अपडेट 168
चरित्र महत्व (2)
"तुम परेशान हो गए थे न? सच सच बोलना हाँ.", अँधेरी छत्त पर आज आसमान के सितारों से ज्यादा उजला सितारा अर्जुन के सीने पर सर झुकाये टकटकी लगाए उसको देखते हुए मुस्कुरा रहा था. खुली छत के ठीक बीच में बिछे गड्डो पर जहाँ अर्जुन सीधा लेता था वही प्रीती उसकी चौड़ी छाती पर हाथ टिकाये बड़ी चाहत से देखती हुई दिल का हाल ले रही थी. अर्जुन की धड़कन इतनी शांत कभी नहीं होती थी जितनी इस पल में प्रीती के करीब होने से थी.
"मैं तोह ये सोचने लगा था की आज तुम्हारे घर की दिवार कूदने के साथ साथ तुम्हारे कमरे का बहार वाला दरवाजा हे न तोडना पड़े. फिर मुझे ये ख़याल भी आया की अगर तुमने मुझसे मिलने का सोच हे लिया है तोह जरूर यही घर में हे होगी पर मैं रात को किस बहाने से दीदी लोगो के कमरे को खुलवाओ? वैसे तुम सचमुच अब कही ज्यादा हे तेज हो चुकी हो मेरी बिल्ली.", झीने कपडे का वो चुस्त पजामा प्रीती के कसरती लेकिन नरम नितम्भो पर पूरी तरह कैसा था जहाँ अर्जुन का एक हाथ हर उठान को महसूस करता ऊपर निचे चल रहा था. दोनों के जिस्म में दूर दूर तक lesh-matra वासना न थी, बस प्यार और एक दूसरे का स्पर्श.
"हो तोह तुम पूरे फत्तू हे में बुद्धूलाल. मेरे घर आने का सोच कर हे कमरे में वापिस चले गए होंगे.", प्रीती भी अपने तराशे हुए नकूहोने से हौले हौले अर्जुन का सीना कुरेदती हुई उतनी हे चाहत से अर्जुन के पूर्ण आगोश में थी. उसकी प्यार भरी चुहल कही न कही सच भी थी.
"जब तुम्हे पता हे है तोह ऐसी शर्ते रखती हे क्यों हो? वैसे आज मेरा एक सपना तोह सच हो हे गया है प्रीती. तुम्हे अपने सीने से लगा कर इस आसमान के तारो को जलने का. हमेशा इतना हे प्यार करोगी मुझसे?", अर्जुन के हाथ अब उसके कूल्हों से ऊपर ढीली टीशर्ट के अंदर मखमली पीठ और कमर पर फिरने लगे थे. प्रीती उचक कर अब पूरी तरह उसके जिस्म पर लिहाफ सी छ गयी थी. अर्जुन के तराशी हुई ठुड्डी को हलके से चूम कर उसने अपना चेहरा सीने पर टिका लिया.
"सपने क्या सिर्फ तुम्हारे हे है अर्जुन? और हैं भी तोह उनमे जब मैं भी बराबर हु तोह फिर प्यार भी बराबर हे होगा. बस कभी कभी लगता है की हमारी ज़िन्दगी वैसी हे रह पाएगी या नहीं जैसी आज है.", प्रीती की बात सुन्न कर अनजाने हे अर्जुन की पकड़ उसकी कमर पर हलकी ज्यादा हे कस चुकी थी. एक तरह से प्रीती की बात गलत तोह नहीं थी क्योंकि अर्जुन ने आने वाले भविष्य का रुख उलझनों से भर जो दिया था.
"मैं तुमसे दूर हो सकता हु भला? हाँ एक और सच है प्रीती जो मैंने तुमसे ज्यादा साँझा नहीं किया आजतक.", सितारों को घूरते हुए अर्जुन दुविधा में था की वो कैसे प्रीती को बताये की प्यार के साथ साथ ये परिवार भी उतना हे अनमोल है और इसके बरकरार रखने के लिए आज उसके कदम कुछ ज्यादा हे आगे निकल चुके है.
"शठ.. जानती हु मैं तुम्हे ाचे से मेरी जान. तुम सबकी फ़िक्र करते हो जैसे सभी तुम्हारी, मेरी या ek-dusre की. ऋतू दीदी को देख कर हे समझ आता है की वो भरपाई ाचे से करने लगी है घर के प्रति. वैसे कभी तुम्हे लगे की तुम मुझे बता कर हल्का महसूस कर सकते हो तोह कोशिश करना. प्यार का मतलब सिर्फ हम दोनों का हे जीवन तोह नहीं है न? ये परिवार भी तोह उतना हे मेरा है जितना तुम्हारा.", प्रीती ने भी दोनों हाथ अर्जुन की बाहों के गिर्द लपेट लिए थे. अर्जुन का अंतर्मन बिलकुल शांत था इस समय.
"तुम्हे बहोत दुःख पहुँचता हु न मैं?", अर्जुन ने जाने कैसे ये कहा था और प्रीती उचक कर उसका चेहरा देखने लगी. वो मायूस तोह नहीं था बस कुछ सोच में डूबा सा दिखा. प्रीती ने थोड़ा सा आगे हो कर अपने होंठो को बड़ी नजाकत से अर्जुन के लबो पर जोड़ते हुए आँखें मूँद ली.
"जितना खुश मैं हु न अर्जुन, इतना तोह शायद तुम भी नहीं होंगे. अगर तुम्हे लगता है की मल्टीप्ल फिजिकल रिलेशन्स मेरे लिए कुछ मायने रखते है तोह तुम गलत हो. हर उस लड़की की आँखों में मैंने अपने लिए जलन की जगह ख़ुशी और रेस्पेक्ट हे देखि है जो तुम्हे पसंद करती है. बस कभी किसी से ऐसा वादा न कर देना अर्जुन जिस से तुम स्वार्थी साबित हो जाओ.", अर्जुन निरुत्तर हो चूका था और एक पल में हे उसके सामने वो सभी चेहरे घूम गए जिनके साथ वो हमबिस्तर हुआ था. किसकी चाहत क्या थी ये जान ने से पहले.
"ाचा ये सब छोडो और एक बात तोह बताओ जान?", अब प्रीती जाने क्या पूछने वाली थी क्योंकि पिछली बात से हे अर्जुन उभरा नहीं था.
"हम्म..", अर्जुन ने बस सर हिला दिया.
"तुम्हारे अंदर जो भी चंगेस आये है पिछले कुछ महीनो में शायद वो वजह हो सकते है तोह उस बात को भूल जाओ. क्या कोई ऐसा है जिसके सामने तुम मुझे भी भूल जाते हो? मेरा मतलब की तुम हम दोनों के साथ उसको कपड़े करते हो?", प्रीती का सवाल गंभीर था लेकिन चेहरे पर अलग हे चमक. अर्जुन के शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी थी लेकिन वो प्रीती से कुछ छिपाना भी उचित नहीं मान रहा था.
"ऋतू के सामने मैं हम दोनों को भूल जाता हु या मतलब हम दोनों हे उनका हिस्सा है जैसे.", अर्जुन से सबसे पहले जो कहते बना उसने वो सच बोल हे दिया जिस पर प्रीती ने उसके दोनों गाल खींच कर नाक से नाक लगते हुए मस्ती में कहा.
"उन्हें बीच में नहीं लाओ न. अब मुझे वो नाम बताओ जो मैं नहीं जानती या तुम्हे लगता है की तुम्हे उस से दूर रहना चाहिए.", अर्जुन जैसे ये बोझ भी अब उतार हे देना चाहता था क्योंकि इन दोनों के बीच प्रेम को शशक्त रखने के लिए सबसे जरुरी था डर को दरकिनार करना.
"मैं कभी तुम्हारी किसी से तुलना नहीं करता प्रीती. मैं गलत हु क्योंकि तुमसे अलग मेरे सम्बन्ध है और वो कैसे या क्यों है इसको तुम समझ भी सकती हो लेकिन जब भी कोई मुझसे इजहार करती है तोह मैं उसको जरूर अपने दिल पर हाथ रख कर देखता हु. मेरी धड़कन कभी नहीं बढ़ी ऐसा करने पर क्योंकि हमारा प्यार अटूट है. बस 3 बार ये धड़कन कुछ पल के लिए डगमगाई जरूर है.", अर्जुन ने प्रीती को करवट के बल अपने बराबर हे लेता लिया था और अर्जुन की हालत देख प्रीती ने हलके से उसके बालो में उँगलियाँ फिरते हुए आगे बोलने को कहा.
"अंशु के साथ मैं कभी दोस्त..
"अगला नाम बताओ न बुधुराम.. उसका मुझे पता है..", प्रीती ने थोड़ा हँसते हुए कहा तोह अर्जुन झेंप गया था.
"तुम्हे तोह अन्नू के बारे में भी पता है..", अर्जुन ने बड़ी हे मासूमियत से दूसरा नाम बताया.
"और लास्ट ओने?", प्रीती के चेहरे पर जो शरारत थी उसका मतलब साफ़ था की उसको मजा आ रहा था अर्जुन को सताने में.
"वो ऐसा भी नहीं है मानो (बिल्ली) लेकिन थोड़ा अजीब सा लगा जब मैंने अफसाना को देखा था. मुझे उसके साथ वो वाली फीलिंग नहीं आयी जो तुम्हारे करीब होने पर होती है लेकिन पता नहीं क्यों वो अजीब सा एहसास था. मतलब .. पता नहीं लेकिन शायद ये मेरा वहां है या उसमे कुछ अलग सी एनर्जी है."
"बुद्धू कही के.. तुम बस क्यूरियस हो गए थे और शायद ऐसा हे कुछ अफसाना के साथ हुआ है. पता है वो तोह बेचारी रोने हे लग पड़ी थी, अपनी उर्दू के लम्बे लम्बे वर्ड्स बोलती हुई. हीहीही.. सच कहु तोह वो ख़ास तोह है हे लेकिन शायद वो कुछ ज्यादा हे सेहमी रहती है जिसकी वजह उसका खुद का खूबसूरत होने के साथ साथ कुछ बाद एक्सपेरिएंसेस भी है. तुम्हे खुद नहीं पता लेकिन जैसे तुम्हे यही दोनों बात उसके चेहरे में नजर आयी और वो ख़ास तोह है हे, इसमें कोई शक नहीं पर एक और राज की बात है.", प्रीती जितने आराम से ये सब गुफ्तगू कर रही थी अर्जुन उसके उलट बस हैरान हुए जा रहा था. उसकी ये बिल्ली तोह समझ से ज्यादा हे समझदार और जानकार निकली.
"कैसा राज और तुम इतनी कॉंफिडेंट कैसे हो?"
"पहले न एक 'हुंका एक चुम्मा दू सजनवा, तभी हम तुमका बताई'.", प्रीती की नौटंकी और ऐसा मस्ती भरा निवेदन देख अर्जुन सब भुला कर उसके ऊपर छ गया. कुछ पल उसकी neeli-hari आँखों में देखते हुए वो आहिस्ता से निचे झुका और बड़े प्यार से उसके नरम गुलाबी होंठो को मुँह में भरते हुए चूसने हे लगा. उस से कही ज्यादा तड़प और जोश प्रीती में था जिसने अर्जुन की जीभ हे अपनी मुँह में खींच कर kaatna-choosna शुरू कर दिया. प्रीती के लम्बे नाखून अर्जुन के सख्त कूल्हों पर गहरा दबाव बनाते हुए जैसे उसके जिस्म को प्रीती में सामने का प्रयास करने लगे. ये जोश जाने कितना बलवत था की आज अर्जुन की सांसें उखाड़ने लगी थी और वो इस नाजुक अप्सरा की पकड़ में कसमसाने हे लगा पर निकल न सका. अर्जुन की जिव्हा और निचले होंठो से निकलते हलके लहू का एहसास होने पर भी प्रीती तब तक न रुकी जब तक अर्जुन लगभग निर्जीव सा न हो गया. दृश्य ऐसा था की उस 90 किलो के जिस्म को प्रीती ने हे अपनी बगल में पलट दिया था. इसके बाद प्रीती 5 मिनट तक बस अर्जुन की हालत देखती रही जो आँखें बंद किये खुद को दुरुस्त करने में लगा था.
