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मिलान
सुबह 6 बजे के करीब नर्स अर्जुन को देखने आई तोह सामने का दृश्य देख कर मुस्कुराती हुई वापिस हे चली गई लेकिन उसके बाद अंदर आई प्रीती के चेहरे पर अलग हे चमक आ गई थी. अर्जुन बिलकुल सीधा लेता था और उसके ऊपर पाँव चढ़ाये छाती पर सर रखे बेसुध सी लिपटी ऋतू.
"बिटिया यहाँ क्यों कड़ी है? अब लेने आये अर्जुन को तोह अंदर तोह चल.", कौशल्या जी की आवाज सुनते हे प्रीती के चेहरे पर एक डर चा गया लेकिन अंदर ऋतू झट्ट कड़ी होती दूसरे बिस्टेर पर बैठ गई.
"ऋतू बीटा, अपने भाई को उठा. हमने बात कर ली है बहार और उन्होंने कह दिए के अर्जुन को ले जा सकते है. उन्हें रिपोर्ट में कुछ भी नहीं मिला.", उनकी बात सुनते वक़्त भी ऋतू के चेहरे पर ऐसी शर्म थी जैसे सुहागरात की अगली सुबह कमरे में सास आने पर दुल्हन के होती है.
"जी दादी. आप अंदर आ जाइये, इतने मैं सामान भी इकट्ठा कर लेती हु.", ऋतू ने अर्जुन को उठाने से पहले जरुरी सामान एक तरफ किआ. कौशल्या जी भी समझ गई की ऋतू उठाने से रही अर्जुन को.
"कुम्भकरण, उठ जा अब. कुछ हुआ है नहीं और बिस्टेर टॉड रहा है.", अर्जुन अपनी दादी की बात सुनता बिस्टेर पर हे ऊपर उठा और उन्हें बाँहों में ले लिए.
"मेरी प्यारी दादी. तोह आपसे घर रुका नहीं गया जो खुद आ गई.", अर्जुन लाड से उनको बोलै तोह वह भी हंसने लगी.
"सुधर जा तू कपूत. बहोत परेशान किआ है तूने सबको. और सबसे ज्यादा इन दोनों को.", अब अर्जुन उनकी बात पर झेंपता सा बिस्टेर से उठा और एक तरफ रखा अपना pajama-tshirt उठाते हुए बाथरूम में चला गया.
"प्रीती बीटा, ये सामान तू पकड़ ले. और ऋतू, अपने भाई को ले आना बहार. मैं तेरे दादाजी के पास हे चलती हु.", उनके जाते हे प्रीती ने शरारत से ऋतू दीदी को देखा.
"आप दोनों तोह यहाँ भी."
"क्या यहाँ भी? और जब तुझे दिख हे गया था तोह आवाज नहीं लगा सकती थी. पागल, बच गए दादी की आवाज सुनाई न देती तोह आज हे घर निकला हो जाना tha.",Ritu अब प्रीती के गले लग गई थी.
"वैसे सच में क्या सन था दीदी. कैमरा होता तोह पका फोटो ले लेती. कैसे आप लेती हुई थी और उसका हाथ कहा पर था.", प्रीती धीरे बोल रही थी साथ हे हंस भी रही थी.
"तू घर चल फिर तू हे मुझे करके दिखाना के कैसा सन था.", आँख मरती हुई ऋतू अब प्रीती के मजे लेने लगी
"चलो. मैं तोह तैयार हे हु. शायद आगे के सन भी दिखा दूंगी, जितना आप देख सको.", प्रीती जैसे अब बदल हे गई थी. शर्मा तोह रही थी लेकिन अब जैसे वह अर्जुन के साथ कुछ भी छुपाना नहीं चाहती थी.
"अरे मेरी जान, बड़ी जल्दी समझ आ गया तुझे प्यार करना."
"और क्या दीदी, अब क्यों पीछे हटना. कल हे हॉस्पिटल में सबको आपने ये जो बोल दिए था के मैं उसकी बीवी हु.", प्रीती इठलाती हुई बोली और अर्जुन को बहार आया देख चुप हो गई.
"ाचा मैं दादी के पास चली, तू इसको ले आ.", ऋतू जल्दी से भाग गई और अब प्रीती अकेले में अर्जुन के पास कड़ी बेचैन होने लगे.
"तोह कैसे चलना चाहोगी? गॉड में या पीठ पर?", प्रीती जबतक उसकी बात समझती अर्जुन ने कंधे के नीचे से पकड़ते हुए प्रीती को उठा कर सीने से लगा लिए.
"प्लीज छोड़ो पागल. दादी आ जाएगी.", प्रीती के चेहरे पर हल्का डर लेकिन अंदर हे वह खुश थी अर्जुन को पहले की तरह देख कर.
"दादी ने हे तोह कहा था के मैं बहार चली. अब यहाँ तोह कोई नहीं है.", घर से नाहा कर इधर आई प्रीती के बदन की खुशबु लेते हुए अर्जुन अपना चेहरा उसकी गर्दन और सीने के करीब करके खड़ा था. प्रीती की साँसे तेज हो गई और आँखें बंद.
"ाचा चलो.", अर्जुन ने उसकी हालत देखते हुए कहा और नंगे पाँव हे प्रीती के साथ बहार आ गया. यहाँ सभी खड़े उसकी हे राह देख रहे थे. छोल साहब ने अर्जुन को गले से लगाया और अपने साथ लिए गाडी तक आ गए.
"सतीश, इन्होने पैसे क्यों नहीं लिए हमसे?", गाडी में बैठते हे कौशल्या जी ने पहला सवाल किआ. अर्जुन भी ये सुनकर अपनी दादी की तरफ देखने लगा. जो पीछे वाली सीट पर बैठी थी रामेश्वर जी के साथ. प्रीती और ऋतू सबसे आखिरी हिस्से में आमने सामने थी.
"भाभी शुक्र मनाओ के हॉस्पिटल सही सलामत है. आप नहीं थी उस वक़्त जब शंकर ने इस हॉस्पिटल के मैनेजर का गाल लाल कर दिए था. सारा हॉस्पिटल हे एक मिनट बाद उधर जमा हो गया था. जिसने अभी आपके पाँव छुए वही मालिक है इसका और अपने शंकर से थोड़ी दोस्ती है.", छोल साहब की बात सुनकर अर्जुन खुद को रोक न पाया.
"अब पापा ने उन्हें मारा क्यों था?"
"तुझे जब लेके आये थे तब तारा ने गाडी वह लगा दी थी जहा रास्ता है अंदर जाने का, रिसेप्शन के बहार. फिर तेरा इलाज अपने दोस्त डॉक्टर से करवाया, िक में पहले ऋतू और बाद में प्रीती भी अंदर आ गई थी. ये सब ऐसी जगह पर सख्त मन है. गाडी पार्किंग में, ट्रीटमेंट के समय कोई भी िक में नहीं, 2 से ज्यादा विजिटर होस्पिअल में नहीं और ऐसे हॉस्पिटल के डॉक्टर हटा देना तोह बिलकुल नहीं. लेकिन अब बात शंकर के परिवार की है तोह तारा भी सही, और िक तोह फिर ड्राइंग रूम हुआ जहा सभी बचे बैठ के अंताक्षरी खेलेंगे.", छोल साहब की बात पर सभी हंस दिए, रामेश्वर जी को छोड़ कर.
"सतीश, मेरी समझ से तोह वह बहार हे है. हर वक़्त हाथ में खारिश लिए घूमता रहता है और तुझे उसका ये करना बड़ा पसंद है. वैसे तू अकेला नहीं है उसका हितेषी.", रामेश्वर जी तल्खी से बोले और कौशल्या जी ने कोहनी लगते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा किआ.
"हाँ तोह मेरी भाभी से पूछ लो की परिवार जरुरी है या ऐसे अनपढ़ मैनेजर जिन्हे जरा भी समझ नहीं दुनियादारी और परिवार की. शंकर के जिम्मेदार बचा है और सबसे बड़ी बात के वह अपने परिवार की ख़ुशी के लिए कोई हद्द नहीं देखता. समंदर सा बिलकुल.", छोल साहब गाडी चलते हुए पिछले शीशे में भी देख रहे थे.
"बिलकुल सही बात है. मेरा बीटा घर से बहार रहता है लेकिन वह इसलिए रहता है जिस से घर की परेशनी भी बहार हे रह सके. और कोई तेरे भाई साहब से पूछे के उन्हें अगर उसका ऐसा करना बुरा लगता है तोह उसको rokte-tokte नहीं? 500 तनख्वाह थी इनकी तब उसको 200 देते थे और मुझे pariwar-baaki बचो के लिए 200. ऊपर से जो भी कहते रहे लेकिन श्री रामेश्वरम की चाय में हे शंकर रहते है.", अब सच में रामेश्वर जी निरुत्तर थे लेकिन चुप रहना भी ठीक नहीं था. बचे इन तीनो की बातें बड़े ध्यान से सुन्न रहे थे.
"उसकी काबिलियत पर मुझे कभी संदेह नहीं हुआ. अगर उसके पेशे की हे बात करू तोह उसको शायद अपने काम से इतना लगाव है जितना मुझे भी नहीं था शायद. जितने वह अपनी ड्यूटी पर रहता है तोह मरीज हे उसके लिए सबकुछ है, फिर रात हो जाये या अगला दिन. लेकिन जब उसको कोई समस्या अपने mareej-hospital से बहार दूर करनी हो फिर उसका तरीका जो है वह न मुझे पहले पसंद था और ना आज. कर मैं सचमुच कुछ नहीं सकता क्योंकि इधर भी उसका हाथ इतनी सफाई से चलता है जैसे ऑपरेशन के वक़्त. साथ वाली नस को पता नहीं चलता के बराबर में किसी ने सर्जरी भी कर दी है."
"भाई साहब उसमे सीखने की लगन थी. सर्जरी पढाई से और सफाई उसने आपके माहौल में सीख ली."
"इस मुद्दे का तोह कोई अंतत है नहीं सतीश. और ये बचे भी बोरियत महसूस करने लगे होंगे. फिर कभी करेंगे इस मुद्दे पर बात.", रामेश्वर जी ने हथियार दाल दिए थे और बाकी दोनों मुस्कुरा रहे थे.
"चल मेरे शेर, अब ध्यान से उतर और अंदर चल के कोमल को बोल 3 चाय बनाये अपने हाथ की.", घर के सामने गाडी रोकते हुए छोल साहब ने कहा और बाकी सभी भी अपनी तरफ के दरवाजे खोलते हुए बहार निकल आये.
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अगले 10 मिनट तक तोह सभी अर्जुन को गले लगते, चूमते हुए मिलते रहे. रेखा जी और कोमल दीदी के तोह आंसू भी निकल आये थे लेकिन उसको सही सलामत देख कर ख़ुशी की वजह से. फिर कोमल दीदी चाय बनाने चली गई और अर्जुन अपनी माँ को साथ लिए उनके कमरे में आ गया.
"अगर मैंने आज के बाद तेरे चेहरे पर शिकन भी देखि तोह फिर तेरा बिस्टेर यही लगवा दूंगी, मेरे कमरे में.", रेखा ने थोड़ी दांत और प्यार से कहा लेकिन अर्जुन उनका गाल चूम कर शरारत से बोलै.
"जब पापा आएंगे फिर तोह बहार निकलोगी."
"अब भी मस्ती सूझ रही है तुझे? जा पहले साथ वाले कमरे में प्रियंका और आरती से मिल ले. वो दोनों बेचारी तोह कल से इतना दरी हुई है के रात तक बहार भी नहीं निकली थी. एक बार मिल ले उनसे.", अर्जुन को भी ध्यान आया था के उसने अपनी इन दोनों बहनो को देखा हे नहीं था. वो जल्दी से उठ कर माधुरी दीदी वाले कमरे में गया जहा प्रियंका दीदी करवट लिए सो रही थी और आरती अपनी डायरी में चुपचाप कुछ लिख रही थी.
"भाव..", आरती के पीछे आकर अर्जुन ने जैसे हे डराया वह सीधा उसके गले लग गई. अर्जुन को कुछ पल बाद महसूस हुआ अपने कंधे पर गिरता गरम पानी.
"दीदी, अरे क्या हुआ आपको? देखो मैं बिलकुल ठीक हु और आपके पास हु.", आरती अलग न हुई लेकिन प्रियंका दीदी ने खड़े हो कर साइड से अर्जुन को बाहों में ले लिए.
"इतनी हिम्मत नहीं हैं हम दोनों बहनो में मेरे भाई. तुझे लगा होगा के हम दोनों तुझसे मिलने नहीं आई लेकिन हर पल बस हम तेरे घर आने की दुआ मांग रही थी. दिल कुछ ज्यादा हे कमजोर है हमारा.", अर्जुन भी दोनों की जरुरत से तेज चलती धड़कन महसूस कर प् रहा था. प्रियंका और आरती ने हर रोज अपनी माँ के दर्द को देखा था और सिर्फ इस वजह से हे नरिंदर ने अपनी दोनों बेटियों को यहाँ भेज दिए था जिस से वह हर समय घबराई दरी न रहे.
"बहोत हिम्मत है आप दोनों में. और आप दोनों आओ मेरे साथ बहार, जोरो की भूख लगी है मुझे. आप बनोगी और आरती दीदी खिलाएंगी.", अर्जुन उनके चेहरे साफ़ करता अपने साथ जबरदस्ती बहार ले आया. ललिता जी ने भी उन्हें गले लगते हुए प्यार से समझते हुए अपने पास बिठाया लेकिन अर्जुन अपने साथ आरती को खाने की मेज तक ले आया.
"दीदी, स्कूल जा रही हो?", रूपाली तैयार हो कर वही बैठी थी. अर्जुन की बात पर वह मुस्कुरा दी.
"तेरी एप्लीकेशन दी हुई है मेरी नहीं. और फ़िक्र मत कर, घर आने के बाद तुझे पढ़ा भी दूंगी.", रुपाली की बात पर अर्जुन इधर उधर देखने लगा.
"मैं बीमार हु तोह अभी पढाई नहीं कर सकता. मंडे से करेंगे न.", अर्जुन की ऐसी हरकत पर आरती के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई. अर्जुन ये देख कर हे खुस हो गया था और रुपाली को भी समझ आ गया के वह क्यों नौटंकी कर रहा है.
"वैसे तू ज्यादा हे बीमार नहीं है जो इतनी सुबह हे पराठे खाने बैठ गया.", ऋतू उसका कान पकड़ती हुई बोली और सामने से हे कौशल्या जी आ गई.
"अब मेरे लाल ने पूरा एक दिन खाना नहीं खाया तोह वह कमी पूरी करेगा हे. चल मेरे बचे जल्दी से खाना खा के तैयार हो जा और स्कूल चल.", दादी की बात पर अर्जुन को छोड़ कर सब हंसने लगे.
"आप भी सबके साथ मिल गई दादी? मैं आपसे बात नहीं करूँगा.", अर्जुन प्लेट एक तरफ करते हुए झूठा गुस्सा दिखने लगा तोह एक साथ उस पराठे पर तीन हाथ लगे और तीनो ने एक एक गरै उसके सामने कर दी.
"तू ऐसे हे ाचा लगता है मेरे लाल. देख घर फिर से घर हो गया.", पहले कौशल्या जी ने खिलाया फिर आरती दीदी ने और आखिरी में पीछे कड़ी ऋतू दीदी ने. अर्जुन भी ये देख कर खुश था. अगले हे पल भरे हुए मुँह में रुपाली दीदी ने भी एक निवाला प्यार से ठूंस दिए.
"उम्म्म.. बस करो भाई. पूरा पराठा मुँह में भर दिए. सब मिले हुए है यहाँ तोह.", अर्जुन फूले हुए मुँह से अजीब आवाज में बोलै और कौशल्या जी उसकी नजर उतरती रसोईघर में चाय लेने चली गई. रुपाली भी जाती हुई हाथ हिला कर अर्जुन को bye बोल कर गलियारे से निकल गई.
"प्रीती तू भी बैठ और ये ले कॉफ़ी.", अलका दीदी ने 4 कप कॉफ़ी टेबल पर रखते हुए प्रीती को अपने साथ बिठाया और Aarti-Ritu को भी उनके कप दे दिए.
"वैसे इन दोनों के हाथ से भी खा ले ारु. सबने खिलाया तोह इन गरीब पर भी कृपा कर दे.", ऋतू की बात प्रीती के तोह समझ न आई लेकिन अलका ने एक निवाला टॉड कर अर्जुन के मुँह के सामने किआ. अर्जुन जैसे हे खाने लगा अलका ने वह अपने मुँह में दाल लिए.
"ये गरीब भूखी है मालकिन.", आँख मरते हुए अलका ने ऋतू से कहा और अर्जुन इन दोनों की मिलीभगत देख रहा था. फिर जैसे हे प्रीती की तरफ देखा तोह उसने शरमाते हुए नजरे झुका ली.
"और ये? लगता है इन्हे साहब अपने हाथ से खुद खिलाएंगे.", अब अर्जुन भी इशारा समझ गया था ऋतू दीदी का और एक निवाला टॉड कर उसने प्रीती की तरफ बढ़ाया. जो की वह वापिस अपने हे मुँह में डालने वाला था. लेकिन अलका ने उसका हाथ वही पकड़ लिए और प्रीती ने हलके से दांत चुभते हुए निवाला मुँह में ले लिए.
"आउच. यहाँ तोह मैं हे हलाल हो रहा हु. मुझे लगा था के आप मेरे साथ हो. मैं नहीं बात करता आप लोगो से. मेरी माँ हे खिलाएगी मुझे.", अर्जुन पाँव पटकता हुआ रसोईघर में दौड़ गया और ऋतू अलका दीदी से हवा में ताली मारती हंसने लगी.
यही तोह होता है परिवार.. छोटी छोटी अनगिनत खुशियां जहा हर क्षण मिलती है, सब एक दूसरे के साथ हर स्थिति में खड़े रहते है.. साथ मिलकर खुशियां मानते है और दुःख की घडी में एक दूसरे के साथ जुड़ कर खड़े रहते है. ज़िन्दगी कितनी खुशियां समेटे है ये बस एक लक्ष्य के पीछे भागने भर से नहीं पता चलता. लक्ष्य पाने का असली मजा है ऐसे एक दूसरे के साथ रहते हुए हंसी खुसी हर पल को जीना. रूठना, मानना, हंसना और हँसाना. और रामेश्वर जी का ये परिवार बिलकुल आदर्श परिवार था.
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"पापा, अब कैसा है अर्जुन? घर ले आये उसको?", पंडित जी के घर से चाय पीने के बाद छोल साहब और प्रीती घर आ गए थे. और कुछ हे देर में शिमला से रेणुका ने फ़ोन करके हलचल पूछने के बाद अर्जुन के बारे में पुछा.
"वह अब ठीक है रेणुका. अभी आधे घंटे पहले हे लेकर आये है उसको.", छोल साहब आराम से हे बात कर रहे थे लेकिन फ़ोन बुआ का है ये पता चलते हे प्रीती अपने कमरे में चली गई.
"रखती हु पापा. बस हलचल पूछने के लिए हे फ़ोन किआ था. आप भी समय से खाना खा लीजियेगा.", रेणुका से जब खुद को और संभाला नहीं गया तोह इतना कहते हे फ़ोन काट कर वह कुर्सी पर बैठी रोने लगी. दिल में फिर से दर्द तेज हो गया था और अर्जुन.. अर्जुन के साथ उसने कैसे ये कर दिए. जो उस से इतना प्यार करता है, इज़्ज़त्त देता है. लेकिन साथ हे प्रीती, जिसने सबकुछ किआ सिर्फ उन्हें खुश रखने के लिए. खिड़की बहार पहाड़ दिख रहे थे लेकिन इस पल तोह जैसे रेणुका का दिल इनसे भी बड़े पहाड़ से भोझ और दर्द के नीचे दबा था. आंसू बहते हुए जमीन पर गिरने लगे थे.
