Incest Pyaar - 100 Baar - Page 37 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

कोई भाई बता सकता है की सबसे ज्यादा लिकेड अपडेट कौनसा है इस कहानी का? 🤔

वैसे आज मैंने देखा की 69 अपडेट जो 23 नोव को दी थी, उसके बाद 70 no अपडेट 26 अप्रैल को 🤐

कमाल है की इतने अंतराल के बाद भी सभी लोग आजतक साथ है. 🙏

नकरात्मक कमेंट हे नई मिले उस दौरान. सिवाए 2 या 3 कमैंट्स के जहा स्टोरी बंद हो गयी जैसा था और वो सही भी था देखा जाए तोह.

फर्स्ट अपडेट पे सबसे पहला कमेंट देने वाले tpk भाई से ले कर kumarrajnish भाई, जिनकी बैंक की कार्यवाही और खला के साथ सफर जैसी रचनाओं के सभी प्रशंशक है ने भरपूर सपोर्ट किया उस गैप में और मैं हैरान हु की ये नाम बढ़ते हे गए. आयरन मन, टोनी भाई, अक भाई, फ़िरेफोक्स, प्रोफेसर साहब, किंगसिंह, राज 142, कस लवर, सिराज भाई, नकुल, राजीव शाह, रेडर, कबीर सिंह, रॉकी 2602, रोनी भाई , बादशाह खान और भी बहोत से भाई कहानी में शुरू से आजतक बरकरार है. ये बिली, सलंक, नैनो, का तोह पता भी नई चला और अब देख रहा हु की शायद कहानी के अपडेट पोस्ट करके मैं ज्यादा जवाब हे नहीं देता. बेहद शुक्रिया दोस्तों इतने प्यार और स्नेह के लिए. आजकल तोह लगता भी नहीं की मैं स्टोरी लिख रहा हु 😅😅 और बाकी बहोत से नाम नहीं लिख सका लेकिन सभी लोग इस थ्रेड का अनमोल भाग है.

🙏💙❤️
 
पहले 70 अपडेट में 8 लाख व्यूज और अगले 100 में 60 लाख. 😍😳
 
ये XLNC कहा गायब है? और aka3829 भाई, आपने तोह अपडेट हे दिया. 🙉🙌

ाचा सॉरी 😅

Tony stark के पुराने रेविएवस देख के याद आया के सचमुच भाई व्यस्त हो गए. अब तोह Professsor साहब भी ख़ामोशी से बिना गलती निकाले निकल लेते है. हाँ वो firefox420 जाने किस जुगत में है जो वात लगाए बिना खामोश है.?

एक टाइम था के Nevil singh जी भी हाजरी दे जाते थे और अब लगता है वो भी Iron Man हो गए 😂😂. रेशमा उनकी पड़ोसन.

Nano भाई के किलो साइज रिप्लाई भी अब नहीं दीखते. कहानी पढ़ते है और फिर 1-2 दिन बाद नजर आते है.

अब Billi420 चुहल तोह करता है swadu भाई के साथ मिल कर लेकिन ये दोनों भी 12 बजे तक परेशां हो कर ढेर हो जाते है Black water भाई के तरह खामोश. 😬

Rayder555 की राइड भी बिलकुल अपने सुनील एना उर्फ़ K S Lover भाई जैसी हो गयी. बहुत हे बढ़िया लाइन के साथ समाप्त. Story Collector भाई तोह प्रेशर में हे जा चुके, फोरम और अपने Love 1994 की कमेंटरी की वजह से. एक परिवर्तन हुआ था Love for you भाई में लेकिन अब वो भी खुला सांड बन चुके. Guffy भाई आदतन खामोश तबियत बिलकुल राजकुमार जी जैसे. सब देखा, पढ़ा और चल दिए. एक अपने Naik भाई है जो आजकल सचमुच ाचा खासा लिखने लगे है और रफ़्तार से राजेश जी भी ढ़ढ़ढ़ पढ़े जा रहे. mahesh भाई फिलहाल यात्रा पर है तोह देखते है वो कब हवन करेंगे यहाँ. बाकी तोह सब Enigma है और उसकी वो हे जाने.
 
यहाँ हुआ क्या है भाई रात में? 😳🤔

80 कमेंट और इतनी बकचोदी? धन्य है प्रभु 🙏🙌
 
अपडेट 179

Fer-Badal (2)

मौसम कोई भी हो लेकिन हर सुबह कुछ ठंडक जरूर समेटे रहती है. 4 बजे हर तरफ अन्धकार हे था और यहाँ खुली छत पर सोया अर्जुन किसी छोटे बचे की तरह अपनी बहिन के सीने में दुबका कूलर की ठंडी हवा से बचने की अथक कोशिश करता लगा. ऋतू के चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान गहराई थी जैसे वो बस अपने हे संसार में हो. नींद में भी उसकी अर्जुन के प्रति परवाह kaabil-e-taarif थी जो वो उसकी तरफ चादर सही करती हुई आराम पूछने लगी.

कुनमुनाता सा अर्जुन थोड़ा और आगे हुआ तोह ऋतू का कमर से निचे का भाग उसके ऊपर आ गया. चादर अब पूरी तरह से अर्जुन के शरीर पर बिच चुकी थी और वो प्रेम की तपिश बाहरी ठंडक से बचाव करती अब आराम दे रही थी.

"ऋतू, सवा 4 बज रहे है. कोमल दीदी या कोई और भी उठ सकता है.", अलका सीढ़ी की तरफ वाले बंद दरवाजे को जांचने के बाद अब बहार आँगन वाली तरफ से इधर आयी. पिछले 10 मिनट वो बस इन दोनों की supt-krida निहारती रही और जब अर्जुन कुछ शांत हुआ तभी उसने हौले से ऋतू को हिलाया

अलसाई सी ऋतू के चेहरे पर अलग हे चमक थी जो इस अन्धकार में भी अलका ने देखि.

"ये 3-4 थपकियाँ देते हे सो गया था और देख अभी भी इसके हाल. कूलर बंद कर जरा और इसको अभी सोने हे देते है.", ऋतू ने तकिया आहिस्ता से अर्जुन की ब्याह के निचे रखा था और उधर अलका ने कूलर का बटन बंद किया. अर्जुन फिर थोड़ा कसमसाया जिसको देख ऋतू उसका सर सहलाने लगी. एक बार फिर से उसके ऊपर ठीक तरह से चादर देती वो गद्दे के निचे से ब्रा निकाल कर बिना टीशर्ट निकले कुशलता से पहन कर कड़ी हो गयी.

"मतलब रात कोई dhama-chaukdi नहीं की तुम दोनों ने?", अलका ने एक रबर ऋतू की तरफ बढ़ाते हुए मस्ती से कहा और ऋतू ने भी अपने खुले बालो को बाँध कर बड़ी मादक सी अंगड़ाई भरी. सीना कुछ पल के लिए यौवन उभार कर फिर से सही हो गया.

"धामा चौकड़ी करने के बाद मैं इसके थोड़ी न सोई होती. इसको आज भी वही दुलार चाहिए होता है जो ये बचपन में चाहता था. तेरे सामने हे है अलका की हम सब तोह फिर भी टाइम मिलने पर आराम और बाकी छोटे मोठे काम हे करते रहते है. इसका रूटीन और लाइफ ज्यादा हे काम्प्लेक्स है. खुदसे तोह ये माँ के पास भी नहीं जा सकता आराम करने और फ़िलहाल बेचारे की इधर ड्यूटी भी हम सबकी वजह से है तोह मुझसे जितना हो सकेगा कोशिश करुँगी ारु नींद तोह सही ले.", दोनों सीढ़ियों से दबे पाँव निचे उतर रही थी और अलका ने भरपूर स्नेह से एक बार ऋतू को गले लगा लिया. अर्जुन को नजर करके वो उसके पीछे हे चल पड़ी.

"बस एक यही तोह फरक है तुझमे और बाकी सभी में. सच कहु तोह मैं भी शायद एक बार तोह इसके साथ करती हे. लेकिन तेरी बात बिलकुल ठीक है यार. रात भी ये 11 के बाद हे आया था और तुम दोनों सोये तोह 12 के बाद हे होंगे. क्योंकि सवाल जवाब तोह तू किये बिना उसको थपकी भी नहीं देने वाली.", अलका ने बहार वाले कमरे के पास लगा नल चलाया तोह ऋतू मुस्कुराती हुई चेहरा धोने लगी. दमकता चेहरा भीगने के बाद अभी कही ज्यादा दिलकश दिख रहा था.

"वही बता रहा था के आजकल क्या चल रहा है. फिर मैंने थोड़ा बहोत उसके रिजल्ट, गाँव और शादी वाले दिन की बातें की. जब लगा की उसका ध्यान भटकने वाला है तोह अपने साथ लगा कर सुला दिया. वैसे आज मुझे आँचल दीदी को मार्किट लेके जाना है. दादी ने कहा था रात में की बेटी की बेटी है और जो सबके लिए लिया है वो उसको भी मिलना चाहिए. तू देख लेना पार्लर वाली को और मैं अलीशा आंटी को भी ले जाउंगी.", ऋतू भी बहार वाले रस्ते हे अंदर चली आयी अलका से बात करती हुई. इन दोनों की उम्मीद से अलग रसोईघर में गुरदीप और कोमल दीदी आ चुकी थी. गुरदीप जैसे अभी चेहरा धो के आयी थी लेकिन कोमल दीदी के कपडे बता रहे थे की वो नाहा चुकी है.

"क्यों, अर्जुन ले जायेगा इन सबको?", अलका ने रसोईग की तरफ देखने के बाद पानी की बोतल खोल कर एक घूँट पिया और फिर ऋतू को पकड़ा दी. फ्रिज से दूध का बर्तन इस तरफ आती कोमल दीदी को देने के बाद वो ऋतू से जवाब की प्रतीक्षा करने लगी. गुरदीप अंदर ट्रे में बिस्कुट और फीकी मट्ठी रख रही थी, उसको खाली चाय की आदत जो न थी.

"अलीशा आंटी से तोह जितना हो सके इसको (अर्जुन) दूर हे रखना है. सरकारी गाडी मिली हुई है तोह कोई दिक्कत नहीं आने वाली और तुझे मैं इसलिए ये सब बता रही हु की यहाँ भी उस बेवकूफ को bin-bulaai आफत से दूर हे रखना है. मेहमान ज्यादा हो गए है और हलकी सी भी गलती नजर न आ जाये." , ऋतू की बात सुन्न कर इस तरफ वापिस दूध रखने आयी कोमल दीदी भी मुस्कुराई जैसे उन्हें भी पता हो के चर्चा का विषय क्या है.

"वो तोह 11 से 2 के शो में जा रहा है. कहे तोह fer-badal कर दे?", अलका की बात हमेशा हे ख़ास अंदाज में होती थी.

"जरुरी है बदलना. सरोज मौसी और पूजा मामी उधर हे रुके है रात में. समय, स्वाति और कंचन हमारे कमरे में है. आज बाकी दोनों मामी भी आने वाली है और शालिनी बुआ भी आ जाएँगी.", ऋतू ने विस्तार से बयान कर दिया था घर और मेहमानो की रूपरेखा. अलका आशंकित थी की विन्नी इस पर क्या प्रतिक्रिया देगी.

"वो तोह मेहंदी से दूर हे रहेगा. वैसे भी गीत हे चलने है आज और बाकी लेडीज की मंडली लगेगी. दीदी की मेहंदी के साथ बाकी लेडीज भी वही सब करवाएंगी. काम पापा लोग देख रहे है जिसके लिए काफी लोग भी लगा दिए है. इसको कैसे व्यस्त कर सकते है?", अलका को भी भान था के अर्जुन को विन्नी दीदी के साथ जाना पड़ा तोह वो कोई न कोई तोह हल निकाल हे लेगा.

"जाने हे दो तोह बेहतर है. मुझे ज्यादा परेशानी वाली बात उसका इधर रहना लगती है. चंद्रो दादी जी भी आएँगी और जाने क्यों मुझे ारु का उनके सामने जाना ठीक नहीं लगता. अब तुम दोनों चाय पी कर फ्रेश हो जाओ बाकी जो सोचा है वैसे हे करना. अलीशा आंटी के साथ ऋतू, रोमिला आंटी को माँ के सिवा कुछ दीखता नहीं और प्रीती अपने आप कर लेगी बाकी सबकुछ.", कोमल दीदी के ऐसे स्पष्ट से जवाब से ये दोनों हे निरुत्तर हो गयी. अब वो जवाब भी नहीं मांग सकती थी क्योंकि कोमल दीदी कभी गलत भी नहीं कहती थी.

"मैं और अफसाना भी चल सकते है क्या ऋतू तुम्हारे साथ?", गुरदीप ने बड़े हे स्नेह से गुजारिश की थी. चाय की जगह वो गरम दूध का गिलास लिए थी और दूसरे हाथ में बिस्कुट.

"अफसाना मेहंदी लगवायेगी गुरदीप, कल हे बता चुकी है वो. और आज उसके ammi-abbu भी आ रहे है तुम्हारे मम्मी पापा के साथ हे. Jasleen-Keerti को ले चलेंगे तुम्हारे साथ साथ. भीड़ भाग से ाचा वह मार्किट में हे मस्ती करेंगे.", ऋतू ने पानी की बोतल रखने के बाद चाय का कप उठा लिया था. कोमल दीदी अब प्रियंका, रुपाली, ऋचा, विन्नी को उठाने चली गयी थी.

"हाँ ये भी ठीक है. वो अफसाना तोह गयी न गयी एक हे बराबर है. उसको रहने देंगे यही लेकिन मुझे न वह फिर से डोसा खाना है.", गुरदीप की बात सुन्न कर अलका ने सर पे हाथ रख लिया और कुछ ऐसा हे किया प्रियंका ने बहार आते हे.

"ओह सरदारनी, तुझे न सपने भी खाने पीने के हे आते होंगे. खा लियो डोसा भी और भठूरे भी. अब दूध पी कर तैयार भी हो जा. 5 बज हे गए है और तू रात 10 बजे से सोई हुई थी.", प्रियंका दीदी ने कपडे दुरुस्त करते कहा और गरुदीप नाक सिकोड़ती हुई वापिस कमरे में चल दी, दूध का गिलास और बिस्कुट की ट्रे लिए.

"कुछ भी कहो पिंकी दीदी, ये बंदी कमाल हे है. इंसान न इतना हे खुश और बेफिक्र रहे तोह बेस्ट है.", ऋतू ने हँसते हुए कहा और फिर शीशे की खिड़की से देखा तोह अर्जुन भी सीढिया उतर चूका था.

"चलो मैं तोह चली अर्जुन के साथ घर पे और आप लोग आ जाना यहाँ सब समेत कर.", अलका ने हाथ हिलाया तोह ऋतू हैरत से देखने लगी.

"कपडे बदल ले पहले नाहा कर. ऐसे हे जायेगी?"

"मेरे कपडे वह भी है और मेरा मूड नहीं इधर नहाने का. तू आ जइयो नाहा के कपडे बदल के. चलती हु पिंकी डार्लिंग.", अलका ने प्रियंका को आँख मारते हुए हाथ भी हिलाया और हिरणी सी फलांग मारती निकल चली. जाने अब उसने अर्जुन से क्या बात करनी थी.

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कृष्णेश्वर जी की बड़ी बेटी दामिनी घर के बहार वाले बाथरूम से अभी नाहा कर हे निकली थी क्योंकि अंदर और ऊपर वाले बाथरूम व्यस्त थे. गीले बाल तोलिये में बांधे वो एक साफ़ सलवार कमीज में अपने मांसल जिस्म को ढकने के बावजूद हर कटाव को दिखती हुई दूसरा टोलिया तार पर दाल कर जैसे हे मुड़ी तोह घर में दाखिल होते शंकर से नजरे 4 हो गयी. उमेद और इन्दर पहले हे अंदर जा चुके थे और इधर सिर्फ शंकर और दामिनी हे थे.

