Incest Pyaar - 100 Baar - Page 7 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 44

नीलगाय


जाने अभी कोनसा पहर था लेकिन ऋतू की आँख खुल गई थी. अर्जुन उसको बाहों में लिए सोया पड़ा था पीछे से पकड़ कर. एक मुस्करात जिसमे सिर्फ ख़ुशी थी khud-ba-khud उसके खिले हुए चेहरे पर तैर गई. 'बस यही तोह सपना था एक. अब अगर ज़िन्दगी यही ख़तम हो जाये तोह कोई शिकवा नहीं.' सोचती हुई ऋतू ने अपने हाथो की उँगलियों में अर्जुन के हाथ की उँगलियाँ प्यार से पीरो दी. उसकी उँगलियों के पूरे पहले से अधिक हे मॉटे लग रहे थे. इतनी काम रौशनी में चोट तोह कही न दिखी बस उनका उभार बता रहा था के कुछ सूजन जरूर थी. आराम से वापिस उंगलिया निकल कर वो फिसलती सी बहार निकल उसकी गिरफ्त से फर्श पर कड़ी हो गई. अर्जुन शायद कुछ थकान की वजह से सोया हे रहा. उंगलिया थोड़ी हिली थी लेकिन नींद नहीं खुली.

ऋतू बाथरूम से मुँह धो कर सीधा रसोईघर में चली गई. रात की बची 2 रोटियां हलकी सी गरम कर सरसों का तेल और हल्दी दाल कर एक प्लेट में राखी. फिर एक चाक़ू और साफ़ सूती कपडा लेकर वापिस कमरे में आ गई. अब यहाँ बड़ी तुबेलिघ्त रोशन थी जिसके उजाले में वह रोटी को किसी पट्टी की तरह काटने लगी थी और साफ़ कपडे की 5-6 लम्बी कतरन बना कर वह अर्जुन के पास बिस्टेर पर आ बैठी. सावधानी से हाथ को अपनी जांघ पर टिका कर उसकी 3 सूजी हुई उँगलियों पर पहले वो गरम रोटी के साफ़ काटे हुए टुकड़े को ाचे से लपेटने लगी और फिर उसको कपडे से ढकने के बाद गांठ लगा दी. अर्जुन इस एहसास से उठ चूका था और चुपचाप बस ऋतू को अपने इस काम में मगन देखता रहा. तीनो उंगलिया पूरी तरह से धक् गई तब अर्जुन ने हलकी आवाज दी.

"इस हाथ की भी ऐसी हे हालत है. वो बॉक्सिंग के समय शायद कही चोट आ गई थी." ऋतू ने जब दूसरे हाथ को देखा तोह वह भी वैसा हे नजारा था. सिर्फ छोटी ऊँगली और अंगूठा सही सलामत थे और यहाँ की भी 3 उंगलिया में सूजन थी.

"रात को हे सब करवा लेते तोह अब तक तोह ठीक भी हो जाते. कोई बात नहीं आप ऐसे हे लेते रहो मई कर देती हु.", एक बार फिर उठ कर कपडे की और कतरन काटने के बाद वही प्रक्रिया इस हाथ पर भी दोहराई. बीच बीच में अर्जुन अपनी chedd-chaad कर हे लेता था. कभी गाउन के ऊपर से खड़ा दीखता निप्पल दबा कर तोह कभी गर्डर और कूल्हे सेहला कर. ऋतू इन छोटी हरकतों का आनंद लेती बस काम करती रही.

"हो गया सब. अब ये तकिया दोनों हाथो के नीचे रखिये और सो जाइये कुछ देर. अभी सिर्फ 3 बजे है. 3-4 घंटे तक उतार दीजियेगा ये.", ऋतू वह से उठने लगी तोह अर्जुन ने फिर पकड़ लिए.

"आप भी यही लेत जाओ न? नहीं नींद नहीं आएगी." अर्जुन ने वापिस बिस्टेर पर करने की कोशिश की ऋतू दीदी को तोह उन्होंने ना में सर हिला दिए.

"अलका के पास वापिस जाना है अभी. वो उठ गई तोह इधर हे आ जाएगी. और आप अकेले में मुझे 'तुम' कहने की आदत दाल सकते हो." ऋतू दीदी अभी तक अपने मिलान वाले रूप में हे थी.

"मई आपको आप हे कहूंगा. और एक बार नाम लिए था लेकिन दिल कहता है की जो इज़्ज़त दी हुई है वह बढ़नी हे चाहिए. तोह आपकी ये बात मई नहीं मानूंगा." उसकी बात पर हलके से मुस्कुराती वह नीचे झुक कर प्यार से गाल चूमती हुई बहार चली गई. फिर से बड़ी लाइट बंद हो चुकी थी. अर्जुन ने एक बार फिर आँखें बंद की तोह ठीक 4:20 पर हे वो उठा. मुट्ठी 2-3 बार khol-band करने के बाद वह उठकर सीधा आँगन में बने बाथरूम में घुसा और टोलिया गीला कर चेहरा साफ़ करने लगा. लेकिन ये भी नहीं कर प् रहा था. ऐसे हे छोड़ कर पेशाब करने के बाद बहार निकला तोह यहाँ भी ऋतू दीदी सामने कड़ी थी.

"अंदर चलो." ब्याह पकड़ती वो अर्जुन को फिर से बाथरूम में ले आई और खुद हे चेहरा साफ़ करने लगी. पजामा नीचे कर सोये हुए अंग को भी हाथ धोने की जगह कर पानी से धोने के बाद तोलिये से साफ़ कर खुद अपने हाथ साबुन से धोये.

"आप सोइ नहीं? मई जा रहा हु आप 8 बजे से पहले नहीं उठना." उन्हें कमरे की तरफ छोड़ कर वो संजीव भैया के पास चल दिया. वो सच में गहरी नींद में सोये हुए थे.

"उठिये भैया. 4:30 बज गए है और आपने कही जरुरी जाना है." घडी एक बार देखता वह उनको हिलने लगा तोह संजीव भैया अंगड़ाई लेते से बिस्टेर पर बैठ गए. नीचे पड़ा पानी का जग उठा कर अर्जुन ने एक गिलास भर के उनकी तरफ बढ़ा दिए और 2 घूँट लेने के बाद वह उठ खड़े हुए.

"थैंक यू छोटे. सही समय उठा दिए भाई. बहोत थकान थी लेकिन अब बेहतर हु." अपने शरीर पर बनियान के ऊपर टीशर्ट डालते हुए वो बोले तोह अर्जुन विदा लेकर अपने कमरे में आ गया. कपडे बदलने में कोई परेशानी न हुई बस जूते पहनते वक़्त उसको लगा के वो उन्हें कस कर नहीं बाँध सकता.

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तारा अभी तक वैसे हे एक करवट लिए सफ़ेद चादर के ऊपर लेती थी. जीरो की रौशनी में उसके लुढ़के हुए दोनों उभर किसी का भी दिल धड़का देने के लिए काफी थे लेकिन अर्जुन ने सावधानी से उसके ऊपर चद्दर लपेट दी और दोनों तरफ से उसके शरीर के नीचे दबाने के बाद जीरो का बल्ब भी बंद कर दिए. पीछे जाने वाले रस्ते का दरवाजा अब चिटकनी से बंद हो चूका तोह सब तरफ देख वो बहार निकल आया.

'साइकिल नहीं चलेगी और स्कूटर ले जाना मतलब सबके सवाल.' घडी में देखा तोह 4:40 बता रही थी और फिर कुछ सोचता सा वह बहार निकल कर साढ़े कदमो से दौड़ चालु करता निकल लिए. आज रफ़्तार पहले की मैराथन से लगभग दोगुनी थी उसकी. नए सेक्टर को पार करते हे घडी पर नजर डाली तोह ठीक उसके शीशे पर एक मोटी बूँद पानी की आ कर गिरी. 5:00. बादलो की वजह से अभी तक एक तरह का अँधेरा था लेकिन ये एक बूँद प्रमाण थी वो भी तैयार हो चुके थे बरसने को. इधर गाँव की सड़क पर दौड़ता वो पसीने में भीग चूका था और आज हवा तोह जैसे एकदम रुक चुकी थी. ठीक गाँव की सड़क पर कदम बढ़ाते हे सामने से बरसाती ओढ़े साइकिल पर दूध के कैनस्टा लिए अर्जुन को साधू सिंह जी आते दिखे. पीले रंग की वह प्लास्टिक की चमकती बरसाती अभी उनके सर पर नहीं थी.

"Ram-Ram बीटा. बड़े रफ़्तार में हो आज." हँसते हुए उन्होंने अपनी साइकिल उसके पास रोकी तोह निगाह हाथो पर भी गई.

"है अंकल वह देख रहा था के मेरी क्षमता कितनी है तोह बस यही आ कर रुका हु घर से.", चेहरे को रुमाल से पोंछता वो उनके Ram-Ram का जवाब दे साथ खड़ा हो गया.

"इतनी सुबह ऐसा पसीना आना बता रहा है के लक्ष्य के लिए गंभीर हो बीटा. बहोत ाची बात है ये तोह. नहीं तोह आजकल के लड़के तोह car-motorcyle से नीचे तोह अपने पाँव रखना पसंद नहीं करते. वैसे मौसम आज खराब है और हालात बता रहे के अगले आधे घंटे में बारिश जम्म के होने वाली है."

"सही कहा अंकल जी. लेकिन बारिश हे तोह है. देखिये आप भी तोह उसकी परवाह किये बिना काम पर चल दिए है और फिर मई उतनी कोई म्हणत नहीं करता जितनी आप करते है." अर्जुन समझ चूका था के kisaan-doodhwale की ज़िन्दगी में तोह आराम मुश्किल हे है. वो तोह फिर भी चैन से सो जाता है जब दिल करे.

"आदत हो गई है बीटा इस शरीर को तोह. काम न करू तोह बुखार आ जाये. ाची बात है बीटा कल मिलते है.", इस बार वह चलने लगे तोह बिना सोचे अर्जुन ने साइकिल पर रखे उनके पाँव को छु लिए. उन्होंने भी मुस्कुराते हुए ढेरो आशीर्वाद दे दिए.

"ाचा अंकल जी कल मिलते है." आगे दौड़ता वो निकल लिए और इधर साधू सिंह भी मुस्कुराते हुए अपने रास्ते हो लिए. गाँव शुरू हुआ तोह अर्जुन बस दोनों तरफ देखता आगे बढ़ता रहा. सविता के घर का दरवाजा तोह लगा हुआ था लेकिन बहार आँगन का लकड़ी का गेट हल्का खुला हुआ था. फिर आगे आया तोह साधू सिंह के घर का आँगन भी नजर आया जिसको देखने भर के बाद वो दौड़ लगता सीधा पुलिया पर हे आकर रुका. कदम रुकते हे अर्जुन को महसूस हुआ के उसकी ज़िन्दगी में अब तक की सबसे लम्बी दौड़ थी. उस पुलिया की छोटी दिवार को पकड़ कर वो अभी किसी कुत्ते की तरह हांफ रहा था. अगर इस पल कोई उस से बात भी करता तोह शायद उसके मुँह से एक लफ्ज़ भी न निकलता.

"uhmm..hmmffff.. हहहहहह.. ये कुछ ज्यादा हे हो गया.. हहह हहह." कोई 5 मिनट तक वह ऐसे हे झुका खड़ा रहा था. फिर धीमे कदमो से पुलिया के पर नीचे उतरता वह नहर के पास आ कर बैठ गया. हाथो को देखा तोह हलके भीगे थे लेकिन पत्तिअ वैसे हे थी. यहाँ बेहद शान्ति थी और एक ठंडक जैसी पुलिया के ऊपर तोह बिलकुल न थी.

"तोह आज तुम इस तूफान में भी घर न रुक सके अपने और मेरी सहेली को देखने आ पहुंचे.", पीछे से आई इस आवाज पर अर्जुन ने देखा तोह काजल घाघरा कमीज पहने हाथ में लौटा लिए कड़ी थी.

"तुम्हे कैसे पता चला के मई इस तरफ बैठा हुआ हु?", उसको हैरानी हुई क्योंकि वो तोह उनके खेतो के दूसरी तरफ यहाँ बैठा था जहाँ से नजर तोह वो आ नहीं सकता था और साइकिल आज उसके पास थी नहीं.

"वो तुम जहा बैठे हो वही पर तोह ये घात बना है. और मई आई थी यहाँ पाँव धोने के लिए और तुम दिख गए." उसकी बात सुनकर अर्जुन ने काजल के गोर पाँव देखे जहा थोड़ा कीचड लगा था. फिर जब उसने नजर उसके पीछे की तरफ की तोह काजल ने हे जवाब दिए.

"सविता थोड़ी देर तक आएगी. गाये खेत में बाँध रही है.", इतना बोल कर वह घाघरा ऊपर करती उस ईंटो की एक बड़ी तालाब से घात की दिवार पर कड़ी हो घाघरा ऊपर करती अपने गोर मांसल पाँव उस ठन्डे पानी में दाल कर हौले हौले हिलने लगी. पानी में बनती तरंगे देखता अर्जुन उसके पाँव भी धान से देखने लगा. बेशक वो तंदरुस्त लड़की थी लेकिन गोरी पिंडलियों पर मासपेशिया बता रही थी की वो मेहनती और जानदार भी थी. चांदी की पतली घुंगरू वाली पाजेब हल्का शोर सा करती हर बार हिलने से.

"ये भी मजेदार खेल है." अर्जुन को अपनी पाँव देखते हुए भी नजरअंदाज करती वो मुस्कुराती बोली.

"हाँ. ये पानी की तरंगे कैसे एक लाये में बनती है फिर गायब हो जाती है.", अर्जुन को ाचा लगा के लड़की ने उसके घूरने को नजरअंदाज कर दिए था. अब नहर के पार देखने लगा तोह काजल फिर बोल उठी, " वह सामने न वो जमीन है जो जंगल के साथ वाली, वो साड़ी हमारी है. गाँव में कुल 16 परिवार है लेकिन हमारे पास पूरे 25 किल्ले है. उस जगह पे तोह बेरी के बहोत झाड़ है.", अर्जुन बस इस चुलबुली की बातें सुन रहा था बिना उसकी तरफ देखे. एक अपराधबोध सा महसूस हुआ था जब वह उसके पैरों की सुंदरता निहार रहा था और काजल ने ये देख लिए था.

"इतनी जमीन है फिर भी तुम्हारे पिता जी दूध का काम क्यों करते है?", अर्जुन jaan-na चाहता था उसके परिवार के बारे में.

"अब ऐसा है के बापू सिर्फ उनके घर में दूध डालने जाते है जिनको वह बहोत समय से जानते है. और ये उनकी आदत बन गई है, उनके चक्कर में तोह अब मेरा भाई भी ये सब करने लग गया है. नहीं तोह वो तोह 8 बजे घर से निकलता है और सीधा रात में 7-8 बजे आता है. बापू बस khet-khalihaan और उनकी gaaye-bhains में दुनिया बनाये रहते है." काजल अब कोई ऐसी बात नहीं कर रही थी जैसे वह कल करती दिखी थी. लगता था के जैसे वह बात करना चाहती है लेकिन शायद दोस्त ज्यादा नहीं है.

"और तुम्हारी माँ. वो क्या करती है?", अर्जुन ने भी उसको बोलने का मौका दिए.

"वो पैसे संभालती है और हिसाब किताब देखती है साड़ी जमीन और दूध का. समय मिल जाए तोह मेरी खिंचाई नहीं मेरे भाई को सीने से लगाए रहती है.", इस बार वह हंसती हुई ये बात बोली.

"तुम लड़की ाची हो. मुझे तोह कोई वजह नहीं लगती की वह तुम्हे daant-ti होंगी. और अगर वो तुम्हारे भाई को प्यार करती है तोह इसका मतलब तुम अपने बापू की लाड़ली हो.", अर्जुन के इस सटीक जवाब से वह एक बार फिर मुस्कुरा दी. भरे भरे गाल ाचे लग रहे थे. इतनी देर बाद अर्जुन ने उसकी तरफ देखा था, जो अब घात की तरफ पीठ करके पाँव जमीन पर लटकाये बैठी हुई थी.

"वैसे तुमने नहीं बताया के तुम यहाँ क्यों आते हो? सविता तोह कही बहार जाती नहीं तोह सपने में आने से रही.", अर्जुन उसकी बात पर सहज होता हुआ बोलै.

"नहीं. मई रोज घर से दौड़ लगाने निकलता हु तोह फिर एक दिन तुम्हारे पिताजी गाँव के मदद पर मिल गए थे. बस उनके जरिये पता चल गया के इस तरफ भी हरियाली और शान्ति है तोह मई इधर आने लगा. और सही बताऊ तोह तुम्हारे गाँव का सबसे ाचा हिस्सा यही है जहाँ हम बैठे है.", और फिर वह नहर में बादलो की परछाई देखने लग गया.

"जगह तोह और भी है इस से ाची. आते रहोगे तोह देखोगे. ये तोह फिर भी ऐसी जगह है जहा पुलिया की वजह से dhor-dangar आ जाते है. लेकिन उस तरफ तोह बस जंगल, नहर और कभी कभी koyal-mor-toute होते है. फूल और फल भी लगते है वह लेकिन अब इतने लोग तोह है नहीं हमरे गाँव में न सड़क तोह वह कोई नहीं आता." थोड़ा आगे की तरफ इशारा करती वह चहकती सी बोली.

"तू अभी तक यही बैठी है.?", सविता वह आई तोह अर्जुन को भी देखा और फिर शांत हो गई.

"है तेरी गाये बांध गई? मैंने सोचा तू समय लगाएगी तोह तेरा दोस्त चला न जाये. यहाँ आ गई इसके पास.", सविता उसकी बात पर आँखें दिखने लगी तोह अर्जुन भी उसकी बड़ी बड़ी काली आँखों को देखने लगा. दोनों सहेलियों ने उसकी ये हरकत देख ली थी. अब जहाँ काजल के चेहरे पर नटखट मुस्कान थी वही सविता का चेहरा लाल हो चूका था.

"ये बचे हुए पैसे aapke.",Ek 50 को नोट अर्जुन की तरफ करती वह दूर हे कड़ी रही है.

"ऐसे तोह ये उड़कर मेरे पास आने से रहा.", अर्जुन ने वही बैठे हुए हे कहा और हाथ बढ़ने का कोई उपक्रम न किआ तोह सविता हलके कदम बढाती सी उसकी तरफ जाने लगी थी.

"ये लीजिये.", उसके सर के पास खड़े होते हुए सविता ने हाथ आगे किआ तोह अर्जुन ने पट्टी लगा हाथ सामने बढ़ा दिए.

"तुम हमेशा हे चोट खाये रहते हो क्या?", सविता उसके हाथ को देखते बोली तोह काजल ने अर्जुन से पहले हे जवाब दे दिए.

"मैंने कहा था के ये पहलवान है अब इसकी उंगलिया बता रही है न." अर्जुन हँसता हुआ पत्तियां खोल कर बोलने लगा.

"पहलवान नहीं वो मई स्टेडियम में बॉक्सिंग सीखता हु तोह कल बस वही अभ्यास करते हुए थोड़ा सूज गई थी.", दोनों सहेलियां उसकी और देखने लगी.

"तुम खिलाडी हो?", काजल ने कहा

"नहीं तोह. बस सीखने के लिए और अपने जोश को सही तरीके से लगाने के लिए मई करता हु." सविता भी अब अपनी सहेली के पास बैठ गई थी. उसका दिल तोह था अर्जुन को jaan-ne का और उस से बातें करने का लेकिन एक झिझक और फिर काजल का वह होना.

"जोश तोह कही और भी दिखा सकते हो और मेहनत भी हो जायेगी.", काजल की द्विअर्थी बात को सविता समझ गई तोह वो उसके हाथ पर मारती नकली गुस्सा दिखने लगी.

"दीदी, बाबा बुला रहे है खेत पे.", ये छोटा लड़का सविता का भाई था जो दूर से आवाज दे रहा था एक हाथ से निक्कर पकड़ कर. उसकी बात सुनकर सविता कुछ इशारा करती काजल को और एक बार अर्जुन की तरफ देख वह से चल दी. अर्जुन ने एक बार उसको जाते देखा और फिर अपनी उंगलिया देखने लगा जो थोड़ी चमक रही थी लेकिन सच में अब वह सूजन नहीं थी.

"चलो जब तक वो आएगी मई तुम्हे मेरी खास जगह दिखती हु." काजल भी कड़ी होती बोली तोह अर्जुन भी बस अपना सर हाँ में हिलता उठ कर उसके साथ चलने लगा. दोनों लड़कियों के साथ ऐसे इतनी सुबह बैठ कर बातें करना उसको बहोत ाचा लगने लगा था. तीसरी हे मुलाक़ात तोह थी लेकिन जैसे वह आज बातें कर रहे थे ऐसा लगता था के तीनो जैसे काफी सालो से एक दूसरे को जानते हो.

"यहाँ आगे कभी कभी सांप भी निकलते है लेकिन मेरे बापू कहते है के ये नहर और खेतो वाले सांप जेहरीले नहीं होते और चूहे खाने के लिए इस तरफ आ जाते है." काजला इठलाती हुई उस 2 फ़ीट चौड़ी झाड़ियों से घिरी पगडण्डी पर इठलाती सी चलती अपना घ्यान बघार रही थी. घाघरे में पीछे से हिलते कूल्हे उसके जिस्म का भूगोल बताते लगते थे. फिर अर्जुन उसके पीछे चलता उसके मुस्कुराते चेहरे को देखने लगता जब वो बार बार मुँह पीछे करती. कानो में छोटी सोने के बाली भी जैसे और आकर्षण बढ़ा दे रही थी.

"तुम बड़ी हिम्मतवाली हो फिर तोह. क्योंकि जितना मई जानता हु लड़कियां तोह कॉकरोच से भी डर जाती है और चूहों से भी." अर्जुन अब घने पेड़ो के बीच से गुजर रहा था और काजल के घाघरे पर भी कही कही झाडिया टकरा रही थी. ये इतनी घनी जगह थी की 6 बजे के लगभग समय भी यहाँ बहोत हे काम उजाला था. ऊपर से घने बादल भी एक वजह थे.

"यहाँ गाँव में तोह सब काम खुद करने होते है. फसल कटाई में देखना कभी कितनी मेहनत लगती है. कमर और हाथ तोह पहले दिन जवाब हे दे जाते है लेकिन अगले दिन आदत हो जाती है.", अर्जुन को पता चल गया था उसके मांसल शरीर का राज.

"ये देखो. ये है मेरी ख़ास जगह." एक छोटा सा घात नहर के पानी से भरा हुआ और ऊपर से घने पेड़ो किसी छतरी की तरह उसके ऊपर झुके हुए थे. छोटे paudho-jhadiiyon पर safed-peele-laal जङ्गली फूल और एक जगह साफ़ पक्की जमीन, शायद वह पगडण्डी का ये आखिरी हिस्सा था. कुछ सफेदे और खैर के पेड़ जमीन के सामानांतर पड़े हुए थे.

"हाँ ये है तोह बड़ी ाची जगह. लेकिन तुम्हे यहाँ अकेले तोह कभी नहीं आना चाहिए." कही कही जमीन और पेड़ के नीचे मिटटी में बने बिल देकते हुए उसने ये बात कही तोह काजल एक गिरे हुए पेड़ पर बैठ कर बोली, "यहाँ तोह सविता भी नहीं आती मेरे साथ. एक दिन नेवला देख लिए था उसके बाद तोह यहाँ आने का नाम लेते हे वह मन कर देती है." काजल हंसती हुई बोली. "लेकिन मुझे ये पसंद है और फिर ये नहर भी तोह है यहाँ. अगर भागना हे पड़े तोह तैरना ज्यादा आसान है."

"बहादुर लड़की हो. ाचा लगा ये जानकार. मई तोह समझा था तुम सिर्फ शरारती और ज्यादा बोलने वाली हे हो." उसके थोड़ा सा पास बैठ ते हुए अर्जुन नहर के उस तरफ देख रहा था जहा घने वृक्ष के बीच हलकी झाड़ियां हिलने लग रही थी.

"वो वह रोज होंगे. कभी कभी खेतो में भी आ जाते है लेकिन कुत्ते पीछे लग जाते है इनके तोह फिर जंगल में भाग जाते है ये.", काजल ने उसकी आँखों का पीछा कर लिए था. और अर्जुन को एक बड़ी सलेटी रंग की हिरण जैसी नीलगाय वह दिखी. ऊंचाई तोह किसी घोड़े के जैसी थी.

"ये नर है. वही इतने बड़े होते है लेकिन इंसानो से दूर हे रहते है ये.", काजल की बात पर अर्जुन ने एक मुस्कराहट के साथ उसकी तरफ देखा तोह वो भी एक बड़ी मोहक मुस्कान से वैसे हे देखने लगी. और अगले हे पल पूरा आसमान safed-lal हो उठा. गर्जना इतनी तेज थी की मुस्कुराती हुई वह हिम्मती लड़की उछलती सी अर्जुन के सीने आ लगी थी. दिल तोह एक बार अर्जुन का भी हिल गया था इस अचानक megh-dahaad को सुन कर. क्योंकि पल भर में साड़ी शान्ति ख़तम सी कर दी थी. पानी की मोटी मोटी बूंदे जब पत्तो पर गिरने लगी तोह एक अलग हे शोर सा भर उठा वह. अर्जुन के एक हाथ भी काजल की पीठ से लगा हुआ था. उसका जोरो से धड़कता दिल और मॉटे दूध उसको अपनी छाती पर महसूस हुए और फिर सॉरी बोलती हुई वो नजरे झुका कर अलग हो गई. नहर की सतह पर पड़ती बारिश एक अलग संगीत सुना रही थी और पत्तो पर गिरती अलग. वो नीलगाय जिसको काजल रोज कह रही थी उन्हें देखकर वापिस जा चुकी थी.

"कोई बात नहीं. सच बोलू तोह डर तोह मई भी गया थो क्योंकि ऐसा तोह बिलकुल भी अंदाज नहीं था.", हँसते हुए उसने इतना कहा तोह हल्का शर्माती सी काजल भी उसका चेहरा देख मुस्कुरा उठी. उसके चेहरे पर भी बारिश के बूंदे गिर रही थी, जो पत्तो से टपक कर आई थी. पलके खोलती झपकती वो अपनी ब्याह से जब उन्हें साफ़ करने लगी तोह उसके कैसे हुए दूध और उभर गए कमीज के ऊपर होने से.

"यहाँ भीग जायेंगे हम दोनों. और उधर नहर पर देखो जरा के बारिश कितनी तेज है. पुलिया तक जाते हुए या तोह पूरे गीले हो चुके होंगे या फिर चिकनी मिटटी में फिसल कर कही गिर पड़ेंगे." काजल कड़ी होती हुई एक बरगद के पेड़ की तरफ चल दी. वही शायद इतना घाना था के कुछ देर तक उन्हें बचा सकता था. नहीं तोह बबूल, सफेदे और नीम के वृक्ष तोह किसी काम के नहीं थे इस समय. अर्जुन भी 15 कदम पीछे इस घने पेड़ के नीचे आ कर खड़ा हो गया था. पगडण्डी भी यही ख़तम होती थी और उसके हे नीचे वो समतल साफ़ जमीन थी जहा दोनों खड़े बस बारिश का ये नजारा ले रहे थे.

"कहते है के जंगल में हे सबसे ज्यादा बिजली गिरती है बारिश के समय." अर्जुन की बात पर काजल थोड़ा सेहम गई और उसकी तरफ देखने लगी जो मुस्कुरा रहा था.

"तुम मुझे डरा रहे हो न? मई सिर्फ इस आसमानी बिजली से हे डर्टी हो और किसी चीज से नहीं. लेकिन ऐसे मत डराओ मेरा दिल घबराता है इसकी आवाज से हे."

'गडढाआजमममममममम तडडडडआककककककककक' की एक भयंकर सी आवाज उनसे शायद 500 गज दूर हे गिरी आसमानी बिजली की हुई तोह पूरा जंगल जैसे थरथरा उठा. पक्षियों की आवाज भी जैसे चीख चीख कर और भयंकर बना रही थी इस पल को. काजल तोह सदमे से उछलती हुई हे लिपट गई अर्जुन से जिसको इस बार कुछ खास फरक नहीं पड़ा था इस गर्जना से लेकिन भीगी हुई काजल का बदन अपनी बाहों में होने से उसके शरीर में भी एक अंग फड़कने लगा था. अर्जुन का एक हाथ उसके भरी नितम्भ पर और दूसरा पीठ से कंधे की तरफ लिप्त हुआ था. नरम दूध सीने से डब्ब चुके थे. और इस बार काजल ने सर पीछे किया तोह उसमे को शर्म नहीं थी जैसा पहली बार हुआ था. बस एक बार गंभीरता से अर्जुन को चेहरे को देखने के बाद अपने भीगे होंठ उसने अर्जुन के मुँह पर लगा दिए. आँखे बंद किये वह इस तगड़े शरीर से कास के लिपटी बस होंठो को चूस रही थी. शायद इस सब में वह उस डराने वाली आवाज को अनसुना कर रही थी. मॉटे कूल्हों को दोनों हाथों में भर के दबाता भी इस जाटनी के शरीर का भूगोल माप रहा था. लुंड महाराज तोह जैसे काजल की नाभि को हे छूट समझ कर हमला करने की सोचने में लगे थे.

"ये गलत होगा." अर्जुन ने खुद को काजल से अलग करते हुए कहा और उस विशाल वृक्ष के तने से पीठ लगा कर आँखे बंद किये खड़ा हो गया. उसकी भी साँसे जोरो से चल रही थी. काजल किसी घायल शेरनी जैसे बस अर्जुन को ऐसे घूर रही थी जैसे उसके मुँह से शिकार छिटक कर वापिस उसको हे चिढ़ा रहा हो. दोनों भारी छात्याँ फूल कर हिल रही थी और गोरा चेहरा उन्माद में लाल हो चूका था. एक लम्बी सांस लेकर वह खुद हे अर्जुन को सामने से चिपकती बोली, "मई तोह अब कर के रहूंगी. सही या गलत वह तुम मुझे बाद में बता देना.", पाजामे के ऊपर से उसका खड़ा लुंड दबती वो एक बार फिर उसके होंठो को जंगली शेरनी से काटने और चूमने लगी तोह अर्जुन भी अब पीछे न हटा. कमीज के ऊपर से हे उसके दोनों बड़े चुनचे हाथो में लेकर दबाता वह उसको अपनी जगह पेड़ के तने से लगा कर चूमने लगा था. इधर पजामा थोड़ा नीचे सरका के काजल अब उसका वो मोटा हथियार बहार निकल कर जैसे मुट्ठ मारना का उपक्रम करने में लगी रही.

"तेरा तोह घोड़े का है रे." अर्जुन का चेहरा हटा कर वो उस से अपने दूध मिंजवाती अब इस फूले हे भूरे लुंड को देखने में लगी थी जीका हत्था उसकी मुट्ठी से बहार था और सूपड़ा भयंकर मोटा और लाल.

"पहले भी तुमने किसी का देखा है क्या?", इस घने जंगल में और बरसते मेघ के बीच बस ये 2 लोग हे थे. जहा काजल अब उसके लुंड को पकडे हुए घूर रही थी और अर्जुन ने अपना एक हाथ घाघरे के ऊपर से उसकी जांघो के बीच दबा रखा था.

"हाँ तोह नहीं क्या. मेरे होने वाले पति का और गाँव में एक 2 लोगो को पेशाब करते हुए देखा था. लेकिन ये तोह सबसे हे बड़ा है जितने आज तक देखे है मैंने.", थोड़ा सच और थोड़ा झूठ बोलती काजल की एक तेज सिसकारी निकल गई जब उसकी छूट पर अर्जुन की उंगलिया महसूस हुई. 'सीईई'

"तुम चाहती हो के हम वो सब करे जो तुम्हारे होने वाले पति के साथ तुम्हे करना चाहिए.?", उसके चेहरे को प्यार से देखते हुए अर्जुन ने ये बात कही तोह काजल ने अपने होंठ उस के साथ जोड़कर अपना जवाब दे दिया. लुंड को छोड़कर काजल ने अपना घाघरा ऊपर उठाना शुरू किआ तोह अर्जुन बस उसकी गोरी मांसल जांघो को अनावृत होते देखने लगा. कमाल का शरीर था उसका. जवान, गठीला, चिकना और मादकता से भरपूर. घाघरे के पूरा ऊपर उठती काजल ने उसके कमर के नाड़े में फंसा लिए था. छूट का लम्बा चीरा और बीच से दिख रही लाल फांक. छोटे छोटे किसी नौजवान की दाढ़ी से बाल छूट के ऊपर पेडू तक थे. लेकिन ये उतने घने या ज्यादा फैले न थे. अपनी उलटे हाथ की पहली ऊँगली से उस लकीर को सहलाते हुए अर्जुन ने छूट का जायजा लेना शुरू किआ तोह काजल पेड़ से लगी थोड़ा कसमसाने लगी थी. मोटी छातियां जैसे उस चोलीनुमा कमीज का कपडा फाड़ने की हद्द तक तन्नै सी उभर चुकी थी. एक बार फिर काजल के हाथ ने मजबूती से उसका लुंड को जकड चूका था क्योंकि एक लम्बी ऊँगली उस की गीली छूट में आधी अंदर बहार होने लगी थी.

"तुम संभल लोगी मेरा या ..", अर्जुन ने दूसरा हाथ उसके कमीज में डालते हुए पूछना चाहा हे था के काजल ने लुंड को खींचते हुए अपनी जांघो के बीच लगा लिए.

"फिर तोह ऐसे शरीर का होना किसी काम का नहीं जो तेरे इसकी मार न सेह पाया तोह. दिल तोह तुझ पे तभी आ गया था जब तू बापू के पास खड़ा था. लम्बा चौड़ा शरीर और जितने प्यार से तू बात करता है. और जब सविता के साथ तुझ से कल मिली थी तोह पक्का कर लिए था के ससुराल जाने से पहले तुझ से अपनी जवानी खिलवा कर हे जाउंगी. लेकिन आज इस मौसम ने मेरी बात 2 दिन में हे मान ली.", बोलिटी हुई वह उसके लुंड को अपनी छूट के होंठो पर रगड़ रही थी जहा अर्जुन की पूरी ऊँगली अंदर धंसी थी.

"चल अब जल्दी कर अगर ये बारिश रुक गई फिर शायद अधूरा न रह जाए ये काम.", काजल को कुछ ज्यादा हे जल्दी थी क्योंकि बादल तोह अभी बरसना रोकने के विचार में कटाई न थे. अर्जुन छूट से अपनी गीली ऊँगली निकलता उसकी कमर को दोनों हाथो से थाम के खड़ा हुआ तोह काजल ने खुद हे छूट की दरार में उसका वह टमाटर सा सूपड़ा फिरते हुए छूट के छेड़ पर लगा लिए.

"जरा रुक एक मिनट.", अपनी हथेली पर थूक लगाकर काजल ने सुपाड़ी पर मसल दिए और एक बार फिर वापिस छेड़ पर टिका लिए. छूट का चीड़ तोह गायब हो गया था इसकी चौड़ाई के पीछे. इधर पेड़ का तना भी बरसते पानी से भीग चूका था लेकिन उनके शरीर पर बस कुछ छोटी छोटी बुँदे हे गिर रही थी.

काजल के होंठो को मुँह में लेते हुए इस बार अर्जुन ने उलटे हाथ से लुंड को पकड़ा और काजल की फैली हुई टांगो के बीच में धक्का जड़ दिए. एक बार तोह अंदर से पूरा वजूद तक हिल गया था काजल का इस करारे धक्के और छूट में घुसे उस मॉटे सुपडे से. लेकिन थी वह ज़िद्दी और हिम्मत वाली जो इस धक्के को अपने तगड़े शरीर पर सेह गई थी. 3 इंच तक लुंड और सूपड़ा छूट को फैलते अंदर जा चुके थे और इधर पहली बार अर्जुन का हाथ कमीज के अंदर से उसके एक नंगे और बड़े गुब्बारे पर टिक गया था.

"सच में बड़ी हिम्मत है तुम में." ाचे से उसके होंठ पीने के बाद अर्जुन ने अब दूसरा हाथ भी कमीज में घुसते हुए कहा तोह दर्द को बर्दाश्त करती काजल ने उसका वह हाथ पकड़ लिए. और खुद हे अपने कमीज को ऊपर खींच कर दोनों बड़े दूध उजागर कर दिए. एक रुपये के सिक्के से कुछ बड़े गोल हलके भूरे घेरे के बीच में किशमिश के जैसे 2 लम्बे नुकीले चूचक जोश से सर उठाये थे. 4-4 किलो के वह दूध के कलश बता रहे थे के इनकी मालकिन की म्हणत की वजह से वह इतने गोश्त से भरे और कड़े है. दोनों हाथो में नीचे से उन्हें पकड़ कर अर्जुन ने एक निप्पल अपने मुँह में भर लिए. खड़े होने की स्तिथि कुछ ऐसी थी की 2 फुट अपने पाँव फैलाये काजल छूट में लुंड लिए पेड़ से चिपकी थी और उसका साथ देता अर्जुन अपने घुटने हलके मदद कर सामान कद बनता उस से चिपका हुआ एक दूध को पकडे दूसरा पीने में लगा था.

"ये तुम बाद में पी लेना जितना मर्जी. निकाल तोह दिए मैंने खुद हे बहार लेकिन पहले नीचे वाला काम आगे बढ़ाओ.", उसके कंधे का सहारा लेती काजल बोली तोह अर्जुन ने वैसे हे दूध पीते हुए दूसरा मोटा चुका छोड़ कर हाथ जांघ के नीचे जमाया और हल्का सा फंसा हुआ लुंड बहार कर बड़ा तगड़ा धक्का लगा मारा. इस पूरी कोशिश के बावजूद वो अपनी आवाज न दबा सकीय थी.

"ोुउउउइइइइइइ माँ रीई... मार दिए बहनचोद. छूट फाड़ दी रे तेरे इस लौड़े ने मेरी.. ाःह.", आँखों में दर्द की वजह से आंसू आ गए थे और सर अर्जुन के कंधे से लगाती काजल अब पूरी जमिनदारनि वाली भाषा बोलने लगी थी. 7 इंच के लुंड ने छूट को उसकी औकात दिखते हुए चूड़े हुए छेड़ से भी खून निकाल दिए था. अर्जुन ने उसके दोनों कूल्हे थामते हुए उसको अपने से ाचे से चिपका लिए. पीठ को सहलाता हुए बस वो लुंड घुसाए उसको आराम देने में लगा था लेकिन काजल बड़बड़ाये जा रही थी, थोड़ा थोड़ा.

"मेरे खसम का लिए था मैंने अंदर. साले का बस चुभा था.. आह और तेरे वाले ने तोह.. ुह्ह्ह्ह मेरी माँ छोड़ दी.", अर्जुन को उसकी गालियां और ऐसा बड़बड़ाना जैसे उत्तेजित कर रहा था. कमाल की लड़की थी वह जो न लुंड बहार निकाल रही थी और ना गालिया बंद कर रही थी.

"अब खड़ा रहेगा या ढीली करेगा इसको. फाड़ तोह दी और तोह फटने से रही अब..." दर्द में हल्का सिसकती वह सीने से सर हटा के अर्जुन को देखती बोली. गीले चेहरे पर भी उसकी आँखों की नमी अर्जुन को दिख गई थी. जो की लाज़मी भी था जब इतना मोटा डंडा एक अधखिली कच्ची छूट को फाड़ कर अंदर जा चूका हो. छूट भी किसी बालो में लगाने रबर की तरह लुंड पर कासी हुई थी.

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अर्जुन ने प्यार से उसके आँखों में आये पानी को चूम लिए और गाल पर लगी पानी की बुँदे भी. थोड़ा सा कमर को पीछे करता वो अब होंठ पीते हुए वापिस अंदर करने लगा तोह दोनों को हे रगड़ दर्द और थोड़ा मजा दे रही थी.

"आह.. पूरा घोडा है रे तू. सच में पेट तक पहुंचा दिए मेरे तूने.", अब फिर से वह नरमी से बातें करती सिसकारियां लेने लगी थी.

"वैसे गालिया बहोत देती हो तुम." अर्जुन मुस्कुराते हुए आधा लुंड अंदर बहार करता बोलै तो इस 5-6 मिनट के धक्को में वह संभल चुकी और मजे से उस से लिपटी हे बोली, "Gaanv-dehat में तोह सब ऐसे हे बोलते है. अभी तुमने मेरी माँ या पड़ोस की भाभियों की गालियां कहा सुनी. ये तोह मई दर्द में बोल गई.", अब उसको शर्म आ रही थी याद करके की वह कितना गन्दा बोल गई थी गुस्से में. और फिर भी ये उस को प्यार से मन रहा था.

"क्या बोलती है वह? बताओ मुझे भी. मैंने कभी ऐसा सुना नहीं.", अर्जुन ने उसका धड़ वापिस पेड़ से लगते हुए दोनों मॉटे दूध दबाते कहा. Neeli-hari नस्से उन गोर चुंचो पर उभरी हुई अर्जुन को और उकसा रहा थी.

"aah-aah.. आराम से खींच रे. और बड़े न कर नहीं तोह बस सब यही देखेंगे." छूट कृतवती हुई काजल उसके हाथों पर हाथ रख कर अपने चुंचो का मर्दन हौले करने को कहने लगी..

"मेरी माँ जब खेत में काम करने वाली औरतो से बात करती है तोह.. आह.. ाची गालियां देती है. और एक दिन मैंने उन्हें भाभी से कहते सुना था.. आह उम्... की तू दिन में भी अपना भोसड़ा फैलाइये लेती रहती है खसम के सामने आह.. वो चुटिया बिजली वाला तुम्हारी gaand-masti देख रहा था... ऐसे हे मेरी पड़ोस वाली भाभी भी बहोत गलियां या गन्दी बातें करती है." उसकी इन बातों का मजा लेता अर्जुन कमर चलते हुए अब उसके निप्पल जोर से चुसकने लगा तोह वह भी पूरी मस्ती में भरी खुद से दूसरा दबा रही थी.

"वैसे तुम्हारा शरीर सच में सुन्दर होने के साथ हे मजबूत बहोत है काजल. और ये तुम्हारे बूब्स मुलायम भी और सख्त भी, दोनों है." निप्पल उमेठते हुए अर्जुन आराम से हे उसको छोड़ने में लगा था. उसके धक्के अभी तक तेज नहीं हुए थे.

"आठ.. काम से मजबूत हो जाता है लेकिन नहाते हुए दही या malaai-haldi से मालिश करती हु. और सोने से पहले मालिश करती हु जिस से बड़े भी हो गए और लटके भी नहीं." उसके लुंड का मजा लेती वह गहरी सिसकरिअ भर्ती अब थोड़ा थकने लगी थी. कमर से ऊपर दोनों इस समय भीग चुके थे और जमीन पर भी पानी खड़ा होने लगा था.

"आह एक बार रुक जरा." अर्जुन ने उसकी बात मानते हुए लुंड बहार खींचा तोह सूपड़ा बहार निकलते हे थोड़ा दर्द हुआ उसको.. छूट का छेड़ जो पहले सिर्फ एक दाल के दाने जैसा था अब ाचे से फ़ैल चूका था. पाँव वैसे हे खोले वो कराह रही थी लुंड बहार आने के बाद. अपने कमीज को बहार निकाल कर उसने घाघरा भी उतार दिए. ओढ़नी जाने कब से जमीन पर गिरी पड़ी थी और गीली हो चुकी थी.

"देख क्या रहा है, तू भी तोह खोल अपने कपड़ो को. तेरा ये लुंड थकने वाला नहीं क्योंकि मेरा तोह अभी एक बार हो भी चूका है. वह लेत के करते है." अर्जुन को समझ आया था के वह लुंड जब बहार निकला तोह ये कराह नहीं रही थी बल्कि इसका चरम हो चूका था. फिर काजल के इस रोमांचक फैंसले को स्वीकार करता वो अपनी टीशर्ट उतार कर जब पाजामा उतरने लगा तोह काजल ने रोक दिए.

"ये तोह न उतार फिर जूते भी पानी से भर जायेंगे."

"वो वैसे भी भरने वाले हे है तोह यही पेड़ के नीचे रहने देता हु इनको." पूरे कपडे निकल कर वो आदिवासी की तरह नंगे पाँव हे चलता काजल के साथ घात की दिवार पर आ गया. अपनी कमीज और उसके पाजामे को तेह लगाती उसने वो कपडे उस 9 इंच चौड़ी दिवार पर बिछा दिए फिर ऐसे हे अपना घाघरा नीचे बिछाती उसकी मुलायम टीशर्ट को ऊपर फैला कर वह वह लेत चुकी थी. इस जगह ना तोह बारिश की बूंदो से बचा जा रहा था और न हे कोई परवाह की इस लड़की ने. अर्जुन को तोह ये सब जैसे एक सपने सा लग रहा था. उसने नहीं सोचा था के बीच जंगल इतनी बारिश में वह खुले आसमान के नीचे एक ऐसी लड़की की कभी चुदाई करेगा जो शरीर और हिम्मत में उसके टक्कर हे होगी, या थोड़ी ज्यादा हे. उस 2 फुट की दिवार के दोनों तरफ पाँव रख के अर्जुन ने काजल की टांगो को फैलते हुए अपनी कमर के गिर्द लपेटा और उस खूब उभरी हुई छूट पर लुंड रखते हे अंदर तेल दिए.

"आह रे.. कितना खाली लग रहा था जब ये बहार निकल गया था." उसकी बात के साथ हे अर्जुन ने दूसरे धक्के में पहले जितना 7 इंच तक लुंड पेल दिए था.

"मजा आ गया रे पहलवान. तू सच में तगड़ा है." अर्जुन की चौड़ी छाती को निगाह भर देख अपने ऊपर झुकाती वो बीच जंगल में उसके नीचे दबी छुड़वा रही थी.

"पूरा दाल दू क्या?", अपने हाथ से उसके दूध दबोचते हुए ये बात कही तोह काजल हैरान होती उसके देखने लगी. लेकिन आँखों में बारिश की बुँदे गिरी तोह वह झट से बंद हुई और उसकी आँखों का इशारा मिलते हे थोड़ा लुंड बहार खींचे हुए अर्जुन ने कास के पूरा जड़ तक थोकक दिए. वो इस आखिरी डेढ़ इंच में तोह बुरी तरह तड़फ गई. छूट के बहार अर्जुन के अंडकोष भीड़ चुके थे.

"पागल इंसान क्यों भोसड़ा बना रहा है छूट का.? माँ बचा ले ऋ इस dhi-chod से. आ ऋ मेरी छूट.." अर्जुन को अब समझ आया के वह इशारा नहीं था आँखों में पानी की बून्द गिरने से वह गलत समझ बैठा था. वैसे हे वह अब गिर रही थी तोह वो उसके चेहरे के ऊपर तक आ गया था. बदन तोह पूरे हे गीले हो चुके थे और अर्जुन की पीठ पर ताबड़तोड़ पड़ती वो बूंदे उसको ठंडक देती उकसाने में लगी थी.

"गलती से मुझे लगा के तुमने आँखें बंद कर के हाँ कहा है." अर्जुन ने अपने कूल्हे वापिस चलते हुए कहा.

"अब भी कुछ बचा है तोह दाल दे मेरे अंदर और आज हे मार दे. कल तक जिन्दा छोड़ने वाला तोह है नहीं तू. आह.. आह." बात ख़तम होते हे उसको मजा आने लगा था इन गहरे धक्को से. छूट सिकुड़ने लगी थी और ठण्ड की वजह से रोयें भी खड़े होने लगे थे काजल के दूध, जांघ और बाहों पर.

"बड़ा गजब का है रे तू. इतनी देर में कोई दूसरा तोह 2 ख़तम हो चूका होता. आह.. मेरे छूट के अंदर कुछ जोर का हो रहा है. मेरे बूब्बे मसल जरा" उसको न इस दिवार से गिरने का डर था न श्री पर पड़ती रगड़ का. बस काम का बुखार और ये भयंकर चुदाई हे ाची लग रही थी काजल को. अर्जुन अब कस के धक्के मारने लगा था. उसकी दाई टांग कुछ सुन्न होने लगी थी ठन्डे पानी की वजह से तोह जल्दी होने के लिए रफ़्तार पूरी बढ़ा दी थी.

"अरे बूबे समझ नई आते क्या? आह जोर से पेल रे.. ये बूबे." मजे लेती वह खुद अपने दूध पकड़ के अर्जुन को दिखने लगी तोह वह दोनों को मेंजटा दबाता हर बार गांड पर थपकी मार रहा था. बारिश की आवाज के साथ हे वह उनकी चुदाई की आवाज भी गूँज रही थी. 'thapp'thap' .. 'patt-patt' और तेज aaahhh-ummmm और इस बीच अर्जुन ने उसके दूध छोड़कर दोनों टाँगे ऊपर उठा कर हवा में सीढ़ी करते हुए अब तक के सबसे गहरे और तेज धक्के लगाने शुरू कर दिए जीने वह सेह न सही और पेट को भींचती से अकड़ने लगी थी. मॉटे हिलते दूध बारिश की बूंदो से नहाते हुए अपने सूजे निप्पल दिखा रहे थे. इधर अर्जुन का सूपड़ा फूल कर फटने को हो रहा था. जैसे हे उनसे काजल की गांड वापिस दिवार पर टिकाई उसके माल की उड़ती धार सीधा काजल के होंठो और गले पर गिरी और अगली सभी पिचकारियां बाकी शरीर पर. वो बस लेती पड़ी रही. छूट khul-band होती फड़क रही थी और दोनों अपने अपने पांव एक दूसरे की और किये दिवार पर आँखें बंद किये पसरे थे.

'चैपायक' की आवाज से अर्जुन ने आँख खोली और उठकर देखा तोह काजल उस टंकी नुमा घात में डुबकी लगाती खुद को रगड़ कर साफ़ कर रही थी. वो भी अंदर उतर गया तोह थोड़ा हैरान हुआ. नीचे सीढ़ियां थी कोई आधा फ़ीट नीचे हर कदम पर. जब वह काजल के पास आया तोह छाती तक पानी आ चूका था और काजल की थोड़ी तक पानी में थी. अंदर हे उस साफ़ पानी के उसको पकड़ कर अपने पास करने लगा तोह काजल उसके चेहरे की तरफ देखने लगी और फिर जल्दी से बोल उठी

"और नहीं छोड़ना मैंने. साफ़ करने दे खुद को और घर जाने दे. एक बार और किआ तोह कसम से यहाँ से फिर उठा के हे लेके जाना पड़ेगा.", उसकी बात से मुस्कुराता अर्जुन उसके दूध दबा के और होंठ चूम वापिस दिवार की तरफ आ गया. गीले कपडे पहनता वह काजल को हे देख रहा था जो तैरती हुई आ रही थी. उसकी गांड के उभार पानी के ऊपर से नजर आये तोह बस वही नजर रह गई.