"हहहहहहह.. ये.. ये क्या.. ये क्या हुआ था अभी?", अर्जुन पूरी तरह सम्भला नहीं था लेकिन उसकी हैरानगी ने विवश करवाते हुए जवाब माँगा. प्रीती अब उसके माथे को सहलाती हुई पहले दोनों आँखों को चूमने के बाद हे बोली.
"हम एक दूसरे के लिए सिर्फ इसलिए ख़ास नहीं है अर्जुन की एक दूसरे से प्यार करते है और आपस में ख़ास कनेक्शन है, सोल कनेक्शन. हम ऐसे इसलिए भी है क्योंकि जरुरत पड़ने पर सिर्फ हम हे एक दूसरे को संभल सकते है. तुमसे एक ख़ास सवाल करू? जवाब देना हे पड़ेगा.", प्रीती ने बड़े अधिकार से ऐसा कहा था और इस पल में अर्जुन सचमुच उसके सामने कमजोर हे था.
"हाँ."
"तुम्हे खुद भी पता है की तुम कैसे हो और तुमने शायद कभी किसी के साथ अपना कण्ट्रोल नहीं खोया होगा, मेरा मतलब उस ख़ास मोमेंट से है जो तुम ाचे से समझ रहे हो. फिर भी कोई ऐसा तोह होगा जिसने तुम्हे खुद हे फ्री या समझो आजाद कर दिया हो. कौन था वो?", प्रीती ने एक भी लफ्ज़ ऐसा इस्तेमाल नहीं किया था जिसमे संसर्ग, मिलान जैसा कुछ हो. चुदाई की दौरान अर्जुन ने क्या कभी किसी के साथ अपनी समस्त ऊर्जा दिखाई थी, यही सवाल था उसका.
"ऋतू.. वो भी मुझे नहीं पता चला था और याद भी नहीं बस मैं होश खो बैठा था..", अर्जुन झेंप रहा था ये सब बताते हुए.
"जवाब मिल गया होगा अब तुम्हे मेरे भोले बालम की मैंने तुम्हे कैसे संभाला. और मेरे ऐसा करने की वजह समझते हो?", आज प्रीती हे अर्जुन को एक गहरा ज्ञान देने वाली थी और किसी ाचे विद्यार्थी की तरह अर्जुन बस सर हिला रहा था.
"ध्यान से सुनो अर्जुन. जब कोई इंसान बहोत समय के लिए खुद को किसी बंधन में रखता है और फिर उसके मैं में किसी ख़ास वजह से आजाद होने की इत्छा उत्पन्न हो तोह ध्यान रखना उसका एनर्जी लेवल वो खुद भी नहीं पहचानता. तुमने अफसाना में वही ख़ास बात देखि और उसके अट्रैक्शन की वजह तुम्हे पता भी नहीं होगी. आरती उसकी एकमात्र और बेहद ख़ास सहेली है जिसके साथ वो बचपन से रही है. अफसाना को गहरा दुःख था जब उसको आरती ने बताया की अब वो पंजाब से इधर हे रहने वाली है, हमेशा के लिए. तुम लोग यूनिवर्सिटी से काम करवा कर आये थे उस दिन और फिर अफसाना ने हिम्मत दिखा कर खुद को बाकी सभी के बीच शामिल किया जबकि वो उस से पहले तक गुरदीप से भी कभी ख़ास बातचीत नहीं करती थी.", प्रीती वो सब बता रही थी जो शायद हे किसी को पता हो और अर्जुन को तोह अफसाना के बारे में ज्यादा कुछ खबर थी भी नहीं.
"फिर?"
"फिर अफसाना को वह यूनिवर्सिटी में जो भी हुआ उसके बारे में पता चला लेकिन उसने तुम्हे सबके सामने एक बार भी नजर उठा कर नहीं देखा. तुमने उसको उस दिन तभी देखा था न जब वो चेहरा धो कर बाथरूम से निकली थी?"
"हाँ..."
"उस से पहले अफसाना ने तुम्हे किसी न किसी की मौजदगी में हे साइड से देखा था लेकिन तुम दोनों का वही पहला मौका था जिसमे तुम दोनों हे थे और तुम्हे एकदम अपने सामने देख वो हैरान इसलिए हुई थी क्योंकि एक इमेज उसके दिल में बन चुकी थी तुम्हारी लेकिन जब सामना हुआ तोह दोनों अपनी अपनी वजह से हैरान भी हुए और कुछ बोल भी न सके. अफसाना ने तुम्हे ाचे से समझा और पहली बार उसको लगा की तुम बाकी दुनिया की तरह नहीं हो और सचमुच ख़ास हो. लेकिन मेरे बारे में जान ने के बाद उसने सबसे पहले मुझसे मिलते हे दिल से माफ़ी मांगी, उस सबके लिए जो कही से भी गलत नहीं था. मैं पहली बार तुमसे ये बार कह रही हु अर्जुन और कोई दबाव नहीं दे रही.", प्रीती ने जिस गहराई से अर्जुन के चेहरे को देखा था वो समझ सकता था की बात नजर से भी कही ज्यादा गहरी है.
"तुम बस कहो प्रीती और जैसा कहोगी वैसा हे होगा."
"अफसाना के साथ दिल से दोस्ती रखना अर्जुन, साफ़ दोस्ती जिसमे वो खुद को महफूज और खुश देख सके. अगर तुम उस से ज्यादा एक इंच भी आगे गए तोह शायद वो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगी और उसके बाद जो होगा वो कभी ठीक नहीं हो पायेगा. अफसाना तुम्हे मन नहीं करेगी और वो कर भी नहीं सकती लेकिन तुम्हे समझना होगा की सही क्या है. उसको दुनिया भी देखनी है और दोस्त भी बनाने है. बेहतर रहेगा तुम भी दोस्ती करना सीखो. सच्चे दोस्त समाज, दुनिया और परिवार की भी परवाह नहीं करते जब बात उनके दोस्त की हो. उसको ऐसे हे दोस्त की जरुरत है और इसमें मैं भी तुम्हारे साथ हु.", प्रीती ने जिस तरह से अर्जुन को आज दोस्त और एक जकड़े हुए इंसान की परिभाषा दी थी वो शायद हे कोई और कर सकता था. आज अर्जुन ने उसका ये बेहद ख़ास पहलु देखा था जिसने प्रीती के प्रति उसके प्रेम को और ज्यादा ऊंचाई प्रदान की थी.
"तुमने बिलकुल सही कहा प्रीती और मैं शायद ये समझ नहीं पाने की वजह से खुद हे उस से दूर भाग रहा था. लगता था कही ऐसी गलती न कर दू जो मुझे हे अपनी नजरो में न गिरा दे."
"शहहह.. तुम कुछ भी ऐसा नहीं कर सकते मेरी जान, कभी भी नहीं. अब बस मुझे अपने ऊपर सोने दो और बाकी सब मैं खुद संभल लुंगी. हाँ, वो सरदारनी नहीं maan-ne वाली, पहले हे बता देती हु. बेवकूफ ये भी नहीं समझ रही की लेने के चक्कर में देने न पड़ जाए.", प्रीती ने हाथ पीछे ले जाते हुए अपनी ब्रा टीशर्ट के अंदर से हे खोल कर एक तरफ रखते हुए बड़ी चंचलता से गुरदीप का जीकर किया था. अर्जुन शर्म से कुछ कह न सका तोह प्रीती के मुलायम जिस्म को अपने आगोश में लेते हुए लिपट गया.
"ी लव यू मेरी मानो. सचमुच तुम हे हो जो मुझे ऐसे समझा सकती हो.. उमाहहह.", यहाँ उन उभारो का एहसास जरूर था अर्जुन को जो उसके सीने से डब्ब रहे थे लेकिन उसको तोह बस प्रीती के साथ होने से मतलब था. प्रीती भी अब चैन से उसके ऊपर लेती थी, नींद में जाने से पहले का एक ख़ास सुकून.
"उम्. ी लव यू तू जान.. वैसे ये सब मैं हे तोह समझा सकती हु तुम्हे. ऋतू दीदी ने तोह अब तक तुम्हारा गाल हे लाल कर देना था अगर वो अफसाना से इतनी बातें कर लेती तोह.. हेहेहे.. मजाक कर रही हु बेबी.. अब मुझे निनी करवाओ बस..", और अर्जुन भी इस पल में प्रीती को थपकी देता आँखें बंद किये मुस्कुराने लगा. साथ प्रीती थी और उसके सोने से पहले ऋतू का जीकर सुन्न कर जैसे अर्जुन भी बगल में अदृश्य ऋतू की थपकी अनुभव करता हुआ गहरी नींद में चला गया. हर व्यक्ति के जीवन में किसी एक चरित्र का ख़ास महत्व होता है लेकिन अर्जुन के जीवन में तोह ऐसे अनेक थे जो उस पर अपना सर्वस्व कुर्बान कर करने में एक पल भी न गंवाए. तारो की छाँव में एक चन्द्रमा आसमान में रोशन था और दूसरा अर्जुन की बाहों में.
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'Ghanan-ghanan' की ये आवाज उमेद के shayan-kaksh में रखे काले टेलीफोन की थी जो बिस्टेर की बगल में हे रखे लकड़ी के गोल तिपाये स्टूल पर पड़ा बज रहा था. राजेश्वरी अभी बाथरूम में थी और चौथी घंट पर अलसाये हुए उमेद सिंह ने हे फ़ोन का हैंडल उठाते हुए अपने कान से सत्ता लिया
"कौन है भाई.. uhhhhaahh",Ubaasi लेता हुए वो सामने वाले की आवाज का इन्तजार करने लगा. साढ़े 4 बजे तोह Inder-Shankar हे फ़ोन कर सकते थे लेकिन अभी तोह उनकी उम्मीद भी नहीं थी.
"Hello.. उमेद सिंह.."
"बोल रहा हु भाई उमेद हे बोल रहा हु.", उमेद अभी तक आलस में था लेकिन ये आवाज जैसे उसके लिए नयी थी.
"शायद तुमने पहचाना नहीं भाई. मैं गजेंद्र भल्ला बोल रहा हु.", इस आवाज के मालिक का नाम सुन्न कर उमेद तुरंत उठ बैठा. इस व्यक्ति का फ़ोन वो भी घर के नंबर पर आ सकता है इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी. लेकिन इस वक़्त क्यों ये ज्यादा हैरानी की बात थी.
"हाँ भल्ला साहब. बताओ आपने गरीब को कैसे याद किया? बात जरूर बड़ी हे होगी.", उमेद ने एक तरफ रखा पानी का लौटा उठा कर घूँट भरा और भल्ला की आवाज का इन्तजार करने लगा.
"बहोत जरुरी हे बात है भाई और हमे बस तुम्ही याद आये इस परेशानी की घडी में.", अब उमेद पूरी तरह जाग चूका था और भल्ला की आवाज में जो दुःख था वो उमेद महसूस कर सकता था.
"गजेंद्र भाई साहब आप बस नाम बताओ या परेशानी. अगर आपको मेरा हे ध्यान आया है तोह फिर उमेद सिंह ये मान बरकरार रखेगा. सोचिये मत और बात बताये.", उमेद बात करते हुए हे अपने पाँव में जूती पहन चूका था. तकिये के निचे राखी रिवॉल्वर अपने पाजामे के भीतर खोंसता वो जैसे अब किसी अनहोनी से भिड़ने को तैयार बैठा था.
"हमारे बेटे का पता नहीं चल रहा है. कल रात हे क्सक्सक्सक्स राजस्थान के बोर्डिंग स्कूल से मेरे ख़ास आदमी और ड्राइवर उसको ले कर निकले थे और आधे घंटे पहले हे ड्राइवर से पुलिस ने बात करवाई है. उसको गोली लगी है और हमारा सुरक्षाकर्मी मारा जा चूका है. पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा और मुझे लगता भी नहीं की पुलिस की मदद लेनी चाहिए इस मामले में. मेरा एक हे बीटा है उमेद और वो भी 15 बरस का. भगवान् के लिए...", भल्ला दूसरी तरफ से अश्रुधारा बहा रहा था जो उमेद को साफ़ पता चल रही थी. एक खतरनाक इंसान और ताक़तवर राजनेता था गजेंद्र भल्ला लेकिन आज उसकी हद्द से बहार उसके हे परिवार का चिराग लापता था.