"कैसे हो शंकर भैया?", कजरारे नैनो ने होंठो से अधिक आवाज की थी और एक चमक शंकर की आँखों में भी उभरी.

"अब शायद ठीक नहीं हु.", शंकर ने ऊपर जाती सीढ़ी की आउट में खड़े होते हुए नलके से पानी पीने का उपक्रम किया तोह झुक कर हैंडल चलती दामिनी के वो उभारो की घाटी देख पानी अंजुली से बहने लगा. दामिनी बहोत ाचे से वाकिफ थी अपने इस भाई और उसकी नजरो से. और ये सब कटाई एकतरफा न था.

"मुझे तोह लगा था के डॉक्टर हो आप जो मुझे ठीक कर सकता है. पता होता की आप हे बीमार हो तोह फिर कही और इलाज देखती."

"मुझसे बेहतर इलाज करने वाला मिल गया है क्या कोई?", अब शंकर ने चुल्लू से पानी पीने के बाद दामिनी के करीब होते हुए उसी तोलिये से हाथ साफ़ किये तोह दामिनी के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गयी. दोनों बहार खुले आँगन में थे इसलिए हरकत तोह मुमकिन न थी.

"जिस डॉक्टर से एक बार रिश्ता बना लिया न दामिनी ने फिर किसी और की देहलीज पर न गयी. आँचल सबूत है इसका जीता जागता. बाकी मुझे लगता है के डॉक्टर रक़ीब हो गया हो तोह फिर मेरी किस्मत हे खराब.", दामिनी हिम्मत करती हुई सबतरफ देख कर बिलकुल सत् हे चुकी थी इस मजबूत जिस्म से. शंकर अगर होनहार डॉक्टर और खतरनाक हैवान था तोह उतना हे आकर्षक व्यक्तित्व का धनि भी. शायद हे कोई stree/mahila जो शंकर के नजदीक आयी हो वो उसके व्यक्तित्व के सम्मोहन से बची हो. दामिनी तोह विवाह से पहले से हे अपना सबकुछ सौंप चुकी थी इस भाई को.

"शादी की जगह दिखा कर लता हु तुम्हे नाश्ते के बाद. बोल देना की कपडे और सामान लेना है.", शंकर ने भी आउट से निकलते हुए दामिनी की गोल नाभि पर हाथ फिर हे दिया था. रात भर ाची खासी शराब ने कुछ ज्यादा हे गर्मी बढ़ा दी बदन में और हॉस्पिटल से दूर होने की वजह से अब किसी को तोह ढूंढा हे था. सुबह सवेरे दामिनी से ये मीठी मुलाकात ने आधा काम तोह कर हे दिया था.

"दामाद और विनोद को फ़ोन लगा दियो दामिनी, टाइम से आ जायेंगे. कल बाटना और संजीव के मेहंदी भी लगनी है और फिर परसो शादी.", कौशल्या जी ने तुलसी में अर्घ देते हुए दामिनी से कहा तोह अपनी हालत दुरुस्त करती वो बस मुस्कुराती हुई बोली.

"जी ताई जी, मैं 9 बजे बात कर लुंगी. वैसे ये आज शाम तक आने का हे कह रहे थे कल जब बात हुई तोह. विनोद का कुछ होटल में मसला था नहीं तोह कल हे वो लोग यहाँ होते.", दामिनी ने एक नजर बगीचे से बहार देखा जहा रामेश्वर जी कुछ लोगो के साथ टहल रहे थे, चर्चा करते हुए. अर्जुन और अलका भी अपने दादा जी से मिल रहे थे और फिर वो दोनों घर में दाखिल हुए.

"ाची बात है अगर जरुरी काम था तोह. ओह बैल, तू कहा गायब रहता है रे? तेरे दोनों चाचा तोह अभी फिर से बिस्टेर टॉड रहे है और शंकर राजकुमार बाकी काम देखने में लगे है. तैयार हो कर शालिनी को लेने चला जा. बिटिया भी रस्मो में बैठेगी और बाकी तोह मुझे कोई दिख नहीं रहा जो काम का हो.", कौशल्या जी ने तोह अर्जुन को आते के साथ काम पे लगा दिया था. अर्जुन ने गर्दन हिलने के बाद अपनी दामिनी बुआ को भी नमस्ते की और दादी के करीब हे खड़ा हो गया.

"वो अगर हवेली आयी होंगी तोह फूफा जी भी तोह साथ हे आये होंगे न दादी.", अर्जुन का जवाब सुन्न कर उन्होंने अपने सर पे हाथ रख लिया.

"तभी तुझे बैल कहती हु रे मैं. घर में बिटिया को खुद लेके आया जाता है जब वो पति के साथ न आयी हो. तेरे फूफा शादी वाले दिन हे आएंगे और शालिनी 6:30 पे आने वाली एक्सप्रेस से लेके आना है.", अब अर्जुन को समझ आया था की हवेली की जगह उसको अपने हे शहर वाले स्टेशन से लेके आना है.

"जमा बुधुराम है रे तू तोह. भला वो हवेली आती तोह इधर आने में क्या संकट था उसको? टाइम देख ले और doodh-khuraak लेके चले जाना टाइम से. बाकी अब फिर तेरे लायक कोई काम नहीं. पटाके ले लियो भाई की घोड़ी के आगे चलने के लिए शादी में.", कौशल्या जी ने लाड से ऐसा कहा था और अर्जुन भी खुश हुआ के अब वो सबसे अलग अपनी मर्जी से वो सब करेगा जो उसने शादी के लिए सोच रखा था.

"वैसे मेहंदी सिर्फ लड़की के हे लगती है क्या दादी?", अर्जुन एक बार फिर चलते चलते ठिठक गया था और अपने पौटे की ऐसी बात पर दादी भी हंसने लगी.

"तेरे भाई के भी लगेगी रे. बस वो बनना है तोह पहले उसके कल बाटना लगेगा, फिर उसके मेहंदी लगाई जायेगी. माधुरी के आज करेंगे ये मेहंदी का शगन क्योंकि जब घर में एक साथ 2 विवाह हो तोह एक हे दिन दोनों बचो के मेहंदी की रसम नहीं करते. ाचा, वो विनीता का जो लेहंगा दिल्ली से लाये थे न उसका भी कुछ काम करवाना है तोह टाइम लगे फिर उसको मार्किट ले जाइयो.", कौशल्या जी ने तोह स्वयं से हे सब कार्यक्रम बना दिया था. अर्जुन मैं हे मैं कुछ गुनगुनाता हुआ अंदर चल दिया.

घर में अभी से रिश्तेदार और परिवार के लोग नजर आने लगे थे और भीतर वाले आँगन में तोह उसको ढेरो चेहरे दिखे. अभी वो अपनी खूबसूरत ताई जी और चची कृष्णा जी को हे निहार रहा था की उछलती कूदती स्वाति उसके सामने आ रुकी. दोनों एक पल तक बस स्थिर रहे और फिर स्वाति उसके गले जा लगी.

"तू न बहोत गन्दा है कालू.", स्वाति ने ऐसा बड़े स्नेह और मजाक से कहा था और अर्जुन ने भी उतने हे प्यार से अपनी इस ममेरी बहिन काम दोस्त को बाहों में भरते हुए सीने से लगा लिया.

"तू खुद हे देख ले हम दोनों का रंग. फिर बता देना कौन कला है. वैसे ाचा हुआ तू आ गयी, अब तैयार हो जा फिर आधे घंटे बाद मेरे साथ हे चलना.", अर्जुन ने स्वाति के सर पे हौले से हाथ फिरते हुए कहा. स्वाति की साफ़ बड़ी बड़ी आँखें बहोत से सवाल लिए थी, प्यार और तड़प के साथ. पर ऐसा तोह कुछ मुमकिन भी नहीं था.

"चल लल्ला तेरा दूध ले और स्वाति बिटिया, तुम्हारा भी माल्टोवा तैयार है.", ललिता जी ने इतने व्यस्त समय भी दोनों के लिए दूध के गिलास टेबल पर रखने के साथ खाने का भी सामान लगते हुए कहा. कृष्णा जी भी तब तक चाय के 2 कप लिए रेखा के कमरे में जा चुकी थी. अर्जुन और स्वाति अभी बैठे हे थे की अनामिका चची, आँचल और दामिनी बुआ भी उनके सामने वाली तरफ आ बैठी. ललिता जी ने उन्हें भी चाय और बिस्कुट परोसे पर तीनो के चेहरों पर भिन्न भिन्न भाव थे. अनामिका तोह हमेशा की तरह अर्जुन को देख मुस्कुरा रही थी वही आँचल अपने इस भाई से अभी तक ठीक से मिली भी न थी और अंतर्मुखी होने की वजह से वो बात करने से हिचक भी रही थी. दामिनी ने हे चर्चा शुरू की, जो अर्जुन को जान ने की ितचुक दिखी. शायद उसके पिता की वजह से.

"तुम मुझे पहचानते हो beta?",Swati भी इस आवाज पर दोनों तरफ देखने लगी क्योंकि उसके लिए तोह ये अजीब हे था.

"जी बुआ. क्सक्सक्सक्स आप वह रहते है न और कृष्णेश्वर दादा जी के सबसे बड़ी बेटी है. ये आँचल दीदी भी आपकी बेटी है. बस इस से ज्यादा नहीं मालूम और माहौल की वजह से बात भी नहीं हो सकीय आप लोगो से.", अर्जुन क्या कहता की वो तोह उनके पिता तक की जन्मकुंडली दबाये बैठा है. पर इनसे कोई man-mutaav तोह था नहीं.

"बहोत ाचे लेकिन सच कहु तोह मैं तुम्हारे बारे में सिर्फ नाम हे जानती हु. कुछ शंकर और इन्दर भैया जैसे हे लगते हो लेकिन जिन्होंने मेरे दादा जी को देखा है वो बता सकता है की तुम ज्यादा उनके जैसे ho.",Damini ने चाय का एक हल्का सा घूँट लिया और अनामिका की तरफ भी नजर की जिसके चेहरे पर इस बात से आश्चर्य आया हुआ था.

"फॅमिली में बचे बड़ो पर हे जाते है न बुआ जी? अब papa-chacha दादा जी जैसे दीखते है और थोड़े फीचर्स दादी जैसे है उनके. लेकिन कुछ केसेस में जनरेशन स्किप हो कर फोट्र्स dada-nana या pad-dada पर भी जा सकते है. वैसे आँचल दीदी इतनी चुप हे रहती है क्या हमेशा?", आँचल थोड़ा सकपका गयी थी क्योंकि वो अपनी माँ के करीब तोह कभी थी हे नहीं और पिता के साथ कुछ लगाव था लेकिन वो भी सिमित. अपने आप में रहने वाली इस लड़की ने बस एक पल के लिए अर्जुन को देखा और अपनी मामी अनामिका की तरफ सरक गयी.

"ये बात तुमने ठीक कही. ऐसा हो जाता है जैसा तुम कह रहे हो और मेरी बेटी कुछ इंट्रोवर्ट हो गयी है बड़ी होने के साथ साथ. और ये प्यार लड़की कौन है?", दामिनी का लहजा मिलनसार था अभी और अर्जुन ने भी स्वाति को इशारे से बात करने को कहा. वो अपनी खुराक थोड़ी थोड़ी चबाते हुए इधर उधर भी देख रहा था. आज तोह बाकी सभी बस नहाने और काम में हे लगे नजर आ रहे थे इनके सिवा. स्वाति की बगल में हे राजेश्वरी चची जी भी आ बैठी, अर्जुन के सर को सहलाती हुई. हमेशा की तरफ खिले हुए गुलाब सी और एक आकर्षक साड़ी में.

"जी मैं स्वाति शर्मा हु, अर्जुन के मां जी की बेटी. यही बड़े पापा (तेजपाल) के पास रह कर कॉलेज कर रही हु आंटी जी.", स्वाति ने जरुरी जवाब हे दिया और फिर खाली कप उठा कर वह से चल दी. अर्जुन के बताये अनुसार उसको अब तैयार भी होना था.

"आपसे तोह हमारी पुराणी पहचान है हे भाभी. वैसे पता लगा के ये जनाब तोह आपके भी बेटे है.", दामिनी जाने क्यों आज इतने सवाल कर रही थी लेकिन उसके ऐसा कहने पर राजेश्वरी जी ने एक बार फिर अर्जुन के सर को सहलाते हुए उसके कान के पीछे काजल का टिका लगाया और मुस्कुरा कर बोलने लगी.

"सबका हे तोह है ये दीदी. इसके चाचा (उमेद) ने जब ये खुशखबरी दी थी की अर्जुन के वो भी दत्तक पिता है उसके बाद हमने दूसरे बचे की कोशिश हे नहीं की. मिली जरूर मैं इस से 9 साल बाद थी फिर. जैसी मेरे लिए विन्नी है वैसा हे ये लेकिन अब इतने हक़दार है मेरे इस बेटे के की मेरी ममता का नंबर जरा दूर हो गया है.", राजेश्वरी जी की इतने अपनेपन से भरी बात सुन्न कर अर्जुन को भी एहसास हुआ था के वो ज्यादा बोलती नहीं थी पर उन्होंने हमेशा हे उसको ख़ास दर्जा दिया था. हमेशा हे अपने एकांत में रहने वाली वो थोड़ा बहोत किसी से बोलती भी थी तोह उसमे एक नाम अर्जुन का भी था.

"मतलब तोह फिर ये इस घर का विनोद हुआ.? हाहाहा..", दामिनी ने तोह जैसे ये बात ऊपरी तौर पर कही थी लेकिन अनामिका को झटका लगा ऐसी तुलना सुन्न कर और अगले हे पल सभी खामोश हो गए जब ये सख्त और हिदायत से भरी आवाज सुनाई दी.

"तुलना करना तोह ाची बात है दामिनी लेकिन बस व्यक्तित्व में कुछ समानता होनी चाहिए. इस घर में दो बेटे है और वो दोनों अपने लिए नहीं, परिवार के maan-ijjatt को प्राथमिकता देने वाले है, निस्वार्थ समर्पण के साथ. विनोद तुम्हारा एकलौता सागा है लेकिन इस घर में तुम भी इसकी बुआ हो, मधु भी और बाकी जो लगती है सो लगती है. यहाँ एकलौता जैसा कुछ नहीं होता जैसे राजेश्वरी बहु ने कहा न की अर्जुन उनका भी बीटा है.", ये थे राजकुमार जी, जो कुछ काम से अपनी माँ के कमरे से हो कर इधर आये थे.

"सॉरी राजू भैया, मेरा वो मतलब नहीं था. विनोद बस वह घर में अकेला लड़का है न और बेध्यानी में मुझे याद नहीं रहा संजीव बेटे का.", हमेशा खामोश तबियत राजकुमार जी की बात सुन्न कर एक पल को तोह दामिनी के साथ साथ आँचल भी सिहर गयी थी. लेकिन अनामिका को जैसे ये ाचा लगा था.

"मेरे प्यारे ताऊजी, बुआ तोह मजाक हे कर रही थी. अब मिल जल कर बैठे है तोह ऐसे हे बात करके पहचान बनाते है न? आपको न ताई जी बुला रही थी वैसे.", अर्जुन अपनी जगह से उठ कर अपने ताऊ जी के करीब आ गया. वो भी उसके हँसते चेहरे को देख मुस्कुराये और फिर दामिनी के बालो को हल्का से हिला कर चलते हुए बोले.

"मजाक मैं भी कर लेता हु बीटा बस ये अंदाज कुछ समय के लिए बंद किया हुआ था. दामिनी को भी पता है की मैं गुस्सा मजाक में हे होता हु.", अब दामिनी तोह मुस्कुराई हे लेकिन अपने पति को ऐसे देख आज ललिता जी के चेहरे पर ज़माने भर की ख़ुशी आ गयी थी. बरसो हे बीत गए थे जैसे राजकुमार जी को ऐसे देखे.

