Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 6 - SexBaba
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Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

Update-29(B) (मेघा अपडेट)

" आपने जीतू को किस टाइप की पिक्टूरें भरवाने के लिए कहा tha............main कुछ समझा नहीं........" और राम भोलेपन से दुबारा बोल पड़ता हैं वहीँ रघु हौले से अपना एक हाथ उसके कंधे पर रखता हैं और राम की बाटिओं को सुनकर वो धीरे से मुस्कुरा देता हैं........

" आवो यहाँ par.........mere पास बैठो malik........main आपको शुरू से लेकर आठ तक सब समझाता हूँ............." और रघु वहीँ राम को बैठने का इशारा करता हैं और कुछ देर की गहरी ख़ामोशी के बाद आखिर रघु फिर से बोल पड़ता हैं.......

" da-asal औरत को जितनी बुरी तरह से बिस्टेर पर रगड़ा जाये उसे मज़ा उतना hi आता hain.........aur हमें bhi..........waise तो दुनिया में कई तरह के इंसान होते hain........kisi को पैसा प्यारा होता हैं तो किसी को laundiya......to कोई किसी और चीज़ के पीछे भागता hain..........jo लोग सिर्फ लौंडिया के पीछे पागल रहते हैं उनमें भी कई ऐसे इंसान होते हैं जो कई तरह का शौक पालते hain.........kuch तो बस छूट के पीछे पागल रहते hain........to किसी को अपना लौड़ा चुसवाने में मज़ा आता hain........to कुछ दूसरे मर्दों का शौक रखते hain.......magar कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें सिर्फ लड़कियों की गांड मरने में hi मज़ा आता hain..........aur कुछ ऐसा hi शौक मैं भी रखता हूँ.........." रघु की बातें पूरी होते hi राम उसकी तरफ आँखें फाड़े ऐसे देखने लगता हैं जैसे रघु ने उसकी जान मांग ली हो.........

" yeeeeeee.....gand मरना किसी कहते हैंण्ण्ण्ण्ण्न........." और राम सवाल भरे नज़रियों से रघु के तरफ देखते हुए धीरे से बोल पड़ता hain.........wahin रघु उसकी बाटिओं को सुनकर फिर से मुस्कुरा पड़ता हैं.........

" मान लो की तुम अपनी भाभी को छोड़ रहे ho.........aur अचानक से तुम्हारा मुन्न उनकी गांड मरने का किया तो तुम क्या karogey.........bolo........nahin पता naa.a...........jis तरह से औरत की छूट मरी जाती हैं ठीक उसकी तरह से औरत की गांड में भी लुंड पेला जाता hain.........yani की उसकी पीछे वाली छेद mein..........aur यकीन मनो बरखुरदार छूट मरने से ज़्यादा मज़ा गांड मरने में आता hain.......kyon की छूट तो छोड़ते छोड़ते ढीली पढ़ जाती हैं मगर गांड जितनी बार भी मारो हर बार टाइट hi रहती hain.......aur जब लुंड टाइट होकर गांड के अंदर जब जाती हैं तो पूछो mutt.....kitna मज़ा आता hain..........kabhi मौका मिले तो तुम भी अपनी भाभी की गांड में लुंड ज़रूर dalna........dekhna.........tumhein कितना मज़ा aayega........tum अपने आपको एक अलग दुनिया में महसूस करोगे........" और रघु के चेहरे पर फिर से कमीनी मुस्कान तैर जाती हैं वहीँ राम का लुंड एक बार फिर से टाइट हो गया tha.......raghu की बातें उसके लुंड में खून की संचार को तेज़्ज़ कर रही थी........

" magar.........kya भाभी को उसमें दर्द नहीं hoga...........aur क्या उन्हें मज़ा आएगा.........." और राम भोलेपन से दुबारा बोल पड़ता हैं वहीँ रघु फिर से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" दर्द तो होगा hi......par मज़े भी बहुत आते hain.........aur जब गांड थोड़ी सी खुल जाएगी तो तुम्हारी भाभी को भी बहुत मज़े aayengey.............aur औरत की गांड तो बानी hi हैं मरने के liye.........aaj जो मैंने वीडियो जीतू से कहा हैं उसे देखने के बाद तुम्हारे ख्यालात हमेशा हमेशा के लिए बदल jayengey..........aur हाँ मैंने उस दिन भी तुमसे कहा था की तुम थोड़ा अपने ऊपर सैयाम rakho..........tumhare जोश की वजह से कल तुम्हारा काम बिगड़ गया naa......na तुम्हारा छुम जल्दी निकलता और न ये खेल जल्दी ख़तम hota...........har काम थोड़ा साबरा से करना chahiye....bilkul आराम se.......tab देखना तुम्हें इस खेल में भी बहुत मज़ा aayega.........aur हाँ आज तुम कुछ भी मुट्ठ karna......sab कुछ तुम अपनी भाभी पर छोड़ dena..........dekh lena.......wo तुम्हें खुद hi सब सीखा degi...........aapke तो भाग्य खुल गए छोटे malik..........aap जैसी किस्मत हमारी कहाँ..............." और रघु अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ राम भी जवाब में धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

थोड़े देर बाद जीतू भी वापस आ जाता hain.............fir पिछली बार की तरह राम उसमें से एक वीडियो को सेलेक्ट करता हैं और उस वीडियो को प्ले कर देता hain........ye एक गैंगबैंग वीडियो था जिसमें एक अकेली लड़की थी और तीन मर्द they.......bari बरी वो वो तीनों लड़की की छूट और गांड में ऊँगली करते हैं जिन्हें राम बड़े गौर से देखे जा रहा tha.......wahin जीतू का भी लुंड खड़ा होता जा रहा tha..........magar ये सब राम के लिए पहली बार tha.........thode देर बाद एक नीग्रो टाइप का आदमी उस लड़की की छूट में लुंड दाल देता hain........aur उसकी चुदाई करने लगता hain.........fir बाद में दूसरा आता hain.....aur फिर teesra.........wahin रघु बड़े ध्यान से उस वीडियो को देख रहा tha......haan बीच बीच में वो अपनी मुर्दनी के ऊपर से अपने लुंड को सेहला दिया करता.......

मगर जीतू तो जैसे पागल सा हो गया tha.......usey तो बिलकुल साबरा hi नहीं हो रहा tha..........wahin जब जीतू की नज़रें रघु के तरफ जाती हैं ........रघु उसकी तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं और उसे मूठ मरने की पूरी चूत दे देता hain........shayad जीतू भी रघु के इशारे का hi इंतज़ार कर रहा tha..............wo अगले hi पल अपना कपडा पिछली बार की तरह उतर देता हैं और तेज़ी से मूठ मरने लगता hain........aab स्क्रीन पर वो सन आता हैं जिसका रघु को बड़ी hi बेसब्री से इंतज़ार tha..........yani गांड की ठुकाई का.......

वहीँ नीग्रो उस लड़की के पीछे जाता हैं और अबकी बार उस लड़की की गांड में आपने मोटा कला लुंड धीरे धीरे डालने लगता hain.........wahin वो लड़की पूरे मज़े के साथ उसका लुंड अपने अंदर ले रही thi.......wahin राम अपनी आँख फाड़े उस वीडियो के तरफ देखे जा रहा था.........

" देख लो छोटे malik.......kaise वो मर्द उस लड़की की गांड फाड़ रहा hain..........aur वो लड़की पूरे मज़े से साथ अपनी गांड उससे मरवा रही हैं............" और रघु काव्य के बारे में सोचकर अपने लुंगी पर हाथ रख देता हैं और अपने हाथों से धीरे धीरे अपने लुंड को मसलने लगता hain.......tabhi एक दूसरा आदमी उस लड़की के ऊपर चढ़ता हैं और वो अपना लुंड उस लड़की की छूट में दाल देता hain.......fir तीसरा खड़ा आदमी अपना लुंड उसके चेहरे के करीब ले जाता हैं और अपना लुंड उसकी मुँह में डालने लगता hain..............is सन को देखकर भले hi रघु थोड़ा बहुत विचलित हुआ था मगर वहीँ राम और जीतू की तो हालत ख़राब हो चुकी thi............jeetu के हाथ बहुत तेज़ी से अपने लुंड पर चल रहा tha.......wahin राम अपनी आँख फाड़े कभी उस वीडियो के तरफ देख रहा tha.................to कभी जीतू के खड़े लुंड की तरफ...............

" मैं न कहता था की औरत के तीन छेद होते हैं छोड़ने के liye...........ek उसकी choot......dusara उसका mooh....aur तीसरा उसकी gand...........gaur से देखो कैसे वो लड़की पूरे मज़े लेकर उन तीनों से के साथ चुद रही hain..........aur अगर औरत छोड़ने पर आ जाये तो वो एक साथ दस मर्दों पर भी अकेले भरी पड़ती हैं........" और रघु गहरी सांस छोड़ता हुआ एपीआई बात ख़तम करता हैं वहीँ जीतू की हाथों की रफ़्तार और भी तेज़्ज़ होती जा रही thi.............aab वो अपने चरम के बेहद करीब tha...............aur आखिर कुछ देर बाद उसका साबरा जवाब दे जाता हैं और वो वहीँ सिसकते हुए बिलकुल ठंडा सा पढ़ जाता hain.......wahin कुछ दूर पर बैठा राम भी लुम्बी लुम्बी सांसें ले रहा tha.................lund तो उसका इतना हार्ड हो गया था की हाथ लगते hi उसका छुम चूत padta........jaise तैसे वो अपने आपको संभाले हुआ था........

मूवी ख़तम होने के बाद राम वापस अपने कमरे की तरफ चल पड़ता hain......uska दिमाग जैसे घूम गया tha......baar बार उसकी आँखों के सामने वही नज़ारा घूम रहा tha...........jaise तैसे वो अपने कमरे में जाता हैं और तेज़ी से मूठ मरने लगता hain....kuch देर बाद वो अपने आपको संतोष करता हैं और फिर पूरी तरह से नार्मल हो जाता hain.........aab तो उसे इंतज़ार tha........to bus............raat का..............

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राम के जाने के करीब 1/2 घंटे बाद रघु और जीतू दोनों बहार गेट पर बैठे हुए आपस में बातें कर रहे they........itne में वहां एक ब्लैक कलर की कार आकर ruki.............raghu और जीतू दोनों एक तुक उस कार की तरफ देखने lage...........car का शीशा चरों तरफ से बंद था और उसपर ब्लैक कलर का शीशा चढ़ा हुआ tha..........car में बैठा साक्ष दो तीन बार जब हॉर्न बजता हैं तब रघु कन्फर्म हो जाता हैं की ये बाँदा यहीं इसी घर में आया हुआ hain..........raghu फ़ौरन अपनी जगह से उठता हैं और जाकर मैं गेट खोल देता hain,..........jaise hi मैं गेट खुलता हैं रघु सामने से अंदर बैठे हुए साक्ष की तरफ देखने लगता hain.......magar इससे पहले वो उसे देख पता वो कार तेज़ी से चलती हुई सीधा अंदर चली जाती हैं और रघु टकटकी लगाए बस उस कार के तरफ देखने लगता है........

फिर वो मैं गेट बंद करता हैं और जब वो वापस उस कार के तरफ जाता हैं जहाँ कुछ दूर पर वो कार जाकर रुकी हुई thi.......wo उस कार के शीशे पर नॉक करता hain......thode देर बाद उस कार का शीशा नीचे की तरफ सरकता हैं और अंदर baitha/baithi साक्ष पर जब रघु की नज़र पड़ती हैं एक पल के लिए तो उसकी आँखें चौंडिया जाती hain.......ander एक लड़की बैठी हुई थी और सर उसका पूरी तरह ब्लैक स्कार्फ़ से ढाका हुआ tha........haan चेहरा उसका साफ़ नज़र आ रहा tha.....magar गले के नीचे भी वही ब्लैक स्कार्फ़ मौजूद tha........aankhon पर काळा रंग का चस्मा चढ़ा हुआ tha........wo फ़ौरन उस कार का दरवाज़ खोलती हैं और रघु उसे देखकर थोड़ा साइड हो जाता hain..........magar उसकी नज़रें अभी भी उसपर hi थी.......................

जैसे hi वो बहार निकलती हैं वो एक तुक रघु के तरफ बड़े अजीब सी नज़रियों से देखने लगती hain..........fir उसकी नज़र थोड़ी दूर पर खड़े जीतू की तरफ जाती hain.........wo उन दोनों को सर से लेकर पवन तक घूर रही thi........magar अजीब नज़रियों se..........kuch देर बाद वो धीरे से रघु की तरफ देखकर बोल पड़ती हैं.............

" काव्य मेहता का घर एहि हैं नाहा....." और वो लड़की रघु के जवाब की परवाह किये बगैर सीधा उस मैं दूर की तरफ चल पड़ती हैं वहीँ रघु उसे सर से लेकर पवन तक घूरे जा रहा tha.........usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की ये आखिर हो कौन सकती hain...........agar ये कोई रिश्तेदार होती तो इस तरह से काव्य का पता नहीं पूछती .......तो फिर कौन हो सकती हैं ये............

" ये लौड़ा हैं कौन!!!!!!!!.......... और हैं क्या चीज़...................................." और रघु के मुँह से धीरे से आवाज़ निकल पड़ती हैं वहीँ कुछ दूर पर खड़ा जीतू भी उसे हैरत से देख रहा tha.........................aur शायद वो भी उससे एहि पूछ रहा था की .............आखिर ye............hain कौन !!!!!!!!!........................................................

कंटिन्यू...................................................................
 
अपडेट- 30(ा) (मेघा अपडेट)

" ये लौड़ा हैं कौन!!!!!!!!.......... और हैं क्या चीज़...................................." और रघु के मुँह से धीरे से आवाज़ निकल पड़ती हैं वहीँ कुछ दूर पर खड़ा जीतू भी उसे हैरत से देख रहा tha.........................aur शायद वो भी उससे एहि पूछ रहा था की .............आखिर ye............hain कौन !!!!!!!!!........................................................

अब आगे.......................................................................................

