Incest Pyaar - 100 Baar - Page 14 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 85

श्रेष्ठ- जयेष्ठ


ये एक ाचे स्तर का होटल था जहा आज संधू जी ने अपनी बेटी पारुल सिंह की सगाई का कार्यक्रम रखा था विकास पुनिअ के साथ, जो कभी उनका हे शिष्य था और आज एक नामी पहलवान के रूप में खुद को स्थापित कर चूका था. कार्यक्रम में सिर्फ निजी लोगो को हे न्योता दिए गया था जिनमे संधू जी के स्टेडियम से हे 4 अफसर और कोच शामिल थे. उनकी छोटे भाई और परिवार, संधू जी की धर्मपत्नी जी की बहिन, पारुल और चारुल सिंह की कुछ खास सहेलियों के साथ बस विकास की तरफ से गिने चुने परिवार के लोग. 7 बजे हे पहली मंजिल के हॉल में लोग पहुंचने लगे थे और इस जगह को आकर्षक रूप से संवारा गया था. 8-9 गोल मेज सफ़ेद कपडे से ढकी थी जिनपर बीच में गुलदस्ता और कांच के गिलास पानी से भरे धक् कर रखे गए थे. एक तरफ सुनेहर लाल सिंहासन रुपी कुर्सियां लगाईं गई थी जो लड़का और लड़की के लिए थी. ाची रौशनी की व्यवस्था के साथ हे हॉल के एक भाग में खाने के स्टाल लगे थे जहा अभी काम शुरू हो रहा था.

बेटी की सगाई थी तोह यहाँ संधू परिवार सबसे पहले हे पहुंच गया था और तैयारी का जायजा लेने के साथ हे आ रहे मेहमानो का स्वागत भी किआ जा रहा था. होटल के बहार हे कांच पर सगाई सन्देश का बोर्ड और स्थान लिखा हुआ था जिस से मेहमानो को परेशानी न हो. सही समय पर हे विकास भी कार से होटल के सामने की पार्किंग आ पंहुचा और अपनी माता जी के साथ behan-jija को लेकर अंदर चल दिए. गेट से हे शमत संधू और स. संधू जी ने उनसे गले लगते हुए स्वागत किआ और अपने साथ हे ले चले.

"क्या बात है जी, आज चेहरे पर मुस्कान भी है और coat-pant में भी हो.", चारुल ने विकास से हाथ मिलते हे साली स्वाभाव का मजार शुरू कर दिए. उनकी माता जी को प्रणाम करने के बाद अपने साथ विकास की बहिन को सबसे आगे की गोल मेज की तरफ लिए चारुल ने उन्हें वह नरम कुर्सी बैठने के लिए बैठ की. दोनों हे परिवारों का परिचय घर के बाकी सदस्यों और मेहमानो से करवाते हुए संधू जी ने मैनेजर को बोल कर coffe-thande के साथ हे हलके khan-paan शुरू करने का आदेश दिए. अभी तक पारुल नहीं आई थी इस जगह पर, जो होटल के हे एक कमरे में तैयार हो रही थी.

"तुम चलो जरा पहले ऊपर और मैं 2 मिनट तक आता हु. साथ में देखते हे कोई मुसीबत न गले पड़ जाये.", अर्जुन भी 7:20 के समय पर होटल की पार्किंग पर आ खड़ा हुआ था. कपडे जैसे फिर से इस्त्री किये थे और ताजगी बता रही थी के जैसे फिर से नाहा कर आया हो.

"अब मैं हे गले पड़ी हु. इसको मुसीबत समझो या प्यार. और साथ चलेंगे तोह साथ चलेंगे.", Laal-kaale रंग की इस पारदर्शी साड़ी में जैसे अन्नू हर दिल पर जुल्म हे करने वाली थी. खुल्ले बाल और सामने माथे पर लगी गोल लाल बिंदी, भरे होंठो पर उनके हे रंग की लाली और ऊपर से नीचे क़यामत धा थी ये अप्सरा अर्जुन को साथ हे ले जाने पर अदि उसको देख रही थी.

"अब तुम्हे साथ हे चलना है तोह चलो. मैं किसी की बात का कोई जवाब नहीं देने वाला.", अर्जुन ने दोनों हाथ सामने जोड़ते हुए फिर एक तरफ कोने में मोटरसाइकिल लगाया और सधी हुई चाल से अन्नू को साथ लिए अंदर चल दिए.

"हाथ पकड़ लू?", अन्नू ने शरारत से कहा. उसको मजा आ रहा था अर्जुन को छेड़ने में. दोनों हे रिसेप्शन के आगे बानी चमकती सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगे तोह मंज़िल से पहले हे घुमाव लेती सीढ़ी पर अर्जुन ने अपने दाए हाथ में अन्नू का बया नाजुक हाथ थम लिए. ऊपर चढ़ती वह दये हाथ की कलाई में पर्स लिए उस हाथ से साड़ी को पकडे थी लेकिन जैसे हे अर्जुन ने हाथ पकड़ा अन्नू ृक्क कर उसका हे चेहरा देखने लगी.

"अन्नू, तू अब आ रही है?", ये आवाज सुनते हे दोनों ने ऊपर की तरफ से आती इस खूबसूरत बाला को देखा तोह अर्जुन हैरान हो गया.

"मिस आपकी भी आज हे इंगेजमेंट है आपकी सिस्टर के साथ हे?", गुलाबी लेहंगा चोली और सलीके से बंधे बालो में चारुल के दुल्हन रुपी गुडिअ सी दिख रही थी अर्जुन को. उसकी बात सुनते हे वह चमकती आँखों से अर्जुन को देखने लगी.

"अब तुम कोण हो यार? और मैं चारुल नहीं हु, पारुल हु. सगाई भी मेरी हे है उसकी नहीं.", एक अजीब तरह से मुस्कुराते हुए पारुल ने इशारे से अन्नू से जैसे कुछ पुछा.

"अर्जुन, फ्रेंड है और निगहबॉर भी. आल्सो इन्वितेद.", इतना हे मुँह से निकल पाया अन्नू के और अर्जुन हाथ जोड़ कर पारुल को शुभकामनाये देता उन दोनों को वही छोड़ आगे बढ़ गया.

"पागल समझा है क्या मुझे? जैसे वह हाथ पकडे था उस से साफ़ पता चलता है के तुम दोनों में दोस्ती से तोह ज्यादा हे है. चल आजा अब ये बात आगे तू हे बताएगी. मेरी सगाई में मैं हे देरी से जा रही हु.", अन्नू थोड़ा झेंपते हुए पारुल के साथ हे अंदर चल दी.

"माँ, ये है अपने शंकर जी का बीटा और मेरा छोटा भाई. अर्जुन ये मेरी माता जी है.", विकास की तरह उनकी माता जी भी एक लम्बे कद तगड़ी महिला था, लगभग 50 के आसपास. अर्जुन के बारे में जानते हे उन्होंने उसका माथा स्नेह से चूमते हुए गले लगा लिए, पाँव छूने से रोकते हुए.

"अरे बीटा ये न जितनी बार घर आता है तेरा जीकर जरूर करता है. और सच कहु तोह देख के बड़ी ख़ुशी हुई की विकास ने गलत नहीं बताया था. लाखों में एक है बीटा तू.", अर्जुन ने भी उन्हें प्यार से वैसे हे अपने से लगाया जैसे वह अपनी माँ रेखा जी से मिलता था.

"आप हो प्यारी तोह आपको सभी ाचे हे लगेंगे आंटी जी. वैसे आपसे मिलते हे पता चल गया के भैया हर हफ्ते हे गाँव क्यों जाते है. उनके लिए आप हे सबकुछ हो.", अर्जुन की बात पर मुस्कुराते हुए उन्होंने सर पर हाथ फेरा और कुछ पल निहारने लगी.

"आंटी जी, ये दादी ने दिए है. मैं नहीं लेके आया, पहले हे बता देता हु. उनोहने कहा था के अपनी आंटी से मिलेगा तोह उन्हें कह देना के थानेदारनी ने प्यार से दिए है.", वह पैकेट मेज से उठा कर अर्जुन ने एक सांस में हे पूरी कहानी सुना दी. विकास की माता जी कभी उसको देख रही थी और कभी विकास को.

"देख छोटे यहाँ तू मेरी सगाई में आया है. मेरे लिए कुछ लेन की जगह तू माँ के लिए ले आया?", विकास ने वैसे हे अर्जुन से कहा जैसे छेड़ रहा हो.

"मैं छोटा हु तोह मैं कुछ कैसे दू. हाँ जो दादी ने दिए वह ले आया.", विकास ने उसकी बात पर हँसते हुए गले लगा लिए.

"रख ले माँ, ये सिर्फ दे रहा है. भिजवाया तोह घर के बड़ो ने है.", विकास की माता जी ने भी आशीर्वाद देते हुए वह तोहफा ले लिए.

"भाई तू छोटा कहा से है? मेरे सेल से 2 उंगल ऊपर हो रखा है और छोटा बतावे है.", ये thik-thak deal-dol वाले 30 के लगभग के व्यक्ति चलते हुए अर्जुन और विकास के पास आ खड़े हुए. हाथ में काळा सोडा का गिलास था.

"अर्जुन ये मेरे जीजा जी श बीरभान जी और जीजा जी ये अर्जुन, डॉक्टर साहब के बीटा और स्टेडियम में बॉक्सिंग का खिलाडी है.", अर्जुन उनके बड़े रिश्ते को देखता पाँव पर हाथ लगाने लगा तोह उन्होंने कलाई पकड़ ली.

"पंडत ते हाथ नहीं लवंडे रे मानस. देख के कालजा खुश हो गया भाई के तेरे जिसे बालक ेब भी होव है. कुरता पजामा मांड वाला, धर्मेंदर तेह भी तगड़ा गाठ भी विकास मान न मान चोर्रा यु तेरे तेह भी फालतू है.", उनकी कड़ी हरयाणवी सुनकर अर्जुन भी मुस्कुराने लगा.

"जीजा मैं तोह कहु था के आप मिलो तोह सही इस से. जड़ यु मेरे टी बचा सके है वह भी आपने ते बड़े और तगड़े पहलवान तेह फेर कोई बात होवेगी.", विकास ने जैसे हे ये जिक्र किआ तोह एक बार फिर उसकी माता जी ने अर्जुन का सर पूछकर दिए.

"शर्मा जी सही बात है. आप छोटे हो उम्र में लेकिन महारे परिवार पे बड़ा एहसान कर दिए.", उनकी बात बीच में काट कर अर्जुन विकास के जीजा के भी गले लग गया.

"जीजा, विकास भैया मेरे लिए इस से भी कही कर सकते है. मैंने कुछ भी नहीं किआ ये तोह. और यहाँ हमारी बातें नहीं करनी, उधर सभी लोग हमको देख रहे है के लड़के को रोके क्यों खड़े है हम.", अर्जुन के ऐसे धीमी आवाज में कहने से बीरभान जी ने हँसते हुए उसकी पीठ जोर से थपथपाई और फिर विकास के साथ परिवार को लेकर सामने संधू परिवार की तरफ चल दिए.

फोटोग्राफर कुछ देर तस्वीरें लेता रहा दोनों परिवारों की और अर्जुन मौका देख वह से खिसकता हुआ बलबीर के पास आ बैठा जो पीछे की एक मेज पर बैठा तंदूरी पनीर के साथ कोला जातक रहा था, अकेला बैठा.

"क्या बलबीर भाई, अकेले अकेले लगे पड़े हो"

"छोटे भाई, उसकी सगाई है वह लड़की के साथ खुश, बाकी सभी बातों से और मैं यहाँ के पनीर से. खा के देख गज़ब बना है.", कपडे से मुँह साफ़ करता बलबीर अर्जुन की तरफ खली प्लेट करते हुए बोलै.

"शर्म करो. खली है ये."

"तभी तोह कहा के इसमें भी दाल और अपने लिए भी ले आ. मैं जरा यहाँ आखें सेक लू. देख कैसे बिजलिया गिरा रही है वह तीनो.", बलबीर बैठा हुआ अन्नू, चारुल और उनके साथ हे कड़ी एक खूबसूरत सी लड़की की तरफ आँखों के इशारे से अर्जुन देखने का कहने लगा. वह भी मुस्कुराता हुआ सामने से आ रहे वेटर को उनकी प्लेट में पनीर रखने का बोल कर हंसने लगा.

"अबे हंस क्यों रहा है?"

"भाई एक तोह कोच साहब की बेटी है, दूसरी जो laal-kali साड़ी में है वह पत्नी नहीं वाली और तीसरी इधर देख नै रही.", बलबीर हलकी नाराजगी से देखने लगा उसको.

"क्यों नहीं पत्नी वाली? अब तोह वह देख भी रही है.", बलबीर ने अर्जुन को बताया तोह अर्जुन ने अपनी तरफ आती तीनो लड़कीओ को देखा.

"लो आ हे गई आपसे बात करने तीनो.", अर्जुन ने इतना कहा तोह बलबीर की सिट्टीपिट्टी गम हो गई.

"मर्डर गए भाई."

"Hello अर्जुन, थैंक यू सो मच फॉर किंग. ये मेरी कजिन है सिम्मी, लुधिअना से और सिम्मी ये अर्जुन है पापा के फ्रेंड के बेटे और उनके फवौरीते स्टूडेंट भी.", अर्जुन ने बड़े अदब से खड़े होते हुए हाथ जोड़े.

"क्या यार हैंडसम और हमउम्र हो. हाथ मिलाने की जगह जोड़ रहे हो.", सिम्मी के ऐसे खुले अंदाज और सामने बढे हुए खूबसूरत हाथ को देख अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए हाथ थाम लिए.

"प्लेअसुरे मीटिंग यू सिम्मी."

"अन्नू तुम भी यहाँ सिम्मी को कंपनी दो मैं जगह पारुल से मिल कर आई. शायद ड्रेस ठीक करनी है उसकी.", चारुल मुस्कुराती हुई अर्जुन को देख कर उन दोनों को वही रुकने का बोलती चली गई.

"तोह मिस्टर अर्जुन करते क्या हो आप?", यहाँ बलबीर जैसे बैठे हुए भी नहीं था. वह चुपचाप बातें सुनता अपनी पसंद का काम करने लगा, खाने.

"जी कुछ नहीं करता हु. पढाई और थोड़ा बहोत sports.",Arjun को ऐसे सिम्मी से बात करते देख अन्नू की धड़कन बदल रही थी.

"वाओ. मतलब तुम फ्री भी रहते होंगे अगर ज्यादा कुछ नै करते. यहाँ पारुल दीदी तोह बहार निकलती नहीं और चारुल को स्कूल से फुर्सत नहीं. अपना शहर हे घुमा दो यार. लुधिअना आओगे तोह मैं तुम्हे वह घुमा दूंगी."

"जी बिलकुल. लेकिन मेरे ख़याल से सैटरडे संडे ठीक रहेगा.", अर्जुन की बात सुनते हे अन्नू ने नीचे से हे उसको पाँव मारा और घूर कर देखने लगी.

"अरे जब तुम्हारे पास टाइम हो. मैं अभी दीदी से घर का नंबर लेके देती हु. बोर होने से ाचा है के घूम भी ले और शॉपिंग भी. क्या ख़याल है अन्नू?"

"यार तुझे पता हे है, स्कूल एंड आल.", अन्नू के स्वर में नाराजगी थी अर्जुन के प्रति.

"टेंशन मत लीजिये अन्नू जी भी साथ चल पड़ेंगी. मैं शॉपिंग के बारे में ज्यादा नहीं जनता.", अर्जुन ने नीचे से हे अन्नू का हाथ थाम कर सेहला दिए. अब नाराजगी की जगह मुस्कान और शर्म ने ले ली थी.

"मैं मैनेज करती हु कुछ.", अन्नू ने इतना कहा तोह सिम्मी ने ध्यान से उसके चेहरे को देखा.

"वाह भाई. तुमने कहा और मैडम एक बार में हे मान गई. ाची बात है. चल अन्नू उधर अंगूठी पहनाने वाले है. अर्जुन से बातें करेंगे साथ डिनर करते हुए. इनके फ्रेंड को भी डिस्टर्ब कर दिए हमने.", बलबीर को जैसे वह जाते हुए चिड़ा हे गई थी.

"छोटे तेरे लुंड पर टिल तोह नहीं?", बलबीर ने बिलकुल कान के पास ये कहा.

"हाँ, हैं तोह भैया. लेकिन उस से क्या?"

"साली साड़ी वही चढ़ेंगी क्योंकि मेरे तोह है नहीं. बहोत तेज है तू भी भाई. स्टेडियम में 2-2, यहाँ एक का तू हाथ पकडे था और दूसरी सामनसे से खुद गिर रही तेरे पर. डर है कही गुरूजी की दूसरी वाली भी न आ गिरे तेरे पर."

"अर्जुन, विकास बुला रहा है तुम्हे.", अर्जुन ने चारुल को देखा तोह उठ खड़ा हुआ.

"बलबीर भाई."

"भाई तू जा. मैं मेरे दिल को पनीर से मन लूंगा." बलबीर ने उसको अकेले हे जाने को कहा तोह अर्जुन जानता था के वह शर्मीला है इसलिए अकेले हे चारुल के पीछे चल दिए.

"भाई, ये तोह इस तरफ नई खड़ा होगा?", संधू जी ने हँसते हुए विकास से कहा जब उन्होंने उसको अर्जुन का हाथ पकड़ कर अपनी कुर्सी के हाथे पर बैठने को कहा.

"स्टेडियम में बिठा लेना पापा.", विकास ने उन्हें आज सीधा पापा कहा तोह वह भी मुस्कुरा दिए. अर्जुन इन सबकी ख़ुशी में खुश था.

अर्जुन के जैसे हे पारुल की कुर्सी पर चारुल बैठी थी और फोटो होने के बाद वह उठ गई तोह अब सिम्मी ने उधर बैठ गई. अर्जुन खड़े होने लगा तोह विकास ने बैठे हे रहने को कहा. तीसरी फोटो में अन्नू को जबरदस्ती चारुल ने बिठा दिए और अर्जुन ने जैसे उधर नजर अन्नू की तरफ की तोह फोटो हो गई.

"भाई साहब इधर कैमरा की तरफ देखिये उनकी तरफ नहीं. फिर से लेना पड़ेगा फोटो.", अर्जुन और अन्नू के चेहरे लाल हो गए उसकी बात पर और पारुल की आवाज सुनते हे विकास के कान खड़े हो गए.

"देख ले अन्नू, सगाई हमारी हो रही है लेकिन प्यार तुम दोनों दिखा रहे हो. वह बैठा भी वह तुझे देख रहा है.", अन्नू शर्मा गई और इधर विकास ने अर्जुन की कमर में हाथ डालते हुए उसके कान में कहा.

"अबे चक्कर क्या है तेरा? कितनी घुमा रहा है? यहाँ भी तू शायद इसके हे साथ आया है और ये इनकी सहली है. परसो बात करूँगा तुझसे.", विकास की बात सुनकर अर्जुन बस मुस्कुराता रहा और इस तस्वीर में चारो के चेहरे खुश थे.

"एकदम बढ़िया तस्वीर आई है जी. नेचुरल स्माइल के साथ.", अर्जुन और अन्नू वह से उठे हे थे की पारुल ने चारुल के कान में कुछ कहा और चारुल थोड़ा हैरानी से अन्नू और अर्जुन को देखने लगी. अन्नू वह से हट कर अब मरस संधू के पास आ कड़ी हुई और अर्जुन वही बलबीर की तरफ चलने लगा.

कुछ देर बाद हे दोनों लड़का लड़की ने अँगूठिया बदली तोह सितारों से भरा बड़ा गुब्बारा फोड़ते हुए इसकी ख़ुशी जाहिर की गई. सभी उन्हें बधाई दे रहे थे साथ हे सगुन और तोहफे भी. अर्जुन और बलबीर ने साथ हे उन दोनों को शगुन भेंट किआ और पारुल ने अर्जुन के हाथ से खुद हे शगुन पकड़ लिए.

"भाभी हु तेरी तोह ये हक़ मेरा है.", पारुल की ऐसी बात और हरकत देख अर्जुन दोनों को देखने लगा.

"हाँ भाई, लगता है मेरे भी दिन बदलने वाले है.", एक ठंडी सांस भरता विकास बेचारगी से अर्जुन और पारुल को देखने लगा.

"भैया ाची बात है. म्हणत घर के मर्द की और लक्समी घर की मालकिन की. ये मंत्र समझ लो कभी परेशानी नहीं आने वाली.", अर्जुन की बात पर विकास हँसते हुए दोहरा हो गया और अर्जुन के हाथ पर हाथ मरती पारुल की भी हंसी चूत गई थी. बच्चों को ऐसे खुश देख संधू जी ने भी अपनी धर्मपत्नी और बेटी के कंधो पर हाथ रखते हुए उन्हें ये दृश्य दिखाया. इस खास पल को फोटोग्राफर क़ैद करने से नहीं चूका.

"सरदारनी जी, ये लड़का है अपने शंकर जी का अर्जुन. पंडित जी सही कहते है के ये जहा जाता है खुशिया ला देता है. देख लो इन बच्चों को, ऐसी चमक और हंसी पहले नहीं देखि मैंने इनके चेहरों पर.", संधू जी की बात पर उनकी बेटी गले में हाथ डालती उनके साथ कड़ी अर्जुन को देखने लगी थी.

"वाहेगुरु सबको खुश रखे. सच कहा दार जी आपने. लड़के पर हे सबकी नजर है जी और कितना साफ़ रब्ब का बाँदा है जी. खुश भी है और खुशाली भी ला रहा है."

"मेहमानो को roti-shoti भी पूछो जी. इनके चक्कर में कही वह न रस जाये.", संधू जी के साथ उनकी पत्नी भी बाकि लोगो से मिलने और ratri-bhoj का कहने चल दिए.

"सही कहते हो पापा जी आप भी. लेकिन इसका दिल कुछ समंदर सा है जिसको पढ़ पाना मुश्किल है.", चारुल ये बुदबुदाती हुई मुस्कुरा रही थी.

"अकेली मुस्कुरा रही है कड़ी कड़ी. चल यार खाना खाते है फिर जाना भी है." अन्नू ने उसकी तन्द्रा भांग करते हुए कहा तोह वह गौर से अन्नू को देखने लगी.

"ये सिर्फ पडोसी हे है न तेरा? सच बोलिओ अन्नू की बची, तू बचपन से मेरी दोस्त है.", चारुल उसका हाथ पकड़ती दिवार के पास ले गई.

"जज मत करना यार. लेकिन सच ये है के मैं उस से प्यार करती हु.", अन्नू ने बड़ी गंभीरता से कहा.

"और वह?"

"वह कहता है के वह मुझे कभी दुखी नहीं होने देगा और जबतक उसके साथ हु वह मेरा ख्याल रखेगा. स्कूल से बहार. बाकी तुझे भी पता है के एक दिन जैसे पारुल है वैसे मैंने भी होना है लेकिन बगल में लड़का कोई और हे होगा. लेकिन इसके साथ मैं खुद को पूरा हुआ मानती हु. जितने है उतने हु. No कम्प्लेंट्स एंड ी ऑलवेज फील हिज लव इवन िफ़ हे रेसिस्टर्स सयिंग ठोस वर्ड्स.", अन्नू की ऐसे साफ़ बात सुनकर चारुल के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई.

"कामिनी पता था मुझे की तू इसकी दीवानी हो रही है. कैसे देख रही थी इसको जब मैं साथ बैठी थी स्कूल के दूसरे दिन. लेकिन इसके अंदर राज बहुत दफ़न है जो मेरी जिज्ञासा बढ़ा रहे है. यू अरे इन लव सो यू अरे जस्ट फौक्स्ड ों तहत. हे इस समवन हिडिंग ा लोट मोरे थान एनीवन कैन इमेजिन.", चारुल की बात पर अन्नू ने उसका हाथ थाम लिए.

"मुझे बस इतना पता है के ये ख़ास है और मेरी परवाह करता है. और मुझे कुछ चाहिए हे नहीं. यू अरे फ्री तो स्टडी हिम एंड एक्स्प्लोर अस मच यू कैन.", आँख मरती हुई वह चारुल को प्रोत्साहित कर रही थी की अन्नू को कोई परेशानी नहीं अगर वह अर्जुन के राज jaan-na चाहती है.

"हाँ वह तोह मैं देख रही हु. आजकल मैडम जैसे नजर आती है बिजलिया गिरती हुई बस वजह जान कर ाचा लगा. इस पर तोह बनती हे है.", चारुल के ऐसे जवाब पर वह शर्माती सी नजरे छुपाने लगी.

"ये ब्लाउज के पास निशाँ कैसा है स्किन पर.?", चारुल की इस बात को सुनते हे झट्ट अन्नू चौंकती हुई सीने की तरफ देखने लगी.

"हाहाहा. अरे कैसे डर गई तू. मजे ले रही थी बस लेकिन ऐसा लगता है बहुत कुछ तू मुझे जल्द बताने वाली है.", अन्नू शर्माती हुई उसको खाने की तरफ ले जाने लगी.

"बुला ले उसको भी. यहाँ कोई स्कूल से नहीं है. मैं भी देखु के तू उसको खिलाती है या वह तुझे."

"बस कर यार. वह सच में शुरू हो जायेगा अगर मैं गलती से बोल भी दिए. मेरा दिल रखने के लिए तोह हाथ भी पकड़ कर अंदर लेके आने लगा था वह.", अन्नू इधर उधर देखती जैसे अर्जुन का हे पता लगा रही थी.

"जिसको तेरी नजरे ढून्ढ रही है उसको पारुल खिला रही है. वाह ऋ किस्मत. जिनकी सगाई है वह दोनों खुद एक दूसरे को खिलने की जगह इसको अपने बचे की तरह खिला रहे है. चल इसके मजे लेते है.", चारुल उधर हे आ गई जहा विकास और पारुल अपने साथ हे अर्जुन को बिठाये थे.

"अभी सगाई हुई है. शादी नहीं. और बचो को खाना खिलने की प्रैक्टिस इतनी जल्दी शुरू कर दी.", चारुल की बात सुनकर तीनो मुस्कुरा दिए.

"साली साहिबा ये बचा यहाँ सिर्फ घूमता फिर रहा था, कुछ खा नहीं रहा था. तोह अपनी भाभी के हाथ चढ़ गया अभी से हे.", विकास की बात सुनते हे चारुल अर्जुन को देखने लगी.

"मैडम बचा लो. ये दोनों अपना खाना मुझे खिला रहे है क्योंकि एक ने आज प्रैक्टिस नहीं की और दूसरा डाइटिंग पर है, क्योंकि उनके माजी नहीं खा रहे.", अब दोनों ने हे उसका कान खींच लिए.

"देखो. बोल रहा हु तोह दोनों हे मार रहे है. बस पेट भर गया मेरा हाथ जोड़ता हु.", अर्जुन की नौटंकी देख विकास की माता जी हे उसको वह से बचा कर ले चली.

"शुक्र है. तुम दोनों उसको कैसे पकड़ कर बिठाये थे यार.", चारुल के ऐसा कहने पर पारुल ने विकास की तरफ देखा.

"अब वह और फस्स गया. इसलिए यहाँ बिठा रखा था.", विकास की बात पर उन्होंने पलट कर देखा तोह अब अर्जुन के सर पर दुलार करती माताजी अर्जुन को साथ बिठाये निवाला खिला रही थी.

"चारुल जी, गाँव में एक सरपंची झोटा होता है. सबसे तगड़ा और गाँव का लाडला जिसको सब खिलते पिलाते रहते है और यहाँ भी कुछ वैसा हे हो रहा है. अब कही पापा न पकड़ ले इसको, फिर तोह ये घर जाने से रहा."

"बस आंटी जी. पेट फट जायेगा. आप खाइये मेरा हो गया.", अर्जुन वह से उठकर जैसे गायब हे हो गया.

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"चल अब मैं निकलती हु यार. कल अगर तू स्कूल आएगी तोह मिलते है.", अन्नू ने चारुल से गले लगने के बाद परिवार के सभी लोगो से मिलकर एक बार और शुभकामनाये दी. संधू जी ने जब जाने का पुछा तोह अन्नू इधर उधर देखने लगी.

"अर्जुन के साथ आई है और वह पता नहीं कहा चला गया.", चारुल भी अर्जुन को हे जैसे तलाश रही थी.

"ाची बात है. लायक लड़का है और संभल कर ले जायेगा. इधर हे होगा कही.", संधू जी ने भी नजर घुमाई तोह अर्जुन उन्हें बीरभान जी के साथ उनकी तरफ हे आता दिखा.

"लो वह आ गया.", अर्जुन ने भी उन सभी को फिर से बधाई दी और संधू जी के साथ उनकी धर्मपत्नी ने भी अर्जुन को आशीर्वाद देते हुए 'सदा खुश रहो' कहते हुए गले लगा कर जाने की इजाजत दी. विकास के परिवार से भी मिलकर वह शांति से अन्नू के चलने की प्रतीक्षा करने लगा.

"अब ये इन्तजार कर रहा है.", पारुल की बात सुनते हे अन्नू झेंपती हुई उसके साथ चल दी.

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"बड़ा समझदार लड़का है ये चारुल. तूने कैसे इसको अनदेखा कर दिए.?", दोनों बहने कुछ पल अब अकेली थी तोह पारुल ने अपने दिल की बात कह दी.

"अनदेखा नहीं किआ है दीदी. ये अलग हे परिंदा है जो मेरे साथ एक घोंसले में नहीं रह सकेगा. जानती हो इसको पहली बार जब मैंने बास्केट कोर्ट पर देखा था तोह इसके नाम की तरह इसका ध्यान दिखाई दिए. वैसा अचूक थ्रो मैंने नहीं देखा था लेकिन पूछने पर इसने जवाब दिए था के ये उस खेल को कभी खेलना नहीं चाहता. मतलब साफ़ है के इसके लक्ष्य कही ज्यादा है और जो भी ये पा लगे ये और आगे बढ़ेगा. मैं इसके सामान नहीं हु. बेशक एक खिलाडी की तरह मैं भी फोकस्ड हु और समर्पित भी लेकिन ये समर्पण नहीं करता. ऐसी दिल्लगी से ाचा है दूर से हे देखो बस. और उम्र पता है कितनी है?" ये हमरे स्कूल में इलेवेंथ का स्टूडेंट है.", अब पारुल के चौंकने की बारी थी.

"मुझे लगा ये अन्नू और तेरा कॉमन फ्रेंड है. और जैसा तू कह रही है वैसा पापा को कहते भी सुना था. वह कहते है की ये लड़का समझ से बहार है उनकी. शायद बॉक्सिंग भी इसकी क्षमता के साथ न्याय नहीं कर पाए. लेकिन अन्नू?"

"प्यार है उसको अर्जुन से. और मैंने खुद देखा है के वह कितनी बदल गई है. जिसका मतलब उसने कुछ गलत नहीं किआ है. चलो छोड़ो इस बात को अब वह यहाँ नहीं है तोह यहाँ पर ध्यान दो.", चारुल बात को यही ख़तम करना चाहती थी.

"नहीं रोक पायेगी तू. लिखवा ले मेरे से. और एक बात बताती हु तुझे, इसकी ज़िन्दगी में सिर्फ अन्नू हे नहीं है 2 और भी लड़कियां है. विकास ने इसके सामने हे बताया था मुझे. उनमे से एक शायद वैसी हे है जो तेरे मुताबिक इस परिंदे के लिए बानी है. अर्जुन ने हम दोनों को हे बताया के जिस लड़की को विकास ने भी अर्जुन के लिए सही कहा था अर्जुन की शादी बचपन से उसके साथ तये है. लेकिन इस लड़के में दुसरो को खुश रखने का हुनर है. अन्नू को हे देख ले.", चारुल पहले तोह हैरान हुई फिर सोचने के बाद बोली.

"अन्नू ने कहा था के उसको हे अर्जुन से प्यार हुआ था. अर्जुन उसका ध्यान रखता है और उसकी परवाह करता है. खुद उसने कभी अन्नू से नहीं कहा के वह सिर्फ उसको प्यार करता है लेकिन अन्नू के मुताबिक वह नहीं कहेगा लेकिन दिल जनता है के अर्जुन प्यार भी करता है. कॉम्प्लिकेटेड है ये सब. तू खुद बता, एक पल के लिए विकास न हो लाइफ में तोह तू प्यार करती ऐसे इंसान से जिसकी लाइफ में 3 लड़कियां हो?"

"अगर वह मेरा ख़याल रखे और प्यार की कमी महसूस हे न होने दे तोह मैं क्यों पीछे हटूंगी. सबसे बड़ी बात जो तीन का दिल इतने ध्यान से रखता है वह चौथी को और ाचे से रखेगा. एक्सपीरियंस इस बेस्ट टीचर इन one's लाइफ.", पारुल इतना कहने के बाद अपने परिवार और विकास के पास चली गई. चारुल खुद को जैसे अपने हे अक्स से दूर होता देख रही थी. पारुल ने जो भी कहा था वह ठीक नहीं था लेकिन दिल गलत भी नहीं मान रहा था. 'अन्नू दोस्त है मेरी. बस यही सच है.'

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"अंदर नहीं आओगे.?", अन्नू घर तक आती बस अर्जुन से चिपक कर बैठी थी. उसको ाचा लग रहा था इस रात में ऐसे अर्जुन के पीछे बैठ कर उस के सीने पर हाथ रखना. सुनसान सड़क पर अर्जुन पहले हे उसके होंठो पर प्यार दे चूका था. अब दोनों घर के गेट के सामने हे खड़े थे.

"और अंदर क्या करेंगे.", अर्जुन की ऐसी मुस्कान देख वह पास कड़ी जैसे बहुत कुछ कहना चाह रही थी. अर्जुन अंधेर में जैसे कुछ देख कर वही नजरे जमाये रह गया.

"वह क्या देख रहे हो?"

"देख रहा हु के तुम्हारे घर में चोरी करने की इतनी ाची जगह पहले नहीं दिखी.", अर्जुन की बात समझने के लिए अन्नू ने भी उधर देखा तोह कुछ नजर नहीं आया.

"क्या कह रहे हो.?"

"तुम्हारा कमरा घर के सबसे पिछले हिस्से में है. यानि इस दिवार के पीछे आँगन होगा.", अर्जुन के ऐसा बताते हे अन्नू भी गौर से देख कर मुस्कुरा उठी.

"इरादे नेक नहीं लगते.", शर्माती हुई वह भी खुश थी की उन दोनों के पास शायद एक रास्ता हो सकता है.

"अभी चलता हु और जिस दिन इरादा खास हुआ तोह दरवाजा खुल्ला रखना पीछे का.", अर्जुन ने पास कड़ी अन्नू के पेट पर ऊँगली फिरते हुए हैंडल पकड़ लिए.

"गंदे कही के.", वह खुद चाहती थी की अर्जुन उसके साथ ऐसी हे शरारत करे.

"गुड नाईट. ध्यान रखना अपना.", अर्जुन ने हाथ हिलने के बाद बुलेट स्टार्ट की और घर की तरफ बढ़ गया.

"अंदर तह बुलाना सी पट. बहरो हे भेज तह मुंडा.", अन्नू की माँ ने जाली का दरवाजा खोल कर अंदर आती अन्नू से कहा.

"देर हो रही सी ओसनु माँ. फेर कड़े आ जायेगा. चलो मैं बुआ ला लेनी है.", अन्नू अंदर आते हे कमरे की और चल दी. मुआयना करने.

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"दीदी, कोई नजर नहीं आ रहा. सबा कहा गए?", अर्जुन घर में दाखिल हुआ तोह इतनी शांति देख रसोई में दूध उबाल रही कोमल दीदी के पास चला आया.

"4 तोह गई मंजू के साथ उसके ससुराल. माँ, मौसी और बुआ है तेजी के कमरे में और प्रियंका माधुरी दीदी के साथ अभी कमरे में गई है फिल्म देखने के बाद.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने जल्दी से उनका गाल चूम लिए.

"मतलब मेरी प्यारी दीदी आज अकेली है?", अर्जुन की इस बात पर कोमल दीदी नजरे झुकाये मुस्कुराती हुई दूध बंद करके उस पर चलनी ढकने लगी.

"दीदी से क्या काम है तुझे? याद तोह आती नै अपनी दीदी की.", कोमल दीदी के ऐसा कहने पर अर्जुन ने उनका चेहरा ऊपर करते हुए उन बड़ी आँखों में देखते हुए कहा.

"आज अगर बुआ नीचे सो जाये तोह आप छत्त पर आ जाना."

"ऋतू के नए कमरे में. छत्त पर अब नहीं.", कोमल दीदी के इतना कहते हे अर्जुन ने फिर से गाल चूम कर अपनी ख़ुशी जाहिर कर दी. फिर पानी की बोतल निकाल कर वह माँ के कमरे में चल दिए जहा रुपाली किताबे बंद करने के बाद सोने की तैयारी कर रही थी. कुछ देर वह उनके पास बैठ कर स्कूल, घर और उनकी व्यक्तिगत बातें करने लगा जो रुपाली को भी ाचा लग रहा था. आधे घंटे बाद अर्जुन जान गया के वह अब सोना चाहती है तोह खुदसे हे उनके माथे को चूम कर वह गूडनिघत कहता ऊपर कमरे में चल दिए. 'बचा हे है ये लड़का. ऋतू ठीक हे कहती है. लेकिन प्यारा है.', रुपाली खुश होती हुई दिवार की तरफ करवट ले कर लेट गई.

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"आज तोह मैं यही सोने वाली हु भाई.", मधु बुआ ने करवट बदलते हुए तकिया ठीक किआ और बाकी दोनों की तरफ देखने लगी. रेखा जी अपने कमरे में चली गई थी, रात गहराने की वजह से. अब यहाँ बुआ के सिवा ललिता जी और सरोज हे थे.

"हाँ मालूम है तेरी जांघ में दर्द है तभी आज सुबह से नीच हे परेशां हो रही है.", ललिता जी ने अपनी छोटी ननद की चुटकी लेते कहा तोह सरोज भी हंसने लगी.

"वैसे ननद रानी, ये जांघ पे ऐसा क्या लगा जो दिन में सिसकी निकल रही थी और अब भी टाँगे जुड़ नहीं रही?", सरोज की मस्ती देख कर मधु के चेहरे पे अलग हे चमक आ गई थी लेकिन शब्द कुछ और बयां कर रहे थे उनके.

"अरे अब ठीक हु मैं. वह तोह बस बाथरूम में पांव फिसल गया था रात को और एक की ठंडक में जकड़न भद्द गई. लगाया आगया कुछ नहीं है.", मधु बुआ सीने के सामने दोनों कोहनिया करती लेती थी.

"इन आँखों ने बहोत फिसलन देखि है. खेतो में, नहर किनारे, आँगन में और गुसलखाने में भी. अब ये है तोह उनमे से हे लेकिन लाडो रानी बता नहीं रही.", सरोज की बात पर ललिता जी भी मधु की कमर पर हाथ रख के चेहरा देखने लगी.

"अब भाभी आप न अपनी तरफ से जो भी सोचो, मैंने तोह सच बता दिए है.", मधु बुआ आँखें बंद करती चुप रहने का नाटक करने लगी.

"ललिता दीदी, वैसे हो सकता है के ये ठीक कह रही हो. 2 बचे है और इस उम्र में कोई जाँघे फैला दे ऐसा हथियार मुनासिब नहीं. लेकिन अनुभव कहता है बिल्ली ने चूहा तोह खाया है."

"चल अगर मधु नहीं बताना चाहती तोह कोई बात नहीं ऋ. सोने दे इसको लेकिन तुझे राज की बात मैं बता देती हु एक. तू कहती है न के ऐसा हथियार नहीं हो सकता जो खेली खाई को हिला दे तोह वहां है तेरा.", ललिता जी बीच में लेती सिर्फ saree-peticot में थी. सरोज और मधु के तन मैक्सी से ढके थे.

"क्या बात करती हो दीदी? जितना भारी पिछवाड़ा है मधु का तोह लुल्ली तोह पता नहीं चलनी इसको. और 2 दिन में मैंने देख लिए यहाँ शिकारी तोह कोई दिखा नहीं अब ये न कहना के बहार का इस घर में घुसके दूध पी गया और बिल्ली मार गया.", सरोज अपना सर हथेली के सहारे टिकाये गौर से ललिता जी को देख रही थी.

"मुन्ना के पास ऐसा अजगर है के काट ले तोह मधु क्या तेरी भी टाँगे फ़ैल जाये."

"पागल हो दीदी. वह बचा शरीर से तगड़ा हो रहा है लेकि उम्र और अंग वैसा हे है, जितनी मुझे समझ है.", सरोज का गाला सूख गया था नाम सुनते हे और मधु बुआ की धड़कन बढ़ने लगी थी, लेकिन आँखें बंद किये वह पड़ी रही.

"पिछले महीने तक बहार आँगन में हे नाहटा था छुट्टियों में सुबह 6 बजे हे. मशीन लगा राखी मैंने कपडे धोने की तोह वह नाहा कर कपडे बदलने बाथरूम में चला गया लेकिन दरवाजे के बीच किसी कपडे की वजह से वह बंद न हुआ. टोलिया सामने से हटा तोह मेरी मुनिया और दिल दोनों कांप गए. सच कहु सरोज तोह उसका इतना बड़ा है और काम से काम इतना मोटा जरूर रहा होगा. अब तोह पहले देख लेती हु मशीन लगाने से या ऊपर जाने से. गलती से घोडा बिदक गया तोह बिल्ली के साथ पेट फाड़ देगा.", हाथ के इशारे से जब ललिता जी ने ऊँगली से लेकर कलाई के 3 इंच नीचे निशान बनाया तोह सरोज जी की खांसी चूत गई. निचे राखी पानी की बोतल उठा कर गटागट पीने के बाद लम्बी सांस ली और फिर कहने लगी.

"ये कैसे मुमकिन है? रेखा से अकेले में मैं साडी बात करती हु. शंकर का कोई हथेली जितना होगा, आपके देवर का भी वैसा हे है समझ लो और बाकी जो सहेलिया है उनके खसम उतने भी खुशकिस्मत नहीं. और जैसा बता रही हो वैसा किसी सरपंच की तरह 5 गाँव में किसी एक का भी मुश्किल है. और इतना तोह यहाँ तक पहुंचेगा. बाप रे, दीदी. मधु ऐसा नहीं खा सकती.", सरोज के बदन में जैसे दाने उभर आये थे जब उसने छूट के सामने से नाभि तक लम्बाई माप और फिर भी आकर ललिता जी के हिसाब से आगे तक था.

"चल मान ले के मैंने झूठ कहा. भला मैं अपने मुन्ना के लिए कोई ऐसी वैसी बात कर सकती हु? सिर्फ तेरी बात का जवाब देते हुए मैंने वही बताया जो सच है. और रही बात ऐसे हथियार को झेलने की तोह कोई लड़की तोह सपने में भी झेल नई सकती अगर दरवाजा बंद हो लेकिन ब्याही हुई औरत जिसका पिछवाड़ा जोरदार हो वह जरूर आधा अधूरा झेल लेगी पहली बार में."

"हम्म्म. सही बात है आपकी. शादी के टाइम जब पहली बार आपके देवर का लिए था तोह मैं मंजू जैसी थी और मेरी तोह चीखे निकलती रही थी 10 मिनट तक. शुरू में हर बार ऐसा होता था लेकिन 6 साल पहले तक पूरा केला एक बार में अंदर गायब हो जाता था."

"मतलब 6 साल से सूखी है तू?", ललिता जी ने गौर से देखा सरोज के चेहरे को जहा सच लिखा था.

"सूखी तोह दीदी 10 साल से हु. उसके बाद अगले 4 साल में तोह ये कभी दारू के नशे में हे सख्त हो कर चढ़ते थे लेकिन फिर तोह वह भी बंद हो गया. और अब तोह लगता है जैसे वह जरर हे न लग गई हो.", सरोज साफ़ दिल और भोली थी बेशक पढ़ी लिखी लेकिन परवरिश वैसी हे थी.

"उम्र देख तेरी. अभी भी 10 बरस तोह पड़े है तेरी इमारत में भूकंप के झटके झेलने के. और ये मर्द सारे हे ऐसे होते है, बचे हुए नहीं के कुछ साल बहार चुपके मुँह मरते फिरेंगे और घर की दाल जैसे गले न उतरती इनके. शंकर जैसा भी है जब घर आता है तोह तबियत से रेखा की मुनिया लाल करता है. बत्ती रात को 10 बजे हे बंद हो जाती है और रेखा 6 बजे तक बहार नई निकलती. तभी आजतक चमक रही है वह. तेरा भी कुछ नहीं बिगड़ा अभी. या तोह अपने नंदलाल को वैद के पास ले जा नहीं तोह कोई और बांसुरी बजने वाला देख ले.", ललिता जी की बात का अब कोई जवाब न था सरोज के पास.

"जैसा किस्मत चाहेगी वही होगा दीदी. चलो अब सोना हे बेहतर रहेगा कल सुबह जल्दी निकलना है.", आँखे मुंदती हुई सरोज का सर भरी हो चला था. वही उसको अभी भी अर्जुन की शरारती आँखें याद आ रही थी. अर्जुन का नाम याद करने भर से दिल हल्का होने लगा और वह नींद में जाने लगी. मधु बुआ भी ये बातें sunn-ne के बाद अब निश्चिंत हो कर सो रही थी, एक मुस्कान के साथ.

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अर्जुन इतने दिन बाद एकांत में अपनी प्यारी दीदी से मिलने को लेकर बेचैन था. अब कही जा कर घर शांत हुआ तोह वह दबे पांव छत्त से उतरता पिछले भाग की तरफ आ खड़ा हुआ. ऋतू दीदी वाला ये कमरा अभी अंदर से हे बंद जान पड़ता था. सावधानी से अर्जुन ने ऊँगली से हल्का बजाते हुए दरवाजा थपथपाया तोह तुरंत हे दरवाजा आधा खुल गया. यहाँ कमरे में अँधेरा था और बहार से आती हलकी रौशनी की वजह से आधे के लगभग बिस्टेर और फर्श नुमाया थे.

"एक तरफ हटो तोह दरवाजा बंद करू.", कोमल दीदी की फुसफुसाती आवाज दरवाजे के पीछे से आई थी और अर्जुन उनकी हे तरफ आते हुए खुद दरवाजा लगाने लगा.

"मैंने ज्यादा देर तोह नहीं की आने में?", अँधेरे में हे अर्जुन ने उनके दोनों हाथ पकड़ते हुए खुद को करीब कर लिए. बंद कमरे में और इतनी करीब से दोनों हे एक दूसरे की साँसे सुन्न प् रहे थे.

"पहले आते भी तोह वैसे हे जाना पड़ता.", कोमल दीदी की बात उसको समझ न आई और फिर वह अर्जुन का हाथ पकड़ती इस कमरे से अंदर की तरफ चल दी जहा दूसरा कमरा था. उनकी आँखे और कदम जैसे अभ्यस्त थे या उन्हें ाचे से हर चीज भली भांति पता था.

"अंदर वाले कमरे में?", ये दरवाजा खुलने की आवाज पर वह उनके से हे एक पल रुका और फिर अंदर आते हे दीदी को दरवाजा फिर बंद करते महसूस किआ.

"जब ये कमरा ज्यादा एकांत दे रहा है तोह उधर रहने का क्या फायदा? और खिडकी भी घर के अंदर की तरफ हे है वह.", अर्जुन को अब इस अँधेरे में थोड़ा बहोत नजर आ रहा था. दिवार में बहार वाली दिवार में बानी कांच और जाली वाली एक खिड़की की वजह से. दीदी ने वह कांच वाला हिस्सा अंदर की तरफ और जाली बहार की तरफ खोल दी. 2क्ष2 के इस झरोके ने जल्द हे कमरे में तजि हवा भरनी शुरू कर दी. और चांदनी रात का प्रकाश अब यहाँ ठीक बीच में लगे बिस्टेर पर लम्बाई से गिरता उसके वह होने का परिचय करा रहा था.

"सच्चा कहा आपने. और ये सही में एक कही ज्यादा ाची जगह है."

"तुम बैठ मैं जरा रौशनी करती हु." ये कमरा कितना शांत था अर्जुन ने ाचे से जान लिए था. पूरे घर में एक यही कमरा था जिसमे वह ऐसे न बैठा था कभी. वैसे भी ये हिस्सा बंद रहता था और Ritu-Alka दीदी की वजह से ये कमरे आबाद होने लगे थे. हलकी दूधिया रौशनी कमरे में भरते हे अर्जुन साँसे थामे बस ये नजारा देखता रह गया.

सुर्ख लाल रेशम के सलवार कमीज में सर पे चुन्नी लिए कोमल दीदी बिस्टेर के दूसरी तरफ फर्श पर कड़ी थी. सूट का कसाव जैसे लेश मात्रा कही सिलवट न लिए था. कोमल दीदी हे तोह थी जिनकी सुंदरता सच में बेमिसाल थी. ऊपर से फक्क गोर रंग पर लाल लिबास उनकी रंगत गुलाबी कर रहा था. कमरे की सफ़ेद दीवारे और लालिमा लिए ये कुदरत का सबसे हसीं मुजस्समा. लम्बी पलके झुकाते हुए दीदी ने चादर को उस जगह से ठीक किआ तोह अर्जुन के होंठ सूख गए.

सीने के सामने वाले हिस्से में से झांकते वह गुलाबी बेदाग़ उभर आपस में एक दूसरे से चिपके अर्जुन का इम्तिहान ले रहे थे. और वह इसमें जैसे नाकाम हे होना चाहता था. अपनी जगह से उठ कर दीदी के करीब पंहुचा तोह वह mirg-nayan अर्जुन को भरपूर प्यार से निहारने लगे. ये भाषा हे तोह जानती थी कोमल जिसको समझना सबको कहा आता था. लेकिन अर्जुन भी उनसे हे जुड़ा था और औरो से अलग.

"आपने ये सब मेरे लिए किआ?", उनकी कलाई पर लाल चूड़ियां देखता वह अपने जज्बात बस किसी तरह रोके था.

"हमारे लिए.", होंठो का लरजना कोई और न देख ले शायद ये भी कोमल दीदी के चुप रहने की वजह थी. ऊपर वाला होंठ कुछ उभरा हुआ धनुष सा और नीचे एक गोलाई लिए रस से भरा थोड़ा मोटा. मुँह खोलने पर जैसे वह खास हरकत करते थे. अर्जुन के बेताब हाथ उनकी कमर के पिछले भाग पर चूहे तोह लम्बी पलकों ने वह नयन अपने पीछे छुपा लिए. ऊपर की तरफ उठा चेहरा और ये मदद्भरे होंठ बाकी की बात पूरी कर गए. अर्जुन यहाँ से वापिस न लौट सका और न दीदी ऐसा चाहती थी.

"आपको नक़ाब में रखा जाये तब भी सिर्फ आँखों से दीवानगी बढ़ जाएगी.", कोमल दीदी के कोमल आधार चूमने के बाद अर्जुन ने उनकी आँखे देखते हुए कहा.

"मेरी दीवानगी का सबब कभी देखना. वह एक याद हे मुझको अपने में समेटे रखती है, पूरी ज़िन्दगी का प्यार देती हुई.", कोमल दीदी की ऐसी मार्मिक बात सुनकर अर्जुन दोनों पांव जमीन पर टिकते उन्हें गॉड में लेकर बिस्टेर पर बैठ गया.

"इतना प्यार करती है की मेरी याद से ज़िन्दगी बिताने का सोचे बैठी है? मैं ज़िंदा हु और आपके पास. कह भर देंगी तोह मैं कही और अपनी परछाई भी न जाने दूंगा.", उनके दोनों गाल हथेली में समेटे वह उनकी बातें सुनता अपनी उनसे कहता बस इस चेहरे में डूबता जा रहा था.

"ऋतू का क्या होगा? वह खुद तेरी परछाई है.", ऋतू दीदी के जीकर पर अर्जुन ने उसी स्नेह से अपनी बड़ी बहिन से कहा.

"प्यार तोह दोनों का आप हे करती है, बराबर. तोह उनको अलग थोड़ी न करेंगी आप.", अर्जुन एक हाथ उनके सर पर लिए दुपट्टे पर रखते हुए जैसे उसको ठीक कर रहा था. किसी कश्मीरी यौवना से उनका ये रूप वह हर पल आँखों में भरे जा रहा था.

"ये मार्किट से लेकर भी वही आई थी और बिस्टेर को बना कर भी ऋतू खुद गई है. कैसे मैं अलग कर सकती तुम दोनों में से किसी भी एक को.?", अर्जुन ने ये तोह सोचा भी न था के सूट अपने आप आया कैसे.

"उन्हें पता है हमारे बारे में?", अर्जुन का एक हाथ दीदी के सुत्वा पेट पर फिर रहा था.

"मुझे जैसे पता है तुम्हारे बारे में.", कोमल दीदी ने प्यार से उसकी नाक के ऊपर नाक लगते हुए कहा. अर्जुन उनकी इस बात पर मुस्कुराते हुए वैसे हे होंठ चूम लिए.

"आपको कभी ऐसा नहीं लगा के हम bhai-behan है और ये सब गलत है, मर्यादा के बहार है?"

"कहने को मैंने कभी अपनी मर्ज़ी से घर की देहलीज तक नहीं लाँघि लेकिन मुझे हमेशा से हम तीनो ek-ansh नजर आये तोह फिर ये अंश आपस में मिलने से कोनसी मर्यादा भांग हो गई? प्यार है और कुछ नहीं. सबके सामने तोह मैं छह कर भी तेरे गले नहीं लग सकती.", अर्जुन के सीने से लगती कोमल का दिल खुद एक बलिदान की कहानी कह रहा था. समाज, परिवार, सोच और नैतिकता के झूठे आडम्बर की दिवार के पीछे दबा उनका दिल कोई स्पर्श नहीं करने वाला था.

"सच कहती है आप. वैसे आज आप ने जो भी मार्किट से ख़रीदा था सब दिखने का वडा किआ है.", अर्जुन इस गंभीरता को वापिस दोनों के इस अनमोल एकांत की तरफ मदद लिए.

"वादा? जहा तक मुझे याद है मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा था.", अपने मोतियों से दांत दिखती वह हंसती हुई उसकी गॉड से उठकर दूर होने लगी लेकिन उनकी एक कलाई पकडे हुए अर्जुन मुस्कुराते हुए उन्हें गर्दन से ना में हिलता जैसे वापिस खींच रहा था.

"चलो, मैंने कहा था. के जो भी लेंगे वह मैं खुद देखूंगा.", उसकी बाहों में गिरती वह अर्जुन के साथ हे बिस्टेर पर लेट गई. ऊपर झुका अर्जुन अपनी इस हसीं प्रेमिका की गर्दन पर अधीर होंठ रखता रेशम से पाँव ऊपर तक सेहला रहा था. कोमल दीदी को उसका ऐसा करना हे अर्जुन की तरफ और आसक्त करने लगा. खुद हे उन्होंने अपना हाथ ऊपर झूलती अर्जुन की टीशर्ट से अंदर करते हुए जैसे और तड़पना शुरू कर दिए.

"ओह्ह तोह अब ऐसे होगा.", अर्जुन के निप्पल नाख़ून से कुरदेति हुई कोमल मुस्कुरा रही थी. अर्जुन भी उनका दुपट्टा एक तरफ करता हुआ उनके बाल खोल कर बिस्टेर पर जैसे बिछाने लगा. शरीर में झुरझुरी हो रही थी दीदी के ऐसा करने से लेकिन वह इस प्यार को आगे बढ़ता जब उनके सीने से सत्ता तोह उनके गालो की लाली बता रही थी की वह खुद अर्जुन के लिए तैयार है. लाल कमीज के थोड़ा सा एक तरफ होते हे उनकी नाभि पर अर्जुन की उंगलिया कमाल दिखने लगी. रोयें खड़े होने लगे इस एहसास से, शरीर को यही स्पर्श तोह पसंद था. आँखे बंद किये वह सर को पीछे करने लगी और अर्जुन उनके ऊपर पूरी तरह झुकता उन मतवाले लबो को इस रात पहली बार जूनून से पीने लगा.

खुमार में दोनों हे आगे सरकते पूरी तरह बिस्टेर पर आ चुके थे लेकिन लैब अलग होना हे नहीं चाहते थे जैसे. यहाँ कोई कुछ नहीं सोच रहा था बस जहा हाथ जा रहे थे वही सहलाने लगते और अर्जुन को अपने नीचे दीदी के दबने का पता चलते हे वह ऊपर उठ गया.

"सॉरी दीदी. पता हे नहीं चला."

"वही मैं चाहती थी की तू मुझे मेरे नाम की तरह मत समझे.", मुस्कुराते हुए वह खुद अर्जुन को अपने ऊपर खींचने लगी लेकिन अर्जुन इस बार संभल कर उनके सीने से लग गया.

"मेरे साथ प्यार करते वक़्त कोई बंदिश मत लगा खुद पर. नहीं तोह हम रहने देते है.", कोमल दीदी की बात सुनते हे अर्जुन ने बिस्टेर से खड़े होते हुए उनके पाँव भी अपनी तरफ खींच लिए. गोल पिछवाड़े के निचे दोनों हाथ डालते हुए वह उन्हें लिए खड़ा हे हो गया.

"क्या कर रहा है ये?", दीदी बस बोल रही थी लेकिन रोक नहीं रही थी. उनके शरीर को दिवार से लगते हुए अर्जुन कमीज के ऊपर से हे उन मॉटे अनारो पर मुँह लगाने लगा. सलवार के पिछले हिस्से पर उनका नरम मांसल भाग अर्जुन के पंजो में डब्ब रहा था.

"आपको जैसा मिलान चाहिए मैं समझ गया हु. लेकिन उस से आगे मत जाने को कहना.", दीदी की महकती साँसे उसके चेहरे पर आ रही थी. दोनों हाथ सलवार के अंदर पीछे से डालते हुए अर्जुन इन चिकने तरबूज से कूल्हों को रबर जैसे दबाता उनके सीने और कस कर होंठ लगा रहा था. पहली बार दीदी की सिसकियाँ कान में सुनाई दी तोह उनके होंठ खोलते हुए अर्जुन वह गुलाबी जीभ मुँह में दबाते हुए पीने लगा. कोमल दीदी के भी हाथ अर्जुन के कपड़ो के अंदर से निर्वस्त्र कूल्हों पर नाख़ून के साथ गाड़ने लगे तोह उसको पता चला के कामुक समय में ऐसे दर्द में भी अलग हे मजा था.

होंठो अलग हुए तोह एक धागे की तरह लार दोनों के मुँह से जुडी खींचती चली गई चेहरे दूर होने पर. टूट कर जैसे हे वह कोमल की गोल ठुड्डी पर चिपकी वही अर्जुन ने जीभ से पूरा भाग चाट कर गीला कर दिए.

"साड़ी रात नहीं है, याद रखना.", दीदी ने कान में सरगोशी की और निचला हिस्सा दांतो में दबा लिए. उनकी इस हरकत ने जैसे कमर के सामने अपना असर दिखाया हो. लुंड ठुमकता हुआ उत्तेजना से अकड़ कर बहार निकल आया.

"लेकिन ये रात याद रहने वाली है, हम दोनों ko.",Arjun ने सलवार का नाडा शहीद करते हुए निचला भाग सलवार से विमुक्त कर दिए. बाहें अंदरूनी जोश से उभरने लगी और किसी गुड़िया की तरह उन्हें ऊपर उठता वह लटकती कुरी के नीचे मुँह घुसता हुआ लास वाली पतली पंतय के ऊपर से हे उनके महकते खजाने पर मुँह लगाए खड़ा हो गया.

इस दृश्य को कोई और देखता तोह यकीनन विश्वास नहीं होता के प्यार में ऐसा भी जूनून हो सकता है. कोमल बेपरवाह सी दिवार से लगी हवा में 6 फ़ीट ऊपर और उसको संभाले बलिष्ट अर्जुन जालीदार कपडे के ऊपर से हे पहले हुए हिस्से को मुँह में भरता चूसे जा रहा था. बाल खींचती हुई कोमल भी उत्तेजना के इस दौर में ऐसा मजा निडर होती उठा रही थी. कुर्ती फटने की हद्द तक टाइट हो चुकी थी उन्माद में और मॉटे हो रहे चुचो से. रास कपडे से निकल कर मुँह में आने लगा तोह अर्जुन भी पहले से तेज चूसै करने लगा उन चिकने छूट के होंठो की.

"आठ ाररू.. उम्मम्मम..", पसीने में नहाया अर्जुन का शरीर इस म्हणत से पूरा उभर चूका था. कोमल की मादक ाहो को कम् करते हुए उसने उन्हें नीचे उतार लिए. जमीन पर पाँव रखते हे हलकी कम्पन्न महसूस होने लगी. लेकिन नजरे उस पाजामे से बहार निकल कर नाड़े के दबाव से कुछ ज्यादा हे मॉटे हो चुके सुपडे पर गई तोह एक कुशल सपेरे की तरह कोमल दीदी ने उसका फानन नीचे से पकड़ लिए. दूसरा हाथ पाजामे को ढीला करता अब अर्जुन को नंगा कर चूका था.

अब आहें भरनी की बारी अर्जुन की थी जो दिवार पर दोनों हाथ रखे घुटने मौडे नीचे बैठी अपनी बड़ी बहिन को देख रहा था. उंगलिया लुंड के मूल पर कस्ती कोमल ने सूखे लाल सुपडे पर नीचे से ऊपर तक जीभ फिरते हुए अर्जुन की तरफ एक कामुक अदा से देखा और इस सबकी बेउम्मीदी लिए बैठा दिल जैसे अंदर तक हिल गया अपनी दीदी का ये रूप देख कर.

"आह्ह्ह्हह्ह.", गुलुप से पूरा लाल सूपड़ा उन नरम होंठो के अंदर उनके गरम गीले मुँह में भर गया. अर्जुन को ऐसे लग रहा था के वह गोल लिपटे होंठ गांड का सख्त छेड़ हो और आगे का गीला नरम हिस्सा दहकती छूट. इतना कसाव सेहन न करता लुंड खुद हे हिलने लगा. अर्जुन मदहोशी में कमर हिलता अपनी दीदी के मुँह को हे छोड़ने की जुगत में था लेकिन ये इतना आसान न था. 4 इंच लुंड आगे होते हे कोमल दीदी के दांतो की सख्ती ने उसको तड़पा कर रख दिए था. वह इस पल में कोई नाजुक लड़की बिलकुल नहीं थी जिसके हलक तक लुंड दाल दिए जाये और वह आंसू बहती रोने लगे. यहाँ अर्जुन उनका गुलाम हो चूका था. उतने हे संवेदनशील भाग पर सर आगे पीछे हिलती कोमल ने अर्जुन को इम्तिहान में लगभग फ़ैल कर दिए था. अंडकोष भरी होने लगे तोह उन्हें हलके से दबती कोमल ने अर्जुन के सखलन को वापिस भेज दिए.

"Kyaaa..karrr रही हो डीडीईई.. आह्हः.. मर्डर जाऊंगाआ.", हर बार ये शब्द सामने वाली लड़की कहती थी लेकिन आज अर्जुन के पाँव कांप रहे थे. अपने प्यार पर और जुल्म न करती कोमल दीदी ने वह भीगा सूपड़ा आजाद करने से पहले बड़े प्यार से चूमा और अर्जुन की छाती सहलाती हुई गर्दन पर मीठे चुम्बन करने लगी. अर्जुन जैसे ज़िन्दगी की सबसे भरी म्हणत करके लौटा, हाफ रहा था. अलग होते हुए कोमल दीदी ने अर्जुन की आँखों में आँखें डालते हुए वह कुर्ती बेहद धीमी गति से उतारते हुए शरीर के सामने किसी परदे की तरह कर ली. अर्जुन उनका ऐसा करना देख साड़ी थकान भूल कर कुर्ती झपटने के लिए आगे बढ़ा और सीधा कोमल दीदी के सीने से जा लगा. अब कुर्ती अर्जुन की पीठ पर कस्ती कोमल उसको साथ लिए हे पीठ के बल बिस्टेर पर आ गिरी.

"पहली बार मुझे प्यार हुआ और अगर प्यार में हसरत हे पूरी न हो तोह फिर कोई फायदा नहीं.", अर्जुन उन वक्षो को दबाये ऊपर लेता था और उसका गाल मुँह में भर्ती कोमल उसको हर बार दीवानगी में एक कदम ऊपर ले जा रही थी. वातस्यना की किताब से निकल कर जिवंत हो उठी इस कामदेवी का शरीर श्रेष्ट था जिसके सामने अर्जुन झुक चूका था. कमर पर अपनी टाँगे लपेट कर वह अपने सख्त उभार खुद हे अर्जुन के सीने से रगड़ रही थी, ब्रा के साथ.

"साड़ी हसरते पूरी करूँगा आपकी, ये नहीं कर सकता तोह आपसे प्यार का हक़ नहीं मुझे.", कंधे पर से दोनों लाल डोरियन निचे खिसकता अर्जुन उनका ऊपरी भाग निप्पल तक निर्वस्त्र कर चूका था. पहाड़ से वह सतांन जरा भी ढीलापन न लिए थे. समूची गोलाई और कसावट का फरक हे उन्हें माधुरी दीदी के जिस्म से 21 बनता था, लेकिन आज उन्होंने ये भी साबित कर दिए था के प्रेम में इंद्रधनुष से रंग भरने के लिए अपशब्द से ज्यादा एक दूसरे पर अँधा विश्वास और अछूते कपाट खोलने पड़ते है. अर्जुन सरक कर उन बुरी तरह अकड़े गुलाबी निप्पल पर आया तोह गोल घेरे पर जीभ घूमते हुए जैसे वह उनको तराश रहा था. होंठो में कस्ते हे वही मादक सिसकारी और कच्ची के साथ हे अपनी गीली छूट अर्जुन के सुपडे पर रागादि वह आनंद से अभिभूत होने लगी.

"ऐसे हे.. आठ.. अर्जुनंन.. ", गुलाबी घेरे के साथ पूरा हिस्सा मुँह में भरते हुए अर्जुन उन्हें चूसता हुए लुंड का दबाव भी दीदी की छूट पर बनाते हुए घिस रहा था. कोमल के उभार थे भी संवेदनशील, अपनी माँ की तरह. उन बड़े गोलों को दबाते हुए पीटा अर्जुन जैसे उनसे दूध की उम्मीद लगाए लगा हुआ था. लार में ाचे से दोनों को टर्र करता वह ऊपर उठा तोह चुचो के नीचे फांसी लाल ब्रा किसी उपहार पर बंधे रिबन सी दिख रही थी. गुलाबी फूले हुए दोनों चूचक भाले सी नोक सामान खड़े चाट को घूर रहे थे.

"नदी पर बांध बनाने का काम शुरू करते है.", मुस्कुराता हुआ वह जैसे नै ऊर्जा से भर उठा था. कोमल दीदी के दोनों चिकने पत् जोड़ते हुए वह छूट के सामने से भीगी लाल कच्ची खींच कर अलग करते हुए अर्जुन उनके गोल घुटनो से चुम्बन छापता हुआ नरम उभरी हुई गुलाबी छूट के सामने आ रुका. छोटी बुँदे बंद गुलाब की चोंच पर उबरी देख पूरी जीभ गुदाद्वार से कुछ पहले तक आई लकीर पर फिरता वह इस चोंच पर रगड़ता ऊपर तक ले आया. और छूट को थोड़ा फैलते हुए उस गुलाबी नोक को होंठो में भर लिए.

"आअह्ह्ह्ह.. सीई.", दोनों मुट्ठियों में बिस्टेर पर बिछी चादर दबोचती कोमल दीदी खुद हे कूल्हे ऊपर उठती अपनी गुलाबी काली को अर्जुन के मुँह में भरने लगी. कॉमर्स चाशनी सा पूरे मुँह में घुलता अर्जुन को और उकसा रहा था. होंठो के बीच जीभ की पेनी नोक निकल कर उन अंदर की फांको पर दबाव बनती डांक मारने लगी. हर कटरा कुरेद कर पीटा हुआ वह भूखा भंवरा इस फूल को खाली करने लगा था. जब ऊपर उठा तोह होठ शहद में भीगे चमक रहे थे. बिना घृणा के कोमल दीदी ने अपने हे कुमुद का रास उसके होंठो को चूमते हुए चख लिए. भीगी थोड़ी पर जीभ फिरती हुई वह निर्वस्त्र काया के साथ अर्जुन के ऊपर आती चली गई. दृश्य उलट चूका था. पीठ के बल बिस्टेर पर पड़ा वह अपने दोनों तरफ पाँव रखे नीचे आती कोमल दीदी एक हर अंग को निहार रहा था.

खुले बिखरे बाल, लाल भभकता मादक चेहरा, थिरकते हिलते दोनों दिव्या कलश और चिकने पत्तो के बीच वह गीली दरार, ये दृश्य इतना भी धीमा नहीं था जितना वह अपने जेहन में भर चूका था और पसरी टांगो के बीच 150 के कोण पर खड़ा वह हिलता kaam-dand पीछे हाथ करके पकड़ती कोमल दीदी ने अपने कूल्हों की गहरी दरार में लंबवत फँसत हुए दोनों फांको में कस लिए. छूट से रगड़ मरता लुंड फैंको के बीच पूरे दबाव से जकड़ा चल रहा था.

ऐसा तोह अलका दीदी भी न कर सकती थी, जिनके कूल्हों में अध्भुत लचक थी. कोमल दीदी ने उसके जेहन से आज सभी नाम मिटा दिए थे. हर बार वह सुपडे को ठीक गुदाद्वार के पास और अधिक कस लेती और फिर छूट की चिनहट से गीला वह मूल निरंतर फांको में फिरती हुई वह अर्जुन के साथ वैसा हे कर रही थी जैसे अर्जुन उनकी छूट चूसते हुए कर रहा था.

"आराम से दीदी.. आठ.. थोड़ा धीरे.. आह्हः..", मजे की अधिकता में जब भी वह गुदाद्वार के पास आता तोह उसमे ठेलने की नाकाम कोशिश करने लगता. अपनी जकड से उसका लुंड आजाद करती कोमल दीदी सीढ़ी लेती कर अर्जुन की छाती पर लाल निशाँ बनती हुई पसीने को भी चूम रही थी. नमी तोह उनके भी पूरे शरीर पर चाय थी इतनी मादकता और गर्मी से.

"आ जाओ, मैं तैयार हु.", अर्जुन की आँखों में देखती कोमल दीदी की ये बात सुनते हे अर्जुन की चेतना वापिस लौट आई. वह अभी तक बस kaam-jwar में तप्त हुआ उनकी गिरफ्त में क़ैद था.

"क्रीम?", अर्जुन ने फांको के बीच अंगूठा फिरते हुए उनको सही आसान में किआ और अतिरिक्त चिकनाहट के लिए पूछने लगा.

"वह आखिर में.", कोमल दीदी के इस जवाब के साथ बानी मुस्कान को समझते हुए अर्जुन ने बड़े प्यार से उस तंग दरवाजे की दरार को चूमा और दोनों जंघे फैलते हुए उनके बीच में सूपड़ा घिसने लगा. लुंड की नस्से ऐसे फूल चुकी थी जैसे शरीर का रक्त बस दिल साफ़ होता सिर्फ इधर आ रहा हो. नीचे हो कर वह उनका मुँह बंद करना चाहता था लेकिन आगे खिसक कर दीदी ने ना में गर्दन हिला दी.

"उम्.. ाः.", सूपड़ा फसते हुए हे दोनों के पेशानी पर पसीने की तजा बूंदा उभर आई. जैसे लुंड औकात से 15 प्रतिशत ज्यादा मोटा हो गया हो, शायद कसाव से हुआ भी हो. गीली छूट में ढाई इंच का गरम सूपड़ा जज्ब किये कोमल हौले हौले अर्जुन की छाती सेहला रही थी.

"दाल दे अर्जुन. देखा जायेगा.", जी मजबूत करती कोमल अपने छोटे भाई का प्यार उसके साथ मिलने वाले दर्द को पा कर हे करना चाहती थी. अर्जुन ने बुरी तरह फसे सुपडे को जैसे तैसे पीछे किआ और अपनी कमर का भरपूर जोर लगते हुए जैसे छूट की अंदर की दिवार खुरच दी.

"Aahhhhhh..hhh.. हिक्क.. आह्ह्हम्म्म्म", गले से कराह के साथ हिचकी भी निकल गई दीदी के और अर्जुन जबड़े भींचे खुद को संभल रहा था. लुंड बस 2 इंच बहार था और अब वह ये दर्द ख़तम करने की कोशिश में लगा निचे झुक कर उन गोल चुचो को पीने लगा. कमर पर दीदी की टाँगे लिपटी हुई कमजोर तोह पड़ी लेकिन निचे न हुई. अर्जुन दोनों उभारो को रगड़ कर उन्हें गर्मी देता हुआ निप्पल बुरी तरह चूसने लगा. छूट में हलकी सनसनाहट ने बता दिए था के कोमल संभल चुकी है लेकिन जब अर्जुन न हिला तोह खुद हे कोमल दीदी ने टंगे और ढीली करते हुए कमर निचे करनी शुरू की और अर्जुन कुछ समझता उस से पहले वह समूचा लुंड अंदर लेती दोनों के शरीर मिला चुकी थी.

"माँ.. अर्जुन तू पूरा समां गया.. aahh..Ab तेरी बारी.", दर्द और जूनून से भरी कोमल को देख अर्जुन ने एक झटके में हे आधा लुंड बहार निकल कर फिर से अंतिम चोरर तक पंहुचा दिए. गद्देदार कूल्हों के बीच अगले 20 धक्को तक उसके अंडकोष जोर से टकराते और दीदी की हलकी कराह या चीख उसके कानो में पड़ती रही. जल्दी हे दर्द सा लाल समां नीले रंग में भरने लगा.

"बस यही सफर तोह चाहती थी मैं.. आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन ाःह.. उम्म्म्म", कमर उसकी ताल से मिलती वह अपने बड़े चुत्तड़ जोर से ऊपर धकेल कर अर्जुन से ये सम्भोग युद्ध लड़ रही थी. कॉमर्स की बुँदे छूट के अंदर चुहाने लगी तोह सिसकिया दोनों की फूटने लगी. मजे की ऐसी अधिकता अर्जुन ने कभी सोची तक न थी जो आज वह साक्षात् महसूस कर रहा था.

"इस सफर में मैं अंत तक आपके साथ rahunga...aahh.. दीदी.. आज कुछ हो रहा है मुझे.", वह बेकाबू होता उनकी टाँगे पूरी चौडाता हुआ हर बार छूट के मुँह पर प्रहार और गहरा करने लगा. साँसे चढ़ने लगी लेकिन वह जैसे रुकना नहीं चाहता था.

"उम्म्म.. नीचे आ.", दीदी की बात का असर इस गति में भी उसपर अगले हे पल हो गया. दोनों उभर छाती पर घिसती वह आगे पीछे हो रही थी लुंड पर उछलने की जगह. रास बहती छूट मॉटे लुंड पर प्यार से थिरकती हुई अर्जुन के आनंद को पहले से दुगना करने लगी.

"दीदी.. आठ.. क्या कर रही हो.. आअह्ह्ह.. ऐसे हे दबा कर रगड़ो.", चुचो के तीखे निप्पल चाकू की धार से अर्जुन की छाती पर आगे पीछे चलते हुए उत्तेजना के चरम पर ले जाने लगे. और मोटी फैंको के बीच फिसलता लुंड इस जन्नत से बहार आना हे नहीं चाहता था. कोमल का दूसरा स्खलन किसी पानी की तेज धार सा छूट और लुंड को भिगोने लगा.

"हूऊऊह्ह्हह्ह.. मा.. खड़ा हो अब. तेरी बारी.", दीदी हार न मानती लुंड से उठी तोह ये गाढ़ी धार पूरी तरह लुंड पर गिरती उसके अंडकोष भी गीले करते चली गई. अर्जुन पहली बार कोमल दीदी को घुटनो के बल गांड बहार उभरे देख रहा था. बीच का वह लाल चीरा अभी भी चिकनाई टपकता उसके इन्तजार में फड़क रहा था.

"आह दीदी. क्या नशा कर रही हो. न झड़ने दे रही हो न रुकने.", अर्जुन ने दोनों झुके हुए चुके बेदर्दी से पकड़ कर दबाते हुए जड़ तक लुंड घुसा दिए.

"और तेज दबा इन्हे अर्जुन.. आह.. माँ.. ऐसे हे .. रुकना मत अब.", किसी इंजन सा धक्के लगता अर्जुन अब रुकने वाला भी नहीं था. दिल की धड़कन और लुंड की रफ़्तार दोनों हौद में लगे थे. उनके पिछवाड़े से चिपका वह घुटने टिकाये पूरा लुंड गहराई तक अंदर बहार करने लगा

"Patt-patt" की आवाज दोनों के शरीर के भिड़ने से इस पल को जहा जगाये रखे थी वही छूट रास की अधिकता और खली जगह को भरते लुंड से निकलती fach-fach की आवाज दोनों को एक दूसरे से ज्यादा चिपका रही थी.

"मैं होने लगा हु दीदी. आह्हः.", अर्जुन लुंड बहार निकाल पता उस से पहले हे छूट ने वह सूपड़ा अंदर दबा लिए. कंपता हुआ शरीर पिचकारी के बाद पिचकारी छोड़ता पूरी छूट को हे जैसे गाढ़े तरल से भरने लगा. ज़िन्दगी में पहली बार अर्जुन इतना झाड़ा था और इतनी देर तक. आखिरी कटरा तक लुंड से पीने के बाद छूट ने उसको अपनी गिरफ्त से आजाद किआ तोह धम्म की आवाज से अर्जुन मुँह के बल एक तरफ गिर गया.

टाइट छूट मुँह खोले फ़ैल चुकी थी. अंदर की गहरी लाली के बीच से टपकता वह सफ़ेद रास लम्बी धार सा बिस्टेर पर गिरता रहा. कोमल इस मादक मुद्रा में कड़ी छूट के अंदर से सारा रास बहार निकल कर हे अर्जुन की तरफ लुढ़की. निप्पल सूज चुके थे और गोर तन्न पर हर तरफ उँगलियों, दांतो और दबाव के निशाँ इस मिलान की पूरी दास्ताँ बयान कर रहे थे. अर्जुन जैसे होश में हे नहीं था. लड़खड़ाती हुई कोमल जैसे तैसे टोलिया लपेटे बाथरूम से खुद को साफ़ करके आई और नंगी हे अर्जुन की पीठ पर लेट गई. अर्जुन श्रेष्ट नहीं था, उसने दिल से मान लिए था. उस मखमली नरम शरीर से हार कर भी वह खुश था जो पूर्ण अधिकार से उसके ऊपर था.
 
अपडेट 86

नादान परिंदे (ी)


सुबह 4 बजे अर्जुन की आँख हलकी ठंडी हवा से खुल गई. खुली खिड़की आँखों के सामने हे थी जहा से बहार का मौसम पता लग रहा था. जिस्म अब हल्का और तारो तजा महसूस हो रहा था. बेसुध सोइ कोमल दीदी का नरम शरीर उसकी पीठ पर हे था, जिस से अर्जुन को काफी आराम मिला था थक्क कर सोने के बाद. बेहद सावधानी से उन्हें बिस्टेर पर पीठ के बल सुलाने के बाद वह बाथरूम में घुस गया. लुंड की त्वचा अकड़ी हुई दोनों के मिलर्स का परिणाम थी. नित्यक्रम से निपट कर अर्जुन हलके गीले बदन हे नंगा बिस्टेर पर आ बैठा.

गहरी नींद में सोई कोमल दीदी का वह शांत मासूम चेहरा. लम्बी पलके और बहार को निकले होंठ बेमिसाल हे थे. कुछ पल उन्हें निहारता हुआ वह जब थोड़ा निचे देखने लगा तोह खुद हे शर्मिंदा हो गया. दोनों निर्वस्त्र उभारो पर जगह जगह हलके दांत के निशाँ और चूचक की सूजन सब अर्जुन की हे दें थे. उसकी तरफ करवट लिए लेती कोमल दीदी की मादक टाँगे घुटने मौडे हुए अब सिर्फ एक मासूम बची का एहसास करा रही थी अर्जुन को. ऐसे वह सिर्फ अर्जुन के समीप होने पैर हुई थी. अर्जुन भी वैसे हे उनकी मुद्रा का प्रतिबिम्ब बनाते हुए बिस्टेर पर लेट उन्हें निहारने लगा. चेहरे पे आये कुचल बाल पीछे हटाता हुआ वह ये मासूमियत ज़िन्दगी भर देख सकता था. अर्जुन ऐसे हे खोया था और कोमल दीदी ने प्यार से उसके होंठो को चूमते हुए अपने साथ चिपका लिए.

"आप कब उठ गई?", अर्जुन प्यार से उनको बाँहों में लिए सीने से लगते हुए पूछने लगा.

"जब तुम खोये हुए थे.", उसके सीने पर होंठ रखने के बाद ऊपर चेहरा करती दीदी ने कहा और थोड़ा सरक कर उसकी बिस्टेर पर तिकी ब्याह पर गर्दन रख ली.

