Incest Pyaar - 100 Baar - Page 34 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

एक बार किसी महानुभाव ने बहोत बड़ी बात कही थी. मैं तब कॉलेज में पहले वर्ष में था और ये व्यक्ति चाय की दूकान चलाया करता था.

भरे और खली गिलास में से अगर कुछ भी चुनाव करना हो तोह खाली हे लेना. तुम अपने हिसाब से जी सकोगे बेशक शुरुवात जीरो से होगी. भरा गिलास या तू डुबो देगा या फिर तुम खाली करने में परहेज करके खुदका नुक्सान करोगे.

नहीं तो मट्ठी डुबो कर भी खाली कर सकते हो, इल्जाम तुम पर नहीं आएगा. 😅😅
 
Mahesh007 भाई आपके सभी सवालो के जवाब कल दूंगा. थोड़ा व्यस्त दिन था और अब अपडेट पर काम कर रहा हु.
 
भाई लोगो माफ़ करना अपडेट देते हुए 10 बज जाएंगे. जरुरी काम है कुछ. अपडेट रेडी है बस घर पहुंचते हे पोस्ट कर दूंगा
 
अपडेट 165

Ehsaas-Ae-Mohabbatt (1)

"कल घर में ज्यादा मेहमान होंगे इसलिए हम शायद हे मिल सके. इसलिए मैंने तुम्हारे फूफा और भाई को शंकर भाई के साथ तुम्हारे ननिहाल भेज दिया.", मधु बुआ ने घर पे मार्किट का बहाना किया था अपनी माँ से. परेशानी तोह आयी थी क्योंकि अनामिका को भी कौशल्या जी मार्किट जाने के लिए कहने लगी. जाने कैसे तारा ने अनामिका को अपने साथ थोड़ी देर बाद चलने के लिए मन लिया था. ये सभी लड़कियां 2 कार से मार्किट जाने वाली थी.

"बुआ, दिल तोह मेरा कल से हे था आपके साथ बातें करने का लेकिन यही भीड़ और घर के काम की वजह से फुर्सत और एकांत नहीं मिल रहा था. वैसे कुछ हे दिन में आप पहले से ज्यादा हे चमकने लगी हो. फूफा जी?", अर्जुन ने कार को यूनिवर्सिटी की तरफ बढ़ाते हुए मधु बुआ से चुहल की तोह वो हलके हाथ से उसके कंधे पर थप्पड़ लगाती मुस्कुराने लगी.

"कहा था न मैंने तुमसे की अब ये मधु सिर्फ तुम्हारी है. हाँ pati-dharam निभाना भी जरुरी है लेकिन सचमुच उनके साथ हो कर भी मैं साथ नहीं होती. और वो तोह गिनती के 10 मिनट से पहले हे खुश हो कर सो जाते है. मुझे ख़ुशी हुई या नहीं, इस से उनका कोई सरोकार नहीं. वैसे तुमने तोह कोई नया गुल नहीं खिला दिया इस बीच?", मधु बुआ को अब अर्जुन क्या जवाब देता की उनसे पहले हे वो उनकी बेटी को तृप्त कर चूका है और तारा आज भी अर्जुन के इशारे पर हर छोटे से मौके को जाने नहीं देती.

"आपके सामने हे है बुआ जो है. क्या लगता है आपको की मैं कुछ भी ऐसा वैसा कर सकता हु?", अर्जुन ने सफाई से सवाल के बदले में सवाल हे दाग दिया. एक नजर मधु बुआ के गहरे गले पर करने के बाद, जहा उन्नत उभारो की घाटी कुछ ज्यादा हे नुमाया थी.

"नहीं मेरा मतलब वो नहीं था अर्जुन. तुम कही भी नार्मल नहीं हो और सबसे बड़ी बात है की तुम्हारा व्यक्तित्व हे ऐसा है की तुम चाहे कुछ न करो लेकिन सामने वाली जरूर पहल कर देगी. रेणुका का तुम भरपूर ध्यान रखते हो और साथ हे कभी ऐसा दीखता भी नहीं की तुम दोनों के बीच कुछ होगा. जब मेरे और रेणुका जैसी परिपक्व ये गलती कर सकती है तोह school-college की लड़कियां तोह बिना सोचे समझे हद्द पार कर देंगी. लेकिन मेरी हे बात को मैं हे खारिज कर देती हु क्योंकि तुम्हे झेल पाना किसी लड़की के बस की बात तोह मुमकिन नहीं, जितने सही जगह और खुला वक़्त न हो.", जिस तरफ बात जा रही थी अर्जुन वह जाना नहीं चाहत था. वो कैसे बताता की घर में हे कितनो के बुखार या मोच की वजह वो खुद है.?

"बुआ, अगर बात सिर्फ जिस्मानी सम्बन्धो की होती तोह फिर मैं बहार हे न रहता? अगर मैं आपके और रेणुका के सिवा किसी के साथ जिस्मानी सम्बन्ध में होऊंगा भी तोह जोरू उसकी कोई वजह तोह होगी हे.", अर्जुन ने एक बार शीशे से आसमान की तरफ देखा जो अभी भी साफ़ और उजाले से भरपूर था और फिर कार laal-batti पर रोक दी. मधु बुआ भी सोचने के बाद मुस्कुराने लगी.

"हाँ. तुम्हारी सबसे ख़ास बात यही तोह है की तुम इंसान की कदर करते हो और पूरी इजत्त देने के साथ उसकी समस्या को समझ कर हल भी करते हो. इस बीच अगर वही इंसान भावनात्मक रूप से जुड़ जाए और ऐसा हे होता है तोह फिर ये गलती नहीं है. सही जीवन और प्यार का अधिकार तोह सबको मिलना चाहिए. वैसे तुम मेरे भतीजे नहीं होते तोह मैं तारा के लिए तुम्हे अपना दामाद बनती.", मधु बुआ के मुँह से अपने आप हे ये लफ्ज़ निकल आये और अर्जुन ने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी को दबाया क्योंकि जो राज था वो राज हे रहने में भलाई थी.

"हंस लो हंस लो. ये सब मैंने तुम्हारे साफ़ दिल और प्यार की वजह से कहा. और सच कहु तोह तारा भी प्रीती के सामने नहीं ठहरती, बेशक तारा मुझसे भी कही ज्यादा खूबसूरत है जब मैं उसकी उम्र की थी. और किस्मत भी सही इंसान के लिए ऐसा हे बेजोड़ साथी ढूंढ़ती है जो उसके मुताबिक हो. तुम ख़ास हो तोह देखो तुम्हारे लिए भगवन ने जिसको बनाया वो अमेरिका से हमारे घर की बगल में हे आ गयी. हाहाहा..", मधु बुआ के भरे भरे लिपस्टिक लगे होंठ और तराशे हुए सफ़ेद दांतो की मुस्कान ने अर्जुन पर एक प्यारा असर दिखाया. उसके भी चेहरे पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी.

"सच कहा बुआ आपने. शायद मुझे न अपनी किस्मत से ज्यादा हे मिला है क्योंकि मैं इतना भी लायक नहीं हु. दादा जी जैसे व्यक्ति के घर जनम, फिर इतना प्यार करने वाले सभी परिवार के लोग. आप, dada-dadi, tauji-taai जी, माँ पापा और सभ बहने मुझे इतने ध्यान से रखती है जैसे मैं कोई इंसान हु हे नहीं. और प्रीती... उसको देखता हु तोह खुदसे हे रश्क होने लगता है. पता नहीं कैसे वो इतनी दूर से बचपन में हे इधर आयी और फिर इतने बरसो बाद मिले तोह मुझे याद थी तोह बस वो हरी नीली आँखें. सच कहु बुआ तोह मुझे हमेशा लगता था के मेरे जीवन को कुछ सोच कर ढला जा रहा है लेकिन दादा जी ने सब नियम कायदे, प्रशिक्षण के बाद मुझे एकदम आजाद सा कर दिया.", कहते कहते अर्जुन अपने जीवन के सभी पालो को याद करने लगा था की हॉर्न की आवाज से ध्यान वापिस बत्ती पर गया. हरी बत्ती देख उसने कार आगे बढ़ाते हुए बात जारी की.

"मुझे समझ आया की वो इतनी म्हणत सिर्फ इसलिए कर रहे थे जिस से मैं हर हालात का सामना कर सकू. दूर किया तोह प्यार का मतलब समझ आया, म्हणत करवाई तोह आराम का महत्व समझा और रोया तोह फिर समझ आया दिल को मजबूत रखना. फिर उन्होंने कहा के अब मैं घर से बहार खुद से जाना शुरू करू और जानती हो बुआ फिर क्या हुआ?", अर्जुन ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी बातों में खोये मधु बुआ को देखते हुए पुछा.

"हाँ.. फिर क्या हुआ?"

"प्यार. फिर मुझे 9 साल बाद वही आँखें दिखी जो मेरे साथ हर रात यादों में थी. जिसके साथ मेरा पूरा बचपन गुजरा और बस वही एक थी जिसके सामने मुझे गुस्सा नहीं आता था. पहली बार मुझे लगा की अगर जीवन में मुझे कुछ चाहिए तोह बस यही चाहिए. मैं ऋतू दीदी की छाया में जितना सुरक्षित खुद को पता था उतना हे वो आँखें भी. झूठ नहीं कहूंगा बुआ की प्रीती के सिवा कभी कोई लड़की मेरे जीवन में थी या है. मेरी एक दोस्त बानी थी आकांक्षा, स्कूल के समय आखिरी इम्तिहान के वक़्त लेकिन जो अलग एहसास मैंने प्रीती के सामने महसूस किया वो हर एहसास से ऊपर था.", मधु बुआ की आँखों में ख़ुशी कई गुना बढ़ चुकी थी अपने भतीजे की दिल से कही हर बात सुन्न कर.

"बुद्धू ये सिर्फ तुझे महसूस नहीं होता. हर देखने वाले को तेरी नजरो में प्रीती के लिए वो बेशुमार प्यार साफ़ पता चलता है. जिस तरह से तू उसके सामने आते हे सब भूल जाता है या इधर उधर देखने लगता है, वो मैंने बहोत बार देखा है. प्रीती शायद उतना हे ज्यादा चाहती है तुझे."

"हाँ बुआ. वो मुझसे बेहतर है."

"जैसे ऋतू. हैं न?", अब करंट सा लगा था अर्जुन को लेकिन चेहरे पर जाहिर न करने दिया. कार यूनिवर्सिटी के गेट से दाखिल हुई तोह एक मुस्कान सिक्योरिटी की तरफ बिखेर के वो धीमी गति से आगे बढ़ चला. इस नाम को सुनते हे अर्जुन के नजरो के सामने जैसे अतीत का सम्पूर्ण चलचित्र हे चलने लगा था.

ऋतू..! वो बस एक बड़ी बहिन हे तोह नहीं थी अर्जुन के लिए. चलना सीखने के बाद से हे ऋतू आज तक अर्जुन की वो ताक़त थी जो उसके लिए जमीन आसमान एक कर सकती थी. पहली मोहब्बत अगर प्रीती थी तोह ये रूहानी एहसास करवानी वाली थी ऋतू. जब भी वो अलका को देखता था, जिसको खुद अर्जुन ने हे अपनी पहली प्रेमिका बनाया था उसमे भी अंश नजर आता था तोह सिर्फ ऋतू का और अलका थी भी तोह वैसी हे.

आकांक्षा की तरफ उसकी चाहत का बढ़ना एक तरह से इस लिए हे मुमकिन हो पाया था की वह अर्जुन ऋतू था और आकांक्षा अर्जुन. वही जिद्द, मनुहार और बेफिक्री आकांक्षा में झलकती थी जो खुद अर्जुन स्वयं के लिए ऋतू की छाया में अनुभव करता था. जितनी भी संगिनी इस दौरान जीवन में आयी थी वो उनको एक बार प्रीती से तुलनात्मक देख सकता था लेकिन ऋतू.. नहीं ऋतू उसके लिए सरोवोपरी थी और प्रीती के साथ रिश्ते को मजबूती देने वाली भी वही थी जिसने अर्जुन को जीवन के वो पथ पढ़ाये थे जो शायद हे वासना से वो सीख पता.

"ऋतू दीदी ने तोह हमेशा ख़याल रखा है मेरा और प्रीती का बुआ. उनके निश्छल प्यार की तुलना करके मैं खुद को अपनी हे नजरो में निचे नहीं गिरा सकता. मुझे चलना कोमल दीदी ने सिखाया था लेकिन उसके बाद मुझे संभाला सिर्फ ऋतू दीदी ने, चाहे मैं उन्हें मार भी देता था लेकिन कभी उन्होंने मुझे अपने से अलग नहीं किया. जानती हो बुआ, हॉस्टल से घर आने के बाद पूरा एक साल लगा मुझे अपनी ऋतू दीदी से मिलने में. और वो 9 साल कैसी रही होंगी अपने ारु के बिना? उन्हें तोह मेरे आने के बाद भी यकीन नहीं था के मैं वापिस आ चूका हु.", अर्जुन सब याद करके थोड़ा भावुक होने लगा था और आँखों के कोरो से हल्का पानी निकलता देख मधु बुआ को शायद खुद पर हे बुरा लगने लगा था ये नाम ले कर.

"सॉरी."

"अरे क्या बुआ आप भी न. सॉरी ये माहौल ऐसा करने के लिए. लेकिन जब आपने ऋतू दीदी का नाम लिया तोह बस जो दिल में था वो कह दिया. प्रीती और मैं तोह एक दूसरे के साथ है लेकिन वो हम दोनों के लिए है."

"तोह मतलब इसको तुम कैसे डेस्क्रिबे करोगे? प्यार या परवाह या फिर कुछ और.?"

"सिर्फ प्यार बुआ और ये ऐसा प्यार है जिसका कुछ विवरण नहीं हो सकता."

"ाची बात है और मुझे सचमुच जान कर ख़ुशी हुई की तुम दोनों सिर्फ नाम से हे नहीं आत्मा से भी जुड़े हो. जब तुम नहीं दिखे थे न आज तोह मैंने ऋतू पर ध्यान दिया. तुम बिलकुल उस जैसे हो और शायद वही वजह होगी जो तुम्हे सचमुच इंसान की इतनी समझ है. अब तोह मुझे ये लगता है की ऋतू तुम्हारी बहिन नहीं होनी चाहिए थी. हाहाहा..", और मधु बुआ को क्या पता था की इरादे बिलकुल वही थे ऋतू के. बातों बातों में कार जब एक पेड़ की छाया के निचे रुकी तोह बुआ के चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गयी.

"मतलब ये परमानेंट तुम्हारा हॉस्टल है?"

"ऐसा हे समझ लीजिये और इस बार तोह रिसेप्शन की तरफ से कोई पहचान भी नहीं मांगेगा आपसे.", अर्जुन ने हँसते हुए कार का लॉक लगाया और सलवार कमीज में केहर ढाती मधु बुआ को अपने साथ लिए उस गलियारे में बढ़ चला जहा उसका वो गोपनीय कक्ष था जिसकी जानकारी सिर्फ सिमित व्यक्तियों तक थी. मुश्किल से 4 लोगो तक.

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"Hello अफसाना. कैसी हो आप?", एक दूसरे का नाम लेने के साथ हे प्रीती ने हाथ मिलाने की जगह गले लग कर अफसाना का हाल लिया. एक पल के लिए अफसाना का दिल कुछ जोरो से धड़का लेकिन प्रीती के साथ उस एक लम्हे में हे कुछ ख़ास महसूस किया था उसने. उसके वो नाजुक हाथ भी प्रीती के गिर्द लिपट कर अलग हुए और फिर दुपट्टा सर पर लेती अफसाना ने बड़ी नजाकत से नजरे उठा कर जवाब दिया.

"हम बेहतर है, खुदा करम से. आप बताये प्रीती? हमको पहली नजर में कैसे पहचाना आपने?", हर लफ्ज़ जैसे किसी मीठी बूँद सा छलकता था अफसाना के होंठो से. प्रीती ने बिना कोफ़्त किये उसका हाथ पकड़ कर खुद को बिस्टेर पर आराम दिया.

"जिसने बताया था वो एक्सप्लेन करने में माहिर है. ये आँखें किसी और की तोह नहीं हो सकती थी, इसलिए नाम लेने से पहले ध्यान इन पर हे गया था. आप मुझे कैसे पहचान गयी."

"आप हिंदी बोल रही है?", अफसाना अभी तक जैसे किसी और हे दुनिया में थी जो प्रीती के चेहरे को वैसे देख रही थी जैसे हर मिलने वाला पहली बार अफसाना को देख कर हैरान होता था.

"मतलब? मैं यही तोह रहती हु और अगर बात आँखों की है तोह फिर मेरा भी आपसे यही सवाल होना चाहिए. अर्जुन ठीक कहता है के आप किसी अरब देश की राजकुमारी सी है.", इस बार अफसाना जमीन पर अपने नाखून गदति सी शर्माने लगी थी.

"वैसे आप उन्हें नाम से तवज्जो देती है?", अफसाना की हालत और बात सुन्न कर प्रीती की दिलकश मुस्कराहट अपने आप हे छलक आयी.

"आप क्या बुलाती है उन्हें?, बात बेशक हलकी दिल्लगी से कही गयी थी लेकिन अफसाना कुछ बेचैन सी होने लगी और प्रीती ने सहज होते हुए उसका एक हाथ अपनी दोनों हथेलियों में भर लिया जैसे कह रही हो की सब ठीक है और वो समझ सकती है. अफसाना ने जैसे हे अपनी लम्बी पलके ऊपर उठाई तोह प्रीती ने इस बार उसको कास के अपने सीने से लगा लिया. ये खामोश सा दर्द और अफसाना की डबडबायी सुनहरी आँखें किसी रेगिस्तान के शाद्वल (ओएसिस) सी हो चुकी थी.

"हमे माफ़ कीजियेगा प्रीती जी. हम गुनेहगार है आपके और अर्जुन जी के. उनके मुस्तकबिल (भाग्य) में आप है और अनजाने हे कुछ धुंदले से ख्वाब हमारी सोच ने बन दिए. हम paak-saaf है और न हे कभी हमने उन्हें इस najar-farmaya था कभी लेकिन...", कहते कहते अफसाना की आँखों से वो मोती बहार टपक हे पड़े.

"शहहह.. मुझे पता है अफसाना और ये भी पता है की आप बेहद हे साफदिल है. अर्जुन ने मुझे बताया था की जब आप आये तोह मैं आपको अपने साथ हे राखु. क्यूंकि जो गलती अर्जुन से आपके साथ हुई थी वो खुद उस से व्यथित है. वो सबकी परवाह करता है और किसी को दुखी भी नहीं देख सकता. आपको गले लगाने के बाद वो जान गया था की उस से गलती हुई है पर क्या अर्जुन के दिल में आपने कुछ फरेब महसूस किया था? कभी उसकी नजरो ने तिरस्कार किया आपका? और आपको ऐसा क्यों लगता है की इसमें आपकी भी गलती है?", प्रीती की इतनी साफ़ तबियत देख और सुन्न कर अफसाना अलग हुई तोह खुद प्रीती ने रुमाल से उस गुलाबी चेहरे को साफ़ किया जहा अब दुःख की जगह बस हलकी सी झिझक थी.

"नहीं नहीं. इसमें उनकी गलती नहीं थी प्रीती जी. वो सब बेशक बस हादसा हे था और हम नाखुश इसलिए हैं क्यूंकि उन्हें देख कर आज भी हमे वही मंजर याद आता है. आप उनकी होने वाली khatoon-e-khanaah है और हमारी उस गलती को हम आज तक गलत नहीं मान पाए."

"क्या क्या हु मैं अर्जुन की?, प्रीती थोड़ा चौंक सी गयी थी इतना भरी लफ्ज़ सुन्न कर.

"हमारा मतलब आप उनकी होने वाली बेगम मतलब बीवी है. माफ़ कीजिये जुबान की समझ हमे काम है लेकिन हम हिंदी हे बोल लेंगे.", पहली मर्तबा अफसाना खुदसे कह रही थी की वो हिंदी बोल लेगी और प्रीती ने हँसते हुए फिर से दोनों हाथ पकड़ लिए.

"जब कुछ भी ाचा लगे जिसमे कोई गलत भावना न हो तोह उस से दुखी नहीं होना चाहिए. आप तोह सिर्फ इस बात को ले कर टेंशन में हो और उधर अर्जुन चाहता है के मैं आपको अपने साथ इसलिए राखु जिस से उसके कदम आपकी तरफ न बढ़ सके."

"अल्लाह.", अफसाना ने हैरत से अपना हाथ मुँह पर रखते हुए जैसे हे ये कहा उसकी बड़ी होती आँखों को देख प्रीती खिलखिला उठी जैसे वो दोनों कितने हे बरसो से साथ रही हो.

"हाहाहा.. ये सच है अफसाना जी और अर्जुन की ख़ास बात पता है क्या है? वो मुझसे इतना प्यार करता है की वो अपनी हर वो बात मुझे बताता है जिस से वो टेंशन में हो या उसको लगे की गलती हो रही है. उसको आपके साथ भी यही डर लगता है की कही वो फिर से प्यार न कर बैठे.", अफसाना का दिमाग सुन्न पद चूका था लेकिन जैसे हे प्यार लफ्ज़ सुना वो न्यास हे बोल उठी.

"निकाह एक हे होता प्रीती जी और जो ये 4 निकाह वाला कानून है हम इसके सख्त खिलाफ है. हमारे साथ जो भी हुआ वो इसलिए अलग था क्योकि वो पहली बार हुआ. हम आपके हे करीब रहेंगे अगर ऐसी हे बात है तोह. इश्क़ जुर्म न सही लेकिन हांसिल न हो तोह हम अपने होने वाले शौहर के भी काबिल नहीं. बस जो भी हमने बात की है इसको अपने तक हे रखियेगा. गुजारिश समझ लीजिये.", अफसाना जहाँ गंभीर और संजीदा थी वही प्रीती मंद मंद मुस्कुराती हुई फिर हंसने हे लगी.

"आप बहोत प्यारी है अफसाना जी और सच कहु तोह पता नहीं किस्मत क्या करवा दे. आप यहाँ है तोह सबके साथ ghule-mile और वो विचार हे ना आने दे जिस से आपको दुःख हो. खुद को बंद करने से हालात बेहतर होने की जगह खराब होंगे. अर्जुन को बस यही समझिये के वो परिवार में है और आप उसको जानती है. और मुझे सिर्फ प्रीती हे बुलाया कीजिये, मैं छोटी हु आपसे."

"आप इतने इत्मीनान और नरमी से ये सब कैसे कह सकती है? आप दोनों मुहब्बत करते है और रिश्ते में भी है. रुस्वा होने की जगह आप तोह हमसे दिल्लगी कर रही है."

"हाहाहा.. ये जो मोहब्बत्त या प्यार है न अफसाना जी ये dor-patang जैसा नहीं है चाहे लोग ऐसे हे एक्साम्प्ले देते हो. न chaand-chakor जैसा है, जिसमे सब दूर दूर लेकिन मिलने की बेमतलब आस. प्रैक्टिकल बात करू तोह प्यार हक़ नहीं एक एहसास है. किसी के साथ ये कुछ ज्यादा होता है किसी के साथ काम. मैं अर्जुन से प्यार करती हु, जैसा सबको पता होगा जो जानते है. वो भी मुझसे कही गहरा प्यार करता है शायद इतना की वो बड़ी से बड़ी बात भी मुझसे चिपटा नहीं. लेकिन सूपपोसे की आप मुझे नहीं जानती और अर्जुन के साथ कुछ समय बिताने के बाद उसको जान कर दिल में ये अलग सा एहसास हो जाए तोह क्या ये गलत बात है? वो फीलिंग तोह आपके दिल में है न और अगर उसको रेस्पेक्ट मिले तोह क्या वो भी गलत बात हुई? मैं कल न राहु..", प्रीती अभी आगे कुछ बोलती अफसाना ने गर्दन ना में हिलाते हुए अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया.

"आपको हमरी भी उम्र लग जाए प्रीती. इतना बड़ा दिल नहीं है हमारा और बड़े हे खुदगर्ज से हम. आपने इतना कह दिया तोह अब दिल से बोझ उतर गया हमारे. इश्क़ की समझ सिर्फ किताबी थी आज से पहले लेकिन हम जान गए है की वो एहसास वाली बात सच है. हम आपके साये में रहेंगे, जबतक यहाँ है."

"वैसे दोस्ती भी की जा सकती है अर्जुन से जिस से वो गले मिलना बुरा नहीं लगेगा. और साये में नहीं अफसाना जी, हमारे साथ रहेंगी आप. और इसका मतलब है की आप मेरे साथ मेरे घर रहेंगी और अभी हम लोग मार्किट चल रहे है. उस से पहले बाकी सबके पास. चलिए और थोड़ा फ्री रहिये, ये अपना घर है कोई आर्मी हक़ नहीं जो इतने कानून और अनुशाशन में बंधे हो. वैसे ऋतू दीदी से मिल चुकी हो न?", प्रीती ने फिर से ये बात मस्ती में कही और अफसाना के चेहरे पर शर्म की लाली गहरी हो गयी.

"वो लड़की हो कर.."

"मतलब ाचे से मिल चुकी हो. हाहाहा.. वो फिर भी ठीक है बस तारा से बच कर रहना आप. आओ उधर होंगे वो सब.", अफसाना की चाल में अलग हे चपलता आ चुकी थी प्रीती से ये गहरी मुलाकात होने के बाद. आज उसको भी लग रहा था की बंदिशे उतनी हे लाजमी है जितने खुद को महफूज रख सके. हर वक़्त हे क़ैद होना सितम से ज्यादा कुछ नहीं.

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उम्र बढ़ने के साथ साथ मधु बुआ के जिस्म में ये अलग हे चमक बढ़ने लगी थी. खूबसूरत तोह थी हे किसी खजुराहो की मूरत सी लेकिन जिस्म के खजाने के साथ साथ prem-milan भी वो अब कही ज्यादा कुशल और सहयोग देने वाली बन चुकी थी. हॉस्टल के इस कमरे के बड़े बिस्टेर पर निर्वस्त्र अर्जुन बड़े प्यार से उन्हें गॉड में थाम कर ये मधुर संसर्ग बढ़ा रहा था.

कही से भी वो बड़े बड़े वक्ष ढलके न थे और उनके उभरे हुए नुक्ले चूचक पूरी सकती से अर्जुन के सीने में घर्षण करते जब जब बुआ अपने चौड़े मांसल कूल्हों को ऊपर निचे हिलती. कुछ समय पहले हुए वो हलक दर्द अब तेज खुमार और मजे में तब्दील हो चूका था. Dhawani-rahit कमरे के भीतर मधु बुआ निर्भीक आहें भर्ती हुई समूचा लिंग अंदर लेती हुई अर्जुन के होंठो को किसी भूखी शेरनी से चबाती हुई जैसे इस मिलान के अंतराल का बदला ले रही थी.

ये धीमी रफ़्तार वाली चुदाई पिछले 10-12 मिनट से जारी थी और अब जैसे मधु बुआ की ख्वाहिश जोरदार संसर्ग की थी. दोनों दुग्ध कलश मसल चूस कर अर्जुन ने रक्तिम कर दिए थे और निप्पल गुहार लगते प्रतीत हुए जैसे उन्हें बख्श दिया जाए.

"ऊपर आ के अपनी मर्जी से करो अर्जुन.. आठ.. मैं सेहन कर लुंगी जितना चाहे जोर से karo...umm", 9 इंच से भी कुछ बड़ा दीखता वो मधु बुआ की choot-ras में भीगा लिंग जब बहार निकला तोह मॉटे होंठो वाली वो चिकनी उभरी छूट संसर्ग से पहले की तरह बंद नहीं थी. गहरे लम्बे धक्के और लिंग की अत्यधिक मोटाई ने मधु बुआ की छूट को लाल करने के साथ हे अपनी हद्द से ज्यादा फैला दिया था.

"बुआ, घुटनो पे हे आ जाओ फिर तोह.", अर्जुन ने एक नरम उभर थोड़ा कस के मसलते हुए ये इत्छा जताई तोह सिसकती हुई बुआ ने कामुक मुस्कान से अपने भरी नितम्भ अर्जुन की तरफ करते हुए चौपाया आसान बना लिया.

"पहले बोल रही हु की आगे हे करना. अभी यहाँ से जाने के बाद मुझे परिवार में लोगो से मिलना भी है और अगर तूने वह किया तोह फिर मैं बता दूंगी की तुमने हे मेरी वैसी हालत की है.", मधु बुआ चेतावनी भी एक अदा से दे रही थी जैसे कह रही हो की दिल तोह मेरा भी है दूसरा छेड़ भरवाने का लेकिन मौका सही नहीं.

"आज वैसे भी मैं आपको खुश करने के लिए यहाँ लाया हु. उस काम के लिए तोह अपने घर और रात से बेहतर कुछ भी नहीं बुआ. वैसे सचमुच आपके हिप्स देख कर कण्ट्रोल करना मुश्किल हे होता है. लेकिन कसार यहाँ से पूरी कर लूंगा.", इस मुद्रा में बहार को उभर आयी छूट की लाल फैंको के बीच एक झटके में हे अर्जुन ने पूरा लुंड जड़ तक भरते हुए बुआ के मखमली चिकनी पीठ पर सीना लगा कर दोनों लटकते दूध थाम लिए.

"ाः.. ोुच्छहह.. कमीने बहोत बार कहा है के मेरी मुनिया को आजतक इसकी आदत नहीं पड़ी है. हर बार ये और भी मोटा लगता है लेकिन तू ..आठ.. आराम से दबा इन्हे अर्जुन.. पहले हे छूट का सत्यानाश कर दिया है तूने.. aahh..ummm.. और कस के आह्ह्ह्ह..", पल में माशा पल में टोला थी मधु. पहले धक्के ने जहा छूट के अंतिम सिरे तक एक मजेदार दर्द दिया था वही दोनों चुचो को मसलते हुए निरंतर धक्को ने मजे के सागर में डुबो दिया. योनि खुलकर रास बहती हुई बुरी तरह उस मॉटे लिंग से चिपकी थी. इतनी चिकनाहट के बावजूद हर घर्षण पर बुआ की आह आह की आवाज भड़ने लगी.

"उम्माह्ह्ह. फाड़ के रख दी है तुमने मेरी.. आठ.. सच कहु तोह पहले .. आठ कुछ मजा भी आता था तेरे फूफा के साथ.. आठ. अब तोह बस ध्यान इसमें हे लगा रहता है की अपनी टाइट राखु.. ओह माँ... मैं गयी रे अर्जुनंन..", यहाँ मधु बुआ अपनी व्यथा सुनती हुई चुद रही थी वही अर्जुन उनके ऊपर सवार हुआ चुचो को मसलने के साथ साथ कंधे पर दांत गड़ता हुआ और जोर से धक्के लगाने लगा. मधु बुआ भी मजूत महिला थी जो इतने तगड़े इंसान को अपने ऊपर लिए हुए मजे से घोड़ी बन्न कर अपनी छूट की हालत खराब करवा रही थी.

