती को एक नया हे एहसास करवा रहे थे. दर्द, प्यार, मस्ती और नशे सा एहसास हर पल बढ़ता रहा. अर्जुन ने भी कूल्हे से हाथ हटते हुए दोनों अनार दबोच कर तन्मयता से सफर थोड़ा तेज कर दिया.

"उम्म्म.. बैकडोर न सही.. आठ.. इनकी अकड़ जरूर काम करके रहूँगा.. उम्म्म.. आह्हः. सचमुच तुम अलग हे हो जान.. जैसे मुझको अंदर हे खींच रही हो..", अब लोहे का ये बिस्टेर इन तगड़े जिस्मो की कुश्ती से choo-choo करने लगा था और प्रीती भी टांगो की कैंची बनाये अर्जुन की पीठ जकड़ती हुई उसके हर धक्के के साथ ऊपर निचे होने लगी. अर्जुन का इतना जोरदार stann-mardan कुछ हे देर बर्दाश्त हुआ और उसके बाद योनिरस की तीव्र फुहार ने सुपडे से लैंड की जड़ तक का हिस्सा 3-4 बार पूरी तरह भिगो दिया.

"माआ.. उफ़... होल्ड में जानन... I'm flying...aahhhhh", अर्जुन के पीठ में नाखून एक चौथाई इंच तक जा धंसे जहा जल्द हे खून की बूंदे उभर आयी. इतनी मजबूत पकड़ सिर्फ उसके जिस्म ने ऋतू और अलका की हे प्राप्त की थी आज से पहले. लेकिन लहू सिर्फ ऋतू निकाल सकीय थी. अपने दर्द को सेहन करता अर्जुन प्रीती को बाहों में लिए हे बिस्टेर से उठ खड़ा हुआ. 2 बटन दबाते हे कमरे में लटकते दोनों दूधिया बल्ब प्रज्वलित हो गए. बिस्टेर की वो सफ़ेद रेशमी चादर बुरी तरह ast-vyast थी और ठीक बीच में आधा फ़ीट के दायरे में वो गीला लाल धब्बा, प्रीती के कौमार्य भेदन की निशानी.

"ठीक हो न प्रीती?", अभी भी प्रीती किसी बची की तरह अर्जुन के सीने से लिपटी थी. दोनों के निर्वस्त्र जिस्म रौशनी में ऐसे चमक रहे थे जैसे कुछ अलग हे तेज प्राप्त हुआ हो इस मिलान से. जल्द हे प्रीती ने अपनी उनींदी सी आँखें खोली तोह दोनों की हालत और रौशनी देख वो ज्यादा शर्मा गयी.

"गंदे कही के ऐसे मेरे अंदर ये दाल कर बेशर्मी से कमरे में खड़े हो. और मैं ठीक हु बस अंदर जैसे फ्लड आ गयी थी और एनर्जी निकल गयी. अब करो भी या इतनी बेशर्मी दिखते रहना है. चलो बीएड.. ये इतना ब्लड निकला है मेरा?", प्रीती सब भूल कर हैरानी से बिस्टेर को देखने लगी और अर्जुन मुस्कुराते हुए उसको लिए उस धब्बे के बराबर प्रीती को लिटाता खुद फर्श पर खड़ा हो गया.

"संभल कर रखा इस बेडशीट को, ऑफिसियल सुहागरात को यही बिचानी है हमे. और अब तोह बेशर्मी का लाइसेंस मिल चूका है तोह जब भी अकेली मिली तोह मैं रुकने वाला नहीं.", अर्जुन ने पनियाई छूट में एक गहरा धक्का लगते हुए अपने विचार बता दिए. दोनों सख्त उभार बुरी तरह से लाल कर चूका था अर्जुन पिछले आधे घंटे में. प्रीती की आँखों का काजल आंसुओ के साथ चेहरे पर फ़ैल कर उसको अब कही ज्यादा हसीं दिखा रहा था. अर्जुन के चेहरे को अपनी तरफ खींचती हुई वो भी पूरी कामुकता से अर्जुन के हर प्रहार पर खुल कर आहें लेने लगी. रौशनी में साफ़ नजर आ रहा था जो हालत प्रीती की खूबसूरत योनि की उस मॉटे तगड़े मूसल नई की थी. 3 इंच व्यास में फैला वो छेड़ अपनी बुरी हालत पर भी जैसे ख़ुशी के आंसू बहा रहा था.

"हहहह.. तुम्हारी बॉडी तोह और ज्यादा चमक रही है आह्हः. सॉरी ब्रैस्ट लाल कर दी.. उम्म्म", इस बहाने से एक बार फिर अर्जुन प्रीती के चूचक चुसकने लगा था चुदाई के साथ. प्रीती के रक्तिम चेहरे पर भी इस हरकत से मजे के भाव आने लगे..

"िस्ष्ह.. खा जाओ इन्हे .. आठ.. अब लाल करो या नीले बस सोच लेना ये तुम्हारे हे है जीवन भर.. ऐसे प्यार से आठ..", प्रीती खुद हे अर्जुन के सर को सहलाती हुई अपने स्टैनो के साथ मनमानी करने की छूट देने लगी. एक बार फिर दोनों गोरी लम्बी टाँगे अर्जुन के कूल्हों को जकड़ती हु उसको अपने साथ पूरी तरह चिपकने लगी. धक्को की रफ़्तार प्रीती ने अपने नियंत्रण में ली थी जब दिल करता टांगो का कसाव ढीला करती, या सख्त. अर्जुन मस्ती में इस अनुभव को भी सीख रहा था इस नौसिखिए प्रेमिका से.

अगले 10 मिनट में हे दोनों की हालत बुरी हो चुकी थी. पिछली रात से अकड़ा हुआ अर्जुन का लिंग अपना बाँध और जायदा न रोक सका. प्रीती ने अंत समय में एक बार फिर उसको अपने ऊपर गिरते हुए जकड़ा तोह अर्जुन की हिम्मत जवाब दे गयी. वो जो चाहता था वैसा कर न सका.

"ओह्ह्ह्ह.. sorryy....main होने लगा हु.. आह्ह्ह्ह.", दहाड़ मारता हुआ वो अपने वृषण (अंडकोष) तक छूट के मुहाने लगता पूरी गहराई में अपना वीर्य उड़ेलने लगा. इतनी गरम और तेज बौछार महसूस करते हे प्रीती की छूट ने भी अपने बाँध को पूरी तरह खोल पानी छोड़ दिया.

"उम्म्म मायआ... उफ़.. पकड़ लो mujhe..aahhh.. ये क्या कर दियाए..", प्रीती तोह जैसे मजे से दोहरी होती बेहोश हे हो गयी और वैसी हे हालत अर्जुन की थी जिसने पूरी चुदाई में एक बार भी पूरा लिंग बहार न निकला था. एक एक कटरा गर्भद्वार पर खाली करके वो अचेत सा प्रीती के बदन पर लेट गया. बिस्टेर के किनारे तिकी योनि से गुलाबीपन लिए दोनों का कॉमर्स फर्श पर एक तार से बह कर गिरता रहा लेकिन दोनों को कोई सुध न रही. एक समाज ऊर्जा वाले दो असाधारण जिस्मो के बीच चली इस मोहब्बत की जुंग में दोनों जीत कर पास्ट हो चुके थे.

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"अबे भोले मेरा तोह कुछ मैं सा नहीं मान रहा. ये सब हो तोह मेरी चाहत से भी बढ़कर रहा है और तेरे लिए सुनंदा माँ जी ने भी वो जमीन भाभी के हाथो दिलवा दी लेकिन इतना बड़ा काण्ड और वो भी एकदम से चाचा जी ने किया क्यों? अब तोह पीछे भी नहीं हट सकते यार क्योंकि उन्होंने जिस तरह से डंके की चोट पर ये कर दिया है तोह और सवाल भी नहीं कर सकते.", सभी लोगो को सेवादार भोजन परोस रहे थे और भोजन कर के मैदान से जाने वालो को परिवार के बचो द्वारा कपडे बंटवाने का काम खुद पंडित जी और कौशल्या जी देख रहे थे. यहाँ ये 5 लोग मंदिर से थोड़ी दूर पिछले सुनसान हिस्से में अपनी गंभीर चर्चा में व्यस्त दिखे.

"इस शंकर का दिमाग इतना तेज नहीं है गज्जू जो इसको पापा की ये कारस्तानी जल्द समझ आ जाए. देख जितनी मुझको समझ है उन्होंने तुम दोनों की ख्वाहिश तोह सोच से बढ़ कर पूरी की है लेकिन इसका मतलब ये भी साफ़ है के तुम दोनों के साथ साथ ये अपना राजेश लफंदर भी जंजीर में बाँध दिया उन्होंने. तुम न उड़द सकते अब पहले वाली आजादी के साथ और दलीप को जिस केस पर वालिए जी ने लगाया है उस से तोह भाई साहब की भी मार ली गयी.", नरिंदर उकडू बैठा हंस रहा था अपनी समझ का प्रदर्शन करता हुआ लेकिन शंकर का दिमाग आज विपरीत रूप में कही ज्यादा गहराई से चल रहा था.

"घंटा व्यस्त कर रहे है वो हमको. इन्दर तुझे पापा को देख कर ये समझ नहीं आया की वो अब फिर से अपनी रिवॉल्वर टांग कर घूमने लगे है? देख भजन मां प्रदेश के मुख्यमंत्री है और वो यहाँ पर हमारा साथ एक लिमिट में पूरी तरह दे सकते है पर गज्जू अगर हर ज़िले में दबदबा बनता है तोह हमारी ताक़त कही ज्यादा बढ़ जाएगी. मुझसे जो करवाया जा रहा है वो जनता की सेवा के साथ साथ मेरा करैक्टर भी क्लीन करने की कोशिश है. प्रमोशन वाली बात से मैं क्मो हो कर गज्जू के साथ हे रहने वाला हु आने वाले समय में. मतलब पापा रुतबा बढ़ा रहे है और ममता को सरकार में जोड़ कर वो साली साहिबा के सहारे कोई और जुगत भिड़ने में लगे है. दलीप यार तेरा केस किस दिशा में जा रहा है?", उमेद और नरिंदर तोह आँखें फाड़े शंकर को देख रहे थे जैसे ये कोई अलग हे गृह का प्राणी हो.

"निवेदिता केस में जड़े यहाँ से ले कर जयपुर तक फैली हुई है शंकर. और ये केस पहले बिशन देख रहा था जो गायब हो चूका है. मुझे ये बात कल रात हे पता चली है. तुम क्या सोच रहे हो? क्या ये भी इत्तेफ़ाक़ नहीं है?", दलीप का स्वर गंभीर था अपनी बात कहते हुए.

"हाँ दलीप भाई ये मैं भी सोच रहा था क्योंकि प्रदेश के बहार तोह केस हमेशा हे मैं देखता हु और इस बार मुझे वो नकली सा मंगलम वाला केस दे दिया गया जबकि मैं मारकाट करने से भी नहीं चूकता, जो स्वाभाविक नजर आ रही है इस निवेदिता वाले मामले में."

"बस यही वजह है राजेश जो तुम्हे व्यस्त किया जा रहा है ममता के साथ और यही के केस में लगाया जा रहा है. दलीप जिस जगह जाएगा वह मामला शायद कुछ और है और इसका शांत रवैय्या और खोजबीन की क्षमता देख कर पापा ने हे सरदार जी से ये करवाया होगा. एक बात और देखि किसी ने?", शंकर की गहरी बातों ने सभी के दिमाग पहले हे चक्र दिए थे और इस अधूरे सवाल को सुन्न कर उमेद बस इतना हे बोल सका.

"क्या भोले?"

"आचार्य हंस इस सब कहा फिट होते है? उन्होंने कहा की वो राजनीति में नहीं पड़ने वाले और इतनी जमीन दान कर दी. उनकी बात सही है और वो कही से भी dhan-daulat के लिए आसक्त नहीं है. मामला जरूर कुछ और है.", शंकर ने जमीन से एक घांस का तिनका ले कर चबाते हुए सोचना शुरू किया लेकिन अब जैसे इसके आगे कुछ समझ नहीं आ रहा था. इन्दर एकके बोल उठा.

