अपडेट 183
जीवन के पहलु
सुबह उठने से पहले हे उनींदे से बिजेन्दर ने अपनी भोली भली खूबसूरत बीवी के जिस्म को फिर से अपने निचे ले लिया था. हर गुजरते दिन के साथ इन दोनों के बीच अब बेहतर तालमेल और परिपक्वता आने लगी थी. नादान सी अनुपमा को भी अब एकांत पालो में बिजेन्दर द्वारा भरपूर प्यार करना ाचा लगने लगा था और इस दौरान वो खुद भी उसका साथ देती. दांपत्य के इन्ही अंतरंग पालो ने जैसे अनुपमा की चमक में इजाफा किया था वही बिजेन्दर भी शारीरिक तौर पर कही ज्यादा स्फूर्ति और ताजगी महसूस करता था.
अभी 20-25 मिनट के ऐसे हे prem-milan ने एक बार फिर पूरा बिस्टेर itar-bitar करके रख छोड़ा था. अपने पति के पुरुषार्थ से लबालब योनि को कपडे से साफ़ करती अनुपमा बिस्टेर से उठने लगी तोह बिजेन्दर ने एक बार फिर उसको पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया. अनुपमा के होंठो पर गहरा चुम्बन करके वो बस उसके प्यारे चेहरे को निहार हे रहा था और वही अनुपमा की शर्मीली मुस्कान बहोत कुछ बता रही थी.
"तू बहोत मीठी है रे मेरी जान. दिल न भरता तेरे से और हर रोज उठते के साथ सोचु हु के तावली हे सांझ हो जे."
"बस करो जी ेब. माँ केहवे थे की मर्द न अपनी ऊँगली पे रखे कर नहीं तोह वो अपने खूंटे पे बिठाये रखेगा. इसका के मतबल हो जी?", सचमुच अनुपमा बहोत भोली हे थी और बिजेन्दर उसकी चोली सही करने के बाद बालो को भी संवार कर उसके बराबर हे बैठ गया.
"माँ ने बोल दियो के मेरा खसम मैंने समझे है और मैं उसने. अनुपमा यु जो पति पत्नी का रिश्ता है न इसमें कोई एक दूसरे से कमतर कोन्या होता. तन्ने साइकिल देखि है न?", बिजेन्दर ने जैसे समझने की कोशिश शुरू की और अनुपमा ने अपनी बड़ी बड़ी पलके झपकते हुए हामी भरी.
"बस वैसा हे रिश्ता है यु मिया बीवी वाला. एक पहिये से साइकिल न चलती और हवा भी दोनों में बराबर होव तोह व बराबर चले है. मैं तेरे बिना अधूरा और तू मेरे बिना. माँ तेरे से हंसी मखौल करे थी मेरी चंदा. तू भी उनसे बतलाये कर तभी दिन दुनिया का बेरा चालेगा. ेब एक मेथी (किश) दे और फेर तैयार हो जा. आज शहर वाले घर में चलना है तन्ने मेरे और माँ के साथ. गोदरेज में एक प्लास्टिक का बैग से उसमे तेरी खातिर साड़ी लिया था व है. पहन के दिखाए और बाकी तुम (गहने) भी मैंने माँ टी दिए थे तेरे खातिर. बेरा चालना चाहिए के मरस अनुपमा बिजेन्दर सिंह पधारी है वह.", बिजेन्दर की बातें और कपडे गहनों वाले खुलासे से अनुपमा किसी बची से खुश होने लगी थी. उसने खुद हे जल्दी से उसके होंठो पर होंठ टिकाये और फिर उठ कड़ी हुई. लेकिन दवाजा खोलने से पहले एक बार मुड़ी और फिल्मी अंदाज में हवाई चुम्बन अपने पति को देते हुए बोली.
"थैंक यू है जी आपका. ऋचा सही कहे थी की आप न सबसे ज्यादा ाचे हो.", और बिना बिजेन्दर का जवाब सुने दरवाजा खोलती बहार निकल गयी. अभी भी उसके जैसे सर ढकने की आदत नहीं पड़ी थी और न हे चंद्रो देवी अनुपमा को ऐसा कुछ करने देती थी. उल्टा उन्होंने हे तोह उसको एक बेटी की तरह आजाद रहने को कहा था इस हवेली के दरमियान.
'हाहाहा.. या भी न जमा भोली है. सच केहवे थी बेबे के प्यार तोह दोनों तरफ से हे महसूस होव है. चाल बीटा बिजेन्दर आज फेर दंड बिस्टेर पर हे पेल लिए तोह कसरत और न करके तैयार हे होया जाए.', बिजेन्दर ने एक तरफ रखा अपना ढीला सा कुरता पहना और धोती सही करके वो भी उठ खड़ा हुआ. वही बहार अनुपमा का सामना अपनी सास सुशीला से हो चूका था जो हारे पर ढूढ़ रखने के बाद आँगन में हे चूल्हे की तरफ जा रही थी.
"ऐ तिनगरी (लड़की), आड़े तोह आ.", अनुपमा काख में टोलिया दबाये थी और अपनी सास को औपचारिक राम राम करने के लिए हाथ जोड़े तोह टोलिया निचे जा गिरा. उसको उठती हुई वो झुकी तोह चोली के बीच की खाई थूक से गीली हो कर चमकती साफ़ नजर आयी सुशीला को.
"जी माँ जी. वो बस नहान हे चली थी. इन्होने कहा के मैं नयी साड़ी पह्नु और तैयार हो जाऊ. आपके साथ हम सेहर जा रहे है न आज?", सुशीला ने अपने माथे पर हाथ हे रख लिया और इस बीच गुड्डी भी मुस्कुराती हुई चूल्हे के पास से उठ कड़ी हुई.
"एक सांस में पूरी कहानी गए दी लेकिन यु न बेरा के वह जाना क्यों है? अँगियां बांधनी कोणी आवे और तू साड़ी किस तरिया बंधेगी? आते आ..", सुशीला ने खुद हे टोलिया उसके हाथ से लेते हुए सीने का गिलपनस साफ़ करते हुए उसका सर सहलाया.
"बैठ थोड़ी देर और चा पे ले. बहोत टेम बाकी है अभी. गुड्डी तू हे थोड़ा समझाया कर इसने. समझदार तोह होने लगी है लेकिन शायद कमरे और आँगन में भेद न पता.", सुशीला ने अनुपमा को वही बिछी खाट पर बैठाया और चूल्हे से चाय का पतीला उतार कर जग में छान ने लगी. मधुलता भी नहाने के बाद उजले रंग की ओढ़नी और kameej-ghaghra पहने इधर आ चुकी थी. अपने जेठानियों से ram-ram करके हौदी के पास धुले कप और ट्रे सुशीला के पास रखती हुई वो भी उधर हे बैठ गयी.
"9 बजे निकलना है मुन्नी. शगन का सामान 2 बार जांच लिए गाडी में रखने से पहले. माँ (चंद्रो) का तोह बेरा हे है तन्ने. आड़े तोह पूछेगी न लेकिन वह जा के रुकेगी भी कोणी सुनाएं से जो कुछ भूल हो गयी तोह.", सुशीला ने 6 कप चाय के भरते हुए बताया जिस पर मुन्नी ने बस सर हिला दिया.