"ाहहए.. बुआ.. जहा से भी दबाउ आप हो बड़ी नरम और सेक्सी.. आठ.. लगता है हर बार हमारा पहली बार हे है.. उम्म्म..", अर्जुन कुछ सीधा हो कर एक हाथ से बुआ की चिकनी जांघ थामे उन्हें सहारा देते हुए लगा रहा और बुआ की तजा तजा पिघली छूट फिर से तैयार हो गयी.

"तू थकता नहीं है रे.. आठ.. और पता लगाना पड़ेगा की तेरे कद्द के साथ साथ ये लुंड मुआ भी क्यों बढ़ता जा रहा है.. आठ.. अगले 2-3 दिन अगर तेरे फूफा नजदीक आये तोह .. आइइइइइइ..", यहाँ बुआ अपनी बात बताती हुई एकाएक चीख उठी जब जड़ तक लुंड फसाये अर्जुन ने अपनी एक ऊँगली से उनकी छूट के बाहरी दाने को दबा दिया.. जिस्म अकड़ने के साथ हे वो औंधे मुँह बिस्टेर पर जा गिरी. एक मिनट के अंदर 2 तगड़े सखलन से जैसे वो होश हे खो चुकी थी.

"बुआ, अभी मेरा नहीं हुआ.", अर्जुन की मुस्कराहट देख नम्म आँखों से हे मधु बुआ भी मुस्कुराने लगी. इस बार जैसे इतने जोरदार रिसाव से वो रो हे पड़ी थी.

"ये सब कहा से सीखा है तू? उफ़.. पता है ऐसा लगा जैसे अंदर से कुछ निकलना चाहता है और तेरा ये मूसल उसको जगह नहीं दे रहा. फिर तोह जैसे बाढ़ सी आ गयी.. आठ.. इसलिए भी दीवानी हु मैं तेरी और अब अंदर नहीं लुंगी.", बना घृणा और लाज के मधु बुआ ने सरक कर अर्जुन के लुंड को पकड़ते हुए होंठो से लगा लिया. अर्जुन थोड़ी हैरत से देख रहा था ये सब. ऐसा नहीं था के बुआ ने मुखमैथुन नहीं किया था उसके साथ. लेकिन चुदाई के बीच में कॉमर्स से भीगे लिंग को वो मुँह में लेंगी ये जैसे सोच से भी परे था.

"क्या सोच रहा है की अब मैं इसको मुँह में क्यों ले रही हु? तुझसे हे सीखा है की जब एक दूसरे से पूरी तरह प्यार करते है तोह फिर कुछ बुरा नहीं. वैसे ये फूल क्यों रहा है?", होंठो से निकाल कर बुआ ने इतना हे पुछा था और इसकी वजह थी अर्जुन की हालत खराब होना. अर्जुन का जवाब सुने बिना हे बुआ ने वापिस पूरा सूपड़ा होंठो से अंदर निगल लिया. गीले और गरम मुँह के एहसास भर से अर्जुन की नस्से खिंच चुकी थी. अपनी कलाई से मॉटे लुंड को जड़ से पकड़ कर बुआ दबा कर अनादर बहार करने लगी तोह अर्जुन का घुटनो पे रहना मुश्किल लगने लगा.

"आह्हः.. बुआ मुँह खराब हो जाएगा.. आठ..", मधु बुआ ने अभी एक मिनट हे चुसाई की होगी और अर्जुन की हुंकार सुन्न कर उनके हाथ और होंठ थोड़ा तेज हो गए. मदहोशी के आलम में खुद को गिरने से बचने के लिए अर्जुन ने बुआ का सर हे दबा लिया. आधे से ज्यादा वो मोटा लुंड मुँह में घुसते हे बुआ के गले से जा लगा. गरम लेसदार पिचकारियों को अपने गले पर चोट पहुंचने के साथ साथ हलक में उतारते पा कर मधु बुआ की भी सांस रुकने सी लगी थी. अर्जुन को रत्ती भर भी हिला सके इतनी हिम्मत उनके जिस्म में बाकी न रही. इधर अर्जुन जबतक खाली न हो गया वो अलग न हुआ.

"ुनंग.. हुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.. कमीने.. ऐसे भी कोई करता है?", मधु बुआ की आँखों से पानी टपक रहा था और वीर्य का आखिरी कटरा तक गले में बहने के बाद जब उन्हें सांस आयी तोह वो अर्जुन के सीने पर हलकी नाराजगी से मुक्के बरसाने लगी जिसको 2-3 बार खाने के बाद अर्जुन ने बुआ को पकड़ कर अपने सीने पर गिरा लिया. कुछ पल तक बस दोनों की गहरी साँसों की आवाज हे सुनाई देती रही

"अब ये आपने कहा से सीखा बुआ? मुझे तोह ऐसा लगा था जैसे मेरा कही फंस हे गया हो... ओह.. कितनी मजबूती से आपके होंठो ने पकड़ा हुआ था.. आह्हः.. अगली बार तोह सिर्फ यही करूँगा मैं."

"करवाती हु सिर्फ यही. मेरी गलती थी जो इस मूसल को मुँह में लिया. मर्डर हे जाती मैं और तुम. तुम्हे तोह कुछ सुनाई भी नहीं दिया.. अभी तक गाला दुःख रहा..", बुआ की बात सुन्न कर अर्जुन ने प्यार से उनका गाल चूम कर पीठ को सहलाया और खड़े होते हुए फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर उनकी तरफ बढ़ा दी.

"आइंदा ऐसी गलती नहीं करूँगा बुआ. और आप भी अगर ये सब करना हो तू शुरू में हे करना. आपके साथ आगे बढ़ने के बाद मुझसे कण्ट्रोल वैसे भी नहीं होता.", अर्जुन निर्वस्त्र हे बुआ के करीब बिस्टेर की पुष्ट पर बैठ गया. इतनी जोरदार चुदाई के बाद अर्जुन द्वारा अपने जिस्म को सहलाये जाने से मधु बुआ भी पानी पी कर उसकी गॉड में सर रखती लेट गयी. उनके गौरवर्ण उभारो पर लाल निशाँ साफ़ दिख रहे थे जिन्हे अर्जुन के सहलाने से कुछ बेहतर लग रहा था.

"पागल है तू पूरा. ये सब भी जरुरी है जब हम प्यार के ऐसे पल में एक दूसरे को सुख देते है. प्रैक्टिस नहीं है न तोह थोड़ा दर्द हुआ लेकिन सिर्फ तू हे मुझे खुश करता रहे तोह ये मेरा लालच हे हुआ. उम्म्म.. ", अर्जुन द्वारा स्टैनो की मालिश से बुआ को अब मजा आ रहा था और वो बेफिक्र लेती बस इस पल का पूरा लुत्फ़ लेती रही. इस ख़ामोशी को अर्जुन के अगले सवाल ने कुछ अलग हे तरीके से भांग किया.

"बुआ.. आप अज्जू चाचा के बारे में कुछ जानती है?", ये सवाल किसी विस्फोट की तरह गूंजा था मधु बुआ के कानो में. ज्यादा हैरत न दिखते हुए बुआ ने बस अर्जुन का दया हाथ अपने बाए उभार पर बस दबा लिया. कुछ पल वो शुन्य में देखती रही और अर्जुन ख़ामोशी से यही सोचने लगा की कही गलत सवाल तोह नहीं पूछ लिया.

"मुझे शालिनी ने बताया था की तुम ऐसे हे किसी मामले में हाथ दाल रहे हो अर्जुन. यहाँ आने से पहले मेरी फ़ोन पर शालिनी से हमेशा की तरह औपचारिक बात हो रही थी लेकिन जब मैंने तुम्हारा जीकर किया तोह उसने मुझे अज्जू भाई वाले मामले में दिलचस्पी लेने के बारे में बताया. मेरी मानो तोह तुम इस सबसे दूर हे रहो बीटा. बहोत कुछ खो चुके है हमारे परिवार और अगर तुम भी अज्जू का पता लगाने चल निकले तोह.. "

"बुआ, आपको मुझ पर यकीन नहीं है? मैं कुछ भी ऐसा वैसा नहीं करूँगा लेकिन बस दिल करता है की अगर मैं किसी तरह मुजरिम तक पहुंच पाउ तोह शायद उनकी आत्मा को शांति मिल जाए. उमेद चाचा तोह फिर भी सब छुपा कर जी लेते है लेकिन मैंने बहुत बार दादा जी, दोनों दादी, शालिनी बुआ और पापा तक की आँखों में एक खालीपन देखा है. जानता हु की बदले की भावना से बहोत कुछ बुरा हो चूका है लेकिन मैं इस सबसे अलग बस उस इंसान तक पहुंचना चाहता हु जिसने ऐसा किया और बस एक सवाल पूछना है की क्यों?"

"तुम्हारे हाथ अतीत के अंधेर में सिर्फ दर्द के सिवा कुछ नहीं लगेगा अर्जुन. मुझे इतना मालूम है की तुम बहोत कुछ जान चुके हो फिर भी शांत बैठे हो इसलिए मैंने भाई का नाम सुन्न कर हैरानी नहीं जताई. जहा तक मुझे पता है तोह उस मामले से जुड़े सभी लोग मारे जा चुके है या उनको कोई नहीं जानता. फिर भी अगर मुझे कुछ पता लगा तोह जरूर बताउंगी."

"बुआ उस दिन जब वो सब हुआ तोह आप कहा थी? मेरा मतलब है की शायद पापा वही जा रहे थे जहा चाचा की हत्या हुई लेकिन वो जा न सके.", अर्जुन के ऐसा कहने पर निर्वस्त्र बुआ उठ कर बैठ गयी जैसे सूई चुभो दी गयी हो.

"मेरा उसदिन किडनैप हुआ था और शंकर भाई ने हे मुझे बचाया था. मतलब अगर वो सब नहीं होता तोह

"तोह अज्जू चाचा जिन्दा होते बुआ लेकिन ये सब किया गया बहोत सफाई से था. आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानती है जो इन दोनों हादसों में शामिल हो और ज़िंदा भी.?", अर्जुन हाथ में बोतल थामे बुआ के चेहरे को गौर से देख रहा था.

"मोहर सिंह की बीवी, मधुलता सिंह और हो सकता है चंद्रो देवी भी. बस मैं उस हवेली पर नहीं जाती इसलिए कुछ भी सही से नहीं कह सकती लेकिन मैंने एक बार ये जरूर सुना था की चंद्रो देवी को सब खबर होती है.", अभी भी मधु बुआ कुछ सोच रही थी दिमाग पर जोर डालते हुए जैसे कुछ तोह गड़बड़ जरूर थी जो याद नहीं आ रही. सहसा उनकी आँखे चमक उठी.

"ये लोग कुछ जानते है या नहीं लेकिन एक इंसान था जो कुछ जानता हो. कुछ क्या वो यकीनन जानता होगा इस बारे में.", मधु बुआ के ऐसा कहने पर अर्जुन ने उनकी दोनों बहन अपने हाथो में थाम ली, एक उम्मीद की आस में.

"कौन था वो बुआ? और क्या वो ज़िंदा होगा?"

"पता नहीं लेकिन शालिनी ने तब मुझे बताया था की नीलिमा के साथ अज्जू का एक ख़ास दोस्त भी उस तरफ भागा थे जहा लड़ाई हो रही थी. नीलिमा को तोह उसके पिता ने रस्ते में पकड़ लिया था लेकिन वो लड़का वह तक गया था. सब सदमे में थे और इस वजह से नीलिमा ने ये बात शालिनी को गायब होने से पहले बताई थी. अरविन्द नाम था उसका और उसने नीलिमा को बताया था की वो कॉलेज छोड़ कर अपने गाँव जा रहा है.", मधु बुआ की बात सुन्न कर अर्जुन ने एक ठंडी आह भरी जैसे ये सुराग किसी काम का न हो.

"ऐसी शकल क्यों बना रहे हो? कॉलेज से रिकॉर्ड मिल सकता है उस लड़के का और क्या पता वो तुम्हे सब बता दे जो उस दिन हुआ था."

"वो अपने घर पहुंच नहीं पाया था बुआ. दलीप मौसा के पापा भी शामिल थे उस केस में और जब उन्हें अरविन्द के बारे में पता लगा था तोह वो गए थे उसके पीछे लेकिन वो ज़िंदा नहीं मिला. जानती हो उसको किसने मरवाया था?", मधु बुआ अर्जुन की बात सुन्न कर अब जरूर हैरत में थी. उन्हें नहीं पता था की अर्जुन कहा कहा की धुल छान चूका है.

"किसने?"

"चंद्रो देवी ने और इसलिए मेरा शक उन पर भी है कुछ हद्द तक. लेकिन बबिता ने इसकी वजह ये बताई थी की अरविन्द हवेली की किसी बहु को ब्लैकमेल कर रहा था, जैसा बबिता ने सुना था. मुझे लगा था के आप भी कुछ जानती होंगी इस सबके बारे में क्योंकि आपकी शालिनी बुआ से ाची जमती है और अज्जू चाचा भी आपको बहोत मानते थे.", अर्जुन के लटके हुए चेहरे को देख कर जैसे मधु बुआ को भी बुरा लग रहा था. अपने हाथ में उसका हाथ लेते हुए उन्होंने बड़े प्यार से कहा.

"मैंने कहा था न अर्जुन की अतीत में सिर्फ अँधेरा हे मिलता है. अब खुद हे सोचो की चंद्रो देवी के परिवार में हे कितने राज दफ़न होंगे? उतने हे राममेहर की तरफ लेकिन आज के वक़्त में तुम्हारी वजह से सभी के दिल में आपस में मिल कर रहने की चाहत है. क्या पता कुछ ऐसा तुम्हारे हाथ लग गया जिस से ये आपसी प्यार बिखर कर दुश्मनी का नया रूप ले ले. अज्जू सचमुच ख़ास था लेकिन वो समय फिर से तोह नहीं लाया जा सकता? वो तुम्हारी तरह हे सबकी िज्जात्त करने वाला और बहोत हंसमुख इंसान था जो हमेशा आज में जी कर खुश रहता था. पापा ने हे नाम दिया था अर्जुन और फिर यही नाम उन्होंने तुम्हे भी दिया. थोड़ा समझना इस बात को गहराई से.", बुआ ने बिस्टेर से अपनी ब्रा उठा कर वक्षो को नजरबन्द किया और फर्श पर कड़ी हो कर बाकी कपडे भी सलीके से पहन ने लगी.

"सही कह रही हो आप बुआ की अतीत में हर बार कुछ न कुछ गलत हे हाथ लगा है मेरे. अब तोह अकेले रहने भर से अजीब सा लगता है और कभी कभी सोचता हु की जीवन में सच जरुरी है इन्साफ. वो सच जो दो तरफ़ा होता है और ऐसा इन्साफ जिसमे एक दोषी तोह एक be-gunaah. फिर वो इन्साफ कैसे हुआ बुआ? मुझे अपने दिल पर कभी इतना बोझ महसूस नहीं हुआ जितना अज्जू चाचा के बारे में जान ने के बाद हर रात लगता है.", एक ये भी वजह थी की अर्जुन अकेले नहीं सोना चाहता था. चाहे फिर शालिनी बुआ के साथ बिस्टेर साँझा करना पड़ा हो या फिर अनामिका चची का ख़याल रखने के बहाने.

"फिर तुम पापा से बात करना अर्जुन लेकिन शादी हो जाने के बाद. जिन्होंने नाम दिया है वही तुम्हारे साथ मिल कर वो इन्साफ और सच पता कर सकते है. कोशिश करना की सिर्फ अज्जू भाई को जान ने निकलो. नहीं तोह कुछ ऐसे नाम भी सामने आ सकते है जिन्हे सुन्न कर कब पाँव के निचे की जमीन धंस जाए, खबर भी नहीं होगी."

"हाहाहा.. मजाक ाचा कर लेती हो बुआ आप. जब मैं चंद्रो देवी की हवेली से राज निकाल सकता हु तोह वह रहने वाले हर इंसान के साथ साथ चारो परिवारों से आगे के भी उन गुमनाम लोगो की जानकारी रखता हु जो मेरे लिए अब गुमनाम नहीं रहे. बस बाकी सबके कदमो के निचे वो जमीन बरकरार रखनी है मुझे अब. इतनी बड़ी जमीन खिसकी तोह बिखरने के बाद समेटना मुश्किल हो जाएगा.", अर्जुन ने बात कहते हुए आनन् फानन में हे अपने कपडे पहन कर बाथरूम का रुख किया तोह मधु बुआ अवाक कड़ी उसको देखती रही. अर्जुन सचमुच उनकी सोच से परे था जैसा शालिनी ने बताया था.

'चिंता है तुम्हारी लेकिन शायद तुम्हे सबकी चिंता हम सबसे ज्यादा है.', बुदबुदाती हुई वो अपने बाल ठीक करके आईने में अपना चेहरा देखने लगी थी. आँखों का काजल चेहरा पर आ चूका था और होंठो से लाली खा कर अर्जुन ने उन्हें कुछ सुजा सा दिया था. गर्दन से थोड़ा निचे जहा उभार थे वह तक मजबूत उँगलियों के निशाँ और कमीज निचे खिसकाते हे अर्जुन के दांत चुचो की उठान पर निशान दे गए थे.

'बस इसलिए तुम पसंद हो मुझे. एक हे बार में हर बार ऐसा महसूस करवाते हो जैसे मेरी आज हे सुहागरात हुई है वो भी अपनी पसंद के आशिक़ से.'

"बुआ सुहागरात जैसा लगे इसलिए हे तोह आपके साथ रोज रोज नहीं करता.", अर्जुन चेहरा धोने के बाद उनकी बगल में हे खड़ा था और उसकी बात सुन्न करो बुआ अचरज से देखने लगी.

"इतनी तेज तोह बोल रही थी आप की मैं सुहागरात जैसा फील करवाता हु आपको. और आशिक़ तोह हु हे आपका क्योंकि इतनी प्यार जो हो.", अर्जुन ने ठुड्डी ऊपर करते हुए एक गहरा चुम्बन जड़ कर अपने इजहार किया तोह मधु बुआ के गालो पर अब हलकी शर्म आ गयी थी. वो बिस्टेर ठीक करने लगा था और बुआ खुद को सही करती हुई बार बार आईने से हे उसको निहारती रही.

"सच कहु तोह मुझे तुम्हारे साथ पता भी नहीं चलता की मैं मैं में बात कर रही हु या बहार. और आज रात तुम्हारे फूफा वही रुकने वाले है तोह अकेले सोना. तुम्हे जो पसंद है वो आज हे ले लेना नहीं तोह अगले एक हफ्ते बस जो भी होगा पता नहीं तुम्हारा होगा भी या नहीं."

"रहने दो रात का बुआ और चलो अब. 7 से ऊपर टाइम हो चूका है और घर जाते हुए 8 बज हे जाने है.", अर्जुन के साथ मधु बुआ अगले 5 मिनट बाद हे बहार कार में बैठी थी. एक बार की हे तगड़ी चुदाई से उन्हें जाँघे मिलाने में परेशानी महसूस हो रही थी लेकिन एक मीठे मजे के साथ.

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अपनी ससुराल पहुंचने के बाद सबसे मिलने जुलने के पश्चात शंकर जी राजेश और दलीप के साथ लिए हुक्का पीने नोहरे में चले गए थे. सुनंदा जी ने रुपाली का भी उतने हे अपनेपन से स्वागत किया था जैसा वो Ritu-Komal का करती थी. बाकी दोनों नानी ने भी हिमांशु के साथ साथ अशोक जी का भी उतना हे सत्कार किया था. व्यवसाय सम्बंधित बातों के लिए अशोक जी बैठक में फ़िलहाल कुन्दनलाल जी और सोहनलाल जी के समीप थे और तेजपाल भी आज घर हे मिले.

हमेशा की तरह मनोहरलाल जी नदारद थे फिलहाल लेकिन सबसे मिलने के बाद. उनके दोनों बेटे कैलाश और मनोज जरुरी काम से शहर से बहार थे और घर के भीतर कुछ ज्यादा हे चहल पहल थी घर की बेटी के आने पर. संगीता और अनीता ने आज उनके जिस तरह पाँव छुए थे रेखा जी को अजीब तोह लगा था लेकिन जब अपनी माँ और दोनों भाभियों के चेहरे पर अलग से मुस्कराहट देखि तोह लगा जैसे कोई शरारत हे होगी.

"वैसे देख कर ख़ुशी हुई माँ की अब ये दोनों भी माँ बन्न ने की तैयारी में है. संगीता अनीता, वो दोनों तुम्हारा ड़याँ तोह रखते है न?"

"जी दीदी और वैसे भी जबसे राजेश जेठ जी इधर आये है तबसे सभी लोग रात का खाना साथ हे खाते है. वैसे शिकायत तोह पहले भी कभी नहीं थी. माँ जी और बड़ी दीदी हमेशा हे बचो की तरह ख़याल रखती है.", ये संगीता ने कहा था और अनीता अभी तक सकुचा रही थी. चेहरे पर दोनों हे छोटी मामियों के अलग हे नूर था, जिसकी वजह रेखा का लाडला अर्जुन जो था.

"वाओ.. बुआ आप कब आयी? और अर्जुन भी आया है क्या?", ये चहकती हुई बाला थी स्वाति, जो अभी अभी अंदर आयी थी पड़ोस वाली सहेली के घर से. इधर उधर देखने पर बस रुपाली हे दिखी जिस से थोड़ा शालीनता से मुलाकात करने के बाद भी स्वाति अर्जुन को हे ढूंढ़ने लगी.

"अररि स्वाति, बचपना कब जाएगा तेरा? नहीं आया तेरा प्यारा भाई रेखा के साथ और आता भी कैसे? हाँ कल मिल लेना उस से वही अपनी बुआ के घर.", सुनंदा जी ने उसको अपनी बगल में बैठा कर जब अर्जुन के नहीं आने की बात कही थी तोह चेहरा हे उतर गया था बेचारी का.

"सवेरे तुम मेरे साथ हे चलना स्वाति और अर्जुन के साथ साथ ऋतू से भी मिल लेना. वैसे पूजा भाभी, समय और कंचन नहीं दिखाई दी.", रेखा जी ने अपनी बड़ी भाभी से सवाल किया तोह इतनी देर में पहली बार पूजा ने मुँह खोला. थोड़ा नाराज तोह वह भी थी यहाँ अर्जुन के न आने से लेकिन अब तोह हर रोज हे वो अर्जुन से मिलने वाली थी बेशक दिन में हे सही.

"वो दोनों हे सरोज दीदी के घर गयी हुई है दीदी. मैं फ़ोन करके सरोज दीदी को भी बता देती हु तुम्हारे आने के बारे में. सभी एक साथ हे डिनर कर लेंगे. ठीक है न माँ जी?", बड़ी नानी अंजना देवी जी ने भी सहमति दी तोह पूजा तुरंत अंदर फ़ोन मिलाने चली गयी.

"ये राजेश को बुलवाओ तोह जरा बड़ी माँ!", अब ममता भी अपनी ननद की बात सुन्न कर थोड़ा गंभीर दिखने लगी लेकिन सुनंदा जी को मुस्कुराते देख शांत हे रही. रेखा कभी भी ऐसे नहीं बुलाती थी अपने किसी भी भाई को लेकिन राजेश के साथ प्यार के साथ साथ बड़ी बहिन वाला पक्का रिश्ता था जिसमे daant-fatkaar तक शामिल रहती थी जो रेखा के चरित्र में ना के बराबर हे था.

"जा स्वाति, नोहरे से बुला कर ला तेरे पापा. वो तभी खिसक लिया था जब रेखा यहाँ मेरे पास आ कर बैठी थी.", स्वाति भी कुलांचे मारती हुई दौड़ गयी और ममता ने अपने सर पे हाथ रख लिया.

"पता नहीं दीदी ये लड़की कब बड़ी होगी? ऋतू और इसमें कुछ हे महीने का फरक है बस."

"हाँ जैसे ऋतू बड़ी हो गयी है ममता? ये मेरी रुपाली और कोमल बिटिया हे है जो समझदार है बाकी ऋतू तोह आज भी वैसी हे है जैसी ारु के होने पर थी."

"हाहाहा.. दीदी देखना कही आज भी वो ..

"बस बस..", झेंपते हुए खुद सुनंदा जी ने दोनों ननद भाभी को चुप करवाया और इधर दिलेर राजेश जब अंदर आ कर अपनी बहिन के पास खिसियाता हुआ मुस्कुरा कर बैठा तोह रेखा ने नजरे घुमा ली जैसे वो वह हो हे नहीं.

"ाचा सॉरी दीदी लेकिन आप तोह जानती हे हो न के मैं ऐसे बहिन की ससुराल नहीं आ सकता.", राजेश ने मनुहार करते हुए अपनी गलती भी स्वीकार कर ली थी लेकिन रेखा टास से मास्स न हुई.

"ाचा वो भूमि पूजन के टाइम के लिए भी माफ़ कर दो."

"तुम ये ससुराल वाला कानून बता कर बच नहीं सकते राजेश. मेरे 4 भाई है जिनमे से 2 हमेशा हे वह होते है लेकिन मजाल कभी फ़ोन भी कर ले, मिलना तोह दूर की बात है. अपने जीजा जी से हर रोज मिल सकते हो लेकिन क्या बहिन की फ़िक्र हे नहीं कोई? बताओ बड़ी माँ कितनी बहिन है इसकी? बिट्टू भैया से बचने से ले कर इसके कॉलेज तक मैं हे इसके काम करती रही हु क्योंकि ये छोटा है मुझसे और उतना हे प्यारा भी. लेकिन खुद माफ़ी मांग रहा है जबकि हफ्ते महीने में बस एक फ़ोन तोह कर सकता है न. ज़िंदा हु तब याद नहीं करता ये और कल को न रही फिर तोह ...", रेखा थोड़ी भावुक हो गयी थी क्योंकि राजेश से पिछले 3 साल में 1 हे बार मुलाकात हुई थी वो भी इधर आने पर. राजेश तुरंत जमीन पर बैठते हुए अपनी बड़ी बहिन के दोनों हाथ अपने चेहरे पर रख चूका था.

"न दीदी न.. तुम इस घर की सबसे बड़ी दौलत हो और तुम जितनी saaf-dil हो न मैं उतना हे बुरा. बहोत दिल करता है दीदी की तुमसे हर रोज मिलु, कोमल और ऋतू बिटिया को उसके mama-maa का बचपन बताओ और जिस काबिल तुमने बनाया वो भी उन्हें पता लगे. मेरे जीवन को बनानी वाली इस बड़ी बहिन का क़र्ज़ मैं किसी सूरत में नहीं उतार सकता. मैले हाथ है न दीदी बस इसलिए तुम्हारे घर एक भाई की तरह नहीं आ पता लेकिन यकीन करो रहता aas-pas हे हु.", राजेश का भी अलग हे प्यार था जिसका एक पक्ष था हर बड़ी वारदात में अपने जीजा शंकर से पहले दुश्मन का सामना करना. कैसे ये भाई बता सकता था की बहिन से न मिलने के बावजूद वो उसका प्रहरी हे था. अपने भाई को ऐसे व्यथित होते देख खुद रेखा को भी अब बुरा लग रहा था.

"मैं जानती हु तुझे लेकिन बस फ़ोन कर लिया कर कभी कभी. मैं तोह इस से हे खुश रहती हु की तू इनसे मिलता रहता है. वैसे तुझे अर्जुन के साथ भी थोड़ा समय बिताना चाहिए. जानती हु मेरे भाई पे बहोत जिम्मेदारियां है लेकिन यही वक़्त है राजेश सबसे मिलने जुलने का. कल बचे बड़े हो जायेंगे तोह न वो समय दे पाएंगे न हम मिल सकेंगे. वैसे मैंने तुझे बुलाया इसलिए भी था की स्वाति मेरे साथ हे जा रही है कल और ममता भाभी को भी अब वह आना होगा. तुम देख लेना कैसे करना है."

"दीदी तुम ने कह दिए न बस. और मैं ध्यान में रखूँगा आपकी बात को.", राजेश अभी भी वही निचे बैठा था की अपने जीजा और दलीप की आवाज बैठक से आती सुन्न कर उधर हे देखने लगा.

"जाओ उनके पास क्योंकि दिल तोह उनका भी नहीं लगता तुम्हारे बिना. हम सुबह निकलेंगे जैसा इन्होने कहा है तोह बाकी बात तभी करेंगे.", इन दोनों के बीच होती बातचीत के समय वह बैठा कोई भी व्यक्ति बीच में नहीं बोलै था. रुपाली सरक कर अपनी माँ के पास आ गयी मां के जाते हे.

"वाह माँ, मुझे तोह आपके बारे ज्यादा कुछ पता हे नहीं.", रुपाली के इतना बोलते हे अंजना जी से पहले घर में दाखिल होती सरोज मौसी ने रुपाली को जवाब दिया.

"इंग्लिश सुनियो कभी तू बीत्या तेरी माँ की. वो तोह वक़्त और था नहीं तोह यही क्लियर करती आईएएस के इम्तिहान. और तुझे अब टाइम मिला रेखा इधर आने का?", सरोज जी के साथ मंजू और मेनका भी आयी थी Somya-Kanchan के साथ साथ. सबसे ाचे से मिलने के बाद रुपाली तोह चिपक हे गयी थी सरोज मौसी से. उसको जान न जो था अपनी माँ के बारे में. दामाद घर आये थे इसलिए रसोई में भी चहल पहल लाजमी थी इसलिए बाकी बहुएं उधर हे बढ़ चली. मंजू इस वक़्त भी रेखा जी के समीप हे थी और समय ये देख मंद मंद मुस्कुरा देती मंजू की तरफ जिस पर वो नजरे झुका लेती. कुल मिला कर अब यहाँ भी ाचा समां बांध चूका था. बैठक में महफ़िल मदिरा की तोह भीतर आँगन में कहानी किस्सों की.

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"लगता है तबियत से मार्किट घूमी है तुमने मधु?", ये ललिता जी तोह चाल और मधु के चेहरे की ख़ुशी देख कर धड़ल्ले से टांग खींचने लगी

"ओह भाभी, कुछ तोह देख कर बोलै करो आप. बस मार्किट हे गयी थी मैं अर्जुन के साथ."

