- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,779
अपडेट 97
कलयुग का चक्रव्यूह
"मुझे तुमसे बात करनी है. क्या हम थोड़ी देर अकेले में बात कर सकते है अर्जुन?", दोपहर का खाना ख़तम करते हे अर्जुन उठने लगा था. सामने बैठी मंजू ने झूठ बोल दिए था के वह घर से हे खा के आई. इधर आरती ने भी खाने के बाद रसोई संभल ली थी. बर्तन, चूल्हे की सफाई और ललिता जी अपने कमरे में चली गई थी, क्योंकि वह हमेशा वही खाना कहती थी.
"तुम साथ हे चलने वाली हो स्टेडियम तोह हम वह बात कर लेंगे मंजू. अभी शरीर थोड़ा थका हुआ है और अगर आराम नहीं किआ तोह शाम की प्रैक्टिस प्रभावित होगी.", अर्जुन ने हलकी सी मुस्कान देते हुए मंजू को जवाब दिए और फिर अपने दादा जी के कमरे में आ कर लेट गया. मंजू अब थोड़ी और परेशां हो गई थी लेकिन वह जाहिर न करते हुए आरती के हे पास चली गई. अर्जुन हाथ के नीचे तकिया दबाये लेट चूका था.
.
.
3 बज रहे थे और आमतौर पर गर्मियों के शुरुवात भी प्रदेश में थोड़ी तेज हे रहती थी इस वक़्त. Log-bag ऐसे समय gaanv-dehat में घर में अंदर रहते है या खेत में पेड़ के नीचे आराम करते है. लेकिन स्वर्गीय राममेहर के यहाँ इसके विपरीत माहौल था. सुशीला ने मोहर सिंह को कुछ जरुरी काम से अगले शहर भेज दिए था और इसके पीछे भी उसका मकसद कुछ और हे था. यहाँ गाँव के बहार एक पुराणी हवेली में वह 5 मर्दो के बीच अकेली महिला थी लेकिन देखने से यही प्रतीत होता था के सभी उसके शुभचिंतक हे थे.
"बेबे, इस बार कटाई काम ख़तम हे कर देना है. न यु रामेश्वर का झंझट आरर न तेरी सास चंद्रो का.", ये 45-50 साल का रोबीला अधेड़ सुशीला का ममेरा भाई था और जैसे करीबी राजदार.
"नरसिंघ, मेरी परेशानी की वजह है भीम, शबनम आरर बिजेन्दर. रामेश्वर का पौता तोह मारन खातिर 8-10 तैयार है लेकिन बिजेन्दर पहला उसके गइल अकेले भिड़ेगा बाद में भीम काम कर देगा उसका. लेकिन भीम चाहवे है आधी जायदाद, बबिता आरर मेनका. शबनम रांड है जो मेरे ख़याल से काल मैंने भी रस्ते से हटा सके है क्यूंकि सिर्फ मेरे धोरे हे उसके सबूत है.", बाकी पांचो ध्यान से देख रहे थे सुशीला को
"बिजेन्दर?", नरसिंघ ने इतना हे पुछा.
"वह बावला हो चुक्या है. बबिता पसंद है आरर शादी की ृत्त लाग ऋ है उसके."
"बेबे, ज़िंदा गाड़ द्यूंगा जे उसने कोई ऐसी हरकत कारन की सोची भी. नाम माटी में मिलावेगा कुनबे का आरर बिरादरी का.", ये तोह पल में हे अंगारे सा दहकने लगा था और बाकी सबके भी चेहरे वैसे हो गए थे.
"शांत रह. 2 साल जेल में भेजन की सोचु थी आरर इतनी देर में बबिता का ब्याह भी कड़े कर हे देवांगे अपनी पहचान में. तू आरर थाम बाकी सब ध्यान डीओ के जगह पे 6 बजे पहुंचना है. भीम का काम ख़तम करना है आरर फेर उस छोरे की लाश रामेश्वर की गली में फेंकनी है. शबनम हाथ चढ़े तोह ससुरी कर डीओ साफ़ वाह भी.", सुशीला सच में हे जहर उगल रही थी. उसका इरादा हे नहीं था किसी को भी छोड़ने का.
"बेबे फेर बिंदु ने के कह्वेगी?", ये एक और तगड़ा सा अधेड़ था जो कुर्सी पर बैठे हुए भी बाकी सबसे 5-6 इंच ऊँचा हे था.
"काले, एक काम कर फेर बिजेन्दर ने भी काट दिए आरर मेनका ने भी. साला साबुत ऐ कोणी छोड़ना आरर अर्जुन शर्मा बी गोदाम में मारा मिलेगा तोह अपने आप मामला हवा पकड़ लेगा.", सुशीला ने एक पाँव कुर्सी के ऊपर रखते हुए ठुड्डी के नीचे हाथ लगा लिए.
"बहोत दूर की सोचहि से तन्ने. मेनका का चक्कर पंडित के पौटे से, बिजेन्दर का शबनम गइल आरर भीम ने बदले के चक्कर में यु कर दिए लेकिन मारा गया उनके साथ हे. चोखी कहानी मिलेगी या तोह. लेकिन बाकी सब ध्यान रखिओ के कोई सा किसी की नजर में ना चढ़ जे. पहला हे साली पुलिस कुत्ते की तरह पाछे लाग ऋ है.", नरसिंघ के पल्ले ये खुनी काण्ड पड़ गया था.
"फेर एक छोटा सा काम रह्वेगा लेकिन वह तोह मैं आप कर लियुंगी. बिंदु की दूसरी छोरी मुस्कान के भी पारर काटने पड़ेंगे, जाने वाह भी बहोत कुछ है.", सुशीला क्या करने वाली थी ये तोह बस वही जानती थी लेकिन कितनो को मौत देने का इरादा बनाये थी ये खतरनाक बात थी.
"वह भी हो जे गए बेबे. तू 13 दिन दुःख में बिता के फेर कुनबा कत्था कर लिए. महारा भी सबकुछ तेरा है, राममेहर फूफा का भी आरर तेरी ससुराद का भी. 40 गाम कब्जे में आये पाछे तोह तू हे टिकट लेवे गई. फेर मैं देखु उस डॉक्टर ने आरर उसके घर की लुगाईया ने.", नरसिंघ की ऐसी बात सुनकर सुशीला हंसने लगे.
"मैंने याद है के तेरी नजर उसकी लुगाई पे है. याद भी है कितने साल पहला देखि थी.?
"ाहो. आज लाक याद है वाह आरर सच कहु तोह इतनी जानलेवा औरत न देखि बेबे कड़े.", नरसिंघ जैसे यादों में रेखा जी का चेहरा ध्यान करने लगा था.
"चाल वा सब बहोत दूर की बात है. फ़िलहाल तोह आज की घडी ध्यान में राखो. थोड़ी सी भी चूक होइ और सारे सपने ख़तम.", सुशीला वह से कड़ी हो कर पैदल हे गाँव की तरफ चल निकली.
"नरसिंघ, अपनी बात याद रखिये. मैं यु काम की कीमत लेके रहूँगा. तू मुकर कोन्या सकदा.", साथ हे बैठे इतनी देर से शांत इस लम्बे चौड़े अधेड़ की बात सुन्न कर नरसिंघ दांत दिखने लगा.
"भाई सुशीला की लेनी है ने? ले लिए. याद रखिओ कोई सा नई बचना चाहिए सुशीला ने छोड़ के. रात ने हवेली भी साफ़ कर देनी है.", नरसिंघ की ऐसी बात पर वह लम्बा व्यक्ति बोल उठा.
"बबिता की पहले मारूंगा फेर उसने मारूंगा. थाम लोग भी देख लिओ 3-4 है उनकी हवेली में. जुन्न सी हाथ चढ़े कोई रेहम नई आरर जितना दिल कर कार्यो फेर ..... समझदार हो कुणसा पहली बार करोगे. हाहाहा.", काला दिल और मैं का भी कला हे था और इन सबमे कही ताक़तवर. ये दूसरे रस्ते से चल पड़े तैयारी करने के लिए.
.
.
"गोलू भाई, के लगे है के जो भी हों लाग रहा है वह ठीक से? मां की बात सच्ची है लेकिन दूसरी तरफ माँ है मेरी. उसने बीच मई कोंनी छोड़ू.", बिजेन्दर 4 बजे हे गोदाम में आ चूका था और ये जगह अब पहले सी dhool-mitti वाली से विपरीत अंदर से साफ़ सुथरी दिख रही थी.
"मैं सलाह कोंनी दे सकू भाई बस इतना कहूंगा के ज़िन्दगी में कड़े कड़े जरुरी नहीं के जो पैदा करे वह सही होव आरर जो नुक्सान करे वह गलत. मां भी शातिर है आरर ताई तोह खैर के कहु. फेर तेरा भीम के बारे में यु सब बताना तोह मैंने भी परेशान करे है यार. तू खुद सोच के मैं किसी छोरी गइल दुष्कर्म करू तोह तू के करेगा? अपनी आख्यान के स्यामि यु सब थोड़ी देर पाछे हों वाला है."
"गोलू तू कड़े एहसा कोणी कर सके और मैंने भी या हे बात परेशां कारन लाग ऋ है के वा मेनका भीम की सगी छोटी बेबे है आरर विधवा अकेली. अर्जुन ुस्ते प्यार करे है या वाह उस लड़के ने तोह बात सही है लेकिन भीम जो करेगा वह तोह हत्या तेह भी बड़ा अपराध से गोलू."
"भीम ने हम कोन्या रोक सकदे या बात ध्यान रखिये. दूसरी ताई खुद अगर यु कारवां लाग ऋ है तोह हम तोह khud-ba-khud शामिल हो गए अपराध में. वैसे यु खेल बड़ा है हमारी सोच से. वह तेरी इंग्लैंड वाली बेबे भी तोह जुगत भिड़ा ऋ होगी किम्मे?"
"हाँ, इस सबमे तोह वाह है हे लेकिन माँ के गइल मिलके व दादी चंद्रो का काम कारन ाली है. कुंण करेगा यु तोह बेरा भी कोणी आरर दादी के कुछ होया तोह माँ जो इतने साल से चाहवे है वह उसने मिल जावेगा.", दोनों कुछ पल खामोश से बैठ गए थे एक तरफ. कुछ पल शांति बरकरार रही और फिर सामने वाला शटर थोड़ा ऊपर हुआ और ये 4-5 लोग अंदर आ खड़े हुए.
"के हाल है भीम काका? Raam-Raam छोटी दादी.", शीला देवी और उसका भीमकाय बीटा भीम उनकी तरफ आ रहे थे. पीछे हे 3 और आदमी थे जो बिजेन्दर की नजरो में हे थे. तीनो हे sapaat-sakht चेहरे वाले लम्बे चौड़े. लेकिन यहाँ खड़े सभी में भीम अलग हे नजर आ रहा था. उसका देहाती लेकिन चौड़ा बदन बिजेन्दर से 25 हे था. सख्त चेहरे पर लम्बी घनी मूछे और गले में सोने का चौकोर कैसा ताबीज काले धागे में पिरोया हुआ. वह सचमुच हे जैसे महाभारत से निकल कर आ खड़ा हुआ था उनके सामने.
"दादी के होव है रे? तू मेरा hum-umar है आरर मेरी माँ काकी की. काकी बुलाये कर आरर आड़े तोह hal-chal बदलन खातिर कत्थे होये है फेर आराम तेह हवेली पे करेंगे साड़ी बात.", भीम इधर उधर देखने लगा फिर सीधा उस कमरे में घुस कर वह से लकड़ी का तख़्त कागज़ की तरह मुट्ठी में पकडे इस भीतर वाले पक्के गोदाम में बिछा कर उसपे बैठ गया.
"ठीक बात है.", बिजेन्दर को गुस्सा तोह आया लेकिन वह दूसरी तरफ देखने लगा जहा वह 3 आदमी अब साथ वाले खुल्ले कच्चे हिस्से की तरफ चल दिए थे. जैसे ये जगह उनकी हे थी.
"तेरी माँ कोणी आवे के बीटा?", शीला देवी भीम की बगल में बैठी इन दोनों को देखती हुई बिजेन्दर से पूछ रही थी.
"आवे है माँ भी काकी. शबनम बेबे ने लेके वाह आड़े ाँ हे वाली होगी.", भीम उसकी बात सुनकर मुस्कुराया और पिछले कमरे से सुशीला इधर हे चलती हुई आ कड़ी हुई. पीछे हे दुपट्टे से मुँह ढके शबनम कड़ी थी. ये गली वाला रास्ता था जो भीम को भी अभी पता लगा था.
"घनी लम्बी उम्र है तेरी सुशीला."
"बेरा नई उम्र लम्बी है या तेरी जुबान काली है शीला. चाल तू अंदर कमरे में आजा आरर भीम के इरादा है मेनका ने आड़े बुलाएं का? 5 बज चुके है सब निबटा के सफाई भी करनी पड़ेगी" सुशीला के बात पर भीम के एक आंख हलकी सी कांपने लगी थी.
"काकी, उसने आड़े का पता देना ठीक कोन्या आरर घर पे जा के था के लयाणा तोह खेल हे खराब कर देगा."
"मतबल? तन्ने किम्मे बदलाव किआ है के?"
"हाँ काकी जरुरी था बदलाव करना भी. लेकिन उसने खुद कोन्या बेरा के वाह आड़े अपने आप ाँ लाग ऋ है.", सुशीला अचरज से देखने लगी भीम को.
"चंद्रो एडमिट है हस्पताल में आरर आखिरी सांस लेवे है. लाड़ली ने देखे बिना न मरती और लाड़ली लिकड़ चुकी है सब भूल के अपनी बड़ी माँ तेह मिलान. आड़े से हे जावेगी.", भीम के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ चुकी थी. और बाकी सब उसको हैरानी से देख रहे थे सिवाय शीला देवी के. बिजेन्दर खून का घूँट पी के रह गया क्योंकि अब वह तीन आदमी भी उधर हे आ खड़े हुए थे.
"यु किस तरिया एकदम से?", सुशीला अब भीम की तरफ हे आ कड़ी हुई थी और शबनम कपडे के पीछे से हे मुस्कुराती सब देखने लगी.
"तेरे साथ वाली लोमड़ी से पूछ काकी, नजर तोह इसने रखवा राखी थी. मैं तोह माँ ने मिलवां लेके गया था. फेर हस्पताल से हे ऋचा ने फ़ोन लगाया महारे जाए बाद मेनका धोरे.", अभी भीम बता हे रहा था के सामने से मूर्छित हालत में मेनका को 2 लोग पकडे हुए अंदर चले आये. माथे पर खून बह रहा था जहा एक आदमी ने कपडा रखा हुआ था. भीम फुर्ती से खड़ा हो कर उन दोनों के सामने आ गया.
"भान के लोडे यो के कर दिए? तेरी माँ छोड़ू.", एक के गाल पर कस के झापड़ जड़ते हे वह जमीन पर जा गिरा. दूसरे ने खुद हे मेनका भीम की तरफ कर दी.
"रुकी कोणी भीम भाई साहब तोह गाडी के शीशे पे ईंट मारनी पड़ी. अपना एक आदमी तोह गाडी के नीचे भी आ गया. लेकिन या बस बेहोश हुई है.", भीम पल में हे ठंडा हो गया था.
"किसी ने देख्या आरर गाडी?"
"किसे ने कोणी देख्या भाई जी. कोई आवे हे कोणी आड़े और गाडी बहार कड़ी है."
"अंदर कर तौली उसने. माँ ले लोडे कोई काम सही तेह नई करदे. इसके कुछ होया तोह थारी माँ छोड़ दूंगा.", मेनका को फूल की तरह उठाते हुए उसने दीवान पर दाल दिए. भीम की हालत देखते हुए खुद सुशीला ने उसके माथे को साफ़ करते हुए घाव देखा और तकिया फाड़ के ढेर साडी रूई वह लगा कर सफ़ेद लीर से पट्टी बांध दी. इस दौरान शीला देवी और शबनम भी मदद कर रही थी. गाडी अंदर करते हे शटर ाचे से बंद कर दिए गया था. 10 मिनट बाद सबकुछ शांत हो चूका था.