"तू ेब तक नहाने न गयी बिटिया?", यहाँ मधुलता ने सवाल अनुपमा से किया तोह जवाब भी सुशीला ने हे दिया.
"इसने कौनसा फसल काटनी है. खेलन कूदन दे इसने भी थोड़ा नहीं तोह बाद में यही bhains-chulha ार हवेली के काम हे करती बूढी होवेगी. ले लाडो और खली चा न पीनी. ये घी के बिस्कुट साथ हे खा, तभी शरीर बढ़ेगा.", सुशीला ने एक प्लेट में 4-5 बड़े अकार के वो बिसुईट रखे जो अक्सर दूध घी से बनवाये जाते थे shehar-kasbo से. अनुपमा भी वैसे हे वो कप प्लेट लिए चारपाई पर बैठ गयी. इत्मीनान से चाय में बिस्कुट डुबो कर खाती अनुपमा को इनके साथ साथ बिजेन्दर और दूसरी तरफ से बहार निकलती चंद्रो देवी भी देख रही थी. उनके चेहरे मुस्कुरा रहे थे ये सब देख.
"नजर न लगे इस प्यारी बची को.", आज मधुलता ने चूल्हे के पास से कहलिख ले कर अनुपमा के कान के पीछे लगाई थी और चाय ले कर वो अपनी सास की तरफ चल दी. सुशीला को भी ये देख कर ाचा हे लगा था के उसकी देवरानी मुन्नी काम से काम बचो के साथ और इस परिवार में तोह सही व्यवहार करती थी. बाकी करतूत से उसको फ़िलहाल कोई मतलब न था. ये लोग भी उत्साहित थे आज पंडित जी के घर संजीव की हल्दी और गीत में शामिल होने के लिए. भोर हो चुकी थी और उजाला हर तरफ फ़ैल कर jameen-kudrat को फिर से सींचने लगा था अपनी रौशनी से.
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अभी रेखा अपने कमरे में अकेली हे थी और नहाने के बाद pooja-path करके वो उत्सव अनुसार एक नयी साड़ी से शरीर को सुसज्जित हे कर रही थी की अपने सपाट मखमली पेट पर इन मजबूत हाथो के स्पर्श से कुछ पल सन्न हे रह गयी. वो इस परिचित स्पर्श से उबारती उस से पहले हे एक हाथ से गर्दन को ढके केश परे करके उन होंठो ने वह गहरा चुम्बन जड़ दिया. पूरी काया उस तगड़े मजबूत जिस्म से सटी थी जो कोई और नहीं उनके पति डॉ शंकर शर्मा हे थे.
"उफ़.. आपने डरा हे दिया.", रेखा कुछ असहज हो रही थी क्योंकि इस कमरे में और भी कोई आ सकता था जैसे राजेश्वरी जी या उनकी कोई ननद भी. लेकिन शंकर जी तोह ठहरे बेफिक्रे और अपनी हे धुन में रहने वाले.
"आज आसमानी साड़ी पहनो न रेखा, वही जो गुलाटी के फंक्शन में पहनी थी. सबसे अलग और बेहतरीन दिखती हो तुम उसमे.", एक कठोर उभर को हलके से मसलने के साथ हे किसी के कदमो के आहात पे वो तुरंत हे अलग हो गए लेकिन रेखा का पल्लू उनके कंधे पर हे टिका रह गया जो वो लेने हे लगी थी जब उनके पति ने उन्हें पीछे से जकड़ा था. ओह्ह्ह ओह्ह्ह्ह की आवाज करती ये शैतान उनकी लाड़ली बेटी ऋतू हे थी जो हाथ में कपडे का थैला लिए अपनी माँ से मिलने आयी थी.
"तोह आप लोगो को ये भी बताना पड़ेगा की फ़िलहाल कोई जगह प्राइवेट नहीं है? वैसे ाचे लग रहे हो पापा इस वाइट फॉर्मल में, हमेशा की तरह. लेकिन लाल पल्लू कंधे पे लेने की जगह गुलाबी चुनरी लेते है और वो भी शादी में.", ऋतू ने तोह दोनों को हे लाजवाब कर दिया था अपनी मस्ती से. टेबल पर थाइलर रखती वो अपने पिता के सीने से आ लगी जब शंकर जी सहज हो कर थोड़ा दूर हुए. अपनी बेटी को हृदय से लगा कर उन्होंने भी हँसते हुए उसका माथा चूम लिया.
"तू थोड़ा बड़ी हो जा और इतनी भी नहीं की मेरी माँ हे बन्न जाये. वो तोह मैं तेरी माँ को ये कहने आया था के आज नाश्ता यही मेरे लिए बना दे. असगर के हाथो से पेट हे भरता है, मैं नहीं. थोड़ी देर के लिए हॉस्पिटल जाना है रेखा मुझे, लेकिन 10 बजे तक लौट आऊंगा. और तुम्हारे मुन्ना लाल कही दिखाई नहीं दे रहे डॉक्टर साहिबा.?", रेखा जी भी अब कुछ सही हो चुकी थी अपने सांसें संभल कर और अपने पति द्वारा बताई साड़ी लिए वो स्टोर रूम में चली गई.
"हाँ.. ये डॉक्टर्स और इनकी इमरजेंसी लाइफ. वैसे ाची बात है पापा की लोग आप पे इतना विश्वास रखते है और आप भी अपने काम को सिर्फ प्रोफेशन हे नहीं समझते. बस आपके आसपास भी बन्न सकीय तोह मुझे फकर होगा की .."
"शठ.. तुम डॉ शंकर की बेटी की जगह अपने नाम से जानी जाओगी और मैं डॉ ऋतू के पिता के. ये कोई पेशा नहीं है ऋतू और तुम बहोत ाचे से समझती हो इस बात को. कमिटमेंट है और हम कभी इसको नजर अंदाज नहीं कर सकते. बात तोह किसी की ज़िन्दगी की है और वो अगर आप पर निर्भर है तोह बाकी सभी काम थोड़ा लेट किये जा सकते है. वैसे तुमने बताया नहीं के ये अर्जुन कहा है? इधर इतने मेहमान और रिश्तेदार आये हुए है लेकिन mehman-nawaji वाला हे गायब."
"उसको मैंने हे काम पे लगाया है अभी पापा. सभी गेस्ट्स को उनके रुकने की जगह चाय देने गया है और अगर किसी को कोई सामान चाहिए हो तोह वो भी. धोबी भैया को बोल दिया है के आज गुस्तस के हे कपडे ले नहीं तोह खैर नहीं उनकी. वैसे मुझे भी मार्किट जाना था लेकिन आप तोह इतनी जल्दी जा रहे है.", ऋतू अब अपने पिता की बगल में हे बैठ कर उनका हाथ पकडे अपनी स्थिति बताने लगी.
"अब भी मार्किट से कुछ लेना रह गया क्या? तारा को ले जाओ या फिर हम शाम को चलेंगे. तुमने भी तोह आज मेहंदी लगवानी होगी?", शंकर जी मजे ले रहे थे अपनी लाड़ली के इस द्विअर्थी सम्बोधन से. जैसे वो मेहंदी का जीकर करके कुछ कहना छह रहे हो. कमरे में उनकी बड़ी बेटी भी आ चुकी थी, नाश्ते की प्लेट लिए जो टेबल पर रखने के साथ वही बैठ गयी.