फिर चेहरा साफ़ करती वह अपने आप से हे कहने लगी, "अर्जुन मैंने तुम्हारे दिल को समझा है. मैं हे स्वार्थी हो गई थी लेकिन मैं जानती हु तुम अपनी रेणुका को माफ़ कर डोज. फिर चाहे तुम मुझे प्यार करो या सजा दो, मैं तुम्हारी याद और हमारे बचे के साथ पूरी ज़िन्दगी जी लुंगी"
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अर्जुन नहाने धोने के बाद किताबे उठा कर अपने दादाजी के पास हे उनकी बैठक में पढ़ने लग गया. रामेश्वर जी ने एक बार उसको देखा और फिर मुस्कुराते हुए वह भी अखबार पढ़ने में लीं हो गया. ऋतू ने पूरे घर में अर्जुन को ढूंढा और फिर वह भी बैठक में आ गई जहा वह अपना सर खुजाता हुआ कोई सवाल हल करने में लगा था. रामेश्वर जी ने ऋतू को देखा जो बड़े गौर से अर्जुन की कॉपी में लिखा हुआ पढ़ रही थी.
"जब नहीं समझ आ रहा तोह गलत क्यों कर रहा है? इधर दे पेन और ध्यान से समझ. आर्गेनिक केमिस्ट्री इजी है अगर तू स्ट्रक्चर में कंफ्यूज न हो तोह. एक पेज पूरा खराब किये बैठा है और अभी भी लगा हुआ है.", ऋतू ने थोड़ा गंभीर आवाज में कहा था और साथ हे अर्जुन के कान के पीछे चपत लगा दी. अर्जुन भी चुप था और रामेश्वर जी एक पल उन्हें देखने के बाद वापिस अखबार में नजर डाले सुन्न रहे थे.
"ये कम्पलीट स्ट्रक्चर है. अब इसको ब्रेक करते है.. ऐसे.. अब ये और .. अगले 15 मिनट तक ऋतू बोलती रही और कॉपी में लिखते हुए अर्जुन को समझती रही. इस समय वह कही से भी उसकी लाड़ली बहिन नहीं लग रही थी. फिर नजर का चस्मा थोड़ा सा ठीक करते हुए कुछ सवाल बना कर अर्जुन को दिए और उन्हें हल करने का बोल कर वह से चल दी. "15 मिनट में ये तीनो करके रखना. मैं नाहा कर आई तब तक."
"बाप रे, पूरी हिटलर है ये. स्कूल हे चला जाता इस से तोह ाचा.", अर्जुन की बात पर रामेश्वर जी मुस्कुरा रहे थे और उन्हें ख़ुशी थी की ऋतू इतना ध्यान देती है अर्जुन की हर चीज पर. कौशल्या जी अब खली समय में इधर आ गई थी और अर्जुन को पढ़ते देख उसके सर पर हलकी चम्पी करने लगी. काम को भूल कर वह भी आँखें मूंदे मजे लेने लगा. अपने बताये समय पर ऋतू दरवाजे पे कड़ी ये देख रही थी और इस बार जो अर्जुन का कान खींचा तोह अर्जुन की साडी मस्ती फुर्र हो गई.
"सुधर जा रे सुधर जा.", ऋतू ने तल्खी से कहा तोह कान मसलता अर्जुन कॉपी के पैन उन्हें दिखता दूसरे हाथ से अपना कान सेहला रहा था.
"और ये आखिरी वाला? ये गलत कहा हो गया?", ऋतू वापिस बैठ गई उसके बराबर और कौशल्या जी ऊपर दीवान पर बैठी चुपचाप देखने लगी इन दोनों को.
"जो स्ट्रक्चर दिए है वह तोह किताब में है हे नहीं और आपने अभी तक मुझे सेकंड ईयर की किताब कहा दी है, वह तोह आप हे पढ़ रही हो.", ये सुनके रामेश्वर जी का माथा थांनका. ये दोनों कोनसी क्लास की पढाई कर रहे है.
"ाचा पहले यही प्रैक्टिस कर ले, गर्मी की छुट्टियों में पढ़ना वह. हाँ ये शायद सेकंड ईयर वाली से हे है.", ऋतू ने एक आखिरी सवाल उसके देने के बाद उस किताब के कुछ पैन पलट कर देखे, जैसे वह संतुष्ट होना चाहती हो.
"ऋतू बीटा, दिखाना जरा ये किताब?", रामेश्वर जी ने उत्सुकता को संभालना उचित न समझा और किताब मांग हे ली. और ऋतू ने अपने दादाजी को किताब पकड़ा दी.
"ये तुम्हारी पिछली क्लास की किताब पढ़ रहा है?"
"दादाजी, अपनी तोह ये सिलेबस पहले हे मेरी पुराणी किताबे पढ़के पूरा कर चूका. और फर्स्ट ईयर की ये किताब मैंने इसलिए इसको दी थी क्योंकि 'आर्गेनिक केमिस्ट्री' में एक तोह ये थोड़ा कमजोर है और ऊपर से बड़ी क्लास में ये सब्जेक्ट ज्यादा कुछ चेंज नहीं होता. और खली बैठा रहने से ek-aadh घंटा एक्स्ट्रा पढ़ ले तोह फिर टूशन की जरुरत हे नहीं होने वाली अगली क्लास में.", ऋतू का सुलझा हुआ जवाब सुनकर रामेश्वर जी गदगद हो गए और अपनी पौती के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बस हमेशा वाली बात कही, "ाची बात है. तुम लोग खूब पढ़ो और भगवन तुम्हे हमेशा खुश रखे."
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"अर्जुन चल उठ, तुझे छोल अंकल के घर बुलाया है.", अर्जुन इस वक़्त अकेला हे बैठा था इस समाया और टेलेविज़न पर चैनल बदल रहा था जब अलका दीदी ने कमरे में आते हे उस से कहा. एक पल को अर्जुन उनके घर जाने का सोच के थोड़ा असहज हुआ फिर जैसे हे कुछ याद आते उठ खड़ा हुआ.
"ठीक है जाट हु.", वही बहार वाले दरवाजे से वह इतना कहता निकल गया.
"देख ले क्या क्या करना पड़ रहा है ऋतू, और अब भी कुछ न हुआ तोह वह जाने.", दरवाजे के पीछे हे कड़ी मुस्कुराती हुई ऋतू से अलका ने कहा तोह वह अपना हाथ उसकी कमर में डालती फिल्मी स्टाइल में बोली.
"प्यार करने वालो को मिलाने से बढ़कर दुनिया में कोई बड़ा काम नहीं है मेरी जान.", आँख दबती वह उसको साथ हे वापिस अपने कमरे की और चल दी.
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अपनी हे धुन में अर्जुन सीधा उनके घर के अंदर आ गया लेकिन यहाँ तोह पूरी ख़ामोशी थी. उसने ध्यान भी नहीं दिए था के बहार गाडी नहीं कड़ी थी. लेकिन आज तोह रसोईघर में पारवती भी उसको नहीं दिखी. जिस दरवाजे से वह अंदर आया था उसके बंद होते हे पीछे देखा तोह प्रीती वह पीठ लगाए कड़ी उसको हे देख रही थी.
"ये सब?", अर्जुन ने इधर उधर देखते हुए प्रीती से इतना हे कहा. उसको थोड़ा डर था के ये पागल क्या कर रही है और कही पारवती ने देख लिए तोह.
"बहोत मार लिए अपने मैं को बस अब और नहीं. जो होगा देखा जायेगा", प्रीती ने पूरी अदा से अर्जुन की आँखों में देखते हुए कहा और नंगे पाँव हे उसकी तरफ चल कर आते हे खड़े खड़े अपनी बाहों का हार अर्जुन के गले में दाल लिए. दरवाजा बंद होने और यहाँ कोई लाइट नहीं जलने से हल्का अँधेरा था और ऐसे मादक माहौल में लम्बी चिकनी टाँगे घुटनो तक बेपर्दा उस एक मात्रा फ्रॉक में.
"घर में..", अर्जुन की बात पूरी होती उस से पहले प्रीती ने उसके होंठो पर ऊँगली रखते हुए अर्जुन के गाल से गाल सत्ता कर सरगोशी की, "कोई नहीं है अगल 2-3 घंटे, सिर्फ मैं हु.", और होंठो से अर्जुन के कान की लौ को चूम लिए. पाँव की उंगलियों के भर कड़ी प्रीती की लम्बी टांगो से ऊपर एक भरपूर आकर लेते ठोस कूल्हों पर स्वतः हे अर्जुन का हाथ पहुंच गया.
"तुम्हारे इरादे ठीक नहीं है. और अगर..
"कुछ अगर मगर नहीं. तुम बहोत बोलते हो.", गुलाबी भरे हुए होंठ अर्जुन के मुँह पर लगाती वह उसकी जुबान बंद कर चुकी थी. अर्जुन ने इस शेरनी के सामने हथियार डालते हे साथ देने में हे भलाई समझी लेकिन शायद उसको अंजाम पता नहीं था.
"उम्मंहहह... आह्ह्हम्म्म", बुरी तरह अर्जुन के होंठो को मुँह में भर कर चूसती प्रीती सच में हे किसी शेरनी की तरह इस तगड़े शिकार को अपने काबू में किये थी. उन्माद और उत्तेजना में अर्जुन सिर्फ प्रीती को थामे उन भरपूर चिकने लेकिन कसरती कूल्हों और मुलायम जांघो पर हाथ फिरता सबकुछ प्रीती के हवाले किये था. थोड़ा सा जोर लगा कर प्रीती ने अपनी कमर उचकाई तोह अर्जुन मदहोशी में भी समझ गया. कूल्हों के नीचे अपने पंजे लगता वह उसकी मदद करने लगा. कमर पर टाँगे कैंची सी बंद करती वह किसी जोंक सी लिपट चुकी थी और अर्जुन वैसे हे उसको उठाये अंदाजन कमरे की तरफ चल दिए. सिर्फ एक पल के लिए प्रीती अपने बिस्टेर पर अर्जुन के नीचे पड़ी चूम रही थी.
"श.. ाचे बचे की तरह नीचे आओ.", उसकी बात मानता वह बिना सवाल किये अब वह प्रीती के नीचे और प्रीती उसकी कमर पर घुटने मदद कर गर्दन चूमती हुई नीचे की तरफ होंठ ला रही थी..
"इसकी कोई जरुरत नहीं है यहाँ.", छाती से ऊपर तक खिसकी अर्जुन की टीशर्ट अगर वह खुद हे नहीं उतरता तोह उसका फटना निर्धारित था.. ाचे से अपने हाथ उसके चौड़े सीने पर घूमते हुए प्रीती एक एक इंच का जायजा ले रही थी. जैसे हे उसके होंठो के बीच अर्जुन का दया निप्पल आया, मजे की अधिकता से अर्जुन की मुट्ठी बिस्टेर पर कास गई. हिम्मत करते हुए उसने फिर से हाथ प्रीती के कूल्हों पर रखे हे थे की प्रीती ने उसके निप्पल पर दांत गदा दिए.
"शठ.. पागल हो गई हो.?", अर्जुन ने बदले में एक तेज सीत्कार करते हुए हे उसके कूल्हे, जहा अब फ्रॉक का कपडा नहीं था को जोर से मुट्ठी में भर लिए. लेकिन प्रीती जैसे उनमे से दूध निकल के हे रुकने वाली थी. अपने होश संभालता अर्जुन इस सब से बचने की जुगत भिड़ने लगा था. कुछ और न समझ में आया तोह उंगलिया बहार को निकले कूल्हों की दरार में दाल दी. गरम मुलायम फैंको के बीच बस कपडे की पतली कतरन का कवच हे बढ़ा था लेकिन अर्जुन के हाथ अपने खजाने के पास महसूस करते हे प्रीती ने काम आसान करते हुए अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठा ली.
"इस से आगे... इस से आगे गड़बड़ हो जाएगी.", प्रीती को उसकी ये चेतावनी जैसे सुनाई नहीं दे रही थी. नशीली आँखों से अर्जुन को देख कर अगले हे पल उसने वह safed-gulabi फ्रॉक शरीर से अलग करके एक तरफ उछाल दी. पतली गुलाबी डोरी वाली ब्रा में क़ैद प्रीती के यौवन अर्जुन की नजरो के सामने थे. लहराती चिकनी पीठ और सीने से नीचे अंदर को धंसी मांसल कमर जहा ख़तम हो रही थी वही एकाएक बहार को निकले कूल्हे.
"वही देखना है मुझे.", अरजणु के जो दोनों निप्पल कड़े हो चुके थे इतनी चूसै की वजह से उनपर जीभ फिरती हुई वह वापिस ऊपर की तरफ जाने लगी. बस इस बार वह अपनी पत्थर सी ठोस और फूली छातियाँ भी उसके सीने से रगड़ती जा रही थी. अर्जुन के ख्वाब से भी बहार था ये सब और प्रीती हर पल जैसे हावी होती जा रही थी.
"बहोत हुआ.", अर्जुन ने ब्रा का क्लिप खोल कर अलग करते हे प्रीती को अपने नीचे ले लिए. वह बेपरवाह से मुस्कुराती हुई जैसे इसके लिए भी तैयार थी.
"रोक कौन रहा है? सब तुम्हारा हे तोह है", खुद हे उसने दोनों kaam-shikhar बेपर्दा करते हुए अर्जुन को खुला न्योता दे दिए. जरुरत से ज्यादा कसाव लिए प्रीती के दोनों उभर यहाँ भी जैसे अर्जुन को चुनौती दे रहे थे. सचमुच अनुपम शरीर था प्रीती का जिसकी गर्मी अर्जुन ने आज महसूस की थी. दोनों उभारो को मुट्ठी में पकड़ते हुए अर्जुन ने एक लाल उभरी हुई चीर्य को मुँह में लिए और हलके हलके चूसने लगा. ट्रैक पाजामे में उभरे उसके सख्त लुंड पर प्रीती का यौनकुंड नीचे से लिप्त अपना दबाव बनाने लगा था. अर्जुन की कमर में टाँगे लपेटे वह नीचे से हे अपने कूल्हे हिलती अर्जुन को मजे से दोहरा किये जा रही थी. दोनों चुचो पर अपना दम दिखने के बाद अर्जुन प्रीती का चेहरा चूम कर एक पल के लिए अलग हो कर बिस्टेर से नीचे खड़ा हुआ.
बिस्टेर पर नागिन सी बलखाये लेती प्रीती का हुस्न अर्जुन को एक सम्मोहन में क़ैद कर रहा था. खुद को निर्वस्त्र करता वह भी सम्मोहित सा उसके जलवानशीं हुस्न के ऊपर आते हुए झुक गया. मुँह से एक उत्तेजक सिसकी निकल गई अर्जुन के जैसे हे 3/4 फुट लम्बे उसके अजगर को प्रीती ने अपनी नरम लम्बी उँगलियों में नीचे हाथ बढ़ाते हुए पकड़ लिए. सुर्ख रक्तिम होंटो के पीने के सिवा अर्जुन के पास और विकल्प नहीं था.
बड़े कमरे में प्रीती के हे नरम बिस्टेर पर एक दूसरे का तबियत से रास पीते हुए दोनों अलग हे जुंग लड़ रहे थे. तीखे निप्पल जिस्म में तीर सा वॉर कर रहे थे लेकिन इसका अलग हे असर हो रहा था अर्जुन के पूरे जिस्म पर. रोये खड़े हो चुके थे और रीढ़ की हड्डी से लेकर पाँव तक एक करंट का एहसास दौड़ रहा था. प्रीती का चेहरा दोनों के जिस्म की गर्मी और इस जोश की वजह से लाल भभूका हो चूका था.
अपनी लम्बी उंगलिया सुपडे से निचे आगे पीछे करती वह अर्जुन को उसकी सभी सीमाओं से परे ले जा चुकी थी जहा अर्जुन के वश में कुछ नहीं रहा था. दोनों बहे पीठ पर लपेटती वह बड़ी कुशलता से अर्जुन को palat-ti एक बार फिर उसके ऊपर आ चुकी थी. इस प्यार के dwand-yudh में प्रीती ने अर्जुन को एक और बार चित्त करते हुए दोनों तरफ पांव करके खड़े होकर अपना वह आखिरी वस्त्र भी बड़ी मादक अदा से अलग करते हुए अर्जुन का रक्तचाप थोड़ा और बढ़ा दिए था. अर्जुन की सोच से कही ज्यादा हे उभरे हुए कूल्हों की खाई भी वैसी गहराई लिए थे लेकिन नजर जब उस ख़ास भाग पर पड़ी तोह वह बेताबी में उठने हे लगा था लेकिन उठ न सका. सीने पर अपना गोरा मुलायम पाँव रखती प्रीती ने उसको वापिस बिस्टेर से चिपका दिए. ये अबतक का सबसे बेहतरीन हुस्न था जिसको प्रीती ने कड़ी म्हणत से तापा कर कुंदन बनाया था और आज तक खुद की आँखों से भी छुपाये रखा था.
"एफ्रोडाइट." अर्जुन जैसे गुलाम हो गया था उस शरीर का जो उसकी आँखों के सामने बेपर्दा था. हलके पसीने से दमकता प्रीती का शरीर एक पैमाना लगने लगा था अगर सुंदरता को आंकने की बात हो. ठोस उभार नेव्तोन का सिद्धांत ठुकरा चुके था, उनसे नीचे तराशा हुआ कैसा पेट और गोल नाभि, बमुश्किल 28 की पतली कमर और फिर 34 के कूल्हों से नीचे बाकी शरीर सी हे खूबसूरत चिकनी जाएंगे.
अर्जुन के लिंग की तरफ चेहरा करती वह उसके सीने से थोड़ा नीचे बैठ कर कुछ पल बस उस असाधारण से फड़कते अंग को देखने लगी. जो अपनी पूरी औकात पर आ चूका था. धीरे धीरे किसी कुशल सर्प पकड़ने वाले की तरह उसकी तरफ बढ़ती प्रीती ने जड़ से इस गरम डंडे को पकड़ते हुए अपना मुँह करीब कर लिए.
"आठ..", अर्जुन सिसक उठा जब प्रीती की जीब सुपडे के निचले हिस्से से होती हुई उसके agra-bhag से छलकती छोटी सी बूँद तक फिसलती गई. हरी नस्से उभरी हुई उसके लुंड को भयानक दिखा रही थी लेकिन प्रीती बिलकुल निश्चिंत सी कभी गीले होंठ तोह कभी अपनी जीभ लगाती अर्जुन के संयंम की परकाष्ठा देख रही थी. अब एक हे उपाए थे अर्जुन के पास सबकुछ अपने हाथ में लेने का. दोनों बाजुओं से प्रीती की जांघो को पीछे खिसकते हुए अर्जुन ने जांघो के बीच चिप्पे मधुकुन्द पर मुँह लगा दिए. अपनी धड़कन को काबू करता वह आँखें बंद किये कस्तूरी सी महक वाले छेड़ के बहार की फांको को वैसे हे चूमने चूसने लगा जैसे प्रीती ने आज उसके होंठो को चूमा था.
"सीईई.. उम्म्म्म." प्रीती की पकड़ उसके लुंड पर और मजबूत हो गई थी और साथ हे जांघो का कसाव चेहरे पर. हिम्मत न हारती वह अर्जुन के सुपडे के बराबर मुँह खोलती पूरा गुलाबी हिस्सा मुँह में भरते हुए अर्जुन को भी वही सुख देने लगी थी जो उसको अर्जुन से मिल रहा था.
इधर अर्जुन की जीभ ने उसके छेड़ को ाचे से टटोलते हुए थोड़ा अंदर प्रवेश किआ, प्रीती ने शरीर ढीला छोड़ दिए. छूट ने रोका हुआ बांध टॉड दिए था लेकिन जब तक वह अलग होती मुँह में फूले हुए सुपडे ने भी गरम पानी फेंकना शुरू कर दिए. दोनों उस क्षण में शांत अपनी जगह रुके रहे...
"आह्हः..", अर्जुन ने जैसे हे ये सिसकारी ली, प्रीती उछलती हुई बाथरूम का दरवाजा बंद करती अंदर जा चुकी थी. अर्जुन के रस की एक भी बूँद अर्जुन के जिस्म पर नहीं गिरी थी. लेकिन वह बेखबर सा आँखें बंद किये वैसे हे पड़ा रहा. कोई 1 मिनट बाद हे प्रीती अपनी जन्मअवस्था में हे उसके शरीर से अमरबेल सी लिपट गई.