"बोलू थी न के प्लान मत बदले कर. लेकिन तू कड़े सुने है आरर शबनम के जरुरत थी इस सबकी? बुढ़िया मारनी थी तोह मार देती लेकिन सब एकसाथ नहीं करना था.", सुशीला जबड़े भींचे बोलने लगी तोह भीम भी नजरे झुकाये खड़ा हो गया.
"मौसी, मैं मेरा काम कर रही हु. अगर भीम ने ऐसे मेनका को उठाना था तोह मैं इसको भी नहीं बताती ये बात. लेकिन परशान मत हो आप. ये जगह ऐसी है के लोग इधर आने से कतराते है और भीम भी की कोई बचा तोह है नहीं. अब आपका काम कितना हुआ है?", शबनम पर जैसे कोई प्रभाव हे न पड़ा था सुशीला के क्रोध का. वह बिजेन्दर को देखने लगी तोह जैसे बिजेन्दर को कुछ पता हे न था.
"देखे के है be-akal. तेरा काम कोणी होया. 6 बजन वाले है आरर दुश्मन का किम्मे पता कोणी.", सुशीला के गुस्से के बावजूद बिजेन्दर शांत हे रहा.
"ताई वह भूरा उसने लें गया था 4 बजे. लेकिन स्टेडियम से छोरा साढ़े 5 या 6 बजे लिकडे करे है तोह थोड़ी देर में थारे सामने हे होगा.", गोलू की बात सुनकर भी सुशीला का गुस्सा काम न हुआ. लेकिन मेनका की कराह सुन्न कर एक बार फिर से सबका ध्यान उसकी तरफ हो गया. शीला ने झट्ट से मेनका के मुँह पर कपडा लगा दिए और सुशीला ने पीछे से बांधते हुए आवाज बंद कर दी. वह उठने की कोशिश करती उस से पहले हे पीछे से दोनों कलाई पकड़ कर भीम ने हाथ भी तकिये के कपडे से कस कर बांध दिए.
"मुँह बांधने की जरुरत नहीं है वैसे. दोनों तरफ खंडहर है और पीछे वाली गली भी वीरान है. बिपास यहाँ से 5 किलोमीटर है जहा शहर की आखिरी चालू ईमारत है.", बिजेन्दर मेनका की आँखों में ज़माने भर का दर्द देख रहा था. वह चटपटा भी नहीं प् रही थी.
"खोल दूंगा बेबे. सब खोल दूंगा और तू चाह के भी नहीं चीखेगी.", भीम की ऐसी बात सुनकर खून साणे चेहरे पर वही खौफ के भाव आ गए जैसे उसको उम्मीद थी.
.
.
"चलता हु भाई बस बहुत प्रैक्टिस हो गई.", इधर अर्जुन पसीने में लथपथ अपना अभ्यास ख़तम करता हुआ बेंच पर बैठ कर ग्लूकोस पी रहा था और बलबीर उसको आज रुकने के लिए मन रहा था.
"भाई 7 से 10 का शो है. चल न यार, सुमन जभी चलेगी अगर मंजू साथ जाएगी तोह."
"तोह भाई मंजू को ले जाओ यार. लेकिन मेरे घर आज कोई नहीं है तोह जाना जरुरी है. ताईजी अकेली होंगी.", अर्जुन फिर कपडे बदलने अंदर चल दिए और बलबीर भी. कुछ समय बाद हे दोनों साफ़ कपड़ो में पटरी पर चलते हुए स्टैंड की तरफ जा रहे थे.
"अर्जुन, सुनो जरा.", मंजू ने पास आते हुए कहा तोह बलबीर थोड़ा पीछे हो गया.
"मेरे साथ चलो, जरुरी बात है.", इस बार वह थोड़ी धीमी आवाज में अर्जुन का हाथ पकड़ कर आगे ले जाने लगी.
"चलते है परेशां क्यों हो रही हो.?", अर्जुन ने आराम से जवाब दिए और बलबीर को जाने का इशारा करता वह मोटरसाइकिल निकल कर मंजू को पीछे बैठने को बोलै. अभी दोनों स्टेडियम से निकल कर पहले चौक पर हे आये थे की ये तगड़ा पहलवान अर्जुन के हाथ में कागज पकड़ता एक तरफ जा कर खड़ा हो गया.
'चुपचाप गाडी में बैठ. मेनका', अर्जुन ने स्टैंड लगते हुए वही मोटरसाइकिल कड़ी कर दी. अपना बैग मंजू को देता वह होंठो पर ऊँगली रखने के बाद उस लड़के के बराबर कड़ी काले शीशे वाली जेन कार की तरफ बढ़ गया. मंजू के चेहरे पर एक डर साफ़ झलक रहा था. लेकिन गाडी को जाते देख वह बस नंबर पढ़ सकीय. अर्जुन को उसने आगाह भी किआ था के मेनका के साथ उसकी भी जान खतरे में है लेकिन वह फिर भी उसकी बात maan-ne की बजाये मनमानी करता रहा. अब आफत आ हे चुकी थी.
'Beep-Beep' की इस धीमी आवाज को सुनते हे मंजू होश में आई. वह अभी भी मोटरसाइकिल के पास हे जमी हुई कड़ी थी लेकिन बैग के अंदर से आई इस आवाज ने उसका ध्यान भांग किआ. तुरंत चैन खोलती वह ऊपर वाली जेब देखने लगी. यहाँ एक कागज़ और ये छोटा सा यन्त्र था कैलकुलेटर जैसी स्क्रीन वाला. 'इस नंबर पर फ़ोन करो.' मोटोराला लिखा ये कला सा यन्त्र एक सन्देश दिखा रहा था और मंजू ने वह कागज देखा तोह वह भी एक और नंबर लिखा था जिसके नीचे अर्जुन का सन्देश था.
'परेशां मत होना और इस पर फ़ोन करके बता दो अर्जुन निकल गया है. स्टेडियम के गार्ड रूम से फ़ोन करके तुम घर चली जाना. लव यू.", मंजू भौचक्की रह गई ये पढ़ते हे. मतलब अर्जुन पहले से तैयार था और वह खुद हे मंजू को दूर रखे थे.
"आप फ़ोन कर लीजिये. मोटरसाइकिल मैं पंहुचा दूंगा.', ये 6 फ़ीट का सफ़ेद कमीज और नीली पतलून में खड़ा व्यक्ति मंजू के लिए किसी जीन की तरह था. जाने कहा से एकदम आया और अर्जुन की मोटरसाइकिल लेकर यूनिवर्सिटी की तरफ चला गया. मंजू भगति हुई स्टेडियम की तरफ उड़द चली.
.
.
हाथ बांध दो लेकिन आँखें क्यों बंद कर रहे हो भाई? मैं इतनी शराफत से तोह साथ चल रहा हु तुम्हारे.", अर्जुन के दोनों हाथ नायलॉन की डोरी से बांधने के बाद उसकी अगल बगल बैठे पहलवानो ने बिना कुछ जवाब दिए सफ़ेद कपडा आँखों पर बांध दिए.
"ाची बात है.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ आराम से पीठ सीट पर टिकता बैठ गया. वह दोनों पहलवान थोड़ा हैरान थे की यहाँ वह अपहरण करके ले जा रहे है और ये लड़का उन्ही पर मुस्कुरा रहा है.
"भूरे, इसका के चक्कर है?"
"भाई सुशीला तै ने इसका काम करना है. मैं तोह जानू हु के लड़का शरीफ है पर के कर सका है.?", ये गाडी चलता हुआ पहलवान जैसे हमदर्दी जाता रहा था अर्जुन के साथ.
"वैसे भैया आप थोड़े दिन पहले अपने दोस्त के साथ मुझे हे देखने तोह आये थे स्टेडियम. वह माजरा अलग था न.?", अर्जुन की बात सुन्न कर एक पल को वह चुप रहा फिर बोलै.
"ग़लतफहमी हो गई थी छोटे भाई. नजर मारने आये थे के वह लड़का कौन है जिसने बिजेन्दर भाई पर हाथ उठाया था.", भूरा देसी भाषा की जगह सरल हिंदी में जवाब देने लगा.
"ग़लतफहमी नहीं थी आपकी. मैं हे था जिसने बिजेन्दर पहलवान पर हाथ उठाया था जब वह विकास भाई से लड़ने आये थे.", अर्जुन के इस खुलासे से चारो एक पल उसको देखने लगे फिर भूरे ने नजर सड़क पर कर दी. हल्का ubad-khabadd रास्ता था ये बाईपास शुरू होने पर.
"मौत इन्तजार कर रही है और तू यहाँ डींगे हक रहा है. बिजेन्दर बीच से चीयर के रख देगा तुझे लेकिन वह नहीं मारने वाला. पर और बहोत लोग है ऐसी इत्छा लिए वह.", अर्जुन खामोश हो गया था अब. जैसे उसका ध्यान माहौल को समझने में रम चूका हो. बाकी सब भी आगे कुछ नहीं बोले. ये छोटी सी गाडी अंदर से जानदार हे थी. और जल्द हे वह पलभर के लिए रुकी. आगे से बायीं तरफ का दरवाजा खुलने और बंद होने की आवाज के बाद 30 सेकंड बाद हे थोड़ा आगे चलती फिर बंद हो गई.
"निकालो रे बहार इसने. अपना काम ख़तम तोह आड़े रुकने का कोई फायदा नहीं.", लेकिन भूरे की बात ख़तम हुई हे थी की उसको एक तरफ धकेलता हुआ भीम आगे बढ़ा और अर्जुन की गर्दन पकड़ कर उसको जमीन पर गिरा दिए.
"कोई कही न जा रहा जितने काम ख़तम न हो जाता. इस बहनचोद की छाती मैं सबके सामने पडूंगा.", अर्जुन आँखों पर बंधी पट्टी के साथ हे उठने लगा था के पीठ पर एक तेज प्रायः किआ भीम ने और एक बार फिर वह जमीन पर जा लगा.
"भीम, यु मेरा आरर इसका मामला है. तू बाद में देखिये.", बिजेन्दर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ था. भीम एक बार उसको अपनी आग उगलती आँखों से देखने लगा फिर सुशीला को. बिजेन्दर ने अर्जुन की आँखों से पट्टी खोली हे थी की सुशीला भी इधर चली आई.
अर्जुन के होंठ और माथे से हल्का खून आ रहा था. उसका चेहरा ऊपर करती वह गुस्से से अर्जुन को देख रही थी.
"बिजेन्दर मैं तोह कहु सु के भीम ने हे यु ख़तम कारन दे. तू एक तरफ हो जा."
"न माँ. शंकर आरर मेरे बाप में भी मुकाबला होया था आरर आज मैं भी इसके खून की गर्मी देखना चहु हु. बाद में भीम जो मर्जी करे इसके साथ लेकिन मौका जरूर दूंगा इसने मैं.", बिजेन्दर अपनी बात कह रहा था उधर अर्जुन से 40 फ़ीट दूर मेनका के गले पे चाक़ू रखे शीला देवी कड़ी थी. अर्जुन के हाथ खुलने के बावजूद बंधे हुए थे.
"बेबे, अगर तू मेरी बात मान लेती तोह मैं इस सब में ना पड़ता. खैर तू दगाबाज हो गई तोह के बात लेकिन मैं पहले इसने मारूंगा फेर इसकी लाश के बगल में तेरे से प्यार गइल अपना नया रिश्ता बनाऊंगा. आशिक़ है न तेरा यु? भाई में के कमी थी जो यु पसंद किआ.", भीम चलता हुआ मेनका के पीछे आ खड़ा हुआ और शीला देवी एक तरफ हो गई. गर्दन पर चाक़ू अब भीम रखे हुए था. मेनका की मुँह पर बंधी पट्टी हटते हुए वह हंस रहा था.
"अर्जुन.. मुझे माफ़ कररर दो.. भैया आपने जो करना है मेरे साथ कर लीजिये. मैं साथ जाने को तैयार हु हमेशा के लिए. प्लीज इसको जाने दीजिये.", शीला देवी न एक करारा झापड़ मेनका के मुँह पर जड़ दिए उसकी बात सुनते हे.
"हरामजादी महीना न होया विधवा होये और यार बनाये बैठी है. इतनी खाज थी तोह मैंने कहती तेरे पे यु सांड मैं खुद चढ़वा देती. यु रामेश्वर का पिल्ला पसंद आया तन्ने.", मेनका के होंठ से खून की बून्द थोड़ी तक आने लगी थी और अर्जुन के चेहरे पर हल्का सा दर्द उभर आया. वह जमीन पर घुटने टिकाये खामोश सा आँखों को बंद किये बैठा रहा.
"देख जरा शंकर का नकली खून. यु पसंद आया था जो न मुअकबला कारन ने तैयार लागे है आरर न तेरी खातिर एक लफ्ज़ लीकडया इसके मुँह से.", सुशीला जाने किस बात पर भड़क उठी थी जो एक तरफ रखा डेढ़ इंची का लोहे का पाइप अर्जुन के सर पर मारती उसके सामने थूक कर आगे बढ़ गई. सर इस चोट से कुछ पल के लिए जमीन पर टिका लेकिन टपकते खून के साथ हे वह फिर से चेहरा सामने करते हुए उन्हें देखने लगा. पाइप जैसे उतना मजबूत न था या अर्जुन का सर पत्थर होगा. खून तोह निकला था लेकिन कोई बड़ा घाव जैसे कुछ न हुआ.
"जब सब थक्क जाओ तोह बता देना.", अर्जुन ने मेनका के सुबकते हुए चेहरे को देखते हुए बस इतना हे कहा.
"पूरे 5 मिनट है तेरे पास. या तू मैंने मार दे अर्जुन या मैं तेरा हाल खराब कर दूंगा. बाद में तेरा तोह निश्चित है मरना.", बिजेन्दर ुको खड़ा करने के लिए बाजू पकड़ कर ऊपर उठा रहा था लेकिन जैसे शरीर में जान न थी या अर्जुन अचानक से चट्टान बन्न गया. अर्जुन ने इस पल में बिजेन्दर को जैसे देखा वह पहले थोड़ा झेंप सा गया फिर अर्जुन की आंखों में जलालत देखते हे उसकी छाती में घुटना मारता हुआ चीखने लगा.
"तू घाना अकड़े है? मैं सोचु था के तू समझ दर होगा लेकिन तू मरना हे चाहवे है." जमीन पर गिरे अर्जुन को घसीट कर वह गोदाम और इस फर्श के बीच वाले मिटटी के हिस्से तक घसीट लाया.
"सुशीला बुआ, खुश तोह बहुत होंगी आप. अपने बेटे के साथ विश्वासघात कर सकती हो तोह बाकी जितने यहाँ है उनकी भी बलि चढाने का प्रबंध करके आई होगी.?" अर्जुन अपने होंठो पर आया खून मिटटी में थूकता हुआ सुशीला को देखने लगा. अर्जुन की ऐसी मुस्कान देख कर सुशीला का रंग उड़द गया था.
"के के बाके है तू? मौत सर पे कड़ी है और भाषण देवे है मैंने. कोई बुआ न लगती मैं तेरी."
"बबिता और बिजेन्दर का रिश्ता तोह कभी होने नहीं वाला, ये मूरख औलाद वैसे हे मेरे साथ म्हणत कर रहा है. और जो खुद लड़की के गर्दन पर चाक़ू लगाए खड़ा है वह खुद को भीम समझता है. थोऊ है ऐसे नामर्दो पर.", अर्जुन जमीन से उठ खड़ा हुआ था और कपडे झाड़ता बिजेन्दर को घूरने लगा.
