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Ghar-Sansar (2)
तारा, अर्जुन के साथ आरती दीदी ने खाना खाया तोह माँ के कहने पर अर्जुन प्रीती को बुलाने उनके घर आ गया. प्रीती कमरे में अकेली कुछ लिखने में खोई थी. हलके भूरे रंग की ये एक मोती सी डायरी थी जिसपर वह जाने के लिख रही थी की अर्जुन के आने का आभास न हुआ. अर्जुन आराम से बिस्टेर पर उसके पास पीठ के बल लेट गया जहाँ प्रीती विपरीत मुद्रा में डायरी पर झुकी हुई थी.
"तुम कब आये?", अर्जुन को यु अपने चेहरे में खोया देख प्रीती थोड़ी हैरान भी हुई के ये कब यहाँ आ गया फिर जल्दी से डायरी को बंद करती उठने लगी तोह अर्जुन ने हाथ पकड़ लिए.
"मुझसे भाग रही हो?"
"नहीं. बस एक मिनट रुको.", प्रीती हाथ छुड़वाती अपनी अलमारी में रखे एक बक्से में डायरी रख उसको टाला लगाती वापिस आराम से अर्जुन के पास बैठ गई. उनकी नजरे फर्श पर थी लेकिन चेहरा सपाट था.
"ठीक है मई चलता हु. मेरी माँ ने कहा था के प्रीती को बोल दू खाने के लिए.", बिना हे नजर घुमाये वह तेज कदमो से बहार निकल गया और जब तक प्रीती उसकी कही बात को समझती वह बहार जा चूका था. प्रीती के दिल में दर्द सा हुआ ये देख कर की आज अर्जुन कैसे प्यार से उसके करीब आया था और उसकी तरफ ध्यान हे नहीं दे पाई सिर्फ इस चिंता में की अर्जुन वह कितनी देर से था और उसने कितना पढ़ा होगा. लेकिन वह कभी इस तरह 'मेरी' माँ नहीं बोलता था. शायद आज अर्जुन को उसकी ये अनदेखी ाची नहीं लगी. सब सोचते हुए उसकी neeli-hari आँखों से पिघलता कांच सा नीचे लुढ़कने लगा. और वही अर्जुन चुपचाप बहार से सीढ़ियां चढ़ता अपने कमरे में चल दिए. कितनी हे देर तक वह सोचता रहा फिर आराम से आँखें बंद करता वह ध्यान लगते हुए विचलित मैं को शांत करने लगा. आज क्षण भर के लिए उसके दिल ने महसूस किआ था के वह प्रीती के पास हो कर भी पास नहीं था. और प्रीती का वह सपाट चेहरा, जैसे वह अर्जुन था हे नहीं. लेकिन इस सब से उबरने का एक हे सही तरीका था के वह अपने इस विचलित मैं को ध्यान लगते हुए शांत कर ले. शांत होते हे वह भी एक गहरी नींद में जा चूका था.
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"प्रीती, अर्जुन नहीं आया था क्या तुझे बुलाने? चची ने तोह उसको आधे घंटे पहले हे भेज दिए था. और मैंने भी अभी तक तेरे इन्तजार में खाना नहीं खाया.", अलका दीदी ड्राइंग रूम से हे बोलती सीधा प्रीती के कमरे में आ घुसी जहाँ वह घुटनो में सर दबाये बैठी थी बिस्टेर से तक लगाए.
"ोये क्या हुआ तुझे?", थोड़ी चिंता से उन्होंने प्रीती का चेहरा सीधा किआ तोह उसकी नम्म लाल आँखें और घुटने पर गीले निशान देख वह घबरा गई थी. "प्रीती.."
उनकी इस तेज आवाज से जैसे प्रीती सदमे से बहार आई और अलका से लिपट गई.
"दीदी, आज शायद एक बड़ी गलती हो गई मुझसे. वो नाराज हो कर चले गए यहाँ से सिर्फ मेरी एक सोच की वजह से.", प्रीती फफक रही थी और अलका उसकी पीठ सेहला रही थी. ऋतू शायद कोई बेहतर हल निकाल सकती थी किसी भी समस्या का. लेकिन अलका से भी प्रीती का दर्द देखा न गया तोह गले लगाए हुए हे उसने प्रीती से कहा.
"तू जानती है प्रीती की उसकी सांस पर सबसे ज्यादा नाम तेरा हे है. और प्यार में नाराज होना और मानना भी तोह जरुरी है. और हर मंजिल सीढ़ी और आसान तोह नहीं होती? तू उस से प्यार करती है या तुझे अब अपने प्यार पर भी शक है?", उनकी बात से रोना तोह काम हो गया प्रीती का लेकिन वह परेशां भी हो गई थी की अलका दीदी ने उसके ऊपर ये सवाल कैसे कर दिए.
"आपको क्या लगता है?", प्रीती ने भीगी आँखों से हे कहा.
"वो तुझसे नाराज नहीं हो सकता लेकिन अगर तू मानती है के तेरी गलती है तोह ज्यादा देर मत कर. और वैसे भी तुझे उसको यही मन लेना चाहिए था. आगे राह मुश्किल हो जाएगी तेरी अगर थोड़ी बड़ी बात हो गई कभी. वह सबसे ज्यादा प्यार बेशक तुझसे करता है लेकिन वो बदल रहा है और मैंने खुद ये बात देखि है की वह अब सबकुछ अपना लेता है बिना जाहिर किये की उसको बुरा लगा है या ाचा.", ऋतू शायद बेहतर होती लेकिन अलका ने सीढ़ी राइ दे दी थी प्रीती को, ज़िन्दगी भर के लिए.
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"मैं चलती हु आपके साथ.", इतना बोलकर प्रीती बाथरूम में चली गई तोह अलका सोचने पर मजबूर हो गई की प्रीती ने ऐसा क्या किआ होगा जिसका अर्जुन बुरा मान सकता है. बात तोह बिलकुल भी प्रीती ऐसी कभी नहीं कर सकती, अर्जुन कोई गलत हरकत कर नहीं सकता कभी, प्रीती के साथ तोह सपने में भी नहीं. फिर क्या हुआ होगा.?
प्रीती चुपचाप बहार निकली और ज्यादा बात किये अलका दीदी के साथ चल दी उनके घर की तरफ.
"वो ऊपर होगा अपने कमरे में तू बहार से हे चली जा ऊपर. सब नीचे हे है और अभी यही रहने वाले है क्योंकि घर पे तोह आधे लोग है नहीं." अलका की बात सुनकर प्रीती हलके कदमो से सीढिया चढ़ती ऊपर अर्जुन के कमरे की और चल दी. हर कदम आज उसको भारी लग रहा था. एक डायरी का पन्ना आज ये करवा देगा की वह अर्जुन को नाराज कर देगी? आज उसने अपने प्यार पर संदेह किआ था की अर्जुन उसकी मर्जी के बिना हाथ तक नहीं लगता तोह कैसे उसने ये सोच लिए के वह उसकी डायरी को पढ़ेगा. बस ऐसे हे सोच में डूबी जब वह कमरे के अंदर दाखिल हुई तोह आज अर्जुन के बिस्टेर पर तकिये नहीं थे, वही नीचे फर्श पर गिरे पड़े थे. और वह बिस्टेर पर सीधा सोया हुआ था दोनों हाथ पेट पर रखे.
'इतनी चुभ गई तुम्हे मेरी वह एक अनदेखी अर्जुन?' प्रीती ने उसको बचपन से देखा था की वह कैसे सोता था और तकिये को कैसे अपने मुँह के नीचे दबा कर रखता था. एक करवट के बल, किसी बचे की तरह. अपनी सोच को लगाम देती वह बिना आवाज किये अर्जुन से थोड़ी दुरी पर बैठ गई.
"तुम्हे एहसास हुआ प्रीती की धड़कन अगर दिल से दूर हो तोह कैसा लगता है? आज वह तुम्हारा दिल मुझे महसूस नहीं कर रहा था. पहली बार ऐसा लगा जैसे मेरा तुम्हारे पास आना तुम्हे परेशां कर गया हो. वह चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा था जैसा तुम्हारे बिस्टेर से खड़े होते हुए मैंने देखा. Shak-sandeh-shanka.
ऐसा हे कुछ था न तुम्हारे मैं में.?", अर्जुन सोया नहीं था बस ध्यान इतना गहरा हो गया था के शरीर सोने की स्थिति में पहुंच चूका था. लेकिन प्रीती की आहात उसने दरवाजे से पहले हे महसूस कर ली थी.
"अर्जुन, मुझे माफ़ कर दो प्लीज. मेरी गलती है के मैंने उस इंसान पर शक किआ जो मेरा सबकुछ है. बस एक वही डायरी है जो मैं नहीं चाहती की तुम कभी उसको हाथ लगाओ या देखो. मैं उसमे इतना खो गई थी की पहली बार मुझे तुहारा एहसास नहीं हुआ लेकिन एहसास होते हे गलती से शक कर बैठी. प्लीज अर्जुन, तुम्हारा वह से इस तरह वापिस आ जाना अब दर्द बढ़ा रहा है. एक बार मुझे माफ़ कर दो अर्जुन चाहे सजा दे दो लेकिन मुझे अपने सीने से लगा के बता दो की प्रीती तुम्हारी धड़कन है." उसका रुदन इतना करूँ और दर्दभरा था की खुद अर्जुन को महसूस होने लगा के वह खुद भी गलत था कहीं न कहीं. हर इंसान का एक तनहा समय होता है जिसमे वह उस जगह होता है जो सिर्फ उसकी होती है. आज पता चल गया था की बेशक प्यार जितना भी हो swayam-ekant में दखल देने से पहले सामने वाले को खुद का एहसास करना उतना हे जरुरी है जितना उसके प्यार की इज़्ज़त करना.
"तुम गलत नहीं हो सकती प्रीती. मई बैलबुद्धि हु न तोह मई उस लम्हे में वह आ गया जहाँ शायद कुछ पल के लिए तुम अपनी दुनिया में थी. आज तुम्हारा दिल दुखाया है मैंने लेकिन आइंदा अगर ऐसा हुआ तोह सजा मुझे मिलेगी.", प्रीती को कास के अपने सीने से लगाए वह उसको अपने ऊपर लिटाये रहा जब तक दोनों की धड़कन ek-samaan न हो गई. प्रीती के आंसू उसको अपने जिस्म में जैसे तेजाब से लग रहे थे. इतना प्यार करने वाली इस मासूम लड़की का भी एक अपना दायरा है जिसकी इज़्ज़त करना जरुरी था.
"मई बहोत बुरी हु न अर्जुन? तुम्हे कभी खुद को प्यार नहीं करने देती. आज तुम आये तोह देखो फिर से मैंने तुम्हारा वो पल खराब कर दिया जहा हम दोनों अब तक हो सकते थे.", प्रीती को अब भी बुरा लग रहा था की कैसे अर्जुन की अनदेखी कर दी थी उसने लेकिन कितनी जल्दी अर्जुन ने उसको अपने सीने से वैसे हे लगा लिए था.
"अब जैसी भी हो ये ज़िन्दगी तोह तुम्हारे साथ हे काटनी पड़ेगी. जैसे तैसे या फिर ऐसे वैसे.", उसका इतना रोना अर्जुन से देखा न गया तोह जो काम उसको ाचे से आता था उसने वही किआ. प्रीती से वैसा हे मजाक करना जिस से वह उसकी नीली आँखों वाली बिल्ली के रूप में आ जाती थी. उसकी 'मानो बिल्ली"
"काटनी पड़ेगी? मैं अभी kaat-ti हु तुम्हे.", पल भर में हे दोनों वैसे हो गए थे जैसे वो रहते थे. नखरे से अर्जुन की गर्दन पर दांत गदति वह फिर उसके चेहरे को देखने लगी जो उसके नीचे था. अर्जुन ने खुद हे उसका सर नीचे दबाते हुए आंसुओ से गीले चेहरे को चूमते हुए सुर्ख गुलाबी होंठ अपने मुँह में भर लिए. प्रीती भी आँखें बंद करती बस अपने इस आशिक़ का प्यार फिर से खून में चलता महसूस करने लगी थी. आज अर्जुन का ये चुम्बन उसकी रूह में उतरता एहसास करा रहा था के वो प्रीती के जीने के लिए कितना जरुरी है. 30 मिनट में वह मरने की हालत में आ गई थी अगर ऐसा कभी एक दिन के लिए हो गया तोह शायद वह अगले दिन का सूरज न देख पायेगी. अर्जुन ने आराम से उसको करवट के बल बिस्टेर पर करते हुए बाहों में भर लिए और आँखें बंद कर ली. प्रीती भी उसके सीने से लगी उसके साथ हे शांत हो गई थी.
प्यार में नाराजगी बड़ी बात नहीं. बस उसका बरक़रार रहना एक बड़ी सजा हो सकता है.
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"ओह Laila-Majnu, उठो भी अब. अभी कानूनन शादी नहीं हुई है तुम लोगो की जो ऐसे दिन में हे हमबिस्तर पड़े हो, वो भी दरवाजा खोले.", अलका ने झिंझोड़ते हुए अर्जुन को उठाया तोह प्रीती भी शर्माती सी फिर से उसके सीने लग गई.
"ये तोह शर्माने लगी है. मैंने वापिस चिपकने के लिए नहीं उठने के लिए कहा है.", अलका दीदी की बात पर अर्जुन ने अब बिस्टेर छोड़ा और सीधा बाथरूम में घुस गया. अलका ने प्रीती की कमर पर चुटकी काटी तोह वो उचकते हुए उन्हें देखने लगी फिर उनके गले लग गई.
"थैंक यू. थैंक यू सो मच दीदी. मेरी सच में जान निकल गई थी और अगर ये यहाँ पास नहीं होता तोह फिर पक्का मैं मर्डर हे जाती.", अलका मुस्कुरा रही थी इन दोनों की नादानी पर. उसको पता था के ये दोनों एक घंटे से ज्यादा हे नाराज नहीं रहने वाले थे बेशक फिर अर्जुन को हे जाना पड़ता इसके पास.
"अब न तू मेरी हर बात मानेगी. और पहली बात ये की आज रात तू मेरी है, जैसे ऋतू की.", अलका दीदी ने प्रीती की टांग खींचते कहा.
"हमर कुछ aisa-waisa नहीं है.", शर्माती हुई वह वैसे हे गले लगी बोली. इधर अलका दीदी ने उसका एक उभर दबा दिए तोह वह उछलती सी अलग हो गई.
"ये तोह सच में किसी बॉल से सख्त है. मतलब ऋतू ठीक कहती थी की तू 2 टेनिस बॉल हमेशा साथ में रखती है. आज रात फिर टेनिस मैच पक्का.", अलका दीदी मजे लेती कड़ी हुई तोह प्रीती ने अब मुस्कुराते हुए कहा.
"होमेग्राउण्ड या विजिटर? आप भी क्या याद करोगी की कितनी दिलदार लड़की से पला पड़ा है.", उनको उलझन में छोड़ वह हिरणी सी उछलती ड्राइंग रूम से होती पिछले आँगन की तरफ दौड़ी तोह अलका भी हंसती सी नीच भाग गई.
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"ओह मेरी बची. देख के देख के.", वह भगति नीचे आई तोह आँगन में सामने से आती रेखा जी ने प्रीती को देखा तोह इतनी हे देर में वह उनके सीने से आ लगी. उसके मुस्कुराते चेहरे पर भी उन्हें वह महीन आंसुओं के निशान दिख गए.
"तुझे सताया अर्जुन ने?", रेखा जी की बात पर वो वैसे हे गले लगी बस 'ना' हे बोली और पीछे से आती अलका को देखा तोह फिर उन्होंने अलका से पुछा
"ये रोइ थी अलका? और फिर ये सब क्या है. पहले अर्जुन को भेजा था इसको बुलाने तोह वह वापिस नहीं आया. और तू भी एक घंटे बाद आ रही इसको लेकर."