"ये सब सपना था?", अर्जुन ने उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.
"हम्म..", प्रीती ने उसकी बात सुनकर सिर्फ इतना कहा और इस बार बड़े हे प्यार से उसके ऊपर लेट कर होंठो पर एक गीला चुम्बन दे दिए.
"तुमने कोई प्रैक्टिस की थी ये सब करने से पहले?", अर्जुन अपने चेहरे के ऊपर झुके उस खूबसूरत चेहरे को देख रहा था. अब वह हलकी शर्म और ढेर सारा प्यार था.
"रोज रात को, सपने में. और आज सीधा फाइनल", प्रीती अर्जुन की नाक पर जीभ से छेड़छाड़ कर रही थी. अब अर्जुन भी बेहतर था और उसके नंगे चुत्तड़ो को हलके हलके दबा रहा था.
"मैंने उम्मीद नहीं की थी इसकी. और वह भी ये की तुम मुझे काबू कर लोगी.", अर्जुन के स्वर में भी प्यार और प्रशंशा थी, अपनी होने वाली बीवी के लिए.
"वह इसलिए क्योंकि बाकी बाद के लिए. मुझे सब करना है लेकिन विथाउट प्रसौतिओं एंड एवरीथिंग इनसाइड.", नीचे खिसक कर वह उसके सीने पर सर रखे लेट गई थी. और अर्जुन उसकी बात का मतलब समझने के बाद खुद शर्मा रहा था.
"और कुछ हो गया तोह.?"
"तभी तोह कहा है. मुझे वही चाहिए और उस से पहले अंदर नहीं. यही तोह तुमने भी कहा था, याद है?"
"हाँ. और मैं दूसरी बात से भी सहमत हु.", साइड से निकले एक दूध को प्यार से सहलाते हुए अर्जुन बोलै और प्रीती की हलकी सी सिसकी चूत गई.
"ससस.. क्या करते हो. मुझे बस ऐसे लेटने दो न.", उसका हाथ पकड़ कर अपनी पीठ पर रखती प्रीती आज खुद को अर्जुन की बाहों में पा कर जैसे खुद को सबसे खुशकिस्मत मान रही थी, पूरी दुनिया में.
"वैसे तुम्हारा फिगर खराब नहीं हो जायेगा इतने बचो से.", अर्जुन उसको छेड़ रहा था लेकिन वह मुस्कुरा रही थी.
"ग्रीस में 4-5 बचे होना नार्मल है. वैसे भी म्हणत से बॉडी बेटर होती है खराब नहीं.", प्रीती अपनी उंगलिया अर्जुन की ब्याह पर फिर रही थी.
"यहाँ तोह मैंने ऐसा कोई नहीं देखा, 1 बचा हुआ नहीं और लड़की से सीधा आंटी.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह प्रीती उसके गाल पर चपत लगती हुई सीने पर थोड़ी रखे उसको देखने लगी.
"यहाँ लड़की को इतर हाफ नहीं बोलते न. और किचन, बचे, कपडे बस यही काम होते है. ग्रीस में 2 हे काम है, फार्मिंग और टूरिज्म. और फॅमिली के सभी एडल्ट्स काम करते है. हेल्थी एक्टिव लाइफस्टाइल का एक एक्साम्प्ले तोह मंडे दिखा दूंगी मैं.", प्रीती ने एक अदा से कहा तोह अर्जुन के भी चेहरे पर चमक आ गई.
"तुम्हारी माँ मंडे आ रही है?"
"तभी तोह दादू पारवती दीदी और मुकेश भैया को लेकर बहार सामान लेने गए है. दादू को एक महीने से पता था लेकिन मुझे उन्होंने आज तुम्हारे घर से आने के बाद हे बताया.", प्रीती की बात सुनकर अर्जुन का मुस्कुराता चेहरा एकदम शांत हो गया.
"क्या सोचने लगे तुम एकदम?", प्रीती सचमुच जैसे उसकी धड़कन समझ जाती थी.
"कुछ नहीं. जैसा तुमने ग्रीस के बारे में बताया, अगर तुम्हारी माँ ने मुझे नापसंद करते हुए वही किसी लड़के को तुम्हारे लिए पसंद किआ तोह क्या होगा?"
"क्या फ़ालतू सोचने लगे? ये उन्हें पहले से पता है के तुम कौन हो. और जोएल की मैरिज वह ग्रीक लड़की से हे करेंगी जो उन्होंने हमारी बात पक्की होने के बाद डैड से कह दिए था. लेकिन वह अब तुमसे मिलेंगी जरूर, जैसे उनके यहाँ होता. फर्स्ट फॉर्मल मीटिंग विथ केक, फ्लावर्स एंड वाइन.", प्रीती ने आँख मरते हुए कहा और कड़ी होने लगी लेकिन अर्जुन ने पीछे से पकड़ कर अब उसको अपनी गॉड में बिठा लिए.
"फ्लावर्स तोह मेरे पास स्पेशल है उनके लिए, केक भी ले आऊंगा लेकिन वाइन की जगह अगर मैं कुछ और लाया तोह रेज्क्ट तोह नहीं कर देंगी?", दोनों उभर मुट्ठी में लेता वह उसके गाल चूम रहा था. नीचे उसका लिंग हलकी फुलावट लेता प्रीती के कूल्हों के बीच दबा था.
"तुम कुछ नहीं भी लाओगे तब भी मैं संभल लुंगी. बस ये जो नीचे खड़ा हो रहा है इसको तुम सम्भालो.", हंसती हुई वह उसकी गिरफ्त से निकल कर शीशे के सामने कड़ी हो कर ब्रा और पंतय पहन कर बाल ठीक करने लगी. बिस्टेर पर तक लगाए अर्जुन बस उसके हुस्न को देखने में खोया रहा.
"ओह मिस्टर मजनू, ऐसे हे नंगे रहना है क्या? 2 घंटे हो गए है हमे यहाँ. कपडे पहन लो.", फ्रॉक उठाने वह बिस्टेर पर झुकी तोह अर्जुन ने फिर से उसको खींच लिए.
"दिल नहीं है अब तुमसे अलग होने का.", कमर को पकड़ कर वह एक बार फिर उसके होंठो को पीने लगा और प्रीती भी उसका साथ देती चेहरा थामे अपनी जीभ उसकी जीभ से भिड़ने लगी. दोनों कुछ देर एक दूसरे को चूसने के बाद अलग हुए तोह अर्जुन भी कपडे पहन कर बाथरूम में चला गया.
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"ये आ गया अर्जुन. घर पे आजकल पाँव नहीं टिकते इसके जब देखो यहाँ वह घूमता रहता है.", अर्जुन अभी पिछले आँगन में आया हे था के अलका दीदी की बात सुनकर ठिठक गया. खाने की टेबल पर इस वक़्त दादी के बराबर में ये जाना पहचाना चेहरा था और साथ हे रुपाली दीदी और माधुरी दीदी बैठे थे.
"नमस्ते.", सामने बैठी कश्यप जी की बहु सरोज को हाथ जोड़ कर अर्जुन बोलै तोह उनके चेहरे पर एक मोहक मुस्कान आ गई. प्रतिउत्तर में सिर्फ सर हिला दिया सरोज ने.
"अब कैसे हो तुम? मैं तुम्हारा हे पता लेने आई थी. कल तुम्हारे भैया ने बताया था के तबियत ज्यादा खराब हो गई थी तुम्हारी.", एक bhari-poori नवब्याहता थी सरोज, 24-25 साल के आसपास, साफ़ रंगत और थोड़ा भरा हुआ चेहरा और शरीर. सबसे ख़ास उसकी आँखें जो शायद होंठो से ज्यादा बात करती थी. और भरे भरे होंठ.
"इधर बैठ जा जब भाभी बात करने आई है तोह.", कौशल्या जी ने अपने परिचित अंदाज में कहा तोह सकपकाता हुआ वह उनके सामने हे बैठ गया, रुपाली दीदी की बगल में.
"जी मैं बिलकुल ठीक हु. और भैया को मेरी तरफ से थैंक यू जरूर बोल दीजियेगा. ऋतू दीदी ने बताया के कैसे उन्होंने मुझे कमरे से गाडी तक पहुंचाया.", अर्जुन अब थोड़ा शर्मा रहा था क्योंकि जब भी सरोज भाभी उसको देखती तोह उनकी आँखों का अलग हे संवाद चल रहा था.
"वह तोह जब तुमसे मिले तोह खुद बोल देना. वैसे ाचा लगा देख कर के जल्दी ठीक हो गए हो. फिर से तोह नहीं अँधेरे में घर से जाना शुरू कर डोज.?", सरोज भाभी की बात पर अब अर्जुन क्या कहता के वह भी उन्हें सुबह देख चूका है उसको देखते हुए.
"अरे सरोज, वह तोह अब इसका नियम बना हुआ है. तेरे दादाजी के कहने पर हे चलता है. वैसे अनिल उतनी हे सुअभ निकलता है न?", यहाँ जवाब कौशल्या जी ने दिए साथ हे सवाल भी कर लिए. एक पल के लिए सरोज भाभी शांत हुई फिर वैसे हे बोलने लगी.
"हाँ अब उनके पास 2-3 शहरों की सप्लाई रहती है और फिर वापिस समय से घर आने के चक्कर में 4-5 बजे निकल जाते है. अब पापा ने समझाया है तोह इस हफ्ते से वह 2 दिन बहार रहा करेंगे और 2 दिन घर. नहीं तोह सेहत पर भी असर होने लगा है अभी से."
"तेरे खाना लागू ारु?", कोमल दीदी की आवाज पर अर्जुन ने बिना सोचे समझे हे बोल दिए.
"प्रीती ने खिला कर भेजा है दीदी.", और सभी नजरे उसके चेहरे पर टिक गई. अर्जुन को समझ आया के वह क्या बोल गया है तब तक देर हो चुकी थी.
"शाबाश. मतलब अबसे दोपहर का खाना तेरा बनाना बंद कर देते है.", ये फिर अलका दीदी ने उसकी टांग खींचनी शुरू कर दी थी. और बाकी सभी दीदी या तोह हंस रही थी या उसको घूर.
"प्रीती?", सरोज भाभी ने दादी की तरफ देखते हुए कहा, जो खुद भी मुस्कुरा रही थी.
"अरे होने वाली बहु है हमारी. वैसे सही कहु तोह इस घर की सबसे छोटी बेटी है वह लेकिन गलती से इस निकम्मे के पल्ले बांध दी है.", कौशल्या जी भी अपनी लाड़ली पोतियों के साथ हो गई थी.
"ओह तोह जनाब स्कूल की उम्र में हे ये सब.", भाभी की बात सुनकर अर्जुन उठ कर जाने लगा तोह कौशल्या जी की आवाज सुनते हे रुक गया.
"भाभी मजाक देवर से नहीं करेगी तोह जेठ से करेगी? संजीव वाली आने दे फिर तू भाग भी नई सकेगा. चल बैठ थोड़ी देर यहाँ और घर छोड़ के आइओ.", अर्जुन तोह सन्न रह गया के दादी ये क्या बोल गई.
"ाचा बैठ रहा हु दादी. वह तोह वैसे हे कुछ काम था मुझे."
"हाँ पता है मुझे. चलो तुम लोग बातें करो मैं चली अपने कमरे में. और तेरी भाभी यहाँ इसलिए भी आई थी के इनकी डिश की तार देख आ एक बार. भैया और अंकल है नहीं घर, दिश्वाला फ़ोन नहीं उठा रहा. यहाँ से भी मिला के देख लिए.", अर्जुन हामी भरते हुए गर्दन हिला कर अलका दीदी को घूरने लगा, दादी के जाते हे.
"वैसे क्या खिलाया आज स्पेशल?", अलका दीदी और ऋतू दीदी भी दादी के जाते हे वही बैठ गई. ऋतू के सवाल ने फिर से अर्जुन को मुख्या केंद्र बना दिए था सबकी नजरो का.
"वह आएगी तोह खुद हे पूछ लेना. खाना तोह खाना होता है.", अर्जुन झेंपते हुए कहने लगा. अब उसकी शर्म आ रही थी इनके बीच बैठने में.
"स्पेशल खाने की उम्र तोह नहीं लगती अभी तुम्हारी?", उनकी ऐसी बात सुनकर अर्जुन ने एक बार हर तरफ देखा और वह सिर्फ उसकी बड़ी बहने हे थी. माँ, ललिता जी अपने कमरे में जा चुकी थी.
"खाने का उम्र से क्या मतलब?", अर्जुन ने उनकी तरफ एक नजर डालते हुए पुछा.
"न कोई उम्र नहीं होती वैसे. चलो मैं चलती हुई माधुरी. आप सबसे मिलकर भी ाचा लगा. कभी सामने भी आया करो.", सरोज भाभी ने सबसे मिलते हुए कहा और अर्जुन उनके पीछे हे चल दिए. डिश की तार ठीक करने.
और 10 मिनट बाद हे वापिस अपने घर आ चूका था. अपने कमरे में आ कर लेता हे था के बगल में अलका दीदी भी आ लेती.
"हाँ तोह फिर मिला स्पेशल खाना? और भाभी की तार जोड़ दी क्या?", उनकी दोनों बातें सुनते हे अर्जुन मुस्कुरा दिए.
"खाना खा लिए था और भाभी के टेलीविज़न की तार बस स्विच में ढीली हो गई थी. मैंने लगा दी."
"मुझे तोह लगा था के वह दूसरा हे कनेक्शन करवाने वाली है. बड़ी जल्दी आ गया.", अलका दीदी उसके मजे ले रही थी.
"ाचा अब सोने दो थोड़ी देर.", अर्जुन ने उन्हें बाँहों में भरा तोह अलका दीदी भी प्यार से किश करने के बाद वैसे हे लेट गई. दोनों हे एक दूसरे की बाँहों में सुखद एहसास में थे. तक़रीबन 5 बजे कोमल दीदी ने अर्जुन को उठाया तोह वह अकेला हे था. सामने अपनी प्यारी दीदी को देख कर खुश हो गया.
"ारु, चल उठ जा भाई. बहोत देर से सो रहा है और आज स्टेडियम भी नहीं गया तू.", गाल पर हाथ फेरती वह उसको छोटे बचे की तरह प्यार कर रही थी.
"हाँ दीदी, कभी कभी तोह एक ब्रेक लेना हे चाहिए.", उनकी गॉड में सर रख के वह लेट गया और कोमल दीदी वैसे हे उसका सर सहलाती हुई उसको बस देखे जा रही थी.
"आप कुछ बोल नहीं रही? वैसे तोह आप कभी भी नहीं बोलती लेकिन मेरे साथ तोह बात कर हे सकती हो न दीदी."
"तेरे साथ बात करने के लिए तोह मुझे कुछ कहना हे नहीं पड़ता बस तुझे जी भर के देख लेने से बात हो जाती है.", प्यारी सी मुस्कान देती वह वैसे हे अर्जुन को गॉड में लिटाये रही.
"सच में आपका दिल नहीं करता मुझसे बात करने का?", अर्जुन ने नजरे उनके चेहरे पर करते हुए कहा तोह जवाब में कोमल दीदी ने आज पहली बार खुदसे उसके ऊपर झुकते हुए छोटा सा किश कर दिए.
"क्या कहु मैं भाई, मुझे इतना प्यार बिना मांगे हे मिला और मांग कर मैं इस प्यार को जाय नही करना चाहती.", कोमल दीदी इतना कहने के बाद चुपचाप कमरे से निकल गई लेकिन अर्जुन के दिल में कई सवाल छोड़ कर.
पानी के नीचे कुछ देर खड़ा होने के बाद वह सही से तैयार होने के बाद फिजिक्स की किताब हाथ में लिए नीचे आया जहा पहले से हे कोमल दीदी उसके लिए दूध और लड्डू रखे हुए थी टेबल पर. अर्जुन के आते हे वह वापिस रसोईघर में चली गई. अपने पास हे ताई जी और माँ को देख वह भी दूध ख़तम करने के बाद जल्दी आने का बोल कर बुलेट ले कर चल दिए, टूशन पढ़ने.
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"हाँ पापा, कैसे हो आप?", रामेश्वर जी ने घंटी बजते हे फ़ोन उठाया तोह सामने से आती खनकती आवाज सुनते हे मुस्कुरा दिए.
"मेरी लाडो को आज अपने बाप की याद आ हे गई. मैं ठीक हु बीटा तुम सुनाओ कैसी हो? अशोक जी और हमारा शहजादा कैसे है?", रामेश्वर जी ने अपने दामाद और नाती का हालचाल पुछा तोह कौशल्या जी भी बराबर आ बैठी.
"सब ठीक है और आपका शहजादा बोर्डिंग में है. ये कल हे गए है अपने काम के सिलसिले में जर्मनी, 2 हफ्ते के लिए. मुझे भी ले जा रहे थे लेकिन मैंने मन कर दिए. कल सुबह पहुंच रही हु आपके पास. ये इंडिया आएंगे तभी आप लोगो से मिलने के बाद मुझे साथ ले चलेंगे. इतने मैं आपके हे पास रहने वाली हु.", मधु शर्मा की ख़ुशी से भरी आवाज रामेश्वर जी को भी प्रसन्न कर रही थी.
"तेरा हे घर है मेरी बिटिया तोह तुझे बताने की जरुरत थोड़ी है. ले तेरी माँ बैठी है कान लगाए इतनी देर से. करदे इसका भी दिल हल्का.", अगले 5 मिनट दोनों maa-beti कितनी हे बातें करती रही और फ़ोन रखने के साथ हे कौशल्या जी थोड़ा चिंतित हो गई.
"आपको क्या हुआ थानेदारनी जी. अभी तोह खुश थी इतना और एकदम से परेशां हो गई."
"ख़ुशी तोह हुई की बिटिया आ रही है लेकिन चिंता भी वही के ये आपकी राजकुमारी आ तोह रही है लेकिन बाकी सबकी शामत आती दिख रही मुझे. अब बाथरूम से लेकर खाने तक में कमिया निकालनी शुरू और नया एक लगवाना पड़ेगा वह अलग.", कौशल्या जी ने अपनी चिंता जाहिर की तोह पंडित जी एक पल सोचने के बाद बोले
"तारा के कमरे में हे सोयेगी वह. और ऊपर टेलीविज़न है हे. रही बात उसके खाने पीने की तोह कोमल से बात करना वही बनाये मधु के लिए. बाकी अब समय के साथ समझदार तोह हुई होगी. परेशां मत हो.", पंडित जी की बात पर थोड़ी रहत मिली लेकिन फिर भी वह बहार चल दी सबको पूरा घर ाचे से ठीक करने के लिए.
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घर के बहार एक तरफ मोटरसाइकिल कड़ी करने के बाद अर्जुन ने घंटी बजे और प्रतीक्षा करने लगा. नीली जीन्स और सफ़ेद सूती शर्ट पहने, लम्बे बाल एकदम ाचे से संभाले हुए वह एक नजर कलाई पर बंधी घडी पर डालने के बाद सामने अंदर का दरवाजा खोल कर उसकी तरफ आती अन्नू को देखने लगा. 3/4 कला जम्पर और मेहरून ढीला सा कमर तक का टॉप पहने वह खिली खिली उसके सामने आ कड़ी हुई. दरवाजा खोल कर अंदर आने का बोल वह उसको साथ लिए अंदर ड्राइंग रूम में कड़ी हुई.
"बैठो यहाँ. क्या लोगे?", अर्जुन को एक सोफे पर बिठाने के बाद उसने पुछा और जवाब में अर्जुन ने किताब सामने टेबल पर रखते हुए कहा.
"कुछ भी नहीं. घर से आ रहा हु दूध पी कर. सोचा फिजिक्स पढ़ लेता हु नहीं तोह क्या पता फिर से क्लास से बहार न जाना पड़े.", अर्जुन की बात सुनते हे वह मुस्कुरा दी.
