Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 4 - SexBaba
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Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

अपडेट- 19(बी) (मेघा अपडेट)

" क्यों की memsaheb.......mera हथियार बहुत बड़ा hain......aur जब भी मैं उसकी लेता था वो बहुत नखरे करती thi......har वक़्त कहती थी की दर्द हो रहा hain...........aab आप hi बताइये की किसी का अगर हथियार बड़ा हो तो इसमें उसका क्या दोष........." और रघु अपना एक हाथ हौले से अपने लुंड की तरफ ले जाता हैं और काव्य के तरफ ऐसे बताता हैं जैसे वो उसका इशारा न समझ रही ho.......wahin काव्य की छूट में गीलापन बढ़ता जा रहा tha...........raghu के मुँह से ऐसी बातें उसे और भी बेचैन कर रही thi.....aur रघु वैसे भी उससे झूट नहीं बोल रहा tha...,.........kyon की वो रघु के मुरझाये हुए लुंड को देख चुकी thi...........uska लुंड सच में बहुत बड़ा और मोटा tha........magar वो ये बात भी ाचे से जानती थी की लुंड कितना भी मोटा और बड़ा क्यों न हो वो किसी भी छूट में आसानी से समां सकता हैं.......

" mmmaaaiiinnnn............naaahiinnnnn जानती........" और काव्य इस बार फ़ौरन अपनी जगह से उठ जाती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं वहीँ रघु भी अपनी जगह से खड़ा हो जाता हैं और काव्य के तरफ बड़े गौर से एक तुक देखने लगता hain.........aab वो जान चूका था की उसकी बुलबुल बहुत जल्द उसकी मुट्ठी में hogi..........kyon की आज उसने खुलकर काव्य से बहुत कुछ कह दिया tha......magar ाशील वर्ड्स का उसने जान बूझकर अभी तक इस्तेमाल नहीं किया tha........magar बहुत जल्द वो ये सब भी काव्य के सामने तरय करने वाला था........

" memsaheb.........ek बात bolun.........agar आप चाहे तो इसमें मेरी कुछ मदद कर सकती hain.........meri तन्हाई को दूर कर सकती हैं....." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य अजीब सी नज़रियों से रघु की तरफ देखने लगती हैं......

" तुम कहना क्या चाहते ho......ki मैं तुम्हारी तन्हाई दूर करने के लिए तुम्हारे saath........wo सब karu..........tum इस घर के नौकर ho........aacha होगा की तुम अपने हुड्ड में raho........nahin तो बहार का रास्ता उस तरफ हैं........." औरर काव्य के चेहरे पर थोड़ी सी नाराज़गी झलक पड़ती हैं वहीँ रघु के चेहरे का रंग कुछ फीका सा पढ़ जाता hain......usney काव्य से ऐसे जवाब की उम्मीद तो बिलकुल भी नहीं थी.........

" aappppp...mujjheeeee गलत समझ रही हैं memsaheb........mera कहने का वो मतलब नहीं tha.........main तो ..........आपसे कुछ मांगना चाह रहा tha........jissey मेरा काम हो जाता......." और रघु की जुबान जैसे लड़खड़ा जाती hain........wo तो इसी ख्याली पुलाव पका रहा था की काव्य उसकी मुट्ठी में आ गयी हैं मगर काव्य के ऐसे बर्ताव से उसका ये भ्रम भी दूर हो गया tha.....wahin काव्य के चेहरे पर गुस्सा साफ़ नज़र आ रहा था.........

" तुम्हें मैंने गरीब जानकर तुमसे हमदर्दी की इसका मतलब ये नहीं की तुम जो चाहे वो मांग lo........aur आज के बाद अगर तुमने ऐसी वैसा कुछ कहा तो मैं तुम्हारी शिकायत तुम्हारे साहेब से कर dungi.......tum एक नौकर ho.........to नौकर की तरह raho.........aab तुम यहाँ से जा सकते हो........." और काव्य अपना पेअर पटकती हुई सीधा अपने कमरे की तरफ चली जाती हैं वहीँ रघु का चेहरा उतर सा गया tha............usney सपने में भी कभी नहीं सोचा था की काव्य उसपर ऐसा भड़क jayegi...........aab उसे सब कुछ खोता हुआ सा नज़र आ रहा tha........aisa लग रहा था जैसे वो सब कुछ हर गया ho..........chehrey पर उसके नाकामी साफ़ नज़र आ रही thi....bujhe मुन्न से वो धीरे धीरे अपने कदम बहार की ओरे बढ़ता हुआ सीधा अपने कमरे की तरफ चल पड़ता हैं.......

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काव्य का मूड काफी देर तक गरम रहता hain...........kareeb दो घंटे तक उसे रघु पर बहुत गुस्सा आता हैं और जब थोड़े देर बाद उसका गुस्सा शांत होता हैं तब वो फ़ौरन अपने कमरे से बहार की तरफ निकलती हैं और सीधा हॉल की तरफ चल पड़ती hain.........aur जैसे hi वो हॉल में जाती हैं एक बार फिर से उसकी नज़र फर्श पर रखे ट्रे पर पड़ती hain.......farsh पर नास्ता उसी तरह से पड़ा हुआ था और रघु ने उसे आज हाथ तक नहीं लगाया tha...........haath लगता भी कैसे .......आज काव्य जो उसपर बरस पड़ी thi..........kuch देर तक काव्य वहीँ ख़ामोशी से उस तरी की तरफ एक तुक देखती रहती हैं और फिर जाकर वहीँ सोफे पर चुप चाप से बैठ जाती हैं.......

रिमोट से वो t.v ों करती हैं और बहुत देर तक चैनल इधर उधर चेंज करती रहती hain.....sach तो ये था की उसे अब किसी भी चीज़ में मुन्न नहीं लग रहा tha.........baar बार उसके दिमाग में रघु की वो साडी बातें घूम रही thi..........kuch सोचकर आखिर वो t.v ऑफ कर देती हैं और फिर से फर्श पर रखे ट्रे की तरफ बड़े ध्यान से देखने लगती hain.......kuch सोचकर उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती हैं.......

" मैं भी naaa.........ye क्या कर दिया मैंने उसके saath........khwamokhwah उस बेचारे को दांत diya.........wo तो वैसे भी बिचारा पहले से दुखी tha......aur मैंने उसे और दुखी कर diya...........usney तो आज तक मुझसे कभी कोई बढ़तमीज़ी नहीं ki........jo भी मैंने कहा उसने सब कुछ चुप चाप से मान liya..........arey......kum से कम मैं उसकी बातें तो सुन leti.....aakhir वो मुझसे मांगना क्या चाहता tha.........jaisa मैं उसके बारे में सोच रही थी वैसा कुछ भी तो नहीं था.........

अगर वो बदमाश रहता तो आसानी से मेरा बंग कर सकता tha..........kyon की इतने बड़े घर में मैं और वो अक्सर अकेले रहते they.......uske पास तो हज़ारों मौके they.........bahane they..............magar उसने कभी आज तक किसी भी मौके का फायदा नहीं uthaya........main hi उसे गलत समझ baithi..........na जाने क्यों मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आता hain.......uffff.....na जाने वो अब मेरे बारे में क्या सोच रहा hoga.........mujhe उसके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए tha.........aaj मेरी वजह से उसने नास्ता तक नहीं kiya....bichara अभी भी भूखा hi hoga..........main अभी उसके पास जाकर उससे सॉरी बोल देती hoon.......mujhe पूरा यकीन हैं की वो आसानी से मान जायेगा........

काव्य के दिमाग में जैसे तूफ़ान उठा हुआ tha.....wo अब रघु के बारे में सब कुछ सोच रही thi........kal तक जिस रघु से उसे नफरत थी आज वहीँ रघु पर उसपर प्यार आ रहा था........

" वो ज़रूर मान jayega........aur मानेगा क्यों nahin.....aakhir मैं उसकी मालकिन जो hoon.........bichara बहुत गरीब hain........uske पास पहनने को अंडरवियर तक नहीं .......जब भी वो फर्श पर बैठता हैं उसका वो नज़र आने लगता hain..........aur वैसे भी उसने कुछ गलत तो नहीं kaha............uski बीवी जब वैसी hi हैं तो इसमें उस बिचारे का क्या dosh.........aakhir हैं तो वो भी एक इंसान hi.....uska क्या मुन्न नहीं करता hoga.........uske नसीब में तो औरत का सुख हैं hi nahin.........maine जो भी किया गलत किया........" और काव्य के चेहरे पर पश्च्याताप की लखीरें साफ़ नज़र आने लगती हैं वहीँ वो काफी देर तक रघु के बारे में सब कुछ सोचती चली जाती हैं........

काव्य जाना तो चाहती थी रघु के paas.....ussey माफ़ी mangney.........magar जीतू की वजह से वो ऐसा कर न saki.........fir उसने तय कर लिया की कल जब रघु वापस काम पर आएगा तो वो उससे उस वक़्त मन legi.......aur उसकी साडी बातें manegi.......chahe वो गलत हो या sahi........uski हर तमन्ना पूरी karegi............uske सुख दुःख में बराबर का हिस्सेदार बनेगी..........

वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा tha..........raat में काव्य रघु को लेकर और भी बेचैन हो उठी thi........neend उसे नहीं आ रही thi.......reh रहकर उसके जेहन में रघु की वो साडी बातें याद aati.......jissey वो और बेचैन हो uthathi...........jaise तैसे रात गुज़री और सुबह hui.......udher राम तो अपने पढ़ाई में जी जान से लगा हुआ tha.......aakhir उसे भी तो काव्य की छूट चाहिए thi......isi वजह से वो जी तोड़ म्हणत कर रहा था.......

काव्य हर रोज़ की तरह नास्ता बनाकर रघु के आने का इंतज़ार कर रही thi..........ghadi की टिक टिक करती सुई उसकी बेचैनी को पल पल बढ़ा रही thi.........aaj उसने रेड कलर की साड़ी पहना राखी थी और आज उसने अपने आपको थोड़ा मेकउप भी किया हुआ tha.......shayad रघु के liye..........raghu का ऐसे देखना अब उसे ाचा लगने लगा tha........jab घडी में 9 बजे तो काव्य की नज़रें सामने के मैं गेट पर जाकर टिक gayi........wo बड़ी बेसब्री से रघु के आने का इंतज़ार करने lagi.......guzarte वक़्त के साथ साथ अब उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi.....kareeb 9.20 पर दरवाज़े का बेल्ल बजा और काव्य के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर गयी.......

जिस पल का उसे बड़ी शिद्दत से इंतज़ार था अब वो घडी आ चुकी thi.......dhadaktey दिल से वो फ़ौरन अपनी जगह से उठती हैं और तेज़ी से मैं दूर के तरफ चल पड़ती hain.......darwaza kholney..........aur जैसे hi वो दरवाज़ा खोलती हैं उसके चेहरे पर आयी मुस्कान एक hi पल में जैसे गायब हो जाती hain........kaleja ज़ोरों से धड़क उठता hain..........jitni उमीदें जितनी आस लगाए वो बैठी थी सब पल भर में टूट गया tha......kyon की सामने इस वक़्त दरवाज़े पर रघु nahin...................balki जीतू था.........

" tummmmm..........aur yahan........raghu कहाँ हैं......" और काव्य फ़ौरन जीतू को देखकर बोल पड़ती hain......wahin जीतू हमेशा की तरह अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता हैं.......

" jee........memsahebbbb......wo......aaj के बाद बहार का काम dekhega......aab उसे अंदर के काम में कोई दिलचस्पसि नहीं hain......usney यहाँ आने से साफ़ इंकार कर दिया हैं......." और जीतू आहिस्ता से बोल पड़ता hain......wahin कवि के चेहरे पर एक बार फिर से गुस्सा चालक पड़ता हैं.........

" उसकी इतनी himmat.........wo यहाँ काम करने से इंकार कैसे कर सकता hain..........samjhta क्या हैं वो अपने आपको ko.........aur वो होता कौन हैं ये फैसला करने wala........kahan हैं wo.........mujhe अभी उससे मिलना हैं........" और काव्य लगभग गुस्से से जीतू पर चिल्ला पड़ती हैं वहीँ जीतू दुर्र से सकपका जाता हैं और धीरे से अपना एक हाथ से अपने रूम की ओरे इशारा करता hain........kavya एक नज़र सामने के माकन की तरफ देखती हैं फिर से वो जीतू की तरफ गुस्से से देखने लगती हैं.......

" तुम जाकर घर का काम karo.......aur मेरे लौटने तक तुम घर से बहार मुट्ठ nikalna......main अभी रघु से मिलकर आती हूँ........" और काव्य गुस्से से रघु के कमरे की तरफ चल पड़ती hai........dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेने वाला था.........................................................................

कंटिन्यू...................................................................
 
अपडेट-20 (ा) (मेघा अपडेट)

" तुम जाकर घर का काम karo.......aur मरे लौटने तक तुम घर से बहार मुट्ठ nikalna......main अभी रघु से मिलकर आती हूँ........" और काव्य गुस्से से रघु के कमरे की तरफ चल पड़ती hai........dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेने वाला था.........................................................................

अब आगे...................................................................................

काव्य का गुस्सा इस वक़्त पूरे चरम पर tha.............gussey से उसकी आँखें सुर्ख लाल हो चुकी thi........wo तेज़ी से चलती हुई रघु के कमरे की तरफ जाती हैं और जाकर उसके कमरे का दरवाज़ा नॉक करती hain........thode देर बाद उधर से रघु दरवाज़ा खोलता हैं और जब उसकी नज़र सामने कड़ी काव्य पर पड़ती हैं उसके चेहरे का रंग एक बार फिर से पूरी तरह फीका पढ़ जाता hain........usney कभी सपने में भी काव्य को यहाँ आने की उम्मीद नहीं की thi........usey तो एक पल ऐसा लगा जैसे वो खुली आँखों से कोई सपना देख रहा हो..........

" mmeeemmsaaahheeebbbb........aaaapppp....aaauuurrr....yaahhaaaannnn...." रघु जैसे हड़बड़ा सा जाता हैं वहीँ काव्य की नज़रें अभी भी रघु पर तिकी हुई thi........wo गुस्से से अभी भी रघु को घूर रही thi........issey पहले रघु आगे कुछ पूछता या और कुछ कहता तभी उसके गलों पर एक ज़ोर का करारा थप्पड़ पड़ता हैं और अगले hi पल वहां एक गहरी ख़ामोशी कुछ पल के लिए चा जाती हैं.......