"सोचना भी मत जो तुम देख रहे हो उसकी तरफ." आँखे और पाजामे में बनते उभर को समझती वह जल्दी से बहार आई और घाघरा पहन लिए. कमीज पहन ने लगी तोह खुद हे एक बार अपने दूध से पहले कमीज को रोक कर अर्जुन की तरफ देखने लगी. अर्जुन ने एक बार फिर दोनों को मुँह में भर के चूसा तोह कमीज नीचे कर वह शर्माती सी अपनी औढनी लेने चल दी.

"वैसे वह जगह भी खूबसूरत है तुम्हारी." अर्जुन की बात सुनकर चेहरा लाल हो गया लेकिन चुपचाप आती वह ओढ़नी को पानी में साफ़ कर निचोड़ने लगी.

"जवाब नहीं दिया तुमने." अर्जुन वही दिवार पर बैठ कर बात करने लगा और एक नजर अपनी घडी पर डाली. स्पोर्ट्स घडी थी तोह पानी का तोह डर नहीं था लेकिन जो समय वो बता रही थी उस से जरूर वो कुछ सोच में पड़ गया था. 7:01

"वो जगह लेनी इतनी आसान नहीं है. भाभी ने बताया था फाग के समय के मर्द को भरी पिछवाड़ा बहोत पसंद होता है और कुछ तोह ज्यादा वही करते है. लेकिन ये आगे की तरह नहीं होता जैसे ये लचीली होती है और गीली. तोह इसको ध्यान से और आराम से हे कर सकते है. और ये तोह मई तुम्हारे साथ बिलकुल नहीं करने वाली." हंसती हुई वो कड़ी हो कर अर्जुन के पास से भाग निकली.

"और सुनो. 10 मिनट बाद यहाँ से निकलना मेरे जाने के बाद." हवा में चुम्मा उछाल कर वह निकल गई वह से.

'ये भी तोह पूरी घोड़ी हे है.' अर्जुन मुस्कुराता हुआ वह ऐसी हे बारिश में बैठा रहा. आया था सविता से मिलने और हो गया काजल से सम्पूर्ण मिलान. वाह ऋ किस्मत क्या रंग है तेरे. ठीक सवा सात बजे वह पगडण्डी से होता हुआ निकला तोह पुलिया तक जाते हुए कई बार फिसलने से बचा. यहाँ ऊंचाई थी तोह अब जगह ख़राब नहीं थी. कुछ सोचता सा चाल को और धीमा कर चलने लगा. जैसे हे वह साधू सिंह के घर के पास पहुंचा तोह वह भैंसो की छत्त के नीचे बैठे हुक्का गुदगुदा रहे थे. हर तरफ शांति थी बारिश की वजह से.

"अरे बीटा तुम इधर हे अब तक?", उनकी आवाज सुनकर वह उधर हे चल दिए तोह साधु सिंह ने एक प्लास्टिक की कुर्सी कई कुर्स्कियों के ऊपर से नीचे उतार कर उसके लिए रख दी.

"अंकल वो आज जंगल के अंदर चला गया था कुछ ज्यादा. फिर एक नीलगाय दिख कर गायब हो गई तोह उसको देखने और आगे निकल गया.", अर्जुन अपनी बाहे से पानी उतरता बोलै तोह साधू सिंह मुस्कुरा दिए.

"चलो कोई बात नहीं उम्र है अभी घूमने फिरने की लेकिन जंगल इतना ाचा भी नहीं है बीटा और सांप गीदड़ भी है अंदर घने जंगल में. तुम बैठो मई तुम्हारे लिए दूध मंगवाता हु." अर्जुन के बोलने से पहले हे उन्होंने वही से आवाज लगाईं. "Guddi-Bimla, मेरी चाय के साथ एक गिलास दूध लेती आना गरम करके शक्कर वाला. खास मेहमान है." रोबदार आवाज देते उन्होंने कहा तोह प्रतिउत्तर में किसी महिला की अंदर आँगन से आवाज आई, "जी ठीक है."

"अंकल पहले हे देरी हो गई है. मई फिर कभी दूध पी लूंगा अभी चलता हु." साढ़े सात बज चुके थे तोह वह थोड़ा चिंतित हो उठा.

"बीटा पौने एक घंटे से पहले तोह पहुँचने से रहे. मिन्दर भी अभी शहर जाने वाला है तोह मोटरसाइकिल से तुम्हे भी छोड़ देगा." उनके बेटे का नाम महेन्दर था जिसको वह मिन्दर बुलाते थे. उनकी इस बात पर अब अर्जुन को थोड़ी शान्ति हुई. बारिश अभी भी हो रही थी लेकिन पहले से गति थोड़ी काम हो चुकी थी. भैंसे अपना चारा खाती मजे मार रही थी जिनके ऊपर साधू सिंह ने बोरी ुधा राखी थी. इतनी हेर देर में अंदर से छतरी लेकर हाथ में ट्रे लिए काजल हे बहार निकली. गोर बदन पर अब एक काला सलवार कमीज था और सर के ऊपर एक चुन्नी जो सामने से उसेक उभार छुपाये थी.

"बापू ये लीजिये." ट्रे को एक सरकंडो से बानी गोल स्टूल पर रखती वो चाय का कप देती बोली तोह अर्जुन ने बस एक नजर उसके चेहरे को देख सामने सर कर लिए.

"हाँ बीटा. गुड्डी ये है अपने शहर वाले बड़े थानेदार जी के पोते अर्जुन और बीटा ये है मेरी लाड़ली बेटी काजल. अभी 12 के इम्तिहान दिए है फिर जादो में इसका ब्याह हो जायेगा.", काजल ने हाथ जोड़कर अभिवादन किआ तोह अर्जुन ने भी वैसे हे नमस्ते से जवाब दिए. थोड़ी देर पहले जिसको वो खुले आसमान के नीचे छोड़ रहा था और जो मजे से अपनी टाँगे फैलाइये नीचे पड़ी छुड़वा रही थी, ये दोनों पहली पारिवारिक मुलाकात बिलकुल अजनबियों की तरह कर रहे थे.

"अंकल जल्दी नहीं कर रहे आप इनकी शादी.?", अर्जुन ने वह गधा दूध का गिलास उठाते कहा तोह कुछ सोचते से साधु सिंह बोले

"अरे बीटा मेरी तोह इत्छा न थी अभी इसको ब्याहने की. 18 की तोह हुई पिछले संक्रात पे. वो मेरी धर्मपत्नी के jaan-pehchan के है और इन्होने इसको पसंद कर लिए जब ये अपनी नानी के घर गई थी 16 की उम्र में. फिर बिमला ने भी कह दिए के जमींदार लोग है, ghar-pariwar ाचा है और अकेला लड़का है. मैंने 5 साल मांगे थे की इसका कॉलेज पूरा करवा दूंगा लेकिन उन्होंने कह दिए के कॉलेज वह भी करवा देंगे. इस बार भर्ती हो गई है लड़के की फ़ौज में तोह दिवाली के बाद जायेगी लेकिन दाखिला मई इसका बैसाखी पर करवा दूंगा कॉलेज का." साधु सिंह की बात पर अब अर्जुन ने सर हिला दिए. और काजल बस उनकी बातें सुनती बारिश देखने लगी.

"बड़ा ाचा लगा अंकल ये जानकार के आप पढाई के पक्ष में है. मेरा मतलब भी वही था अपना प्रश्न करने का. तोह इनका ससुराल भी अपने शहर के aas-pas हे है तभी यहाँ कॉलेज में एडमिशन दिलवा रहे है." अर्जुन की इस बात पर काजल उनकी और पीठ किये मुस्कुराने लगी थी.

"हाँ तोह इसका ननिहाल कही दूर थोड़ी है. ये अपनी बड़ी यूनिवर्सिटी से अगला गाँव हे तोह है. ससुराल भी वही हो गया फिर. मेरी लाड़ली को दूर तोह मई भेजने से रहा और फौजी को भी कह दिए के पढ़ाई में दिक्कत आई तोह मई उसका court-marshal कर दूंगा." उनकी इस बात पर वो दोनों हंस दिए और काजला अंदर भाग गई.

"अररि छतरी तोह लेती जा अपनी. देख बीटा अभी तक बचपना नहीं गया लेकिन शादी की बात पर शर्मा के भाग गयी." अर्जुन इस बात पर मुस्कुरा दिए. इधर एक लाल रंग की स्प्लेंडर मोटरसाइकिल बहार निकलता उनका बीटा दिखा, जो एक सर से लेकर पाँव तक बरसात पहने था. बस दूध के कनस्तर नहीं थे उनपे.

"मिन्दर बीटा ये अपना हे बचा है, रास्ते में हे घर पड़ेगा तोह उतार के चले जाना. दूध तोह आज तुम्हे डालना नहीं है वो पहले हे डेरी वाला लेके चला गया था." साधु सिंह ने अपने बेटे से अर्जुन का परिचय करवाया तोह वह भी इस लम्बे चौड़े लड़के को देखने लगा जिसकी अभी दाढ़ी भी न आई थी. महेन्दर एक 20 साल का एक साढ़े पांच फ़ीट का लेकिन सही सेहत वाला युवक था. पीछे से हे एक hatti-katti औरत दरवाजे की चौखट तक आ कड़ी हुई. ये रंग और शरीर से हे बता रही थी की काजल की माँ थी.

"अपने पंडित जा का पौता है क्या ये?", वही कड़ी वह अर्जुन पर नजर डालती बोली और अपने बेटे की तरफ उसका बटुआ बढ़ा दिए.

"है बिमला ये डॉ. साहब का बीटा है और देख के हे लगता है के उनके जैसा है. मामूली सा जरा लम्बा ज्यादा हो चूका है.", अर्जुन ने शिष्टाचार से दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किआ तोह बिमला देवी ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिए. दिवार की ोुत्त से काजल भी झाँक रही थी चुपके से.

"ाचा भाई बैठ जाओ मई तुम्हे छोड़ देता हु फिर आगे भी जाना है.", महेन्दर की आवाज में थोड़ा उतावलापन था जिसको समझते हुए अर्जुन झट्ट से बैठ गया और साधू सिंह को हाथ हिलता उसके साथ बैठ कर निकल लिए.

"भाई तुम न अगर कभी मोटरसाइकिल खरेदो तोह बुलेट हे लेना. मेरी तोह ये हलकी सी फटफटिया तुम्हारे लिए नहीं बानी.", अर्जुन उसकी बात पर हंस दिए.

"हाँ भाई मई भी वही सोच रहा हु लेने की. अगर कोई 15 किलो बढ़ गया 2-3 इंच के साथ तोह फिर इसपर तोह बैठ हे न सकूंगा.

"सही बात है भाई. वैसे कोनसे कॉलेज में हो? तुम्हारे घर वालो में से कुछ को तोह मई भी जानता हु. डॉ अंकल को, संजीव भाई को और दादाजी को तोह ाचे से.", अर्जुन गौर से उसकी बात सुन रहा था.

"भाई अभी तोह ग्याहरवी में जाऊंगा मई. एक साल तोह स्कूल में देरी से भर्ती हुआ था ऊपर से जब हॉस्टल भेजा तोह उन्होंने भी दूसरी कक्षा फिर से करवा di.",Dono हे अगले सेक्टर की सीढ़ी सड़क पर आ चुके थे.

"कमाल है भाई मुझे लगा के कॉलेज के अंतिम वर्ष में होंगे और अखाड़े वेखदे जाते होंगे. साला तुम तोह अभी स्कूल में हो लेकिन कुछ भी कहो भाई शरीर तोह विलायती सांड सा है. बेहतर होगा अगर ये कहु के अरबी घोड़े जैसे हो. चर्बी तोह है नहीं लेकिन चौड़े ाचे खासे हो.", महेन्दर उसके शरीर से खासा प्रभावित था. और गाँव का था तोह सीढ़ी बात हे कह देता था.

"वैसे रोज सुबह 10 कम दौड़ लगता हु और शाम को बॉक्सिंग सीखने स्टेडियम जाता हु जहा थोड़ी कसरत भी करवाई जाती है. शरीर तोह भाई आपका भी काम नहीं है.", अर्जुन ने भी उसकी पलट कर प्रशंशा की तोह वो बड़ा खुश हो गया.

"घर आया करो भाई कभी हमारे भी. Shanivar-ravivaar तोह मई घर हे रहता हु और इस बहाने तुम्हे गांव दिखाऊंगा और बहोत कुछ सीख भी लूंगा.", घर के सामने मोटरसाइकिल रोकते हुए महेन्दर ने कहा तोह हाथ मिलते हुए अर्जुन ने धन्यवाद् करते हुए अंदर आने के लिए कहा. लेकिन फिर कभी आने का बोल वह निकल लिए. पूरे 8 बजे वह अपने घर आ गया था और बारिश अभी तक होने लग रही थी. अंदर आते हे सीधा बाथरूम में घुस के नहाने के बाद वो बहार से हे ऊपर चल दिए. कपडे पहन कर दरवाजा खोला तोह तारा अपने बाल सही करती दिखी.

"आ गए जनाब? वैसे सुबह के लिए थैंक्स." उसके गाल को चूम कर वो पिछले दरवाजे से उसके साथ हे नीचे उतर कर डाइनिंग टेबल की तरफ आ गई. जहाँ सभी थे इस समय.

"इतनी देर तक कहा था तू?", अलका दीदी ने बिना कुछ देखे ये बात बोली तोह ऋतू ने हाथ मारा उसके पिछवाड़े पर.

"वो बारिश तेज हो गई थी तोह वही रुक गया. फिर गाँव से आते एक दोस्त ने यहाँ तक छोड़ दिए.", वह कुर्सी पर आरती की बगल में बैठ गया जो चाय और परांठा खाने लग रही थी. ऋतू दीदी एक गिलास दूध और एक लड्डू उसके सामने रख दिए.

"वह कपडे बता देना रात को शादी में जो पहन कर जाने है. तारा को छोल अंकल उसकी कंपनी छोड़ देंगे और भैया भी 5 बजे तक आ जायेंगे.", ऋतू दीदी ने पूरा कार्यक्रम बता दिए लेकिन अभी वह वैसे हे बर्ताव कर रही थी जैसा पहले करती थी.

"ाचा अपनी पसंद से निकाल देना जो ठीक लगता हो आपको.", अर्जुन की इस बात पर वो वैसे हे मुस्कुराई जैसे ये शब्द उनके पति ने कहे हो. और इसको अलका के साथ आरती ने भी देख लिए था. प्रियंका दीदी ने अलका को बिठाते हुए एक प्लेट में परांठा और मक्खन दिए तोह वह भी सामने बैठ गई और गौर से अर्जुन को देखने लगी.

"मई खाना थोड़ी देर तक खाऊंगा दीदी. मेरा बना कर आप डब्बे में रख देना.", लड्डू ख़तम करता वह उठने हे लगा था के छोल साहब और प्रीती आ गए उनकी तरफ.

"बरखुरदार खाना अभी हे खाओगे. चाहे काम हे सही लेकिन नाश्ता समय पर होगा.", उनकी बात पर वह वही बैठ गया. तारा उठती हुई रसोईघर में प्लेट रख कर हाथ धोने चली गई तोह प्रीती अलका दीदी के साथ बैठ गई.

"दादू आप आज इतनी जल्दी जा रहे हो?", अर्जुन ने उनसे बात शुरू की तोह वह भी एक कुर्सी पर बैठ गए.

"बीटा आर्मी ऑफिस में रेइरेमेंट के बाद भी काम और फाइल ख़तम नहीं होती. फिर दोस्त भी होते है वह तोह shagan-mela कर लेते है. तू शाम को समय से ले जाना इनको शादी में मई तोह वही 10 बजे आऊंगा.", तारा को बैग लिए आते देख वो आरती और अलका के सर पर हाथ रखते बहार चल दिए.

"यार प्रीती तेरे तोह मजे है. आज तू शादी में और हम यहाँ अकेले वही chulha-chauka करते रहेंगे." अलका ने शकल बनाते हुए कहा

"हाँ दीदी. वो आपको मैंने देखा है कितना ज्यादा काम करती रहती हो आप. प्रियंका दीदी और ऋतू तोह मदद भी नहीं करते आपकी." उनकी हे तरह जवाद देती वो बोली तोह अलका उसके कान पकड़ने लगी और बाकी सभी हंसने.

"ले प्रीती तू भी आजा मेरे साथ नाश्ता कर ले.", ऋतू दीदी अपनी प्लेट उसकी बगल में रखती बोली और बैठ गई.

"वैसे तोह मई कर के आई हु लेकिन आपके साथ जरूर खाउंगी.", प्रीती को एक बार देख कर अर्जुन वापिस मुस्कुराते हुए खाना खाने लगा.

"ाचा रसोई के बाद मई ऊपर की सफाई कर दूंगी. और जो कपडे अर्जुन के धोने वाले है वह निकल लुंगी.", अलका प्लेट उठती इतना बोलकर रसोईघर में चल दी तोह आरती भी उनके पीछे चली गई.

"आप मेरे साथ खाना खा के घर चलो, बुआ बुला रही थी आपको. और मुझे भी बहोत कुछ बताना है आपको.", अर्जुन की तरफ एक गहरी मुस्कान दिखती वो बोली तोह अर्जुन को खांसी आ गई.

"लो आप पानी पियो जी." प्रीती ने फिक्र सा कस्ते हुए गिलास उसकी तरफ बढ़ाया तोह उसकी उंगलिया दबाते हुए उसने गिलास ले लिए. और अर्जुन का इतना करना हे प्रीती को चुप करवाने के लिए बहोत था. उठकर वह भी अंदर चली गई अलका दीदी के पास.

"मजा आता है उसको सताने में?", ऋतू दीदी के बात पर वो बस मुस्कुरा दिए. प्रियंका दीदी बेध्यानी में जब अर्जुन के साथ लगती हुई बैठने लगी तोह उनका मोटा बहार को निकला उभर कास के अर्जुन की कोहनी से रगड़ता गया. ऋतू दीदी तब तक उठ चुकी थी लेकिन अर्जुन को तोह ये स्पर्श महसूस होते हे मजा सा आ गया था. एक मुस्कान के साथ उसने प्रियंका दीदी के चेहरे की तरफ देखा तोह अब वो नजरे झुकाये शर्मिंदा सी खुद को ठीक करती बैठी रही.

"हो जाता है ऐसा कभी कभी. आपको नजरे नीची करने की जरुरत नहीं है.", वो अब वह अकेलटी बैठी थी तोह अर्जुन ने साथ देने के इरादे से खुद को बिठाये रखा.

"थैंक यू. ध्यान नहीं था मेरा तोह टकरा गई.", उनका दिल भी अब रफ़्तार पकड़ रहा था धड़कने की. आकर्षित तोह थी हे वह जबसे उसका मोटा उभर उन्होंने देखा था और ऊपर से जितना कुछ पिछले दिनों में उन्होंने देखा और बातें की थी, उनका दिल भी करता था के वो सब कुछ महसूस करे बस एक झिझक और उम्र में अंतर के चलते शर्म सी थी. यहाँ हर गुजरते दिन के साथ अर्जुन जैसे महीनो का अनुभव लेता जा रहा था. अर्जुन को प्रियंका दीदी के मैं में भी कुछ चलता महसूस हुआ था.

"कोई बात नहीं दीदी. वैसे आप है तोह बहोत प्यारी.", अर्जुन की इस तारीफ को प्रियंका दीदी समझ गई थी और अब शरमाते हुए खाना खाने लगी. इधर प्रीती और ऋतू निकल लिए उनके घर की तरफ. जाते हुए प्रीती एक इशारा सा करती गई जो सिर्फ अर्जुन ने हे देखा और मुस्कुरा दिए.

"ाचा आप खाना खाइये मई ऊपर चलता हु फिर दिन में आता हु आपके पास.", आरती दीदी को वह बैठ ते देख कर अर्जुन ने आरती की तरफ भी एक शरारती मुस्क़ुआन उछाल दी जिसको देख वो सर झुका कर मुस्कुराने लगी अपना कॉफ़ी का कप टेबल पर रखते हुए. प्रियंका भी अर्जुन के इस तरफ सीधा बता देने से थोड़ी खुश और थोड़ी सोच में डूब कर नाश्ता करने लगी.

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"कहा रह गई थी ऋ आज सुबह तू? और मई उधर आई थी देखने तोह तू वह पर नहीं दिखी?", सविता अपने घर खाना बनाने के बाद अब काजल के घर उसके कमरे में बैठी थी. सुबह उसको बारिश की वजह से खेत में बानी झोपडी पर हे रुकना पड़ गया था.

"अरे पहले तोह मई वही उसके साथ हे बैठी रही फिर जब कुछ बुँदे गिरने लगी तोह वह जंगल वाले घात पर बैठ कर बातें करते रहे. 7 बजे हे घर आ पाई मई बापू की वजह से.", काजल गॉड में तकिया रखे बिस्टेर पर बैठी अपनी सहेली को बताने लगी.

"इतनी देर तक तू उसके साथ वह अकेली थी?", कुछ सोचती सी वो ये बात बोली तोह काजल मुस्कुराती हुई कहने लगी

"लड़का ाचा है और बातें भी बड़ी ाची करता है. राह तोह वह तेरी भी देख रहा था लेकिन मेरे साथ हे बैठा रहा बारिश की वजह से." वह सोच कुछ रही थी और बोल कुछ.

"यकीन नहीं होता के sava/dedh घंटा तू उसके साथ थी और तुमने कुछ न किआ." सविता को जाने कोनसी चिंता थी.

"जंगल की बातें की, तेरी बातें और गाँव भर की. फिर थोड़ी देर वह बारिश का मिजाज देख नहर में नाहा के चला गया. मेरा भाई हे छोड़ने गया था उसको क्योंकि बापू और माँ उसके परिवार से वाकिफ है. लेकिन तू चिंता न कर मेरी तोह शादी पहले हे पक्की है तोह कल थोड़ा शर्माना छोड़ कर बात कर लिओ दिल की कही ऐसा न हो के वह तेरे इस तरह दूर दूर रहने से कहीं आना हे छोड़ दे और तू फिर कही उस से प्यार करने लगे.", काजल की बात से अब कही सविता के चेहरे पर मुस्कान और शर्म आ गई.

"यार तू जानती हे है मुझे. लड़का ाचा है और बात भी तमीज से करता है लेकिन अगर कल कोई ऊंच नीच हो गई तोह खुद सोच मेरी ज़िन्दगी खराब हो जाएगी.", उसकी बात में गंभीरता थी.

"ऐसे हे खेत और घर पर काम करती मर्डर जाएगी एक दिन. तेरे बापू ने तोह फ़ौज से ब्याह कर रखा है और तेरे बाबा कभी इस तरफ ध्यान नै देते. अगर कोई प्यार करता हुआ तुझे कुछ खुशियां देता जाये तोह बहोत है न इस जकड़ी हुई ज़िन्दगी से तोह. जिस तरह वह तुझे देखता है उस से साफ़ पता चलता है के उसको तू पसंद है. जितने ब्याह नहीं होता काम से काम इतने हे उसके साथ चाँद पल बिता ले. और फिर गलत लगे कुछ तोह मिलना बंद कर देना. और मई इसमें तेरा साथ देने को तैयार हु." काजल की बात पर सविता बस मुस्कुरा दी.

लेकिन यहाँ तोह बिमला और उनका बीटा महेन्दर तोह सविता को इस घर की बहु के रूप में हे देखते थे. साधु सिंह को भी वो बची बेहद पसंद थी लेकिन आज तक उन्होंने ये बात अपने मुँह से न कही थी. वो तोह सोच रहे थे के फसल कटाई के समय सीधा फौजी सम्पत सिंह से हे बात करेंगे रिश्ते की.
 
अपडेट 45

सोचा न था


"अर्जुन जरा ये सोफे पड़ा हुआ कपडा तोह पकड़ा दे. मेरे पाँव गीले है और बहार फर्श पर मई पूछा लगा चुकी हु.", अर्जुन अपने कमरे में आ कर लेत गया था क्योंकि रात नींद ाचे से पूरी नहीं हुई थी. बहार बारिश अभी भी धीमी लेकिन लगातार हो रही थी किसी झड़ी की तरह तोह लाइब्रेरी जाना मुमकिन न था. अभी आराम करते घंटा भर हुआ था के अलका दीदी की आवाज से नींद उचट गई. ऐसे हे उठकर वह तारा के कमरे जो ड्राइंग रूम भी था में आया तोह बाथरूम की लाइट जल रही थी लेकिन दरवाजा ढलका हुआ था. एक सफ़ेद तोलिये जैसा कपडा सोफे से उठा कर दरवाजा धकेलता अंदर आया तोह कदम और नजर वही रुक गए. हाथ में हैंडल वाला शावर, जो शायद वह अभी हे देख रहा था, लिए हुए अलका दीदी सिर्फ एक लाल रंग की नए डिज़ाइन की कच्ची में नहाती हुई उसको देख कर मुस्कुरा रही थी.

"सफाई करवा दे जरा मेरे साथ.", उनकी बात और मुस्कराहट को देखते हुए अर्जुन के कपडे भी अब दरवाजे के पीछे किल्ली पर टंगे थे. नींद तोह शायद कदम अंदर रखते हे उतर गई थी. मोटा मूसल नाभि के सामने तक सीधा हुआ फुंफकार रहा था.

"आपकी मदद करना हे तोह मुझे पसंद है दीदी." हाथ से वह फुहारा लेता हुए खुद उनके गुलाबी चुंचो पर पानी डालता उन्हें ाचे से रगड़ कर भूरे निप्पल खड़े करने लगा. अलका तोह उसके स्पर्श से हे निहाल हो गई थी. दोनों दूध दबवाने के बाद कत्छी उतार कर वह उसकी तरफ पीठ करके कड़ी हुई तोह एक बार पूरी पीठ पर पानी का छिड़काव करने के बाद अर्जुन ने अपना निर्वस्त्र जिस्म उनके पिछवाड़े से जोड़ लिए और लुंड को नीचे दबाते हुए उनकी जांघो में लगा दिए. आगे पानी मारते हुए वह उनकी बिना बालो वाली फूली हुई छूट का थोड़ा बहार निकला हिस्सा रगड़ता कमर भी हिलने लगा था.

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"आज आपका ये मूड देख के तोह लग रहा है के सफाई गहराई तक होने वाली है.", अर्जुन ने अब उस फुहारे को छोड़ कर ऊपर वाला चला दिए. गांड में लुंड फिरते हुए वो एक दूध और छूट लगातार मसल रहा था. ऊँगली के अंदर बहार होने से अलका की सिसकियाँ निकलने लगी और वह खुद हे गांड ऊपर नीचे करती उस मॉटे डंडे के मजे लेने लगी टी. कूल्हे मस्त हिलते जब वह ये रगड़ लगाती थी.

"सफाई के साथ साथ मई तेरा भी ख्याल रखूंगी जैसे तू मेरा रखता है.", उसकी बाहों से निकल वह अब उसके होंठ चूमती उसके खड़े लुंड को मसलने लगी थी, जिसपर पानी की फुंहार गिर रही थी. साबुन को उठा कर ाचे से लुंड पर झाग बना के धोने के बाद अलका दीदी पहले हल्का सा शरमाई लेकिन दिल को मजबूत करती घुटनो पर बैठ कर सुपाड़ी को मुँह में निगल गई, थोड़ी दिक्कत के साथ.

"आह दीदी. ये आपने कब सोचा करने के लिए.. आह.. ", मजे में सीत्कार के साथ अर्जुन ने इतना बोलै लेकिन कोई जवाब नहीं मिला सिर्फ मजे में बढ़ोतरी हो गई जब नरम होंठो के बीच में उसका आधा लुंड अंदर बहार होने लगा, जो गले तक टक्कर मार रहा था. 2 मिनट बाद जब अलका ने मुँह हटाया तोह आँखों में पानी आ गया था लेकिन चेहरे पर एक हसीं मुस्कान थी. फिर हे वह गीले फर्श पर टाँगे फैला कर पसर गई तोह अर्जुन ने घुटने जमीन पर टिकते हुए उनकी गोरी और मोटी छूट को फैलते हुए अपने होंठ जमा दिए..

"आह.. तेरा ऐसा करना हे मुझ से वह करवा गया. आह उम्म्म..", अपने दोनों दूध दबती वह अर्जुन से छूट चुसवाने का मजा लेने लगी. दोनों को कोई फ़िक्र या जल्दी नहीं थी. ाचे से एक बार मुँह से झाड़ने के बाद जब अर्जुन ने मुँह हटाया तोह अलका दीदी फर्श पर पड़ी बस गहरी साँसे लेने में लगी थी. पानी अभी भी गिर रहा था जिसको अर्जुन ने बंद कर दिए और बॉडी लोशन उठा कर लुंड पर लगता वह उनके ऊपर झुक गया.

"आज तुझे जैसे करना है कर. आह बस मुझे जी भर के प्यार कर दे एक बार.", उनकी ये बात ख़तम होते हे अर्जुन दोनों हाथ उनकी बगल के नीचे डालता होंठो को पीने लगा. अर्जुन का इशारा वह बिना कहे समझ गई थी. उसका मोटा लुंड जिसकी वजह से उनके होंठ और जबड़ा अभी तक दुःख रहा था, पकड़ कर छूट पर लगा लिए.

दबाव से अर्जुन ने चिकने लुंड को ठेलते हुए छूट की गहराई में उतार दिए.

"आह.. सच में ये जान ले लेता है भाई.. लेकिन बस मेरी ये इसको हे चाहती है चाहे जितना भी ये दर्द देता हो.", आधा लुंड उस गोटी छूट में धंसा कर अर्जुन उनके मुलायम दूध मस्ती में चूसने लगा तोह अलका ने अपनी टाँगे उसकी कमर पर चढ़ा ली. एक और धक्का लगते हे मुँह से कराह निकल गई. उनकी लचीली कासी हुई छूट ने 8 इंच लुंड छूट में जकड लिए था. लोशन की वजह से आज वह इतना अंदर चला गया था बिना ज्यादा छूट को नुक्सान पहुंचाए.

"जैसे आप इसको नीचे से जकड लेती हो मई हवा में उड़ने लगता हु दीदी.", अर्जुन हौले से छोटे छोटे धक्के लगता बोलने लगा तोह वह मजे और थोड़े दर्द में बस आँखें बंद किये सिसकती रही. फर्श सख्त था लेकिन अभी कोई होश न था. आधा लुंड अंदर बहार होने लगा तोह आवाज भी तेज होने लगी थी.

"आह्हः.. उम्म्म्म.. अर्जुन.. आह.. पीठ दर्द कर रही है.. " उनकी बात समझ कर अर्जुन ने लुंड बहार खींच लिए. 'पुककक' की आवाज से वो फूला हुआ लुंड बहार निकल तोह जांघो पर हाथ रखती अलका हिम्मत से कड़ी हो गई.

"आप ये पाँव यहाँ रखो दीदी." उनको दिवार की तरफ करते हुए अर्जुन ने कोड पर एक पाँव टिकने को कहा और फिर उनके गोल कूल्हों को फैला कर पीछे से लुंड एक झटके में अंदर तेल दिए.

"आह रे.. ऐसे एकदम मत डाला कर. दुखता है भाई."

"दीदी वह देखो." अर्जुन उनका एक गोल कुल्हा रगड़ता हुआ लुंड निकल के अंदर करता बोलै. शीशे में दोनों साफ़ नजर आ रहे थे हो बाथरूम के इस कोने में थे और शीशा दरवाजे के उस कोने में. मोटा लुंड अपने चूतड़ों के नीचे से छूट में जाता देख एक अलग हे मजा अलका के जिस्म में भरने लगा. हर धक्के पर अपनी हिलते दूध देख मुस्कुराती हुई बस इन झटको का मजा लेने लगी.

"मुँह इधर करो न." उनका चेहरा पीछे करता वह उनके दोनों होंठ मुँह में लेकर जड़ तक लुंड ठूसने लगा था लम्बे धक्को से. गांड की दरार में भी लुंड की रगड़ से खुजली होने लगी थी.

"दीदी, यहाँ भी करूँगा एक दिन. आपकी सबसे मुलायम और लचीला यही हिस्सा है जो अभी तक प्यार से बचा हुआ है." गांड को हल्का खोलता वह ऊँगली से उनका सिकुड़ा हुआ छेड़ दबाने लगा. दोनों कूल्हे रबर से पिलपिले थे. बिलकुल गद्देदार और मांसल.

"कर लेना वह मई नहीं रोकूंगी. बस आज नहीं और थोड़ा जल्दी कर अगर कोई आ गया तोह जवाब नहीं होगा हमारे पास." उनकी बात समझते हुए अब वह इतने तेज धक्के लगाने लगा था के पूरा शरीर हिलने लगता अलका का.

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"पता है ये मेरे ऐसे क्यों है? आह.. और जोर से मार .. उम्... मई न इन्हे हिलने का अभ्यास करती हु अकेले में. अहह.. पहले ये ऐसे नहीं थे.. लेकिन ाची मालिश और कुछ इंग्लिश गाने के वीडियो देखे थे मत्व पर. बस मुझे वैसे हे करने है ये.. आह.. अभी तोह 36 है लेकिन 40 कर लुंगी एक दिन बराबर आकर में रखते हुए.. आह मई होने वाली हु आह.." अब अर्जुन को समझ आया था के सबसे अलग कूल्हे कैसे है उनके जितनी भी लड़कियों से वह मिला था उनमे.. और उनकी मजे की बातों ने उसको भी चरम पर पंहुचा दिए था..

"आह मई गई रे... आह." वो दिवार पकड़ कर झुकी तोह गांड भी पीछे को और उभर गई जिस से गलती से लुंड गांड के नरम छेड़ पर जा टिका और पिचकारी निकलने से पहले हे कोई एक कम वह छेड़ में धंस कर हिचकोले खाने लगा था.

"आह.." उन्हें हलकी पीड़ा हुई जो चरमसुख के सामने पता नहीं चली लेकिन चिकना लुंड हलके दबाव से गांड के छेड़ को फैलता उसमे गाढ़ा गरम वीर्य भरने लगा था.

"ओह्ह.. दीदी.. ये बेहतरीन था." सिर्फ गांड के छेड़ को 1 कम दबाने भर से अर्जुन फट गया था. लुंड ने ाचे से चूम लिए था उस छेड़ को और अलका को वह गीला गरम एहसास पसंद भी आ गया था.

"चल भाई तू अब कमरे में जा. मई खुद को सही करके नीचे जाती हु फिर." अर्जुन का लुंड साफ़ करके अलका ने कहा तोह वह सिर्फ पजामा पहन कर बहार निकल गया. और एक बार फिर वह अपने बिस्टेर पर लुढ़क चूका था. पिछली रात से 4 बार सम्भोग कर चूका था तोह लुढ़कना बनता भी था. अलका भी saaf-safaai के बाद हल्का सा जांघो के बीच मीठा दर्द लिए नीचे चली गई. आरती किताब में खोई हुई थी और प्रियंका पानी के नीचे कड़ी अपनी दुनिया में. पानी बेशक ठंडा गिर रहा था उनके शरीर पर लेकिन उनका शरीर जैसे अंदर से जल रहा था. एक ऐसी आग जो अब उन्हें परेशान कर रही थी और उनके पास इसका इलाज़ न था.

गदराया हुआ भरा शरीर जहाँ मांसलता सिर्फ चुचो और गांड पर थी. पेट बस गोलाई लिए हुए लेकिन जरा भी बहार को न था. उनके वजनी उभार इतने भारी थे के गोलाकार होते हुए भी कोई एक इंच नीचे लुढ़के रहते थे ब्रा न होने पर. जैसे हे उन्होंने साबुन लगाने का उपक्रम किआ उनके भूरे गोल निप्पल अकड़ गए एक अनजानी सी मस्ती से.

'सीई... ये क्या हो रहा है इनमे.' अपने हांथो से थोड़ा उन्हें महसूस किआ तोह जैसे निप्पल के नीचे कोई गाँठ सी महसूस हुई. और दूसरे पर भी यही हाल था. दोनों हाथो से उन्हें मसला तोह जांघो के बीच में कोई एक इंच बहार को निकलती उनकी फूली हुई छूट में चींटिया सी रेंगने लगी. बस कोई 8-10 बार हे वह उंगलिया फिरते हे पाँव अकड़ गए उनके और दिवार पकड़ कर वो सिसकती सी अपने इस छोटे से चरमसुख को महसूस करने लगी.

"आह ऋतू की बची क्या दिखा दिए तूने मुझे उस रात को, अब देख ये हर समय खुजली करती रहती है. आह्हः.." उस विदेशी फिल्म के दृश्य जैसे उनके दिमाग में चिपक गए थे और रही सही कसार अर्जुन ने पूरी कर दी थी इस हवा को भड़काने में. नहाने के बाद शरीर पांच कर वो सर पे टोलिया लपेट के बहार निकली तोह अलका डाइनिंग टेबल साफ़ करने में लगी थी और ऐसे झुकने पर उसके गोल कूल्हे इस झीने कपडे के पाजामे में ाचा आकर बना के उन्हें और उभार रहे थे.

"यार अलका तू मुझे भी न अपनी तरह slim-trim कर दे. सच में तू अपने शरीर का सही ध्यान रखती है.", प्रियंका ने ाचे से देखा था अलका के शरीर को. जहा टेबल पर झुकने से वह हलके रंग की टीशर्ट उसकी गोरी और पतली कमर को दिखा रही थी वही उसका उभरा और थिरकता पृष्ट भाग एकदम से गोलाई लिए पाजामे में कैसा था. टाँगे लम्बी लेकिन सुडोल और सही अनुपात में थी. ऐसे कटीले जिस्म के साथ 5'9" की लम्बाई अलका को हिन्दुस्तानी लड़कियों से बिलकुल अलग दिखती थी. ऐसा नहीं था के प्रीती या ऋतू का कद कही छोटा था. प्रीती जहा 5'7" से थोड़ी ऊपर थी और उसके आसपास हे ऋतू थी लेकिन शरीर थोड़ा जुड़ा था उन दोनों से भी. ऋतू को खूबसूरती और लम्बाई अपनी बेहद हसीं माँ रेखा और lambe-tagde बाप शंकर से मिली थे तोह वही प्रीती की तोह माँ हे उस देश से थी जहाँ दुनियां की सबसे खूसूरत लड़कियां पैदा होती थी, ग्रीस. तोह उसका रूप स्वाभिव हे थे सबसे बेहतर होना लेकिन अलका के mata-pita औसत कद के और maa-badi बहिन गदराये शरीर की थोड़ी गेंहुए रंग वाली ठोस व्यक्तित्व की थी वही ये कही अधिक लम्बी, भूरे baal-aankhon वाली गुलाबी लड़की. जैसे अरब देश की शहजादी होती है. पूरे घर में यही तोह एक थी जो किसी हद्द तक अर्जुन के मुकाबले की लड़की थी बस अर्जुन के बालो का भूरापन सिर्फ धुप में दीखता था उसके तेल लगाने की वजह से. प्रियंका भी इन सब खासियत से उसकी तरफ खिंचाव महसूस कर रही थी.

"दीदी, ऐसा कुछ नहीं है. ऋतू को देखा है आपने, वो है स्लिम भी और फिट भी. मेरा तोह मुँह चलता रहता है खाने को देख के लेकिन वह तोह जैसे हर चीज naap-tol के कहती है. वैसे आप खुद इतनी सुन्दर हो और शरीर तोह ऐसा है के हर मर्द ऐसी बीवी की कामना करता है." अलका की ये भी तोह खासियत थी की वह बराबर इज़्ज़त देती थी सबको. और बात गलत भी नहीं थी उसकी. प्रियंका बेहद उम्दा शरीर और चेहरे मोहरे वाली किसी सरदारनी सी लगती थी.

"नहीं यार. सच में अब तुझे क्या बताऊँ लेकिन तू बहिन और दोस्त भी है तोह तुझसे बात कर सकती हु यार.", वो वही कुर्सी पर बैठ गई तोह अलका भी उनके पास हे बैठ कर उनकी तरफ देखने लगी.

"पता है ये पंजाब में रह के खाना और रहना गलत हो गया थोड़ा. पहले साल में कॉलेज के मेरा वजन 54 था और अब तीसरे में 68. यहाँ तोह मई तुम सब को देख के टीशर्ट पजामा पहन लेती हु लेकिन वह सिर्फ खुल्ले सूट पजामी में रहना मज़बूरी लगता है. लड़के ऐसी लड़कियों को हमारे शहर में सिर्फ एक हे नजर से देखते है लेकिन उनको मेरे जैसी लड़की या तोह शादी के लिए या फिर कमरे में बंद हे पसंद होती है. आरती को देखती हु तोह सोचती हु के मई भी पहले ऐसी हे थी. जीन्स टॉप में वो ाची लगती है." प्रियंका दीदी की बात सुनकर अलका मामला समझ गई थी.

"दीदी जैसे सब उंगलिया बराबर नहीं होती वैसे हे सबका शरीर भी नहीं होता. और आपके इस बदलाव की वजह है आपके ऊपर घर की जिम्मेदारी बढ़ना. चाची की जगह अब घर का काम आप करती हो. ज्यादा बैठने और परेशां रहने से भी वजन थोड़ा बढ़ जाता है. लेकिन आप मोटी तोह बिलकुल नहीं हो. माधुरी दीदी को आपने देखा है. वो अपने शरीर से खुश है क्योंकि वो बिलकुल माँ पर गई है. ये दोनों जगह उनकी भारी है लेकिन सबसे जरुरी है फिट रहना जिसके लिए वह म्हणत का काम करती है. उनका शरीर कही से ढीला नहीं है लेकिन मुझे थोड़ा लगता है के आपमें ये बदलाव आया है. बुरा न मानो तोह अपना साइज बताओगी.", अलका ने उनसे खुलकर बात करना हे ठीक समझा जिस से वो उनकी मदद कर सके.

"सीने पर 36-डी थोड़ा टाइट रहती है तोह मई 38 पहन लेती हु. कमर पहले तोह 30 थी लेकिन अब जाँघे मोटी हो गई है तोह जीन्स नहीं आती. अपनी सहेली की तरय की थी तोह 32 कमर की लेकिन वह जांघो में फंस गई थी. िंचितपे से कमर अब 32 है बस ये अब 34 से 38 हो गए है.", अपने कूल्हों का माप बताते हुए वह गंभीर थी.

"हाँ तोह इसमें क्या बड़ी बात है? देखो अभी आप हो हे कितनी बड़ी, 21 साल की. बस सुबह देर तक सोना बंद कर दीजिये और रात को खाना काम. बहार कही घूम नहीं सकती तोह ऋतू की तरह किताब लेकर छत्त पर या आँगन में घूम लिए कीजिये. और जरुरी बात ये की 36-डी अगर टाइट है तोह एक बार 36-दद तरय कीजिये. 38-डी का कप आपके ये संभल जरूर सकता है लेकिन कंधे पर अगर ढीला रहे और छाती पर भी तोह ये भी थोड़ा लटकने लगेंगे. रात को तोह उंडेर्गारमेंट बिस्टेर पर सोने से पहले निकलना जरुरी है नहीं तोह इनकी ख़ूबसूरती और सेहत दोनों पर असर पड़ेगा.", अलका को शरीर के बारे में ाचा ज्ञान था और प्रियंका वो सब ध्यान से सुन रही थी.

"यार ये ज्यादा हे बड़े है. रात को बिना ब्रा के सोना थोड़ा अजीब हो जायेगा.", उनके स्वर में एक चिंता के साथ जिज्ञासा भी थी.

"अपने कमरे में हे तोह सोना है आपने. यहाँ तोह मई सुबह की कॉफ़ी पीने के बाद भी कभी कभी नहीं पहनती. और जैसे अभी घर पे कोई नहीं है तोह मई तोह अभी भी टीशर्ट के नीचे एक sports-vest पहने हु. कोई ब्रा नहीं.", मुस्कुराती हुई अलका ने ये कहा और अपनी टीशर्ट के ऊपर हाथ रख के थोड़ा हिलाते हुए दिखाया.

"ओह. ये इतना जरुरी है?", प्रियंका दीदी तोह अब हैरान थी.

"ये सच में जरुरी है दीदी. अगर आपको सहूलियत न हो तोह काम से काम सोने के समय उतार दिए कीजिये और पहले आप सही माप की ब्रा पहन न शुरू करो. वैसे सच कहु तोह आपकी फिगर भी ाची है. हिप्स की जगह तइस को थोड़ा ठीक करना है और जो भी हल्का फुल्का फैट है उसको डाइट और सही रूटीन से ख़तम. बस इतना हे.", अलका अब कड़ी होती बहार की तरफ चल दी जहा कपडे धोने की मशीन अब रुक चुकी थी. प्रियंका को भी बहोत कुछ समझ आ गया था. पिछले 2 साल में बस वो कॉलेज और घर हे तोह संभल रही थी. जहा पहले वह बैडमिंटन और सुबह सैर करती थी अब वह बिलकुल बंद हो चूका था. उल्टा अब शरीर नींद ज्यादा लेने लगा था. मैं को मजबूत करती वह टोलिया तार पर सूखा कर माधुरी दीदी के कमरे में चल दी कंघी करने के लिए.

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इधर प्रीती के घर पर पारवती और प्रीती मिलकर रेणुका बुआ के पाँव और हाथो से उनके महीन बाल निकल रही थी पत्तियां चिपकाती उखाड़ती हुई और ऋतू उनके चेहरे और गर्दन पर क्रीम को गीले हाथो से रगड़ती चमकाने में लगी थी.

"बुआ, शादी में ऐसे जाओगी तोह कही दूल्हा आपको न अपनी समझ बैठे.", प्रीती ने चुटकी लेते ये कहा तोह ऋतू की हंसी चूत गई. और पारवती के साथ रेणुका जी भी मुस्कुराने लगी थी.

"सही बात है प्रीती तेरी. वैसे बुआ सच में आप न बहोत वेल मैनटैनेड हो. जैसे बस कॉलेज ख़तम किआ हो आपने.", ऋतू उनकी गर्दन की मालिश सी करती बोली. एक बिना ब्याह का सफ़ेद गाउन पहने रेणुका बुआ फर्श पर बैठी थी और ऋतू एक स्टूल पर उनके पीछे. उनके गाउन को घुटने से ऊपर करके पारवती और प्रीती उनकी वैक्सिंग करने में जुटी थी.

"तुम दोनों की चेहरे इतने सुन्दर है की तुम्हे तोह किसी मसाज और मेकअप की जरुरत नहीं ऊपर से बाल के रोयें तक नहीं दीखते शरीर पर. मई हो गई हु बूढी तोह मेरे मजे ले रही हो.", मैं में मुस्कुराती रेणुका बुआ ऊपर से नखरा दिखा रही थी.

"आपको किसने कहा के बाल नहीं है.", ऋतू के मुँह से इतना हे निकला के वह खुद झेंप गई और प्रीती के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

"हाँ तोह सही तोह कहा के नहीं है. बता जरा कहा है तेरे बाल?", उनकी इस बात पर वह निरुत्तर हो गई थी.

"अरे बुआ, ऋतू दीदी के भी आते है लेकिन वह भी मेरी तरह टाइम पर रिमूव कर देती है. इस से बस ग्रोथ स्लो हो जाती है लेकिन अगर हर महीने नहीं करे तोह 3-4 महीने तक नजर आ जायँगे. हैं तोह आपके भी नहीं लेकिन पता नहीं किसके लिए इतनी म्हणत कर रही है आप.?", प्रीती ने ऋतू को बचते हुए अब अपनी बुआ को हे लपेटे में ले लिए था. जिस पर अब ऋतू आँख मारती हुई प्रीती को शाबाशी दे रही थी.

"दीदी हमारे तोह अम्मा कहती है के चूल्हा चुका करने से और मर्द के रगड़ने से बाल नहीं आते haath-paanv पर. बस एक हे जगह रहते है और वह जरुरी भी है.", पारवती ने अपना ज्ञान उड़ेल दिए इस बीच.

"हाहाहा बुआ. सुन लीजिये काम की बात. ऐसे बाल नहीं आएंगे और फिर थोड़ी सी जगह हे ध्यान देना पड़ेगा.", प्रीती ने अब बिलकुल हे मुँह बंद करवा दिए था रेणुका जी का.

"ाचा चलो मान लिए मैंने की मैं ऐसा नहीं करती लेकिन तुम दोनों..'", उन्होंने बात अधूरी छेड़ कर अब पलट वॉर कर दिए था जिस से दोनों कुछ चुप सी हो गई.

"अभी तोह बताया बुआ के हमको साफ़ करने पड़ते है. लेकिन अगर आप कहती हो तोह फिर मई विचार करती हु पारवती की बात पर बस आपका हे नुक्सान होने वाला है.", प्रीती के इस जवाब पर रेणुका जी ने पारवती को कॉफ़ी बनाने भेज दिए और उसके जाते हे प्रीती का कान पकड़ लिए. ऋतू शांत थी इस समय.

"सोचियो भी मत अभी जितने मई हु यहाँ.", उनकी हंसी से कही गई ये बात पर जरूर ऋतू ध्यान दे रही थी लेकिन जब प्रीती ने इशारे से सर हिलाया तोह वो वैसे हे चुप चाप बैठी रही.

"ाचा अब आप नहाने जाओ फिर देखते है और क्या करना है. और मई पारवती को अपने कपडे दे देती प्रेस करने के लिए.", प्रीती ने उन्हें खड़े करते कहा तोह रेणुका ने दोनों को धन्यवाद् किआ और वह से होती हुई अपने कमरे में चली गई. प्रीती ने उठकर दरवाजा लगा लिए था.

"हाँ. ये सब झोलझाल क्या था?", अपने साथ प्रीती को चिपकते हुए ऋतू दीदी ने पुछा तोह वह थोड़ा सोचने लगी.

"दीदी, आपको तोह पता है मई आपसे कुछ नहीं छुपा सकती. लेकिन आप बात को समझने की कोशिश करना.", प्रीती की बात पर ऋतू ने उसके गाल चूम लिए.

"ोये तू न जो भी करेगी मई विशवास से कहती हु की तू गलत नहीं हो सकती. अर्जुन और बुआ का छोड़ लेकिन शुरू से बता के हुआ कैसे ये सब.", अब प्रीती उनको हैरानी से देखने लगी. जाने कैसे उन्होंने ये इतनी बड़ी बात यु हँसते हुए कह दी थी.

"बता न यार. मुझे पता है के इन दोनों के बीच कुछ हुआ है लेकिन bina-wajah तोह बुआ जैसी डिस्कॉपलीनेड औरत ऐसा करने से रही.", ऋतू की बात बिलकुल ठीक थी.