"मुझे कही शामिल नहीं किया गया तोह इसका मतलब है मैं पापा के साथ रहने वाला हु तोह देर सावेर में पता लग हे जाएगा. वैसे आचार्य जी आजकल बहोत करीब है माँ और पापा के और वो बिना किसी वजह के ऐसा कर सकते है. उनके पास तोह पहले हे सबकुछ है और देश विदेश की सरकार तक में पहचान है आज उनकी. उनकी तरफ से तोह निश्चिंत हे रहो भाई.", नरिंदर की बात सुन्न कर शंकर निरुत्तर था क्योंकि ये बात बिलकुल सही थी और उन्हें तोह हिमानी के बारे में कुछ पता भी न था.

"लेकिन मैं शंकर की बाकी बातों का मतलब समझ रहा हु इन्दर. दलीप भाई ने कहा है के केस राजस्थान तक फैला हुआ है. चाचा जी अपनी ताक़त बढ़ा रहे है और वो पहले से अलग भी दिख रहे है. इस daan-karam वाले दिन उन्होंने एक तरह से shakti-pradarshan हे कर दिया है जिसकी आवाज भजन मां की उपस्थिति की वजह से दूर तक जाने वाली है. वो कुछ बड़ा कर रहे है जिसमे समय भी लगेगा और हम लोग व्यस्त भी रहेंगे. दलीप संपर्क में रहना भाई क्योंकि अगर मामला प्रदेश से बहार का है तोह तुम भी संकट में पड़ सकते हो.", उमेद की चिंता व्यर्थ न थी और शंकर ने भी ऐसा हे कहा अपने हंसाये दोस्त से.

"इस सबके बीच में जो गायब है यहाँ से कही वही तोह नहीं ये सब करवा रहा?", ये बात इतनी देर से शांत बैठे परमवीर ने कही थी और उसका इशारा उमेद और नरिंदर तुरंत समझ गए.

"अर्जुन के यहाँ न आने की वजह सबको पता है परम. वो धार्मिक काम से हमेशा दूर हे रहता है. लेकिन सच कहु तोह बात तुम्हारी पूरी तरह गलत भी नहीं हो सकती. वो यहाँ नहीं है लेकिन जितने लोग अंदर बैठे चर्चा कर रहे थे, आज की तारीख में वो उसके साथ ख़ास लगाव रखते है. संजीव इस दौरान एक बार भी हमारे करीब नहीं आया तोह वो भी ये सब जानता होगा.", उमेद के खुलासे से दलीप को पसीना आ गया था लेकिन राजेश के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान थी जो नरिंदर से छिपी न रह सकीय.

"बोल भी दे लफंदर जो तेरे दिल में है.", नरिंदर की बात पर राजेश ने हँसते हुए कहा.

"जब वो लड़का मेरी कार का प्रयोग करके करम सिंह का काण्ड करवा सकता है वो भी शंकर के अंदाज में तोह आप लोग क्या उसको इतनी आसानी से समझ जाओगे? एक और ख़ास बात बताऊ जो मुझे अब याद आयी है?", राजेश जैसे कोई बम फोड़ने वाला था अब और शंकर जी ने तुरंत कहा

"अब क्या कर दिया है उसने जो हमको खबर हे नहीं? हैं तोह वो पापा से भी शातिर क्योंकि हर घूरती आँख को वो 100 कदम दूर से भी पकड़ लेता है. लेकिन तुम शायद कुछ नया बताने वाले हो.", शंकर ने जैसे पुछा था वैसे हे राजेश ने गर्दन हिला दी.

"वो सरदार जी का ख़ास पुत्तर है आज के समय. उन्हें मेरे सामने फ़ोन आया था जब केस पर चर्चा हो रही थी. पहले तोह वो शायद अपनी बीवी से बात करते रहे लेकिन उसके बाद जब उन्होंने 'अर्जुन पुत्तर' कहा तोह न चाहते हुए भी मेरा ध्यान चला हे गया. वैसे हे पूछने के नाटक किया तोह उन्होंने बताया के शंकर जीजा जी का लालदा तक़रीबन हर दिन उनके घर होता है और पूरा ख्याल रखता है श्रीमती जी का. कई बार तोह वालिए जी के लिए अर्जुन ने हे चाय बनाई है उनके घर और shatranj-ludo की लम्बी बाजियां भी चलती है इस दुअरान.", राजेश की बात सुन्न कर दलीप के साथ शंकर का भी कलेजा बैठ सा गया.

"इसका कुछ कर भी नहीं सकता क्योंकि अब उसका घुलना मिलना देखने में तोह लगाव वाला हे है पर क्या कर रहा है ये किसी को खबर भी नहीं. ऐसे मामले से मैं तोह दूर हे ठीक हु भाई. गज्जू का दिल करे तोह वो बात करे घुमा फिर कर उसके साथ या फिर दलीप भी ये जोखिम उठा सकता है.", दलीप का नाम शंकर ने मस्ती में लिया था क्यों माहौल गंभीर होने लगा था.

"बहनचोद गांड में खाज है क्या मेरे जो मैं उसके आसपास भी जाऊ.? जब जब वो सामने आता है मेरी हालत तुम लोग नहीं समझ सकते सिवाए शंकर के जो मजे ले रहा है. तुम लोग तोह फिर भी उसके साथ हंसी मजाक कर सकते हो, मेरी तोह अब उतनी हैसियत भी नहीं रही.", दलीप के चेहरे के भाव देख कर सभी हंसने लगे तोह परम ने पूछ लिया.

"ऐसी क्या भैंस खोल ली दलीप भाई अपने अर्जुन ने आपकी? लड़का तोह हीरा है उसमे कोई राये नहीं बस उसके साथ स्वाभाविक रहो तोह वो पूरा maan-samman देता है. रूचि तोह माँ से भी बस अपने भतीजे का गुणगान करती रही आज पूरे सफर में. मैं बस इतना कहूंगा की उसकी तरफ अपनी सोच को वैसा हे रखो जैसा उसके साथ हमारा रिश्ता है. मेरी बेटी को एक इतना प्यारा भाई मिल गया है अर्जुन के रूप में तोह मेरे लिए वो सिर्फ बीटा है बस.", परम की बात ने तोह चर्चा पर purn-viraam हे लगा दिया. इस बात से यहाँ बैठे सभी इत्तेफ़ाक़ रखते थे की अर्जुन किसी के मामले में टांग तोह नहीं डाटा.

"हाँ एकदम सही बात कही भाई तुमने. वो घर के हर सदस्य का ख़याल रखता है और ज्यादातर समय कोई न कोई उसके पास हे रहता है. दलीप भाई तुम भी सहज रहो तोह कोई परेशानी नहीं. जो भी मसला है मुझे नहीं लगता होगा उसमे कभी अर्जुन ने टोका होगा तुम्हे.", नरिंदर की बात पर राजेश और शंकर भी दलीप की तरफ देखने लगे.

"सच कहु तोह वो मुझे मौसा कह कर पूरी िज्जात्त और ख़ुशी से मिलता है. बस अंतर्मनन में अलग हे डर लगा रहता हैं के कही वो कुछ पूछ हे न ले. गलती होने के बाद डर तोह लगता हे है यार और उसका दिल इतना बड़ा है की उसने कभी कुछ जाहिर हे नहीं किया तोह ये डर ज्यादा हो गया."

"देखो दलीप भाई, आप उसके साथ बात करोगे तोह ाचे समझ जाओगे उसको. मेरा भांजा जितना बड़ा दिल रखता है उतना शायद हे कोई और हो. कॉलेज की जमीन उसकी लेकिन उसने अपनी हिस्सेदारी प्रीती और मंजूबाला में आधी आधी बाँट दी, खड़े पाँव. उसको सब समझ है और इसका उदहारण ये बात भी है के ऋचा को अर्जुन ने अंकल जी के सामने परिवार में शामिल कर दिया. इतना जिगरा तोह खुद जीजा जी में भी नहीं होगा. गलत तोह नहीं कह रहा न मैं शंकर जीजा?", इस बात पहली बार शंकर जी थोड़ी झिझक के साथ मुस्कुराये.

"हाँ, ऋचा ज्यादाता मेरे बचो और बीवी के साथ हे रहती है. विन्नी का तोह शुरू से हे लगाव है अर्जुन से लेकिन अब ऋचा भी खुल कर पूरे घर में घूमती फिरती है. कल रात माँ ने खुद हे उसके कपडे अर्जुन से मंगवाए थे आज के दिन के लिए. मैं खुद मानता हु की वो सबके साथ जुड़ कर रहता है और मेरे से जुडी हर चीज और इंसान का पूरा ख़याल रखता है. बस डर भी लगता है के इस सबमे कही कोई गलत इंसान को वो करीब न ले आये."

"फ़िक्र न कर भोले, वो गलत को मौका भी परिवार से कही दूर रख कर देता है शंकर और फिर भी उसको ऐतबार न हो तोह अपनी निगरानी से बहार नहीं होने देता. शबनम का हे उदहारण ले ले जिसको भरोसे में लेने के बाद भी खुली हवा नसीब न होने दी.", उमेद तोह धरम पिता और गुरु था अर्जुन का. यहाँ बैठे लोगो से बेहतर वो उसका मैं जानता था. इधर इनकी चर्चा अभी अर्जुन पर और आगे बढ़ती उस से पहले हे विकास बुलाने आ पंहुचा.

"चाचा जी, सभी लोगो को छोटे दादा बुला रहे है. खाना बांटने भी जाना है न.", इस बात पर ये चर्चा यही समाप्त हो गयी. सभी तुरंत उठ चले सब भूल भाल कर.

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"अर्जुन कहा है कोमल?", बबिता ऋचा को साथ लिए इधर चली आयी जहा सभी लड़कियां मंदिर के बहार फर्श पर बैठी भोजन कर रही थी. हर कोई अपने हिसाब 3-4 के जोड़े में बैठी थी और कोमल भी प्रियंका विन्नी के साथ थी.

"बबिता दीदी, वो तोह आया हे नहीं. क्या कुछ ख़ास बात थी? घर तोह आप हमारे साथ हे चल रही हो न?", कोमल के ऐसा कहने पर ये गदराई घोड़ी चुन्नी सही से अपने सर पर करने के बाद वही बैठ गयी. विन्नी मंद मंद मुस्कुरा रही थी बबिता के चेहरे पर हाली मायूसी देख कर. आज वो कही ज्यादा हे खूबसूरत लग रही थी लेकिन ये सादगी देखने वाला हे मौजूद न था तोह बुरा लग्न स्वाभाविक हे था.

"ओह. मैं सोच रही थी की वो होता तोह उसके साथ हे मैं यहाँ से निकल लेती अपनी हवेली. खैर अगर घर में हे है तोह मैं तुम्हारे साथ हे चल पड़ूँगी. बखत (टाइम) से पहुंच गए तोह वो मुझे ससुराल छोड़ आएगा.", बबिता ने ये नहीं कहा के ससुराल ले जा कर छोड़ आएगा. आग तोह लग हे रही थी इतने दिन से जो उसके तगड़े शरीर को ठीक खुराक न मिली हो.

"हाँ क्यों नहीं. मैं साथ चलूंगी आपको छोड़ने. इस बहाने थोड़ी आउटिंग भी हो जाएगी मेरी और आपका सुसराल भी देख लुंगी मैं.", विन्नी के ऐसा कहते हे बबिता के चेहरे पर थोड़ी लाली सी आ गयी जो ऋचा और कोमल से भी छिपी रह सकीय.

"सही बात है और कोमल भी तोह नहीं गयी आपकी नयी हवेली में तोह आना जाना हे करना है इसलिए ये भी विन्नी के साथ चली जाएगी.", बबिता ने घूर कर ऋचा को देखा और उधर विन्नी भी आँखें दिखा रही थी जैसे वो कुछ वक़्त अर्जुन के साथ अकेले रहना चाहती हो.