"आप तोह चलो जरा मेरे साथ. यहाँ 2-2 बचो की शादी होने लगी है आपके और आपका मजाक शुरू हो गया. संधान से करना ये सब बातें.", मुहफट्ट ललिता जी ने नकेल दाल दी थी ऐसा बोल कर पर राजकुमार जी के इरादे जैसे कुछ और हे थे.

"2-2 बचो के ब्याह की मुझे तुमसे ज्यादा ख़ुशी है ललिता देवी. 2-2 संधान भी तोह मिलेंगी इस बहाने और सुना है देविका तोह आज भी तुम्हारी टक्कर की है.", यहाँ जोरदार ठहाका आँगन में आती सरोज मौसी ने लगाया अरु झेंपती हुई कृष्णा जी भी हंस रही थी. हंसी की आवाजे सुन्न कर कौशल्या जी भी चली आयी और एकाएक अपने बेटे के करीब जा कर उन्होंने उसका माथा चूम कर दुआएं दी.

"अरे मेरे बचे, तू घर में ये आज बरसो बाद पता लगा. लगता है तेरे पापा के साथ कल रात रहना काम कर गया. ललिता, मेरे बेटे की मोजरिया निकाल के दे आज. पता लग्न चाहिए के राजू घर का बड़ा राजकुमार है. और तू बीटा ये कपडे की हंट उतार दे कलाई से, चल मेरे साथ अंदर.", कौशल्या जी उतने हे अधिकार और प्यार से अपने बड़े बेटे को लिए अंदर चल दी, राजकुमार को राजकुमार बनाने. ललिता जी की आँखों में अर्जुन के प्रति अब कही ज्यादा हे वात्सल्य और आभार था.

"वैसे न ताई जी, संधान वंधन कुछ नहीं होगी आपके सामने. शर्त लगा सकता हु के आपकी टक्कर बस आप हे हो.", अर्जुन मस्ती करता उनके गाल चूम कर ऊपर दौड़ गया और जाते हुए मौसी के गाल भी सेहला गया. बाकी सभी हंस रहे थे या हैरानी से बस उसकी कारस्तानी देख रहे थे.

"ऐ रेखा, संजीव से पहले इस लल्ला को चढ़ा रे घोड़ी. निगोड़ा अपनी ताई और मौसी को भाभी मान रहा है. पक्की घोड़ी न मिल रही तोह कोई काम चलौ हे देख ले.", ललिता जी के ऐसे मजाक पर तोह सबका हंस हंस के बुरा हाल हो चूका था. आँचल को भी ये सब बड़ा ाचा लगा था. इतना khush-haal परिवार भी हो सकता है उसने कल्पना तक न की थी कभी.

"बीटा, इसलिए मुझे इधर आना और रहना ाचा लगता है. यहाँ कोई भी किसी को नजरअंदाज नहीं करता. अपनी अनामिका मामी को हे देख लो, ये पहले से ज्यादा हे खुश दिख रही है न?", राजेश्वरी जी ने उठ कर रेखा के कमरे की तरफ जाने से पहले ये बात आँचल से कही थी जो अब थोड़ा झेंप गयी थी लेकिन उसकी माँ के चेहरे पर भरपूर ख़ुशी थी.

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"तोह जीजा, अब आप हे बताओ के क्या करना है? शंकर का सामना करने की हिम्मत नहीं है मुझमे.", सुबह के इस वक़्त आदत से विपरीत विनोद जल्दी उठ कर होटल के आलिशान कमरे में 2 कप में चाय भरता हुआ अपने जीजा पप शर्मा से बात कर रहा था. शर्मा के उल्टे हाथ की पूरी हथेली पर पट्टी बंधी थी, राजेश द्वारा दिए गहरे जखम की वजह से. रात इन्होने ाची खासी शराब पी थी लेकिन शायद उसका भी उतना असर न हुआ था.

"शंकर घर से बहार के हादसे कभी परिवार के बीच नहीं लेके जाता साले साहब. एक तरह से तोह देखा जाए तोह वो मामला अँधेरे में बस मिशन जैसा था. उन्होंने वो किया जो वो करने आये थे लेकिन हम तोह ज़िंदा है न? पर्दा उन्होंने भी रखा है विंडो तोह यही हमने करना है. जाना तोह होगा हे और नहीं गए तोह शायद वो मकसद भी कभी पूरा न हो पाए जिसकी कसम तुमने उठाई थी.", शर्मा ने चाय का कप उठाने से पहले कपडे सही से पहने और विनोद के सामने वाली कुर्सी पर आ बैठा.

"वैसे मेरे जितना या ज्यादा नुकसान तोह उन सबने आपका भी किया है. ख़ास कर शंकर भाई और राजेश ने. देखा जाए तोह आप शंकर के भी जीजा लगते हो और राजेश तोह आगे उसका भी साला है.", विनोद के कमजोर दिमाग में जाने क्या हे खिचड़ी पक्क रही थी और शर्मा की आँखे कुछ छोटी हो गयी.

"कहना क्या चाहते हो इस 'ज्यादा' नुक्सान से.? भागीदार तोह हम बराबर हे है न हर चीज में?", चाय का कप वैसे हे रखा था क्यूंकि विनोद ने बात जो इस तरह शुरू की थी. वो नौटंकी करता थोड़ा गंभीर चेहरा बनाते हुए अपने जीजा को देखने लगा.

"कहना तोह नहीं चाहिए क्योंकि इजत्त तोह मेरी भी खराब होगी ये बात बताने से.", विनोद ने अगली पहेली बुझाई तोह शर्मा से सेहन न हुआ.

"तू सीधा बोल न विनोद, ऐसे अधूरी बातें करनी है तोह फिर रहने दे."

"जीजा, शंकर भाई और दामिनी का सम्बन्ध है. शादी से पहले से है जो मुझे बस उस दिन हे पता चला जब आप आँचल को उसके कंप्यूटर सेण्टर छोड़ने गए थे. और ऐसा हे कुछ राजेश का भी है.", विनोद ने ये धमाका हे कर दिया था, चाहे आधा झूठ हे सही. लेकिन वो जैसे ठान चूका था की अब अगर बर्बाद होना है तोह फिर साम, दाम, दंड और भेद के साथ कलंकित भी करना पड़े तोह वो करेगा हे. शर्मा की तोह आँखों में खून हे उतर आया था ये सुन्न कर. उसने गुस्से में विनोद का गिरेबान पकड़ा तोह अपने साले के चेहरे पर दुःख देखते हुए जबड़े भींच कर हाथ हटा लिया.

"तू होश में नहीं है विनोद. ये बहोत गन्दी बात कही है तुमने और अगर इसके पीछे तुम्हारी कोई अलग हे मंशा है तोह साफ़ हे कह देते. दामिनी का चरित्र गिराने की जरुरत नहीं थी."

"मैं साबित कर दूंगा जीजा और खुद हे चुपके सुन्न लेना जब दामिनी कबूल करेगी मेरे सामने. मैं ये इसलिए कह रहा हु क्योंकि ये सिर्फ बस पैसे की लड़ाई नहीं रही, इजत्त और मर्दानगी का भी सवाल बन्न चुकी है. ठन्डे दिमाग से हे चलना होगा क्योंकि आमने सामने की जुंग में तोह हम एक मिनट न टिक सकेंगे. मैं शंकर की जड़ पकड़ता हु आप राजेश की. लेकिन पहले मैं साबित करूँगा जिस से आपको अपने साले पर थोड़ा विश्वास तोह हो.", विनोद ने अब चाय का कप खुद हे शर्मा के सामने कर दिया जो सदमे में बैठा था.

"जीजा, उस परिवार की एक कमजोरी मेरी समझ में आयी है और शायद उसने मेरी औरत को भी अपवित्र कर दिया है. कैसे भी करके सिर्फ वो इंसान गायब हो जाए तोह उनके बड़े बड़े 2 परिवार आधे ख़तम हो जाएंगे. अर्जुन जहा शंकर का बीटा है वही वो राजेश की तरफ भी वारिस है, कोई और लड़का उनके खानदान में न होने से. चाहे जितना भी समय लगे, हमको बस इस नाम को बड़ी सफाई से हटाना है.", विनोद ने अपने इरादे अब खुल कर जाहिर कर दिए थे जिस पर शर्मा ने सहमति जताई.

"अगर ऐसी बात है तोह वो शमशान (कंट्री फार्म) जमीन बेच कर आदमी लगा विनोद. इस लड़के की हर छोटी से छोटी बात और समय की खबर जमा करके शंकर की नेसल हे ख़तम करते है. बस ध्यान रखना की इस बार ये इस तरह होना चाहिए की कोई कड़ी हमसे न जुडी मिले. बदले के लिए अब 1 करोड़ का 10 भी लग जाए तोह गम नहीं. ये लड़का अब राख बनेगा चाहे इसमें 10 दिन लगे या फिर 10 महीने.", विनोद को शायद ऐसे हे जवाब की उम्मीद थी और वो अंदर हे अंदर खुश हो रहा था. जैसे उसने ठान लिया था के अब वो कुछ ऐसा करेगा की नुक्सान किसी का भी हो पर वो साफ़ बना रहे.

"बस फिर हम आज यहाँ से निकलते हे ख़ामोशी से इस पर लग जाते है जीजा. लेकिन पहले मैं सबूत दूंगा और फिर हे आप मेरा साथ देना.", कुटिलता में जैसे विनोद एकदम हे उचाई पर जाने लगा था.

"नहीं, दामिनी का जो भी है मुझे अब परवाह नहीं. नुक्सान के बदले बड़ा नुक्सान करके हे रहेंगे. तुम करो तैयारी चलने की और तोहफे ऐसे लेना की सब देखते रह जाए. चाहे 5 लाख लगे या 10 लेकिन उन्हें लग्न चाहिए की हम परिवार में हे है.", शर्मा सिग्रत्ते सुलगा कर बाथरूम की तरफ चल दिया. और विनोद बस बैठा अंदर हे अंदर हंस रहा था.

'जीजा, तेरी बीवी भी जायेगी, तू भी और वो शंकर का पिल्ला भी. लेकिन विनोद का दिल इतने से नहीं भरने वाला. आँचल को रंडी बना के रखूँगा अपनी और अब तोह जब तक जिन्दा हु शंकर का पूरा परिवार ऐसी दुर्घटनाये देखता रहेगा, साल दर साल.', विनोद ने खड़े हो कर अलमारी से 500-500 के नोटों की गड्डियां निकाल कर बिस्टेर पर फेंकी और कपडे बैग में भरने लगा. वो एक हे हादसे के बाद जैसे पूरी तरह बदल चूका था और उसका तरीका भी. परिवारों के बीच कुछ तोह बड़ा होना हे था चाहे विनोद को हे हानि हो और इसका मतलब था रामेश्वर और कृष्णेश्वर के बीच पक्की दरार. बस विनोद को जो ज्ञात न था तोह वो ये की शादी के बाद खुद अर्जुन हे उसके घर आने वाला था. ऐसे fer-badal की दूर दूर तक उसको आशंका न थी.

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यहाँ आज बहोत कुछ घटने जा रहा था. अर्जुन अपने साथ स्वाति को लिए निकल चूका था शालिनी बुआ के लेने, शंकर अपना कार्यक्रम बना चूका था दामिनी के साथ, कुछ बड़े मेहमान पहुंचने वाले थे पंडित जी के निवास पर और एक तरफ सारंग के परिवार में भी कुछ उथल पुथल हो चुकी थी. आने वाले समय में बहोत कुछ होने वाला था जिसकी प्रतीक्षा थी या फिर कोई उम्मीद भी नहीं.
 
firefox420 भाई, सर्वप्रथम दिल से नमन आपको और बाकी सभी मित्रो को. जो आपने लिखा उसको मैंने 2 बार पढ़ा क्योंकि प्रथम भाग वैसा हे है जैसा मैं महसूस करता हु और शब्दों के साथ न्याय न कर पाने की वजह से बयान नहीं कर पाटा. हाँ, प्यार 💯 बार को सरल रूपांतरण सिर्फ और सिर्फ ऐसे हे एहसास, अनदेखी की पीड़ा, ज्ञान का मंतव्य और एकाकीपन में जीवन का वर्णन है.

जब मैं उन्मुक्त हो कर सिर्फ खुद के लिए लिखता हु तोह वह किरदार या कोई दायरा नहीं होता. लमस दिल की और बयान उस सोंधी सी मिटटी की महक का जो पहली बारिश में आप तभी महसूस कर सकते है जब आप अंदर से उसमे जुड़ा हुआ पाए. कभी कभी तोह बरसो घर दूर भाग दौड़ करके, महंगे से महंगा भोजन करके भी शरीर सुख नहीं मानता. ऐसे हे be-samay वो पल याद आ जाये जब हाथ में मलाई cheeni-roti गोल करके घर से स्कूल निकले हो तोह उस से बहुमूल्य क्या होगा?

"उजले सवेरे की भी क्या बिसात, सनम भीगे चेहरे जब हमारी आँखों से ru-ba-ru हो."

किस्से कहानियों में इश्क़ के, आकर्षण के हजारो वर्णन होंगे. कही जुल्फों तक का उड़ना जानलेवा तोह कही चेहरे पे आयी लातो से क़यामत. नींद से आँख खुलने पर पहली बार अपने चेहरे पर जब उसकी गीली जुल्फों का स्पर्श हुआ था, तोह लगा की साला ये ाची बात नहीं. नींद खराब हुई.. 😅

जागते समय ऐसा हुआ तोह उसका वर्णन हे मुमकिन नहीं. छोटे छोटे से लम्हे जिनमे कभी बस उँगलियों का वो इरादतन उलझना. कुछ कदम दुरी से चलते हुए बस उसके एक बार पलट के देखने की चाहत और पूरा भी होना, वो जुल्फों को बेध्यानी से दोनों हाथ उठा कर एक रबर में बांधना लेकिन नजरे 4 हो जाए तोह खुदसे कुछ कहते नहीं बनता लेकिन सामने वाला सब जानते हुए भी सपाट चेहरा या हलकी मुस्कान जिसका मतलब समझ से परे.

ये सब हर रिश्ते या जीवन के बहोत से मौको पर होता है. मेरे पिता ने रबर वाली टाई की जगह जब वो गाँठ लगाने वाली पहली बार खुदसे मुझे पहनते हुए सिखाई थी वो लम्हा आज ख़ास लगता है. सैलरी से उनके लिए पहला उपहार एक टाई हे था क्योंकि उसमे वही फीलिंग थी.

हमारे गुजरते जीवन के साथ शिक्षक भी बदलते है. स्कूल और कॉलेज इसका एक जिवंत उदहारण है. अपने eternity भाई ने बड़े पते की बात कही और उसका जवाब शायद यही मुमकिन है. एक रिश्ता जुड़ने के बाद सीखने से ज्यादा निभाने पर ध्यान रहता है. लेकिन सीखना तोह जीवनभर है इसलिए शिक्षक भी समय अनुसार बदलेंगे.

मैंने इस कहानी को सिर्फ एक हे तरह सोचा था लेकिन दिल में एक और वर्णन था जिस पर मैं अब काम कर रहा हु. यहाँ लिखा भी दिल से है क्योंकि दूसरा पहलु नजरअंदाज नहीं कर सकते, लेखन अनुभव लेने का. हर पीढ़ी, उनका समय और अनुभव अलग होते है परन्तु इंसान के जीवन में जो नहीं बदलता वो है व्यक्तित्व, एहसास और प्रेम. कहने और प्रकट करने का तरीका बदल सकता है जैसे परिस्थितया.

जैसा मैं हमेशा हे कहता हु की अर्जुन कही न कही केंद्र है परन्तु हर चरित्र विशेष है. शंकर के दिल का वर्णन हे नहीं हुआ और नरिंदर के भी कुछ पहलु होंगे. प्यार तोह रामेश्वर जी को भी हुआ था और कहानी संजीव की भी है. सरल जीवन में उमेद राजेश्वरी का भी प्रसंग है तोह चाहत अपने शास्त्री जी की भी थी जिसके साथ उनकी रानी की यादें जुडी है.