"चची इसके दादा आज घर पे अकेले छोड़ गए तोह बेचारी डर के रोने लगी थी. फिर मैंने बोलै इसको की आज तू मेरे साथ सोयेगी और मई साडी रात तेरा ध्यान रखूंगी. तब कही जा के ये चुप हुई और इतनी खुश हो गई के देखो सारे घर में दौड़ती फिर रही है.", प्रीती अब रेखा जी की बांह से लगी अलका दीदी को देख रही थी. उनकी बात का मतलब समझती वह बस मुस्कुरा रही थी.
"ाची बात है न और अगर अलका के पास दिल न लगे तोह मेरे कमरे में आ जाना.", रेखा जी ने उसको अपने साथ लगाए हे डाइनिंग टेबल की तरफ ले जाते अलका को खाना लगाने के लिए कहा.
"अब तुम दोनों चुपचाप खाना कहो और फिर आराम कर लेना. अलका मुन्ना तैयार हो गया क्या जाने के लिए?", कुर्सी पर प्रीती के सामने बैठ उन्होंने अर्जुन क लिए पुछा तोह अलका दीदी ने चची को बता दिए के वह तैयार होक जाने लगा है स्टेडियम. और फिर 2 प्लेट में खाना लेकर वह वही आ गई प्रीती के पास.
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हलकी गीली सड़क सुबह की बारिश से और नहाये हुए वृक्ष. इतने सुहाने नज़ारे को थोड़ा विचलित सी करती वह laal-chaandi के रंग की बुलेट 25-30 की रफ़्तार से चलता अर्जुन आज कुछ अलग हे महसूस कर रहा था. राह चलते हुए लोग भी जैसे उसको हे देख रहे थे और किसी के चेहरे पर तोह khud-ba-khud प्रशंशा झलक रही थी. वही अर्जुन आज थोड़ी देर पहले हुई घटना को सोच mand-mand मुस्कुरा रहा था. एक छोटा सा मजाक प्रीती से करना कितना भारी पड़ गया था लेकिन उसने प्रीती को बताया नहीं था के वह आज उसको सत्ता रहा था. फिर दुःख भी बहोत हुआ था के प्रीती आज इतना रोइ सिर्फ उसके इस बर्ताव से. बेशक वह अपनी यादों में थी और अर्जुन के आने का एहसास उसको नहीं हुआ था. उस सपाट चेहरे पर भी प्रीती की आँखों में तोह वही था बस.
'कितनी पागल है ये लड़की भी न. इसलिए हे तोह मेरी धड़कन है वह.' मुस्कुराता वह ये सोच रहा था के स्टेडियम से पहले आने वाले बड़े चौक पर पुलिस का एक नका लगा हुआ था. ब्रेक लगाई तोह देखा ट्रैफिक लाइट बंद पड़ी थी और आमने सामने का यातायात सफ़ेद वर्दी वाले पुलिस के 4 मुलाजिम रोके हुए थे.
"अंकल ये क्या हो रहा है?", साथ हे खड़े स्कूटर पर बैठे अधेड़ से चस्मा लगाए व्यक्ति से पुछा उसने.
"बीटा वह मंत्री आ रहा होगा कोई. जनता को परेशां करना तोह बस इन्ही लोगो के हाथ में है नहीं तोह पुलिस ऐसा नहीं करती.", इंसान शायद ज्यादा हे परेशां था इन राजनेताओ की शाही ज़िन्दगी से. अर्जुन बस मुस्कुराता अपनी मोटरसाइकिल को साइड स्टैंड पर खड़ा किये सामने देख रहा था. बीच से गुजरती सड़क पर साईरन की आवाज सुनाई दी जो थोड़ी दूर से आ रही एक सफ़ेद गैप्सी, जिपर लाल बत्ती तिकी थी से आती लगी. और इधर सड़क के सामने से एक लड़का जाने कसीसे कैंची साइकिल चलता वहां बीच चौराहे पर आ पंहुचा. पुलिस वाले से चूक हुई थी और ये लड़का भी शायद साइकिल को रोक न पाया था. 12-13 साल का ये डरा सा लड़का जैसे हे चौक के बीच आया वैसे हे गाडी के टायर की चीखती आवाज हुई और 5 गाड़ियां कतार से रुक गई. अर्जुन किसी चीतः सा दौड़ता वह पहुंच गया मोटरसाइकिल अपनी जगह छोड़. साइकिल सड़क के बीच गिरी थी और लड़का सेहमा सा सामने काली वर्दी पहने उस रोबदार ड्राइवर को अपनी और आते देख रहा था. किसी पुलिस के सिपाही में भी हिम्मत न हुई के वह अपनी जगह छोड़ कर वह beech-bachav करता लेकिन तभी 'तड़ाक' की आवाज आई और लड़का अपने गाल पर हाथ रखे बस रो पड़ा.
"बहनचोद बाप की सड़क है जो को करतब दिखा रहा है? मर्डर जाता तोह गले पद जाता अभी. 2 कौड़ी के साले बचे पैदा करके सड़क पर छोड़ देते है.", वो लम्बा सा रोबीला ड्राइवर मिजाज से हे किसी कसाई सा था जिसने इतने छोटे बचे पर करारा हाथ जड़ दिए था.
'काड्डाआक' ये आवाज तोह पहले वाले से भी कही दसगुना तेज थी लेकिन इस बार वो ड्राइवर जमीन पर पड़ा था, अर्जुन के इस झन्नाटेदार थप्पड़ से. फुर्ती से 3 आदमी जिप्सी से बहार लपके, हाथ में बंदूके लिए और सर पे गोल काली टोपी में.
"ोये लड़के. रुक नहीं तोह अंजाम के लिए तू जिम्मेदार होगा.", एक ने पास आते इतना कहा हे था के गर्दन दबोचते हुए अर्जुन ने उसको जिप्सी के बोनट पर टिका दिए.
"तुम्हारे बाप की सड़क है क्या? और दिमाग घुटने में है जो एक बचे पर हाथ उठा दिए इस आदमी ने और तुम मुझे धमका रहे हो.", पीछे से भागते हुए आये 3 पुलिस वालो ने उसको पकड़ लिए था और इधर सफ़ेद अम्बस्सडोर कार से कुर्ते पाजामे में एक ऊर्जावान बुजुर्ग नीचे उतरे जिन्होंने इशारे से सबको रुकने को कहा तोह 2 बन्दूक जो अर्जुन पर तन्नी थी नीचे झुक गई और पुलिस वाले भी पीछे हट गए.
"सही बात है बीटा. सड़क इनके बाप की नहीं है और इस ड्राइवर ने भी गलत किआ बचे पर हाथ उठा कर.", इतना बोलकर वह मंत्री जी अर्जुन के पास आते उस छोटे लड़के के गाल पर हाथ फिरते उसका होंठ देखने लगे जिस से हल्का खून रिस रहा था.
सड़क के दोनों तरफ ाची खासी भीड़ हो चुकी थी वाहनों की आवाजाही रुकने से और बाद में इस घटना के होने से. इधर इन मंत्री महोदय ने अपने ड्राइवर को आँख दिखाई तोह वह सकपकता सा हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लगा.
"अंकल जो समझदार थे वह सभी तोह अभी भी देखिये नियम से खड़े है अपनी जगह. ये बेचारा बचा अगर छोटी सी गलती कर गया तोह काम से काम ऐसी प्रतिकिर्या तोह नहीं मिलनी चाहिए थी इसको. कल यही फिर समाज के नियम तोड़ेगा तोह लोग गरीबी, जाट या जाने किस और बात के इल्जाम लगा देंगे इसके गलत राह पर चलने के लिए. लेकिन सिर्फ यही याद रखेगा इस घटना को जिसने इसके अंतर्मनन को पीड़ित किया है.", अर्जुन हाथ जोड़ कर वापिस मुड़ने लगा तोह मंत्री जी ने आवाज लगते हुए उसको रोक लिए. बड़े ध्यान से देख रहे थे वह इस इंसान को. 6 फ़ीट से ऊँचा, शरीर से इतना बड़ा लेकिन मासूम चेहरा और गंभीर बातें करता ये नौजवान. उन्होंने सभी गाड़ियां चौक से आगे करने को कहा और ट्रैफिक को जारी करने का निर्देश देते फुटपाथ पर अर्जुन के कंधे पर हाथ रख के खड़े हो गए. एक पोलिसवाले ने भी प्यार से उस छोटे लड़के को सड़क पार करवाते हुए जेब से कुछ मीठी गोलियां भी खाने को दी. और वह भी उस जगह चलता आ गया जहा 4-5 अंगरक्षको और एक बड़े पुलिस अधिकारी के साथ अर्जुन और मंत्री जी खड़े थे.
"क्या मई तुम्हे जानता हु बीटा?", उन्होंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए कहा तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.
"लेकिन जाने क्यों मैंने चेहरा भी देखा है कही और ये बात भी सुनी हुई सी थी. जो तुमने कही की जुर्म के पीछे कोई उस चिंगारी को नहीं देखता जो बहोत पहले लगी होती है इंसान के मैं में बस सभी वह देखते है जो आज हुआ होता है. किसी बड़े इंसान ने ऐसा हे कुछ कहा था मुझे, लेकिन याद नहीं आ रहा."
"पंडित रामेश्वर शर्मा, जी वह मेरे दादाजी है. उनसे हे मैंने सीखा था के 20 साल बाद किसी अपराधी को पकड़ने से ाचा है आज हे उसके साथ होने वाले अन्याय को रोक लिए जाये. और शायद कभी आप उनसे मिले हो.", हाथ जोड़ते हुए उसने ये बात कही इधर एक ट्रैफिक पुलिस वाला जो नाके के समय अर्जुन की तरफ खड़ा था वह उसकी मोटरसाइकिल को खींचता हुआ उनकी तरफ ला रहा था.
"वाह बीटा. पंडित जी (आह सी भरते हुए उन्होंने कहा).. मेरे मित्र है वह और बड़े एहसान है उनके भी मुझपर. और तुम्हारा बाप हैं न शंकर वह जवानी में ऐसा हे था, बस बातें अलग थी उसकी." अर्जुन के बाप का जिक्र करते वह मुस्कुराये तोह वह पुलिस अधिकारी जो साथ खड़ा तोह वो भी हंस दिया.
"गलत बात तोह नहीं कही मैंने सुरेश?", अपने इस अधिकारी को हँसते देख उन्होंने भी वैसे अंदाज में कहा
"नहीं सर. बिलकुल सही बात कही आपने डॉ शंकर के लिए. ये विनोद अभी तक एम्बुलेंस में होता और शंकर बात तोह सुनता भी कहा. बस आपको देख कर बेशक गले लग जाता.", जिस ड्राइवर को अर्जुन ने थप्पड़ मारा था अब वह भी खिसियाता सा मुस्कुरा रहा था.
"ाचे लड़के हो बीटा तुम. पंडित जी को तुम पर नाज होगा. उन्हें बताना के हमने इज़्ज़त और प्यार भेजा है उनके नाम. शंकर से तोह मिलना हो हे जाता है जब उसके शहर जाते है तोह." एक बार उसको गले लगते हुए वह आगे चलने लगे तोह अर्जुन ने पीछे से आवाज लगाई.
"अंकल नाम हे नहीं पता तोह क्या कहूंगा?", मंत्री जी के अंगरक्षाक ने कार का दरवजा खोल दिए था तोह बैठने से पहले हे वह मुस्कुराते हुए बोले, "चंदू बोल देना वह समझ जायेंगे." और बैठ कर बढ़ चले अपने काफिले के साथ.
"बीटा तुम पंडित जी के बचे हो?", मोटरसाइकिल में चाबी लगते हुए अर्जुन बैठने लगा तोह ये 2 सितारा वर्दी वाले पुलिस कर्मी ने कंधे पर हाथ रखते पुछा. बड़े प्यार से देख रहा था वो अब अर्जुन को जहाँ पहले यही था जिसने उसकी ब्याह पकड़ ली थी घटना के समय.
"जी अंकल. अर्जुन शंकर शर्मा नाम है मेरा. और आपका है श्री तेजपाल शर्मा. और ये कहीं सुना है मैंने.", किक लगाने से पहले अर्जुन इन व्यक्ति को गौर से देखने लगा.
"बस बीटा इतना कह दिए बहोत है के पहले देखा है. तुम्हारी माँ रेखा को कहना के उनका बड़ा भाई भी अब उनके शहर में है. बड़े ताऊजी का बीटा हु मई उनके और तुम्हारा मां हु.", अर्जुन नीचे उतारकर उनके पाँव छूने लगा तोह उन्होंने गले से लगा लिए. गोर और ाचे कद्द के थे वह, जैसे उसकी माँ और बहने भी थी.
"आप हमारे घर नहीं आएंगे?" अर्जुन ने उन्हें देखते हुए पुछा.
"आऊंगा न बीटा लेकिन बहिन के घर तोह सिर्फ त्यौहार या रक्षाबंधन पर हे आते है. रेखा हे तोह एक बहिन है हमारी पूरे 3 परिवार में. और तुम तोह अपने नाना के घर शायद 10-11 साल पहले हे आये थे. ये यूनिवर्सिटी के पास वाले थाने का इंचार्ज मैं हे हु. आना बीटा कभी अभी तोह शायद तुम्हे भी कही जाना है और मुझे भी.", एक बार और गले लगने के बाद वह प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते चलने लगे और उनके साथ हे बाकी सिपाही भी, जो अर्जुन का चेहरा देख कर गए थे की ये लड़का जहा दिखे कभी उलझना नहीं इसके साथ.
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"15 मिनट देरी से हो और कोई सफाई नहीं चाहिए. 100 uthak-baithak करने के बाद बलबीर के पास दौड़ जाओ.", जोगिन्दर जी ने आते हे अर्जुन से कहा और अर्जुन बैग एक बेंच पर रखता बिना कपडे बदले अपनी सजा पूरी करने लगा. बाकी लोग अभ्यास में लगे थे और स्टेडियम में आते हुए अर्जुन को आज ज्यादा लोग नहीं दिखे थे. 100 दंड बैठक पूरी करते हे शरीर गरम हो गया था. अपना बैग उठा के वह जल्दी से कपडे बदल कर गयम में पहुंचा जहाँ बलबीर एक योग की गद्दी पर लेता सपने ले रहा था.
"उठो मुंगेरी भैया. और आ जाओ इस बेंच पर.", बलबीर के गाल थपथपा के अर्जुन रोड में प्लेट लगाने लगा तोह हँसता हुआ बलबीर भी उठ खड़ा हुआ.
"आज लगता है पहली सजा मिल हे गई हीरो को.?", रोड के एक तरफ खड़े होते उसने अर्जुन को देखते कहा जिसके शरीर पर हल्का पसीना था.
"हाँ भाई. आप सही कहते हो के वो द्रोणाचार्य हे है. साँसे लेने से पहले हे ऐसे देख लिए जैसे उनको निशाना मिल गया जिसपर तीर लगाने का इन्तजार कर रहे थे काफी समय से.", हँसता हुआ वह बेंच पर लेट कर अभ्यास करने लगा और फिर दोनों अगले आधे घंटे तक बस वही रहे.
"हाँ तोह आज अर्जुन तुम मार खाओगे और बलबीर तुम इसके श्री पर उचित दुरी से 3-1-1-3 का अभ्यास करोगे. चेस्ट गार्ड लगा लो. 5 सेट के बाद दोनों जगह बदल लेना.", 'ये द्रोणाचार्य नहीं महिषासुर है भाई' उनकी बात सुनकर बलबीर ने वह सफ़ेद रंग का छाती पर pehan-ne वाला कवच अर्जुन की पीठ पर बांधते हुए कहा तोह दोनों हंसी मजाक करते फिर लगन से अभ्यास करने लगे. आज अर्जुन को समझ आया था के शरीर के किस भाग को सही से पंच करना होता है. बलबीर भी प्रहार वैसा हे कर रहा था जैसे अभ्यास में करना होता है. सिर्फ लक्ष्य तक अपना सटीक पंच लेकिन कोई ज्यादा दबाव नहीं. अर्जुन ने भी वही अनुसरण किआ. फिर अभ्यास होने पर जोगिन्दर जी ने खुद दोनों के हाथो से दस्ताने खोले और गार्ड हटाए.
"ये पी लो लेकिन इस शीशी को कोशिश करना 6-8 घूँट में आराम से ख़तम करने की.", ये बोतल लगभग 250-300 मल की थी जो दोनों को दी थी उन्होंने, हलके हरे रंग का पानी था. 5 मिनट में हे दोनों तारो तजा हो चुके थे.