"दीदी, अब अर्जुन और बुआ के बीच ये सब कैसे हुआ वह तोह आपको पता लग गया होगा जब अर्जुन ने जान बचाई थी इनकी और उन्हें प्यार भी हो गया है उस पागल लड़के से. लेकिन बुआ का ऐसा करना सिर्फ फूफाजी की उनसे ज्यादती करना और उनको प्यार न करना एक बड़ी वजह है. इतने साल की शादी में उन्होंने बुआ को सिर्फ घर के एक कीमती सामान की हैसियत से हे रखा हुआ है. बुआ बिलकुल ऐसी नहीं के वह किसी भी लड़के या मर्द के चक्कर में पड़ जाये. लेकिन ये आपका जो भाई है न अपने प्यार और स्वाभाव से हर किसी को वश में कर लेता है. और बुआ को तोह जैसे उसमे उनके सपनो का राजकुमार दिख गया जो वह आज फिर से अपने कॉलेज वाली लड़की के रूप में बदलने लगी है. इस बिस्टेर पर, मेरे बिस्टेर पर मेरी बुआ के साथ आपका भाई उन्हें ये बीमारी देके निकल लिए, जवान होने की. मेरी परवाह है नै उसको कोई.", प्रीती की इस बात को गौर से सुनती ऋतू भी आखिरी बात पर हंसती उसके गोले दबाने लगी.

"मेरी जान. तू न उसका वो प्यार है जिसको वो संभाल के हमेशा अपने साथ रखना चाहता है. और तू भी बड़ी दिलदार है जो उसको पूरा कृष्ण कन्हैया बनती फिर रही है. चल जितने भाई नहीं उतने उसकी बहिन से हे काम चला. इंदिरेक्ट्ली प्यार तोह वही से मुझमे आता तेरे में जाएगा."

"छोड़िये आप. आपने कल रात भी उनके साथ गुजारी है न?"

"अहा. ये आप तोह बड़ी शर्म से बोलै तूने. हाँ यार सच कहु तोह बुरा हाल कर दिए है मेरा अर्जुन ने. सामने होते हुए भी मई उसको सीने से नहीं लगा सकती बस ये chori-chipe हे जितना मिल जाता है उसके साथ रह लेती हु. लेकिन तुझे तोह डरना नहीं चाहिए, तू तोह प्रेग्नेंट भी हो गई तोह बस शादी हे जल्दी होगी और तोह कुछ नहीं."

"हाहाहा. वैरी फनी. उसकी टाँगे न टॉड दूंगी अगर कुछ भी किआ मेरे साथ. पहले बोलो उसको के बाहरवीं कर ले जल्दी से, होने वाली बीवी उम्र में बराबर है लेकिन क्लास में 2 साल आगे. इसके चक्कर में 5-6 साल पढ़ना पड़ेगा तब जा के ये कही ग्रेजुएशन पूरी करता लगता है मुझे.", प्रीती की बात हंसी के साथ दर्द वाली भी थी.

"चल परेशां मत हो. उसको तेरे से कोई अलग नहीं करने वाला. तेरा मिट्ठू तोता है वह, सारे शहर में te-te करने के बाद वो आता तेरे पास हे है.." ऋतू ने प्रीती को समझते हुए कहा. बड़ी अलग हे विडम्बना और प्रतिज्ञा सी थी इस लड़की में शायद. हीरे को तराशने में खुद के हाथ भी देखना भूल रही थी.

"सिर्फ मेरा तोह नहीं है वह. और ये भी जानती हु आपने इस सबके लिए कुछ ढंग का सोच तोह लिए होगा.", खुद को ऋतू दीदी की गॉड में लिटटी सी वह बाकी शरीर बिस्टेर पर फैलाती उनके चेहरे की तरफ एक आशा से देखने लगी थी.

"हु.. लेकिन तेरी हे वाली बात है यहाँ भी. 6-7 साल तोह निकलने हे होंगे हमे. फिर सब तेरे पर है क्योंकि मैं तोह कोशिश करुँगी की वापिस औ हे ना यहाँ अगर सब ठीक रहा तोह." ऋतू का मान पक्का हो चूका था हिंदुस्तान के बहार जा कर बाकी पढ़ाई और ज़िन्दगी गुजरने का.

"जैसा आप चाहेंगी वैसा हे होगा.", प्रीती ने उठ कर दरवाजा खोलने से पहले कहा.

"दीदी कॉफ़ी ले लीजिये और बुआ जी भी आ रही है कपडे पहनकर. वो भी यही पीयेंगी." पारवती बिस्टेर पर ट्रे रख के जाती हुई बोली तोह प्रीती ने उसको अपने कपडे भी बता दिए रात को तैयार करने के लिए.

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इधर 1 बजने को आया तोह अलका घंटे भर में आने का बोल कर प्रीती के घर निकल गई तोह आरती भी उसके साथ हो ली. दोपहर का खाना आज 2 के बाद हे बनाना था और अलका ने बताया भी था के 3 बजे तक भैया आएंगे तोह तभी सब खाएंगे. काम तोह सब हो हे चूका था. घर में यहाँ प्रियंका दीदी अब अकेली थी और ऊपर अर्जुन घोड़े बेच के सोया पड़ा था.

'दिन में मिलने का बोलकर खुद महाराज सोया पड़ा है. देखती हु उसको हे क्या कहता है." अर्जुन की बात याद करती वह पिछली सीढ़ियों से ऊपर दूसरी मंजिल पर चल दी. यहाँ तोह एकदम हे शान्ति थी. सभी दरवाजे बंद और बिस्टेर के बीच में मुँह पर तकिया रखे अर्जुन बेसुध पड़ा था. प्रियंका दीदी कुछ सोचती मुस्कुराती अंदर आ गई तोह देखा के चौड़ा सीना पूरा नुमाया हुआ पड़ा था. उसकी ठोस और छड़ी छाती, नीचे कासी हुई कमर जहाँ ाची खासी मासपेशियां थी और सख्त बाजु देख कर प्रियंका दीदी बस उसके शारीरिक आकर्षण में हे खो गई. बेसुध सी वह जब उसकी सीने पर हाथ फिरते हुए जायजा सा लेने लगी तोह अर्जुन को भी शरीर पर हाथ रेंगता महसूस हुआ लेकिन वो ऐसे हे चुपचाप पड़ा रहा.

'खलनायक फिल्म वाला संजय दत्त हो गया है पूरा लेकिन जिस्म कितना साफ़ है.' उसके शरीर की मैं में तुलना करती वह पूरी झुक सी गई थी बिस्टेर पर बैठी हुई. अर्जुन ने बिना आहात के तकिया पीछे सरका के अधखुली आँखों से प्रियंका दीदी को अपने ऊपर झुके देखा तोह बस हलकी सी मुस्कान चेहरे पर आ गई. छाती से हाथ फिरते जब वह कंधे तक आई तोह दोनों की आँखें टकरा गई. वह झट्ट से उठने लगी तोह अर्जुन ने वैसे हे लेते हुए कहा, "दीदी, आपका पूरा हक़ है मुझपे. ऐसे खुद को तड़पना ठीक भी तोह नहीं. पसंद हु तोह बोल कर दिल का बोझ हल्का कर लीजिये और ऐसा नहीं है तोह मई कुछ नहीं कहूंगा." उसकी बात सुनकर पाँव तोह वही रुक गए लेकिन अर्जुन की तरफ पीठ कर के वह बस धड़कते दिल से चुपचाप कड़ी रही. अर्जुन उनके ऐसे रुकने से समझ गया था के दीदी उसको पसंद करती है. लेकिन उनकी शर्म और झिझक भी जाहिर थी. वह अब बिस्टेर से खड़ा हुआ तोह ये आवाज भी प्रियंका दीदी के कानो में पड़ गई. दिल किसी बड़े घंटे सा jor-jor से dhak-dhak करने लगा था.

"जानता हु आपको शर्म आ रही है. और ऐसा होना लाजमी भी है क्योंकि आप लड़की हो. लेकिन अब यहाँ हम दोनों हे तोह है और खुद हे देखो की दरवाजे सब बंद है.", उनके कंधे पर हाथ रखते हुए अर्जुन ने जैसे हे ये बात धीमे से उनके कान में कही उनका तोह शरीर एक उत्तेजना से कांप गया.

"तुम मेरे भाई हो अर्जुन.", प्रियंका दीदी की इस बात पर अर्जुन ने अपने हाथ उठा लिए उनके कंधे से लेकिन अगले हे पल प्रियंका खुद हे पलट कर उसके सीने से लिपट गई. बाहों को कैसे वह अपनी भारी छातियां अर्जुन के सीने से लगाए कड़ी हो गई.

"लेकिन जाने क्यों दिल ये भी कहता है के तुमसे ज्यादा ाचे से मेरे दिल को कोई समझ नहीं सकता.", प्रियंका की आवाज अब थोड़ी करूँ हो गई थी. अर्जुन ने अपनी गर्दन तक आते उनके सर को अपने हाथ से ऊपर करते हुए उस भरे हुए सुन्दर चेहरे को देखा और फिर आँखों के ऊपर एक प्यार भरा चुम्बन जड़ते हुए कहा.

"दिल तोह कभी गलत नहीं होता न दीदी. फिर आप घुटन को पसंद करेंगी या खुलकर दिल की बात समझेंगी.?", बस इतनी हे बात सुनकर प्रियंका ने अपने लाल आधार उसके सर को नीचे झुकाए हुए होंठो से जोड़ दिए.

"मई बस इतना चाहती हु की मई अब कभी इस तड़प को न साहू." और फिर इस बार ाची तरह वह उसके होंठ चूमती पंजो के भार कड़ी हो गई. उनकी कमर को थाम कर अर्जुन बिस्टेर पर पैर लटकता हुआ उन्हें गॉड में लिए बैठ गया. उनके भारी नितम्भ अब अर्जुन की मजबूत जांघो पर ठीके थे और वो उनका चेहरा थामे बस प्रियंका का साथ दे रहा था इस गहरे चुम्बन में. पुराण अनुभव तोह कोई था नहीं लेकिन चलचित्र और किताबो को देखते हुए जितना प्रियंका को पता था वह वैसे हे अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला रही थी. उनका मुँह हल्का सा खोलते हुए जब अर्जुन ने जीभ को अपने मुँह में भर के चूसना शुरू किआ तोह जैसे उनका मजा सब हड्डी पार कर गया. शरीर को पूरी तरह से उसके सीने से जोड़ती वो उसकी नंगी पीठ पर हाथ फिरते हुए इस मजे को जीने लगी थी. सफ़ेद कमीज जिस पर काली बिंदियो का डिज़ाइन था वह जिस्म से पूरी कासी हुई उनके भूगोल का एकदम सही वर्णन कर रही थी. साँसे उखाड़ने लगी तोह बस दोनों एक दूसरे के चेरे पर चुम्बनों की बौछार करने में लगे थे और अब चेहरे से हाथ फिसलते हुए प्रियंका के बड़े ठोस dugdh-kalash पर पहुँच कर रुक गए.

एक बार उनकी आँखों में झांकते हुए अर्जुन ने देखा जैसे उनकी स्वीकृति चाहता हो तोह प्रियंका दीदी ने शरमाते हुए अपना चेहरा सीने से लगा लिए. गॉड में बिठाये हुए हे अर्जुन ने उनके मॉटे चुके कपडे के ऊपर से हे दबाते हुए ढीले करने शुरू कर दिए. वो सच में हे इतने बड़े थे की एक पल को अर्जुन को माधुरी दीदी हे याद आ गई थी.

"इन्हे आपके पंजाब में क्या कहते है?", अर्जुन उन्हें थोड़ा बातचीत करके अपने साथ खोलना चाहता था. इसलिए ये नटखट सा सवाल कर दिए.

"तुझे नहीं पता?", सीने से लगे हुए हे उन्होंने ये बात कही तोह अर्जुन ने बस इतना कहा , "Stann-boobs"

"वह इन्हे मोममे या बोब्बे कहते है.", और गहरी लाज आ गई खुद के इस जवाब पर हे.

"ये सच में बहोत बड़े और मुलायम है. मई देख लू इन्हे?", एक छोटी मटकी सा प्रियंका का वो मोटा नरम गोला अर्जुन के दोनों हाथो में नहीं समां रहा था.

"तू मुझसे कुछ मत पूछ बस तुझे जो करना है वह कर.", अर्जुन के हाथो ने जैसे हे उनकी बात सुनकर मांसल पेट को चूहा तोह वह और ज्यादा चिपक गई उसके साथ.

"ऐसे तोह फिर मई न छु सकूंगा न देख." उनके मखमली नरम और गुदाज पेट को सहलाते हुए अर्जुन प्रियंका के कान में सरगोशी सा करता बोलै. प्रियंका के तोह कुछ समझ नहीं आ रहा था के वो कैसे ये सब करे. पहली बार हे उसके शरीर पर किसी मर्द का हाथ पड़ा था. जाने कितने हे लकड़ी रोज उसके कॉलेज के बहार चक्कर लगते थे जिनकी नजरो को वह समझती थी क्योंकि वह सिर्फ शारीरिक भूख हे दिखाई देती थी उन्हें.

"हम रात को नहीं मिल सकते?", दिन के उजाले में वह झिझक महसूस कर रही थी.

"रात को भी वही मई रहूँगा और वही आप. और मुझे तोह उसमे भी कोई दिक्कत नहीं है. आपको ये सब ाचा नहीं लग रहा तोह कोई बात नहीं.", अर्जुन नरमी से और प्यार से उनसे बात करता हुआ बोलै. वह अभी भी उसके गले लगी हुई थी. फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने पास अपने सीने को उस से दूर किआ लेकिन सर वैसे हे टिकाये रखा.

"आप सच में कितनी नरम हो दीदी. देखो न हाथ कैसे फँसल रहे है.", उनके पेट से ऊपर की तरह हाथ लेजाते हुए अर्जुन ब्रा की शुरुआत पर रुक गया. या कहे की उस से आगे सूट भी पूरी तरह से कस गया था.

"मुझे कुछ नहीं पता ये सब.", दिल मचल रहा था अर्जुन के इस कारनामे से उनका लेकिन शर्म हे तोह सबसे ज्यादा परेशां कर रही थी उनको.

"हाथ हे आगे नहीं जा रहे मेरे. कमीज तंग है या आपके ये मोममे ज्यादा बड़े है." उनके हे बताये शब्द को बोलता वो हाथ ब्रा के नीचे फिरता रहा.

"पीठ की चैन खोल ले. पहले ये इतने बड़े नहीं थे लेकिन अब कमीज तंग कर दी है इन्होने.", सहज भाव और इस नए सुख में उन्होंने इतना कहा तोह अर्जुन ने पीठ पर हाथ फिरते हुए बारीक चैन को ढूंढ कर कमीज ढील कर दिए. और वो वजनी खरबूजे हल्का सा नीच हुए. ब्रा की तननिअ सच में थोड़ी ढीली थी जिनमे से आगे बढ़ती अर्जुन की सख्त उँगलियाँ उन नरम गोलों पर फिरते हे एक तेज सिसकी सी प्रियंका के मुँह से निकल गई.. "उम्म्म.."

अर्जुन ने थोड़ी बेताबी से जैसे हे दोनों गोलों का अगला भाग हाथो में थमा तोह स्वयं हे दीदी की छूट अर्जुन की तरफ खिसक गई. वो बड़े दूध को आहिस्ता आहिस्ता दबाता उनकी नरमी महसूस करने में लगा था. दिल तोह कर रहा था के दीदी को पूरा नंगा कर के इस भरे हुए मांसल बदन को आँखों से जी भर के पीने का. लेकिन बिना जल्दबाजी किये वह बस कभी उन्हें कमीज के अंदर दबाता तोह कभी निप्पल पर हाथ से हलकी रगड़ करता. इतने बड़े चुचो पर भी निप्पल खास मॉटे न थे जिसका एक हे मतलब था के न हे उन्हें मसला गया है न पीया. प्रियंका पर जब ये मजा हावी हो गया और छूट भी गीली होने लगी तोह वो हिम्मत कर उसके होंठ पीने लग गई. एक बेचैनी से हावी हो चुकी थी आज पहली बार उनके दिल और जिस्म पर और ऐसे देख कर अर्जुन ने उनका कमीज गले तक ऊपर उठा दिए. नीचे सफ़ेद ढीला ब्रा में वो रसभरे कलश झूल रहे थे जिनमे से एक को अर्जुन ने ब्रा ऊपर उठाते हुए बहार निकल कर कास के भींच लिए. मस्ती में प्रियंका खुद हे बिस्टेर पर पलट गई और चित्त पसर गई. उनके होंठो के बीच अपनी 2 उँगलियाँ दाल कर अर्जुन ने पहली बार नीचे नजर डाली. सफ़ेद ब्रा और आधी कमीज की साइड से वह गोल मटोल बड़ा सा चुका कितना आकर्षक था उसके लिए कोई शब्द न थे. नुकीले gulabi-bhoore निप्पल को जीभ से सहलाते हे पूरा मुँह में भर के वह मजे से किसी छोटे बचे की तरह चुसकने लगा तोह प्रियंका अपने दांत उसकी उँगलियों पर गाड़ने लगी थी. उसके शरीर में शायद सतांन हे सबसे संवेदनशील थे, क्योंकि मुँह में चूचक भरते हे प्रियंका की छूट ने पानी की बूंदे छोड़नी शुरू कर दी थी.

"आठ.. उम्म्म.. सशः.. उम्म्म.." सिसकती वह सर हटाना भी चाहती थी और अपने दूध अर्जुन को चुसवाना भी. इधर अर्जुन के हाथो ने कमीज और ब्रा पूरे ऊपर उलट दिए तोह अब दोनों हे बोब्बे बेपर्दा से पड़े थे. एक को मसलता वह दूसरे को पीने लगता और फिर दूसरे के साथ भी वही करता. थूक और लार से वो गीले और कड़े हो चुके थे. और ऐसे उनके ऊपर लेते होने से अब लुंड भी जांघो के बीच ठोकर लगाने लगा था.

"आह.. मेरे नीचे कुछ लग रहा है.. उसको वह से हटा."

"दीदी वह वही जाना चाहता है जहा उसको आपकी वो बुला रही है." अर्जुन ने थोड़ा जोर से अपनी कमर को उनकी फैली हुई टैंगो के बीच में छूट के ऊपर रगड़ा तोह जोरदार आठ निकल गई उनके मुँह से. कच्ची तोह इस एक रगड़ में हे गीली हो गई थी.

"Arjun-Arjun.. अभी नहीं भाई.. ये सही समय नहीं है.", उनको लगा था के वह छूट में कही घुसा हे न दे.

"मुझे पता है दीदी. और वैसे भी अभी मई कर नहीं सकता क्योंकि आप फिर चलने से रही कुछ घंटे. मई सिर्फ अभी प्यार हे करूँगा अंदर नहीं.", उसकी इस बात से प्रियंका को चैन मिला के वो पहली बार में हे उनका कौमार्य भांग नहीं करेगा. लेकिन अर्जुन ने दूध चूसते हुए हे उनका नाडा खोलते हुए पजामी निचे सरकनि शुरू की तोह एक बार आंख्ने खोलती वह उसको ना का इशारा करने लगी. दूध से मुँह हटा कर अर्जुन ने भी कहा.

"आप आँखें बंद रखे मई कुछ नहीं कर रहा अभी. सिर्फ आपको ऊपर से हे मजा दूंगा." प्रियंका की टाँगे फ़ैल कर बिस्टेर से लटकी हुई थी जिनके बीच में अर्जुन जमा हुआ था. अगले हे मिनट वह खुली सलवार नीचे उनके पैरो में पड़ी थी. अर्जुन ने भी हाथ से पजामा नीचे सरकते हुए अपना लुंड आजाद किआ और कच्ची के ऊपर से हे उनकी मोटी छूट पर उसको घिसने लगा.

"आह.. ये सच में ाचा है रे.. आह वह हमेशा खुजली सी रहती है.. उम्म्म लेकिन तेरे ऐसा करने से मजा आ रहा है." प्रियंका के विशाल चुके हिलने लगे थे और इधर अर्जुन ने उनकी इलास्टिक वाली कच्ची पकड़ के नीचे करि तोह उन्हें थोड़ा होश आया.

"इसको मत उतार." वह आधे मैं से बोली तोह अर्जुन ने मुस्कुरा कर जैसे उन्हें ना कहा और इस बार उनका हाथ हटा तोह कच्ची भी घुटनो से नीचे थी.

"देखना मत." वो शर्माती सी उसको खुद से चिपकती बोली तोह अर्जुन ने भी आश्वासन दिए.

"नहीं देख रहा मई दीदी. बस वह ऊपर से रगडूंगा.." और छूट के होंठो पर जैसे हे हाथ लगाया तोह उसका दिल करने लगा एक बार इस इतनी उभरी और मोती छूट को देखने का.. फिर बस महसूस करते हुए हे वह उसको सहलाता रहा. दोनों होंठ और छूट का चीरा बड़े थे. कुछ ज्यादा हे मॉटे छूट के होंठ बेहद नरम और बहार की और थे. ऊँगली को दरार में फिरते हे उसको महसूस हो गया के ये अब तक की सबसे गदराई और गहरी छूट होने वाली है. आधा पूरा ऊँगली का दरार में गया तब कही अर्जुन को छूट के छेड़ का एहसास हुआ. नहीं तोह जितनी छूट अभी थी छोड़ी थे, बेशक सभी सुन्दर, उबरी हुई और मुलायम थी. कोमल दीदी की तोह बेशक उन सभी में ऊपर थी और अलका या ऋतू दीदी की भी कोई काम न थी. लेकिन इतनी उभरी, फूली और नरम तोह माधुरी दीदी की भी नहीं थी. आराम से अंदर ऊँगली फिरते हुए वह उसको और तसल्ली से टटोलने लगा. गीली दरार में हाथ से पकड़ कर जब उसने अपना गरम लुंड लिटाया तोह दोनों की हे मजे की आवाज निकल गई..

"आआअह्ह्ह.. ये मत कर.. आठ"

"उम्म्म.. दीदी बहोत गरम है आपकी ये तोह.", उनकी बात सुने बिना हे अपना लुंड वो छूट के होंठो के बीच रगड़ने लगा. इस उन्माद से बंद आँखे किये प्रियंका जैसे पागल सी हो कर खुद हे कमर हिलने लगी.

"आह.. करता रह ऐसी हे .. मुझे कुछ हो रहा है.", छूट अंदर से गीली होने लगी तोह छूट के होंठ में चिकने होने लगे. लुंड उनकी नरम दरार को लम्बाई में फैलता फिसलने लगा था. जब अर्जुन को लगा के ये मजा अधूरा न रह जाए तोह वह जरा कस के धक्के लगाने लगा कमर को आगे पीछे करते हुए. और हुआ भी वैसा हे. प्रियंका दीदी तोह ऐसे झड़ी जैसे पेशाब हे कर दिए हो. गधा पानी छूट से किसी फुंहार की तरह निकल कर लुंड और दोनों की जांघो को टर्र करने लगा.

"ोीी.. ये क्या हो गया मुझे अर्जुन.. बचा ले भाई." इतनी जोर से उन्होंने कास लिए अर्जुन को की सांस लेना दूभर हो गया था. उसने इस तरह के चरम सुख के बारे में भी पढ़ा था के जब किसी नारी को काफी समय से तीव्र सम्भोग की इत्छा हो और ऐसा संभव न हो तोह फिर वह जब पुरुष संसर्ग पर अपना चरम सुख हांसिल करती है तोह एक तीव्र स्खलन होता है जैसे मूत्र त्याग किआ हो लेकिन इसमें से वही महक आती है जो योनि रास से आती है. इंग्लिश में इसको स्क्वरटिंग भी कहते है.

दीदी को इस तरह अर्धमूर्छित देख वह खड़ा हो कर उनके कपडे सही करता है और बाथरूम से टोलिया गीला करके अपने और उनके अंगो को साफ़ कर एक बार उनका चेहरा थपथपा देता है. अर्जुन ने उनकी छूट को देखने तक की कोशिश भी न की थी और अपने कपडे ठीक देख प्रियंका बस शर्माती सी नीचे भाग गई. बिना चुदाई किये भी सवा 2 बज चुके थे और अर्जुन अब लुंड पर ठंडा पानी डालता उसको बिठाने में लगा था. 'सही किआ के नहीं किआ. फंसते नहीं तब भी शरीर में जान नहीं रहती. लेकिन दीदी है सच में एकदम अलग.' मुस्कुराता हुआ वह फिर सब ठीक करके नीचे उतर आया.

"दीदी खाना क्या बना रही हो आप?", रसोईघर में अलका के साथ प्रियंका भी थी और अर्जुन की आवाज से अलका दीदी ने जवाब दिए.

"matar-gobhi के पुलाव और खीरे का रायता. अगर तुझे कुछ और खाना है तोह बता मई बना दूंगी."

"नहीं नहीं मई वैसे हे पूछ रहा था पुलाव मई खा लूंगा और रायता तोह वैसे हे मुझे बहोत पसंद है.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा तोह बहार का दरवाजा खुलने की आवाज आई. उसको पता था के ऋतू दीदी नहीं है अभी तोह वही होंगी या फिर जैसे सुबह बताया गया था के संजीव भैया होंगे तोह वो बस टेबल पर उँगलियाँ बजता बैठा रहा.

"Munna-Munna, बीटा ये सामान निकलवा.", ये तोह ताई जी की आवाज थी. अर्जुन स्प्रिंग की तरह उछलता सा बहार निकला तोह सामने वाले मुख्या दरवाजा पूरा खुला है और वह उनकी नै सफारी गाडी से घर के लोग उतर रहे थे या कुछ उतर कर अंदर आने लगे थे.

"ताई जी नमस्ते." और ऐसे हे सबके पाँव छूटा हुआ वह गाडी तक आया तोह रामेश्वर जी ने लाडले को सीने से लगा लिए.

"और मेरे शेर. कैसा है तू? देख हम एक दिन पहले हे आ गए. वह तेरे बिना दिल हे नहीं लगा.", वह भी उनसे लिपट के मिला फिर गाडी की और बढ़ गया जहा ताऊजी राजकुमार जी खड़े थे. मतलब चाचाजी वही से निकल गए थे और ये गाडी लेकर आये. उनके पाँव छुए तोह उन्होंने उसको आशीर्वाद देते हुए पिछले दरवाजा खोलने को कहा. यहाँ अभी कोमल और माधुरी दीदी बैठी थी जो सामान को उठती सी एक तरफ कर रही थी. दोनों बहने नीचे उतरी तोह अर्जुन बड़े प्यार से उनके गले लग के मिला और उसको वापिस देख कर दोनों हे बहोत खुश थी.

"आप चलिए अंदर मई सारा सामान ले कर आता हु.", उनको भेज कर वह सामान निकलने लगा तोह ताऊजी ने चाबी देते हुए कहा के आराम से सब सामान उतर कर फिर गाडी बंद कर देना. सर हिलाते हुए वो वैसा हे करने लगा. इधर प्रीती और ऋतू दीदी भी आ गए तोह वो भी उसके साथ सामान उठाने में मदद करती बैग और गाँव से लाया सामान लेकर अंदर चल दी. 2 चक्कर में सब कुछ अंदर पहुंचने के बाद अर्जुन ने दरवाजे ाचे से लॉक करते हुए चाबी दादाजी के कमरे में अपनी दादी जी के हवाले कर दी.

"अरे मेरे बचे. सच में हमारा दिल पहली बार गाँव में बिलकुल नहीं लगा. बीटा वह भी बस ये फ़िक्र थी की इन लड़कियों से तेरा ध्यान रखा जायेगा भी नहीं.", कौशल्या देवी तोह भावुक हे हो गई थी एक बार.

"नहीं दादी. दीदी लोगो ने तोह बहोत ध्यान रखा मेरे खाने और आराम का. फिर भी आपकी जगह तोह कोई ले नहीं सकता. ाचा आप आराम कीजिये मई चाय लेके आता हु.", उनको एक बार और गले से लगा के वह उठ खड़ा हुआ तोह अलका दीदी ट्रे में चाय और पानी लिए पहले हे कड़ी थी.

"देखा दादी, मेरी बहने तोह जीन की तरह है. आप काम बस बोल के देखो अगल हे पल पूरा.", वह हँसता हुआ बहार निकल गया और अलका दीदी भी उसकी इस बात पर मुस्कुरा दी.

"सच में जी, अब इसको देख रही हु तोह चैन मिला है. ये हँसता मलंग सा सामने रहता है न तोह दिल खुश रहता है. आगे से बस आप हे जाना अपने भाई के पास.", कौशल्या देवी की बात पर पंडित जी हंस दिए.

"थानेदारनी देख रहा हु तुम 5-6 दिन में बदल गई हो. इतनी तोह कमजोर न थी पहले."

"वो बात बिलकुल नहीं है. बस अब दिल करता है के घर में रहूं और सारा काम ये बचे देखे. और आप भी अब आराम करो. देखा नहीं बहार बगीचा कितना साफ़ पड़ा है. ये सब बच्चों को देखने दो."

"नहीं कौशल्या अभी ये करना उचित नहीं. लेकिन सोचूंगा. और तू इधर आ मेरी राजकुमारी." अलका को पास बिठाते लाड से वह बोले तोह ऋतू दीदी पीछे अपनी दादी से लिपट गई.

"आप वाली तोह chui-mui सी है जी, मेरी तोह ये बची तूफ़ान है. सच में जी घर तोह यही है बेशक जमीन वह हो.", ऋतू के गाल चूमती दादी ने ये बात कही तोह पंडित जी ने सर हिला दिए.

सबने अपने कमरों में हे थोड़ा बहोत खाया था, संजीव भैया भी आने के बाद खाना खा के अपने dada-daadi का हलचल पूछते पाँव दबाने लगे थे. इधर अर्जुन अब अपनी माँ से चिपका पड़ा था जहा उसकी ताईजी और कोमल दीदी भी थे.

"आपने तोह वह जाने के बाद फ़ोन भी नहीं किआ?", शिकायत करता वह अपनी माँ से बोलै तोह रेखा जी उसके बाल सहलाती एक बार अपनी जेठानी की तरफ देखने लगी.

"तेरी माँ ने तोह किआ था लेकिन तू लाइब्रेरी गया हुआ था. फिर शाम को किआ था परसो 8-9 बजे तब तू रेणुका के साथ था.", ललिता जी ने इतना बोलै तोह वह फिर से अपनी माँ से चिपट गया.

"तू इसको चुकी पीला रेखा मई तोह चली आराम करने.", ललिता जी की इस बात पर रेखा जी शर्म से मुस्कुराने लगी और अर्जुन भी बहार निकल लिए.

"दीदी, देखा भाग गया आपकी बात सुनकर.", रेखा जी ने हलके हँसते हुए कहा तोह कोमल भी इन बड़ो की बात सुनकर शर्मा गई.

"रेखा है तोह बचा हे. मुझ से कहे तोह मई अभी पीला दू लेकिन जब तू है उसके पास तोह फिर तू हे सही." और ऐसे मस्ती करती वह अपने कमरे में चल दी तोह इधर अब ऋतू भी अंदर आ के अपनी माँ से लिपट गई. जो शायद हे कभी होता था. रेखा जी ने एक बार उसका चेहरा देखा फिर उसको सीने से लगा जैसे दिल को महसूस करने लगी. ऋतू ने शायद हे कभी अपनी माँ से कोई व्यक्तिगत बात या सलाह की हो कभी, वो बस खुद में रहने वाली और अपने बाप की सर्चढी बेटी थी लेकिन अर्जुन से प्यार होने के बाद अब उसको वो हर चीज पसंद थी जो अर्जुन को थी. उसके लिए खाना बनाने से लेकर उसका हर तरह से ख्याल रखना, सबसे घुलना मिलना और अब तोह अपनी माँ के आगोश में उसको एक नया हे प्यार महसूस हुआ था.

"मेरी दोनों बच्चियां बड़ी हो गई देखते देखते हे.", ऋतू का माथा चूमकर उन्होंने कोमल को भी गले लगा लिए.

"मेरी लिए क्या लेके आई दीदी आप वह से?", माँ की गॉड में बैठे हुए हे ऋतू ने कोमल दीदी से पुछा.

"माधुरी दीदी की शादी का न्योता.", चुपचाप रहने वाली कोमल ने ऐसा जवाब दिए तोह ऋतू उन्हें गौर से देखने लगी. ये मजाक करने लगी है?

"आप वही हो न?",

"हाँ बिलकुल वही हु और इधर आ मेरे साथ फिर दिखती हु मई मेरी गुड़िया के लिए क्या क्या लाइ हु." उसका हाथ पकड़ के वह बहार चल दी तोह रेखा जी सोचती से बिस्टेर पर लेत गई. एक हे पल में वह किसी गहरी सोच में डूब सी गई थी.

"ये देख तेरे लिए चिकनकारी वाले कुर्ते, ये कढ़ाई वाली जूती, तेरी पसंद के नमकीन पिस्ता का पैकेट और सबसे ख़ास ये.", सब सामान बिस्टेर पर बिछा कर आखिरी में उन्होंने एक अखबार लिप्त हुआ कुछ ऋतू के हाथ में रख दिए.

"ये क्या है?", छोटी बची सी खुश होती अब वह इस आखिरी चीज को ध्यान से देखने की कोशिश करने लगी.

"अब तेरे लिए है तोह तू खुद हे खोल के देख ले न. बस मुझे याद आ गया था कुछ इसको वह मार्किट में देख कर तोह मैंने पापा से बोलकर ये ले लिया." कोमल दीदी भी अपनी बहिन की ख़ुशी में खुश थी.

"वाओ." अखबार हटते हे वो ख़ुशी से उछाल पड़ी. एक गट्टे के पारदर्शी डब्बे में 3 गुड़िया थी. दोनों तरफ लड़किया और बीच में एक लड़का. खुसी में चिल्लाती वह कोमल दीदी को कास के गले लगाए चींख रही थी.

"बार्बी और केविन.. ये आपको याद है अभी तक.?", वो हैरान भी थी की बड़ी बहिन को उसके बचपन की हर चीज याद थी.

"प्रीती जब आई थी तोह सबसे पहले उसने एक गुड़िया तुझे और एक अर्जुन को दी थी न. और कैसे तू और प्रीती अपनी दोनों गुड़िया का मेकअप करती रहती थी और मुन्ना अपने गुड्डे को मिटटी में दबाये रखता था.", ऋतू की आँखों में तोह पानी हे आ गया था. ये शायद उसके छोटे से जहां में खुशियां ज्यादा हे भर गई थी.

"पागल लड़की बस कर. और फिर अब प्रीती वाली उसको वापिस कर के तोह आ.?", उन्होंने ऋतू का चेहरा ठीक करते हुए कहा.

"लेकिन अब अर्जुन तोह इस से खेलने से रहा तोह इसका क्या करू?", उसने हँसते हुए कहा तोह दीदी भी हंस पड़ी.

"इसको दादा की बैठक में रख दे. वही तोह है उसके बचे हुए खिलोने. और चल अब ये सामान अपनी अलमारी में रख और आज तू कॉफ़ी पिलाएगी. चाय बहोत पी चुकी मई.", बिस्टेर पर बैठ थी कोमल दीदी ने इतना कहा तोह ऋतू मुस्कुराती हुई बहार निकल चली. यही हाल अलका का भी था जिसको माधुरी दीदी और ललिता जी सामान दिखा रहे थे. इस बीच अर्जुन भी घूमता फिरता आया और कोमल दीदी को अकेला देख गले लग गया. वो भी सर सहलाती उसको महसूस करती रही.

"ऋतू दीदी के लिए तोह आप शायद मार्किट खरीद लाये और मेरे लिए?", अर्जुन की बात पर बस वो मुस्कुरा दी.

"तेरे लिए तोह मई हे हु न. अब तू बता के मई चाहिए हु या फिर कोई उपहार.?" पास बिठाकर उन्होंने वैसे हे सवाल अपने भाई से कर दिए.

"दीदी आप हे तोह मेरा सबसे ाचा उपहार हो." बैठे हुए हे वह उनकी गॉड में सर रख कर बिस्टेर पर फ़ैल गया. इधर कोमल दीदी ने एक सोने की जंजीर डब्बी सी निकलते हुए उसके गले में दाल दी, जिसमे एक छोटा सा मोरपंख का लॉकेट था.

"ये मेरी तरफ से तेरे बर्थडे का एडवांस गिफ्ट.", कोमल दीदी ने उसके चेहरे पर झुकते हुए कहा तोह वह झट्ट से खड़ा हो कर अलमारी के शीशे में देखने लगा. सोने की एक चमकदार जंजीर और वो गोल सा मोरपंख.

"ये तोह बहोत महंगा उपहार हो गया दीदी.", थोड़ा गंभीरता से अर्जुन ने उनके चेहरे की तरफ देखते कहा.

"कुछ महंगा नहीं है. छोटे दादा ने इस बार जब हिस्सा दिए था पिछली फसल का तोह दादी माँ ने सबके लिए सोने की चैन बनवा के दी थी. फिर तेरी और मेरी मैंने एक करवा ली. क्यों तुझे पसंद नहीं आई?", कोमल दीदी की बात पर वह मुस्कुराता हुआ उनके पास बैठकर चैन को उतर उनके गले में डालने लगा.

"आपकी और मेरी है तोह फिर मई चाहता हु के अभी आप इसको पहनो क्योंकि मैंने तोह ये ले हे ली है. और फिर आपका ये उपहार मुझे बहोत पसंद आया तोह अब ये हमारा साँझा हो गया.", अर्जुन की बात को कोमल दीदी मन न कर पाई. उन्हें तोह उसका चैन पहनना भी मंगलसूत्र सा लग रहा था. बस वह आँखों से उसको देखती रही जो गले में चैन को बंद करने में लगा था.

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"वाह क्या सन है. भाई हमको तोह कभी ऐसा गिफ्ट नई मिला.", अंदर आती ऋतू दीदी की आवाज से अर्जुन बस मुस्कुरा दिए लेकिन फिर चैन को डालने के बाद सीधा बैठ गया.

"दीदी ने गिफ्ट दिए था तोह मैंने वह उन्हें हे पहना दिए. जब मेरा दिल करेगा तोह मई इनसे ले लूंगा.", अर्जुन की बात पर कोमल दीदी जहा शर्माती सी मुस्कुरा रही थी वही ऋतू ने कॉफ़ी को बिस्टेर पर रखते हुए अपनी मुट्ठी में पकड़ी डब्बी भी आगे कर दी.

"लेकिन मेरी वाली तोह शायद इस से आधी है,", अपनी चैन डब्बी से निकाल कर दिखते हुए वह थोड़ी हैरान थी.

"ये मेरी और दीदी की एक हे बनवाई गई है इसलिए थोड़ी भारी है. अगर आपको ये चाहिए तोह ले लीजिये.", अर्जुन नहीं चाहता था के ऋतू दीदी ये चैन ले और उन्होंने भी फिक्र कस्ते हे मन कर दिए. फिर हंसने लगी.

"ये दीदी ने प्यार से बनवाई है तोह उनके पास हे रहने दे. फिर हम में कोई बंटवारा तोह है नहीं. मेरा दिल करेगा तोह मई पहन लुंगी.", ऋतू की बात पर कोमल दीदी निकलने लगी चैन तोह खुद उन्होंने अपनी बड़ी बहिन का हाथ पकड़ लिए.

"दीदी, मई तोह सोच रही हु के तीनो को हे जुड़वाँ लेते है साथ में. आप इतनी सुन्दर हो की ये फिर भी थोड़ी छोटी हे लग रही है.", अब तीनो भाई बहिन मुस्कुरा रहे थे. फिर अर्जुन वह से उठ कर बहार निकल गया और इधर अलका, प्रियंका और आरती भी आ गई उनके कमरे में. माधुरी दीदी आराम करने चली गई थी.
 
भाई अपडेट या तोह 2 बजे तक रात में दूंगा नहीं तोह सुबह 11 बजे. I'm वर्किंग इन आईटी
 
अपडेट 46

Prem-Ansh


शाम तक़रीबन 7 बजे वही पुराण समां था आज रामेश्वर जी के घर. रसोईघर में रेखा जी और ललिता जी काम करने में लगी थी और कोमल दीदी के साथ प्रियंका दीदी भी वही थी. अलका और आरती ऊपर तारा के कमरे में टेलीविज़न पर गाने देखती हुई तारा को तैयार होते हुए देख रही थी, जो शादी में जाने के लिए एक नए फैशन का सूट पहन ने में लगी थी. एक साफ़ रेशमी सूट को आधुनिक डिज़ाइन दिए गया था जो सिर्फ की shaadi-byaah या खास दिन के लिए बनवाया गया था.

"यार ये ड्रेस तोह बड़ी सूंदर और डिज़ाइनर है.", आरती ने देखा की सूट का गाला भी थोड़ा गहरा है लेकिन बिलकुल फिटिंग का वो सूट बेहद जाँच रहा था तारा पर. अलका ने भी haan-me -हाँ मिलाई तोह तारा मुस्कुरा दी.

"दिल्ली में लिए था लेकिन पहना कभी नहीं था. आज सोच के देख लेती हु इसको भी क्योंकि कपडे तोह वही पसंद है जो आरामदायक हो और ये थोड़ा ज्यादा हे बाहड़कीला सा है.", छोटी बनियान और निक्कर पहन कर सोने वाली तारा को तोह हर वह कपडा भारी हे लगता था जिसमे पूरा शरीर धक् जाये.

"हाँ. तू वैसे भी वह टीशर्ट और शॉर्ट्स वाली लड़की है. ये तोह जैसे तुझे सांस भी नहीं लेने देगा.", अलका ने तारा की खिंचाई कर दी और फिर ऐसे हे वह अपना मेकअप और संदल पहनती तैयार होने लगी.

"ोये. उठ जा अब प्रीती आई है तुझे बताने की जल्दी तैयार हो जा घर पे बुआ भी तैयार है. जाने में भी समय लगेगा क्योंकि शादी थोड़ी दूर है.", अर्जुन बिस्टेर पर मुँह दबाये पड़ा था तोह ऋतू दीदी प्यार से उसको उठाने में लगी थी. जब उनकी आवाज सुनी तोह मस्ती करते हुए अर्जुन ने उन्हें पकड़ के अपने ऊपर खींच लिए और वह भी शायद ढीली कड़ी थी जो उसके ऊपर गिरती चली गई.

"आप न यही सो जाओ मेरे साथ. शादी वादी तोह होती रहेगी.", अर्जुन उनके गाल चूमने लगा तोह किसी के हंसने की आवाज से ऋतू दीदी को जल्दी से छोड़ दिए. ऋतू भी शर्माती सी कड़ी हो कर अपनी टीशर्ट ठीक करने लगी. प्रीती बहार वाले दरवाजे के पास कड़ी हंस रही थी. अर्जुन ने सर झुका लिए उसको वह देख कर.

"मई कह रही थी न तुझे के जा के खुद उठा ले अब देख ले.", ऋतू दीदी कमरे से निकलती हुई बोली. "और जल्दी नीचे आजा तारा भी इन्तजार कर रही है."

"तुम कब आई यहाँ?", प्रीती से नजर चुराते हुए अर्जुन उठ के शीशे की तरफ देखता बोलै.

"मई तोह साथ हे आई थी लेकिन ऐसी उम्मीद तोह बिलकुल नहीं थी की तुम उठते हे ऐसा कुछ करोगे."

अर्जुन ने उसको बैठने का बोलै और खुद टोलिया लेकर बाथरूम में घुस गया. ड्राइंग रूम में कोई नहीं था और उधर से नीचे जाने वाला दरवाजा भी बंद था. मुँह और बाल गीले करके वह सिर्फ पाजामे में अंदर आया तोह प्रीती को अब ध्यान से देखा. हलकी neeli-firoji रंग की उस खूबसूरत पोषक में किसी पारी सी लग रही थी वो. टोलिया तोह बस खुद के गाल में हे रुक गया था जैसे. कदम अपने आप हे प्रीती की और बढ़ चले जो खुद भी अपनी neeli-hari चमकती आँखों से शुन्य भाव से अर्जुन को देख रही थी. "उम्म्म्म" दोनों के होंठ आपस में जुड़ गए थे किसी गुरुत्वाकर्षण की वजह से. बेशक कदम अर्जुन ने बढ़ाये थे लेकिन डोर प्रीती ने अपने हाथ में ले ली थी इस गहरे चुम्बन की जिसमे वह अब उस का सर पकड़ती से जैसे बरसो से भूखी हो, अर्जुन के होंठो को चूसने हे लगी थी.

"तू कपडे पहन ले और इसको छोड़ नहीं तोह मर्डर जाएगी दम घुटने से.", ऋतू दीदी हाथो में इस्त्री की हुई अर्जुन की ड्रेस लिए अंदर आई तोह ये नजारा देख ठिठक गई थी लेकिन जब दोनों हे 2-3 मिनट तक अलग न हुए तोह उन्होंने अर्जुन को ठेला जो खुद शेरी के मुँह में जकड़ा था.

"आह.. हँ.. अब मई क्या बोलू.", प्रीती ने अर्जुन को आजाद किआ तोह वह सिर्फ इतना हे बोल पाया था अपनी उखड़ी साँसों से. ये आज तक का सबसे गहरा किश था जो साड़ी हद्दें तोड़ता कोई 5 मिनट चला था. प्रीती अब आँखें बंद किये बस दिवार से लगी लम्बी साँसे ले रही थी. ऋतू दीदी उसके गुलाबी चेहरे को देख मुस्कुराती सी प्रीती को पकड़ कर बिस्टेर पर बिठाने लगी. अर्जुन कपडे लेकर साथ वाले कमरे में चल दिए. 'पागल है ये तोह. एक मिनट और पकड़े रहती तोह आज मर्डर हे गया था." वह ड्राइंग रूम में आके अपने कमरे का दरवाजा बंद करके कपडे पहनता बस यही बड़बड़ा रहा था.

"ओह हेरोइन ये क्या था? मई तोह बस सीढ़ियां उतर कर कपड़े लेकर वापिस आई तोह तू उसको खाने लगी थी जो सबका शिकार कर सकता है." ऋतू दीदी ने बीएड पर लेती प्रीती से कहा तोह वह शर्मा के हंसने सी लगी.

"ये न खुद इनविटेशन देता है और फिर सबको लगता है लड़की इसकी तरफ खींची जाती है. वैसे जमा हे बंधु है ये आपका भाई. हाथ तक नहीं रखता मेरे ऊपर.", कड़ी हो कर वो एक बार ऋतू के गले से लग गई. फिर दीदी ने एक बार उसके बाल और ड्रेस को ठीक किआ और लेकर नीचे आ गई.

"तू रपे न कर डीओ किसी दिन इसका.", बहार आँगन में ऋतू दीदी ने ये बात कही तोह प्रीती ने आँख मार दी.

"उसके बिना काम नहीं होने वाला मेरे से आप लिखवा लो. और इसको भेजो हमारे घर 8 बजने वाले है. बुआ 6 बजे से इन्तजार कर रही है.", पतीति बहार निकलती बोली.

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कुछ देर बाद तारा कार की ड्राइविंग सीट पर थी और उसकी बगल में अर्जुन जेंटलमैन की तरह बैठा था. पीछे रेणुका जी और प्रीती थे. रेणुका जी ने वही साड़ी पहनी थी हलके हरे रंग की जो अर्जुन ने पसंद की थी उनके लिए. एक बिलकुल छोटा सा सिंदूर का निशाँ माथे से ऊपर और बालो की जड़ में, एक गोल हरी छोटी सी बिंदी, गले में बारीक काले मोतियों का सोने का मंगलसूत्र जो उनके उभारो से थोड़ा ऊपर था, साड़ी के साथ का हे हैंडबैग और चूड़ियां पहने वह आज एक साक्षात् बिजली सी लग रही थी. पूरी कार इन तीन लड़कियों के शरीर से उठती महक से भरी थी जो अब सड़क पर ढूढ़ने लगी थी.

"By-pass पर जो बिंद्रा फार्महाउस है वही शादी है तारा. अर्जुन रास्ता बता देना जरा हम पहले हे देरी से जा रहे है.", रेणुका जी की आवाज वही थी जो सबके सामने होती थी. तारा भी सर हिलती समझती सी बोली, "है अर्जुन ने बता दिए है रास्ता मुझे मौसी. और हमारी देरी की वजह भी आपका ये लाडला हे है.", खिड़की से बहार देखती प्रीती भी इस बात पर रेणुका बुआ के चेहरे की तरफ देख मुस्कुराने लगी जिसपर उसको भी वैसे हे मुस्कान बुआ के चेहरे पर दिखाई दे रही थी. कार चलते हुए हे तारा ने कैसेट प्लेयर का बटन दबा दिए तोह रील की हलकी से आवाज के साथ हे गण चल पड़ा और जाने सभी के चेहरे खामोश से बस उसमे हे खो गए.

"ऐ मेरे हमसफ़र... एक जरा इन्तजार... सुन सदायें दे रही है मंजिल प्यार की.."

"यहाँ से लेफ्ट लेना है तारा.", अर्जुन की आवाज से तारा को होश सा आया. देख तोह सड़क पर हे रही थी लेकिन वह पक्का भूल जाती के इस तरफ मुड़ना है. अगले 5 मिनट पर कार एक आलिशान से जगमगाते फार्महाउस के बहार कड़ी थी जहा पहले से हे ाची खासी भीड़ थी. Saje-sajaye लोग अंदर जा रहे थे और कुछ बहार गेट पर खड़े थे. चूंकि रेणुका जी लड़को वालो की रिश्तेदार थी तोह गेट पर उतारते हे उनका ाचे से स्वागत हुआ और फिर उन्होंने भी बाकी तीनो को अपने सम्बन्धियों से मिलवाया. कार को अंदर एक वर्दीधारी ड्राइवर लेकर गया और वापिस आने के बाद चाबी अर्जुन को पकड़ा दी.

"चची जी, ये है मेरी भतीजी प्रीती और ये है तारा." रेणुका जी ने अपनी इस chaachi-saas, जिनके बेटे की शादी थी से दोनों को मिलवाया और फिर अर्जुन को.

"रेणुका, ये लड़कियां पहले न दिखाई तूने. बड़ी सुन्दर बच्चियां है दोनों और प्यारी कितनी है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं के हमारा गुस्सा काम हो गया. भला कोई अपने देवर की शादी में भी मौके पे हे आता है क्या?", थोड़ा नखरा करती वह गहने से लड़ी आंटी बोली तोह रेणुका जी ने उनको गले लगते हुए मन लिए. बरात तोह कब की अंदर आ चुकी थी क्योंकि 8 बजे घुड़चढ़ी का समय था और ये सब तोह 9 बजे पहुंच रहे थे.

फार्महाउस कोई 6-7 एकड़ में फैला बड़ा हे आलिशान और भरपूर सजाया गया था. पता हे लगता था के रईस होने के साथ हे पैसा दिखने का पूरा शोक था दोनों हे परिवार को. अंदर आने पर अपने saas-sasur से भी रेणुका जी सादगी से मिली, पाँव छूने का उपक्रम करती सी. अर्जुन तोह शकल देख के हे समझ गया था के वो 55-60 साल की आंटी थोड़ी घमंडी सी है वही वो 60 के लगभग का अंकल जैसे बीवी का गुलाम. ऐसे हे कुछ चुनिंदा लोगो से मिलने के बाद रेणुका जी खुल्ले आसमान के नीचे सजाई गई बड़ी गोल टेबल पर तीनो के साथ बैठ गई. घास के इस खुले मैदान को फूलों और रंगीन कपड़ो के साथ हे छोटे बल्ब की लड़ियों से भी रोशन किआ गया था. तरह तरह के व्यंजन और पीने के स्टाल वही खुल्ले में हे सजाये गए थे. Safed-kaali वर्दी में कोई 40-45 वेटर सभी लोगो की खिदमत में लगे थे.