"आपके ड्राइवर ने जो भी बतया है भाई साहब, विस्तार से बताये. अगर ये मामला मेरे हे कही आसपास का है तोह भरोसा रखिये, उमेद उसको कही से भी ढून्ढ निकलेगा. और हिम्मत रखिये क्योंकि भाभी और परिवार को आपने हे संभालना है.", उमेद के सामने अब तक पूर्णिमा जी चाय का प्याला रख कर जा चुकी थी. भल्ला ने इसके बाद पूरा विवरण जैसे तैसे दिया जितना उसको बताया गया था. मामला अपहरण का था और वो भी एक बड़े व्यक्ति के बेटे का. रकम के लिए अभी तक फ़ोन नहीं आया था मतलब वो लोग अपने ठिकाने नहीं पहुंचे होंगे. और ऐसे मामलो में रकम मिलने के बाद भी व्यक्ति को मार हे दिया जाता है. उमेद फ़ोन रखने के बाद गहरी सोच में डूब गया था.
'साला ये तोह अपने हे नेशनल हाईवे के पास काण्ड हो गया. इतना गुड्डा किसके पास है इस तरफ जो ऐसा काण्ड कर जाए और पुलिस को भनक हे न हो. चाचा जी से बात की तोह मामला फिसल सकता है और वो ठहरा बचा.', उमेद सोचविचार कर फ़ोन की तरफ बढ़ा और नंबर मिलाने लगा. चाय पर अब मलाई आ चुकी थी जिसकी उमेद को जरा भी परवाह न थी.
"इन्दर, वह तेरे aas-pas अर्जुन है क्या?", दूसरी तरफ फ़ोन नरिंदर ने उठाया था जो बैठक में अभी सो कर उठा हे था.
"इतनी सवेरे तुझे अर्जुन की याद क्यों आयी बे गज्जू? थोड़ी देर में तू आ तोह रहा हे है."
"अबे ओह नंदलाल, अर्जुन तेरे aas-pas है तोह उसको बुला. बाद में बताता हु तुझे मैं सब.", उमेद ने जिस तरह खिसियाते हुए कहा था नरिंदर बगल खुजाते हुए हंसने हे लगा.
"अर्जुन.. हैं तोह घर में हे तू एक मिनट होल्ड कर.", नरिंदर ने अपनी माँ के कमरे वाले दरवाजे से भीतर देखा तोह ऋतू शायद आवाज सुन्न कर उठ गयी थी. बाकी वह न कौशल्या जी थी और न हे देवकी.
"बीटा, अर्जुन को बुला जरा. कहना की उमेद का फ़ोन है.", ऋतू को संदेसा दे कर नरिंदर आदतन उमेद की टांग खिंचाई में जुट गया जो उमेद दिल पे पत्थर रख कर करवाता रहा. ऋतू भीतर आयी चली आयी जहा अर्जुन नदारद था. कसरत वाली जगह भी न दिखा तोह उसके कमरे में गयी.
'अब ये महाराज कहा चले गए जबकि चाचा जी तोह कह रहे है की वो घर में हैं'
"आप किसी को खोज रही है आपि?", अफसाना स्नान के बाद सर को ढके जैसे नमाज से फुर्सत हुई थी. ऋतू को भटकते देख जेहनी तौर पर उसने वजह पूछी तोह ऋतू ने एक पल उसको देखा और फिर सिर्फ इतना हे कहा.
"अर्जुन.", ये नाम सुन्न कर अफसाना ने एक पल शर्म से नजरे झुकाई और फिर छत की तरफ इशारा कर दिया. ऋतू हैरत से उसको देखती ऊपर चल दी. अफसाना को अर्जुन की खबर थी ये बात गले नहीं उतरी लेकिन ऊपर आते हे उसने सर पे हाथ रख लिया. सिर्फ पजामा पहने ऊपर से निर्वस्त्र अर्जुन टेढ़ा लेता था और उसके ऊपर प्रीती बेसुध सी दुनिया भूलकर. अभी पूरी तरह उजाला न हुआ था लेकिन 5 बजने वाले थे. प्रीती की ब्रा इस तरह पड़ी थी जैसे ये दोनों अपने शयनकक्ष में दरवाजा बंद कर के निश्चित मनमर्जी करके सोये हो.
"ओह कमीनो.. तुम मरवाओगे अपने साथ साथ मुझको भी.", ऋतू ने प्रीती को हिलाये बिना अर्जुन को झिंझोड़ा. कसमसाती हुई प्रीती भी उठती हुई आँखें खोलने लगी तोह सामने ऋतू का धुंदला सा चेहरा नजर आया.
"यार मैंने नै आपके साथ सोना.", प्रीती नींद में हे थी जो फिर से गद्दे पर अर्जुन से लिपट गयी लेकिन अब अर्जुन इधर उधर देख रहा था.
"इसको सोने दे और तू चल निचे. उमेद चाचा का फ़ोन है तेरे लिए, इन्दर चाचा ने कहा है. बाकी सवाल मैं तुझसे बाद में करुँगी.", अर्जुन तुरंत दौड़ गया जिस हालत में था वैसे हे. कुछ सोच कर ऋतू अब प्रीती की बगल में आ लेती.
"जान, हलकी ठंडी लग रही है.", प्रीती नंदी सी ऋतू से लिपटी तोह ऋतू कामिनी मुस्कान के साथ खुद भी उस से चिपक गयी. एक हाथ जैसे हे प्रीती के आज़ाद उभर पर रखा था अब प्रीती को करंट लगा.
"आप? अर्जुन कहा है?", हाथ अभी भी प्रीती के उभर पर हे था लेकिन वो विस्मित सी अपनी बगल में ऋतू को देखती रही.
"सुधर जाओ रे तुम दोनों सुधर जाओ. तेरी ब्रा कहा है पता है? ऊपर से खुली छत पे तुम दोनों nang-dhadang से पड़े थे. शायद अफसाना भी देख गयी तुम्हे जिसने मुझे बताया की अर्जुन कहा है."
"ओह सहित.. दीदी सॉरी. वो आँख नहीं खुली तोह वापिस नहीं जा पायी कमरे में. लेकिन कसम से कुछ भी नहीं किया हमने.", प्रीती की मासूमियत देख कर ऋतू भी हंसने लगी.
"जानती हु तुझे मैं मेरी गुड़िया. लेकिन थोड़ा तोह सबर रखो यार जब इतने लोग घर में है. वैसे रिस्क लेना बेकार हे गया जब कुछ किआ हे नहीं."
"दीदी.. और अब इधर से तोह हाथ हटा लो नहीं तोह ..", प्रीती ने जब ऋतू का ध्यान अपने उभर की तरफ दिलाया तोह ऋतू ने हँसते हुए उसको अपने साथ हे लगा लिया.
"तू न नखरे मैट हे किया कर. और धमकी तोह तेरी किसी काम की नहीं जो तुझे पता हे है. वैसे कुछ किया नहीं लेकिन फीलिंग पूरी ले रहे थे."
"धत्त.. चलो अब जाने दो मुझे निचे. पता नहीं अफसाना के साथ साथ और कौन देख गया होगा?", प्रीती थोड़ी चिंतित दिखी तोह ऋतू ने उसका गाल सहलाते हुए चिंता दूर की.
"और कोई इधर नहीं आया. तू परेशां मैट हो किसी का सोच कर. कोई कुछ कह के तोह देखे जरा तुझे कुछ. घर के बड़े तोह ऊपर आते नहीं है और बाकी किसी की मजाल नहीं जो मेरी प्रीती को कुछ कह दे. चल अगर थोड़ी देर और सोना है तोह आँखें बंद कर ले.", ऋतू ने बड़े स्नेह से प्रीती का चेहरा अपनी ब्याह पे रखते हुए दुलार जताया तोह वो भी किसी बचे की तरह आँख बंद करके वापिस सोने लगी. दूसरे हाथ से ऋतू ने वो ब्रा तकिये के निचे कर दी. फिलहाल कोई इतना जरुरी काम भी न था के ऋतू को जाना पड़ता. प्रीती को आराम देती वो अपने हे विचारो में डूब गयी.
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अगले आधे घंटे से पहले अर्जुन की काली लांसर इस घने मोहल्ले में कड़ी थी जहा यूनिवर्सिटी वाले सुरक्षा प्रमुख का विख्यात भाई सोनू रहता था. कुछ छोटे बचे जो इतनी सवेरे जाग जाते थे वो संकरी गली में कड़ी इस कार को हाथ लगा कर हे खुश हो रहे थे और उस बिना प्लास्टर के 2 मंजिला घर के भीतर आँगन में अर्जुन उस निवार वाली लोहे की कुर्सी पर एक सख्त जान व्यक्ति के सामने बैठा था.
"देखो अर्जुन भाई मामला तोह समझ आता है और जिस तरह अंजाम दिया गया है तोह वो लोग भी मेरे अनुमान से जान पहचान के है. लेकिन कैंप का कोई भी व्यक्ति उनके साथ दुश्मनी नहीं करेगा. आपस में सम्बन्धी है और जुड़ाव के साथ साथ एक दूसरे की मदद भी करते है."
"सोनू भैया, बात सिर्फ अपहरण की होती तोह बदले में पैसा दे कर सुलट सकते थे. एक हाथ दिया और एक हाथ लिया वाला मामला. लेकिन उन्होंने एक आदमी को जान से मारा है और दूसरा भी बुरी हालत में है. आपको भी पता है की पैसा मिलने के बाद भी वो लोग लड़के को तोह वापिस नहीं करेंगे.", अर्जुन के हाथ में पानी का गिलास था जिसकी एक घूँट तक उसने न भरी थी. सोनू की बीवी चूल्हे पर चाय रखने के साथ साथ इन दोनों को भी देख रही थी. सोनू के बचे अंदर कमरों में इत्मीनान से सोये थे.
"भैया, कुछ तोह लीजिये.", सोनू की बीवी ने दोनों के बीच हलकी ख़ामोशी देख अर्जुन से कहा.
"भाभी जी, अब ये तोह सोनू भैया के ऊपर है की वो मुझे नमक खिलाना चाहते है या भेजना.", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर सोनू चिंतित हो गया जबकि अर्जुन के चेहरे पर ठीक वैसी गंभीरता थी जैसी रामेश्वर जी के दिखाई पड़ती थी जब वो सामने वाले को मौका देने की बात करते थे.
"देखो अर्जुन भाई, कैंप एक परिवार है और तुमने भी कभी हमको अलग नहीं समझा. लेकिन जो तुम चाहते हो उसके नतीजे खतरनाक हो सकते है. निम्मा एक कपटी व्यक्ति है जिसको पकड़ना इतना आसान नहीं. इसलिए तोह वो फिरौती लेने के बाद भी शिकार को ख़तम करके सब सबूत हे मिटा देता है. वो लोग कैंप वालो के साथ दुश्मनी नहीं करेंगे लेकिन अगर उन्हें पता चला की यही से उनका भेद खुला है तोह फिर अंजाम हमारे खिलाफ भी जा सकता है."
"सोनू भैया, न मैं आपके पास आया न वो इस बार बचेंगे. आप बस ये बताओ की उनका ठिकाना कहा है और आपकी परेशानी ख़तम करते हुए मैं इतना भी बता दू के जो फिरौती लेने जायेगा वो भी नहीं बचने वाला. मतलब सभी गायब हे होंगे जो भी शामिल हुए.", अर्जुन के विश्वास को देख सोनू ने अपनी बीवी से किसी को बुलाने को कहा. अगले 10 मिनट तक 2 लोगो के साथ सोनू बहार हे मंत्रणा करता रहा और गंभीर चेहरे के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ.