"तभी तोह थोड़ा जल्दी जाना था मुझे. बाद में मेहंदी लग जाने पर तोह कोई काम होने नहीं वाला. और आप न जब कोमल दीदी को बोल हे आये थे नाश्ते के लिए तोह मम्मी के सामने क्यों बहाना बना रहे थे?", ये फंसे मर शंकर शर्मा.
"हैं.. भूल गया था की मैंने मेरी बड़ी गुड़िया को बोल दिया है. एक यही तोह है जो मेरा इतना ख़याल रखती है बाकी दूसरे वाली तोह पता नहीं इस जनम में एक चाय भी पिलाएगी या नहीं.", शंकर जी उठ कर नाश्ते की टेबल पर आ बैठे. कोमल भी मुस्कुरा रही थी और रेखा जी के बहार आते हे वो उन्हें लिए रसोई की तरफ चली गयी. शंकर जी मुस्कुरा रहे थे अपनी बीवी को उस परिधान में देख कर.
"Hello, आप बात बदल रहे है पापा. सीधा बोल दो न के आपके पास मेरे लिए टाइम हे नहीं है.?", ऋतू नखरे से उठ कर जाने लगी लेकिन फिर वही उनके सामने कुर्सी पर आ बैठी.
"और मुझे नहीं पता की आप फ्री होंगे या बिजी. 10 बजे आप मेरे साथ मार्किट चलने वाले है. कह दिया तोह कह दिया. हांजी.", दोनों हाथ टेबल पर पटकती हुई ऋतू ने ज़िद्द दिखा हे दी थी और उसके चेहरे को देख शंकर जी ने मज़बूरी से सर हाँ में हिला दिया. दोनों हाथ जोड़ कर.
"मेरी माँ मैं 9:55 पे तेरे गेट के बहार मिलूंगा और चल पड़ना जहा चलना हो. अब 2 निवाले खा लू अगर इजाजत हो तोह?"
"हाँ खा लीजिये, मैंने कौनसा हाथ पकड़ा हुआ है आपका. लेकिन जाने से पहले 5 हजार दे जाना, मेरे लिए नहीं कोमल दीदी के लिए.", कोमल अभी पराठा ले कर दाखिल हे हुई थी की अपना नाम सुन्न कर ऋतू को घूरने लगी. शंकर जी ने बिना कुछ कहे अपने बटुआ ऋतू को थमा दिया जिसमे से जाने कितने नोट उसने निकले और लगभग खली बटुआ टेबल पर रख कर बहार भाग गयी.
"पापा, मुझे क्यों चाहिए होंगे? और आपने भी उसको दे दिए बिना सवाल किये.", कोमल ने गरम पराठा उनकी प्लेट में रखते हुए शिकायती लहज़े में पुछा.
"बीटा, तुम भी उसको ाचे से जानती हो. उसके पास भी पैसे थे जैसे तुम्हारे पास हैं. लेकिन वो शायद मेरी तरफ से कुछ करना चाहती है इसलिए उसने ऐसा किया होगा. वैसे जब तुम शादी करके इस घर से चली जाओगी तोह तुम्हारी समझदारी के साथ साथ तुम्हारे हाथो के खाने को बहोत मिस करूँगा. मेरी बेटी सचमुच सबसे ाचा खाना बनती है."
"ये बात तोह आपने थोड़े दिन पहले दादी के लिए भी कही थी और फिर माधुरी दीदी के लिए भी. आप आजकल सबको मस्का लगाने लगे हो पापा. और मैं कही नहीं जा रही शादी करके. यही रहूंगी जबतक आप परेशां नहीं हो जाते..", कोमल भी अपने पिता से बातें करके ाचा महसूस कर रही थी.
"हाँ मेरी छाती पर हे मूंग डालो तुम दोनों. लेकिन एक बाप जितना मर्जी अपनी बेटी को अपने पास रखना चाहे, वो रख नहीं पता.", शंकर जी का हाथ अचानक रुक हे गया था और कोमल समझ चुकी थी की उसके पिता ने जो आखिरी बात कही है वो दिल से कही है जिसमे उन्हें अपनी बेटियों की कितनी परवाह है साफ़ जाहिर होती है.
"आपके लिए मैं लस्सी लेके आती हु, चाय ठंडी हो गयी और ये सेहत के लिए ठीक भी नहीं है. पराठा ठंडा हो रहा है.", कोमल ने माहौल को सही करते हुए कप उठाया और बहार चली गयी. बहार सभी लोगो के तैयार होने, सामान ढूंढ़ने और एक दूसरे से बतियाने की आवाजे बता रही थी की सभी जल्दी में है और सबको चाव है आज होने वाले कार्यक्रम का.
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घर की बैठक में लगभग आधा दर्जन युवक पंडित जी के सम्मुख बैठे थे और सभी के चेहरे पर बड़ा गर्व था इन्हे साक्षात् मिलने पर. संजीव ने उनका परिचय अपने दादा जी करवाया था जो उसकी ट्रेनिंग के समय दोस्त बने थे और आज ाचे पद पर कार्यरत थे. सभी अपने व्यस्त जीवन से अवकाश ले कर सिर्फ इस विवाह में शामिल होने dur-daraaj से आये थे.
"सर, ट्रेनिंग के टाइम भी कभी ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा होगा जब आपका उदहारण न दिया गया हो. मैंने आपके बहोत से केस स्टडी किये है पर्सनली नॉलेज इम्प्रूव करने के लिए और आपके काम करने का जो तरीका था वो आज भी एक उदाहरण है. मेरा पसंदीदा केस वो जज मालिक वाला रहा है. कितना डेंजरस साइट रहा होगा न आपके लिए? 5 हत्याएं और कातिलों ने उसके बाद 3 अधिकारी जो जांच कर रहे थे उन्हें भी मार दिया था. आप तोह उस वक़्त sub-inspector थे लेकिन फिर भी वो केस सप रैंक से आपके पास आया. और आपने न सिर्फ सोल्वे किया था बल्कि उसको जिस तरह से खोल कर सामने उजागर किया था वो यकीनन सनसनीखे था.", ये एक लकी के सामान ओहदे वाला अधिकारी था जो 27-28 बरस का थोड़ा सा गंभीर दिखने वाला लेकिन जोशीला इंसान था.
"रूपक बीटा, वैसे तोह मैं कहना चौंगा की वो सिर्फ एक ड्यूटी थी और कभी कभी मामले कुछ मुश्किल हो हे जाते है. लेकिन ये जान कर भी ाचा लगा के आजकल के युवक पुराने तरीके भी स्टडी करते है, दिलचस्पी के साथ. जो अफसर शहीद हुए वो काबिल भी थे और परिपक्व भी लेकिन कही न कही सिस्टम में हे दीमक लग जाती है जो बड़े ओहदे पर ज्यादा असर करती है. मेरे मामले में यही छोटा ओहदा हे मेरे पक्ष में काम कर गया. उन्हें भी लगा होगा की बस डर के मारे पुलिस जैसे तैसे ये केस ख़तम करना चाहती है और इसके लिए ये अदना से औपचारिक सी आया है. लेकिन दूसरा पहलु था मुझे हमारे हे बड़े सिस्टम के मजबूत नेटवर्क की सपोर्ट मिलना. तोह क्रेडिट हमेशा टीम का हे होता है यदाकदा चेहरा एक सामने रख कर. तुम भी एक आदर्श हो युवाओं के लिए. जैसे सेंध तुमने क्सक्सक्सक्स शहर में बड़े बड़े नामी व्यक्तियों पर लगाईं, बेशक इसके लिए तुमने उच्चाधिकारियों को पहले बताया नहीं लेकिन मैं जरूर प्रभावित हुआ. ये दर्शाता है के तुम कार्यतंत्र और प्रणाली को बखूबी समझते हो.", पंडित जो को तोह उनके पसंद का जमघट मिल गया था लेकिन ये घर था और यहाँ वो खुद किसी के सामने ओहदे में कमतर थे.