"हाँ ये मार्किट देख कर हे 3 बचे पैदा किये है मैंने और 2 का तोह ब्याह भी हो रहा मधु. वैसे कुछ ज्यादा हे जल्दी में नहीं थी तुम?", ललिता जी की बात सुन्न कर अब मधु ने भी शर्म त्याग कर अपनी बड़ी भाभी का हाथ पकड़ कर उन्हें उनके कमरे में हे खींच लिया.

"आग की बात करती हो भाभी? जबसे यहाँ से गयी हु न बस टप्प हे रही थी और दिल तोह था की कल रात हे यहाँ रुक जाती लेकिन यहाँ मुमकिन न था. अब कही लगा है मैं अपने मायके आयी हु. सच में अगर आज ये यहाँ होते तोह रात मैं दूसरे कमरे में सोती.", मधु का इशारा अपने पति से था और ललिता जी भी मस्ती करती उसके गाल खींचती हुई बोली.

"कर ले मस्ती जितनी करनी है लाडो, यही टाइम है इस आग के जिन्दा रहने का. न ऐसा मिलेगा और न उसके बाद किसी से ठंडी हो सकेगी. वैसे हैं कहा लल्ला?", ललिता जी की आँखों की शरारत जैसे मधु को भी भा रही थी.

"आते हे उसको माँ ने बहार भेज दिया. पिछले घर में फ्रिज और रसोई तैयार करवा रहे थे तोह वो सब देख कर आ जायेगा आपका लल्ला. आप तोह इधर हे रहती हो, खुराक देता रहता होगा."

"न न मधु, अभी कुछ दिनों से न मैं उस तरफ देखती हु न वो. तेरे भैया है इधर और कभी पी कर ऊपर आये तोह फिर जवाब देते न बनेगा, चाहे उम्र हो गयी लेकिन उसके निचे आने का मतलब किताब पूरी खुलना. चल ये सब जाने दे और रुचिता से मिल ले जरा. वो ऊपर गयी है अनामिका के साथ. बाकी लड़कियां तोह सब मार्किट से हे खा पी कर आएँगी. तेरे भाई साहब भी गए है उमेद के साथ साथ.", ललिता जी ने संदेसा दिया तोह मधु भी हाँ करती हुई उनके पास से उठ कर ऊपर वाली मानिल की तरफ बढ़ चली. इस बीच इन दोनों को हे ध्यान न रहा के इस तरफ कोई और भी था जिसके कानो ने ये सबकुछ सुन्न लिया था.

और पिछले घर में भी कुछ अलग हे हुआ था इस बीच जहा सभी कारीगरों और मजदूरों द्वारा किया काम देख उन्हें फारिग करके अर्जुन वापिस जाने के लिए गेट पर आया तोह वही ठिठक कर बस अपने सामने कड़ी अपनी इस दिलरुबा को देखता रह गया. ये शायद सपना हे लग रहा था उसको और अगर हक़ीक़त थी तोह अर्जुन अभी घर वापिस नहीं आने वाला था.
 
इश्क़ है भी तोह हांसिल नहीं

दर्द में क्यों मेरे मैं शामिल नहीं

टेरिइइइइ निगाह क्यों याद है?

मैं मुराद तू हांसिल नहीं...

इश्क़ है भी तोह हांसिल नहीं...

रुक कर वही देखु

देखु उस जगह को..

गूंजता है क्यों आसमान.. ?

क्यों मिलना मुनासिब नहीं..

इश्क़ है भी तोह हांसिल नहीं...

थी शिकायते, वो भी गैरो से कभी

मैं हु बैठा.. उम्मीद में वही..

अब क्यों नाराज हो

क्यों be-awaaj हो..

मिल लो रूह आफरीन...

इश्क़ हैं भी तोह हांसिल नहीं..

धूमिल हर राह है..

क्यों तुम शामिल नहीं..

मेरी गुस्ताखी की ऐसी सजा.. ☹️

सुनो.. आ जाओ न ..

वही बैठा हु आ जाओ न...

लापरवाह हे सही..

करता तेरी परवाह हु..

इन उजालो के अन्धकार में..

दिखेगा तुम्हे कभी न कभी..

इश्क़ हैंण्ण्न, जो रहेगा मेरे दिल में हे...

दर्द है बस तू हांसिल नहीं..

दर्द है बस मैं अब खुद वो नहीं..

इश्क़ है भी तोह हांसिल नहीं. ...!!!

💚
 
अपडेट 166

Ehsaas-Ae-Mohabbatt (2)


"यार दलीप, राजस्थान में इतना सबकुछ हो रहा है और ये सब पता भी नहीं चल रहा.?", अंदर की महफ़िल में जहा सोहनलाल जी के साथ कुन्दनलाल जी और अशोक जी बैठे थे और तेजपाल जी मदिरा की जगह बस बातों में साथ दे रहे थे वही शंकर, दलीप और राजेश वही नोहरे में बोतल खोल कर ये गहरी चर्चा में विलीन थे. मुद्दा था उस लापता लड़की का और दलीप की खोजबीन.

"सबकुछ वैसा नहीं है शंकर जैसा हमको पता चलता है या कभी कभी कोई केस थोड़ा खुल कर नजर आ जाता है. निवेदिता बड़े घर की बेटी थी इसलिए ऐसी जांच बिठाई गयी. लेकिन पाली और बारमेर के बीच हालात इतने बुरे है की अगर किसी को भनक भी लगती है न कारवाही या किसी अफसर की तोह समझो सब गायब. अभी हाल हे में 6 युवतियां अपहरण, बलात्कार का शिकार हुई जिनमे से 4 की लाश थकाने पंहुचा दी गयी. एक किसी तरह बच तोह गयी लेकिन उसके घरवालों ने हे उसका जीवन ख़तम कर दिया. अब खुद हे सोचो की gaanv-dehat के साथ साथ कुछ बड़े शहर भी है उधर लेकिन गुनाह करने वाले हवा की तरह अदृश्य.", दलीप ने एक कागज कुर्ते की बायीं जेब से निकालने के बाद खोल कर शंकर की तरफ बढ़ाया तोह राजेश ने भी टोर्च की रौशनी दिखते हुए वह लिखित रिपोर्ट और छोटी छोटी तसवीरो पर नजर डाली.

"तोह क्या दलीप भाई वह कोई इनफार्मेशन हाथ नहीं लगी?", राजेश के सवाल पर शंकर ने थोड़ी हैरानी से उसको देखा.

"इसने कहा न के 6 लड़कियां थी तोह एक इसके हाथ लगी हुई है. लेकिन दलीप ये सब तोह देहात की लड़कियां है जिनकी उम्र 15 से 17 बरस बताई गयी है. निवेदिता 22 वर्ष की आधुनिक लड़की थी. मामला दोतरफा क्यों लग रहा है.?", शंकर ऐसे हालात में कितना संजीदा हो सकता ये इन दोनों का ाचे से पता था.

"सही कह रहे हो तुम शंकर की मामला do-tarfa लगता है लेकिन गहराई में जाओ तोह आपस में जुड़ा है. पाली से आगे पथरो की खान है और वह इस उम्र की कई लड़कियां काम करती है या उनके परिवार वाले. बारमेर में सीमेंट और चूना पत्थर का बड़ा कारोबार है और ये दोनों जानते हो किसके है?", दलीप के सवाल पर बाकी दोनों ने ना में गर्दन हिला दी.

"कुमार सारंग के. लेकिन वो नाड़े के कच्चा व्यक्ति नहीं है, जरा भी नहीं. हाँ उसका रौब भी है और ये सभी परिवार चुप भी है क्योंकि उन्हें कीमत मिली है जुबान बंद रखने की."

"एक बार कहा था पापा ने की सारंग जैसा भी व्यक्ति हो लेकिन वो गिरी हुई हरकत या औरत से अभद्रता नहीं करता लेकिन वो इन्हे चुप क्यों करवा रहा है? और क्या सचमुच उसका इतना प्रभाव है उस तरफ?", शंकर की बात सुन्न कर राजेश भी सर खुजाने लगा था.

"प्रभाव की बात करते हो तुम सारंग के? चाचा (पंडित जी) का तोह नेटवर्क तुमने देखा हे होगा जो हर बड़े व्यक्ति के साथ साथ निचले दर्जे तक को शामिल रखते है. सारंग उस से भी 2 कदम आगे है शंकर. वह की सियासत तोह क्या लोकल रंगरूट और हर छोटा बड़ा बाहुबली तक उसके निचे है. 6 पोलिसवाले मार दिए थे भाई जो पहले निवेदिता केस में दिल्ली से गए थे उधर. दिखाया जीप का रोड एक्सीडेंट और ड्राइवर पेश भी हो गया. लेकिन मुद्दे की बात सुनो तुम.", दलीप अब जैसे कोई बड़े राज से पर्दा उठाने वाला था.

"ये सभी बलात्कार और कटला कुमार इंद्रनील ने किये है, सारंग के बड़े बेटे ने. और निवेदिता की रिपोर्ट में उसके साथ एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा दुष्कर्म बताया गया था लेकिन वो इस तरफ से उधर गयी या ले जाई गयी थी. जानते हो उसको वह आखिरी बार ज़िंदा किसके साथ देखा गया था?", दलीप थोड़ा थोड़ा खुलासा करने के साथ हे सवाल भी दाग रहा था. शंकर ने नाराजगी में अलग से नेट पेग लगते हुए ना में गर्दन हिलाई तोह दलीप ने दोनों हाथ जोड़ दिए.

"शांत भाई शांत. ये काफी बड़ा नाम था इसलिए मैंने ड्रामा किया. निवेदिता को उधर लेकर जाने वाला व्यक्ति था विमल कपूर जिसको तुमने ख़तम कर दिया. तुम्हे शायद पता भी नहीं होगा की वो इंसान क्या हस्ती था. पते की बात ये है की इंद्रनील है एक साइको या पागल जैसा हे समझो और वो रपे करने के बाद लड़की को मार देता है. निवेदिता के साथ कपूर, पुष्पक ने 2 दिन तक रपे किया था और जब वो इंद्रनील के हाथ लगी तोह वो अक्षत कुंवारी नहीं थी इसलिए अप्राकृतिक दुष्कर्म करने के बाद उसने निवेदिता के शरीर को cheer-faad दिया."

"ये तोह सचमुच कोई जानवर आदमी है दलीप भाई.", राजेश के चेहरे पर घृणा के भाव उभर आये थे.

"हाँ यार साला इसका तोह इलाज जरुरी है नहीं तोह जाने कितनी ज़िंदगियाँ बर्बाद करेगा ये पागल?"

"Shankar-Rajesh, किस्सों के हिसाब से वो ज्यादा नहीं तोह 70-75 लड़कियां रेगिस्तान में दफना चूका है और जो सहमति से अपना कौमार्य उसको सौंप देती है इंद्रनील उसको फिर कभी परेशां नहीं करता. Haal-filhaal में हे उसकी शादी भी हुई थी जनुअरी महीने में उत्तरांचल के पुराने shahi-raajneetik परिवार की एकमात्र लड़की के साथ. सुना है की इंद्रनील की दुखती रागग वही युवती है और उसकी हर बात को वो अपने सर आँखों पर रखता है.", दलीप बात आगे बढ़ा रहा था लेकिन शंकर बड़े गौर से उन लड़कियों को देखने लगा जो इस दुनिया में नहीं रही थी.

"वो छाती लड़की कहा है दलीप?", शंकर ने मुद्दे की हे बात कही.

"सुरक्षित है और उसको मैंने सही हालात में रखा हुआ है शंकर. उसने हे मुझे बताया था की कुंवर सा ने उसका बलकार किया और बुरी तरह जख्मी कर दिया. वो लड़की किस्मत से हे मेरे हाथ लगी थी शंकर और सांसें कभी भी रुक सकती थी लेकिन शायद अभी ज़िन्दगी लिखी थी उसकी."

"इस इंद्रनील को ठिकाने लगाना जरुरी है दलीप."

"भूल कर भी ये करने की मैट सोचना शंकर. उसके करीब जाने से पहले हे हम तुम जमीन में दफ़न होंगे. और जरुरी बात ये है की वो इस देश से 3 दिन पहले हे जा चूका है अपने बाप की वजह से. अब उस से बड़ा शैतान और सारंग का भाई राज्यवर्धन आ गया है. वो भी शोषण करता है लड़कियों का लेकिन मरता सिर्फ पुरुषो को है वो भी डर बैठने के लिए.", दलीप ने कंधे ढलकाये तोह राजेश को बहोत बुरा लगा.

"दलीप भाई, मैं काटूंगा इन सबकी लुल्ली. देख लेना आप चाहे वो राजा हो या महाराजा."

"सच दलीप, क्या तुम ये बात मुझसे कह रहे हो की मैं उनका कुछ नहीं बगाड़ सकता?", शंकर की सूई अटक गयी थी इस बात पर.

"तुम, मैं, उमेद, राजेश, इन्दर और जो भी लोग तुम जानते हो उन्हें इकठ्ठा करो और सब एकसाथ मरते है वह जा कर. तुम पे मुझे खुद से ज्यादा ऐतबार है शंकर और जब तुम तुम नहीं रहते तोह फिर सामने कितने है वो भी मायने नहीं रखता लेकिन खुद हे सोचो जब प्रशाशन से लेकर आम व्यक्ति तक उनके साथ हो और मैनेजर तक के पर 20 सुरक्षाकर्मी हो तोह सारंग के लाडले बेटे की सुरक्षा कैसी होगी? और ये भी बताता चालू की पुष्पक हर लिहाज से तुम्हारी टक्कर का है, सारंग का दूसरा बीटा और उसके कारोबार को बढ़ने वाला. इंद्रनील और पुष्पक की बहस न होती निवेदिता को ले कर तोह मुझे भी इस मामले का पता न चलता. इनफार्मेशन लेके आया हु मैं इन सबकी, कल देख लेना खाली समय में.", शंकर ने माथे पर हाथ रख लिया था क्योंकि उसको पता था दलीप कभी भी गलत बात नहीं कहेगा.

"एक बार रघुवीर चाचा जी और पापा बात कर रहे थे तब सुना था के सारंग बहुत ज़िद्दी और ताक़तवर व्यक्ति है. वो हमेशा पापा के पास चाचा वाली जगह लेना चाहता था लेकिन उनके जितना सक्षम न बन्न सका और उलट चाचा का दोस्त बन्न ने के उसने बैर कर लिया उनके साथ. ये इंद्रनील नाम सारंग के बेटे को कृष्ण दादा ने दिया था, अपने इन्दर की तरह लगने के लिए. साला कही से भी इन्दर जैसा नहीं है और उल्टा पुष्पक जान पड़ता है के थोड़ा सही व्यक्ति है."

"हाँ वो इंसान समझदार है लेकिन कपूर के साथ ने उसको चरस और naari-deh का नशेड़ी जरूर बना दिया है. लेकिन हमेशा होश में रहता है, ये ख़ास बात है. ऐसे व्यक्ति का सामने या तोह हमारी जमीन पर हो सकता है या फिर जो किसी की भी न हो. निवेदिता केस की रिपोर्ट मैंने जब सरदार जी को दी तोह आगे से उसको बंद करवा दिया गया है. मतलब, जहा थे वही रहे और अगर राजेश वह जाता तोह पक्का था की इतना जंगलराज देख ये कुछ न कुछ ऐसा वैसा जरूर करता."

"इसलिए इसको यही रखा गया नहीं तोह साले साहब पता नहीं कितनो का सर काट कर लाश होने की एक्टिँगे करके उनके बीच पड़े रहते. हाहाहा.."

"जीजा तुम कभी ऐसा क्यों नहीं कहते की मैं मर्डर जाता?", राजेश थोड़ा संजीदा हो गया था ये सुन्न कर.

"तुम्हे मैंने कबि अपने छोटे भाई से अलग नहीं समझा राजेश और अगर कबि हम दोनों पागलपन में कुछ ऐसा वैसा कर भी गए तोह तुम्हारी तरफ आने वाली मौत को मैं अपने ऊपर झेल लूंगा. अपनी भी मोहब्बत है यार कुछ?"

"हाहाहा.. ये सही बात कही तुमने शंकर. तुम्हारा ये साला भी न कुछ ऐसा हे जैसे तुम हो. ये कभी तुमसे मुक़ाबला नहीं करता लेकिन पहल जरूर कर देता है जिस से तुम्हारे तक विरोधी काम हे पहुंच पाए. कभी सिर्फ तुम दोनों हे एक साथ किसी चक्रव्यूह में घिर गए तोह दुश्मन की खैर नहीं. प्लानिंग के बिना बस तुम तोह खून बहते रहोगे.", दलीप भी लंगोटिया हे था इनका और ाचे से मालूम था की जीजा साले की आपसी मोहब्बत्त अलग हे मिसाल थी जिसमे शंकर जितनी राजेश की परवाह करता था उतना हे आदर और सुरक्षा राजेश देता था.

"चल यार रोटी खाते है दलीप, दारु ज्यादा नहीं पीनी इधर. राजेश ने तोह ड्यूटी भी जाना है कल, नए केस पर.", इसके साथ हे तीनो व्यक्ति आखिरी सिग्गट के काश लगते हुए घर की तरफ चल दिए. आज ढेर साड़ी जानकारी हाथ लगी थी लेकिन इस रस्ते पर शंकर को न चलने की सही हिदायत दी थी दलीप ने.

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"चाचा जी आप न ऐसे खड़े नहीं रहोगे. चलो उधर हमारे साथ और जब मार्किट में आये हो तोह सबके साथ रहना हे पड़ेगा.", इतनी साड़ी आफत के साथ भला उमेद कहा बच सकता था और जहा Ritu-Vinni ने राजकुमार जी को भी गोगाप्पै टिक्की के ठेले पर अपने साथ लगा लिया था वही अलका और आरती ने उमेद को भी लपक लिया.

"बीटा, मैं ये सब नहीं खता और जरा देखो तोह सही इस रेहड़ी वाले की हालत. पहले हे फंसा हुआ है तोह हमारी कहा सेवा कर सकेगा."

"ाचा तोह आपका कहने का मतलब है अगर आप गोलगप्पे खाने लगे तोह ये थक जायेगा?", आरती का दिमाग जहा चल रहा था वो देख नजदीक कड़ी गुरदीप भी हंसने लगी. उमेद लगभग फंस हे चूका था अपनी भतीजी की चाल में.

"चलो मैं दिखता हु तुम्हे की मैं गोलगप्पे क्यों नहीं खता.", और अब बाकी सभी एक तरफ हो गए अपनी अपनी bhalle-paapdi और टिक्की की प्लेट ले कर. राजकुमार जी भी खाने के साथ साथ मुस्कुरा रहे थे.

"आरती बीटा ये उमेद अगर खाने पर आया तोह 40-50 से पहले नहीं रुकेगा."

"ताऊ जी, आरती का तोह इतना सिर्फ स्टार्टर हे है समझ लो.", यहाँ ये पंप दिया था प्रियंका ने जो अपनी बहिन को ाचे से जानती थी.

"तोह जो हरा वो दूसरे का कोई भी एक मनचाहा काम करेगा.", ऋतू ने जाने क्यों ये शर्त जोड़ दी और उमेद जी ठहरे भोले हाथी जो मान भी गए.

"मंजूर है. चल भाई तू दे जरा 2 प्लेट इधर और समझ ले तू शोले की बसंती है और मैं गब्बर. बस तेरे हाथ नहीं रुकने चाहिए.", यहाँ कुछ लोग और भी आये थे खाने के लिए लेकिन अब वो भी इस खेल को देखने लगे थे. रेहड़ी वाला भी हसमुख व्यक्ति था और तुरंत हे हो गया शुरू गोलगप्पे खाने का मुक़ाबला.

"भैया थोड़ा तीखा रखना.. इस्सस..", आरती की रफ़्तार से अफसाना और जसलीन भी हैरत में थी, खामोशी से हे. और उमेद भी जैसे गोलगप्पो का शौक़ीन रहा होगा अपने समय पर जो gapa-gap हर पुचके को निगलने लगा.

"हाँ.. भाई.. करो थोड़ा चटपटा और ज्यादा छोटे मत दो.", यहाँ रेहड़ी वाले के हाथ सचमुच बसंती के पाँव बन चुके थे. रुकने का कोई नाम हे नहीं. एक कटोरी में गोलगप्पा रखा नहीं की दूसरी में भी और उतनी हे तेजी से ये दोनों लोग हड़प भी रहे थे.

"मेरा वोट उमेद अंकल की तरफ.", प्रीती ने खेल को आगे बढ़ा दिया वोट दे कर.

"मेरा आरती पे. और आरती तुम लगी रहो चाहे मुश्किल हो जाए, मैं दवा दे दूंगी.", ऋतू ने अपनी खाली प्लेट एक तरफ रखते हुए आवाज दी तोह बचो के साथ राजकुमार जी भी मैदान में उतर गए.

"मेरा वोट भी उमेद की तरफ.", उनके साथ साथ कीर्ति, विन्नी और जसलीन भी उमेद जी की और हो गए लेकिन कोमल ने जब आरती कहा तोह तारा, अलका के साथ गुरदीप भी आरती के पक्ष में चिल्लाई. अब तोह रेहड़ी वाला भी हैरान हो रहा था क्योंकि आरती सचमुच उमेद जी से आधी थी लेकिन खाने में तेज.

"भाई थोड़ा आराम से खिलाओ अब. ऐसा नहीं है के मैं थक गया हु बस आराम से खिलाओ.", अब तक शायद 30-30 गोलगप्पे दोनों हजम कर चुके थे और उमेद जी को लगने लगा था की स्पीड काम करनी जरुरी है.

"हाँ आराम से खिलाओ भैया जी, मुझे भी कोई जल्दी नहीं है. बीच बीच में एक दो पपड़ी भी देते रहना.", अब आरती मजे ले रही थी अपने चाचा के शायद जीत सुनिश्चित मान कर.

"उमेद अंकल आप बस लगे रहो.", प्रीती की मीठी आवाज सुन्न कर एक बार उमेद जी ने इस प्यारी गुड़िया को देखा और सर हिला कर हां का इशारा दिया. अफसाना बड़े ध्यान से मुकाबला देख रही थी और गुजरते समय के साथ साथ उमेद ने dahi-vada भी बीच में शामिल कर लिया. रेहड़ी के ird-gird पूरा झुरमुट लग चूका था.

"कितने हो गए भाई?", राजकुमार जी ने जैसे हे टोका रेहड़ी वाले ने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

"अंकल गिनती भुलवाओगे क्या? 83 और ये 84.", दोनों प्लेट में एक एक डालते हुए वो भी जैसे इस मुकाबले का मजा ले रहा था. आरती के मुँह में जैसे अब और खाने की हिम्मत न रही और पुचके का पानी कटोरी में हे रहने लगा तोह उमेद जी ने ना में ऊँगली दिखाई.

"आह.. बस चाचा जी अब और नहीं.", आरती ने कुल 90 होते हे कटोरी रख कर हाथ खड़े कर दिए. उसकी हालत से लग रहा था के जैसे आज के बाद वो कभी गोलगप्पे नहीं खायेगी.

"ये... विनर है चाचा जी.", प्रीती ने ऋतू की तरफ आँख मारी तोह वो भी हंसने लगी.

"अंकल जी, बस करू क्या?", रेहड़ी वाला लाचारी से पूछने लगा था.

"100 तोह पूरे कर भाई. 5 मेरी बेटी के नाम के और 5 मेरे.", उमेद जी की तरफ अब बाकी सभी हैरानी से देख रहे थे और इस बीच राजकुमार जी ने किस्सा सुनाया.

"आरती बीटा, तुमने ाची टक्कर दी लेकिन जिसने भी तुम्हे उमेद से मुकाबले के लिए कहा था न उसको शायद ये नहीं पता की हमारे गज्जू जी गोलगप्पे और दही भल्ले सिर्फ इसलिए नहीं खाते क्योंकि फिर ये जनाब रुक नहीं पाते. कॉलेज में धर्मपाल के दोस्त ने शर्त लगाईं थी इसके साथ की कौन ज्यादा गोलगप्पे खायेगा. वो बेचारा रेहड़ी वाले के पास अपनी साइकिल गिरवी रख के गया था उसके बाद.", इस किस्से को सुन्न कर आरती अब थोड़ी नाराजगी से विन्नी दीदी को देख रही थी जो कान पकड़ के ख़ामोशी से सॉरी कहती नजर आयी.

"पता होता तोह मैं पन्गा लेती हे नहीं ताऊ जी. लेकिन चाचा जी आप सचमुच इतने गोलगप्पे कैसे खा लेते हो.?", रेहड़ी वाले को जब उमेद जी पैसे देने लगे तोह उनका हाथ रोक कर राजकुमार जी ने पेमेंट की. एक व्यक्ति जो अपनी बीवी के साथ ये सब देख रहा था वो तोह उमेद से हाथ भी मिला कर गया.

"बीटा इसमें है हे क्या? बारीक सी पापड़ी और बाकी मजेदार पानी. इसलिए तोह थोड़े भल्ले भी खाये जिस से पेट में कुछ तोह जाए.", उमेद जी की हंसी देख बाकी सब भी ठहाका लगा दिए और आरती हार कर भी खुश थी.

"आपने भी कुछ कमाल नहीं दिखाया आरती. मान गए की आप पेटू तोह है चाहे लगती नहीं.", अफसाना ने धीमी आवाज में ये सरगोशी की थी आरती के कान में.

"हाँ अफसाना, ये तोह सच कहा तुमने. वैसे पिंकी को साथ देना चाहिए था आरती का.", जसलीन ने प्रियंका का जीकर किया तोह वो पहले हे हाथ खड़े करने लगी.

"न बाबा.. देखा नहीं चाचा जी को? अभी भी शायद चाचा जी 10 और खा ले.", प्रियंका की बात पर बाकी सभी हंस दिए और अब घर जाने का वक़्त हो चला था इतनी मस्ती मजे के बाद.

"20 बीटा जी 20 तोह खा हे लूंगा मैं.", एक गाडी उमेद जी ने खोली तोह दूसरी वाली राजकुमार जी ने. तारा भी अर्जुन की कार लिए थी जिसमे अलका, ऋतू, अफसाना और प्रीती बैठ गयी. रात के 9 बज चुके थे इसलिए अब सीधा घर हे जाना हे था सबने. और उधर पुराने घर में घंटा भर पहले बहोत कुछ घटित हो चूका था.

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कोई हे दिन शायद ऐसा गुजरा हो जब अर्जुन को इसकी याद न आयी हो और जब भी कभी फुर्सत मिलती थी तोह सबसे पहला काम होता था कंप्यूटर से इसको सन्देश देना. इतनी दूरियां होने पर भी हमेशा एक दूसरे के करीब हे रहे थे लेकिन ऐसी उम्मीद अर्जुन को सपने में भी न थी की 6 महीने बाद होने वाली मुलाकात इतनी जल्दी होगी और वो भी ऐसे हे.

"ऐसे हे खड़े रहना है क्या?", अन्नू की आँखों में आंसू और चेहरे पर जमाने भर की चमक देख अर्जुन खो सा गया था की कही ये ख्वाब तोह नहीं. उसकी आवाज सुनते हे जान गया की ये हकीकत है. न aas-pados की फ़िक्र और न लेना देना था अब अर्जुन को. एक कदम दोनों हे आगे आये और अर्जुन ने अपने चौड़े सीने में इस मांसल नरम सरदारनी को जोरो से कस लिया. दिल में जो ठंडक पड़ी थी इसका अंदाजा तोह बढ़ी हुई धड़कनो के कुछ शांत होने से लगाया जा सकता था. अन्नू ने भी अपने इजहार और prem-pradarshan में कोई कौताही न दिखाई. उतने हे प्रेम से वो अर्जुन की बाहों में समाई जितना इन दोनों में था.

"ओह अन्नू, तुम सचमुच आ गयी? बस मेरे ऐसा कहने भर से की मैं तुम्हे सामने देखना चाहता हु?", जबसे अन्नू इंग्लैंड गयी थी इन दोनों के बीच कभी ऐसा वार्तालाप न हुआ था जिसमे दुःख, कमी या याद आने का जीकर हुआ हो सिवाए 5 दिन पहले के.

"तुम अगर ये बात मेरे जाते हे कह देते तोह मैं अगले दिन लौट आती अर्जुन. ी लव यू सोऊ मच एंड बदली मिस्ड यू.", बोलने के साथ हे इस लम्बी लचीली सरदारनी ने अपने सुर्ख होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए. इस हलके से चुम्बन में तपिश थी उसको अर्जुन बखूबी महसूस कर सकता था.

"मिस्ड यू तू एंड ी लव यू अन्नू, ी लव यू ा लोट. बस हम गलत जगह खड़े है.", अर्जुन ने चेहरा हाथ में लेते हुए माथे को चूमा और दोनों ने खुद को थोड़ा सही किया. अन्नू लगातार अर्जुन को निहारे जा रही थी जैसे बरसो बाद देख रही हो.

"वैसे दिन में तोह आंटी से बात हुई थी मेरी और तुम्हारा तोह कोई जीकर न किया उन्होंने. मैं यहाँ हु ये कैसे पता चला?"

"10 मिनट पहले तोह आयी हु दिल्ली से पापा के साथ. और आते हे उन्होंने तुम्हारे घर फ़ोन किया था काम से लेकिन मैंने उनसे फ़ोन ले कर दादी जी से पुछा तोह उन्होंने बताया की तुम इधर आये हुए हो. वैसे घर नहीं दिखाओगे मुझे?", अन्नू कहने के साथ साथ बड़े गेट से अंदर दाखिल हुई तोह अर्जुन भी मदद गया. इस बार अन्नू ने गेट की सांकल लगाने के साथ हे अर्जुन का जकड लिया था.

"बच्चू, इस एक हफ्ते में अब हर रोज तुम मुझे प्यार करोगे और ये शुरू होता है अबसे.. उम्म्म्म", घुटने से कुछ लम्बी फ्रॉक जैसी पोशाक में क़ैद वो जन्नत सा जिस्म अर्जुन पर हावी हो रहा था. बिना आस्तीन के परिधान से नुमाया होती उसकी खूबसूरत बाहों का स्पर्श अध्भुत सुख से भरा था.

"आज आराम कर लो थोड़ा और जब अभी हे पहुंची हो तोह हमको थोड़ा सा कण्ट्रोल तोह करना हे है. चलो, मैं भी तुम्हारे घर हे चलता हु.", अर्जुन ने कमर को पकड़ने के बाद एक गहरा चुम्बन जड़ते हुए प्यार जताया. अन्नू खुश थी और अर्जुन की बात मान कर अलग भी हुई. दोनों एक बार फिर घर से बहार निकले लेकिन अब हाथ थामने की जगह हलकी फुलकी बातें करते हुए एक दूसरे पर नजर करते वालिए जी के घर की तरफ बढ़ चले.

"ज्यादा याद नहीं आयी मेरी शायद?", अर्जुन ने ये तंज किया था मस्ती से.

