Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 10 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

अपडेट- 46 (ा) (मेघा अपडेट)

" तो फुट जाएगी तो फटने दो na...........waise भी गांड फूटने के लिए hi होती hain..........aur मैं तो चाहता हूँ की तुम्हारी छेद इतनी बड़ी कर दूँ की उसमें कुछ भी आसानी से चला जाये..........." और रघु इस बार अपने उँगलियों को काव्य के गांड के सूराख पर रख देता हैं और बहुत एआरएम से उसपर अपने उँगलियों को सहलाने लगता hain........wahin काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं और रघु के जिस्म से और भी बुरी तरह से चिपक जाती hain..............wahin कुछ दूर पर खड़ा जीतू बस उन दोनों के इस चुदाई भरे खेल को बस देखे जा रहा tha.................aur सोच रहा था की आगे रघु अपनी मेमसाहेब के साथ न जाने और क्या क्या खेल khelega............ye सोचकर उसका हाथ एक बार फिर से अपने लुंड पर चला जाता हैं...............................................

अब आगे..................................................................................

रघु फ़ौरन काव्य को अपनी बाँहों में समेत लेता हैं और एक बार फिर से उसके नरम होंठों को चूसने लगता hain..........apne डेंटन से कसकर काटने लगता hain...........aab उसकी भी बेकरारी पल पल बढ़ती जा रही thi...........wo भी चाहता था की अपने अंदर की उठ रही उस प्यास को कैसे भी करके शांत kare...........upar से चींटी के कटे जाने से उसकी छूट और गांड दोनों सूझ गयी थी जिससे वहां हाथ लगाने से काव्य को काफी रहत मिल रही thi.........aurr ऊपर से रघु का सूपड़ा भी काफी मोटा दिख रहा था.......

" मुझे प्यार करो न jaan.............jaisa मैं तुम्हें करता hoon.........sir से लेकर पवन तक............" और इस बार रघु काव्य की आँखों में आँखें डेल आहिस्ता से बोल पड़ता hain..........wahin काव्य एक नज़र रघु की तरफ देखती हैं फिर वो धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती हैं और इस बार रघु की होंठों को खुद hi चूसने लगती hain.......chaatney लगती hain..........sach तो ये था की उसे भी अब इस खेल में मज़ा आने लगा tha............choot में जो आग अब दहक रही थी अब उसे संभाले नहीं जा रही थी...........

वो अपने जीभ को रघु के गंदे काळा जिस्म पर धीरे धीरे से फेरने लगती hain...........uske होंठों से नीचे उसके चीन par............jaise जैसे काव्य के जीभ रघु के जिस्म पर फिरते जा रहे थे वैसे वैसे रघु का लौड़ा भी सख्त होता जा रहा tha..........wahin कुछ दूर बैठा जीतू किसी मूवी की तरह सब कुछ देख रहा tha.............magar बड़े ध्यान से..............

काव्य अपना जीभ जीतू के गुर्दें पर ले जाती हैं और वहां उसके जिस्म पर जमा कुछ मेल अपने जीभ से चटनी लगती hain........uske जिस्म से निकलने वाले पसीने की एक एक बूँद को वो अपने जिस्म में उतरने लगती hain..............apne होंठों के zariye.........aab सब कुछ उसे ाचा लग रहा tha..........jaise कोई नशा सा उसपर चाय ho........ek अजीब सा खुमार...............

वो फिर अपने हाथों को इस बार रघु के नंगे काळा सीने पर ले जाती हैं और उसके दोनों कला काळा छोटे निप्पल्स को अपनी उँगलियों के बीच दबाकर खींचने लगती hain...........masalney लगती hain...........apne बड़े बड़े नाख़ून से उसके निप्पल्स को कुरेदने लगती hain......wahin रघु दर्द और मज़े से सिसक उठता हैं और काव्य के चूचियों को फिर से थम लेता हैं और इस बार कसकर वो उन्हें मसल देता hain.......mano वो उससे बदला निकल रहा हो.............

वहीँ काव्य कोई विरोध नहीं करती और उसके निप्पल्स पर अपने हाथ और नाखूनों से वार करती रहती hain.......fir वो अपना जीभ उसके राइट निप्पल्स पर ले जाती हैं और उसके निप्पल्स को अपने मुँह में लेकर बरी बरी से चूसने लगती hain.......wahin रघु जैसे तड़प सा जाता hain..........wo फ़ौरन उसके बालों को कसकर अपनी मुट्ठी में थम लेता हैं और काव्य के चेहरे को बड़े अजीब सी नज़रियों से देखने लगता hain.........kuch सोचकर वो अपने मुँह से गधा गधा थूक निकलता हैं और इस बार वो अपने थूक को अपने निप्पल्स और सीने पर गिरने लगता hain...........wahin काव्य बड़े गौर से उसके एक एक हरकतों को देख रही थी.........

" छतो न इन्हें memsaheb...............aachey से............." और रघु अपने थूक की तरफ धीरे से इशारा करता हैं वहीँ काव्य एक नज़र रघु के चेहरे की तरफ देखती हैं फिरर वो होली से अपना जीभ निकलते हुए रघु के उस थूक को चटनी लगती hain...........aur उसे अपने हलक के नीचे उतरती चली जाती hain..........aise hi रघु दो तीन बार करता हैं और काव्य हर बार उसका थूक चाटती hain....fir वो कुछ थूक अपने लुंड पर भी गिरता hain..........aur काव्य इस बार उसका लुंड भी ाचे से चाटकर साफ़ कर देती हैं........

" धीरे धीरे काव्य उसके घुटनों के नीचे की तरफ आती हैं और उसके गंदे पवन पर भी अपना जीभ फेरने लगती hain..........saath hi साथ उसके लुंड को bhi...........chinti के काटने से उसका सूपड़ा काफी सख्त और मोटा हो गया था ...........वहीँ जब काव्य के जीभ का एहसास रघु को काफी रहत दे रहा tha.........uske अंदर एक अजीब सा प्यास धीरे धीरे बढ़ता जा रहा tha...........raghu फ़ौरन आकर वहीँ सोफे पर बैठ जाता हैं और पास में रखा तेल अपनी हाथों में उठा लेता hain..........aur काव्य को अपने ऊपर आने का इशारा करता hain............kavya भी फ़ौरन आकर उसके जांघों के बीच अपनी छूट सत्कार आराम से बैठ जाती हैं वहीँ रघु मुस्कुराकर काव्य के तरफ बड़े प्यार से एक तुक देखने लगता हैं.......

" ाचा तो मेरी रानी तैयार हैं क्या अपनी गांड मरवाने के liye................kahe तो पूरा अंदर दाल दूँ.............." और रघु अपने लुंड पर तेल गिरने लगता hain..........jo तेल उसके सुपाड़ी से बेहटा हुआ उसके ांडों तक बह रहा tha.........jissey उसका कला लुंड और भी कला और भयानक सा दिखने लगा tha.............wahin काव्य की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी..............

" मार लो न raghu.............mera सब कुछ अब तुम्हारा hi तो हैं................" और काव्य हौले से सिसक पड़ती hain.........wahin रघु अपने दोनों हाथों से उसकी दोनों चूचियों को थम लेता हैं जैसे वो उसकी का सहारा लिए बैठा ho.............bari बरी से वो उसके दोनों निप्पल्स को मसल रहा tha.......daba रहा था वहीँ काव्य पल पल तड़प रही थी.......

रघु कुछ तेल की बूँद अपने हाथों पर गिरता हैं और उस तेल को अगले hi पल काव्य के गांड के टाइट सूराख पर रख देता हैं और आहिस्ता आहिस्ता से एक एक ऊँगली अंदर बहार करने लगता hain......aur उस तेल को भी अंदर करता जाता hain...........is तरह हाथ लगाने से काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं मगर रघु का विरोध नहीं karti.........raghu लगातार अपने बीच की ऊँगली पर तेल चुपड़ी काव्य की गांड के अंदर बहार कर रहा tha............aur उसके टाइट सूराख को लूसे भी करता जा रहा tha.......tel लगने से अब काव्य की गांड थोड़ी सी खुल गयी थी मगर दर्द उसे भी हो रहा tha.........jissey अब आसानी से उसकी मोती ऊँगली उसकी गांड के अंदर बहार हो रही थी.........

करीब 5 मिनट तक रघु काव्य की गांड को अपनी ऊँगली से फैलाती हैं फिर वो उसे उठकर उसी बिस्टेर पर ले जाता हैं और पेट के बल आराम से सुला देता hain..........kavya का दिल अब दुर्र से धड़कने लगा tha..............durr से उसके चेहरे पर पसीने साफ़ चालक रहे they.........janti थी वो भी बहुत ाचे से की आने वाला पल उसे कितनी तकलीफ देने वाला hai...........raghu का लुंड जब उसकी छूट में पूरा जाता तो उसे तकलीफ होती तो उस छोटे से सूराख में जब उसका लुंड पूरा घुसेगा तो उसकी क्या हालत होगी ये वो आसानी से अंदाज़ा लगा सकती thi.........magar न hi उसके अंदर अब रघु को रोकने की हिम्मत thi......aur न उसका विरोध कर पाने की ताक़त.............

रघु एक नज़र काव्य के नंगे बदन को बड़े गौर से देखता हैं फिर वो अपना दोनों हाथ उसकी गांड पर रख देता हैं और उसके गांड को दोनों तरफ से फैलाने लगता hain.............gand के दरार में जो छोटी सी सूराख थी अब नज़र आने लगी थी जो की अभी भी पूरी तरह से बंद thi..........wahan पर तेल लगा हहआ था मगर उससे कहीं ज़्यादा तेल रघु के लुंड पर नज़र आ रहा thaa...........kavya बिस्टेर पर लेती हुई अपने दोनों बाँहों को फैलाये बिस्टेर को कसकर पकड़े हुई thi.........durr से उसका कलेजा बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha..........wahin कुछ दूर पर जीतू भी अपने कपड़े निकल चुका था और अपने हाथों में लुंड लिए हुआ कुछ दूर पर खड़ा सब कुछ बड़े गौर से देख रहा tha...........jaise तैसे उसने खुद अपने आपको संभाला था.......

" मैं आया मेरी रानी................" रघु फ़ौरन बिस्टेर पर चाहता हैं और अपना लुंड काव्य के उस छोटे से छेद पर सेट करता hain.........aur आराम से चढ़ता हुआ काव्य के ऊपर पेट के बल आकर लेट जाता hain............aur अपना एक हाथ वो काव्य के चूचियों और बिस्टेर के बीच डालता हैं और अपने मज़बूत हाथों से उसकी दोनों चूचियों को कसकर थम लेता hain.............jakad लेता hain...........wahin वो अपना दूसरा हाथ अपने लुंड पर ले जाता हैं और इस बार अपना लुंड काव्य की गांड के सूराख पर सेट कटा हैं और धीरे धीरे फिर अपने लुंड पर दबाव डालना शुरू करता hain.........pehle तो उसका लुंड कई बार इधर उधर फिसल जाता हैं मगर रघु कहाँ इतनी आसानी से हार मानले वालों में से था...........

वो थोड़ा सा तेल फिर से अपने लुंड पर गिरता हैं औरर कुछ काव्य की गांड के सूराख par........aur फिर से वो कोशिश करता hai........aur इस बार जैसे उसकी कोशिशः रंग लगती hain..........wo एक करारा धक्का मरता हैं और अगले hi पल उसका 3.5 इंच मोटा सूपड़ा काव्य की नाजुक सी छेद को भेदता हुआ सीधा अंदर घुस जाता hain.........jahan रघु को तो मज़े आ जाते हैं वहीँ काव्य इस बार ऐसा चीखती हैं जैसे उसकी गांड में किसी ने गरम रोड दाल दिया ho............wwo कसकर अपनी बिस्टेर को मुट्ठियों के बीच मसलने लगती hain.............aur अपना सर इधर उधर करने लगती hainn..........dard से कुछ आंसूं की बूँदें उसके आँखों से चालक पड़ते है.............