"हाँ अर्जुन को रुकने की इजाजत तोह नहीं मिलेगी अब और विन्नी साथ चली जाये अगर इसका दिल हो. बाकी तोह किसी में हिम्मत भी नहीं होगी क्योंकि रात ढाई बजे से जाग रहे है सभी. घर जाते हे बाकी टाइम तोह आराम करने और हल्का फुल्का खाना बनाने में निकल हे जाना है. वैसे बबिता दीदी आप आज हमारे हे यहाँ रुक जाओ तोह बेहतर है. अर्जुन सवेरे जल्दी छोड़ भी आएगा और आपके साथ रह कर हमे भी ाचा लगेगा.", कोमल के दूसरे सुझाव को झट्ट से बबिता ने मान लिया.

"चल भाई कोमल तेरा इनविटेशन फाइनल. अब तोह सबेरे हे हम हवेली जाएंगे अर्जुन के साथ और आज की रात तुम्हारे साथ.", कोमल के ऊपर विन्नी को हल्का गुस्सा तोह आ रहा था लेकिन उसको भी इसमें अपना हे फायदा नजर आने लगा.

"हाँ, आज तोह आप कोमल और ऋचा के साथ गप्पे लड़ना. मैं इनके शोर से अलग आराम से सोऊंगी.", विन्नी की बात सुन्न कर बबिता ने बड़े स्नेह से कोमल को अपनी एक तरफ लगा लिया.

"दोने. तुम विन्नी डार्लिंग, सपने देखना और हम मस्ती करेंगे. देखते है ये कोमल कितना साथ देगी मेरा.", बबिता को समझ नहीं आया था के अभी विन्नी क्या कह गयी है और ऋचा हैरानी से विन्नी को देख रही थी जैसे वो खतरा मोल ले रही हो. इधर भी हलकी boonda-baandi होने लगी थी जो हवा के साथ साथ. लगभग लोग अब यहाँ से जा चुके थे और घर के सभी पुरुष गाडी से गरीब बस्तियों के लिए निकल चुके थे. दोपहर को इतने सुहावने मौसम ने जैसे विन्नी को इजाजत दे हे दी थी अपनी रात रंगीन करने की. बस आज उसकी बुआ फिर से मोर्चा न मार ले.
 
अपडेट 155

कठपुतली

लगभग 2 घंटे तक गहरी नींद लेने के बाद प्रीती की आँख खुली तोह शरीर में मीठे दर्द के साथ चेहरे पर वही गुलाबी रंग उभर आया जो अक्सर सुहागरात को याद करके नयी ब्याहता के चेहरे पर अगली सुबह दीखता है. बिस्टेर को छोड़ कर पूरा कमरा एकदम साफ़ सुथरा था. सिरहाने रखा वो बॉक्स नजरो के पास देख कर प्रीती ने थोड़ा शरीर हिलाया तोह वही मीठा दर्द सीने तक आ गया.

'उफ़.. ये अर्जुन भी न.. सचमुच अलग सी आग लगा दी है हर तरफ.' शरीर सीने तक चादर में ढाका था और थोड़ा सरकने से वो अर्धगोलाकार गोर सतांन निप्पल तक निर्वस्त्र हो गए जिस पर प्रीती ने कोई ध्यान न दिया. पैकेट को खोलते हे उसमे ये काले रंग की खूबसूरत ड्रेस थी, बिना ब्याह की और घुटने से 2-3 इंच निचे लम्बाई तक.

'लंच डेट', अंदर रखे कागज पर यही लिखा था और उसके बाद 34-स की जालीदार ब्रा. कोई पंतय उस पैकेट में न देख प्रीती थोड़ा हैरान हुई लेकिन जैसे तैसे करके वो बिस्टेर से निचे उतरी तोह योनि में वो भयंकर दर्द न हुआ जो सोने से पहले महसूस किया था जब अर्जुन ने उसको फर्श पर खड़ा करते हुए ाचे से साफ़ किया था.

'तोह इडियट ने पेनकिलर खिला दी anti-pregnancy बता कर.', वो मुस्कुराती हुई धीमी चाल से अपनी माँ के बाथरूम में आयी तोह यहाँ भी सबकुछ साफ़ सुथरा था. न बाथटब में कोई phool-wine के निशाँ, न वो कैंडल्स और उसकी गीली ड्रेस. साफ़ टोलिया जरूर एक तरफ टेंगा था जो ख़ास प्रीती के लिए हे अर्जुन ने कल लिया था मार्किट से. आईने में खुद का चेहरा देख वो कुछ पल के लिए खो सी गयी थी.

एक बार में हे अर्जुन से मिलान करके चेहरे पर अलग हे चमक आ चुकी थी और वो काजल की कालिख जैसे काले बद्र पूनम के चाँद पर. निचला होंठ थोड़ा फूल चूका था और सीने पर भी हलके लाल निशाँ हर तरफ थे दोनों चुचो के.

'इडियट. पता नहीं क्या निकलने लगे थे इनसे जबकि पता है टच करते हे बेबी नहो हो जायेगा.', अपनी बात पर खुद हे हंसती हुई वो फुहारे के निचे कड़ी हो गयी. आज ये पानी भी प्यार की ठंडक से भरा महसूस हुआ प्रीती को. शरीर से बचा खुचा दर्द भी हवा हो गया और जहा जहा अर्जुन नई प्यार के निशाँ बनाये थे, ठन्डे पानी का एहसास वह कुछ अलग हे जादू दिखने लगा. योनि पर ये तेज सिहरन ऐसी थी जैसे अर्जुन ने फिर से वह होंठ टिका दिए हो.

'शहहह.. आज क्या हो रहा है मेरे साथ? बी गॉड ये फीलिंग सचमुच जान हे ले कर रहेगी. ठीक कहती थी ऋतू दीदी, प्यार के बाद जब पानी भी लगेगा तोह यही महसूस होगा अर्जुन पानी बन्न कर तड़पा रहा हो जैसे.', 10 मिनट बाद हे प्रीती हलके हाथो से शरीर पौंछती अपनी माँ के कमरे में लगे बड़े दर्पण के सामने स्टूल पर बैठी थी. ब्रा मुलायम होने के बावजूद स्टैनो को उत्तेजित कर रही थी लेकिन प्रीती ने जैसे तैसे ड्रायर की मदद से अपने बाल सुखाये और वो काली ड्रेस पहन ने के बाद बिस्टेर की चादर समेत कर उपहार वाले बॉक्स में पैक कर के एक तरफ रख दी. अगले 10 मिनट में ये पूरा कमरा वैसा हे हो चूका था जैसा रोमिला ने जाने से पहले छोड़ा था.

'कमरे में हे पंतय पहनती हु चल कर. और देखु तोह ये जनाब कहा गायब हुए है और कबसे?', प्रीती जैसे हे पैकेट लिए कमरे से बहार निकली अर्जुन रसोई से एक ट्रे लिए उसके सामने आ खड़ा हुआ.

"वाओ. पहले से भी कही ज्यादा हे सुन्दर लग रही है मेरी मानो (बिल्ली). उम्म्म्म.. ी लव यू.", अर्जुन ने एक तरफ से कमर में ब्याह डालते हुए प्रीती की तारीफ करने के साथ हे उसके होंठो पर छोटा सा चुम्बन अंकित करते हुए कहा तोह प्रीती भी थोड़ा कस के लिपट गयी.

"ी लव यू तू जान. वैसे सचमुच कुछ अलग हे हुआ है पर पता नहीं कैसे. ये जूस किस लिए?", अर्जुन को ट्रे टेबल पर रखते देख प्रीती ने साथ चिपके हुए हे पुछा.

"मुझे पता है तुम्हे इसकी अभी बहोत जरुरत है. और जूस पीने के बाद तुम ये टेबलेट ले लेना मैं घर से कपडे बदल कर थोड़ी देर में वापिस आता हु. हो सके तोह निचे पंतय मैट पहन न क्योंकि प्रॉब्लम होगी. कोई आरामदायक स्लीपर्स पहन लो, फिर हम लंच पर बहार चल रहे है.", अर्जुन ने माथे पर चुम्बन करने के बाद अलग होते हुए वो गोली और जूस प्रीती के हाथ में पकड़ाया और उसके हाथ से चादर वाला पैकेट ले लिया.

"तुम बहार गए थे?", प्रीती ने सिर्फ इतना हे पुछा

"हाँ. जाना तोह था हे क्योंकि बहोत कुछ साफ़ करना था और गाडी पर लगवाए फ्लावर्स भी हटवाने थे. ये मेडिसिन लेनी भी जरुरी थी प्रीती और निश्चिंत रहो, बाकी सब भी क्लीन कर दिया है. आंटी के कैमरा वाला सामान डी ड्राइव में आवर फोल्डर के नाम से साफल्य cut-paste कर दिया. अब तुम तैयार हो जाओ मैं भी 10 मिनट में आता हु.", अर्जुन इस वक़्त प्रीती को बिलकुल परेशां नहीं करना चाहता था. कैमरा वाली बात सुन्न कर प्रीती के गाल फिर से लाल होते देख वो तुरंत बहार निकल गया.

'बुद्धू कही के. हमारी तस्वीर भी न लू क्या फर्स्ट टाइम की? और पंतय के बिना लंच पे ले जा रहे हो, वाह..', प्रीती ने तुरंत वो गोली निगलि और छोटे छोटे घूँट जूस के लेती हुई अपने कमरे में चली आयी. अलमारी खोल कर पहले माथे पर एक छोटी सी सफ़ेद बिंदी लगाने के बाद आँखों में काजल लगाती वो आज खुद की खूबसूरती को हे निहार रही थी. दोनों कानो में अर्जुन के दिलवाये बूंदे पहन कर प्रीती ने आईने को चूमा और निचली दराज से वो पत्तियों वाली काली सैंडिल पहन कर ऊपर से निचे तक खुद को देखने लगी.

'अभी भी कुछ तोह कमी है. ये ड्रेस इतनी भी छोटी नहीं है के पंतय दिखे.. उम्म्म.. बँगलेस (चूड़ियां)..', कलाई से वो लाल चूड़ियां अर्जुन ने खुद हे निकाल दी थी संसर्ग के बाद. कुछ सोच कर प्रीती ने वो चांदी रंग की ख़ास चूड़ियां निकाल कर 6-6 दोनों कलाई में पहनी और गले वाला लॉकेट ड्रेस से बहार निकाल लिया. आज वो किसी भी आधुनिक खूबसूरत युवती को पानी भरने पर मजबूर कर रही थी इस एक साधारण सी पोशाक और न बराबर make-up के साथ.

"मैडम, 20 मिनट हो गए है आपको. मान लिया आज सबकी नजरे मेरी जान पर हे रहने वाली है पर ऐसा जुल्म भी न करो की कमरा बंद करने पर मजबूर हो जाऊ.", अर्जुन ने पीछे से प्रीती को बाहों के घेरे में लेते हुए गर्दन पर होंठ रख दिए. एक नीली जीन्स और सफ़ेद कमीज में वो हमेशा की तरह उतना हे आकर्षक लग रहा था जितना प्रीती की मौजदगी में दीखता था. इन दोनों का हे कुछ अलग सा कनेक्शन ठीक Ritu-Arjun की तरह.

"पता नहीं जान आज तोह खुदसे से रश्क होने लगा है. क्या ये सिर्फ एक बार के मिलान से हुआ है या कुछ और बात है?", प्रीती दोनों का अक्स आईने में देखती हुई बोली. उसको अलग हे सुख मिल रहा था इस तरह खुदको अर्जुन की बाहों में देख कर.

