Incest Pyaar - 100 Baar - Page 12 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 73 (ा)

Arjun-Shankar/Dev-Danav


3 बजे के समय था कोई और एक साधारण से होटल के कमरे में संजीव अकेला हे बीएड पर सोया हुआ था. दरवाजे की घंटी के एक बार बजते हे वह झट्ट उठ खड़ा हुआ. कसरती जिस्म ऊपर से बेपर्दा था जिसकी परवाह किये बिना वह उठते हे दरवाजे पर पहुंच गया.

"बड़ी देर कर दी आने में आपने.", सामने डॉ शंकर खड़े थे, हाथ में के बैग लिए. उन्हें कमरे के अंदर करते हे संजीव ने फिर से दरवाजा बंद कर दिए.

"ये हाथ कैसे जख्मी हुआ?", बैग खोलते हुए उन्होंने मरहम पट्टी का सामान निकाल कर बिस्टेर पर रखा और संजीव के हाथ पर बंधा कपडा खोल कर ध्यान से देखने लगे.

"सब सही जा रहा था लेकिन एक हमारी उम्मीद से 3 लोग ज्यादा थे वह. फिर भी बचाव हो गया क्योंकि गोली मेरी हे पिस्तौल से टकरा गई थी.", संजीव की बात सुनते हुए शंकर जी चिमटी की मदद से 3-4 छोटे धातु के टुकड़े हथेली से निकल रहे थे. जख्म ाचे खासे थे लेकिन कोई शिकन न थी संजीव के चेहरे पर. सभी टुकड़े निकलने के बाद एक तरल से हाथ को साफ़ करने के बाद उन्होंने ख़ास तरह की मलहम एक पट्टी के टुकड़े पर लगाने के बाद उसको हथेली पर चिपका दिए. रूई का टुकड़ा लगाने के बाद ऊपर पट्टी करते हुए उन्होंने अगला प्रश्न किआ.

"कोई निशाँ पीछे?"

"नहीं. 7 लोग थे कुल वह. रोशन के भाई समेत सभी 3 से ज्यादा संगीन अपराध में वंचित.", संजीव ने पट्टी हो जाने के बाद ध्यान से हाथ को देखा और फिर टेबल पर उलटे रखे दोनों गिलास साफ़ करने के बाद वही पड़ी 'वैट 69' की बोतल से दोनों के लिए गिलास में जाम तैयार किये. थोड़ा पानी और बंद डब्बे से निकाल कर 3-3 टुकड़े बर्फ के डालने के बाद एक गिलास अपने चाचा की और बढ़ा दिए.

"कुछ jaan-ne लायक बात", गिलास होंठ पे लगाने से पहले शंकर जी ने पुछा.

"बहोत साडी है. जिन तीन लोगो की वह उम्मीद नहीं थी, वह सभी फाजिल्का एरिया कण्ट्रोल करते थे. सारा सफ़ेद सामान उन्ही के पास से इधर आता था. तक़रीबन 8 मर्डर के केस में वह भगोड़े करार थे पंजाब के 3 ज़िलों में और हरयाणा के 2. रोशन के भाई पास से ये बरामद हुआ जो वह रोशन को देने वाला था और शायद फिर वही जहा आपने मुझे नजर रखने को कहा था.", ये 4 तस्वीरें थी जिन्हे शंकर शर्मा ने देखा और एक तरफ रख दिए.

"सिग्रेटे.", शंकर जी ने इतना हे कहा तोह संजीव ने 2 सिग्रेटे सुलगते हुए एक उनकी तरफ बढ़ा दी.

"उनमे से एक आदमी ***** गांव से था और उसके पास ये तस्वीर, चिट्ठी और 3 लाख बरामद हुए. एक सूटकेस में था सारा सामान. पैसे मैंने हक़ भिजवा दिए थे बाकी असले और पैसे के साथ. .", इस बात को सुनते हे शंकर जी ने गिलास एक तरफ रखते हुए तस्वीर पर भरपूर निगाह डाली. फिर चिठ्ठी को पढ़ने के बाद संजीव की तरफ देखा.

"इनके साथ क्या चक्कर हो सकता है?", आस भरी निगाह से अब संजीव अपने चाचा की तरफ देख रहा था. शंकर जी ने 2 लम्बे काश लगाने के बाद सिग्रेटे बुझा कर raakh-dani में दाल दी.

"कनेक्शन समझो. ये उमेद गुज्जर है और मोहर सिंह खुद इसका कुछ बिगड़ नहीं सकता तोह उसके पास 2 हे रस्ते बचते है. या तोह किसी प्रोफेशनल से काम करवाया जाये या अपने भांजे बिजेन्दर से. तुमने पहला रास्ता फ़ैल कर दिए अब वह दूसरे को परखेगा, लेकिन एकदम से नहीं. और बिजेन्दर पर नजर रखना.", सारा सामान अपने ब्रीफ़केस दाल कर उन्होंने वह बंद कर दिए.

"आपका ऑपरेशन कैसा रहा?", संजीव ने दोनों गिलास में फिर से जाम बना दिए थे.

"मैं डॉक्टर हु और ऑपरेशन सफाई से करना मेरी आदत है. और शायद ये कहो तोह ज्यादा बेहतर होगा के मेरी टीम बदलती नहीं और सभी मेंबर अपने काम में माहिर है. मंगत की सर्जरी सक्सेसफुल रही और सांगवान का जन्मदिन भी."

इसके बाद जाने कितनी देर दोनों की बातें चलती रही और सुबह 6 बजे डॉ शंकर कमरे से चले गए संजीव को पूरा दिन आराम करने का बोल कर. आज संजीव ने पहली बार कोई ऐसा मिशन अकेले पूरा किआ था जहा उसके अनुमान से ज्यादा लोग और पास में गोलीअ काम थी. लेकिन अपने चाचा से इन 3 घंटो में वह सीख चूका था के भविष्य में ये गलतिया कैसे ख़तम करनी है.

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तक़रीबन पौने 6 बजे ऋतू दीदी ने करवट बदली तोह अर्जुन की आँख खुल गई. नींद में भी ऋतू के चेहरे पर एक मोहक मुस्कान थी लेकिन अर्जुन को कुछ अलग महसूस हुआ तोह बिना ज्यादा hile-dule उसने अपने पिछली तरफ देखा तोह अलका दीदी भी उस से चिपक कर सोई हुई थी. टीशर्ट पेट से ऊपर उठी हुई थी और एक उभार लगभग आधा बहार था. अर्जुन ने जल्दी से टीशर्ट को ठीक किआ और फिर आराम से बिस्टेर से उतर कर दोनों के ऊपर चद्दर डालने के बाद बहार आ गया. अब बारिश रुक चुकी थी लेकिन फिर भी आसमान में कही कही काले बादल घिरे हुए थे.

"अलका दीदी कब आई हमारे पास.?", सर को खुजाता वह सीधा नीचे उतर कर बाथरूम में घुस गया. नाहा धो कर अपने कमरे में आया और स्कूल के कपडे पहन कर पहले छत्त पर सबकुछ ठीक किआ और फिर जहा Ritu-Alka सो रही थी उस कमरे को. सबकुछ सही करने के बाद नीचे आते हे सामने दादी के खड़े पाया.

"आज सुबह गया नहीं तू?"

"दादी बारिश में अगर जाता तोह फिर बिस्टेर पर पड़ा होता. वैसे भी कल ज्यादा हे म्हणत हो गई थी. पहले स्कूल फिर स्टेडियम और रात को पढाई.", उनके हाथ से दूध का गिलास और 2 लड्डू लेकर वही आँगन में राखी कुर्सी पर बैठ कर वह खाने लगा.

"सही बात है वैसे तेरी. कोई बात नहीं थोड़े दिन में सब अपने समय पर होने लगेगा.", इतना कहती कौशल्या जी रसोईघर में काम कर रही ललिता और रेखा जी के पास चली गई.

रूपाली भी तैयार हो कर नाश्ता करने बैठ गई थी और प्रियंका दीदी चाय की ट्रे लेकर अपने कमरे में जा रही थी. कोमल और माधुरी दीदी के पास.

"ऋतू दीदी कहा पर है?", इतनी सुबह प्रीती को सामने देख अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन उसकी बात सुनते हे चुप हो गया.

"वो और अलका दीदी ऊपर इस साइड वाले कमरे में सो रही होंगी.", रूपाली ने अपनी जगह बैठे हुए हे इशारे से प्रीती को बताया और वह तेजी से सीढ़ियां चढ़ती ऊपर चली गई.

"दीदी, अभी स्कूल जाने में पूरा एक घंटा पड़ा है. मैं जरा अपने एक दोस्त से मिल कर आ रहा हु. 15-20 मिनट में वापिस आ जाऊंगा.", रूपाली को इतना बता कर अर्जुन ने गलियारे में राखी अपनी पतले टायर वाली साइकिल उठाई और निकल लिए अपनी मंज़िल की तरफ.

"128, 127 और ये रहा 126.", अर्जुन 2 मिनट बाद हे इस आलिशान से घर के बहार खड़ा था. 4 लोगो के हिसाब से थोड़ा ज्यादा बड़ा और एक कार अंदर कड़ी थी और एक बहार. आसपास नजर दौड़ाई तोह बस इधर 4 हे घर थे और इनके सामने पार्क की छोटी वाली साइड. साइकिल एक तरफ कड़ी करने के बाद उसने घर के बढ़ा लगा घंटी का बटन दबा दिए. 'Trrr-Trrr'

आँगन के दूसरी तरफ जाली का दरवाजा खोलती हुई भरे भरे शरीर की 40-45 साल की ये गौरवर्ण महिला गेट की तरफ आ गई.

"हांजी क्या काम है?", गेट के दूसरी तरफ से उन्होंने अर्जुन पर नजर डालते हुए कहा. वह भी देख चुकी थी के ये लड़का स्कूल ड्रेस में है.

"जी आंटी जो वह अजीत अंकल से जरुरी काम है. एक बार उन्हें बता देंगी.", अर्जुन ने लचर आवाज में कहा. वह महिला बड़बड़ाती हुई अंदर चल दी. "इतने बड़े हो गए लेकिन दोस्ती स्कूल के बचो से लगाए रहते है." कुछ हे देर बाद एक सांवले रंग और औसत लम्बाई के साथ थोड़ा बहार को निकले पेट वाला अजीत सोलंकी कालर वाली टीशर्ट और घुटने तक की खुली निक्कर पहन कर सामने से चलता गेट तक आया.

अर्जुन को देख कर वो जैसे इस अनजान चेहरे को याद करने की असफल कोशिश करने लगा और अर्जुन ने उसकी शंका ख़तम करते हुए जेब से वह कागज़ का टुकड़ा निकल कर सामने कर दिए. चेहरे पर राजदार मुस्कान थी जिसको देख सोलंकी भी थोड़ा खुश होता बहार आ गया.

"तोह तुम हो मेरे कबूतर? लेकिन यहाँ चल कर आने की कोई खास वजह?", वो समझ गया था के ये लड़का भी काम के बदले sewa-pani की इत्छा रखता है.

"अंकल पार्क में चल कर बात करते है अगर 5 मिनट हो आपके पास?", अर्जुन ने वही मुस्कान चेहरे पर रखे हुआ कहा और सोलंकी हाथ से उसको साथ चलने का इशारा करता पार्क के अंदर जाने वाली जगह से प्रवेश कर गया.

"इसके बदले मैंने सनी को 1000 रुपये दे दिए थे ताकि वह तुम लोगो को खुश रखे. कही तुम भी उसकी तरह बहती गंगा में हाथ तोह नहीं धोना चाहते.?", इस समय उसके चेहरे से भरपूर काइयाँ पैन टपक रहा था.

"मैं जो चाहता हु उस से तेरा भविष्य अन्धकार में नज़र आता है सोलंकी.", खली पार्क में दूर बेंच पर सोलंकी की बगल में बैठे अर्जुन की आवाज में पहले से विपरीत सिर्फ आवेश और चेतावनी थी. लेकिन स्वर बहोत धीमा और सार्ड. अजीत सोलंकी के चेहरे के भाव भी अचानक बदल गए.

"तू क्या बात कर रहा है लड़के? तू मुझे जानता नहीं है ाचे से.", सोलंकी ने देखा था के ये लड़का जरुरत से ज्यादा हे तगड़ा और लम्बा चौड़ा है. लेकिन है तोह एक स्कूल जाने वाला नादान.

"पहले तू मेरे बारे में जान ले. अर्जुन शर्मा नाम है मेरा और इस नाम को तू कभी भूल न सके उसके लिए मेरे पिता का नाम भी बता देता हु, "डॉ शंकर शर्मा"." इतना सुनते हे सोलंकी की गर्दन झुक गई जिसको वह अपने दोनों हाथो से छुपाये था.

"तेरी भी एक जवान बेटी है, सुना ये भी है के वह खूबसूरत भी बहोत है.", अर्जुन ने उसके पत् पर हाथ रखते हुए कहा. सोलंकी अंदर तक हिल गया था उसकी बात का मतलब समझते हुए.

"ऐ.. इस सबसे उसका क्या लेना देना?"

"देखा कैसे आवाज निकली अपनी बेटी का नाम सुनते हे. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला. लेकिन कान खोल कर एक बात सुन ले, जो काम तू करने की तैयारी कर रहा था उसको अंजाम तक पहुंचने के लिए ठोस सबूत जरूर होंगे तेरे पास. वह मुझे चाहिए और ऐसा न करने की सूरत में मैं तेरे साथ क्या करूँगा तू सोच भी नहीं सकता. तूने 2 बजे का समय निर्धारित किआ था न तूने उस मासूम की ज़िन्दगी खराब करने के लिए, तोह आज दोपहर 1:50 पर मैं तेरे घर आऊंगा. और अगर तुझे मेरी बातें कोरी धमकी लग रही है तोह पिछले महीने की 25 तारीख का अखबार उठा कर देख लेना, पुलिस ने जो 2 हत्यारे बेहोशी की हालत में kshatt-vishatt हालत में पकडे थे वह मेरा हे काम था. और तू उनसे कुछ अलग नहीं है, जैसी सोच है तेरी. चलता हु मैं और समय पर आऊंगा तुझसे मिलने.", अर्जुन ने कलाई घडी में समय देखा और सोलंकी को pareshan-gum में डूबा वही बैठा छोड़ बहार आ गया.

पहली मंजिल पर कड़ी ये लड़की ध्यान से देख रही थी कभी अपने बाप को और कभी इस लड़के को जो उनके घर के सामने से अपनी साइकिल चला कर निकलता बना. इधर सोलंकी कुछ याद करते हुए बेंच से खड़ा हुआ और अपने घर का दरवाजा खोल सीधा अपनी बीवी को आवाज लगाने लगा.

"Geeta-Geeta"

"कहो क्या काम है?"

"वह पिछले महीने के अखबार कहा है?", सोलंकी जैसे अभी भी उस लड़के को जांचना चाहता था.

"ऊपर चट्टी पर रखे है तारिख के हिसाब से. लेकिन उनमे क्या देखना है?", बीवी की पूरी बात सुने बिना हे वह अंदर हे बानी सीढिआँ चढ़ता खुली छत्त पर जाने से पहले बानी स्टोर नुमा जगह पर रखे अख़बार ध्यान से देखने लगा. 25 तारिख.. जैसे हे वह अखबार उसने उठा कर ध्यान से देखना शुरू किआ, उनके शहर वाले पृष्ट पर छपी बड़ी खबर पर उसकी नजर अटक गई. "जितेंदर और विष्णु घायल अवस्था में पुलिस को #### स्टैंड पर बेहोशी की हालत में मिले", इस लाइन को वह स्वर में बोल बोल कर पढ़ गया. और अख़बार हाथ से चूत कर नीच गिर चूका था.

"मतलब वह सही कह रहा था. और वो बीटा भी शंकर का है मतलब पंडित रामेश्वर के घर से.", अंदर तक हिल गया था सोलंकी. लेकिन इस सबके बीच वह ये न देख सका के उसकी लाड़ली, जिसको वह दुनिया के डर से ज़्यदातर घर में हे रखता था, उसने सब देख सुन्न लिए था. खुद को दुरुस्त करता वह नीचे चला गया. और उस लड़की ने अपने बाप के जाने के बाद वही अखबार उठा कर ध्यान दिए लेकिन ज्यादा कुछ समझ नहीं आया.

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आज भी आकांक्षा घर के बहार हे मिली थी और पिछले दिन की तरह अर्जुन उन दोनों के पीछे चल रहा था और वह अपनी बातो में लगी आगे आगे.

"आ गया बहनो का भैया. देखो सही काम लगाया हुआ है इसको, पीछे गुलाम की तरह सामान ले कर चलने के.", अर्जुन ने सनी की बात को नजरअंदाज करते हुए बस संदीप की आँखों में देखा और उसने पलके झपका कर जवाब दे दिए. फिर बिना रुके अर्जुन स्कूल के अंदर आ गया.

"फत्तू साला.", मुकेश ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा और सभी हंसने लगे.

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आज भी विद्या मैडम की क्लास ाची गई थी. लगभग सभी बचे इस सब्जेक्ट में ाचे थे और उनके पढ़ने का तरीका भी सरल था. पीरियड समाप्त होते हे सभी स्टूडेंट्स अपने आप हे सीधे बैठ गए थे लेकिन अर्जुन कल वाले डेस्क पर हे आज अंदर की तरफ था. डेस्क पर कोहनी टिकाये किताब में खोया हुआ. जब सभी ने एक साथ गुड मॉर्निंग मिस कहा तोह वह भी जल्दी से खड़ा हुआ लेकिन मिस अन्नू वालिए की नज़र तोह जैसे आते हे उस पर थी.

"सीट डाउन आल.", सबके बैठने के बाद उन्होंने अटेंडेंस लेनी शुरू की लेकिन आज वह हरेक नाम बोलने के बाद स्टूडेंट का चेहरा देख रही थी. अर्जुन का रोल नंबर 4 था क्योंकि नाम 'ा' से था और जैसे हे मिस वालिए ने अर्जुन शर्मा पुकारा, अर्जुन ने बड़ी शालीनता से 'प्रेजेंट' बोलै.

'अर्जुन शर्मा', मैं में ये नाम दोहराया मिस वालिए ने और फिर बिना ऊपर देखे सबकी हाजरी लगा ली.

"हम कल कहा थे?", मैडम ने इतना हे कहा के सभी ने एक स्वर में टॉपिक का नाम लिए, "एनर्जी- फंडामेंटल्स"

"गुड. मतलब सभी का ध्यान था क्लास में.", वह बोल रही थी और अर्जुन फिर से उस किताब में हे देख रहा था. लेकिन आते हे टोकना जैसे मिस वालिए को ठीक नहीं लगा. उन्होंने पहले आज का टॉपिक एक्सप्लेन किआ फिर बाकी बचो से 2-3 सवाल किये. जैसे हे सवाल थोड़े मुश्किल होने लगे क्लास में हाथ भी काम उठने लगे थे.

'मटर' से शुरू हुए क़ुएस्तिओन्स और भी ज्यादा मुश्किल हो गए जब मैडम ने फिर से अर्जुन को खड़ा किआ और आज समय भी पर्याप्त था सवाल भी. डेंसिटी, एटम, structre,nature सभी सवाल मिस अन्नू वालिए ने कर लिए थे लेकिन अर्जुन के पास सवाल ख़तम होते हे जवाब तैयार थे. मिस अन्नू वालिए जवान थी और दिमाग से गरम, बिना ज्यादा अनुभव के. और अगले 10 मिनट में हे फिजिक्स में मेजर करने वाली मैडम के पास सवाल ख़तम हो चुके थे. 6-7 सवाल तोह ऐसे थे जो बाकी किसी भी स्टूडेंट ने सुने भी नहीं थे कभी.

गोरा गुलाबी चेहरा अब हताश दिख रहा था. लेकिन हारने से पहले एक आखिरी सवाल किआ उन्होंने जिसका जवाब अर्जुन सही देते देते गलत दे गया.

"गेट आउट ऑफ़ माय क्लास. यू ओवरस्मार्ट.", ज्वालामुखी फट पड़ा था अर्जुन की इस गलती से लेकिन ये कहने के बाद हे अंदर से उन्हें एहसास हो गया था के अभी जो यहाँ हो रहा था वह कही से भी एक शिक्षक और विद्यार्थी का स्तर नहीं था. लेकिन वह कक्षा से अर्जुन को निकल चुकी थी और अपनी गलती मान लेना मुमकिन न था. डेस्क पर राखी अपनी पानी की बोतल से एक घूँट पीने के बाद वह चुपचाप बस बोर्ड पर घर से करने के लिए काम लिखने लगी और उसके बाद घंटी बजने से 5 मिनट पहले हे क्लास से निकल गई.

दर्शन जी की क्लास में आज भी सभी ने दिल से पढाई की और साथ हे उन्होंने पढ़ते हुए hansi-majaak का माहौल भी बनाये रखा. Chapter को समझते हुए वह आम ज़िन्दगी से जुड़े हुए मजेदार उदाहरण देते थे जो बिलकुल हे अलग और प्रभावशाली तरीका था. अपना पीरियड ख़तम होने से पहले वह भी थोड़ा मजेदार काम करने के लिए देते गए थे.

मिस चारुल सिंह आज भी क्लास को ग्राउंड में ले आई थी. लड़कियां फिर से सीढ़ियों पर बैठ कर criss-cross, पजल जैसे खेल खेल रही थी वही आज लड़को ने 2 टीम बना कर फूटबाल खेलना तये किआ. क्लास में 10 लड़किया और 14 लड़के थे जिसमे से एक लड़का आज नहीं आया था और अर्जुन ने खेलने से मन कर दिए तोह बाकि सभी 6-6 की टीम बना कर खेलने लगे. अर्जुन जहा लड़कियां बैठी थी उसी कतार में थोड़ा दूर जा कर अकेला बैठ गया.

"तुम नहीं खेल रहे?", मिस चारुल सिंह भी घूमती हुई अर्जुन के पास आ कर कड़ी हो गई थी. आज उन्होंने हलकी गुलाबी लिपस्टिक लगाई हुई थी और स्पोर्ट्स पाजामे की जगह एक फिटिंग वाली जीन्स पहन राखी थी. भूरे बाल आज भी ऊपर से बंधे थे.

"नहीं. सेविंग एनर्जी.", अर्जुन ने ये जानबूझ कर कहा था. उसने पीछे से आती मिस वालिए को देख लिए था और उसका ये जवाब सुनकर मिस वालिए एक पल के लिए रूकती हुई बस उसको हे देखने लगी. यहाँ बहार के उजाले में अर्जुन ने देखा था के सुर्ख गुलाबी रंग के साथ हे उनकी आँखों का भी रंग भी हल्का भूरा था. और चेहरे पर थोड़ी मायूसी.

"मतलब?", चारुल मम को पता नहीं चला के वह कहना क्या चाहता है.

"मिस, मैं स्टेडियम में शाम को 4-6 बॉक्सिंग प्रैक्टिस करता हु और फिर सुबह भी रनिंग और एक्सरसाइज के लिए जाता हु. इसलिए अभी थोड़ा बॉडी एनर्जी सेव कर रहा हु.", अर्जुन ने जब पूरी बात बताई तोह चारुल मैडम उसके पास हे बैठ गई. उन्होंने जब अन्नू मम को देखा तोह मुस्कुराते हुए अपने पास हे बुला लिए. वह चुपचाप उनकी तरफ बैठ गई.

"स्टेडियम में किसके अंडर प्रैक्टिस कर रहे हो? अनिल जी या रविंदर कुमार?" अर्जुन ने ये नाम सुने थे क्योंकि वह जूनियर लेवल के साधारण लड़को को सिखाते थे. चारुल मैडम को उनके नाम पता होना थोड़ा ताज्जुब की बात थी.

"नहीं नहीं. मेरे कोच सर जोगिन्दर सिंह संधू जी है. और हो सकता है अगले महीने मैं हैवी वेट जर में भाग लू.", मिस चारुल को थोड़ी हैरानी हुई जब अर्जुन ने अपने कोच का नाम लिए और बॉक्सिंग के बारे में बताया.

"कितने समय से प्रैक्टिस कर रहे हो?"

"एक महीना हुआ है अभी, मिस.", अर्जुन ने ये जवाब दिए तोह देखा की अन्नू मम उसको हे देख रही थी.

"तुम बैठो एक बार मैं आती हु अटेंडेंस रजिस्टर लेकर.", वह फुर्ती से कड़ी हुई और बिल्डिंग के अंदर की तरफ चल दी.

"तुम्हे बुरा नहीं लगा आज?", ये आवाज अन्नू मम की थी जो अर्जुन से नजरे मिलाये बिना सामने ग्राउंड की तरफ देख कर बोल रही थी.

"मिस बुरा किस बात का. आपने क्वेश्चन किआ, मैंने गलत बताया तोह सजा मिलनी हे चाहिए. एग्जाम में भी तोह गलत नंबर के मार्क्स कट होते है.", अर्जुन भी सामने देखते हुए हे जवाब दे रहा था. उसको यही ठीक लगा, क्योंकि सीधा आँखों में देखना ठीक नहीं था ऐसे अवसर पर.

"तुम्हे पता है वह क्वेश्चन तुम्हारी बुक से बहार का था.?"

"मेरी बहिन मेडिकल स्टूडेंट है और मैंने वह उसकी हे बुक्स में पढ़ा था."

"और तुम्हे उसका जवाब भी पता था न?", मिस अन्नू अब अर्जुन की तरफ देख रही थी. बहार हलकी हवा में उसके कुण्डल जैसे घुंगरल बाल हवा से हिल रहे थे. चेहरा कितना शांत था और आवाज में एक ख़ास भारीपन.

"मम, गलती ये हुई की मैंने उस से पहले कुछ ज्यादा हे जवाब दे दिए थे. ये ध्यान नहीं रहा के ओने 2 ओने डिस्कशन नहीं है, पूरी क्लास हमे देख रही है. एंड I'm रियली सॉरी फॉर तहत. आपने ये मुकाम अपनी म्हणत और लगन से कमाया है और स्टूडेंट्स का ाचा भविष्य बनाने में सबसे ज्यादा योगदान टीचर का हे रहता है. मैं कुछ समय के लिए भूल गया था. ी विल नेवर रिपीट सुच मिस्टेक अगेन.", अर्जुन ने बात ख़तम करि हे थी और मिस चारुल रजिस्टर लेकर उधर हे आ गई. और मिस अन्नू को जैसे अर्जुन के इस जवाब ने और परेशां कर दिए था लेकिन अभी वह आगे बात नहीं कर सकती थी.

"अभी तोह 20 मिनट से ज्यादा टाइम पड़ा है. हाँ तोह अर्जुन हम कहा थे?", उनकी ऐसी बात पर अर्जुन के जुबान एक बार फिर फिसल गई

"मिस हम तोह यही थे बस आप रजिस्टर लेने गई थी.", उसकी बात पर चारुल मैडम ने आँखें तरेर कर देखा तोह अर्जुन को गलती का एहसास हो गया.

"सॉरी. ध्यान नहीं रहा."

"It's ऑलराइट. वैसे बता देती हु मेरा पूरा नाम चारुल सिंह संधू है. और मेरे पापा तुम्हारे कोच है.", अब बारी अर्जुन की थी हैरान होने की.

"ओह..", वह इतना हे कह पाया.

"मैं भी स्टेडियम जाती थी लेकिन अब यहाँ इवनिंग में आना पड़ता है 1 घंटा रोज तोह ी ऍम आल्सो सेविंग एनर्जी.", इस बार वह ऐसे मुस्कुराई जैसे दोस्तों के साथ हो. घडी पर नजर डालने के बाद वह उठ कड़ी हुई और मिस अन्नू ने भी जाने से पहले एक बार फिर अर्जुन की तरफ देखा, जो उधर हे चल दिए था जहा बाकि सभी स्टूडेंट्स आ चुके थे हाजरी लगवाने.

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आज भी केमिस्ट्री की मैडम नहीं आई थी लेकिन ये सुब्स्तितुते लग गया था लाइब्रेरी के लिए और सभ स्टूडेंट्स ने अपनी पसंद की किताबो में ध्यान लगा लिए था. बस यही समय था जब अर्जुन आकांक्षा के साथ एक तरफ बैठा था और दोनों टेबल के नीचे से एक दूसरे का हाथ पकडे धीमी आवाज में बातें कर रहे थे. ये 40 मिनट कब ख़तम हुए दोनों को पता हे नहीं चला.

"भाई सनी और मुकेश?", संदीप ने अर्जुन को बैग उठाते देखा तोह पास आ कर जैसे पूछ रहा था के उनका क्या करना है.

"मैंने रूपाली दीदी को बोल दिए है के वह और आकांक्षा साथ चले जाये मैं थोड़ी देर तक आऊंगा. अब हम कुछ देर यही रुकते है और सनी तेरे बिना यहाँ से जाने से रहा तोह बस इन दोनों के जाते हे मैं सब संभल लूंगा.", अर्जुन ने संदीप को आश्वस्त किआ और दोनों वही गलियारे में कुछ देर खड़े रहे. जब इस तरफ का सारा स्कूल खली दिखने लगा तोह दोनों एक साथ हे बहार की तरफ चल पड़े. गेट के बहार हे सनी अपने 3 दोस्तों के साथ खड़ा संदीप का हे इन्तजार कर रहा था.

"कहा मर्डर गया थे रे बहनचोद.?" थोड़े गुस्से से उसने संदीप को आवाज लगाई लेकिन अर्जुन उसका हाथ पकड़ कर बिना सनी की और ध्यान दिए अपने साथ सड़क पार गली की तरफ चल दिए.

"ओह बहिन के लोडे तुझे सुन्न नहीं रहा मैं.. कडाककककक." सनी ने जब देखा की संदीप उसकी बात सुनकर भी अनसुना करता जा रहा है तोह वह गाली देते उसके पीछे लपका लेकिन जबड़े पर पड़े इस मुक्के ने उसके मुँह का भूगोल हिला दिए था. अर्जुन ने संदीप को एक तरफ करते हुए भरपूर प्रहार किआ था सनी के बाए गाल पर. फिर उसका गिरेबान पकड़ते हुए tada-tadd थप्पड़ो की बौछार कर दी थी. अपने दोस्त का ये हाल होता देख बाकी तीनो भी उनकी तरफ लपके लेकिन अर्जुन तैयार था. मुकेश जिस रफ़्तार से उसकी तरफ लपका था, अर्जुन ने उतनी हे फुर्ती से मुकेश को कमीज से पकड़ कर और आगे की तरफ जैसे उछाल हे दिए था. कन्धा अमलताश के वृक्ष के तने से टकराते हे मुकेश की दर्दभरी चीख निकल गई और इधर बाकी दोनों में से एक की गर्दन अर्जुन के पंजे में थी और आखिरी वाला अर्जुन को एक मिनट वही रुकने की धामी देता उनसे विपरीत दिशा में भाग लिए. संदीप में भी अब हिम्मत आ चुकी थी और वह भी नीचे गिरे मुकेश पर थप्पड़ बरसाने लगा.

"वह बचने नई चाहिए भाई.", इतने में वह चौथा लड़का स्कूटर पर पीछे बैठ कर उधर आ गया. उसके साथ कुलविंदर और राणा थे जिन्होंने जैसे हे स्कूटर बंद करने के बाद सामने अर्जुन को देखा तोह दोनों की घिघि बांध गई.

"ओह मादरचोद ये किस से लड़ने के लिए बुला लिए.", कुलविंदर ने पहले तोह खुद हे उस लड़के के गाल पर झापड़ रसीद कर दिए और उसके बाद दोनों हाथ जोड़ कर अर्जुन के सामने खड़ा हो गया. राणा तोह अर्जुन को देख कर पैदल हे वह से निकल लिए.

"भाई मेरा इनसे कोई लेना देना नहीं है. तुम कहो तोह मैं हे इन्हे मारता हु. लेकिन मैं इनके साथ नहीं दिखूंगा तुम्हे कभी.", नीचे गिरे सनी पर 3-4 ठोकर मरते हुए कुलविंदर जैसे उनपर हे गुस्सा निकल रहा था. संदीप और अर्जुन ने उन्हें मरना बंद कर दिए था क्योंकि ाची खासी धुनाई हो चुकी थी तीनो की और बस मुँह से खून आने के कसार रह गई थी.

"बस अपने दोस्तों को इतना समझा देना कुलविंदर की मैंने इन्हे सिर्फ सहलाया है. मार कैसे पड़ती है ये इन्हे दिखाया तोह इनके घरवालों को दुःख होगा की उनके बचो की ये दुर्दशा किसने की.", कुलविंदर के कंधे पर हाथ रखते हुए अर्जुन ने साइकिल का स्टैंड हत्या और संदीप के साथ आगे बढ़ चला.

"अरे बिलकुल गांडू आदमी है तू सनी, साले इस राक्षश से पन्गा ले लिए? शुक्र मन हलके हाथ से मारा तुझे नहीं तोह..", कुलविंदर अपने गाल पर हाथ रखता सनी और मुकेश के कपडे ठीक करता उन्हें समझा भी रहा था.

"भाई मुझे लगा के तुम आते हे उसकी धुलाई करोगे और यहाँ उल्टा मुझे हे कूट दिए.", सनी की आँखों से आंसू बह रहे थे और रो तोह मुकेश और वह तीसरा लड़का भी रहे थे.

"अरे शुक्र मन के अभी भी वह गुस्से में नई था. तुम्हारी शकल उतनी भी नहीं बिगड़ी, मैं और राणा तोह 3 दिन तक रुमाल बांड के घर में बंद रहे थे.", कुलविंदर उनको आपबीती बता रहा था.

"है बहनचोद का हाथ बहोत भरी है लेकिन तुम्हे देख के नहीं लग रहा के तसल्ली से मारा होगा. हमारी तोह माँ छोड़ दी थी साले ने सड़क पे लिटा के. ऊपर से पोलिसवाले भी उसको हे जानते है.", राणा जाने कहा से आ कर वही जमीन पर बैठ गया था. किसी बुजुर्ग समझदार व्यक्ति की तरह वह इन्हे ज्ञान दे रहा था और साथ हे अपना दुखड़ा रो रहा था.

"भाई इसलिए आप लोग अब स्कूल के सामने नहीं आते क्या?", मुकेश रुमाल से अपना चेहरा साफ़ कर रहा था साथ हे अपना कन्धा भी दबा रहा था.

"स्कूल? हम इस सड़क पे नहीं आते और आगे से इस पागल से दूर हे रहना. किस्मत ाची थी आज तुम्हारी.", इतना बोल कर वह सभी वह से निकल लिए.

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ठीक 1:50 पर अर्जुन सफ़ेद कासी हुई टीशर्ट और नीली जीन्स पहने अजीत सोलंकी के घर के बहार खड़ा था. लाल रंग का बुलेट वही एक तरफ खड़ा करके वह गेट खुलने की प्रतीक्षा कर हे रहा था के सोलंकी खुद गेट खोलकर उसको अपने साथ अंदर ले आया. उसकी बीवी नजर नहीं आ रही थी जब वह दोनों ड्राइंग हॉल से होते हुए इस ऑफिस नुमा कमरे में दाखिल हुए.

"मैं और विनय तनेजा साथ हे बिज़नेस करते है. और बचपन के दोस्त है. कुछ गलतियां हमने साथ हे की है और एक बार वह ज्यादा हे नशे में था तोह मैंने ये फोटो खींच लिए थे, भविष्य में इनको काम में लेने के लिए. लेकिन मेरी मंशा उस समय उसकी बेटी के साथ ऐसा वैसा कुछ करने की नहीं थी.", टेबल की दराज से 2 फोटो और उनके नेगेटिव अर्जुन के सामने रखते हुए वह सर झुकाये कुर्सी पर बैठा था.

"ाचा घर है, बीवी है, बचे भी और दौलत भी. फिर भी तुम्हे भूख है? घर से बहार तुम क्या करते हो ये तुम्हारा परिवार नहीं जानता, लेकिन सोचो अगर उन्हें ये सब पता चल जाये तोह? एक बेटी का विश्वास टूट जायेगा, उस पत्नी के साथ सम्बन्ध ख़तम हो सकता है, कानून के घेरे में आ गए तोह जो कमाया है सब मिटटी. अपनी भूख को काबू करो मर सोलंकी और अपने kaam-pariwar से प्यार करो.", टेबल पर रखे सिग्रेटे लाइटर को जलाते हुए अर्जुन ने वह दोनों फोटो और और नेगेटिव जलाते हुए टेबल के नीचे रखे स्टील के डस्टबिन में फेंक दिए.

"मैं आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा लेकिन क्या मैं ये पूछ सकता हु के तुमने ये सब क्यों किआ? तुमने खुद हे वह सबूत जला दिए जिनका शायद तुम इस्तेमाल कर सकते थे, जैसा मैं सोच रहा था.", सोलंकी की बात सुनकर एक बार के लिए अर्जुन का पारा ऊपर हो गया था. मुट्ठी कस गई और भुजाये फटने की कगार तक फूल चुकी थी लेकिन अगले हे पल खुदको शांत करता वह बड़े साढ़े हुए स्वर में बोलै,

"तुम नहीं समझे मेरा मकसद? एक लड़की जिसके साथ कोई जबरदस्ती करके उसकी आत्मा को चलनी करदे, एक बाप जिसकी बेटी की ज़िन्दगी नरक बन जाये और एक इंसान जिसको ये पता हो के उसको प्यार करने वाली के साथ कोई ऐसा करने वाला है और वह कुछ न कर सके तोह क्या परिणाम होंगे? मैंने वही सब रोकने के लिए ये किआ है. और तुम्हे और तुम्हारे परिवार को भी उस परिणाम से बचाया है जो समाज में तुम्हे kalank-balatkari और एक धोखेबाज दोस्त के रूप में याद रखता. चलता हु और आशा करूँगा के आप ध्यान देंगे जो भी आपसे इस दौरान हुआ और क्या कुछ खोने से आप बच गए.", अर्जुन ने हाथ जोड़ने के बाद कमरे के दरवाजा खोला और ड्राइंग रूम से बहार निकलती उस परछाई को भी देख लिए.

सोलंकी के भी हाथ खुद हे जुड़ गए थे. आँखों से पश्चाताप के आंसू टपकते हुए फर्श पर गिरने लगे. अर्जुन वह से बहार निकल गया लेकिन उसकी धर्मपत्नी ने अपने पति की आँखों में वह ाँसे देख लिए थे.

"जी, आप रो रहे है? और ये लड़का कोण था? सुबह भी आया था ये.", अपने पति का चेहरा आँचल से साफ़ करती वह ये सब पूछ रही थी. दिल बैठ रहा था उसका किसी अनहोनी की आशा से.

"गीता इस लड़के ने हमारे परिवार को ख़तम होने से बचा लिए. इस से ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगा. बस ये समझ आ गया के दुनिया में परिवार, विश्वास और इज़्ज़त्त से ऊपर कुछ नहीं है.", अपने पति के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर गीता की आँखों में भी 2 बुँदे चल्लाकक आई थी. कहा तोह हमेशा काम के बहाने घर से कई कई दिन गायब रहने वाला सोलंकी जो अपनी biwi-beti को घर से बहार भी न जाने देता था. अपना कमरा तक अलग किये हुए थे कितने हे सालो से और आज वह इतने भारी शब्द कह रहा था.

"सब ठीक हो जायेगा जी. हम सबके आपके साथ हर घडी में हैं. चलिए मुँह धो लीजिये मैं आपके लिए खाना लगाती है.", सोलंकी अपनी बीवी के साथ हे खड़ा होता उनके शयनकक्ष की और चल दिए.

"कौन हो तुम?", पूर्वी ने अर्जुन को मोटरसाइकिल स्टार्ट करते देखा तोह घर के अंदर बानी क्यारी (गार्डन) से हे हलकी आवाज में पुछा. पतली- छरहरी सी काली आँखों वाली ये लड़की संदीप के वर्णन को बिलकुल सही साबित करती थी. अर्जुन ने एक पल के लिए उसको देखा और फिर एक छोटी सी मुस्कान के साथ जवाब दिए.

"बदमाश हु. तुमने तोह सुना हे होगा मैं कैसे आपके पापा से फिरौती मांग रहा था.", अर्जुन की बात सुनकर उसके सपाट चेहरे पर भी एक मुस्कान तैर गई.

"थैंक यू सो मच. ऐसा कोई भी किसी के लिए नहीं करता.", पूर्वी ने बहार खड़े हो कर साड़ी बात सुनी थी और हर गुजरते अंतराल के साथ उसके दिल में अर्जुन का चरित्र गहरा होता गया था.

"तुमसे थैंक यू sun-ne के लिए हे ये सब किआ है मैं, मिस पूर्वी सोलंकी.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करने के बाद पूर्वी की तरफ एक बार देखा और इतना बोलकर निकल लिए.

"ऐ तुम्हारा नाम..", पूर्वी को इस बात का जवाब न मिला और वह हैरान भी थी की इस लड़के को उसका नाम कैसे पता था. लेकिन एक अमित चाप छोड़ गया था अर्जुन उसके दिल पर. "पता लग हे जायेगा, देर सावेर. स्कूल ड्रेस थे सुबह देख हे ली थी."
 
अपडेट 73 (बी)

Arjun-Shankar/Dev-Daanav


'कभी कभी इंसान आवेश में आ कर ऐसे फैंसले ले लेता है जिनके नतीजे वह जानते हुए भी नजरअंदाज कर देता है. ऐसे फेंसलो के परिणाम सिर्फ और सिर्फ विनाश करते है. किसी ईमारत का अगर कोई हिस्सा खराब हो जाये तोह जरुरी नहीं उसकी बुनियाद हे मिटा दी जाये. नए स्तम्भ जोड़ कर उसके स्वरुप को बचाया जा सकता है. ऐसे हे अगर कोई इंसान या जीव अपना पथ भटक कर कुछ ऐसा करने की इत्छा रखता हो जिस से उसके हे अस्तित्व संकट में पड़ने वाला हो, सही सबक सिखाते हुए उसको एहसास करना चाहिए उन सभी के बारे में जो उसकी ज़िन्दगी में महत्व रखते है. जो अभी उसके पास है. जो उसके किसी भी नकरात्मक कदम का बोझ भी बराबर भुगतेंगे. हे पार्थ, युद्ध तभी आरम्भ करना चाहिए जब उसका शंखनाद हो चूका हो. नहीं तोह ऐसे छद्दमम युद्ध हर तरफ किसी क्षद्यंत्र से नजर आएंगे जो समय रहते रोके जा सकते है. करता भी तुम्ही हो और भोगी भी तुम्ही. अपने अंतर्मनन का इतना विस्तार करो के तुम समझ सको, समझा सको और अघोषित पथ पर चलते हुए उस भटके जीव को वापिस सही मार्ग का महत्व और उस अघोषित पथ पर चलने से होने वाले दुष्परिणाम दिखा सको. मारने वाले से बड़ा सैदेव हे बचने वाला होता. घोषणा से पहले किसी भी युद्ध को ऐसे हे टाला जा सकता है.'

अर्जुन सोफे पर आँखें मूंदे बैठा था और परेशां था जब वह यहाँ आकांक्षा के घर आया था. क्या उसने सही किआ था जो बिना कोई ज्यादा शारीरिक या मानसिक क्षति पहुचाये इन गुनहगारों को छोड़ दिए था? क्या उसको आकांक्षा को सबकुछ बता देना चाहिए जो भी उसके साथ हो सकता था या होने वाला था.? आकांक्षा नाहा कर कपडे बदल कर दोनों के लिए खाना गरम करने रसोईघर में गई हुई थी जब अर्जुन ने अपने आशंकित मैं को टटोलना शुरू किआ था. और जल्द हे उसको उसके अंतर्मन ने जवाब दे दिए था. चेहरा और दिल दोनों हे अब शांत थे. जो भी किआ था उस से वह एक होने वाले विनाश को रोक चूका था और आने वाले परिणाम ज्यादा गंभीर नहीं हो सकते थे अब. वह से उठ कर वह रसोईघर में दाखिल हुआ जहा आकांक्षा को पहली बार चूल्हे और बर्तनो से झूझते देख रहा था. मासूम से ये लड़की आज पहली बार ऐसा कुछ काम कर रही थी.

भीगी कमीज से दिखती सफ़ेद ब्रा की तान्निया बता रही थी की ये कमसिन ऐसे किसी काम की आदि नहीं है. एक हाथ से पीछे से उसका बदन अपने साथ लगते हुए अर्जुन ने दूसरे से चूल्हे को बंद करने की दिशा में घुमा दिए और गर्दन पर उबरी हुई पसीने की बूंदे बड़े प्यार से चूम ली.

"क्या करते हो? बस हो गया न और मैं आ रही थी खाना दाल कर.", उन बिल्लोरी आँखों ने पलट कर अर्जुन की आँखों में देखते हुए कहा. चेहरे पर बड़ी मोहक मुस्कान थी आकांक्षा के.

"अंदर चल कर पहले चेहरा साफ़ करो और आइंदा कभी ये काम मत करना.", अर्जुन ने एक पल के लिए आकांक्षा को गॉड में उठाया और दरवाजे से बहार खड़ा करते हुए खुद हे सब फैला सामान ठीक करना शुरू कर दिए. आकांक्षा वह से जाने के बजाये दिवार से तक लगाती अर्जुन को तेजी से सब सामान व्यवस्थित करते देखा रही थी. मैले बर्तन उनके धोने की जगह, चूल्हा और पत्थर की स्लैब को सफाई वाले कपडे से ाचे से साफ़ करने के बाद साफ़ बर्तनो में दोनों के लिए खाना परोसना.

"अभी तक यही कड़ी हो? चलो मैं अंदर टेबल पर खाना लगता हु.", प्लेट उठाने से पहले अर्जुन ने पलट कर वही कड़ी आकांक्षा को वही खड़े देख कहा तोह अब वह उसकी बात मानती हुई अंदर चली गई और पीछे पीछे हे अर्जुन खाने के बर्तन लेकर.

"आइंदा ये रसोई वाला काम अकेले नहीं करोगी.", हाथ मुँह धोने के बाद अर्जुन भी वही टेबल पर आ कर बैठा तोह आते हे उसने आकांक्षा से कहा. वह उसकी बात अनसुनी करती सीधा उसकी गॉड में चढ़ बैठी.

"क्यों न करू? तुम कोई रोज रोज मेरे साथ ऐसे अकेले में लंच करने आते हो? वैसे काम तोह तुम्हे करना आता है.", गले में बाहें डालती वो बड़ी हसरत से अर्जुन को देख रही थी. उसका भोलापन और मासूम चेहरा अर्जुन के दिल को बेचैन कर रहा था. इस से पहले जितनी महिलाये या नवयवतीअ अर्जुन के संसर्ग में आई थी वह सभी परिपक्व थी लेकिन आकांक्षा जैसे आज भी एक नन्ही सी प्यार पारी थी. अपनी बाहो के घेरे में लेते हुए अर्जुन ने उसके माथे पर छोटा सा चुम्बन अंकित किआ और टेबल पर रखे भोजन की याद दिलाई.

"जो दिल करता है वह कर लेना लेकिन पहले खाना."

"मैं तुम्हे खिलाऊंगी और तुम मुझे.", इठलाती सी वह वैसे हे अर्जुन से चिपकी हुई बोली. अर्जुन ने भी रोटी का एक कोर टॉड कर सब्जी के साथ आकांक्षा के होंठो से लगाया. और वैसा हे आकांक्षा ने किआ उसके हाथ से खाने के बाद. बड़े प्यार से और आराम से ऐसे हे दोनों ने एक दूसरे को निवाले खिलते हुए जितनी इत्छा थी उतना खाया और अर्जुन ने उसको साथ वाली कुर्सी पर बिठाने के बाद सभी बर्तन उठा कर रसोईघर में रख दिए.