कॉन्टिनोएड..........................................................................
 
अपडेट- 46 (बी) (मेघा अपडेट)

"pppppppppppppppllllllllllllssssssssssssss.....aaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhh...............rrrraaaghhu.............naaaaaaaahhhhhiiinnnnnnnnnnnnnn...........muuujhse एई नह्निन होगा......................" और काव्य जैसे रघु के सामने फररयाद करने लगती hain...............magar न रघ्घू अपना लुंड एक पल के लिए भी बाहर निकलता हैं और न काव्य की चीखें बंद होती hain...........kavyaa की ये चीखें उसके लुंड में जैसे एक नया जोश पैदा कर रही thi..............ek अजीब सा सुकून उसे मिल रहा था काव्य को ऐसे तड़पता हुआ देखकर............

" कुछ नहीं होगा मेरी रानी ko...............bus थोड़ा सा और दर्द बर्दास्त कर lo............fir से तुम्हें यहाँ से भी आगे मज़े आने वाले hain....................yu समझ लो की तुम्हारे ये द्वार खुलते hi जनात के दरवाज़े भी खुलते चले जाएंगे................." और रघु इस बार अपना लुंड बहार निकलता हैं और काव्य थोड़ी सी रहत की सांस लेती hain..........wahin जीतू अपने लुंड को तेज़ी से हिला रहा tha...........masal रहा tha.............aab उसका साबरा भी जवाब देता जा रहा था...............

अगले hi पल रघु एक बार फिर से करारा ढाका मरता हैं और इस बार उसका लुंड काव्य की गांड के उस छोटे से छेद को चीरता हुआ गुप्प से अंदर घुस जाता हैं लगभग 5 इंच tak...............wahin काव्य इस बार पूरी ताक़त से चीख पड़ती hain.............uski चीख इतनी तेज़्ज़ थी की उस पूरे बंगलो में उसकी चीख गूँज उठी thi................wahin वो इस बार अपने हाथों और पैरों को कसकर पटक रही thi........magar रघु के चुंगल से भला वो कैसे इतनी आसानी से आज़ाद हो pati...........raghu कसकर उसे वहीँ बिस्टेर पर दबोच हुआ tha............wahin काव्य कसकर अपने हाथों को चला रही thi..........aur बार बार उठने की कोशिश कर रही thi.........tabhi रघु कसकर उसकी गांड पर एक ज़ोर का चांटा मरता हैं जिससे काव्य दर्द से फिर तड़प उठाती हैं...........

" गांड ढीली कर नहीं तो और भी dukhegi............bilkul आराम से लेती reh............dekhna मेर ये लौड़ा पूरे आराम से चला जायेगा............" और रघु जैसे काव्य को समझने लगता हैं वहीँ काव्य के आँखों से आंसूं बहे जा रहे थे........ दर्द के सिवा उसे कुछ नहीं सूझ रहा tha..............raghu की कहने से वो अपने गांड को बिलकुल ढीला छोड़ देती हैं और रघु इसी पोजीशन ंविं कुछ देर तक रुका रहता hain.............kavya की गांड इतनी ज़्यादा टाइट थी की अब उसका लुंड भी दुखने लगा tha............magar मज़े की उसकी कोई सीमा नहीं thi..........wo तो चाहता था की वो अपना पूरा का पूरा लुंड काव्य के गांड में उतर de.......magar ये सब काव्य के लिए बर्दास्त करना शायद उतना आसान नहीं tha............magar आज रघु काव्य को सिर्फ दर्द hi तो देना चाहता tha...........taki उसे भी पता चले की दर्द क्या होता हैं......

रघु फिर से अपना लुंड बहार की तरफ निकलता हैं और इस बार अपने हाथों से वो उसके दोनों चूचियों को थम लेता हैं और बरी बरी से उन्हें मसलने लगता hain.........saath hi साथ व्वो अपना गन्दा सा जीभ अब काव्य के गलों पर भी फेरता जा रहा tha.......agle hi पल वो एक और कसकर ढाका मरता हैं और इस बार काव्य की चीखें जैसे उसके अंदर hi घुटकर रह जाती hain...........kyon की इस बार ढाका इतना ज़बरदस्त था की उसकी चीख बहार नहीं निकल पायी थी बल्कि अंदर hi घुटकर रह गयी thi............aankhon से आंसूं लगातार बहे जा रहे थे वहीँ काव्य बस रघु की बाँहों में छटपटाकर रह गयी थी............

" aassssssssssssss...mujhe नहीं मरवाना अपनी gand...............please रघु इसे बहार निकालो नहीं तो मैं मुरर jawungi.............aab मुझसे दर्द बर्दास्त नहीं हो रहा ............pls..........bahar निकालो इसे................" और काव्य जैसे रघु से फर्याद करने लगती हैं वहीँ रघु आज कहाँ उसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला tha............aaj तो वो अपनी पूरी मनमानी कर रहा था.........

" अब क्या फटेगी मेरी rani......teri गांड जितनी फटनी थी फुट gayi...........aab तो बस मज़े hi मज़े हैं.........." और रघु हौले से हंस पड़ता हैं और इस बार अपना लुंड थोड़ा सा बहार की तरफ निकलता हैं और फिर से एक करारा ढाका मरता हैं जिससे काव्य फिर से दर्द से चीख पड़ती hain........aab उसका दर्द कम होता जा रहा था.......

जिस बिस्टेर पर काव्य सोई हुई थी वहां का आधा हिस्सा गिला हो गया tha..............shayad रघु के द्वारा इस तरह की ठुकाई se..........aab करीब उसका 8 इंच से भी ज़्यादा हिस्सा रघु का लुंड काव्य के गांड के अंदर tha.............raghu का लुंड इस कदर काव्य की गांड में जकड़ा हुआ था जिससे वो अपना लुंड अंदर बहार नहीं कर पा रहा tha............aab तो उसे भी तकलीफ होने लगी थी...........

जब रघु का एक हाथ बिस्टेर पर पड़ता हैं उसके चेहरे पर एक शरती मुस्कान तैर जाती hain...........wo काव्य के तरफ देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" ये क्या मैडम ji............aapki तो मूट निकल gayi...............chee की chee......aap तो किसी छोटे बाचे की तरह इसी बिस्टेर पर सुसु कर di............aab कोई देखेगा तो क्या सोचेगा आपके बारे mein...............fikar मुट्ठ कीजिये जीतू किसी से कुछ नहीं kahega...........aur न hi main..........magar मैं चाहता हूँ की आप मेरी एक सपना ज़रूर पूरी kare.............agar आप करने का वादा करेंगी तो hi मैं आपको बताउंगा..............." और रघु काव्य को फ़ौरन बिस्टेर से उठता हैं मगर अपने लुंड को काव्य की गांड से बहार नहीं nikalta.........wahin काव्य का दर्द अब बहुत हुड्ड तक कम हो गया था..............

वहीँ काव्य भी कुछ नहीं कहती और हाँ में धीरे से अपनी गुर्दें हिला देती hain............fir रघु मुस्कुराता हुआ धीरे से आगे बोल पड़ता हैं........

" मैं चाहता हूँ की आप मेरे ऊपर ऐसी hi छड़ी रहे और मैं नीचे से आपकी गांड में लुंड पेलता rahun............aur साथ hi साथ जब मेरा लुंड तेज़ी से आपकी गांड के अंदर बहार हो रहा हो तब उस वक़्त आपकी मूट भी निकलती rahe..........sochiye memshaeb.........kya नज़ारा hoga..........mera लुंड आपकी गांड में होगा और आप बिस्टेर पर अपनी दोनों पवन फैलाये मूट रही होंगी........." और रघु इस बा काव्य की जवाब का इंतज़ार किये बगैर उसे अपने ऊपर की तरफ करता हैं और उसके दोनों पवन को फैलाकर धीरे धीरे से अपना लुंड काव्य की गांड के अंदर बहार कण्रेय लगता hain..............saath hi कुछ खून के दाग भी अब उसके लुंड पर चमक रहे थे जो इस बात के सबूत थे की वाकई में आज काव्य की गांड पूरी तरह से फुट चुकी हैं..........

खून लगने से रघु का लुंड तेरी से अंदर बहार सरक रहा tha............wahin काव्य की आहें और सिसकारी भी अब बढ़ चुकी thi............raghu ने तो इसी लिए उसे एक बूटले पानी पिलाया था ताकि वो काव्य की जब गांड फाड़े तो दर्द से और कुछ उसके लूणद के परिसर से उसकी मूट निकल pade..............wahin वो अब लगातार फिर से अपने लुंड पर प्रेशर बनाये जा रहा tha..........wahin काव्य जैसे तैसे फिर से अपने मूट को रोके हुई thi.............pisab आधा रुक जाने से प्रेशर और भी बढ़ जाता हैं इसी वजह से काव्य बड़े मुश्किलों से अपने मूट को रोक रही thi..............magar रघु तो अपने लुंड पर लगातार दबाव बनाये जा रहा tha........wo जितनी स्पीड से लुंड अंदर करता उतनी hi तेज़ी से लुंड बहार निकल देता............

इस तेज़्ज़ झटके से काव्य का जिस्म बुरी तरह से हिलता और उसकी छूट में आग लग jati...........aab उसे भी मज़ा आने लगा tha...........wahin रघु तो जैसे ज़िद्द पर उतर आया tha...........raghu नीचे लेता हुआ था और ऊपर काव्य अपनी दोनों टांगें फैलाये अपनी गांड में रघु का मोटा कला लुंड पूरा ली हुई उससे छुड़वा रही thi...............wahin रघु बरी बरी से उसकी दोनों चूचियों के साथ खेल रहा tha............masal रहा tha..........wahin जीतू पूरा नंगा खड़ा होकर काव्य की तरफ देखता हुआ तेज़ी से अपने लुंड को हिला रहा tha.............wahin काव्य की नज़रें भी बार बहार उसके चेहरे पर ..............तो कभी उसके लुंड पर जाकर अटक जाती.............

अगले hi पल रघु ज़ोरों से ढ़ाके मरने लगता hain...........aab उसकी भी सांस फूलने लगी थी और दिल की धड़कनें भी काफी तेज़्ज़ हो चुकी thi..........wo भी अब अपने मंज़िल के बेहद करीब tha.............do तीन सेकंड बीते होंगे तभी काव्य इस बार ज़ोरों से चीख पड़ती हैं और इस बार उसके छूट से मूट की एक तेज़्ज़ धार फुट पड़ती हैं जो कुछ दूर खड़े जीतू प् जाकर गिरती hain............kuch उसके सीने par.......to कुछ बूँदें उसके लुंड और पैरों par....................to कुछ उसके बिस्टेर par................aur थोड़े बहुत रघु के ांडों पर................

वहीँ जीतू का भी साबरा का बांध टूट जाता हैं और उसके लुंड से गधा गधा छुम निकल पड़ता हैं जो अब कुछ दूर फर्श पर जाकर गिरा हुआ tha...........wahin जीतू लुम्बी लुम्बी सांसें लेता हुआ काव्य के तरफ बड़े ध्यान से देख रहा tha.......udher रघु का छुम भी चूत पड़ता हैं और वो अपना सारा छुम इस बार काव्य की गांड की गहराई में उतरता चला जाता hain..............aur किसी बेजान लाश की तरह बिलकुल ठंडा सा पढ़ जाता hain.........kavya भी अब रघु के ऊपर किसी लाश की तरह लेती हुई थी..............