"कल अगर तुम्हे समय लगे तोह 3-4 बजे आ जाना. रविवार है तोह वैसे तोह अवकाश है लेकिन यहाँ पर कल और परसो State-level के मैच है. देखने से शायद कुछ बेहतर समझ पाओगे. और बलबीर तोह होगा हे तोह तुम दोनों का tal-mel बेहतर रहेगा.", एक टोलिया देते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन ने चेहरा साफ़ करने के बाद सर हिला दिए.
"ये मई घर से धुलवा लाऊंगा सर.", अर्जुन ने तार पर टंगे हुए 5-6 तोलिये भी उतारते हुए कहा तोह वह आज के दिन में पहली बार मुस्कुराये.
"ाची बात है. चलो अब तुम दोनों निकलो मुझे अपने खिलाडी तैयार करने है.", पीठ पर चपत लगते हुए उन्होंने बलबीर को भी बहार का रास्ता दिखा दिए.
"भाई कुछ भी बोल. कोच साहब न आदमी ाचे है लेकिन कोच सख्त. वह अखरोट की तरह.", बलबीर कंधे पर हाथ रखने की कोशिश कर रहा था लेकिन लम्बाई ज्यादा होने से बस हथेली अर्जुन के कंधे पर रख उसके साथ बहार आ गया.
"बलबीर भाई आओ आपको मेरी रानी से मिलवाता हु.", उनका साथ लिए वह अपनी मोटरसाइकिल के पास आया तोह विकास पहले से बैठा था उसकी मोटरसाइकिल पर और 4-5 लड़के बस देखने लग रहे थे के ये क्या चीज है.
"भैया ये लो.", अर्जुन ने चाबी उछलते हुए कहा तोह विकास ने वह लपक ली लेकिन purv-vat हे बैठा मुस्कुराता रहा. दोनों गले लग गए जब अर्जुन उसके पास गया तोह. विकास बलबीर से भी बड़े प्यार से मिला था.
"बड़े चर्चे हो रहे तेरी इस सवारी के भाई. चौक पे तू हे था जिसने आज मंत्री का सुरक्षा कर्मी लपेट दिए?", उसकी हंसी बता रही थी की बात फ़ैल चुकी है और बलबीर को अब समझ आया के अर्जुन देरी से क्यों आया. विकास ने चाबी मोटरसाइकिल में लगाई और बलबीर को बीच में आने को कहा. आखिरी में अर्जुन को बिठा के वह तीनो निक्कर में हे बहार की तरफ चल दिए.
"झोटा है भाई ये तेरी मोटरसाइकिल. 250 किलो वजन लाड के तोह और बढ़िया चल रही. मेरे पास भी है एक लेकिन इस बार गांव जाऊंगा तोह लेके आऊंगा.", सच में हे विकास बड़ी दक्षता से चला रहा था इस गाडी को. उसके और अर्जुन जैसे हे जवान तगड़े बने थे इस सवारी के लिए.
"भाई ये आपकी हे तोह है फिर गांव वाली वही रहने दो. वैसे भी तोह आप आधा समय तोह बहार रहते हो. अगर कभी मुझे अपने गाँव लेकर गए तोह वही मई चलने का मजा लूंगा न.", अर्जुन के प्यार से वह गदगद हो गया था. बुलेट को एक बड़ी जूस की दूकान के बहार रोका तोह वह पहले से हे कई जवान खिलाडी खड़े जूस पी रहे थे या इन्तजार कर रहे थे. कोई 15-16 लोग थे वह इस समय लेकिन जैसे हे उन्होंने विकास को देखा तोह वह बारी बारी से उसके पाँव छूने लगे. कुछ उनमे से बड़े थे तोह वह बस गर्दन झुका कर मिल रहे थे.
"अरे बस बस भाई. आराम से पीयो और स्टेडियम के बहार मैं पहलवान विकास कोणी. यो देखो मेरे भाई के सोचेंगे मेरे बारे में? प्रजापति ोये, 3 गिलास बना भाई आये है मेरे.", ठेठ हरयाणवी में बोलते हुए विकास ने एक बेंच उस जूस कुटेर के बहार रखते हुए दोनों को वह बैठाया.
"भाई ले चलूँगा गाँव भी. ये पहली तारीख को मई बहार जा रहा हु आज पासपोर्ट आ गया था मेरे, चाचा ने हे बनवा के दिए है. फेर जब आऊंगा तोह एक नेशनल कैंप है 2 दिन का उसके बाद चलेंगे मेरे गांव. तेरे घर मई अपने आप संदेसा भिजवा दूंगा.", अर्जुन की पीठ पर हाथ रखते हुए वह बता रहा था अगले कम्पटीशन के बारे में. फिर थोड़ा मजाक बलबीर के साथ भी किआ.
"रे बलबीर, कल तेरे थप्पड़ लगा मैंने सुना.", बलबीर नजरे झुकता सा इस बात से शर्मा गया. अर्जुन हैरानी से देखने लगा तोह विकास ने आँख मार दी.
"भाई वह ग़लतफहमी हो गई थी उस लड़की को. बिना सुने हे कान गरम कर दिए मेरा.", बलबीर सफाई दे रहा था लेकिन विकास पेट पकड़ एक हंसने लगा तोह अर्जुन बस उन्हें देख मुस्कुराने लगा.
"ग़लतफहमी? भाई एक तोह तू पव्वा है, ऊपर से वह छोरी 6 फुट की. साले ने टांग हे सेहला दी बता भाई.", और फिर वह हँसते हुए गिरने हे लगा के बलबीर ने हे हाथ पकड़ लिए जो किसी लड़की सा शर्मा रहा था. बात पल्ले पड़ी तोह अर्जुन हँसता हुए दिवार से टकरा गया.
"अरे शिकारी तू मत हंस. तेरी खबर भी है मेरे पास. चुन्नी तोह छोरी मुँह पे बाँध लेगी लेकिन kad-kathi और स्कूटर पे जिसके साथ थी वह तोह दिखेगा. के नहीं?", अर्जुन की हंसी एकदम से ृक्क गई. और विकास फिर हंसने लगा उसका चेहरे देख.
"आपने कहा देखा? वह तोह दोस्त है बस भैया?", अर्जुन झेंप गया था.
"अरे तेरी दोस्त ने हे कल धरा था इसके कान के नीचे. दोपहर में खाना खा रहे थे मेस में. और ये जनाब उस से टकराने के बाद नीचे झुक के उसकी पिंडली सेहला गए. दे दिया कान पे जाटनी ने." अब बलबीर भी हंस रहा था उसके साथ. इतने में हे वह छोटे कद का जूस की दूकान वाला फलों के जूस के 3 बड़े गिलास ट्रे में लेके उनकी तरफ आ गया.
"भाई पता है तू ऐसा वैसा लड़का नई है और वह जाटनी भी ाची चोरी है. बस समाज है न वह लड़का लड़की को एक नजर से देखता है. और कोई बड़ी बात नई तू टेंशन मत ले. वैसे आज तेरा जो पन्गा हुआ तोह तू बच कैसे गया.?" विकास ने बात बदलते हुए कहा.
"भैया मई तोह बाकी के लोगो को भी धार लेता लेकिन फिर पुलिस वाले आ गए और वह मंत्री जी. पता चला के दादाजी के दोस्त है और वह अंकल जो पुलिस इंचार्ज थे, मेरे मां हे निकले.", अर्जुन ने सर नीचे करते जूस का घूँट पीया तोह बलबीर गिलास मुँह से लगाए दोनों की तरफ देख रहा था.
"पुलिस वाले तोह भाई होते हे मामे है और तेरे वाला तोह असली निकल गया.. हाहाहा.. लेकिन भाई किस्सा मशहूर हो गया आज ये. सच में दिलेर आदमी है जो वर्दी वाले के थप्पड़ जड़ दिए बीच सड़क में.", विकास प्रशंशा के साथ प्यार भी दिखा रहा था.
"भाई अपने कोच साहब भी कल इसके जाने के बाद कह रहे थे के ये विभाग के अधिकारी गौतम जी की नजर में आ चूका है. वो उनके पीछे पड़े है के इसको हैवीवेट के लिए तैयार करो. अपनी तरफ से इस केटेगरी में कोई मुक्केबाज नई है अभी तक. लेकिन उन्होंने अभी जवाब नई दिए कोई.", बलबीर की बात पर अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन विकास शांति से घूँट भरता बोलै.
"वो करेंगे भी नहीं इसको तैयार. कोच साहब ने साफ़ बता दिए था के अर्जुन को एक मुक्केबाज से ज्यादा प्रशिक्षण देना है. इस साल ये बेशक मर्जी से डिस्ट्रिक्ट खेल ले सितम्बर में लेकिन अगले साल ये मेरे खेल में आने वाला है. और छोटे बस अपना ध्यान और समर्पण कोच पे रखिओ, खेल कोई भी हो फरक नहीं पड़ता. और उठो अब इसका घर का टेम हो गया रे बलबीर." प्रजापति को गिलास पकड़ते हुए इस बार विकास ने चाबी बलबीर को पकड़ा दी तोह वह अर्जुन की तरफ देखने लगा.
"चला रे. इसकी तरफ के देखे है, तेरा दिल है और फिर तेरे तोह पास थी भी पिछले साल वो फौजी वाली मोटोरोसीक्ले.", बलबीर ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तोह इस बार अर्जुन बीच में और विकास आखिरी में बैठा था.
"भाई वो मोटरसाइकिल मेरे बड़े भाई की थी. गोली खा के बिस्टेर पे था 4 महीने तोह मई ले आया था यहाँ. लेकिन एक दिन भाई जरूर ये सवारी लूंगा, चाहे चली हुई लू.", बलबीर को शायद गहरा लगाव था इस से और सबसे बड़ी बात थी की इन दोनों से बेहतर तरीके से चलता हुआ स्टेडियम के अंदर आया तोह दोनों को नीचे उतारते हुए एक टांग पर पूरी मोटरसाइकिल गुआंते हुए एक कला गोल घेरा जम्में पर बना दिए जिसको अर्जुन हैरानी से देख रहा था.
"छोटे भाई. बड़ी से बड़ी चीज भी काबू कर सकते हो बस उस से प्यार करो और खुद को उसपर हावी रखो. सरपंची झोटा भी एक पतली रस्सी के साथ बालक लिए घुमते है क्योंकि वह उस से प्यार भी करते है और खाना देके ये बता देते है के वह मालिक है.", विकास ने बलबीर के हाथ से चाबी अर्जुन को देते हुए कहा तोह अर्जुन समझ गया था के control-niyantran क्या चीज है.
"और भाई इस्पे वो लिखवा ले पीछे 'रानी'." बलबीर ने हँसते हुए कहा तोह विकास ने भी कन्धा हलके से दबाते अर्जुन को जाने को बोलै.
"चल शेर. फिर मिलते है और बलबीर है न पक्की हड्डी है, बहोत सीखा सख्त है तुझे. इसको लगता होगा के मैं इसको जानता नई या देखता नई. लेकिन विकास बोलता काम था लेकिन अब उसके पास उसके 2 भाई और है." बलबीर को अपने साथ लेकर वह हाथ हिलता हॉस्टल की तरफ निकल लिए तोह अर्जुन भी खुश होता हुअबाध लिए अपनी 'रानी' को वैसे हे आराम से चलता.
"भैया, ये साड़ी दिखाना जरा.", अर्जुन आज मॉडल टाउन की उस दुकान पर खड़ा था जहाँ वह अलका दीदी को लेकर आया था ड्रेस दिलवाने के लिए. यहाँ एक पोरपङ्ख के रंग की चमकदार साड़ी को देखने के बाद उसने काउंटर पर खड़े व्यक्ति से कहा तोह प्लाटिक की मूरत पर नजर डालने के बाद उसने एक दराज से वैसी हे साड़ी का डब्बा निकल के सामने कर दिए.
"शिफॉन की बेहद उम्दा साड़ी है भाई ये. न कोई tadak-bhadak और न हे कोई jari-tar. लेकिन कपडे का कोई मुकाबला नहीं है. हाथ में लेकर देखो.", उसने वह एक तरफ से खोलते हुए सामने की तोह अर्जुन उस मुलायम रेशमी कपडे को महसूस करने लगा. ये बिलकुल वैसा हे थे जैसे उसकी माँ की कलाई का स्पर्श.
"इसका ब्लाउज का कपडा ये है, थोड़ा सा ज्यादा गहरा लेकिन इसपर कोई प्रिंट नहीं है. ये रेशमी है और अंदर से अस्तर लगवाया जा सकता है अगर जरुरत हो." अपनी बात पूरी करते उसने वह अलग कपडा भी दिखाया. सब देखने के बाद अर्जुन ने बैग से अपना बटुआ निकला तोह उसमे 500 के 4 नोट और 100 के 2 नोट हे थे. बैंक से वह कबि अपने पैसे नहीं निकलता था क्योंकि हमेशा उसकी अलमारी में जेबखर्ची वह एक बक्से में जमा रखता था और वह भी खरच नहीं होती थी. दुकानदार ने थोड़ा भांप लिए था उसका चेहरा के वह शायद चिंतित होगा कीमत के लिए. बात भी वही थी अर्जुन के सोचने की. रेणुका बुआ के साथ और प्रीती के अनुभव से उसको लगा था के साड़ी तोह 3-5 हजार तक आती होगी.
"भाई ये 1800 की है लेकिन बस 2 हे पीेछे है दूकान पर और अप्रैल से नया माल आएगा इसलिए सभी पर 25 प्रतिशत की छोट है."
"आप पैक कर दीजिये. अगर ये महंगी भी होती तोह मई कल आ कर ले जाता. पैसे तोह हैं मेरे पास और कम् पड़ जाते तोह फिर घर से ले आता. लेनी है तोह फिर दाम जो भी होता.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए 1500 दूकान वाले की तरफ बढ़ा दिए. उसने भी साड़ी को वापिस डब्बे में डालने के बाद एक प्लास्टिक के बैग में पैक करते हुए 200 रुपये वापिस कर दिए.
"भाई तुम पहले भी आ चुके हो हमारी दुकान पर और हम ग्राहक खराब नहीं करते. कुछ काम भी होते तोह मई दे देता साड़ी तुम्हे. पैसों का क्या है आने होंगे तोह आएंगे नहीं तोह नहीं." वह हँसते हुए बोलै तोह अर्जुन हाथ मिलते हुए बहार आ गया.
"Hello अर्जुन.", कान में ये मीठी आवाज सुनाई दी तोह वह मोटरसाइकिल में चाबी लगता रुक कर पीछे देखने लगा. आकांक्षा कड़ी थी ठीक पीछे वही पेड़ के नीचे. मुस्कुराती हुई किसी बिजली सी चमकदार.
"Hello आकांक्षा. कैसी हो? और यहाँ?", अर्जुन थोड़ा करीब चलते हुए बोलै तोह वह भी अब नजदीक आ कर कड़ी हो गई थी. Kaali-peeli धारियों वाली कासी टीशर्ट और नीली चुस्त जीन्स में खुल्ले बाल, बेहद आकर्षक लग रही थी वह. और अर्जुन को देख कर तोह चेहरे पर जैसे अलग हे नूर सा आ गया था.
"हाँ वह यहाँ आई थी पार्लर में. बाल ठीक करवाने, फिर स्कूल जाने पर टाइम मिले न मिले. पापा चले गए थे घर वापिस कुछ काम था उन्हें तोह बस इधर से ऑटोरिक्शा लेने लगी थी. तुम तोह एक बार भी नहीं मिले इन छुट्टियों में.", अपना बताने के बाद थोड़ी शिकायत से बोली तोह अर्जुन ने पैकेट उसके हाथ में दिए और मोटरसाइकिल पर बैठ गया.
"आओ चलते हुए बात करते है. रिक्शा के पैसे मुझे दे देना.", उसकी बात सुनकर वह खुसी से चहकती सी पास आ कड़ी हुई.
"वाह. तोह अब तुम्हे ये बाइक मिल गई घर से."