हम इंसान है और जब अपने अधूरे या टूटे एहसास, प्यार से बाहर निकलना चाहते है तोह रास्ते खोजते है. कभी सही तोह कभी गलत. वही तोह हर कहानी का सार है. एक राम और एक रावण. लेकिन गलत को गलत कहना भी सही नहीं. वो व्यक्ति जिसका सपना अपनी मोहब्बत्त को हर सुख देने का हो, जिसके बिना वो खुदको अधूरा पाए. गर वही न रहे तोह प्रतिशोध क्या गलत होगा?

जीवन के रंग अनेक और वैसा हे हर व्यक्ति, उसका चरित्र और गुरु. समाज भी हमारा, नियम बनाने वाले भी हम. नियम टूटे तोह भी दुःख या गुस्सा और खुद तोड़े तोह हम अलग या श्रेष्ठ.

मेरा मकसद है बस इस कैनवास पर वो हर रंग भरना जिसमे सही गलत से ज्यादा हमारे हे व्यक्तिगत पहलु के दृश्य हो. कहे, अनकहे, चाहे या अंधेरो में छिपे.

लिखता हु, मिटाता हु और फिर कुछ समय ले कर फिर लिखता हु. बस रुकना नहीं चाहे कुछ देरी हो जाए. कभी कभी व्यथित हो जाता हु या व्यस्त भी, जिम्मेवारी भी है और जरुरत भी.

ऑफिस शिफ्ट किया है, कुछ कॉन्ट्रैक्ट्स चल रहे है, आर्ट एक्सहिबिशन के लिए 2 महीने अलग डेडलिनेस और साथ हे इस कहानी पर 2 तरफ़ा काम. सोचता हु की अगले दिन कुछ समय बचेगा पर कभी कभी माहौल अनुकूल नहीं मिलता. हाँ इसका असर सभी पर न हो इतनी कोशिश रहती है.

सभी के लिए आने वाला वर्ष मंगलमय रहे, स्वस्थ जीवन के साथ उन्नत्ति की प्रार्थना.

आपका

एनिग्मा 🙏
 
आज अपडेट आएगा. हैप्पी नई ईयर 🎉 भाई लोगो 🎉💚🎈😀
 
अपडेट 180-ा

अंगूर

"तुम भागते क्यों रहते हो मुझसे? देखो अगर तुम्हारे दिल में किसी बात का पछतावा है या फिर मैं हे पसंद नहीं हु तोह साफ़ भी बोल सकते हो. मेरे दिल से मैं तुम्हे नहीं निकाल सकती.", ज्यादातर जीन्स टीशर्ट में रहने वाली स्वाति ने इस वक़्त फिरोज़ी कमीज और चुस्त सलवार पहना था और चेहरे पर ताजगी लिए वो कार में अर्जुन के साथ निकली थी पर बात शुरू होते हे उदासी ने वो ताजगी हवा कर दी. अर्जुन कुछ पल बस शांति से गाडी चलता सड़क देखता रहा. उसको भी मालूम था के स्वाति ने कुछ भी गलत नहीं कहा. ननिहाल में एक यही लड़की तोह थी जो उसके साथ बचपन से हे दोस्त या उस से बढ़कर हे रही. जवानी की देहलीज पर प्यार भी खुद हे कबूल किया था जब वो दोनों एकांत में थे.

"तुमसे कहा भागता हु? डर मुझे खुदसे लगता है स्वाति और इस बात से की कोई जान गया इस बारे में तोह हमारे पास जवाब न होगा. जितना तुम मुझसे प्यार करती हो शायद मैं उतना न कर सका लेकिन हम दोनों को सच तोह पता है. मेरा भी दिल करता है की तुम्हारे साथ राहु कभी, तुम्हे समय दू और हम दोनों वैसे हे रहे जैसे अक्सर रहते थे. आज तुम्हारे सामने है की मैंने किसी और से पुछा तक नहीं और सिर्फ तुम्हे कहा मेरे साथ आने को.", अर्जुन की बात पर स्वाति भी कुछ याद करती हुई मुस्कुराने लगी जैसे वो बीते हुए पल अभी तक महक रहे हो. सुबह के इस वक़्त सड़क पर नाम मात्रा आवाजाही थी और कार अपनी हे रफ़्तार से गंतव्य की और बढ़ती रही.

"समय दीदी अपनी सहेली को बता रही थी की उन्हें तुमसे प्यार है. क्या तुम उनके साथ भी?", स्वाति के सवाल पर अब अर्जुन अगर ये कहता की उसकी लगभग हर बहिन हे यही करती है तोह बात बिगड़ जाती. वो पिछले शीशे पर एक नजर करके कार थोड़ी धीमी गति से चलने लगा.

"बस एक आकर्षण हे समझ लो इसको स्वाति. कहते है न की जब आप कुछ अजीब सा और सोच से परे अनुभव करो तोह इत्छा बढ़ जाती है खुद भी वही सब करने की. समय दीदी के मामले में कुछ ऐसा हे हुआ. लड़को से तोह वो दूर हे रही है या अगर दोस्त भी है तोह बस पढ़ाई और यूनिवर्सिटी तक. फिर उन्होंने अनीता मामी और संगीता मामी वाले मामले में ladka-ladki वाला सम्बन्ध पाया तोह न चाहते हुए भी वो आकर्षित हो गयी या शायद प्यार भी हो गया हो मुझसे. मैं आया था उनके इस शहर वाले घर और वह गलती हो भी जाती लेकिन दोनों अनजाने और किस्मत से कुछ और हे मामले में व्यस्त हो गए. बस उसके बाद से हे मुझे उनसे दुरी बनानी पड़ी लेकिन हो गया तुमसे भी दूर. अभी बस यहाँ शादी में सबके साथ मगन रहो, फिर मैं पक्का तुम्हारे साथ टाइम बिताऊंगा और घूमने भी चलेंगे.", एक तरफ चौक से कार घुमा कर अर्जुन ने ये रेलवे स्टेशन वाली सड़क का रास्ता पकड़ लिया था. स्वाति भी अब बेहतर थी और कुछ गुनगुनाती सी सड़क के दोनों तरफ देखती रही.

"वैसे ताई (पूजा मामी) कह रही थी की उन्होंने समय दीदी के लिए एक लड़का पसंद कर लिया है और ताऊजी भी 2 दिन पहले देख के आये थे लड़के और उसके परिवार को. रिजल्ट के बाद चर्चा करेंगे वो इस बारे में. वैसे दादा जी ने कहा है की अगर tauji-taai को सब जंचता है तोह फिर शादी सर्दियों में हे रख ले.", अर्जुन लगभग स्टेशन के बहार वाहनों के लिए आरक्षित जगह आ चूका था. स्वाति से इतनी बड़ी बात सुन्न कर उसको अजीब तोह लगा लेकिन जाहिर न करता हुआ वो कार सही से लगाने के बाद स्वाति को साथ लिए लोहे की सीढिया चढ़ता पल से प्लेटफार्म की तरफ चल दिया.

"वैसे राजेश मां तुम्हारी शादी जल्दी नहीं करने वाले.", अर्जुन ने मस्ती में ऐसा कहा था जैसे उसकी मंशा हो स्वाति के दिल की बात जान ने की.

"हाहाहा.. हमारे घर में आज भी फैंसले तीनो दादा और दादी मिल कर हे लेते है munna-raja. और पापा से ज्यादा तोह माँ की हे सुनी जायेगी क्यूंकि पापा घर में रहते हे कब है. और मैं शादी तभी करुँगी जब तुम्हारी हो जायेगी प्रीती के साथ. बाकी पता नहीं, लड़की हु तोह 4-5 साल में तोह कर हे देंगे. यही ट्रैन है न?", नीली रेलगाड़ी अभी धीमी गति से आती हुई स्टेशन से 500-700 गज दूर हे होगी जिसको देख स्वाति ने ऐसा कहा. इसक रेलगाड़ी के डिब्बों में गहरा कांच और बंद दरवाजे बता रहे थे की ये वातानुकूलित है. धीमी होती होती वो उनके सामने से गुजर कर लगभग रुक चुकी थी. हर डिब्बा वैसा न था, कुछ जनरल थे जो आखिर में थे.

"हाँ यही है. और वैसे भी कौनसा इतना बड़ा स्टेशन है ये जो अनिगिनत ट्रैन आएँगी? कुल 4 तोह प्लेटफार्म है जो लगभग खाली हे दीखते है.", अर्जुन स्वाति का हाथ पकडे हर डिब्बे के सामने से गुजरने लगा. उसको ऐसे हड़बड़ाता हुए देख स्वाति मुस्कुरा भी रही थी और लगभग दौड़ भी.

"बुधुराम, रुको तोह सही. जो लोग उतरेंगे वो हमको देखेंगे भी न.? बस यही खड़े रहो.", अर्जुन को भी खुद पर शर्मिंदगी हुई जैसे वो किसी बचे को खोज रहा था. अब कही रेलगाड़ी स्थिर हो चुकी थी और वो दरवाजे भी अपने आप हे खुल रहे थे. 2 बोगी आगे हे दरवाजे पर कड़ी हुई इधर उधर देखती उस खूबसूरत हलकी नीली साड़ी में कड़ी शालिनी बुआ को देख अर्जुन के चेहरे पर न्यास हे मुस्कराहट आ गयी. वो फुर्ती से स्वाति का हाथ छोड़ उस तरफ लपका और बुआ के बगल में रखे बैग को उठाने के साथ हे उनका हाथ पकड़ को निचे आने में भी मदद की. शालिनी बुआ को भी अर्जुन को अपने सामने देख उतनी हे ख़ुशी हुई थी जिसका एहसास उन्होंने बड़ी शालीनता से अर्जुन को अपने गले से लगा कर करवाया. कुछ खामोश और हसरत से देखती वो हलकी बिल्लोरी चमकती आँखें भी बगल में दिखाई दी. जीन्स और कुरता पहने आइशा दिल से तोह वैसा हे करने का सोच रही थी जैसा उसकी माँ ने किया था अर्जुन के साथ लेकिन वो बस उँगलियों में उँगलियाँ फंसाये कुछ पशोपेश में लगी.

"कैसी हो आइशा? दिख तोह ाची रही हो जैसे नींद पूरी हो गयी हो.", ये मंशा भी अर्जुन ने हे पूरी कर दी जो आइशा की चाहत थी. उसको भी अपने साथ लगते हुए वो बेहद ाचे से मिला. स्वाति ने भी इधर आ कर बुआ को नमस्ते की, फिर आइशा से हाथ मिलाया जो अब खुश होने के साथ थोड़ा झेंप रही थी.

"मैं तोह ाची हु और नींद तोह आएगी हे न जब एक बिरथ हो. लेकिन अब जोरो की भूख लगी है.", आइशा अर्जुन से अलग हो कर स्वाति के करीब थी और अर्जुन ने एक बैग कंधे पर टांगने के साथ दूसरा हाथ में लटका लिया.

"बुआ, अब तोह थोड़ा जल्दी हे चलना पड़ेगा. राजकुमारी जी को समय पर खाना न मिला तोह समझो शिकायत शुरू. वैसे ये स्वाति है, राजेश मां जी की बेटी और आपके बारे में तोह मैं इसको बता हे चूका हु.", बुआ ने एक बाद देने को भी कहा लेकिन वो इतनी जेहमत उन्हें कहा करने देता. स्वाति के साथ आइशा आगे चलने लगी थी और अर्जुन ने पलट कर एक बार पीछे देखा जहा शालिनी बुआ भी ध्यान देने लगी. ये व्यक्ति उस डिब्बे से हे बहार आया था जिस से बुआ और ऐसा उतरे थे. प्लेटफार्म पे वो इनके करीब हे खड़ा रहा था और फिर कुछ कदम हट कर sare-aam अपनी देसाई बीड़ी सुलगता वो कभी इन्हे देखता तोह कभी इधर उधर.

"कुछ रह गया है क्या?", शालिनी बुआ के ऐसा कहने पर अर्जुन ने ना में गर्दन हिलाते हुए अब बहार निकलने पर तवज्जो दी.

"बता दो, ऐसे गौर से तुम उसको देख रहे थे मतलब तुम्हे उस पर कुछ शक है शायद? वैसे मैं भी बता देती हु की वो हमारे शहर से हे साथ चढ़ा था रात में. और इसकी टिकट तट ने हे बना कर दी थी. पूरे 5 घंटे ये बस एक तरफ बैठा जागता रहा लेकिन बीड़ी पी रहा है तोह मतलब ये एक में जाने का आदि नहीं है. जनरल में तोह लोग दरवाजे पर खड़े हो कर ये सब कर लेते है.", शालिनी बुआ ने जैसे ाचे से पहचाना था इस आदमी को. अर्जुन ने अपने खाली हाथ में धुप का चस्मा अपनी तरफ करके पीछे का दृश्य देखा तोह वो व्यक्ति उन्हें हे देख रहा था. अर्जुन के चेहरे पर कुटिल मुस्कान देख शालिनी बुआ भी सोच में पड़ गयी.

"पीछे मैट देखना आप बुआ. वैसे जब मैं बैग उठाने लगा था तोह वो आदमी तभी मुझे गौर से देख रहा था. पहनावे से जरूर वो देहाती या राजस्थानी दिख रहा है लेकिन वो एक पोलिसवाले है. आप टेंशन मैट लेना क्योंकि ये जो खोज रहा है वो इसको भी नहीं पता. वैसे फूफा जी नहीं आये?", शालिनी जहा खुद को 36 आंक रही थी वो अर्जुन की बात सुन्न कर भौचक्की रह गयी.

"फूफा तोह तुम्हारे शादी वाले दिन हे आएंगे लेकिन तुम्हे ये कैसे पता की वो आदमी पोलिसवाले है? मैं नहीं मानती ये बात. वो कोई अमीर जमींदार हो सकता है या फिर लोकल जासूस जो तुम्हारे फूफा के परिवार की रेकी कर रहा हो क्योंकि कुछ समय से वो व्यापार के साथ राजनीति में भी कुछ दोस्तों की मदद कर रहे है."

"मेरा बोर्डिंग याद है न बुआ? तोह राजस्थान की मिटटी और लोग मैंने इतने करीब से देखे है जितने आपने अपने विवाहित जीवन में नहीं देखे होंगे. क्योंकि मैं तोह रहता हे उनके बीच था. ये जनाब घनी मूछ की जगह संवरी हुई साफ़ मुचो में थे और गाल एकदम तजा उस्तरा किये. दूसरी बात की धोती पहन कर चलने वाला कभी भी कमर पर हाथ नहीं रखता और जो रखता है वो धोती नहीं बांधता. बीड़ी की आदत तोह जरूर है क्योंकि कुर्ते में 2-3 जगह चिंगारी के छेड़ थे और सबसे बड़ी वजह है के वो स्टेशन पर खुलेआम बीड़ी पी रहा था और जब रपफ वाला आया तोह उसने कुर्ते की जेब से निकल कर कुछ दिखाया जो मैंने चश्मे में प्रतिबिम्ब में देखा. रपफ वाले ने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया तोह वो ना में सर हिला कर उसको मन कर गया. मतलब वो पोलिसवाले है.", अर्जुन ने एक बार और चस्मा वैसे हे किया लेकिन अब वो व्यक्ति नजर न आया. शालिनी बुआ तोह चलते चलते भी मुँह फाड़े बस अर्जुन को देख रही थी. दोनों लड़कियों में तोह 2 मिनट में हे दोस्ती हो चुकी थी जो अपनी हे धुन में उनसे 20 कदम आगे उस पल पर चलने लगी थी.

"तुम इतना ध्यान देते हो ऐसी छोटी छोटी बातों पर?"