न एक लफ्ज़ रघु कुछ कहता hain...........aur न kavya.........wahin रघु अपने गलों पर एक हाथ हौले से रख लेता हैं और अपना सर नीचे की तरफ झुका लेता hain..........wahin काव्य अभी भी गुस्से से उसे घूरे जा रही thi.........is वक़्त वो किसी देवी की अवतार सी लग रही thi..........kuch पल के लिए तो रघु भी काव्य को देखकर दुर्र सा गया tha.........kuch देर की गहरी ख़ामोशी के बाद आखिर काव्य उस ख़ामोशी को फिर से तोड़दि हैं...........

" तुम होते कौन हो इस घर में फैसला लेने wale...........tumhara मर्ज़ी किया तो काम kiye......aur नहीं किया तो छोड़ diye...........main पूछती हूँ आखिर तुम्हें ये हुक किसने diya..........ye मुट्ठ भूलों की तुम्हारी हैसियत इस घर में एक नौकर की hain.........na की मालिक ki........aur आज के बाद यहाँ जो कुछ भी होगा सब कुछ मेरी मर्ज़ी से hoga......agar तुम्हें यहाँ रहना हैं तो मेरे हिसाब से चलना hoga...........agar नहीं चल सकते तो तुम यहाँ से बेशक जा सकते हो........." तमाचे की गूंज इतनी तेज़्ज़ थी की उसकी आवाज़ बहार तक गयी thi.......wahin रघु के गलों पर काव्य की उंगलियां चाप सी गयी thi........wahin काव्य के नाजुक और गोर हाथ पूरी तरह से लाल पढ़ गए they.........dard उसके हाथों में भी हो रहा tha........aur वो बार बार अपने हाथों को झटक रही thi.......jisey रघु बड़े गौर से देख रहा था........

" memsaheb........mmuujhe माफ कर dijiye..........aagey से ऐसी गलती कभी नहीं hogi........aap जब कहेंगी जैसा कहेंगी वैसा hoga........magar.........." और रघु फिर से खामोश हो जाता हैं वहीँ काव्य एक बार फिर से उसके तरफ गुस्से से घूरने लगती हैं मगर कहती कुछ nahin.........aab वो क्या कहती रघु के उस तमाचे से उसका सारा गुस्सा पल भर में शांत हो गया tha.........munn hi मुन्न उसे अब पछतावा भी हो रहा था की उसने रघु पर अपना हाथ क्यों uthaya........wo तो उसे यहाँ मानने आयी थी और यहाँ आकर उसने और भी उसे नाराज़ कर दिया........

" magar............sari गलती हमारी hi थी memsaheb.........humein इसकी सजा मिलनी चाहिए thi........aur सजा मिली bhi..........aacha हुआ जो अपने मुझे मेरी औकात याद दिला di...........hum ये भूल गए थे की आप हमारी मालकिन हैं aur.........hum आपके naukar..........hum तो आपको अब अपना समझने लगे थे इस वजह से हमने अपना सुख दुःख सब कुछ आपको bataya.........nahin जानते थे की इस दुनिया में गरीब की कोई इज़्ज़त नहीं hoti..........aapne आखिर अपने होते hain.......hum कितने भी हैं आखिर हैं तो गैर hi ना......" और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ इस बार काव्य हौले से अपनी पलकें नीचे की तरफ झुका लेती hain...........raghu ने जो कहा था सच hi तो कहा tha.......shayad इस वजह से अब काव्य को अपनी गलती का एहसास हो रहा था..........

" ीाम सॉरी......." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं और जैसे hi वो जाने के लिए मुड़ती हैं रघु एक बार हौले से बोल पड़ता हैं जिससे सुनकर काव्य के बढ़ते कदम फिर से थम जाते hain..........wahin रघु इस बार काव्य के और करीब आता हैं और आकर उसके सामने की तरफ खड़ा हो जाता हैं.........

" किस बात के लिए आप मुझसे माफ़ी मांग रही हैं memsaheb..........hum होते कौन हैं आपको माफ़ी देने wale........aab हमारी इस तरह से और बेइज़्ज़ती न कीजिये........." और रघु फ़ौरन अपने दोनों हाथ काव्य के सामने जोड़ लेता हैं और अपना सर एक बार फिर से नीचे की तरफ झुका लेता hain.......wahin काव्य जवाब में कुछ नहीं बोल पति और वो भी अपना सर नीचे की तरफ झुका लेती hain........sach तो ये था की अब कहने सुनने को कुछ रह hi कहा गया tha........gehri ख़ामोशी के बाद रघु इस बार हौले से बोल पड़ता हैं.......

" अपना हाथ दीजिये memsaheb.........dekhiye आपका हाथ सूझ गया hain........main आपको दवा लगा देता हूँ......." और रघु काव्य के जवाब का इंतज़ार किये बगैर काव्य का हाथ हौले से थम लेता हैं और वहीँ काव्य को कुर्सी पर बैठने का इशारा करता hain........wo सामने की ालमिरह से डेटोल की शीशी और रुई और पट्टी निकलता हैं और आकर वहीँ काव्य के पास नीचे फर्श पर बैठ जाता hain.......wahin काव्य उसकी इस ऐडा से मुस्कुराये बिना नहीं रह pati..........jin हाथों ने उसे चोट पहुंचाई थी अब रघु उन्ही हाथों पर मरहम लगा रहा था...........

" memsaheb.......aap हैं महलों की राजकुमारी और हम हैं पाथर के बने insaan...........agar आप पाथर पर अपना हाथ मारेंगी तो चोट पाथर को नहीं बल्कि आपके हाथों को lagegi..........agar आपको इतना hi गुस्सा था तो मुझसे कह देती मैं खुद hi अपने आपको मार पीट leta..........kum से कम इन नाजुक हाथों को तो तकलीफ नहीं hoti.........aur शायद उससे आपके इस दिल को ठंडक पहुँचती........" और रघु काव्य की आँखों में देखते हुए हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य की नज़रें एक बार शर्म से नीचे की तरफ झुक जाती hain..........wo चाह कर भी एक लफ्ज़ कुछ नहीं बोल पति.........

रघु काव्य के नाजुक हाथों पर धीरे धीरे डेटोल लगा रहा था और उसके हाथों को मालिश कर रहा tha......bade प्यार से सेहला रहा tha.......raghu के कठोर हाथों के स्पर्श से काव्य की दिल की धड़कनें अब धीरे धीरे बढ़ने लगी thi...........wo एक तुक कभी अपने हाथों की तरफ देख रही thi..........to कभी रघु के taraf.........ek बार फिर से उसे रघु पर प्यार आ रहा tha...........kuch सोचकर काव्य हौले से बोल पड़ती हैं......

" raghu...........tumne अब तक ये नहीं बताया की तुम मुझसे आखिर मांगना क्या चाहते थे........." और काव्य इस बार हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ रघु भी मुस्कुराये बिना नहीं रह pata.........aab उसे पूरा यकीन हो चूका था की काव्य के दिल में उसके प्रति कुछ तो अरमान जागने लगे hain.........aab वो भी उसके में थोड़ी बहुत इंट्रेस्ट ले रही हैं..........

" अगर मैं सच कहूंगा तो आप मुझे फिर से marengi.......aur एक बात कहूं आप थप्पड़ बहुत कसकर मरती hain........mujhe शौक नहीं हैं आपके हाथों से दुबारा मार खाने का.........." और रघु इतना कहकर हौले से मुस्कुरा पड़ता hain......wahin काव्य हौले से मुस्कुरा पड़ती hain........aab रघु की बातें उसके दिल को गुदगुदाने लगी थी..........

" नहीं bolungi.........aur न marungi........promise........aur अगर अबकी बार तुम कुछ नहीं कहे तो फिर से एक थप्पड़ दूंगी........." और काव्य फिर से हंस पड़ती हैं वहीँ रघु बड़े प्यार से काव्य के हाथों की मालिश कर रहा tha......saath hi साथ उसके नाजुक कलियों को धीरे धीरे सेहला रहा था..........

कॉन्टिनोएड.......................................................................................
 
अपडेट-20 (बी) (मेघा अपडेट)

" मैं तो ये कह रहा था की आप भी अकेली hain.....aur मैं bhi........aapko मालूम हैं की मेरी बीवी इस दुनिया में नहीं hain.........aur आप ाचे से जानती हैं की बीवी के बिना मेरी रात कैसे गुज़रती hogi...........bus आप मुझपर एक एहसान कर दीजिये memsaheb............wo क्या हैं na.......raat में मूठ मरते वक़्त मेरा छुम जल्दी से नहीं निकल pata........aur कभी कभी तो बहुत दिक्कत भी हो जाती hain.....jab तक साला दिन में एक बार छुम नहीं निकल जाता मुझे नींद नहीं aati............to मैं बस एहि चाहता हूँ की आप हर रोज़ अपनी पहनी हुई पंतय या ब्रा मुझे दे जाया karti..........jissey सूंघकर मेरा छुम आसानी से निकल jata...........aur मैं आराम से सू pata..........aapko पाना तो मुझ गरीब के बस में हैं hi nahin.........bus आपको याद करके मैं अपने आपको संतुष्ट कर lunga......aur मुझे कुछ नहीं चाहिए........" और रघु गहरी सांस छोड़ते हुए हौले से बोल पड़ता hain..........wahin उसका दुर्र से कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा tha........pata नहीं काव्य इस बार उसकी बाटिओं का क्या रिएक्शन karegi.........kahin वो उसे फिर से थप्पड़ न मार दे.......

काव्य वहीँ कुछ देर तक शांत रहती हैं और अपने सोच में यु hi डूबी रहती hain........wahin रघु बड़ी आस लगाए काव्य के खूबसूरत चेहरे की तरफ देखे जा रहा था.........

" आप विशवास कीजिये memsaheb.............is बात की कानों कान किसी को खबर नहीं hogi......yahan तक की जीतू को भी nahin........main हर रोज़ सुबह आपको आपकी ब्रा और पंतय दे जाया karunga........aur हर रोज़ आप अपनी पहनी हुई ब्रा पंतय मुझे दे दिया kijyega.......issey मैं पूरी तरह से संतुष्ट हो जावूंगा........" और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ वो काव्य के नाजुक हाथों को अभी भी हौले हौले से सेहला रहा tha..........maalish कर रहा tha.......kavya अभी भी सोच में गम thi.......wo कोई फैसला नहीं कर पा रही थी की रघु को अपने उन्देर्गर्मेन्ट्स देना क्या ठीक rahega........agar वो अपने उन्देर्गर्मेन्ट्स से उसे संतोष कर सकती हैं तो उसे देने में इसमें कोई बुराई नज़र नहीं aati........agar उस बिचारे की बीवी होती तो वो मुझसे ये सब कभी नहीं mangta........kuch सोचकर काव्य हौले से बोल पड़ती हैं.........

" तुम्हें पता भी हैं की तुम मुझसे क्या मांग रहे ho..........mujhse वो चीज़ें जिनपर सिर्फ और सिर्फ मेरे पति का अधिकार hain.........aur इस बात की क्या गुरंटी हैं की तुम ये बात जीतू से नहीं kahogey..........agar उसने कभी देख लिया या जान गया to.........fir मेरा क्या hoga.........aur एक baat........main तुम्हारी ये इच्छा पूरी तो कर सकती हूँ magar.......ye ध्यान रहे की मेरे उन्देर्गर्मेन्ट्स ख़राब नहीं होने chahiye.......uspar तुम्हारे उसका दाग बिलकुल भी नहीं लग्न chahiye........nahin to......main उसे वापस ले लुंगी......." और काव्य के चेहरे पर शर्म की लखीरें गहरी होती चली जाती हैं वहीँ रघु ख़ुशी से झूम उठता हैं.........

" आप निश्चिन्त रहिये memsaheb...........ye बात कभी किसी को पता नहीं चलेगा.........." और रघु काव्य के हाथों पर पाती बांधने लगता हैं वहीँ कवि बड़े प्यार से उसके तरफ एक तुक देखे जा रही thi...........wahin रघु मंद मंद मुस्कुरा रहा था.......

" मैं चलती हूँ aab............kal से तुम अपने टाइम पर आ जाना........" और काव्य हौले से अपनी जगह से कड़ी होती हैं वहीँ रघु भी उसके साथ उठ जाता hain.........kavya के हाथ पर पाती लग चुकी थी और उसका दर्द अब काफी हुड्ड तक कम हो चूका tha.........wahin वो रघु के तरफ देखकर हौले हौले मुस्कुरा रही थी........

" memsaheb.........jate जाते मुझे मेरा सामान तो देती jaiye.........aaj की रात मैं कैसे गुज़ारूंगा........" और रघु काव्य को देखकर हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य एक तुक उसके चेहरे की तरफ देखने लगती hain.......usey समझ में नहीं आता की वो इस वक़्त उसे अपने पहने हुए उन्देर्गर्मेन्ट्स निकल कर कैसे दे..........

" kya.........aabhi.......magar मैं अभी कैसे तुम्हें निकलकर दे सकती hoon..........wo भी तुम्हारे samney.......naa naa.....mujhse ये नहीं होगा......" और काव्य की सांसें फिर से भरी होने लगती hain.......uska दिल एक बार फिर से ज़ोरों से धड़क उठा था...........

" आप फ़िक्र मुट्ठ कीजिये memsaheb........main पीछे की तरफ घुमा जाता hoon......aap अपनी साड़ी के अंदर हाथ डालकर अपनी पंतय निकल lijiye..........main एहि समझूंगा की आपने मुझे माफ़ कर diya........agar अपनी पंतय नहीं दिया तो एहि समझ लूंगा की आप भी औरों की तरह बस बड़ी बड़ी बातें करती hain.........aur रघु इस बार काव्य को देखकर ताने मरने लगता हैं वहीँ काव्य का सर शर्म से झुक जाता hain..........aab रघु ने उसे जैसे चैलेंज कर दिया tha..........agar वो उसे अपनी पंतय निकल कर नहीं देती तो उसकी बाटिओं का कोई अस्तिस्त्व नहीं रह jata...........aur वो अपनी बाटिओं से दुबारा मुकरना नहीं चाहती थी.........

" magar...........kahin कुछ हुआ तो......... और अगर तुमने पीछे मुड़कर देख लिया तो........" और काव्य का कलेजा ज़ोरों से धड़क उठता hain.......wahin उसकी सांसें एक बार फिर से भरी होती चली जाती hain...........dil में बेचैनी एक बार फिर से बढ़ने लगी thi.........excitement और लजात से उसका चेहरा सुर्ख लाल होता जा रहा tha.........wahin शर्म से उसका बुरा हाल tha.......aaj तक वो ऐसे कभी किसी के सामने अपनी पंतय नहीं निकलती thi......yahan तक की राहुल के सामने भी nahin.......usey बहुत शर्म आ रही थी मगर अब उसे कोई चारा भी नज़र नहीं आ रहा tha.......aur वो अब रघु को बिलकुल भी नाराज़ नहीं करना चाहती थी.......