"मासी ये दिल्ली वाला कल्चर अब यहाँ भी चलने लगा है. थोड़ा तोह मुझे भी ये ओवर हे लग रहा है.", तारा ने सब तरफ देखने के बाद ये कहा तोह अर्जुन भी वैसे हे उनकी बात सुन ने लगा.

"अरे सब दिखावा है इसलिए तोह मई ladies-sangeet और बाकी रस्मो पर नहीं आई. कार, कॅश, ज्वेलरी और जाने क्या क्या डिमांड पूरी करवाई गई है. और मेरी चाची सास ने भी लड़की को जैसे कुबेर का खजाना दे दिए हो. आना जरुरी था तोह मई आ गई. इस बहाने चलो mel-milap हो जाता है तोह शिकायत नहीं करते लोग." रेणुका जी ने समझदारी से उत्तर दिए.

"बुआ मतलब 200 लोग और 50 वेटर. और इतनी बड़ी जगह. सीरियसली थिस इस तू मच.", प्रीती की इस बात पर तारा ने भी सहमति जताई.

"अभी बोलै न बुआ ने तोह लगता है समझ नहीं आया आप लोगो को. मतलब ये है की दिखाना बहोत जरुरी है आज के समय में. वैसे मुझे कोई शिकायत नहीं है.", अर्जुन ने बात समझने के बाद हँसते हुए कहा तोह रेणुका जी भी मुस्कुरा दी. कुछ हल्का फुल्का खाते हुए वह बातें करने लगे तोह वह भी लोग रेणुका जी से मिलने आने लगे. कैमरा वाला भी फोटो उतरने लगा तोह अर्जुन चुपचाप एक जूस का गिलास लेकर टहलने लगा था. 8 कुर्सियों वाली उस टेबल पर अब सिर्फ महिलाएं या लड़कियां हे बैठी थी. थोड़ी आगे हे बड़े बड़े स्पीकर लगे थे जहा दोनों पक्ष के लड़के लड़कियां ठुमके लगा रहे थे. पंजाबी, इंग्लिश गांव को बहुत जोर से बजाय जा रहा था. एक स्टाल से उबले हुए मक्की चटपटे दाने खता वह aas-pas घूम रही लड़कियों को देखता किसी जाने पहचाने चेहरे को देखने लगा. जब वह कोई न दिखा तोह बड़े हाल की तरफ कदम बढ़ा दिए. प्रवेश द्वार पर गुलाब के फूल बरसाए जा रहे थे. अंदर चमकदार संगेमरमर के इस फर्श पर तक़रीबन 30 स्टाल मुख्या खाने के लगे थे जहा अभी सिर्फ चाँद गिने चुने लोग हे थे. सामने हे कुछ लोग, जो सिर्फ मर्द हे थे एक दरवाजे से पिछले भाग में aa-ja रहे थे. अर्जुन भी उधर की तरफ घूमता सा चल दिए.

"अरे भाई, ये दूल्हे के जीजा है. इनके लिए एक बड़ा पटियाला पेग बनाओ.", एक आदमी वह लगे एक काउंटर पे शराब परोस रहे व्यक्ति से बोलै. 25-30 लोग थे इस जगह जो शराब और बियर का मजा लेने में लगे थे. हॉल के पीछे इस तरफ ये जगह भी खुले आसमान के नीचे हे थी. नौजवान, अधेड़ और बुड्ढे सभी एक दूसरे से jaan-pehchaan करते गिलास मिलाने में लगे थे. अर्जुन को एक पल तोह लगा के गलत जगह आ गया है. लेकिन यहाँ वैसा माहौल बिलकुल न था जैसा मल्होत्रा अंकल के वह शादी में था. ये लोग तोह हँसते बोलते हुए एक तरह से इस सब का मजा खुली तरह से ले रहे थे.

"आओ जवान. वेलकम तो थे पार्टी.", ये एक बड़े हे सभ्य से 48-50 साल के दीखते अंकल थे. सफारी सूट, स्टील के बारीक फ्रेम का चस्मा और बिलकुल साफ़ चेहरे वाले इन अंकल पर दोस्ताना मुस्कराहट थी. उन्होंने अर्जुन को कंधे पर हाथ रखते हुए इस bar-counter के पास कर लिए.

"बाई ाची पर्सनालिटी है भाई तुम्हारी तोह. बताओ क्या लोगे वही बनवा देते है. बियर, व्हिस्की, वोडका या कॉकटेल.", 35 के तक़रीबन दीखते ये व्यक्ति भी एक ाची kad-kaathi के थे जिनके साथ हे 20-22 साल के 2 लड़के भी लम्बे कांच के गिलास में बियर की चुस्किया ले रहे थे.

"नहीं सर. थैंक यू. मई ये सब नहीं पीटा. वो अकेला था शादी में और ज्यादा किसी को जानता नहीं हु तोह बस घूमने लग रहा था.", अर्जुन ने भी सभ्य तरीके से सबको सर हिला कर अभिवादन करते हुए प्यार से मन कर दिए.

"अरे बीटा 300-350 लोगो में भी अकेले हो तोह ये तोह हमारी तौहीन हे हो गई. भाई 20 मिनट में मैंने यहाँ 10 लोग दोस्त बना लिए और तुम खुद को अकेला समझ रहे हो.", ये पहले वाले अंकल थे जो अपना खली गिलास काउंटर पर रखते अब एक सिग्रत्ते जलाते हुए बोले. सामने वाले उन्ही 35 के व्यक्ति को भी उन्होंने सिग्रेटे का न्योता डब्बी बढ़ाते किआ जिन्होंने स्वीकारते हुए एक सिग्रत्ते सुलगा ली.

"वैसे किसी तरफ से हो भाई? छोटू यहाँ एक ऑरेंज जूस दो, बिलकुल फ्रेश.", ये थोड़ी दिलचस्पी दिखा रहा था अर्जुन में. व्यक्तित्व भी ाचा था और बात भी खुशमिजाजी से की थी.

"जी मई मेरी बुआ और कौसिन्स के साथ आया हु यहाँ. वो रिश्ते में दूल्हे की बड़ी भाभी लगती है. मरस रेणुका. माइसेल्फ अर्जुन शंकर शर्मा", अर्जुन ने इतनी बात कही तोह सामने वाले उस व्यक्ति ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. और ये अंकल ने भी पीठ थपथपते हुए प्यार का इजहार किआ.

"वाह भाई क्या बात है. मेरी बड़ी साली लगती है तुम्हारी बुआ और कौशल मेरा साला है. माइसेल्फ अभिमन्यु.", ये वही 35 के लगने वाले व्यक्ति थी जिन्होंने अब कुछ ज्यादा हे ख़ुशी जाहिर कर दी थी.

"और बीटा हम है उनके mama-sasur विजयप्रताप." अंकल जी ने अपना परिचय दिए तोह वह तक़रीबन 12-13 लोगो ने अब अर्जुन से mel-jol बनाया. सब अपनी रिश्तेदारी का बखान कर रहे थे. आधे घंटे में हे एक ाचा खासा लोगो का दायरा अब उसको जान रहा था. Hasi-majaak, purane-naye दौर की बातें करते वह सभी बस अपने पेग के मजे ले रहे थे. कोई वह ऐसा न था के जो पक्का शराबी हो या गलत सलत हरकत कर रहा हो. अब तोह यहाँ भी 50-55 लोगो की महफ़िल सज चुकी थी और वेटर भी garam-garam शाकाहारी और मांसाहारी चटपटे व्यंजन छोटी प्लेट्स में परोस रहे थे. अर्जुन तोह पूर्ण शाकाहारी था तोह ज्यादा जोर देने पर बस 1-2 पनीर और मशरूम के टुकड़े हे खाये.

"ाचा मई जरा अपने सदस्यों से मिलता हु जी. वो भी अब तक मुझे देख रहे होंगे.", अर्जुन ने हाथ जोड़ते हुए जाने का कहा तोह ये सज्जन जिनका नाम अभिमन्यु था भी उसके साथ हे हो लिए सबको हाथ हिलाते हुए.

"आओ भाई जरा हम भी मिल लेते है अपनी साली साहिबा और बाकी लोगो से.", दोनों हे चलते हुए वह आ गए जहा अर्जुन रेणुका जी के साथ पहले बैठा था. लेकिन अब वह तोह और हे लोग बैठे हुए थे. इतने में हे तारा की आवाज कानो में पड़ी तोह अर्जुन ने उधर हे देखा. रेणुका जी, प्रीती और तारा के साथ उनकी हमउम्र 4 और थी जो सभी एक काउंटर से थोड़ी दूर बातें करती chaat-papdi का भी लुत्फ़ ले रही थी. अब लगभग हर तरफ ऐसे हे झुण्ड नजर आ रहे थे.

"प्रणाम रेणुका जी. कैसी आप?", अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए बुआ का अभिवादन किआ तोह उनके साथ लहंगे में कड़ी उनकी हे उम्र की महिला भी मुस्कुरा कर उन्हें देखने लगी. लेकिन रेणुका जी ने एक छोटी सी मुस्कराहट दिखते हुए बस हाथ जोड़ कर इतना हे कहा. "नमस्कार जी. मई बिलकुल ठीक हु और आशा है आप भी ाचे होंगे."

फिर वह उन महिला को मुस्कुरा कर कुछ बोलती सी प्रीती का हाथ पकड़ के अंदर की तरफ चल दी जहाँ शायद उनकी कोई और रिश्तेदार खाने के लिए बुला रही थी. तारा ने भी अर्जुन को खाने के लिए पुछा तोह अर्जुन भी उसके साथ अंदर हाल की तरफ चलने लगा.

"बच गई थी ये पिछली दिवाली को लेकिन आज मौका है.", अभिमन्यु ने ये बात रेणुका जी का पिछवाड़ा देखते हुए कही और अर्जुन के कानो ने भी ये सुना लेकिन वह सीधा हे चल दिए. अंदर आने के बाद सभी एक टेबल से प्लेट लेते हुए खाना डालने लगे. अर्जुन यहाँ रेणुका जी के साथ हे था.

"तुम्हे ये कहा से मिल गया था?", उन्होंने प्लेट में सब्जी डालते हुए अर्जुन से पुछा.

"वो मई इधर उधर घूम रहा था तोह एक काउंटर पर ये भी मिल गए. और इनके पूछने पर हे मैंने बताया के मई अपनी बुआ के साथ आया हु तोह इन्होने अपना रिश्ता बताया और फिर साथ में आ गए. कोई बात है क्या?", अर्जुन की बात सुनकर उन्होंने देखा की तारा और प्रीती अपनी नै सहेलियों के साथ सलाद डालती हुई अपने में हे व्यस्त थी.

"कुछ ऐसा हे है अर्जुन. रिश्ता बड़ा है तोह मई इज़्ज़त देती हु लेकिन ये इंसान जितना बहार से ाचा दीखता है उतना हे घटिया और मौकापरस्त है.", अपनी और अर्जुन की प्लेट में गरम रोटी रखते हुए वो चलती हुई इस तरफ आ गई जहा थोड़ा एकांत था.

"मतलब? अगर आप चाहे तोह बता सकती है मुझे और विश्वास कीजिये की मई आपके साथ हु तोह आप बस निश्चिंत रहिये.", अर्जुन की आवाज जरूर धीमी थी लेकिन उसमे प्यार के साथ सुरक्षा का भाव भी था.

"पता है मुझे की मई दुनिया में सबसे ज्यादा तेरे साथ सुरक्षित हु. कौशल की शराब की आदत है लेकिन ज्यादा नहीं झेल सकते वह. पिछली दिवाली ताश खेलते हुए वह इनके और 2 और दोस्त के साथ ज्यादा हे जातक गए थे, मेरी ससुराल में. रात 3 बजे ये उन्हें लेकर मेरे कमरे में आया था तोह वह तोह बेसुध थे और मैं अपने रात के कपड़ो में." फिर रोटी की गराई सब्जी से लगाती एक बार फिर इधर उधर देखने लगी थी रेणुका. पहले दमकते चेहरे पर अब थोड़ी चिंता सी आ गई थी.

"इन्हे बिस्टेर पर लिटाने में मेरी मदद करने के बहाने अभिमन्यु ने मेरे शरीर के साथ भी अनजान बनते हुए छेड़छाड़ की थी. और जब मैंने नजरअंदाज किआ शराब की गलती समझते हुए तोह सीधा हे मुझे बाहों में भर कर बिस्टेर पर गिराने की कोशिश की थी. वो तोह जाने कैसे इसका पाँव फिसल गया और मैं चंगुल से आजाद हो कर चीख पड़ी तोह माफ़ी मांग कर बहार निकल गया था ये." अर्जुन को आज फिर एक सबक मिल गया था के लोग वैसे नहीं होते जैसा वह भीड़ के सामने दिखते है खुद को. गुस्सा तोह आया लेकिन वो शांत हो गया.

"आप यहाँ मेरे साथ हो तोह ऐसे इंसान के बारे में हम और बात नहीं करेंगे." अपने हाथ से उसने एक निवाला रेणुका को खिलाया तोह बिना किसी परवाह के उन्होंने भी उसके हाथ से खाते हुए वैसे हे उसका भी खिलाया. चेहरे पर मुस्कान वापिस आ गई थी.

"वाह bua-bhatije में तोह बड़ा प्यार है. ये पहले तोह नहीं देखा हमने." तारा उनकी तरफ आती बोली जो खुद मुस्कुरा रही थी. पीछे हे 2 और खूबसूरत लड़कियों के साथ आती प्रीती भी ये देख रही थी.

"ये तोह है हे मेरे दिल का टुकड़ा. और तू बुरा मत मान मई तुझे भी खिला देती हु.", उनकी इस बात पर तारा मुस्कुराती हुई ना में गर्दन हिलती चमच से चावल खाने लगी. और वही प्रीती भी चोरी चोरी अर्जुन को देख रही थी क्योंकि उसके साथ वाली भी शायद अर्जुन को देखती उस से बातें कर रही थी. अर्जुन भी ाचे से तैयार हो कर आया था यहाँ जिस से सभी उस से प्रभावित थे और सबसे ज्यादा तोह खुद रेणुका जी हे.

"मीठे में क्या खाओगे.?", रेणुका जी सीधा सम्बोधन नहीं कर रही थी अर्जुन के साथ और न हे 'तुम' या उसके नाम से उसको बुला रही थी, जब दोनों यहाँ अकेले में थे.

"मीठा? वो तोह मई अपने साथ हे लेकर आया हु. आप ने जो खाना है वह मई ले आता हु.", इस बात पर तोह रेणुका के चेहरे की चमक दोगुनी हो गई थी साथ हे हाय की लाली लिए वह प्लेट रखने जानी लगी तोह अर्जुन ने हाथ से वो लेते हुए खुद हे हॉल में रखे बक्से में रख दी.

"आइयें आपका मुँह मीठा करवा देते है पहले. मई बाद में चख लूंगा." धीमे से सरगोशी करता वह उन्हें लिए एक अलग काउंटर्स की कतार की तरफ चल दिए. रेणुका के शरीर का हर कटाव इस साड़ी और ब्लाउज में नुमाया हो रहा था. शालीन और खूबसूरत व्यक्तित्व तोह था हे लेकिन अर्जुन के असर से अब वह एक कामुक नवयुवती लग रही थी और ज्यादातर मर्द भी chori-chipe या खुलकर उनकी ख़ूबसूरती का दीदार कर रहे थे.

"पता है इतने लोग आपको यहाँ देख रहे है की मई सोच भी नहीं सकता. सच में आज बिजलियाँ गिरती दिख रही है.", वैसे हे उनके करीब चलता वह एक छोटी प्लेट उठता एक गरम गुलाबजामुन उस प्लेट में रख कर उन्हें देने लगा.

"मुझे कोई नजर नहीं आ रहा यहाँ.", नजरे नीची रखते उन्होंने एक प्यारी शर्मीली मुस्कान से ये कहा तोह अर्जुन ने जगह का लिहाज करते हुए उनको सहज रखना हे ठीक समझा.

"कैसी हो रेणुका बिटिया? बहुत समय के बाद तुम्हे देखा तोह एक बार पहचान हे नहीं पाया. बहुत ाची लग रही हो पहले से.", ये तोह वही अंकल थे, mama-sasur. जो एक प्लेट में सब्जी रोटी लिए उनके पास आ गए थे. साथ हे उनके अभिमन्यु और एक नौजवान और था. वो दोनों भी बेशर्मी से मुस्कुराते बस रेणुका को हे देख रहे थे. रेणुका ने ये देख लिए था लेकिन खुद को सहज रखती वो आराम से इन व्यक्ति से मुखातिब हुई.

"मई तोह बिलकुल ठीक हु मामाजी. और जैसी आपने पहले देखि वैसी हे हु. आप बताइये कैसे है?", उनकी बात सुनकर विजयप्रताप ने उस लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए रेणुका जी की तरफ किआ.

"ये बात वैसे तोह मुझे तुम्हारे पिता जी से करनी चाहिए लेकिन फिर भी मई तुम्हे मेरे बड़े भतीजे से एक बार मिलवाना चाहता हु. ये अनुराग है, बड़े भाई का बीटा. आजकल तुम्हारे इस शहर में हे टेक्सटाइल कंपनी में इंजीनियर के पोस्ट पर है. लड़का ाचा है और वह तुम्हारी भतीजी इसको पसंद भी है....

"उसका रिश्ता हो चूका है मामाजी. तोह आप इस बारे में कोई जिक्र न हे करे तोह बेहतर होगा. और ये अनुराग वही है न जिसपर दिल्ली वाला केस चल रहा है? आपने सोचा भी कैसे ये सब?", धीमी आवाज बेशक थी लेकिन जुबान से आग हे उगल रही थी इस समय वह जब विजयप्रताप ने इशारा प्रीती की तरफ किआ. सुर्ख लाल चेहरा देख कर भी अभिमन्यु किसी घाघ की तरह मुस्कुरा रहा था. और शर्म तोह जैसे इन अंकल को भी नहीं थी जो ढिठाई से रेणुका की तरफ देखते कभी अपने इस भतीजे को.

"राज करेगी वह. 20 एकड़ जमीन और 2 बंगले है लड़के के. ऊपर से ाची नौकरी भी है. बस मई तोह ये कह रहा था के विचार करना. जहा तक मई जानता हु कौशल भी मन नहीं करेगा."

"जिसके साथ रिश्ता हुआ है उस परिवार को नहीं जानते आप नहीं तोह शायद इतना नहीं बोलते. रही बात ये jameen-jayedad की तोह प्रीती के पास देश और देश से बहार आपके भतीजे से दोगुना हे होगा.", अर्जुन उनकी ब्याह पर हाथ रखते शांत रहने का इशारा करने लगा लेकिन ये महाशय और अभिमन्यु तोह सोच कर हे आये थे यहाँ.

"ऐसा कोनसा परिवार है जरा मालूम हो हमको भी रेणुका जी जिसके सामने ये लड़का आपका इतना बुरा लगा." अभिमन्यु की बात पर अर्जुन ने इस कड़ियल इंसान को गौर से देखा फिर रेणुका को.

"S.P. पंडित रामेश्वर जी के पोते से बात पक्की हो चुकी है. और आपका भतीजा उन्हें न जानता हो लेकिन आप तोह वाकिफ हे है उनसे. मेरी शादी में तोह ाचे से मिल चुके है आप, मां जी. वैसे बता दू की एक पूरा गाँव हे उनका है तोह जमीन का तोह मुद्दा ख़तम हे समझिये. फिर आती है बात संस्कार की तोह आपके भतीजे का नाम जिस केस में है वह संस्कार मायने नहीं रखते. नमस्कार." इतना बोलकर वह अर्जुन को साथ लिए आराम से वह से निकल गई और पीछे छोड़ गई विजयप्रताप का पत्थर हो चूका चेहरा और उबलते हुए bhatije-Abhimanyu को.

"अंकल जी, कोण है ये पंडित रामेश्वर और कोनसी टॉप है? अपने लड़के की बेइज़्ज़त्ती कर के चली गई ये औरत?", ख़ुशी से थोड़ी देर पहले उछलते इस आदमी और अब के अभिमन्यु बे din-raat का फरक आ चूका था.

"छोड़ यार बात यही ख़तम करते है. और बीटा तू दूर हे रहना उस लड़की से कही भनक लग गई तोह पता नहीं क्या होगा.", वह तोह इतने चिंतित हो गए के साड़ी शराब और मजा गायब हो गया.

"चाचा जी, आपसे नहीं होगा तोह मई खुद हे देख लेता हु. फूफा जी साथ है मेरे.", ये अनुराग बोलै जिसको शायद घमंड था पैसे और ताक़त का. और अभिमन्यु को मतलब था बस रेणुका से जिसके लिए उसने भी हाँ में हाँ मिला दी.

"बहनचोद, बोलै न के चुप कर. किसी ने सुन भी लिए के तू किनसे रश्क लेने की बात कर रहा है तोह तेरी और इसकी, दोनों की माँ यही छोड़ देंगे. और पंडित का नाम जहा यहाँ इज़्ज़त से लिया जाता है उनके बेटे का दहशत से. एक बार किसी मेरी उम्र या मेरे से बड़े आदमी से इस शादी में जरा तफ्तीश करके देखो पता लग जायेगा की किनकी बात हो रही है. रेणुका की शादी इसलिए कौशल से हो गई थी की छोल पूरी ने रामेश्वर जी से सलाह नहीं करि थी. लेकिन छोल के पास भी तुम्हारी कोई हरकत गई तोह मई साफ़ मुकर जाऊंगा के मैं तुम्हारे इरादे जानता था. आज भी ये बात इस लड़की से इसलिए कर्ली की तू मुझे यहाँ कसम देके ले आया मादरचोद. चल अब मेरा पीछा छोड़." बड़बड़ाता हुआ सा विजयप्रताप प्लेट को बक्से में गिरता फिर से शराबखाने की और बढ़ गया.

"देख अनुराग ये हो गए है बूढ़े लेकिन एक बार हम इस बात की चर्चा किसी से कर के देखते है फिर सुलझाते है उस पंडित जी के पोते की कुंडली नहीं तोह इसको तोह मई उठा हे लूंगा." अभिमन्यु अब बड़े तूफ़ान से लापरवाह हो गया था और साथ में हे अनुराग भी. दोनों वह से चलते हुए अपनी पहचान के और लड़की की वालो की तरफ के श्रीमान त्यागी जी से मिले जो इस शहर में हे सुब इंस्पेक्टर पोस्टेड थे और थोड़ा बहोत अभिमन्यु के kaam-kaaj भी करवाते थे, मॉटे पैसे के बदले.

"त्यागी जी कैसे है आप? भाई हमने तोह मयखाने बुआलया लेकिन आप तोह हमे निराश कर गए.", चापलूसी से अभिमन्यु ने उनसे बात शुरू की तोह अनुराग ने भी हाथ मिलाया त्यागी जी से.

"अरे नहीं भाई ऐसा नहीं है कुछ. वह यहाँ पब्लिक प्लेस है और फिर यही से बस ड्यूटी जाना है तोह मैंने नहीं पी. और बताओ कोई काम था क्या?" त्यागी भी कड़ियल पुलिसिया था जो समझ गया के ये बिना हे मतलब के तोह नहीं आया होगा.

"आया तोह आपसे मिलने हे था फिर याद भी आ गया के शायद आप बता सके हमे कुछ.", थोड़ा उन्हें एक तरफ लाते हुए अभिमन्यु ने एक नकली खुसी से कहा.

"बताओ भी भाई और तुम्हे पता है के मैंने आज तक ना नहीं की है तुम्हारे किसी काम को.", अपनी जेब का इशारा करते हुए उसने कीमत याद दिलाई जिसपर ये इंसान सर हिला के हामी भरने लगा.

"ये रामेश्वर कोण है?"

"कोण रामेश्वर भाई? थोड़ा खुल के बताओ मई इस नाम के बारे में ज्यादा नहीं जानता." त्यागी ने सोचने की अदा से कहा.

"जी कोई सप पंडित रामेश्वर है यहाँ इस शहर का." अनुराग ने दखल देते हुए कहा.

"कोण है बे ये छोरा? ोये पंजाबी कोण है ये बहनचोद? पंडित जी का नाम तमीज से लियो नहीं तोह यहीं गाड़ दूंगा और फिर ये आदमी जो चापलूसी में लगा है पैसे भी इसकी गांड में दाल दूंगा." तीनो इस समाया कोने में थे जहा त्यागी 2 बार अभिमन्यु से सवाल करने के बाद अनुराग की कालर पकड़ चूका था.

"भाई इसका वह मतलब नहीं था. हमे किसी ने बताया था के वो शहर के गणमान्य व्यक्ति है बस इत्छा थी उनके बारे में जान ने की. त्यागी जी शादी का माहौल है.", उनको शांत करता वह अनुराग की गर्दन छुड़ाते हुए बोलै. फट तोह इसकी भी गई थी क्योंकि ऐसे जवाब की उम्मीद तोह बिलकुल नहीं थी.

"मुन्ना, जब किसी के बारे में जानते नहीं तोह बात तमीज से करते है. और मर अभिमन्यु अगर आप सच में jaan-na चाहते है जैसा की मुझे नहीं लगता लेकिन फिर भी बता देता हु की पंडित जी के दुश्मन भी उनकी इज़्ज़त्त करते है. और पुलिस डिपार्टमेंट से रिटायरमेंट लेने के बावजूद वह आज भी अपनी सेवाएं दे रहे है हरयाणा पुलिस में. I.G. निर्मल सिंह, डगप अलोक चावला उनके नीचे काम कर चुके है और रात के 1 बजे भी उनके हुकुम पर हाजिर हो सकते है. कह सकते हो की पूरे प्रदेश में उनका कोई नाम नहीं लेता सिर्फ पंडित जी हे कहा जाता है, हमारे विभाग में. ाचे स्वाभाव के है और पुलिस वालो के परिवार के लिए सर्कार से कई काम करवा चुके है. अब वह बात जो तुम पूछना चाहते हो लेकिन कहना नहीं. गलती से उनके किसी परिवार के शक़्स की तरफ मत देखना या कोई हरकत ऐसी मत करना जो बुरी लगे. पुलिस बाद में तुम्हारे खिलाफ कुछ करेगी पहले एक डॉक्टर और उसका भाई, जो दोनों उनके बेटे है तुम्हारी सांस बहार निकल लेंगे. चलता हु और माफ़ करना इस जानकारी के पैसे लेकर मई उनके नाम की तौहीन नहीं करना चाहता. और तू थोड़ा ध्यान से रहियो." जाते हे अनुराग को ऊँगली दिखते हुए वह निकल गया और यहाँ पीछे रह गए ये दोनों hakke-bakke.

"चल यार तू छोड़ ये सब 2-2 ड्रिंक लेते है फिर करते है कुछ." अपने साथ अनुराग को शराब के ठिकाने ले जाता अभिमन्यु अब सिर्फ रेणुका को ध्यान कर रहा था. मूड ख़राब हो गया था ये bhatija-bhatiji के चक्कर में और एक अनजान इंसान के बारे में इतना सुन के.

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"आपको बहुत पता है वैसे हमारे परिवार के बारे में." अर्जुन अब कुर्सी पर रेणुका जी के साथ बैठा था पंडाल में जहा dulha-dulhan से सभी मिल रहे थे और photo-shagun का रिवाज हो रहा था. प्रीती और तारा भी अपनी इन नयी सहेलियों के साथ बैठी उधर हे कॉफ़ी की चुस्किया लेती बातें कर रही थी. उन्हें शायद ये ाची लड़कियां मिली जो सोच और स्वभाव से उनके हे जैसी थी.

"पता तोह होगा हे. अब मेरे पापा जब यहाँ रहने आये थे तोह उनका फिर ट्रांसफर हो गया था. लेकिन मेरी माँ और मैंने ज्यादा समय आप लोगो के घर में हे बिताया है. और जब रामेश्वर ताऊजी नहीं होते थे तोह मेरे पापा भी वैसे हे दोनों परिवार की dekh-rekh करते थे जैसे ताऊजी. बाकी तुम्हे कल हे पता चल जायेगा जब मई आउंगी." इस बात पर थोड़ी मुस्कान सी थी उनके चेहरे पर.

"वैसे आज देख लिए के आपको गुस्सा भी बहोत आता है. और ये किस पोते की बात हो रही थी वह?", अर्जुन ने थोड़ा छेड़ते हुए कहा.

"चुप करो न अब. यहाँ बस अभी हम दोनों है न. खुद हे देखो के कौशल की जगह मई यहाँ किसके साथ हु.", रेणुका सच में हे इतना आगे बढ़ चुकी थी के दिल से हे अपने असली पति को निकल हे बैठी थी. अर्जुन का ये 3 दिन का प्यार एक नए सावन सा था उनके लिए अपने पतझड़ जैसे जीवन में. और ये उसको बरकरार हे रखना चाहती थी. फिर ऐसे हे उन्हें भी स्टेज पर बुलाया गया और ये सब होते हुए तक़रीबन 1 बज गए थे रात के. तारा और प्रीती को कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि दोनों को हे देर तक जागने की आदत थी वह बस शादी में हो रही रस्मे और सब चीजे देखती इधर उधर घूम रही थी. लेकिन आसपास हे.

"मुझे बाथरूम जाना है मेरे साथ चलो.", रेणुका की बात पर अर्जुन मुस्कुरा दिए फिर उसने एक बार Tara-Preeti की तरफ देखा जो hans-bol रही थी तोह वह रेणुका के साथ हाल की बहार की तरफ चल दिए जहाँ बाथरूम का बोर्ड उन्होंने देखा था. लेकिन वह जा कर देखा तोह वह शराब की महक से वह खराब था.

"अब क्या करे?", उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा तोह पास में हे खाना खा रहे एक वेटर से अर्जुन ने पुछा के कोई और भी बाथरूम है तोह उसने बताया के हाल के ऊपर 2 बाथरूम है लेकिन वह टाला होगा इस समय. लेकिन फार्महाउस के उस तरफ भी बाथरूम है जो हमेशा साफ़ रहता है.

"आप चलिए मई पानी का गिलास लेकर आता हु. प्यास लगी है." रेणुका को उस दिशा में जाने का बोलकर वह सामने रखे पानी की काउंटर की तरफ चल दिए तोह रेणुका एक ऐडा से मुस्कुराती उधर चल दी. हाल के पीछे से भी उस तरफ दिखाई देता था और रेणुका को अकेले उधर जाते देख अभिमन्यु की भी नजर चली गई. अनुराग पूरा नशे में बस कुर्सी पर सर लुढ़का के बैठा था. नशा तोह अभिमन्यु पर भी था लेकिन उस पर रेणुका का नशा कुछ ज्यादा हो चूका था. दबे पाँव वह उधर चल दिए लेकिन ये ध्यान नहीं दिए के दूसरी तरफ से कोई और भी वे जा रहा है.

रेणुका वह कोने में पहुंची तोह यहाँ 2 बाथरूम थे दोनों हे बड़े और saaf-suthre. दरवाजा लगा के वो अंदर चल दी एक में और साड़ी उचका कर कोड पर बैठ गई. बहार किसी के खड़े होने का आभास दरवाजे के नीचे से आती रौशनी से हुआ तोह अर्जुन को समझ कर वह बस मुस्कुरा दी. अर्जुन ने बहार खड़े इस व्यक्ति को देख लिए था और उसकी मनोदशा भांपते हे ऋतू दीदी वाली घटना याद आ गई. शांति से अभिमन्यु के पीछे जा के खड़े होते उसने कन्धा हिलाया.

"किसी का इन्तजार कर रहे हो आप?", रेणुका ने भी ये आवाज सुनी जो अपनी छूट धोने के बाद साड़ी ठीक कर रही थी.

"तू जा यहाँ से और अपना काम कर. मेरे रास्ते में मत आ.", थोड़ा हेकड़ी से अभिमन्यु ने इतना कहा तोह दूसरे बाथरूम का खुला दरवाजा देख कर अर्जुन ने झटके से उसको अंदर तेल दिए और खुद भी अंदर आ दरवाजा चढ़ा दिए.

"रास्ता बंद हे कर देता हु. बहोत हवस देख ली तेरी आँखों में मैंने नीच इंसान." उसकी सार्ड आवाज जब अभिमन्यु के कानो में पड़ी तोह वो पलट वॉर करने के लिए लपका लेकिन झन्नाटेदार थप्पड़ से सीधा दिवार में जा लगा.

"तुझ पर से आज ये वासना और चालाकी का भूत न उतार दिए तोह मेरा नाम भी अर्जुन नहीं.", शराब में धुत्त उस इंसान के पेट में मुक्का जड़ते हे साड़ी शराब कोड में निकलवा दी. और फिर हुआ थप्पड़ का दौर जो शायद कोई 1 मिनट चला. 20 करारे थप्पड़ बहोत थे चेहरा और नाक सूजने के लिए. होंठ से खून आ गया और नाक भी बहने लगी थी अभिमन्यु की. वो बेबस सा इस पहलवान के हाथो मार खा रहा था और बहार रेणुका कड़ी इन्तजार कर रही थी. पता तोह सबकुछ था के अंदर क्या हो रहा है.

"चल तेरी बहिन से माफ़ी मांग नहीं तोह इस चेहरे के साथ हे फेरो के मंडप में लेके जाऊंगा और ाचे से दिखाऊंगा के तेरा असली चेहरा क्या है." हाथ जोड़ते अभिमन्यु को जमीन पर धकेलते हुए सीधा रेणुका जी के कदमो में उसका सर टिकवा दिए था अर्जुन ने.

"और एक बात सुन ले कान खोल के. वो लड़का मैं हु जिस से इनकी भतीजी की शादी तय है. वह इसलिए चुप था के सब लोग थे और ाचा माहौल था. आइंदा से अगर इनके आसपास दिखा और उस लड़की की तरफ देखा भी तोह गर्दन जमीन में दाल कर टॉड दूंगा." बात ख़तम करते हुए एक भरपूर लात उसकी टांगो के बीच में जड़ दी जिसकी वजह से वह ब्याही गए की तरह रामभता हुआ तड़पने लगा.

"चलिए आप. इसका कोटा पूरा हो गया. दिल तोह कर रहा था के हाथ उखड दू जिनसे इस कमीने ने आपको छुआ था. लेकिन बाद में जोड़कर फिर माफ़ी कैसे मांगेगा." रेणुका जी को साथ लिए वह वह से चल के पंडाल में आ गया.

"चलो Preeti-Tara. अब देरी हो गई है और अर्जुन ने सुबह उठना भी है.", रेणुका जी की आवाज पर वो दोनों हे भागी आई और फिर चारो लोग पार्किंग की तरफ आये जहा अर्जुन ने गाडी की चाबी तारा की तरफ बधाई तोह प्रीती जल्दी से अगली सीट पर तारा के बगल में बैठ गई. उसकी मुस्कान देखते हुए अर्जुन ने भी रेणुका जी के लिए दरवाजा खोलते हुए उन्हें बैठाया और फिर बंद करते हुए दूसरी तरफ से खुद भी पीछे बैठ गया. चारों वह से निकल लिए अँधेरी सुनसान by-pas की इस सड़क पर. आगे दोनों लड़किया सामने देखती बातों में लगी थी पीछे अर्जुन और रेणुका की उंगलिया आपस में उलझी थी. हाथ रेंगते हुए दोनों के एक दूसरे की जांघो पर फिरने लगे थे लेकिन चेहरे पास और सामने की तरफ थे. बस रेणुका के चेहरे पे ये आज के दिन की सब्सि बड़ी मुस्कान थी. नंगी कमर पर अर्जुन का हाथ उनके शरीर से संगीत निकलने लगा था. और फिर उन्होंने अपना सर उसके कंडे पर टिकते हुए आँखें बंद कर ली. अर्जुन भी उतना हे हाथ फेरता रहा जितना ऐसे मौके पर ठीक था. रेणुका का नरम पेट और गहरी नाभि उसके अंदर एक रोमांच भर रही थी. कितना सुत्वा शरीर था उनका और साथ हे एकदम माँ सा चिकना. बस ऐसे हे वह उन्हें महसूस करता रहा और कार के रुकने पर हे वो जैसे होश में आया.

"कार हमारे यहाँ लगा दू?", तारा की बात पर रेणुका जी ने उसको मन कर दिए.

"प्रीती ने ताऊजी को बड़ा दिए था के तुम रात को हमारे घर हे रुकोगे और यहाँ टाला लगा है. रात 2 बजे उन्हें परेशां मत करो हमारे घर चलो. पारवती ने गेट खुला रखा होगा. कार अंदर लगा देना." उनकी बात पर तारा ने कार 2 घर आगे बढ़ा दी. प्रीती और अर्जुन बहार निकल आये तोह अर्जुन ने दरवाजे के कपाट खोल दिए. कार अंदर लगाने के बाद वापिस बंद करते हुए टाला लगाने के बाद चुपचाप वो लोग अंदर आये तोह पारवती भी नीचे आती दिखी.

"पारवती मेरे और प्रीती के कमरे में पानी की बोतल रख दे. फिर ऊपर चली जाना सब सोने हे लगे है.", रेणुका जी का कहना अगले मिनट हे करती पारवती अंदर का दरवाजा लगाती वापिस चली गई.

"तारा तुम मेरे साथ आ जाओ मेरे कमरे में और अर्जुन पिछले कमरे में सो जायेगा. अर्जुन, रुको मई पजामा देती हु.", प्रीती धीमी आवाज में सब समझती तारा को अंदर ले गई जहा तारा सीधा बाथरूम में घुस गई और प्रीती ने एक मुस्कान के साथ पजामा देते हुए शरारत से अर्जुन को देखा तोह वह झेंप सा गया. रेणुका जी पास कड़ी ये देख बस खुश हो रही थी.

"गूडनिघत प्रीती." प्यार से अर्जुन ने कहा तोह वो भी दोनों गूडनिघत बोलकर अपने कमरे में वापिस घुस गई और दरवाजा बंद कर लिए. इधर रेणुका ने एक खली कमरे में बिस्टेर पर चादर रखते हुए वापिस दरवाजा बंद कर दिए और अर्जुन को लेकर अपने कमरे में चली गई. ड्राइंग रूम में जीरो की नीली रौशनी थी बस और छोल साहब का दरवाजा तोह हमेशा के तरह बंद हे था.

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"मई बाथरूम होकर आती हु. आप लेटिए.", एक मुस्कान के साथ रेणुका ने अलमारी से बैग निकला और बाथरूम में चली गई जो इस बड़े कमरे के अंदर हे था. ये भी वैसा हे थे जैसा प्रीती का था. छोल साहब ने शायद दोनों हे कमरे एक जैसे रखे थे. बड़ा आलिशान बिस्टेर, दोनों तरफ लैंप और दिवार में लगी बड़ी अल्मारिया जहा शीशे लगे थे. आसमानी रंग की दीवारे और सफ़ेद छत्त पर 2 पंखे, जो चार ताडियो वाले थे. अपने जूते खोल कर अर्जुन ने एक तरफ ध्यान से रख दिए और वैसे हे शर्ट और पंत उतार कर दरवाजे के पीछे लगे हक्क पर टांग दी. साथ वाले कमरे के बाथरूम में जा कर ाचे से haath-mooh धोने के बाद वो वापिस इस कमरे में आ गया और चिटकनी लगा दी. बनियान के साथ पजामा पहनकर वह बिस्टेर से पाँव टिकाये बैठा बस रेणुका का इन्तजार कर रहा था. और कोई 15 मिनट बाद ये प्रतीक्षा पूरी हुई.

'अगर किसी का ईमान इन्हे देख कर दोल जाता है तोह फिर गलती उस इंसान की नहीं भगवन की हे है.' हलकी गुलाबी साड़ी में लिपटी छरहरी रेणुका किसी क़यामत सी चलती हुई बड़े धीमे कदमो से उसकी तरफ आ रही थी. हलके भीगे बाल, नाभि से 2-ढाई इंच नीचे बंधी साड़ी, उरोज के पूर्ण अकार के ब्लाउज में वह Rambha-Menka को भी पानी दिखती सी लग रही थी. अर्जुन को खुद में इस कदर खोया देख थोड़ा शर्मा से नजर झुकाती वह बिस्टेर पर घुटने मदद के बैठ गई. पूरी बेपर्दा चिकनी बाहों की कलाई लाल रेंज के कदो से सजी थी.

"लाइट बंद कर दीजिये न.", हर समय सर उठाये रेहनी वाली ये औरत किसी दुल्हन से शर्माती अपना सर घुटनो में दिए बैठ गई थी. अर्जुन ने दोनों तरफ के नाईट लैंप जलाते हुए कमरे के बड़ी लाइट बंद कर दी. अब अंधेर में बस बिस्टेर हे पीली रौशनी से कुछ जगमग सा था.

"मैं क्या कह रहा था?" अर्जुन ने पाँव सीधे करते हुए उनका चेहरा ऊपर किआ.

"बोलिये न.", उनकी ब्याह पर ऐसे बैठे हुए हे सर रखती रेणुका ने धीमे से जवाब दिए.

"वो लोग गलत नहीं थे जो आपको पाने की हसरत लिए थे. बस गलती इतनी थी की वो ब्रह्मसरोवर का kamal-pushp तोडना चाहते थे. नहीं जानते के ये सिर्फ उसका होता है जिसको खुद ये Kamal-pushp चाहता हो. किसी divya-kalakar की उत्कृष्ट रचना सी, हंसिनी के सामान सुन्दर और एक साथी को समर्पित, एकंट्रास में प्रखर कामुकता से भरपूर कादिम्बिनी हो आप." और उनके सामने बैठ कर आँखों को चूमते हुए सीने से लगा लिए.

"आपका ये रूप किसी और ने नहीं देखा मई भी विश्वास से कहे सकती हु. मेरा समर्पण भी तोह उस व्यक्ति के प्रति हे है जो मुझे समझ कर बिना raag-dwesh के सिर्फ मेरे दिल से प्यार करता है और उतना हे समर्पित है एकांत में जितना की मैं." रेणुका ने छाती पर हाथ फिरते हुए वैसे हे अर्जुन के गाल चूम लिए. अर्जुन ने प्रेमपूर्वक रेणुका को अपनी गॉड में चेहरे के सामने करते हुए बिठा लिए और साड़ी का पल्लू प्यार से हटते हुए मुलायम कंधे को चूमते हुए फिर गले के नीचे अपने होंठ रख दिए. इतने से हे रेणुका की गर्दन पीछे को लुढ़कने लगी थी जिसको दूसरे हाथ से सँभालते हुए अर्जुन ने अब इस choli-numa ब्लाउज के गले पर एक गहरा चुम्बन कर दिए. दोनों किसी कामकला के आसान की तरह बैठे थे. अपने उन्नत उभारो पर अर्जुन का सर दबती रेणुका सिसक उठी.

"इस पर सिर्फ आपका अधिकार है अर्जुन. अगर इस शरीर पर कभी किसी और का हाथ लगा तोह वो दिन आपकी इस प्रेमिका का आखिरी दिन होगा.", रेणुका कही से भी वह रेणुका नहीं थी जो शादी में थी, जिसका विवाह हो चूका था, एक बचा जो किसी सैनिक स्कूल के हॉस्टल में था वो माँ थी उसकी.. लेकिन वह रेणुका यहाँ नहीं थी. सिर्फ ये अपने अर्जुन की प्रेयसी थी जो अब खुद को समर्पित कर चुकी थी एक ऐसे इंसान को जो कहने को बेशक उम्र में आधा था ज़माने के लिए लेकिन एक प्रेमी के रूप में वह अतुल्य था हर किसी के लिए.

"मैंने कहा था न के मई आपके साथ हु और रहूँगा. मेरे होते हुए आपको कोई छह भी नहीं सकता तोह फिर ये जान देने की बात कहा से आ गई.?", उनकी दोनों बाहों के नीचे से अपने हाथ रेणुका की पीठ पर करता वो प्यार करते हुए भी उनसे भरपूर बात कर रहा था. यहाँ पीठ पर अर्जुन की उँगलियों ने वो पतली डोरी खोल दी तोह ये चोली भी उन madhu-kalash के जोड़े से नीचे आने लगी. गोर उरोज बेपर्दा हुए तोह वह बस उन्हें देखता हे रहा. अर्जुन को इतना शांत देख रेणुका ने अपनी आँखे खोली तोह खुद की हालत पता चलते हे अर्जुन के सीने से लिपट गई. उन्माद में खड़े वो भूरे निप्पल छाती में गाड़ते से महसूस हुए साथ हे ये नरम गोले हल्का पिचकने लगे उसके चौड़े मजबूत सीने पर.

"प्यार तोह करने दीजिये या ऐसे हे सुबह तक बैठे रहना है.", अर्जुन की बात सुनकर हलके से मुस्कुराती रेणुका ने जब उसकी बनियान पकड़ कर उठाई तोह अर्जुन ने भी हाथ ऊपर उठा दिए. नंगे चौड़े सीने को प्यार से चूमती सहलाती रेणुका सच में हे एक ऐसी स्त्री थी जिसको सिर्फ प्यार किआ जा सकता है. कमर से लेकर उभरे हुए दूध के गोलों तक अर्जुन अपने हाथो को हरकत देने लगा तोह ऐसा हे उसके जिस्म के साथ रेणुका कर रही थी. बिस्टेर पर प्यार से रेणुका को लिटाते हुए अर्जुन ने गुलाबी भूरे निप्पल को मुँह में लेकर चुभलाया तोह वह सीत्कार करती सी बस उसका सर और नंगी पीठ सेहला रही थी. किसी छुईमुई सी लड़की सी रेणुका अपने इस भरपूर बलिष्ट प्रेमी पर सब न्योछावर करने लगी थी. माध्यम आकर के वह उन्नत चुके के मुट्ठी में भरता अर्जुन चुचो की दरार से जीब फिरत जब गहरी नाभि पर आया तोह किसी नागिन सी वह बिस्टेर पर बल खाने लगी थी. कमर पर लिपटी साड़ी ast-vyast सी हो चुकी थी लेकिन उनके शरीर के माध्यम बिंदु पर कामकला दिखता अर्जुन बस वैसे हे उनको चूमता दोनों नरम गोलों में हवा सा भरने में लगा था.

"कमर ऊपर कीजिये अपनी." साड़ी को बिना हे खोले अर्जुन ने नीचे सरकना शुरू किआ तोह बंद आँखों से हे रेणुका ने अपनी पतली कमर और उन्नत कूल्हे ऊपर उठा दिए. गलबी शरीर से वह गुलाबी साड़ी उतर कर एक तरफ रखते हुए अर्जुन बस उनकी गोरी और बेदाग मांसल और तराशी हुई जाँघे और पिण्डलिया देख और हाथों से महसूस करने में खो गया. पेटीकोट नहीं पहना था रेणुका ने इन अंतरंग पालो को आसान बनाने के लिए. हाथ फंसलटे हुए ऊपर केले से चिकनी मुलायम जांघो पे आये तोह अर्जुन ने उन्हें फैलते हुए वह बीच से उभरी गलबी कच्ची के ऊपर मुँह टिका दिए.

"सशः.. ाः." गहरी सिसकी निकल गयी रेणुका के मुँह से उत्तेजना की अधिकता से. अर्जुन का ऐसे उनकी छूट पर मुँह रखना बहोत था कॉमर्स बहाने के लिए. ये रेशमी कच्ची भी इतनी हे बड़ी थी की छूट को ऊपर से ढकती बारीक सी 2 तन्निव में कमर पर लिपटी थी. खींच कर उस छोटे से वस्त्र को आराम से हटते हुए अर्जुन बेसब्री से इन जांघो के बीच के खजाने की प्रतीक्षा कर रहा था. जहाँ पिछली बार कुछ gine-chune बाल थे वह पूरा मैदान आज मुलायम रबर सा बिलकुल सफाचट था. 3-4 इंच का लम्बा चीरा जिसमे से बहार को झांकती गुलाब की 2 छोटी पत्तियां और बहार की तरफ थोड़े फूले हे मुलायम लम्बे होंठ. एक बार नाक से उसकी महक अपनी सांस में भर कर अर्जुन ने दोनों हाथो की उँगलियों से छूट को फैलते हुए होंठ छेड़ पर टिका दिए..

"उम्म्म.. आह. ये कैसा मजा दे रहे है आप.? अर्जुन प्लीज आराम से" मजे में रेणुका उसके बाल सहलाती खुद हे कमर ऊपर उठाने लगी थी. ऐसा कामोन्माद तोह पहली बार में भी नहीं चढ़ा था यहाँ तोह अभी चुदाई शुरू भी नहीं हुई थी.

"ये प्यार करने लायक हे है तोह वही कर रहा हु." अर्जुन ने प्यार से उनकी बात का जवाब दिए और उनके सही अकार के दोनों कूल्हों के नीचे हाथ रखते हुए वह तल्लीनता से उनकी छूट तब तक chaat-ta रहा जब तक एक बार फिर रेणुका की छूट ने उसके मुँह में अपना शहद नहीं उड़ेल दिए. उखड़ी साँसों से बस वह बिस्टेर पर बिछी साँसे काबू में करने में लगी थी. इधर अर्जुन ने पजामा और कच्चा, जो शादी की वजह से पहन लिए था उतार कर अपना kaam-astra आजाद किआ और रेणुका को करवट के बल करते हुए उनके पीछे आ लेता. हाथ से अपने लुंड को उनके मांसल कूल्हों के बीच से छूट के नीचे करते हुए रेणुका का सर घूमते हुए होंठो को चूमने लगा.

"आपको दर्द नहीं देना चाहता लेकिन ये होगा तोह सही. मन कर देना अगर ज्यादा दर्द हो.", एक बार होंठो को आजाद कर वो सर रेणुका के ऊपर करते हुए समझने लगा. नीचे छूट की दरार में मोटा सूपड़ा होंठो को फैला रहा था.

"हम पहले कर चुके है न? आप बस मुझे प्यार कीजिये दर्द तोह आखिर खुसी में बदल हे जायेगा.", और बात कहने के बाद उसका सर वापिस झुकाती अर्जुन के होंठ मुँह में भर वह हमले के लिए खुद को तैयार कर चुकी थी. अर्जुन ने भी ये मुद्रा इसलिए चुनी थी की वह पूरा अंदर नहीं दाल दे. और फिर कासी गीली छूट पर लुंड छेड़ पर लगते हुए उसने उचित जोर लगते हुए धक्का लगा दिए. सूपड़ा अपनी सहेली के अंदर घुस गया था और रेणुका ने मजबूती से ये धक्का सेहन कर लिए था. वैसा हे एक और धक्का मारते हुए अर्जुन ने 6 इंच तक लुंड अंदर कर दिए था और रेणुका के चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आये थे. पीछे से हाथ उनके उभारो पर रख वह उन्हें हौले हौले मसलते हुए बस धीमी रफ़्तार से छोटे छोटे धक्के मार रहा था. कूल्हों की दरार में घिसता लुंड तोह बस सातवे आसमान पर था और इतने प्यार से किये गए इस मिलान में 5 मिनट बाद हे रेणुका मजे की आहें लेने लगी थी.