उसकी छूट से भी मूट निकल चुकी थी और अब वो काफी रिलैक्स महसूस कर रही thi.............magar अब उसकी इज़्ज़त भी तो मिटटी में मिल गयी thi.....itne बड़े घर की मालकिन होने के नाते वो ऐसे बेशर्मों वाला काम सबके सामने खुलकर कर रही थी ये सब उसे कहाँ शोभा दे रहा tha.............magar छूट की आग जब उठती हैं तो सब कुछ पल भर में बहकर ले जाती hain.......izzat........maan samman.....maryaaada........sab kuch............aab एक बहुत बड़ा तूफ़ान जैसे आकर गुज़र गया tha.............ek बार फिर से कमरे में जैसे गहरी ख़ामोशी ने जगह बना लिया tha...............dekhna था की ये ख़ामोशी क्या कोई तूफ़ान लेकर आती हैं या फिर कुछ और..............................................

कंटिन्यू..............................................................................
 
भाई ीाम सॉरी फॉर डिले ........क्या करूँ घर पर काम चल रहा बिलकुल वक़्त नहीं मिलता की यहाँ आ sakun........jaise तैसे यहाँ थोड़ा टाइम निकलकर आ जाता hoon..........bus तीन से चार दिनों की बात हैं उसके बाद से रेगुलर इस कहानी पर उपदटेस आएंगे पहले की tarah..............thanks..
 
अपडेट लिख रहा हूँ जब टाइम मिलेगा मैं उसे पोस्ट कर dunga.............bhai लोगों ज़रा भी टाइम नहीं मिल रहा समझा करो yaaron.........bus दो चार दिनों के बाद इस कहानी के अपडेट पहले की तरह रेगुलर आएंगे.........
 
now.........again ीाम गोइंग तो कंटिन्यू थिस स्टोरी आफ्टर ा लॉन्ग time...............update एक या दो दिन में आ जायेगा पहले की tarah...........till वेटिंग.............
 
अपडेट- 47 (मेघा अपडेट)

उसकी छूट से भी मूट निकल चुकी थी और अब वो काफी रिलैक्स महसूस कर रही thi.............magar अब उसकी इज़्ज़त भी तो मिटटी में मिल गयी thi.....itne बड़े घर की मालकिन होने के नाते वो ऐसे बेशर्मों वाला काम सबके सामने खुलकर कर रही थी ये सब उसे कहाँ शोभा दे रहा tha.............magar छूट की आग जब उठती हैं तो सब कुछ पल भर में बहकर ले जाती hain.......izzat........maan samman.....maryaaada........sab kuch............aab एक बहुत बड़ा तूफ़ान जैसे आकर गुज़र गया tha.............ek बार फिर से कमरे में जैसे गहरी ख़ामोशी ने जगह बना लिया tha...............dekhna था की ये ख़ामोशी क्या कोई तूफ़ान लेकर आती हैं या फिर कुछ और..............................................

अब आगे.....................................................................

इस वक़्त घडी में दोपहर के 2 बज चुके they.............kavya अभी तक बेसुध रघु के ऊपर लेती हुई thi...............thode देर बाद जब उसे होश आता हैं वो फ़ौरन रघु के ऊपर से उतरती हैं और उसका लुंड अपने गांड से बहार निकलती hain..........ek बार फिर से उसके मुँह से एक दर्द भरी सिसीकारी फुट पड़ती hain.............jaise hi रघु का लुंड काव्य की गांड से बहार आता हैं एक पूउउउउउउउच की आवाज़ निकलती हैं और काव्य के गांड से कुछ छुम की बूँदें नीचे फर्श पर टपकने लगती हैं.............

काव्य फ़ौरन अपने कपड़े संटटती हुई सीधा बाथरूम में घुस जाती हैं वहीँ रघु और जीतू एक ऐडा से मुस्कुरा पड़ते hain............aab तक वो दोनों इतना तो समझ hi चुके थे की काव्य अब उन दोनों के लिए कुछ भी कर सकती hain.........kisi भी हुड्ड तक जा सकती hain...........aagey वो दोनों काव्य को एक मोहरे की तरह से इस्तेमाल करने वाले they..........thode देर बाद वो दोनों अपने कपड़े पहनते हैं और फ़ौरन बहार की तरफ निकल पड़ते hain............aaj उन दोनों के चेहरे पर एक जीत की चमक थी............

इधर काव्य शावर के नीचे बिलकुल खामोश कड़ी thi.............ek बार फिर से वो अपने बीते यादों में खो सी गयी thi.............wo भी एक बात ाचे से जानती थी की आज जो कुछ भी हुआ ठीक नहीं hua..............usey ऐसा नहीं करना चाहिए tha.............usney आज अपने पति को hi धोका नहीं दिया बल्कि उसके प्रति उस विश्वास को भी तोड़ दिया जो राहुल उसपर शुरू से करता आया tha.............hawas ने आज उसे अँधा बना दिया tha............wo धीरे धीरे अपने वजूद को भी भूलती जा रही thi................yaad था तो सिर्फ उसे अपने छूट की pyaas..............jo उसे सब कुछ करने पर मज़बूर कर रहा tha...............magar जो कुछ हुआ था उसे तो अब बदला नहीं जा सकता था............

नहाने के बाद वो बिन कपड़ों के बहार निकलती हैं और उसी हाल में नंगी चली हुई सीधा अपने बैडरूम में जाती hain...........wo भी ाचे से जानती थी की वो दोनों अब तक जा चुके hoge...........wo अलमारी से अपने ब्रा और पंतय निकलकर पहनती हैं फिर एक नीले रंग का सूट और वाइट कलर की लग्गी नीचे पहन लेती hain..........humesha की तरह आज भी वो इन कपड़ों में बेहद हसीं लग रही thi...........thoda सा मेकउप करने के बाद वो सीधा किचन में जाकर खाना बनाने लगती hain...........kareeb 3 बजे राम भी कॉलेज से वापस लौट आता हैं..............

आज उसका भी मूड काफी बदला बदला सा tha.............kyon की आज उसके दोस्तों ने मोबाइल में उसे ब्लू फिल्म जो दिखाई thi..........baar बार उसका लुंड जैसे फड़क रहा tha...............jaise hi वो खाना खता हैं एक बार फिर से काव्य पर उसकी नज़रें जाकर ठहर जाती hain............wahin कुछ दूर पर बैठी काव्य t.v देख रही thi...............ram की नज़रें उसके सीने और कमर पर जैसे जमी हुई thi...........wo चाह कर भी अपनी नज़रें वहां से नहीं हटा पा रहा था..........

" ram...................kaisi चल रही हैं तुम्हारी इन दिनों पढ़ाई लिखाई.............." काव्य t.v स्क्रीन की तरफ देखती हुई राम की तरफ बिना देखे उससे बोल पड़ती hain........aabhi भी उसकी नज़रें सामने चल रही टी. स्क्रीन पर hi thi..............wahin राम बड़े गौर से काव्य के खूबसूरत से चेहरे की तरफ देख रहा tha...............is तरह अचानक काव्य के सवालों से राम थोड़ा सा हड़बड़ा जाता हैं मगर अगले hi पल वो खुद को संभल लेता हैं.........

" ठीक चल रही हैं भाभी..........." और राम के चेहरे पर थोड़े से सुकून के भाव झलकने लगते hain....................itne दिनों के बाद आज काव्य ने उसका हाल जो पुछा tha...........tabhi काव्य फ़ौरन अपनी जगह से उठ जाती हैं और राम के तरफ धीरे धीरे बढ़ने लगती hain.............apni तरफ काव्य को ऐसे आता हुआ देखकर राम की दिल की धड़कनें फिर से धीरे धीरे बढ़ने लगती hain..........wahin राम टकटकी लगाए बस काव्य के चेहरे की तरफ देखने लगता hain...........issey पहले राम कुछ बोलता काव्य आकर वहीँ राम के पास उससे सत्कार कड़ी हो जाती हैं और बड़े गौर से राम के चेहरे की तरफ देखने लगती hain........wahin उसका दूसरा हाथ अब राम के सर पर उसके बालों के बीच घूम रहा था जिससे काव्य बड़े प्यार से सेहला रही थी..............

" लगता हैं तुम्हें भूक कुछ ज़्यादा ज़ोरों की लगी hain..........magar भूख जब भी लगती हैं तो खाना जल्दीबाज़ी में नहीं खाया jata..........balki बड़े आराम और इतेमेंआन के साथ खाया जाता hain...........taki खाने के साथ साथ उसका टास्ते भी पूरा मिलता rahe............par मुझे तो लगता हैं की तुम्हारी भूख पूरी तरह से अभी तक मिटी नहीं hain............jis चीज़ की तुम्हें आज ज़रूरत हैं वो चीज़ मैं तुम्हें dungi...........aur तुम्हारे उस भूख को भी ाचे से शांत karungi..............magar............." और इतना कहकर काव्य एक तुक राम के चेहरे की तरफ बड़े गौर से देखने लगती hain.............wahin राम के चेहरे पर पसीने की चाँद बूँदें साफ़ नज़र आने लगती hain.............shayad दुर्र se........ya फिर काव्य के ऐसे बदले हुए तेवर से..............

" mmmaaaniiiiiiiiiinnnnn ठीक हूँ भाभीई......." और राम की जुबान जैसे फिर से लड़खड़ा जाती hain..........wahin काव्य जवाब में हौले से मुस्कुरा पड़ती hain...........wo कुछ देर तक यु hi अपने ख्यालों में डूबी रहती हैं फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती hain...........wo राम को ज़रा सा पीछे की तरफ सरकने का इशारा करती हैं वहीँ राम थोड़ा सा पीछे की तरफ सरक जाता हैं और काव्य राम के सामने आकर उसके तरफ अपना चेहरा करके डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ जाती hain.........uski नज़रें अभी भी राम के चेहरे पर hi तिकी thi........kuch सोचकर काव्य अपना दुपाता फ़ौरन अपने सीने से अलग करती हैं जिससे उसके बड़े बड़े चूचियों का क्लेवराज राम के सामने साफ़ नज़र आयने लगता हैं........

" खाना खाने के बाद दूध ज़रूर पिया जाता hain...........aur मैं जानती हूँ की तुम्हें दूध पीना बिलकुल भी पसंद nahin.........magar आज के बाद अगर तुम्हें सबसे ज़्यादा जो चीज़ पसंद आएगी तो वो चीज़ hogi..........doodh..........." और काव्य राम की आँखों में आँखें डालकर एक तुक उसके चेहरे की तरफ देखने लगती hain.........wahin राम अपनी आँखें बड़ी बड़ी किये हुए काव्य के चेहरे को घूर रहा tha..............shayad वो काव्य के इशारे को समझने की कोशिश कर रहा हो...............

" मगर.............." और राम की हिम्मत धीरे धीरे जवाब देने लगती hain..........wahin काव्य राम की तरफ धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं और उसके और भी करीब आने लगती hain............itne करीब की वो अब आसानी से काव्य के उठाते सांसों को ायचे से महसूस कर सकता था.................

" क्या मगर .......ram...............aaj से जो कुछ भी मैं चाहूंगी वही होगा इस घर mein.............chahe वो चीज़ तुम्हें पसंद आये या न aaye.............aur मुझे कहीं से ऐसा नहीं लगता की जो मैं चीज़ चाहूंगी वो तुम्हें पसंद न aaye.............waise मैं सोच रही हूँ की आज मैं तुम्हें तुम्हारा तोहफा दे hi doon..............tumhare पास होने की ख़ुशी mein..............magar..........sab कुछ आज मेरे हिसाब से hoga..............kahin कोई जल्दीबाज़ी nahin...............to क्या अब तुम इसके लिए तैयार हो.............." और काव्य अपने उँगलियों को हौले से नाचते हुए राम के गलों पर ले जाती हैं और एक ऐडा से उसके चेहरे की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुराने लगती hain...........wahin राम के चेहरे पर खुशियां साफ़ झलक पड़ती hain.............na जाने कब से वो ऐसे hi कुछ मौके ढूंढ रहा था...........