" आप फ़िक्र मुट्ठ कीजिये memsaheb.........main पीछे की तरफ घूम जाता hoon....aap जल्दी से अपनी पंतय निकलकर मुझे दे दीजिये........." और रघु फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य एक शब्द और कुछ नहीं कहती और रघु के तरफ बड़े गौर से एक तुक देखने लगती hain.....raghu का चेहरा दूसरी तरफ tha.......wahin उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा tha........kuch सोचकर वो अपने दोनों हाथ नीचे की तरफ ले जाती hain.......apni साडी के अंदर की तरफ..........

उसकी नज़रें एक सेकंड के लिए भी रघु से हटेने नहीं हुत्त रही thi.....dil में दुर्र बढ़ता जा रहा था की अगर रघु पीछे मुड़कर कहीं देख लिया to.......magar उसे उसपर विश्वास था की वो ऐसा कभी नहीं karega........kavya हौले हौले अपने हाथों को ऊपर की तरफ ले जा रही थी और धीरे धीरे उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi..........jab उसका हाथ उसकी कमर पर पहुँचता हैं वो अपने दोनों हाथों से साड़ी के अंदर से अपनी पंतय को धीरे धीरे नीचे की तरफ सरकने लगती hai........wahin रघु की तरफ उसकी नज़रें अब भी थी...........

साड़ी के अंदर हाथ डालने से काव्य की साड़ी उसकी घुटनों तक ऊपर की तरफ उठ गयी thi..........jissey उसकी गोरी गोरी टांगें और भी कातिलाना लग रही thi........agar इस हाल में रघु उसे देख लेता तो वो आज काव्य पर टूट padta.......magar अब वो भी जान चूका था की इस बुलबुल का शिकार बहुत इत्मीनान से करना hain..........wo उसकी जवानी को बहुत आहिस्ता से मसलना चाहता tha.........ghar की मालकिन आज खुद एक नौकर के लिए अपनी साड़ी के अंदर हाथ डेल हुए उसकी ख़ुशी की खातिर अपनी पंतय उसके सामने उतर रही thi.........ye कोई छोटी मोती बात थोड़ी न thi......wo भी रघु जैसे इंसान के लिए.......

काव्य अपने दोनों हाथों से तेज़ी से अपनी पंतय को नीचे की तरफ सरका रही thii.......jab उसकी पंतय उसकी घुटनों तक आती हैं वो अपने दोनों हाथ बहार की तरफ खींच लेती हैं और अगले hi पल उसकी ब्लैक कलर की पंतय उसकी घुटन से नीचे सरकता हुआ उसके क़दमों में गिर पड़ता hain..........wo अपने दोनों पवन से उस पंतय को अपने से अलग करती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं........

" raaaaagghhhuuuuuu....leeeee...looo...tuuumheinininii जोऊ chahiiyee.e....." और काव्य की सांसें फिर से भरी होने लगती hain.....bechaini की वजह से उसके मुँह से बोल नहीं फुट रहे they.....wahin वो लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi..........wahin रघु मुस्कुराता हुआ पीछे की तरफ पलटता हैं और जब उसकी नज़र काव्य के क़दमों पर पड़े उस ब्लैक कलर की पंतय पर जाती हैं उसके चेहरे पर एक गन्दी सी मुस्कान तैर जाती हैं वहीँ काव्य का चेहरा शर्म से पूरा लाल पढ़ जाता hain.....wo अब रघु का सामना बिलकुल नहीं करना चाहती thi......uska जी तो कर रहा था की वो वहां से फ़ौरन कहीं भाग jaye......jaise hi वो जाने के लिए मुड़ती हैं रघु आगे बढ़ता हैं और फर्श पर काव्य की पंतय को अपने हाथों में उठा लेता hain.......kuch देर तक हवा में उस पंतय को लहराने के बाद वो उसे अपने हाथों में थम लेता हैं........

" आपका बहुत बहुत शुक्रिया memsaheb........apni अमानत मुझ गरीब को देने के liye......isey तो मैं अपनी जान से ज़्यादा संभलकर रखूँगा.........." और इस बार रघु उस पंतय को अपने चेहरे के पास ले जाता हैं और पंतय में से उठ रही भीनी भीनी छूट की खुसबू को अपनी सांसों में धीरे धीरे उतरने लगता हैं और काव्य के तरफ देखता हुआ उस पंतय को हौले से चूम लेता hain.........panty से उठ रही खुसबू रघु को मदहोश कर देने वाली thi.......wo तो जैसे उसमें खो सा गया tha..........uski खसबू उसे पल पल पागल करती जा रही थी....... वहीँ काव्य के चेहरे का रंग शर्म से और लाल पढ़ जाता हैं और वो बिना कुछ कहे वहां से फ़ौरन बहार की तरफ निकल पड़ती hain........kaleja उसका बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha........wahin छूट में चीटियां सी रेंगने लगी थी........

काव्य के जाते hi रघु उस पंतय को दुबारा से अपने नाक के पास ले जाता हैं और इस बार वो बहुत लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगता हैं .......जैसे उस खुसबू का एक कटरा न छोड़ना चाहता ho...........wahin उसकी मदहोशी भी बढ़ती जा रही thi.....uska लुंड एक बार फिर से अकड़ने लगा tha..........ek बार फिर से उसे सब कुछ एक सपना सा लग रहा tha.........aab काव्य करीब करीब उसकी मुट्ठी में आ चुकी thi.....jo लड़की अपना पंतय तक उसे दे सकती हैं वो लड़की क्या अपनी छूट उससे नहीं मरवा sakti...........aab रघु को अपनी मज़िल साफ़ नज़र आ रही thi........dekhna था की वो अपने मंज़िल को कब और कितने सामान्य में हासिल कर लेता hain.............ye तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था.......

" आज तो मैंने तेरी पंतय तुझसे hi निकलवाई हैं मेरी jaan........kal को मैं खुद तेरी पंतय utarunga.......wo भी अपने इन हाथों se......wo भी तेरी साड़ी के अंदर अपने हाथ dalke...........fir एक एक कर मैं तेरे बदन से सरे कपड़े उतरता jawunga.......aur तुझे सर से लेकर पवन तक पूरा नंगा karunga..........uske बाद तेरे साथ मैं वो गन्दा खेल खेलूंगा की तू बस मेरे लुंड की घुलम बनकर रह जाएगी........

तुझे एक बड़े घराने की लड़की से मैं एक सस्ती बाज़ारू रांड banauga........main तुझे इतना पागल कर दूंगा की तू मेरे इस लुंड के सिवा और कुछ नहीं sochegi.........har वक़्त तुझे मेरे लुंड की ज़रुरत padegi........aur इसी लुंड को पाने के लिए मैं तुझसे वो सब कुछ करवाऊंगा जो मेरा बरसों का सपना hain.......jo मैं हर रोज़ किसी लड़की के साथ ऐसा कण्रेय की सोचता hoon......aur मुझे उम्मीद हैं की तू मेरे हर सपने को पूरी तरह से साकार karegi....................uspar पूरा खरा utaregi.................................aur रघु फिर से अपने ख्यालों में डूबता चला जाता hain......................dekha था की वो अब इस खेल में कितना सफल हो पता hain........ye तो बस आने वाला समय hi जनता था.......................................................................

कंटिन्यू......................................................................
 
अपडेट-21 (मेघा अपडेट)

तुझे एक बड़े घराने की लड़की से मैं एक सस्ती बाज़ारू रांड banauga........main तुझे इतना पागल कर दूंगा की तू मेरे इस लुंड के सिवा और कुछ नहीं sochegi.........har वक़्त तुझे मेरे लुंड की ज़रुरत padegi........aur इसी लुंड को पाने के लिए मैं तुझसे वो सब कुछ करवाऊंगा जो मेरा बरसों का सपना hain.......jo मैं हर रोज़ किसी लड़की के साथ ऐसा कण्रेय की सोचता hoon......aur मुझे उम्मीद हैं की तू मेरे हर सपने को पूरी तरह से साकार karegi....................uspar पूरा खरा utaregi.................................aur रघु फिर से अपने ख्यालों में डूबता चला जाता hain......................dekha था की वो अब इस खेल में कितना सफल हो पता hain........ye तो बस आने वाला समय hi जनता था.......................................................................

अब आगे..................................................................................................

काव्य के जाने के बाद जीतू अपना सारा काम ख़तम करके वापस रघु के पास चला आता hain...........kavya ने जीतू के सामने अपना पाती से बंधा हुआ हाथ छुपा लिया tha.............uski वजह भी thi.......kyon की काव्य के पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था जो वो जीतू को दे सकती thi..........udher जीतू भी बहुत एक्सिस्टेंड हो रहा था की ऐसी कौन सी वजह थी जो आज काव्य खुद रघु से मिलने उसके कमरे पर आयी हुई thi........jaise hi जीतू अंदर जाता हैं उसके चेहरे पर उतावलापन साफ़ झलकने लगता hain.......wahin वो रघु को देखकर हंस पड़ता hain.........aur उसके कंधे पर अपना एक हाथ हौले से रख देता हैं........

" तेरे तो यार आज चंडी हो गए............ हमारी मेमसाहेब आज खुद तुझसे मिलने तेरे कमरे पर aayi........kya बात hain.........waise तो वो तुझपर बहुत भड़की हुई सी लग रही thi..........tere बारे में मुझसे पूछने लगी और मैंने जब कोई जवाब नहीं दिया तो साली मुझपर भी भड़क uthi.........magar तुझसे मिलने के बाद वो बड़ी शांत शांत सी नज़र आ रही thi........aisa यार तूने क्या कर दिया अपनी मेमसाहेब के saath..........kahin तूने उनकी दोनों चूचियों को तो नहीं मसल diya.........ya फिर तूने उनकी छूट और गांड पर तो हाथ नहीं फेर दिया........." और जीतू इतना कहकर अपने काले पीले दन्त दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" तू naa.......bewkoof का बेवकूफ hi rahega...........isi वजह से मेमसाहेब तुझे ज़रा भी घास नहीं dalti...........arey थोड़ी सी तू अपनी अकाल लगाया kar............ye सीधा सीधा चूचियां मसलने और छूट में ऊँगली करने से यु काम नहीं banta...........kaam ऐसा किया जाता हैं जिससे हमारी मेमसाहेब खुद आकर अपनी चूचियां हमसे masalwaye..........khud आकर कहे की मेरी छूट और गांड मार lo.........jaisa जी में आये वैसा chodo...........aur तू जनता भी हैं की हमारी मेमसाहेब ने मुझे कौन सा तोहफा दिया hain.......arey देखेगा न तो तेरी दोनों आँखें बहार निकल aayegi...........tu भी क्या याद करेगा की तेरा पला किस्से पड़ा tha........ye देख.........

इस बार रघु वहीँ बीएड के नीचे से थोड़ी सी चादर हटाता हैं और काव्य का पहना हुआ पंतय उस चादर के नीचे से निकलता हैं और जीतू के सामने उसे ऐसे हवा में लहराता हैं जैसे वो कोई खेलने की चीज़ ho.......ya कोई फ्लैग (झंडा ) ho..........wahin जीतू की जब नज़र काव्य के पंतय पर जाती हैं उसकी आँखें हैरत से फैलती चली जाती hain.......kuch पल के लिए तो उसे अपने आप पर बिलकुल भी यकीन नहीं hota.........magar जो कुछ भी उसकी आंखों के सामने था वो बिलकुल सच tha..........uski नज़रें कभी रघु के तरफ thi.........................to कभी हवा में लहराती उस पंतय की taraf.......................jisey रघु अपनी उँगलियों पर नचा रहा था..........

" ये सब तूने किया kaise........ye तो पंतय मेमसाहेब की लगती हैं........" और जीतू हैरत से रघु के तरफ ऐसे देखने लगता हैं जैसे उसने को अजूबा देख लिया हो..........

" लगती नहीं हैं bewkoof.......ye मेमसाहेब की hi hain......aur मज़े की बात तो ये हैं की उन्होंने खुद ये पंतय निकलकर मुझे दी hain.........aur जब कोई लड़की खुद अपनी पंतय निकलकर मुझे दे सकती हैं तो क्या वो मुझसे छुड़वा नहीं sakti.........beshak छुड़वा सकती hain..........magar इसमें थोड़ा वक़्त lagega..........aabhi फिलहाल तू इसी से अपना काम चला............" और रघु उस पंतय को हवा में लहराते हुए सीधा जीतू के तरफ उछाल देता हैं जिससे जीतू उसे तुरंत अपनी मुट्ठी में कैद कर लेता hain.........wo बड़े गौर से काव्य की पंतय को अपने हाथों में लेकर एक तुक देख रहा tha...........aabh भी उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था.........

" और हाँ एक बात aur..........agar तेरा जी चाहे तो तू इसे अपने लुंड पर लपेटकर मुट्ठ मार सकता hain..............tujhe इसकी पूरी चूत hain......aur तू दुर्र mutt..........tu चाहे तो अपना छुम इस पंतय पर भी छोड़ सकता hain..........magar..................." और रघु इतना बोलकर खामोश हो जाता हैं वहीँ जीतू उसे सवाल भरे नज़रियों से ऐसे देखने लगता हैं जैसे वो ये सोच रहा हो की कहीं रघु उससे इसकी कीमत तो नहीं mangega...........magar अब वो कर भी क्या सकता tha...........usey आज रघु की साडी शर्तें मंज़ूर थी.........

" मगर क्या रघु............" और जीतू का कलेजा ज़ोरों से धड़कने लगता हैं वहीँ रघु उसे देखकर ज़ोरों से हंस पड़ता hain........ghabrahat साफ़ उसके चेहरे से झलक रही थी...........

" तेरी क्यों गांड फटने लगी be............main तुझसे इसके बदले कुछ ऐसा वैसा थोड़ी न मांग raha...........main तो बस एहि कह रहा हूँ की तू बेशक चाहे मुट्ठ मार le..........magar जो कुछ भी करेगा सब कुछ मेरी आँखों के सामने karega..........yani खुलेआम खुल्ला ............नहीं तो मैं ये पंतय तुझे नहीं देने वाला......." और रघु जैसे अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ जीतू की नज़रें थोड़ी झुक सी जाती hain......sharam साफ़ उसकी आँखों में नज़र आने लगते hain.......wahin रघु उसे देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था.................