"हाँ, जब सोई रहती थी तभी तुम्हारे सपने आते थे बाकी तोह कॉलेज से उतना वक़्त नहीं मिला. वैसे तुमने ऐसा क्यों कहा?", आदतन अन्नू अभी भी उतना दिमाग नहीं चलती थी.

"खूबसूरत ज्यादा हो गयी हो न इसलिए कहा की मेरी याद नहीं आती होगी. चलो सपनो में सही, जान कर ाचा लगा."

"घर चलो फिर कुछ दिखती हु और ये खूबसूरती इसलिए दिख रही है क्यों की मैं अभी तुम्हारे साथ हु.", इधर से गुजरते हुए एक नजर अर्जुन ने आकांक्षा के घर को देखा जहा ख़ामोशी हे थी और कार भी नदारद. शायद तनेजा परिवार मार्किट या काम से बहार होगा. इस सड़क पर हे तोह अन्नू और अर्जुन के सही से मुलाकात हुई थी जब वो आकांक्षा के घर से निकला था.

"याद है हम यही मिले थे और तुम तब मेरी टीचर थी."

"और मैं चाहती थी की उस दिन तुम मेरे साथ कुछ और देर रहते और ये चाहत फिर इतनी बढ़ी की अब दीवानगी बन्न चुकी है. वैसे मम्मी से तोह तुम हर रोज हे मिलते रहे हो, थैंक यू.", घर का गेट अर्जुन को खोलते देख अन्नू की मुस्कान गहरी हो गयी. बड़े अधिकार से वो अंदर जाने के बाद आंटी जी से गले लग कर मिला था और वालिए जी ने भी अर्जुन को वैसे हे प्यार दिया.

"इंग्लैंड से मैं आयी हु लेकिन प्यार आप दोनों इसको जाता रहे है जो इधर हे रहता है.", अन्नू ने भोला सा चेहरा बनाते हुए नाराजगी जताई थी और आंटी जी ने उसके सर पर थपकी देने के बाद उसको भी अपनी बगल में लगा लिया.

"ये मेरा ाचा बीटा है और बिना कहे हे हालचाल लेने के साथ काम भी करके जाता है. सच कहु तोह तुम दोनों की यही शरारते पसंद थी मुझे और अर्जुन नहीं आता तोह .."

"ओहो आंटी जी, छोडो ये सब बातें अब. और अंकल जी अभी तक तैयार बैठे है?", अर्जुन ने उन्हें शांत करवाने के साथ वालिए जी की तरफ प्रश्न किया.

"ओह यार अर्जुन, मैं जरा जरुरी काम से घंटे भर के लिए बहार जा रहा हु. वैसे तोह दफ्तर का काम घर आने के बाद मैं कभी नहीं करता लेकिन ये थोड़ा अर्जेंट है. भगवान आप जरा बचो के लिए doodh-shoodh बना दो फिर आ कर डिनर साथ हे करेंगे. अर्जुन, तुम डिनर के बाद हे जाओगे और कोई बहाना नहीं.", ये आदेश था प्यार से भरा और अर्जुन ने उम्मीद से आंटी जी की तरफ देखा.

"कर देती हो मैं फ़ोन तुम्हारे घर और अन्नू, कपडे बदल लो तुम भी इतने फिर दूध पीना.", फ़ोन का हैंडल उठा कर आंटी जी 5 नंबर दबाने के बाद दूसरी तरफ का फ़ोन उठने की प्रतीक्षा करती रही. वालिए जी भी निकल चले और अन्नू अपने कमरे में.

"सात श्री अकाल बीजी. मैं कहना सी के अर्जुन रात डा खाना इत्थे हे करेगा. अन्नू आयी है न इस करके उसके पापा ने अर्जुन ने सदया है.", बड़ी शालीनता से उन्होंने अपनी बात कही थी और दूसरी तरफ से भी कौशल्या जी ने उतने हे प्यार से मंजूरी दी थी, हिदायत के साथ की अर्जुन 10 बजे तक घर लौट आये.

"ले हो गयी तेरी प्रॉब्लम दूर?", आंटी जी ने अर्जुन को आँखें उचका कर बताया तोह वो लड़की सा शर्माने लगा था. इतनी हे देर में हमेशा की तरह इनकी पड़ोस वाली भाभी जी प्रकट हुई.

"नमस्ते आंटी जी.", अर्जुन ने झट्ट हाथ जोड़ दिए.

"हाँ नमस्ते बीटा. सिम्मी वो भाई साहब इस वक़्त बहार गए है?", ये आंटी जी भी कमाल हे थी जो पहले बैठी और फिर सवाल किया. मतलब वो चाय पी कर हे जाएंगी.

"जी भरजाई जी ेहना न कुछ कम् स ऑफिस डा. तुस्सी बैठो मैं चा रख के ौंडी आ. अर्जुन पुत्तर तू अंदर वाले कमरे विच आराम तोह बह. बीजी (कौशल्या) ने दास्य सी की तू सारा दिन तोह कम् विच लगेया है.", आंटी जी ने अर्जुन को भी पकने से बचते हुए अंदर भेजा जहा अन्नू गयी थी. अब वो कमरा तोह अन्नू का हे था.

"सॉरी.", दरवाजा खोलते हे अंदर अन्नू सिर्फ एक ढीले पाजामे में नजर आयी जहा सीने पर सिर्फ एक ब्रा ने आधे कबूतर जकड़े हुए थे. उस दूधिया जिस्म को देख अर्जुन ने फिर से दरवाजा लगा दिया. अन्नू के चेहरे पर मुस्कान और शर्म थी इस पल.

"आ जाओ अंदर और सॉरी मैं भूल गयी थी की आजकल ये कमरा तुम्हारा ज्यादा है.", एक ढीली और लम्बी सफ़ेद टीशर्ट पहन कर अन्नू तुरंत दरवाजा खोल अर्जुन को अंदर ले आयी.

"सॉरी दोनों हे बोल रहे है? याद है न हमने सॉरी नहीं कहना था.", अर्जुन तकिया उठा कर धम्म से बिस्टेर पर जा बैठा और पड़ोस वाली आंटी की आवाज सुन्न कर अन्नू ने शरारत से चेहरा गोल किया.

"मौका मिलता नहीं तोह भी ऊपर वाला बना देता है.", झट्ट से वो उसकी गॉड में आ बैठी और नाक से नाक लड़ा कर वही हरकत करने लगी जो अक्सर इस कमरे में इन दोनों के बीच चलती थी. बहोत अलग और अनूठा था इन दोनों का प्रेम सम्बन्ध भी.

"वैसे तुम ज्यादा स्ट्रेस लेने लगी हो न? चस्मा नया लेके आते है कल क्योंकि निशाँ दिखने लगे है आँखों पर." इतने करीब होने पर अर्जुन ने जो बात गौर से देखि थी उसको सुन्न कर अन्नू स्नेहवश उसके गले से लग गयी. ये भी इनके बीच एक सच था, एक दूसरे की परवाह चाहे बात छोटी सी हे क्यों न हो.

"पता है वह मुझे बिलकुल ाचा नहीं लगता. शुरू में भैया के पास 3-4 दिन रही थी लेकिन फिर हॉस्टल हे चली गयी. तुम्हे आदत दाल दी थी न हर बात और जरुरत का ध्यान रखने की. यहाँ पापा और मुम्मा भी इतने लाड से रखते थे तोह वह मुझे बिलकुल ाचा नहीं लगा.", अन्नू वैसे हे सुकून से अर्जुन के गले में बाहें डेल बस उसको देखती rahi.Ehsaas-Ae-Mohabbatt (1)
 
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चरित्र महत्व (1)

पंडित जी के घर अभी सभी बचे मार्किट से वापिस आये हे थे और ठीक उनके पीछे नरिंदर जी और संजीव भी. दोनों चाचा भतीजा खुश थे और शायद उन्होंने जो भी किया था वो सीमा से कही काम हे किया था. चेहरे पर कही से भी मदिरा का असर नहीं था. पूर्णिमा जी ने बहार आँगन में हे उमेद से कुछ बात की तोह उमेद एक बार अपनी चची कौशल्या जी और फिर सांगवान परिवार से मिलने के बाद वापिस बीवी और माँ को लिए हवेली निकल चला.

"देख लो दीदी, मेरे ये तोह थे हे लापरवाह और आज तोह इन्होने अपने साथ साथ जेठ जी (रामेश्वर) को भी शामिल कर लिया.", यशोदा सांगवान जी भी अभी जाने हे लगी थी परम के साथ ले कर. रुचिता और ांनी भी कार में बैठ चुकी थी लेकिन ये दोनों महिलाये अभी कुछ चर्चा में व्यस्त थी.

"कभी कभी ऐसा होना जरुरी भी है यशोदा. जानती हो हमे लगता है की ये सब umar-daraaj को शोभा नहीं देता लेकिन हम भूल जाते है की दोस्त उम्र होने पर कही ज्यादा परवाह करते है लेकिन उन्हें परिवार की वजह से समय हे नहीं मिल पता. कल बचो की भी लेके आना है तुम्हे क्योंकि बचो के मां ने भात लेके आना है. तुम देवरानी हो मेरी तोह रस्मे भी करनी होंगी देवर जी के साथ.", कौशल्या जी का यही आचरण था की चाहे कोई बड़ा हो या ताक़तवर, सभी उनसे स्नेह रखते थे िज्जात्त के साथ साथ. दोनों गले लग कर मिली थी और उसके बाद मरीना भी कौशल्या जी का गाल चूम कर हाथ हिलती हुई अपने पिता की बगल वाली सीट पर जा बैठी.

'भगवन नारायण सभी को खुश रखे.', अभी वो वापिस जाने के लिए मुड़ी हे थी की कुछ सोच कर बहार की तरफ चल di.Is समय दादी को अकेले बहार जाते देख ऋतू भी गीला चेहरा दुपट्टे से साफ़ करती उनकी तरफ लपकी.

"ओह मेरी प्यारी दादी, अब रात में किधर चली आप?", ऋतू बगल में आते हे दादी का हाथ पकड़ कर उनके साथ हे चल दी. कौशल्या जी ने मुस्कुरा कर एक बार ऋतू को और फिर अपने बगीचे को देखा.

"मेरी लाडो, तू न थोड़ा सा तोह dekh-parakh लिया कर सब. छोटी नहीं है अब तू."

"वही तोह दादी, अब मैं छोटी नहीं हु और अपनी दादी को यु अकेले बहार जाते देख मेरा फर्ज है उनके साथ रहने का. वैसे ये हलवाई अंकल अभी तक काम पे है?", ऋतू ने जब देख की वो प्लाट में आ गए है और असगर खुद हे सभी कुर्सियों को समेत रहा था. उसके बाकी लोग खाना खा रहे थे जमीन पर बैठ के.

"बीटा, ये सब होता रहेगा और वैसे भी बाद में कर सकते हो. पहले खाना खा लो.", कौशल्या जी को अपने पास देख कर असगर ने हाथ जोड़ कर सर झुका लिए था.

"माता जी, पहले मेरे लोग भोजन कर ले. मैं खाना कमरे पे जा कर खा लूंगा और इतने समय है तोह ये सब ठीक करना हे सही लगा मुझे."

"कल से ऐसा नहीं होगा असगर नहीं तोह कान खींच दूंगी तुम्हारे. बीटा, समय देखो और फिर तुम्हे देरी भी हो रही होगी नमाज के लिए.?", अब असगर ने बड़े हे प्रेम से कौशल्या जी को देखा जैसे वो कोई छोटा बचा हो और सामने उसकी माँ.

"जी शुक्रिया माता जी और आपने पहले हे हमे बेहतर छत के साथ साथ कूलर, बराबर भोजन की सुविधा दे राखी है तोह हमारा भी फ़र्ज़ है की आपका कोई नुक्सान न हो. कल से सबकुछ समय पर हे होगा.", असगर यहाँ बात कर हे रहा था और उसके 2 लोग अब काम पर लग चुके थे.

"ाची बात है बीटा लेकिन जब हम म्हणत 2 वक़्त की रोटी के लिए करते है तोह ध्यान रखना चाहिए की समय पर हे खाये. कमरे पर कुछ भी जरुरत हो तोह बता देना. वैसे इधर के लिए चौकीदार है तोह ज्यादा दिक्कत की बात नहीं. हाँ कल 6 की जगह साढ़े 7 बजे हे आना.", इसके बदले असगर ने सिर्फ 'जी' हे कहा था और उसके बाकी 2 लोग एक पन्नी में कुछ भोजन लिए असगर के करीब आ गए.

"उस्ताद जी, आपका खाना ले लिया है और बर्तन भी समेत दिए है."

"अब जाओ और तुम सभी लोग आराम करो.", कौशल्या जी के आदेश पर वो सभी एक बार फिर हाथ जोड़ कर अपने रस्ते हो लिए.

"दादी, सच कहु तोह आपको सरकार चलनी चाहिए. आप सभी से सलीके से बात भी करती है और सामने वाला हर बात मान भी लेता है. और गलत भी नहीं होती कभी.", ऋतू ने एक बार प्रीती के घर की तरफ देखा जहा रोमिला अपनी भाभी से कुछ बातों में लगी थी और फिर अपनी दादी को.

"चला आ थोड़ा चहल कदमी करते है, खाना भी हजम हो जाएगा.", कौशल्या जी ने जैसे ऋतू की बात को अनसुना कर दिया था और ऋतू मुस्कुरा रही थी क्योंकि ये उसको भी पता था की दादी ऐसे tark-vitark नहीं करेगी उसके साथ. दोनों हे दादी पौती खम्बो पर लगी रौशनी की छाव में धीमी गति से गली में आगे चल दी.

"इंसान को 2 तरह से जीत सकते है बेटी. या तोह आप उसके बराबर हो जाओ नहीं तोह उसको महसूस करवाओ की वो आपके बराबर है. इसको आगे चाहे फिर 10 अलग तरीको से बढ़ा लो पर सच यही है की हर इंसान चाहत है िज्जात्त और प्यार के 2 मीठे बोल. ये असगर खानसामा है लेकिन ताप्ती भट्टी के आगे काम करके कितने हे लोगो के पेट की आग ठंडा करता है? ऐसे व्यक्ति को मान देना हमारा कर्त्तव्य है इसलिए उसको अपने संकस्ख बनाओ.", ऋतू कुछ समझी थी लेकिन कुछ अभी भी संदेह था.

"वो दोनों तरीके तोह एक हे बात हुई न दादी?", इस बात पर कौशल्या जी हलके से मुस्कुराई जिस पर ऋतू ने भी उनका अनुसरण किया, क्योंकि उसको पसंद था अपनी दादी को खुश देखना.

"अब दूसरी बात समझो जरा. अब तू कल को डॉक्टर बनेगी लेकिन कुछ ऐसे होंगे जो खुद को नामी डॉक्टर मान कर घमंड करेंगे और तू होगी एकदम नयी. मतलब कोई मुक़ाबला हे नहीं होगा जैसे फ़र्ज़ कर शंकर और तू. ये जो अनुभव है शंकर का उसको तोह तू कम् नहीं कर सकती न?", ऋतू बड़े ध्यान से सब सुन्न रही थी और इस सवाल पर उसने सर हाँ में हिलाया.

"तोह तुझे ख़ास बन्न न होगा फिर. जब ज्यादा अनुभव न हो तोह तैयार करो वो खासियत जिसके सामने बड़ा नाम भी आपके बराबर आ जाए. न्यूरो या कार्डियक जैसे. फिर तोह सामने वाले को तुम्हारा लोहा मान कर िज्जात्त देनी हे पड़ेगी न?", दादी के मुँह से ऐसे साफ़ चिकित्सा के शब्द सुन्न ऋतू खासी प्रभावित हुई.

"वाह दादी क्या एक्साम्प्ले दिया है आपने. वैसे मुझे तोह लगा था के आप दूसरे की डिटेल पापा वाले स्टाइल में देंगी. हेहेहे..", ऋतू जहा बोल रही थी वो कौशल्या जी को ाचे से पता था.

"ओह शैतान, जीवन को कभी शंकर की नजर से मैट देखना कह देती हु. वो किसी बड़े के बराबर जिस तरह होता है न उस से दहशत वाला सम्मान मिलता है लेकिन तुम सिर्फ जीवन देने वाला रास्ता चुनोगी.", मजाक के बाद कौशल्या जी ने बड़ी हे गंभीर बात कही थी. एक पल ऋतू भी खामोश रही और मदद से वापिस घर के तरफ आते हुए उसने अपने दिल की बात कह हे दी.

"दादी, मुझे न किसी के समकक्ष नहीं होना और न हे िज्जात्त या बड़े नाम से कुछ वास्ता है. बस मैं इतना हे चाहती हु की आपको और बाउजी को कभी दुखी न करू. हाँ डॉक्टर बन्न न मेरा सपना है क्योंकि मुझे वही समझ है लेकिन सोच तोह दादा जी वाली हे है की जीवन बचाना ज्यादा मुश्किल है इसलिए मुश्किल काम हे करना चाहिए. क्या मुझसे कभी कोई गलती हो जाए तोह आप मेरा जीवन बचाएंगी?", ऋतू को समझ नहीं आ रहा था की वो 2 अलग अलग बातें एक साथ कह रही थी. उसके दिमाग के जैसे तार उलझ से गए थे एकाएक किसी दूसरे विचार के शामिल होने से. ऋतू के चेहरे पर आये अवसाद को देख कौशल्या जी ने बगीचे से पहले हे ृक्क कर उसके माथे को सहलाया.

"मैंने क्या कहा है तुझे? शंकर से अलग बन्न न है तुम्हे ऋतू. वो जो चाहता है उसके लिए बाकी सबसे लड़ लेगा लेकिन चाहत के सामने बेबस. मतलब अब तुम जरा ये बात समझो और मुझे बताओ की अगर कभी तुम्हारे और प्रीती में अटूट प्रेम के बीच कोई तकरार हो जाए, आपसी विचार की वजह से तोह क्या तुम सारा शहर जला डौगी या समझदारी से प्रीती के साथ बैठ कर उसको सुलझाओगी? किसी ख़ास की मदद ले सकती हो जो तुम दोनों का बराबर पक्ष लेता हो."

"मैं ऐसा करुँगी हे नहीं दादी. अगर प्रीती की बात सही होगी तोह मान लुंगी और मेरी सही हुई तोह वह मान लेगी.", ऋतू के सपाट से जवाब पर कौशल्या जी की मुस्कान गहरी हो गयी जैसे अब उन्होंने ठान हे लिया था के आज वो ऋतू को कही बड़ा ज्ञान देने वाली है. इतनी ख़ामोशी में वैसे भी यहाँ ये दोनों हे दादी पौती मौजूद थी और स्वर धीमा हे था.

"फ़र्ज़ करो की प्रीती अगर तुमसे या मुझसे शादी के लिए ये शर्त रखे की हमारी पूरी वसीयत पहले उसके नाम की जाए और उसको राधिका बिटिया की जगह घर के मुख्या बहु का मान दिया जाए तभी वो शादी करेगी. मेरे बाद मैं ये सबकुछ तुम्हे सौंप देती हु और अर्जुन भी अगर प्रीती की बात से सहमत हो तोह तुम्हारा क्या फैंसला होगा? बेटी, जवाब देने से पहले ाचे से सोच विचार लेना.", कौशल्या जी ने बहोत हे दूर की सोची थी इस पल में और ऋतू एक दिल पर उनका हर लफ्ज़ गहरा असर कर गया था. लेकिन उसको भी पता था के दादी बिना मतलब तोह सर पे भी हाथ नहीं फेरती तोह इतनी बड़ी बात अगर उन्होंने कही है तोह जरूर ख़ास बात हे होगी.

"दादी मैं 2 तरह से बात कहु तोह चलेगा?"

"मुझे पता है की तुम एक तरह से कभी भी कुछ नहीं करती. सही तरीका पहले और दूसरा बाद में."

"सही तरीका होगा अर्जुन और प्रीती को ये समझने का की जीवन में अगर हम बड़ो को दरकिनार करके फैंसला लेते है तोह सब जिम्मेवारी हमारी होगी. फिर ये वसीयत भी नहीं मिलेगी और ये परिवार भी नहीं. हाँ अगर चाहो तोह जो भी अर्जुन के अधिकार है और जितना उसको मिला है वो सब प्रीती को सौंप दिया जाएगा. रही घर पे अधिकार वाली बात तोह ये फैंसला आप हे करेंगी और अगर सबकुछ आप मेरे हवाले करती है तोह राधिका भाभी चाहे तोह प्रीती को घर की बड़ी बहु सामान हक़ सौंप सकती है, लेकिन प्रीती की काबिलियत देख कर. और अगर मैं मुखिया हु तोह अर्जुन मेरे खिलाफ नहीं जा सकता.", ऋतू के चेहरे पर कोई भाव ने थे ये सब कहते हुए जैसे वो सिर्फ एक िमिहान में बैठी हो.

"और तुम्हारा दूसरा तरीका क्या होता?"

"ऐसे मामलो में दूसरा तरीका नहीं होता दादी. सब बिखर जाता है और अर्जुन खुद हे गलत हो जायेगा अगर प्रीती कुछ भी ऐसी डिमांड रखती है तोह. ये प्यार का मजाक हुआ या फिर एक षड़यंत्र जिसके लिए प्रीती ने अर्जुन को चुना हो. मोहब्बत्त में बाघी होना अलग बात है क्योंकि तब दुनिया खिलाफ होती है और शर्त रख कर मोहब्बत्त नहीं सिर्फ साजिश होती है, लालच से भरी साजिश."

"तू इसलिए मेरी लायक बची है ऋतू, सबसे लायक. और मुझे ये भी पता है की प्रीती तोह खुद तेरे जैसी है जो जरुरत पड़ने पर अपनी ख्वाहिश भुला सकती है लेकिन कभी कुछ गलत नहीं कर सकती. अर्जुन का क्या है, वो तोह न माया की चाहत रखता है और न सम्मान या ओढ़े की.", कौशल्या जी थोड़ी भावुक होने लगी थी लेकिन खुद को संभाल गयी.

"पापा ने क्या चुना था दादी?", ऋतू के बस इतना कहने के साथ हे कौशल्या जी ने आँखें कस के मूँद ली जैसे इस सवाल के लिए वो तैयार हे नहीं थी. ये अतीत का गहरा दर्द उन्हें आज तक दुखता था. ऋतू अपनी दादी को अपने साथ लगाए फिर उनके कमरे तक चली आयी जैसे अब उसको जवाब में कोई दिलचस्पी हे न रही हो. ज्यादा जरुरी था अपनी दादी को खुश रखना और सुकून देना.

"आप आराम करो दादी, सुबह अंधेरे से जगी हो और दिन में भी आराम नहीं किया आपने.", यहाँ कमरे में इस वक़्त कोई न था और ऋतू जाने के लिए मुड़ी तोह कौशल्या जी ने उसको अपने पास हे बैठा लिया. ऋतू ने बैठने से पहले बड़ी तुबेलिघ्त बंद करके जीरो का पीला बल्ब जला दिया.

"सच कहु तोह दादी, मुझे खुद नहीं पता की मैं लायक हु या नहीं लेकिन अगर कभी आपके दुःख का कारण मैं बानी तोह आपके सामने कभी नहीं आउंगी.", ऋतू को एहसास होने लगा था की एक न एक दिन ये प्यार कुछ ऐसा हे करवा सकता है. आज दादी को उसके पिता के एक पुराने फैंसले से इतना दुःख था तोह इस उम्र में अर्जुन के साथ उसके रिश्ते की सहमति न जाने क्या हे गज़ब करवा दे. वही कौशल्या जी अभी बेहतर थी और उन्होंने बैठे हुए हे ऋतू का बाय गाल हलके से सहलाते हुए कहा.

"Maa-baap बहसों के लिए हमेशा उनकी खुशियां हे चाहते है बेटी. भला कौन माँ अपने बचो को दुखी देख सकते है? तुमने मुझे बाकी सभी से कही बेहतर समझा है और जिस दुःख के बारे में तुम सोच कर परेशान हो रही हो क्या पता वो सोच निरर्थक हो. मुझे बस यही परखना था की मेरी बेटी फैंसले मिल कर लेने में यकीन रखती है या सिर्फ अपने आप. तुम्हे सही गलत की जितनी समझ है उसकी आधी भी अगर मैं अपने बचो को दे पाती तोह मुझे खुद पर मान होता.", जहाँ कौशल्या जी दबे छिपे शब्दों में Arjun-Ritu को स्वीकार कर चुकी थी वही थोड़ी अपने आप से भी व्यथित थी.

"पता है दादी, आपकी जगह अगर कोई भी माँ होती तोह वो भी अकेले रह कर इतनी ाची परवरिश नहीं दे पाती. ताऊजी, पापा, चाचा के साथ साथ दादा जी भी जीवन में बेहतर मुकाम पर पहुंचे तोह परिश्रम आपका हे था. और अगर इस बीच कुछ भी थोड़ा इधर उधर हुआ तोह एक माँ का दिल अपने बचो को जंजीरो में तोह नहीं बाँध सकता न? और आपने ये किसने कहा की मैं समझदार हु? हम सभी bhai-behan बचपन से अगर किसी के सबसे ज्यादा करीब रहे या खेले कूड़े भी तोह आपकी हे dekh-rekh में. दादा जी ने तोह कभी किसी बचे को कहने तक का मौका नहीं दिया कुछ भी चाहिए होता है तोह. कभी कभी लगता था की हम लड़कियों पर आपकी सख्ती शायद इस वजह से है की हम लड़की है पर बाद में समझ आया की हर चीज का सही समय होता है और आपकी परवाह जायज भी थी. मुझे उम्मीद नहीं थी की आप स्कूटी के लिए हाँ कहेंगी और देखिये बाद में car-motorcycle तक की चाभी आपने अपने हाथो मुझे दी.", ऋतू अब अपनी दादी की बगल में हे लेट गयी थी, चेहरा उनके सीने में धंसाए. कौशल्या जी बड़े स्नेह से उसका सर सेहला रही थी जैसे आज कितने हे बरसो बाद वो खुद को एक माँ महसूस कर रही हो.

"मुझे इतना पता है बिटिया की एक जननी कही ज्यादा सक्षम होती है किसी भी पुरुष से, बस उसको मौका मिलना चाहिए. हाँ हर स्त्री बराबर नहीं हो सकती जैसे हाथ की सभी उँगलियाँ. माधुरी घरेलु है और कोमल समझदार लेकिन एक अपने हे दायरे में सिमटी हुई. सभी की विशेषता अलग होती है ऐसे हे और तुम या तारा इन दोनों से अलग हो. आरती के बदलाव भी उसकी परिभाषा बदलते हे तोह मुझे ये सबकुछ समझ कर हे हर बचे की खूबी पर ध्यान देना हे होगा. तुम्हारी माँ एक पढ़ी लिखी महिला है लेकिन उस से कही ज्यादा वो परिवार की एहमियत और त्याग में विश्वास करती है. मुझे हमेशा हे तुम एक बेटे जैसी लगती हो जो निर्णय, हालात और परिवार को गहराई से समझती हो. मेरी कमियां तोह अब क्या हे भरपाई हो पाएंगी लेकिन मुझे उम्मीद है तुमसे. और निश्चिन्त रहना अपने लक्ष्यों पर काम करने के साथ साथ. मेरी बेटी, परीक्षा तोह हर जगह होती है लेकिन तुम जो अर्जित करना चाहोगी वो हांसिल होगा.", ऋतू इतने दुलार से लिपटी हुई जाने कभी की सो चुकी थी और जब कौशल्या जी को ये एहसास हुआ की वो अब अकेले हे बात कर रही है तोह उन्होंने ऋतू के तनावमुक्त खूबसूरत चेहरे को निहारते हुए माथा चूम लिया. घर के बहार गाडी की आवाज सुन्न कर वो खुद को ठीक करती हुई उठी और ऋतू की ब्याह के निचे तकिया देने के साथ साथ उसके ऊपर चादर भी ुधा दी.

"कौन आया है संजीव?", उनसे पहले हे बहार आँगन में संजीव और नरिंदर जी आ चुके थे. घर के बहार रुकी कार से जो चेहरा पहले उतर कर चौखट पे आया उसको देखते हुए नरिंदर जी ने झुक कर आशीर्वाद लिया. 60 वर्ष पार ये एक सेहतमंद इंसान था और रामेश्वर जी का छोटा भाई कृष्णेश्वर.

"प्रणाम भाभी माँ.", संजीव नरिंदर से मिल कर जैसे हे कृष्णेश्वर घर में दाखिल हुए, आते हे बड़ी भाभी के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिए. उनके पीछे हे उनकी धर्मपत्नी के साथ साथ बड़ी बेटी दामिनी और नातिन आँचल भी चले आये. सबसे मिलने के बाद कौशल्या जी उन्हें बैठक में ले आयी और अपने कमरे का दरवाजा इधर से लगा दिया, ऋतू की नींद में खलल न पड़े इस वजह से.

"रास्ते में कही रुके थे क्या कृष्ण? और जरा इत्तिला हे कर देते की रौशनी बिटिया भी आ रही है तुम्हारे साथ.", कौशल्या जी ने संजीव को हे jal-paan का कहा था और उसके बाद सभी के खाने का प्रबंध करने को. फिर वो मुखातिब हुई बड़े सोफे पर पसरे अपने देवर से और इस बीच उन्होंने आँचल को अपने साथ लगा कर स्नेह दर्शाया, जिसमे एक नानी वाला हे वात्सल्य था.

"वो भाभी मैं तोह सोच रहा था की 19 को हे आया जाए लेकिन रौशनी बिटिया की जिद्द और वह चले आने पर मुझे खुद का फैंसला हे गलत लगा. परिवार में इतने मांगलिक अवसर पर हर रसम में शामिल होना जरुरी है. बिनोदिया तोह पता नहीं कहा था इसलिए अड्डे से ड्राइवर बुलवा कर 4 बजे निकले थे. देरी के लिए क्षमा चाहता हु.", ये क्षमा भी खानापूर्ति सी थी इनकी जो कौशल्या जी को भली भाँती पता थी पर वो बस मुस्कुरा दी.

"ये तुमने ाचा किया कृष्ण की समय से आये. मुझे तोह बस इस बात की चिंता थी की बेटी और नातिन साथ है और अँधेरे में सफर करना थोड़ा सुरक्षित नहीं. खैर तुम्हारे भाई साहब भी अभी बहार गए हुए है और आने हे वाले होंगे. चाय पीने के बाद हाथ मुँह धोना हो या नहाना हो तोह कर लो. खाना लगवा देती हु जब ठीक लगे.", इधर अनामिका भी अपने saas-sasur के आने की खबर मिलते हे चली आयी थी. कृष्णेश्वर जी ने तोह मेहमान कमरे में रुकना था अपनी बीवी के साथ इसलिए रौशनी और आँचल को अनामिका अपने साथ अंदर ले गयी.