" तो शुरुवात कहाँ से kare..............sabse पहले तुम जाकर अपना मुँह हाथ ाचे से धो aawo............aur हाँ मैं जितना कहूं उतना hi karna..........zyada अपना दिमाग मुट्ठ चलना नहीं तो समझ लेना की ये ऑफर भी गया अब तुम्हारे हाथ से.............." और काव्य राम के तरफ देखती हुई धीरे से हंस पड़ती हैं और हौले से अपनी आँख मर देती हैं वहीँ राम भी जवाब में ख़ुशी से झूम उठता हैं............

वो बिना वक़्त गंवाए सीधा बाथरूम में जाता हैं और अपने हाथ मुँह ाचे से धोता hain.........fir अपने चेहरे को ाचे से साफ़ करता hain..........ek बार फिर से उसकी नज़रें सामने रखे शीशे की तरफ चली जाती hain..............wo बड़े गौर से एक तुक अपने चेहरे को देखने लगता hain.............na जाने कब से उसके दिल में दबे अरमान काव्य के रूप में पूरे जो होने वाले they............jaise hi वो मुँह हाथ धोकर डाइनिंग रूम में जाता हैं काव्य उसे खिन नज़र नहीं aati............wo चरों तरफ इधर उधर काव्य को ढूढ़ने लगता हैं मगर काव्य उसे कहीं नज़र नहीं आती.............

फिर से जो उसके दिल में खिले अरमान थे अब वो एक बार फिर से दम तोड़ने लगे they...........issey पहले वो पूरी तरह से मायूस होता दो नाजुक से हाथ उसके आँखों पर आते हैं और उसकी आँखों को अपनी नाजुक सी कलाई से धक् लेते hain........issey पहले राम काव्य के हाथों को हटाता तभी काव्य उसे इशारों में मन कर देती हैं और उसे वहीँ डाइनिंग टेबल पर आराम से बैठा देती hain............fir वो एक बड़ी सी रस्सी अपने हाटों में लेती हैं और राम के दोनों हाथों को पीछे की तरफ करके उसके दोनों हाथों को धीरे धीरे से बांधने लगती hain.............issey पहले राम कुछ समझता काव्य अपना दुपट्टा अपने हाथों में लेती हैं और उसके दोनों आँखों पर ाचे से बंद देती हैं............

अब राम के दोनों हाथ पीछे की तरफ बंधे हुए थे और आँखों पर पाती लगी हुई thi..........wo बस काव्य को महसूस कर सकता tha.......na hi उसे देख सकता tha...........wahin कुछ दूर पर कड़ी काव्य राम के तरफ देखती हुई धीरे धीरे से मुस्कुरा रही थी.........

" ये सब क्या हैं भाभी................" और राम धीरे से बोल पड़ता hain.........wahin काव्य अपने नाजुक सी ऊँगली राम के लिप्स पर हौले से रख देती हैं और उसे चुप रहने का इशारा करती hain.......wahin राम भी बिलकुल चुप सा हो जाता hain.............uska दिल इस वक़्त बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha.........aur दिल में एक्ससिटेमेंट भी धीरे धीरे अब बढ़ती जा रही थी...........

" हर बात बताना ज़रूरी नहीं hota.............bus थोड़ा सा साबरा रखो ऐसी भी क्या जल्दी hain...........tum सब कुछ थोड़े देर में जान hi जाओगे..............." और काव्य इतना कहकर फ़ौरन राम के दोनों जंगों पर अपना जांघ रखकर अपना मुँह उसकी तरफ करके बैठ जाती हैं और बड़े गौर से राम के चेहरे की तरफ एक तुक देखने लगती hain..........ek बार फिर से उसकी छूट में आग लगी हुई thi............wo फिर से अपनी प्यास को बुझा लेना चाहती thi...............aab मंज़िल बहुत करीब थी मगर फासला अभी भी tha...............jo अब उन दोनों को मिलकर hi अब तय करना tha.............dekhna था की आने वाला वक़्त काव्य की ज़िन्दगी में कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था........................................................

कंटिन्यू......................................................................................
 
अपडेट- 48 ( मेघा अपडेट)

" हर बात बताना ज़रूरी नहीं hota.............bus थोड़ा सा साबरा रखो ऐसी भी क्या जल्दी hain...........tum सब कुछ थोड़े देर में जान hi जाओगे..............." और काव्य इतना कहकर फ़ौरन राम के दोनों जंगों पर अपना जांघ रखकर अपना मुँह उसकी तरफ करके बैठ जाती हैं और बड़े गौर से राम के चेहरे की तरफ एक तुक देखने लगती hain..........ek बार फिर से उसकी छूट में आग लगी हुई thi............wo फिर से अपनी प्यास को बुझा लेना चाहती thi...............aab मंज़िल बहुत करीब थी मगर फासला अभी भी tha...............jo अब उन दोनों को मिलकर hi अब तय करना tha.............dekhna था की आने वाला वक़्त काव्य की ज़िन्दगी में कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था........................................................

अब आगे....................................................................................

काव्य की गरम सांसें राम अब ाचे से महसूस कर रहा tha...........guzarte वक़्त के साथ साथ अब उसकी भी बेकरारी बढ़ने लगी thi............uska जी तो छह रहा था की वो अभी काव्य पर चढ़ जाये और उसकी छूट में अपना लुंड पूरा उतर de..........magar इस वक़्त वो चाह कर भी कुछ करने की स्थिति में बिलकुल नहीं tha.................kyon की जो कुछ भी अब कर रही थी काव्य hi कर रही थी..............

" ram..........kuch खाना पसंद karogey.............ya फिर कुछ पीना..........." और काव्य की आँखें जैसे मदहोश सी होने लगती hain.......hawas साफ़ अब उसकी आँखों में झलक रही thi..............wahin राम भी पल पल बेचैन होता जा रहा tha.........saath hi साथ अब उसका लुंड अकड़ने लगा tha...........jo उसके ऊपर बैठी काव्य के गांड में अब धीरे धीरे दस्तक देने लगा tha..........jisey काव्य बहुत ाचे से महसूस कर रही thi...........ram आगे कुछ बोलता इससे पहले काव्य फिर से दुबारा बोल पड़ती हैं............

" रहने do..........aabhi तो तुमने खाना खाया hain.............to ये तुम्हारे सेहत के लिए ाचा hi होगा की तुम खाना खाने के बजाये कुछ पी lo..............waise मैं तुम्हें आज बहुत स्पेशल चीज़ पिलाने वाली hoon.............jisey पीने के बाद तुम पूरी तरह से मस्त हो jawogey..........wo चीज़ शराब से भी ज़्यादा खतरनाक hain..............jante हो वो क्या चीज़ हैं............" और काव्य अपना जीभ हौले से राम के कानों के तरफ ले जाती हैं और धीरे धीरे से अपना जीभ उसके कानों के दरमियान धीरे धीरे से फेरने लगती hain.........chatneyy लगती hain...........wahhin राम की सांसें भरी हो जाती hain..............uska जोश गुज़रते वक़्त के साथ साथ अब बढ़ता जा रहा tha..........aaj तो काव्य उसे पूरी तरह से पागल बना देना चाहती थी..........

" बताओ न ram..............kya पीना तुम पसंद करोगे............." और काव्य इस बार अपने जलते हुए होंठ राम के होंठों पर हौले से रख देती हैं और उसके लबों को धीरे धीरे से चूसने लगती hain.............wahin राम की बेचैनी पल पल बढ़ने लगती हैं...........

" जो आप पीला dijiye........main वो पी loonga...........kuch भी............" और राम जैसे तैसे अपनी बात कहता hain...........wahin काव्य उसके लबों को फिर से चूसने लगती हैं............

" कुछ भी.............." और काव्य राम के गलों पर धीरे से अपनी ऊँगली फेरती हुई एक ऐडा से मुस्कुरा पड़ती hain..............wahin राम की सांसें धीरे धीरे बढ़ने लगती hain.............wo ाचे से समझ रहा था की काव्य का इशारा किस तरफ hain.........magar वो झिझक की वजह से खुलकर कुछ बोल नहीं पा रहा tha................wahin काव्य उसकी बेचैनी का पूरा पूरा मज़ा ले रही थी.....................

" इसके बारे में क्या ख्याल हैं ram.............kya तुम इसे पीना चाहोगे............." और इस बार काव्य थोड़ी सी ऊपर की तरफ उठती हैं और अपना दोनों चूचियों को राम के मुँह पर हौले हौले से रफादने लगती hain...........wahin राम के चेहरे पर जब काव्य की चूचियों की नर्माहट उसे महसूस होती हैं एक बार फिर से उसके तन्न बदन में जैसे आग लग जाती hain............uska रोम रोम खड़ा हो जाता hain.......kuch एक्ससिटेमेंट se............to कुछ जोश से.......................

" हाआनंनंन्न ..............zaaaruuurrrrrrrrrrrr..........." और राम जैसे तैसे बोल पड़ता hain............wahin काव्य उसके चेहरे की तरफ देखती हुई धीरे से मुस्कुराने लगती hain.............uske चेहरे पर शरती मुस्कान थी............

" aacha............magar तुम्हें तो दूध पीना ज़रा भी पसंद nahin.......fir तुम मेरा दूध क्यों पीना चाहते ho...........badmaash कहीं ke...............aur मैं तुम्हें अपना दूध एक hi शर्त पर pilaungi................agar तुम उसे काटोगे नहीं to...........nahin तो न बाबा na.................aur उसी शर्त पर मैं तुम्हारे आँखों से पाती भी nikalungi...........agar तुम्हें मंज़ूर हो तो............." और काव्य बड़ी ऐडा से मासूमियत के साथ बोल पड़ती हैं वहीँ राम जैसे आदर्श इंसान के साथ चुप चाप काव्य की बात मान लेता hain...................usey तो बस काव्य की जवानी चखने से मतलब tha..............aur वो कैसे भी करके आज इतना सुनेहरा मौका अपने हाथ से नहीं जाने देने वाला था...................

" नैन काटूंगा saachi...........aab तो मेरी आँख खोल दीजिये................." और राम जैसे फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य आगे की तरफ थोड़ा से झुकाती हैं जिससे उसकी दोनों चूचियां एक बार फिर से राम के होंठों पर टच होने लगती hain.........wahin राम भी मौके का पूरा पूरा फायदा उठता हैं और उसके चूचियों को अपने मुँह से रगड़ने लगता hain...........wahin काव्य राम के इस हरकत पर बुरी तरह से मचल उठती hain.........uski भी सांसें बहुत ज़ोरों से चल रही thi.........saath hi छूट में गीलापन भी अब धीरे धीरे बढ़ने लगा था..............

काव्य अपने दोनों हाथ राम के सर के पीछे की तरफ ले जाती हैं और उसके आन्ह्कों पर लगी पट्टी खोल देती हैं और अपने दुपट्टे को नीचे फर्श पर धीरे से सरका देती hain............aab राम की नज़रें सामने काव्य की गोल गोल चूचियों पर थी जो उसपर सूट में पूरे गोल अकार में साफ़ नज़र आ रही thi..........wo उसे ललचायी हुई नज़रियों से एक तुक देखे जा रहा था.........

"bhabhi..........aab और न tadpawo........please अपना दूध मुझे पीला दो ..........एक बार प्लीज..........." और राम इस बार बुरी तरह से तड़प उठता hain..........uski बेचैनी पल पल बढ़ती जा रही thi.............wahin उसका साबरा धीरे धीरे अब जवाब देता जा रहा tha.............agar इस वक़्त उसके हाथ नहीं बंधे होते तो वो यकीनन काव्य पर टूट padta...........wahin काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर हौले से मुस्कुरा देती हैं...........