"आओ मैं तुम्हे हैंडवाश करना सिखाती हु.", अर्जुन को अपने साथ लिए वह अपने कमरे से जुड़े बड़े और आलिशान बाथरूम में आ गई. अर्जुन के साथ चिपकती मस्ती करती वह नल से गिरते पानी के नीचे दोनों के हे हाथ आपस में हलके हलके रगड़ रही थी. 34" के लगभग अपने गोल कूल्हे मस्ती में अर्जुन की जीन्स के अग्रभाग पर इधर उधर करती वह हर एक पल का आनंद ले रही थी. अर्जुन भी उसका हर पल में पूरा साथ दे रहा था.

"अब मुझे मीठा खाना है. लेकिन जिस से कैविटी न हो.", अर्जुन की छाती पर हाथ रखती आकांक्षा उसको अपनी तरफ खींच रही थी और जैसे हे चेहरा नीचे झुका, उसके होंठो को अपने नरम होंठो में दबती वह पूरी तरह से मस्ती में डूबने लगी. पिछले दिन की तरह हे उसने उचक कर अपने पाँव अर्जुन की कमर के गिर्द जोड़ लिए थे. गले में बाहों का हार डाले वह बेइंतिहा बस उसके होंठो को जैसे खाने हे लगी थी. अर्जुन भी अंदाजे से उसको वही कमरे में ले आया जहा आकांक्षा का बड़ा सा बिस्टेर, जिसपर आजतक सिर्फ वही सोई थी पर उसकी पीठ टिकता इस आत्मिक चुम्बन में पूरा साथ देने लगा.

"हहहहहह.. तुम जरुरत से ज्यादा मीठे हो.", नरम बिस्टेर पर लेती वह अपने ऊपर झुक कर खड़े अर्जुन को देखती हुई बोली. उसके हाथ अर्जुन की उन्नत और मजबूत बाजुओं पर फिसलते जैसे पूरा जायजा ले रहे थे. अचानक खुद को खड़ा करने के बाद वह अर्जुन की टीशर्ट को दोनों सिरों से पकड़ कर ऊपर करने लगी. अर्जुन ने उसकी मदद करते हुए वह सफ़ेद कासी हुई टीशर्ट उतार कर एक तरफ रख दी.

"वाओ. एकदम टार्ज़न जैसे हो.", आँखें बड़ी करती वह अर्जुन की पूरा कटाव और उबार ली हुई छाती पर हाथ रखे थी. हाथ रेंगता हुआ छाती से नीचे बानी 4 चौकोर और सख्त मांसपेशियों पर गया तोह वह बस उस जगह को सहलाती रही.

"क्या हुआ?", अर्जुन की आवाज से जैसे वह वर्तमान में वापिस आई हो.

"पहले दरवाजा बंद करने दो, और तुम यहाँ बैठो.", एक अदा से वह उसकी ब्याह के नीचे से निकलती दरवाजे को बंद करने के बाद वही कड़ी रही.

"लेट जाओ सीधे.", कमरे में जगमग सफ़ेद तुबेलिघ्त को बंद करने के बाद उसने अर्जुन से कहा और उस से दूर कड़ी वह एक एक करती अपनी सफ़ेद कमीज के बटन खोलने लगी. कमरे में ड्राइंग रूम से आती रौशनी की वजह से देखने लायक भरपूर रौशनी थी और हर खुलते बटन के साथ बढ़ती शर्म और लाली अर्जुन देख रहा था. फिर बिना कमीज को शरीर से अलग किये वह जल्दी से अर्जुन की बगल में आ कर लेट गई. मुँह बिस्टेर में छुपाये वह एक हाथ अर्जुन के ऊपर रखे थी.

"एकदम से क्या हो गया?", अर्जुन भी उसकी तरफ करवट लेते हुए एक हाथ कमर में डाले था.

"मैंने सोचा था के मैं तुम्हारे सामने ऐसा करुँगी लेकिन.. शर्म आती है न.", उसकी बात पर अर्जुन ने आकांक्षा को अपने ऊपर हे खींच लिए. दोनों हाथ उसकी खुली कमीज में दाल कर वह उसके गाल चूमने लगा. आकांक्षा के baal-vihin शरीर पर छोटे छोटे रोये खड़े होने लगे थे जैसे जैसे अर्जुन के हाथ उसकी नंगी कमर, पेट और पीठ पर रेंगते महसूस हुए.

"मेरी आँखों में देखो जरा.", अर्जुन ने इतना कहा तोह हिम्मत करती आकांक्षा ने चेहरा ऊपर किआ. फिर से किश करते हुए अर्जुन ने कब वह कमीज आकांक्षा के शरीर से जुड़ा कर दी खुद उसको पता न लगा.

उंगलिअ एक बार फिर से उस मुलायम पीठ पर रेंगती सफ़ेद ब्रा के हक्क पर आ पहुंची. और यहाँ भी अर्जुन की उंगलियों ने कमाल दिखते हुए मजबूती से बंद दोनों हक्क खोल दिए थे लेकिन ये आकांक्षा को एहसास हो गया था. एक हाथ अपने सीने पर रखती वह अधखुली ब्रा से अपना खूबसूरत यौवन छुआपये अर्जुन के पेट बैठी 'ना' में गर्दन हिला रही थी. उसकी आँखों में जमाने भर की शरारत नज़र आ रही थी. अर्जुन को भी उसका यु उसके साथ खेलना, प्यार करना, शर्माना एक नया हे सुख दे रहा था.

"बड़े गंदे हो तुम. एक अकेली और असहाये जवान लड़की का फायदा उठा रहे हो न?", होंठ को दांत से kaat-ti वह इस पल में ाचे से मस्त हो रही थी.

"ये असहाये लड़की खुद मेरे ऊपर बैठी मेरी इज़्ज़त्त लूट रही है. ध्यान से देखो.", अर्जुन के इतना कहते हे उसको एहसास हो गया के वो जहा बैठी है, उसके नीचे एक सख्त और खूब मोटा सा कुछ उसके कूल्हों में दबा है. कान लाल हो गए ये ख़याल करते हे की अर्जुन के पास जो प्यार करने वाली छड़ी है वो जरुरत से ज्यादा हे बड़ी है. आकांक्षा को ऐसे खुद में खोये देख अर्जुन ने आराम से वह छाती के सामने वाली कपडा नीचे खींच लिए.

उसके बाद के दृश्य को देखने के बाद अब अर्जुन उस हालत में था जहा उस से पहले आकांक्षा थी. गोलाकार और बिलकुल अकड़ कर खड़े उसके यौवन कलश जैसे बस अभी पक्के थे. आधे कटे नारियल से दूध पर ठीक बीच में laal-gulabi चेरी से निप्पल और 2 रुपये के सिक्के के आकर का गुलाबी घेरा उनके बहार की तरफ. जैसे वह कोई सुरक्षा कवच हो इन गुलाबी नगीनो को बचने के लिए. इतनी देर की अठखेलिओ और एक दूसरे के शरीर की गर्मी से वह बिलकुल सीध में देखते खड़े थे. आकांक्षा कब अर्जुन पर झुकी और कब उसने उसकी गर्दन पर गरम साँसे छोड़ते हुए चूमा उसको पता हे न चला. जैसे हे आकांक्षा ने मस्ती में भरते हुए गर्दन पर दांतो से कथा अर्जुन खयालो से बहार निकला.

"आउच", मस्ती में अर्जुन ने जानबूझ कर कहा.

"ाचा बच्चू. मेरे साथ जबरदस्ती करते हु. मैं दिखती हु अब तुम्हे.", अर्जुन की बलिष्ट बाजुओं पर अपने साफ़ तीखे नाख़ून दबत वह गीले होंठो से गर्दन के दोनों तरफ चूम रही थी.

"ये मेरी चेस्ट पर दोनों तरफ क्या चुभ रहा है.. आह्हः.", अर्जुन जानबूझ कर ये कह रहा था. आकांक्षा को जब उसका मतलब समझ आया तोह वह एक बार फिर शर्माती हुई अपने खूबसूरत दूध दोनों हथेलिओ से छुपाने लगी.

"बदमाश कही के. अब मैं कुछ नहीं करुँगी. जान कर सत्ता रहे हो न?", आकांक्षा का ऐसे इतराना बता रहा था के वह अर्जुन पर कितना विश्वास करती है, कितना प्यार है उसको इस इंसान से जिसके साथ पहली बार वह उस अवस्था में थी जो शायद कभी वह अपने एकांत में भी न हुई थी.

"नौटंकी कही की. अब बताओ क्या करोगी?", अब दृश्य उलट था. अर्जुन उसके ऊपर और आकांक्षा बीएड पर पीठ के बल लेती उसकी इस हरकत पर खिलखिला रही थी. वह हंसी जल्द हे गायब हो कर एक सिसकी में बदल गई..

"उम्म्म.. क्या करते हो? प्लीज आराम से.", अर्जुन के तपते होंठो के बीच उसका बया निप्पल क़ैद होते हे वह जल बिन मछली की तरह बल खाने लगी थी. दोनों पाँव पूरी जान से उसने अर्जुन की कमर में किसी sarp-kundal से लपेट लिए थे. मुँह से वह उसको आराम से निप्पल चूसने को कह रही थी लेकिन ये नया एहसास उसके जिस्म में एक नै अगन बढ़ा रहा था. अर्जुन के सर को सहलाती वह खुद अपना उभर ऊपर उठाने लगी. अपनी जीभ से अर्जुन उतनी देर तक एक निप्पल पर कलाकारी करता रहा जब तक आकांक्षा के पेट से होती एक नए उन्माद की लहर उस जगह तक न पहुंच गई जहा से वह आज तक अछूती थी. उसकी योनि के भीतर जैसे भूचाल आ गया था.

"आह्ह्ह्हह्ह... ये.. आह.. ये क्या हो रहा hai....mmmm." मजे से सिसकती आकांक्षा पूरे बिस्टेर की चादर बेतरतीब करती अर्जुन के इस जादू का भरपूर सुख ले रही थी. जिस्म का हर रोम जैसे काम की आग में और अधिक जलने लगा था. उसकी ये हालत देख कर अर्जुन ने निप्पल मुँह से निकलते हुए दोनों बेदाग़ अनार हाथो में लेते हुए फिर से उसके रसभरे होंठ अपने होंठो में ले लिए.

अब आकांक्षा का भी चूमने का तरीका और निखार गया था. अपने मुँह में अर्जुन का होंठ दबती वह उसकी चौड़ी पीठ पर अपने नाख़ून घिस रही थी. कब अपने आप हे उसकी कमर उछाल कर अर्जुन के जीन्स में बंद औजार से रगड़ने लगी खुद आकांक्षा को एहसास न हुआ.

"आअह्ह्ह्ह... मुझे रोक लो.. आह..", रह रह कर आकांक्षा का जिस्म झटके खाने लगा और अर्जुन समझ गया था ये उसके साथ क्या हो रहा है. अपना पहला चरमसुख झेलती वह मजे में बदहवास होने लगी थी. कुछ समय बाद जब आँख खोली तोह खुद को अर्जुन की बायीं बाजू पर सर रखे लेता पाया. वो भी बड़े प्यार से उसका मासूम चेहरा सेहला रहा था.

"अब ाचा लग रहा है?", अर्जुन ने गाल पर हाथ रखे हुए हे उसकी तरफ देखते हुआ पुछा. आकांक्षा की चमकदार आँखे अब जैसी किसी नशे में हलकी भारी थी लेकिन अब बेहतर हालत थी.

"क्या हुआ था मुझे?", उसकी तरफ करवट करती वह अपना सर अर्जुन की चौड़ी छाती पर रखती बाहों में भरे थी.

"आज तुम्हे एहसास हुआ है खुद के औरत होने का. एक पुरुष के साथ पहले अनुभव का, बेशक पूरा मिलान नहीं लेकिन अभी थोड़ी देर पहले तुम्हे चरमसुख का एहसास हुआ है. ओर्गास्म.", अर्जुन अब उसको किसी छोटे बचे की तरह सेहला रहा था. आकांक्षा भी ऊपरी भाग से निर्वस्त्र होने के बावजूद pur-sukoon से उसके साथ चिपकी थी.

"ऐसा लगा जैसे मैं किसी और हे दुनिया में थी और कुछ अलग सा मजा नशा हो रहा था. फिर जैसे मेरे वह से कुछ निकलने लगा और आँखें बंद हो गई.", अर्जुन उसकी ऐसी नासमझ बातों को भी प्यार से सुन्न रहा था.

"अभी तुम थोड़ा आराम कर लो और मैं भी स्टेडियम से हो कर वापिस आता हु. उसके बाद मैं रात तक तुम्हारे हे साथ रहूँगा.", अर्जुन ने इतना कहने के बाद छोटा सा किश उन नरम होंठो पर किआ तोह आकांक्षा की आँखों में उस गुहार को देखा जो कह रही थी की कही भी मत जाओ, आज मेरे पास हे रहो.

"ाचा बाबा जल्दी आ जाऊंगा और फिर तबतक तुम्हारे साथ रहूँगा जबतक तुम चाहो.", उसकी बात सुनकर आकांक्षा के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान तैर गई.

"वैसे हमने वह तोह किआ हे नहीं. फिर वापिस आ कर डबल म्हणत करोगे?"

"नौटंकी कही की. वह मेरा काम है और मैं डबल ट्रिपल सभी कर लूंगा. अब तुम ऊपर कपडे पहनो और दरवाजा अंदर से बंद करो.", अर्जुन ने भी बाथरूम में जा कर खुद को दुरुस्त किआ और बहार आया तोह आकांक्षा के शरीर पर एक झीनी सी कमीज थी. ब्रा अभी भी बीएड पर हे थी जिसको अर्जुन देख चूका था.

"वापिस आने के बाद ज्यादा म्हणत नहीं करवाउंगी.", एक अदा से उसने ऐसा कहा तोह अर्जुन उसके कूल्हे पर हलके से थप्पड़ लगते हुए साथ हे लेकर बैठक के दरवाजे तक आ गया.

"वापिस आओ फिर इसका बदला जरूर लुंगी.", एक मादकता से अपने कूल्हे को सहलाती वह अर्जुन को जैसे उकसा रही थी.

"देखते है कोण बदला लेगा.", हाथ हिलने के बाद वह बहार चला गया और दरवाजे की चिटकनी लगाती आकांक्षा सिर्फ इतना हे बोली, 'पागल टार्ज़न'.

पौने 4 बज चुके थे जब अर्जुन घर से निकला. उसने बता दिए था घर पे के वह स्टेडियम से आने के बाद अपने दोस्त के घर जायेगा और हो सकता है रात खाना खा के आये. प्रीती को साथ लिए वह ठीक समय पर स्टेडियम पहुंच गया था.

"तुम यही मिलना 5 बजे.", अर्जुन ने प्रीती से कहा तोह उसने कोई सवाल नहीं किआ आज जल्दी प्रैक्टिस ख़तम करने के बारे में.

"ठीक है सरकार. जैसी आपकी आज्ञा.", हंसती हुई वह बोली तोह अर्जुन भी बस हंस दिए.

आज वह लड़के कही दिखाई नहीं दे रहे थे. अर्जुन ने सब तरफ सरसरी निगाह डाली और फिर पहुंच गया अपनी अभ्यास की जगह.

"बलबीर भाई, आज जल्दी जाना है.", अर्जुन ने इतना हे कहा तोह बलबीर ने सर हिला दिए.

"कोई बात नहीं हलकी कसरत कर लेते है फिर 5-5 सेट लगा के निकल चलेंगे. वैसे भी कोच साहब तोह हैं नहीं यहाँ. कोई मीटिंग चल रही है प्रबंधन टीम की.", बलबीर ने ये बात कही तोह अर्जुन के शरीर में फुर्ती आ गई. सारा ध्यान कसरत पे लगता वह जल्द हे इधर से फारिग हो कर पंचिंग बैग के पास आ गया था. अगले आधे घंटे में दोनों पसीने से tar-batar हो चुके थे.

"बस भाई, तेरी जल्दी के चक्कर में कुछ ज्यादा हे म्हणत हो गई. इतना तोह 90 मिनट में न करते थे जितना 45 में कर लिए आज.", घुटनो के बल बैठ कर बलबीर कह रहा था और अर्जुन हंस रहा था.

"भाई, जल्दी जाने का कहा था मैंने. अभ्यास काम करने के लिए नहीं. लो पानी पीयो.", तोलिये से अपना शरीर और चेहरा साफ़ करते हुए उसने ग्लूकोस की बोतल बलबीर को थमा दी. दोनों वह से निकलते हुए कपडे बदल कर स्टैंड पर आ गए.

"वह कल वाले दोनों लोग फिर दिखाई दिए क्या?", अर्जुन प्रीती की राह देखते हुए बलबीर से बात भी कर रहा था.

"नहीं भाई फिर नहीं दिखे. और परेशां मत हो वह स्टेडियम में ऐसा वैसा कुछ करने से पहले 100 बार सोचेंगे."

"ये मैं जानता हु भाई. और ये भी पता है के वह जो भी करेंगे स्टेडियम से बहार हे करेंगे. चिंता सिर्फ इसकी है.", सामने से आती प्रीती की तरफ आँखों से इशारा करते हुए अर्जुन बोलै.

"Don't वोर्री बे हैप्पी माय फ्रेंड. विकास भाई भी आ रहा कल.", आँख मारते हुए बलबीर ने मजाकिया लेज्जे में ये खबर सुनाई तोह अर्जुन भी हँसता हुआ मोटरसाइकिल निकलने लगा. एक बार फिर प्रीती उसके पीछे बैठी थी.

"आज रात को दिवार कूद कर आ जाऊ?", अर्जुन ने मस्ती करते हुए कहा.

"मार खानी है क्या? हर रोज यही बात.", कंधे पर सर टिकाये प्रीती भी अर्जुन की बात से मैं हे मैं इत्तेफाक रखती थी लेकिन शायद अभी समय ठीक नहीं था.

"वैसे तुम हमारे घर भी सोने का बोल कर आ सकती हो. और सबके सोने के बाद मैं तुम्हारे पास..."

"चुप.. बिलकुल चुप. सुधर जाओ नहीं तोह घर पर बता दूंगी की कैसी बातें करने लगे हो.", पीछे से उसको ाचे से पकड़ को ये पल महसूस कर रही थी. काश वो दोनों अभी से हमेशा के लिए एक साथ होते.

"वैसे मेरा दिल है तुम्हारे साथ ढेर साडी बातें करने का, रात भर.", अर्जुन ने फिर से बात दोहराई.

"ठीक है.", प्रीती ने संक्षिप्त सा जवाब दिए.

"सचमुच?" अर्जुन के स्वर में हैरानी के साथ हे ख़ुशी का मिश्रण था.

"हाँ सचमुच. लेकिन आज नहीं कल रात को. आज दादू देरी से आने वाले है तोह बुआ को अकेले नहीं रहने दे सकती न.", अपनी बुआ के लिए विशेष प्यार और इज़्ज़त्त थी प्रीती के दिल में.

"बुआ को क्या हुआ है?", अर्जुन ने वैसे हे कौतहूल वश पूछ लिए

"जैसे खुदको कुछ पता हे नहीं.", प्रीती की बात सुनकर एक पल के लिए उसके माथे पर चिंता की लकीर बन गई

"अभी उन्हें समय लगेगा सब भूलने में. पिछले परिवार और जो भी उनके साथ हुआ. और तुम्हे पता है सबसे ज्यादा प्यार वह तुम्हे करती है. इसलिए मैं और ज्यादा उनकी फ़िक्र करती हु. वैसे तुम हो हे प्यार करने लायक.", थोड़ी हिम्मत करते हुए प्रीती ने अर्जुन की गर्दन को चूम लिए.

"ाचा जी. फिर ठीक है. और इस दरियादिली की वजह?"

"मेरी मर्जी. मेरे हो तोह तुम्हारे साथ कुछ भी करू. सीधा चलो और जल्दी से घर उतारो मुझे."

प्रीती को उसके घर उतरने के बाद अर्जुन सिर्फ 10 मिनट हे अपने घर रुका. दूध पीने के बाद कपडे बदल कर वह पैदल हे निकल लिए अपनी मंजिल की तरफ. बादल एक बार चा गए थे आसमान में.

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"काका, वह दोनों लड़के मैं देख आया था कल. देख के तोह कोणी लागे के उन्होंने बिजेन्दर पे हाथ तय होगा.", #### गांव में ठीक उसी जगह बिजेन्दर पहलवान मण्डली का मजमा लगा था. बिजेन्दर के मां मोहर सिंह को गोलू बता रहा था जितना भी कल उसने देखा था.

"हाँ तोह वह भी कोई लदान वाला था. शकल जमा एक बालक की और दूसरा तोह डेढ़ फुटिया था, नीरा.", ये वह पहलवान बोलै था जो स्टेडियम में गोलू के साथ गया था.

"मां, न्यू हे आप टेम खराब करो हो. जड़ लड़ाई हुई थी तोह वे 2 लड़के मुँह ढके थे, बलबीर पे सिर्फ शक है ार दूसरा कन्फर्म कोन्या. विकास आवेगा तोह रेकी कारन का फायदा है.", बिजेन्दर ने समझने के लेज्जे से अपनी बात राखी. लेकिन मोहर सिंह हुक्का गुदगुदाता कुछ सोच रहा था.

"जो छोरा थामने बालक सा दिखे था उसके बारे में कुछ और बेरा चल्या के?", मुँह से धुआं निकलता वह गोलू और दूसरे लड़के की तरफ देखने लगा.

"अगर डिटेल मैं पूछो तोह बता द्यौ हु. चोर्रा deal-dol से तगड़ा है और मुक्केबाज़ है. सेहत में अगर बिजेन्दर से 21 न है तोह 20 बे कोणी लेकिन शकल का कच्चा है. लड़ाई झगडे कारन वाला तोह 0%. हाँ लड़कीबाज हो सके है क्यूंकि सुथरा बहोत है. मोटरसाइकिल देख के तोह घर से भी अमीर हे होगा. लेकिन मैं फेर या बात कहूंगा के वह फसाद कारन वाला कोन्या."

"ाची बात है. बलबीर पे नजर रखिओ. देखो अगर वह किसे पहलवान गइल नजर आवे तोह. ार विकास के साथ कोई पन्गा नई करना, लेकिन जड़ में वह भी होना चाहिए. कोशिश कार्यो के स्टेडियम के अंदर न जाना पड़े.", मोहर सिंह हिदायत देने के बाद फिर हुक्का गुदगुदाने लगा और बाकी मंडली आपस में लगी रही.

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"मम्मी का फ़ोन आया था. 7 बजे तक चलेंगे वह और आने में 4-5 घंटे आराम से लगेंगे. मैंने उन्हें बोल दिए है के दरवाजा वो अपनी चाबी से खुद खोल ले.", इस समय आकांक्षा सिर्फ सफ़ेद पंतय पहने अर्जुन के साथ बिस्टेर पर लेती थी. अर्जुन उंगलिओ से उसके निप्पल सहलाता बात सुन्न रहा था. जीन्स उसकी भी कमरे में राखी कुर्सी पर पड़ी थी. आकांक्षा का हाथ उसकी नाभि से फिसलता जब पहले से खड़े विकराल लुंड पे पंहुचा तोह गाल लाल हो गए. उसकी गर्मी और सख्ती को महसूस करते हे आकांक्षा ने अपनी एक टांग अर्जुन पर रखते हुए नीचे से खुद को उसके और करीब कर लिए.

"तुम्हे डर नहीं लग रहा?", अर्जुन ने अपना ऊपर वाला हाथ उसकी पंतय के अंदर सरकते हुए मुलायम उभरे हुए एक कूल्हे को सेहलते हुए पुछा.

"लग्न नहीं चाहिए क्या? ये है हे इतना बड़ा. लेकिन करना तोह है हे. इसलिए आज दर्द हो तोह ज्यादा ाचा है न, फिर कल ज्यादा परेशानी नहीं होगी." आँखों में वही नटखटपन और शैतानी थी जिस से दोनों हे आज ru-ba-ru हुए थे. अर्जुन का हाथ भी आगे बढ़ता अब उस गरम दरार पर फिर रहा था जहा से आकांक्षा का अछूता यौवन आधा इंच दूर था.

"ये इतना आसान भी नहीं जितना लग रहा है.", अर्जुन सीधा खड़ा हुआ और आकांक्षा को बिस्टेर पर पीठ के बल ाचे से लिटाने के बाद कुछ देर बस देखता रहा. अकल्पनीय सुंदरता. शरीर में जैसे चर्बी थी हे नहीं सिवाए कुछ हद्द तक कूल्हों के. चिकने गोर और सांचे में ढले पाँव, मांसल लेकिन सुघड़ झंगे उनके बीच में छोटी सी सफ़ेद पंतय जो सिर्फ उस जगह को छुपाये थी जिसको आज आकांक्षा ने अर्जुन को सौंपने का फैसला कर लिए था. कमर के ऊपर झुकते हुए अर्जुन ने वह सफ़ेद वस्त्र दोनों किनारो से पकड़ते हुए धीरे धीरे नीचे सरकना शुरू किआ तोह आकांक्षा ने अपनी आँखे बंद कर ली. अर्जुन सिर्फ उसके चेरे को देखता रहा और इस दौरान पैंट्री निकल कर निचे गिर चुकी थी.

फिर उसने ध्यान दिए उस जगह पर जो वह बेपर्दा कर चूका था. लेश्मार्त्र भी बाल नहीं थी उस जगह. पूरे जिस्म की तरह सामान गोरी रंगत जहा ख़तम होती थी ठीक नीचे एक बारीक से डेढ़-2 इंच की अधूरी लकीर जो जांघो के आपस में सटे होने से आगे नहीं दिख रही थी.

अर्जुन ने अपने चेहरे को नीचे झुकाते हुए वह की महक को सूंघा हे था की स्वतः उसका मुँह उस लकीर पर जा लगा. 2-3 चुम्बन करने के बाद उसने दोनों जंघे फैलाई तोह अब वह लकीर के बीच का गुलाबी हिस्सा उसके होंठो में था.

"आह.. ये क्या कर रहे हो.. आठ..", अर्जुन के होंठो पर वह तजा रास लगते हे जैसे वह उसके स्त्रोत तक पहुंचना चाहता था. इस कोशिश में जीब का अगला भाग योनि की जरुरत से ज्यादा संकरी गली में घुसने की नाकाम कोशिश करने लगा और आकांक्षा के शरीर के सभी तार एक हे सुर में बजने लगे थे. प्यार का सुर. समागम का सुर. 2-3 मिनट ाचे से चूसने के बाद जब अर्जुन ने नजर उठा कर आकांक्षा की तरफ देखा तोह उसकी आँखों में अर्जुन के लिए बे पनाह प्यार और एकसार होने का अनुरोध था.

"क्रीम.", अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा तोह आकांक्षा ने इशारे से अलमारी दिखाई. जाने कितनी हे तरह की क्रीम वह राखी थी लेकिन वही पर राखी होंठो पर लगनी वाली वैसेलिन की डिब्बी उठा कर वह वापिस अपनी जगह आ गया. कूल्हों के नीचे एक तकिया और तकिये के ऊपर साफ़ टोलिया रखने के बाद अर्जुन ने बड़े ध्यान और धीरे धीरे वैसेलिन से उस खास सुरंग के मुहाने को चिकना करना शुरू किआ. ऊँगली का अगला भाग भी छेड़ के अंदर जाने में सक्षम न था. अपना आखिरी कपडा उतरने से पहले उसने आकांक्षा की तरफ फिर देखा, जैसे पुछा रहा हो के रुक जाते है.

"मैं तैयार हु. कुछ नहीं होगा.", आकांक्षा इस समय थोड़ी गंभीर थी लेकिन उसका जवाब वही था. पूरी तरह उसके ऊपर आने के बाद अर्जुन ने ाचे से खुद को व्यवस्थित किआ और वैसेलिन से चिकना हुआ अपना सूपड़ा एक हाथ से पकड़ते हुए उस कुंवारे छेड़ पर लगा दिए. पूरी योनि हे इस भयंकर ling-mund के पीछे जैसे ओझल हो गई थी. दूसरा हाथ कोहनी के बल टिका आकांक्षा के सर को सेहला रहा था. आँखों में एक बार देखने के बाद अर्जुन ने उसकी आवाज अपने मुँह से बंद करते हुए आकांक्षा की फैली हुई जांघो के बीच कमर थोड़ी ताक़त से आगे धकेल दी. एक पल के लिए रुकता हुआ वह टमाटर सा बड़ा सूपड़ा योनि का दरवाजा बुरी तरह फाड़ते हुए अंदर जा कर फंस गया था. आकांक्षा का कोमल शरीर इस भीषण पीड़ा से बुरी तरह तड़प उठा लेकिन उसकी चीख अर्जुन के मुँह में हे घुटी रह गई. रक्त की धार जख्मी छूट से लकीर सी बहती हुई तोलिये को भिगोने लगी थी.

आकांक्षा की बंद आँखों के दोनों किनारो से आंसुओ की धरा बहती हुई गाल से नीचे बिस्टेर तक जा रही थी. अर्जुन ने अपने होंठ अलग करते हुए उसकी आँखों पर रख दिए. वह बरी बरी से दोनों तरफ के आंसुओ को पी रहा था. शरीर में कम्पन बंद हुई तोह आकांक्षा ने अपनी आँखे धीरे से खोली. जहाँ भर का दर्द चेहरे पर लिए हुए भी वह मुस्कुराने की झूठी कोशिश कर रही थी.

"मैं खुश हु. दर्द है लेकिन जितना और दर्द देना है जल्दी से दे दो.", ऐसी कोरी छूट अर्जुन की विकराल लुंड को कटाई नहीं झेल सकती थी और अर्जुन को ये बखूबी पता था.

"शांत रहो.", थोड़ा सा नीचे होते हुए उसने एक सतांन को मुठी में पकड़ा और दूसरे को थोड़ा जोर से पीने लगा. दर्द की दिशा बदलने के लिए वह ऐसा कर रहा था. जब 5 मिनट तक दोनों उरोज चूस चूस कर लाल कर दिए तोह अर्जुन ने फिर से उसके होंठो पर होंठ रखते हुए एक और धक्का लगा दिए. सूती कपडे की तरह आकांक्षा की छूट जहा तक लुंड घुसा वह तक fat-ti चली गई और इस बार उसकी चीख बहार निकल आई थी. 5 इंच लुंड अंदर बुरी तरह छूट को फैलाये कैसा हुआ था.

"अर्जुनंनं....", उसकी चीख में भी अर्जुन का हे नाम था. गाल को थोड़ा तेजी से थपथपते हुए अर्जुन फिर से उसके ठन्डे हो चुके जिस्म को गरम करने लगा था. दिल मजबूत रख पाना अर्जुन के लिए भी मुश्किल होता जा रहा था. दिल में एक बार फिर वही फांस सी चुबने लगी थी. ये दर्द जैसे उसको आकांक्षा के साथ और ज्यादा जोड़ रहा था.

"बस हो गया. तुम घबराओ मतों अंशु... हो गया अब जो भी होना था.." उसके बस में होता तोह वह अभी लुंड बहार निकल कर दूर हो जाता. लेकिन इस मिलान के सुख से वह आकांक्षा को वंचित नहीं रखना चाहता था. फिर से आकांक्षा ने आँखें खोल कर अर्जुन को इतना परेशां देखा तोह हिम्मत करते हुए उसने खुद हे अर्जुन के गाल को होंठो से छु लिए.

एक बार फिर दोनों उरोज थामे अर्जुन ने बड़ी सावधानी से धीरे धीरे लुंड पीछे खींचा और वैसे हे आराम से उतना वापिस अंदर. कोई 15-16 ऐसे घर्षण करने में हे उसकी पीठ से लेकर पाँव तक पसीना आ चूका था. इतनी सावधानी और धीमी रफ़्तार से पहले कभी उसने चुदाई नहीं की थी.

"आह्हः.. अर्जुनंनं.. हैं.. ऐसे... बस्स्स.. आह्हः..", आकांक्षा भी हिम्मत दिखती अब अपनी टंगे उसके कूल्हों पर बंधे थी. 2-ढाई इंच लुंड फसा फसा अंदर बहार होता अब छूट में चिकनाहट बनाने लगा था.

"अब बस इस पल को महसूस करो. बस.", थोड़े गहरे धक्के लगने से अब दोनों के शरीर थिरक रहे थे. छूट के प्राकृतिक रास से भीगा लुंड थोड़ा थोड़ा आगे भी भाड़ रहा था लेकिन ये ज्यादा हे थोड़ा था.

"उम्म्म.. ाचा लग रहा है .. आह्हः.. दर्द के साथ .. आह फिर वही... वही मजा.. आह.. मममम अर्जुनंनं.", आँखें एक बार फिर से फैल गई थी लेकिन मजे की इन्तहा की वजह से. इस चरम पर आने तक आकांक्षा की छूट 6 इंच लुंड को अंदर ले चुकी थी. अर्जुन वैसे ने वैसे हे रुके रह कर आकांक्षा को ज़िन्दगी के दूसरे चरम का आनंद इत्मीनान से लेने दिए. वह भी पहले वाले से कुछ हे घंटे बाद.

"उम्मम्मम.", खुद हे वह जोश में भर कर अर्जुन को चूमने लगी थी. उसको सम्भला देख अर्जुन ने फिर से milan-safar शुरू कर दिए. इस बार फरक ये था के वह दोनों हे एक दूसरे को चूम रहे थे मसल रहे थे. हर धक्के के बाद आकांक्षा खुद हे कमर हिला रही थी लेकिन अर्जुन ने अपने लुंड को उस सीमा से आगे नहीं जाने दिए.

"आठ.. आठ.. जल्दी जल्दी करो.. आह.." लगातार रगड़ और बहरपुर चिकनाहट की वजह से आकांक्षा की छूट अभी गरम थी और उसको भी अपने इस प्रथम मिलान में भरपूर सुख मिलने लगा था. इस बार दोनों की नाव हे किनारे आने लगी थी.. लुंड इन फूल कर झटके देने शुरू किये तोह जोश में अर्जुन ने अपने दन्त उसके दाए सतांन पर थोड़ा जोर से गदा दिए..

"ोूई.. आह..", इसके साथ हे आकांक्षा की छूट ने kaam-ras की बौछार करते हुए अर्जुन के लुंड को नेहला हे दिए. 'पुक्क' की आवाज के साथ जैसे हे वह सुर्ख रंग का मोटा सूपड़ा छूट की फांके फैलता बहार निकला गाढ़ा सफ़ेद रास पिचकारी की धार सा आकांक्षा के शरीर पर 5-6 बार गिरा. इस सखलन के बाद अर्जुन भी फर्श पर बीएड का किनारा पकड़ते हुए बैठ गया.

"ठीक हो न?", आज पहली बार हुआ के सामने वाला सम्भोग के बाद अर्जुन से पूछ रहा था उसका हाल. छूट बुरी तरह ज़ख़्मी हो चुकी थी. फूला हुआ बहार का भाग पहले से दोगुना नजर आ रहा था. लेकिन अपनी परवाह न करती वह सरक कर बिस्टेर से पाँव निचे लटकाये अर्जुन के बाल सेहला रही थी.

"हाँ. लेकिन शायद मैंने तुम्हारे साथ ठीक नहीं किआ.", अर्जुन अभी भी चेहरा निचे झुकाये था. आवाज भर्राई हुई थी जो साफ़ था के वह पश्चाताप कर रहा था.

"नहीं बाबा. देखो मैं बिलकुल ठीक हु और ये तुमने नहीं किआ. मेरी यही एक ख्वाहिश थी ज़िन्दगी में बस. के एक बार तुम्हारे साथ मैं जी भर के प्यार करू, मेरे पहले और आखिरी प्यार के साथ. वैसे ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था के तुम थोड़े से लड़कीओ जैसे हो.", दर्द को ाचे से बर्दाश्त करती वह अर्जुन की जांघो पर बैठ कर जैसे हौसला दे रही थी. इस बार अर्जुन ने अपनी आँखें उसकी तरफ उठाई तोह वह किसी चकोर की तरह अपने चाँद (अर्जुन) को हे देख रही थी. आँखों में अथाह प्रेम और समर्पण लिए. अर्जुन ने कांपते हाथो से उसको अपने सीने से लगा लिए.

"बिलकुल हे पागल हो तुम. तुम्हे नहीं पता के आज मेरे साथ क्या हो रहा था. दर्द तुम्हे दे रहा था लेकिन असर मुझपे हो रहा था. मैं तुम्हे कभी भी दर्द में नहीं देख सकता अंशु लेकिन आज मैंने ये जान लिए के वह दर्द मैं भी महसूस करता हु. अब से तुम कभी मुझे ऐसा कुछ करने को नहीं कहोगी."

"अभी से तोह कहूँगी न. अब सब रस्ते जो खोल दिए है तुमने.", ये लड़की सच में समझ से परे थी. योनि से इतना खून बहाने के बावजूद ये फिर भी मुस्कुरा रही थी. उसकी इस बात पर अर्जुन ने भी उसकी नाक से अपनी नाक रगड़ते हुए कहा, "पागल हो तुम. सच में बिलकुल पागल. देखा न मैंने तुम्हारा क्या हाल कर दिए."

"हाल तुम्हारा ख़राब है मिस्टर. मेरा नहीं.. आह..", अपनी बात कहती वह जैसे हे कड़ी होने लगी पेट में तीव्र दर्द की वजह से घुटने सीधे न हुए.

"ऐ.. आराम से. रुको मैं तुम्हे ले चलता हु.", अर्जुन ने खड़े होते हुए उसका बड़े आराम से उठाया और बाथरूम में ला कर बंद कमोड पर बिठा दिए. इस समय उसके चेहरे पर हलकी पीड़ा और अर्जुन का इस तरह उसकी परवाह करने से एक मुस्कराहट भी थी.

"ये तप ों कर दो बाथटब की. मेरे अगले सपने को पूरा करने के ये बिलकुल ठीक समय है.", आकांक्षा ने बोलते हुए एक तरफ इशारा किआ तोह अर्जुन ने टब के एक तरफ लगे दोनों नुल घुमा दिए. टब में पानी भरना चालू हो गया और इधर वह नीचे बैठ कर आकांक्षा की kshat-vishat योनि का ध्यान से मुआयना करने लगा. सच में जरुरत से ज्यादा बुरा हाल था.

"ऐसे क्या देख रहे हो? शर्म नहीं आती? इतना बड़ा है तोह यही हाल होना था.", आकांक्षा का दिल था के वह अभी अर्जुन की कमर पर पाँव रखते हुए उसके सीने से जा लगे लेकिन ...

"देख रहा हु के तुम्हारी ज़िद्द ने क्या करवा दिए. अभी इसको पहले गरम पानी से साफ़ करता हु फिर ज्यादा बेहतर पता लगेगा के अंदर कोई मलहम की जरुरत है या बस पेनकिलर से दर्द ख़तम हो जायेगा.", एक छोटा टोलिया गरम पानी में डूबने के बाद वह वापिस वही आ बैठा और सावधानी से जांघो पर लगा सूखा खून साफ़ करता हुआ योनि के बहरी भाग पर आ गया. यहाँ कपडा लगते हे तेज सिसकार निकलने लगी आकांक्षा की. वो बेचारी थी भी एक नादान और फूल सी नाजुक.

सब सफाई होने के बाद अगले 10 मिनट बाद दोनों प्रेमी उस टब के अंदर बैठे थे. अर्जुन उसको अपने ऊपर बिठाय बड़े प्यार से पानी डालता नेहला रहा था और आकांक्षा बस इन पालो को अपने दिल में सहेज रही थी.

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8 बजे ये कार एक आलिशान से घर के बहार आ कड़ी हुई. ये घर शहर से बहार एक वीरान से जगह में बस अकेला धरती पर खड़ा था. बहार से देखने पर बंद पड़े इस घर में कोई रौशनी नहीं दिख रही थी लेकिन जैसे पिछले हिस्से में कही प्रकाश था. कार की पिछली सीट से 3 जोड़ी कदम एक एक करते बहार निकले और 20 कदम दूर दरवाजे के पास आ कर रुक गए. कुछ देर वह तीन लोग ध्यान से सब तरफ देखते रहे और सबसे आगे वाला व्यक्ति अपना सूटकेस उस 4 फ़ीट ऊँची दिवार पर रखने के बाद उस पर उतर गया दिवार फांद कर. बाकी दोनों भी वैसे हे बिना आवाज किये अंदर दाखिल हो गए.

"तुम इस तरफ से पीछे जाओ. और तू भाई सामने रहना सांगवान.", ये आवाज डॉ शंकर की थी. जिन्होंने संजीव को अँधेरे में घर के पीछे की तरफ जाने को कहा और अपने दोस्त सांगवान को घर के सामने के दरवाजे पर रहने का बोल खुद दबे पाँव जिधर से वह हलकी रौशनी आ रही थी उस तरफ चल दिए. सांगवान का दया हाथ अपनी कमर में खांसी हुई रिवॉल्वर पर था. संजीव भी एक हाथ में कपडा और अपनी सीलेंसर लगी रिवाल्वर लिए अँधेरे में हे बड़ी सावधानी से गायब हो गया.

"गररररर... आउउउउ आउउउउ...", एक पल के लिए किसी बड़े कुत्ते की गुर्राहट निकली थी लेकिन वह 10 सेकंड से पहले हे शांत हो गई थी. शंकर अब जहा खड़ा था वह से घर के अंदर देख सकता था. खिड़की में लगे शीशे के उस पर 2 लोग बैठे जाम पी रहे थे. टेबल पर जाने कितनी तस्वीर, कागज़ और पैसे पड़े थे. लेकिन शंकर की नजरे कुछ देर अंदर का जहां मुआयना करने में लगी रही. निश्चिंत होने के बाद वह थोड़ा आगे चलते हुए उस बड़े शीशे के पास आ खड़ा हुआ जो उसके कद्द के बराबर हे था.

"तहदायक", उन दोनों व्यक्तियों को जब तक कुछ समझ आता शंकर एक के सर के पीच खड़ा उसकी गर्दन पर ऑपरेशन करने वाला जरुरत से ज्यादा तीखा ब्लेड लगाए खड़ा था. कमरे में इस तरफ जमीन पर हर तरफ उस बड़े शीशे के अनगिनत टुकड़े बिखरे थे. सामने बैठे आदमी के चेहरे पर सिर्फ खौफ था.

"शंकर, इसको छोड़ दे. इसका कोई लेना देना नहीं इस सब में. मैं बोल रहा हु तू यहाँ से ज़िंदा बच कर नहीं जा पायेगा अगर इसको कुछ भी हुआ तोह.", वह शक्श बोल भी रहा था और कांप भी रहा था. भये और गुस्सा, दोनों के साथ.

"किसके दम पर तू मुझे रोकेगा मट्टू?", शंकर के चेहरे पर सिर्फ एक सार्ड मुस्कान और आवाज में भारीपन था. दाहिनी तरफ से एक लाश को घसीट कर अंदर आते संजीव को देख कर रोशन मट्टू की जुबान को लकवा मार गया था. लेकिन वह अभी भी जैसे किसी और का भी इन्तजार कर रहा था.

"दूसरे का भी यही हाल है. ड्यूटी के टाइम दोनों शराब पी रहे थे. गलत बात बिलकुल गलत बात.", संजीव लाश को वही जमीन पर रखते हुए रोशन मट्टू के बराबर आ बैठा.

"चाचा आप तोह लोगे न?", बोतल उठा कर ट्रे में एक तरफ उलटे रखे 4 कांच के गिलास में से एक को उठाते हुए संजीव ने शराब उडेलनि शुरू की. साथ हे वह वही बिछी हुई तस्वीरो को भी ध्यान से देख रहा था.

"2 और पेग बना, बिना पानी के.", शंकर की आवाज sun-ne के बाद रोशन मट्टू का चेहरा सफ़ेद होने लगा था. आँखें जैसे बहार निकलने वाली हो और जुबान को लकवा. जिस शख्स के गले पर ऑपरेशन ब्लेड लगा था उसको पूरी गोलाई में चक्की चलने के क्रम में शंकर ने काट दिए था. खून किसी इतालियन फाउंटेन की तरह हर तरफ से उछलता जमीन, कपड़ो, सोफे और शंकर के हाथो को भिगोने लगा. कितनी मजबूत पकड़ होगी उस हाथ की जिसने आवाज तक निकलने का मौका न दिए इस आदमी को और सर उतार कर सोफे की हाथी पर टिका दिए.

एक पल के लिए थे ये दृश्य देख कर संजीव ने भी आँखें फेर ली थी. कटे हुए धड़ से अभी भी गर्दन से खून लगातार रिस रहा था. पीछे से घूम कर शंकर उस फड़फड़ती लाश के बराबर आ बैठा.

"मेरे बिना हे ऑपरेशन कर दिए रे दांगी तूने.", ये सांगवान था जो उसी रस्ते से अंदर आ रहा था जिधर से संजीव आया था.

"तेरे हाथ कुछ नई लगा सांगवान?", शंकर ने उसकी तरफ जाम करते हुए पुछा और वह गिलास थामते हुए रोशन मट्टू की दूसरी तरफ बैठ गया.

"वंडरफुल स्कॉच एंड ा नीस पीेछे ऑफ़ मीट. यही बोली थी न वह रुस्सियन पंडत? आड़े तोह मैंने यो मीट नजर आवे है. वंडरफुल पीेछे ऑफ़ मीट मट्टू. वाह क्या बात कही है डॉ सांगवान, मब्ब्स मस.", अपनी हे कही बात पर ठहाका लगता वह रोशन मट्टू का गाल thap-thapane लगा.

"हम्म्म.. चल अब अपना हुनर दिखा तू और मैं जरा ये फोटो देख लू. गुलाटी आ रहा है?", शंकर ने पेग पीते हुए सभी तस्वीरो को देखना शुरू किआ. और संजीव ने कागज़ पर.

"न भाई. वो पंजाबी तोह न आता. हे इस ेनजयिंग डार्कनेस एंड मोहम्मद रफ़ी साहब इन थी ब्यूटीफुल वाइल्ड नाईट. और तू डर क्यों रहा है मट्टू? मारु कोणी मैं बस दोंग योर बॉडी चेकउप. जान लेना और देना तोह ऊपर वाले के हाथ में है मेरे दोस्त." बड़े हे दार्शनिक अंदाज़ में ये बात कहते हुए सांगवान ने चौथा गिलास उठाया और लकड़ी की टेबल पर हलके से चटकने के बाद रोशन मट्टू का सीधा हाथ वही टेबल पर रखते हुए 'कछह' से एक ऊँगली को अलग कर दिए..

"आह्हः..", इतनी भयंकर चीख थी की संजीव के हाथ से कागज नीचे गिर गया लेकिन सांगवान ने मजबूती से मट्टू का हाथ पकडे रखा. वह किसी मुर्गे सा तड़फ रहा था इस कॅशे की पकड़ में.

"ये फोटो किसने खींचे थे?", शंकर की सार्ड आवाज एक बार फिर से गूँज उठी इस वीराने में. रोशन की ऊँगली से लगातार खून बह रहा था जिस पर अब सांगवान शराब टपकने लगा था.

"आठ.. मर्डर जाऊंगा मैं.. रुको मैं बोलता हु." एक पल के लिए रुक कर अपने हाथ को देखता वह फिर बोलने लगा.

"ये तस्वीर इसने ली थी मेरे कहने पर. मुझे 5 लाख मिले थे तुम्हारे बेटे का हुलिया और आने जाने की साड़ी डिटेल जमा करके आगे देने के लिए.. आठ.. और थोड़ी देर पहले हे ये मेरा जिगरी दोस्त जिसको तुमने मार डाला, यही लेके आया था ये सब. आअह्ह्ह... लेकिन तुम बचोगे नहीं.. तुम उन्हें नहीं जानते... आअह्हह्ह्ह्हह.. मुझे छोड़ दो.. आठ..", उसकी बात ख़तम होते होते हे सांगवान ने कलाई के निचे एक गहरा जख्म और दे दिए था.

"सोमबीर सिंह की पहली बीवी और उसके भाई ने हे दिए था ने ये काम?", शंकर की आँखे तड़फते हुए रोशन मट्टू को घूर रही थी. दर्द में भी वह हैरान था के इनको कैसे ये पता चला.