"हाँ आज हे मिली है. दादाजी का गिफ्ट है आने वाले जन्मदिन का." आकांक्षा लड़को की तरह पीछे बैठ गई थी डब्बे को दोनों के बीच रखती. अर्जुन ने मोटरसाइकिल को घूमते हुए सड़क पर चढ़ा लिए.
"एक तोह मुझे पता नहीं था के तुम रहती कहा हो. दूसरा जब पता चल गया तोह फिर सोचा के तुम्हारे घर तोह आ कर मिलना ठीक नहीं. ऐसा होता तोह तुम उस दिन खुद हे मुझे रोक लेती.", अर्जुन की बात सुनकर आकांक्षा ने वह डब्बा बीच से निकलते हुए एक तरफ कर दिए और एक हाथ उसकी कमर में रखती पीछे से चिपका कर बैठ गई.
"दिल तोह था के तुम्हे रोक लू. लेकिन जो मेरे साथ में मेरी सहेली कड़ी थी वह तुम्हारी हे बात कर रही थी और संदीप भी साथ में था तोह मैंने चुप रहना ठीक समझा. वैसे मेरे घर में ऐसा कुछ नहीं है. एक्चुअली, तुम तोह कभी भी आ सकते हो.", उसके गोल नरम दूध अर्जुन को अपनी पीठ पर हलके दबते महसूस हो रहे थे. यहाँ से उनके सेक्टर तक की ये सड़क भी शांत हे थी. वैसे भी शहर की ये साइड hari-bhari और bheed-bhaad से दूर थी.
"जब टाइम मिला तोह जरूर आऊंगा. लेकिन ये भी तोह पता नहीं के तुम किस समय होती हो घर और किस समय नहीं.", अर्जुन का तरीका अलग था जिस से वह जान सके की आकांक्षा कहा रहती है या कैसे समय निकलती है.
"मई तोह रहती हे घर पे हु. तुमने देखा नहीं के मेरे कोई दोस्त नहीं है सिर्फ गली में हे 2-3 है जिन से थोड़ा बहोत बात कर लेती हु. और Papa-mummy तोह हमेशा ऑफिस. शाम को 6 बजे हे आते है वापिस लेकिन पापा तोह ज्यादातर 10 बजे और कभी कभी टूर के कारण आते भी नहीं.", आकांक्षा अपना चेहरा उसके कंधे से लगती बता रही थी वो सब जो अर्जुन ने पुछा भी नहीं था. एक यही लड़का तोह था जिस पर उसका दिल आया था और पूरे स्कूल का दिल इस लड़की पर था. अर्जुन को भी पता था के वह उसको किस नजर से देखती है लेकिन वह दोस्त या बस एक गहरा दोस्त हे मानता था खुद को.
"मंडे देखता हु अगर लाइब्रेरी नहीं गया तोह मई आऊंगा तुमसे मिलने. Ice-cream खाओगी आकांक्षा?", अपने सेक्टर के बहार एक 'क़्वालिटी Ice-Cream' की रेहड़ी कड़ी देख अर्जुन ने वही इस बड़ी पार्किंग पर मोटरसाइकिल रोक ली थी. इस जगह अभी dukaan-showroom सिर्फ काटे गए थे लेकिन अभी वह पूरी तरह से खाली हे पड़ी थी.
"चॉकलेट कोर्नेत्तो." मुस्कुराते हुए आकांक्षा ने कहा तोह अर्जुन ने उस रेहड़ी वाले की तरफ देखा.
"अभी लाया साहब.", अपने रोज के स्वाभाव के मुताबिक इस आदमी ने अर्जुन को साहब हे कहा, जैसा वह अधिकतर गाडी वाले या premi-jodo के सामने लड़को को कहता था. फिर एक कोन बढ़ता वह चलके आया तोह अर्जुन ने पर्स से 100 का नोट बढ़ा दिए. आकांक्षा मोटरसाइकिल पे बैठी थी और अर्जुन बस सामने खड़ा उसको खाते देख रहा था.
"तुम नहीं खाओगे?"
"नहीं मई ice-cream नहीं खता.", हँसते हुए उसने कहा तोह आकांक्षा ने थोड़ा प्यार दिखते अपनी हे ice-cream उसके मुँह के पास कर दी. बिना हे जगह देखे के माहौल कैसा है. जबकि वह वैसे भी कोई खास लोग थे हे नहीं. रेहड़ी वाला आगे चल दिए था और ikka-dukka कोई सड़क से cycle-scooter पर निकल रहा था. यहाँ दोनों पेड़ के नीचे इस खुली पार्किंग पर खड़े थे. अर्जुन ने भी दिल रखने के लिए सिर्फ होंठो से छु भर लिए.
"मतलब सच में नहीं खाते?", वह उसके होंठो पर लगी ice-cream देखते हुए बोली. अंदर से तोह आकांक्षा को महसूस हुआ था के जैसे अर्जुन ने उसके हे होंठो को चूम लिए था. लेकिन वैसे हे हल्का मुस्कुराती वह खाती हुई बोली. "फिर तोह हम चल हे पड़ते है यहाँ से, कोई फायदा नहीं अगर अकेले हे खानी है तोह.", उसने नखरे से कहा था जिसपर अर्जुन मुस्कुरा दिए. अपने टंगे पिछली सीट पर दोनों तरफ करती वह अर्जुन को दिखने लगी थी की अब यहाँ से चलो और अपनी सीट पर बैठो.
"चलो तुम्हारी ice-cream तुम्हे मुबारक.", बैठने से पहले अर्जुन ने अपने होंठ उसके गाल पर लगते हुए चूम लिए और फिर बिना प्रतिकिर्या देखा आगे बैठते हुए किक मार कर मोटरसाइकिल उतनी हे रफ़्तार में आकांक्षा के घर की और मदद ली. पीछे बैठी हुई आकांक्षा तोह जैसे अभी तक सपने में थी. वो हमेशा शर्माने वाला, अकेला सा लड़का आज कैसे उसके गाल खुलेआम चूम गया था. और अब वह बातें करता भी hansta-muskurata है. फिर अपने गाल को छु कर उसने मुस्कुराते हुए बची ice-cream फेंक दी और अर्जुन के गर्दन पर हल्का सा चूम लिए.
"जितनी तुमने वापिस की थी वह मैंने फिर से तुम्हे दे दी.", उसकी बात को समझकर अर्जुन बस हंस दिए.
"जब अगली बार मिलूंगा तब जरूर ाचे से वापिस करूँगा." उनके घर के बहार बुलेट को रोकते उसने फिर से आकांक्षा को देखा जो एक दिलकश मुस्कान देती उसको हे देख रही थी.
"ाचा चलता हु." धीरे से उसने ये कहा तोह आकांक्षा ने भी हाथ हिला दिए और फिर उसको मोटरसाइकिल मदद कर वापिस जाते देखने लगी. हैंडल पर पैकेट लटकाये वह आराम से जा रहा था, गोल शीशे में पीछे कड़ी आकांक्षा को देखता.
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"बीटा ये लड़का कौन था? पहले तोह नहीं देखा इसको.", विनय तनेजा, जो घर के अंदर से हे अर्जुन को देख कर चौंक गया था अपनी बेटी से पूछ रहा था. इंसान ये भी अमीर था और घर भी शानदार बना रखा था. 2 कार हरदम घर में रहती थी और 1 घर के गेट पर. तनेजा जहा एक गहरे रंग का आदमी था वही उसकी बीवी जैसे उम्र को धोखा देती एक जवानी से भरपूर पंजाबी महिला थी. गोरी, गदराई और ाची padhi-likhi. एक हे बेटी थी जो बिलकुल हे अपनी माँ पर गई थी.
"पापा, वह स्कूल फ्रेंड है मेरा. अर्जुन शर्मा. पार्लर के पास हे दिख गया था तोह घर तक ड्राप करने आ गया. घर भी हमरे हे सेक्टर में और ाचा लड़का है.", अपने कमरे की तरफ जाती हुई वह बस इतना बताती निकल गई.
"कौन था बेटी? और ऐसे हे घर से भेज दिए पीना chai-thanda पूछे.", अंदर ड्राइंग रूम में कुछ काम करती उसकी माँ ने पुछा तोह आकांक्षा बस मुस्कुराती सी अपने कमरे में चल दी और दरवाजा बंद कर लिए.
"ये लड़का डॉ शंकर का बीटा था. हमारी हे बेटी के स्कूल में उसके साथ पढता है.", अंदर आ कर विनय अपनी बीवी के सामने बैठ कर बोलै तोह सुषमा तनेजा बस मुस्कुरा दी नाम सुनकर.
"ाचे घर से है तोह लड़का ाचा हे होगा.", विनय क्या जवाब देता बस वह कुछ याद करता सा गाल को सहलाता बस 'हम्म्म्म' हे बोल पाया. बेटी ने पसंद भी किआ तोह वही जिसने खुद बाप को अपनी बेटी सामान लड़की की चुदाई करते रेंज हाथ पकड़ा था. वाह ऋ किस्मत कैसा खेल खेला. कल को बेटी के सामने वह इस से नजर कैसे मिलाएगा.
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घर पहुंच कर सीधा वह अपने कमरे में भाग गया मोटरसाइकिल को खड़ा करते हे. पता तोह चल हे गया होगा घरवालों को उसके आने का लेकिन हाथ में पकड़ा पैकेट लिए वह जल्दी से कमरे में आया और अपनी अलमारी में पीछे की तरफ उसको छुपता वह जूते खोल साफ़ कपडे लिए तारा के कमरे में आया.
"हाँ तोह मैं नजर आ हे गई आखिर.", तारा ने अर्जुन को अपने सामने देखा तोह नाराजगी से कहा.
"तुम नजरो से दूर हे कब हुई थी.", वैसे हे उसके पास जा कर बाँहों में लेते उसने कहा तोह तारा शर्माती सी पीछे होने लगी.
"वैसे तोह कहती हो मई पास नहीं आता. और अब खुद दूर कर रही हो.", अर्जुन ने टीशर्ट के ऊपर से हे उसका नरम और मोटा उभर दबाते हुए कान में सरगोशी की तोह इतने में हे उसकी छूट में सनसनी होने लगी.
"आठ... गंदे बचे पहले नाहा तोह लो. पसीने के स्मेल आ रही है.", नखरे और शर्म से तारा ने इतना कह तोह दिए लेकिन ये पसीने की गंध उसको उत्तेजित कर रही थी. और अर्जुन ने भी वही बात कह दी.
"पसीना तोह तुम्हे भी बहोत आता है. और फिर परवाह भी नहीं करती जब दोनों हे पसीने में लिपटे होते हैं.", उसकी बंद हो चुकी आँखों को देखते हुए अर्जुन ने तारा के होंठ चूसने शुरू किये तोह वह खुद हे एक हाथ से अपना उभर दबवाती दूसरे से उसका सर जोर से अपने मुँह पर दबाने लगी थी. अर्जुन को डर भी था के कही कोई ऊपर न आ जाये. कस के एक बार चूम कर उसने तारा को छोड़ दिए लेकिन वो प्यासी नजरो से बस उसको हे देख रही थी.
"खाने के बाद बाथरूम में. बस ध्यान रखना सबसे पहले हम दोनों हे खाना खाये. उतना समय बहोत होगा हमारे लिए फिर रात का कुछ पता नहीं के कोण यहाँ सोये और कोण कहा.", अर्जुन ने दूसरा उभर भी दबाते हुए कहा और तारा ने भी हाँ में सर हिलाते हुए जवाब दिए. वह से निचे आने के बाद वो सीधा बाथरूम में घुस गया.
"टोलिया तो ले ले बीटा.", रेखा जी ने आवाज लगाई तोह अर्जुन ने टीशर्ट उतरने के बाद दरवाजा खोलते हुए उन्हें देखा और रेखा जी भी उसके चौड़े सीने और प्यारी सूरत को देखती हक्क पर टोलिया तंग कर मदद गई. दरवाजा फिर से बंद कर वह नहाने लगा इधर रेखा जी अपने बेटे के लिए दूध तैयार करने में लगी थी. अलका और प्रियंका को प्रीती थोड़ी देर पहले हे अपने घर लेकर चली गई थी उन्हें बता कर की आज रात वह वही रहने वाली है और खाना भी पारवती बना देगी. पुछा तोह उन्होंने आरती से भी था लेकिन आरती ने मन कर दिए था ये कहते हुए की आज रात को वह अपनी बुक ख़तम करने वाली है. कल वह प्रीती के साथ उसके घर हे रहेगी. इधर नाहा कर अर्जुन बहार आया तोह उसकी माँ ने टेबल पर दूध का बड़ा गिलास और 2 लाडू रख दिए थे.
"ला ये टोलिया मुझे पकड़ा और इधर बैठ.", उन्होंने टोलिया अर्जुन के हाथ से लेते हुए ाचे से उसका सर सुखाया और फिर आरती को आवाज दी.
"हाँ ताईजी. बताइये.", एक सफ़ेद टीशर्ट और गुलाबी प्रिंट वाला पजामा पहने और आँखों पर नजर का चस्मा लगाए वह आई तोह अर्जुन ने बड़े गौर से उसको देखा. कितनी मासूम और हमेशा अकेले में रहने वाली. बस ज्यादातर वह अपनी बहनो में हे बातें कर लेती थी नहीं तोह बस किताबे और उसका कमरा.
"यहाँ बैठ जा अपने इस छोटे भाई के भी पास. और मई तेरी कॉफ़ी लेके आती हु.", रेखा जी ने टोलिया तार पर डालते हुए कहा और फिर वह रसोईघर में चली गई.
"आपका दिल नहीं करता सबके साथ रहने को? हमेशा कमरे में अकेली घुसी रहती हो आप.", अर्जुन ने आँखों में देखते हुए कहा तोह आरती ने नजरे नीची कर ली.
"वैसे हमेशा तोह अकेली नहीं रहती. और ये 2 बुक्स तुमने दी है जो मुझे, ये बस मुझे कहीं जाने हे नहीं देती. आज रात पूरी हो जायँगी बस. कल से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.", आरती धीमी आवाज में वैसे हे बोल रही थी बिना उसको देखे.
"पता है ये चस्मा आपकी ख़ूबसूरती और बढ़ा देता है. और ये इतनी लम्बी पलके, ये शीशे पर नहीं लगती क्या?", अर्जुन को ऐसे तारीफ करते देख गोर गाल हलके गुलाबी होने लगे और इतने में हे रेखा जी 2 कप लिए वही टेबल पर आ गई. आरती की बगल में baith-te हुए उन्होंने अर्जुन से कहा.
"वो आरती को अपने साथ जरा मार्किट ले जाना बीटा. देसी घी और थोड़ा सामान लेके आना है. फिर बादल बने हुए है तोह रात में जाना ठीक नहीं होगा.", एक पर्ची और पैसे अर्जुन की तरफ करती वह बोली तोह अर्जुन ने लड्डू कहते वह पकड़ लिए.
"माँ, मैं कह रहा था के आरती दीदी तोह व्यस्त है क्योंकि किताब पढ़ना ज्यादा जरुरी है इनके लिए बजाये की ये छुट्टियां हमारे साथ बिताने के तोह आप हे चल लीजिये मेरे साथ मार्किट.", अर्जुन की इस बात पर थोड़ा चौंकते हुए आरती ने देखा तोह अपनी ताईजी को हँसते देख वह झेंप गई.
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं. मैंने तोह ये कहा था न के रात को पढूंगी और वैसे भी ख़तम होने हे वाली है. मैं चल रही हु मार्किट.", आरती ने जवाब देने के बाद बस ख़ामोशी से कप को होंठो से लगा लिए.
"माँ फिर आपको तोह मई कल हे लेके जाऊंगा अपने साथ. आज आरती दीदी हे सही.", अर्जुन ने अपनी माँ को मुस्कुरा कर कहा तोह वह थोड़ा अचंभित सी देखने लगी.
"मैंने मार्किट क्यों जाना है? कोई काम नहीं है मुझे तोह वह."
"ओफ्फो, मुझे कुछ लेना है मेरे लिए तोह फिर आप चलेंगी तोह गलती नहीं होगी न. और वैसे भी अभी मुझे खरीदारी करनी कहाँ आती है.", अब वह समझी की अर्जुन क्या कह रहा है.