थोड़े देर बाद काव्य आकर दरवाज़ा खोलती हैं और जब उसकी नज़र अपने सामने खड़े साक्ष की तरफ जाती हैं वो उसे देखकर ख़ुशी से झूम उठती hain............wahin वो लड़की भी काव्य की तरफ देखते हुए मुस्कुरा रही थी........

" इस तहत काव्य मेहता house..........i वांट तो मीट हेर नाउ........" और वो लड़की काव्य की तरफ देखते हुए शरारती अंदाज़ में धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ काव्य फ़ौरन उसके गले से लिपट जाती हैं और उसका हाथ पकड़कर अंदर अपने कमरे की तरफ ले जाने लगती हैं......

" ोये.......... सना tu.....................yahan कब और कैसे ............तुझे मेरे यहाँ का पता किसने diya.........aur तेरी आदत गयी नहीं अब tak.........angrez की औलाद........" और काव्य सना की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ सना भी काव्य की तरफ देखते हुए मुस्कुरा रही थी...........

सना khatoon.........naam से hi '. और एक अमीर घराने की लड़की thi............wo दोनों बचपन से एक hi क्लास में पढ़ते आये थे और सना काव्य की बेस्ट फ्रेंड जो thi........waise तो सना की शादी (निकाह) अख्तर नाम के साक्ष के साथ हो चुकी thi........aur वो उसके साथ बहुत खुस thi............wo भी अब इसी सेहर में रह रही thi...............aur जब उसे पता चला की काव्य भी इसी सेहर में हैं तो वो उसका नाम पता पूछती हुई यहाँ तक चली aayi.............uske घर तक........

" काव्य mehta............ye नाम किसी ज़माने में बहुत फेमस हुआ करता tha..........aur शायद अब भी hain.............aur होता भी क्यों naa........tu तो कॉलेज की जान जो thi.........sare लड़के तेरे पीछे पीछे घूमते हुए नज़र आते they.........lekin एक बात hain.......shadi के बाद तू तो काफी निखर गयी hain........kya बात हैं लगता हैं राहुल तेरी ाचे से खातिरदारी करता हैं..........." और सना काव्य की तरफ मुस्कुराते हुए धीरे से आँख मार देती हैं वहीँ काव्य जवाब में बस मुस्कुरा पड़ती हैं.......

" और tu........mere पीछे हज़ार थे तो तेरे पीछे क्या लाख नहीं they.......apna क्यों नहीं batati..........waise तू भी तो काफी निखर गयी hain......aur अख्तर कहाँ हैं और वो इस वक़्त क्या कर रहे हैं........" और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ सना अभी भी काव्य के तरफ देखते हुए मुस्कुराये जा रही थी........

" वो भी तेरे हस्बैंड की तरह विदेश रहते hain.............ek दो महीनों की छुट्टी मिली हैं तो वो यहाँ आये हुए hain........aur अबकी बार जो जाएंगे तो पूरे तीन साल के लिए chutti.......fir तो पूरे तीन साल ऊँगली से काम चलना padega........shadi के बाद यार ऊँगली कुछ मज़ा नहीं देती..........." और सना शरारती भरे अंदाज़ में काव्य के तरफ देखते हुए मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ काव्य के चेहरे पर भी मुस्कान तैर जाती हैं......

" तू naa.......kabhi नहीं sudhregi..........jab देखो तब एहि सब baatein..........tujhe तो बस दिन रात वहीँ सब chahiye......pata नहीं तेरे अंदर की ये प्यास कभी बुझती भी हैं या nahin..........bechara तेरा पति भी तुझसे परेशां हो जाता होगा........" और काव्य शरारती अंदाज़ में सना की तरफ देखती हुई मुस्कुरा पड़ती hain.....wahin सना खिलखिला कर हंस पड़ती हैं........

" वो तो मुझसे दूर भागते hain..........jab मेरा मूड बनता हैं तो मैं उनके भी पसीने चढ़ा देती hoon..........waise दिल तो करता हैं की दो चार जगह अपनी मुँह मरवा आवुन मगर बदनामी से थोड़ा दुर्र लगता hain......magar कभी लाइफ में मैं तरय ज़रूर karungi.............tu तो ऐसे बन रही हैं जैसे कोई सटी सावित्री ho............maine देखना नहीं हैं क्या की तू कई बार अपनी छूट में बर्बर ऊँगली किया करती thi...........aab तेरे पति तो होंगे नहीं तो वही सिलसिला अब भी चलता होगा........" और सना फिर से काव्य के तरफ देखती हुई मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ काव्य के चेहरे पर भी हंसी आज जाती हैं.........

" तू naa.a...............kabhi नहीं sudhregi...........jab देखो बक बक ...........तू बैठ मैं तेरे लिए चाय और कुछ नास्ता लेकर आती hoon........aur काव्य थोड़े देर बाद कुछ स्नैक्स और चाय लेकर आती हैं और सना के पास आकर दुबारा से बैठ जाती हैं.........

" एक बात पूछूं kavya............tune गुडगाँव क्यों हमेशा के लिए छोड़ diya..........kahin विक्की और रोहित की वजह से तो nahin........ya कहीं उन दोनों ने आत्महत्या कर लिया कहीं इस वजह से तो तू यहाँ आकर सेटअप तो नहीं हो gayi.........waise जो भी हुआ बहुत गलत hua..........ismein जितना उनका दोष था उतना तेरा भी tha.............tujhe उनकी ज़िन्दगियों के साथ इस तरह से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए tha.........khair.......koshish करना की ये बात कभी राहुल को पता न chale.......nahin तो तेरी शादी शुदा लाइफ खतरे में पढ़ सकती हैं......." और सना इस बार थोड़ी सीरियस होती हैं और लुम्बी सां छोड़ती हुई अपनी बात ख़तम करती hain........wahin काव्य के चेहरे का रंग फिर से फीका पढ़ गया tha............kahin न कहीं एक बार फिर से उसका अतीत उसे परेशां कर रहा था............

" सना please...........chup हो jawo........tum जानती हो की मैंने रोहित और विक्की को साफ़ साफ़ मन कर दिया tha..........mujhe उन दोनों से कभी प्यार था hi nahin..........haan एक गलती हुई जिसकी वजह से मुझे आज भी पछतावा hain......aur शायद उसी गलती की वजह से उन दोनों ने सुसाइड कर li..........ismein मैं क्या कर सकती हूँ........" और काव्य गहरी सांस छोड़ते हुए अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ सना कुछ देर तक चुप्पी साढ़े रहती हैं और फिर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" ाचा वो सब छोड़ और ये बता की तूने अपने घर में कैसे बेहूदा नौकर पल रखे hain...........dekhney से ऐसा लगता हैं जैसे राह चलते भिकारी ho.........ya जंगल से आये हुए ho.............main तो एक तक उनके हुलिए को देखती रह gayi.......aise नौकरों से तू ज़रा बचकर रहा kar............ye लोग मौका पाकर कुछ भी कर सकते हैं......." और सना आहिस्ते से बोल पड़ती हैं वहीँ काव्य के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर जाती हैं............

" जैसे वो दिखते हैं वैसे वो लोग हैं नहीं ......sana..........wo दोनों वफादार भी हैं और ईमानदार bhi........aacha ये बता की न कोई तेरा फ़ोन कॉल और न कोई message..........fir अचानक तू इस सेहर में कैसे.....!!!!!!!!" और काव्य सना को देखती हुई धीरे से सवाल कर देती हैं वहीँ सना कुछ देर की चुप्पी रहने के बाद धीरे से बोल पड़ती हैं.....

" इसे संजोग hi कहा जा सकता हैं kavya........khair अभी तो मैं अपने सास ससुर के साथ hoon.......apne ससुराल mein.........ek महीने बाद अख्तर भी विदेश चले जाएंगे और मेरे सास ससुर अपने पुराने घर pe............fir मैं भी तेरी तरह बिलकुल अकेली रह jawungi...........khair मैं बीच बीच में आया karungi........aur तेरा वो भोला भला देवर कहीं नहीं दिख raha........wo अभी तक वैसा hi हैं या उसके अंदर कोई चंगेस अब तक नहीं आया......" और सना आहिस्ता से दुबारा बोल पड़ती हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं........

" वो अब मेरे साथ यहीं रहता hain......aur धीरे धीरे वो अब बदल रहा hain.........samay आने पर वो भी पूरा बदल जायेगा......." और काव्य लुम्बी सांस छोड़ते हुए आहिस्ता से दुबारा बोल पड़ती हैं वहीँ सना उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" तेरी तो लाटरी लग gayi........arey जब घर में hi लुंड मौजूद हैं तो ऊँगली करने की क्या zaroorat........tu भी अपनी आग उससे बुझा लिया karna.......ghar की बात घर में hi रह jayegi.......aur तेरी जैसी माल को पाकर उसके भी मज़े हो जाएंगे.........." और सना इस बार ज़ोरों से हंस पड़ती हैं वहीँ काव्य का चेहरा शर्म से लाल पढ़ जाता हैं.......

" तू भी न sana.......kuch भी बोलती hain...........agar तेरी छूट की आग बुझी न हो तो बोल मैं राम से बात करती hoon.....wo तेरी आग ाचे से बुझा देगा.........." और काव्य भी शरारती अंदाज़ में सना की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं...........

कॉन्टिनोएड.......................................................................
 
अपडेट- 30 (बी) (मेघा अपडेट)

" नहीं nahin........tu hi बुझा उससे अपनी छूट की aag.........mere लिए तो मेरा अख्तर hi काफी hain........aab मैं चली हूँ kavya..........beech बीच में यहाँ आती रहूंगी........." और सना फिर वापस अपने घर की तरफ चल पड़ती hain......jaise hi वो बहार जाती हैं एक बार फिर से जीतू और रघु उसे आँख फाड़े सर से लेकर पवन तक घूरते रहते hain..........wahin रघु हमेशा की तरह अपने लुंगी के ऊपर से अपने लुंड को धीरे धीरे से मसलने लगता hain.......wahin सना अपना मुँह फेर लेती हैं और कार में जाकर चुप चाप से बैठ जाती hain......fir वो फ़ौरन अपने घर की तरफ निकल पड़ती हैं.........

" ये लौड़ा हैं क्या cheez...............dekhney से तो मालूम पड़ता हैं की ये काव्य की कोई बहिन hain.........maal तो साली ेकुम टाइट और मस्त hain...........chodney में बड़ा मज़ा आएगा isko..........agar ये मिल जाये तो मैं तो गंगा नाहा लून........" और रघु अपने लुंगी के ऊपर से अपने लुंड पर हाथ फेरता हुआ आहिस्ता से बोल पड़ता हैं वहीँ जीतू भी उसे देखकर मुस्कुरा रहा था.................................

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घडी में इस वक़्त रात के 10 बज रहे they..............khana खाकर राम अपने मोबाइल में वो चुदाई वाली वीडियो देख रहा tha...........nazrein बार बार उसकी दरवाज़े पर जाकर टिक जाती मगर सन ऐसे थे की उसकी नज़र स्क्रीन से हटाए नहीं हुत्त रही thi.........aakhirkar काव्य राम के कमरे में आती हैं और राम तो जैसे उस वीडियो में पूरी तरह से खोया हुआ tha........jab उसकी नज़र काव्य पर पड़ती हैं वो फ़ौरन हड़बड़ा जाता हैं और जल्दी से अपना मोबाइल काव्य से छुपाने लगता hain...........magar काव्य ने आज शायद कुछ देख लिया tha........wo बड़े गौर से कभी राम की तरफ देख रही thi............to कभी उसके हाथ में थामे मोबाइल की तरफ.........

" क्या बात हैं ram.........aisa क्या हैं उस मोबाइल में जो तुम मुझसे छुपा रहे हो........." और काव्य फ़ौरन उस कमरे का दरवाज़ा बंद करती हैं और अपने सीने पर लगा दुपाता बिस्टेर पर फेंक देती hain............wahin राम की एक बार फिर से फुट गयी thi.........usey तो दुर्र था की कहीं काव्य उससे उसकी मोबाइल न मांग le...........aur राम को जिस चीज़ का दुर्र था आखिर वही हुआ...........

" ज़रा दिखाना अपना mobile........aakhir मैं भी तो देखूं की तुम ऐसा क्या देख रहे हो इस मोबाइल में............" और काव्य राम के जवाब का इंतज़ार किये बगैर उसके हाथों से वो मोबाइल चीन लेती हैं और उसका पैटर्न खोलकर उस मोबाइल के फाइल्स को एक एक कर देखने लगती hain.......wahin राम की पूरी तरह से फुट गयी thi...........usey दुर्र से कुछ बोलै नहीं जा रहा tha........aur न वो काव्य को रोक पा रहा tha...........kavya को कुछ वीडियो के फाइल्स दिखाई देते हैं और वो उस फाइल्स को ओपन करती hain........aur जब उसकी नज़र उसमें चल रहे ब्लू फिल्म्स पर जाती हैं उसके चेहरे पर एक मुस्कान तैर जाती hain.......wo उसे कुछ देर तक ऐसे hi देखती रहती hain........ek बार फिर से उसकी छूट में गीलापन बढ़ता जा रहा tha.............wo राम की तरफ शरारती ढंग से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" अरे waah........tum तो बहुत कमल के चीज़ देख रहे ho..............tabhi मैं बोलूं की हर वक़्त तुम अकेले कमरे में दिन रात मोबाइल में ऐसे क्या लगे रहते ho...............lagta हैं मुझे पापा मम्मी से इस बारे में तुम्हारी शिकायत करनी padegi.........hain ना......." और काव्य उस स्क्रीन में चल रहे पोर्न वीडियोस को राम के तरफ दिखती हुई हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम की रही सही हिम्मत भी जवाब दे जाती hain.............aisa लगता हैं जैसे उसके जिस्म से किसी ने पूरा खून निचोड़ लिया ho...........uski दुर्र से बोलती मनो बंद हो गयी थी...........

" iiiiaaaaaaammmmmsssssooooororrrryyyy.........bhaaaaabhhhiiiii....pppllleeasseee आआआपपपप ककीसीइस सीई कूऊऊऊक्कछ्ह मममममूततततत कककककाहहीईईएईएग्गगगआआआ" और राम की रही सही हिम्मत भी जवाब दे जाती हैं वहीँ काव्य राम की तरफ देखकर मुस्कुराये जा रही थी.........