"नहीं बुआ, छोटी बातें खुद हे सामने आ जाती है. वैसे वो यहाँ तक इसलिए नहीं आया की फूफा जी की रेकी कर रहा हो. मुझे लगता है की ये नजर आप पर राखी जा रही है. शायद आपको लगता होगा की आपकी सहेली का परिवार वो सब भूल चूका है लेकिन मुझे नहीं लगता. या फिर कुछ और भी बात हो सकती है लेकिन जैसा आप सोच रही है वैसा कुछ नहीं है.", अर्जुन की बात सुन्न कर और यहाँ पहुंचते हे हुई इस घटना को तुरंत हे दिमाग से निकाल शालिनी बुआ ने उसका वो खाली हाथ थाम लिया.

"जाने दो इस सबको. कुछ करना हे होगा तोह करेगा. अब ये बात यही ख़तम करो और जो स्टेशन पे हुआ वो बस यही. तुमने लास्ट टाइम कुछ प्रॉमिस किया था और मुझे नहीं लगता की तुम वो निभाओगे.", अर्जुन के गाल लड़कियों से लाल होने लगे थे अपनी इस बुआ की बात सुन्न कर जो शालिनी ध्यान से देख रहे थी.

"सभी है न इधर इस माहौल में. उसके बाद आप आराम से मेरे कमरे में सो सकती है मुझसे बातें करते हुए. फ़िलहाल तोह मुझे दूसरे घर रहना पड़ता है जहा सभी दीदी और उनकी फ्रेंड्स सोने जाती है रात को.", कार के करीब आते आते अब ये विषय यही ख़तम हो गया था लेकिन अर्जुन ने सामान डिक्की में रखने के साथ हे दूसरी तरफ फाटक लांघते उसी व्यक्ति को देख लिया था जो बुआ के पीछे हे इस शहर आया था. अगल बगल देखता हुआ वो एसटीडी पीसीओ में जा घुसा और अर्जुन ने ना में गर्दन हिलाते हुए जैसे कुछ ठान लिया था.

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आज पंडित जी के संसार में खासी चहल पहल थी और इसका कारण ये भी था की नाश्ते पर उनके पुराने सहकर्मियों के साथ साथ dharam-sala भजन भी सपरिवार उपस्थित था. हर गणमान्य व्यक्ति की उचित dekh-rekh के साथ साथ घर को भी पूरी तरह सजाया जा चूका था. छोल साहब के घर में भी बराबर सेवा जारी थी और इनके सुपुत्र विवान भी शाम को पधारने वाले थे. बहोत अर्जुन इस सबमे आज मुख्या पौत्र की तरह कही संजीव भैया और उनके दोस्तों की सेवा में दीखता तोह कभी अपने दादा जी, pita-chacha के मेहमानो की aav-bhagat में.

शादी अभी 2 दिन बाद थी लेकिन 200 के करीब लोग का jal-paan करवाने के लिए असगर की मण्डली में भी 8 लोग और लगाए गए थे. ये सब खुद भजन की देख रेख में हो रहा था जो अपना ओहदा भुला कर हर जरुरी बात को ध्यान देते हुए कमी पेशी दूर करने में लगा था. 10 बजते बजते भीड़ काम हुई और घर के भीतर ब्यूटी पार्लर से 4 yuvtiya/mahilaaye पधार चुकी थी. भीतर के आँगन में रस्मो के बीच सभी घर और पड़ोस की महिलाये हंसी ठिठोली और गीत में लगी थी लेकिन कुछ यहाँ से गायब भी थी.

दामिनी मार्किट का बोल कर निकली थी शंकर के साथ और विन्नी को भी जरुरी काम था लहंगे का जिसके लिए उसने अर्जुन को उसके दादा जी से दांत लगवा कर साथ लिया था. उनके जाने के कुछ हे समय बाद घर में पधारे थे हुसैन साहब अपनी बेगम और बड़ी बिटिया ज़ुबैदा को लिए. रेशम सिंह जी भी आये थे अपनी सरदारनी जी को लिए लेकिन उनका बीटा नदारद था घर की देखभाल की वजह से.

"आओ mallika-e-tarannum.. आपके दीदार हे दूभर हो चले थे. और ये हमारी मरस रेशम सिंह तोह दुनिया घूम लेंगी बस अपनी बहिन से मिलने न आये.", कृष्णा जी ने दोनों का स्वागत करने के साथ हे ज़ुबैदा को भी अपने गले से लगाया जो यहाँ मौजूद हर लड़की को गज़ब की टक्कर देती लगी अपने बेफ़िकराना से अंदाज में. अर्जुन की माँ रेखा जी का पता लगने पर वो बड़े जोश से उनके गले लग कर मिली थी, बेशक सलवार कमीज और दुपट्टा था पर वो तोह थी हे ज़ेबेंडा जिसका तोड़ा हे न हो. अफसाना को देख कर जहा उसकी माता जी खुश और हैरान हुई वही ऋतू देख रही थी कोमल और ज़ुबैदा को मिलते हुए. 2 चित्रकार और वो भी एक दूसरे से भिन्न प्रवर्ति के लेकिन कुछ तोह साँझा था इनमे. उसको लिए कोमल अपने कमरे में ले चली और यहाँ chai-namkeen के दौर के साथ सबका मिलना मिलाना होने लगा.

"हमे आने में तकलीफ नहीं थी कृष्णा, हुकुमरान (कौशल्या) जी से इजाजत जितनी मिली हमने उतनी हे जरुरी समझी.", अफसाना की अम्मी के ऐसे मजाक पर हलकी सी चपत उनके सर पे कौशल्या जी ने भी जमा दी.

"बड़ी आयी इजाजत लेने वाली. ये क्यों नहीं कहती के वो मुआ (हुसैन) काम से बहार निकलता हे नहीं. मिलने दे उसको जरा फिर लगाती हु उसके कान के निचे. और सरदारनी, तू तोह ईद भी ऐसी हुई जैसे नसीब में न हो. रेशम ने कही फंदा तोह नहीं फंसा के रखा आजतक?", कौशल्या जी जब अपने पर आती थी तोह ऐसा लपेट लेती थी की ना सामने वाला है कह सकता था था और न हे ना.. शर्म साफ़ झलक रही थी अफसाना की अम्मी और गुरदीप की माता जी के चेहरों पर लेकिन उनका मुस्कुराना भी गजब हे था.

"ऐसा नहीं है बड़ी अम्मी. हम तोह कल हे आ जाते बस रुखसना के भाई उन्हें लिवाने शाम हे आये तोह देरी हुई. ये बाजी तोह 2 दिन पहले से हे तैयार रही पर हमसे हो न पाया. अब आपके पहलु में है जब इजाजत देंगे तोह रुखसत लेंगे.", अफसाना की अम्मी का बोलना भी दिल से हे ठौर कौशल्या जी ने उन्हें आशीर्वाद देने के साथ हे उनके चाय नाश्ते के लिए सेवको को आवाज दी. ढोलक जो कुछ देरी के लिए खामोश हुई थी अब फिर जोरो से चालु हो चुकी थी. फिलहाल तोह लट्ठे की चादर, उस पर सलेटी रंग माहिया कई स्वरों से गया जा रहा था जिस पर मधु के साथ शालिनी के ठुमके la-jawaab थे. लेकिन सफर के बावजूद इनके बीच अफसाना की अम्मी को कृष्णा जी खींच हे लायी. ये पल गवाह था की इस घर में इंसान को इंसान हे मन गया जहा Alisha-Romela के स्वर, श्रीमती हुसैन का मधु के संग नृत्य और गुरदीप की माता जी का उतना हे प्यार सत्कार के साथ गीत गाते हुए शामिल होना.

गर इंसान है तोह धरम इंसानियत रख बंदेया, पंडित तोह शायद मजहब से परे सिर्फ ग्यानी हे कहलाता है.

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"शंकर.. आठ.. कुछ नशे में है क्या आज? आयी माआहहह... तेरा लौड़ा एक बार में नहीं झेल सकती रे खसम.. फट गयी है.. आह्हः.", ाचे खाने पीने से दामिनी का शरीर भरपूर गदरा चूका था और यहाँ सांगवान के निजी फार्महाउस पर जब ये दोनों पहुंचे थे तोह ताले की चाबी शंकर के पास होने का मतलब साफ़ था की ये वीरान हे है. रात से गर्मी में झुलस रहे शंकर ने भी अपनी इस आशिकी का समय बर्बाद न करते हुए सही जगह पर निर्वस्त्र करके थोड़ा बहोत सहलाने के बाद अपना सख्त हथियार दामिनी को घोड़ी बना कर उसकी फूली हुई गुफा में जोरदार झटके से उतार दिया.

"फाड़ तोह 22 साल पहले दी थी मैंने तेरी.. आह्ह्ह्ह.. लेकिन एक बचा देने के बाद इतनी कासी हुई है आजतक.. दामिनी.. तू हे थी जिसने मुझे उकसाया था हर तरीके की चुआड़ी सीखने के लिए.. और देख.. ुह्ह्ह्ह.. तेरा पिछवाड़ा पूरी कहानी बताता है..", दामिनी सचमुच हे आकर्षक थी जिस्म के ख़ास हिस्सों पर. यही वजह थी की खुद उसके सेज भाई विनोद की तबियत भी खराब हो जाती थी उसके चौड़े कूल्हों और मॉटे चुचो को देख कर. शंकर निर्दयता से जितना उसके लटकते चुचो को मसलता दामिनी उतनी तेज पकड़ छूट से लुंड पर बनती. सटासट पेलम पिलाई के बावजूद दामिनी इतने जोरदार धक्के शायद काफी अंतराल बाद झेल रही थी.

"ओह्ह्ह.. माँ ऋ... शंकर.. तेरा लुंड जोरदार होने के साथ.. आठ.. जरुरी चीज है.. जोर.. मार हे देता है भाई तू तोह.. आजतक तेरे जीजा का न मुँह में लिया मैंने और तू ऐसा है जिसने गांड, छूट और मुँह के साथ chuche-dhunni तक न छोड़ी.. उम्म्म्म.. और तेज मार... फाड़ दे इस फुद्दी को.. आह्ह्ह्ह. बिनोदिया तेरे खिलाफ जा रहा है.. बता देती हु.. मा.. और शायद वो आँचल को भी खराब करने की जुगत बैठा रहा. जितना मैं जानती हु वो इसके लिए जीजा का दिमाग भरेगा अपने.", छूट की भूरी फांके लटकी थी लेकिन लुंड की भरपूर मोटाई से जैसे ये फरक शंकर और दामिनी को पता तक न चला. उसके मुँह से ये बात सुनकर शंकर ने और भी जोरदार लेकिन गहरे धीमे धक्के शुरू कर दिए. अब दामिनी सिसक रही थी और उसके मॉटे चुके मसलता शंकर भी चुदाई की गर्मी निकालने के साथ सोच रहा था.

"उसकी भी गांड मारनी हे पड़ेगी अगर ऐसा है तोह.. आह्हः. बेबे (बहिन), पप है चुटिया और बिनोद महा चुटिया जो ऐसा कुछ करने की अगर सोच भी रहा है तोह. पापा को माँ आजाद कर चुकी है हर वचन से... उम्म्म.. गलती हुई न अगर उस गांडू से तोह इस बार न वो बचेगा और न उसके साथ mili-bhagat वाला कोई.. वैसे आह्ह्ह्ह.. रात को तेरे पिछवाड़े को ढीला करूँगा.. लगता है पप ने कही से भी ाचा काम न किया तेरे पे.", शंकर का बस चलता तोह वो अभी दूसरा सुराख खोल देता लेकिन समय और स्थिति का पूरा ध्यान था उसको भी. दामिनी की छूट से भी सफ़ेद झाग बहार आता बता रहा था के वो झाड़ भी गयी है और मजे में भी है. हर बार patt-patt की आवाज के साथ दोनों की सांस भी चढ़ने लगी थी.

"आअह्ह्ह.. तू .. दूर रहियो.. शंकर.. अनामिका हे काण्ड करवाएगी देखता रह.. लेकिन कोशिश करियो के छोटा भाई सलामत रहे. उम्म्म.. बस कर रे..", दामिनी की टाँगे जवाब दे गयी थी इस 15-16 मिनट की तूफानी चुदाई में और अब तोह छूट ने घर्षण सेहन करने से इंकार हे कर दिया था. शंकर ने भी बिना आगे बात किये उसका पूरा जिस्म मसलते हुए जड़ तक प्रहार करके वो साड़ी गर्मी सफ़ेद पसीने में अंदर खाली कर दी जिसकी वजह पिछली रात की अत्यधिक शराब और चुदाई न हो पाना थी. गहरी सांसें भरते वो दोनों कुछ समय उस बिस्टेर पर हे पसरे रहे.

"दामिनी, तुमने भी बहोत कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ रहा और मैं तोह इसको बचते बचते खुद हार चूका हु. चरित्र नहीं बदल सकते जब इंसान खुद हे न चाहे. पता नहीं की खानदान में अकेला विनोद हे क्यों ऐसा है और फिर उसको आगे जीजा भी मिले तोह कोढ़ में खाज वाले. बस वो कोई ऐसी गलती न कर दे जैसा तुम कह रही हो. और जहाँ तक मुझे लगता है वो कोई गलती तोह कर चूका है क्यूंकि उसके पीछे वो है जिसको मैं नहीं रोक सकता. चलो अब तुम्हे लेहंगा या साड़ी जो कहो दिलवा देता हु.", शंकर ने कपडे सही करते हुए एक बार दामिनी को देखा जो अपने चुचो पर हो रही जलन से उन्हें बस सेहला रही थी.

"उफ़.. सूट नहीं निकला तुम्हारे मुँह से? सारे और लेहंगा कही भी ऊपर उठा के पेल देना आसान है न? वैसे मुझे भी लगता है के विनोद ने अगर वही किया तोह अब उसको न मैं बचा पाउंगी और न तुम. ताऊजी अगर जमीन पे आये तोह मतलब पापा एक तरफ और बाकी सब लाइन में. लड़की छेड़ने पर बिनोदिये को खेत से घर तक कूट ते हुए लाये थे पर दोहती का मामला सुना तोह फिर उसको चौराहे पर लटका देंगे. उम्म्म.. लुंड हो तोह सचमुच तेरे जैसा हो भाई.. आठ.. रात को जहा कहेगा वह मिलूंगी.", और बस इनकी यही बात का फायदा लेने वाला था विनोद इस रात लेकिन वो तोह खुद हे चारा था जो खुद को अजगर समझ रहा था लेकिन हकीकत में बरसात के केंचुए सा विनोद अगर अभी तक सुरक्षित था तोह सिर्फ इसलिए क्यूंकि खुद परिवार उसको बचा रहा था और वो भी रामेश्वर जी से. अब उनका सेनापति कहो या छोटा राजा, अंदरूनी मिलीभगत से वो गाँव जाने हे वाला था सत्ता कायम रखने के लिए.
 
अपडेट 180

अंगूर (बी)

"ाची फसल जा रही है बिटवा इस बार. लगता है अंगूर की बेले ख़ास तकनीक से लगाईं थी तुमने.", घने बाग़ में 10 फ़ीट की ऊंचाई पर अंगूर के बेलो ने हे छत का रूप लिया हुआ था. अभी ये मौसम थे फसल पकने का जो एक महीने के लगभग चलने वाली क्रिया थी. शहरी आबादी से 7-8 किलोमीटर दूर इस बाग़ में 7-8 मजदुर अपने काम कर रहे थे और बगीचे का मालिक जो तक़रीबन 27-28 बरस का हत्ता कट्टा सा व्यक्ति था, वो अपने इन 4 मेहमानो के साथ एक तरफ निवार वाली लोहे की कुर्सियों पर बैठा उनकी बातें सुन्न ने के साथ हे सबके लिए चाय भी कप में उड़ेल रहा था.