"अब तुम परदे से बहार हो प्रीती. यहाँ तुम्हे अपनी ख़ूबसूरती को छिपा कर रखने की अब कोई जरुरत नहीं. अब मैं से ये ख़याल हमेशा के लिए निकाल दो की तुम्हे हिंदुस्तानी रंगत या वैसा हे दिखना है. चलो आज तुम्हे एक ख़ास जगह लंच करवाता हु.", अर्जुन ने पीछे से उसके बाल एक तरफ करते हुए गाल पर चुम्बन किया और बहार टेबल से घर की चाबी उठा कर कार की तरफ बढ़ चला. प्रीती इस सुहाने मौसम से जहा खुश थी वही अब उसको इस बात से अलग डर लग रहा था की गली में किसी ने उसको इस ड्रेस में अर्जुन के साथ बहार जाते देखा तोह क्या होगा.

"चली आओ मैडम. जो सोच रही हो उस से हमको फरक नहीं पड़ना चाहिए. तुम मेरी हो और पूरी फॅमिली की भी.", अर्जुन अपनी काली लांसर का दरवाजा खोल कर बिना किसी की परवाह करता प्रीती को बैठने के लिए बोलै तोह एक बार प्रीती की नजर सामने एक घर छोड़ कर बहार सफाई करती सरोज भाभी पर पड़ी जो ऊँगली और अंगूठे के इशारे से उसको बता रही थी की वो कितनी गजब दिख रही है.

"तुम्हे डर नहीं लग रहा अर्जुन? सरोज भाभी भी मजे ले रही है देखो.", प्रीती हिचकिचाते हुए अगली सीट पर बैठी तोह दूसरी तरफ से अपनी सीट पर जाता अर्जुन सरोज भाभी को हाथ हिला कर 'bye' करता दिखा.

"भाभी है वो हमारी और सबसे बड़ी बात है के तुम आज ऐसा इसलिए सोच रही हो क्योंकि अब हमारे बीच रिश्ता पूरी तरह बन्न चूका है. तुम्हे ध्यान है न मैं कैसे तुम्हे निक्कर टीशर्ट में छोटे दादू और आंटी के सामने हे मोटरसाइकिल पर मौसी को छोड़ने ले गया था.? यहाँ सबको पता है हम कौन है तोह इतना सोचना बंद करो.", अर्जुन की बात को समझते हे प्रीती एकाएक सहज हो कर मुस्कुरा उठी.

"सच कह रहे हो. मैं जो फील कर रही थी वो इन्हे तोह नहीं पता न. चलो अब बेफिक्र हो कर जहा चलना है चलो. लेकिन जल्दी हे वापिस आना होगा हमे सबके लौटने से पहले.", प्रीती ने अपना काले रंग का हैंडबैग पिछली सीट पर रखते हुए अर्जुन के गियर बदलते हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

"सबके आने के बाद हे वापिस आएंगे डार्लिंग. चाबी दो इधर.", अर्जुन कार को आगे बढ़ाते हुए सरोज भाभी के करीब रोक कर शिक्षा निचे करते हुए कहने लगा.

"भाभी, ये प्रीती के घर की चाबी है. हम मार्किट जा रहे है तोह जब घरवाले वापिस आये तोह हमारी चाबी के साथ ये भी उन्हें दे दीजियेगा.", अर्जुन आज सरोज भाभी के साथ उन्मुक्त तरीके से बात कर रहा था और वो भी मुस्कुराती हुई करीब आ कर गीले हाथ से अर्जुन का गाल सहलाती हुई बोली.

"आराम से आना देवर जी. देवरानी पहली बार तोह जाती देख रही हु तुम्हारे साथ. प्रीती, जेब खाली करवाए बिना वापिस मैट आना मेरे देवर की.", प्रीती होंठ दबती हुई बुरी तरह झेंप गयी थी उनकी बात सुन्न कर.

"कहो तोह आपको हे ले चालू भाभी जी.", अर्जुन ने जैसे ये कहा सरोज तुरंत चाबी ले कर पीछे हट गयी.

"होली दूर है देवर जी, इतने भाभी हाथ नहीं आने वाली. ाचा एन्जॉय करना और मैं बता दूंगी तुम्हारे घर, दोनों मार्किट गए है.", भाभी के बात बदलने की वजह घर के अंदर का दरवाजा खुलने की आवाज थी. अर्जुन भी थैंक यू बोल कर अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चला. पूरी तरह से बंद कार के भीतर इस वक़्त ये गाना बज रहा था,

'इस जहां की नहीं है तुम्हारी आँखें..

इस जहां की नहीं है तुम्हारी आँखें..

आसमान से ये किसने उतारी आँखें..

2 जहां दे के ले लू तोह सस्ती हैं ये..

2 जहां से भी प्यारी तुम्हारी आँखें..

आसमान से ये किसने उतारी आँखें..

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बेहद हे आलिशान से महल सरीखे इस बड़े घर के इस उतने हे शाही कमरे में ये खूबसूरत युवती नरम बिस्टेर पर बैठ कर लैपटॉप में खोयी थी. दरवाजे पर दस्तक होते हे जो भी बहार तोह उसको अंदर आने की अनुमति देने के साथ साथ बिस्टेर की बगल में लगे स्विच को दबा कर कमरा रोशन कर दिया.

ये शबनम मिर्ज़ा का निजी कक्ष था और वो जबसे इंडिया से वापिस अपने घर लौटी थी, ज्यादातर इस कमरे में या इस महलनुमा घर से बहार आगे खूबसूरत उपवन में हे समय बिताने लगी थी. घंटो वो घने वृक्षों के सामीप्य में नदी किनारे विचरण करती थी या अपने पिता के मौजूद होने पर उनके आसपास रहती. मिर्ज़ा साहब भी अपनी बेटी के साथ समय बिता कर ाचा महसूस करने लगे थे और हर शाम वो भोजन शबनम के साथ हे करते.

हमेशा अपनी माँ के साये टेल रहने वाली शबनम को अब अपने अतीत से हे घुटन होने लगी थी लेकिन अर्जुन द्वारा दिया ये नया जीवन वो व्यर्थ न करते हुए अब पूरी कोशिश करती थी अपने आसपास के माहौल को सकरात्मक रखने की. इतने साल अपने सौतेले पिता के समीप रहने के बावजूद उसने कभी उन्हें वक़्त या बेटी वाला प्रेम न दिया था. लेकिन घर में ये नयी शबनम पूरे मिर्ज़ा खानदान को भा गयी थी. Tej-taraar व्यक्ति जब अपनों से प्यार भी करता है तोह वो पूरा समर्पित हो जाता है अपने स्वभाव के विपरीत. यही नयी शबनम ने किया था इन चाँद दिनों.

"आ जाएँ माँ. आपको नॉक करने की जरुरत कबसे होने लगी?", 10 फ़ीट ऊँचे वो नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे के पार कड़ी ये महिला भी सौन्दर्य की मिसाल हे थी लेकिन चेहरे पर ख़ूबसूरती जैसे भाव बिलकुल न थे. रेशमी सफ़ेद कला सलवार कमीज और सर पे भी दोरंगा दुपट्टा करने से लिए बड़ी नजाकत से चलती बिंदिया उर्फ़ फरज़ाना बेगम अंदर चली आयी. कमरे के फर्श पर महंगा कालीन अपने आप में इस घर के रसूखियात बता रहा था. सुनहरी शहतीर की बानी उस आकर्षक कुर्सी पर बैठते हुए बिंदिया चाँद लम्हे अपनी बेटी को देखती रही जो ढीली टीशर्ट और वैसे हे पाजामे में अपने लम्बे बालो का जुड़ा बनती हुई उसमे क्लिप लगा रही थी.

"तुम ठीक तोह हो न शबनम? अब मेरी बेटी के पास अपनी माँ के लिए इतना भी वक़्त नहीं की dukh-sukh हे बतला ले? जबसे वापिस आयी हो एक बार भी ठीक तरह से मुझसे बात तक नहीं की. समाज के लिए मैं जो भी हु शबनम लेकिन तुम तोह मेरा सबकुछ हो.", बिंदिया अपनी बात कहते हुए बड़ी आस भरी निगाहो से शबनम को देख रही थी जिसके चेहरे पर ख़ास भाव न थे.

"हो गया आपका माँ? आपने अभी अभी जो कहा है वो एक बार फिर से कहिये, मेरे सर पर हाथ रख कर. वैसे उसका भी फायदा नहीं कुछ, मरने के लिए तोह छोड़ हे दिया था आपने मुझे. लेकिन मुझे अपने किये का जरा भी दुःख नहीं है, माँ के लिए किया था न सबकुछ. वो अलग बात है के माँ ने कुछ नहीं किया अपनी इस नाजायज़ औलाद के लिए.", शबनम द्वारा 'नाजायज़' शब्द कहना बिंदिया के दिल पर हथोड़े की तरह प्रहार कर गया. शबनम के आवाज में कही कोई दुःख या गुस्सा न था. किसी आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह वो शांत थी लेकिन बिंदिया तड़प उठी थी. आँखों में एक पल में हे मोटी मोटी बुँदे उभर आयी आंसुओं की.

"हाँ मैं बदचलन औरत हु शबनम, बेगैरत जो अपनी बेटी को भी ाची परवरिश देने की जगह उस दलदल में ले गयी जहाँ से वापिस आना नामुमकिन था. मजबूर थी, गुस्सा थी और बदले की भावना ने मुझसे जाने कितने पाप करवा दिए जिसकी सजा एक जनम में तोह मिल भी नहीं सकती. लेकिन मैंने तुमसे हमेशा दिल से प्यार किया है और कभी तुम्हारे लिए 'नाजायज़' लफ्ज़ जुबान पर नहीं आने दिया. मेरे पहले प्यार की निशानी को सीने से लगाए आयी थी यहाँ और शादी की सहमति भी तुम्हे पहली बेटी के दर्जा देने पर हुई. मेरी मजबूरी किसी को समझ नहीं आ सकती शबनम लेकिन मैं अब अपनी बेटी को हमेशा पास रखना चाहती हु. क्या एक मौका दे सकती हो अपनी माँ को?", बिंदिया से जवाब देते नहीं बन्न रहा था क्योंकि एक बात कहने पर शबनम के 3-4 सवाल करना तये था.

"मैं अर्जुन नहीं हु माँ जो अपनी हे मौत के सौदागर को माफ़ कर दू. आपको पता है इस बदले की भावना में आपकी बेटी का चरित्र वैश्य जैसा हो गया? वह जिनकी सुरक्षा में भेजा था उन भेड़ियों ने मेरे शरीर के साथ साथ आत्मा को नीलाम किया लेकिन आप खामोश रही. त्याग भी उसके लिए ाचा लगता है माँ जो dev-swaroop हो. नरिंदर जी के साथ आपने इतना कुछ किया तब प्यार कहा था? एक पल तोह अपने ताऊ जी के नीचे आने वाली थी उस समय आप कहा थी? छोड़िए ये सब बातें, मेरे कर्मो की जो भी सजा मुझे मिली है वो मैंने कबूल कर ली. अब जीवनभर न मुझे किसी से बदला लेना है और न किसी से नाराजगी है. आपके सामने हु और आप हमेशा मेरे लिए मेरी माँ हे रहेंगी.", शबनम ने 2 टूक बता दिया था की अब जीवन शांत और तनावरहित रखने की हे मंशा है.

"मैं एहसानमंद हु अर्जुन की और मुस्कान से भी मैंने माफ़ी मांग ली है शबनम. अब तुम जैसा चाहती हो वैसा हे करुँगी बेटी लेकिन बस एक बार अपनी माँ के साथ वैसी हो जाओ जैसी बचपन में थी."

"हाँ वो टार्चर दे कर मुझे सख्त और इमोशनलेस बनाने वाला बचपन भूलना बहोत मुश्किल काम है माँ लेकिन उसकी याद अब दर्द नहीं देती. मुस्कान मासूम है और अर्जुन के साथ ने उसको कही ज्यादा समझदार बना दिया. मैं थोड़ी ढीठ हु न तोह समय लगेगा मुझे. वैसे आप चाह कर भी खुद को ठीक नहीं कर सकती, खुद का दिल रखने के लिए चाहे बोल लीजिये.", शबनम के ये सूक्ष्म तीर बुरी तरह आहात कर रहे थे उसकी माँ को.