" ram.........tum मुझसे इतना डरते क्यों ho................kya मैं तुम्हें marungi..........ya मैं तुम्हें खा jawungi............main कोई डरने की चीज़ थोड़ी न hoon...........main तो बस प्यार करने की चीज़ hoon............karogey न तुम मुझसे प्यार........." और काव्य बड़े प्यार से राम के सर पर अपना हाथ हौले हौले से फेरने लगती हैं वहीँ राम अब फिर से पूरी तरह नार्मल हो चूका tha...........uske अंदर दुबारा से हिम्मत आ गयी thi..........uska दुर्र अब गायब हो चूका था........

" हाँ bhabhi.........zaroor karunga.........magar मुझे तो नहीं आता की प्यार किस तरह से किया जाता हैं..........." और राम भोलेपन से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसके तरफ देखती हुई मुस्कुरा रही थी............

" मैं तुम्हें सिखाउंगी की प्यार कैसे किया जाता hain............aab जैसा जैसा मैं कहूँगी तुम वैसा वैसा करते jana..........dekh लेना तुम भी पूरी तरह से एक्सपर्ट बन जाओगे............" और काव्य राम की तरफ देखती हुई शरारती ढंग से मुस्कुरा पड़ती hain........wahin राम का जोश धीरे धीरे अब बढ़ने लगा था...........

" सबसे पहले तुम्हें ये जान लो की मर्द और औरत में क्या फर्क होता hain.........tum एक मर्द ho..........aur मैं एक औरत हूँ............" और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम फिर से भोलेपन में जावा देता हैं.......

" हाँ इतना तो मैं जनता हूँ की आप औरत ho....aur मैं मर्द hoon.............magar आपमें और मुझमें फर्क क्या हैं........" और राम किसी छोटे बाचे के जैसे अब बेहवे कर रहा था वहीँ काव्य उसे किसी टीचर की तरह सब कुछ सिखाये जा रही थी...........

" गौर से देखो मेरी ore..........mere सीने की taraf...........ye जो दो गोल गोल तुम्हें बड़ी बड़ी जो चीज़ें नज़र आ रही हैं जानते हो वो क्या hain........inhein दूध कहते hain............wo मर्दों में नहीं होते........." और काव्य के छूट में गीलापन भी धीरे धीरे अब बढ़ने लगता hain..........aisi चुदाई भरी बातें उसकी छूट में आग लगाती जा रही थी वहीँ राम का भी लौड़ा अब धीरे धीरे तनता जा रहा था........

" तो क्या इनमें से दूध निकलता हैं............" और राम भोलेपन से दुबारा काव्य के तरफ देखते हुए सवाल करता हैं वहीँ काव्य हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं......

" और नहीं तो kya...........magar अभी nahin........aabhi इनमें दूध नहीं hain..........jab मेरा बाचा होगा तब इसमें दूध aayega..........aur उस दूध को पीकर बच्चा बड़ा hoga.......jaise सब होते हैं.......

" और आपका बाचा आएगा कहाँ से.........." और राम फिर से बोल पड़ता hain.......aab तो उसे भी इस खेल में मज़ा आने लगा tha...........aaj वो भी काव्य के साथ पूरा नंगापन का खेल खेल रहा tha...........wahin काव्य शर्म की दीवार को पल पल तोड़ने की कोशिश कर रही thi..............aur वो इसमें सफल भी हो रही थी क्यों की आज उसकी छूट में आग जो लगी thi.........jo उसके सोचने समझने की शक्ति को पल पल चींटी जा रही थी...........

" यहाँ से..........." और काव्य अपने दोनों टांगों के बीच राम को देखती हुई अपने हाथों से इशारा करती हैं वहीँ राम सवाल भरे नज़रियों से काव्य के जांघों के बीच तो कभी............... उसके चेहरे की तरफ देख रहा था........

" मगर मुझे तो कुछ नज़र नहीं आ raha...........aap ाचे से बताइये ना............." और राम फिर से भोलेपन से दुबारा बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य की सांसें धीरे धीरे भरी होने लगती hain........aab वो भी जान चुकी थी की राम भी पूरी तरह से मूड में आ चूका हैं...........

" मेरे choootttttttttttttt सीई............" और काव्य की आवाज़ जैसे कनकपा सी जाती हैं वहीँ उसकी सांसों की रफ़्तार और तेज़्ज़ होती चली जाती हैं.........

" भाभी .......मुझे कुछ समझ में नहीं आ raha....aap खुलकर बताइये naa......tabhi तो मैं समझूंगा............" और राम सवालों की नज़र से काव्य के तरफ देखने लगता हैं वहीँ काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं.........

" जब किसी मर्द की पेनिस किसी औरत की वागिना के अंदर जाता हैं और वो उसे फ़क करता हैं तब उसके स्पर्म से बाचे होते hain.....aur वो बाचा वागिना से बहार आता हैं........." और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ राम अभी भी टकटकी लगाए काव्य के तरफ देखे जा रहा था......

" मुझे कुछ समझ में नहीं आ raha.......aap शुरू से ाचे से हिंदी में समझाइये............." और राम जैसे काव्य को आर्डर करता हैं वहीँ काव्य भी अब समझ चुकी थी की आज राम उसके मुँह से क्या कहलवाना चाहता हैं और उसके मुँह से क्या सुनना चाहता hain.........aakhir कुछ सोचकर काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं.......

" सूपपोसे करो की कोई आदमी...." और जैसे hi काव्य आगे बोलती राम इस बार बीच में फिर से बोल पड़ता हैं.....

" ये सब मुझे नहीं सुनना hain.......aap साफ़ साफ़ मेरा और अपना एक्साम्प्ले लेकर क्यों नहीं बताती की बाचा आखिर आता कहाँ से hain..........aise में तो मैं कुछ सीख थोड़ी न pawunga.............us दिन भी आपने मुझे कहा था की आप मुझे सब कुछ सीखा dengi.........fir......" और राम शिकायत के लहज़े से काव्य के तरफ एक तुक देखने लगता हैं वहीँ काव्य दुबारा से बोल पड़ती हैं.....

" मान लो की तुम मुझे chooddogggereeeyyy.............aur tumhare.......virrrrryyaaaa जब मेरी क्छःहोंऊत्तत्त में जायेगा तो उससे मेरा बाचा होगा..........." और काव्य की सांसें भरी होने लगती हैं आज तो राम जैसे काव्य के साथ पूरे नंगेपन पर उतर आया tha.........wahin काव्य की बेचैनी पल पल बढ़ती जा रही थी.....

"साफ़ साफ़ कहिये शुरू se.......mujhe कुछ समझ में नहीं आ raha.....aur ये छोड़ना किसी कहते हैं........" और राम फिर से सवाल करता हैं वहीँ काव्य की छूट पूरी तरह से गीली होती जा रही थी........

" जब तुम मुझे नंगा करोगे और जब तुम अपना लुंड को मेरी छूट के अंदर डालोगे और उसे डालने के बाद तुम मेरी ाचे से चुदाई करोगे तब तुम्हारे लुंड से जो छुम निकलेगा वो मेरी छूट के अंदर jayega......aur उसी छुम से मेरा बाचा होगा जो पूरे 9 महीने बाद मेरी छूट से बहार aayega...............aab भी कुछ समझे या और डिटेल में समझावूं.........." और काव्य गहरी सांस छोड़ती हुई हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम ना में अपना सर धीरे से हिला देता हैं..........

"aacha......to लुंड को छूट में डालना hi उसको छोड़ना कहते hain..........taab तो मुझे भी आपको छोड़ना hain............chudwaogi न आप मुझसे ................." और राम जैसे बिलकुल किसी मासूम बाचे जैसा ट्रीट कर रहा था वहीँ काव्य का बुरा हाल tha..........wo जवाब में धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती हैं वहीँ राम हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं.........

" तो आइये आप मेरे paas........aap मुझसे इतनी दूर क्यों hain.........kareeb आएँगी तब न मैं आपको chodunga.............aur आप मुझे आज सिखाएगा की छोड़ा कैसे जाता हैं..........." और राम दुबारा से जाकर कुर्सी पर बैठ जाता हैं और काव्य को अपनी तरफ बुलाने का इशारा करता hain.........wahin काव्य मुस्कुराते हुए राम के गोदी में आती हैं और आकर फिर से अपने दोनों पवन फैलाकर उसकी गॉड में बैठ जाती hain..........wahin राम बहुत अजीब नज़रियों से काव्य के तरफ देखे जा रहा tha...........ek बार फिर से काव्य के बदन से उठने वाली खुसबू उसे मदहोश करती जा रही थी........................................

अब दोनों के बीच खेल शुरू हो चूका tha.........khiladi भी नया tha.............aur खेल bhi.......dekhna था की कौन इस खेल में जीतता hain.......................aur किसी होती हैं हार................................................................

कंटिन्यू.........................................................
 
अपडेट- 31(ा) (मेघा अपडेट)

अब दोनों के बीच खेल शुरू हो चूका tha.........khiladi भी नया tha.............aur खेल bhi.......dekhna था की कौन इस खेल में जीतता hain.......................aur किसी होती हैं हार................................................................

अब आगे...........................................................................................

राम की नज़रें काव्य के चेहरे पर तिकी हुई thi..........wahin काव्य भी टकटकी लगाए राम की तरफ देख रही thi..............dono के बीच कुछ पल की ख़ामोशी rahi...........fir राम आहिस्ता से बोल पड़ता हैं.........

" bhabhi........main इनके साथ जी भरकर खेलना चाहता हूँ............." और राम काव्य के दोनों चूचियों की तरफ घूरता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य गहरी सांस छोड़ती हुई हाँ में अपना सर हिला देती hain..........wo तो चाहती hi थी की राम उसके दोनों चूचियों के साथ khele.........unhein जी भरकर masley........usey नंगा करके उन्हें मुँह में लेकर choosey.........apne डेंटन से kaate...........magar शर्म की वजह से वो ऐसा बोल नहीं पा रही thi............aur शायद राम ने उसके इस मुश्किल को अब आसान कर दिया था..........

" haan...........ram.........tum जी भरकर खेलो इनके साथ............." और काव्य का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगता हैं वहीँ राम ललचायी हुई नज़रियों से काव्य के दोनों चूचियों को घूर रहा tha.......mano अपनी आँखों से परख रहा हो की दोनों साइज में एक सामान हैं या nahin..........wahin काव्य एक तुक राम की तरफ देखे जा रही thi.........kuch सोचकर वो हौले से बोल पड़ती हैं........

" ऐसे क्या देख रहे हो ram.............khelo न इनके saath............main तुम्हें कुछ नहीं कहूँगी........." और कयवा अंदर hi अंदर बेचैन हो उठती hain........wahin उसकी छूट में फिर से सेंसेशन होना शुरू हो जाता hain............ram के हाथ अपने उभारों पर महसूस करके उसका रोम रोम अब रोमांचित होने लगा tha............wahin राम अब भी खामोश tha........shayad थोड़ा कंफ्यूज लग रहा था........

" मैं ये सोच रहा हूँ की मैं इनमें से पहले कौन सा pakdun.........mujhe तो दोनों एक सामान hi नज़र आ रहे hain...........aab एक को अगर पडकाड़ता हूँ तो दूसरे के साथ बेईमानी होगा........." और राम हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं वहीँ काव्य का शर्म से बुरा हाल tha.........jaise तैसे वो राम के सवालों का जवाब दे पति hain.......wahin उसकी छूट में गीलापन बढ़ता hi जा रहा था.......

" tum.......dono एक साथ पदक लो ram..............ismein कोई बेईमानी नहीं होगी.........." और काव्य का कलेजा फिर से ज़ोरों से धड़कने लगता hain..........wahin राम ख़ुशी से चहक उठता hain........ram हाँ में अपनी गुर्दें हिलता हैं और अबकी बार अपने दोनों हाथ काव्य के चूचियों की तरफ धीरे धीरे बढ़ाने लगता hain..........jaise hi उसके हाथ काव्य के चूचियों को छूटे हैं काव्य न चाहते हुए भी ज़ोरों से aaaaaaaaaassssssssssssssssssssssssssssssss.........sisak पड़ती hain........ek बार वो फिर से जैसे मदहोश होने लगी थी............

राम अपने हाथों से काव्य के नरम नरम चूचियों को हौले हौले से दबा रहा tha.......masal रहा tha.......uski नर्माहट को अपने हाथों पर महसूस कर रहा tha........to कभी उसके निप्पल्स को अपनी उँगलियों के बीच दबाकर खींच रहा tha..........masal रहा tha..........wahin काव्य आँखें बंद किये हल्की हल्की सिसकारी ले रही thi...........saath hi साथ उसका दिल अब ज़ोरों से धड़क रहा था...........

" bhabhi.........maine देखा था उस वीडियो में की वो लड़की उस आदमी का लुंड अपनी गांड में ले रही thi.............kya लुंड गांड में भी लिया जाता hain..........kya उसमें दर्द नहीं होता.........." और राम फिर से बोल पड़ता hain............aisa पहली बार था जब राम ऐसे ओपन वर्ड्स का उसे काव्य के सामने कर रहा tha...............usey अजीब तो लग रहा था पर मज़ा भी बहुत आ रहा tha...........is वक़्त उसका लुंड पूरी तरह से सख्त हो चूका tha.........aisa लग रहा था जैसे अब पानी निकल jayega.........wahin काव्य का भी बुरा हाल tha..........uska भी साबरा धीरे धीरे जवाब देता जा रहा था..........

" हाँ कुछ लडकियां लेती hain.............aur उन्हें वहां पर लेने में शायद मज़ा भी आता है............" और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ राम हौले से मुस्कुरा पड़ता hain.........aisa लग रहा था जैसे वो काव्य के जवाब से संतुष्ट न हुआ हो...........