"हाँ.. हाँ. लेकिन तेरे बेटे के बारे में पता करने का काम ये सोमबीर की बीवी ने दिए था. मोहर सिंह को तोह पता नहीं के वह दोनों शख्स एक हे है जिसने उसके भांजे को पीटा था और शंकर का बीटा. अगर तू ये सोच रहा है के तू अपनी औलाद को बचा लेगा तोह बता देता हु के मेरे भाई ने आज उसकी फोटो भेज दी होंगी मोहर सिंह को, और देर सावेर उसको पता लग हे जायेगा के वही तेरा बीटा है.", रोशन मट्टू ने बखूबी दर्द संभल लिए था ये सोच कर की उसने शंकर के बेटे की मौत का सौदा कर हे दिए है.

"ये फोटो की बात कर रहा है तू? चल तू भी मिल ले अपने भाई से.", वही ऑपरेशन वाला ब्लेड अगले हे पल पूरा दिल के अंदर बैठ चूका था रोशन के. और खून रिस्ता हुआ पूरी कमीज को लाल करने लगा था.

"बहनचोद, बता के कोणी मार सके? कर दिए पेग ख़राब. आदमी ठीक कोन्या तू पंडत बहनचोद. ार बीटा संजीव पूत सम आइस इन थिस ड्रिंक. वास्ते नहीं करना दारु को रात के इस भयंकर समय.", संजीव इन दोनों का वहशीपना देख कर सकते में आ चूका था. इतने सटीक तरीके थे किसी को टॉर्चर करने और बिना आवाज निकले मार देने के. कोई रेहम नहीं कोई दिल नहीं. वही लाश के दोनों तरफ बैठे कैसे खून से साणे हाथो से हे शराब पी रहे है.

"बता इस बहनचोद ने मेरे चोरे के साथ हे बहु की तस्वीर भी उतार ली थी. लेकिन देख तोह सही सांगवान, बहु मेरी जमा गुड़िया सी है.", लाल बुलेट पर अर्जुन से चिपक कर बैठी प्रीती की इस तस्वीर को पल भर देखने के बाद शंकर ने वह सांगवान को दी और खुद वैसी हे और तस्वीरें देखने लगा.

"बात तोह ठीक है लेकिन ये दोनो प्रेमी युगल ज्यादा नई हवा में उड़द रे. बता कोई इस तरिया खुल्लेआम चोरी बिठाये घूमे करे है के?"

"जाट आदमी ये खाप नई है. शहर है और वह इसकी धर्मपत्नी."

"हँ.. घनी सुथरी. संजीव प्लीज रिपीट ओने मोरे. और भाई या छोर्री कोण है, ये दोनों तोह अलग अलग है.", सांगवान ने फोटो शंकर की तरफ की तोह संजीव ने भी एक भरपूर नजर उस चेहरे पर डाली.

"चाचा ये कही देखि है और ये दोनों इसमें स्कूल ड्रेस में है मतलब ये aaj-kal में हे ली गई है."

"उल्लू के चरखे ये सभी फोटो आज और कल की हे है. निचे देख जरा तारिख. लेकिन ये साला इस उम्र में हे 4-4 घुमा रहा है?", शंकर की बात सुनते हे बाकी दोनों उसकी तरफ देखने लगे. संजीव के चेहरे पर परेशानी उभर आई बात सुनते हे.

"4-4 मतलब?" उसने jaan-ne की जैसे कोशिश की थी.

"एक तोह प्रीती, एक वह दलीप की बेटी, एक मेनका सिंह और ये चौथी.", जाम को ख़तम करते हुए शंकर उठ खड़ा हुआ. पास में पड़ी 2 शराब की बोतल दोनों लाशो पर खली करने के बाद बिजली के तार आपस में भिड़ते हुए पूरा घर आग के हवाले करते वह तीनो अपना साजो सामान लेकर अँधेरे में लीं हो गए. बस संजीव अभी भी यही पूछे जा रहा था के मेनका कोण है और शंकर सिर्फ यही जवाब दे पाया के बाप की कड़ी फसल बीटा काट रहा.

"जमा हरामी है भाई तेरा लोंदा. मेरे से तोह कड़ी न मिलवाइओ कही फेर रुस्सियन भी नसीब न हो.", तीनो हस्ते हुए कार में बैठे जिसमे अभी भी मोहम्मद रफ़ी का ये गण सुनता गुलाटी अपने भी राग साथ दे रहा था...

वादा करले साजना..

वादा करले साजना..

तेरे बिना मैं न राहु मेरे बिना तू न रहे, हो के जुड़ा

ये वडा रहा

न होंगे जुड़ा

ये वडा रहा
 
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अपडेट 74

Aaj-Samaaj


आकांक्षा की हालत अब बेहतर थी और अर्जुन पूरे घर को ाचे से साफ़ कर चूका था.

"तुम ये 2 टेबलेट्स खा लेना और कोई ज्यादा bhag-daud नहीं. हो सके तोह रात को नीचे कुछ मत pehan-na.", अर्जुन की बाँहों में झूलती आकांक्षा ड्राइंग रूम के दरवाजे तक आई थी और वह उसको प्यार से समझा रहा था क्या करना है क्या नहीं. रात के 9:30 बज चुके थे.

"तुम्हारा इरादा ठीक नहीं लग रहा मिस्टर. कही इतना ध्यान रखने के बाद फिर से तोह नहीं करने वाले.?"

"पागल लड़की. अब उतरो और ये दरवाजा बंद कर लो. याद से टेबलेट और हल्दी वाला दूध.", अर्जुन ने उसके पाँव जमीन पर टिकते हुए फिर से चेताया और एक हल्का सा चुम्बन करने के बाद गली में आ गया. हलकी बूंदे गिरनी शुरू हो गई थी लेकिन या इतनी भी ज्यादा नहीं थी की अर्जुन कुछ हे देर में भीग जाता. सुनसान सड़क पर ऐसे अकेला चलता वह कुछ गुनगुना रहा था.

'आ चल के तुझे में लेके चालू एक ऐसे गगन के टेल... हु हु हु हु..' और कुछ हे घर पार करने के बाद सड़क पर एक कुत्ता घुमा रही एक युवती दिखाई दी. गली में इतना अन्धकार भी नहीं था खम्बो पर चली पीली रौशनी की वजह से. ये एक लम्बे बालो वाला सफ़ेद छोटा सा कुत्ता था जिसको उस युवती ने शायद बारिश के डर से अब अपनी गॉड में उठा लिए था. जैसे हे वह युवती पलटी अर्जुन भी थोड़ा नजदीक आ चूका था.

"गुड इवनिंग मिस.", अपने आप यही निकला उसके मुँह से चेहरा दिखा देते हे. दोनों के कदम वही ठिठक गए थे.

"गुड इवनिंग. तुम यहाँ और इस वक़्त?", एक जीन्स और हलके खुले गले का टॉप पहने मिस अन्नू वालिए, एक हाथ से अपने सीने का सामने वाला भाग ठीक करने लगी थी. शायद कुत्ते को ऊपर उठाते समय टॉप खिंच गया था और कपडा कुत्ते के नीचे डाब गया था.

"जी अभी अपने दोस्त के घर से आ रहा हु और यही 2 गली के बाद बीच वाली सड़क पर हे मेरा घर है.", अर्जुन ने भी नजरे दूसरी दिशा में करते हुए कहा. उसके ऐसा करने पर अन्नू के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ गई थी.

"सो वे अरे टेक्निकली नेइबोर्स. गुड. मेरा घर भी यही इस गली के आखिर में है. सैम को उठाते हुए अपने पीछे परछाई देखि तोह पलट गई थी. थैंक गॉड तुम हे थे.", अपने कुत्ते को हलकी थपकी देती वह जैसे बता रही थी की उसको डर लग गया था.

"मुझे नहीं पता था के आप यही रहती है."

"मतलब अगर पता होता तोह तुम इधर नहीं आते? चलते हुए बात करते है.", स्कूल में वह जैसी अभी तक अर्जुन ने देखि थी इस समय वह बिलुल विपरीत थी. और उनकी बात सुनकर वह थोड़ा झेंप गया था. बूंदे गिरना भी भी वैसी हे रफ़्तार पर जारी थी. Naam-matra की

"नहीं मिस ऐसा नहीं है. मेरा कहने का मतलब ये है की मैं यहाँ रहने वाले लोगो को नहीं जानता हु. वैसे तोह मैं अपनी गली में रहने वालो को हे नहीं जानता तोह आसपास तोह शायद एक या 2 लोगो को हे.", वो सड़क को देखते हुए चल रहा था और मिस अन्नू बीच बीच में उसके चेहरे को.

"नए रहने आये हो इधर.?

"नहीं मिस, मैं इधर हे पैदा हुआ हु लेकिन घर वापिस 9 साल बाद आया था अभी पिछले हे साल. और वापिस आने के बाद बस घर या फिर स्कूल. ज्यादा दोस्त नहीं है तोह फिर बहार निकला हे नहीं जिस से कुछ पता चलता."

"ओह. तोह ये बात है. वैसे एक बात पूछ लू अगर तुम्हे बुरा नहीं लगे तोह?", चलने की रफ़्तार दोनों की हे काम थी और इन दोनों के सिवा इस समय बहार कोई था नहीं तोह वातावरण भी सुनसान हे था.

"आपको परमिशन नहीं लेनी चाहिए. आप मेरी टीचर है तोह कुछ भी पूछ सकती है मिस.", अर्जुन ने सरल भाव से ये बात कही थी. अभी तक उसने मिस अन्नू से नजरे नहीं मिले थी.

"नहीं. ये जरुरी है और इस वक़्त हम स्कूल में नहीं है तोह मुझे ऐसी कोई बात करने से पहले परमिशन लेनी चाहिए.", इस बार अर्जुन ने साथ चलती मिस अन्नू को देखा तोह वह हवा से आगे की तरफ आई एक जुल्फ को कान के पीछे कर रही थी. ये देखते हे उसने नजरे वापिस सामने की तरफ कर ली. लेकिन मिस अन्नू भी उसका ऐसा करना देख चुकी थी.

"क्या अभी तक तुम वह क्लास वाला मेरा बेहेवियर और इमेज अपने मैं में रखे हो? जैसे मैंने तुम्हारे साथ बुरा बर्ताव किआ और गुस्सा दिखाया कल और आज की क्लास में.", वह शब्दों का चुनाव बड़ी धीरे करते हुए बोल रही थी. ये आवाज कही से भी वैसी नहीं थी जैसे क्लास में होती थी. एकदम तेज, भड़की हुई और गुस्से से भरी. यहाँ आवाज मीठी और सभ्य थी, किसी प्यारी से घरेलु लड़की की तरह.

"बिलकुल भी नहीं. मैंने आपको पे के पीरियड में बताया था न की गलती मेरी हे थी. और आप कहती है तोह मैं फिर से सॉरी के देता हु. लेकिन मैंने आपकी कोई इमेज नहीं बनाई है अपने मैं में."

"एक्चुअली फर्स्ट डे मेरा मूड पहले से हे किसी बात पर खराब था और तुम्हारे ऐसे क्वेश्चन को सुनते हे सारा गुस्सा तुम्ही पे निकाल दिए मैंने. और जब वापिस क्लास में आये तोह मुझे लगा के तुम्हे सबक सीखने का सही तरीका है सबके सामने क्वेश्चन पूछना और फिर उनका जवाब नहीं देने पर पुनीश करना. हो गया उल्टा और उस से काम ज्यादा हे खराब हुआ. आज जो क्लास में किआ वह भी कल की फ़्रस्ट्रेशन की वजह से हुआ लेकिन जब तुम बिना कसूर के क्लास से बहार गए तोह मुझे मेरी मिस्टेक रीलीज़ हो गई थी. और.."

"और आप सॉरी फील कर रही थी अंदर से लेकिन एक टीचर है आप तोह ये सोचना बंद कीजिये. आप दिन में 100 स्टूडेंट्स को पद्धति है और ऐसे में जरुरी है के ऐसी choti-moti बातें इग्नोर हे करे. क्लास में स्ट्रिक्ट रहना भी आपका सही है. बालंका बना रहता है. शायद आपका घर आ गया मिस.", दोनों उस गली के मदद से पहले बने घर के सामने खड़े थे. और मिस अन्नू के घर के बहार की जलती लाइट में उनका खूबसूरत चेहरा अर्जुन ने अब कही ाचे से देखा था.

"थैंक यू सो मच फॉर थिस अंडरस्टैंडिंग. और तुम ाचे लड़के हो, मातुरित्य के साथ. वैसे बारिश तेज होने लगी है और अगर तुम भीगना नहीं चाहते तोह हम थोड़ी देर बरामदे में खड़े हो सकते है.", मिस अन्नू जैसे खुद हे उस से और बातें करना चाहती थी लेकिन सीधा कहने की जगह बारिश को एक बहाने के तौर पर कहा.

"गूडनिघत मिस. अभी घर पर टाइम से नहीं पंहुचा तोह सबको चिंता होने लगेगी. गुड bye सैम.", अर्जुन ने जाने से पहले दोनों को एक नजर देखा और गली में ओझल हो गया.

"अन्नू बीटा अंदर आ जाओ. कितनी देर तक बहार कड़ी रहोगी. बारिश में भीग कर बीमार होना है?", अंदर का दरवाजा खोल कर उनके पिता ने आवाज लगाई तोह वह मुस्कुराती हुई अंदर चल दी. 'ाचा लड़का है.

.

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"आओ नवाब साहब. आजकल तोह जैसे गायब रहने लगे हो घर से.", अर्जुन अपने दादा रामेश्वर जी के पास आया तोह तजजिए लहजे में उन्होंने कहा.

"कहा दादाजी. स्कूल, स्टेडियम फिर पढाई. अभी बस दोस्त के घर से आया हु तोह सीधा आपसे मिलने आ गया.", यही कमरे में प्रियंका दीदी जमीन पर बैठी अपनी दादी से बालो में चम्पी करवा रही थी.

"इसका सामान भी मंगवाना है जी और लड्डू बनाने के लिए. बस कल के लिए हे 4 बाकी हैं. इस महाराजा के पास तोह टाइम है नहीं जो इस से कुछ कहु. दस लग गया स्कूल शुरू होते हे.", कौशल्या जी भी काफा थी अर्जुन से.

"दादी, आप न गुस्से में ज्यादा प्यारी लगती हो. वह बाउजी आपको सही कहते है, थानेदारनी.", पीछे से उनके गले लगता वह जैसे कौशल्या जी को मानाने की कोशिश कर रहा था.

"तू miya-biwi में झगड़ा करवा डीओ अब ये बातें बोल कर. चल इधर आ कर बैठ और पाँव दबा मेरे.", रामेश्वर जी के चेहरे पर वही chir-paichit ख़ुशी थी जो अपने इस लाडले को देखने के बाद हमेशा आ जाती थी. कौशल्या जी भी पलट कर उन दोनों को देखती मुस्कुराने लगी और वापिस अपनी पौती के सर में हाथ चलने लगी.

"वैसे एक बात तोह है दादा जी, दादी के सामने तोह आप भी चुप हो जाते हो.", अर्जुन ने रामेश्वर की पाँव के तलवे पर मालिश शुरू करते हुए कहा और इधर कौशल्या जी ने कान पकड़ते हुए मरोड़ दिए उसका.

"सुधर जा ो बैलबुद्धि.. सुधर जा. तेरे आने से पहले तेरे दादा भी यही बोल रहे थे और तू आ गया अब आग में घी टपकने..", कौशल्या जी की बात पर अर्जुन के में सिर्फ 'ोीीी' निकला वही रामेश्वर जी के साथ इस बार प्रियंका दीदी भी जोर से हंसने लगी.

"दादी छोड़ो न.. नहीं करता बक्श दो.", और कौशल्या जे ने उसका कान छोड़ दिए और साथ हे वह से उठ कर कमरे के अंदर हे बने स्टोर में चल दी, जहा उनकी गोदरेज की अलमारी राखी थी. यही थोड़ी इधर उधर की बातें करता हुआ रामेश्वर जी को अपने स्कूल और स्टेडियम की बातें सुनाने लगा और दादी हाथ मुँह धो कर रामेश्वर जी के लिए गिलास में गरम दूध ले कर वापिस वही आ गई.

"ाचा अब थोड़ा अपनी दादी के पाँव दबा दे. देख बेचारी सारा दिन काम करती रहती है.", रामेश्वर जी ने अर्जुन को चेताया तोह वह भी बिस्टेर के उस तरफ खिसक गया. कौशल्या जी ने कमर ठीक करने से पहले दूध का गिलास उन्हें पकड़ाया तोह वह तक लगते हुए बिस्टेर से बैठ कर दूध पीने लगे.

"जोगिन्दर कह रहा था के तेरे खेल में सुधर हो रहा है लेकिन साथ हे उसने कहा के अर्जुन सात्विक खाना खता है तोह उसके शरीर में उतनी ऊर्जा नहीं मिलती होगी जितनी आगे होने वाली म्हणत के लिए चाहिए.", कौशल्या जी अपनी बात कहती कहती रुक कर उसको देखने लगी.

"दादी कौन ये बात कहता है के सात्विक खाने से काम ताक़त मिलती है? रही बात anda-maans की तोह आपका पौता हु मैं, जिस हाथ में गीता पुराण और वेद लिए हो वह इतने कमजोर नहीं की किसी बेजुबान को जीवन शुरू होने से पहले या बाद में सिर्फ इसलिए खाने लागु के मेरा शरीर दुर्बल है. बॉक्सिंग खेलना बेशक बंद कर दूंगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं करने वाला. और कोच सर अगर ऐसा आइंदा कहे तोह बता देना के अर्जुन नौसिखिया जरूर है लेकिन शरीर में ताक़त इतनी है के अपने 2 मैं (80 किलो) के शरीर से 5 मैं उठा के चल सकता हु.", अर्जुन के चेहरे की गंभीरता देख दादी ने उसके हाथ रोकते हुए उठकर अपने सीने से लगा लिए

"वह मेरे बचे, तू सच में वैसी औलाद है जो मैं और तेरे दादाजी चाहते थे. मिला तू बस पौटे के रूप में. और मैंने जोगिन्दर को भी कह दिए था के उसकी दादी जितने ज़िंदा है वह खुद हे तेरी खुराक का ध्यान रख सकती है.", प्यार से उसका सर सहलाती वह बड़े नाज से कह रही थी.

"और कल सतीश के साथ मैं खुद जा रहा हु बड़ी मार्किट तोह जो भी तेरी दादी ने सामान मंगवाया है वह खुद लेके आऊंगा. कुछ भी कह लेकिन सच कहु तोह तेरी मौज है बीटा, इस उम्र में भी बीवी और पौटे की सेवा करनी पड़ती है तब 2 घडी आराम से सोने को मिलता है.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने के साथ हे कौशल्या जी ने आँखे तरेर कर देखा जैसे कह रही हो के 'बचे के सामने कुछ तोह सोच कर बोलै करो.'

"चलता हु दादी नहीं तोह फिर दादाजी कहेंगे के मेरी वजह से उन्हें आपसे दांत पड़ती है", दादी को गले से लगाने के बाद अर्जुन दोनों को गूडनिघत बोलता कमरे से अंदर वाले आँगन की तरफ आ गया. यहाँ कोमल दीदी और उसकी माँ रेखा जी रसोईघर में थी.

"ाचा तोह आप दोनों अभी तक ये काम हे कर रही है.", अर्जुन ने अपनी माँ को पीछे से बाँहों में भर लिए तोह रेखा जी अपने बेटे की बाहे देख मुस्कुरा दी और साथ हे कोमल दीदी भी.

"काम होता हे कहा है मेरे पास करने के लिए. ये तेरी दीदी तोह मुझे हाथ लगाने नहीं देती. खुद हे देख ले जरा बर्तन ये धो रही है, खाना भी आजकल ये और प्रियंका बनाने लगी है तोह मेरे पास करने को क्या बचा फिर.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन ने बड़े प्यार से कोमल दीदी की तरफ देखा जो बर्तन धोती हुई अर्जुन को देख कर खुश हो रही थी. दोनों हे maa-beti अप्रतिम सौन्दर्य की मूरत थी साथ हे सबसे ज्यादा उसको प्यार करने वाली.

"मेरी दीदी है हे इतनी प्यारी और सबका ख़याल रखने वाली.", वह रेखा जी से अलग होता अपनी दीदी के पास खड़ा हो गया. बर्तन भी लगभग धूल चुके थे और रेखा जी बस चूल्हे को साफ़ करने के बाद सभी सामान अपनी जगह रखने लगी थी.

"वैसे दीदी, आपने दिखाया नहीं आपने कलर्स से क्या बनाया?", अर्जुन को जैसे याद आया तोह उसने पूछ लिए. कोमल दीदी ने अपनी बड़ी बड़ी आँखों से उसको देखा और इशारे से चुप रहने को कहा.

"ाचा तुम दोनों बातें करो और फिर अपने अपने कमरे में चले जाना. रूपाली मेरे कमरे में पढ़ रही है और वही सोयेगी तोह मैं कुछ देर उस से भी बात कर लू.", रेखा जी ने दोनों भाई बहनो को जल्दी सोने का चेताया और रसोईघर में सरसरी नजर डालने के बाद बाथरूम चली गई, कपडे बदल कर सोने के लिए.

"भाई, माँ के सामने क्यों पूछ रहा था? उन्हें नहीं पता और मैं जो बना रही हु वह सबसे पहले तू हे देखेगा, पूरा होने के बाद.", अपनी दीदी को ऐसे थोड़ा नाराज होते देख अर्जुन को उनपे बड़ा प्यार आ रहा था.

"मैं जानता हु के मुझे सब देखने की इजाजत है.", उनका हाथ पकड़ कर दूसरे हाथ से गाल पर आये बालो को पीछे करता वह द्विअर्थी संवाद में बोलै तोह गोर चेहरे पर भरपूर लाली आ गई थी कोमल दीदी के. "चल हट अभी", हाथ छुड़ाने की कोई hil-hujjatt किये बिना वह शर्मा रही थी. लेकिन ाचा लग रहा था ऐसे अर्जुन का उनका हाथ पकडे रखना.

"ाचा दीदी, आज घर में इतनी शांति कैसे है?", अर्जुन जैसे कुछ jaan-na चाहता हो.

"रोज हे तोह होती है इस समय. वैसे आजकल सबके सोने की जगह बदल गई है.", बर्तन धोने की जगह पर साफ़ पानी चलती वह ये आखिरी काम कर राइ थी. साथ हे अर्जुन को ऐसे अपने साथ वक़्त बिताते देख खुश भी थी.

"मतलब? सबने जगह बदल ली?", अर्जुन थोड़ा हैरान होते हुए बोलै.

"अलका और ऋतू ने अपना कमरा यहाँ से बदल कर ऊपर चाचा वाले में सब सामान लगा लिए है. और अब आरती भी उनके हे साथ आज से वही सोने लगी है. प्रियंका तुम्हारे वाली तरफ अब तारा के साथ है तोह नीचे वाले एक कमरे में माधुरी दीदी और ऋतू वाले में अब से मैं हु.", अपने हाथ धोने के बाद कील पर लटके छोटे तोलिये से उन्होंने अपने gore-mulayam हाथ साफ़ करते हुए कहा तोह अर्जुन ये जान कर थोड़ा हैरान हो गया. रसोईघर की लाइट बंद करते हुए कोमल दीदी बाथरूम में चली गई और अर्जुन उनके कमरे में.

पहले ये कमरा हमेशा Alka-Ritu की आवाज से भरा रहता था, आज वही कमरा एक अलग हे ठंडक और सुकून से. अर्जुन तकिये को मदद कर कंधे और सर के नीचे लगाए दरवज्जे की तरफ करवट लिए देखता रहा. कोई 5 मिनट बाद हे कोमल दीदी अंदर आई तोह जीरो बल्ब की रौशनी में अपने बिस्टेर पर अर्जुन को ऐसे उनकी राह देखते पाया. उनकी चेहरे पर वही मुस्कान लौट आई जो सिर्फ और सिर्फ अर्जुन के होने पर हे आती थी. बिना कुछ कहे पहले उन्होंने दरवाजा अंदर से लगाया और लमारी खोल कर जैसे कुछ करने लगी.

"आपने कभी सिर्फ कुरता पहना है रात में?", अर्जुन ने जैसे उनकी समस्या का निदान कर दिए था और अपनी अलमारी से एक जीना सा कपडा निकलने के बाद कोमल दीदी ने पहले तोह वह जीरो की रौशनी भी बंद कर दी और फिर अँधेरे में हे शरीर पर पहने दोनों कपडे उतरने के बाद वह एक कपडा पहन कर फिर से वह छोटी लाइट जला दी. रात के हिसाब से वह रौशनी पर्याप्त थी उनकी आभा दिखने के लिए. कपडे समेत कर वापिस अलमारी में रखती वह अर्जुन के बराबर हे आ कर लेट गई.

"वैसे ाचा लगता है जब तुम बताते हो की मुझे कैसे कपड़ो में देखना तुम्हे पसंद है. नहीं तोह सुबह जो सामने आया पूरा शरीर ढकने को वह पहन लिए. रात में कुछ उस तरह हे बस नींद लेने के समय.", उनके गले में चमकती सोने की चैन देखता अर्जुन उनकी बात सुन्न रहा था.

"वैसे आपको ाचे से पता है मुझे आप कैसे ाची लगती है.", शरारत से कही उसकी बात उनकर कोमल दीदी हल्का शर्माती हुई उसके और करीब आ गई. अर्जुन भी थोड़ा आगे होता उनके शरीर के साथ लग गया.

"एक तुम हे हो जिसकी बस एक झलक देखने भर से दिल में सुकून आ जाता है. बहार सबके साथ रहकर मैं जितना अकेली महसूस करती हु, वह बस तुम्हारे एक पल के लिए पास आने भर से पूरे जहां सा लगने लगता है, ारु.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन को फिर एहसास हो गया था की उसकी इस बहिन की दुनिया हमेशा से खुद वही रहा है. बिना स्वार्थ और काम के उसने कोमल दीदी की कमर पर हाथ रखते हुए उनको होंठो को चूमा और खुद से चिपका लिए. कोमल दीदी की आँखें अपने आप हे बंद हो गई थी और ऐसे अर्जुन का उन्हें यु सहलाना और प्यार से सर पर थपकी देना साड़ी थकान मिटा गया था.

आज पहली बार वह किसी छोटे बचे की तरह सिमट कर उसके सीने में चेहरा लगाए कब सो गई उन्हें खबर भी न हुई. अर्जुन वैसे हे अपनी प्यारी बड़ी बहिन को be-awaaj लोरी सुनाता थपकता रहा. शरीर उसका भी थका था लेकिन जब तक हाथ चलते रहे वह उन्हें सहलाता रहा और खुद भी उनके साथ हे सो गया.

.

.

आँख खुली तोह अभी बहार अँधेरा हे था. अपनी बाहों के घेरे में सोती दीदी के माथे को हलके से चूम कर अर्जुन बिना आवाज किये सावधानी से बिस्टेर से निचे उतर गया. 2 तकिये उनके साथ टिकने के बाद वैसे हे कमरे से बहार आया और आसमान की तरफ देखा. सब शांत था लेकिन फिर भी अँधेरा हे था अभी. ऊपर वाले कमरे में जा कर बाथरूम से फ्री होने के बाद कपडे बदल कर वह बहार वाले रस्ते से हे घर से बहार आ खड़ा हुआ. फिर कुछ सोचने के बाद वापिस अंदर आया और अपनी साइकिल के साथ हे टोलिया लेते हुए वह फिर से घने अँधेरे में हे अपनी मंजिल की तरफ चल दिए. हवा में हलकी ठंडक थी और पर्याप्त नींद लेने से शरीर हल्का महसूस हो रहा था. अभी आसमान में कुछ रंग दिखने शुरू हुए हे थे.

जैसे हे अगले सेक्टर में पंहुचा इतनी सुबह एक पुलिस की जिप्सी सामने से आती करीब से गुजर गई. एक पल के लिए अर्जुन ने रुक कर देखा तोह पीछे से वह खली हे थी और सामने की तरफ वह देख चूका था की एक ड्राइवर और साथ में एक जवान सा व्यक्ति था. फिर वापिस पैदल मारता वह वैसे हे प्रकृति का नजारा करता वह आ पहचा था जहा सड़क गाँव की तरफ मुड़ती थी. बिना ब्रेक लगाए उसने साइकिल गाँव की तरफ बढ़ा दी और अगले 10 मिनट में साइकिल पुलिए के ऊपर लगी लोहे के ग्रिल के साथ लगी कड़ी थी. और अर्जुन टोलिया उठाये नीचे की तरफ चलता जंगल वाली जगह आ गया.

"वाह", उसके मुँह से बस यही निकला जब वह नहर की दिवार पर आ खड़ा हुआ.

पानी दिवार तक ऊपर आया हुआ था और साथ हे किसी गहरे रंग के शीशे सा चमक रहा था. एक सार में बेहटा पानी और पीछे कही कही से आती मोर की pihu-pihu की आवाज. कुछ देर के लिए इस जन्नत से नज़ारे को देखने के बाद अर्जुन वही किनारे पर अपना ट्रैक पजामा और टीशर्ट उतर कर रखने के बाद सीधा कूद गया.

"छपाक" की आवाज जैसे उस पूरे बियावान जंगल की शांति भनग करती सुनाई दी और अर्जुन उस ठन्डे बहते पानी में तैरता आगे निकल गया. 300 मीटर के लगभग दूर पुलिया के नीचे से निकलने के बाद वही साइड की दिवार पकड़ बहार आता वह किनारे किनारे चलते हुए फिर वही आ खड़ा हुआ. और एक बार फिर वही क्रम दोहरा दिए. तक़रीबन अगले आधे घंटे वह नहर में कूदता, पुलिया तक जाता और फिर वापिस आता. यही कर रहा था.

इस बार जैसे हे वह पुलिया के नीचे से होता बहार निकला तोह सामने हाथ में लौटा पकडे कड़ी सविता और काजल को देख कर कुछ पल के लिए रुक गया. सविता बस tukur-tukur अर्जुन के चेहरे को देखे जा रही थी. जैसे कोई जीन उसके सामने इतनी सुबह आ खड़ा हुआ हो और वही काजल उसके भीगे नंगे जिस्म को, जिसपर सिर्फ एक पूरे कपडे वाला अंडरवियर था. अपने गीले लम्बे बालो को दोनों हाथो से पीछे करता वह बिना कुछ कहे सुने वैसे हे इस तरफ वापिस आ गया और आते हे टोलिया उठा कर खुद को पौंछने लगा.

आसमान में अब हलकी रौशनी फ़ैल चुकी थी. ये भोर का वही समय था जो सूरज के उगने से पहले होता है. एक तरफ हलकी neeli-laali और एक तरफ ख़तम होता अँधेरा.

"तोह आजकल मछली दिखने लगी गाँव की नहर में भी.", बदन सूखा के वह सीधा खड़ा हुआ हे थे के गोल चाँद सा चेहरा और रात सी काली आँखों वाली काजल उसके पास आ कड़ी हुई. अपने दूसरे हाथ से हे उसने सविता का भी हाथ पकड़ा था जिसने अब अपने चेहरे के सामने चुन्नी बांध ली थी.

"तुम शायद मगरमछ बोलना चाहती थी.", अजरुन ने कमर पर बंधे तोलिये के ऊपर से हे पजामा पहनते हुए कहा और फिर एक निगाह सविता के मासूम से चेहरे पर भी डाली. अर्जुन को यु अपनी तरफ देखते हुआ पाया तोह सविता ने नजरे जमीन पर गदा दी.

"ाची बात नहीं है वैसे ये तुम्हारी. एक तोह हमारे गाँव ऐसे आते हो और आते हो तोह आते हो बिना मिले चले भी जाते हो. ये बेचारी तोह एक हफ्ता रोज देखती रही अपने घर के बहार वाली सड़क को के तुम आज आओगे, अब आओगे.", नटखट पैन दिखती काजल का इशारा अपनी तरफ होते देख सविता ने उसकी कलाई पर चूंटी काट दी.

"मैंने कब कहा ये भला? और मैं इनका रस्तात क्यों देखने लगी?", सविता ने बड़ी तल्खी से ऐसा कहा तोह अर्जुन ने मुस्कुराते हुए अपने चौड़े सीने पर टीशर्ट पहन ने के बाद वही रखे पत्थर पर बैठते हुए जवाब दिए.

"हाँ ये क्यों मेरा रास्ता देखने लगी. और वैसे तोह तुम भी ऐसी हे हो. मैं एक अनजान लड़का जो बस यहाँ आता है और चला जाता है.", वह पाँव साफ़ करने के बाद जूते पहन रहा था. दोनों हे लड़किया उसको देख रही थी लेकिन अब कोई भी कुछ बोलै नै.

"ाचा तोह फिर मैं चलता हु जी.", अर्जुन उठने लगा तोह जाने कैसे सविता उसके सामने आ कड़ी हुई, हिम्मत करती.

"ताकि फिर 2 हफ्ते बाद शकल दिखाओ और मिलने की बात करके गायब हो जाओ.", उसकी आवाज में हल्का गुस्सा और उत्तेजना थी. जो अर्जुन भी समझ गया था किस वजह से थी.

"हाँ जैसे तुम मुझे इधर बिठा कर आने का बोल कर गई थी और फिर आज दिखी हो. पूरी बरसात मैं यही था लेकिन तुम ना आई.", उसकी बात का अब कोई जवाब न था सविता के पास और वह बिना कहे हे जब मदद कर जाने लगी तोह अर्जुन ने उसका चुन्नी में लिप्त हाथ थाम लिए.

"तुम्हारी सहेली से थोड़ी देर बाद मिल सकती हो?", काजल ने ये बात सुनी तोह वह हाँ में सर हिलती हुई मुस्कुराती हुई वह से पुलिया के उस पार कहते की तरफ चलने लगी और इधर सविता के नाजुक शरीर में तेज सिरहन शुरू हो गई थी.

"क्या करते हो? ऐसे क्यों पकड़ा मुझे और कोई देख लेगा तोह क्या होगा?"

"आओ इधर बैठ जाओ. और अगर मैंने जो किआ वह ाचा नहीं लगा तोह सॉरी. वैसे यहाँ तुम्हे कोई नहीं देखने वाला और ये तुम भी जानती हे हो.", अर्जुन ने सविता को भी अपने सामने बिठाते हुए कहा. लज्जटी सिमटी सी वह एक बार सब तरफ देखने के बाद बैठ गई.

"हाँ तोह अब बताओ की मुझसे क्या गुस्ताखी हुई जो आज सुबह सुबह ये खूबसूरत चेहरा लाल किये हो? मिलने तुम नहीं आई और खफा भी तुम.", अर्जुन की इस बात का वह क्या जवाब दे सकती थी क्योंकि उसको पता था के गलती उसकी थी उस दिन.

"वह.. वह बारिश थी और मुझे लगा"

"यही लगा के मैं बारिश में वापिस चला गया होऊंगा?"

"हम्म्म"

"चलो फिर तोह किसी की गलती नहीं हुई तोह गुस्से की वजह?", अर्जुन ने हाथ अभी भी अपने हे हाथ में पकड़ा हुआ था और सविता भी कोई नखरा किये बिना साथ बैठी थी.

"तुम आये नहीं उसके बाद एक बार भी.", अपने बड़ी बड़ी हिरानी जैसी आँखे उठती वह अर्जुन को देखते हुए शिकायत कर रही थी. अर्जुन को भी उसका ऐसे कहना बड़ा भा रहा था.

"फिर ये बात तोह ऐसे होनी चाहिए थी की आज तुम आते हे सबसे पहले यही बात पूछती, गुस्सा होने की जगह. क्या पता मुझे कुछ हुआ हो.", अर्जुन ने जैसे ये लफ्ज़ कहे हे थे की अपना नाजुक सा हाथ सविता ने उसके होंठो पर रख दिए और अर्जुन की अगली हरकत होते हे सविता ने शर्म से मुँह फेर लिए.

"गंदे कही के.", उसकी लम्बी नाजुक उंगलिओ को अर्जुन ने चूम लिए था. सविता के शरीर को आज सही से पता लगा था के उस इंसान का चूना कैसे अलग लगता है जिसको आप पसंद करते हो.

"इसमें क्या गन्दा था? तुम्हारे हाथ इतने सुन्दर है तोह मुझे जो ठीक लगा मैंने वही किआ. कल अगर तुम अपना चेहरा मेरे पास लेके आओ तोह क्या मैं तुम्हारे ये गुलाबी होंठ पर किश नहीं करूँगा? तब भी यही कहोगी.?", सविता का बैठना दूभर हो गया था अर्जुन की ऐसी बातें सुनकर. वह जैसे हे शर्माती सकुचाती सी उठने लगी अर्जुन ने फिर से उसके ढीले जिस्म को खींच लिए.

इस बार सविता का सम्पूर्ण शरीर अर्जुन के आगोश में था. चेहरे के सामने उसका वह प्यारा सा चेहरा. शर्म से बंद हुई आँखों पर लम्बी घनी पलके और लरजते होंठ जो शायद आवाज निकलना भूल गए थे. और फिर सविता को करंट सा लगा जिस से शरीर रह रह कर फड़कने लगा था. साँसे बेतरतीब हो गई थी, माथे पर बल गए और दिल की धड़कन जैसे इतनी भद्द चुकी थी की वह बहार से हे महसूस हो जाये. अर्जुन के लबो को अपने लबो पर महसूस किआ था उसने और फिर जैसे दोनों होंठ अर्जुन ने बड़ी नरमी से एक एक करते हुए मुँह में भरने के बाद आजाद किये.

"अब से न मैं कह देती हु की.. मुझसे दूर रहना.. ह्ह्ह्हुउउ.. गंदे हो तुम.", साँसे दुरुस्त करती जब वह कड़ी हुई तोह वह कांप रही थी और अर्जुन उसको देख कर मुस्कुरा रहा था. फिर जब सब याद और महसूस किआ था मारे शर्म के वह सीढ़ी पगडण्डी पर भाग चली.

"सच में गंदे हो तुम.", थोड़ी दूर ृक्क कर पीछे मुड़ी और शर्म से मुस्कुराती फिर से वह अर्जुन को देख कर बोली.

"कल मैं फिर यही मिलूंगा तुमसे.", अर्जुन ने हवा में चुम्बन देते हुए कहा और उस हिरणी को कुलांचे मारते हुए जाते देखने लगा. कुछ हे देर बाद वही से काजल उसकी तरफ मटकती आ रही थी. अब उसके हाथ में लौटा नहीं था.

"क्या कह दिए उसको जो वह इतनी खुश होती हुई सीधा घर हे जा के रुकी.?", एक अदा से काजल कमर पर हाथ रखे कड़ी हुई बोली. वही सूती लेहंगा और छाती पर कासी चोली पहने वह शरारत से अर्जुन को देख रही थी.

"कुछ नहीं. बस उसके हाथ को चूम लिए था.", अर्जुन ने अपनी जगह से खड़े होते कहा तोह काजल उसके शरीर के बिलकुल साथ लग गई. कैसे हुए मॉटे दूध अर्जुन के सीने से थोड़ा नीचे छु रहे थे.

"बाकी कसार मैं पूरी कर देती हु.", जिस अदा से ये बात कही थी काजल ने अर्जुन को भी अंदाज ाचा लगा था. उसके दोनों फूले हुए मॉटे कूल्हे दबाता वह काजल के चेहरे को चूम कर बोलै, "आज नहीं. दिन निकल आया है और फिर स्कूल है मेरा. कल मिलता हु यही पर और देखता हु ये मछली मेरे से कितनी तेज है.", काजल भी उसकी बात सुनकर चहक उठी. बदले में एक मीठा चुम्बन अर्जुन को करती वह भी साथ चलती पुलिया तक आ गई जहा अर्जुन की साइकिल कड़ी थी.

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सुबह के 6 बजे खुले मैदान की तरफ से अपनी सरकारी कोठी की तरफ इस भूरे रंग के ताम्बे घोड़े की पीठ पर सवार डॉ शंकर रफ़्तार धीमी करते हुए अस्तबल के पास लगाम खींचते हुए उसको रूक कर आराम से नीचे उतर आये तोह घोड़ो के देखभाल करने वाला ये पक्के से रंग का औसत कद काठी वाला आदमी उनके हाथ से घोड़े की लगाम लेते हुए खड़ा हो गया. सफ़ेद कासी हुई कालर वाली टीशर्ट और चुस्त पतलून पहने डॉ शंकर ने अपना चेहरा तोलिये से साफ़ किआ.

"बंसी, पवन को ाचे से नहलाने के बाद इसका खुर्र दिखवा लेना कल्लू लोहार से. और वह तुम्हारे खाते में पैसे डलवा दिए थे कल तोह अपनी बिटिया का दाखिला भी करवा आना स्कूल में. उनको मैंने फ़ोन कर दिए था.", बंसी नाम का उनका ये सेवक दोनों हाथ जोड़ के खड़ा रहा सर झुकाये, लगाम अभी भी हाथ में हे थी. पवन नाम के इस घोड़े के चेहरे को थपथपया तोह उसने जैसे डॉ शंकर के चेरे पर प्यार से अपना मुँह लगाया.

"गुड बॉय. और कोई दिक्कतत परेशानी तोह नहीं?", फिर से पवन को चेहरे को सहलाने के बाद उन्होंने बंसी से उसके साथ हे चलते हुए पुछा.

"नहीं मालिक. और कछु नाही चाहि. आप पहले हे इत्ता सब किये हो हमर खातिर के 10 जनम लेके भी आपका ह्रीं नहीं उतार पावेंगे. ऊपर से बिटिया का दाखिला बी पीरवते (प्राइवेट) स्कूल में करा देइ हो.", बंसी अनुकम्पा से हाथ जोड़ते हुए हे उनके पीछे चल रहा था.

"तुम्हारा हक़ तुम्हे दिए है भाई तोह एहसान कैसा. और बिटिया का भी बचत खता खुलवा देते है जिस से कल अगर शादी करनी हो तोह तुम्हारे पर कोई अतिरिक्त भार न आये. शाम को आज मैं यही घर आऊंगा हॉस्पिटल से तोह एक बार सफाई देख लेना.", बंसी वैसे हे हाथ जोड़े ृक्क गया और अपने मालिक को जाते देखने लगा. सामने एक जूनियर डॉक्टर कड़ी थी हाथ में कुछ कागज लेके और थोड़ी हे दुरी पर भुप्पी (ड्राइवर).

"गुड मॉर्निंग सर.", वह कोई 25-26 साल की खूबसूरत युवती थी. खुल्ले भूरे बाल, जो कंधे से कुछ नीचे तक थे, बड़े सफाई से संभाले हुए. Gulabi-safed चुस्त सलवार कमीज के ऊपर एक डॉक्टर कोट पहने इस लड़की की मुस्कान दिलकश थी.

"गुड मॉर्निंग डॉ लवलीन. It's किते अर्ली ी गेस.", शंकर जी ने भी अनुशाषित स्वर में हे अभिवड़ां किआ. जिस पर इस युवती ने पहले कान के पास से अपने बाल ठीक किये और फिर आने की वजह बताई.

"आज एक इम्पोर्टेन्ट सर्जरी है सर और वह भी सचेडूले से पहले. मला लाल जी के बेटे की और उन्होंने क्मो सर को साफ़ मन करते हुए सिर्फ आपमें हे फेथ दिखाया है. उसके बाद 4 डेड बॉडीज है जिनका पोस्टमॉर्टम आपके अंडर हे मेंशन है और ये उनके पेपर्स है. दसप सलूजा ने ये रेकमेंड किआ है के ये स्ट्रिक्टली आपके हे सुपेर्विसिओं में कंडक्ट हो.", शंकर जी के चेहरे पर सहज भाव थे बहार से क्योंकि उनके अंदर की मुस्कान वह किसी बाहरी के सामने तोह दिखते तक नहीं थे.

"थैंक यू. Let's हैवे सम कॉफ़ी एंड वे विल लीव इन 15 मिनट्स. रिलैक्स योरसेल्फ इन गार्डन एरिया.", शंकर जी ने इस महिला डॉक्टर को कोठी के बहार हे राखी कुर्सी पर बैठने को कहा और खुद भुप्पी के साथ गली की सड़क के किनारे खड़े हो गए.

"हाँ तोह भुप्पी जी हुकुम?", ये अंदाज़ अब बिलकुल अलग था क्योंकि दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी.

"वह मैं यही बताने आया था जो आपके सामान ने बोलै अभी. दसप को बोल दिए था देर रात में हे बड़े सांगवान जी ने की ये कोठी वाले हादसे की रिपोर्ट बना दे और कटे शरीर हवाले कर दे उनके लाडले बेटे शंकर शम्भू को. अब जोड़े या और काटे उसकी मर्जी.", भुप्पी के कंधे पर हाथ रखे शंकर जी मुस्कुराते हुए सुन्न रहे थे उसकी बात. एक बात तोह साफ़ थी की भुप्पी जिसको सबके सामने ड्राइवर बताया जाता था वह कार ड्राइवर तोह बिलकुल नहीं था.

"सांगवान चाचा अपने इस बेटे के चेहरे और कमीज पर दाग नई देख सकते. फिर बेशक सामने वाला संत्री हो या मंत्री.. और ये मेरा सामान अभी हुआ नहीं भुप्पी बीटा लेकिन तूने आज कह दिए तोह तेरी बात पूरी कर देते है आज. वैसे भी कोनसा शाम में बैटरी लेके जंगल में फिर जाना है.", भुप्पी ने कार की तरफ कदम बढ़ाते हुए हवाई सलाम किआ और हँसता हुआ सीट पर जा बैठा.

"छोटे सांगवान ने बोलै है के मुर्गा बनवा के रखना. अभी याद आया तोह बता दिए. चलता हु महादेव.", गाडी पिछले गियर में डालता वह एक मिनट बाद हे गाडी घूमता गली से गायब हो गया. शंकर जी खुद को दुरुस्त करते हुए वापिस कोठी के अंदर पार्क में आ कर बैठ गए.

"सर शुगर?", डॉ लवलीन ने कॉफ़ी बनाते हुए पुछा. कॉफ़ी की ट्रे बंसी की धर्मपत्नी रख के गई थी यहाँ गार्डन में.

"No शुगर एंड No मिल्क, डॉक्टर.", शंकर जी ने वही रखे 'थे ट्रिब्यून' अखबार पर नजर डालते हुए कहा. उनका जवाब सुनकर डॉ लवलीन एक पल के लिए उन्हें देखती रही फिर एक कप में थरमस से डाली वही काळा रंग का गरम पानी उनकी और बढ़ा दिए.

"थैंक यू."

"वेलकम, सर."

कोई 5 मिनट बाद हे अपनी कार में बैठ कर वह अपने सरकारी हॉस्पिटल निकल चले. इतने सारे काम जो लेके आ गई थी डॉ लवलीन उनके लिए.

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"ओह मेरी प्यारी ताईजी, आज कहा आग लगाने चल दी आप?", अर्जुन खाने की मेज से खली प्लेट लेकर रसोईघर में रखने आया, जहा प्रियंका दीदी और उसकी माँ रेखा नाश्ता बना रही थी. तभी ललिता जी गहरी काली साडी और ब्लाउज पहन कर अंदर चली, नहाने के बाद. उनको देखते हे अर्जुन ने शरारत करते हुए ललिता जी के गाल चूम लिए.

"हट नासपीटा. कुछ भी बोलता है. देख ले रेखा तेरे सपूत को सुबह सुबह कैसी बात कर रहा है.", वह भी हंसती हुई उसकी पीठ पर चपत लगते हुए बोली. रेखा जी और प्रियंका दीदी भी उनकी hansi-thitholi देखकते हंसने मुस्कुराने लगे.

"आपका हे लाल है और मैं क्या बोलू आप दोनों के बीच में. वैसे गलत तोह कुछ कहा नहीं वैसे इसने. कितने हे दिन बाद आज आप खुश भी हो और दमक भी रही हो.", अपनी देवरानी की बात सुनकर ललितजी भी मुस्कुरा दी.