"क्या मतलब है शबनम तुम्हारा? मेरे दिल से पूछो इसमें कितना दर्द है और तुम्हारे लिए मैं सब भुला कर अलग ज़िन्दगी जीने को भी तैयार हु. नहीं रखूंगी किसी से भी वास्ता. न अतीत से और न वह मौजूद किसी इंसान से.", बिंदिया की आँखों से बहते आंसू ठुड्डी से उसकी गॉड तक गिर रहे थे.

"मत बेहलाओ न माँ. जानती हो अर्जुन कहता है के मेरी माँ तोह हमेशा बस मोहरा भर रही है इन खुनी खेल का. उसके लिए तोह आप एक नादान पीड़ित औरत हो जिसका उपयोग किया गया लेकिन क्या बताती मैं उसको की मेरी माँ तोह शरीर का सौदा करने में एक पल व्यर्थ नहीं करती अगर बात अर्जुन के परिवार को नुक्सान पहुंचने की हो. हर वो गलत इंसान जो ऐसा कर सकता है, मेरी माँ अपने साथ साथ अपनी बेटी को भी उसकी गॉड में बैठा देती है. आज आप कह रही हो की सुधर जाओगी लेकिन हर शनिवार आपके कदम फिर उस जगह पहुंचेंगे जहा एक खानदानी औरत के नहीं होने चाहिए.", शबनम का इशारा छोटे मिश्रा की तरफ था.

"वो जा चूका है और अब मुझे किसी की परवाह नहीं है शबनम. मेरी ज़िन्दगी को वो लोग बीच बाजार भी नीलाम कर दे तोह भी मैं उनका किसी गलत काम में साथ नहीं दूंगी. जानती हु कोई गंगा मेरे पाप नहीं धो सकती लेकिन मैं इस घर में अपनी बेटी और पति के साथ बाकी ज़िन्दगी चैन से गुजरना चाहती हु. सिवाए दुःख और दर्द के मुझे कुछ भी नहीं मिला आजतक. अब अगर मौत भी आये तोह अपनों के बीच हे आये.", बिंदिया दोनों हाथ जोड़ने हे लगी थी की शबनम ने फुर्ती से अपनी माँ को ऐसा करने से रोक लिया.

"काम से काम उस इंसान से तोह माफ़ी मांग लो माँ जिसने तुम्हे आजाद करवाया है उन खून चूसने वाले जानवरो से.", शबनम पहले बार थोड़ा नाराजगी से पेश आयी थी. बिंदिया हैरत से भीगी आँखों के साथ अपनी बेटी को अपलक देखने लगी. कैसी आजादी और कौनसे जानवर?

"आजाद करवाया है?"

"राजकुमारी अनामिका की बेटी उतनी भी समझदार नहीं है जितना अक्सर शाही लोग होते है. अर्जुन बात तोह की है तुमने कुछ दिन पहले लेकिन अपना सच उस से भी छिपाया जो तुम्हारे लिए अपनी जान डाव पर लगा गया. क्यों नहीं नीलिमा का पता दिया उसको? लाजवंती नानी के इशारो पर ज़िन्दगी भर नाचती रही हो आप लेकिन उनसे आजाद करवाने वाले के प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं. एक 18-19 साल का युवक आपकी िज्जात्त के लिए जाने किस किस से लड़ रहा है और उसको सिर्फ अपनी बेटी वापिस भेजने के लिए धन्यवाद कहा?", अपना पूरा सच तोह खुद बिंदिया को भी पता नहीं था.

"तुम्हारी नानी का नाम दमयंती है शबनम और मान लिया के लाजवंती मौसी के पास कुछ ऐसा है जिस से वो मेरी माँ की िज्जात्त खराब कर सकती है. मेरी भी कुछ गलतियों के सबूत मौसी और लता के पास है जिस से कभी कभी मज़बूरी में मुझे उनका साथ देना पड़ा लेकिन पंडित जी के परिवार ने मुझे सिर्फ दुःख पहुंचाया है और कुछ नहीं. ये अर्जुन ाचा लड़का हो सकता है और तुम्हारे एवज में मैंने उसका शुक्रिया भी किया लेकिन बाकी सभी दोषी है. मैं तुम्हारे लिए उन्हें भी माफ़ करने को तैयार हु."

"उस परिवार की एक ईंट नहीं हिला सकती आप और आपके सो कॉल्ड वेल विशेर्स. वैसे नाजायज़ तोह आप भी है या फिर किसी के प्यार की निशानी. चन्दर की मौत के बाद अर्जुन ने आपकी मौसी और मां के घर में सेंध लगा दी, जहाँ बहोत कुछ मिला था उसको. करम मां की मौत के बाद वो सब उसने उनके घर बाकी सबूतों के साथ मिला कर सही ठिकाने भी पंहुचा दिया है. अब किसी मिश्रा, मुन्नी या लाजो से डरने की जरुरत नहीं आपको. हाँ बाप का नाम वो भी ढून्ढ रहा है आपके. सही करने वालो को आप माफ़ भी कैसे कर सकती है? वैसे अर्जुन अब आपके असली मां के पीछे लगा हुआ है, कुमार सारंग के. अब नानी से पूछने के लिए आपके पास बहुत से सवाल थे माँ लेकिन आपकी गलती से वो भी सारंग के पास है.", शबनम ने जो इतना बड़ा विस्फोट किया था बिंदिया के दिल और दिमाग पर, वो सफ़ेद हे पड़ गयी. शबनम अपनी माँ को खामोश देख कर तुरंत उन्हें हिलनी लगी तोह जैसे बिंदिया की चेतना लौटी और वो फफक कर निरंतर आंसू बहाने लगी.

"मेरी बची मुझे कुछ समझ हे नहीं आया कभी. कुमार हमेशा हमारे लिए अन्नदाता जैसे रहे जैसा माँ ने बताया था के तुम्हारे नाना उनके ख़ास व्यक्ति थे जिनकी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी. सच कहती हु शबनम ये सब मुझे नहीं पता था सिवाए इसके की नीलिमा मेरी मौसी की बेटी थी जिनके घर से हमारे कोई तालुक्क नहीं बचे थे. अर्जुन ने कोशिश भी की थी मुझसे बात करने की लेकिन मैं अपनी जिद्द में सही से बात हे न कर सकीय. तुम्हारी नानी को वापिस लाना होगा शबनम, उन्हें वापिस लाना होगा. कही इस बार उनकी जान के बदले हमे फिर से कुछ गलत न करना पड़ जाए.", फफक फफक कर रोटी हुई बिंदिया को शबनम अपने साथ चिपकाये कड़ी रही. इस समस्या का समाधान तोह उसके पास भी न था.

"वो अपने भाई के पास है माँ और सारंग उन्हें तोह कुछ होने नहीं देगा. मैं इतना तोह जानती हु की कही न कही अर्जुन ने आपको और नानी को लाजवंती के हाथो आजाद करवा कर आपके मां पर एहसान हे किया है. लेकिन अर्जुन का टकराव कुमार सारंग से सुनिश्चित है देर सावेर. आपको ये फैंसला करना होगा की इस बार आप किसका साथ देंगी. उस इंसान का जिसने काबिल होने के बावजूद नानी और आपको अंधेर ज़िन्दगी दी और वो चुनिंदा लोगो के सामने मजबूर हो गया या फिर उसकी जो कहने को आपका कुछ नहीं लेकिन मेरा और उसका खून का अटूट रिश्ता है. अब आप कठपुतली नहीं हो माँ, जो धागो से बंधी है. आप आजाद है और देखा जाए तोह हमारा ये परिवार रामेश्वर दादा जी के परिवार के साथ मिल कर सबकुछ सही कर सकता है. फैंसला आपके हाथ में है माँ लेकिन मैं अर्जुन के साथ हु आखिरी सांस तक.", शबनम ने कुछ हे समय में अपनी माँ के दिल से कालिख को खुरच दिया था और बिंदिया के अंतर्मन में भी अर्जुन का नाम इस कदर बैठाया था की अब वो चाह कर भी पंडित जी के परिवार से नफरत नहीं कर सकती थी.

"मैं अपनी बेटी के पास कुछ पल सुकून से सो सकती हु शबनम? मेरा दिल घबरा रहा है बेटी और अब मेरी जरा भी हिम्मत न होगी तेरे पापा और भाई का सामना करने की.", बिंदिया द्वारा तेरे पापा का मतलब साफ़ साफ़ नरिंदर जी से था और जिसको वो भाई बता रही थी उसने तोह उनकी बेटी के दिल में कुछ अलग हे चाहते भर दी थी जिसका किसी और को भान न था.

"आप यही आराम करो माँ और मैं खुद आपकी बात करवाउंगी अर्जुन से. वो भी बहोत कुछ बता सकता है आपको आपके बारे में. शायद मेरा वो सब जानकारी देना सही न होगा.", बिंदिया को अपने नरम बिस्टेर पर साथ लगा कर सुलाते हुए शबनम उनकी पीठ भी सेहला रही थी. ये आंसू अभी कुछ पल और भी बहने थे और शबनम इन्हे रोकना भी नहीं चाहती थी. उसकी माँ अब किसी की कठपुतली नहीं थी.

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सबसे milne-julne के बाद और सभी काम निबटा कर जबतक पंडित जी फारिग हुए तोह दोपहर के 2 बज चुके थे यहाँ मंदिर में. बड़े बुजुर्गो ने तोह व्यस्तता के साथ कुछ घडी आराम भी किया था लेकिन शनकर इत्यादि को चैन लेने नहीं दिया गया था. अभी वो सब शहर की बस्तियों में भोजन आदि बाँट कर मंदिर के प्रांगण में बैठे हे थे की कौशल्या जी की आवाज सुनी.

"बीटा, घर चल के आराम कर लियो. अर्जुन भी अकेला है और फिर प्रीती क्या हे खाना पकाएगी उसके लिए.", कौशल्या जी की फ़िक्र देख कर उमेद तोह फर्श पर लेट हे गया.

"चची, उसके पास कार है, पैसे है और फिर अगले की होने वाली बीवी है प्रीती. होटल वोटेल में खाना खाएने दोनों और आप हमको कमर सीढ़ी तोह करने दो. उसकी फ़िक्र है जिसके पास सबकुछ मौजूद है लेकिन अपने बेटे की नई जो सवेरे 3 बजे से अभी तक चैन से 2 घडी सांस न ले सका. उन्हें हे देख लो किस तरह हंस खेल रही है.", उमेद ने लड़कियों की तरफ अपनी चाची का ध्यान करवाया जो कैमरा के सामने अलग अलग तरह से तस्वीरें निकलवा रही थी एक दूसरी के साथ. एक नजर शंकर ने भी देखा और फिर मुँह पर रुमाल रख कर वो भी अपनी चची की गॉड में सर रखते हुए वही पसर गया.

"ढेला हो गया है इनका पूर्णिमा. ये जो बोल रहे न चैन से सांस लेने की बात, बहार भी तफरी मारते रहे और इधर भी. गाडी चलने के नाम पर देख कैसे केंचुए की तरह बिखर के फर्श पर. अपने आप हे देखे इनके baap-chacha. अब तेरी गॉड से ये तोह उठने से रहा.", पूर्णिमा जी आदतन मुस्कुराती हुई शंकर का सर थपकने लगी.

"करने दे इन्हे भी कमर सीढ़ी कौशल्या. काम तोह किया है है इन्होने और फिर आधी अधूरी नींद के बावजूद एक बार भी जवाब न दिया. वैसे तू खामख्वाह हे चिंता करती है अर्जुन की. वो समझदार है और ध्यान रखना ाचे से जानता है. बाकी सब तोह चले हे गए है, जब तक ये बचे हंस खेल रहे है इतने इन्हे भी आराम करने दे.", पूर्णिमा जी की बात सुन्न कर खम्बे के साथ पीठ टिकाये आराम करता नरिंदर अपनी माँ की तरफ देख मुस्कुराने लगा जैसे उन्हें चिढ़ा रहा हो.