"माँ यो किस तरह जाने है या बात? आरर यु तन्ने बुआ कहके बुलावे है मतलब झूठ तोह कोणी बोले है.", बिजेन्दर की बात ख़तम हुई और उधर से भीम सांड की तरह दहाड़ता अर्जुन पर लपका. मेनका की गर्दन पर कोई चाकू न था क्योंकि भीम अर्जुन पर उस से हे प्रहार करने लगा था.
'ढड्ढाममम", जिस रफ़्तार से भीम उसकी तरफ आया था उस से दोगुनी रफ़्तार के साथ वह जेन का शीशा तोड़ता हुआ उसके अंदर जा फंसा. अर्जुन की कलाई के ऊपर ये 2 इंच लम्बा घाव जरूर बन्न गया था लेकिन कोई परवाह न थी. बाकी सबका जैसे हलक सूख चूका था भीम की हालत देख कर. आनन् फानन में शीला देवी ने ये दूसरा चाक़ू मेनका की गर्दन पर कस दिए था. हल्का खून बहार चालक आया था वह से. अर्जुन एक बार फिर से असहाये हो गया था. जो 3 आदमी भीम के साथ आये थे अब अपना दम दिखते वह रूई की तरह अर्जुन पर laat-ghunse बरसते पिल पड़े. बिजेन्दर अपनी माँ को देख रहा था जो मुस्कुरा रही थी और मेनका का बेहटा खून देख जमीन पर गिरे मार कहते अर्जुन का उसके प्रति प्यार.
"बहनचोड़ दूर हत्तो. गोलू मार इन कमीं लोग ने.", बिजेन्दर झोटे की तरह उन तीनो से भीड़ गया था. और उसकी आवाज सुन्न कर इतनी देर से सर झुकाये खड़ा गोलू भी अपने दोस्त की राह पर चल दिए. भूरा और उसके दोस्त आगे आये और इधर एक के बाद एक 6 गोलियां उस रिवॉल्वर से छूट गई. शबनम के हाथ में धुँआ छोड़ती खली रिवॉल्वर थी और इधर जमीन पर भूरा, गोलू, भीम का एक आदमी और बिजेन्दर का वह पहलवान दोस्त जो अर्जुन को लेके आया था गिरे पड़े थे. शबनम कोई निशानची न थी लेकिन 6 गोलियों में 4 लोग उसने गिरा दिए थे. माहौल पूरा बदल चूका था. शबनम अभी भी ट्रिगर दबा रही थी इस उम्मीद से की कही से कोई और गोली चले और निशाने पर आया अर्जुन भी अपने अंजाम तक पहुंच जाए.
"शबनम दीदी. ये काम आपने आते हे क्यों नहीं कर दिए था? ये सब बेवजह मारे न जाते.", अर्जुन में उठने की ताक़त न थी लेकिन वह गर्डर उठता हुआ शबनम को जैसे जलील कर रहा था.
"मिन्दे, अपनी रिवोलेर लिकड़ के ले आ. साले सारे मारने है ये. कोई बचके न जा सके.", भीम जैसे तैसे बहार निकल कर गाडी पकडे खड़ा था. अपने एक आदमी से उसने पहले हे रिवॉल्वर प्लाट वाले हिस्से में रखवाई थी ये सोच कर की अगर कोई बहार आये तोह छत्त से हे टपका देना. वह आदमी भी फुर्ती से उस और भगा. बिजेन्दर जमीन पर गिरे अपने दोनों दोस्तों का सर थामे बैठा था. गोलू की सांसें चल रही थी क्योंकि गोली पेट में थी लेकिन भूरा शांत हो चूका था. एक गोली सीने में और दूसरी उसके दिल के ठीक ऊपर लगी थी. पक्का फर्श खून से ऐसे भरा था जैसे बाल्टी भर के वह उड़ेल दिए गया हो.
अगला दृश्य एकदम अलग था जहा भीम का मददगार जमीन पर रगड़ता हुआ अंदर आ रहा था और उसके आगे साढ़े 6 फ़ीट का ये दाढ़ी वाला 45-50 के करीब का यमराज सा आदमी जिसने मिन्दे की टांग पकड़ राखी थी.
"माहौल तोह ज्यादा खराब कर दिए तुमने सुशीला. और शीला वह चाकू हटा लो नहीं तोह सूनी मांग तुम्हारे हे खून से भरने में मुझे कष्ट नहीं होगा.", शीला और सुशीला के पसीने छूट गए थे अपने सामने इस पहाड़ को खड़े देख कर. भीम के दोनों आदमीओ के चेहरे पर सटीक गोली मरते हुए उसने अपनी बात पुख्ता कर दी थी की वह शबनम की तरह कोई कच्चा निशानची न था. शीला एक तरफ कड़ी हुई और शबनम ने इस तरफ से वह लोहे का पाइप पूरी जाने से इस व्यक्ति के सर पर मारने का उपक्र्रम किआ.
"जानती मुझे तोह ये चेष्टा नहीं करती लड़की. ये तिनके उमेद सिंह से टकरा कर मदद सकते है लेकिन हमें खरोच भी नहीं दे सकते.", शबनम को उसके हाल पर छोड़ता उमेद सिंह शेर सी चाल चलता बड़े आराम से बिजेन्दर के सर पर आ खड़ा हुआ.
"बीटा बहार गाडी कड़ी है और ड्राइवर भी. इसको हॉस्पिटल ले जाओ ये ज़िंदा है.", बिजेन्दर के आंसुओ से गीले चेहरे पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए उमेद सिंह ने जैसे उसको हिम्मत दी और बाकी दोनों दोस्त भी तेजी से लपके. आनन् फानन में शटर खोलते वह गोलू को उठाये बहार निकल लिए.
"तोह भीम सिंह, बाज नहीं आते न तुम. हालत तोह तुम्हारी भी ठीक नहीं है लगता है किसी नए शिकारी से टकरा गए इस बार.", पहली बार चेहरे पर मुस्कान आई थी उमेद सिंह के और वह अपना भूरा ray-ban उतारते हुए भीम का चेहरा पकड़ कर ऐसे देखने लगे जैसे डॉक्टर मरीज का निरिक्षण कर रहा हो.
"अर्जुन, मेनका को खोल दो और इन तीनो को बांध दो. चलो फिर काम धंदा करते है, बहोत समय खराब हो गया.", उमेद सिंह ने उस चश्मे में हे प्रतिबिम्ब देखा था शबनम को जो भागना चाहती थी लेकिन आवाज और रिवॉल्वर अपनी तरफ देख कर वही ृक्क गई. अर्जुन हल्का सा लड़खड़ाता हुआ मेनका की और बढ़ा. रस्सी खोलते हे वह उसके गले लग चुकी थी. और यही उमेद सिंह से गलती हो गई जो वह बहार से आते इन 5 बदमाशों का न देख सका लेकिन फुर्ती से एक तरफ होता वह उनकी गोली से जरूर बच गया था. लेकिन शीला देवी इतनी खुशकिस्मत न थी. गले को चीरती वह गोली बहोत थी उसका शरीर जमीन पर गिराने के लिए.
नरसिंघ के पास पिस्तौल थी और बाकी 4 के हाथ में एक तलवार और 3 लोहे की रोड. और अपनी गोली का गलत निशाना देख कर वह भी गाडी के दूसरी तरफ चिप्पे उमेद पर 12-14 फ़ीट से गोली बरसाने लगा. उधर से भी 4 गोलियां चली जिसमे 2 लोग मारे गए, एक तोह वही था जिसको सुशीला चाहिए थी. नरसिंघ की बन्दूक से भी आखिरी गोली उमेद के पांव में जा घुसी थी.
"बच न सकता आज तू उमेद. गोली तेरी भी ख़तम आरर मेरी भी लेकिन तू अकेला है और हम 4.", नरसिंघ ने भीम को भी सहारा देते हुए उठा लिए था. काला उमेद की तरफ बढ़ा क्योंकि शरीर से वही था जो उमेद से टकरा सकता था, भीम की हालत दुरुस्त होती तोह शायद वह भी ऐसी हिमकर कर सकता था. लेकिन उन चरों का ध्यान अपनी तरफ बढ़ती मौत पर न गया जो तीनो महिलाओ को कमरे में बंद करने के बाद उनकी तरफ आ रहा था.
"उमेद तुम जैसे 4-5 पर नींद में भी भरी पड़ेगा हिजड़े. नरसिंघ नाम रखने से तू शेर नहीं बन्न ने वाला.", काले की तलवार का वॉर बचते हुए उमेद ने उसकी कलाई पकड़ ली थी लेकिन हवा में गूंजी इस चीख को सुन्न कर सभी इधर हे देखने लगे.
"वार सामने से करते है भीम, पीछे से गीदड़ हे झूठन चुराने आते है.", अर्जुन ने उमेद की तरफ लोहे की रोड लिए बढ़ रहे भीम सिंह को कमर से पकड़ कर उस गाडी के बोनट पर ऐसे दे मारा था के भीम की चीख में गाडी का टूटना भी सुनाई न दिए था. बचे हुए शीशे भी मिटटी की तरह हर तरफ बिखर गए थे और भीम कटे वृक्ष सा आधा बोन्नुत पर और आधा गाडी की छत्त फाड़े उसके भीतर. शरीर कुछ हिलने के बाद शांत हो गया था लेकिन अब नरसिंघ की कलाई अर्जुन के हाथ में थी. उधर उमेद भी कुछ जोश में काले की तलवार उसकी हे छाती के भीतर दाल चूका था.
2 और गोलिया चली जिसके साथ हे नरसिंघ जमीन पर गिर गया बिना अर्जुन की मार खाये और आखिरी वाला भागने से पहले हे जमीन सूंघ रहा था.
"छोटे पंडित, हमेशा देरी से हे आती है पुलिस. खैर तुम आये तोह अब सम्भालो ये सब. मैं निकलता हु.", संजीव भैया गंभीर चेहरे से अर्जुन को देख रहे थे, जो मुस्कुरा रहा था. उमेद सिंह संजीव को आँख दिखते हुए अर्जुन के सीने से लगते हुए बस इतना हे बोले, "नाज है तुझपे. मैसेज देरी से मिला उसके लिए सॉरी, वह चुनाव भी आ रहे है न."
"चाचा, फ़ोन करता हु सुबह.", अर्जुन ने भी संक्षिप्त सा जवाब दिए और वह अँधेरे में बहार निकल गए.
"ये सब मुझे मंजू के फ़ोन से पता चला. और दादाजी से तेरा पेजर नंबर. इतनी बड़ी वारदात तू अकेले करने निकल आया?", गुस्से में उन्होंने भीम के चेहरे में 2 गोलियां उतार दी थी.
"जेब देख लिए करो जरा अपनी. गाडी में बैठने से पहले मैंने कागज डाला था. सीक्रेट सर्विस वाले अंडरकवर.", अर्जुन उनके गले लगते हुए हंसने लगा. संजीव भैया बी अपने छोटे भाई की हंसी पर शांत हो गए थे.
"बाकी सब कहा है?"
"उधर बंद किआ हुआ है हाथ बांध के.", उनके साथ हे वह सुशीला और शबनम के पास आ गया जो जमीन पर बैठी थी, हाथ पीछे से बंधे थे उनके. और एक तरफ कड़ी मेनका के गले पर अर्जुन का रुमाल बंधा था.
"चल तू मेनका को ले कर निकल मैं इन्हे जरा ससुराल के दर्शन करवाता हु. वैसे तोह इरादा कुछ और है लेकिन कानून की हद्द में रहना ज्यादा सही रहेगा. घर पे ये अंडरकवर वाली बात."
"हाँ नहीं कहता मैं कुछ भी लेकिन अपने छोटे भाई से मत छुपाया करो इतना सब. रिवॉल्वर रखनी नहीं आती आपको अभी तक."
"तेरा पेजर है कहा? और ये इतना एडवांस्ड पेजर तेरे पास?", संजीव भैया सुशीला के पीठ पर रिवॉल्वर लगाए चल रहे थे और शबनम भी सेहमी हुई साथ हे थी.
"मेरे पास बहोत कुछ है लेकिन मनाही है. पेजर उमेद चाचा के कहने पर एक पोलिसवाले कल देके गया था और दादाजी को पता था. इसलिए सब घरवाले बहार हैं.", अर्जुन ने ये जोर का झटका दिए था संजीव भैया को.
"वो इस सब के बारे में जानते है? और उन्होंने तुझे इजाजत दी इस सबकी? बिना सोचे की तू इतना छोटा है और यहाँ जान जा सकती थी.", संजीव थोड़ा सकते में था.
"यहाँ और भी लोग है भैया. दूसरी बात उन्हें ये पता है के उमेद चाचा सब कर रहे है, मैं तोह सिर्फ छोटा सा प्यादा हु. समझ लो खबरि जैसा. इधर तोह मैं आया हे नहीं हु. आप उनसे भी यही कहेंगे.", अर्जुन ने बहार कड़ी जीप को देखा तोह थोड़ा सोचने लगा. फिर शटर के पास कड़ी बुलेट देख कर वह उसकी तरफ बढ़ा. ये बिजेन्दर की थी और चाबी उसमे हे लगी थी.
"किसी को मैं कुछ नहीं कहने वाला लेकिन तुझसे बहोत सवाल है मेरे. मंजू अगर फ़ोन न करती तोह यहाँ गड़बड़ हो जानी थी आज.", संजीव भैया ने दोनों महिलाओ को जीप के पीछे बैठने के बाद सीट के साथ हे एक एक हाथ उनके हथकड़ी से बांध दिए थे.
"मंजू न करती तोह भी आपके पास फ़ोन आता. वैसे पेजर देख लीजिये मैसेज जरूर होगा पूरे 6 बजे.", अर्जुन ने मेनका को अपने पीछे बिठाया और संजीव भैया अपने पेजर की हरी लाइट में वह सन्देश पढ़ने लगे.
"हम्म. तोह तुझे मेरा पेजर नंबर भी पता है?"
"आप आगे चलो मैं आराम से आता हु. सवाल मेरे भी बहोत है लेकिन फिर कभी बात करेंगे जब आपका दिल हो jeera-lemon पिलाने का. अभी मुझे कुछ काम है." , अर्जुन ने किक लगते हुए वह बुलेट स्टार्ट की और भैया गाडी में बैठ ने के साथ हे वायरलेस पर कोई सन्देश देने लगे. आज पहली बार वह अपना परिचय दे रहे थे. आईपीएस सजीव शर्मा. लाल बत्ती वाली वह जीप उनसे आगे चलने लगी थी और अर्जुन धीमी रफ़्तार से ये अलग तरीके की बुलेट चलता ठंडी हवा का लुत्फ़ लेने लगा.
"आज तुमने मुझे खरीद लिए अर्जुन. बेशक तुम मुझे फिर कभी मत देखना लेकिन मैं तुम्हे बचाना हे चाहती थी.", मेनका उसकी कमर में हाथ डाले भावुक हो गई थी और पछतावा भी था के इतना सबकुछ हो गया.
"ये ऐसे वक़्त पर भी रोने की वजह समझ नहीं आ रही. तुम मेरे साथ हो, दोनों ज़िंदा और सलामत. हमारे प्यार की वजह से देखो आज भीम सिंह भी नहीं रहे और तुम्हारी माँ भी. देखा जाये तोह तुम्हे मुझसे नफरत करनी चाहिए क्योंकि मेरी वजह से परिवार ख़तम हो गया तुम्हारा.", अर्जुन सपाट लहजे में कह रहा था. लेकिन मेनका जोर से उसकी पीठ से लिपट गई.