"आपको कही कोई दर्द तोह नहीं है?", अर्जुन सीधा उनकी छूट का हाल नहीं पूछ सकता था.

"तुम पास हो तोह दर्द कैसे होगा? तुमसे दूर होने पर जरूर होता है.", हलकी मुस्कान बिखेरती वह अर्जुन के होंठो पर चूमने के बाद उसके बालो में उंगलिया फिरने लगी. इतनी सवेरे हे उनकी आँखे एक शोखी से अर्जुन को देख रही थी.

"फिर मेरे पास हे रहो, हमेशा.", अर्जुन वैसे हे उन्हें देख रहा था लेकिन दीदी ने अपना पाँव उसके ऊपर रखते हुए निचला हिस्सा साथ लगा लिए.

"थोड़ा प्यार अभी करते है फिर जब मिलेंगे तब मिलेंगे. तुम पास हे तोह हो.", अर्जुन भी और अनदेखी न करता हुआ उनके गोल कूल्हों को दबाते हुए दोनों के खास अंग आपस में रगड़ने लगा. सुबह का ये पहला गीला चुम्बन जल्द हे उन्हें और आगे ले गया. हलके से उनके दूध सहलाता हुआ वह जल्द हे उनके ऊपर आ गया. दीदी मुस्कुरा रही थी और अर्जुन के हाथ, जिनमे वह दोनों उभर पकडे था उन पर उंगलिअ रखे लेती रही. अर्जुन अपनी काम कला दिखता दोनों चुके बारी बारी से पीने लगा तोह जैसे कोमल दीदी को आराम आया. सूजन पर ये गीली गर्मी मजा दे रही थी. लेकिन दोनों हे इस पल में सबकुछ आराम से करना चाहते थे, बिना आवाज किये.

"दीदी, दर्द तोह नहीं है यहाँ?", उनकी मोटी नरम फांको पर हाथ रखते हुए अर्जुन ने सहलाने से पहले हे पूछ लिए.

"परेशां मत हो और अपनी दीदी से बस ाचे से प्यार कर.", उनकी ऐसी मुस्कान देख कर अर्जुन ने धीरे धीरे अंदरूनी हिस्से में उंगलिया फिरनी शुरू कर दी. कोमल दीदी के आँखें बंद हो चुकी थी. हल्का सा गीलापन आते हे एक ऊँगली आराम से अंदर चली गई. अर्जुन एक तरफ लेता उनके पेट पर होंठ फिरते हुए ऊँगली से हे छूट को जागृत करने लगा. छूट की लचक मांस की अधिकता से ाची थी और कुछ देर बाद वह दोनों उंगलिया अंदर बहार होने लगी तोह दीदी धीमी आहे लेती हुई अर्जुन का सर सहलाने लगी. जल्द हे वह उनकी बगल में आते हुए उनकी एक जांग अपने पत् पर रखता लुंड को छूट से भिड़ा कर दीदी को चूमने लगा. इस अवस्था में दोनों हे बिस्टेर पर एक दूसरे के सामने थे.

"आठ.. प्यार से कर अर्जुन धीरे धीरे उम्", गुलाबी हिस्सा सिर्फ थोड़े दबाव से अंदर करने के बाद दोनों हे रुकते हुए एक दूसरे के आधार चूमने लगे. एक मुलायम बड़ा सतांन हलके हलके दबाता हुआ अर्जुन कोमल दीदी के शरीर को आराम दे रहा था. जांघ अर्जुन के ऊपर होने से वह तरबूज सी लाल छूट भी आराम से फ़ैल रही थी. चूमने और दूध दबाने का असर छूट के अंदर भी हो रहा था. अतिरिक्त गीलेपन की वजह से छूट खुद हे लुंड को अंदर जगह देने लगी. बेहद धीमी गति से उनकी गहराई को मापता अर्जुन बस उन्हें प्यार किये जा रहा था.

"ममममम... इन्हे थोड़ा पी ले.", छूट पूरा लुंड निगलने के बाद आराम से लिपटी थी और दीदी ने अपना उभर पकड़ते हुए खुद हे अर्जुन को उन्हें पीने का न्योता दे दिए. कोई जल्दबाजी न करता अर्जुन भी दोनों हाथ में उन्हें भर कर पीने लगा और दीदी खुद हे निचला हिस्सा हिलती 2-3 इन्चा लिंग अंदर बहार करने लगी. बहार की तरफ हलकी सूजन थी जिस से लुंड जड़ में टकराते वख्त छूट में जलन होने लगती. लेकिन ऐसे मिलान में ये कुछ ख़ास बड़ी बात न थी कोमल दीदी के लिए. सख्त हड्डी सा ये बड़ा लुंड उन्हें कोई दर्द न दे रहा था. उसके उलट जैसे अब ये प्यार से उनकी छूट को आराम पंहुचा रहा था.

अर्जुन दीदी का दूध पीने का उपक्रम करता उन खरबूजों से हे लिप्त रहा और कोमल दीदी अपने साथ हे छोटे भाई को भी उसकी मंजिल तक ले जाने लगी. ये अवस्था यु भी ख़ास थी की लम्बी और कासी हुई रगड़ से लुंड भी कुछ हे देर में फूलने लगा था. दीदी के साँसे तेज होने लगी और वह आँखें बंद करती अब थोड़ा तेज अपने नितम्भ हिलती 3/4 हिस्सा अंदर बहार कर रही थी.

"दीदी अब मत कसना मेरा अपने अंदर.", अर्जुन की बात सुनकर भी उनकी रफ़्तार काम न हुई और जैसे हे वह झड़ने लगी अर्जुन ने जल्दी से लुंड बहार खींच लिए. कोमल दीदी के पेट, चुचो और गले तक अर्जुन का गाढ़ा वीर्य उछलता हुआ गिरा, कुछ बिस्टेर पर भी. 5 मिनट बाद दीदी ने उठ कर एक बार अपनी टांगो के बीच देखा. गीली लाल छूट का मुँह थोड़ा खुल चूका था. नंगे बदन हे बाथरूम की और जाती कोमल दीदी के गोल थिरकते चुत्तड़ देख अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान तैर गई.

"वह मत देख. कुछ महीने तक सिर्फ सामने.", दीदी की बात सुनकर झेंप गया. दीदी थोड़ी हे देर में बाथरूम से बहार आ गई. एक साफ़ कुरता और ढीला पजामा पहन कर. सभी ख़ास कपडे जो अर्जुन का उपहार था, उन्हें चूड़ियों के साथ वापिस पैक करके उन्होंने अलमारी के निचले हिस्से में रखा और साफ़ चादर अर्जुन की मदद से बिस्टेर पर बिछाने के बाद ऊपर बैठ गई. सिरहाने से तक लगा कर उन्होंने अर्जुन का सर अपनी गॉड में ले लिए.

"ारु, पता है तू बहोत ाचा है. लेकिन कुछ बातें तुझे भी जल्दी सीखनी होंगी.", दीदी का यु सर सहलाना और बात करना अर्जुन को रहत पंहुचा रहा था.

"आप हे समझाओ न दीदी."

"ाचा एक बात बताएगा मुझे? तुझे कैसा महसूस होता है जब तू यही सब किसी और के साथ करता है? मेरा मतलब घर से बहार है और मई ये सब इसलिए पूछ रही हु के मैं तेरे अंदर जो हो रहा है उसको समझती हु लेकिन तू खुद भी मेरी तरह हे है. बताता नहीं है.", कोमल दीदी की स्पष्ट बात सुनकर अर्जुन कुछ देर शांत हे रहा. लेकिन दीदी प्यार से उसका सर सहलाती रही.

"पता है दीदी, मैं ये सब खुद से कभी नहीं करना चाहता था. माधुरी दीदी के साथ तोह आपको पता हे है."

"अर्जुन माधुरी दीदी, ऋतू, अलका या तारा की बात नहीं कर रही हु. ज्योति भी भूल जा क्योंकि वह बेशक तेरी पहली थी लेकिन अब वह कही नहीं है. इस चारदीवारी के बहार जो होता है क्या उसमे तेरी रजामंदी रहती है?", उनकी बात सुनकर एक पल के लिए अर्जुन सेहम गया था. कोमल दीदी उसकी सोच से भी ज्यादा जानती थी.

"मंजू के साथ शुरुआत में ये सब एक ched-chaad जैसा था. वह अलग थी और मुझे कभी बुरा नहीं लगा था उसके साथ. और वह प्यार करती है और Preeti-mere रिश्ते की कदर करती है. लेकिन नानी के वह जरूर मुझसे कुछ गलतियां हुई थी. मुझे ाचा नहीं लगता था दोनों छोटी मामी का जीवन ऐसी हालत में देख कर. उनके साथ करते वक़्त मैंने सिर्फ उन्हें माँ बनाने के बारे में सोचा लेकिन पूजा मामी, वह कुछ और चाहती थी. सबक के चक्कर में मैंने उनके साथ वह सब कर दिए जो वह चाहती थी. लेकिन उन्होंने फिर मेरे साथ कुछ ऐसा वैसा नहीं किआ."

"मेरे भाई अगर छोटी मामी के साथ रिश्ता सिर्फ उन्हें माँ बनाने तक था तोह ठीक है. लेकिन पूजा मामी बेशक तुझे चाहती हो या उनको तेरे साथ ाचा लगा हो, लेकिन इसका असर सबसे ज्यादा तुझपर हे होगा, अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया. बिट्टू मां उनसे प्यार करते है, उनकी दोनों बेटियां बड़ी है. कल अगर गलती से बेटी तेरे पहलु में आ गिरी तोह यकीनन माँ तक बात आएगी. तू भोला है मेरे भाई जो सबको प्यार करता है. लेकिन इंसान के अंदर जो प्यार की कशिश होती है जबतक वह न दिखे तोह समझ लेना की चूक हो चुकी है. जिसको कभी प्यार न मिला हो और वह तुझे दिल से पसंद करे तभी आगे बढ़ना ारु. लेकिन जिस्मानी रिश्ता अपने साथ कुछ और भी लेकर आता है. हक़, जज्बात, मोह और द्वेष. किसी को प्रीती और तेरा रिश्ता खटक सकता है अगर वह जिस्मानी तौर पर तेरे साथ जुडी हो. हो सकता है कोई घर के खिलाफ फैंसला करती हमारे घर आ कड़ी हो तेरे मोह में, इंकार कर पायेगा के तुम्हारा उसके साथ कोई सम्बन्ध नै? कोई अपने जज्बात जाहिर न कर पाए लेकिन अंदर घुटन से गलत कदम उठा ले तोह? आरजू, प्यार में बहकर अगर तूने गलती से प्रीती का हक़ किसी और को दे दिए तोह हमारी दुनिया पलट सकती है.", कोमल दीदी की बातें सुनकर अर्जुन के रोये खड़े होने लगे थे. वह नादानियाँ कर चूका था और शायद आगे भी करता.

"दीदी, मैं इंकार नहीं कर पता हु जब भी किसी को दर्द या खुदसे प्रेम करते पता हु?"

"ाची बात है न. इंकार करने को कौन कह रहा है? इंसान को समय दे, निकट आने से पहले जितना समझ सके उतना समझ. किसी का दर्द काम करना तोह पुण्य है लेकिन वैसे हे जैसे कृष्ण जी करते थे. वह गोपियों के साथ कभी सीमा से आगे नै गए थे. प्यार और स्नेह से उन्हें तृप्त रखते थे जिस से वह उन्हें चाहती थी लेकिन kaam-lobh नै था. अपने दिल के साथ दिमाग का भी विस्तार कर थोड़ा. सब मंजू या रेणुका बुआ जैसे नहीं है जो तुझे अंदर तक समझते हो, तेरी फ़िक्र हो उन्हें. मेरा प्यारा भाई अगर आज समझदार नहीं बनेगा तोह उनका क्या होगा जो तेरे नाम को हे अपनी इज़्ज़त्त मानते है. हमारे दादाजी.", नीचे झुकती हुई कोमल दीदी ने अर्जुन के माथे को चूम लिए.

"रेणुका बुआ? ये आपको कैसे पता? और उन्हें मेरी फ़िक्र कब हो गई जो आपको पता चल गई.", अर्जुन उठना चाहता था लेकिन दीदी ने वैसे हे उसको लेते रहने को कहा.

"देख तू संजीव भैया और पापा के सामने कुछ ऐसा वैसा नहीं करता तोह इसका मतलब ये तोह नहीं के बाकी तुझे देख नहीं सकते. वो अलग बात है के ये अलका और ऋतू तुझे बचा लेती है, नजर नहीं आने देती या ध्यान घुमा देती है. रेणुका बुआ को शायद मैं बेहतर जानती हु प्रीती, तेरे या किसी और से. वह तेरे बारे में कुछ जान ने के बाद चाहती थी की तुझे एहसास हो तेरी गलतियों का और तू प्रीती से कुछ समय दुरी का दर्द सेह कर देखे की प्यार के मायने क्या होते है. एक बार तू किसी hum-umar लड़की के साथ सुनसान सड़क पर चिपका खड़ा था मॉडल टाउन से हमारे सेक्टर वाली सड़क की किसी गली में, फिर बाजार में कोई और तेरे साथ और शिमला जाने से पहले वाले दिन भी रात में तू पार्क के पिछली सड़क पर निकल गया था. समझा सकता है उनको ये सब? और प्रीती? उसने बचे तुझे आजादी दी है के निश्चिंत रह कर ज़िन्दगी सँवारे, लोगो से प्यार करे और उनकी मदद करे. लेकिन अगर वह कुछ ऐसा वैसा सेह न सकीय तोह?", अर्जुन की आँखों में आंसू उभर आये थे जब सबकुछ दिमाग में पड़ा.

"बदलने के लिए नहीं कह रही मैं तुझे. बस थोड़ा सुलझी हुई ज़िन्दगी बना अपनी. जहा लालच न हो वह तू जो चाहे कर, तेरी बहिन संभल लेगी शिकायत लेके आने वाले को. बस अगर कोई प्यार करने लगे एक हद्द से ज्यादा तोह अपना निर्धारित भविष्य बता कर निश्चिंत जरूर कर देना, फिर वह समय ले और खुद फैंसला करे. और सबसे पहले ये आंसू पांच और रेणुका बुआ को फ़ोन लगा नीचे जा कर, 5:30 हो चुके है.", होंठो को चूमती हुई वह उसको सीधा करने के बाद गले लगी और बाल ठीक करने के बाद नीचे चल दी.

अर्जुन कुछ पल अपनी आँखों के सामने चलती तस्वीरें देख रहा था जहा उसने बहुत कुछ नहीं बताया था किसी एक भी राजदार को या अनजाने में गलतियां हुई थी. रेणुका बुआ ने उसको आकांक्षा, मेनका और अन्नू के साथ देखा था. 2 मौके गलत और एक में सही था. चेहरा ाचे से साफ़ करने के बाद अर्जुन नीचे आँगन में आया तोह सामने से आती माँ के गले लग गया.

"नींद नहीं आई बीटा तुझे ठीक से?", उन्हें ने चिंता से पुछा

"नहीं माँ. नींद ठीक आई बस अपनी प्यारी माँ को देख कर प्यार आ गया.", अर्जुन की बात से मुस्कुराती रेखा जी बाथरूम में कपडे रखने लगी.

"तेरी मौसी को बस में बिठा के आना है थोड़ी देर बाद.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने हामी भरी और कोमल दीदी को देखता उनके कमरे में चला गया.

"ये ले, बैठक में रखा है फ़ोन और बात कर. इतने मैं दूध बनती हु तेरा.", वह पहले हे एक कागज पर नंबर लिखे उसका इन्तजार कर रही थी. अर्जुन चुपचाप बहार वाली बैठक में चला गया. फ़ोन पर ट्रंक कॉल की सुविधा थी तोह 0 के बाद नंबर मिलता वह हैंडल कान पर लगाए प्रतीक्षा करने लगा.

"Hello, हांजी कौन साहब बोल रहे है?"

"जी #### से अर्जुन शर्मा, रेणुका बुआ से बात करवा दीजिये."

"हाँ, रुको बीटा वह यही है. रेणुका बात कर लो.", कोई 10-15 सेकंड बाद दूसरी तरफ से आवाज आई.

"Hello?"

"बुआ...", अर्जुन इतना हे कह सका और उसकी भर्राई आवाज सुनकर सामने से भी आवाज बदल गई.

"मैं थोड़ी हे देर में निकल रही हु. दोपहर तक पहुंच जाउंगी.", आगे आवाज न आई लेकिन फ़ोन दोनों के कान पर लगे थे.

"सॉरी. आप बस आ जाओ.", अर्जुन ने जैसे तैसे खुद को संभाले रखा था.

"I'm आल्सो गिलटी. लेकिन दोपहर को तुम घर पर हे मिलना.", आंसू के साथ हे रेणुका के चेहरे पर दर्द ख़तम हो गया था. वह भी अपने इस कदम पर इतने दिन से दुखी थी लेकिन कह न सकीय थी. अर्जुन फ़ोन रखने के बाद कुछ देर वही शांत बइहा रहा.

"ोये मूर्खनंद. चल थोड़ा hath-panv हिला ले और तैयार हो जा. दिन निकल आया है.", रामेश्वर जी अभी pooja-path करने चले थे नाहा धो कर और अर्जुन को ऐसे बैठे देख अपने लाडले से शरारत करते हुए उसको उठा कर अंदर चल दिए. अर्जुन भी कुछ हे समय में नाहा कर साफ़ कपडे पहने अपनी मौसी के बराबर बैठा दूध पे रहा था.

"मुन्ना, तेरे से तोह बात हे न हो पाई रे इस बार. अब समय निकाल कर मौसी से मिलने तू हे आना."

"क्यों, मौसी के पाँव में दही जमी है? बेटी से मत मिलिओ लेकिन तू चक्कर लगा लिओ बीच में. वैसे एक बार अर्जुन तू भी गौशाला नजर मार लिओ ऐतवार को, तेरी मौसी अपनी बहिन के घर आती हे है उस दिन.", कौशल्या जी की बात पर सरोज भी मुस्कुरा दी.

"यहाँ तोह माँ जी कब चक्कर लगे लेकिन है गौशाला मैंने भी जाना है क्योंकि ये तोह अपने शहर और जमीन के काम से बहार रहते है. आप हे निकल लो समय जरा, सुनंदा मौसी भी कह रही थी की आपने तोह आना जाना हे बंद कर दिए.", सरोज जी की बात पर कौशल्या जी भी कुछ सोचने लगी. अर्जुन दूध ख़तम कर चूका था और बहार गाडी की आवाज बता रही थी की शैतान मण्डली घर में प्रवेश कर चुकी है.

"हाँ सरोज, ये मंगलवार वाले दिन आउंगी मैं. धोक लगनी है हनुमानजी की तोह तू साथ हे चलना मंदिर. फिर कुछ देर सुनंदा से भी बतिया लेंगे. आज फ़ोन करती हु उसको और खबर भी लुंगी के वह भी आ सकती है, घर में 4-4 बहु है पीछे और devrani-jethani अलग."

"ाचा माँ जी, अब निकलती हु नहीं तोह फिर धुप में सफर करना पड़ेगा.", कुछ औपचारिकता पूरी करने के बाद सरोज जी सबसे मिलती अर्जुन के हे साथ बहार चल दी.

"ऋतू बेटी, मंजू घर हे रुकी है?", ऋतू दीदी बहार आँगन में रोमिला जी का हाथ पकडे कड़ी थी. अपनी मौसी की बात सुनकर उन्होंने भी गले मिलने के बाद परिचय करवाया.

"ये अंग्रेज है?", सरोज जी की ऐसी बात पर रोमिला मुस्कुरा उठी.

"जी नहीं ग्रीक हु. आपसे मिलकर ाचा लगा."

"दय्या. हिंदी बोलती हो आप?", अर्जुन पीछे खड़ा कान पकडे रोमिला को सॉरी कह रहा था.

"थोड़ी थोड़ी. और अर्जुन मैं भी यही बताने आई थी की हम सैटरडे मॉर्निंग चलेंगे. रेणुका आ रही है और प्रीती कोई काम नहीं कर रही.", रोमिला की बात पर अर्जुन ने सर हाँ में हिला दिए. और मोटरसाइकिल निकलते हुए उन्हें इतना हे कहा.

"आंटी, प्रीती से कहना के मैं अभी आ रहा हु थोड़ी देर में उस से मिलने."

"वह आ चुकी है. िफ़ यू लुक ात योर गेट, she's तेरे.", अर्जुन ने सफ़ेद उजली टीशर्ट और पाजामे में प्रीती को सामने खड़े देखा तोह बुलेट का स्टैंड लगते हुए सीट देखने लगा. जैसे कुछ सोच रहा हो.

"बुआ थोड़ा एडजस्ट करना आप. प्रीती साथ चलो, काम है.", अर्जुन की बात पर सरोज जी को तोह ख़ुशी हे हुई लेकिन प्रीती अपनी माँ और ऋतू दीदी की तरफ देखने लगी.

"जो. ी गेस नींद उतर जाएगी तुम्हारी.", रोमिला वही ऋतू के साथ कुर्सी पर बैठ गई थी कोमल को कॉफ़ी की ट्रे सामने स्टूल पर रखते देख कर. कोमल दीदी भी उन दोनों के साथ बातें करनी लगी अर्जुन को जाते देख कर.

"ये लड़की समझ से बहार है मेरे कोमल. कभी लगता है सयानी हो गई है लेकिन फिर एकदम से 6 साल की हो जाती है."

"आंटी आप देखो कैसे ये वापिस आने के बाद सयानी हे बानी रहेगी, काम से काम सबके सामने.", कोमल दीदी की बात पर ऋतू दीदी उन्हें देखने लगी और रोमिला मुस्कान के साथ कॉफ़ी का आनंद.

"ऐसा क्या होने वाला है?"

"कॉफ़ी पी हर वक़्त दिमाग नहीं. और थैंक यू सो मच.", कोमल दीदी की इस मुस्कान पर ऋतू ने शरारत से दोनों बहन गले में दाल ली.

"आहे. थैंक यू. घर से हमको निकल दिए एक रात. कोई बात नई कर लो पढाई फिर मेरा नंबर है.", उनकी बातें रोमिला को तोह समझ नहीं आई लेकिन प्यार देख कर ाचा लग रहा था.

"तुम दोनों ट्विन्स जैसी हो बूत कोमल इस स्लिंगटली बेटर. हेअल्थी है और ाचा है न.", रोमिला की बात का मतलब समझते हुए ऋतू ने शरारत से दीदी को देखा.

"मैं भी यही कहती आंटी दीदी से. और ये कहती है के मैं ज्यादा सुन्दर हु."

"She's राइट इन ा मन्नेर. तुम खूबसूरत हो, लुक्स, हाइट एंड मेसुरेमेन्ट्स. बूत बीटा वह हमारे यहाँ एक कहावत है. ठीकेर इस बेटर.", उनकी ऐसी बात सुनकर दोनों बहने एक दूसरे को देखने लगी और फिर मुस्कुराती हुई रोमिला को.

"सही कहा आंटी. वैसे जहा से थिक होना चाहिए मैं वह से कुछ हद्द तक हु. लेकिन प्रीती इस मामले में आप पर नहीं गई. आपको देख कर तोह मेरा हे दिल ख़राब हो जाता है." ऋतू की बात पर रोमिला अपनी हंसी न रोक पाई और कोमल दीदी भी मुस्कुराते हुए ऋतू के हाथ पर हाथ मरती उसको चुप रहने का इशारा करने लगी..

"लेट हेर स्पीक कोमल. She's राइट. ये 2 भाग जरुरी है हेअल्ती लाइफ और ाची मैरिड लाइफ के लिए. साथ हे इनको मेन्टेन भी करना. ी इनहेरिटेड थिस बॉडी फ्रॉम माय मदर. वह अब भी कमाल है लेकिन मुझे मेन्टेन रखने के लिए एफर्ट करने पड़ते है. प्रीती एथलेटिक है थोड़ी वेस्टर्न बॉडी है. बूत मुझे लगता है वह अर्जुन के साथ शादी के बाद हे अपनी ब्लूद्लिने पर जाएगी.", रोमिला बड़े सतांन और नितम्ब का महत्व बता रही थी और उनकी नजर में कोमल दीदी के लिए प्रशंशा थी.

"वैसे तुम अभी छोटी हो ऋतू और एक्टिव लाइफ है इसलिए फ़िलहाल परफेक्ट हो. बस हेअल्थी डाइट और थोड़ा इन पर ध्यान देना है. बाकि प्रीती का तोह अब अर्जुन के हवाले. हे इस हूजे एंड आल मुस्कले. दबने से हे न मर्डर जाये मेरी बेटी.", हंसती हुई वह अपनी बात ख़तम करने के बाद उठने लगी तोह ऋतू दीदी भी उनके साथ बगीचे की तरफ चल दी.

"वैसे आपने कल प्रॉमिस किआ था एक एक्सरसाइज और स्पेशल डाइट का. हम कब समझेंगे?"

"कल. तुम और अलका 4 बजे आ जाना. Hansi-majaak अपनी जगह है लेकिन तुम वाकई खूबसूरत हो ऋतू. मेरा बीटा बड़ा होता तोह मैं तुम्हे हे उसके लिए सेलेक्ट करती या अलका को. सबसे ाची बात है के तुम्हारा सुलझापन. यू हैवे चेंज्ड माय मंद अबाउट इंडियन गर्ल्स.", दोनों हाथ सामने करती वह ऋतू के साथ हे घर आ गई थी लेकिन ऋतू दीदी बाद में आने का कह कर वापिस लौट आई.

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"अब क्या करे अर्जुन? ये तोह सचमुच गड़बड़ हो गई. और सब तुम्हारी वजह से हुआ है तुम्ही ठीक करो.", मौसी को छोड़ कर आते समय अर्जुन ने रेणुका बुआ का पूरा सच बताया तोह पहले प्रीती का दिल बैठ गया लेकिन फिर अर्जुन की कमर से हाथ हटती वह नखरे से उसको हल्का मारने लगी.

"मैंने हे उन्हें फ़ोन किआ था और इसलिए हे वह आ रही है. मारना बंद करो न, तुम्हे लग जाएगी."

"गंदे कही के. क्या मुसीबत में दाल दिए है. ऋतू दीदी को बताती हो वह करेंगी तुम्हारा इलाज. मजे मारो तुम और भुगतना हमको पड़ रहा है.", प्रीती के स्वर में हलकी नाराजगी थी. अर्जुन ने पार्क के पास खड़े फलो के जूस वाले पर मोटरसाइकिल रोकते हुए प्रीती को अपने साथ लिए हे 2 गिलास बनाने को कहा.

"अबसे मैं तुम्हारा और मेरा रिश्ता सार्वजानिक रखूँगा. गुस्सा मत करो, सॉरी.", गाल पर हाथ रखते हुए अर्जुन प्रीती को मन रहा था. थोड़ी हे दूर खड़े 2 जवान लड़के इन्हे हे देख रहे थे. निक्कर टीशर्ट में कोई खिलाडी हे थे.

"बात वह नहीं है. तुम जो भी करो बहार क्योंकि गलती तुम्हारी नहीं है. मैं नहीं कह रही ये सब बंद करने को लेकिन अपनी बुआ से कैसे नजरे मिला पाऊँगी.?"

"बस आते हे उनके गले लग जाना. तुमसे ज्यादा प्यार तोह वह किसी से नहीं करती.", अर्जुन गले लगाने लगा तोह प्रीती रूठने का नाटक करती हुई हाथ पीछे करने लगी.

"भाई तुम्हारा दिल बड़ा खुश हो रहा है मेरी हालत देख कर. आओ तुम्ही मन लो अपनी बहिन को.", अर्जुन ने उन दोनों को झुंझलाते हुए कहा तोह वह लड़के इधर उधर देखने के बाद शर्मिंदा होते हुए आगे चल दिए. लेकिन खुद प्रीती मुस्कुराती हुई उसके गले लग गई थी.

"उन बेचारो को क्यों भगा दिए तुमने? ाचे लगते हो जब थोड़े परेशां दीखते हो."

"भैया आपका जूस.", दुकानवाले ने आवाज दी तोह अर्जुन ने मायूसी से उसकी तरफ देखा.

"भाई सुबह से मेरा हर कोई जूस हे निकल रहा है. एक तुम हे हो जो मेरी परवाह कर रहे हो."

"ओह नौटंकी कही के. चुपचाप जूस पीयो और स्कूल दफा हो जाओ. दोपहर को मेरी बुआ लेंगी तुम्हारी खबर.", प्रीती ने दोनों गिलास पकड़ लिए और अर्जुन मुस्कुराते हुए पैसे देने के बाद गिलास लेने लगा तोह वह दोनों में से हे पी रही थी. फिर तरस दिखते हुए आधा गिलास अर्जुन को पकड़ा दिए और बाकी अपने मुँह लगाती पीने लगी.

"धन्य है ज़िन्दगी. पता नहीं शादी के बाद रोटी मिलेगी या ब्रेड.", अर्जुन मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हुए आसमान की तरफ देखते हुए कहने लगा.

"तुम्हे थप्पड़ मिलने चाहिए. यही काम सीख लो घर पर जिस से आराम तोह मिलेगा मुझे कुछ. खाने में कमी निकालनी अभी से शुरू कर रहे हो.", प्रीती को ऐसे हे हँसता हुआ वह साथ लिए घर आया तोह छोल साहब और रोमिला घर के बहार हे खड़े थे और दोनों को हँसते देख वह भी खुश हो गए.

"कहा से आ रहे हो दोनों, इतनी सुबह? कपडे देख कर तोह नहीं लागतात दोनों में से कोई भी रनिंग के लिए गया हो.", छोल साहब की बात सुनकर प्रीती उछलती सी उनके बराबर आ कड़ी हुई.

"जूस पी कर आ रही हु. अर्जुन की मौसी को बस स्टैंड छोड़ने गए थे.", प्रीती की हरकत देख उन्होंने उसके सर पर हलकी चपत लगते हुए कहा.

"एक-2 लोगो को और ले जाना था बीटा इस मोटरसाइकिल पर. ाचा, अर्जुन मैं जरा कैंट जा रहा हु तोह 10 बजे तक आऊंगा रात में वापिस तोह स्टेडियम से आते हुए अपनी आंटी के लिए कुछ सामान ले आना. इसको भेजा तोह ये सामान छोड़ कर बाकी सब ले आएगी और पता नै फिर कितनी देर में आये.", प्रीती को उन्होंने एक बार सीने से लगाया और अर्जुन को काम लगते हुए वह गाडी लेकर निकल लिए.

"लिस्ट अभी दू या बाद में?", रोमिला ने अर्जुन को देखते हुए कहा.

"माँ इसको स्कूल जाने दो अभी. आएगा दोपहर में तोह ले लेगा.", प्रीती ने अपनी माँ का हाथ खींचते हुए कहा, अंदर चलने के लिए.

अर्जुन और रोमिला इस हरकत पर बस हंस दिए और मोटरसाइकिल आँगन में कड़ी करने के बाद अर्जुन भी स्कूल ड्रेस पहन ने के लिए अपने कमरे में आ गया.

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स्कूल का पहला पीरियड ख़तम होने से कुछ देर पहले हे अर्जुन मरस वर्मा से गणित का कोई सवाल लेके बैठ गया. उसका सवाल थोड़ा टेढ़ा था जिसके लिए मरस वर्मा भी सुशिल को उसकी जगह से हटा कर खुद हे अर्जुन की कॉपी पर सवाल हल करने के साथ समझने लगी. इधर घंटी बजी लेकिन दोनों हे प्रश्न में डूबे हुए हरेक क्रम को साँझा कर रहे थे. मिस अन्नू क्लास में आई तब भी उन दोनों को छोड़ कर बाकि सब खड़े हो गए. अन्नू ने इतनी तन्मयता से मरस वर्मा और अर्जुन को सवाल को लेकर बातचीत करते देखा तोह अपनी जगह वैसे हे बैठ गई.

"देखो अगर तुम यहाँ ये फार्मूला लगते हो तोह बेशक आधा सवाल हल हो जायेगा. लेकिन इसमें हम 2 रूल लेकर चलेंगे. डिफरेंशियल ेकशन वाला तरीका यहाँ लगाना गलत होगा. तोह हम यहाँ वही वैल्यू रखते हुए ऐसे करेंगे.", मरस वर्मा एक सीनियर स्टूडेंट जैसे अर्जुन को समझा रही थी.

"लेकिन मिस, यहाँ पर हम रूल 2 फॉलो करे और पहले लहस को हे ेकशन के बराबर क्रम में हल करे तोह रहस्य एक्सपैंड करने की जरुरत हे नै है. लेकिन आखिर में बस यहाँ गड़बड़ हो रही है.", अर्जुन के उत्तर को ध्यान से देखने के बाद मरस वर्मा के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

"इतना अगर सही तरीका जानते हो तोह ये ेकशन का 3रद पावर कैसे भूल गए? लो तुम्हारे हे तरीके से सोल्वे हो गया. हहहहह. चलो नेक्स्ट क्वेश्चन फ्री पीरियड में करेंगे अभी क्लास ख़तम करने से पहले अटेंडेंस ले ले.", मरस वर्मा ने जैसे हे कुर्सी पर मिस अन्नू को बैठे देखा तोह झेंप गई.

"सॉरी. पीरियड ओवर हो गया?", उन्होंने जैसे jaan-na चाहा के कही मिस अन्नू जल्दी तोह नहीं आ गई क्लास में किसी टीचर को न देख कर.

"कोई बात नहीं मम. It's ऑलराइट. और मैं तोह खुद यहाँ काम करने आयी थी, क्लास का प्रैक्टिकल है तोह मैं फ्री हु.", उनकी बात सुनते हे बाकी स्टूडेंट्स भी कतार बनाते खिसकने लगे.

"थैंक्स अन्नू. लेक्चर तोह मेरे अगले दोनों हे फ्री है लेकिन इस लड़के के प्रश्न ने जैसे मुझे भी उलझा दिए. पता नहीं ये कोनसी किताबे पढ़ रहा है. क्लास में ध्यान देता है तोह कुछ कह नहीं सकती और क्वेश्चन पूछने पर तोह बिलकुल नहीं. वैसे तुम्हारे सब्जेक्ट में कैसा है ये?", क्लास में यही दोनों बैठी थी अब.

"आप वाला हे हाल है. पहले 2 दिन तोह क्लास से बहार निकल दिए था सवाल के चक्कर में. ज्यादा आगे के सवाल करेगा तोह बाकी क्लास क्या समझेगी. लेकिन फिर मुझे भी वही सूझा जो आप कर रही है. लेकिन इसने मेरी पुराणी किताबे खुलवा दी. अब सवाल नहीं करता.", अन्नू ने पेन से डायरी में कुछ लिखने के बाद बंद किआ और वह भी अनुभव साँझा करने लगी.

"िन्दु भी बता रही थी की ये जाने कोनसी दुनिया में रहता है. कल स्टाफरूम में केमिस्ट्री के टेस्ट चेक कर रही थी तोह इसका पेपर दिखाया.", अन्नू थोड़ा ध्यान से सुन्न ने लगी जब टेस्ट की बात आई.

"केमिस्ट्री का टेस्ट खराब गया क्या?"

"अरे ये 10 मिनट बाद क्लास से चला गया था. 6 में से 5 सवाल हल करने के बाद. छत्ता सवाल टेस्ट में लिखा हे नहीं इसने. 18 का हल किआ और 18 थे, वह कोशिश करने के बाद भी नंबर काट न पाई. हस्स रही थी के देखो मैं इसको नालायक समझ रही थी और क्लास में दूसरे सासबसे ज्यादा नंबर है इसके.", मरस वर्मा की बात पर अन्नू न चाहते हुए भी मुस्कुरा दी.

"चलो आज के टाइम में कुछ पढ़ने वाले बचे तोह है मैडम. नहीं तोह दसवीं करते है और घरवालों के पैसे खराब करना शुरू.", दोनों हंसने लगी और पूरे पीरियड में बस बातें करती रही. सभी पीरियड हमेशा की तरह समय पर ख़तम हुए तोह अर्जुन गलियारे में बस्ता लिए अकेला चल रहा था जब मेनका की आवाज सुन्न कर रुक गया.

"कहा भागे जा रहे हो?"

"कही नहीं. छुट्टी हो गई तोह घर हे जाऊंगा. आप बताओ इधर से कैसे आ रही हो? लैब तोह उधर है."

"अरे सामान रखने गई थी ालमिरह में. ाचा शाम को कितने बजे आना है?", मेनका के याद दिलाने से अर्जुन को याद आया था के उसने आज शाम मेनका को डॉक्टर के लेके जाना है.

"साढ़े 6 चले? मैं स्टेडियम से आने के बाद बसा नाहा के आ जाऊंगा.", अर्जुन की बात पर मेनका कुछ सोचने लगी.

"7 बजे आ जाना आराम से.", मेनका के शब्दों में जो रहस्य था वह तोह अर्जुन न समझ सका लेकिन हामी भर दी.

"यार तुम लोग यहाँ खड़े हो? Hi अर्जुन. मेनका चल जरा मेरे साथ.", अन्नू ने उनके पास आते हे अर्जुन को एक दिलकश मुस्कान के साथ कहा और मेनका को साथ लिए वापिस लैब की तरफ चल दी. अर्जुन अपने रस्ते.

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"Hello आकांक्षा. कैसी हो?", बहार आकांक्षा अर्जुन का इन्तजार कर रही थी रुपाली दीदी के साथ. संदीप और अर्जुन के आते हे दोनों चलने लगी हे थी की इस लड़की को देख कर आकांक्षा उस से हाथ मिला कर बड़ी ख़ुशी से मिली. रुपाली का परिचय करते हुए उसने कहा.

"Hello दी. आप कैसी हो और यहाँ? ये रुपाली है और रुपाली ये मेरी didi-friend पूर्वी.", संदीप के चेहरे पर चमक आ गई थी पूर्वी को देख कर लेकिन वह ज्यादा हैरान हुआ जब अर्जुन ने आगे बढ़कर पूर्वी को एक हाथ बढ़ाते हुए गले से लगा लिए.

"धुप में यहाँ कैसे?", रुपाली और आकांक्षा हैरत के साथ दोनों को हे देखने लगे. लेकिन अगली आवाज सुनते हे शांत.

"भाई, तुमसे हे मिलने आई थी. माँ ने कहा है तुम्हे याद दिला दू की कल थर्सडे है.", अर्जुन इस बात पर मुस्कुराते हुए पूर्वी के साथ हे चलने लगा. बाकी सब भी.

"मुझे याद है और तुम्हे ऐसे धुप में आने की जरुरत नहीं थी. शाम को घर आ सकती हो, कोई मनाही नहीं है."

"स्कूटी उधर कड़ी है. पैदल नहीं आई."

"ठीक है. कल आता हु फिर आराम से बातें करेंगे.", अर्जुन ने सलेटी रंग की स्कूटी को देखा और फिर सर पे हाथ फेरने के बाद किक से खुद स्कूटी चालू करके पूर्वी को जाने का इशारा किआ.

"वाह. क्या बात है अर्जुन. तेरी बहने घर पर काम है जो अब बहार भी होने लगी.", रुपाली दीदी की बात पर वह हँसता हुआ दोनों को देखने लगा.

"ाची बात है न. उसके पास भाई नहीं था और मुझे एक और बहिन मिल गई."

"वैसे ये हुआ कैसे? पूर्वी दीदी तोह घर से बहार नहीं निकलती और तुम्हे उनके घर और कोई जनता नहीं.", आकांक्षा की ऐसी बात पर उसने संदीप की तरफ देखा, जो झेंपते हुए गर्दन झुका कर साथ चल रहा था.

"दुनिया बहोत छोटी है. Jaan-pehchaan में देर नहीं लगती. और लग रहा है के दीदी आज तुम्हारे हे साथ जाने वाली है.", अर्जुन ने साइकिल पर रुपाली दीदी का बैग न देखते हुए कहा.

"हाँ. वह आज यही से काम करके मैं घर आउंगी. शाम को पढाई तोह होने वाली नहीं घर. और आकांक्षा के साथ हे लंच कर लुंगी, खाना बनाना सीख रही है ये भी.", आकांक्षा ऐसे अपना राज बताने के लिए दीदी के कंधे पर हलके से मरते हुए उन्हें देखने लगी.

"ठीक है. मैं चलता हु संदीप के साथ." अर्जुन उन्हें घर के सामने छोड़ कर आगे बढ़ गया.

"ये लड़की हे बहिन बनानी थी भाई?", संदीप की आवाज सुनते हे अर्जुन ने उसकी तरफ देखा.

"भाई, मैंने देख कर बहिन नहीं बनाया. जान ने के बाद दिल से बहिन मन है. वैसे तू चिंता न कर. कभी उसने मुझे ये कहा न के तू उसको पसंद है तोह मैं खुद तेरे से बात करूँगा.", अर्जुन साफ़ शब्दों में कह गया था के पूर्वी अगर उसको पसंद करे. दोनों ने विषय बदल कर दीदी की शादी, अगले महीने की छुट्टियां और लड़को वाली बाकी बातें करनी शुरू कर दी. कुछ देर घर के मदद के पास हे खड़े रहे फिर बाद में मिलने का बोलकर दोनों अपने घर की तरफ बढ़ गए.

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रेणुका बुआ घर समय पर पहुंच गई थी. अपनी भाभी से मिलने के बाद जब वह आराम करने कमरे में गई थी तभी प्रीती भी अंदर आ कड़ी हुई. अपने पीछे का दरवाजा बंद करने के बाद बस वह वही कड़ी बुआ को देखने लगी. रेणुका बुआ भी अपनी इस प्यारी भतीजी को कुछ देर देखने के बाद हलके से मुस्कुरा दी. और प्रीती जैसे इसकी हे प्रतीक्षा में थी और तेजी से उनके गले लग गई. मुस्कुराती हुई बुआ उसको अपने सीने से चिप्क्या बिस्टेर पर बैठी थी लेकिन जब उसके बहते आंसुओ का पता चला तोह प्यार से पीठ सहलाने के बाद उसका चेहरा दोनों हाथो में ले लिए.

"मेरी गुड़िया, तू क्यों रो रही है? मेरी गलती होने के बावजूद मैं तोह खुश हु.", प्रीती का मासूम चेहरा साफ़ करती बुआ बस उसकी neele-hari आँखों में देखते हुए बोल रही थी.

"N.nn.. नहीं बुआए.. आप जो कर रही थी बस वह समझ नहीं आया था. और मैंने इतना कुछ कह दिए आपको बिना सोचे समझे."

"तूने कुछ भी गलत नहीं कहा था. गलती ये हुई की मैंने अर्जुन से भी खुलकर बात नहीं की और तुझे भी समझाए बिना हे खुद फैंसला ले लिए. भूल गई थी की तुम बड़े हो रहे हो. तुमसे बड़ी होने के बावजूद बचपना करते हुए ऐसा कर दिए जिस से तीनो को ये सब सहना पड़ा. माफ़ी मुझे भी मांगनी चाहिए, लेकिन मैंने तोह नहीं मांगी."

"बुआ, आपको पता है के आप मेरे लिए क्या हो? लेकिन मैंने बहुत गलत बातें कह दी थी. प्लीज, आप सबकुछ भुला कर वैसे हे मेरी प्यारी बुआ बन्न जाओ.", प्रीती के फिर से बचो की तरह लिपटने से रेणुका बुआ उसको अपने साथ हे बिस्टेर पैर लिटाते हुए गाल चूमने के बाद बोली.

"कैसी प्यारी? वही जो इसकी बहिन भी और मौसी भी है?", प्रीती का हाथ अपने पति पर रखते हुए रेणुका बुआ ने हौले से कान में कहा तोह प्रीती शर्माती हुई उनसे लिपट गई. फिर बड़े ध्यान से उनके पेट पर हाथ रखते हुए वह उनके चेहरे को देखने लगी.

"इसकी तरफ तोह तीनो का ध्यान नहीं गया?", प्रीती को अब इस सारे हादसे में बहुत बुरा महसूस हो रहा था.

"अर्जुन का ध्यान गया था. और मैं हिम्मत नहीं जूता प् रही की उसके चेहरे का सामना कैसे करुँगी. तू और मैं तोह बराबर है लेकिन अर्जुन की बात एक हद्द तक ठीक थी की मैंने अधिकार जताया था वह भी बिना उस से बात किये. वह किसी के साथ अगर था भी तोह वजह जरूर होगी लेकिन मैंने न कुछ पूछा और बताया. चिंता तेरी भी थी इसलिए तुझे साथ ले जाने लगी थी की वह भी महसूस करे की कैसे लगता है जब प्यार की कमी हो. लेकिन जो इंसान बिना शर्त मुझे प्यार करता रहा मैंने उसके दिल के बारे में कुछ न सोचा. अब उसकी आँखों का सामना करने से हे धड़कन धीमी पड़ने लगती है.", रेणुका की आँखे अगर विरह में सूखी न होती तोह वह शायद अभी रो पड़ती.

बहार रोमिला किसी से बात कर रही थी जिस पर दोनों bua-bhatiji का ध्यान गया लेकिन अगले हे पल दरवाजे पर थपथप्ने की आवाज से प्रीती झट्ट उठ कड़ी हुई. बहार सिर्फ अर्जुन खड़ा था. प्रीती उसको अंदर जाने का रास्ता देने के बाद अपनी माँ के कमरे की तरफ बढ़ गयी. इन दोनों को समय देने के लिए.

नजरे झुकाये रेणुका किसी मुजरिम सी कड़ी थी. हिम्मत न थी की वह अर्जुन की आँखों का सामना कर सके. और अर्जुन अपनी आँखों के सामने कड़ी रेणुका को ऐसे देख कर खुद दुखी हो गया. हमेशा खिले गुलाब से रहने वाली रेणुका आज मुरझाई सी, बेमेल साड़ी में आधी अधूरी लग रही थी. गले से आवाज नहीं निकली लेकिन सूखी आँखों के पीछे कोई बाँध फूट पड़ा और हलकी हिचकियों लेती वह अर्जुन की बाहों में बेआवाज बस रोने लगी.

"हमारे फैंसले हम पर गलत असर करेंगे तोह इसको कौन देखेगा?", अर्जुन ने गीले चेहरे को हाथो में लेने के बाद रेणुका को कुछ कहने न दिए. किसी पूर्ण गृहस्त आदमी की तरह उसका स्वर था लेकिन रेणुका के होंठो को वैसे हे निस्चल प्यार से चूमने के बाद रुमाल से चेहरा साफ़ किआ. और गले लगाए कुछ देर खड़ा रहा.

"बिलकुल ाची नहीं लग रही हो. खुद को ठीक करो और बहार आ जाओ, खाने के बाद सेक्टर की मार्किट चलना है.", रेणुका फिर भी वैसे हे कड़ी सीने से लगे रही.

"ाचा ठीक है, सॉरी. रात को हमारे हे घर आ जाना. मैं कोमल दीदी से बात कर लूंगा.", रेणुका ने अब बड़े प्यार से अर्जुन के चेहरे को देखा, आँखों में बिछड़ने का दर्द और प्यार, दोनों का मिश्रण था.

"आज नहीं. कल दिन में यही, हमारे कमरे में. भाभी ने पापा के साथ जाना है.", रेणुका अलग होने लगी तोह अर्जुन ने दोनों कूल्हों पर हाथ रख लिए और रेणुका शर्माती हे उसके दोनों कंधे पकडे बस अर्जुन के इस स्पर्श को महसूस करने लगी.

"वजन बढ़ा लो थोड़ा सा.", अर्जुन ने मुस्कुरा कर अलग होते हुए कहा और बहार चला गया. रेणुका बस इस छोटे से एकांत मिलान से हे जैसे खिल उठी थी. बैग से कपडे निकाल कर बाथरूम की तरफ जाते हुए वही पुराणी चपलता चाल में आ गई थी.

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"तुम नहीं खाओगे अर्जुन?", खाने की टेबल पर रोमिला, प्रीती, बुआ और अर्जुन बैठे थे. अर्जुन को छोड़कर तीनो की प्लेट में खाना था.

"नहीं बुआ. मैं खाने के बाद हे इधर आया था. आप आराम से खाइये."

"रेणुका, फर्स्ट मंथ ओवर हो गया क्या?", रोमिला ने बिना लाग लपेट के पूछ लिए

"जी भाभी, 15 दिन ऊपर हो गए है. लेकिन अभी भी मॉर्निंग सिकनेस रहती है थोड़ी.", चम्मच से खाना उठाते हुए रेणुका बुआ ने जवाब दिए और अर्जुन कुछ सोचने लगा.

"कोई बात नहीं बस कल से थोड़ा डाइट और रूटीन बदलते है तेरा. सुबह मैं उठा लुंगी तुझे. और कल प्रीती घर पे हे रहना है तुम्हे. मैं और तुम्हारे दादा जी दिल्ली जा रहे है.", रोमिला जी ने प्रीती और रेणुका बुआ की प्लेट में ाचा खासा सलाद डालते हुए कहा. कांच के जग से ठंडा हो चूका संतरे का रास गिलास में भरते हुए अर्जुन के सामने रखते हुए आँखों से हे उसको पीने का कहती रोमिला फिर से खाना शुरू करने लगी.

"माँ, विकी का आने का कैसे प्रोग्राम बन गया यहाँ आने का? और मामी भी आ रही है क्या?", प्रीती की बात पर उन्होंने पहले खाना चबाया और फिर एक घूँट पानी पीने के बाद जवाब देने लगी. रेणुका बुआ और अर्जुन दर्शक जैसे थे अभी.

"तुम्हारी मामी विकी को छोड़ने आ रही है और उन्हें चंडीगढ़ में काम है कुछ तोह वह करने के बाद वह वापिस चली जाएँगी, ट्यूसडे को. विकी 6 महीने यूनिवर्सिटी में रहने वाली, रिसर्च प्रोग्राम है.", रोमिला की बात पर प्रीती दुविधा में पड़ गई.

"6 महीने के लिए वह फिर हमारे साथ रहने वाली है?"

"नहीं बीटा, यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल हॉस्टल है और उसने खुद कहा है के तुमसे वह वीकेंड पर हफ्ते में एक दिन खुद मिल लिए करेगी. घर पे कैसे रह सकती है जब उसकी लाइफ हे प्लांट्स और ऑर्किड्स में गुजरी है?", रोमिला ने प्लेट में खाना ख़तम करने के बाद फिर से थोड़ा पानी पिया और Preeti-Renuka पर ध्यान दिए.

"विकी, यहाँ रह सकती है. इतने बड़े घर में हम लोग है भी कितने? 7 रूम में से 4 तोह बंद हे रहते है. आप आई हो तोह ये और एक खुला है. वैसे विकी अब तोह बड़ी हो गई होगी."

"रेणुका, पूरा फिनिश करो. और बीटा तुम्हारे दादाजी ने भी ये कहा था लेकिन अब उसने यहाँ रिसर्च करनी है तोह फिर हम पढाई डिस्टर्ब नहीं कर सकते. 23 साल की हो चुकी है वह. आखिरी बार जब तुम दोनों मिले थे वह 16 और तुम 11 की थी.", पारवती ने झूठे बर्तन ध्यान से उठा लिए थे और रोमिला भी कड़ी होती हुई पिछले आँगन में टहलने चली गई.

"बुआ ये भी ले आना मार्किट से. लेकिन अलग रखना इस सामान को, maa-dada जी डांटेंगे अगर उन्हें पता लगा तोह.", एक पर्ची जल्दी से बुआ को पकड़ती वह भी कड़ी हो गई.

"और इसके पैसे ये देगा, अपनी जेब से.", नखरे से अर्जुन को देखती वह हाथ धोने चली गई. रोमिला ने भी पैसे और सामान की लिस्ट अर्जुन के निकलने से पहले पकड़ा दी थी.

"रेणुका तुम परेशां क्यों हो रही हो? ये चली जाएगी वैसे भी काम कोई इसने अब करना नहीं है.", रोमिला की बात पर प्रीती हाथ हिलती कमरे में भाग गई.

"भाभी मुझे पर्सनल सामान लेना है कुछ?", रेणुका बुआ ने आराम से जवाब दिए और चप्पल बदलने का कह कर अपने कमरे में चली गई.

"ध्यान से लेके जाना बीटा इसको."

"जी इसलिए स्कूटर लेके आया हु आंटी. सामान आगे रहेगा और सीट बड़ी है."

"तू समझदार है बीटा. मैं चली जाउंगी तोह पीछे से अपनी बुआ का ध्यान रखना. अगले कुछ समय तेरा aas-pas रहना जरुरी है.", अर्जुन खुश था के रोमिला को अपनी ननद की चिंता थी.

"आंटी मैं हे तोह हु जिसको घर से कही जाने नहीं दिए जाता क्योंकि सभी बहार होते है. आप फ़िक्र मत कीजिये मैं दिन में 2 बार जरूर दादू और बुआ से मिलता रहूँगा.", रेणुका आ गई थी तोह रोमिला को अर्जुन के गाल सहलाते देख मुस्कुराने लगी.

"भाभी, बड़ा प्यार आ रहा है अभी से अपने होने वाले दामाद पर."

"हो चूका दामाद है ये. लेकिन उस से पहले इस घर का बीटा. जैसा तुम्हारे पापा कहते है. चलो जाओ तुम और फिर आने के बाद मिलना मुझे."

.

.

"हम तोह इस मार्किट में जाने वाले थे?", रेणुका ने अर्जुन को सेक्टर वाली मार्किट के सामने से गुजरते देख पूछा.

"पहले मॉडल टाउन फिर आते हुए इधर से सामान ले चलेंगे.", अर्जुन ध्यान से स्कूटर चला रहा था. पीछे नया salwar-kameej पहने बैठी रेणुका ने सर और मुँह दुपट्टे से ढाका हुआ था. 5 मिनट बाद हे स्कूटर को एक नीम के घने वृक्ष के नीचे खड़ा करता वह रेणुका का हाथ थामे इस महिला saaj-sajja की कांच से सुसज्जित दूकान पर आ खड़ा हुआ.

"यहाँ?"

"खुद को थोड़ा ठीक करवा लीजिये और ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ भूल गई है.", हमेशा सलीके से रहने वाली रेणुका की भावो पर एक बाल अतिरिक्त न दीखता था और वैसे हे वह अपने कंधे से कुछ नीचे तक आते रेशमी बालो को रखती थी. लेकिन अर्जुन ने सबकुछ ध्यान से देखा था इसलिए वह उन्हें यहाँ ले आया था. बिना सवाल किये रेणुका भी छोटी सी मुस्कान देते हुए अर्जुन के साथ हे अंदर आ गई.

"जी, जो भी ट्रीटमेंट करते है हेयर से नेल्स तक कर दीजियेगा. मैं यही मार्किट में सामान ले रहा हु.", ये एक अधेड़ सी संचालिका थी जो अभी जैसे किसी ग्राहक से फारिग हे हुई थी और सामान ठीक करने में लगी थी. जगह ाची और बेहद saaf-suthri दिखाई दे रही थी.

"मैं बता देती हु आपको जो भी करना है.", रेणुका को ऐसे कहते देख वह महिला मुस्कुराने लगी. अंदर की तरफ से ये 19-20 साल की लड़की निकल कर आई और बाकी साफ़ सफाई करने लगी.

"चलिए फिर आप बैठ जाइये और जैसा कहेंगी मैं कर देती हु. और आप कर लीजिये शॉपिंग, यहाँ आधा घंटा भी लग सकता है और एक भी.", अर्जुन ने घडी में देखा तोह ढाई बज रहे थे. अभी उसके पास ाचा खासा समय था. रेणुका से प्रीती वाली पर्ची लेते हुए वह बहार चल दिए उन्हें वही रहने का बोल कर.

प्रीती ने चॉकलेट, कई तरह की टॉफ़ी, क्रीम, लोशन और जाने कितनी हे लड़कीओ वाली चीजे लिख राखी थी. वह अकेले हे हँसता हुआ हर दूकान से सामान लेता भटक रहा था. पर्ची एक तरफ से थोड़ी मुड़ी हुई थी और पिछले हिस्से पर 'White-C-34' लिखा था जो एक पल के लिए तोह अर्जुन ने पढ़ के वैसे हे छोड़ दिए लेकिन सामने वाली दुकान पर लगे शीशे से बहार दिखती उस चीज ने उसको सब समझा दिए.

"मरवा दिए. अब ये कैसे लू? बुआ को कहा तोह प्रीती पक्का नाराज हो जाएगी. ऊपर वाले लाज रखना.", अर्जुन मैं में बुदबुदाता हुआ उस बड़ी दूकान के अंदर चल दिए. ाची रौशनी, बड़े काउंटर, दीवारे महिलाओ के वस्त्रो के साथ हे सौन्दर्य प्रसाधन से सजी हुई थी. लेकिन काउंटर के पीछे एक महिला कोई 30-32 साल की जो शायद मालकिन होगी और 2 युवतिया कड़ी थी.

"जी कहिये क्या खिदमत कर सकती हु आपकी?", इस आकर्षक महिला की आवाज मधुर और नजाकत से भरी थी.

"जी एक वाइट स 34 लेनी है.", अर्जुन के मुँह से वैसे हे निकल गया जैसे लिखा था. महिला मुस्कुरा उठी उसकी ऐसी बात सुनकर.

"मतलब 34-स में वाइट कलर चाहिए?"

"जी.", अर्जुन उनकी बात सुनकर सिर्फ इतना हे कह पाया.

"कोई डिज़ाइन या चॉइस?", अब अर्जुन सच में गहराई से सोचने लगा. ऋतू दीदी और अलका दीदी के अब डी साइज था एक का 34 और दूसरी का 36 और प्रीती के कंधे है ऋतू दीदी से चौड़े तोह 36 काम से काम होना चाहिए और लेकिन पहले ऋतू दीदी के स था जैसे अलका दीदी ने पहली बार बताया था और वह प्रीती से बड़े थे. ये प्रीती ने बाद में लिखा है मतलब की ये हुआ रेणुका बुआ का. ओह तेरी तोह मानो (बिल्ली) का दिमाग यहाँ दौड़ रहा था. अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान आ गई जैसे हे सब समझ आया. दूकान वाली महिला भी ये देख रही थी की थोड़ी देर पहले घबराया सा ये जवान लड़का अब मुस्कुरा रहा है.

"हांजी. 34 स में सेमि कप जो बेस्ट क्वालिटी में हो आपके पास, आरामदायक.", उन 2 में से एक लड़की ने अपनी मैडम की नजरो को समझते हुए 4-5 डब्बे देखे और 2 उम्दा ब्रा की जोड़ी सामने रख दी. अर्जुन ने देखा तोह दोनों हे किसी ाचे नाम की थी और सबकुछ आराम को ध्यान में रख के लगाया गया था.

"जी दोनों हे पैक कर दीजिये.", दाम पूछे बिना हे अर्जुन को दोनों खरीदते देख उन महिला ने पूछ हे लिए.

"गर्लफ्रेंड को गिफ्ट दे रहे हो?"

"जी नहीं. उसने मंगवाई है तोह खरीद रहा हु."

"ओह मुझे लगा के तुम अपनी तरफ से दे रहे हो. जैसा तुमने पहले एक कहा था लेकिन अब दोनों हे खरीद रहे हो."

"जी जब शादी उस से हे होनी है तोह फिर 2 क्या और 10 क्या.", अर्जुन की ऐसी साफ़ बात सुनकर उनके चेहरे पर भी स्नेह से भरी मुस्कान तेरी गई.

"ाचे पति बनोगे तुम. वैसे अगर अपनी गर्लफ्रेंड को यहाँ लेकर आओ तोह मैं उसके मतलब की लगभग हर चीज धिका सकती हु."

"जी अगली बार बिलकुल लेके आऊंगा.", अर्जुन ने पैसे देने के बाद वह अलग से पैक करवाए और घडी देखने लगा. 3 बजने वाले थे और बुआ शायद और समय लेने वाली थी. प्रीती का सामान स्कूटर की डिक्की में आ गया था. अर्जुन ने अब घर वाली पर्ची पर नजर घुमाई तोह ज्यादातर सामान किरयाने की बड़ी दूकान से मिल जाना था और बाकि दवाई की दूकान और सब्जी वाले से. लगे हाथ अर्जुन ने वह सभी सामान इधर से हे खरीद कर ाचे तरह से गट्टे के डब्बे में बंधवा लिए. स्कूटर पर आगे डब्बा रखने के बाद जब बुआ के पास पंहुचा तोह वह भी लगभग फारिग हो चुकी थी. पार्लर की मालकिन बुआ की गोरी बाहो पर कोई क्रीम लगते हुए हलके से मालिश कर रही थी. चेहरा दमक रहा था और वैसा हे हाल हर दिखाई दे रही जगह पर था. सलवार की मोरी थोड़ी ऊपर उठी हुई थी मतलब उन्होंने वह भी कुछ करवाया था. शीशे से वह अर्जुन को देख कर मुस्कुरा रही थी जो सीधा उन्हें हर तरफ से देख रहा था.

"हो गया?", बुआ ने इतना हे पुछा तोह इन मैडम ने खुश हो कर सिर्फ हां में गर्दन हिला दी.

"डिस्काउंट के साथ 1300 हो गए आपके. कटाई, क्लींजिंग, ऊपर निचे और अंडरआर्म की वैक्सिंग, स्क्रब, पेडीक्योर और थेअडिंग मिला कर.", उन्होंने सब गिनवा दिए था और अर्जुन इन नामो को सुनकर देख रहा था के वह लड़की अपने हाथ साफ़ कर रही थी एक तरफ. मतलब दो लोगो ने इतनी म्हणत की थी. उसने बटुए से 1300 निकाल कर आगे कर दिए तोह बुआ हाथ पकड़ कर उसकी तरफ देखने लगी. लेकिन फिर अगले हे पल नजरे नीची करती हुई वह अपना पर्स लिए अर्जुन के साथ हे बहार चल दी.

"तुम अभी कमा नहीं रहे हो. हो गया पर्स खली?", रेणुका की आवाज में मामूली सा गुस्सा था.

"नहीं हुआ खली. और किसने कहा के नहीं कमा रहा हु. हर महीने खाते में पैसे आते है ऊपर से बचत इतनी जमा है जो खर्च होती नहीं.", अर्जुन ने प्यार से उन्हें देख कर जवाब दिए.

"मेरे पास पहले हे बहुत है. तोह उनका क्या करू?", अर्जुन की बात का जवाब न मिला तोह थोड़ा खीझते हुए रेणुका ने कहा.

"मुझे सरप्राइज कर सकती हो, उनसे कुछ अपने लिए लेकर. हमारे खास समय में.", अर्जुन की ऐसी बात पर सारा गुस्सा काफूर हो गया रेणुका का. मुस्क़ुरती हुई वह स्कूटर पर बैठी तोह अर्जुन ने स्टार्ट करते हे सिर्फ इतना कहा 'वाइट 34-स'

"मतलब?", रेणुका का हाथ अर्जुन की कमर में था.

"इतना मुश्किल तोह नहीं था. जरा सोचो और फिर बताओ क्या समझ नहीं आया."

"34-स वाइट. ये प्रीती की बची मार खायेगी मेरे से. उसको कुछ बताना हे बेकार है. तुम्हे अब वह सब नहीं लेना."

"ले चूका हु. Semi-cup वह भी 2. एक नेट और एक पद.", अर्जुन स्कूटर चलते हुए हंस रहा था. रेणुका हलके से पीठ पर मुक्का मरने के बाद फिर सर चिपका कर बैठ गई.

"बहोत बुरे हो तुम. शर्म नाम की कोई चीज है भी?"

"सोचो मेरी हालत क्या हुई होगी जब मैं ऐसा सामान लेने दूकान पर गया और वह सब महिलाये. आवाज नहीं निकली थी एक बार. और अगर आपको नहीं लेनी तोह फिर कोई बात नहीं."

"बुद्धू. ऐसी बात नहीं है कोई. और ये लेने के लिए प्रीती ने तुम्हे खुदसे कहा क्योंकि वह मेरे से ये पूछ रही थी की मेरे पास कोनसा कलर नहीं है. और फिर ये बात उसने तुम्हे बता दी. और मेरे से बिना पूछे तुम ले भी आये."

"वह पहले लगा के .. वह उसने मंगवाई होगी. पर्ची के पीछे लिख कर दिए था न."

"फिर कैसे पता चला के उसकी नहीं है?", रेणुका की इस बात के पीछे जो शरारत थी वह अर्जुन समझ गया.

"मैंने ये साइज खुद उतरा हुआ है तोह याद आ गया के किसका है. फिर सोचा के जब ले हे रहा हु तोह अलग अलग डिज़ाइन लेता चालू. उन दोनों को भी ाचा लगेगा."

"किन दोनों को?", रेणुका थोड़ा चौक गई. प्रीती के अलावा कौन.

"जिनको ये छुपा के रखने के काम आती है."

"धत्त. तुम बहोत गंदे होते जा रहे हो.", रेणुका को समझ आ गया था के वह उसके चुचो की बात कर रहा है.

"वैसे आप ठीक हो अभी?", अर्जुन ने जिस तरह से ये कहा था रेणुका को समझ आ गया था.

"निश्चिंत रहो. अगले 6 महीने तोह ठीक हे रहने वाली हु. मैंने तुम्हे तब भी नहीं छोड़ना. ये महीना हो गया पूरा तोह अब कोई दिक्कत नहीं आने वाली.", प्यार से दोनों बातें करते सेक्टर के पास पहुंचे तोह रेणुका ने खुद को ठीक किआ. अर्जुन ने घर आते हे खुद सामान अंदर टेबल पर रखने के बाद प्रीती को स्कूटर की चाबी पकड़े और पारवती पानी का गिलास ले कर आ गई.

"सब सामान मिल गया, अर्जुन? और ये प्रीती कहा निकल गई.?", अर्जुन ने पानी पीने के बाद मुस्कुरा कर जवाब दिए और रोमिला के सामने हे प्रीती वह प्लास्टिक बैग लेकर कमरे में चली गई, चाबी अर्जुन की जेब में डालती.

"ये लड़की नहीं सुधरने वाली.", रोमिला अपनी बेटी की हरकत पर मुस्कुरा कर रह गई.

"स्टेडियम के लिए तैयार हो जाओ. बहोत आराम कर लिए तुमने. मैं आ रहा हु तबतक गेट पर मिलना.", अर्जुन ने बहार निकलने से पहले प्रीती को कमरे के बहार से बता दिए था के वह लेने आ रहा है.

"10 मिनट बस."

.

.

स्टेडियम में आज भी अर्जुन और बलबीर की वही दिनचर्या थी. दोनों हे कड़ी म्हणत से शरीर को चमका रहे थे. बलबीर बार बार पिछली रात की बात करने लगता और अर्जुन हँसते हुए टालता रहा.

"देख भाई आखिरी बार पूछ रहा हु, बता दे. वह साड़ी वाली तेरी सेटिंग है न?"

"बड़े भाई, वह मेरी नहीं मैं उसकी सेटिंग हु ऐसा समझ लो. और क्या यार आप अभी तक वही अटके हो. बाकी दोनों तोह खली है फिर एक से तोह बात कर हे सकते हो.", अर्जुन गीली बनियान उतार कर बेंच पर ऊपर से निर्वस्त्र बैठ गया. शरीर पर आया पसीना उसके फौलादी जिस्म पर की गई म्हणत बता रहा था.

"चल मान लिए तू यलगार का संजय दत्त है और लड़किया खुद फिसलती है. पर भाई वह तेरी उम्र की तोह नहीं लगती क्योंकि कोच साहब की बेटी तोह पद्धति है और वह उसकी सहेली."

"हाँ तोह ये वाली भी पद्धति है. अब आप उम्र की बात करोगे तोह एक है जिस से मैं प्यार करता हु और वह 34 साल की है. बताओ उम्र से क्या फरक पड़ता है भाई? दोनों में परस्पर प्यार है, समझते है एक दूसरे को. आप न किसी भी लड़की को आँखों में आँखे दाल कर एक बार दिल से इजहार कर दो. अगर उसने मन किआ तोह आपका हाथ और मेरा गाल, वह भी उसके सामने." अर्जुन ने वापिस बनियान पहन कर खड़े होते हुए कहा तोह बलबीर कुछ सोचता हुआ उसके साथ अभ्यास वाली जगह आ गया.

"छोटे भाई मेरी थोड़ी fatt-ti है जबसे तेरी उस बास्केटबाल वाली ने थप्पड़ मारा है. मैं एक को पसंद तोह करता हु लेकिन कही वह भी ऐसा न करदे और स्टेडियम में बेइज्जत्ती न हो जाये, यही सोच कर नई कहता. बाकी तू जानता है के मैं मजाक करता हु. कल वाली किसी के लिए मेरे मैं में कुछ नहीं है.", बलबीर सचमुच गंभीर था और किट पर प्रैक्टिस करने की जगह वह अर्जुन को हे देख रहा था जो उसकी बातें सुनते हुए खुद भी धीमी रफ़्तार से अभ्यास कर रहा था.

"लड़की स्टेडियम की है?"

"हाँ भाई. वह सुमन है न तेरी वाली की दोस्त, वह पसंद है मुझे. देखती भी है जब aas-pas होती है.", अर्जुन उसकी बात सुनकर हँसता हुआ साथ लिए चल दिए. दोनों हे घुटने तक की निक्कर और उस खुली बनियान में बास्केटबाल वाली तरफ चल दिए. बलबीर थोड़ा घबराया हुआ था के अर्जुन उसकी शामत न ले आये. जोगिन्दर संधू जी बेशक इधर नहीं थे लेकिन स्टेडियम में आये हुए थे. कोर्ट के किनारे लगी बेंच पर 2 लड़किया बैठी थी बाकी 6 अभ्यास में लगी हुई थी. सुमन उन दोनों में से एक थी.

"सुमन जी, कैसी है आप?", अर्जुन को अपने सामने ऐसे पसीने में वह भी मुस्कुराते देख सुमन कड़ी हो गई. एक बार बलबीर पर नजर डालने के बाद थोड़ी शर्माती हुई कहने लगी.

"मैं बिलकुल ाची हु जी. आज आपको मेरी याद आ गई ये कैसे हुआ? मंजू बहार है क्या?"

"मंजू तोह साथ हे है. लेकिन बात आपसे करनी थी अगर आपके पास 2 मिनट है तोह.", अर्जुन ने साथ वाली लड़की की तरफ देख कर कहा तोह सुमन ने इशारे से उसको जाने को कहा.

"बोलो जी, बिलकुल फ्री हु आपके लिए. क्या सेवा करे आपकी?"

"जी ध्यान से sunn-na पूरी बात. ये बलबीर पहले हे आपके चक्कर में मंजू से थप्पड़ खा चूका है. लेकिन सच कहु तोह इसने आजतक किसी लड़की को गलत नजर से नहीं देखा. देखता सिर्फ आपको है वह भी प्यार से. बाकी आप दोनों बात कर लो लेकिन अगर आपने भी वही करना है जैसा मंजू ने किआ तोह गाल मेरा सामने है.", अर्जुन की ऐसी बात और वह मंजू का किस्सा ध्यान में आते हे सुमन हैरान हो गई. बलबीर उसको पसंद था लेकिन उस दिन उसको लगा था के वह मंजू को कैंटीन में लाइन मार रहा था. गलती से पांव उस से टकराया और फिर भुगतना पड़ा था.

"इनके मुँह में जुबान नहीं है क्या? इन्होने नहीं बोलना तोह फिर कोई बात नहीं मैं मंजू के साथ तेरे लिए फ्री.", सुमन की ऐसी बेबाकी देख बलबीर की जुबान लड़खड़ा गई.

"ऐसे कैसे. मुझे तुम 2 साल से पसंद हो लेकिन बोलै नहीं तोह मतलब इसके साथ.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ उन्हें वही छोड़कर वापिस अभ्यास के लिए आ गया. बलबीर अकेला रह गया tej-taraar सुमन के सामने. 20 मिनट बाद वह किसी शेर की तरह सीना तान कर अर्जुन के पास आ खड़ा हुआ.

"ी लव यू बोल दिए तेरे भाई ने. मान भी गई."

"वह मुझे बोल देती अगर भाई तुम नहीं बोलते तोह."

"भाई दिल बैठ गया था एक बार लेकिन तूने तोह भाई ज़िन्दगी बना दी तेरे भाई की. कल पिक्चर देखने जा रहे हम दोनों, 10-1.", बलबीर के शब्दों में अर्जुन के लिए प्रशंसा और भाई वाला हे प्यार था. अर्जुन बलबीर को साथ लिए कपडे बदलने आ गया.

"बड़े भाई, जब भी कुछ सच हो और दिल में हो, खुद को रोकना नहीं कहने से. दिक्कत तोह आ सकती है लेकिन ज़िन्दगी ha-naa के चक्कर में नहीं उलझेगी. ये अगर न कह देती तोह हो सकता है दिल टूट जाता लेकिन ये जुड़ जाता है. यहाँ कोई फिल्म नहीं चल रही की प्यार में असफल हो गए तोह ज़िन्दगी ख़तम. हर तरफ प्यार है और ज़िन्दगी .", अर्जुन ने हाथ मुँह धोने के बाद ट्रैक पजामा और टीशर्ट पहन लिए. बेंच पर बैठ कर जूते बांधता वह बलबीर को हे देख रहा था.

"भाई बहोत बड़ी बात कह दी तूने. सच कहु तोह डर इस बात का हे था के ये ना कर देगी तोह शायद बॉक्सिंग भी बंद न हो जाये मेरी. लेकिन तूने कमाल कर दिए यार. दिल से शुक्रिया.", बलबीर ने उसको गले से लगा लिए.

"चलो अब ये कल आप सुमन के साथ करना. फिर मैं कहानी सुनूंगा.", अर्जुन और बलबीर स्टैंड तक बातें करते हुए आ रहे थे जहा प्रीती पहले से हे डिम्पी के साथ कड़ी बातें कर रही थी. अर्जुन ने डिम्पी से हाथ मिलाने के बाद प्रीती को साथ लिए और चल दिए.

"क्या जवाब दिए फिर तेरी सहेली ने?", मुस्कान एक खास तरीके से डिम्पी से पूछ रही थी जैसे आज डिम्पी ने प्रीती को कुछ बताया हो.

"यार पता नहीं किस मिटटी की बानी है ये लड़की. बातों बातों में मैंने जब उसको बताया के अर्जुन का मंजू के साथ चक्कर चल रहा है तोह उसने इस बात पर स्माइल की. और यही नहीं उसका जवाब अजीब था.", डिम्पी दोनों हाथो में टेनिस का राकेट घूमा रही थी.

"ऐसा क्या जवाब दी इसने? और सच में फरक नहीं पड़ा इतनी बड़ी बात का? यु तोह ये उसकी लैला बानी फिरती है.", मुस्कान की मुस्कान अब ढल्ल गई थी.

"कहती की वह अपनी हे है फिर चक्कर कैसा. मंजू का अर्जुन पर पूरा हक़ है.", डिम्पी ने राकेट घास पर टिका दिए.

"मंजू से डर तोह नहीं गई ये? क्योंकि जाटनी जैसी भी है लेकिन है शेरनी. अगर ऐसे नहीं तोह फिर दूसरी तरह सही. मंजू को आने दे अब मैं देखती हु.", मुस्कान ये बात कहती दोनों हाथो की उंगलिया आपस में जोड़ रही थी.

"देख मुस्कान, अर्जुन मेरा दोस्त है और प्रीती भी. तुझे अर्जुन से जो भी चाहिए तू जिसकी मर्जी मदद ले, लेकिन प्रीती पर बात आई फिर बात बहार हो जाएगी और मेरा कोई लेना देना नहीं फिर.", डिम्पी अपना पल्ला झड़ते हुए आगे चल दी.

"तू तोह फिल्म में हे नहीं है मेरी जान. मंजू खुद लेके आएगी अर्जुन को मेरे पास और फिर देखते है की तेरी प्रीती क्या कहेगी जब पता लगेगा उसका मजनू मेरे समंदर में गौते लगा चूका है.", मुस्कान की बात सुनकर डिम्पी ने कोई जवाब न दिए और स्कूटी लिए बहार निकल चली.

.

.

"अभी कोई प्रोग्राम है तुम्हारा?", प्रीती अर्जुन के पीछे दोनों तरफ पाँव किये चिपक कर बैठी थी, जिस से अब दोनों को किसी के भी देखने से फरक नहीं पड़ने वाला था.

"बताओ मालकिन, सेवक हाजिर है खिदमत में.", अर्जुन ने प्रीती के घुटने से थोड़ा ऊपर बया हाथ रखते हुए कहा. वह भी खुश थी की अर्जुन अब किसी तरह का पर्दा नहीं रखता.

"नहीं बस पूछ रही थी की कही जा रहे हो घर पहुंचने के बाद."

"हम्म.. मेनका को डॉक्टर के पास लेके जाना है 7 बजे. पर पहले तुम्हारा काम करते है, बताओ क्या बात है.?", अर्जुन समझ गया था के प्रीती ऐसे कभी नहीं पूछती.

"फिर ठीक है. मैं साथ हे चलूंगी वह. मंजू आज सुबह वही थी तोह उसके साथ घर आ जाउंगी, हमारा प्रोग्राम है रात में मूवी का.", प्रीती की बात सुनकर अर्जुन कुछ पल शांत रहा.

"मौसी को jaan-ne से पहले से हे मैं और मंजू मिल रहे है.", अर्जुन ने दिल पर हाथ रख लिए ये कहते हुए लेकिन वही हाथ प्रीती ने पकड़ कर अपने घुटने पर रखवा लिए.

"मालूम है मुझे. फिल्म देखने से लेकर सुहागरात तक. तुम जहा हाथ रख रहे थे वह मेरे पास है बच्चू.", अर्जुन हैरान था इस खुलासे से. वह पूछना चाहता था लेकिन शब्द नहीं आ रहे थे जुबान पर.

"ऐसा है के तुम्हे बोलने की जरुरत नहीं. मैं सुबह स्कूटी से उसके हे घर थी, कपडे धुलवाए खाना मिल कर बनाया और फिर दोनों ने गमले भी ख़रीदे थे. 8 बजे गई थी और बुआ के आने से आधा घंटा पहले हे वापिस आई थी. लेकिन बात तुम्हारा नाम लिए बगैर वह 2 दिन पहले हे बता चुकी थी, अपने हस्बैंड की कहानी सुनते हुए. तारा, ऋतू दीदी, अलका दीदी और आरती के साथ मैं भी थी. आज नाम बताया क्योंकि ऋतू दीदी या अलका दीदी की जगह उसने मुझे अपनी बहिन बनाया है. और रिश्ते की शुरुआत वह मुझे अँधेरे में रख कर नहीं करना चाहती थी. गलती उसकी भी नहीं है जो तुमसे प्यार कर बैठी.", अर्जुन ने रफ़्तार धीमी कर दी थी बात सुनते हुए.

"वैसे सच कहु तोह मंजू का दिल भी बहोत बड़ा है. उसने कसम हे ले ली थी की वह तुम्हारे पास कभी नहीं आएगी, लेकिन मैंने अपनी कसम से देकर रोक लिए. अर्जुन मंजू की ज़िन्दगी हमारी तरह नहीं है. तुम मेरे हो और ये बात हम सबके सामने कह सकते है. उसके पास सिर्फ तुम्हारा प्यार है, वह भी सबकी नजरो से चिप्प कर. मेरी बात मानोगे?", प्रीती ने दोनों बाहें अर्जुन की छाती पर बांध ली. बुलेट वही रुक चुकी थी जहा अर्जुन ने प्रीती को चूमा था, घने पार्क के पीछे खली सड़क पर.

"नहीं मानूंगा."

"सुनो ध्यान से नहीं तोह ये बात अगर किसी ने आर्डर के साथ कही तोह फिर मुँह बंद हो जायेगा.", अर्जुन शांत हो गया था. अजीब उथल पुथल मच गई थी थोड़ी हे देर में.

"ऐसा है के हफ्ते में एक बार तुम मंजू के लिए अलग से समय निकलोगे. झूठ मत बोलना लेकिन कही न कही तुम भी मंजू की परवाह करते हो, दिल से. उस बेचारी की ज़िन्दगी खराब हो जाएगी मेनका की तरह. पति जो मिला है शायद तुम्हे पता हे होगा. और कैसे बर्बाद होते देख सकते हो तुम किसी ऐसे इंसान की ज़िन्दगी जिसने तुम्हे प्यार किआ हो? परिवार ने उसकी शादी बेशक मेनका के भाई से की है लेकिन पति का हक़ उसने खुद तुम्हे दिए है, सिन्दूर के साथ.", प्रीती वही कह रही थी जो सच में अर्जुन के दिल में मंजू के लिए था. प्यार तोह करता हे था वह उस से लेकिन अगर बात दोनों में से किसी एक पर आती तोह अर्जुन उस तरफ कदम भी न रखता.

"चले अब.?", अर्जुन के ऐसा कहते हे प्रीती नीचे उतर आई. अर्जुन के चेहरे को पकड़ कर एक तगड़ा चुम्बन करते हुए वह बेफिक्र सी उसके होंठो से चिपकी रही जितने सांस न फूल गई.

"हहहहह. अब चलो.", एक अदा से मुँह साफ़ करती वह अर्जुन को दिखा रही थी की अर्जुन उसकी औरत हो जैसे.