"ऐसा लगता है के बस यही ज़िन्दगी है और मई ta-umar बस आपकी बाहों में ऐसे हे पड़ी राहु. मुझे प्यार देकर एहसान किआ है आपने.", खुद हे वह हलकी कमर पीछे हिलती अर्जुन के हाथ जो उसके चुके पर था को दबती हुई थोड़ी नम्म आँखों और मुस्कान से बोल रही थी. अर्जुन ने के बार गले पर होंठ फिरने के बाद कहा.

"ज़िन्दगी का ये पल हमारा है. और इसमें हम दोनों है तोह एहसान तोह आपका भी उतना हे मेरे ऊपर है न." छूट में कसता सा जा रहा लुंड आज किसी वासना के धक्के नहीं लगा रहा था.

"मई ऊपर आना चहु तोह? आप बस ये पास वाला लैंप बंद कर दो.", अर्जुन ने हाथ हटाया तभी वह सरकती हुई एक तरफ हो गई और फिर एक लैंप बंद करने के बाद अर्जुन सीधा बिस्टेर पर लेत गया. बिना बिस्टेर पर खड़े हुए रेणुका वैसे हे सरकती से अर्जुन के ऊपर आ गई. एक बार फिर लुंड को हाथ में पकड़ कर उसने रेणुका की छूट के नरम छेड़ पर टिकाया तोह कमर को नीचे करती वह इस बार 7 इंच तक अंदर ले गई. छूट का इस तरह फैलना एक सतरंगी सा अनुभव देता था. छाती को चूमती रेणुका हलके धक्के खुद हे लगाने लगी तोह अर्जुन ने भी उनके कूल्हे थामते हुए नीचे से धक्के देने शुरू कर दिए. 30 मिनट से ये चुदाई बड़ी कामुक और धीमी चल रही थी लेकिन रेणुका ने अब इसको गति देनी शुरू कर दी थी.

"पूरा अंदर कर दीजिये." अर्जुन के गले को चूमती वह कमर को तेजी से चलती बोली. चुके शरीर के झुकने से छाती पर एक मजेदार रगड़ दे कर अर्जुन को उत्तेजित कर रहे थे और रेणुका की बात सुनते हुए उसने उनकी कमर को पकड़ते हुए हे खुद की पीठ ऊपर उठा ली. अब वह बैठा था सीढ़ी टाँगे किये और दोनों तरफ पाँव किये जैसे रेणुका उसको छोड़ रही थी. कमर को कस के पकड़े हुए हे अर्जुन ने होंठ मुँह में लेते हुए कास के एक धक्का लगा दिए. हल्का सा तड़फ कर वह शांत हो गई थी और जड़ तक लुंड छूट में बैठ चूका था.

"ाःह.. आपका जैसा दिल करे वैसा कीजिये. Tej-jordar, प्यार से .. बस मेरे शरीर को ये बता दीजिये के आप हे इसके मालिक है.. आह.. उम्म्म." उनकी बात पर अब अर्जुन दोनों दूध दबाते हुए लम्बे और गहते धक्के मारता छूट की कसावट काम करने में लग गया था. कुछ देर ऐसे हे करने के बाद उन्हें घुटनो पर करते हुए इस बार खुलकर वह उनकी इस करारी छूट में जड़ तक लुंड nikal-daal रहा था. गीली छूट कॉमर्स बहार तक निकल रही थी.

"अंदर हे करना प्लीज." रेणुका के इस आग्रह में एक बहुत हे विनय और गुहार थी. वो नारतीवा का पूरा सुख महसूस करना चाहती थी और अर्जुन के फूलते सुपडे ने बता दिए था के वह इस एक घंटे के लगभग चले prem-milan के चरम पर है. पीछे से दोनों उभर सहजता से थामे अर्जुन ने रेणुका के साथ हे झड़ना शुरू कर दिए. बच्चेदानी तक उसका वह prem-ras महसूस करती रेणुका नीचे गिरने के जगह कूल्हों को उचका कर ाचे से चिपक सी गई थी अर्जुन से जैसे वह आखिरी बूँद तक अपने अंदर हे लेना चाहती थी. अर्जुन ने भी उनके ऊपर गिरने की जगह बस थाम कर आराम से करवट लेते हुए बिस्टेर पर लिटा लिए. लुंड अभी भी छूट के अंदर हे थे और दोनों के नंगे जिस्म चिपके हुए थे. प्यार से वह उनकी गर्दन चूमता हौले हौले निप्पल सहलाता रहा.

"हर बार पहले से ज्यादा हे प्यार कर रहे हो. मई अगर रह नाइ आपके बिना तोह क्या होगा?", रेणुका बेहद खुश थी अर्जुन के इतने प्यार से लेकिन अब वह भी महसूस कर रही थी की ये शायद हमेशा न रहे.

"मई तोह हमेशा आपके साथ हु न? और हमारा प्यार भी तोह है. ये मिलान चाहे साल में 2 बार हो या 100 बार लेकिन प्यार हमेशा है. और वही तोह जरुरी है.", अर्जुन की बात पर रेणुका शांत हो गई और दोनों ऐसे हे नंगे चिपके बातें करते रहे. अर्जुन सो गया था और इधर सोने से पहले रेणुका ने बस इतना हे कहा "हमारा प्यार अर्जुन.. मई इसको अपने में समाहितः करुँगी और जनम दूंगी. तुम दुनिया के सामने मेरे न भी हुए तोह गम नहीं क्योंकि मई हमारे प्यार के इस मिलान को एक ज़िंदगी देकर हमेशा अपने दिल से लगा के रखूंगी." और आँखें बंद कर चैन से उसकी बाहों में लिपट कर सो गई. अर्जुन भी दुनिया से बेपरवाह अपनी प्रेमिका को जकड़े सो चूका था.

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अपडेट 47

पंडित जी का परिवार


कोई 5 बजे दरवाजे पर आवाज हुई तोह रेणुका कसमसाती सी उठी और फिर अर्जुन के साथ हे अपने निर्वस्त्र होने का आभास होते हे चादर उसके शरीर पर दाल वह खुद को भी दरवाजे पर तंगी मैक्सी से धक् दरवाजे की तरफ बढ़ी. शरीर में अभी तक रात की मस्ती के प्रमाण और उत्तेजना थी. दरवाजे को हल्का सा खोल बहार देखा तोह प्रीती को मुस्कुराते पाया...

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(रेणुका)

"बुआ अर्जुन को उठा दीजिये और दूसरे कमरे में करिये. दादू 5:30 बजे उठ जाते है.", बिना हे अंदर नजर डाले प्रीती ने उन्हें मुस्कुराते हुए धीमी आवाज में चेताया.

"तू सोइ नहीं थी इसका मतलब? और मैं इन्हे अभी बोलती हु.", प्रीती से भी वह अपने जिस्म को छुपाती नजरे नीची करती बोली.

"मुझे तोह जागना हे था क्योंकि 4 बजे आप लोग सोये तोह फिर बिना जगाये तोह उठने वाले नहीं थे. और 'इन्हे' नहीं अर्जुन को उठाइये. यहाँ मई भी कड़ी हु.", पूर्ववत हे वह मुस्कुराती बोली तोह रेणुका ने शरमाते हुए दरवाजा बंद करने से पहले गर्दन हिला दी.

"उठ कर दूसरे कमरे में चलिए. 5 बज चुके है.", प्यार से अर्जुन को हिलाते उन्होंने जगाया तोह वह नंगा हे अंगड़ाई लेता उठ गया. सामने मुस्कुराती रेणुका को देख अर्जुन ने बस गाल को चूमा और 2 मिनट में हे अपने रात वाले कपडे जूते पहन कर वह बहार आ गया. ड्राइंग रूम में पानी का गिलास लिए कड़ी प्रीती को अपने खरीदे हुए कपड़ो में देख गिलास को टेबल पर रख दिए.

"इतनी सुबह आज फिर बिजली चमक रही है.", उसकी छोटी निक्कर और उस बनियान सी टीशर्ट में चिपके शरीर को एक बार भरपूर देख वो बिना किसी परवाह के प्रीती की कमर को पकड़ गर्दन पर मुँह लगा बैठा. बिंदास रहने वाली प्रीती अंदर तक हिल गई जब अर्जुन के शरीर का आभास अपने सीने और kati-pradesh पर हुआ. अर्जुन ने ऐसे हे गले लगाए उसके माथे को चूमा तभी धड़कन कुछ शांत हुई और जब तक प्रीती की चेतना वापिस आती वह जा चूका था. आँखें बंद किये बस वह वैसे हे कड़ी रही.

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(प्रीती)

"वो जा चूका है प्रीती.", कमरे से रात की कहानी बताती चादर को उठाये रेणुका जी ने पिछले आँगन की तरफ जाते हुए उसको हिलाते कहा तोह वह नजर झुकाती सीधा अपने कमरे में दौड़ गई जहा तारा एक तकिये को दबाये प्रीती की nikkar-tshirt में बेसुध पड़ी थी.

'ये भी न. जब ऐसे करता है बिना कुछ बताये तोह जाने क्यों haath-paanv काम करने बंद कर देते है. चलो एक बात तोह समझ आ गई.' खुद से बात करती वह एक बार मुस्कुराई और फिर पीछे से तारा से लिपट कर सो गई. साड़ी रात तोह बस पहरा हे देती रही थी बस.

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अर्जुन भी अपने घर से तैयार होने के बाद इस सुहानी सुबह बिना और नींद लिए आज पार्क की तरफ निकल गया था. आचार्य जी से मिलने और उनसे बातें करने. वह दोनों बड़े स्नेह से मिले और उन्होंने बहुत सा अध्यातिमिक ज्ञान और समाज के जरुरी भाग उसको समझाए. लेकिन वही दूसरी तरफ कुछ और हे नजारा था.

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"आपकी ऐसी हालत कैसे हुई फूफाजी?", ब्याह से बरात जब निकलने लगी थी तोह एक सूमो गाडी में अपने बाप के साथ बैठा अनुराग जब साथ में बैठे अभिमन्यु से पूछने लगा तोह उसके चाचा के साथ बाप का ध्यान भी अभिमन्यु के सूजे हुए गाल, फाटे होंठ और नाक पर गया.

"अंकल जी मई छोडूंगा नहीं उस हरामी लड़के को." अगली सीट पर बैठे विजयप्रताप से मुखातिब होते हुए उसने ये बात कही तोह थोड़ा हैरान हो कर उन्होंने बीच वाली सीट पर बैठे अभिमन्यु का चेहरा एक बार देखा फिर चुप हो गए.

"बात क्या है जमाई जी? थोड विस्तार से बताये और ऐसा कोनसा लड़का पैदा हो गया जो हमरे घर की इज्जत पर हाथ दाल गया?", ये थे अनुराग के पिता अजयप्रताप, एक 60 साल के प्रभावशाली व्यक्ति.

"जो लड़का वह शादी में था रेणुका के साथ, वो पहलवान सा. उसकी है रिश्ता रेणुका की भतीजी से हुआ है. साले ने मुझे नशे में देख कर मेरे साथ ऐसा किआ नहीं तोह मई उसको चट्टी का दूध याद दिला देता. हां नहीं तोह.", वो खोखला हे फुफकार रहा था.

"बात क्या है विजय? जरा समझाओगे. तुम्हे देख कर लगता है के जैसे सब जानते हुए भी चुप हो. ये बहुत बड़े अपमान की बात है.", वह सभी गाड़ियों में बाकी रिश्तेदार और dulha-dulhan बैठ रहे थे इधर ये थोड़ा अलग बैठे थे अपनी अलग गाडी में.

"भाई साहब मुझ से भी गलती हुई है लेकिन मैं काबुल कर चूका हु और माफ़ी मांग चूका हु. ये जमाई जी जिस लड़के की बात कर रहे है वह पंडित रामेश्वर जी का छोटा पोता है और आपके सुपुत्र अनुराग तोह उनके घर की होनेवाली बहु को हांसिल करने की फ़िराक में है." इतना बोलकर नजरे झुका ली विजयप्रताप ने. यहाँ अब कोई शराब नहीं थी बस पश्चाताप था. "आप भी मुझे माफ़ कर दीजिये" उन्होंने बस इतना कहा और सामने देखने लगे.

"वह साला कोई भी हो लेकिन मई उसका बुरा हाल जरूर करूँगा.", गुर्राता हुआ अभिमन्यु इतना हे बोलै था के गहरी सोच में डूबे अजयप्रताप ने कस के गले पर तमाचा जड़ दिए.

"तुम हमारे जमाई हो इसलिए ये बात कह गए हो तुम. हम अपने परिवार को हिफाजत से रखना चाहते है और अगर तुम्हारी वजह से इसमें कोई परेशानी आई तोह हम रिश्ता ख़तम करने में पल भर नहीं लगाएंगे.", एक सार्ड लहजे में उन्होंने इतना कहा और फिर खुद हे उसका कालर ठीक करते अपना रुमाल अभिमन्यु के गाल पर रख दिए जिसको सेहमते हुए उसने गाल पर चिपका लिए.

"पापा, ये सब इस शहर में इतना डरते क्यों है इस इंसान के नाम से? जिसको देखो वह उनकी बात पर सर झुका देता है. आप जानते है क्या इनके बारे में?", अनुराग भी अब थोड़ा सेहम गया था और ाचे से jaan-na चाहता था के वो दुश्मनी ले तोह पहल पता तोह हो की औकात है भी या नहीं. वैसे तोह समझ आ चूका था के फ़िलहाल वह बेबस हे था.

"बीटा इनके बारे में 40 साल में मई सबकुछ जानता हु. बस मुलाकात बहोत काम हे हुई या यु कहो के जरुरत के समय हे हुई. पंडित जी.. " इस नाम को लेकर अजयप्रताप एक पल के लिए गहरी सोच में डूब गए.

"आज भी याद है जब वह thana-incharge थे हमरे शहर में, जो उस समय क़स्बा हे होता था. हमारा घर पास में था थाने के और पंडित जी तोह अपने रोज के नियम से सभी के थाने में समस्या हल करते थे. शाम को घोड़े पर हे कसबे में गश्त देते दिख जाते थे और छोटे क्या बड़े क्या, सभी उनकी इज़्ज़त करते और वह भी सड़क पर हे सबसे prem-purvak मिलते थे. फिर वह से तबादला होने के बाद वह अगले शहर चले गए, दसप के ओहदे पर. हलके के तक़रीबन 200 गाँव में वह 2 साल में हे प्रचलित हो गए थे. अपने अनुशाषित जीवन, gaanv-valo की समस्याएं दूर करने की वजह से और अपने हे पुलिस विभाग में सभी कर्मियों के बच्चों की शिक्षा मुफ्त में उपलब्ध करवा कर. मुख्यमंत्री ने उनकी ये मांग एक हफ्ते में पूरी करवा दी थी. पंडित जी तोह chor-uchakko को भी समझते थे और मदद करते थे सही इंसान में बदलने की. उन्ही दिनों की बात है की उनके घनिष्ट मित्र और जाने माने जमींदार रघुबीर सिंह गुज्जर के परिवार पर एक बड़ा हुम्ला हुआ था. Jameen-mandir का विवाद था और मेरे पिताजी भी उनके ाचे संपर्क में थे.

मामले की जांच करने खुद पंडित जी आये थे और कुछ ाचे बड़े लोगो पर उन्होंने दबिश भी कर दी थी. नाम बड़े थे तोह दबाव भी बड़ा आ गया उनपर. लेकिन केस को सुलझाने की जगह उस से हट जाने का. खुद उनके सीनियर अधिकारी राठोड ने उनका तबादला राजस्थान के साथ लगते शहर में करवा दिए. पंडित जी तबादले से पहली रात को रघुबीर सिंह के घर, जो की उस समय के हिसाब से कही महल हे था में बैठे थे और मेरे पिताजी भी वही थे और 3-4 घनिष्ट लोगो के साथ." अजयप्रताप ने सांस लेते हुए कहना जारी रखा जिसको अब ये दोनों भी सुन रहे थे.

"2 और बड़े परिवार होते थे उस समय. रामेहर सिंह गुज्जर और सोमबीर सिंह, जिन्होंने रघुजबीर के बड़े बेटे को मार दिए थे और फैक्ट्री में आग लगा कर कोई 15-16 मजदूरों को जिन्दा जलवा दिए था. रघुबीर का बस एक बीटा और बेटी बच पाए थे. और ये 2 आपराधिक परिवार सर्कार के भीतर ाची पैठ रखते थे, अपने पैसे और ताक़त के बूते पर. जिस समय वह घर के आँगन में बातें हो रही थी, राममेहर सिंह और उसके दोनों बेटे वह आये थे, कहने को वह मामला सुलझाने आये थे लेकिन साजिस थी उनकी ये सब. उनके पीछे हे सोमबीर सिंह और उसके 4 बेटे और 6-7 खास पहलवान पास में हे थे. जो उनके लिए एक तरह से सुरक्षा चक्र का काम देने आये थे. बात सही जा रही थी की रघुबीर ने उन्हें माफ़ करने के बदले प्रदेश छोड़ कर जाने की बात कह दी जिस पर पंडित जी ने भी उनका समर्थन दिए. बाकी nafe-nuksaan की बातें पहले हो चुकी थी. लेकिन सोमबीर सिंह के बड़े बेटे फ़तेह सिंह ने जोश में पंडित जी पर गोली चला दी जो शायद सही निशाने न लगी और कंधे को चीरती निकल गई.

इस अचानक हमले से रघुबीर सिंह के आदमियों ने जवाबी हमला कर दिए जिसमे सोमबीर और राममेहर तोह भाग खड़े हुए लेकिन उसका छोटा बीटा मार दिए गया. सब तरफ आवाज गई थी गोलियों के चलने की तोह log-baag भी आ गए थे और चूँकि रघुबीर सिंह ाचा आदमी था तोह एक तरह से वह यहाँ का अन्नदाता हे था. पंडित जी को हॉस्पिटल ले जाया गया लेकिन ज्यादा खून बहने से वह अचेत हो गए थे.

बात कई शहरों में पहुंच गई थी जबकि उन दिनों इतना तोह टेलीफोन या खबरे नहीं होती थी. लेकिन उनके सभी चाहने वाले लोगो को बड़ा झटका लगा था. पुलिस ने भी मुक्कड़म दर्जा करते हुए दबाव में कुछ आवारा मुजरिमो को हे पकड़ा. रघुबीर सिंह पर भी उन्होंने हाथ नहीं डाला था क्योंकि खून का इल्जाम उनके आदमी ने अपने सर पर ले लिए था.

तुम सोच रहे होंगे के मई कोनसी फ़िल्मी कहानी बताने लगा हु. लेकिन सुनो, तभी तुम्हे समझ आएगा के परिवार क्या होता है और पंडित जी के चाहने वाले कोण लोग है.

"इस घटना के बाद पंडित जी के 2 बेटे नजर में आये थे. एक बार जब वह हॉस्पिटल में अपने पिता के साथ जब बंद कमरे में रहे. जिन्होंने ने कुछ पहचान वाले पुलिस के लोगो से भी मुलाक़ात की थी. लगभग 20-22 साल के वो दोनों मुझ से उस समय 10 साल छोटे होंगे. फिर उन्हें एक दिन बाद देखा गया था रघुबीर सिंह के घर, जहाँ मेरे पिता के अनुसार उन्होंने हर बात को ाचे से समझा और सलाह मशवरा किआ था. दोनों भाइयों ने कोई मदद न ली थी उनसे और अपने पिता की तरह हे उनका भी बड़ा प्यार था इस परिवार के साथ. बात तोह यहाँ तक थी की पंडित जी के बड़े बेटे के लिए लड़की रघुबीर सिंह ने हे पक्की करि थी. अगले 3 दिन तक शान्ति थी प्रदेश में और पंडित जी को हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद 15 दिन का आराम दिए गया था. 3 दिन के बाद सोमबीर सिंह के चारों बेटे सड़क पर कुचले पड़े मिले थे. उनकी जीप gaanv-dhaani के बहार उन सबकी लाशो से 20 कदम दूर जाली हुई हालत में मिली थी. देखने वालो का कहना है की सिर्फ सर हे सलामत थे बाकी तोह उठाने लायक भी नहीं बचा था. इसके पीछे कोण था ठीक से कहना मुश्किल था, ऐसा पुलिस का जवाब था. सोमबीर और रामेहर के दबाव में पंडित जी के बेटो के बारे जानकारी ली गई तोह वह बेगुनाह निकले थे, ये भी पुलिस का हे कहना था. लेकिन इसके बाद जो हुआ वह कुछ ऐसा था की एक बार के लिए पुलिस ने भी हाथ खड़े कर दिए थे. जिस मंदिर और जमीन पर कब्ज़ा किआ गया था, Sombir-Ramehar द्वारा वह पर पूरे परिवार के मर्दो की लाशें बिछी पड़ी मिली थी. साथ में हे उनके सर्कार में करीबी 3 सांसद और पार्षद व्यक्तियों की. 16 लोग एक जगह पर काट दिए गए थे और बताया जाता है के उस समय इतनी लाशो के लिए लकडिया भी काम पड़ गई थी. पिछली बार की तरह पंडित जी का बीटा इस बार भी अपने कॉलेज के हॉस्टल और कक्षा में उपस्थित था, उस समय के इंस्पेक्टर निर्मल सिंह की रिपोर्ट में ये बताया गया था. लेकिन गाँव में सबको पता था के वही व्यक्ति था इस सबके पीछे अपने भाई और रघुबीर सिंह के बेटे के साथ. इस घटना के बाद सप राठोड की बेटी भी 2 दिन तक गायब रही थी और फिर उन्होंने अपना तबादला खुद हे करवा लिए था उस शहर से.

पंडित जी ने ठीक होने के बाद हे अपना कार्यभार संभल लिए था लेकिन उन्हें इस केस पर कभी आने हे नहीं दिए गया था. कहा जाता हे के पुलिस के अधिकारीयों को पता था के पंडित जी शायद अपने बेटो को भी अंदर डालने से पीछे नहीं हटेंगे. लेकिन इस घटना के बाद उन्होंने पुलिस में रहते हुए बहोत सेवा की अगले 10 सालो तक. उनके द्वारा स्थापित कई ट्रस्ट अब पुलिस और सुरक्षा सेवा देने वाले प्रदेश के युवको की मदद करते है. मतलब इतना है के सिस्टम में रहने वाले ये व्यक्ति हरयाणा ban-ne के बाद से हे पुलिस विभाग की एक मजबूत जड़ है जो आज भी नए भर्ती हुए हप्स, आईपीएस को सलाह मश्वरा देते दिख जायेंगे. और एक बड़ी बात है इनके पीछे, महाराजा बलविंदर सिंह के मुंशी इनके पिताजी मोतीलाल शर्मा जी थे, तोह jameen-jaydaad भरपूर होने के बावजूद ये एक साधारण ज़िन्दगी वाले व्यक्ति है."

अजयप्रताप अब बहार की तरफ उगते सूरज को देखने लगे थे. अभिमन्यु की तोह फट के चार हो चुकी थी की 20 लोगो के मार देने वाले व्यक्ति को भी पुलिस हे सुरक्षा दे रही थी उसके बाप से. अनुराग हर बात पर गौर कर रहा था.

"भाई साहब डॉ. शंकर का खौफ पंडित जी के नाम से कही ज्यादा है ये भी जरा ाचे से समझा दो इन्हे. वो छोल पूरी ने तोह खुद कहा था जब हम सभी बैठे थे उनके मयखाने में.", विजयप्रताप की बात सुनकर अजयप्रताप मुस्कुरा दिए.

"वो डॉक्टर ाचा है विजय और छोल को अपना बाप मानता है. देखा नहीं दोनों जिगरी भी है जो एक गिलास में हे पी लेते है.", शंकर शर्मा और छोल साहब का रिश्ता याद करते हुए अजयप्रताप फिर से गंभीर हो गए.

"बीटा वो लड़की शंकर की बहु बनेगी और अगर थोड़ा भी तुम समझे हो तोह बस दूर हे रहना. जमाई जी मुझे लगता है आप भी ऐसा कुछ नहीं करोगे. नहीं तोह ये शंकर नाम का हे नहीं काम से भी महादेव है. पंडित जी ने ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार हे अपने ओहदे का प्रयोग किआ था, छोल पूरी को साफ़ साबित करने के लिए लेकिन शंकर ने जो भी 3 आर्मी में पूरी के समकक्ष थे सभी को स्वर्ग भेज दिए था, उनपर गलत आरोप लगाने के जुर्म में. आजकल वह शांत है क्योंकि घर में उनका भतीजा संजीव अब सब संभल रहा है. और मई अभी ये बता दू की संजीव पंडित जी और शंकर का मिश्रण है. तुम अब यही से निकल जाओ जमाई जी और मेरे बचे को ये salah-mashwara देना तोह दूर इसके आसपास भी नहीं दिखना. अनुराग अब तुम मेरे और अपने चाचा के साथ हे काम करोगे.", अपने शहर के एक चौंक पर हे गाडी रुकवाते हुए उन्होंने इस उजली सुबह अभिमन्यु को तिरस्कार भरी नजरो से देखते हुए घर से पहले हे उतार दिए जो मुँह लटका के अपनी राह निकल लिए.

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"दादाजी, आज मैंने एक नया पाठ पढ़ा शास्त्री जी से.", अर्जुन जब घर आया तोह वैसे हे अपने दादा जी को बैठे पाया बगीचे में. छोल साहब के साथ कुर्सी पर चाय पीते हुए. आज वह देरी से गया था और आया भी 7 बजे था.

"तोह फिर हमे भी बताओ भाई के क्या सीखा जिस से हमको भी कुछ फायदा हो.", छोल साहब ने ये बात कही उधर पंडित जी ने अपनी धर्मपत्नी को दूध के लिए आवाज लगा दी. अर्जुन नीचे घास पर बैठ कर जूते खोल रहा था.

"छोटे दादू उन्होंने आज बताया Nar-Narayan के बारे में. और किसी व्यक्ति का चरित्र समझने की प्रक्रिया. और एक आधा पाठ पढ़ाया अपनी इन्द्रियों को जागृत करने के बारे में.", दोनों बुजुर्ग मुस्कराहट के साथ उसको देख रहे थे. फिर पंडित जी चाय का कप बेंत के स्टूल पर रखते हुए बोलने लगे.

"बीटा ये बड़ा हे जहां सबक है. मुझे तोह लगा था के तुम इसके लिए तैयार नहीं हो अभी. नर जो की एक देवतुल्य व्यक्ति थी और नारायण भगवन उनके परम मित्र. आगे जरा तुम बताओ अगर मैंने ठीक कहा है तोह.", पूरी साहब भी अब जरा ध्यान से sun-ne लगे थे. उनको भी ये वार्तालाप दिलचस्प होती दिखने लगी थी.

"है दादाजी. ठीक समझे आप इस बात को. Nar-Narayan को हमेशा एक साथ लिए जाता है जैसे शरीर और आत्मा. हम शरीर देख सकते है जो की अपने आप में एक अबूझ पहेली है और रहस्यों से भरा है. जिसकी सीमा कोई नहीं जान पाया और हम बिना हे इसको ाचे से जाने नारायण, यानि की आत्मा को देखने की इत्छा रखते है. जो की किसी हाल में मुमकिन नहीं. दादू आप जो बताने वाले थे वह था पौराणिक उल्लेख और मई थोड़ा अलग बता रहा हु." अर्जुन ने पंडित जी की आँखों में देखा तोह उन्होंने सहमति में सर हिला दिए.

"हाँ. मई तोह इसके बाद तुम्हे Nar-Narayan के Arjun-Krishna का वर्णन करता. लेकिन तुम मुझे वो बता रहे हो जो वास्तविकता है."

"हाँ भाई साहब ये जो बताने लगा है वह मैं भी समझना चाहता हु." छोल साहब नई भी जिज्ञासा दिखाई.

"तोह सुनिए आप भी." एक बार अपनी दादी को वही कुर्सी पर दूध का गिलास और 2 लड्डू लिए देख फिर अर्जुन आगे बोलने लगा.

"ये शरीर बहोत जटिल है और इसकी क्षमता इतनी है की हम जान नहीं सकते. पौराणिक उदहारण को साथ में रख के बात करें तोह अर्जुन के समकक्ष धनुर्धर कोई नहीं था. मानता हु आप कहेंगे कारन और एकलव्य लेकिन सही मायने में वह भी नहीं थे. अर्जुन का सबसे मजबूत पक्ष था के वह शरीर को समझता था और इसकी क्षमता को निर्धारित करता था सामने वाले के अनुसार. चाहे वह द्रोणाचार्य के सामने, चाहे फिर देवराज इंद्रा के साथ युद्ध में या फिर स्वयं नारायण के हे समकक्ष. एकलव्य जहाँ एक लक्ष्य से बस धनुर्धर हे ban-na चाहता था बिना युद्ध अभ्यास के वही कारन को घमंड था अपने कवच और देविक शिक्षा पर. कोई भी अपने Nar-Narayan के तालमेल में सही नहीं था.

"अब मई वापिस आता हु वास्तविकता पर. बहरी शरीर को समझने के बाद प्रक्रिया होती है नरोत्तम होने की. 5 इन्द्रियों को काबू करने की नहीं तोह अगर हम इनके कहे चलने लगे तोह नारायण मिलने से रहे नर भी ख़तम हो जायेगा. नयन, जिव्हा, कान, नाक और त्वचा, यही प्रमुख 5 इन्द्रियां है लेकिन इन्हे काबू करने के बाद आती है चट्टी इंद्री. आभास. जैसे अर्जुन का गांडीव जिसमे कभी तीर ख़तम नहीं होते थे. ऐसे हे है आभास जो शरीर को आत्मा या नारायण के पास ले जाता है." रुक कर दूध पीते और लड्डू खाते हुए अर्जुन aas-pas भी देख रहा था. फिर खड़ा हो कर chui-mui के पौधे के पास गया और एक पट्टी को हाथ लगाया. वो सिमट गई.

"देखिये ये सिर्फ छूने से सिमट गई जो की इसकी विशेषता है लेकिन ये अगली पट्टी को देखिये." अर्जुन ने उसके साथ वाली के बिलकुल पास हे ऊँगली की थी की वह सिमट गई.

"आभास. कुदरत ने हमको ये जनम सी मिलता है लेकिन जैसे हे हम वह सब सीखते है जो दुनिया या समाज में प्रचलित है हम स्वयं को खो कर बस वही बनते है जैसा सब बताते है. और ये गलत तोह नहीं लेकिन फिर भी एक अवरोध बन जाता है. योग मतलब जोड़. शरीर का आत्मा से मिलान हे तोह Nar-Narayan हुआ न दादाजी, योग भी." लड्डू को खाते हुए वह अब अपने दादाजी को देखने लगा जो निशब्द थे इस छोटे लड़के के सामने.

"वाह बीटा बड़ी ज्ञान की बात करि तुमने तोह. मेरे भाई साहब भी पहली बार इतनी गहरी सोच में है.", पूरी साहब ने इतना कहा तोह रामेश्वर जी मुस्कुरा कर उन्हें देखने लगे.

"सतीश, ये बात बहोत गहरी है और मुझे इतना पता है के अभी भी इसने विस्तार से नहीं बताई. लेकिन इसका अगला सबक भी साथ हे जुड़ा है. किसी इंसान को समझना या चरित्र jaan-na.", अब अर्जुन हैरानी से उन्हें देखने लगा था.

"वो जब ये आभास शब्द मेरे कानो में गूंजा तोह अपने पुलिस के दिन याद आ गए. वर्षो की म्हणत से एक पल में हे किसी का चरित्र जान लेते थे. और अगर इसकी बात को समझा जाये तोह जो व्यक्ति खुद को जान लेता है फिर वह इतना सक्षम हो जाता है के सामने वाले को खुद हे अपना व्यक्तित्व का राज उगलना पड़ता है. जब इसने कहा था के अर्जुन ने इंद्रा से युद्ध किआ था, देवराज को भी अपनी साड़ी शक्तियां प्रयोग करनी पद गई थी लेकिन अर्जुन के सामने उनके कोई astra-vidhya काम नहीं आई थी. उनका ाचा बुरा सभी व्यक्तित्व उजागर हो गया था क्योंकि सामने वाला तोह अपनी क्षमता को समझ चूका था लेकिन इंद्रा खुद अपने अहंकार में थे. आपका चरित्र साफ़ और मजबूत हो तोह फिर बुरे इंसान भी बुराई कबूल कर के सामने आ जाते है." रामेश्वर जी की बात सटीक थी.

"जैसे की आप दादाजी. शास्त्री जी ने ये सबक आपके नाम पर हे मुझे दिए की आपका व्यक्तित्व कितना विशाल है लेकिन फिर भी आप अपने उस दायरे में हे रहते हो जो आपको ाचा लगता है और किसी और को इस से पीड़ा नहीं होती. उन्होंने मुझे ये भी कहा की aabhas-purvbhaas अगर कोई व्यक्ति उनसे बेहतर जानता है वह आप है. और आपने अपनी 5 इन्द्रियों को ाचे से समझने के बाद हे ये दायरा बनाया है जिसमे एक तरह से आप राजा से सिर्फ एक आम गृहस्थ व्यक्ति हे रह गए है, अपनी मर्जी से." रामेश्वर जी ने आखें बंद कर ली थी इतना सुनकर और छोल साहब ने उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिए था.

"चल अब उठ तू यहाँ से और चल के नाहा.", कौशल्या जी डपट कर बोली अर्जुन से.

"रुको बीटा. एक छोटा सा सबक साँझा कर दू फिर तुम चले जाना." एक बार कौशल्या जी को देख कर उन्होंने अर्जुन को बिठाते हुए सर पे हाथ फेरा.

"हम जीवन में अँधेरे से प्रकाश की तरफ भागते है. इस से अँधेरा दूर नहीं होता सिर्फ जगह बदल जाती है. मैंने अपना पूरा प्रयास किआ था लेकिन मई उस अन्धकार की गहराई को साफ़ न कर सका. जिन लोगो से मुझे उम्मीद थी उन्हें शायद मुझ से इतना अधिक प्यार था के वह andhere-ujaale में फरक तक भूल गए. अगर ये दायरा छोटा न करता तोह मुझे आभास था के फिर कुछ नहीं बचेगा. एक विनाश से भरे raj-paat से ाचा 2 कमरों का वो घर होता है जो राहगीर और परिवार का भला करे. और सच कहु मुझे तुमसे कोई ऐसी उम्मीद नहीं है के तुम समाज में बड़ी हस्ती बनो या फिर दौलत का अम्बार खड़ा कर दो. बस वह इंसान बनो जो खुद को समझे, सच का साथ दे और हो सके तोह जरूरतमंद की भलाई करे. फिर चाहे तुम जो भी बनो कोई परवाह नहीं. अनुशासन और प्रेम ये बस 2 हे सूत्र है जिंदगी के. और तोह मई तुम्हे कुछ दे नहीं सकता." उनकी बात पर अर्जुन ने दादाजी के पाँव छू कर बस सर हाँ में हिलाया और अंदर दौड़ गया.

"भाई साहब, आपने कभी गलत नहीं किआ और आपकी औलाद ने भी. बस आपके लाडले को वही समझ आता है जो शायद उसने आपके दिल में महसूस किआ हो. शंकर का प्यार आपके लिए साफ़ है लेकिन मई जानता हु के प्यार के साथ हे आपको उस से शिकायत भी है.", छोल साहब ने उनकी ब्याह दबाता हुए उनसे ये बात कही तोह वह बस मुस्कुरा दिए. लेकिन कौशल्या जी बोल उठी.

"देवर जी मई बिलकुल सहमत हु आपसे. वो शेर है और उसने सीखा भी इनसे है के परिवार के लिए सबकुछ करो बस ये भूल जाता है के उसका जंगल का दायरा अब char-diwari में है और यहाँ अब राज नहीं होता." बात कहती वो अपने पतिदेव की तरफ एक निगाह डालती अंदर चल दी.

"यार सतीश, खुद हे देख ले तू अब. शेर अगर दूसरे शेरो का शिकार करना शुरू कर दे तोह संतुलन नहीं रहता ऊपर से उसकी शेरनियों की तादाद लम्बी है जो कभी कभी मुझको आभास कराती है के अनहोनी न हो जाये. मेरे तोह हाथ खड़े है तू हे बात कर के देख अपने लाडले से. चल आजा अंदर खाना खाते है. रेणुका को मई अभी बुलवा लेता हु आज मेरी बेटी मेरे पास रहेगी." उनको साथ लिए वह अंदर आ गए जहा अर्जुन बस नाहा कर बहार टोलिया सकने जा रहा था.

"बरखुरदार, अपनी बुआ और प्रीती को नाश्ते के लिए बुला लाओ.", अर्जुन उनकी बात सुनकर अपने कमरे में चल दिए, कपडे pehan-ne.

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सब वैसे हे हो रहा था जैसे रोज होता था. नाश्ता करके अर्जुन आज 9 बजे हे लाइब्रेरी चल दिए था. घर पे थोड़ी रौनक थी आज रेणुका और प्रीती की वजह से. माधुरी दीदी भी चर्च का विषय थी जो सभी बहनो और रेणुका bua-Preeti के साथ ऊपर तारा के कमरे में बैठी थी. रेखा जी और ललिता जी रसोईघर में saaf-safai में लगी थी. तारा स्कूटरी पर खुद हे कंपनी जा चुकी थी.

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"मुबारक हो माधुरी रिश्ता पक्का होने की ख़ुशी में.", रेणुका जी व्यवस्थित साड़ी में मुस्कुराती हुई सोफे पर बैठी थी और उनकी बात पर माधुरी दीदी शर्म से मुस्कुरा रही थी.

"वैसे आपने तोह बताया नहीं कुछ होने वाला जीजू के बारे में?", प्रीती ने बिस्टेर पर अलका दीदी के साथ बैठे हुए उनसे कहा तोह वह कुछ देर चुपचाप मुस्कुराती रही.

"गौरव नाम है उनका और पंजाब के ####### शहर में एक्साइज अफसर है. अभी तोह shagan-tilak किआ है. सितम्बर में सगाई और फिर नवंबर में शादी है. और तोह ज्यादा पता नहीं बाकी घरवाले उनके परिवार को ाचे से जानते है." माधुरी दीदी ने जितना पता था बता दिए.

"और उन्होंने तोह कोमल को भी पसंद किआ था लेकिन चाचा जी ने मन कर दिए.", उनकी बात पर कोमल दीदी मुस्कुरा उठी.

"वाह ये तोह ाचा हो जाता.", आरती ने इतना कहा तोह रेणुका जी बीच में बोल पड़ी.

"बहने devrani-jethani बन जाती तोह दोनों रिश्ते संभल नहीं पाती. ाची बात है के मन कर दिए.", उनकी बात पर आरती सर खुजाने लगी थी.

"संजीव की भी बात चली क्या कहीं?", रेणुका जी वैसे हे जिक्र कर दिए.

"भैया का रिश्ता तोह पहले हे पक्का किआ हुआ है दादाजी ने. एक हे दिन शादी है हम दोनों की.", माधुरी दीदी की बात पर ऋतू और अलका एक दूसरे को देखने लगी तोह कोमल दीदी हंसती हुई बोली.

"हाँ ये बात सिर्फ कुछ हे लोगो को पता है, घर में भी सबको नहीं बताई गई थी. संजीव भैया ने भी पिछले हे साल हाँ कह दी थी.", कोमल दीदी के बताने पर ऋतू उन्हें चूंटी काटने लगी

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(ऋतू)

"अब ये भी बता दो की कही हम सबका हे तोह पहले से रिश्ता नहीं पक्का किआ हुआ. कल फिर अचानक कही बोल दे के फैलाने से तुम्हारी पक्की कर चुके है." अलका जैसे सदमे में बोली तोह रेणुका जी के साथ हे माधुरी और प्रियंका भी जोर से हंस दी.

"एक और है यहाँ जिसका रिश्ता पहले हे पक्का किआ जा चूका है लेकिन ... बस उनकी माँ को ये बात अभी नहीं बताई गई है.", रेणुका जी की बात का इशारा समझते हुए सभी प्रीती को देखने लगे जो बुरी तरह से ऋतू दीदी से चिपक गई थी.

"और अगर उस लड़की की माँ ने ऐतराज किआ तोह फिर?", अलका की बात पर ऋतू ने आँख मारते हुए जवाब दिए.

"फिर तोह बुआ रिश्ता नहीं होगा." इस बात पर प्रीती शेरनी सी भड़क गई

"वही होगा जहा पक्का किआ है. माँ भी मेरी इस घर में हे रहती है." फिर सबको हँसते देख वापिस ऋतू के पीछे सर छुपा लिए.

"हाय रे. ये तोह बगावत वाली निकली. हम तोह इसको bholi-bhali समझते थे.", अलका की बात पर पूरा कमरा हंसी की आवाज से गूँज गया था लेकिन प्रियंका और आरती थोड़ा सोचने भी लगी थी की ये बात किस तरफ जा रही है. लेकिन चुप हे रही.

"वैसे बुआ आपने कुछ सोचा? दूसरे के बारे में. अब तोह चांस लेना चाहिए आपको.", माधुरी दीदी की बात को समझते हुए उनका चेहरा थोड़ा लाल हो गया था.

"हाँ इस बार कोशिश है. चलो तुम लोग बातें करो मुझे जगह दो सोने के लिए. फिर दोपहर के खाने के बाद तोह मई Tauji-Taaiji के पास रहने वाली हु शाम तक." वो उठने लगी बीएड की तरफ आती तोह प्रीती ने उन्हें रोक दिए.

"बुआ ये सामने वाला कमरा है न. आप वही आराम करो हम लोग यही बैठी है और वो बिस्टेर नरम भी है.", प्रीती की इस बात पर ऋतू थोड़ा हंसने लगी तोह प्रीती ने उनकी गर्दन ऐसे सेहला दी जैसे अर्जुन करता था. 'आठ.. मत कर' दबी आवाज में उन्होंने कहा इधर रेणुका जी इस कमरे में आई तोह समझ गई के ये किसका कमरा है. दरवाजा ढाल कर वह इत्मीनान से बिस्टेर पर बैठ कर कमरे को देखने लगी. फिर चादर को बाहों में लेती वह लेत गई जैसे अर्जुन की बाहों में हो.

"अगला नंबर प्रियंका का है. दादी बता रही थी की एक जगह लड़का देखा है लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में बात करेंगे.", माधुरी दीदी की बात पर तोह प्रियंका के रोयें खड़े हो गए. दिल में बस एक हे नाम सुनाई दिए 'अर्जुन'. और बस वह फिर से शांत हो गई.

"मैं तोह करने वाली नहीं भाई. जो भी कहता रहे लेकिन शादी तोह करुँगी नहीं और अपने सपने पूरे करुँगी." अलका ने फरमान सुना दिए था जिसके समर्थन में हमेशा की तरह ऋतू साथ थी.

"शादी नहीं करेगी? ये कैसे मुमकिन है?", आरती की बात पर ऋतू ने जवाब दिए.

"क्यों? ये खूब पड़ेगी, इसके बहोत सपने है. फिर काम भी करना है इसको और एक इंडिपेंडेंट लाइफ जीनी है. तोह जैसा इसको पसंद है वैसा करने में क्या हर्ज है."

"लेकिन बिना प्यार के जीना?", प्रियंका को एक शंका हुई.

"किसने कहा के बिना प्यार के? शादी नहीं करनी प्यार थोड़ी मन किआ है." अलका की बेबाकी पर प्रीती ने भी उन्हें गले लगाया तोह बाकी सभी को कुछ समझ न आया लेकिन शांत रहने वाली कोमल दीदी सब समझ गई लेकिन वैसे हे मुस्कुराती रही.

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इधर जब सभी लोग ऊपर बातें करने में लगी थी नीचे रेखा जी और ललिता जी सब काम ख़तम कर अपना खाना लेकर ललिता जी के कमरे में बिस्टेर पर बैठ चाय के साथ नाश्ता करती बातें करने में लगी थी. दरवाजा ढाल दिए था जैसे कोई जरुरी बात कर रही हो. और इनका बीएड भी दरवाजे की नजर से पीछे था जहा ये चर्चा में व्यस्त थी.

"तू परेशां मत हो रेखा. ऐसे कब तक सोचती रहेगी तू और खुद को कोसना बंद कर.", ललिता जी ने अब अपनी देवरानी को कुछ समझते हुए कहा.

"दीदी आपको नहीं पता के दिल पर क्या बीत रही है. मैंने उनको जिस तरह से देखा था वह दृश्य दिमाग से निकल हे नहीं रहा. विनोद को भी पता था इस बारे में.", रेखा जी पहेलियाँ बुझती सी बात कर रही थी.

"विनोद उस समय बचा हे था जब मैंने शंकर को उस कलमुही के साथ रंगरलिया मानते देखा था. और खुद सोच के विनोद तोह खुद अब जगह दे रहा था इनको मिलने की. तू अपनी हालत ठीक कर और शंकर जैसा है वैसा हे रहेगा. वह खेत में जाने कितनी कुंवारिया वह रगड़ चूका है जवानी में लेकिन उनके बाप की भी हिम्मत नै जब रोकने की तोह हम क्या कर सकते है.", रेखा के इस सुन्दर मुखड़े पर पीड़ा के भाव थे. एक घुटन होने लगी थी अपने पति के इस रूप को हर तरफ देख देख के. वही ललिता जी की बात भी उन्हें ठीक हे लगी थी क्योंकि वो सच में कुछ न कर सकती थी.

"फिर आप हे बताये दीदी मैं क्या करूँ? कैसे इस दर्द को अपने दिल से निकलू?", वो असहाये सी रोटी का निवाला नीचे रखती बोली.

"तुझे प्यार की जरुरत है रेखा. मैं जानती हु की जबसे मैंने तुझे बताया है मेरा चरित्र तेरी नजर में अब बदल गया होगा. लेकिन तू मेरी बहिन है और मई गलत बात नै कहूँगी. अपना दिल लगा किसी ऐसे शख्स में जो सिर्फ तुझे समझे, इज़्ज़त के साथ हे वो प्यार दे जो शंकर कभी न दे पाया. तू आज भी जवान है ऋ और मत खराब कर इस वरदान में मिले शरीर को.", माथे पर हाथ फेरते उन्होंने कहा तोह रेखा जी बस शुन्य सी देखती रही उनको.

"आपने ये सब किसके साथ किआ है?", रेखा की इस बात पर तोह ललिता जी कुछ देर खामोश हो गई.

"रेखा नाम जान लेने से कुछ नहीं होगा. लेकिन तुझे मैं इतना बता सकती हु की उस इंसान पर मई खुद से ज्यादा यकीन करती हु और वह भी कबि मेरी इज़्ज़त पर बात नै आने देगा. बेशक हमउम्र नहीं लेकिन दिल, शरीर और भावनाओ में वह सबसे ऊपर है." ललिता जी गहराई से अर्जुन को सोचने लगी जो सच में टूट कर उन्हें प्यार देता था लेकिन कोई सवाल या जबरदस्ती नहीं थी कभी.

"ऐसा हे इंसान तोह मुझे नहीं मिला. किस्मत ने सबकुछ दिए है. इतना बड़ा और प्यार करने वाला परिवार, समझदार बचे और दुनिया भर का आराम. लेकिन उमरभर प्यार करने वाला साथी देने में भगवन ने गलती कर दी मेरे साथ दीदी.", वो बस रो हे पड़ी थी लेकिन फिर खुद को ठीक करती संभल कर बैठ गई.

"भगवन सिर्फ हमको धरती पर भेजता है. सही गलत कुछ नहीं होता रेखा लेकिन एक फैंसला होता है जो दिल से किआ जाना चाहिए. तू बस मेरी बात पर विचार कर और अकेले मत रहा कर.", चाय का कप अपनी देवरानी को पकड़ते वह बोली तोह रेखा भी अब कुछ समझती सी चाय पीने लगी थी. ये इधर बातें करती रही और 11 बजे सभी लड़कियों के नीचे आने की आवाज सुनकर मुस्कुरा दी. "आ गई पल्टन अब चल उन्हें काम बता के फिर तू भी आराम कर ले 2 घडी." ललिता जा उठती हुई बोली. ऐसे हे कोमल, प्रियंका को कपडे धोने और अलका, ऋतू को अपने कमरे ठीक करने का बता कर रेखा जी अपने कमरे में चल दी और ललिता जी अपनी सास के पास.

"आज कर लिए बहोत काम अब सीधा दोपहर को उठूंगा." अर्जुन बहार से हे सीधा दूसरी मंजिल पर चढ़ गया था नींद पूरी करने के लिए और जैसे हे आराम से दरवाजा खोला तोह सामने बिस्टेर पर रेणुका को सोये देख मुस्कुरा दिए. ड्राइंग रूम का दरवाजा सत्ता के फिर अपने कमरे के दोनों दरवाजे भी लगता वो पजामा पहन कर पीछे से उनसे लिपट गया.

"प्रीती सोने दे न.", नींद में हे रेणुका ने ये कहा तोह अर्जुन उनका एक उभार प्यार से पकड़ते हुए कान में बोलै, "प्रीती नहीं प्रीतम है आपके." अर्जुन की आवाज सुनकर वह वैसे हे उसकी तरफ पलट गई. आंख्ने खोल कर जब सामने उसका मुस्कुराता चेहरा देखा तोह आँखें बंद करती फिर से उसकी बाहों में लिपट गई.

"ाचा अब मई भी सोने हे लगा हु. आपकी नींद जब खुले तोह उठा देना." और एक बार उनके कूल्हे को हाथ में पकड़ कर सेहलते हुए अर्जुन ने होंठो को चूम कर उनसे लिपट कर आँखें बंद कर ली. फिर से रेणुका का चेहरा अब उसकी छाती में चिप्प गया था. दोनों अब ज्यादा आराम से गहरी नींद में चले गए थे.

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"ये अर्जुन आज दिखा नहीं. है कहा अब तक?", अलका ने इतना कहा तोह ऋतू ने कंधे उचका दिए.

"सुबह 9 बजे लाइब्रेरी गया था लेकिन पता नहीं कहा है 1 बज गया है.", उसकी बात ख़तम हुई हे थी की प्रीती naha-dho के उनके कमरे में आ घुसी.

"ोये तेरा मजनू कहा है? तुझे कुछ पता भी है उसके बारे में?", अलका की इस बात पर प्रीती सिर्फ मुस्कुरा दी.

"तू काम कर अलका मई अभी आई. और प्रीती तू साथ है जरा.", कपडे तेह लगाती वह बीच में छोड़ कर बहार निकल गई. बहार वाले आँगन से ऊपर आती वह बड़ी सावधानी से चल रही थी और प्रीती उन्ही का अनुसरण करती कुछ सोचती हुई आ रही थी. ऊपर आने के बाद अपने होंठो पर ऊँगली रखती वह प्रीती को इशारे से चुप रहने को बोली.

"साइकिल देखि थी न? मतलब वह घर में हे है." कान में जब ये बात कही तोह प्रीती के चेहरे पे एक मुस्कान तैर गई ऋतू दीदी का मतलब समझ कर. धीरे से उन्होंने दरवाजा थोड़ा सा खोला तोह दोनों बस देखती रह गई अंदर का नजारा.