"हंस ले कपूत तू भी हंसले अपनी चची की शरण में. ये सारे बलूँगड़े न पूर्णिमा तुझे देख के हे ये मनमानी करते है.", अभी कौशल्या जी कुछ और बोलती उस से पहले हे ऋतू वह आ कड़ी हुई.

"दादी जी आप दोनों चलो हमारे साथ अभी के अभी.", ऋतू ने अपनी दादी का हाथ पकड़ कर उन्हें उठाते हुए कहा और साथ हे विन्नी और आइशा भी पूर्णिमा जो को खींचने लगी. शंकर जी इस आवाज को सुन्न कर हे एक तरफ पसर गए अपनी चाची को मुक्त करते हुए.

"अरे बता तोह दे डॉक्टरनी कहा ले जा रही है? बुढ़ापे में हाथ न हिला दियो जोड़ से मेरा.", कौशल्या जी ये सब ऊपरी तौर से कह रही थी और हँसते हुए अपनी लाड़ली के साथ उस तरफ हे चल पड़ी जहा ऋतू उन्हें ले जा रही थी. यहाँ 2 कुर्सियां ठीक मंदिर के सामने घने वृक्षों के बीच राखी थी.

"आप दोनों यहाँ बैठिएं और आपके पीछे हम सभी खड़े होंगे. भैया, इस फोटो में मंदिर भी पूरी तरह से आना चाहिए.", अब कही कौशल्या जी को समझ आया के ये सभी क्या कर रहे है. इन सभी बच्चों के साथ उनकी एक भी तस्वीर न थी जिसमे सभी शामिल हो. संजीव ने भी सभी को एक क्रम में पीछे खड़ा करने के बाद कुछ दुरी से 3-4 तस्वीरें उतारी. यहाँ जल्द हे माहौल पूरी तरह से बदल गया था.

"दादा जी आप और छोटे दादा जी भी बैठिये इधर अब.", अलका ने अब रामेश्वर जी को भी इस तस्वीर के खेल में शामिल कर लिया. दोनों बुजुर्ग dost-bhai इन बचो के सान्निध्य में मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवाने लगे. दृश्य कुछ ज्यादा हे बदल गया जब नरिंदर जी ने सभी को हटा कर अपने पापा और चाचा के साथ खुदकी तस्वीर खिंचवाई, दोनों कुर्सियों के बीच हाथी पर बैठ कर.

"आओ अब तुम भी आ जाओ Shankar-Umed.", छोल साहब ने इन दोनों को भी बुला लिया था और इस बार संजीव भैया को ऋतू ने इन सबके सामने बैठने का कह कर ये तस्वीर खींची. सिर्फ यही परिवार उपस्थित था और आगे तब तक ये दौर चलता रहा जबतक रील ख़तम हे न हो गयी. सबसे बड़ी तस्वीर खुद ऋतू ने खींची थी जिसमे पंडित जी का सम्पूर्ण संसार था, सिवाए Preeti-Arjun और तस्वीर खींचने वाली ऋतू के.

"चलो भाई अब चलते है घर वापिस, जाने में 2 घंटे तोह लगेंगे हे.", रामेश्वर जी ने जैसे हे चलने का आदेश दिया अब किसी ने भी इंकार न किया. इस घरेलु समारोह से सभी खुश हो चुके थे बस कोमल के चहरे पर आज कुछ गहरी सोच थी जिसको कृष्णा जी ने तुरंत पकड़ लिया.

"कोमल, क्या हुआ बेटी तू गुमसुम क्यों हो गयी एकदम से?", ये बात रेखा जी और ललिता जी ने भी सुनी तोह वो भी कोमल की तरफ देखने लगी.

"इसका लाडला भाई नहीं था न उस बड़ी तस्वीर में तोह भावुक हो गयी लगता है.", शालिनी बुआ से इस जवाब की उम्मीद वह किसी को भी न थी लेकिन कोमल के चेहरे के पर मुस्कान के साथ साथ 2 आंसू भी आ गए. कृष्णा जी ने अपनी भतीजी को अपने सीने से लगते हुए लाड किया तोह कोमल ने तुरंत चेहरा साफ़ कर लिया.

"सही कहा शालिनी तुमने. कोमल के लिए अर्जुन हे सबकुछ है और जहाँ ऐसे पूरा परिवार साथ हो लेकिन जान से प्यारा भाई हे बाकी रहे तोह कमी तोह महसूस होती हे है. कोई बात नहीं बीटा, शादी से पहले और शादी वाले दिन बड़े कैमरा से इतनी तस्वीरें उतरवाउंगी न पूरे परिवार की तुम ये वाली बात कभी याद हे नहीं करोगी. मुझे भी कमी लगती है मेरे बेटे की लेकिन तू दिल छोटा न कर इतनी सी बात पर.", कृष्णा जी ने इस बार कोमल को अपने साथ हे सीट पर बैठाया था और शालिनी बुआ को भी bhai-behno की ये चाहत देख दिल में वही दर्द सा उठा लेकिन वो तुरंत हे संभल गयी.

"अर्जुन को यहाँ मौजूद सभी लोग याद कर रहे है भाभी और अभी तोह घर से दूर हमे आधा दिन भी नहीं हुआ.", शालिनी अपनी भाई की कार में बैठने की जगह कृष्णा जी की बगल में हे आ बैठी. नरिंदर जी की बगल में रेणुका थी अब. सारा सिस्टम बदल चूका था जैसे जिसको जहा सीट दिखी वो उस कार में बैठ गया.

"याद उसको किया जाता है शालिनी जो दूर हो. अर्जुन यहाँ न हो कर भी सबके साथ है और रही बात आधा दिन की तोह यहाँ जितने भी है उनका वो आधा दिन काम से काम एक पल अर्जुन के साथ होता है. वो भी शामिल हो जाता जोर देने पर लेकिन ऐसा करना भी किसी को पसंद नहीं. वैसे तुम मिली हो ाचे से अर्जुन से अभी तक?", कृष्णा जी के इस सवाल पर शालिनी को ये गुजरी रात याद आ गयी. अब वो क्या कहती की कितने बरसो बाद उसके दिल को भी सुकून अर्जुन की बाहों में मिला था.

"हाँ थोड़ी बहोत बात तोह हुई है मेरी अर्जुन से कल. आज भी इधर वाले घर हे रुकना है तोह थोड़ा समय और मिलूंगी. ाचा लड़का है भाभी और आपकी बात भी सही है. जो साथ हे है उसको क्या भूलना और क्या याद करना. वैसे कोमल का तोह शायद सबसे ज्यादा हे गहरा लगाव है अपने छोटे भाई से.", इस बात पर कोमल मुस्कुराती हुई खिड़की से बहार देखने लगी.

"सारा दिन तोह लिए फिरती थी ये अपने ारु को. जब ऋतू थोड़ी समझदार हुई तोह वो अर्जुन के साथ और ये उन दोनों के. कितने बरस तक तोह ये उसको गॉड में बिठा कर खुद हे खाना खिलाती रही. बचपन में उसकी शैतानियों के पीछे अनगिनत बार दांत खायी लेकिन कभी अपने ारु पर बात न आने दी. प्यार तोह अर्जुन को सबने हे किया है शालिनी लेकिन मेरी इस पारी की जान उस ारु नाम के तोते में बसी है.", कृष्णा जी इतना कुछ कह रही थी तोह नरिंदर जी कहा चुप रहते. कार अपनी रफ़्तार से हाईवे पर दौड़ने लगी थी.

"हाँ सिर्फ कोमल की हे जान है वो शालिनी. तेरी भाभी ने तोह खामख्वाह हे 18 साल उसके जन्मदिन पर व्रत रखे है. जब भी यहाँ आती थी एक दिन उस से अलग न सोई ये कभी. और तोह और जब शहजादा मामूली सी बात पर हॉस्पिटल भर्ती हुआ तोह इतनी देर तंसुए (आंसू) बहाये जितने उसको छुट्टी न मिल गयी. बात करती है कोमल की जान अर्जुन में बसने की. वो शैतान भी अब मेरी लुगाई पे कब्ज़ा जमाये बैठा है, माँ माँ की ृत्त लगा कर.", ये सब नरिंदर जी मस्ती में कह रहे थे और बाकी सबके चेहरे पर बस मुस्कराहट थी.

"वैसे एक रेणुका हे है जिसके साथ अर्जुन का इतना व्यवहार नहीं है.", कृष्णा जी ने ये बात तोह इस मकसद से कही थी की रेणुका भी कुछ बोले लेकिन जो रेणुका ने एकदम से जवाब दिया उसकी उम्मीद कोमल ने भी न की थी.

"अर्जुन का व्यवहार मेरे साथ भाभी? मुझे नयी ज़िन्दगी देने वाला अर्जुन मेरे लिए क्या मायने रखता है इसका जवाब मैं चाह कर भी नहीं दे सकती. जितनी परवाह अर्जुन ने मेरी की है और करता है वो बोल कर मैं उसका अपमान नहीं कर सकती.", कहने को तोह रेणुका ये सब कह गयी लेकिन फिर तुरंत हे सेहम गयी जब बगल में अपने बड़े भाई को हैरानी से अपनी तरफ देखते पाया. कोमल ने कुछ सोच कर तुरंत हे बात संभल ली.

"बुआ के साथ बहोत बुरा हो सकता था चची लेकिन अर्जुन ने इनकी िज्जात्त और ज़िन्दगी बचते हुए 2 बड़े क्रिमिनल्स को मरने की हालत में हॉस्पिटल पंहुचा दिया. थोड़ा वो भी जख्मी हुआ था उस वक़्त और एक बार बुआ के एक्स हस्बैंड के जीजा ने इनके साथ वैसी हे हरकत दोहरानी चाहि थी जब ये ससुराल की रिश्तेदारी में शादी में गयी थी. वह भी अर्जुन सही समय पर पहुंच गया था. अभिमन्यु नाम था न बुआ उस आदमी का?", कोमल ने जैसे हे ये राज खोला तोह नरिंदर जी का सीना चौड़ा हो गया अपने भतीजे की मर्दानगी पर.

"फ़र्ज़ है उसका और chot-vot लगती रहती है इस सब में. रेणुका, तुम्हे ये अभिमन्यु वाली बात पापा को बतानी चाहिए थी. खैर ाचा लगा ये जानकार की वो स्थिति संभाल सकता है.", नरिंदर जी अपने जज्बात खुलकर जाहिर न करते हुए अब इस अभिमन्यु के बारे में सोचने लगे थे. उनकी बहिन की िज्जात्त पर हाथ रखने वाले को अर्जुन द्वारा दी गयी सजा से संतोष नहीं मिला था.

"इन्दर भैया, भूल जाइये न. वो अब हमारे जीवन में दूर दूर तक नहीं हैं.", रेणुका ाचे से समझती थी शंकर और नरिंदर को. इनकी ये ख़ामोशी बहोत कुछ बता देती थी जो इनके करीब होता था. नरिंदर जी मुस्कुरा उठे क्योंकि माहौल सचमुच थोड़ा गंभीर हो गया था.

"वैसे सुना तोह मैंने ये भी है के अर्जुन ने आठवीं कक्षा में हे उमेद भाईसाहब को पटखनी दे दी थी.", कृष्णा जी ने मस्ती में ये नया खुलासा किया तोह उनके पति हंसने लगे लेकिन शालिनी हैरानी से देख रही थी. रेणुका आँखों से कोमल को धन्यवाद देती वापिस इस बात की चर्चा सुन्न ने लगी.

"सचमुच ऐसा हुआ था क्या इन्दर भैया? ये तोह पता है की अर्जुन के dharam-pita है उमेद भाई लेकिन ये अखाड़े वाली बात नहीं पता."

"गुड्डी भाभी के बेटे के बारे में नहीं सुना क्या तुमने शालिनी?", नरिंदर जी ने इस व्यक्ति का जीकर किया तोह शालिनी के चेहरे पर घृणा के भाव आ गए.