"जीजी, सुना है होने वाली बहु आधुनिक है और कुछ बड़े घर से है? वो ऐसा है न के उतने नखरे भी हो जाते है. वैसे आप तोह सबसे ज्यादा दुनिया समझती हो लेकिन कही बचो की बात पर रिश्ता..", ये शब्द निकले थे श्रीमती देवकी जी के मुख से. 60 बरस की ये महिला बड़ी जीवट शक्शियत थी और शायद इनके जीवन में सबसे अधिक ईर्ष्या इन्हे थी तोह सिर्फ अपनी जेठानी कौशल्या जी से लेकिन उनका रसूख और ताक़त पहचान कर बस बिलबिला हे सकती थी. संजीव को ये शब्द कुछ ठीक नहीं लगे थे लेकिन वो आदतन शांत हे था.

"ऐसा है देवकी, बचे जब समझदार हो जाए और अपने पाँव पर खड़े भी तोह हमारा दायित्व है फैंसले मिल कर लेने का. संजीव आज एक ाचे मुकाम से है बिना किसी सहायता के और इसने कभी ऐसा नहीं कहा की उस लड़की से शादी करवाओ. तुम्हारे जेठ जी को अपने सभी बचो की तसल्ली से खबर रहती है इसलिए वही गए उधर बात चलने. परिवार पहचान का है और बिटिया भी लाखो में एक. बचे खुश तोह परमात्मा भी. थोड़ा बहोत अपने पास भी है अगर उनका परिवार संपन्न है तोह. ठीक बात कही न कृष्ण मैंने?", नरिंदर जी तोह मंद मंद हंस रहे थे अपनी माँ के teen-tarfa हमले से और अब कृष्णेश्वर क्या जवाब देते.

"भाभी आप प्रमुख है और आपके फैंसले तोह खुद भैया भी मानते है. बचे खुश रहे बस और रही dhan-daulat की बात तोह जितना आप दान कर चुकी है उतना किसी संपन्न परिवार में भी नहीं होता. आज मैं 10 गाँव में सम्मान्नित हु और भैया की वजह से कभी कोई संकट तक छू न पाया. घर से बचे जाते है लेकिन आपने तोह एक पल में सबकुछ मेरे हवाले कर के यहाँ 2 कमरों से नया बसेरा बनाया और आज सबके सामने उदहारण है भैया और आप.", कृष्णेश्वर एकके हे गंभीर हो उठे और उनकी बात का जवाब उनकी धर्मपत्नी के पास भी न था.

"तुम उनके लिए आज भी सबसे ख़ास हो कृष्ण और ये खुद कष्ट सेह सकते है पर तुम्हे दुखी नहीं कर सकते.", कौशल्या जी आगे कुछ बोलती उस से पहले हे आगमन हुआ jikar-daraaj व्यक्ति का, श रामेश्वर जी. कृष्णेश्वर तुरंत उठ कर उनकी तरफ लपके और वही उनकी बीवी ने घूंगट ओढ़ कर हाथ जोड़ दिए.

"कैसे हो मेरे Dhilu-lal? ईद हो गयी भाई आज तोह तुम हमारे गरीबखाने नजर आये.", रामेश्वर जी अपने पैन से यही बुलाते थे अपने छोटे भाई को, ढिल्लू. दोनों गले लग कर मिले थे और कुछ वक़्त गले लगे हे रहे. उनके साथ साथ हे अंदर आये अर्जुन पर जब कृष्णेश्वर जी और देवकी की नजर पड़ी तोह हैरत से बस उसको हे देखने लगे. सवा 6 फ़ीट का वो lamba-chauda सा युवक जैसे उन्हें किसी का समरण करवा गया हो.

"नमस्ते दादा जी.", अर्जुन ने हे गंभीरता से उन दोनों के पाँव छुए तोह कृष्णेश्वर को वक़्त लगा जवाब देने में.

"भैया, ये..."

"तुम्हारा पौता है ये कृष्ण और शंकर का बीटा अर्जुन. देख लो ये तुम्हे पहचान गया और तुम्हे जैसे कुछ और हे नजर आया.", उनकी बात पर कृष्णेश्वर ने भिंची हुई मुस्कान देने के साथ साथ अर्जुन को भी सीने से लगाया जो बाहों के घेरे में भी नहीं आया था उनकी.

"ऐसा लगा भैया जैसे पिता जी की तस्वीर रंगीन हो कर जीवित हो उठी हो. बहुत ख़ुशी हुई तुम्हे देख कर बीटा, सचमुच भैया ने तुम्हे इसलिए हे घर में सहेज कर रखा होगा.", अर्जुन क्या कहता की ये ख़ुशी ज्यादा लम्बी नहीं है छोटे दादा जी. आप मेरे गले नहीं लगे उल्टा मैं आपके गले पड़ने वाला हु जल्द. पर उसने कुछ भी ऐसा न कहा.

"आप लोग बैठिये, मैं खाना लगवाता हु. चल अर्जुन.", संजीव भैया तुरंत हे उसको अपने साथ ले चले. यहाँ कुछ देर और गपशप होने के बाद सबको ाचे से खाना खिलवा कर संजीव भैया ने गेट के टाला लगाया और अर्जुन को खोजते हुए उसके कमरे तक चले आये.

"अबे तू ये सब क्या करने लगा है?", बीच का दरवाजा बंद था और दूसरी तरफ संजीव भैया के कमरे में Anamika-Roshni और आँचल थी और हॉल कमरे में रुचिता, रेणुका और मधु बुआ, जिन्हे फिलहाल किसी से कुछ ज्यादा मतलब नहीं था. संजीव ने कमरे में अर्जुन को kagaj-pen लिए उलझा देखा तोह धीमी आवाज में पुछा.

"ओह.. कुछ नहीं भैया बस तिकड़म लगा रहा था कुछ."

"जरा विस्तार से बता न कैसा तिकड़म और ये कमरा बंद कैसे है इधर से?"

"उधर बुआ लोग सो रहे है और मैं नहीं चाहता की लाइट की वजह से उन्हें परेशानी हो. वैसे तिकड़म ये है की मुझे दादा जी पता चला के आपके ससुर जी के बड़े भाई श्री सोमनाथ जी बड़े रसूखदार बिजनेसमैन के साथ साथ मला भी है और उनकी पकड़ भी है इधर के साथ साथ राजस्थान में."

"ोये सुधर जा सुधर जा. तू खुद हे कहता है के अब आगे कुछ नहीं करेगा लेकिन फिर भी इस सबमे घुसा रहता है. वो टेढ़ा आदमी है और सरफरा भी. तेरी भाभी ने मुझे साफ़ कहा था के उनके सामने मैं भी कुछ ज्यादा बातचीत न करू. चल छत पे चलते है और 10 मिनट बात करके मैं सोने चला जाऊंगा.", रात के 11 से ऊपर होने लगे थे लेकिन संजीव भैया की बात सुन्न कर अर्जुन उठ खड़ा हुआ.

"सच बोल दिया करो न भैया की सिग्गट की तालाब लगी है क्योंकि आप बहोत कुछ सोच रहे हो इस वक़्त.", संजीव भैया ने हँसते हुए उसकी पीठ पर धौल जमाई तोह अर्जुन उनके साथ हँसता हुआ दबे पाँव बहार की तरफ से हे निचे उतर कर पिछले आँगन से छत्त की और बढ़ चला. ज्यादातर कमरों में शान्ति थी पर ऊपर Ritu-Alka वाले भाग में जगमग लाइट से साफ़ पता चलता था की लड़कियों की एक पल्टन इधर अभी जागरूक है. ये पंजाब वाली और इधर की शैतान चौकड़ी हे होगी.

"अब बताओ भैया की क्या बात आपको परेशां कर रही है?", अर्जुन खुले आसमान के निचे अपने भैया का साथ अब एकांत में था. तारो से भरे आसमान की ख़ूबसूरती कही ज्यादा लुभावनी थी और हवा भी कुछ हद्द तक ठंडी. दिवार पर संजीव अपने भाई की आड़ में बैठ कर सिग्गट जलाते हुए कुछ खामोश हे था लेकिन एक काश के साथ हे बोलने लगा.

"पता चला है की चाचा जी (शंकर) ने उमेद चाचा के साथ मिल कर बहोत तगड़ा कारनामा अंजाम दिया अभी 2 रात पहले. 25 से ज्यादा नामी बदमाश और 3 व्यापारी और राजनैतक हस्ती को बुरी तरह cheer-faad दिया गया.", संजीव की बात सुन्न कर अर्जुन हैरत से अपने भैया को ऐसे देखने लगा जैसे वो दूसरी भाषा में बोल रहे हो.

"हैरान होने वाली बात ये नहीं है छोटे."

"अब इस से बड़ी बात क्या होगी भैया? 2 लोगो ने 25 लोगो को मार डाला और कानून? गलती से पापा को कुछ हो जाता तोह?"

"अबे तू नहीं जानता अभी ढंग से अपने पापा को लेकिन असली बात ये है की वो जगह राख में बदल दी गयी जिसके मालिक विनोद चाचा और उनके जीजा यानी पप शर्मा, हमारे फूफा है. कानून की नजरो में तोह वो हादसा है जो आग लगने से हुआ और वह ज्वलनशील प्रदार्थ ज्यादा मात्रा में था. पर ये जो भी हुआ है न इस्पे एक ख़ुफ़िया टीम भी काम कर रही है, सेण्टर से अप्पोइंट की हुई. इस तरह की ये तीसरी वारदात है जहा जो खबर में आयी है. स्टाइल भी एक जैसा है इन सबका. दिल्ली के पास मिश्रा के साथ साथ 18 लोग जल कर मारे गए, वो rape-murder वाले किस्से में जब तूने हेल्प की थी तोह वह भी उमेद चाचा ने बाद में आग लगा दी थी और अब ये तीसरा जो सबसे बड़ा मामला है. लोकल पुलिस, पॉलिटिशंस या यूँ कहु की बड़े बड़े सरकारी डिपार्टमेंट्स को भी नहीं पता की खोजबीन शुरू हो चुकी है.", संजीव इतनी बात कह कर लगातार काश खींचने में लग गया और अर्जुन की सिट्टीपिट्टी गुम्म हो चुकी थी. कहा तोह वो हैरान था 2-2 बड़े खुलासो से लेकिन अब परेशां हो चूका था की अगर सबूत मिल गए तोह.

"अब क्या होगा?", उसने झिझकते हुए पुछा तोह अलाव की रौशनी में संजीव के चेहरे पर अलग हे भाव नजर आये.

"फाइल तोह बंद हो जायेगी छोटे क्योंकि वह सबूत कुछ ख़ास नहीं मिलने वाले लेकिन बात ये है की ऐसी जांच शुरू हे क्यों हुई? मतलब अभी भी कुछ लोग हमारी नजर से बचे है जो ये सब करके ध्यान हटवा रहे है."

"भैया ये मामला कुछ और तोह नहीं? वालिए अंकल भी कुछ अलग हे बता रहे थे.", अर्जुन ने ये बात कुछ सोच कर हे भैया के सम्मुख कही थी.

"वो क्या कह रहे थे? और उन्होंने ये तुझसे बताया?"

"वो मुझे छोड़ने आये थे घर तक और फिर दादा जी के साथ साथ छोल दादा जी भी बहार हे मिल गए. उनकी बात सुन्न कर पता चला था की उन्हें एक बड़े केस को तुरंत रोकने का आदेश मिला है ऊपर से. और वो सोल्वे कर हे चुके है फिर भी केस क्लोज की फाइल ली गयी है उनके हेड द्वारा, वो भी आफ्टर वर्किंग हॉर्स एक नई क्लीन रिपोर्ट के साथ.", अब संजीव भी कुछ देर आसमान में देखते हुए चिंतन करने लगा था.

"अगर उस केस पर काम करने वाली बात डिपार्टमेंट से लीक हुई होगी तोह ये दूसरा केस शुरू करवाया गया है. अब तू तेरे सोर्स लगवा और पता कर की ये D.S. मीणा की क्या हिस्ट्री है. यही है दिल्ली में इस तरफ का प्रभारी और वालिए जी का सुपर सीनियर. मतलब तोह साफ़ है की ये सब सिर्फ इसलिए किया गया है की उनके पास भी कमजोर कड़ी हो इस तरफ की.", संजीव ने इस नाम का जीकर करते हुए अर्जुन में पूरी उम्मीद जताई थी.

"दिल्ली में तोह दबोच हे लेंगे इसको भैया लेकिन आपने तोह नाम बता कर आधा मामला हे सोल्वे कर दिया. मीणा मतलब राजस्थान से है वो और जहाँ तक बात है इसके सुपर सीनियर होने की तोह अपने पास एक और बराबर का इंसान है वह. क्या समझे?", अर्जुन के चेहरे से परेशानी chu-mantar हो चुकी थी जिसको देख कर अब संजीव की आँखों में भी ख़ास चमक उभर आयी.

"गलत हे सही लेकिन तू तरीका निकाल हे लेता है. दबाएगा कैसे?", संजीव की बात पर अर्जुन ने तत्काल हे जवाब दिया.

"उसको मैसेज मैं पहुँचाऊँगा और जलवा आप दिखाना. कई बार बड़ी पहुंच से ज्यादा कारगर होता है मजबूत इंसान को भी असुरक्षित एहसास करवाना. वैसे आप सूरे हो की ये जांच आगे नहीं बधाई जाएगी?"

"101% . खुद हे सोचो जब ये इनफार्मेशन मुझ तक आयी है तोह मतलब ये एक मैसेज हे है की उन्हें भी खबर है इस सबकी. मतलब खेल इस तरह से नहीं खेला जाएगा जिस तरह चाचा जी लोग कर रहे.", संजीव अपनी तरफ जायज था लेकिन अर्जुन कुछ सोच चूका था जिसके बारे में उसने कोई खुलासा नहीं किया.

"ाची बात है भैया. वैसे भी अब तोह सभी लोग व्यस्त है और उसके बाद सुना है उमेद चाचा जी के साथ नरिंदर चाचा जी भी बिज़नेस में लगने वाले है. पापा भी बिजी हो जाएंगे दादा जी के दिमाग की वजह से तोह फिलहाल ये सब नहीं होगा जो हो चूका."

"हाँ बस इसलिए हे इतना निश्चिंत हु छोटे. वैसे थैंक्स भाई जो तू अकेले हे घर के सारे काम इतने ाचे से देख रहा है.", संजीव भैया पारिवारिक कामो में अर्जुन से खासे प्रभावित थे.

"आप मेरी शादी में करके हिसाब बराबर कर देना भैया, थैंक्स अपने पास हे रखो."

"साले तुझे बहोत जल्दी है शादी की. वैसे तुझे जरुरत तोह हैं नहीं जितनी लिए घूम रहा है.", अब दोनों भाई पहले सी मस्ती करने लगे थे सब भूल कर.

"उस से हे तोह बचना है भैया. ये मस्ती कही कोई काण्ड न करवा दे इसलिए कोशिश करता हु के बिजी राहु. आपकी चांदी है अब 5 दिन बाद. पता नहीं मुझे ऊपर वाले कमरे में रहने भी डोज या नहीं.", अर्जुन भी बराबर मजे लेने लगा.

"तू ऊपर हे रहेगा जहा अभी रहता है. हाँ कमरा ऐसे हे बंद रखना बस जैसे आज देखा था.", संजीव भैया की गहरी मुस्कान देखा अर्जुन ने और भी टांग खिंचाई की.

"वैसे जरुरत तोह नहीं लगती इस सबकी. वो बड़ा वाला बीएड लगवा रहा हु कल आपके कमरे में.", अर्जुन इतना बोल कर थोड़ा आगे दौड़ गया जैसे पकड़म पकड़ाई चल रही हो.

"ठहर जा बे तू .. बड़े भाई के लिए बीएड लगवाता है.."

"ओह मेरे प्यारे भैया.. आपके लिए नहीं, रात के शोर से बचने के लिए. ाचा सॉरी सॉरी..", अर्जुन हाथे चढ़ा तोह तुरंत हँसते हुए सॉरी बोलने लगा था. संजीव ने भी मस्ती में कान खिंच कर उसको अपने साथ हे लगा लिया.

"पता है छोटे, जो जीवन संगिनी होती है न इसका एक अलग स्थान होता है जो एक भाई को भाई से कभी विमुक्त नहीं कर सकती. हाँ कुछ ऐसा जरूर हो जायेगा की तुझे मेरा दरवाजा खटखटाना पड़े कभी कभी लेकिन मैं जानता हु तू राधिका का ख़याल वैसे हे रखेगा जैसे मेरा रखता है.", दोनों भाई अब चलते हुए घर के सामने वाली तरफ आ खड़े हुए थे छत पर.

"Devar-bhabhi का रिश्ता बहोत जटिल होता है भैया लेकिन मेरी नजर में शायद माँ बेटे के बाद सबसे सम्पूर्ण. वो इधर आएँगी तोह अपने भाई और maa-papa को छोड़ कर जिसमे आप उनको भरपूर मानसिक सहयोग देंगे लेकिन मैं वादा करता हु की भाभी को कभी अपने छोटे भाई की कमी महसूस नहीं होगी और शायद शरारती देवर की भी.. हाहाहा..."

"सुधर जा बे सुधर जा. तू न सचमुच लगता शरीफ है बस लेकिन मैं जानता हु के तू कितना शरारती है. और ये भी सच है की राधिका को कभी दुखी नहीं होने देगा. मेरे भाई पर मुझे जितना यकीन है शायद अपने प्यार पे नहीं.", संजीव ने बहोत बड़ी बात बोल दी थी और अर्जुन ने अनजाने हे उन्हें अपनी बाहों में कस लिया था

"कभी कपड़े मैट करना भैया क्योंकि मुझे पता है आपका. बस इस सबको बदलाव की तरह लेने की जगह ताक़त हे समझना. शायद कही न कही मैं भी आपका वो सहयोग न कर सकू जो भाभी करेगी. चलो अब हमको निचे चलना चाहिए, कल थानेदार जी 6 बजे तक सोने नहीं देने वाले.", अर्जुन भैया के साथ हे यही हलकी फुलकी बातें करता हुआ जब निचे उतरा तोह दोनों का मैं काफी हल्का हो चूका था.

"वैसे तू तोह कल से पिछले घर रहने वाला है न?", गलियारे में आते हे भैया ने अर्जुन को याद दिलाया तोह वो सर खुजाने लगा.

"फंस गए भैया. मैंने तोह अपना कमरा भी नहीं समेटा और वह अभी भी बहोत कुछ है जो सबसे दूर रखना जरुरी है. चलो कर हे लूंगा रात में.", अर्जुन अब भैया से विदा ले कर फिर से सीढ़ियां चढ़ने लगा तोह बीच में हे रुक गया.

'मर्डर गया.. प्रीती ने रात का मिलने को कहा था और वो नजर भी नहीं आयी.', अर्जुन दिमाग के घोड़े दौड़ने लगा था लेकिन ये समय ऐसा था की न वो उनके घर जाने का जोखिम उठा सकता था और न हे पिछले हिस्से में किसी दरवाजे को खटखटा सकता था, प्रीती के चक्कर में. समय 12 हो चूका था मतलब मध्यरात्रि और ये बिलकुल भी सही समय न था किसी उलटी सीढ़ी हरकत के लिए. मैं मार कर वो अपने कमरे में आ बैठा जहा अब बड़ी तुबेलिघ्त जल रही थी जिसकी तरफ अर्जुन का ध्यान देरी से गया.

"मैं तोह नाईट लैंप में काम कर रहा था.", अर्जुन ने ध्यान दिया और फिर टेबल पर रखे दूध के गिलास पर नजर गयी.

'बुधुराम, भैया से बात हो जाए तोह फिर वापिस ऊपर आ जाना.', ये पंक्ति जिसने लिखी थी अर्जुन भली भांति पहचानता था और चेहरे पर ख़ुशी बता रही थी की प्रीती इधर हे है.

"आया मेरी बिल्ली अभी आया बस."

.

.

"यार डीपी, तेरा कुछ सन है क्या अर्जुन के साथ?", Aarti-Tara वाले कमरे में बीएड पर उनकी जगह इस वक़्त गुरदीप, कीर्ति थी. जसलीन सबसे आखिरी कमरे में कोमल और विन्नी के साथ थी और बीच के कमरे में अलका, अफसाना और प्रीती जहाँ सिर्फ प्रीती हे जाग रही थी और दोनों बाकी सो चुकी थी. निचे वाली मंजिल पर Madhuri-Priyanka के दूसरी तरफ वाले कमरे में आरती आज अपनी माँ के साथ सोई थी और फिर भी रेखा जी वाला कमरा खाली था. इधर कीर्ति की बात सुन्न कर गुरदीप के चेहरे पर अलग सी चमक साफ़ बता रही थी की बात जरूर है.

"तुम्हे कैसे पता की कुछ है?"

"वो तुम उसको बड़े गौर से देख रही थी और उसने भी तुम्हारे इधर हलके से हाथ लगाया था जब वो अपने कमरे में जा रहा था.", कीर्ति ने हलके से गुरदीप के नितम्भ पर हाथ रख कर बताते हुए कहा तोह सरदारनी के चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गयी.

"तुम्हारा तोह बॉयफ्रेंड है न?"

"बता न यार गुरदीप. मेरा बस नाम का हे बॉयफ्रेंड है और यहाँ मैं ये नहीं कह रही की उसको मेरा बॉयफ्रेंड बनवा दे. लेकिन ये लड़का हैं पहुंची हुई चीज.", कीर्ति की मतलब गुरदीप भी ाचे से समझती थी.

"जसलीन ने जब तुम्हे बताया था न की अर्जुन ने उसको स्मूच किया था इसलिए लिपस्टिक गायब है तोह मैंने भी सुना था. लेकिन सच कहु तोह ख्वाहिश जसलीन की हे होगी इसलिए हे तोह अर्जुन ने किया होगा. और रही बात मेरी तोह देखो मुझे वो ाचा लगता है और आपस में थोड़ा खुलापन है हमारे, दोस्तों से थोड़ा ज्यादा.", गुरदीप भी जैसे आपस की बातें भली भाँती जानती थी.

"मतलब दोस्ती से ज्यादा क्या?"

"तू बोल तुझे क्या सुन्न न है?", गुरदीप अब कीर्ति की तरफ हे पलट कर आँखें नाचती हुई पूछने लगी. कीर्ति थोड़ा झिझकने लगी तोह गुरदीप ने खुद हे उसको ढील दी.

"पूछ ले न यार जो तेरा दिल कह रहा है."

"वो.. मेरा मतलब है क्या तुम दोनों ने वो सब भी किया है? देख मैं इसलिए पूछ रही क्योंकि कही जसलीन गलती न कर बैठे.", कीर्ति का झूठ साफ़ झलक रहा था लेकिन गुरदीप भोली थी बेवकूफ नहीं.

"यार देख मेरी तोह है अलग सोच और अर्जुन ने पहले हे बता दिया था के प्रीती उसकी गर्लफ्रेंड है और उसेक साथ हे शादी karega.Lekin मैंने दिल दिया या समझ ले अत्त्रक्ट हुई और उसने तबियत से मुझे chaand-taare दिखाए. तू न गलती भी मैट करियो उसके निचे आने की नहीं तोह शादी में नाचे या नाचे लेकिन बिस्टेर पर लम्बी जरूर पड़ी रहेगी 2 दिन.", गुरदीप को बिंदास बोलते देख कीर्ति ने मुँह पर हाथ रख लिया.

"शहहह.. पागल है क्या और मैं भला क्यों उसके निचे आने लगी? वैसे तेरा शरीर है बहोत भरा भरा.", कीर्ति से कुछ कहते हे न बना और वो आगे भी पूछना चाहती थी लेकिन खामोश हो गयी.

"तेरी कलाई बहोत पतली है कीर्ति, इस से भी कही मोटा होगा उसका और दूध पीती बची तोह तू है नहीं जो न पता हो मैं किसी बात कर रही हु. लम्बा भी हथेली से ज्यादा है और अगर झेल गयी तोह तेरे भी मांस चढ़ हे जाएगा उसकी मेहनत से. फ़िलहाल तोह हालात मुश्किल है के ऐसा कोई मौका मिले लेकिन अगर तुझे फिल्म देखनी हे है तोह दुआ कर कल रात सन बन्न जाये. वो हम लोग कल दूसरे घर रहेंगे न और अर्जुन को हमारी सुरक्षा के हिसाब से वही छत पर रहने का बोलै है उसके दादा जी ने."

"बेड़िया भेद की रखवाली करेगा. हेहेहे.. वैसे तू सच में रिस्क लेने का सोच रही है?", कीर्ति को विश्वास नहीं था लेकिन वो भी अब देखना चाहती थी ये सब. उसको जसलीन पर पंजाब से हे शक था और अनजाने हे वो भी अर्जुन की तरफ आकर्षित होने लगी थी.

"वह प्रीती न हुई तोह 100% मैं करुँगी और चांस भी यही है की प्रीती उधर नहीं होने वाली जब उसका घर हे साथ में है तोह. बस ये सब अपने तक हे रखना कीर्ति, वो लड़का बुरा नहीं है और यहाँ उसके ऊपर बात नहीं आणि चाहिए.", गुरदीप को गंभीर देख कीर्ति ने गले पर रखते हुए कसम हे उठा ली.

"बस मुझे न ये सब देखने की इत्छा है गुरदीप, असलियत में. और अब घर से बहार होने के साथ साथ तेरी जैसी फ्रेंड भी है जो मेरी इत्छा पूरी कर सकती है तोह मौका नहीं जाने देना."

"तू कह तोह देख कीर्ति, अपने साथ तुझे भी उसके निचे ला दूंगी. हाहाहा.."

"बकवास नै यार. मैं सचमुच कुछ ऐसा वैसा नै करना चाहती शादी से पहले, बस देखना है.", कीर्ति को इन हलकी बातों से हे अपनी छूट में चींटियां चलती महसूस होने लगी थी. न्यास हे उसने अपनी उभरी हुई मुनिया को खुजाया तोह गुरदीप हंसती हुई अपने ऊपर चादर डालने लगी.

"खुजा ले झूठी खुजा ले. Cream-vream हो तोह साफ़ राखियों मैदान, आसानी होगी थोड़ी.", गुरदीप पलट कर लेती तोह कीर्ति ने नाराजगी से थपकी मारते हुए बस इतना हे कहा.

"परे मर तू डीपी.. मैं वैसे भी जंगल पसंद नहीं करती."

.

.

यहाँ छत्त पर अर्जुन 2 गद्दे बिछाने के साथ साथ तकिये और चादर रख कर पूरी तैयारी में बैठा था और उधर सीढ़ियों से दबे पाँव आती आकृति को देख उसके चेहरे पर ख़ुशी बढ़ती जा रही थी.
 
अपडेट 168

चरित्र महत्व (2)


"तुम परेशान हो गए थे न? सच सच बोलना हाँ.", अँधेरी छत्त पर आज आसमान के सितारों से ज्यादा उजला सितारा अर्जुन के सीने पर सर झुकाये टकटकी लगाए उसको देखते हुए मुस्कुरा रहा था. खुली छत के ठीक बीच में बिछे गड्डो पर जहाँ अर्जुन सीधा लेता था वही प्रीती उसकी चौड़ी छाती पर हाथ टिकाये बड़ी चाहत से देखती हुई दिल का हाल ले रही थी. अर्जुन की धड़कन इतनी शांत कभी नहीं होती थी जितनी इस पल में प्रीती के करीब होने से थी.

"मैं तोह ये सोचने लगा था की आज तुम्हारे घर की दिवार कूदने के साथ साथ तुम्हारे कमरे का बहार वाला दरवाजा हे न तोडना पड़े. फिर मुझे ये ख़याल भी आया की अगर तुमने मुझसे मिलने का सोच हे लिया है तोह जरूर यही घर में हे होगी पर मैं रात को किस बहाने से दीदी लोगो के कमरे को खुलवाओ? वैसे तुम सचमुच अब कही ज्यादा हे तेज हो चुकी हो मेरी बिल्ली.", झीने कपडे का वो चुस्त पजामा प्रीती के कसरती लेकिन नरम नितम्भो पर पूरी तरह कैसा था जहाँ अर्जुन का एक हाथ हर उठान को महसूस करता ऊपर निचे चल रहा था. दोनों के जिस्म में दूर दूर तक lesh-matra वासना न थी, बस प्यार और एक दूसरे का स्पर्श.

"हो तोह तुम पूरे फत्तू हे में बुद्धूलाल. मेरे घर आने का सोच कर हे कमरे में वापिस चले गए होंगे.", प्रीती भी अपने तराशे हुए नकूहोने से हौले हौले अर्जुन का सीना कुरेदती हुई उतनी हे चाहत से अर्जुन के पूर्ण आगोश में थी. उसकी प्यार भरी चुहल कही न कही सच भी थी.

"जब तुम्हे पता हे है तोह ऐसी शर्ते रखती हे क्यों हो? वैसे आज मेरा एक सपना तोह सच हो हे गया है प्रीती. तुम्हे अपने सीने से लगा कर इस आसमान के तारो को जलने का. हमेशा इतना हे प्यार करोगी मुझसे?", अर्जुन के हाथ अब उसके कूल्हों से ऊपर ढीली टीशर्ट के अंदर मखमली पीठ और कमर पर फिरने लगे थे. प्रीती उचक कर अब पूरी तरह उसके जिस्म पर लिहाफ सी छ गयी थी. अर्जुन के तराशी हुई ठुड्डी को हलके से चूम कर उसने अपना चेहरा सीने पर टिका लिया.

"सपने क्या सिर्फ तुम्हारे हे है अर्जुन? और हैं भी तोह उनमे जब मैं भी बराबर हु तोह फिर प्यार भी बराबर हे होगा. बस कभी कभी लगता है की हमारी ज़िन्दगी वैसी हे रह पाएगी या नहीं जैसी आज है.", प्रीती की बात सुन्न कर अनजाने हे अर्जुन की पकड़ उसकी कमर पर हलकी ज्यादा हे कस चुकी थी. एक तरह से प्रीती की बात गलत तोह नहीं थी क्योंकि अर्जुन ने आने वाले भविष्य का रुख उलझनों से भर जो दिया था.

"मैं तुमसे दूर हो सकता हु भला? हाँ एक और सच है प्रीती जो मैंने तुमसे ज्यादा साँझा नहीं किया आजतक.", सितारों को घूरते हुए अर्जुन दुविधा में था की वो कैसे प्रीती को बताये की प्यार के साथ साथ ये परिवार भी उतना हे अनमोल है और इसके बरकरार रखने के लिए आज उसके कदम कुछ ज्यादा हे आगे निकल चुके है.