" और आपको bhabhi..........kya आप नहीं लेती भैया का लुंड अपनी गांड में..........." और राम मासूमियत से दुबारा बोल पड़ता hain........wahin काव्य एक तुक राम के चेहरे की तरफ देखे जा रही thi..........dheere धीरे उसका शर्म अब ख़तम होता जा रहा tha.........upar से राम इस तरह उससे खुले में बात कर रहा था तो उसका बहकना जायज़ था............

" nahin..........filhaal तो मैंने कभी नहीं लिया उनका वहां pe..........na जाने क्यों मुझे बहुत घबराहट सी होने लगती hain.......................aur वो भी कोई जगह हैं करने की.............." और काव्य का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगता hain........wahin राम मुन्न hi मुन्न खुस हो जाता hain...........shayad उसे लगने लगा था की काव्य उससे कभी न कभी अपनी गांड तो ज़रूर मरवायेगी.........

" मैंने तो देखा था की लडकियां एक साथ तीन तीन मर्द को संभाले हुई thi..............ek उसकी गांड में लुंड डाला हुआ tha.......to दूसरी उसकी छूट mein.....aur तीसरा उसकी मुँह में........" और राम थोड़ा हिकरण होता हुआ काव्य के चेहरे की तरफ देखता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य की सांसें पल पल बेकाबू होती जा रही thi.........jaise तैसे वो अपना होश अब तक संभाले हुई थी.........

" वो वैसा उस टाइप्स की मूवीज में होता hai..........reality में नहीं........" और काव्य का दिल एक बार फिर से मचल उठता hain........wahin राम भी जनता था की काव्य की बाटिओं में कितनी सच्चाई hain.........wo कुछ नहीं कहता और इस बार उसके चूचियों को कसकर मसलने लगता हैं वहीँ काव्य की सिसकारी फिर से तेज़्ज़ होती चली जाती hain...........kabhi वो अपने होंठों को अपने डेंटन के बीच दबाकर काट रही थी तो कभी अपनी आँखें बंद कर लेती..........

" bhabhi.......magar मुझे तो कहीं से भी ऐसा नहीं lagta............khair..........utariye न inhein..............mujhe आपके दूध देखने हैं........." और राम काव्य के चूचियों पर सूट के ऊपर से हाथ फेरता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य अपना दोनों हाथ अपने पीठ की तरफ ले जाती हैं और पीठ पर बढ़ा डोर धीरे से खोल देती hain..........fir वो अपने सूट को ऊपर की तरफ उठाने लगती हैं वहीँ राम बड़े गौर से काव्य के तरफ देखे जा रहा tha.........jaise जैसे उसके कपड़े ऊपर की तरफ उठते जा रहे थे वैसे वैसे राम के लुंड में सनसनाहट भी बढ़ती जा रही थी..........

काव्य अगले hi पल बिना वक़्त गंवाए अपना सूट उतर देती हैं और काळा ब्रा में उसका गोरा बदन और भी क़हर धने लगता hain.........wahin राम की नज़रें उसपर hi तिकी हुई thi.........wo अभी भी काव्य के तरफ बड़े गौर से देखे जा रहा tha..........is हालत में पहली बार वो किसी लड़की को इस तरह से देख रहा था.........

" उतरिये न इन्हें भी............" और राम काव्य के ब्रा की तरफ देखते हुए धीरे से बोल पड़ता hain.........wahin काव्य हौले से अपने दोनों हाथ पीछे की तरफ ले जाती हैं और धीरे से अपने ब्रा का हुक खोल देती hain.......agle hi पल उसका ब्रा उसकी चूचियों से दूर होता चला जाता हैं वहीँ राम की जैसे सांसें अटक गयी thi..........wo अपनी आँखें फाड़े काव्य के दोनों चूचियों की तरफ देखे जा रहा tha..........wahin काव्य का शर्म से बुरा हाल tha.........uski नज़रें नीचे की तरफ झुकी हुई थी..........

राम अपना हाथ आगे की तरफ बड़ाहट हैं और काव्य के ब्रा को उसके बदन से धीरे धीरे अलग करने लगता hain........jaise जैसे उसके ब्रा हटते जा रहे थे वैसे वैसे राम की बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi..........wahin उसका कलेजा भी ज़ोरों से धड़कता जा रहा tha..........agle hi पल राम काव्य के ब्रा को उसके बदन से अलग कर देता हैं और काव्य की गोरी नंगी चूचियां अब उसकी आँखों के सामने बेपर्दा हो जाती hain........jinhein राम बड़े धयान से देख रहा tha............gore बदन में गुलाबी चूचियां और भी क़हर धा रही थी जो किसी मटर के डेन के सामान तानी हुई thi...........wahin राम बिना वक़्त गंवाए काव्य के चूचियों पर अपने हाथ रख देता हैं और बरी बरी से उन्हें मसलने लगता हैं.........

राम के इस तरह मसलने से काव्य की सांसें एक बार फिर से भरी होने लगती hain...........wahin उसकी पंतय लगभग पूरी तरह से भीग गयी thi...........ram बहुत आहिस्ता से अपने उँगलियों के बीच काव्य के निप्पल्स को दबा रहा था तो कभी उन्हें चुटकी में लेकर खींच रहा tha.......to कभी गोल गोल घुमा रहा था वहीँ काव्य की बहचयनि भी बढ़ती जा रही thi........wo वहीँ लुम्बी लुम्बी सांसें लेती हुई हौले हौले से सिसक रही thi..........jawani का खेल अब उनके बीच शुरू हो चूका था..........

राम अगले hi पल अपना चेहरा काव्य के दोनों चूचियों की तरफ ले जाता हैं और एक नज़र वो काव्य की चूचियों को बड़े ध्यान से देखने लगता hain...........fir वो हौले से अपना मुँह खोलता हैं और काव्य के चूचियों को अपने मुँह में भरकर हौले हौले से किसी छोटे बाचे की तरह पीने लगता hain...........wahin उसका दूसरा हाथ अभी भी उसके दूसरे चुकी पर थे जिन्हें वो अभी भी मसल रहा tha..........wahin काव्य बड़े प्यार से अपने हाथ राम के सर पर रखे हुई थी और उसके सर को सहलाये जा रही थी..........

राम कभी अपने डनोटों के बीच उन्हें दबा leta............to कभी अपने डेंटन से दबाकर खींचने lagta.......uske हर एक हरकत पे काव्य बुरी तरह से मचल jati..........aab उसका साबरा धीरे धीरे जवाब देता जा रहा tha.........wahin राम आज काव्य के चूचियों पर मनो टूट पड़ा tha......aisa लग रहा था जैसे काव्य कहीं भागी जा रही ho...........wo जैसे जनम का भूखा ho.........wo कभी पूरी ताक़त से उन्हें मसलता तो कभी उसके निप्पल्स को बरी बरी से खींचने lagta............wahin काव्य दर्द और मज़े से सिसक उठती........

राम का लुंड इस वक़्त बुरी तरह से अकड़ा हुआ tha...............aisa लग रहा था जैसे अब उसका पानी चूत jayega..........aab उसे भी साबरा नहीं हो रहा tha.............ram काव्य से थोड़ा सा दूर होता हैं और फिर से काव्य के तरफ बड़े ध्यान से देखने लगता hain............wahin काव्य उसे hi देखे जा रही थी............

कॉन्टिनोएड.................................................................
 
अपडेट- 31(बी) (मेघा अपडेट)

" aaaaaaaaaasssssssssssss........aise क्या देख रहे हो राम........." और काव्य की आँखें दुबारा लाजत से बंद हो जाती हैं वहीँ राम इस बार अपना एक हाथ काव्य के पेट की तरफ ले जाने लगता hain.....aur जैसे जैसे उसके हाथ नीचे की तरफ सरक रहे थे काव्य की बेचैनी भी अब बढ़ती जा रही thi.......wo बहुत ाचे से जानती थी की राम का हाथ ाअब उसके जिस्म के किस हिस्से पर जाने वाला hain............ye ख्याल आते hi उसकी छूट में गीलापन फिर से बढ़ने लगता hain........wahin वो भी अपना एक हाथ आगे बढाती हैं और राम के लोअर की तरफ ले जाने लगती hain.......aur राम के लुंड को लोअर के ऊपर से hi पकड़ लेती hain.......wahin राम न चाहते हुए भी ज़ोरों से सिसक पड़ता हैं........

इस तरह काव्य के नाजुक स्पर्श से राम का लुंड और भी सख्त होता जा रहा tha........wahin उसका साबरा अब जवाब देने लगा tha.........wo भी बिना वक़्त गंवाए अगले hi पल काव्य की जांघों के बीच अपने हाथ रख देता हैं और उसकी छूट को कसकर अपनी मुट्ठी में ज़ोरों से भींच लेता hain.......ram के इस हरकत पे काव्य भी ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं वहीँ राम उसकी चूचियों को कभी काटे जा रहा tha.......to कभी बेरहमी से मसले जा रहा tha............idher काव्य भी उसके लुंड को लोअर के ऊपर से हिला रही थी और आख़िरकार इस बार राम का साबरा पूरी तरह से जवाब दे जाता हैं और वो वहीँ ज़ोरों से सिसकते हुए छुम छोड़ने लगता hain...........jo उसके लुंड के पानी से उसके लोअर को गिला करता जा रहा था........

अब वो अपनी मंज़िल तो पा चूका था मगर प्यासी रह गयी थी तो एक बार फिर से kavya............jo अब वो राम को अजीब सी नज़रियों से देख रही thi........ram की सांसें बहुत ज़ोरों से चल रही थी वहीँ उसकी आँखें अभी भी बंद thi.........jab उसका नशा पूरी तरह से उतरता हैं वो फ़ौरन काव्य को अपने से अलग करता हैं और फ़ौरन बाथरूम में भाग जाता hain...........fresh होने के बाद वो दुबारा से वापस आता हैं तो काव्य अपना सूट दुबारा से पहन चुकी thi............aur वो वहीँ बैठी हुई लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi............sach तो ये था की उसकी प्यास बुझने के बजाये और भी भड़क उठी thi.........is अधूरे प्यास की वजह से उसके अंदर की जो आग लगी हुई थी वो आग अब और भी भड़क गयी thi........magar राम का ये सब पहली बार था ये सोचकर वो मायूस तो होती हैं मगर उससे नज़र नहीं hoti............wo भी जानती थी की जवानी के इस खेल में ऐसा अक्सर होता हैं............

वो भी अपने आपको समझा बजाकर बिस्टेर पर लेट जाती हैं और राम काव्य से नज़रें छुपाये फ़ौरन बिस्टेर पर जाकर सू जाता hain........waise भी आज जो कुछ हुआ था राम के लिए इतना सब बहुत tha........aaj काव्य जैसी हस्सना को उसने अध्नंगी हालत में देख लिया था ऊपर से उसके बदन के साथ जी भरकर खेल रहा tha............ye राम के लिए किसी करिश्मे से कम नहीं था............

मगर शायद आज काव्य की आँखों में नींद जैसे गायब हो चुकी thi............bister पर वो भले hi लेती हुई थी मगर उसके दिमाग में इस वक़्त बहुत कुछ घूम रहा tha.........aaj काव्य पूरी तरह से बेचैन लग रही thi...........jawani की आग में वो पल पल जल रही thi............aab उसे अपनी प्यास किसी भी कीमत पर बुझानी thi............chahe उसके लिए उसे जो करना pade..........sahi या ........galat.........wo नहीं जाती thi.............kafi देर तक वो यु hi न जाने क्या क्या सोचती रहती हैं और आखिरकार वो भी थक कर सू जाती हैं............

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हर रोज़ की तरह राम अपने कॉलेज चला जाता हैं और काव्य अपने काम में लग जाती hain.......magar हर दिन की तरह आज का दिन कुछ ख़ास होने वाला tha..........upar से आज मौसम का मिज़ाज़ भी कुछ बदला बदला सा नज़र आ रहा tha...........aasman में घने बदल छाए हुए थे और धीरे धीरे हवा भी अब चलने लगी thi...........kavya कुछ सोचकर मुस्कुरा पड़ती हैं और फ़ौरन अपने कमरे की तरफ चल पड़ती hain............fir वो ालमिरह से साड़ी सेलेक्ट करती हैं और वही सफ़ेद रंग की साड़ी निकलती हैं जो कल रघु ने उससे डिमांड की thi...........ek बार फिर से उसके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती हैं और वो अपने सूट को धीरे धीरे उतरने लगती hain.........aur नीचे अपना लग्गी.........

अब वो सिर्फ ब्रा और पंतय में शीशे के सामने कड़ी थी और एक तुक अपने आपको निहार रही thi.......shayad उसे भी अपना हसीं बदन अत्त्रक्ट कर रहा tha...........wo उस साड़ी को धीरे धीरे पहने लगती हैं और बार बार घडी की तरफ भी देखती रहती hain......dil में बेचैनी भी वक़्त के साथ साथ अब बढ़ती जा रही thi.........waise रघु को आने में अभी कुछ वक़्त tha......aur काव्य के लिए इतना वक़्त तैयार होने के लिए काफी tha...........humesha की तरह डीप लौ कट ब्लाउज जो उसकी नंगी पीठ को और भी अपनी तरफ अत्त्रक्ट कर रही thi.........samney ड्रेसिंग टेबल पर वो कुछ श्रृंगार के सामान उसे करती हैं और अपने आपको सजने सँवारे लगती hain.......final टच देकर आख़िरकार उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती हैं और वो अपने आपको एक तुक शीशे में कड़ी यु hi निहारी रहती hain..........har रोज़ की तरह वो आज कुछ ज़्यादा hi हसीं लग रही thi.........aaj उसने बल भी खुले रखे थे............

वैसे आज वो ये सब रघु के लिए hi तो कर रही thi............kyon की रघु की ख़ुशी में उसे अब अपनी ख़ुशी नज़र आ रही thi..........waise काव्य आज पूरी क़यामत लग रही thi..............ghadi में जब उसकी नज़र जाती हैं उसके चेहरे पर एक मुस्कान तैर जाती hain........kyon की अब घडी में 9 बज चुके थे और रघु के आने का वक़्त भी हो चूका tha.........ander hi अंदर उसे कुछ घबराहट सी होने लगी थी वहीँ उसे रघु के आने का अब बड़ा hi बेसब्री से इंतज़ार भी tha..........tabhi कमरे का डोर बेल्ल बजा और काव्य के चेहरे पर एक मुस्कान तैर gayi.........usey पता तथा की दरवाज़े पर इस वक़्त कौन होगा.........