"मुझमे तोह इतनी हिम्मत नहीं है.", अभी वह इतना हे बोली थी की 46-47 साल की सलवार कमीज पहने ये सभ्य सी महिला अंदर से चलती हुई इधर आ गई. अर्जुन ने शिष्टाचार से उन्हें खड़े हो कर नमस्ते की तोह उन्होंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिए.
"अन्नू मैं तेरे पापा दे ऑन तोह पहले आ जाना. अपने हैप्पी दे घर पथ है तह चली स. जे दिल करे तह आ जावी, माथा टेकन." उनकी माता जी पंजाबी में बात कर रही थी. और अर्जुन ध्यान से सुन रहा था के वह कहना क्या छह रही है. पंजाबी समझ लेता था वह लेकिन ये थोड़ा तेज बोल रही थी
"ओह मम्मी जी तुस्सी जाओ. मैं नहीं जाना path-vath ते. चंगा भला पता है तुहानू. जे पापा आ गए तह मई बना दवंगी ौहना वास्ते चा.", अन्नू ने भी वैसे हे जवाब दिए.
"वेख पट, कुड़ी न पानी गरम नई करना ौंदा नाल तेरे सामने चा दी गाल कर रही है. ओह बीटा मैं भी झल्ली हु जो तुम्हारे साथ पंजाबी बोलने लगी. मंद मत करना. आप लोगो बातें करो मैं चलती हु. अगली बार बैठूंगी साथ अभी चलती हु.", उन्होंने अर्जुन से मुस्कुराते हुए कहा. हंसमुख महिला थी जैसे अमूमन पढ़ीलिखी पंजाबी महिला होती है.
"कोई गल्ल नई आंटी जी. तुस्सी पंजाबी वच गाल कर सकदे हो. मेरे वास्ते बोलना थोड़ा जा मुश्किल ऐ पर समझ चंगी तरिया लेना है.", अर्जुन ने जब साफ़ पंजाबी में बात की तोह आंटी ठुड्डी पर हाथ रखती उसको देखने लगी.
"ऐ तह चंगी गाल है पट. एक था कुड़ी ने पहली वरि मुंडा घरे सदया नाल हैगा वि गबरू. रब खुश रखे. चंगा लगेया मिल के बीटा जी. फेर मिलदे है.", उनकी बात पर जिस तरह अन्नू शरमाई अर्जुन को समझ तोह नहीं आया लेकिन जवाब में उसने भी हाथ जोड़ दिए. आंटी जी सर पे चुन्नी सही करने के बाद बहार चले गए.
"अब बताओ जरा ये क्या था? उन्होंने जो समझा वह शायद गलत समझा न. और तुमने कुछ बोलै भी नहीं.", अर्जुन मुस्कुराती अन्नू से बोलै तोह वह जाली वाले दरवाजे की चिटकनी लगाने के बाद बराबर आ बैठी.
"आराम से बाबा. मम्मी के हिसाब से तुम मेरे दोस्त हो और कुछ नहीं. और पहली बार उन्होंने मेरा कोई मेल फ्रेंड देखा तोह उन्हें ाचा लगा. इसलिए मैंने ज्यादा बात को नहीं खींचा. क्योंकि घर पर टूशन जैसा कुछ पॉसिबल नहीं और देखने से तुम लगते नहीं हो स्कूल के. अगली बार इसकी हेल्प मत लेना.", किताब उसको दिखते हुए अन्नू ने एक तरफ राखी और अर्जुन की बाजु पकड़ते हुए सत् गई.
"बाप रे. ये टीचर खतरनाक है. घर में स्टूडेंट को दोस्त बता के मिलवा रही है. कल को श्रीमान वालिए जी रिश्ता लेके घर आ गए तोह मैं घर से बहार. और उन्हें ये पता लगेगा के मैं ग्याहरवी में पढता हु तोह तुम्हारी करा देंगे शादी किसी दाढ़ी वाले सरदारजी से.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह अन्नू ने चूंटी काट ली उसकी कमर पर.
"दिमाग काम चलाओ. स्टूडेंट नहीं हो मेरे, याद रखना स्कूल के बहार स्टूडेंट नहीं हो."
"फिर क्या हु?", अर्जुन ने शरारत से देखा.
"मैं बात नहीं करती तुमसे , जाओ.", नखरा दिखती अन्नू पीछे हुई तोह उसकी गोरी कमर दिखने लगी, टॉप सरकने से. जो पहले अर्जुन ने देखि और उसकी नजर का पीछा करते हे अन्नू ने.
"शर्म नहीं आती क्या?", नजरे झुकाती वह दूसरी तरफ देखने लगी.
"मैं तोह बहार से हे तुम्हे देख रहा था. सुन्दर हो तोह देखूंगा हे.", अर्जुन ने तारीफ करते हुए कहा.
"मैं वो बात नहीं कर रही. तुम्हारी नजरे, उनकी बात कर रही हु. पहले मेनका के उधर और अब यहाँ."
"कल हॉस्पिटल वाला भूल गई शायद, नरम वाला.", अर्जुन जैसे सोच के बैठा था परेशां करने का.
"ऐसे नहीं मानोगे.", अन्नू मुस्कुराती हुई मारने के लिए ऊपर हुई तोह अर्जुन ने कलाई पकड़ते हुए अपने चेहरे के सामने उसको कर लिए. अन्नू की धड़कन उसके ऐसे पकड़ने से हे भाड़ गई थी और अब तोह दोनों के चेहरे 2 इंच दूर थे. आँखें बंद करती वह खुद को ढीला छोड़ उसके होंठो पर होंठ लगती उसकी बाहों में आ गई. एक मिनट के किश के बाद अर्जुन ने चेहरा पीछे किआ तोह बंद आँखों पर लम्बी पलके और हलके हिलते मॉटे होंठ, खूसूरत चेहरा और अन्नू की तेज चलती सांसें. धीरे से अन्नू ने आँखें खोली और उठ कर अंदर चली गई. अर्जुन बस देखता रहा.
"अब यही बैठे रहोगे? ये ड्राइंग रूम है मेहमानो के लिए. हम मेरे कमरे में बैठेंगे.", अन्नू उसका हाथ पकड़ कर उठती हुई साथ लिए अंदर की तरफ चल दी. ड्राइंग हॉल में तीन कमरों के दरवाजे थे और ये सबसे अंदर की तरफ वाला था. कमरे के देखते हे अर्जुन समझ गया के ये maa-baap के एकलौती लाड़ली बेटी है. पूरे बीएड के सिरहाने 7-8 अलग टेडी बेयर, एक स्टडी टेबल, एक कंप्यूटर, एक तरफ की पूरी दिवार पर काले रंग की लकड़ी की 4 अलमारी जो जमीन से छत्त तक थी बड़े आईने के साथ. बाथरूम से पहले हे अलग जगह शायद ड्रेसिंग के लिए और अनगिनत किताबे सलीके से दिवार पर लगी 3 लकड़ी की रैक में.
"बड़ा प्यार से संभल कर रखा है हर चीज को और उतना हे सुन्दर कमरा है तुम्हारा.", दिवार पर एक कौन में टंगे गिटार को देखते हुए अर्जुन ने कहा.
"मेरे भाई का है वह.", अन्नू थोड़ा भावुक हो गई ये कहते हुए. अर्जुन ने हैरानी से देखा तोह फिर मुस्कुराती हुई बोली.
"बुद्धू ऐसा वैसा कुछ नहीं, जस्सी सॉरी जसपाल इंग्लैंड में सेटल्ड है. मेरे से 4 साल बड़ा है मेरा भाई लेकिन पढ़ने गया था और वही पक्का हो गया. मम्मी के तोह सरे अरमान धरे रह गए मेहंदी, हल्दी, संगीत के लेकिन पापा खुश है. कहते है 'गोरी नाल मूंदे ने व्याह कित्ता है", अब अन्नू पहले जैसी हे मुस्कुरा रही थी.
"वैसे पहली बार कोई इस कमरे में आया है और सबसे ाची बात है के वह तुम हो.", सामने से अर्जुन के गले लगती वह कुछ देर ऐसे हे कड़ी रही और अर्जुन भी उसको सीने से लगे बाहों में भर के खड़ा रहा. उसको ये देख कर ाचा लगा था के अन्नू एक साफदिल और भावुक लड़की है.
"अब वह नरम सा फिर महसूस हो रहा है.", अर्जुन ने जब देखा के वह अलग हे नहीं हो रही तोह फिर से छेड़ते हुए कहा.
"ी लव यू ा लोट. रेपल्य मत देना. बस ऐसे हे रहना सदा. तुम मुझे बहोत ाचे से समझते हो. उम्मम्माह्ह्ह.", उसका गाल चूम कर वह अब उसको अपने बीएड पर लेकर बैठ गई थी.
"तुम्हे डर नहीं लगता मेरे साथ अकेले में?", अर्जुन तक लगाए किनारे की तरफ बैठा था और उसका हाथ अपने हाथ में लिए अन्नू अंदर की तरफ.
"इस से ज्यादा सिक्योर मैंने पहले कभी फील हे नहीं किआ. और तुम ये बोले क्यों वैसे.? इतनी कमजोर नहीं हु मैं जो तुम कुछ भी कर लो. सरदारनी हु.", आँखें बड़ी करती वह अर्जुन को घूरते हुए कहने लगी.
"पता है पता है कितनी बहादुर हो. मैं कल हे रिजाइन कर दूंगी.. बला बला बला .. इत्ते मॉटे मॉटे आंसू निकलने वाली सरदारनी.", अर्जुन परसो शाम वाली उसकी नक़ल करते हुए चिढ़ाने लगा तोह अन्नू उसको मारने का नाटक करती गॉड में हे आ बैठी.
"नक़ल करते हो मेरी. गंदे कही के."
"अब देखो खुद आ कर मेरे ऊपर गिरेगी तोह खतरा तोह है हे. फिर ये जो चिपक जाती हो तब दिमाग काम करना बंद कर देता है.", अर्जुन की गॉड में बैठी वह सीने से लग गई थी. और अर्जुन की शरारत से भरी बातें सुनते हुए गाल लाल हो चुके थे.
"हर टाइम यही सूझता है क्या तुम्हे? दिमाग बंद नहीं ज्यादा चलने लगता है तुम्हारा.", अन्नू का दिल भी तेजी से धड़क रहा था लेकिन ऐसे अर्जुन की गॉड में उस से चिपक कर बैठना अलग हे सुख दे रहा था.
"हर टाइम नहीं. जब तुम मेरे गले से लगती हो या मैं जब ये देख लेता हु.", नंगी कमर पर अर्जुन हाथ रखते हुए बोलै तोह अन्नू की सांस अटक गई. इस जगह पहला स्पर्श था ये किसी लड़के का. वह थोड़ा और कसक चिपक गई थी. नंगी मुलायम बाहों पर रौंगटे खड़े हो गए थे अर्जुन की इस च्वहाण से. और अब तोह उसके दोनों हाथ अन्नू की मुलायम कमर को पकडे थे, टॉप के अंदर से.
"प्लीज कमर से नीचे मत जाना. I'm नॉट रेडी येत.", अन्नू ने लड़खड़ती आवाज में बेचैनी से कहा तोह अर्जुन ने मुस्कुराते हुए आराम से उसको साथ में लिटा दिए.
"मैं गले से भी नीचे नहीं जा रहा हु. वह तोह इसलिए तुम्हे पकड़ा क्योंकि किनारे पर बैठा था. गिर न जाये हम.", अर्जुन की ऐसी बात सुनते हे शर्म से आँखें बंद कर ली अन्नू ने. लेकिन उसकी हिलती चट्टियां बता रही थी की वह अर्जुन को रोकती नहीं अगर वह इन्हे बेपर्दा भी कर देता.
"एक बार वैसे हे किश कर सकते हो जैसे फर्स्ट टाइम किआ था. वैसे हे खुदसे लगा कर. मैं उस एहसास को महसूस करना चाहती हु अर्जुन, ज़िन्दगी का सबसे खास एहसास था वह.", अन्नू बिस्टेर पर अभी भी वैसे हे लेती थी, आँखें बंद किये. अर्जुन भी उसकी बात सुनकर उसके ऊपर आ गया लेकिन कमर से खुद को दूर रखते हुए उसने अन्नू को दोनों होंठो को मुँह में भर लिए. इस बार वह भी तैयार थी और भरपूर साथ दे रही थी होंठो को पीने में. कब ये किश और गहरा हो गया दोनों अनजान थे. अर्जुन की जीभ कभी अन्नू अपने मुँह में भर लेती कभी वह उसका रास पीने लग जाता. अर्जुन के चौड़े सीने से दबते उभर थोड़ा सख्त होने लगे तोह अन्नू ने उसको पूरा अपने ऊपर खींचते हुए पीठ पर नाख़ून गाड़ने शुरू कर दिए.
"इस से आगे नहीं अन्नू. बस इस से आगे नहीं.", अर्जुन उसके ऊपर से लुढ़क कर एक तरफ हो गया. दोनों हे गहरी सांसें ले रहे थे. अन्नू अभी भी आँखें बंद किये थी. कुछ सँभालने के बाद उसने आँखें खोल कर अर्जुन को देखा और साथ में लेट गई.
"जो मुझे कहना चाहिए था वह तुम क्यों कह रहे थे.?"
"अन्नू, अगर हमने ये लाइन क्रॉस कर ली तोह फिर पीछे हटने में दोनों फ़ैल हो जायेंगे. और मैं तुम्हारी आत्मा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करना चाहता. तुम्हे मुझ पर यकीन है, भरोसा है और प्यार भी लेकिन मैंने पहले भी कहा था के हमारे भविष्य के बारे में हम खुद नहीं जानते. और तुम मेरे लिए शारीरिक जरुरत तोह नहीं.", प्यार से उसके सर को सहलाते हुए अर्जुन छत्त की तरफ देख रहा था. अन्नू की आँखों से अपने आप हे बूंदे छलकती बिस्टेर पर गिरने लगी.
"ऐ.. अब क्या हुआ? मेरी बात का बुरा लगा तोह I'm रियली सॉरी अन्नू. लेकिन मुझसे गलती हो जाती तोह बाद में पछताने से ाचा है वह गलती नहीं होने देना."
"बुद्धू मैं खुश हु की तुम इतने समझदार हो. लेकिन जो बात तुम अब भी नहीं समझ रहे वह ये है के मैं तुम्हे प्यार करती हु. हमारा भविष्य क्या होगा वह कल का भी नहीं पता लेकिन जितने है इतने मैं तुम्हारी हु. मेरी लाइफ में पहले तुम्ही हो और रहोगे. शादी मैं भी अपने पापा की मर्जी से हे करुँगी लेकिन मेरे दिल में हमेशा तुम रहोगे. प्यार में सिर्फ 2 दिल होते है, गलतियां भूल या पछतावा नहीं. नाउ किश में बिफोर ी स्टार्ट क्राइंग अगेन..", उसको फिर से अपने ऊपर करती अन्नू अब बड़ी नजाकत से और हौले हौले अर्जुन को चूम रही थी. खुद हे हाथ अर्जुन की छाती पर फिरती वह मैं हे मैं उसकी मर्दानगी पर मरी जा रही थी. ऐसा शरीर शायद टेलीविज़न पर हे देखा था उसने.
"एक विश पूरी करोगे मेरी?", अन्नू किश ख़तम करने के बाद गॉड में तकिया लगाए बैठी अर्जुन को देख रही थी. उसके चेहरे की मासूमियत देख अर्जुन ने हँसते हुए हां में सर हिला दिए.
"मुझे तुम्हे बिना टीशर्ट के देखना है. प्लीज के बार.", अर्जुन ने हँसते हुए अपनी शर्ट के बटन एक एक कर के खोले और उतार कर हाथ में पकड़ ली. अन्नू अपनी ऊँगली दांत में दबती उसको ध्यान से देख रही थी.
"ये असली में तुम ऐसे ho?Baap रे. तुम्हारी चिस्ती और शोल्डर कितने बड़े है. टीशर्ट में जब देखा था तभी से मेरे मैं में था के अंदर से कैसे होंगे तुम.", अन्नू करीब आ कर कड़ी हो गई. बड़ी सावधानी से उसने अर्जुन की चौड़ी छाती की फाडियों पर हाथ रखा तोह जैसे हल्का करंट लगा.
"पूरे मसल्स बना रखे है तुमने किसी वुफ फाइटर जैसे.", अर्जुन ने जल्दी से शर्ट पहनी तोह वह रूठने का नाटक करने लगी.
"बहोत देख लिए. अब बस."
"गलत बात है. मैं देख हे रही थी न कुछ कर थोड़ी रही थी."
"और यही मैं कहु तोह?", अर्जुन ने इतना हे कहा.
"है तोह कोनसी बड़ी बात .. ऐ पागल कही के मैं लड़की हु.", जब अन्नू को समझ आया के वह क्या करने लगी है तोह हाथ वही रुक गए टॉप तबतक आधा ऊपर हो चूका था. और अर्जुन का हाथ उसके निर्वस्त्र पेट पर. जो नरम मुलायम सा था.
"ऐ.. गलत बात hai..",Sharam से आँखें बंद कर ली थी अन्नू ने लेकिन टॉप उतना ऊपर उठाये थी अबतक
"अभी तोह सिर्फ पेट पर हाथ रखा है. तुम मेरे जहा रख रही थी वह रखा तोह क्या हाल होगा."
"रख लो. मन नहीं करुँगी.", उसके इतना कहते हे अर्जुन ने एक उभर पर हाथ रख लिए. अन्नू ने झट्ट आँखें खोल ली और अगले हे पल शरमाते हुए जमीन में देखने लगी.
"हटा लो प्लीज.", अन्नू ने कहा तोह अर्जुन ने वैसे हे हाथ हटा लिए.
"इसलिए पसंद हो मुझे. तुम 2 मिनट बैठो मैं अभी आ रही हु.", थोड़ा सँभालने के बाद वह अर्जुन को बीएड पर बैठने का बोलकर बाथरूम चली गई. वापिस आई तोह पजामा चेंज था और चेहरा धोया हुआ.
अर्जुन उसको देख कर मुस्कुराने लगा जो उसको समझ नहीं आया.
"ऐसे क्या देख रहे हो?", अन्नू ने गले में बाहे डालते हुए कहा
"यही की सिर्फ हाथ लगाने से तुम्हे कपडे बदलने पद गए.", अर्जुन की मुस्कान का राज उसको अब पता लगा था.
"की गंदे कही के. ऐसे बात नहीं करते."
"चलो इसको तुम कैसे कहती?"
"किसको?"
"यही जो तुम्हे ओर्गास्म हुआ अभी उसको."
"धत्त पागल. अब इतनी देर से किश कर रहे थे और इधर उधर टच हो रहा था तोह हो गया. अब छोड़ो ये सब. गन्दी बातें हे करना.", अन्नू शर्मा रही थी
"तुम कर सकती है और मैं बात भी नहीं कर सकता.?"
"मार खानी है तोह बोल दो.", अर्जुन ने हाँ कहा तोह अन्नू ने गाल पर काट लिए.
"आउच. बिल्ली हो. चलो बाबा, अब मैं चलता हु बहोत देर हो गई. फिर कभी आऊंगा.", अर्जुन खड़ा होने लगा क्योंकि 7 बजने में 15 मिनट थे. और उसके खड़े होते हे अन्नू फिर से उसके गले लग गई.
"मत जाओ न. फिर तुमने पता नहीं कब आना है."
"जब तुम कहो तब आ जाऊंगा लेकिन अभी जाना पड़ेगा.", उसके चेहरे के सामने से बालो को आज अर्जुन ने कान के पीछे किआ जैसा वह खुद करती थी.
"कल आओगे फिर? सैटरडे है और स्कूल बंद है कल."
"तुम कितने बजे उठती हो?", अर्जुन ने पलट कर सवाल किआ
"6"
"5 बजे बहार कड़ी मिलना. जब हॉर्न दू तब इस साथ वाली गली में. अब चलता हु दरवाजा बंद कर लेना.", अन्नू के होंठो को हल्का सा चूम के अर्जुन उसके साथ हे बहार आ गया ड्राइंग रूम से किताब उठाते हुए. जिसको लेके आने की अब कोई जरुरत नहीं थी आगे से.