" magar.........ye सब में तुझे कौन सा मज़ा aayega...........tere सामने मैं ऐसा कैसे कर सकता hoon...........aur जो तेरे पास हैं वो मेरे पास भी hain..........kuch तो मेरे अंदर शर्म रहने दे यार..........." और जीतू जैसे अपना दुखड़ा रघु को सुनाता हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर ज़ोरों से हंस पड़ता हैं..........

" sharam............hahahahahhahh.........arey behanchod..............jab तू काव्य को छोड़ेगा तब क्या तुझे शर्म नहीं aayegi.......jab मैं और तू हम दोनों एक साथ मैडम की छूट और गांड फाड़ेंगे तब तुझे शर्म नहीं aayegi..........bus मैं कुछ नहीं janta........agar तुझे पंतय चाहिए तो bol............nahin तो चलता बन............." और रघु जैसे जीतू पर भड़क सा जाता हैं वहीँ जीतू एक शब्द कुछ और नहीं कहता और चुप चाप से अपने पेण्ट रघु के सामने उतरने लगता hain..........wahin रघु के चेहरे पर शरती मुस्कान टायर जाती हैं.......

" अब चल जल्दी से अपने अंडरवियर भी उतर............." और रघु जैसे जीतू को हुकुम देता hain.......wahin जीतू को शर्म तो बहुत आ रहा था मगर वो जनता था की अगर मेमसाहेब की छूट उसे चाहिए तो जो रघु कहेगा उसे वो सब करना padega..............wo फ़ौरन अपने अंडरवियर पर अपने दोनों हाथ ले जाता हैं और अगले hi पल अपना अंडरवियर भी रघु के सामने उतर देता hain........lund उसका थोड़ा अकड़ा हुआ सा tha.........wahin रघु की नज़रें जीतू के काळा मोठे लुंड पर थी..........

" चल अब जाकर पलंग पर चुप चाप से बैठ जा और इस पंतय को ाचे से अपने लुंड पर लपेट le......chahe तो इसे अपने नाक से सूघ le.........chahe जो मर्ज़ी kar..........mujhe तो तेरा छुम निकलता हुआ इस पंतय पर देखना हैं......" और रघु वहीँ सामने की चेयर पर जाकर बैठ जाता हैं और जीतू की तरफ ऐसे देखने लगता हैं जैसे कोई मूवी अब चालू होने वाली ho.........jeetu मरता क्या न karta.......wo फ़ौरन अपनी आँखें बंद करता हैं और उस पंतय को सबसे पहले अपने नाक के पास ले जाता hain.....fir उस पंतय से निकल रही भीनी भीनी खुसबू को अपने सांसों में धीरे धीरे उतरने लगता hain..........uski खुसबू से hi जीतू का लुंड धीरे धीरे अकड़ने लगता हैं.........

एक नशा सा उसपर चा रहा tha.......wo भी धीरे धीरे मदहोशी के आलम में डूबता जा रहा tha.........jaise जैसे उसपर नशा सा चा रहा था वैसे वैसे वो ये भूलता जा रहा था की इस वक़्त सामने रघु भी बैठा हुआ हैं जो बड़े धयान से उसे hi लाइव देख रहा hain...........wahin जीतू का लुंड कुछ hi देर में पूरा अकड़ जाता हैं जिसे देखकर रघु मुस्कुराये बिना नहीं रह pata........jeetu का भी लुंड करीब करीब रघु जितना बड़ा tha........aur उतना hi मोटा bhi........bus कुछ 1/2 या 1 िच का अंतर होगा दोनों के लुंड में...........

जीतू इस वक़्त पूरी तरह से मदहोश हो चूका tha.......wahin अब वो अपनी आँखें बंद किये हुए उस पंतय को नीचे की तरफ ले जाता hain......apne लुंड par.............fir वो उस पंतय को अपने लुंड पर ाचे से लपेट लेता हैं और फिर आहिस्ता आहिस्ता से अपने हाथों को हरकत करने लगता hain............jaise जैसे उसका जोश बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे उसके हाथ अपने लुंड पर और तेज़्ज़ होते जा रहे they............wo सब कुछ भूल चूका tha......yaad था तो उसे बस kavya.......................aur उसका नंगा जवान jism.......jiski कल्पना किये वो तेज़ी से मुठ मरे जा रहा tha..........haath और तेज़्ज़ ................और तेज़्ज़ से चलने लगे they........saath hi साथ अब उसकी सिसकारी भी बढ़ती जा रही थी......................

अब जीतू अपने चरम सुख के बेहद करीब tha...........kuch hi पलों में उसका छुम निकलने वाला tha......wahin कुछ दूर पर बैठा रघु उसे बड़े गौर से देखकर मंद मंद मुस्कुराये जा रहा tha.........chehrey पर उसके वहीँ एक गन्दी हंसी thi............chand मिनट बाद hi जीतू तेज़ी से सिसक पड़ता हैं और अगले hi पल उसका जिस्म अकड़ने लगता hain........jaise उसके अंदर से कोई लावा फुट पड़ा ho..........jis चरम सुख के लिए वो जी तोड़ म्हणत कर रहा था वो सुख अब उसे हासिल हो गया tha........jeetu का गधा गधा सफ़ेद छुम बेहटा हुआ काव्य के काळा पंतय को आहिस्ता आहिस्ता से भिगोने लगता hain.........wahin उसके बदन पर पसीने की चाँद बूँदें भी साफ़ नज़र आ रही thi..........wo लुम्बी लुम्बी सांसें लेता हुआ हांफ रहा tha........lazzat और मज़े से उसका बुरा हाल tha.......aur आज जितना मज़ा उसे पहले कभी नहीं आया था.......

कुछ देर बाद जब वो नार्मल होता हैं और जब उसकी नज़र सामने बैठे रघु पर पड़ती हैं उसका चेहरा शर्म से नीचे की तरफ झुक जाता hain.......wahin रघु उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता hain........aur रघु फ़ौरन अपनी जगह से उठता हैं और जीतू के लुंड से भीगा हुआ काव्य का पंतय एक बार फिर से अपने हाथों में लेकर उसे बड़े ध्यान से एक तुक देखने लगता hain.........aabhi भी उस पंतय पर रघु का गधा गधा छुम साफ़ नज़र आ रहा था.........

" शाबाश मेरे sher............theek इसी तरह तुझे एक दिन काव्य की छूट और गांड दोनों फडनी हैं अपने इस लुंड se..........magar एक चीज़ जो मुझे तुझमें कमी नज़र आयी .............वो हैं saiyaam..........tere अंदर साबरा नाम की चीज़ ज़रा भी नहीं hain..........jab तेरे अंदर साबरा आ जायेगा तब तुझे काव्य का शिकार करने में और भी बड़ा मज़ा aayega.........aur मैं तुझे सिखाउंगा की साबरा कैसे किया जाता hain.......chal उठ और अपने कपड़े पहन le............tera ये नायब तोहफा मैं कल अपनी मेमसाहेब को dunga...........aur ये सिलसिला हर रोज़ यु hi चलता rahega........fir एक दिन वो भी ग़ाफ़ि आएगा जब तू काव्य की छूट ले रहा hoga.........aur वो अपनी छूट फ़तवाती हुई चीख रही hogi....................chilla रही होगी.................." और रघु फिर से अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस पड़ता hain.......wahin जीतू भी उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पता.............

" वो सब तो ठीक हैं रघु मगर ये ाचा वक़्त आएगा कब!!!!!!!! मुझे अब और इंतज़ार नहीं hota........kaise भी करके ये ाचा वक़्त जल्दी से ला न यार................" और जीतू जैसे एक बार फिर से रघु से फर्याद करने लगता हैं वहीँ रघु फिर से अपने ख्यालों में डूबता चला जाता hain......jar बार की तरह उसके दिमाग में फिर से कुछ न कुछ नया प्लान जनम ले रहा tha......dekhna था की आगे वो अपने प्लान को क्या अंजाम देता हैं................................................

कंटिन्यू..................................................................................
 
अपडेट- 22 (ा) (मेघा अपडेट)

" वो सब तो ठीक हैं रघु मगर ये ाचा वक़्त आएगा कब!!!!!!!! मुझे अब और इंतज़ार नहीं hota........kaise भी करके ये ाचा वक़्त जल्दी से ला न यार................" और जीतू जैसे एक बार फिर से रघु से फर्याद करने लगता हैं वहीँ रघु फिर से अपने ख्यालों में डूबता चला जाता hain......jar बार की तरह उसके दिमाग में फिर से कुछ न कुछ नया प्लान जनम ले रहा tha......dekhna था की आगे वो अपने प्लान को क्या अंजाम देता हैं................................................

अब आगे........................................................................................

सुबह का वक़्त tha..........kavya अपने हाथों के चोट से उबार गयी thi..........magar रह रहकर उसके जेहन में कल की साडी बातें अभी भी घूम रही thi...........uska रघु के पास अपना यु पंतय छोड़ aana..........raghu की वो साडी बातें जो उसकी छूट में गीलापन को धीरे धीरे बढ़ा रही thi..........kal तक जिस रघु से उसे नफरत thi.........jisey वो देखना भी पसंद नहीं करती thi..........aaj उसे उसी रघु से एक लगाव सा हो गया tha...........uske पहनावे se..........uski गांदगडी से जिसे चीड़ thi........aaj वहीँ सब चीज़ें उसे अपनी तरफ अत्त्रक्ट कर रही थी...........

t.v सामने चल तो रहा था मगर नज़रें काव्य की कहीं और thi........reh रहकर उसकी नज़रें सामने के दरवाज़े पर जाकर टिक jati.........to कभी सामने के दीवार पर तंगी घडी की तरफ चली jati.........ghadi की टिक टिक करती सुई उसकी बेचैनी और बेकरारी को पल पल बढाती जा रही thi........halanki अभी घडी में 8:30 बजे थे और रघु को आने में अभी 1/2 घंटे का समय और tha..........magar काव्य के लिए तो जैसे ये 1/2 घंटा 1/2 सदी के बराबर बीत रहा tha............magar रह रहकर उसके अंदर घबराहट भी होने lagti.........kabhi ये सोचकर की वो कैसे रघु का सामना कर payegi........kal की बीती घटना उसकी बेचैनी को और भी बढ़ता जा रहा था..........

मगर वक़्त क्या कभी ठहरा हैं जो अब thehrega.......jaise hi घडी में 9 बजे काव्य का दिल एक दम से बेचैन हो utha.........jo नज़रें कभी t.v पर तो कभी घडी की तरफ जा रही थी अब वही नज़रें एक जगह जाकर ठहर गयी thi........wo थी सामने की मैं दूर par...........kavya को खुद समझ में नहीं आ रहा था की वो आज रघु के लिए इतनी बेचैन क्यों hain........kyon वो रह रहकर उसके बारे में सब कुछ सोच रही hain........wahin उसकी छूट में भी गीलापन बढ़ता जा रहा tha........shayad ये सोचकर की आज भी रघु का मोटा कला लुंड देखने को मिल jaye............kavya तो जैसे अब रघु के लुंड के लिए पागल होती जा रही थी............

काव्य इन्ही सब उधेरबुन में डूबी हुई थी तभी उसके दरवाज़े का मैं दूर बेल्ल baja.........aur वो अपने सोच से बहार nikali.........chehrey पर मुस्कान लिए हुए वो फ़ौरन मैं दूर के तरफ चल पड़ती hain........waise आज काव्य ने ब्लू कलर की साड़ी पहन राखी थी और उसी रंग का मैचिंग ब्लाउज bhi.....jo हमेशा की तरह डीप लौ कट tha.........aur पीठि उसकी आधे से ज़्यादा नंगी thi............jismein उसका गोरा बदन और भी क़हर धा रहा tha..........waise आज उसने अपने आपको थोड़ा सा मेकउप भी किया हुआ tha......aur बल आअज खुले हुए they.........jo उसकी नंगी पीठ को कवर कर रहे they..........jism में से हल्का सा परफ्यूम की खुसबू आ रही थी और भीनी भीनी शैम्पू की भी..........

जैसे hi काव्य उम्मीद कर रही थी सामने आज हमेशा की तरह रघु खड़ा tha...........usi हाल mein......usi अंदाज़ mein.........roz की तरह आज भी उसके मुँह में पान tha........jisey वो अपने मुँह में लेकर हौले हौले चबा रहा tha...........wahin न चाहते हुए भी काव्य के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ जाती हैं तो भला रघु कहाँ इन सब में पीछे रहने वाला tha..........wo भी काव्य को देखकर अपने पीले काळा दन्त दिखता हुआ हंस पड़ता हैं और हमेशा की तरह काव्य के पीछे पीछे चल पड़ता hain..........kavya भी ाचे से जानती थी की रघु हर बार उसके पीछे hi क्यों चलता hain........taki वो काव्य के मटकती गांड को ाचे से दीदार कर sake.......aur शायद अब काव्य को भी ये सब ाचा लगने लगा था........

" अब आपका दर्द कैसा हैं मेमसाहेब..........." और रघु काव्य के गांड के बीच की दर्द को घूरता हुआ हौले से बोल पड़ता hain..........waise उसने अपनी नज़र अभी भी नहीं हटाई थी और जैसा की उम्मीद था काव्य इस बार फ़ौरन पीछे की तरफ पलट जाती हैं और रघु के तरफ बड़े गौर से एक तुक देखने लगती hain.........raghu की नज़र को अपनी गांड पर दुबारा पाकर एक बार फिर से उसका चेहरा सुर्ख लाल हो जाता hain.......wahin रघु फिर से अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं.........

" ठीक हैं........." और काव्य इतना कहकर फिर से खामोश हो जाती हैं वहीँ रघु ाचे से काव्य के बदन को स्कैन करने लगता hain...........wo अभी भी काव्य को देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था.........

" एक बात बोलूं memsaheb............aap सच में किसी अप्सरा जैसी लगती hain..........saheb तो आपके बहुत किस्मतवाले हैं जिसे आप जैसी सूंदर बीवी मिली..........." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं.........

"ाचा ji...........kya बात hain..........dekh रही हूँ की आज कल तुम मेरी तारीफ कुछ ज़्यादा hi कर रहे ho.............maska लगाने की कोई ख़ास वजह......." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु भी धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" जो लोग तारीफ के काबिल होते हैं उन्ही की तो तारीफ होगी ना memsaheb........aab हम जैसे को देख lijiye..........na दिखने में ाचे हैं न hi हमारे अंदर कोई खासियत hain..........humare नसीब में तो आप जैसी बीवी भी nahin...........jisey हम कभी सपने में भी पा सके........" और रघु एक तुक काव्य के तरफ बड़े गौर से देखने लगता hain.....wahin काव्य मुस्कुराये बिना नहीं रह पति...........