"आउच. गंदे ये सब नहीं.", बदला लेते हुए उसने भी पूरा सख्त उभार पकड़ कर दबा दिए, आराम से.

"ाचा मैं गन्दा हो गया अब? चलो तुम आओ रात हमारे घर फिल्म देखने. मैं हमारी फिल्म बनता हु आज.", अर्जुन और वह nok-jhok करते हुए घर आ गए. उनके सामने हे रोमिला और रेणुका अर्जुन के हे घर जा रही थी लेकिन गली के मदद से आते दोनों पर उनकी नजर न पड़ी. कुछ सोच कर अर्जुन ने चाबी बंद करते हुए मोटरसाइकिल न्यूट्रल कर दी. प्रीती को कुछ समझ नहीं आया के वह कर क्या रहा है. लेकिन जब अर्जुन का घर पार हो गया तोह वह थोड़ा हैरान हो गई. प्रीती के घर के बहार लगे अशोक के वृक्षों के पास बुलेट के ब्रेक लगता वह उनके घर के अंदर हे चल दिए. प्रीती समझ गई थी की अर्जुन क्यों इधर आया है. खुश होती हुई वह भी जल्दी से अंदर आते हुए उसके साथ हे अपने कमरे में घुस गई. पारवती को अर्जुन ने छत्त पर देख लिए था, उसकी तरफ पीठ किये हुए.

"चल क्या रहा है दिमाग में तुम्हारे.?", प्रीती को बस ये नहीं पता था के अर्जुन करने क्या वाला है. है अब वह उसके कमरे में था और दोनों घर में अकेले तोह शरारत तोह पक्का होने वाली थी. लेकिन बीएड से पहले हे जूते पाँव से उतार कर अर्जुन ने 10 सेकंड में हे प्रीती को बाहों में भरते हुए बाथरूम का दरवाजा धकेल दिए.

"अभी बताता हु क्या चल रहा है.", दोनों की टीशर्ट दरवाजे के पीछे लगे हक्क पर तंगी थी. स्पोर्ट्स ब्रा और पजामा पहने प्रीती अब अर्जुन से बचने की जुगत लगा रही थी लेकिन दरवाजा बंद और उसके सामने अर्जुन, निर्वस्त्र सीने के साथ.

"गलती भरी पड़ जाएगी अगर कुछ भी किआ तोह.", प्रीती का सीना हिल रहा था और नंगा पेट कभी सख्त होता कही ढीला. अर्जुन मुस्कुराता हुआ वैसे हे खड़ा उसको देखता रहा. प्रीती ने जब उसको कुछ करते न पाया तोह मजाक मान कर दरवाजा खोलने आगे बढ़ गई.

"आउच.", अर्जुन ने कूल्हों से पकड़ते हुए उसको ऊपर उठा लिए. प्रीती समझ चुकी थी की अब वह नहीं बचने वाली.

"क्या करना है?", उसने इतनी मासूमियत से कहा की अर्जुन ने वापिस जमीन पर खड़ा करते हुए प्रीती को छोड़ दिए. वह दरवाजा खोलने हे लगा था और अर्जुन सी हालत में हे प्रीती उसकी पीठ से चिपकी थी. नुकीले निप्पल चुभती हुई.

"बोल सकते हो न के साथ में नाहा रहे है. इतना ड्रामा लड़किया नहीं करती जितना तुम करते हो.", अर्जुन भी घूम कर उसकी तरफ मुँह करके खड़ा हो गया. बालो में बंधा रब्बर खोलता वह प्रीती की आँखे देखने लगा. जैसे यहाँ वह दोनों अब अपनी दुनिया में थी.

"जब तुम ऐसे करती हो?"

"वह तोह मैं अभी भी करने वाली हु.", नंगे चुके अर्जुन के सीने से लगाती प्रीती ने दोनों हाथो से पजामा और कच्चा घुटने तक सरका दिए और फिर अपना एक पाँव अर्जुन से रगड़ते हुए बाकी का भी. इधर अर्जुन कहा पीछे रहने वाला था. गोल उभरे हुए चिकने कूल्हों को प्रीती की पंतय के अंदर से दबाता हुए पंतय उतारते हुए खुद भी नीचे होता चला गया. मस्ती में प्रीती की सिसकी निकल गई जब हलके पसीने से महकती उसकी गोरी गुलाबी फांको के बीच अर्जुन ने होंठ रख दिए.

"आठ.. पानी के नीचे कर लेते इडियट. अभी खेल कर आ रही हु.", प्रीती रोक नहीं रही थी अर्जुन को. बस सीधा छूट पर हुम्ला बर्दाश्त न हुआ. अर्जुन एक हाथ से दोनों वस्त्र जमीन तक उतरता दूसरे से प्रीती का गोल कटाव लिए दया चुत्तड़ दबाते हुए खास तरह से उभरी हुई खाई में होंठ और जीभ फिर रहा था. फिर अलग होते हुए दोनों अपने कपडे एक तरफ रखते बड़े फुहारे के नीचे आ गए. प्रीती का शरीर भी ाची म्हणत से पूरा तराशा हुआ था. सुडोल चिकनी जाँघे, हल्का अंदर धंसा पेट, 34 के कूल्हे जो बेहद ख़ास थे उसके विदेशी खून और म्हणत की वजह से, गुलाबी तीखे निप्पल और बड़े संतरे सी गोल ठोस चूचियां. दोनों हे लम्बे कद के युगल जब ठन्डे पानी के नीचे खड़े हुए तोह एक दूसरे से चिपक कर ाचे से शरीर रगड़ने लगे.

अर्जुन अपनी ऊँगली से छूट की लकीर रगड़ रहा था और प्रीती अपनी कलाई के बराबर मोटा अर्जुन का लुंड आगे पीछे करती उसकी उत्तेजना को हवा दे रही थी. कुछ सोच कर अर्जुन ने प्रीती को फुहारे की तरफ घुमा दिए. अब वह पीछे खड़ा उसको दोनों चुके दबाता हुआ अपना सख्त लुंड प्रीती के कूल्हों की दरार से छूट तक रगड़ रहा था. प्रीती का मुँह एक तरफ करता वह साथ हे उसके गुलाबी होंठ चूसने में लगा रहा. इस उत्तेजक मुद्रा में प्रीती भी मजे से अपने कूल्हे लुंड पर दबती हुई कमर हिला रही थी.

"आह मरवा डोज तुम.. लेकिन मजा आ रहा है.", प्रीती ने भीगते चेहरे को एक तरफ करते हुए कहा. उसके दोनों गुलाबी निप्पल ऐसी कामुक रगड़ाई से फूल कर आधा इंच बहार निकल चुके थे. अर्जुन का लुंड उन चिकनी गहरी फांको में धंसा जोरो से रगड़ लगा रहा था.

"तुमने हे आग लगाई है ये. न मुझे चूमती और न मैं इन्हे पकड़ता.", अर्जुन ने एक हाथ नीचे लाते हुए सामने से प्रीती की गुलाबी छूट की अंदरूनी फांके रगड़नी शुरू कर दी. ठंडा पानी भी इन दोनों के जिस्म पर गिरता भाप बन रहा था. प्रीती को टाइल के फर्श पर लिटाते हुए अर्जुन उस गुलाबी सुरंग पर मुँह रखने लगा तोह प्रीती ने हाथ पकड़ लिए.

"इधर करो.", और बिना कोई जवाब दिए अर्जुन ने अपना सख्त लुंड प्रीती के चेहरे की तरफ करते हुए जांघो के बीच होंठ चिपका दिए. एक हाथ से उस मूसल पर पकड़ बनती प्रीती ने अगला हिस्सा होंठो में दबा लिए. नंगे जिस्म कामशास्त्र की 69 वाली स्थिति में एक दूसरे को पूरा सुख देने लगे. छूट उत्तेजना के चरम पर पहुंचने लगी तोह गुलाबी सूपड़ा भी औकात तक फूल चूका था, प्रीती के मुँह में. अर्जुन ने जल्दी से अलग होते हुए वह दहकता अंग प्रीती की रास बहती छूट पर टिका दिए.

साँसे रोके वह बस अर्जुन को देख रही थी. लेकिन वह उसके एक अकड़े हुए निप्पल को मुँह में भर के पीटा हुआ उन फांको के बीच अपना लुंड लम्बाई में घिसते हुए दोनों को फिर से चरम पर ले जाने लगा.

"आह्हः.. तेज तेज.. उम्म्म. पीयो इन्हे, दोनों को.. उम्म्म", कमर ऊपर उठती प्रीती इस रगड़ाई से मस्त होने लगी और वही हाल अर्जुन का था. दोनों का जिस्म एक साथ ऐंठ गया और गलती से अर्जुन ने दोनों कबूतर थोड़ा तेज दबाते हुए दोनों के जिस्म के बीच हे सफ़ेद रास उड़ाना शुरू कर दिए. प्रीती खुद को अर्जुन से चिपकाये गेहटी साँसे ले रही थी. दोनों के होंठ इस बार बड़े प्यार से एक दूसरे को चूसते हुए शरीर का तापमान काम करने लगे.

"आह.. बेदर्दी. देखो क्या किआ है.", चुचो पर उभरी लाल लकीरे बता रही थी की अर्जुन की उंगलिया ज्यादा जोर से इनसे चिपक गई थी. ऊपर से हैट ते हे सफ़ेद रास पानी से खुद हे उतर कर बह गया. प्रीती थोड़े गुस्से से अर्जुन को और अपने चुचो के देख रही थी.

"वह उस टाइम मजे में यही पकड़ लिए मैंने. सॉरी.", अर्जुन ने दोनों निप्पल बरी बरी से चूस लिए और प्रीती उसको देखने लगी.

"बेशर्म. ये नहीं की इनपर क्रीम से थोड़ी मसाज कर दू. अभी भी मुँह में हे लेने है. जाओ मैं बात नहीं करती.", अर्जुन उसके ऐसे प्यार भरे नाटक पर मुस्कुराते हुए उसको ऊपर उठाते हुए सीने से लगाए खड़ा हो गया.

"मस्सगे की तोह फिर दोनों फंस जायेंगे. पहले हे आधा घंटा होने वाला है.", हलके से दोनों कूल्हों को दबाते हुए अर्जुन ने गाल चूमने के बाद फुहारा बंद करते हुए प्रीती का निर्वस्त्र बदन तोलिये से सुखना शुरू कर दिए.

"बड़ा टब लगवाती हु. ज्यादा ठीक रहेगा. नहीं ये तोह ऐसे ये सामने झूलता रहेगा और मैं फिर इसको पकड़ लुंगी.", प्रीती को मजा आ रहा था अर्जुन के ऐसा करने पर. वह भी शरारत करती उसको छेड़ रही थी.

"टब लगवा लेना लेकिन इसको ज्यादा चड्डा तोह 2 दिन चल नहीं पाओगी. पहले हे इतनी सी है.", अर्जुन ने पलटवार करते हुए प्रीती को आधी ऊँगली दिखते हुए उसकी छूट का आकर बताया.

"इतनी सी बताएगी तुम्हे, रुक जाओ थोड़े साल. कमरे से बहार निकलने की जान नहीं छोड़ने वाली तुम्हारे शरीर में.", पलट कर वह पंतय पहन ने लगी तोह बहार निकले उस दिलकश कूल्हे पर अर्जुन ने चपत लगा दी.

"आउच. गंदे ऐसे दर्द होता है.", निर्वस्त्र कूल्हे को वह ऐसे सेहला रही थी जैसे अर्जुन को उकसा रही हो. फिर जल्दी से पजामा पहन कर बाकी कपडे उधर हे छोड़ वह आँख मरती बाथरूम से निकल गई. अर्जुन ने खुद को साफ़ करने के बाद पजामा पहना और 5 मिनट बाद दरवाजा पूरा खोलते हुए कमरे में आ गया. जैसे हे सामने देखा तोह बोलती बंद हो गई. सामने रोमिला कड़ी थी और प्रीती वह थी हे नहीं. टीशर्ट एक हाथ में और टोलिया दूसरे में. सिर्फ ट्रैक पजामा जिस्म पर था.

"तुम्हारा हे घर है. लेकिन बाथरूम से ऐसे बहार आते हो तोह कमरा बंद रखना चाहिए कोई भी आ सकता है. ये तोह मैं हु जिस से तुम्हे कोई खतरा नहीं. टेबल पर दूध रखा है.", रोमिला मुस्कुराती हुई वह से गई तोह अर्जुन ने देखा की कमरे में प्रीती का namo-nishaan तक न था. न जूते, न राकेट जैसे की वह अकेला हे इधर आया हो.

"नाहा लिए तुम? मैं भी नाहा ली बुआ के बाथरूम में. चलो अब पहले तुम्हारे घर चलते है फिर मुझे मंजू के यहाँ छोड़ देना.", प्रीती रेणुका बुआ के कमरे से बहार निकलती अपने बाल सूखा रही थी.

"इसको दूध पीने दो और तुमसे किसने पुछा के तुम कहा नाहा रही थी बीटा?", रोमिला ने प्रीती को protein-mix का गिलास थमते हुए कहा और कुर्सी पर बैठी रेणुका बुआ मुस्कुरा रही थी.

"वह तोह इसलिए कहा के अगर ये मुझे ढून्ढ रहा हो तोह.", प्रीती अपनी बात पर हे फंसने लगी थी. लेकिन गिलास मुँह के लगते हुए वह अगले जवाब देने से बचने की कोशिश में लग गई.

"हाँ. ढूंढ़ना तोह था हे इसने जो तुम इसका बैग अपने साथ लेकर जाओगी.", रोमिला ने टेबल पर रखा बैग आगे की तरफ सरकते हुए कहा. ये अर्जुन का हे था. अर्जुन के तोह गले में हे दूध फंस गया.

"आराम से पीना है बीटा कोई जल्दी नहीं.", ज्यादा न सताते हुए रोमिला मुस्कुराती हुई रसोई में चली गई.

"तुम दोनों सुधर जाओ थोड़ा. ये तोह ाचा हुआ के भाभी को पता नहीं चला और वह मजे ले रही है. लेकिन मैं कमरे में आई थी मेरे और वह कोई नहीं था. भाभी को बहार पैसे पकड़ने गई हु तोह प्रीती ऊपर कपडे पहन रही थी. चलो जाओ मौज करो.", रेणुका बुआ की बात पर प्रीती शरमाते हुए उनके गले लग गई.

"यही गड़बड़ करता है हमेशा.", कान में धीरे से प्रीती ने कहा और मुस्कुराते हुए अर्जुन को देखने लगी.

"गंदे ऐसे दर्द होता' ये शायद यही कह रहा था. बस करो अब तुम दोनों.", रेणुका बुआ ने प्रीती के कहे शब्द उसको हे सुना दिए और वह बिना देरी किये बहार निकल गई. और फिर अर्जुन भी.

"रेणुका अपनी तोह ज़िन्दगी निकल गई यार दुनियादारी में. इनको देख कर ाचा लगा के ये चुपके चुपके भी मिलते है.", कॉफ़ी के 2 कप टेबल पर रखती रोमिला ने कहा. मुस्कान दोनों के चेहरे पर थी.

"भाभी इतने सालो से साथ है दोनों. अभी नादान परिंदे है, करने दो मस्ती. शादी के बाद घोंसला बनाना पड़ेगा तब पता लगेगा दोनों को.", दोनों हे हंसती हुई अतीत और आने वाले कल की बातें करने लगी.
 
अपडेट 87

नादान परिंदे (ी)


"Bal-bal बचे है आज. देख लो क्या क्या करवा देते हो तुम.", प्रीती नीली जीन्स और हलकी पीली टीशर्ट पहने मोटरसाइकिल पर अर्जुन के पीछे बैठी थी. दोनों मंजू के हे घर जा रहे थे कुछ देर अर्जुन के यहाँ रुकने के बाद.

"मुझे तोह मजा आया, जो भी कहो. सच कहु तोह गलती कर दी जो पहले ये सब शुरू नहीं किआ.", अर्जुन की कुटिल मुस्कान प्रीती शीशे से देख रही थी.

"हाँ तुम्हारे तोह मजे होंगे हे. डर मुझे लगता है न.", प्रीती को जैसे हे वह दृश्य याद आया जब अर्जुन उसकी जांघो के बीच बैठ गया था, दिल की धड़कन बढ़ गई.

"क्यों परेशां होती हो. मैं हमारे वैसे मिलान को पहली बार बाथरूम में तोह नहीं करने वाला."

"मतलब तुम शादी से पहले मेरे साथ कर सकते हो?", प्रीती के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे.

"तुमने कहा था के वह सिर्फ शादी के बाद लेकिन कही और तोह मन नहीं है."

"बदमाश चुप चाप सामने देखो. गंदे कही के, कैसी बात करते रहते हो.", प्रीती के जिस्म में सिरहन और हलकी से उत्तेजना बढ़ गई थी जब उसको अर्जुन की बात का मतलब समझ आया. वह उसके पिछले हिस्से की बात कर रहा था.

"क्यों? मैंने तोह कुछ गलत नहीं कहा? अब तुम्हारे होंठ है हे ऐसे तोह वह मैं करने से कैसे रोकू खुद को."

"ू मर समझदार, उल्लू मत बनाओ मुझे. इतनी समझ है मुझे के तुम क्या चाहते हो क्या नहीं. लास्ट टाइम भी और आज भी, इरादा तुम्हारा क्या था मुझे पता है. लेकिन भूल जाओ. बड़े आये कही और करने वाले.", प्रीती मंजिल पर पहुंचते हे उछाल कर नीचे उतरी और अर्जुन को आँख मरती हुई अंदर चली गई. अर्जुन को समझ नहीं आया के प्रीती का मतलब क्या है. लेकिन फिर मुस्कराहट आ गई उसके चेहरे पर. 'मेरी जान इतनी जल्दी भी नहीं है मुझे.'

"अब ये पारी कौन है? मंजू तुम्हारी तोह बहोत फ्रेंड्स है यार लेकिन ये सचमुच बड़ी प्यारी है.", मंजू ड्राइंग हॉल में बैठी पढ़ रही थी की प्रीती ने उसके बराबर बतिहते हुए अपने बाहे गले में दाल दी. मंजू भी एक हाथ से उसको साथ लगाती खुश हो रही थी की तभी मेनका अपने कमरे से तैयार हो कर निकली तोह प्रीती की सुंदरता देख खुद को रोक न सकीय.

"दीदी ये प्रीती है, मेरी छोटी बहिन.", मंजू ने अपना गाल प्रीती के गाल से लगते हुए प्यार जताया.

"वाह क्या बात है. अब तुम्हारी बहिन और हमे पता भी नहीं. मेरा एक और भाई होता तोह ये पक्का इस घर में हे...

"ओह्ह्ह मैडम ब्रेक लगाओ अपने. अभी एक मिनट हुआ नहीं और ऐसे ख़याल बनाने शुरू कर दिए. मेरी है वह, सिर्फ मेरी.", अर्जुन जो दरवाजे से ये देख रहा था अंदर आते हुए बोलै और मेनका को आश्चर्य में छोड़ सीधा फ्रिज से बोतल निकाल कर ऊपर से पीने लगा. वह दोनों हंस रही थी, मेनका मुस्कुराती हुई सामने हे बैठ गई.

"क्या बात है भाई. अर्जुन तुमने तोह ये बड़ा खूसूरत झटका दिए है.", उनकी बात सुनकर अर्जुन धम्म से इस बड़े सोफे पर मंजू की बगल में बैठ कर उसके बाल खराब करता हुआ फिर से मेनका को देखने लगा. मंजू हलके गुस्से से अर्जुन को देख रही थी.

"हीलो दी, प्रीती. और आप मेनका दी है." प्रीती इन दोनों को इस सोफे पर छोड़ मेनका की बगल में आ गई.

"क्या बात है? पहली बार में हे पहचान लिए. वैसे लगा नहीं था एक बार के हिंदुस्तानी हो.", मेनका ने प्रीती का gora-gulabi हाथ पकड़ कर ाचे से जैसे जाँच लिए था.

"घर में 2 हे तोह लोग है यहाँ, तोह कैसी मुश्किल होनी थी. वैसे बड़ी म्हणत से हिंदी सीखी है.", ये यहाँ बातें कर रहे थे उधर अर्जुन ने मंजू की कॉपी के पिछले हिस्से में कुछ लाइन लगते हुए '0' 'क्ष' (zero-Kaata) खेलना शुरू कर दिए. मंजू भी बिना बोले लग गई उसके साथ.

"वही तोह मैं कहु. अलग सी हो और तुम्हारी आँखें.", मेनका की बात सुनकर प्रीती ने साफ़ मुस्कान बिखेर दी.

"आप बताओ, मैं तोह अब रोज हे दिखने वाली हु आपको. कल से मंजू और मैं साथ स्टेडियम जाने वाले है. वैसी आप बड़ी फिट हु. मंजू की बड़ी ननद जैसा शब्द सुनकर लगा था के कोई डेंजरस आंटी होंगी, जैसा वह स्टार टीवी पर आता है.", प्रीती की नौटंकी देख मेनका खुद को रोक न सकती और हलके से उसके सर पर चपत लगाने के बाद हथेली में चेहरा पकड़ कर देखने लगी.

"इरादे ठीक नहीं आपके. वह ऐसी नहीं है जैसा आपको लग रहा है.", अर्जुन के ऐसे बोलने पर तीनो मुस्कुराने लगे.

"ओह ठण्ड रख थोड़ी. मैं तोह ये सोच रही हु की भगवन ने तेरी किस्मत अलग हे लिखी है. कल तारा अलका ऋतू को देखा तोह हैरान और खुश दोनों हुई की बताओ ऐसी लड़किया भी होती है और सभी तेरे परिवार में. आज ये गुड़िया जैसे लेकिन थोड़ी शरारती उन्ही तीनो की तरह, ये भी तेरे से हे जुडी है. भगवान् ने बड़ी तसल्ली से हरेक को तैयार किआ और फिर तुझे इनके बीच भेज दिए.", मेनका की बात सुनकर जो अर्जुन ने कहा उस से मंजू और प्रीती उसको हे देखने लगी.

"आप को शरारत सीखा देते है, सुन्दर तोह हो हे जैसा प्रीती ने भी कहा. फिर ऐसा नहीं लगेगा के आप अलग हो हम सब से."

"ये सही कहा न अर्जुन ने. चलो आज आप भी हमारे साथ चलो.", प्रीती ने उनके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

"अरे जरूर आउंगी. लेकिन संडे को और शरारत करते तुम बचे ाचे लगते हो, मैं नहीं.", मेनका को भी ाचा लग रहा था बातें करना.

"आप बड़ी हो? मेरी माँ और अर्जुन की ताईजी से मिल लेना एक बार.", मंजू ने भी खुद को शामिल कर लिए इस बात पर.

"ये बात बोली न मंजू ने. आप मिलो जरा मेरी ताईजी से फिर पता लगेगा जब वह बातों से हे आपकी रेल न बना दे. वैसे काम तोह मेरी दादी भी नहीं है, लेकिन आपको वह पक्का बेटी की तरह देखेंगी.", अर्जुन की बात पर मेनका ने प्रीती की तरफ देखा जैसे पूछ रही हो के सब ऐसे है.

"कोई काम नहीं है उधर. बचके रहना दी, जहा जुबान फिसली तोह समझो के आप फांसी. अरे अब चलते है हम, 7 बज गए. चल मंजू कड़ी हो और निकल स्कूटी.", प्रीती की बात पर मंजू ने मेनका की तरफ देखा.

"जाओ भाई करो अपनी मूवी नाईट एन्जॉय. तुम्हारा समय है अभी और चलो तुम भी खड़े हो जाओ जनाब.", अर्जुन उनकी बात सुनकर उठ गया.

"मैं कपडे बदल कर आती हु.", मंजू कमरे की तरफ जाने लगी तोह यहाँ प्रीती की जुबान कुछ फिसल गई.

"रहने दे यार वह बिस्टेर पर हे लेटना है कोनसा रिश्तेदार आने वाले है देखने.", लेकिन फिर मुँह पर हाथ रखती मेनका की तरफ देखने लगी.

"ठीक कह रही है ये. वैसे रात के लिए कपडे लेने है तोह रख ले मंजू.", मेनका की मुस्कान देख मंजू शर्मा गई.

"मेरे या ऋतू दीदी के पहन लेगी ये दीदी. सुबह वापिस तोह आ हे जाना है.", प्रीती हाथ खींच कर उसको साथ हे ले जाने लगी.

"चाबी नहीं लू क्या? पैदल चलना है?", मंजू की बात पर प्रीती ने हाथ में पकड़ी चाबी दिखते हुए आँख मार दी.

"सब तैयार है आपके लिए मैडम. बस चलो जल्दी नै तोह मेरी क्लास लग जाएगी.", उन दोनों को देखते हुए मेनका खुश थी. उनके निकलते हे मेनका ने सामान समेटा और टेबल पर रखा पर्स उठाने लगी. अर्जुन ने शरारत से गर्दन पर ऊँगली फिर दी.

"ुयी.. क्या कर्त हो?", मेनका इस हरकत पर बहार से मुस्कुरा रही थी लेकिन बस चुहान से हे पूरा वजूद कांप गया था.

"देख रहा था के आपको फरक भी पड़ता है या बस हमेशा की तरह सिर्फ दिखावे में जी रही हो.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर वह अपनी बड़ी आँखों से बस उसको करीब से देखने लगी. दोनों एक दूसरे के सामने चेहरा लिए बस 8-9 इंच की दुरी पर थे. लेकिन इस बार वह हुआ जिसकी कल्पना अर्जुन ने भी नहीं की थी. मेनका ने हलके से उसके होंटो को चूम लिए, बिना पलके झपकाए.

"अब चलो, हम पहले हे लेट है.", मेनका अपने धड़कते हुए दिल के बावजूद स्पष्ट भाव से बोली तोह अर्जुन बस बात सुनता हुआ पीछे चल दिए. वह खुद हैरान था के मेनका ने कैसे कर दिए. उसको साथ लिए अर्जुन 2 सेक्टर पार करके इस घर में हे बने महिला क्लिनिक के बहार आ रुका. मेनका ने हे रास्ता समझाया तोह उसको.

"चलो तुम अंदर हे बैठ जाना.", अर्जुन को ाचा लग रहा था मेनका का बदला हुआ रूप, या यु कहा जाये के बदल रहा. सफ़ीद कमीज सलवार जिसके कमीज पर नीले लाल फूल छपे थे, मेनका को इस साधारण लिबास में भी ख़ास बना रहा था. सुघड़ सेहतमंद शरीर और परिपूर्ण सौन्दर्य, हलके गेहुए रंग के बावजूद. पहले हे कमरे में कुछ कुर्सी और एक बेंच लगा था. सामने खुले दूसरे दरवाजे के पर से ये महिला डॉक्टर उन्हें देख कर पास चली आई.

"आइये. मेरे ख़याल से आप हे मिस मेनका सिंह है.", एक कागज़ पर लिखे नाम और समय को देख कर इन्होने कहा.

"जी डॉक्टर. मरस वर्मा ने बात तोह की होगी आपसे?"

"हाँ आप अंदर आ जाइये. आपकी मरस वर्मा मेरी टीनएज टाइम से फ्रेंड है और यही पिछली गली में हे उसका घर है.", अर्जुन वही कुर्सी पर बैठ गया टाँगे लम्बी करता. वह अंदर वाला दरवाजा अब बंद था. कोई 20 मिनट बाद अंदर दोनों महिलाये बातें कर रही थी. डॉक्टर ने जरुरी टेस्ट कर लिए थे.

"तोह मिस सिंह, सब आपके सामने हे है. आपमें किसी तरह की कोई भी कमी नहीं है. आप बताएंगी की ऐसा सोचने की वजह क्या है? देखिये अपने डॉक्टर से आप जितना खुलकर बात करेंगी उतना बेहतर होगा.", डॉक्टर की ऐसी बात पर मेनका कुछ सोचने के बाद कहने लगी.

"डॉ, मेरे हस्बैंड ने ये कहते हुए मेरे साथ सोना बंद कर दिए था के मैं बस एक ठंडी लाश हु. मेरे में औरत वाला वह ख़ास गुण है हे नहीं.", मेनका की झुकी नजरे और बात सुनकर डॉक्टर भी शान्ति से देखती रही.

"तुम्हारे पति ने कभी हमबिस्तर होते वक़्त तुम्हारा ख़याल रखा था. जैसे की सम्बन्ध बनाने से पहले तैयार करना और दोनों का सबकुछ मर्जी से करना?"

"जी नहीं. पहली बार मुझे समझ हे नहीं थी तोह उन्होंने जो भी किआ बस करके चले गए, दर्द से रोटी हुई मुझे छोड़ कर. फिर बाद में जब भी ऐसा कुछ हमारे बीच हुआ तोह उन्होंने कभी मर्जी पूछी हे नहीं. जहा दिल करता नाख़ून, निशाँ बना कर सिर्फ अपना काम करते और फिर अलग हो जाते. मेरी सभी सहेलिया जो विवाहित है उन्होंने जो भी मुझे बताया वह बिलकुल अलग था. उन्हें अंदर सबकुछ महसूस होता था और फिर एक सहेली ने मुझे चेक करने के लिए शरीर के साथ थोड़ा बहुत छेड़छाड़ किआ लेकिन उसका कहना था के मैं अंदर से ड्राई हु. और मुझमे कमी है. मेरे पति का देहांत हो गया कुछ समय पहले लेकिन हम साथ रहे बस naam-matra थे."

"देखो तुम मुझसे छोटी हो और शायद ऐसी बातों का तजुर्बा ज्यादा नहीं रखती हो. जो तुम्हारे पति ने किआ वह एक तरह का बलात्कार हे हुआ और ऐसी चीजे मानसिक आघात पंहुचा सकती है. एक डर भी क्योंकि तुम्हारे साथ पहली बार भी प्यार से नहीं हुआ था. शरीर की खास बात क्या है? जो हमे ाचा लगता है उसके लिए ाचा महसूस होना, खुश होना. वैसे हे जिस चीज ने पहली बार में हे दर्द दिए हो तोह फिर एक तस्वीर बन्न जाती थी के ये तोह दर्द हे देगा. अब शरीर के वह ख़ास अंग भी वैसे हे प्रतिक्रिया देंगे. ये जिस्मानी सम्बन्ध समझना कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन इसमें दोनों को शरीर और दिल से साथ होना जरुरी है. ाचा एक बात बताओ, कभी तुम्हे किसी के छूने या किसी हरकत से ऐसा लगा है जैसे तुम्हारे खास जगह पर कोई हलचल हुई हो, शरीर का तापमान बढ़ा ho?",Doctor की इतनी खुली बात सुनकर पहले तोह उसको वही याद आया जो खेत में देखा था. उसके भैया का खेत पर कामवाली को छोड़ना, मेनका गरम हो गई थी उस समय. फिर अर्जुन के जिस्म से लगने पर होने वाले बदलाव और आज तोह उस किश ने जैसे नाभि से छूट तक असर कर दिए था.

"जी कुछ देखने पर और एक बार किसी के साथ बैठे होने पर ये दोनों बातें हुई थी."

"मतलब किसी को वैसी हालत में देखा था? और ये जिसके साथ बैठे होने की बात कर रही हो मतलब ये जो भी है उन्हें तुम दिल से पसंद करती हो."

"जी. मेरे पति की मृत्यु के बाद मेरा ख़याल उन्होंने हे रखा है.", मेनका स्पष्ट क्या कहती की बहार जो लड़का है उसके छूने से छूट में एक गीलापन आ जाता है लेकिन उसको तोह इसका पता भी नै है.

"तोह आप अपने इनको अंदर बुला लीजिये.", इस मुस्कान को देख कर मेनका का दिल बैठ गया लेकिन इतना सटीक कैसे कह गई थी वह. अर्जुन के कान सबकुछ सुन्न रहे थे, जैसा की वह अभ्यस्त था हे.

"आपको कैसे?"

"घबराइए नहीं, आप अपने डॉक्टर के पास है और यहाँ पर पेशेंट के दवा और हल सिर्फ पेशेंट को दिए जाते है. आपने बताने के हिसाब से आपकी समस्या थी ड्राई रहना लेकिन आने पर जो पाया तोह वह जगह नेचुरल थी. मतलब आप लोग दोनों हे आये है. शायद इनके साथ आना भी ाचा लगा हो या आकर्षण.", मेनका ने सकुचाते हुए दरवाजा खोलते हुए अर्जुन को पुकारा. वह खुद को बेखबर दिखता बस वैसे हे थोड़ी दुरी पर बैठा था. आवाज सुनकर वो भी उठ कर अंदर आ गया.

"जी डॉक्टर. क्या कोई गंभीर बात है या समस्या?", अर्जुन को ाचे से निहारते हुए डॉक्टर ने बस बैठने का इशारा किआ.

"बात गंभीर न होती तोह मैं आपको इतनी देर बाद अंदर क्यों बुलाती? आपकी खास दोस्त को ये गंभीर समस्या है और मुझे लगता है के आप कोशिश करेंगे इनकी इस से उबरने में."

"जी मैं सबकुछ करूँगा आप बस प्रॉब्लम बताये.", अर्जुन के चेहरे की गंभीरता और आवाज सुनकर डॉक्टर ने भी गंभीर स्वर में हे जवाब दिए.

"आपको इन्हे खुश रखना है जिस से ये बेहतर महसूस करे. हो सके तोह अंतरंग पालो में सीधा बस मर्द वाला काम करने की जगह इन्हे ाचे से तैयार करे और पूर्ण सहमति से आगे बढे. नहीं तोह गहरे अवसाद और तनाव के चलते इनके शरीर के साथ गड़बड़ होने की पूरी सम्भावना है. हर चीज की दवा नहीं होती है, कुछ परशानिया साथ मिलकर सुलझाई जा सकती है या बात करना जरुरी होता है जब कुछ अजीब हो. और मिस मेनका आपको भी पूरा सहयोग देना होगा इन्हे, अगर तुम्हे ज़िन्दगी को लम्बा जीना है. कुछ केसेस में मैंने वह सब देखा है जिनके परिणाम बताने लायक नहीं है. दोनों समझदार और परिपक्व हो. अगर बाद में बच्चा प्लान करना हो तोह उस पर भी बात कर सकते है और किसी भी समस्या की जांच भी.", डॉक्टर की ऐसी बात सुनकर अर्जुन अंदर से थोड़ा झेंप गया था लेकिन बहार से वह साधारण रहा. मेनका जैसे डर गई थी इस अचानक हुई घटना से. अर्जुन के साथ वह शायद ये सब कहने और करने में समय लेती या अपने तरीके से चलती. लेकिन डॉक्टर द्वारा इस तरह खुली बात करने पर वह शर्मिंदा सी नजरे झुकाये मैं में खुद को हे कोसने लगी.

"हम सब ठीक कर सकते है, साथ में. परेशां होने की जरुरत नहीं है. बात करने से हे हल निकलेगा मेनका.", अर्जुन ने नीचे से उसका हाथ अपने हाथ में थाम लिए था. डॉक्टर ने उसकी बात सुनी भी और चेहरे को देखा भी.

"सुलझे हुए और समझदार व्यक्ति हो. मेनका तुम्हे भी ऐसा हे दृष्टिकोण रखना होगा. परस्पर बातें करो, परेशानी साँझा करो और मिलकर हल करो. डॉक्टर चमत्कार नहीं करते. हम भी तभी इलाज कर सकते है जब बीमारी दिखाई दे और उसके लिए मैं यहाँ हु.", एक सफ़ेद पैन पर कुछ लिखने के बाद अर्जुन की तरफ बढ़ाते हुए उन्होंने फिर बात जारी राखी.

"मैंने सिर्फ कुछ सलाह और हिदायते लिखी है. दोनों हे देखना और समझना.", दोनों कोहनिया टिकती वह उन्हें देखने लगी. अर्जुन ने कागज मेनका को पकड़ते हुए फीस पूछी जो परमर्श और टेस्ट के साथ 400 रुपये थी. देने के बाद अर्जुन ने मेनका को प्यार से कहा.

"चलो और फिर कुछ परेशानी हुई तोह हम मिल लेंगे.", डॉक्टर ने भी खड़े होते हुए सहमति में सर हिलाया. सकुचाती हुई मेनका नजरे झुकाये हे अर्जुन के साथ चलने लगी. डॉक्टर इस कमरे से उनके साथ हे बहार आई, शायद यही आखिरी थे मिलने वाले उनसे.

"आशा करती हु आप लोगो को ज्यादा दिक्कत न आये. और मेनका पुराणी बातें सोचने से ाचा सबकुछ नए सिरे से शुरू करो.", मेनका ने पहली बार गर्दन हिलाते हुए हामी भरी. अर्जुन भी उनका ध्यानवाद करता मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ गया.

"हम्म्म.. ाची बात हे के किसी का तोह भला हो. सबको सलाह दे सकते है लेकिन खुद क्या करे.", अपने आप से बात करती डॉक्टर फिर सामने के गलियारे से घर के अंदर दाखिल हो गई. दरवाजे पर लिखा था, 'डॉ रचना Kharbanda-stree एवं यौन विशेषज्ञ'

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"कितनी बार कहु के बात किआ करो, जो भी दिल में बंद रखती हो मुझसे कहा करो लेकिन न तुम्हे समझ आता है और न मेरी कदर करती हो. ध्यान भी है के मेरे साथ रहती हो तोह कितनी खुश होती हो? पहले दिन जब ऑटो से मार्किट गए थे तब भी तुम सब महसूस कर रही थी, दिल से साथ थी. कपडे लेते समय भी, घर खाना बनाते हुए भी और हर उस समय जब हम दोनों हे होते है. लेकिन रखो अंदर हे अगर मैंने जो भी कहा वह झूठ है और तुम ऐसी नहीं हो जैसा मैंने कहा है.", दोनों घर तक ख़ामोशी से आये थे. मोटरसाइकिल अंदर खड़ा करने के बाद अर्जुन ने सोफे पर बैठी मेनका के सामने पानी का गिलास रखा और सामने बैठ कर बोलने लगा. मेनका चुपचाप सुनती रही लेकिन सर झुकाये हुए हे.

"चलो अब तुम्हारे चुप्प रहने को हे जवाब समझ लेता हु. ठीक है.", अर्जुन हल्का झुंझलाया हुआ था और उसको ाचा नहीं लगा था के मेनका ने उसको कुछ बताया नहीं पहले.

"नहीं. रुक जाओ प्लीज. मेरी अपनी कई वजह है चुप रहने की लेकिन साथ हे जो भी तुमने कहा सब सच है. और ये भी की मैं तुम्हारे साथ हे खुद को जिन्दा महसूस करती हु. परेशान हो गई हु अंदर के अकेलेपन और बहार की दुनिया से. मैं हिम्मत कर रही थी की धीरे धीरे सब बताऊ तुम्हे लेकिन सबकुछ उस डॉक्टर ने कह दिए तोह खुद को अपराधी मान रही हु. क्या सोचते होंगे तुम मेरे बारे में.", मेनका की बड़ी आँखे अब आंसुओ से सजल थी और वह अर्जुन की बाजू पकडे उसको रोक रही थी.

"तुम्हे पता भी है के तुम बहोत भोली और नरमदिल हो. सबके बारे में सोचती हो, खुश रखती हो लेकिन जब तुम्हारे करीब कोई आने लगे तोह सबसे पहले तुम्हे उसकी हे चिंता होने लगती है. कही तुम्हारे साथ उसकी ज़िन्दगी पर संकट न आ जाये. खुश रहने का जितना हक़ दुसरो को है ठीक उतना तुम्हे भी है. और अगर फिर भी तुम्हे कोई डर है तोह हम यहाँ है. घर के अंदर और ये तुम्हारा है. इधर के फैंसले तुम करोगी कोई और नहीं. जाने से पहले तुमने जो किआ था वह सही था.", अर्जुन ने भी मेनका को थाम लिए था. अर्जुन की बातें सुनती वह उसके सीने से लग गई.

"तुम सबको प्यार करते हो और मेरा भी इतना ध्यान रखते हो तोह लगता है कही मैं ज्यादा न मांग लू तुमसे अपने दिल का हाल कहकर.", मेनका अपना पक्ष रख रही थी.

"वह मुझे पता है अब अगर तुम्हारा रोना रुक गया हो तोह तुम्हारे कमरे में बैठ कर पहले डॉक्टर की सलाह पढ़ ले.", अर्जुन ने माहौल को बदलने के लिए मेनका के कान में धीमी आवाज में कहा. वह सकुचाती हुई बिना कुछ कहे अंदर की तरफ चल दी. अर्जुन भी कुछ सोच कर जाली का दरवाजा अंदर से बंद करते हुए कमरे में आ गया. मेनका का कमरा भी दूसरे कमरा जैसा हे बड़ा और काफी खुला था.

"बैठो मैं कपडे बदल कर आती हु.", नजरे हलकी सी ऊपर करती मेनका के स्वर में अब अपराङबोहड़ या दर्द नहीं था. अर्जुन भी टहलता हुआ कमरे को देखने लगा. बड़ी तुबेलिघ्त को बंद करते हुए छत्त के दोनों सीरो पर लगी 2 सफ़ेद हलकी रौशनी वाली लाइट जलने के बाद वह फ़ोन के पास बैठ गया.

"हाँ दादा जी, दादी से बात करवाना.", अर्जुन नंबर मिलाने के बाद फ़ोन के दूसरी और अपने दादा जी की आवाज सुनते हे उनसे बोलै. उन्होंने भी फ़ोन पास में बैठी कौशल्या जी को दे दिए.

"है बीटा. बता कोई जरुरी बात है क्या? प्रीती बता रही थी की तू मेनका को लेके डॉक्टर के पास गया था.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर रामेश्वर जी का भी ध्यान उधर हे हो गया.

"हाँ दादी इसलिए हे फ़ोन किआ है. बाकी सब तोह ठीक है लेकिन डॉक्टर का कहना है की थोड़ा मानसिक तनाव है और उन्हें ज्यादा सोचने और अकेले रहने से मन किआ है. मैंने वैसे ये बताने के लिए भी फ़ोन किआ था के मैं खाना इनके यहाँ हे खा लूंगा. क्योंकि साथ तोह ये आ नहीं रही हमारे घर आज और फिर अकेले खाना शायद न हे बनाये कही.", कौशल्या जी अर्जुन के कहने का मतलब समझ गई थी और संतुष्ट भी थी की ये सबकी परवाह करता है.

"ाचा अगर वह नहीं आ रही तोह तू रात उधर हे ठहर जा. मंजू का कमरा खली हे होगा. फिर कल से रात को मंजू रुका करेगी उसके पास, दिन में रह लेगी अपने यहाँ."

"दादी, दीदी को बोल देना के गेट के टाला लगा लेंगी समय से और नंबर आपके पास है हे यहाँ का अगर रात में जरुरत हुई कोई. मैं 5 बजे आ जाऊंगा सुबह घर, ध्यान रखना.", अर्जुन जब ये कह रहा था तोह सामने दरवाजे से बहार निकल कर बाल ठीक करती मेनका को भी निहार रहा था.

"ठीक है और मेनका को कह डीओ के ऐतवार की जगह शनिवार शाम हे यहाँ आ जाये. चल मैं रखती हु अब. ध्यान रखियो.", कौशल्या जी ने हैंडल रख दिए और फिर से अपनी बेटी और पति से बातें करने लगी. इधर अर्जुन अब पाँव बिस्टेर पर रखे आराम से बिस्टेर पर तक लगाए मेनका को देख रहा था. वह एक सफ़ेद बिंदियो वाला काले रंग का गाउन पहन कर बाल बांध रही थी.

"अब इधर बैठो मेरे पास.", अर्जुन ने आराम से हाथ पकड़ते हुए मेनका को बराबर बिठा लिए. वह कागज जो डॉक्टर ने दिए था सामने करते हुए पहले खुद पढ़ा और फिर मेनका को पढ़ने को दिए.

"क्या लिखा है इसमें?"

"इसमें लिखा है के दोनों एकांत समय व्यतीत करो, जल्दबाजी नहीं करनी, माहौल को हिसाब से बनाओ, मुख्या काम से पहले दोनों एक दूसरे के शरीर को समझो और कुछ दिक्कत हो तोह चिकनाई प्रयोग की जा सकती है. कुल 5 लाइन है जिनमे शायद सबकुछ आ गया. और तुम्हे कुछ समझना है इनमे से तोह पूछ लो.", मेनका के चेहरे पर लाली चा गई थी अर्जुन की कहे बातें सुनकर. वह नजरे घूमती हुई बंद कंप्यूटर की तरफ देखने लगी.

"हाँ. अभी जवाब कंप्यूटर हे देगा.", अर्जुन ने दाए हाथ की अपनी उंगलिया मेनका के नाजुक बाए हाथ की उँगलियों में डालते हुए शरारत से कहा.

"तुम्हे थोड़ी भी शर्म नहीं है. पहली बार मेरे से ऐसे बात कर रहे हो लेकिन इतने खुले शब्द."

"पहली बार? और ये कैसे खुले शब्द है जो मुझे हे समझ नहीं आये? अब तुम्हे आ गए है तोह बताओ मुझे.", अर्जुन ने हलके से हाथ अपनी तरफ खींचते हुए मेनका को करीब कर लिए.

"मुझे माता चलाओ. जानती हु की तुम सब समझते हो लेकिन तंग कर रहे हो मुझे.", मेनका अपना हाथ उसके हाथ में दिए अर्जुन को वैसी हे झुकी नजरो से देख रही थी.

"बात नै करोगी.?", अर्जुन ने बचो जैसे पुछा.

"हम दोनों हे समझते है के ये क्या लिखा है.", मेनका की शर्म काम नहीं होते देख इस बार अर्जुन ने थोड़ा जोर से अपने पास खींच लिए. हलके सांवले रंग के बावजूद मेनका आकर्षक थी. बादामी रंग, तीखे nain-naksh, माध्यम से आकर्षक होंठो के ऊपर एक भूरा टिल और ये झुकी नजरे. दिल की धड़कन तेजी से चलती एक पल के लिए रुक सी गई थी मेनका की जैसे हे अर्जुन ने उसके होंठो को चूमते हुए ऊपर वाले एक होंठ को मुँह में भर लिए. वैसा हे हाल निचले होंठ का करते हुए फिर अपने कंधे से मेनका को सताते हुए चेहरे पर नजर जमा ली.

"ऐसा क्यों किआ?"

"क्योंकि तुमने यही तोह कहा था मुझसे.", अर्जुन ने शरारत से जवाब दिए तोह मेनका कंधे पर हे सर टिकाये यादों के पिटारे से कुछ बहार निकल कहने लगी.

"इंद्रधनुष सा ये लड़का कब दिल में उतर गया मुझे खुद हे पता न चला. 20 मिनट में हे मेरे चेहरे पर इतनी मुस्कान ले आया था जितनी 20 साल में न आई थी. जैसे मेरे पाँव पर से मिटटी झाड़ रहा था तोह ऐसा लग रहा था के सालो से धुल में लिप्त दिल साफ़ कर रहा हो. मुझे तोह एहसास भी न था के मैं एक लड़की, युवती या ज़िन्दगी में कोई अस्तित्व भी है. मेरी कलाई को थामे वह चलने लगा तोह पहली बार मुझे खुद लगा के ये हक़ बस इसका हे होना चाहिए, मुझे थामने के और संवारने का. मेरे लिए एक कड़वा बोल न सहते हुए कैसे ये अनजान सा लड़का खतरे से जा भिड़ा. उस क्षण में मेरे दिल ने पहली बार कहा था के ये एक तरफ साडी दुनिया है और एक तरफ बस ये अकेला. अगर वैसे हे हाथ थामे धड़कन रुक भी जाती तोह पिछली बदहाल ज़िन्दगी का कोई दुःख न था. भूल गई थी की मांग में सिन्दूर है, पाँव में समाज की जंजीर बस ये पल हे है जो किसी वरदान सा मिला है.", मेनका की इस बात पर अर्जुन ने दोनों हाथो का घेरा उसके गिर्द कर लिए.

"आशिक़ हो रही हो पूरी. पहली बार में हे सब हो गया था क्या?", अर्जुन ने मुस्कुराते हे कहा तोह मेनका ने स्पष्ट चेहरे से देखा और फिर सर पहले की तरह टिका लिए.

"बाघी हो गई थी उस पल में. शायद ऊपरवाला मेरे इम्तिहान ले रहा था. दूसरी बार इस चेहरे ने खुशियां दी थी. फिर तुम्हे पल भर देखने के लिए कितने दिन गुजारे और कैसी घटनाये एक के बाद एक होती रही. लगा के ऊपर वाला बस एक अनमोल याद दे कर बाकी ज़िन्दगी वैसी हे रखने वाला है, तनहा और अकेलेपन से भरी हुई. लेकिन शायद दिल पिघल गया हो थोड़ा जो तुम्हे इतने तोह करीब ले आया के रोज देख सकू, अपनी हद्द बनाये हुए.", भावशून्य सी मेनका हलके हलके अपने नाख़ून के अगले हिस्से से अर्जुन की टीशर्ट कुरडी कह रही थी.

"तुम्हे पता है तुम कितनी मासूम सी हो? पता नहीं क्या सोच कर घरवालों ने शादी की थी. और तुमने ऐसा क्यों कहा के दूसरी बार देखा था? जहा तक मैं याद रखता हु सबकुछ तोह मैंने ये चेहरे पहली बार उस दिन हे देखा था.", अर्जुन ने गाल सहलाते हुए पूछा.

"जब पहली बार देखा था तब मैं मासूम हे थी. 23 साल पहले और यही चेहरा मेरे कच्चे घर की देहलीज पर बैठा था. माँ का हाथ पकडे उन्हें ज़िन्दगी जीने का सहारा देते हुए. 2 बार ये चेहरा अलग समय के अंतराल पर आया और दुनिया बदल कर सब ठीक कर दिए, धीरे धीरे.", अर्जुन कुछ समझ गया था लेकिन जाहिर न करते हुए वैसे हे बात करने लगा.

"7 साल की उम्र में देखा चेहरा ऐसा हे था?"

"Hu-ba-hu. बचपन में देखे कुछ सपने हम याद रखते है हमेशा. और इस चेहरे ने तोह जीने का सहारा दिए था मेरे परिवार को.", इस बार खुद को थोड़ा सही करती मेनका ने खुद सामने से अर्जुन के होंठो को चूमा. बड़ी नजाकत और आराम से.

"अब जरा डॉक्टर की सलाह पर चर्चा कर ले?", अर्जुन ने कपडे के ऊपर से हे वह लगभग 30 की कमर पकड़ते हुए मेनका को थाम लिए. उसकी बात पर एक शर्मीली मुस्कान आ गई मेनका के दिलकश चेहरे पर.

"अगली बात पर चलो फिर.", अर्जुन की बाहों से निकलती वह बगल में वापिस आ बैठी. और अर्जुन पलट कर मेनका के सामने आता ऊपर झुक गया.

"जल्दबाजी कर रहे हो.", वह मुस्कुराती हुई बोली.

"माहौल बना रहा हु.", अर्जुन का चौड़ा सीना अपने सामने देख एक पल के लिए वह खुद कांप गई थी लेकिन उसके दिल का ध्यान आते हे मेनका ने कंधे पर दोनों हाथ रखते हुए अपने होंठ मिला लिए. नरम तकिये पर टिकाया सर धीरे से कुछ नीचे हुआ और अर्जुन आधा शरीर ऊपर रखे अब इत्मीनान से मेनका के लबो को चूसते हुए उसकी बेरंग ज़िन्दगी में रंगो की हलकी फुहार गिरता सा उसपर चा गया. 5 मिनट तक वह रुक रुक कर मेनका के मुँह का हर भाग टटोलता रहा और मेनका कब उसकी पीठ मजे लेती सहलाने लगी पता न चला. दोनों अलग हुए तोह मेनका की आँखें अब बदल गई थी. जैसे किसी गहरे नशे में बोझिल सी.

"पहला किश तुम्हारे हे साथ पता चला है.", मेनका ये कह रही थी और अर्जुन ने मुस्कुराते हुए गले पर एक चुम्बन करने के बाद सीने से ऊपर होंठ रख दिए.

"इसशहहह.. गुदगुदी होती है.", वह शर्म से हिलने लगी थी क्योंकि अर्जुन अब उस तरफ बढ़ रहा था जिधर वह खुद भी अपने आप को देखने से कतराती थी.

"अभी हर तरफ ये होगा और ऐसे हिलने से तोह खुद हे थक्क जाओगी.", अर्जुन ने शरारत से हे बता दिए था के वह क्या करने वाला है.

"Na-na. जहा तक दिख रहा है वही तक इजाजत है बस.", मेनका ने जिस अदा से ये कहा अर्जुन उसकी हरकत में हे खो गया. मेनका मछली सी फिसलती उसके नीचे से निकल कर फर्श पर आ कड़ी हुई.

"खाना बनाना है बच्चू मुझे. यहाँ तुम ये हरकते करोगे तोह रात निकाल डोज इसमें हे.", अर्जुन इसमें भी एक शरारत मिलने पर हँसता हुआ उठ गया. मेनका बिना पालते रसोई में चल दी लेकिन यहाँ चैन नहीं मिलने वाला था उसको.

"अरे.. यहाँ नहीं.", पीछे से उसको पकड़ता अर्जुन दोनों बहो में कमर पकड़ कर गले को चूमने लगा. मेनका की आँखें बंद हो गई थी अपनी छोटी सी ना करते हुए. मांसल नरम पेट पर हाथ फिरते हुए अर्जुन ने कान की लौ पर जीभ लगा दी.

"आह्हः.. अंदर हे चलो.", इस नए खुमार के सामने वह पिघलने लगी और कमरे में चलने को कहती उसकी बाहों में कड़ी रही.

"पूरा घर खली है.", अर्जुन ने एक हाथ में बया सतांन पकड़ लिए और मेनका सुन्न रह गई. गलती का एहसास होते हे अर्जुन ने हाथ हटते हुए मेनका का शरीर आजाद कर दिए. उसको लगा था के कही वह ज्यादा हे तेज रफ़्तार पकड़ गया था और मेनका इस से शायद परेशां हो गई.

"घर खली है और यहाँ सिर्फ हम दोनों तोह रुक क्यों गए.?", सामने से खुद हे दोनों बहन गले में डालती वह अर्जुन को देखने लगी.

"लेकिन पहले कमरे में हे चलते है. तुम्हे शायद यहाँ उतना ाचा न लगे.", कूल्हों के नीचे हाथ रख कर मेनका को उठाते हुए अर्जुन फिर से वही बिस्टेर पे ले आया. मेनका इतने से सफर में हे समझ गई थी की अर्जुन कितना मजबूत है.

"तुमने अंदर ये क्यों पहनी हुई है?", एक संतरे को पकड़ते हुए अर्जुन ने जैसे हे कहा शर्माती हुई वह ज्यादा न बोल सकीय.

"और क्या पहनते है अंदर?"

"रात को ऐसे समय कुछ नहीं पहनते.", सामने की चैन नीचे सरकते हुए अर्जुन ने वह चमकता सीना और काली ब्रा में क़ैद सुनहरी सतांन देखे तोह वह हैरत से मेनका को देखने लगा.

"मुझे नहीं पता था के इस रात में तुम ये सब भी करने लगोगे. लेकिन हैरान मुझे होना चाहिए तुम क्यों हो रहे हो.?", खुले हिस्सी पर अपना हाथ रख कर वह सामने से खुला भाग ढकने लगी.

"तुमने कहा था के तुम्हारी शादी हुई थी, फिर ये ऐसे क्यों है.?", मेनका का जितना हिस्सा ब्रा से बहार अर्जुन ने देखा था वह कसावट लिए बिलकुल लड़कियों जैसा था.

"वह कुछ हुआ हे नहीं कभी तोह उधर क्या होना था? 5 साल में 20 बार अगर कुछ हुआ तोह बस नीचे.", और मेनका एकदम परशान हो गई. अचानक उसको क्या हुआ ये अर्जुन भी न समझ सका. उसने भी कोई जोर न डालते हुए मेनका को जाने दिए और खुद बाथरूम में चला गया. कितनी देर वह पानी के नीचे हे खड़ा रहा फिर पानी बंद करने के बाद वही कपडे पहन कर बहार आ गया. मेनका ने दोनों का खाना मेज पर लगा दिए था. इस दौरान भी दोनों हे खामोश थे. जैसे तैसे खाना ख़तम करते अर्जुन वह से उठकर कमरे में आ गया. अभी भी वह 2 लाइट हे जल रही थी जिनमे से अपनी तरफ की बंद करने के बाद टीशर्ट उतार कर इधर किनारे हे लेट गया.

घर में अजीब सी ख़ामोशी चा गई थी इतनी हे देर में. मेनका बर्तन साफ़ करने के बाद सब सामान व्यवस्थित करती हुई अपने हे खेलो में और परेशान हो रही थी. कमरे में आने पर अर्जुन को लेते देख कर बाथरूम में घुस गई. 15 मिनट वही गुजरने के बाद वह नाहा कर बहार आई. मेनका ने अपनी तरफ की लाइट भी बंद करते हुए फिर से अर्जुन की तरफ देखा जो आँखें बंद किये सीधा लेता था. शरीर शांत. तकिया थोड़ा किनारे करती हुई मेनका भी उसकी तरफ पीठ करके लेट गई.

"मेरी किस बात ने तुम्हे इतना दुखी कर दिए की तुम ऐसे उठ कर चली गई थी? और अब मेरी हे बगल में लेती रो रही हो?", आधे घंटे बाद अर्जुन को ये सिसकने की धीमी आवाज सुनाई दी तोह वह पल में हे मेनका के बराबर आ कर चेहरा देखने लगा. ड्राइंग हाल से आती रौशनी पर्याप्त थी गीले चेहरे को देखने के लिए.

"मैं खुद एक झूठन से ज्यादा कुछ नहीं हु. ये सोच कर बुरा लगा के तुम कितनी म्हणत कर रहे हो मेरे लिए लेकिन मेरे पास जो है वह पहले हे किसी और ने भोगा हुआ है, चाहे मर्जी नहीं थी मेरी लेकिन वह पहले मिलान सा कुछ नहीं बचा तुम्हारे लिए.", अर्जुन हलकी सी मुस्कान के साथ चेहरा साफ़ करते हुए मेनका को खींच कर अपने ऊपर ले आया.

"इतनी सी बात थी और तुमने मुझे कितना परेशां कर दिए. पागल कही की. मैं ये सोच रहा था इतनी देर से की जाने क्या गलत कर दिए मैंने जो तुम बीच में हे खफा हो कर उठ गई. थोड़ी देर में हे तुम्हे पता लग जायेगा के तुम्हारे शरीर और आत्मा पर पहला स्पर्श किसका हुआ. तुम उतनी हे साफ़ हो जितनी अग्नि होती है.", अर्जुन ने एक बार फिर से मेनका को सँभालते हुए दोनों के होंठ जोड़ दिए. बेसुध सी मेनका पूरी शिद्दत्त से अर्जुन के होंठो को मुँह में भर कर चूस रही थी. जैसे वह किसी कमी को पूरा कर रही हो.

"तुम सच में नाराज नहीं हो न.?", उसके ऊपर लेती हे वह अर्जुन के गाल पकड़ कर पूछ रही थी.

"ज्यादा बोलोगी तोह जरूर हो जाऊंगा. अब मैं देखु जरा के कितनी जगह मेरे नाम है.", अर्जुन ने मेनका को पीठ के बल लिटाते हुए इस बार सामने से चैन को खींच कर सीने के नीचे तक खोल दिए. मेनका बस उसके चेहरे को देखती संतुष्ट थी की अर्जुन अधिकार से कर रहा था सबकुछ, जैसा वह चाहती थी.

काली ब्रा का कप ऊँगली से थोड़ा सरकते हे अर्जुन ने वह माध्यम अकार का संतरा निप्पल से निचे तक बेपर्दा कर दिए. 19-20 साल की लड़की के जिस्म सा वह उभर और चने के छोटे डेन जितना निप्पल. ऊँगली से ऊपरी सतह को सहलाते हुए अर्जुन ने मुँह लगा लिए.

"आह्ह्ह्ह... पहली बार.. उम्. इन्हे प्यार मिला है.", मेनका ये स्पर्श मिलते हे कमर उठाने लगी मजे में. अर्जुन इस चिकने वक्ष को मुँह में भरते हुए हे दूसरे को भी बेपर्दा करता मुट्ठी में भरने लगा. चुके उन्नत्त थे लेकिन पूरे हथेली में समां सके इतने बड़े. दूसरे उभर को भी मजे से चूसता वह नीचे लेती मेनका के ऊपर आ गया था. दोनों पाँव मेनका की फैली जांघो के बीच और स्तनपान से मिल रहे आनंद में चूर मेनका उसके सर पर हाथ फेरती निहाल हो रही थी.

"लाइट जला दू?", अर्जुन ने बनियान जिस्म से निकलते हुए कहा तोह मेनका ने सर एक तरफ घुमा लिए.

"अभी पहली बार ऐसे हे. उतना अँधेरा नहीं है यहाँ.", अर्जुन ने बिना जवाब दिए मेनका के जिस्म पर लिप्त वह बड़ा वस्त्र टांगो से ऊपर करते हुए उतरना शुरू कर दिए. कमर के पास आते हे मेनका ने भी साथ देते हुए बाकी का हिस्सा खुद हे जिस्म से जुड़ा कर दिए. हलकी रौशनी में खुले बाल, दोनों सख्त कच्चे संतरे जिन पर निप्पल सूई से तीखे हो चुके थे, गहरी नाभि उस चिकने पेट पर और कमर के नीचे वह काला एक मात्रा वस्त्र. छूट का सिर्फ सामने का भाग उन चिकनी जांघो के बीच चिपका हुआ. छाती जहा माध्यम आकर की थी वही कमर के नीचे का फैलाव आकर्षक था. यहाँ से मेनका के कूल्हे तोह नहीं दिख रहे थे लेकिन फैलाव और आपस में सटी जंघे बता रही थी की वह बड़े भी है और मॉटे भी.

"उम्म्म.. आह्हः.. मुझे आज पूरी रात इतना प्यार करो अर्जुन की ज़िन्दगी भर ये रात न भूल पाव.", दोनों के शरीर ऊपर से बेपर्दा थे और जब नंगे सीने आपस में मिले तोह मेनका खुद को रोक न सकीय. जिस्म में आग भर चुकी थी अपने चुचो के ऐसे अर्जुन की छाती में चुम्भन और दबने से. अर्जुन भी होंठ, गाल और गले को चूमता एक तरफ से एक चुके को ाचे से दबा रहा था.

"कल स्कूल नहीं जा सकोगी.", अर्जुन ने दूसरे हाथ को मेनका के चिकने पत् पर फिरते हुए वह लात थोड़ी फैला दी.

"पहले ये रात तोह पूरी करो.. आठ.. कल की कल देखेंगे.", मेनका खुलकर साथ देती हुई अपने पाँव फैलाये अर्जुन की पीठ सेहला रही थी. एक पल के लिए वह अलग हुआ और फिर वापिस ऊपर आया तोह दोनों के जिस्म अब पूरी तरह निर्वस्त्र थे. मेनका को थोड़ी घबराहट होने लगी थी जब अर्जुन उसके एक दूध को चूसता हुआ दूसरे हाथ से पेट सहलाता नीचे जाने लगा. हलके बाल उस थोड़े से हिस्से में अर्जुन को महसूस हुए और थोड़ा आगे ढलान पर वह गरम मॉटे होंठ, जिनकी दरार अंदर से गीली थी.

"तुमने डॉक्टर से कहा था के तुम्हे यहाँ परेशानी है. लेकिन ये कुछ और हे कह रही है.", अर्जुन ने ऊँगली गुआंते हुए थोड़ा दबाव दिए तोह आधी ऊँगली उस गरम चिकने छेड़ में उतर गई.

"आह्ह्हह्ह्ह्ह.. ममममम.. मैंने गलत नहीं कहा था.. आह्हः.. ये तुम जो इतनी देर से कर रहे हो, उसकी वजह से हुआ है.. उम्म्म... और ये क्या लग रहा है इधर.", अर्जुन निरंतर छूट में ऊँगली चलता हुआ दोनों चुके बदल कर पी रहा था. मेनका की छूट बुरी तरह से गीली हो कर अब पूरी ऊँगली अंदर लेने लगी थी. लेकिन एक अलग सा एहसास कमर के पास हुआ तोह मेनका ने वह चीज हाथ से पकड़ कर देखनी चाही.

"पता चल हे गया होगा के क्या है.", अर्जुन ने मुँह चुचो से हटते हुए कहा और दूसरी ऊँगली भी इस संकरी गली में उतार दी. हलके दर्द और मजे से सिसकती मेनका ने उसके मॉटे लुंड पर मुट्ठी कस दी.

"आह्हः. आराम से अर्जुन.. यहाँ आह्हः कुछ नहीं गया है बहोत समय से. और तुम्हारा ये जरुरत से ज्यादा हे बड़ा है.", मेनका को कोई डर न था क्योंकि उसको भी पता था के जैसा भी है अब यही है. दोनों उंगलिया जहा पहले फांसी हुई जा रही थी वही अब वह थोड़े आराम से छूट के अंदरूनी भाग को टटोल रही थी. जल्द हे पूरा जिस्म लकड़ी की तरह ऐंठ गया. रह रह कर लग रहे झटको के साथ मेनका की आहे बता रही थी की ये एहसास पहली बार उसको हुआ है. वह भी चुदाई किये बिना. अर्जुन उँगलियाँ छूट में फसे हे रुक कर मेनका के होंठो को पीने लगा. शरीर जब हिलना बंद हुआ तोह उसने बड़े प्यार से मेनका की आँखों में देखा.

"ाचा लगा?"

"बता भी नहीं सकती कैसा लग रहा है. अंदर से जैसे किसी खास हिस्से से कुछ निकलता हुआ मुझे हवा में उड़ने लगा था... आठ.. तुम रुक क्यों गए?"

"रुका नहीं बस तुम्हे सँभालने का मौका दे रहा हु.", वह मुस्कुराता हुआ अलग हुआ और बाथरूम में घुस गया. बहार आया तोह हाथ में नारियल के तेल की शीशी थी. मेनका इस हलके अँधेरे में निर्वस्त्र अर्जुन को अपनी तरफ आते देख मुस्कुरा रही थी. कैसे वह बेपरवाह सा नंगा विचरण कर रहा था. लेकिन थोड़ी रौशनी में वह ख़ास भाग नजर आया तोह हलक सूख गया. इतना बड़ा अंग उसने कभी सोचा भी न था के किसी आदमी के शरीर पर हो सकता है. लेकिन छूट पर उसकी चिकनी हथेली लगते हे पाँव फैलते हुए मेनका ने काम आसान कर दिए. आँखे बंद किये वह इसमें में मजा ले रही थी. अंदर और बहार ाचे से चिकना करते हुए अर्जुन ने तेल की धार सीधा सुपडे पर गिरनी शुरू कर दी. जड़ तक उस भयंकर लुंड को तेल से नहलाने के बाद हाथो से हलकी मालिश करता वह छूट के सामने बैठ गया.

"दर्द होगा शुरू में.", अर्जुन ने चिकनी हथेली दोनों चुचो पर मालिश के अंदाज में चलते हुए कहा और साथ हे थोड़ा कस के निप्पल मसल दिए..

"ेईईईई. आराम से आह्हः.. जो भी करना है करो.. आह. ज्यादा दर्द नहीं होगा, मैंने बताया था न."

"चुप. बस शरीर को ढीला छोड़ दो.", अर्जुन ने आगे न बोलने दिए और मेनका के दोनों चिकने पाँव सही करते हुए लुंड का सूपड़ा उन नरम फांको के ऊपर लगा दिए.

"शठ.. ाचा लग रहा है ये ऐसे करना तुम्हारा..", छूट की फांको के बीच सूपड़ा दबा कर ऊपर नीचे करता अर्जुन जानता था के मेनका बेशक पहले शादीशुदा थी लेकिन ये सुरंग खुली नहीं है. दोनों पत् हाथ से एक जगह दबाये रखते हुए अर्जुन ने सुपडे की नोक छूट के छेड़ पर लगते हुए साधा हुआ धक्का लगा दिए.

"मर्डर गई माहहहह..", अभी मेनका की चीख पूरी तरह निकली भी नहीं थी की अर्जुन ने साथ हे अगला धक्का लगते हुए सुपडे से 2 इंच ज्यादा लुंड उस नाजुक छूट में उतार दिए. दर्द से मेनका चटपटा रही थी और इधर लुंड जैसे खूंटे की तरह उसकी जमीन फाड़ता अंदर फंस चूका था. अर्जुन दोनों चुके मसलता हुआ मेनका के गले को चूमने लगा. वह चाहता था के मेनका इस दर्द को बहार आने दे. छूट की फांके औकात से ज्यादा चौड़ी हो कर अब खून के टपके चादर पर गिरा रही थी.

"बस मेनका, बस. थोड़ी हे देर में ाचा लगेगा तुम्हे.", अर्जुन उस खूबसूरत चेहरे पे आया पसीजना और आँखों का पानी साफ़ करता हुआ मेनका को हिम्मत दे रहा था.

"छूट फाड़ के रख दी मेरी आह्ह्ह्हह.. कह रहे हो ाचा लगेगा.. बचा ले माँ..", मेनका दर्द से तड़पती वह शब्द बोल रही थी जो गाँव में उसने कभी सहेलियों से सुने थे. अर्जुन धैर्य रखते हुए उन सैंट्रो को मसलते हुए उनका आकर बढ़ता रहा. 2 मिनट बाद दर्द के साथ सिसकी की आवाज सुनते हे उसने एक भूरा निप्पल मुँह में भर लिए. थोड़ा बहार और उतना हे अंदर लुंड करते हुए पहले मेनका की छूट का इतना हिस्सा ढीला करता हुआ वह उसका दर्द और आहे अनसुनी करने लगा.

"आठ.. माँ.. बहोत बड़ा है तुम्हारा.. मर्डर गई मई. ऐसे भी करता है कोई? थोड़ा प्यार से करो.", अर्जुन ने मेनका की बात मानते हुए शरीर से शरीर चिपका लिए. रसीले होंठ पसीने और आंसुओ की वजह से नमकीन स्वाद दे रहे थे. नीचे छूट में अंदर बहार होता 3 इंच लुंड अब मेनका को बेहतर लग रहा था.

"उम्म्म.. अर्जुन.. बस ऐसे हे करो.. आह्ह्ह्ह.. गंदे हो तुम.. बहोत gande..faad के रख दी मेरी.. आह्ह्ह्ह माँ.. सीई.", अर्जुन गालो को मुँह में भरने के साथ हे बीच बीच में निप्पल मसल देता था. अब मेनका भी घुटने मोड़ती हुई 5 इंच के लगभग लुंड की लम्बाई अंदर लेते हुए सिसकियाँ भरने लगी.

"आह्हः.. क्या फट गई तुम्हारी? बताओ न .. उम्म्म", अर्जुन भी इतनी कासी छूट की चुदाई करता साँसे ले रहा था. इतनी म्हणत करने पर हल्का पसीना पूरे शरीर पर चमक रहा था. वह साथ हे मस्ती करता उसकी टाँगे मदद कर ऊपर उठाने लगा.

"ुहम्म.. आह्हः.. जहा दाल के तुम आठ ये कर रहे हो.."

"खुल के बोलै न मेनका.. हह.. हम क्या कर रहे है.. बताओ..", छूट में गीलपांड अब भरपूर था और अर्जुन के लिए छूट की गहराई मापने का ठीक समय.

"आह्हः.. छह.. चुदैई.. कर रहे है.. आह छूट फाड़ दी तुमने मेरीए.. लेकिन मजा आ रहा हैई अब.. ये तुम्हारा बहोत बड़ा है. माहहह.. मार दिए रे.. ", बातो में उलझाए रखने का मकसद यही था के मेनका का ध्यान हट जाये. जैसे हे वह मस्ती में बातें करने लगी इस गहरे धक्के में छूट के होंठ लुंड की जड़ से चिपक गए. बचा खुचा खून भी छूट से बहार वैसे हे बिस्टेर पर गिरने लगा. शरीर ठंडा पड़ने लगा था लेकिन अर्जुन के साथ ऐसे हालात हो चुके थे पहले भी.

"आह्हः माँ... थोड़ा धीरे करो प्लीज.", अर्जुन ने जल्द हे पहले सी रफ़्तार बनाते हुए हलके धक्के लगाने शुरू किये और मेनका की आहे फिरसे कमरे में गूंजने लगी. छूट जितना फैलनी थी उतनी फ़ैल चुकी थी. अब हर धक्के पर अर्जुन का मूसल जड़ में ठोकर मारता गर्भ से टकरा रहा था.

"पेट तक आ रहा है ये खम्बा... आयी.. dard-maja दोनों आठ मिल रहे है.", गांड खुद ऊपर उतनी शुरू हुई तोह धक्के भी लम्बे लगने लगे. हर बार दोनों की जड़े मिलने पर 'ठप्प' की आवाज गूँज उठती. शरीर में जज्बा और जान थी मेनका के जो वह जल्द हे पूरा लुंड अंदर लेती अर्जुन की taal-se-taal मिलाने लगी.

"क्या कह रही थी तुम? यहाँ पहले भी किसी ने किआ है? आज तुम कर रही हो.. आह.. और यही फरक है.. उम्म्म", दीवानवार सा वह उसके चुचो को मुँह में भरे सुपडे तक लुंड निकाल कर पूरा अंदर उतार रहा था. गति भी किसी घोड़े से तेज बनाये वह मेनका का पूरा शरीर काबू में किये आज उसको बता रहा था के असली मिलान क्या होता है.

"सही थे तुम.. आठ.. जोर से.. मारो.. आठ.. पहली बार मुझे .. आठ. पता चला है के .. क्या नहीं मिला .. मुझे.. ाःह.. मैं होने लगी हु..", मेनका की बड़ी गांड हवा में उठ चुकी थी और पाँव अपने आप हे कैंची से उसकी कमर से चिपके लुंड को छूट के अंदर हिलने भी नहीं दे रहे थे. अर्जुन का सूपड़ा भी फटने हे वाला था.

"मेनका मैं होने वाला हु.. आठ..", दोनों अलग होते उस से पहले हे अर्जुन ने अपना रास छूट के गहराई में भरना शुरू कर दिए. मेनका इस गरम तरल से सुकून पाती हुई लगातार झाड़ रही थी. छूट में जगह लुंड ने हे ख़तम कर दी थी आखिर तक फंसने से. गर्भ से टकराता वीर्य हौले हौले ऊपर की तरफ आने लगा.

"पुक्क" की आवाज से लुंड बहार निकला तोह मेनका जैसे खाली हो गई थी. बिस्टेर पर बेजान से पड़ी वह टाँगे फैलाये बस लेती रही. अर्जुन उसकी बगल में हांफ रहा था और छूट की वह बंद गली अब पूरा मुँह खोले लाल फैंको में से सफ़ेद पानी और लाल कतरे बहती फड़क रही थी.

"तुमने पहले किसको चुदाई करते देखा था?"

"आठ.. क्या करते हो? इन्हे आज पहली बार हाथ लगा है और आह्हः.. देखो क्या हाल किआ है तुमने. कपडे नहीं पहन सकुंगी.", दोनों चुचो की ाची शामत आई थी जो वह बुरी तरह लाल होने के साथ हे सूज चुके थे. निप्पल जहा पहले सिर्फ छोटे चने के दाने से थे अब फूल कर लोबिअ जितने बड़े और खड़े थे.

"इन्हे जल्दी हे इतना बड़ा कर दुगा के सिर्फ यही दिखेंगे. सच्चे में कोई पागल हे होगा जो इन्हे न देख सका. लेकिन तुमने बताया नहीं मेनका.", अर्जुन ने उसकी गर्दन के नीचे हाथ करते हुए खुद से लगा लिए. दोनों निर्वस्त्र बेपरवाह.

"भैया को खेत में देखा था. हमारे यहाँ फसल काटने वाली के साथ. सच कहु तोह पहली बार उस औरत को देख कर लगा था के चुदाई में मजा आता होगा. लेकिन आज पता लगा के ये मजा बहोत महंगा पड़ता है. हिलते हुए भी वह दर्द हो रहा है.", अर्जुन ने प्यार से कमर सहलाते हुए मेनका को तबियत से चूमा और मेनका भी बेझिजक एक टांग लुंड की तरफ रखती हुई बराबर होंठ चूस रही थी. चुचो का अर्जुन के जिस्म से लग्न हल्का दर्द और उत्तेजना दे रहा था.

"और ये choot-chudai कहा से सीखे.?"

"गाँव में यही तोह कहते है इस सबको. लेकिन मैंने पहले बार आज हे बोलै है.", थोड़ी शर्म से वह अपना मुँह छाती पर रखती हुई अपनी चिकनी जांघ अर्जुन के हलके से अकड़े लुंड से भी रगड़ रही थी.

"तुम अकेले में हमेशा वैसे हे बात किआ करो जैसे तुम्हे ाचा लगे. सच कहु तोह मुझे बड़ा मजा आया तुम्हारे मुँह से ये लफ्ज़ सुनकर. उम्मीद हे नहीं थी की एक टीचर ऐसा कुछ बोल सकती है."

"ाचा? उम्मीद तोह ये भी नहीं थी की तुम मेरा ऐसा हाल करोगे. सच में कितना बड़ा है तुम्हारा. वह तक लग रहा था जहा कुछ और शुरू हो जाता है."

"मेनका, तुमने अभी ये देखा हे कहा है. न मैंने तुम्हे ाचे से देखा है. एक बार रौशनी में करे?"

"आज बस ऐसे हे करो. फिर जैसे मर्जी कर लेना मैं खुद करवाउंगी. अभी हिम्मत नहीं है लेकिन मुझे ये पूरी रात लेना है.", रेडियम की डंडी घडी में साढ़े 10 बता रही थी. मतलब अभी बहोत समय बाकी था.

"वैसे मैंने सब अंदर हे कर दिए. गोली?"

"नहीं. अब भी तुम अंदर हे करना. ाचा लगा मुझे. वह एहसास सचमुच ख़ास था. बाद में दवाई ले लुंगी.", मेनका के लगातार लुंड को सहलाने से वह फिर से खड़ा हो गया था. अर्जुन ने भी बाद में आराम की मंशा से मेनका को ऊपर ले लिए.

"क्या कर रहे हो?"

"झूला झूलता हु तुम्हे.", मेनका की दोनों टाँगे अपने ऊपर हे फैलते हुए अर्जुन ने लुंड को वीर्य से गीली छूट पर लगते हुए हलके धक्के में हे अंदर उतार दिए. आधा लुंड ऐसे हे अंदर उतरता गया.

"ममम.. ये तुम बड़ी जल्दी तैयार हो गए. . आह कितना गरम और मोटा है ये.", उभरी हुई मोटी गांड को दबाते हुए अर्जुन ने इस बार सारा हे अंदर करते हुए मेनका को कास लिए.

"देखो पूरा ले लिए तुमने. रात में हे इसको आदत हो जाएगी.", कूल्हों को भींचता वह ऐसे हे लम्बे और धीमे धक्के लगता हुआ अपने ऊपर लेट मेनका को असली सुख देने लगा. पहली बार तोह आधी चुदाई दर्द में हे निकली थी उसकी.

"आह.. शही.. सच में इतना मजा आता है.. आठ लेकिन छूट के बहार जलन हो रही है.", अर्जुन उसकी बात सुनकर वैसे हे कमर हिलता हुआ दोनों कूल्हों की दरार फ़ैलाने लगा.

"ओह्ह्ह.. अहहहहहहहहहह.. वह से हाथ हटाओ.. ाममममम.. वह नाहीई.. ", मेनका मन करती रही लेकिन अब खुद वह चुत्तड़ आगे पीछे करती अपनी छूट लुंड के आखिर तक मार रही थी. रास से गीली एक ऊँगली गांड के दरदरे छेड़ पर लगते हे वह एक पल रुकी लेकिन जैसे हे एक पूरा अंदर गया वह छूट को ढीला छोड़ती अर्जुन के धक्को का मजा लेने लगी. अर्जुन भी हर धक्के के साथ ऊँगली अंदर बहार करने लगा.

"सीई.. आग भड़का रहे हो .. आठ. वह क्या कर रहे हो ऐसा?", धीमी चुदाई जहा दोनों को हे सुकून और मस्ती दे रही थी वही गांड के तंग छेड़ में चलती ऊँगली जैसे इस मजे को और बढ़ा रही थी. मेनका ने दोनों हाथ छाती पर टिकते हुए अपने भारी कूल्हे खुद उछलने शुरू कर दिए. यहाँ एक हाथ से अर्जुन मेनका के अनार सेहला रहा था वही ुंली अपनी लम्बाई के आखिरी हिस्से तक उस गरम छेड़ में उतरने लगी.

"यहाँ भी करेंगे जल्द.. पहले बस तुम्हारा सामने वाला हिस्सा ठीक कर दू... आह.", अर्जुन धड़ को ऊपर उठाते हुए मेनका को नीचे करना लगा. वह भी कंधे को मजबूती से पकडे उसकी दानव जैसे शरीर के नीचे होती इस खेल को तेज करने के चाह में थी. यहाँ जैसे हे अर्जुन ने मेनका की टाँगे ऊपर उठाई वह तूफानी रफ्ता से छूट को जैसे रौंदने लगा. हर झटके पर गुलाबी हिस्सा बहार तक दीखता फिर लुंड के साथ हे अंदर. छूट पानी छोड़ती मेनका की हालत बता रही थी लेकिन ये चुदाई अब लम्बी चलने वाली थी.