मिलान
सुबह 6 बजे के करीब नर्स अर्जुन को देखने आई तोह सामने का दृश्य देख कर मुस्कुराती हुई वापिस हे चली गई लेकिन उसके बाद अंदर आई प्रीती के चेहरे पर अलग हे चमक आ गई थी. अर्जुन बिलकुल सीधा लेता था और उसके ऊपर पाँव चढ़ाये छाती पर सर रखे बेसुध सी लिपटी ऋतू.
"बिटिया यहाँ क्यों कड़ी है? अब लेने आये अर्जुन को तोह अंदर तोह चल.", कौशल्या जी की आवाज सुनते हे प्रीती के चेहरे पर एक डर चा गया लेकिन अंदर ऋतू झट्ट कड़ी होती दूसरे बिस्टेर पर बैठ गई.
"ऋतू बीटा, अपने भाई को उठा. हमने बात कर ली है बहार और उन्होंने कह दिए के अर्जुन को ले जा सकते है. उन्हें रिपोर्ट में कुछ भी नहीं मिला.", उनकी बात सुनते वक़्त भी ऋतू के चेहरे पर ऐसी शर्म थी जैसे सुहागरात की अगली सुबह कमरे में सास आने पर दुल्हन के होती है.
"जी दादी. आप अंदर आ जाइये, इतने मैं सामान भी इकट्ठा कर लेती हु.", ऋतू ने अर्जुन को उठाने से पहले जरुरी सामान एक तरफ किआ. कौशल्या जी भी समझ गई की ऋतू उठाने से रही अर्जुन को.
"कुम्भकरण, उठ जा अब. कुछ हुआ है नहीं और बिस्टेर टॉड रहा है.", अर्जुन अपनी दादी की बात सुनता बिस्टेर पर हे ऊपर उठा और उन्हें बाँहों में ले लिए.
"मेरी प्यारी दादी. तोह आपसे घर रुका नहीं गया जो खुद आ गई.", अर्जुन लाड से उनको बोलै तोह वह भी हंसने लगी.
"सुधर जा तू कपूत. बहोत परेशान किआ है तूने सबको. और सबसे ज्यादा इन दोनों को.", अब अर्जुन उनकी बात पर झेंपता सा बिस्टेर से उठा और एक तरफ रखा अपना pajama-tshirt उठाते हुए बाथरूम में चला गया.
"प्रीती बीटा, ये सामान तू पकड़ ले. और ऋतू, अपने भाई को ले आना बहार. मैं तेरे दादाजी के पास हे चलती हु.", उनके जाते हे प्रीती ने शरारत से ऋतू दीदी को देखा.
"आप दोनों तोह यहाँ भी."
"क्या यहाँ भी? और जब तुझे दिख हे गया था तोह आवाज नहीं लगा सकती थी. पागल, बच गए दादी की आवाज सुनाई न देती तोह आज हे घर निकला हो जाना tha.",Ritu अब प्रीती के गले लग गई थी.
"वैसे सच में क्या सन था दीदी. कैमरा होता तोह पका फोटो ले लेती. कैसे आप लेती हुई थी और उसका हाथ कहा पर था.", प्रीती धीरे बोल रही थी साथ हे हंस भी रही थी.
"तू घर चल फिर तू हे मुझे करके दिखाना के कैसा सन था.", आँख मरती हुई ऋतू अब प्रीती के मजे लेने लगी
"चलो. मैं तोह तैयार हे हु. शायद आगे के सन भी दिखा दूंगी, जितना आप देख सको.", प्रीती जैसे अब बदल हे गई थी. शर्मा तोह रही थी लेकिन अब जैसे वह अर्जुन के साथ कुछ भी छुपाना नहीं चाहती थी.
"अरे मेरी जान, बड़ी जल्दी समझ आ गया तुझे प्यार करना."
"और क्या दीदी, अब क्यों पीछे हटना. कल हे हॉस्पिटल में सबको आपने ये जो बोल दिए था के मैं उसकी बीवी हु.", प्रीती इठलाती हुई बोली और अर्जुन को बहार आया देख चुप हो गई.
"ाचा मैं दादी के पास चली, तू इसको ले आ.", ऋतू जल्दी से भाग गई और अब प्रीती अकेले में अर्जुन के पास कड़ी बेचैन होने लगे.
"तोह कैसे चलना चाहोगी? गॉड में या पीठ पर?", प्रीती जबतक उसकी बात समझती अर्जुन ने कंधे के नीचे से पकड़ते हुए प्रीती को उठा कर सीने से लगा लिए.
"प्लीज छोड़ो पागल. दादी आ जाएगी.", प्रीती के चेहरे पर हल्का डर लेकिन अंदर हे वह खुश थी अर्जुन को पहले की तरह देख कर.
"दादी ने हे तोह कहा था के मैं बहार चली. अब यहाँ तोह कोई नहीं है.", घर से नाहा कर इधर आई प्रीती के बदन की खुशबु लेते हुए अर्जुन अपना चेहरा उसकी गर्दन और सीने के करीब करके खड़ा था. प्रीती की साँसे तेज हो गई और आँखें बंद.
"ाचा चलो.", अर्जुन ने उसकी हालत देखते हुए कहा और नंगे पाँव हे प्रीती के साथ बहार आ गया. यहाँ सभी खड़े उसकी हे राह देख रहे थे. छोल साहब ने अर्जुन को गले से लगाया और अपने साथ लिए गाडी तक आ गए.
"सतीश, इन्होने पैसे क्यों नहीं लिए हमसे?", गाडी में बैठते हे कौशल्या जी ने पहला सवाल किआ. अर्जुन भी ये सुनकर अपनी दादी की तरफ देखने लगा. जो पीछे वाली सीट पर बैठी थी रामेश्वर जी के साथ. प्रीती और ऋतू सबसे आखिरी हिस्से में आमने सामने थी.
"भाभी शुक्र मनाओ के हॉस्पिटल सही सलामत है. आप नहीं थी उस वक़्त जब शंकर ने इस हॉस्पिटल के मैनेजर का गाल लाल कर दिए था. सारा हॉस्पिटल हे एक मिनट बाद उधर जमा हो गया था. जिसने अभी आपके पाँव छुए वही मालिक है इसका और अपने शंकर से थोड़ी दोस्ती है.", छोल साहब की बात सुनकर अर्जुन खुद को रोक न पाया.
"अब पापा ने उन्हें मारा क्यों था?"
"तुझे जब लेके आये थे तब तारा ने गाडी वह लगा दी थी जहा रास्ता है अंदर जाने का, रिसेप्शन के बहार. फिर तेरा इलाज अपने दोस्त डॉक्टर से करवाया, िक में पहले ऋतू और बाद में प्रीती भी अंदर आ गई थी. ये सब ऐसी जगह पर सख्त मन है. गाडी पार्किंग में, ट्रीटमेंट के समय कोई भी िक में नहीं, 2 से ज्यादा विजिटर होस्पिअल में नहीं और ऐसे हॉस्पिटल के डॉक्टर हटा देना तोह बिलकुल नहीं. लेकिन अब बात शंकर के परिवार की है तोह तारा भी सही, और िक तोह फिर ड्राइंग रूम हुआ जहा सभी बचे बैठ के अंताक्षरी खेलेंगे.", छोल साहब की बात पर सभी हंस दिए, रामेश्वर जी को छोड़ कर.
"सतीश, मेरी समझ से तोह वह बहार हे है. हर वक़्त हाथ में खारिश लिए घूमता रहता है और तुझे उसका ये करना बड़ा पसंद है. वैसे तू अकेला नहीं है उसका हितेषी.", रामेश्वर जी तल्खी से बोले और कौशल्या जी ने कोहनी लगते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा किआ.
"हाँ तोह मेरी भाभी से पूछ लो की परिवार जरुरी है या ऐसे अनपढ़ मैनेजर जिन्हे जरा भी समझ नहीं दुनियादारी और परिवार की. शंकर के जिम्मेदार बचा है और सबसे बड़ी बात के वह अपने परिवार की ख़ुशी के लिए कोई हद्द नहीं देखता. समंदर सा बिलकुल.", छोल साहब गाडी चलते हुए पिछले शीशे में भी देख रहे थे.
"बिलकुल सही बात है. मेरा बीटा घर से बहार रहता है लेकिन वह इसलिए रहता है जिस से घर की परेशनी भी बहार हे रह सके. और कोई तेरे भाई साहब से पूछे के उन्हें अगर उसका ऐसा करना बुरा लगता है तोह उसको rokte-tokte नहीं? 500 तनख्वाह थी इनकी तब उसको 200 देते थे और मुझे pariwar-baaki बचो के लिए 200. ऊपर से जो भी कहते रहे लेकिन श्री रामेश्वरम की चाय में हे शंकर रहते है.", अब सच में रामेश्वर जी निरुत्तर थे लेकिन चुप रहना भी ठीक नहीं था. बचे इन तीनो की बातें बड़े ध्यान से सुन्न रहे थे.
"उसकी काबिलियत पर मुझे कभी संदेह नहीं हुआ. अगर उसके पेशे की हे बात करू तोह उसको शायद अपने काम से इतना लगाव है जितना मुझे भी नहीं था शायद. जितने वह अपनी ड्यूटी पर रहता है तोह मरीज हे उसके लिए सबकुछ है, फिर रात हो जाये या अगला दिन. लेकिन जब उसको कोई समस्या अपने mareej-hospital से बहार दूर करनी हो फिर उसका तरीका जो है वह न मुझे पहले पसंद था और ना आज. कर मैं सचमुच कुछ नहीं सकता क्योंकि इधर भी उसका हाथ इतनी सफाई से चलता है जैसे ऑपरेशन के वक़्त. साथ वाली नस को पता नहीं चलता के बराबर में किसी ने सर्जरी भी कर दी है."
"भाई साहब उसमे सीखने की लगन थी. सर्जरी पढाई से और सफाई उसने आपके माहौल में सीख ली."
"इस मुद्दे का तोह कोई अंतत है नहीं सतीश. और ये बचे भी बोरियत महसूस करने लगे होंगे. फिर कभी करेंगे इस मुद्दे पर बात.", रामेश्वर जी ने हथियार दाल दिए थे और बाकी दोनों मुस्कुरा रहे थे.
"चल मेरे शेर, अब ध्यान से उतर और अंदर चल के कोमल को बोल 3 चाय बनाये अपने हाथ की.", घर के सामने गाडी रोकते हुए छोल साहब ने कहा और बाकी सभी भी अपनी तरफ के दरवाजे खोलते हुए बहार निकल आये.
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अगले 10 मिनट तक तोह सभी अर्जुन को गले लगते, चूमते हुए मिलते रहे. रेखा जी और कोमल दीदी के तोह आंसू भी निकल आये थे लेकिन उसको सही सलामत देख कर ख़ुशी की वजह से. फिर कोमल दीदी चाय बनाने चली गई और अर्जुन अपनी माँ को साथ लिए उनके कमरे में आ गया.
"अगर मैंने आज के बाद तेरे चेहरे पर शिकन भी देखि तोह फिर तेरा बिस्टेर यही लगवा दूंगी, मेरे कमरे में.", रेखा ने थोड़ी दांत और प्यार से कहा लेकिन अर्जुन उनका गाल चूम कर शरारत से बोलै.
"जब पापा आएंगे फिर तोह बहार निकलोगी."
"अब भी मस्ती सूझ रही है तुझे? जा पहले साथ वाले कमरे में प्रियंका और आरती से मिल ले. वो दोनों बेचारी तोह कल से इतना दरी हुई है के रात तक बहार भी नहीं निकली थी. एक बार मिल ले उनसे.", अर्जुन को भी ध्यान आया था के उसने अपनी इन दोनों बहनो को देखा हे नहीं था. वो जल्दी से उठ कर माधुरी दीदी वाले कमरे में गया जहा प्रियंका दीदी करवट लिए सो रही थी और आरती अपनी डायरी में चुपचाप कुछ लिख रही थी.
"भाव..", आरती के पीछे आकर अर्जुन ने जैसे हे डराया वह सीधा उसके गले लग गई. अर्जुन को कुछ पल बाद महसूस हुआ अपने कंधे पर गिरता गरम पानी.
"दीदी, अरे क्या हुआ आपको? देखो मैं बिलकुल ठीक हु और आपके पास हु.", आरती अलग न हुई लेकिन प्रियंका दीदी ने खड़े हो कर साइड से अर्जुन को बाहों में ले लिए.
"इतनी हिम्मत नहीं हैं हम दोनों बहनो में मेरे भाई. तुझे लगा होगा के हम दोनों तुझसे मिलने नहीं आई लेकिन हर पल बस हम तेरे घर आने की दुआ मांग रही थी. दिल कुछ ज्यादा हे कमजोर है हमारा.", अर्जुन भी दोनों की जरुरत से तेज चलती धड़कन महसूस कर प् रहा था. प्रियंका और आरती ने हर रोज अपनी माँ के दर्द को देखा था और सिर्फ इस वजह से हे नरिंदर ने अपनी दोनों बेटियों को यहाँ भेज दिए था जिस से वह हर समय घबराई दरी न रहे.
"बहोत हिम्मत है आप दोनों में. और आप दोनों आओ मेरे साथ बहार, जोरो की भूख लगी है मुझे. आप बनोगी और आरती दीदी खिलाएंगी.", अर्जुन उनके चेहरे साफ़ करता अपने साथ जबरदस्ती बहार ले आया. ललिता जी ने भी उन्हें गले लगते हुए प्यार से समझते हुए अपने पास बिठाया लेकिन अर्जुन अपने साथ आरती को खाने की मेज तक ले आया.
"दीदी, स्कूल जा रही हो?", रूपाली तैयार हो कर वही बैठी थी. अर्जुन की बात पर वह मुस्कुरा दी.
"तेरी एप्लीकेशन दी हुई है मेरी नहीं. और फ़िक्र मत कर, घर आने के बाद तुझे पढ़ा भी दूंगी.", रुपाली की बात पर अर्जुन इधर उधर देखने लगा.
"मैं बीमार हु तोह अभी पढाई नहीं कर सकता. मंडे से करेंगे न.", अर्जुन की ऐसी हरकत पर आरती के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई. अर्जुन ये देख कर हे खुस हो गया था और रुपाली को भी समझ आ गया के वह क्यों नौटंकी कर रहा है.
"वैसे तू ज्यादा हे बीमार नहीं है जो इतनी सुबह हे पराठे खाने बैठ गया.", ऋतू उसका कान पकड़ती हुई बोली और सामने से हे कौशल्या जी आ गई.
"अब मेरे लाल ने पूरा एक दिन खाना नहीं खाया तोह वह कमी पूरी करेगा हे. चल मेरे बचे जल्दी से खाना खा के तैयार हो जा और स्कूल चल.", दादी की बात पर अर्जुन को छोड़ कर सब हंसने लगे.
"आप भी सबके साथ मिल गई दादी? मैं आपसे बात नहीं करूँगा.", अर्जुन प्लेट एक तरफ करते हुए झूठा गुस्सा दिखने लगा तोह एक साथ उस पराठे पर तीन हाथ लगे और तीनो ने एक एक गरै उसके सामने कर दी.
"तू ऐसे हे ाचा लगता है मेरे लाल. देख घर फिर से घर हो गया.", पहले कौशल्या जी ने खिलाया फिर आरती दीदी ने और आखिरी में पीछे कड़ी ऋतू दीदी ने. अर्जुन भी ये देख कर खुश था. अगले हे पल भरे हुए मुँह में रुपाली दीदी ने भी एक निवाला प्यार से ठूंस दिए.
"उम्म्म.. बस करो भाई. पूरा पराठा मुँह में भर दिए. सब मिले हुए है यहाँ तोह.", अर्जुन फूले हुए मुँह से अजीब आवाज में बोलै और कौशल्या जी उसकी नजर उतरती रसोईघर में चाय लेने चली गई. रुपाली भी जाती हुई हाथ हिला कर अर्जुन को bye बोल कर गलियारे से निकल गई.
"प्रीती तू भी बैठ और ये ले कॉफ़ी.", अलका दीदी ने 4 कप कॉफ़ी टेबल पर रखते हुए प्रीती को अपने साथ बिठाया और Aarti-Ritu को भी उनके कप दे दिए.
"वैसे इन दोनों के हाथ से भी खा ले ारु. सबने खिलाया तोह इन गरीब पर भी कृपा कर दे.", ऋतू की बात प्रीती के तोह समझ न आई लेकिन अलका ने एक निवाला टॉड कर अर्जुन के मुँह के सामने किआ. अर्जुन जैसे हे खाने लगा अलका ने वह अपने मुँह में दाल लिए.
"ये गरीब भूखी है मालकिन.", आँख मरते हुए अलका ने ऋतू से कहा और अर्जुन इन दोनों की मिलीभगत देख रहा था. फिर जैसे हे प्रीती की तरफ देखा तोह उसने शरमाते हुए नजरे झुका ली.
"और ये? लगता है इन्हे साहब अपने हाथ से खुद खिलाएंगे.", अब अर्जुन भी इशारा समझ गया था ऋतू दीदी का और एक निवाला टॉड कर उसने प्रीती की तरफ बढ़ाया. जो की वह वापिस अपने हे मुँह में डालने वाला था. लेकिन अलका ने उसका हाथ वही पकड़ लिए और प्रीती ने हलके से दांत चुभते हुए निवाला मुँह में ले लिए.
"आउच. यहाँ तोह मैं हे हलाल हो रहा हु. मुझे लगा था के आप मेरे साथ हो. मैं नहीं बात करता आप लोगो से. मेरी माँ हे खिलाएगी मुझे.", अर्जुन पाँव पटकता हुआ रसोईघर में दौड़ गया और ऋतू अलका दीदी से हवा में ताली मारती हंसने लगी.
यही तोह होता है परिवार.. छोटी छोटी अनगिनत खुशियां जहा हर क्षण मिलती है, सब एक दूसरे के साथ हर स्थिति में खड़े रहते है.. साथ मिलकर खुशियां मानते है और दुःख की घडी में एक दूसरे के साथ जुड़ कर खड़े रहते है. ज़िन्दगी कितनी खुशियां समेटे है ये बस एक लक्ष्य के पीछे भागने भर से नहीं पता चलता. लक्ष्य पाने का असली मजा है ऐसे एक दूसरे के साथ रहते हुए हंसी खुसी हर पल को जीना. रूठना, मानना, हंसना और हँसाना. और रामेश्वर जी का ये परिवार बिलकुल आदर्श परिवार था.
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"पापा, अब कैसा है अर्जुन? घर ले आये उसको?", पंडित जी के घर से चाय पीने के बाद छोल साहब और प्रीती घर आ गए थे. और कुछ हे देर में शिमला से रेणुका ने फ़ोन करके हलचल पूछने के बाद अर्जुन के बारे में पुछा.
"वह अब ठीक है रेणुका. अभी आधे घंटे पहले हे लेकर आये है उसको.", छोल साहब आराम से हे बात कर रहे थे लेकिन फ़ोन बुआ का है ये पता चलते हे प्रीती अपने कमरे में चली गई.
"रखती हु पापा. बस हलचल पूछने के लिए हे फ़ोन किआ था. आप भी समय से खाना खा लीजियेगा.", रेणुका से जब खुद को और संभाला नहीं गया तोह इतना कहते हे फ़ोन काट कर वह कुर्सी पर बैठी रोने लगी. दिल में फिर से दर्द तेज हो गया था और अर्जुन.. अर्जुन के साथ उसने कैसे ये कर दिए. जो उस से इतना प्यार करता है, इज़्ज़त्त देता है. लेकिन साथ हे प्रीती, जिसने सबकुछ किआ सिर्फ उन्हें खुश रखने के लिए. खिड़की बहार पहाड़ दिख रहे थे लेकिन इस पल तोह जैसे रेणुका का दिल इनसे भी बड़े पहाड़ से भोझ और दर्द के नीचे दबा था. आंसू बहते हुए जमीन पर गिरने लगे थे.