"शठ.. जानती हु मैं तुम्हे ाचे से मेरी जान. तुम सबकी फ़िक्र करते हो जैसे सभी तुम्हारी, मेरी या ek-dusre की. ऋतू दीदी को देख कर हे समझ आता है की वो भरपाई ाचे से करने लगी है घर के प्रति. वैसे कभी तुम्हे लगे की तुम मुझे बता कर हल्का महसूस कर सकते हो तोह कोशिश करना. प्यार का मतलब सिर्फ हम दोनों का हे जीवन तोह नहीं है न? ये परिवार भी तोह उतना हे मेरा है जितना तुम्हारा.", प्रीती ने भी दोनों हाथ अर्जुन की बाहों के गिर्द लपेट लिए थे. अर्जुन का अंतर्मन बिलकुल शांत था इस समय.

"तुम्हे बहोत दुःख पहुँचता हु न मैं?", अर्जुन ने जाने कैसे ये कहा था और प्रीती उचक कर उसका चेहरा देखने लगी. वो मायूस तोह नहीं था बस कुछ सोच में डूबा सा दिखा. प्रीती ने थोड़ा सा आगे हो कर अपने होंठो को बड़ी नजाकत से अर्जुन के लबो पर जोड़ते हुए आँखें मूँद ली.

"जितना खुश मैं हु न अर्जुन, इतना तोह शायद तुम भी नहीं होंगे. अगर तुम्हे लगता है की मल्टीप्ल फिजिकल रिलेशन्स मेरे लिए कुछ मायने रखते है तोह तुम गलत हो. हर उस लड़की की आँखों में मैंने अपने लिए जलन की जगह ख़ुशी और रेस्पेक्ट हे देखि है जो तुम्हे पसंद करती है. बस कभी किसी से ऐसा वादा न कर देना अर्जुन जिस से तुम स्वार्थी साबित हो जाओ.", अर्जुन निरुत्तर हो चूका था और एक पल में हे उसके सामने वो सभी चेहरे घूम गए जिनके साथ वो हमबिस्तर हुआ था. किसकी चाहत क्या थी ये जान ने से पहले.

"ाचा ये सब छोडो और एक बात तोह बताओ जान?", अब प्रीती जाने क्या पूछने वाली थी क्योंकि पिछली बात से हे अर्जुन उभरा नहीं था.

"हम्म..", अर्जुन ने बस सर हिला दिया.

"तुम्हारे अंदर जो भी चंगेस आये है पिछले कुछ महीनो में शायद वो वजह हो सकते है तोह उस बात को भूल जाओ. क्या कोई ऐसा है जिसके सामने तुम मुझे भी भूल जाते हो? मेरा मतलब की तुम हम दोनों के साथ उसको कपड़े करते हो?", प्रीती का सवाल गंभीर था लेकिन चेहरे पर अलग हे चमक. अर्जुन के शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी थी लेकिन वो प्रीती से कुछ छिपाना भी उचित नहीं मान रहा था.

"ऋतू के सामने मैं हम दोनों को भूल जाता हु या मतलब हम दोनों हे उनका हिस्सा है जैसे.", अर्जुन से सबसे पहले जो कहते बना उसने वो सच बोल हे दिया जिस पर प्रीती ने उसके दोनों गाल खींच कर नाक से नाक लगते हुए मस्ती में कहा.

"उन्हें बीच में नहीं लाओ न. अब मुझे वो नाम बताओ जो मैं नहीं जानती या तुम्हे लगता है की तुम्हे उस से दूर रहना चाहिए.", अर्जुन जैसे ये बोझ भी अब उतार हे देना चाहता था क्योंकि इन दोनों के बीच प्रेम को शशक्त रखने के लिए सबसे जरुरी था डर को दरकिनार करना.

"मैं कभी तुम्हारी किसी से तुलना नहीं करता प्रीती. मैं गलत हु क्योंकि तुमसे अलग मेरे सम्बन्ध है और वो कैसे या क्यों है इसको तुम समझ भी सकती हो लेकिन जब भी कोई मुझसे इजहार करती है तोह मैं उसको जरूर अपने दिल पर हाथ रख कर देखता हु. मेरी धड़कन कभी नहीं बढ़ी ऐसा करने पर क्योंकि हमारा प्यार अटूट है. बस 3 बार ये धड़कन कुछ पल के लिए डगमगाई जरूर है.", अर्जुन ने प्रीती को करवट के बल अपने बराबर हे लेता लिया था और अर्जुन की हालत देख प्रीती ने हलके से उसके बालो में उँगलियाँ फिरते हुए आगे बोलने को कहा.

"अंशु के साथ मैं कभी दोस्त..

"अगला नाम बताओ न बुधुराम.. उसका मुझे पता है..", प्रीती ने थोड़ा हँसते हुए कहा तोह अर्जुन झेंप गया था.

"तुम्हे तोह अन्नू के बारे में भी पता है..", अर्जुन ने बड़ी हे मासूमियत से दूसरा नाम बताया.

"और लास्ट ओने?", प्रीती के चेहरे पर जो शरारत थी उसका मतलब साफ़ था की उसको मजा आ रहा था अर्जुन को सताने में.

"वो ऐसा भी नहीं है मानो (बिल्ली) लेकिन थोड़ा अजीब सा लगा जब मैंने अफसाना को देखा था. मुझे उसके साथ वो वाली फीलिंग नहीं आयी जो तुम्हारे करीब होने पर होती है लेकिन पता नहीं क्यों वो अजीब सा एहसास था. मतलब .. पता नहीं लेकिन शायद ये मेरा वहां है या उसमे कुछ अलग सी एनर्जी है."

"बुद्धू कही के.. तुम बस क्यूरियस हो गए थे और शायद ऐसा हे कुछ अफसाना के साथ हुआ है. पता है वो तोह बेचारी रोने हे लग पड़ी थी, अपनी उर्दू के लम्बे लम्बे वर्ड्स बोलती हुई. हीहीही.. सच कहु तोह वो ख़ास तोह है हे लेकिन शायद वो कुछ ज्यादा हे सेहमी रहती है जिसकी वजह उसका खुद का खूबसूरत होने के साथ साथ कुछ बाद एक्सपेरिएंसेस भी है. तुम्हे खुद नहीं पता लेकिन जैसे तुम्हे यही दोनों बात उसके चेहरे में नजर आयी और वो ख़ास तोह है हे, इसमें कोई शक नहीं पर एक और राज की बात है.", प्रीती जितने आराम से ये सब गुफ्तगू कर रही थी अर्जुन उसके उलट बस हैरान हुए जा रहा था. उसकी ये बिल्ली तोह समझ से ज्यादा हे समझदार और जानकार निकली.

"कैसा राज और तुम इतनी कॉंफिडेंट कैसे हो?"

"पहले न एक 'हुंका एक चुम्मा दू सजनवा, तभी हम तुमका बताई'.", प्रीती की नौटंकी और ऐसा मस्ती भरा निवेदन देख अर्जुन सब भुला कर उसके ऊपर छ गया. कुछ पल उसकी neeli-hari आँखों में देखते हुए वो आहिस्ता से निचे झुका और बड़े प्यार से उसके नरम गुलाबी होंठो को मुँह में भरते हुए चूसने हे लगा. उस से कही ज्यादा तड़प और जोश प्रीती में था जिसने अर्जुन की जीभ हे अपनी मुँह में खींच कर kaatna-choosna शुरू कर दिया. प्रीती के लम्बे नाखून अर्जुन के सख्त कूल्हों पर गहरा दबाव बनाते हुए जैसे उसके जिस्म को प्रीती में सामने का प्रयास करने लगे. ये जोश जाने कितना बलवत था की आज अर्जुन की सांसें उखाड़ने लगी थी और वो इस नाजुक अप्सरा की पकड़ में कसमसाने हे लगा पर निकल न सका. अर्जुन की जिव्हा और निचले होंठो से निकलते हलके लहू का एहसास होने पर भी प्रीती तब तक न रुकी जब तक अर्जुन लगभग निर्जीव सा न हो गया. दृश्य ऐसा था की उस 90 किलो के जिस्म को प्रीती ने हे अपनी बगल में पलट दिया था. इसके बाद प्रीती 5 मिनट तक बस अर्जुन की हालत देखती रही जो आँखें बंद किये खुद को दुरुस्त करने में लगा था.

"हहहहहहह.. ये.. ये क्या.. ये क्या हुआ था अभी?", अर्जुन पूरी तरह सम्भला नहीं था लेकिन उसकी हैरानगी ने विवश करवाते हुए जवाब माँगा. प्रीती अब उसके माथे को सहलाती हुई पहले दोनों आँखों को चूमने के बाद हे बोली.

"हम एक दूसरे के लिए सिर्फ इसलिए ख़ास नहीं है अर्जुन की एक दूसरे से प्यार करते है और आपस में ख़ास कनेक्शन है, सोल कनेक्शन. हम ऐसे इसलिए भी है क्योंकि जरुरत पड़ने पर सिर्फ हम हे एक दूसरे को संभल सकते है. तुमसे एक ख़ास सवाल करू? जवाब देना हे पड़ेगा.", प्रीती ने बड़े अधिकार से ऐसा कहा था और इस पल में अर्जुन सचमुच उसके सामने कमजोर हे था.

"हाँ."

"तुम्हे खुद भी पता है की तुम कैसे हो और तुमने शायद कभी किसी के साथ अपना कण्ट्रोल नहीं खोया होगा, मेरा मतलब उस ख़ास मोमेंट से है जो तुम ाचे से समझ रहे हो. फिर भी कोई ऐसा तोह होगा जिसने तुम्हे खुद हे फ्री या समझो आजाद कर दिया हो. कौन था वो?", प्रीती ने एक भी लफ्ज़ ऐसा इस्तेमाल नहीं किया था जिसमे संसर्ग, मिलान जैसा कुछ हो. चुदाई की दौरान अर्जुन ने क्या कभी किसी के साथ अपनी समस्त ऊर्जा दिखाई थी, यही सवाल था उसका.

"ऋतू.. वो भी मुझे नहीं पता चला था और याद भी नहीं बस मैं होश खो बैठा था..", अर्जुन झेंप रहा था ये सब बताते हुए.

"जवाब मिल गया होगा अब तुम्हे मेरे भोले बालम की मैंने तुम्हे कैसे संभाला. और मेरे ऐसा करने की वजह समझते हो?", आज प्रीती हे अर्जुन को एक गहरा ज्ञान देने वाली थी और किसी ाचे विद्यार्थी की तरह अर्जुन बस सर हिला रहा था.

"ध्यान से सुनो अर्जुन. जब कोई इंसान बहोत समय के लिए खुद को किसी बंधन में रखता है और फिर उसके मैं में किसी ख़ास वजह से आजाद होने की इत्छा उत्पन्न हो तोह ध्यान रखना उसका एनर्जी लेवल वो खुद भी नहीं पहचानता. तुमने अफसाना में वही ख़ास बात देखि और उसके अट्रैक्शन की वजह तुम्हे पता भी नहीं होगी. आरती उसकी एकमात्र और बेहद ख़ास सहेली है जिसके साथ वो बचपन से रही है. अफसाना को गहरा दुःख था जब उसको आरती ने बताया की अब वो पंजाब से इधर हे रहने वाली है, हमेशा के लिए. तुम लोग यूनिवर्सिटी से काम करवा कर आये थे उस दिन और फिर अफसाना ने हिम्मत दिखा कर खुद को बाकी सभी के बीच शामिल किया जबकि वो उस से पहले तक गुरदीप से भी कभी ख़ास बातचीत नहीं करती थी.", प्रीती वो सब बता रही थी जो शायद हे किसी को पता हो और अर्जुन को तोह अफसाना के बारे में ज्यादा कुछ खबर थी भी नहीं.

"फिर?"

"फिर अफसाना को वह यूनिवर्सिटी में जो भी हुआ उसके बारे में पता चला लेकिन उसने तुम्हे सबके सामने एक बार भी नजर उठा कर नहीं देखा. तुमने उसको उस दिन तभी देखा था न जब वो चेहरा धो कर बाथरूम से निकली थी?"

"हाँ..."

"उस से पहले अफसाना ने तुम्हे किसी न किसी की मौजदगी में हे साइड से देखा था लेकिन तुम दोनों का वही पहला मौका था जिसमे तुम दोनों हे थे और तुम्हे एकदम अपने सामने देख वो हैरान इसलिए हुई थी क्योंकि एक इमेज उसके दिल में बन चुकी थी तुम्हारी लेकिन जब सामना हुआ तोह दोनों अपनी अपनी वजह से हैरान भी हुए और कुछ बोल भी न सके. अफसाना ने तुम्हे ाचे से समझा और पहली बार उसको लगा की तुम बाकी दुनिया की तरह नहीं हो और सचमुच ख़ास हो. लेकिन मेरे बारे में जान ने के बाद उसने सबसे पहले मुझसे मिलते हे दिल से माफ़ी मांगी, उस सबके लिए जो कही से भी गलत नहीं था. मैं पहली बार तुमसे ये बार कह रही हु अर्जुन और कोई दबाव नहीं दे रही.", प्रीती ने जिस गहराई से अर्जुन के चेहरे को देखा था वो समझ सकता था की बात नजर से भी कही ज्यादा गहरी है.

"तुम बस कहो प्रीती और जैसा कहोगी वैसा हे होगा."

"अफसाना के साथ दिल से दोस्ती रखना अर्जुन, साफ़ दोस्ती जिसमे वो खुद को महफूज और खुश देख सके. अगर तुम उस से ज्यादा एक इंच भी आगे गए तोह शायद वो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगी और उसके बाद जो होगा वो कभी ठीक नहीं हो पायेगा. अफसाना तुम्हे मन नहीं करेगी और वो कर भी नहीं सकती लेकिन तुम्हे समझना होगा की सही क्या है. उसको दुनिया भी देखनी है और दोस्त भी बनाने है. बेहतर रहेगा तुम भी दोस्ती करना सीखो. सच्चे दोस्त समाज, दुनिया और परिवार की भी परवाह नहीं करते जब बात उनके दोस्त की हो. उसको ऐसे हे दोस्त की जरुरत है और इसमें मैं भी तुम्हारे साथ हु.", प्रीती ने जिस तरह से अर्जुन को आज दोस्त और एक जकड़े हुए इंसान की परिभाषा दी थी वो शायद हे कोई और कर सकता था. आज अर्जुन ने उसका ये बेहद ख़ास पहलु देखा था जिसने प्रीती के प्रति उसके प्रेम को और ज्यादा ऊंचाई प्रदान की थी.

"तुमने बिलकुल सही कहा प्रीती और मैं शायद ये समझ नहीं पाने की वजह से खुद हे उस से दूर भाग रहा था. लगता था कही ऐसी गलती न कर दू जो मुझे हे अपनी नजरो में न गिरा दे."

"शहहह.. तुम कुछ भी ऐसा नहीं कर सकते मेरी जान, कभी भी नहीं. अब बस मुझे अपने ऊपर सोने दो और बाकी सब मैं खुद संभल लुंगी. हाँ, वो सरदारनी नहीं maan-ne वाली, पहले हे बता देती हु. बेवकूफ ये भी नहीं समझ रही की लेने के चक्कर में देने न पड़ जाए.", प्रीती ने हाथ पीछे ले जाते हुए अपनी ब्रा टीशर्ट के अंदर से हे खोल कर एक तरफ रखते हुए बड़ी चंचलता से गुरदीप का जीकर किया था. अर्जुन शर्म से कुछ कह न सका तोह प्रीती के मुलायम जिस्म को अपने आगोश में लेते हुए लिपट गया.

"ी लव यू मेरी मानो. सचमुच तुम हे हो जो मुझे ऐसे समझा सकती हो.. उमाहहह.", यहाँ उन उभारो का एहसास जरूर था अर्जुन को जो उसके सीने से डब्ब रहे थे लेकिन उसको तोह बस प्रीती के साथ होने से मतलब था. प्रीती भी अब चैन से उसके ऊपर लेती थी, नींद में जाने से पहले का एक ख़ास सुकून.

"उम्. ी लव यू तू जान.. वैसे ये सब मैं हे तोह समझा सकती हु तुम्हे. ऋतू दीदी ने तोह अब तक तुम्हारा गाल हे लाल कर देना था अगर वो अफसाना से इतनी बातें कर लेती तोह.. हेहेहे.. मजाक कर रही हु बेबी.. अब मुझे निनी करवाओ बस..", और अर्जुन भी इस पल में प्रीती को थपकी देता आँखें बंद किये मुस्कुराने लगा. साथ प्रीती थी और उसके सोने से पहले ऋतू का जीकर सुन्न कर जैसे अर्जुन भी बगल में अदृश्य ऋतू की थपकी अनुभव करता हुआ गहरी नींद में चला गया. हर व्यक्ति के जीवन में किसी एक चरित्र का ख़ास महत्व होता है लेकिन अर्जुन के जीवन में तोह ऐसे अनेक थे जो उस पर अपना सर्वस्व कुर्बान कर करने में एक पल भी न गंवाए. तारो की छाँव में एक चन्द्रमा आसमान में रोशन था और दूसरा अर्जुन की बाहों में.

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'Ghanan-ghanan' की ये आवाज उमेद के shayan-kaksh में रखे काले टेलीफोन की थी जो बिस्टेर की बगल में हे रखे लकड़ी के गोल तिपाये स्टूल पर पड़ा बज रहा था. राजेश्वरी अभी बाथरूम में थी और चौथी घंट पर अलसाये हुए उमेद सिंह ने हे फ़ोन का हैंडल उठाते हुए अपने कान से सत्ता लिया

"कौन है भाई.. uhhhhaahh",Ubaasi लेता हुए वो सामने वाले की आवाज का इन्तजार करने लगा. साढ़े 4 बजे तोह Inder-Shankar हे फ़ोन कर सकते थे लेकिन अभी तोह उनकी उम्मीद भी नहीं थी.

"Hello.. उमेद सिंह.."

"बोल रहा हु भाई उमेद हे बोल रहा हु.", उमेद अभी तक आलस में था लेकिन ये आवाज जैसे उसके लिए नयी थी.

"शायद तुमने पहचाना नहीं भाई. मैं गजेंद्र भल्ला बोल रहा हु.", इस आवाज के मालिक का नाम सुन्न कर उमेद तुरंत उठ बैठा. इस व्यक्ति का फ़ोन वो भी घर के नंबर पर आ सकता है इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी. लेकिन इस वक़्त क्यों ये ज्यादा हैरानी की बात थी.

"हाँ भल्ला साहब. बताओ आपने गरीब को कैसे याद किया? बात जरूर बड़ी हे होगी.", उमेद ने एक तरफ रखा पानी का लौटा उठा कर घूँट भरा और भल्ला की आवाज का इन्तजार करने लगा.

"बहोत जरुरी हे बात है भाई और हमे बस तुम्ही याद आये इस परेशानी की घडी में.", अब उमेद पूरी तरह जाग चूका था और भल्ला की आवाज में जो दुःख था वो उमेद महसूस कर सकता था.

"गजेंद्र भाई साहब आप बस नाम बताओ या परेशानी. अगर आपको मेरा हे ध्यान आया है तोह फिर उमेद सिंह ये मान बरकरार रखेगा. सोचिये मत और बात बताये.", उमेद बात करते हुए हे अपने पाँव में जूती पहन चूका था. तकिये के निचे राखी रिवॉल्वर अपने पाजामे के भीतर खोंसता वो जैसे अब किसी अनहोनी से भिड़ने को तैयार बैठा था.

"हमारे बेटे का पता नहीं चल रहा है. कल रात हे क्सक्सक्सक्स राजस्थान के बोर्डिंग स्कूल से मेरे ख़ास आदमी और ड्राइवर उसको ले कर निकले थे और आधे घंटे पहले हे ड्राइवर से पुलिस ने बात करवाई है. उसको गोली लगी है और हमारा सुरक्षाकर्मी मारा जा चूका है. पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा और मुझे लगता भी नहीं की पुलिस की मदद लेनी चाहिए इस मामले में. मेरा एक हे बीटा है उमेद और वो भी 15 बरस का. भगवान् के लिए...", भल्ला दूसरी तरफ से अश्रुधारा बहा रहा था जो उमेद को साफ़ पता चल रही थी. एक खतरनाक इंसान और ताक़तवर राजनेता था गजेंद्र भल्ला लेकिन आज उसकी हद्द से बहार उसके हे परिवार का चिराग लापता था.

"आपके ड्राइवर ने जो भी बतया है भाई साहब, विस्तार से बताये. अगर ये मामला मेरे हे कही आसपास का है तोह भरोसा रखिये, उमेद उसको कही से भी ढून्ढ निकलेगा. और हिम्मत रखिये क्योंकि भाभी और परिवार को आपने हे संभालना है.", उमेद के सामने अब तक पूर्णिमा जी चाय का प्याला रख कर जा चुकी थी. भल्ला ने इसके बाद पूरा विवरण जैसे तैसे दिया जितना उसको बताया गया था. मामला अपहरण का था और वो भी एक बड़े व्यक्ति के बेटे का. रकम के लिए अभी तक फ़ोन नहीं आया था मतलब वो लोग अपने ठिकाने नहीं पहुंचे होंगे. और ऐसे मामलो में रकम मिलने के बाद भी व्यक्ति को मार हे दिया जाता है. उमेद फ़ोन रखने के बाद गहरी सोच में डूब गया था.

'साला ये तोह अपने हे नेशनल हाईवे के पास काण्ड हो गया. इतना गुड्डा किसके पास है इस तरफ जो ऐसा काण्ड कर जाए और पुलिस को भनक हे न हो. चाचा जी से बात की तोह मामला फिसल सकता है और वो ठहरा बचा.', उमेद सोचविचार कर फ़ोन की तरफ बढ़ा और नंबर मिलाने लगा. चाय पर अब मलाई आ चुकी थी जिसकी उमेद को जरा भी परवाह न थी.

"इन्दर, वह तेरे aas-pas अर्जुन है क्या?", दूसरी तरफ फ़ोन नरिंदर ने उठाया था जो बैठक में अभी सो कर उठा हे था.

"इतनी सवेरे तुझे अर्जुन की याद क्यों आयी बे गज्जू? थोड़ी देर में तू आ तोह रहा हे है."

"अबे ओह नंदलाल, अर्जुन तेरे aas-pas है तोह उसको बुला. बाद में बताता हु तुझे मैं सब.", उमेद ने जिस तरह खिसियाते हुए कहा था नरिंदर बगल खुजाते हुए हंसने हे लगा.

"अर्जुन.. हैं तोह घर में हे तू एक मिनट होल्ड कर.", नरिंदर ने अपनी माँ के कमरे वाले दरवाजे से भीतर देखा तोह ऋतू शायद आवाज सुन्न कर उठ गयी थी. बाकी वह न कौशल्या जी थी और न हे देवकी.

"बीटा, अर्जुन को बुला जरा. कहना की उमेद का फ़ोन है.", ऋतू को संदेसा दे कर नरिंदर आदतन उमेद की टांग खिंचाई में जुट गया जो उमेद दिल पे पत्थर रख कर करवाता रहा. ऋतू भीतर आयी चली आयी जहा अर्जुन नदारद था. कसरत वाली जगह भी न दिखा तोह उसके कमरे में गयी.

'अब ये महाराज कहा चले गए जबकि चाचा जी तोह कह रहे है की वो घर में हैं'

"आप किसी को खोज रही है आपि?", अफसाना स्नान के बाद सर को ढके जैसे नमाज से फुर्सत हुई थी. ऋतू को भटकते देख जेहनी तौर पर उसने वजह पूछी तोह ऋतू ने एक पल उसको देखा और फिर सिर्फ इतना हे कहा.

"अर्जुन.", ये नाम सुन्न कर अफसाना ने एक पल शर्म से नजरे झुकाई और फिर छत की तरफ इशारा कर दिया. ऋतू हैरत से उसको देखती ऊपर चल दी. अफसाना को अर्जुन की खबर थी ये बात गले नहीं उतरी लेकिन ऊपर आते हे उसने सर पे हाथ रख लिया. सिर्फ पजामा पहने ऊपर से निर्वस्त्र अर्जुन टेढ़ा लेता था और उसके ऊपर प्रीती बेसुध सी दुनिया भूलकर. अभी पूरी तरह उजाला न हुआ था लेकिन 5 बजने वाले थे. प्रीती की ब्रा इस तरह पड़ी थी जैसे ये दोनों अपने शयनकक्ष में दरवाजा बंद कर के निश्चित मनमर्जी करके सोये हो.

"ओह कमीनो.. तुम मरवाओगे अपने साथ साथ मुझको भी.", ऋतू ने प्रीती को हिलाये बिना अर्जुन को झिंझोड़ा. कसमसाती हुई प्रीती भी उठती हुई आँखें खोलने लगी तोह सामने ऋतू का धुंदला सा चेहरा नजर आया.

"यार मैंने नै आपके साथ सोना.", प्रीती नींद में हे थी जो फिर से गद्दे पर अर्जुन से लिपट गयी लेकिन अब अर्जुन इधर उधर देख रहा था.

"इसको सोने दे और तू चल निचे. उमेद चाचा का फ़ोन है तेरे लिए, इन्दर चाचा ने कहा है. बाकी सवाल मैं तुझसे बाद में करुँगी.", अर्जुन तुरंत दौड़ गया जिस हालत में था वैसे हे. कुछ सोच कर ऋतू अब प्रीती की बगल में आ लेती.

"जान, हलकी ठंडी लग रही है.", प्रीती नंदी सी ऋतू से लिपटी तोह ऋतू कामिनी मुस्कान के साथ खुद भी उस से चिपक गयी. एक हाथ जैसे हे प्रीती के आज़ाद उभर पर रखा था अब प्रीती को करंट लगा.

"आप? अर्जुन कहा है?", हाथ अभी भी प्रीती के उभर पर हे था लेकिन वो विस्मित सी अपनी बगल में ऋतू को देखती रही.

"सुधर जाओ रे तुम दोनों सुधर जाओ. तेरी ब्रा कहा है पता है? ऊपर से खुली छत पे तुम दोनों nang-dhadang से पड़े थे. शायद अफसाना भी देख गयी तुम्हे जिसने मुझे बताया की अर्जुन कहा है."

"ओह सहित.. दीदी सॉरी. वो आँख नहीं खुली तोह वापिस नहीं जा पायी कमरे में. लेकिन कसम से कुछ भी नहीं किया हमने.", प्रीती की मासूमियत देख कर ऋतू भी हंसने लगी.

"जानती हु तुझे मैं मेरी गुड़िया. लेकिन थोड़ा तोह सबर रखो यार जब इतने लोग घर में है. वैसे रिस्क लेना बेकार हे गया जब कुछ किआ हे नहीं."

"दीदी.. और अब इधर से तोह हाथ हटा लो नहीं तोह ..", प्रीती ने जब ऋतू का ध्यान अपने उभर की तरफ दिलाया तोह ऋतू ने हँसते हुए उसको अपने साथ हे लगा लिया.

"तू न नखरे मैट हे किया कर. और धमकी तोह तेरी किसी काम की नहीं जो तुझे पता हे है. वैसे कुछ किया नहीं लेकिन फीलिंग पूरी ले रहे थे."

"धत्त.. चलो अब जाने दो मुझे निचे. पता नहीं अफसाना के साथ साथ और कौन देख गया होगा?", प्रीती थोड़ी चिंतित दिखी तोह ऋतू ने उसका गाल सहलाते हुए चिंता दूर की.

"और कोई इधर नहीं आया. तू परेशां मैट हो किसी का सोच कर. कोई कुछ कह के तोह देखे जरा तुझे कुछ. घर के बड़े तोह ऊपर आते नहीं है और बाकी किसी की मजाल नहीं जो मेरी प्रीती को कुछ कह दे. चल अगर थोड़ी देर और सोना है तोह आँखें बंद कर ले.", ऋतू ने बड़े स्नेह से प्रीती का चेहरा अपनी ब्याह पे रखते हुए दुलार जताया तोह वो भी किसी बचे की तरह आँख बंद करके वापिस सोने लगी. दूसरे हाथ से ऋतू ने वो ब्रा तकिये के निचे कर दी. फिलहाल कोई इतना जरुरी काम भी न था के ऋतू को जाना पड़ता. प्रीती को आराम देती वो अपने हे विचारो में डूब गयी.

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अगले आधे घंटे से पहले अर्जुन की काली लांसर इस घने मोहल्ले में कड़ी थी जहा यूनिवर्सिटी वाले सुरक्षा प्रमुख का विख्यात भाई सोनू रहता था. कुछ छोटे बचे जो इतनी सवेरे जाग जाते थे वो संकरी गली में कड़ी इस कार को हाथ लगा कर हे खुश हो रहे थे और उस बिना प्लास्टर के 2 मंजिला घर के भीतर आँगन में अर्जुन उस निवार वाली लोहे की कुर्सी पर एक सख्त जान व्यक्ति के सामने बैठा था.

"देखो अर्जुन भाई मामला तोह समझ आता है और जिस तरह अंजाम दिया गया है तोह वो लोग भी मेरे अनुमान से जान पहचान के है. लेकिन कैंप का कोई भी व्यक्ति उनके साथ दुश्मनी नहीं करेगा. आपस में सम्बन्धी है और जुड़ाव के साथ साथ एक दूसरे की मदद भी करते है."

"सोनू भैया, बात सिर्फ अपहरण की होती तोह बदले में पैसा दे कर सुलट सकते थे. एक हाथ दिया और एक हाथ लिया वाला मामला. लेकिन उन्होंने एक आदमी को जान से मारा है और दूसरा भी बुरी हालत में है. आपको भी पता है की पैसा मिलने के बाद भी वो लोग लड़के को तोह वापिस नहीं करेंगे.", अर्जुन के हाथ में पानी का गिलास था जिसकी एक घूँट तक उसने न भरी थी. सोनू की बीवी चूल्हे पर चाय रखने के साथ साथ इन दोनों को भी देख रही थी. सोनू के बचे अंदर कमरों में इत्मीनान से सोये थे.

"भैया, कुछ तोह लीजिये.", सोनू की बीवी ने दोनों के बीच हलकी ख़ामोशी देख अर्जुन से कहा.

"भाभी जी, अब ये तोह सोनू भैया के ऊपर है की वो मुझे नमक खिलाना चाहते है या भेजना.", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर सोनू चिंतित हो गया जबकि अर्जुन के चेहरे पर ठीक वैसी गंभीरता थी जैसी रामेश्वर जी के दिखाई पड़ती थी जब वो सामने वाले को मौका देने की बात करते थे.