Ghar-Sansar (2)
तारा, अर्जुन के साथ आरती दीदी ने खाना खाया तोह माँ के कहने पर अर्जुन प्रीती को बुलाने उनके घर आ गया. प्रीती कमरे में अकेली कुछ लिखने में खोई थी. हलके भूरे रंग की ये एक मोती सी डायरी थी जिसपर वह जाने के लिख रही थी की अर्जुन के आने का आभास न हुआ. अर्जुन आराम से बिस्टेर पर उसके पास पीठ के बल लेट गया जहाँ प्रीती विपरीत मुद्रा में डायरी पर झुकी हुई थी.
"तुम कब आये?", अर्जुन को यु अपने चेहरे में खोया देख प्रीती थोड़ी हैरान भी हुई के ये कब यहाँ आ गया फिर जल्दी से डायरी को बंद करती उठने लगी तोह अर्जुन ने हाथ पकड़ लिए.
"मुझसे भाग रही हो?"
"नहीं. बस एक मिनट रुको.", प्रीती हाथ छुड़वाती अपनी अलमारी में रखे एक बक्से में डायरी रख उसको टाला लगाती वापिस आराम से अर्जुन के पास बैठ गई. उनकी नजरे फर्श पर थी लेकिन चेहरा सपाट था.
"ठीक है मई चलता हु. मेरी माँ ने कहा था के प्रीती को बोल दू खाने के लिए.", बिना हे नजर घुमाये वह तेज कदमो से बहार निकल गया और जब तक प्रीती उसकी कही बात को समझती वह बहार जा चूका था. प्रीती के दिल में दर्द सा हुआ ये देख कर की आज अर्जुन कैसे प्यार से उसके करीब आया था और उसकी तरफ ध्यान हे नहीं दे पाई सिर्फ इस चिंता में की अर्जुन वह कितनी देर से था और उसने कितना पढ़ा होगा. लेकिन वह कभी इस तरह 'मेरी' माँ नहीं बोलता था. शायद आज अर्जुन को उसकी ये अनदेखी ाची नहीं लगी. सब सोचते हुए उसकी neeli-hari आँखों से पिघलता कांच सा नीचे लुढ़कने लगा. और वही अर्जुन चुपचाप बहार से सीढ़ियां चढ़ता अपने कमरे में चल दिए. कितनी हे देर तक वह सोचता रहा फिर आराम से आँखें बंद करता वह ध्यान लगते हुए विचलित मैं को शांत करने लगा. आज क्षण भर के लिए उसके दिल ने महसूस किआ था के वह प्रीती के पास हो कर भी पास नहीं था. और प्रीती का वह सपाट चेहरा, जैसे वह अर्जुन था हे नहीं. लेकिन इस सब से उबरने का एक हे सही तरीका था के वह अपने इस विचलित मैं को ध्यान लगते हुए शांत कर ले. शांत होते हे वह भी एक गहरी नींद में जा चूका था.
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"प्रीती, अर्जुन नहीं आया था क्या तुझे बुलाने? चची ने तोह उसको आधे घंटे पहले हे भेज दिए था. और मैंने भी अभी तक तेरे इन्तजार में खाना नहीं खाया.", अलका दीदी ड्राइंग रूम से हे बोलती सीधा प्रीती के कमरे में आ घुसी जहाँ वह घुटनो में सर दबाये बैठी थी बिस्टेर से तक लगाए.
"ोये क्या हुआ तुझे?", थोड़ी चिंता से उन्होंने प्रीती का चेहरा सीधा किआ तोह उसकी नम्म लाल आँखें और घुटने पर गीले निशान देख वह घबरा गई थी. "प्रीती.."
उनकी इस तेज आवाज से जैसे प्रीती सदमे से बहार आई और अलका से लिपट गई.
"दीदी, आज शायद एक बड़ी गलती हो गई मुझसे. वो नाराज हो कर चले गए यहाँ से सिर्फ मेरी एक सोच की वजह से.", प्रीती फफक रही थी और अलका उसकी पीठ सेहला रही थी. ऋतू शायद कोई बेहतर हल निकाल सकती थी किसी भी समस्या का. लेकिन अलका से भी प्रीती का दर्द देखा न गया तोह गले लगाए हुए हे उसने प्रीती से कहा.
"तू जानती है प्रीती की उसकी सांस पर सबसे ज्यादा नाम तेरा हे है. और प्यार में नाराज होना और मानना भी तोह जरुरी है. और हर मंजिल सीढ़ी और आसान तोह नहीं होती? तू उस से प्यार करती है या तुझे अब अपने प्यार पर भी शक है?", उनकी बात से रोना तोह काम हो गया प्रीती का लेकिन वह परेशां भी हो गई थी की अलका दीदी ने उसके ऊपर ये सवाल कैसे कर दिए.
"आपको क्या लगता है?", प्रीती ने भीगी आँखों से हे कहा.
"वो तुझसे नाराज नहीं हो सकता लेकिन अगर तू मानती है के तेरी गलती है तोह ज्यादा देर मत कर. और वैसे भी तुझे उसको यही मन लेना चाहिए था. आगे राह मुश्किल हो जाएगी तेरी अगर थोड़ी बड़ी बात हो गई कभी. वह सबसे ज्यादा प्यार बेशक तुझसे करता है लेकिन वो बदल रहा है और मैंने खुद ये बात देखि है की वह अब सबकुछ अपना लेता है बिना जाहिर किये की उसको बुरा लगा है या ाचा.", ऋतू शायद बेहतर होती लेकिन अलका ने सीढ़ी राइ दे दी थी प्रीती को, ज़िन्दगी भर के लिए.
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"मैं चलती हु आपके साथ.", इतना बोलकर प्रीती बाथरूम में चली गई तोह अलका सोचने पर मजबूर हो गई की प्रीती ने ऐसा क्या किआ होगा जिसका अर्जुन बुरा मान सकता है. बात तोह बिलकुल भी प्रीती ऐसी कभी नहीं कर सकती, अर्जुन कोई गलत हरकत कर नहीं सकता कभी, प्रीती के साथ तोह सपने में भी नहीं. फिर क्या हुआ होगा.?
प्रीती चुपचाप बहार निकली और ज्यादा बात किये अलका दीदी के साथ चल दी उनके घर की तरफ.
"वो ऊपर होगा अपने कमरे में तू बहार से हे चली जा ऊपर. सब नीचे हे है और अभी यही रहने वाले है क्योंकि घर पे तोह आधे लोग है नहीं." अलका की बात सुनकर प्रीती हलके कदमो से सीढिया चढ़ती ऊपर अर्जुन के कमरे की और चल दी. हर कदम आज उसको भारी लग रहा था. एक डायरी का पन्ना आज ये करवा देगा की वह अर्जुन को नाराज कर देगी? आज उसने अपने प्यार पर संदेह किआ था की अर्जुन उसकी मर्जी के बिना हाथ तक नहीं लगता तोह कैसे उसने ये सोच लिए के वह उसकी डायरी को पढ़ेगा. बस ऐसे हे सोच में डूबी जब वह कमरे के अंदर दाखिल हुई तोह आज अर्जुन के बिस्टेर पर तकिये नहीं थे, वही नीचे फर्श पर गिरे पड़े थे. और वह बिस्टेर पर सीधा सोया हुआ था दोनों हाथ पेट पर रखे.
'इतनी चुभ गई तुम्हे मेरी वह एक अनदेखी अर्जुन?' प्रीती ने उसको बचपन से देखा था की वह कैसे सोता था और तकिये को कैसे अपने मुँह के नीचे दबा कर रखता था. एक करवट के बल, किसी बचे की तरह. अपनी सोच को लगाम देती वह बिना आवाज किये अर्जुन से थोड़ी दुरी पर बैठ गई.
"तुम्हे एहसास हुआ प्रीती की धड़कन अगर दिल से दूर हो तोह कैसा लगता है? आज वह तुम्हारा दिल मुझे महसूस नहीं कर रहा था. पहली बार ऐसा लगा जैसे मेरा तुम्हारे पास आना तुम्हे परेशां कर गया हो. वह चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा था जैसा तुम्हारे बिस्टेर से खड़े होते हुए मैंने देखा. Shak-sandeh-shanka.
ऐसा हे कुछ था न तुम्हारे मैं में.?", अर्जुन सोया नहीं था बस ध्यान इतना गहरा हो गया था के शरीर सोने की स्थिति में पहुंच चूका था. लेकिन प्रीती की आहात उसने दरवाजे से पहले हे महसूस कर ली थी.
"अर्जुन, मुझे माफ़ कर दो प्लीज. मेरी गलती है के मैंने उस इंसान पर शक किआ जो मेरा सबकुछ है. बस एक वही डायरी है जो मैं नहीं चाहती की तुम कभी उसको हाथ लगाओ या देखो. मैं उसमे इतना खो गई थी की पहली बार मुझे तुहारा एहसास नहीं हुआ लेकिन एहसास होते हे गलती से शक कर बैठी. प्लीज अर्जुन, तुम्हारा वह से इस तरह वापिस आ जाना अब दर्द बढ़ा रहा है. एक बार मुझे माफ़ कर दो अर्जुन चाहे सजा दे दो लेकिन मुझे अपने सीने से लगा के बता दो की प्रीती तुम्हारी धड़कन है." उसका रुदन इतना करूँ और दर्दभरा था की खुद अर्जुन को महसूस होने लगा के वह खुद भी गलत था कहीं न कहीं. हर इंसान का एक तनहा समय होता है जिसमे वह उस जगह होता है जो सिर्फ उसकी होती है. आज पता चल गया था की बेशक प्यार जितना भी हो swayam-ekant में दखल देने से पहले सामने वाले को खुद का एहसास करना उतना हे जरुरी है जितना उसके प्यार की इज़्ज़त करना.
"तुम गलत नहीं हो सकती प्रीती. मई बैलबुद्धि हु न तोह मई उस लम्हे में वह आ गया जहाँ शायद कुछ पल के लिए तुम अपनी दुनिया में थी. आज तुम्हारा दिल दुखाया है मैंने लेकिन आइंदा अगर ऐसा हुआ तोह सजा मुझे मिलेगी.", प्रीती को कास के अपने सीने से लगाए वह उसको अपने ऊपर लिटाये रहा जब तक दोनों की धड़कन ek-samaan न हो गई. प्रीती के आंसू उसको अपने जिस्म में जैसे तेजाब से लग रहे थे. इतना प्यार करने वाली इस मासूम लड़की का भी एक अपना दायरा है जिसकी इज़्ज़त करना जरुरी था.
"मई बहोत बुरी हु न अर्जुन? तुम्हे कभी खुद को प्यार नहीं करने देती. आज तुम आये तोह देखो फिर से मैंने तुम्हारा वो पल खराब कर दिया जहा हम दोनों अब तक हो सकते थे.", प्रीती को अब भी बुरा लग रहा था की कैसे अर्जुन की अनदेखी कर दी थी उसने लेकिन कितनी जल्दी अर्जुन ने उसको अपने सीने से वैसे हे लगा लिए था.
"अब जैसी भी हो ये ज़िन्दगी तोह तुम्हारे साथ हे काटनी पड़ेगी. जैसे तैसे या फिर ऐसे वैसे.", उसका इतना रोना अर्जुन से देखा न गया तोह जो काम उसको ाचे से आता था उसने वही किआ. प्रीती से वैसा हे मजाक करना जिस से वह उसकी नीली आँखों वाली बिल्ली के रूप में आ जाती थी. उसकी 'मानो बिल्ली"
"काटनी पड़ेगी? मैं अभी kaat-ti हु तुम्हे.", पल भर में हे दोनों वैसे हो गए थे जैसे वो रहते थे. नखरे से अर्जुन की गर्दन पर दांत गदति वह फिर उसके चेहरे को देखने लगी जो उसके नीचे था. अर्जुन ने खुद हे उसका सर नीचे दबाते हुए आंसुओ से गीले चेहरे को चूमते हुए सुर्ख गुलाबी होंठ अपने मुँह में भर लिए. प्रीती भी आँखें बंद करती बस अपने इस आशिक़ का प्यार फिर से खून में चलता महसूस करने लगी थी. आज अर्जुन का ये चुम्बन उसकी रूह में उतरता एहसास करा रहा था के वो प्रीती के जीने के लिए कितना जरुरी है. 30 मिनट में वह मरने की हालत में आ गई थी अगर ऐसा कभी एक दिन के लिए हो गया तोह शायद वह अगले दिन का सूरज न देख पायेगी. अर्जुन ने आराम से उसको करवट के बल बिस्टेर पर करते हुए बाहों में भर लिए और आँखें बंद कर ली. प्रीती भी उसके सीने से लगी उसके साथ हे शांत हो गई थी.
प्यार में नाराजगी बड़ी बात नहीं. बस उसका बरक़रार रहना एक बड़ी सजा हो सकता है.
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"ओह Laila-Majnu, उठो भी अब. अभी कानूनन शादी नहीं हुई है तुम लोगो की जो ऐसे दिन में हे हमबिस्तर पड़े हो, वो भी दरवाजा खोले.", अलका ने झिंझोड़ते हुए अर्जुन को उठाया तोह प्रीती भी शर्माती सी फिर से उसके सीने लग गई.
"ये तोह शर्माने लगी है. मैंने वापिस चिपकने के लिए नहीं उठने के लिए कहा है.", अलका दीदी की बात पर अर्जुन ने अब बिस्टेर छोड़ा और सीधा बाथरूम में घुस गया. अलका ने प्रीती की कमर पर चुटकी काटी तोह वो उचकते हुए उन्हें देखने लगी फिर उनके गले लग गई.
"थैंक यू. थैंक यू सो मच दीदी. मेरी सच में जान निकल गई थी और अगर ये यहाँ पास नहीं होता तोह फिर पक्का मैं मर्डर हे जाती.", अलका मुस्कुरा रही थी इन दोनों की नादानी पर. उसको पता था के ये दोनों एक घंटे से ज्यादा हे नाराज नहीं रहने वाले थे बेशक फिर अर्जुन को हे जाना पड़ता इसके पास.
"अब न तू मेरी हर बात मानेगी. और पहली बात ये की आज रात तू मेरी है, जैसे ऋतू की.", अलका दीदी ने प्रीती की टांग खींचते कहा.
"हमर कुछ aisa-waisa नहीं है.", शर्माती हुई वह वैसे हे गले लगी बोली. इधर अलका दीदी ने उसका एक उभर दबा दिए तोह वह उछलती सी अलग हो गई.
"ये तोह सच में किसी बॉल से सख्त है. मतलब ऋतू ठीक कहती थी की तू 2 टेनिस बॉल हमेशा साथ में रखती है. आज रात फिर टेनिस मैच पक्का.", अलका दीदी मजे लेती कड़ी हुई तोह प्रीती ने अब मुस्कुराते हुए कहा.
"होमेग्राउण्ड या विजिटर? आप भी क्या याद करोगी की कितनी दिलदार लड़की से पला पड़ा है.", उनको उलझन में छोड़ वह हिरणी सी उछलती ड्राइंग रूम से होती पिछले आँगन की तरफ दौड़ी तोह अलका भी हंसती सी नीच भाग गई.
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"ओह मेरी बची. देख के देख के.", वह भगति नीचे आई तोह आँगन में सामने से आती रेखा जी ने प्रीती को देखा तोह इतनी हे देर में वह उनके सीने से आ लगी. उसके मुस्कुराते चेहरे पर भी उन्हें वह महीन आंसुओं के निशान दिख गए.
"तुझे सताया अर्जुन ने?", रेखा जी की बात पर वो वैसे हे गले लगी बस 'ना' हे बोली और पीछे से आती अलका को देखा तोह फिर उन्होंने अलका से पुछा
"ये रोइ थी अलका? और फिर ये सब क्या है. पहले अर्जुन को भेजा था इसको बुलाने तोह वह वापिस नहीं आया. और तू भी एक घंटे बाद आ रही इसको लेकर."