"निम्मे ने हे अंजाम दिया है उस वारदात को. क्सक्सक्सक्स गाँव से आगे लड़कियों के बड़े स्कूल की तरफ एक रास्ता उतरता है. वही hadda-rohdi (जानवर दफ़नाने की जगह) से पहले एक खंडहर है जिधर वो गिरोह शिकार को रखता है. फिरौती कहा मंगवाई जाएगी ये तोह वही फ़ोन पर बताएँगे लेकिन पीछे भी 4 लोग रुकेंगे. काम होने के बाद वही hadd-rohdi में जानवरो के बीच हे शिकार के टुकड़े मिला कर वो लोग हफ्ते 2 हफ्ते वापिस अपनी बस्ती में. एक बार फिर से सोच लो अर्जुन, वो लोग कसाई है.", सोनू ने चेतावनी की जगह अर्जुन के प्रति चिंता दिखाई तोह पानी का घूँट भरने के साथ साथ अर्जुन ने सामने राखी प्लेट से नमकीन का टुकड़ा खाते हुए आँख दबा दी.
"चलता हु भाभी जी, गुल्लू के साथ जब खेलने आऊंगा तोह रोटी खा कर जाऊंगा. वैसे मुझे मटर वाले चावल और बूंदी का रायता पसंद है. धन्यवाद् सोनू भाई.", अर्जुन ने कार में बैठने से पहले सोनू को गले लगाया और हाथ हिलता हुआ सामने की तरफ हे निकल चला. इस बस्ती से आगे हे हाईवे की तरफ सड़क निकलती थी. इतनी सुबह रस्ते में पीसीओ के लिए नजर दौड़ता अर्जुन भी अजीब कश्मकश में था.
'उमेद चाचा ने मुझे जिम्मेवारी सौंपी क्योंकि उन्हें मुझपर विश्वास है. उन्होंने सिर्फ पता लगाने का कहा है लेकिन अगर वो समय रहते दोनों जगह न पहुंच पाए तोह.?', अर्जुन विचारो में उलझा था की सड़क ख़तम होने से पहले हे सदाप की बायीं तरफ पानी की छिड़काव से उड़ती मिटटी देख वो पीसीओ नजर आया. कार थोड़ा आगे रोक कर पर्स से खुल्ले पैसे निकलने के बाद उसने बगल वाली सीट पर नजर डाली तोह उस सफ़ेद गमछे को सर पे बांध लिया.
"भैया फ़ोन कर सकते है?", ये व्यक्ति कोई 30 बरस का होगा जो छिड़काव में मसरूफ था.
"कर लो भाई, फ़ोन चालू है और बिल के लिए चिकचिक मैट करना. वैसे हे ज्यादा कुछ बचता भी नहीं और इधर के लोग एक रुपये के लिए झगड़ने लगते है. छुट्टे खुद नहीं लाएंगे और 9 के अगर 10 काट ले तोह 4 गाली मुफत में दे जाते है.", व्यक्ति शायद तंग आ चूका था कैंप बस्ती से और अर्जुन अंदर दाखिल हो कर उमेद सिंह का नंबर मिलाने लगा.
"हाँ चाचा जी. कोई फ़ोन आया पार्टी का?"
"तुम्हे क्या खबर लगी है? वैसे 10 मिनट पहले हे फ़ोन आया था उस तरफ की 8 बजे बाईपास चुंगी पर 50 लाख हनुमान मंदिर के पीछे वाले प्लाट में छोड़ दिए जाए. उसके बाद 8:30 पर लड़का जीरी सड़क के मदद वाले खेत में पंहुचा दिया जायेगा.", उमेद जिस तरफ था वो खुल कर बात कर सकता था लेकिन ये पब्लिक बूथ था जहा टेलीफोन अर्जुन के सामने खुले में था.
"अपने दोस्त मंदिर के करीब अभी से हे भेज दीजिये चाचा जी. एनिमल क्रीमेशन ग्राउंड पर फूल और कांटे मिल सकते है लेकिन सिर्फ माली हे कांटे संभाल सकता है. कोई ख़ास गया तोह फूल मुरझा जायेगा. आप मंदिर सम्भालिये और फूल के मालिक को वही रखियेगा. मैं उधर हे मिलता हु.", उमेद हैरान था अर्जुन के बात करने के लहजे से और जबतक वो कुछ और बात करता अर्जुन फ़ोन काटने के बाद बहार खड़े व्यक्ति को 50 रुपये थमा कर कार की तरफ जा चूका था. ये व्यक्ति भीतर आया तोह बिल मशीन पर रकम 3 रुपये 60 पैसे नजर आयी.
"चलो, भगवन की कृपा से बोहनी शानदार रही.", वो खुश था और अर्जुन समय के अभाव की वजह से tivra-gati से कार दौड़ता उस सड़क पर आ चूका था जहा से एक रास्ता बबिता की हवेली वाले गाँव जाता था और और दूसरा उमेद सिंह के.
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"गजेंद्र भाई, आपके लिए आज मैंने अपने बेटे को हे दांव पर लगा दिया है. उसको सिर्फ सुराग पता लगाने भेजा था लेकिन अब वो इस सबमे शामिल हो कर मेरी भी हालत आप जैसे कर चूका है.", उमेद ने भल्ला को फ़ोन लगाया तोह उस वक़्त भल्ला भी तूफानी रफ़्तार से चलती कार में सेलुलर फ़ोन पे उमेद की बात सुन्न रहा था. चेहरे पर गहरी चिंता और बगल में आंसू बहती हुई एक 17-18 बरस की युवती, जो भल्ला की बेटी थी.
"उमेद भाई, मैं अगले 2 घंटे में आपके पास पहुंच जाऊंगा. वाहेगुरु बस आज किसी तरह बचो को बचा ले उसके बाद मैं हम दोनों का केहर इतना बुलंद कर दूंगा की हमारे बचो पर निगाह डालने वाली हर आँख कबर में मिलेगी. उमेद, हम वही मिलते है.", भल्ला ने अपनी बेटी को सीने से लगते हुए फ़ोन का लाल बटन दबाया और बेटी को हौंसला देने लगा. ये विदेशी लम्बी कार लगभग 200 पर दौड़ रही थी और दूसरी तरफ उमेद की दिल की धड़कन भी.
'साला ये सचमुच पागल हे है. मुझे भी मौत पड़ी थी जो अर्जुन से बात की. लग गए तगड़े वाले.', उमेद ने भन्नाते हुए अगले 10 हे मिनट में 5-6 फ़ोन खडका दिए थे और उसके बाद जब वो हवेली से निकला तोह आज उसकी काली जीप में किंग उसके साथ हे था. और एक कार में 4 मजबूत सुरक्षाकर्मी, उनके पीछे.
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"ये अर्जुन नजर नहीं आ रहा कही पंडित जी.", 7 बजे हे शास्त्री जी पंडित जी के इधर पधारे तोह बगीचे में चाय का लुत्फ़ लेते हुए उन्होंने यही से बात शुरू की. राजकुमार जी मंडी से सब्जी और जरुरी सामान ले कर अंदर गए थे और खाने की तरफ नरिंदर जी अपनी लाड़ली आरती के साथ असगर को निर्देश देने में लगे थे. कृष्णेश्वर जी देहात से थे तोह उनकी दिनचर्या भी जल्द शुरू हो जाती थी. वो भी बगीचे को निहारते हुए चाय का लुत्फ़ लेने में लगे थे.
"पता नहीं शास्त्री जी वो कहा निकल गया आज? किसी काम से इतनी जल्दी तोह वो कार ले कर घर से जाने से रहा.", एकाएक पंडित जी भी बेचैनी बढ़ी जो आचार्य जी से छिपी न रह सकीय. वो भांप गए थे की अर्जुन किसी अलग हे काम से निकला है.
"जवान लड़का है भाई साहब और क्या पता शादी के हे किसी काम से गया हो. मैंने इसलिए हे पूछ लिया की इस समय तोह वो आपके पास यही दूध पी रहा होता है.", आचार्य जी खामोश हुए तोह इधर आते नरिंदर जी ने राज से पर्दा उठाया.
"आचार्य जी, सॉरी चाचा जी ऐसा है की आपका लाडला अपने ख़ास चाचा से मिलने गया है. और अब उमेद ने उसको क्यों बुलाया है ये तोह वो दोनों हे बता सकते है. लेकिन इतना कह सकता हु की काम उमेद को हे होगा नहीं तोह वो इतनी जल्दी फ़ोन नहीं करता. अब अर्जुन ऐसा कौनसा काम कर सकता है जो उमेद के वश का नहीं ये तोह मैं क्या हे बताऊ.", नरिंदर वही घास में हे बैठ गया और प्लेट से नारियल की बर्फी उठा कर चबाते हुए कृष्णेश्वर जी की धोती से हाथ साफ़ करते हुए उनके साथ धीमी आवाज में कोई चुहल करने लगा जिस पर कृष्णेश्वर जी हँसते हुए उसके सर पर थपकी देने लगे.
"हो सकता है कही लेके जाना हो उमेद ने उसको अपने साथ. शास्त्री जी, उमेद घर का पहला बीटा है अपने. शंकर से 2 महीने बड़ा है लेकिन आपस में ये सभी एक हे जैसे है. अर्जुन जैसा इन्दर के लिए वैसा हे शंकर उमेद के लिए बस उमेद उसको बहोत मानता है.", रामेश्वर जी थोड़ा बेफिक्र हो गए थे ये जान कर और अब आचार्य जी भी मुस्कुराये जब ये बात पता लगी.
"देखा जाए तोह इस बचे ने हमको भी आपसे जोड़ दिया पंडित जी. विरले हे होते है कुछ लोग जो सिर्फ बनाने में यकीन रखते है. मुझे बता रहा था की स्कूल के बाद या तोह कलकत्ता जाऊंगा कॉलेज के लिए या फिर ंसित दिल्ली. ये लड़का न अभी से अपने कई निर्णय बना चूका है. जाने दुनिया की इतनी समझ कैसे आयी है इसमें.", आचार्य जी के कहने पर पंडित जी को भी दिल्ली के कॉलेज वाली बात याद आ गयी.
"सांगत का असर है शास्त्री जी. हाहाहा.. अब दोस्त हे 40 से 70 बरस वाले हो तोह वो दूर की हे सोचेगा... लो जी ये आपके और कृष्ण के लिए ख़ास मूंग की दाल का चिल्ला. हमारी भगवान जब भी रसोई में जाती है तोह समझ लीजिये आज कुछ दिल को सुकून देने वाला खाना हे नसीब होगा.", एक ट्रे में खुद कौशल्या जी 3 प्लेट में मूंग की दाल से बने चिल्ले लिए आयी थी, तीखी और मीठी चटनी के साथ.
"रहने दो जी अब माखन लगाने के लिए. देवर जी ने कल हे कहा था के नाश्ते में इन्होने चिल्ला खाना है लेकिन सिर्फ प्याज, हरी मिर्च और टमाटर के सलाद वाला. कृष्ण को भी पसंद है लेकिन पनीर के साथ. आपको नहीं मिलेगा.", कौशल्या जी ने थोड़े नखरे से कहा था और वो 3 प्लेट बता रही थी की एक पंडित जी की हे है.
"हाँ... ये सही कहा माँ आपने. पापा का न बप सही रखो बस और ये चिल्ला जो है हरी चटनी इस्पे गिराई और ऐसे गोल करके बस इमली चटनी में डुबो कर मुँह में rakha...ummm.. स्वाद हे आ गया कसम से.", सबसे पहले ये कारनामा नरिंदर ने हे किया जो बिना किसी की परवाह के एक प्लेट उठा कर टूट पड़ा.
"देख लो भाई.. एक तोह हमारी थानेदारनी जी हमारे लिए कभी कुछ बनती है और उस पर भी ये लकड़बग्घे हाथ साफ़ कर देते है. हाहाहा..", पंडित जी को बचो की ख़ुशी हे तोह पसंद थी. छोल साहब भी इस तरफ आये तोह कोमल एक और ट्रे में गरम चाय और कुछ चिल्ले लिए आ गयी थी.
"दादी ने सबके लिए हे बनाये है बाउजी. आप चलो दादी, मैं सबके लिए चाय दाल कर चिल्ले लेने आती हु.", यहाँ अब पूरी महफ़िल लग चुकी थी और कौशल्या जी जाते जाते राजकुमार जी को भी बोल गयी की बगीचे में सबके साथ नाश्ता करे. समय 7 से कुछ ऊपर हे हुआ था और एक तरह से ये सिर्फ जायके का हल्का फुल्का दौर था जिसके बाद सभी काम में व्यस्त होने वाले थे.