"अंगूर की फसल न होती अंकल जी, पैदावार होती है क्योंकि एक बार कलम लगाने के बाद आप उसका ख़याल 3 बरस तक किसी बचे की तरह रखते हो. फेर वो अगले 15-20 बरस इसका मोल हर गुजरते साल के बाद अधिक से अधिक पैदावार से चुकती है. ये बाग़ मुझे मेरे पिता ने सौंपा था जब मैं 23 का था और यहाँ की हर बैल 6 महीने की. आज आपको यहाँ फसल दिख रही है और मुझे अपना परिवार. वैसे आपने मुद्दे की बात नहीं की.", लड़का समझदार था और सलीके से हे जवाब सवाल करता हुआ सामने बैठे चारो चेहरों को बस नजर कर रहा था, घूरना तोह अभद्रता होती. ये चार लोग थे रेणुका के पूर्व जीजा अभिमन्यु, स्वर्गीय मज कौशल के चाचा आनंद सिंह, मेनका सिंह का पूर्व देवर और स्वर्गीय लत अजीत का भाई संग्राम और संग्राम के साथ उसका मां लल्लन सिंह. इनके आने का प्रयोजन तोह कही न कही साफ़ हे था लेकिन जिसके पास ये लोग आये थे वो युवक था कुलदीप, सरिता का छोटा भाई और भीम सिंह का साला.

"बात तोह तुम भी समझते हो बीटा. पैसे की कमी न हमारे पास है और भगवान् ने तुम्हे भी मोहताज नहीं किया किसी जरुरत के लिए. लेकिन क्या तुम सुकून में हो कुलदीप बीटा?", ये घाग व्यक्ति था लल्लन सिंह जो आनंद सिंह को रोक कर खुद मुखातिब हुआ था सरिता के भाई से.

"सुकून तोह तब भी कहा था जब पैदा हुए? अब मरने के बाद हमको क्या पता लगेगा अंकल जी के सुकून मिला या नहीं? ज़िंदा आदमी कभी सुकून से रह हे नहीं सकता और जो दवा करता है वो जिम्मेवारियों से भाग कर लौटा लिए दर दर भीख मांगता मिलेगा, भगवन के नाम पर. वैसे आपने भी बात का सही जवाब नहीं दिया अंकल जी.", कुलदीप ने सबको चाय देने के बाद पास हे रखे मटके से गिलास भर पानी निकाल कर पीते हुए अभिमन्यु को थोड़े ध्यान से देखा. जाने क्या सोच कर अभिमन्यु इस मामले में शामिल था.

"ऐसा है बीटा की हमने बहोत म्हणत और bhaag-daud करके पता करवाया है की 3 परिवारों में जो जो आकस्मिक मौत हुई है उनके तार एक हे व्यक्ति या कहे परिवार से जुड़े है. इनका भतीजा कुयशाल और हमारा भांजा अजीत, जिसके साथ तुम्हारी बहिन की ननद ब्याही हुई थी वो दोनों पक्के दोस्त जैसे थे. कौशल मेरे भांजे से एक रैंक ऊपर था लेकिन उनमे इस वजह से कोई bhed-bhaav न बना कभी. मालूम चला की उन दोनों को किसी नक्सली ने नहीं मारा.", अब कुलदीप के भी कान खड़े हो गए थे जैसे कोई अनहोनी खबर पता लगने वाली हो. लल्लन सिंह के खामोश होते हे वो अपनी उत्सुकता रोकते हुए आगे बोलने का इशारा करके purva-vat हे बैठा रहा.

"हाँ और उनके हे करीबी से पता चला था के कौशल की मौत जिस गोली से हुई वो अजीत की गन की थी और अजीत को point-blank पर जिस रिवॉल्वर से मारा गया वो फ़ौज की नहीं बल्कि एक जर्मन पिस्तौल थी. फ़ौज ऐसे मामले कभी सार्वजनिक नहीं करती लेकिन अंदर बहोत से राज समेटे रखे जाते है. इस काण्ड को करने वाला कोई और नहीं रामेश्वर पंडित का सबसे छोटा बीटा नरिंदर शर्मा हे था और उसके पास ऐसी स्वचालित 3-4 महंगी पिस्तौल है. ठीक वैसी हे गोली तुम्हारे जीजा के छोटे भाई ऋषभ सिंह के माथे के ठीक बीच में धंसी मिली थी. लेकिन कही भी नरिंदर इन घटनाओ के aas-pas नहीं दिखेगा. असम में ट्रेनिंग के समय वो दुर्घटना हुई तोह नरिंदर शर्मा अपने मां के निधन पर उनके गाँव था. दूसरी घटना के समय वो देश से हे बहार था. लेकिन तीसरी घटना में तुम्हारे जीजा मारे गए और उन्हें अपराधी दिखा कर पुलिस की गोली का शिकार दर्शाया गया. सच्चाई कुछ और है बीटा.", कुलदीप तोह चाय भूल कर बस यही सब सुनता हुआ आँखे फाड़ कर चारो की तरफ एकटक देखे जा रहा था.

"हाँ बिटवा. एही सच है और भीम सिंह के साथ शीला देवी को बदले की भावना से मारा गया था. भीम की तोह आधा दर्जन पसलियां, रीढ़ की हड्डी के साथ साथ दर्जन भर हाड टूटे हुए थे. इसमें भी रामेश्वर पंडित के बेटे का हे हाथ था और प्रशाशन डॉक्टर सभी उनके साथ. देखा जाए तोह वह मिली ज्यादातर लाशो के ठीक माथे पर पके अंगूर जितना छेड़ था ठीक वैसा जैसे अजीत, ऋषभ के और पिस्तौल भी कुछ हद्द तक वैसी हे लेकिन ये नरिंदर का काम न था. नरिंदर का बड़ा भाई भी सफ़ेद पॉश डॉक्टर होने के साथ एक दरिंदा है लेकिन उसको ये goli-woli में विश्वास नहीं है इसलिए उसको अलग हे रखते है.", अब आनंद सिंह ने ये विवरण विस्तार से बताया तोह कुलदीप के चेहरे पर अनेको भाव आ चुके थे.

"इतना मत सोचो बीटा की दिमाग काम करना हे बंद कर दे. तुम सोच रहे होंगे की हम तुम्हे ये सब क्यों बिता रहे है और फिर तुम्हारे जीजा एक अपराधी की मौत मारा गया या वो चाहे था भी दोहरे चरित्र का लेकिन तुम्हे शायद अभी अपने पिता की मृत्यु का भी सच नहीं पता.", लल्लन पूरी तैयारी से आया था इधर और उसने एक और बम गिरा दिया इस युवक पर.

"kkk..Kyaaa... मतलब अंकल जी..?", अटकते हुए कुलदीप यही कह सका और गंभीरता का ढोंग करता हुआ लल्लन आगे बताने लगा.

"तुम्हारे पिता जी साधारण से व्यक्ति थे न कुलदीप? 5 किल्ले जमीन में परिवार को पालने वाले मेहनती व्यक्ति. फिर तुम पढ़ने जाते हो महंगे कृषि कॉलेज में और वापिस आये तोह ये 15 एकड़ का बगीचा, पक्का घर भी बना लिया 2 मंजिल का और उस सब को तुमने अपने दिमाग और म्हणत से बढ़ाया है अब. लेकिन तुम्हारे पिता का एक सच ये भी है की वो लोहान नाम के सरगना के साथ संलिप्त रहे थे 2 बरस और वो सब कमाई उसकी हे दें थी. फिर उनकी मौत हो गयी सांप के डंसने से, जब वो रात में अपने खेत में सोये हुए थे. उस समय हम भी आये थे तुम्हारे यहाँ शीला देवी, भीम, ऋषब, मेनका और इस संग्राम के साथ.", लल्लन की बात सुन्न कर कुलदीप सदमे से तोह बहार आ गया था और अब आखिरी सच सुन्न ने को आतुर था.

"तोह अंकल जी मेरे पिता की मौत की वजह कुछ और थी?", कुलदीप ने बहोत धीमी हे आवाज में ऐसा पूछा

"हाँ बीटा यकीनन ऐसा हे था. हम आयुर्वेदिक चिकित्सा के साथ साथ जहर पर भी बरसो से शोध करते आ रहे है. उन्हें जहर से मारा गया था न की सांप ने डंसा था. ऐसा किया तोह लोहान ने हे होगा क्योंकि तुम्हारे पिता उस से अलग हो गए थे जो giroh-sargana कभी नहीं चाहता परन्तु अगर दूसरा पहलु देखा जाए तोह लोहान जैसे मुजरिम के तार रामेश्वर पंडित से भी जुड़े है, जेल में है लोहान और वो भी ख़ास मेहमान की तरह. तोह क्या समझे तुम?", इन बातों में निस्संदेह आधा झूठ और आधा सच था क्योंकि लोहान कभी भी पंडित जी का ख़ास न था और वो हरेक मुजरिम के साथ नरम हे रवैय्या रखते थे. लेकिन ये जालसाज चौकड़ी अब इस व्यक्ति को अपने वश में कर चुकी थी.

"बहनचोद, ये सब चल क्या रहा है? हर मामले में ये रामेश्वर पंडित और उसके बेटे शामिल है लेकिन उनके ऊपर कोई कार्यवाही हे नहीं हुई. हैं कौन ये आदमी?", कुलदीप अपना आप खो चूका था और यहाँ आनंद सिंह के इशारे पर अभिमन्यु ने कुलदीप के सामने 3 तसिवरे रख दी. पंडित जी, नरिंदर और शंकर की.

"ये है वो 3 लोग और क्सक्सक्सक्स शहर में इन पहुंच ऐसी है की तुमने इनके खिलाफ जाने की सोच से वह कदम भी रखे तोह तुम्हारा वजूद हे नहीं रहेगा. पुलिस में रामेश्वर पंडित का स्थान कानून की किताब तुल्य है और ये शंकर समो है वो भी अपने बाप से कही ज्यादा हे रसूख वाला. इस पर तुम जैसे 4-5 लोग भी हथियार के साथ हुम्ला करो तोह किसी के भी हाथ जिस्म पर नहीं रहेंगे और ये कमीज पर दाग भी न लगने देगा अपनी. और ये जनाब जो अपने इस बड़े भाई के जैसे हे दीखते है, ये है नरिंदर शर्मा. क्या करता है? कहा मिलेगा और इसका नेटवर्क क्या है ये किसी को भी खबर नहीं लेकिन ये जितना शांत दीखता है असलियत में अपने बड़े भाई से ज्यादा हे सार्ड और निर्मम हत्यारा है. तुम्हे मालूम है की इतनी सी सूचना जमा करने में हमको एक महीना लगा और 20 लाख खरचने के साथ साथ 5 लोग भी अपनी जान से गए.", आनंद सिंह के कथन से अब कुलदीप के साथ साथ अभिमन्यु और संग्राम भी हैरत में आ चुके थे. मतलब साफ़ था के जिस से दुश्मनी लेने की वो सोच रहे थे उसके तोह करीब जाने से पहले हे दुनिया छोड़नी पड़ेगी.

"फिर हम कर हे क्या सकते है अंकल जी? मैं तोह खुद हे अब अपने परिवार का एकलौता मर्द हु. कहा तोह पिता की मौत का सुन्न कर मैं सोच रहा था इस रामेश्वर और इसके बेटो के सीने में पीतल भर दू और आपकी पूरी बात सुन्न कर लग रहा है के मैं यही मान लू के मैं इन्हे जानता हे नहीं हु.", कुलदीप की बेबसी देख लल्लन सिंह के चेहरे पर मुस्कान तैर गयी.

"ये रामेश्वर पंडित आदमी बहोत बढ़िया है दिल का कुलदीप बीटा. मदद मांगने जाओ इसके पास और वह बताना की तुम्हारे अपराधी जीजा की वजह से बहिन की ज़िन्दगी तोह खराब हुई हे है लेकिन बचो के भी भविष्य पर मुसीबत दिख रही है. वो जरूर मदद करेगा तुम्हारी और एहसान होने के बाद तुम कभी भी उसके aas-pas जा सकोगे. जैसे तुमने कहा था न के अंगूर की कलम लगाने के बाद 3 साल मेहनत की थी और आज ये बगीचा उसका परिणाम है तोह ये खेल भी उतनी हे लगन मांगता है. हम में से कोई उनके करीब नहीं फाटक सकता पर तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है और रामेश्वर इस मामले में उसूल का पक्का आदमी है. और इतनी म्हणत के बदले में मैं तुम्हे अजीत का पूरा हिस्सा देने को तैयार हु. 28 किल्ले जमीन जो हमारी तरफ रोड पे है.", लल्लन सिंह ने अपनी पेशकश रख दी थी कुलदीप के सामने.

"और इतना हे कुछ मैं भी देने को तैयार हो बिटवा. कौशल के लिए तोह इतना कर हे सकता हु.", आनंद सिंह ने जमीन के कागज़ कुलदीप के आगे कर दिए. जवान कुलदीप को अब ये बदला भी तगड़ी कमाई हे दिख रहा था और 50 एकड़ से ज्यादा जमीन मिलना दिवाली की लाटरी से बढ़कर था इसके लिए.

"और अगर मैं उनके नजदीक हो गया तोह उसके बाद क्या करना है अंकल जी?", कागज़ देखने के साथ हे कुलदीप ने एक सरसरी नजर उन दोनों आदमियों पर की जिन्होंने इतना कुछ एक पल में उसके आगे कर दिया था.

"सही मौके पर वैसा हे दर्द देना है रामेश्वर को जैसा उसने और उसके परिवार ने हमे दिया है. बेटे के बदले बीटा या फिर उतना हे ख़ास कोई उनका अपना. चाहे इसमें 2 महीने लगे या फिर 2 साल.", आनंद की बात पर कुलदीप ने सर हिला दिया.

"मुझे चाहिए अर्जुन शर्मा और उसको तड़पा के मैं बदला लूंगा उस रंडी से जिसकी वजह से मैं अब चैन से सोना भी भूल चूका हु. जितना तुम्हे अभी मिल रहा है उतना मैं अकेला हे दूंगा तुम्हे अगर तुम उनके करीब जा सको और वह से अर्जुन के अकेले बहार जाने की सही सूचना दो या फिर रेणुका पूरी को मुझ तक ले आओ. उस औरत को कब्जे में ले कर फिर पूरे रामेश्वर परिवार को घुटने टिकवाये जा सकते है. याचक बन कर जाओ और सेंध लगाओ.", अभिमन्यु ने तोह बिना बड़ो की परवाह किये वो बात कह दी थी जिस पर आनंद और लल्लन सिंह तक को शर्मिंदगी महसूस हुई पर बोल न सके कुछ.

"हु.. तोह वो औरत इतनी ख़ास है.. चलो अंकल जी, अब देखो इस बागवानी करने वाले का दिमाग. बस हो सके तोह उनकी देहलीज पर जाने से पहले वह की जो भी जानकारी आप दे सके उपलब्ध करवा दीजिये. मदद मांगने के लिए जाऊँगा तोह देख भी लूंगा की वह हालात सहने लायक है भी या नहीं. ये कागज़ भी आप हे रखिये क्योंकि कुलदीप पहले जमीन जांचता है और फिर हे कदम रखता है. जान पर बात आयी तोह मैं पीछे हैट जाऊंगा और सही लगा तोह फिर वही हमेशा वाला फिल्मो का काम. एक को पकड़ कर कब्जे में लो, पैसा फेंक कर बदमाश बुलवाओ और जो छुड़ाने आये उसका काम तमाम. रसूख धरा का धरा रह जाता है इस तरह और हम सामने भी नहीं आएंगे. अब घर चलता हु जी और आप लोग हो सके तोह मुझे वो जानकारी जूता कर दीजिये जिस से मुझे मदद मिले.", कुदलीप तुरंत वह से उठ खड़ा हुआ दोनों हाथ जोड़ कर.