'चादर कमर तक लिए दोनों किसी pati-patni की तरह चिपके सोये थे. साड़ी कमर से गायब थी जहा अर्जुन का हाथ था और रेणुका का होंठ उसके नंगे सीने पर थे. टांग चादर के अंदर से अर्जुन के ऊपर राखी हुई थी.

"अब इन्हे कोई ये समझाए के ये इनका हनीमून नहीं है. हमारा घर है.", ऋतू ने प्रीती को हँसते हुए बोलै लेकिन वह तोह अंदर हे खोई थी. कैसे उसकी बुआ का हाथ अर्जुन की पीठ पर था.

"ोये कुछ कर जल्दी से. मई गई तोह काम ख़राब हो जायेगा.", वो प्रीती को हिलती बोली तोह प्रीती को होश आया.

"हँ.. सही बात है. ये दोनों तोह जगह हे भूल गए है और यही शुरू कर दिए." प्रीती को बात को सुनकर ऋतू ने ना में गर्दन हिला दी.

"सिर्फ साथ सोये है. चादर ठीक है और अर्जुन बेशक ऐसी वैसी हरकत कर दे बुआ नहीं करेंगी. मैं नीचे चली अब तू अगले 2 मिनट में किसी एक को अलग कर." इतना बोल कर वह भाग गई नीचे.

'कैसा पति दिए है भगवन जो पत्नी के सामने हे किसी के साथ भी पड़ा रहता है.' खुद की बात पर मुस्कुराती वह अंदर दाखिल हुई और आराम से सिर्फ बुआ को हिलाया. कुछ देर में हे उन्होंने आँखें खोल प्रीती को देखा तोह बस मुस्कुरा दी.

"ओह बुआ. ये अपना घर नहीं है और ना हे रात है. कोई आ गया तोह फिर शामत आ जाएगी. ये मंदबुद्धि भी पागल है. चलो उठो बहोत सो चुकी आप.", थोड़ा शर्माती सी रेणुका बात समझ कर सपनो से बहार आई और अर्जुन के हाथ के नीचे तकिया रखती उठ गई.

"सच में यार. पता नै कैसे हो गया.", साड़ी को ठीक करती वह शर्मा रही थी.

"चलो ाचा है के किसी ने नहीं देखा नहीं तोह हो गया था आज काम." उनको ड्राइंग रूम के रस्ते बहार लेके जाती वह बोली. दोनों नीचे आये तोह रेणुका बुआ बाथरूम चली गई और प्रीती वापिस कमर में Ritu-Alka के पास.
 
कहानी के कुछ प्रमुख महिला चरित्र.

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(अलका)

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(कोमल)

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(माधुरी)

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(तारा)

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(आरती)
 
मई सभी रेविएवस का रिप्लाई रात में करूँगा. आप सभी के रिप्लाई बहोत ाचे है और मैंने शायद 2 बार पढ़े लेकिन दिल ज्यादा हे खुश हो गया. इतना प्यार और दोस्त मिलेंगे इसकी उम्मीद कभी नहीं की थी. ऑफिस में फ़ोन का उपयोग ज्यादा नहीं कर सकता क्योंकि सर्वर एडमिन हु तोह बस सीनियर पोजीशन की वजह से इतना अल्लोवेद है. लेकिन 2-3 के बीच एक अपडेट जरूर दूंगा. लंच टाइम होगा.

लॉट्स ऑफ़ लव तो एवरीवन एंड कीप सपोर्टिंग
 
अपडेट 48

Kismat-Vaada-Maa


दोपहर का भोजन रेणुका जी के साथ हे किआ था रामेश्वर जी और कौशल्या ने. उन्हें भी बहोत स्नेह था अपनी इस बेटी से और वैसा हे प्रेम रेणुका को भी था दोनों से. एक तरह से तोह कौशल्या जी को वह अब अपनी माँ हे मानती थी और बड़ी माँ कहके हे सम्बोधित करती थी. खाने के बाद कौशल्या जी ने रेणुका को वो सब सामान दिखाया जो वह उसके लिए गांव से खासतौर पर लेके आई थी. उन्हें भी पता था के रेणुका सादगी पसंद है तोह वैसे हे कपडे और कुछ सोने के के जेवर. फसल की आमदनी से रामेश्वर जी ने रेणुका को भी एक हिस्सा दिए था जिसको मन करने के बावजूद उन्हें लेना हे पड़ा. प्रीती को तोह सुबह हे रामेश्वर जी ने अपने हाथो से सब सामान दिए था और अभी वह बहार रेखा जी के साथ रसोई में काम करवा रही थी. अर्जुन बस चुपचाप खाना खता रहा बिना किसी तरफ ध्यान दिए.

"इतना शांत क्यों बैठा है? कोई बात है क्या?", माधुरी दीदी की बात पर सिर्फ ना में गर्दन हिला के वह वापिस खाने पर धयान देने लगा था. कोमल दीदी खाना परोस रही थी और प्रियंका, अलका, आरती और ऋतू भी वही बैठी खाना कहते हुए बस हलकी बातचीत कर रही थी.

"ताईजी, ताऊजी नहीं दिख रहे?", अर्जुन रात को तोह घर था नहीं और सुबह से उसका ध्यान गया नहीं था राजकुमार जी पर तोह उसने वैसे हे पूछ लिए.

"तेरे ताऊजी कल शाम हे चले गए थे वापिस काम पर. अगले हफ्ते आने का बोल कर गए है.", उनका स्वर थोड़ा नाराजगी भरा था. लेकिन अगले हे पल जब उन्हें ध्यान आया के पूछने वाला तोह अर्जुन है तोह फिर आवाज को संभालती हुई बोली, "ऐसा है न उन्हें तोह कोई फ़िक्र है नहीं बीटा. अब एक तू है जो हाल तोह पूछ लेता है वर्ण तेरी ताई की तोह ज़िन्दगी बस चूल्हे से शुरू और वही ख़तम.", उनकी मुस्कान देख कर अर्जुन भी रहस्यमई तरीके से मुस्कुरा उठा जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया था. खाना ख़तम कर के अर्जुन अपने दादाजी के कमरे में चला गया जहा बिस्टेर पर उनके पास हे दादी और रेणुका बुआ बैठी थी. बचे की तरह वह उछलता सा बिस्टेर पर चढ़ अपनी दादी की गॉड में जा लेता.

"कौशल्या इस नमूने का बताया कर के ये 6 फुट से ऊपर जाने लगा है और अभी तक बचपना नहीं गया.", रामेश्वर जी हँसते हुए बोले तोह कौशल्या जी भी उसके सर पे हाथ फिरती स्नेह दिखने लगी.

"ये है मेरा राजा बीटा. और फिर मेरे लिए तोह हमेशा छोटा हे रहेगा. अर्जुन इसने भी बहोत खिलाया है तुझे गॉड में आज तू तेरी बुआ से हे मालिश करवा रे अपने सर की. बूढी हड्डियां तेरा वजन सच में नई सेहन करती रे.", उनकी बात पर जहाँ अर्जुन बिना परवाह किये रेणुका की गॉड में जा लेता वही एक पल के लिए उनकी सांस अटक गई. 'पहले मैंने गॉड में खिलाया है और अब ये मुझे गॉड में लिए साड़ी रात नई सोने देता.' मैं में सोचती रेणुका बस प्यार से हे उसके सर में हाथ फिरने लगी.

"रेणुका, तुझे नई लगता के ये कभी बड़ा हे नई होगा? एक तेरे ताऊजी भी इसको बड़ा नई होने दे रहे.", कौशल्या जी लाड से हे उसकी शिकायत लगा रही थी लेकिन रेणुका बस अर्जुन की मुंडी आँखें देखती बालो में उंगलिया फिरती रही.

"थानेदारनी जी, मेरे से ज्यादा आप हे इसको सर पे चढ़ाये रहती हो. और खड़ा हो मेरी बेटी की गॉड से, फूल से है वह.", उन्होंने हँसते हुए अर्जुन के गाल को थपथपायो तोह वह नाराजगी से बोलै.

"अब फैंसला कर लो पहले के मुझे यहाँ लेटना चाहिए या नहीं. और फिर मुझे किसने बिगाड़ा है? हाँ.. दादाजी मुझे याद आ गया." वो झट्ट से सीधा खड़ा हो अपने दादा की बगल में आ गया.

"देख रेणुका अभी ये कैसा जादू करने वाला है.", कौशल्या जी ने इशारा करते हुए धीमी आवाज में रेणुका का ध्यान उधर उन दोनों की तरफ किआ.

"हाँ बताओ साहब क्या हुकुम है आपका.?", रामेश्वर जी भी हँसते हुए बोले तोह अर्जुन उनसे कास के लिपट ते हुए बोलै.

"वह क्या है न आपने कार का तोह मन कर दिए और मुझे भी आपकी बात ठीक लगी. लेकिन स्कूटर न कुछ जंचता नहीं अब, 8 साल पुराण भी है. मई कह रहा था के मैंने न एक रॉयल एनफील्ड देखि थी अपने सेक्टर की मार्किट में." इतना बोलकर वह अपनी दादी की तरफ देखने लगा और फिर उठकर उनसे लिपट गया.

"दादी और कुछ नहीं चाहिए बस मुझे न वह मोटरसाइकिल दिलवा दीजिये, प्लीज. पक्का वडा है के सिर्फ जरुरत पर हे चलाऊंगा. प्यारी दादी." गाल चूमते वह अपनी दादी को मानाने लगा था क्योंकि फैंसला उनके हे हाथ था.

"तेरे दादा जी ने वह बड़ी गाडी के साथ हे बुक करवा दी थी. लेकिन उस दिन वो शोरूम में नहीं थी जो रंग इन्होने कहा था.", दादी ने तोह धमाका हे कर दिए था ये बात बोलकर और अर्जुन दोनों के चेहरे देख रहा था जो बस मुस्कुरा रहे थे. रेणुका के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई अर्जुन का ये अंदाज देख कर.

"मेरे बेटे को जो चीज चाहिए होती है वह उसकी इत्छा से पहले हे मुझे पता होती है. संजीव ने कहा था का 3 बजे तक आएगा वह. लेकिन एक बात कान खोलकर सुन ले मेरी, कही भी अगर आवारागर्दी की तोह फिर चाबी तेरी दादी से वापिस नहीं मिलने वाली." उनकी बात सुनते हे वह जोर से लिपट गया रामेश्वर जी से.

"दादी आप और बाउजी न सच में सबसे ज्यादा प्यार मुझे हे करते हो."

"अरे मेरे बचे अब नहीं करेंगे तोह कब करेंगे? कल तू हमारे जाने के बाद यही सब तोह याद करेगा." उन्होंने भी पोते को गले लगते हुए प्यार दिए.

"ताईजी सच में यहाँ पता लगता है के परिवार क्या होता है.?", रेणुका कब भावुक हुई उनको पता भी न चला. रामेश्वर जी तोह सीधे हे बैठ गए और प्यार से रेणुका का सर सहलाते हुए अपनी बीवी से बोले.

"सतीश को कहना के मुझ से बात करे." और फिर खुद उठ कर बैठक में चले गए. अर्जुन इशारा समझ गया था के उसको भी बहार जाना है अब. कौशल्या जी ने रेणुका के आंसू साफ़ करते हुए उन्हें चुप करवाया.

"अर्जुन अभी यहाँ कोई नहीं आएगा.", दादी की ये आवाज भी वह ाचे से समझता था. दरवाजा लगा कर बहार आने के बाद वो कुछ सोचता हुआ साथ वाले कमरे में जा कर चुपचाप बैठ गया आँखें बंद करते हुए कुर्सी पर. यहाँ बिलकुल अँधेरा था.

"सच बता बीटा के क्या बात है? कौशल और उसके घरवाले तेरे साथ ठीक नहीं है क्या?", ये वो दौर था के लड़की पराया धन हे होती थी लेकिन ये परिवार बेशक जद्दो से जुड़ा था लेकिन दकियानूसी सोच वाला नहीं था.

"आप पापा से ये बात मत करना प्लीज." उनकी बात पर कौशल्या जी ने भी सहमति दे दी.

"शादी के शुरू में तोह फिर भी हालत ठीक थी बड़ी माँ. फिर मेरे सामने इनका करैक्टर धीरे धीरे सामने आने लगा था. देहरादून में कोई ऐसा दिन नहीं गया के जब रात को ये पी कर न आये हो. बहार मेस या रेजिमेंट की पार्टीज में भी लोगो के सामने मुझे इज्जत की बजाये एक पुरुस्कार की तरह हे पेश करते. बचे के साथ अगले 6 साल जैसे तैसे काट लिए लेकिन उसको हॉस्टल में भेज दिए तोह फिर वही घर में क़ैदी. ससुराल में तोह और भी बुरा हाल है. घर के बड़े लोग तोह ाचा maan-samman करते है पापा का और ताऊजी का इसलिए मुझे कोई कुछ नहीं कहता लेकिन मेरे देवर, चाचा ससुर के लड़के और उनके जमाई सिर्फ ऐसे देखते है जैसे मई विधवा हु और अब उनका हे हक़ है मुझपे. इन्हे बताया था तोह मेरे हे गाल लाल कर दिए थे. रेजिमेंट और I.M.A. में अगर आप भी जाएँगी तोह पता चल जायेगा के वह भर्ती होने वाली लड़कियों के साथ इनके किस्से. दम ghutt-ta है वह तोह साल में 2 बार इधर आ जाती हु लेकिन वापिस जाते हे सब शुरू हो जाता है." एक हे सांस में साड़ी बात कहती वह jaar-jaar रोये जा रही थी. ऐसा समाया आया के हिचकियों के साथ रोने की आवाज थोड़ी बुलंद हो गई तोह कौशल्या देवी ने सीने से लगाए हे चुप करते हुए बस इतना हे पुछा.

"कब वापिस आ रहा है वह अरुणाचल से? इस बार तू वापिस नहीं जाएगी जितने वह और उसका बाप यहाँ नहीं आते.", स्वर पूरा कड़क था उनका और चेहरे पर भयंकर गुस्सा. "मई बोलूंगी तेरे बाप को की मुझे बात करनी है तेरे पति और ससुर से. और अगर नहीं सुधरे तोह फिर मई जानती हु कैसे सुधारना है. फौजी हो या पोलिसवाले, सबको समझाना आता है मेरे बेटे को." थोड़ी देर बाद बहार आ कर खुद हे गीला टोलिया कर के वह वापिस कमरे में आई और रेणुका का हुलिया ठीक कर के अपने पतिदेव को आवाज दी.

"सुनिए जी. आप बैठो इसके पास थोड़ी देर मई इसके लिए शरबत बना के लाती हु.", वह एक बार फिर रेणुका के सर पर हाथ फेरती बहार निकल गई तोह रामेश्वर जी के साथ हे अलका भी अंदर आ गई.

"बुआ, मतलब आप बूढी हो गई जो यहाँ बैठी हो? और दादाजी, आपने इन्हे इधर बंद किआ हुआ है?", तुनक कर वो बोली तोह दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई. अलका भी उनके पास बैठ गई क्योंकि उसने भी थोड़ा बहोत तोह सुना हे था जो भी बुआ ने दादी को बताया था. बैठी हुई थी वह बैठक में जहा रामेश्वर जी दीवान पर लेते थे.

"ाचा मई चला स्टेडियम." इधर अर्जुन ऊपर से अंदर वाले आँगन में आते हुए बोलै तोह प्रीती की तरफ देख कर बोलै.

"मुझे मंडे जाना है. अभी कोर्ट क्लियर नहीं है हमारे." उसने हलकी उदासी से कहा तोह अर्जुन ने एक मुस्कान देते हुए नजरो से हे कुछ कहा तोह वह पल भर में हे मुस्कुराती अंदर चली गई. इधर संजीव भैया अभी तक नहीं आये थे और फिर मनुबला को याद करते वह स्कूटर लेकर निकल लिए घर से.

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"कैसी हो?", 4 बजने में अभी 10 मिनट थे और मंजूबाला अर्जुन को स्टैंड के बहार हे मिल गई थी.

"तुम्हे अब याद आई मेरी?", थोड़ा उखड़े लहजे में मंजू ने ये कहा तोह अर्जुन ने अपनी मज़बूरी और फिर छुट्टी के बारे में बताया. दोनों साढ़े 5 का मिलने का बोल कर निकल लिए. अर्जुन अपने हॉल की तरफ और मंजू हॉस्टल में पैकिंग के लिए.

"आज चेस्ट के साथ हे कंधे की सिर्फ रोड से प्रैक्टिस करोगे तुम दोनों. अब से मशीन बंद और शरीर गरम करने के बाद कसरत अगले 30 मिनट में ख़तम करे वापिस यही मिलोगे.", जोगिन्दर जी तोह पूरे कोच के हे स्वभाव में थे आज. कोई प्यार या haal-chal नहीं पूछते हुए सिर्फ अभ्यास का बोल कर खुद कपडे बदलने चल दिए.

"कोच साहब अब हमारी बंद बजायेंगे भाई. लगता है उस दिन की हिम्मत दिखा के अपने पाँव पर खुद हे कुल्हाड़ी मार ली हमने.", बलबीर अर्जुन के साथ गयम की तरफ चलते बोल रहा था. अर्जुन भी हँसते हुए चलता रहा. दोनों ने कड़ी म्हणत करते हुए आज सिर्फ कसरत पर हे ध्यान रखा और ठीक 25 मिनट बाद वापिस जोगिन्दर जी के सामने पसीने में भीगे खड़े थे. दोनों के हे शरीर की मांसपेशियां चमक रही थी.

"बनियान नीचे और ये पहन लो दोनों. सामने प्रोफेशनल किट लगी है और 3-1-1-3 का कायदा मानते हुए पूरे 10 सेट फिर मेरे सामने वापिस यही."

'भाई बोल रहा हु के ये सटक गए है. तू तोह रेम्बो बन जायेगा मई तोह शईद होने वाला हु.' हलकी आवाज में बोलते हुए बलबीर मुक्केबाजी वाले दस्ताने पहनता बोलै.

"भैया, आज मुझे भी लग रहा है के अगर इसके बाद और करवाया तोह मई घर नहीं पहुँचने वाला." अर्जुन ने ये बात मजाक में करि थी लेकिन अगले 20 मिनट में वो दोनों हे फूली नसों के साथ हफ्ते हुए वापिस कोच साहब के सामने बेदम से खड़े थे.

"ये पी लो और फिर बैठ जाओ यहाँ.", जोगिन्दर जी ने गौर किआ था के अर्जुन के शरीर में कटाव दिखने लगे थे. श्री बड़ा था तोह छाती भी कही चौड़ी और बाजू भी भारी थे.

"एक बार इधर आओ. और इस पर खड़े हो जाओ.", वजन करने की मशीन दिखते हुए उन्होंने अर्जुन और बलबीर को अपने पास बुलाया तोह दोनों हे सिर्फ निक्कर में वो ग्लूकोस वाला पानी थोड़ा थोड़ा पीते उधर हो लिए. दोनों का वजन किआ फिर एक अभ्यास कर रहे लड़के को पास बुला के छाती का माप करवाने लगे.

"बलबीर 58 किलो के हो तोह या फिर 2 किलो बढ़ा लो या 3 काम. छाती ठीक है तुम्हारी फ्लायवेट के हिसाब से. 37 इंच. और तुम पहलवान, यही बुलाते है अब तुम्हे यहाँ के लोग अगर न पता हो तोह. तुम्हारा वजन है 86 किलो लेकिन लम्बाई 6'1" है तोह काम से काम 4-8 किलो भर ऊपर करना है फिर वापिस काम करते हुए 85. जितना बड़ा शरीर है उसको सही आकर में लाने के लिए जरुरी है. अभी से 42 इंच छाती है मई सोच रहा हु के जब मांसपेशिया उभर जाएँगी और ये थोड़ी बहोत वासा निकल जाएगी तोह 45-46 तक पहोच जाओगे. उम्र अभी काम है तोह कंधे की कसरत बढ़ा दो थोड़ी और तुम्हे दौड़ बंद करनी पड़ेगी कुछ दिन तक. बाकी मई बात कर लूंगा पंडित जी से." वह से आगे बढ़ के उन्होंने 2 लड़को को कुछ समझाया तोह वो दोनों छोटे तोलिये और एक पानी की तरह साफ़ तेल की शीशी ले कर बलबीर और अर्जुन के पास आ गए.

"आप दोनों बैठ जाइये और शरीर सीधा रखिये." एक ने इतना बोलै और फिर दोनों ने पहले ाचे से उनके श्री का पसीना पोंछा और फिर एक nape-tule अंदाज में शरीर की मालिश सी करने लगे. कंधे, बाजू और पिंडलियों की. अगले 7-8 मिनट में हे बलबीर और अर्जुन की थकान उड़नछू हो गई थी. अलग सी ताक़त शरीर में महसूस करते वह दोनों बस उन्हें धन्यवाद् करने लगे.

"आप लोग खिलाडी हो भाई और हम कोच साहब के साथ यही काम करते है. मैच, नस चढ़ जाना, थकान मिटाना और कम्पटीशन से पहले खिलाडी को तैयार करना. आपका स्वागत है." कह कर दोनों निकल लिए.

"भाई ये तोह अध्भुत था. पता होता के बाद में इतना आराम मिलेगा तोह मई पूरी म्हणत से करता." बलबीर की इस बात पर अर्जुन हंसने लगा.

"मतलब आप भाई अभी तक मजाक में ले रहे थे?"

"नहीं भाई वह 8 सेट के बाद मैंने 2 सेट बस निकाल हे दिए थे. ये सोच कर के रात को कही खाना भी न खा पाव." और दोनों हे मुस्कुरा उठे. कोच साहब के इशारे से दोनों वह से निकले तोह बलबीर ने पहले अर्जुन का शरीर साफ़ किआ फिर अर्जुन ने उसका. कपडे बदल कर बलबीर लड़किया देखने के अपने रूटीन पर निकल गया और अर्जुन स्टैंड पर पहुँच कर मंजू का इन्तजार करने लगा.

"बहार मिलो वही पेड़ के पास." मंजू ने आते हे कहा तोह अर्जुन स्कूटर निकल कर घर से विपरीत दिशा में चल दिए और अमलतास के वृक्ष के नीचे खड़ा हो गया. एक मिनट बाद हे मंजू इधर उधर देखने के बाद बैग अर्जुन को आगे रखने को देती खुद पीछे बैठ गई. इस समय एक मेहरून kameej-slawar में वह सर को दुपट्टे से ढके थी.

"कितनी दूर है तुम्हारा गाँव जो इतनी देरी से बस पकड़ रही हो?", यूनिवर्सिटी की शांत सड़क पर आते हे उसने पुछा तोह अब मुँह से दुपट्टा हटती मंजू बोली.

"30 किलोमीटर है मेरी मौसी का गाँव. कल maa-pitaji उधर हे आएंगे. फिर रविवार शाम को या सोमवार सुबह वह से हम हमारे घर चले जायेंगे, 12 किलोमीटर आगे है." अब उसका हाथ अर्जुन की कमर पर था और चेहरा कंधे पर. स्कूटर धीमी रफ़्तार में चलते हुए अर्जुन कुछ सोच रहा था.

"ाचा अगर मई तुम्हे सीधा गाँव हे छोड़ दू तोह?", उसकी बात सुनकर मंजू हंसती सी बोली.

"मेरे 15 रुपये बचने के चक्कर में जूते न खा लेना. गाँव का माहौल अलग होता है थोड़ा. और मुझे तुम्हारे साथ देख कर लोग सवाल करेंगे.", दिल से तोह वो भी चाहती थी के ये हो जाए.

"ाचा. मतलब इतना बड़ा गाँव है के हरदम सड़क पर नजर जमाये रहता है के कोनसी लड़की किस लड़के के साथ आ रही है." अर्जुन की बात सुनते हे मंजू चुप हो गई. सही तोह बोलै था वह के 40 परिवार का गाँव जो सड़क से अंदर था वह कितने हे लोग ये देखते होंगे. ऊपर से लड़का पहलवान है तोह कह भी सकती है के बस निकल गई थी 6 बजे वाली तोह इसने छोड़ दिए मुझे.

"अपना मुँह ज्यादा मत खोलना और सही से चलोगे तोह हम 40 मिनट में मेरे गांव होंगे.", मंजू ने इस बार बात कहने के बाद उसकी गर्दन चूम ली थी.

"मई सोच रहा था के 2 घंटे में गाँव पहुंचे हम. रास्ते में तुम मुझे khet-khalihan दिखा डौगी." अर्जुन ने एक हाथ से जांघ सहलाते हुए कहा तोह मजे के लहर दौड़ गई मंजू के शरीर में.

"आज नहीं लेकिन अगर तुम अगर परसो सुबह 9 बजे ##### गाँव के बहार वाले अड्डे पर मिलो तोह मई तुम्हे खेत दिखा दूंगी. सभी लोग सवामणी लगाने हनुमान मंदिर जाएंगे तोह शाम से पहले तोह आने वाले है नहीं. और मेरे Chacha-mausa एक हे है मतलब मेरे पिताजी के भाई और हमारे खेत सांझे है, गाँव से बिलकुल बहार." अर्जुन पूरी मंशा समझ गया था अब परसो की और उसने वादा कर दिए था के वह परसो 9 बजे पहोच जायेगा. इधर दोनों उस जगह पहुंचे थे जहा से गांव की बस भी मिलती थी की अगला पहिया हिलने लगा और अर्जुन ने एकदम स्कूटर रोक दिए.

"इसको भी अभी पंक्चर होना था." जोर से पहिये पर लात मारते हुए वह स्टैंड लगा के इधर उधर देखने लगा.

"ाची बात है. वैसे भी रात हो जाती वापिस आते हुए. और वो आ गई मेरी बस भी. तोह पहलवान जी अब आपका इन्तजार रहेगा परसो. उसके सीने से अपनी कठोर छातियां रागादि वह हाथ हिलती बस में चढ़ गई और अर्जुन सब भूल कर उसकी मोहक मुस्कान देखने लगा. 'चल भाई वो कहती है तोह ाचा हे किआ तूने जो यहाँ पंक्चर हुआ. गांव या रस्ते में होता तोह हो गया था काम.' स्कूटर से बतियाता वह side-cover से दूसरा टायर खोल कर बदलने लगा. Chabi-pana डिकी में था. अगले 10 मिनट में हे टायर बदल लिए था लेकिन इसमें भी हवा थोड़ी काम थी तोह पेट्रोल पंप से हवा भरवाने लगा.

'संजीव भैया कहा जा रहे है? और ये साथ में कोण है?' अर्जुन ने देखा तोह उसके बड़े भैया एक और आदमी के साथ, जिसने कला चस्मा लगाया हुआ था के साथ उसके सामने से निकल गए. कार भी ये उनकी एस्टीम नहीं थी, देवू इलो थी. फिर हवा भरवाने के बाद देखा तोह नजरो से ओझल हो चुकी थी वो कार. दिमाग पर जोर डालता वह सीधा घर की और बढ़ लिए. 6 तोह यही बज गए थे.

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"आज कहा सोयेगा तू?", स्कूटर खड़ा करने लगा तोह माधुरी दीदी उसकी तरफ पीठ करती पूछने लगी.

"अभी तोह कुछ कह नहीं सकता क्योंकि किसी का भी कुछ पता नहीं. छत्त पर तोह मुश्किल है आप खुद हे देख लीजिये काले बदल.", अर्जुन ने अपना कपडे का बैग स्कूटर से उतारते कहा और कुछ देर खड़ा रहा.

"भैया तोह अब सोमवार को हे आएंगे और Alka-Ritu प्रीती के घर जा रही है. अगर तुझे ठीक लगे तोह मई ऊपर आ जाउंगी.", माधुरी दीदी जैसे अर्जुन से मिलान के लिए तड़प रही थी.

"आप एक काम कर सकती है, तारा ऊपर हे रहती है तोह आप संजीव भैया के कमरे में सो जाना. मई देर रात आने की कोशिश करूँगा बस आप इन्तजार करने की जगह सो जाना जिस से तारा भी अकेली सो जाये. नहीं तोह वह 1 बजे तक जागती रहेगी आपके साथ." इतना बोलकर वो गलियारे से होता हुआ अंदर आ गया जहाँ दादी और रेणुका बुआ रेखा जी और प्रियंका के साथ डाइनिंग टेबल पर बैठी थी. ललिता जी भी चाय की ट्रे लेकर उधर आ गई थी.

"अर्जुन तू नाहा ले मई कपडे रख देती हु बीटा.", रेखा जी ने उठते हुए कहा तोह अर्जुन जूते निकाल कर सीधा बाथरूम में घुस गया. जल्दी से नाहा कर टोलिया लपेट अपनी माँ के कमरे में चला गया जहाँ बिस्टेर पर टीशर्ट राखी थी. रेखा जी बहार आँगन से उसका पजामा लेने गई थी. टीशर्ट पहन कर मुदा तोह सामने अपनी माँ को देखा जो धुला पजामा लिए अंदर आ रही थी.

"ये ले पहन कर बहार आजा. मई दूध बना देती हु." अर्जुन ने हाथ से जैसे हे पजामा लिए इधर उसका टोलिया फर्श पर गिर गया. मजबूत टांगो के बीच में 5-6 इंच तक झूलता उसका साफ़ और मोटा लुंड उजागर होते हे जैसे दोनों की सांस अटक गई. रेखा जी तोह हैरान थी की ये उनका मुन्ना सच में अब बहोत बड़ा हो चूका है. बेशक वो माँ थी लेकिन इस जानवर जैसे अंग को देखकर उनकी छूट के अंदर जैसे किसी कोने में एक बूँद टपक गई थी. अगले हे पल वह बहार निकल गई और इधर अर्जुन ने जल्दी से पजामा पहन लिए. वो झिझकता हुआ ऊपर जाने लगा तोह दादी की आवाज कानो में पड़ी.

"चल इधर आ और ये दूध पी. फिर अपनी बुआ को उसके सामान के साथ घर छोड़ कर आना है." मरता क्या न करता. चुपचाप चल दिए नजरे झुकाये टेबल की और. रेखा जी के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान आ गई अपने बेटे को यु नजर चुराते देख.

"अलका, डब्बे में से 2 लड्डू निकाल के दे इसको. और ललिता एक मुट्ठी काले चने और एक मुट्ठी साबुत सोया मिटटी के बर्तन में भिगो देना रात को. अब से ये रोज का काम है तुम्हारा." उन्होंने ये 2 बातें कही तोह अर्जुन हैरान होते उन्हें देखने लगा.

"तेरे हे लिए है ये सब और मुँह नहीं बनाएगा. चुपचाप कहा लेना." कौशलया जी की आवाज में वही सख्ती थी जो उनके स्वाभाव में होती थी.

"बड़ी माँ, ये सब क्या है और ये कैसे लड्डू है जो अलका लेके आई है.?", रेणुका की बात पर अब अर्जुन और बाकी सब का ध्यान भी कौशल्या जी के चेहरे की तरफ हो गया. अब पता तोह लगे के हो क्या रहा है.

"बेटी कुछ नहीं बस ये वह खुराक है जो कोई पहलवान हे सेहन कर सकता है. लड्डू को शक्कर या पंजीरी के नहीं है. तेरे ताऊजी का आदेश था के इसको ऐसी खुराक देनी है के जंगली घोड़े सी जान रहे शरीर में. खास jadi-butiyon और मसलो से बनाये थे मैंने, जैसे मेरे पिताजी ने सिखाये थे मुझे. शुरू में एक एक हे खिलाये इसको subah-shaam ये देखने के लिए की शरीर सेहन कर सकता है या नहीं. आज से दोगुना कर दिए है फिर ठन्डे मौसम में थोड़ा अलग बना के दूंगी जिस से ज्यादा ताक़त बढे और शरीर थकान न महसूस करे." उन्होंने इतना कुछ बताया तोह अर्जुन के पल्ले कुछ पड़ा की क्यों वह कुछ दिनों से अलग महसूस करता है और कैसे उसका ख़ास अंग इतनी जल्दी अकड़ जाता है, जो की पहले से कुछ मोटा भी होने लगा था.

"घोडा बन जायेगा माजी ये इस तरह से तोह. और फिर आप तोह अभी से सर्दियों की भी सोच के बैठी हो." ललिता जी की इस बात पर रेणुका और रेखा जी के मैं में एक हे विचार आया, 'बन क्या जायेगा, पूरा घोडा हे तोह है अभी से. और ये उसको और तगड़ा करना चाहती है.'

"देख ललिता बात ऐसी है की ये देसी नुस्खे बहोत काम लोगो को पता है लेकिन सच कहु तोह ये इतने कारगर है की मेरे पिताजी ने बहोत लोगो को इनके प्रयोग से ठीक किआ था. बस जो मैं इसको दे रही हु वह किसी कमजोर शरीर वाले को नहीं दिए जा सकता. सेहन नहीं करेगा और बीमार पड़ जायेगा. अब भीगे चने और सोया की दाल से शरीर की गर्मी भी काम होगी और खून भी बढ़ेगा. इसलिए बस नियम से ये भीगोने है खिला इसको रेखा देगी. अबसे सुबह दूध भी इसको वही पिलाएगी मैंने बहोत सेवा कर ली इस मुस्टंडे की." वह हंसती सी अपनी बहुओं को काम समझा अर्जुन को देखने लगी जो हिम्मत करते हुए अब दूसरा लड्डू ख़तम करने लगा था.

"दादी, एक बात बतानी थी आपको. वो कोच ने आज लम्बाई देखि थी मेरी. फेब्रुअरी में तोह 6 फ़ीट का था मई लेकिन अभी एक इंच और बढ़ गया हु. और वह तोह बोल रहे थे के कोई 6-8 किलो बढ़ाना पड़ेगा फिर 5 किलो घटना. मुझे वह चीज तोह समझ नहीं aai.",Arjun ने आज की स्टेडियम की बात बताई.

"खुराक और कसरत से बढ़ेगा हे तू. और अगर ये सब तुझे अभी समझ आ जाता तोह तू न जोगिन्दर की जगह वह कोच होता. बात हुई थी मेरी उस से अभी तेरे आने से पहले. कह रहा था के 3 इंच से ज्यादा और बढ़ेगा अभी तू. पता नई रेखा ने क्या खाया था तेरी बारी में.", कौशल्या जी की बात पर रेखा जी मुस्कुरा दी.

"बड़ी मुश्किल से तोह बचा था माजी. सब तोह एहि कहते थे के कमजोर है और बचेगा नहीं. आपकी म्हणत है और प्यार है जो ये अब ऐसा हो चूका है." रेखा जी की बात में स्पष्ट शब्द नहीं थे.

"हाँ मैंने हे दूध पिलाया न इसको 3 साल तक? याद है कैसे चमगादड़ सा लगा रहता था तेरी छाती से. उस फूल सी बची को भी हटा देता था भुक्खड़. न बंद कराती तेरा दूध तोह स्कूल में तुझे साथ हे लेके जाता फिर ये.", कौशल्या जी भी अपने आप में बस एक हे थी. कबि गुस्सा तोह कभी सख्त. और कभी ऐसा मजाक कर देती की सामने वाला जवाब न दे पाए. यही हाल रेखा जी का हो चूका था. उन्हें याद आ गए थे वह दिन जब अर्जुन कैसे उनके चुचो से चिपका रहता था. एक को चुस्त तोह दूसरे को उँगलियों में पकड़ कर खींचता रहता था. और ऐसा कभी भी न हुआ था के दूध ख़तम हो जाता हो. तब भी दवा उनकी सास ने हे बना के दी थी.

"माजी, वह दवा आप आज भी बना लेती है?", सोच में हे गलती से ये बात मुँह से निकल गई तोह फिर चेहरा नीचे झुक गया खुद का हे शर्मा से और कौशल्या जी की हंसी चूत गई.

"कल से भैंस का दूध पिलाना है रेखा.", अपनी सास की इस बात पर वह उठ कर रसोईघर में चल दी साथ हे ललिता जी भी. अर्जुन बस समझने की कोशिश करता रहा के कोनसी दवा की बात माँ ने की जो वह उठ के चल हे दी बिना कुछ आगे कहे. फिर खड़ा हुआ तोह रेणुका भी कड़ी हो गई.

"चलिए, आपका सामान मई घर पहुंचा देता हु.", अर्जुन ने इतना कहा तोह रेणुका जी अपनी बड़ी माँ से एक बार गले लग कर मिली और फिर कमरे से सामान उठवा कर अर्जुन के साथ चलने लगी.

"मुझे भी पकड़ने दो." हाथ से सामान लेने की कोशिश की तोह अर्जुन ने नजरो से मन कर दिए और वो उसके साथ हे नजरे झुकाये हल्का मुस्कुराती अपने घर आ गई. गेट खुद हे खोल और फिर लगा कर अर्जुन के पीछे चलती ड्राइंग रूम में आई तोह वह पारवती टेबल साफ़ करती दिखी.

"पापा नहीं आये अभी तक, पारवती?"

"नहीं दीदी, वह बता कर गए है के 9 बजे तक आयंगे." पारवती की बात सुनकर वह मुस्कुराती हुई अर्जुन को सामान उनके कमरे में रखने का बोलकर दरवाजा खोलती अंदर चल दी.

"अर्जुन, पारवती बहार है.", जैसे हे वह अंदर आ कर अलमारी से अपने घर के कपडे निकलने लगी अर्जुन ने पीछे से उनके उभर पकड़ते हुए गाल को चूम लिए. लुंड गांड की दरार पर डाब रहा था.

"बहार है वह. हम अंदर. आप बोलती हो तोह मई चला जाता हु." अर्जुन उनके नरम चुचो से हाथ पीछे करने लगा तोह खुद हे रेणुका ने उसके हाथ वह दबा लिए.

"आपके लिए मई उसके सामने भी कपडे खोल सकती हु फिर यहाँ तोह हम हमारे कमरे में है." अपना सर उचकते हुए अर्जुन के होंठ चूमती वह बुरी तरह लिपट सी गई थी. अर्जुन ने कास के चूमने के बाद उन्हें अलग किआ खुद से.

"सुबह 4 बजे मेरे साथ चलेंगी आप? मेरी एक ऐसी जगह है जहाँ मई आपको ले जाना चाहता हु.", अर्जुन ने बीएड पर बैठते हुए कहा. उसको पता था के ये मुमकिन नै होगा लेकिन उसका दिल था के एक बार वह रेणुका को जरूर वह लेकर चले जहा घाना जंगल था, तालाब से आगे.

"एक बात मानोगे मेरी तोह मई चलूंगी. और जरुरी भी नहीं के मानिये. आपके कहना मतलब मेरी हाँ बस एक इत्छा है मेरी." उनकी बात सुनते हुए अर्जुन ने बैठे हुए हे रेणुका के दोनों हाथ अपने हाथो में थामते हुए प्यार से इशारा किआ बताने का.

"मुझे एक बार में खुल्ले में प्यार करोगे? मैं वो महसूस करना चाहती हु की सिर्फ हम दोनों हो और बस खुला आसमान या जमीन." अर्जुन उनकी आँखों को देखता उठ खड़ा हुआ.

"मई भी वही लेके जाने वाला हु. बस अलार्म लगा लेना अपना और ठीक 4 बजे मई स्कूटर पर बहार मिलूंगा. बता सकती हो घर पे के घूमने गई थी आप अगर थोड़ी देर हुई तोह.", गाल चूमकर वह बहार निकल गया और रेणुका बस मुस्कुराती बाथरूम में चली गई.

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"माँ खाना लगा दो फिर हमने जाना भी है प्रीती के यहाँ.", अलका दीदी ने कुर्सी पर बैठे हे ललिता जी को पुकारते हुए कहा तोह ऋतू दीदी हंसती हुई अलका का उतावलापन देखने लग रही थी.

"आज का क्या प्रोग्राम है वह पर?", प्रियंका दीदी ने शरारत से ये बात कही तोह ऋतू ने हँसते हुए ना में सर हिला दिए. आरती तोह यहाँ भी अर्जुन की दी हुई किताब में खोई हुई थी. अर्जुन को दादा जी ने बताया था के मोटरसाइकिल कल आएगी उनकी बात हो गई थी संजीव भैया से. और फिर जब उनसे फारिग हो कर वह बहार आया खाने की टेबल पर तोह वह सिर्फ कोमल दीदी और तारा हे खाना खा रही थी. माधुरी दीदी आप परोस रही थी. अर्जुन भी कोमल दीदी की बगल में बैठ कर बातें करता खाना खाने लगा.

"दीदी, आप कल मेरी मोटरसाइकिल पर चलेंगी मेरे साथ? मई सबसे पहले आपको बिठाना चाहता हु अपने साथ.", अर्जुन ने ये बात कही तोह कोमल ने अपने छोटे भाई के सर सहलाते हुए ख़ुशी से हाँ कर दी.

"तू सच में मुझे सबसे पहले बिठाना चाहता है?", उन्हें कोई शक नहीं था लेकिन फिर भी उत्सुकता में उन्होंने पूछ लिए

"आप अगर कहोगी तोह मई किसी और को सीट के हाथ भी न लगाने दूंगा. बस मई चाहता हु के आप हे उसको तिलक करो और पहले बैठो.", अर्जुन ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा तोह कोमल को वह वही नजर आया जो उनका दिल चाहता था.

"मतलब तू मुझे नहीं बिठायेगा?", तारा ने ये बात कही तोह कोमल दीदी ने जवाब दिए.

"क्यों नहीं? तेरा पूरा हक़ है और कहने की जरुरत क्या है. सोमवार को ऑफिस यही लेके जायेगा तुझे." उनकी बात पर दोनों मुस्कुरा दिए फिर खाना ख़तम हुआ तोह अर्जुन एक बार ललिता जी की तरफ देख कर बहार वाली बैठक में चला गया. जाने कैसे इशारे थे वह जो बस एक नजर में हे हो जाते थे.

कुछ देर बाद आरती भी उधर आ गई तोह दोनों हे बैठे गोविंदा की कॉमेडी फिल्म देखने लगे थे. रामेश्वर जी के कमरे का दरवाजा ढल गया था टेलीविज़न की आवाज से. इधर कब आरती का सर अर्जुन के कंधे पर टिक गया पता न चला. बस अर्जुन का हाथ भी उसकी गर्दन से होता दूसरे कंधे पर टिक गया था. फिल्म के शोर से ज्यादा तोह आरती की धड़का उसको सुनाई देने लगी थी. नरम उभर भी एक तरफ से छाती पर दबने लगे थे. आरती ने बस एक गहरी नजर सब तरफ डालते हुए धीमे से अर्जुन के गाल पर अपने होंठ टिका दिए. उसका पूरा शरीर कांप रहा था लेकिन वह ये एहसास लेना चाहती थी. अर्जुन ने भी दूसरे हाथ से चेहरा ऊपर करते हुए आरती के होंठो पर होंठ रखते हुए उसकी बिना मांगी मुराद पूरी कर दी. एक पल को वह बस ये महसूस करती रही फिर बिजली की गति सी दरवाजे तक पहुँच गई. लम्बी साँसे लेती वह पलट कर एक बार अर्जुन को देख फिर कोमल दीदी के कमरे में जा घुसी.

"क्या हुआ जो ऐसे हांफ रही है.?", कोमल दीदी ने बिस्टेर ठीक करते हुए आरती को देखते हुए कहा तोह वो बिना कुछ बोले बस मुस्कुराती हुई बिस्टेर पर लेत गई.

"पागल हो गई है ये लड़की. सारा दिन किताब में घुसी रहती है फिर रात को bhaag-daud करती फिरती है.", उसके ऊपर चादर देते हुए वो भी बगल में हे लेट गई.

कोई 10 बजे तक पहली मंजिल शांत हो गई थी. रेखा जी भी अपने कमरे में जा चुकी थी बस ललिता जी पानी की बोतल भर कर कमरे में जाने की तैयारी में थी की अर्जुन वह आ गया. फ्रिज से ठंडी बोतल निकल कर पीते हुए उसने अपनी गदराई हुई ताईजी की तरफ देखा तोह वह उसको हे देख कर मुस्कुरा रही थी.

"मई चलती हु, आराम से आ जाना." और वह एक मादक चाल से चलती कमरे में चली गई. इधर अर्जुन भी पानी पीने के बाद मुँह हाथ धो कर सब तरफ देखने के बाद ताईजी के कमरे का दरवाजा धकेल कर अंदर आ गया. फिर चिटकनी लगते हुए कमरे का जायजा लिए तोह ललिता जी कोने में लगे बिस्टेर के पास कड़ी अपनी साड़ी खोल रही थी.

"तू बैठ यहाँ मई जरा कपडे बदल कर आती हु." पेटीकोट ब्लाउज में में क़ैद उनका वह bhara-bhara शरीर जैसे सितम हे ध रहा था. एक बार फिर से दरवाजा खोल कर बहार से बंद करती वह बाथरूम में चली गई और अर्जुन टीशर्ट उतार कर बिस्टेर पर पसर गया. कोई 10 मिनट के बाद एक पक्के हरे रंग की मैक्सी पहन कर अंदर आई ललिता जी ने फिर से दरवाजा बंद कर दिए और दिवार पर लगे तुबेलिघ्त के बटन को बंद करती जीरो के बल्ब को जलती बिस्टेर के पास आ गई.

"2 मिनट रुक फिर आज तेरी इत्छा भी तोह पूरी करनी है.", गोदरेज की लोहे की अलमारी खोलती वह कुछ निकलने लगी और साथ हे एक छोटी शीशी भी उन्होंने वह से निकल ली. किल्ली से टोलिया उतार कर सिरहाने रख वह बिस्टेर पर आ बैठ तोह अर्जुन भी सीधा बैठ गया.

"ताई जी आप इधर आओ." अर्जुन ने सीधे हे ललिता जी को अपनी गॉड में आने को कहा तोह वह मुस्कुराती सी सरक कर उसकी जांघो पर बैठ गई. गोल मटोल पिछवाड़े के नीचे उसका घोड़े का लुंड महसूस करते हे उनकी छुडास एक पल में हे चर्म पर पहुँच गई थी. अर्जुन ने भी उनको बाहों में भरते हुए hontho-gaalo को चूमना काटना शुरू कर दिए तोह ललिता जी उसका जोश देख कर मजे में उसकी छाती सहलाती हल्का सिसकने लगी थी.

"आराम से कर अर्जुन नहीं तोह फिर ज्यादा देर नहीं चलेगा.", वह जानती थी की ये घोडा आधे पौने घंटे तक उनकी फाड़ेगा फिर भी वह चाहती थी की इतने दिनों बाद मिल रहा है तोह कही जल्दी न खाली हो जाये. इधर वो कपडे के ऊपर से हे उनके मॉटे दूध कास के पकड़ता निप्पल को मुँह में लेता दबा के चूसने लगा तोह ललिता जी बस हवा में हे उड़ने लगी थी. ये दूध अब तक के सबसे बड़े थे जो अर्जुन ने मसले और देखे थे. किसी छोटी फुटबॉल से उनके कलश अपने वजन से थोड़ा लटके थे लेकिन उनमे कसाव गजब का था, इस उम्र में भी.

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"ताईजी, आज मेरे पास इतना समय है के मई फिर से तैयार हो जाऊंगा अगर जल्दी हो भी गया तोह.", जोश में उसने एक निप्पल को दांत में दबाते हुए उनकी गांड के कपाट हाथो से चौड़े करने शुरू किये तोह ललिता जी ने भी गांड को ाचे से उसके लोहे से सख्त लुंड पर रगड़ दिए. कपडे के ऊपर से हे स्पर्श इतना कड़ा और गरम था के छूट में गीलापन आ चूका था. न तोह मैक्सी के नीचे ब्रा थी न हे कच्ची और ऊपर से कपडा बिलकुल बारीक. अर्जुन जाने किस जल्दी में था के जांघो तक चढ़ी उनकी मैक्सी के दोनों सिरे खेंचता उसको उतरने लगा. अगले हे क्षण ललिता जी पूर्ण निर्वस्त्र उसकी गॉड में बैठी थी. जाँघे ाची चर्बी के साथ हे बिलकुल नरम, हलकी उभरी हुई कमर जहा को एक इंच गहरी नाभि और थोड़ा हे ऊपर बड़े पपीते से मॉटे मॉटे सतांन जिनके फूले चने के दाने जैसे निप्पल वासना में सूज चुके थे. अर्जुन ने एक बार दोनों चूचक अंगूठे और एक ऊँगली में दबाते हुए उनके मुलायम होंठ चूसने चालू किये तोह ललिता जी अपनी भारी गांड आगे को ठेलती पाजामे के ऊपर से हे उसका लुंड छूट में लेने की कोशिश करने लगी

"बहोत आग लगी है रे. एक बार कस के पेल दे फिर जो चाहे करता रहिओ.", अपने होंठ अर्जुन से हटते हुन्होने कहा और उसकी गॉड से निकलती बिस्टेर पर बैठ वह अर्जुन का आखिरी वस्त्र उतरती बड़ी कामुकता से इस भयंकर लुंड को घूर रही थी जो पिछली बार से ज्यादा हे मोटा और तगड़ा लग रहा था. इस हलकी रौशनी में भी साफ़ हे नजर आ रहा थे जो इस 6क्ष6 के बीएड पर हो रहा था. लुंड पर उभरी हुई motti-patli नस्से उसकी सख्ती और आकर ाचे से दिखा रही थी. ललिता जी किसी भूखी बिल्ली से उस पर jhapat-ti मुट्ठी में पकड़ हिलने लगी और अर्जुन उनका एक मोटा दूध मुँह में भर चुसकने लगा. अपने दूसरे हाथ से वह अपनी ताईजी की मोटी और थोड़ी खुली छूट में अपनी ऊँगली पेलने लगा तोह ललिता जी से अब ये सेहन करना मुश्किल हो गया.

"एक मिनट रुक तोह जरा. आठ.. अरे सुन.. उम्म्म", छूट पूरी गीली थी जिसमे अर्जुन 2 उँगलियाँ ठेलने लगा तोह ललिता जी सेहन न कर पाई और छूट ने पानी निकल दिए. आज अर्जुन ने उनके दाने को छेड़ दिए था जो पहले कभी नहीं हुआ था. कपडे से अर्जुन की उँगलियाँ साफ़ करती फिर वह अपनी छूट के बहार तक आ चूका पानी भी हटाने लगी. पास में हे राखी वह छोटी शीशी उठा कर उन्होंने दोनों हथेलियों में वह तेल मलते हुए अर्जुन के मूसल को पकड़ लिए. किसी लड़की की कलाई सा मोटा वो डंडा अब ललिता जी के दोनों मुट्ठियों में था. ऊपर से नीचे जड़ तक वह उसकी मालिश करने लगी और अर्जुन दोनों लटकते बूब्स को किसी भैंस के थांन की तरह मसलता खींचता अपने लुंड की मालिश का मजा लेता रहा.

"ताईजी, इस तेल में अलग हे महक आ रही है. आह थोड़ी तीखी और थोड़ी नशीली सी.", ये बिलकुल हे अलग तेल था और अर्जुन की बात सुनती ललिता जी ने हलकी मुस्कान के साथ उसको बताया.