"वो सरफिरा राक्षश? कमीना सिर्फ इसलिए हमारे गाँव में टिका है क्योंकि वो ताई का पौता है. पता नहीं क्यों चंद्रो ताई के घर में कोई न कोई ऐसा बदमाश हमेशा रहा है."

"वो बिस्टेर पर पड़ा है शालिनी डेढ़ महीने से और डॉक्टर का कहना है के 6 महीने से पहले तोह वो ठीक होने से रहा. सिर्फ यही सुदर्शन के जैसे हे उसके 4 बदमाश साथी भी वैसी हे हालत में है और इस सबके karta-dharta हमारे छोटे साहबजादे अर्जुन जी है. गज्जू एक सुदर्शन को फिर भी संभल ले और शायद मैं भी लेकिन वैसे हे 5 दानव अकेले कोई नहीं संभल सकता. अर्जुन ने फिर भी होश नहीं खोया क्योंकि वो अपनी हद्द पहचानता है. ये भी छोडो, एक बार को तोह शीला काकी वाला वो सांड भीम हे देख लो. उसका गवाह तोह खुद गज्जू है जब उसके पाँव में थोड़े टाइम पहले गोली लगी थी. तब अपने चाचा के चक्कर में अर्जुन ने हे उस सांड को उठा कर ऐसा पटका था की शरीर की एक भी हड्डी साबुत न बची. हाँ बाद में गाजु ने उसके सर में गोली मार कर तड़पने नहीं दिया भीम को.", नरिंदर जी के ऐसे बखान सुन्न कर शालिनी ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया.

"Baap-chacha अपना वक़्त भूल गए. जवानी तोह आप लोगो की थी जहा सब be-lagaam से थे.", कृष्णा जी ने ज्यादा सवाल जवाब करने का मौका हे न दिया किसी को.

"हाहाहा. क्या यार कृष्णा तुम भी. हम मनमौजी थे और लड़ाई झगडे में कभी पड़े हे नहीं. हाँ शालिनी चुड़ैल थी मधु के जैसी, इसके नाखून हम सभी के हाथो पर आज तक छापे होंगे.", वो बातें और दिन याद करके शालिनी के चेहरे पर हंसी आ गयी.

"बहोत ज्यादा हे मस्ती करते थे आप लोग. कृष्णा भाभी सिग्गट की बात छुपाने के लिए इन्दर और उमेद भैया हर बार चाट या चूड़ियों के वाडे करते थे. कितनी हे बार मुझसे हे चिकन बनवाया इन्होने नोहरे में लेकिन काम होते हे ऐसे बेहवे करते थे जैसे मैं बस कामवाली भर हु. खैर मार तोह बहोत खायी है इन्होने मुझसे और मधु से. शंकर भैया हे बस हाथे नहीं चढ़ते थे.", शालिनी एकाएक फिर से भावुक हो गयी थी वो सब याद करते हुए. अज्जू भी तोह था उस यादों की किताब में, उसका सबसे प्यारा भाई जो हमेशा इस बहिन को पलकों पर रखता था. कृष्णा जी भी समझ गयी थी.

"जिस बात को हमने इस कार में बैठते वक़्त कहा था शायद तुम इतनी जल्दी वो भूल गयी शालिनी. जो दिल में है उसको न याद किया जाता है न भुलाया.", कृष्णा जी ने कह तोह दिया लेकिन कार चलते नरिंदर जी की आँखों की नमी भी शालिनी से छुप न सकीय थी.

"पूछो न भाई से फिर आप. इनकी ganga-jamuna की वजह क्या है?", शालिनी तोह तुरंत अपनी आँखें साफ़ कर ली क्योंकि अब वो उन यादों से आहात नहीं होना चाहती थी लेकिन उसको ये भी एहसास हो गया था के अर्जुन ने जो कहा था वो सच हे था. अज्जू के जाने का दुःख शालिनी जितना या उस से ज्यादा हे होगा कुछ लोगो को.

"आँखों में नमी कभी कभी मुस्कुराते चेहरे याद करके भी आती है शालिनी. हाँ मैं हर रोज याद करता हु उस समय को. किसी का कुछ बिगाड़ा भी नहीं था और अपनी दुनिया में हम सब कितने खुश थे. जानती हु आज भी वैसे खुशनुमा माहौल की वजह वही नाम है जिसकी याद कभी दिल से जुड़ा न हुई. लेकिन अतीत में जीवन भर खड़े रह कर मैं वर्तमान में न चल सकूंगा और न भविष्य के लिए तैयार रह सकूंगा. दिल में है और दिल में रहेगा.", नरिंदर जी ने भी चेहरा सही कर लिए था एक मुस्कराहट के साथ.

"वैसे सच कहु शालिनी, आज वाला अर्जुन कहता है के अतीत से अगर कुछ वर्तमान में लाना हो तोह बस वो यादें सँजोनि चाहिए जिसमे फूलो सी महक हो. टूटे हुए मुरझाये फूलो से कभी बगीचा आबाद नहीं होता. कितनी हे बार तोह मैंने शंकर भाई साहब को भी इनके साथ वह पंजाब में ये आंसू बहते देखा है जब छत्त पर दोनों अपनी महफ़िल लगते थे. वो बात अलग है मैंने ये इन्हे आज से पहले बताया नहीं.", कृष्णा जी की बात सुन्न कर नरिंदर जी अपने बालो में हाथ फिरने लगे. जैसे कोई मीठी सी चोरी पकड़ी गयी हो.

"उसके नाम का भी पेग बनाते थे कृष्णा, वो अलग बात है के महाराज शिकंजवी का जग पीने के शौक़ीन थे. अब महफ़िल लगेगी तोह 4 लोग तोह बैठेंगे हे चाहे दिखाई 2 दे. चलो अब ये सब छोडो और ये बताओ के रेणुका की होने वाली बिटिया का नाम क्या रखा जाएगा?", आदतन नरिंदर जी ये भी नहीं देखते थे की वो बहिन के साथ हे मजाक कर रहे है. रेणुका का चेहरा सुर्ख हो गया था उसके गर्भवती होने वाली बात पर.

"वाओ. तोह रेणुका इसलिए सबसे दूर दूर और मेरी चची के पास थी सारा समय. नहीं तोह रेखा भाभी या कृष्णा भाभी के पास. वैसे इन्दर भाई लड़का भी तोह हो सकता है?", शालिनी ने भी रेणुका को घेर लिया.

"रेणुका बुआ भी यही कह रही थी शालिनी बुआ. लड़का हे होगा लेकिन कोई और भी है जो कह रहा था लड़की होगी. वोट 2-2 हो गए हैं इस तरह तोह.", कोमल भी इस मस्ती में शामिल हुई तोह रेणुका ने चेहरे के सामने रुमाल कर लिया.

"बस करो आप सब भी, मेरी ये सबसे छोटी ननद ऐसी हे शर्मीली है. जो भी हो क्या फरक पड़ता है लड़का लड़की से. वैसे वो दूसरा कौन था कोमल?", न न करते हुए कृष्णा जी ने भी रेणुका को फांस हे लिए था.

"क्या भाभी, बस भी कीजिये आप सब. भैया आप बहोत गंदे हो, मैं बात नहीं करती आपसे.", रेणुका शर्माती हुई इन सबसे बचने के लिए गाडी से बहार देखने लगी. शीशे में एक पल शालिनी और रेणुका की नजरे टकराई तोह स्वतः रेणुका ने अपनी लम्बी पलके शर्म से झुका ली जैसे शालिनी के साथ कुछ जुड़ाव हो. समझ तोह शालिनी को भी नहीं आया बस मुस्कुरा दी. ये सफर ऐसे हे चलता रहा.

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अभी 4 बजने वाले थे और एक बेहतरीन लंच करने के बाद अर्जुन प्रीती का हाथ पकडे इस उद्यान में घूम रहा था जहा वो एक बार अपनी माँ रेखा जी के साथ आया था. सिर्फ प्रकृति और दूर जंगल से हिस्से में कुलांचे मारते वो ताम्बे रंग के छोटे बड़े हिरन. रह रह कर अर्जुन इधर प्रीती को अपने आगोश में भर ले रहा था. कभी गाल तोह कभी होंठो को चूमता हुआ वो उसको लिए यहाँ ख़ामोशी में इस घने वृक्ष की छाया में बैठ गया. प्रीती उसकी गॉड में सीने से पीठ लगाया सामने झील और जीवो को निहार रही थी.

"कभी चलेंगे ऐसी जगह अर्जुन जहा सिर्फ हम दोनों और बस नेचर हो. सुकून से तारो की छाव में खुले आसमान के निचे, बस हम दोनों. पता है ये जगह भी काम नहीं अगर बहार वाली तरफ वो पार्क की जगह सिर्फ जंगल होता. थैंक यू सो मच फॉर थिस लवली डे.. उमाठ.", पलट कर इस बात खुद प्रीती ने अर्जुन को चूमा था और अर्जुन उसके उभारो के निचले हिस्से दोनों हाथ बंधे इस एकांत का पूरा लुत्फ़ लेता दिखा.

"चलेंगे जान बस एक बार कॉलेज जाने दो मुझे. मेरा भी दिल है तुम्हारे साथ जिम कॉर्बेट या Nandan-kanan जाने का. वह जब भी वेकेशन होंगी तोह तुम्हे ले कर 2-3 गायब हो जाऊंगा इस दुनिया से दूर. Bheed-bhaad से अलग बस हम दोनों.", अर्जुन के भी अनकहे ढेरो सपने थे प्रीती के साथ. आज का दिन उसके लिए भी जीवन के चुनिंदा सुनहरे पालो में से एक था.

"वाह.. मैं भी ऐसा हे कुछ सोच रही थी. लेकिन मोटरसाइकिल पर तुम्हारे पीछे बैठ कर अनजान सड़क पर कभी पहाड़ो में तोह कभी रेगिस्तान या जंगलो में. कॉलेज वाला प्लान मस्त है वैसे. मेरे तोह 5 साल होंगे और तुम कॉलेज आओगे 2 साल बाद. इस तरह 3 साल तोह कॉमन हे रहेंगे हमारे. बाकी सैटरडे संडे वाला वादा भी है तुम्हारा इन 2 सालो में. शायद तुम्हारे कॉलेज से पहले हे हम 10-12 बार तोह ऐसा कर हे लेंगे."

"मुझे मरवाने का इरादा है क्या? हम दोनों 2 दिन ऐसे कही गायब हुए न तोह थानेदार साहब ने नाकेबंदी करवा देनी है. जो भी करेंगे सही तरीके से करेंगे. मैं यहाँ से स्कूल ट्रिप पर और फिर तुम्हे वह से रनिंग डे ले कर ट्रिप से अलग. उमाह.. वैसे रिस्की भी होगा लेकिन कर तोह लेंगे हे. तुम्हारे 38 जो करने है.", अर्जुन ने इस बार एक उभार दबाने के साथ हे ड्रेस के ऊपर से panty-viheen योनि सेहले तोह प्रीती तड़फती हुई पूरी तरह लेट हे गयी.

"सष्ठ.. गंदे कही के. चलो अब यहाँ से जल्दी. तुम्हारे इरादे न होटल से ठीक नहीं है. कार में भी यही सब कर रहे थे. देखो अब 4 बज चुके है और इस ड्रेस में मैं तोह माँ के सामने जाने वाली नहीं.", प्रीती तुरतं उठ कर एक तरफ भागने लगी तोह अर्जुन भी पीछे दौड़ गया.

"आराम से जान. चलो चलते है घर और बात सही है. बाकी सबको तोह ये कह दूंगा के लंच के लिए बहार गए थे पर आंटी या दादी ने हम दोनों को ऐसे देखा तोह समझ लो मैं गया. अगर वो लोग आ चुके होंगे तोह मैं तुम्हे तुम्हारे घर के बहार उतार कर आ जाऊंगा नहीं आये होंगे तोह कोई टेंशन नहीं."