"चची इसके दादा आज घर पे अकेले छोड़ गए तोह बेचारी डर के रोने लगी थी. फिर मैंने बोलै इसको की आज तू मेरे साथ सोयेगी और मई साडी रात तेरा ध्यान रखूंगी. तब कही जा के ये चुप हुई और इतनी खुश हो गई के देखो सारे घर में दौड़ती फिर रही है.", प्रीती अब रेखा जी की बांह से लगी अलका दीदी को देख रही थी. उनकी बात का मतलब समझती वह बस मुस्कुरा रही थी.
"ाची बात है न और अगर अलका के पास दिल न लगे तोह मेरे कमरे में आ जाना.", रेखा जी ने उसको अपने साथ लगाए हे डाइनिंग टेबल की तरफ ले जाते अलका को खाना लगाने के लिए कहा.
"अब तुम दोनों चुपचाप खाना कहो और फिर आराम कर लेना. अलका मुन्ना तैयार हो गया क्या जाने के लिए?", कुर्सी पर प्रीती के सामने बैठ उन्होंने अर्जुन क लिए पुछा तोह अलका दीदी ने चची को बता दिए के वह तैयार होक जाने लगा है स्टेडियम. और फिर 2 प्लेट में खाना लेकर वह वही आ गई प्रीती के पास.
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हलकी गीली सड़क सुबह की बारिश से और नहाये हुए वृक्ष. इतने सुहाने नज़ारे को थोड़ा विचलित सी करती वह laal-chaandi के रंग की बुलेट 25-30 की रफ़्तार से चलता अर्जुन आज कुछ अलग हे महसूस कर रहा था. राह चलते हुए लोग भी जैसे उसको हे देख रहे थे और किसी के चेहरे पर तोह khud-ba-khud प्रशंशा झलक रही थी. वही अर्जुन आज थोड़ी देर पहले हुई घटना को सोच mand-mand मुस्कुरा रहा था. एक छोटा सा मजाक प्रीती से करना कितना भारी पड़ गया था लेकिन उसने प्रीती को बताया नहीं था के वह आज उसको सत्ता रहा था. फिर दुःख भी बहोत हुआ था के प्रीती आज इतना रोइ सिर्फ उसके इस बर्ताव से. बेशक वह अपनी यादों में थी और अर्जुन के आने का एहसास उसको नहीं हुआ था. उस सपाट चेहरे पर भी प्रीती की आँखों में तोह वही था बस.
'कितनी पागल है ये लड़की भी न. इसलिए हे तोह मेरी धड़कन है वह.' मुस्कुराता वह ये सोच रहा था के स्टेडियम से पहले आने वाले बड़े चौक पर पुलिस का एक नका लगा हुआ था. ब्रेक लगाई तोह देखा ट्रैफिक लाइट बंद पड़ी थी और आमने सामने का यातायात सफ़ेद वर्दी वाले पुलिस के 4 मुलाजिम रोके हुए थे.
"अंकल ये क्या हो रहा है?", साथ हे खड़े स्कूटर पर बैठे अधेड़ से चस्मा लगाए व्यक्ति से पुछा उसने.
"बीटा वह मंत्री आ रहा होगा कोई. जनता को परेशां करना तोह बस इन्ही लोगो के हाथ में है नहीं तोह पुलिस ऐसा नहीं करती.", इंसान शायद ज्यादा हे परेशां था इन राजनेताओ की शाही ज़िन्दगी से. अर्जुन बस मुस्कुराता अपनी मोटरसाइकिल को साइड स्टैंड पर खड़ा किये सामने देख रहा था. बीच से गुजरती सड़क पर साईरन की आवाज सुनाई दी जो थोड़ी दूर से आ रही एक सफ़ेद गैप्सी, जिपर लाल बत्ती तिकी थी से आती लगी. और इधर सड़क के सामने से एक लड़का जाने कसीसे कैंची साइकिल चलता वहां बीच चौराहे पर आ पंहुचा. पुलिस वाले से चूक हुई थी और ये लड़का भी शायद साइकिल को रोक न पाया था. 12-13 साल का ये डरा सा लड़का जैसे हे चौक के बीच आया वैसे हे गाडी के टायर की चीखती आवाज हुई और 5 गाड़ियां कतार से रुक गई. अर्जुन किसी चीतः सा दौड़ता वह पहुंच गया मोटरसाइकिल अपनी जगह छोड़. साइकिल सड़क के बीच गिरी थी और लड़का सेहमा सा सामने काली वर्दी पहने उस रोबदार ड्राइवर को अपनी और आते देख रहा था. किसी पुलिस के सिपाही में भी हिम्मत न हुई के वह अपनी जगह छोड़ कर वह beech-bachav करता लेकिन तभी 'तड़ाक' की आवाज आई और लड़का अपने गाल पर हाथ रखे बस रो पड़ा.
"बहनचोद बाप की सड़क है जो को करतब दिखा रहा है? मर्डर जाता तोह गले पद जाता अभी. 2 कौड़ी के साले बचे पैदा करके सड़क पर छोड़ देते है.", वो लम्बा सा रोबीला ड्राइवर मिजाज से हे किसी कसाई सा था जिसने इतने छोटे बचे पर करारा हाथ जड़ दिए था.
'काड्डाआक' ये आवाज तोह पहले वाले से भी कही दसगुना तेज थी लेकिन इस बार वो ड्राइवर जमीन पर पड़ा था, अर्जुन के इस झन्नाटेदार थप्पड़ से. फुर्ती से 3 आदमी जिप्सी से बहार लपके, हाथ में बंदूके लिए और सर पे गोल काली टोपी में.
"ोये लड़के. रुक नहीं तोह अंजाम के लिए तू जिम्मेदार होगा.", एक ने पास आते इतना कहा हे था के गर्दन दबोचते हुए अर्जुन ने उसको जिप्सी के बोनट पर टिका दिए.
"तुम्हारे बाप की सड़क है क्या? और दिमाग घुटने में है जो एक बचे पर हाथ उठा दिए इस आदमी ने और तुम मुझे धमका रहे हो.", पीछे से भागते हुए आये 3 पुलिस वालो ने उसको पकड़ लिए था और इधर सफ़ेद अम्बस्सडोर कार से कुर्ते पाजामे में एक ऊर्जावान बुजुर्ग नीचे उतरे जिन्होंने इशारे से सबको रुकने को कहा तोह 2 बन्दूक जो अर्जुन पर तन्नी थी नीचे झुक गई और पुलिस वाले भी पीछे हट गए.
"सही बात है बीटा. सड़क इनके बाप की नहीं है और इस ड्राइवर ने भी गलत किआ बचे पर हाथ उठा कर.", इतना बोलकर वह मंत्री जी अर्जुन के पास आते उस छोटे लड़के के गाल पर हाथ फिरते उसका होंठ देखने लगे जिस से हल्का खून रिस रहा था.
सड़क के दोनों तरफ ाची खासी भीड़ हो चुकी थी वाहनों की आवाजाही रुकने से और बाद में इस घटना के होने से. इधर इन मंत्री महोदय ने अपने ड्राइवर को आँख दिखाई तोह वह सकपकता सा हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लगा.
"अंकल जो समझदार थे वह सभी तोह अभी भी देखिये नियम से खड़े है अपनी जगह. ये बेचारा बचा अगर छोटी सी गलती कर गया तोह काम से काम ऐसी प्रतिकिर्या तोह नहीं मिलनी चाहिए थी इसको. कल यही फिर समाज के नियम तोड़ेगा तोह लोग गरीबी, जाट या जाने किस और बात के इल्जाम लगा देंगे इसके गलत राह पर चलने के लिए. लेकिन सिर्फ यही याद रखेगा इस घटना को जिसने इसके अंतर्मनन को पीड़ित किया है.", अर्जुन हाथ जोड़ कर वापिस मुड़ने लगा तोह मंत्री जी ने आवाज लगते हुए उसको रोक लिए. बड़े ध्यान से देख रहे थे वह इस इंसान को. 6 फ़ीट से ऊँचा, शरीर से इतना बड़ा लेकिन मासूम चेहरा और गंभीर बातें करता ये नौजवान. उन्होंने सभी गाड़ियां चौक से आगे करने को कहा और ट्रैफिक को जारी करने का निर्देश देते फुटपाथ पर अर्जुन के कंधे पर हाथ रख के खड़े हो गए. एक पोलिसवाले ने भी प्यार से उस छोटे लड़के को सड़क पार करवाते हुए जेब से कुछ मीठी गोलियां भी खाने को दी. और वह भी उस जगह चलता आ गया जहा 4-5 अंगरक्षको और एक बड़े पुलिस अधिकारी के साथ अर्जुन और मंत्री जी खड़े थे.
"क्या मई तुम्हे जानता हु बीटा?", उन्होंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए कहा तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.
"लेकिन जाने क्यों मैंने चेहरा भी देखा है कही और ये बात भी सुनी हुई सी थी. जो तुमने कही की जुर्म के पीछे कोई उस चिंगारी को नहीं देखता जो बहोत पहले लगी होती है इंसान के मैं में बस सभी वह देखते है जो आज हुआ होता है. किसी बड़े इंसान ने ऐसा हे कुछ कहा था मुझे, लेकिन याद नहीं आ रहा."
"पंडित रामेश्वर शर्मा, जी वह मेरे दादाजी है. उनसे हे मैंने सीखा था के 20 साल बाद किसी अपराधी को पकड़ने से ाचा है आज हे उसके साथ होने वाले अन्याय को रोक लिए जाये. और शायद कभी आप उनसे मिले हो.", हाथ जोड़ते हुए उसने ये बात कही इधर एक ट्रैफिक पुलिस वाला जो नाके के समय अर्जुन की तरफ खड़ा था वह उसकी मोटरसाइकिल को खींचता हुआ उनकी तरफ ला रहा था.
"वाह बीटा. पंडित जी (आह सी भरते हुए उन्होंने कहा).. मेरे मित्र है वह और बड़े एहसान है उनके भी मुझपर. और तुम्हारा बाप हैं न शंकर वह जवानी में ऐसा हे था, बस बातें अलग थी उसकी." अर्जुन के बाप का जिक्र करते वह मुस्कुराये तोह वह पुलिस अधिकारी जो साथ खड़ा तोह वो भी हंस दिया.
"गलत बात तोह नहीं कही मैंने सुरेश?", अपने इस अधिकारी को हँसते देख उन्होंने भी वैसे अंदाज में कहा
"नहीं सर. बिलकुल सही बात कही आपने डॉ शंकर के लिए. ये विनोद अभी तक एम्बुलेंस में होता और शंकर बात तोह सुनता भी कहा. बस आपको देख कर बेशक गले लग जाता.", जिस ड्राइवर को अर्जुन ने थप्पड़ मारा था अब वह भी खिसियाता सा मुस्कुरा रहा था.
"ाचे लड़के हो बीटा तुम. पंडित जी को तुम पर नाज होगा. उन्हें बताना के हमने इज़्ज़त और प्यार भेजा है उनके नाम. शंकर से तोह मिलना हो हे जाता है जब उसके शहर जाते है तोह." एक बार उसको गले लगते हुए वह आगे चलने लगे तोह अर्जुन ने पीछे से आवाज लगाई.
"अंकल नाम हे नहीं पता तोह क्या कहूंगा?", मंत्री जी के अंगरक्षाक ने कार का दरवजा खोल दिए था तोह बैठने से पहले हे वह मुस्कुराते हुए बोले, "चंदू बोल देना वह समझ जायेंगे." और बैठ कर बढ़ चले अपने काफिले के साथ.
"बीटा तुम पंडित जी के बचे हो?", मोटरसाइकिल में चाबी लगते हुए अर्जुन बैठने लगा तोह ये 2 सितारा वर्दी वाले पुलिस कर्मी ने कंधे पर हाथ रखते पुछा. बड़े प्यार से देख रहा था वो अब अर्जुन को जहाँ पहले यही था जिसने उसकी ब्याह पकड़ ली थी घटना के समय.
"जी अंकल. अर्जुन शंकर शर्मा नाम है मेरा. और आपका है श्री तेजपाल शर्मा. और ये कहीं सुना है मैंने.", किक लगाने से पहले अर्जुन इन व्यक्ति को गौर से देखने लगा.
"बस बीटा इतना कह दिए बहोत है के पहले देखा है. तुम्हारी माँ रेखा को कहना के उनका बड़ा भाई भी अब उनके शहर में है. बड़े ताऊजी का बीटा हु मई उनके और तुम्हारा मां हु.", अर्जुन नीचे उतारकर उनके पाँव छूने लगा तोह उन्होंने गले से लगा लिए. गोर और ाचे कद्द के थे वह, जैसे उसकी माँ और बहने भी थी.
"आप हमारे घर नहीं आएंगे?" अर्जुन ने उन्हें देखते हुए पुछा.
"आऊंगा न बीटा लेकिन बहिन के घर तोह सिर्फ त्यौहार या रक्षाबंधन पर हे आते है. रेखा हे तोह एक बहिन है हमारी पूरे 3 परिवार में. और तुम तोह अपने नाना के घर शायद 10-11 साल पहले हे आये थे. ये यूनिवर्सिटी के पास वाले थाने का इंचार्ज मैं हे हु. आना बीटा कभी अभी तोह शायद तुम्हे भी कही जाना है और मुझे भी.", एक बार और गले लगने के बाद वह प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते चलने लगे और उनके साथ हे बाकी सिपाही भी, जो अर्जुन का चेहरा देख कर गए थे की ये लड़का जहा दिखे कभी उलझना नहीं इसके साथ.
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"15 मिनट देरी से हो और कोई सफाई नहीं चाहिए. 100 uthak-baithak करने के बाद बलबीर के पास दौड़ जाओ.", जोगिन्दर जी ने आते हे अर्जुन से कहा और अर्जुन बैग एक बेंच पर रखता बिना कपडे बदले अपनी सजा पूरी करने लगा. बाकी लोग अभ्यास में लगे थे और स्टेडियम में आते हुए अर्जुन को आज ज्यादा लोग नहीं दिखे थे. 100 दंड बैठक पूरी करते हे शरीर गरम हो गया था. अपना बैग उठा के वह जल्दी से कपडे बदल कर गयम में पहुंचा जहाँ बलबीर एक योग की गद्दी पर लेता सपने ले रहा था.
"उठो मुंगेरी भैया. और आ जाओ इस बेंच पर.", बलबीर के गाल थपथपा के अर्जुन रोड में प्लेट लगाने लगा तोह हँसता हुआ बलबीर भी उठ खड़ा हुआ.
"आज लगता है पहली सजा मिल हे गई हीरो को.?", रोड के एक तरफ खड़े होते उसने अर्जुन को देखते कहा जिसके शरीर पर हल्का पसीना था.
"हाँ भाई. आप सही कहते हो के वो द्रोणाचार्य हे है. साँसे लेने से पहले हे ऐसे देख लिए जैसे उनको निशाना मिल गया जिसपर तीर लगाने का इन्तजार कर रहे थे काफी समय से.", हँसता हुआ वह बेंच पर लेट कर अभ्यास करने लगा और फिर दोनों अगले आधे घंटे तक बस वही रहे.
"हाँ तोह आज अर्जुन तुम मार खाओगे और बलबीर तुम इसके श्री पर उचित दुरी से 3-1-1-3 का अभ्यास करोगे. चेस्ट गार्ड लगा लो. 5 सेट के बाद दोनों जगह बदल लेना.", 'ये द्रोणाचार्य नहीं महिषासुर है भाई' उनकी बात सुनकर बलबीर ने वह सफ़ेद रंग का छाती पर pehan-ne वाला कवच अर्जुन की पीठ पर बांधते हुए कहा तोह दोनों हंसी मजाक करते फिर लगन से अभ्यास करने लगे. आज अर्जुन को समझ आया था के शरीर के किस भाग को सही से पंच करना होता है. बलबीर भी प्रहार वैसा हे कर रहा था जैसे अभ्यास में करना होता है. सिर्फ लक्ष्य तक अपना सटीक पंच लेकिन कोई ज्यादा दबाव नहीं. अर्जुन ने भी वही अनुसरण किआ. फिर अभ्यास होने पर जोगिन्दर जी ने खुद दोनों के हाथो से दस्ताने खोले और गार्ड हटाए.
"ये पी लो लेकिन इस शीशी को कोशिश करना 6-8 घूँट में आराम से ख़तम करने की.", ये बोतल लगभग 250-300 मल की थी जो दोनों को दी थी उन्होंने, हलके हरे रंग का पानी था. 5 मिनट में हे दोनों तारो तजा हो चुके थे.