"आज मैंने देखा था तुम्हारी आँखों में. तुम अपनी जान भी देने को तैयार थे. कैसे कर सकते हो इतना प्यार वह भी ऐसी औरत से जो शायद तुम्हारी दुश्मन हे थी एक तरह से.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले हे 'भदायकक.. chhrrrrrrrrrrr' का ये धमाका वातावरण को हिला गया. उनसे 500 मीटर दूर चल रही भैया की जीप इस बाईपास वाले मदद से विपरीत दिशा में उछलती हुई सड़क से परे घने वृक्षों में जा लगी. धमाके की गर्जना ऐसी थी की एक पल के लिए बुलेट भी अनियंत्रित हो गई लेकिन अर्जुन बदहवास सा खुद हे मोटरसाइकिल नीचे गिरता उस तरफ भागने लगा. स्थिति हर तरह से बेकाबू हो चुकी थी. उस सेंटर से उतर कर 3 लोग जीप की तरफ भद्द रहे थे जब तक अर्जुन वह पहुँचता एक आदमी ने ड्राइवर के भेजे में गोली उतार दी थी. दूसरा पीछे वाले हिस्से की तरफ जाता खली कनस्तर से जैसे पानी छिड़कने लगा था.
"संजीव कड़े गिरा है रे? उसने ज़िंदा नहीं छोड़ना.", वह आदमी आगे कुछ कहता उस से पहले हे 2 गोलिया उसके सीने में आ लगी उधर झाड़िओ से. बाकी दोनों भी उधर हे लपके लेकिन कोई और गोली चलती उस से पहले हे अर्जुन दोनों को लिए अँधेरे में कूद गया.
"कडाकक" की तेज आवाज और जंगल इस आदमी की चीख से गूँज उठा. अर्जुन ने रीढ़ का जोड़ हे टॉड दिए था. दूसरा संभालता उस से पहले हे उसका शरीर जीप पर जा गिरा.
"Bhaiya-Bhaiya..", अर्जुन पुकारता हुआ आगे बढ़ रहा था और सामने से कराहता हुआ संजीव पसलिया दबाये दूसरे हाथ में पिस्तौल के साथ रगड़ता हुआ आ रहा था. अर्जुन ने फुर्ती से उन्हें अपने कंधे पर डाला और सड़क की तरफ बढ़ने लगा. अँधेरे में दोनों भइओ के chehre-sar से खून बेहटा जमीन गीली कर रहा था. ये मजबूत सा हाथ अर्जुन के पाँव पर कैसा तोह वह जैसे नीचे बैठने लगा, लेकिन फिर खुद हे मुट्ठी खुल गई थी.
"मोहर सिंह.. मोहर सिंह है ये. अर्जुन ऐसे हम नहीं जा पाएंगे भाई.. तू जीप देख, मैंने वायरलेस किआ हुआ है. उन्हें बता इसके बारे में.", इधर मेनका भी आ कड़ी हुई थी. कुछ और न सूझा तोह अपने सर पर बंधी पट्टी और गले का रुमाल वह संजीव भैया के सर पर दबती हुई उनका खून रोकने लगी. किस्मत इतनी भी बेरहम न थी आज. अर्जुन की आँखों में आंसू देख शायद भगवन भी तरस खा गया था. लाल बत्ती की जीप और बड़ी वन मदद से इधर आती दिखी. अर्जुन अपने भैया को कंधे पे लिए ठीक सड़क के बीच खड़ा होता उनके सामने आ गया.
"इन्हे जल्दी हॉस्पिटल लेके चलो. और उधर जीप में देखो के कोई ज़िंदा है क्या.", अर्जुन की बात सुन्न कर भैया दर्द में भी मुस्कुराने लगे.
"ये अपना काम कर लेंगे. इधर लकी है मेरे साथ. तू यहाँ से निकल और जुबान बंद रखना. मैं जल्द मिलता हु तुझसे.", लकी भी संजीव की हालत देख घबरा गया था लेकिन दूसरी गाडी वालो को निर्देश देता वह जीप लिए शहर की तरफ निकल चला. जीप में सुशीला और शबनम शायद बेहोश हो गई थी जिन्हे ये 4 पोलिसवाले गाड़ी में डालने के बाद बाकी 3 अधमरे और मृत व्यक्तिओ और ड्राइवर की लाश को भी वन में लिटा कर वापिस निकल गए. घटनास्थल पर एक हवलदार छोड़ कर.
"भाई, जरा वह से मेरी मोटरसाइकिल ला दो गए?", अर्जुन ने कमर पर हाथ रखते हुए उस पोलिसवाले से कहा और वह बिना कुछ कहे अँधेरे में उस तरफ चल दिए. अर्जुन की सोच से कही ज्यादा हे बड़ा मामला हो गया था ये. आज एक पल के लिए वह जैसे अपने भैया को खो हे चूका था. ऐसा हो जाता तोह शायद अर्जुन ज़िन्दगी भर ये इल्जाम अपने दिल पर लिए रहता. जैसे तैसे वह खामोश सा मेनका को लिए उसके घर आ गया. अगले 10 मिनट में वह बिस्टेर पर लेता था मंजू के कमरे में जहा ये डॉक्टर साहब उसके हर घाव पर मरहम लगाने के बाद नींद का इंजेक्शन दे कर चले गए थे. कुछ ऐसा हे दूसरे कमरे में मेनका के साथ हुआ था.
"इसका ध्यान रखना बिटिया. और होश में आने पर कह देना के रामेश्वर शर्मा के सवाल इसका इन्तजार कर रहे है. ये मासूम प्यादा मेरी gair-maujdgi में वजीर बन्न बैठा.", ये पंडित जी हे थे जिनके साथ तेजपाल शर्मा चुपचाप खड़े थे.
"कोई घबराने वाली बात तोह नहीं है न दादाजी?", मंजू की आँखों में आंसू देख कर वह मुस्कुरा दिए.
"ये मेरा अभिमान है बिटिया, कभी कुछ नहीं हो सकता इसको. लेकिन नासमझ है थोड़ा ज्यादा होशियार पता नहीं. घाव छोटे मॉटे है 1-2 दिन में तोह दिखने वाले भी नहीं. चलो आज बिटिया तुम्हारे हाथ की चाय पीला दो अब आ हे गया हु तोह फिर क्या 10 मिनट और क्या घंटा.", रामेश्वर जी मंजू को सर सहलाते हुए बहार सोफे पर आ बैठे.
"तोह बिट्टू मिया, देख लिए नजारा?"
"पंडित जी, ये पागलपन हे था. संजीव मारा जाता अगर ये न होता तोह. उमेद के भी पाँव में गोली लगी है. लेकिन ये कैसे पहुंच गया उधर?"
"पोलिसवाले का खून तोह कही न कही सबमे हे है इस घर में. इसने कहा था के ये उमेद की मदद करेगा, गुरु है न वह इसका. लेकिन उमेद भी जैसे इसका गुलाम हो गया है. बाकी सब तोह जांच के बाद पता लगेगा. कहा खाद में मिटटी देने की बात कही थी और ये सब साफ़ कर आया.", रामेश्वर जी की मुस्कान रहस्य से भरी थी.
"चंद्रो देवी की हालत भी स्थिर है अब. डॉक्टर कह रहे थे की खतरे से बहार है. Bheem-Sheela देवी ने 3 और लोगो की मदद से सुशीला के परिवार पर हमला किआ जिसमे मोहर सिंह के साथ 12 और लोग मारे गए है अपराधियों को मिला कर.", जैसे तेजपाल मां ने खाखा तैयार किआ हो रिपोर्ट बनाने से पहले.
"हम्म्म.. 12 की जगह 13 कर दो तेजपाल. एक को हमने खुद आजाद कर दिए. भाभी जी से मैं परसो मिल लूंगा और सुशीला को कहना की रामेश्वर आज भी उनका भला हे सोचता है बेशक उसकी वजह से मेरे बेटे की खुशिया मैंने ख़तम कर दी लेकिन उसको ba-ijjat बरी कर दिए गया है. बिजेन्दर से व्यक्तिगत मुलाकात मैं परसो कर लूंगा. हाँ शबनम को अपनी निगरानी में रखना, शंकर करेगा बात आने पर.", इधर मंजू चाय रखने के बाद मेनका के कमरे में चली गई.
"जी. आर्डर और फाइल तोह आप भिजवा हे देंगे. वैसे अभी आप यही रुकने वाले है?"
"बरखुरदार तुम्हारे पिता जी ने आज दावत राखी है तोह हम यहाँ क्या करेंगे. 8:00 बजे है तोह 45 मिनट में तोह तुम मुझे घर उतार हे डोज.", तेजपाल जी के चेहरे पर भी हंसी आ गई.
"वैसे सच कहु तोह अर्जुन को देख कर गर्व होता है."
"हाँ भांजा जब मां की गर्दन पकड़ने लगे तोह गर्व होगा हे. हाहाहा.. वैसे सच बात है. मैं इसको इन सबसे दूर रखना चाहता हु लेकिन छह कर भी रख न पाउँगा.", रामेश्वर जी कमरे में निगाह मरते हुए अर्जुन को देखने लगे.
"अब चिंतित होने की वजह हे नहीं है अंकल. सब साफ़ तोह कर हे दिए है संजीव और उमेद ने मिलकर. जो बचे है वह दोस्त रहेंगे या शुभचिंतक."
"इसके साथ एक समस्या है बीटा. काम न मिले तोह ये खुद हे ढून्ढ लेता है. अभी तोह चलो जो हुआ सो हुआ. और मैं भी कोशिश करूँगा के इसकी शिक्षा थोड़ी ज्यादा बढ़ा दू, मेरे लिए हे ाचा रहेगा. चलो भाई अब चलते hi. बेटी के घर की चाय पी ली बहोत ाचा लगा.", रामेश्वर जी उठने के बाद फिर से अर्जुन को देख कर मंजू को भी आशीर्वाद देते हुए बहार निकल चले.
.
.
बिजेन्दर िक के बहार बैठा था अपने एक दोस्त के साथ. आज उसने एक दोस्त खो दिए था और दूसरा शायद खो हे देता अगर उमेद काका उसकी समय रहते मदद न करते. आँखे अभी तक भीगी थी. सबसे अजीब बात ये हुई थी की इस हस्पताल में हे उसकी माँ और चचेरी बहिन को भी लाया गया था लेकिन वह बताने के बावजूद वह से हिला नहीं.
"जी, आपके कपडे और खाना लाइ हु.", अनुपमा पहली बार बहार यु उसके सामने आई थी. बेशक बबिता हे उसको लेके आई थी लेकिन बबिता अलग इमरजेंसी वार्ड में अपनी माँ के पास चली गई थी. एक पल तोह बिजेन्दर खामोश बैठा रहा, शुन्य में देखते हुए लेकिन फिर उसकी कमर पर मुँह रखते हुए वह फफक कर रो पड़ा. यहाँ बस 3 हे लोग थे लेकिन उसका दोस्त बहार चला गया था हालत देख कर.
"आपने कभी कुछ गलत नहीं किआ लेकिन कही न कही चूक हुई है. हम मिल कर सुधर सकते है सबकुछ. बलवान (भूरा) भाई के जाने का मुझे भी दुःख है लेकिन गोलू भैया खतरे से बहार. हौंसला रखिये आप. चलिए कपडे बदल लीजिये इतने मैं यहाँ देखती हु.", अनुपमा की साफ़ और दिल से कही बात सुनकर बिजेन्दर खड़ा हो कर उसके गले लग गया. वह बहोत कुछ कहना चाहता था लेकिन आज जैसे शब्द नहीं फुट रहे थे.
"हम नै शुरुवात कर सकते है. कल पापा को मुखाग्नि देनी है आपको और उसके बाद जिम्मेवारी सम्भालनि पड़ेगी साडी.", बिजेन्दर ने चेहरे से चेहरा लगते हुए सिर्फ हामी भरी और कपडे ले कर चला गया. पुलिस ने इस मामले में इनमे से किसी से पूछताछ तोह नहीं की थी लेकिन अपनी तैयार रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करवा लिए थे. शबनम को संदिग्ध की श्रेणी में रखा गया था और उसका इलाज भी पुलिस निगरानी में हे हो रहा था.
"देख माँ, के हो गया पूरे परिवार गइल. तन्ने सबके स्यामि यो कहा था ने के मेरी छोरी इतने ब्याह नई करेगी जितने शंकर के परिवार साथ बदला न ले लिए जाये. मैंने सिर्फ तेरी हां में हां मिले थी. लेकिन आज शंकर के परिवार ने पूरा घर ख़तम करने की जगह तन्ने ba-ijjat बरी आरर उस हरामी मामे की मौत भी बदले की भावना से की हत्या लिख दी. वह छोरा सबने मार सके था लेकिन उसने एक की जान भी कोन्या ली. ेब तेरे धोरे बहोत टेम है सोचन का. यु टांग टूट चुकी है, कलाई की हड्डी भी आरर सर्र पे 6 टाँके आये है. हफ्ता आते हे रह, मैं हलचल लेती रहूंगी तेरा.", बबिता ने आगे कुछ न कहते हुए अपनी माँ को दाल का पानी बड़े प्यार से पिलाया जो सुशीला पीना नहीं चाहती थी. आँखे उसकी भी भरी थी और सब खोने के बाद एहसास हुआ था के वह कितनी खराब बहु, बीवी, माँ और बहिन थी. लेकिन फिर सामने से बिजेन्दर को आते देख मुँह फेर लिए. आज हिम्मत न थी अपने बेटे की आँखों का सामना करने का.
"ऐ माँ, तू तौली ठीक हो जय. 13 दिन बाद तेरे छोरे का आरर छोरी का ब्याह है.", बिजेन्दर गोल स्टूल पर बैठता अपनी माँ के गाल पर हाथ रखते हुए बोलै तोह बबिता हैरानी से उसको देखने लगी.
"बेबे तू टेंशन न ले. गोलू गइल तेरा ार अनुपमा गइल मेरा ब्याह होवेगा. गोलू ने होश आया तोह मैंने बताया के मैं अनुपमा ने पसंद करू हु. वह बावला तोह अर्जुन धोरे काल स्टेडियम हे चला गया था यु कहां के बिजेन्दर ने वह कुछ न करे आरर वह यु सब अपने प्यार खातिर कारन लाग रहा है. फेर बेरा चल्या के थम्म दोनो पसंद करो हो एक दूसरे ने. चाल माँ तू आराम कर, मैं तड़के आऊंगा मिलान. गोलू के maa-baap हो सके है के hal-chal लें ऊपर आवे. मैं अनुपमा ने छोड़ के औ घर. तू ध्यान रखिये बेबे अपना. जो गलती हुई उसके खातिर छोटे भाई ने माफ़ कर दिए.", जाने से पहले वह अपनी माँ और बहिन से गले लग के मिला.
"देख ले इसका दिल. यु है सच्चा आरर परिवार की हिफाजत कारन वाला. खैर तेरे नींद की सुई दे राखी है तोह तू आराम कर. मई इस बिस्तरे पे सोउ हु.", बबिता ने भी माँ के चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहा और फिर खली बिस्टेर पर लेट गई.
सुशीला सोच रही थी की अगर आज यही लड़ाई शंकर के साथ हुई होती तोह एक बार फिर सब ख़तम हो जाता लेकिन वह अर्जुन था. जो मरने को तैयार था और सबको बचने के लिए भी.
"बेटी, एक बार बस अर्जुन ने सन्देश भिजवा दिए के उसकी बुआ मिलना चाहवे है उस से. शंकर तोह कड़े कोणी आवे लेकिन वह छोरा भला है.", सुशीला ने इतना कहा और आँखे बंद कर ली. वही बबिता मुस्कुरा उठी अपनी माँ की बात सुनकर.
.
.
रात 12 बजे अर्जुन झटके से उठ खड़ा हुआ. पसीने से भीगा जिस्म और उत्तेजना से वह बेचैन सा था लेकिन फिर अचानक हे वह वापिस बिस्टेर पर लुढ़क गया.