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हर तरफ ख़ामोशी व्याप्त थी इस खुले मैदान और उसके अगल बगल के निर्जन से स्थान पर. हवा में भयानक दुर्गन्ध ऐसी जिसमे सांस लेना भर मुनासिब न हो. एक तरफ कच्ची पगडण्डी और बाकी कही जानवरो के कंकाल जिन पर चिल्लाते gidh-cheel की बेसुरी आवाज या वो भूखे कुत्ते जो गंदगी में भी हड्डियों पे जमा सदा गाला गोश्त खंगाल कर इत्मीनान से जुटे थे. पगडण्डी से थोड़ा आगे हे दलदली सा कीचड जो दो दिशा में जा रहा था.
इस कीचड और झाड़ियों के झुरमुट से आगे था ये jirn-shirn हालत में खड़ा एक वीरान सा दीखता खंडहर जो अंदर से उतना वीरान भी न था. खाली आँगन जिसमे जाने कैसी कैसी झाड़ियां दिवार तक ऊँची उठी थी और उसके बाद गहरे अँधेरे से ढाका एक खुला सा कमरा. कमरे से आगे कुछ हंसी और ठहाके की आवाज एक और कमरे से आ रही थी.
"ाःह.. तेरे जैसी रंडी आज तक नहीं देखि जुगनी.. साली की गांड और भोसड़ा जितना मर्जी फाड़ो, छेड़ कैसा हुआ है लगता है.", तक़रीबन 6 फ़ीट का एक पक्के रंग का मांसल व्यक्ति मोटी तगड़ी औरत को घोड़ी बनाये अपने भयंकर लुंड से सटासट पेल रहा था. इस कमरे में सिर्फ यही दोनों नहीं थे. उस औरत के मुँह में भी एक तगड़ा लुंड फंसाये वैसी हे kad-kaathi का जल्लाद सा युवक जैसे आखिरी झटके लगा रहा था. औरत के बड़े बड़े दूध किसी घडी के पेनद्ळम से हिलते लेकिन वो इस दो तरफ चुदाई में मजे से लगी रही.
"ओह खैरु, बहनचोद अपनी अम्मा के भोसड़े में काम के बाद भी घुस सकता है. साला अभी काम ख़तम नहीं हुआ और यहाँ गांड हिला कर मुजरा पहले करने लगे तुम तीनो. चल ऋ जुगनी जरा उस कबूतर के पास बैठ और तुम दोनों निकलो वन ले कर माल लेने.", ये आदमी इन दोनों हे युवको से कही ज्यादा हे गहरे रंग का और तक़रीबन सवा 6 फ़ीट लम्बा था. चेहरे पर तीखी मूछे और कमर पर लुंगी के साथ एक देसी तमंचा. वो दोनों युवक उस औरत से हेट तोह मुँह और फैली हुई छूट को सफ़ेद कर चुके थे. खिसियाते हुए दोनों ने जल्दी से patloon-kameej पहनी और कमरे से बहार निकल आये.
"निम्मे भाई, काम होने के बाद इस जुगनी की लोंड़िया से मेरा ब्याह करवा देना बस. रूपया चाहे एक लाख काम डोज तोह चलेगा.", ये लीलू था जो औरत के पीछे चढ़ा था कुछ शन्न पहले. इसने भी कमर में देसी पिस्तौल खोंसने के साथ अपने लम्बी जुल्फों को दोनों तरफ बराबर हाथ चलते हुए दांत दिखाए.
"भोस्डिके जब पहले हे तेरा ब्याह हो चूका है तोह काहे दूसरी गांड में लीनो को मर्डर रहा है.? खैरु, बीटा ध्यान से माल लेना है और साला कोई ऊंच नीच लगे तोह पता है न क्या करना है? माल मिलते हे दरजी के बराबर वाले बूथ से फ़ोन मिला देना पूर्ण को. उसके संदेशे के बाद इस कबूतर को निबटा के खेत में मैं खुद फेंकवा दूंगा. माल के बदले वापिस करने का वादा जो किया है. हाहाहा..", ये sakht-jaan व्यक्ति हे इनका मुखिया था निम्मा कसाई.
"हीहीही.. भाई.. वैसे आजतक साला 2-3 लाख का हाथ मारा था पर किस्मत देखो इस बार सीधा 50 लाख.. बहनचोद जाने क्या हे करम किये थे पिछले जनम जो ऐसी दिवाली नसीब हो रही.", खैरु की बात पर निम्मे ने इशारे से जुगनी को आखिरी वाले कमरे में जाने को कहा और इन दोनों के साथ हॉल कमरे में थोड़ा आगे चला आया.
"ये काम किस्मत हाथ नहीं लगा bhosad-pappu. इसको करने के भी 50 मिल रहे है और दूसरी तरफ से भी 50. तुम सबको 15-15 लाख देने के बाद भी मेरे हिस्से आये 25. मतलब रकम हे नहीं काम भी बड़ा है. होशियारी उतनी हे दिखाना जितनी कही है.", निम्मा धीमी आवाज में दोनों को समझते हुए भी हड़का रहा था. खैरु के दांत होंठो के पीछे छिप चुके थे अपने गुरु का गुस्सा उगलती आँखें देख.
"इस रांड को भी कुछ देना है क्या उस्ताद.?", ये लीलू था जिसका आशय जुगनी से था.
"हाँ बे लीलू इसको खुश रखना बहोत जरुरी है. ये काम न करती तोह वो कार भी न रूकती और पहले भी इसने तुम लोगो की गर्मी उतारने के साथ साथ बहुतो को ठंडा किया. तभी तोह मैंने 5 कहे, 4 नहीं. चल बीटा जल्दी निकल और पौने घंटे में पूर्ण मेरे पास आ जाना चाहिए तुम्हारा फ़ोन सुन्न कर.", निम्मे ने दोनों के कंधे पर थपकी लगते हुए विदा किया और Lilu-Khairu चीते से चाल चलते हुए बड़ी अदा के साथ इस वीराने में बहार निकल आये.
"वाह लीलू, अब देख मैं लूंगा एक नयी मारुती और एक विलायती तमंचा. फिर अपने हे बस्ती के 5 लोंडो के साथ अलग गैंग बना कर ऐश की ज़िन्दगी.", खैरु कीचड से कुशलता से बच कर अब पगडण्डी पर आया तोह लीलू को अपने अरमान बताने लगा.
"हाँ खैरु भाई, मैं आपका मैं रहूँगा याद रखना. वैसे भी दिल्ली की तरफ काम करेंगे तोह रोज 50-50 कमा सकते. इधर साला महीने में लाख कमाओ और उसके बाद 29 दिन मुफत में bakra-murga हलाल करो. निम्मा उस्ताद देखना अब जुगनी की गांड में घुसेगा और काम के बाद नाम भी उसका.", ये दोनों ऐसे हे प्लान बनाते हुए सड़क की दिशा में पगडण्डी पर हो लिए. 2 आँखें निरन्त इन्हे देख रही थी जिसका भान न इनको था और न हे खंडहर में मौजूद निम्मे और बाकी उसके आदमियों को. हरे सरकंडो के बीच छिपे अर्जुन ने कलाई घडी में समय देखा तोह 7:35 हो चूका था.
'यहाँ से बिपास चौक है 22 कम और इनके पास खतरा वन मतलब 30 मिनट. अंदर 3 लोग जिनको निबटना होगा 10 से 12 मिनट में. चल बीटा अर्जुन आज सचमुच चाचा को गुरुदक्षिणा देने का समय है.', खंडहर पिछली तरफ से ज्यादा हे जर्जर था और इधर से ऊपर की छत भी झाड़ चुकी थी. चेहरे पर गमछा बाँध कर किसी सतर्क विडाल सा अर्जुन अब खंडहर के आँगन में दाखिल हो चूका था.
सबसे आखिरी कमरे की खिड़की इस आँगन में भी खुलती थी और अंदर का नजारा लेते हे अर्जुन गंभीर हो गया. जमीन पर बेहोशी की हालत में वो 15 वर्ष का लड़का करवट के बल था और उसके दूसरी तरफ जुगनी को निर्वस्त्र करके अपने मूसल पर तेल रगड़ता निम्मा कसाई. अर्जुन को इस से बेहतर अवसर मिल हे नहीं सकता था.
"देख लिया या पूरी फिल्म देख के हे मानेगा?", ये आवाज बिलकुल बगल से हे आयी थी और जैसे हे अर्जुन पलटा तोह लीलू जैसा हे एक hatta-katta लेकिन गंभीर सा युवक उसके सामने था.
"ज़मींदार, चुदाई देखने के लिए ऐसे रिकास (रिस्क) न लेने चाहिए. उस्ताद ने देख लिया तोह बेवजह तेरी गांड में छुरा दाल के कुत्तो को खिला देगा. चल अब चुपचाप निकल.", ये युवक निहायती बेवकूफ था या फिर अर्जुन का शुभचिंतक. उसको यही लगा की कुर्ते पयजामे वाला ये युवक aas-paas का कोई ठरकी मुस्टंडा है जो चुदाई देखने इधर आया होगा. उनके अड्डे पर आजतक जब पुलिस हे न आयी हो तोह किसी और शिकारी की क्या उम्मीद.
"कभी किया नहीं न भाई साहब तोह देख कर हे हिला लेता हु. चलता हु.", अर्जुन दबे पाँव चलने लगा और इस युवक ने हँसते हुए बीड़ी सुलगा ली.
"साले लुंड अभी तक लुल्ली है और चुदाई देखने कहा कहा घुस जाते.. उस्ताद भी इस रंडी की गांड में हे घुसा रहेगा.", ये काश लगा कर घूमा हे था की जैसे भूचाल सा आया और आँखों के सामने तारे घूमने के बाद गहरा अन्धकार. अर्जुन ने वही गमछा घुमा कर उसके चेहरे पर मारने के तुरंत बाद हे गर्दन की जाने कौनसी नस दबाई थी की पालक झपकते हे ये बदमाश उसकी बाहों में था.
'लुल्ली हर टाइम लुंड नहीं बनानी चाहिए बरखुरदार. खूंटा समझ कर लोग डर भी सकते है.", अर्जुन ने उतने हे ध्यान से उसके मूर्छित शेर को जमीन पर रखने के साथ हे अंगोछा वापिस चेहरे पर बाँध लिया. अब अंदर सिर्फ 2 लोग थे उस छोटे लड़के के सिवा. जुगनी और निम्मा, जो बेफिक्र एक दूसरे के जिस्म का मजा लूट रहे थे. दबे पाँव अर्जुन इस अँधेरे कमरे से आगे बढ़कर निम्मे वाले कमरे के देहलीज पर आ रुका.
'आठ.. जुगनी.. साली तेरी गांड मारने के बाद किसी को हलाल करता हु तोह मजा दुगना हो जाता है.. आठ.. आज भी वैसी है जैसी ब्याह के आयी थी तब थी...", निम्मा कस के पेल रहा था और जुगनी भी इस चुदाई में भरपूर आवाज कर रही थी. इन वेह्शी दरिंदो को उस बेहोश बचे की भी फ़िक्र न थी जिसके हाथ बुरी तरह कास कर बाँध रखे थे.
"Aa..aah.. निम्मे या गांड भी तूने हे खोली थी मेरी.. आह.. और छूट तोह तुझे पसंद नहीं रही जबसे मेरी बेटी की सील खोल कर तू उसका रसिया बना है.. फाड़ दे रे पूरी फाड़ दे.. aahhh..aaiiiii..", ये आवाज लुंड की तोह बिलकुल न थी और जुगनी औंधे मुँह फर्श से जा टकराई. वैसी हे हालत निम्मे की थी जिसकी गांड पर अर्जुन की भरपूर लात का प्रहार हुआ था.
"भोस्डिके.. तू अपनी मैया छुड़वाने आया है? ज़िंदा नहीं बचेगा.. बाइंडर.. बाइंडर.."