वो फ़ौरन मैं दूर की तरफ चल पड़ती हैं जहाँ रघु हमेशा की तरह बहार खड़ा हुआ दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार कर रहा tha.........magar कहीं न कहीं उसके अंदर थोड़ी घबराहट भी हो रही thi..........magar उसे यकीन था की आज रघु उसे इस हाल में अगर देखियेगा तो ज़रूर खुस हो jayega...........aur शायद काव्य भी एहि तो चाहती thi.........jaise hi मैं दूर खुला रघु सामने वहीँ दरवाज़े पर खड़ा tha............usi हाल mein........usi अंदाज़ mein..........humesha की तरह आज भी वो पान चबा रहा tha.........wahin रघु की जब नज़र काव्य पर पड़ी उसकी आँखें हैरत से फैलती चली gayi........kyon की उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था की काव्य आज उसके लिए सज सँवाकर आयी hain..........bahar काफी ज़्यादा मोसिटुरे था और हवा भी अब चलनी बंद हो गयी thi...........badal बहुत घने छाए हुए थे ऐसा लग रहा था जब बारिश हो जाये ........वहीँ रघु का जिस्म पसीने से बुरी तरह भीगा हुआ tha...........kuch काम की वजह se,............to कुछ बढ़ते तापमान की वजह से............

" अरे waah..................aaj तो आप बिलकुल क़यामत लग रही हैं मेमसाहेब............" और रघु काव्य के पीछे पीछे चल पड़ता हैं वहीँ उसकी नज़रें हमेशा की तरह आज भी काव्य के गांड पर तिकी हुई thi...........wahin काव्य बहुत ाचे से जानती थी की रघु इस वक़्त क्या देख रहा hoga........magar शायद काव्य को आज ये सब ाचा लग रहा था..........

" नास्ते में .............क्या लेंगे आप............" और काव्य रघु की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ रघु अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता hain...........aaj काव्य के लैंग्वेज में भी थोड़ा सा बदलाव आ गया tha...........jis नौकर से वो कल तक तुम कहकर बुलाती थी आज उसी नौकर को आप कहकर बुला रही thi...........ye बड़ी बात थी.......

" लेने को तो बहुत कुछ हैं memsaheb.........magar क्या आप दे सकती हैं ये चीज़ ज़्यादा मायने रखती hain...........waise आप जो भी देंगी मैं ख़ुशी खुसी ले लूंगा......." और रघु अपने दांत फिर से दिखता हुआ हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य भी रघु के बाटिओं को सुनकर थोड़ी सी शर्मा जाती hain............wo रघु के बाटिओं का मतलब बहुत ाचीय से समझ रही thi............ki रघु का इशारा किस तरफ हैं......

" जो तुम चाहो वो सब कुछ मैं तुम्हें दे सकती हूँ मगर उसको लेने के लिए तुम्हारे अंदर कलेजा होना chahiye............hain तुम्हारे अंदर वो हिम्मत.....!!!! " और काव्य भी रघु की तरफ देखते हुए अपनी बात का जवाब देती हैं वहीँ रघु फिर से हंस पड़ता हैं......

" आपके लिए तो मैं जान दे भी सकता हूँ ..............और किसी की ले भी सकता hoon............aap एक बार हुकुम तो कीजिये.........." और रघु पान चबाते हुए फिर से बोल पड़ता हैं वहीं काव्य उसकी बेटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं..........

" वो तो वक़्त hi batayega.......ki तुम में हैं कितना dum..........kehna बहुत आसान हैं और करना उतना hi मुश्किल.........." और काव्य धीरे से हंस पड़ती हैं...............

" शुक्रिया memsaheb.......jo आपने मेरी बात rakhi............mere खातिर ये साड़ी दुबारा से पहने के लिए..........." और रघु आहिस्ता से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य जवाब में फिर से मुस्कुरा पड़ती हैं.........

" एक बात और kahe.........mujhe आपका ये A.C बिलकुल सूट नहीं karta..........in सब में रहने की आदत आपको हैं ...........मुझे nahin........to क्या आप मेरे खातिर अपना ये A.C बंद करेंगी..........." और रघु फिर से काव्य की तरफ अजीब नज़रियों से देखने लगता हैं वहीँ काव्य कुछ देर तक सोच में डूब जाती hain..........uske लिए A.C में एक पल रहना बहुत मुस्खिल tha.........wo जानती थी की अगर थोड़ी देर के लिए भी A.C अगर बंद हुआ तो वो पसीने से पूरी तरह भीग jayegi...........aur तो और आज गर्मी हर रोज़ से बहुत ज़्यादा भी thi.........magar वो रघु को नाराज़ भी नहीं करना चाहती thi............kuh सोचकर वो A.C बंद कर देती हैं वहीँ रघु फिर से मुस्कुरा पड़ता hain.........raghu ाचे से जनता था की जो लोग A.C में रहते हैं वो अगर ज़रा भी बहार निकले तो वो लोग पसीने से बुरी तरह भीग jayengey..........aur शायद रघु भी एहि चाहता था की काव्य के साथ भी कुछ ऐसा hi हो..............

" शुक्रिया मेमसाहेब..........." और रघु वहीँ पलटी मोड़कर फर्श पर हमेशा की तरह बैठ जाता हैं वहीँ काव्य किचन में जाती हैं और रघु के लिए नास्ता लेकर आती hain...............aaj नास्ते में दो केले .........एप्पल और इडली सांभर they.........jo ख़ास आज काव्य ने रघु के लिए बनाये they............wo ट्रे लेकर जैसे hi नीचे की तरफ झुकाती हैं एक बार फिर से रघु का लुंड उसकी आँखों के सामने नज़र आने लगता hain...........ek बार फिर से उसकी सांसें भरी होने लगती hain............wahin एक बार उसका दिल फिर से मचलने लगा tha........choot में गीलापन फिर से बढ़ने लगा tha.........jaise तैसे वो अपने सांसों को संभालती हैं और आकर वहीँ सोफे पर बैठ जाती हैं.........

A.C बंद होने की वजह से काव्य को अब धीरे धीरे पसीने होने लगे they.......upar से बहार का मौसम इतना गरम था की उसकी बेचैनी अब बढ़ती जा रही thi.........wahin रघु के जिस्म से भी पसीने अब धीरे धीरे बह रहे they...........raghu कुछ देर तक काव्य के तरफ टकटकी लगाए देखता रहता हैं फिर वो अपने t-shirt के अंदर से काव्य की ब्रा निकलता हैं और उसे अपने जगहों पर रख देता hain........wahin काव्य बड़े गौर से रघु के हर एक हरकतों को देख रही thi.........laal ब्रा होने की वजह से उसमें सफ़ेद सफ़ेद दाग साफ़ नज़र आ रहे थे जो काव्य को समझने के लिए काफी थे की ये दाग आखिर किस चीज़ के हैं.........

"रघु अगले hi पल उस ब्रा को अपने मुँह के पास ले जाता हैं और ब्रा के एक कप में अपने मुँह में रखा कुछ पान का पीक उसमें थूक देता hain...............wahin काव्य उसे अजीब नज़रियों से देख रही thi.......aur उसका दिल भी अब ज़ोरों से धड़कने लगा tha.............pata नहीं रघु उसकी ब्रा की और क्या क्या हालत करेगा वो एहि सोचकर हैरान thi........magar उसे रघु की साडी हरकतें धीरे धीरे अब पसंद आ रही thi.........wahin उसका इंकार भी धीरे धीरे अब ख़तम होता जा रहा था.............

रघु फिर से एक पान का टुकड़ा अपने t-shirt से बहार निकता हैं और उसे मुँह में लेकर फिर से चबाने लगता hain.......fir वो उस ब्रा को हवा में लटकते हुए सीधा काव्य के तरफ चल पड़ता hain..............wahin काव्य अजीब नज़रियों से रघु को अपने तरफ आता हुआ देख रही thi............wahin उसका दिल अब ज़ोरों से घबरा रहा tha.........wo ाचे से जानती थी की रघु जैसे hi उसके पास आएगा वो उसे इंकार नहीं कर payegi............aur शायद काव्य उसे इंकार करना भी नहीं चाहती thi............ek अजीब सी प्यास फिर से काव्य के अंदर अब धीरे धीरे जनम लेने लगी थी..........

कॉन्टिनोएड...........................................................
 
फिर से मेरा 10 कब का अपडेट लॉस्ट हो gaya.......kal से मैं तीन बार लिख चूका हूँ और हर बार ये अपडेट लॉस्ट हो जा रहा hain..........mood पूरा ऑफ हो चूका hain........agla अपडेट जल्द दूंगा....
 
अपडेट- 32(ा) (मेघा अपडेट)

रघु फिर से एक पान का टुकड़ा अपने t-shirt से बहार निकता हैं और उसे मुँह में लेकर फिर से चबाने लगता hain.......fir वो उस ब्रा को हवा में लटकते हुए सीधा काव्य के तरफ चल पड़ता hain..............wahin काव्य अजीब नज़रियों से रघु को अपने तरफ आता हुआ देख रही thi............wahin उसका दिल अब ज़ोरों से घबरा रहा tha.........wo ाचे से जानती थी की रघु जैसे hi उसके पास आएगा वो उसे इंकार नहीं कर payegi............aur शायद काव्य उसे इंकार करना भी नहीं चाहती thi............ek अजीब सी प्यास फिर से काव्य के अंदर अब धीरे धीरे जनम लेने लगी थी..........

अब आगे..........................................................................................

रघु काव्य के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो जाता hain............ussey satkar...........aab उसके जिस्म और काव्य के जिस्म के बीच बस कुछ hi इंच का फासला रह गया tha............wahin काव्य फिर से रघु को अपने करीब पाकर मदहोश होने लगी thi..............ek अजीब सी स्मेल रघु के बदन से बार बार उठ रही थी जो काव्य के होश को अब चींटी जा रही thi...........wahin काव्य का बदन बुरी तरह से पसीने से डूबता जा रहा tha.........wahin उस कमरे में मॉइस्चर इतना ज़्यादा था की उसका दम जैसे घुटता सा महसूस हो रहा tha.......upar से A.C भी बंद थी और कमरे की सभी खिड़ियाँ bhi........usey अब गर्मी बर्दास्त नहीं हो रही थी मगर उसे रघु की ख़ुशी के लिए सब मंज़ूर था..........

रघु हौले से अपने हाथ काव्य के कमर की तरफ बढ़ता हैं और उसे इस बार कसकर अपनी मज़बूत बाँहों में जकड लेता hain...........aab उसका हाथ काव्य के पेट पर था जिसे वो काव्य को अपनी गिरफ्त में लिए हुआ tha.........wahin काव्य किसी बेल की तरह रघु के बदन से चिपकी हुई thi..........aab रघु और काव्य के बीच जो बची खुची दूरी थी अब वो भी ख़तम हो गयी thi..............kavya के बदन से उठने वाली गरम सांसें रघु पल पल महसूस कर रहा tha............kyon की उसका चेहरा अब काव्य के बहुत करीब tha........wo हौले से अपना गन्दा होंठ काव्य के शोल्डर्स पर रख देता हैं और बहुत आहिस्ता से वहां चूम लेता hain.........uske इस हरकत पे काव्य को जैसे 440 वाल्ट जितना झटका लगता हैं वहीँ उसकी आँखें लजात से बंद होने लगती hain...........kaleja उसका ज़ोरों से धड़क रहा tha..........wahin छूट की गर्मी भी धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी...........

आज न रघु काव्य को संभालने देने वाला था और न खुद रुकना चाहता tha..............kyo की आग आज दोनों तरफ बराबर लगी हुई thi.............raghu अपने होंठों को धीरे धीरे हरकत करने लगता hain..............aab वो अपना जीभ हौले से बहार की तरफ निकलता हैं और बहुत आराम से काव्य के शोल्डर पर घूमने लगता hain..........magar बहुत धीरे धीरे se..........aab उसके मुँह से बेहटा कुछ लार और पान का रूस काव्य के बदन पर गिरता जा रहा tha........saath hi साथ वो उसके पसीने को भी अपने जीभ से चाटता जा रहा tha..........kavya बुरी तरह से मचल उठी thi........raghu की एक एक हरकत उसकी छूट में आग लगाती जा रही thi........jo अब धीरे धीरे उसके बर्दास्त के बहार होता जा रहा था..........

काव्य अब सिर्फ कठपुतली बनकर रह गयी थी और रघु आज उसे अपने इशारों पर नचा रहा tha.......jaise chahe.......jo chahe......uske साथ कर रहा tha...........ek हाई क्लास मॉडर्न अमीर घराने की लड़की आज एक लौ ग्रेड नौकर की बाँहों में thi..........aur वो नौकर काव्य के हसीं बदन के साथ खेल रहा tha..........magar कहीं से भी काव्य को कुछ भी बुरा नहीं लग रहा tha.......ek अजीब सा नशा .......एक अजीब सा खुमार उसपर चाय हुआ tha........wo तो जैसे उसकी आगोश में थी..........

रघु अपना जीभ हौले हौले से काव्य के ष्होल्डर्स पर चलाये जा रहा tha..........jab काव्य की शोल्डर्स पान के पीक की वजह से लाल हो जाती हैं रघु अपना जीभ ऊपर की तरफ बढ़ाने लगता hai..........uski गुर्दें की taraf................aab वो उसी अंदाज़ में काव्य के गुर्दें पर अपना जीभ फेर रहा tha........to कभी उसके कान को चाट leta.........kavya का बुरा हाल tha......jaise तैसे वो खुद को सम्भले हुई thi..........magar कब तक अपने आपको वो संभाले रहती ये कहना ज़रा मुश्किल tha.........kyon की उसे ऐसा नहीं लगता था की वो ज़्यादा देर तक खुद को अब रोक payegi...........wahin काव्य की छूट में सेंसेशन होना शुरू हो गया था...........

