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अपडेट- 19(बी) (मेघा अपडेट)
" क्यों की memsaheb.......mera हथियार बहुत बड़ा hain......aur जब भी मैं उसकी लेता था वो बहुत नखरे करती thi......har वक़्त कहती थी की दर्द हो रहा hain...........aab आप hi बताइये की किसी का अगर हथियार बड़ा हो तो इसमें उसका क्या दोष........." और रघु अपना एक हाथ हौले से अपने लुंड की तरफ ले जाता हैं और काव्य के तरफ ऐसे बताता हैं जैसे वो उसका इशारा न समझ रही ho.......wahin काव्य की छूट में गीलापन बढ़ता जा रहा tha...........raghu के मुँह से ऐसी बातें उसे और भी बेचैन कर रही thi.....aur रघु वैसे भी उससे झूट नहीं बोल रहा tha...,.........kyon की वो रघु के मुरझाये हुए लुंड को देख चुकी thi...........uska लुंड सच में बहुत बड़ा और मोटा tha........magar वो ये बात भी ाचे से जानती थी की लुंड कितना भी मोटा और बड़ा क्यों न हो वो किसी भी छूट में आसानी से समां सकता हैं.......
" mmmaaaiiinnnn............naaahiinnnnn जानती........" और काव्य इस बार फ़ौरन अपनी जगह से उठ जाती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं वहीँ रघु भी अपनी जगह से खड़ा हो जाता हैं और काव्य के तरफ बड़े गौर से एक तुक देखने लगता hain.........aab वो जान चूका था की उसकी बुलबुल बहुत जल्द उसकी मुट्ठी में hogi..........kyon की आज उसने खुलकर काव्य से बहुत कुछ कह दिया tha......magar ाशील वर्ड्स का उसने जान बूझकर अभी तक इस्तेमाल नहीं किया tha........magar बहुत जल्द वो ये सब भी काव्य के सामने तरय करने वाला था........
" memsaheb.........ek बात bolun.........agar आप चाहे तो इसमें मेरी कुछ मदद कर सकती hain.........meri तन्हाई को दूर कर सकती हैं....." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य अजीब सी नज़रियों से रघु की तरफ देखने लगती हैं......
" तुम कहना क्या चाहते ho......ki मैं तुम्हारी तन्हाई दूर करने के लिए तुम्हारे saath........wo सब karu..........tum इस घर के नौकर ho........aacha होगा की तुम अपने हुड्ड में raho........nahin तो बहार का रास्ता उस तरफ हैं........." औरर काव्य के चेहरे पर थोड़ी सी नाराज़गी झलक पड़ती हैं वहीँ रघु के चेहरे का रंग कुछ फीका सा पढ़ जाता hain......usney काव्य से ऐसे जवाब की उम्मीद तो बिलकुल भी नहीं थी.........
" aappppp...mujjheeeee गलत समझ रही हैं memsaheb........mera कहने का वो मतलब नहीं tha.........main तो ..........आपसे कुछ मांगना चाह रहा tha........jissey मेरा काम हो जाता......." और रघु की जुबान जैसे लड़खड़ा जाती hain........wo तो इसी ख्याली पुलाव पका रहा था की काव्य उसकी मुट्ठी में आ गयी हैं मगर काव्य के ऐसे बर्ताव से उसका ये भ्रम भी दूर हो गया tha.....wahin काव्य के चेहरे पर गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था.........
" तुम्हें मैंने गरीब जानकर तुमसे हमदर्दी की इसका मतलब ये नहीं की तुम जो चाहे वो मांग lo........aur आज के बाद अगर तुमने ऐसी वैसा कुछ कहा तो मैं तुम्हारी शिकायत तुम्हारे साहेब से कर dungi.......tum एक नौकर ho.........to नौकर की तरह raho.........aab तुम यहाँ से जा सकते हो........." और काव्य अपना पेअर पटकती हुई सीधा अपने कमरे की तरफ चली जाती हैं वहीँ रघु का चेहरा उतर सा गया tha............usney सपने में भी कभी नहीं सोचा था की काव्य उसपर ऐसा भड़क jayegi...........aab उसे सब कुछ खोता हुआ सा नज़र आ रहा tha........aisa लग रहा था जैसे वो सब कुछ हर गया ho..........chehrey पर उसके नाकामी साफ़ नज़र आ रही thi....bujhe मुन्न से वो धीरे धीरे अपने कदम बहार की ओरे बढ़ता हुआ सीधा अपने कमरे की तरफ चल पड़ता हैं.......