"ये shri-gopal तेल है. वह अपने गांव में वैध जी की बीवी मेरी सहेली है तोह उसने हे इसकी विशेषता बताई थी मुझे और तेरे ताऊजी के लिए दिए. लेकिन उनके तोह मई अब पास न लागु. तोह मैंने ये सिर्फ तेरे हे लिए लिए ये. वो बता रही थी की इसमें इतनी jadi-bootiyan और शक्ति है की ढीले अंग को भी मजबूत और तगड़ा कर देता है. साथ हे समय भी बढ़ा देता है." आखिरी लाइन बोलती वह नजरे नीची कर थोड़ी शर्मा गई थी.

"आपका समय काम लगता है? चलो आज के बाद नहीं लगेगा." अर्जुन ने अब फुर्ती से उनको अपने नीचे palat-te हुए दोनों भारी और मोती टाँगे चौडाते हुए लुंड छूट के ऊपर टिका दिए. ताईजी भी गज़ब की लचीली थी. शरीर भारी था लेकिन मक्कन सा नरम और रबर की तरह मुड़ने वाला. फूले सुपडे को उनकी थोड़ी खुल चुकी छूट पर दबाते हुए अर्जुन ने अपना तेल से चिकना लुंड जोर से अंदर तेल दिए. सरसराते हुए वह एक हे धक्के में 5 इंच अंदर बैठ गया छूट के होंठ फैलता हुआ.

"आठ.. मेरी छूट तड़प रही थी रे इसके लिए.. आठ.. अब तोह ये निगोड़ा और भी मोटा हो गया है.. आह..", छूट अंदर से गीली थी और लुंड चिकना तोह ललिता जी इस मॉटे लुंड का पहला झटका सेहन कर गई, कमर एक पल के लिए अकड़ गई थी फिर अर्जुन ने अगले हे धक्के में रही सही कसार पूरी करते हुए अपने भारी अंडकोष उनकी गांड से भिड़ा दिए.

"मर्डर गई रे.. मेरी माँ. सांस लेने देता जरा.. आह.. इतना तोह उस दिन भी नहीं दर्द हुआ था." छूट में भयंकर पीड़ा हुई और ललिता जी को महसूस हुआ के जैसे इस बार लुंड ने उनकी बच्चेदानी हे जैसे पीछे धकेल दी हो. मोटा सूपड़ा कही फंस सा गया था पूरी गहराई में. अर्जुन को ये कसाव किसी नादान छूट जैसा महसूस हुआ. उनके बड़े तरबूज से कूल्हे ऊपर उठे थे बिस्टेर पर से और अर्जुन दोनों मोटी जांघो के बहार से अपनी लम्बी भुजाये निकले ललिता जी के बहार की तरफ लुढ़कते दूध हाथो में पकड़ते हुए अब उनकी गहरी छूट से आधा लुंड बहार खींचता अंदर पेलने लगा..

"आह ताईजी आपकी ये तोह बड़ी गरम और चिकनी है." लुंड 2 मिनट बाद हे उस लचीली छूट में फँसलने लगा तोह दोनों की सिसकियाँ निकलने लगी. हर धाखे पे उनके पानी से भरे बड़े गुब्बारे जैस कूल्हे थिरकने लगते जो अर्जुन को उत्साह को और बढ़ा देते. छूट तोह अब खुद हे लुंड को pakadti-chodti हर धक्के के साथ और गीली हो रही थी.

"उम्.. सच में घोडा है रे तू. आह बीटा छोड़ तेरी ताई को और फाड़ दे इस निगोड़ी छूट को.. आह्हः.. इस सकूं के लिए कब से तड़प रही थी.. उम्म्म", अर्जुन को खींचती वह दोनों हाथो में उसके चेहरा पकड़ पागलो सी बस चूमने लगी थी. इधर अर्जुन उनकी naram-mulayam गांड की दरार को गैलाते हुए दोनों उँगलियों से छोटा नरम छेड़ कुरेद रहा था. ललिता जी ने अंदर आने से पहले बाथरूम में हे अपना ये छोटा छेड़ चिकना कर लिए था जिसमे अब अर्जुन अपनी ऊँगली धसता अपना सख्त लुंड छूट में जड़ तक थोक रहा था. छूट में एक तेज संकुचन हुआ तोह ताईजी की टाँगे हवा में फैली हुई हे अकड़ने लगी..

"मई गई रे.. आह.. मुझे पकड़ ले.. उम्म्म.. " उनके चरम को अर्जुन ने भी महसूस कर लिए था तोह वह लुंड को छूट में फंसाये हे उनकी दोनों जाँघे थामे रुक गया. छूट का पानी थोड़ा बहार निकलता फैली हुई गांड की दरार की तरफ जा रहा था और ललिता जी आँखें मूंदे अपने इस चरमसुख को संभल रही थी.

"तू इस मूसल को बहार निकाल जरा.", अर्जुन ने 20 मिनट में हे अपनी ताईजी को 2 बार झाड़ दिए था और अभी भी उसका दैत्याकार लुंड अकड़े खड़ा था. पहले से और भयंकर, चुतरस में भीगा वो साढ़े 8 इंच का डंडा खतरनाक दिख रहा था लेकिन ललिता जी ने मुस्कुरा कर उसको देखा और फिर एक छोटा सा पैकेट खोलती वो लुंड के सामने झुकी.

"ये क्या कर रही है आप?", मस्ती नाम की उस डब्बी पर कला घोडा छापा था जिसमे से उसकी ताईजी ने वह सिल्वर पैकेट निकल कर एक गुलाबी निरोध बहार निकाल कर अब उसके मॉटे सुपडे पर चढ़ाना शुरू किआ था.

"ये जरुरी है पहली बार पीछे करने के लिए.", वो खुद हैरान थी की निरोध तोह पूरा चौड़ा हो गया था सुपडे पर चढ़ाते हुए और फिर लुंड की जड़ से 2 इंच पहले हे वह आगे नहीं गया. उसके आकर को देखती वह मुस्कुरा कर घोड़ी बन गई. पेट के नीचे 3 तकिये लगाए ललिता जी ने दोनों हाथ बिस्टेर से जुडी दिवार पर टिका कर अर्जुन को देखा जो उनके विशालकाय कूल्हों में हे खोया अपने लुंड पर चढ़े निरोध को मसल रहा था.

"वो सफ़ेद तुबे से क्रीम निकल कर एक ऊँगली से गांड का चला नरम कर. और जब 2 उंगलिया अंदर होने लगे तोह एक बार बताते हुए अपना काम शुरू कर डीओ.", सबके सामने घूंघट में रहने वाली ललिता जी तोह इस बंद कमरे में अर्जुन की गुरु बानी हुई थी. और वह भी उनके कहे अनुसार तुबे से एक पारदर्शी सी क्रीम को निकलने लगा.

"ताईजी ये क्रीम भी अलग है. जैसे gond-katira पानी में भीगने के बाद दीखता है वैसे सी.", अपनी पहली ऊँगली के पूरे पर उसको लगते हुए अर्जुन ने सीधे हाथ की वह ऊँगली उलटे हाथ से गांड को खोलते हुए पहले से चिकने छेड़ पर आराम से फिराई और चले के किनारे घूमते हुए लगाने लगा..

"हाँ.. आह.. ये तेरे बाप ने हे दी थी इन्हे.. आह कोई डॉक्टर जेली है.. उम् जो पिछवाड़ा खोलने में तेल से कही ज्यादा कारगर और सुरक्षित है.", अर्जुन की दूसरी ऊँगली भी गांड के छेड़ में महसूस करती वो किसी लुंड सा हे मजा लेने लगी थी. अर्जुन को उनके हिलते पिछवाड़े बड़े मस्त लग रहे थे और अनजाने में हे उसने हलके से अपना पंजा उनके बाए कूल्हे पर मारा तोह पूरा नितम्भ मुलायम रबर सा थरथराता सा हिल गया.

"आह रे.. क्या कर रहा है तू.", उन्हें भी ये स्पर्श मजेदार लगा था लेकिन अर्जुन से मुस्कुराते हुए उन्होंने वजह पूछी तोह वह उनकी गांड के पीछे लुंड लगता बस मुस्कुरा दिए.

"तुझे पसंद है क्या मेरे बड़े कूल्हे?"

"ताईजी ये इतने गद्देदार और मॉटे है की इनको कपडे के ऊपर से देखने पर हे मेरा ये खड़ा हो जाता है. और जब ये नंगे हिलते है तोह दिल करता है इन को प्यार से सहलाता हुआ थपथपाता राहु.", दोनों कूल्हों को फैलता वो जब अपने मॉटे सुपडे को अंदर धंसने लगा तोह सूपड़ा नीचे सरकने लगा.

"तेरे है हक़ है इनपे. जब दिल करे बिना बोले जो मर्जी कर लिए कर, बस अकेले में.", नीचे से अपना हाथ लुंड पर करती वह सुपडे को गांड के सही छेड़ पर टिकती बोली और इधर अर्जुन ने अब उस khulte-band होते छोटे छेड़ को भांप लिए था.

"ताईजी.. संभालना खुद को.", इतना बोलकर थोड़े दबाव से अर्जुन ने सुपडे को अंदर किआ तोह वह एक बार उसको थोड़ा सो खोल कर रुक गया. चिकनाई पर्याप्त थी लेकिन ये माध्यम आकर के आलू सा सूपड़ा कुछ ज्यादा हे मोटा था. ललिता जी को पता चल गया था के अब उनकी फटने वाली है और इतना सोचते हे सांस रूकती महसूस हुई और दर्द से उन्होंने जबड़े कस लिए.

"eeeeeeeeeee...mmm", कछह से मोटा सूपड़ा अंदर पहुंच कर चले में कस गया था और ललिता जी गांड में जैसे मिर्ची भर गई thi.Arjun को भी इतने कसाव की उम्मीद न थी. लेकिन किताब की कही बात मानते हुए वह उतना हे डाले अब उनकी गांड को दबाने मसलने लगा. 2-3 हलके थप्पड़ उन नरम मांस के गोलों पर पड़ते हे ललिता जी ने अपनी गांड का चला ढीला छोड़ दिए जो दर्द की वजह से उन्होंने कास लिए था और ऐसा करते हे आधा लुंड फंसलटा हुआ उस गरम और अंदर से हलकी खुली अंधेर गुफा में फिसलता चला गया.

"बस ताईजी अब कसना मैट.. हो गया जो होना था." अर्जुन ने तोह इतना बोल दिए लेकिन ललिता जी की तोह आँखों में आंसू आ चुके थे जो वो दिवार की तरफ मुँह किये चुपचाप बहती रही. ाचा था के निरोध के साथ किआ तोह लुंड चिकनाई से अंदर गया. पीछे से उनके दोनों लटकते दूध पकड़ कर अर्जुन ने 1-2 इंच लुंड हलके से अंदर करना शुरू किआ तोह कुछ देर तक ताईजी को दर्द होता रहा लेकिन अब ये दर्द भी मजा देने लगा जब अर्जुन के एक हाथ ने उनकी छूट के छेड़ को रगड़ना शुरू किआ था.

"आठ. ताईजी ये कितनी कासी हुई है. मजा आ रहा है यहाँ करने में." अर्जुन अब एक नए हे अवतार में था. अपनी ताई के कूल्हों पर हलकी चपत लगता वह तगड़े धक्के मरता गांड के छेड़ को चौड़ा करता आहें भरते हुआ पाना पूरा डंडा बस सुपडे तक रोक कर उन्हें पेलने में लगा था. अर्जुन के हाथो का मरदाना प्रहार भी ललिता की छुडास और बढ़ने का काम कर रहा था. कोई 10 मिनट तक ाचे से गांड छोड़ने के बाद वो एक पल के लिए रुका तोह ललिता जी ने उसका लुंड पकड़ कर बहार खींच लिए.

"आह मर्डर गई रे. कितना मोटा है ये." सीढ़ी होती वह अपनी गांड के खुले छेड़ पर हाथ लगाती हुई अर्जुन को पीठ के बल करती लुंड पे चढ़ा निरोध उतरने लगी. अर्जुन बस चुपचाप ये हरकत देख रहा था. फिर से थोड़ा तेल लुंड पर चुपड़ के वह अपने भरी नितम्भ उठती खुद हे उसके ऊपर झुकती चली गई. चिकना लुंड फिर से गांड के छेड़ पर चिपका और अगले हे पल वो सिसकारती सी उसपे बैठ गई. उसका भीषण लुंड इस एक हे दबाव में गहराई में उतर गया.

"ये बहार निकलता भी दर्द देता है और अंदर जाता भी." कराहती हुई वह उसके ऊपर बैठी धीमे धीमे गांड चलती अर्जुन की छातियों की मालिश करने लगी और अर्जुन भी उनके झूलते चुंचो को बेदर्दी से मसलने लगा था. थोड़ी हे देर में वह पूरी गांड उछलने लगी थी, छूट तोह अर्जुन के जिस्म पर घिसती सी कॉमर्स छोड़ रही थी.

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"ताई जी." इतना बोलकर अर्जुन ने दोनों कूल्हे नीचे से हे पकड़ते हुए फैला दिए और अब जड़ तक उनकी गांड में वह लुंड ठोकने लगा. इस आसान और गांड को फ़ैलाने से पहली बार वह इतनी गहराई में जा रहा था. और ये तीसरी बार ललिता जी झड़ती हुई उसके जिस्म पर गिरी तोह ताबड़तोड़ धक्के लगता वह पूरे जोश में गांड को फाड़ने हे लगा था. सूपड़ा अंदर इतना फूल चूका थी की अब गांड चीरने से लगी लेकिन अगले हे पल जैसे गरम लावा उनकी गहरी सुरंग को भरने लगा और वह तेज सिसकारती सी अपने नाख़ून अर्जुन के सीने पर धंसने लगी. किसी घोड़े सा हिनहिनाता अर्जुन तक़रीबन 1 मिनट तक उनकी गांड में अपना रास भरता रहा.

"मार हे डाला रे तूने तोह. वो बिना उठने का उपक्रम किये वैसे हे लेती इस अध्भुत एहसास को जीने में लगी थी. अर्जुन भी हौले हौले उनके कूल्हे सेहला रहा था. लुंड अब भी उस तंग सुरंग में धंसा पड़ा था.

"ताईजी ये तोह सच में अध्भुत था और आपका ये छेड़ सच में कमाल का है." एक निप्पल को उमेठते हुए उसने कहा तोह वो सिसकती सी बोली.

"मजा तोह मुझे भी बहोत आया. गांड होती है न ये छूट से भी गहरी होती है बस इसका छेड़ लचीला नहीं होता और न ये खुद कोई रस छोड़ती है. हफ्ते में 2-3 बार अगर इसको खोलेगा फिर हे मजा आएगा. तेरे ताऊ का तोह तेरे से आधा हे है तोह छूट पहले बेशक शांत हो जाती थी लेकिन गांड की गहराई तोह सच में तेरे जैसा लुंड से हे मापी जा सकती है. बस अब ज्यादा इन्तजार मत कराइयों.", एक बार उसका गाल चूमती वह गांड उठाने लगी तोह एक दर्द भरी आह निकल गई जैसे हे वह मोटा सूपड़ा बहार को निकला. पेट के बल वह नंगी हे गिर गई बिस्टेर पर.

"आप ठीक है न?", तोलिये से अपना लुंड साफ़ करता वह उनकी पीठ पर हाथ फेरता बोलै तोह ललिता जी 'हम्म्म' की आवाज करती पसरी रही.

"ाचा अब तू जा और दरवाजा ढालता जैव. मई थोड़ी देर तक कर लंग सब साफ़.", उन्होंने हिम्मत करके इतना हे कहा था के अर्जुन ने निरोध को कागज में दाल दिए, तेल और तुबे को अलमारी में रखता वह ललिता जी को सीधा करने के बाद उनकी मैक्सी पहना कर उनके गाल चूमता बोलै.

"कपडे उतरने वाले को हे वापिस ढकने चाहिए. और आप बस आराम करो अब मई चलता हु.", उसकी इतनी परवाह देख ललिता जी ने प्यार से उसको गले लगा लिए.

"तभी तोह मैं तेरी दीवानी हो गई हु रे. तेरे जैसा घोडा हे संभल सकता है ऐसी भैंस को." दर्द की परवाह करती वह हंसी तोह अर्जुन भी जाते हुए उनके दुखते निप्पल को मसलता बहार निकल गया.

'शैतान है पूरा. आज तोह पिछवाड़ा भी सुजा गया. हाय लेकिन बस इसको हे पता है के औरत संतुष्ट कैसे होती है. माजी भी न, इसका ये बिलांत भर कर खूंटा एक फुट का करके मानेंगी. आह.. ाचा हे है.. फाड़ेगा तोह मजा भी देगा.' खुद से बातें करती वह टाँगे फैलाये उलटी होकर बिस्टेर पर गिर गई. गांड के छेड़ से अभी तक उसका वीर्य रिसने लग रहा था. इधर अर्जुन बहार आँगन में आने के बाद बाथरूम में चल दिए नहाने और इधर रेखा जी के कमरे का दरवाजा खुला तोह वह एक बार सब तरफ देखती सी कुछ समय बाद रसोईघर में पानी पीने में लगी थी. इधर वह बहार निकली और उधर अर्जुन हलके भीगे जिस्म पर सिर्फ पजामा पहने बहार निकला.

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(रेखा जी का सौंदर्य)

"आप सोइ नहीं अभी?", अर्जुन अंदर से जरूर सेहम गया था लेकिन आवाज संयत थी उसकी अपनी माँ को कुछ कदम दूर देख कर.

"नहीं थोड़ा सर दुःख रहा था तोह अभी दवा खाई है. लेकिन तू इस समय यहाँ नाहा रहा है.?", उन्होंने भी अर्जुन से सवाल किआ जिसका जवाब उसके तेज दिमाग में पहले से हे था.

"वो तारा के कमरे में है न बाथरूम अब. वह जाना ठीक नहीं लगा था इतनी रात को तोह नीचे आ गया. आपकी तबियत ख़राब क्यों हो गई." वो चलता हुआ अपनी माँ के पास आया और स्नेहवश उनका माथा छु कर देखने लगा.

"आप चलो मेरे साथ." अपनी माँ का हाथ पकड़ के वह उनके कमरे में आ गया और उन्हें बिस्टेर पर बिठाते हुए दर्ज से जैतून के तेल की शीशी निकल कर पाँव अपने पत् पर रखता हलके हाथो से मालिश करने लग गया.

"आपको ब्लड प्रेशर की शिकायत कबसे हो गई माँ?", रेखा जी तोह अपने बेटे के इस सटीक अनुमान से थोड़ी हैरान हो गई थी. हैरान तोह वह इस बात से भी थी कैसे वो उन्हें अंदर ले आया था और बिना कुछ कहे बिस्टेर पर तक लगवाते उनके पाँव पर मालिश करने लगा था.

"अभी 7-8 दिन से बस कभी जी घबराने लग जाता है जब अकेली होती हु. लेकिन तुझे कैसे पता लगा के मुझे रक्तचाप (blood-pressure) हो गया है? मैंने तोह अभी डॉक्टर को दिखाया भी नहीं.", उनके पाँव इतने खूबसूरत थे की अर्जुन ना चाहते हुए भी अपने हाथो से उनके तलवे मसलता उनके खूबसूरत और माँ से पंजे को देख रहा था.

"वो आपका माथा ठंडा था और कान के पास हल्का पसीना था न. मैंने लाइब्रेरी में एक किताब में पढ़ा था थोड़ा इसके बारे में. आप चाहो तोह मुझे अपनी परेशानी बता सकती है माँ. बिना परेशानी के तोह शरीर बीमार नहीं पड़ता और आप जैसी स्वस्थ महिला को blood-pressure होना तोह सिर्फ मानसिक तनाव की वजह से मुमकिन है. मई आपके लिए कुछ भी कर सकता हु, माँ लेकिन आपको ऐसे नहीं देख सकता." अर्जुन का दिल एकदम से उनके शरीर को भूल कर अब अपनी माँ की हालत से जुड़ गया था. उसको एक चिंता सी महसूस हुई और इधर रेखा जी अपने बेटे को क्या जवाब देती और कैसे बताती वह वजह जो कोई भी माँ एक बेटे को नहीं बता सकती. ध्यान से उसकी बात sun-ne के बाद उन्होंने बस आँखें बंद कर ली. हलकी सफ़ेद रौशनी में अर्जुन अब उनके चेहरे को देख रहा था. काले लम्बे bal-khaate बाल, बादाम के अकार में गोरा और खूबसूरत चेहरा, बड़ी पलके और दुनिया के सबसे दिलकश होंठ लेकिन उस चेहरे पर जहां उदासी. दोनों पाँव के तलवे ाचे से मसलने के बाद वह चुपचपा बहार निकल गया तोह रेखा जी का दिल कांप गया. मैं में हजारो विचार उमड़ने लगे की कही अर्जुन बुरा मान गया होगा, नाराज भी होना हक़ है उसका अपनी माँ को ऐसी हाल में देख कर, बता भी नहीं सकती मई इसको.... अभी वह ये सब सोचती परेशां हो रही थी की अर्जुन हाथ में कपडा लिए अंदर आया. वो हाथ धोने गया था और फिर एक साफ़ अंगोछा लेकर उनकी कमर के पास आ बैठा.

"आप बस परेशां मत हो माँ. जानता हु के शायद वह बात आप एक बेटे से नहीं कर सकती. और मुझे भी कोई दुःख नहीं इस बात का. लेकिन अपने बेटे के लिए बस खुश रहने की कोशिश तोह कर सकती है आप.? और आज मई यही सोऊंगा आपके पास.", उनके चेहरे को ाचे से साफ़ करने के बाद अर्जुन ने अपनी माँ कानो से दोनों लम्बी बालियान निकाल कर बीएड की दर्ज में रख दी. रेखा जी सब बड़े ध्यान से देख रही थी और चेहरे पे बेशक मुस्कान न थी लेकिन अब उनकी आँखें कुछ शांत थी. अर्जुन के कपडे लगभग हर कमरे में हे पड़े रहते थे और यहाँ भी टेबल पर उसके आज के धुले कपडे रखे थे जहा से उसने आधी ब्याह की बनियान अपने नंगे सीने पर पहनी और फिर जीरो का बल्ब बंद करते हुए अपनी माँ की कमर पर हलके से हाथ रखते हुए उनके साथ लेट गया.

"आप यहाँ पर भी अपना सर रख सकती है. ाचा महसूस होगा क्योंकि शरीर में ठंडक है अभी.", अपनी ब्याह उनके सर के नीचे करता वह अँधेरे में बोलै तोह रेखा जी बस खिसकती सी अपने बेटे की मजबूत ब्याह पर बाल रखती उसके सीने से लगी लेती तोह अर्जुन ने दूसरे हाथ से दोनों पर चादर दाल ली. कुछ देर बाद दृश्य विपरीत था. अर्जुन तोह अपनी माँ के आगोश में 5 मिनट में हे सो गया था जो दुनिया की सबसे आरामदायक जगह थी लेकिन उसकी माँ ने अब बेटे को छाती से चिपका लिए था और बस वह सोचती सी कुछ फिर थोड़ा मुस्कुराई और ऐसे हे उसका सर सहलाती सो गई. रात का एक बज चूका था.

अर्जुन भूल गया था माधुरी दीदी को अपनी माँ के सामने लेकिन यहाँ भी भगवन ने उसकी मदद हे की थी. प्रियंका दीदी भी ऊपर चली गई थी जहाँ तारा काम करने में व्यस्त थी और माधुरी दीदी संजीव भाइये के बिस्टेर पर लेती थी. प्रियंका ने भी बस उन्ही के पास सोने का निर्णय लिए और दोनों बड़ी बहने khatti-meethi बातें करती 11 बजे हे गहरी नींद में सो चुकी थी. और एक बजे अर्जुन भी अपनी माँ के आगोश में बचे सा चिपका था, सुकून से.
 
अपडेट 49

Ghar-Sansar


कोई 3 बजे के आसपास रेखा जी की नींद टूट गई, बहार बारिश की बूंदो के शोर से. आँगन में प्लास्टिक का टब रखा था जिसपर गिरती बुँदे खलल पैदा करने लगी थी. वह अर्जुन को एक बार सेहला के सही से उसका सर बिस्टेर पर रखती उठी और बिना हे लाइट जगाये आँगन में आ गई.

'बारिश भी जाने इस बार कौनसे मौसम में होने लगी है.? ऊपर से इतनी रात में ये शोर. ऋतू को बोलै भी था के टब गलियारे में रखने के लेकिन या लड़की भी न..' मैं में ये सब बोलती वह भीगती हुई आँगन में रखे सामान और चारपाई को सही जगह रखने लगी. अभी बारिश माध्यम गति से हो रही थी लेकिन धीमी भी नहीं थी की शरीर को पता हे न चले.

उनका लाल गाउन, जो अँधेरे में रंग तोह नहीं बता प् रहा था, वो आधा गीले हो चूका था. लेकिन 5-6 मिनट में हे उन्होंने सब सही कर दिए और फिर कमरे के अंदर चली आई. दरवाजा बंद करने के बाद अब बारिश की आवाज भी उतनी नहीं सुनाई दे रही थी और वह तेज प्लास्टिक पर गिरती बूंदो की thak-thak अब ख़तम हो चुकी थी. जीरो का बल्ब जगा कर रेखा ने अपना ये लाल रंग का गाउन पीछे से चैन खोलते हुए उतरा तोह हुस्न बेपर्दा हो गया. अर्जुन उनकी तरफ पीठ किये सो रहा था तोह एक बार उसका शांत चेहरा देख वह हल्का सा मुस्कुराती हुई अपनी अलमारी से एक सफ़ेद कॉटन का गाउन निकल कर पहन ने लगी. पुराने वाले से हे अपने हलके भीगे बाल और चेहरा साफ़ करने के बाद उसको दरवाजे के पीछे हे टांग दिए. शरीर पर हलके रोयें खड़े हो गए थे ऐसे एकदम ठन्डे माहौल में जाने से. बेटे के साथ ाची नींद आ रही थी लेकिन 2 घंटे में हे वह उचट गई थी.

फिर से बल्ब को बंद करने के बाद वह संभालती सी अर्जुन के बराबर आ लेती और सावधानी से उसका सर अपनी छाती से लगाती दूसरे हाथ से उसका सर सेहला कर सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन हैरत से रेखा का दिमाग सुन्न हो गया था. इस सब में वो भूल गई थी की ये सफ़ेद गाउन के सामने की तरफ हक्क लगे थे चैन नहीं. और बिना उन्हें बंद किये जब वह बिस्टेर पर झुकती अर्जुन के साथ लेती थी तोह उनका एक उभर निप्पल समेत बहार निकल आया था. पता तब लगा जब नींद में हे अर्जुन ने वह अपने मुँह में भर लिए और चूसना शुरू कर दिए था. बहार से आती हलकी रौशनी में देखने की कोशिश सी करती रेखा को बस इतना दिखा के वह तोह आँखें बंद किये पहले की तरह हे नींद में है. न हे अर्जुन ने उनको जकड़ा था और न हे कही और हाथ लगाया था. बस वह तोह अपने होंठो पर आ लगे इस निप्पल को मुँह में भर के नींद में हे पीने में लगा था.

'पी ले बीटा यही सोच लुंगी की जब तू आखिरी बार मेरे साथ सोया था तब भी पीटा था और आज भी वही पर है.' अपने मैं को शांत करती वह संभल गई और ऐसे हे अर्जुन के चेहरे को देखती रही. अर्जुन के हल्का जोर से निप्पल को खींचने से उन्हें दर्द हुआ और ऐसा लगा जैसे कोई बारीक सा कांटा उनके निप्पल से बहार निकल गया हो. और उभारो में अगली हरकत महसूस करते हे वह एक बार फिर घबरा गई. 12 साल के बाद भी उसके सतांन सूखे नहीं थे बस जिस दवा को 3-4 साल तक रेखा ने अपने निप्पल पर लगा लगा के दूध को बंद किआ था वह अर्जुन ने वापिस निकल दी थी.

अर्जुन के मुँह में वह garam-meetha दूध जाने लगा तोह स्वयं हे उसका दूसरा हाथ ऊपर वाले सतांन को ढूंढ़ने लगा. उसके हाथ की इस हरकत पर मंद मंद मुस्कुराती रेखा ने बेटे का वही रूप देखा तोह दूसरा दूध भी आजाद करती उसके हाथ में थमा दिए. उँगलियों से धीरे धीरे दूसरे निप्पल को वह खींचता बचे की तरह हे लगा रहा फिर खुद हे निप्पल मुँह से निकल कर माँ की छाती से लगा शांत हो गया.

'मेरा बचा.' ऐसे हे रेखा अपने बेटे का सर जाने कितनी देर सेहलती अपने से लगाए अतीत को याद करती रही. पूरे 3 साल का होने के बाद भी वह अपनी माँ को जब अकेला देखता था तोह चुकी के चिपक जाता था. ललिता जी भी कहती थी की रेखा इसकी शादी भी हो जाएगी तोह भी तेरी हे छाती से चिपका रहेगा ये. फिर कैसे अपने पति के गुस्सा करने पर भी वह चुपके चुपके उसको दिन में 2-3 बार दूध पीला हे देती थी. 5 साल का वह हुआ था तोह उसकी सास ने हे कहा था के डॉक्टर को दिखा के इसका दूध बंद करवा दो नहीं तोह वह बछड़ा इस गायें से हमेशा लगा रहेगा. कितनी दवा ली थी लेकिन ये दूध कभी बंद हे नहीं होता था. फिर खुद माजी ने 36 महीने तक "ोठली" और "कुज्जी" से बनाई देसी दवा दी थी रेखा को जिस से चुचुक के छिद्र बंद हुए थे. हर समय ये दुखते रहते थे और वह साड़ी रात अपने बेटे को याद करती रहती थी. न वह अगले 9 साल आया न इनका दर्द काम हुआ. उनके पति भी तोह सिर्फ इन्हे थामते हे थे, कभी मुँह नहीं लगते थे क्योंकि उन्हें तोह ऐसे निप्पल पसंद हे न थे. वैसे भी वह रेखा के साथ हमबिस्तर भी कहा कितना होते थे, महीने में 2-3 बार और कभी 2 महीने में 3-4 बार. ये सब सोचती सोचती वह नींद में चली गई और फिर 5 बजे अपनी जेठानी के दरवाजा खटकने की आवाज से हे जाएगी.

"रेखा, बारिश तेज हो रही है. तू बाथरूम से फारिग हो जा मई चाय बना के लाती हु तेरे कमरे में." ललिता जी ने इतना कहा और इधर हमेशा चेतना में रहने वाला अर्जुन दुनिया भुला के बस अपनी माँ के दूध से होंठ चिपकाये सोया पड़ा रहा.

"आई दीदी. 2 मिनट.", बहोत हलके से उन्होंने कहा लेकिन शायद ललिता जी ने सुन लिए था. अर्जुन के गर्दन तक चादर दाल कर वह उठ कड़ी हुई. जीरो के प्रकाश में अपने हुलिए पर नजर डाली तोह शर्म और मुस्कान चेहरे पर आ गई थी. ऊपर का हिस्सा बिलकुल निर्वस्त्र था और दोनों पर्वत बहार चिपकते हुए निकले पड़े थे. बाईं तरफ वाला तोह अभी भी हल्का गीला था.

'दूसरे वाला कल पी लिओ. आज एक हे सही.' फिर कपडे लेती वह बाथरूम में घुस गई. सवा पांच बजे ललिता जी जब कमरे में आई तोह देखा के अर्जुन गहरी नींद में अपनी माँ के बिस्टेर पर सोया पड़ा था. गोल टेबल के साथ लगी 2 कुर्सियों में से एक पर वह बैठ कर वो उस लड़के और कमरे को बस देखती रही इधर रेखा जी भी नाहा धो कर साड़ी में अब अंदर आ चुकी थी.

"ये तेरे साथ सोया था?", ललिता जी की नजर अभी भी अर्जुन पर हे थी.

"हाँ. रात तबियत ठीक नहीं थी दीदी मेरी, तोह दवा के साथ पानी लेने फ्रिज की तरफ गई तोह फिर अर्जुन ने देख लिए था. रात तलवे की मालिश करने के बाद फिर मेरे साथ हे सो गया था. 3 बजे उठी थी बारिश की आवाज से फिर वापिस tub,balti और चारपाई गलियारे में रख के आ कर लेत गई थी." वो भी एक निगाह अपने इस छोटे से बचे पर डालती चाय का कप उठती अपनी जेठानी से बतियाने लगी.

"इतना बड़ा घोडा हो गया है और देख ले माँ के साथ सोया पड़ा है.", बात तोह उनकी ये मजाक में हे निकली थी लेकिन रेखा जी की आँख में दो बूंदे आ गई थी.

"अरे पागल. मेरी बात पर तू रोने क्यों लगी? मैं तोह वैसे हे मजाक कर रही थी." ललिता जी ने कप टेबल पर रखते कहा

"नहीं दीदी आपकी बात कभी बुरी नहीं लगती. मैं तोह बस ये याद कर रही थी की मेरा बचा कितना छोटा सा था जब मुझ से अलग कर दिए था इसको. ये कभी अपनी माँ से अलग न रहा था और फिर 10 साल बाद ये मेरे सीने से लग कर सोया है.", ललिता जी भी एक माँ थी और वह ाचे से समझ सकती थी रेखा का दर्द. माहौल को ठीक करने के हिसाब से वह chir-parichit अंदाज में बोल पड़ी.

"फिर तोह मुन्ना को चुकी लगवाई होगी इस ख़ुशी में.? या कही कुछ और तोह न कर दिए इसने, पूरा घोडा हो गया तेरा ये मुन्ना?", रेखा के तोह गाल हे लाल हो गए थे ललिता जी की बात पर. फिर शर्माती सी वह बोली तोह अब उनकी जेठानी की आँखें चौड़ी हो गई थी बात सुनकर.

"वो मेरे फिर से दूध उतरना शुरू हो गया है." रेखा जी ने तोह नजर झुका ली लेकिन ललिता जी तोह भौचक्की सी रह गई.

"तूने इसको पिलाई या इसने पी?", बस इतना हे बोल पाई वह लेकिन रेखा जी ने साड़ी बात विस्तार से बताई तोह ललिता जी के चेहरे पर चमक आ गई.

"देख ले आज ऊपर से दूध निकल दिए इसने एक रात में. और जितना ध्यान से इसको मैंने देखा है न ये तेरे और कही से भी निकल देगा." अपनी बात पर वह हंसी तोह रेखा जी को समझ आया के ये क्या बोल गई है. वो झूठा सा नखरा करती ट्रे उठती हुई बोली

"ऐसा कुछ नहीं है दीदी. बचा है वह और आपने ऐसा क्या देख लिए जो मुझे मेरे बेटे में न दिखा?", वो कड़ी हो चुकी थी तोह ललिता जी भी साथ हे उठती हुई बोली.

"बचे पैदा करने लायक हो चूका है वह. शरीर से हे नहीं हर तरफ से घोडा हो चूका है. बेशक तुझे मेरी बात बुरी लगे रेखा, लेकिन एक तेरे जैसी भरपूर औरत को ऐसा हे जंगली घोडा पास्ट कर सकता है. जिसके बस एक बार तेरे थांन मुँह में भरने से दूध बहार आ गया हो. और तू खुद हे सोच के तुम दोनों में कितना प्यार है के शरीर को भी एहसास है के इसका मालिक कोण है. कोमल की बारी में तेरा दूध भी सही से न उतरा था तोह मई पीला देती थी और ऋतू ने तोह पीया हे 6 महीने और फिर बंद. लेकिन इसके अंदर सिर्फ तेरा खून और दूध अभी तक हिलोरे ले रहा." रेखा को वही सोचती छोड़ कर ललिता जी बहार चली आई. बेशक वह पहले मजाक कर रही थी लेकिन उनका हर शब्द तीर सा लगा था रेखा के दिल पर. और जरा भी झूठ नहीं थी उनकी बात. अर्जुन जब बचपन में दूध पीटा था तोह कई बार उनका स्खलन सिर्फ उसके दूध पीने और निप्पल खींचने भर से हो जाता था.

शर्माती सकुचाती सी वह रसोईघर में आ गई जहाँ उनकी जेठानी दूध डलवाने के लिए बड़ा पतीला धो रही थी.

"ललिता, बरता दे जरा बहार साधु खड़ा है बारिश में.", कौशल्या जी अंदर आती बोली तोह रेखा और ललिता दोनों ने पहले उनका आशीर्वाद लिए फिर कौशल्या जी बर्तन लेकर बहार चल दी. आँगन में हे साधु सिंह खड़ा पंडित जी से बतला रहा था.

"नमस्कार माजी." कौशल्या जी को देखते हे उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए नजरे नीची कर ली थी.

"साधू, तू बरसात में भी नियम का पक्का है. ग्रहण वाले दिन छोड़कर तोह आज तक देरी नहीं की तूने कभी." पतीला सामने रखती कौशल्या जी कड़ी होती उसकी प्रशंशा करे लगी और वह बड़े कनस्तर से इस 5 किलो के बर्तन को भरने लगा जिसपर एक बड़ी चलनी पहले हे राखी थी.

"पंडित जी से सीखा है माता जी समय की कदर करना. नहीं तोह baap-dada के राज में थे तोह खेत जाने की सुध भी नहीं रहती थी." वैसे हे आराम से वो दूध डालता बोलै तोह दाढ़ी बनाते पंडित जी मुस्कुरा उठे.

"अरे समझदार था तभी तोह मान गया था एक थप्पड़ में. नहीं तोह लोग तोह कतल करके भी नहीं सुधरते.", पंडित जी की इस बात पर ये जनाब हंस भर दिए.

"आपके पौटे को देखा था पंडित जी 3-4 बार. अँधेरे में हे दौड़ लगता वह गांव से भी आगे निकल जाता है. लेकिन 2 दिन से दिखाई नहीं दिए तोह सोचा आज पूछता चालू.", साधू सिंह की बात पर कौशल्या देवी की बोहेन तन्न गई.

"तेरे गांव से भी आगे जाता है? और पक्का पता है के वह अर्जुन हे है?", एक बार और पक्का करने के उद्देश्य से उन्होंने ये कहा तोह पंडित जी तोह बस बैठे मुस्कुराते रहे लेकिन साधू सिंह थोड़ा झेंप सा गया.

"जी माजी. वो शंकर भाई से भी ऊँचा और चौड़ा है न तोह पहचान तोह गए थे बाकी थोड़े दिन पहले जब मेरा बीटा उसको बारिश में घर छोड़ने आया था इधर तोह 2 घडी बातें भी हुई थी. सच कहु माजी लड़का क्या है हीरा है.", कनस्तर को बंद किआ तोह दरवाजे के पीछे से ललिता जी ने अपनी सास को पुकारा. 3 कप चैट उन्हें पकड़ती वो दूध का बर्तन दरवाजे के पीछे से हे अंदर ले गई.

"ले चाय पी पहले. और है वही है तेरे पंडित जी का लाडला लेकिन आज अभी तक दिखा नहीं. स्टेडियम से भी उसको मन किआ है उसके कोच ने ज्यादा दौड़ लगाने से तोह शायद नींद पूरी कर रहा होगा किसी कमरे में.", आते के बिस्कुट की प्लेट साधू सिंह की तरफ बढाती वह बोली. रामेश्वर जी तोह चटाई बिछा कर हे दाढ़ी बनाते थे और साधू सिंह भी वही बैठ गया था एक मुद्दे पर. कौशल्या जी प्लास्टिक की कुर्सी पर असली थानेदार सी विराजी हुई थी. इतनी हे देर में अपनी दादी को पीछे से गले लगता अर्जुन भी बहार आ गया. सामने था साधू सिंह.

"नमस्ते अंकल." इतना बोलकर वह पाँव छूने के बाद अपने दादा की बगल से चिपक के बैठ गया.

"Ram-Ram बीटा. तुम्हारे दादाजी से अभी तुम्हारी हे बात हो रही थी.", उनकी बात को सुनकर अर्जुन तीनो के चेहरे देखने लगा लेकिन मुँह खोला कौशल्या जी ने.

"तू गांव से आगे तक कबसे दौड़ लगाने लगा? और फिर इतनी दूर जाता है तू भागते हुए?", सवाल थोड़ा सख्त था और चिंतित थी उसकी दादी.

"अरे दादी कैसी बात करती हो. 4 कोस कौन दौड़ेगा एक तरफ. मतला 8 कोस. वह तोह मई साइकिल लेके गांव ताका जाता हु. पहले जंगल में अपनी दौड़ और कसरत पूरी करने के बाद टहलता हुआ नहर के पास मन बेहला लेता हु. लेकिन एक दिन कोशिश की थी अपना दम देखने की. 35-40 मिनट लग गए थे गाँव पार करके अगले जंगल तक जाने में अपने घर से. वह तोह आते हुए अंकल के बेटे महेन्दर भाई ने घर छोड़ दिए, नहीं तोह लाइब्रेरी के समय हे घर वापिस आने वाला था." अर्जुन ने चतुराई से बात बता दी थी. जितना सच जरुरी था उतना और कौशल्या जी तोह गदगद हो गई थी बचे की इतनी म्हणत देख कर.

"अरे मई जानती हु मेरा लाल बहोत मजबूत है लेकिन तेरे अंकल से हे पूछ ले के उस तरफ जंगली सूअर, गौह, सीआर और सांप भी बहोत होते है. बस यही डर है नहीं तोह तुझे कोई rok-tok थोड़ी न है." साधू सिंह ने भी हाँ में हाँ मिले.

"माजी बात 16 आने सही है. गाँव तोह चलो सुरक्षित जगह है लेकिन अभी खेत में 8 फुट का सांप निकला था मेरे.", साधू सिंह की बात पर अर्जुन अपने दादा साथ लगा मुस्कुराने लगा.

"अब इन्हे ये नहीं बताएगा के तू हंस क्यों रहा है.?" पंडित जी को तोह अपने बचे का थोड़ा भेद था लेकिन साधू सिंह को तोह बिलकुल न था और उसकी दादी तोह वैसे हे बचो के लिए सावधान रहती थी.

"अंकल आपके घर में कोई मेहमान आये तोह आप क्या करते है? उसको बिठा के उसका स्वागत करते है और खातिरदारी. ऐसे हे कोई दुश्मन आ जाये तोह फिर आप उसको करारा जवाब देंगे. लेकिन मैंने हॉस्टल और खुद की इस प्रकृति को देखने की रूचि से सीखा है के जानवर बिलकुल ऐसे नहीं होते. आप उनके दायरे में जाओ तोह पहले आपको पता होना चाहिए के उसका स्वाभाव कैसा है. सांप सिर्फ तभी हमला करेगा जब वह डरा हुआ हो या फिर वह नागराज हो क्योंकि वह तोह राजा है. ऐसे हे सभी व्यवहार करते है. मई सामने से आते हाथी को देख कर रस्ते से हट जाऊंगा तोह वह सीधा चल देगा. लेकिन डंडा दिखाऊंगा तोह फिर कही नहीं दिखूंगा." हँसते हुए उसने ये बात कही तोह अब पंडित जी ने अपने पोते की पीठ पर हाथ फेरती हुए शाबाशी दी.

"वैसे भी इस आस पास की vanya-shakti में मेरी टक्कर का तोह जानवर मुश्किल है अंकल. इंसान हु न." ये बड़ी गहरी बात कही थी जिसको कौशल्या जी भी समझ गई थी.

"हाहाहा. सही बात कही बीटा. तुम्हारी आंटी भी कह रही थी की शंकर जी के बेटे को तोह कला टिका लगा के घर में रखना चाहिए. कब कोण नज़र लगा दे. मैंने उन्हें बता दिए था के ये घोडा पंडित जी का है तोह रस्ते से नहीं भटकेगा और किसी की नजर इसको लगने नहीं वाली. ाचा माजी, एक आखिरी घर में दूध देना है अपने छोल साहब के. अब इजाजत दीजिये. और बीटा कभी आओ तोह फिर तुम्हे khet-khalihan भी दिखते है." वह से उठ कर वो बारिश में हे अपनी बरसाती फिर से शरीर पर दाल निकल लिए बड़ा कनस्तर उठाते.

अर्जुन को छोल साहब के नाम से याद आया रात को रेणुका से किआ वादा लेकिन फिर बारिश की तरफ देखता बस वह वही बैठा दूध सुड़कने लगा जो दादी ने सामने रख दिए था, 2 लड्डू के साथ.

"मुन्ना, दूध पीने के बाद छाता लेके जइयो जरा सतीश भाई साहब के घर. बोलियों के मैंने बुलाया है उनके भाई ने नहीं.", कौशल्या जी ने प्यार से ये बात कही तोह रामेश्वर जी ने एक बार अपनी बीवी को देखा फिर तोलिये से चेहरा साफ़ करते उस डंडी वाले शीशे में देखने लगे, कही कोई बाल न रह गया हो. रोज का नियम था उनका ये जाब्स पुलिस में भर्ती हुए थे.

"दादी टेलीफोन मिला दो न." अर्जुन ने इतना बोलै तोह रामेश्वर जी ने हलके से उसका कान उमेठ दे.

"जब बात जरुरी हो और इंसान भी तोह 100 किलोमीटर जा कर भी बात करनी चाहिए. और ये तोह 10 कदम पर है. इज़्ज़त्त और प्यार ये छोटी छोटी बातें सिखाती है. फ़ोन है इमरजेंसी वाली सुविधा. समझ गया महाराज पटिआला?" अर्जुन की हालत देख कौशल्या जी ने अपने पति को झूटी फटकार लगा दी.

"बचा है अभी. छोड़ो कान उसका और चलो अंदर कमीज पहन लो आप. ये बनियान हे मिली है विरासत में इस घर को.", अर्जुन और दादाजी दोनों हे हंस दिए दादी के अंदर जाते हे. लेकिन फिर उसने एक सबक सीख लिए था. "महत्वपूर्ण इंसान के सामने जा कर बात करनी चाहिए. एहसास होता है के वह कितना जरुरी है."

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"अंदर आ जाओ भैया. अंकल ने कहा है.", पारवती ने बहार गेट पर छतरी लिए अर्जुन से कहा तोह वह बरामदे में छतरी को खुला हे जमीन पर टिकता फिर अंदर आ गया. छोल साहब चाय पीने लग रहे थे वही ड्राइंग रूम में बैठकर और कोई वह दिख नहीं रहा था.

"गुड मॉर्निंग छोटे दादू." उनसे आशीर्वाद ले वह भी सामने बैठ गया.

"हांजी नवाब साहब, ऐसी बारिश में आज आप हमारे गरीबखाने में?", अर्जुन से मजाक करते उन्होंने कहा तोह वह भी मुस्कुराता उनका जवाब देने लगा.

"वो क्या है के मुझे लगा इतनी बारिश में तोह आप कही जाने से रहे तोह आज क्यों न आपके हे साथ पकोड़े खाये जाये.", काम की बात छोड़कर वह भी टेबल पर उलटी राखी प्लेट को घूमता बोलै तोह छोल साहब ने पारवती को आवाज दी.

"सुन रही हो पारवती बीटा. आज छोटे पंडित जी पकोड़े खाने आये है सुबह 6 बजे. हाहाहा.", पारवती बहार को झांकती बस थोड़ा सा मुस्कुरा दी.

"अरे नहीं पारवती दीदी आप काम करो मई तोह बात करने आया था. हाँ तोह दादू, वह आपकी भाभी जी ने कहा है के आपको बता दू उन्होंने आपको जरुरी याद किआ है. और ये भी बोलै है के बता देना की खास उन्होंने हे बुलाया है.", अर्जुन की बात पर उन्होंने कप नीचे रख दिए.

"तुम्हारी छतरी बहार हे राखी है न? यही बैठो मई जा रहा हु तुम्हारे घर और प्रीती उठ जाए तोह बता देना के मई कहा पर हु. पारवती, तुम बीटा इसके लिए आलू गोभी के पकोड़े बना दो. मई नाश्ता वहीँ करूँगा.", पाजामे कुर्ते में हे वह बहार निकल गए. छोल साहब को पता था के उनकी ये भाभी जब भी बुलाती है तोह बात जरुरी हे होती है. साधारण हवाई चप्पल में हे चल दिए अपनी बड़ी भाभी जी की बात sun-ne. इधर जब अर्जुन ने देखा के वह अकेला है और पारवती तोह रसोईघर से निकलने वाली नहीं अगले 20-30 मिनट तोह पहले वह रेणुका जी के कमरे में गया जहाँ उनके साथ हे ऋतू और अलका सोइ हुई थी. शायद देर तक जाएगी होंगी वो सब. वापिस वह दरवाजा ढालता चल दिए अपनी शहजादी के कमरे में जो सिर्फ वैसे हे बंद था.

कमरे में प्रीती वही कपड़ो में थी लेकिन सलेटी रंग वाली कासी हुई बनियान और वैसी हे छोटी निक्कर में जिसके किनारे काले रंग के थे. सोये हुए वह सच में किसी पारी सी लग रही थी. दरवाजा बंद करते हुए वह प्रीती को करीब से देखता रहा फिर उसकी कमर पर हाथ रखता लेटने का उपक्रम सा करता उसके चेहरे पर झुक गया.

"संसार में इस से बढ़कर खूबसूरत कोई हो नहीं सकता." मैं में इतना बोलता वह हौले से कमर से हाथ ऊपर कर उसके गाल पर झुक गया. दिल किसी जनरेटर की तरह dhad-dhad कर रहा था लेकिन खुद को हिम्मत देता वह बिलकुल चेहरे तक पंहुचा तोह इधर प्रीती का चेहरा कुछ सीधा हो गया कमर पर एक स्पर्श महसूस करते हे. दोनों के होंठ चुम्बक से चिपक गए. जहाँ अर्जुन की आँखें इस जादुई एहसास से बंद हो गई वही प्रीती की neeli-hari आँखे किसी चमकते हीरे से खुल गई. अर्जुन ने तोह सिर्फ दोनों के होंठ हे मिलाये थे लेकिन नीचे लेती प्रीती ने ाचे से उसके होंठ मुँह में भर कर पीने हे शुरू कर दिए. अर्जुन को किसी रूई के हलके ढेर की तरह अपनी बाहों में कस्ती प्रीती ने अपने ऊपर लिटा लिए था. पल भर में हे उसके हाथ अर्जुन की टीशर्ट के अंदर से उसकी पीठ पर रेंग रहे थे और वह जैसे किसी कमजोर बकरे सा अपनी कसाई प्रेमिका की गिरफ्त में जकड़ा था.