रघु उस ब्रा को ऊपर की तरफ ले जाने लगता hain...........kavya के चेहरे की taraf.............wahin वो अब भी उसके गुर्दें से लेकर शोल्डर्स तक अपना जीभ चला रहा tha......chaat रहा tha...........shayad काव्य को भी अब इस खेल में मज़ा आने लगा tha.........kahin से भी उसके अंदर इंकार की कोई भावना नज़र नहीं आ रही thi..........raghu उस ब्रा को काव्य के होंठ के पास ले जाता हैं और धीरे धीरे उस ब्रा को उसके चेहरे पर घूमने लगता hain............kabhi उसके नाक par......to कभी उसके गलों par...........fir वो ब्रा की एक कप जिसमें अभी उसने कुछ देर पहले पान का पीक डाला हुआ था वो हिस्सा काव्य के होंठों की तरफ ले जाता हैं और अपने उँगलियों को धीरे धीरे हरकत कररने लगता है.........

वो बहुत हौले से काव्य के होंठों पर अपनी उंगलियां चला रहा tha......saath hi साथ उस ब्रा को भी उसके होंठों पर फेर रहा tha............thoda सा ज़ोर लगाने पर काव्य हौले से अपना लैब खोल देती हैं और अगले hi पल रघु अपनी गन्दी काली ऊँगली काव्य के मुँह में धीरे धीरे पुश करने लगता hain..........saath hi साथ वो पान का पीक वाला हिस्सा भी अब उसके मुँह के अंदर जाने लगा tha.....jo उसकी जुबान से घुलने लगा tha..........ek पल तो काव्य को ऐसा लगा की मनो उसे उलटी हो jayegi..........kyon की पान का वो टास्ते बहुत अजीब सा tha........jo अब उसकी जुबान से होता हुआ नीचे उसकी हालतक में उतर रहा tha............wahin रघु धीरे धीरे उस ब्रा के उस कप को और भी अंदर की तरफ पुश करता जा रहा tha..........wahin उसका दूसरा हिस्सा जिसपर छुम लगने से सफ़ेद निशान पढ़ गए they.............pata नहीं ये छुम रघु का था या फिर जीतू का.........

वहीँ ब्रा के दूसरे कप में भी छुम के कुछ निशान थे जो काव्य अपने मुँह में इस वक़्त ली हुई thi..........wahin रघु ब्रा का दूसरा कप अपने मुँह में ले लेता हैं और उसे धीरे धीरे से चूसने लगता hain.............wahin काव्य अजीब सी नज़रियों से उसे देखे जा रही thi.......aur शायद एहि सोच रही थी की ये कैसा इंसान हैं जो अपना hi छुम खुद चाट रहा hain..........shayad कहीं न कहीं रघु की ये गंगादि hi काव्य को अपनी तरफ अत्त्रक्ट कर रहा tha........isi वजह से वो रघु के तरफ और भी खींचती चली आ रही थी........

अब ब्रा का एक हिस्सा रघु के मुँह में tha............wahin दूसरा हिस्सा काव्य के मुँह mein..........kavya जहाँ रघु के मुँह से निकला पान का पीक और कुछ छुम अपने हलक में उतर रही थी वहीँ रघु भी उस ब्रा को किसी अमृत की तरह चूसे जा रहा tha.........bra का 1/2 हिस्सा जब काव्य के मुँह में चला जाता हैं वो कुछ देर तक उसे ऐसे hi काव्य के मुँह में रहने देता hain.......fir वो उसे बहार की तरफ निकलने लगता hain..........kavya के मुँह में रहने से ब्रा का आधा हिस्सा भीग गया tha........wahin रघु अपने मुँह में रखा ब्रा निकलता हैं और उसी हिस्से को दुबारा से काव्य के मुँह में डालने लगता hain.......aur ब्रा का दूसरा हिस्सा वो उसके चेहरे par......to कभी उसके नाक par....to कभी उसके गलों पर धीरे धीरे से फेरने लगता hain.........aab काव्य का चेहरा पान के पीक की वजह से लाल पढता जा रहा tha..........ek अजीब सा नशा था उसके इस अंदाज़ mein......wo खुद को रोक नहीं पा रही थी और न रघु को रोकना चाहती थी........

" memsaheb............main आपके इन चूचियों को अपने हाथों से चूना चाहता hoon.......unhein मसलना चाहता hoon.........agar आपकी इज़ाज़त हो तो क्या मैं.............." और रघु काव्य के कान पर अपना जीभ फेरता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य इस बार ज़ोरों से aaaaaaaaaaaaaaaaassssssssssssssssssshhhhhhhhhhhh करती हुई लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain.........aab वो कुछ भी कहने और सुनने के मूड में नहीं thi........usey तो बस अपनी प्यास बुझानी thi...........chahe जैसी बुझे.........

" aaaaaaaaaaahhhhhhhhh...........rrraaggghhuuuuu........jjjoooootuummharaaaa dilllllllkaareeee........pppppllllsssssssssssss ककाआरूऊऊ..." और काव्य की सांसें पूरी तरह से फूलने लगती hain........uski धड़कन उसके बस में नहीं thi.........aab सब कुछ उसके बस से बहार होता चला जा रहा tha..........wahin रघु काव्य की बेबसी पर हंस पड़ता hain.........wo तो काव्य का शिकार बड़े इतमीनान से करना चाहता tha............chudai उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं thi.........aur वो बहुत ाचे से जनता था की दो मिनट लगेगा काव्य को अभी नंगा करने mein........fir वो उसकी छूट में अपना लुंड डालकर उसकी छूट ाचे से marega...........magar इससे होगा क्या!!!!! जो चीज़ उसे चाहिए थी वो उसे आराम से हासिल करना चाहता tha..........aur काव्य तो अब कहीं से भी इंकार के मूड में नज़र नहीं आ रही थी...........

" memsaheb...........aapko अपना वादा याद हैं na.............maine आपसे आपकी पंतय मांगी thi............agar आपकी इज़ाज़त हो तो मैं.............." और रघु इतना कहकर डरा से खामोश हो जाता हैं वहीँ काव्य लुम्बी लुम्बी सांसें लेती हुई अपनी सांसों को दुरुस्त कर रही thi.........magar वो इसमें सफल नहीं हो पा रही थी............

" ppppppppppllllllsss raaaagggghhhhhuuuu.............jooooooo टट्ट्टूमंहःहैहराआआ ड्डड्डीईई ललललललल kaaaaareeeeeeee......wwwwooooo काआररररररूओ........" और काव्य हौले से बोल पड़ती hain........aaj उसने रघु को पूरी तरह से चूत दे दी thi........wahin रघु उसका जवाब सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता hain..........aaj बड़े घराने की मालकिन उस दो टेक के नौकर के सामने बिलकुल बेबस सी नज़र आ रही thi..........kahin न कहीं रघु अपनी जीत पर इत्र रहा tha........magar जो भी था उसे आज किसी बात की कोई जल्दी नहीं थी.........

" main.......kya करूँ memsaheb.........zara खुलकर कहिये ना............." और रघु इस बार काव्य के नंगी पीठ पर अपने गंदे होंठ हौले से रख देता हैं जिससे काव्य बुरी तरह से मचल जाती hain..........wahin रघु आहिस्ता आहिस्ता से उसके नंगी पीठ को चाट रहा tha.......uske पसीने को अपने गले के नीचे उतर रहा thaa..........wahin काव्य बस हौले हौले से सिसक रही thi..........raghu अपना जीभ काव्य के पीठ के सभी हिस्सों पर धीरे धीरे फेर रहा tha........saath hi साथ काव्य को एक गुदगुदी सी हो रही thi.......magar छूट में जैसे कोई शोला भड़क उठी thi........uska साबरा अब बर्दास्त के बहार होता जा रहा tha........wahin रघु तो आज उसके साथ कुछ और hi खेल खेलने में लगा हुआ tha..........poorey पीठ पर पान के लाल लाल निशान पढ़ते जा रहे they............saath hi साथ उसके थूक और लार से काव्य का गोरा साफ़ सुथरा बदन अब मैला सा होता जा रहा tha..........wo भी धीरे धीरे काव्य को अपने रंग में पूरी तरह से रंगता जा रहा था..........

कॉन्टिनोएड...............................................................
 
अपडेट-32 (बी) (मेघा अपडेट)

तभी बिजली की तेज़्ज़ कड़कड़ाहट हुई और काव्य जैसे दुर्र से बुरी तरह सेहम gayi..............wo फ़ौरन पलट जाती हैं और रघु के सीने से चिपक जाती hain........aur अपना सर उसके सीने में कहीं छुपा लेती hain..........uska दिल इस वक़्त बुरी तरह से धड़क रहा tha.......kuch दुर्र से to........kuch एक्ससिटेमेंट se........wahin रघु बड़े प्यार से काव्य के सर पर .......उसके बालों पर अपने हाथ फेरे जा रहा tha........wahin काव्य किसी छोटे बाचे की तरह अभी भी रघु के सीने में सिमटी हुई thi.........aapne आपको छुपाये हुई थी...........

" क्या हुआ memsaheb.........aap दुर्र गयी क्या!!!!!!!! " और रघु काव्य के चीन पर अपने हाथ हौले से रख देता हैं और उसके चेहरे को अपनी तरफ ऊपर की तरफ उठता hain.......wahin काव्य एक नज़र रघु की तरफ देखती हैं फिर वो हौले से अपनी आँखें बंद कर लेती hain.......magar कहती कुछ nahin.........wahin रघु उसे देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" आपने मेरे सवालों का जवाब नहीं diya.............bataiye न मैं क्या करूँ............" और रघु काव्य की तरफ देखता हुआ फिर से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य का शर्म से बुरा हाल tha........wo ाचे से जानती थी की रघु उसके मुँह से क्या कहलवाना चाहता hain......aur वो क्या सुनना चाहता hain............magar उसके अंदर इतनी भी हिम्मत नहीं थी की वो एक लफ्ज़ भी कुछ कहे..........

" rrraagghhhuuuuuu.........yeeeee..mmuujhhsseee नननननहहःननीयी होऊँगा..........." और काव्य फिर से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं..........

" memsaheb.......aapse तो सब कुछ hoga..........magar समय आने पर..........." और रघु इस बार अपना होंठ काव्य के गलों पर रख देता हैं और बड़े प्यार से काव्य के गलों को चूम लेता hain..........saath hi साथ वो अपना जीभ काव्य के गलों पर फिर से फेरने लगता hain..............aur जब उसका होंठ काव्य के होंठों पर आता हैं वो बड़े प्यार से उसके होंठों को चूम लेता hain..........aur हौले हौले से उसके निचली होंठों को अपने काळा होंठों के बीच दबाकर चूसने और काटने लगता hain..........aab रघु के मुँह से पान का पीक और उसका लार सब धीरे धीरे काव्य के होंठों के अंदर जाने लगा tha........wahin काव्य फिर से जैसे मदहोश होती जा रही thi..........aab उसने आपने आपको रघु के हवाले कर दिया था...........

रघु बड़े इतमीनान से काव्य के होंठों का रूस पी रहा tha............choos रहा tha......kaat रहा tha.........wahin अब उसके दोनों हाथ काव्य के कमर से नीचे की तरफ सरकते हुए काव्य के गांड की तरफ जा रहे they.......magar हौले haule..........wahin वो उसके जीभ को कभी अपने डेंटन के बीच दबा deta......to उसे कभी अपने मुँह में लेकर चूस leta...........aab पान का ज़ायका काव्य के रगों में भी घुलता जा रहा tha.............aur सच तो ये था की उसे अब इस खेल में मज़ा भी आ रहा था...........

रघु अगले hi पल अपने दोनों हाथ काव्य के गांड पर हौले से रख देता हैं और उसे कसकर अपने खुरदुरे हाथों से मसल देता hain..........wahin काव्य की दिल की धड़कनें और तेज़्ज़ होने लगती hain........uska बदन पसीने से बुरी तरह भीग गया tha.....wahin रघु अब काव्य के गांड के दोनों भाग को मसल रहा tha.........to कभी खेल रहा tha.........wahin काव्य हुअल हौले से सिसक रही thi...........kavya की दोनों चूचियां अब रघु के सीने से दबी हुई थी जिन्हें रघु आपने सीने में महसूस कर रहा था.......

वो फिर से काव्य को दूसरी तरफ घूमता हैं और फिर से काव्य के ठीक पीछे जाकर्र खड़ा हो जाता hain........theek satkar........aab एक बार फिर से उसका कला नाग काव्य की गांड की दरार में दस्तक दे रहा tha............wo बहुत ाचे से रघु के काळा मोठे नाग को अपनी गांड के दरारों के बीच महसूस कर रही thi...........wahin उसकी बेचैनी भी अब बढ़ती जा रही थी.............

" वैसे memsaheb...........mujhe आपके जिस्म में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा खूबसूरत लगती hain............ek तो आपकी ये बड़ी बड़ी chuchiyaan.........jinhein देखने के बाद मुन्न तो करता हैं की मैं इन्हें बस अपने हाथों में लेकर मसलता rahun........aur इनके साथ बस खेलता rahun...........aur दूसरी आपकी ये gand..........jo मेरे इस दिल पर बिजली गिरा देती hain...........jee तो करता हैं की मैं बस आपकी गांड के साथ ऐसे hi खेलता रहूं..........." और रघु की ऐसी बातें सुनकर काव्य की छूट में गीलापन फिर से बढ़ने लगता hain.........jaise तैसे वो खुद को संभाले हुई थी मगर आज शायद रघु उसे पल भर के लिए भी संभालने नहीं देने वाला था..........

" बताइये naa..........kya मैं इन्हें पकड़ लून........" और रघु अपने हाथों को काव्य की नंगी पेट पर फेरता हुआ आहिस्ता से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य बस जवाब में हौले से सिसक पड़ती hain..........wo तो जैसे आज होश में थी hi nahin...........wahin रघु उसकी प्यास को बुझाने के बजाये पल पल भड़का रहा था.........