" aacha.........agar मान लो की तुम्हारी किस्मत में अगर मेरी जैसी बीवी मिल गयी to........ya सूपपोसे करो की मैं hi मिल गयी तुम्हें to.............to तुम क्या करोगे........." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु भी ऐसा hi सुनेहरा मौका ढूढ़ रहा tha.........wo भी काव्य की बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ता hain........wahin काव्य को इस बार अपनी गलती का एहसास हो जाता हैं की उसने जाने अनजाने में रघु से क्या बोल diya.........magar जब तीर कमान से निकल चूका था तो फिर सोचना कैसा!!!!!!

" तब तो मैं दुनिया का सबसे खुसनसीब इंसान अपने आपको समझूंगा memsaheb...........agar कसम से आप मुझे मिला जाती तो मुझे इसका सहारा कभी नहीं लेना पड़ता........." और रघु अपने t-shirt के अंदर से काव्य का ब्लैक पंतय निकल देता हैं और एक बार फिर से उसे हवा में लहराने लगता hain.........magar आज उस पंतय का रंग कला के बजाये ज़्यादा सफ़ेद नज़र आ रहा tha.......aur उसपर सफ़ेद सफ़ेद गधे गधे ढाबे भी साफ़ नज़र आ रहे they.......jo काव्य को ये समझने के लिए काफी थे की वो ढाबे किस चीज़ के hain.........wahin काव्य के चेहरे पर शर्म की लकीहरिन फिर से झलकने लगती हैं..........

" आप देख रही हैं न memsaheb........ispar जो सफ़ेद सफ़ेद निशान हैं वो मेरे लुंड से निकले हुए मणि के hain..........aapke बदन की खुसबू ने मुझे पागल बना दिया hain........kal से लेकर अब तक मैंने दो बार मुठ मारा hain.......aur अपने आपको इससे संतोष किया hain.............agar आप मेरी बीवी होती तो सबसे पहले मैं आपको कपड़े hi नहीं पहने deta.........sara दिन मैं आपको इस घर में पूरा नंगा rakhta.......sir से लेकर पवन tak........aur रात दिन मैं कभी आपके इन चूचियों को masalta...........to कभी उन्हें डेंटन के बीच kaatata.........to कभी उनसे khelta........aur मेरा लुंड तो बस आपकी छूट के अंदर hi rehta........sara दिन मैं इसे वहीँ डेल रहता............" और रघु गहरी सांस छोड़ता हुआ हौले से बोल पड़ता hain.........aab उसे लग रहा था की उसने सही मौके पर सही बात कही हैं.......

आज उसने जानबूझकर लुंड, चुकी और छूट शब्द का इस्तेमाल काव्य के सामने किया tha........jo की इसका असर काव्य पर बहुत भरी पड़ने वाला tha..........kavya वही लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही थी और आपने आपको संभालने की नाकाम कोशिश कर रही thi...........shayad उसे रघु से ये सब नहीं पूछना चाहिए tha.........shayad वो एहि सब सुनना तो चाहती thi........kahin न कहीं उसे भी रघु की ये साडी बातें ाची लगने लगी thi..........apni चुदाई का ख्याल आते hi उसकी छूट में गीलापन फिर से बढ़ने लगता hain........wahin एक बार वो रघु के मोठे काळा लुंड की कल्पना करने लग जाती hain.......jissey उसकी छूट में नमी और भी बढ़ जाती हैं.......

" एक बात बोलूं memsaheb........saheb तो चुटिया हैं जो आप जैसी बीवी को छोड़कर विदेश कमाने चले gaye........arey उनके पास तो वैसे भी पैसे की कोई कमी नहीं hain........agar साहेब की जगह मैं होता तो मैं आपको एक पल के लिए भी कहीं आपसे दूर नहीं jata........isi सेहर में मेहनत मज़दूरी करके ज़िन्दगी काट leta.......magar नसीब को कौन बदल सकता हैं........" और रघु जैसे काव्य को देखकर तने मरने लगता हैं वहीँ काव्य बिलकुल खामोश सी हो जाती हैं और शर्म से अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर लेती हैं.........

कॉन्टिनोएड..................................................................................
 
अपडेट- 22(बी) (मेघा अपडेट)

" एक बात बोलूं memsaheb...........aap सर से लेकर पवन तक क़यामत hain........bhagwaan ने आपको बड़ी hi फुर्सत में बनाया hain.........aapke हर आंग आंग को किसी संगमरमर की तरह तराशा hain.........aapka जिस्म देखकर तो बुद्धों के भी होश उड़द जाते हैं तो जवान मर्द कैसे खुद को संभालते hongey...........aap तो ऐसी चीज़ हैं मेमसाहेब की आपको पाकर कभी किसी का मुन्न नहीं भरने wala...........aapko पाने के बाद हर मर्द आपके जिस्म के साथ दिन रात खेलना chahega........aapke हर आंग आंग को मसलना चाहेगा........" और रघु फिर से अपने काळा पीले दांत दिखता हहआ हौले से हंस पड़ता hain......wahin काव्य का अब बुरा हाल था.........

रघु उसकी तारीफ तो कर रहा tha.......magar गंदे अंदाज़ mein...........shayad कहीं न कहीं अब काव्य को भी उसकी तारीफ ाची लगने लगी thi......is वजह से वो अब तक रघु को रोकने की ज़रा भी कोशिश नहीं कर रही thi.........aur तो और रघु की बातें सुनकर उसकी बेचैनी पल पल बढ़ती जा रही thi........choot में गीलापन अब और भी बढ़ता जा रहा tha.......wo बड़े मुस्खिलों से अपने आपको संभाले हुए थी.......

" raaaaaggghhhuuu.......naaastaaaa चाहिय्येई कककययय्यआआअ!!!! " काव्य को आगे कुछ समझ में नहीं आता तो वो हौले से बोल पड़ती hain........wahin एक बार फिर से उसकी जुबान जैसे लड़खड़ा सी जाती hain.......sansein पल पल भरी होती जा रही thi........aur धड़काओं का भी कुछ वैसा hi हाल था.......

" हाँ memsaheb.........aapke हाथों से नास्ता कौन नहीं करना चाहेगा.........." और रघु इतना कहकर अपने लुंगी को हौले से ऊपर की तरफ घुटनों तक फोल्ड करता हैं और वहीँ फर्श पर जाकर उसी अंदाज़ में बैठ जाता hain...........wo जनता था की काव्य जब नास्ता देने के लिए आएगी और नीचे की तरफ जब झुकेगी तो फिर से एक बार उसके मोठे काळा लुंड का उसे साक्षात् दर्शन hoga...........kavya फिर कुछ नहीं कहती और सीधा नास्ता लेने किचन की तरफ चल पड़ती hain.......thode देर बाद वो एक ट्रे में नास्ता लेकर आती हैं......

आज भी नास्ता में काव्य ने दो बॉयल्ड अंडे रखे हुए थे और ब्रेड पर मख्हन लगा हुआ tha......saath में वहीँ गिलास में फाइलर का pani.........wo जैसे hi नीचे की तरफ झुकाती हैं एक बार फिर से उसकी नज़रियों के सामने रघु का मोटा कला लुंड साफ़ नज़र आने लगता hain.......magar हर रोज़ की तरह आज उसका लुंड और भी मोटा और बड़ा नज़र आ रहा tha..........shayad इतने देर से वही चुदाई वाली बाटिओं से आज उसका लुंड भी खड़ा हो गया tha........wahin काव्य की सांसें जैसे फूल जाती hain.......dil की धड़कनें एक बार फिर से तेज़्ज़ और तेज़्ज़ होते चले जाते hain......aankhein हैरत से फैलाती चली जाती hain............choot में गीलापन फिर से बढ़ चूका tha.........bahut मुश्किलों से वो अपने आपको खुद को संभल रही thi..........wahin रघु भी बार बार उसके साबरा का इम्तिहान ले रहा tha..........magar अब काव्य को लगने लगा था की ये सिलसिला अगर यु hi चलता रहा तो वो बहुत जल्द हार jayegi.......aur हो सकता हैं वो अपने आपको रघु के हवाले भी कर de.......aur शायद रघु तो एहि चाहता था...........

जैसे तैसे काव्य अपनी सांसों को नार्मल करती हैं मगर इस दिल की धड़काओं का क्या kare.......wo तो उसके बस में थे hi nahin........tezz सांस चलने से उसकी चूचियां तेज़ी से ऊपर नीचे की तरफ हो रही thi........jinhein रघु बड़े ध्यान से देख रहा tha........aur शायद मुन्न hi मुन्न बहुत खुस भी हो रहा tha........wo वहीँ फ़ौरन आकर सोफे पर बैठ जाती हैं और t.v स्क्रीन की तरफ देखने लगती hain........magar सच तो ये था की अब उसका ध्यान कहीं नहीं लग रहा tha........baar बार उसकी नज़रियों के सामने रघु का वही कला मोटा लुंड घूम रहा tha.........jo अब उसे परेशां करने लगा था........

रघु उसी अंदाज़ में फिर से खाने लगता hain........wahin काव्य कभी उसके तरफ देख रही थी तो कभी t.v स्क्रीन की taraf..........aab उसका रघु के सामने बैठना पल पल मुस्खिल होता जा रहा था.........

" memsaheb...........main अब इसका क्या करूँ..........." रघु नास्ता करते हुए अगले hi पल काव्य की पंतय अपने हाथ में उठता हैं और उसे एक बार फिर से हवा में लहराने लगता hain.........wahin काव्य की जो सांसें अब कुछ नार्मल होने लगी थी रघु के इस सवाल से फिर से बेकाबू होने लगती hain........wo हैरत से कभी रघु के तरफ देखे जा रही thi..........to कभी अपनी पंतय की taraf........usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या kahe..........kya kare..........wahin रघु तो आज काव्य के साथ पूरा नंगापन का खेल खेल रहा tha..........ek बार फिर से काव्य के चेहरे पर शर्म की लखीरें झलकने लगती hain........wahin उसकी नज़रें शर्म से नीचे की तरफ झुक जाती hain........kavya कुछ कहती तभी रघु फिर से बोल पड़ता हैं.....

" अब आप फिर से अपनी पहनी हुई पंतय निकलकर मुझे दे dijiye..........aur इसे धोने के लिए दाल dijiye..........mera भी काम चलता rahega......aur आपका भी........" और रघु अंडे मुँह में डालता हुआ धीरे से बोल पड़ता hain......wahin काव्य का कलेजा ज़ोरों से धड़कने लगता hain............usey कुछ सूझ नहीं रहा था की वो रघु के सवालों का क्या जवाब दे..........

" तुम्हारे samney............ye मुझसे नहीं होगा........" और काव्य की नज़रें दुबारा से नीचे की तरफ झुक जाती हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर हंस पड़ता हैं........

" मैंने ये कब कहा मेमसाहेब की आप अपनी पंतय मेरे सामने utariye..........maine तो बस ये कहा की आप मुझे अपनी पंतय निकल कर dijiye..........waise एक बात तो हैं memsaheb..........aapki छूट की खुसबू सच में मदहोश कर देने वाली hain...........isey जब भी मैं अपने नाक से इसकी खुसबू लेता हूँ एक पल के लिए मैं सब कुछ भूल सा जाता hoon.........ek नशा सा मुझपर चने लगता हैं........" और रघु वहीँ पानी की गिलास हाथ में उठता हैं और फिर से उसी अंदाज़ में पीने लगता hain........aadha गिलास पानी ख़तम करने के बाद वो फिर से उस गिलास को वहीँ फर्श पर रख देता hain......ek बार फिर से उस साफ़ सुथरे पानी में रघु के मुँह से निकला हुआ पान का कुछ टुकड़ा और katha.........aur अंदर के छोटे छोटे तड़के उसपर तैरते हुए से नज़र आ रहे they.........jinhein काव्य बड़े ध्यान से देखे जा रही थी........

" tum...naaaa....bahut बढ़तमीज़ किसम के इंसान ho...........tumhein ज़रा भी शर्म नहीं आती की लड़की या औरत से किस तरह से बात करनी chahiye............aur मैं तुम्हारी मालकिन hoon........tumhein इस बात का ज़रा भी ख्याल नहीं.........." और काव्य गहरी सांस छोड़ते हुए बड़े मुस्खिलों से अपनी बात कहती हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर हंस पड़ता हैं.......

" तो मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया memsaheb..........maine क्या आपसे कोई बदतमीज़ी ki..........ya आपको chuwa........nahin ना......." और रघु प्लेट में रखा ब्रेड अपने हाथों में उठता हैं और अपने गंदे हाथों से उस ब्रेड को साफ़ करने लगता hain..........jo ब्रेड अभी कुछ देर पहले चमक रहा था अब वही ब्रेड रघु के हाथ पड़ने से मैला हो गया tha......aur जगह जगह काळा काळा निशान उसपर साफ़ नज़र आ रहे they.......wo इन सब की परवाह किये बगैर उस ब्रेड को अपने मुँह में डालता हैं और उसे खाने लगता hain.......wahin काव्य उसके एक एक हरकतों को बड़े गौर से देखे जा रही थी........

" वहीँ जो तुमने अभी अभी kaha..........wo गंदे words.......mera मतलब........" और काव्य का चेहरा फिर से शर्म से लाल पढ़ जाता हैं वहीँ रघु इस बार उसकी बाटिओं को सुनकर ज़ोरों से हंस पड़ता हैं.......

" तो मैंने कहाँ कुछ गलत कहा memsaheb..........aab आप hi बताइये चुकी को मैं चुकी नहीं कहूंगा तो क्या kahunga..............theek उसी तरह लुंड और छूट को भी मैं उसी नाम से hi तो पुकारूंगा naaa.......aab मैं आपके जैसा पढ़ा लिखा थोड़ी न हूँ की मुझे इंग्लिश आती hain........chudai को इंग्लिश में पता नहीं वो क्या कहते hain.......suna सा लगता हैं मगर इस वक़्त दिमाग पर नहीं चढ़ raha.........mujhe तो बस शुद्ध हिंदी भासा hi आती hain.......aur मैं जनता हूँ की हिंदी में इसे छूट और लुंड hi कहते hain.......bus..................aap भी चाहे तो बोल सकती hain......ismein कोई बुराई थोड़ी न हैं........." और रघु मज़े से ब्रेड को खाने लगता हैं वहीँ काव्य का चेहरा शर्म से पूरा लाल पढ़ जाता hain...........jitna वो ये सब वर्ड्स से बचना चाहती थी आज रघु उतना hi ये वर्ड्स उसके सामने उसे कर रहा था..........