"सच में ताई जी. लैब तोह आज आप सच में बहोत सुन्दर रही हो. कला रंग जंचता है आप पे.", ये प्रियंका दीदी थी.

"अरे. मैं हे मिली तुम तीनो को दिन चढ़ते हे. वह आज यही साड़ी सामने आई तोह पहन ली.", इतना कहती वह भी चूल्हे के पास बैठ गई और इशारे से प्रियंका को उठने कहा.

"उतरना मत.", अर्जुन ने उनके कान में इतना हे कहा जब वह बहार जाने लगा और कहते हे भाग गया.

"अरे कपूत. रुक तू.", वह हंसती हुई उसको लताड़ रही थी लेकिन अर्जुन बहार भाग आया जहा रुपाली दीदी उसका इंतज़ार कर रही थी.

"देख ले तेरे सपूत को. मुझे लव यू बोल के भाग गया. नासपीटा.", बात को सफाई से घूमती वह वैसे हे मोहक हंसी के साथ फिर काम में लग गई.

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"भाई आज शाम को तू कुछ कर रहा है क्या?", संदीप भी आज इनके हे साथ स्कूल जा रहा था. जब रुपाली और आकांक्षा बातें करती आगे चलने लगी तोह पीछे वह दोनों चल रहे थे.

"क्यों? अब क्या हो गया भाई? शाम को क्या करना है?", अर्जुन ने साइकिल का हैंडल पकड़ कर चलते हुए उसकी तरफ देखा.

"वह भाई दीदी के होने वाले saas-sasur आ रहे है आज घर. तोह पापा ने मुझे कहा था के तेरे को बता दू के उन्होंने 6 बजे तुझे घर बुलाया है.", संदीप की बात सुनकर अर्जुन को ख़ुशी हुई लेकिन वह कुछ सोच में डूब गया.

"भाई उन्होंने जो कहा मैंने कह दिए. मैंने बताया था के तू 7 बजे तक हे वापिस आता है स्टेडियम से. बाकी जो तुझे ठीक लगे.", संदीप ने उसको सोचते देखा तोह खुद हे जैसे जवाब बनाने लगा था.

"अरे ऐसी कोई बात नहीं है. और मैं 6 से पहले आ जाता हु बे घर. 7 तोह तभी बजते है जब कुछ काम हो मार्किट का. घर जाने के बाद बोल देना के मैं आ जाऊंगा.", अर्जुन का जवाब सुनकर संदीप ने रहत की सांस ली.

"थैंक यू भाई. तू तोह जनता हे है के मेरे पापा तुझे बहोत मानते है."

"तोह मैं भी तोह उनके लिए हे आ रहा हु. तेरे साथ वीडियो गेम खेलना मैंने कब का छोड़ दिए है.", दोनों ऐसे हे बातें करते स्कूल आ पहुंचे जहा आज वह रोज का दिखने वाला झुण्ड गायब था.

"Hello. रुको जरा एक मिनट." ये आवाज उनके पीछे से आई तोह संदीप ने पलट कर देखा.

"भाई. पीछे ये लेडी शायद तुझे हे बुला रही है.", रुपाली और आकांक्षा अंदर जा चुके थे और ये दोनों भी बस गेट पर पहुंचे हे थे की संदीप के कहने पर अर्जुन ने पलट कर देखा तोह उसको अंदर जाने का बोल कर वह इस महिला की तरफ चल दिए. रिक्शावाले को किराया देने के बाद मेनका साढ़े कदमो से चलती अर्जुन की तरफ हे आ रही थी.

"आप यहाँ?", हलके क्रीम कलर की साड़ी और वैसा हे ब्लाउज. कोई खास सौन्दर्य प्रसाधन लगाए बिना सिर्फ हलकी सी होंठो के रंग की हे लिपस्टिक लगाए मेनका को एकदम से यु अपने सामने देख पल भर के लिए अर्जुन हैरान हो गया. वह भी एक पल के लिए हैरान हुई थी लेकिन चेहरे से जाहिर किये बिना वह बस हलके से मुस्कुरा कर उसको देख रही थी.

"हाँ तोह कहा होना चाहिए था मुझे? वो अलग बात है के 2 दिन देरी से आई हु पारिवारिक काम की वजह से लेकिन मुझे पढ़ना अब यही है. अब चलो मेरे साथ अंदर.", अर्जुन जैसे बंधी डोर की तरह साथ चल दिए. बार बार वह मेनका के चेहरे को देखता और फिर सीधा.

"कोनसी क्लास में हो?", जब विद्यालय के प्रांगण में आ गए तोह मेनका ने अपना folder-purse छाती के सामने दोनों हाथो से रखते हुए पुछा.

"11तह स, non-medical."

"ठीक है. फिर पीरियड के बाद मिलते है और कुछ काम भी है तुम्हारे लायक.", हाथ हिलती वह टीचर्स रूम की तरफ चली गई. अर्जुन अभी भी वही खड़ा बस देख रहा था और सोच रहा था के ये उसके हे स्कूल में आने वाली थी. फिर सर झटकता वह जब क्लास की तरफ चलने लगा तोह कई जोड़ी आँखों को खुद को हे घूरता पाया. स्टूडेंट्स और उनमे से एक टीचर.

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"भाई अर्जुन ये विद्या मैडम से टूशन रखने का सोच रहा हु. तू भी चलेगा क्या?", अभी क्लास शुरू नहीं हुई थी और सभी बैठे थे. धरमिंदर ने अपने से आगे, दिवार से तक लगाए अर्जुन से मैथ में अपनी कमजोरी की बात करते हुए बात शुरू की.

"भाई वह यहाँ भी वही पद्धति है जो घर पे पढ़ाएंगी. नया क्या है उधर."

"तू धरमिंदर का मतलब नई समझा. कमजोरी शारीरिक है इसकी.", ये बात सुशिल ने कही तोह चारो हंस दिए और तभी टीचर भी आ गई.

टॉपिक शुरू किआ और अगले बीस मिनट तक बड़े प्रभाशाली तरीके से वह सब समझने लगी. 40 के आसपास होने पर भी उनकी शख्शियत ऐसी थी की नए नए जवान हो रहे लड़को के लिए वह जैसे कामदेवी का रूप थी. लेकिन सार्ड और स्पष्ट लहजे की वजह से किसी की अतिरिक्त बात करने की हिम्मत नहीं होती थी. यही हाल अभी इन सबका था.

"Ok क्लास. नाउ it's योर टर्न. ये आपने सोल्वे करना है और 5 मिनट दिए जाते है.", एक सवाल बोर्ड पर लिखने के बाद उन्होंने साथ हे हाजिरी लगनी शुरू कर दी. आकांक्षा, कोयल, अर्जुन और एक लड़के के सिवा बाकी सभी अगले 5 मिनट गुजरने के बाद भी लिखते रहे.

"हाँ तोह इसको बोर्ड पर कोण सोल्वे करेगा?", और जवाब में अर्जुन को छोड़ कर बाकी तीनो ने हाथ उठा दिए. विद्या मैडम ने चश्मे के किनारे से अर्जुन को देखा और फिर कुछ कहे बिना आकांक्षा को सवाल बोर्ड पर हल करने को कहा. जो बिलकुल सही तरीके से उसने किआ भी.

"गुड गर्ल. एंड नाउ रेस्ट ऑफ़ थे क्लास, प्लीज फोकस. ये अभी स्टार्टिंग है और यही ध्यान नहीं डोज तोह फिर मैथ लेने का फैंसला गलत हे होगा. और अब ये कल के टॉपिक से सवाल है. इसको करे, इतने मैं आती हु.", एक और सवाल लिखने के बाद उन्होंने अर्जुन को सामने आ कर खड़े होने को कहा और बहार चली गई.

"भाई, तू तोह बच गया लेकिन बाकी फस्स गए. ये सवाल टॉपिक से जरूर है लेकिन आधा. इंटीग्रेशन पूरा कहा पढ़ाया है.", दिनेश मैथ में ठीक था लेकिन ये सवाल पूरी क्लास में सिर्फ 2 लोग हे कर रहे थे. अर्जुन बस खड़ा था सामने दिनेश की बात सुनता.

"बचा नहीं हु अभी मैं. शायद पुनीश होने वाला हु.", अर्जुन ने इतना कहा और इशारे से दिनेश को कोयल और आकांक्षा को देखने को कहा. दोनों हे लगी हुई थी अपनी कॉपी में पेन के साथ.

"भाई ये बैटरी भी बहोत तेज लगती है.", कोयल ग्रोवर ने सुना जो दिनेश ने कहा फिर वापिस सवाल में लग गई. बाकि दोस्तों के चेहरे पर हंसी थी जो गायब होने वाली थी अब.

"हाँ तोह तुम तीनो. और तुम दोनों. सामने आ कर हाथ खड़े कर लो.", क्लास में एक खुली खिड़की से विद्या मैडम ने सबकुछ देखा था और अंदर आते हे अर्जुन के तीनो दोस्त और आखिरी कतार वाले दोनों लड़को को दिवार के साथ हाथ सीधे करके खड़ा कर दिए.

"मम मेरा हो गया.", ये आवाज 2 बार गूंजी और मैडम ने दोनों लड़कीओ की कॉपी ध्यान से देखि.

"हम्म्म. ये आपका लास्ट स्टेप गलत है बीटा. एग्जाम में सोल्वे करती तोह 5 में से 4 मार्क्स मिलते. एंड ऑलमोस्ट शामे हेरे. ये आंसर क्यों गलत है कोयल जरा आकांक्षा की कॉपी से देख कर बताओ.", वह दोनों हे लड़कीओ से प्रभावित हुई लेकिन उनकी दोनों की हे गलतिया आपस में देख कर समझने का बोल कर वापिस कुर्सी पर आ बैठी.

"सो, अर्जुन शर्मा. स्टार्ट.", अपना चस्मा ठीक करती वह कुर्सी को बोर्ड की तरफ हे घुमा कर देखने लगी. जहा अर्जुन किसी मंझे हुए अध्यापक की तरह सवाल के हर चरण को समझते हुए लिख रहा था. चाक पर पकड़ ाची थी और वैसे हे लिखावट भी. 2 मिनट के बाद हे चाक को वापिस टेबल पर रखता वह एक तरफ खड़ा हो गया.

"अब समझ आया सभी को की फोकस रखना कितना इम्पोर्टेन्ट है क्लास में. कुछ स्टूडेंट होते है ऐसे जो लगता है बातें कर रहे है लेकिन ध्यान उनका क्लास में होता है. और तुम तीनो भी थोड़ा इसके साथ रहते हो तोह 50% ध्यान लगाओ इसकी तरह. एंड अर्जुन नाउ यू मई सीट.", सभी को उनकी सीट पर बिठाने के बाद वह भी बेल्ल बजते हे चली गई.

अगला पीरियड फिजिक्स लैब का था और वह वैसे हे मौज मस्ती में निकल गया क्योंकि फर्स्ट लैब सिर्फ समझने के लिए असिस्टेंट टीचर ने दी थी. मिस अन्नू वालिए नजर नहीं आई.

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आज दर्शन सर ने क्लास में सभी बचो को अपने परिचित अंदाज में पढ़ने के साथ हे गण भी सुनाया और उसका मजेदार इंग्लिश ट्रांसलेशन करते हुए लोटपोट कर दिए था. Chapter ख़तम होने के बाद क्वेश्चन पूछे तोह गलत जवाब वालो की क्लास में अनुपस्थिति और सही जवाब वालो को टॉफ़ी. मतलब हंसाने के साथ हे उन्होंने ये भी बता दिए था के कक्षा की अहमियत क्या है.

"भाई ये अंकल जी तोह खतरनाक निकले. लग गई मेरी एब्सेंट मजाक मजाक में.", धरमिंदर पढ़ाकू था लेकिन क्लास में आज पहला सवाल उस से हे पुछा गया था तोह उसने मजाक में हे गलत जवाद दिए था.

"भाई देख 5 पीरियड है तोह इतनी देर तोह हम लोग ध्यान रख हे सकते है.", सुशिल की इस बात पर अर्जुन और दिनेश ने भी समर्थन दिए. तये हुआ के मजाक सिर्फ मजाक के समय और जहा ध्यान देना है वह बस ध्यान.

मेनका सिंह के पास आज कंप्यूटर क्लास थी और उनकी हे लैब में सभी स्टूडेंट्स ने सिर्फ कंप्यूटर की जरुरी बातें समझी. कितने part, किसका क्या काम, और कैसे टाइप करते है. यहाँ एक-2 बार अर्जुन और मेनका की आँखें जरूर मिली लेकिन उस से ज्यादा कुछ खास न हुआ.

केमिस्ट्री की मैडम ने भी परिचय लिए और किताब के बारे में थोड़ा बातें करने के बाद अगले दिन से टॉपिक शुरू करने का बोल कर क्लास फ्री कर दी.

"संदीप दीदी को घर तक छोड़ देना मैं थोड़ी देर तक आऊंगा घर.", आकांक्षा से उसका हाल चल अर्जुन ने ले लिए था क्लास में जब दोनों हे रह गए थे उस समय. और हिम्मत दिखती उस लड़की ने भी अर्जुन के गाल पर किश करके बता दिए था की वह उस से कितना प्यार करती है.

"तुम नहीं चलोगे साथ.?", स्कूल प्रांगण में जब ये चारो एकसाथ थे तभी आकांक्षा ने पूछ लिए.

"नहीं. थोड़ा काम है और दीदी आप बता देना घर पर.", फिर तीनो हे निकल गए और अर्जुन वही भीतर वाले प्रांगण में बैठ कर मेनका की प्रतीक्षा करने लगा. साथ हे सोच भी रहा था के क्या काम होगा और वह सुबह कैसे इतना खुलकर उसके साथ अंदर तक चली आई थी.

"Hello अर्जुन.", आवाज सुनते हे चबूतरे पर पाँव लटकाये बैठा अर्जुन झट्ट खड़ा हुआ.

"गुड आफ्टरनून मिस.", सामने कड़ी मिस अन्नू को देखते हे अर्जुन ाचे विद्यार्थी की तरह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ. लेकिन हमेशा गंभीर रहने वाली मिस अन्नू वालिए इस समय थोड़ी खुश दिख रही थी. आज पहनावा भी अलग था. नीला जमुनी रंग का कारीगरी वाला तंग पजामी वाला सलवार कमीज, कंधे से सीने की तरफ से जमीन की तरफ जाट सीधा मैचिंग दुपट्टा और एक ढीले रबर में सर से बंधे घने बाल

"अरे don't बे फॉर्मल ात थिस टाइम. बैठो आराम से. किसी का वेट कर रहे थे?", कानो में किसी छोटी चूड़ी के जैसी हे महीन धातु की बालिया उनके गोर गाल के निचले हिस्से को छु रही थी.

"जी मिस. हमारी कंप्यूटर फैकल्टी, मिस मेनका सिंह ने रुकने के लिए कहा है.", उसकी बात सुनकर मिस अन्नू की छोटी सी मुस्कान अब खूबसूरत खिलखिलाहट में बदल गई थी. दमकते दांत, लम्बा बादामी अकार चेरा और सुर्ख होंठ. ये दृश्य अनुपम था जिसको अर्जुन भी टुकुर टुकुर देख रहा था. फिर झेंपते हुए नजरे झुका ली.

"मतलब आज पहले दिन वह आई और यहाँ भी क्लैश ऑफ़ माइंडस.", अपनी हंसी को रोकने की कोशिश करती वह फिर मुँह पर हाथ रखते कड़ी हो गई थी. फिर अर्जुन को जैसे हे देखा हंसी फिर चूत गई.

अर्जुन ने उन्हें इतना खुश देखा तोह बताना जरुरी नहीं समझा के बात कही से भी ऐसी नहीं थी. बस उसको ाचा लगा था के उसकी वजह से मिस अन्नू के चेहरे पर थोड़ी देर के लिए हे सही मुस्कराहट तोह आई.

"Hello मेनका. ये अर्जुन ने तुम्हे भी पहले हे दिन तंग कर दिए क्या? सच कहु तोह स्टूडेंट थोड़ा कमिटेड है लेकिन बुरा नहीं.", मेनका जैसे हे उनके पास आई तोह अन्नू ने हाथ मिलते हे अर्जुन की बात शुरू भी कर दी.

"अरे, ये मुझे तंग करेगा? क्या अन्नू इसने तुझे बताया नहीं क्या? फैमिलीज़ नोन है हमारी और मैं कल हे आई हु यहाँ वाले घर में. तोह आज इसके जिम्मे कुछ काम लगाने थे इसलिए रोका है इसको.", अब बारी हैरान होने की मिस अन्नू की थी. वह अब अर्जुन को थोड़ा गंभीर चेहरे से देख रही थी. और वही अर्जुन सोच रहा था के मेनका ने ये क्यों कहा के उनके परिवार आपस में एक दूसरे को जानते है.

"ाचा तोह ये बात है. लेकिन इसने तोह कुछ बताया हे नहीं. मुझे लगा के .. चल छोड़ ये बात. वैसे अब शिफ्ट हो गई हो तोह हमारे घर भी आओ इवनिंग. अर्जुन शर्मा को तोह पता भी हमारा घर.", जाने किस वजह से वह एकदम हे ऐसे बात करने लगी थी. अर्जुन दोनों से कुछ कदम पीछे हो कर खड़ा हो गया था. अगले 2-3 मिनट हे दोनों ने बातें की और फिर हाथ मिलती हुई अलग हो गई. जाने से पहले मिस अन्नू ने एक बार नजर उठा कर जरूर देखा था अर्जुन को जो अब सर झुकाये थोड़ी दूर खड़ा था.

"चले हम.", अर्जुन ने मेनका को करीब आते हे तल्खिया स्वर में पुछा.

"हां चलो. लेकिन तुम्हारी मोटरसाइकिल कहा है?", अर्जुन ने साथ चलते हुए अपने माथे पर हाथ रख लिए उनकी बात सुनकर.

"सुबह देखा था न के मैं साइकिल से आया था. और वह भी मैंने भिजवा दी अपने दोस्त के हाथ. पहले ये तोह बताओ के काम क्या है आपको? 5 मिनट में मोटरसाइकिल भी ले आऊंगा", अर्जुन मेनका के साथ स्कूल से निकल कर बहार पेड़ के नीचे आ खड़ा हुआ था.

"हम्म्म. मार्किट जाना है और घर का जरूरी सामान लेना है. मतलब राशन और घरेलु जरुरत का सामान. बाकी रहने के बाद पता लगेगा और क्या लेना है. भाई तोह कल रात को छोड़ कर सुबह अँधेरे में हे वापिस चला गया.", मेनका जैसे खुद को बेबस मान रही थी शहर आने के बाद.

"चलो मेरे साथ. ये भी कोई काम हुए.", अर्जुन ने बेध्यानी में हाथ पकड़ा और सड़क पर करते हुए मेनका को लेकर स्कूल से दूसरी तरफ वाली सीढ़ी सड़क पर चलने लगे. वह भी बिना जयदा soche/kahe साथ चलने लगी.

"ऑटो.", सड़क किनारे अपने से थोड़ी स्टार्ट खड़े हुए ऑटोरिक्शा को रुके रहने की आवाज देने के बाद वह मेनका के साथ उसमे बैठ गया.

"स्पेशल है. पहले सेक्टर वाली मार्किट ले चलो.", मेनका अर्जुन के साथ बैठी बस देख रही थी की वह क्या कह रहा है और कैसे कर रहा है. सिर्फ एक दिन हे मिली थी वह इस लड़के से लेकिन उस दिन हे ये एक ऐसी ाम्मित्त छप्प छोड़ गया था दिल पर की इस बड़े शहर में वह खुद को अकेला महसूस नहीं कर रही थी अब. कोई 5 मिनट बाद हे दोनों सेक्टर की इस मार्किट में था जहा अर्जुन हमेशा घर का सामान लेने आता रहता था.

"यही रुकना और चाहो तोह इतने chai-thanda पी लो भाई. 15-20 मिनट लगेंगे सामान लेने में.", अर्जुन ने उतरने के साथ हे जेब से पैसे निकल कर देने चाहे तोह ऑटोवाले ने हँसते हुए मन कर दिए.

"आप काम कर लो भैया जी फिर जहा आपको पहुंचना है वही पैसे दे देना.", ये भी एक हंसमुख सा व्यक्ति था. फिर मेनका को साथ लिए हे बड़े किरयाने की दूकान पर आ खड़ा हुआ. यहाँ वह चलते समय अब एहतियात रख रहा था.

"अंकल जी, ये सामन जरा पैक करवा दीजिये छोटू को बोलकर.", दोपहर के समय दूकान लगभग खली थी और दूकान वाला पहचानता था अर्जुन को तोह झट्ट से पर्ची लेकर वह छोटू को सामान निकलने के लिए एक एक चीज बोलने लगा. उन्हें भी 5 मिनट का बोलकर अर्जुन सब्जी वाली रेहड़ियों की पास आ गया. चाहया में सब्जी पर गीली बोरी डाले ये 3-4 रेहड़ी वाले ग्राहक न होने की वजह से ऊंघ रहे थे.

"भैय्या.. ये सब्जी टोल दीजिये जरा जो भी मैडम बताये आपको.", आवाज सुनते हे रेहड़ी वाले भी खुद को झाड़ते हुए पीपल के पेड़ की छाँव में बने चबूतरे से खड़े हो कर आ गए.

"जी भाभी जी बताये. सभी सब्जिया ताज़ी है और भैया जी को पता है के दाम भी ज्यादा नहीं लगते हम." मेनका उन्हें बताने लगी और अर्जुन वही छोटी दुकानों में खुली दवाई की दूकान पर आ गया.

"एक गूडनिघत, एक सवलों, 2 डेटोल साबुन, एक #### शैम्पू, एक कॉटन रोल, बैंडेज पैकेट, डिस्प्रिन और कुछ band-aid दे दीजिये.", दुकान वाले ने भी सामान साथ हे निकल कर दे दिए और पैसे देने के बाद अर्जुन सारा सामान एक पैकेट में लिए वापिस सब्जी वाले के पास आ खड़ा हुआ. सब्जियां भी लिफाफे में दाल कर एक तरफ राखी हुई थी.

"चलिए ये ऑटो में रख देता हुआ फिर राशन ले आते है." ऐसे हे कुल 20-25 मिनट में हे सारा सामान अब ऑटो में आ चूका था और फिर मेनका ने बैठने के बाद ऑटोवाले भैया को घर का पता बताया.

"भैया 1110, सेक्टर क्सक्स में जाना है."

"ये साथ वाली सड़क पर सीधा चलिए भाई. और ये अगले सेक्टर के दाई तरफ.", अर्जुन ने जब रास्ता समझाया तोह मेनका आश्चर्य से देखने लगी.

"घर कब आये तुम मेरे?"

"ओह मैडम जी, मैं यही रहता हु और रोज उधर से रनिंग करता जाता हु. सेक्टर की शुरुवात में हे लोहे का तीरनुमा बोर्ड लगा है 1112-1100 नंबर का. और आगे जाते हुए नंबर काम होते जाएंगे और फिर दूसरी तरफ शुरू हो जायेंगे.", उनकी बातें सुनता ऑटोवाला भी मुस्कुराता हुआ अगले सेक्टर में पहुंच कर कोने से तीसरे मकान के सामने रुक गया. सेक्टर साफ़ सुथरा और खुला था. जैसे के अभी यहाँ आबादी ज्यादा नहीं थी तोह इस गली में भी सिर्फ 3-4 घर हे बने थे. लेकिन चलती सड़क और अगले सेक्टर की मार्किट से पास हे था तोह यहाँ डरने जैसा कुछ नहीं था.

"कितने हुए भाई"

"50 रुपये भैय्या जी.", मेनका अपने पर्स से देने लगी लेकिन तबतक अर्जुन पैसे दे कर सामान उतार कर इस एक मंजिला मकान के गेट के सामने रख चूका था. मेनका ने पर्स से चाबी निकल कर टाला खोला और थैला उठाने लगी तोह अर्जुन ने आँखों से हे मन कर दिए.

"आप चलिए मैडम, आप कष्ट मत कीजिये बस ये अंदर वाला दरवाजा भी खोल दीजिये.", उसकी बातें सुनती मेनका ने मुस्कुराते हुए ये घर के अंदर वाला लकड़ी का दरवाजा खोला और अर्जुन को अंदर आने की जगह दी. ड्राइंग हाल के अंदर की तरफ हे रसोईघर की स्लैब पर सामान रखने के बाद अर्जुन वही पड़े सोफे पर बैठ गया. धुल मिटटी से बचने के लिए इनपर अभी भी कपडा ढाका था.

"तुम साथ न होते तोह मैं सोच सोच कर हे पागल हो जाती के कैसे ये सब करुँगी मैं अकेले. और हम जहा से अभी आये वह से तोह स्कूल ज्यादा दूर भी नहीं लगा. थैंक यू सो मच.", स्नेह से अर्जुन के बालो में हाथ फेरती वह कह रही थी.

"वैसे घर ाचा है आपका. और हर चीज ढकी क्यों हुई है अभी तक?"

"बताया था न के कल हे रात आये थे और आज छोटा भाई वापिस चला गया. अब तोह एक हफ्ते बाद हे वह आएगा अपनी बीवी को साथ लेके. उसके आने के बाद शायद ये ज्यादा न खटके. ाचा तुम बैठो मैं कपडे बदल कर आती हु.", मेनका ऐसे व्यवहार कर रही थी जैसे बरसो की पहचान हो और अर्जुन कोई उसका ख़ास करीबी.

"नहीं नहीं. अब आप आराम करो मैं चलता हु घर और अगर कहो तोह मैं खाना पैक करवा के ला देता हु आपको.", अर्जुन खड़ा होने लगा तोह मेनका रसोईघर के साथ बने अपने शयनकक्ष से वापिस बहार आ गई.

"ोये ये क्या बात हुई. मैंने तुम्हे ये सब काम इसलिए नहीं कही की तुम मेरे स्टूडेंट हो. याद रखो हम पहले दोस्त है और बाद में मेरी नौकरी की वजह से teacher-student.", उसका हाथ पकड़ती वह वापिस सोफे पर बिठा कर साड़ी में लगी पिन निकलती कमरे में चली गई. अर्जुन भी फिर शरीर को ढीला छोड़ कर आँखें बंद करता पसर गया.

"अब उठ भी जाओ तोह कुछ खाना खाये या आज व्रत रखना है.?", अर्जुन ने पलके खोली तोह चेहरे के सामने झुकी हुई मेनका और उसके गले से दिखती चिकनी गहरी खाई नजर आई. एक बार फिर से आँखे बंद करने के बाद खोली तोह मेनका सामने बैठी मुस्कुरा रही थी. इस समय एक चुस्त सूती सलवार कमीज में बैठी वह टेबल पर दोनों के लिए खाना प्लेट में दाल रही थी.

"ओह. मैं कितनी देर से सो रहा था.?", पूरा घर साफ़ था और सोफे, टेबल, टीवी किसी पर भी कपडा नहीं ढाका था. परदे ाचे से लगे थे जिस से कमरे में ठंडक थी.

"हम 2 बजे घर आये थे और अभी 2:50 हुए है. मतलब की सिर्फ 50 मिनट से तुम सो रहे हो. ाचा अब उठो और हाथ मुँह धो कर आ जाओ.", अर्जुन अंगड़ाई लेता हुआ खड़ा हुआ था शर्ट का छाती के ठीक सामने वाला बटन चटक गया. मेनका ने भी ये देख लिए था और वह मुस्कुरा रही थी.

"पहलवान हे हो पूरे. पता नहीं स्कूल में कैसे हो अब तक.", अर्जुन वैसे हे बात सुनता इधर वाले कमरे में बने बाथरूम में हे आ गया. Wash-basin पर सब सामान अपनी जगह था. फिर चेहरा धोने के बाद जब टोलिया उठाया तोह उसके नीचे तंगी सफ़ेद मुलायम ब्रा भी सामने आ गई.

"बहुत जल्दी काम कर लिए आपने इतने हे समाया में.", अर्जुन सामने हे बैठ गया. मेनका जैसे कही खोई हुई सी दोनों प्लेट में खाना लगाने के बाद टेबल को हे देख रही थी. फिर जैसे वह जाएगी हो और एक बार सामने बैठे हुए अर्जुन को देखा और चेहरा मुस्कुराते हुए दुरुस्त करने का प्रयास करने लगी.

मेनका सच में खाना ाचा बनती थी. साधारण सी आलू प्याज की टमाटर रास वाली ये सब्ज़ी भी अर्जुन की रसना पर स्वाद का असर दिखा गई. एक चम्मच रायता जैसे हे चखा तोह ये भी बिलकुल हे अलग था. फिर से एक चम्मच सिर्फ स्वाद को पहचान ने के लिए खाया और एक नज़र सामने देखा तोह मेनका खुद न कहती हुई बस अर्जुन को देख रही थी. जल्दी से एक गरम रोटी डब्बे से निकल कर अर्जुन की प्लेट में रख दी.

"घीया का रायता है. पसंद नहीं आया क्या? वह अपनी ठुड्डी पर हथेली रखे कोहनी सोफे की पुष्ट से टिकाये फिर से अर्जुन को देखने लगी थी.

"इतनी साधारण सब्जियों का स्वाद भी ऐसा निराला और स्वादिष्ट हो सकता है बस अभी अभी पता चला है. ाचा खाना बना लेती हो आप लेकिन मैं देख रहा हु के आपने तोह खाना शुरू भी नहीं किआ है.", अर्जुन की बात का वह क्या जवाब देती फिर भी अपनी गर्दन हिलती बस खाने का उपक्रम करने लगी. कुछ समय बाद अर्जुन खड़ा हो गया और हाथ धोने के बाद मेनका के सोफे के बराबर आ खड़ा हुआ. वह एक रोटी जैसे तैसे खाने के बाद वैसे हे बैठी थी.

"घर नहीं दिखाओगी?"

"हाँ हाँ. क्यों नहीं. मैं भी दिखाना चाहती थी.", मेनका उठ कड़ी हुई और दुपट्टा ठीक करती वह अर्जुन को साथ लेती हुई पहले दूसरी तरफ चल दी. ये भी एक बड़ा और ाचे से सहेजा हुआ शयनकक्ष था. लकड़ी का ाचा काम था एक पूरी दिवार पर बानी अलमारी के बहार की तरफ. बड़ा बिस्टेर, आदमकद आइना और जो भी एक कमरे में होना चाहिए वह सभी. इधर भी एक साथ हे जुड़ा बाथरूम. पीछे आँगन में जाते हुए दरवाजा खोल कर वह दिखने लगी इस थोड़े खुल्ले से संगमरमर के फर्श वाले आँगन को जहा एक तरफ 2 टूंटी लगी थी. ये अभी बिलकुल हे खाली था. उधर से हे मेनका वाले कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर आये तोह कमरे की लाइट जलती वह ये कमरा भी दिखने लगी. एक कोने में रखा हुआ कंप्यूटर अभी ढाका हुआ था टेबल के ऊपर. वापिस उधर से ड्राइंग रूम की तरफ आये तोह 'स' के आकार में बानी वाली सुसज्जित रसोई जहा सब बिजली के उपकरण भी लगे थे.

"ऊपर भी एक कमरा है.", मेनका ने कहा लेकिन अर्जुन बस ध्यान से उसको हे देख रहा था.

"मैं कुछ भी नहीं पूछूंगा लेकिन अगर कुछ ऐसा है जिसकी वजह से मैं वह देख नहीं प् रहा तोह खुद को वापिस वैसे हे रूप में बदल लीजिये. ये आँखों की ज्यादा पहचान नहीं है मुझे लेकिन आपकी आखों में आज मैं वह अकेलापन और दर्द देख रहा हु जो आपके लिए बिलकुल सही नहीं है.", मेनका ने भरसक कोशिश की थी खुद को खुश दिखने की, खुद को मजबूत रखने की लेकिन ये नासमझ सा दिखने वाला मासूम लड़का इतनी बड़ी बात कर गया के उसके चेहरे पर जमाने भर का गम घने काले बादलो सा उमड़ आया था.

"मेरी किस्मत इस घर के जैसे हे हैं अर्जुन, इसमें जरुरत का सामान तोह है लेकिन क्या जीने के लिए बस यही जरुरी होता है? खूबसूरत बेजान दीवारों की तरह नहीं हु मैं लेकिन एक विधवा का कसूर क्या होता है? मेरी माँ, बड़े छोटे दोनों भाई ने इस दौरान कोई प्यार के 2 शब्द नहीं कहे लेकिन तुम पराये हो कर भी समझ गए के मैं जैसे बोझ में दबी हु.", आँखों से अश्रुधारा बहने लगी थी उसके और अर्जुन ने किसी अपने हे घर के बड़े की तरह बस बाहों में लेते हुए सर के पिछले हिस्से पर हाथ रखते हुए मेनका को बस रोने दिया, लेकिन सहारा बने हुए.

"मैंने कहा था न के मैं ज्यादा नहीं जानता तोह तुम्हे भी वैसा हे करना चाहिए. समाज को ज्यादा नहीं jaan-na चाहिए नहीं तोह वह खुद की बनाई इतनी बेड़िया पहना देता है के हर तरफ हर इंसान ऐसा दिखने लगता है जो फिर एक नया कायदा लेकर सामने आ खड़ा हो. तुम बेरंग नहीं रह सकती ये समाज को पता होना चाहिए मेनका. सफ़ेद इंद्रधनुष जिन्होंने नहीं देखा वह इसको बेरंग बोलते है तोह ऐसे समाज में खुद को इतना मजबूत रखो के वह नजरे मिलाने की हिम्मत न करे. वह माँ भी बेचारी समाज के बोझ से बंधी है और वह भाई भी. लेकिन ज़िन्दगी तुम्हारी है और जिस मेनका को मैंने पहली बार देखा था, वह मेरी दोस्त अपने आप में एक बहती हुई बयार थी. मुरझाने मत दो नहीं तोह रूह बेरंग हुई तोह फिर जीना हर गुजरते दिन के बाद बस उस अन्धकार सा लगेगा, जिसके बाद उजाला नहीं होता.", अर्जुन की स्कूल ड्रेस वाली कमीज सामने से पूरी भीग चुकी थी मेनका के आंसुओ से लेकिन अर्जुन द्वारा स्नेह से समझने और थपकिया देने से मेनका का रुदन शांत हो चूका था.

"कोई तुमसे हे नासमझ क्यों न मिला मुझे दर्द को समझने वाला? तुम बहोत समझदार हो अर्जुन."

"वह सब बाद में मिस मेनका सिंह, एक तोह राजा राम मोहन राइ इतनी बड़ी लड़ाई लड़ कर गए थे आपके हक़ के लिए और आप हो की किसी बची सी रोटी अपने हे स्टूडेंट के गले लगी कड़ी हो. कल को मुझे जरुरत हुई एक कंधे की तोह कह डौगी बहार निकलो, ठरकी लड़के.", अर्जुन की इस चुहल से वह भीगी आँखें और चेहरा उठती उसको देख मुस्कुराई और बाथरूम में दौड़ गई. गुबार हटा दिया था एक नासमझ ने उसके दिल पर छाया.

"वैसे आप न वह saree-waree मत पहना करो. सूट ज्यादा ाचे लगते है आप पर और अगर नए लेने हो तोह मैं मार्कीटिंग का काम भी करता हु एक बड़ी दूकान के लिए. कभी ले चलूँगा जब आपकी ये बेजान char-diwari को hara-bhara करने का सोच लो तोह. अब मैं चलता हु स्टेडियम भी जाना है.", किसी बुजुर्ग की तरह सर पर हाथ फेरने के बाद माथा चूम कर वह धुप में पैदल हे घर निकल गया. बदलाव की नसीहत मेनका के ऊपर छोड़ कर.

'ठीक हे तोह कहा है. मैं तोह ज़िंदा हु.'

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"सर रिपोर्ट्स चेक कर लीजिये अगर टाइम हो तोह.", शंकर अपने ऑफिस में बैठा गहरी सोच में डूबा था के दरवजी तरफ सी आती आवाज सुनकर सामने देखा. लवलीन एक फाइल अपने सीने से लगाए कड़ी थी.

"के इन एंड टेक ा सीट.", फिर खुद हे किये पोस्टमॉर्टम की उन रिपोर्ट्स पर सरसरी नजर डालते हुए स्टाम्प लगाने के बाद अपने सिग्न कर दिए.

"सर, आपको बुरा न लगे तोह एक बात पूछ सकती हु?", कान पर बाल ठीक करती डॉ लवलीन जैसे नजरे नहीं मिला रही थी.

"सूरे."

"सर. आप इतने आराम से कैसे इतनी ब्रूटल डेड बॉडीज के साथ बैठ कर काम कर लेते है? ी मैं सभी डॉक्टर्स डिग्री के टाइम डेड बॉडीज देखते है लेकिन जो आज कंडीशन थी वह, 2 नर्स बेहोश हे हो गई थी लेकिन आपका फेस इतना क्लैम था और जैसे वह बॉडीज नहीं हो कर बस कोई आर्टिफैक्ट्स थी."

"मिस लवलीन. ये वैसी हे बॉन्डिंग है जैसे किसी रेगुलर ह्यूमन के साथ हमारी होती है. बस डेड बॉडीज कुछ कहने से रही जब उन्हें खोला जाता है और एक्सामिने करते है. मुझे अपने प्रोफेशन से प्यार है और ये part जो आज तुमने देखा, हेल्प करता है समझने में आफ्टर इफेक्ट्स. एक ज़िंदा पेशेंट को बचने में और उसकी सर्जरी करने में. Don't सी थम अस ब्रूटल डेड कप्सेस. ी don't डिफ्रेंटिट बिटवीन स्टैंडर्ड्स ऑफ़ ब्यूटी. फॉर सम पर्सन यू मिगहत बे ब्यूटीफुल, फॉर में ठोस बॉडीज वेरे नॉट ात आल अग्ली. यू अरे जस्ट सकारेद बिकॉज़ यू रेलाते योरसेल्फ विथ सुच सीटुएशन्स." टेबल पर रखे उस फ़ोन पर नंबर डायल करने के बाद डॉ शंकर ने एक ब्लैक कॉफ़ी और एक ऑरेंज जूस का बोलै और फिर दोनों कुछ देर बातें करते रहे.

लवलीन जितना बात करती जा रही थी वह खुद हे इस गंभीर इंसान की तरफ अपना झुकाव बढ़ता महसूस करने लगी थी.

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"आओ बीटा बैठो यहाँ मेरे पास में हे बैठो.", संदीप की पिताजी श धर्मपाल जी ने अर्जुन को अपने साथ हे बिठा लिए. स्टेडियम से आने के बाद वह थोड़ा तैयार हो कर इधर आया था. साथ हे 2 डब्बे मिठाई के भी सुनहरे प्लास्टिक में पैक करवाते हुए.

"ये आप सभी को मुँह मीठा करवाने के लिए मेरी तरफ से.", अर्जुन ने रसोईघर से उसकी तरफ चलती आई संदीप की माता जी को पकड़ते हुए कहा और उन्होंने भी दुलार करते हुए अर्जुन को दांत भी लगाईं ये सब लेके आने के लिए.

"पुनिअ जी, ये हैं तोह संदीप का दोस्त लेकिन मेरे लिए अपने बचो के सामान है. ये कहे तोह ज्यादा बेहतर के एक लायक और होनहार बीटा.", अर्जुन ने भी सामने बैठे हुए अधेड़ दंपत्ति के करीब जा कर charan-sparsh किआ और फिर वापिस आ बैठा.

"धर्मपाल जी, लड़का तोह ये लगता है जैसे जाट को होना चाहिए वैसा. बीटा जी, अपना शुभ नाम और पिताजी क्या करते है?", कोई laag-lapet बिना उन्होंने अर्जुन से पूछ लिए.

"जी अर्जुन शर्मा. पापा सरकारी डॉक्टर है और अभी #### शहर में उनकी ड्यूटी है.", अर्जुन का नाम दोहराते हुए वह कुछ सोचने लगे.

"मैं भी वही रहता हु भाई और एक शर्मा जी तोह उधर भी सिविल हॉस्पिटल में है. भगवान, क्या नाम है उनका जिन्होंने बबलू का प्लास्टर किआ था?"

"शिवजी शर्मा.", कुछ पल वह भी सोचती हुई बोली, शायद खुद के जवाब से संतुष्ट नहीं थी. अर्जुन मुस्कुराते हुए बोलै.

"जी उनका नाम है डॉ शंकर शर्मा, वही मेरे पापा है."

"हाँ हाँ बीटा यही नाम है उनका. वह अब भोलेनाथ का कोई एक नाम तोह है नहीं.", आंटी झेंपती हुई कहने लगी और फिर कुछ घर परिवार की बातें हो रही थी. इधर संदीप की माताजी भी शामिल हो गई इन सबमे और रसोईघर से सर पर पल्लू लिए ज्योति चाय नाश्ते का सामान ट्रे में लिए उधर आ गई. नजरे झुकाये हुए हे सब टेबल पर रखने के बाद ज्योति ने अपने होने वाले saas-sasur के पाँव छूने का उपक्रम किआ तोह लड़के की मान ने 101 रुपये सोने की चैन पर रखते हुए शगुन दिए. वैसे हे लड़के के पिता ने भी 2 कंगन और लिफाफे में रखा शगुन ज्योति के हाथ में देते हुए आशीर्वाद.

"धर्मपाल जी, हमारी खुशकिस्मती के ऐसी सुशिल लड़की मिली हमको और आपके जैसे सज्जन व्यक्ति एक भाई के रूप में.", उनकी बात सुनकर अंकल थोड़े भावुक होते हुए उनके एक हाथ को अपनी दोनों हथेली में लेते हुए बस उनकी हे प्रशंशा करने लगे. संदीप भी मिठाई के डब्बे टेबल पर रखने के बाद वही दीवान पर बैठ गया था.

"देखो बहिन जी, साथ हे मैं ये बात अभी कर देती हु. मेरी छोटी बहिन की बिटिया भी दसवीं में आ गई है और आपका लड़का हमने देख हे लिए है. आप इस बार आये वह तोह नजर दाल लेना.", संदीप उनकी बात सुनते हे लड़कियों सा शर्माने लगा और अर्जुन उसकी हालत पर हंसने.

अपनी होने वाली सास के बराबर बैठी ज्योति बीच बीच में चोरी से अर्जुन को देख लेती थी. दोनों हे परिवारों में ऐसे बातें चलती रही और फिर नाश्ता होने के बाद संदीप की माता जी ने शगुन के कपडे और मिठाई के डब्बे samadhi-samdhan के हाथो में रखे, जो उनके रसम थी. संदीप ने फिर सारा सामान अर्जुन के साथ बहार कड़ी उनकी गाडी में रखवाया तोह फिर एक बार वही सभी आपस में मिले.

पुनिअ जी ने दोनों लड़को को अपनी जेब से 100-100 रुपये दिए तोह अर्जुन ने लेने से इंकार कर दिए.

"अरे बीटा प्यार से दे रहा हु अपना मान कर. ले लो अगर इज़्ज़त्त करते हो तोह.", इतनी बात सुनकर अर्जुन ने चुपचाप वह नोट जेब में दाल लिए. उन्हें विदा करने के बाद कुछ देर के लिए अर्जुन और धर्मपाल जी बातें करते रहे फिर दोनों अंदर चले आये.

"बिटिया वह किताब लेके आना जो मैं आते हुए लाया था.", धर्मपाल जी ने पलंग पर हे अर्जुन को अपने पास बिठा रखा था. संदीप भी उधर बैठा टेलीविज़न के चैनल बदलता हुआ वुफ कुश्ती के चैनल पर रुक गया.

"ये लो पापा.", किताब देने के बाद ज्योति भी अपने पिता के बगल में स्नेहपूर्वक उनके साथ लग कर बैठ गई.

"ये आज मैं तुम्हारे लिए हे लाया हु. पता लगा के तुम्हे बहुत शौक है साहित्य को तोह हमारी हिंदी भाषा में ये मेरे पसंदीदा लेखक है.", किताब का मुखपृष्ठ ध्यान से देखने के बाद वह किताब उन्होंने अर्जुन को पकड़ाई.

"Godaan-Munshi प्रेमचंद. वाह, ये कमाल के लेखक थे अंकल जी. बहुत धन्यवाद आपका इसके लिए क्योंकि यही किताब मुझे नहीं मिल रही थी.", उसकी बात सुनकर बाए हाथ से उसको अपने से लगते वह भी खुश हो गए थे अर्जुन के किताबप्रेम को देख कर.

"और एक ये तुम्हारा दोस्त है भाई. इन साहब को टेलीविज़न पर कुश्ती और कार्टून से फुर्सत नहीं. किताबे तोह नींद गोली से तेज असर करती है इस्पे. जाने क्या सोच कर संधान जी इसके विवाह की बात कर गई.", अब सभी हंस रहे थे और संदीप शर्मिंदा होता रसोईघर में अपनी माँ के पास चला गया.

"ाचा अंकल जी अब आज्ञा चाहता हु. आज तोह स्कूल के बाद घर पे जैसे गया हे नहीं हु और सारा काम बाकी पड़ा है. जल्द हे मिलता हु आपसे फुर्सत के समय और आपने रविवार को पपीते का पौधा ला कर देना है अगर याद हो तोह.", अर्जुन ने पाँव छूटे हुए उन्हें याद दिलाया तोह वह भी हाँ में सर हिलाते मुस्कुरा दिए.

"बिटिया भाई को बहार तक छोड़ कर आओ और लाइट भी जला देना, संध्या हो चुकी है.", अर्जुन दरवाजा खोलता हुआ बहार आ गया तोह ज्योति भी उसके पीछे हे.

"थैंक यू आज इस अवसर पर आने के लिए.", ज्योति ने नजरे झुकाये हे कहा और बस एक बार अर्जुन को देख कर दरवाजे की सांकल लगाती अंदर आ गई.

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अर्जुन अपने कमरे में किताबो में खोया पढ़ रहा था जब प्रीती उसके कमरे में आ कड़ी हुई. कुछ देर वह यही चुपचाप कड़ी रही और फिर उसको पढ़ाई में लीं देख जाने के लिए वापिस हे मुड़ी थी की अर्जुन की आवाज सुनकर वही रुक गई.

"तुम्हे मेरे पास आने के लिए इतना सोचना पड़ता है?", उसकी बात पर वह मुस्कुराती हुई वही बिस्टेर पर आ बैठी.

"तोह तुम्हे पता चल गया था?"

"जब 20 मिनट पहले बहार का गेट खुला तभी पता लग गया था लेकिन ऊपर आने में इतना टाइम?", अर्जुन ने किताबे बंद करके रखने के बाद प्रीती की तरफ करवट लेते हुए कहा. कमर पर हाथ रखे वह उसकी आँखों को प्यार से निहार रहा था.

"वह नीचे दादी ने रोक लिए था रसोईघर में. शायद तुम्हारे लिए कुछ बना रही है वह.", प्रीती ने उसके माथे के सामने लटके हुए एक कुण्डल को ऊँगली से सहलाते हुए जवाब दिए.

"आज हमारे हे घर रुकने वाली हो?"

"नहीं. दादू को बुलाने आई थी फिर सोचा के तुमसे थोड़ी बातें कर लू. रात को आने का कोई फायदा नहीं होने वाला क्योंकि अब मैं बुआ के साथ सोने वाली हु.", प्रीती की आवाज में जैसे विरह की पीड़ा थी.

"तोह क्या हुआ जानेमन, मैं यही तुम्हे बंद कर लूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा.", अर्जुन हँसता हुआ उसको बाहों में भरके बोलै तोह प्रीती भी शर्माती सी उसके सीने से लग गई.

"इतना आसान नहीं है न हमारा घर में एक दूसरे के साथ अकेले समय बिताना, पूरी रात.", प्रीती अर्जुन के धड़कते दिल पर हाथ फिरती कह रही थी. उसको सुकून मिल रहा था ऐसे अर्जुन के सीने से लगे हुए.