" raaaagghhhuuu........muuujheeee ाअऔऊरररर नाआआ taaaadfddpppapaawwoo.......ppplllleeeaasseee....." और काव्य फिर से जैसे रघु के सामने फर्याद करने लगती हैं वहीँ रघु इस बार अपना होंठ फिर से काव्य के होंठों पर रख देता हैं और उसके होंठों को बुरी तरह से चूसने लगता hain.........wahin वो अपना दोनों हाथ सरकते हुए ऊपर की तरफ ले जाने लगता hain........uske चूचियों की taraf.........jaise जैसे उसके हाथ ऊपर की तरफ सरक रहे थे वैसे ब्वाइसे काव्य और भी बेचैन होती जा रही thi............fir वो घडी भी आ गयी जिसका रघु को शिद्दत से इंतज़ार था........

बिना वक़्त गंवाए वो अपने खुरदुरे हाथों को इस बार काव्य के चूचियों पर हौले से रख देता हैं और बहुत आराम से उसपर अपना हाथ धीरे धीरे से फेरने लगता hain.......mano वो जायज़ा ले रहा हो की उसकी चूचियों का की क्या वो सच में बड़े hain..........wo जैसे उसकी गोलाई को माप रहा ho...........blouse और साड़ी के ऊपर se.............aab उसके दोनों हाथ काव्य के दोनों चूचियों पर घूम रहे they.........aur इधर वो उसके होंठों को चूस रहा tha........apne थूक को उसके मुँह के अंदर दाल रहा tha........to कभी काव्य के थूक को अपने मुँह mein...........wahin उसका ब्रा फर्श पर गिरा पड़ा tha.......mano जैसे उसकी ज़रुरत अब ख़तम हो गयी हो.............

रघु के दोनों हाथ अब काव्य के चूचियों पर they...........agle hi पल वो पूरी ताक़त से काव्य के दोनों चूचियों को मसला देता हैं वहीँ काव्य न चाहते हुए भी ज़ोरों से सिसक पड़ती hain..........uski छूट में तेज़्ज़ संसानत होती हैं जिससे उसकी छूट और भी पानी छोड़ने लगती hain..........aab उसकी पंतय लगभग भीग चुकी thi.........wahin रघु इस बार बुरी तरह से काव्य के दोनों चूचियों को किसी आते की तरह गूंथ रहा tha.......masal रहा tha........wahin काव्य बस सिसक रही thi..........aur साथ hi साथ वो अपना लुंड काव्य की गांड पर भी रगड़ता जा रहा tha..........uske इस हरकत पे काव्य जैसे पागल हो उठी thi..........wahin वो लुम्बी लुम्बी सांसें लेती हुई अपने आपको संभल रही थी...........

" memsaheb........aapne बताया नहीं की क्या मैं आपकी पंतय निकलूं या नहीं.........." और रघु फिर से बोल पड़ता hain......wahin काव्य क्या कहती .........रघु ने उसे अब कहने लायक छोड़ा hi कहाँ tha..........wo तो बस सिसक रही thi........apne आपको काबू में कर रही थी मगर रघु उसे पूरी तरह से बेकाबू करता जा रहा था.......

" aaaaaaaassssshhhhhhhhhhhhhhhh...........rrraaagghhhuuuuu......aaabbbbbbbbbbbb..aaauurrrrr नाआ taaaddddppawwoo............."aur काव्य फिर से बोल पड़ती hain.......uski सांसें फूलती जा रही thi......wahin रघु अभी भी उसकी चूचियों के साथ खेले जा रहा था.........

" memsaheb.........aapne कंधे पर लगा ये साड़ी का पिन निकल दीजिये नाआ..........." और रघु फिर से काव्य के कान और गुर्दें पर जीभ फेरता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य धीरे से आँखें खोलती हैं और अपने दोनों हाथ अपने कंधे पर ले जाती हैं और साड़ी पर लागर सेफ्टी पिन खोल देती hain.......agle hi पल उसका साड़ी सरकता हुआ नीचे फर्श पर गिर पड़ता hain..........aab काव्य रघु के सामने ब्लाउज में कड़ी थी वहीँ रघु फिर से अपने दोनों हाथों को उसकी चूचियों पर ले जाता हैं और फिर से उन्हें मसलने लगता हैं............

" आप तो अभी से हार गयी memsaheb...........khel तो अभी शुरू हुआ hain..............main आपकी पंतय उतर तो सकता हूँ मगर ................" और रघु फिर से चुप हो जाता hain..........wahin काव्य का अब बुरा हाल tha.......wo अब पूरी तरह से बेबस हो चुकी thi.......chhoot की आग ने उसे आप पूरी तरह से पागल कर दिया tha........agar उसका बस चलता तो वो वहीँ नंगी होकर रघु का कला मोटा लुंड अपनी छूट में ले लेती मगर ये कमीना रघु उसे छोड़ भी तो नहीं रहा tha..........wo तो बस उसके साथ खेल रहा tha..........uske बदन के saath.....uski भावनाओं के साथ...........

" माआगर कयय्यआआ रग्गगहहु........." और काव्य फिर से सिसक पड़ती hain.........wahin रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं.......

" मैं चाहता हूँ की आज मैं अपने हाथों का इस्तेमाल न karun.......aur आपकी पंतय मैं खुद अपने डेंटन से nikalun...........uske लिए अब आगे मुझे क्या करना होगा ये आप ाचे से समझ सकती हैं..............." और रघु इतना कहकर फिर से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य भी अब ाचे से जानती थी की आगे रघु उसके साथ और क्या क्या करने वाला hain..........ye ख्याल आते hi एक बार उसकी छूट में गीलापन फिर से बढ़ने लगता hain........dekhna था की ये सिर्फ शुरुवात thi..........ya फिर कुछ और...............................

कंटिन्यू......................................................................
 
अपडेट -33 (ा) (मेघा अपडेट)

" मैं चाहता हूँ की आज मैं अपने हाथों का इस्तेमाल न karun.......aur आपकी पंतय मैं खुद अपने डेंटन से nikalun...........uske लिए अब आगे मुझे क्या करना होगा ये आप ाचे से समझ सकती हैं..............." और रघु इतना कहकर फिर से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य भी अब ाचे से जानती थी की आगे रघु उसके साथ और क्या क्या करने वाला hain..........ye ख्याल आते hi एक बार उसकी छूट में गीलापन फिर से बढ़ने लगता hain........dekhna था की ये सिर्फ शुरुवात thi..........ya फिर कुछ और...............................

अब आगे..................................................................

काव्य इस वक़्त पूरी तरह से बेबस नज़र आ रही thi..............na तो रघु उसे संभालने दे रहा tha........aur न वो खुद को संभल पा रही thi............raghu hi जनता था की वो कैसे खुद को अब तक संभाले हुआ tha.......aisi हसीं पारी को पाकर भी वो खुद को अब तक रोके हुए tha...........ye बहुत बड़ी बात thi............jee तो उसका भी कर रहा था की वो अभी काव्य को पूरा नंगा करके उसपर टूट pade.........aur उसे जी भर छोड़ de.............magar ऐसे जल्दबाज़ी में सारा कियेकराये पर पानी फिर jata...........fir काव्य कभी उसकी मुठी में नहीं आती..........

" memsaheb.........aapne मेरे सवालों का जवाब नहीं diya............bataiye न मैं क्या करूँ..........." और रघु फिर से अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य पूरी तरह से खामोश thi.........kaleja अभी भी उसका बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha..........wo तो अपने बदन की आग में पल पल जल रही thi........aur यहाँ रघु था की उससे बस सवाल जवाब किये जा रहा tha........munn hi मुन्न उसे रघु पर गुस्सा भी आ रहा था मगर चाह कर भी वो एक लफ्ज़ उससे कुछ नहीं बोल पा रही थी..........

" तत्तुम्हहाराआ जजूऊऊ डीएल काआरीई वोओओओओ kkkkkkaaarrrrrooooo.......ppppllllllllleeeeeaaaaaasssseee......" और काव्य का साबरा अब पूरी तरह से जवाब देने लगता hain............wahin रघु एक बार फिर से काव्य की बेबसी देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं..........

" ये क्या memsaheb..........aap तो अभी से हार मान li.............khair.........koi बात nahin...............aisa होता hain..........waise आपकी चूचियों की साइज क्या हैं............." और रघु इस बार अपने दोनों हाथ फिर से काव्य के चूचियों पर रख देता हैं और फिर से धीरे धीरे काव्य के दोनों चूचियों को अपने कठोर हाथों से मसलने लगता hain..........blouse के ऊपर से उसकी दोनों निप्पल्स को धीरे धीरे खींचने lagta.............to कभी अपनी दोनों उँगलियों के बीच कसकर दबा deta.......wahin काव्य न चाहते हुए भी ज़ोरों से सिसक padti.........magar न वो खुद रघु से दूर हटती हैं और न रघु को रोकने की कोशिश करती hain...........wahin रघु जैसे अपने हाथों से उसकी चूचियों की साइज नाप रहा हो...........

" बताइये न memsaheb...........aapki साइज कितनी हैं..........." और रघु इस बार ज़ोरों से काव्य की दोनों चूचियों को मसलने लगता हैं वहीँ काव्य न चाहते हुए भी ज़ोरों से सिसक पड़ती hain.........aankhein लजात से उसकी बार बार बंद हो रही thi......wahin छूट में गर्मी अब अपने पूरे उफान पर thi...........shayad पंतय के नीचे से कुछ पानी अब उसकी गोरी टांगों से नीचे की तरफ बहने लगा था...........

" 36........aaaaasssssssshhhhhiiiiiiiiiii......." और काव्य हौले से सिसक पड़ती हैं वहीँ रघु फिर से मुस्कुरा पड़ता hain...........is बार रघु अपने दोनों हाथ नीचे की तरफ ले जाने लगता hain........kavya के कमर के taraf.........fir वो उसे सरकता हुआ पीछे की तरफ ले जाता hain..........kavya के गांड par.......jaise hi उसके दोनों हाथ काव्य के गांड को छूटे हैं वो बड़े आराम से उसकी गोल गोल गांड पर अपने हाथ धीरे धीरे से घूमने लगता hain........sehlaney लगता hain............kabhi वो उसके एक गांड के हिस्से को थम leta.......to कभी dusara...........wo बरी बरी से उसकी दोनों गांड को मसले जा रहा tha..........apne खुरदुरे हाथों से रगड़ रहा tha.........wahin काव्य और भी ज़ोरों से सिसक रही thi............aahein भर रही थी............

" और इसका साइज.........." रघु काव्य के गांड के दोनों भाग पर अपने हाथ रखता हुआ फिर से बोल पड़ता hain...........wahin काव्य शर्म से दोहरी होती चली जाती hain............aaj रघु उसकी शर्म को......... उसकी लाज को मिटटी में मिला रहा tha.........jo शब्द वो कभी कहना नहीं चाहती थी आज रघु एक एक कर उससे बुलवा रहा था..........

" 38............ssssssshhhhhhhhhhhh..........aaab बब्बूउसस भहहभीई ककाकररररओओओओओओओओ राआगजगहःहूउउ......" और काव्य फिर से तड़प उठती hain........magar रघु को कहाँ उसपर दया आ रही thi.........wo तो उसकी बेबसी का पूरा पूरा मज़ा ले रहा था..........

" अरे waah..............aapki साइज तो किसी फिल्म की हीरोइन माफ़िक़ hain.........waise एक बात पूछूं मेमसाहेब............" और रघु इस बार काव्य के कान पर फिर से अपना गन्दा जीभ रख देता हैं और धीरे धीरे से उसके कान को तो कभी उसके गुर्दें को चटनी लगता hain...........wahin काव्य फिर से जैसे तड़प उठती hain...........wo अब रघु के सामने पूरी तरह से बेबस हो चुकी thi........aur ये बात भी ाचे से जानती थी की ये कमीना करेगा अपनी hi wali........iske आगे कहना सब बेकार hain..........magar इस छूट की आग का क्या kare........wo तो अब उसे अंदर hi अंदर जलाये जा रही थी..........

" ककककयाआआआआ......." और काव्य न चाहते हुए भी धीरे से बोल पड़ती hain.........wahin रघु उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ता है.........

" मालिक आपको ठीक से छोड़ते थे की nahin...........aapki बुर की प्यास ठीक से बुझाते थे या नहीं........." और रघु फिर से अपना जीभ काव्य की गुर्दें पर फेरने लगता hain........chatney लगता hain...........wahin काव्य का और भी बुरा हाल tha........wo अब रघु को कैसे बताती की राहुल उसे ठीक से खुस कर पता हैं या nahin..........agar कर पता तो क्या वो इस तरह से आज उसकी बाँहों में hoti..........agar नहीं तो उसका पति क्या एक na-mard hain...........chaah कर भी काव्य कोई जवाब नहीं दे पति वहीँ रघु उसकी गांड को अपने खुरदुरे हाथों से मसले जा रहा tha.......uske गांड के दोनों फांकों को अलग karta....to कभी hilata...........to कभी मसलता........

" आप चुप क्यों हैं memsaheb..........bataiye नाआआ............." और रघु फिर से बोल पड़ता hain............wahin काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं.........

" ववववववूऊओ ममुहझे बबआहहहउतत्ट खहहस्सस रखहहतय hhhhaaaaaiiiiinnnnnnn..............aaaaaaahhhhhhhhssssssssssssss........." और काव्य की सांसें फूलने लगती हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ता हैं...........

" तो क्या आप साहेब का लुंड अपने मुँह में भी लेती thi............aur अपनी गांड में bhi...........kya आपने अपनी गांड मरवाई हैं कभी उनसे.........." और रघु अब तो जैसे अश्लील शब्दों पर उतर आया tha.........wo ाचे से काव्य की मानसिकता को समझ चूका tha........kavya इस वक़्त ऐसी स्थिति में थी जहाँ वो चाह कर भी रघु को कुछ नहीं बोल सकती thi........na hi किसी बात से इंकार कर सकती thi........wo तो जैसे उसकी हाथों की कठपुतली बन चुकी thi.......raghu चाहे जैसा उसे nachaye...........wo उसके हर एक इशारों पर नाच रही थी............