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काव्य का मूड काफी देर तक गरम रहता hain...........kareeb दो घंटे तक उसे रघु पर बहुत गुस्सा आता हैं और जब थोड़े देर बाद उसका गुस्सा शांत होता हैं तब वो फ़ौरन अपने कमरे से बहार की तरफ निकलती हैं और सीधा हॉल की तरफ चल पड़ती hain.........aur जैसे hi वो हॉल में जाती हैं एक बार फिर से उसकी नज़र फर्श पर रखे ट्रे पर पड़ती hain.......farsh पर नास्ता उसी तरह से पड़ा हुआ था और रघु ने उसे आज हाथ तक नहीं लगाया tha...........haath लगता भी कैसे .......आज काव्य जो उसपर बरस पड़ी thi..........kuch देर तक काव्य वहीँ ख़ामोशी से उस तरी की तरफ एक तुक देखती रहती हैं और फिर जाकर वहीँ सोफे पर चुप चाप से बैठ जाती हैं.......
रिमोट से वो t.v ों करती हैं और बहुत देर तक चैनल इधर उधर चेंज करती रहती hain.....sach तो ये था की उसे अब किसी भी चीज़ में मुन्न नहीं लग रहा tha.........baar बार उसके दिमाग में रघु की वो साडी बातें घूम रही thi..........kuch सोचकर आखिर वो t.v ऑफ कर देती हैं और फिर से फर्श पर रखे ट्रे की तरफ बड़े ध्यान से देखने लगती hain.......kuch सोचकर उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती हैं.......
" मैं भी naaa.........ye क्या कर दिया मैंने उसके saath........khwamokhwah उस बेचारे को दांत diya.........wo तो वैसे भी बिचारा पहले से दुखी tha......aur मैंने उसे और दुखी कर diya...........usney तो आज तक मुझसे कभी कोई बढ़तमीज़ी नहीं ki........jo भी मैंने कहा उसने सब कुछ चुप चाप से मान liya..........arey......kum से कम मैं उसकी बातें तो सुन leti.....aakhir वो मुझसे मांगना क्या चाहता tha.........jaisa मैं उसके बारे में सोच रही थी वैसा कुछ भी तो नहीं था.........
अगर वो बदमाश रहता तो आसानी से मेरा बंग कर सकता tha..........kyon की इतने बड़े घर में मैं और वो अक्सर अकेले रहते they.......uske पास तो हज़ारों मौके they.........bahane they..............magar उसने कभी आज तक किसी भी मौके का फायदा नहीं uthaya........main hi उसे गलत समझ baithi..........na जाने क्यों मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आता hain.......uffff.....na जाने वो अब मेरे बारे में क्या सोच रहा hoga.........mujhe उसके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए tha.........aaj मेरी वजह से उसने नास्ता तक नहीं kiya....bichara अभी भी भूखा hi hoga..........main अभी उसके पास जाकर उससे सॉरी बोल देती hoon.......mujhe पूरा यकीन हैं की वो आसानी से मान जायेगा........
काव्य के दिमाग में जैसे तूफ़ान उठा हुआ tha.....wo अब रघु के बारे में सब कुछ सोच रही thi........kal तक जिस रघु से उसे नफरत थी आज वहीँ रघु पर उसपर प्यार आ रहा था........
" वो ज़रूर मान jayega........aur मानेगा क्यों nahin.....aakhir मैं उसकी मालकिन जो hoon.........bichara बहुत गरीब hain........uske पास पहनने को अंडरवियर तक नहीं .......जब भी वो फर्श पर बैठता हैं उसका वो नज़र आने लगता hain..........aur वैसे भी उसने कुछ गलत तो नहीं kaha............uski बीवी जब वैसी hi हैं तो इसमें उस बिचारे का क्या dosh.........aakhir हैं तो वो भी एक इंसान hi.....uska क्या मुन्न नहीं करता hoga.........uske नसीब में तो औरत का सुख हैं hi nahin.........maine जो भी किया गलत किया........" और काव्य के चेहरे पर पश्च्याताप की लखीरें साफ़ नज़र आने लगती हैं वहीँ वो काफी देर तक रघु के बारे में सब कुछ सोचती चली जाती हैं........