"पगली कही की. इतना मत सोचा करो. ाचा हे है न के ये थोड़ी बहुत दूरियां हमको याद दिलाती रहती है के रिश्ता होने के बावजूद हम ऐसे चुप चुप के प्यार करते रहते है.", उसकी थोड़ी को ऊपर उठाते हुए अर्जुन फिर उन neeli-hari आँखों में देखने लगा. और उसकी खुद हे आँखें बंद होती चली गई जब प्रीती ने जैसे मधुरस से भरे अपने होंठ उसके मुँह पर रखते हुए अर्जुन को चूमना शुरू कर दिए.

यही सबसे अलग बात थी प्रीती के प्यार में, छूने में और इज़हार करने में. अर्जुन खुद बेबस सा क़ैद हो जाता था उसके सामने. कोई एक मिनट बाद वह अलग हुई तोह अर्जुन अभी भी आँखें बंद किये हवा में होंठ हिला रहा था.

"बुद्धू कही के.", गाल थपथपति जैसे वह उसको वापिस होश में ले आई.

"एक दिन बदला जरूर लूंगा मैं तुमसे. जब देखो बस अपनी मर्जी से जो दिल करा वह किआ और फिर मुझे ऐसे छोड़ देती हो.", अर्जुन नाराज होने का ढोंग कर रहा था.

"बड़े नखरे नहीं हो गए तुम्हारे? एक तोह सामने से खुद मैंने किश किआ और साहब इसमें भी मुँह फुलाए है."

"अब बताता हु तुम्हे प्रीती की बची.", उसको अपने ऊपर खींचता वह पीठ के बल बीएड पर लेट गया तोह प्रीती भी उसके बाहुपाश में बंधी अर्जुन से लिपट गई. दोनों ने एक बार फिर आँखों में देखा और वही पहल सा समां बांध गया. बस इस बार अर्जुन बेबस वैसे हे रहा लेकिन उसको चूमती हुई प्रीती ने कब उसकी टीशर्ट ऊपर करके सीने पर हाथ कास दिए पता न चला. इस बार ये दृश्य कामुक हो चला था. बड़े इत्मीनान से वह होंठो को chublati,choomti और मुँह में भर रही थी. साथ हे अर्जुन के छोटे से चूचक को जागृत करती नाख़ून से कुरेद रही थी.

"अरे मेरी माँ, कमरा बंद कर लिए कर कभी तोह. मान लिए तुम्हारे पास लर्निंग लाइसेंस है लेकिन कही भी शुरू होने का नहीं.", दरवाजे पर कड़ी ऋतू दीदी इतना सुना कर वह दरवाजा बंद करती बहार चली गई लेकिन इन्हे जैसे कुछ सुनाई दिए हे न हो.

अर्जुन का एक हाथ खुद हे अपने नितम्भ पर रखती प्रीती सीधा उसके शरीर पर चादर सी बिछी थी. दोनों के होंठ जोंक से चिपके जैसे एक दूसरे का खून हे पीने लगे हो. साँसे उखाड़ने के बाद भी वह अर्जुन के चेहरे पर मुँह टिकाये अर्जुन के हाथो की चुहान का अपने शरीर पर मजा लेती पड़ी रही. अर्जुन भी वैसे हे उसके कैसे नितम्भ को हाथो में भरता सेहलता अपनी प्रीती को प्यार करने में लीं था.

"उठने दो अब मुझे या अब सुनाई नहीं दे रहा कुछ.", प्रीती ने अर्जुन के ऊपर से उठने की कोशिश की तोह उसके नशे में क़ैद अर्जुन ने अपने होंठ गर्दन पर लगते हुए एक उन्नत ठोस उभार को पकड़ लिए.

"ोोुछःह.. गंदे कही के. हटो साइड में. कोई आया है ऊपर.", एक तरफ बैठी वह गुस्से से अर्जुन को देख रही थी. जो खुद शर्माता हुआ प्रीती को देख रहा था.

"ऊँगली पकड़ो तोह सीधा कान पकड़ लेते हो."

"तुम्हारे कान बड़े प्यारी है प्रीती. देखना वह से दूध भी आएगा एक दिन.", अर्जुन की बात को समझते हे वह तकिये से मारने लगी उसको.

"गंदे हो बिलकुल गंदे.", और एक बार फिर दरवाजा खटकने के बाद खोलकर ऋतू दीदी आ कड़ी हुई.

"मतलब तुम दोनों का कुछ नहीं हो सकता. पिछली बार जब आई तोह miya-biwi बने हुए थे और अब वापिस वही नर्सरी के बचे."

"आप पहले कब आई थी?", दोनों हे हैरान और झेंपते हुए दीदी को देखने लगे और फिर एक दूसरे को.

"वाह क्या बात है. मतलब मैं इतना कुछ बोल कर चली गई और तुम दोनों बेखबर लगे रहे. और तू नीचे चल प्रीती, घर से फ़ोन आया था के बुलाने गई थी लेकिन खुद वही रह गई.", ऋतू दीदी बात सुनकर प्रीती चुपचाप शर्माती सी निकल चली उनका हाथ पकडे हुए. अर्जुन भी खुद को दुरुस्त करता अगले एक घंटे और पढ़ने के बाद वही बिस्टेर पर सो गया.
 
अपडेट 75

रफ़्तार बेशुमार (ी)


Neem-andhere में पेड़ को पकड़ कर कड़ी काजल अर्जुन के इस मजबूत तगड़े मॉटे लुंड की चुदाई का भरपूर मजा ले रही थी. पिछले 20 मिनट से वह उसको 2 बार झाड़ जुका था और अब कही जा कर उसकी छूट अर्जुन के मॉटे लुंड को मजे से अपने अंदर तक लेती झेलने लगी थी. चोली से बहार निकले दोनों खरबूजे दबाता अर्जुन उसके भरे भरे नितम्भो पर करारे धक्के लगता खुद भी चरम की तरफ बढ़ रहा था.

"आह.. आह.. उम्म्म माँ.. पूरा खागड है तू रे.. आह. करदे पूरी ढीली इस निगोड़ी को ममममम.... आठ.. बस तू हे इसकी आग भुजा सकता है.", इतने सन्नाटे में बस 'thap-thap' का यही संगीत गूँज रहा था. अर्जुन सवा 4 बजे जब उसके घर के सामने से निकला था तोह काजल भी दबे पाँव पीछे आ गई थी. एक बार नहर किनारे शुरू हुआ उनका समागम वह दर्द दे रहा था और अब यहाँ खड़े हो कर चुड़ते समय काजल को सिर्फ मजा आ रहा था. किसी पिस्टन की तरह उन बड़े तरबूज जैसे कूल्हों के अंदर बहार होता वह साढ़े 8 इंच से ज्यादा लम्बा अंग पूरी चिकनाई की वजह से बिना रुकावट चल रहा था.

"बड़ी हिम्मत हैं तुम में. आठ..", अर्जुन उसके लटकते चुचो के निप्पल दबाते हुए ek-saar कमर हिला रहा था. माथे पर पसीना चमक रहा था और शरीर के ऊपर नस्से उभर आई थी, इतनी जोरदार म्हणत से.

"आह.. माँ... हिम्मत न करती तोह ाः.. ये मजा भी न मिलता.. आठ.. मैं गई रे.. आह..", छूट ने पानी के साथ हे पेशाब के कतरे भी बहा दिए थे जो लुंड को भिगोते हुए बड़े अंडकोषों से नीचे टपक रहा था. अर्जुन का सूपड़ा भी अपनी औकात तक फूल गया और झटके से उसको बहार निकलता वह सफ़ेद गधे वीर्य को उन गोर गोल मटोल कूल्हों पर गिराने लगा. 2 पल सांस लेने के बाद काजल वही जमीन पर बैठ गई. छूट के फ़ैल चुके मॉटे होंठो के बीच से रुक रुक कर उसका पेशाब चालक रहा था. अपनी सांसें दुरुस्त करता अर्जुन देख रहा था इस कामाग्नि से भरी कामदेवी को, जो इतनी सुबह अपने हे गाँव के जंगल में अकेली उसके पास यहाँ वीराने में सम्भोग करके हटी थी.

अर्जुन नहर के बनेरे पर जा खड़ा हुआ और अगले हे पल वह उसके अंदर. आज वह सिर्फ उस जगह खड़ा इस ठन्डे पानी में खुद को रगड़ कर साफ़ करता नाहा रहा था. काजल भी कुछ पल बाद लड़खड़ाती सी उधर आ कड़ी हुई. कुछ पल तक वह बड़े मोह से अर्जुन को निहारती रही जिसका चेहरा भी अभी पानी के रंग सा सलेटी नजर आ रहा था. अपनी चौली उतार कर वही पड़े घाघरे पर रखती वह भी उस 5 फ़ीट गहरे पानी में उतर आई.

"ठंडा है न.", अर्जुन के चौड़े सीने पर अपने ठोस उभर गदति वह चिपक कर कड़ी हो गई. कुछ पहले की चुदाई से और अब ठन्डे पानी की वजह से काजल के निप्पल पत्थर से सख्त हो चुके थे.

"तुम गरम हो इसलिए.", दोनों उभारो को मुठी में दबाते हुए अर्जुन ने जैसे उसकी इत्छा बिना कहे पढ़ ली हो. वो सिसकती हुई अपने टाँगे मजबूती से पानी के अंदर टिकाये रखने की कोशिश कर रही थी लेकिन छूट में हो रहे हलके दर्द की वजह से अर्जुन से चिपक कर खड़े होना ज्यादा बेहतर था.

"आह.. बस.. मेरा दिल तोह है अभी करने का लेकिन नहीं.", अर्जुन ने उसके एक कूल्हे को पानी के अंदर से हे दबाया तोह मजे की सीत्कार लेती वह उस से अलग होती वापिस किनारा पकड़ कर बहार आ गई. अर्जुन के तोलिये से हे खुद को थोड़ा बहोत साफ़ करने के बाद कपडे पहन कर काजल जहा से इधर आई थी उधर निकल चली. अर्जुन अभी भी गर्दन तक पानी में डूबा जैसे शरीर को दुरुस्त कर रहा था.

आज भी सविता से कल जैसे हे कुछ पल साथ बिताने के बाद वह घर की और निकल चला था. आज बस सविता ने हिम्मत दिखते हुए खुद हे अर्जुन का मुँह मीठा किआ था और उसके साथ वह पुलिया तक हाथ पकड़ कर आई थी..

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"दादी अब ये क्या बना दिए है?", आँगन में बैठे dada-paute के पास कौशल्या जी chai-doodh लीके आई तोह साथ हे अर्जुन की नै खुराक भी.

"चुपचाप खा ले लड्डू हे है ये.", उन्होंने आँखें दिखते हुए कहा.

"कितना बकबका सा स्वाद है इनका और थोड़ा कड़वा भी.", अर्जुन ने मुँह बनाते हुए कहा.

"कोई बात नहीं. ये सिर्फ एक बार खाना है, हर रोज सुबह. और वह भी एक हे.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन ने जल्दी से वह निगल लिए और गटागट दूध ख़तम करते हुए मुँह साफ़ किआ.

"मुझे पता था तू ऐसे हे करेगा बच्चू. चल कोई बात नहीं आदत हो जाएगी तब आराम से चबा चबा के खाना. केसर, अश्वगंधा, जावित्री की वजह से थोड़ी कड़वाहट आती है इनमे और शिलाजीत की स्वाद जीब को थोड़ा सुन्न कर देता है. लेकिन इसको रोज खाना है नहीं तोह शरीर को पूरी खुराक नहीं मिलेगी.", कौशल्या जी एक कुर्सी पर बैठ अर्जुन की कनपटी पर हलके हाथो से मालिश करने लगी थी. वह भी उनकी गॉड में गर्दन ढलकाये आनंद ले रहा था. उनके स्नेह से भरे हाथ जादू सा असर कर रहे थे. शरीर में naam-matra भी थकावट न रही थी सुबह की गई मेहनत वाली.

"ोये खोते दे पुत्तर. चल खड़ा हो और पानी दे बगीचे में फिर नाहा के निकल अपने रस्ते. गॉड मिली नहीं और सोना शुरू.", हँसते हुए रामेश्वर जी आँखें मूंदे पड़े अर्जुन को डपट कर उठा दिए. वह भी अंगड़ाई लेता टूंटी की तरफ चल दिए पाइप लगा कर सभी phool-paudho को पानी देने.

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"मां, खबर पढ़ी के?", बिजेन्दर सुबह 6 बजे हे अखबार लिए नोहरे में अपने मां के पास आ खड़ा हुआ. जहा वह अपना पसंदीदा काम कर रहे थे लेकिन आज हुक्का पीते हुए वह अपने एक खतरनाक से दिख रहे kaal-bhoore रंग के कुत्ते को भी थपथपा रहे थे. बिना पूछ का ये कुत्ता जरुरत से ज्यादा हे बड़े मुँह का था और बिजेन्दर के अंदर आते हे उसको घूम घूम कर सूंघता जैसे कुछ कह रहा हो.

"अरे दत्त जा सुल्तान. बात कारन दे.", बिजेन्दर ने उसके सर पर हाथ फिराया तोह वह कुत्ता समझदारी दिखता हुआ एक तरफ लगी सब्जियों के पास चल दिए.

"तू हे पढ़ के सुना दे."

"बिजली की तार में हुए शार्ट सर्किट से तीन लोगो की जल कर मौत और साथ हे एक sar-kati लाश बरामद. जल करे मरे हुए व्यक्तियों में से एक की पहचान हो पाई है. रोशन मट्टू नामक ये व्यक्ति कुछ घोटालो में वंचित था.", पूरी खबर पढ़े बिना बिजेन्दर ने जरुरी पंक्तिया हे बुलंद आवाज में पढ़ कर अपने मां को सुनाई.

"बहनचोद रोशन भी कोई काम न कर सका. और पता नई किसने मार के घर में छुपाये बैठा था. एक मिनट- एक मिनट. तू अगले कुछ दिन गाँव में हे रहिओ और भूल के भी अपनी mitra-mandli के साथ नजर न आइओ बिजेन्दर. शंकर ने शतरंज पहल हे बिछा ली है इसका मतबल.", मोहर सिंह के चेहरे का दर्द साफ़ झलक रहा था. बिजेन्दर हैरान सा अपने मां को देख रहा था जो कभी उसके सामने ऐसे कमजोर परेशां नहीं दीखता था.

"मां के बात? मेरे तोह पल्ले कुछ न पड़ा अभी तक और शंकर कहा से आ गया इस बीच? खबर तोह हैं के वे दारु पे रहे थे और तार में आग लगने की वजह से बहार न निकल पाए."

"सर काटना बहोत पसंद है शंकर को. एक तरह से यो उसकी हिदायत है हमारे लिए. और मैं पक्की तरिया कह सकू हु के रोशन का भाई भी ज़िंदा कोन्या नहीं तोह वह महारे पास खबर कर चुक्या होता हादसे की.", थोड़ी पर हाथ रखे मोहर सिंह कुर्सी के ऊपर हे दोनों पाँव पसार के बैठ गया था.

"ठीक कहवे है तू मोहर. और कान खोल के सुन्न ले मेरी बात. तेरे से कुछ न हो सके तोह बिजेन्दर ने इस सबसे दूर रखिये.", ये hatti-katti 50 के पार उम्र की जाटनी जब अंदर आई तोह मोहर सिंह कुर्सी से खड़ा हो गया. बिजेन्दर भी उन्हें दूसरी कुर्सी लेकर देने के बाद जमीन वापिस उकडू बैठ गया.

"जीजी, तन्ने लागे है के मई अपने एकलौते भांजे पर किसी की नजर भी लागण दूंगा. ार रोशन के बारे में kis-tariya बेरा चाल्या?", अपनी बड़ी बहिन के बैठने के बाद वह भी वापिस कुर्सी पर बैठ गया, पाँव जमीन पर टिकते हुए.

"फ़ोन किआ था मैंने उमेद गुज्जर और शंकर के चोर्रे की तौह खातिर रोशन के भाई मोतीलाल ने 4 दिन पाछे. मंटू पैसे लेके परसो गया भी था उसका फ़ोन आये बाद. आज पता चाल्या के उसके साथ 6 और जाना की खोपड़ी में पित्तल भर गया सीड वाले. फोटू भी बरामद कर ली ार पैसे भी. मंटू बेचारा खामखा शईद हो गया. ध्यान ते सुन्न मोहर, दिल तोह मेरा भो रोवे है लेकिन ेब अगर घर में ये 4 बच्या का भला चाहवे है तोह हमने यो सब रोकना पड़ेगा. सोच के देख अगर उमेद, शंकर और नरिंदर इस बार फेर आये तोह वह तीन हे पूरा गाम काट के चले जावेंगे, जिसह वो पहले करके गए थे. मैंने बस मेरे बचे प्यारे है.", चेहरा साफ़ करती वह जमीन पर बैठी बिजेन्दर के सर को सहलाती भावुक हो गई.

"माँ, के कहावे है के सिर्फ तीन लोग थे वे? मां बोले था के 50 जनन आये थे.", बिजेन्दर की बात सुनते हे उसकी माँ ने आग उगलती नजरो से अपने भाई को देखा जिसकी सिट्टीपिट्टी गम हो चुकी थी.

"देख मोहर, आधी और झूठी बात कड़े न करिये. इसका बाप भी दिलेर था और दादा भी. ार सच यो भी है के शंकर अकेला 10 दिलेर संभल सके है. बिजेन्दर बचपन से हे यो सोच के तैयार किया था के यो Shankar-Narender न बन्न सके तोह उमेद जितना जरूर हो. मेरा बीटा है भी उतना दिलेर लेकिन यो एक हे है मेरे धोरे. उठ बीटा और चाल भीतर. चाल सुल्तान.", वह कुत्ता भी ये आवाज सुंतकर गरदारन झुकाये दुबकता सा उन दोनों के पीछे चल दिए.

'जीजी, तू बेशक गुणगान कर ले उस राक्षश का लेकिन मैं कोन्या करू. साला बहार से आदमी बुलाके मरवाऊ लेकिन इतने मेरा कलेजा भी ठंडा कोणी होव जितने मैं मेरा बदला न ले लिउ. मेरी लुगाई छोड़ी थी साले ने ार मैं अपनी प्यारी लुगाई मार सकू हु तोह शंकर भी मरेगा.', मुट्ठी कुर्सी पर कसता वह हुक्के के लात मार कर गाँव की तरफ निकल चला.

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"हाँ आज दोपहर को रुपाली मेरे साथ हमारे घर रुकेगी स्कूल के बाद. तुम्हे कोई ऐतराज़.", आकांक्षा स्कूल की ड्रेस पहने घर के बहार इनकी हे राह देख रही थी. उसकी बात सुनते हे रूपाली ने अर्जुन की तरफ देखा.

"तुम दोनों फ्रेंड हो तोह मैं क्या कहु. बस वापिस घर तुम छोड़ देना.", अर्जुन ने कंधे उचका कर कहा और रुपाली दीदी के चेहरे पर ख़ुशी की झलक देखता वह भी खुश हो गया. फिर रोज की तरह वह उनके पीछे हे संदीप से बात करता चलने लगा. स्कूल के पास पहुंचे हे थे की संदीप ने उसकी गर्दन अपने हाथ से पकड़ते हुए चेहरा एक तरफ घुमा दिए.

"भाई ये वही कल वाली मैडम है न? पहचान हे नहीं आ रही आज तोह.", संदीप के साथ अर्जुन भी उधर हे देखने लगा. रिक्शा से उतरती मेनका आसमानी रंग के सलवार कमीज और चमड़े की लड़कीओ वाली सांडले पहने थे. दुपट्टा एक हाथ से कंधे पर डालती वह पैसे निकाल कर देने लगी तोह ये दोनों सड़क के इस तरफ हे रुके रहे.

"हैं तोह वही भाई.", अर्जुन इतना हे बोलै और संदीप अभी भी खुल्ले मुँह से मेनका को हे घूर रहा था. "अब्बे मुँह बंद कर ले." उसकी बात सुनकर संदीप को होश आया.

"यार कितनी गज़ब की लग रही है ये तोह. और तू तोह जानता है न पहले से इसको.", संदीप तोह पलभर में हे मेनका का दीवाना हो गया था. कब वह स्कूल के अंदर चली गई उसको ख़याल न रहा.

"हम्म.. दोस्त है मेरी. और चल यहाँ से सीधा अंदर. साले मरवाएगा किसी दिन तू. सड़क के बीच में खड़े है हम.", संदीप झेंपता सा हँसता हुआ साथ चल दिए. अंदर वही रोज की तरह वाला माहौल था. संदीप को साइकिल खड़ा करने का बोल कर अर्जुन पीछे बने स्टैंड की तरफ चला गया और वह अपनी क्लास की तरफ.

"मैं तोह समझती थी तुम शरीफ लड़के हो.", ये आवाज सुनते हे नजर सामने की तोह काले रंग की काइनेटिक हौंडा कड़ी करने के बाद चाबी निकलती मिस अन्नू अर्जुन को हे देख रही थी.

"गुड मॉर्निंग मिस. ऐसा आपने क्या देखा जिस से आप ने ये समझ लिए?", अर्जुन ने बैग एक तरफ कंधे पर टांगते हुए कहा.

"सड़क के बीच में खड़े अपनी हे टीचर्स को देखते हो और मुझ से पूछ रहे हे.", अपनी खूबसूरत बोहेन ऊपर करती वह आँखे हिलती पूछने लगी. अर्जुन ये अदा देख मुस्कुराये बिना न रह सका और मिस अन्नू शर्म से नजरे झुकाये जैसे उसके जवाब का इन्तजार कर रही थी.

"एक तोह वह पर हम 2 लोग थे मिस. ऊपर से वह सिर्फ एक हे टीचर थी, टीचर्स नहीं. मतलब वह देख रहा था और मुझसे पूछ रहा था के मैं कैसे जानता हु उन्हें. बाकी अगर आपको लगता है के मैं ऐसा वैसा हु तोह आप गलत तोह नहीं हो सकती.", अर्जुन वह से निकल चला लेकिन अपने स्कूटर पर पल भर बैठी वह याद कर रही थी की अर्जुन की नजरे कितना बोलती है. और शायद वह पसंद करता है... चच्छ.. क्या सोचने लगी मैं भी.' सर पर हाथ मरती वह सामान उठाये अंदर चल दी.

क्लास में आते हे फिर वही सब शुरू. विद्या मम ने रोज की तरह टॉपिक शुरू किआ और समझाना भी. आज बस ये फरक था के अर्जुन के साथ उसके दोस्तों का भी ध्यान पढ़ने पर हे थे. तोह आज उनमे से कोई उनके हत्थे न चढ़ा और पीरियड ख़तम होने से पहले हे अर्जुन विद्या मम से आज्ञा लेकर पानी पीने चला गया. और जाने के एक मिनट बाद पीरियड की घंट बजी तोह मिस अन्नू वालिए रजिस्टर उठाये क्लास में आ गई.

सभी स्टूडेंट्स खड़े हो गए और हरतरफ नजर डालने के बाद जब वह इंसान नहीं दिखा जिसको आँखें तलाश रही थी तोह चुपचाप चाक उठा कर बोर्ड पर लिखना शुरू.

"भाई आज फिर ये उसपे भड़केगी और वह फिर क्लास से बहार.", सुशिल के कान में धरमिंदर ने कहा तोह दिनेश ने भी ये सुना. तीनो के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई जैसी अमूमन अपने दोस्त के फंसने पर आती है.

"कोलगते ज्यादा लगा लिए क्या आज ब्रश करते समय?", जानी पेहचानी आवाज सुनते हे तीनो की बोलती बंद हो गई लेकिन मिस ने हँसते सिर्फ दिनेश को देखा था.

"सॉरी मिस. फिर नहीं होगा.", गंभीर आवाज में उसने खड़े होते हुए माफ़ी मांग ली.

"गुड एंड सीट डाउन."

"मई ी के इन, मम.", अर्जुन को बिना देखे वह बोर्ड पर लिखते हुए हे बोली.

"क्लास में आने का ये कोनसा टाइम है?", मिस अन्नू की बात सुनते हे फिर धरमिंदर ने सुशिल के कान में कहा, "आज अंदर हे नई आएगा ये तोह भाई."

"यू बोथ. गेट आउट फ्रॉम माय क्लास एंड अर्जुन शर्मा, बे ों टाइम इन माय क्लास.", धरमिंदर के गाल पर लगा था चाक जब मिस अन्नू ने वह फेंक कर मारा था और दोनों हे बहार निकल गए. धरमिंदर गाल सहलाता हुआ.

"सॉरी मम. एंड थैंक यू.", क्लास में अपनी सीट पर बैठ कर अर्जुन ने एक निगाह बोर्ड पर डाली और फिर अपनी कॉपी निकल कर पढ़ने लग गया. इस दौरान एक बार भी मिस अन्नू ने उसकी तरफ निगाह नहीं की थी, जैसे वह देखने से बच रही हो. क्लास आराम से चलती रही अगले 25 मिनट और हाजिरी लेने के बाद बोर्ड पर घर से करने काम देने के लिए जब वह उठने लगी तोह नजर उसकी तरफ हे देख रहे अर्जुन से एक क्षण के लिए जा मिली. मिस अन्नू का पहली बार वह एहसास हुआ जो हर जवान लड़की को उस चेहरे को देखने पर होता है जिसको पूरा दिन लड़की देखने की चाह करती है पर सामने आते हे चेहरे पर शर्म और धड़कन बेतरतीब. दिवार से तक लगाए अर्जुन देख उधर रहा था लेकिन दिमाग शायद कही और हे थे.

"आप सभी ने ये एक्सरसाइज घर से करनी है और नेक्स्ट टॉपिक की ब्रीफ स्टडी करनी है.", जैसे तैसे मिस अन्नू ने इतना लिखा और purse-register उठती वह क्लास से गोली की तरह निकल गई.

"आज इन मैडम को क्या हुआ भाई? ये तोह बिना सवाल जवाब किये निकल गई.", अर्जुन के साथ बैठा दिनेश बोलै लेकिन अर्जुन पहले की तरह वैसे हे बैठा रहा. हिलने पर जैसे वह खयालो से बहार आया.

"सही करती है वैसे मिस वालिए तेरे साथ. बहनचोद आँखे खोल के कोण सोता है बे.", उसकी बात पर अर्जुन बस मुआकुरा भर दिए. इंग्लिश की क्लास अपने तरीके से हे गई. एक नै कविता दर्शन सिंह जी ने विस्तार से समझे और समझते बातें करते हुए बिना हाजिरी लिए वह घंट बजते हे निकल गए.

"फिजिकल एजुकेशन वाले अपना हाथ उठाये.", ये मिस चारुल सिंह थी जिनके हाथ में पे की लाल रंग की किताब और लकड़ी का रूलर लिए कड़ी थी. 16 के हाथ खड़े हुए और 7 के नहीं. एक स्टूडेंट आज आया नहीं था.

"हम्म्म.. संस्कृत वाले?"

इस बार बाकी 7 में से 4 हाथ और ये चारो हे लड़कीअ थी. मिस चारुल सिंह ने ध्यान से देखा तोह अभी भी 3 लोग बाकी थे.

"तुम्हे फिजिकल एजुकेशन नहीं लेना चाहिए था?", अर्जुन ने दोनों हे बार हाथ नहीं उठाया था और मिस चारुल सिंह को हैरानी हुई ये देख कर की एक खिलाडी होने के बावजूद अर्जुन ने शारीरिक शिक्षा का चुनाव नहीं किआ था, अपन अतिरिक्त विषय के लिए.

"ये अभी इलेवेंथ क्लास हे है मम और फिजिकल की क्लास तोह मैं कैसे भी कर सकता हु लेकिन मुझे कंप्यूटर के बारे में कुछ भी नहीं पता. 2 हे क्लास है कंप्यूटर लर्निंग की और उसमे उतना नहीं सीख पाउँगा इसलिए मैंने इस सब्जेक्ट को सेलेक्ट किआ जिस से 2 एक्स्ट्रा वीकली क्लासेज मिल सके.", अर्जुन ने अपना मंतव्य स्पष्ट किआ तोह मिस चारुल ने फीकी मुस्कान से उसकी बात मान ली.

"Okay तोह पे वाले सभी यही बैठेंगे, संस्कृत वाले स्टूडेंट्स की क्लास गैलरी के लास्ट वाले क्लासरूम में होगी. कम्प्यूटर्स वाले सभी लैब में जा सकते है.", एक कतार से सभी बाहरी सब्जेक्ट वाले निकल गए.

"तुमने संस्कृत क्या सोच कर ली है?", आकांक्षा अर्जुन के साथ हे बहार आई थी और वह उत्सुकता से पूछ रहा था.

"9तह में मेरे 99 थे संस्कृत में और टेंथ के एग्जाम में 100 नंबर का सही एटेम्पट किआ है तोह परसेंटेज स्कोर करना इजी है मेरे लिए."

"ओह. ाची बात है. चलो क्लास के बाद मिलते है.", आकांक्षा को हलके से हाथ हिलता वह कोने में बानी लैब के गेट पर पहुंच गया.

"मई ी के इन मिस?", मेनका इस समय शायद कुछ लिखने में व्यस्त थी अपनी कुर्सी पर बैठी. अर्जुन के साथ 2 और स्टूडेंट्स को देख कर अंदर आने का इशारा करती वह भी कुर्सी से कड़ी हो गई.

"आप तीन हे लोग है तोह सबसे पहले मैं आपको एक हे कंप्यूटर पर कुछ बेसिक्स बताती हु. फिर आप लोग अकेले बैठ कर प्रैक्टिस कर सकते है या आपको जो कंप्यूटर पर पसंद हो. पेंट, गेम या इंटरनेट, कर सकते है.", सबसे पहले कंप्यूटर पर 2 लोगो के बैठने की जगह थी जहा अंदर की तरफ एक लड़की को बिठाने के बाद खुद मेनका सिंह उसके साथ बैठ कर उस 14" की टेलीविज़न जैसी स्क्रीन पर कीबोर्ड की सहायता से कुछ लिखने लगी.

अर्जुन बड़े ध्यान से पीछे खड़ा देख रहा था के मिस मेनका ने एक बार भी निचे लिखे अक्षर देखे बिना हे सब स्क्रीन पर टाइप कर दिए था. जितने भी डब्बे बने थे उनके बारे में वह जरुरी बातें बता रही थी. 'माय डाक्यूमेंट्स, माय कंप्यूटर, नेटवर्कल, रीसायकल बिन, फोल्डर, स्टार्ट और उसके भीतर मौजूद बहुत कुछ. अर्जुन को अब पता चल रहा था के ये अपने आप में हे एक बहुत गहरा विषय है. और ज्यादा ध्यान से देखने के चक्कर में वह पीछे से मेनका से थोड़ा सत् कर खड़ा हो चूका था जिसका उसको खुद पता नहीं चला लेकिन मेनका ने महसूस करते हुए नजर तरेरी और हलकी मुस्कान के साथ फिरसे वह समझने लगी.

"अब आप सभी जो चाहे कर सकते है और कुछ भी समझना हो तोह मैं यही आपके पास हे क्लास में हु.", मेनका अपनी जगह से उठ गई और उस कंप्यूटर पर वही लड़की काम करने लगी. अर्जुन और दूसरी लड़की अलग अलग कंप्यूटर पर बैठ गए. लेकिन अर्जुन अभी भी थोड़ा अनिश्चित था इस मशीन पर काम करने के लिए.

"उधर खिसको.", मेनका ने उसकी उलझन समझते हुए अर्जुन को अंदर की तरफ करते हुए खुद कीबोर्ड और माउस संभाला. अर्जुन भी ध्यान से देखने लगा जो भी वह समझने लगी थी. राइट क्लिक, लेफ्ट क्लिक, सिलेक्शन और जो भी चीज खोलनी चलनी हो. गाने, गेम, नयी फाइल और फिर मेनका कीबोर्ड की रचना भी बताने लगी.

एक वक़्त आया जब वह अर्जुन को करीब करती उंगलियों को कीबोर्ड पर रखने का सही तरीका बता रही थी. बहार को निकले हुए उनके ठोस उभार के नीचे अर्जुन का हाथ लगते हे मेनका जहा की ताः रुक गई. धड़कन धौंकनी की तरह हो चली थी लेकिन हाथ हट चूका था. गहरी सांस लेती वह ये हादसा भूलती फिर से हर जरुरी छोटी छोटी बातें बताने लगी और अर्जुन जो जरुरी लगता वह लिख लेता. घंट लगने तक दोनों हे अपनी जगह चिपके रहे.

"थैंक यू सो मच मिस. अगली बार मैं अकेले हे प्रैक्टिस करूँगा और जब नहीं समझ में आएगा तभी आपकी मदद लूंगा.", आज्ञाकारी छात्र की तरह अर्जुन क्लास से निकलने से पहले मेनका का शुक्रिया अदा करके जाने लगा.

"एक मिनट रुकना अर्जुन.", उनकी बात सुनकर वह वापिस अंदर आ गया. दोनों लड़कियां जा चुकी थी.

"जी मिस, कहिये."

"यहाँ बैठ यार और मेरी बात सुन्न.", मेनका सीधा अब दोस्त वाले अवतार में आ गई थी और अर्जुन भी मुस्कुराता सामने बैठ गया.

"हांजी बोलिये मेनका जी.", थोड़ी शरारत से उसने पुछा.

"फिर तुम्हारी मदद चाहिए थोड़ी सी. अगर तुम्हारे पास समय हो तभी. मैं नहीं चाहती की मेरी वजह से घर पर तुम्हे दांत लगे या जरुरी समय खराब हो."

"फिर मैं चला अगर इतना सोचने के बाद बात करोगी तोह.", अर्जुन उठने लगा तोह मेनका ने हाथ पर हाथ रखते उसको वापिस बैठने को कहा.

"ाचा बाबा सुनो. कुछ कपडे लेने है मेरी होने वाली भाभी के लिए, छोटे भाई की शादी है रविवार को और उसके बाद वह यही मेरे साथ रहने वाली है. शादी **** गांव में हे होगी तोह मैं कल शाम को हे चली जाउंगी. अब समस्या फिर वही है के इस शहर में अकेले मैं कहा से khareed-dari करू और मार्किट का ज्यादा मुझे पता नहीं. वैसे तोह मैं अन्नू के साथ भी जा सकती हु लेकिन तुम चलो तोह बेहतर रहेगा.", आखिरी लफ्ज़ कहते हुए मेनका ने नजरे झुका ली.

"हाँ तोह मैंने तोह कल हे कहा था के आपको अपने लिए भी लेने चाहिए और मेरी पहचान भी है थोड़ी. लेकिन चलेंगे शाम को और देख लेना आपकी भाभी तारीफ न करे तोह कहना.", वह डेस्क पर कोहनी टिकाये मेनका को बता रहा था और एक बार फिर बराबर में मिस अन्नू आ बैठी थी जिनकी तरफ अर्जुन का ध्यान नहीं गया.

"ाचा जी. बड़ा पता है के लड़कियों को कैसे कपडे पसंद होते है!!", अर्जुन ने अपने साथ वाली कुर्सी पर मिस अन्नू को देखा तोह उठने लगा लेकिन उन्होंने हे बैठने का इशारा करते हुए बोहेन ऊपर करते हुए सवाल किआ.

"5 बहने रहती है मेरे घर में मिस और एक बुआ भी है जिनको मैंने हेल्प की है जरुरी समय पर पहने जाने वाले कपडे लेने में.", अर्जुन बात जारी करते हुए बोलै.

"तोह तुम्हारे हिसाब से कासुअल और ट्रेडिशनल के लिए शहर में कोनसे स्टोर या शॉप ाचे है? ध्यान रहे मैं महीने में 2 बार जरूर मार्किट जाती हु.", मेनका भी अन्नू की बात ध्यान से सुन्न रही थी.

"जी **** & संस और Haar-shringaar पारम्परिक वस्त्र जैसे साड़ी, लेहंगा, सलवार कमीज के लिए सही है. और अगर इन दोनों में से भी जो बेहतर है वह **** & संस है. स्टिचिंग भी अवेलेबल है वह और डिज़ाइन भी ुप्तो डेट. अगर कासुअल जीन्स या टॉप लेने है तोह बड़ी मार्किट में बेशक कुछ ाचे शॉप है पार्क के पास हे लेकिन ****** स्टोर, मॉडल टाउन में जो है वह सब मिल जाता है. फिर भी मैं गलत हो सकता हु क्योंकि अब जितना देखा है वही पता है." अर्जुन ने दोनों की तरफ एक बार देखते हुए बात ख़तम की.

"इसको तोह सच में हे सब पता है मेनका. लेकिन जहा की बात तुम कर रहे हो **** & संस की, एक तोह उनके थोड़े ज्यादा रेट दूसरा स्टिचिंग में हफ्ते का टाइम लेना. हाँ क्वालिटी सबसे ाची है ये जरूर मानती हु.

"मिस ओनर मेरा फ्रेंड है और रही बात सिलाई में समय लगने की तोह वह 24 घंटे से पहले मेरी जिम्मेदारी अगर अर्जेंट हो तोह."

"एक बार जाने में हर्ज क्या है मेनका. अगर इसकी बात ठीक है तोह जरा पहचान कर हे आना, फिर दोनों चलते है किसी दिन.", अन्नू की बात पर मेनका ने मुस्कुराते हुए सर हिलाया. और अर्जुन पीरियड का ध्यान आते हे उठ खड़ा हुआ.

"मैं हो गया केमिस्ट्री की क्लास से बहार. सवा 6 बजे आऊंगा घर तैयार रहना.", जल्दबाजी में अर्जुन कॉपी उठता लैब से बहार भाग गया.

..

"सच कहु जिस दिन हमारा इंटरव्यू था उस दिन तुम ऐसी दिख रही थी. कल जैसे तुम्हे यहाँ देखा था तोह एक पल के लिए सोचने लगी थी की ये वही मेनका है. सॉरी यार तूने बताया भी था लेकिन फिर आज वापिस वही पहली बार वाली देख कर ाचा लगा.", मेनका और अन्नू दोनों का हे ये पीरियड खाली था और वो लैब में हे बातें कर रही थी.

"हार मान कर ज़िन्दगी को वैसे हे जीने की कोशिश कर रही थी जैसे सबने समझाया था, अन्नू. फिर किसी ने समझाया की अगर ध्यान से देखो तोह सफ़ेद भी एक रंग है. और रंग हे नहीं खुद में एक इंद्रधनुष. बस समाज के ठेकेदारों ने इसको उन लोगो के नाम कर दिया जो ज़िंदा न हो, जो मजबूत न हो और जिनका सहारा टूट चूका हो. ज़िन्दगी अपनी है और उसके दायरे में समाज तब तक नहीं आता जबतक तुम मजबूत हो, स्थापित हो. रात भर उसकी सभी बातें सोचने के बाद आज वह अनचाहा समाज ट्रंक में बंद कर दिए. बस इसलिए वापिस वही बन्न गई जैसे आज दिख रही हु.", गंभीर आवाज में बात शुरू की थी लेकिन ख़तम होते होते मेनका के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी.

"यार कल हे तू आई और कल हे ये कोण कलयुग का महात्मा मिल गया जिसने इतना बड़ा बदलाव ला दिए?", सोचने का अभिनय करती अन्नू मेनका से नाम sunn-na चाहती थी उस शख्स का जिसने ये बदलाव ला दिया था. इतनी गहरी और बड़ी बातें करते हुए.

"छोड़ नाम में क्या रखा है.", वह भी हंसती हुई जैसे जाहिर नहीं करना चाहती थी.

"अर्जुन. है न?", आँख मारते हुए अन्नू ने कहा तोह मेनका एक पल के लिए चुप हटने के बाद बोली.

"हाँ. अर्जुन हे है वह. पता है इस लड़के में हर बदलते वक़्त के साथ नयी खूबी नजर आती है.", उसके बाद मेनका ने #### गांव वाला सारा वृतांत और जैसे कल उसने मदद की थी कह सुनाया. अन्नू बड़े ध्यान से हर बात सुन्न रही थी और हैरान भी थी.

"सिर्फ एक लिफ्ट देने वाले इस लड़के ने खतरा मोल ले लिए वह भी अनजान लोगो से और कल भी वह सारा काम निस्वार्थ खुद हे करके गया.? और कही तुझे वह पसंद तोह नहीं आने लगा है.?", अन्नू ाचे से टटोल रही थी मेनका के दिल को. मेनका थी भी पानी सी साफ़, जिस से भी वह दिल लगाती थी उसके साथ.

"पसंद तोह है तभी तोह मैं हर काम के लिए उस से कहती हु. लेकिन ये पसंद वैसी है जैसी 2 दोस्तों के बीच होती है. और मैं उसकी ज़िन्दगी में आ कर उसका भविष्य खराब नहीं करना चाहती अगर तेरा अंदाजा वो वाला हो तोह. ऐसे हाल में उसकी भी समाज वाली बात गलत होगी अन्नू. विधवा, 10 साल बड़ी और जितना फसाद जुड़ सकता है साथ में सबकुछ. तेरी जगह होती तोह पक्का था के ये लड़का हाथ से कभी जाने न देती.", मेनका फीकी मुस्कान देती पानी की बोतल से घूँट भरने के बाद थोड़ा शांत हो गई.

"मेरी जगह होती? अब ये कहा ले जा रही है बात तू?", अन्नू थोड़ा चौंकते हुए बोली.

"देख तेरी उम्र 24 है अभी और वह 18 का है लेकिन दीखता 24-25 का हे है. तू कुंवारी है और अगले 2-3 साल तोह शादी करने से रही. सारा परिवार padha-likha है, शहर में रह रहा है तोह इतना भेदभाव, jaat-paat, panchayat-gaanv बिरादरी के लफड़े नहीं है ज़िन्दगी में. बाकी तेरी बॉडी वैसे भी आइडियल है.", मेनका ने भी शरारत से अन्नू के हाथ पर हाथ रखते हुए आखिरी लाइन पर जोर डाला.

"हट पागल कही की. ये नहीं सोच रही की वह स्टूडेंट है मेरा और थिस इस टोटली अगेंस्ट थे सिस्टम.", अन्नू की आवाज थोड़ी गंभीर हो गई थी एकदम.

"जहा सिस्टम की बात आ जाये तोह मुझे पता है के एक कंप्यूटर से 2 कैसे जोड़े जा सकते है अलग अलग काम के लिए. कण्ट्रोल बस उस मैं सर्वर के पास रहता है. तू अगर थोड़ा भी सोचती है इस बारे में तोह स्कूल के अंदर और उसके बहार वाली ज़िन्दगी को मिलने मत देना. कही कुछ नहीं होने वाला.", मेनका की बात अब ाचे से समझ आ रही थी अन्नू को. उसका दिल भी कह रहा था के ये मुमकिन है. बस सबसे जरुरी बात रहती है.

"और अगर मैंने हिम्मतत करते हुए कह भी दिए तोह? उसके इंकार के बाद क्या मैं यहाँ उसको अपने सामने देख पाऊँगी?", अन्नू के सवाल ने जैसे मेनका की दुखती राग को दबा दिए था. वह भी एक ठंडी आह लेती सोचने लगी थी.

"बोल न मेनका क्या होगा?"

"तू सच में सीरियस है अन्नू? अगर है भी तोह सच कहु तेरे इस सवाल का जवाब मेरे पास भी नहीं है. कोशिश कर सकती है बस. जैसे जहा वह aata-jata हो उस जगह पर मिलते हुए. अगर लगे की वह थोड़ा भी पसंद करता है तोह बात शुरू कर सकती है. कुछ बातें ध्यान में रखना जैसे उसका करियर और प्रिऑरिटीज़, अगर 1% भी चांस हो जाता है तोह." मेनका ने बात ख़तम की हे थी की स्कूल ख़तम होने की घंटी बज उठी.

"7 बजे **** & संस पर हे रहना. वही मिलती हु जहा वह आता जाता है.", अन्नू लैब से निकलती हुई मेनका को आँख मार गई.

"मेला लगा है तू भी देख ले सखी. किसी का क्या जाता है जो आँखे 2 ज्यादा हो जाये.", मेनका मुस्कुराती हुई अपना सामान समेटने लगी.

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दोपहर का खाना खाने के बाद अर्जुन थोड़ा आराम करने की नियत से ऊपर अपने कमरे में आया तोह ललिता जी और प्रियंका दीदी को ऊपर के भाग की सफाई करते पाया. तै जी मैले कपडे, चादर इकट्ठा कर रही थी और दीदी कमरे में बानी अलमारी और खिड़कियां कपडे से साफ़ करने में मगन थी. तारा वाले कमरे के फर्श पर जैसे मैले कपड़ो का अम्बार लग गया था. अर्जुन ये देख कर वही खड़ा हो गया.

"इतने मैले कपडे?", तै जी जब उसके कमरे से भी एक धेरी कपड़ो की बहार लेकर आई तोह अर्जुन ने इतना हे कहा. उसकी आवाज सुनकर दीदी भी वह चली आई.

"ये मुस्टंडा आ गया न तोह अब मैं चलती हु कपडे लेके. निचे मशीन चला राखी है ये कपडे धोने के लिए. और तू इस से तीनो कमरों के पंखे और दिवार के जले साफ़ करवा. उसके बाद झाड़ू पूछा करने के बाद आराम कर लेना.", ललिता जी ये कह रही थी और अर्जुन ने सभी कपडे एक हे चादर में बांध दिए.

"ताई जी कपडे मैं धुलवा देती हु. आप कैसे करेंगी?", प्रियंका दीदी उन्हें रोक रही थी काम करने से.

"ऋतू है मेरे साथ मदद के लिए. लेकिन यहाँ का काम तू इस से करवा. तीन लोग रहते है ऊपर और काम इतना बढ़ा रखा है जैसे पूरा घर इधर हे रहता हो.", तै जी अर्जुन को सुनती हुई बोली तोह वह हँसता हुआ कपड़ो की धेरी लिए उनके साथ निचे आ गया.

"चल अब ऊपर जा कर जितना कहा है उतना कर. वो बेचारी अकेले लगी हुई है कितनी देर से.", ललिता जी की बात सुन्न कर अर्जुन उनका गाल मस्ती में खींच कर ऊपर भाग आया.

"नासपीटे तू आ मेरे हाथ फिर देखती हु.", उनके भी चेहरे पर हंसी आ गई थी. ऋतू भी वही आँगन में कड़ी पानी भर्ती अर्जुन की इस हरकत को देख मुस्कुराने लगी.

"तै जी, देख लो अब ये आपके साथ भी शरारत करने लगा.", जानबूझ के वह गंभीर सा चेहरे बनती ललिता जी से बोली.

"तू तोह रहने हे दे बस. देख लिए मैंने कितना खुश हो रही थी तू. और मेरा लाडला है तोह मेरे से मस्ती नहीं करेगा तोह बहार करेगा?", ललिता जी भी मुँहफट और हंसोड़ महिला थी. ऋतू हँसत हुई उनके साथ लग गई गठरी खोल कर कपडे अलग करने.

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"दीदी, जरा सफाई वाला कपडा यहाँ बाथरूम में देना.", अर्जुन की आवाज सुनकर प्रियंका दीदी बिना किसी सोच के संजीव के कमरे से निकल कर बाथरूम के अंदर कपडा अर्जुन को देने आ गई. वही उनसे चूक हो गई, प्यारी चूक.

"अरे अरे. ये क्या करने लगा?", उनका हाथ पकड़ कर अर्जुन ने खुद के सीने से लगा लिए. वह शर्माती हुई इतना हे कह सकीय.

"आपको तोह बहार वाला दरवाजा बंद देखते हे समझ जाना चाहिए था. और वैसे भी मैंने वादा किआ था के जब ननिहाल से वापिस आऊंगा तोह आपकी इत्छा पूरी करूँगा.", उनके मॉटे कूल्हे पंजे से दबाते हुए और कस के खुद से लगा लिए. प्रियंका अब संभल चुकी थी और उसको भी अर्जुन का ऐसा करना सुखद लग रहा था.