कलयुग का चक्रव्यूह
"मुझे तुमसे बात करनी है. क्या हम थोड़ी देर अकेले में बात कर सकते है अर्जुन?", दोपहर का खाना ख़तम करते हे अर्जुन उठने लगा था. सामने बैठी मंजू ने झूठ बोल दिए था के वह घर से हे खा के आई. इधर आरती ने भी खाने के बाद रसोई संभल ली थी. बर्तन, चूल्हे की सफाई और ललिता जी अपने कमरे में चली गई थी, क्योंकि वह हमेशा वही खाना कहती थी.
"तुम साथ हे चलने वाली हो स्टेडियम तोह हम वह बात कर लेंगे मंजू. अभी शरीर थोड़ा थका हुआ है और अगर आराम नहीं किआ तोह शाम की प्रैक्टिस प्रभावित होगी.", अर्जुन ने हलकी सी मुस्कान देते हुए मंजू को जवाब दिए और फिर अपने दादा जी के कमरे में आ कर लेट गया. मंजू अब थोड़ी और परेशां हो गई थी लेकिन वह जाहिर न करते हुए आरती के हे पास चली गई. अर्जुन हाथ के नीचे तकिया दबाये लेट चूका था.
.
.
3 बज रहे थे और आमतौर पर गर्मियों के शुरुवात भी प्रदेश में थोड़ी तेज हे रहती थी इस वक़्त. Log-bag ऐसे समय gaanv-dehat में घर में अंदर रहते है या खेत में पेड़ के नीचे आराम करते है. लेकिन स्वर्गीय राममेहर के यहाँ इसके विपरीत माहौल था. सुशीला ने मोहर सिंह को कुछ जरुरी काम से अगले शहर भेज दिए था और इसके पीछे भी उसका मकसद कुछ और हे था. यहाँ गाँव के बहार एक पुराणी हवेली में वह 5 मर्दो के बीच अकेली महिला थी लेकिन देखने से यही प्रतीत होता था के सभी उसके शुभचिंतक हे थे.
"बेबे, इस बार कटाई काम ख़तम हे कर देना है. न यु रामेश्वर का झंझट आरर न तेरी सास चंद्रो का.", ये 45-50 साल का रोबीला अधेड़ सुशीला का ममेरा भाई था और जैसे करीबी राजदार.
"नरसिंघ, मेरी परेशानी की वजह है भीम, शबनम आरर बिजेन्दर. रामेश्वर का पौता तोह मारन खातिर 8-10 तैयार है लेकिन बिजेन्दर पहला उसके गइल अकेले भिड़ेगा बाद में भीम काम कर देगा उसका. लेकिन भीम चाहवे है आधी जायदाद, बबिता आरर मेनका. शबनम रांड है जो मेरे ख़याल से काल मैंने भी रस्ते से हटा सके है क्यूंकि सिर्फ मेरे धोरे हे उसके सबूत है.", बाकी पांचो ध्यान से देख रहे थे सुशीला को
"बिजेन्दर?", नरसिंघ ने इतना हे पुछा.
"वह बावला हो चुक्या है. बबिता पसंद है आरर शादी की ृत्त लाग ऋ है उसके."
"बेबे, ज़िंदा गाड़ द्यूंगा जे उसने कोई ऐसी हरकत कारन की सोची भी. नाम माटी में मिलावेगा कुनबे का आरर बिरादरी का.", ये तोह पल में हे अंगारे सा दहकने लगा था और बाकी सबके भी चेहरे वैसे हो गए थे.
"शांत रह. 2 साल जेल में भेजन की सोचु थी आरर इतनी देर में बबिता का ब्याह भी कड़े कर हे देवांगे अपनी पहचान में. तू आरर थाम बाकी सब ध्यान डीओ के जगह पे 6 बजे पहुंचना है. भीम का काम ख़तम करना है आरर फेर उस छोरे की लाश रामेश्वर की गली में फेंकनी है. शबनम हाथ चढ़े तोह ससुरी कर डीओ साफ़ वाह भी.", सुशीला सच में हे जहर उगल रही थी. उसका इरादा हे नहीं था किसी को भी छोड़ने का.
"बेबे फेर बिंदु ने के कह्वेगी?", ये एक और तगड़ा सा अधेड़ था जो कुर्सी पर बैठे हुए भी बाकी सबसे 5-6 इंच ऊँचा हे था.
"काले, एक काम कर फेर बिजेन्दर ने भी काट दिए आरर मेनका ने भी. साला साबुत ऐ कोणी छोड़ना आरर अर्जुन शर्मा बी गोदाम में मारा मिलेगा तोह अपने आप मामला हवा पकड़ लेगा.", सुशीला ने एक पाँव कुर्सी के ऊपर रखते हुए ठुड्डी के नीचे हाथ लगा लिए.
"बहोत दूर की सोचहि से तन्ने. मेनका का चक्कर पंडित के पौटे से, बिजेन्दर का शबनम गइल आरर भीम ने बदले के चक्कर में यु कर दिए लेकिन मारा गया उनके साथ हे. चोखी कहानी मिलेगी या तोह. लेकिन बाकी सब ध्यान रखिओ के कोई सा किसी की नजर में ना चढ़ जे. पहला हे साली पुलिस कुत्ते की तरह पाछे लाग ऋ है.", नरसिंघ के पल्ले ये खुनी काण्ड पड़ गया था.
"फेर एक छोटा सा काम रह्वेगा लेकिन वह तोह मैं आप कर लियुंगी. बिंदु की दूसरी छोरी मुस्कान के भी पारर काटने पड़ेंगे, जाने वाह भी बहोत कुछ है.", सुशीला क्या करने वाली थी ये तोह बस वही जानती थी लेकिन कितनो को मौत देने का इरादा बनाये थी ये खतरनाक बात थी.
"वह भी हो जे गए बेबे. तू 13 दिन दुःख में बिता के फेर कुनबा कत्था कर लिए. महारा भी सबकुछ तेरा है, राममेहर फूफा का भी आरर तेरी ससुराद का भी. 40 गाम कब्जे में आये पाछे तोह तू हे टिकट लेवे गई. फेर मैं देखु उस डॉक्टर ने आरर उसके घर की लुगाईया ने.", नरसिंघ की ऐसी बात सुनकर सुशीला हंसने लगे.
"मैंने याद है के तेरी नजर उसकी लुगाई पे है. याद भी है कितने साल पहला देखि थी.?
"ाहो. आज लाक याद है वाह आरर सच कहु तोह इतनी जानलेवा औरत न देखि बेबे कड़े.", नरसिंघ जैसे यादों में रेखा जी का चेहरा ध्यान करने लगा था.
"चाल वा सब बहोत दूर की बात है. फ़िलहाल तोह आज की घडी ध्यान में राखो. थोड़ी सी भी चूक होइ और सारे सपने ख़तम.", सुशीला वह से कड़ी हो कर पैदल हे गाँव की तरफ चल निकली.
"नरसिंघ, अपनी बात याद रखिये. मैं यु काम की कीमत लेके रहूँगा. तू मुकर कोन्या सकदा.", साथ हे बैठे इतनी देर से शांत इस लम्बे चौड़े अधेड़ की बात सुन्न कर नरसिंघ दांत दिखने लगा.
"भाई सुशीला की लेनी है ने? ले लिए. याद रखिओ कोई सा नई बचना चाहिए सुशीला ने छोड़ के. रात ने हवेली भी साफ़ कर देनी है.", नरसिंघ की ऐसी बात पर वह लम्बा व्यक्ति बोल उठा.
"बबिता की पहले मारूंगा फेर उसने मारूंगा. थाम लोग भी देख लिओ 3-4 है उनकी हवेली में. जुन्न सी हाथ चढ़े कोई रेहम नई आरर जितना दिल कर कार्यो फेर ..... समझदार हो कुणसा पहली बार करोगे. हाहाहा.", काला दिल और मैं का भी कला हे था और इन सबमे कही ताक़तवर. ये दूसरे रस्ते से चल पड़े तैयारी करने के लिए.
.
.
"गोलू भाई, के लगे है के जो भी हों लाग रहा है वह ठीक से? मां की बात सच्ची है लेकिन दूसरी तरफ माँ है मेरी. उसने बीच मई कोंनी छोड़ू.", बिजेन्दर 4 बजे हे गोदाम में आ चूका था और ये जगह अब पहले सी dhool-mitti वाली से विपरीत अंदर से साफ़ सुथरी दिख रही थी.
"मैं सलाह कोंनी दे सकू भाई बस इतना कहूंगा के ज़िन्दगी में कड़े कड़े जरुरी नहीं के जो पैदा करे वह सही होव आरर जो नुक्सान करे वह गलत. मां भी शातिर है आरर ताई तोह खैर के कहु. फेर तेरा भीम के बारे में यु सब बताना तोह मैंने भी परेशान करे है यार. तू खुद सोच के मैं किसी छोरी गइल दुष्कर्म करू तोह तू के करेगा? अपनी आख्यान के स्यामि यु सब थोड़ी देर पाछे हों वाला है."
"गोलू तू कड़े एहसा कोणी कर सके और मैंने भी या हे बात परेशां कारन लाग ऋ है के वा मेनका भीम की सगी छोटी बेबे है आरर विधवा अकेली. अर्जुन ुस्ते प्यार करे है या वाह उस लड़के ने तोह बात सही है लेकिन भीम जो करेगा वह तोह हत्या तेह भी बड़ा अपराध से गोलू."
"भीम ने हम कोन्या रोक सकदे या बात ध्यान रखिये. दूसरी ताई खुद अगर यु कारवां लाग ऋ है तोह हम तोह khud-ba-khud शामिल हो गए अपराध में. वैसे यु खेल बड़ा है हमारी सोच से. वह तेरी इंग्लैंड वाली बेबे भी तोह जुगत भिड़ा ऋ होगी किम्मे?"
"हाँ, इस सबमे तोह वाह है हे लेकिन माँ के गइल मिलके व दादी चंद्रो का काम कारन ाली है. कुंण करेगा यु तोह बेरा भी कोणी आरर दादी के कुछ होया तोह माँ जो इतने साल से चाहवे है वह उसने मिल जावेगा.", दोनों कुछ पल खामोश से बैठ गए थे एक तरफ. कुछ पल शांति बरकरार रही और फिर सामने वाला शटर थोड़ा ऊपर हुआ और ये 4-5 लोग अंदर आ खड़े हुए.
"के हाल है भीम काका? Raam-Raam छोटी दादी.", शीला देवी और उसका भीमकाय बीटा भीम उनकी तरफ आ रहे थे. पीछे हे 3 और आदमी थे जो बिजेन्दर की नजरो में हे थे. तीनो हे sapaat-sakht चेहरे वाले लम्बे चौड़े. लेकिन यहाँ खड़े सभी में भीम अलग हे नजर आ रहा था. उसका देहाती लेकिन चौड़ा बदन बिजेन्दर से 25 हे था. सख्त चेहरे पर लम्बी घनी मूछे और गले में सोने का चौकोर कैसा ताबीज काले धागे में पिरोया हुआ. वह सचमुच हे जैसे महाभारत से निकल कर आ खड़ा हुआ था उनके सामने.
"दादी के होव है रे? तू मेरा hum-umar है आरर मेरी माँ काकी की. काकी बुलाये कर आरर आड़े तोह hal-chal बदलन खातिर कत्थे होये है फेर आराम तेह हवेली पे करेंगे साड़ी बात.", भीम इधर उधर देखने लगा फिर सीधा उस कमरे में घुस कर वह से लकड़ी का तख़्त कागज़ की तरह मुट्ठी में पकडे इस भीतर वाले पक्के गोदाम में बिछा कर उसपे बैठ गया.
"ठीक बात है.", बिजेन्दर को गुस्सा तोह आया लेकिन वह दूसरी तरफ देखने लगा जहा वह 3 आदमी अब साथ वाले खुल्ले कच्चे हिस्से की तरफ चल दिए थे. जैसे ये जगह उनकी हे थी.
"तेरी माँ कोणी आवे के बीटा?", शीला देवी भीम की बगल में बैठी इन दोनों को देखती हुई बिजेन्दर से पूछ रही थी.
"आवे है माँ भी काकी. शबनम बेबे ने लेके वाह आड़े ाँ हे वाली होगी.", भीम उसकी बात सुनकर मुस्कुराया और पिछले कमरे से सुशीला इधर हे चलती हुई आ कड़ी हुई. पीछे हे दुपट्टे से मुँह ढके शबनम कड़ी थी. ये गली वाला रास्ता था जो भीम को भी अभी पता लगा था.
"घनी लम्बी उम्र है तेरी सुशीला."
"बेरा नई उम्र लम्बी है या तेरी जुबान काली है शीला. चाल तू अंदर कमरे में आजा आरर भीम के इरादा है मेनका ने आड़े बुलाएं का? 5 बज चुके है सब निबटा के सफाई भी करनी पड़ेगी" सुशीला के बात पर भीम के एक आंख हलकी सी कांपने लगी थी.
"काकी, उसने आड़े का पता देना ठीक कोन्या आरर घर पे जा के था के लयाणा तोह खेल हे खराब कर देगा."
"मतबल? तन्ने किम्मे बदलाव किआ है के?"
"हाँ काकी जरुरी था बदलाव करना भी. लेकिन उसने खुद कोन्या बेरा के वाह आड़े अपने आप ाँ लाग ऋ है.", सुशीला अचरज से देखने लगी भीम को.
"चंद्रो एडमिट है हस्पताल में आरर आखिरी सांस लेवे है. लाड़ली ने देखे बिना न मरती और लाड़ली लिकड़ चुकी है सब भूल के अपनी बड़ी माँ तेह मिलान. आड़े से हे जावेगी.", भीम के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ चुकी थी. और बाकी सब उसको हैरानी से देख रहे थे सिवाय शीला देवी के. बिजेन्दर खून का घूँट पी के रह गया क्योंकि अब वह तीन आदमी भी उधर हे आ खड़े हुए थे.
"यु किस तरिया एकदम से?", सुशीला अब भीम की तरफ हे आ कड़ी हुई थी और शबनम कपडे के पीछे से हे मुस्कुराती सब देखने लगी.
"तेरे साथ वाली लोमड़ी से पूछ काकी, नजर तोह इसने रखवा राखी थी. मैं तोह माँ ने मिलवां लेके गया था. फेर हस्पताल से हे ऋचा ने फ़ोन लगाया महारे जाए बाद मेनका धोरे.", अभी भीम बता हे रहा था के सामने से मूर्छित हालत में मेनका को 2 लोग पकडे हुए अंदर चले आये. माथे पर खून बह रहा था जहा एक आदमी ने कपडा रखा हुआ था. भीम फुर्ती से खड़ा हो कर उन दोनों के सामने आ गया.
"भान के लोडे यो के कर दिए? तेरी माँ छोड़ू.", एक के गाल पर कस के झापड़ जड़ते हे वह जमीन पर जा गिरा. दूसरे ने खुद हे मेनका भीम की तरफ कर दी.
"रुकी कोणी भीम भाई साहब तोह गाडी के शीशे पे ईंट मारनी पड़ी. अपना एक आदमी तोह गाडी के नीचे भी आ गया. लेकिन या बस बेहोश हुई है.", भीम पल में हे ठंडा हो गया था.
"किसी ने देख्या आरर गाडी?"
"किसे ने कोणी देख्या भाई जी. कोई आवे हे कोणी आड़े और गाडी बहार कड़ी है."
"अंदर कर तौली उसने. माँ ले लोडे कोई काम सही तेह नई करदे. इसके कुछ होया तोह थारी माँ छोड़ दूंगा.", मेनका को फूल की तरह उठाते हुए उसने दीवान पर दाल दिए. भीम की हालत देखते हुए खुद सुशीला ने उसके माथे को साफ़ करते हुए घाव देखा और तकिया फाड़ के ढेर साडी रूई वह लगा कर सफ़ेद लीर से पट्टी बांध दी. इस दौरान शीला देवी और शबनम भी मदद कर रही थी. गाडी अंदर करते हे शटर ाचे से बंद कर दिए गया था. 10 मिनट बाद सबकुछ शांत हो चूका था.