"इतनी भी क्या जल्दी हैं ram............tumhein मैं अपना सब कुछ दूंगी मगर ...........आहिस्ता aahista..............agar तुम चाहो तो मेर दूध फिलहाल में चख सकते हो............." और काव्य अपने दोनों चूचियों को आगे की तरफ बढाती हैं और राम के होंठों पर फिर से धीरे धीरे रगड़ने लगती hain............wahin राम अपना मुँह खोलकर काव्य के बड़े बड़े चूचियों को अपने डेंटन के बीच काटने लगता hain...........uske सूट के ऊपर से उसके दोनों चूचियों को पीने लगता hain............is एहसास से उसका लुंड अब काफी हुड्ड तक हार्ड हो गया tha............wahin उसके मज़े की सीमा भी नहीं thi...........sach तो ये था की उसे अब इस खेल में बड़ा मज़ा आ रहा था.............

" aaaaahhhhhhhhhhhhhh........ram......zara धीरे se..........tumne hi तो कहा था की काटूंगा nahin............fir तुम क्यों काट रहे ho..........agar इस तरह से करोगे तो मैं तुम्हें अपना दूध नहीं पिलाऊंगी................" और काव्य अपना एक चुकी राम के मुँह में रगड़ते हुए हौले से सिसक पड़ती hain.............uski भी बेचैनी अब साफ़ उसकी हरकतों से पता चल रही thi..........wo थोड़ा सा और आगे की तरफ झुकाती हैं और राम के बंधे हुए हाथों को धीरे से खोल देती hain............wahin काव्य अपने बदन को बिलकुल ढीला सा छोड़ देती hain...........mano जैसे उसमें कोई जान न बची हो..............

राम के दोनों हाथ जैसे hi आज़ाद होते हैं वो फ़ौरन काव्य को फ़ौरन अपने मज़बूत हाथों में कसकर जकड लेता हैं और इससे पहले काव्य कुछ संभालती वो तेज़ी से अपने दोनों हाथों को ऊपर की तरफ ले जाता हैं और बहुत सख्त हाथों से काव्य के नरम नरम चूचियों को मसलना शुरू करता hain..............aisa लग रहा था जैसे वो आता गगूँथ रहा ho...........uske दोनों हाथ अब काव्य के दोनों चूचियों पर इस कदर से चल रहे थे मनो वो काव्य के दोनों दूध ाचे से निचोड़ लेना चाहता ho............jaise जैसे उसके हाथों पर दबाव बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे काव्य की आहें भी तेज़्ज़ होती जा रही थी...........

वो राम की बाँहों में किसी मछली की तरह माचल रही thi................wahin राम की दोनों आखें हवस से सुर्ख लाल हो चुकी thi............wo तो जैसे काव्य को इतने करीब पाकर मनो पागल सा हो गया tha..............aisa लग रहा था जैसे वो आज काव्य के कपड़े फाड़ dalega..............wahin काव्य आज जैसे राम को पोरोइ चूत दे राखी thi...........na hi वो अब राम को रोकना चाहती थी और न hi उसका कोई वीयर्ध करना चाहती thi.............sach तो ये था की राम के इस हरकत से उसकी छूट में जैसे सैलाब सा उमड़ पड़ा tha..........uski छूट से पानी ऐसे बह रहा था जैसे कोई नदी.............

" aaaaaaaaaaaaaaaassssssssssshhhhhhhhhhhhhhhh............aahiisstaa से ram...............zara धीरे से maslo.....inhein.............main कहीं भागी थोड़ी न जा rahi...........aaaaaaaaaaassssssssssssss.............." और काव्य की सांसें ज़ोरों से चलने लगती हैं वहीँ राम तब तक काव्य के दोनों चूचियों को ऐसे hi मसलता रहता हैं जब तक उसका जी नहीं भर jata...............issey पहले काव्य कुछ समझती राम अगले hi पल काव्य के सूट को कसकर फाड़ने लगता हैं और तब तक उसके हाथ नहीं रुकते जब तक काव्य के सूट दो टुकड़ों में नहीं बाँट jata...................ram अगले hi पल उसकी फाटे हुए सूट को उसके बदन से अलग कर देता हैं और काव्य सलवार और ऊपर के ब्रा में राम के सामने बिकती रहती hain........................aab तो उसे राम की हरकतों से दुर्र सा लगने लगा था..........

" ये क्या पागलपन हैं ram..............tumne मेरे इतने कीमती कपड़े क्यों फाड़ diye............bahal इस तरह से कोई करता हैं क्या!!!!!! " और काव्य राम की तरफ देखती हुई हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम पर तो जैसे आज खून सवार tha..........wo काव्य के सवालों का कोई जवाब नहीं देता हैं फ़ौरन काव्य को नीचे की तरफ खींच लेता हैं जिससे काव्य फर्श पार आ जाती hain..........issey पहले काव्य कुछ संभालती या बोल पति राम अपने दोनों हाथ नीचे उसकी जानगोहन पर ले जाता हैं और उसके कमर में फंसा लाग्ग्य एक hi झाकते में पूरा खींच देता hain.............agle hi पल उसकी लग्गी काव्य के बदन से जजूदा होती चली जाती hain..........aab काव्य सिर्फ ब्रा और पंतय में राम के सामने thi...................wahin राम भूके भेड़िये की तरह काव्य को तो कभी उसके बदन को अजीब सी नज़रियों से घूर रहा था................

" ram...............ye क्या पागलपन hain...............tum मेरे साथ ऐसे क्यों पेश आ रहे ho........aakhir तुम्हें हो क्या गया हैं............" और काव्य हौले से बोल पड़ती hain............thoda सा दुर्र अब उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा tha........wahin राम कुछ देर तक ऐसे hi शांत खड़ा रहता हैं फिर वो बिना कुछ बोले आकर वहीँ कुर्सी पर जाकर आराम से बैठ जाता hain............kavya अपनी जगह से खड़ा होती हैं और एक तुक राम की तरफ अजीब नज़रियों से देखने लगती hain...........kuch सोचकर उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान तैर जाती हैं और वो अपने दोनों हाथ पीछे की तरफ अपने पीठ पर ले जाती हैं और अपने ब्रा के हुक को धीरे से खोल देती हैं...........

ब्रा के हुक खुलते hi वो अपना दोनों हाथ नीचे पंतय की तरफ ले जाती हैं और धीरे धीरे उसे भी नीचे की तरफ सरकने लगती hain.............fir कुछ सोचकर वो सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी हैलट में राम के करीब धीरे धीरे जाने लगती hain..........wahin कुछ दूर पर राम बिना अपनी पलकें झपकाए काव्य के नंगे बदन को बड़े गौर से देख रहा thaa............aisa पहली बार था जब वो काव्य को इस रूप में देख रहा tha..............aur शायद ये सोच रहा था की " ये हसीं बदन क्या सिर्फ मेरे लिए hain..............aab तक वो नंगी लड़कियों को केवल ब्लू फिलॉन और पोस्टर्स में देखता आया था आज उसका पहला एक्सप्रेस था जब वो किसी लड़की को सर से लेकर पवन तक बिन कपड़ों के देख रहा था................

उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ नज़र आ रही थी वहीँ आँखों में जैसे हवस फिर से साफ़ नज़र आने लगे they.............mano जैसे ानकोहन में खून उतर आया ho............aaj वो काव्य को भोगना चाहता tha.............uske हसीं बदन को पाना चाहता tha.........uske जवानी को चकना चाहता tha..................aaj उसे ऐसा लगने लगा था की अब मंज़िल उसकी दूर nahin..........dekhna था की आने वाले वक़्त में वो काव्य पर भारी पड़ता hain...............................ya काव्य उसपर......................................

कंटिन्यू............................................................
 
वापसी करूँगा भाई इस वक़्त मुझे चोट लगी हैं जिससे मैं अभी अनफिट हूँ. एक साक्ष को बचने के चक्कर में बाइक से चोट लग गया. लिखने तो मैं वाला hi था फिलहाल कुछ दिन तक और थोड़ा रेस्ट चाहता हूँ. देरी के लिए सॉरी तो आल ऑफ़ यू........
 
Update-49(A) (मेघा अपडेट)

उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ नज़र आ रही थी वहीँ आँखों में जैसे हवस फिर से साफ़ नज़र आने लगे they.............mano जैसे ानकोहन में खून उतर आया ho............aaj वो काव्य को भोगना चाहता tha.............uske हसीं बदन को पाना चाहता tha.........uske जवानी को चकना चाहता tha..................aaj उसे ऐसा लगने लगा था की अब मंज़िल उसकी दूर nahin..........dekhna था की आने वाले वक़्त में वो काव्य पर भारी पड़ता hain...............................ya काव्य उसपर......................................

अब आगे.................................................................

राम के साबरा का बाँध पूरी तरह से टूट चूका tha........kavya की ये tadapahat.......pal पल उसकी जान लेती जा रही thi.........usey अब कुछ नहीं सूझ रहा tha..........siwaye काव्य के बुर ke............kaise भी करके वो अपना लुंड काव्य की बुर में पूरी तरह से उतरना चाहता tha...........uski छूट को जी भरके छोड़ना चाहता tha.........upar से काव्य को ऐसे सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी हालत में देखकर उसके साबरा का बाँध अब पूरी तरह से टूट गया था.........

वो फ़ौरन अपने कपड़े एक एक कर निकलने लगता हैं और कुछ hi सेकण्ड्स में वो सर से लेकर पवन तक पूरा नंगा हो जाता hain...........issey पहले काव्य कुछ समझती ............या संभालती ..........राम फ़ौरन आगे बढ़कर काव्य को कसकर अपनी मज़बूत गिरफ्त में ले लेता हैं और उसे बेहताशा चूमने चटनी लगता hain............kabhi उसके गलों par...........to कभी उसके गार्डन और होंठों ko...............sach तो ये था की वो अब पूरी तरह से पागल हो गया tha............usey कुछ और नहीं सूझ रहा tha.............siwaye काव्य की बुर में अपने लुंड पेलने को.................

वो फ़ौरन आगे बढ़ता हैं और काव्य को वहीँ फर्श पर पीठ के बल लेता देता hain......aur खुद भी उसके ऊपर चढ़ जाता hain..............issey पहले काव्य कुछ संभालती ya............samjhti ..............राम अपने खड़े लुंड को काव्य के बुर पर सेट करता हैं और बिना एक पल के देर किये वो अपना पूरा लुंड एक hi झटके में काव्य के बुर में पूरा उतर देता hain..............aur ताबड़तोड़ धक्के मरना शुरू करता hain..............aur ये सिलसिला ज़्यादा देर तक नहीं चलता और आखिर राम के साबरा का बाँध पूरी तरह से टूट जाता हैं............

आख़िरकार वो वहीँ हफ्ते और चीखते हुए दो चार ढकूँ में अपना सारा वीर्य काव्य की बुर की गहराई में उतरता चला जाता हैं और तब तक वो काव्य के बदन को ढीला नहीं छोड़ता जब तक की उसके अंदर का तूफ़ान पूरी तरह से शांत नहीं हो jata.............aakhirkar थक हारकर शर्मिंदा के भाव लिए ........काव्य से अपनी नज़रें मिलाये bina..........ussey कुछ कहे ........चुप चाप से ..............अपने कपड़े उठाकर उस कमरे से फ़ौरन बहार निकल जाता hain.............wahin काव्य फर्श पर अभी भी पूरी तरह से नंगी हालत में लेती हुई बस राम को अपने से दूर जाता हुआ देख रही thi..............sach तो ये था की उसके चेहरे पर मायूसी अब साफ़ नज़र आ रही thi..........wo इस खेल को लुम्बा ले जाना चाहती थी मगर राम की नादानी से आज सब किये कराये पर पानी फिर गया था........