"ये सब बाद में भी कर लेना जी. बचो की महफ़िल और ख़ुशी में आप अपने किस्से कहानियों से बहार निकलो. अर्जुन बीटा, ये सभी संजीव के hum-kadam दोस्त है और इन्हे तुम होटल ले जाओ. सभी दूर दराज से आये है और शाम को कार्यक्रम में शामिल होने से पहले इन्हे आराम भी करना होगा. तेरे दादा जी का तोह बस नहीं चलता नहीं तोह बहार हे लिखवा दे, रिटायर्ड थाना परिसर. आइये और अपने अनुभव बताये फिर हम आपको सुझाव देंगे.", कौशल्या जी की बातें सुन्न कर सबसे पहले पंडित जी ने हे बहार का रुख किया. बाकी सभी बस हंस रहे थे और उनको देख कर कौशल्या जी भी हंसने लगी.
"आंटी जी, सचमुच आपसे मिलना यादगार अनुभव है. जितने प्रेम से आपने नाश्ता करवाया और बातें की, बहोत ाचा लगा.", सभी ने बारी बरी से उनके चरण स्पर्श किये और फिर विदा ले कर बहार आ गए. अर्जुन तबतक सफारी गाडी निकल कर गेट पे लगा चूका था. संजीव भी अपने दोस्तों को शाम के बारे में बताने के बाद उन्हें गाडी में बैठा कर अपनी दादी के साथ हे अंदर चल दिया. आज उसका अधिकतर समय इनके साथ हे बीतने वाला था. वही 6 लोगो को अपने साथ लिए अर्जुन भी सुबह के 8 बजे सड़क पर गाडी चलने लगा था.
"मैं रूपक हु, ये अमन, इसके साथ आशीष और कार्तिकेयन स्वामी. पीछे वो दोनों संजय और एंड्रू है. तुम्हारे बारे में भी हमने बहोत सुना है छोटे भाई. अर्जुन, यही नाम है न तुम्हारा.", अर्जुन को अपना परिचय देते हुए रूपक ने हे चर्चा शुरू की. कपडे मैले हो चुके थे अर्जुन के लेकिन उसको जैसे इस सबका ध्यान हे न था.
"आप सभी से मिल कर ख़ुशी हुई भैया. लेकिन संजीव भैया कभी भी पुलिस और अपने सर्किल के बारे में घर पे ज्यादा डिसकस नहीं करते. हाँ वो बताते जरूर है की उनके दोस्त P.A. में भी बने थे जो शादी में आएंगे. मैं तोह फ़िलहाल बस पढाई और खेलकूद में हे लगा रहता हु इसलिए वो ये सब नहीं बताते होंगे."
"वाह भाई. वैसे बता दू के तुम्हारे भाई साहब उतने भी गंभीर नहीं है. हैं तोह सही लेकिन वो भी मस्ती मजाक कर हे लेता है. जो तुम्हारी भाभी बन्न ने वाली है न उनका भी बहोत रौब था ट्रेनिंग में लेकिन देखो जरा संजीव का ये पहलु की मिस राधिका उस से प्रभावित हो गयी. सभी शाहरुख़ खान बनते रह गए और काजोल को अजय ले उदा. हाहाहा...", ये मस्ती भरा खुलासा किया था पिछली सीट पर बैठे आशीष ने और अर्जुन भी इस पर हंसने लगा था बाकी सभी के साथ. सड़क भी थोड़ी चहल पहल थी क्योंकि ये ऐसा हे वक़्त था.
"वैसे मुझे भी हैरानी तोह बहोत हुई थी ये जान कर की भैया न सिर्फ प्यार लेकिन शादी तक पहुंच गए. आप लोग तोह उनके साथ हे रहे है तोह भाभी के बारे में भी ाचे से जानते होंगे. मेरा मतलब की वो नेचर की कैसी है और ..."
"एक दिन बाद तुम्हे उनके साथ हे तोह रहना है भाई. खुद हे देख लेना और एक्साम्प्ले के लिए बता दू की ये एंड्रू और लकी अरोरा थप्पड़ खा चुके है तुम्हारी राधिका भाभी से. हाँ बेचारो ने ये कष्ट भी तुम्हारे भाई के लिए हे झेला था. हाहाहा..", रूपक ने सबसे आखिर में बैठे अपने दोस्त एंड्रू का किस्सा सुनाया तोह अर्जुन को बड़ी हैरानी हुई लेकिन हंसी तोह उसको भी आ रही थी.
"मतलब भाभी इतने गुस्से वाली है?"
"तुम्हे क्या लगता है कुंडली ऐसे हे मिल गयी उन दोनों की? संजीव जहा शरीफ बैल है तोह राधिका शेरनी है, बस बी मिस्टेक वो वेजीटेरियन निकली. हाहाहा... जोक्स अपार्ट बूत थे बोथ अरे मेड फॉर एच इतर. संजीव का दिया prem-patra ले कर जब एंड्रू गया था तोह राधिका ने बिना पड़े हे वो फाड़ कर इसके थप्पड़ जड़ दिया था. ये थोड़ा काम हे बोलता है, इतना काम की इसने तोह नाम भी नहीं लिया के वो संजीव ने भेजा था. और फिर हमारे दूसरे होशियारचंद मर लकी अरोरा. खुद हे एक हार्ट लगा टेडी बेयर खरीदते है, मुश्किल से सेण्टर में लेके आते है और वीमेन हॉस्टल के बहार अपनी होने वाली भाभी को सॉरी बोलने के उद्देश्य से जाते है. नतीजा शामे और गाल लाल.", यहाँ आशीष ने पूरा वृतांत कह सुनाया और अर्जुन भी गाडी को ओवेर्ब्रिद्गे से ले जाता हुआ ये सुन्न कर दांग हो रहा था. इतना कुछ तोह उसको पता भी न था.
"तोह भैया ने कोई एक्शन नहीं लिया? मेरे दोस्त के साथ ऐसा करे कोई...", वो बात बीच में हे छोड़ कर इनकी तरफ देखने के बाद सामने देखने लगा.