काव्य जाना तो चाहती थी रघु के paas.....ussey माफ़ी mangney.........magar जीतू की वजह से वो ऐसा कर न saki.........fir उसने तय कर लिया की कल जब रघु वापस काम पर आएगा तो वो उससे उस वक़्त मन legi.......aur उसकी साडी बातें manegi.......chahe वो गलत हो या sahi........uski हर तमन्ना पूरी karegi............uske सुख दुःख में बराबर का हिस्सेदार बनेगी..........
वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा tha..........raat में काव्य रघु को लेकर और भी बेचैन हो उठी thi........neend उसे नहीं आ रही thi.......reh रहकर उसके जेहन में रघु की वो साडी बातें याद aati.......jissey वो और बेचैन हो uthathi...........jaise तैसे रात गुज़री और सुबह hui.......udher राम तो अपने पढ़ाई में जी जान से लगा हुआ tha.......aakhir उसे भी तो काव्य की छूट चाहिए thi......isi वजह से वो जी तोड़ म्हणत कर रहा था.......
काव्य हर रोज़ की तरह नास्ता बनाकर रघु के आने का इंतज़ार कर रही thi..........ghadi की टिक टिक करती सुई उसकी बेचैनी को पल पल बढ़ा रही thi.........aaj उसने रेड कलर की साड़ी पहना राखी थी और आज उसने अपने आपको थोड़ा मेकउप भी किया हुआ tha.......shayad रघु के liye..........raghu का ऐसे देखना अब उसे ाचा लगने लगा tha........jab घडी में 9 बजे तो काव्य की नज़रें सामने के मैं गेट पर जाकर टिक gayi........wo बड़ी बेसब्री से रघु के आने का इंतज़ार करने lagi.......guzarte वक़्त के साथ साथ अब उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi.....kareeb 9.20 पर दरवाज़े का बेल्ल बजा और काव्य के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर गयी.......
जिस पल का उसे बड़ी शिद्दत से इंतज़ार था अब वो घडी आ चुकी thi.......dhadaktey दिल से वो फ़ौरन अपनी जगह से उठती हैं और तेज़ी से मैं दूर के तरफ चल पड़ती hain.......darwaza kholney..........aur जैसे hi वो दरवाज़ा खोलती हैं उसके चेहरे पर आयी मुस्कान एक hi पल में जैसे गायब हो जाती hain........kaleja ज़ोरों से धड़क उठता hain..........jitni उमीदें जितनी आस लगाए वो बैठी थी सब पल भर में टूट गया tha......kyon की सामने इस वक़्त दरवाज़े पर रघु nahin...................balki जीतू था.........
" tummmmm..........aur yahan........raghu कहाँ हैं......" और काव्य फ़ौरन जीतू को देखकर बोल पड़ती hain......wahin जीतू हमेशा की तरह अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता हैं.......
" jee........memsahebbbb......wo......aaj के बाद बहार का काम dekhega......aab उसे अंदर के काम में कोई दिलचस्पसि नहीं hain......usney यहाँ आने से साफ़ इंकार कर दिया हैं......." और जीतू आहिस्ता से बोल पड़ता hain......wahin कवि के चेहरे पर एक बार फिर से गुस्सा चालक पड़ता हैं.........
" उसकी इतनी himmat.........wo यहाँ काम करने से इंकार कैसे कर सकता hain..........samjhta क्या हैं वो अपने आपको ko.........aur वो होता कौन हैं ये फैसला करने wala........kahan हैं wo.........mujhe अभी उससे मिलना हैं........" और काव्य लगभग गुस्से से जीतू पर चिल्ला पड़ती हैं वहीँ जीतू दुर्र से सकपका जाता हैं और धीरे से अपना एक हाथ से अपने रूम की ओरे इशारा करता hain........kavya एक नज़र सामने के माकन की तरफ देखती हैं फिर से वो जीतू की तरफ गुस्से से देखने लगती हैं.......
" तुम जाकर घर का काम karo.......aur मेरे लौटने तक तुम घर से बहार मुट्ठ nikalna......main अभी रघु से मिलकर आती हूँ........" और काव्य गुस्से से रघु के कमरे की तरफ चल पड़ती hai........dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेने वाला था.........................................................................