राम ने तो उसकी आग को बुझाने के बजाये और भी भड़का दिया thaa...........ram तो बस अपनी प्यास बुझाकर वहां से चला गया था मगर पीछे काव्य को यु hi प्यासा अकेले छोड़ गया tha...............ek पल तो काव्य को उसपर गुस्सा भी बहुत आया था मगर वो चाह कर भी राम को कुछ बोल नहीं सकती thi.............kyon की वो जानती थी की राम अभी इन सब मामलों में थोड़ा बाचा hain.......aabhi उसे ये सब सीखने में थोड़ा और समय lagega..............aab तो उसे बस रघु का hi सहारा tha.......ek वो hi था जो उसकी इस बढ़ती हुई प्यास को बुझा सकता tha............kafi देर तक काव्य न जाने इन्ही सब में उलझी रहती हैं फिर वो अपने बुर से बेहटा राम के रूस को ाचे से साफ़ करती हैं और i-pills की दवा खाकर फ़ौरन बाथ्रून में नहाने चली जाती हैं...........

*******************************************************************

शाम से रात हुई और रात से फिर shubeh.............ram तो अभी भी शर्मिंदगी की वजह से काव्य से अपनी नज़रें चुरा रहा tha..........magar काव्य को उससे कोई गिला शिकवा न tha.........wo तो बस राम के मासूमियत से प्यार करती thi...........kareeb सुबह के 9 बजे राम नास्ता करके काव्य को बिना कुछ बताये चुप चाप se..........raghu और जीतू के कमरे के तरफ चला जाता hain...........kyon की वो एक बात ाचे से जनता था की उसका रघु और जीतू से मिलना काव्य को पसंद नहीं था.........

जैसे hi वो रघु के कमरे के पास पहुंचता हैं हमेशा की तरह उसके कमरे का दरवाज़ा धीरे से नॉक करता hain...........jeetu जाकर दरवाज़ा खोलता हैं और राम को अपने पास अपने सामने खड़ा पता hain.......jisey देखकर उसके चेहरे पर एक कमीनी सी मुस्कान तैर जाती hain..........jab राम उस कमरे में दाखिल होता हैं तब उस कमरे में एक अजीब सी गंध हवा में फैली हुई होती hain........ram तो नशा करता था नहीं फिर वो क्या जनता की ये किस चीज़ का धुवा hain.......haan मगर जैसे hi वो अंदर दाखिल होता हैं उसे ज़ोरों की खांसी ज़रूर आ जाती hain..............ye देखकर रघु के चेहरे पर एक कमीनी सी मुस्कान तैर जाती हैं और वो राम की तरफ देखता हुआ धीरे से उसे अपनी पास बैठने का इशारा करता हैं........

" ये क्या कर रहे हैं आप................" और राम रघु की तरफ देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता hain..........wahin रघु राम की तरफ देखता हुआ धीरे से फिर मुस्कुरा पड़ता हैं......

" ये जानत हैं तुम नहीं samjhogey.........aur इसे जुवा कहते hain.........aur ये ताश के पाटों के साथ खेला जाता hain..........is खेल का नाम हैं डंकी load...........yani जिसके पास जितना छोटा पाती होगा समझो वो जीत gaya......aur जिस्सके पास जितना बड़ा पाती होगा वो हार जायेगा इस खेल mein..........yu समझ लो की ये नसीब और दिमाग दोनों का खेल hain.............tumhein खेलनी हैं............" और रघु एक गांजा से भरा हुआ सिग्रत्ते का एक लुम्बा सा काश खींचता हुआ धीरे से बोल पड़ता hain............nashe से उसकी आँखें इस वक़्त सूर्ख लाल thi..........aur शायद हवस से भी..........

" पर मुझे तो ये खेलना आता hi nahin..........sikhowogey क्या आप मुझे......." और राम उत्सुकतावश रघु से पूछ बैठता हैं वहीँ कुछ दूर पर खड़ा जीतू भी जवाब में धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं...........

" zaroor.......zaroor..............ismein कौन सी नयी बात hain...........ek दो बार तुम भी ध्यान से देख लो .......और समझ lo........tum भी आसानी से खेल loge...........par जानते हो मज़ा तो इस खेल में तब आता हैं जब इसमें लगाने को कुछ दांव भी lage.............aur तुम्हारे पास तो कुछ ऐसा हैं नहीं की तुम दांव पे लगा sako...........aur जो चीज़ तुम्हारे पास लगाने को हैं शायद वो चीज़ तुम कभी लगाना नहीं चाहोगे..........." और जीतू इस बार रघु की तरफ देखता हुआ कमीनी सी मुस्कान के साथ हंस पड़ता hain............wahin राम उन दोनों का बस मुँह देखता रहता hain.........wo उनका इशारा शायद नहीं समझ सका tha..........tabhi जीतू पलंग के नीचे से एक अश्लील किताब निकलता हैं और इस बार वो उसे राम के हाथों में धीरे से थमा देता हैं.......

" ये लो छोटे maik...........ye किताब ख़ास आपके liye............ismein वो साडी तस्वीर हैं जो आप देखना चाहते ho...........ismein ऐसे ऐसे तसवीरें हैं जिन्हेंइ देखकर आपका लौड़ा आपके पेण्ट से बहार उछाल मरने lagega............ismein औरत के छूट को साफ़ साफ़ दिखाया गया hain.......gaur से देख लो की औरत की छूट दिखती कैसी hain..........aagey भी देख लो इसमें बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिसे देखने के बाद आपको मज़ा बहुत आएगा........." और जीतू इतना कहकर धीरे से हंस पड़ता हैं वहीँ राम की उत्सुकता भी धीरे धीरे बढ़ने लगती hain...........magar शर्म और झिझक से वो उस किताब को ले तो लेता हैं मगर उसके पानी नहीं kholta......ye देखकर जीतू उसकी तरफ देखता हुआ मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" अब इसमें क्या शर्माना छोटे malik...........sab लोग तो एहि करते hain.......aap भी देख लीजिये यहीं पर हमारे samney.......hum भला किसी से कहने थोड़ी न jayengey..........aur क्या हम मालकिन से ये सब कहेंगे..........." और जीतू अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ धीरे से हंस पड़ता hain......wahin राम कुछ देर बाद उस किताब के पानी को धीरे धीरे एक एक कर उसके पन्ने पलटने लगता हैं.........

जैसे जैसे वो उसके पन्ने पलट रहा था वैसे वैसे उसके होश उड़ते जा रहे they........us तस्वीर में ऐसे ऐसे फोटो थे जिन्हें देखकर राम का लुंड पूरी तरह से अकड़ने लगा tha..........fir राम उस किताब के पानी आगे palata.........tabhi जीतू उस किताब के पानी पर अपने हाथ रख देता हैं और दो चार पानीय आगे पलटने के बाद एक ऐसी तस्वीर को राम के सामने रख देता हैं जिसे देखकर राम के होश hi उड़द जाते hain..........wo बड़े गौर से उस तस्वीर को एक तुक देखने लगता हैं........

" गौर से देखिये मालिक इस तस्वीर ko...........dekhiye इस तस्वीर में ये लड़की किस तरह से अपनी छूट खोले कैसे मूट रही hain,..........aap एक दिन मुझसे कह रहे थे न ki...........aurat कैसे मूतति hai.........dekhiye........" और जीतू फ़ौरन उस तस्वीर को राम के सामने एक एक कर दिखने लगता hain.......wahin राम का लुंड पूरी तरह से खड़ा हो जाता hain.........sari तस्वीर देखने के बाद उसके आँखों के सामने काव्य का हसनेन चेहरा और हसीं बदन फिर से घूमने लगता हैं..........

" किस सोच में आप डूब गए malik..........zara sochiye........agar इस तस्वीर की जगह अगर आपकी भाभी होती तो बात hi क्या thi.........jab घर में इतनी हसीं मालकिन हैं तो आपको ये तस्वीर देखने की क्या zaroorat.........aap कह के तो देखिये उनसे एक baar.......aapke एक इशारे पर आपकी भाभी आपके सामने अपना छूट खोलकर आपको परोस degi..........fir जैसा चाहे वैसा khaiye........sab आपका hi तो हैं........" और जीतू राम को उसकी कीमती चीज़ के बारे में बताते हुए धीरे से इशारा करता hain......wahin राम के चेहरे पर मायूसी फिर से झलक पड़ती हैं.........

" हाँ वो तो हैं मगर मुझसे hi कण्ट्रोल नहीं होता" ..........फिर राम कल का सारा किस्सा उन दोनों को बताता चला जाता हैं वहीँ जीतू और रघु के चेहरे पर कमीनी मुस्कान फिर से तैर जाती हैं.........

" इसमें इतनी फ़िक्र करने की कौन सी बात hain...........aap बस अपने तरफ से हाँ कहिये फिर देखिये हम कैसे अपनी मालकिन को आपके कदम के नीचे लेट hain.........bus एक एहसान हमपर इतना ज़रूर कर दीजिये की हमें भी थोड़ा उनकी जवानी का रूस चखा dijiye......aur मिल बाँट के खाने में कोई हर्ज़ थोड़ी न hain..........agar आप कहिये तो मैं कुछ इंतेज़ाम करूँ....." और इस बार जीतू अपनी बात पे ज़ोर देते हुए धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ राम कुछ देर तक चुप्पी साढ़े रहता हैं फिर वो आख़िरकार हाँ में अपनी गुर्दें धीरे से हिला देता हैं......

" मगर क्या भाभी manegi..........kahin वो मुझपर भड़क गयी to.........aur मैं कैसे उन्हें इन सब के लिए राज़ी करूँगा........." और राम ासमझाश में धीरे से बोल पड़ता hain........wahin इस बार रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं........

" ये देख रहे हो इन ताश के पत्तों ko..........bus तुम्हें कैसे भी करके हमारी मालकिन को इसे खेलने के लिए तैयार करना hain.........fir बाकि तुम सबकुछ मुझपर छोड़ do............na इस ताश के पाते की बाज़ी में मैंने उन्हें हरा दिया तो मेरा नाम भी रघु nahin............fir तुम देखना कैसे मैं एक एक कर उनके सरे कपड़े उतरवाउंगा और नंगा करता jawunga.............aur इस खेल के ज़रिये हम जो चाहे जैसा शर्त चाहे उनसे मनवा सकते hain......aur एक बार हम ये बाज़ी जीत गए तो समझो तुम्हारी भाभी हम सबकी hui.........fir हम जो चाहे जैसा चाहे kare.........humhein बोलने वाला कोई नहीं hoga.......bus तुम मेरा पूरा पूरा साथ dena...........fir देखना मैं कैसे तुम्हारी भाभी को अपनी मुट्ठी में करता हूँ........." और इस बार रघु राम को अपना सारा प्लान समझाता चला जाता hain.........wahin राम फिर से अपने सपनों की दुनिया में खोता चला जाता हैं.......

इसे पहले की वो इन सब ख्यालों की दुनिया से बहार निकलता तभी सामने का दरवाज़ा तेज़ी से खुलता हैं और राम के हाथों में थमा किताब नीचे फर्श पर गिर पड़ता hain..........is वक़्त सामने का मंज़र बहुत अजीब tha..........samney बिस्टेर पर ताश के पाते बिखरे पड़े they..........wahin रघु के हाथों में ताश की गाडी भी thi.........wahin कुछ दूर पर जीतू सिग्रत्ते में भांग के काश ज़ोरों से खींच रहा tha.........aur सारा धुवां पूरे कमरे में फैला हुआ tha.........aur वहीँ राम बैठा उनके साथ बातें कर रहा tha.............yu सामने कड़ी काव्य को ऐसे दरवाज़े के सामने देखकर जहाँ राम की पूरी तरह से फुट जाती हैं वहीँ रघु और जीतू उसे देखकर हौले हौले से मुस्कुराने लगते hain..............aise लगता हैं मनो जैसे वो काव्ये के आने का hi इंतज़ार कर रहे हो..............