"फत्तू हो पूरे के पूरे. ये नहीं बोल सकते थे की मेरे साथ अंदर चलोगे जिस से माँ मुझसे सवाल हे न करे.", प्रीती ने मुँह बनाते हुए कहा तोह अर्जुन ने फिर से हाथ थाम लिया.

"मजाक कर रहा था. वैसे भी आंटी को तोह ाचा हे लगेगा जब हम दोनों को साथ देखेंगी. चलो बैठो.", कार में बैठते हुए भी अर्जुन शैतानी से नहीं हटा. प्रीती के कूल्हों पर चपत लगता वो तुरंत अपनी तरफ आ बैठा.

"बाज आ जाओ मर अर्जुन शर्मा. ये मस्ती मजाक भारी पड़ जायेगा अगर मैं अपने वाली पर आयी. जानते हो न मुझे ज्यादा कुछ करना भी नहीं पड़ेगा फिर चीखते रहना.. ोोू प्रीती ोू प्रीती करते हुए.", इस बार सचमुच अर्जुन अपने बगले झाँकने लगा था प्रीती का गुस्सा देख कर. तुरंत गाडी रिवर्स करता वो mukhya-marg पर बढ़ लिया. प्रीती खिलखिला कर हंस रही थी अर्जुन की हालत पर.

"ोये मेरा प्यारा प्यारा ारु गुस्सा हो गया? सुधरते नहीं हो न इसलिए तुम्हे ऐसे हे समझाना पड़ता है.. उमाहहह.", गाल चूम कर एक पल में हे प्रीती ने वापिस मन लिया अर्जुन को.

"वो बताया था न तुम जब पास होती हो तोह कण्ट्रोल करना मुश्किल हो जाता है. ाचा रात को तुम्हारा क्या प्लान है?", अर्जुन जैसे हे अपने सेक्टर की सड़क पर दाखिल हुआ 3 jaani-pahchani करो से घिर गया. प्रीती का ध्यान नहीं था उधर तोह वो वैसे हे बोलने लगी.

"ऋतू दीदी और अलका दीदी आज मेरे कमरे में सोने वाली है. शायद आरती और तारा भी आ जाये.", अर्जुन के चेहरे के उड़ते रंग देख प्रीती को कुछ समझ न आया लेकिन नजर आगे चलती टाटा सिएरा पर पड़ते हे उसकी भी हालत वैसी हे हो गयी.

"फस्स गए. ऐसी किस्मत लिखी है अपनी? कही और मदद लो अर्जुन, उस गाडी में दोनों दादा जी और दादजी है."

"नहीं घुमा सकता डार्लिंग. थानेदार जी के काफिले के बीच फंस चुके है. अपनी तरफ देखो जगह ऋतू पापा के पीछे बैठी इशारे कर रही है.", प्रीती इतना सुन्न कर हिम्मत न कर सकीय क्योंकि उस तरफ उसके ससुर थे और वो मुस्कुरा रहे थे इन दोनों को देख कर. पिछली 2 कार भी इनके हे घर की थी.

"सुनो, नेचुरल हे रहना और यही सभी गाड़ियां हमारे घर रुकने वाली है तोह मैं तुम्हारे घर के सामने रुकूंगा."

"रहने दो अब इतना मैट सोचो. सब अपने हे हैं और इनसे नहीं भाग सकते. लंच करने गए थे तोह गए थे.", प्रीती ने इस बार पलट कर ऋतू की तरफ हाथ हिलाया तोह ऋतू ने गॉड का इशारा किआ जैसे बचा खिलने को कह रही हो. अर्जुन तोह बुरी तरह सकपका गया ये देखते हे. प्रीती ने शंकर जी का ध्यान सामने देख आँख मार दी जैसे उसको समझ आ गया हो.

"रुकना मैट अर्जुन और गली से अपोजिट कार घुमा लेना. 'ह' को आकांक्षा के घर से ले कर चलेंगे इतने सभी अंदर जा चुके होंगे.", अर्जुन तोह हैरान हे रह गया इन दोनों का taal-mel देख कर. ऋतू के दिमाग के आगे सचमुच सभी फ़ैल थे. गली में जैसे हे सभी कार घूमी अर्जुन इंडिकेटर देता दूसरी तरफ चल निकला.

"थैंक गॉड. मुझे तोह कुछ और हे लगा था ऋतू का इशारा देख कर."

"हाहाहा.. बुद्धू हो पूरे", प्रीती की बात सुन्न कर अब ये नयी समस्या आ गयी थी. आकांक्षा नाम की ये बिजली कब टकरा गयी प्रीती के साथ? गाडी धीमी गति से आकांक्षा की गली में आयी तोह अर्जुन असहज होने लगा. वो आकांक्षा की भी पूरी परवाह करता था और इस वक़्त वो अपनी प्रेमिका के साथ उसके घर जा रहा था जो उस से दिलो जान से प्यार करती थी दोस्ती का दिखावा करती.

"जाओ ले आओ 'ह' को. मैं यही इन्तजार करता हु.", अर्जुन का ऐसा जवाब सुन्न कर प्रीती हैरत से देखने लगी.

"साथ चलो तुम भी. तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड है और आंटी तोह जितना gunn-gaan तुम्हारा करती है मुझे तोह लगता है तुम दोनों पक्के दोस्त नहीं होते तोह वो तुम्हे दामाद बना लेती. चलो अब अंदर चुपचाप.", प्रीती की बात सुन्न कर अर्जुन हिचकिचाता हुआ उसके साथ हो लिया. ये सुन्दै काले लिबास में केहर धा रही थी और जो अंदर थी वो भी अलग हे खूंखार बिल्ली थी आतंरिक पालो में.

"ओह मेरी बची. शुक्र है तुम आयी तोह सही.", सुषमा जी ने अभी सिर्फ प्रीती को हे देखा था और इस घर में ऐसे परिधान कोई बड़ी बात न थी. लेकिन जैसे हे नजर अर्जुन पर पड़ी वो प्रीती को छोड़ बड़ी गर्मजोशी से अर्जुन के गले जा लगी. उसको अपने साथ लगाए वो हॉल में आयी तोह आकांक्षा भी उछलती सी प्रीती से गले लग कर मिली. सुषमा जी के एक तरफ हटने पर यही सलूक अर्जुन के साथ हुआ.

"बच्चू अब आये हो तुम हमारे घर. माँ इन दोनों को आज डिनर के बिना जाने नहीं देना.", प्रीती तोह हंस रही थी लेकिन अर्जुन जो पहले से सुषमा जी के ठोस बड़े उभारो से गुमसुम था अब आकांक्षा की हरकत से बिलकुल सुन्न हो चूका था.

"आज नहीं आंटी जी लेकिन जल्दी हे मैं आकांक्षा के पास रात भी रुकूंगी. घरवाले भी अभी बहार से आये है और कुछ गेस्ट्स भी है तोह आज के लिए सॉरी. हाँ अंशु को मैं ले जाती हु अपने साथ.", अर्जुन को तोह ऐसे दृश्य की उम्मीद हे नहीं थी. कहा तोह वो इस घर की आँखों का तारा था और यहाँ सारा प्यार प्रीती लूट रही थी.

"हाँ तोह मैं बोर हे हो रही हु और ये भी कौनसा आता है मुझसे मिलने. शादी न हुई कोई महाभारत हो गयी.", अभी ये बातें हे कर रहे थे और बुआ सबके लिए शरबत ले आयी. 'ह' भी कालीन पर kood-faand कर रहा था जिसको प्रीती ने तुरंत लपक लिया.

"अर्जुन, कल टाइम मिले तोह एक बार आ जाना 10 बजे के बाद. तुम्हारे अंकल ने कुछ डिसकस करना है तुमसे.", सुषमा जी ने अर्जुन को अपने बगल में बैठने की चेष्टा की तोह ाकनसक्षा ने माँ को घूरते हुए अर्जुन को अधिकार से अपने साथ हे बड़े सोफे पर बैठा लिया.

"कैसे नहीं आएगा ये मैं भी देखु. और हाँ कल तोह पूर्वी दीदी भी ब्रेकफास्ट पर आ रही है.", प्रीती आकांक्षा की दूसरी तरफ आ बैठी उस पिल्लै को गॉड में लिए.

"हाँ तोह आ जाऊंगा आंटी जी. वैसे भी पूर्वी दीदी से परसो मिलना हे था तोह कल मिल लूंगा. तुम्हे कोई जरुरी काम है.", अर्जुन ने आकांक्षा को अपने साथ चिपक कर बैठते देख पुछा.

"कल हम लेहंगा सिलवाने देंगी तोह 5-6 दिन तोह लगेंगे हे न? तुमने अंशु को बोलै था वेडनेसडे जाने का.", प्रीती के याद दिलाने पर अर्जुन ने झिझकते हुए शरबत का गिलास उठा लिया.

"हाँ चलते है कल. मुझे वैसे भी कोई काम नहीं है.", अर्जुन ने अपनी ज़िन्दगी में आयी हर लड़की के बारे में कोमल दीदी को बताया हुआ था लेकिन आकांक्षा का जीकर ऋतू और प्रीती से वो कभी न कर सका था. आज मैं थोड़ा व्यथित होने लगा था उसका. कुछ पल साथ बिताने के बाद ये तीनो हे लोग बहार निकल आये तोह प्रीती ने आकांक्षा के लिए खुद हे पिछले दरवाजा खोला. तीनो बैठ चुके तोह अर्जुन ने कार आगे बधाई.

"इतनी प्यारी लड़की का प्रोपोज़ तुमने रिजेक्ट करने की हिम्मत कैसी की अर्जुन?", इतना सुनते हे अर्जुन की रीढ़ से भी पसीना निकल गया. प्रीती ने वो सवाल कर दिया था जिसका दूर दूर तक वो अंदाजा न लगा सका. कार के अंदर जैसे मौत हे पसर गई थी.
 
वैसे रीडर खुद समझदार है. शादी हिज घर में हो रही वह पहले हे उमेद, शंकर और नरिंदर होंगे. ऊपर से पुरा पुलिस का उच्च महकमा और खुद मुख्यमंत्री. 1500 बाराती की सुरक्षा में 500 से ज्यादा सुरक्षा कर्मी. अर्जुन घंटा हीरो बनेगा यहाँ जब व्यस्त हे अपने भाई के साथ रहेगा ? मान भी लो कुछ मस्ती मजाक रिबन कटाई पे हो, लेकिन हद्द पार तोह कोई न कर सकता क्योंकि एक इंसान ऐसा है जो ठुकाई का मौका ढूंढ़ता फिरता है.

दोनों हे फैमिलीज़ में खौफ सिर्फ शंकर भाई का है और आएगी साला कम भी इन्वॉल्व हो तोह फिर क्या हे कहना. यहाँ ऐसा कुछ होगा जो ताक़त और बढ़ा देगा. अब आएंगे इंद्रजीत
 
देखो भाई स्पष्ट बोल रहे की एक्शन तोह होगा लेकिन शादी से पहले और बाद में. अर्जुन उसमे शामिल नहीं होगा क्योंकि सभी महानुभाव वह पहले हे है. लेकिन सबसे तगड़ा नजारा जल्द दिखेगा और इस बार ठुल्ले ी मैं पोलिसवाले कूटेंगे अर्जुन क हाथ वो भी सबके सामने
 
सॉरी दोस्तों आज क्लास मुमकिन नहीं है और न हे कल. आर्ट गैलरी के साथ आज मीटिंग थिस जो उम्मीद से कही ज्यादा हे लम्बी चली. कल उन्हें कुछ पेंटिंग्स सौंपनी है तोह आज की रात और कल की सुबह पेंटिंग्स को कोटिंग और फ्रेमन करने में लगेगी. डील बहोत जरुरी है क्योंकि 7 महीने की मेहनत है तोह आशा करता हु आप लोग समझेंगे. मोबाइल पर मैं उब्लब्ध हु पर टाइपिंग का कोई मौका नहीं कंप्यूटर पर.
 
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