"वह कुछ नहीं करना. वह इस सबके लिए नहीं होती.", मेनका की छूट से लुंड निकल कर अर्जुन ने मॉटे चुत्तड़ अपने सामने कर लिए. मेनका को डर था के कही वह आज हे पिछले छेड़ भी न खोल दे. लेकिन हाथ से छूट की दोनों फांके रगड़ने के बाद अर्जुन ने एक बार में हे पूरा लुंड अंदर भर दिए.

"आह.. मुझे लगा था के पिछले रास्ता भी खराब कर डोज.. आह.. आराम से दबाओ इन्हे.. ममम.. बाल साफ़ करुँगी उठते हे.. आह.. ऐसे तोह ज्यादा मजा आ रहा है.", घोड़ी बनाते हुए चुदाई में मेनका के साथ अर्जुन भी चुदाई सुख का मजा ले रहा था. गरम कूल्हों के बीच रगड़ लगता वह सख्त लुंड फंसा हुआ गहराई तक जा रहा था. दोनों हाथो में दबते चुके भी अर्जुन का भरपूर साथ दे रहे थे मेनका को एक हे जगह रोकते हुए. 10 मिनट बाद हे छूट ने ऐसा संकुचन किआ की मेनका bhal-bhal के झरने की तरह पानी गिराने लगी और उसके साथ हे अर्जुन गांड को फैलता हुआ बुरी तरह फुला हुआ सूपड़ा बच्चेदानी पर दबाये गरम धार से छूट की सिकाई करने लगा.

"आह्ह्ह्ह..", उसकी पीठ पर हे गिरता वह बिना लुंड निकले चिपक गया था. मेनका जैसे मदहोश सी औंधे मुँह पड़ी बस साँसे ले रही थी. छूट का हाल अभी कहा पता था के क्या होगा लेकिन अभी के लिए वह संतुष्ट भी थी और खुश भी. अर्जुन ने आज उसको जैसे पूरा निचोड़ लिए था. कुछ हे देर बाद दोनों नंगे हे एक दूसरे की बाहों में लिपटे सो चुके थे.

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"यार अब जिसने सोना है वह जा सकता है और जिसने फिल्म देखनी है वह बैठा रहे.", अलका ने घडी में समय देखने के बाद सबकी तरफ नजर घुमाई. साढ़े 11 बजे थे और कमरे में घर की सभी लड़किया जमा थी. खाने के बाद सभी तारा वाले कमरे में जमा हो गई थी. 2 गद्दे फर्श पर, एक बीएड, एक बड़ा सोफे इन सबको संभाले था. अंग्रेजी फिल्म ईविल डेड बस ख़तम हे हुई थी जो ये लोग ढाई घंटे से देख रही थी.

"मैं तोह चली सोने और जिसने जल्दी उठना है वह भी साथ चले मेरे.", माधुरी दीदी की बात पर Komal-Rupali-Priyanka दीदी उठ कड़ी हुई. प्रियंका दीदी का दिल था लेकिन अभी आरती वही थी तारा और अलका के बीच में ऊपर बीएड पर. और आरती से थोड़ी नजरो की झिझक थी जो पूरी नहीं खुली थी. मंजू नीचे वाले गद्दे पर बीएड से तक लगाए थी और ऋतू दीदी सर के नीचे 2 तकिये लगाए प्रीती को अपने से चिपकाये हुए लेती थी. मंजू कभी इन दोनों को देखती कभी ऊपर उन तीनो को, चेहरे पर एक हंसी थी.

"तारा, बंद कर यार दरवाजा ाचे से. और चैनल बदल तू प्रीती, ऐसे मजा नहीं आ रहा.", ऋतू दीदी के हाथ प्रीती की टीशर्ट के अंदर से उसका पेट सेहला रहे थे.

"करती हु यार रुक जरा.", चादर ऊपर से हटती तारा कड़ी होने के बाद कमर से थोड़ी नीचे खिसकी अपनी चुस्त निक्कर ऊपर करने के बाद मटकती हुई दरवाजे की चिटकनी लगाने लगी.

"ऐ मंजू, आजा न यार इधर. ऋतू प्रीती के साथ लगी है और ये दोनों चद्दर के अंदर. तू भी अकेली मई भी अकेली.", अलका की बात सुनकर मंजू शर्माती हुई नजरे ऋतू की तरफ करते हुए मुस्कुरा रही थी.

"अलका, उन दोनों को करने दे जो कर रही. तू इधर आजा मंजू के साथ और ले फिल्म चल रही है.", ऋतू की बात सुनते हे अलका झट्ट कड़ी हो कर मंजू की बगल में आ गई. ऊपर तारा और आरती ये देख थोड़ा आराम से चादर के अंदर खुद को ठीक करनी लगी और मंजू शर्माती हुई टेलीविज़न पर नजरे गड़ाए देखने लगी.

"ऋतू, लाइट बंद कर दे यार.", अलका ने मंजू के पेट पर हाथ रखते हुए कहा. मंजू की धड़कन तेज हो गई थी अलका का स्पर्श महसूस होते हे. ऋतू ने बेमन से खड़े होते कमरे में अँधेरा कर दिए. बस अब टेलीविज़न की रौशनी थी और सबकी नजरे वही.

"प्रीती, तू फिर हिल गई यार.", ऋतू दीदी ने वापिस आने पर प्रीती को सीधा हुआ देख कहा.

"आप आओ इधर मैं आपके पेट पर हाथ रखूंगी.", ऋतू मुस्कुराती हुई पाँव की तरफ राखी चादर दोनों के ऊपर करने से पहले पजामा ढीला करती प्रीती की तरफ पीठ करके लेट गई.

"सीख इनसे कुछ.", अलका ने जैसे हे मंजू के कान में ये कहा वह ऋतू को देखने लगी. चादर के अंदर जैसे अब प्रीती का पाँव ऋतू के ऊपर और हाथ सामने था.

"अलका यार ये ज्यादा नहीं हो रहा?", मंजू ने इतना कहते हे चादर ऊपर कर ली जिसमे अलका भी अंदर थी.

"यार फीलिंग ले रहे है बस कुछ कर तोह सकते नहीं.", अलका ने मंजू की टीशर्ट में हाथ डालते हुए हलके से पेट से ऊपर सेहला दिए. इन चारो की नजर स्क्रीन प् चल रहे दृश्य पर अटक गई. घुटने से ऊपर तक का एक गाउन पहने ये अंग्रेज युवती एक पेट्रोल पंप पर गाडी के बहार कड़ी आदमी से बात कर रही थी. जो उसको लेकर पंप के आखिर में बने स्टोर जैसी जगह आ जाता है. जल्द हे वह लड़की घुटने पर बैठी उस आदमी का लुंड हाथ में पकडे चूस रही थी. तभी आरती की धीमी आवाज से इन चारो के कान खड़े हो गए.

"तारा, ये ऐसे कैसे करते है? और सबका इतना बड़ा होता है क्या? आह्हः.. आराम से दबा न.", प्रीती ने ऋतू के कान में कुछ कहा जो किसी को सुनाई नहीं दिए और अगली आवाज तारा की सुनाई दी.

"अरे वह इतना सबका होता है. कुछ का बड़ा भी.. हाथ हटा न.. और अपने यहाँ सबका ऐसा नहीं होता. लेकिन फिर भी इस से बड़ा जरूर होता hai..siii.. कामिनी धीरे से.", उन दोनों की बात सुनकर अलका ने भी मंजू को कुछ कहा.

"उन्हें नई पता के किसी का इस से कही ज्यादा भी बड़ा है.", मंजू ने होंठ अलका की तरफ करते कहा तोह अलका ने हलके से चूम लिए.

"उन्हें बताना भी मत. वह बिल्ली जो हमको देख रही है, खा जाएगी.", अलका की बात सुनकर मंजू ने प्रीती की चमकती आँखे देखि और मुस्कुरा दी.

"यार ये सही है. देख जरा प्रीती.", ऋतू की बात सुनकर प्रीती ने फिल्म में देखा तोह वही आदमी अब उस लड़की की टांग पूरी ऊपर उठाते हुए पीछे से चुदाई कर रहा था. बड़े सफ़ेद चुके हवा में पेंडुलम से हिल रहे थे.

"दीदी, तरय करना.", प्रीती ने हलके से ऋतू के उभर पर निकला निप्पल सहलाते हुए कान में हे कहा.

"ाःह. पागल मरवायेगी. जब करुँगी तब करुँगी लेकिन लगता है तू ज्यादा जवान हो रही है.", ऋतू ने पलट कर प्रीती की निक्कर में हाथ डालते हुए एक कूल्हे हो दबा दिए.

"मैं बाथरूम हो कर आई.", आरती की आवाज पर ये चारो ठीक हो गई. उधर फिल्म में वह आदमी अब लड़की के चुचो पर अपना पानी गिरा रहा था.

"छियई..", मंजू के ऐसा कहते हे अलका हंसने लगी.

"अंदर लेने में कोई हर्ज़ नहीं और अगर वही सैंट्रो पर पानी गिरा दिए तोह छी. देख ले ऋतू इस दुल्हन को.", अलका की बात सुनकर ऋतू ने मंजू का गाल खींच दिए.

"यार मैं भी तुम्हरे पास आ रही हु.", तारा निक्कर बनियान में हे उठाकर Ritu-Manju के बीच हे गद्दे पर आ लेती. आरती बाथरूम से बहार आई तोह मुस्कुरा रही थी.

"मैं सोने लगी यार तुम देखो ये फालतू."

"खुद का हो गया तोह नींद आ गई. सही है आरती की बची.", तारा की बात पर सभी हंसने लगे. मंजू दिनभर से थकी थी तोह आँखे उसकी बी भरी हो रही थी.

"ऐ चल सो जा ऊपर जा कर. परेशां मत हो, तू काम कर रही थी सारा दिन.", अलका ने प्यार से मंजू का गाल सहलाते हुए कहा.

"यही सो जाती हु न यार, ाचा लग रहा है.", मंजू ने अलका को हैरान कर दिए जब उसने करवट अलका की तरफ करते हुए सीधा होंठो को चूमते हुए उसके साथ हे चिपक कर लेट गई.

"सीधा 6 रन. नॉट बाद.", ऋतू की बात पर अलका के चेहरे पर भी हंसी आ गई. फिल्म में अब अलग दृश्य चल रहा था. ये कोई गाये का तबेला था जाया बहोत मॉटे चुचो वाली जवान औरत दूध निकल रही थी. ाआधे चुके कपडे से बहार निकल कर उसकी कामुकता बढ़ा रहे थे. घास काट रहा आदमी उसको देख कर मुस्कुराया और चारा रखने वाली जगह चल दिए. पीछे हे वह औरत.

"यार ऋतू इसके देख कितने बड़े है.", तारा की बात पर ऋतू ने दृश्य देखा जहा वह औरत अपने कपडे निकाल कर दोनों चुके दबा रही थी. आदमी भी अपनी पंत खोलता जड़ल नंगा हो गया था.

"तेरे भी हो जायेंगे. लेकिन इतने बड़े होंगे पता नहीं."

"उधर ग्रीस में बहोत होते है इतने बड़े.", प्रीती की बात पर तीनो ने उसकी तरफ देखा.

"ऐसे क्या देख रही हो. होता है न जगह के हिसाब से.", प्रीती ने ऋतू को बाहों में लेते हुए प्यार से जवाब दिए.

"चल यार सोना हे बेहतर है अब.", अलका ने भी मंजू की तरह सर तकिये पर रखते हुए कहा.

"बोल दो दीदी, ऐसे नींद नहीं आने वाली.", प्रीती ने ाचे से ऋतू की टीशर्ट में हाथ डालते हुए अलका की और हँसते हुआ कहा.

"यार आंटी के भी ऐसे हे है. देखे तोह नहीं पूरे लेकिन पता चल हे जाता है.", अलका ने इतना हे कहा और ऋतू प्रीती के साथ हे मुस्कुराने लगी.

"वैसे बात सही है अलका की.", तारा सामने से ऋतू की और खिसक आई.

"हाँ तोह मैंने कब मन किआ. मुझे पता था के वह क्या कहने वाली है. ज्यादा हे रहने लगी है न उनके साथ, शायद टिप्स ले रही होंगी.", तारा ने गर्दन घूमते हुए पीछे देखा और इधर ऋतू ने उसकी बनियान में हाथ दाल लिए लेकिन तारा आराम से अलका को हे देखने लगी.

"तूने बड़े करने है क्या? मैं सिर्फ एक्सरसाइज और डाइट जान रही हु उनके साथ.", तारा को हे जवाब दिए था अलका ने

"मुझे ये बड़े करने है, जैसे तेरे हिलते है वैसे और थोड़े बड़े.", तारा का इशारा कूल्हों की तरफ था.

"उसके लिए तू भी वही म्हणत कर जो अलका ने बड़ी मुश्किल से हे सही लेकिन कर तोह ली है.", ऋतू की इस बात के पीछे जो राज था वह सिर्फ अलका जानती थी.

"मर्डर जाएगी ये. तू मत लगा इसको नहीं तोह लेने के देने पड़ जायेंगे. और प्रीती तू भी सो जा अब.", अलका की बात पर प्रीती ने ऋतू के कान में कुछ कहा तोह ऋतू ने पलट कर गाल चूमते हुए उसको अपने साथ हे लिटा लिए

"गूडनिघत और तुम दोनों भी सो जाना अब.", ऋतू दीदी ने इतना कहा और टेलीविज़न बंद करने के बाद अलका और तारा ऊपर बीएड पर चली गई.

ये सब नादान से परिंदे इस छोटे से दायरे में हे चेहचाहट हुए खुश थे. इतनी हे दुनिया थी और यही इनकी खुशियां और ताक़त. सब एक हे तोह थे और साथ भी.

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सभी लड़किया जब ऊपर व्यस्क फिल्म देख रही थी तोह ये 2 भी थी जो बिस्टेर पर लेती बातों से हे खुद को तस्सली दे रही थी. मधु बुआ के दिन से आज जांघो के बीच खाज हो रही थी लेकिन न जगह थी न अर्जुन से मिलान की आस. शाम को कमरा लड़कियों ने हथिया लिए था तोह ये अपनी शरारती बड़ी भाभी के कमरे में आ गई थी सोने. ललिता जी भी आज कुछ ज्यादा हे अंदर से गरम थी. उम्र के इस पड़ाव पर कुछ ज्यादा हे उफान रहता है क्योंकि कुछ साल बाद तोह सब ख़तम होना हे होता है.

"भाभी आज थोड़ी परेशां हो आप? कोई बात है क्या?", मधु की आवाज से ललिता जी ने वैसे हे लेते हुए जवाब दिए.

"कुछ नहीं बस कभी कभी लगता है के क्या ज़िन्दगी है हमारी. सारा दिन काम करते रहो और रात में कोई प्यार नहीं कोई साथ नहीं."

"भैया ध्यान नहीं देते बिलकुल भी, मैं आई हु फिर भी घर नहीं आये तोह आपके पास कितना रुकते होंगे.", मधु की आवाज में अपनी भाभी के प्रति स्नेह और चिंता थी.

"उन्हें 6 साल तोह हो गए मेरे पास ढंग से सोये हुए. ऊपर से ऐसे सोने का क्या फायदा की सुख हे न पंहुचा सके. अशोक तेरा ख़याल रखता है?"

"कैसा ख़याल भाभी? साल में 6 महीने बहार और बाकी फैक्ट्री, टूर और पैसा. यार हे नहीं आखिरी बार दोनों कब दिन में साथ थे. लेकिन भैया तोह हमेशा आपके aas-pas हे घूमते थे उन्हें क्या हो गया?"

"नयी का चस्का और पैसे. होता कुछ नहीं लेकिन मजे के लिए 30 की देखते है. मैं हाथ भी रख दू तोह नींद आने लगती है.", ललिता जी बात करते हुए भी सोच रही थी.

"सही बात है आपकी. पता नहीं इन सबको 40 पर करते हे अपनी बीवी काम नजर आने लगती है और बहार की गन्दगी जैसे sona-chandi हो.", मधु के स्वर में नाराजगी थी.

"तू तोह अभी जवान है मधु और कमी भी कोई नहीं है. अकेले रहती है तोह किसी तरह ज़िन्दगी जी हे सकती है. यहाँ तोह ये परिवार भी मोहल्ले जैसा है."

"तोह भाभी आपने कभी सोचा है किसी के साथ करने का?", मधु ने थोड़ी शंका से कहा.

"हाँ जिसके साथ तूने सोचा मैंने भी सोच लिए.", ललिता जी के चेहरे पर एकाएक मुस्कान आ गई.

"Kkk..kya किआ है मैंने?"

"लाडो मैंने तोह ये कहा के तूने जिसके साथ सोचा. ये नहीं की तूने किआ है.", ललिता जी की ऐसी चुहल देख मधु बुआ के चेहरे पर लाली आ गई.

"सोच तोह जो मर्जी लो. उसमे कोई हर्ज नहीं है.", मधु बुआ ने जैसे कुछ याद करते हुए तकिया ब्याह के नीचे लगाया तोह ललिता जी की चमक बढ़ गई.

"हाँ वह भी ऐसे हे तकिया रखता है हाथ के नीचे जैसे तूने उसको याद करके रखा है.", मधु बुआ हैरत से अपनी बड़ी भाभी को देखने लगी.

"चल अब सो जा. मजे ले रही हु तेरे.", ललिता जी ने कह तोह दिए लेकिन मधु को चैन न पड़ा

"आपने अर्जुन के साथ किआ है न? सच कहु तोह मैंने किआ है और मुझे उसकी हे याद आ रही है.", मधु बुआ ने हिम्मत दिखते हुए जवाब दिए.

"वह तेरी हालत देख कर हे मैं जान गई थी. सरोज थोड़ी भोली है और रेखा के प्रति गंभीर इसलिए उस दिन मैंने ज्यादा दबाव नै डाला था. उसको अर्जुन के बारे में बताने का मतलब भी यही था मेरा. और वह कभी उसके साथ ऐसा नहीं करेगी इसलिए मैंने अब ये बात कही. और अर्जुन हे है जो 15-20 दिन में कभी इस बुढ़ापे पर दया दृष्टि दाल देता है. 4 बार अभी तक किआ है और सच कहु तोह भोला है वह जो उसको मेरे जैसी के साथ ख़ुशी मिलती है.", ललिता जी की बात सुनकर मधु बुआ ज्यादा कुछ सोच न सकीय थी.

"जैसा उसका है तोह कोई और झेल भी नहीं सकता. आप ज्यादा अनुभवी है और मेरी हालत तोह कैसी कर दी थी शायद आपने जान हे ली होगी.", मधु अब अंदर से थोड़ी निश्चिंत थी.

"हाँ वह बात भी है मधु. ऊपर से वह सबकी आँखों के सामने रहता है तोह समय निकलना मुश्किल हो जाता है. लालच नहीं कर सकती उसके साथ क्योंकि वह दिल से करता है. लेकिन आज लगता है नींद की गोली लेनी पड़ेगी.", ललिता जी की बात सुनकर मधु भी कड़ी हो गई.

"मेरे लिए भी निकाल हे दो. ऐसे तोह मैं भी न सो सकुंगी.", ललिता जी ने अलमारी से 2 गोलियां निकल कर एक मधु को दी और एक खुद खा ली बोतल से पानी पीते हुए.

"मंगलवार को पूरा मौका मिलेगा. दिन में तू और रात को मैं. हफ्ते की कसार निकल लेना.", ललिता जी की बात पर मधु ने आँखे बड़ी करते हुए देखा

"मंगलवार? एक तोह इतने दिन पड़े है और वैसे मंगलवार को क्या है?"

"माँ जी **** शहर जा रही है तोह रेखा भी साथ जाएगी. बड़ी गाडी में पिताजी, कोमल, अलका, ऋतू, प्रियंका और मंजू भी उनके साथ जाएँगी. रेखा की बात हुई होगी माँ जी से.", ललिता जी की बात सुनकर मधु ने हामी भरी और फिर आँखें बंद कर ली. कही कोई ज़िन्दगी से ज्यादा हे खुश था कही बस ाची ज़िन्दगी की आस में खुश था. ये दिन भी गुजर गया था समय के पहिये के साथ हे.
 
अपडेट 88

निर्णय - गलत सही कुछ नहीं


"मेनका, एक बार खुद को ठीक कर लो फिर वापिस सो जाना. मैं जाने लगा हु.", अर्जुन ने कपडे पहन लिए थे और बाथरूम से बहार आया तोह मेनका को वैसे हे करवट के बल निर्वस्त्र लेते देख उठाने लगा.

"तंग मत करो अर्जुन, प्लीज. सोने दो अभी नहीं उठना मुझे."

"बिस्टेर देख लो और दरवाजा लगा लो, सोती रहना फिर जब तक दिल करे.", अर्जुन ने एक निप्पल मसल दिए था इस बार.

"िसष्ठ.. उठ रही हु.. आठ maa..marr गई.", सिसकी लेने के बाद ये दर्द भरी चीख. मेनका को ऐसा लगा जैसे जांघो के बीच कोई बड़ा घाव हो और पेट तक दर्द. थोड़ा आँखे अपनी छूट पर लगाती वह देखने लगी तोह परेशान हो गई. छूट के होंठ आपस में चिपके हुए थे लेकिन दोनों हे आधा इंच ज्यादा उभरे और दरार में पपड़ी बन्न गई थी खून और वीर्य की. फिर एक बार पूरे बिस्टेर पर निघा डालते हे हैरानी बढ़ गई. खून के 2 बड़े धब्बे सूख कर पक्के हो चुके थे.

"ाः.. उठा नहीं जा रहा और ये सब क्या है?", अपने चुचो को छुपाती वह फिर से छूट पर देखने लगी

"तुम इधर आओ मेरे साथ.", अर्जुन ने सहारा देते हुए मेनका को बाथरूम की कोड पर बिठाया और फिर चादर उतार का एक तरफ रख दी. अलमारी से एक नयी चादर बिछाने के बाद वापिस बाथरूम में आ गया.

"इसमें गरम पानी आता है?", अर्जुन के पूछने पर सिमिति सी बैठी मेनका ने हां में गर्दन हिला दी. रात भर वह खुल कर अर्जुन का साथ दे रही थी लेकिन अब जैसे दुइया भर की शर्म सिर्फ उसके हे हिस्से आ गई हो. चुचो और छूट को छुपाती वह दर्द में भी शर्मा रही थी. कुछ देर बाद वह गरम पानी से भीगा टोलिया लगते हे जैसे पेट इकट्ठा हो गया था मेनका का, घुटने जोर से दबती वह 'आह्हः' करती दर्द सहने लगी. अर्जुन आराम से छूट के सूजे हुए हिस्से को साफ़ करता हुआ फिर अंदर की लकीर के साथ भी वैसा हे करने लगी.

"एक बार नाहा लो फिर मैं तुम्हे बिस्टेर पर छोड़ दूंगा.", अर्जुन ने जवाब सुने बिना हे मेनका को फुहारे के नीचे बैठा दिए. पानी निवाया था और जैसे अब पूरे शरीर को हे आराम मिलने लगा हो. चुचो पर बने निशान और सूजन में भी आराम मिलने लगा था. लेकिन फिर से उसको उठाते हुए अर्जुन ने थोड़ा बहोत शरीर हे सुखाया और गॉड में उठा कर कमरे में ले आया.

"अब आराम से सो जाओ और अगर दर्द की दवा हो तोह मैं दे देता हु.", मेनका ने अपने चेहरे के पास अर्जुन को देख कर हलके से होंठ चूमने के बाद कहा.

"तुम ज्यादा हे चिंता कर रहे हो मेरी. अब आराम है पहले से. गाउन पकड़ा दो मेरा जरा.", हिम्मत करती वह गाउन पहन कर बिस्टेर के किनारे आ बैठी.

"चलो फिर मैं दरवाजा लगा लेती हु.", अर्जुन ने सहारा देना चाहा तोह वह मुस्कुरा कर मन करने लगी. टाँगे फैला कर आराम से चलती वह अंदर के दरवाजे पर आ कड़ी हुई. इस बार अर्जुन ने गले से लगते हुए खुदसे हे मेनका को प्यार से चूमा और हलके से कूल्हों पर चपत लगा दी.

"आराम करना अब. स्कूल में मैं बता दूंगा की तबियत खराब है तुम्हारी इसलिए नहीं आई.", अर्जुन ने चिटकनी खोलते हुए कहा

"नहीं. ये कहना के मुझे जरुरी काम से गांव जाना पद गया, आज देर रात तक वापिस आ जाउंगी.", मेनका के इस जवाब पर अर्जुन खुद का सर खुजाने लगा.

"सॉरी. मेरी बात कहता तोह पक्का तुमसे मिलने कोई आ हे जाता."

"बिलकुल ठीक. चलो अब जाओ और ध्यान रखना.", मेनका अर्जुन को जाता देखने लगी. दरवाजे के पास हे अँधेरे से निकलता एक मिनट बाद जा चूका था. दर्द में भी मुस्कुराती वह दरवाजा बंद करती हुई एक बार फिर मीठी नींद में खो गई.

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पार्क में हलकी दौड़ लगाने और आचार्य जी के साथ कुछ समय बिता कर अर्जुन 6 बजने से पहले हे घर पहुंच गया था. दादाजी से बातें करने और दूध पीने के बाद बगीचे में पानी देता वह बस आचार्य जी की कही बातों पर विचार कर रहा था. 15 मिनट बाद घर के अंदर आया तोह अपनी माँ और ताई जी से मिलकर माधुरी दीदी के कमरे घुस गया. ऐसा वह करता हे रहता था, किसी के भी कमरे में सुबह सुबह परेशां करने के लिए. यहाँ माधुरी दीदी तोह नहीं थी लेकिन ढीली आसमानी रंग की एक खुली टीशर्ट पहने करवट के बल सोई प्रियंका दीदी जरूर दिख गई.

38 आकर के उनके बड़े चुके जैसे बिस्तर पर ठीके थे अंदर ब्रा न होने की वजह से. अर्जुन ने उन छोटी फुटबॉल को देखा और पास बैठ कर हलके से दबा दिए. प्रियंका दीदी वैसे हे सोई रही. उन्हें हिलता न देख वह बहार से हे ऊँगली फिरता उनका चूचक ढूंढ़ने लगा. वह छोटा मूँगवाली के दाने जैसा चूचक निचले बड़े चुके के पास हे हल्का उभरा हुआ था. प्यार से उसको सहलाते हुए वह दीदी के चेहरे को भी देख रहा था. यहाँ नींद में हे वह जैसे मुस्कुरा रही थी. अगली हरकत पर ये मुस्कान लम्बी हो गई जब उनका गरम मुलायम पपीता अर्जुन ने ढीली टीशर्ट के अंदर से हे निर्वस्त्र अवस्था में हाथ में भर कर हलके से दबा दिए. घुटने खुद हे मदद गए थे प्रियंका के और फिर जैसे हे आँख खुली तोह कमरे में कोई न था.

"ये लड़का नींद में भी पागल करता रहता है. मिलने दो जरा अकेले में.", करवट दूसरी तरफ करती वह मुस्कुराती हुई फिर सो गई. उनके पाँव की तरफ खड़ा अर्जुन भी चुपचाप हँसता हुआ अंदर वाले बाथरूम में हे नहाने चला गया.

नहाने के बाद जैसे हे टोलिया उठा कर शरीर पर डाला तोह हक्क पर लटकी काली मैक्सी के नीचे से दिख रही ब्रा की तन्नी नजर आ गई. कुछ सोच कर अर्जुन ने सावधानी से इस बड़ी ब्रा को हाथ में लिए और उसके बड़े कप पर ऊँगली राखी जहा वह रंग में गहरा और गीला था. अपनी ऊँगली को तोलिये से पांच कर फिरसे दूसरे कप पर लगाया तोह यहाँ भी वही गीलापन. वापिस वैसे हे रखने के बाद वह पजामा पहन कर ऊपर कमरे की और चल दिए. शरीर में अलग हे झुरझुरी दौड़ रही थी और खयालो में खोया वह बिना इधर उधर देखे कमरे में खड़ा अलमारी से स्कूल के कपडे निकल रहा था के पीछे से ये 2 नरम बाहें उसके बदन से लिपट गई

"तारा.?"

"कैसे पहचान लिए बिना देखे?", तारा वैसे हे लिपटी अर्जुन से पूछने लगी.

"ये जो नरम हिस्सा लग रहा है न तुम्हारा मेरी पीठ पर, इनका अगला तीखा भाग बता रहा है के अंदर कुछ नहीं है. और ऐसे तोह तारा हे सो सकती है. वैसे इतनी सुबह मेरे साथ ये और कौन कर्ज.", अर्जुन की बात पर हल्का शर्माती हुई वह उसकी चौड़ी उभरी छाती पर उंगलिया फिरने लगी.

"ये तुम्हे याद कर रहे है इसलिए इतने सेंसिटिव है कल रात से हे. लेकिन एक तोह तुम दिखाई कहा देते हो आजकल और ऊपर से तुम्हे मैं नजर हे नहीं आती हु.", अर्जुन सुबह से हे भरा हुआ था आज. पहले मेनका, फिर प्रियंका दीदी के बड़े उभार और बाथरूम में गीली ब्रा. तारा के इन नरम बड़े चुचो ने जैसे उसका तनाव और बढ़ा दिए था. घर में इस समय या तोह सभी अपने काम में लगे थे या तैयार हो रहे थे. अर्जुन को जगाने तोह कोई आने वाला नहीं था क्योंकि ज्यादातर ने उसको तैयार होने के लिए ऊपर जाते देख लिए था.

"दरवाजा बंद करके वापिस आ जाओ.", अर्जुन ने इस्त्री की हुई कमीज और पतलून कुर्सी पर रखते हुए अलमारी बंद की और इधर तारा फुर्ती से दरवाजा बंद करने चली गई. अर्जुन ने भी अपनी तरफ का दरवाजा देख लिए था जो पहले से हे बंद था. जांघ से 3 इंच नीचे की वह छोटी सी इलास्टिक वाली निक्कर पहने तारा कूल्हे हिलती उसकी तरफ आई तोह अर्जुन ने बहून में ऊपर उठाते हुए उसको अपने साथ हे बाथरूम में ले लिए. शरीर से दोनों हे छोटे कपडे पल भर में नदारद थे और पूरा baal-vihin नाजुक जिस्म अर्जुन के सामने. नरम 34-डी के बड़े चुचो पर उभरे हुए निप्पल देख अर्जुन ने दोनों पर हाथ रखते हुए तारा को दिवार से लगा लिए. पागलो की तरह एक दूसरे को चूमते हुए वह अपने अंदर भरी आग को मिलकर ठंडा करने का प्रयास कर रहे थे.

नंगी टाँगे ऊपर उठती तारा एक हाथ से अर्जुन का बड़ा लुंड मसलती हुई जुनूनी अण्डां में होंठो को चुसवा रही थी. अर्जुन का पजामा भी फर्श पर गिरा पड़ा था. दोनों चुके ाचे से मसलने के बाद अर्जुन ने उन मुलायम फांको को ऊँगली से कुरेद कर जायजा लिया तोह वह जैसे चिकनाहट की बाढ़ आ चुकी थी. सबसे ख़ास छूट थी तारा की जो कही ज्यादा नीचे और बिलकुल जांघो के जोड़ पर थी. अर्जुन ने देरी न करते हुए टमाटर सा लाल सूपड़ा उस हिस्से पर रगड़ते हुए एक बड़े दूध को मुँह में भर लिए.

"शठ. आह्ह्ह्ह.. जल्दी करो न.. इन्हे बाद में पी लेना आह्हः..", अर्जुन ने अनसुना करते हुए उस मुलायम बड़े वक्ष को होंठो में दबाये रखा लेकिन जैसे हे सूपड़ा छूट के छेड़ पर दबाया तोह तारा ने भी टाँगे खोलते हुए साथ दिए. दोनों हाथ उसके कंधे पर रखती वह अपनी छूट की गर्मी से निजात पाना चाहती थी.

"ाःह.. आराम से अर्जुन.. आठ.. हर बार दुखता है.", कच से आधा लुंड अंदर दाल दिए था अर्जुन ने उस मुलायम छूट में लेकिन ऐसे में पूरा डालना और चुदाई करना मुमकिन न था. दोनों बढे कूल्हे ऊपर उठाते हुए जोर लगाया तोह तारा भी उसकी गर्दन पकड़ कर हवा में उठ गई. उसको ऐसे उठाये हे अर्जुन ने ये अगला धक्का लगा दिए.

"उम्.. ाः..", तारा ने इस धक्के को जज्ब कर लिए लेकिन अर्जुन के होंठो में अपना मुँह दबाये वह चीख को भी रोक चुकी थी. जिस्म को पूरा होने का एहसास हुआ तोह तारा खुद हे अर्जुन की कमर से टाँगे लपेटे गांड हिलती झटके देने लगी. अर्जुन शीशे से उसकी गुलाबी छूट में फिसलते अपने डंडे को देख रहा था. तारा इस कामुक पल में अर्जुन के सीने में अपने दोनों सतांन दबाये ऐसे धक्के लगा रही थी की अर्जुन खुद को उस लचीली बड़ी गांड को दबाने से न रोक सका.

"आठ.. यहाँ भी करेंगे यार.. आठ.. पहले बस थोड़ा आराम पंहुचा दे.. उम्म्म", कंधे पकडे वह इतना बोलकर उसके होंठो से होंठ लगाए पूरे जोश में खुद अपनी छूट को ढीला करवा रही थी. अर्जुन इस दृश्य में खोया उसके हिलते कूल्हों की नरमी का मजा ले रहा था. लुंड चुतरस से भीगा बता रहा था के तारा की आग कितनी ज्यादा भड़की हुई थी. लेकिन ये नाजुक छूट इतना बड़ा लुंड लेने में जरा भी आनाकानी करती दिखी.

"तुम्हारा पूरा शरीर जैसे तराशा हुआ है.. आह. वह देखो न..", अर्जुन की बात सुनकर तारा ने शीशे में वह कामुक दृश्य देखा जहा दोनों अंग एक दूसरे को गहराई से प्यार कर रहे थे. उसके गोल कूल्हों पर धंसी अर्जुन की मजबूत उंगलिया. सर इस तरफ के कंधे पर रखती वह अब 8 इंच के लगभग लुंड अंदर बहार कर रही थी. सूपड़ा आधा दीखता और फिर छूट को रगड़ता बच्चेदानी पर लगता.

"ाःह.. सच में अर्जुन.. उम्म्म.. मैं ये पल यही रहना चाहती हु.. तुम्हारे साथ हे.. आठ.. सुख मिला है ये.. आठ... ", अर्जुन ने उसके शरीर को आराम देते हुए खुद हे झटके लगाने शुरू कर दिए. छूट का तरल लुंड को गीला करने के बाद अंडकोष भी भिगो रहा था. सफ़ेद सा योनिरस जड़ पर इकट्ठा होता हुआ अंदर से और निकल रहा था. तारा ने शीशे में देखते हुए हे फुहारे का हैंडल घुमा दिए.

"मुझे उम्मीद नहीं थी की तुम ये इतनी जल्दी पूरा लेने लगोगी. लेकिन आज एहसास हुआ के तुम यहाँ भी ले सकती हो.", अर्जुन ने दोनों गहरी फांको के बीच उस छोटे से laal-bhoore छेड़ पर ऊँगली दबाते हुए कहा.

"तुम जहा कहोगे मैं ले लुंगी.. आठ.. बस मुझे थोड़ा टाइम दे दिए करो. तड़प इतनी बढ़ जाती है के दिल किसी काम में नहीं लगता.", तारा प्यार और चुदाई में खोई पानी में भीग रही थी. गांड में गीली ऊँगली कब अंदर जाने लगी उसको इस मजे में पता न चला. चुके सख्ती से फूले हुए अर्जुन के सीन्स से टक्कर ले रहे थे.

"आठ.. दिवार पर हाथ रख कर कड़ी हो जाओ.", अर्जुन ने जब तारा को जमीन पर उतरा तोह लुंड पहले से अधिक बड़ा और खतरनाक लग रहा था. प्यार से उसको पकड़ती तारा ने खुद हे अपनी गुलाबी छूट पर टिकाया और अर्जुन ने अंदर ठूस दिए. दोनों नरम गुब्बारे दबाता वह ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा था. तारा और अर्जुन अगले 5 मिनट तक बस आहे भरते एक दूसरे को तृप्त करने में लगे रहे. चरम इतना तेज था के वह कड़ी न रह सकीय. और लुंड छूट से बहार आते हे झटके खता हवा और तारा के जिस्म पर मॉटे मॉटे वीर्य के कतरे बरसाने लगा. अर्जुन भी पिछली दिवार से लग कर खुद को आराम देने लगा. तारा हिम्मत करती कड़ी हुई और अर्जुन के होंठो को ाचे से चूमने के बाद छाती से लिपट गई.

"तैयार भी होना है तुम्हे.", तारा की बात पर अर्जुन उसको अपने से लगाए फिर से पानी के नीचे खड़ा हुआ और ाचे से उसको अपने हाथो से सहलाते हुए नहलाने लगा. 10 मिनट बाद दोनों हे नंगे जिस्म अपने अपने कमरे में आ गए. तारा की छूट इस जबरदस्त चुदाई से अभी तक फड़क रही. इस एहसास को और महसूस करने के लिए बस ढीला पजामा और टीशर्ट पहन कर वह कुछ देर के लिए बिस्टेर पर लेट गई. चुके अभी तक तने हुए थे और उनपर हाथ रखती वह मुस्कुराती हुई हलके से दबा कर फिर से करवट के बल लेट गई. 'तुम्हारी अकड़ ठिकाने लग गई तोह अब आराम करने दो.', वह अपने उभारो से हे ये कर आराम करने लगी.

"बड़ी देर लगा दी मुन्ना तैयार होने में.", रेखा जी की बात सुनकर अर्जुन पराठे को गोल करता हुआ उन्हें देखने लगा.

"आँख लग गई थी माँ लेकिन अभी तोह 20 मिनट पड़े है.", इधर रुपाली भी खाना ख़तम करके उठने लगी तोह अर्जुन को कुछ याद आया.

"दीदी, आज मैं माँ के साथ सोऊंगा. इतने दिन से आप और ऋतू दीदी हे सो रही हो, मुझे तोह सोने को मिलता नहीं.", उसकी बात पर ऋतू दीदी ने भी रुपाली की तरफ मुस्कुरा कर देखा.

"2 दिन से तोह मैं भी नहीं सोई माँ के साथ. आज दोनों सोयेंगे."

"नहीं. मैं अकेला सोऊंगा क्योंकि आप पहले हे 10 दिन लगातार सोई थी.", रुपाली बस मुस्कुरा रही थी और अर्जुन को बचे की तरह ऋतू दीदी से nok-jhok करते देख रही थी.

"इतना बड़ा बीएड है. फिर मेरे सोने से तुझे क्या परेशानी है?"

"बीएड बड़ा होने से क्या होता है? आपने मुझे तोह कोने में कर देना होता है आँख लगते हे और खुद माँ को अपनी तरफ कर लेती हो. नहीं मतलब नहीं. सिर्फ मैं सोऊंगा और वह भी 2 दिन.", अर्जुन के सर को दुलारती रेखा जी अपने बेटे को खुद हे पराठा खिलने लगी.

"ऋतू, तू बड़ी है तोह मान जा. ये छोटा है और इसकी बात भी सही है. रुपाली भी समझदार है तोह 2 दिन ये तेरे साथ सो जाएगी.", अपनी माँ की बात सुनकर अर्जुन की आँखे ख़ुशी से चमक उठी और वह बैठा हुआ हे ऋतू दीदी को अंगूठा दिखने लगा.

"2 दिन इसके तोह 3 दिन मेरे और बाकी 2 दिन रुपाली के. लगाओ इसको अपने सीने से, बैलबुद्धि.", ऋतू दीदी भी पलट कर उसको जीभ दिखती चिढ़ाने लगी

"ऐसा नहीं कर सकते के हम दोनों 4 दिन माँ के साथ सोये?", रुपाली की बात पर अर्जुन जैसे सोचने लगा.

"आईडिया ाचा है लेकिन 3 दिन. एक दिन मैं अकेला तोह मैं ऋतू दीदी से आगे रहूँगा और आप उनके बराबर.", अर्जुन की बात पर रुपाली ने भी हँसते हुए उसका गाल खिंच लिए.

"ये सच में हे छोटा है माँ. ऋतू ठीक कहती है के ये शरीर से हे बड़ा है. अभी तक ऐसी बातो पर जिद्द करने वाला बचा.", रुपाली की बात सुनकर ऋतू ने भी साथ ताली मरते हुए अर्जुन का दूसरा गाल खींच दिए. वह मुँह में पराठा भरे ऊपर चेहरा करता अपनी माँ को देखने लगा.

"ओह लेलेलेले. मम्मी का बचा रोने लगा है? लगा लो माँ इसको सीने से नहीं बहाना करता स्कूल से भी चट्टी मार लेगा. और घडी देख ले माँ के मुन्ने.", रुपाली दीदी प्लेट और कप उठा कर ले जाती हुई अर्जुन को छेड़ गई.

"बस करो तुम सब. मेरे लल्ला को अगर किसी ने कुछ कहा तोह रोटी नहीं देने वाली.", ललिता जी ने ऋतू दीदी का कान खींच कर अर्जुन की तरफ आते हुए उसको पानी का गिलास दिए और सर पर हाथ फेरती अपनी देवरानी से बोली.

"रेखा तू भी बोल दिए कर इन्हे की अगर वह छोटा है तोह ज़िन्दगी भर वैसा हे रहने वाला है. स्कूल की क्लास कोई है जो 2 साल एक साथ फांद लिए. चल बीटा तू स्कूल जा और इन सबको आज मैं लगाती हु काम. महर्निया हो गई साडी, आज धोएंगी पूरे घर के परदे और कपडे फिर खाना. और रेखा ने काम किआ तोह कमरे में बंद.", बैठे बिठाये सबकी शामत आ गई थी. क्योंकि लड़कीओ को पता था के ललिता जी ने कह दिए तोह वह कर देंगी.

"दादी, ताई हमको सजा दे रही है?", ऋतू दीदी ने अपनी दादी के गले लगते शिकायत लगाई और अलका भी दूसरी तरफ से उनसे लगती हाँ में हाँ मिलाने लगी.

"क्यों भी ललिता, सुबह सुबह ये बच्चियां कैसे परेशां करदी.?"

"माँ जी, लल्ला के पीछे लगी हुई है इतनी देर से. वह तोह आधा पराठा बीच में छोड़ कर चला गया स्कूल.", यहाँ अर्जुन ने एक निवाला नहीं छोड़ा था और ललिता जी बढ़ा चढ़ा कर बोल रही थी.

"रेखा, वह जले वाला झाड़ू भी पकड़ा दे इनको. आज इनका दिल है काम करने का तोह फिर सारा घर हे साफ़ कर लेंगी. वैसे भी 6-6 जनि है ये तोह 2 घंटे में कपडे, परदे और saaf-safaai ख़तम कर देंगी. ऋतू मेरी अलमारी भी ठीक कर डीओ बीटा और लक्समी अपने दादाजी की कर देगी.", कौशल्या जी की बात पर ालक और ऋतू हैरानी से उन्हें देखती कभी एक दूसरी को.

"ये तेरे चक्कर में सब फंस गए. कहा था के माँ के सामने मत मजाक किआ कर और यहाँ दादी तोह बिलकुल नहीं सुनेंगी की उनका लाडला आधा खाना खा कर घर से चला गया.", अलका की बात सुनकर पीछे से आती आरती और माधुरी दीदी उन्हें गुस्से से देख रही थी.

"घर पता है कितना बड़ा है तुम दोनों को? हम कमरे में आराम कर रही है और यहाँ तुम्हारे साथ भुगतना पड़ेगा.", माधुरी दीदी की बात सुनकर ऋतू ताईजी को देखने लगी.

"ाचा कोई बात नहीं. जिसका दिल जितना करे उतना कर लेना नहीं तोह मत करना. मैं देख लुंगी बस परदे उतरवा देना.", कोमल दीदी की बात सुनकर अलका उनके गले लग गई.

"आपके साथ काम करने को मिले तोह सही. मैं तोह रोज तैयार हु.", कान में इतना कहती वह हंसने लगी तोह कोमल दीदी शर्माती हुई उसका गाल खींचने लगी.

"चल यार पड़े पड़े कोई काम तोह था नहीं. आज इन सबको घर से निकालो और लगो काम पर.", ऋतू दीदी का इशारा घर के बड़ो की तरफ था.

"मैं भी आज यही हु तोह फिल्म देखते है आराम से.", बहार से आती प्रीती को देख कर अलका मुस्कुराने लगी.

"तू फ्री है?"

"हाँ. पूरा दिन."

"सम्भालो कोमल दीदी इसको, ये उतरवायेगी परदे और जले.", अलका की बात सुनकर प्रीती कमर पर हाथ रखे सबको देखने लगी.

"चल आजा तुझे भी सिखाते है कुछ काम.", आरती ने उसको पकड़ते हुए कहा.

"मैं मंजू को छोड़ने जा रही हु, आ कर मिलती हु सबसे.", वह ये कह रही थी की मंजू salwar-kameej पहने मौसी के कमरे से बहार आती दिखी.

"मैं कही नहीं जा रही अभी. स्टेडियम के बाद चलेंगे उधर."

"वह बुआ घर पर अकेली है तोह..

"बस कर बस कर. चल तुझे मैं अपने साथ लगाती हु. पहले सब नाश्ता कर ले.", ऋतू दीदी ने उसको हाथ पकड़ कर खाने की मेज पर ले जाते हुए कहा.

"वैसे कोई बताएगा के इस सबका कारण कौन है.?"

"तेरे मिया जी. और ये ऋतू की बची.", अलका भी बराबर बैठ कर बोली.

.

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"मम, मिस मेनका जरुरी काम से गाँव गई है तोह आप उनकी अर्जेंट एप्लीकेशन लगा दीजियेगा. वह रात तक वापिस आ जाएँगी.", स्टाफरूम के बहार खड़ा अर्जुन स्कूल की प्रधानाचार्य मरस सिंगला को अभिवादन करने के बाद बता रहा था.

"ओह. उनके परिवार में सब ठीक है?", अपना चस्मा ठीक करती मरस सिंगला ने हाथ में पकडे कागज पर नजर डालने के बाद पूछा.

"जी उनका मैसेज तोह इतना हे था और ऐसा नहीं लगा के कोई परेशानी वाली बात हो. बाकी वह का आपसे मिल हे लेंगी.", अर्जुन ने उत्तर दिए तोह कमरे से बहार आ कर कड़ी हुई चारुल और अन्नू रुक कर सुन्न रही थी.

"Ok. थैंक यू फॉर थिस इनफार्मेशन. मैं उनके पीरियड्स का सुब्स्तितुते बनवा देती हु तुम बैग रख कर प्रेयर में जाओ.", शालीनता से जवाब देती वह अपने अनुशाषित स्वाभाव से चलती हुई ऑफिस की तरफ बढ़ गई.

"मेनका को क्या हुआ?", अन्नू ने जैसे हे अर्जुन से पुछा उसने दोनों को गुड मॉर्निंग कहने के बाद जवाब दिए.

"पूछ लेना आप. मुझे इतना हे बताया है के गाँव जाना जरुरी था काम से और देर रात तक लौट आएँगी.", चारुल आराम से अर्जुन को निहार रही थी जैसे कोई परवाह न हो किसी और की.

"ठीक है, मैं रात को फ़ोन कर लुंगी. वैसे तुम कब फ्री हो?", अन्नू की ऐसी बात सुनकर अर्जुन ने साड़ी तरफ ध्यान से देखा तोह वह वह बस तीनो हे थे.

"कल."

"ठीक है. बस जाने से पहले मिल कर जाना.", अन्नू ने ये बात हलकी मुस्कान से कही थी. गुलाबी चेहरे पर उसकी ये मुस्कान अर्जुन देख रहा था. फिर चारुल के वह होने का याद करते हे चुपचाप चला गया.

"क्या बात है अन्नू. दिलेर हो गई है जो खुलकर हे बात करने लगी है."

"यार देखने के बाद हे तोह बात की थी. और तुझे मैंने सब ram-katha सुना दी है तोह तुझसे तोह कोई डर नहीं."

"हम्म्म. वैसे क्या बात करने वाली है उस से?"

"बता दूंगी पहले बात क्लियर हो जाये.", अन्नू इतना कहने के साथ हे चारुल को लिए प्रार्थना की जगह चल दी.

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दिन ज्यादा अलग नहीं था हर रोज से. सभी कक्ष्ये समय पर पूरी हुई और आखिरी पीरियड ख़तम होने के साथ हे अर्जुन ने आकांक्षा को रुकने को कहा.

"दीदी के साथ चली जाना तुम. मैं थोड़ी देर तक आता हु और उन्हें भी बता देना की अगर थोड़ी देर रुकना चाहे तोह मैं तुम्हारे घर से उन्हें ले लूंगा."

"और कुछ?", अपनी बिल्लोरी आँखों से अर्जुन को निहारती वह जैसे बहोत कुछ कहना चाहती थी.

"ी लव यू. पता है यही सुन्न ने के लिए कड़ी हो.", अर्जुन ने हलके से गाल सेहलते हुए कहा तोह वह खुश होती हुई बिना जवाब दिए मुड़ने लगी.

"ाचा मतलब मैंने कहा और तुम चलदी.?"

"हाँ तोह मैं sunn-na चाहती थी. तुमने ये तोह नहीं कहा के मैं भी कहु." खिलखिलाती हुई वह बहार जाने लगी लेकिन रुक कर होंठो से हवाई चुम्बन देकर फिर उड़द चली.

"पागल है पूरी. लेकिन प्यारी भी.", अर्जुन वैसे हे अकेला क्लास में खड़ा कह रहा था फिर बैग उठा कर विपरीत दिशा में कंप्यूटर लैब की और चल दिए. यहाँ भी माहौल शांत था और पहली कतार में बीच वाले कंप्यूटर पर बैठी अन्नू कुछ काम कर रही थी.

"कहिये? मैं आ गया.", अर्जुन बराबर में हे कुर्सी पर बैठ कर स्क्रीन देखने लगा जहा अन्नू कोई फॉर्म भर रही थी. इशारे से उसको बैठे रहने का कहती वह अगले 5 मिनट तक काम करती रही और याहू ईमेल खोल कर कुछ सन्देश लिखने के बाद डिटेल वाला परचा साथ लगा कर भेज दिए.

"हाँ तोह मुझे ये जरुरी बात सबसे पहले तुमसे हे करनी थी. देखो अर्जुन मैं सिर्फ तुमसे हे प्यार करती हु और मुझे कोई लेना देना नहीं की दुनिया क्या कहती है या क्या सोचती है. मुझे चारुल ने बताया के तुम्हारे सम्बन्ध 2 और लड़कीओ से भी है जिसमे से एक शायद ख़ास है. लेकिन सच कहु तोह मुझे फरक हे नहीं पड़ा इस बात से. एक तोह तुमने पहली बार में हे कह दिए था के हम आज साथ है लेकिन कल का कुछ नहीं पता. दूसरा मेरे दिल ने हमेशा से मन है के जब मैं तुम्हारे साथ होती हु तुम भी दिल से मेरे साथ होते हो. बेशक तुमने कभी खुद से ये नहीं कहा के तुम्हे मुझसे प्यार है लेकिन मैंने हर बार ये बात तुम्हारी धड़कन से सुनी hai.Aur मेरी एक ख्वाहिश है बाकी बात करने से पहले.", अन्नू की आँखों में कोई ख़ुशी नहीं थी इस वक़्त बस हल्का दर्द था.

"तुम जो कहोगी मैं करूँगा अन्नू. बस ये दर्द चेहरे पर मत आने देना कभी.", अर्जुन अपना हे वादा भूलते हुए उसको गले से लगाए बैठ गया. अन्नू का दर्द उसको परेशां कर रहा था. जब दोनों ने शुरुअवात से हे मन था के इसमें कोई वादा, ज़िन्दगी का साथ या अर्जुन की तरफ से प्यार का इजहार न था तोह ये दर्द कैसे शामिल हो गया. अन्नू भी उसकी बाहों में सुकून महसूस कर रही थी लेकिन जल्द हे अलग हो कर वह सामने देखने लगी.

"इस संडे से लेकर अगले तक मुझे जितना प्यार कर सकते हो, करोगे? मैं वह 7 दिन हर रोज तुमसे मिलना चाहती हु और अगर पूरा समय अकेले मिला तोह चाहती हु की तुम मुझे अपने प्यार से इतना भर दो की कभी ऐसा न लगे के मैं तुमसे दूर हु.", अन्नू की दूर होने वाली बात पर अर्जुन के चेहरे सपाट हो गया था. जैसे चेहरे से नूर किसी अँधेरे में खो गया हो.

"कहा जा रही हो.?"

"लंदन."

"कितने समय के लिए?"

"अभी कुछ नहीं कह सकती लेकिन तुम्हे हर बात बताउंगी जाने से पहले. लेकिन जो मैं तुमसे चाहती हु वह."

"वह तुम्हारा हे तोह है, अन्नू. बस एक पल के लिए थोड़ा झटका लगा के अचानक से कैसे. लेकिन फिर ये सोचकर ाचा लगा के ज़िन्दगी अगर नए रस्ते खोले तोह हमको उन्हें देखना जरूर चाहिए. भैया भी तोह वही है है न तुम्हारे.", अर्जुन ने वह नाजुक हाथ अपनी हथेली में पकड़ा हुआ था.

"हाँ. और मैं बाकी का काम हे कर रही थी बस. कल तुम कभी भी घर आ सकते हो.", अन्नू कड़ी होने लगी तोह अर्जुन भी बहार निकल कर खड़ा हो गया रास्ता देते हुए.

"हम साथ चले घर?", अर्जुन ने ये बात ऐसे कही जैसे वह दिल से चाहता था के अब अन्नू जहा भी घर से बहार हो वह उसके साथ हे रहे.

"मैं तोह चाहती हु के तुम हमेशा साथ रहो. लेकिन चाहने से कभी हर ख्वाहिश पूरी हुई है? वैसा मैं भी यही चाहती हु के अब जितना समय साथ बिता सकते है बिताये.", अर्जुन उसके साथ हे चल दिए. गेट तक आने पर हे वह 100 बार इस चेहरे को देख चूका था जाने क्या अलग था अन्नू में की वह न चाहते हुए भी प्यार कर हे बैठा था. खली सड़क पर सीढ़ी गली के आखिर में हे अन्नू का घर था लेकिन आकांक्षा का भी. अर्जुन बजाये उस रस्ते पर जाने के पूर्वी के घर वाली सड़क पर अन्नू को लेके चल दिए. किनारे लगे शीशम और aam-neem के पेड़ो की चाहया में दोनों साथ चल रहे थे.

"Uncle-Aunty यहाँ अकेले रहेंगे?", अर्जुन ने बोलने की शुरुवात की और फिर से इस गुलाबी सरदारनी को देखने लगा. हलकी धुप भी जैसे इसके रंग पर असर दिखा रही थी. घने घुंगराले बाल कही से भूरे कही से ताम्बे चमकते अलग हे छत्ता बिखेर रहे थे.

"हाँ फिलहाल तोह रहेंगे यहाँ. तुम्हे कभी समय मिले तोह मेरी माँ से मिल लिए करना. उन्हें तुम ाचे लगते हो. वैसे कितना देखोगे मुझे? लैब से लेकर यहाँ तक मुझे देखते हे चल रहे हो.", और बात ख़तम हुई तोह अर्जुन का सर इस मोटी टहनी से टकरा गया.

"आउच.. दिखाओ इधर. बोल भी रही थी लेकिन सुनते कब हो मेरी.", अन्नू ने दोनों हाथो में अर्जुन का चेहरा थाम लिए. वह शांत सा बस मुस्कुरा रहा था. माथे पर रगड़ का लाल निशाँ था बस. अन्नू पर्स से रूमाल निकाल कर फूंक मरती उस जगह लगाने लगी. अर्जुन अभी भी बस उसके परेशां चेहरे और बड़ी आँखों को निहार रहा था.

"सुधर जाओ. Kam-akal हो सच में. यहाँ भी चोट की जगह नजरे मुझपे लगाए मुस्कुरा रहे हो.", अन्नू गुस्से में रुमाल जमीन पर फेंकती आगे चलने लगी लेकिन अर्जुन फिर बराबर आ गया.

"गुस्सा आ नहीं रहा बस तुम खुद हे कर रही हो. और मेरे देखने से अगर परेशानी है तोह नहीं देखूंगा. बस. अब आराम से चलो.", अन्नू न चाहते हुए भी अर्जुन को देखने लगी जो अब सामने देख कर चल रहा था.

"समझ क्या रहे हो खुदको. मतलब हमेशा खुदकी करते हो. ", सोलंकी के घर से आगे इस खली जगह दोनों खड़े थे और अर्जुन ने अन्नू की ये हालत देख बिना सोचे अपने सीने से लगा लिए. गिनती के घर थे जहा बहरपुर सन्नाटा था लेकिन अर्जुन को वैसे भी परवाह सिर्फ अन्नू की थी. वह भी गले लगते हे चिपक गई..

"अन्नू, मुझे मालूम है तुम्हारी हालत क्या है अंदर से. काश मैं मेरी कह सकता क्योंकि ये कहना भी सही नहीं होगा. तुम्हे कोई परेशानी नहीं होने दूंगा इन बाकी दिनों में. और तुम तोह संडे का कह रही हो न, मैं और तुम कल हे मिलेंगे, वह भी हमारे एकांत में. अब खुद को ठीक करो यहाँ गली में है हम.", अर्जुन अपनी जेब से रुमाल निकाल कर चेहरा ठीक करने लगा तोह अन्नू ने रुमाल चीन लिए.

"मेरा तुम्हारी वजह से गिरा न. ये मैं रखूंगी और चलो यहाँ से. सड़क पर हे लड़की को पकडे खड़े हो.", मासूमियत और शरारत चाँद क्षणों में वापिस आ गई थी चेहरे पर.

"और कल हम कब, कहा मिलेंगे?", घर से पहले हे ृक्क कर अन्नू ने पुछा.

"स्कूल से सीधा मेनका के घर. लेकिन मेनका जाएगी मेरे घर जहा मंजू भी होगी. 1 बजे से 6 बजे तक बस हम दोनों", अर्जुन ने जैसे इतना कहा तोह शर्मीली मुस्कान से अन्नू ने ना में गर्दन हिला दी.

"1 से 3. फिर तुम अपने घर और बाद में स्टेडियम. हम पहली बार मेरे बिस्टेर पर.", और हाथ हिलती वह अपने घर में चली गई. अर्जुन इस तरफ से हे आकांक्षा के घर चल दिए. उसकी मुट्ठी में भी वह साफ़ मुलायम रुमाल था जो अन्नू ने नीचे गिरा दिए था गुस्से में.

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अर्जुन घर आया तोह बहार आँगन तक फर्श चमक रहा था. रुपाली और वह अपने कमरों में बढ़ गए और कपडे बदलने के बाद खाने की मेज पर आ बैठे. बाकी सब भी उनके हे साथ बैठे थे या काम कर रहे थे.

"तुम्हारा खाना यहाँ नहीं है आज.", प्रीती ने धीमे से अर्जुन के कान में कहा और वह झट्ट खड़ा होता अपनी कुर्सी उसको दे कर गलियारे से निकल लिए. किसी ने खास ध्यान नहीं दिए इस तरफ क्योंकि रुपाली दीदी ऋतू के साथ घर की saaf-safaai की बातों में लगी थी और वैसा हे हाल बाकी सबका था.

अर्जुन ने बिना घंटी बजाये दरवाजा खोला और सीधा अंदर चलता ड्राइंग हॉल में आ गया. रेणुका रसोई में लगी हुई थी और पारवती स्लैब साफ़ करके अभी फारिग hi हुई थी.

"ाचा तुम अब आराम करो पारवती. काम होगा तोह मैं बुला लुंगी.", रेणुका की बात सुनकर पारवती गर्दन हिलती सीढ़ियों से ऊपर चली गई और रेणुका खुद हे खाना उठा कर टेबल पर लगाने लगी.

"बैठने के लिए कहना पड़ेगा क्या?", रेणुका की ऐसी बात पर अर्जुन भी पीछे हे रसोई में आ गया. दिवार पर टंगे साफ़ तोलिये से अपनी तरफ देखती रेणुका का चेहरा साफ़ करते हुए वह देख रहा था के वह अकेली कितनी म्हणत कर रही थी.

"खाना पारवती भी बना सकती थी. या प्रीती. तुम्हे काम करने की जेहमत उठानी नहीं चाहिए.", रेणुका के चेहरे पर भरपूर ख़ुशी थी अर्जुन के ऐसा करने पर.

"जब हम दोनों है तोह फिर हमारे काम तोह मुझे हे करने चाहिए. कौनसा मैं रोज हे करती हु. और अभी ऐसी हालत नहीं है के मैं बिस्टेर पकड़ लू. चलो अब यहाँ गर्मी में नहीं खड़े होना.", अर्जुन बात सुनकर वैसे हे परछाई सा पीछे चलने लगा.

रेणुका ने वही साड़ी पहनी हुई थी जो उसने खुद पसंद करके दिलवाई थी. हलकी गुलाबी लाल और वैसा हे डोरी वाला ब्लाउज. पूरी तरह से वह अपने ख़ास रूप में थी जैसा अर्जुन को पसंद था.

"बिंदी?", अर्जुन ने खुद दोनों की प्लेट लगते हुए माथे को खाली देख कर पूछा. रेणुका देख रही थी की अर्जुन वैसे हे उसके लिए खाना लगा रहा था जैसे उसकी भाभी रोमिला डालने लगी थी.

"कमरे में.", रेणुका ने भी उतना हे जवाब दिए और अर्जुन खुद हे उनको खाना खिलने लगा. रेणुका ने हाथ उठाया भी लेकिन कलाई को वापिस टेबल पर रखते हुए वह प्यार से देखते हुए खुद हे एक निवाला रेणुका का खिलता और एक खुद.

"सॉरी. देरी से आने के लिए.", रेणुका का हाथ पकड़ते हुए अर्जुन ने कहा तोह वह बस मुस्कुरा दी.

"फ्री तोह मैं भी सामने हे हुई हु. तोह समय पर हे आये हो."

"नहीं. पता होता तोह मैं रसोई में साथ हे होता. आगे से कोशिश करना के गर्मी में ज्यादा काम न करो.", बातें करते हुए अगले 10 मिनट खाना खतम करने के बाद अर्जुन खुद बर्तन समेत कर रसोई में रखने चला गया और रेणुका अपने कमरे में. अर्जुन प्रीती के बाथरूम से हाथ मुँह धोने के बाद रेणुका के पास हे आ गया. खुद को साफ़ और व्यवथित करने के बाद अलमारी के आईने कड़ी वह बाल ठीक करते हुए ये गोल छोटी बिंदी माथे के बीच में लगा रही थी.

"पता है आप बिंदी के साथ हे ज्यादा प्यारी लगती हो.", अर्जुन ने पीछे से बाहें उस गोर नरम पेट पर लपेटते हुआ आईने में रेणुका का अक्स देखते हुए कहा.

"और ये लगती भी तुम्हारे लिए है.", दोनों की नजरे आईने में हे एक दूसरे को देख रही थी.

"वैसे खुद को ऐसा हे नहीं रख सकती हमेशा?", रेणुका का यही रूप तोह पहले उसकी पहचान था.

"अब दिल नहीं करता और फिर इतना कुछ जो हुआ है उसके बाद हिम्मत नहीं यही कपडे सबके सामने पहन ने की."

"दिल पर इतना बोझ मत डालो. तलाक़ हुआ था और एक तरह से आज़ाद हुई हो. फिर आज़ादी ऐसी तोह नहीं होती की खुद हे उसको बेरंग कर दो.", प्यार से नाभि सहलाते हुए अर्जुन रेणुका की गर्दन पर हलके से फूंक मार रहा था. वह सामने से ये देख मुस्कुराती खुद उसकी कलाई को अपने पेट से लगाए थी.

"ठीक कहते हो. वैसे तुम बड़ी जल्दी समझदार होने लगे हो."

"हाँ. बड़ी जल्दी बाप भी बन रहा हु तोह बेटी को क्या कहूंगा के पापा बैलबुद्धि है.", गोर गाल पर हल्का सा चुम्बन करता वह हाथो को ब्लाउज के किनारो पर ले आया था.

"बीटा हे होगा, तुम्हारे जैसा. बेटियों की किस्मत मैंने देख ली है."

"तुम्हारे जैसी बेटी. लेकिन ज़िन्दगी के सभी फैंसले खुद लेने वाली.", अर्जुन ने ये पूरी बात कही तोह रेणुका ने पीछे सर घुमा कर उसका चेहरा करीब से देखना चाहा. अर्जुन ने गर्दन के पास से बाल हटते हुए ये खूबसूरत चेहरा हथेली से पकड़ कर पतले होंठ अपने होंठो से मिला लिए. रेणुका जाने कबसे अर्जुन के करीब आना चाहती थी और इस पल में आ चुकी थी. आहिस्ता से एक दूसरे को सुख देते हुए दोनों कुछ पल ऐसे हे खड़े रहे.

"दरवाजा?", अर्जुन ने अलग होने के बाद रेणुका को जैसे याद दिलाया.

"बस हमारा वाला बंद कर लो. बाकी कोई बात नहीं.", कानो से झुमके उतार कर आईने के सामने रखती वह जानती थी अब यही समय है जिसमे वह प्यार करने वाले है. अर्जुन भी चिटकनी लगा कर रेणुका को बिस्टेर पर ले आया.

"तुम्हे बुरा लगता होगा न के हम कितने समय बाद मिल पाते है.?"

"नहीं. मैं अब समझती हु और ाची बात है न. फिर तुम प्यार भी उतना ज्यादा हे करते हो.", रेणुका बाँहों में लेती अर्जुन के सीने पर उंगलिया घुमा रही थी. अर्जुन का हाथ साड़ी के ऊपर से हे रेणुका के सुघड़ माध्यम कूल्हों पर चल रहा था.

"और घर पे कैसे बताया इसके बारे में?", अर्जुन ने चिकने पेट पर हाथ रख कर कहा.

"किसी ने न कुछ पुछा न कहा. तोह मैं खुदसे क्या कहती?"

"मतलब कभी बाप का नाम नहीं मिलेगा?", अर्जुन ने ये बात कह तोह दी थी लेकिन उसका दिल धड़क रहा था ये सोचकर की रेणुका की प्रतिक्रिया क्या होगी.

"क्यों? इसको हमेशा पता होगा इसके पापा का. और प्रीती की शादी के बाद मैं खुद बता दूंगी.", रेणुका ने ये बात कही तोह आँखों में अलग हे चमक थी.

"लेकिन अब इसके पापा तोह मम्मी से प्यार नहीं करते. बस बातें करके मम्मी का मूड खराब कर रहे है.", रेणुका के सी ताने पर अर्जुन ने वह ब्लाउज सामने से उलट दिए. रेणुका को पता भी नहीं था के अर्जुन ने कब पीछे से डोर खोली. दोनों उभर उस सफ़ेद आधी कप की ब्रा में क़ैद जैसे अर्जुन से मिलने के लिए बस निकलने में लगे थे. बाए सतांन के ठीक ऊपर उस काले टिल पर होंठ रखता अर्जुन रेणुका का ऊपर वाला पाँव खुद पर रखता जैसे कपड़ो में से हे सामने लगा था.

"प्यार से करना."

"ये कहने की जरुरत नहीं है.", अर्जुन ने एक दूध प्यार से दबाते हुए रेणुका को अपने मजबूत बदन से पूरी तरह लगा लिए था. 10 मिनट बाद हे दोनों निर्वस्त्र से एक दूसरे से अमरबेल से चिपके जिस्म आपस में रगड़ते प्यार की अगली देहलीज पर थे. गोरी लम्बी फांको के बीच अर्जुन ने बड़े धीरज के साथ अपने जरुरत से बड़े लुंड को आधा फंसाया हुआ था. हर धक्के पर दोनों के शरीर जैसे सुकून से भर उठते. रेणुका ने इतने दिन बाद ये लुंड लिए था और सुपडे ने हे उसकी आँखों में नमी ला दी थी. लेकिन उसके बाद अर्जुन ने कोई जल्दी न दिखते हुए सिर्फ रेणुका को सुख और प्यार दिए. अब इतने हे लुंड से दोनों चुदाई का मजा लेते अपने मिलान को भरपूर जी रहे थे.

"आठ.. बस यही है जो कोई नाटक नहीं करता और मुझसे दिल खोल कर प्यार करता है.", रेणुका अर्जुन का एक निप्पल दबती हुई अपनी चिकनी छूट में चल रहे लुंड के बारे में कह रही थी. कहा तोह पहली बार के मिलान में वह आंसुओ की नदिया बहा चुकी थी और आज ये पहले से बड़ा और मोटा होने के बावजूद उसको प्यारा लग रहा था.

"अब ये तुम्हारी मर्जी से चलता है. पहले मेरी बात सुनता था.", नंगे कूल्हों के बीच हल्का पसीना उन्हें और चिकना बना रहा था. अर्जुन वह हाथ फेरता ये धीमी चुदाई करने में लीं था और रेणुका ने कब आधे से पूरा लुंड अंदर कर लिए अर्जुन भी न जान सका.

"आह्ह्ह्ह.. पहले से कही बड़ा है ये.", गहराई से लुंड ने छूट का पानी निकलना शुरू किआ तोह अब हर धक्के के साथ रेणुका मदहोश होती जा रही थी. चुके ज्यादा हे ठोस और निप्पल पूरे तने हुए उसके बदन की उत्तेजना जाहिर कर रहे थे. एक बार पहले हे छोटा सा स्खलन वह पा चुकी थी लेकिन इस बार दोनों लिपटे हुए अपनी मंज़िल पर एक साथ पहुंच रहे थे. अर्जुन को इस बात की चिंता नहीं थी की वीर्य कहा निकलना है.

"ऊपर आ कर करो.", रेणुका की बात समझता वह करवट लेते हुए हे ऊपर से रेणुका पर चा गया. अगले 10 धक्को में दोनों आँखें बंद किये लिपटे थे. अर्जुन ने अपना वजन घुटनो पे लिए था जिस से रेणुका उसके नीचे ज्यादा न दबे. हर बार वीर्य आखरी हद से टकराया था रेणुका की गीली छूट में. और 30 सेकंड तक अंदर वीर्य भरने के बाद अर्जुन फिर से बगल में आ गया था. लुंड अभी भी उस लाल हो चुकी गोरी छूट में पेवस्त था. दोनों ऐसे हे लेते रहे और थकन से अर्जुन की आँख लग चुकी थी.

'सच में बहोत प्यारे हो तुम. और पता नहीं भगवन ने कैसे ये मेहरबानी कर दी की वीराने में जी रही मुझ अभागिन का पूरा जीवन हे तुम्हारे हाथो बदल दिए. अर्जुन, भगवन न करे के कभी तुम पर कोई संकट आये लेकिन अगर ऐसा कभी हुआ तोह तुम्हारी रेणुका अपनी जान भी दांव पर लगाने से पीछे नहीं हटेगी. मेरी हर सांस बस तुम्हारे लिए है.', अर्जुन के शांत चेहरे को सहलाती वह अपने मैं में यही कह रही थी. अर्जुन के साथ उसको लगता हे नहीं था के पुराणी या आगे की ज़िन्दगी क्या थी या क्या होगी. बस उसका ये मासूम सा kam-umar हमसफ़र उसकी जीने की वजह बन चूका था. और इस वजह ने एक और वजह रेणुका के गर्भ में भर दी थी.

"मैं जानता हु तुम मेरे लिए कर सकती हो. अभी के लिए बस वापिस मेरे सीने से लग कर लेट जाओ.", अर्जुन ने बंद आँखों से हे रेणुका को उस बात का जवाब दे दिए जो वह मैं में कह रही थी. लेकिन बिना सवाल जवाब किये वह अपनी पसंदीदा जगह आ गई. अर्जुन की बाहों में. 3 बज चुके थे और अभी इनके पास आराम के लिए पर्याप्त समय था.

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"इन्दर, क्या बताया है फिर दिल्ली वालो ने?", डॉ शंकर शर्मा के चेहरे पर इस वक़्त दुनियां जहाँ की गंभीरता चाय हुई थी. आपस में वह अपने छोटे भाई को इन्दर हे बुलाते थे. और अभी फ़ोन पर उस से हे बात कर रहे थे.

"भाई क्या कहना है उन्होंने? कुछ नया तोह उनके पास भी नहीं है. कह रहे थे की बम्बई में समाधान हो सकता है कुछ नहीं तोह फिर बहार जाना पड़ेगा. वह भी 10% है चांस.", नरिंदर के चेहरे पर इस वक़्त भी एक मुस्कराहट हे थी. ये इंसान अलग हे था जो कभी किसी भी परिस्थिति में विचलित या दुखी नहीं होता था. बस ख़ास बात थी की जो ठीक है वह ठीक और जो गलत वह गलत. सिर्फ शंकर हे थे जिसकी बात नरिंदर के लिए भगवन की आवाज थी और वह अपने पिता रामेश्वर जी को भी अनसुना कर सकता था.

"तेरा और कृष्णा का पासपोर्ट लेते आना शनिवार को. उसको बचो से मिलवा ले एक दिन और सोमवार मैं खुद तुम्हे दिल्ली एयरपोर्ट छोड़ दूंगा.", अपने भाई की ऐसी बात सुनकर नरिंदर एक पल रुकने के बाद बोलै.

"तुमने ये पहले हे कर लिए था? और पता है के ये आसान नहीं होने वाला."

"इन्दर, तू हमेश खुद का अस्तित्व रखने के बावजूद मेरी परछाई बांके रहा जबकि तू शंकर की आत्मा है ये कोई और नहीं जानता. दिल्ली भेजने का मतलब यही था के अगर उन्हें समझ आता है तोह उनके हिसाब से कितने चान्सेस है. मैं यहाँ इलाज कभी करवाना हे नहीं चाहता था. फ़िलहाल 60 दिन के लिए बंदोबस्त हुआ है बाकी जब तक कृष्णा पूरी ठीक नहीं होती मैं तुम दोनों को वही रखूँगा.", शंकर की आवाज में प्यार और एक फैंसला था. नरिंदर को पता था के वह जो कहेगा वह करेगा.

"पता है कितना खर्चा होगा वह? भाई बम्बई में भी चांस है.", ये आखिरी कोशिश थी नरिंदर की.

"तू जानता भी है के तू क्या कह रहा है? यहाँ बात तेरे पहले और आखिरी प्यार की हो रही है, इन्दर. और रही बात पैसे की तोह शंकर अकेले के पास इतना है की आग लगाए न ख़तम हो और वह सबकुछ तेरा हे है. अगली बात इस बारे में नहीं बोलेगा."

"तू भी साथ चल न भाई. छोड़ के आ जाना बस.", नरिंदर की आवाज बहुत कुछ कह गई इन gine-chune शब्दों में और शंकर ने अपने जरुरी काम, मीटिंग और जो कुछ अगले हफ्ते के लिए तये किआ था सब भूलते हुए जवाब दिए.

"ठीक है."

"ठीक है?", नरिंदर इस जवाब पर प्रश्न करता हुआ किसी बचे सा कान पे लगा हैंडल दोनों हाथो में पकडे था.

"हाँ मेरे भाई मैं साथ चल रहा हु. 3-4 दिन में तुझे वह सेट करके आ जाऊंगा. वैसे भी साल की 100 छुट्टियां खराब होती है तोह इस बहाने तेरे साथ अकेले में समय मिलेगा."

"मैं तैयारी करता हु फिर.", नरिंदर की आवाज शंकर के चेहरे पर ख़ास मुस्कान ले आई. एक खली कुर्सी पर दोनों पांव रखते हुए टेबल पर पड़ी सिग्रत्ती जलाता वह अतीत में खो गया.

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क्रमश
 
अपडेट 88

निर्णय - गलत सही कुछ नहीं


अब आगे....

साल - 1974

"तू डर तोह नहीं रहा न इन्दर?", ये दोनों तगड़ी kad-kathi के फ़िल्मी हीरो जैसे नौजवान खुल्ले मैदान में इस सलेटी जीप में बैठे थे. थानेदार रामेश्वर शर्मा के सुपत्र शंकर और नरिंदर. चेहरे दोनों के लगभग एक जैसे हे थे. बस नरिंदर के चेहरे पर मुस्कान और शांति रहती थी वही शंकर हमेशा gambhir-garam. इस वक़्त दोनों सय्यमित से थे और इतनी सुबह अँधेरे में जैसे किसी की प्रतीक्षा में यहाँ खड़े थे. मैदान में कड़ी जीप की दिशा सड़क की और हे थी.

"भाई बस जबतक मैं नहीं कहु तुम बीच में नहीं आओगे. मेरा होने के बाद गुस्सा उतार लेना.", शंकर इस 21-22 साल के अपने शांत भाई को देख रहा था, बहार से कैसे मुस्कुरा रहा है और बात कर रहा है की वह अकेले करेगा सबकुछ.

"भाई, उधर से रौशनी आ रही है. गाडी सिर्फ सोमबीर सिंह के घर है तोह वही होंगे.", शंकर ने दूर अँधेरे में वह 2 लाइट अपनी और आती देखि तोह निश्चिंत सा बैठा पल पल आगे बढ़ती आ रही गाडी को देखता रहा. जब लाइट का आकर समझ आने जितनी दुरी रह गई तोह पूरी रफ़्तार से अपनी जीप इस कच्ची जगह से सड़क के बीच ला कर कड़ी कर दी, ठीक उस दूसरी जीप के सामने जिसके टायर सड़क पर चीखते से उनकी गाडी से 2 फ़ीट दूर रुके थे.

जीप में बैठे 4 लोग उनकी गाडी की रौशनी में नहाये अगली जीप में बैठे इन दोनों को देख रहे थे लेकिन अगले पल जो हुआ वह समझ आता उस से पहले एक की चीख इस वीराने में गूँज उठी. नरिंदर उनकी हे जीप के बोनट पर चढ़ता गाडी चला रहे आदमी को लिए सड़क पर कूद गया. सर जमीन से टकराया और नरिंदर के मजबूत हाथो ने उसकी गर्दन की हड्डी किसी लकड़ी की तरह टॉड दी थी.

"बाप पर गोली चलाई थी बहनचोद, हमारे बाप पर. तेरे बाप को घमंड है तुम्हारे ऊपर, उसके कंधे हे तुम्हारी अर्थी उठेगी अब और फिर उसकी जिसके लिए कन्धा देने वाला नहीं मिलेगा.", पिछले हिस्से में बैठे दोनों हे तगड़े पहलवान से आदमी नरिंदर की आवाज सुनकर कभी उसको देखते तोह कभी जमीन पर पड़ी उनके भाई की लाश को. लेकिन दोनों में से एक कब जमीन पर आ गिरा दूसरे को पता न चला जब तक वह भी अपने भाई के बराबर न आ पड़ा.

"गलत कर रहा है तू चोर्रे. भीरु गोली मार दे इस साले के." अपने सर पर हाथ लगता ये शक्श खून बहने से रोक रहा था और साथ हे जो भाई अगली सीट पर सुन्न सा बैठ था उसको आवाज दे कर बन्दूक चलने के लिए चीख रहा था.

"हिलना नहीं. बैठा रह चुपचाप. तू बड़ा निशानची है न तेरी माँ की छूट भोस्डिके, तुझे ज़िंदा रखूँगा अभी.", ये शंकर था जिसने इस चौथे वाले को गर्दन से पकडे सीट के साथ लगा रख था. दूसरे हाथ से गियर के पास पड़ी बन्दूक उठा कर अपनी गाडी में उछाल दी.

"देख लड़के, तू बचेगा नहीं. राममेहर मां और उसके लड़के परिवार ख़तम कर देंगे तुम्हारा.", मौत को सामने देखते हुए भी ये दाढ़ी वाला 6 फ़ीट लम्बा चौड़ा आदमी कोरी धमकी दे रहा था नरिंदर को जो उसका उपहास उड़ाता उसके हे दूसरे भाई की ब्याह टॉड चूका था. चीख को अपने हे हाथ से दबाते हुए नरिंदर ने मुस्कुरा कर देखा.

"देख मैं प्यार से मार रहा हु, वह चांडाल तेरे भाई के साथ क्या करेगा तू खुली आँखों से देख. उसके बाद तू फैंसला करना के कैसी मौत चाहिए. 'काडड्डाककक'", और दूसरे आदमी की गर्दन भी ढीली हो कर रबर सी लटक गई थी.

"कर ले शंकर सड़क पालिश.", नरिंदर ने तीसरे वाले को टांग से पकड़ते हुए सड़क किनारे किआ और इधर शंकर भीरु नाम के इस दढ़ियल झोटे जैसे आदमी का मुँह जीप के लोहे पर जोर से मारने के बाद नीच गिरता हुआ सड़क के बीच तक ले आया. जाने कोनसी नस दबाई थी इसकी जो चाह कर भी वह न हिल प् रहा था और न चीख. बस खुली आँखों से यमराज नजर आ रहा था शंकर इस हलके अँधेरे में उसको.