" tuuuummmmmmmmmmmmmm.......yahan क्या कर रहे हो ram.........in दोनों के saath...........aur ये सब क्या हैं..........." और काव्य बड़े गौर से उन तीनों को एक तुक देखने लगती हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" कुछ नहीं memsaheb..........bus यु hi खली समय होता हैं तो छोटे मालिक हमारे पास चले आते hain...........time पास karney..........agar आप बुरा नहीं मानेंगी तो आप भी हमारे साथ यहीं पर आकर बैठ जाइये ............और मेरी मानिये तो क्यों न एक एक ताश की बाज़ी भी हो जाये..........." और रघु काव्य के बदन को देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा पड़ता hain........wahin काव्य अभी भी बड़े गौर से रघु और जीतू को घूरे जा रही thi........taash का इस तरह से काव्य को ऑफर करना कुछ अजीब सा उन्हें लग रहा tha.........magar उन्हें काव्य को पाना tha..............so पाना था.............

वैसे आज काव्य काळा रंग की साड़ी पहनी हुई thi.....aur उसी रंग की मैचिंग ब्लाउज bhi........jismein वो बेहद खूबसूरत लग रही thi...........saari हमेशा उसके बदन से पूरी तरह चिपकी हुई thi..........jo उसके बदन के हर कटाव को साफ़ उजागर कर रही thi..............kuch देर तक तो रघु और जीतू भी काव्य को देखते hi रह gaye......upar से काव्य ने हल्का पिंक कलर का लिपस्टिक भी लगाया हुआ tha...........aur हल्का मेकउप bhi..........jismein वो बहुत हसीं लग रही thi........agar इस वक़्त राम यहाँ नहीं होता तो रघु फिर से काव्य पर टूट पड़ता..........

मगर वो तो वैसे भी उसपर आज टूटने वाला tha.......ek बहुत hi मस्त प्लान उसके दिमाग में इस वक़्त चल रहा tha..........jisey सोचकर वो मुन्न hi मुन्न मुस्कुरा भी रहा था..........

" आप नाराज़ क्यों होती हैं memsaheb.........aur छोटे मालिक कब तक आपके साथ rahenge.......unka भी तो मुन्न करता होगा इधर उधर घूमने ka.........bus थोड़ी सी अपनी दिल बहलाने के लिए यहाँ चले आते hain.........aur हम सब कोई जुवा थोड़ी न खेल rahe.........ye तो बस पट्टी का खेल hain..........jiske किस्मत में छोटा पाती आया वो jeeta.............chahe तो आप भी खेल सकती hain........ye खेल हर बाचा बाचा जनता hain............aur मैं तो आपसे निवेदन करूँगा की आप भी आज हमारे साथ इसी जगह पर आकर khele.........ek एक बाज़ी हो jaye..........dekhtey हैं आज इस खेल में जिततता कौन हैं.............." और रघु काव्य के तरफ अजीब सी नज़रियों से देखने लगता हैं वहीँ काव्य कुछ देर तक खामोश कड़ी रहती हैं फिर वो कुछ नहीं बोलती और उन तीनों की तरफ यु hi देखती रहती हैं......

कंटिन्यू...................................................................
 
Update-49(B) ( मेघा अपडेट)

" अबे haramkhor...........apni मेमसाहेब को बैठने के लिए कुर्सी तो दे........" और रघु जैसे जीतू पर चिल्ला पड़ता hain..........wahin जीतू फ़ौरन सामने राखी कुर्सी को धीरे से काव्य के तरफ बढ़ा देता hain.........wahin काव्य बिना कुछ कहे चुप चाप से आकर उस कुर्सी पर बैठ जाती hain........waise उसे इस माहोल में कुछ अजीब सा जरूर लग रहा tha.......aur राम की उपस्थिति की वजह से वो थोड़ी झिझक ज़रूर रही थी........

" मुझे आता हैं ये khel.......mujhe समझने की कोई ज़रूरत नहीं............" और काव्य के इस जवाब से तीनों के चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी की लहर दौड़ जाती hain............wahin राम भी पूरी तरह से नार्मल हो जाता hain.......aur फ़ौरन काव्य के हाथों को बड़े प्यार से थामकर उसे ये खेल खेलने की ज़िद्द करता hain......wahin काव्य बिना कुछ कहे धीरे से हैं में उसका समर्थन करती hain........sach तो ये था की वो राम का दिल नहीं तोडना चाहती थी मगर राम तो आज उसकी सामूहिक चुदाई का इंतेज़ाम कर आया tha..........charon चार तरफ एक घेरा बनके बैठ जाते हैं और रघु पाते फेंटने लगता hain............halanki राम को ये खेल नहीं आता था तो उसके साथ जीतू हो जाता हैं.........

" अरे waah............main न कहता था हमारी मालकिन जैसा कोई nahin...........aap सच में बहुत मस्त hain........aur वैसे आप इन कपड़ों में तो आज और भी हसीं लग रही हैं........." और जीतू इस बार काव्य की तारीफ करता हुआ धीरे से अपनी एक आँख मार देता हैं वहीँ काव्य शरमाते हुए अपनी नज़रें फ़ौरन नीचे की तरफ झुका लेती हैं........

" memsaheb............khel तो तब मज़ा आएगा जब इसमें लगाने को कुछ दांव भी lage...........jo जीतेगा वो हारने वाले से कोई भी काम करवा सकता hain.........kuch bhi........aur हरनेवाले को वो काम करना hi पड़ेगा..... चाहे वो काम कुछ भी क्यों न हो ...................वो उसे हर हाल में पूरा karega.........aur कोई भी बीच में गेम नहीं छोड़ sakta...........aur हर राउंड में ये खेल बदलता rahega..........aur तब तक नहीं रुकेगा जब तक जीतने वाला न चाहे.............." और रघु जैसे अपना फैसला सुनाता hain........wahin काव्य कुछ देर तक सोचती हैं फिर वो भी धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती hain........na जाने क्यों उसके दिल में एक अजीब सा दुर्र भी लग रहा tha.......magar वो चाहे जो हो आज वो उस खेल को खेलना चाहती thi.........shayad राम की ख़ुशी के लिए........

अब खेल शुरू हो चूका tha.............raghu तो पूरा प्लान कर चूका था की अगर काव्य हार गयी तो वो उसके साथ क्या karwayega..........aab सवाल ये था की काव्य को कैसे हराना tha..............raghu राम के कान में धीरे से कुछ कहता हैं जिसे सुनकर राम फ़ौरन हाँ में अपनी गुर्दें हिला देता hain........wahin राम के आँखों में एक अजीब सी चमक दिखाई देने लगती hain........wahin दूसरी तरफ काव्य असमाजश में उन दोनों के तरफ बड़े गौर से देखने लगती hain........fir खेल शुरू हो जाता हैं......

रघु पाते फेंटा हैं और एक एक कर सरे पाते सबके बीच बांटने लगता hain............jab सरे पत्ते बाँट जाते हैं तब सब एक एक कर उठाने लगते hain.........wahin जहाँ काव्य के चेहरे पर मुस्कान आ जाती हैं वहीँ दूसरी तरफ जीतू का मुँह लटक जाता hain.........shayad उसके पाते ठीक नहीं आये they...........fir रघु अपना पहला पाटा डालता hain.......aur एक एक कर सब अपने पाते फेंकने लगते hain.........jo भी था इस खेल में सबकी नज़रें काव्य पर hi thi..........wahin रघु बीच बीच में अपनी लुंगी के ऊपर से अपने लुंड को भी मसल देता वहीँ काव्य की सांसों की रफ़्तार बढ़ jati........pehle दांव में जीतू हार जाता हैं..........

रघु कुछ देर तक सोचता हैं फिर काव्य की तरफ देखता हुआ धीरे से बोलने का इशारा करता hain........wahin काव्य भी धीरे से बोल पड़ती हैं........

" आप hi बोलिये malkin.........isey क्या सजा मिलनी chahiye........issey क्या करवाया जाये.........." और रघु तिरछी नज़र देखता हुआ जीतू की तरफ बड़े गौर से देखने लगता hain........wahin काव्य को कुछ समझ नहीं आता की वो क्या bole.......kuch देर सोचने के बाद वो आखिर धीरे से बोल पड़ती हैं.....

" तुम कल घर का सारा काम अकेले karogey........yehi तुम्हारी सजा हैं......." और काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु अपना माथा पीट लेता हैं......

" ये क्या memsaheb.........ye कौन सी सजा hui..........arey सजा hi देनी हैं तो ऐसा दीजिये जिसमें खेल का पूरा पूरा मज़ा aaye........jaise इसे मुर्गा banana......iske कपड़े utarwana.....wagerah......." और रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ फिर से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य को अब रघु का पूरा खेल समझ में आ जाता हैं की वो आखिर अब चाहता क्या hain...........aab काव्य इतना तो समझ चुकी थी की अगर वो हारी तो रघु उसके भी कपड़े उतरवा lega........aur देखा जाये तो अब इस खेल का मकसद भी एहि tha........magar अब काव्य चाह कर भी इस खेल को छोड़ नहीं सकती thi........aur इस तरह से भाग नहीं सकती thi......kyon की उसे हारना या भागना शुरू से hi पसंद नहीं tha.......aur ऊपर से उसका ईगो ऐसा करने भी नहीं दे रहा था..........

" चल be.....tu पहले अपने शर्ट उतर का एक कीटरने रख de.........aur याद rakh.....aabhki बार हरा तो बीटा अगला नंबर तेरा पेण्ट का होगा........." और रघु एक नज़र काव्य के तरफ देखता हुआ धीरे से हंस पड़ता हैं वहीँ जीतू अपना शर्ट के एक एक बटन खोलने लगता हैं और कुछ देर में वो अपना शर्ट निकलकर एक तरफ रख देता हैं.........

फिर से दूसरा दांव चलता हैं और इस बार राम की बरी आती हैं हारने ki.........isi तरह से उसका भी शर्ट उतरता hain.........fir अगली बार जीतू फिर से हार जाता हैं और इस बार उसका पेण्ट भी उतर जाता hain..........wahin काव्य को अब थोड़ा अजीब लग रहा tha.......wo अकेले तीन तीन मर्दों के बीच ऐसे नंगेपन खेल को खेल रही thi.......aur वो ाचे से जानती थी की आगे हारने का अजनाम क्या hoga.......is लिए वो बहुत सोच समझकर अपने पाते फेंक रही थी............

फिर से दूसरा दांव होता हैं और इस बार रघु हार जाता hain.....wo भी अब अपना शर्ट उतारकर रख देता hain............kamal की बात तो ये थी की काव्य अभी तक हारी नहीं थी मगर नसीब हर बार साथ नहीं deti.............is बार पत्ते काव्य के बहुत ख़राब आये they........jaise तैसे वो अपनी चाल चल रही थी मगर आख़िरकार आठ में वही हुआ जिसका उसे दुर्र tha..........wo पहली दफा इस खेल में हरी thi......aur अब रघु के चेहरे पर मुस्कान तैर गयी थी..........