"बोलू थी न के प्लान मत बदले कर. लेकिन तू कड़े सुने है आरर शबनम के जरुरत थी इस सबकी? बुढ़िया मारनी थी तोह मार देती लेकिन सब एकसाथ नहीं करना था.", सुशीला जबड़े भींचे बोलने लगी तोह भीम भी नजरे झुकाये खड़ा हो गया.
"मौसी, मैं मेरा काम कर रही हु. अगर भीम ने ऐसे मेनका को उठाना था तोह मैं इसको भी नहीं बताती ये बात. लेकिन परशान मत हो आप. ये जगह ऐसी है के लोग इधर आने से कतराते है और भीम भी की कोई बचा तोह है नहीं. अब आपका काम कितना हुआ है?", शबनम पर जैसे कोई प्रभाव हे न पड़ा था सुशीला के क्रोध का. वह बिजेन्दर को देखने लगी तोह जैसे बिजेन्दर को कुछ पता हे न था.
"देखे के है be-akal. तेरा काम कोणी होया. 6 बजन वाले है आरर दुश्मन का किम्मे पता कोणी.", सुशीला के गुस्से के बावजूद बिजेन्दर शांत हे रहा.
"ताई वह भूरा उसने लें गया था 4 बजे. लेकिन स्टेडियम से छोरा साढ़े 5 या 6 बजे लिकडे करे है तोह थोड़ी देर में थारे सामने हे होगा.", गोलू की बात सुनकर भी सुशीला का गुस्सा काम न हुआ. लेकिन मेनका की कराह सुन्न कर एक बार फिर से सबका ध्यान उसकी तरफ हो गया. शीला ने झट्ट से मेनका के मुँह पर कपडा लगा दिए और सुशीला ने पीछे से बांधते हुए आवाज बंद कर दी. वह उठने की कोशिश करती उस से पहले हे पीछे से दोनों कलाई पकड़ कर भीम ने हाथ भी तकिये के कपडे से कस कर बांध दिए.
"मुँह बांधने की जरुरत नहीं है वैसे. दोनों तरफ खंडहर है और पीछे वाली गली भी वीरान है. बिपास यहाँ से 5 किलोमीटर है जहा शहर की आखिरी चालू ईमारत है.", बिजेन्दर मेनका की आँखों में ज़माने भर का दर्द देख रहा था. वह चटपटा भी नहीं प् रही थी.
"खोल दूंगा बेबे. सब खोल दूंगा और तू चाह के भी नहीं चीखेगी.", भीम की ऐसी बात सुनकर खून साणे चेहरे पर वही खौफ के भाव आ गए जैसे उसको उम्मीद थी.
.
.
"चलता हु भाई बस बहुत प्रैक्टिस हो गई.", इधर अर्जुन पसीने में लथपथ अपना अभ्यास ख़तम करता हुआ बेंच पर बैठ कर ग्लूकोस पी रहा था और बलबीर उसको आज रुकने के लिए मन रहा था.
"भाई 7 से 10 का शो है. चल न यार, सुमन जभी चलेगी अगर मंजू साथ जाएगी तोह."
"तोह भाई मंजू को ले जाओ यार. लेकिन मेरे घर आज कोई नहीं है तोह जाना जरुरी है. ताईजी अकेली होंगी.", अर्जुन फिर कपडे बदलने अंदर चल दिए और बलबीर भी. कुछ समय बाद हे दोनों साफ़ कपड़ो में पटरी पर चलते हुए स्टैंड की तरफ जा रहे थे.
"अर्जुन, सुनो जरा.", मंजू ने पास आते हुए कहा तोह बलबीर थोड़ा पीछे हो गया.
"मेरे साथ चलो, जरुरी बात है.", इस बार वह थोड़ी धीमी आवाज में अर्जुन का हाथ पकड़ कर आगे ले जाने लगी.
"चलते है परेशां क्यों हो रही हो.?", अर्जुन ने आराम से जवाब दिए और बलबीर को जाने का इशारा करता वह मोटरसाइकिल निकल कर मंजू को पीछे बैठने को बोलै. अभी दोनों स्टेडियम से निकल कर पहले चौक पर हे आये थे की ये तगड़ा पहलवान अर्जुन के हाथ में कागज पकड़ता एक तरफ जा कर खड़ा हो गया.
'चुपचाप गाडी में बैठ. मेनका', अर्जुन ने स्टैंड लगते हुए वही मोटरसाइकिल कड़ी कर दी. अपना बैग मंजू को देता वह होंठो पर ऊँगली रखने के बाद उस लड़के के बराबर कड़ी काले शीशे वाली जेन कार की तरफ बढ़ गया. मंजू के चेहरे पर एक डर साफ़ झलक रहा था. लेकिन गाडी को जाते देख वह बस नंबर पढ़ सकीय. अर्जुन को उसने आगाह भी किआ था के मेनका के साथ उसकी भी जान खतरे में है लेकिन वह फिर भी उसकी बात maan-ne की बजाये मनमानी करता रहा. अब आफत आ हे चुकी थी.
'Beep-Beep' की इस धीमी आवाज को सुनते हे मंजू होश में आई. वह अभी भी मोटरसाइकिल के पास हे जमी हुई कड़ी थी लेकिन बैग के अंदर से आई इस आवाज ने उसका ध्यान भांग किआ. तुरंत चैन खोलती वह ऊपर वाली जेब देखने लगी. यहाँ एक कागज़ और ये छोटा सा यन्त्र था कैलकुलेटर जैसी स्क्रीन वाला. 'इस नंबर पर फ़ोन करो.' मोटोराला लिखा ये कला सा यन्त्र एक सन्देश दिखा रहा था और मंजू ने वह कागज देखा तोह वह भी एक और नंबर लिखा था जिसके नीचे अर्जुन का सन्देश था.
'परेशां मत होना और इस पर फ़ोन करके बता दो अर्जुन निकल गया है. स्टेडियम के गार्ड रूम से फ़ोन करके तुम घर चली जाना. लव यू.", मंजू भौचक्की रह गई ये पढ़ते हे. मतलब अर्जुन पहले से तैयार था और वह खुद हे मंजू को दूर रखे थे.
"आप फ़ोन कर लीजिये. मोटरसाइकिल मैं पंहुचा दूंगा.', ये 6 फ़ीट का सफ़ेद कमीज और नीली पतलून में खड़ा व्यक्ति मंजू के लिए किसी जीन की तरह था. जाने कहा से एकदम आया और अर्जुन की मोटरसाइकिल लेकर यूनिवर्सिटी की तरफ चला गया. मंजू भगति हुई स्टेडियम की तरफ उड़द चली.
.
.
हाथ बांध दो लेकिन आँखें क्यों बंद कर रहे हो भाई? मैं इतनी शराफत से तोह साथ चल रहा हु तुम्हारे.", अर्जुन के दोनों हाथ नायलॉन की डोरी से बांधने के बाद उसकी अगल बगल बैठे पहलवानो ने बिना कुछ जवाब दिए सफ़ेद कपडा आँखों पर बांध दिए.
"ाची बात है.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ आराम से पीठ सीट पर टिकता बैठ गया. वह दोनों पहलवान थोड़ा हैरान थे की यहाँ वह अपहरण करके ले जा रहे है और ये लड़का उन्ही पर मुस्कुरा रहा है.
"भूरे, इसका के चक्कर है?"
"भाई सुशीला तै ने इसका काम करना है. मैं तोह जानू हु के लड़का शरीफ है पर के कर सका है.?", ये गाडी चलता हुआ पहलवान जैसे हमदर्दी जाता रहा था अर्जुन के साथ.
"वैसे भैया आप थोड़े दिन पहले अपने दोस्त के साथ मुझे हे देखने तोह आये थे स्टेडियम. वह माजरा अलग था न.?", अर्जुन की बात सुन्न कर एक पल को वह चुप रहा फिर बोलै.
"ग़लतफहमी हो गई थी छोटे भाई. नजर मारने आये थे के वह लड़का कौन है जिसने बिजेन्दर भाई पर हाथ उठाया था.", भूरा देसी भाषा की जगह सरल हिंदी में जवाब देने लगा.
"ग़लतफहमी नहीं थी आपकी. मैं हे था जिसने बिजेन्दर पहलवान पर हाथ उठाया था जब वह विकास भाई से लड़ने आये थे.", अर्जुन के इस खुलासे से चारो एक पल उसको देखने लगे फिर भूरे ने नजर सड़क पर कर दी. हल्का ubad-khabadd रास्ता था ये बाईपास शुरू होने पर.
"मौत इन्तजार कर रही है और तू यहाँ डींगे हक रहा है. बिजेन्दर बीच से चीयर के रख देगा तुझे लेकिन वह नहीं मारने वाला. पर और बहोत लोग है ऐसी इत्छा लिए वह.", अर्जुन खामोश हो गया था अब. जैसे उसका ध्यान माहौल को समझने में रम चूका हो. बाकी सब भी आगे कुछ नहीं बोले. ये छोटी सी गाडी अंदर से जानदार हे थी. और जल्द हे वह पलभर के लिए रुकी. आगे से बायीं तरफ का दरवाजा खुलने और बंद होने की आवाज के बाद 30 सेकंड बाद हे थोड़ा आगे चलती फिर बंद हो गई.
"निकालो रे बहार इसने. अपना काम ख़तम तोह आड़े रुकने का कोई फायदा नहीं.", लेकिन भूरे की बात ख़तम हुई हे थी की उसको एक तरफ धकेलता हुआ भीम आगे बढ़ा और अर्जुन की गर्दन पकड़ कर उसको जमीन पर गिरा दिए.
"कोई कही न जा रहा जितने काम ख़तम न हो जाता. इस बहनचोद की छाती मैं सबके सामने पडूंगा.", अर्जुन आँखों पर बंधी पट्टी के साथ हे उठने लगा था के पीठ पर एक तेज प्रायः किआ भीम ने और एक बार फिर वह जमीन पर जा लगा.
"भीम, यु मेरा आरर इसका मामला है. तू बाद में देखिये.", बिजेन्दर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ था. भीम एक बार उसको अपनी आग उगलती आँखों से देखने लगा फिर सुशीला को. बिजेन्दर ने अर्जुन की आँखों से पट्टी खोली हे थी की सुशीला भी इधर चली आई.
अर्जुन के होंठ और माथे से हल्का खून आ रहा था. उसका चेहरा ऊपर करती वह गुस्से से अर्जुन को देख रही थी.
"बिजेन्दर मैं तोह कहु सु के भीम ने हे यु ख़तम कारन दे. तू एक तरफ हो जा."
"न माँ. शंकर आरर मेरे बाप में भी मुकाबला होया था आरर आज मैं भी इसके खून की गर्मी देखना चहु हु. बाद में भीम जो मर्जी करे इसके साथ लेकिन मौका जरूर दूंगा इसने मैं.", बिजेन्दर अपनी बात कह रहा था उधर अर्जुन से 40 फ़ीट दूर मेनका के गले पे चाक़ू रखे शीला देवी कड़ी थी. अर्जुन के हाथ खुलने के बावजूद बंधे हुए थे.
"बेबे, अगर तू मेरी बात मान लेती तोह मैं इस सब में ना पड़ता. खैर तू दगाबाज हो गई तोह के बात लेकिन मैं पहले इसने मारूंगा फेर इसकी लाश के बगल में तेरे से प्यार गइल अपना नया रिश्ता बनाऊंगा. आशिक़ है न तेरा यु? भाई में के कमी थी जो यु पसंद किआ.", भीम चलता हुआ मेनका के पीछे आ खड़ा हुआ और शीला देवी एक तरफ हो गई. गर्दन पर चाक़ू अब भीम रखे हुए था. मेनका की मुँह पर बंधी पट्टी हटते हुए वह हंस रहा था.
"अर्जुन.. मुझे माफ़ कररर दो.. भैया आपने जो करना है मेरे साथ कर लीजिये. मैं साथ जाने को तैयार हु हमेशा के लिए. प्लीज इसको जाने दीजिये.", शीला देवी न एक करारा झापड़ मेनका के मुँह पर जड़ दिए उसकी बात सुनते हे.
"हरामजादी महीना न होया विधवा होये और यार बनाये बैठी है. इतनी खाज थी तोह मैंने कहती तेरे पे यु सांड मैं खुद चढ़वा देती. यु रामेश्वर का पिल्ला पसंद आया तन्ने.", मेनका के होंठ से खून की बून्द थोड़ी तक आने लगी थी और अर्जुन के चेहरे पर हल्का सा दर्द उभर आया. वह जमीन पर घुटने टिकाये खामोश सा आँखों को बंद किये बैठा रहा.
"देख जरा शंकर का नकली खून. यु पसंद आया था जो न मुअकबला कारन ने तैयार लागे है आरर न तेरी खातिर एक लफ्ज़ लीकडया इसके मुँह से.", सुशीला जाने किस बात पर भड़क उठी थी जो एक तरफ रखा डेढ़ इंची का लोहे का पाइप अर्जुन के सर पर मारती उसके सामने थूक कर आगे बढ़ गई. सर इस चोट से कुछ पल के लिए जमीन पर टिका लेकिन टपकते खून के साथ हे वह फिर से चेहरा सामने करते हुए उन्हें देखने लगा. पाइप जैसे उतना मजबूत न था या अर्जुन का सर पत्थर होगा. खून तोह निकला था लेकिन कोई बड़ा घाव जैसे कुछ न हुआ.
"जब सब थक्क जाओ तोह बता देना.", अर्जुन ने मेनका के सुबकते हुए चेहरे को देखते हुए बस इतना हे कहा.
"पूरे 5 मिनट है तेरे पास. या तू मैंने मार दे अर्जुन या मैं तेरा हाल खराब कर दूंगा. बाद में तेरा तोह निश्चित है मरना.", बिजेन्दर ुको खड़ा करने के लिए बाजू पकड़ कर ऊपर उठा रहा था लेकिन जैसे शरीर में जान न थी या अर्जुन अचानक से चट्टान बन्न गया. अर्जुन ने इस पल में बिजेन्दर को जैसे देखा वह पहले थोड़ा झेंप सा गया फिर अर्जुन की आंखों में जलालत देखते हे उसकी छाती में घुटना मारता हुआ चीखने लगा.
"तू घाना अकड़े है? मैं सोचु था के तू समझ दर होगा लेकिन तू मरना हे चाहवे है." जमीन पर गिरे अर्जुन को घसीट कर वह गोदाम और इस फर्श के बीच वाले मिटटी के हिस्से तक घसीट लाया.
"सुशीला बुआ, खुश तोह बहुत होंगी आप. अपने बेटे के साथ विश्वासघात कर सकती हो तोह बाकी जितने यहाँ है उनकी भी बलि चढाने का प्रबंध करके आई होगी.?" अर्जुन अपने होंठो पर आया खून मिटटी में थूकता हुआ सुशीला को देखने लगा. अर्जुन की ऐसी मुस्कान देख कर सुशीला का रंग उड़द गया था.
"के के बाके है तू? मौत सर पे कड़ी है और भाषण देवे है मैंने. कोई बुआ न लगती मैं तेरी."
"बबिता और बिजेन्दर का रिश्ता तोह कभी होने नहीं वाला, ये मूरख औलाद वैसे हे मेरे साथ म्हणत कर रहा है. और जो खुद लड़की के गर्दन पर चाक़ू लगाए खड़ा है वह खुद को भीम समझता है. थोऊ है ऐसे नामर्दो पर.", अर्जुन जमीन से उठ खड़ा हुआ था और कपडे झाड़ता बिजेन्दर को घूरने लगा.