" nnnahin.....karna मुझे ......ये sab.........sach में तुम बहुत गंदे ho............tumse बहस करना बेकार hain..........junglee कहीं के.........." और काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं मगर कहीं न कहीं उसे रघु की ये साडी बातें ाची लग रही thi...........wo उसे इंकार तो कर रही थी मगर दिल hi दिल में रघु की बातें उसे गुदगुदा भी रही thi..........wahin उसके छूट में नमी भी बढ़ती जा रही thi.............agar इस वक़्त रघु वहां नहीं होता तो वो फ़ौरन अपनी साड़ी उतर फेंकती और पूरी नंगी होकर अपनी छूट में ाचे से ऊँगली karti..........kyon की अब उसका साबरा धीरे धीरे जवाब देता जा रहा tha............magar आज रघु भी पूरे मूड में था.........

" अगर आप कहो तो मैं आपकी पंतय खुद hi निकल देता hoon...........ismein आपको भी मज़ा aaeyga.........aur मुझे bhi..........."aur रघु काव्य के बदन को घूरता हुआ हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य रघु को अजीब नज़रियों से देखने लगती हैं.......

" तुम नौकर हो तो नौकर की तरह raho..........apni हुड्ड मुट्ठ bhoolon.......shukra मानवो की मैं तुम्हें अपनी पंतय hi बस दे रही hoon........agar ज़्यादा उछलने की कोशिश किये ना ..............तो मैं वो भी तुमसे चीन lungi.........aab जल्दी से नास्ता ख़तम करो और जाकर अपने काम में लग jawo............tumhara काम ख़तम होते hi तुम्हारी जो चीज़ हैं वो तुम्हें मिल जाएगी..........." और काव्य जैसे अपना फैसला सुनती हैं वहीँ रघु का चेहरा फीका सा पढ़ जाता hain.......usey काव्य से ऐसे जवाब की उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी.........

" बहनचोद ...........ये भगवान् ने लड़की क्यों banayi..........sala इनका दिमाग का कुछ पता nahin........ek पल में सब कुछ हाँ कहती हैं तो कभी दूसरे पल में ना बोल देती hain..........tu आखिर कब तक मुझसे बचती फिरेगी मेरी rani...........kabhi न कभी तो बकरा हलाल होगा hi...........aakhir कॅशे के हाथों बकरा कब तक खैर manayega............usey कभी न कभी तो उसके हाथों काटना होगा hi.........................main भी आखिर देखता हूँ की तू कब तक आपने आपको रोक पति hain..........aur अपने ऊपर सैयाम बरकरार रख पति hain...........main तेरे साबरा को बहुत जल्द चकनाचूर karunga.........aur जिस दिन ऐसा हो gaya....................us दिन तू मेरी मुट्ठी में होगी..........................

कंटिन्यू.........................................................................
 
अपडेट-23 (ा) (मेघा अपडेट)

" बहनचोद ...........ये भगवान् ने लड़की क्यों banayi..........sala इनका दिमाग का कुछ पता nahin........ek पल में सब कुछ हाँ कहती हैं तो कभी दूसरे पल में ना बोल देती hain..........tu आखिर कब तक मुझसे बचती फिरेगी मेरी rani...........kabhi न कभी तो बकरा हलाल होगा hi...........aakhir कॅशे के हाथों बकरा कब तक खैर manayega............usey कभी न कभी तो उसके हाथों काटना होगा hi.........................main भी आखिर देखता हूँ की तू कब तक आपने आपको रोक पति hain..........aur अपने ऊपर सैयाम बरकरार रख पति hain...........main तेरे साबरा को बहुत जल्द चकनाचूर karunga.........aur जिस दिन ऐसा हो gaya....................us दिन तू मेरी मुट्ठी में होगी..........................

अब आगे..................................................................................................

चाहता तो था रघु की ये सिलसिला अब और आगे बढ़े मगर काव्य का इस तरह अचानक से बदला हुआ रूप देखकर वो भी बिलकुल ठंडा सा पढ़ जाता hain...........usey ाचे से मालूम था की ये बुलबुल बहुत जल्द उसकी मुट्ठी में hogi.........magar इसमें थोड़ा और वक़्त लग सकता hain.........din गुज़रते गए और रघु हर रोज़ काव्य को अपने तरीके से सडके करता raha......magar काव्य इतनी आसानी से उसके हाथ नहीं आने वाली thi..........is लिए अब रघु ने कुछ और नया प्लान करने का सोच रखा था.......... मगर क्या!!!!!! ये तो आने वाला वक़्त hi बता सकता था............

इधर राम के एक्साम्स का आज लास्ट पेपर था और उसका रिजल्ट भी कल आने वाला tha..........ek तरह से वो बहुत खुस भी था मगर रिजल्ट आने की चिंता उसे अंदर hi अंदर खाये जा रही thi........halanki उसे पूरा यकीन था की वो फर्स्ट क्लास से ज़रूर पास हो jayega.......magar कहीं ऐसा नहीं हुआ to.............uska सारा म्हणत पर पानी फिर jayega...........aab सवाल पास फ़ैल का नहीं बल्कि काव्य की छूट का tha.......aur अब काव्य की छूट को पाने के लिए hi उसने आज जी तोड़ म्हणत जो की thi.........aur वो अपनी म्हणत को यु जायज़ नहीं जाने देना चाहता tha..........aab तो सब कुछ बस ऊपर वाले के हाट में था............

शाम का वक़्त था और राम एक्साम्स देकर फुर्सत में बैठा हुआ tha..........aaj पूरे 10 दिन गुज़र गए थे वो ठीक से काव्य से बात तक नहीं कर पाया tha..........na hi काव्य उसे पढ़ाई के बीच कभी डिस्टर्ब karti..........sach तो ये था की काव्य दिल से चाहती थी की राम ाचे नम्बरों से पास हो jaye..........agar वो नहीं भी पास होता तो भी काव्य उसे अपना छूट ज़रूर सानुपाती........

और उसकी वजह भी thi.......kyon की उसे राम बहुत पसंद था और अब तो काव्य उसे dil-o-jaan से चाहने लगी thi........apna मानने लगी थी..........

राम अपने कमरे में अकेले बैठा हुआ ........गुमसुम सा....... अपने ख्यालों में कहीं गम tha........usey कल के रिजल्ट की चिंता अंदर hi अंदर खाये जा रही thi........tabhi उसके दिमाग में कुछ ख्याल आता हैं और उसके चेहरे पर आयी परेशानी एक पल में जैसे गायब सी हो जाती hain........wo फ़ौरन अपने बिस्टेर से उठता हैं और सीधा अलमारी का दूर खोलता हैं और उस किताब को निकलता हैं जो कुछ दिन पहले उसे रघु ने दी thi...........jaise hi उसके हाथ में वो किताब लगता हैं उसके चेहरे पर एक मुस्कान तैर जाती हैं और वो फ़ौरन उस किताब को बीएड के नीचे रख देता हैं और फ़ौरन उस अलमारी का दरवाज़ा बंद करता हैं..........

अगले hi पल वो अपने बिस्टेर पर जाकर आराम से बैठ जाता हैं और बीएड के नीचे छुपाये हुए उस किताब को अपने हाथों में उठता हैं और एक तुक उस किताब को बड़े ध्यान से देखने लगता hain..........wo वहीँ पास में रखा एक बायोलॉजी का किताब उठता हैं और उस किताब के बीच में रघु की दी हुई किताब को रख देता हैं और फिर से सामने के दरवाज़े की तरफ देखने लगता hain.........usey बार बार ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी भाभी कहीं आ न jaye..........wo बड़ी सावधानी से अपनी नज़रें गड़ाए कभी उस किताब के तरफ देख रहा tha..............to कभी सामने के दरवाज़े के तरफ......................

जैसे hi वो उस किताब का पहला पाना पलटता हैं उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क उठता hain...........jo सांसें अभी कुछ देर पहले पूरी तरह से नार्मल थी वो अब पूरे उफान पर thi........dil की धड़कनें भी तेज़्ज़ हो चली thi.......aankhein हैरत से फैलते चले गए they.......wahin लुंड में भी हलचल होनी शुरू हो चुकी thi.........pehle पेज पर एक लड़की पूरी नंगी कड़ी thi......magar उसकी छूट उसमें साफ़ नज़र नहीं आ रही थी........

राम जैसे जैसे उस किताब के पानी पलटता जा रहा था उसकी बेचैनी और भी बढ़ती जा रही thi..........jaise hi वो दो तीन पेज पलटता हैं उसकी सांसें जैसे रुक सी जाती hain.............ek लड़की पूरी नंगी हालत में लेती हुई अपनी छूट दोनों हाथों से फैलाये हुए मुस्कुरा रही thi........ram का ऐसा पहला मौका था जब वो किसी लड़की की छूट इस तरह से देख रहा tha.......uski आँखें तो उस सन से जैसे हुत्त hi नहीं रही thi.........wo उस पानीय को बेसुध घूरे जा रहा tha..........wahin उसका लुंड अब पूरी तरह से अकड़ गया tha..........aur उसमें से उसका प्रेकम भी निकलना शुरू हो गया tha......wo अपने एक हाथ से धीरे धीरे कभी अपने लुंड को मसल रहा tha.....to कभी उस पन्ने पर अपने हाथ फेर रहा tha...........aur उसे ये सब में मज़ा भी बहुत आ रहा था..........

जैसे hi वो आगे पेज पलटता हैं एक नीग्रो टाइप का आदमी एक गोरी सफ़ेद लड़की की छूट में अपना कला लुंड पेले हुए रहता hain.......uska एक हाथ उसकी चुकी पर था जिसे वो अपने काळा मुट्ठी में जकड़ा हुआ tha.........aagey के भी पोज़ कुछ इसी तरह के they........kabhi लड़की उस काळा हब्सी पर लेती हुई अपनी छूट उससे मरवा रही थी तो कभी वो हब्सी उसपर चढ़ा हुआ उसकी छूट छोड़ रहा tha...........aakhiri के सन को देखकर जैसे राम की आँखें हैरत से फैलती चली जाती hain...........ek लड़के के लुंड से उसका छुम धीरे धीरे निकल रहा था और वहीँ फर्श पर बैठी नंगी लड़की को अपना छुम पीला रहा tha...........wahi वो लड़की पूरे मज़े से अपनी मुँह खोले हुए उसे पी रही thi...........ye सब देखकर तो राम का सर घूम सा गया tha.........usney सपने में भी नहीं सोचा था की इस तरह का भी सेक्स लोग कभी करते होंगे......

वहीँ उसका लुंड और भी पानी छोड़ता जा रहा tha..........tabhi अचानक से उसके दिमाग में काव्य का ख्याल आता हैं जिससे उसका सारा जिस्म रोमांचित हो उठता hain............ek पल के लिए वो उस नंगी लड़की की जगह अपनी भाभी की कल्पना करने लगता हैं और ये सब सोचकर उसके लुंड में जैसे खून का एक नया संचार होता हैं और उसका लुंड और भी सख्त होता चला जाता हैं..........

" तो क्या इसी तरह से भाभी की छूट भी दिखती hogi..........kya इसी तरह से उनकी दोनों चूचियां भी hongi.........gori gori......safed सफ़ेद si...........kya भाभी का बदन भी इसी तरह से दीखता hoga.........ya इस लड़की से कहीं ज़्यादा सूंदर hoga.........yakeenan मेरी भाभी तो इन सब से बहुत खूबसूरत hain.......wo तो नंगी हालत में और भी सूंदर lagegi.........mujhe किसी भी तरह बस उन्हें एक बार पूरा नंगा देखना hain...........pata नहीं मेरा ये सपना कब पूरा hoga.........bus मैं किसी तरह से एक बार उन्हें पूरा नंगा देख पवन तो..........." राम जैसे सपनों की दुनिया में खो सा गया था तभी काव्य उसके रूम में एंटर करती हैं और जब राम की नज़र सामने कड़ी काव्य पर पड़ती हैं उसकी तो मनो हवा निकल जाती हैं.........

जितना लुंड पर प्रेशर बना हुआ था सब जैसे एक hi पल में फुस्स्स हो गया tha.........jo कलेजा एक्ससिटेमेंट में अभी कुछ देर पहले धड़क रहा था वहीँ कलेजा अब काव्य को देखकर दुर्र से धड़कने लगा tha.........ram फ़ौरन उस किताब को छुपता हैं और जैसे तैसे उस बुक को अपने बीएड के नीचे दाल देता हैं मगर ये सब अब काव्य की नज़रियों से कहाँ छुपा tha........wo बड़े गौर से राम के हर हरकतों को देखे जा रही thi..............to कभी राम के भोले और मासूम चेहरे ko..........wahin राम का जैसे सारा नशा काव्य को देखकर उतर गया tha.......wo फ़ौरन एक तकिया अपने हाथों में उठता हैं और उसे अपने खड़े लुंड पर रख लेता hain..........wahin अब उसके चेहरे का रंग पूरा फीका पढ़ गया tha..........durr से उसकी नज़रें नीचे की तरफ झुक सी गयी thi.........wahin वो दुर्र से अंदर hi अंदर काँप रहा था......

" tum..............theek तो हो न ram............kya मुझे इस वक़्त तुम्हारे कमरे में नहीं आना चाहिए था........." और काव्य राम के तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम की तो जैसे बोलती बंद हो गयी thi.......awaaz उसकी हलक से बहार नहीं निकल रहे they..........wahin उसका कलेजा और भी ज़ोरों से धड़क रहा tha.........wo जैसे तैसे अपने आपको संभालता हैं और फिर अचानक से बोल पड़ता hain.......halanki काव्य को ये समझने की ज़रुरत नहीं थी की राम ने पिलो क्यों अपने लुंड पर रखा tha.......aur वो अकेले में क्या कर रहा tha.........ram की साडी हरकतें काव्य को समझने के लिए बस काफी थी..............

" haaaann....naahiinnnnn......naaahiinnnn.......woooo......merammmmmmm......maaaatllllaaaaaabbb.........." और राम की रही सही हिम्मत भी जवाब दे जाती हैं वहीँ काव्य उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ती hain.........wo कुछ सोचकर राम के पास वहीँ बाजु में आती हैं और आकर वहीँ बिस्टेर पर राम से सत्कार बैठ जाती hain........is तरह अपने और करीब काव्य को बैठा हुआ पाकर राम की हालत और भी पतली होने लगती hain.........wo एक पल के लिए भी काव्य से अपनी नज़रें नहीं मिला पा रहा tha......aisa लग रहा था जैसे उसने कोई चोरी की ho........wahin काव्य बड़े प्यार से उसके सर अपर अपना हाथ हौले से फेरती हैं और एक तुक उसकी आँखों में देखने लगती हैं.......