"फिर भी अगर कोई आ गया तोह? और ये दिन का समय है अर्जुन, मेरी हालत खराब हो जाएगी.", उन्हें जैसे वह लम्हा याद आया जब अर्जुन का भयंकर लुंड महसूस किआ था.

"अभी तोह कोई नहीं आने वाला यहाँ और हम करेंगे भी वही तक जहा तक ठीक रहे.", अर्जुन खुद इस समय पाजामे में था और अपनी बात कहते हे उसने दीदी को दिवार से लगते सताते हुए उनके होंठ मुँह में भर लिए. गोल मटकी से उनके बड़े कूल्हे वह पहले से मसलते हुए नरम कर रहा था. प्रियंका ने भी जल्द हे सुर मिला लिए, इतने दिनों की आग अंदर जो भरी थी.

अर्जुन के सख्त सीने से दबती उनकी चूचिया कपडे के अंदर हे उत्तेजित हो रही थी. बाथरूम के अंदर का तापमान यकायक बढ़ गया था.

"एक मिनट रुक जरा.", अर्जुन को धकेल कर हटती प्रियंका दीदी ने अपना वह पुराण ढीला सा कुरता एक झटके में उतार कर किल्ली पर टांग दिए. चेहरे पर शर्म से ज्यादा उत्तेजना और लाली थी. "गर्मी लगने लगी है.", उन्होंने आगे इतना कहा और अर्जुन ने फिर से उनको सीने से लगते हुए वह बड़े कबूतर उनके सफ़ेद पिंजरे से आजाद कर दिए. अर्जुन के शरीर का सारा रक्त उस एक जगह पहुंच गया ये नजारा देख कर, जो अपनी पूरी औकात पर आता सर उठा चूका था.

"वाओ दीदी. आपके ब्रैस्ट तोह कितने बड़े और प्यारे है.", किसी माध्यम से पीते जितने बड़े और मांस से भरे प्रियंका के दूध सही मायने में माधुरी की टक्कर के थे. भारीपन की वजह से बहोत हल्का सा ढलाव लेकिन पूरे कैसे हुए. मटर के डेन से गोल निप्पल जैसे अर्जुन को हे देख रहे थे. प्रियंका ने भी देरी न करते हुए अर्जुन का सर उन मॉटे चुचो पर लगते हुए अपनी तड़प जाहिर कर दी.

"आह.. इन्हे ब्रैस्ट मत बोल.. बोब्बे कह.. आठ.. ाचे से पी इन्हे. तुझे जब भी देखती हु ये बड़ा परेशां करने लगते है.. उम्म्म ऐसे हे.", दोनों हाथो से उन भारी चुचो को थोड़ा ऊपर उठाते अर्जुन दबा दबा के मुँह में भर रहा था. प्रियंका की हलकी हलकी सिसकियाँ बता रही थी की उसको कितना मजा आ रहा था अर्जुन के ऐसा करने से.

कुछ हे देर में वह गोर चुके हलके लाल दिखने लगे थे और उनपर उभरे हलके भूरे निप्पल लार में भीगे पहले से ज्यादा उभर को बहार निकल आये. प्रियंका को तोह पता भी नहीं चला कब उसकी इलास्टिक वाली सलवार पैरों में जा गिरी. अर्जुन नीचे झुका हुआ हे एक चुके को पकड़ कर पीटा हुआ उनके नंगे कूल्हों को आगे की तरफ दबाता अपने लुंड से प्रियंका दीदी का यौवन घिस रहा था. पतली सी कच्ची के ऊपर से हे उभरी छूट बता रही थी की इसकी मालकिन का शरीर खासा भरा हुआ है.

"आप पलट जाओ जरा.", उनका मुँह दिवार की तरफ करने के बाद अर्जुन ने वह सफ़ेद कच्ची पलभर में हे पूरी नीचे सरका दी. यहाँ उनके मॉटे चुत्तड़ो की दरार इतनी गहरी थी की कच्ची उतरने से पहले भी वह उसके होना का कोई ata-pata न था. कूल्हों की दरार से अपना हाथ नीचे ले जाते हुए अर्जुन ने वह मॉटे मॉटे होंठ सहलाते हुए उनकी पनियाई छूट का जायजा लिया तोह मजे से दोहरी होती प्रियंका ने जाँघे बंद करते हुए उसका हाथ वही दबा लिए..

"आप तोह तैयार हो.", अर्जुन ने जब ऊँगली अंदर करनी शुरू की तोह 2 पोरे तक वह बिना किसी व्यवधान के घुस गई. नरम लचीला मांस ाचे से चुतरस से गीला हो चूका था. वही अर्जुन थोड़ा हैरान भी था के दीदी की छूट में ये ऊँगली इतने आराम से कैसे चली गई. लेकिन इस दौरान उसने उनकी छूट में अपनी ऊँगली तेजी से अंदर बहार करनी शुरू कर दी.

"मैं तोह हफ्ते से तैयार हु... आठ.. जो करना है कर भाई.. उम् ाचा लग रहा है.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन उस हाथ से उनकी फूली हु चिकनी में ऊँगली करने के साथ हे दूसरे से अपना पजामा नीचे सरकता उनके कूल्हों से चिपक गया. ऊँगली छूट से बहार थी और उस दरार में अब किसी लड़की की कलाई सा मोटा लुंड फंसा था.

अपनी छूट के बहार उस लम्बे तगड़े लुंड से निकलती गर्मी महसूस करते हे प्रियंका ने अपना पिछवाड़ा और उनहार्टे हुए खुद को पहले से ज्यादा झुका लिए. लुंड का सूपड़ा इस तरह ठीक छूट की गीली फांको के बीच आ चूका था.

"अंदर मत करना.", प्रियंका दीदी ने अर्जुन को एक बार फिर चेताया तोह वह शांति से उनके एक लटकते चुके को पीछे से पकड़ता हुआ दूसरे हाथ से अपना लुंड छूट पर थोड़े दबाव के साथ घिसने लगा. जब उसका लुंड सही तरह से छूट के होंठो को चढ़ाता हुआ आगे पीछे होने लगा तोह अर्जुन ने दोनों खरबूजे पीछे से पकड़ कर कमर चलनी शुरू कर दी. सख्त हाथो में वह नरम गुब्बारे आज पूरी मालिश का मजा ले रहे थे.

"आठ.. ऐसे हे.. अह्ह्ह्ह.. उम्म्म. अर्जुन तू.. आह बहोत ाचा है रे.. आह.. दिल कर रहा है.. सशह्ह्ह्ह..", हर रगड़ के साथ छूट पहले से ज्यादा पानी छोड़ रही थी और अचानक सुपडे का अगला भाग 1 इंच तक छूट को फैलता हुआ अंदर खिसक गया. दोनों के शरीर हरकत बंद करते हुए वैसे हे रुक गए. छूट का मुँह बंद हो चूका था और प्रियंका दीदी का दिल जैसे धड़कना. अर्जुन ने जाने क्या सोचते हुए उनके कंधे को थाम कर थोड़ा दबाव बढ़ाया तोह उस टाइट सुरंग में पूरा सूपड़ा उतर गया.

छूट के होंठ जैसे अब इजाजत नहीं दे रहे थे आगे इतनी मोटाई को जाने के लिए. लेकिन ये सबसे मोटा हिस्सा जो लगभग ढाई इंच लम्बा था वह अंदर आ चूका था. बिना कुछ कहे अर्जुन सिर्फ आधे सुपडे को अंदर बहार करते हुए प्रियंका दीदी को चुदाई सुख देने लगा.

"तूने कर हे दिए न अंदर... ummm..aahhhh... रुका नहीं गया... सीई.. आठ..", वह बस एक जगह रुकी मजे ले रही थी छूट के सबसे संवेदनशील बाहरी भाग पर लगते सुपडे की रगड़ का.

"हहहहह.. आह.. आपने पहले भी किआ है कुछ.. आठ.", सुपडे से थोड़ा ज्यादा लुंड अंदर बहार होने लगा तोह अर्जुन ने सवाल किआ. वह शरीर को चिपका नहीं सकता था इस वक़्त क्योंकि लुंड 3/4 जितना तोह बहार था अभी.

"4-5 दिन से आअह्ह्ह.. तरय कर रही थी.. आठ.. बस और नहीं.. आह.. पहले कैंडल से किआ था आह.. फिर उम्म्म. तारा के साथ आह.. केले पर तेल लगा कर.. उम्.. वह उसने हे किआ था.. ", उनकी बातें सुनते हुए अर्जुन 4 इंच लुंड अंदर पेल चूका था लेकिन इस से आगे न लुंड जा रहा था और न दीदी उसको करने दे रही थी.

"सही किआ आपने.. हँ.. हिम्मतत तोह दिखाई और ये देखो आपने लगभग आधा अंदर ले लिए.", गर्दन को चूमता अर्जुन अभी भी उनके चुके दबा रहा था. प्रियंका दीदी का शरीर भारी था और छूट भी कुछ ज्यादा हे फूली, जिसको वह पिछले हफ्ते से लगातार ढीली कर रही थी अर्जुन का झेलने के लिए. तभी वह 4 इंच तक उसका लुंड अंदर ले प् रही थी.

"मैं गई रे.. मेरी माँ... aahhh..",Aankhon के आगे जैसे नीला रंग चा गया था प्रियंका के. वजह थी छूट के अंदर लगातार अंदर बहार हो रहे लुंड से पैदा हुआ चरम. पहले से हे बरसात से गीली उनकी छूट के अंदर youn-ras की बाढ़ आ गई. अर्जुन यहाँ नहीं रुका और दिवार को थाम कर कड़ी प्रियंका दीदी के चुत्तड़ो को पकड़ कर थोड़ा तेजी से लुंड चलने लगा.

"माहहहह... रुक जा रे.. आह्हः.. ये अंदर लग रहा है..", इस दौरान लुंड जैसे उनके सखलन में रुकावट दाल रहा था और अर्जुन उनकी बाते सुने बिना हे 3 इंच तक बहार खींच कर वापिस उतना हे अंदर डालता रहा. लुंड के उतने हिस्से पर चुतरस से सफ़ेद लकीर बन चुकी थी. जैसे छूट ने खुद बता दिए हो के आज यही हद्द है.

मॉटे चुचो पर नस उभर आई थी लगातार दबाये जाने से लेकिन अर्जुन अगले 5 मिनट बिना तरस खाये उनकी छूट का वह 4 इंच गहरा रास्ता भविष्य के लिए भरपूर ढीला करता रहा. उनका वह कुछ देर पहले वाला दर्द एक बार फिर मस्ती भरी आहों में बदल चूका था. छूट ने जैसे हे इस बार लुंड को कसना चाहा अर्जुन ने 3-4 बार तेजी से अंदर बहार करने के बाद लुंड बहार खींच लिए. अगले हे पल वह खुद अपनी छूट सहलाती सिसक रही थी और उनकी गांड की दरार में अर्जुन का गधा सफ़ेद रास पिचकारी सा भरा जा रहा था..

"मोये फुद्दी का बुरा हाल कर दिए तूने.", इतनी देर से एक हे स्थिति में कड़ी प्रियंका दीदी पाँव चौडाते हुए वही फर्श पर बैठ गई, निढाल होती. साथ हे अपनी मॉटे होंठो वाली सूज चुकी छूट पर नजर डालते हे दर्द में भी हैरान हो गई. अंदर का लाल मांस बहार दिख रहा था और बंद रहने वाला छेड़ फडकता हुआ सिक्के जितना गोल और खुला था.

नीचे बैठ कर अर्जुन ने उनके होंठो को चूमते हुए एक बार अपने हाथ से वह double-roti जैसी छूट सेहला दी.

"कुछ भी कहो दीदी, आपि छूट झेल गई मेरे हथियार को."

"हट मोये. देखा न क्या हाल हुआ है वह भी इतनी प्रैक्टिस के बाद भी. अभी तोह आधा हे गया था और लगता भी नहीं के बिना फाड़े ये पूरा अंदर जायेगा. आह.. साफ़ कर मुझे और सारा काम तू हे करेगा अब.", शरीर थोड़ा ठंडा हुआ तोह अब चलने में हल्का सा फरक आ चूका था. दोनों खुद को साफ़ करते बहार आये तोह प्रियंका दीदी बार बार छूट के सामने हाथ रख रही थी.

"खारिश हो रही है तोह फिर से कर लेते है.", अर्जुन उनका दूध दबा कर आँख मारते हुए बोलै.

"कमीने यहाँ तोह तू भूल के भी न हाथ लगा. सुजा के रख दिए दोनों मम्मी मेरे. ऊपर निचे दोनों जगह कपडा जलन कर रहा है. तू हे कर ये काम मैं चली.", प्रियंका के दोनों गुब्बारे सचमुच दुःख भी रहे थे और सूज भी गए थे 20 मिनट की रगड़ाई से. वह पाँव पटकती दरवाजा खोल कर जाने लगी.

"दीदी, अभी तोह ये प्रैक्टिस थी. रात को अगर छत्त पर सोने आओ तोह पूरा काम करेंगे.", अर्जुन ने शरारत से कहा.

"जितना कर लिए न वही बहोत है. अब तोह सोचूंगी भी नहीं.", नखरा दिखती वह धीमी चाल से बहार चली गई. अर्जुन अकेला हे बाकी काम करने में व्यस्त हो गया. प्रियंका की हालत का जिम्मेदार वही था तोह काम करना उसकी सजा.

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छोल साहब के घर आज कोई मेहमान आये हुए थी जिस वजह से अर्जुन अकेला स्टेडियम जा रहा था. रोज 20-30 की रफ़्तार से जाने वाला वह इस अकेलेपन को ख़तम करने के लिए 60-70 पर बुलेट दौड़ता हुआ laal-batti पर आ रुका.

"हाँ हीरो क्या हाल है तेरे? बड़ी तेज चला रहा था, आज रेस करे.", बराबर में आ कर रुकी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल पर 2 लड़के बैठे थे. शायद कॉलेज के थे और पीछे बैठा लड़का अर्जुन को मुस्कुराते हुए आपस में रेस लगाने की चुनौती दे रहा था.

"भाई जितना अभी आपने देखा वह मेरी हद्द थी. मतलब साफ़ है के मुकाबले का फायदा हे नहीं जब जीत आपकी है.", बत्ती हरी होते हे अर्जुन ने कुछ सोचते हुए रेस दी और फिर से गियर बदलते हुए रफ़्तार बढ़ा दी. उन लड़को को जबतक समझ आता वह नजरो से ओझल हो चूका था.

"बहनचोद ये तोह अपना हे काट गया रे चंदू.", वह दोनों लड़के उसको गायब देख आराम से आगे बढ़ गए.

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"Hello मर पहलवान, क्या हाल है?", स्टैंड से अर्जुन बहार निकला तोह डिम्पी पटरी पर कड़ी थी. हाथ में टेनिस का बल्ला हिलती हुई.

"Hello डिम्पी. कैसी हो?", अर्जुन ने साधारण सा हे जवाब दिए.

"मैं ठीक हु लेकिन लगता है प्रीती के न होने से तुम्हारे जरूर 12 बजे हुए है.", खिलखिलाती हुई अर्जुन के मजे लेने लगी.

"हाँ. आज प्रीती नहीं आ सकीय और उसने कहा था तुम्हे बताने के लिए. बाकी मैं तोह हमेशा ऐसा हे रहता हु.", अर्जुन कदम बढ़ाना चाहता था लेकिन लग नहीं रहा था के डिम्पी ऐसे मूड में थी.

"फिर आज तुम हे मेरे साथ प्रैक्टिस कर लो. दोनों एक हे तोह हो.", डिम्पी की ऐसी बात सुनते हे अर्जुन बिना देखे बॉक्सिंग एरिया की तरफ निकल चला और वह भी खिलखिलाती हुई अपनी स्कूटरी निकलने चली गई. 'पागल लड़की. ये प्रीती भी न' खुद से इतना कहता वह जल्दी से कपडे बदल कर गयम में आ गया.

"आज मेरे बिना हे शुरू हो गया छोटे भाई?", बलबीर भी अंदर आ चूका था. अर्जुन ने हाथ मिलाने के बाद शरीर गरमाना शुरू कर दिए.

"देख लिए था मैंने आपको आते हुए. और भाई आपने कहा था विकास भाई भी आज आने वाले थे.", कपडे से बेंच को साफ़ करता अर्जुन उस पर बैठ कर कमर की कसरत करने लगा.

"सुबह देखा था भाई. वह उज़्बेकिस्तान में सिल्वर जीतने पर उसको रेलवे में नौकरी नौकरी का प्रस्ताव मिला है साथ हे एक और खबर थी लेकिन विकास खुद तुझे खबर देगा, कल. आज उसका कार्यक्रम थोड़ा व्यस्त है. वैसे तोह अपने द्रोणाचार्य भी आज छुट्टी पर गए हुए है.", अर्जुन बातें सुनता कसरत करने लगा और फिर दोनों हे अपने अभ्यास की जगह आ गए.

कोई 10 मिनट हुए थे दोनों को कसरत करते हुए की अर्जुन को अपने ठीक पीछे किसी के होने का आभास हुआ. एक तरफ को होते हुए उसने पीछे वाले का अपनी तरफ बढ़ता हाथ पकड़ लिए.

"वाह मानस तेरे तोह पीछे भी आँख लगी है.", विकास हंस भी रहा था और अर्जुन की फुर्ती पर हैरान. और अगला झटका तब लगा जब अर्जुन ने उसको अपनी तरफ खींच कर बाजुओं में उठा लिए.

"विकास भाई बहोत बहोत बधाई हो.", अर्जुन के ऐसा करते हे जो 15-16 और लड़के अभ्यास कर रहे थे वह भी रुक गए.

"अरे तालियां बजाओ भाई सिल्वर लेके आया है.", अर्जुन ने थोड़ी जोशीली आवाज में कहा तोह बाकी सभी भी उन्हें घेर कर तालिया बजाते विकास को बधाई देने लगे. बलबीर अपने अलग हे नारे लगा रहा था.

"बस कर भाई बस कर. सरदारजी ने देख लिए तोह सारे बहार कर देंगे.", हँसता हुआ विकास अर्जुन को नीचे उतरने के लिए कहने लगा तोह अर्जुन ने भी बात मानते हुए उसको जमीन पर खड़ा कर दिए. एक बार फिर गले लगते हुए उसने विकास को थोड़ा ध्यान से देखा.

"भैया, कुछ तोह अलग हुआ है कुश्ती के मैडल के अलावा. अब बोल भी दो के ये चेहरे पे इतनी साफ़ सफाई और चमक की वजह.", अर्जुन की बात सुनते हे वह हाथ पकड़ कर उसको बहार हे ले चला. बलबीर को साथ चलने का इशारा करते हुए. अर्जुन भी समझ गया था के बहार जा रहे है. बेंच पर रखे पाजामे से बटुआ निक्कर में रखते हुए बुलेट की चाबी उसने बलबीर की तरफ उछाल दी.

"चीता हो गया तू इतने हे दिन. समझ गया के बात यहाँ नहीं करनी तोह बहार हे चल रहे."

"जैसे आपने हाथ खींचा तोह मैं समझ गया था के हम बहार जा रहे हैं.", अर्जुन और विकास स्टैंड के पास आये तोह बलबीर बुलेट स्टार्ट किये खड़ा था. तीनो हे लोग 2 मिनट बाद वही जूस की दूकान के बहार फत्ते के बेंच पर बैठे थे.

"तेरे भाई की सरकारी नौकरी लग गई. सरकारी तोह खैर पहले भी लग रही थी पुलिस में लेकिन रेलवे का नजारा ज्यादा है तोह आज मैं लेटर सिग्न कर आया.", विकास आज बहोत ज्यादा हे खुश था और उसको ऐसे देख Arjun-Balbir के साथ हे वह खड़े बाकी लोग भी. सभी हॉस्टल या स्टेडियम के हे थे.

"बड़ी वजह बताओ न भैया क्यों छुपा रहे हो.", अर्जुन ने गले पर एक बाजु रखते हुए पुछा. जैसे उसको पता था के कोई और भी बड़ी खुसी की बात है.

"रिश्ता हो गया भाई मेरा और अगले मंगलवार सगाई है.", विकास पुनिअ, जो अब अंतराष्ट्रीय पहलवान बन चूका था किसी लड़की सा शर्माने लगा.

"ये हुई न बात. भाइये इन सबसे पैसे मत लेना, ये मेरी तरफ से.", अर्जुन ने दूकान वाले भाई को हाथ उठाते हुए कहा और बलबीर भी गले मिल कर बधाई देने लगा.

"वैसे वह खुशीसमत लड़की है कौन भैया?", अर्जुन जैसे आज सबकुछ जान लेना चाहता था.

"ठण्ड रख भाई. और ये गिलास पकड़. लड़की हैं अपने कोच साहब की बेटी.", विकास ने ख़ुशी से कहा और अब झटका अर्जुन को लगा. साथ हे बलबीर को भी.

"चारुल सिंह?", अर्जुन के मुँह से नाम सुनते हे विकास हंसने लगा.

"वाह मेरे शेर. बहोत पता है तुझे उनके बारे में. लेकिन शादी उसकी जुड़वाँ बहिन पारुल से हो रही है मेरी. कोच साहब ने शर्त राखी थी की मैडल लाऊंगा तभी शादी करवाएंगे मेरी. 3 साल पुराण प्यार है भाई मेरा वह.", अर्जुन विकास को चहकते देख खुद भी बहोत खुश था. अगले आधे घंटे तीनो उधर बैठे हे जहां भर की बातें करते रहे और जैसे हे समय पर नजर गई अर्जुन झट्ट उठ खड़ा हुआ.

"भैया अब उठो जल्दी. नहीं तोह मैं गया काम से आज.", उसकी बात सुनते हे बाकी दोनों भी उसके साथ हे स्टेडियम वापिस आ गए.

"छोटे मंगलवार को याद से खली रहिओ. सगाई तोह है हे लेकिन मेरी माँ से भी मिलवाना है तुझे.", अर्जुन के सर पर हाथ फेरते हुए विकास ने कहा तोह अर्जुन ने गर्दन हां में हिला दी. जिस रफ़्तार से वह आज स्टेडियम आया था ठीक वैसे हे वह घर के लिए निकल चला.

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शाम के हलके धुन्दल्के में #### गाँव के बहार वाले खेत के एक हिस्से में सिसकने की आहे गूँज रही थी. आवाज वही बने मोटर वाले हिस्से से आ रही थी जहा गांव की एक गरीब घर की लड़की की सलवार निचे उतारे मोहर सिंह पागलो की तरह धक्के लगा रहा था. वह लड़की गारे की दिवार पर दोनों हाथ टिकाये बस मोहर सिंह का लुंड झेल रही थी.

"आरी कालो, बहनचोद तू भी फैल गई अपनी माँ की तरह. ाः.. बहोत मन करू था मैं तेरी माँ ने के इसका ब्याह न कर लेकिन रांड से मेरी खुसी न देखि गई. आठ.. छूट का भोसड़ा बनवा हे दिए तेरा ब्याह करके.. मैं आया ऋ.. आठ.", लुंड का पानी उस 20-21 साल की लड़की की छूट में हे खली करते हुए मोहर सिंह धोती से हे अपना वह 4 इन्चा का पतला सा लुंड साफ़ करने के बाद अंदर करके सांस दुरुस्त करने लगा. उस सांवले रंग की गदराई हुई लड़की ने भी सलवार ऊपर करते हुए एक बार मोहर सिंह को हलके गुस्से से देखा और गाँठ लगते हे हाथ सामने कर दिए.

"ले मेरी जान पूरे है.", 500 रुपये हथेली पर रखते हुए वह उसकी हथेली सहलाने लगा.

"जिमिदार साहब, असली लुंड लुंगी तोह चौड़ी तोह होवेगी. आप कोणी टीको 5 मिनट भी ार लैंड खड़ा कारन में लागे है आध घंटा. मेरे खसम का घाना बड़ा कोणी लेकिन यो थोड़ा छोटा जरूर है. चालू हु और जे कल भी जी करे तोह दोपहर में घर हे आ जैव.", इतना बोलती वह एक अदा से चुन्नी घूमती मोहर सिंह को जलील करने के पैसे लेके चलती बानी.

'दोनो माँ बेटी के भोसड़े आग लागू, बहनचोद रंडी साली.', बड़बड़ाता हुआ वह वही पानी की टंकी के बराबर में पड़ी देसी शराब की बोतल उठा कर मुँह से लगा घूँट घूँट पीने लगा. मोहर सिंह अनजान था उन एक जोड़ी आँखों से जो पिछले आधे घंटे से उसको हे देख रही थी.
 
माफ़ करना दोस्तों चारकोल तीखा कर रहा था सुबह ड्राइंग के लिए तोह उलटे हाथ की पहली ऊँगली थोड़ी ज़ख़्मी कर बैठा था. इस लिए देरी हुई अपडेट पोस्ट करने में.

और किसी भाई को पता हो के ये नए तरीके से फोटो कैसे डाला जाता है स्टोरी के बीच तोह जरूर बताने का कष्ट करे.

इसका दूसरा भाग भी मैं आधा लिख चूका हु और अभी कुछ देर और लिखूंगा..
 
अपडेट 76

रफ़्तार बेशुमार (ी)


"कैसे हो सुधीर भाई.", अर्जुन मेनका को समय पर हे अपने इस दोस्त की दूकान पर ले आया था. वह आते हे काउंटर पर खड़े दुकान के छोटे मालिक, अपने दोस्त से हाथ मिलते हुए मिला और मेनका को सोफे पर बैठने को कहा. मेनका चुपचाप सी बैठ गई. उसका दिल अभी तक dhak-dhak कर रहा था. पहले तोह सारे रस्ते हे उसका सीना अर्जुन के पीठ से टकरा रहा था लेकिन गेट खोलते समय जैसे अर्जुन की कोहनी पूरी तरह से उसके बाए उभार से रगड़ी थी, एक पल के लिए तोह शरीर सुन्न हो गया था.

'अर्जुन की तोह कोई गलती नहीं, बहार निकल रही उस लड़की की वजह से मैं खुद हे टकराई थी. लेकिन क्या उसको पता नहीं चला होगा?', वह पेशोपेश में चुप बैठी थी की अर्जुन उसके बराबर आता सोफे में धंस कर बैठ गया.

"लो भाई ये रहे जैसे आपने बताये है वैसे हे सूट. इतना तोह अब मुझे भी अंदाजा होने लगा है तुम्हारी सांगत में.", एक लड़के ने 6-7 हलके रंग के ाचे डिज़ाइन वाले अलग अलग सूट उनके सामने रख दिए. शाम का समय था और हमेशा की तरह इस बड़ी दूकान में thik-thak भीड़ थी. मेनका ने शहर देखे थे लेकिन वह भी ऐसी कपड़ो की बड़ी दूकान और इतनी विविधता उपलब्ध नहीं थी.

"मैंने अपनी छोटी भाभी के लिए लेने थे.", मेनका ने एक निगाह उन सूट पर डालते हुए अर्जुन को देखा.

"हाँ तोह जैसे आप तोह शादी में जा नहीं रही हो. ऊपर से school-ghar के लिए भी कुछ ले सकती हो. आपकी होने वाली भाभी के लिए ड्रेस मैं पसंद कर चूका हु बस अब इनमे से जो पसंद है वह देखो. और लड़की घर पर साथ रहेगी तोह उसके लिए भी सूट चाहिए होंगे न?", अर्जुन ने तस्वीर साफ़ करते हुए कहा तोह मेनका दिमाग में चल रहे सब ख्याल हटती अब मुस्कुराते हुए सभी कपड़ो पर हाथ रखती देखने लगी.

"टेंशन मत लीजिये भाभी जी, ये वाला पुरे खाड़ी है, अभी तक सिर्फ हमारे पास हे सैंपल आया है इसका.", सफ़ेद रंग के इस सूट पर कंधे पर दोनों तरफ डोरियन थी जो पीठ पर किसी जूते के तस्मे की तरह बंद होती थी. सामने लकड़ी के झूलते हुए बटन लगे थे और सफ़ेद कपडे से हे डिज़ाइन बना था.

"एक ये वाला कर दीजिये.", मेनका ने वह पहली बार में हे पसंद कर लिए था.

"इनमे से 5 लेने है अपने लिए, कोई एक मन कर सकती है आप बस.", अर्जुन ने थोड़े हक़ से ये बात कही तोह मेनका ने अपनी घनी पलके ऊपर करते हुए उसको देखा. फिर बिना कुछ बोले उनमे से एक जाली वाला jamuni-safed रंग वाला सूट एक तरफ कर दिए.

"ले भाई सुधीर ये वापिस भिजवा दे और अब वह शादी वाली ड्रेस भी दिखा दे जरा.", सुधीर छोटू को साथ लेकर वह ड्रेस लेने गया तोह अर्जुन ने मेनका के कान में कहा.

"इनके साथ के भी चाहिए हो तोह उस काउंटर से पसनद कर लेना.", अर्जुन की बात समझने के लिए मेनका ने उसकी आँखों का पीछा किआ तोह वह महिलाओ के अंतःवस्त्र वाले काउंटर दिखती दिए.

"धत्त.. पागल कही के." वह शर्माती सी उसकी जांघ पर हाथ मरते बोली

"लो जी. एक तोह मदद कर रहा हु ऊपर से गुस्सा. वह आपका जरुरी सामान मिल जायेगा और दिखने वाली भी लड़की हे है तोह फिर शर्माना क्या. नहीं चाहिए तोह कोई बात नहीं.", अर्जुन कमर को सीधा करके बैठ गया तोह मेनका ने भी ाचे से काउंटर की तरफ देखा.

"हाँ तोह कुछ पसंद भी किआ या इसके साथ बस खली दिमाग ख़राब कर रही हो?", ये मिस अन्नू वालिए थी, जो एक चुस्त काली जीन्स और ज़ेबरा प्रिंट टॉप पहने बाल सही करती साथ लेंगे सिंगल सोफे पर मेनका के पास आ बैठी.

"तुम यहाँ?", नाटक करती मेनका ने थोड़ा चौंकते हुए कहा लेकिन अर्जुन ने खड़े हो कर अभिवादन किआ तोह अन्नू ने छोटी सी मुस्कान के साथ उसको बैठने को कहा.

"आर्मी में नहीं हो जो कही भी सलूट की पोजीशन में आ जाते हो.", अर्जुन उनकी बात समझता हुआ वापिस आने का बोल कर एक तरफ चला गया.

"हाँ तोह फिर क्या पसंद किआ या इसने करवाया?", अन्नू ने शोखी से ये बात कही.

"सामने पड़े है जो इसने अपनी पसंद से निकलवाए थे लेकिन 6 में से 5 रखवा लिए. वैसे पसंद वह भी था मुझे लेकिन 5 बोलै तोह फिर 5.", मेनका ने टेबल पर एक तरफ रखे सूट अन्नू की और करते हुए कहा. अन्नू ध्यान से हरेक सूट को देखने लगी.

"कितना समय लगाया ये सब पसंद करने में?"

"एक मिनट.", मेनका ने आँखे सूट पर रखे हे कहा.

"वो जो नहीं लिए वह भी निकलवा ले. मैंने बिना देखे हे ले लिए समझ. ये सभी डिज़ाइन इस महीने की ग्रहशोभा में थे और अपने शहर में इनका मिलना हे बड़ी बात है. समर वियर.", अन्नू की सोच से आगे था अर्जुन का कपड़ो में चुनाव.

"क्या बात है? बिना देखे हे.", मेनका ने छेड़ते हुए कहा. सुधीर भी इतने 2 परिधान लिए आ गया था. सभी सूट एक तरफ रखवाते हुए उसने वह दोनों शादी के जोड़े उनके सामने रखे तोह मेनका ने बीच में हे टोक दिए.

"सुनिए, क्या आप वह आखिरी वाला सूट भी पैक करवा सकते हे अलग से? इन्हे वही लेना है.", सुधीर ने एक बार सोफे पर बैठी इस हसीना की तरफ देखा जिसकी घनी झुल्फे अंदर चल रही हवा में हिल रही थी.

"भाभी जी वह ऐसा है न के 6 पीेछे आये थे जिनमे से एक यहाँ रखना जरुरी है. इसलिए अर्जुन को मैंने 5 हे लेने को कहा था. लेकिन अगले हफ्ते तक मैं मंगवा दूंगा.", सुधीर ने सफाई देते कहा और अन्नू ने भी कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी.

"कोई बात नहीं ये इनमे से हे ले लेगी जो पसंद होगा.", मेनका ने अन्नू की ब्याह पर हाथ रखते हुए कहा. फिर दोनों ने पूरे 10 मिनट बस उन 2 परिधान में से एक को पसंद करने में लगा दिए. आखिर में एक फाइनल करने के बाद दोनों ने उसको पैक करने का बोलै और उस और चल दी जहा महिलाओ के अंदरूनी वस्त्र थे. अन्नू ने विपरीत दिशा में देखा तोह अर्जुन वह लगे काउंटर पर कोई सफ़ेद कपडा देख रहा था. इधर भी दोनों ने जल्दी से सब सामान लेकर अलग पैकेट में डलवा लिए. तब तक अर्जुन भी एक पैकेट लिए उनके पास आ हे आ गया था.

"सूट स्टिच तोह नहीं करवाने आपने?", अर्जुन ने इस बार दोनों की तरफ देखते हुए कहा.

"जी ये सूट पहले से हे कटाई और पूरे डिज़ाइन के साथ है तोह आपको ये कल 4 बजे तक मिल जायेंगे.", सुधीर काउंटर के अंदर आ चूका था.

"ठीक है करवा दीजिये. मैं कल समय से ले जाउंगी.", सुधीर ने सिलाई वाली मैडमजी को बुलाते हुए उन्हें मेनका को साथ ले जाने को कहा.

"आप भी जाइये, माप नहीं देना क्या?", अर्जुन ने अन्नू से कहा तोह वह बोहेन ऊपर उठती उसको देखने लगी.

"मेरे हाथ में कोई सूट दिखाई दे रहा है.?"

"लीजिये अब दिखेगा. आप जल्दी कीजिये फिर घर भी चलना है.", अर्जुन ने वह आखिरी वाला सूट उनके हाथ पर रखते हुए कहा. अन्नू की आँखें एक बार के लिए बड़ी हुई फिर पलके झुकती वह भी मेनका वाली दिशा में चली गई.

"भाई हैं कोण ये मिर्ची? बहोत पातर पातर कर रही थी जब तू kurta-pyajama ले रहा था.", सुधीर अर्जुन को पानी का गिलास उठा कर देते हुए बोलै.

"गलती से मेरी फिजिक्स की टीचर है भाई. और सच में कुछ ज्यादा हे बोलती है. हाँ याद आया मैं भी अपना माप दे देता हु मास्टरजी को.", अर्जुन सफ़ेद खाड़ी का कपडा उठाये मास्टरजी के पास पहुंच गया जो वही मशीन फीता लिए बैठे मास्टरनी से 4 फ़ीट आगे.

"बिल कितना हुआ?", सब काम से फारिग होने के बाद मेनका ने काउंटर पर आते हे सुधीर से पुछा. और सुधीर ने एक पर्ची उनके सामने रख दी.

"5 सूट, एक जोड़ा और 800 अलग. टोटल 16800.", मेनका ने थोड़ी हैरानी से पढ़ा तोह अन्नू ने भी पर्ची देखि.

"भैया यहाँ 5 सूट लिखे है लेकिन 6 लिए है.", अन्नू ने गलती बताते हुए कहा

"एडजस्ट कर दिए है जी. उन 5 के हे साथ और इसमें सिलाई भी जोड़ दी है.", उसकी बात सुनकर अन्नू को थोड़ी हैरत हुई लेकिन फिर एक तरफ बैठे अर्जुन को मुस्कुराते देख उसने कुछ नहीं कहा. मेनका ने अपने पर्स से पैसे निकल कर पेमेंट की और सारा सामान कल हे ले जाने का कह कर शुक्रिया अदा करती अन्नू के साथ हे बहार निकल आई. अर्जुन ने 2 मिनट का बोलै और सुधीर से बात करने के लिए उसके पास आ खड़ा हुआ.

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"चलने के बारे में क्या विचार है?", अर्जुन ने बहार कड़ी दोनों को बातों में लगे देख कहा.

"बस ये आखिरी काम तुम करते आना, प्लीज. बड़े भैया ने भी थोड़ी देर तक पहुंच जाना है तोह मैं अन्नू के साथ निकलती हु तुम ये सामान लेकर मुझे पकड़ा देना.", मेनका ने आस भरी नजरो से अर्जुन को देखा. बहार अँधेरा हो चला था ये देखते हुए अर्जुन ने वह सामान की पर्ची ले ली.

"ध्यान से जाना, मैं आता हु लेकर ये.", पर्ची पर हवन सामग्री जैसा सामान लिखा था और उसको जेब में दाल कर वह भी कुछ दूर उनके साथ चला फिर मार्किट में उस तरफ मदद गया जिधर सामान की दूकान थी.

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"तेरे इरादे नेक नहीं लग रहे मुझे. इतनी स्पीड से जा रही है के कही कुछ हो गया तोह फिर पछताना न पड़े.", मेनका जैसे अन्नू को समझा रही थी.

"देख मेनका, मेरी बात ध्यान से सुन्न. साड़ी ज़िन्दगी मैंने पढाई में निकाल दी. यहाँ तक की घरवाले भी जब मुझे घूमने या कॉलेज टूर पर जाने को बोलते थे तब भी मैंने अपनी किताबो की दुनिया से बहार निकलना जरुरी नहीं समझा. आज मैं उस मदद पर कड़ी हु की अगर मैंने खुद को नहीं ढूंढा तोह फिर मेरी पूरी ज़िन्दगी वैसे हे निकल जाने वाली है जैसे पहले थी. फिलहाल मुझे इसमें एक उम्मीद दिखाई दे रही है और मैं जानती हु के सब जल्बाजी में हो रहा है लेकिन मेरे सब अरमान मेरी दिखने वाली रफ़्तार से कही तेजी से बहार निकल रहे है. मैं भी जीना चाहती हु, बहार निकलना चाहती हु और चाहती हु की जो फिल्मे अकेले में देखि है उन्हें अब किसी के साथ देखु.", अन्नू खुद को शांत रखते हुए हे अपना पक्ष रख रही थी.

"तेरा जो दिल करे तू कर मैं जैसे अब साथ हु वैसे हे हमेशा रहूंगी. तू कामयाब हो या न हो बस खुद को बदलना मैट.", थोड़ी चिंता से मेनका ने अन्नू की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा.

दोनों घर पहुंच गई थी मेनका के. और यहाँ आते हे अन्नू ने काइनेटिक घर की बरामदे में खड़ा करके बालो वाली पिन से पिछले पहिये की हवा निकालनी शुरू कर दी. पूरे 5 मिनट तक वाल दबाने के बाद वह पहिया खाली हुआ और अन्नू के गुलाबी खूबसूरत चेहरे पर पसीना चालक आया था. इधर वह अंदर के दरवाजे से बैठक में आई हे थी की घंटी बज गई.

"अन्नू देखना जरा, मैं कपडे बदल कर आई.", अंदर से मेनका ने आवाज दी और उस से पहले हे अन्नू ने गेट खोल दिए जहाँ अर्जुन खड़ा था, एक थैला हाथ में लिए.

"आओ अंदर. मेनका भी 5 मिनट में आ रही है.", अर्जुन किसी अलग हे धुन्न में बिना अन्नू पर कोई ध्यान दिए सीधा अंदर चला आया और थैला रसोई में रख कर फ्रिज से पानी निकल कर वही खड़ा पीने लगा. अन्नू उसके ऐसे व्यवहार को देख कर थोड़ा अचरज में पड़ गई. फिर उसके करीब से निकलता वह धम्म से सोफे पर बैठ गया. इधर मेनका भी कपडे बदल कर घर के सलवार कमीज में आ गई थी. गिलास में पानी दाल कर पहले उसने अर्जुन से पुछा तोह अन्नू का धैर्य जवाब दे गया.

"स्कूटर मेरा पंक्चर हुआ, खींच कर मैं यहाँ तक लाइ, ये घर में घुसते हे अकेले पानी पी कर सोफे पर आराम कर रहा है और तुम भी पानी उस से हे पूछ रही हो." गोर पसीने में गीले गाल थोड़े laal-peele हो गए थे इस पंजाबन के.

"ाचा ाचा. ले तू भी बैठ और पानी पे. ज्यादा थकान हुई हो तोह ग्लूकोस बना देती हु.", मेनका ने थोड़ी ममता दिखते हुआ कहा. अर्जुन वैसे हे बैठा अकेले मुस्कुरा रहा था.

"चलो मेनका जी मैं चलता हु अब समय हो गया जाने का. अपना ख़याल रखियेगा और कल भी कोई काम हो तोह बता देना." अर्जुन उठकर चलने हे लगा तोह मेनका ने रोका.

"आज के लिए धन्यवाद और बस ये आखिरी काम भी कर दो, जा रहे हो तोह अन्नू को भी इसके घर उतार देना. रात में अकेली कैसे जाएगी बेचारी देखो 8 बजने वाले है.", इधर वह बात कर रहे थे अन्नू बड़े सोफे पर बैठ कर टेलीविज़न चलने लगी रिमोट से.

"देख कर तोह कही से नहीं लग रहा के मिस अन्नू जाने के मूड में है.", मेनका ने अर्जुन की बात सुनकर अन्नू को देखा जो सोफे पर पद्मासन लगाए मत्व देख रही थी.

"पहली बार आई हु तोह कॉफ़ी पी कर हे जाउंगी. इतना काम किआ है आज. फिर चलते हैं.", अर्जुन भी गहरी सांस लेता हुआ बैठ गया, लाचार सा चेहरा बनता. अन्नू दिखने को लापरवाह बैठी थी लेकिन मैं में लड्डू फूट रहे थे.

"मेरे लिए मत बनाइयेगा. मैं कॉफ़ी नहीं पीटा.", अर्जुन ने चूल्हे पर बर्तन रखती मेनका को देख कर कहा.

"फिर क्या बनाऊ? दूध या निम्बू पानी?"

"कुछ भी नहीं. घर जा कर बस खाना हे खाऊंगा."

"आज यहाँ खाना खा लो.", मेनका ने कॉफ़ी का बर्तन हिलाते हुए पुछा.

"संडे को आऊंगा न. आपकी भाभी को देखने तोह खाना खा कर जाऊंगा.", अर्जुन की बात ने शांत बैठी अन्नू के कान खड़े कर दिए.

"मेनका, तूने मुझे तोह इन्विते नहीं किआ. शादी में तोह चल जाना मुमकिन नहीं लेकिन इतनी कंजूस भी मत बन्न."

"इसकी ाची बात पता है क्या है, ये फरक नहीं समझता. मैंने इसको कोई अलग से तोह नहीं कहा. इसको याद रहा तोह बोल दिए. तुम भी आ जाना, ाचा हे लगेगा जब 3 की जगह 5 लोग होंगे घर में.", मेनका ने कॉफ़ी कप में डाली और ट्रे में रख कर बहार टेबल पर रख दी. साथ हे नमकीन और बिस्कुट.

अन्नू ने बिस्कुट का दबा अपने पाँव में रखते हुए एक बिस्कुट निकाल कर कॉफ़ी डुबोया और मुँह में. ये देखकर अर्जुन मुस्कुराने लगा और बगल में बैठी मेनका भी.

"ऐसे क्या देख रहे हो? घर पे बैठे है तोह मैं जैसे अपने घर रहती हु वैसे हे यहाँ हु. अभी तोह कहा था ये फरक नहीं करता फिर मैं क्यों फॉर्मेलिटी करू.", 3-4 बिस्कुट खाने के बाद कॉफ़ी को 2 घूँट में ख़तम करती वह झुक कर अपने सैंडिल पहन ने लगी और इस बार अर्जुन ये नजारा देख कर कुछ पल के लिए मूरत बन गया. ढीले टॉप के गले से झांकते गोर मॉटे उभर बुरी तरह उस आधे कप वाली ब्रा में कैसे थे. अन्नू की नजर सामने पड़ी तोह वह जल्दी से उठ कड़ी हुई. इतनी देर बाद जो गोरा चेहरा ठीक हुआ था फिर से लाल हो गया था.

"मोटरसाइकिल स्टार्ट करो मैं फेस वाश करके आई.", अन्नू बाथरूम में घुस गई.

"संभल के रहना.", मेनका ने कप ट्रे में रखते हुए ऊपर ऊपर से हे अर्जुन को हिदायत दी.

"तुमसे? मेरे ख़याल से गलत राइ है. खुद को रोक लो या जो दिल कह रहा है मान लो. मैं तोह दोनों तरफ हु.", अर्जुन ने इतनी गहरी बात कह दी थी की एक बार मेनका को समझ नहीं आई लेकिन जबतक समझ में आया के वह ये बात उसके दिल के बारे में करके गया है तोह वह बेचैन सी अपनी जगह पर बैठी रह गई.

'मेरे दिल की बात दिमाग में न आने दी और ये इसको पता लग गई.', मेनका का ध्यान जब टूटा तोह अन्नू हाथ हिलाते दरवाजे से बहार जा चुकी थी.

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मौसम खुशनुमा था, जैसे अक्सर अप्रैल महीने की रात में रहता है. गली से बहार निकले तोह आसमान में पर्याप्त अँधेरा हो चूका था. ये सड़क सीधा उनके सेक्टर में जाती थी जिस पर अभी बुलेट आई थी.

"इतनी म्हणत क्यों की हवा निकलने में? वैसे कह देती तोह क्या मैं मन कर देता?", अर्जुन के पीछे एक तरफ दोनों पाँव किये बैठी अन्नू उसकी बात से थोड़ा परेशां हो गई थी. नवयुवती वाले दिमाग में फिर से शिक्षिका वाले विचार आने लगे.

"परेशां होने की कोई जरुरत नहीं है. सिर्फ हम दोनों हे तोह है यहाँ, अब तोह मेनका भी नहीं है.", अर्जुन को अभी भी प्यार से हे बात करते देख अन्नू ने हिम्मत करते हुए अपना हाथ आगे करते हुए अर्जुन की कमर से ऊपर रख लिए. सामने देख कर चलते हुए अर्जुन का चेहरा शांत था, किसी ठहरे हुए पानी सा.

"तुम फीलिंग्स समझते हो? अजीब लगेगा लेकिन मैं खुद जब अकेली होती हु तोह मुझे ये अजीब सी फीलिंग्स होती है. ऐसा school-college की पूरी लाइफ में नहीं हुआ जो मैंने 3 दिन में महसूस किआ है. और अब मैं अलग तरह की मिक्स्ड फीलिंग्स से हर टाइम घिरी रहती हु. सुबह जिस तरह तुमने मुझे देखा तोह मुझे लगा के दिन शुरू होने से पहले हे बेटर हो गया है. क्लास में मैं तुमसे ऐसे नजरे चुरा रही थी की पता नहीं तुम्हारे सबके सामने मुझे देखने से कही कुछ हो न जाये. और कल मैं जेवुलूस फील की थी, जब मेनका के साथ तुम स्कूल में आये. सब बहोत जल्दी जल्दी हो रहा है अर्जुन. ी क्नोव it's रॉंग बूत माय हार्ट doesn't तुरस्त माय ओन वर्ड्स. मैं टीचर हु तुम मेरे स्टूडेंट, मैं तुमसे बड़ी हु और करियर पर हु, तुम्हारा सारा फ्यूचर अभी पेंडिंग है लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा. पूरी रात मैंने खुद को समझाया लेकिन सुबह आईने के सामने तैयार सिर्फ तुम्हे सोच कर होने लगी. मैं बहोत बुरी हु जो इस हद्द तक आ गई. तुम मुझे यही उतार दो अर्जुन, कल से मैं शायद स्कूल से भी रिजाइन कर दू. ी फील डिसगस्टिंग अस ी थिंक मोरे अबाउट व्हाट ी दीद एंड स्टिल दोंग.", आराम से शुरू हुई बात के अंतत तक अन्नू का गुलाब सा चेहरा आंसुओ से tar-batar मुरझाये गुलाब सा हो गया था. उसकी आवाज में भी सिसकिया ज्यादा तेज थी. जब मोटरसाइकिल रोकने के लिए उसने कहा तोह अर्जुन ने भी स्टैंड लगते हुए एक तरफ खड़ा कर दिए.