"कल अगर तुम्हे समय लगे तोह 3-4 बजे आ जाना. रविवार है तोह वैसे तोह अवकाश है लेकिन यहाँ पर कल और परसो State-level के मैच है. देखने से शायद कुछ बेहतर समझ पाओगे. और बलबीर तोह होगा हे तोह तुम दोनों का tal-mel बेहतर रहेगा.", एक टोलिया देते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन ने चेहरा साफ़ करने के बाद सर हिला दिए.
"ये मई घर से धुलवा लाऊंगा सर.", अर्जुन ने तार पर टंगे हुए 5-6 तोलिये भी उतारते हुए कहा तोह वह आज के दिन में पहली बार मुस्कुराये.
"ाची बात है. चलो अब तुम दोनों निकलो मुझे अपने खिलाडी तैयार करने है.", पीठ पर चपत लगते हुए उन्होंने बलबीर को भी बहार का रास्ता दिखा दिए.
"भाई कुछ भी बोल. कोच साहब न आदमी ाचे है लेकिन कोच सख्त. वह अखरोट की तरह.", बलबीर कंधे पर हाथ रखने की कोशिश कर रहा था लेकिन लम्बाई ज्यादा होने से बस हथेली अर्जुन के कंधे पर रख उसके साथ बहार आ गया.
"बलबीर भाई आओ आपको मेरी रानी से मिलवाता हु.", उनका साथ लिए वह अपनी मोटरसाइकिल के पास आया तोह विकास पहले से बैठा था उसकी मोटरसाइकिल पर और 4-5 लड़के बस देखने लग रहे थे के ये क्या चीज है.
"भैया ये लो.", अर्जुन ने चाबी उछलते हुए कहा तोह विकास ने वह लपक ली लेकिन purv-vat हे बैठा मुस्कुराता रहा. दोनों गले लग गए जब अर्जुन उसके पास गया तोह. विकास बलबीर से भी बड़े प्यार से मिला था.
"बड़े चर्चे हो रहे तेरी इस सवारी के भाई. चौक पे तू हे था जिसने आज मंत्री का सुरक्षा कर्मी लपेट दिए?", उसकी हंसी बता रही थी की बात फ़ैल चुकी है और बलबीर को अब समझ आया के अर्जुन देरी से क्यों आया. विकास ने चाबी मोटरसाइकिल में लगाई और बलबीर को बीच में आने को कहा. आखिरी में अर्जुन को बिठा के वह तीनो निक्कर में हे बहार की तरफ चल दिए.
"झोटा है भाई ये तेरी मोटरसाइकिल. 250 किलो वजन लाड के तोह और बढ़िया चल रही. मेरे पास भी है एक लेकिन इस बार गांव जाऊंगा तोह लेके आऊंगा.", सच में हे विकास बड़ी दक्षता से चला रहा था इस गाडी को. उसके और अर्जुन जैसे हे जवान तगड़े बने थे इस सवारी के लिए.
"भाई ये आपकी हे तोह है फिर गांव वाली वही रहने दो. वैसे भी तोह आप आधा समय तोह बहार रहते हो. अगर कभी मुझे अपने गाँव लेकर गए तोह वही मई चलने का मजा लूंगा न.", अर्जुन के प्यार से वह गदगद हो गया था. बुलेट को एक बड़ी जूस की दूकान के बहार रोका तोह वह पहले से हे कई जवान खिलाडी खड़े जूस पी रहे थे या इन्तजार कर रहे थे. कोई 15-16 लोग थे वह इस समय लेकिन जैसे हे उन्होंने विकास को देखा तोह वह बारी बारी से उसके पाँव छूने लगे. कुछ उनमे से बड़े थे तोह वह बस गर्दन झुका कर मिल रहे थे.
"अरे बस बस भाई. आराम से पीयो और स्टेडियम के बहार मैं पहलवान विकास कोणी. यो देखो मेरे भाई के सोचेंगे मेरे बारे में? प्रजापति ोये, 3 गिलास बना भाई आये है मेरे.", ठेठ हरयाणवी में बोलते हुए विकास ने एक बेंच उस जूस कुटेर के बहार रखते हुए दोनों को वह बैठाया.
"भाई ले चलूँगा गाँव भी. ये पहली तारीख को मई बहार जा रहा हु आज पासपोर्ट आ गया था मेरे, चाचा ने हे बनवा के दिए है. फेर जब आऊंगा तोह एक नेशनल कैंप है 2 दिन का उसके बाद चलेंगे मेरे गांव. तेरे घर मई अपने आप संदेसा भिजवा दूंगा.", अर्जुन की पीठ पर हाथ रखते हुए वह बता रहा था अगले कम्पटीशन के बारे में. फिर थोड़ा मजाक बलबीर के साथ भी किआ.
"रे बलबीर, कल तेरे थप्पड़ लगा मैंने सुना.", बलबीर नजरे झुकता सा इस बात से शर्मा गया. अर्जुन हैरानी से देखने लगा तोह विकास ने आँख मार दी.
"भाई वह ग़लतफहमी हो गई थी उस लड़की को. बिना सुने हे कान गरम कर दिए मेरा.", बलबीर सफाई दे रहा था लेकिन विकास पेट पकड़ एक हंसने लगा तोह अर्जुन बस उन्हें देख मुस्कुराने लगा.
"ग़लतफहमी? भाई एक तोह तू पव्वा है, ऊपर से वह छोरी 6 फुट की. साले ने टांग हे सेहला दी बता भाई.", और फिर वह हँसते हुए गिरने हे लगा के बलबीर ने हे हाथ पकड़ लिए जो किसी लड़की सा शर्मा रहा था. बात पल्ले पड़ी तोह अर्जुन हँसता हुए दिवार से टकरा गया.
"अरे शिकारी तू मत हंस. तेरी खबर भी है मेरे पास. चुन्नी तोह छोरी मुँह पे बाँध लेगी लेकिन kad-kathi और स्कूटर पे जिसके साथ थी वह तोह दिखेगा. के नहीं?", अर्जुन की हंसी एकदम से ृक्क गई. और विकास फिर हंसने लगा उसका चेहरे देख.
"आपने कहा देखा? वह तोह दोस्त है बस भैया?", अर्जुन झेंप गया था.
"अरे तेरी दोस्त ने हे कल धरा था इसके कान के नीचे. दोपहर में खाना खा रहे थे मेस में. और ये जनाब उस से टकराने के बाद नीचे झुक के उसकी पिंडली सेहला गए. दे दिया कान पे जाटनी ने." अब बलबीर भी हंस रहा था उसके साथ. इतने में हे वह छोटे कद का जूस की दूकान वाला फलों के जूस के 3 बड़े गिलास ट्रे में लेके उनकी तरफ आ गया.
"भाई पता है तू ऐसा वैसा लड़का नई है और वह जाटनी भी ाची चोरी है. बस समाज है न वह लड़का लड़की को एक नजर से देखता है. और कोई बड़ी बात नई तू टेंशन मत ले. वैसे आज तेरा जो पन्गा हुआ तोह तू बच कैसे गया.?" विकास ने बात बदलते हुए कहा.
"भैया मई तोह बाकी के लोगो को भी धार लेता लेकिन फिर पुलिस वाले आ गए और वह मंत्री जी. पता चला के दादाजी के दोस्त है और वह अंकल जो पुलिस इंचार्ज थे, मेरे मां हे निकले.", अर्जुन ने सर नीचे करते जूस का घूँट पीया तोह बलबीर गिलास मुँह से लगाए दोनों की तरफ देख रहा था.
"पुलिस वाले तोह भाई होते हे मामे है और तेरे वाला तोह असली निकल गया.. हाहाहा.. लेकिन भाई किस्सा मशहूर हो गया आज ये. सच में दिलेर आदमी है जो वर्दी वाले के थप्पड़ जड़ दिए बीच सड़क में.", विकास प्रशंशा के साथ प्यार भी दिखा रहा था.
"भाई अपने कोच साहब भी कल इसके जाने के बाद कह रहे थे के ये विभाग के अधिकारी गौतम जी की नजर में आ चूका है. वो उनके पीछे पड़े है के इसको हैवीवेट के लिए तैयार करो. अपनी तरफ से इस केटेगरी में कोई मुक्केबाज नई है अभी तक. लेकिन उन्होंने अभी जवाब नई दिए कोई.", बलबीर की बात पर अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन विकास शांति से घूँट भरता बोलै.
"वो करेंगे भी नहीं इसको तैयार. कोच साहब ने साफ़ बता दिए था के अर्जुन को एक मुक्केबाज से ज्यादा प्रशिक्षण देना है. इस साल ये बेशक मर्जी से डिस्ट्रिक्ट खेल ले सितम्बर में लेकिन अगले साल ये मेरे खेल में आने वाला है. और छोटे बस अपना ध्यान और समर्पण कोच पे रखिओ, खेल कोई भी हो फरक नहीं पड़ता. और उठो अब इसका घर का टेम हो गया रे बलबीर." प्रजापति को गिलास पकड़ते हुए इस बार विकास ने चाबी बलबीर को पकड़ा दी तोह वह अर्जुन की तरफ देखने लगा.
"चला रे. इसकी तरफ के देखे है, तेरा दिल है और फिर तेरे तोह पास थी भी पिछले साल वो फौजी वाली मोटोरोसीक्ले.", बलबीर ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तोह इस बार अर्जुन बीच में और विकास आखिरी में बैठा था.
"भाई वो मोटरसाइकिल मेरे बड़े भाई की थी. गोली खा के बिस्टेर पे था 4 महीने तोह मई ले आया था यहाँ. लेकिन एक दिन भाई जरूर ये सवारी लूंगा, चाहे चली हुई लू.", बलबीर को शायद गहरा लगाव था इस से और सबसे बड़ी बात थी की इन दोनों से बेहतर तरीके से चलता हुआ स्टेडियम के अंदर आया तोह दोनों को नीचे उतारते हुए एक टांग पर पूरी मोटरसाइकिल गुआंते हुए एक कला गोल घेरा जम्में पर बना दिए जिसको अर्जुन हैरानी से देख रहा था.
"छोटे भाई. बड़ी से बड़ी चीज भी काबू कर सकते हो बस उस से प्यार करो और खुद को उसपर हावी रखो. सरपंची झोटा भी एक पतली रस्सी के साथ बालक लिए घुमते है क्योंकि वह उस से प्यार भी करते है और खाना देके ये बता देते है के वह मालिक है.", विकास ने बलबीर के हाथ से चाबी अर्जुन को देते हुए कहा तोह अर्जुन समझ गया था के control-niyantran क्या चीज है.
"और भाई इस्पे वो लिखवा ले पीछे 'रानी'." बलबीर ने हँसते हुए कहा तोह विकास ने भी कन्धा हलके से दबाते अर्जुन को जाने को बोलै.
"चल शेर. फिर मिलते है और बलबीर है न पक्की हड्डी है, बहोत सीखा सख्त है तुझे. इसको लगता होगा के मैं इसको जानता नई या देखता नई. लेकिन विकास बोलता काम था लेकिन अब उसके पास उसके 2 भाई और है." बलबीर को अपने साथ लेकर वह हाथ हिलता हॉस्टल की तरफ निकल लिए तोह अर्जुन भी खुश होता हुअबाध लिए अपनी 'रानी' को वैसे हे आराम से चलता.
"भैया, ये साड़ी दिखाना जरा.", अर्जुन आज मॉडल टाउन की उस दुकान पर खड़ा था जहाँ वह अलका दीदी को लेकर आया था ड्रेस दिलवाने के लिए. यहाँ एक पोरपङ्ख के रंग की चमकदार साड़ी को देखने के बाद उसने काउंटर पर खड़े व्यक्ति से कहा तोह प्लाटिक की मूरत पर नजर डालने के बाद उसने एक दराज से वैसी हे साड़ी का डब्बा निकल के सामने कर दिए.
"शिफॉन की बेहद उम्दा साड़ी है भाई ये. न कोई tadak-bhadak और न हे कोई jari-tar. लेकिन कपडे का कोई मुकाबला नहीं है. हाथ में लेकर देखो.", उसने वह एक तरफ से खोलते हुए सामने की तोह अर्जुन उस मुलायम रेशमी कपडे को महसूस करने लगा. ये बिलकुल वैसा हे थे जैसे उसकी माँ की कलाई का स्पर्श.
"इसका ब्लाउज का कपडा ये है, थोड़ा सा ज्यादा गहरा लेकिन इसपर कोई प्रिंट नहीं है. ये रेशमी है और अंदर से अस्तर लगवाया जा सकता है अगर जरुरत हो." अपनी बात पूरी करते उसने वह अलग कपडा भी दिखाया. सब देखने के बाद अर्जुन ने बैग से अपना बटुआ निकला तोह उसमे 500 के 4 नोट और 100 के 2 नोट हे थे. बैंक से वह कबि अपने पैसे नहीं निकलता था क्योंकि हमेशा उसकी अलमारी में जेबखर्ची वह एक बक्से में जमा रखता था और वह भी खरच नहीं होती थी. दुकानदार ने थोड़ा भांप लिए था उसका चेहरा के वह शायद चिंतित होगा कीमत के लिए. बात भी वही थी अर्जुन के सोचने की. रेणुका बुआ के साथ और प्रीती के अनुभव से उसको लगा था के साड़ी तोह 3-5 हजार तक आती होगी.
"भाई ये 1800 की है लेकिन बस 2 हे पीेछे है दूकान पर और अप्रैल से नया माल आएगा इसलिए सभी पर 25 प्रतिशत की छोट है."
"आप पैक कर दीजिये. अगर ये महंगी भी होती तोह मई कल आ कर ले जाता. पैसे तोह हैं मेरे पास और कम् पड़ जाते तोह फिर घर से ले आता. लेनी है तोह फिर दाम जो भी होता.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए 1500 दूकान वाले की तरफ बढ़ा दिए. उसने भी साड़ी को वापिस डब्बे में डालने के बाद एक प्लास्टिक के बैग में पैक करते हुए 200 रुपये वापिस कर दिए.
"भाई तुम पहले भी आ चुके हो हमारी दुकान पर और हम ग्राहक खराब नहीं करते. कुछ काम भी होते तोह मई दे देता साड़ी तुम्हे. पैसों का क्या है आने होंगे तोह आएंगे नहीं तोह नहीं." वह हँसते हुए बोलै तोह अर्जुन हाथ मिलते हुए बहार आ गया.
"Hello अर्जुन.", कान में ये मीठी आवाज सुनाई दी तोह वह मोटरसाइकिल में चाबी लगता रुक कर पीछे देखने लगा. आकांक्षा कड़ी थी ठीक पीछे वही पेड़ के नीचे. मुस्कुराती हुई किसी बिजली सी चमकदार.
"Hello आकांक्षा. कैसी हो? और यहाँ?", अर्जुन थोड़ा करीब चलते हुए बोलै तोह वह भी अब नजदीक आ कर कड़ी हो गई थी. Kaali-peeli धारियों वाली कासी टीशर्ट और नीली चुस्त जीन्स में खुल्ले बाल, बेहद आकर्षक लग रही थी वह. और अर्जुन को देख कर तोह चेहरे पर जैसे अलग हे नूर सा आ गया था.
"हाँ वह यहाँ आई थी पार्लर में. बाल ठीक करवाने, फिर स्कूल जाने पर टाइम मिले न मिले. पापा चले गए थे घर वापिस कुछ काम था उन्हें तोह बस इधर से ऑटोरिक्शा लेने लगी थी. तुम तोह एक बार भी नहीं मिले इन छुट्टियों में.", अपना बताने के बाद थोड़ी शिकायत से बोली तोह अर्जुन ने पैकेट उसके हाथ में दिए और मोटरसाइकिल पर बैठ गया.
"आओ चलते हुए बात करते है. रिक्शा के पैसे मुझे दे देना.", उसकी बात सुनकर वह खुसी से चहकती सी पास आ कड़ी हुई.
"वाह. तोह अब तुम्हे ये बाइक मिल गई घर से."