"चीख ले लोदु.. जोर लगा कर चीख. और हाँ, चुदाई करते वक़्त इतना भी लापरवाह नहीं होना चाहिए की हथियार हे दूर कर दो.", अर्जुन के हाथ में निम्मे का तमंचा था और जुगनी की आँखों में इस नकाबपोश को देख दहशत.
"लोंदे, यही हड्डा रोहड़ी में दफना दूंगा और घरवालों को तेरी हवा तक नसीब न होगी.", निम्मे के होंठो से निकलता खून भी जैसे कला सा था. वो गुर्रा रहा था और अर्जुन एकदम शांत. उसकी तरफ देखते हुए अर्जुन ने तमंचे की नाल और हठी अलग करके बहार उछाल दी.
"सुना है तू जल्लाद कसाई है जो भैंसे की गर्दन एक वार में अलग कर देता है? आंटी तुम जरा भी हिली तोह रिवॉल्वर जैसा हाल करूँगा तुम्हारा.", अर्जुन ने निम्मे को हड़काते हुए जुगनी को भी एक मजाकिया धमकी दी थी जिस वजह से वो नंगी हे एक कोने में दुबक गयी. अर्जुन की हिम्मत देख निम्मे ने भी अपनी धोती लपेटी और उसकी तरफ लपका.
"न न.. यही गलती करते है कसाई लोग. भैंसा होता है आपके सामने जिस पर करीब से प्रहार करते है. जब वो भैंसा दूर खड़ा हो तोह हाथ नहीं हिलना चाहिए.. ऐसे पटक देगा..", निम्मा कद्द में एकदम बराबर था अर्जुन के लेकिन उतना मुस्तैद नहीं. कलाई हाथ में पकड़ कर अर्जुन ने इस तरह से निम्मे को पटका था की उसका पूरा शरीर हवा में 360 के कोण पर घूमा और धड़ाम से मजबूत फर्श पर जा गिरा.. पके तरबूज की तरह जमीन पर निम्मा फ़ैल चूका था. चेहरे, सर से लहू और जाने कौन कौन सी हड्डी के टूटने की आवाज आयी होगी. जुगनी की आँखें भये और दर्द से सफ़ेद होने लगी थी. क्वांटल भर के निम्मे को अर्जुन ने पालक झपकते हे फर्श पर ऐसे बिछा दिया था जैसे धोबी गीले कपडे को भिगो कर पटक दे.
"हाथ खोलो इस लड़के के और होश में लाओ. मुझे आपके नंगे जिस्म से कोई मतलब nahi..aahh.", अर्जुन जुगनी को अभी आदेश दे हे रहा था की एक बर्फ तोड़ने वाला सुआ उसके कंधे के ऊपर हिस्से को भेदता निकल गया. अर्जुन अगर अपनी जगह से हिला नहीं होता तोह वो सुआ पक्का उसके पीठ से सीने तक चला जाता. अँधेरे कमरे से इस रौशनी वाले कमरे के बीच वो परछाई देख न पाया था पर तुरंत संभल गया. सफ़ेद कुर्ते पर लाल रंग फैलने लगा था.
"पूर्ण.. बचा ले पूर्ण.. ये जानवर है या जाने क्या.. हरामी ने निम्मे को भी मार दिया और शायद बाइंडर को भी.. बचा ले मुझे इस शैतान से.", जिस तरह जुगनी उछाल कर इस पीठ पर वॉर करने वाले की तरफ लपकी थी, ऐसा लगता था प्यासे को कुआ दिख गया हो. लेकिन बीच में हे उसकी कलाई अर्जुन के हाथ आ चुकी थी.
"कौन है बे तू?", पूर्ण एक औसत कद का अधेड़ सा व्यक्ति था लेकिन चेहरे पर उसके भी खौफ छ चूका था जब अर्जुन को अपनी तरफ मुस्कुराते देखा.
"मेरे पास एक मिनट है और इस एक मिनट में अगर तुम यहाँ से भाग कर बचना चाहो तोह सच कहता हु की तुम्हे जाने दूंगा. और हाँ इसको भी ले जाओ अपने साथ. मुझे सिर्फ ये लड़का चाहिए और आंटी तू इसको खोल नहीं तोह फिर जो कहा था वही करूँगा.", अर्जुन ने jaan-boojh कर पूर्ण से नजरे हटाई थी और जुगनी की कलाई छोड़ कर उसको काम करने को कहा. पूर्ण वही बर्फ तोड़ने वाला सुआ लिए अर्जुन पर झपटा तोह इस बार उसका सूए वाला हाथ और गर्दन अर्जुन की मजबूद पकड़ में थी.
"मतलब सुधारना नहीं है? फिर भी मैं तुम्हे मारूंगा नहीं.", अर्जुन ने सूए वाली मुट्ठी अपनी हथेली में दबाते हुए पूर्ण की तरफ हे घुमा दी. गर्दन पर कस्ती पकड़ से वो पहले हे फड़फड़ा रहा था और उसकी खुदकी मुट्ठी में पकड़ा सुआ अब उसके कंधे से निचे जा टिका था..
"मममम.. मुझे.. जाने दो.. जाने आअह्ह्ह्हह..", एक तरफ वो 8 इंच लोहे का सुआ उसके जिस्म में गया और दूसरी तरफ चीखने के साथ हे मूर्छा (बेहोश) ने आ घेरा. अर्जुन ने चेहरे पर बंधा अंगोछा फिर से कैसा और उस लड़के को अपने दूसरे कंधे पर टांग लिया.
"यहाँ से निकल लो और फिर कही नजर मैट आना. थोड़ी हे देर में भूखे कुत्ते यहाँ आएंगे और शायद ख़ुशी में तुम्हे भी अपना निवाला बना ले.", अर्जुन ने वही एक तरफ राखी बड़ी सी प्लेट को उठाते हुए जुगनी को चेताया जो उसका मतलब नहीं समझी लेकिन जैसे तैसे अपना घागरा बाँध कर बहार दौड़ गयी. इस सब कार्यवाही में उसको 12-13 मिनट हे लगे थे. खंडहर से बहार निकलते हे उसने कुत्तो को 'tu-tu-tu' करके आवाज दी और गोश्त के बचे कूचे ढेर सारे टुकड़े खंडहर के आगे और आँगन में बिखेर दिए. भूखे कुत्ते पूरी रफ़्तार इस तरफ दौड़े थे जिन्होंने एक बार अर्जुन को कृतज्ञता से देखा और फिर गोश्त हड्डी पर टूट पड़े. उन्हें इस से बेहतर महक अंदर से भी आ रही थी लेकिन अर्जुन उन्हें खजाने तक छोड़ आगे बढ़ चला.
'जीवन और मृत्यु एक कटु सत्य है. जो आया है वो जायेगा भी लेकिन आपका जाना आपके कर्मो पर निर्भर करता है. ॐ शांति.. वैसे ये साला बचा भी कुछ ज्यादा हे मोटा तगड़ा है.', अर्जुन पगडण्डी की जगह दूसरी तरफ झाड़ियों से जा रहा था, जो रास्ता कुछ अलग था. 2-3 मिनट बाद हे वो सड़क पर अपनी कार की अगली सीट पर था और लड़के के चेहरे पर पानी डालने के बाद अब पूरी रफ़्तार से इस निर्जन सड़क पर लगभग उड़ने हे लगा था. सफर 22 किलोमीटर था और समय 15 मिनट से कुछ काम.
"बचाओ बचाओ.. हेल्प में समबडी हेल्प में..", अर्जुन ने जैसे हे ये कानफोड़ू आवाज सुनी तोह उसका ध्यान पिछली सीट पर चिल्लाते उस लड़के पर गया.
"ओह चुप कर मेरे दोस्त चुप कर. तुझे बचने के चक्कर में 3 घंटे से अपनी मरवा रहा हु.", चेहरे से बड़ा प्यारा सा और gol-matol सा था ये लड़का जो अर्जुन के इतने दोस्ताना रवैय्ये की वजह से एकदम खामोश सा हो गया. उसकी नजर सीट से दीखते अर्जुन के रक्त में भीगे कुर्ते पर गयी और फिर इस साफ़ सुठि कार पे तोह वो जैसे सब याद करने लगा.
"भैया, हम कहा है?"
"चल आगे आजा और डर मत. सेफ है अब तू और जल्द हे हम तेरे पापा के पास होंगे.", अर्जुन ने आगे हे नजर रखते हुए एक बार आईने से मुस्कुरा कर उसको देखा और हाथ के इशारे से अगली सीट पर आने को कहा. वो gol-matol सा लड़का सेहमा हुआ सा हिम्मत करके जैसे तैसे अगली सीट पर बैठ हे गया. अर्जुन की आँखों पर अब चस्मा था और अंगोछा दोनों सीट के बीच.
"आपके ब्लीडिंग हो रही है भैया. और वो ईविल लोग कहा गए. थे वेरे रियली क्रुएल एंड बाद. मुझे भी मारा था उन्होंने और मुरली भैया को शूट भी कर दिया था. पापा कहा है भैया और आप कोई एक्शन हीरो हो.?", अर्जुन इस नादान से बचे को देख कर एक बार मुस्कुराया और फिर पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ा दी.
"कलम डाउन फ्रेंड. ठोस ईविल पीपल अरे वनिषेद एंड यू अरे सेफ नाउ. वैसे हुआ क्या था तुम्हे कुछ पता है?"
"ी don't क्नोव एनीथिंग भैया. आपने नहीं बताया के आप कौन है?", मोटू बचे के होंठो से गिर कर पानी कुछ गले और उस मैली हो चुकी टीशर्ट पर भी आ चूका था. हालत बुरी थी लेकिन बचा हिम्मतवाला था जो अब दहशत में नहीं था. शायद अर्जुन की मुस्कान और उसके कंधे की चोट जो इस बचे को बचने में लगी थी उसको देख कर वो अब सुरक्षित महसूस कर रहा था.
"मेरा नाम साहिल है भैया, साहिल भल्ला लेकिन आप मुझे गोलू भी बोल सकते है. मुम्मा दीदी यही बुलाते है मुझे. हम कबतक पापा के पास होंगे भैया? मेरी दीदी मुझसे बहोत प्यार करती है और उन्हें ये पता चला होगा तोह वो बहोत रो रही होंगी.", ये भी गुरदीप का हे कोई रिश्तेदार था बोलने में. रेडियो शुरू हुआ तोह अब बंद होने का नाम हे नहीं ले रहा था. अर्जुन दिमाग से कही और था इसलिए बस मुस्कुरा भर रहा था.
"अर्जुन नाम है मेरा साहिल. और हम बस 5 मिनट में आपके पापा के पास होंगे.", आज पहले बार अर्जुन 150 के पार जा रहा था और जैसे हे एक गाँव नजर आया वो समझ गया की मंज़िल करीब है. 8 बजने में अभी 2 हे मिनट बाकी थी और ये कोई फिल्म तोह नहीं थी जिसमे सही वक़्त पर हे डील हो.
"मुझे भूख भी लगी है भैया और हेडाचे भी हो रहा है. आप पहले कही से खाने को हे ले लो कुछ, ी विल पाय यू बैक. मेरे पापा के पास बहोत पैसे है भैया और वो आपका ट्रीटमेंट भी फ्री में करवा देंगे.", अर्जुन मैं हे मैं खुद के सर पे हाथ लगा रहा था के साला ऐसा भी कोई बचा होता है. यहाँ गांड फटी पड़ी है के कही वो लोग पैसे लेके निकल न जाए और इसको भूख लगी है. लेकिन उसकी आँखों में एक चमक सी आ गयी जब वो सफ़ेद खतरा मारुती ओमनी सड़क किनारे कड़ी दिखी. उधर खैरु सीट पर बैठा काश लगा रहा था और लीलू झाडी पर मूत्रविसर्जन करने में व्यस्त था. रफ़्तार काम किये बिना हे अर्जुन आगे निकल चला.