"उम्मम्मम", चेहरे को दोनों हाथो में थाम के अर्जुन ने वह कदम उठाया जो वह कभी खुदसे करने में 100 बार सोचता. अन्नू के होंठो पर भी आंसुओ का नमक उसने अपने मुँह में महसूस किआ था लेकिन वह फिर भी बड़े इत्मीनान से उसके होंठो को तबतक चूसता रहा जबतक सामने से अन्नू ने उसका सर पकड़ते हुए साथ देना शुरू नहीं कर दिए. 60 सेकंड का ये बेआवाज जवाब बहुत कुछ कह गया था. अपनी जेब से रुमाल निकल कर अर्जुन ने उस गीले चेहरे को प्यार से साफ़ किआ और अन्नू को सीट से खड़ा करते हुए बाहों में ले लिए.

"ज़िंदा हो तोह महसूस करना लाज़मी है. देर से सही लेकिन महसूस किआ और ाची बात ये भी तोह है के खुद हे इज़हार कर लिए. आकर्षण, प्यार या परवाह में कुछ बुरा तोह नहीं सिर्फ थोड़ी सी उम्मीद सामने वाले से भावनाओ को समझने की. हमारा भविष्य क्या है ये हम खुद नहीं जानते तोह उसकी इतनी परवाह क्यों. हाँ एक दायरा जरुरी है अन्नू, जिस से हम साथ भी रहे और कोई गलत मिसाल भी न बने. का मैं आँखों को पढ़ने में इतना बुरा हु? अँधेरे में हे मैंने उस दिन महसूस कर लिए था के तुम मुझे कुछ देर और रोकना चाहती थी. फिर एकदम तुम्हारा मेनका के साथ खड़े होने पर परेशां हो जाना. और तुम्हारी हंसी में खोया शायद मैं तुम्हे नहीं दिखा, जो सिर्फ इसलिए तुम्हे कुछ न बता पाया के वह पल अनमोल था. आज वह सूट मेरी तरफ से पहला उपहार था. मैं कोई वादा नहीं कर सकता लेकिन तुम्हारी परेशानी, उलझन और अकेलेपन में मैं साथ जरूर दूंगा. बस बदले में एक वादा चाहिए. हम अकेले हैं तोह साथ है, स्कूल में तुम्हारा व्यवहार वही रहना चाहिए, जहा तक जरुरी है.", ये वही जगह थी जहा अर्जुन ने प्रीती को किश किआ था, बड़े पार्क के पीच वाली सुनसान पतली सड़क. चाँद की रौशनी टेल खड़े दोनों एक दूसरे को जैसे आज पहली बार देख रहे थे, वैसे ये सच भी था. पहली बार वह ऐसे उस अदृश्य chaar-diwari से बहार थे.

"मैं पहले हे दिन समझ गई थी की तुम अलग हो बस आज पता चल गया के क्यों अलग हो. मेरे से कही ज्यादा मातुरे और समझदार हो.", बुलेट पे बैठने से पहले अन्नू इस बार खुद जोर से ऊके गले लग गई.

"देरी हो गई है, हमे चलना चाहिए.", अर्जुन ने भी उसको बाँहों में लिए हे कहा. अन्नू अब बेहतर हालत में थी और एक बार लम्बी सां लेने के बाद वह अर्जुन के पीछे बैठ चुकी थी. अब पीछे बैठ कर अर्जुन के सीने पर हाथ रखते हुए अन्नू को जरा भी संकोच या उलझन नहीं थी. अर्जुन बहार वाले रस्ते से अन्नू को उसके घर के बहार ले आया.

"समझदारी वैसे दूर दूर तक नहीं है तुम में. तुम्हारा स्कूटर भी मुझे हे लाना पड़ेगा.", अर्जुन के बराबर आ कड़ी हुई थी अन्नू.

"अबसे बहोत कुछ लाना पड़ेगा. वैसे तुमने तोह सरप्राइज गिफ्ट दे दिए लेकिन मैंने कुछ नहीं दिए.", अन्नू ने गियर लगते हुए अर्जुन के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

"तुमने कॉफ़ी पीला दी है मुझे.", और वह आगे बढ़ गया हँसता हुआ.

'पागल कही का. धत्त..' अपने सर पर हाथ मारती अन्नू फिर से वही खिलता हुआ गुलाब बन चुकी थी, एक बार फिर.

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"दादी, महाभारत के अर्जुन की कितनी बीविया थी?", अर्जुन अपने दादाजी के पाँव की मालिश करते हुए पास में बैठी कौशल्या जी से पूछने लगा. उसका अचानक से ऐसा सवाल सुनते हे कौशल्या जी ने पास की नजर का अपना चस्मा उतार कर बिस्टेर के साथ लगी टेबल पर रखा और पीठ बिस्टेर से टिका ली.

"महाभारत के अर्जुन की तोह 4 हे थी लेकिन अगर सिर्फ अर्जुन के बात करें तोह 5 रानिया और 17 गन्धर्व विवाह हुए थे पूरे जीवन काल में. ये सवाल आया कहा से तेरे दिमाग में?", अब डाव अर्जुन पर आ गिरा था.

"कुछ नहीं वह मैंने थोड़ा बहोत पढ़ा था के अर्जुन अगर किसी भी विभाग में कमजोर था तोह उसकी पूर्ती अर्जुन की पत्निया कर देती थी. लेकिन ये नहीं पता था के 5 थी. द्रौपदी, सुभद्रा, उलूपी और चित्रांगदा के बारे में हे पता है मुझे. और गन्धर्व विवाह मतलब?", यहाँ अर्जुन जिज्ञासा के साथ हे थोड़ा नासमझ भी बन रहा था. वह खुद गन्धर्व विवाह कर चूका था लेकिन उसके कुछ सवाल शायद इस सीढ़ी से हो कर हे आगे जा रहे थे.

"पांचवी थी अग्नि. जिसका उल्लेख पहले Nar-Narayan में है लेकिन महाभारत में अग्नि का देववतार पुरुष का थी, जिसके लिए अर्जुन ने अपने पिता देवराज इंद्रा से युद्ध किआ था. लेकिन महाभारत इसका वर्णन नहीं करता.", कौशल्या जी को पता था के अर्जुन के सवाल अभी बाकी है.

"ाचा एक और बात थी. श्री कृष्ण और अर्जुन में कोई पारिवारिक सम्बन्ध भी था या वह दोनों सिर्फ ाचे मित्र थे.?", अर्जुन अपने हे दिए जवाब से उन्हें प्रश्न निकाल कर देने लगा.

"कुंती, जो अर्जुन की माँ थी उनके भाई वासुदेव जी थे. तोह अर्जुन कृष्ण जी की बुआ का बीटा था.", कौशल्या जी ने अपने पाँव सीधे किये अब आराम करने के लिए.

"फिर कृष्ण जी ने क्यों अर्जुन से कहा के वह सुभद्रा को भगा कर ले जाये और विवाह कर ले?", अर्जुन के इस पहले से तैयार सवाल का कौशल्या जी ने बिना सोचे जवाब दे दिए लेकिन अब रामेश्वर जी के कान खड़े हो गए थे.

"क्योंकि बलराम जी ने सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करने का वादा किआ था और सुभद्रा प्यार करती थी अर्जुन से और वह भी सुभद्रा से करता था. इसलिए कृष्ण जी ने अर्जुन को सुभद्रा को मेले में से हे भगा ले जाने की सलाह दी क्योंकि अपहरण करने के बाद जो भी सुभद्रा पर दवा करता उसको अर्जुन से युद्ध करना पड़ता."

"दादी मेरा मतलब ये था के वह तोह bhai-behan थे न. क्या ये धरम के खिलाफ नहीं हुआ?", इसका सही जवाब कौशल्या जी के पास नहीं था क्योंकि अगर अब वह कुछ भी जवाब देती तोह नया सवाल अर्जुन करने हे वाला था.

"ऐसा है बीटा के कभी कभी धरम से आगे प्यार को रखा जाता है. और दूसरा कारण था के सुभद्रा का yudh-kala और युद्ध प्रभंधन में सर्वश्रेष्ट होना. अगर वह दुर्योधन की बीवी बन जाती तोह परिणाम अलग हो सकता था. चल अब बस कर और तू भी आराम कर जा कर.", रामेश्वर जी ने ये जवाब देने के बाद अर्जुन को बिना मौका दिए निरुत्तर करते हुए भेज दिए.

"सच में. ये लड़का कहा से ढून्ढ कर लता है ऐसे सवाल? बताओ आज तोह ये मुसीबत हे करने वाला था अगर आप न सँभालते.", कौशल्या जी की बात पर पंडित जी हँसते हुए करवट लेकर कहने लगे.

"इसका मैं उतना हे अशांत है जितना ये बहार से शांत दीखता है. किसी भी विषय में जरा इस से बात करके देखो. जवाब में से हे सवाल निकाल लेगा."

"पोलिसिअ गुण आने हे थे इसमें. अब सो जाओ जी आप."

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"अर्जुन, कहा सोने लगा है आज?", 11 बजे के करीब अर्जुन तारा के कमरे से बहार निकल रहा था, जहा तारा और प्रियंका अभी टेलीविज़न चलाये आपस में बातें कर रही थी. अर्जुन को बहार जाते देख तारा ने जिज्ञासा दिखाई.

"अभी तोह थोड़ी देर माँ के पास जा रहा हु. सोने के वक़्त हे पता लगेगा के कहा नींद ले जाती है. कुछ काम था तोह कहो.", अर्जुन दरवाजे के पास हे रुक कर दोनों को देखने लगा. प्रियंका दीदी उस से नजरे चुरा रही थी वही तारा की आँखों में प्यास साफ़ नजर आ रही थी.

"ठीक है. अगर यही कमरे में आओगे तोह दरवाजा खटका देना.", तारा की बात पर अर्जुन हामी भरने के बाद निचे उतर कर पिछले आँगन में आ गया. हमेशा की तरह बहार शांति थी. साढ़े कदमो से चलकर ताईजी के दरजे पर हाथ लगाया तोह वह खुला हे था, सिर्फ पल्ले आपस में ढलके हुए थे. अंदर हलकी रौशनी में अलमारी के पास कड़ी ललिता जी जैसे नाहा कर हे आई थी. अपनी बाहो पर कोई क्रीम लगते समय एक नजर अंदर आते अर्जुन को देखा तोह वही कड़ी मुस्कुरा दी. दरवाजे चिटकनी अब अंदर से लगी थी और अर्जुन अपनी प्यारी तेजी को पीछे से बाँहों में लिए खड़ा था.

"मतलब आपको यकीन था के मैं आऊंगा.?", सर नीचे झुकता वह उनके कंधे और गर्दन के भाग पर अपने होंठ लगता साफ़ बदन से आती महक को भी सूंघ रहा था. उसके शिकंजे में कड़ी ललिता जी का शरीर भी ये प्यार का अथवा सुर बजने लगा था.

"आज नहीं आता तोह फिर तेरी खैर नहीं थी. रात को आधा घंटा सिर्फ तेरे लिए हे लगाया है मैंने.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने दोनों फुटबॉल से चुके निघ्त्य के ऊपर से हे पकड़ कर भींच दिए.. "आह आराम से कर न.."

निघ्त्य के अंदर कोई और कपडा नहीं था ललिता जी के जिस्म पर. हाथ अब उनके मॉटे अंगूर से निप्पल को उस झीने से कपडे पर से हे हलके हलके उमेठ रहे थे और वह खुद भी मुँह अर्जुन की तरफ करती अपने रसीले होंठो का रास उसको पीला रही थी.

"बीएड पर चले या खड़े खड़े?", अर्जुन ने कान में सरगोशी करते हुए कहा तोह ललिता जी के जवाब का उसको जो अनुमान था वह गलत साबित हुआ.

"आज सब शीशे के सामने और अगर तू लम्बा टिका तोह फिर जैसे तू चाहे.", एक अदा से उन्होंने कहा तोह अर्जुन ने अपना हाथ उनकी गुदाज जांघो पर फिरते हुए फूल कर बहार को निकली छूट पर रख दिए. कपडे के अंदर आजाद छूट आज सफाचट थी लेकिन फिलहाल कोई गीलापन न था उन मोटी फांको के बीच. अर्जुन की उंगलियों को अपने रसकुंड पर महसूस करते हे ताई जी का चुम्बन करने का तरीका आक्रामक हो गया. फांको को फैलते हुए 2 उंगलियों से वह रगड़ कर वह उनके ati-kamuk शरीर को और भड़का रहा था.

"आप इधर बैठो.", उन्हें लकड़ी के स्टूल पर बिठा कर अर्जुन घुटने मदद कर जांघो के बीच बैठ गया. ललिता जी का निचला भाग पूरी तरह बेपर्दा करता अर्जुन दोनों मोटी जाएंगे फैलते हुए उनकी मांसल छूट पर कुछ चुम्बन देने के बाद इत्मीनान से जीभ की कलाकारी दिखने लगा.

"अरे लल्ला.. ये क्या करने लगा तू आह्हः.. मेरी बात का और हे मतलब तोह निकाल लिए.", ये अंदाज देख कर ललिता जी ने भी उसके सर को अपनी छूट पर दबाते हुए छूट चुसाई का स्वर्गिक लुत्फ़ लेना शुरू कर दिए. अंदर और बहार, दोनों तरफ की फांको को ाचे से गीला करता वह खड़ा हुआ और उनका एकमात्र वस्त्र ऊपर से उतार कर पूरा जिस्म इस हलकी लेकिन पर्याप्त रौशनी में उजागर कर दिए. दरमियाने कद्द की ललिता जी की जाँघे आपस में सटी थी. छूट की फांके उस जोड़ से बहार को निकली हुई, ऊपर मुलायम पेट और फिर 2 बड़े गुब्बारे, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपना जादू बरकरार रखे थे. कमर पे बेशक प्रसव दौरान बने निशाँ थे लेकिन वह भी आकर्षक लगते थे इस गठीले जिस्म पर. नारियल से लंबवत और भरी चुचो पर गहरे भूरे तने हुए चूचक और गोर चिकने कंधे. खजुराहो में हे ऐसी गठीली महिलाओ का वर्णन रहा होगा. पूरे जिस्म को ाचे से सहलाता अर्जुन जब अपनी तेजी के मॉटे दूध दबाने लगा तोह उन्होंने भी उसका पजामा ढीला करते हुए निर्वस्त्र कर दिए.

अर्जुन को एक अपनी पुराणी जगह बैठती वह एक ऐडा से उसके प्रचंड लुंड को मुट्ठी में पकड़ कर झुक गई. अर्जुन दोनों का अक्स बराबर में लगे बड़े दर्पण में देख रहा था. जेर्सी गाये सी बड़े थांन वाली ताई जी उसके घोड़े सामान लुंड को चूमती बड़ी उत्तेजक दृश्य दिखा रही थी. अर्जुन की ज़िन्दगी के सबसे बड़े कूल्हों की स्वामिनी जिनका हर अंग एक अलग कामुकता झलकता था. बड़े और पहले हुए सुपडे पर जीभ फिरते हुए उन्होंने पूरा सूपड़ा मुँह में निगल लिए और अर्जुन की आँखें मजे से बंद हो गई. जोश में वह अपने हाथ बढ़ता उनके बहार को निकले विशाल चुत्तड़ो को मसलता मुखमैथुन का मजा लेने लगा, जिसमे ये महिला परिपक्व थी.

दोनों हाथ अर्जुन के पत् पर टिका कर ललिता जी अब आधे के करीब उसका लुंड सुपडे तक चूसती और फिर अंदर निगल लेती. उनकी राल से लुंड बुरी तरह भीग कर फूल चूका था.

"हहहयहहह.. अब बिल्ली मरने का समय आ गया.", सांस दुरुस्त करती वह अपना शीशे की तरफ वाला दाहिना पंजा ड्रेसिंग पर टिकती अर्जुन को पीछे से छूट मरने का न्योता देने लगी.

"ाचे से मारते है न इस बिल्ली को.", अर्जुन ने पीछे खड़े हो कर बहार की तरफ निकली उन मोटी 4 इंच लम्बी फांको के बीच सुपडे को सहलाते हुए जैसे उसमे सामने की purv-ghosna की तोह ललिता जी ने भी शीशे में देखते हुए हामी भरी.

'गुलुप' करता वह गुलाबी हिस्सा उनकी गद्देदार छूट ने निगल लिए.

"आह.. बड़ा दुमदार है रे तेरा घोडा.. लगाम कास के रखिओ.", वह अर्जुन को चेता रही थी उसके लुंड के बड़े आकर की वजह से.

"आपकी ये बिल्ली कहा कुछ काम है. पूरा निगल लेगी देखो जरा.", बड़े मटके सी उनकी गांड के निचले हिस्से में फंसा अर्जुन का लुंड अगले धक्के में पूरा अंदर बैठ गया.

"मार दिए रे जालिम. हर बार जैसे खंजर सा घुसता है ये तेरा हथियार. अब रुक जा थोड़ा. पेट में महसूस हो रहा है ये.", अर्जुन भी एक पाँव जमीन पर टिकाये पूरा लुंड जड़ तक डालने के बाद उनके चुके मसलता हुआ पीठ, गले और गाल चूमने लगा. छूट के अंदर हल्का स्पंदन महसूस करते हे उसने दोनों खरबूजे निचली तरफ करते हुए जैसे उन्हें झुकने का इशारा दिए.

"आह ऐसे हे रे.. आह्हः उम्म्म्म ऐसे हे पूरा निकाल के मार इस निगोड़ी के अंदर.. मा.. फाड़ दे इसको..", चुतरस से दमकता लुंड इतनी जल्दी हे लाये पकड़ता हुआ इस मुद्रा में बच्चेदानी तक लग रहा था.

"ताईजी बड़ी गर्मी है आज अंदर.. अहह.. ", जोश में अर्जुन उनके कूल्हों को आते की तरह दबाते हुए उसके लुंड को भरपूर टक्कर देती इस नमकीन छूट की गर्मी से हर ढके के बाद ज्यादा सख्त होता जा रहा था.

"अरे गर्मी भी तोह ये मूसल हे निकल सकता है.. सीईई.. हर दिन कुछ ज्यादा हे मोटा हो रहा है ये... उम् .. गई रे मैं लल्ला आह..", ललिता जी अपना पाँव ड्रेसिंग से उठा कर जमीन पर रखती बीएड की पुष्ट पकड़ती घोड़ी बन गई. अर्जुन अब और भी गहरे और तेज धक्के लगता उनकी गांड की फांको को भी फैला रहा था. भरपूर चर्बी और मांस के बावजूद दोनों नितम्भ baal-vihin और कांच से चिकने थे. अर्जुन की नजर अब इस दूसरे छेड़ को ढीला करने पर थी.

"बस कर रे. चल बिस्टेर पर आजा."

"अब मैं इधर करूँगा.", अर्जुन ने गांड का नरम चला अंगूठे से दबाते कहा तोह ललिता जी हांफती हुई सीढ़ी हो कर अलमारी खोलने लगी.

"मुझे पता था तू ये लिए बिना नहीं मानेगा. निरोध या सीधा.?", उन्होंने आज अर्जुन को उसकी मर्जी से करने को कहा.

"बस तेल निकल लो.", ललिता जी ने वह खास तेल की शीशी उसको थमते हुए बिस्टेर पर घुटनो के बल हो कर अपनी हे ऊँगली से गांड के चले पर तुबे से डॉक्टर जेली लगते हुए अर्जुन को देखा. जो सीधा शीशी से अपने एक गीत लम्बे लुंड पर तेल टपका रहा था. छूट में फिर से पानी छू ने लगा था उनकी. अर्जुन का लुंड था हे ऐसा के ललिता जी का दिल उसको अपने किसी भी छेड़ में लेने का हर समय दिल होता था.

इधर अर्जुन भी अपने लुंड को ाचे से चमकाने के बाद मसलता हुआ उनके बड़े तम्बूरे के पीछे आ खड़ा हुआ.

"सच में ताईजी, वैसे तोह आप ऊपर से निचे तक खाने के लायक हो लेकिन आपका पिछवाड़ा देखते हे मेरा ये नींद में भी खड़ा हो जाता है.", पंजे के बल पीछे खुद को सेट करता वह सीधे हाथ की उंगलिओ से गांड तक जाता रास्ता खोलता अपने सुपडे को लगाए तैयार हो गया.

"संभालना.", मुट्ठी में लुंड को जड़ के पास से पकड़ कर अर्जुन ने दबाव बढ़ाते हुए उस लचीले से छोटे छेड़ में धकेलना शुरू किआ.

"ुई... मर्डर गई रे.. आह किसी दिन फाड़ हे देगा तू इसको.", सूपड़ा अंदर जाते हे उस कसाव के आगे अर्जुन सब भूल गया. दोनों तरफ से हाथ निकल कर मॉटे निपला निचोड़ता वह पूरा लुंड गांड को फैलते हु दाल कर हे रुका. दोनों की पेशानी पर पसीना चालक आया था.

अगले मिनट हे thap'thapp, फच फच की आवाजे कमरे में शोर मचने लगी. और साथ हे दोनों की मस्ती भरी आहे.

"तेरे साथ तोह पिछवाड़े में भी मस्ती चढ़ने लगती है रे.. आह्हः. कास के पेल ..", अर्जुन पीठ पर डाँड़ गड़ता बुरी तरह उनकी गांड थोक रहा था. ये ललिता जी के भरी कूल्हों का हे कमाल था जो वह चीखने की बजाये इस भयानक लुंड को लेती सिसकारी भर रही थी. अब अर्जुन ने लुंड निकल कर उन्हें पीठ के बल लिटाते हुए दोनों मोटी जंघे अपने कंधे पर रख ली. इस तरह से गांड का छेड़ कही ज्यादा उभर के बहार आ गया. उनकी कमर छत्त की तरफ किया वह इस तरह पूरा हे लुंड अंदर पेल रहा था. अब कही जा कर ललिता जी को गांड में हल्का दर्द महसूस हुआ लेकिन बिना अर्जुन को कुछ कहे वह अपने कूल्हों पर पड़ती थाप का मजा लेती रही.

"आह्ह्ह्ह..", एक सिसकारी लेता अर्जुन उनके मॉटे निप्पल दांतो में दबाता रुक रुक कर उनकी गांड की गहराई में गरम तरल भरने लगा. ललिता जी भी उसके कूल्हों को दबती खुद के अंदर जैसे समां लेना चाहती थी. दोनों के शरीर कुछ पल तक कांपते रहे फिर अर्जुन एक तरफ पलटा तोह उन गोल कूल्हों की गहराई से उसका वीर्य धीरे धीरे बहार निकलने लगा.

"मार दिए रे आज तोह तूने. कल न चलने के काबिल रहती.. आह..", इस समय उन्हें गांड किसी फोड़े की तरह दर्द दे रही थी. ऐसे हे वह नंगी करवट लेती सीने के भार बिस्टेर पर पसर गई.

"मैं चलता हु आप दरवाजा लगा लो.", उनके कूल्हों पर चपत लगते हुए अर्जुन एक बार होंठ चूम कर निकल गया. जैसे तैसे दरवाजा बंद करती ललिता जी फिर से उसी मुद्रा में पसर गई.

"दिल तोह करता है रात भर दोनों छेड़ कुटवाओ. बस अगले दिन घर में कोई हो न.", खुद से कहती वह तकिया पेट के नीचे करती आँखें बंद कर सोने की कोशिश करने लगी.

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गहरी स्याह रात में छत्त पर लेता अर्जुन कुछ परशान था. या शायद अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचता हुआ विचारो के पातळ में खोया. ये जितना भी utaar-chadhaav उसके जीवन में हो रहा था शायद वह इसमें खुद के लिए समय हे नहीं निकाल प् रहा था. आँखें बंद करता वह इन सभी विचारो को दिमाग से त्यागने की कोशिश करने लगा और अब उसको समाधान के रूप में ध्यान की जरुरत थी. शनैः शनैः शरीर को ढीला छोड़ता वह aatma-mulyankan को जाने वाले खामोश सफर पर चलने लगा.

'वह तुम हो जो खुद को हानि पंहुचा सकते ho'-Menaka

'मैं सिर्फ तुम्हारी hu'-Preeti

'अपने आप की ख़ुशी बाद में, पहले अपने से जुड़े लोगो के चेहरे पर संतुष्टि'- माँ

'अर्जुन की तरह बन. अगर तेरे पास समाधान न हो तोह उसके ज्ञान धारक को खुदमे समां le'-Daadi

'करम और धर्म, इंसान को उसको सही मार्ग बताते है'- दादाजी

'क्यों कष्ट दे रहे हो खुदको. जिस ज़िन्दगी के प्रति तुम इतने चिंतित हो, जिस धरम को लेकर आशंकित हो और जो भी तुम देखते हो या दिखाया जाता है अगर यही सब एक दिन चलवा निकले तोह खुद को कहा पाओगे? अपना वजूद तलाशने की जगह अगर तुम बंधन में जकड़ी इस अनश्वर आत्मा की आवाज सुनो तोह तुम भी आजाद हो और तुम्हारी आत्मा भी. रस्ते खुद बनेंगे बस जो भी करो अपना 100 प्रतिशत देना.'

अर्जुन ने तुरंत अपनी आँखें खोल ली. ये आवाज ऐसे सुनाई दे रही थी जैसे आचार्य प्रमोद शास्त्री जी उसके साथ हे बिस्टेर पर बैठे हुए हो.

'ठीक कहा आपने आचार्य जी. शुभरात्रि.' अर्जुन ने पद्मासन लगाए हुए हे अपने हाथ जोड़ते हुए जैसे नमस्कार किआ और शांत मैं से नींद के मीठे सफर पर चल दिए.

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आज जैसे एक नयी सुबह थी अर्जुन के जीवन की. पक्षिओ की मधुर आवाज सुनकर हे आँख खुली तोह आसमान में फैले हलके उजाले में वह छत्त पर टहलने लगा. पानी के लम्बे घुट भरता वह शांतचित था. दिवार से परे पड़ोस वाले घर की छत्त पर नजर पड़ी तोह छोल साहब का नौकर मुकेश कमीज पहन कर तैयार हो रहा था. अर्जुन भी अगले 15 मिनट बाद अपने दैनिक वस्त्र पहने घर के बहार आ गया.

"गुड मॉर्निंग यंग मन.", छोल साहब अपने घर के बहार खड़े थे और मुकेश एक गाडी में सामान रख रहा था. अर्जुन भी उनकी तरफ हे चल दिए.

"इतनी सुबह कहा जा रहे हो दादू?", पाँव छूने के बाद वह भी उनके साथ खड़ा हो गया.

"मैं कहा जा रहा हु भाई? रेणुका के मां आये हुए है और वही वापिस जा रहे है अब शिमला.", अर्जुन की नजर उस महंगी गाडी की डिक्की पर थी.

"मेरे ख़याल से तोह कल हे आये थे लेकिन इतना सामान?", अर्जुन ने थोड़े शंकित स्वर में कहा तोह छोल साहब हंसने लगे.

"ोये सीड, सही समझा तू. वह रेणुका और प्रीती भी जा रहे है न. उन्हें हे लेने मेरे साले साहब आये थे. जा मिल ले अपनी बुआ से एक बार.", एक 60 की उम्र के लगभग रोबीला व्यक्ति घर के अंदर से उनके पास चलता आया तोह छोल साहब ने अर्जुन को अंदर जाने को कहा. घर में जाने से पहले अर्जुन ने उन्हें नमस्कार किआ और हैरान सा ड्राइंग हाल में आ गया.

"ये जनाब कौन है जो इतनी सुबह सीधा हे घर के अंदर? सिक्योरिटी के लिए मिलिट्री से मिला है क्या जीजाजी?", अपने साले की बात पर छोल साहब थोड़ा जोर से हंस दिए.

"बलदेव, अब क्या कहु तेरी बात पर. अपना दामाद है वह तोह घर में जाने के लिए किसी की परमिशन थोड़ी लेगा. वैसे शरीर से लगता है न स्पेशल रिक्रूट?", अब उनके साले साहब ठुड्डी पर हाथ रखे सोचने लगे.

"वह प्रीती के बचपन वाली बात मजाक नहीं थी? यही वह लड़का है न आपके ख़ास बेटे का सुपुत्र?"

"हाँ बलदेव ये वही है और सच कहु तोह बेशक उस समय मजाक था लेकिन मेरी भाभी ने स्पष्ट कह दिए था के प्रीती उनके हे घर की वधु बनेगी. आज उनके फैंसले को मैं वरदान मान रहा हु. इस लड़के से बेहतर कुछ हो हे नहीं सकता.", दोनों बातें कर रहे थे और मुकेश कुर्सियां रखने के बाद अब चाय की ट्रे वही ले आया था.

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"आजकल मैं पूरी तरह से najar-andaaj किआ जा रहा हु.", अर्जुन अंदर आया तोह ड्राइंग रूम में कोई न था लेकिन रेणुका बुआ और पार्वती की आवाज उनके कमरे से आ रही थी. अर्जुन दबे पांव प्रीती के कमरे में आ गया, जहा शीशे के सामने कड़ी वह अपने बाल कंघी से पीछे कर रही थी. दरवाजा बंद होने की आवाज पर उसने जब सामने अर्जुन को इतनी सुबह उसके कमरे में देखा तोह हाथ रुक गए. अर्जुन बीएड के किनारे बैठा बस यही बोल कर नीचे देखने लगा.

"तुम्हे ये लगता है?", नज़र वापिस शीशे पर करती वह दोनों हाथो में बाल पकड़ कर उनमे रबर डालने लगी

"हर बार मेरे हे सवाल के जवाब में कब तक सवाल करती रहोगी? मैं हे अब सवाल करने बंद कर देता हु.", अर्जुन अपनी जगह से उठ कर बहार जाने लगा तोह प्रीती ने तुरंत अर्जुन की ब्याह को थाम लिए. उसकी आँखें अचरज से अर्जुन को देख रही थी, जो अब के जगह खड़ा बस दरवाजे को देख रहा था.

"इसलिए आये थे यहाँ?", प्रीती ने अर्जुन का चेहरा अपने हाथ में लेते हुए पुछा.

"प्रीती, अब भी सवाल हे है तुम्हारे पास.", अर्जुन ने धीमी लेकिन सार्ड आवाज में कहा जैसे वह अब एक पल भी वह रुकने में सक्षम न था.

"मेरी गलती है अर्जुन, प्लीज रुको एक बार. मैंने सोचा भी था के कल तुम्हे बता दू लेकिन..", प्रीती एकदम चुप हो गई अपनी बात कहते कहते.

"मैं यहाँ गलती निकलने तोह नहीं आया. और मुझे तोह पता भी नहीं चलता अगर मैं आधा घंटा पहले घर से चला गया होता. तुम्हे जहा जाना है तुम आजाद हो जाने के लिए. ये तुम्हारी अपनी ज़िन्दगी है और उसके फैंसले भी. अब मैं चलता हु और जब तुम्हारे 'लेकिन' बीच में ना आये तोह शायद हम बात करे.", प्रीती का हाथ अपनी ब्याह से अलग करते हुए अर्जुन दरवाजा खोल कर बहार निकला और सामने हे रेणुका बुआ को खड़े पाया. जो गुस्से से उसको हे देख रही थी.

"अंदर चलो वापिस.", उसका हाथ पकड़ती वह फिर से अर्जुन को कमरे में ले आई. प्रीती सर झुकाये एक तरफ कड़ी थी.

"मैंने मन किआ था प्रीती को तुम्हे बताने से. और ये तोह जाना भी नहीं चाहती थी लेकिन मैंने जोर देके इसको तैयार किआ. इसको भी हक़ है बहार निकलने का, अपनी तरह से ज़िन्दगी को देखने का. हर वक़्त ये बस तुम्हारी परछाई बानी नहीं रह सकती.", रेणुका बुआ आज बिलकुल भी वह महिला नहीं थी जो हमेशा से अर्जुन देखता आ रहा था, आज जैसे उनका मानसिक संतुलन सही नहीं था.

"आप ठीक कह रही है रेणुका जी. वैसे मैंने भी यही कहा था प्रीती को कुछ देर पहले. प्यार करते है हम दोनों इसलिए दुःख हुआ मुझे ये जान कर की पहली बार वह मुझे बताये बिना हे कही जा रही है. और मुझे तोह ाचा लगता के यहाँ से बहार तोह जा रही है. लेकिन अब मैं एक और बात कहूंगा, बुरा लगेगा आपको. एकाधिकार अर्जुन पर आपका नहीं हो सकता. प्रीती का दिल बड़ा है और वह नासमझ. यात्रा शुभ रहे आपकी और वह मेरी है मेरी रहेगी.", आंसू बहती प्रीती के गाल को उनके सामने हे चूम कर अर्जुन बहार निकल गया. पीछे छोड़ गया तोह बस परेशां रेणुका बुआ और आँखों में आंसू लिए हैरान कड़ी प्रीती को.

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"अर्जुन तैयार नहीं हुआ अभी तक? और वह दिखाई भी नहीं दे रहा.", स्कूल जाने का समय हो चूका था लेकिन आज अर्जुन नदारद था यहाँ खाने की मेज से. तैयार कड़ी रूपाली को देखते हुए ऋतू दीदी ने अपनी माँ से पुछा.

"ऊपर जाते तोह देखा था मैंने उसको साढ़े 5 बजे के aas-pas. उसके कमरे में जा कर देख जरा बीटा. वह कभी स्कूल के लिए लेट नहीं हुआ.", रेखा जी की बात सुनकर ऋतू भी तेज कदमो से सीढिया चढ़ती अर्जुन के कमरे में आ कड़ी हुई. ब्याह के बीच तकिया रखे वह आज नींद में भी चेहरे से परेशां लग रहा था. ऋतू दीदी की धड़कन तेज हो गई एक अंजना डर महसूस करते हुए.

"अरे इसका तोह सर गरम है. Arjun-Arjun, उठ भाई", अर्जुन का माथा तवे सा तप्त महसूस हुआ ऋतू को हाथ रखते हे. लेकिन ितं हिलने के बावजूद उसके शरीर में मामूली सी हलचल भी न हुई. ये देखते हे ऋतू की धड़कन जैसे थमने लगी थी. रफ़्तार अब रुक चुकी थी.
 
अपडेट 77

अर्जुन की सुभद्रा


"दादी, पापा को फ़ोन लगाओ जल्दी. अर्जुन को तेज बुखार आया है और वह हिल भी नहीं रहा. प्लीज दादी जल्दी करो.", ऋतू की आँखों से आंसुओ की धरा बहती हुई नीचे टपक रही थी. इतनी हे देर में उसका गाला रूंध गया था.

"बेटी खुद को संभल और रोना बंद कर. मैं लगाती हु फ़ोन तेरे बाप को. और बुखार हे है तोह ठीक हो जायेगा. मेरी बहादुर बेटी.", ऋतू का रोना देख कौशल्या जी का दिल बैठ गया था. एक हे पल में उन्हें दोनों का बचपन याद आ गया के अगर अर्जुन को कुछ भी हुआ तोह ये भी बिस्टेर पकड़ लेगी. बैठक से ऋतू का रोना सुनकर रामेश्वर जी जैसे हे अंदर आये तोह कौशल्या जी की छाती से लिपट कर रोटी ऋतू को देखा.

"जी शंकर को फ़ोन लगाओ जल्दी और कहो के कोई डॉक्टर यहाँ भेजे. अर्जुन के बुखार आया है."

अगले 15 में हे ऊपर अर्जुन के कमरे के अंदर डॉक्टर के साथ रामेश्वर जी, कौशल्या देवी और ऋतू थे. किसी और को अंदर नहीं आने दिए था कौशल्या जी.

"हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा इसको पंडित जी. बुखार अभी 104 दिखा रहा है लेकिन ये काम हुआ है जहा तक मैं जानता हु. और ज्यादा होने की वजह से एपिलेप्टिक अटैक आया इसलिए ये उनकंसियस है. हमे जल्दी हे इसको ले जाना होगा.", डॉक्टर की बात सुनते हे कौशल्या जी के भी haath-paanv फूल चुके थे. घर में कोई और मर्द था नहीं इन डॉक्टर साहब और रामेश्वर जी के सिवा. लेकिन ऋतू का रोना पलभर में हे बंद हो गया. वह दौड़ती हुई कमरे से बहार भागी और तारा को जल्दी बड़ी गाडी बहार निकलने का बोलती गली में आ गई. कश्यप जी के घर के सामने खड़े सब्जीवाले और उस से सब्जी ले रहे अनिल कश्यप को बुलाकर वह बहार वाले रस्ते हे ऊपर आ गई.

"अनिल भैया इसको उठाने में हेल्प कीजिये.", कश्यप जी का बीटा भी समझदार था और स्थिति को देखते हुए उसने अर्जुन के नीचे बिछी चादर को दोनों तरफ से पकड़ा तोह सब्जी वाला भी ये देख कर सर की तरफ से वैसे हे चादर समेत अर्जुन को इधर से उठा कर नीचे चल दिए. सफारी की बीच वाली लम्बी सीट पर अर्जुन को डालते हे ऋतू फुर्ती से अंदर आ कर अपने भाई का सर गॉड में लिए बैठ गई.

"चल तारा जल्दी से गाडी हॉस्पिटल की तरफ ले.", ऋतू की बात पर तारा ने भी गाडी बढ़ा दी. उसकी बगल में हे रामेश्वर जी बैठे थे, भावशून्य से. डॉक्टर अपने स्कूटर से उनके पीछे आ रहा था.

"सब ठीक हो जायेगा मेरी बची. तेरी दादी ने शंकर को भी बोल दिए होगा अब तक हॉस्पिटल पहुंचने के लिए.", रामेश्वर जी बोल तोह रहे थे अपने पौती को लेकिन अंदर हे अंदर वह भी भगवन से अपने बचे के लिए दुआ मांग रहे थे. उनको पता था के बस एक अर्जुन हे है जो उनके परिवार का दिल है.

"जल्दी से मेरे भाई को निकालो. ध्यान से देख कर.", गाडी इस बड़े हॉस्पिटल के अंदर घुसते हे तारा ने बिना परवाह किये लोगो के अंदर जाने वाले गेट के सामने लगा दी. 2 compunder/helper फुर्ती से स्ट्रेचर पर अर्जुन को डालते हुए इमरजेंसी की तरफ ले चले. उनके पीछे हे ऋतू, जिसको अपने कपड़ो का भी होश न था. वही रात को सोने के वक़्त पहने कपड़ो में वह उस दरवाजे के बहार रोक दी गई सीनियर डॉक्टर द्वारा.

"बीटा आप अंदर नहीं आ सकते. यही वेट कीजिये.", बहार लगी 3 लोहे की एकसाथ जुडी कुर्सिओं में से किनारे वाली पर बैठ कर वह बस इस बंद दरवाजे को देख रही थी जिसके पीछे उसके भाई को ले कर डॉक्टर चले गए थे.

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"भाई साहब, कैसा है अब अर्जुन?", रामेश्वर जी सर झुकाये लॉबी में बैठे थे अकेले. छोल साहब को अपने पास आया देख वह खड़े हुए तोह आज पहली बार उन्हें बुढ़ापे का एहसास हो गया.

"पता नहीं सतीश. मेरे बचे को जाने क्या हुआ है. एक घंटा हो गया लेकिन कोई खबर नहीं है अभी.", आँखों में पानी भर आया था बात कहते हुए पंडित जी की. छोल साहब ने उन्हें पकड़ कर बिठाते हुए पास कड़ी नर्स से पानी मंगवाया.

"भगवन पे भरोसा रखो भाई साहब. अपना अर्जुन इतना कमजोर नहीं के छोटी मोती बीमारी से उसको कुछ हो जाये. शेर है वह शेर.", उनको सांत्वना देते हुए छोल साहब भी परेशां हो गए थे. कुछ हे घंटे पहले तोह वह मिले थे अर्जुन से और तब वह हमेशा की तरह कितना ज़िंदादिल दिख रहा था. और जाते हुए वह सीधा निकल गया था. 'प्रीती'.. अचानक से उन्हें झटका लगा जब ये नाम उनके दिल ने लिए.

"पापा आप मेरे साथ चलो.", शंकर के साथ हे 2 और डॉक्टर थे जिन्हे एक तरफ भेजने के बाद उन्होंने अपने पिता और अंकल को उठाते हुए अपने साथ लिए. आप लोग खुद का ध्यान रखिये और इधर आराम कीजिये. एक कांच का दरवाजा खोलकर उन्हें इस sofa-bister लगे कमरे में बैठने का बोल कर वह खुद भी इमरजेंसी वाली जगह आ पहुंचे.

"पापा, देखो न ारु को कितनी देर से अंदर बंद किआ हुआ है. उसको ठीक कर दो पापा, मेरे भाई को बचा लो. हम उसको फिर से बहार भेज देंगे लेकिन उसको कुछ होना नहीं चाहिए.", ऋतू.. एक यही थी जिसमे बेदर्द डॉ शंकर की जान बस्ती थी. जिसके सामने वह अपना हर रूप भुला कर सिर्फ अपनी इस शहजादी का एक ाचा बाप बन जाता था. आज वह उस से लिपटी हुई फफक कर रो रही थी. उसका रुदन जैसे शंकर की आत्मा को भेद रहा था और वह खुद बेबस था. खुद को सँभालते हुए अपनी बेटी के सर पर हाथ रखे वह कुछ पल शांत खड़ा रहा.

"मैं तेरे भाई को कुछ नहीं होने दूंगा. तू बस कुछ पल यहाँ बैठ मैं तबतक यहाँ से नहीं जाऊंगा जबतक तू उस से बात न कर ले.", खुद शंकर को अभी तक नहीं पता था के उसके बेटे को क्या हुआ है और वह किस हालत में है. तारा ने ऋतू को पकड़ कर अपने साथ लगाया तब कही डॉ शंकर अंदर जा पाए.

"गुप्ता, क्या कंडीशन है? और तुम हैंडल कर लोगे इसको या और टीम चाहिए? मैं लाइन लगा दूंगा न्यूरो एक्सपर्ट्स की लेकिन मुझे तुम पर खुद से ज्यादा भरोसा है ऐसे केस में.", जो डॉक्टर शंकर के साथ आया था वही अब अर्जुन का इलाज देख रहा था. अर्जुन इस वातानुकूलित जगह में सिर्फ नीला चौगा पहने सीधा पड़ा था. मुँह पर ऑक्सीजन वाला मास्क, माथे के दोनों तरफ कुछ तार जो एक हरी स्क्रीन से जुडी थी.

"शंकर मेरे दोस्त, हर चीज मेरे कण्ट्रोल में है अब. जो डॉक्टर इसको देखने गया था वह एप्लेप्टिक बता रहा था लेकिन तेरे बेटे का साथ वैसा कुछ नहीं हुआ है. ये समझ ले के कुछ ऐसा हुआ जिस से इसको मानसिक आघात पंहुचा और उसको ये सेहन नहीं कर पाया. और ब्रेन में ऑक्सीजन की सप्लाई कुछ एक समय के लिए cut-off. अभी मैंने इंजेक्शन दे दिए है और थोड़ी देर में हे ये आँखें खोल लेगा. बस आज इसको यही रखना होगा होश में आने के बाद. अगर कोई सिम्पटम्स दीखते है तोह हम मेडिसिन का कोर्स शुरू करेंगे नहीं तोह ये फिर वही अपने रोज की ज़िन्दगी बेफिक्र जिए. और कुछ भी कह यार ये तेरी औलाद है सख्त जान. कोई और होता तोह जितना समय इसको लगा यहाँ लेन में उतनी देर में काम हो चूका होता. अंदर और बहार से शरीर जरुरत से ज्यादा हे ाचा है ये कह सकते है.", डॉ गुप्ता की साड़ी बात सुनते हे डॉ शंकर अर्जुन के पास राखी डॉक्टर की कुर्सी पर बैठ गया.

"मेरा परिवार बचा लिए गुप्ता आज तुमने. अगर इलाज ये लोग कर रहे होते तोह कहानी ख़तम हो जाती. तू जानता नहीं आज क्या एहसान कर दिया ये मुझपे. जो दरवाजे के बहार बैठी है वह मेरा सबकुछ है और उसका ये.", अपने हाथ में गुप्ता का हाथ पकड़ते हुए शंकर ने जज्बाती होते हुए कहा और गुप्ता ने उसके कंधे पर हाथ रखा.

"मेरे दोस्त, जितना तू मेरे लिए कर चूका वह मैं बता नहीं सकता. आज पहली बार मैं तेरे काम आया हु और फिर दोस्ती में एहसान नहीं होते. बोल दे अपनी जान से की उसकी जान आँखें खोल कर देख रही है.", अर्जुन की आँखों को देख कर गुप्ता ने मुस्कुराते हुए कहा. शंकर बिना अर्जुन को देखे बहार आ गया.

"जा मिल ले उस से लेकिन उसको आज यही रहना है. बोल नहीं सकता कुछ देर तक.", ऋतू को खड़ा करते हुए शंकर ने अपने सीने से लगा लिए. और अपने पिता की बात सुनते हे वह रोटी हुई भी ख़ुशी में गाल चूम कर तितली सी अंदर दौड़ गई.

"बचा लिए भगवन.", शंकर ने इतना कहा तोह तारा भी अपने मां के गले लग गई.

"मां, आप नहीं आते तोह पक्का था के थोड़ी देर बाद अर्जुन के साथ हे ऋतू भी अंदर होती.", इतनी देर से अपने आपको संभाले बैठी तारा की आँखों से भी झड़ी लग गई.

"बस कर मेरी गुड़िया. तेरा मां अभी ज़िंदा है और उसके होते इस परिवार पर आंच तक नहीं आएगी. वैसे पता नहीं मेरी इस औलाद में ऐसा क्या दीखता है सबको जो मेरे बाप से लेकर बेटियां तक आँखों में ganga-jamuna बहा रही है.", शंकर ने माहौल थोड़ा हल्का करने की मंशा से कहा

"मैं आपसे बात नहीं करुँगी मामाजी अगर आपने अर्जुन के लिए कुछ कहा तोह.", रट हुए भी वह रूठती हुई अपने मां के सीने पर हाथ मरती हुई कहने लगी. पहले एक तरफ की कमीज ऋतू ने भिगो दी थी और अब इस तरफ की तारा ने.

"ाचा चल तू मेरे साथ घर चल. वह भी बता दे के उनका लाडला ठीक है. नहीं तोह घर में हर तरफ पानी पानी मिलेगा.", तारा को अपने साथ हे चिपकाये डॉ शंकर घर जाने से पहले अपने पिता को भी खबर दे गए थे अर्जुन के होश में आने की और उन्हें साथ लेकर हे घर आये क्योंकि शाम से पहले किसी को मिलने नहीं दिए जा सकता था, सिवाए ऋतू के जो अब अपने अर्जुन के साथ हे घर आने वाली थी..

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"वह अब बेहतर है माँ. आप कबसे इतनी कमजोर हो गई हो? वह बात और है के उसकी जगह कोई भी और होता तोह शायद न ज़िंदा रहता लेकिन आपकी म्हणत का फल है के उसने सेहन भी कर लिए और अब होश में भी आ गया.", कौशल्या जी शंकर को देखते हे रोने लगी थी और वह अपनी माँ को सँभालते हुए अर्जुन के बारे में बता रहे थे. कमरे के बहार दरवाजे के साथ लगी कोमल अपने पापा की बात सुनकर आँखें पौंछती हुई रसोईघर में दौड़ गई.

"ारु को होश आ गया है मैं, पापा दादी को बता रहे थे अभी. अब तोह आप चुप हो जाओ और पानी पी लो.", गिलास अपनी रोटी हुई माँ के मुँह से लगाती कोमल उन्हें सांत्वना दे रही थी. पिछले 3 घंटे से घर में मौजूद हर शक्श बस रो हे रहा था. कोमल ने एक गिलास अपनी तेजी, माधुरी दीदी और अलका को दिए और फिर से रसोई से और पानी लेकर अपने पापा के पास आ गई.