"माँ यो किस तरह जाने है या बात? आरर यु तन्ने बुआ कहके बुलावे है मतलब झूठ तोह कोणी बोले है.", बिजेन्दर की बात ख़तम हुई और उधर से भीम सांड की तरह दहाड़ता अर्जुन पर लपका. मेनका की गर्दन पर कोई चाकू न था क्योंकि भीम अर्जुन पर उस से हे प्रहार करने लगा था.
'ढड्ढाममम", जिस रफ़्तार से भीम उसकी तरफ आया था उस से दोगुनी रफ़्तार के साथ वह जेन का शीशा तोड़ता हुआ उसके अंदर जा फंसा. अर्जुन की कलाई के ऊपर ये 2 इंच लम्बा घाव जरूर बन्न गया था लेकिन कोई परवाह न थी. बाकी सबका जैसे हलक सूख चूका था भीम की हालत देख कर. आनन् फानन में शीला देवी ने ये दूसरा चाक़ू मेनका की गर्दन पर कस दिए था. हल्का खून बहार चालक आया था वह से. अर्जुन एक बार फिर से असहाये हो गया था. जो 3 आदमी भीम के साथ आये थे अब अपना दम दिखते वह रूई की तरह अर्जुन पर laat-ghunse बरसते पिल पड़े. बिजेन्दर अपनी माँ को देख रहा था जो मुस्कुरा रही थी और मेनका का बेहटा खून देख जमीन पर गिरे मार कहते अर्जुन का उसके प्रति प्यार.
"बहनचोड़ दूर हत्तो. गोलू मार इन कमीं लोग ने.", बिजेन्दर झोटे की तरह उन तीनो से भीड़ गया था. और उसकी आवाज सुन्न कर इतनी देर से सर झुकाये खड़ा गोलू भी अपने दोस्त की राह पर चल दिए. भूरा और उसके दोस्त आगे आये और इधर एक के बाद एक 6 गोलियां उस रिवॉल्वर से छूट गई. शबनम के हाथ में धुँआ छोड़ती खली रिवॉल्वर थी और इधर जमीन पर भूरा, गोलू, भीम का एक आदमी और बिजेन्दर का वह पहलवान दोस्त जो अर्जुन को लेके आया था गिरे पड़े थे. शबनम कोई निशानची न थी लेकिन 6 गोलियों में 4 लोग उसने गिरा दिए थे. माहौल पूरा बदल चूका था. शबनम अभी भी ट्रिगर दबा रही थी इस उम्मीद से की कही से कोई और गोली चले और निशाने पर आया अर्जुन भी अपने अंजाम तक पहुंच जाए.
"शबनम दीदी. ये काम आपने आते हे क्यों नहीं कर दिए था? ये सब बेवजह मारे न जाते.", अर्जुन में उठने की ताक़त न थी लेकिन वह गर्डर उठता हुआ शबनम को जैसे जलील कर रहा था.
"मिन्दे, अपनी रिवोलेर लिकड़ के ले आ. साले सारे मारने है ये. कोई बचके न जा सके.", भीम जैसे तैसे बहार निकल कर गाडी पकडे खड़ा था. अपने एक आदमी से उसने पहले हे रिवॉल्वर प्लाट वाले हिस्से में रखवाई थी ये सोच कर की अगर कोई बहार आये तोह छत्त से हे टपका देना. वह आदमी भी फुर्ती से उस और भगा. बिजेन्दर जमीन पर गिरे अपने दोनों दोस्तों का सर थामे बैठा था. गोलू की सांसें चल रही थी क्योंकि गोली पेट में थी लेकिन भूरा शांत हो चूका था. एक गोली सीने में और दूसरी उसके दिल के ठीक ऊपर लगी थी. पक्का फर्श खून से ऐसे भरा था जैसे बाल्टी भर के वह उड़ेल दिए गया हो.
अगला दृश्य एकदम अलग था जहा भीम का मददगार जमीन पर रगड़ता हुआ अंदर आ रहा था और उसके आगे साढ़े 6 फ़ीट का ये दाढ़ी वाला 45-50 के करीब का यमराज सा आदमी जिसने मिन्दे की टांग पकड़ राखी थी.
"माहौल तोह ज्यादा खराब कर दिए तुमने सुशीला. और शीला वह चाकू हटा लो नहीं तोह सूनी मांग तुम्हारे हे खून से भरने में मुझे कष्ट नहीं होगा.", शीला और सुशीला के पसीने छूट गए थे अपने सामने इस पहाड़ को खड़े देख कर. भीम के दोनों आदमीओ के चेहरे पर सटीक गोली मरते हुए उसने अपनी बात पुख्ता कर दी थी की वह शबनम की तरह कोई कच्चा निशानची न था. शीला एक तरफ कड़ी हुई और शबनम ने इस तरफ से वह लोहे का पाइप पूरी जाने से इस व्यक्ति के सर पर मारने का उपक्र्रम किआ.
"जानती मुझे तोह ये चेष्टा नहीं करती लड़की. ये तिनके उमेद सिंह से टकरा कर मदद सकते है लेकिन हमें खरोच भी नहीं दे सकते.", शबनम को उसके हाल पर छोड़ता उमेद सिंह शेर सी चाल चलता बड़े आराम से बिजेन्दर के सर पर आ खड़ा हुआ.
"बीटा बहार गाडी कड़ी है और ड्राइवर भी. इसको हॉस्पिटल ले जाओ ये ज़िंदा है.", बिजेन्दर के आंसुओ से गीले चेहरे पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए उमेद सिंह ने जैसे उसको हिम्मत दी और बाकी दोनों दोस्त भी तेजी से लपके. आनन् फानन में शटर खोलते वह गोलू को उठाये बहार निकल लिए.
"तोह भीम सिंह, बाज नहीं आते न तुम. हालत तोह तुम्हारी भी ठीक नहीं है लगता है किसी नए शिकारी से टकरा गए इस बार.", पहली बार चेहरे पर मुस्कान आई थी उमेद सिंह के और वह अपना भूरा ray-ban उतारते हुए भीम का चेहरा पकड़ कर ऐसे देखने लगे जैसे डॉक्टर मरीज का निरिक्षण कर रहा हो.
"अर्जुन, मेनका को खोल दो और इन तीनो को बांध दो. चलो फिर काम धंदा करते है, बहोत समय खराब हो गया.", उमेद सिंह ने उस चश्मे में हे प्रतिबिम्ब देखा था शबनम को जो भागना चाहती थी लेकिन आवाज और रिवॉल्वर अपनी तरफ देख कर वही ृक्क गई. अर्जुन हल्का सा लड़खड़ाता हुआ मेनका की और बढ़ा. रस्सी खोलते हे वह उसके गले लग चुकी थी. और यही उमेद सिंह से गलती हो गई जो वह बहार से आते इन 5 बदमाशों का न देख सका लेकिन फुर्ती से एक तरफ होता वह उनकी गोली से जरूर बच गया था. लेकिन शीला देवी इतनी खुशकिस्मत न थी. गले को चीरती वह गोली बहोत थी उसका शरीर जमीन पर गिराने के लिए.
नरसिंघ के पास पिस्तौल थी और बाकी 4 के हाथ में एक तलवार और 3 लोहे की रोड. और अपनी गोली का गलत निशाना देख कर वह भी गाडी के दूसरी तरफ चिप्पे उमेद पर 12-14 फ़ीट से गोली बरसाने लगा. उधर से भी 4 गोलियां चली जिसमे 2 लोग मारे गए, एक तोह वही था जिसको सुशीला चाहिए थी. नरसिंघ की बन्दूक से भी आखिरी गोली उमेद के पांव में जा घुसी थी.
"बच न सकता आज तू उमेद. गोली तेरी भी ख़तम आरर मेरी भी लेकिन तू अकेला है और हम 4.", नरसिंघ ने भीम को भी सहारा देते हुए उठा लिए था. काला उमेद की तरफ बढ़ा क्योंकि शरीर से वही था जो उमेद से टकरा सकता था, भीम की हालत दुरुस्त होती तोह शायद वह भी ऐसी हिमकर कर सकता था. लेकिन उन चरों का ध्यान अपनी तरफ बढ़ती मौत पर न गया जो तीनो महिलाओ को कमरे में बंद करने के बाद उनकी तरफ आ रहा था.
"उमेद तुम जैसे 4-5 पर नींद में भी भरी पड़ेगा हिजड़े. नरसिंघ नाम रखने से तू शेर नहीं बन्न ने वाला.", काले की तलवार का वॉर बचते हुए उमेद ने उसकी कलाई पकड़ ली थी लेकिन हवा में गूंजी इस चीख को सुन्न कर सभी इधर हे देखने लगे.
"वार सामने से करते है भीम, पीछे से गीदड़ हे झूठन चुराने आते है.", अर्जुन ने उमेद की तरफ लोहे की रोड लिए बढ़ रहे भीम सिंह को कमर से पकड़ कर उस गाडी के बोनट पर ऐसे दे मारा था के भीम की चीख में गाडी का टूटना भी सुनाई न दिए था. बचे हुए शीशे भी मिटटी की तरह हर तरफ बिखर गए थे और भीम कटे वृक्ष सा आधा बोन्नुत पर और आधा गाडी की छत्त फाड़े उसके भीतर. शरीर कुछ हिलने के बाद शांत हो गया था लेकिन अब नरसिंघ की कलाई अर्जुन के हाथ में थी. उधर उमेद भी कुछ जोश में काले की तलवार उसकी हे छाती के भीतर दाल चूका था.
2 और गोलिया चली जिसके साथ हे नरसिंघ जमीन पर गिर गया बिना अर्जुन की मार खाये और आखिरी वाला भागने से पहले हे जमीन सूंघ रहा था.
"छोटे पंडित, हमेशा देरी से हे आती है पुलिस. खैर तुम आये तोह अब सम्भालो ये सब. मैं निकलता हु.", संजीव भैया गंभीर चेहरे से अर्जुन को देख रहे थे, जो मुस्कुरा रहा था. उमेद सिंह संजीव को आँख दिखते हुए अर्जुन के सीने से लगते हुए बस इतना हे बोले, "नाज है तुझपे. मैसेज देरी से मिला उसके लिए सॉरी, वह चुनाव भी आ रहे है न."
"चाचा, फ़ोन करता हु सुबह.", अर्जुन ने भी संक्षिप्त सा जवाब दिए और वह अँधेरे में बहार निकल गए.
"ये सब मुझे मंजू के फ़ोन से पता चला. और दादाजी से तेरा पेजर नंबर. इतनी बड़ी वारदात तू अकेले करने निकल आया?", गुस्से में उन्होंने भीम के चेहरे में 2 गोलियां उतार दी थी.
"जेब देख लिए करो जरा अपनी. गाडी में बैठने से पहले मैंने कागज डाला था. सीक्रेट सर्विस वाले अंडरकवर.", अर्जुन उनके गले लगते हुए हंसने लगा. संजीव भैया बी अपने छोटे भाई की हंसी पर शांत हो गए थे.
"बाकी सब कहा है?"
"उधर बंद किआ हुआ है हाथ बांध के.", उनके साथ हे वह सुशीला और शबनम के पास आ गया जो जमीन पर बैठी थी, हाथ पीछे से बंधे थे उनके. और एक तरफ कड़ी मेनका के गले पर अर्जुन का रुमाल बंधा था.
"चल तू मेनका को ले कर निकल मैं इन्हे जरा ससुराल के दर्शन करवाता हु. वैसे तोह इरादा कुछ और है लेकिन कानून की हद्द में रहना ज्यादा सही रहेगा. घर पे ये अंडरकवर वाली बात."
"हाँ नहीं कहता मैं कुछ भी लेकिन अपने छोटे भाई से मत छुपाया करो इतना सब. रिवॉल्वर रखनी नहीं आती आपको अभी तक."
"तेरा पेजर है कहा? और ये इतना एडवांस्ड पेजर तेरे पास?", संजीव भैया सुशीला के पीठ पर रिवॉल्वर लगाए चल रहे थे और शबनम भी सेहमी हुई साथ हे थी.
"मेरे पास बहोत कुछ है लेकिन मनाही है. पेजर उमेद चाचा के कहने पर एक पोलिसवाले कल देके गया था और दादाजी को पता था. इसलिए सब घरवाले बहार हैं.", अर्जुन ने ये जोर का झटका दिए था संजीव भैया को.
"वो इस सब के बारे में जानते है? और उन्होंने तुझे इजाजत दी इस सबकी? बिना सोचे की तू इतना छोटा है और यहाँ जान जा सकती थी.", संजीव थोड़ा सकते में था.
"यहाँ और भी लोग है भैया. दूसरी बात उन्हें ये पता है के उमेद चाचा सब कर रहे है, मैं तोह सिर्फ छोटा सा प्यादा हु. समझ लो खबरि जैसा. इधर तोह मैं आया हे नहीं हु. आप उनसे भी यही कहेंगे.", अर्जुन ने बहार कड़ी जीप को देखा तोह थोड़ा सोचने लगा. फिर शटर के पास कड़ी बुलेट देख कर वह उसकी तरफ बढ़ा. ये बिजेन्दर की थी और चाबी उसमे हे लगी थी.
"किसी को मैं कुछ नहीं कहने वाला लेकिन तुझसे बहोत सवाल है मेरे. मंजू अगर फ़ोन न करती तोह यहाँ गड़बड़ हो जानी थी आज.", संजीव भैया ने दोनों महिलाओ को जीप के पीछे बैठने के बाद सीट के साथ हे एक एक हाथ उनके हथकड़ी से बांध दिए थे.
"मंजू न करती तोह भी आपके पास फ़ोन आता. वैसे पेजर देख लीजिये मैसेज जरूर होगा पूरे 6 बजे.", अर्जुन ने मेनका को अपने पीछे बिठाया और संजीव भैया अपने पेजर की हरी लाइट में वह सन्देश पढ़ने लगे.
"हम्म. तोह तुझे मेरा पेजर नंबर भी पता है?"
"आप आगे चलो मैं आराम से आता हु. सवाल मेरे भी बहोत है लेकिन फिर कभी बात करेंगे जब आपका दिल हो jeera-lemon पिलाने का. अभी मुझे कुछ काम है." , अर्जुन ने किक लगते हुए वह बुलेट स्टार्ट की और भैया गाडी में बैठ ने के साथ हे वायरलेस पर कोई सन्देश देने लगे. आज पहली बार वह अपना परिचय दे रहे थे. आईपीएस सजीव शर्मा. लाल बत्ती वाली वह जीप उनसे आगे चलने लगी थी और अर्जुन धीमी रफ़्तार से ये अलग तरीके की बुलेट चलता ठंडी हवा का लुत्फ़ लेने लगा.
"आज तुमने मुझे खरीद लिए अर्जुन. बेशक तुम मुझे फिर कभी मत देखना लेकिन मैं तुम्हे बचाना हे चाहती थी.", मेनका उसकी कमर में हाथ डाले भावुक हो गई थी और पछतावा भी था के इतना सबकुछ हो गया.
"ये ऐसे वक़्त पर भी रोने की वजह समझ नहीं आ रही. तुम मेरे साथ हो, दोनों ज़िंदा और सलामत. हमारे प्यार की वजह से देखो आज भीम सिंह भी नहीं रहे और तुम्हारी माँ भी. देखा जाये तोह तुम्हे मुझसे नफरत करनी चाहिए क्योंकि मेरी वजह से परिवार ख़तम हो गया तुम्हारा.", अर्जुन सपाट लहजे में कह रहा था. लेकिन मेनका जोर से उसकी पीठ से लिपट गई.