जबरदस्ती तोह वह भी खुद को अलग नहीं करना चाहता था इसलिए शरारत करना हे उसने सही समझा. हालत तोह पतली हो गई थी जो खुद वो चाक़ू पर गिरा था. हिम्मत कर के अर्जुन ने अपने दोनों हाथ उस छोटी सी लचीली बनियान में डाले तोह प्रीती ने अर्जुन की जुबान हे अपने मुँह में भर कर चुसनी शुरू कर दी और दोनों टैंगो में उसके जकड़ते हुए बस मुमकिन होता तोह अंदर घुस जाती. अर्जुन का दिमाग चलना बंद हो चूका था लेकिन हाथ सरकते हुए जैसे हे उन सख्त गोलों पर पड़े तोह वही जम्म गए. पीठ पर रेंगने वाले हाथो में अब अर्जुन के कूल्हे जकड चुके थे. लेकिन अर्जुन वैसे हे मदहोश सा अपनी ज़िन्दगी के सबसे सख्त स्टैनो को हाथो में भर के लेता हुआ था. निप्पल ऐसे महसूस हो रहे थे जैसे कोई 1/4" का पेच हो. सख्त, तीखा और साफ़ हाथो में चुबता हुआ.

"ohooo-ohooo.", अलका जो जाने कब से अंदर कड़ी ये देख रही थी लेकिन ाची बात थी की उसने भी दरवाजा बंद कर रखा था, ने उनका ध्यान हटाने की कोईशि की लेकिन दोनों बेअसर थे. अर्जुन तोह वैसे भी कुछ कर पाने की हालत में न था लेकिन प्रीती अपने प्यार को आज शईद करने पर तुली हुई थी.

"ओह hello.. उठ छोड़ दे इसको नहीं तोह फिर ये तेरा आखिरी किश हे होगा.", अलका ने प्रीती का शिकंजा हिलाया तोह वह होश में आई और फिर फुर्ती से बाथरूम में जा घुसी.

"इसने तोह तेरा रपे हे कर दिए." टीशर्ट से साफ़ दिख रहा था के पीठ पर खरोंचे लगी थी और होंठ थोड़े फूल गए थे. अर्जुन बिस्टेर पर सीधा लेता हुआ तेज साँसे ले रहा था. अलका भी बिस्टेर पर बैठ कर उसको मुस्कुराती देख रही थी. 5 मिनट बाद हे प्रीती बहार आई जो अब टीशर्ट और एक हलके रंग के पजामा पहने थी. बाल रबर से बंधे थे और चेहरा धोने के बाद ज्यादा चमक रहा था.

"आप पारवती को बोलो के chai-coffee तैयार कर दे मई आई.", प्रीती ने गले लगते हुए धीरे से ये कहा तोह अलका दीदी बहार निकल गई, हंसती हुई.

"हाँ तोह फिर इतनी हिम्मत कैसे हो गई मुझे छूने की?", अर्जुन के ऊपर झुकती प्रीती हंसती हुई बोली तोह अर्जुन ने हाथ जोड़ दिए.

"आए.. उम्. तुम हाथ मत जोड़ो लेकिन याद रखना के अगली बार अगर पास आये तोह मई जगह, लोग और रिजल्ट नई देखने वाली. फिर रट रहना.", गाल चूम कर वह एक बार प्यार से लिपट गई तोह अर्जुन ने भी अपनी ब्याह प्रीती की पीठ से प्यार से रख ली.

"चलो अब उठो और ऐसे किसी लड़की के कमरे में आइंदा मत आना." अर्जुन जैसे हे उठने लगा तोह इस बार उसने मजबूती से प्रीती का चेहरा पकड़ लिए. बाजी उलट गई थी और यहाँ प्रीती की आँखें बंद हो गई थी, मुस्कराहट भी गायब थी वह से.

"मैं इसलिए चाहता हु की तुम्ही वह लड़की रहो मेरी ज़िन्दगी में जो मुझे इशारो पर चलाये. मेरे हाथ लगाने से तुम्हे दर्द हो सकता है प्रीती.", और फिर गाल चूम के वह दरवाजा खोल कर बहार आ गया, जहाँ ऋतू दीदी रेणुका बुआ के साथ बैठी कॉफ़ी पी रही थी और अलका शायद रसोईघर में कुछ लेने गई थी.

"गुडमॉर्निंग." अर्जुन ने एक कुर्सी खींचते हुए दोनों की तरफ देखते हुए कहा तोह रेणुका जी के चेहरे पर जैसे कोई भाव नहीं था लेकिन ऋतू मुस्कुरा रही थी. दोनों ने हे गुडमॉर्निंग का जवाब दिए तोह पारवती ने कॉफ़ी के साथ पकोड़े की प्लेट अर्जुन के सामने कर दी. अलका भी रसोईघर से आती एक प्लेट में पकोड़े और चुटनी लेती उनके सामने बैठ कर मुस्कुराने लगी.

"तुझे क्या हो गया जो ऐसे मुस्कुरा रही है?", ऋतू दीदी ने जब ये बात अलका दीदी से कही तोह अर्जुन थोड़ा झेंप गया और सर झुका कर पकोड़े खाने लगा.

"कुछ नहीं यार बस देख रही हु के अपना अर्जुन कैसे इस घर में हुकुम दे कर सुबह सुबह पकोड़े बनवाने लगा है.", इस बात पर तोह ऋतू दीदी भी हंस दी. फिर वह बाथरूम जाने का बोल कर उठ गई तोह अलका भी प्रीती के कमरे की तरफ चली गई. एक अतिरिक्त कप कॉफ़ी का प्रीती के लिए लेकर.

"सुबह का कोई वादा था?", रेणुका जी ने बड़ी हलकी आवाज में बिना देखे ये बात कही.

"सॉरी. वो रात को माँ की तबियत ठीक नहीं थी तोह नींद देरी से आई. सुबह बहार बारिश इतनी तेज थी की फिर जाने से बीमार हे होना पड़ता. आप शाम को तैयार रहना मई 6 बजे लेने आऊंगा. फिर फिल्म देखने चलेंगे." उतने धीमे हे अर्जुन ने जवाब दिए.

"कोई बात नहीं. अब कैसी है आपकी माँ?", उनकी बात पर अर्जुन को कुछ याद सा आने लगा लेकिन फिर लगा के शायद वह सपना हे था.

"कहा खो गए? वैसे पिक्चर का क्या प्रोग्राम बनाया है?", इस बार अर्जुन ने ध्यान दिए था के रेणुका उस से कुछ पूछ रही है.

"हाँ.. वो मई कह रहा था के फिल्म किसको देखनी है. 6 बजे चलेंगे और 8 बजे वापिस." एक मुस्कराहट से उसने ये बात कही तोह रेणुका ने मन कर दिए.

"नहीं. हम ऐसे हे कही शांत जगह घूम सकते है और किसी दूर पार्क में जा सकते है. सिनेमा नहीं.", अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हो गया था. रेणुका एक सभ्य और प्यार करने वाली महिला थी. कैसे उसने ये सोच लिए के वह सिनेमा ले जायेगा.

"सॉरी. वो गलती से और जल्दबाजी से मैंने बोल दिए. आप जैसी शाम चाहेंगी मई वैसी हे आपके साथ बिताऊंगा.", और फिर कुछ देर दोनों हे ऐसी बातें करते रहे तोह अर्जुन वहां से उठकर अपने घर की तरफ चल दिए. बारिश हलकी हो गई थी लेकिन बादल अभी भी बने हुए थे आसमान में. सुबह सवा सात का समय भी जैसे साढ़े पांच बता रहा था. गली सुनसान हे थी लेकिन जैसे उसका मैं थोड़ा अशांत था.

"अर्जुन, जा अपने कमरे की सफाई करवा ले माधुरी से. और तारा को भी नीचे भेज देना उसके मैले कपड़ो के साथ.", घर में आया नहीं के एक और हुकुम मिल गया था. ये ताईजी की आवाज थी जो सब्जी काट रही थी. वही कोमल दीदी डाइनिंग टेबल और वह का फर्श साफ़ करने में लगी थी. उनके चेहरे पर वो भोली मुस्कान हर समय रहती थी जब जब अर्जुन पास होता था.

"जाता हु ताईजी. और दीदी आप कैसी है?", ललिता जी को हाँ कहने के बाद अर्जुन अपनी प्यारी दीदी से बोलै तोह वह भोली सी मुस्कान और लम्बी हो गई थी. उनकी बड़ी बड़ी आँखें जैसे उनकी जुबान से ज्यादा बातें करती थी लेकिन हर कोई तोह ये भाषा समझने से रहा.

"मई बिलकुल ठीक हु. काम से फारिग होने के बाद तुम.. फारिग होने के बाद हम बात करेंगे.", बात को सुधरती वह शर्मा गई थी और अर्जुन ने भी उन्हें सतना ठीक न समझा. यहाँ से दादाजी वाला कमरा बंद था और जब वह अंदर आया था तब बैठक और उसके साथ वाले कमरे का दरवाजा भी बंद था. फिर वो दौड़ता हुआ ऊपर चल दिए जहा तारा बिस्टेर पर पसरी हुई थी. जाग चुकी थी लेकिन फिर भी आलस से पड़ी थी. अर्जुन सीधा उसके बगल में छलांग लगता कमर को पकड़ के लेट गया.

"तुमममम.." तारा एकदम से चौंक गई फिर अर्जुन की ये हरकत देख थोड़ा सा मुस्कुराती हुई तकिये में सर दाल कर मुँह छुपाने लगी. अर्जुन ने उस बारीक बनियान से टॉप में काख की तरफ से हाथ डालते हुए एक नरम उभर मुठी में भर लिए.

"क्यों मैं नहीं आ सकता क्या?", और हौले से उसका निप्पल मसल दिए.

"इस्सस.. आह. आ सकते हो.. लेकिन आह इतनी सुबह और सीधा ये सब.", तारा की तेज सिसकी सुनते हे अर्जुन ने हाथ खींच लिए. इधर संजीव भैया के कमरे से हलकी आवाज हुई तोह वह सीधा हो गया.

"वो ताई जी तुम्हे नीचे बुला रही है. अपने सारे मैले कपडे साथ में नीचे लेती जाना. तीनो कमरों की सफाई होने लगी है यहाँ ऊपर और आज तुम्हारी छुट्टी भी है तोह करो थोड़ी सेवा.", अर्जुन की बात पर तारा शर्माती सी कड़ी हुई तोह उसके गोल कूल्हे उसकी नजरो के सामने आ गए. अर्जुन ने एक बार भैया के कमरे की तरफ देखा और अपने हाथ से तारा का वह गोलाकार नरम नितम्भ दबा दिए.

"सुधर जाओ. अगर इतना हे दिल है तोह फिर ाचे से मेरे साथ टाइम स्पेंड क्यों नहीं करते? काम से काम 2-3 दिन में एक घंटा तोह निकल सकते हो?", तारा ने दिल से ये बात कही थी जैसे वह अर्जुन के लिए तरस गई हो. "चाहे सिर्फ बातें हे कर लेना लेकिन मेरे साथ अकेले. प्लीज"

"पक्का प्रॉमिस. मंडे मई हे तुम्हे छोड़े जाऊंगा फिर शाम को लाते समय बहार चलेंगे और अगर मुमकिन नहीं हुआ तोह फिर साड़ी रात तुम्हारे साथ." दोनों हे इतनी धीरे आवाज कर रहे थे की एक दूसरे तक हे जा रही थी. फिर तारा बाथरूम में घुस गई कपडे बदलने और सामने वाले कमरे में अर्जुन को सलवार कमीज में झाड़ू लगाती माधुरी दीदी का पिछवाड़ा नजर आया. स्थिति को समझते हुए उसने खड़े होते हुए आवाज दी.

"दीदी, वो तेजी बोल रही थी की मेरा कमरा भी ठीक कर देना सफाई करने के साथ हे. और मैले कपडे भी देख लेना.", माधुरी दीदी ने उसकी ऊँची आवाज सुनी तोह थोड़ा हैरानी से देखा लेकिन फिर बाथरूम से बिस्टेर की तरफ जाती तारा को देख वह हौले से मुस्कुरा दी. 5 मिनट में हे तारा ने कोई 5-6 जोड़ी कपडे इकट्ठे कर लिए थे.

"दीदी, मई नीचे जा रही हु. प्लीज सफाई के बाद सारे डोर्स एक बार खोल देना. Pollen-allergy है मुझे तोह मई डस्टिंग से दूर रहती हु." तारा की इस बात से अर्जुन को समझ आया के वह रसोईघर के काम और बर्तन धोने जैसे काम हे क्यों करती है और स्कूटर पर भी ज्यादातर अपने चेहरे पर रुमाल रख लेती थी. एक बार अर्जुन को मुस्कुरा के देख वह नीचे चली गई. और सब तरफ देखने के बाद अर्जुन वैसे हे बिस्टेर पर आ लेता.

"यहाँ क्यों लेता है?", माधुरी दीदी इधर आई तोह अर्जुन को ऐसे आराम करते देख थोड़ा हैरान हो गई.

"क्यों? कुछ काम था दीदी?", अर्जुन ने गंभीर चेहरा बनाते हुए कहा तोह माधुरी दीदी ने चेहरा घुमा लिए. अर्जुन हँसते हुए खड़ा हुआ और पीछे से उनको जकड के बोलै.

"बाथरूम या मेरा कमरा.?", और उनके खरबूजे मसलते हुए सलवार के ऊपर से हे अपना वो सख्त लुंड उनके कूल्हों की दरार में दबा दिए.

"पहले ये और तुम्हारे कमरे का दरवाजा लगा दो.", माधुरी दीदी अपने कूल्हे हिलती अर्जुन के कमरे में चल दी इधर अर्जुन ने वह दरवाजा बंद किआ तोह उसके कमरे का दरवाजा दीदी खुद बंद करने लगी थी. हाथ चिटकनी को बंद करते ऊपर उठे इधर अर्जुन ने फिर से उन्हें पीछे से जकड लिए.

"आज सिर्फ मई करूँगा और आप मजे लोगी.", इतना बोलकर अर्जुन ने माधुरी दीदी को दिवार से लगाए हे उनकी सलवार ढीली करते हुए उनके पैरों में गिरा दी. मॉटे कूल्हे उसके सामने थे जहाँ कोई निशान या दाग न था. भारी और उन्नत नितम्भ, जिनके साथ अपना नंगा मोटा लुंड लगते हुए अर्जुन ने कमीज के अंदर से हे उनके मॉटे दूध पकड़ लिए. यहाँ उनके कूल्हों की दरार में वह बड़ा डंडा घुसने की कोशिश कर रहा था वही अर्जुन ने उनका चेहरा पीछे करते हुए होंठ मुँह में भरते हुए एक हाथ से उनके एक कड़े निप्पल को चुटकी में भरते हुए शरीर को को उत्तेजित करना शुरू कर दिए.

"मैं तोह खुद चाहती हु की अब हर रोज मुझे प्यार करे लेकिन जानती हु ये ज्यादा हो जायेगा. जितना कर सकता है उतना प्यार अपनी इस दीदी को देदे भाई. और मेरी शादी से पहले हफ्ते तू हर भार मेरे अंदर हे करेगा.", माधुरी दीदी सिसकती हुई बोली. उनका शरीर हे इतना भरा हुआ था के वह जाहिर करता था उनके शरीर में भरे काम को. कुछ पल बाद हे दोनों बिस्टेर पर थे जहा माधुरी दीदी अपने छोटे भाई का लुंड सहलाती लेती हुई थी और उनके ऊपर झुका अर्जुन उनके भूरे और उन्माद से भरे चूचक पीने में लगा था. जब छूट में उचित गीलापन और लुंड बिलकुल फूल कर कड़ा हो गया तोह अर्जुन ने उनकी जाँघे फैलते हुए मोटा सूपड़ा उस फूली हुई चिकनी छूट के छेड़ पर टिकते हुए करारा धक्का जड़ दिए. आधा लुंड फच्च से छूट में उतर गया तोह बिना रुके हे उसने एक और धक्का लगते हुए अपने वेररया से भारी हो चुके अंडकोष उनकी गांड से चिपका दिए.

"आह. .. भाई ये तोह और ज्यादा बड़ा महसूस हो रहा है. छूट अंदर से दर्द करने लगी है." कराहती हुई माधुरी अपने छोटे भाई का अंदाज देख मस्ती से दोगुनी हो गई थी. और इधर अर्जुन ने तोह सोच हे लिए था के वो माधुरी दीदी को आज सिर्फ तेजी और जोर से छोड़ने वाला है. हर धक्के पर वह सिसकने लगती थी. मॉटे दूध थिरक रहे थे और कूल्हों को अर्जुन ाचे से दबोचे जड़ तक अपना खूंटा उनकी छूट की गहराई में उतार रहा था. 10 मिनट में हे वह किसी बाढ़ की तरफ पानी छोड़ती झड़ने लगी तोह अर्जुन ने उनको पलट दिए. कमर में हाथ दाल ऊपर उठाते हुए बिना कोई परवाह किये जब फिर से उनकी अब थोड़ी उभरी छूट के छेड़ पर लुंड टिकती हुए पूरा घुसाया तोह एक चीख निकल गई उनके मुँह से जिसको अर्जुन ने उनका मुँह दबाते हुए बंद कर दिए था.

"दीदी, अगली बार जब भी आप मेरे साथ सोयेंगी मई आपकी इसमें जरूर करूँगा.", नीचे झूलते 3-3 किलो के खरबूजे दबोचे वह गांड पर झटके मारता माधुरी दीदी की छूट को फाड़ने में हे लगा था. हर धक्के के साथ वह आगे सरकने लगी थी. और ये पूरा कमरा बस उनकी दर्द और मस्ती की आहों से भर चूका था.

"उम्म्म्म.. आआअह्हह्ह्ह्ह.. जहा मर्जी कर रे.. तू हे इसका पहला.. आह.. मालिक है... उम्म्म. आज तेरा ये जोश देख के मजा... आ गया आह माँ .. ", छूट तोह जैसी अब हार मान चुकी थी लेकिन आधे घंटे में उनका पूरा शरीर झीणौद कर रख दिए अर्जुन ने. माधुरी दीदी को भी आज पता चला था के कितना मजबूत शरीर है उसके इस छोटे भाई का.

लुंड को बहार निकल कर अर्जुन ने उन्हें बाहों में उठाते हुए होंठ चूमने शुरू कर दिए. इशारे से उनके पांव अपनी कमर पर लिपटवाते हुए अब वह फिर से लुंड छूट में घुसेड़ कर हवा में लिए चुदाई में लग गया.

"आह दीदी.. देखो जरा.. कैसे आप ले रही हो.." शीशे में माधुर का वह यौवन से लड़ा जिस्म अर्जुन किसी हलकीफुलकी गुडिअय सा उठाये लगभग राउंड हे रहा था और माधुरी दीदी एक बार दोनों को इस अवस्था में देखती फिर उसके कंधे को पकड़ वापिस चूमने लग गई. लुंड छूट को फ़ैलाने लगा तोह दोनों हे समझ गए के अंतिम समय नजदीक है. माधुरी दीदी को ऐसे हे गॉड में लिए वह बाथरूम में घुस गया.

"आह दीदी. सच बताना ऐसे आपको मजा आया?", वह दिवार से लगाए वह उनको झुक कर पीछे से पेलता बोलै तोह माधुरी दीदी के शब्द मजे में आधे अधूरे हे निकल रहे थे. छूट बहार तक लाल हो चुकी थी और एक धागे की तरह लिसलिसा पानी बहार लटक रहा था.

"ाःह.. माज़आआआ.. मैई.. तोह.. आह्ह्ह्ह माँ.. मजे से मरने .. ीीी.. मरने.. गयी रे.. ", शावर का हैंडल थाम वह दिवार से चिपकी तोह अर्जुन फटने की हालत में पहुँच चुके अपने लुंड को उस पौने इंच गहरी गांड की दरार में रगड़ने लगा.. "आह didi..mai भी गया." पसीने में भीगा उसका बदन चमक रहा था. हर मांसपेशी ऐसे फूल गई थी जैसे गयम में 2 घंटे से म्हणत कर रहा हो. 6-7 तेज पिचकारी अपने गाढ़े पानी की दीदी की पीठ और कूल्हों पर बरसाने के बाद वह वही फर्श पर बैठ गया.

माधुरी भी टाँगे पसारती दिवार से लग कर गहरी साँसे लेने लगी. दोनों एक दूसरे के सामने बैठे बस मुस्कुरा रहे थे.

"ाची सफाई करने लगा है तू. और ये तोह मैंने नहीं सिखाया था." वह वैसे हे शांति से बोली तोह अर्जुन ने बिना जवाब दिए फुहारा खोल दिए और 5 मिनट बाद दोनों उसके कमरे में कपडे पहन रहे थे.

"दीदी, एक पूरी राति मैंने आपके ये पीने है. आज सिर्फ मैंने आपको मजा देना था क्योंकि समय काम था. लेकिन मई चाहता हु के एक पूरी रात मई आपको सोने न दू." अर्जुन ने दीदी की कमीज गर्दन से नीचे आने से पहले उनके भारी और मुलायम दूध को कास के दबाते हुए अपनी इत्छा जाहिर की तोह माधुरी दीदी ने एक मीठा चुम्बन उसके होंठो पर करते हुए बहार धकेल दिए.

"देखेंगे अभी तू नीचे जा. नाश्ता लग गया होगा मई 10 मिनट में आती हु.", उनकी टाँगे थोड़ी फ़ैल गई थी इस भीषण चुदाई से. अर्जुन भी हँसता हुआ नीचे चल दिए.

'पक्का घोडा हो गया है और हाय राम कैसे कुटाई की है आज. इतना मोटा हो गया एक हफ्ते में हे है.' बिस्टेर पर अर्जुन की चादर ठीक करती वह अभी तक मजे में थी

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नाश्ते से फारिग होने पर अर्जुन ने देखा की अंदर से छोल साहब और दादाजी आ रहे है. चेहरे सपाट थे तोह कहना मुश्किल था के क्या बात हुई होंगी अंदर लेकिन फिर माहौल को देखते हे दोनों चेहरा शांत करते हुए खाना खाने बैठ गए. थोड़ी देर बाद हे दादीजी भी आ गयी और वह खुद हे प्यार से दोनों का भोजन परोसने लगी थी. आज 9 बज गए थे इस समय तक और आँगन में अब बारिश की बूंदे गिरनी बंद हो चुकी थी.

"अर्जुन बहार चल जरा मेरे साथ.", कोमल दीदी चहकती हुई आई और उसकी बाजु खींचती सी बिना किसी की परवाह किये बाहर ले चली. रामेश्वर जी हंस दिए थे क्योंकि उनको पता था के क्या हुआ होगा.

"सुनती हो. एक आरती का थाल लेके बहार जाओ जरा." कौशल्या जी भी बिना देरी किये प्लेट लेकर मंदिर में चल दी.

"वाह. ये तोह जो मैंने देखि थी उस से भी कही शानदार है.", 2 लोग उनके आँगन में खड़े थे. उनकी हलकी नीली कमीज बता रही थी की थोड़ा बहुत तोह गीले हुए है वह. उनमे से एक मोटरसाइकिल को कपडे से चमकाने में लगा था.

"सर ये रामेश्वर जी के नाम से ली गई है हमारी अब तक की बेहतरीन 350 रॉयल एनफील्ड माचिस्मो. आप यहाँ सिग्न कर दीजिये और बाकी डाक्यूमेंट्स मर संजीव शर्मा के पास पहले हे दिए जा चुके है. डिलीवरी देरी से करने के लिए माफ़ी चाहते है क्योंकि पहले हे इसकी 60 दिन की एडवांस बुकिंग चल रही है." वो व्यक्ति किसी रट्टू टूटते की तरह बताये जा रहा था लेकिन अर्जुन तोह मोटरसाइकिल के चारो और घूमता बस इस चमकदार और बड़ी सी मशीन को देखने में लगा था.

"बाद में बैठना.", कौशल्या जी थाली लेकर पास आई तोह अर्जुन ने वह उनके हाथ से लेते हुए कोमल दीदी को पकड़ा दी. जो अपनी दादी की तरफ देख रही थी उलझन से.

"अरे जब इसने तुझे करने को कहा है तोह तू तिलक कर. मैंने बहोत कर लिए है पहले हे.", कौशल्या जी ने ख़ुशी से कहा तोह दीदी मोटरसाइकिल के लाइट और छक्के के ऊपर वाले स्टील के फ्रेम पर तिलक लगाने के बात हैंडल पर मौली बाँध्ती भाई की सलामती की दुआ मांगने लगी. अर्जुन भाग कर अपने कमरे में गया और बटुआ उठा के ले आया.

"ये प्यारी दादी और दीदी के लिए शगुन. और थैंक यू दादी इसके लिए.", दोनों के हाथ में 1100 रुपये रखते हुए वह दादी से गले मिला और फिर अपनी बहिन को गॉड में उठा कर अगली सीट पर बिठा दिए.

"क्या कर रहा है अर्जुन?", दादी के सामने भाई की इस हरकत पर कोमल दीदी थोड़ा डर गई थी.

"प्यार करता है तुझसे जैसे तू करती है. और अगर इसने सोच लिए है के तू सबसे पहले बैठेगी तोह फिर हर्ज कैसा. चल अब मेरी बची को बिठा के चला के दिखा जरा.", कौशल्या जी तोह अपने बचो का इतना प्यार देख फूली नहीं समां रही थी और अर्जुन ने मोटरसाइकिल पहले भी बहोत बार चलाई थी जब संजीव भैया अपने ऑफिस के किसी भी दोस्त की लेकर आते थे.

"सही कहा दादी. दीदी को हे सबसे पहले मई चक्कर लगवा के लेके आऊंगा. बस 5 मिनट में आया वापिस.", कोमल को वैसे हे नीचे उतार कर वह आगे बैठा और टंकी पर लगे स्टीकर पर गियर का निशान देख दबा के किक लगा दी.

"dug-dug.. dug-dug." वह भरी भरकम आवाज पूरे घर के अंदर तक सुनाई पड़ी और पंजा नीचे दबाते हे अर्जुन ने हलकी रेस देते हुए आँगन में उसको गेट की तरफ मदद लिए.

"अब जल्दी से बैठो भी.", कोमल इधर उधर देखने लगी थी. नंगे पाँव और घर के सलवार कमीज में.

"दादी आप हे बोलो न. मई कोनसा मोटरसाइकिल को रोक कर इन्हे पैदल चलाऊंगा.", कौशल्या जी हंसती हुई हाथ हिलती कोमल को बोली तोह वह शर्माती सी पीछे बैठ गई. धीरे धीरे आगे बढ़ता वह सँभालते हुए इस bhari-bharkam बुलेट को बहार लिए चल दिए.

"दीदी ये मेरा सपना था. एक दिन आपको इसपर बिठा के कही दूर लेके जाऊंगा. सिर्फ hum-dono और सिर्फ दूर तक जाती खाली सड़क.", कोई 3-4 गली के बाद हे अर्जुन और उस दुपहिया गाडी में जैसे एक बंधन सा जुड़ गया था. वह भी अब उसके हिसाब से आराम से चलने लगी थी. नहीं तोह बुलेट के बारे में तोह प्रसिद्ध था के ाचे ाचे धुरंधर भी इसको संभल नहीं सकते थे. कोमल अपने छोटे भाई की पीठ से लगी इसको एक सपने सा देख रही थी. पूरे 10 मिनट बाद दोनों वापिस आये थे और अब उसकी सभी बहने बड़े ध्यान से इस अजूबे को देख रही थी. लाल और स्टील रंग की ये 200 किलो वजनी मशीन अपने आप में हे बेमिसाल थी. ऐसे हे उसने सबको थोड़ा बहोत घुअमाया और इधर दादी जी ने भी शोरूम से आये दोनों व्यक्तियों को 101 रुपये के साथ chai-nashta करवा के विदा किआ.

"भाई अब तोह तुम भी गाडी वाले हो गए.", छोल साहब ने मुस्कुराते हुए तारीफ भी की अर्जुन की पसंद की और फिर उन्होंने खुद चप्पल पहने हे चला की भी दिखाई. अर्जुन के साथ अभी घुलमिल के वह थोड़ा बेहतर महसूस कर रहे थे.

"दादू, ये किसकी है.?", प्रीती घर में आई तोह छोल साहब हे सीट पर बैठे थे और वह सिर्फ कौशल्या जी, पंडितजी और अर्जुन हे खड़े थे.

"ये बीटा दहेज़ की पहली क़िस्त दी है तेरे दादा ने.", कौशल्या जी के इस जवाब पर दोनों बड़े तहका मारते हंसने लगे तोह अर्जुन झेंप गया और प्रीती ने नजरे झुका ली.

"बीटा ये तेरे बड़े दादा ने इस नालायक को दी है. कह रहे थे के मेरी बची अब स्कूटरी या स्कूटर पर थोड़ी जाएगी स्टेडियम.", छोल साहब ने पुचकारते हुए कहा तोह प्रीती ने अर्जुन की फिर से क्लास लगा दी.

"बड़े दादू फिर ड्राइवर की वर्दी? वो तोह आप भूल गए." अर्जुन छह के भी जवाब न दे पाया था इस बात का.

"बीटा वो तोह अब तू हे बता डीओ कैसी सिलवानी है. हमारे कहा सुनेगा अब ये. गाडी आ गई, जमीन भी नाम है, घर भी और तू भी. तोह ये तोह अपनी मालकिन की सुनेगा या हमारी.", कौशल्या जी और छोल साहब ने सोच लिए था के दोनों की क्लास हे लगा के रखनी है.

"दादाजी?" अर्जुन ने थोड़ा नाराज होते हुए रामेश्वर जी की बाहन पकड़ी तोह वह बोले.

"बस भाई बहोत हुआ मजाक अब. हाँ. ऐसे हे तुम दोनों इन बचो के पीछे पड़े हो. जाओ बीटा तुम प्रीती को सिनेमा ले जाओ.", उन्होंने भी आखिर में हँसते हुए सीप लगा दी तोह प्रीती घर के अंदर भाग गई और अर्जुन बगीचे में.

"ोये चाबी तोह लेता जा." छोल साहब ने आवाज दी तोह अर्जुन ने पलट कर बस इतना कहा, "मोटरसाइकिल में रहने दो. मई बगीचे में नाली बना रहा हु." रामेश्वर जी भी फिर छोल साहब के साथ चलते बरसात के बाद गीले बगीचे का जायजा लेने लगे थे. कई जगह ाचा पानी जमा हो गया था और अर्जुन लोहे की खुरपी से लकीर बनता उसको हल्का खोदते हुए पीछे की ढलान तक बनाने लगा था. पत्ते और डालियाँ टूट कर बिखर गई थी जिन्हे वह साथ हे उठा कर धेरी बनाने लगा.

"भाई साहब दामाद हो तोह ऐसा हो. ाचा किआ था आपने जो बचपन में हे मेरी बची को इसके लिए मांग लिए था. खैर वह तोह पहले से हे आपकी हे है. लेकिन ये बचा इतना क़ाबिल है के प्रीती हे खुशकिस्मत है. नहीं तोह ऐसा दूसरा तोह मुश्किल हे होगा कही. मेरी गलती रही की मैंने रेणुका के लिए कोई ऐसा क्यों नहीं देखा या आपसे सलाह नहीं कर पाया.", दोनों लोग बड़ी फूलों की झाड़ियों सी दिवार के साथ लगे अर्जुन को ऐसे काम में मशगूल देखते बातें कर रहे थे.

"सतीश, इसके बचपन में मैंने इसको चुप करने के लिए कहा था के तेरे लिए विलायती गुड़िया आएगी जो बिलकुल पारी जैसी होगी. फिर प्रीती आई तोह जैसे ये शुरू से बस उसके हे आगे पीछे रहता था. न इसके कोई बचे दोस्त थे न उसके. शंकर ने मुझे कहा था के अगर कोई इस लड़के को सीधा कर सकता है तोह यही बची है क्योंकि प्रीती के नाम पर ये 6 साल की उम्र में हर उस बात को मान लेता था जो ये कभी आमतौर पर नहीं करता था. मेरे भाई एक तरह से तोह ये तेरा एहसान है जो एक कच्ची बात को तूने पक्की कर दिए. और मैं एक बात और भी बता दू, अगर ऐसा नहीं हुआ तोह फिर 10 शंकर भी उस आफत को नहीं रोक पाएंगे जिसे अभी तू क़ाबिल और कोहिनूर बता रहा है.", छोल साहब भी ये बात समझ गए थे. उन्हें भी ाचे से पता था के दोनों बचे एक दूसरे के लिए पूरी प्रेम भावना रखते है. प्रीती तोह अर्जुन से दूर होने के बाद जैसे अर्जुन बन गई थी. कभी कभी तोह आज भी उसका गुस्सा उन्हें डरा देता है.

"भाई साहब छोड़िए इन बातों को. इनका भविष्य इन साथ में हे है. बस मैं अभी रेणुका के लिए चिंतित हु. खैर परसो जाऊंगा मैं अगले शहर और जैसा भाभी जी ने कहा है शंकर को भी बुला लूंगा, वो बेहतर जानता है लोगो को आपसे और मुझसे कही. डॉक्टर आदमी है तोह बात सही करेगा.", आखिरी बात पर रामेश्वर जी भी मुस्कुरा दिए.

"तेरी भाभी इसलिए नहीं भेज रही उसको की वह डॉक्टर है. इसलिए भेज रही है के वो शंकर है और तेरे में उसकी जान बस्ती है. पता नहीं यार तुम दोनों का कैसा रिश्ता है और मई jaan-na भी नहीं चाहता.", रामेश्वर जी अब बगीचे के अंदर आ गए थे जहा अर्जुन सारा पानी बहार कर चूका था और कचरा 'कम्पोस्ट' के गद्दे में दबाने के बाद खुर्ची हुई मिटटी ऊपर दाल रहा था.

"ओह खोटे दे पुत्तर. कड़े दिमाग ला लिया कर. सनी बूट केहड़ा बाँदा कम् करदा क्यारी वच.?", रामेश्वर जी प्यार से दांत लगते थे तोह पंजाबी में लगते थे उसको, वो समझ नहीं आती थी अर्जुन को लेकिन छोल साहब उनकी बात सुनकर हँसते हुए अंदर आ गए.

"जब भी मिटटी में काम करो तोह बीटा जूते उतर दिए करो.", अर्जुन मिटटी के हाथ हे सर पे घिसता सा हंस के अंदर चल दिए, नहाने. ये दोनों कुर्सी झाड़ते वही बैठ गए थे.

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"माँ, अब मई लाइब्रेरी जा रहा हु. 12-1 बजे तक आऊंगा. आप अब परेशां नहीं होगी, है न मेरी अछि माँ?", तैयार होने के बाद अर्जुन अपनी माँ रेखा के कमरे में बैठा था जो घर का काम निपटा के अपने कमरे में बिस्टेर पर बैठ कर कपडे तेह कर रही थी. अर्जुन उन्हें गले लगा के बोलै तोह वह वैसी मनमोहक मुस्कान से उसके गाल सहलाती बोली.

"मेरा बीटा जब मेरा ख्याल रख सकता है तोह मई किस बात की चिंता करने लगी." अर्जुन को इस मुस्कान के सामने कुछ याद नहीं रहता था. और बहार जाने का बोलने वाला अब वापिस माँ की गॉड में सर रखे बिस्टेर पर पसर गया.

"मेरा तोह फिर दिल हे नई करता कही जाने का. अब देखो न फिर से लग रहा है के यही सो जॉन और आप लोरी सुनाओ.", बेटे की इस बात फॉर वह उसके कुण्डल वाले बालो में उँगलियाँ फिरती बस उसके चेहरे को देखते रही. कैसी किस्मत थी रेखा की? एक पति जो जहां भर में दिलफेंक था लेकिन बीवी के लिए महीने में भी 2 घडी समय निकलता था, वह भी शारीरिक संतुष्टि के लिए. जिसके लिए बंद कमरे में रेखा ने वह सब सीखा जो पसंद नहीं था, बस अपने pati-parmeshwar की इत्छा समझ के.

'और एक ये था, उनका बीटा. जिसके पीछे खुद जहां भर की लड़कियां पड़ी थी, वो अपनी माँ को रात के अँधेरे में पहचान लेता था की वह परेशां और बीमार है. जिसके छूने भर से रेखा को मातृत्व के साथ हे अपने औरत होने का एहसास हो जाता था. अर्जुन वह वरदान था उनके लिए जो एक खूबसूरत चलिए था. कभी उनके पास होता तोह कभी अगले हे पल kai-kai दिन नजरे तरस जाती थी ध्यान से देखने को.

"ाचा अब उठ और पढ़ने जा. नहीं तोह तेरी दादी ने देख लिए तोह मेरी भी सहमत आ जाएगी.", वो उसको दुलारती बोली तोह अर्जुन की नजर उनके एक उभर पर जम्म गई. मेहंदी के रंग की इस साड़ी के नीचे उनके लाल ब्लाउज के एक उभर पर एक छोटा सा गीला धब्बा बन गया था जो थोड़ी देर पहले नहीं था. रेखा जी ने भी ध्यान दिए तोह उन्हें पता लग गया के अर्जुन कहा देख रहा है. थोड़ी शर्माती सी वह उसके सर को उठती फिर से बोली, "अब जा फिर बहोत काम भी है."

अर्जुन खड़ा हो गया और अपनी माँ के चेहरे के और एक बार देख कर बहार निकलता हुआ बोलै, "मतलब वह सपना नहीं था." और एक बचकानी मुस्कान उडाता बहार निकल गया.

'ये पागल समझ रहा थे के सपना था वह सब.' और अपने सर पे हाथ रख वह अकेले में हे शरमति सी मुस्काने लगी थी.

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लाइब्रेरी में बैठा अर्जुन आज भी वही 2 किताबे लिए था जिनके शीर्षक थे. 'शरीर- एक रहस्य' और 'हाउ तो हील योरसेल्फ'. और वह गहराई से उन्हें समझ रहा था.

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"दादी आपके लिए फ़ोन है, आपके भाई का गांव से.", कौशल्या जी घर के सामने रेहड़ी वाले से phal-sabji ले रही थी की अलका ने बहार आ उन्हें आवाज लगाई. कौशल्या जी को पता था के उनके दोनों भाई सिर्फ holi-diwali या जमीन की बात के लिए हे फ़ोन करते थे. कौशल्या जी के ये दोनों हे भाई तक़रीबन 58 और 66 साल के थे. लेकिन जैसा की प्रचलन में था वह बहिन के घर saal-tyohar हे आते थे.

"आ गई मई लक्समी. तू इधर ये सब्जी करवा ले ज्ञान से.", अलका को सब्जी लेने के लिए बोल वह अंदर आई थोड़े तेज कदमो से क्योंकि भाई तोह सिर्फ किसी जरुरी बात पर हे करते थे फ़ोन.

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"Hello, है बनने?", उन्होंने अपने भाई बनवारी का नाम लिए जो उन्हें सबसे प्यारा था और छोटा था. प्यार से उसको Banna-Banne हे बुलाती थी वह.

"जीजी, मई हंसमुख बोल रहा हु.", मंझले की काम्पटी आवाज सुनकर कौशल्या जी का दिल बैठ गया. सामने भी शांति च गई थी.

"है बिल्लू. तू घबराया क्यों हुआ है?", घबरा तोह वह खुद गई थी पल भर में हे. चेहरा शुन्य और मैं चिंतित.

"वो जीजी, बिल्लू गुजर गया जीजी. अपने भाई को अकेले छोड़ गया ..." और किसी बचे सा उनका ये बुजुर्ग भाई हिचकियाँ लेता रोने लगा. ऋतू काम से अंदर आई थी तोह देखा की दादी की आँखों से tap-tap आंसू गाल से लुढ़कते हुए साड़ी पर गिर रहे थे. इधर अलका सब्जी का थैला लिए अंदर आई तोह सामने का नजारा देख सन्न रह गई. दादी के हाथ से फ़ोन का हैंडल निचे गिर गया था और वह अपने पल्लू को मुँह पे रखती सुबकने लगी थी. ऋतू ने जल्दी से अपनी दादी को बाहों में भर लिए.

"कड़ी क्या है? माँ को बुला या दादा जी को. जल्दी जा ना." अलका दौड़ती से पिछले आँगन में गई तोह अपनी माँ ललिता जी और चची को दादी का हाल बताया वह दोनों भी भगति हुई अंदर आई तोह कौशल्या जी लगभग अचेत सी ऋतू के ऊपर लुढ़की थी.

"माँ, दादी को सदमा लगा है. आप इन्हे सम्भालो मई डॉक्टर बुला के लाती हु.", ऋतू ने अपनी दादी को बिस्टेर पर पकडे हे बोलै और रेखा जी ने अपनी सास को सीने से चिपका लिए. पल भर में हे पूरा घर वह इकठ्ठा था लेकिन ऋतू स्कूटरी दौड़ाती पास के नर्सिंग होम पहुँच गई. डॉक्टर को अपने साथ लेके हे वह 10 मिनट में अपने घर आ चुकी थी जहाँ अब दादी के पास रामेश्वर जी और छोल साहब थे. उन्हें अब होश था बस रोये जा रही थी. रामेश्वर जी के कहने पर उन्होंने अपनी नब्ज़ और रक्तचाप चेक करवाया तोह डॉक्टर ने सिर्फ एक इंजेक्शन उन्हें दिए और आराम करने को बोलै.

"पंडित जी, कोशिश करिये की माता जी जल्दी संभल जाए. ब्लूडप्रेससुरे ज्यादा हे काम हो गया है इनका. वैसे दवा तोह वही लेनी है जो चल रही है.", डॉक्टर अपना बैग लिए बहार निकल गया.

"भाभी, आप इतनी कमजोर तोह न थी. बताये तोह सही के हुआ क्या है? रोने से तोह कोई हल नहीं होगा."

"सतीश, मेरा भाई बनना ख़तम हो गया रे. मैं उस से मिल न पाई आखिरी बार.", रामेश्वर जी की भी आँखों में पानी आ गया लेकिन जल्दी से खुद को सँभालते वह बस अपनी धर्मपत्नी का सर सहलाते रहे. अलका ग्लूकोस के साथ दादी की बप की दवा लेकर अंदर आई तोह ऋतू ने उन्हें उठाते हुए खुद हे जबरदस्ती दवा खिलते हुए ग्लूकोस का एक घूँट पिलाया.

"कौशल्या ये बहोत बुरा हुआ, तेरे लिए तोह वह भाई काम बचा हे था. लेकिन जरा इन बचो को भी देख जो तेरे लिए आंसू बहा रहे है. मई अभी गाडी मंगवाता हु, तू रोना बंद कर अभी के लिए. और ऋतू बीटा, तेरी दादी के और मेरे 2 जोड़ी कपडे रख बैग में फिर मई निकलता हु." रामेश्वर जी को अपनी बीवी से गहरा प्यार था. उनकी आँख में आंसू देख वह भी रो दिए थे लेकिन जानते थे के वह मर्द है और उनकी बीवी का गम देखते हुए उन्हें मजबूत रहना हे पड़ेगा.

"भाभी, मई गाडी निकलता हु बस आप खुद को संभाले. भाई साहब मुझे 5 मिनट दीजिये.", छोल साहब सुबह वाले कपड़ो में हे थे अभी तक और उन्हें भी अपनी सगी से बढ़कर इन भाभी का दुःख सेहन न हुआ. आने वाले सभी काम भूल कर वह बस अपने घर चल दिए, भाभी को उनके गाँव ले जाने.

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"मई भी आपके साथ हे चलती हु.", अपने पापा को तैयार होते देख रेणुका ने जैसे उन्हें फैंसला सुनाया और कमरे में घुसते हे आनन् फानन में 2 सफ़ेद सूट बैग में रखती वह कपडे बदल कर बहार आ निकली. छोल साहब तैयार हे खड़े थे. इधर घर के बहार ऋतू बैग लिए कड़ी थी और आँगन में रामेश्वर जी कुरता पजामा पहने अपनी धर्मपत्नी को हौंसला दे रहे थे.

"सिर्फ मेरे कहने पर बस कुछ देर आंसू रोक लो कौशल्या. उस बचे ने तुम्हारी आँखों में आंसू देख लिए तोह अनर्थ हो जायेगा. डॉक्टर की बात याद है न?", कौशल्या जी कुछ हद तक संभल चुकी थी लेकिन आंसू निरंतर आक्न्हों से jhar-jhar बह रहे थे. अपने पति की बात सुनकर आँखों पर अपनी साड़ी रखती वो कोशिश करने लगी थी की घर से बहार जाते हुए वह खुद को सहज कर ले लेकिन ये मुमकिन नहीं था. बनवारी था हे ऐसा उनके लिए. राखी पर वो सूरज उगते के साथ हे अपनी जीजी के पास आ जाता था. जमीन में तीन हिस्से lad-jhaga कर करवाए थे उसने और नियम से साल में 2 बार वह अपनी बड़ी बहिन की फसल की आमदनी उनके खाते में जमा करवा देता था. रामेश्वर जी को भी उनका ये साला प्रिय था, शादी के बाद कितने हे दिन वह इनके यहाँ रहकर अपनी बड़ी बहिन की मदद करता था और उनके बचो पर तोह जान वार्ता था.

शादी भी 35 की उम्र में की थी पंडित जी के दबाव देने पर नहीं तोह वह तोह कहता था के सबकुछ सिर्फ उसके शंकर का है. औलाद हो गई तोह बंटवारा करना पड़ेगा. और बेचारे की किस्मत भी ऐसी थी की पत्नी का देहांत 10 साल के बाद हे हो गया था. पीछे एक लड़की छोड़ गई थी 8 साल की जो अब बनवारी के जीने का सहारा थी. फिर भी बनवारी अपनी बहिन और जीजा के साथ वैसा हे रहा जैसा वह उनकी शादी के समय था. बड़ा भाई हंसमुख बस नाम का हे हंसमुख था. बनवारी जहा एक मजबूत दिलेर इंसान था, मान मर्यादा में रहने वाला. हंसमुख तोह सिर्फ जोरू का गुलाम और डर के रहने वाला हलकी तबियत का भाई.

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साइकिल चलता अर्जुन घर के सामने पहुंचा तोह बड़ी गाडी बहार कड़ी थी. सीट पर छोल साहब बैठे दिखे तोह इधर घर से बहार दादा और दादी के साथ बैग उठाये ललिता जी और माधुरी दीदी गाडी की तरफ बढ़ते.

"ये क्या है? मुझे बिना बताये आप सब किधर जा रहे हो?" अर्जुन साइकिल गाडी के बराबर लता बोलै तोह रामेश्वर जी ने जल्दी से बीच वाली सीट पर अपनी पत्नी को रेणुका की बगल में बिठाते हुए सँभालते हुए जवाब दिए.

"वह बीटा हम जरा 2 दिन के लिए तेरी दादी के गांव जा रहे है कुछ जरुरी काम आ गया है. जल्दी हे आ जायेंगे और तू यहाँ घर का ध्यान ाचे से रखना क्योंकि तेरा भाई भी परसो हे आएगा." वह अर्जुन का ध्यान खुद पे करवा रहे थे इधर ललिता जी भी बीच वाली सीट पर अपनी सास के बगल आ बैठी. गाडी का पिछले दरवाजा खोलती माधुरी दीदी अंदर हुई और उनके पीछे ऋतू भी, जिसको अपनी दादी की हालत सेहन नहीं हो रही थी.

"आप कभी झूट नहीं बोलते दादाजी. लेकिन ऋतू दीदी की आँख में पानी था. कोई बात नहीं मई पूछूंगा नहीं क्योंकि आप खुद हे बता देंगे बाद में. लेकिन मेरी दादी का ख्याल रखना.", जाने ये कैसा अंदाज था उस लड़के का और कितनी तेज निगाह के वह भाप सबकुछ गया था लेकिन मौका सही न देख बस साइकिल जमीन पर गिरता अपने दादा के गले लग गया. और उन्होंने भी आज थोड़े कमजोर शरीर से अर्जुन को जकड लिए.

"मेरे बचे, सब ठीक है और तेरी दादी जल्द हे आएगी वापिस. अब हम चलते है शाम से पहले पहुंचना है.", कौशल्या जी का गाँव यहाँ से 3-साढ़े 3 घंटे की दुरी पर था और जैसा गाँव में रिवाज रहता है अंतिम संस्कार सूर्यास्त से पहले करते है. अर्जुन ने छोल साहब को हाथ जोड़ कर प्रणाम किआ तोह उन्होंने भी शांत चेहरे से सर हिला दिए. गाडी अर्जुन के साथ से निकलती बढ़ चली तोह कुछ देर वह उसको जाता देख बहार वैसे हे खड़ा रहा. गली से बहार निकल जब गाडी ओझल हो गई तोह साइकिल को उठता वह घर के अंदर चला आया. आज घर ऐसे शांत था के जैसे वह कोई और रहता हे न हो. न रसोईघर में कोई था और खाने की टेबल पर. हर समय चहकने वाला "शर्मा निवास" किसी खण्डार सा प्रतीत हो रहा था अर्जुन को. उसने पहले कभी ऐसा घर नहीं देखा था जहाँ मौत हुई हो तोह ये कुछ अलग हे था उसके लिए. जब वह सुबह गया था घर से तोह कितना hansta-khelta छोड़ कर गया था सबको लेकिन अभी का सन्नाटा दिल में चुभ रहा था.

"है गया बीटा? चल मुँह हाथ धो ले मई तेरा खाना लगा देती हु.", रेखा जी ने अर्जुन को ऐसे अकेले गुमसुम बैठे देखा तोह वह थोड़ा संभल कर बात करती उसके पास आई.

"माँ, क्या हुआ है घर में?", अर्जुन का ये सवाल सुनकर उन्हें सच बताना हे बेहतर लगा.

"बीटा वह तेरी दादी जी के छोटे भाई का स्वर्गवास हो गया है आज सुबह. तोह तेरे दादाजी उन्हें वहीँ गाँव लेके गए है. अब बहिन और भाई में तोह एक मजबूत रिश्ता होता हे है. चाहे मौत कितनी भी बड़ी सच्चाई हो लेकिन हर इंसान इस से घबराता और सेहन नहीं कर पता. उन्हें भी अपने भाई की अकाल मृत्यु का दुःख है और वो अकेली हे तोह बहिन है. इसलिए वह लोग गाँव गए है.", रेखा जी की बात सुनकर अर्जुन समझ गया की सच्चाई क्या है. पहले तोह उसका दिल घबरा गया था जब उसने अपने दादाजी को सहारा देकर दादी को गाडी में बिठाते देखा था और ऋतू दीदी की आँखों में आंसू.

"हाँ माँ. जीवन की सच्चाई ऐसी हे है. मृत्यु तोह निश्चित है लेकिन किसी अपनों को खो देने का दुःख सच में भारी हे होता होगा.", अनुभव नहीं था अर्जुन को अभी तक इसलिए वह शांत हो गया था के जिनकी मृत्यु हुई है उन्हें वह ज्यादा नहीं जानता था और दादी को अपने भाई का गम था. अर्जुन का सर सहलाती रेखा जी भी शांत थी और उन्हें फकर था के उनका बीटा अब बड़ा हो रहा है, समझदार होने के साथ हे. तारा के नीचे आने की आवाज से दोनों अलग हुए और रेखा जी रसोईघर में चल दी. मौत रिश्तेदारी में हुई थी तोह घर में इतना मातम नहीं था लेकिन अगले 13 दिन बस कोई दिया नहीं जलना था मंदिर और तुलसी में.
 
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