कंटिन्यू...................................................................
" क्यों की memsaheb.......mera हथियार बहुत बड़ा hain......aur जब भी मैं उसकी लेता था वो बहुत नखरे करती thi......har वक़्त कहती थी की दर्द हो रहा hain...........aab आप hi बताइये की किसी का अगर हथियार बड़ा हो तो इसमें उसका क्या दोष........." और रघु अपना एक हाथ हौले से अपने लुंड की तरफ ले जाता हैं और काव्य के तरफ ऐसे बताता हैं जैसे वो उसका इशारा न समझ रही ho.......wahin काव्य की छूट में गीलापन बढ़ता जा रहा tha...........raghu के मुँह से ऐसी बातें उसे और भी बेचैन कर रही thi.....aur रघु वैसे भी उससे झूट नहीं बोल रहा tha...,.........kyon की वो रघु के मुरझाये हुए लुंड को देख चुकी thi...........uska लुंड सच में बहुत बड़ा और मोटा tha........magar वो ये बात भी ाचे से जानती थी की लुंड कितना भी मोटा और बड़ा क्यों न हो वो किसी भी छूट में आसानी से समां सकता हैं.......
" mmmaaaiiinnnn............naaahiinnnnn जानती........" और काव्य इस बार फ़ौरन अपनी जगह से उठ जाती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं वहीँ रघु भी अपनी जगह से खड़ा हो जाता हैं और काव्य के तरफ बड़े गौर से एक तुक देखने लगता hain.........aab वो जान चूका था की उसकी बुलबुल बहुत जल्द उसकी मुट्ठी में hogi..........kyon की आज उसने खुलकर काव्य से बहुत कुछ कह दिया tha......magar ाशील वर्ड्स का उसने जान बूझकर अभी तक इस्तेमाल नहीं किया tha........magar बहुत जल्द वो ये सब भी काव्य के सामने तरय करने वाला था........
" memsaheb.........ek बात bolun.........agar आप चाहे तो इसमें मेरी कुछ मदद कर सकती hain.........meri तन्हाई को दूर कर सकती हैं....." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य अजीब सी नज़रियों से रघु की तरफ देखने लगती हैं......
" तुम कहना क्या चाहते ho......ki मैं तुम्हारी तन्हाई दूर करने के लिए तुम्हारे saath........wo सब karu..........tum इस घर के नौकर ho........aacha होगा की तुम अपने हुड्ड में raho........nahin तो बहार का रास्ता उस तरफ हैं........." औरर काव्य के चेहरे पर थोड़ी सी नाराज़गी झलक पड़ती हैं वहीँ रघु के चेहरे का रंग कुछ फीका सा पढ़ जाता hain......usney काव्य से ऐसे जवाब की उम्मीद तो बिलकुल भी नहीं थी.........
" aappppp...mujjheeeee गलत समझ रही हैं memsaheb........mera कहने का वो मतलब नहीं tha.........main तो ..........आपसे कुछ मांगना चाह रहा tha........jissey मेरा काम हो जाता......." और रघु की जुबान जैसे लड़खड़ा जाती hain........wo तो इसी ख्याली पुलाव पका रहा था की काव्य उसकी मुट्ठी में आ गयी हैं मगर काव्य के ऐसे बर्ताव से उसका ये भ्रम भी दूर हो गया tha.....wahin काव्य के चेहरे पर गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था.........
" तुम्हें मैंने गरीब जानकर तुमसे हमदर्दी की इसका मतलब ये नहीं की तुम जो चाहे वो मांग lo........aur आज के बाद अगर तुमने ऐसी वैसा कुछ कहा तो मैं तुम्हारी शिकायत तुम्हारे साहेब से कर dungi.......tum एक नौकर ho.........to नौकर की तरह raho.........aab तुम यहाँ से जा सकते हो........." और काव्य अपना पेअर पटकती हुई सीधा अपने कमरे की तरफ चली जाती हैं वहीँ रघु का चेहरा उतर सा गया tha............usney सपने में भी कभी नहीं सोचा था की काव्य उसपर ऐसा भड़क jayegi...........aab उसे सब कुछ खोता हुआ सा नज़र आ रहा tha........aisa लग रहा था जैसे वो सब कुछ हर गया ho..........chehrey पर उसके नाकामी साफ़ नज़र आ रही thi....bujhe मुन्न से वो धीरे धीरे अपने कदम बहार की ओरे बढ़ता हुआ सीधा अपने कमरे की तरफ चल पड़ता हैं.......