"देखो अर्जुन भाई, कैंप एक परिवार है और तुमने भी कभी हमको अलग नहीं समझा. लेकिन जो तुम चाहते हो उसके नतीजे खतरनाक हो सकते है. निम्मा एक कपटी व्यक्ति है जिसको पकड़ना इतना आसान नहीं. इसलिए तोह वो फिरौती लेने के बाद भी शिकार को ख़तम करके सब सबूत हे मिटा देता है. वो लोग कैंप वालो के साथ दुश्मनी नहीं करेंगे लेकिन अगर उन्हें पता चला की यही से उनका भेद खुला है तोह फिर अंजाम हमारे खिलाफ भी जा सकता है."

"सोनू भैया, न मैं आपके पास आया न वो इस बार बचेंगे. आप बस ये बताओ की उनका ठिकाना कहा है और आपकी परेशानी ख़तम करते हुए मैं इतना भी बता दू के जो फिरौती लेने जायेगा वो भी नहीं बचने वाला. मतलब सभी गायब हे होंगे जो भी शामिल हुए.", अर्जुन के विश्वास को देख सोनू ने अपनी बीवी से किसी को बुलाने को कहा. अगले 10 मिनट तक 2 लोगो के साथ सोनू बहार हे मंत्रणा करता रहा और गंभीर चेहरे के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ.

"निम्मे ने हे अंजाम दिया है उस वारदात को. क्सक्सक्सक्स गाँव से आगे लड़कियों के बड़े स्कूल की तरफ एक रास्ता उतरता है. वही hadda-rohdi (जानवर दफ़नाने की जगह) से पहले एक खंडहर है जिधर वो गिरोह शिकार को रखता है. फिरौती कहा मंगवाई जाएगी ये तोह वही फ़ोन पर बताएँगे लेकिन पीछे भी 4 लोग रुकेंगे. काम होने के बाद वही hadd-rohdi में जानवरो के बीच हे शिकार के टुकड़े मिला कर वो लोग हफ्ते 2 हफ्ते वापिस अपनी बस्ती में. एक बार फिर से सोच लो अर्जुन, वो लोग कसाई है.", सोनू ने चेतावनी की जगह अर्जुन के प्रति चिंता दिखाई तोह पानी का घूँट भरने के साथ साथ अर्जुन ने सामने राखी प्लेट से नमकीन का टुकड़ा खाते हुए आँख दबा दी.

"चलता हु भाभी जी, गुल्लू के साथ जब खेलने आऊंगा तोह रोटी खा कर जाऊंगा. वैसे मुझे मटर वाले चावल और बूंदी का रायता पसंद है. धन्यवाद् सोनू भाई.", अर्जुन ने कार में बैठने से पहले सोनू को गले लगाया और हाथ हिलता हुआ सामने की तरफ हे निकल चला. इस बस्ती से आगे हे हाईवे की तरफ सड़क निकलती थी. इतनी सुबह रस्ते में पीसीओ के लिए नजर दौड़ता अर्जुन भी अजीब कश्मकश में था.

'उमेद चाचा ने मुझे जिम्मेवारी सौंपी क्योंकि उन्हें मुझपर विश्वास है. उन्होंने सिर्फ पता लगाने का कहा है लेकिन अगर वो समय रहते दोनों जगह न पहुंच पाए तोह.?', अर्जुन विचारो में उलझा था की सड़क ख़तम होने से पहले हे सदाप की बायीं तरफ पानी की छिड़काव से उड़ती मिटटी देख वो पीसीओ नजर आया. कार थोड़ा आगे रोक कर पर्स से खुल्ले पैसे निकलने के बाद उसने बगल वाली सीट पर नजर डाली तोह उस सफ़ेद गमछे को सर पे बांध लिया.

"भैया फ़ोन कर सकते है?", ये व्यक्ति कोई 30 बरस का होगा जो छिड़काव में मसरूफ था.

"कर लो भाई, फ़ोन चालू है और बिल के लिए चिकचिक मैट करना. वैसे हे ज्यादा कुछ बचता भी नहीं और इधर के लोग एक रुपये के लिए झगड़ने लगते है. छुट्टे खुद नहीं लाएंगे और 9 के अगर 10 काट ले तोह 4 गाली मुफत में दे जाते है.", व्यक्ति शायद तंग आ चूका था कैंप बस्ती से और अर्जुन अंदर दाखिल हो कर उमेद सिंह का नंबर मिलाने लगा.

"हाँ चाचा जी. कोई फ़ोन आया पार्टी का?"

"तुम्हे क्या खबर लगी है? वैसे 10 मिनट पहले हे फ़ोन आया था उस तरफ की 8 बजे बाईपास चुंगी पर 50 लाख हनुमान मंदिर के पीछे वाले प्लाट में छोड़ दिए जाए. उसके बाद 8:30 पर लड़का जीरी सड़क के मदद वाले खेत में पंहुचा दिया जायेगा.", उमेद जिस तरफ था वो खुल कर बात कर सकता था लेकिन ये पब्लिक बूथ था जहा टेलीफोन अर्जुन के सामने खुले में था.

"अपने दोस्त मंदिर के करीब अभी से हे भेज दीजिये चाचा जी. एनिमल क्रीमेशन ग्राउंड पर फूल और कांटे मिल सकते है लेकिन सिर्फ माली हे कांटे संभाल सकता है. कोई ख़ास गया तोह फूल मुरझा जायेगा. आप मंदिर सम्भालिये और फूल के मालिक को वही रखियेगा. मैं उधर हे मिलता हु.", उमेद हैरान था अर्जुन के बात करने के लहजे से और जबतक वो कुछ और बात करता अर्जुन फ़ोन काटने के बाद बहार खड़े व्यक्ति को 50 रुपये थमा कर कार की तरफ जा चूका था. ये व्यक्ति भीतर आया तोह बिल मशीन पर रकम 3 रुपये 60 पैसे नजर आयी.

"चलो, भगवन की कृपा से बोहनी शानदार रही.", वो खुश था और अर्जुन समय के अभाव की वजह से tivra-gati से कार दौड़ता उस सड़क पर आ चूका था जहा से एक रास्ता बबिता की हवेली वाले गाँव जाता था और और दूसरा उमेद सिंह के.

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"गजेंद्र भाई, आपके लिए आज मैंने अपने बेटे को हे दांव पर लगा दिया है. उसको सिर्फ सुराग पता लगाने भेजा था लेकिन अब वो इस सबमे शामिल हो कर मेरी भी हालत आप जैसे कर चूका है.", उमेद ने भल्ला को फ़ोन लगाया तोह उस वक़्त भल्ला भी तूफानी रफ़्तार से चलती कार में सेलुलर फ़ोन पे उमेद की बात सुन्न रहा था. चेहरे पर गहरी चिंता और बगल में आंसू बहती हुई एक 17-18 बरस की युवती, जो भल्ला की बेटी थी.

"उमेद भाई, मैं अगले 2 घंटे में आपके पास पहुंच जाऊंगा. वाहेगुरु बस आज किसी तरह बचो को बचा ले उसके बाद मैं हम दोनों का केहर इतना बुलंद कर दूंगा की हमारे बचो पर निगाह डालने वाली हर आँख कबर में मिलेगी. उमेद, हम वही मिलते है.", भल्ला ने अपनी बेटी को सीने से लगते हुए फ़ोन का लाल बटन दबाया और बेटी को हौंसला देने लगा. ये विदेशी लम्बी कार लगभग 200 पर दौड़ रही थी और दूसरी तरफ उमेद की दिल की धड़कन भी.

'साला ये सचमुच पागल हे है. मुझे भी मौत पड़ी थी जो अर्जुन से बात की. लग गए तगड़े वाले.', उमेद ने भन्नाते हुए अगले 10 हे मिनट में 5-6 फ़ोन खडका दिए थे और उसके बाद जब वो हवेली से निकला तोह आज उसकी काली जीप में किंग उसके साथ हे था. और एक कार में 4 मजबूत सुरक्षाकर्मी, उनके पीछे.

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"ये अर्जुन नजर नहीं आ रहा कही पंडित जी.", 7 बजे हे शास्त्री जी पंडित जी के इधर पधारे तोह बगीचे में चाय का लुत्फ़ लेते हुए उन्होंने यही से बात शुरू की. राजकुमार जी मंडी से सब्जी और जरुरी सामान ले कर अंदर गए थे और खाने की तरफ नरिंदर जी अपनी लाड़ली आरती के साथ असगर को निर्देश देने में लगे थे. कृष्णेश्वर जी देहात से थे तोह उनकी दिनचर्या भी जल्द शुरू हो जाती थी. वो भी बगीचे को निहारते हुए चाय का लुत्फ़ लेने में लगे थे.

"पता नहीं शास्त्री जी वो कहा निकल गया आज? किसी काम से इतनी जल्दी तोह वो कार ले कर घर से जाने से रहा.", एकाएक पंडित जी भी बेचैनी बढ़ी जो आचार्य जी से छिपी न रह सकीय. वो भांप गए थे की अर्जुन किसी अलग हे काम से निकला है.

"जवान लड़का है भाई साहब और क्या पता शादी के हे किसी काम से गया हो. मैंने इसलिए हे पूछ लिया की इस समय तोह वो आपके पास यही दूध पी रहा होता है.", आचार्य जी खामोश हुए तोह इधर आते नरिंदर जी ने राज से पर्दा उठाया.

"आचार्य जी, सॉरी चाचा जी ऐसा है की आपका लाडला अपने ख़ास चाचा से मिलने गया है. और अब उमेद ने उसको क्यों बुलाया है ये तोह वो दोनों हे बता सकते है. लेकिन इतना कह सकता हु की काम उमेद को हे होगा नहीं तोह वो इतनी जल्दी फ़ोन नहीं करता. अब अर्जुन ऐसा कौनसा काम कर सकता है जो उमेद के वश का नहीं ये तोह मैं क्या हे बताऊ.", नरिंदर वही घास में हे बैठ गया और प्लेट से नारियल की बर्फी उठा कर चबाते हुए कृष्णेश्वर जी की धोती से हाथ साफ़ करते हुए उनके साथ धीमी आवाज में कोई चुहल करने लगा जिस पर कृष्णेश्वर जी हँसते हुए उसके सर पर थपकी देने लगे.

"हो सकता है कही लेके जाना हो उमेद ने उसको अपने साथ. शास्त्री जी, उमेद घर का पहला बीटा है अपने. शंकर से 2 महीने बड़ा है लेकिन आपस में ये सभी एक हे जैसे है. अर्जुन जैसा इन्दर के लिए वैसा हे शंकर उमेद के लिए बस उमेद उसको बहोत मानता है.", रामेश्वर जी थोड़ा बेफिक्र हो गए थे ये जान कर और अब आचार्य जी भी मुस्कुराये जब ये बात पता लगी.

"देखा जाए तोह इस बचे ने हमको भी आपसे जोड़ दिया पंडित जी. विरले हे होते है कुछ लोग जो सिर्फ बनाने में यकीन रखते है. मुझे बता रहा था की स्कूल के बाद या तोह कलकत्ता जाऊंगा कॉलेज के लिए या फिर ंसित दिल्ली. ये लड़का न अभी से अपने कई निर्णय बना चूका है. जाने दुनिया की इतनी समझ कैसे आयी है इसमें.", आचार्य जी के कहने पर पंडित जी को भी दिल्ली के कॉलेज वाली बात याद आ गयी.

"सांगत का असर है शास्त्री जी. हाहाहा.. अब दोस्त हे 40 से 70 बरस वाले हो तोह वो दूर की हे सोचेगा... लो जी ये आपके और कृष्ण के लिए ख़ास मूंग की दाल का चिल्ला. हमारी भगवान जब भी रसोई में जाती है तोह समझ लीजिये आज कुछ दिल को सुकून देने वाला खाना हे नसीब होगा.", एक ट्रे में खुद कौशल्या जी 3 प्लेट में मूंग की दाल से बने चिल्ले लिए आयी थी, तीखी और मीठी चटनी के साथ.

"रहने दो जी अब माखन लगाने के लिए. देवर जी ने कल हे कहा था के नाश्ते में इन्होने चिल्ला खाना है लेकिन सिर्फ प्याज, हरी मिर्च और टमाटर के सलाद वाला. कृष्ण को भी पसंद है लेकिन पनीर के साथ. आपको नहीं मिलेगा.", कौशल्या जी ने थोड़े नखरे से कहा था और वो 3 प्लेट बता रही थी की एक पंडित जी की हे है.

"हाँ... ये सही कहा माँ आपने. पापा का न बप सही रखो बस और ये चिल्ला जो है हरी चटनी इस्पे गिराई और ऐसे गोल करके बस इमली चटनी में डुबो कर मुँह में rakha...ummm.. स्वाद हे आ गया कसम से.", सबसे पहले ये कारनामा नरिंदर ने हे किया जो बिना किसी की परवाह के एक प्लेट उठा कर टूट पड़ा.

"देख लो भाई.. एक तोह हमारी थानेदारनी जी हमारे लिए कभी कुछ बनती है और उस पर भी ये लकड़बग्घे हाथ साफ़ कर देते है. हाहाहा..", पंडित जी को बचो की ख़ुशी हे तोह पसंद थी. छोल साहब भी इस तरफ आये तोह कोमल एक और ट्रे में गरम चाय और कुछ चिल्ले लिए आ गयी थी.

"दादी ने सबके लिए हे बनाये है बाउजी. आप चलो दादी, मैं सबके लिए चाय दाल कर चिल्ले लेने आती हु.", यहाँ अब पूरी महफ़िल लग चुकी थी और कौशल्या जी जाते जाते राजकुमार जी को भी बोल गयी की बगीचे में सबके साथ नाश्ता करे. समय 7 से कुछ ऊपर हे हुआ था और एक तरह से ये सिर्फ जायके का हल्का फुल्का दौर था जिसके बाद सभी काम में व्यस्त होने वाले थे.

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हर तरफ ख़ामोशी व्याप्त थी इस खुले मैदान और उसके अगल बगल के निर्जन से स्थान पर. हवा में भयानक दुर्गन्ध ऐसी जिसमे सांस लेना भर मुनासिब न हो. एक तरफ कच्ची पगडण्डी और बाकी कही जानवरो के कंकाल जिन पर चिल्लाते gidh-cheel की बेसुरी आवाज या वो भूखे कुत्ते जो गंदगी में भी हड्डियों पे जमा सदा गाला गोश्त खंगाल कर इत्मीनान से जुटे थे. पगडण्डी से थोड़ा आगे हे दलदली सा कीचड जो दो दिशा में जा रहा था.

इस कीचड और झाड़ियों के झुरमुट से आगे था ये jirn-shirn हालत में खड़ा एक वीरान सा दीखता खंडहर जो अंदर से उतना वीरान भी न था. खाली आँगन जिसमे जाने कैसी कैसी झाड़ियां दिवार तक ऊँची उठी थी और उसके बाद गहरे अँधेरे से ढाका एक खुला सा कमरा. कमरे से आगे कुछ हंसी और ठहाके की आवाज एक और कमरे से आ रही थी.

"ाःह.. तेरे जैसी रंडी आज तक नहीं देखि जुगनी.. साली की गांड और भोसड़ा जितना मर्जी फाड़ो, छेड़ कैसा हुआ है लगता है.", तक़रीबन 6 फ़ीट का एक पक्के रंग का मांसल व्यक्ति मोटी तगड़ी औरत को घोड़ी बनाये अपने भयंकर लुंड से सटासट पेल रहा था. इस कमरे में सिर्फ यही दोनों नहीं थे. उस औरत के मुँह में भी एक तगड़ा लुंड फंसाये वैसी हे kad-kaathi का जल्लाद सा युवक जैसे आखिरी झटके लगा रहा था. औरत के बड़े बड़े दूध किसी घडी के पेनद्ळम से हिलते लेकिन वो इस दो तरफ चुदाई में मजे से लगी रही.

"ओह खैरु, बहनचोद अपनी अम्मा के भोसड़े में काम के बाद भी घुस सकता है. साला अभी काम ख़तम नहीं हुआ और यहाँ गांड हिला कर मुजरा पहले करने लगे तुम तीनो. चल ऋ जुगनी जरा उस कबूतर के पास बैठ और तुम दोनों निकलो वन ले कर माल लेने.", ये आदमी इन दोनों हे युवको से कही ज्यादा हे गहरे रंग का और तक़रीबन सवा 6 फ़ीट लम्बा था. चेहरे पर तीखी मूछे और कमर पर लुंगी के साथ एक देसी तमंचा. वो दोनों युवक उस औरत से हेट तोह मुँह और फैली हुई छूट को सफ़ेद कर चुके थे. खिसियाते हुए दोनों ने जल्दी से patloon-kameej पहनी और कमरे से बहार निकल आये.

"निम्मे भाई, काम होने के बाद इस जुगनी की लोंड़िया से मेरा ब्याह करवा देना बस. रूपया चाहे एक लाख काम डोज तोह चलेगा.", ये लीलू था जो औरत के पीछे चढ़ा था कुछ शन्न पहले. इसने भी कमर में देसी पिस्तौल खोंसने के साथ अपने लम्बी जुल्फों को दोनों तरफ बराबर हाथ चलते हुए दांत दिखाए.

"भोस्डिके जब पहले हे तेरा ब्याह हो चूका है तोह काहे दूसरी गांड में लीनो को मर्डर रहा है.? खैरु, बीटा ध्यान से माल लेना है और साला कोई ऊंच नीच लगे तोह पता है न क्या करना है? माल मिलते हे दरजी के बराबर वाले बूथ से फ़ोन मिला देना पूर्ण को. उसके संदेशे के बाद इस कबूतर को निबटा के खेत में मैं खुद फेंकवा दूंगा. माल के बदले वापिस करने का वादा जो किया है. हाहाहा..", ये sakht-jaan व्यक्ति हे इनका मुखिया था निम्मा कसाई.

"हीहीही.. भाई.. वैसे आजतक साला 2-3 लाख का हाथ मारा था पर किस्मत देखो इस बार सीधा 50 लाख.. बहनचोद जाने क्या हे करम किये थे पिछले जनम जो ऐसी दिवाली नसीब हो रही.", खैरु की बात पर निम्मे ने इशारे से जुगनी को आखिरी वाले कमरे में जाने को कहा और इन दोनों के साथ हॉल कमरे में थोड़ा आगे चला आया.

"ये काम किस्मत हाथ नहीं लगा bhosad-pappu. इसको करने के भी 50 मिल रहे है और दूसरी तरफ से भी 50. तुम सबको 15-15 लाख देने के बाद भी मेरे हिस्से आये 25. मतलब रकम हे नहीं काम भी बड़ा है. होशियारी उतनी हे दिखाना जितनी कही है.", निम्मा धीमी आवाज में दोनों को समझते हुए भी हड़का रहा था. खैरु के दांत होंठो के पीछे छिप चुके थे अपने गुरु का गुस्सा उगलती आँखें देख.

"इस रांड को भी कुछ देना है क्या उस्ताद.?", ये लीलू था जिसका आशय जुगनी से था.

"हाँ बे लीलू इसको खुश रखना बहोत जरुरी है. ये काम न करती तोह वो कार भी न रूकती और पहले भी इसने तुम लोगो की गर्मी उतारने के साथ साथ बहुतो को ठंडा किया. तभी तोह मैंने 5 कहे, 4 नहीं. चल बीटा जल्दी निकल और पौने घंटे में पूर्ण मेरे पास आ जाना चाहिए तुम्हारा फ़ोन सुन्न कर.", निम्मे ने दोनों के कंधे पर थपकी लगते हुए विदा किया और Lilu-Khairu चीते से चाल चलते हुए बड़ी अदा के साथ इस वीराने में बहार निकल आये.

"वाह लीलू, अब देख मैं लूंगा एक नयी मारुती और एक विलायती तमंचा. फिर अपने हे बस्ती के 5 लोंडो के साथ अलग गैंग बना कर ऐश की ज़िन्दगी.", खैरु कीचड से कुशलता से बच कर अब पगडण्डी पर आया तोह लीलू को अपने अरमान बताने लगा.

"हाँ खैरु भाई, मैं आपका मैं रहूँगा याद रखना. वैसे भी दिल्ली की तरफ काम करेंगे तोह रोज 50-50 कमा सकते. इधर साला महीने में लाख कमाओ और उसके बाद 29 दिन मुफत में bakra-murga हलाल करो. निम्मा उस्ताद देखना अब जुगनी की गांड में घुसेगा और काम के बाद नाम भी उसका.", ये दोनों ऐसे हे प्लान बनाते हुए सड़क की दिशा में पगडण्डी पर हो लिए. 2 आँखें निरन्त इन्हे देख रही थी जिसका भान न इनको था और न हे खंडहर में मौजूद निम्मे और बाकी उसके आदमियों को. हरे सरकंडो के बीच छिपे अर्जुन ने कलाई घडी में समय देखा तोह 7:35 हो चूका था.

'यहाँ से बिपास चौक है 22 कम और इनके पास खतरा वन मतलब 30 मिनट. अंदर 3 लोग जिनको निबटना होगा 10 से 12 मिनट में. चल बीटा अर्जुन आज सचमुच चाचा को गुरुदक्षिणा देने का समय है.', खंडहर पिछली तरफ से ज्यादा हे जर्जर था और इधर से ऊपर की छत भी झाड़ चुकी थी. चेहरे पर गमछा बाँध कर किसी सतर्क विडाल सा अर्जुन अब खंडहर के आँगन में दाखिल हो चूका था.

सबसे आखिरी कमरे की खिड़की इस आँगन में भी खुलती थी और अंदर का नजारा लेते हे अर्जुन गंभीर हो गया. जमीन पर बेहोशी की हालत में वो 15 वर्ष का लड़का करवट के बल था और उसके दूसरी तरफ जुगनी को निर्वस्त्र करके अपने मूसल पर तेल रगड़ता निम्मा कसाई. अर्जुन को इस से बेहतर अवसर मिल हे नहीं सकता था.

"देख लिया या पूरी फिल्म देख के हे मानेगा?", ये आवाज बिलकुल बगल से हे आयी थी और जैसे हे अर्जुन पलटा तोह लीलू जैसा हे एक hatta-katta लेकिन गंभीर सा युवक उसके सामने था.

"ज़मींदार, चुदाई देखने के लिए ऐसे रिकास (रिस्क) न लेने चाहिए. उस्ताद ने देख लिया तोह बेवजह तेरी गांड में छुरा दाल के कुत्तो को खिला देगा. चल अब चुपचाप निकल.", ये युवक निहायती बेवकूफ था या फिर अर्जुन का शुभचिंतक. उसको यही लगा की कुर्ते पयजामे वाला ये युवक aas-paas का कोई ठरकी मुस्टंडा है जो चुदाई देखने इधर आया होगा. उनके अड्डे पर आजतक जब पुलिस हे न आयी हो तोह किसी और शिकारी की क्या उम्मीद.

"कभी किया नहीं न भाई साहब तोह देख कर हे हिला लेता हु. चलता हु.", अर्जुन दबे पाँव चलने लगा और इस युवक ने हँसते हुए बीड़ी सुलगा ली.

"साले लुंड अभी तक लुल्ली है और चुदाई देखने कहा कहा घुस जाते.. उस्ताद भी इस रंडी की गांड में हे घुसा रहेगा.", ये काश लगा कर घूमा हे था की जैसे भूचाल सा आया और आँखों के सामने तारे घूमने के बाद गहरा अन्धकार. अर्जुन ने वही गमछा घुमा कर उसके चेहरे पर मारने के तुरंत बाद हे गर्दन की जाने कौनसी नस दबाई थी की पालक झपकते हे ये बदमाश उसकी बाहों में था.

'लुल्ली हर टाइम लुंड नहीं बनानी चाहिए बरखुरदार. खूंटा समझ कर लोग डर भी सकते है.", अर्जुन ने उतने हे ध्यान से उसके मूर्छित शेर को जमीन पर रखने के साथ हे अंगोछा वापिस चेहरे पर बाँध लिया. अब अंदर सिर्फ 2 लोग थे उस छोटे लड़के के सिवा. जुगनी और निम्मा, जो बेफिक्र एक दूसरे के जिस्म का मजा लूट रहे थे. दबे पाँव अर्जुन इस अँधेरे कमरे से आगे बढ़कर निम्मे वाले कमरे के देहलीज पर आ रुका.

'आठ.. जुगनी.. साली तेरी गांड मारने के बाद किसी को हलाल करता हु तोह मजा दुगना हो जाता है.. आठ.. आज भी वैसी है जैसी ब्याह के आयी थी तब थी...", निम्मा कस के पेल रहा था और जुगनी भी इस चुदाई में भरपूर आवाज कर रही थी. इन वेह्शी दरिंदो को उस बेहोश बचे की भी फ़िक्र न थी जिसके हाथ बुरी तरह कास कर बाँध रखे थे.

"Aa..aah.. निम्मे या गांड भी तूने हे खोली थी मेरी.. आह.. और छूट तोह तुझे पसंद नहीं रही जबसे मेरी बेटी की सील खोल कर तू उसका रसिया बना है.. फाड़ दे रे पूरी फाड़ दे.. aahhh..aaiiiii..", ये आवाज लुंड की तोह बिलकुल न थी और जुगनी औंधे मुँह फर्श से जा टकराई. वैसी हे हालत निम्मे की थी जिसकी गांड पर अर्जुन की भरपूर लात का प्रहार हुआ था.

"भोस्डिके.. तू अपनी मैया छुड़वाने आया है? ज़िंदा नहीं बचेगा.. बाइंडर.. बाइंडर.."

"चीख ले लोदु.. जोर लगा कर चीख. और हाँ, चुदाई करते वक़्त इतना भी लापरवाह नहीं होना चाहिए की हथियार हे दूर कर दो.", अर्जुन के हाथ में निम्मे का तमंचा था और जुगनी की आँखों में इस नकाबपोश को देख दहशत.

"लोंदे, यही हड्डा रोहड़ी में दफना दूंगा और घरवालों को तेरी हवा तक नसीब न होगी.", निम्मे के होंठो से निकलता खून भी जैसे कला सा था. वो गुर्रा रहा था और अर्जुन एकदम शांत. उसकी तरफ देखते हुए अर्जुन ने तमंचे की नाल और हठी अलग करके बहार उछाल दी.

"सुना है तू जल्लाद कसाई है जो भैंसे की गर्दन एक वार में अलग कर देता है? आंटी तुम जरा भी हिली तोह रिवॉल्वर जैसा हाल करूँगा तुम्हारा.", अर्जुन ने निम्मे को हड़काते हुए जुगनी को भी एक मजाकिया धमकी दी थी जिस वजह से वो नंगी हे एक कोने में दुबक गयी. अर्जुन की हिम्मत देख निम्मे ने भी अपनी धोती लपेटी और उसकी तरफ लपका.

"न न.. यही गलती करते है कसाई लोग. भैंसा होता है आपके सामने जिस पर करीब से प्रहार करते है. जब वो भैंसा दूर खड़ा हो तोह हाथ नहीं हिलना चाहिए.. ऐसे पटक देगा..", निम्मा कद्द में एकदम बराबर था अर्जुन के लेकिन उतना मुस्तैद नहीं. कलाई हाथ में पकड़ कर अर्जुन ने इस तरह से निम्मे को पटका था की उसका पूरा शरीर हवा में 360 के कोण पर घूमा और धड़ाम से मजबूत फर्श पर जा गिरा.. पके तरबूज की तरह जमीन पर निम्मा फ़ैल चूका था. चेहरे, सर से लहू और जाने कौन कौन सी हड्डी के टूटने की आवाज आयी होगी. जुगनी की आँखें भये और दर्द से सफ़ेद होने लगी थी. क्वांटल भर के निम्मे को अर्जुन ने पालक झपकते हे फर्श पर ऐसे बिछा दिया था जैसे धोबी गीले कपडे को भिगो कर पटक दे.

"हाथ खोलो इस लड़के के और होश में लाओ. मुझे आपके नंगे जिस्म से कोई मतलब nahi..aahh.", अर्जुन जुगनी को अभी आदेश दे हे रहा था की एक बर्फ तोड़ने वाला सुआ उसके कंधे के ऊपर हिस्से को भेदता निकल गया. अर्जुन अगर अपनी जगह से हिला नहीं होता तोह वो सुआ पक्का उसके पीठ से सीने तक चला जाता. अँधेरे कमरे से इस रौशनी वाले कमरे के बीच वो परछाई देख न पाया था पर तुरंत संभल गया. सफ़ेद कुर्ते पर लाल रंग फैलने लगा था.

"पूर्ण.. बचा ले पूर्ण.. ये जानवर है या जाने क्या.. हरामी ने निम्मे को भी मार दिया और शायद बाइंडर को भी.. बचा ले मुझे इस शैतान से.", जिस तरह जुगनी उछाल कर इस पीठ पर वॉर करने वाले की तरफ लपकी थी, ऐसा लगता था प्यासे को कुआ दिख गया हो. लेकिन बीच में हे उसकी कलाई अर्जुन के हाथ आ चुकी थी.

"कौन है बे तू?", पूर्ण एक औसत कद का अधेड़ सा व्यक्ति था लेकिन चेहरे पर उसके भी खौफ छ चूका था जब अर्जुन को अपनी तरफ मुस्कुराते देखा.

"मेरे पास एक मिनट है और इस एक मिनट में अगर तुम यहाँ से भाग कर बचना चाहो तोह सच कहता हु की तुम्हे जाने दूंगा. और हाँ इसको भी ले जाओ अपने साथ. मुझे सिर्फ ये लड़का चाहिए और आंटी तू इसको खोल नहीं तोह फिर जो कहा था वही करूँगा.", अर्जुन ने jaan-boojh कर पूर्ण से नजरे हटाई थी और जुगनी की कलाई छोड़ कर उसको काम करने को कहा. पूर्ण वही बर्फ तोड़ने वाला सुआ लिए अर्जुन पर झपटा तोह इस बार उसका सूए वाला हाथ और गर्दन अर्जुन की मजबूद पकड़ में थी.

"मतलब सुधारना नहीं है? फिर भी मैं तुम्हे मारूंगा नहीं.", अर्जुन ने सूए वाली मुट्ठी अपनी हथेली में दबाते हुए पूर्ण की तरफ हे घुमा दी. गर्दन पर कस्ती पकड़ से वो पहले हे फड़फड़ा रहा था और उसकी खुदकी मुट्ठी में पकड़ा सुआ अब उसके कंधे से निचे जा टिका था..

"मममम.. मुझे.. जाने दो.. जाने आअह्ह्ह्हह..", एक तरफ वो 8 इंच लोहे का सुआ उसके जिस्म में गया और दूसरी तरफ चीखने के साथ हे मूर्छा (बेहोश) ने आ घेरा. अर्जुन ने चेहरे पर बंधा अंगोछा फिर से कैसा और उस लड़के को अपने दूसरे कंधे पर टांग लिया.