फिर चेहरा साफ़ करती वह अपने आप से हे कहने लगी, "अर्जुन मैंने तुम्हारे दिल को समझा है. मैं हे स्वार्थी हो गई थी लेकिन मैं जानती हु तुम अपनी रेणुका को माफ़ कर डोज. फिर चाहे तुम मुझे प्यार करो या सजा दो, मैं तुम्हारी याद और हमारे बचे के साथ पूरी ज़िन्दगी जी लुंगी"
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अर्जुन नहाने धोने के बाद किताबे उठा कर अपने दादाजी के पास हे उनकी बैठक में पढ़ने लग गया. रामेश्वर जी ने एक बार उसको देखा और फिर मुस्कुराते हुए वह भी अखबार पढ़ने में लीं हो गया. ऋतू ने पूरे घर में अर्जुन को ढूंढा और फिर वह भी बैठक में आ गई जहा वह अपना सर खुजाता हुआ कोई सवाल हल करने में लगा था. रामेश्वर जी ने ऋतू को देखा जो बड़े गौर से अर्जुन की कॉपी में लिखा हुआ पढ़ रही थी.
"जब नहीं समझ आ रहा तोह गलत क्यों कर रहा है? इधर दे पेन और ध्यान से समझ. आर्गेनिक केमिस्ट्री इजी है अगर तू स्ट्रक्चर में कंफ्यूज न हो तोह. एक पेज पूरा खराब किये बैठा है और अभी भी लगा हुआ है.", ऋतू ने थोड़ा गंभीर आवाज में कहा था और साथ हे अर्जुन के कान के पीछे चपत लगा दी. अर्जुन भी चुप था और रामेश्वर जी एक पल उन्हें देखने के बाद वापिस अखबार में नजर डाले सुन्न रहे थे.
"ये कम्पलीट स्ट्रक्चर है. अब इसको ब्रेक करते है.. ऐसे.. अब ये और .. अगले 15 मिनट तक ऋतू बोलती रही और कॉपी में लिखते हुए अर्जुन को समझती रही. इस समय वह कही से भी उसकी लाड़ली बहिन नहीं लग रही थी. फिर नजर का चस्मा थोड़ा सा ठीक करते हुए कुछ सवाल बना कर अर्जुन को दिए और उन्हें हल करने का बोल कर वह से चल दी. "15 मिनट में ये तीनो करके रखना. मैं नाहा कर आई तब तक."
"बाप रे, पूरी हिटलर है ये. स्कूल हे चला जाता इस से तोह ाचा.", अर्जुन की बात पर रामेश्वर जी मुस्कुरा रहे थे और उन्हें ख़ुशी थी की ऋतू इतना ध्यान देती है अर्जुन की हर चीज पर. कौशल्या जी अब खली समय में इधर आ गई थी और अर्जुन को पढ़ते देख उसके सर पर हलकी चम्पी करने लगी. काम को भूल कर वह भी आँखें मूंदे मजे लेने लगा. अपने बताये समय पर ऋतू दरवाजे पे कड़ी ये देख रही थी और इस बार जो अर्जुन का कान खींचा तोह अर्जुन की साडी मस्ती फुर्र हो गई.
"सुधर जा रे सुधर जा.", ऋतू ने तल्खी से कहा तोह कान मसलता अर्जुन कॉपी के पैन उन्हें दिखता दूसरे हाथ से अपना कान सेहला रहा था.
"और ये आखिरी वाला? ये गलत कहा हो गया?", ऋतू वापिस बैठ गई उसके बराबर और कौशल्या जी ऊपर दीवान पर बैठी चुपचाप देखने लगी इन दोनों को.
"जो स्ट्रक्चर दिए है वह तोह किताब में है हे नहीं और आपने अभी तक मुझे सेकंड ईयर की किताब कहा दी है, वह तोह आप हे पढ़ रही हो.", ये सुनके रामेश्वर जी का माथा थांनका. ये दोनों कोनसी क्लास की पढाई कर रहे है.
"ाचा पहले यही प्रैक्टिस कर ले, गर्मी की छुट्टियों में पढ़ना वह. हाँ ये शायद सेकंड ईयर वाली से हे है.", ऋतू ने एक आखिरी सवाल उसके देने के बाद उस किताब के कुछ पैन पलट कर देखे, जैसे वह संतुष्ट होना चाहती हो.
"ऋतू बीटा, दिखाना जरा ये किताब?", रामेश्वर जी ने उत्सुकता को संभालना उचित न समझा और किताब मांग हे ली. और ऋतू ने अपने दादाजी को किताब पकड़ा दी.
"ये तुम्हारी पिछली क्लास की किताब पढ़ रहा है?"
"दादाजी, अपनी तोह ये सिलेबस पहले हे मेरी पुराणी किताबे पढ़के पूरा कर चूका. और फर्स्ट ईयर की ये किताब मैंने इसलिए इसको दी थी क्योंकि 'आर्गेनिक केमिस्ट्री' में एक तोह ये थोड़ा कमजोर है और ऊपर से बड़ी क्लास में ये सब्जेक्ट ज्यादा कुछ चेंज नहीं होता. और खली बैठा रहने से ek-aadh घंटा एक्स्ट्रा पढ़ ले तोह फिर टूशन की जरुरत हे नहीं होने वाली अगली क्लास में.", ऋतू का सुलझा हुआ जवाब सुनकर रामेश्वर जी गदगद हो गए और अपनी पौती के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बस हमेशा वाली बात कही, "ाची बात है. तुम लोग खूब पढ़ो और भगवन तुम्हे हमेशा खुश रखे."
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"अर्जुन चल उठ, तुझे छोल अंकल के घर बुलाया है.", अर्जुन इस वक़्त अकेला हे बैठा था इस समाया और टेलेविज़न पर चैनल बदल रहा था जब अलका दीदी ने कमरे में आते हे उस से कहा. एक पल को अर्जुन उनके घर जाने का सोच के थोड़ा असहज हुआ फिर जैसे हे कुछ याद आते उठ खड़ा हुआ.
"ठीक है जाट हु.", वही बहार वाले दरवाजे से वह इतना कहता निकल गया.
"देख ले क्या क्या करना पड़ रहा है ऋतू, और अब भी कुछ न हुआ तोह वह जाने.", दरवाजे के पीछे हे कड़ी मुस्कुराती हुई ऋतू से अलका ने कहा तोह वह अपना हाथ उसकी कमर में डालती फिल्मी स्टाइल में बोली.
"प्यार करने वालो को मिलाने से बढ़कर दुनिया में कोई बड़ा काम नहीं है मेरी जान.", आँख दबती वह उसको साथ हे वापिस अपने कमरे की और चल दी.
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अपनी हे धुन में अर्जुन सीधा उनके घर के अंदर आ गया लेकिन यहाँ तोह पूरी ख़ामोशी थी. उसने ध्यान भी नहीं दिए था के बहार गाडी नहीं कड़ी थी. लेकिन आज तोह रसोईघर में पारवती भी उसको नहीं दिखी. जिस दरवाजे से वह अंदर आया था उसके बंद होते हे पीछे देखा तोह प्रीती वह पीठ लगाए कड़ी उसको हे देख रही थी.
"ये सब?", अर्जुन ने इधर उधर देखते हुए प्रीती से इतना हे कहा. उसको थोड़ा डर था के ये पागल क्या कर रही है और कही पारवती ने देख लिए तोह.
"बहोत मार लिए अपने मैं को बस अब और नहीं. जो होगा देखा जायेगा", प्रीती ने पूरी अदा से अर्जुन की आँखों में देखते हुए कहा और नंगे पाँव हे उसकी तरफ चल कर आते हे खड़े खड़े अपनी बाहों का हार अर्जुन के गले में दाल लिए. दरवाजा बंद होने और यहाँ कोई लाइट नहीं जलने से हल्का अँधेरा था और ऐसे मादक माहौल में लम्बी चिकनी टाँगे घुटनो तक बेपर्दा उस एक मात्रा फ्रॉक में.
"घर में..", अर्जुन की बात पूरी होती उस से पहले प्रीती ने उसके होंठो पर ऊँगली रखते हुए अर्जुन के गाल से गाल सत्ता कर सरगोशी की, "कोई नहीं है अगल 2-3 घंटे, सिर्फ मैं हु.", और होंठो से अर्जुन के कान की लौ को चूम लिए. पाँव की उंगलियों के भर कड़ी प्रीती की लम्बी टांगो से ऊपर एक भरपूर आकर लेते ठोस कूल्हों पर स्वतः हे अर्जुन का हाथ पहुंच गया.
"तुम्हारे इरादे ठीक नहीं है. और अगर..
"कुछ अगर मगर नहीं. तुम बहोत बोलते हो.", गुलाबी भरे हुए होंठ अर्जुन के मुँह पर लगाती वह उसकी जुबान बंद कर चुकी थी. अर्जुन ने इस शेरनी के सामने हथियार डालते हे साथ देने में हे भलाई समझी लेकिन शायद उसको अंजाम पता नहीं था.
"उम्मंहहह... आह्ह्हम्म्म", बुरी तरह अर्जुन के होंठो को मुँह में भर कर चूसती प्रीती सच में हे किसी शेरनी की तरह इस तगड़े शिकार को अपने काबू में किये थी. उन्माद और उत्तेजना में अर्जुन सिर्फ प्रीती को थामे उन भरपूर चिकने लेकिन कसरती कूल्हों और मुलायम जांघो पर हाथ फिरता सबकुछ प्रीती के हवाले किये था. थोड़ा सा जोर लगा कर प्रीती ने अपनी कमर उचकाई तोह अर्जुन मदहोशी में भी समझ गया. कूल्हों के नीचे अपने पंजे लगता वह उसकी मदद करने लगा. कमर पर टाँगे कैंची सी बंद करती वह किसी जोंक सी लिपट चुकी थी और अर्जुन वैसे हे उसको उठाये अंदाजन कमरे की तरफ चल दिए. सिर्फ एक पल के लिए प्रीती अपने बिस्टेर पर अर्जुन के नीचे पड़ी चूम रही थी.
"श.. ाचे बचे की तरह नीचे आओ.", उसकी बात मानता वह बिना सवाल किये अब वह प्रीती के नीचे और प्रीती उसकी कमर पर घुटने मदद कर गर्दन चूमती हुई नीचे की तरफ होंठ ला रही थी..
"इसकी कोई जरुरत नहीं है यहाँ.", छाती से ऊपर तक खिसकी अर्जुन की टीशर्ट अगर वह खुद हे नहीं उतरता तोह उसका फटना निर्धारित था.. ाचे से अपने हाथ उसके चौड़े सीने पर घूमते हुए प्रीती एक एक इंच का जायजा ले रही थी. जैसे हे उसके होंठो के बीच अर्जुन का दया निप्पल आया, मजे की अधिकता से अर्जुन की मुट्ठी बिस्टेर पर कास गई. हिम्मत करते हुए उसने फिर से हाथ प्रीती के कूल्हों पर रखे हे थे की प्रीती ने उसके निप्पल पर दांत गदा दिए.
"शठ.. पागल हो गई हो.?", अर्जुन ने बदले में एक तेज सीत्कार करते हुए हे उसके कूल्हे, जहा अब फ्रॉक का कपडा नहीं था को जोर से मुट्ठी में भर लिए. लेकिन प्रीती जैसे उनमे से दूध निकल के हे रुकने वाली थी. अपने होश संभालता अर्जुन इस सब से बचने की जुगत भिड़ने लगा था. कुछ और न समझ में आया तोह उंगलिया बहार को निकले कूल्हों की दरार में दाल दी. गरम मुलायम फैंको के बीच बस कपडे की पतली कतरन का कवच हे बढ़ा था लेकिन अर्जुन के हाथ अपने खजाने के पास महसूस करते हे प्रीती ने काम आसान करते हुए अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठा ली.
"इस से आगे... इस से आगे गड़बड़ हो जाएगी.", प्रीती को उसकी ये चेतावनी जैसे सुनाई नहीं दे रही थी. नशीली आँखों से अर्जुन को देख कर अगले हे पल उसने वह safed-gulabi फ्रॉक शरीर से अलग करके एक तरफ उछाल दी. पतली गुलाबी डोरी वाली ब्रा में क़ैद प्रीती के यौवन अर्जुन की नजरो के सामने थे. लहराती चिकनी पीठ और सीने से नीचे अंदर को धंसी मांसल कमर जहा ख़तम हो रही थी वही एकाएक बहार को निकले कूल्हे.
"वही देखना है मुझे.", अरजणु के जो दोनों निप्पल कड़े हो चुके थे इतनी चूसै की वजह से उनपर जीभ फिरती हुई वह वापिस ऊपर की तरफ जाने लगी. बस इस बार वह अपनी पत्थर सी ठोस और फूली छातियाँ भी उसके सीने से रगड़ती जा रही थी. अर्जुन के ख्वाब से भी बहार था ये सब और प्रीती हर पल जैसे हावी होती जा रही थी.
"बहोत हुआ.", अर्जुन ने ब्रा का क्लिप खोल कर अलग करते हे प्रीती को अपने नीचे ले लिए. वह बेपरवाह से मुस्कुराती हुई जैसे इसके लिए भी तैयार थी.
"रोक कौन रहा है? सब तुम्हारा हे तोह है", खुद हे उसने दोनों kaam-shikhar बेपर्दा करते हुए अर्जुन को खुला न्योता दे दिए. जरुरत से ज्यादा कसाव लिए प्रीती के दोनों उभर यहाँ भी जैसे अर्जुन को चुनौती दे रहे थे. सचमुच अनुपम शरीर था प्रीती का जिसकी गर्मी अर्जुन ने आज महसूस की थी. दोनों उभारो को मुट्ठी में पकड़ते हुए अर्जुन ने एक लाल उभरी हुई चीर्य को मुँह में लिए और हलके हलके चूसने लगा. ट्रैक पाजामे में उभरे उसके सख्त लुंड पर प्रीती का यौनकुंड नीचे से लिप्त अपना दबाव बनाने लगा था. अर्जुन की कमर में टाँगे लपेटे वह नीचे से हे अपने कूल्हे हिलती अर्जुन को मजे से दोहरा किये जा रही थी. दोनों चुचो पर अपना दम दिखने के बाद अर्जुन प्रीती का चेहरा चूम कर एक पल के लिए अलग हो कर बिस्टेर से नीचे खड़ा हुआ.
बिस्टेर पर नागिन सी बलखाये लेती प्रीती का हुस्न अर्जुन को एक सम्मोहन में क़ैद कर रहा था. खुद को निर्वस्त्र करता वह भी सम्मोहित सा उसके जलवानशीं हुस्न के ऊपर आते हुए झुक गया. मुँह से एक उत्तेजक सिसकी निकल गई अर्जुन के जैसे हे 3/4 फुट लम्बे उसके अजगर को प्रीती ने अपनी नरम लम्बी उँगलियों में नीचे हाथ बढ़ाते हुए पकड़ लिए. सुर्ख रक्तिम होंटो के पीने के सिवा अर्जुन के पास और विकल्प नहीं था.
बड़े कमरे में प्रीती के हे नरम बिस्टेर पर एक दूसरे का तबियत से रास पीते हुए दोनों अलग हे जुंग लड़ रहे थे. तीखे निप्पल जिस्म में तीर सा वॉर कर रहे थे लेकिन इसका अलग हे असर हो रहा था अर्जुन के पूरे जिस्म पर. रोये खड़े हो चुके थे और रीढ़ की हड्डी से लेकर पाँव तक एक करंट का एहसास दौड़ रहा था. प्रीती का चेहरा दोनों के जिस्म की गर्मी और इस जोश की वजह से लाल भभूका हो चूका था.
अपनी लम्बी उंगलिया सुपडे से निचे आगे पीछे करती वह अर्जुन को उसकी सभी सीमाओं से परे ले जा चुकी थी जहा अर्जुन के वश में कुछ नहीं रहा था. दोनों बहे पीठ पर लपेटती वह बड़ी कुशलता से अर्जुन को palat-ti एक बार फिर उसके ऊपर आ चुकी थी. इस प्यार के dwand-yudh में प्रीती ने अर्जुन को एक और बार चित्त करते हुए दोनों तरफ पांव करके खड़े होकर अपना वह आखिरी वस्त्र भी बड़ी मादक अदा से अलग करते हुए अर्जुन का रक्तचाप थोड़ा और बढ़ा दिए था. अर्जुन की सोच से कही ज्यादा हे उभरे हुए कूल्हों की खाई भी वैसी गहराई लिए थे लेकिन नजर जब उस ख़ास भाग पर पड़ी तोह वह बेताबी में उठने हे लगा था लेकिन उठ न सका. सीने पर अपना गोरा मुलायम पाँव रखती प्रीती ने उसको वापिस बिस्टेर से चिपका दिए. ये अबतक का सबसे बेहतरीन हुस्न था जिसको प्रीती ने कड़ी म्हणत से तापा कर कुंदन बनाया था और आज तक खुद की आँखों से भी छुपाये रखा था.
"एफ्रोडाइट." अर्जुन जैसे गुलाम हो गया था उस शरीर का जो उसकी आँखों के सामने बेपर्दा था. हलके पसीने से दमकता प्रीती का शरीर एक पैमाना लगने लगा था अगर सुंदरता को आंकने की बात हो. ठोस उभार नेव्तोन का सिद्धांत ठुकरा चुके था, उनसे नीचे तराशा हुआ कैसा पेट और गोल नाभि, बमुश्किल 28 की पतली कमर और फिर 34 के कूल्हों से नीचे बाकी शरीर सी हे खूबसूरत चिकनी जाएंगे.
अर्जुन के लिंग की तरफ चेहरा करती वह उसके सीने से थोड़ा नीचे बैठ कर कुछ पल बस उस असाधारण से फड़कते अंग को देखने लगी. जो अपनी पूरी औकात पर आ चूका था. धीरे धीरे किसी कुशल सर्प पकड़ने वाले की तरह उसकी तरफ बढ़ती प्रीती ने जड़ से इस गरम डंडे को पकड़ते हुए अपना मुँह करीब कर लिए.
"आठ..", अर्जुन सिसक उठा जब प्रीती की जीब सुपडे के निचले हिस्से से होती हुई उसके agra-bhag से छलकती छोटी सी बूँद तक फिसलती गई. हरी नस्से उभरी हुई उसके लुंड को भयानक दिखा रही थी लेकिन प्रीती बिलकुल निश्चिंत सी कभी गीले होंठ तोह कभी अपनी जीभ लगाती अर्जुन के संयंम की परकाष्ठा देख रही थी. अब एक हे उपाए थे अर्जुन के पास सबकुछ अपने हाथ में लेने का. दोनों बाजुओं से प्रीती की जांघो को पीछे खिसकते हुए अर्जुन ने जांघो के बीच चिप्पे मधुकुन्द पर मुँह लगा दिए. अपनी धड़कन को काबू करता वह आँखें बंद किये कस्तूरी सी महक वाले छेड़ के बहार की फांको को वैसे हे चूमने चूसने लगा जैसे प्रीती ने आज उसके होंठो को चूमा था.
"सीईई.. उम्म्म्म." प्रीती की पकड़ उसके लुंड पर और मजबूत हो गई थी और साथ हे जांघो का कसाव चेहरे पर. हिम्मत न हारती वह अर्जुन के सुपडे के बराबर मुँह खोलती पूरा गुलाबी हिस्सा मुँह में भरते हुए अर्जुन को भी वही सुख देने लगी थी जो उसको अर्जुन से मिल रहा था.
इधर अर्जुन की जीभ ने उसके छेड़ को ाचे से टटोलते हुए थोड़ा अंदर प्रवेश किआ, प्रीती ने शरीर ढीला छोड़ दिए. छूट ने रोका हुआ बांध टॉड दिए था लेकिन जब तक वह अलग होती मुँह में फूले हुए सुपडे ने भी गरम पानी फेंकना शुरू कर दिए. दोनों उस क्षण में शांत अपनी जगह रुके रहे...
"आह्हः..", अर्जुन ने जैसे हे ये सिसकारी ली, प्रीती उछलती हुई बाथरूम का दरवाजा बंद करती अंदर जा चुकी थी. अर्जुन के रस की एक भी बूँद अर्जुन के जिस्म पर नहीं गिरी थी. लेकिन वह बेखबर सा आँखें बंद किये वैसे हे पड़ा रहा. कोई 1 मिनट बाद हे प्रीती अपनी जन्मअवस्था में हे उसके शरीर से अमरबेल सी लिपट गई.