"वही तोह हुआ फिर. संजीव से सेहन नहीं हुआ और उसने नकचढ़ी अमीर under-training नवाबजादी को आड़े हाथो हे ले लिया. वो भी 30-35 लोगो के सामने. गुस्से गुस्से में ये भी बोल गया के अगर राधिका को उसमे दिलचस्पी नहीं भी है तोह उसका कोई हक़ नहीं बनता की उसकी तरफ से भिजवाए लेटर, गिफ्ट को लाने वाले के साथ वो ऐसे पेश आये. राधिका की तोह आँखों में पानी हे आ गया था और रट हुए वो सॉरी बोलती हुई लग गयी थी संजीव के गले. बड़ा मजेदार और .. मजेदार नहीं भाई इमोशनल सा सन था वो. संजीव ने उसके बाद कभी गुस्सा नहीं किया और राधिका ने हमेशा हे हमारे दोस्त को अपनी ऊँगली पर रखा. शादी की बात भी लड़की ने हे चलाई थी नहीं तोह हमारे गंभीर मुनि तोह जैसे मुँह में फेविकोल रखे हुए थे. हाहाहा.. क्या हे किस्सा याद दिला दिया तुमने अर्जुन. खुद हे सोचो की तुम्हे लगता होगा हम लोग जैसे प्रहार फिल्म वाले नाना पाटेकर जैसे कटीली तारो के निचे रहते होंगे, सख्त नियम और सुबह 4 बजे ट्रेनिंग मैदान में बन्दूक ऊपर उठाये.. हाहाहा.. लेकिन सच ये है की अनुशाशन के साथ साथ वह एक कॉलेज जैसा हे माहौल रहता है.", अमन ने ये लम्बा चौड़ा किस्सा सुनते हुए वो समय याद किया तोह बाकी सभी ने आहें भरी. अर्जुन भी खुश था के जैसा उसको लगता था पुलिस ट्रेनिंग के बारे में वो सब इतना बुरा भी नहीं होता. अब तक वो लोग होटल गोल्ड पहुंच चुके थे जहा इन सबका इंतजाम किया गया था.
"चलो भाई पहले एक जाना क्लासिक का पैकेट पकड़ लो और फिर कमरे में फ्रेश हो कर आराम करते है. अर्जुन, शाम को हम लोग खुद हे आ जायेंगे प्रोग्राम की जगह पर. सरकारी गाडी की सुविधा भी है हमारे पास. और बहोत ाचा लगा तुमसे मिल कर. शाम को साथ में वक़्त बिताएंगे, उम्मीद करता हु.", आशीष ने अर्जुन द्वारा रिसेप्शन पर कमरे पता करने के बाद जब उन्हें रास्ता दिखाया तोह एक कर्मचारी खुद हे इन सबका सामान लिए उनके साथ चलने लगा. जाने से पहले सभी ने अर्जुन से हाथ मिला कर उसका धन्यवाद् किया था और अब अर्जुन इधर से निकल कर घर जाने का हे सोच रहा था की शादी की जगह का जायजा लेने के विचार से वो और आगे बढ़ चला.
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"हहहह...", विवान अपने बिस्टेर पर गहरी नींद में सोया हुआ था की अपने जिस्म पर किसी और के स्पर्श से थोड़ा हिलने डुलने लगा. उसको ऐसा लग रहा था जैसे वो कोई कामुक सपना देख रहा है और जैसे हे उसको अपने लिंग पर गीलापन और कसाव महसूस हुआ, उसकी नींद तुरंत उचट गयी. वो हैरानी से देख रहा था उस चेहरे को जिसकी कल्पना नहीं थी. काम से काम इस घर में तोह बिलकुल भी नहीं. ये उसकी सलहज अलीशा थी जो बड़े हे जोशीले अंदाज में विवान का सख्त लिंग मुठी में पाखडे mukh-maithoon कर रही थी. दोनों की नजरे एक होते हे विवान फुर्ती से उठ खड़ा हुआ. कपडे सही करता वो काफी गुस्से में था लेकिन अलीशा के चेहरे पर कुटिल मुस्कान साफ़ बता रही थी की वो इसकी परवाह नहीं करती.
"जो गलतियां हमारा सबकुछ तबाह कर सकती है वो तुम क्यों दोहराना चाहती हो अलीशा? काम से काम इस घर का तोह ख़याल करो और ऐसी एक गलती से मेरा सबकुछ ख़तम हो सकता है. ये बिस्टेर मेरी बीवी का है और ये घर मेरे पापा का.", विवान के शब्द तीखे और गंभीर थे.
"क्यों इतनी टेंशन लेते हो तुम विवान. घर में इस वक़्त कोई नहीं है और तुम तोह जानते हे हो की मेरी जरूरते कितनी है. बस एक बार इसको शांत कर दो और ये तोह तुम्हे भी पसंद है न?", अपना ढीला सा टॉप सरकती हुई अलीशा ने वो गोर बड़े गुब्बारे आधे विवान के सामने नज़र करते हुए कहा तोह विवान ने नजरे हटा ली. अलीशा एक गदराई हुई खूबसूरत महिला थी जिसको नजरअंदाज करना इतना आसान न था.
"वो सब ठीक है अलीशा लेकिन तुम समझा करो की यहाँ हम कौन है और क्या स्थिति है. मैं अपने पिता और बची के सामने गुनहगार नहीं बन्न न चाहता. कपडे ठीक करो और यहाँ से जाओ, अभी के अभी.", अब विवान की आवाज में वो कड़ापन और बेरुखी न थी लेकिन वो नजरे मिलाने से भी बच रहा था जैसे शिकार शिकारी को नजरअंदाज कर रहा हो. लेकिन अलीशा पर तोह जैसे इसका कोई प्रभाव हे न पड़ा. वो अपने सीने का वस्त्र निकल कर विवान के जिस्म से जा लिपटी.
"तुम कुछ और कह रहे हो और तुम्हारा दिल कुछ और. तुम्हे तोह मेरे ये बड़े उभार बहोत पसंद है न विव? और मेरी ये भी तोह तुम्हारी फवौरीते है.", विवान का हाथ पकड़ कर अलीशा ने खुद हे स्कर्ट के अंदर से अपनी योनि पर टिका दिया. साफ़ जाहिर था की इसके अंदर कोई अतिरिक्त वस्त्र मौजूद न था. विवान कुछ कहता उस से पहले हे अलीशा उसके होंठो को बुरी तरह पीने लगी थी और स्वतः हे विवान की आँखें बंद होती हुई बाकी जिस्म को हरकत देने लगी. वो एक हाथ से अलीशा की योनि मसलता हुआ दूसरे से एक बड़े उभर और उसके गुलाबी मॉटे निप्पल को मसलने लगा था. कुटली सी हंसी के साथ अलीशा ने चेहरा अलग करके विवान का पजामा निचे सरका दिया.
"ओह्ह्ह्हह.. तुम किसी दिन सब बर्बाद करवा के रहोगी अलीशा.. उम्मम्मम्म..", लुंड को मुठियाती हुई अलीशा विवान के सीने को चूम रही थी और कुछ हे पल में वो दोनों उस बिस्टेर पे थे जिसका उलाहना विवान अपनी बीवी का बता कर दे रहा था. स्कर्ट ऊपर सरकती हुई अलीशा ने अपने बड़े बड़े चिकने कूल्हे उजागर करते हुए सही मुद्रा बनाई और उस साधारण से सख्त लिंग को अपनी जांघो के बीच रास बहती गुफा का रास्ता दिखा दिया.