"आज मैंने देखा था तुम्हारी आँखों में. तुम अपनी जान भी देने को तैयार थे. कैसे कर सकते हो इतना प्यार वह भी ऐसी औरत से जो शायद तुम्हारी दुश्मन हे थी एक तरह से.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले हे 'भदायकक.. chhrrrrrrrrrrr' का ये धमाका वातावरण को हिला गया. उनसे 500 मीटर दूर चल रही भैया की जीप इस बाईपास वाले मदद से विपरीत दिशा में उछलती हुई सड़क से परे घने वृक्षों में जा लगी. धमाके की गर्जना ऐसी थी की एक पल के लिए बुलेट भी अनियंत्रित हो गई लेकिन अर्जुन बदहवास सा खुद हे मोटरसाइकिल नीचे गिरता उस तरफ भागने लगा. स्थिति हर तरह से बेकाबू हो चुकी थी. उस सेंटर से उतर कर 3 लोग जीप की तरफ भद्द रहे थे जब तक अर्जुन वह पहुँचता एक आदमी ने ड्राइवर के भेजे में गोली उतार दी थी. दूसरा पीछे वाले हिस्से की तरफ जाता खली कनस्तर से जैसे पानी छिड़कने लगा था.
"संजीव कड़े गिरा है रे? उसने ज़िंदा नहीं छोड़ना.", वह आदमी आगे कुछ कहता उस से पहले हे 2 गोलिया उसके सीने में आ लगी उधर झाड़िओ से. बाकी दोनों भी उधर हे लपके लेकिन कोई और गोली चलती उस से पहले हे अर्जुन दोनों को लिए अँधेरे में कूद गया.
"कडाकक" की तेज आवाज और जंगल इस आदमी की चीख से गूँज उठा. अर्जुन ने रीढ़ का जोड़ हे टॉड दिए था. दूसरा संभालता उस से पहले हे उसका शरीर जीप पर जा गिरा.
"Bhaiya-Bhaiya..", अर्जुन पुकारता हुआ आगे बढ़ रहा था और सामने से कराहता हुआ संजीव पसलिया दबाये दूसरे हाथ में पिस्तौल के साथ रगड़ता हुआ आ रहा था. अर्जुन ने फुर्ती से उन्हें अपने कंधे पर डाला और सड़क की तरफ बढ़ने लगा. अँधेरे में दोनों भइओ के chehre-sar से खून बेहटा जमीन गीली कर रहा था. ये मजबूत सा हाथ अर्जुन के पाँव पर कैसा तोह वह जैसे नीचे बैठने लगा, लेकिन फिर खुद हे मुट्ठी खुल गई थी.
"मोहर सिंह.. मोहर सिंह है ये. अर्जुन ऐसे हम नहीं जा पाएंगे भाई.. तू जीप देख, मैंने वायरलेस किआ हुआ है. उन्हें बता इसके बारे में.", इधर मेनका भी आ कड़ी हुई थी. कुछ और न सूझा तोह अपने सर पर बंधी पट्टी और गले का रुमाल वह संजीव भैया के सर पर दबती हुई उनका खून रोकने लगी. किस्मत इतनी भी बेरहम न थी आज. अर्जुन की आँखों में आंसू देख शायद भगवन भी तरस खा गया था. लाल बत्ती की जीप और बड़ी वन मदद से इधर आती दिखी. अर्जुन अपने भैया को कंधे पे लिए ठीक सड़क के बीच खड़ा होता उनके सामने आ गया.
"इन्हे जल्दी हॉस्पिटल लेके चलो. और उधर जीप में देखो के कोई ज़िंदा है क्या.", अर्जुन की बात सुन्न कर भैया दर्द में भी मुस्कुराने लगे.
"ये अपना काम कर लेंगे. इधर लकी है मेरे साथ. तू यहाँ से निकल और जुबान बंद रखना. मैं जल्द मिलता हु तुझसे.", लकी भी संजीव की हालत देख घबरा गया था लेकिन दूसरी गाडी वालो को निर्देश देता वह जीप लिए शहर की तरफ निकल चला. जीप में सुशीला और शबनम शायद बेहोश हो गई थी जिन्हे ये 4 पोलिसवाले गाड़ी में डालने के बाद बाकी 3 अधमरे और मृत व्यक्तिओ और ड्राइवर की लाश को भी वन में लिटा कर वापिस निकल गए. घटनास्थल पर एक हवलदार छोड़ कर.
"भाई, जरा वह से मेरी मोटरसाइकिल ला दो गए?", अर्जुन ने कमर पर हाथ रखते हुए उस पोलिसवाले से कहा और वह बिना कुछ कहे अँधेरे में उस तरफ चल दिए. अर्जुन की सोच से कही ज्यादा हे बड़ा मामला हो गया था ये. आज एक पल के लिए वह जैसे अपने भैया को खो हे चूका था. ऐसा हो जाता तोह शायद अर्जुन ज़िन्दगी भर ये इल्जाम अपने दिल पर लिए रहता. जैसे तैसे वह खामोश सा मेनका को लिए उसके घर आ गया. अगले 10 मिनट में वह बिस्टेर पर लेता था मंजू के कमरे में जहा ये डॉक्टर साहब उसके हर घाव पर मरहम लगाने के बाद नींद का इंजेक्शन दे कर चले गए थे. कुछ ऐसा हे दूसरे कमरे में मेनका के साथ हुआ था.
"इसका ध्यान रखना बिटिया. और होश में आने पर कह देना के रामेश्वर शर्मा के सवाल इसका इन्तजार कर रहे है. ये मासूम प्यादा मेरी gair-maujdgi में वजीर बन्न बैठा.", ये पंडित जी हे थे जिनके साथ तेजपाल शर्मा चुपचाप खड़े थे.
"कोई घबराने वाली बात तोह नहीं है न दादाजी?", मंजू की आँखों में आंसू देख कर वह मुस्कुरा दिए.
"ये मेरा अभिमान है बिटिया, कभी कुछ नहीं हो सकता इसको. लेकिन नासमझ है थोड़ा ज्यादा होशियार पता नहीं. घाव छोटे मॉटे है 1-2 दिन में तोह दिखने वाले भी नहीं. चलो आज बिटिया तुम्हारे हाथ की चाय पीला दो अब आ हे गया हु तोह फिर क्या 10 मिनट और क्या घंटा.", रामेश्वर जी मंजू को सर सहलाते हुए बहार सोफे पर आ बैठे.
"तोह बिट्टू मिया, देख लिए नजारा?"
"पंडित जी, ये पागलपन हे था. संजीव मारा जाता अगर ये न होता तोह. उमेद के भी पाँव में गोली लगी है. लेकिन ये कैसे पहुंच गया उधर?"
"पोलिसवाले का खून तोह कही न कही सबमे हे है इस घर में. इसने कहा था के ये उमेद की मदद करेगा, गुरु है न वह इसका. लेकिन उमेद भी जैसे इसका गुलाम हो गया है. बाकी सब तोह जांच के बाद पता लगेगा. कहा खाद में मिटटी देने की बात कही थी और ये सब साफ़ कर आया.", रामेश्वर जी की मुस्कान रहस्य से भरी थी.
"चंद्रो देवी की हालत भी स्थिर है अब. डॉक्टर कह रहे थे की खतरे से बहार है. Bheem-Sheela देवी ने 3 और लोगो की मदद से सुशीला के परिवार पर हमला किआ जिसमे मोहर सिंह के साथ 12 और लोग मारे गए है अपराधियों को मिला कर.", जैसे तेजपाल मां ने खाखा तैयार किआ हो रिपोर्ट बनाने से पहले.
"हम्म्म.. 12 की जगह 13 कर दो तेजपाल. एक को हमने खुद आजाद कर दिए. भाभी जी से मैं परसो मिल लूंगा और सुशीला को कहना की रामेश्वर आज भी उनका भला हे सोचता है बेशक उसकी वजह से मेरे बेटे की खुशिया मैंने ख़तम कर दी लेकिन उसको ba-ijjat बरी कर दिए गया है. बिजेन्दर से व्यक्तिगत मुलाकात मैं परसो कर लूंगा. हाँ शबनम को अपनी निगरानी में रखना, शंकर करेगा बात आने पर.", इधर मंजू चाय रखने के बाद मेनका के कमरे में चली गई.
"जी. आर्डर और फाइल तोह आप भिजवा हे देंगे. वैसे अभी आप यही रुकने वाले है?"
"बरखुरदार तुम्हारे पिता जी ने आज दावत राखी है तोह हम यहाँ क्या करेंगे. 8:00 बजे है तोह 45 मिनट में तोह तुम मुझे घर उतार हे डोज.", तेजपाल जी के चेहरे पर भी हंसी आ गई.
"वैसे सच कहु तोह अर्जुन को देख कर गर्व होता है."
"हाँ भांजा जब मां की गर्दन पकड़ने लगे तोह गर्व होगा हे. हाहाहा.. वैसे सच बात है. मैं इसको इन सबसे दूर रखना चाहता हु लेकिन छह कर भी रख न पाउँगा.", रामेश्वर जी कमरे में निगाह मरते हुए अर्जुन को देखने लगे.
"अब चिंतित होने की वजह हे नहीं है अंकल. सब साफ़ तोह कर हे दिए है संजीव और उमेद ने मिलकर. जो बचे है वह दोस्त रहेंगे या शुभचिंतक."
"इसके साथ एक समस्या है बीटा. काम न मिले तोह ये खुद हे ढून्ढ लेता है. अभी तोह चलो जो हुआ सो हुआ. और मैं भी कोशिश करूँगा के इसकी शिक्षा थोड़ी ज्यादा बढ़ा दू, मेरे लिए हे ाचा रहेगा. चलो भाई अब चलते hi. बेटी के घर की चाय पी ली बहोत ाचा लगा.", रामेश्वर जी उठने के बाद फिर से अर्जुन को देख कर मंजू को भी आशीर्वाद देते हुए बहार निकल चले.
.
.
बिजेन्दर िक के बहार बैठा था अपने एक दोस्त के साथ. आज उसने एक दोस्त खो दिए था और दूसरा शायद खो हे देता अगर उमेद काका उसकी समय रहते मदद न करते. आँखे अभी तक भीगी थी. सबसे अजीब बात ये हुई थी की इस हस्पताल में हे उसकी माँ और चचेरी बहिन को भी लाया गया था लेकिन वह बताने के बावजूद वह से हिला नहीं.
"जी, आपके कपडे और खाना लाइ हु.", अनुपमा पहली बार बहार यु उसके सामने आई थी. बेशक बबिता हे उसको लेके आई थी लेकिन बबिता अलग इमरजेंसी वार्ड में अपनी माँ के पास चली गई थी. एक पल तोह बिजेन्दर खामोश बैठा रहा, शुन्य में देखते हुए लेकिन फिर उसकी कमर पर मुँह रखते हुए वह फफक कर रो पड़ा. यहाँ बस 3 हे लोग थे लेकिन उसका दोस्त बहार चला गया था हालत देख कर.
"आपने कभी कुछ गलत नहीं किआ लेकिन कही न कही चूक हुई है. हम मिल कर सुधर सकते है सबकुछ. बलवान (भूरा) भाई के जाने का मुझे भी दुःख है लेकिन गोलू भैया खतरे से बहार. हौंसला रखिये आप. चलिए कपडे बदल लीजिये इतने मैं यहाँ देखती हु.", अनुपमा की साफ़ और दिल से कही बात सुनकर बिजेन्दर खड़ा हो कर उसके गले लग गया. वह बहोत कुछ कहना चाहता था लेकिन आज जैसे शब्द नहीं फुट रहे थे.
"हम नै शुरुवात कर सकते है. कल पापा को मुखाग्नि देनी है आपको और उसके बाद जिम्मेवारी सम्भालनि पड़ेगी साडी.", बिजेन्दर ने चेहरे से चेहरा लगते हुए सिर्फ हामी भरी और कपडे ले कर चला गया. पुलिस ने इस मामले में इनमे से किसी से पूछताछ तोह नहीं की थी लेकिन अपनी तैयार रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करवा लिए थे. शबनम को संदिग्ध की श्रेणी में रखा गया था और उसका इलाज भी पुलिस निगरानी में हे हो रहा था.
"देख माँ, के हो गया पूरे परिवार गइल. तन्ने सबके स्यामि यो कहा था ने के मेरी छोरी इतने ब्याह नई करेगी जितने शंकर के परिवार साथ बदला न ले लिए जाये. मैंने सिर्फ तेरी हां में हां मिले थी. लेकिन आज शंकर के परिवार ने पूरा घर ख़तम करने की जगह तन्ने ba-ijjat बरी आरर उस हरामी मामे की मौत भी बदले की भावना से की हत्या लिख दी. वह छोरा सबने मार सके था लेकिन उसने एक की जान भी कोन्या ली. ेब तेरे धोरे बहोत टेम है सोचन का. यु टांग टूट चुकी है, कलाई की हड्डी भी आरर सर्र पे 6 टाँके आये है. हफ्ता आते हे रह, मैं हलचल लेती रहूंगी तेरा.", बबिता ने आगे कुछ न कहते हुए अपनी माँ को दाल का पानी बड़े प्यार से पिलाया जो सुशीला पीना नहीं चाहती थी. आँखे उसकी भी भरी थी और सब खोने के बाद एहसास हुआ था के वह कितनी खराब बहु, बीवी, माँ और बहिन थी. लेकिन फिर सामने से बिजेन्दर को आते देख मुँह फेर लिए. आज हिम्मत न थी अपने बेटे की आँखों का सामना करने का.
"ऐ माँ, तू तौली ठीक हो जय. 13 दिन बाद तेरे छोरे का आरर छोरी का ब्याह है.", बिजेन्दर गोल स्टूल पर बैठता अपनी माँ के गाल पर हाथ रखते हुए बोलै तोह बबिता हैरानी से उसको देखने लगी.
"बेबे तू टेंशन न ले. गोलू गइल तेरा ार अनुपमा गइल मेरा ब्याह होवेगा. गोलू ने होश आया तोह मैंने बताया के मैं अनुपमा ने पसंद करू हु. वह बावला तोह अर्जुन धोरे काल स्टेडियम हे चला गया था यु कहां के बिजेन्दर ने वह कुछ न करे आरर वह यु सब अपने प्यार खातिर कारन लाग रहा है. फेर बेरा चल्या के थम्म दोनो पसंद करो हो एक दूसरे ने. चाल माँ तू आराम कर, मैं तड़के आऊंगा मिलान. गोलू के maa-baap हो सके है के hal-chal लें ऊपर आवे. मैं अनुपमा ने छोड़ के औ घर. तू ध्यान रखिये बेबे अपना. जो गलती हुई उसके खातिर छोटे भाई ने माफ़ कर दिए.", जाने से पहले वह अपनी माँ और बहिन से गले लग के मिला.
"देख ले इसका दिल. यु है सच्चा आरर परिवार की हिफाजत कारन वाला. खैर तेरे नींद की सुई दे राखी है तोह तू आराम कर. मई इस बिस्तरे पे सोउ हु.", बबिता ने भी माँ के चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहा और फिर खली बिस्टेर पर लेट गई.
सुशीला सोच रही थी की अगर आज यही लड़ाई शंकर के साथ हुई होती तोह एक बार फिर सब ख़तम हो जाता लेकिन वह अर्जुन था. जो मरने को तैयार था और सबको बचने के लिए भी.
"बेटी, एक बार बस अर्जुन ने सन्देश भिजवा दिए के उसकी बुआ मिलना चाहवे है उस से. शंकर तोह कड़े कोणी आवे लेकिन वह छोरा भला है.", सुशीला ने इतना कहा और आँखे बंद कर ली. वही बबिता मुस्कुरा उठी अपनी माँ की बात सुनकर.
.
.
रात 12 बजे अर्जुन झटके से उठ खड़ा हुआ. पसीने से भीगा जिस्म और उत्तेजना से वह बेचैन सा था लेकिन फिर अचानक हे वह वापिस बिस्टेर पर लुढ़क गया.