"ठीक है बीटा. हम बाकी सदस्यों की भी जितनी मुमकिन होगी उतनी जानकारी तुम्हे देंगे. अगले हफ्ते मिलते है फिर तुमसे.", ये चारो भी अभिवड़ां करके बहार की तरफ बढ़ चले जिसके बाद कुलदीप एक पल भी बगीचे पर न रुका. सड़क किनारे कड़ी अपनी हीरो हौंडा कद-100 स्टार्ट करता वो तुरंत अपने घर की तरफ निकल लिया और कार में बैठे ये चारो अपनी हे चर्चा में लग गए.

"तोह तुम कहते हो की रेणुका वो मछली है जिसको पकड़ ले तोह बाकी सब बेबस हो जाएंगे?", लल्लन ने सवाल अभिमन्यु से किया था जो सिग्रत्ते जला कर कुछ सोच में खोया बस बगीचे को निहार रहा था यहाँ से जाते हुए. कार का स्टीयरिंग संग्राम के हाथ था जो कुलदीप से विपरीत दिशा में निकला चला अपने सेहर की और.

"यकीन है मां मुझे. रेणुका के लिए हे तोह कौशल और अजीत को मारा गया. ये लड़का लालच में आ गया है और इसकी बहिन का घर फिर से बेस या न बेस पर अगर ये रेणुका की रेकी कर गया और वो हाथ चढ़ गई तोह जितनी जमीन हम इसको देने लगे थे उस से इतने कसाई खरीदेंगे की वो छोल का खानदान भी मिटत जाए इस रामेश्वर के साथ साथ. हाँ उस साली को रंडी बना कर रखूँगा अपनी और अर्जुन के गोली मैं उतरुगना सीने में. बस ये चुटिया किसी तरह बहिन की शादी की नौटंकी कर दे उनकी चौखट पर और 3-4 बार उनके वह जाएगा तोह काम बन्न हे जायेगा.", अभिमन्यु की बात कितनी सही थी ये तोह इन बेवकूफ लोगो को अभी तक पता न थी.

"वैसे क्या सचमुच इस चूतिये के बाप को लोहान ने मारा था और वो उनका हे आदमी है?", संग्राम के कहने पर आनंद और लल्लन दोनों हे हंसने लगे.

"चूतिये और गांडू समझदार नहीं होते. बहनो के साथ खिलवाड़ किया था हमने बीटा. अरे, कहानी में कुछ किरदार ऐसे बैठाओ जो सही लगे माहौल के हिसाब से. लोहान तोह दोस्त था इसके बाप का और मौत तोह सांप से हे हुई थी. बस भड़काना था क्योंकि उस अवस्था तक ये लड़का हां और ना में फंसा था. अब ये काम करेगा और उसके बाद हम इसका भी कर देंगे. 5 करोड़ नगद मिलेगा अगर शंकर के साथ उसका बाप भी हम ऊपर पंहुचा दे.", लल्लन ने ये राज खोल कर सबको हैरान कर दिया था और फिर बता भी दिया के इसके पीछे उनके साथ कौन कौन है. वही कुलदीप अपने घर पहुंच चूका था और जाते हे फ़ोन से नंबर मिला दिया.

'नमस्कार अंकल जी हम दीपू. सरिता के भाई."

"जी अंकल जी सब कुशल है और दीदी भी मान गयी है शादी के लिए. आपने बहोत एहसान किया है हम सब पर. वैसे 3 लोग आये थे उस आनंद के साथ. लल्लन सिंह, संग्राम और उन्ही का जीजा दामाद अभिमन्यु.", कुलदीप ने नाम बताने के बाद दूसरी तरफ से आती आवाज सुनी और फिर आगे बोलने लगा.

"जी अभी तोह अंगूर खट्टे है लेकिन अगले हफ्ते ठीक इसी समय पक्क जायेंगे. बगीचा बहोत बड़ा है वैसे और आप किसको भेजोगे?"

"ठीक है अंकल जी और संजीव भाई को ढेरो शुभकामनाये विवाह के लिए. अब रखता हु फिर 10 दिन बाद सरिता दीदी का भी ब्याह है तोह आपसे तभी मिलूंगा.", कुलदीप ने सामने वाले की बात सुन्न कर ख़ुशी से कहा और फ़ोन काट दिया.

"किसका फ़ोन था रे दीपू?", कमरे के अंदर आती इसकी माता जी ने सवाल किया तोह कुलदीप ने ख़ुशी से हे जवाब दिया.

"मैंने फ़ोन लगाया था माँ. दीदी की ब्याह की तैयारी बताने के लिए पंडित जी को. कह रहे थे शगुन में टोकरा भर के अंगूर भिजवा दू लेकिन अब अगले हफ्ते खुद हे आ रहे है."

"बहोत ाचा किया बीटा. पंडित जी जैसा व्यक्ति हर कोई नहीं हो सकता. तेरे पिता का सारा क़र्ज़ माफ़ करवा दिया था उन्होंने और फिर ये बगीचा भी तुझे दिलवाया. सरिता को वह ब्याने की गलती हमारी थी लेकिन देख एक बार फिर उसका घर बसवा रहे है. तू उन जैसा तोह शायद हे बन सके लेकिन हमेहा ऐसे हे खुद्दार और साफ़ तबियत का रहना. इंसान तोह चला जाता है लेकिन उसके करम हमेशा रहते है.", अपने बेटे का माथा चूम कर वो खाना लगाने बहार जाने लगी थी की कुलदीप ने भी कदम उनके साथ हे बढ़ा लिए.

"माँ, तभी तोह तेरा बीटा हु मैं. जो म्हणत और हक़ का नहीं है न तोह वो फिर कारण का खजाना हे क्यों न हो, मैं देखता भी न उसकी तरफ. चल अब टिंण्डी के साथ गरम रोटी खिला दे. फेर सेहर भी जाना है.", माँ भी अपने बेटे को चूल्हे के करीब हे बैठती हुई जुट गई गरम खाना खिलने में. कलयुग का अभिमन्यु तोह जैसे मात खाने के लिए हे पैदा हुआ था और इस बार ये उसका अंतिम हे प्रयास होने वाला था क्योंकि रामेश्वर पंडित अब जिसको भेजने वाले थे वो sard-yumraj था, शंकर से कही ज्यादा दरिंदा लेकिन बाहरी आवरण कही ज्यादा विपरीत और खुशनुमा.

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साल 2003

ये हमेशा निर्जन सा रहने वाला रेगिस्तान आज अशांत था. हमेशा ताप्ती रेहनी वाली इस मरुस्थल की भूमि पर हर तरफ लाशें बिछी थी जिसमे कौन दुश्मन और कौन दोस्त, कुछ साफ़ न था. सांझ के 6 बजने पर भी आसमान उजाले से भरपूर लेकिन मौसम सहने लायक. इस जीवंत शमशान सी भूमि पर सिर्फ 4 हे लोग अपने पांव पर खड़े थे. रक्तरंजित शंकर के साथ वैसी हे हालत में फाटे वस्त्रो के साथ मुस्कुराता हुआ थकान से चूर नरिंदर उर्फ़ इंदरजीत और इन दोनों के सामने 6 फ़ीट 10 इंच का दैत्याकार सा वो कला भूसंद aghori-numa तांत्रिक जिसकी ओट में खली पिस्तौल लिए भयभीत सा अधेड़ मनीराम.

"हम अघोरी है बालक और ऐसे वैसे नहीं श्रेष्ठ कपाल क्रिया वाले सिद्ध तांत्रिक. तुमने हमारी क्रिया भांग करके अपनी मौत को दावत दी है. आज तुम दोनों के शव भी मेरे इन सेवको के साथ यही रेत में दफ़न होंगे.", गर्जना करता हुआ ये शैतान सा व्यक्ति अपनी लाल आँखों से इन दोनों को घूरता हुआ इनकी हे तरफ धीमी गति से बढ़ रहा था.

"ये तोह स्वयं भोलेनाथ है फिर स्वामी जी. मेरा प्रदर्शन तोह देखने वाले ये सब नरकलोक सिधार चुके अब आप खुद आत्मदाह की तैयारी करो अपनों इष्टदेव के हाथो. वैसे भी बकचोदी बहोत हो गयी और ये मनीराम अब मेरे साथ जाएगा.", नरिंदर ने भी कदम आगे बढ़ाये उस दूसरे आदमी को दबोह्चने के लिए लेकिन उसके सामने ये पहाड़ आ रुका. दोनों एक दूसरे को ऐसे घूर रहे थे जैसे 2 सांड सींग लड़ने से पहले. शंकर के जिस्म पर अब वो फटी हुई कमीज नदारद थी जिसको उतार कर वो अपने बहते जख्म साफ़ करता इन्हे हे देख रहा था.

"मनीराम हमारे कवच में सुरक्षित है मुर्ख. उस तक तोह काल भी नहीं पहुंच सकता.. हहहहहह..", और नरिंदर के प्रहार करने से पहले हे तांत्रिक ने उसकी दोनों कलाई पकड़ कर ऐसे उछाल फेंका जैसे वो कोई किशोर बालक हो. रिश्ते जख्मो पर अब रेगिस्तान की रेत लिपट चुकी थी. इन्दर लड़खड़ाता हुआ खड़ा हो कर फिर से इस दानव पर कूड़ा. तांत्रिक की गर्दन दबोचे हुए वो जैसे वृक्ष से लटका सा हुआ था लेकिन उसकी ताक़त को निस्तेज करता वो दानव कही अधिक दबाव से इन्दर की कमर को पकड़ कर जिस्म में दर्द भरने लगा. इन्दर के चेहरे पर उभरता दर्द साफ़ बता रहा था की वो इसकी टक्कर का कही से न था. और परिणाम स्वरुप एक बार फिर उसका जिस्म हवा में उड़ता दूर जा गिरा लेकिन अपने भाई के कदमो में. नरिंदर का जिस्म जवाब दे चूका था जो पिछले एक घंटे में 10 से ज्यादा को मौत के घात उतरने के बाद लगभग निष्किरया हाल में था. एक बार आँखें खोल कर उसने अपने भाई के चेहरे को देखा तोह दर्द में भी वो मुस्कुराने लगा. शंकर के शरीर में होती कंपकंपी, टपकता लहू और उतने हे रक्तिम चेहरे के साथ अब उसकी आँखों में बस तांत्रिक का प्रतिबिम्ब हे था.

"मौत के सामने मुस्कुराने वाला तू पहला दिलेर है बालक. तेरे प्राण लेने का दुःख होगा लेकिन सजा तोह देनी हे है.", तांत्रिक अभी एक कदम हे आगे आया था और उसका वो पहाड़ सा शरीर धम्म से रेत में जा गिरा. धुल इतनी अधिक उडी थी की एक पल के लिए जैसे बवंडर हे आ गया हो. मनीराम भी उस बड़े शरीर से टकरा कर ठीक सामान हालत में garda-mitti भोगता जमीन पर था.

"मेरा इन्दर है वो कमीने.. मेरा सबकुछ है मेरा इन्दर.. अघोर कहता है तू खुदको निशाचर..? काल तोह क्या महाकाल भी मेरे इन्दर के सामने आया तोह उसका भी हाल यही करूँगा. मेरा बचपन लेने वाला वो तू हे था और जीवन भर दर्द देने वाला भी.. आज तुझे मुक्ति देने से पहले अगर तेरे जिस्म के हर हिस्से में वही दर्द न भरा तोह मैं कौशल्या देवी का खून नहीं..", शंकर की आवाज जैसे उस तांत्रिक के दिमाग में पीड़ा पंहुचा रही थी और वो खौफ से देख रहा था अपने से एक फुट छोटे लेकिन सचमुच हे काल सामान इंसान को. बरगद की मोटी दाल से उसके एक पाँव को उठता शंकर दूसरे पर पंजा टिकाये ऐसा शक्ति प्रदर्शन कर रहा था के तांत्रिक के मुँह से गगनभेदी चीख निकलने लगी.

"और जोर से चीख बहनचोद... दरिंदे तूने हे मेरा जीवन खराब किया था न...? और जोर से चीख..", तांत्रिक का पाँव जांग मज्जा के टूटने की आवाज कर चूका था लेकिन शंकर जैसे उसका पंजा मुँह पर लगा कर हे रुकने वाला था. मनीराम ने रेत में गिरा वो लम्बा खंजर उठा कर जैसे हे शंकर की पीठ पर वार करना चाहा उसकी कलाई नरिंदर की हथेली में जा फांसी. कमजोर जरूर हो गया था लेकिन इतना भी नहीं की अपने भाई पर होने वाला वार न रोक सके. इस द्वन्द से मनीराम को दूर करता इन्दर वही खंजर उसकी गर्दन पर टिकाये रेत में बैठ गया.

"देख मनीराम.. जिसके साथ मिल कर तूने हजारो गुनाह किये और जिसको तू अपना भगवन मानता था वो राक्षश मेरे भाई के निचे बिलबिला रहा है.. आह्हः.. मादरचोद.. तुझे शर्म तक न आयी.. आठ.. अपनी बहिन, दोहती और बचो की बलि तक देने लगा.. अह्ह्ह्ह.. तू चल अब मेरे साथ इस भोगी के संहार के बाद.. तेरी रेल मैं बनाऊंगा..", नरिंदर बोलते हुए सामने भी देख रहा था जहा तांत्रिक एक टांग टूटने के बाद जैसे पागल हे हो गया था. बची हुई टांग से उसने भरपूर ठोकर मार कर शंकर को जमीन सुंगा थी. रेंगता हुआ वो शराब की तरफ बढ़ कर गटागट हलक से निचे उतार गया.

"आह्हः.. बहोत दम है तुझमे.. और ..आठ.. तू कौशल्या का खून है न तोह तुझे बता देता हु.. तेरा बाप हे वजह है इस सबकी. उसके साथ तू भी मिटेगा और तेरा वंश भी... आजा.. आ न..", तांत्रिक जैसे तैसे खड़ा हो कर चिल्ला रहा था, एक लात निष्क्रिय होने के बावजूद. और उसको ज्यादा इन्तजार न करना पड़ा जब एक बार फिर शंकर उसके सामने था. इस बार उसके बड़े बड़े पंजो में उंगलिया फंसाये शंकर दिखा रहा था इंसान का वो पागलपन जिसमे सिर्फ और सिर्फ ऊर्जा हे शामिल होती है.

"मेरे पिता के काबिल नहीं हु मैं हरामजादे.. वो राम है, नाम से भी और काम से भी.. उन्हें भगवन हे मानता हु...", तांत्रिक का सारा जोश और नशा उतर गया जब दोनों हाथ मरोड़ कर शंकर ने उसके कंधो से उतार दिए. एक आखिरी वार किया था अब शंकर ने जैसे हे नरिंदर ने वो खंजर अपने भाई की तरफ उछाला.. तक़रीबन 7 फ़ीट का वो चट्टान सा जिस्म रेगिस्तान की धरती पर बिना सर के जा गिरा, लहू का फूहररा बहता हुआ. मनीराम बेहोश हो गया था उस प्रलयंकारी दृश्य से जिसमे खुद यमराज उस तांत्रिक का कटा सर पकडे उसके सामने खड़े थे और तांत्रिक की खुली आँखों में सिर्फ मौत का भये, जो प्रदान की जा चुकी थी.

"इतना जोर न था इसमें शंकर. मैं भी मार देता इसको तोह लेकिन तेरे मुँह से सुन्न न था के तू आज भी मुझसे उतना हे प्यार करता है क्या जितना पहले करता था. बस इसलिए मार खायी thodi..Aaahh.", नरिंदर की आवाज सुन्न कर शंकर ने वो खोपड़ी एक तरफ उछाल दी और वही खड़ा बस मुस्कुराता हुआ अपने भाई को देखने लगा. आँखों में आंसू थे दोनों के लेकिन एक मुस्कान के साथ.