"आह्हः.. बस यही कमी महसूस हो रही थी मुझे... उम्म्म..", यहाँ जैसे सिर्फ जिस्मानी भूख हे थी इन दोनों के दरमियान और अगले 5-7 मिनट तक अलीशा निरंतर ऊपर निचे उछलती हे दोनों जिस्मो को ये असीम काम सुख देती रही. बड़े बड़े गुब्बारों से चुके ऊपर निचे उछाल रहे थे जिन्हे विवान कभी मसलता तोह कभी काट लेता. अलीशा की गर्मी के सामने वो ज्यादा न ठहर सका लेकिन इतने में अलीशा भी जैसे अपना कॉमर्स बरसाने लगी थी. उन्माद में जैसे हे उसने विवान के लिंग को अपनी जांघो में कैसा, वो भी छूट की गहराई में खाली होने लगा. दोनों पसीने से भीग चुके थे और कुछ पल ऐसे हे निष्प्राण से मूरत बने रहे.
"ओह्ह्ह्हह्ह.. तुमने आखिर कर हे ली न अपनी मनमानी. अब जल्दी से कपडे ठीक करो इस से पहले की कोई लौट आये. और मैं बाथरूम होने के बाद कुछ देर आराम करूँगा.", अलीशा से अलग हो कर विवान तुरंत हे अंदर वाले बाथरूम में जा घुसा. अलीशा मुस्कुराती हुई अपने कपडे पहन कर बिना चादर ठीक किये कमरे से निकल चली. कुछ बूँद सफ़ेद तरल की जैसे उसने जानबूझ कर रोमिला के बिस्टेर पर रहने दी थी. कोई 2 मिनट बाद रोमिला इस कमरे में लौटी तोह एक हे नजर में समझ चुकी थी की इधर क्या हुआ होगा. वो तोह बस अपना पर्स लेने यहाँ आयी थी लेकिन जैसे एक और जख्म उसकी आत्मा पे लिखना तये था यहाँ आने पर. उसके पति ने फिर से बेवफाई कर हे दी थी और अलीशा अभी तक अपनी मनमानी से पीछे नहीं हटी.
'ये आखिर बार था अलीशा और इसकी सजा तुम दोनों को मिलेगी.', रोमिला ने भी चादर को सही न करके पर्स उठाया और धड़ाम से दरवाजा बंद करके बहार चली गयी. विवान को उसने इशारा दे दिया था के वो कमरे में आयी थी और दरवाजा पटकने का मतलब क्या था. विवान शरीर साफ़ करके कमरे में आया तोह बिस्टेर की हालत देख कर उसके किनारे हे सर पकड़ कर बैठ गया. अपने घर लौटे अभी चाँद घंटे हे गुजरे थे और वो बेवफाई कर चूका था जिसकी गिनती नहीं थी.
'पता नहीं अब क्या होगा? वो प्रीती या डैड को नहीं बताएगी, इतना जानता हु. साली अलीशा रंडी, तू गलत खेल रही है...', सामने दिवार पर जोर से घूंसा मारने के बाद विवान इस गलती पर दर्द से दोहरा हो गया. वो बस खुद के साथ साथ अपनों को भी दुःख हे पंहुचा रहा था.
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एक तरफ जहा पंडित जी के संसार में खुशियों भरा दिन था और ढेरो लोग घर और कार्यक्रम में शामिल होने आ रहे थे वही एक दूसरी जगह भी थी जहा सबकुछ इसके विपरीत था. और ये जगह भी पंडित जी के संसार से सेंकडो (100स) कोस दूर Bihar-Bengal की सरहद थी. लगभग कंकाल सा ये 35-40 वर्ष का व्यक्ति कमीज की जेब से तम्बाखू और चूना निकल कर रगड़ने हे लगा था की एक जोरदार थप्पड़ से मिटटी सूंघने लगा.
"बुरचूड़ी के इन्हे काम करने आये हो या कलेक्टर बने खातिर? तुहार बहिन छोड़ू बांसडीके.. निकल इन्हे से.", सुपारी रंग की चमकदार कमीज और उस से गहरे रंग की चकचक पतलून पहने ये एक तगड़ा सा व्यक्ति था कोई 30 बरस का. बुर्शट के ऊपर वाले 3 बटन खुले थे और सोने की मोटी जंजीर सी चैन उसके गले में झिलमिल चमकती हुई बता रही थी की वो कुछ तोह हैसियत रखता है. चारदीवारी वाले इस 15-16 एकड़ वाले भूखंड पर आधी जगह वृक्षों से घिरी थी और बीच में कोई 25-30 कमरे खड़े थे, जैसे कोई सराये या धर्मशाला दुनिया की नजर से बचा कर राखी हो. जमीन पर थप्पड़ खा कर गिरा व्यक्ति क्षमा मांगता हुआ उठ कर उन कमरों की और चल दिया जहा शायद उसकी नियुक्ति थी.
'500 रूपया महीना फ्री में मिलता है क्या बे? सेल हराम की खा खा कर अपनी औकात भूल जाते है.', मुँह से पान की पीक एक तरफ गिरता ये आदमी जिस तरह से जीभ को मुँह में फिर कर दांत साफ़ करता हुआ बड़बड़ा रहा था इस से साफ़ पता लगता था के वो बहोत हे घिनोना भी है घमंडी होने के साथ साथ.
"माई बाप, डिलीवरी खातिर कलकत्ते (कलकत्ता) से बिमल शेठ आया है.", ये एक नेपाली मूल का आदमी था लेकिन यहाँ के माहौल में जैसे इसका रंग भी पक्क चूका था जुबान के साथ साथ. हाथ जोड़ कर जिस तरह से वो char-diwari के बहार आये व्यक्ति की सूचना दे रहा था इस साफ़ पता चलता था की उसकी कंधे पे तंगी बन्दूक से ज्यादा ईमान गिरा हुआ है.
"हँ.. इन्हे हे लिवा लाओ शेठ को. और तुम्हार बिटिया की खबर आयी?"
"जी माई बाप. तुली अपने साथ 4 को ले कर कटिहार पहुंच गयी थी कल रात. चरों 15-16 के बीच है.", खींसे निपोरता से ये पालतू व्यक्ति देख रहा था के उसके जवाब पर उसका मालिक अब मुस्कुराने लगा था.
"छग्गू, पूरे 15 हजार तुझे दूंगा और उतने हे तेरी तुली को. बस अब शेठ को बुला और लाली को बोल जगह इन्हे 2 कुर्सी जमा दे.", ये व्यक्ति था दुर्गेश यादव उर्फ़ लल्ला जी. सरहद पार से behla-fusla कर या jor-jabardasti से नेपाली मूल की kam-umar लड़कियां ला कर सोंगची, पटना और दिल्ली तक ये उन्हें बेचता था. बाप इस जगह का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट का व्यापारी था जिसके ट्रक समूचे उत्तर भारत में माल धुलाई पर लगे रहते थे और ये रसूख का इस्तेमाल करके ऐसा व्यापार करता था जो कही से भी इंसानियत वाला न था.