" ओह ho........memsaheb........aap तो बाज़ी हार gayi.........chalo कोई बात nahin.....hum इतनी निर्दयी थोड़ी न hain..........aap एक काम कीजिये आप अपने साड़ी का पालू अपने सीने पर से हटा dijiye.......aab खेल ख़तम होने तक ये पल्लू ऐसे hi नीचे रहेंगे........." और इस बार रघु अपने लुंड को मसलते हुए धीरे से अपने काळा पीले दन्त दिखता हुआ हंस पड़ता hain.......kavya कुछ देर तक सोचती हैं फिर वो धीरे से अपने कंधे पर लगा पिन निकल देती हैं और अगले hi पल अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा देती hain..........aab उसकी बड़ी बड़ी चूचियां उस काळा छोटे से ब्लाउज में क़हर ध रहे they...........jispar उन तीनों की नज़रें जैसे जैम सी गयी thi.........jo भी था अब उन तीनों को इस खेल में मज़ा बहुत आ रहा था...........

काव्य एक बात तो जानती थी की चाहे इस खेल का अजनाम जो ho...........magar नंगा तो उसे हर हाल में होना hi padega......chahe उन तीनों की हार ho..........ya फिर जीत ho........agar हारेंगे तो वे सब काव्य के सामने पूरा नंगा होते चले jayengey..........aur जीतेंगे तो उसे एक एक कर ये लोग नंगा करते jayengey..........ye सोचकर न जाने क्यों उसकी बुर में गीलापन भी अब बढ़ने लगा tha........magar राम की मौजूदगी की वजह से वो काफी झिझक रही thi...........khair जो भी था खेल तो पूरे ज़ोर शोर के साथ चल रहा था......

इस बार फिर राम बाज़ी हार गया और उसे अपना पेण्ट उतरना pada........aur अगली बार में फिर से जीतू हार गया जिससे वो सिर्फ अंडरवियर पर बस रह gaya.........ye देखकर रघु इस बार ज़ोरों से हंस पड़ता हैं.....

" beta............bahut संभलकर इस बार khelna.........kyon की अबकी बार जो तू हरा तो तेरी इज़्ज़त गयी samjho............tujhe पूरा नंगा होने से अब कोई नहीं रोक सकता........." और रघु ज़ोरों से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य का अब शर्म से बुरा हाल tha........kyon की एक तो वो उन मर्दों के बीच अपना पल्लू नीचे गिराकर बैठी थी जिससे सबकी ललचायी नज़रें उसके बड़े बड़े चूचियों पर जा रही thi.....wahin रघु के दिमाग में काव्य को हारने का प्लान चल रहा था........

अगला दांव चला और इस बार काव्य हार gayi.........aur इस बार राम बीच में hi बोल उठा.....

" bhabhi.....aap तो इस बार हार gayi........aab तो आपकी साड़ी उतरी samjho........chaliye उतरिये जल्दी से अपना साडी......." और इस बार राम जैसे ख़ुशी से चहक उतथा हैं वहीँ काव्य अपना सर झुका लेती हैं और धीरे से कड़ी होकर अपनी साड़ी उतरने लगती hain.........sach तो ये था की काव्य को भी अब इस खेल में पूरा पूरा मज़ा आ रहा tha........wo आज बहुत जम कर छोड़ना चाहती thi.....kyon की उसके अंदर की प्यास आज बहुत ज़्यादा भड़क उठी thi..........magar राम की वजह से वो थोड़ी झिझक रही thi........magar अब तो राम भी एहि चाहता था की काव्य भी उनके सामने पूरी नंगी ho.......to अब काव्य को भला इसमें क्या ऐतराज़ था........

फिर से दांव चला और इस बार राम हार gaya........is बार उसकी पेण्ट उतरी .......और नेक्स्ट राउंड में उसकी banyaan.......bus एक रघु hi था जो थोड़ी ाची हालत में tha........fir से दांव हुआ और इस बार काव्य हार गयी..........

" चलिए memsaheb.......aab जल्दी से अपना ये ब्लाउज उतर dijiye........fatafat......" और जीतू इस बार चहकते हुए बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य ना में धीरे से अपना सर हिला देती हैं......

" please.........jeetu.........aab मुझसे ये नहीं hoga..........main नहीं उतर सकती और ये sab......tum मर्दों की बात अलग hain.......aur तुम सब के बीच मैं सिर्फ एक अकेली औरत hoon.......please............" और काव्य जैसे फर्याद करने लगती हैं वहीँ रघु उसे फिर से वारं करता हैं........

" मैंने कहा था न की खेल जब तक ख़तम नहीं होगा कोई कहीं नहीं jayega.....aur हारने वाला वहीँ करेगा जो जीतनेय वाला उससे kahega.......aab नखरे न कीजिये फटाफट अपने सरे कपड़े utariye........aur ये कोई नयी बात थोड़ी न हैं ...हमने तो कई बार आपको बिन कपड़ों के देखा hain...........to इसमें शर्म कैसी............." और रघु राम की तरफ देखता हुआ धीरे से हंस पड़ता हैं वहीँ राम की आँखें हैरत से फैलाती चली जाती हैं........

" इसमें इतने आश्चर्य की बात नहीं हैं छोटे malik............paatey की बाज़ी होने दीजिये हम आपकी भाभी के एक एक किस्से आपको बताते jayengey........aur सच कहूं तो आपकी भाभी बिना कपड़ों के और भी ाची लगती hain......agar मेरा बस चलता तो मैं इन्हें ऐसे hi दिन रात पूरा नंगा rakhta.........aab उतर भी दीजिये memsaheb.......apne ये ब्लाउज......." और रघु काव्य के चूचियों की तरफ देखता हुआ धीरे से इशारा करता हैं वहीँ काव्य धीरे धीरे से अपना एक एक कर सारा बटन खोलने लगती हैं और वो अपना ब्लाउज भी उतर देती hain........aab वो सिर्फ काळा रंग की ब्रा में थी और नीचे उसका पेटीकोट था.......

खेल का अगला दान चला और इस बार जीतू फिर से हार gaya........magar जीतू से कहीं ज़्यादा शॉकिंग काव्य को होने वाला tha......kyon की अब उसके जिस्म पर एक आखिरी कपडा tha..........aur अब वो भी उतरने वाला tha..........jeetu एक नज़र काव्य के तरफ देखता हैं फिर वो खड़े होकर भेषर्मोन की तरफ हँसता हुआ अपना काचा भी उतर देता हैं और उसका फनफननता हुआ 9 इंच का लौड़ा काव्य के आँखों के सामने झूलने लगता hain...........kavya की सांसें अब धीरे धीरे बढ़ने लगी थी........

अब फिर से खेल शुरू हुआ और इस बार रघु हार gaya.........wo भी फ़ौरन अपनी लुंगी निकल देता हैं और वो फिर से दांव खेलता hain..........aab तक काव्य जीतते आ रही थी मगर अब उसका बुरा वक़्त शायद शुरू होने वाला tha...........kyon की अब पाते जीतू फेंट रहा tha..........khel चलता रहा और काव्य इस बार हार gayi..........aur जीतू ने इस बार उसका पेटीकोट उतरवा liya.........tabhi काव्य बीच में अचानक बोल पड़ती हैं........

" रुक जाओ raghu........agar इस तरह से चलता रहा तो हम सब के जिस्म पर एक भी कपड़े नहीं bachengey..........main अब ये खेल और नहीं खेल sakti.........agar इस खेल में कुछ शर्तें हो तो kaho.........nahin तो मैं चली यहाँ से........" और काव्य खेल को बीच में छोड़ने का फैसला कर लेती हैं वहीँ रघु फ़ौरन बीच में अपना दूसरा प्लान शुरू कर देता हैं......

"ठीक hain..........tab इस खेल में कुछ बदलाव hongey.......aab ये खेल सिर्फ 5 बार खेला jayega...........aur जो इस खेल में सबसे ज़्यादा हरा वो .........वहीँ करेगा जो सब के सब विजेता chahengey.......yu समझ लो की वो एक दिन के लिए उन सब का घुलम हो jayega..........maalik की हर आज्ञा उसे माननी hogi........har हार mein.........chahe जो ho.........is लिए बड़े ध्यान से खेलना सब के sab........aur हाँ इस बार कोई बीच में किसी को कुछ नहीं karwayega.........jo हारेगा वहीँ सब कुछ करेगा इन 5 बाज़ी mein..........to खेल शुरू करते हैं........."

" रघु जनता था की ये बाज़ी उसे कैसे भी करके काव्य को हैरानी hain....aur ये उसके लिए एक सुनेहरा मौका tha.........wo फ़ौरन अपने पाते फेंटते हैं और काव्य से नज़रें बचाकर उस पाते की गाडी से सबसे छोटे पाते छुपकर अपने पास रख लेता hain.......wahin काव्य इन सब से अनजान वो इस खेल को खेलने लगती hain.....pehle दांव में राम हार जाता हैं और दूसरे दांव में raghu.......fir रघु अपने पास छुपाये सरे पाते धीरे से निकलते हुए जीतू और राम के तरफ काव्य से छुपाकर बढ़ा देता hain.......aur कुछ पाते अपने पास रख लेता हैं.......

फिर से दांव फेंका जाता हैं और इस बार काव्य हार जाती hain.......kyon की काव्य के पास सरे के सरे बड़े पाते आये they........wo तो जनता hi था की काव्य इस खेल में अब तो हारेगी hi.........aur अब आगे भी haregi...........kyon की वो तो अब उसके साथ ऐसा गन्दा खेल खेलना चाहता था जिससे काव्य की रही सही शर्म भी अब ख़तम होने वाली thi...........yakeenan जैसा रघु चाहता था वैसा hi hua.........dusare दांव में भी काव्य फिर से हार gayi..........is बार भी उसके पास बड़े पाते aaye...........aab बचा फाइनल round.............aab काव्य का दिल ज़ोरों से घबरा रहा tha...........kyon की ये आखिरी राउंड था और इस बार हार मतलब की उसकी चुदाई pukki......kyon की वही सिर्फ इस खेल में अब तक दो बार हरी थी........

और इस बार तीसरा दांव हुआ और इस बार जब काव्य के पास पाते आये उसे देखकने के बाद उसके चेहरे का रंग बिलकुल फीका सा पढ़ gaya........kyon की सरे के सरे बड़े पाते उसकी के पास आये they..........aur अब काव्य इतना तो समझ चुकी थी की अब उसकी हार लगभग तय hain...........fir से खेल चला और आख़िरकार वही हुआ जिसका काव्य को दुर्र tha.........taash के आखिरी पत्त्तों के साथ जैसे सबके चेहरे पर खुशियां खिल उठी वहीँ काव्य के चेहरे का रंग बिलकुल फीका सा पढ़ गया........ जिससे वो फ़ौरन ना कहती हुई अपना चेहरा दोनों हाथों से धक् लेती हैं वहीँ वो तीनों ख़ुशी से झूम उठाते hain.........ab तो उसकी चुदाई एक दम पक्की थी और रघु जीतू जैसे साख से वो और उम्मीद कर भी क्या सकती thi........aab तो पूरे 24 घंटे उसकी बुर में सबके लुंड घुसते hi बस rahengey.........shayad आने वाला दौर अब एहि होने वाला था.........

" memsaheb.....aab तो आप हार gayi............aur जैसा की शर्त के मुताबिक़ आज से 24 घंटे के लिए आप हम सबकी घुलम hui.......jiska जो दिल चाहे वो आपके साथ कर सकता हैं और आप किसी को किसी बात के लिए मन नहीं karengi.............aur तो आप बहुत ाचे से जानती हैं की इन 24 घंटों में आपके साथ क्या होने वाला hain.........aur हम सब आपके साथ मिलकर क्या करने वाले hain...........wo कहते हैं na...................samajhdaar को बस इशारा काफी होता हैं.............." और इतना कहकर तीनों ठहाका मरकर ज़ोरों से हसने लगते हैं.....................................................

कॉन्टिनोएड..........................................................................
 
Back
Top