"हाँ आज हे मिली है. दादाजी का गिफ्ट है आने वाले जन्मदिन का." आकांक्षा लड़को की तरह पीछे बैठ गई थी डब्बे को दोनों के बीच रखती. अर्जुन ने मोटरसाइकिल को घूमते हुए सड़क पर चढ़ा लिए.
"एक तोह मुझे पता नहीं था के तुम रहती कहा हो. दूसरा जब पता चल गया तोह फिर सोचा के तुम्हारे घर तोह आ कर मिलना ठीक नहीं. ऐसा होता तोह तुम उस दिन खुद हे मुझे रोक लेती.", अर्जुन की बात सुनकर आकांक्षा ने वह डब्बा बीच से निकलते हुए एक तरफ कर दिए और एक हाथ उसकी कमर में रखती पीछे से चिपका कर बैठ गई.
"दिल तोह था के तुम्हे रोक लू. लेकिन जो मेरे साथ में मेरी सहेली कड़ी थी वह तुम्हारी हे बात कर रही थी और संदीप भी साथ में था तोह मैंने चुप रहना ठीक समझा. वैसे मेरे घर में ऐसा कुछ नहीं है. एक्चुअली, तुम तोह कभी भी आ सकते हो.", उसके गोल नरम दूध अर्जुन को अपनी पीठ पर हलके दबते महसूस हो रहे थे. यहाँ से उनके सेक्टर तक की ये सड़क भी शांत हे थी. वैसे भी शहर की ये साइड hari-bhari और bheed-bhaad से दूर थी.
"जब टाइम मिला तोह जरूर आऊंगा. लेकिन ये भी तोह पता नहीं के तुम किस समय होती हो घर और किस समय नहीं.", अर्जुन का तरीका अलग था जिस से वह जान सके की आकांक्षा कहा रहती है या कैसे समय निकलती है.
"मई तोह रहती हे घर पे हु. तुमने देखा नहीं के मेरे कोई दोस्त नहीं है सिर्फ गली में हे 2-3 है जिन से थोड़ा बहोत बात कर लेती हु. और Papa-mummy तोह हमेशा ऑफिस. शाम को 6 बजे हे आते है वापिस लेकिन पापा तोह ज्यादातर 10 बजे और कभी कभी टूर के कारण आते भी नहीं.", आकांक्षा अपना चेहरा उसके कंधे से लगती बता रही थी वो सब जो अर्जुन ने पुछा भी नहीं था. एक यही लड़का तोह था जिस पर उसका दिल आया था और पूरे स्कूल का दिल इस लड़की पर था. अर्जुन को भी पता था के वह उसको किस नजर से देखती है लेकिन वह दोस्त या बस एक गहरा दोस्त हे मानता था खुद को.
"मंडे देखता हु अगर लाइब्रेरी नहीं गया तोह मई आऊंगा तुमसे मिलने. Ice-cream खाओगी आकांक्षा?", अपने सेक्टर के बहार एक 'क़्वालिटी Ice-Cream' की रेहड़ी कड़ी देख अर्जुन ने वही इस बड़ी पार्किंग पर मोटरसाइकिल रोक ली थी. इस जगह अभी dukaan-showroom सिर्फ काटे गए थे लेकिन अभी वह पूरी तरह से खाली हे पड़ी थी.
"चॉकलेट कोर्नेत्तो." मुस्कुराते हुए आकांक्षा ने कहा तोह अर्जुन ने उस रेहड़ी वाले की तरफ देखा.
"अभी लाया साहब.", अपने रोज के स्वाभाव के मुताबिक इस आदमी ने अर्जुन को साहब हे कहा, जैसा वह अधिकतर गाडी वाले या premi-jodo के सामने लड़को को कहता था. फिर एक कोन बढ़ता वह चलके आया तोह अर्जुन ने पर्स से 100 का नोट बढ़ा दिए. आकांक्षा मोटरसाइकिल पे बैठी थी और अर्जुन बस सामने खड़ा उसको खाते देख रहा था.
"तुम नहीं खाओगे?"
"नहीं मई ice-cream नहीं खता.", हँसते हुए उसने कहा तोह आकांक्षा ने थोड़ा प्यार दिखते अपनी हे ice-cream उसके मुँह के पास कर दी. बिना हे जगह देखे के माहौल कैसा है. जबकि वह वैसे भी कोई खास लोग थे हे नहीं. रेहड़ी वाला आगे चल दिए था और ikka-dukka कोई सड़क से cycle-scooter पर निकल रहा था. यहाँ दोनों पेड़ के नीचे इस खुली पार्किंग पर खड़े थे. अर्जुन ने भी दिल रखने के लिए सिर्फ होंठो से छु भर लिए.
"मतलब सच में नहीं खाते?", वह उसके होंठो पर लगी ice-cream देखते हुए बोली. अंदर से तोह आकांक्षा को महसूस हुआ था के जैसे अर्जुन ने उसके हे होंठो को चूम लिए था. लेकिन वैसे हे हल्का मुस्कुराती वह खाती हुई बोली. "फिर तोह हम चल हे पड़ते है यहाँ से, कोई फायदा नहीं अगर अकेले हे खानी है तोह.", उसने नखरे से कहा था जिसपर अर्जुन मुस्कुरा दिए. अपने टंगे पिछली सीट पर दोनों तरफ करती वह अर्जुन को दिखने लगी थी की अब यहाँ से चलो और अपनी सीट पर बैठो.
"चलो तुम्हारी ice-cream तुम्हे मुबारक.", बैठने से पहले अर्जुन ने अपने होंठ उसके गाल पर लगते हुए चूम लिए और फिर बिना प्रतिकिर्या देखा आगे बैठते हुए किक मार कर मोटरसाइकिल उतनी हे रफ़्तार में आकांक्षा के घर की और मदद ली. पीछे बैठी हुई आकांक्षा तोह जैसे अभी तक सपने में थी. वो हमेशा शर्माने वाला, अकेला सा लड़का आज कैसे उसके गाल खुलेआम चूम गया था. और अब वह बातें करता भी hansta-muskurata है. फिर अपने गाल को छु कर उसने मुस्कुराते हुए बची ice-cream फेंक दी और अर्जुन के गर्दन पर हल्का सा चूम लिए.
"जितनी तुमने वापिस की थी वह मैंने फिर से तुम्हे दे दी.", उसकी बात को समझकर अर्जुन बस हंस दिए.
"जब अगली बार मिलूंगा तब जरूर ाचे से वापिस करूँगा." उनके घर के बहार बुलेट को रोकते उसने फिर से आकांक्षा को देखा जो एक दिलकश मुस्कान देती उसको हे देख रही थी.
"ाचा चलता हु." धीरे से उसने ये कहा तोह आकांक्षा ने भी हाथ हिला दिए और फिर उसको मोटरसाइकिल मदद कर वापिस जाते देखने लगी. हैंडल पर पैकेट लटकाये वह आराम से जा रहा था, गोल शीशे में पीछे कड़ी आकांक्षा को देखता.
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"बीटा ये लड़का कौन था? पहले तोह नहीं देखा इसको.", विनय तनेजा, जो घर के अंदर से हे अर्जुन को देख कर चौंक गया था अपनी बेटी से पूछ रहा था. इंसान ये भी अमीर था और घर भी शानदार बना रखा था. 2 कार हरदम घर में रहती थी और 1 घर के गेट पर. तनेजा जहा एक गहरे रंग का आदमी था वही उसकी बीवी जैसे उम्र को धोखा देती एक जवानी से भरपूर पंजाबी महिला थी. गोरी, गदराई और ाची padhi-likhi. एक हे बेटी थी जो बिलकुल हे अपनी माँ पर गई थी.
"पापा, वह स्कूल फ्रेंड है मेरा. अर्जुन शर्मा. पार्लर के पास हे दिख गया था तोह घर तक ड्राप करने आ गया. घर भी हमरे हे सेक्टर में और ाचा लड़का है.", अपने कमरे की तरफ जाती हुई वह बस इतना बताती निकल गई.
"कौन था बेटी? और ऐसे हे घर से भेज दिए पीना chai-thanda पूछे.", अंदर ड्राइंग रूम में कुछ काम करती उसकी माँ ने पुछा तोह आकांक्षा बस मुस्कुराती सी अपने कमरे में चल दी और दरवाजा बंद कर लिए.
"ये लड़का डॉ शंकर का बीटा था. हमारी हे बेटी के स्कूल में उसके साथ पढता है.", अंदर आ कर विनय अपनी बीवी के सामने बैठ कर बोलै तोह सुषमा तनेजा बस मुस्कुरा दी नाम सुनकर.
"ाचे घर से है तोह लड़का ाचा हे होगा.", विनय क्या जवाब देता बस वह कुछ याद करता सा गाल को सहलाता बस 'हम्म्म्म' हे बोल पाया. बेटी ने पसंद भी किआ तोह वही जिसने खुद बाप को अपनी बेटी सामान लड़की की चुदाई करते रेंज हाथ पकड़ा था. वाह ऋ किस्मत कैसा खेल खेला. कल को बेटी के सामने वह इस से नजर कैसे मिलाएगा.
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घर पहुंच कर सीधा वह अपने कमरे में भाग गया मोटरसाइकिल को खड़ा करते हे. पता तोह चल हे गया होगा घरवालों को उसके आने का लेकिन हाथ में पकड़ा पैकेट लिए वह जल्दी से कमरे में आया और अपनी अलमारी में पीछे की तरफ उसको छुपता वह जूते खोल साफ़ कपडे लिए तारा के कमरे में आया.
"हाँ तोह मैं नजर आ हे गई आखिर.", तारा ने अर्जुन को अपने सामने देखा तोह नाराजगी से कहा.
"तुम नजरो से दूर हे कब हुई थी.", वैसे हे उसके पास जा कर बाँहों में लेते उसने कहा तोह तारा शर्माती सी पीछे होने लगी.
"वैसे तोह कहती हो मई पास नहीं आता. और अब खुद दूर कर रही हो.", अर्जुन ने टीशर्ट के ऊपर से हे उसका नरम और मोटा उभर दबाते हुए कान में सरगोशी की तोह इतने में हे उसकी छूट में सनसनी होने लगी.
"आठ... गंदे बचे पहले नाहा तोह लो. पसीने के स्मेल आ रही है.", नखरे और शर्म से तारा ने इतना कह तोह दिए लेकिन ये पसीने की गंध उसको उत्तेजित कर रही थी. और अर्जुन ने भी वही बात कह दी.
"पसीना तोह तुम्हे भी बहोत आता है. और फिर परवाह भी नहीं करती जब दोनों हे पसीने में लिपटे होते हैं.", उसकी बंद हो चुकी आँखों को देखते हुए अर्जुन ने तारा के होंठ चूसने शुरू किये तोह वह खुद हे एक हाथ से अपना उभर दबवाती दूसरे से उसका सर जोर से अपने मुँह पर दबाने लगी थी. अर्जुन को डर भी था के कही कोई ऊपर न आ जाये. कस के एक बार चूम कर उसने तारा को छोड़ दिए लेकिन वो प्यासी नजरो से बस उसको हे देख रही थी.
"खाने के बाद बाथरूम में. बस ध्यान रखना सबसे पहले हम दोनों हे खाना खाये. उतना समय बहोत होगा हमारे लिए फिर रात का कुछ पता नहीं के कोण यहाँ सोये और कोण कहा.", अर्जुन ने दूसरा उभर भी दबाते हुए कहा और तारा ने भी हाँ में सर हिलाते हुए जवाब दिए. वह से निचे आने के बाद वो सीधा बाथरूम में घुस गया.
"टोलिया तो ले ले बीटा.", रेखा जी ने आवाज लगाई तोह अर्जुन ने टीशर्ट उतरने के बाद दरवाजा खोलते हुए उन्हें देखा और रेखा जी भी उसके चौड़े सीने और प्यारी सूरत को देखती हक्क पर टोलिया तंग कर मदद गई. दरवाजा फिर से बंद कर वह नहाने लगा इधर रेखा जी अपने बेटे के लिए दूध तैयार करने में लगी थी. अलका और प्रियंका को प्रीती थोड़ी देर पहले हे अपने घर लेकर चली गई थी उन्हें बता कर की आज रात वह वही रहने वाली है और खाना भी पारवती बना देगी. पुछा तोह उन्होंने आरती से भी था लेकिन आरती ने मन कर दिए था ये कहते हुए की आज रात को वह अपनी बुक ख़तम करने वाली है. कल वह प्रीती के साथ उसके घर हे रहेगी. इधर नाहा कर अर्जुन बहार आया तोह उसकी माँ ने टेबल पर दूध का बड़ा गिलास और 2 लाडू रख दिए थे.
"ला ये टोलिया मुझे पकड़ा और इधर बैठ.", उन्होंने टोलिया अर्जुन के हाथ से लेते हुए ाचे से उसका सर सुखाया और फिर आरती को आवाज दी.
"हाँ ताईजी. बताइये.", एक सफ़ेद टीशर्ट और गुलाबी प्रिंट वाला पजामा पहने और आँखों पर नजर का चस्मा लगाए वह आई तोह अर्जुन ने बड़े गौर से उसको देखा. कितनी मासूम और हमेशा अकेले में रहने वाली. बस ज्यादातर वह अपनी बहनो में हे बातें कर लेती थी नहीं तोह बस किताबे और उसका कमरा.
"यहाँ बैठ जा अपने इस छोटे भाई के भी पास. और मई तेरी कॉफ़ी लेके आती हु.", रेखा जी ने टोलिया तार पर डालते हुए कहा और फिर वह रसोईघर में चली गई.
"आपका दिल नहीं करता सबके साथ रहने को? हमेशा कमरे में अकेली घुसी रहती हो आप.", अर्जुन ने आँखों में देखते हुए कहा तोह आरती ने नजरे नीची कर ली.
"वैसे हमेशा तोह अकेली नहीं रहती. और ये 2 बुक्स तुमने दी है जो मुझे, ये बस मुझे कहीं जाने हे नहीं देती. आज रात पूरी हो जायँगी बस. कल से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.", आरती धीमी आवाज में वैसे हे बोल रही थी बिना उसको देखे.
"पता है ये चस्मा आपकी ख़ूबसूरती और बढ़ा देता है. और ये इतनी लम्बी पलके, ये शीशे पर नहीं लगती क्या?", अर्जुन को ऐसे तारीफ करते देख गोर गाल हलके गुलाबी होने लगे और इतने में हे रेखा जी 2 कप लिए वही टेबल पर आ गई. आरती की बगल में baith-te हुए उन्होंने अर्जुन से कहा.
"वो आरती को अपने साथ जरा मार्किट ले जाना बीटा. देसी घी और थोड़ा सामान लेके आना है. फिर बादल बने हुए है तोह रात में जाना ठीक नहीं होगा.", एक पर्ची और पैसे अर्जुन की तरफ करती वह बोली तोह अर्जुन ने लड्डू कहते वह पकड़ लिए.
"माँ, मैं कह रहा था के आरती दीदी तोह व्यस्त है क्योंकि किताब पढ़ना ज्यादा जरुरी है इनके लिए बजाये की ये छुट्टियां हमारे साथ बिताने के तोह आप हे चल लीजिये मेरे साथ मार्किट.", अर्जुन की इस बात पर थोड़ा चौंकते हुए आरती ने देखा तोह अपनी ताईजी को हँसते देख वह झेंप गई.
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं. मैंने तोह ये कहा था न के रात को पढूंगी और वैसे भी ख़तम होने हे वाली है. मैं चल रही हु मार्किट.", आरती ने जवाब देने के बाद बस ख़ामोशी से कप को होंठो से लगा लिए.
"माँ फिर आपको तोह मई कल हे लेके जाऊंगा अपने साथ. आज आरती दीदी हे सही.", अर्जुन ने अपनी माँ को मुस्कुरा कर कहा तोह वह थोड़ा अचंभित सी देखने लगी.
"मैंने मार्किट क्यों जाना है? कोई काम नहीं है मुझे तोह वह."
"ओफ्फो, मुझे कुछ लेना है मेरे लिए तोह फिर आप चलेंगी तोह गलती नहीं होगी न. और वैसे भी अभी मुझे खरीदारी करनी कहाँ आती है.", अब वह समझी की अर्जुन क्या कह रहा है.