" क्या बात hain..........exams ख़तम होने के बाद भी तुम आज पढ़ाई कर रहे ho........itni ज़्यादा changes...........ye तो कमल की बात हैं........." और काव्य राम को देखते हुए हौले से हंस पड़ती हैं वहीँ राम जवाब में कुछ नहीं बोल पता और फ़ौरन अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता hain......aab वो अपनी भाभी से क्या बताता की वो इस समय कौन सी पढ़ाई कर रहा था...........

" wwwwoooooo...bhaaabhiii..........bbbuuusss ाहैइससीईए hhhiiii......bbbioolloogyyyy ......पप्पाडड्ढह्ह ररराह्ह्हआआ ठहाआआआ......." और राम जैसे तैसे अपनी बात ख़तम करता hain.........wahin काव्य उसके तरफ देखते हुए बस मुस्कुराये जा रही thi..........wo भी ाचे से जानती थी की राम इस वक़्त कौन सी बायोलॉजी पढ़ रहा हैं...........

" कोई बात nahin.........tum थोड़ी देर रिलैक्स हो jawo........main अभी चाय बनाकर तुम्हारे लिए लेकर आती हूँ........." और काव्य अपनी जगह से उठती हैं औरर फ़ौरन किचन के तरफ चल पड़ती हैं वहीँ राम एक नज़र काव्य के तरफ घूरता hain.......magar उसके चेहरे की तरफ nahin..............balki उसकी गांड की taraf...........jo काव्य के चलने से और भी क़हर धा रही thi........jab तक काव्य उसकी नज़रियों से ओझल नहीं हो जाती वो उसके गांड को ऐसे hi घूरता रहता hain..........kavya के जाते hi उसकी जान में जान आता हैं........

वो फ़ौरन बाथरूम में जाता हैं और अपने लोअर को जल्दी से चेंज करता hain...........uske प्रेकम से उसका लोअर का काफी हिस्सा भीग सा गया tha.........aur अगर काव्य उसे इस हाल में देख लेती तो शायद उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं hota.........thode देर बाद वो अपने मुँह हाथ धोकर फिर से अपने बिस्टेर पर आता हैं और अपने आपको पूरी तरह से नार्मल करने की कोशिश करता hain.......magar अभी तक उसके दिमाग में वही सब रंगीन फोटोज घूम रहे they.........jisey वो पल भर के लिए भी भुला नहीं पा रहा था........

कॉन्टिनोएड..................................................................................
 
अपडेट-23 (बी) (मेघा अपडेट)

थोड़े देर बाद काव्य चाय लेकर दुबारा से राम के कमरे में आती hain.........aur इस बार राम उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता hain......wahin काव्य भी उसे देखर हौले से मुस्कुरा देती hain........magar कुछ देर तक वो वहीँ बहार hi कड़ी रहती hain........bilkul चुप चाप से.........

" आप अंदर आइये न bhabhi.........ruk क्यों गयी........" और राम जैसे काव्य को देखकर हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य भी जवाब में हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं और वो हमेशा की तरह वहीँ राम के बाजु में आकर बैठ जाती हैं और उसे वो कप पीने का ऑफर करती है........

" bhabhi.......iam sorry..........wo मैं....." और राम हौले से फिर बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य एक तुक उसके चेहरे की तरफ सवाल भरे नज़रियों से देखने लगती hain........usey समझ में ये नहीं आ रहा था की आखिर राम उससे माफ़ी किस बात की मांग रहा हैं........

" वो किस लिए ram..........aakhir तुमने किया क्या हैं.........." और काव्य के चेहरे पर हैरानी के बदल साफ़ उमड़ पड़ते हैं वहीँ उसकी नज़रें अभी भी राम के चेहरे पर hi तिकी हुई थी........

" wo......aabhi कुछ देर pehle.........jo main........aapse ठीक तरह से बात नहीं कर paya......uske लिए......" और राम एक बार फिर से भोलेपन से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य इस बार मुस्कुराये बिना नहीं रह pati.........wo अपना एक हाथ बड़े प्यार से उसके गलों पर ले जाती हैं और राम के गलों को धीरे से सहलाने लगती hain........wahin काव्य के उस छुवन से राम के लुंड में दुबारा से हलचल होने लगती हैं मगर इस बार राम काव्य को बिलकुल भी ज़ाहिर नहीं होने deta.........aab वो दुबारा से काव्य की नज़रियों में शर्मिंदा नहीं होना चाहता tha........magar काव्य के नरम स्पर्श से उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी......

" तुम भी naa........kuch भी बोलते ho...........waise गलती मेरी hi thi.......mujhe दरवाज़ नॉक करके अंदर आना चाहिए tha........mujhe नहीं मालूम था की तुम भी कुछ पर्सनल काम में बिजी hogey.......khair........kaisa रहा तुम्हारा एक्साम्स....." और काव्य हौले से बोल पड़ती hain..........wahin राम काव्य की बाटिओं को सुनकर बुरी तरह से झेप सा जाता hain..........magar कहता कुछ नहीं.......

" ाचे गए bhabhi..........aur ये लीजिये विजिटिंग card..........ye मेरी क्लास टीचर ने आपको दिए hain..........da-asal कल कॉलेज में पेरेंट्स मीटिंग हैं और उसी के सिलसिले में कॉलेज के सरे बच्चों के पेरेंट्स कल jayengey.........aur रिजल्ट्स भी कल डिक्लेअर karengey..........to मम ने आपको भी बुलाया हैं......." और राम इतना कहकर खामोश हो जाता हैं वहीँ काव्य बड़े गौर से राम के चेहरे की तरफ एक तुक देखने लगती hain.........wo जवाब में हौले से बस मुस्कुरा पड़ती हैं मगर कहती कुछ नहीं........

" bhabhi..........ek बात पूछूं............" और राम हौले से फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य की नज़रें अभी भी उसके मासुम चेहरे पर तिकी हुई थी......

" तुम्हे मैंने कभी किसी चीज़ के लिए मन किया हैं क्या राम!!!!!! " और काव्य राम को देखते हुए दुबारा से बोल पड़ती hain........wahin वो अपने हाथों में चाय की कप उठती हैं और उसे हौले हौले से अपने होंठों पर लगाकर पीने लगती हैं....

" अगर मेरे नंबर्स इस बार ाचे नहीं आये to.........mera मतलब की अगर मैं सिर्फ पास हो गया और मेरा फर्स्ट डिवीज़न अगर नहीं आया to........kya आपने जो मुझसे वादा किया था वो क्या कभी पूरा hoga..........mera matlab.......girlfreind........" और राम की जुबान जैसे एक बार फिर से लकडहा सी जाती हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से हंस पड़ती हैं.......

" तुम भी naa.a............poorey बुद्धू ho........buddhu..........main तो तुम्हारी गिलफ्रेंड पहले भी thi.......aur आज भी hoon.......haan अगर तुम्हारे नंबर्स ाचे नहीं आएंगे तो मुझे इस बात का अफ़सोस तो ज़रूर hoga...........magar मैं चाहती हूँ की तुम अपनी पढ़ाई दिल लगाकर karo.........aur अगर तुम्हारे नंबर्स बढ़िया आये तो .............जो तुम chaho......wo मैं तुम्हें सब कुछ dungi..........tumhari हर तमन्ना ख़ुशी ख़ुशी पूरा karegi.........ye मेरा तुमसे वादा हैं........" और काव्य इस बार गहरी सांस छोड़ते हुए अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ राम जवाब में कुछ नहीं बोल पता और बस टकटकी लगाए काव्य के तरफ एक तुक देखने लगता हैं.......

" wo........bhabhi......main अगर ाचे नंबर्स से अगर पास हो गया to......kya आप मेरे साथ इसी बिस्टेर पर आकर हर रोज़ मेरे बगल में सोया करेंगी........" और राम जैसे अपने दिल में दबे फीलिंग्स को बहार निकलता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर हौले से मुस्कुरा देती हैं.......

" हाँ baba.......sowungi bhi........aur मैं तुम्हें गिलफ्रेंड होने का सब सुख भी dungi...........magar............sab कुछ तुम्हारे रिजल्ट पर देपेंद करता hain...........aab मैं जा रही हूँ खाना banane..........time से आकर तुम खाना खा लेना........." और काव्य चाय की आखरी घूँट पीते हुए राम के तरफ बड़ी ऐडा से एक तुक देखने लगती हैं वहीँ राम भी जवाब में हौले से मुस्कुरा पड़ता hain.........aab तो उसे भी कल का बड़ी hi बेसब्री से इंतज़ार था...........................................

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जैसे तैसे रात गुज़री और सुबह hui.........ram की तो वैसे भी गांड फटी पड़ी thi.........raat भर उसने चैन से सोया नहीं tha.........usey नींद आती भी kaise...........result ने उसकी नींद हराम कर राखी thi.........aur उससे ज़्यादा काव्य ne............udher काव्य नाहा धोकर आज राम के कॉलेज जाने वाली thi..........aaj रघु की दाल तो गलने से rahi.......kyon की आज राम भी घर पर hi tha........to सवाल hi कहाँ पैदा होता की रघु आज कुछ करता........

वैसे आज काव्य ने वाइट रंग की ट्रांसपेरेंट साड़ी पहन राखी thi......aur उसी रंग का ब्लाउज bhi.......jo हमेशा से डीप लौ कट tha...........wo अपने बैडरूम में तैयार हो रही thi............final टच देकर वो अपने आपको आईने में आपने आपको देखती हैं और हौले से मुस्कुरा पड़ती hain.......aaj वो हमेशा से कहीं ज़्यादा खूबसूरत लग रही thi..........safed साड़ी में वो किसी पारी की तरह नज़ार आ रही thi.........wo तैयार होकर सीधा राम के कमरे की तरफ चल पड़ती hain.......ram वहीँ अपने कमरे में चुप चाप से बैठा हुआ tha.........kavya को देखर उसकी भी आँखें फटी की फटी रह जाती hain..........aaj काव्य सच में क़हर बरसा रही thi.........wahin राम भी कुछ पल तक काव्य को देखता रह जाता हैं..........

" bhabhi......aaappp........." और राम अपने जगह से फ़ौरन उठ जाता हैं वहीँ काव्य उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" तुम अब तक तैयार नहीं hue........tumhein क्या अपने कॉलेज नहीं जाना......." और काव्य राम को देखते हुए हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम की नज़रें तो काव्य के हसीं जिस्म पर तिकी हुई thi......wo बेसुध काव्य को एक तुक देखे जा रहा tha.........wahin काव्य राम की नज़रियों को परख रही थी..........

" अब ऐसे hi घूरते रहोगे या तैयार भी howogey..........aur हाँ एक बात तो मैं तुमसे बताना भूल hi gayi.........mujhe थोड़ी शॉपिंग भी करनी हैं तो क्या तुम अपने भैया की बाइक ले chalogey..........aur वैसे भी बाइक पर घूमने का मज़ा hi कुछ और हैं......" और काव्य जैसे अपना फैसला राम को सुनती हैं वहीँ राम बस हाँ में धीरे से अपनी गुर्दें हिला देता hain..........waise उसका कॉलेज जाने का ज़रा भी मुन्न नहीं कर रहा tha........aur ऊपर से उसकी गांड भी फटी पड़ी थी की अगर रिजल्ट ख़राब हुआ तो छूट तो मिला दूर की baat..........kavya के तने अलग से सुंनने को milengey..........munn मरते हुए वो तैयार होने लगता हैं और काव्य जाकर हॉल में उसका इंतज़ार करती हैं...........

थोड़े देर बाद राम तैयार होकर आता हैं और काव्य उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ती hain........wahin राम कुछ नहीं बोलता और चुप चाप से बाइक के तरफ चल पड़ता hain.........wahin काव्य भी उसके पीछे पीछे चल पड़ती hain.......jaise hi वो बहार जाती हैं सामने रघु और जीतू खड़े हुए नज़र आते hain.........humesha की तरह जीतू अपनी गुर्दें नीचे की तरफ झुका लेता हैं वहीँ रघु काव्य को खा जाने वाली नज़रियों से घूरे जा रहा tha.......ek बार तो वो जान बूझकर अपना एक हाथ अपनी लुंगी की तरफ हौले से बढ़ा देता हैं जिससे काव्य की सांसें भरी होने लगती hain......kuch सोचकर वो अपनी नज़रें रघु से हटा लेती हैं और राम के आने का इंतज़ार करती हैं........

राम थोड़े देर बाद अपनी बाइक (पल्सर) लेकर आता हैं और काव्य उससे छिपकर बैठ जाती hain.......wahin राम बिना वक़्त गंवाए अपनी बाइक तेज़ी से अपने कॉलेज के तरफ मोड़ देता hain........kavya का एक हाथ राम के थिगह के पास tha.........wahin वो राम से थोड़ी सी दूरी बनाये हुई thi........idher राम को कुछ भी ाचा नहीं लग रहा tha.......ander hi अंदर उसकी घबराहट धीरे धीरे बढ़ती जा रही thi........poorey रास्ते भर उसने काव्य से कोई बात तक नहीं की thi.......wahin काव्य उसके मुन्न की सिचुएशन को बहुत ाचे से समझ रही thi..........aur वैसे भी काव्य राम को आलरेडी पहले से बहुत ज़्यादा टेंशन दे चुकी thi........aab वो और उसे नहीं देना चाहती थी........

कॉलेज के अंदर राम जाकर एक कोने में कहीं बैठ जाता hain......wahin काव्य थोड़े देर बाद अंदर जाती हैं और जाकर उसी मैडम से दुबारा मिलती हैं जिस मैडम से वो एक बार राम के शिकायत पर जाकर उससे पहले मिली thi..........wo मैडम काव्य को देखर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं और उसे सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा करती hain........wahin काव्य हौले से मुस्कुराते हुए सामने की चेयर पर जाकर बैठ जाती हैं.........

" ये लीजिये राम की मार्कशीट............" और सामने बैठी मैडम (माधुरी) उस मार्कशीट के बंडल में से राम की मार्कशीट निकट हुए धीरे से काव्य के तरफ बढ़ा देती hain...........wahin इस बार काव्य का दिल ज़ोरों से धड़क उठता hain.........ek अंजना सा दुर्र उसके जेहन में उमड़ पड़ता hain..........wo दिल hi दिल में बस एहि दुआ कर रही थी की राम ाचे नम्बरों से पास हो jaye.........aur शायद अब उसकी दवा बहुत जल्द रंग लेन वाली thi.........samney बैठी मैडम मंद मंद काव्य को देखकर मुस्कुरा रही थी वहीँ काव्य की नज़रें तो मार्कशीट पर जैसे जमी हुई थी.......