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काव्य का मूड काफी देर तक गरम रहता hain...........kareeb दो घंटे तक उसे रघु पर बहुत गुस्सा आता हैं और जब थोड़े देर बाद उसका गुस्सा शांत होता हैं तब वो फ़ौरन अपने कमरे से बहार की तरफ निकलती हैं और सीधा हॉल की तरफ चल पड़ती hain.........aur जैसे hi वो हॉल में जाती हैं एक बार फिर से उसकी नज़र फर्श पर रखे ट्रे पर पड़ती hain.......farsh पर नास्ता उसी तरह से पड़ा हुआ था और रघु ने उसे आज हाथ तक नहीं लगाया tha...........haath लगता भी कैसे .......आज काव्य जो उसपर बरस पड़ी thi..........kuch देर तक काव्य वहीँ ख़ामोशी से उस तरी की तरफ एक तुक देखती रहती हैं और फिर जाकर वहीँ सोफे पर चुप चाप से बैठ जाती हैं.......
रिमोट से वो t.v ों करती हैं और बहुत देर तक चैनल इधर उधर चेंज करती रहती hain.....sach तो ये था की उसे अब किसी भी चीज़ में मुन्न नहीं लग रहा tha.........baar बार उसके दिमाग में रघु की वो साडी बातें घूम रही thi..........kuch सोचकर आखिर वो t.v ऑफ कर देती हैं और फिर से फर्श पर रखे ट्रे की तरफ बड़े ध्यान से देखने लगती hain.......kuch सोचकर उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती हैं.......
" मैं भी naaa.........ye क्या कर दिया मैंने उसके saath........khwamokhwah उस बेचारे को दांत diya.........wo तो वैसे भी बिचारा पहले से दुखी tha......aur मैंने उसे और दुखी कर diya...........usney तो आज तक मुझसे कभी कोई बढ़तमीज़ी नहीं ki........jo भी मैंने कहा उसने सब कुछ चुप चाप से मान liya..........arey......kum से कम मैं उसकी बातें तो सुन leti.....aakhir वो मुझसे मांगना क्या चाहता tha.........jaisa मैं उसके बारे में सोच रही थी वैसा कुछ भी तो नहीं था.........
अगर वो बदमाश रहता तो आसानी से मेरा बंग कर सकता tha..........kyon की इतने बड़े घर में मैं और वो अक्सर अकेले रहते they.......uske पास तो हज़ारों मौके they.........bahane they..............magar उसने कभी आज तक किसी भी मौके का फायदा नहीं uthaya........main hi उसे गलत समझ baithi..........na जाने क्यों मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आता hain.......uffff.....na जाने वो अब मेरे बारे में क्या सोच रहा hoga.........mujhe उसके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए tha.........aaj मेरी वजह से उसने नास्ता तक नहीं kiya....bichara अभी भी भूखा hi hoga..........main अभी उसके पास जाकर उससे सॉरी बोल देती hoon.......mujhe पूरा यकीन हैं की वो आसानी से मान जायेगा........
काव्य के दिमाग में जैसे तूफ़ान उठा हुआ tha.....wo अब रघु के बारे में सब कुछ सोच रही thi........kal तक जिस रघु से उसे नफरत थी आज वहीँ रघु पर उसपर प्यार आ रहा था........
" वो ज़रूर मान jayega........aur मानेगा क्यों nahin.....aakhir मैं उसकी मालकिन जो hoon.........bichara बहुत गरीब hain........uske पास पहनने को अंडरवियर तक नहीं .......जब भी वो फर्श पर बैठता हैं उसका वो नज़र आने लगता hain..........aur वैसे भी उसने कुछ गलत तो नहीं kaha............uski बीवी जब वैसी hi हैं तो इसमें उस बिचारे का क्या dosh.........aakhir हैं तो वो भी एक इंसान hi.....uska क्या मुन्न नहीं करता hoga.........uske नसीब में तो औरत का सुख हैं hi nahin.........maine जो भी किया गलत किया........" और काव्य के चेहरे पर पश्च्याताप की लखीरें साफ़ नज़र आने लगती हैं वहीँ वो काफी देर तक रघु के बारे में सब कुछ सोचती चली जाती हैं........