लल्ला करम के साथ साथ दिल से भी दरिंदा हे था जिसके लिए कमसिन लड़की सिर्फ माल और उसके लिए काम करने वाले लोग बस keede-makode सी हैसियत रखते थे. जाने कितनो को हे इसने मौत के घात उतरा था और दबे छिपे ये कहावत मशहूर थी की चम्पारण के हांड़ी मीट में बकरा होता है लेकिन लल्ला जी इंसान के गोश्त की हांड़ी पकाते है. अब तक एक काली कॉन्टेसा कार char-diwari से अंदर आ कर कुछ हे दुरी पर रुक चुकी थी. उन कमरों की तरफ से भी एक 22-23 बरस की महिला 2 निवार वाली कुर्सियां लिए दुर्गेश यादव के सामने जांचा कर जाने लगी. शरीर पर बस एक पारदर्शी सी सस्ती साड़ी और पैबंद लगा ब्लाउज हे था जो उसके यौवन को छुपाने की जगह दिखा ज्यादा रहा था. दुर्गेश उसकी सांवली चिकनी कमर और माध्यम से कूल्हों को देख मैं में लुंड सेहला रहा था क्योंकि अभी ज्यादा जरुरी काम जो थे.
"लाली, इन्हे पानी भिजवा दियो और यह के बाद 2 कप चाय. आओ शेठ, तुम्हारा हे इन्तजार था.", ये बिमल सेठ भी शकल से पूरा घाघ सा व्यक्ति था, बंगाली झलक लिए. आँखों पर मोठे फ्रेम का चस्मा, सजीली सी घनी मूछ और सांवली रंगत के साथ घुंगराले तेली बाल. 2 गनमैन कार के पास हे थे और ड्राइवर एक अटैची लिए ठीक सेठ के पीछे.
"ोर्रे लल्ला जी, बाबा हम तोह कल हे कोलकाता से आ गया था. वो तोह ीदार का मटन हमको भ गया तोह रात पिछले सेहर हे कमरा में रुक गया. अब तुम्हारा साथ इतना पुराण डीलिंग है तोह रात सावेर से क्या प्रॉब्लम होता? हेहेहे..", चमचागिरी की चाशनी ाचे से लपेटनी आती थी बिमल सेठ को और इसके साथ हे उसने विप की वो अटैची यादव के सामने रख दी.
"न तुम कही भागे जा रहे शेठ और न तुम्हारा माल. इस बार आर्डर थोड़ा बड़ा देना क्योंकि अगले 3 महीने काम बंद रहेगा इस तरफ.", नोटों को बस गद्दियों के हिसाब से गईं कर यादव ने अटैची एक तरफ रख दी. अब तक लाली भी पानी ले आयी थी और उसके सहमे हुए चेहरे से पहले सेठ की नजर उस छोटे से ब्लाउज या कहे चोली में से झांकते कैसे हुए सांवले उभारो पर जा रुकी. यादव भी ये बात ध्यान से देख रहा था. पानी होंठो से लगते हुए भी सेठ के मुँह से लार टपकती लगी. लाली तुरंत वह से निकल चली.
"ये माल तोह करारा है शेठ लेकिन लाली न बिकाऊ है और न हे मैंने खुद इस्पे हाथ डाला है. वैसे तुमने अगला आर्डर नहीं बताया.", यादव जैसे आदमी की भी क्या मजबूरी हो सकती है जो लाली अभी तक उस से बची रही.
"ोर्रे लल्ला जी, हम तोह यही देख रहा था के ये वास्तबिक सुंदरता की देवी है बिलकुल असली संदेश की तरह. हाँ वो आर्डर तोह मैं दूंगा लेकिन इस बार कुछ फॉरेन क्लाइंट लोग है. 6 चाहिए और तुमसे बन्न सके तोह 13-14 से ऊपर का नहीं हो. एक का 2 लाख हम तुमको देगा.", ये डिमांड सुन्न कर एक पल को तोह यादव कुछ गंभीर हुआ लेकिन हर लड़की का 2 लाख सुन्न कर आँखों में चमक आ गयी.
"देश से बहार भेज रहे हो शेठ?"
"बाबा यही समझ लो. शेख लोग है और उनके साथ डील मतलब तुम्हारा भी फ्यूचर बिज़नेस ट्रिपल और हमारा भी. पान खिलाओ अब इस बात पर.", सेठ की बात सुन्न कर यादव ने पांदनी निकाल कर एक पान उसको दिया और एक अपने मुँह में रखने के बाद उँगलियाँ कमीज से साफ़ कर ली.
"वाह शेठ, तुम्हारे साथ बिज़नेस का यही मजा है. इन्हे लोकल में साला 50 के ऊपर कोई 17-18 वाली के नहीं देता और तुम साला 13 वाली का 2 लाख सेट कर दिया. हाथ डालो बहार के धंदे में और मैं लाइन लगा दूंगा एक नंबर माल की. ओह बुदहु, शेठ का माल बुलवाओ बुरचूड़ी के.", इस आवाज पर वही अधेड़ सा कंकालनुमा व्यक्ति हाथ जोड़ने के बाद एक कमरे में दाखिल हो गया. सेठ ने भी अपने ड्राइवर को इशारा किया तोह वो गेट की तरफ लपका. उस सुरक्षाकर्मी से बात करके गेट खुलवाया गया तोह ये नीली जीप अंदर दाखिल हुई. हर तरफ से इस्पात की चादर लगी जीप ऐसी थी जैसे मुर्गियां धोने का वाहन.
"लो शेठ, देख लो. सभी को ट्रेनिंग दिया है और तुम्हारी हर बात मानेंगी. कोई भी 17 से बहार नहीं है और निचे से बंद.", वो अधेड़ एक कतार से ये 8 लड़कियां यहाँ ले आया था और सभी kam-umar नेपाली मूल की सेहमी हुई सी गोरी पतली लड़कियां.
"बाबा यही चीज तोह हमको तुम्हारा पसंद है. ब्यूटीफुल. ऐ सब ऐसे हे लाइन से जीप में बैठो डार्लिंग.", सेठ इतना बोल कर खड़ा हे हुआ था के सररर से उसके भेजे को चीरती एक गोली निकल गयी. कटे वृक्ष सा बिमल सेठ जमीन पर गिरा था और उसके सर से गहरा लहू मिटटी को रंगने लगा. चाँद सेकंड में हे अंदर के कमरों से 10-11 बंदूकधारी ढ़ढ़ढ़ करते हुए तैनात हो चुके थे और उतनी हे जल्दी सभी जमीन पर, बिमल सेठ के दोनों प्रेहरियो और ड्राइवर समेत. अब वह पुरुष कोई बाकी था तोह एक खुद यादव, उसका गुलाम और वो अधेड़. लड़कियां सभी जमीन पर घुटनो के भार बैठी थी सर झुकाये, कुछ का तोह पेशाब तक निकल गया था.
"अरे कौन मादरचोद है बे जो पीछे से गोली चला रहा. भोंसड़ीक..", और इसके साथ हे अगली गोली उसके कंधे में आ धंसी. मुख्या द्वार एक झटके में उखड कर जमीन पर पड़ा था और ट्रक अंदर दाखिल होता ठीक उन लड़कियों के सामने आ रुका. उसकी छत पर बैठे आदमी ने चुग्गे को बंदूक जमीन पर गिराने का इशारा किया तोह तुरंत पालन हुआ.
"बहोत समय इस दीमक की जड़े खोज रहा था और देखो साला लेके भी आया तोह उस दल्ले के पास जिसका अपना कुछ है हे नहीं.", ड्राइवर सीट से लपक कर ये फुर्तीला आदमी ठीक यादव के ऊपर आ खड़ा हुआ. बात कहने के साथ हे वो चुग्गे का भेजा खोल चूका था.
"अबे तुम हो कौन बे? ज़िंदा न बचोगे भोंसक..