"ये सब सपना था?", अर्जुन ने उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.
"हम्म..", प्रीती ने उसकी बात सुनकर सिर्फ इतना कहा और इस बार बड़े हे प्यार से उसके ऊपर लेट कर होंठो पर एक गीला चुम्बन दे दिए.
"तुमने कोई प्रैक्टिस की थी ये सब करने से पहले?", अर्जुन अपने चेहरे के ऊपर झुके उस खूबसूरत चेहरे को देख रहा था. अब वह हलकी शर्म और ढेर सारा प्यार था.
"रोज रात को, सपने में. और आज सीधा फाइनल", प्रीती अर्जुन की नाक पर जीभ से छेड़छाड़ कर रही थी. अब अर्जुन भी बेहतर था और उसके नंगे चुत्तड़ो को हलके हलके दबा रहा था.
"मैंने उम्मीद नहीं की थी इसकी. और वह भी ये की तुम मुझे काबू कर लोगी.", अर्जुन के स्वर में भी प्यार और प्रशंशा थी, अपनी होने वाली बीवी के लिए.
"वह इसलिए क्योंकि बाकी बाद के लिए. मुझे सब करना है लेकिन विथाउट प्रसौतिओं एंड एवरीथिंग इनसाइड.", नीचे खिसक कर वह उसके सीने पर सर रखे लेट गई थी. और अर्जुन उसकी बात का मतलब समझने के बाद खुद शर्मा रहा था.
"और कुछ हो गया तोह.?"
"तभी तोह कहा है. मुझे वही चाहिए और उस से पहले अंदर नहीं. यही तोह तुमने भी कहा था, याद है?"
"हाँ. और मैं दूसरी बात से भी सहमत हु.", साइड से निकले एक दूध को प्यार से सहलाते हुए अर्जुन बोलै और प्रीती की हलकी सी सिसकी चूत गई.
"ससस.. क्या करते हो. मुझे बस ऐसे लेटने दो न.", उसका हाथ पकड़ कर अपनी पीठ पर रखती प्रीती आज खुद को अर्जुन की बाहों में पा कर जैसे खुद को सबसे खुशकिस्मत मान रही थी, पूरी दुनिया में.
"वैसे तुम्हारा फिगर खराब नहीं हो जायेगा इतने बचो से.", अर्जुन उसको छेड़ रहा था लेकिन वह मुस्कुरा रही थी.
"ग्रीस में 4-5 बचे होना नार्मल है. वैसे भी म्हणत से बॉडी बेटर होती है खराब नहीं.", प्रीती अपनी उंगलिया अर्जुन की ब्याह पर फिर रही थी.
"यहाँ तोह मैंने ऐसा कोई नहीं देखा, 1 बचा हुआ नहीं और लड़की से सीधा आंटी.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह प्रीती उसके गाल पर चपत लगती हुई सीने पर थोड़ी रखे उसको देखने लगी.
"यहाँ लड़की को इतर हाफ नहीं बोलते न. और किचन, बचे, कपडे बस यही काम होते है. ग्रीस में 2 हे काम है, फार्मिंग और टूरिज्म. और फॅमिली के सभी एडल्ट्स काम करते है. हेल्थी एक्टिव लाइफस्टाइल का एक एक्साम्प्ले तोह मंडे दिखा दूंगी मैं.", प्रीती ने एक अदा से कहा तोह अर्जुन के भी चेहरे पर चमक आ गई.
"तुम्हारी माँ मंडे आ रही है?"
"तभी तोह दादू पारवती दीदी और मुकेश भैया को लेकर बहार सामान लेने गए है. दादू को एक महीने से पता था लेकिन मुझे उन्होंने आज तुम्हारे घर से आने के बाद हे बताया.", प्रीती की बात सुनकर अर्जुन का मुस्कुराता चेहरा एकदम शांत हो गया.
"क्या सोचने लगे तुम एकदम?", प्रीती सचमुच जैसे उसकी धड़कन समझ जाती थी.
"कुछ नहीं. जैसा तुमने ग्रीस के बारे में बताया, अगर तुम्हारी माँ ने मुझे नापसंद करते हुए वही किसी लड़के को तुम्हारे लिए पसंद किआ तोह क्या होगा?"
"क्या फ़ालतू सोचने लगे? ये उन्हें पहले से पता है के तुम कौन हो. और जोएल की मैरिज वह ग्रीक लड़की से हे करेंगी जो उन्होंने हमारी बात पक्की होने के बाद डैड से कह दिए था. लेकिन वह अब तुमसे मिलेंगी जरूर, जैसे उनके यहाँ होता. फर्स्ट फॉर्मल मीटिंग विथ केक, फ्लावर्स एंड वाइन.", प्रीती ने आँख मरते हुए कहा और कड़ी होने लगी लेकिन अर्जुन ने पीछे से पकड़ कर अब उसको अपनी गॉड में बिठा लिए.
"फ्लावर्स तोह मेरे पास स्पेशल है उनके लिए, केक भी ले आऊंगा लेकिन वाइन की जगह अगर मैं कुछ और लाया तोह रेज्क्ट तोह नहीं कर देंगी?", दोनों उभर मुट्ठी में लेता वह उसके गाल चूम रहा था. नीचे उसका लिंग हलकी फुलावट लेता प्रीती के कूल्हों के बीच दबा था.
"तुम कुछ नहीं भी लाओगे तब भी मैं संभल लुंगी. बस ये जो नीचे खड़ा हो रहा है इसको तुम सम्भालो.", हंसती हुई वह उसकी गिरफ्त से निकल कर शीशे के सामने कड़ी हो कर ब्रा और पंतय पहन कर बाल ठीक करने लगी. बिस्टेर पर तक लगाए अर्जुन बस उसके हुस्न को देखने में खोया रहा.
"ओह मिस्टर मजनू, ऐसे हे नंगे रहना है क्या? 2 घंटे हो गए है हमे यहाँ. कपडे पहन लो.", फ्रॉक उठाने वह बिस्टेर पर झुकी तोह अर्जुन ने फिर से उसको खींच लिए.
"दिल नहीं है अब तुमसे अलग होने का.", कमर को पकड़ कर वह एक बार फिर उसके होंठो को पीने लगा और प्रीती भी उसका साथ देती चेहरा थामे अपनी जीभ उसकी जीभ से भिड़ने लगी. दोनों कुछ देर एक दूसरे को चूसने के बाद अलग हुए तोह अर्जुन भी कपडे पहन कर बाथरूम में चला गया.
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"ये आ गया अर्जुन. घर पे आजकल पाँव नहीं टिकते इसके जब देखो यहाँ वह घूमता रहता है.", अर्जुन अभी पिछले आँगन में आया हे था के अलका दीदी की बात सुनकर ठिठक गया. खाने की टेबल पर इस वक़्त दादी के बराबर में ये जाना पहचाना चेहरा था और साथ हे रुपाली दीदी और माधुरी दीदी बैठे थे.
"नमस्ते.", सामने बैठी कश्यप जी की बहु सरोज को हाथ जोड़ कर अर्जुन बोलै तोह उनके चेहरे पर एक मोहक मुस्कान आ गई. प्रतिउत्तर में सिर्फ सर हिला दिया सरोज ने.
"अब कैसे हो तुम? मैं तुम्हारा हे पता लेने आई थी. कल तुम्हारे भैया ने बताया था के तबियत ज्यादा खराब हो गई थी तुम्हारी.", एक bhari-poori नवब्याहता थी सरोज, 24-25 साल के आसपास, साफ़ रंगत और थोड़ा भरा हुआ चेहरा और शरीर. सबसे ख़ास उसकी आँखें जो शायद होंठो से ज्यादा बात करती थी. और भरे भरे होंठ.
"इधर बैठ जा जब भाभी बात करने आई है तोह.", कौशल्या जी ने अपने परिचित अंदाज में कहा तोह सकपकाता हुआ वह उनके सामने हे बैठ गया, रुपाली दीदी की बगल में.
"जी मैं बिलकुल ठीक हु. और भैया को मेरी तरफ से थैंक यू जरूर बोल दीजियेगा. ऋतू दीदी ने बताया के कैसे उन्होंने मुझे कमरे से गाडी तक पहुंचाया.", अर्जुन अब थोड़ा शर्मा रहा था क्योंकि जब भी सरोज भाभी उसको देखती तोह उनकी आँखों का अलग हे संवाद चल रहा था.
"वह तोह जब तुमसे मिले तोह खुद बोल देना. वैसे ाचा लगा देख कर के जल्दी ठीक हो गए हो. फिर से तोह नहीं अँधेरे में घर से जाना शुरू कर डोज.?", सरोज भाभी की बात पर अब अर्जुन क्या कहता के वह भी उन्हें सुबह देख चूका है उसको देखते हुए.
"अरे सरोज, वह तोह अब इसका नियम बना हुआ है. तेरे दादाजी के कहने पर हे चलता है. वैसे अनिल उतनी हे सुअभ निकलता है न?", यहाँ जवाब कौशल्या जी ने दिए साथ हे सवाल भी कर लिए. एक पल के लिए सरोज भाभी शांत हुई फिर वैसे हे बोलने लगी.
"हाँ अब उनके पास 2-3 शहरों की सप्लाई रहती है और फिर वापिस समय से घर आने के चक्कर में 4-5 बजे निकल जाते है. अब पापा ने समझाया है तोह इस हफ्ते से वह 2 दिन बहार रहा करेंगे और 2 दिन घर. नहीं तोह सेहत पर भी असर होने लगा है अभी से."
"तेरे खाना लागू ारु?", कोमल दीदी की आवाज पर अर्जुन ने बिना सोचे समझे हे बोल दिए.
"प्रीती ने खिला कर भेजा है दीदी.", और सभी नजरे उसके चेहरे पर टिक गई. अर्जुन को समझ आया के वह क्या बोल गया है तब तक देर हो चुकी थी.
"शाबाश. मतलब अबसे दोपहर का खाना तेरा बनाना बंद कर देते है.", ये फिर अलका दीदी ने उसकी टांग खींचनी शुरू कर दी थी. और बाकी सभी दीदी या तोह हंस रही थी या उसको घूर.
"प्रीती?", सरोज भाभी ने दादी की तरफ देखते हुए कहा, जो खुद भी मुस्कुरा रही थी.
"अरे होने वाली बहु है हमारी. वैसे सही कहु तोह इस घर की सबसे छोटी बेटी है वह लेकिन गलती से इस निकम्मे के पल्ले बांध दी है.", कौशल्या जी भी अपनी लाड़ली पोतियों के साथ हो गई थी.
"ओह तोह जनाब स्कूल की उम्र में हे ये सब.", भाभी की बात सुनकर अर्जुन उठ कर जाने लगा तोह कौशल्या जी की आवाज सुनते हे रुक गया.
"भाभी मजाक देवर से नहीं करेगी तोह जेठ से करेगी? संजीव वाली आने दे फिर तू भाग भी नई सकेगा. चल बैठ थोड़ी देर यहाँ और घर छोड़ के आइओ.", अर्जुन तोह सन्न रह गया के दादी ये क्या बोल गई.
"ाचा बैठ रहा हु दादी. वह तोह वैसे हे कुछ काम था मुझे."
"हाँ पता है मुझे. चलो तुम लोग बातें करो मैं चली अपने कमरे में. और तेरी भाभी यहाँ इसलिए भी आई थी के इनकी डिश की तार देख आ एक बार. भैया और अंकल है नहीं घर, दिश्वाला फ़ोन नहीं उठा रहा. यहाँ से भी मिला के देख लिए.", अर्जुन हामी भरते हुए गर्दन हिला कर अलका दीदी को घूरने लगा, दादी के जाते हे.
"वैसे क्या खिलाया आज स्पेशल?", अलका दीदी और ऋतू दीदी भी दादी के जाते हे वही बैठ गई. ऋतू के सवाल ने फिर से अर्जुन को मुख्या केंद्र बना दिए था सबकी नजरो का.
"वह आएगी तोह खुद हे पूछ लेना. खाना तोह खाना होता है.", अर्जुन झेंपते हुए कहने लगा. अब उसकी शर्म आ रही थी इनके बीच बैठने में.
"स्पेशल खाने की उम्र तोह नहीं लगती अभी तुम्हारी?", उनकी ऐसी बात सुनकर अर्जुन ने एक बार हर तरफ देखा और वह सिर्फ उसकी बड़ी बहने हे थी. माँ, ललिता जी अपने कमरे में जा चुकी थी.
"खाने का उम्र से क्या मतलब?", अर्जुन ने उनकी तरफ एक नजर डालते हुए पुछा.
"न कोई उम्र नहीं होती वैसे. चलो मैं चलती हुई माधुरी. आप सबसे मिलकर भी ाचा लगा. कभी सामने भी आया करो.", सरोज भाभी ने सबसे मिलते हुए कहा और अर्जुन उनके पीछे हे चल दिए. डिश की तार ठीक करने.
और 10 मिनट बाद हे वापिस अपने घर आ चूका था. अपने कमरे में आ कर लेता हे था के बगल में अलका दीदी भी आ लेती.
"हाँ तोह फिर मिला स्पेशल खाना? और भाभी की तार जोड़ दी क्या?", उनकी दोनों बातें सुनते हे अर्जुन मुस्कुरा दिए.
"खाना खा लिए था और भाभी के टेलीविज़न की तार बस स्विच में ढीली हो गई थी. मैंने लगा दी."
"मुझे तोह लगा था के वह दूसरा हे कनेक्शन करवाने वाली है. बड़ी जल्दी आ गया.", अलका दीदी उसके मजे ले रही थी.
"ाचा अब सोने दो थोड़ी देर.", अर्जुन ने उन्हें बाँहों में भरा तोह अलका दीदी भी प्यार से किश करने के बाद वैसे हे लेट गई. दोनों हे एक दूसरे की बाँहों में सुखद एहसास में थे. तक़रीबन 5 बजे कोमल दीदी ने अर्जुन को उठाया तोह वह अकेला हे था. सामने अपनी प्यारी दीदी को देख कर खुश हो गया.
"ारु, चल उठ जा भाई. बहोत देर से सो रहा है और आज स्टेडियम भी नहीं गया तू.", गाल पर हाथ फेरती वह उसको छोटे बचे की तरह प्यार कर रही थी.
"हाँ दीदी, कभी कभी तोह एक ब्रेक लेना हे चाहिए.", उनकी गॉड में सर रख के वह लेट गया और कोमल दीदी वैसे हे उसका सर सहलाती हुई उसको बस देखे जा रही थी.
"आप कुछ बोल नहीं रही? वैसे तोह आप कभी भी नहीं बोलती लेकिन मेरे साथ तोह बात कर हे सकती हो न दीदी."
"तेरे साथ बात करने के लिए तोह मुझे कुछ कहना हे नहीं पड़ता बस तुझे जी भर के देख लेने से बात हो जाती है.", प्यारी सी मुस्कान देती वह वैसे हे अर्जुन को गॉड में लिटाये रही.
"सच में आपका दिल नहीं करता मुझसे बात करने का?", अर्जुन ने नजरे उनके चेहरे पर करते हुए कहा तोह जवाब में कोमल दीदी ने आज पहली बार खुदसे उसके ऊपर झुकते हुए छोटा सा किश कर दिए.
"क्या कहु मैं भाई, मुझे इतना प्यार बिना मांगे हे मिला और मांग कर मैं इस प्यार को जाय नही करना चाहती.", कोमल दीदी इतना कहने के बाद चुपचाप कमरे से निकल गई लेकिन अर्जुन के दिल में कई सवाल छोड़ कर.
पानी के नीचे कुछ देर खड़ा होने के बाद वह सही से तैयार होने के बाद फिजिक्स की किताब हाथ में लिए नीचे आया जहा पहले से हे कोमल दीदी उसके लिए दूध और लड्डू रखे हुए थी टेबल पर. अर्जुन के आते हे वह वापिस रसोईघर में चली गई. अपने पास हे ताई जी और माँ को देख वह भी दूध ख़तम करने के बाद जल्दी आने का बोल कर बुलेट ले कर चल दिए, टूशन पढ़ने.
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"हाँ पापा, कैसे हो आप?", रामेश्वर जी ने घंटी बजते हे फ़ोन उठाया तोह सामने से आती खनकती आवाज सुनते हे मुस्कुरा दिए.
"मेरी लाडो को आज अपने बाप की याद आ हे गई. मैं ठीक हु बीटा तुम सुनाओ कैसी हो? अशोक जी और हमारा शहजादा कैसे है?", रामेश्वर जी ने अपने दामाद और नाती का हालचाल पुछा तोह कौशल्या जी भी बराबर आ बैठी.
"सब ठीक है और आपका शहजादा बोर्डिंग में है. ये कल हे गए है अपने काम के सिलसिले में जर्मनी, 2 हफ्ते के लिए. मुझे भी ले जा रहे थे लेकिन मैंने मन कर दिए. कल सुबह पहुंच रही हु आपके पास. ये इंडिया आएंगे तभी आप लोगो से मिलने के बाद मुझे साथ ले चलेंगे. इतने मैं आपके हे पास रहने वाली हु.", मधु शर्मा की ख़ुशी से भरी आवाज रामेश्वर जी को भी प्रसन्न कर रही थी.
"तेरा हे घर है मेरी बिटिया तोह तुझे बताने की जरुरत थोड़ी है. ले तेरी माँ बैठी है कान लगाए इतनी देर से. करदे इसका भी दिल हल्का.", अगले 5 मिनट दोनों maa-beti कितनी हे बातें करती रही और फ़ोन रखने के साथ हे कौशल्या जी थोड़ा चिंतित हो गई.
"आपको क्या हुआ थानेदारनी जी. अभी तोह खुश थी इतना और एकदम से परेशां हो गई."
"ख़ुशी तोह हुई की बिटिया आ रही है लेकिन चिंता भी वही के ये आपकी राजकुमारी आ तोह रही है लेकिन बाकी सबकी शामत आती दिख रही मुझे. अब बाथरूम से लेकर खाने तक में कमिया निकालनी शुरू और नया एक लगवाना पड़ेगा वह अलग.", कौशल्या जी ने अपनी चिंता जाहिर की तोह पंडित जी एक पल सोचने के बाद बोले
"तारा के कमरे में हे सोयेगी वह. और ऊपर टेलीविज़न है हे. रही बात उसके खाने पीने की तोह कोमल से बात करना वही बनाये मधु के लिए. बाकी अब समय के साथ समझदार तोह हुई होगी. परेशां मत हो.", पंडित जी की बात पर थोड़ी रहत मिली लेकिन फिर भी वह बहार चल दी सबको पूरा घर ाचे से ठीक करने के लिए.
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घर के बहार एक तरफ मोटरसाइकिल कड़ी करने के बाद अर्जुन ने घंटी बजे और प्रतीक्षा करने लगा. नीली जीन्स और सफ़ेद सूती शर्ट पहने, लम्बे बाल एकदम ाचे से संभाले हुए वह एक नजर कलाई पर बंधी घडी पर डालने के बाद सामने अंदर का दरवाजा खोल कर उसकी तरफ आती अन्नू को देखने लगा. 3/4 कला जम्पर और मेहरून ढीला सा कमर तक का टॉप पहने वह खिली खिली उसके सामने आ कड़ी हुई. दरवाजा खोल कर अंदर आने का बोल वह उसको साथ लिए अंदर ड्राइंग रूम में कड़ी हुई.
"बैठो यहाँ. क्या लोगे?", अर्जुन को एक सोफे पर बिठाने के बाद उसने पुछा और जवाब में अर्जुन ने किताब सामने टेबल पर रखते हुए कहा.
"कुछ भी नहीं. घर से आ रहा हु दूध पी कर. सोचा फिजिक्स पढ़ लेता हु नहीं तोह क्या पता फिर से क्लास से बहार न जाना पड़े.", अर्जुन की बात सुनते हे वह मुस्कुरा दी.