काव्य जाना तो चाहती थी रघु के paas.....ussey माफ़ी mangney.........magar जीतू की वजह से वो ऐसा कर न saki.........fir उसने तय कर लिया की कल जब रघु वापस काम पर आएगा तो वो उससे उस वक़्त मन legi.......aur उसकी साडी बातें manegi.......chahe वो गलत हो या sahi........uski हर तमन्ना पूरी karegi............uske सुख दुःख में बराबर का हिस्सेदार बनेगी..........
वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा tha..........raat में काव्य रघु को लेकर और भी बेचैन हो उठी thi........neend उसे नहीं आ रही thi.......reh रहकर उसके जेहन में रघु की वो साडी बातें याद aati.......jissey वो और बेचैन हो uthathi...........jaise तैसे रात गुज़री और सुबह hui.......udher राम तो अपने पढ़ाई में जी जान से लगा हुआ tha.......aakhir उसे भी तो काव्य की छूट चाहिए thi......isi वजह से वो जी तोड़ म्हणत कर रहा था.......
काव्य हर रोज़ की तरह नास्ता बनाकर रघु के आने का इंतज़ार कर रही thi..........ghadi की टिक टिक करती सुई उसकी बेचैनी को पल पल बढ़ा रही thi.........aaj उसने रेड कलर की साड़ी पहना राखी थी और आज उसने अपने आपको थोड़ा मेकउप भी किया हुआ tha.......shayad रघु के liye..........raghu का ऐसे देखना अब उसे ाचा लगने लगा tha........jab घडी में 9 बजे तो काव्य की नज़रें सामने के मैं गेट पर जाकर टिक gayi........wo बड़ी बेसब्री से रघु के आने का इंतज़ार करने lagi.......guzarte वक़्त के साथ साथ अब उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi.....kareeb 9.20 पर दरवाज़े का बेल्ल बजा और काव्य के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर गयी.......
जिस पल का उसे बड़ी शिद्दत से इंतज़ार था अब वो घडी आ चुकी thi.......dhadaktey दिल से वो फ़ौरन अपनी जगह से उठती हैं और तेज़ी से मैं दूर के तरफ चल पड़ती hain.......darwaza kholney..........aur जैसे hi वो दरवाज़ा खोलती हैं उसके चेहरे पर आयी मुस्कान एक hi पल में जैसे गायब हो जाती hain........kaleja ज़ोरों से धड़क उठता hain..........jitni उमीदें जितनी आस लगाए वो बैठी थी सब पल भर में टूट गया tha......kyon की सामने इस वक़्त दरवाज़े पर रघु nahin...................balki जीतू था.........
" tummmmm..........aur yahan........raghu कहाँ हैं......" और काव्य फ़ौरन जीतू को देखकर बोल पड़ती hain......wahin जीतू हमेशा की तरह अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता हैं.......
" jee........memsahebbbb......wo......aaj के बाद बहार का काम dekhega......aab उसे अंदर के काम में कोई दिलचस्पसि नहीं hain......usney यहाँ आने से साफ़ इंकार कर दिया हैं......." और जीतू आहिस्ता से बोल पड़ता hain......wahin कवि के चेहरे पर एक बार फिर से गुस्सा चालक पड़ता हैं.........
" उसकी इतनी himmat.........wo यहाँ काम करने से इंकार कैसे कर सकता hain..........samjhta क्या हैं वो अपने आपको ko.........aur वो होता कौन हैं ये फैसला करने wala........kahan हैं wo.........mujhe अभी उससे मिलना हैं........" और काव्य लगभग गुस्से से जीतू पर चिल्ला पड़ती हैं वहीँ जीतू दुर्र से सकपका जाता हैं और धीरे से अपना एक हाथ से अपने रूम की ओरे इशारा करता hain........kavya एक नज़र सामने के माकन की तरफ देखती हैं फिर से वो जीतू की तरफ गुस्से से देखने लगती हैं.......
" तुम जाकर घर का काम karo.......aur मेरे लौटने तक तुम घर से बहार मुट्ठ nikalna......main अभी रघु से मिलकर आती हूँ........" और काव्य गुस्से से रघु के कमरे की तरफ चल पड़ती hai........dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेने वाला था.........................................................................
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