बिपास चौक पे ब्रेक लगा कर एक बार सामने नजर की और फिर दाए बाए. इधर मंदिर के सामने हे उमेद सिंह का ख़ास सुरक्षाकर्मी रणजीत नजर आया तोह अर्जुन ने उसकी तरफ न लेते हुए कार सामने हवेली वाली सड़क पर दाल दी. कुछ 50 गज आगे हे काली मेरसेदेज़ जीप और एक सफ़ेद विदेशी रोल्स रॉयस नजर आते हे अर्जुन ने अपनी कार भी सफाई से उनसे थोड़ा आगे निकाल कर कच्चे में रोक दी.
"पापा.. पापा.. देखो ी ऍम टोटली फाइन..", अर्जुन ने सिर्फ अपनी कार रोकी हे थी की वो लड़का चहकता हुआ तेजी से उस चमचमति कार के बहार बरगद की छाया में खड़े bhari-bharkam से अधेड़ के गले जा लगा. Gora-gulabi ये व्यक्ति शकल से हे इसका बाप लग रहा था लेकिन तगड़ी शख्सियत वाला. उमेद सिंह भी चल कर अपने भतीजे के पास आ चूका था.
"तुम्हे ये क्या हुआ अर्जुन? और मैंने तुमसे कहा भी था के सिर्फ पता करो लेकिन .. चलो पहले हवेली चल कर..", उमेद खून देख कर कहुआफ खा चूका था बेशक लोगो का कितना हे खून बहा चूका हो पर ये उसके भतीजे के जिस्म पर आयी चोट थी. गुस्सा भी पल में गायब था और अर्जुन बहार निकल के उनके गले लगता हुआ लापरवाही से बोलै.
"चाचा जी, आपने मुझ पर भरोसा दिखाया यही मेरे लिए बड़ी बात है. वैसे मैं आपको अगर बता भी देता तोह शायद साहिल को बचाना आसान न होता. वैसे ये जिसकी भी औलाद है दिमाग बहोत खाती है. ओह सबसे जरुरी बात है की वो लोग आने हे वाले होंगे. 2 हैं और सफ़ेद ओमनी में. दोनों के पास रिवॉल्वर भी हो सकती है.", अर्जुन ने जैसे हे काम की बात कही अपने दुखते कंधे पर एक हाथ महसूस करते हे थोड़ा गुस्से में पलटा.
"तुमने मेरा घर उजड़ने से बचा लिया बीटा. मैं नहीं जानता के ये तुमने कैसे किया लेकिन मेरा बीटा मेरे सामने है. सॉरी.. ये चोट मुझे पता नहीं थी.", गजेंद्र भल्ला एक तरफ अपने बेटे को लगाए अर्जुन के सामने खड़ा था और उसकी आँखों में पीड़ा देख अर्जुन भी दर्द भूल गया.
"बचो को बोर्डिंग तभी भेजना चाहिए अंकल जी, जब वो चाहे. इतना हे प्यार करते है इस से तोह अपने साथ हे रखिये. आपकी असली दौलत तोह आखिर यही है क्योंकि आज सबकुछ छोड़ कर आप बीच सड़क बस अपने बचे के लिए खड़े है.", गजेंद्र भल्ला से ऐसी बात कहने की जरुरत शायद हे कोई इंसान कर सकता था लेकिन वक़्त और मेहरबानी से मजबूर होने के साथ साथ भल्ला को अर्जुन एक नजर में हे भा गया था. इस बीच 2 पटाखे चलने की आवाज आयी तोह अर्जुन मुस्कुरा दिया.
"बना दी चाचा जी ने उन दोनों के माथे पर बिंदी. चलता हु अंकल जी और आप चाचा जी के ख़ास है तोह फिर हमारे घर शादी में तोह आएंगे हे. और एक बात आपको समझनी चाहिए की आपका बीटा वापिस आ रहा है ये किस बहार के आदमी को खबर थी. पता लगाइये अंकल जी, कोई करीबी हे मिलेगा.", यहाँ अब उमेद सिंह नहीं था, जो लीलू और खैरु को उनके कर्मो से मुक्ति देने के बाद वही मंदिर के पास अब सिग्गट सुलगता हुआ अपने आदमियों से ये कचरा साफ़ करने को कह रहा था. अर्जुन अपनी कार में बैठ कर उनकी हे तरफ मदद गया. उस सफ़ेद कार के अंदर बैठी वो खूबसूरत बाला जाने कितनी हे देर से अर्जुन को निहार रही थी और उसकी आवाज को अपने सीने में संजो चुकी थी.
"चाचा जी, घर पे सभी पूछेंगे आपसे मेरे बारे में. आप बता देना की आपने मुझे नया डॉग दिखने के लिए बुलाया था और फिर लॉन्ग ड्राइवर पर चले गए थे. कार में मेरे पास और भी कपडे है जो मैं ड्रेसिंग करवाने के बाद बदल लूंगा. ये जो भी कुछ हुआ है इसकी भनक पापा या दादा जी को भी नहीं लगनी चाहिए. अब हवेली शालिनी बुआ को लेने हे आऊंगा.", अर्जुन भी बिना कार से उतरे उमेद सिंह को घर का बता कर हाईवे पकड़ गया बिना जवाब सुने. उमेद पहले हैरान हुआ और फिर बस मुस्कुरा दिया.
'ये सचमुच हमसे 10 कदम आगे है. मान गए अर्जुन मिया की उमेद सिंह एक असली शिकारी का चाचा है. जग जग जियो शेरा.', उमेद कायल हो चूका था अपने हे भतीजे का जिसने इतनी बड़ी मुसीबत में दिमाग का सही उपयोग भी किया और काम को अंजाम भी अकेले हे दिया. गजेंद्र भल्ला अब उमेद से निचे हो चूका था इस पल में.
"उमेद, हमने दुनिया पर एहसान किये है और लोग मुझे पीठ पीछे गुंडा, दहशतगर्द, राजनीतिक हत्यारा और जाने क्या क्या बुलाते है. दिल्ली में हम जहा चाहे वह समय रोक दे लेकिन देखो आज मैं तुम्हारे सामने झोली पसार गया. इस एहसान को मैं जीवनभर नहीं उतार पाउँगा उमेद, कभी भी नहीं. मुझे इस मौके पर ऐसी बात केहनी तोह नहीं चाहिए लेकिन ये पैसा मेरी तरफ से शादी का शगुन समझ कर हे रख लो.", अपने ड्राइवर से वो चमड़े का भूरा बैग पकड़ कर गजेंद्र भल्ला ने उमेद की तरफ बढ़ाया तोह कुछ सोचने के बाद उमेद ने वो बैग थाम लिया.
"भाई साहब, शादी में बाकी एक लाख भी लेते आना. 51 का शगुन होता है और इतने ये मेरी गाडी में हे सुरक्षित है जो आप खुद अपने हाथ से दे दीजियेगा. जब बिज़नेस से बात भाईचारे की आ गयी है तोह इसमें एहसान जैसा कुछ नहीं होता. क्या पता कभी मैं आपके सामने फ़रियाद ले औ. चलिए आपको हवेली पर हे नाश्ता करवाता हु और घर पे बोल दीजिये की सब सुरक्षित है. बीटा तुम उस गाडी में आओ, आपकी दीदी कबसे आपका वेट कर रही है.", उमेद ने भल्ला को अपनी गाडी में बैठाया जहा अब किंग नहीं था और बाकी गाड़ियां भी उनके पीछे हे चल दी. भल्ला अभी तक अर्जुन की वो बात ध्यान से सोच रहा था जो जाते हुए कही थी. उसका कोई अपना करीबी हे था इस सब कारनामे के पीछे. Der-saver वो हाथ आ हे जाना है.
"दीदी, आपने एक्शन मन को देखा था? हे इस हूजे एंड हैंडसम और पता है उन भैया को पैन भी नहीं हो रहा था. हे वास् समिलिंग.", साहिल से उसकी बहिन बड़े हे भावुक अंदाज में मिली थी और अब उसकी खूबसूरत आँखों में जो आंसू थे वो ख़ुशी के थे.
"तुम्हे उनका नाम पता है? और क्या क्या बात हुई तेरी उनके साथ?", ये लड़की अपने प्यारे भाई के दोनों गाल हाथो में पकड़ कर बड़े स्नेह से जानकारी ले रही थी.
"मैं तोह बेहोश था दीदी लेकिन जैसे उन भैया के चोट लगी हुई थी तोह मतलब उन्होंने सभी ईविल में मार दिए होंगे. मुझे पानी पिलाया और मुझसे बात भी की थी उन्होंने हंस हंस कर. फिर बोले की चलो तुम्हे नाश्ता करवाता हु लेकिन मैंने हे मन कर दिया. मैं तोह आपके साथ हे खता हु न दीदी? बूत आपने उन्हें थैंक यू भी नहीं कहा.", साहिल की बातें सुन्न कर लड़की इतना तोह समझ गयी थी की उसका भाई भूखा है और उसको प्यार भी बहोत आ रहा था अपने भाई पर.
"थैंक यू से काम नहीं चलेगा गुल्लू. उन्होंने मेरे गुल्लू को बचाया है तोह इनाम के हक़दार है वो. पापा के फ्रेंड के बेटे है तोह हम उन्हें ाचे से मिल कर हे ट्रीट de-denge. पार्टी करोगे न?"
"बेस्ट रहेगा दीदी और उन्हें भी पिज़्ज़ा ाचा हे लगेगा पेप्सी के साथ. बरौनी और और कुल्फी भी खा हे सकते है. है न?", ये सचमुच हे एक नादान भुक्खड़ सा बचा था लेकिन उसकी बहिन ने तोह जैसे कुछ अलग हे इनाम देने की ठान ली थी जिसको अभी अर्जुन के बारे में रत्ती भर भी खबर न थी. उसका चरित्र जब सामने आएगा तब ये ख्वाब क्या रंग लेंगे इस लड़की को भनक तक न थी, जो दिल हार चुकी थी अपने भाई को बचने वाले पर.
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पंडित जी के परिवार में खासी रौनक लगी थी सुबह के 10 बजे. घर के भीतर वाले आँगन में शामियाने की छाया टेल आज भात भरने आये ladka-ladki के mama-maami के साथ साथ ढेरो हे aas-pados के लोगो के साथ साथ सभी पहचान के करीबी लोग जमा था. बहार बैठक में chai-pakodo के दौर के बीच अलग महफ़िल सजी थी पुरुषो की और असगर की तरफ भी ढेरो लोग नाश्ते का लुत्फ़ उठा रहे थे. अर्जुन पिछले आँगन की सीढ़ियों पर हिमांशु के साथ बैठा सभी दृश्यों और riti-riwaaj को कमरे में क़ैद होने के साथ साथ प्रत्यक्ष देख रहा था.
"Sanjiv-Madhuri के साथ इनकी बहिन अलका को बैठाओ जी.", इनके मां ने शगुन शुरू करने से पहले ये आवाज दी तोह कौशल्या जी ने एक नजर संजीव और फिर अलका को देखा. वो इत्मीनान से हे बैठी थी जैसे किसी के कुछ बोलने का इन्तजार हो.
"भाई की बगल में भाई हे बैठेगा मां जी.", संजीव जैसे इस रिवाज से परिचित था और 30-35 महिलाओ, chacha-pita और दोस्तों के बीच उसने बड़ी सहजता से ऐसा कहा था. उसके मां श्री केशव कुमार जी अपनी बीवी और फिर बहिन की तरफ देखने लगे.
"दीदी, अब अलका हे तोह है?", ऐसा केशव जी की धर्मपत्नी ने कहा था जिसका हाथ खुद अलका ने दबाता हुए जैसे उन्हें रोकना चाहा.
"मेरा लल्ला बैठेगा अपने भाई के साथ. 2 बेटे है मेरे बरखा और दोनों एक सामान. लल्ला, चल आ इधर.", ललिता जी के ऐसा कहते हे बाकी सबके चेहरे पर मुस्कान छा गयी. मां मामी ने भी मुस्कुरा कर क्षमा चाही थी और अर्जुन उनके बीच से होता हुआ इतना बोल गया.