"मुझमे तोह इतनी हिम्मत नहीं है.", अभी वह इतना हे बोली थी की 46-47 साल की सलवार कमीज पहने ये सभ्य सी महिला अंदर से चलती हुई इधर आ गई. अर्जुन ने शिष्टाचार से उन्हें खड़े हो कर नमस्ते की तोह उन्होंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिए.
"अन्नू मैं तेरे पापा दे ऑन तोह पहले आ जाना. अपने हैप्पी दे घर पथ है तह चली स. जे दिल करे तह आ जावी, माथा टेकन." उनकी माता जी पंजाबी में बात कर रही थी. और अर्जुन ध्यान से सुन रहा था के वह कहना क्या छह रही है. पंजाबी समझ लेता था वह लेकिन ये थोड़ा तेज बोल रही थी
"ओह मम्मी जी तुस्सी जाओ. मैं नहीं जाना path-vath ते. चंगा भला पता है तुहानू. जे पापा आ गए तह मई बना दवंगी ौहना वास्ते चा.", अन्नू ने भी वैसे हे जवाब दिए.
"वेख पट, कुड़ी न पानी गरम नई करना ौंदा नाल तेरे सामने चा दी गाल कर रही है. ओह बीटा मैं भी झल्ली हु जो तुम्हारे साथ पंजाबी बोलने लगी. मंद मत करना. आप लोगो बातें करो मैं चलती हु. अगली बार बैठूंगी साथ अभी चलती हु.", उन्होंने अर्जुन से मुस्कुराते हुए कहा. हंसमुख महिला थी जैसे अमूमन पढ़ीलिखी पंजाबी महिला होती है.
"कोई गल्ल नई आंटी जी. तुस्सी पंजाबी वच गाल कर सकदे हो. मेरे वास्ते बोलना थोड़ा जा मुश्किल ऐ पर समझ चंगी तरिया लेना है.", अर्जुन ने जब साफ़ पंजाबी में बात की तोह आंटी ठुड्डी पर हाथ रखती उसको देखने लगी.
"ऐ तह चंगी गाल है पट. एक था कुड़ी ने पहली वरि मुंडा घरे सदया नाल हैगा वि गबरू. रब खुश रखे. चंगा लगेया मिल के बीटा जी. फेर मिलदे है.", उनकी बात पर जिस तरह अन्नू शरमाई अर्जुन को समझ तोह नहीं आया लेकिन जवाब में उसने भी हाथ जोड़ दिए. आंटी जी सर पे चुन्नी सही करने के बाद बहार चले गए.
"अब बताओ जरा ये क्या था? उन्होंने जो समझा वह शायद गलत समझा न. और तुमने कुछ बोलै भी नहीं.", अर्जुन मुस्कुराती अन्नू से बोलै तोह वह जाली वाले दरवाजे की चिटकनी लगाने के बाद बराबर आ बैठी.
"आराम से बाबा. मम्मी के हिसाब से तुम मेरे दोस्त हो और कुछ नहीं. और पहली बार उन्होंने मेरा कोई मेल फ्रेंड देखा तोह उन्हें ाचा लगा. इसलिए मैंने ज्यादा बात को नहीं खींचा. क्योंकि घर पर टूशन जैसा कुछ पॉसिबल नहीं और देखने से तुम लगते नहीं हो स्कूल के. अगली बार इसकी हेल्प मत लेना.", किताब उसको दिखते हुए अन्नू ने एक तरफ राखी और अर्जुन की बाजु पकड़ते हुए सत् गई.
"बाप रे. ये टीचर खतरनाक है. घर में स्टूडेंट को दोस्त बता के मिलवा रही है. कल को श्रीमान वालिए जी रिश्ता लेके घर आ गए तोह मैं घर से बहार. और उन्हें ये पता लगेगा के मैं ग्याहरवी में पढता हु तोह तुम्हारी करा देंगे शादी किसी दाढ़ी वाले सरदारजी से.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह अन्नू ने चूंटी काट ली उसकी कमर पर.
"दिमाग काम चलाओ. स्टूडेंट नहीं हो मेरे, याद रखना स्कूल के बहार स्टूडेंट नहीं हो."
"फिर क्या हु?", अर्जुन ने शरारत से देखा.
"मैं बात नहीं करती तुमसे , जाओ.", नखरा दिखती अन्नू पीछे हुई तोह उसकी गोरी कमर दिखने लगी, टॉप सरकने से. जो पहले अर्जुन ने देखि और उसकी नजर का पीछा करते हे अन्नू ने.
"शर्म नहीं आती क्या?", नजरे झुकाती वह दूसरी तरफ देखने लगी.
"मैं तोह बहार से हे तुम्हे देख रहा था. सुन्दर हो तोह देखूंगा हे.", अर्जुन ने तारीफ करते हुए कहा.
"मैं वो बात नहीं कर रही. तुम्हारी नजरे, उनकी बात कर रही हु. पहले मेनका के उधर और अब यहाँ."
"कल हॉस्पिटल वाला भूल गई शायद, नरम वाला.", अर्जुन जैसे सोच के बैठा था परेशां करने का.
"ऐसे नहीं मानोगे.", अन्नू मुस्कुराती हुई मारने के लिए ऊपर हुई तोह अर्जुन ने कलाई पकड़ते हुए अपने चेहरे के सामने उसको कर लिए. अन्नू की धड़कन उसके ऐसे पकड़ने से हे भाड़ गई थी और अब तोह दोनों के चेहरे 2 इंच दूर थे. आँखें बंद करती वह खुद को ढीला छोड़ उसके होंठो पर होंठ लगती उसकी बाहों में आ गई. एक मिनट के किश के बाद अर्जुन ने चेहरा पीछे किआ तोह बंद आँखों पर लम्बी पलके और हलके हिलते मॉटे होंठ, खूसूरत चेहरा और अन्नू की तेज चलती सांसें. धीरे से अन्नू ने आँखें खोली और उठ कर अंदर चली गई. अर्जुन बस देखता रहा.
"अब यही बैठे रहोगे? ये ड्राइंग रूम है मेहमानो के लिए. हम मेरे कमरे में बैठेंगे.", अन्नू उसका हाथ पकड़ कर उठती हुई साथ लिए अंदर की तरफ चल दी. ड्राइंग हॉल में तीन कमरों के दरवाजे थे और ये सबसे अंदर की तरफ वाला था. कमरे के देखते हे अर्जुन समझ गया के ये maa-baap के एकलौती लाड़ली बेटी है. पूरे बीएड के सिरहाने 7-8 अलग टेडी बेयर, एक स्टडी टेबल, एक कंप्यूटर, एक तरफ की पूरी दिवार पर काले रंग की लकड़ी की 4 अलमारी जो जमीन से छत्त तक थी बड़े आईने के साथ. बाथरूम से पहले हे अलग जगह शायद ड्रेसिंग के लिए और अनगिनत किताबे सलीके से दिवार पर लगी 3 लकड़ी की रैक में.
"बड़ा प्यार से संभल कर रखा है हर चीज को और उतना हे सुन्दर कमरा है तुम्हारा.", दिवार पर एक कौन में टंगे गिटार को देखते हुए अर्जुन ने कहा.
"मेरे भाई का है वह.", अन्नू थोड़ा भावुक हो गई ये कहते हुए. अर्जुन ने हैरानी से देखा तोह फिर मुस्कुराती हुई बोली.
"बुद्धू ऐसा वैसा कुछ नहीं, जस्सी सॉरी जसपाल इंग्लैंड में सेटल्ड है. मेरे से 4 साल बड़ा है मेरा भाई लेकिन पढ़ने गया था और वही पक्का हो गया. मम्मी के तोह सरे अरमान धरे रह गए मेहंदी, हल्दी, संगीत के लेकिन पापा खुश है. कहते है 'गोरी नाल मूंदे ने व्याह कित्ता है", अब अन्नू पहले जैसी हे मुस्कुरा रही थी.
"वैसे पहली बार कोई इस कमरे में आया है और सबसे ाची बात है के वह तुम हो.", सामने से अर्जुन के गले लगती वह कुछ देर ऐसे हे कड़ी रही और अर्जुन भी उसको सीने से लगे बाहों में भर के खड़ा रहा. उसको ये देख कर ाचा लगा था के अन्नू एक साफदिल और भावुक लड़की है.
"अब वह नरम सा फिर महसूस हो रहा है.", अर्जुन ने जब देखा के वह अलग हे नहीं हो रही तोह फिर से छेड़ते हुए कहा.
"ी लव यू ा लोट. रेपल्य मत देना. बस ऐसे हे रहना सदा. तुम मुझे बहोत ाचे से समझते हो. उम्मम्माह्ह्ह.", उसका गाल चूम कर वह अब उसको अपने बीएड पर लेकर बैठ गई थी.
"तुम्हे डर नहीं लगता मेरे साथ अकेले में?", अर्जुन तक लगाए किनारे की तरफ बैठा था और उसका हाथ अपने हाथ में लिए अन्नू अंदर की तरफ.
"इस से ज्यादा सिक्योर मैंने पहले कभी फील हे नहीं किआ. और तुम ये बोले क्यों वैसे.? इतनी कमजोर नहीं हु मैं जो तुम कुछ भी कर लो. सरदारनी हु.", आँखें बड़ी करती वह अर्जुन को घूरते हुए कहने लगी.
"पता है पता है कितनी बहादुर हो. मैं कल हे रिजाइन कर दूंगी.. बला बला बला .. इत्ते मॉटे मॉटे आंसू निकलने वाली सरदारनी.", अर्जुन परसो शाम वाली उसकी नक़ल करते हुए चिढ़ाने लगा तोह अन्नू उसको मारने का नाटक करती गॉड में हे आ बैठी.
"नक़ल करते हो मेरी. गंदे कही के."
"अब देखो खुद आ कर मेरे ऊपर गिरेगी तोह खतरा तोह है हे. फिर ये जो चिपक जाती हो तब दिमाग काम करना बंद कर देता है.", अर्जुन की गॉड में बैठी वह सीने से लग गई थी. और अर्जुन की शरारत से भरी बातें सुनते हुए गाल लाल हो चुके थे.
"हर टाइम यही सूझता है क्या तुम्हे? दिमाग बंद नहीं ज्यादा चलने लगता है तुम्हारा.", अन्नू का दिल भी तेजी से धड़क रहा था लेकिन ऐसे अर्जुन की गॉड में उस से चिपक कर बैठना अलग हे सुख दे रहा था.
"हर टाइम नहीं. जब तुम मेरे गले से लगती हो या मैं जब ये देख लेता हु.", नंगी कमर पर अर्जुन हाथ रखते हुए बोलै तोह अन्नू की सांस अटक गई. इस जगह पहला स्पर्श था ये किसी लड़के का. वह थोड़ा और कसक चिपक गई थी. नंगी मुलायम बाहों पर रौंगटे खड़े हो गए थे अर्जुन की इस च्वहाण से. और अब तोह उसके दोनों हाथ अन्नू की मुलायम कमर को पकडे थे, टॉप के अंदर से.
"प्लीज कमर से नीचे मत जाना. I'm नॉट रेडी येत.", अन्नू ने लड़खड़ती आवाज में बेचैनी से कहा तोह अर्जुन ने मुस्कुराते हुए आराम से उसको साथ में लिटा दिए.
"मैं गले से भी नीचे नहीं जा रहा हु. वह तोह इसलिए तुम्हे पकड़ा क्योंकि किनारे पर बैठा था. गिर न जाये हम.", अर्जुन की ऐसी बात सुनते हे शर्म से आँखें बंद कर ली अन्नू ने. लेकिन उसकी हिलती चट्टियां बता रही थी की वह अर्जुन को रोकती नहीं अगर वह इन्हे बेपर्दा भी कर देता.
"एक बार वैसे हे किश कर सकते हो जैसे फर्स्ट टाइम किआ था. वैसे हे खुदसे लगा कर. मैं उस एहसास को महसूस करना चाहती हु अर्जुन, ज़िन्दगी का सबसे खास एहसास था वह.", अन्नू बिस्टेर पर अभी भी वैसे हे लेती थी, आँखें बंद किये. अर्जुन भी उसकी बात सुनकर उसके ऊपर आ गया लेकिन कमर से खुद को दूर रखते हुए उसने अन्नू को दोनों होंठो को मुँह में भर लिए. इस बार वह भी तैयार थी और भरपूर साथ दे रही थी होंठो को पीने में. कब ये किश और गहरा हो गया दोनों अनजान थे. अर्जुन की जीभ कभी अन्नू अपने मुँह में भर लेती कभी वह उसका रास पीने लग जाता. अर्जुन के चौड़े सीने से दबते उभर थोड़ा सख्त होने लगे तोह अन्नू ने उसको पूरा अपने ऊपर खींचते हुए पीठ पर नाख़ून गाड़ने शुरू कर दिए.
"इस से आगे नहीं अन्नू. बस इस से आगे नहीं.", अर्जुन उसके ऊपर से लुढ़क कर एक तरफ हो गया. दोनों हे गहरी सांसें ले रहे थे. अन्नू अभी भी आँखें बंद किये थी. कुछ सँभालने के बाद उसने आँखें खोल कर अर्जुन को देखा और साथ में लेट गई.
"जो मुझे कहना चाहिए था वह तुम क्यों कह रहे थे.?"
"अन्नू, अगर हमने ये लाइन क्रॉस कर ली तोह फिर पीछे हटने में दोनों फ़ैल हो जायेंगे. और मैं तुम्हारी आत्मा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करना चाहता. तुम्हे मुझ पर यकीन है, भरोसा है और प्यार भी लेकिन मैंने पहले भी कहा था के हमारे भविष्य के बारे में हम खुद नहीं जानते. और तुम मेरे लिए शारीरिक जरुरत तोह नहीं.", प्यार से उसके सर को सहलाते हुए अर्जुन छत्त की तरफ देख रहा था. अन्नू की आँखों से अपने आप हे बूंदे छलकती बिस्टेर पर गिरने लगी.
"ऐ.. अब क्या हुआ? मेरी बात का बुरा लगा तोह I'm रियली सॉरी अन्नू. लेकिन मुझसे गलती हो जाती तोह बाद में पछताने से ाचा है वह गलती नहीं होने देना."
"बुद्धू मैं खुश हु की तुम इतने समझदार हो. लेकिन जो बात तुम अब भी नहीं समझ रहे वह ये है के मैं तुम्हे प्यार करती हु. हमारा भविष्य क्या होगा वह कल का भी नहीं पता लेकिन जितने है इतने मैं तुम्हारी हु. मेरी लाइफ में पहले तुम्ही हो और रहोगे. शादी मैं भी अपने पापा की मर्जी से हे करुँगी लेकिन मेरे दिल में हमेशा तुम रहोगे. प्यार में सिर्फ 2 दिल होते है, गलतियां भूल या पछतावा नहीं. नाउ किश में बिफोर ी स्टार्ट क्राइंग अगेन..", उसको फिर से अपने ऊपर करती अन्नू अब बड़ी नजाकत से और हौले हौले अर्जुन को चूम रही थी. खुद हे हाथ अर्जुन की छाती पर फिरती वह मैं हे मैं उसकी मर्दानगी पर मरी जा रही थी. ऐसा शरीर शायद टेलीविज़न पर हे देखा था उसने.
"एक विश पूरी करोगे मेरी?", अन्नू किश ख़तम करने के बाद गॉड में तकिया लगाए बैठी अर्जुन को देख रही थी. उसके चेहरे की मासूमियत देख अर्जुन ने हँसते हुए हां में सर हिला दिए.
"मुझे तुम्हे बिना टीशर्ट के देखना है. प्लीज के बार.", अर्जुन ने हँसते हुए अपनी शर्ट के बटन एक एक कर के खोले और उतार कर हाथ में पकड़ ली. अन्नू अपनी ऊँगली दांत में दबती उसको ध्यान से देख रही थी.
"ये असली में तुम ऐसे ho?Baap रे. तुम्हारी चिस्ती और शोल्डर कितने बड़े है. टीशर्ट में जब देखा था तभी से मेरे मैं में था के अंदर से कैसे होंगे तुम.", अन्नू करीब आ कर कड़ी हो गई. बड़ी सावधानी से उसने अर्जुन की चौड़ी छाती की फाडियों पर हाथ रखा तोह जैसे हल्का करंट लगा.
"पूरे मसल्स बना रखे है तुमने किसी वुफ फाइटर जैसे.", अर्जुन ने जल्दी से शर्ट पहनी तोह वह रूठने का नाटक करने लगी.
"बहोत देख लिए. अब बस."
"गलत बात है. मैं देख हे रही थी न कुछ कर थोड़ी रही थी."
"और यही मैं कहु तोह?", अर्जुन ने इतना हे कहा.
"है तोह कोनसी बड़ी बात .. ऐ पागल कही के मैं लड़की हु.", जब अन्नू को समझ आया के वह क्या करने लगी है तोह हाथ वही रुक गए टॉप तबतक आधा ऊपर हो चूका था. और अर्जुन का हाथ उसके निर्वस्त्र पेट पर. जो नरम मुलायम सा था.
"ऐ.. गलत बात hai..",Sharam से आँखें बंद कर ली थी अन्नू ने लेकिन टॉप उतना ऊपर उठाये थी अबतक
"अभी तोह सिर्फ पेट पर हाथ रखा है. तुम मेरे जहा रख रही थी वह रखा तोह क्या हाल होगा."
"रख लो. मन नहीं करुँगी.", उसके इतना कहते हे अर्जुन ने एक उभर पर हाथ रख लिए. अन्नू ने झट्ट आँखें खोल ली और अगले हे पल शरमाते हुए जमीन में देखने लगी.
"हटा लो प्लीज.", अन्नू ने कहा तोह अर्जुन ने वैसे हे हाथ हटा लिए.
"इसलिए पसंद हो मुझे. तुम 2 मिनट बैठो मैं अभी आ रही हु.", थोड़ा सँभालने के बाद वह अर्जुन को बीएड पर बैठने का बोलकर बाथरूम चली गई. वापिस आई तोह पजामा चेंज था और चेहरा धोया हुआ.
अर्जुन उसको देख कर मुस्कुराने लगा जो उसको समझ नहीं आया.
"ऐसे क्या देख रहे हो?", अन्नू ने गले में बाहे डालते हुए कहा
"यही की सिर्फ हाथ लगाने से तुम्हे कपडे बदलने पद गए.", अर्जुन की मुस्कान का राज उसको अब पता लगा था.
"की गंदे कही के. ऐसे बात नहीं करते."
"चलो इसको तुम कैसे कहती?"
"किसको?"
"यही जो तुम्हे ओर्गास्म हुआ अभी उसको."
"धत्त पागल. अब इतनी देर से किश कर रहे थे और इधर उधर टच हो रहा था तोह हो गया. अब छोड़ो ये सब. गन्दी बातें हे करना.", अन्नू शर्मा रही थी
"तुम कर सकती है और मैं बात भी नहीं कर सकता.?"
"मार खानी है तोह बोल दो.", अर्जुन ने हाँ कहा तोह अन्नू ने गाल पर काट लिए.
"आउच. बिल्ली हो. चलो बाबा, अब मैं चलता हु बहोत देर हो गई. फिर कभी आऊंगा.", अर्जुन खड़ा होने लगा क्योंकि 7 बजने में 15 मिनट थे. और उसके खड़े होते हे अन्नू फिर से उसके गले लग गई.
"मत जाओ न. फिर तुमने पता नहीं कब आना है."
"जब तुम कहो तब आ जाऊंगा लेकिन अभी जाना पड़ेगा.", उसके चेहरे के सामने से बालो को आज अर्जुन ने कान के पीछे किआ जैसा वह खुद करती थी.
"कल आओगे फिर? सैटरडे है और स्कूल बंद है कल."
"तुम कितने बजे उठती हो?", अर्जुन ने पलट कर सवाल किआ
"6"
"5 बजे बहार कड़ी मिलना. जब हॉर्न दू तब इस साथ वाली गली में. अब चलता हु दरवाजा बंद कर लेना.", अन्नू के होंठो को हल्का सा चूम के अर्जुन उसके साथ हे बहार आ गया ड्राइंग रूम से किताब उठाते हुए. जिसको लेके आने की अब कोई जरुरत नहीं थी आगे से.