" वैसे एक बात की तो आपकी तारीफ करनी hi padegi......mrs.......jo राम के अंदर बदलाव आया हैं वो kaabil-e- तारीफ hain........aur आप राम के रिजल्ट में देख भी सकती hain........aapko ये जानकर बेहद ख़ुशी होगी की राम जो अब तक थर्ड क्लास से पास होता आया tha.......aaj वो फर्स्ट क्लास से पास हो गया hain.....wo भी 65%.............." और इतना कहकर वो मैडम हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ काव्य भी ख़ुशी से झूम उठती hain.....itna तो तय था की अब उसकी छूट का द्वार राम के लिए तो अब खुल hi चूका tha............dekhna था की राम अब उसकी छूट को कब और किस तरह से खता hain...........ya काव्य उसे कैसे खिलाती hain..............ye तो आने वाला वक़्त hi बता सकता था.....................................

कंटिन्यू...................................................................
 
लगता हैं ये वेबसाइट भी जल्दी hi बंद होने वाला hain......shayad उसी को सेव करने के लिए अब कंट्रीब्यूट डोनेशंस तो सर्वर्स फण्ड ओप्तिओंस आ रहे हैं..........
 
अपडेट- 24(ा) (मेघा अपडेट)

" वैसे एक बात की तो आपकी तारीफ करनी hi padegi......mrs.......jo राम के अंदर बदलाव आया हैं वो kaabil-e- तारीफ hain........aur आप राम के रिजल्ट में देख भी सकती hain........aapko ये जानकर बेहद ख़ुशी होगी की राम जो अब तक थर्ड क्लास से पास होता आया tha.......aaj वो फर्स्ट क्लास से पास हो गया hain.....wo भी 65%.............." और इतना कहकर वो मैडम हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ काव्य भी ख़ुशी से झूम उठती hain.....itna तो तय था की अब उसकी छूट का द्वार राम के लिए तो अब खुल hi चूका tha............dekhna था की राम अब उसकी छूट को कब और किस तरह से खता hain...........ya काव्य उसे कैसे खिलाती hain..............ye तो आने वाला वक़्त hi बता सकता था.....................................

अब आगे..............................................................................

काव्य रिजल्ट लेने के बाद सीधा राम के पास चली जाती हैं वहीँ राम के चेहरे पर अभी भी बारह बजे हुए they...........wo काव्य के चेहरे को ऐसे घूर रहा था जैसे उसका चेहरा पड़ने की कोशिश कर रहा ho..........durr और झिझक से वो काव्य से कुछ पूछ भी नहीं पा रहा tha.........aur उससे पूछता भी kaise.........agar काव्य उसे ये बताती की उसके मार्क्स ाचे नहीं आये तो उसके सरे अरमानों पर पानी फिर jata.........aur राम ये अब नहीं चाहता tha......wahin काव्य बिलकुल नार्मल थी और एक तुक राम के चेहरे की तरफ देखे जा रही थी..........

"घर chale.......ram.......mujhe कुछ शॉपिंग भी करनी हैं........" और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम एक नज़र काव्य के तरफ ऐसे देखने लगता हैं जैसे आज उससे कोई बहुत बड़ा गुनाह हो गया ho..........aab उसे यकीन हो चला था की जैसा काव्य उससे उम्मीद कर रही थी वो उसके उमीदों पर खरा नहीं उतर सका tha..........nirasha साफ़ उसके चेहरे से चालक रही thi.......wo एक शब्द और कुछ नहीं कहता और फ़ौरन बाइक की चाभी लेकर सीधा बाइक के तरफ चल पड़ता hain..........dono पूरी तरह से खामोश थे ..........न hi राम कुछ कह रहा tha......aur न hi kavya.......poorey रास्ते भर काव्य ने राम से कोई बात तक नहीं ki.........aur न राम ने काव्य से कुछ पूछने की हिम्मत ki...........kavya ने थोड़ी देर रुक कर शॉपिंग की और दो चार सामान khareedey...........wahin राम बाइक पर ख़ामोशी से बैठा हुआ काव्य के आने का इंतज़ार कर रहा tha.......thode देर बाद काव्य उसे दूर से आती हुई दिखाई di.......ek बार फिर से राम की नज़रें काव्य के जिस्म पर जाकर टिक gayi.......magar सच तो ये था की उसे इस वक़्त कुछ भी ाचा नहीं लग रहा था.......

थोड़े देर बाद वो दोनों घर पहुंचे........ रघु वहीँ सामने खड़ा उन्ही दोनों को अजीब नज़रियों से घूर रहा tha..........baar बार उसकी नज़रें काव्य पर चली जाती वहीँ काव्य भी तिरछी नज़रियों से उसे घूर रही thi..........ram बाइक खड़ा करने चला जाता हैं और काव्य सीधा अपने कमरे में.........

जैसे hi राम अंदर जाता हैं उसके चेहरे पर दुर्र की लखीरें और भी गहरी होती चली जाती hain..........himmat तो उसके अंदर ज़रा भी नहीं थी की वो काव्य से कुछ poochey.........wahin वो कुछ देर तक खामोश रहता हैं और काव्य उसे hi घूरती रहती hain.......aakhir कुछ देर की चुप्पी के बाद काव्य उस ख़ामोशी को तोड़ती हैं.......

" पता हैं तुम्हारी मैडम तुम्हारे बारे में क्या कह रही थी.........." और काव्य इतना कहकर फिर से खामोश हो जाती हैं वहीँ राम के चेहरे का रंग बिलकुल फीका सा पढ़ जाता hain.......wo दुर्र से एक शब्द कुछ नहीं बोल पता और अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता hain.....wahin काव्य उसके मासूम चेहरे को देखर मुस्कुरा पड़ती hain..........kavya हौले से राम के करीब जाती हैं और उसके चीन पर अपने हाथ हौले से रख देती हैं और उसके झुके हुए चेहरे को ऊपर की तरफ उठती hain........wahin राम एक नज़र काव्य के तरफ देखता हैं और फिर से अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता hain.........durr से उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा था..........

" वो मुझसे कह रही थी की तुम....... ाचे नम्बरों से पास हो गए ho........first क्लास से......." और काव्य राम को देखर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम उसे ऐसे देखने लगता हैं जैसे उसने कोई अजूबा देख लिया ho.........usey आपने कानों पर बिलकुल भी विश्वास नहीं हो रहा tha......wahin काव्य अपने पर्स में से उसका मार्कशीट निकलती हैं और धीरे से उसके हाथों में सौंप देती hain....ram बड़े गौर से अपने मार्क्स देखे जा रहा tha........wahin उसके चेहरे पर खुशियां झलक पड़ती hain.......jo दुर्र और घबराहट हो रही थी वो एक पल में जैसे गायब सी हो गयी थी......

" आप ये बात ाचे से जानती थी की मेरी अंदर hi अंदर क्या हालत हो रही thi........uske बावजूद भी आपने मुझे सस्पेंस में rakha........mujhe बताना ज़रूरी नहीं samjha..........aap सच में बहुत बुरी हैं......" और राम काव्य को देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता hain.....aur बुरा सा मुँह बना लेता hain............wahin काव्य भी जवाब में धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" bhabhi.......aapne जो कहा था वैसा मैंने kiya........aab तो आपको अपना वादा निभाना hoga.........mujhe तो अपनी गर्लफ्रेंड होने का वो सब सुख chahiye............jo आप मुझे देने का वादा कर चुकी हैं..............." और राम हामी भरते हुए काव्य के तरफ देखते हुए धीरे से अपनी बात ख़तम करता हैं वहीँ काव्य जवाब में हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" सब कुछ मैं तुम्हें दूंगी ram...........magar.........sahi वक़्त आने par...........mujhe थोड़ा वक़्त तो do...........filhal मैं अभी इन सब चीज़ों के लिए तैयार नहीं hoon.........aur मुझे मेरा किया हुआ वादा ाचे से याद hain............magar मैंने तुम्हारे लिए एक गिफ्ट भी लायी hoon......tumhare पास होने की ख़ुशी mein..........mujhe यकीन हैं की तुम्हें मेरा ये तोहफा ज़रूर पसंद आएगा........." और काव्य अपने बैग से एक नया एंड्राइड स्मार्ट फ़ोन निकलती हैं और राम के हाथों में धीरे से थमा देती hain.......wahin राम का मूड पूरा ऑफ हो चूका tha..........usney काव्य के साथ न जाने कितने रंगीन सपने देखे थे मगर काव्य ने आज उसके सरे सपनों पर पानी फेर दिया tha...........ander hi अंदर उसे काव्य पर बहुत गुस्सा भी आ रहा था..........

" नहीं चाहिए मुझे आपका ये tohfa........isey आप अपने hi पास rakhiye...........jhootey हैं आपके सरे vaade........aur झूठी हैं आप..........." और राम गुस्से से अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेता हैं वहीँ काव्य टकटकी लगाए बस राम के चेहरे को घूरे जा रही thi..........wo उसे कैसे समझती की ये सब करने में उसे कौन कौन सी दिक्कतों का सामना करना पढ़ सकता हैं...........

" ीाम सॉरी ram........main फिलहाल अभी तुम्हेर इच्छा पूरी नहीं कर sakti........mujhe थोड़ा वक़्त chahiye......please..........ye फ़ोन रख lo......main समझूंगी की तुमने मुझे माफ़ कर दिया........." और काव्य जैसे फैसला सुनते हुए सीधा अपने रूम की तरफ चल पड़ती हैं वहीँ पीछे खड़ा राम गुस्स्से से काव्य को घूरे जा रहा tha..........mood तो उसका पूरा ऑफ हो चूका tha........jo अरमान दिल में जगे थे वो अब बुझ से गए they.............jee तो उसका कर रहा था की वो अभी जाकर काव्य का बंग कर de.........magar उसके अंदर ये सब करने की भी हीमत नहीं थी.........

" मैं तुम्हें आखिर कैसे समझाऊवन राम की मैं तुम्हारी इच्छा क्यों नहीं पूरी कर sakti.........mere पीरियड्स चल रहे हैं और मैं जानती हूँ की तुम बहुत भोले ho........na-samajh ho.........mere लाख समझने पर भी तुम कभी नहीं samjhogey.........isliye मुझे ये फैसला करना pada......kaash तुम समझ जाते तो इतनी तुम्हें तकलीफ नहीं hoti..........par मैं वादा करती हूँ राम की मेरे ठीक हो जाने के बाद मैं तुम्हें अपना वो सब कुछ दूंगी जो तुम मुझसे चाहते ho.........apni ये jawani.......ye badan........aur जिसके लिए ये अब तक पागल ho..........yani मेरी ये..... छूट bhi.........ek दिन सब कुछ ये तुम्हारा होगा........." और काव्य जैसे अपने सोच में डूबती चली जाती हैं............................

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उधर राम मुन्न मरकर उस फ़ोन को न चाहते हुए भी उठा लेता हैं और सीधा बहार की तरफ चल पड़ता hain.........jahan इस वक़्त रघु और जीतू दोनों बैठे हुए माखी मार रहे they.........aur जब उन दोनों की नज़र राम पर पड़ती हैं वो दोनों राम के करीब जाते हैं और उसका हाल चाल पूछने लगते hain.........wahin राम के चेहरे पर छायी उदासी के बदल रघु और जीतू की नज़रियों से नहीं चुप pate.......wo दोनों राम को अपने रूम में ले जाते हैं और हमेशा की तरह उसका दुःख बांटने की कोशिश करते हैं......

" क्या बात हैं छोटे malik.........subeh से मैं आपको देख रहा हूँ की आप कुछ खोये खोये से लग रहे hain.......baat क्या hain.......memsaheb ने आपसे कुछ कहा क्या!!!!!! " और जीतू राम को देखर हौले से बोल पड़ता हैं और अपना एक हाथ हौले से उसके कंधे पर रख देता hain........wahin राम की आंखें कुछ नुम सी पढ़ जाती hain........kuch देर की चुप्पी के बाद आखिर राम धीरे से बोल पड़ता हैं........

" मेरी भाभी बहुत बुरी hain......unhone मेरे साथ किया हुआ वादा ठुकरा diya........aur बदले में ये फ़ोन मुझे गिफ्ट के तौर पर थमा di.......wo सिर्फ मेरे भोलेपन का फायदा उठा रही हैं..........." और राम सब कुछ शुरू से लेकर आठ तक रघु और जीतू को साडी बातें बताता चला जाता hain.........wahin रघु और जीतू जब साडी बातें जान लेते हैं तो उन दोनों के चेहरे पर एक कमीनी सी मुस्कान तैर जाती hain......agle hi पल रघु अपना एक हाथ राम के कंधे पर रख देता hain.......jaise वो उसे सांत्वना दे रहा हो.........

" आप फ़िक्र मुट्ठ कीजिये malik........aaj से आप अकेले नहीं hain.........ye लड़ाई हम सब की hain...........hum भी आपके सुख दुःख में बराबर के भागीदार hain.......aur हम गरीब ज़रूर हैं मगर जुबान के काचे nahin.........chahe जान hi क्यों न चली जाये हम अपनी जुबान से कभी पीछे नहीं hutengey..........aur मेरा यकीन मानिये की जो सपने आपने अपनी भाभी के साथ देखे हैं उन्हें अब हम पूरा karengey.........chahe जिस हाल mein....jaisa ho.........wo कैसे ये आप हम पर छोड़ dijiye.............hum आपको आपकी भाभी की छूट दिलवाकर hi रहेंगे..........." और रघु जैसे एलान करता हैं वहीँ राम के चेहरे पर थोड़ी सी ख़ुशी झलक पड़ती हैं............

" अगर किसी दुश्मन को हराना हो तो सबसे पहले उसे उसकी कमज़ोरी ाचे से जान लेनी chahiye.........fir वो उसे मैदान में आसानी से चीत्त कर सकता hain........theek इसी तरह तुम काव्य मैडम की साडी कमज़ोरी मुझे बता do.........uski पसंद न pasand......sab kuch....jo तुम उसके बारे में जानते ho.....fir देखना मैं तुम्हारी भाभी को बहुत जल्द एक चलती फिरती सस्ती रांड बना dunga..........aur उसकी औकात दो कौड़ी की रह jayegi.........fir तुम जब चाहे जैसा चाहे अपनी भाभी को छोड़ सकते ho........uske साथ जो करना चाहे कर सकते ho.........wo बस तुम्हारे और हमारे इशारों पर नाचेगी........." और रघु शायद ऐसा hi कुछ चाहता tha.........aab उसे यकीन हो चूका था की काव्य को वो बहुत जल्द अपनी मुट्ठी में आसानी से कर सकता hain......aab तो उसे उस घडी का बेसब्री से इंतज़ार था......

कॉन्टिनोएड...........................................................................
 
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