"टेंशन क्यों लेते हो मां जी, ये भात के शगुन न भैया दीदी के बाद 6 बहनो और एक और छोटे भाई तक होंगे. आप बस लिफाफों की चिंता मैट करो, हम शगुन ऐसे हे ले लेंगे. क्यों भैया?", अर्जुन ने अपनी सभी बहनो के साथ हे हिमांशु को भी शामिल कर लिया था. संजीव ने बड़े हे प्यार से अर्जुन को अपने साथ लगाया लेकिन उसके चेहरे पर क्षण मात्रा के लिए आये दर्द को पहचान कर फिर शांत हो गया. बात अब रस्मो के बाद हे होनी थी.
आज क़यामत का जिम्मा एक बार फिर प्रीती, अलका, ऋतू, आरती के साथ साथ जसलीन, अफसाना ने ले रखा था लेकिन 2 चेहरे एक साथ आँगन में प्रकट हुए. अन्नू और आकांक्षा भी अपनी अपनी माँ के साथ आज इधर चली आयी थी. माहौल बन्न चूका था और विवाह पूर्व रौनक लगने लगी थी पंडित जी के संसार में. सभी उत्साहित थे यहाँ और lok-geet के साथ हे bhaat-nyotne का रिवाज शुरू हो गया.
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"छोटे कुंवर सा, बड़े मालिक ने आपके लिए बुलावा भेजा है.", राजस्थान के इस रेगिस्तानी हिस्से में आसमान जल्द हे अपनी तपिश पकड़ लेता था. सूरज अभी मध्य में भी नहीं पंहुचा था की पारा 45 छू रहा था. इस संगमरमर की खदान में जितनी गर्मी बहार थी उतनी हे ठंडक इस तीन के दफ्तर में थी जहा दीवान पर पसरा हुआ 6 फ़ीट से उन्हे और उतना हे गठीला शक्श पसरा हुआ था. जमीन पर बिखरी बियर की खाली बोतल बयान कर रही थी की सुकून देने के लिए इनका हे सहारा लिया था इस व्यक्ति ने. अपने सेवक की आवाज सुन्न कर आँखे खोल कर एक बार छत को देखा और झट्ट उठ खड़ा हुआ.
"सच कह रहे हो लाल सिंह, पिता जी ने हमको याद किया है?"
"जी छोटे कुंवर सा. बड़े मालिक ने कहा है की आप तुरंत हॉस्पिटल पहुँचिये. छोटी मेमसाब भी दिल्ली से आ चुकी है.", इतना सुन्न कर हे पुष्पक ने लकड़ी के मेज पर रखा खरा अपने चेहरे पर बरसा दिया. चेहरा साफ़ करते हे इस शक्श की ख़ुशी देखते हे बनती थी जैसे उसने सबकुछ पा लिया हो.
"लतिका भी आयी है और हमे भी बुलाया है तोह बात जरूर बड़ी होगी. चलो, हम तुम्हारे हे साथ चलते है लाल सिंह.", पलभर में हे पुष्पक पुराने वस्त्र त्याग कर उजले हुए कुर्ते पायजामा और ख़ास जूती में था. अपनी जीप वही छोड़ कर पुष्पक अपने पिता की हे कार में जा बैठा जिसका ड्राइवर लाल सिंह था. ख़ुशी में वो इतना खो चूका था की कब वो अपने गंतव्य पर आ पहुंचे खबर भी नहीं हुई.
"छोटे कुंवर सा, हम पहुंच गए है.", लाल सिंह की आवाज से पुष्पक की तन्द्रा भांग हुई और बिना उसकी मदद लिए वो खुद हे दरवाजा खोल कर किसी बचे सा भागता हुआ उस बड़े हॉस्पिटल के भीतर दाखिल हुआ. गलियारे में हे 4 सुरक्षाकर्मियों के बीच वो लाल गुलाब सी युवती उसको अपनी तरफ हे देखती मिली. पुष्पक दौड़ कर उसके सामने आ रुका.
"ओह हमारी प्यारी सी गुड़िया, आप खबर कर देती तोह स्वयं हम आपको लेने आ जाते. आपको देख कर हमे कितनी प्रसन्नता हो रही है हम बयान नहीं कर सकते.", पुष्पक ने बड़ी नजाकत से कुमारी लतिका का बया हाथ पकड़ कर चूमते हुए स्नेह जताया तोह बहिन ने भी नजरे झुका कर अभिवादन किया.
"बुआ आपसे मिलना चाहती है भैया. उनकी आखिरी इत्छा है जिसके लिए उन्होंने आपसे मिलना है.", पुष्पक की ख़ुशी पल में हे काफूर हो गयी थी ये सुन्न कर.
"हमारी बुआ.. बुआ यहाँ है? अंतिम समय..", वो जुबान से हकलाने लगा था लेकिन कंधे पर जो हाथ महसूस किया तोह ऐसे शांत हो गया जैसे सर्कस का शेर अपने मास्टर के सामने. ये हाथ कुमार सारंग का था, इनके पिता.
"हम आपका मान करते है पुष्पक लेकिन खफा है जिसकी वजह भी आपको ज्ञात होगी. आपकी बुआ के प्रिय हमेशा से हे आप हो और उन्हें मतलब भी नहीं की हमारी नजर में आपके क्या चरित्र सही है क्या गलत. उनसे मिल लीजिये, ज्यादा समय नहीं है उनके पास.", सारंग इतना कह कर एक तरफ हुआ और पुष्पक धीमे कदमो से अंदर कमरे में दाखिल हुआ. सामने गौरवर्ण दमकते चेहरे वाली दमयंती उर्फ़ कुमारी अनामिका अपने जीवन की अंतिम घडिया जिन्न रही थी. बंद आँखों के बावजूद होंठ थरथराये.
"आ गया मेरे बचे.. इधर अपना हाथ ला..", जैसे तैसे अनामिका ने ये कहा और पुष्पक एक बचे की तरह उनकी बगल में बैठ कर दोनों हाथो में उस लगभग निर्जीव से ठन्डे हाथ को थामे रोने हे लगा था.
"बुआ सा, आप ठीक हो जाएंगी.. आपको कुछ नहीं होगा बुआ सा. बड़ी मुश्किल से तोह आप मिली है.."
"नहीं मेरे बचे.. मैंने अपने जीवन के सुख दुःख देख लिए है. अब जीवन भी निरर्थक लगने लगा है.. मेरे 2 काम करेगा मेरे बेटे?"
"जी बुआ सा.. हम धरती आसमान भी एक कर देंगे बस आप आदेश करे...", पुष्पक की आँखों से झरर झरर गिरते आंसू उस हाथ को भिगोने लगे थे और अनामिका का हाथ स्वतः उसके चेहरे से आंसू हटाने लगा.
"रामेश्वर जी का बहोत एहसान है हम पर बीटा.. वो हैं तोह तुम और भैया है.. मेरे जाने के बाद उन्हें बताना की मैं उनकी शुक्रगुजार रही हु जो उन्होंने कभी बदले की भावना नहीं राखी.. दूसरा काम.. आह्ह्ह्हह.. हे रामम... शबनम और आह्हः... शबनम और बिंदिया को बचाना .. उस चांडाल मधुलता और उसकी माँ से... नरक बना दिया मेरी बच्चियों का jiwannn....mere बेटे...", और इसके साथ हे दमयंती उर्फ़ अनामिका की गर्दन लुढ़क चुकी थी. पुष्पक कुछ पल बस एकटुक उन्हें देखता रहा, आँखों से आंसू टप्प टप्प गिरते रहे और कमरे में सारंग, लतिका के साथ साथ हॉस्पिटल का डॉक्टर भी आ चुके थे.
"हिम्मतत रखिये आप पुष्पक.. इनके वारिस हमेशा से हे आप थे और हमसे इन्होने निवेदन किया था की इन्हे मुखाग्नि आप हे दे और अस्थि विसर्जन का भी हक़ सिर्फ आपका है.", सारंग ये सब जो भी कह रहा था पुष्पक जैसे सुन हे नहीं रहा था. वो जितना बड़ा दरिंदा अपने बाप की नजरो में था उतना हे प्यारा बीटा अपनी बुआ के लिए. माँ पहले हे नहीं थी और आज बुआ भी आज उसको छोड़ चली गयी थी.
"हम त्याग करते है कुंवर पद से. हमारी बुआ सा की अंतिम इत्छा का मरते दम तक पालन करेंगे और आपने जो भी कहा है उसका भी सम्मान रहेगा राजा साहब. हम कुमारी बिंदिया के आने का प्रबंध करते है, संस्कार पूरे शाही सम्मान से होगा और सभी शामिल होंगे.", राज्यवर्धन आँखे फाड़े देख रहा था जिस तरह से पुष्पक आज अपने पिता से बात कर रहा था. उसने डॉक्टर को भी हाथ लगाने से मन कर दिया था अपनी बुआ के शरीर को. जब तक बिंदिया नहीं आ जाती शव को सुरक्षित रखने के निर्देश दे कर वो बहार जाने लगा तोह लतिका ने हाथ थाम लिया, पिता की वजह से.
"शबनम को अनुमति नहीं है बेटे यहाँ आने की. बिंदिया यहाँ आएगी तोह वो मुसीबत में फंस सकती है."
"इसका जो भी हल है वो मैं करके रहूँगा. वो बुआ के रूप में हमारी माँ थी. पुष्पक झुकने को तैयार है कानून, प्रशाशन और भगवन के सामने.", जिस स्वर में आज सारंग के बेटे ने ये कहा था राज्यवर्धन भी समझ चूका था की भतीजा बाघी हो चूका है लेकिन सारंग ने ज्यादा भाव प्रदर्शन नहीं किया.
"जाओ फिर पंडित रामेश्वर जी की चौखट पर और करो उनसे बिनती की आप बुझदिल हो और उनके सामने घुटने तक कर फ़रियाद कर रहे हो की भतीजी बहिन पर कोई कार्यवाही न करे. जाओ और दिखा दो के आज भी कुछ शाही खून उनके कदमो में गिरने को तैयार रहता है.. इंसान जनम लेता है और मृत्यु को भी प्राप्त करता है. लेकिन मायने रखता है तोह उसका जीवन और रसूख. आपमें न पहले चरित्र था और रसूख दुत्कारने की हिमाकत तोह दिखा हे चुके है.", सारंग के तीखे बाण लतिका, राज्यवर्धन और गुलाम लोगो को भी भेंड़ चुके थे. पुष्पक के चेहरे पर एक सार्ड सी मुस्कान आ गयी इनके विपरीत.
"जानते है हम पंडित जी को.. उनकी छाती में भी बाप का प्यार है लेकिन हम आपके हे है और रहेंगे राजा साहब. उनकी देहलीज पर गिड़गिड़ाने नहीं जा रहे, हक़ से जा रहे है. भतीजे लगते है उनके हम और उन्हें प्रबंध करना हे होगा. राजा साहब..", वो मजाक हे उड़ा गया था जैसे सारंग का जब आखिर में राजा साहब कहा. क्योंकि सारंग के वश में नहीं था बिंदिया और शबनम को वतन वापिस बुलाना लेकिन रामेश्वर जी कर सकते थे. यहाँ ये लोग सोच में हे थे और पुष्पक निकल चूका था धुल उडाता हुआ उस गंतव्य की तरफ जहा अगर वो गलती से भी किसी और के हत्थे चढ़ा तोह मौत सुनिश्चित थी.
"पापा, भैया के पीछे किसी को भेजिए. नील भैया भी नहीं है यहाँ.", लतिका के स्वर में पीड़ा थी बेशक उसको अपने पिता से लगाव न था और इंद्रनील से तोह रत्ती भर भी नहीं लेकिन पुष्पक अपनी बहिन के लिए जान वार सकता था.
"वो कवच साथ हे लेके गया बेटी और जिनके पास जा रहा है वो आपके भाई की परवाह हमसे कही बेहतर करते है. राज, मीणा को बोलो के तत्काल प्रभाव से हर जांच रोक दी जाए. जुंग आपस में हे रहने दी जाए तोह बेहतर रहेगा.", सारंग की आँखों में बहिन के जाने का दुःख तभी प्रकट हुआ था जब वो कमरे से बहार निकल चला. आज एक बार फिर पंडित रामेश्वर जी उस पर भारी पड़ रहे थे और ये सेहन भी नहीं हो रहा था. चरित्र हे ऐसा था तोह क्या कर सकते है.