"यहाँ से निकल लो और फिर कही नजर मैट आना. थोड़ी हे देर में भूखे कुत्ते यहाँ आएंगे और शायद ख़ुशी में तुम्हे भी अपना निवाला बना ले.", अर्जुन ने वही एक तरफ राखी बड़ी सी प्लेट को उठाते हुए जुगनी को चेताया जो उसका मतलब नहीं समझी लेकिन जैसे तैसे अपना घागरा बाँध कर बहार दौड़ गयी. इस सब कार्यवाही में उसको 12-13 मिनट हे लगे थे. खंडहर से बहार निकलते हे उसने कुत्तो को 'tu-tu-tu' करके आवाज दी और गोश्त के बचे कूचे ढेर सारे टुकड़े खंडहर के आगे और आँगन में बिखेर दिए. भूखे कुत्ते पूरी रफ़्तार इस तरफ दौड़े थे जिन्होंने एक बार अर्जुन को कृतज्ञता से देखा और फिर गोश्त हड्डी पर टूट पड़े. उन्हें इस से बेहतर महक अंदर से भी आ रही थी लेकिन अर्जुन उन्हें खजाने तक छोड़ आगे बढ़ चला.

'जीवन और मृत्यु एक कटु सत्य है. जो आया है वो जायेगा भी लेकिन आपका जाना आपके कर्मो पर निर्भर करता है. ॐ शांति.. वैसे ये साला बचा भी कुछ ज्यादा हे मोटा तगड़ा है.', अर्जुन पगडण्डी की जगह दूसरी तरफ झाड़ियों से जा रहा था, जो रास्ता कुछ अलग था. 2-3 मिनट बाद हे वो सड़क पर अपनी कार की अगली सीट पर था और लड़के के चेहरे पर पानी डालने के बाद अब पूरी रफ़्तार से इस निर्जन सड़क पर लगभग उड़ने हे लगा था. सफर 22 किलोमीटर था और समय 15 मिनट से कुछ काम.

"बचाओ बचाओ.. हेल्प में समबडी हेल्प में..", अर्जुन ने जैसे हे ये कानफोड़ू आवाज सुनी तोह उसका ध्यान पिछली सीट पर चिल्लाते उस लड़के पर गया.

"ओह चुप कर मेरे दोस्त चुप कर. तुझे बचने के चक्कर में 3 घंटे से अपनी मरवा रहा हु.", चेहरे से बड़ा प्यारा सा और gol-matol सा था ये लड़का जो अर्जुन के इतने दोस्ताना रवैय्ये की वजह से एकदम खामोश सा हो गया. उसकी नजर सीट से दीखते अर्जुन के रक्त में भीगे कुर्ते पर गयी और फिर इस साफ़ सुठि कार पे तोह वो जैसे सब याद करने लगा.

"भैया, हम कहा है?"

"चल आगे आजा और डर मत. सेफ है अब तू और जल्द हे हम तेरे पापा के पास होंगे.", अर्जुन ने आगे हे नजर रखते हुए एक बार आईने से मुस्कुरा कर उसको देखा और हाथ के इशारे से अगली सीट पर आने को कहा. वो gol-matol सा लड़का सेहमा हुआ सा हिम्मत करके जैसे तैसे अगली सीट पर बैठ हे गया. अर्जुन की आँखों पर अब चस्मा था और अंगोछा दोनों सीट के बीच.

"आपके ब्लीडिंग हो रही है भैया. और वो ईविल लोग कहा गए. थे वेरे रियली क्रुएल एंड बाद. मुझे भी मारा था उन्होंने और मुरली भैया को शूट भी कर दिया था. पापा कहा है भैया और आप कोई एक्शन हीरो हो.?", अर्जुन इस नादान से बचे को देख कर एक बार मुस्कुराया और फिर पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ा दी.

"कलम डाउन फ्रेंड. ठोस ईविल पीपल अरे वनिषेद एंड यू अरे सेफ नाउ. वैसे हुआ क्या था तुम्हे कुछ पता है?"

"ी don't क्नोव एनीथिंग भैया. आपने नहीं बताया के आप कौन है?", मोटू बचे के होंठो से गिर कर पानी कुछ गले और उस मैली हो चुकी टीशर्ट पर भी आ चूका था. हालत बुरी थी लेकिन बचा हिम्मतवाला था जो अब दहशत में नहीं था. शायद अर्जुन की मुस्कान और उसके कंधे की चोट जो इस बचे को बचने में लगी थी उसको देख कर वो अब सुरक्षित महसूस कर रहा था.

"मेरा नाम साहिल है भैया, साहिल भल्ला लेकिन आप मुझे गोलू भी बोल सकते है. मुम्मा दीदी यही बुलाते है मुझे. हम कबतक पापा के पास होंगे भैया? मेरी दीदी मुझसे बहोत प्यार करती है और उन्हें ये पता चला होगा तोह वो बहोत रो रही होंगी.", ये भी गुरदीप का हे कोई रिश्तेदार था बोलने में. रेडियो शुरू हुआ तोह अब बंद होने का नाम हे नहीं ले रहा था. अर्जुन दिमाग से कही और था इसलिए बस मुस्कुरा भर रहा था.

"अर्जुन नाम है मेरा साहिल. और हम बस 5 मिनट में आपके पापा के पास होंगे.", आज पहले बार अर्जुन 150 के पार जा रहा था और जैसे हे एक गाँव नजर आया वो समझ गया की मंज़िल करीब है. 8 बजने में अभी 2 हे मिनट बाकी थी और ये कोई फिल्म तोह नहीं थी जिसमे सही वक़्त पर हे डील हो.

"मुझे भूख भी लगी है भैया और हेडाचे भी हो रहा है. आप पहले कही से खाने को हे ले लो कुछ, ी विल पाय यू बैक. मेरे पापा के पास बहोत पैसे है भैया और वो आपका ट्रीटमेंट भी फ्री में करवा देंगे.", अर्जुन मैं हे मैं खुद के सर पे हाथ लगा रहा था के साला ऐसा भी कोई बचा होता है. यहाँ गांड फटी पड़ी है के कही वो लोग पैसे लेके निकल न जाए और इसको भूख लगी है. लेकिन उसकी आँखों में एक चमक सी आ गयी जब वो सफ़ेद खतरा मारुती ओमनी सड़क किनारे कड़ी दिखी. उधर खैरु सीट पर बैठा काश लगा रहा था और लीलू झाडी पर मूत्रविसर्जन करने में व्यस्त था. रफ़्तार काम किये बिना हे अर्जुन आगे निकल चला.

बिपास चौक पे ब्रेक लगा कर एक बार सामने नजर की और फिर दाए बाए. इधर मंदिर के सामने हे उमेद सिंह का ख़ास सुरक्षाकर्मी रणजीत नजर आया तोह अर्जुन ने उसकी तरफ न लेते हुए कार सामने हवेली वाली सड़क पर दाल दी. कुछ 50 गज आगे हे काली मेरसेदेज़ जीप और एक सफ़ेद विदेशी रोल्स रॉयस नजर आते हे अर्जुन ने अपनी कार भी सफाई से उनसे थोड़ा आगे निकाल कर कच्चे में रोक दी.

"पापा.. पापा.. देखो ी ऍम टोटली फाइन..", अर्जुन ने सिर्फ अपनी कार रोकी हे थी की वो लड़का चहकता हुआ तेजी से उस चमचमति कार के बहार बरगद की छाया में खड़े bhari-bharkam से अधेड़ के गले जा लगा. Gora-gulabi ये व्यक्ति शकल से हे इसका बाप लग रहा था लेकिन तगड़ी शख्सियत वाला. उमेद सिंह भी चल कर अपने भतीजे के पास आ चूका था.

"तुम्हे ये क्या हुआ अर्जुन? और मैंने तुमसे कहा भी था के सिर्फ पता करो लेकिन .. चलो पहले हवेली चल कर..", उमेद खून देख कर कहुआफ खा चूका था बेशक लोगो का कितना हे खून बहा चूका हो पर ये उसके भतीजे के जिस्म पर आयी चोट थी. गुस्सा भी पल में गायब था और अर्जुन बहार निकल के उनके गले लगता हुआ लापरवाही से बोलै.

"चाचा जी, आपने मुझ पर भरोसा दिखाया यही मेरे लिए बड़ी बात है. वैसे मैं आपको अगर बता भी देता तोह शायद साहिल को बचाना आसान न होता. वैसे ये जिसकी भी औलाद है दिमाग बहोत खाती है. ओह सबसे जरुरी बात है की वो लोग आने हे वाले होंगे. 2 हैं और सफ़ेद ओमनी में. दोनों के पास रिवॉल्वर भी हो सकती है.", अर्जुन ने जैसे हे काम की बात कही अपने दुखते कंधे पर एक हाथ महसूस करते हे थोड़ा गुस्से में पलटा.

"तुमने मेरा घर उजड़ने से बचा लिया बीटा. मैं नहीं जानता के ये तुमने कैसे किया लेकिन मेरा बीटा मेरे सामने है. सॉरी.. ये चोट मुझे पता नहीं थी.", गजेंद्र भल्ला एक तरफ अपने बेटे को लगाए अर्जुन के सामने खड़ा था और उसकी आँखों में पीड़ा देख अर्जुन भी दर्द भूल गया.

"बचो को बोर्डिंग तभी भेजना चाहिए अंकल जी, जब वो चाहे. इतना हे प्यार करते है इस से तोह अपने साथ हे रखिये. आपकी असली दौलत तोह आखिर यही है क्योंकि आज सबकुछ छोड़ कर आप बीच सड़क बस अपने बचे के लिए खड़े है.", गजेंद्र भल्ला से ऐसी बात कहने की जरुरत शायद हे कोई इंसान कर सकता था लेकिन वक़्त और मेहरबानी से मजबूर होने के साथ साथ भल्ला को अर्जुन एक नजर में हे भा गया था. इस बीच 2 पटाखे चलने की आवाज आयी तोह अर्जुन मुस्कुरा दिया.

"बना दी चाचा जी ने उन दोनों के माथे पर बिंदी. चलता हु अंकल जी और आप चाचा जी के ख़ास है तोह फिर हमारे घर शादी में तोह आएंगे हे. और एक बात आपको समझनी चाहिए की आपका बीटा वापिस आ रहा है ये किस बहार के आदमी को खबर थी. पता लगाइये अंकल जी, कोई करीबी हे मिलेगा.", यहाँ अब उमेद सिंह नहीं था, जो लीलू और खैरु को उनके कर्मो से मुक्ति देने के बाद वही मंदिर के पास अब सिग्गट सुलगता हुआ अपने आदमियों से ये कचरा साफ़ करने को कह रहा था. अर्जुन अपनी कार में बैठ कर उनकी हे तरफ मदद गया. उस सफ़ेद कार के अंदर बैठी वो खूबसूरत बाला जाने कितनी हे देर से अर्जुन को निहार रही थी और उसकी आवाज को अपने सीने में संजो चुकी थी.

"चाचा जी, घर पे सभी पूछेंगे आपसे मेरे बारे में. आप बता देना की आपने मुझे नया डॉग दिखने के लिए बुलाया था और फिर लॉन्ग ड्राइवर पर चले गए थे. कार में मेरे पास और भी कपडे है जो मैं ड्रेसिंग करवाने के बाद बदल लूंगा. ये जो भी कुछ हुआ है इसकी भनक पापा या दादा जी को भी नहीं लगनी चाहिए. अब हवेली शालिनी बुआ को लेने हे आऊंगा.", अर्जुन भी बिना कार से उतरे उमेद सिंह को घर का बता कर हाईवे पकड़ गया बिना जवाब सुने. उमेद पहले हैरान हुआ और फिर बस मुस्कुरा दिया.

'ये सचमुच हमसे 10 कदम आगे है. मान गए अर्जुन मिया की उमेद सिंह एक असली शिकारी का चाचा है. जग जग जियो शेरा.', उमेद कायल हो चूका था अपने हे भतीजे का जिसने इतनी बड़ी मुसीबत में दिमाग का सही उपयोग भी किया और काम को अंजाम भी अकेले हे दिया. गजेंद्र भल्ला अब उमेद से निचे हो चूका था इस पल में.

"उमेद, हमने दुनिया पर एहसान किये है और लोग मुझे पीठ पीछे गुंडा, दहशतगर्द, राजनीतिक हत्यारा और जाने क्या क्या बुलाते है. दिल्ली में हम जहा चाहे वह समय रोक दे लेकिन देखो आज मैं तुम्हारे सामने झोली पसार गया. इस एहसान को मैं जीवनभर नहीं उतार पाउँगा उमेद, कभी भी नहीं. मुझे इस मौके पर ऐसी बात केहनी तोह नहीं चाहिए लेकिन ये पैसा मेरी तरफ से शादी का शगुन समझ कर हे रख लो.", अपने ड्राइवर से वो चमड़े का भूरा बैग पकड़ कर गजेंद्र भल्ला ने उमेद की तरफ बढ़ाया तोह कुछ सोचने के बाद उमेद ने वो बैग थाम लिया.

"भाई साहब, शादी में बाकी एक लाख भी लेते आना. 51 का शगुन होता है और इतने ये मेरी गाडी में हे सुरक्षित है जो आप खुद अपने हाथ से दे दीजियेगा. जब बिज़नेस से बात भाईचारे की आ गयी है तोह इसमें एहसान जैसा कुछ नहीं होता. क्या पता कभी मैं आपके सामने फ़रियाद ले औ. चलिए आपको हवेली पर हे नाश्ता करवाता हु और घर पे बोल दीजिये की सब सुरक्षित है. बीटा तुम उस गाडी में आओ, आपकी दीदी कबसे आपका वेट कर रही है.", उमेद ने भल्ला को अपनी गाडी में बैठाया जहा अब किंग नहीं था और बाकी गाड़ियां भी उनके पीछे हे चल दी. भल्ला अभी तक अर्जुन की वो बात ध्यान से सोच रहा था जो जाते हुए कही थी. उसका कोई अपना करीबी हे था इस सब कारनामे के पीछे. Der-saver वो हाथ आ हे जाना है.

"दीदी, आपने एक्शन मन को देखा था? हे इस हूजे एंड हैंडसम और पता है उन भैया को पैन भी नहीं हो रहा था. हे वास् समिलिंग.", साहिल से उसकी बहिन बड़े हे भावुक अंदाज में मिली थी और अब उसकी खूबसूरत आँखों में जो आंसू थे वो ख़ुशी के थे.

"तुम्हे उनका नाम पता है? और क्या क्या बात हुई तेरी उनके साथ?", ये लड़की अपने प्यारे भाई के दोनों गाल हाथो में पकड़ कर बड़े स्नेह से जानकारी ले रही थी.

"मैं तोह बेहोश था दीदी लेकिन जैसे उन भैया के चोट लगी हुई थी तोह मतलब उन्होंने सभी ईविल में मार दिए होंगे. मुझे पानी पिलाया और मुझसे बात भी की थी उन्होंने हंस हंस कर. फिर बोले की चलो तुम्हे नाश्ता करवाता हु लेकिन मैंने हे मन कर दिया. मैं तोह आपके साथ हे खता हु न दीदी? बूत आपने उन्हें थैंक यू भी नहीं कहा.", साहिल की बातें सुन्न कर लड़की इतना तोह समझ गयी थी की उसका भाई भूखा है और उसको प्यार भी बहोत आ रहा था अपने भाई पर.

"थैंक यू से काम नहीं चलेगा गुल्लू. उन्होंने मेरे गुल्लू को बचाया है तोह इनाम के हक़दार है वो. पापा के फ्रेंड के बेटे है तोह हम उन्हें ाचे से मिल कर हे ट्रीट de-denge. पार्टी करोगे न?"

"बेस्ट रहेगा दीदी और उन्हें भी पिज़्ज़ा ाचा हे लगेगा पेप्सी के साथ. बरौनी और और कुल्फी भी खा हे सकते है. है न?", ये सचमुच हे एक नादान भुक्खड़ सा बचा था लेकिन उसकी बहिन ने तोह जैसे कुछ अलग हे इनाम देने की ठान ली थी जिसको अभी अर्जुन के बारे में रत्ती भर भी खबर न थी. उसका चरित्र जब सामने आएगा तब ये ख्वाब क्या रंग लेंगे इस लड़की को भनक तक न थी, जो दिल हार चुकी थी अपने भाई को बचने वाले पर.

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पंडित जी के परिवार में खासी रौनक लगी थी सुबह के 10 बजे. घर के भीतर वाले आँगन में शामियाने की छाया टेल आज भात भरने आये ladka-ladki के mama-maami के साथ साथ ढेरो हे aas-pados के लोगो के साथ साथ सभी पहचान के करीबी लोग जमा था. बहार बैठक में chai-pakodo के दौर के बीच अलग महफ़िल सजी थी पुरुषो की और असगर की तरफ भी ढेरो लोग नाश्ते का लुत्फ़ उठा रहे थे. अर्जुन पिछले आँगन की सीढ़ियों पर हिमांशु के साथ बैठा सभी दृश्यों और riti-riwaaj को कमरे में क़ैद होने के साथ साथ प्रत्यक्ष देख रहा था.

"Sanjiv-Madhuri के साथ इनकी बहिन अलका को बैठाओ जी.", इनके मां ने शगुन शुरू करने से पहले ये आवाज दी तोह कौशल्या जी ने एक नजर संजीव और फिर अलका को देखा. वो इत्मीनान से हे बैठी थी जैसे किसी के कुछ बोलने का इन्तजार हो.

"भाई की बगल में भाई हे बैठेगा मां जी.", संजीव जैसे इस रिवाज से परिचित था और 30-35 महिलाओ, chacha-pita और दोस्तों के बीच उसने बड़ी सहजता से ऐसा कहा था. उसके मां श्री केशव कुमार जी अपनी बीवी और फिर बहिन की तरफ देखने लगे.

"दीदी, अब अलका हे तोह है?", ऐसा केशव जी की धर्मपत्नी ने कहा था जिसका हाथ खुद अलका ने दबाता हुए जैसे उन्हें रोकना चाहा.

"मेरा लल्ला बैठेगा अपने भाई के साथ. 2 बेटे है मेरे बरखा और दोनों एक सामान. लल्ला, चल आ इधर.", ललिता जी के ऐसा कहते हे बाकी सबके चेहरे पर मुस्कान छा गयी. मां मामी ने भी मुस्कुरा कर क्षमा चाही थी और अर्जुन उनके बीच से होता हुआ इतना बोल गया.

"टेंशन क्यों लेते हो मां जी, ये भात के शगुन न भैया दीदी के बाद 6 बहनो और एक और छोटे भाई तक होंगे. आप बस लिफाफों की चिंता मैट करो, हम शगुन ऐसे हे ले लेंगे. क्यों भैया?", अर्जुन ने अपनी सभी बहनो के साथ हे हिमांशु को भी शामिल कर लिया था. संजीव ने बड़े हे प्यार से अर्जुन को अपने साथ लगाया लेकिन उसके चेहरे पर क्षण मात्रा के लिए आये दर्द को पहचान कर फिर शांत हो गया. बात अब रस्मो के बाद हे होनी थी.

आज क़यामत का जिम्मा एक बार फिर प्रीती, अलका, ऋतू, आरती के साथ साथ जसलीन, अफसाना ने ले रखा था लेकिन 2 चेहरे एक साथ आँगन में प्रकट हुए. अन्नू और आकांक्षा भी अपनी अपनी माँ के साथ आज इधर चली आयी थी. माहौल बन्न चूका था और विवाह पूर्व रौनक लगने लगी थी पंडित जी के संसार में. सभी उत्साहित थे यहाँ और lok-geet के साथ हे bhaat-nyotne का रिवाज शुरू हो गया.

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"छोटे कुंवर सा, बड़े मालिक ने आपके लिए बुलावा भेजा है.", राजस्थान के इस रेगिस्तानी हिस्से में आसमान जल्द हे अपनी तपिश पकड़ लेता था. सूरज अभी मध्य में भी नहीं पंहुचा था की पारा 45 छू रहा था. इस संगमरमर की खदान में जितनी गर्मी बहार थी उतनी हे ठंडक इस तीन के दफ्तर में थी जहा दीवान पर पसरा हुआ 6 फ़ीट से उन्हे और उतना हे गठीला शक्श पसरा हुआ था. जमीन पर बिखरी बियर की खाली बोतल बयान कर रही थी की सुकून देने के लिए इनका हे सहारा लिया था इस व्यक्ति ने. अपने सेवक की आवाज सुन्न कर आँखे खोल कर एक बार छत को देखा और झट्ट उठ खड़ा हुआ.

"सच कह रहे हो लाल सिंह, पिता जी ने हमको याद किया है?"

"जी छोटे कुंवर सा. बड़े मालिक ने कहा है की आप तुरंत हॉस्पिटल पहुँचिये. छोटी मेमसाब भी दिल्ली से आ चुकी है.", इतना सुन्न कर हे पुष्पक ने लकड़ी के मेज पर रखा खरा अपने चेहरे पर बरसा दिया. चेहरा साफ़ करते हे इस शक्श की ख़ुशी देखते हे बनती थी जैसे उसने सबकुछ पा लिया हो.

"लतिका भी आयी है और हमे भी बुलाया है तोह बात जरूर बड़ी होगी. चलो, हम तुम्हारे हे साथ चलते है लाल सिंह.", पलभर में हे पुष्पक पुराने वस्त्र त्याग कर उजले हुए कुर्ते पायजामा और ख़ास जूती में था. अपनी जीप वही छोड़ कर पुष्पक अपने पिता की हे कार में जा बैठा जिसका ड्राइवर लाल सिंह था. ख़ुशी में वो इतना खो चूका था की कब वो अपने गंतव्य पर आ पहुंचे खबर भी नहीं हुई.

"छोटे कुंवर सा, हम पहुंच गए है.", लाल सिंह की आवाज से पुष्पक की तन्द्रा भांग हुई और बिना उसकी मदद लिए वो खुद हे दरवाजा खोल कर किसी बचे सा भागता हुआ उस बड़े हॉस्पिटल के भीतर दाखिल हुआ. गलियारे में हे 4 सुरक्षाकर्मियों के बीच वो लाल गुलाब सी युवती उसको अपनी तरफ हे देखती मिली. पुष्पक दौड़ कर उसके सामने आ रुका.

"ओह हमारी प्यारी सी गुड़िया, आप खबर कर देती तोह स्वयं हम आपको लेने आ जाते. आपको देख कर हमे कितनी प्रसन्नता हो रही है हम बयान नहीं कर सकते.", पुष्पक ने बड़ी नजाकत से कुमारी लतिका का बया हाथ पकड़ कर चूमते हुए स्नेह जताया तोह बहिन ने भी नजरे झुका कर अभिवादन किया.

"बुआ आपसे मिलना चाहती है भैया. उनकी आखिरी इत्छा है जिसके लिए उन्होंने आपसे मिलना है.", पुष्पक की ख़ुशी पल में हे काफूर हो गयी थी ये सुन्न कर.

"हमारी बुआ.. बुआ यहाँ है? अंतिम समय..", वो जुबान से हकलाने लगा था लेकिन कंधे पर जो हाथ महसूस किया तोह ऐसे शांत हो गया जैसे सर्कस का शेर अपने मास्टर के सामने. ये हाथ कुमार सारंग का था, इनके पिता.

"हम आपका मान करते है पुष्पक लेकिन खफा है जिसकी वजह भी आपको ज्ञात होगी. आपकी बुआ के प्रिय हमेशा से हे आप हो और उन्हें मतलब भी नहीं की हमारी नजर में आपके क्या चरित्र सही है क्या गलत. उनसे मिल लीजिये, ज्यादा समय नहीं है उनके पास.", सारंग इतना कह कर एक तरफ हुआ और पुष्पक धीमे कदमो से अंदर कमरे में दाखिल हुआ. सामने गौरवर्ण दमकते चेहरे वाली दमयंती उर्फ़ कुमारी अनामिका अपने जीवन की अंतिम घडिया जिन्न रही थी. बंद आँखों के बावजूद होंठ थरथराये.

"आ गया मेरे बचे.. इधर अपना हाथ ला..", जैसे तैसे अनामिका ने ये कहा और पुष्पक एक बचे की तरह उनकी बगल में बैठ कर दोनों हाथो में उस लगभग निर्जीव से ठन्डे हाथ को थामे रोने हे लगा था.

"बुआ सा, आप ठीक हो जाएंगी.. आपको कुछ नहीं होगा बुआ सा. बड़ी मुश्किल से तोह आप मिली है.."

"नहीं मेरे बचे.. मैंने अपने जीवन के सुख दुःख देख लिए है. अब जीवन भी निरर्थक लगने लगा है.. मेरे 2 काम करेगा मेरे बेटे?"

"जी बुआ सा.. हम धरती आसमान भी एक कर देंगे बस आप आदेश करे...", पुष्पक की आँखों से झरर झरर गिरते आंसू उस हाथ को भिगोने लगे थे और अनामिका का हाथ स्वतः उसके चेहरे से आंसू हटाने लगा.

"रामेश्वर जी का बहोत एहसान है हम पर बीटा.. वो हैं तोह तुम और भैया है.. मेरे जाने के बाद उन्हें बताना की मैं उनकी शुक्रगुजार रही हु जो उन्होंने कभी बदले की भावना नहीं राखी.. दूसरा काम.. आह्ह्ह्हह.. हे रामम... शबनम और आह्हः... शबनम और बिंदिया को बचाना .. उस चांडाल मधुलता और उसकी माँ से... नरक बना दिया मेरी बच्चियों का jiwannn....mere बेटे...", और इसके साथ हे दमयंती उर्फ़ अनामिका की गर्दन लुढ़क चुकी थी. पुष्पक कुछ पल बस एकटुक उन्हें देखता रहा, आँखों से आंसू टप्प टप्प गिरते रहे और कमरे में सारंग, लतिका के साथ साथ हॉस्पिटल का डॉक्टर भी आ चुके थे.

"हिम्मतत रखिये आप पुष्पक.. इनके वारिस हमेशा से हे आप थे और हमसे इन्होने निवेदन किया था की इन्हे मुखाग्नि आप हे दे और अस्थि विसर्जन का भी हक़ सिर्फ आपका है.", सारंग ये सब जो भी कह रहा था पुष्पक जैसे सुन हे नहीं रहा था. वो जितना बड़ा दरिंदा अपने बाप की नजरो में था उतना हे प्यारा बीटा अपनी बुआ के लिए. माँ पहले हे नहीं थी और आज बुआ भी आज उसको छोड़ चली गयी थी.

"हम त्याग करते है कुंवर पद से. हमारी बुआ सा की अंतिम इत्छा का मरते दम तक पालन करेंगे और आपने जो भी कहा है उसका भी सम्मान रहेगा राजा साहब. हम कुमारी बिंदिया के आने का प्रबंध करते है, संस्कार पूरे शाही सम्मान से होगा और सभी शामिल होंगे.", राज्यवर्धन आँखे फाड़े देख रहा था जिस तरह से पुष्पक आज अपने पिता से बात कर रहा था. उसने डॉक्टर को भी हाथ लगाने से मन कर दिया था अपनी बुआ के शरीर को. जब तक बिंदिया नहीं आ जाती शव को सुरक्षित रखने के निर्देश दे कर वो बहार जाने लगा तोह लतिका ने हाथ थाम लिया, पिता की वजह से.

"शबनम को अनुमति नहीं है बेटे यहाँ आने की. बिंदिया यहाँ आएगी तोह वो मुसीबत में फंस सकती है."

"इसका जो भी हल है वो मैं करके रहूँगा. वो बुआ के रूप में हमारी माँ थी. पुष्पक झुकने को तैयार है कानून, प्रशाशन और भगवन के सामने.", जिस स्वर में आज सारंग के बेटे ने ये कहा था राज्यवर्धन भी समझ चूका था की भतीजा बाघी हो चूका है लेकिन सारंग ने ज्यादा भाव प्रदर्शन नहीं किया.

"जाओ फिर पंडित रामेश्वर जी की चौखट पर और करो उनसे बिनती की आप बुझदिल हो और उनके सामने घुटने तक कर फ़रियाद कर रहे हो की भतीजी बहिन पर कोई कार्यवाही न करे. जाओ और दिखा दो के आज भी कुछ शाही खून उनके कदमो में गिरने को तैयार रहता है.. इंसान जनम लेता है और मृत्यु को भी प्राप्त करता है. लेकिन मायने रखता है तोह उसका जीवन और रसूख. आपमें न पहले चरित्र था और रसूख दुत्कारने की हिमाकत तोह दिखा हे चुके है.", सारंग के तीखे बाण लतिका, राज्यवर्धन और गुलाम लोगो को भी भेंड़ चुके थे. पुष्पक के चेहरे पर एक सार्ड सी मुस्कान आ गयी इनके विपरीत.

"जानते है हम पंडित जी को.. उनकी छाती में भी बाप का प्यार है लेकिन हम आपके हे है और रहेंगे राजा साहब. उनकी देहलीज पर गिड़गिड़ाने नहीं जा रहे, हक़ से जा रहे है. भतीजे लगते है उनके हम और उन्हें प्रबंध करना हे होगा. राजा साहब..", वो मजाक हे उड़ा गया था जैसे सारंग का जब आखिर में राजा साहब कहा. क्योंकि सारंग के वश में नहीं था बिंदिया और शबनम को वतन वापिस बुलाना लेकिन रामेश्वर जी कर सकते थे. यहाँ ये लोग सोच में हे थे और पुष्पक निकल चूका था धुल उडाता हुआ उस गंतव्य की तरफ जहा अगर वो गलती से भी किसी और के हत्थे चढ़ा तोह मौत सुनिश्चित थी.

"पापा, भैया के पीछे किसी को भेजिए. नील भैया भी नहीं है यहाँ.", लतिका के स्वर में पीड़ा थी बेशक उसको अपने पिता से लगाव न था और इंद्रनील से तोह रत्ती भर भी नहीं लेकिन पुष्पक अपनी बहिन के लिए जान वार सकता था.

"वो कवच साथ हे लेके गया बेटी और जिनके पास जा रहा है वो आपके भाई की परवाह हमसे कही बेहतर करते है. राज, मीणा को बोलो के तत्काल प्रभाव से हर जांच रोक दी जाए. जुंग आपस में हे रहने दी जाए तोह बेहतर रहेगा.", सारंग की आँखों में बहिन के जाने का दुःख तभी प्रकट हुआ था जब वो कमरे से बहार निकल चला. आज एक बार फिर पंडित रामेश्वर जी उस पर भारी पड़ रहे थे और ये सेहन भी नहीं हो रहा था. चरित्र हे ऐसा था तोह क्या कर सकते है.
 
रात भर कण्ट्रोल कर लो भाई तुम लोग. क्या फकीरा, क्या बिल्ली और क्या हे राघव भाई.. सभी जुटे हुए आज तोह गरम हो कर. कल देता हु कुछ गरम दृश्य 🤦😅😅
 
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