"चीखना मत.", शंकर ने उसकी एक तंग दूसरी पर टेढ़ी रखते हुए अपनी लात का जोरदार प्रहार किआ. घुटने से निचला हिस्सा झूल गया था और आवाज जैसे वृक्ष टूटा हो. नरिंदर अपने भाई को जीप की तरफ बढ़ता देख रहा था जिसने पहले वाली दोनों लाश भीरु के दोनों तरफ बिछा दी थी. सफाई से जीप घूमता शंकर बता रहा था के ये मशीन जैसे उसके इशारे पर हे चलती है. अगला दृश्य आखरी वाला देख न सका और मुँह से उलटी हो गई. तीनो की छाती पर जीब के टायर गुजरता शंकर जैसे उनके जिस्म समतल करने लगा हो. उतने हिस्से में सड़क ज्या काली होने लगी थी और गीले टायर जहा भी घुमते वैसा हे कालापन उधर हो जाता. चेहरे सलामत रखते हुए वह मैं भरने तक यही करने वाला था लेकिन अपने भाई की आवाज पर गाडी उन taar-taar हुए मांस के लोथोड़ो पर हे रोकता वह नरिंदर को देखने लगा.

"मैं क्या कहता हु के तुम हे मार लो इसको."

"नहीं नहीं. मैंने कुछ नहीं देखा. जाने दो भाई मुझे, मैं कुछ नहीं करूँगा. और ये आदमी पागल है, पूरा पागल. मुझे माफ़ कर दे भाई लेकिन अगर मारना हे है तोह तू गर्दन टॉड दे या गोली मार दे. उसके हाथ मत सौंप.", उसकी हालत देखते हुए शंकर ने जीप की आगे बानी दर्ज में हाथ दाल कर कुछ निकला. कागज के अंदर ये डॉक्टर का चीरा लगाने वाला स्टील का ब्लेड वह पल भर के लिए देखने के बाद नीचे उतर आया. उसके कदम अपनी तरफ बढ़ते देख ये आदमी अपनी टूटी टाँगे रगड़ता नरिंदर के पाँव से लिपट रहा था, जो खुद इसको हिम्मत दे रहा था अपनी मौत से मिलने की.

"डॉक्टर बना है अभी. पहले सिर्फ मुर्दा लोगो पर kaat-peet की है. चल उसकी मदद कर अब फिर उसने लोगो की मदद भी करनी है. ॐ शंकर देवाये नमः.", और ऐसा हे हुआ उसके साथ. पेट 'क्ष' की अंदाज में काट कर जैसे खली कर दिए था. मुँह पर नरिंदर ने कसाव बढ़ाये चीख बहार न उबलने दी लेकिन जल्द हे पूरा शरीर अपनी कारीगरी से खोलने के बाद उसकी लाश भी बाकी 3 के पास रख कर शंकर ने 5-6 बार सबको कुचला, जीप के टायर टेल. भोर होने को थी और नरिंदर के बोलते हे जीप मैदान में घूमता वह फिर जहा से आई थी वही निकल चली. पीछे बस 4 लाश जो उठाने लायक न थी सिवाए चेहरों के और उनके खून से भीगी सड़क रह गई.

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"भाई एक बात करनी थी?", नरिंदर कपडे से ब्लेड और शंकर का हाथ साफ़ करते हुए बोलै.

"वैसे तोह पता है के तू क्या कहने वाला है. लेकिन चल यहाँ चाय पीते है और फिर बात करते है.", दोनों हे जीप एक तरफ कड़ी करने के बाद इस सड़क किनारे 24 घंटे चलने वाले ढाबे की तरफ बढ़ चले. 3-4 ट्रक सामान से लाडे या खली खड़े थे खुली जगह में और उनके driver-cleaner चारपाई पर पड़े ऊंघ रहे थे. भोर हो चुकी थी और ढाबेवाले बड़े टोपिये में चाय का पानी उबाल रहा था. 2 लकड़ी बाल्टी में पानी भरे डब्बे से मिटटी पर छिड़काव करने में लगे थे.

"ओह चाचा, 2 चाय doodh-patti थोकक के चीनी रोक के.", शंकर ने एक चारपाई पर बैठने के साथ कहा. सामने वाली पर नरिंदर अपने भाई की तरह हे पांव लटकाये हाथ निवार पर रखे बैठ गया.

"2 मट्ठी भी दे देना और अगर बूंदी का लड्डू हो तोह वह भी.", नरिंदर की बात पर ये 50 की लगभग उम्र का saaf-suthra सा आदमी हाथ से हाँ करता मुस्कुरा दिए.

"चल अब बोल के तू क्या नै बात बताने वाला था.", शंकर ने पाँव से हे चमड़े की जूतियाँ जमीन पर उतार कर नंगे पाँव उस ठंडी मिटटी पर रख लिए.

"वह कृष्णा है न, #### गांव से, वह मेरी क्लास वाली लम्बी सी लड़की. माँ से बात करो न उसके लिए."

"लेकिन मेरी तोह शादी पक्की हो गई है भाई. मान लिए लड़की ाची है और खूबसूरत भी लेकिन मेरा रिश्ता पिताजी ने किआ है तोह माँ कुछ नहीं कर सकती.", शंकर के ऐसा कहते हे नरिंदर ने गर्दन घुमा ली.

"मजाक कर रहा हु यार. लेकिन बहनचोद तू एक बात बता के अभी इस झंझट से निकले नहीं है और तू यहाँ प्यार के गीत सुना रहा है, शादी की बात कर रहा है."

"भाई, जो कर रहे है वह तोह हमारा कर्म है लेकिन प्यार की बात किसी खास समय के हिसाब से थोड़ी होती है. वैसे भी हमको अगला काम भी जल्द करना है, उमेद तैयारी में लगा हे हुआ है. अभी कॉलेज रहेगा तोह कल घर जाते हे माँ को बता देना की तुमने मेरे लिए कृष्णा पसंद की है, वह उनके घर बात कर लेंगी.", नरिंदर की इतनी ख़ुशी से शंकर भी खुश हो रहा था. इधर चाय रख कर ये लड़का चला गया.

"माँ खुद थानेदार है. बीटा तेरे चक्कर में दोनों हे फंसने वाले है. चल जब ओखली में सर दे हे दिए तोह मूसल से क्या डरना. लेकिन कृष्णा के घर वाले बिदक गए तोह?"

"फिर मैं उठा लाऊंगा उसको. लेकिन मान हे जायेंगे आखिर लड़की की उम्र भी हो चुकी है और पिताजी का नाम सुनकर वह लोग ऐतराज नहीं करेंगे. बात तुम्हे करनी होगी बस.", शंकर ने मट्ठी चाय में डुबोते हे सर हिला दिए था. नरिंदर संतुष्ट हो कर लड्डू खता इधर उधर देखने लगा.

अगले दिन दोनों जब घर आये तोह माहौल थोड़ा गरम हो चूका था. लेकिन बिना परवाह किये अपना सामान लेकर घर में घुसते हे अपनी माँ से गले मिलते बैठ गए. रामेश्वर जी का अवकाश अभी बचा था लेकिन आराम से चल फिर रहे थे.

"तुम दोनों से pooch-tach करने के लिए ये लोग आये हुए है.", 3 पुलिसकर्मी आँगन में बैठे थे और उनको देख कर दोनों भाई भी सामने की चारपाई पर बैठ गए.

"पंडित जी, आपकी इजाजत है?", इस 2 सितारा वर्दी वाले ने टोपी काख में दबाई हुई थी. चेहरे पर लाचारी के साथ रामेश्वर जी की तरफ देख रहा था.

"बेहिचक पूछताछ कीजिये आप लोग. ये दोनों कानून की नजर में संदिग्ध है तोह मैं बीच में आने वाला कौन हु? अगर जुर्म किआ है तोह अंदर दाल दीजिये दोनों को या जो भी अपराधी है इनमे से.", रामेश्वर जी अपनी कुर्सी पीछे करके बैठ गए लेकिन बराबर आ बैठी अपनी धर्मपत्नी को देख चुप हो गए.

"शंकर और नरिंदर शर्मा, सोमबीर सिंह निवासी #### गांव ने आपके ऊपर आरोप लगाया है के उनके चारो बेटो की हत्या के पीछे आप दोनों का हाथ है. आप दोनों बता सकते है के जुर्म की रात यानि परसो रात से कल सुबह तक आप लोग कहा थे?", पोलिसवाले का स्वर उतना कड़क नहीं था जितना आमतौर पर रहता है.

"जी मैं परसो कॉलेज से शाम 4 बजे हॉस्टल पंहुचा था, फिर अपना सामान रखने के बाद 5 बजे हे प्रैक्टिस के लिए हॉस्पिटल आ गया था. कॉलेज और हॉस्पिटल एक हे जगह है जहा मेरी इंटर्नशिप का आखिरी हफ्ता चल रहा है. रूटीन की choti-moti जांच और कुछ मरीजों की marham-patti करने के बाद मैंने 9 बजे वही मेस में कहनाय खाया था और वापिस हॉस्टल निकलने हे वाला था की #### नर्स ने मुझे हॉस्पिटल के डायरेक्टर का सन्देश दिए के रात मैं वही राहु. डायरेक्टर डॉ धर्मवीर सिंह सांगवान जी है.", शंकर ने इतना कहा और साथ वाले हवलदार ने एक कागज इंस्पेक्टर को दिखाया.

"उसके बाद आप कब तक वह थे, इन डॉक्टर साहब के साथ.?"

"जी रात 2 बजे तक मैं एक ऑपरेशन में उनके साथ हे था, 30 के करीब की एक महिला थी जिसकी जांघ और पेट की जहां सर्जरी की गई थी. वह से फारिग होने के बाद मैं डॉक्टर सांगवान से सवाल जवाब कर रहा था केस के बारे में और तक़रीबन 3 बजे पुलिस एक अज्ञात लाश लेके आई थी जिसका पोस्टमॉर्टम 2 नर्स और खुद डॉक्टर सांगवान की मौजदगी में मैंने किआ था. 5 बजे मैं हॉस्टल में वापिस आ कर सोने चला गया. और फिर 8 से 4 तक मैंने मेरी क्लास ख़तम की. आगे का भी बता देता हु.", शंकर की बात सुनकर उन्होंने नरिंदर की तरफ रुख किआ.

"आपका क्या कहना है मिस्टर नरिंदर शर्मा? इस बताये समय में कॉलेज हे था या..

"जी मैं क्लास लगाने के बाद 5-8 अखाड़े में था और फिर सबके साथ हे हॉस्टल में खाना खा कर कमरे में चला गया था.", नरिंदर नजरे झुकाये बता रहा था.

"नरिंदर, हमने तुम्हारे कॉलेज के वार्डन से भी बात की थी. और एक चौकीदार ने तुम्हे रात 1 बजे दिवार फांदते हुए देखा था. अब भी अगर तुम्हे लगता है के तुम कुछ छुपा रहे हो तोह ये आखिरी मौका है तुम्हारे पास अपनी बात रखने का."

"ji..ji.. फिर तोह आपको चौकीदार ने बताया हे होगा के वह दिवार किस तरफ है?", नरिंदर कनखियों से अपनी माँ और पिता को भी देख रहा था.

"हमे क्या मालूम है क्या नहीं इस से तुम्हारा कोई सरोकार नहीं है. डिटेल में बताओ के फिर कहा गए थे और कब वापिस आये."

"जी गर्ल्स हॉस्टल में.", नरिंदर की इस बात को सुनकर कौशल्या जी का पारा चढ़ने लगा था. लेकिन नरिंदर ने बात आगे केहनी शुरू की.

"जी एक बजे मैं गर्ल्स हॉस्टल के पिछले हिस्से से रूम 217 में गया था और वह से सुबह करीब साढ़े 4 बजे हे कॉलेज के मुख्या द्वार से दौड़ने की प्रैक्टिस करता अंदर हॉस्टल में आ गया था. आप वह के चौकीदार से भी पूछ सकते है.", नरिंदर की हिम्मत नहीं थी की अब अपनी माँ और पिता जी को देख भी सके.

"217 में जो रहता है उसकी डिटेल, पूरी डिटेल.", इंस्पेक्टर ने घूरते हुए पुछा और नरिंदर गहरी सांस अंदर भरने लगा.

"कृष्णा देवी रोल नंबर 138, फाइनल ईयर और मेरी हे कक्षा की. #### गाँव के सरपंच श ##### शर्मा की बेटी. मैं रात 1 से लेकर करीब सवा 4 बजे तक बंद कमरे में उसके हे साथ था. और हॉस्टल आने के बाद 5 बजे से 6 बजे तक कसरत करता रहा हमारी व्यायामशाला में. 8 बजे इम्तिहान देने कॉलेज गया था और 12 बजे वापिस हॉस्टल आ गया था. बस इतना हे.", नरिंदर ने एक सांस एम् ये कहा और चेहरे पर हाथ रख के बैठ गया.

"क्षमा चाहता हु पंडित जी आपसे की ये परेशानी दी आपको. बाकी सब हमारी रिपोर्ट में वैसा हे दर्ज है जैसा दोनों ने कहा. और वारदात में जिस गाडी का इस्तेमाल किआ गया है पहिये के निशाँ किसी जीप के है और इनके पास स्कूटर है. दोनों के हॉस्टल में किसी के पास भी जीप नहीं है. सरकारी जीप के पहिये का मिलान भी गलत निकला और अजित का बयान हम पहले हे ले चुके है. लेकिन नरिंदर को साथ ले जाना होगा लड़की की स्टेटमेंट jaan-ne के लिए अगर आपकी इजाजत हो तोह.", तीनो पोलिसवाले खड़े हुए तोह कौशल्या जी भी साथ कड़ी हो गई.

"गाडी निकलवाओ जी आप अजित को बोलकर और इंस्पेक्टर साहब रुको जरा, हम अपनी गाडी में साथ हे चलते है.", शंकर कोहनी मार रहा था नरिंदर के जो सर झुकाये अब खड़ा हो गया था. रामेश्वर जी जैसी हालत में थे वैसे हे पाजामे कुर्ते में बहार की तरफ चल दिए, शंकर को साथ आने का कहते.

"ये नरिंदर ने कुछ बताया था क्या तुझे? कौन लड़की है और बताओ हर टाइम शराफत से भरा रहने वाला ये लड़का अब लड़कीओ के कमरे में जाने लगा है. आज हड्डिया टॉड दूंगी इसकी मैं.", पिछली सीट पर शंकर और उसकी माताजी बैठे थे जहा वह तवे सी गरम हुई दहाड़ रही थी. न चाहते हुए भी आगे बैठे रामेश्वर जी मुस्कुरा दिए.

"आप जो हंस रहे हो न वह दिख रहा है शीशे में. हाँ नहीं तोह. और भेजो इनको हॉस्टल में. पढाई ख़तम होने वाली है और नालायको ने पोलिसवाले के घर हे पुलिस बुलवानी शुरू कर दी."

"थानेदारनी जी, किस बात पर गुस्सा हो? घर में पुलिस आने पर या लड़की वाली बात पर.? तुम्हारा जो लड़का ज्यादा संदिग्ध था वह तोह साफ़ बचकर तुम्हारे पल्लू में बैठा है और दूसरा इस केस की तहकीकात को किस माउद पे ले गया इन उल्लू के पत्तो को अभी भी समझ नहीं आ रहा.", रामेश्वर जी की बात शंकर समझ गया था के उन्हें इस ड्रामे का पता चल गया है.

"छोड़ो जी मुझे नहीं समझ आता ये सब. पहले लड़की देख लू के बेचारी कौन है जिसकी ज़िन्दगी खराब करने में लगा हुआ था ये, पता नहीं कबसे.", कुछ देर बाद दोनों गाड़ियां हॉस्टल के बहार थी तोह रामेश्वर जी ने हिदायत देते हुए इंस्पेक्टर से कुछ कहा.

"कौशल्या, नरिंदर को साथ लेकर जाओ. और लड़की को सावधानी से इस बगीचे तक बुला लाओ. तुम्हारे साथ बैठकर सिर्फ इंस्पेक्टर साहब हे पूछताछ कर लेंगे. रामेश्वर जी को पता था के ऐसे लड़की पर क्या प्रभाव पड़ सकता है पुलिस पूछताछ का. कौशल्या जी भी नरिंदर के साथ चली गई थी, उसका हाथ पकडे. पोलिसवाले आराम करने के हिसाब से कमर सीढ़ी करते थोड़ी दूर घास पर बैठ गए तोह रामेश्वर जी ने इस एकांत में शंकर को पास बुलाया.

"तोह कैसे किआ ये?"

"जैसे करते है."

"तुम जानते हो मैं किस बारे में पूछ रहा हु?"

"आप कभी गलत हुए है आजतक? लेकिन कुछ साबित नहीं होने वाला. दोनों प्यार करते है तोह माँ को कहने की हिम्मत नहीं थी इन्दर में. यही ठीक लगा मुझे जिस से माहौल ठीक हो जाये."

"माहौल कैसा कर चुके हो तुम्हे खबर नहीं है शंकर. ये बचपना नहीं था, बगावत है कानून से भी और उनके साथ भी जो अब तुम्हारे पीछे है."

"कानून की समझ आपसे हे ली है मैंने, कुछ मुश्किल नहीं है. ये जो पूछताछ कर रहा है ये मेरे हे हाथो लिखी रिपोर्ट है. और जिनके लिए आप मुझे सावधान कर रहे है वह खुद अनजान है की क्या होने वाला है उनके साथ. रोक नहीं सकते अब इस अनहोनी को. मुझे पता है के आप मुझपर लगाम लगा सकते है किसी न किसी तरह से लेकिन वह सामने जो आ रहा है वह अपने maa-baap को भगवन मानता है. माँ की आँख में जितने आंसू आपको देखने के बाद टपके थे उतना हे ज्यादा उसका सीना चलनी हुआ. इन्दर की खास बात है वह मेरी तरह आप नहीं खोता. चलिए मिल लीजिये अपनी होने वाली बहु से.", शंकर एक वृक्ष की डंडी तोड़ता आगे बढ़ चला और रामेश्वर जी अपनी धर्मपत्नी को देख रहे थे जो इस शर्माती हुई लड़की के साथ हंसती हुई आ रही थी. पीछे सर झुकाये नरिंदर.

"ठीक है इंस्पेक्टर साहब आप जाओ अब हम बिटिया के घरवालों से मिल कर बात पक्की कर आते है.", कौशल्या जी की बात सुनकर पुलिस की गाडी जैसे आई थी वैसे चली गई. रामेश्वर जी ठंडी आह भरते गाडी में अपनी जगह बैठ गए. पिछली सीट पर एक तरफ Shankar-Narinder और दूसरी तरफ कौशल्या जी के साथ ये खूबसूरत नवयौवना.

"तेरे पिता ने पक्का तेरा नाम कृष्णा इसलिए रखा होगा की तेरी आँखें उतनी हे सुन्दर है, हिरन से बड़ी और काली.", सर पर चुन्नी करती वह लड़की बस शर्म से सर झुकाये बटिहि थी.

"भगवान, जरा दिव्यदृष्टि खोलो अपनी. लड़की ाची है, समझदार और पढ़ी लिखी भी है. लेकिन तुम्हारा सपूत?"

"नरिंदर ने ाचा किआ जो खुद ढून्ढ ली जी. पता नहीं हम कैसी देखते."

लड़की के घरवाले हैरान हो गए थे जब घर के बहार पुलिस की गाडी में बेटी को इतने लोगो के साथ देखा लेकिन अगली आवाज सुनकर सरपंच के हाथ जुड़ गए और बीटा भाग कर अंदर से चारपाई लेकर आँगन में आ खड़ा हुआ.

"शर्मा जी, रिश्ता जोड़ लिए है जी आपसे. बाकी बात अपने सम्बन्धी से करो.", कौशल्या जी लड़की को साथ लिए घर में पूरे हक़ से अंदर चल दी और रामेश्वर जी हाथ जोड़े इनके सामने खड़े थे.

"पंडित जी आप हाथ मत जोड़िये हमारे सामने. बीटा जा चाय नाश्ता मंगवा और तेरी माँ से कहे की संधान जी का ाचे से ध्यान रखे. खुद राम जी घर में आये है.", उनके हाथ पकड़ कर कृष्णा के पिता ने रामेश्वर जी को चारपाई पर बिठाया और दोनों लड़को की तरफ भी नजर डाली जो अभी तक खड़े थे. अजित सिंह दरवाजे पर 303 सरकारी बनूक लिए खड़ा था.

"शर्मा जी, ऐसे रिश्ते की बात करूँगा ये नहीं सोचा था. इसके लिए क्षमा कर दीजिये. लेकिन मेरी धर्मपत्नी ने लड़की कॉलेज में हे पसंद कर ली और ladka-ladki भी आपस में एक दूसरे को जानते है, पसंद करते है तोह सबको यहाँ ले आये.

"कैसी बात करते है पंडित जी. हमारा भाग्य है के आप इतने साल बार मेरे घर आये और कुछ लेने भी आये तोह रिश्ता. भगवन का लाख शुक्र है, चिंता मुझे भी थी कृष्णा की लेकिन बराबर पढ़ा लिखा लड़का और परिवार मुशील हो रहा था.", ऐसे हे बातें करते हुए chai-pani ख़तम करने के बाद जब लड़के देखे तोह सरपंच जी ने रामेश्वर जी की तरफ देखा.

"दोनों में से कोनसा है जी हमारे भाग में? ज्यादा फरक नहीं है जी कोई माफ़ कीजियेगा."

"ये जो 2 ऊँगली फ़ालतू लम्बा और शर्मा रहा है वही नरिंदर है.", नरिंदर ने अब पाँव छुए तोह बटुए से एक रुपये का नीला नोट निकाल कर लड़की के पिता ने मुट्ठी में रख दिए. अंदर से कौशल्या जी भी बहार आ गई.

"देखो जी, शंकर का रिश्ता कर चुके है और अब नरिंदर का भी हो गया है तोह विवाह एक हे दिन रख लीजिये. दूसरी बहु ये 5 कोस दूर #### शहर में कुन्दनलाल जी की बिटिया रेखा है. आपको कुछ करने की जरुरत नहीं सब आपके भाई साहब देख लेंगे बस आप अपने रिश्तेदार और मेहमान वही ले आइयेगा. क्यों जी मैंने ठीक कहा न?"

"भगवान तुम गलत कब कहती हो? लेकिन पहले इनकी मर्जी तोह पूछ लेने दो. बेटी का ब्याह है और आसान बात नहीं की 20 दिन में सब कर दे.", रामेश्वर जी की बात पर कौशल्या जी नखरे से देखने लगी जैसे उन्हें ये बात ाची नहीं लगी हो.

"उत्तम विचार है जी. कुन्दनलाल जी तोह पीले चावल खुद देके गए है. अब एक हे मंडप में दोनों बेटियां ब्याही जाएँगी तोह इस से बड़ा कन्यादान क्या होगा. सब हो जायेगा जी आप बस अपना धायण रखिये और सेहत जल्द दुरुस्त कीजिये."

जितनी आराम से ये सब हो गया था इतनी उम्मीद खुद शंकर और नरिंदर को न थी. लेकिन दोनों भाइयों ने फिर मिलकर वह वारदात आजाद दे डाली थी जिसमे 13 लोग सड़क पर काट कर बिछा दिए थे, सभी मजबूत शख्शियत. सोमबीर सिंह और उसके सभी भाइयों के साथ हे जो भी व्यक्ति रघुबीर गुज्जर के बेटे की मौत और रामेश्वर जी पर हमले में शामिल थे उनको बीच चौराहे काट कर उमेद सिंह, शंकर और नरिंदर बिना सबूत चोदे आम ज़िन्दगी में निर्दोष शामिल हो गए थे.

शादी के अगले हे दिन शंकर ने वह फैंसला लिए था जिसका दोनों भाइयों के साथ परिवार भी दुखी हो गया था. लेकिन जो जरुरी था वही किआ गया था. अपनी बीवी कृष्णा के साथ नरिंदर पंजाब चल दिए था इस नयी नौकरी पर, अपने शरीर से दूर. शंकर नहीं चाहता था की उसका भाई कभी फिर उस रस्ते पर चले जहा वह दोनों सिर्फ तबाही करते थे. नरिंदर ने भी भाई की बात मानते हुए वही किआ और ज़िन्दगी के वर्ष सिर्फ अपनी बीवी के नाम कर दिए, अपने प्यार के नाम.

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साल 1998

डॉ शंकर के चेहरे पर एक मुस्कान और आँखों में हलकी नमी चा गई थी सब याद करते हुए. कैसे 2 जिस्म एक जान थे वह और परिवार के लिए सबकुछ करना हे पड़ा. दरवाजे पर हुई इस दस्तक से वह उठ खड़े हुए और सामने वाले व्यक्ति को देख तुरंत कुर्सी छोड़ कर उनके पाँव छूने लगे.

"ओह मेरे शेर तू दिल में है मेरे यहाँ तोह सांगवान दुनिया और कालू को रखता है.", 6 फ़ीट 3 इंच का ये बुजुर्ग व्यक्ति बता रहा था के वह अगर कोई सूर्य नहीं है तोह प्रभाव काम भी नहीं था. शंकर को अपने सीने से लगता वह खुद उसकी कुर्सी पर आ बैठा. शंकर वही पड़े स्टूल पर हाथ थाम कर उन्हें देख रहा था.

"बड़ा दिल कर रहा था आपसे मिलने का अंकल.", शंकर की आवाज सुनकर वह बड़ा हाथ बालो में फिरने लगा.

"ोये उल्लू तू cheer-faad से फुर्सत ले तोह मैं मिलने औ या तू दर्शन दे. वैसे सच कहु तोह आज मैं परेशां था तोह तुझे देखने के लिए आ गया. तेरा यार भी आया है लेकिन मैंने उसको बहार खड़े होने का हुकुम सुना दिए. पहले मेरे बेटे से मिल लू अकेले में.", इस बात पर शंकर मुस्कुरा दिए

"ाचा पहले बताओ क्या लोगे?"

"कुछ भी नहीं बस शाम को फार्महाउस आ जाना. फिर तू अमेरिका चला जायेगा भाई तोह कहा बूढ़े को देखेगा. ये तेरे कागज़ और पासपोर्ट रख बाकी बात वही करेंगे. बुला ले उस गांडू को अंदर, देख कैसे झाँक रहा है"

"पापा कितनी बार बोलू के मैंने गाल न कदया करो और वह भी इसके सामने तोह बिलकुल नहीं. वैसे कहना बेकार है दोनो एक जिहसे हो. पंडत जूस मंगवा दे बहोत जोर की तीस लाग ऋ है.", डॉ सांगवान दो कुर्सियों पर पसारता हुआ बोलै तोह शंकर ने फ़ोन मिला कर निर्देश दे दिए.

"झकोई तू सुधर जा थोड़ा सा. बेरा है के कुकर्म करता फायर है. आज नै गाडी लेनी है, काल नै कोठी ार बेरा नई कद्द लुगाई ले आवे कोई फिरंगन. यो छोरा समझदार है और बेटे के फर्ज पूरे करे है सारे. तेरे बाप के 10 हस्पताल में तू 10 बार नई गया लेकिन यो पूरा स्टाफ आड़े बैठे बता देगा. नोट उड़ा बीटा तू यो ार मैं तोह कॉमन खातिर है. बहनचोद डेढ़ कही का.", अपने बाप की बात सुनकर भी वह मुस्कुरा रहा था. और शंकर उनके हाथ पर हाथ रखते हुए शांत कर रहा था.

"करने दो जो करता है. आप हम दोनों से ज्यादा काम करते हो और अब थोड़ा ध्यान दो खुद पर."

"अर्जुन कैसा है अब? कोई और तोह परेशानी नहीं है जो नजर में ना आई हो?"

"वह अपनी ज़िन्दगी में मस्त है, परिवार है, लड़कियां हैं और सेल के पास समझदारी ज्यादा हे है. अंकल हम काम करते थे तोह सबूत मिटने पड़ते थे लेकिन उसके सबूत खुद उसकी हे निगरानी करते है. कई बार डर लगता है के जैसा पापा कहते है वह वैसा न बन्न जाये."

"शंकर, पंडित जी कोई teri-iski उम्र के नहीं है. वह शक्श अगर जानता है न अर्जुन को तोह गलती से भनक न लगने दियो अँधेरे की. तेरा ये अंकल भी कुछ न कर पायेगा फिर. ब्याज प्यारा है मुझे भी और पंडित जी को भी. घर रहे तोह बस घर नहीं तोह संजीव की तरह तुझे भी देख लिए कही ऐसी वैसी जगह तोह जड़ में घुसके हे रहेगा. और फिर जवाब देने मुश्किल बेशक सब परिवार और अपनों के लिए कर रहे है लेकिन जिनकी चाय में वह बड़ा हो रहा है वह उसको गलत गलत और सही सिर्फ सही की तरह नजर आएंगे. मकसद नहीं, बलिदान नहीं. और कही वह शामिल हुआ तोह फिर नरिंदर .."

"बस बस. मत डराओ यार. अभी से जानवर है वह और नरिंदर की तरह दिल हो गया उसका तोह समझ नहीं आएगा कुछ. चलो बस करो ये सब बातें आप जूस पीयो उसके बाद मैं चेकउप करता हु आपका.

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"अर्जुन अभी तक सो रहा है? मैं उठा देती हु.", प्रीती 4 बजने से 10 मिनट पहले हे घर में दाखिल हुई तोह रेणुका कमरे से बहार निकल आई. अभी वह jaise-taise हे कपडे लपेटे हुए थी और प्रीती को देख कर हलकी सी शर्म चेहरे पर चा चुकी थी.

"नहीं नहीं. तुम स्कूटी ले जाओ मैं उठा देती हु. वह थोड़ी देर तक खुद स्टेडियम पहुंच जायेगा.", अपनी बुआ की ऐसी हड़बड़ाहट और हालत देख प्रीती ने आँख मार दी.

"कोई नई आराम से उठा लेना. मैं वैसे भी मंजू के साथ हे जा रही हु. आपको देख कर पता चल गया था के वह सो हे रहा होगा. मैं चलती हु.", प्रीती कमरे से सामान लेकर जबतक चली नहीं गई रेणुका वही कड़ी रही. उसके जाते हे मुस्कुराती हुई कमरे का दरवाजा बंद करती अर्जुन को देखने लगी, जो चैन से सो रहा था. झुक कर अर्जुन को हलके से हिलाया और अर्जुन ने उठने की जगह रेणुका को हे अपने साथ लगा लिए. मुँह उस ख़ास अंग को टटोल रहा था जिसपर अब ब्लाउज चढ़ चूका था लेकिन अंदर निप्पल आजाद मिलते हे मुँह में भर कर चुस्कने लगा.

"आह्हः.. बस करो न. उठ जाओ अब. स्टेडियम का समय हो गया है."

"स्टेडियम तोह वैसे हे जाता हु रोज, तुम रोज नहीं मिलती.", आँखें बंद किये हे वह 2 हुक से बंधा ब्लाउज खोलकर फूले हुए gulabi-bhoore निप्पल को मुँह में भरता अर्जुन रेणुका की कमर सहलाने लगा.

"उम्म्म.. प्लीज मत करो. पारवती आ जाएगी अब आह्हः.. और मेरा दिल बहक गया तोह फंस जायेंगे.. उमंमाहहह.. आराम से पीयो न, काटना बंद करो.", इतनी हे देर में रेणुका की साँसे चढ़ गई थी और वह कड़ा निप्पल जैसे बटन हो छूट को जगाने का. अर्जुन ने आँखे खोलते हुए मदहोश रेणुका के होंठ चूमे और जल्दी से उठकर कपडे पहन ने लगा. रेणुका नाराजगी से उसको देख रही थी.

"अब क्या हुआ?", हँसते हुए अर्जुन ने गाल पर हाथ रखते हुए पूछा तोह रेणुका ने हाथ झटक कर नजरे झुका ली.

"ओहो तोह अभी दिल नै भरा. लो फिर उतार देते है कपडे.", अर्जुन टीशर्ट उतरने लगा तोह रेणुका ने टीशर्ट नीचे से पकड़ ली

"नौटंकी बंद करो. जब पता है के ऐसा करने से अजीब लगता है और तुमने चले जाना है फिर भी करते हे हो."

"उमंमाहः.. जब भी दिल करे बुला लेना या घर आ जाना..", अर्जुन ने होंठो को चूम कर गले लगते हुए कहा.

"क्या कहु घर आ कर? अर्जुन कहा है मुझे उस से प्यार करना है?", रेणुका अंदर से सुकून से भरी अर्जुन से लिपटी थी लेकिन अब वह भी शरारत कर रही थी.

"न न. कहना की बचा पापा को याद कर रहा था. तोह अकेले में मिलवाना है.", अर्जुन ने साड़ी के ऊपर से हे छूट दबाते हुए सरगोशी की.

"धत्त. अब छोडो मुझे और जाओ यहाँ से. जब समय लगेगा तोह मिलवा दूंगी. अब नहाना है और तुम्हे स्टेडियम भी जाना है.", रेणुका बाँहों से निकलने लगी तोह अर्जुन ने पीछे से जकड लिए.

"साथ में हे नहाते है न. मैं प्यार से नेहलाऊंगा."

"बदमाश कही के चलो निकलो और जाओ. अब परेशां नहीं करना.", अर्जुन ने एक और प्यार भरा चुम्बन किआ और पेट पर हाथ फेरने के बाद चला गया.

"तेरे पापा मार खाएंगे किसी दिन. तू भी वैसा हे बनेगा, तुझे क्या समझा रही हु.", खुद से बात करती वह हंसती हुई नहाने चली गई.

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"अर्जुन शर्मा. यही नाम है तुम्हारा है न.", ये वही व्यक्ति था जो लड़ाई वाले दिन अर्जुन और बलबीर के पास आया था. स्टेडियम का निर्देशक.

"जी सर."

"बीटा खेल बहुत ाचा है तुम्हारा और मैं सीढ़ी बात करता हु. अगले महीने के पहले हफ्ते हे ट्रायल्स है डिस्ट्रिक्ट के. अपनी केटेगरी में एंट्री भर दो. स्टेडियम की तरफ से हैवी वेट और सुपर हैवीवेट में कोई भी नहीं है. पता नहीं जोगिन्दर ने तुम्हारा नाम लिस्ट में क्यों नहीं डाला."

"जी भूल गए होंगे. अगले महीने अगर ट्रायल्स है तोह मेरे पास वक़्त है अभी. आप खुद नाम दाल दीजिये."

"ये हुई ना बात असली खिलाडी वाली. बहुत ख़ुशी हुई तुम्हारी खेल के प्रति विश्वास देख कर. म्हणत करो और आगे बढ़ो."

"धन्यवाद् सर."

"इस पेपर को पढ़ लो. ज्यादा लाइन नहीं है और फिर हस्ताक्षर करके प्रैक्टिस में लग जाओ. मैं वही तुमसे मिलता रहूँगा बीच बीचे में.", ज्यादा खास कुछ लिखा नहीं था और अर्जुन ने सिग्न करते हुए ये संक्षिप्त सी मुलाक़ात ख़तम की और गयम की तरफ बढ़ गया. पगडण्डी से चलता वह इस तरफ देखने के बाद रुक गया जहा मंजू प्रीती को गले लगाए इन बास्केटबॉल वाली 3-4 लड़कीओ से बात कर रही थी.

"पता नै था मंजू की तुम्हारा कोई रिश्ता है आपस में. तुझे पता है न यार के वह लड़का पसंद है मुझे, लेकिन प्यार व्यार वाला सन नहीं एक बार वाला. इसलिए तुझसे वह बात कह दी.", मुस्कान के 12 बजे हुए थे, जाने इस से पहले क्या क्या कहा था मंजू ने.

"देख तू ाची सहेली है मेरी लेकिन ये मेरी बहिन के साथ हे बहोत कुछ है. न इसके फाटे में टांग अडानी है न किसी और को देनी है. और तू जिसके साथ ये सब करने का सोच रही है तोह दिमाग से निकाल दे, पागल. न वह किसी भी सूरत में ऐसा कुछ करेगा. और चल मेरे कहने से उसने तेरे साथ कर लिए तोह क्या कुछ नया हो जाने वाला है. खुदाई और चुदाई जितनी कर लो, मिटटी भरेगी फिर खली हो जाएगी. चल नेशनल की तैयारी करते है अगर तूने ाचा परफॉर्म किआ तोह तेरी बात अर्जुन से करुँगी.", मंजू ने मुस्कान के कंधे पर हाथ रखते हुए उसको अपने साथ लिए और पीछे मदद कर प्रीती को आँख मरते हुए हवाई चुम्मा उछाल दिए. वह भी हंसती हुई अपनी तरफ चल दी

"पक्का तू मेरी बात करेगी?"

"अरे मंजूबाला ने कभी झूठ बोलै है क्या? और तू जिस से उलझ रही थी न अगर ये अर्जुन का पता चल जाता तोह स्टेडियम से बहार हो जाती तू. देखा नई के वह आउटसाइडर हो कर प्रोफेशनल कोच से ट्रेनिंग लेता है, बिना किसी ट्रायल के.", मंजू पूरी फ़िल्मी थी जो अर्जुन की ऐसी छवि बना रही थी मुस्कान के दिमाग में जैसे वह अमीर बाप की एकलौती औलाद हो और स्टेडियम उसके बाप के चंदे पर चलता हो. जो भी था ये उसका हुनर हे था जो गरम दिमाग के बावजूद शान्ति से मुस्कान को एक मुसीबत से बचा लिए था.

"तुम अपनी प्रैक्टिस पे नहीं जा रहे? यहाँ खड़े लड़कियां देख रहे हो.", प्रीती की शरारती आवाज कान में पड़ते हे अर्जुन अपने रस्ते चल दिए, बिना कुछ कहे मुस्कुराते हुए.

"अरे बाप रे. पहले ये खुलासा की तू और मंजूबाला एक साथ हो वह झटके से काम नै और ये दूसरा के अब सरे आम तुम अर्जुन को कुछ भी कहने लगी हो.", डिम्पी ने हंसती हुई प्रीती को देखा तोह प्रीती राकेट पर बॉल उछलती हुई कहने लगी.

"अरे इतना मत सोचा कर. सरे आम बुलाने से क्या हो गया. दोस्त भी ऐसे हे करते है और वैसे भी वह लवर के साथ हे दोस्त और होने वाला पति है. देखा नई वह हँसता हुआ हे गया है.

"लेकिन मंजू?"

"चिल कर यार. मंजू डार्लिंग है अपनी. तू मैच लगा और ध्यान से खेलना.", प्रीती का आत्मविश्वास और बातें देख डिम्पी हैरान सी दूसरी तरफ चल दी कोर्ट के.

इधर गयम में बलबीर के साथ विकास को देख कर अर्जुन ठिठक गया.

"आजा इधर रुक क्यों गया? तेरी क्लास लगने वाले है.", अर्जुन इस बात पर हँसता हु विकास के गले लग गया.

"लेट हो गया, घर से कही और चला गया था क्या?"

"कहा भैया. वह डायरेक्टर ने बुला लिए था. आज ट्रायल्स पे सिग्न करवा लिए अगले महीने वाले. कह रहे थे के बड़ी केटेगरी में कोई प्लेयर नहीं है हमारे स्टेडियम से. तोह मैंने भी पढ़ कर सिग्न कर दिए.", अर्जुन ने टीशर्ट उतार कर बेंच पर राखी और विकास उसके शरीर को देखने लगा.

"तेरे तोह शरीर पर कट्स निकल गए बे. इतनी जल्दी?"

"विकास भाई, 130 किलो बेंच मार रहा ये और 40-50 मिनट की गयम. पता नहीं कहा रुकेगा और आप अभी यही हो तोह देखना जब गयम से निकलेंगे तोह कैसा दिखेगा ये.", बलबीर की बात सुनता विकास भी अर्जुन को बेंच पर पाँव रखे push-up लगते देखने लगा. आज वह खुद अर्जुन के साथ हे एक्सरसाइज करने आया था, संधू जी के कहने पर. और वह बस देखना चाहता था के अर्जुन कैसा रहता है इस दौरान.

जल्द हे दोनों 120-120 के सेट लगा रहे थे. बलबीर आज एक अलग लड़के के साथ करीब हे एक्सरसाइज कर रहा था.

"चलो 20 बढ़ा लेते है और फिर आखिर में देख्नेगे.", अर्जुन ने दोनों तरफ लोहे की रोड में 10-10 की प्लेट डालने के बाद बेंच पर लेट कर ऊपर देखा तोह विकास रोड पर हाथ लगाने के हिसाब से खड़ा था. अर्जुन ने गर्दन हिला कर ना में सर हिलाया और हाथ रोड पर सही रकते हुए आराम से उठा लिए. जोर लग रहा था लेकिन चेहरे पर खास भाव नहीं आये उसके. 15 बार ऊपर नीचे करने के बाद वह खड़ा हुआ तोह विकास ने दोनों प्लेट निकाल कर अपना सेट लगाना शुरू किआ. 11 पर हे अर्जुन ने रोड को दोनों तरफ से हल्का हाथ लगते सहारा दिए और 15 करते करते विकास थक कर एक तरफ बैठ गया. अर्जुन ने इस बार दोनों तरफ 15-15 किलो डालते हुए 150 के वजन से आखिरी सेट लगाया तोह विकास बैठे हुए बस उसके शरीर को निहार रहा था. बाजू इतने फूल उठते थे की अभी फट जायेंगे. चौड़ी छाती की डबल रोटी जैसे मोटी और उभार सख्त था. हर बार ऊपर उठाते वक़्त पेट थोड़ा अंदर धंसता तोह 6 चौकोर मांसपेशिया वह पूरा गहरा कटाव दिखती उभर आती. अर्जुन रोड रखने के साथ हे खड़ा हो कर कदमो के भार हल्का उछलने लगा.

"पागल है बहनचोद. बलबीर, इसका हिसाब समझ से बहार है मेरे.", विकास उन दोनों के साथ हे चलता बॉक्सिंग प्रैक्टिस वाली जगह चल दिए.

"विकास भाई, कोच साहब खुद हैरान है तोह आपका होना भी लाजमी है. परसो इसने शॉटपुट वाला नई था जिसको हॉस्टल से निकला था, उसको काख से पकड़ कर ऊपर उठा दिए था. पता नहीं अंदर क्या है इसके और सब कहते है ये जूनियर है.", बलबीर आराम से बात बता रहा था. फिर थोड़ी देर संधू जी से बात करके विकास चला गया और ये दोनों लग गए अपने काम में. संधू जी बैठे इनको हे देख रहे थे.

'टेस्ट भी क्लीन आया इसका और विकास कह रहा के ये थकता भी नहीं. माँ जी से हे बात करके हल निकलेगा कोई. कौनसी jadi-booti है जो आदमी को घोडा बना देती है. लेकिन वह लैब वाला कह रहा था के इसका ब्लड और स्पर्म टेस्ट ज्यादा बता सकता है शरीर के बारे में. लेकिन इतना बड़ा खतरा नहीं लेना भाई. कर बीटा तू प्रैक्टिस.', संधू जी देख कर हे खुश हो रहे थे की अपनी बेटी की आवाज सुनकर तन्द्रा टूटी.

"पापा, सिम्मी आई है देखने स्टेडियम.", ये चारुल थी जो अपने साथ हे सिम्मी को लिए थे, चचेरी बहिन लुधिअना वाली.

"हाँ आओ बीटा बैठो जरा. बस एक बार इन दोनों से बात कर लू फिर चलते है. स्टेडियम भी दिखा देता हु और दिल करे तोह खेल भी लेना.", संधू जी ने सिम्मी को अपने पास बिठा लिए और चारुल पीछे कड़ी उधर देखने लगी जहा अर्जुन baniyaan-nikkar में किट पर पीला हुआ मुक्के बरसा रहा था. कमर तोह साधारण थी लेकिन चौड़ी पसलियां, तराशी हुई मोटी बाहें और पसीना उसको कोई divya-purush सा दिखा रहा था. नाम के अनुरूप वह बस पूरे ध्यान में अभ्यास कर रहा था.

"लो बलबीर भाई, पानी पीयो और चलो कपडे बदलने. अंदर तक भीग गया हुआ.", अर्जुन ने वैसे हे कहा था लेकिन उसकी बात सुनकर चारुल के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गई थी.

"ये लड़का बॉक्सर है पापा?", अपने पिता के कंधे पर हाथ रखती वह पीछे खड़े हे उनसे पूछने लगी.

"बेटी कर तोह वही रहा है लेकिन मुझे लगता है के इसको वेटलिफ्टिंग या कुश्ती करनी चाहिए. पर नहीं मानेंगे इसके घरवाले भी और ये भी. खेल इसके लिए सिर्फ कसरत है. ज़िन्दगी नहीं लगा सकता ये इस पर अपनी. इसकी दादी ने भी यही कहा था के शरीर मजबूत और खुद की रक्षा कर सके ऐसा तैयार करना है."

"गुड इवनिंग मिस, hello सिम्मी.", अर्जुन ने दोनों का अभिवादन किआ तोह संधू जी ने पास राखी ग्लूकोस की बोतल पकड़ते हुए खुद हे उसका चेहरा साफ़ करना शुरू कर दिए. वह दिल से पसंद करते थे अर्जुन को. उसकी लगन, म्हणत और साफ़ दिल की वजह से.

"Hello. तोह तुम इस समय आते हो.", सिम्मी ने जवाब देने के साथ हे सवाल कर दिए.

"नहीं जी. मैं इस समय जाता हु.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर संधू जी और चारुल दोनों हंस दिए और वह कपडे बदल कर आने का बोल वह से चल दिए.

"ताया जी, तुस्सी मेरे वास्ते ेहो जा हे मुंडा वेखना है. हाँ मैं कह डंडी आ.", सिम्मी ने वह बस अपनों को देख कर संधू जी से कहा.

"ओह पुत्तर जी ेहो जा मुंडा लाभे तह सही. लुधिअने पक्का होने, मई तेरे पापे न कहंदा है.", हँसते हुए उन्होंने सिम्मी के सर पर चपत लगा दी. थोड़ा सुलझा और खुशाल परिवार था जिसमे hansi-majaak भरपूर रहता था.

अर्जुन चेहरा साफ़ करके अब ट्रैक और टीशर्ट में वापिस आ खड़ा हुआ था. और बलबीर गायब था क्योंकि सुमन उसका इन्तजार कर रही थी मिलने के लिए.

"चल बीटा आजा एक राउंड लगा के आते है स्टेडियम का.", संधू जी की बात पर वह भी उनके साथ चल दिए. सिम्मी हर जगह की पूछताछ करती उनके साथ आगे चल रही थी और अर्जुन पीछे जहा उसके साथ चारुल भी इधर उधर देख रही थी. दौड़ और हॉकी की फील्ड से गुजरते ये लोग बास्केटबॉल वाली तरफ आये तोह संधू जी ने मंजू को आवाज दे कर अपने पास बुलाया.

"जी सर.", मंजू ने न चाहते हुए भी अर्जुन को देख हे लिए.

"बीटा मंजू ये भतीजी है मेरी और इसका कहना है के स्विमिंग करनी है. संडे अगर फ्री हो तोह बीटा जी इस पागल को थोड़ा स्विमिंग पूल ले जाना. तुम ध्यान रख सकती हो इसलिए कह रहा हु.", संधू जी का अंदाज मजेदार था.

"जी क्यों नहीं सर. वैसे भी अब हर संडे मैं और प्रीती स्विमिंग स्टार्ट हे करने लगे है. स्टैमिना build-up के साथ हे समर एक्सरसाइज के लिए. आप एड्रेस बता दीजिये.", मंजू ने कहा तोह सिम्मी ने जवाब दिए.

"वह हं *** सेक्टर ##. जब दिल करे आ जाना.", सिम्मी की ऐसी बात पर मंजू हंसने लगी.

"ठीक है जी आ जायेंगे. लेकिन नाम तोह बताया नहीं आपने."

"सिमरप्रीत कौर संधू लेकिन सिम्मी साउंड्स कूल.", दोनों ने हाथ मिलाया और जाने से पहले फिर से अर्जुन और मंजू की नजरे चार हुई. सिम्मी चहकती हुई तेज तेज चल रही थी और संधू जी भी वैसे हे चलते थे, कसरत हो जाती थी जैसा उनका maan-na था.

"ये लड़कियां तुम्हे देख रही थी और जिसको पापा ने बुलाया वह शायद तुम्हारी पहचान की है. कही ये वही तोह नहीं जिसके बारे में पारुल को बताया था तुमने.?"

"हाँ ये वही है और दूसरी वाली ये रही.", अर्जुन ने टेनिस बॉल प्रीती की तरफ बढ़ाते हुए चारुल का परिचय करवाया.

"प्रीती ये मिस चारुल है, कोच सर की बेटी और मिस ये है प्रीती जिसके बारे में बताया था.", प्रीती ने भी इज्जत से हाथ मिलाया और मुस्कुरा कर hello किआ. फिर घर जाने का बोल कर वह मंजू की तरफ चली गई.

"कमाल है यार. मतलब तुम्हारी दोनों गर्लफ्रेंड साथ रहती है, एक साथ आती और जाती है.?"

"ऐसा नहीं होना चाहिए क्या? मतलब दोनों का आपस में प्यार है बिना मेरी वजह. और दोनों मुझे पसंद करती है और मैं दोनों को. कुछ उलझन या झूठ नहीं है.", चारुल ध्यान से उन दोनों को साथ जाते देख रही थी. मंजू की टांगो पर अब निक्कर की जगह ट्रैक पंत थी जो उसने शायद ऊपर से हे पहन लिए था. प्रीती का सामान अपने कंधे पर रखती वह पीछे बैठ गई और प्रीती मुस्कुराते हुए उसको कुछ बताती हुई बहार की तरफ चल दी.

"वाओ. तुम्हारा कहने का मतलब यही हुआ न के दोनों ट्रांसपेरेंट है. और मुतवल्ली कनेक्टेड है. लेकिन तुम्हारा केस क्या है. मतलब यू अरे थे थर्ड एंगल इन थिस सिनेरियो."

"कोई एंगल नहीं. प्यार है तोह मैं किसी को एक किलो और दूसरी को आधा किलो नहीं करता. आईटी इस मोरे लिखे फॅमिली एंड केयरिंग. प्रीती का समय कोई और नहीं ले सकता और मंजू को मंजू के लिए. सब साथ हो तोह दोस्तों की तरह हंसना, बोलना, लड़ना, मजाक मस्ती सब साथ.", अर्जुन ने जिस तरीके से ये कहा था वह सुनकर चारुल के होंठो पर एक गोला बना और फिर होंठ मुस्कान में बदल गए.

"सही बात है तुम्हारी मैंने तोह सोचा हे नहीं था के ये किरयाने की दूकान वाला हिसाब नहीं है. लेकिन तुम जल्दी समझदार हो गए हो."

"नहीं मिस. मैं समझदार नहीं हुआ हु. ये सब इन्होने, मेरी सिस्टर्स ने और परिवार ने मुझमे विश्वास दिखाया और कभी रोका नहीं कुछ भी समझने से, पढ़ने से या खेलने से. बस उनका यही कहना है के हम तेरे साथ है. तोह समझदारी जैसा कुछ नहीं है क्योंकि समझदार लोगो को मैंने अकेले देखा है, चिंता करते.", अर्जुन ने ये बात कुछ सोच कर कही थी और जैसे तीर सीधा यहाँ मछली की आँख की तरह चारुल के दिल पर जा लगा. उधर सामने से संधू जी आते दिखे तोह दोनों उनको हे देखने लगे.

"पुत्तर जी सिम्मी ने जाना है मेरे साथ मार्किट. तुम दीदी को घर छोड़ देना या ऑटो में भीता देना अगली बत्तियों से. ये गाडी पता नहीं क्यों नई लेके आये.", संधू जी की बात पर अर्जुन ने तोह हाँ में सर हिला दिए लेकिन जवाब सिम्मी ने दिए.

"गद्दी आपकी पापा जी लेके गए होये ने. दूजी वाली वच पारुल दीदी, मुम्मा तेह ताईजी मार्किट हे गए ने तेह अस्सी आधार हे चले आ.", सिम्मी हाथ पकड़ कर उन्हें पार्किंग की तरफ ले चली इधर अर्जुन और चारुल खामोश खड़े थे.

"फिर अन्नू. अन्नू के साथ तुमने ऐसा क्यों किआ?"

"अन्नू के साथ मैंने क्या किआ है?"

"नहीं किआ तोह कुछ नहीं लेकिन पता नहीं अजीब है के वह भी तुमसे प्यार करती है."

"और मैं भी करता हु. आओ चलो आपको अन्नू के घर हे छोड़ देता हु. घर तोह आपका खली है और आपकी सहेली भी खुश हो जाएगी इस बहाने.", अर्जुन का ये सुझाव वह मन न कर सकीय. बुलेट देख कर एक बार माथे पर बल पड़ गए.

"ये तुम्हारी है? क्या लिखा है 'रानी'?"

"हाँ ये मेरी रानी है जी. बैठिये.", अर्जुन ने स्टार्ट करते हुए कहा तोह वह उचित दुरी रखती हुई दोनों पांव एक तरफ रखती बैठ गई. रस्ते में कुछ खास बात नहीं की दोनों ने अर्जुन जहा आचार्य जी के सबक को दोहरा रहा था वही चारुल दिल और दिमाग में उलझी हुई एक अलग दशा में थी.

"आओ पुत्तर जी तेह नाल चारुल वि आई है.", गेट के बहार हे अन्नू की माताजी मिल गए जो ख़ुशी से अर्जुन से मिले और फिर चारुल का हलचल भी लिए.

"आंटी जी अज्ज खास तुहाडे तोह हे मिलान आया है. ेहना ने अन्नू तोह मिलना सी इस कर के कत्थे आ गए स्टेडियम तोह.", चारुल हैरान सी देख रही थी इसको जो ाची पंजाबी बोल रहा था और आंटी खुद उसका हाथ पकडे अंदर चल दी थी.

ड्राइंग हाल में अर्जुन के साथ हे आंटी भी सोफे पर बैठ गई.

"तेरे अंकल ने रोज 7 बजे दे बाद ौना हुँदा है इसलिए मैं पार्क चली सी. हूँ तू आया तह 2 घडी तेरे नाल गल्लां कर लवंगी. अन्नू अंदर हे है बीटा मिल ले.", उन्होंने अर्जुन के साथ बात करते हुए हे चारुल से कहा और बहार की आवाज सुनती अन्नू हाथ में किताब और आँखों पे चस्मा लगाए आ कड़ी हुई.

"तुस्सी दूध बना दो उठ के, स्टेडियम तोह आया होना यह.", अन्नू की बात सुनकर उसकी माताजी भी हंसती हुई अर्जुन को बैठने का बोल रसोई की तरफ चल दी. बाकी सबके लिए चाय बनाने का कहती हुई.

"अरे बाप रे. महाराज आपके चरण कहा है?", चारुल दोनों हाथ जोड़ती अर्जुन को कहे लगी तोह अन्नू अपनी माताजी वाली जगह पर हे दोनों पाँव सोफे पर रखती हंसने लगी.

"बैठ जा यार कड़ी क्यों है? और मेरी माँ को अर्जुन से बात करना ाचा लगता है. वैसे तुम एकदम से कैसे आ गए.?"

"एकदम से मतलब? पहले चिठ्ठी लिखनी पड़ती है आने के लिए? मिस आज स्टेडियम से घर आ रही थी मेरे साथ तोह इन्हे यहाँ ले आया की इस बहाने आंटी से मिल लूंगा."

"मतलब मेरे लिए नहीं आये?", हलकी आवाज में नाराजगी से अन्नू ने किताब अर्जुन की ब्याह पर मारते हुए कहा.

"हाँ यहाँ सिर्फ आंटी रहती है न जैसे?", अर्जुन ब्याह सहलाता चारुल की तरफ देखने लगा, अन्नू की अनदेखी करता हुआ.

"ोये ज्यादा मत बनो अब. सुनो न प्लीज.", अन्नू ने वही ब्याह पकड़ कर अपनी तरफ करते हुए कहा.

"आंटी आ जाएगी पगली. हाँ तुम्हे हे देखने आया हु, दिल कर रहा था. और चारुल वही थी तोह बहाना मिल गया. अब हाथ छोड़ो.", अर्जुन रसोई वाले रस्ते की तरफ हे देख रहा था. उसका चेहरा देख अन्नू भी हंसने लगी.

"यार ये सही है तुम्हारा. मतलब इस अर्जुन के बचे ने मुझे हे उसे किआ घर में आने के लिए?", चारुल अर्जुन को घूर कर देखने लगी.

"कहा उसे किआ? देखा नहीं आपने कैसे आंटी बहार जाती हुई अंदर हे आ गई.", अभी वह बात कर हे रहे थे की अन्नू की माताजी ट्रे लेकर उधर हे गई. अन्नू उनकी जगह बैठ गई थी तोह वह सोफे पर दूसरी तरफ अर्जुन के बराबर बैठ गई.

"चारुल बीटा कर पे सब कैसे है? पारुल की सगाई की मुबारक दे देना और मैं आती हु कल दिन में तुम्हारे घर.", चाय का कप चारुल को देती आंटी ने एक कप अन्नू के सामने रखा तोह वह उन्हें देखने लगी.

"आंटी जी ाचा है कल आ हे जाओ. छोले चावल आपने हे खिलने है फिर.", आंटी हंसती हुई हां कहकर फिर से रसोई में चली गई. अर्जुन घूँट भर चूका था दूध की लेकिन गरम होने की वजह से वापिस रख दिए.

"बीटा आधा आधा कर लो तुम दोनों. गलती से चाय बना दी मैंने अन्नू के लिए.", आंटी ने खली गिलास में दूध आधा डाला तोह अन्नू चारुल को देख कर मुस्कुराने लगी. इधर बहार से ये महिला चलती हुई आ कड़ी हुई तोह उन्होंने उधर देखा.

"आओ भाभी जी. बड़े ाचे टाइम आये हो. चाय बना के हटी हु और चलो बचो तुम कमरे में बैठो यहाँ बुद्धो में क्या करोगे.", उन्होंने अभी भी अर्जुन के सर पे हाथ फेरते हुए हे कहा था.

"हाँ मैं भी इन्तजार कर रही थी की तुम आई नहीं. फिर सोचा खुद हे बुला लाती हु. चाय के बाद पार्क हे चलते है.", ये आंटी जी तोह अभी बैठने से पहले अगला प्रोग्राम बनाये बैठी थी. तीनो वह से चल दिए. चारुल अपना कप लिए, अन्नू किताब और पीछे अर्जुन दोनों गिलास. यहाँ चारुल अभी बैठने की जगह देख रही थी की अर्जुन तकिया सिरहाने लगता बिस्टेर पर पीठ लगाए पसर गया. अन्नू ने भी दरवाजा ढलते हुए उसके हाथ से गिलास पकड़ा और साथ हे खिसक कर वह भी बैठ गई.

"पहली बार आई है घर में?", अन्नू ने जैसे कहा चारुल भी इधर किनारे बैठ गई चौकड़ी लगाती.

"पहली बार तोह नहीं आ रही लेकिन इस कमरे का माहौल अलग लग रहा है.", अन्नू ने पलट कर देखा तोह अर्जुन दूध पीटा हुआ वही मोटी फिजिक्स की किताब के पैन पलट रहा था.

"ऐसा हे माहौल है बस तू पहले अकेले आई है न. आज इसको ले आई तोह माहौल अलग हो गया."

"किस्मत किस्मत की बात है अन्नू. वैसे तुम्हारा भी घर पास हे है न अर्जुन?"

"ये गली में मुड़कर आखिर से लेफ्ट और फिर एक हे गली है उसमे इधर से तीसरा वाला. आओ कभी, अंकल तोह आते रहते है.", अर्जुन ने जैसे ये कहा चारुल हैरान हो कर देखने लगी. न कोई मिस न आप.

"चली जा चारुल.", अन्नू ने जिस तरह खिलखिलाते हुए कहा था चारुल के मुँह से भी हलकी सी चाय निकल कर होंठो पर आ गई.

"पागल कही की. और ये भी कैसे रास्ता बता रहा है जैसे मैं आ हे जाउंगी.", हँसते हुए मुँह साफ़ करने के लिए कपडा देखने लगी तोह बिस्टेर के किनारे पड़ा रुमाल उठाने लगी.

"ऐ.. वह नहीं. इधर दे इसको. ये इस टॉवल से कर ले.", साफ़ टॉवल देती हुई अन्नू ने रुमाल ले कर बीएड की दराज में रख दिए.

"क्या बात है. गेट्स रुमाल से इतना प्यार. चल कोई नई. 2 मिनट में आई.", चारुल उठ कर बाथरूम में चली गई और इधर उसके जाते हे अन्नू अर्जुन पर झपट पड़ी. दूध का गिलास दोनों हे रख चुके थे और ये छोटा सा एकांत मिलते हे वह अर्जुन के होंठो को चूमती उसके ऊपर पूरी झुकी हुई थी. अर्जुन ने भी वह बड़े गुब्बारे हलके से हाथो में पकड़ लिए. दोनों एक दूसरे के मुँह में मौजूद दूध और बॉर्न्विटा की मिठास चूसते ये भूल गए थे की चारुल सिर्फ थोड़ी साफ़ करने गई थी. दरवाजे के सामने कड़ी वह इन दोनों की ऐसी हालत देख सुन्न रह गई. अन्नू पूरी उसके ऊपर चढ़ती हुई सर को पकडे होंठ चबाने हे लगी थी.

"हूह.. पागल हो गई थी क्या? आंटी घर में हे है और चारुल बाथरूम में. हहहहहह.. लेकिन इतनी मीठी कैसे हो गई.", अर्जुन साँसे भरता अन्नू के गाल सेहला रहा था और दोनों की गर्दन आवाज की दिशा में मदद गई.

"दूध पीया है न तुम्हारा झूठा. और चारुल बाथरूम में रहने नहीं गई थी.", उसकी बात पर अर्जुन बिस्टेर से उठने लगा तोह चारुल ने मुस्कुराते हुए कहा.

"अरे बैठो यार. मैं हे रंग में भांग दाल रही हु. मैं चलती हु तुम बैठो."

"अरे नहीं नहीं. मैंने वैसे भी जाना हे था. घर से काफी देर से बहार हु. अंकल आ जायँगे तोह अन्नू घर भी छोड़ आएगी.", और इस बार अर्जुन ने चारुल के सामने हे अन्नू के गाल को चूमा और दरवाजे से बहार निकल गया. चारुल हैरानी से अन्नू की मुस्कान और अर्जुन को बेफिक्र सा जाते देख रही थी.

"शाबाश. पहले तोह चलो तुम दोनों अकेले थे तोह लगे हुए थे लेकिन अभी ये क्या किआ इसने.?"

"Bye कहा है और कुछ नहीं. देखा नहीं सिर्फ गाल पर चूमा. तुझे भी वैसी हे bye चाहिए थी क्या? बालो?"

"कामिनी कही की. मुझे ऐसा समझा है? लेकिन यार सच में जो देखा वह पहली बार लाइव देखा है ज़िन्दगी में.", चारुल अन्नू की तरह उसके बराबर आ बैठी.

"कब से देख रही थी.?", अन्नू ने नजरे झुकाते हुए कहा, चेहरे पर भरपूर लाली चा गई थी ये सोच कर की उनके अंतरंग पल उसके सहेली ने देख लिए थे.

"जब तू उसके ऊपर चढ़ती जा रही थी होंठो पर होठ रखे और उसके हाथ तेरे यहाँ थे. तुम दोनों छी बेशरम लोग.", चारुल का इशारा अन्नू के बड़े गुब्बारों की तरफ था.

"हो गया यार गलती से. इतनी देर से उसको देख रही थी नहीं कण्ट्रोल हुआ.", अन्नू उंगलिया आपस में रगड़ रही थी दोनों हाथ की

"परेशां मत हो यार. प्यार करते हो तोह ाची बात है न के ऐसे पल भी बना हे लेते हो. लेकिन तू कैसे इतनी बोल्ड हो गई?"

"मैं हे बोल्ड हु. वह तोह आगे हे नहीं बढ़ता, जिद्द करनी पड़ती है.", अन्नू ने शोखी से होंठ दबा लिए ऐसा कह कर.

"ओह बाप रे. बात यहाँ तक पहुंच चुकी है. मुझे तोह कल तूने यही बताया था के किश और इधर हाथ लगाने तक."

"हाथ हे लगे है. जो लग्न चाहिए वह नहीं लगा लेकिन कोई बात नहीं 2-3 दिन में वह भी हो जाना है.", अन्नू ने तकिया मोड़ते हुए गर्दन ऊपर उठा ली.

"तुझे डर नै लगता? देख कल को तेरी शादी होगी और शादी से पहले अगर किआ तोह पति के लिए क्या बचाएगी.? पागलपन नहीं है ये?"

"प्यार है ये. और कोई साथ ले जायेगा क्या करने के बाद. वही पति के लिए रहेगी बस पर्दा हट जायेगा. और स्पोर्ट्स वाली लड़कीओ में तोह खेलने से हे नहीं हैमेन ब्रेक हो जाता? फिर वह कैसे ये गिफ्ट देती होंगी हस्बैंड को?", अन्नू की बात पर चारुल उसके सर पर हाथ मरती हंसने लगी.

"कामिनी बहोत दिमाग चलने लगा है तेरा. और सच कहु तू ऐसे ज्यादा ाची लगती है. उसके बारे में बात करते हुए या जब वह पास होता है तू बिलकुल गुलाब सी लगने लगती है. वैसे बात सही है तेरी, स्पोर्ट्स में थोड़ी सी एक्सरसाइज या स्ट्रेचिंग से हे पूरे चान्सेस है पर्दा गायब होने के."

"पापा आ गए चल थोड़ा घूम के आते है फिर घर ड्राप कर दूंगी.", अन्नू मुस्कुराती हुई चारुल को लेकर बहार की तरफ चल दी.

.

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अर्जुन नाहा धो कर बगीचे में खाद दाल रहा था और रामेश्वर जी उसको समझा रहे थे की कहा कितनी और क्यों डालनी है. दोनों दादा पौटे लगे हुए थे क्योंकि अभी 7 बजे भी दिन पूरा ढला नहीं था.

"चल खाद देने के बाद पानी अचे से छोड़ देना नहीं तोह छोटे पौधे जल भी सकते है. मैं नाहा लेता हु इतने, तू आ जाना काम ख़तम करके.", रामेश्वर जी के हाथ पाँव भी मिटटी से साणे हुए थे. अर्जुन ट्रैक पजामा घुटने तक मौडे ऊपर बनियान में हे लगा हुआ था.

"आप थोड़ा आराम कर लो. दादी कह रही थी की आजकल घर पे नहीं टिकते आप.", अर्जुन ने कस्सी से बड़े टुकड़े दबा कर चूरा करते हुए कहा तोह रामेश्वर जी पंजाबी में कुछ बोल कर चले गए और अर्जुन हँसता हु उन्हें जाते देख फिर काम में लग गया. आँगन की बाहर वाली बड़ी लाइट भी उन्होंने जला दी थी कुछ सोच कर.

"सो गार्डनर्स हेरे इन इंडिया वर्कआउट ा लोट. थिस ढूढे है सम क्रेजी फिटनेस.", अंग्रेजी में ये आवाज पास से आती देख अर्जुन मिटटी वाले हाथ की उलटी तरफ से हे आँखों के सामने आया पसीना साफ़ करते हुए देखने लगा. प्रीती के साथ ये कुछ अलग सी दिख रही लड़की अर्जुन के बारे में हे बोल रही थी. (वार्तालाप हिंदी में रहेगा)

"विक्य, अब तुम इंडिया आ गई हो तोह ऐसे बहोत से सरप्राइज दिखने वाले है. चलो घर चलते है और सॉरी घर पर नहीं मिलने के लिए.", प्रीती उसको साथ लिए चली गई. उनके पीछे हे घर से रेणुका बुआ बहार चलती आई तोह रुक कर अर्जुन को देखने लगी

"आपकी भतीजी मुझे माली बता के चली गई. ऐसे कौन परिचय देता है अपने होने वाले पति का?", अर्जुन पानी की पाइप एक तरफ बगीचे में रखते हुए कह रहा था.

"ाची बात है न के कल वह इस माली को हे मालकिन के साथ देखेगी.", रेणुका बुआ की इस बात पर दोनों हंसने लगे.

"आप न जानती हो ाचे से के कैसे दिल रखा जाता है.", अर्जुन उनके पास आ खड़ा हुआ. रेणुका बुआ इस बड़े से गुलाब के झाड़ पर उंगलिया फिर रही थी.

"तुमसे सीख रही हु.", उनकी ऐसी बात सुनकर अर्जुन ने उस कांटे वाले पौधे को अपनी तरफ कर लिए.

"ध्यान से, इसमें कांटे है और चुभ सकते है.", रेणुका बुआ उसके चेहरे और फिर हाथ को देखने लगी

"तुम्हारे हाथो में नहीं चुभते क्या? छोड़ो इसको."

"मेरे हाथो को ये पहचानते है और इनकी सख्ती भी. लेकिन कई बार गुलाब के पत्ते भी इनमे अटक जाते है, नाजुक होते है वह.", रेणुका थोड़ा एक तरफ हट गई तोह अर्जुन ने बड़ी सावधानी से वह पौधा सीधा कर दिए.

"दिखाओ हाथ.", अर्जुन ने इतना सुनते हे हाथ सामने कर दिए जिनपर मिटटी लगी थी.

"सॉरी. मिटटी लग गई आपके हाथ पर भी.", बनियान के एक हिस्से से साफ़ करते हुए उसने हाथ छोड़ दिए.

"देख लिए न के हाथो को खरोच नहीं आई. मैंने उन्हें भी इस तरह पकड़ा था के हाथ नीचे से ऊपर जाए. नहीं तोह चुभ तोह मुझे भी जाते.", वह हँसता हुआ कह रहा था और रेणुका अपने हाथ को हे देख रही थी जो अर्जुन के हाथ में था अभी थोड़ी देर पहले.

"मजा आता है तुम्हे इस काम में?"

"किसको ाचा नहीं लगेगा? म्हणत तोह लगती है थोड़ी लेकिन यही बड़े हो कर चाय, फल, फूल और सांस लेने के लिए जरुरी हवा देते है. ऊपर से कोई जब न मिले तोह इनसे हे बातें कर लो.", अर्जुन की ऐसी भोली बातें रेणुका को भी भा रही थी.

"मुझसे भी मिलवा दो, क्या पता मैं भी बातें करना सीख जाऊ. भाभी को तोह 2-2 पौधे दे दिए जिन्हे वह सुबह शाम बड़े ध्यान से रखती है."

"ये तुम्हारे हे हैं.", अर्जुन ने इस बार जैसे कहा था वह सिर्फ कमरे या दोनों के एकांत में ऐसा कहता था. रेणुका खुद को रोकने में कामयाब रही, ना चाहते हुए भी.

"कभी आप आना सुबह सैटरडे या संडे को. फिर कुछ नए पौधे लगाएंगे उधर वाले हिस्से में. अभी जमीन तैयार की है.", अर्जुन ने इशारा किआ और फिर भाग कर पाइप दूसरी तरफ करके वापिस आया.

"याद नहीं रहा पानी चला राहकः है."

"रात की रानी के बारे में जानते हो? मुझे बहोत पसंद है."

"जस्मिने. हाँ उनकी महक सबसे अलग और लुभावनी होती है. सही याद दिलाया आपने, यूनिवर्सिटी से बड़ा पौधा हे मिल जायेगा. पहले भी लगाया था इधर लेकिन मेरी गलती से खराब हो गया था."

"फिर पक्का मैं शाम को तुमसे बात करने आया करुँगी.", रेणुका को ये पसंद थे मतलब कुछ खास था इनमे.

"परसो आप 6 बजे यही मिलना आपके हाथो से हे लगाएंगे. काम से काम रात में भी ये बगीचा मेहकना शुरू होगा.", अर्जुन ने वाल बंद करने के बाद सामान एक तरफ रखा और हाथ से चलने वाले नलके पर आ खड़ा हुआ.

"घर जाने की जल्दी में हो आप?"

"नहीं. मेहमान अभी आराम कर रहे है और करने को कुछ था नहीं.", रेणुका अंदर आ कर कड़ी हो गई थी.

"नलका चलो फिर.", हाथ मुँह धोने लगा हे था के कौशल्या जी आ गई.

"ओह कपूत. कोई और न मिला तोह अपनी बुआ से नलका चलवाने लगा. बाल्टी भर लेता खुद या पाइप लगा ले. इस बची को ऐसे काम करवा रहा है इतना बड़ा हो कर."

"ताई जी, इतना जोर वाला काम भी नहीं है. वैसे हु उसको दांत रही हो आप."

"रेणुका ये हाथ मुँह धोता नीचे बैठ जायेगा तोह आधे घंटे नहीं हटने वाला. चल तू बाथरूम में जा और नाहा ले ाचे से.", अर्जुन हँसता हुआ बाथरूम में घुस गया और कौशल्या जी रेणुका से बातें करती उनको भी अंदर हे ले आई. अर्जुन नाहा धो कर सिर्फ टोलिया लपेटे ऊपर भाग गया.

"शर्म कर थोड़ी तोह.", जैसे हे कमरे के अंदर आया सामने तारा वाला दरवाजा लगा था और अर्जुन ने ये देख टोलिया बिस्टेर पर फेंकते हुए अलमारी का पल्ला खोला. इधर कोने में कड़ी ऋतू दीदी उसकी दराज से पेन निकाल रही थी जो वह देख न सका.

"आप यहाँ कैसे?", जल्दी से सामने तकिया रखता वह पीछे मदद कर उन्हें हे देखने लगा जो हंस रही थी उसकी हालत पर.

"पहन ले कपडे. कुछ नया नहीं देख रही मैं. हरा पेन ढून्ढ रही थी नोट्स के लिए लेकिन तू कोई और ये दिखता घूम रहा है.", अर्जुन ने झेंपते हुए जल्दी से पजामा पहना और उतनी देर तक ऋतू दीदी उसको हे देखती रही. फिर अलमारी में से एक नया पेन निकल कर अर्जुन ने उनकी तरफ बढ़ा दिए.

"ये लीजिये. वह मैं सिर्फ नीला पेन और पेंसिल हे रखता हु. आगे से पेन चाहिए हो तोह इस दराज में सभी है."

"और मुझे ख़ास वाला चाहिए हो तोह.", ऋतू दीदी ने उसके करीब आते हुए कहा तोह अर्जुन बगले झाँकने लगा. ऊपर कोई भी हो सकता था और दीदी ऐसे कर रही थी.

"पहले बता देना फिर. यहाँ कोई भी आ सकता है अभी."

"हाहाहा. डरपोक. अगर मैं ऐसा कर रही हु तोह मतलब कोई भी नहीं होगा न.", दीदी के इतना कहते हे दरवाजा खुला और प्रियंका दीदी हाथ में अर्जुन के इस्त्री किये कपडे लेकर आ कड़ी हुई. अब अर्जुन मुस्कुरा रहा था और ऋतू दीदी चुप थी.

"शांत क्यों हो भाई? इसने कुछ कहा क्या ऋतू.", उनकी बात सुनकर ऋतू दीदी की भी हंसी निकल गई.

"दोनों हे पागल हो. ले तेरे कपडे रख अलमारी में.", ऋतू दीदी भी साथ हे चली गई उनके. अर्जुन भी पढ़ने बैठ गया.

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रात 11 बज चुके थे जब अर्जुन ने समय देखा अपनी टेबल पर राखी घडी में. साढ़े 8 बजे वह खाने के बाद पढ़ने बैठा था लेकिन पता हे न चला कब इतना समय हो गया. सब व्यवथित करता वह कमरे की लाइट बंद करने के बाद तारा की तरफ आया तोह यहाँ सिर्फ मधु बुआ अकेली बिस्टेर पर बीच में लेती हलकी आवाज में टेलीविज़न पर पुराने गाने देख रही थी जो रात 11 बजे आते थे.

"आप सोई नहीं अभी तक?", अर्जुन की आवाज से उनका ध्यान बिस्टेर के नजदीक खड़े अर्जुन पर गया. एक मुस्कराहट के साथ उन्होंने कहा.

"अकेले नींद नहीं आ रही थी और तारा किताबे लेकर अलका के साथ चली गई सोने. तुम कुछ कर रहे हो?"

"अभी आता हु थोड़ी देर में.", अर्जुन इतना बोल कर नीचे चल दिए.

यहाँ भी माहौल शांत था बस बाथरूम से निकल कर ललिता जी उसके सामने हे अपने कमरे में गई थी. वह उसको देख न सकीय क्योंकि अर्जुन ऊपर वाली सीढ़ी पर था. उनके जाने के बाद वह आराम से चलता माँ के कमरे में आ गया.

"आप सोई नहीं अभी तक?"

"इतनी जल्दी तोह मैं वैसे भी नहीं सोती और आज तोह तूने यहाँ सोना था इसलिए रुपाली भी कोमल के साथ सोने चली गई थी घंटा भर पहले."

"ठीक है, मैं भी देखने आया था. थोड़ी हे देर में आता हु जब तक आप कर लो जो कर रही थी.", अर्जुन ने उन्हें कपडे समेत ते देख कर कहा तोह रेखा जी वही मुस्कान जवाब में दिखी जो अर्जुन के लिए किसी वरदान सी अनमोल थी.

"हाँ, दरवाजा वैसे हे ढला होगा. खुद बंद कर लेना अगर मैं लेट जाऊ तोह.", उनकी बात सुनकर वह रसोई से पानी की बोतल लेकर वापिस ऊपर आ गया. यहाँ एक चालू था और लाइट बंद. बस वह गाने अब पहले से 5 आवाज ऊपर थे जो ज्यादा तेज भी नहीं थी.

मधु बुआ बाथरूम से बहार निकल कर बहार आई तोह अर्जुन को देख कर हे चमक बढ़ गई.

"मिल हे गया टाइम फिर?"

"ज्यादा नहीं लेकिन इतना की आपको नींद लेने में परेशानी नहीं होगी.", अर्जुन ने उन्हें बाँहों में कस्ते हुए गले पर चूमा और दोनों अब बिस्टेर के बीच में थे. मधु बुआ की आग इतनी हे देर में भड़क कर चरम पर आ चुकी थी. एकमात्र कपडा जो शरीर पर था उसको अलग करती वह खुद अर्जुन के मुँह में अपना उभार भर्ती उसके ऊपर झुकी हुई थी.

"जितना कर सकता है कर. बहोत परेशां कर दिए तूने मुझे. एक बार आग लगा कर आज वापिस आया है." दोनों धीमी आवाज में बातें कर रहे थे. अर्जुन ने हाथ उनकी मोटी छूट पर लगाया तोह वह उन्होंने जैसे अभी कोई चिकनाई लगाई थी.

"तैयारी के साथ आई हो."

"गलती नहीं करने वाली इस बार मैं. तेरा लेने के बाद अकाल आ हे जाती है.", उनके बड़े पपीते अर्जुन नीचे लेता मसल रहा था और मधु बुआ न जल्दी से उसका नाग पिटारे से आजाद कर लिए.

"बाप रे, कितना मोटा है. हमेशा ऐसे हे रहता है ये."

"जब आप इस हालत में होंगी तोह ये भी सर उठाएगा हे.", अर्जुन भी उनकी जल्दबाजी देख रहा था. बगल में लेट कर खुद हे मधु बुआ ने टाँगे फैला ली थी. चिकनी छूट की मोटी फांके फैलाती वह अर्जुन का लुंड अब बिना देरी अंदर चाहती थी और अर्जुन ने भी वैसा हे किआ.

"आह.. प्यार से कर जालिम. मेरी ये अभी भी तेरा झेलने में दर्द करती है.", गुलाबी हिस्सा उन मोटी फांको में जा चूका था. ये क्रीम कुछ ज्यादा हे चकिनी थी जो अर्जुन के बुआ के ऊपर झुकते हुए हे लुंड छूट में और अंदर फिसल रहा था.

"बुआ ये क्या लगाया है आपने अंदर.? रुका नहीं जा रहा."

"दाल दे रे पूरा. फिर कर लिओ बात. जान निकल रही है.", अर्जुन उनके मॉटे गुलाबी होंठ पीते हुए हे ये आखिरी धक्का लगता आखिरी हद्द तक जा पंहुचा. छूट चिकनाई के बावजूद कस गई थी. दोनों के शरीर एक पल रुके और फिर उनके कूल्हे 6 इंच गद्दे से हवा में उठाये अर्जुन जड़ तक धक्के देता बुआ को संतुष्ट करने लगा. छूट का कसाव ाचा खासा था, जिसकी वजह लुंड की मोटाई थी.

"आह... बस ऐसे हे कर रे.. तू हे दर्द की दवा है. उम्म्म.. इन्हे भी चूस और दबा.. तड़प रहे है ये.", अर्जुन दोनों बड़े चुचो को सामने से दबाता सटासट लुंड पेलने लगा. हर धक्के पर वह बड़े चुत्तड़ स्पिरिंग से हिलने लगते और ऐसे हे दोनों चुके. 10 मिनट में हे बुआ की छूट का बांध टूट गया था लेकिन अर्जुन चुदाई रोके बिना और ज्यादा जोर से उनकी छूट ढीली करने लगा रहा.