"मैं तोह हार हे चूका था मेरे भाई और शायद मारा भी जाता. तू आया और ये देख कितने यहाँ जमीन पर कटे पड़े है. जब तू मेरे लिए खुद मौत के सामने आ सकता है हर बार तोह क्या मैं एक बार भी ऐसा नहीं कर सकता? ऋचा की जान बचने के साथ साथ आज तूने मुझे उस आदमी से मिलवा दिया जिसने वो जख्म दिया था मुझे जो मैं हर रोज भूलना चाहता हु. तेरे लिए ऐसे 100 भी मार दू तोह काम है इन्दर.. बस दुःख है की लाजो काकी को न बचा सका मैं और अब मधु को क्या जवाब दूंगा.", शंकर उस खंजर को रेत में गाड़ता हुआ अपने भाई के बगल में हे आ बैठा.

"पहले तोह यहाँ से निकलने का सोच यार. कार के तोह छक्के भी रेत में धंसे पड़े है.. आठ.. और इधर आसपास कोई जगह भी नहीं इलाज की.. ऋचा बेहोश है अभी तक और ये हरामी भी.", नरिंदर ने गहरे होते आसमान के साथ उचित बात कही थी और दोनों भाई एक दूसरे का हाथ थामे बैठे हुए डूबते सूरज को देखने लगे.

"कार की डिक्की में डालते है इस हरामी को और फर्स्ट अिध होगा वह किट में. दारु मिल जाए तोह कार निकाल दूंगा फिर.", शंकर का शरीर काँप रहा था और वैसा हे हाल नरिंदर का था.

"दारु की तोह पति पड़ी है लेकिन खाने में बस अंगूर हे होंगे जो रास्ते में लिए थे मैंने और वही से मुझे खबर लगी की तेरी कार इस तरफ आयी है ऋचा के पीछे."

"चल फेर अंगूर के साथ हे नेट लगते है. आज एस्टीम से तेरी बेंज खिंच के दिखता हु.. माँ चुड़ गयी यार मेरी तोह आह्हः.. तू सचमुच मार सकता था क्या इस हरामी को? ऐसे दुलत्ती मारी है न सीने के साथ पीठ तक बुरा हाल हो रहा.", शंकर ने खड़े होने के साथ हे सिसकारी भरी. नरिंदर हँसता हुआ मनीराम की टांग खींचता उसको ृगदाता हुआ हे लिए चल दिया 500 से जायदा कदम दूर कड़ी उस काली कार की तरफ.

"गोटे मुँह में आ गए थे बे मेरे तोह जब उसने फेंक के मारा था. लेकिन इतना पता था के वो मुझे मारेगा तोह तू तू नहीं रहेगा. वैसे दूसरा रास्ता भी था लेकिन मैं उसकी पीठ पे वार नहीं करना चाहता था. ाचा लड़ लेता है तू आज भी हैं? सोमबीर ताऊजी को तूने ऐसे हे जांघ पे पाँव रख के फाड़ दिया था.", नरिंदर की बात सुन्न कर शंकर भी हंसने लगा. दोनों हंसाया और एक दूसरे पर जान देने वाले भाई जो थे.

"बूढ़ा हो रहा है मैं और नाना भी बन चूका हु. तू आज तक वो कॉलेज में हे फंसा हुआ है. बहनचोद, गस कस्ट्रक्शन के मालिक के पास दारु के साथ सिर्फ अंगूर हे है खाने में.. लानत है तेरे पे और दुगनी लानत उस गज्जू पे.", शंकर कार के अंदर बैठा तोह पिछली सीट पर मासूम सी ऋचा बेहोश पड़ी थी जिसके सर पे हाथ फेरने के बाद कार के डैशबोर्ड पे देखा तोह हर्रे लिफाफे में अंगूर भरे थे. वही एक तस्वीर चिपकी थी जिसमे उमेद के दोनों तरफ शंकर और इन्दर थे.

'वाह बहनचोद पूरी फीलिंग ली जा रही है. तेरे से भी जल्द हे मिलता हु बे गज्जू हठी..', शकर अंगूर चबाता हुआ खुदसे बातें कर रहा था और नरिंदर डिक्की में मनीराम को बंद करके स्टीयरिंग वाली तरफ आ बैठा.

"पानी, दारु और सिग्रत्ते हे अपने पास तोह.", नरिंदर की बात पर शंकर ने हलके से उकसे सर पे चपत लगाईं.

"तुम रहोगे बैलगाड़ी वाले चूतिये. सीट बदल पहले और फिर तुझे मैं बताता हु ये कार आल व्हील ड्राइव कैसे है.", शंकर अंदर से नरिंदर वाली सीट पर चढ़ा और वो वो उतर के दूसरी तरफ से बगल में आ बैठा.

"भूल गया था ये तोह. वैसे अब क्या करना है? पहले यहाँ से निकले या दारु? और बीटा कॉलेज से घर आया हुआ है तोह उसको साथ हे लेके जाना भाई जब ऋचा को छोड़ने जाए. समझने में आसानी होगी और ये मनीराम ज़िंदा रहना चाहिए जब तू लता से बात करे."

"सिग्रत्ते सुलगा भाई शीशे उतार कर.", शकर ने अंगूर मुँह में डालते हुए गाने का बटन दबाया और गाडी स्टार्ट करते हे कुशलता से स्टीयरिंग मदद कर रेत उड़ाते हुए वो रास्ता पकड़ा जिधर से सड़क करीब थी. अंगूर के दानो के साथ उस तस्वीर को निहारने भर से शंकर का शरीर स्फूर्ति पा गया था.

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19 मई, 1998

"तोह हम अभी जा किधर रहे है?", अर्जुन कार की जगह अपनी रानी पर सवार विन्नी दीदी के साथ बड़ी मार्किट की और चल दिया. हाथ में लहंगे वाला बैग लिए विन्नी भी दूसरा हाथ उसकी कमर में लपेटे ऐसे बैठी थी जैसे वही उसकी नवब्याहता हो.

"दीदी, हम मार्किट हे चल रहे है क्योंकि आपने ध्यान दिया हो तोह ऋतू दीदी भी तारा और अलीशा आंटी के साथ उधर हे गयी है. बाकी मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हु.", अर्जुन ने अपना बया हाथ विन्नी के हाथ के ऊपर रखते हुए मोटरसाइकिल की रफ़्तार कुछ धीमी करते हुए एहसास दिलवाया की वो दिल से उन्हें पसंद करता है और परवाह भी. विन्नी के प्यारे चेहरे पर परिचित मुस्कान आ गयी जैसा अकेले में वो अर्जुन के होने पर ख़ुशी जाहिर करती थी.

"हाँ तोह तुम पूछो न. और ये भी सही है की हमे वो देखे तोह यकीन रहे की हम घर से काम पर हे निकले है.", विन्नी के नरम उभर एक तरफ से अर्जुन की पीठ पर ाचे से दबे थे.

"बात सिर्फ दिखने की नहीं है विन्नी दीदी. ऐसा है की मैं आपके साथ वैसा हे टाइम बिताना चाहता हु जैसा आप लेकिन क्या ये माहौल हमको इजाजत देता है? आप समझ रही है न मेरा मतलब? शालिनी बुआ भी है इधर और अगर कुछ भी ऊपर निचे हुआ तोह काम खराब हो जाएगा ऐसे माहौल में.", अर्जुन चुदाई का न कह कर बस इशारा कर रहा था जिस पर विन्नी भी अब सोचने लगी थी. अर्जुन के साथ यही तोह समय था जिसमे वो एकाकार हो सकती थी लेकिन अभी वो ऐसा क्यों कह रहा है.

"मतलब?"

"दीदी, आप जानती हैं न मैं वह से एब्नार्मल हु? सच कहु तोह मैं आपसे नहीं छुपाऊंगा लेकिन एक गर्लफ्रेंड है मेरी जिस से आपको मैं जल्द हे मिलवा दूंगा. आपकी हे आगे की है वो और जब हम दोनों साथ थे अकेले में तोह उसके बाद वो 2 दिन तक सबसे दूर हे रही. मतलब आप समझ रही है न? मैं नहीं चाहता की शादी के समय आप पर बात आये या आप पाँव में मोच का बहाना करो. जब ये सब हो जाएगा तोह हम आराम से वही मेरे कमरे में रात को सो सकते है.", अर्जुन ने सीधे न सही लेकिन सही शब्दों में बता दिया था के विन्नी की हालत जरूर खराब हो जाएगी. और विन्नी ने भी उसके मूसल को ाचे से महसूस किया था और उसका नतीजा वो जानती थी.

"हाँ तुम ठीक कह रहे हो अर्जुन. लेकिन क्या मैं तुम्हारे साथ..?

"रात को आप मेरे पास आराम से सो सकती हो दीदी. मैं मन थोड़ी न कर रहा हु और प्यार के बदले उतना हे प्यार करूँगा. ये देखो इधर इलो के करीब हे पापा की एस्टीम भी कड़ी है.", मार्किट में आते हे जब वो मोटरसाइकिल अंदर ले आया तोह नजर वही गयी जहा उसके घर के 2-2 कार कड़ी थी.

"एक बात बताओ जरा मुझे तुम. क्या तुम्हे भी लगता है की शालिनी बुआ कुछ अलग है?", विन्नी ने अर्जुन को अभी वही रोक लिया था और उनके परिवार के सदस्य आसपास नहीं दिख रहे थे.

"हाँ आपकी बात सही है लेकिन मुझे लगता है की वो ऐसा करके बाकी सबको बचा रही है. चलो आपको मैं एक और बात बता देता हु जिस से आप ये तोह नहीं समझेंगी की मैं आपसे काम प्यार करता हु.", अर्जुन अब उन्हें ले कर विपरीत दिशा में पैदल चल पड़ा. उसको इस तरफ भी एक दूकान पता थी जहा लहंगे का काम हो सकता था.

"बताओ. मुझे तोह लगता है की बुआ शायद हमारे साथ कम्फर्टेबले नहीं है और ये भी हो सकता है की वो अलग सोच रखती हो. दिल की बुरी नहीं है शालिनी बुआ और अब तोह पहले से ज्यादा घुलने मिलने लगी है.", विन्नी ने मार्किट में चहल पहल से ध्यान हटा कर साथ चलते अर्जुन की तरफ देखते हुए कहा. उसने पाया था की बहोत सी नजरे अर्जुन को हे ताड़ रही है और ऐसा होना स्वाभाविक हे था.

"वो बिलकुल सही है क्योंकि वो हमेशा पहले परिवार के बारे में सोचती है दीदी. लेकिन मुझे लगता है की उनकी शादी गलत घर में हो गयी है. फूफा जी हो सकता है उनका उचित ध्यान रखते हो और परवाह भी करते हो लेकिन कुछ तोह गलत है उनकी तरफ. जानती हो आज उनके साथ ट्रैन में एक पोलिसवाले देहाती के रूप में आया था.", अर्जुन ने ये धमाका किया तोह विन्नी हैरान हे रह गयी.

"ज्यादा मैट सोचो दीदी. बस बुआ से मैं पता कर हे लूंगा की वो ट्रैन से क्यों आयी जब उनके पास इतना सबकुछ है. और वो ट्रैन से आयी तोह फिर कोई उनके पीछे कैसे आया? मतलब उनके घर से हे कोई है जो ये सब करवा रहा है और वो जान न चाहते है की बुआ के aas-pas कौन है.", अर्जुन अब मार्किट में उस तरफ चला आया था जहाँ सही दुकाने थी महिलाओं के कपड़ो की और वह ज्यादा भीड़ भी न थी.

"तुम इतना सूरे कैसे हो?"

"क्योंकि वो पोलिसवाले अब उमेद चाचा की पकड़ में है, मेरे कहने पर. लेकिन पता उसको भी नहीं कुछ जहा तक मैं जानता हु. प्यादे हे काम पर लगाए जाते है दीदी हर शतरंज की बड़ी बिसात पर. आप बस हो सके तोह बुआ के साथ हे रहना और देखना की अगर कल के फंक्शन और परसो शादी में कोई उनके करीब दिखे तोह. मुझे लगता है के सबकुछ ठीक नहीं है.", अर्जुन ने इस दूकान के अंदर आने से पहले बात ख़तम की और सामने बैठे व्यक्ति को नमस्ते करते हुए आने का प्रयोजन बताया. ये कौशल्या जी को चची बुलाते थे और वो इन्हे मोनू. अर्जुन का पूरा सत्कार हुआ था यहाँ और मिनट से पहले हे एक मास्टरजी लहंगे का उचित माप ले कर उसको ठीक करने अंदर चले गए.

"मैं यही पर हु अंकल जी, आता हुआ 15-20 मिनट में.", अर्जुन ने ऐसा कह कर बहार का रुख किया लेकिन ठीक सामने वो हसीं महकती हुई ग्रीक महिला ऋतू और तारा के साथ दिखी. एक पल को तोह उसका वो गुलाब सा महकता यौवन अर्जुन को वशीभूत कर गया पर वह ऋतू भी थी जिसके सामने हर गुलाब फीका था.

"अलीशा आंटी, ये अर्जुन है और ये विन्नी दीदी. आप शायद मिली नहीं और अर्जुन अगर तुमने यहाँ लेहंगा दिया है तोह वो मैं कलेक्ट कर लुंगी. तुम वह अपने दोस्त की दूकान पर पापा के पास चले जाओ. विन्नी दीदी, बुआ के लिए निघटवेअर ले लेना वह से और अगर आपको भी कुछ चाहिए हो तोह वो भी. यहाँ से मैं आपके कपडे ले लुंगी.", ऋतू के तेवर के सामने अलीशा कुछ कह हे न सकीय सिवाए अर्जुन को एक भरपूर निगाह देखने के.

'ठरकी साली.' ऋतू ने अर्जुन और विन्नी को जाते देखने के बाद जब अलीशा की नजर का पीछा किया तोह मुस्कुराते हुए बस यही कहा.

"थिस अर्जुन इस ट्रूली हैंडसम एंड चार्मिंग ऋतू."

"ी क्नोव तहत आंटी बूत हे इस आउट ऑफ़ योर लीग. यू अरे वे ब्यूटीफुल एंड एलिगेंट. Let's फोकस ों योर शॉपिंग", ऋतू ने इरादतन ध्यान हटवाना चाहा लेकिन तारा को देख कर वो भी अलीशा को देखने लगी.

"ग्रपेस अरे नॉट सावर एनफ डार्लिंग. सोमेतिमेस वे जस्ट ओवर प्रोटेक्टिव बूत ी क्नोव व्हेन तो हार्वेस्ट थे बेस्ट.", मतलब साफ़ था के अलीशा को अब अर्जुन चाहिए था. अंगूर देख चुकी थी की वो पक्क चुके है.
 
दोस्तों, सही बात है की अपडेट देने की रफ़्तार कही ज्यादा हे धीमी हो गयी है. और इसका कारण भी मैं थोड़ा बहोत बता चूका हु. लेकिन सबकुछ सेटल करने में समय बहोत लग रहा है और ज्यादा मैं कुछ बता भी नहीं सकता.

ऑफिस शिफ्टिंग

आर्ट कॉन्ट्रैक्ट्स

क्लाइंट मीटिंग्स

घर और जिम्मेवारी

यही अभी ज्यादा समय ले रहे है लेकिन आइंदा संतुलन बना के रखूँगा. एक बार फिर से वही ट्यूसडे थर्सडे एंड सैटरडे का सिस्टम रहेगा जिसमे अपडेट की लम्बाई के साथ घटनाक्रम से कोई समझौता नई होने दूंगा.

बस 1-2 दिन की और बात है क्योंकि ऑफिस फिर से set-up किया है तोह छोटी मोती दिक्कत आ रही.

आर्ट कॉन्ट्रैक्ट मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है क्योंकि मुख्या आये का जरिया वही है परन्तु कहानी नजरअंदाज नहीं करूँगा.

सिस्टम से संडे का दिन सिर्फ परिवार के लिए है लेकिन आप सभी से यहाँ कमैंट्स में बात जारी रहेगी.

आशा है आप सभी समर्थन करेंगे.
 
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