"खामोश.. साला गांड 2 फाड़ हो चुकी है लेकिन हेकड़ी ख़तम नहीं हो रही. विश्वास, सभी लड़कियों को ट्रक में बैठा और ये पैसे बाँट दे इनमे.", अपने उस बंदूकधारी को आदेश देते हुए भी इस व्यक्ति की नजर यादव पर हे थी. लाली दरी सेहमी सी एक तरफ कड़ी थी जिसने ट्रक में जाने से इंकार कर दिया था. बाकी सभी लड़कियों को अंदर बैठने के बाद विशवास उन कमरों को देखने चल दिया.
"तुम हो कौन.. आठ.", यादव का सीना तक खून से लथपथ हो चूका था और वो सोने की जंजीर जैसे बता रही थी की उसका कोई मोल नहीं लहू के सामने.
"तुम्हारे बाप के बाप का भाई हु मैं और मरने से पहले सुन्न लो हमारा नाम, विष्णु. विष्णु वर्धन.. जब तक तुम जैसे परभक्षी पनपेंगे, तब तब उनके पीछे आएगा विष्णु वर्धन.", और इसके साथ हे यादव की आँखे खुली हे रह गयी, गोली ठीक माथे के बीच धंसने के बाद. विशवास 2 बैग लिए इधर हे आ चूका था और उसकी बन्दूक की नोक पर वो अधेड़ और लाली भी यही आ गए.
"हाँ तोह ये ज़िंदा क्यों है अब तक? और लड़की तुम्हे यही रहना है तोह मरना होगा नहीं तोह साथ चलो."
"सर, इन दोनों बैग में पैसा है. और ये आदमी साफ़ है जिसको यहाँ बंधुआ बनाया हुआ था."
"चल तू निकल यहाँ से. और अब तुम बोलोगी भी या मार दू?", आवाज सपाट थी और जबड़े भींचे हुए. लेकिन लाली जैसे अब सेहमी हुई न थी.
"ये आदमी खरीद के लाया था हमको, ब्याह का बोल कर. हम कहा जाए अब? घर लौटे तोह िज्जात्त चला जायेगा और इन्हे रहे तोह पुलिस हमको पकड़ेगा या बड़े मालिक हे ख़तम कर देई हमको. इतना को मारे हो तोह हुंका भी एक गोली काहे नहीं मार देते?", अब जैसे विष्णु लाजवाब हे हो चूका था.
"ब्याह करोगी?", विष्णु के ऐसे सवाल और उसकी उम्र का अंदाजा लगाती लाली जैसे मूरत बन्न चुकी थी.
"हमसे नहीं. हमारे लिए तोह बेटी सामान हो तुम और हम ब्रह्मचारी है जो गोली तोह क्या बुरी नजर भी नहीं मार सकते. तुम बैठो गाडी में और कलकत्ते जा कर हम करते है तुम्हारे लिए उचित प्रबंध. जिसकी खुदकी कोई दुनिया न हो वो या तोह दुनिया उजाड़ता है या फिर बसता है. चलो भाई विशवास, पैसा रखो बिमल की गाडी में और इन सभी लड़कियों को टिकट करवा कर ाचे से भिजवा देना. हम वही मिलेंगे जहा रात रुके थे.", विश्वास भक्त आदमी था इस व्यक्ति का और दोनों बैग कॉन्टेसा में रख कर वो खुद ट्रक पे सवार हो गया. लाली को विष्णु ने पिछली सीट पर बैठाया और खुद स्टीयरिंग पर.
"हमारे एक मित्र थे बिटिया जिनका कहना था की आपका जीवन किसी के जाने से ख़तम नहीं होता चाहे वो आपका परिवार हे क्यों न हो. वो ख़तम होता है जब आप ये सोच लो के ज़िन्दगी बोझ है. बस तभी से हमने सोच लिया के ज़िन्दगी बिगड़ने वालो के पीछे पदों, अपने तोह खैर दिल में हमेशा हे रहेंगे.", कार चालू करने से पहले विष्णु ने अपनी कलाई को देखते हुए अतीत का पथ सुनाया और चाबी घुमा दी. हरे जोड़ने से वह लिखा था 'Inder-Vishnu'
"हम का कहे आपको?"
"फ़िलहाल तोह पिता हे बोल लो जब बिटिया मान लिया है लेकिन हफ्ते 10 दिन बाद तुम अपनी दुनिया में होगी और याद रखना के उस दुनिया में हम नहीं होंगे.", इसके साथ हे विष्णु वर्धन लल्ला जी लंका दहन करके निकल चला इस चार दीवारी सी. अब लाली भी कुछ हद्द तक सहज हो चुकी थी.
"वैसे आप जो करते है वो भी तोह गलत है.", लाली ने साफ़ हिंदी में बात करने की ाची कोशिश की थी.
"हाँ गलत तोह है बिटिया लेकिन विरावो में अक्सर कानून कमजोर का साथ नहीं देता. या तोह खुद हे कानून बनाओ या फिर जुल्मी के भोगी. हमको पहला वाला ठीक लगा तोह वही करने लगे. और उन बच्चियों की चिंता मैट करना, विश्वास का नाम और काम एक जैसा है. वो उन्हें सही जगह पंहुचा कर लौट आएगा.", विष्णु ने कार भागने की कोई जेहमत न की थी और इन संकरी सड़को पर शायद विरानो के सिवा कुछ था भी नहीं. पहला क़स्बा हे यहाँ से 50 कोस था.
"इसलिए हमको आपसे डर नहीं लगा क्योंकि ज़िन्दगी ने इतना तोह सीखा हे दिया है के नजरे क्या कहती है. आप क्या सारा जीवन ऐसे हे रहेंगे?"
"मेरा भाई आएगा न एक दिन मुझे घर ले जाने. फिर विरानो में नहीं आऊंगा वापिस. अभी वो शायद खुद उलझा हुआ है अपनी दुनिया में लेकिन वो आएगा, मेरा दिल यही कहता है.", इसके बाद विष्णु ने बात न करते हुए स्टेरो का बटन दबा दिया. गाने के बोल थे
'मोने पोरे रूबी रे, कविताये ठुमके एक दिन कोहतो कोरे देखी ची..
तुझे बिन जाने ...
बिन पहचाने ..
मैंने हृदय से लगाया...
पर मेरे प्यार के बदले में तूने... मुझको ये दिन दिखलाया..
जैसे विरहा की ... हृत्त मैंने काटी.. तड़प के आहें भर भर के..
जले मैं तेरा भी.. किसी के मिलान को.. अनामिका तू भी तरसे..
मोने पोरे रूबी रे.. कविताये ठुमके एक दिन कोहतो कोरे देखि ची
आज हाय रूबी ray..deke बोलो ामा के टॉमके कोठों जानो देखि ची..
मोने पोरे रूबी रे..
आज कितनी हे मासूम ज़िंदगियाँ बचाई थी इस रहस्यमयी व्यक्ति ने और ख़तम कर दिया था उस स्त्रोत को जो आगे जाने और किते घर उजाड़ता. कई लोग जीवन में मकसद बनाते है लेकिन जैसे इस इंसान का तोह मकसद हे जीवन बनाना था. कही तोह जरूर मंज़िल मिलनी थी लेकिन कब, इसका जवाब जैसे खुद विष्णु के पास न था.