"सच कहती हु के औरत को सुख देना तू जानता है.. आठ.. 2-3 बार करवाने से पहले तू हे नहीं खली होता. रुक तेरी पसंद का पोज़ बनती हु.", गीली छूट के फैले हुए सुराख से चमकता लुंड बहार निकला तोह एक हलकी सी आह देती मधु बुआ रुक कर फिर चौपाया बन गई. सच में हे अर्जुन को ये पसंद था. भरी गदराया शरीर, बड़े फैले हुए चुत्तड़, नीचे की तरफ लटके वह 2-2 किलो के बड़े पपीते. अपनी घोड़ी जैसी बुआ पे वह भी घोड़े सा चढ़ता अपना पूरा लुंड एक बार में उन लाल फैंको के बीच भरने के बाद शरीर से लिपट गया.

"आठ.. सच में घोडा है रे तू.. अंदर तक जाता है जहा तक रास्ता बना हो. आह्ह्ह्ह.. ऐसे हे खींच रे इन्हे.", दोनों चुके हथेली में बुरी तरह दबाता वह हर धक्के पर उनके कूल्हों से टकरा जाता. निप्पल मसल मसल कर मॉटे कर दिए थे और छूट से निकलता रास अब भरपूर चिकनाई दे रहा था. हर धक्का जैसे ढोल पर थाप की तरह पड़ता दोनों को मंजिल तक ले जाने लगा. 20 मिनट में उन्होंने सिर्फ चुदाई हे की थी आज. न कोई प्यार से सहलाना चूमना और न ज्यादा बातें.

"बुआ मेरा होने वाला है.. आठ.", अब बुआ की छूट में भी जलन होने लगी थी. उनका हो चूका था लेकिन अर्जुन का लुंड फूलने की वजह से छूट के बहार भरपूर रगड़ दे रहा था.

"ाहः.. अंदर हे भर दे रे.. आठ.. गोलिया ले रही हु मैं.. लेकिन याद कर लिए कर जल्दी हे अपनी बुआ ko..mmmaaaaahhhh.. आठ.. भर दे पूरा.", ट्रेक्टर की ट्राली सा जुड़ा वह झटके देते हुए हे छूट में गधा वीर्य उड़ेलने लगा. लुंड का आखिरी कटरा भी जब छूट में गिर गया तोह अर्जुन भी उनके कूल्हों पर चपत लगता लुंड बहार निकल कर बाथरूम में चला गया. बुआ घोड़ी बानी हुई हे नीचे सर रखे छूट से उस लम्बी सफ़ेद तार को बढ़ते देख रही थी जो चादर की तरफ जाने लगी थी. जल्दी से तकिये के पास राखी अपनी सफ़ेद कच्ची छूट पर दबती वह सारा वीर्य साफ़ करने लगी. पहले जो चेहरा मुरझ्या हुआ था अब वह चमक और ख़ुशी थी.

"बुआ अगली बार तभी जब आप ये देंगी.", उनकी गांड पर ऊँगली फिरता वह बैठ कर पानी पीने लगा.

"यहाँ भी कर लिओ. तुझे नहीं रोकने वाली. लेकिन तेरी बुआ की आग ऐसी है के 2-3 दिन में एक बार आ जाया कर, चाहे इतनी हे देर के लिए जितना आज किआ.", अर्जुन ने सर हिलाते हुए हां कहा और उनका गाउन पकड़ते हुए खड़ा हो गया.

"दरवाजा बंद कर लो बुआ. कल मिलता हु.", ये बात थोड़ी तेज कही थी और फिर वह नीचे अपनी माँ के कमरे में आ गया जो लाइट बंद किये बिस्टेर पर लेती थी. जीरो का बल्ब जलाते हे अर्जुन की सांसें रुक गई ये दृश्य देख कर.
 
अपडेट 89

बदलाव एक जरुरत


रेखा अपने बेटे के इन्तजार में खुद को ाचे से सँवारने के बाद बिस्टेर पर करवट के बल लेट गई थी. आँखों में नींद तो दूर दूर तक न थी लेकिन इन्तजार करते हुए बस आँखें बंद करने से बेहतर लग रहा था. और जैसे हे अर्जुन ने वह हलकी रौशनी की तोह अपने बेटे को यु हैरान देख उसके भी चेहरे पर एक लुभावनी मुस्कराहट आ गई.

"चल आजा. पहले हे कितना समय हो चूका है.", अपनी माँ की बात सुनकर अर्जुन खयालो से बहार निकलता उनकी तरफ बढ़ गया. लम्बे घने बाल खुले लेकिन सही तरह से एक तरफ किये वह सिरहन सर के नीचे लगाए थी. अर्जुन द्वारा दिलवाई वही काली निघ्त्य उनके गोर सुडोल जिस्म को चार चाँद लगाती उम्मीद से ज्यादा हे दिलकश बना रही थी. अर्जुन बिस्टेर के इस तरफ हे उनकी बगल में आ लेता.

"आपकी बड़ी स्पीड है. इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गई आप?", अर्जुन एक हाथ उनकी करम पर रखता हुआ अपना सर उनकी ब्याह पर टिकाये लेता था. शरीर की महक अर्जुन को फिर अलग दुनिया में ले जाने लगी थी. उनके भरे भरे मॉटे होंठ बोलने के लिए खुले तोह वह बिलकुल करीब से उन्हें हे देखने लगा.

"कहा तैयार हुई हु? जब तू आया था तब मैं नाहा तोह चुकी हे थी. बस ये पहन लिए जो मेरे बेटे ने अपनी ख़ुशी से दिलवाया था.", रेखा जी उसके नादान से चेहरे पर अपना कोमल हाथ रखते हे बता रही थी.

"पता नहीं आप इतनी खूबसूरत कैसे हो? हर बार देखने पर लगता है जैसे पहले ध्यान से देखा हे नहीं. वैसे आप ऋतू दीदी को ज्यादा प्यार करने लगी हो.", अर्जुन अपनी माँ की सुगंध लेता उनके गले के पास नाक करते हुए कह रहा था.

"हाँ पता है कितनी खूबसूरत हु मैं. और ऋतू की शिकायत से पहले ये सोच ले के कितने दिन, दिन नहीं हफ्तों बाद तू यहाँ आया है. वह बेचारी तोह 10 मिनट में सो जाती है लेकिन तू जितनी म्हणत करवाता है वह?", उनकी बात सुनकर अर्जुन बचे से शर्माता हुआ उनके बड़े पुष्ट सीने पर अपना हाथ रख कर जायजा लेने लगा. रेशमी कपडे के भीतर वह पुरे सख्त और फूले हुए थे.

"उनको जबसे पता लगा है आपके दूध का तोह आने हे नहीं देती मुझे और साथ में तीनो सोये तोह मुझे पीने नहीं देंगी.", अर्जुन की बात सही थी लेकिन रेखा हंसती हुई खुद हे अपने सीने के सामने वाली डोरी खोलने के बाद वह मोटा निप्पल जो दूध की अधिकता से सूजा हे हुआ था, अर्जुन के होंठो पर लगाती बोली.

"रुपाली भी साथ सोती है तोह ऋतू को उतना मौका हे नहीं मिलता. हाँ उसकी स्पीड तेरे से तेज है जो 10 मिनट में दोनों खली करके सो भी जाती है. आह्हः.. आराम से पी तीसरी रात है जो ये खली नै हुए.", अर्जुन ने हलके से जीभ लगाने के बाद भूखे बचे के तरह गुलाबी अकड़ा हुआ निप्पल होंठो में भर के शीशी की तरह चूसना शुरू किआ तोह रेखा जी की भी हलकी सी आह निकल गई. उनका ये उभार सचमुच किसी खरबूजे सा गोल और सख्त हो रखा था. चिकने उभार पर नीली लकीरे उभरी हुई बता रही थी की वह किस हद्द तक दूध से भरे हुए है. जल्द हे अर्जुन ने उन्हें आराम पहुंचना शुरू कर दिए. मुँह में वह मीठा निवाया दूध भरते हे मजे की अधिकता से अर्जुन निचले हाथ को दूसरे पर रखलने लगा और ऊपर वाले हाथ से अपनी माँ की कमर का चिकना और उभरा भाग सहलाने लगा.

"अह्ह्ह.. वह भी इतना आराम नहीं दे पति मुझको जैसे तू देता है. उम्मम्मम", अर्जुन का हाथ उनकी कमर पर बंधी रेशमी काली डोरी अंदर से उस रेशम से मुलायम और विशाल कूल्हे पर आया तोह दूध के मजे में उसने पूरा पंजा वह दबा दिए. उस मुएलएम त्वचा के अंदर का भाग ऐसा नरम तह जैसे गीले गुब्बारे के अंदर पानी भरा हो. निप्पल के गिर्द बना gulabi-bhoora घेरा भी मुँह में लेता वह पूरी लगन से उसको खली कर रहा था. बीच बीच में हे वह चूसना रोक कर अपनी जीभ से निप्पल सेहला देता या सिर्फ फूला हुआ हिस्सा होंठो से दबा देता. रेखा उसकी ऐसी हरकत पर बड़ी मुश्किल से अपनी सिसकारी बहार निकलने से रोक प् रही थी. ऐसे समय में जब भी उनकी आँखें बंद होती तोह होंठ कही ज्यादा उत्तेजक अदा से कस जाते.

"आज दूध ख़तम हे नहीं हो रहा.", अर्जुन की बात पर वह सीढ़ी लेटकर उसको दूसरा वाला पीने का कहने लगी. इस वक़्त उनकी दोनों बड़ी छातियां पूरी निर्वस्त्र होकर छत्त को देख रही थी. ऐसे में जहा जवान लड़कीओ के चुके भी अंदर धंस जाता या फ़ैल जाते थे वही रेखा के उन्नत बड़े वक्ष पूरे तन्न कर उनकी कसावट और सुंदरता का बखान कर रहे थे. अर्जुन ने इस वाले सूखे निप्पल को देखा जो पहले वाले से हे हाल में था तोह चुटकी में भरते हुए दबा दिए. इधर एक सफ़ेद बड़ी बूंद निप्पल से प्रकट हुई उधर रेखा ने अपना दूसरी तरफ का हाथ जांघो के बीच रख लिए.

"आह्ह्ह्हह तेरी शैतानिया काम होने का नाम नहीं ले रही.", छूट का उभार बता रहा था के रेखा का ये हिस्सा भी कितना मादक है लेकिन इस वक़्त ये उत्तेजना जैसे इस ख़ास हिस्से को भी और फूलती हुई अंदर से गीला करने लगी थी. लाल पोलिश लगे नाखुर वाली 2 गोरी उँगलियों से रेखा खुद हलके से अपनी छूट की दरार सेहला रही थी, डोरी वाली उस काली naam-matra की पंतय के ऊपर से.

"आपसे शैतानी नहीं करूँगा तोह किस से करूँगा?", दूध अर्जुन के होंठो से बहार आ रहा जिसको देख कर रेखा ने खुद हे अपने बेटे के होंठो को मुँह में भर लिए. बड़ा सुकून मिल रहा था ऐसे करने पर. अर्जुन की कठोर चिकनी बड़ी छाती के नीचे दबते एक उभर के साथ हे दूसरे पर उसके हाथ की वह मरदाना पकड़. रेखा उसके गाल छोड़ कर दोनों हाथो से पीठ सहलाना लगी. रेखा उस शरीर की मालकिन थी जो न हे दुबला था और न बेडोल फैला हुआ. हर अंग एक खास आकर और भरपूर यौवन से भरा हुआ. 38 के बड़े चुचो का कसाव कोमल से ज्यादा था तोह अकार माधुरी से बड़ा. सपाट नरम गद्देदार पेट और आध इंच गहरी गोल नाभि. बाल विहीन गोर पत् के ऊपर लेशमात्र ढीलापन न था, लेकिन अंदर की तरफ से वह उतने हे मुलायम थे. 40 के आकार की नितम्भ बेदाग़ और कही भी वह दरदरापन न था उनकी घाटी में जो अक्सर इस जगह बाकी हिस्से से अलग होता है. माँ से सर्वाधिक प्यार के अलावा यह भी एक बड़ी वजह थी अर्जुन की उनके प्रति दीवानगी की.

"अर्जुन वह से हाथ हटा न.. आह्हः.. परशान कर रहा है.", अर्जुन के होंठो को छोड़ कर रेखा ने उसकी कलाई को दबा लिए. अर्जुन पंतय को एक तरफ से हटा कर उनकी बड़ी उभरी हुई फांको को सहलाने लगा था. वह का नरम मांस ऐसे सीधा उँगलियाँ लगने से हे अर्जुन से प्यार की गुहार लगता प्रतीत हो रहा था. अगले हे पल एक ऊँगली सु रस से भरी मांड में जा घुसी. रेखा के चेहरे पर कामुकता से डोरे बन चुके थे. शरीर का निचला हिस्सा ऊपर उठता खुद हे पूरी ुंली को अंदर लील गया.

"आप कुछ और कह रही हो और वह कुछ और. किसकी सुनु?", एक खास तरीके से वह अंदर ऊँगली टेढ़ी करता उन रसीली दीवारों को कुरेद रहा था. ये वही जगह थी जो किसी भी नारी का संवेदनशील भाग होता है.

"उम्म्म.. माँ का दूध पीना है या प्यार करना है? सोच ले.. आह्हः..", वह जो कह रही थी अर्जुन दोनों करने लगा था. अंगूर से निप्पल को चुभलाते दबा कर पीने लगता और आपस में कासी मुलायम जांघो के बीच उस फूली हुई छूट के अंदर पूरी कुशलता से रेखा का kaam-jwar बढ़ता. छूट के भीतर जैसे शहद उतरने लगा था और ऊँगली के साथ हे वह बाहरी होंठो को भिगोता हुआ रेखा को चरम पर ले आया. छूट ने कस के ऊँगली को अंदर हे दबा लिए तोह अर्जुन ने हलके से उनका उभर काट लिए.

"आउच.. आह्हः.. ये वाला पी ले अब.. उसको थोड़ा आराम दे.", दूसरा उभर खुद दबती हुई वह दूध से पूरी गोलाई गीली कर रही थी. उन्माद में कब वह ये करने लगी कुछ ध्यान न रहा.

"ऐसे नहीं पीने वाला मैं. जो करता हु करने दो और ऐसे हे लेती रहो आप.", अर्जुन ने हौले से कान में कहा तोह रेखा ने आँखें बंद कर ली, एक मुस्कान के साथ. अर्जुन अपना पजामा फर्श पर गिरता उनकी जांघो के बीच आ बैठा. दोनों हाथो से चिकनी पिण्डलिया सहलाता वह अंदरूनी नरम हिस्से पर आ रुका. थोड़ा जोर लगते हे खुद रेखा ने अपने बेटे के सामने वह ख़ास हिस्सा उभर दिए जहा हलकी रौशनी में भी शबनम की बुँदे उभरी हुई इस adh-khile गुलाब को निखार रही थी. दोनों हाथो की उँगलियों से अर्जुन ये मखमली गुलाब की पत्तिया खोल कर अपनी जीभ से वह ये औंस की बूंदें जीभ से चाट कर पीने लगा.

"िस्ससाहहह..", ये अर्जुन का वह बाण था जो बड़े प्यार से सही जगह आ लगा था. रेखा अपने बेटे के इस हुनर से कमर उठती हुई खुद हे अपने बेजोड़ स्टैनो को दबाने लगी. गुलाबी फांके खुद हे जीभ को रास्ता देती उसको अंदर जाने दे रही थी. बीच बीच में वह अपने होंठो में उस ख़ास टुकड़े को पकड़ लेता जो दोनों फांको के बीच हल्का सा बहार निकल रहा था.

"आह्ह्ह्हह्ह .. आवाज नहीं रोक पाऊँगी .. आठ.. ", एक बारीक सी शहद की धार अंदर से ृस्टि हुई अर्जुन के होंठो से आ लगी तोह दीवांवर सा वह अपनी माँ की दोनों टंगे और फैलते हुए कुछ ज्यादा हे गहराई से ये रास निकाल कर पीने लगा. बड़े कूल्हे इस अवस्था में बिस्टेर से 4 इंच ऊपर उठते उसकी थोड़ी पर स्पर्श दे रहे थे. इस सखलन से पेट, नाभि और वह गुलाबी कुमुद अंदर बहार हिलते बता रहे थे की ये एहसास कितना जरुरी था इस शरीर के लिए.

"अब आप बताओ जरा क्या करना है?", अर्जुन उस गुलाब को पूरा खिला कर फिर से पुराणी जगह, अपनी माँ की बगल में आ गया. कितनी हसरत से वह बड़ी काली आँखें अर्जुन को निहार रही थी जैसे काम अभी अधूरा हे था. मदहोशी के आलम में चेहरे पर आये इन घने घुंगराले बालो को ठीक करता अपनी माँ को देख रहा था. फिर उनके होंठ हलके से हिले और हाथ भी.

"जो ये चाहता है वही.", अर्जुन का सख्त मूसल नीली रगो की वजह से कुछ ज्यादा हे भीषण लग रहा था लेकिन उन गोर नाजुक हाथो की पकड़ उस पर ऐसे थी जैसे उसका आकर या रूप कुछ मायने नहीं रखता, बस वह खास था. ुंगिया लिपटी होने के बावजूद एक इंच दुरी थी अंगूठे और ऊँगली में.

"अब बताता हु के दूध कैसे पीना है.", अर्जुन वैसे हे बगल से पलट कर उनके ऊपर आ गया. रक्तिम लाल होंटो पर होंठ रखता वह उन्हें पूरी तरह खुद से लगाए हर हिस्से का अनुभव कर रहा था. बड़े वक्ष अर्जुन के सीने से लगते उसको हे उत्तेजित कर रहे थे. रेखा ने अपने बेटे के कूल्हों पर हाथ लगाया तोह अर्जुन ने बिना होंठ हटाए घुटने सही करते अपनी कमर हलकी ऊपर कर ली.

"आह्हः.. माँ.. ये क्या कर रही हो आप?", अर्जुन के होंठ खुदसे हे अलग हो गए और दोनों यौवन कलश पर हथेली टिकता वह उनकी आँखों में देखने लगा. रेखा ने उसका लाल अग्रभाग एक बार ाचे से उन गीली गरम मांस की फांको में ऊपर से नीचे फिराया और अपने कूल्हों के बीच हलके से दबा लिए. 2-3 बार ऐसा करते हे अर्जुन की आह निकल गई लेकिन इस हरकत से वह सूपड़ा जैसे पहले से कही ज्यादा हे मोटा और लाल हो कर झटके खाने लगा था.

"दिखा रही हु के कभी कभी जो दीखता है उसकी क्षमता उस से ज्यादा होती है, एक हे कसरत एक हे हद्द तक काम करती है.", उनका हर लफ्ज़ सच था और अर्जुन कामुक क्षणों में भी इस बात को याद रखते हुए बाद में विचार करने का सोच कर अपने सुपडे को देखने लगा जो सच में पहले से अलग दिख रहा था. शरीर का सारा खून जैसे इस हिस्से में उतर आया था. रेखा ने जड़ को कस के दबाते हुए इस बार छूट के मुहाने वह टमाटर सा भाग दबा दिए.

"आराम से डालना, दिवार के उस पार और भी लोग है.", रेखा ने ये बात एक मुस्कान के साथ कही थी और अर्जुन उनके ऊपर झुकता हुआ कमर भी आगे धकेलने लगा. हल्का सा उस तंग छेड़ पर रुकने के बाद बस सूपड़ा हे अंदर दाखिल हो पाया. छूट का गुलाबी हिस्सा जैसे साथ हे अंदर धंस गया था.

"ममममम.. सच में बहोत बदल गया है ये.. आह..", होंठ दांतो से दबती वह अपने ऊपर झुके अर्जुन से बोली. माथे पर बल पड़ गए थे छूट के इतना फैलने से. अर्जुन दोनों गुलाबी निप्पल मसलता दूध की बुँदे निकल रहा था.

"आपने हे किआ है इसको ऐसा. आह.. पहले ये पूरा चला जाता था इतने जोर पर.. हहहह.. अब कैसे रुक गया है.", अर्जुन ने कुछ सोचकर nut-bolt से उलझे छूट लुंड को खोलने के इरादे से सूपड़ा बहार खींचा तोह वह गुलाबी खाल भी बहार आ गई.

"आह्ह्ह्ह.. तेरे लड्डू बंद करवाती हु जल्दी हे.. ऐसे तोह अगले महीने तू बहार से कर पायेगा नहीं तोह.", वह कसमसा रही थी और अर्जुन मुस्कुराता हुए उन्हें देखता निचले हिस्से पर दोनों अंगो को आपस में रगड़ रहा था. चिकनाई लगते हे उसने अपना माँ के होंठ मुँह में पकड़ते हुए दोनों जाँघे विपरीत दिशा में फैला दी. रेखा ने एक बार फिर से लुंड को उभरी हुई छूट के दरमियान लगाया तोह ये हलकी कराह अर्जुन के मुँह में हे घुट्टी रह गई. आधा लुंड इस बार थोड़ी परेशानी से सही लेकिन रेखा के rass-kund में उतर चूका था. मुँह हटते हे वह उनके माथे को सहलाने लगा जहा हल्का पसीना था लेकिन दर्द नहीं.

"ठीक हो न आप? पता नहीं एकदम से आप इतनी टाइट कैसे हो गई हो.", अर्जुन वैसे हे रुकता हुआ दोनों निप्पल बारी बारी से चूसने लगा, अपनी बात कहने के बाद. उसको पता था के माँ का यही हिस्सा उनको सुख प्रदान करता है..

उम्म्म्म .. उसकी एक्सरसाइज करती हु और ध्यान भी रखती हु. लेकिन आह्हः.. ये भी बड़ा हुआ है इस बीच. चल अब दर्द नहीं होगा.", अर्जुन की पीठ सहलाती हुई वह अब तैयार थी. पूरी तरह उनके ऊपरी हिस्से से lipat-te हुए अर्जुन ने हल्का सा पीछे खिंच कर लुंड आगे धकेला तोह 'सररर' से वह उस सुरंग के आखिर में जा लगा. दोनों पूरी तरह एक दूसरे में समां चुके थे.

"आअह्ह्ह्ह..", इस दर्द भरी सिसकारी में भी एक कशिश और तृप्ति थी. कशिश क्योंकि अर्जुन से निस्वार्थ प्रेम था और वही ये सम्पूर्ण एहसास करवा सकता था जहा हरेक हद्द ख़तम हो जाती थी. और तृप्ति क्योंकि सम्पूर्णता का अनुभव इतना आसान भी न था पाना. रेखा की लम्बी घनी पलके इस लम्हे में प्यार के इस विलक्षण मिलान से बंद हो चुकी थी. होंठ लरजते जैसे अर्जुन की आस देख रहे थे. जल्द हे दोनों प्यार से एक दूसरे के लबो को चूमते हुए शरीर को हलकी गति देने लगे. अपनी माँ के स्टैनो की रगड़ से अर्जुन के बदन में अलग हे बिजली कौंध रही थी. भारी जाँघे अर्जुन के हर मजबूत धक्के को पूरा जज्ब करती हुई जैसे उसके मुअकबले की जानदार थी.

"ममम.. उमंमाहः..", दोनों हलके पसीने में बेइंतेहा चूमते हुए इस क्षण को और आगे ले जा रहे थे. गहरी शांत रात में बस हलकी आहें और दोनों के ख़ास अंगो के मिलान की आवाज इस कमरे में सुनाई दे रही थी. दोनों के हे सीने दूध से भीगने पर आपस में बुरी तरह रगड़ खा रहे थे. हर धक्के में वह कलाई से मोटा लुंड जड़ तक अंदर गायब हो रहा था.

"ये अगर बड़ा हुआ भी तोह आह्हः.. आपकी हद्द भी पहले से गहरी हो गई है.. हँ..", अर्जुन ने साँसे लेने के लिए दोनों के चेहरे अलग किये और फिर उनकी बाहों के नीचे से दोनों हाथ निकल कर पूरी तरह कब्जे में लेता वह पीठ के बल हो गया. रेखा अब अपने बेटे के ऊपर आ चुकी थी.

"आह.. ऐसे तोह ज्यादा बड़ा लग रहा है. उम्.. और वह मेरी नहीं तेरी हद्द है. ये खुद को ढाल लेती है अपने प्यार करने वाले के हिसाब से.. आह्ह्ह्ह.. ऐसे चाहता था..?", भरी कूल्हों के बीच अपनी रास बहती छूट को एक अदा से लुंड की पूरी लम्बाई पर ऊपर से नीचे तक कास कर रगड़ती रेखा अपना एक हाथ अर्जुन की चाट पर रखे दूसरे हाथ से ये बड़ा उभार खुद उसके मुँह में देती मजे में अपने होठ दबा रही थी. अर्जुन भी अपने लुंड के सुपडे से जड़ तक कमाल करती माँ के दूध को मुँह में चूसता निहाल हो रहा था. यही तोह वह संगिनी थी जो अर्जुन को हे काबू कर लेती थी. अर्जुन ने कभी जाहिर नहीं किआ था लेकिन वह खुद जानता था की एक उसकी माँ हे है जो उसको वैसे तृप्त करती है जैसा कोई भी कभी कर नहीं सकता था. बेशक वह बाकी सब से प्यार करता था और हरेक में खुश ख़ास था लेकिन उसकी माँ बेजोड़ थी. सही मायने में उसकी माँ, हर लिहाज से.

"माँ, थक गई होगी आप.", अर्जुन ने छलकते दूध को देख कर परवाह से कहा तोह मुस्कुराती हुई रेखा ने बाय पाँव इस तरह से ऊपर उठाया के चिकना लुंड बहार निकलने के साथ हे वह रास से भीगा लाल गुलाब अर्जुन की नजरो ने ाचे से निहारा. घुटने के बल वह बिस्टेर की सरहद पर चौपाये सी मुद्रा में आई तोह अर्जुन भी कामदेव सा निर्वस्त्र उनके पीछे आ खड़ा हुआ, फर्श पर.

अर्जुन ने कभी भी माँ के गुदाद्वार पर प्रहार नहीं किआ था और आज वह उनके पीछे खड़ा बस इन तराशे हुए बड़े गोलों को देख रहा था. इतने बड़े आकर के बावजूद वह रत्ती भर भी बेडोल और बदरंग न थे. वैसी हे चिकने और मुलायम लेकिन 1 इंच से ज्यादा गहराई में वह बंद छोटी ऊँगली की मोटाई के सामान गुलाबी चिदड्रा. ध्यान हटा कर फिर से उस बहार की तरफ निकली 4 इंच लम्बी मोटी फैंको को देखा तोह khud-ba-khud सूपड़ा उस लाल खुले छेड़ पर जा लगा. हलके दबाव के साथ हे पूरा अंदर डालता वह पीछे से उनके साथ जुड़ चूका था. रेखा के चेहरे पर जो मुस्कान थी अर्जुन को उसका कोई भान न था. दोनों हाथ उनकी कमर पर रखते हुए वह बस हिलते कूल्हों को देख कर कही ज्यादा जोरदार धक्के लगा रहा था.

"आह्ह्ह्ह.. रुकना मैट..", इस तेज सिहरन के साथ हे दोनों विशाल गोलाकार पर्वत और ऊपर उठ गया साथ हे रेखा का चेहरा बिस्टेर पर टिक गया. योनिराज्ज से भीग कर लुंड की रफ़्तार बेलगाम सी हो गई थी. शरीर पर हर तरफ पसीने की बुँदे और वेग से कमर चलता अर्जुन. जैसे हे वह झाड़ा, पाँव में कमपन्न की वजह से वह उन्हें नीचे दबाते हुए खुद उनके ऊपर लुढ़क गया. रह रह कर लुंड पिचकरिअ छोड़ रहा था लेकिन हर बार शरीर में एक झुरझुरी दौड़ जाट अर्जुन के. वह जाने कबतक उनके जिस्म से लिप्त खुद को अपनी माँ की गहराई में खाली करता रहा. लुढ़क कर एक तरफ हुआ तोह छूट से वह तरल एक धार के रूप में नीचे टपकने लगा. रेखा की हिम्मत भी जवाब दे चुकी थी.

हिम्मत करती वह 5 मिनट बाद कड़ी हुई तोह सफ़ेद वीर्य की एक पतली धार जांघो से होती घुटने तक आ गई थी लेकिन बिस्टेर पर जितनी मात्रा दिखाई दी वह हैरान करने वाली थी.

"अर्जुन खड़ा हो जरा. चादर हे बदलनी पड़ेगी.", प्यार से सर सहलाते हुए अर्जुन को उठाया तोह वह जैसे आधी नींद में था. नीचे उतर कर वह बस दिवार पकड़ कर खड़ा रहा और रेखा ने ये चादर स्टोर में रखने के बाद साफ़ बिछा दी. अर्जुन को हाथ से पकड़ कर अपने साथ लिटाने से पहले वह जीरो का बल्ब भी बंद कर दिए था. अर्जुन के मुँह में अपना निप्पल देती वह अपने बेटे को सीने से लगाए वह कुछ देर सोचने के बाद मुस्कुराते हुए आँख बंद करती सो गई. अर्जुन नींद में वैसे हे चूसक चूसक का उनका दूध ख़तम कर रहा था.

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यहाँ #### शहर के बहार बने इस आलिशान 4 एकड़ के फार्महाउस में रात के 10 बजे थोड़ी चहल पहल थी. गेट पर 2 सुरक्षाकर्मी हाथो में बन्दूक लिए खड़े थे और दोनों तरफ घने वृक्षों के बीच बानी इस 15 फ़ीट चौड़ी पक्की सड़क के आखिर में 4 गाड़ियां सलीके से कड़ी थी. अंदर बड़े हाल में रौशनी थी और बाकी कमरे बंद पड़े थे. यहाँ पर कोई इंसान नहीं था लेकिन कुछ आवाजे पहली मंजिल से आ रही थी. चमकते पठार की शानदार सीढिया ठीक इस हाल के बीच से ऊपर वाली मंजिल तक जा रही थी जिधर इस गलियारे के पहले हे कमरे में बड़े सोफे पर डॉ धर्मवीर सिंह सांगवान बैठे थे और उनके सामने राखी कांच की बड़ी मेज के उस पर ये सफ़ेद कुरता पजामा पहने एक रौबदार 55-60 की उम्र का व्यक्ति.

"सांगवान साहब ये काम करवा दो कैसे भी बस, पैसे की चिंता नहीं है. पानी की तरह बहा दूंगा मैं.", इस शक्श के चेहरे पर बड़ी उम्मीद थी. और बड़े सांगवान जी गर्दन हां में हिलाते दरवाजे की तरफ देखने लगे. शंकर के साथ ये झबरैला भेड़िये सा कुत्ता उछलता हुआ अंदर आया और दोनों हे बिस्टेर पर चढ़ गए. एक और काले रंग का कुत्ता पूँछ हिलता हुए सांगवान जी के चरणों में आ बैठा. शंकर पूरी तन्मयता से इस कुत्ते के साथ खेलने लग रहा था किसी छोटे बचे की तरह और वह भी वैसे हे कभी डरने की झूटी कोशिश करता कभी बिस्टेर पर बैठ डूम इधर उधर हिलने लगता.

"पत्रं, काम मुश्किल है लेकिन जब तुम हमारी देहलीज तक आ हे गए तोह मन भी नहीं कर सकता. शंकर.", बस इतनी आवाज पर हे वह भेड़िया सा कुत्ता शांत हो गया और शंकर आराम से उन्हें देखने लगा.

"इनको तोह जानते होंगे तुम.", उन्होंने जैसे कहा था उसमे कुछ विशेष िज्जात्त न थी.

"हाँ चाचा, ये अपने पत्रं जी है. शिक्षा मंत्री.", शंकर ने भी एक बार उस शख्स की तरफ देख कर हलके से अभिवादन स्वरुप सर हिला दिए. काम से अलग वह सांगवान जी को चाचा हे कहता था.

"इनका एकलौता पुत्र है और इनकी पुत्रवधु 5 साल से संतानसुख नहीं दे सकीय है. सबको दिखा लिए है लेकिन आखिर में हमारे दरवाजे आ कर बैठे है. भाई तुम नए ज़माने के डॉक्टर हो तोह इनकी समस्या का हल करो. लेकिन इन्हे लड़का हे चाहिए और चाहो तोह गुलाटी को भी शामिल कर लेना.", ऐसी बात सुनकर शंकर के चेहरे पर नाराजगी के भाव आने लगे थे लेकिन सांगवान जी ने गर्दन ना में हिलाते हुए शांत रहने को कहा.

"अपने बेटे और बहु को हॉस्पिटल भेज दीजियेगा.", शंकर ने उनकी तरफ देखे बिना इस कुत्ते की गर्दन को सहलाते हुए जवाब दिए.

"वह हॉस्पिटल नहीं आ सकते, इनकी िज्जात्त का सवाल है. तभी कहा है के गुलाटी के लिए. उसके फार्महाउस तोह तुम जाओगे हे शनिवार को, वही प्राइवेट में जांच कर लेना.", गुलाटी का फार्महाउस में भी एक लैब और छोटा हॉस्पिटल था जहा तीनो दोस्त खास लोगो के हे इलाज करते थे.

"पहले बता देता हु के 60-40 चांस रहेगा. भगवन नहीं हु मैं जो मनचाहा बचा दे दू. परसो 1 बजे #### रोड पर ## फार्महाउस है. वह दोनों को भेज दीजियेगा. सिर्फ दोनों को.", शंकर फिर से अपना मूड ठीक करने के लिए इस भेड़िये रुपी कुत्ते के साथ लग गया जो अपने दांत उसकी कलाई पर प्यार से गदा रहा था.

"60-40 में तोह सर्कार बन जाती है सांगवान जी. आपने इतना कह दिए तोह मुझे संतुष्टि हो गई. आप जो मांगेंगे मैं देने को तैयार हु.", हाथ जोड़ता वह खड़ा हो गया.

"पत्रं जी कभी किसी को गॉड लेने का विचार नहीं किआ आपने. बचा भी मिल जाता और लोगो में छवि भी ाची बन्न जाती.", शंकर खड़ा हुआ तोह दोनों कुत्ते अपनी जगह से उठ गए.

"हेहेहे. सही बात कही जी. गॉड भी ले लेंगे लेकिन वंश तोह अपने हे खून से चलता है न जी.", खिसियानी सी हंसी हस्ता वह आज्ञा लेता बहार चल दिए. शंकर की तरफ देख कर स्नाग्वं जी मुस्कुरा दिए.

"नहीं सुधरेगा तू. मुझे पता है तू बेटियों को ज्यादा मानता है. लेकिन ये जहा से है वह सोच आज भी देहलीज से ज्यादा अंदर क़ैद है बीटा. इन्हे बीटा चाहिए वह भी खुद का. दोस्त बहु में है इनकी लेकिन धातु खुदकी औलाद के पानी में नहीं है. बनवा लेना मेरी भाभी जी से दवा, एक बार और. माफ़ी चाहता हु लेकिन इसको कीमत चुकानी पड़ेगी इसकी.", सांगवान जी हाथ जोड़ने लगे तोह शंकर ने उनके हाथ पकड़ लिए.

"कैसी बात करते हो आप? माँ तोह उल्टा खुश हो जाती है जब मैं उनको काम के लिए कहता हु. लेकिन आपसे पहले मैं वसूल करूँगा कीमत. सुना है चुनाव में बहु को देखने विपक्ष की जनता भी आ गई थी रैली में.", सांगवान जी पीठ पर थपकी देते हुए हंसने लगे शंकर की बात पर.

"सुधर जा. तेरी दवा के साथ सूई लगाने वाली आदत जाती नहीं. चल आजा पेग लगते है नहीं तोह वह गांडू भुप्पी के साथ कही बहार न भाग जाये. और फिर खाना भी खाना है. शेरू लीव आईटी.", इस भेड़िये का नाम शेरू था जो मुँह में सोफे की गद्दी उठाये चलने लगा था. लेकिन इतनी आवाज सुनते हे वह गद्दी छोड़ कर उनके आगे उछलने लगा.

"ये भी बाप बन गया है. एक पिल्ला अर्जुन को दे देना, गर्मी की छुट्टियों में थोड़ा उसका भी नियम बेहतर हो जायेगा."

"ाची बात है. मैं भी सोच रहा था के घर पर 2 जर्मन शेफर्ड रख हे लू. पापा और अर्जुन हे तोह रहते है वह.", शंकर की बात पर सांगवान जी भी सहमत नजर आये. दोनों गलियारे से जाते इस अलग सीढ़ी से नीचे उतर रहे थे. शायद ये रास्ता किसी और मेहमान के लिए न था.

"फ़िलहाल एक रख जिस से अर्जुन थोड़ा समझे और बाकी लोग भी की ये जीव कैसे व्यहवहार करते है और माहौल में ढलते है. फिर अगली बार गब्बर का बचा हे देना घर. हिफाजत और वफादारी, दोनों में वह कालू और शेरू से 10 कदम आगे है."

"सही कहा. गब्बर जैसा कोई मैंने भी नहीं देखा. आप तोह शुरू से मेरे शौक जानते है, हर जानवर मैंने समझा और काबू किआ जो हम पाल सकते है. लेकिन गब्बर सिर्फ चाची से डरता है."

"उस से मैं भी डरता हु बरखुरदार. गब्बर ने देखा है इसलिए वह भी हमारी होम मिनिस्टर के सामने नजरे नीची हे रखता है."

"पिता जी आप न इसके साथ gandak-ghode के बातें करते रहियो. मैं आड़े बकरा बनाये इन्तजार कारन लग रहा हु के ेब दारु शुरू होगी. भुप्पी तोह बेचारा थक्क हर के बहार घास में हे लौट लगान लग रहा है.", ये हिस्सा ख़ास तरह से त्यार किआ गया था. बड़ी और बेहतरीन रसोई जो इधर से पूरी खुली थी और ये बड़ा ड्राइंग हाल, वातानुकूलित और नरम बड़े सोफों से सजा. लकड़ी और कांच का टेबल जिस पर महंगी शराब, गिलास, मांस और सलाद सजे थे और भी चीजों के साथ.

"गुलाटी कहा है?", सांगवान जे शंकर के साथ हे इस बड़े सोफे पर पसर गए. शंकर ने वही धक् करा राखी बड़ी प्लेट से 2 मांस के बड़े टुकड़े दोनों कुत्तो की तरफ बढ़ा दिए. शंकर ने नजरो से हे अपने दोस्त छोटे सांगवान का धन्यवाद किआ कुत्तो के लिए साफ़ मीट रखने के लिए.

"वह आ रहा है पिताजी अभी. पंजाबी स्विमिंग पूल देख के दत्त कोणी सके.", बातें होती रही और गुलाटी भी साथ शामिल हो गया. सबके जाम वही बना रहा था और सबकी तरफ बढ़ने के बाद अपना गिलास उठा कर जाम भिड़ने के बाद मुँह से लगा लिए.

"मैं अब एक साल बाद रिटायर हो रहा हु. तुम चारो ने हे आगे से अपने अपने काम देखने है. जितने ज़िंदा हु छोटी मोती सलाह दे दिए करूँगा. वैसे भी ये सब तुम लोगो का हे है.", बड़े सांगवान जी की बात सुनकर चारो हे उनकी तरफ देखने लगे.

"हम हमेशा साथ नहीं रहते. आप हे हो जो जानते हो के किस से काम लेना है और काम कैसे करना है.", गुलाटी ने हिचकिचाते हुए अपनी बात राखी.

"देख बीटा, शंकर सारे सरकारी कनेक्शन और हॉस्पिटल संभालता है. परम (छोटा सांगवान) पैसा और आदमी लेकिन तू है जो संतुलन रखता है. पैसे को कहा और कैसे लगाना है वह हमेशा तूने सबसे ाचे से संभाला है. भुप्पी आज भी हमारी चारो की तार है कल भी रहेगा. साथ हे जो नासमझ हो उसको समझने का हुनर इसके हे तोह पास है. शंकर और परम तोह बात करने के बाद भी सामने वाले को ज़िंदा तोह रखेंगे नहीं. चारो हे डॉक्टर भी हो और अपने विभाग में सर्वोच्च. एक साल में बाकी सब भी मैं तुम लोगो के हवाले कर दूंगा.", धर्मवीर सिंह की बात गंभीर थी लेकिन लहजा दार्शनिक.

"4 साल. हम 4 लोग है यहाँ तोह आप बेशक अभी से साल में 3 महीने काम कीजिये लेकिन अगले 4 साल तक आप हे सब देखेंगे.", शंकर ने जैसे फैंसला सुना दिए था एक घूँट में गिलास ख़तम करके रखते हुए. धर्मवीर सिंह को छोड़ कर तीनो हे सहमत थे उसकी बात से.

"हाँ पापा. आप महीने में एक हफ्ता काम करो लेकिन इतना समय देना हे होगा. शंकर की बेटियों की शादी, गुलाटी की भी लड़की है जिसका ब्याद अगले साल करना है. भुप्पी भी परिवार को सुरक्षित कर दे और मैं भी मेरी बीवी और बेटी वापिस ले औ. हम सब सुनिश्चित करने के बाद हे वह कर पाएंगे जो आप अकेले करते आ रहे हो.", छोटा सांगवान कभी कभी इन सबसे ज्यादा समझदार लगता था.

"चलो भाई बनाओ पेग. शंकर के फैंसले तोह कॉलेज से देख रहा हु मैं. अब तुम लोग भी हमेशा की तरह इसके साथ हो तोह ये बुद्धा कर भी क्या सकता है."

"हाँ जैसे कॉलेज में आप बस bhole-bhale प्रोफेसर थे.", गुलाटी की इस बात पर बाकी सब हंसने लगे.

"सही कहता है मेरा मेरा छोरा. पंजाबी खतरनाक आदमी है. भाई तुम लोग हो तोह आज ये सब और मैं हु. और सच कहु तोह मेरी ज़िन्दगी शंकर और नरिंदर की ज्यादा है लेकिन काम तुम्हारी भी नहीं."

"सही कहा चाचा. हम तोह कभी वह न कर सकते जो शंकर शम्बू और संत परशुराम ने किआ था. कुछ भी कहो नजारा देख कर वही उलटी आ गई थी.", ये भुप्पी बोल रहा था और सब उसको देख रहे थे.

"सत्यवचन. भाई डॉक्टर मैं था लेकिन ये दोनों उस समय भी मेरे से बेहतर जानते थे शरीर को.", धर्मवीर सिंह जी की बात उनका बीटा बड़े ध्यान से सुन्न रहा था.

"पिताजी, मेरी कसम है आज पूरी बात बता हे दो. गुलाटी और मुझे इन दोनों ने कभी नई बताया और आप भी ताल देते हो हर बार.", छोटा सांगवान नया पेग मुँह से लगाने के बाद हलकी चुस्की के बाद बोलै.

"ाची बात है भाई. तोह सुन्न. ये तीसरे साल में थे तुम सब और मैं भुप्पी को लेकर अपने गाँव से कॉलेज जा रहा था, छुट्टियां ख़तम हो गई थी. तुझे तेरी माँ ने घर हे रख लिए था क्योंकि उसका दिल कभी भरता नई था अपने लाडले से. जीप कॉलेज से अभी 30 किलोमीटर दूर थी #### बिपास पे पहुंचे थे हम लोग. उधर सुनसान रहता था सुबह 6 बजे और वैसे पूरा दिन हे वह जगह ऐसी हे थी.", भुप्पी हामी भर रहा था उनके हर कथन पर. बाकी लोग सुन्न रहे थे और शंकर सुनते हुए हे कुत्तो को मॉस के छोटे टुकड़े खिला रहा था.

"एक सरपंच हुआ करता था कोई गुज्जर, नाम बताना जरुरी नहीं. उसने कोई एक लड़की का बलात्कार किआ था और प्रशाशन में उसकी दखल थी. लेकिन जो थानेदार उस लड़की को लेके आया था हॉस्पिटल वह ईमानदार था और निडर भी. मैंने भी पुष्टि कर दी की बलात्कार हुआ है और सबूत भी थे पुलिस के पास. उसको जेल हो गई थी और मैं अवकाश लेके घर आ गया था. और जिस दिन वापिस जा रहे थे तब उन लोगो के पास सुचना आ चुकी थी मेरी. बदला लेने के लिए उन्होंने ठीक जगह जीप के साथ जीप भिड़ा दी."

"हाँ चाचा. सही बीच में मारी थी और मैं तोह टक्कर के साथ हे सड़क पे जा गिरा था.", भुप्पी उत्तेजना में बोल गया.

"सही कहा. अब तेरा बाप कमजोर इंसान तोह नहीं था लेकिन 6 मेरी बराबरी के लोग और वह dande-talwar लिए. मामला हाथ से निकल चूका था. एक-2 डंडे सर पर लगे तोह मैं भी सड़क पे आ गिरा. जैसे हे उस मजबूत से आदमी ने तलवार मेरी गर्दन तक पहुंचे की एक कपडे बंधे हाथ ने वह रोक ली, एक तेज आवाज आने के बाद. वह नरिंदर था जिसने तलवार लेते हे उसकी कलाई टॉड दी थी. हिम्मत करके मैं उठा तोह 3 लोग जमीन पर पड़े थे और 2 की गर्दन शंकर दबाये था. इनका स्कूटर भुप्पी की बगल में सड़क पर गिरा पड़ा था और सामान भी. लेकिन इस चक्कर में एक ने नरिंदर की जांघ पर चुर्रा मार दिए था. उसके बाद जो हुआ वह मैं सदमे में देखता रहा, अपनी जगह हे पड़ा.", धर्मवीर सिंह कुछ पल शांत हो कर बस यादों में खोये अपना जाम पीने लगे.

"फिर?", गुलाटी ने पुछा.

"फिर शंकर ने उसकी गर्दन टॉड दी और 6 के 6 लोग जीप में भरने के बाद जीप नहर में. मैंने किसी को उतना पागल और उतना हे हिम्मत वाला नहीं देखा था लेकिन 2 जवान लड़को ने सारा नजरिया बदल कर रख दिए. नरिंदर शायद कही न कही शंकर से 21 होगा ताक़त में लेकिन शंकर अपने भाई के लिए पागलपन में फिर 21 से सीधा 100 पर पहुंच गया था. मुझे और भुप्पी को गाडी में डालने के बाद शंकर ने हे जीप चलाई थी और नरिंदर खून बहती जांघ पर अंगोछा बंधे स्कूटर लिए कॉलेज आ गया था. दर्द सहने की क्षमता कितनी होगी उस इंसान में जिसकी जांघ पर 15 टाँके आये हो लेकिन वह मुस्कुराता हुआ बिना बेहोशी की दवा लिए बस हनुमान कवच पढता रहा.", शंकर उनका हाथ थाम कर उन्हें शांत करने लगा था. जैसे वह कही फिर यादों में डूब न जाये.

"चाचा उस गुज्जर का क्या हुआ फिर?", गुलाटी की इस बात पर कुछ पल ख़ामोशी चाय रही. फिर नया पेग बनते हे बड़े सांगवान जी ने एक तगड़ा घूँट भरने के बाद कहा.

"शंकर नरिंदर ने उसके साथ बाकी तीनो को भी मार दिए. वजह अलग थी लेकिन और इनको पता भी नहीं था के वो व्यक्ति मेरे हादसे जुड़ा था. जिस लड़की का बलात्कार हुआ था उसको घरवालों ने अपनाने से मन कर दिए था लेकिन नरिंदर ने मुझसे गुजारिश की थी की मेरी ज़िन्दगी बचने के बदले मैं उस लड़की का जीवन सुधर दू. मैंने किआ भी और दिल को ऐसा सुकून मिला ये देख कर की ये लड़के मदद के बदले भी किसी और इंसान की मदद करने को बोल रहे थे. उसको नर्स बना दिए था. शंकर ने उस लड़की को बहोत कुछ सिखाया था और फिर जब वह bin-byaahi माँ बन्न गई तोह जितने छाती से दूध आया उतने वह वही रही. फिर नरिंदर उस लड़के को कही दे आया और वह लड़की जो औरत बन गई थी, मैंने दिल्ली में नर्स लगवा दिए था. अब बताओ भाई मैं कैसे इन दोनों को आत्मा से अलग कर दू.", उनकी बात सुनकर छोटा सांगवान तोह शंकर से बुरी तरह लिपट हे गया.

"बस कर ोये जात्बुद्धि. दारी चढ़ गई है.", शंकर ने हँसते हुए कहा लेकिन अपने दोस्त की आँखे नम्म देख वह फिर से उसको अपने सीने से लगाए खड़ा रहा.

"भाई, मेरा एक हे बाप है और मेरी माँ हर रोज इनके खातिर करवाचौथ रखती आ रही है. शायद उनका dharam-karam हे काम आया जो पापा जिन्दा है. इतना हे पता था के तुम दोनों भाइयो ने एक्सीडेंट से बचाया था.", सांगवान साहब ने अपने बेटे के सर पर हाथ फेरा तोह वह मुँह धोने अंदर चला गया.

"चाचा कहा से गड़े मुर्दे निकाल लाते हो. दारु का नशा उतार दिए. अब आप अपने तरीके वाले पेग बनाओ.", धर्मवीर जी ने भी शंकर को एक बार गले लगाने के बाद दोनों के गिलास आधे शराब से भर दिए.

"हम तोह नहीं पीते ऐसे. सुबह उठाना भी है और काम भी करने है, शंकर का तोह कल कोई सचेडूले नहीं है जब आप इधर हे हो.", गुलाटी की बात पर भुप्पी ने भी हाँ हिलाते हुए उन दोनों से आधे पेग बनाये और थोड़ी देर बाद छोटा सांगवान भी उनके बीच शामिल हो गया. ये महफ़िल इन सबको और करीब ले आई थी और जाम का दौर कही देर तक चलता रहा.

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अर्जुन गहरी नींद में था जब रेखा ने अपने बेटे के मासूम चेहरे को देखा और सावधानी से उठ कर बेआवाज कमरे से चली गई. अभी 4 बजने में भी कुछ वक़्त था और घाना अँधेरा. बाथरूम में ठन्डे फौहारे के नीचे कड़ी हो कर वह पूरा शरीर ाचे से मॉल कर साफ़ करने लगी. चाटिया दूध की वजह से chip-chip करने लगी थी लेकिन पहले न हिम्मत थी और न अर्जुन को वह परेशां करना चाहती थी. गोरी मधमस्त जांघो के बीच जैसे हे हाथ रेंगा तोह अपनी ुंलियों से हे ये हलकी सी सिकी निकल गई. वह मोटी फांके जैसे अभी तक अर्जुन के नशे में थी और हर एहसास उन्हें उत्तेजित कर रहा था. जैसे तैसे नहाना ख़तम करके वह बस एक लाल रंग का गाउन पहन कर वापिस अपने कमरे में आ गई.

अर्जुन नींद में हे जैसे अपनी माँ को हाथो से टटोलने की नाकाम कोशिश कर रहा था. रेखा अपने बेटे की ऐसी हरकत देख मुस्कुराती हुई उसके बराबर लेट गई. बिना समय गवय अर्जुन ने उनका वह बड़ा सा उभार हाथ में लिए और उसके सामने मुँह खिसकता आ लगा. रेखा ने भी अपने लाल को परेशां न करते हुए खुद हे ये सतांन सामने से बेपर्दा करते हुए होंठो पर लगाया और अपने बेटे को सीने से लगाए सहलाने लगी. आँखें बंद हे थी और ध्यान सिर्फ अर्जुन द्वारा दूध चुसकने पर. दरवाजा हल्का सा खुला और फिर बंद हो गया.

"ये वाला मेरा है.", ऋतू ने अर्जुन का मुँह वह से हटते हे अपनी माँ को सीधा लिटाया और वही सतांन होठो में दबा लिए. रेखा जी अपनी इस लाड़ली के सामने ख़ामोशी से बस मुस्कुरा हे सकती थी. लेकिन सीधे होने से उन्होंने दूसरा वाला सतांन भी आजाद करते हुए अर्जुन का चेहरा उस से सत्ता दिए. एक बार फिर उसके होंठ धीमी गति से चलने लगे, अपनी बड़ी बहिन के विपरीत. जो कही ज्यादा हे तेजी से दूध पी रही थी. और दूसरा वाला भी अर्जुन के मुँह से निकाल वह ये खली वाला छोड़ कर उसके साथ लग गई. अगले 10 मिनट में दोनों बड़े दूध के कलश आखिर बूँद तक ऋतू के होंठो में सपराप्ती कर चुके थे. आँखें हलकी सी बोझिल हुई तोह वह भी अपनी माँ से लिपट कर सो गई. अर्जुन इस किनारे पड़ा कुछ देर तक हवा में होंठ चलता रहा फिर आँखे खोल के देखने पर माँ को करवट के बल सोये देख खड़ा हे हो गया. ऋतू दीदी पर नजर पड़ते हे एक मुस्कान के साथ वह कमरे से बहार निकल गया. सच बात हे थी की उसकी बड़ी बहिन उस से ज्यादा हे छोटी और ज़िद्दी थी, माँ के मामले में.

ऊपर इस वक्त पूरी ख़ामोशी देख अर्जुन ने नहाने के बाद कपडे बदले और बहार वाले रस्ते हे घर से अपनी पतले टायर वाली साइकिल लिए निकल चला. आज पार्क में आचार्य जी नहीं मिलने वाले थे, शहर से बहार होने की वजह से. कल उन्होंने उसको ाचा सबक दिए था और रात में उसकी माँ ने. ज़िन्दगी में nirnaya-fainsle हमेशा एक परिस्थिति देख कर किये जाते है. हुको कोई अधिकार नै है ऐसे फेंसलो पर सवाल करने का जिसके साथ जुडी परिस्थिति को हम जानते हे नहीं. अन्नू की परिस्थिति को समझना जरुरी है उसके फैंसले पर प्रतिक्रिया करने से. वैसा हे तोह बहुत कुछ अर्जुन अपने आसपास देख रहा था. लेकिन अब उसको ये नै दिशा मिल गई थी. हरेक निर्णय के पीछे तक तोह लेने की, कैसी परिस्थितिया रही होंगी जिस से वह सिर्फ ऊपर तेह हे देख पाया था.

दूसरा सबक था उसकी माँ का. जब एक कसरत असर करना बंद कर दे तोह इसका मतलब ये नहीं की खुद को वही तक विकसित किआ जा सकता है. नया स्त्रोत- बेहतर कसरत ढूंढ़ने में म्हणत करनी पड़ेगी और वही आगे ले जा सकती है. बेहतर होने की कोई सीमा या मापदंड तोह कोई है हे नहीं. दादी ने भी तोह doodh-badaam के बाद वह 2 लड्डू सुबह शाम देने शुरू किये थे एक महीने तक. जिनसे शरीर के हर हिस्से में भरपूर बदलाव आये थे. लेकिन अगली खुराक शायद उस से बेहतर थी और थोड़ी जिस से शरीर उसको जज्ब कर सके. लेकिन परिणाम सोच से भी कही ज्यादा दे रही थी. शरीर में हर वक़्त ऊर्जा और स्फूर्ति रहती थी और अगर वह kasrat-sambhog-daud बंद कर दे तोह परिणाम उलटे हो सकते थे. क्योंकि यही ताक़त गलत काम करवा सकती थी. मतलब साफ़ था की निर्णय और बदलाव जरुरी है और दोनों हे परिस्थिति को देख कर लिए जाते है.

"अरे बीटा, आज तोह बख्त से पहले हे आ गए.", अर्जुन कब गाँव के अंदर आया उसको खुद भी पता न चला लेकिन साधु सिंह की आवाज सुनकर वह वही ृक्क गया. वह शायद अभी उठे हे थे और नित्यक्रम से निबटने के बाद नाहा धो कर भैंसो के टेबल से पहले हे अर्जुन को देख कर रुक गए थे. जो हलके अँधेरे में हे इधर चला आ रहा था.

"Ram-ram अंकल जी. बस आज समय नहीं देखा आँख खुली तोह और मौसम ाचा था इसलिए इधर चल आया.", साइकिल उनके हे पास कड़ी करता वह वैसे हे परिचित सम्मान के साथ उनसे बात करने लगा.

"बहुत ाचा भाई. ये सुबह के पहले पहर में जो सुकून मिलता है इसके सामने फिर कोई suvidha-sampatti मायने नहीं रखती. लेकिन आजकल की पीढ़ी तोह 7 से पहले कहा उठती है शहरों में.", अभी दोनों बात हे कर रहे थे के उनकी धर्मपत्नी 2 बाल्टी उधर लेती आ गई. एक में थोड़ा पानी था जो शायद भैंसो के थांन धोने के लिए था. उन्हें भी सर झुका कर अभिवादन किआ तोह प्रतिउत्तर में उन्होंने सर पर हाथ फेरते हुए सदा खुश रहो कहने के बाद दोनों बाल्टियां तीन की चादर टेल बंधी भैंसो के पास रख दी.

"चलता हु उनले जी. अभी ाचा समय है तोह तैरने का अभ्यास आराम से कर लूंगा और आजकल स्कूल भी है तोह समय से घर वापिस भी पहुंचना है. आप भी कीजिये अपना काम.", उन्होंने भी स्नेह से हाथ फेरा सर पर और अर्जुन फिर से साइकिल पर सवार आगे निकल चला.

"जी कुछ भी कहो, लड़का हो तोह ऐसा हो. इसको देखती हु तोह काजल और हमारे होने वाले जमाई की जोड़ी बेमेल लगती है. मिन्दर को खाने की कोई कमी नहीं लेकिन सेहत वह भी न बना सका.", ये बिमला देवी थी, gaanv-dehaat की थोड़ी मुँहफट लेकिन साफदिल महिला.

"अररि बिमला, पसंद भी तुम्हारी थी क्योंकि लकड़ा तुम्हारे मायके से है. और पंडित जा का पौता एक तोह मेहनती है ऊपर से उसके आदर्श. ऐसे लड़के नहीं मिलते कही.", बाल्टी से पानी लेके वह भैंस के थांन साफ़ करने लगे और साथ हे बिमला देवी भी अपने चौड़े कूल्हे फैलाती दूसरी भैंस का दूध निकलने लगी. इस अवस्था में वह बड़े पपीते उनके कमीज से एक चौथाई बहार निकलते और तन्न गए थे.

"ओह जी, आँखें सेक ली हो तोह काम कर लो. खुद तोह कमरा अलग किये नाम के हिसाब से साधू बने फिरते हो लेकिन आँखें फिरती रहती है.", उनकी बात पर साधू सिंह हँसते हुए दूध निकलते हुए बोले.

"अररि ये 2 हो गए इसलिए रुक गया लेकिन देखने से दिल तोह भर हे सकता हु. आज भी तेरी टक्कर की औरत तोह पूरे गाँव में न होगी."

"बस करो जी ऐसी बातें. आपकी लाड़ली आ रही है और आप बातों से आग लगा के निकल लोगे फिर वापिस आ के ताश, हुक्का और खेत.", बिमला देवी की बात पर उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा तोह उनकी लाड़ली हाथ में लिया लौटा चुन्नी से धक्के अपने बापू के पास चली आई.

"कभी कभी बापू शहर हे घुमा लाया करो. महेन्दर तोह लेके जाता नहीं जैसे उसकी िज्जात्त में खोट पड़ती हो मुझे अपनी फटफटिया पे बिठाते हुए.", काजल की ऐसी बात सुनकर वह हंस दिए.

"अररि इतने बखत उठते हे तुझे शहर की सूझ रही है. कोई बात नहीं ऐतवार को तेरा भाई ले जायेगा तुझे नहीं तोह अपनी माँ के साथ चली जाना, मैं ऑटो वाले गुल्लू को बोल दूंगा.", काजल इस बार पर खुश होती अपने पिता के गाल चूम कर तेज कदमो से कच्ची सड़क पर चल दी.

"घोड़ी हो गई लेकिन बचपना नहीं गया. नाक कटवा देगी किसी दिन और आप हँसते रहना. दिनभर सविता, खेत और मटरगश्ती करती है."

"अररि भगवान्, एक हे तोह राजकुमारी है घर की और फिर कुछ महीने बाद वह भी चली जानी है. मिन्दर का सोचो कब ब्याह करना है. घर में बहु आये तोह थोड़ा ाचा लगेगा."

"सविता हे बनेगी बहु. कह देती हु पहले हे. लड़की पसंद भी है और बिन माँ की बची को पूरा प्यार भी मिलेगा. फौजी से बात कर लेना आप, अगले हफ्ते आ रहा है.", इधर ये दोनों बातें कर रहे थे उधर अर्जुन साइकिल कड़ी करने के बाद दर्जन भर गौते उस ठन्डे पानी में लगा चूका था. रफ़्तार बढ़ने लगी थी उसके तैरने की और साथ हे अब वह कही ज्यादा लम्बी दुरी तक चक्कर लगाने लगा था. कुछ देर बाद वही किनारे की मोटी दिवार पर वह आँखें बंद किये लेता था. नहर आज ऊपर तक आई हुई थी क्योंकि खेतो में पानी लगने का समय चल रहा था. एक इंच पानी में डूबी दिवार बड़ा आराम पंहुचा रही थी उसके शरीर को और वह आँखें बंद किये इस जंगल की हर आवाज को गौर से सुन्न रहा था.

"पूनम के चाँद हो गए हो पूरे. महीने में 2-4 बार दिखना फिर गायब." काजल की ये आवाज सुनकर भी अर्जुन वैसे हे आँखे बंद किये लेता रहा लेकिन चेहरे पर मुस्कान आ गई थी. उसको मालूम था के वह पिछले 5 मिनट से कड़ी उसको निहार रही थी. फिर कपडे सरकने की आवाज आई और सूखा गदराया निर्वस्त्र जिस्म उसके ऊपर आ लेता.

"तुम जरा भी देर नहीं लगाती न.", अर्जुन ने अपने ऊपर लेती काजल से कहा जो अपने गोल कड़े निप्पल उसकी छाती पर हलके हलके एक मादक तरीके से रगड़ रही थी.

"ये हरजाई अगर 3-4 दिन में मिलता रहे तोह मैं भी प्यार दिखाऊ. लेकिन एक तोह इतने दिन बाद और ऊपर से हमेशा की तरह सुबह अँधेरे में. बापू के साथ तुम्हारी आवाज न सुनती तोह एक घंटे बाद हे आती इधर और तुम जा चुके होते अपने घर.", इतना कहते हे वह अपनी उत्तेजना दिखती अर्जुन के होंठो को पीने लगी. एक हाथ उसकी सर की तरफ राखी चौड़ी भुजा को थामे था और दूसरा अर्जुन की जांघ पर. जल्द हे दोनों नहर में उतर गए एक दूसरे के जिस्म को भरपूर रगड़ते. काजल सचमुच हे एक तगड़ी अल्हड़ लड़की थी. मॉटे गद्देदार चुके और वैसे हे गोल चुत्तड़. Khaan-paan ाचा होने से गोर गाल भी कुछ फूले और चिकने थे.

"चल उधर चलते है. वह पानी का बहाव भी नहीं है और गहराई भी ढाई फुट है.", नहर के किनारे बानी तीन दीवारी हौद की तरफ इशारा करती वह पानी के अंदर हे अर्जुन का लुंड दबा रही थी, जो पूरे उफान पर था. अर्जुन ने भी छूट को 2 उँगलियों से हल्का खोल दिए था इतने समय में. दोनों हे कुछ दुरी तैर कर उनसे आगे बानी इस हौद की तरफ आ गए. लाल ईंटो से बानी दिवार पानी से घिस कर चिकनी और समतल हो चुकी थी. एक दिवार पर दोनों हाथ टिकती वह पीछे से अर्जुन को आने का इशारा करने लगी. जिस जगह को वह ढाई फुट बता रही थी इस समय वह 2 से भी काम थी. घुटनो से बस 1-2 इंच ऊपर. काजल जिस तरह से अपना गोरा पिछवाड़ा बहार निकले कड़ी थी अर्जुन ाचे से निहारता उसके पीछे जा खड़ा हुआ. भूरी गुलाबी छूट अंदर की लालिमा दिखा रही थी और उसकी सहले अपना भूरा बंद छेड़ उस गोरी गहरी खाई के बीच.

"आह जालिम.. तू मर्द है यार.. shhhhh..Ruk जा थोड़ा नहीं तोह छूट की हालत खराब हो गई तोह हर बार पाँव फिसलने का बहाना काम नई आएगा. आह्ह्ह्ह.. इतना मोटा लुंड है रे.", 2 धक्को में आधा लुंड उस jaani-pehchani भूकी छूट में फंसाये अर्जुन उसके तीखे चूचक और मॉटे दूध दबा रहा था. उसकी छूट की गर्मी पानी में भी किसी लावे सी थी. मजे की सिसकिया लेती वह खुद और झुक कर पूरी छूट बहार उभरे कड़ी थी जिसमे वह पौने फुट का मोटा बांस फंसा अब हिलने लगा था.

"तुम्हारे साथ करता हु तोह एक तरफ तोह ाचा लगता है क्योंकि तुम पूरा साथ देती हो और शरीर भी ाचा है. लेकिन दूसरी तरफ तुम्हारे पिता और होने वाले पति का सोचता हु तोह अजीब लगता है. आह्ह्ह्ह.", अर्जुन दोनों गुब्बारे दबाता अब उस गुलाबी छेड़ में जड़ तक अंदर जा चूका था. इतने में हे वह एक बार कुछ देर के लिए ढीली हो गई थी.

"आअह्ह्ह्ह.. जितनी बार कर लू उतनी बार तुम्हारा ये मूसल पहले से मोटा लगता है और छूट फट ने जैसी. और मेरे बापू की मत सोचो.. आह्हः.. वह ज्यादा नहीं सोचते.. ममम.. ऐसे हे दबाते हुए मार रे.. आठ.. इतनी जल्दी पहला पानी निकल दिए.. उम्म्म.. और वह चुटिया है जिस से मेरी शादी हो रही है.. माहहह.. पेट में लगता है जब पूरा बाद देता है रे.. मेरी माँ ने करवा दिए था रिश्ता और वह नीरा हे झंडू आदमी है. लुल्ली छूट पर लगी नहीं के 2 बूँद पोलियो की दवा उगल दी. आया था परसो.. आह्हः.", काजल अब पूरी तरह अर्जुन के साथ खुल चुकी थी और उसकी गुलाबी मोटी छूट भी. अर्जुन को भी उसकी बातों और चुदाई में मजा आ रहा था. लुंड निकाल कर उसने काजल को सामने किआ फिर अंदर करते हे सीने से लगता खड़े हो कर चुदाई में लग गया. वह भी उसकी कमर पर टंगे लपेटे अपने मॉटे चुत्तड़ हिलती जड़ तक उसका मूसल ले रही थी.

"क्या कहा फिर परसो तुम्हारे होने पति ने. ाःह.. तुम्हारी आग देख कर तोह मुझे नहीं लगता वह 10 दिन से ज्यादा तुम्हे ठंडा रख पायेगा."

"उम्म्म.. मुआहहह.. उसके होंठ चूमती वह इस चुदाई से बड़ी खुश थी. और अर्जुन जैसे यहाँ भी कसरत कर रहा था, उसके शरीर को उठाये.

"महेन्दर घर था नहीं.. आठ.. माँ और बापू खेत थे फसल काट गई तोह समतल करने के लिए.. आह्ह्ह्हह.. दाल दे अंदर ऊँगली.. सीईई आह्हः.. इधर उधर की बातें करते सलवार सरका दी मेरी उसने लेकिन पिछवाड़े से छूट पर लगते हे गर्मी न सेहन कर पाया. टोपा घुसते हे उसका पानी निकल गया और साथ हे माँ घर में आ गई तोह वह कमरे से बहार निकल गया. अब बताओ आठ.. के मेरे जैसे.. जवानी उस से सम्भलेगी? ब्याह के बाद हे हफ्ता रहने आउंगी घर तोह तू हे पेट से कर डीओ. अगले 9 महीने आग तोह नई भड़केगी. आह्हः.. मैं गई रे.. आठ.. लेकिन आज तू पिछले भी खोल दे छेड़, मेरे कपड़ो में गोले के तेल की शीशी है.", अर्जुन पूरी ऊँगली उसकी गांड में अंदर बहार करता 15 मिनट में उसको ये दूसरी बार झाड़ चूका था. कुछ देर दोनों हे रुक कर साँसे लेते रहे तोह काजल फुर्ती से नहर के बहाव में विपरीत तैर कर वही चली गई जहा कपडे पड़े थे. अर्जुन हैरान था उसकी रफ़्तार और जान देख कर. बहाव के उलटी दिशा में तैरना बचो का खेल तोह नहीं था. ऊपर से वह अभी अभी ढीली हुई थी इस लम्बी चुदाई के बाद.

"मेरा दिल था तेरे साथ हे पिछले छेड़ खुलवाओ. वह मेरी एक भाभी है उसको पीछे करवाते देखा था और फिर उसके घर बिल्लू पिक्चर देखि तोह मेरे भी दिल में यहाँ करवाने की आ गई. वह भाभी तोह ऐसी चुड़क्कड़ हे के धोबी, दिश्वाला और लुहार के साथ हे गाँव के सारे जवान लड़को से चुड़ चुकी है.", अर्जुन के लाल सुपडे पर दोनों हाथो से नारियल का तेल चुपड़ती वह गाँव के ऐसे किस्से सुना रही थी.

"तुमने कितनो के साथ किआ है?", अर्जुन ने उसका झुका हुआ एक दूध हलके से दबाते हुए कहा.

"सिर्फ तुम्हारे साथ. आग और जवानी जरूर है मुझमे लेकिन रांड न हो जैसे मेरी माँ कहती है उसके लिए. लेकिन वह बेचारी तोह इसलिए बदनाम है के पति है नहीं और जमीन के नाम सिर्फ 3 कमरे का घर. छुडवायेगी नहीं तोह घर कैसे चलाएगी.", अर्जुन ने अब उस औरत के लिए कुछ नहीं पुछा और वह पतली शीशी सीधा गांड के छेड़ पर लगते हुए तेल से टर्र करने लगा. पीछे मुँह गुआंती काजल ऐसी झुकी कड़ी कही ज्यादा हे उत्तेजक लग रही थी. अर्जुन ने समझदारी करते हुए कुछ देर उसकी गहरी चिकनी डरफ में हे लुंड आगे पीछे चलते हुए ाचे से लुंड की और कूल्हों की मालिश करि.

"तुम्हारी माँ ने कुछ कहा नहीं तुमसे अगर उन्होंने मंगेतर के साथ तुम्हारा वह सब करना देख लिए था?", लुंड का मोटा सूपड़ा कभी हलके से छेड़ पर दबाता कभी कूल्हों को दोनों हाथो से ज्यादा फैलता वह काजल को समय दे रहा था.

"माँ ने देख लिए था लेकिन मुझसे कहने की जगह वह मेरी चची को बता रही थी.. आह.. बाद दे अब..", छेड़ नरम हो चूका था जिस से काजल के कहते हे अर्जुन ने कूल्हे फैलते हुए अपनी कमर का दबाव ज्यादा हे बढ़ा दिए. लुंड का हलकी गोलाई वाला सामने का हिस्सा कुछ अंदर गया और फिर सररर से पूरा सूपड़ा उस कैसे हुए चले के उस पार. गांड का चला रबर सा लचीला था और भरपूर चिकनाई, नहीं तोह ऐसे लुंड से उसका फटना पक्का था.

"माहहहह.. बचा ले ऋ.. आह्हः.. गलती हो गई भारी..", काजल ने अपना चेहरा नीचे झुका लिया. जबड़े कस गए थे गांड के इतने चौड़ा होने से. अर्जुन भी सेहन कर रहा था क्योंकि लिंगमुंड तोह काजल ने उसका भी अंदर भींच रखा था. दोनों चुके थोड़े जोर से दबाता वह उसका दर्द शरीर में बांटने लगा. हिम्मत दिखती काजल ने भी चेहरा ऊपर किआ तोह अर्जुन ने एक हाथ से उसकी छूट को सहलाते हुए 2 उंगलिया घुसड़ दी..

"आअह्ह्ह. तुम्हे चुदाई का सब पता है.. आठ. फाड़ भी दी और दर्द भी काम कर रहे हो..", सच में गांड के निचले हिस्से से हल्का सा खून पानी में टपक गया था. अर्जुन ने बाकी लुंड पर थोड़ा तेल गिरते हुए आगे धकेला जो की कुछ आसान काम था सूपड़ा डालने से. फिर उतना बहार निकल कर और तेल गिरते हुए अंदर कर दिए. अगले 2 हे मिनट में वह उन गोर चुत्तड़ो के बीच उस संकरी चिकनी गांड को ाचे से फैलता 5-6 इंच तक लुंड अंदर बहार कर रहा था. अब मस्ती में काजल भी अपने तरबूज उसके लुंड पर पलट कर मारती हिल रही थी.

"ऊँगली छूट में और ये मूसल पीछे.. बड़ा मजा आ रहा है दर्द के साथ. आह्हः.. बस आराम से करता रह तेरा मोटा हिस्सा अंदर कही लगता है रे.. आह्हः.."

"बहोत टाइट हो तुम.. आह लेकिन उतना हे ाचा भी लग रहा है. आह.. फिर क्या बताया तुम्हारी माँ ने चची को.", अब अर्जुन काजल को सीधा करता आगे से हे छूट सेहला रहा था और एक उभर मसलता हुआ पूरा डंडा उन चुत्तड़ो में दबा के अंदर तक भर रहा था.

"आठ.. ये पिछवाड़े की चुदाई का असर आगे हो रहा है.. आठ. माँ ने कहा के आठ.. लड़का फ़ैल है.. उम्म्म.. मेरी घोड़ी नहीं सम्भलेगी इस से. भिड़ते हे तेल निकल गया तोह आगे जाने क्या होगा. संधान से कहूँगी किसी वैध को दिखाए.. ममम. होने वाली हु रे मैं.", गांड को ाचे से लुंड पर कस्ती वह अकड़ सी गई और उसके साथ हे अर्जुन ने भी अपन पानी उस गरम छेड़ में खोल दिए. काजल मुँह घुअमाये अर्जुन को चूम रही थी और वह बिना हिले बस अंदर रास भरता रहा. फिर दोनों अलग हुए तोह 'पुक्क' की आवाज से लुंड उस भूरे चीड़ को खोलता हुआ बहार निकल आया जहा से सफ़ेद रास हलके गुलाबीपन के साथ रिस्ता हुआ बहने लगा था. एक बार दिवार पकड़ कर काजल पानी के अंदर हे बैठ गई थी. दर्द और गांड में जलन की वजह से.

"तुम ठीक हो?"

"ठीक तोह कर दिए तुमने. आह.. किसी दिन 3-4 घंटे रगड़ दे न ाचे से. तुम्हे तोह घर आने से कोई मन भी नहीं करेगा और पूरे महीने दोपहर से शाम 5 बजे तक घर खली हे रहने वाला है अब.", अर्जुन भी पानी में दिवार से तक लगाए बैठ गया और इस पानी में आधे डूबे कमल के फूल सी काजल को निहारने लगा. चुचो की उभरी हुई डोड्डी बता रही थी की ये लड़की जल्द हे थकने वाली नाजुक काली नहीं है. बहुत हिम्मत और ऊर्जा थी उसके शरीर में.

"वह मैं कर लूंगा किसी दिन. वैसे तुम इतना ाचा कैसे तैर लेती हो, वो भी बहाव के उल्टा?"

"आगे पीछे ले लिए ये इतना बड़ा और तुम इतनी छोटी बात पूछ रहे हो. इस नहर में जब से कूद रही हु जब 8 साल की थी. लेकिन सच कहु तोह बस जिद्द थी की गाँव में जितने लड़के यहाँ तैरने आते थे उनसे ज्यादा ाचा और तेज तैरने की. फिर अकेले हे लगी रहती थी सुबह अँधेरे में जैसे अब तुम करते हो. फिर रंगत सांवली होने लगी थी और ये बड़े तोह माँ ने कुछ रोक लगा दी थी.", अपने गोल मॉटे दूध को पकड़ कर अर्जुन की तरफ करती वह मुस्कुरा रही थी. अर्जुन ने भी हलके से वह भूरा चूचक होंठो में ले कर कुछ पला चूसा और फिर हलके से दबाने लगा.

"चलो अब तुम जाओ यहाँ से. बहोत देर हो गई है और किसी ने देख लिए तोह तुम्हारा कुछ नहीं जाना लेकिन मेरी माँ मुझे मार हे डालेगी.", अर्जुन उसके होंठो को ाचे से चूमने के बाद जैसे काजल विपरीत बहाव में गई थी वैसे हे वह भी चल दिए. थोड़ा मुश्किल था और रफार धीमी लेकिन वह कपड़ो तक पहुंच गया था. दोनों हे अनजान थे उन 2 जोड़ी आँखों से जो उनको शायद पिछले आधे घंटे से देख रही थी. पुलिया के इस तरफ घने पेड़ की आड़ से सविता, जो मदहोश सी हो चुकी थी और नहर के दूसरी तरफ के जंगल में कड़ी बिमला देवी जो पहले हैरान थी लेकिन अपनी बेटी को इतने तगड़े घोड़े की बाहो में चुड़ते और फिर दिवार पकड़ कर गांड मरवाते देख कर सलवार के ऊपर से हे अपनी छूट 2 बार झाड़ चुकी थी. अर्जुन सुकून से भरा और शरीर से हल्का महसूस करता उड़ता हुआ साइकिल लेकर वह से निकल लिए.

"इतनी देर चुदाई कौन करता है? और ये घोड़ी भी कैसे वह इतने बड़े सट्टे से अपनी कुण्डी मठवा रही थी. बाप रे, पिछवाड़े में कैसे ले गई ये?", बिमला की हालत खराब हो चुकी थी और वह दबे पाँव वह से निकलती बस जल्द हे घर पहुंच कर नहाना चाहती थी.

"तोह तू देख रही थी सबकुछ वह कड़ी?", काजल अभी भी चूचियों तक पानी के अंदर दिवार पकड़ कर पाँव चला रही थी. गांड का दर्द काम करने का ये सही तरीका था क्योंकि अगर वह पसर जाती तोह दुखते पिछवाड़े से घर तक उसकी चाल जाने कितने हे लोग देख लेते.

"कैसे ले रही थी तू उसका? मुझे उधर से सिर्फ ऊपर से दिख रहा था लेकिन जब तू वह तेल लगा रही थी तोह मेरी हालत खराब हो गई थी. सच कहती थी यार तू के वह बहोत ज्यादा हे बड़ा है. भाभी के 2-3 से करवाते देखा था लेकिन वह इतने से ज्यादा बड़े नै थे.", सविता वैसे शर्मीली लड़की थी और समझदार भी लेकिन अपनी सखी के साथ वह खुलकर बात कर रही थी जिसका एक हे मतलब था के काजल ने खुद उसको सबकुछ बता दिए था.

"तभी मैंने तुझे बकरी कहा था. अगर तेरे अंदर उसका आधा भी चला गया तोह यहाँ से गाँव तक तेरी चीख सुनाई देगी. तू चूमा छाती कर और ज्यादा से ज्यादा उसको अपने ये मसलने दे, थोड़े बड़े हो जायेंगे. लेकिन गलती से तेरी मुनिया न सामने रख डीओ. वैसे भी इत्ती सी है तेरी.", काजल ने ऊँगली सविता को दिखते कहा तोह वह उसकी ब्याह पर थप्पड़ मरती अपनी टंगे भी दिवार से लटकती बैठ गई, सिर्फ पाँव हे ठन्डे पानी में डुबाये.

"छेड़ हरेक का बराबर हे होता है बता देती हु. और न मैं उस से कुछ करने वाली, आता तोह हफ्ते 10 दिन में है, उसके साथ chooma-chati तू हे कर.", सविता ऊपर से नखरा दिखा रही है ये काजल को पता था.

"उसने तुझे यहाँ पटक लिए न तोह टाँगे तू मेरे से ज्यादा खोल लेगी. मुझे तोह वह ाचा लगता है और चुदाई तगड़ी करता है इसलिए पसंद है लेकिन तू तोह मरती है उस पर. पिछली बार अपना बदन तूने ऐसे हे नहीं मुझे दिखाया था, तू खुद चाहती है के वह सबकुछ करे लेकिन तू मुँह से कुछ न कहे. सच्चे में तेरे ये आम भी काम नहीं.", पलट कर काजल ने सविता का वह मुट्ठी जितना सख्त उभर मसला और अपने कपड़ो की तरफ निकल चली.

"कामिनी कही की.. आठ.. चल अब घर चले कही तेरी माँ इधर आ गई तोह तेरे साथ मेरी भी खबर ले लेगी."

"हाँ वह तोह है. बहु जो बनेगी तू उनकी. लेकिन बता देती हु मिन्दर जैसे चूहे के पल्ले वह सुख नहीं मिलने वाला जो ये baagad-billa दे सकता है.", काजल अपने भाई के लिए खुलकर कह रही थी. और दोनों सहेलियां मस्ती भरी बातें करती घर की और चल दी. काजल फ़िलहाल खुद को 90% ठीक कर चुकी थी.