"इधर मेरे पास बैठ मेरी गुड़िया. मुझे पता है तू कभी ज्यादा नहीं बोलती लेकिन अर्जुन और ऋतू का दर्द तुझे ज्यादा दर्द देता है. अब वह बिलकुल ठीक है. मैं खुद शाम को तुझे लेकर चलूँगा.", कोमल अपने पापा का स्पर्श पाते हे फिर से भावुक हो गई.

"खुद देख ले शंकर इस घर के हाल. तू कितनो को चुप करवाएगा कितनो को समझायेगा. बीटा आज उसको कुछ हो जाता तोह शाम तक मेरी भी अर्थी तेरे कंधे होती. इस बुढ़ापे में उसका वियोग सोच कर हे दिल बहार निकल आया. और पता नहीं ाचा भला था रात को, रेखा भी कह रही थी की सुबह घूम कर आने के बाद अपने कमरे में गया था. जितने देख नहीं लेती मुझे चैन नहीं आने वाला. एक बार बहार से हे दिखा ला बीटा और कुछ नहीं चाहिए.", शंकर को आये 5 मिनट नहीं हुए थे वह अपनी माँ की बात सुनकर फिर खड़ा हो गया.

"अपनी माँ को भी बुला ले गुड़िया और अलका को भी. बाकी शाम को चले जायेंगे. उठ माँ मैं गाडी निकलता हु.", बड़ी गाडी की चाबी टेबल से उठाते हुए शंकर बहार निकल गया और पीछे हे कौशल्या देवी. रेखा, कोमल के साथ हे अलका भी अपने आंसू साफ़ करती गाडी में बैठी तोह शंकर ने पीछे मदद कर अलका के सर पर हाथ फेरा और गाडी बहार निकल ली.

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"यार शंकर तेरी बिटिया को तोह मैंने उसके पास बिठा दिए था लेकिन अब वह अपने साथ तेरी बहु को भी अंदर लिए है. यहाँ की हॉस्पिटल मॅनॅग्मेंट मुझसे पूछ रही है के अंदर 2-2 लोग क्रिटिकल यूनिट में क्या क्या कर रहे है. और कोई गाडी हॉस्पिटल कंपाउंड के सामने कड़ी करि होगी तोह उसके लिए एक्शन लेने का कह गया था एक आदमी. और ये तेरा बेटस तोह अभी स्कूल में नहीं है फिर शादी कब हो गई इसकी?", डॉ गुप्ता अंदर गलियारे में हे शंकर को मिल गया. वही एक तरफ कुर्सी पर सर झुकाये छोल साहब गहरी सोच में डूबे थे. लेकिन गुप्ता अपनी हे धुन में जो भी घटित हुआ बताता चला गया. फिर पीछे 4 और चेहरे देखते हे सकपका गया.

"रेखा तुम माँ के साथ इधर बैठो मैं देखता हु.", छोल साहब के साथ हे अपनी बीवी और माँ को बैठ कर शंकर ने छोल साहब के कंधे पर हाथ रकह.

"चाचा, परेशां मत हो. सब ठीक है अब और आपको क्या जरुरत थी वापिस आने की?", लेकिन छोल साहब की आँखों में भी आंसू देख शंकर का दिमाग घूम गया. जगह को देख उसने बस रुमाल से आंसू पूछे उनके की तभी एक coat-pant पहने हुए व्यक्ति शंकर के पास आ खड़ा हुआ.

"आपका रिलेटिव है जो िक में है?"

"है."

"हमारे हॉस्पिटल में हमने आउटसाइड डॉक्टर अल्लोव कर दिए इसका मतलब ये नहीं की ये हॉस्पिटल आपने खरीद लिए है मिस्टर. सुबह से आपके लोगो ने मैनेजमेंट का मजाक बना रखा है. ये मल्टीस्पेशलिटी है कोई सरकारी डिस्पेंसरी नहीं.", इतना हे कहा था के उस लम्बे गलियारे में 'तड़ाक' की आवाज गूँज उठी. वह आदमी अपने गाल पे हाथ रखे शंकर को घूर रहा था, होंठ के किनारे से खून रिसना शुरू हुआ और उसका चस्मा नीचे बिखरा हुआ था.

"चुप. बिलकुल चुप. यही गाड़ दूंगा अगर एक लफ्ज़ मुँह से निकला तोह.", आसपास 8-9 लोग आ गए थे इस आवाज को सुनते हे. लेकिन मजाल थी कोई कुछ कह पता.

"गुप्ता, अलोक को फ़ोन करके बोल उसका एक आदमी नौकरी से निकल दिए है मैंने.", डॉ गुप्ता से पहले हे एक नर्स be-taar वाला फ़ोन लिए उधर आ कड़ी हुई.

"कौन हो भाई और हॉस्पिटल में क्या लफड़ा लगा रखा है? अभी पुलिस भिजवाओ क्या?", सामने से शायद हॉस्पिटल का मालिक हे बोल रहा था जिसको नर्स ने इस घटना के बारे में बता दिए था.

"तेरा बाप शंकर बोल रहा हु अलोक."

"भाई तू ठण्ड रख मैं आ गया 2 मिनट में.", फ़ोन काट के नर्स को वापिस पकड़ते हुए शंकर िक का दरवाजा खोल कर अंदर आ गया. शायद ये जगह ध्वनिबद्ध (साउंडप्रूफ) थी और बहार क्या हो रहा है अंदर मालूम नहीं था. अर्जुन आराम से लेता था और उसके सीने पर सर टिकाये ऋतू. प्रीती बस उसके बालो में हाथ फेर रही थी.

"ये कैसा है अब?", अपने पापा की आवाज से ऋतू ने सर ऊपर उठाया और प्रीती भी कड़ी होने लगी.

"बैठी रहो बेटी. बस इसकी दादी और माँ देखने आई थी इसको."

"अभी अभी सोया है पापा. डॉक्टर अंकल ने कहा के थोड़ा सोयेगा तोह 1-2 घंटे में हे नार्मल हो जायेगा. मैं बहार जाती हु दादी और माँ मिल लेंगे.", ऋतू न चाहते हुए भी बहार आने लगी.

"कोई जरुरत नहीं है. वह भी अंदर आ कर देख लेंगी इसको. तुम इसके पास से तब तक नहीं जाने वाली जब तक ये उठ कर खड़ा न हो जाये, मैं जनता हु."

"वो एक आदमी आया था डॉक्टर अंकल के पास जो प्रीती को भी पहले नहीं आने दे रहा था. फिर माँ और दादी..

"अब कोई कुछ नहीं कहेगा. हाँ अगर कपडे बदलने हो या खाना, तोह घर चल सकती हो. मैं यहाँ से सबको घर छोड़ कर वापिस चला जाऊंगा.", शंकर ने बहार निकलने से पहले ऋतू से पुछा तोह जवाब उसको पहले हे पता था.

"जाओ देखलो उसको लेकिन शोर मत करना. न हे उसके पास रोने की जरुरत है.", अपने बेटे की बात सुनते हे कौशल्या जी रेखा का हाथ पकड़ती उठकर अपने पौटे से मिलने चल दी.

"तुम दोनों भी मिल लो.", शनकर ने कोमल और अलका से कहा तोह अलका ने कोमल दीदी को भेज दिए.

"चाचा मैं तोह यही रहने वाली हु.", वापिस कुर्सी पर बैठ कर अलका न कहा तोह शंकर ने लम्बी सांस भरी.

"मेरे चाचा लिखवा लो ये आपका लाडला घर में purn-bahumat से सरकार बना चूका है. जिसको देखो उसको अर्जुन के हे पास रहना है.", छोल साहब का मूड ठीक करते हुए शंकर ने कहा तोह वह भी फीकी मुस्कान दे कर उसके गले लग गए.

"आज उसको कुछ हो जाता तोह मैं तुझे कैसे मुँह दिखता शंकर.?"

"बच्चे है चाचा, आप खुदको दोष मत दो. उसके और प्रीती के बीच हम न हे पड़े तोह ठीक. और देखा न आपने के कैसे यहाँ मजे से एक में लेता अपनी जोरू से सेवा करवा रहा है", शंकर जैसे बात थोड़ी समझ चूका था और वह दोनों परिवार पर इसका असर पड़ने नहीं देना चाहता था.

"तू इसलिए मेरा सबसे प्यारा बीटा है शंकर. लेकिन अब मैं खबर लूंगा इन दोनों की एक बार इनको घर आने दो."

"कुछ मत कहना. ये जवान हो रहे बचे है, सीखने दो लड़ते प्यार करते. प्रीती को मैं कुछ कहने नहीं दूंगा, अर्जुन को बचने पूरी फ़ौज है. और आप तोह वैसे भी रिटायर्ड हो.", इतनी देर बाद शंकर के चेहरे पर हंसी आई थी. और छोल साहब भी अब बेहतर थे.

"मेरे आदमी से गलती हो गई शंकर. यार न मुझे किसी ने खबर की थी की तुम्हारे परिवार से है पेशेंट न ये जानते थे की तुम कौन हो. इस बात का असर हमारे बीच मत होने देना भाई.", ये हॉस्पिटल का मालिक था डॉ अलोक प्रताप, जो शंकर के पास आते हे हाथ पकड़ के खड़ा था.

"कैसी बात करता है तू अलोक. बस बेटे की वजह से थोड़ा टेम्पर हो गया. तू परेशां मत हो. बस जबतक मेरा बीटा इधर है तोह उस से मिलने आने वालो को मत रोकना. मैं वापिस जा रहा हु थोड़ी देर तक.", शंकर अब शांत था और बड़े आराम से अलोक से बात करने के बाद गले भी मिला.

"तेरा हे तोह सबकुछ है भाई. ऐ इधर आओ जरा. जो पेशेंट अंदर समझ लो वह मैं हु. कोई कमी नहीं आणि चाहिए देखभाल में. नाम पढ़ लो और जो भी मिलने आये उसके साथ इज़्ज़त्त से पेश आना नहीं तोह नौकरी देखनी शुरू कर लेना.", स्टाफ को कड़कती आवाज में धमकाते हुए अलोक ने कहा तोह शंकर ने हाथ हलके से दबा दिए.

"ोये महाराणा प्रताप, हॉस्पिटल है. थोड़ा आराम से."

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"वैसे अर्जुन ठीक कह रहा था. तुम्हे रेणुका बुआ से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी यार. प्रेग्नेंट है वह और अपने बचे के बाप के लिए स्वार्थ आ जाता है. और ये पागल भी जरुरत से ज्यादा सोचने की वजह से ऐसी हालत में पड़ा है.", प्रीती ने जो भी हुआ था वह अलका और ऋतू को बता दिए था. अर्जुन की हालत अब ठीक थी और इंजेक्शन की वजह से वह सो रहा था.

"दीदी, आप हे बताओ मैं क्या करती? पहले हे उनकी वजह से अर्जुन को समय नहीं दे प् रही थी की वह प्रेग्नेंट है, उनका मूड बदलता रहता है लेकिन जब आज अर्जुन ने उनको उन्ही का सच बताया तब मुझे समझ आया के मैं जो भी बुआ के लिए कर रही थी वो असलियत में उसका हे फायदा लेते हुए मुझे उस से दूर कर रही थी. अर्जुन के जाने के बाद मैंने सिर्फ इतना हे कहा के उनकी ख़ुशी के लिए मैंने अर्जुन से प्यार का बटवारा करना भी मंजूर कर लिए, जो औलाद आज उनकी कोख में पल रही है उसके लिए जाने मैं कितना कुछ सेह रही हु लेकिन उन्होंने मेरे हे विश्वास और प्यार का अपमान किआ. मेरी नादानी की वजह से आज हमारा अर्जुन यहाँ पहुंच गया. मैं उन्हें ज़िन्दगी भर माफ़ नहीं करुँगी.", प्रीती इस समय अपनी ज़िन्दगी के उन फेंसलो पर खुद को कोस रही थी जिन्हे उसने सिर्फ अपनी बुआ की ख़ुशी के लिए लिए था.

"मैं तीनो की बात से सहमत हु. हर इंसान एक सा नहीं होता प्रीती. रेणुका बुआ को अगर हम अर्जुन से हटा कर देखे तोह उनमे एक बड़ी बहिन, राजदार दोस्त और एक ज़िम्मेदार औरत वाली सभी खूबियां है. उनपर शादी के बाद जितने भी जुल्म हुए वह तेरी और अर्जुन की मदद से उन्हें भुला सकीय. और जब एक नया मदद आया उनके प्रेग्नेंट होने पर तोह इन्सेक्युरित्य वाली गलती उन्होंने कर दी, वह भी तुझसे और अपने होने वाले बचे के बाप से. चल अब जो हुआ सो हुआ. हम क्यों ये बात कर रहे है जब इंसान अभी पास है हे नहीं.", अलका दूसरे मरीज के लिए बने बिस्टेर पर औंधी लेती प्रीती को समझा रही थी.

"ये होश में आये तोह सही फिर मैं बताती हु इसको. कमीना ये भी नहीं सोचता की इसके सिवा ज़िन्दगी में बाकी क्या रह जाता. रेणुका बुआ को उनकी ज़िन्दगी गुजरने के लिए सहारा दे दिए लेकिन मैंने जो हमारे sunday-monday प्लान कर रखे है वह तोह दुनिया में आने हे नहीं थे.", ऋतू सोये हुए अर्जुन का गाल चूमते हुए बोली और दोनों लड़किया हैरानी से उसको देखने लगी.

"Sunday-monday मतलब?", प्रीती हैरान थी के ये क्या बात हुई.

"बुद्धू इसका मतलब beta-beti से है. ऋतू को दोनों हे चाहिए. जितना ये दिखती है उस से ज्यादा आग लगी है इसके अंदर.", अलका चेहरा उचकते हुए बोली तोह प्रीती के चेहरे पर भी पुराणी मुस्कान फ़ैल गई.

"धत्त.. कैसी बातें करती हो आप भी. ये सब सोचने की बात है कोई.", प्रीती इतनी बात कहते हे शर्माती हुई फर्श पर देखने लगी.

"रहने दे मानो (बिल्ली), जितनी तू मासूम है मुझे पता है. अब बता न कितने सोचे हुए है? अलका ने भी 2 हे सोच रखे है.", ऋतू ने प्रीती को छेड़ते हुआ कहा.

"एक.", प्रीती ने छोटा सा जवाब दिए और फिर चेहरा झुका लिए.

"क्या? बस एक हे? लेकिन मुझे नहीं लगता अर्जुन एक पर रुकेगा, जितना मेहनती ये है.", अब अलका शोखी से बोली तोह प्रीती ने रहस्य्मय मुस्कान दी.

"ऐ. चीटिंग कर रही है ये. पूछ ऋतू जरा इस से की सच में इसने कितने सोचे है.", अलका की बात पर ऋतू दीदी ने अपनी बोहेन ऊपर करते हुए प्रीती को बोलने का इशारा किआ.

"बताया तोह दीदी एक, लेकिन हर साल.", प्रीती की बात समझते हे दोनों की आँखें बड़ी हो गई.

"इतने संभालेगा कौन? हर साल एक? फैक्ट्री नहीं है.", अलका दीदी हैरान थी प्रीती के जवाब पर.

"यार वह सब तोह ठीक है. प्रीती की तोह शादी आज हो जाये या कल लेकिन अपना रास्ता जरुरत से ज्यादा मुश्किल है.", ऋतू दीदी एक निश्चित आशंका से बोली.

"सुभद्रा ने भी अर्जुन से शादी की थी. दोनों bhai-behan हे थे और रात में दादाजी ने भी कहा के प्यार धरम से बढ़ कर है जब यही उदहारण मैंने उन्हें दिए था. लेकिन शर्त ये है के sunday-monday की जगह, मंडे तो संडे होंगे.", अर्जुन ने ऑक्सीजन मास्क हटते हुए कहा और तीनो इस आवाज को सुनकर पहले तोह हैरान हुई फिर ऋतू दीदी कड़ी होती उसको jhoot-muth का मरने हे लगी की वह दर्द का नाटक करने लगा.

"कहा लगी ारु?", थोड़ा चिंतित होती वह उसके ऊपर झुकी तोह अर्जुन ने जल्दी से चेहरा चूम लिए.

"सुधर जाओ तुम दोनों. यहाँ 2 लोग और भी बैठे है और हमे तेरी हालत की परवाह है इसलिए दूर है.", अलका दीदी ने अर्जुन को सुनते हुए कहा लेकिन उधर बहार दरवाजे की झिरी से वह आँखें बहार से हे ये नजारा देख कर जहा से आई थी उधर हे चली गई.

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5 बजे डॉ गुप्ता अर्जुन का जायजा लेने आये तोह कुछ देर के लिए उन्होंने सभी को बहार जाने को कहा. तीनो लड़किया उनकी बात मानते हुए बहार गलियारे में आई तोह अलका ने जबरदस्ती ऋतू और प्रीती को कैंटीन में चल कर कुछ हल्का फुल्का खाने के लिए मन हे लिए. खाना घर से भी आया था लेकिन दोनों ने हे उस वक़्त भूक न होने का बहाना करते हुए मन कर दिए था. लेकिन अब अलका ने कसम दे कर उन्हें मन हे लिए.

"हाँ तोह बरखुरदार, अब कैसा महसूस कर रहे हो?", कुछ रिपोर्ट्स पर सरसरी नजर डालने के साथ हे उन्होंने अर्जुन की नब्ज़ और शरीर का तापमान देखने के बाद उसके बराबर हे बैठते हुए पुछा.

"मैं बिलकुल ठीक हो सर. शायद पहले से भी ज्यादा ठीक.", अर्जुन का ऑक्सीजन मास्क 2 घंटे पहले हे हटा दिए गया था और अब वह लोहे के बिस्टेर पर तक लगाए बैठा था.

"वह तोह मैं भी देख रहा हु. जैसा ये केस था इसमें 90% चान्सेस रहते है किसी न किसी डैमेज के लेकिन तुम्हारी सभी रिपोर्ट्स एकदम क्लियर है. टेस्ट्स भी बता रहे है के जैसे तुम्हे कुछ हुआ हे नहीं था. तुम्हारी इम्युनिटी किसी भी नोर्मल्ली हेअल्थी पर्सन से बहोत ज्यादा है.", डॉ गुप्ता के स्वर में एक संजीदगी और तारीफ हे थी.

"मेरी पूरी फॅमिली मेरा ध्यान किसी छोटे बचे की तरह रखती है सर लेकिन साथ हे उन्होंने इस शरीर को इस काबिल बनाया है जो आप कह रहे है. सबसे ज्यादा मेरे दादा और दादी जी ने.", अर्जुन भी उनसे अपनेपन से हे बात कर रहा था.

"बरखुरदार जैसा मैंने सब देख परख लिए है, यू अरे 100% फाइन. और मैं स्टाफ को अभी तुम्हारे पास कुछ हलके नाश्ते के साथ भेजूंगा, प्लीज खा लेना. एक रात की बात है क्योंकि प्रसौतिओं के लिए तुम्हे रखना है जिस से सबका वहां दूर हो जाये. और आइंदा ऐसा कोई स्ट्रेस मत लेना जिसमे जरुरत से ज्यादा मेन्टल डिस्टर्बेंस हो. अब मैं चलता हु, टेक केयर.", अर्जुन से हाथ मिलते हुए डॉ गुप्ता सभी रिपोर्ट्स भी अपने साथ हे ले गए.

कोई 5 हे मिनट बाद एक नर्स ट्रे में दलीय और जूस लेकर उसके पास आ गई.

"ये आपका खाना है सर, जब आप खा ले तोह साइड टेबल पर राखी बेल्ल प्रेस कर दीजियेगा. अगर कोई हेल्प चाहिए तोह बता दीजिये मैं कर दूंगी. आपकी सिस्टर्स अभी कैंटीन में है. और बहार कोई आपसे मिलने आया है, आप खाने से पहले उनसे मिलना चाहेंगे या मैं उन्हें वेट करने के लिए कहु?", नर्स को मालूम था के वह किस से बात कर रही है. पूरी इज़्ज़त्त और नरमी के साथ वह अर्जुन से बात कर रही थी.

"थैंक यू वैरी मच. अभी कोई हेल्प नहीं चाहिए और जो भी है उन्हें आप भेज दीजिये सिस्टर. मेरे घर से आये होंगे.", अर्जुन ने अपनी कमर के ऊपर तक चादर कर ली थी, बेशक वह नीला चोगा भी उसको ाचे से ढके हुए था. नर्स भी खाना बराबर में रखने के बाद बहार निकल गई.

"अब कैसे हो अर्जुन?", जूस का गिलास खली करके रखा हे था के उसके सामने अन्नू कड़ी थी. चेहरे पर हमेशा वाली चमक की जगह बस अलग सी शांति थी अन्नू के और एक सादे salvar-kameej के साथ गले में चुन्नी लिए वह एक मासूम सी घरेलु लड़की लग रही थी.

"ाचा हु अब और कड़ी क्यों हो बैठ जाओ. मैं यहाँ हु तुम्हे कैसे पता चला?", अर्जुन को कोई उम्मीद नहीं थी अन्नू के आने की.

"माधुरी स्कूलमाटे थी मेरी, तुम्हारी बड़ी बहिन. एप्लीकेशन देने आई थी वह तुम्हारी दूसरी बहिन के साथ जो स्कूल में हे है. एप्लीकेशन तोह मिस वर्मा को दी थी लेकिन मैं चारुल के साथ ग्राउंड में हे थी तोह बातों बातों में तुम्हारा पता चला. कही इसके पीछे मैं हे तोह...", अन्नू कुर्सी की जगह अर्जुन के पास हे उसके बीएड पर बैठी थी. उसने जब इस सब के लिए खुद को हे दोष देना चाहा तोह अर्जुन ने अपनी सीधे हाथ की ऊँगली होंठो पर रखते हुए चुप्प करवा दिए.

"शठ.. इसमें किसी का दोष नहीं है और तुम्हारा तोह सपने में भी नहीं हो सकता. बस थोड़ा रेस्ट का दिल कर रहा था तोह इधर आ गया. पापा डॉक्टर है न मेरे और यहाँ आराम भी पूरा है.", अर्जुन ने हल्का मुस्कुरा कर देखा तोह अन्नू ने प्यार से वह हाथ पकड़ते हुए वापिस तकिये पर रख दिए.

"इस हाथ में दर्द होगा अभी?", सीधा हाथ हे था वह और उसमे अभी भी इंजेक्शन वाली नलकी लगी थी. अन्नू ने वह देख कर हे अर्जुन से पुछा था और उसने जवाब में बस ना में गर्दन हिला दी.

"मैं खिलाती हु तुम्हे, खुदसे नहीं खा पाओगे.", ट्रे में राखी गरम डालिये की कटोरी उठाते हुए अन्नू फूँक मरते हुए चम्मच से थोड़ा थोड़ा करके अर्जुन को खिलने लगी. अर्जुन ने मन किआ था के वह खुद खा लेगा लेकिन जब अपनापन दिखते हुए अन्नू ने चम्मच मुँह के सामने की तोह वह भी आराम से खाने लगा.

"डॉक्टर क्या कह रहे है अब?", कटोरी के किनारे से दलीय ठीक करते हुए वह बात कर रही थी.

"कल मॉर्निंग में डिस्चार्ज कर देंगे. लेकिन स्कूल अब मंडे हे आने देंगे.", अर्जुन ने शरारत से कहा. थोड़ा सा दलीय उसके होंठो से नीचे लग गया था इस दौरान जिसको अन्नू ने अपने रुमाल से हे साफ़ कर दिए.

"ाची बात है न. रेस्ट हो जायेगा तुम्हारा." अन्नू भी उसका बेहतर हे चाहती थी लेकिन उसको देखे बिना एक और दिन जैसे अब मुश्किल था उसके लिए.

"वैसे अगर बात करने का दिल करें तोह घर भी आ सकती हो. डॉक्टर ने तोह ये कहा है के मैं कल से मेरा रूटीन वापिस शुरू कर सकता हु लेकिन घरवाले स्कूल नहीं जाने देंगे."

"स्कूल के बाद हे पॉसिबल होगा और घर पे आना क्या ठीक रहेगा?", अन्नू की शंका जायज़ थी और उसको थोड़ा डर भी था क्योंकि अब अर्जुन उसकी पुराणी सहेली का भाई था, वह भी छोटा.

"घरवाले तोह यही सोचेंगे की मेरा हाल पूछने आई हैं और इस बहाने दीदी से भी मिल लोगी. हाँ जैसे हम यहाँ बैठे है वह मुश्किल होगा. और मैं आता हु तुम्हारे घर तोह भी परेशानी होगी. अपने घर क्या कहोगी?", अर्जुन ने अन्नू को संकट में डालते हुए कहा और फिर अपनी हे बात आगे बढ़ा दी.

वैसे मंडे तक की तोह बात है. कोई बात नहीं.", जानबूझ कर वह चिंतित सा गंभीर चेहरा बनाते हुए बोलै.

"तुम मंडे की बात कर रहे हो मुझसे आज स्कूल में आखिर एक घंटा निकलना मुश्किल हो गया था. ऊपर से माधुरी ने बताया था के 5 के बाद हे िक में मिलने देते है पेशेंट से. जानते भी हो मैं अंदर आने तक कितना घबरा रही थी ये सोच कर की कोई पूछे तोह मैं क्या बताउंगी. लेकिन मैं रिसेप्शन पर सीधा तुम्हारा नाम बताते हुए आ गई.", अधलेटे से अर्जुन के ऊपर झुकती अन्नू बेहिचक उसके गले लग गई थी.

"मजाक कर रहा था. मैं भी सीधा घर आ सकता हु तुम्हारे, फिजिक्स समझने का बोलूंगा तोह मन करने से रहे. और ऊपर उठो जरा ये कुछ नरम सा लग रहा है कुछ चेस्ट पर.", अन्नू अगले हे पल अर्जुन की छाती पर हलकी चपत मारती हुई वह से उठ कर कुर्सी पर बैठ गई.

"एक लड़की से ऐसे बात करते है?", शर्म से वह नीचे देखने लगी और अर्जुन खुद को सही से बिस्टेर पर लिटाते हुए मुस्कुरा रहा था. इस दौरान उसने ाचे से देख लिए था के दरवाजा पूरा बंद है तोह नाटक करते हुए सर के पास हाथ रखते हुए मुँह से हलकी सी आह की आवाज निकल कर सहलाने लगा.

"देखने दो जरा.", घबराती सी अन्नू आज इस बिस्टेर पर दूसरी लड़की थी जो इस नाटक में फांसी, पहले वह ऋतू को चूम हे चूका तोह और अब देरी न करते हुए अर्जुन ने अन्नू के भी होंठो पर होंठ भिड़ा दिए. अर्जुन के सीने से लगने पर वह पहले से हे थोड़ी भावुक थी और अब किश होते हे अन्नू ने खुद को ढीला छोड़ते हुए खुद बे ाचे से अर्जुन के होंठो को महसूस किआ.

"अब चलती हु यहाँ से. पता नहीं मुझे तुमसे खतरा है या तुम्हे मुझसे." अपने होंठ को दांत से दबती वह अर्जुन के सर को सेहला कर जाने लगी तोह अर्जुन ने पीछे से हे धीमी आवाज में कहा, "घर पे सीखना फिजिक्स, फिर पता चलेगा action-reaction का."

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रामेश्वर जी के साथ हे छोल साहब, संजीव भैया, रुपाली और माधुरी दीदी आये थे अर्जुन से मिलने, लगभग 7 बजे शाम को. िक के बहार हे गलियारे में पहले कमरा शंकर जी ने हॉस्पिटल में बात करते हुए ले हे लिए था जिसमे ऋतू, अलका और प्रीती बैठी थी और अब माधुरी दीदी के साथ रुपाली ने भी पहले बड़ो के मिलने देते हुए वही बैठना उचित समझा.

"दादाजी आप अब आये है?", अर्जुन बाथरूम से हल्का हो कर आया था नर्स की मदद से. और वह अभी बिलकुल ठीक था, बस थोड़ा दवा इंजेक्शन का असर था जो उसको mootra-tyagne में हलकी परेशानी हुई. बिस्टेर पर आते हे अपने दादा को देख पहले तोह खुश हुआ फिर रूठने का नाटक करता पाँव मोड़ते हुए बैठ गया.

"ओह शैतान की डूम. मैं हे आया था सुबह तुझे लेके और तेरे चाहने वालो की कतार देख कर मैंने सोचा अब तोह तभी मिला जाये जब दस साहब के पास टाइम हो.", गाल पर हलकी सी चपत लगते हुए वह बोले और अर्जुन अपने प्यारा दादा के सीने से लग गया.

"एक बात समझ ले आज तू अर्जुन बीटा, ये जो तेरे बड़े दादा है न मैं इनके साथ तेरे पैदा होने से पहले से हु. लेकिन मैंने इन्हे किसी पारिवारिक हादसे या किसी की मृत्यु पर रट नहीं देखा. तेरी वजह से आज मैंने ये भी देख लिए. अगली बार ऐसा कुछ भी हुआ न तोह सोच ले के मैं तेरा क्या हाल करता हु.", छोल साहब प्यार के साथ हे उसको घुड़की भी दे रहे थे.

"क्या सतीश कुछ भी बोलता रहता है. ये मेरा अर्जुन है जो कभी मौत से भी नहीं हार सकता फिर मैं क्यों रोने लगा. वह तोह बस ऐसे हे सब परेशां थे इसलिए हो गया. लेकिन मेरे बचे आइंदा अगर तुझे कोई भी कैसी भी परेशानी हो, मेरे से बात जरूर करना. अब मेरी 3 निकम्मी औलादो के बाद संजीव और तू हे मेरे लायक बचे हो. ये रामेश्वर शर्मा, जिसने भगवन से कभी कुछ नहीं माँगा वह हर रोज बस तुम दोनों की ाची ज़िन्दगी की प्रार्थना करता है.", रामेश्वर जी ने थोड़ा जोर से अर्जुन को सीने से चिपका लिया.

"बाउजी, डॉक्टर ने बोलै है के मैं बिलकुल ठीक हु. और ये सब आपकी और दादी की म्हणत है जो मेरा शरीर इस लायक बना. हाँ बाकि संजीव भैया पर थोड़ी म्हणत करो और उन्हें सिखाओ के छोटे भाई से प्यार कैसे करते है.", उसकी बात पर रामेश्वर जी के साथ हे छोल साहब के चेहरे पर भी खुसी आ गई लेकिन इतनी देर से शांत खड़ा संजीव ढीला पड़ता हुआ जैसे अर्जुन की बाहों में झूल गया. अर्जुन ने भी पूरी मजबूती से अपने बड़े भाई को गिरफ्त में लेते हुए छाती से लगा लिए. रामेश्वर जी अपनी जगह से उठ गए और साथ हे छोल साहब भी. संजीव की हालत तोह उन्होंने घर पर हे देख ली थी जब वह अपनी माँ से पता लगते हे सब chodd-chaad के वह आया था और घरवालों से वही उसको पता चला था के अर्जुन को एडमिट किआ गया है.

"तूने जो भी करना है तू कर भाई लेकिन मैं बस ये बर्दाश्त नहीं कर सकता के तुझे कोई खरोच भी आये. मैं तेरे बिना हमारे सबके होने की कल्पना भी नहीं कर सकता और तू छोटी सी बात पर हे बेहोश हो गया.", अर्जुन ने अपने बड़े भाई की आँखों में पहली बार आंसू देखे थे. वह हमेशा से एक सख़्तदिल बड़ा भाई था और घर में लोगो ने सिर्फ अर्जुन के साथ हे उसके चेहरे पर हंसी देखि थी. अर्जुन के लिए भी संजीव भैया उसके Ram-Kirshan सब थे.

"वादा करता हु भैया के अब मैं कभी अकेला नहीं रहूँगा. ये सब बस इस वजह से हुआ है के मैं बिना परिणाम जाने खुद को परेशां कर गया. बस अपनी आँखों में कभी आंसू मत लाना. ये मैं भी कभी देख नहीं सकता. आप हे तोह इस अर्जुन के कृष्ण हो."

"बड़ी बड़ी बातें करने लगा है तू. और थोड़ा सुधर जा.", उस से अलग होने के बाद संजीव भैया ने अर्जुन के माथे को चूम कर कहा. वह थोड़ी हैरानी से उनको देखने लगा.

"मतलब?"

"मतलब तोह मैं कल रात को बताऊंगा तुझे जब मेरे कमरे में सोयेगा. अब माधुरी और रुपाली को भेजता हु. तू टाइम से खाना खाने के बाद सो जाना.", अर्जुन को अंदेशा नहीं था के संजीव भैया किस बारे में बात कर गए. लेकिन उसने दिमाग पर जोर नहीं डाला. थोड़ी देर माधुरी दीदी और रुपाली दीदी अर्जुन के पास बैठी उस से बातें करती रही और उन्हें भी ये देख कर ाचा लग रहा था के अर्जुन बिलकुल ठीक था. एक नयी बात ये हुई थी रुपाली दीदी ने आज उसको गले से लगाया और माथे पर प्यार दिया था.

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शंकर शर्मा अपने सरकारी बंगले पर वापिस आ चूका था. आते हुए अपनी बीवी को संडे को सुबह तैयार रहने का बोल कर. दलीप सिंह और सरोज की एकलौती बेटी की शादी में घरवालों के सिवाए बस यही 2 लोग जा रहे थे. वापिस कोठी पर पहुंचते हे शंकर अपनी बेचैनी काम करने के लिए नहाने के बाद सिर्फ पजामा पहन कर ड्राइंग हाल में बैठ गया.

टेबल पर रखे कांच के गिलास में से एक को उठा कर एक चौथाई शराब भरते हुए 4 टुकड़े बर्फ मिला कर पड़ा रहने दिए. बेचैनी में सिग्रेटे सुलगता वह गहरी सोच में था. शाम को जो भी उसकी आँखों ने देखा था, वह बेशक एक क्षण भर के लिए देख पाया लेकिन शंकर अंदर तक हिल चूका था उस दृश्य से. और पिछले 4 घंटे से बस वही दिमाग में घूम रहा था. सिग्रेटे के 2 काश खींचने के बाद एक घूँट शराब मुँह में लेते हे शंकर जैसे अतीत में चला गया था.

उसका पहला प्यार, मधु. बेशक कॉलेज में शंकर के बहुत prem-prasang थे जो शहर से लेकर aas-pas के गाँव तक फैले थे. लेकिन समझदारी के दिनों से हे बस उसने मधु को हे देखा था. देखभाल, शरारते, हर ख्वाहिश पूरी करना कब एक ऐसे प्यार में बदल गया के दोनों को एक दूसरे के सिवा कुछ पसंद हे नहीं आता था. फिर अपनी हद्द लांघते दोनों चोरी छिपे एक दूसरे की बाहों में आने लगे, अकेले में एक दूसरे को भरपूर चूमना और सहलाना. 3 साल तक दोनों ने इन्तजार किआ था एक होने का और उनके मिलान की पहली रात मधु दर्द में रोई भी, तदपि भी लेकिन शंकर को एकाकार होने में पूरा साथ निभाती चली गई. शंकर के लिए भी वह पल ज़िन्दगी का सबसे अनमोल था. फिर तोह जब भी दोनों एकांत में मिलते, खुलकर एक दूसरे पर अपना प्यार लुटाते. शंकर की शादी होने के बाद भी दोनों का प्यार बदस्तर जारी रहा और 3 साल बाद हे मधु की शादी भी हो गई थी. लेकिन ज़िद्दी मधु को अपनी पहली संतान शंकर से हे चाइये थी जिसके लिए दोनों ने समाज को टाक पर रखते हुए ये भी कर दिखाया.

"सिग्रेटे से ऊँगली न जल रही तेरी और कहा खोया है तू डाकि जो खुली आँखों से सपने ले रहा.? ेब बालक ठीक है न?", इस आवाज से जैसे शंकर होश में आया तोह सांगवान को सामने बैठे देख बस मुस्कुरा दिए. अब उसके चेहरे पर बड़ी शांति थी और दिल की बेचैनी हवा हो चुकी थी.

"बस सोच रहा था कुछ. और पता नई चला यार ये सिग्रेटे कब ख़तम हुई.", सांगवान के लिए पेग डाला तोह ध्यान दिए के इस बड़े ड्राइंग हाल में अब पहले से ज्यादा रौशनी थी. बंसी एक ट्रे में सोडा, सलाद और बर्फ लेकर आ गया था.

"अर्जुन भी बढ़िया है और अब बिलकुल ठीक है. तेरा तोह मुझे याद हे नहीं रहा था यार.", पेग सांगवान को देते हुए शंकर ने कहा और दोनों ने अपने जाम आपस में टकराये.

"अरे तोह भाई कोनसी बड़ी बात हो गई. तू अगर न भी आता तोह मैं अपने 4 पग लगा के इधर हे सोने वाला था. बढ़िया बात है के बीटा ठीक और तू यहाँ.", उनकी शराब और बातें देर रात तक चलती रही.

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अब कही जा कर रामेश्वर जी के घर में माहौल ठीक हुआ था. संजीव सभी को घर छोड़ने के बाद कल आने का बोल कर वापिस जा चूका था और रात में हे सभी ने पूरे दिन से कुछ खाया था. आज रात तोह तारा भी नीचे हे सोने आई थी माधुरी दीदी और प्रियंका के साथ. आरती अपनी तेजी और अलका दीदी के साथ थी और रेखा जी के एक तरफ कोमल और दूसरी और रुपाली. सभी सोने की कोशिश तोह कर रहे थे लेकिन साथ हे सबको इन्तजार था अर्जुन के सुबह घर आने का.

"आपने भी वही देखा था जी सुबह जो मैंने देखा?", कौशल्या जी भी लेती हुई अपने पति रामेश्वर जी बतिया रही थी.

"बोलो कौशल्या कहना क्या चाहती हो. मैंने तोह आज जैसे सारा संसार देख लिए था उस पल में.", रामेश्वर जी एक आह भरते हुए तकिया ठीक करने के बाद उनकी और मुँह करते सुन्न ने लगे.

"ऋतू. आप नहीं देख प् रहे हो या शायद जानते हुए भी चुप हो. ये दोनों अगर ऐसे हे एक दूसरे के साथ जुड़े रहे तोह वह लड़की इस घर से कैसे जाएगी?", कौशल्या जी दुखी नहीं थी लेकिन थोड़ी चिंतित जरूर थी.

"कौशल्या, उस लड़की ने कभी कोई खिलौना माँगा है क्या 20 साल की ज़िन्दगी में? अर्जुन पैदा हुआ तोह बस उसकी दुनिया वही बन गया था. हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर घर न होने पे शंकर को घर आना पड़ता था सिर्फ ऋतू के लिए. उसका पागलपन 5 साल तक चला और फिर कुछ साल वह जैसे दुनिया से हे अलग हो गई थी जब अर्जुन के आने की उम्मीद उसके लिए ख़तम सी हो गई. अर्जुन के आने के 10 महीने बाद तक वह अपने किसी डर की वजह से वह उस से बात तक करने से डर्टी रही. लेकिन अब उसके पास फिर से वही दुनिया लौट आई है. मैं, तुम या शंकर कुछ भी नहीं कर सकते. तुमने पुछा था न के मैंने सुबह देखा या नहीं. कौशल्या मैंने इतना निस्वार्थ प्रेम अपनी पूरी ज़िन्दगी में नहीं देखा.", रामेश्वर जी जैसे शुन्य में देखते कुछ और भी याद करने लगे.

"वही मेरी चिंता की बड़ी वजह है. आपने कल उसका आखिरी सवाल नहीं सुना था? मुझे तोह तभी घबराहट होने लगी थी.", कौशल्या जी ने बिस्टेर पर बैठते हुए टेबल से दूध का गिलास उठा कर रामेश्वर जी की और बढ़ा दिए.

"वह सिर्फ पहला सवाल था. ऋतू कभी कुछ मांगेगी नहीं क्योंकि वह समझदार है और सबकी बराबर परवाह है उसको. लेकिन अर्जुन, जब किसी को भी परेशां नहीं देख सकता तोह ऋतू की ख़ुशी के लिए शायद वह पूरे samaaj-pariwar के सामने खड़ा हो जाये. चलो अब ये सब छोड़ो, और तुम भी दूध ख़तम करके सोने की कोशिश करो. सुभद्रा को भागने के लिए इस अर्जुन के पास अभी कृष्ण नहीं है. समय ने क्या लिखा है कोई नहीं जानता.", वापिस खुद को सोने की मुद्रा में व्यवस्थित करते रामेश्वर जी ने कहा.

"ऋतू मेरी उतनी बड़ी चिंता नहीं है जी. प्रीती है.", कौशल्या जी अभी गरम दूध पी हे रही थी.

"वह खुद ऋतू के साथ है, बचपन से. थानेदारनी जी, ऊपर वाला जो करेगा कुछ सोच कर हे करेगा. तुम अपने लाडले पर ध्यान दो के वह ज़िन्दगी में कभी हारे नहीं और उसकी परवरिश में कमी न हो."

"मैंने आज तक कभी कोई कमी राखी क्या? आगे भी नहीं रखने वाली. मुझे बस मेरे बचे खुश चाहिए.", कौशल्या जी ने गिलास रखा और लेट गई.

"वाह भगवान्. खुद रामायण शुरू की और अब खुद कह रही हो के बचे खुश भी चाहिए. तोह चैन से ज़िन्दगी जियो और बस करम करते रहो.", रामेश्वर जी के चेहरे पर अब कही वह उनकी मुस्कान आई थी.

"वह कृष्ण कही यहाँ बिस्टेर पर हे न लेता हो. शुबरात्रि जी. ऊपर वाला सब पर मेहर करे.", कौशल्या जी भी सोने से पहले पंडित जी पर तंजज कास हे गई लेकिन वह मुस्कुरा कर सोने की कोशिश करने लगे.

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सारा दिन अर्जुन की देखभाल करते हुए बिना ज्यादा कुछ खाये ऋतू थक गई थी लेकिन फिर भी वह सोने की बजाये अर्जुन के पास हे बैठी थी.

"इधर मेरे पास आओ आप.", अर्जुन ने कुर्सी पर बैठी ऋतू को अपने पास जगह बनाते हुए अपनी बार पर सर रखवाते हुए लिटा लिए. डॉक्टर आज के दिन का आखिरी चक्कर लगा के चले गए थे. और नर्स ने बता दिए था के बेल्ल बजा कर बुला सकते है जरुरत होने पर. अब कोई नहीं था इन दोनों के सिवा.

"जरुआत से ज्यादा हे प्यार नहीं करती आप मुझसे?", उनके गाल थपथपते हुए अर्जुन उनकी आँखों में हे जैसे खो गया था.

"अपनी जान से सभी प्यार करते है और तेरी जगह अगर मैं..

"चुप. फिर कभी ये मत कहना. आप तोह मुझे संभल भी सकती हो लेकिन मैं शायद अपने होश में न राहु अगर कुछ ऐसा वैसा हुआ तोह.", अर्जुन को ऐसे डरते देख ऋतू ने बड़े प्यार से होंठो को चूम कर सर पर हाथ फिर दिए. अर्जुन को भी उतना हे प्यार था ऋतू से.

"वैसे एक बात बता, तू सुधरने नहीं वाला न?", ऋतू को जैसे कुछ याद आया.

"अब क्या कर दिए मैंने?", अर्जुन ने कमीज के ऊपर से उनका एक उभर पकड़ने की कोशिश की हे थी की ऋतू ने हाथ पकड़ लिए.

"आजकल बहोत कुछ तेरे से पता नहीं चलता लेकिन सामने आ हे जाता है. वह शाम को किसके हाथ से खाना खाया जा रहा था.", ऋतू की बात पर अर्जुन एक पल के लिए चुप हो गया.

"वह मेरी फ्रेंड है एक. ाची फ्रेंड बस.", अर्जुन ने फिर से हाथ रखना चाहा तोह ऋतू ने वैसे हे हाथ पकडे रखा.

"लेकिन वह शायद खुद को तेरी ाची फ्रेंड से ज्यादा समझती है. पहले तोह नहीं देखा मैंने फिर भी थोड़ी jaani-pehchani थी. सच बता पूरा.", अर्जुन अब एक पल के लिए खामोश हुआ और फिर ऋतू दीदी की आँखों में देखते हुए बोलना शुरू किआ.

"इस साल से हे शायद वह हमारे स्कूल में पढ़ने लगी है, फिजिक्स. घर के पास हे रहती है हमारे, 2 गली दूर स्कूल की तरफ जो रास्ता जाता है वही. उसने हे मुझसे प्यार का इज़हार किआ था और वह तोह खुद कह रही थी की ये गलत है लेकिन उसका खुद पर कोई कण्ट्रोल हे नहीं हो रहा. कल अगर मैं हाँ नहीं कहता तोह वह आज स्कूल से रिजाइन करके जा चुकी होती. यही सच है और मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं किआ इसमें.", ऋतू बड़े ध्यान से सुन्न रही थी और उसको भी मालूम था के अर्जुन उस से कभी झूठ नहीं बोल सकता.

"उमाहहह.. तू न सही में गधा है, पूरा गधा. अब उसकी भी गलती क्या है अगर हो गया तोह तुझसे प्यार. लेकिन जब तू उस से मिलेगा न तोह प्रीती के बारे में बता जरूर देना.", अब ऋतू ने खुद हे अर्जुन का हाथ अपने एक उभार पर रख लिए था.

"क्यों आपके बारे में नहीं बताऊ क्या? वैसे मैंने पहले हे कह दिए है के स्कूल में हम वही है जो सबके सामने है और मैं हर परेशानी, जरुरत में उनका साथ दूंगा लेकिन मेरी ज़िन्दगी में बहुत कुछ है जिस से किसी भविष्य की उम्मीद न रखे. और मेरा भविष्य यहाँ है, संडे मंडे पर.", अर्जुन ने ऋतू का निचला होंठ मुँह में पकड़ते हुए हलके हलके वह मुलायम सख्त उभर दबाना जारी रखा.

"ोये कही भी मत शुरू हो. आराम कर बस, ये हमारा घर नहीं है.", धीमी आवाज में ऋतू ने कहा लेकिन हाथ नहीं हटाया. अर्जुन भी उन्हें खुद से लगते हुए सहलाने लगा. थकी हारी ऋतू उसकी बाहो में जल्द हे सो चुकी थी. अर्जुन ने फिर ठीक तरीके से पूरे बिस्टेर पर उन्हें लिटाया और खुद उतर गया. आज ज्यादा हे आराम हो गया था और अब नींद नहीं आ रही थी. अंदर हे बने बाथरूम से हल्का होने के बाद वह कुछ देर गलियारे में टहलता रहा. फिर वापिस अपनी जगह आ कर सोई हुई ऋतू के मासूम चेहरे को देखने लगा, कुर्सी पर उसके करीब बैठ कर.

'बिलकुल पागल है ये. सबके सामने हे मेरे साथ चिपकी रही और तोह और पापा तक की परवाह नहीं की. इतना प्यार कोई कैसे कर सकता है. और कैसे chaan-bin करती रहती है, लेकिन बस बताने भर से हे वापिस पहले जैसी. ी लव यू ऋतू.', बहोत देर तक उन्हें ऐसे हे ताकते हुए अपने मैं में हे अर्जुन ने कहा. वह दोनों हाथ बीएड पर रखे उसपर चेहरा टिकाये बस अपनी तरफ मुँह करके लेती ऋतू में हे खोया रहा.

"ी लव यू तू ारु. उम्माह. चल अब सो जा थोड़ी देर.", अर्जुन स्तब्ध रह गया के ये कैसे संभव है लेकिन जाहिर किये बिना ऋतू की कमर पर हाथ रखते हुए लिपट कर वह भी जल्द हे सो गया. पूरे 2 घंटे वह उनमे खोया रहा था.
 
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