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घर पे समय से पहले हे तैयार हो कर स्कूल से निकल लिए था. अपनी दादी के पूछने पर उसने उन्हें बताया था के यही पास में उसने एक प्यारी सी लड़की को बहिन बनाया है और कल उनके यहाँ नहीं जा सका था तोह नाश्ता वही करके वह स्कूल चला जायेगा.

"घर भी लेके आइओ फिर उस प्यारी लड़की को. मैं भी देखु मेरे लादले ने ऐसी कौनसी बहिन बनाई है.", कौशल्या जी उसको छेड़ रही थी और अर्जुन ने उनके पास ृक्क कर इतना हे कहा.

"पक्का लाऊंगा दादी. और उस प्यारी सी लड़की ने अपना भाई समय से पहले खो दिए था और आपका ये कपूत उस कमी को दूर करने की हर कोशिश कर रहा है.", रेखा जी भी अपने बेटे की बात सुन्न रही थी और अपने बाल बांधती रुपाली दीदी ने भी दादी को हाँ में सर हिलाते हुए अर्जुन की बात से सहमति जाता दी.

"बड़ी माँ, अर्जुन की वह बहिन सच में खास है. भाई के लिए तोह वह दोपहर को स्कूल के बहार कड़ी इन्तजार कर रही थी. और मुझे भी तभी पता चला था के उसका भाई कुछ समय पहले हे गुजरा है, एकलौता था. उनकी माँ भी इसको अपने बेटे की तरह हे देखती है. आपने देखा कैसे निकल गया वह.", किसी को भी नहीं पता था के वह क्या कह गए है. भाई शब्द सुनते हे कौशल्या जी को बनवारी की याद आ गई थी और अर्जुन के ह्रदय में अपनी सगी बहिन सा प्यार किसी और लड़की के लिए देख आँखे गीली हो गई थी.

"मेरी ज़िन्दगी सफल कर दी इस लड़के ने. ये खुशिया देने के लिए पैदा हुआ है या इसके पैदा होने से हे खुशिया आने लगी. भगवन मेरे बचे को हर नजर से बचाये.", चाय का कप बीच में हे छोड़ कर वह अपने कमरे में चली गई.

"चल रुपाली बीटा तू नाश्ता कर, ऋतू तुझे स्कूल छोड़ देगी.", रेखा जी ने प्यार से अपनी इस बेटी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा. उन्हें भी अपनी सास के भावो से पता चला था के उन्हें अपने भाई की याद आ गई थी किसी के भाई की मौत का सुन्न कर.

"माँ, मैं खुदसे हे जाउंगी. ऋतू को रहने दो यही 2 गली दूर स्कूल है मेरा.", ऋतू दीदी सब dekh-sunn रही थी फिर रुपाली की बात से आश्वस्त होते हे वो अपनी लाड़ली दादी के पास चली गई. वही एक थी जो उन्हें प्यार से ठीक कर सकती थी.

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थोड़े नखरे और झूठे गुस्से के बाद पूर्वी और गीता खुद अपने हाथो से अर्जुन को खिला रही थी. सोलंकी उन्हें देखने के बाद मुस्कुराता हुआ अपना चाय का कप लिए वही बड़ी टेबल के दूसरी तरफ कुर्सी पर बैठ गया.

"अपने लाडले से फुर्सत मिल जाये तोह भाई हमारे कपडे भी निकाल देना. नाश्ता तोह नहीं लगता के आज मिलेगा. इसको खिलने से हे तुम दोनों का पेट भर जाने वाला है और मेरे अकेले के लिए तोह म्हणत होगी नहीं.", उसकी बात पर गीता ने हलके गुस्से से आँखे दिखाई और वापिस अर्जुन के सर को सहलाने लगी.

"ाचा अब बस कीजिये. मैं नाश्ता करने आया था लेकिन तीनो समय का खिला रही हो आप दोनों. अंकल के कपडे दे दीजिये पहले आप.", गीता इस बात पर हलकी नाराजगी से अपने पति को देख कर चली गई जो कान पकडे था. पूर्वी हंस रही थी.

"भाई ाचा किआ जो इस वक़्त आये. दिन ाचा हे जाएगा अब. और थर्सडे भूलना नहीं अगला नहीं तोह माँ के साथ मैं भी नाराज हो जाउंगी.", अर्जुन ने अपने हाथो से एक निवला पूर्वी को खिलाया तोह वह बिना नहाये हे इस निवाले को खाने लगी.

"पक्का आऊंगा. वह तोह स्टेडियम से थोड़ा देर हो गई थी कल और फिर काम से घर भी पहुंचना था इसलिए नहीं आया. आगे से ऐसा नहीं होने वाला. और हाँ कल शायद मैं तुम्हे लेने आऊंगा, दादी से मिलवाना है.", अर्जुन की बात पर पूर्वी हामी भरते हुए उसके चेहरे को रुमाल से साफ़ करने लगी और फिर उंगलिया भी.

"इतना भी छोटा नहीं हु.", अर्जुन ने मुँह बनाते हुए कहा.

"मेरे लिए तोह छोटे हे रहने वाले हो बाकी तुम दोनों आपस में डीडे कर लो के छोटा बड़ा कौन है. जाओ जी नाहा लो आप 2 मिनट में ये भाग जायेगा, स्कूल का टाइम तोह हो गया इसके.", गीता ने बड़े प्यार से लस्सी का गिलास अर्जुन के मुँह से लगाया और कड़ी होती हुई कमरे में चली गई.

"अब इन्हे क्या हो गया?"

"खुद हे देख लेना. मैं क्या जानू लेकिन तुम छोटे हे रहोगे. कह देती हु.", पूर्वी ने उसके बाल खराब करते हुए कहा तोह अर्जुन उदास शकल से उसको देखने लगा.

"आआ. नाराज भी होते हो? चलो मैं ठीक कर देती हु तुम्हारी जुल्फें.", फिर प्यार से वह लम्बे घुंगराले बाल सही करने लगी तोह अर्जुन भी मुस्कुरा उठा.

"ये ले बीटा, कल तेरे लिए लेके आई थी. अब पता नहीं आएगी भी या नहीं.", अर्जुन ने प्लास्टिक से बहार निकाल कर वह डिज़ाइनर सफ़ेद कमीज देखि जिसके कालर और ब्याह के किनारे काले रंग के थे और ये नीली जीन्स जिसका रंग हल्का आसमानी था. वह सचमुच खास हे थी.

"अब इसकी वजह?"

"बेटे के लिए वजह तोह नहीं देखनी पड़ती.", अर्जुन उनके गाल को चूम कर खड़ा हुआ और kameej-jeans बैग में रखता हुआ बहार चल दिए. साथ हे पूर्वी भी. अपनी स्कूटी से स्कूल के सामने उतरने के बाद कुछ बोल कर वह निकल गई तोह अर्जुन सर पर हाथ रख कर हँसता हुआ सामने कड़ी आकांक्षा को देखने लगा.

"वाह क्या बात है. आज तोह गाडी कही और से घूम कर स्कूल पहुंची है.", अर्जुन उसकी बात पर मुस्कुराता हुआ साथ हे अंदर चल दिए.

आज भी मरस वर्मा क्लास को पढ़ने के बाद अर्जुन की मदद कर रही थी किसी सवाल पर, लेकिन वह अपनी हे कुर्सी पर बैठी थी और अर्जुन बराबर खड़ा था. घंटी लगते हे सभी लैब की तरफ चल दिए प्रैक्टिकल के लिए, जैसा नया समय सारिणी पर लिखा था. सवाल हल होते हे अर्जुन ने उन्हें धन्यवाद किआ और वह एक बड़ी सी मुस्कान देती चली गई. उनका ये पीरियड खली नहीं था.

"तुम अकेले क्या कर रहे हो क्लास में?", अर्जुन बोर्ड साफ़ करने के बाद कॉपी बैग में हे रख रहा था के गुलाबी पंजाबी salwar-kameej में तजा गुलाब सी महकती अन्नू अंदर आ गई.

"तुम्हारा इन्तजार.", अर्जुन डेस्क के सामने खड़ा था जहा दरवाजा उसके पास हे था. पांव से दरवाजा भिड़ाता वह ऊपर से नीचे तक अन्नू को निहार रहा था और उसके विपरीत अन्नू कभी दरवाजे को तोह कभी अर्जुन को, घबराहट के साथ. शरीर जैसे जड़ हो गया था. अर्जुन हाथ में प्रैक्टिकल फाइल लिए उसके करीब आया और बंद होंठो पर हलके से होंठ भिड़ने के बाद हवा की तरह क्लास से बहार निकल गया. एक पल तोह अन्नू को कुछ समझ न आया लेकिन फिर सीने पर हाथ रखती वह निश्चिंत हो कर मुस्कुरा उठी. कुर्सी पर बैठी वह बस खुश हो रही थी. अर्जुन सचमुच उसको हर पल ये एहसास करा रहा था के वह खास है, लेकिन माहौल को पढ़ते हुए. फिर कुछ सोच कर वह भी लैब की तरफ चल दी.

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आखिर पीरियड में आज वही 3 स्टूडेंट थे कंप्यूटर लैब में और मेनका, जिसके चेहरे पर ये खास चमक थी. अर्जुन ने भी वह देख ली थी लेकिन खुलकर जाहिर न करते हुए वह किताब खोले हुए कुछ प्रैक्टिस करता रहा.

"मैडम आप चेक कर लीजिये. मेरा कम्पलीट हो गया है.", एक लड़की ने कहा तोह मेनका ने साथ बैठ कर वह एक्सरसाइज देखि जो उसने करने के लिए दी थी.

"हम्म. बिलकुल ठीक. वैरी गुड. आगे कुछ करना हो तोह कुछ भी कर सकती हो नहीं तोह यू अरे फ्री तो जो. टेस्ट हो गया है.", क्लास में अभी 10 मिनट हे हुए थे और ये लड़की मुस्कुराती हुई जल्दी जाने की ख़ुशी से बहार चल दी. और कोई 5 मिनट बाद दूसरी भी.

"तोह मर अर्जुन शर्मा, आप हे है जो अभी तक छोटा सा टेस्ट नहीं कर प् रहे. जरा देखु तोह मैं भी.", मेनका एक खास अदा से ये कहती हुई अर्जुन के साथ लगती हुई बैठ गई. माध्यम से गोल उभार अर्जुन की ब्याह से लेकर कोहनी तक रगड़ते हुए आ रुके. अर्जुन वैसे हे बैठा मेनका की ये मस्ती देख मुस्कुरा रहा था.

"ाचे से देख लेना.", अर्जुन की बात पर मेनका ने स्क्रीन पर देखा तोह टेस्ट वाली स्क्रीन नीचे किये वह मस दोस की प्रैक्टिस कर रहा था जो वह घर से हे पढ़ कर आया था.

"वाह जनाब तोह आगे चल रहे है. लेकिन इसके नुक्सान भी हो सकते है.", मेनका स्वाभाव से कंप्यूटर के प्रति आसक्त थी और अर्जुन की लगन देख वह भी उसको समझने लगी. जितना अभी के लिए जरुरी था. और जैसे हे मेनका ने समझाना ख़तम किआ, खुद हे अपने दोनों उभर उसकी कलाई के ऊपर रख दिए.

"मरवा डौगी दोनों को हे आप.", अर्जुन ने उन नरम उभारो को महसूस करते हे बिना मेनका की तरफ देखे कहा.

"ाचा. और खुद जैसे गायब हो गए वह? कल रात पता नहीं क्या क्या होता रहा अंदर. और तुम तोह अँधेरे में ऐसे गायब हुए की अगली सुबह तक नजर नहीं आये. शरीर अभी भी दुःख रहा है लेकिन बड़ा मीठा सा.", मेनका की ऐसी बात और दीवानगी देख अर्जुन ने कंप्यूटर स्क्रीन पर बड़ी धीमी रफ़्तार से कुछ लिखा तोह मेनका भी उधर देखने लगी.

"वेट फॉर जस्ट ओने डे. टुमारो ात 12 नून.", और फिर वह उठते हे हलके से एक उभर दबाता बहार निकल गया.

"ये कैसी नए रंग भर गए हो ज़िन्दगी में तुम, पहले से कही ज्यादा बेचैन रहने लगा है ये दिल. 2 घडी सुनो जरा ये धड़कन हमारी, हर वक़्त तुम्हारा हे नाम लेने लगा है ये दिल.", मेनका का दिल सचमुच उसके काबू न रहा था. और ये चाँद पंक्तिया गवाह थी जो न्यास हे उसके दिल से जुबा तक आ गई थी.

"कल पक्का सुनूंगा. वैसे स्कूल से सीढ़ी दादी से मिलने चली जाना.", अर्जुन वापिस अंदर आते हे इतना कह कर फिर भाग गया.

"फरेबी कृष्णा. अर्जुन का नाम लगाए फिरता है.", मेनका एक अदा से गर्दन झटकती हुई मुस्कुरा कर अपने डेस्क की तरफ चल दी.

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आकांक्षा क्लास में अर्जुन का हे इन्तजार कर रही थी. उसकी संस्कृत की क्लास भी समय से पहले ख़तम हो गई थी आज.

"घर चले?", आकांक्षा की बात पर अर्जुन ध्यान से उसके शरारती चेहरे को देखने लगा.

"10 मिनट में क्या हो जायेगा मैडम? घर पहुंचेंगे और फिर वापिस आना पड़ेगा दीदी को लेने.", अर्जुन ने बड़े प्यार से उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिए था.

"ाचा सुनो, मैं क्या कह रही थी. शाम को थोड़ी देर मिलने आ सकते हो? 7 बजे के करीब. फिर मैंने mumma-papa के साथ रात को हे दिल्ली निकल जाना है. नेक्स्ट वीक तक हे वापिस आ पाऊँगी.", आकांक्षा कभी उस से ऐसे नहीं कहती थी. वह बस बोल देती थी की इस वक़्त तुम्हे आना होगा.

"तुम ठीक हो?", अर्जुन स्कूल की मर्यादा भूलते हुए उसको सीने से लगा के खड़ा हो गया.

"हाँ बस तुम्हे मिस करुँगी. ऐसे हम ज्यादा मिल नहीं सकते लेकिन 2 वक़्त तुम्हे देख लेती और और बोल लेती हु तोह दिल में चैन रहता है. इस बार न जाने क्यों कुछ अलग सा लग रहा है."

"मैं 7 बजे आ जाऊंगा.", अर्जुन ने हलके से गाल चूमते हुए कहा और दोनों हाथो में वह मासूम चेहरा थामे आकांक्षा को देखने लगा.

"Papa-mumma मार्किट से 9 बजे तक आएंगे और मैं चाहती हु जाने से पहले मैं अपना ये टाइम सिर्फ तुम्हारी बाहों में बितौ."

"तुम ये बात वैसे हे कह सकती हो जैसे हमेशा कहती हो. मुझे ाचा लगता है जब तुम मेरी आकांक्षा की तरह हक़ जताती हो और बचपना करती हो. ये रिक्वेस्ट करने जैसा लहजा सही नहीं है.", दोनों हे चुप हो गए जब बहार कदमो की आहात सुनाई दी. अर्जुन और आकांक्षा ने अपने बैग उठाये और बहार निकले हे थी की घंटी बज गई. चारो फिर साथ हे घर की तरफ चल दिए और रुपाली दीदी फिर आकांक्षा के घर हे रुक गई, उसकी पैकिंग में मदद करवाने और खाना सीखने के लिए. संदीप ज्योति दीदी की शादी के प्लान बताता अर्जुन के साथ घर निकल लिए.

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"नहीं राज मैं किसी और की होने से ाचा मरना पसंद करुँगी. तुम मुझे अभी के अभी यहाँ से भगा कर ले जाओ राज, मुझे अपने साथ ले जाओ."

"और maa-babu जी का क्या? उनके भरोसे और प्यार का. नहीं सिमरन हम इतने खुदगर्ज़ नहीं हो सकते. मैं तुम्हे यहाँ से लेकर जाऊँगा और खुद बाबूजी तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में देंगे."

"नहीं राज, ऐसा कभी नहीं होगा. वह हमारे प्यार को नहीं समझेंगे."

अन्नू कपडे बदलने कर गॉड में तकिया रखे पूरी तन्मयता से इस फिल्म में खोई थी. पहले तोह अर्जुन के साथ लैब में chori-chori मस्ती और फिर अन्नू का वह चुपके से मुट्ठी में कागज रखना अर्जुन की. कैसे दुनिया से बचते बचते अठखेलिए कर रहे थे. अभी अभी अन्नू की माताजी घर से गई थी उसको बोल कर की वह 5 बजे तक वापिस आएंगे और वह उठ कर दरवाजा लगा ले. अन्नू के कान पर जो तक न रेंगी लेकिन उनकी माताजी बहार खड़े रिक्शा पर बैठ कर निकल चली. और वह भी अपनी हे धुन में मगन थी जो अर्जुन को न देख सकीय, जो गली से निकल कर उनके घर के सामने हे रुक गया था. मोटरसाइकिल वह आवाज की वजह से कुछ दूर पहले हे बंद कर चूका था.

"कोई बात नै.", अर्जुन उन्हें जाता देख रहा था और रिक्शा अब गली के आखिर में पहुंच कर ओझल हो गया था.

अर्जुन को पता था के इस वक़्त घर में कोई नहीं होगा और वह दबे पाँव ड्राइंग हाल से अन्नू के कमरे की और बढ़ गया. यहाँ वह बिस्टेर पर बिलकुल टेलीविज़न के सामने बैठी फिल्म में खोई थी. अर्जुन मुस्कुरा दिए क्योंकि यही फिल्म कोमल दीदी और अलका दीदी की सबसे पसंदीदा थी.

हलके हरे टॉप और ढीले धारीदार पाजामे में दुनिया से अलग थलग बैठी अन्नू को एहसास तक न हुआ जब अर्जुन ने पीछे से उसको थोड़ा सख्ती से दबोच लिए.

"ीीे.. तुम.. ? गंदे कही के जान निकल दी थी.", अन्नू की डर से तेज चीख निकल गई लेकिन फिर अर्जुन को देख कर नाटक करती वह उसके सीने पर हलके से मरने लगी. अर्जुन हँसता हुए उसको खींच कर अपने ऊपर ले आया.

"ठीक तोह हो? एक बार तोह तुम्हारी चीख ने मुझे हे डरा दिए.", अर्जुन अपनी कमर पर बैठी अन्नू की हालत देख मुस्कुरा रहा था.

"इसलिए अभी तक हंस रहे हो? जब घर में कोई भी नहीं है तब भी तुम ऐसी उलटी सीढ़ी हरकत कर रहे हो? जाओ मैं नहीं बात करती तुमसे.", अन्नू रूठती हुई मुँह दूसरी और करती अब झूठा गुस्सा दिखा रही थी.

"ओह. ठीक है अगर तुम्हे मेरा आना ाचा नहीं लगा तोह मैं चलता हु.", अर्जुन ने बड़े गंभीर चेहरे और आवाज से इतना कहा और बस हिला हे था की अन्नू ने उसके कंधे दबाते हुए अपना सीना भी उसकी छाती पर रख दिए.

"हिल कर दिखाओ इस बीएड से जरा. बड़े आये जाने वाले. प्यार से मुझे मानना तोह दूर, खुद नाराज हो कर दिखा रहे हो.", अर्जुन इस बात पर हंसने लगा तोह वह नाराजगी दिखने के बाद पूरी तरह उस से लिपट गई.

"तुम हे तोह जिसके साथ मुझे ख़ुशी मिलती है. ये सब रूठना मानना ाचा लगता है.", अर्जुन अन्नू की ऐसी बात सुनकर नंगी कमर पर हाथ फिरते दूसरे से उसका चेहरा अपने सामने किये देखने लगा.

"मैं भी तोह वही कर रहा था. मैं रूठ जाऊ तोह तुम मुझे कैसे मानती हो वही देख रहा था."

"ऐसे मन लुंगी तुम्हे.", इतना कहते हे अन्नू ने वह दहकते सुर्ख होंठ अर्जुन से मिला दिए. हलके हलके उसका ऊपरी होंठ मुँह में भर कर चूसती हुई वह फिर वैसा हे निचले होंठ के साथ करती हुई अपना प्यार जताने लगी. दोनों आँखे बंद किये कितनी हे देर एक दूसरे को ऐसे हे चूमते रहे. अर्जुन जहा उसके दोनों नरम नितम्भ दबा रहा था वही अन्नू उसकी छाती के दोनों तरफ हाथ रखे पूरा चेहरे गीला कर रही थी.

"ये फिर मुझे लग रहे हैं.", अर्जुन का इशारा उसकी उन्नत छातियों की तरफ था. अन्नू उसकी बात सुनकर सीढ़ी बैठ गई. आँखों में ख़ास चमक थी इस पल में जो बता रही थी की वह पीछे हटने वाली तोह बिलकुल नहीं है अर्जुन जितना मर्जी उसका ध्यान हटाए. सररर से वह टॉप उसके सीने से निकलता एक तरफ फर्श पर जा गिरा. अर्जुन की उम्मीद से अलग वह गुलाबी ब्रा, जिसमे दोनों बेजोड़ सतांन कैसे थे अगले हे क्षण जिस्म से अलग होती पहले वाले वस्त्र के ऊपर पड़ी थी. फक्क सफ़ेद और चमकते सतांन पूरी तरह उसके चेहरे से एक फ़ीट दूर अपने लाल चूचक कड़े किये जैसे अर्जुन को हे घूर रहे थे.

"अब ाचे से लगेंगे तोह इनकी ख्वाहिश भी पूरी हो जाएगी.", अन्नू के होंठ अपनी हे हरकत पर लरज रहे थे. हल्का सा नीचे झुकती हुई वह अर्जुन की कमीज के बटन खोलती उसको भी सीने से बेपर्दा करने लगी. अब बारी अर्जुन की थी सिसकने की.

"अह्ह्ह..", छोटे निप्पल जीभ से रगड़ती वह अपने उभर भी उसके शरीर पर चूहा रही थी. दोनों बाहे दबाये जैसे वह अर्जुन को हिलने नहीं देना चाहती थी.

"शह्ह्ह्ह.. हर बार तुम भाग जाते हो मुझे खुश कर के. आज नहीं.", अन्नू अपने नरम गद्देदार कूल्हे नीचे सरकती हुई उसके घुटनो तक आ बैठी. अर्जुन हैरान था इस नाजुक और भोली सी लड़की को ये सब करते देख. फिर खुद हे अर्जुन के हाथ की उंगलिओ को अपने मुँह में लेती अन्नू ने चूसते हुए गीला किआ और अपने बड़े से चुके पर रख दिए. उनका आकर सचमुच ज्यादा था जो कपड़ो के ऊपर से कभी इतना बड़ा नहीं लगा था. उस प्राकृतिक मुलायम उभर पर उंगलिया लगते हे अर्जुन हलके से निप्पल पर उंगलिया फिरता महसूस करने लगा. बेहद कोमल और एक आकर्षण से भरपूर. अर्जुन की इत्छा हो रही थी की वह कास कर इन्हे दबाता हुए मुँह में भर कर लाल कर दे. लेकिन वह अन्नू को देखने लगा जो जीन्स का बटन और चैन खोलने के बाद उस सांप के पिटारे को खोलने लगी थी जहा उसको झटका लगने वाला था.

"ओह्ह्ह.. ये क्या है?", स्प्रिंग की तरह उछाल कर वह बांस सा मोटा और सख्त लिंग उसकी पकड़ से निकल कर अर्जुन की नाभि से टकराता फिर 45 के कोण पर अर्जुन की तरफ खड़ा हो गया. अन्नू सब भूल कर इस दिन के उजाले में अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा अजूबा देख रही थी. नीली नसे कही कही tedhi-medhi सी उभरी हुई इस gore-gulabi लुंड को और निखार रही थी. अन्नू अपने हिलते सीने पर एक हाथ रखे हैरत से कभी इस अंग को तोह कभी अर्जुन को देख रही थी. जो उसके हे चेहरे को पहले की तरह प्यार से देख रहा था.

"इस थिस रियल? मतलब मैं ये सवाल कर हे क्यों रही हु. तुम मेरे साथ इसलिए नहीं करना चाहते थे न? ये कितना बड़ा है और कितना अलग.", अन्नू खुद को दुरुस्त करती हुई बड़े हे धीमे से अपनी उंगलिया लुंड के मूल पर लगाने लगी, जैसे वह फिर से पक्का करना चाहती हो के ये सपना नहीं है. चिकना और गरम, यही उसने ऊँगली से महसूस किआ और फिर अपनी गोरी हथेली उसके गिर्द घूमती वह बीच से उसको पकड़ कर मुट्ठी में लेने लगी. पूरा मूल पकड़ में न आ सका लेकिन बदन में हजारो सूक्ष्म विस्फोट से होने लगे थे अन्नू के.

"ये असली है और कितना खूबसूरत भी.", अन्नू जिस से डर रही थी अब वही हाथ में पकड़ने पर उसका प्यारा लग रहा था.

"ये तुम्हे दर्द से भर देगा अन्नू. और मैं तुम्हे बस मुस्कुराते देखना पसंद करता हु. तुम हमेशा एक फूल से खिली और महकती रहती हो, वैसी हे पसंद हो. ये तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा.", अर्जुन दिल से ये बात कह रहा था और फिर अन्नू का हाथ वह से हटा कर अपने नाग को बंद करना चाहा तोह खुद अन्नू ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिए.

"थिस इस माइन. अभी ये मेरे पास है और मुझे यही चाहिए. भाड़ में गया दर्द और बाकी सब लेकिन जैसे तुम मेरा पहला और आखिरी प्यार हो, वैसे हे ये मेरे वजूद में जाने वाला पहला पेनिस. मॉन्स्टर है तोह क्या हुआ, मेरी बॉडी इसको सेह लेगी. नाजुक हु कमजोर नहीं अर्जुन.", गुलाबी हिस्से को हलके से चूम कर वह अर्जुन के बराबर उसकी ब्याह पर सर रखती लेट गई. सीधा हाथ अभी भी उस 'मॉन्स्टर' को पकडे था.

"मैं जनता हु अन्नू. लेकिन ऐसे मिलान में दर्द के साथ बहुत कुछ और भी होगा. मैं तुमसे प्यार करता हु और नहीं चाहता के इस शारीरिक मिलान से तुम मेरे बारे में अपने विचार एक प्रतिशत भी बदलो. कही प्यार और मेरा ये करना तुम्हे किसी गंभीर स्थिति में न दाल दे. या कल हम दोनों के बीच इसकी वजह से कोई भ्रम पैदा हो जाये.", अर्जुन अपने सीधे हाथ से उसके gol-matol से गाल सहलाता आँखों में देख कर कह रहा था. नरम चुके ाचे से उसके जिस्म से चिपके थे लेकिन अर्जुन का ध्यान बस अन्नू पर हे था. अन्नू के प्रति एक चाह जरूर थी अर्जुन के दिल में. उस से मिलना, लिपटना, चूमना और बातें करना. लेकिन वह दिल से यही चाहता था के अन्नू उसके साथ वह न कर बैठे जो सबकुछ बदल दे. चुदाई के बात उसने कुछ लोग बदलते देखे थे और कुछ का प्यार हद्द से ज्यादा बढ़ते हुए. लेकिन इतनी बार अन्नू को तृप्त करके वह बच चूका था लेकिन आज जैसे वह खुद ये रोकने में असफल हो रहा था. इस मिलान का असर क्या होने वाला है वह बस इस बात से चिंतित था. कही अन्नू प्यार भुला कर जिस्म की आग में झुलसने लगी तोह? रिश्ता सिर्फ शारीरिक सुख तक सिमित हो गया तोह? और इसके विपरीत वह पहले से ज्यादा उस से प्यार करने लग गई तब भी कुछ तोह गलत होगा हे. वह हक़, एकाधिकार या जूनून में आगे बढ़ गई तोह. अर्जुन इस दुविधा में आँखे बंद किये था और अन्नू उस से चिपकी दिल की गहराई से अर्जुन को महसूस कर रही थी.

क्रमश.....
 
एक बार आप लोग अपडेट 47 को फिर से पढ़ लीजियेगा. शायद तब आदतन मदिरा के सुरूर में थोड़ा इधर उधर निकल गया था तोह ये गलती हो गई. लेकिन इसका ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा कहानी पर बस बाकी परिवार के सदस्य मैंने एक बार यहाँ बता दिए है.
 
अपडेट 89 (2)

बदलाव एक जरुरत


अब आगे...

"तुम्हे मेरे बारे में इतना सोचने की जरुरत नहीं है. मैं वैसी हे रहने वाली हु हमेशा. जब तुम मेरे पास हो तोह तुम्हारी, नहीं तोह फिर नहीं. कोई वादा नहीं और कोई ज़िद्द नहीं. अनकंडीशनल लव व्हेन वे अरे टुगेदर.", अन्नू जैसे अर्जुन की गहरी सोच को समझ गई थी. और उसकी ऐसी बात सुनकर अर्जुन प्यार से अन्नू के माथे पर चुम्बन करता उसकी तरफ हे मदद गया.

"तुम्हे किसने कहा के कोई वादा नहीं है हमारे बीच? बस मैं थोड़ा डर रहा हु की कही तुम्हे अनजाने में कोई दुःख न दे बैठु. सुख तोह वैसे भी मैं कितना हे दे प् रहा हु."

"ष्ठीय. चुप्प बिलकुल चुप्प रहो. मैंने एक फिल्म देखि थी कल रात, सोने से पहले. अब उसको रिपीट करते है.", आँख मारती हुई वह अर्जुन के होंठो पर ऊँगली रखने के बाद दोनों गदराई जाँघे उसकी कमर के दोनों तरफ करती ऊपर आ गई. ठुड्डी से चूमती हुई वह उसके गले पर हलके से दांत लगाती हुई ये अनजानी म्हणत करने लगी. साथ हे वह निर्वस्त्र अंग उन गरम जांघो की बीच की गद्देदार मुलायम सतह से डब्ब रहा था. अर्जुन के दोनों हाथ स्वतः हे उन झूलते हुए गोर उभारो को सहलाने लगी. मजे की सिसकारी लेती अन्नू अपनी कमर को और कस कर दबती हुई फिर से अर्जुन से लिपट गई..

"अह्ह्ह.. तुम इन्हे हाथ लगते है तोह सब भूल जाती हु. ज्यादा पसंद है तोह फिर मनमानी क्यों नहीं करते? उम्म्म.. इन पर भी अपना नाम लिख दो न.", अन्नू की आवाज में अलग हे कम्पन्न थी. कहा वह गुस्सैल, अनुशाषित और गंभीर टीचर और अब यहाँ ये निस्वार्थ समर्पित और कामुक प्रेमिका. दोनों हे चरित्र अन्नू बखूभी संभल रही थी.

"जैसा तुम कहो.", अर्जुन ने बिस्टेर पर अन्नू को पलट कर नीचे ले लिए. दोनों लाल फूल से अंकुर निहारता वह समूचे चूचक को मुँह में भरता हुआ दूसरे मखमली गुब्बारे को दबाते हुए जिसे और हवा भरने लगा.

"इस्सस.. सूचक थम हर्डर.. आह.. ये कितना ाचा लग रहा है.. आह्हः.. ", मजे में अपने दूध chuswati-dabwati अन्नू सिसकारी भर्ती हुई जोर से अर्जुन के लिंगमुण्ड को मुट्ठी में पकड़ती अंदर से इकट्ठी हो रही थी. अर्जुन भी अब यहाँ से वापिस नहीं मदद सकता था. दोनों के शरीर के बीच बस उसकी आधी खुली जीन्स और अन्नू का पजामा व्यवधान दाल रहे थे.

"घर में बहाने के लिए तैयार कर लेना खुद को.", अर्जुन ने उस मादक सी गहरी नाभि को चूमने के बाद अन्नू से कहा जो उसके स्पर्श से गीली हुई जा रही थी. एक कामुक अदा से अर्जुन को निहारती वह खुद हे अपने टाँगे ऊपर करती उसकी मदद करने लगी ये ढीला पजामा उतरने में. अर्जुन इस दृश्य को जैसे तस्वीर की तरह दिमाग में उतारे हे लगा था. अन्नू 5 फ़ीट 9 इंच लम्बी और एक बेजोड़ शरीर की मालकिन थी. आपस में सटी वह माखन सी जाँघे और उनके बीच उभरी हुई गुलाबी फांके जिनपर कोई रोयं तक न था. बस योनि स्थल से ऊपर के हिस्से पर हलके सुनहरी रंगत लिए थोड़े बाल जो ध्यान से देखने पर हे पता चल रहे थे.

"आह्हः.. बहानो की चिंता मत करो.. उम्म्म्म लेकिन ये जो तुम कर रहे हो इस से आठ... पागल होने लगी हु.", बंद गुलाबी मॉटे होंठो की दरार को चखने से अर्जुन खुद को रोक न पाया. वह बहार से जितनी मुलायम और मोटी थी अंदर उतनी हे तंग और बारीक. ऐसी छूट को देख कर हे पता लगता था के अर्जुन क्यों खुद को अन्नू से मिलान करने के लिए रोकता था. गीली दरार में गुलाब के आरक सा रास जीभ की नोक से चकता हुआ वह कोई जोर नहीं दाल रहा था. जाँघे फैलने से अब कुछ हद्द तक वह पूरी छूट को समझ प् रहा था. Mutra-chidra से नीचे वह पतला सा गुलाबी सुराक बड़ा आकर्षक था. दोनों तरफ हलकी सिलवट वाली गुलाबी नन्ही पत्तियां जैसे कोई खूबसूरत प्रहरी थी. 'व्' के आकर में नीचे बंद होती सीमा तक गाढ़ा तरल और अर्जुन की लार जमा हो कर इस योनि को कही ज्यादा कामुक बना रहे थे.

"बॉडी लोशन या कोई वैसी क्रीम है?", अर्जुन के होंठो और ठुड्डी पर चमकता खुद का पानी देख अन्नू ऊपर उठती मदहोश सी उसके मुँह से चिपक गई. पूरा चेहरा चूमने के बाद वह कुछ पल के लिए अर्जुन के सीने से लगी बेआवाज जैसे शुक्रिया कह रही थी. अर्जुन भी उसकी मांसल मलाई सी पीठ पर हाथ फिरते हुए उसके गरम नरम उभारो से हल्का उत्तेज्जित होने लगा.

"इस ड्रावर में सबकुछ है. जो चाहे निकल लो.", बीएड के किनारे रखे लैंप के नीचे ये बड़ी दर्ज थी जिसको अर्जुन ने खोला तोह पल भर के लिए वह भी हैरान रह गया. जाने कितनी हे तरह की क्रीम, लोशन और तेल थे यहाँ. बॉडी लोशन, सुन क्रीम, फुट क्रीम, मस्तूरिज़र, ओलिव आयल, V-cream, B-cream.. हर शीशी और बोतल को ध्यान से देखने के बाद ये एक स्ट्रॉबेरी बॉडी लोशन निकलता वह फिर से अन्नू के पाँव के बीच आ गया.

"इतनी कलेक्शन मैंने कही नहीं देखि.", अर्जुन ने वह बारीक सा ढक्कन हटते हुए बोतल खोली तोह अन्नू मुस्कुराती हुई उसको हे देखने लगी. अर्जुन ने दोनो उभारो के ऊपर एक हलकी सी धार छोड़ने के बाद वैसा हे पेट पर किआ और फिर उस से भी नीचे. ठंडी क्रीम इस गरम बदन को जैसे अलग हे सुख दे रही थी. जल्द हे अर्जुन के हाथो ने पूरे धड़ की मालिश करते हुए हर अंग को गरमाना शुरू कर दिए. अन्नू को इतना सुकून अपने हाथो से तोह कभी मिला नहीं था और न हे वह अर्जुन की तरह कभी मालिश करती थी. दोनों उभारो पर हथेली gol-gol गुआंता वह उन्हें चिकना करने के साथ हे और सख्त कर रहा था. पेट पर वही हाथ किसी फूल की तरह चलते और जब उस ख़ास हिस्से पर आते तोह दोनों फैंको को अंगूठे से रगड़ता वह अन्नू की सिसकियाँ निकलवा देते.

"आह्हः.. ममम.. मुझे नहीं पता था के तुम मस्सगे थेरेपिस्ट भी हो.. वैसे ये म्हणत में समय खराब नहीं कर रहे?", अन्नू का मजा भरपूर आ रहा था लेकिन वह बस अर्जुन से पूरी तरह मिलान के लिए ज्यादा बेताब थी.

"अगर ये नहीं किआ तोह शरीर पर वह निशाँ बन्न जायेंगे जो देख कर मुझे तुमसे ज्यादा दुःख होगा.", दोनों लाल निप्पल अपनी औकात से लम्बे होते हुए अकड़ चुके थे. अर्जुन समझ चूका था के अब आगे बढ़ा जा सकता है.

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स्टेडियम पहुंचने में आज थोड़ी देर हो गई थी अर्जुन को. 4 बजे की जगह घडी 4:20 दिखा रही थी. स्टैंड से निकल कर आगे बढ़ने लगा तोह प्रीती के साथ वही शाम वाली लड़की मैच लगा रही थी. कही काली जुल्फे तोह कही चांदी के रंग की. घुंगराले लम्बे बाल कुछ अलग से हे थे और इसकी लम्बाई भी तक़रीबन अलका दीदी जितनी. कुछ लड़के कोर्ट के पिछली तरफ से भी इस लड़की पर हे नजर गड़ाए थे, ज्यादातर कबड्डी और वॉलीबॉल वाले आवारा. अर्जुन ने देखा की लड़कियों को कोई परवाह नहीं है और वह ध्यान भी नहीं दे रही तोह अपने गयम के रस्ते चल दिए.

"छोटे भाई, कहा रह गया था आज? चोट कैसे लगी तेरे ये होंठ पर?", बलबीर ने जैसे हे हाथ मिलाया तोह अर्जुन का चेहरा देख कर थोड़ा गंभीर हो गया.

"दरवाजा लग गया था. ऐसी वैसी कोई बात नै बड़े भाई. चलो प्रैक्टिस करते है.", उसकी बात सुनकर बलबीर भी शरीर गर्माने लगा.

"आज टेनिस कोर्ट पे बवाल होगा पक्का. लिखवा ले मेरे से.", बलबीर की ऐसी बात पर अर्जुन बेंच पर टिकाये पंजे जमीन पर रखता सीधा खड़ा हो गया

"क्या बात कर रहे हो? बवाल कैसा?", अर्जुन थोड़ा परेशां हो गया था ये सुनकर.

"छोटे भाई इस स्टेडियम के एक तरह से तीन हिस्से है. उधर जहा हम जाते नहीं. वह kabaddi-dangal वालो का हिस्सा है और उनको खेल से ज्यादा अपनी ताक़त और बदमाशी के लिए जाना जाता है. उन्हें प्रशाशन इधर आने के लिए मन करता है लेकिन रोक नहीं सकता. फिर है हमारा हिस्सा एथलेटिक्स और फील्ड गेम वालो का. यहाँ सभी प्रोफेशनल है और आखिरी है वीमेन एरिया जहा सिर्फ लड़कियां हे जा सकती है. लेकिन सुदर्शन छोटी कुछ देर खड़ा हुआ था टेनिस कोर्ट के पास और जिस तरह वह इस विदेशी लड़की को देख रहा था मतलब साफ़ था के वह उसको पसंद आ गई है."

"ये छोटी कौन है?"

"छोटे भाई छोटी पर बहुत राजनितिक लोगो का हाथ है और जिस्म से वह पूरा सांड है. जेल में 1 दिन से ज्यादा कभी नहीं रुका और कबड्डी वाले असल में उसके लिए हे chote-mote लड़ाई झगडे करते है. छोटी बड़े काम करता है. मैं तुझे ये इसलिए बता रहा हु की तेरे वाली उस लड़की के साथ हे खेल रही है. मैं तेरे साथ मरते दम तक हु लेकिन छोटी से उलझना विकास और कोच के बस का भी नहीं.", अर्जुन के जबड़े कस गए थे इतना सुनकर. दिमाग में प्रीती और आँखों में गर्मी लिए वह खामोश सा टेनिस कोर्ट की तरफ चल दिए. बलबीर तुरंत वह से निकल कर कुश्ती के अभ्यास वाली जगह. आज ज्यादातर कोचिंग स्टाफ और स्टेडियम प्रशासन छुट्टी पर हे था कोई टूर्नामेंट या ट्रायल नहीं होने की वजह से. सिर्फ मुख्या द्वार वाले सुरक्षाकर्मी और जूनियर कोचिंग स्टाफ.

"विक्य, let's जो. यहाँ माहौल ठीक नहीं लग रहा.", 3-4 लड़के अब घांस तक आ बैठे थे और फब्तियां कसने लगे इन 3-4 लड़कियों पर. लेकिन उनकी नजर इस विदेशी लड़की पर थी जिसके चेहरे पर हल्का गुस्सा और खेलने की वजह से पसीना था. चुस्त जिस्म से चिपका कला ट्रैक जो नाभि से नीचे तक था. और पत्तिओ वाली वैसी हे चुस्त safed-kali स्पोर्ट्स टीशर्ट जो सीने से एक इंच नीचे तक हे थी. अर्जुन जिस जगह खड़ा था वह कोर्ट से साइकिल स्टैंड के बीच वाली पटरी थी.

"ओह गुलाबो. दत्त जा के जल्दी है. मेरी jaan-pehchaan करवाए बगैर कड़े जावेगी? और न छोटी जान देगा.", ये साढ़े 6 फ़ीट का आदमी जिसका सर गांजा और बीच में एक लम्बी गांठ बंधी छोटी थी. देख कर हे वह किसी जीन जैसा लगता था. वॉलीबाल वाले आवारा लड़के अपनी जगह छोड़ कर दूर जा खड़े हुए और वैसा हे बाकी सबने किआ. कोर्ट के किनारे कड़ी प्रीती और विक्य के सामने किसी दिवार सा सुदर्शन छोटी, कला भूसंद और शरीर दैत्याकार. उसके पीछे हे 4 और लोग जो सभी 6 फ़ीट से ऊपर और विकास से भी तगड़े.

"रास्ता छोड़ो नहीं तोह ठीक नहीं होगा.", प्रीती निडरता से दहाडी तोह वह हँसता हुआ अपने चमचो को देखने लगा. सुरक्षाकर्मी उधर पंहुचा हे था के एक चमचे ने पेट में लात मार कर उसको वही गिरा दिए. गिरे हुए आदमी के 4-5 और लात मरने के बाद वह भी छोटी को देखने लगे. इधर विकास ने ये देखा और मंजूबाला भी कोर्ट पर आ कड़ी हुई.

"छोटी भाई जाने दे इनको. मेरी पहचान के है इनके साथ पन्गा मत कर.", विकास पुनिअ खुद एक शेर था लेकिन वह भी छोटी को हाथ लगाने की जगह सामने नजरे नीची करता निवेदन सा कर रहा था.

"पहलवान यहाँ से 9-2-11 हो ले नहीं तोह गांड में गोली मार दूंगा तेरी. पहले तोह वह बस फिरंगन छोड़ने वाला था लेकिन ेब यू जंगली गुलाब भी साथ लेके जाऊंगा.", छोटी का हाथ प्रीती की तरफ बढ़ा तोह मंजू सामने आ कड़ी हुई.

"यहाँ से निकल नहीं तोह अपने पैरो पे न जा सकेगा.", मंजू की आँखे और जुबान आग उगल रही थी. छोटी का बढ़ता हाथ एक तरफ करती वह उसकी आँखों में देख रही थी.

"बहिन की लोदी 2 टक्के की रांड.", सुदर्शन छोटी ने जोर से मंजू को एक तरफ धकेला और प्रीती की कलाई पकड़ ली, जो नीचे गिरी मंजू की तरफ बढ़ने लगी थी.

"तेरी माँ की बहिन के लौड़े.", अर्जुन की तरफ किसी का ध्यान हे नहीं था जिसने बिजली की गति से आते हे छोटी की कलाई पकड़ कर कंधे के जोड़ तक गीले कपडे की तरह मरोड़ दी. सभी सुन्न रह गए और जब तक किसी को होश आता अर्जुन इस 150 सवा क्वांटल वजनी झोटे को गर्दन और जांघ से हवा में उठाये पत्थर की पटरी पर फेंक चूका था.

"आअह्ह्ह्हह.", 10 से ज्यादा पत्थर की स्लैब टूट कर बिखरती बता रहे थी की इस राक्षस के साथ क्या हुआ होगा. लेकिन अर्जुन तोह जैसे अब वह था हे नहीं.

"ऐ मादरचोद.. हंसना आ रहा था? काडड्डाककक", जिसने सुरक्षा कर्मी के लात मारी थी उसका घुटना झूलता हुआ लटक चूका था अर्जुन के इस भरपूर वॉर से और इसको भी उठा कर बेहोश सुदर्शन छोटी पर फेंकता वह गुर्राया तोह तीनो एक साथ उसकी तरफ लपके.

"साला जिन्दा नई बचना चाहिए.", एक ने इतना हे कहा था के विकास सब नियम भूलता अपने से तगड़े इस आदमी के पाँव जमीन से उखाड़ता नीम के वृक्ष से जा तक्र्य. उस आदमी का सर कठोर तन्ने से लगते हे लहू बहाने लगा. बलबीर अपनी औकात से तगड़े व्यक्ति से पूरे जोश से भिड़ा हुआ था लेकिन तीसरा वाला लगातार चीख रहा था जिसके 4 सामने वाले दांत जमीन पर थे और ब्याह टूट चुकी थी. अर्जुन का रूप और भयानक हो चला था. जिस पर विकास की नजर गई लेकिन वह बलबीर के साथ इस आखिरी वाले को संभाले था.

"बलबीर अर्जुन को रोक.", इतना हे कह पाया के मुँह पर मुक्का लगते हे वह जवाब देने लगा. बलबीर जैसे हे करीब पंहुचा अर्जुन सुदर्शन छोटी की लात पकड़ चूका था, जो अब आँखे खोले अपने जिस्म की हालत समझने में लगा था. सर पर गहरे जखम और जाने कितनी पसलिया टूटी होंगी इस गैंडे की लेकिन अर्जुन उसको कटी लकड़ी की तरह खींचता हुआ उधर जा रहा था जहा प्रीती कड़ी थी

"रुक जा छोटे..", बलबीर की आवाज बीच में हे रह गई जब वह उधर जा गिरा जहा पहले हे विकास से लड़ता वह पहलवान गिरा हुआ था. विकास का हलक सूख रहा था देख देख कर. 100 से ज्यादा लोग दूर खड़े बस दांग थे की हो क्या रहा है इधर.

"तू ज़िंदा नहीं बचेगा छोरे.. आह.. जान प्यारी है तोह .. आआअह्ह्ह्ह.", साडी चेतावनी हलक से चीख के रूप में बहार निकल आई, चीख भी ऐसी की कैयो ने तोह मुँह पर हाथ रख लिए. छोटी की घुटने और पाँव के बीच की हड्डी अर्जुन टॉड कर उसकी गर्दन पकडे झुका हुआ था. जैसे उसको दिखा रहा हो की यमराज का रूप कैसा होता है. 2 सुरक्षाकर्मी सब देखते हुए अपनी जगह खड़े मैं हे मैं प्रसन्न हो रहे थे. उनका साथ जमीन पर बैठा था जिसको एक पानी पीला रहा था.

"ये मेरी आत्मा है और वह मेरी जान. और तूने दोनों को हाथ लगा दिए. क्या सोच रहा था जब ऐसा किआ? हिलना भी मैट तुझे मैं दिखता हु की किसी और की हड्डी कैसे टूट जाती है.", वही तड़पता छोड़ वह विकास का परे धकेल कर इस वाले पहलवान को किसी गए के बछड़े की तरह गर्दन से पकड़ कर छोटी के सामने ले आया. दोनों हाथ का जोर लगाने के बावजूद ये पहलवान उसकी कलाई न हिला सका.

"इन जैसो के दम पर भोंक रहा था. ले देख मेरे लिए ये क्या है.", गर्दन अपने सर से ऊपर उठाते हुए अर्जुन ने इसको भी जांघ से पकड़ कर दोनों बाजू में किसी खली कनस्तर की तरह उठा लिए. जिस्म पर पहनी टीशर्ट छाती और बाजू की अध्भुत्त फुलावट से जगह जगह फट चुकी थी और जमीन पर अध्कता सा पड़ा छोटी खौफ से वह दृश्य देख रहा था जहा उसका हे सबसे तगड़ा चमचा इस मासूम जल्लाद की हथेलियों में जमीन से 8 फ़ीट ऊपर था. और अगले हे पल वह प्रीती के ऊपर से उड़ता हुआ टेनिस कोर्ट से पहले बिछी पट्टी पर जा गिरा. किसी भैंसे की तरह दर्द में रामभता वह अगले हे पल बेहोश हो गया.

"अर्जुन, प्लीज.", प्रीती रोटी हुई उसके सीने से जा लगी, उसको फिर से इस खस्ताहाल सांड की तरफ बढ़ते देख. सुदर्शन छोटी भी सदमे से बेहोश हे होने वाला था लेकिन उसकी जान प्रीती ने उस नदी की तरह बचा ली जो आग के दरिया के सामने आ कड़ी हुई हो. जैसे तैसे रगड़ता वह लहूलुहान हालत में प्रीती के पांव पकड़ने हे लगा था के मंजू ने उसकी कलाई पर अपना पाँव रख दिए.

"मौत बुला रहा है फिर से वही गलती करके. हाथ लगा तोह ये भी दूसरे वाले की तरह लटक जायेगा, कुत्ते.", मंजू की बात समझते हे वह मिटटी में मुँह धनस्ये वही पड़ गया.

"अर्जुन, बहुत हुआ. अब चलो यहाँ से नहीं तोह पुलिस का पन्गा पड़ जायेगा.", मंजू ने उसकी ब्याह पकड़ कर अपने साथ चलने को कहा और इतनी देर से पत्थर की बट बानी विक्य भी उसके सीने से आ लगी.

"प्लीज, स्टॉप थिस एंड मूव. हेरे हुंडरेड्स ऑफ़ पीपल वाचिंग उस."

"किसी ने, मतलब वह कोई भी सूरमा हो या बदमाश, इनकी तरफ आँख भी उठा कर देखा तोह जमीन में ज़िंदा गाड़ दूंगा.", अर्जुन की गर्जना सुनते हे वह जैसे कर्फ्यू लग गया हो. भीड़ tittar-bittar होती गायब. लेकिन पीछे से ये भरी हाथ कंधे पर पड़ते हे बिना देखे अर्जुन ने सामने वाले की गर्दन पकड़ ली.

"तेरा मां हु.", अर्जुन बर्फ सा ठंडा हो गया सामने तेजपाल मां को देख कर. हाथ khud-ba-khud गर्दन के साथ झुक गया.

"डालो इन सब गुंडों को गाडी में. ड्रग्स का धंदा, हत्या का प्रयास और रपे एटेम्पट साबित हुआ है इन पर.", अपने थानेदार की आवाज सुनते हे सुरक्षा कर्मियों की मदद से 8 पुलिसवालो ने ये 5 के 5 फटेहाल 'गंभीर मुजरिम' वन में भर लिए. उठाते हुए भी निकलती चीखे बता रही थी की शरीर साल से पहले ठीक नहीं होने वाले उनके.

"ये है कौन इंस्पेक्टर.?", बोरी पर लिटा कर छोटी को 4 पोलिसवाले ले जा रहे थे और उसकी बात सुनकर वह अपने साहब और अर्जुन के पास पल भर ृक्क गए. जैसे वह भी jaan-na चाहते हो के ये कौन है जिसने जनाब की गर्दन हे पकड़ ली थी और वह ऐसे खड़े रहे जैसे सामने वाला इनसे भी बड़ा हो.

"शंकर, पूछ लेना अपने baap-dada से के कौन है शंकर." तेजपाल की बात सुनकर हे छोटी ने आँखें बंद कर ली. ये नाम जैसे वह ाचे से जानता था.

"तुम थोड़ा ठन्डे रहना सीखो. मैं अगली बार तुम्हारा परिचय ऐसा नहीं देना चाहता.", तेजपाल जी अपने भांजे की फ़िक्र करते हुए उसके गाल पर हाथ रखते हुए कह रहे थे. इधर दोनों का ध्यान विकास पर गया जो पानी की बोतल अर्जुन के शरीर पर उड़ेलता हुआ खून साफ़ कर रहा था. बलबीर 2-3 बोतल लिए खड़ा था साथ हे. अर्जुन ने खुद भी एक बोतल ले कर विकास का चेहरा साफ़ किआ जिस पर 5-6 निशाँ बने हुए थे कुछ ऐसा हे हाल बलबीर का भी था. लेकिन अर्जुन के शरीर पर कोई चोट नहीं थी सिवाए उस पहले से सूजे होंठ के.

"अंकल जी इस जितना ठंडा तोह हमने कोई देखा हे नहीं था लेकिन आज जो देखा वह अभी तक सपने सा लग रहा है.", विकास अर्जुन के मामाजी से बात कर रहा था इधर प्रीती वह बैग ढून्ढ कर ले आई जिसमे अर्जुन के कपडे थे और मंजू आराम से उसका जिस्म साफ़ करती ध्यान दे रही थी की कही उसके चोट तोह नहीं आई.

"पहन लो.", अर्जुन ने वह चीथड़े सी टीशर्ट हटा कर ये पहले वाली पहन ली. शरीर पर इस वक़्त भी ये पूरी कासी हुई थी. तेजपाल की नजर दोनों लड़कीओ पर थी. मंजू अभिवादन कर चुकी थी लेकिन प्रीती को जैसे कुछ पता नहीं था.

"खून की गर्मी इस अकेले में नहीं है. विरासत में मिली है इसको. चलो अब ज्यादा बात नहीं करना इस बारे में घर पे बाकी मैं इनको तोह बहार आने नहीं दूंगा, अगर ये ठीक हो पाए तोह. और बेटी, तुम रोक सकती हो इसको तोह साथ रहा करो इसके. Ek-aadh मर्डर जाता तोह बात सम्भालनि आसान नहीं रहती.", प्रीती और मंजू के सर पर हाथ फेरते हुए वह बोले.

"मां, मरना हे होता तोह मैं इतनी देर नहीं लगता. मेरे दादाजी सजा के पक्ष में है लेकिन ज़िन्दगी लेने के नहीं. सिर्फ हड्डियां हे तोड़ी और ऐसी जगह पर मारा था के शरीर टूटे लेकिन सांस नहीं. हाँ बात आपकी भी ठीक हे है, खुद को काबू करने में 5 मिनट लगाने हे पड़े थे लेकिन उतने में हे उसको मौका मिल गया इन दोनों पर हाथ डालने का.", अपनी बात कहता वह हलकी सी नजरे झुकाये प्रीती और मंजू की तरफ मुँह करके खड़ा हो गया.

"चलो भाई तुम लोग खेलो, कसरत करो हम चलते है. चरण दस, ाचा काम किआ जो समय से फ़ोन लगा दिए. बीटा है मेरा वह.", तेजपाल जी ने अर्जुन को एक बार सीने से लगाने के बाद चलते हुए प्रवेश द्वार के रक्षक को कहा जो उन्हें सलाम कर रहा था.

"चल भाई अब इस हाल में प्रैक्टिस तोह करने से रहे, अर्जुन जूस पिलायेगा हम दोनों को कूटने के बदले.", विकास की बात सुनकर अर्जुन हैरान सा देखने लगा.

"मैंने आप दोनों को मारा? तुम लोग खेलो, कल मिलता हु.", प्रीती की पीठ सहलाता वह विकास से बात करना चाहता था. लेकिन प्रीती अपने साथ मंजू और विक्य को लिए वही कड़ी रही.

"साढ़े 5 हुए है और 20 मिनट बाद तुम मेरे साथ घर चल रहे हो. मतलब चल रहे हो.", प्रीती के तेवर देख अर्जुन हामी भरता स्टैंड की तरफ चल दिए.

"चाबी मेरे पास है तेरी रानी की. ये ले भाई, अब से छोटा तोह कहूंगा नहीं.", बलबीर की बात सुनकर अर्जुन ने मुस्कुराते हुए चाबी पकड़ ली.

"आप बड़े हो तोह बड़े हे रहोगे. और वैसे हे बुलाओगे जैसे हमेशा बुलाते हो. दिल से आप दोनों से माफ़ी मांगता हु. अनजाने में हाथ उठा आप दोनों पर. मुझे ऐसे वक़्त सिर्फ 2 तरह के लोग हे दीखते है. एक जो असहाये, मेरे करीब हो और दूसरा जो गलत हो. और आप मुझे रोक रहे थे.", अर्जुन ने हाथ जोड़ दिए दोनों के सामने.

"अरे बावले भाई. तूने कुछ न किआ हमारे साथ. वह तोह लड़ते वक़्त उस झोटे ने मेरी और बलबीर की रेल बना दी थी. चल अब जूस वाली दूकान पे छोड़ दे हमको नहीं तोह तेरी मैडम के चक्कर में हमारा हाल भी खराब हो जाये.", चाबी उसके हाथ से लेता विकास अर्जुन को गले लगाने के बाद खुद मोटरसाइकिल निकलने लगा. इधर बलबीर ने भी अर्जुन को सीने से लगाने के बाद मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर कब्ज़ा जमा लिए था. तीनो गेट से निकल कर जूस के अड्डे की तरफ निकल लिए.

"ये सच में क्या हो गया यहाँ थोड़ी हे देर में?", विक्य घांस पर बैठी थी हाथ टिकाये और सामने प्रीती मंजू को देख रही थी. गोर चेहरे पर कोई भाव न था. खुल्ले लम्बे बाल अब रबर से बाँध चुकी थी.

"तुमने देखा है अपनी आँखों से जो भी हुआ. वेलकम तो थिस नई वर्ल्ड विक्य.", प्रीती के चेहरे पर इतनी देर बाद हलकी सी मुस्कान थी. मंजू घुटने मौडे बैठे प्रीती के बाल सही करती मुस्कुरा रही थी.

"देखा मैंने और ऐसा पहली बार हे देखा है. तहत बाल्ड मन वास् हूजे एंड स्केरी. तुम आखिरी समय तक सूरे थी की वह कुछ कर नहीं पायेगा. ऐसा हे मंजू को देख कर लगा था के उसको भी डर नहीं था इन गुंडों से. मेरी हालत खराब थी यही सोच कर की इंडिया में आते हे आज किडनैप और रपे होने वाला है मेरा. लोग दूर से तमाशा देख रहे थे लेकिन कोई आया नहीं. बूत वह माली एकदम से तूफान की तरह आया और बस हड्डियां टूटने की आवाजे और कैसे उठा कर फेंक दिए था. ी वास् शॉकेड एंड I'm स्टिल इन शॉक. यू बोथ गर्ल्स अरे डेटिंग थिस गार्डनर? No हे इस नॉट गार्डनर. एक्चुअली तुम दोनों इस एब्नार्मल फाइटर से प्यार करती हो.?", विक्य जैसे चुप नहीं रह प् रही थी.

"मैं प्यार नहीं करती.", मंजू ने धीमी आवाज में कहा.

"Don't फूल में मंजू. वह भी करता है और तुम दोनों भी. हिज आईज कंफेस्सेड एवरीथिंग. एंड प्रीती नाउ यू तेल्ल में हु इस थिस गाए?"

"अर्जुन. जिसको हम दोनों प्यार करती है और मेरी शादी भी इस से हे होने वाली है. बहोत प्यारा है वह और कल जिस घर में हम गए थे वह उसका हे है. विक्य तुम कह रही थी न के मैं उस आदमी से दरी नहीं थी. वह मुझे और तुम्हे उठा भी लेता तब भी मैं उसका सामना करती और अर्जुन जरूर आता चाहे हम कही भी होते. लेकिन ये भी सच है के मुझे ऐसी उम्मीद तोह बिलकुल नहीं थी की वह अकेला इतना कुछ कर देगा. मंजू, तुम होश में थी और तुमने तोह कोई बदलाव देखा होगा.", प्रीती ने बहुत कुछ बता दिए था विक्य को जो सपाट चेहरे पर एक मुस्कान लिए दोनों को देख रही थी.

"मैंने जिसको देखा वह कही से अर्जुन नहीं था. शरीर से भी नहीं और चेहरे से भी. मासूम कैसे जल्लाद दिख रहा था और शरीर सच में जैसे त्रिनेड किलर हो, वह हॉलीवुड फिक्शन जैसा. पर्सनालिटी डिसऑर्डर जैसा लेकिन उसका दिल वही था और तुम्हारा हाथ लगते हे वह ठीक हो रहा था लेकिन तेजपाल मां को बिना देखे जब वह उनकी गर्दन पकडे था उस वक़्त फिर से एक पल में हे उसका चेहरा बदला थोड़ा सा फिर ठीक.", मंजू जैसे सब गौर से याद करती बोल रही थी.

"वह तुम्हारे साथ भी ऐसा था मंजू. ी सॉ तहत. तुमने उसका हाथ पकड़ा हुआ था और वह बस तुम्हे देख रहा था, प्रीती उसके गले लगी हुई थी."

"मंजू चल तू विक्य के साथ चल मैं अर्जुन के साथ आती हु.", प्रीती ने अर्जुन को आते देख कहा.

"ये स्कूटी चला लेती है?", मंजू ने उठते हुए कहा तोह विक्य ने मन कर दिए.

ठीक है तुम इसको लेकर चलो मैं मेरी स्कूटी पे उसके साथ आती हु.", प्रीती की बात पर मंजू और विक्य उठ कर चल दी.

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"तुम खुद को रोकने की कोशिश कर रहे थे? सॉरी हमारी वजह से ये सब हुआ आज.", प्रीती अर्जुन के साथ वही कड़ी थी, खाली सड़क पर जहा अर्जुन ने उसको चूमा था.

"पागल हो तुम. गलती कही से भी तुम्हारी नहीं थी उल्टा मुझे तोह हैरानी हुई की मेरी बिल्ली इतनी दिलेर है.", अर्जुन उसको सीने से लगा कर चेहरे देख रहा था. कितनी मासूम सी थी प्रीती और प्यारी भी.

"तुमने जवाब नहीं दिए.", प्रीती भी उसके सीने से लगी प्यार का एहसास कर रही थी.

"हाँ. एक बार मैं उस जानवर को रोक रहा था जो अंदर जाग चूका था. मैं उनका सामना होश में करना चाहता था लेकिन शायद नहीं कर पता. और फिर बस उसका हाथ मंजू और तुम्हे लगते हे जैसे अंदर से जंजीर टूट गई थी कोई. पता नहीं है के ये क्या हो जाता है मुझे कभी कभी.", अर्जुन गहरी सांस लेने के बाद खुद को दुरुस्त करने के लिए प्रीती के होंठो को चूमने लगा. जैसे वह अभी भी अशांत था कुछ और धीरे धीरे वह बिलकुल ठंडा हो गया. शरीर का वह नया कसाव ढीला पड़ गया जब प्रीती भी वैसे हे प्यार से उसको चूमने लगी.

"पहले भी तुम्हारे साथ ऐसा हुआ है न?", वह चेहरा अलग करती उसके दिल पर हाथ फिरने लगी.

"कुछ समय पहले हुआ था जब किसी ने रेणुका पर हाथ डालने की कोशिश की थी. लेकिन तब भी मैं ये अंदर की जंजीर से उस जानवर को रोके हुआ था.", अर्जुन कुछ छुपाना नहीं चाहता था प्रीती से और इस पल में रेणुका बुआ को वह सीधा नाम से हे बुला रहा था.

"तभी तुम्हे चोट आ गई थी. लेकिन आगे से बस इतना ध्यान रखना के जितना हो सके रोकने की कोशिश करना. तुम्हे कुछ हो गया तोह मैं ज़िंदा नहीं रह पाऊँगी.", प्रीती की आँखों से वह गीले मोती बाहर निकल आये.

"ऐ.. श.. तुम मेरी आत्मा हो प्रीती और वह 5 की जगह 50 भी होते तोह तुम्हारा ये रूद्र वही करता. इस जिस्म पर हाथ लगाने वाले हर उस व्यक्ति का वही हाल होगा. ये मेरा जानवर नहीं है, तुम्हारा है.", उसके आंसू पोंछता हुआ अर्जुन सच में जैसे प्रीती के लिए बिलकुल अलग हे इंसान लग रहा था.

"उम्माह.. चलो अब यहाँ से फिर तुम्हारी रेणुका परेशां हो रही होगी. आजकल वह मेरे हे साथ रहती है.", प्रीती ने खुद को ठीक करते हे अर्जुन को चूमा और स्कूटी स्टार्ट करके अर्जुन के साथ घर की तरफ चल दी. रूद्र के बारे में कोई बात किये बगैर.

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शाम के 7 बजे इस बड़ी हवेली के खुले भाग में ये 70 वर्ष की तगड़ी सी बुजुर्ग बड़े पलंग पर बैठी गरज रही थी. हवेली पुराणी थी लेकिन साफ़ और मजबूत. 4-5 शिकारी कुत्ते खुल्ले घूम रहे थे और 2 महिलाये बड़े चूल्हे पर खाना पका रही थी. एक आदमी आँगन में छिड़काव कर रहा था लेकिन अपनी मालकिन की आवाज सुनकर उधर देखने लगा जहा 2 आदमी सर झुकाये खड़े थे.

"शंकर के बाप रामेश्वर ने यही मेरे सामने हाथ जोड़ कर संधि की थी. और हमने भी जुबान निभाते हुए कभी बदला लेने की नहीं सोची. इतने साल बाद शंकर ने फिर से अपना रंग दिखा दिए. बुलवाओ अपने mantri-aadmi, इस शंकर को मिटटी में मिलाने का वक़्त आ गया.", ऐसी आवाज शायद सालो बाद गूंजी थी जो सबके हाथ काम करते हुए रुक गए.

"दादी, ये वह शंकर नहीं है.", ये लम्बा चौड़ा 35 साल का आदमी उनके पाँव के सामने जमीन पर बैठ गया.

"सुदर्शन पर किसी और ने हाथ उठाया है? और ये दूसरा शंकर कौन आ गया जो सुदर्शन से भी तगड़ा निकला.? जिस शंकर को मैं जानती हु अब तोह उसकी भी हड्डियां इतनी मजबूत नहीं रही होंगी जो मेरे पहाड़ से लड़के का सामना कर सके लेकिन फिर भी वह मुकाबला कर सकता है. और रामेश्वर भाई ऐसी गलती होने भी नहीं देंगे, इतने साल बाद", एकदम हे चेहरे पर गुस्से की जगह गंभीरता ने ले ली. वह सर का कपडा एक तरफ करती बुदबुदाने लगी थी कुछ.

"दादी मुकाबला हुआ हे नहीं, जैसा पता चला है. वह लड़का अकेला था और सुदर्शन के साथ हे बाकी चारों को इमरजेंसी में पंहुचा दिए. डॉक्टर ने कहा है के 2 से 3 महीने सिर्फ इलाज में लगेंगे और हड्डियां जुड़ने में. मामला कही से भी पुराणी रंजिश का नहीं है. भूषण ने सबकुछ खुद देखा था और वह सीधा इधर चला आया. बुलाऊ?", इस दादी के आँखें खौफ से बड़ी हो गई थी ये सुनकर की एक अकेला लड़का और राक्षस से 5 लोग, फिर भी मुकाबला उल्टा. हामी भर्ती वह बड़े दरवाजे की तरफ देखने लगी जहा इस आदमी ने इशारा किआ तोह बीच के छोटे दरवाजे से ये कबड्डी वाला 24-25 का तगड़ा नौजवान उनकी तरफ चल आया.

"मुन्नी, चोर्रो को दूध घायल दे.", उन्होंने चूल्हे के पास बैठी महिला को आवाज दी और ये युवक भी उनके सामने हाथ जोड़े उकडू बैठ गया.

"हाँ बीटा भूषण बता. लेकिन बात पूरी और साफ़ बताइओ. Her-fer मैं दूध में पकड़ लेती हु तोह जुबान और भी आसान है.", आवाज में खास रौब और अनुशाशन था जो ये लड़का भांप गया था.

"दादी, छोटी भाई ने आज एक अंग्रेज लड़की को देख लिए था स्टेडियम में और वह उसको उठा के ले जाने वाले थे. फिर दूसरी लड़की बीच में आई और भाई को रोकने लगी. 2 लड़के भी आये थे लेकिन दूर से हे वह भाई को मन रहे थे की वह उनके साथ कुछ न करे. स्टेडियम में भाई से तगड़ा तोह कोई है हे नहीं और सारे डरते है. कोच और प्रशाशन भी."

"बीटा आगे बता.", लड़की लफ्ज़ सुनते हे दादी के माथे पर बल पड़ गए थे.

"फिर इस लड़की की कलाई पकड़ी हे थी छोटी भाई ने के पूरा माहौल बदल गया. जिस हाथ से उन्होंने लड़की के हाथ लगाया था वह पूरा कंडम करके उस लड़के ने भाई को हवा में उठा के सड़क पे दे मारा. और बाकी सबके भी हाथ पाँव और बाकी पसलिया टॉड के रख दी. 5-6 मिनट से ज्यादा न चली थी लड़ाई. नाम तोह पोलिसवाले के मुँह से सुना था के ये शंकर है. ार लगते हाथ उसने पूरे स्टडियम में रुक्का मार दिए था के उस लड़की की तरफ किसे ने देखा तोह वही हाल करेगा जो भाई और दोस्त का किआ. पास जाने की हिम्मत तोह मेरी भी नहीं पड़ी, जमा बावला और राक्षश. नाम भी बहार निकलते वक़्त सुनाई पड़ गया."

"बीटा गलती तोह हमारे लड़के की है जो वह ऐसे किसी की भी beti-bahu उठाने लग रहा. आज कर रहा था तोह मतलब पहले भी करता रहा होगा.", उनकी बात सुनकर पहले वाला आदमी नजरे झुकाये जमीन देखने लगा.

"बल्ली, तू बहोत कुछ छुपावे है मेरे से. हड्डी में असला उतार दूंगी, बुद्धि हुई हु मरी कोणी. बीटा तू बैठ और ेब इसकी भी सुन्न लेवा थोड़ी.", बाल पकड़ कर चेहरा ऊपर कर दिए था उस बूढी मजबूत ब्याह ने इस आदमी का.

"दादी छोड़ दे बताता हु. छोटी मंत्रियो के लिए तोह काम करता हे है लेकिन कतल, नशा और बलात्कार में भी शामिल है. साबित नहीं होये आज से पहले कभी. मेरी हिम्मत नई पड़ी पहले बताने की क्योंकि वह मार देता."

"बेटीचोद तू और ऐसा वह कमीं. बुढ़ापे में भी उसके लिए करती मर्डर गई के वह राजनीति में कुछ कर लेगा तोह अपने dada-nana की तरह फिर से रुतबा बनाएगा, नाम करेगा वंश का लेकिन आज सुन्न रही हु के कपूत घर को अँधेरे में रखे ये गुल खिला रहा है. Ladaai-jhagde से न रोकती मैं लेकिन ये नशा और किसी की behan-beti पर हाथ डालने वाले की परछाई घर में बर्दाश्त नहीं. दूर हो जा मेरी नजरो के सामने से, हरामी कुत्ता.", बल्ली के लात मरती वह गुस्से से जबड़े भींचे गुर्राई. और वह कपडे झाड़ता बिना कहे बहार की तरफ चल दिए.

"हाँ बीटा तोह वह अकेला था और सबकी हड्डियां टॉड दी. और तू ये भी कह रहा के सुदर्शन जैसे सांड को हवा में उठा के उछाल दिए?", अब उन्होंने इसकी तरफ ध्यान दिए जो थोड़ा डरे बैठा था. दूध का गिलास अपने हाथ से उसको पकड़ती वह सर पे हाथ रखती बोली.

"जी दादी. वह उम्र में कोई ज्यादा न लगता हद्द 20 का लेकिन मेरे से 2-3 इंच ऊपर और शरीर भी साफ़ तगड़ा. इतना जोर तोह हम में से किसी ने न देखा पहले कभी. दादी खुद हे सोचो के भाई कितना बड़ा है और इस छोरे ने किसी खली पिप्पी की तरह उठा के उछाल दिए. सब हुआ लड़की की खातिर और 3 में से उस विदेशी को छोड़ के ये 2 छोरियां भी छोटी भाई के सामने निडर कड़ी थी, जिस तरह उन दोनों को पता था के उनका कोई कुछ कर नहीं सकता.", दादी बड़े ध्यान से हर बात सुन्न रही थी. और ये लड़का बात भी गहराई से याद करते हुए कहने लगा.

"दादी, हाँ वह विकास पहलवान है न वह भी इन लड़कियों को बचने आया था और भाई के सामने हाथ जोड़े थे उसने की वह ये सब न करे."

"पुनिअ वाला विकास? मेरे पीहर वाला?"

"हाँ दादी आपकी हे फोटू आई थी न उसके साथ जब उसको आपने इनाम दिए था. लेकिन भाई ने उसको भी मारा था."

"बहोत गलत हुआ बीटा. वह भला लड़का है और फिर कही न कही सबसे जुड़ा है. बीटा इस लड़के के बारे में पता कर के कौन है और ghar-pata, परिवार. तू खिलाडी है और साथ हे स्टेडियम में भी है. बस ऐसा न लगे की हमारी नियत में कोई खोट है. कुछ नहीं करना उसके साथ लेकिन बड़ी इत्छा सी हो गई दिल में इस लड़के को देखने की. ", कुछ याद करती सी वह खयालो में खोई हुई बोल रही थी.

"दादी, बुरा न maan-na लेकिन कोई और भी ऐसा राक्षश था क्या कभी? आपकी बातों से लगता है जैसे आप कुछ याद कर रही हो.", उस लड़के ने ये सवाल किआ तोह सख्त चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गई दादी के.

"बीटा जैसा तूने इसके बारे में बताया है ये कही ज्यादा हे लगता है उन से जिनको मैं जानती हु लेकिन थे वह भी दिलेर और सूरमा. बेशक वह अपनों के दुश्मन हे थे लेकिन चंद्रो ने काबिल की हमेशा तारीफ हे की है."

"दादी, मतलब वह एक से ज्यादा थे?"

"2 थे लेकिन एक जैसे. और भगवन से हमेशा मैं वैसे हे बचे चाहती रही लेकिन तेरे tau-chacha बचे नहीं और पौतो के नाम पर एक ये सुदर्शन और दूसरा रविंदर. एक हाथ से निकल गया दूसरा 25 का होने पर भी 5 का है. एक और भी है लेकिन उसकी माँ बदले की आग में उसको अपने साथ ले गई. अब तोह बस मेरी दोनों बच्चियां ब्याह के चली जाये अपने घर फिर मैं भी उपरवाले की शरण में सुकून से चली जाऊ.", उनकी छोटी बहु खाना उस पलंग पर रखती हुई उनको ध्यान करने लगी की अब खाने के बाद आराम का वक़्त हो चला है. भूषण भी आशीर्वाद लेने के बाद हौदी पर गिलास रख कर बहार चला गया.

"मुन्नी, ऋचा कब आ रही है वापिस? तू भी बैठ जा यही.", लकड़ी का स्टूल सामने करती उनकी बहु ने वह थाली सामने राखी और फिर बताने लगी.

"जी कल सवेरे पहुंच जाएगी. शाम को फ़ोन आया था लेकिन आप उस वक़्त सरपंच से बात कर रही थी बहार."

"हम्म्म.. बिटिया आ रही है और हवेली में कुछ तैयारी हे नहीं की गई. 12 साल दूर रखना कितना मुश्किल था सबके लिए लेकिन ाची बात है घर में खुशियां लौटने लगी है. और मुआ सरपंच कोई काम ढंग से नहीं करता, बिजली के तार जगह जगह लटके हुए थे अब उसका कान मरोड़ा तोह अँधेरे में भी खुद बैटरी पकडे ठीक करवा रहा है.", उनकी बहु ज्यादा कुछ न बोलती अपनी थाली लेने चली गई.

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"अंशु, तुम कोई हमेशा के लिए नहीं जा रही हो. और ाचा है न के अपने परिवार में इतने सालो बाद सबसे मिलोगी, शादी का माहौल कोई bar-bar मिलता है.", अर्जुन बिस्टेर पर तक लगाए लेता था और उसके ऊपर आकांक्षा चिपकी हुई थी. छोटी सी निक्कर और बनियान में वह हमेशा वाली प्यारी गुड़िया से अर्जुन को सब बता रही थी जो खुद उसके नरम कूल्हे सलहलाता हुए दूसरे हाथ से चेहरे के सामने वाले बाल ठीक करता हर बात का जवाब दे रहा था.

"आजकल पता नहीं लेकिन मुझे हर रात तुम्हारी याद आती रहती है. और अब 7 दिन तुम्हे बिना देखे कैसे रहूंगी यही सोच कर हाल बुरा होने लगता है. वैसे न मुझे ऐसे तुम्हारे ऊपर लेटना सबसे ज्यादा पसंद है.", बिल्लोरी आँखों से अर्जुन को निहारती वह उसका हाथ खुद अपने इधर वाले उभार पर रखती अर्जुन की जांघ पर निक्कर का सामने वाला हिस्सा दबाने लगी.

"ोये शरारती कही की. ऐसे वक़्त में भी तुम्हारा ध्यान इधर हे लगा है.?", अर्जुन उसके पिछवाड़े पर हलकी चपत लगते हुए मुस्कुराने लगा.

"एक बार ाचे से करते है न. मेरा बड़ा दिल और फिर हक़ भी बनता है क्योंकि कल दोपहर में वैसे भी करना था हमने और अब मैं हफ्ते भर यहाँ होने नहीं वाली.", अर्जुन के गले पर होंठ लगाती वह जिद्द कर रही थी जैसे.

"घंटे तक तुम्हारे पेरेंट्स ने आ जाना है और इतने समय में तुम खुद को संभल नहीं सकती. ऊपर से कर सकता हु.", अर्जुन ने भी बनियान के अंदर आजाद उसका सख्त अनार हलके से पकड़ कर दबाते हुए कहा. आकांक्षा नाराजगी से उसको देखने लगी, मुँह फुलाए.

"भाड़ में जाओ. नहीं करना कुछ भी मैंने.", उसके सीने से अलग होती वह बिस्टेर के दूसरी तरफ लेट गई. अर्जुन उसको ऐसे नाराज हो कर बिस्टेर में मुँह दबाये देख कर मुस्कुराता हुआ उन उभरे हुए नरम कूल्हों को दोनों हाथ से दबाता उसके ऊपर आ लेता.

"ते तोह सच में नाराज हो गई. कैसे मनौ इस प्यारी गुड़िया को?", वह आकांक्षा के बाल एक तरफ करता उसकी गर्दन चूमने के साथ हे एक नरम उभर दबाने लगा. नीचे दबी आकांक्षा खिलखिलाने लगी अर्जुन द्वारा की गई गुड़गुड़ाहट से.

"गंदे लड़के, मासूम भोली भली लड़की को ऐसे सतना बुरी बात है. कपडे उतार कर करो न, ज्यादा ाचा लगता है.", अर्जुन हँसता हुआ एक तरफ लुढ़क गया और आकांक्षा पलभर में हे दोनों कपडे निकल कर उसको इशारे से अपने ऊपर बुलाने लगी. अर्जुन भी 1 मिनट में आकांक्षा जैसी हालत में निर्वस्त्र उसको दबोचे ऊपर लेता था.

"तुम सच में ज्यादा हे चालाक हो. हर बात कैसे मनवा लेती हो न.", दोनों सख्त उभार दबाता वह पूरे चेहरे पर छोटे छोटे चुम्बन कर रहा था. आकांक्षा अपनी सुडोल टाँगे अर्जुन की कमर से लपेटे वह छोटी सी फूली हुई छूट अर्जुन के बड़े लुंड के मूल पर प्यार से रागादि हुई खुद भी उसके gaal-honth चूमती सिसक रही थी.

"लेकिन तुम जानबूझ कर सताते हो मुझे. जब मैं पहले हे ये ले चुकी हु तोह अब कुछ अलग तोह नहीं होने वाला.?"

"अंशु, पहले हमारे पास हमेशा समय रहता था और कितनी देर तक तुम्हे दर्द रहता था वह याद है.?", अर्जुन के स्वर में चिंता और भरपूर प्यार था उसके लिए.

"थोड़ा थोड़ा करते है न प्लीज.", उसकी ऐसी बात सुनकर अर्जुन हंस दिए और दोनों आपस में लिपटे एक दूसरे के होंठो का रास पीने लगे. ये मधुर पल अपनी धीमी गति से आगे बढ़ता गया जब तक दोनों शरीर आपस में मिल न गए.

डेढ़ घंटे बाद इस 'ट्रिंग' की आवाज से अर्जुन की आँख खुली तोह अपने ऊपर आराम से सोई आकांक्षा को एक तरफ ध्यान से लिटाता वह उठ खड़ा हुआ. दोनों के शरीर पर इस वक़्त पूरे कपडे थे. आकांक्षा गहरी नींद में ये सफ़ेद फ्रॉक पहने किसी बची की तरह सोई थी. अर्जुन ने दबे पाँव बहार निकल कर दरवाजा खोला तोह सामने विनय तनेजा और सुषमा तनेजा हाथो में बैग लिए खड़े थे, खरीदी के.

"अंशु सो चुकी है अपने कमरे में.", अर्जुन ने उन्हें अंदर आने का रास्ता दिए और उनके साथ वह भी ड्राइंग हॉल में आ गया. ऐसे सीधा चले जाना उसको ठीक नहीं लगा ता.

"थैंक यू सो मच बीटा. एक तुम हे हो जिसके साथ वह हंसती बोलती है. और बहार जाना उसको पसंद नहीं है तोह इस बहाने तुम्हारे साथ टाइम स्पेंड कर लिए.", सुषमा तनेजा ने सारा सामान अपने पतिदेव को रखने को दिए और खुद सोफे पर बैठ गई. अर्जुन फ्रिज से पानी और 2 गिलास उनके सामने रखने के बाद वही बैठ कर पानी भर के गिलास उन्हें देने लगा.

"वह अभी भी एक छोटी बची हे है आंटी. आपको नहीं लगता के एक छोटी फॅमिली में रहने के नुक्सान ज्यादा है? अंशु अंदर से अकेली है आंटी.", उसकी इतनी गहरी बात सुनकर सुषमा अपने पति को देखने लगी जो खुद भी अर्जुन की बात सुनकर गंभीरता से विचार कर रहा था.

"सही कह रहे हो बीटा. हम दोनों हे कसूरवार है इसके लिए. तुम्हारे अंकल के साथ मैं हे अलग रहने आ गई परिवार से और अंशु को प्यार की जगह बस suvidha-samaan देने में लगे रहे."

"इस बार मैं अपने परिवार को साथ हे ले आऊंगा. वैसे भी ऊपर का हिस्सा इतना हे बड़ा है और खली. माँ और मेरी बहिन वैसे भी अकेली हे हो जाएँगी, मीनू की शादी के बाद. आकांक्षा को भी सेजल का साथ मिल जायेगा.", विनय आराम से अपने दिल की बात कह रहा था.

"आंटी आप भी समय रहते अपनी बेटी की सहेली बन सकती है. अगर पैसा ज्यादा जरुरी न हो आपके लिए. मेरा अधिकार नहीं है ऐसी बात कहने का लेकिन आपकी बेटी की हालत पर ध्यान दीजियेगा.", अर्जुन की आवाज सार्ड सूई सी सुषमा के दिल पर लगी. इज्जत के साथ वस्त्र उतार दिए थे एक लड़के ने उनके. सुषमा के खूबसूरत चेहरे पर दर्द उभर आया था और आँखे सजल.

"आप कब आये? और तुम अभी यही हो?", अपनी प्यारी सी गुड़िया को देखते हे सुषमा जी ने कास के अपने सीने से लगा लिए. अर्जुन विनय को एक मुस्कान देता हुआ हाथ हिला कर बहार निकल चला, अँधेरे में अपने घर.

"अबसे मेरी बेटी हमेशा मेरे पास रहेगी. पैसा बहोत है लेकिन मेरी जान तुम हे हो बीटा. कोई ऑफिस नहीं अब, बस तुम्ही मेरा सबकुछ हो. कुछ गलत नहीं कहा तुमने अर्जुन.", वो रोटी हुई अपनी बेटी से लिपटी थी और अर्जुन का नाम ले रही थी.

"ाची बात है सुषमा और अबसे मैं भी shaniwar-eitwaar बहार खराब नहीं करूँगा. जैसे सोलंकी अब घर समय बिताने लगा है. और अर्जुन जा चूका है.", विनय की बात पर सुषमा ने देखा तोह सचमुच वह बस वह 3 लोग हे थे. आकांक्षा ने आंसू पूछे अपनी माँ के तोह उन्होंने भी बड़े प्यार से माथा चूम लिए.

"तुम्हारा दोस्त बहुत ाचा है बीटा. बहोत परवाह करता है तुम्हारी और maa-baap से ज्यादा तुम्हे वह जानता है. उसको बोलना के आगे से इस घर में वह तुमसे बाद में मिलेगा पहले मुझसे.", आकांक्षा अपनी माँ की बात पर खुश होती उनसे लिपट कर सोफे पे बैठ गई.

"वह सोलंकी अंकल से याद आया के अर्जुन को पूर्वी दीदी ने भाई बनाया हुआ है और आंटी ने बीटा. दीदी कह रही थी की अर्जुन ने उनकी खोई खुशिया लौटा दी और अब वह वीक में एक दिन आंटी और दीदी के साथ खाना खता है. अंकल भी आंटी को रोज शाम को बहार घूमने लगे है.", आकांक्षा आखिरी बात बढ़ी चंचलता से बोली.

"पागल लड़की. अगर ये सब अर्जुन ने किआ है तोह सच में ये लड़का ख़ास है. किआ हे होगा, जैसे मुझे मेरे सामने हे आइना दिखा कर चला गया वह. अब रात को सफर नहीं करेंगे, आराम से सुबह चलेंगे जी.", सुषमा जी अपनी लाड़ली को लिए आज उसके हे कमरे में चल दी, सहेली भी ban-na था अपनी बेटी का उन्हें.

"डाटा तेरा शुक्र है.", तनेजा इतना कहता खुद भी कपडे बदलने चल दिए.

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आज रात कई लोगो की आँखों से कोसो दूर थी और उनमे से हे एक थी अन्नू वालिए. बिस्टेर पर लेती अन्नू का चेहरा कुछ ज्यादा हे चमक रहा था और रह रह कर वह मुस्कुरा उठती. आँखें बंद करते हे बस अर्जुन दिखने लगता और फिर शर्म से आँखें खोल लेती. बंद कमरे में एक चलाये वह इस चादर के अंदर अल्फ नंगी लेती थी इस वक़्त. बार बार सब याद आ रहा था जो भी आज दिन में हुआ था उन दोनों के बीच.

"तुम्हारा शरीर सच में किसी अनुपम रचना सा है अन्नू. हाथ लगता हु तोह यही डर लगता है के कही से मैला न हो जाये.", अर्जुन पूरे जिस्म की मालिश करने के बाद ध्यान से हर भाग निहार रहा था. चुके ज्यादा हे मॉटे लग रहे थे और उनपर उभरे निप्पल सुर्ख लाल. अन्नू की तड़प को देख कर वह पंजे के भर चलता उसके सीने तक आ पंहुचा. बाये सतांन का ऊपरी हिस्सा मुट्ठी से पकड़ कर मुँह पर लगते हे अन्नू मजे से सिसक उठी थी.

"ाःह.. कबसे तैयार हु मैं ummm..Tumhi देर लगा रहे हो. आज भर दो प्यार से इस जिस्म को.", ऊपर झुकने से वह मोटा गुलाबी हिस्सा अन्नू की छूट पर लगातार टकरा रहा था. अन्नू ने भी लुंड की गर्दन अपने छेड़ पर खुद भिड़ा दी. कितना मजेदार स्पर्श था उस मॉटे गरम सुपडे का. गोरी छूट के भीतर का लाल हिस्सा उसको चूमता हुआ फड़क रहा था. क्रीम और चुतरस का मिश्रण सुपडे को खूब चिकना करने लगा जब अन्नू ने मस्ती में उसको फांको के बीच घिसना शुरू किआ.

"पता है मुझे तुम तैयार हो. अब तुम्हारी इत्छा पूरी करता हु. थोड़ा दर्द होगा लेकिन हिम्मत रखना.", अर्जुन को भी आभास था के ये गदराया शरीर उसको झेल लेगा. अन्नू के जिस्म में मांस और लचक खास हिस्सों पर भरपूर थी. दोनों मोटी गोल जाँघे थोड़ी फैलते हुए अर्जुन ने आखिरी बार इस अक्षत छूट को निहारा जो अकल्पनीय थी लेकिन मोटी फांके बता रही थी की उनके बीच का सुराख़ फैलने के बाद अर्जुन को जो आनंद देगा वह शायद उसको किसी और से न मिला हो. फैंको को ऊँगली से फैलते हुए अर्जुन ने दहकता सूपड़ा वह लगाया और पूरी छूट उसके पीछे छिप से गई. दोनों को ये पल उत्तेजना से अधिक आ गए ले गया.

"उम् ..माहहह.", चररर से अन्नू की छूट की सभी परत फाड़ता हुआ लुंड पहली बार किसी कुंवारी छूट में 4 इंच तक जा बैठा था एक धक्के में. झिल्ली पतली थी लेकिन छूट ने जहा कभी ऊँगली तक नहीं ली थी आज वह मूसल घुस गया था. चीख होंठो में हे घुट्ट कर रह गई थी अर्जुन ने जैसे धक्का लगते हे उन्हें अपने मुँह में दबा लिए था. शरीर जोर से अकड़ गया था इस बेइंतेहा दर्द से और फिर एकदम ठंडा.

साफ़ चादर पर खून गिरता हुआ उतने हिस्से को लाल करने लगा था और अक्षत कुंवारी छूट ऊँगली की लम्बाई से ज्यादा फैली हुई उस मॉटे बांस जैसे लुंड से बुरी तरह चिपकी हुई थी. अर्जुन अन्नू की हालत देख शांत रहकर दोनों नरम गुब्बारों को दबाते हुए निप्पल चुटकी से मसलने लगा. शरीर को गर्मी देना जरुरी था इस वक़्त. गाल चूमते हुए उसने ड़याँ से उसकी बंद आखों को देखा तोह किनारे से आंसू बिस्टेर पर गिर रहे थे.

"हे.. बस हो गया अन्नू. थोड़ी देर हिम्मत से काम लो बस.", अर्जुन ने दया हाथ चुचो से हटा कर चेहरे पर रखते हुए गाल थपथपये और आंसू साफ़ करने लगा. 2-3 मिनट बाद अन्नू ने अपनी भीगी पलके खोलते हुए अर्जुन को देखा जो खुद उसके दर्द में परशान अन्नू के लिए चिंतित था.

"मममम.. कुछ नहीं हुआ. आह.. ये दर्द अगर तुमसे मिलान की सजा है तोह हर रोज मैं ये सहने को तैयार हु.", गीले होंठो से अर्जुन को चूमती हुई वह खुद को संभल चुकी थी. अर्जुन भी वैसे हे चूम कर जवाब देता हुआ उसके सीने से अपनी छाती दबाये अन्नू की कमर सहलाने लगा.

"सच कहु तोह मैं डर गया था. मैंने पहले भी सेक्स किआ है और मेरा ये पहली हे बार में इतना अंदर कभी नहीं गया. मुझे लगा जैसे आज बहुत बड़ी गलती हो गई.", अर्जुन के इतना बोलने पर अन्नू ने ना में गर्दन हिलाई और उसका हाथ फिर से अपने बड़े उभर पर टिका दिए.

"प्यार से या जोर से. जैसे मर्जी करो.. बस अब रुकना मत.", अन्नू की बात पर अर्जुन मुस्कुरा दिए. वह अंदर से हैरान था उसकी हिम्मत देख कर. हल्का सा लुंड बहार निकलते हे अन्नू ने होंठ भींच लिए लेकिन अपनी जाँघे सख्त नहीं की. 2 इंच लुंड से वह इस मांसल छूट का मर्दन बड़े हे प्यार से करने लगा. सचमुच अन्नू की छूट विलक्षण हे थी पूरे शरीर की तरह. यहाँ अंदर की दीवारे अर्जुन का पूरा साथ दे रही थी और अर्जुन को भी लग रहा था जैसे वह एक तंग सुरंग में लुंड घुसा रहा है लेकिन ये अंदर से किसी गेली की तरह आरामदायक थी.

"आठ.. सच में तुम ख़ास हो अन्नू.. हँ.. ", अर्जुन ने थोड़ी जाँघे ऊपर उठाई तोह अन्नू ने भी सिसकते हुए बखूबी साथ निभाया. अर्जुन के चौड़े कंधो के किनारे से लगी उसकी नरम गोल पिण्डलिया बता रही थी की शरीर रबर सा है.

"आठ.. ाचा लग रहा है थोड़ा.. फ़क.. पता नहीं कहा रुकेगा ये.. लेकिन ाअम्म्मम्म.. पूरा भर दो.. आह्ह्ह्हह.. बस...", छूट का अन्दरूनी हिस्सा भी वैसा हे गद्देदार और मुलायम था जैसी अन्नू खुद थी. किसी सक्शन पंप की तरह पूरा लुंड छूट ने हे अंदर खींच लिए था जैसे. अन्नू को पहली बार एहसास हुआ था के शरीर के इस हिस्से में कितनी गहराई है. सूपड़ा उस नरम दिवार से चिपक कर रुक चूका था जहा से गर्भ शुरू होता है. बस आधा इंच लुंड बहार था.

"तुम कमाल हो.", अर्जुन पूरी तरह अन्नू पर झुकता हुआ दोनों चुके अब बिना डरे दबा रहा था. उसने अन्नू के रहस्यमयी शरीर को कुछ हद्द तक समझ लिए था जैसे. किसी रबर को खींचने या दबने के बावजूद वह अपने सही आकर में वापिस आ जाता है वैसा हे अन्नू का जिस्म था. जैसे झरने के नीचे बानी गुफा में लगातार पानी रिस्ता है कुछ वैसे हे अन्नू की छूट थी. हर बार कुछ गीलापन ज्यादा हो जाता लुंड की गहरी ठोकर से. लेकिन कही भी अर्जुन ने रफ़्तार नहीं दिखाई थी. उसको यही प्यार से गहरे धक्के लगते हुए अन्नू की गहराई मापने में मजा आ रहा था.

"आठ.. जान.. मुझे कस के पकड़ लो.. उम्म्म..", पसीना दोनों के शरीर पर आ रहा था जैसे वातानुकूलन का कोई प्रभाव हे न हो. अर्जुन नीचे लेती अन्नू को हाथो के घेरे में भरता बेतहाशा चूमने लगा. दोनों को एहसास तक न था के वह सम्भोग कर रहे है या कुछ और. अन्नू का शरीर रह रह कर झटके खता हुआ आज पहली बार सम्भोग से चरम तक पंहुचा था. सबकुछ कितना अलग था इस बार. अपने प्रेमी की बाहों में लिपटी वह ये नीले सफ़ेद से बादलो में उड़ती खुद को बादल हे महसूस कर रही थी. शरीर जैसे था हे नहीं. अर्जुन बिना हिले बस पूरी तरह अन्नू को ये पल जीने दे रहा था. जिसमे अब कोई दर्द, पीड़ा या अलगाव न था. दोनों एकाकार थे और बेफिक्र वक़्त से परे.

"ी लव यू अर्जुन, उमाहहह.", जैसे हे आँखे खुली तोह सामने अर्जुन को मुस्कुराते वह भावुक होती उसके होंठो से लगी. एक बार फिर कश्ती दरिया में कहने लगी और इस बार दोनों हे जोश में थे. बिस्टेर ने chu-chu की आवाज से संकेत दे दिए था के बड़े शरीर और ताक़त से भरे ये दोनों ज्यादा देर तक चले तोह पलंग टिक न पायेगा.

"ी लव यू तू अन्नू. मैंने शायद अपनी धरना की वजह से तुम्हे इतना तड़पाया लेकिन आज मैं भी खुश हु.", अर्जुन अपनी शरीर से उसको चिपकाये हुए हे बिस्टेर से नीचे आ खड़ा हुआ. अब वह और खुलकर अन्नू से संसर्ग करने लगा था. गोरी छूट के बहार जमा रक्त खुद अन्नू के कॉमर्स ने साफ़ कर दिए था. इस बार धक्के जोर से और आवाज के साथ लग रहे थे. बड़े कूल्हे हर तरफ से हिलते हुए अर्जुन से टकराते बता रहे थे के उनमे भी पूरी मस्ती भर चुकी है..

"आह्हः.. डीपर.. अर्जुन.. उम्म्म्म. एस.. और तेज.. आठ.. पिंच माय ब्रेअस्ट्स..", जल्द हे जोश फिर से उफान पर पहुंच गया. दोनों टाँगे हवा में उठाये अर्जुन जड़ तक अंदर जाता और अन्नू की सिसकारियां तेज होने लगती. पूरा शरीर अर्जुन चूम चूका था और अब भी उसके दूध चूसक्ता वह मंजिल के करीब आने लगा.

"उम्म्म.. जलन हो रही है.. यू अरे स्टिल ग्रोइंग inside.",Annu से भी अर्जुन के लुंड में आया तनाव चुप्प न सका. और उसने भी अपनी छूट बुरी तरह लुंड की जड़ पर कस ली.

"छोड़ो.. आठ.. माँ बन्न जाओगी इस गलती से.", अर्जुन ने पूरे जोर से खुद को पीछे खींचा और सफ़ेद रस सीधा अन्नू के चेहरे, गले और छाती पर गिरता हुआ वह हफ्ते हुए अन्नू को देखने लगा. बिस्टेर पर पीठ के बल पसरी वह भी तेज साँसे ले रही थी. बड़े खरबूजे से उसके चुके थिरकते हुए हालत बता रहे थी की कितनी म्हणत की है दोनों ने. अर्जुन भी साथ चिपकता उसको बाहो में ले के लेट गया.

"देखा तुमने. मैं कमजोर नहीं हु. और तुम डरपोक हो. मेरे प्यारे डरपोक.", अपनी चिंकी निर्वस्त्र टांग अर्जुन पर रखती वह एक गहरा चुम्बन करती उसका सीना सहलाने लगी. अर्जुन भी दोनों की धड़कन महसूस करता उसके नरम कूल्हे पंजे से दबाता मुस्कुरा रहा था. खुद का वीर्य अन्नू के शरीर से लिपटने पर उसपे भी लग रहा था.

"चलो आज तुम्हे अपने साथ हे नहलाता हु.", अर्जुन ने शैतानी से कहा तोह अन्नू भी लपक कर उसकी कमर पर आ गई. बाहों में लिए जब वह अंदर बाथरूम में घुसा तोह फिर से अन्नू का शरीर हलके दर्द से सिहर उठा.

"आह्हः.. सारा दिन कौन गॉड में उठा के चलेगा मुझे.", छूट पर हाथ रखती वह जायजा ले रही थी इस पीड़ा के स्त्रोत का. 2 छोटी सी पत्तियां उस हिस्से से चोंच की तरह बहार दिखने लगी थी और गोरी रंगत अब लाल होने के साथ हे दोगुनी फूल चुकी थी.

"इसलिए कह रहा था के बहाना तैयार रखना. अभी गरम हो तोह उठ प् रही हो लेकिन बिस्टेर पर आराम करने के बाद पाँव रखना भी दर्द देगा.", अर्जुन ने अपने से लगते हुए हे वह बड़ा फुहारा चालू कर दिए. ाचे से हर अंग साफ़ करने के साथ हे वह अन्नू को चूम रहा था, सेहला रहा था. लुंड में तनाव फिर से आने लगा तोह उसको कोड पर बिठाता वह अकेले नहाने लगा.

"तुम्हारा शरीर कही ज्यादा बेजोड़ है. हर part जैसे ख़ास तराशा हुआ और कितना बड़ा है.", वह उसको निहारती हुई उस ख़ास अंग को भी देख रही थी जो इस वक़्त भी साधारण से कही बड़ा और मोटा था.

"जो बड़ा है वही तुम्हारे दर्द की वजह है. आराम से बैठो ये मुश्किल से संभल रहा है. नहीं तोह इस बार बहाना काम नहीं करने वाला अगर फिर से कर बैठे.", नहाने के बाद फुहारा बंद करता वह टोलिया उठा कर अन्नू को साफ़ करने लगा लेकिन नजरे चेहरे पर रखे हुए. वह भी शरारत से हंसती उसका ध्यान भटकने की कोशिश कर रही थी.

"फिर से तोह और मजा आएगा. गर्मी बरकरार रहेगी तोह दर्द नहीं होगा. जैसा तुमने कहा था आराम करने के बाद मुश्किल होगा."

"बस बस. तुम यहाँ बैठो थोड़ी देर मैं कमरा ठीक करके आया. और उसको वही छोड़ कर अर्जुन ने खून से सनी चादर बदलने के बाद सब कपडे भी उठाये और बाथरूम में आते हे अन्नू को टॉप और पेजमा अपने हाथो से पहनाया. खुद तैयार हो कर वह उसको वापिस बिस्टेर पर लिटाता अन्नू के बाल सूखने लगा.

"ऐसा दर्द रोज रोज मिलेगा तोह मैं तैयार हु. इतनी सेवा भी मिलेगी.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ उसका कान खींचने लगा.

"सेवा की बची अब ये बताओ के पेनकिलर कहा है?"

"Na-na. कोई दवाई नहीं. औरत ban-ne का सुख मैं दवा से भूलना नहीं चाहती. और मैं ठीक हु अब. चादर कहा राखी तुमने?"

"तुम्हारी अलमारी में. मुझे पता है के तुम अब उसको फेंकने वाली नहीं. अपना ध्यान रखना.", अर्जुन ने चेहरा हाथो में लेते हुए अन्नू के बड़े होंठ प्यार से चूमने के बाद एक बार गले लगा लिए.

"थैंक यू सो मच. उम्माह.", अन्नू ने अलग होने के बाद उसके गाल पर ये पप्पी दी और मुस्कुरा दी. अर्जुन पानी की बोतल उसके सिरहाने रख कर एक तकिया पाँव के नीचे लगाने के बाद चला गया. अपनी माँ को तोह उसने आज पीरियड्स का बहाना करके समझा दिए था और उन्हें भी पता था के अन्नू के पीरियड्स कही ज्यादा दुखदाई रहते है. रात का खाना खुद वह अपनी बेटी को बिस्टेर पर खिला कर गई थी.

पूरा समय शरीर में मस्ती भर्ती रही और अब रात में जैसे छूट बिना कुछ किये हे रोने लगी थी. बाथरूम जाने के वक़्त जो जलन मची थी उसका अलग खुमार था. अन्नू सब याद करने के बाद खुद हे अपना नरम उभर दबती सिसक पड़ी.. "ी लव यू.. और जल्दी से आ जाना अब. ये हफ्ता हर रोज तुम्हारी अन्नू तुम्हारा प्यार पाना चाहती है. गुड नाईट.", तकिया सीने से लगाती वह आँखे बंद करके जैसे सच में हे अर्जुन से लिपटी सोने लगी हो. एक नया बदलाव ले आया था अर्जुन उसके जीवन में और ये बदलाव अन्नू को किसी तपस्या के बाद मिले वरदान की तरह लग रहा था, अनमोल.
 
प्यार 100 बार के कुछ जरुरी पत्र, चरित्र और उनके परिवार का विश्लेषण

छोल साहब के परिवार के मुख्या पत्र

छोल सतीश पूरी

बेटी रेणुका

बहु रोमिला

पौती प्रीती

पौता जोएल

सोमबीर सिंह के परिवार के मुख्या पत्र

दादी चंद्रो देवी (72) (सोमबीर की धर्मपत्नी)

सुशीला सिंह (50) (बहु और बबिता (32)/बिजेन्दर (30) की माँ)

मल्टी उर्फ़ गुड्डी (47) (बहु और सुदर्शन छोटी (30) की माँ)

मधुलता उर्फ़ मुन्नी(45) (बहु और Ravinder(25)/Richa (24) की माँ)

बिंदिया उर्फ़ बिंदु (42) (छोटी बहु और शबनम (25) की माँ)

शीला देवी (सोमबीर सिंह की सौतेली बीवी)

भीम सिंह (बड़ा बीटा)

मेनका सिंह (बेटी)

चारुलता (भीम सिंह की बीवी)

ऋषभ सिंह (छोटा Beta-Gaud लिए)

मंजूबाला उर्फ़ मंजू (छोटी बहु)

राममेहर सिंह का परिवार

सितारा देवी (राममेहर सिंह की बीवी, 70)

भंवरी (51) (बड़ी बहु, सुकन्या (26) की माँ)

सुशीला (50) (बेटी)

बेला देवी (49) (दूसरी बहु)

मोहर सिंह (48) (छोटा बीटा और अक्षरा (24)/अनुपमा (24) का बाप)

कोच जोगिन्दर सिंह संधू (50) का परिवार

निर्मल कौर (48) बीवी

Charul/Parul (24) बेटियां

अन्य प्रमुख किरदार:

निर्मल सिंह (दिग) और पंडित जी के विश्वास पत्र

तेजपाल शर्मा (इंस्पेक्टर) अर्जुन के मां

विकास पुनिअ (पहलवान और अर्जुन का मुँहबोला बड़ा भाई)

बलबीर (अर्जुन का साथी और बड़े भाई जैसा)

डॉ धर्मवीर सांगवान उर्फ़ बड़े सांगवान (शंकर के गुरु और पिता सामान)

डॉ परमवीर सांगवान उर्फ़ छोटे सांगवान (शंकर का जिगरी)

डॉ मेहुल गुलाटी उर्फ़ पंजाबी (शंकर का जिगरी)

डॉ भूपिंदर सिंह उर्फ़ भुप्पी (रहस्य)

मुस्कान (बास्केटबाल खिलाडी और एक शातिर किरदार)

लकी अरोरा (पुलिस अफसर और संजीव का जिगरी)

डिम्पी अरोरा (लकी की बहिन और एक जरुरी किरदार)

सरोज कश्यप (24) (कश्यप जी की छोटी बहु और अर्जुन की पड़ोसन)

मरस वर्मा (अर्जुन की गणित तीसर, 40)

मिस अन्नू वालिए (अर्जुन की फिजिक्स टीचर और प्रेमिका, 24)

विक्य (प्रीती की ममेरी बहिन, ग्रीस की रहने वाली, 23)

साधू सिंह (गाँव के मुखिया और किसान)

बिमला देवी (साधू सिंह की धर्मपत्नी, 45)

महेन्दर उर्फ़ मिन्दर (साधू सिंह की बीटा 23)

काजल (साधू सिंह की बेटी और अर्जुन की गुप्त प्रेमिका, 18)

सविता (काजल की एकमात्र सहेली और अर्जुन पर आसक्त, 18)

विनय तनेजा (अर्जुन के पडोसी)

सुषमा तनेजा (बीवी, 43)

आकांक्षा तनेजा (बेटी, अर्जुन की प्रेमिका और एक प्रमुख चरित्र, 18)

सोलंकी (खास किरदार)

गीता सोलानी (बीवी और अर्जुन को बीटा मानती है, 42)

पूर्वी सोलंकी (बेटी और अर्जुन की राखी बहिन, 19)

धर्मपाल सिंह (अर्जुन के पडोसी और दोस्त के पिता)

ज्योति (बेटी और अर्जुन की सम्भोग गुरु)

संदीप (बीटा, अर्जुन का खास दोस्त, 18)

चंद्रकांत दीक्षित उर्फ़ चंदू (राज्य मंत्री और रामेश्वर जी के मित्र)

बहन सिंह (लोक दाल पार्टी का खास व्यक्ति और कुख्यात राजनितिक अपराधी)

बाकी सभी किरदार जैसे रामेश्वर जी का परिवार कहानी के पहले पृष्ट पर, ननिहाल के सभी पत्र भी ननिहाल वाले पहले पेज पर और बाकी समय के साथ आते रहेंगे. जहा गलती हो जाये किर्प्या बताने में झिझक महसूस मति कीजियेगा.
 
अपडेट 90

गड़े मुर्दे - 1


गहरी रात में हमेशा की तरह पंडित जी के घर सबकुछ शांत था. 11 बजे सब लाइट बंद थी सिर्फ बहार आँगन की हमेशा की तरह जगमग छोटी तुबे के सिवा. ललिता जी नाहा कर अपने कमरे में जा चुकी थी. आज भी शरीर में तड़प कही ज्यादा थी लेकिन मधु अकेले सोने की जगह उनके हे कमरे में आ लेती थी. उधर माधुरी दीदी भी प्रियंका के साथ बातें करने के बाद नींद में जा चुकी थी. अर्जुन कुछ अशांत था और अपनी माँ या कोमल दीदी के साथ सोना उसको ठीक नहीं लगा. रुपाली दीदी पहले हे रेखा जी के साथ सो चुकी थी अर्जुन का इन्तजार करते हुए.

"ऋतू दीदी.", अर्जुन कमरे से निकला तोह तारा और आरती साथ चिपकी हुई सो रही थी, टेलीविज़न चलता छोड़ कर. अर्जुन पलभर दोनों पर निगाह डालने के बाद मुस्कुराता हुआ बहार आ गया.

"कुछ बेचैनी है?", अलका दीदी शायद कपडे बदल कर सोने चली थी जो अँधेरे में अर्जुन को देख कर रुक गई थी.

"नहीं बस वैसे हे नींद नहीं आ रही थी. आप नहीं सोई?"

"चल अंदर आजा पहले.", उन्होंने हाथ पकड़ कर उसको कमरे में कर लिए. ऋतू दीदी एक झीना टॉप पहने कुर्सी पर बैठी लैंप की रौशनी में पढ़ रही थी. आँखों पर बारीक डंडी का चस्मा लगाए.

"लेट जा तू मैं 2 मिनट में आ गई बस.", उन्होंने बिना अर्जुन को देखे कहा और पेन से किताब में कुछ लाइन लगाने लगी. अलका दीदी दूसरे कमरे से 2 तकिये बीएड के सरहाने लगाती एक किनारे लेट गई और अर्जुन को बीच में लिटा लिए.

"अब बता क्या हुआ है जो आज तू चची की जगह अपनी बहनो के पास चला आया?", अलका दीदी की ऐसी बात सुनकर अर्जुन उनके गले लग गया.

"बस आज अकेले रहने का दिल नहीं कर रहा था दीदी. और माँ या कोमल दीदी के पास जाने की हिम्मत नहीं थी.", अर्जुन अपनी बात कह रहा था के पीछे से ऋतू दीदी ने उसको अपने आगोश में भर लिए. कमरे में बस एक कोने में रखा टेबल लैंप जल रहा था, तुबे बुझ चुकी थी.

"ये हम तीनो का हे है. बस वह वाला कोमल दीदी और तेरा.", ऋतू दीदी ने बड़ी मासूमियत से कहा जैसे वह उसको तंग कर रही हो.

"ए तू चुप कर और इसको बोलने दे.", अलका ने झिडकते हुए ऋतू से कहा.

"आज कुछ गलत हो गया है मुझसे.", अर्जुन की बात पर ऋतू दीदी ने उसकी पीठ से खुद को लगते हुए प्यार से गाल सहलाया.

"रक्षा करना गलत कबसे हो गया? मुझे तोह नाज है के तू बहादुर है और अपने प्यार के लिए किसी का भी सामना कर सकता है.",

"सच थोड़ा अलग हे दीदी. मैं जानता हु प्रीती ने आपको बताया होगा के वह क्या हुआ लेकिन उसको भी पूरा नहीं पता.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर ऋतू दीदी ने उसको अपनी तरफ करके सीने से चिपका लिए. जैसे वह आशंकित हो गई हो कुछ समझ कर.

"सच क्या है ारु?", अलका ने भी स्नेह से सर पर हाथ फेरते हुए अर्जुन से पुछा.

"दीदी, मुझे ाचा लगा था वह करके. समझ लो जैसे मैंने कुछ नया पा लिए हो. लेकिन अब मुझे डर लग रहा है खुद से.", अर्जुन बचे की तरह ऋतू के सीने में मुँह दबाये कुछ शांत हो गया.

"जैसे रोने के बाद पीड़ा काम हो जाती है ये भी वैसा हे है बाबू. तुझे वैसा नहीं बन्न न जैसा सब पापा के लिए बताते है. तुझे दादी का शंकर नहीं अपने दादाजी का वो अर्जुन bann-na है जिसके गांडीव के 2 तीर धरती, पातळ और आकाश को एक कर सकते हो. कुछ दीवारे तोड़ने से नुक्सान नहीं होता बल्कि और ज्यादा जगह मिलती है. तेरी क्षमता का किसी को नहीं पता लेकिन दादा जी हमेशा से कहते है के तू गलत नहीं हो सकता. नारायण भी तोह सुरक्षा के लिए शांति का रास्ता त्याग देते थे लेकिन सिर्फ तभी जब कोई रास्ता नहीं बचता था. स्टेडियम में हाथ जोड़ने से वह लोग नहीं रुके तोह जो भी किआ ठीक किआ. और मुझे तुझ पर तेरे से ज्यादा यकीन है. अलका जरा ारु को जरा मजे की दहलीज तक लेके जा फिर मैं बाकी समझा दूंगी.", ऋतू दीदी की साड़ी बात समझने के बाद अर्जुन हैरानी से चेहरा ऊपर करके अपनी दीदी को देखने लगा जो शायद इतनी गहरी बातों के बीच ये अलग सी बात कर गई.

"आजा मुन्ना, ऋतू को यहाँ रहने दे तू मेरे साथ आ. मैं तेरी हालत ज्यादा ाचे से समझती हु.", अलका कड़ी होती हुई अर्जुन को उस कमरे में लिए चल दी जहाँ वह कोमल दीदी के साथ उस ख़ास रात में रहा था. अंदर से चिटकनी लगने की आवाज सुनकर ऋतू दीदी ने डब्बी से रूई निकल कर दोनों कानो में भर ली और आँखें बंद करने से पहले टेबल पर राखी उस घडी को देखा, 11:25.

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तक़रीबन मध्यरात्रि के समय ये कार स्वर्गीय सोमबीर सिंह की हवेली के बहार आ रुकी. अँधेरे में दूर से कुत्तों के भोंकने और कही कही सियार के रोने की आवाज गाँव के वातावरण को थोड़ा अशांत कर रही थी. लेकिन सन्नाटा भरपूर था इस जगह जहा ये गाडी कुछ देर रुकी रही. फिर दरवाजे से उतारकर ये शक्श उस 15 फ़ीट के इस्पात से बने दरवाजे के बहार लगी कड़ी हलके से बजने लगा. शिकारी कुत्तो के भोंकने से हवेली के बहार वाले कमरे से ये महिला चुन्नी से मुँह ढके दरवाजे की तरफ बढ़ चली. कुत्ते एक तरफ हो गए लेकिन फिर भी चौकन्ने थे.

"कौन है?", इस मधुर आवाज के प्रतिउत्तर में बहार से बस एक हे शब्द सुनाई दिए.

"शंकर.", और बिना देरी के छोटा दरवाजा खोलती ये महिला अपना मुँह फेर के कड़ी हो गई.

"ताई जाग रही है लता?", शंकर ने जिस नाम से मुन्नी को पुकारा था वह शायद कोई और नहीं लेता था. और चुन्नी मुँह से हटती वह आगे चलने लगी.

"बैठो मैं पानी लाती हु. माँ जी 9 बजे सो गई थी अब 3 बजे उठेंगी या 4 बजे.", मुन्नी चारपाई पर हाथ रखने लगी तोह शंकर ने खुद हे पकड़ते हुए इस समतल कच्ची जमीन पर बिछा ली. मुन्नी लौटे में पीने का पानी लेकर आ कड़ी हुई.

"कैसे याद आ गई इधर की? माँ से मिलने के लिए तोह तुम सुबह भी आ सकते थे.", शंकर को परेशां देख कर मुन्नी ध्यान से पढ़ने की कोशिश कर रही थी लेकिन बस ज्यादा नहीं देख पाई. कुछ काम रौशनी की वजह से और कुछ अपने दिल की.

"ताई उठ जाये तोह मुझे भी जगा देना. पिछले 3 घंटे से गाडी चला रहा हु और अब थोड़ा आराम करने की इत्छा है.", शंकर ने जूते खोल कर एक तरफ रखे तोह मुन्नी ने जुराबे खुद उतार कर दोनों चीजे अंदर छज्जे के पास रख दी. रबर की चप्पल चारपाई के एक तरफ रखते हुए 2 तकिये और चादर शंकर को पकड़ती वह दरवाजा लगाने चल दी. शंकर इस बार ध्यान से देख रहा था मुन्नी को जाते हुए.

"कुछ चाहिए हो तोह बता देना. मैं पहले हे कमरे में हु.", मुन्नी के जाने के बाद शंकर ने भी आँखें बंद कर ली और अँधेरे कमरे का वह पर्दा भी सही हो गया जहा से कोई इन पर नजर रखे था.

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अलका दरवाजा खोल कर ऋतू के पास आई तोह पूरा शरीर सफ़ेद पानी से नहाया हुआ तीखी गंध छोड़ रहा था. 2:20 का समय बता रही घडी का मतलब था के वह पिछले 3 घंटे से अर्जुन के साथ अंदर बंद थी और अब भी अकेली हे बहार आई थी.

"चल उठ जा डार्लिंग, तेरी बारी है.", अलका के पाँव हलके कांप रहे थे और ऋतू ने ध्यान से देखा तोह उसकी छूट सूज चुकी थी और जांग से भी सफ़ेद पानी बेहटा घुटने की तरफ जा रहा था. गोर चुचो पर जगह जगह निशान बता रहे थे की उनके साथ आज भरपूर युद्ध हुआ है.

"तूने अंदर हे करवा लिए क्या?"

"पागल नहीं हु, पिछली तरफ 2 बार. चल अब संभल उसको मैं नाहा कर सोने लगी हु.", चलते हुए उसके दोनों कूल्हे विपरीत दिशा में थिरकते बहुत कुछ कह गए. ऋतू ने एक हलकी मुस्कान से बाथरूम में घुसती अलका को देखा और फिर उस अँधेरे कमरे में चल दी जहा अर्जुन था.

हलकी रौशनी में बिस्टेर के बीच किसी लाश सा पड़ा वह भारी शरीर पसीने में नहाया था. अर्जुन की सांसें अभी तक उखड़ी हुई बता रही थी की आज वह किस कदर थक चूका है. झीनी कमीज फर्श पर गिरती ऋतू सिर्फ पतली पंतय पहने अपने प्यार की ब्याह पर सर रखती लेट गई.

"दीदी, अब कुछ नहीं कर सकता मैं थोड़ी देर.", अर्जुन छत्त की तरफ देखते हुए बोलै. दीदी का निर्वस्त्र नाजुक जिस्म उसको पता चल गया था लेकिन हालत खराब थी.

"कुछ करने नहीं आई हु मैं यहाँ. बस तेरे खली जिस्म में अपनी जगह देखने आई हु. फिर कितनी बार किआ अलका के साथ?"

"5 बार. लेकिन आखिर में शायद 4 बूँद हे शरीर से बहार निकली और अब उठने की हिम्मत भी नहीं है.", अर्जुन पिछले 24 घंटे में मधु, रेखा, Kaajal,Akanksha और अन्नू के साथ मिलान कर चूका था. मतलब 10 बार और अब उसमे जैसे कुछ भी शेष न था.

"हम्म्म. ाची बात है. आज अलका को बढ़िया नींद आने वाली है. मैं तोह बस सोने से पहले थोड़ी देर तेरे साथ रहना चाहती हु. तेरी बाहों में.", उनकी इतनी सी बात सुनकर अर्जुन अपनी दीदी की तरफ करवट लेता पलट गया.

"आपको इतना बताने की जरुरत नहीं है. अपने प्यार को बाहों में लेकर सोने से बेहतर सुकून कहा मिलेगा.?", अर्जुन के होंठ लरजते हुए ऋतू से चिपक गए. प्यार से बस होंठ चूमते हुए दोनों अलग होते तोह ऋतू दीदी उसके चेहरे पर प्यार देती बालो को सहलाने लगती. अर्जुन उनके आगोश में pur-sukoon से लेता अपनी दीदी अपने प्यार को जी रहा था. लिंग में न कोई संवेदना था न जैसे जान. और दोनों के जिस्म छाती से थोड़ी दुरी पर थे. ऋतू दीदी ने उसका सर अपने सीने पर रखते हुए प्यार से पीठ सहलाते हुए एक निप्पल होंठो के पास कर दिए. जैसे ये अपने आप हे हुआ हो.

अर्जुन आँखे बंद किया उन मुलायम उभारो पर गाल टिकाये कब उस गुलाबी कड़े निप्पल को चूमने लगा, जीभ से सहलाने लगा उसको खुद मालूम न लगा. लेकिन दोनों हे इस समय एक दूसरे को इत्मीनान से सेहला रहे थे. अर्जुन अपने जिस्म के खालीपन में ऋतू दीदी का प्यार भरता महसूस कर रहा था. वह हमेशा से हे ऐसी थी जो अर्जुन के लिए जैसी amrit-dhara की तरह काम करती थी. निर्जीव में जीवन देना. कब दोनों के चेहरे करीब आये अर्जुन को भान न था. अब शांत ठंडा शरीर दीदी के ऊपर लेता बड़े इत्मीनान से उनके मूखरास को पी रहा था.

"आप इतना प्यार कैसे कर सकती है? मैं खुद से रश्क करने लगता हु क्योंकि मैं एक से अधिक के साथ हु लेकिन आप सिर्फ मेरे साथ.", अर्जुन उनके सर के नीचे हाथ रखे वह बड़ी आँखें और ऊर्जा से भरपूर लेकिन शांत खूबसूरत चेहरा निहार रहा था.

"तुझमे मैं तेरे से ज्यादा हु तोह मैं भी हरेक के साथ हे हुई. तेरे जिस्म या दिमाग से ज्यादा दिल समझदार और मजबूत है. और वही है बस जो हम दोनों को एक बनता है. ये मेरा है.", अर्जुन के सीने पर अपना हाथ रखते हुए दीदी ने भी उसकी आँखों में देखते हुए कहा. अर्जुन को ऐसे लगा जैसे उसके दिल की धड़कन उस हाथ से सीने में आ रही हो. वह वैसे हे रुकता हुआ इस भ्रम या जुड़ाव को समझने लगा. उनकी कलाई को पकड़ते हुए अर्जुन ने आँखें बंद कर ली थी.

दिल की dhak-dhak उस कलाई की नब्ज़ की फड़क से रत्ती भर अलग नहीं थी. सामान हरकत और अपने से अधिक ऊर्जा दीदी की हथेली पर अर्जुन महसूस कर चूका था. सर किसी स्वचालित मशीन की तरह ऋतू दीदी के चेहरे पर झुकता चला गया. होंठो को चिपकाये कब ऋतू दीदी उसके भरी शरीर को बिस्टेर पर लिटटी ऊपर आ गई और अर्जुन वैसे हे आँखें बंद किये अपने शरीर पर मरहम लगती महसूस कर रहा था. 5 मिनट बाद हे ऋतू का एक उभार मुट्ठी में भरे वह चूसता हुआ दूसरे को दबा रहा था. दीदी का सर अर्जुन के चेहरे से आगे बिस्टेर पर टिका था और उनकी गीली छूट नाभि पर अपना एहसास कराती हुई अर्जुन की हालत वैसी कर रही थी जैसे कस्तूरी की गंध के पीछे मृग मृगनी की तरफ खिंचा आता है.

ये बस शारीरिक सुख या सम्मोहन न था, ये उन दोनों का एक दूसरे का पूरक होना और अटूट प्रेम था. ऋतू ने बड़े आराम से पंतय को अपनी योनि के सामने से एक तरफ कर दिए था. अब वह गुलाबी हिस्सा बेपर्दा सा अर्जुन के शरीर पर रगड़ता हुआ शरीर के सुप्त अंग को फिर से जगाने लगा. शांत वातावरण में प्यार की डोर से बंधे ये 2 शरीर शनये शनये एकाग्र होने लगे. वही निर्जीव सा लिंग अब सरकता हुआ उन गीली नरम दीवारों से लगने लगा था जो सिर्फ उसके स्पर्श को पहचानती थी.

"आह्हः.. उम्म्म", ऋतू के शरीर की थिरकन पल भर के लिए रुक सी गई थी और वैसे हे अर्जुन उनका चेहरा नीचे किये उनके होंठ चूमने लगा. पल प्रति पल वह अध्भुत लम्बाई youn-kund में पूरी उतर चुकी थी. एक दूसरे को सँभालते हुए वह इस सफर पर पूरी कशिश और समर्पण से निरंतर आगे बढ़ने लगे, समय और दुनिया से परे. Youn-ras अविरल सा बेहटा दोनों के अंगो को सरोबार किये थे.

"दीदी.", अर्जुन ने कस कर ऋतू को बाहों में भर लिए. वह असीम गति से निकलता मिलान रास दोनों के जिस्म में नयी उमंग और ऊर्जा भरता हुआ उनके अटूट प्रेम का साक्षी था. कितनी हे देर तक दोनों ऐसे लिपटे रहे.

"ये हमारा प्यार है अर्जुन. जो हमेशा रहेगा और हर बार पहले से मजबूत. ये सुख है, मिलान है और आनंद. वह नहीं था जिस से तुझे मजा आया. वह बस एक नयी ऊर्जा थी लेकिन अकेली ऊर्जा. अलका ने खली कर दिए था तुझे वैसे हे तेरा वह स्वरुप भी खली हो जायेगा जब सारा गुस्सा और दर्द ख़तम हो जायेगा. लेकिन प्रेम ख़तम नहीं होता, वह जीवन देता है. ये प्रेम से बना और पैदा हुआ.", अपनी योनि से निकले उस गाढ़े वीर्य को चारो उँगलियों से निकल कर अर्जुन को दिखती वह कड़ी हो गई. अर्जुन को सत्य दिखती.

"रूद्र तेरा हिस्सा है. तुम रूद्र नहीं हो. चाहो तोह कितने हे रूद्र पैदा कर सकते हो लेकिन मैं चाहती हु उसके साथ हे तुम अर्जुन भी बनो. सुभद्रा के अर्जुन.", अर्जुन तृप्त हो कर आज इस कदर शांत हो चूका था जैसे पुनर्जन्म हुआ हो. ऋतू और अलका ने मिलकर कैसे उसका shakti-mardan भी कर दिए था और पहले से कही ज्यादा ताक़त प्रदान करती वह उसको स्वयं को jaan-ne के इस अगले चरण पर ले आई थी.

"ठीक कहती हो दीदी की वह तोह पीड़ा से उपजा था लेकिन आपका प्यार उस से भी कही आगे है. मैंने आज मेरी धड़कन शरीर से निकलती महसूस की है. और फिर वापिस अंदर सम्माहित होती. आपका प्यार यक़ीनन इस अर्जुन के हर स्वरुप से बड़ा है.", रात के साढ़े तीन बजे हे वह पानी के नीचे खड़ा अब बेहतर महसूस कर रहा था. फिर वैसे हे गीले बदन पर निक्कर पहन वह ऋतू दीदी के बिस्टेर पर आ गया. दोनों बहने उसकी जगह छोड़े इन्तजार में हे थी जैसे.

"चल अब सो जा. 6 बजे उठा दूंगी तुझे, बहोत काम है आज तेरे जिम्मे. अपनी सास को gaanv-shehar ले जाना है और धर्मपत्नी से पौधा भी लगवाना है.", ऋतू दीदी की बात पर वह शर्माता सा अलका दीदी के गले लग कर लेट गया.

"आपको किसने बताया ये पौधे वाली बात?"

"तेरी धर्मपत्नी के बचे की behan-mausi ने. ज्यादा दिमाग मत चलाया कर और अब आराम कर.", ऋतू दीदी भी पीछे से अपने भाई से लिपट गई.

"वैसे मेरी पहली सास तोह ललिता जी और रेखा जी हुई na?",Arjun की ये बात सुनकर अलका ने हलके से गाल पर चपत लगा दी.

"सुधर जा सास के बचे. उन दोनों में से किसी को भी पता चला तोह तुझे तोह कुछ कहेंगी नहीं लेकिन हमदोनो की शादी अगले हे दिन हो जनि है."

"ाची बात है न. वैसे भी तोह आप दोनों एक दूसरे की लवर हे हो. साथ में शादी मैंने भी नहीं देखि 2 लड़किओं की."

"ोये चुप्प कर बस. अलका ये ऐसे नहीं सोयेगा. तू इसको ज्यादा हे ढील देती है और ये मनमर्जी करता है अपनी.", ऋतू दीदी ने उसका कान पकड़ कर अपनी तरफ किआ और एक पाँव ऊपर रक्तही बाल सहलाने लगी.

"वैसे इसका आईडिया बुरा नहीं है. तू सचमुच गज़ब की बीवी बनेगी मेरी.", अलका की ये बात सुनते हे ऋतू ने उसका भी कान खींच दिए.

"सुधर जा शैतान. आगे पीछे तू करे और बीवी बनु मैं. चल अब सो जा. पता नहीं 5-5 बार करके भी कैसे हंस रही है."

"करवा के देख फिर तू भी नशे में हँसेगी. माह.. ये दरिंदा हे है..", पंतय पर हाथ लगते हे सिसकी निकल गई फिर शांत होती अलका भी अर्जुन को पीछे से आगोश में लिए सो गई.

'और ये अब विक्य का नंबर भी लगने वाला है. अर्जुन शर्मा शादी कर लो जल्दी से नहीं तोह तबतक 100 पर डोज जिस रफ़्तार से जा रहे हो.', ऋतू ने आँख बंद करने से पहले अपने मासूम भाई का चेहरा देखते हुए मैं में कहा.

"आपसे हो चुकी है अगर याद हो तोह.", उन्हें अपने सीने से लगता वह बंद आँखों से इतना बोलकर फिर शांत हो गया.

'मन में बोलो तब भी सुन्न लेता है. एक हे तोह दोनों.', मुस्कुराती हुई वह भी सुकून से सो गई. सुबह उसने कोमल दीदी से दवा भी लेनी थी, जो अलका को वह बता चुकी थी. 4 बजने से पहले तीनो हे एक साथ जुड़े सो चुके थे.

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"हाँ तोह आज हमारे घर सुदामा आया है या परशुराम?", सुबह की हलकी ठंडक में दादी चंद्रो देवी naha-dho कर पाठ करने के बाद बहार आँगन में आई तोह शंकर भी हौदी के पानी से नहाने के बाद साफ़ कपडे पहने चाय के साथ सिग्रेटी पी रहा था. उन्हें देख कर सिग्रेटी बुझाने लगा तोह खुद चंद्रो देवी ने हाथ पकड़ कर रोक लिए. वह वही बराबर आ बैठी थी.

"पी ले रे मैं भी हुक्का पीती हु. और तू इतनी इज़्ज़त्त देता है तोह बुरा लगता है. मुन्नी, काली चाय पीटा है ये और तू तोह ाचे से जानती है.", उनकी बहु स्टील एक गिलास में चाय लिए उनके पास आई तोह दादी ने तल्खी से कहा.

"ताई जो पता होता है जरुरी तोह नहीं हर बार याद दिलाया जाये? और मैं रात में जब आया था आप सो चुकी थी नहीं तोह मैं रुकता नहीं."

"तुझे मैंने कभी रोका है आने से या गुस्सा किआ हो. पति के साथ साथ 4 बेटे खोये मैंने. 4 बहु विधवा हो गई और 6 नन्हे बचो के सर से बाप का साया उठा गया लेकिन चंद्रो ने कभी शंकर के लिए एक शब्द बुरा न कहा उस दुर्घटना के बाद कहे आखिरी बात के. तू तेरी जगह ठीक था लेकिन मेरा तोह सब उजाड़ दिए तूने. शंकर पूरे एक साल बाद मुझे समझ आया था के मेरे साथ क्या हो गया है. आग देने के लिए मर्द न था घर में कोई और बस उस वक़्त मेरे मुँह से पहली और आखिरी बार तेरे लिए गलत निकला था. दर्द करवा देता है गलतियां.", चंद्रो देवी बात करते हुए थोड़ी भावुक हो गई और शंकर ने हाथ थाम लिए.

"मैं खुद चलके आया था आपके पास लेकिन आपने तोह मौत देने से हे इंकार कर दिए था. बताओ ताई की बेटे का धर्म निभा कर मैंने कोई गलती की थी? आया तोह मैं आपके पास भी था के ख़तम कर दो मुझे."

"शंकर, ये बुढ़िया हर रोज दुआ करती है के तू ज़िंदा रहे. मेरा कोई बीटा और खुद पति बेबस हो गए उस लड़के के सामने जिसके बाप पर उन्होंने गोली चला कर शुरुवात कर दी थी. रोइ तोह कौशल्या भी थी अपने पति के लिए और फिर यहाँ इस आँगन में भी. हाँ एक बात से सरोकार रखती हु मैं, तेरे घर से किसी ने भी अगर इस बार मेरी हवेली की ईंट भी हिलने की कोशिश की तोह चंद्रो सिर्फ 3 लोगो को ज़िंदा छोड़ेगी. छोटा कन्धा अर्थी के लिए तू खुद ढून्ढ लिओ.", आवाज में कोई गुस्सा न था और न आवाज ऊँची की थी चंद्रो देवी ने. मुन्नी थोड़ी हे दुरी पर बैठी सब्जी काट रही थी और दूसरी बहु भी एक बाल्टी दूध की लिए चूल्हे के पास बैठ गई थी.

"ताई मेरी बात सुन्न पहले फिर तू जो चाहे कर लेकिन मेरी गलती हुई तभी.", शंकर का लहजा भी नरम और िज्जात्त से भरा था.

"बोल तू. और मुन्नी वह जरा गुड्डी को बोल चूरमा बना देगी."

"मैं बना देती हु माँ जी.", मुन्नी उठकर जाने से पहले कहने लगी

"हाँ. भूल गई थी. जा बना ले.", शंकर ध्यान से देख और सुन्न रहा था. नजरे शर्म से हलकी झुक गई थी.

"ताई वह मेरा एक बीटा है. ग्याहरवी में पढता है वह. कल तेरे पौटे सुदर्शन के साथ जो भी हुआ वह उसने हे किआ लेकिन मैं अपनी माँ की सौगंध खा कर कहता हु के उसको हमारे बारे में कुछ नहीं पता और जो भी हुआ उनके आपसी मतभेद से हुआ. गुजारिश है के उसको पारिवारिक झगडे की तरह मैट देखना. और पहले बात पता कर लेना फिर जो करोगी, मेरे साथ कर लेना. उसको कुछ हुआ तोह मेरा बाप और परिवार नहीं बचेगा.", शंकर के हाथ जुड़ते उस से पहले हे दादी के बूढ़े मजबूत हाथ ने कलाई पकड़ ली.

"सोच तोह रही थी की ये कोनसा शंकर पैदा हो गया और जितना सुना था वह तेरे से भी बढ़कर सुना लेकिन उसने मारा नहीं किसी को तोह ख़याल निकाल दिए था दिल से की वह तेरे से जुड़ा होगा. भूल गई थी की बंजारा अपने दर्द के साथ एक जगह नहीं टिकता लेकिन इस बंजारे का बाप तोह साधू है और वही रोक गया शायद तेरे खून को किसी का कटला करने से. शंकर कही रुकता है क्या."

"ताई मैं मेरे बेटे को जानता हु की वह गलत नहीं कर सकता क्योंकि वह मेरे से ज्यादा मेरे पिता की चाय में पला है. सुदर्शन ने उसकी मंगेतर का हाथ पकड़ा था."

"तू मेरी बहु के बचे का बाप है ऐसे तोह. लेकिन मैंने तेरे बेटे को कल रात हे माफ़ कर दिए था शंकर बस एक छोटी सी शर्त मान ले मेरी.", शंकर ने वह बुद्धा हाथ दोनों हाहतो में थाम लिए.

"आप बताओ मैं हर संभव काम करने को तैयार हु."

"घंटा भर रुक जा फिर साथ ले चलियो. रात से हे इत्छा है मेरी उस लड़के को देखने की. और तू निश्चिन्त रह मेरी तरफ से, ये बुढ़िया जितने ज़िंदा है कभी कोई जल्दबाजी में ऐसा कदम नहीं उठाएगी जिस से वह आग फिर जल उठे. मेरे पास भाड़े के कुत्ते है और मैं जानती हु की शेर का शिकार नहीं कर पाएंगे. गुस्से में बड़बड़ा लेती हु लेकिन वह जरुरी भी है. मैं मुन्नी नहीं हु रे, परिवार की मुखिया हु. बचे सब संभल ले तोह शांति से चली जाऊ."

"ताई मैं भी यही चाहता हु की वह गलतियां आगे न जाए जो 25 साल खा गई हमारे."

"तभी तोह रात 12 बजे तू मेरी देहलीज पर चला आया. लेकिन सुशीला और बिंदु नहीं समझ रही. जितने ज़िंदा हु उतने शायद वह सामने से कुछ न करे लेकिन वह दोनों हे तेरे परिवार की शांति भांग जरूर करेंगी.", चंद्रो देवी कड़ी हो कर अंदर चल दी पीछे शंकर को सोच में छोड़ कर.

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अर्जुन खुरपी से ये गद्दा तैयार करता हुआ पास बैठी रेणुका से भी बातें कर रहा था. सलवार कमीज पहने इस वक़्त रेणुका भी बगीचे के एक खूसूरत फूल से हे लग रही थी.

"ये अब इसमें दाल दो और मैं मिटटी से भरता हु फिर.", बड़े पौधे के बहार लिप्त प्लास्टिक हटा कर अर्जुन ने रेणुका से कहा तोह उसने अर्जुन को प्यार से देखा. अर्जुन भी समझता हुआ रेणुका के हाथो पर अपने हाथ रखता पौधे को आराम से गद्दे में रखें लगा. दोनों हे अपने हाथो से मिटटी दाल कर सतह बराबर करने लगे. फुहारे वाली बाल्टी भी हाथ में थामे जैसे वह कोई दंपत्ति वाला प्रयोजन कर रहे थे. मिटटी को गीला करने के बाद खुद अर्जुन ने रेणुका के दोनों हाथ पानी से साफ़ किये और खड़ा हो कर इस रात की रानी को निहारने लगा.

"चलो ये तोह लग गया अब क्या करे?", अर्जुन की बात पर मुस्कुराती हुई रेणुका ने वह फुजहरा उसके सामने कर दिए. अर्जुन पलट कर उनको भिगोता उस से पहले हे आवाज सुन्न कर रुक गया.

"बच गई.", दबी आवाज में इतना बोलकर वह पीछे पलटा तोह प्रीती, विक्य और रोमिला बगीचे के बहार खड़े थे. 'क्लिक' की आवाज के साथ हे मिटटी में साणे हाथो के साथ उसकी तस्वीर रोमिला ने उतार ली. जिसमे रेणुका और अर्जुन के साथ हे बाकी का प्राकृतिक दृश्य भी क़ैद हो गया था.

"यंग मन. चले अब नहीं तोह यहाँ की धुप में मैं बहार नहीं निकलने वाली.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ रेणुका के सामने हाथ करके खड़ा हो गया और वह इस बार आराम से उसके हाथ धुलवाने लगी. ये दृश्य भी न बच सका था कैमरा से. 10 मिनट बाद हे अर्जुन अंदर से साफ़ टीशर्ट और पजामा पहने अपनी लाल बुलेट लिए बहार आ खड़ा हुआ.

"हम इस से जायेंगे? मैं जवान लड़की नहीं हु प्रीती की उम्र की.", रोमिला ने एक बार अर्जुन और फिर मोटरसाइकिल को देखा. खुद वह भी एक आधी ब्याह का सूती टॉप और अलग तरह का सीधा पायजामा सा पहने थी, bell-bottom की तरह. कोडक बोस डी2000 लिखा ये कैमरा बहोत अलग था और काला फीता रोमिला की गर्दन में किसी चैन की तरह लिप्त था.

"ये ज्यादा ठीक है आंटी. गाँव की सड़क पर और तंग रस्ते पर चलने के लिए. हर जगह कार तोह नहीं जा सकती. वैसे भी आप 60 साल की दादी तोह नहीं है. चलिए चलते है.", अर्जुन के इतना कहते हे वह मुस्कुराती हुई वैसे बैठ गई जैसे सिर्फ प्रीती बैठती थी.

"ये क्या है?", प्रीती ने अपनी माँ और अर्जुन को देख कर थोड़ा हँसते हुए कहा. विक्य भी लगातार अर्जुन को देख रही थी लेकिन अर्जुन जैसे उसकी नजरो से बचने की कोशिश में हे था.

"गर्लफ्रेंड बदल ली है मैंने आज. अब तुम काम करो घर का मैं इन्हे लेकर भाग रहा हु.", अर्जुन तोह मस्ती हे कर रहा था लेकिन अगली आवाज सुनकर हवा टाइट हो गई.

"हाँ ले जा भगा के तू अपनी सास को. तेल ख़तम हो गया फिर न इधर आ सकेगा और न बिना पासपोर्ट इसके साथ जा सकेगा.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर प्रीती खिलखिला उठी और अर्जुन बिना जवाब दिए शर्माता हुआ अपने रस्ते चल दिए.

"यार उस से पूछ के मुझे भी गर्लफ्रेंड बना ले, एक दिन की.", विक्य का गंभी स्वर सुनकर प्रीती हाथ पकड़ कर उसको अंदर ले चली. कौशल्या जी बगीचे में पानी दे रही रेणुका को रोकक कर अपने पास कुर्सी पर बिठा चुकी थी.

"एक दिन की गर्लफ्रेंड बन्न ने के बाद अगले दिन तुम कहोगी के एक दिन वाइफ भी बनवा दू. साड़ी रात तोह सोने नहीं दिए तुमने और सुबह होते हे फिर शुरू. मामी ने तोह कहा था के तुम इन सब में इंटरेस्ट नहीं लेती.", प्रीती इस बात पर बुरा माने बगैर आराम से हे बात कर रही थी. आँगन में ऋतू दीदी को देख कर उनको अपने साथ लिए वह रेखा जी के कमरे में जा घुसी, जो अब खली हे था.

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गाँव की पतली सड़क पर धीमी रफ़्तार से चलने पर भी अर्जुन की पीठ पर रह रह कर वह भारी उभर लग रहे थे. लेकिन आज वह जैसे इन सब भावो से दूर था जैसे उत्तेजना शरीर में थी हे नहीं. रोमिला भी शहर से इस काम दुरी पर पूरी तरह बदले माहौल को देख कर खुश हो रही थी. वैसे भी उनका ध्यान शरीर पे नहीं था.

"ये सच में बहुत ाची जगह है अर्जुन. हर तरफ कितनी शांति और हरियाली है यहाँ.", रोमिला दोनों तरफ लगे घने वृक्षों और गाँव की साफ़ हवा को महसूस करती कहने लगी.

"हाँ और यहाँ एक बार में हे आपको बहुत साड़ी तस्वीर उतरने को मिलने वाली है.", इतना कहते हे उसने मोटरसाइकिल साधू सिंह के घर के बहार वाले खुले हिस्से पर रोक दी. हुक्का गुदगुदाते साधू सिंह की तस्वीर क़ैद करने के बाद हे अर्जुन ने परिचय करवाया.

"Ram-Ram अंकल जी, ये मेरी आंटी है और बहार से आई है. इन्हे गाँव के रेहान सेहन को देखना था और तस्वीर लेनी थी. तोह आपसे ज्यादा सही जगह मुझे कहा मिलती.", साधू सिंह भी अपनी जगह से खड़े होते उन्हें हाथ जोड़ कर कुर्सी पर बैठने का कहने लगे. रोमिला ने भी अभिवादन में हाथ जोड़े और फिर ध्यान गया खूटे से बंधी गाये पर. वह बछड़ा थोड़ी दुरी पर अपनी माँ से मिलने के लिए उछाल रहा था.

"लो जी आप ये फोटू उतारो फिर बाकी गाँव भी दिखते है.", उन्होंने जैसे हे बछड़े की रस्सी खोली वह उछलता हुआ जा लगा अपनी माँ के थांनो से. रोमिला ने देरी किये बगैं एक के बाद एक 4-5 फोटो उतार लिए थे इस दृश्य के. दरवाजे पर कड़ी बिमला देवी के हाथ में खाने की थाली और पारम्परिक वस्त्र वह कैसे छोड़ सकती थी. रोमिला ने वह भी कैमरा कर दिए.

"बीटा, आज तोह तुम्हारे साथ गोरी मेम आई है. पहले बता देते तोह इनकी व्यवस्था करती कुछ." वह सकुचाती सी थाली रखने के बाद हाथ जोड़ने लगी.

"कोई बात नहीं जी. मैं थोड़ी हिंदुस्तानी भी हु. थैंक यू.", रोमिला की बात पर जहा बिमला देवी आश्चर्य से उन्हें देख रही थी वही साधू सिंह जी हंसने लगे.

"ये अपने छोल साहब की बहु है न?", उनकी बात पर अर्जुन और रोमिला जी ने हामी भरी. फिर खुद उन्होंने पूरी बात समझने के बाद दोनों को हल्का नाश्ता करवाया और काजल तब तक ghaghri-choli के साथ दुपट्टा लिए उधर आ कड़ी हुई.

"बीटा चल आज तू भी दिखा जाटनी दूध कैसे निकलती है. बहु खुश तोह हम भी खुश.", काजल शर्माती सी अर्जुन और रोमिला को देखने के बाद भैंस के थांनो पर पानी डालती बैठ गई. रोमिला ने इस बार पूरी roop-rekha के साथ इस अल्हड़ जवान लड़की और दूध निकलने के उपक्रम को ध्यान से कैमरा में क़ैद किआ. सड़क पर चलती गाँव की महिला, जो सर पर पीतल की टोकनी में पानी लिए जा रही थी वह भी रोमिला ने खींच लिए था. अगले एक घंटे में खेतो में काम करते बैल, कुए से पानी निकलती औरते, चूल्हे पर खाना बनती लड़की, बीड़ी पीटा बुजुर्ग किसान, झोपडी और पुआल के बण्डल के साथ हे रोमिला न हर मुमकिन दृश्य देख लिए था. सविता के खेत पर उन्होंने आराम से बैठ कर laal-lassi का स्वाद भी लिए था जो बिना बर्फ के भी शरीर में ठंडक दे गई थी.

"तुम दोनों लड़किया सुन्दर हो और तुम्हारा गाँव भी. थैंक यू सो मच फॉर सुच ग्रेट हॉस्पिटैलिटी डिअर.", रोमिला ने अपने स्वभाव के हिसाब से हे दोनों को गले लगा लिए था. वह दोनों भी खुश थी की वह एक विदेशी महिला से इतने करीब से मिली, घूमी और तस्वीर भी उतरवाई.

"नहर और जंगल भी देखने चाहिए आपको. वह अभी बचे नाहा रहे होंगे.", काजल की बात पर अर्जुन इधर उधर देखने लगा जिस पर रोमिला का ध्यान न गया.

"ाची बात है अगर ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा तोह चलो."

"नहीं जहा से आये है वही बाए हाथ पर जंगल और दाए से हम इधर आये है.", सविता ने अपनी बारह क्लास की thik-thak अंग्रेजी में समझाया था. और नहर के किनारे ऐसा हे माहौल था.10-12 साल के बचे बड़ी दक्षता से किनारे से छलांग लगते और आपसे में प्रतियोगिता सी करते दिखे नहर में.

"वाओ. ब्रेव है जो ऐसे पानी में जम्प कर रहे है."

"5 फ़ीट से ज्यादा नहीं है गहराई.", अर्जुन के इतना कहते हे वह उसको देखने लगी.

"पोज़ फॉर में. जो. वह से जम्प करो मैं क्लिक करती हु.", रोमिला ने इशारे से वह जंगल की तरफ नहर पर झुकी पीपल की मोटी दाल दिखते हुए कहा. काजल और सविता भी देख रही थी की ये क्या हो रहा है. अर्जुन ने एक लड़के से कुछ कहा तोह वह हां में सर हिलता काजल को देख कर वह से भाग गया. अर्जुन 300 मीटर दूर उस तरफ चल दिए था और बाकी तीनो भी थोड़ा संभल कर पीछे. नहर से कोई 10 फ़ीट ऊपर ये डाली आगे तक भी जा रहा था लेकिन ठीक बीच में ऊंचाई उतनी हे थी, मोटाई पर्याप्त थी और चढ़ना आसान.

"ुधा देखो लेकिन शोर मत करना.", रोमिला ने दोनों का ध्यान दिलाया तोह नहर के दूसरी तरफ 3-4 नीलगाय शांति से जुगाली कर रही थी. और उनको परवाह भी नहीं थी जैसे क्योंकि मादा नीलगाय घोड़े से ऊँचा और जैसे उन सबका प्रहरी था. इस कोण से पूरा जंगल और ठीक मध्य रेखा की तरह नहर का neela-hara पानी. 50 फ़ीट दुरी पर कैमरा के पीछे नजर गड़ाए वह ाचे से विश्लेषण कर रही थी की दृश्य कहा से बिलकुल सही आएगा.

"परफेक्ट. अब तुम जब जम्प करने लगो तोह अपना थंब उप कर देना.", अर्जुन उनकी बात सुनकर आधी निक्कर में ऊपर जा चढ़ा. काजल के शरीर में चींटिया दौड़ने लगी थी अर्जुन को इस हालत में देख और वह एक तरफ जमीन पर बैठ गई. अर्जुन द्वारा कूदने के साथ हे कैमरा की आवाज लगातार आती रही और साथ हे रोमिला नहर की तरफ बढ़ती उसके तैरने की तस्वीर भी बड़ी दक्ष्ता से निकाल रही थी. यहाँ जैसे हे भीगा बदन वह पुलिया के नीचे से उनकी तरफ आने लगा, कुछ सोच कर रोमिला ने ये तस्वीर क़ैद कर ली. गीले बालो में उंगलिया चलता अर्जुन भी अनजान था लेकिन रोमिला के चेहरे पर एक मुस्कान चा गई थी.

"वेल दोने. मुझे नहीं लगता था के वह आसान काम होगा. तुम मन कर देते तोह मैं सेकंड टाइम नहीं पूछती. तुमने बहोत नैचुरली और ज्यादा एफर्ट दिखाए बिना कर दिए. अब शायद हमको चलना चाहिए. कैमरा की पावर भी ख़तम होने वाली है.", अर्जुन ने भी सर हिलाया और वह छोटा लड़का एक पतला हरा टोलिया लिए उनके पास आ गया.

"दीदी, बाबा बुला रहे है आपको भी और काजल दीदी के पापा भी.", ये सविता का भाई था जो काजल के घर से हे ये पतला टोलिया लेके आया था. और वह दोनों रोमिला से मिलने के बाद चली गई. अर्जुन टोलिया लपटे कपडे बदलने लगा लेकिन रोमिला ने यहाँ भी कोई मौका नहीं गवाया.

"बीस्ट.", इतना कहने के बाद उसने कैमरा बंद होते देखा तोह मुस्कुरा उठी. 'टाइमिंग'

"चलो आंटी अब घर चलते है.", अर्जुन ने अनजाने में हे उनका हाथ पकड़ लिए था और ऐसे हाथ थामे हे वह उनके साथ चलता साधू सिंह के घर तक आ गया. रोमिला के पतले कपडे उमस और पसीने से भीग चुके थे.

"चलता हु अंकल जी. और आपने सचमुच इतना ाचे से करवा दिए के शायद हम ऐसा कर भी नहीं सकते थे.", अर्जुन ने टोलिया बिमला देवी को पकड़ाया तोह वह भी उसको निहार रही थी.

"भाई, तुम्हारी आंटी को शिकायत है तुमसे. एक तोह घर आये और गाँव में वक़्त गुजरने के बाद भी खाना नहीं खाया."

"अभी तोह जाना जरुरी है आंटी. लेकिन कल पक्का मैं आपके हाथ का खाना खाने आऊंगा दोपहर में.", बिमला देवी के चेहरे पर एक अलग मुस्कान आ गई थी.

"तेरा हे घर है बीटा. जब दिल करे तब आ, मैं तोह बस कह सकती हु बाकी आना न आना तेरे हाथ."

"पक्का आऊंगा. 1 बजे तक.", अर्जुन इतना कहने के बाद फिर से उन्हें धन्यवाद करके निकल लिए. इस बार रोमिला के शरीर में नै हलचल लिए.

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रामेश्वर जी के साथ छोल साहब भी अपनी जगह से उठ खड़े हुए जब सामने से आती इस वृद्ध औरत को देखा, जो शरीर से अब भी मजबूत और सीढ़ी कड़ी थी. रामेश्वर जी के दोनों हाथ जुड़ गए लेकिन चेहरे पर हलकी हैरानी थी.

"Ram-Ram भाई रामेश्वर. बैठ जा और ये क्या सतीश भी यही है.", चंद्रो देवी का उनके घर ऐसे आना उन दोनों के लिए हल्का झटका था.

"नमस्कार भाभी. आप बैठो यहाँ.", दीवान की तरफ बैठने का आग्रह करते रामेश्वर जी अभी भी हाथ जोड़े खड़े थे.

"शंकर, चाय बनवा दे और तेरी माँ को भी बुलवा ला. ज्यादा देर नहीं बैठने वाली.", उनकी बात सुनकर शंकर वही से अंदर चल दिए.

"कोई खास प्रयोजन आपके आने का?"

"अरे क्यों मैं मिलने नहीं आ सकती क्या? शहर आई थी ऋचा को लेने और शंकर भी दिख गया तोह आ गई. अब तू मेरे से ज्यादा बूढा हो गया जो घर से निकलता नहीं और ये तोह मैं भूल हे गई थी इस दुनिया में है.", उनकी बात सुनकर छोल साहब नजरे झुकाये अब मुस्कुरा रहे थे.

"नहीं भाभी ऐसी कोई बात नहीं है. बस घर में इतने सालो से कोई कभी मिलने नहीं आया और मैं भी अब अपने बचो के साथ हे व्यस्त रहता हु. तीनो बेटे तोह घर रहते नहीं जो मैं बहार निकल सकू.", दरवाजे पर कड़ी इस लम्बी गोरी लड़की की तरफ नजर गई तोह रामेश्वर जी ने उसको अपने पास बुला लिए. सर पर हाथ फेरते हुए आशीर्वाद देने के बाद पानी लेकर आई कोमल से कहा.

"बहिन है तुम्हारी, अंदर ले जाओ.", वह लड़की भी अपनी दादी को देखने के बाद उनके साथ अंदर चली गई. कौशल्या जी हे एकमात्र शक्श थी जो पूरे रौब से उनके गले लग कर मिली और बराबर आ बैठी.

"थानेदारनी न बूढी होती. कौशल्या तू आज भी वैसी हे है.", उनकी बात सुनकर कौशल्या जी मुस्कुरा दी और अपने हाथ से पानी का गिलास देती haal-chal लेने लगी. और ठीक इस पल में हे बुलेट की आवाज से माहौल हल्का सा अशांत हुआ और उछलता कूदता अर्जुन इधर आ खड़ा हुआ. चंद्रो देवी सामने खड़े इस 6 फ़ीट 2 इंच लम्बे तगड़े लड़के को देख कर हैरान हो उठी. रामेश्वर जी के माथे पर भी बल पड़ गए थे लेकिन वह चलती हुई उसके सामने आ कड़ी हुई. कुछ पल निहारने के बाद अपने सीने से लगाती वह उसका माथा चूमने लगी. शरीर ढीला पड़ने लगा था और अर्जुन ने उन्हें हाथो में थाम लिए.

"दादी. आप ठीक हो?", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा वह उसकी बाहों में थोड़ी सुकून से उसको निहारने लगी.

"अरे बूढी हो गई हु न बीटा. लेकिन तू संभल गया. आ बैठ जरा मेरे पास.", उसको अपने साथ लगाए वह दीवान पर आई तोह कौशल्या जी ने थोड़ी जगह बना दी. अर्जुन के माथे को सहलाती वह बार बार उसको देख रही थी.

"रामेश्वर, तोह तेरी तपस्या ये लेके आई है?", छोटे से कपडे के बटुए से वह मोटी चैन निकाल कर उसके गले में बांधने लगी और किसी ने कोई सवाल न किआ. अर्जुन सबको देख रहा था के उसको कोई तोह बताओ ये है कौन और क्या हो रहा है.? शंकर शर्म भी शांत बैठे बस देख रहे थे.

"ये अर्जुन है भाभी, शंकर का पुत्र और हमारा पौता. पता नहीं मेरी तपस्या से मिला है या कर्मो से लेकिन यही है जिसकी वजह से परिवार एक बंधन में बंधा है.", रामेश्वर जी की बात सुनकर अर्जुन उन्हें देखने लगा.

"तेरी बड़ी दादी है ये बीटा. आज मिलने आई है तुझसे.", रामेश्वर जी ने उसकी शंका का थोड़ा निवारण करते हुए कहा तोह अर्जुन इस बार खुद उनसे गले लग कर मिला.

"आप यही रहो न फिर. ये देखो कर्फ्यू लग गया पहली बार घर में.", अर्जुन की बात सुन्न कर वह खुलकर हंसने लगी.

"बीटा अब जहा का दाना लिखा है वही आखिरी समय निकल लू. तुझे देख लिए बस अब ठंडक मिल गई.", चंद्रो देवी इस वक़्त सरल और साफ़ थी जैसे वह कही से उस परिवार से नहीं थी जिनको यहाँ बैठे लोगो से रंजिश रही हो. प्रीती अपने दादाजी को बुलाने आई थी और वह भी अंदर आते हे रुक गई.

"ये इसकी मंगेतर है ताई.", शंकर ने जैसे हे ये कहा तोह चंद्रो देवी दोनों को देखने लगी.

"हाँ इसके टक्कर की मिलने से भी रही कही. बिटिया बहार से आई हो.?"

"जी. अपने घर से.", प्रीती ने सकुचाते हुए कहा.

"इनका मतलब है के विदेश से आई हो. दादी वह हैरान है अभी.", अर्जुन ने अपनी समझदारी का नमूना पेश कर दिए था जो बहोत था बाकी के चेहरों पर मुस्कराहट लाने के लिए और प्रीती के वह से भागने के.

"चल बीटा तुझसे मिल ली अब तू कभी समय लगे तोह बुढ़िया को देखने आ जाना. मैं तोह आई हे ये देखने थी की अर्थी को आग कोनसा देगा मेरी. चल अब तेरी दादी से बात कर लू.", अर्जुन उनसे फिर से मिलकर बहार चल दिए तोह कमरे के बाकी दरवाजे शंकर ने बंद कर दिए. आधे घंटे बाद सभी बहार निकले तोह चेहरे पर कोई चिंता नहीं थी लेकिन विचार सबके दिल में थे.

ऋचा कोमल दीदी के हे साथ बहार आई थी और मोटरसाइकिल साफ़ करते अर्जुन को देखने के बाद वही रुक कर उनसे बात करने लगी. शायद वह कुछ हे दिन में शहर आने वाली थी. चंद्रो देवी ने जाने से पहले भी अर्जुन के माथे को चूमा और अपनी पौती के साथ गाडी में बैठ के निकल चली.

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"तू क्यों गया था उनके घर?", कौशल्या जी शंकर को लिए बैठी थी अब और वही मधु बुआ और रामेश्वर जी भी थे. लेकिन रामेश्वर जी ने मधु को बहार भेज दिए था. यहाँ बात शायद ये तीन हे कर सकते थे.

"काम था माँ."

"तू किस्मत वाला है जो वह अपने परिवार के कातिल में भी बीटा देखती है. लेकिन उनकी कही बात अगर एक प्रतिशत भी सही है तोह फिर ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए."

"भगवान् तुम फिर गलत सलाह दे रही हो. ये उन दोनों से जुड़े सभी को गायब कर देगा. शंकर जैसे चल रहा है चलने दो. मैंने सब संभल रखा है और तुम्हारी दखल किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं होगी. और अब तुम वह वजह बताओ के उनके घर क्यों गए थे?", रामेश्वर जी का स्वर पोलिसिअ सख्त था जैसा अब नहीं देखने को मिलता था.

"लता से मिलने. उसने कहा था के ऋचा को लेने मैं जॉन.", शंकर के झूट को रामेश्वर जी जान कर भी चुप हो गए.

"अब अगर फिरसे मिलने गए तोह फैंसला कर लेना. या तोह उसको अपना नाम देना या फिर यहाँ वापिस नहीं आना. उस वक़्त तुझे ये ध्यान था के अपने छोटे भाई की शादी करवानी है लेकिन मुँह से नहीं फुट सका के खुद भी वैसे हे हाल में है.", रामेश्वर जी के चेहरे पर पसीना आ गया था.

"आपको ऐसा लगता है के मैं वह अपने प्यार की वजह से गया था? ताई ने खुद कागज में उनकी पौती के बाप का नाम शंकर शर्मा दर्ज करवाया हुआ है. लेकिन मधुलता पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. आप जानते है अपने बेटे को, आपका सर नहीं झुकने दिए कभी मैंने. शंकर खुद मर्डर सकता है लेकिन पंडित रामेश्वर जी की प्रतिष्ठा और सम्मान पर आंच नहीं आने दे सकता. बेशक आपके कुछ फेंसलो पर मुझे आपत्ति हुई और उनकी वजह थी लेकिन मैंने वह भी चुपचाप माने.", शंकर की बात सुनकर पंडित जी ने उसका हाथ थाम लिए.

"देख बाप के कंधे पे बेटे की अर्थी की बात मत करना कभी. मैं बस इतना चाहता हु की हमारा परिवार जैसा है ऐसे रहे. चंद्रो देवी गलत नहीं है लेकिन तेरा उनके आसपास दिखना उनकी ज़िन्दगी खतरे में दाल देगा. मोहर सिंह पहले भी चाल चल चूका है और इस बार वह मौका नहीं छोड़ेगा. बिंदु का परिवार हमारी पहुंच से बहार है तोह तू बस सब छोड़ कर वही कर जो कर रहा है. कौशल्या, अपने बेटे के लिए खाना लगवा दो.", रामेश्वर जी चेहरा साफ़ करते हुए बिस्टेर पर लेते हे थे की अर्जुन के चिल्लाने की आवाज सुनकर फिर से उठ बैठे.
 
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