" वुवूऊऊ mmmaaaaiiinnnn.......naaahhnniiiinnnnnn.....lllleeeettttttiiiiiiiiii........wwwaaaaahhhhaaaannnnnnnnn............" और काव्य की जुबान जैसे फिर से लड़खड़ा जाती hain............sansein एक बार फिर से उसकी भरी होने लगी thi........wahin रघु हौले हौले से मुस्कुरा रहा tha.........muskura इस लिए रहा था क्यों की काव्य शादी शुदा होने के बावजूद अभी थोड़ी काची काली thi............aab तो उसे hi इस काली को फूल जो बनाना था..........

" अगर आपकी इज़ाज़त हो तो क्या मैं आपकी ये ब्लाउज का हुक खोल दू............" रघु की बातें पूरी होती तभी बिजली की एक तेज़्ज़ कड़कड़ाहट फिर से होती hain.......aur काव्य एक बार फिर से बुरी तरह सेहम जाती hain.......wo फिर से रघु के सीने से लग जाती हैं और लुम्बी लुम्बी सनें लेने लगती hain...........wahin रघु किसी छोटे बाचे की तरह काव्य को फिर से दुलार रहा tha..........aab तो इंकार और इज़ाज़त का कोई सवाल hi कहाँ रह गया था...........

" मेरे रहते आप इतनी डर्टी क्यों हैं memsaheb...........main हूँ ना..........." और रघु फिर से काव्य के पीछे आता हैं और अपने गंदे हाथ धीरे धीरे से काव्य के शोल्डर्स से फेरता हुआ उसकी नंगी पीठ तक फेरता रहता hain...........wahin काव्य बुरी तरह से सिसक पड़ती hain...........is बार रघु अपने दोनों हाथ काव्य के पीठ पर ले जाता हैं और ब्लाउज का हुक एक एक कर खोलने लगता hain..........jaise जैसे उसके हाथ बढ़ते जा रहे थे वैसे वैसे काव्य की सांसें भी बढ़ती जा रही thi............blouse की आखरी हुक खुलते hi ब्लाउज बिलकुल ढीली सी पढ़ जाती हैं और अंदर काव्य की ब्रा की स्ट्रिप्स साफ़ नज़र आने लगती hain.........wo बड़े गौर से काव्य के नंगी पीठ की तरफ देख रहा था...........

कॉन्टिनोएड......................................................................
 
अपडेट-33 (बी) (मेघा अपडेट)

वो आगे बढ़ता हैं और फिर से काव्य के पीठ को चूम लेता hain..........chaat लेता हैं .........वहीँ काव्य न चाहते हुए फिर से सिसक पड़ती hain.........uski पीठ से लेकर उसकी गाल तक का पूरा हिस्सा पान के पीक की वजह से अब लाल हो गया tha...........magar काव्य को इसका कहीं कोई होश न tha..........wo तो अब भी इस आग में झुलस रही thi........pal पल तड़प रही थी..........

" memsaheb............apni टांगें थोड़ी चौड़ी kijiye...........mujhe आपकी पंतय निकालनी हैं..............." और रघु आहिस्ता से काव्य के कान में बोल पड़ता hain........wahin काव्य बस लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही थी और अपने सांसों को दुरुस्त कर रही thi.............kuch सोचकर वो अपनी दोनों टांगें थोड़ी से फैला देती hain............wahin रघु मुस्कुराता हुआ काव्य के और करीब आता हैं और फिर से उसकी गांड पर अपने हाथ हौले से रख देता hain..............fir वो नीचे की तरफ झुकने लगता hain............usski दोनों टांगों के तरफ............

रघु की नज़रें काव्य की गोर गोर पैरों पर thi.........wo फ़ौरन झुककर काव्य के गोर पवन को बड़े प्यार से चूम लेता हैं और उसपर अपने जीभ आहिस्ता आहिस्ता से फेरने लगता hain..........kavya को रघु की हरकतें थोड़ी अजीब तो लग रही थी मगर उसे रघु का इस तरह से जीभ फेरना अपने पवन पर ाचा भी लग रहा tha............apne गंदे काळा जीभ से वो काव्य की गोरी टांगों को चाट रहा tha............raghu के जीभ धीरे धीरे कभी एक पवन तो कभी दूसरे पवन पर चल रहे they........wahin काव्य के जिस्म में गुदगुदी होने लगी thi...............wahin छूट में तेज़्ज़ sansanahat.............wo धीरे धीरे से अपने जीभ ऊपर की तरफ अब लेता जा रहा था...........

" memsaheb........apni साड़ी ऊपर की तरफ उठाइये naa........mujhe थोड़ी सहूलियत होगी............" और रघु काव्य की तरफ देखकर फिर से अपने जीभ से काव्य के गोर पवन को धीरे धीरे से चटनी लगता hain........wahin काव्य अपनी कमर पर अपने दोनों हाथ ले जाती हैं और अपनी साड़ी को घुटनों तक ऊपर की तरफ उठा लेती hain........aab काव्य के गोर पवन रघु की सामने चमक रहे they........kuch पल तक वो उसे वैसे hi घूरता हैं फिर वो अपने जीभ से उसे फिर से चटनी लगता hain......aur बहुत आहिस्ता से ऊपर की तरफ ले जाने लगता hain............wahin काव्य की सांसें फिर से तेज़्ज़ होने लगती hain............wo भी ाचे से जानती थी की आने वाला वक़्त रघु उसके साथ क्या क्या करने वाला था.........

रघु अपने जीभ को फेरता हुआ और ऊपर की तरफ ले जाने लगता hain......uske घुटनों के taraf........jaise hi उसके जीभ घुटनों पर पहुंचते हैं रघु अपना सर काव्य के साड़ी के अंदर छुपा लेता hain..........fir वो आहिस्ता से ऊपर की तरफ बढ़ने लगता hain..........kavya के छूट के taraf..........wo साड़ी के अंदर hi अंदर काव्य के दोनों टांगों को बरी बरी से छाती जा रहा tha.........uspar अपना जीभ फेरता जा रहा tha...........wahin काव्य का अब और बुरा हाल tha.......wo उसी हाल में कड़ी अपनी दोनों टांगें फैलाये रघु से अपनी टांगें चटवा रही thi.......aur कुछ hi पल में रघु उसकी जवानी को चकने वाला tha..........yani की उसकी छूट को..........

जैसे जैसे रघु ऊपर की तरफ बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे काव्य का अब गाला सूखता जा रहा tha..........aab रघु काव्य के छूट से बस कुछ hi इंच के फासले पर tha........magar इस वक़्त उसका आधा जिस्म काव्य की साड़ी के अंदर tha...........aisa लग रहा था जैसे रघु काव्य के जिस्म का कोई इन्वेस्टीगेशन कर रहा ho..........aakhir वो समय भी आ गया जब रघु उसकी पंतय के करीब पहुंच gaya.............wahin जब रघु उसकी पंतय को अपने मुँह से जब छूटा हैं काव्य हौले से अपनी दोनों टांगें पूरा फैला देती hain............aur इस बार ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं........

रघु हौले हौले से काव्य के दोनों टांगों पर जीभ फेर रहा tha......aur अपने जीभ से उसकी पंतय को भी चाट रहा tha......magar सब कुछ साड़ी के अंदर से hi........wahin काव्य अब बुरी तरह से मचलने लगी thi..........aab उसे ऐसा लगने लगा था की वो बहुत जल्द जहर jayegi...........magar रघु आज उसे कहाँ इतनी ासी से झरने देने वाला tha........wo तो उसकी छूट की आग को और भी भड़काए जा रहा tha...........aab उसका खड़ा होना भी दुस्वार होता जा रहा tha..........dono पवन अब काँप रहे थे जैसे उनमें कोई जान न बची ho.......jab काव्य कुछ देर तक अपने आपको संभाले रहती हैं मगर जब उसकी साबरा की इन्तेहाह जब हो जाती हैं तब वो अपने दोनों हाथ साड़ी के ऊपर रख देती hain.........aur साड़ी के ऊपर से hi रघु के सर को थम लेती hain.........wahin रघु अभी भी काव्य की छूट के साथ खेल रहा था........

"aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaassssssssssssssssssssshhhhhhhhhhhh...........rrrrrraaaaagggghhhhhuuuu य्ययएईए टट्ट्टूमंमं क्क्क्ययया काआरररररर रआआह्ह्हेयी ह्ह्ह्हह्हूऊओ" और काव्य बुरी तरह से मचल उठती हैं वहीँ रघु इस बार अपने डेंटन के बीच काव्य की पंतय को जकड़ता हैं और उसे हौले हौले से नीचे की तरफ खींचे लगता hain..........wahin काव्य का अब बुरा हाल tha.......kyon की रघु के दोनों हाथ अब काव्य के नंगी गांड पर they.........wo कभी उन्हें मसल रहा था तो कभी उसपर धीरे धीरे से अपनी ऊँगली फेर रहा tha.......wahin काव्य तो जैसे रघु के इस हरकत पर पागल हो उठी thi.........aab उसे अपनी छूट में लुंड चाहिए thi........magar ये कमीना रघु तो जैसे छोड़ने के मूड में लग hi नहीं रहा tha.....wo तो बस काव्य के साथ बस मस्ती किये जा रहा tha.........uske बदन के साथ खेले जा रहा था.......

जैसे hi काव्य की पंतय उसकी जांघों तक सरकती हैं रघु इस बार अपना जीभ हौले से ऊपर की तरफ ले जाता hain........kavya के छूट की taraf...............fir वो बहुत आहिस्ता से काव्य की छूट पर एक लुम्बी सी जीभ आहिस्ता से फेरता चला जाता हैं और फिर अचानक से उसकी पंतय को अपने डेंटन से खींचता हुआ बहार की तरफ आने लगता hain..........raghu के उस हरकत पर काव्य इस बार अपने सिसकारी को दबा नहीं पति और इस वहीँ ज़ोरों से सिसक पड़ती hain...........na चाहते हुए भी उसकी मुँह से आहें फुट पड़ती hain........aur लाजत से उसकी दोनों आअंखें बंद हो जाती hain.......sansein फिर से पूरी तरह से बेकाबू हो चुके थे..........

अब रघु के डेंटन में काव्य की पंतय फांसी हुई थी वहीँ वो किसी कुत्ते की तरह घुटनों के बल बैठा हुआ काव्य को घूर रहा tha.........kavya की पूरी पंतय इस वक़्त उसकी छूट रूस से भीग गयी thi..........wahin काव्य का शर्म से बुरा हाल था.......... रघु अपने हाथों में काव्य की पंतय को ले लेता हैं और उसपर धीरे धीरे से अपना जीभ फेरने लगता hain........to कभी चटनी लगता hain.........uski छूट रूस से जो खुसबू आ रही थी उसे मदहोश बना देने के लिए काफी thi.........wahin काव्य इस वक़्त ऐसी हालत में थी न hi वो रघु से खुलकर कुछ बोल पा रही thi............aur न अपनी छूट की प्यास बुझा पा रही thi..........aab उसे रघु पर गुस्सा आने लगा था.........

" rrrraaaghhu......ttumm अभी यहाँ से चले जाओ प्लस........" और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती hain....bhale hi उसे रघु पर गुस्सा था मगर वो चाह कर भी उसपर अपना गुस्सा ज़ाहिर नहीं कर पा रही thi..........magar रघु अब कहाँ मानने वाला tha........wo भी जनता था की काव्य उसपर चीड़ सी गयी hain.......pichely दो घंटों से वो उसे बस यु hi तपड़ाये जा रहा tha......to उसका गुस्सा होना बिलकुल लाज़मी tha...........raghu फ़ौरन काव्य के पीछे आ जाता हैं और फिर से काव्य के गांड के दोनों फांकों को अपनी मज़बूत हथेली में थम लेता hain..........fir से वो उसकी गांड को बरी बरी से मसलने लगता hain.......wahin काव्य एक शब्द कुछ नहीं बोल पति और बस रघु को अपने जिस्म पर पूरी मनमानी करने देती हैं..........

रघु इस बार अपने हाथ काव्य के पेट पर ले जाता हैं और उसकी साड़ी पर लगा सेफ्टी पिन धीरे से निकल देता hain.............wahin वो अपना होंठ काव्य के होंठों पर रखकर अब उसे बेहताशा चूमे जा रहा tha.......saath hi साथ वो उसके साड़ी को भी खोलते जा रहा tha............thodi मेहनत के बाद आखिर काव्य की साड़ी उसके जिस्म से अलग होती चली जाती hain..........wahi काव्य अब ब्लाउज और पेटीकोट में रघु के बाँहों में thi..............upar से उसका ब्लाउज भी आधा खुला हुआ tha...........raghu बहुत आहिस्ता आहिस्ता काव्य को नंगा करता जा रहा tha.......uske शर्म को ख़तम करता जा रहा था............

रघु इस बार फॉर से अपने दोनों हाथ काव्य के चूचियों पर रख देता हैं और फिर से उसे पूरी ताक़त से मसलने लगता hain.........kareeb दो तीन मिनट तक बुरी तरह मसलने के बाद वो अपना एक हाथ काव्य के हाथ पर ले जाता हैं और उसे पीछे की तरफ अपने जांघों की तरफ ले जाने लगता hain........wahin काव्य की छूट से लगातार पानी बेहटा जा रहा tha.................jaise hi उसका हाथ अपने लुंड पर जाता हैं रघु फ़रूअन अपने हाथ पीछे की तरफ खींच लेता hain........wahin अबकी बार रघु का लुंड अब काव्य के हाथों में आ जाता hain.......kavya के हाथों के नाजुक स्पर्श से रघु इस बार ज़ोरों से aaaaaaaaaaasssssssss सिसक पड़ता हैं वहीँ काव्य को एक ज़ोरों का करंट सा लगता hain.........wo फ़रूअन अपने हाथों को हटतति हैं मगर रघु फिर से उसके हाथ को अपने लुंड पर रख देता हैं..........

रघु का मोटा कला लुंड अब उसकी मुट्ठी में था जो अब लुंगी के अंदर भले hi था मगर ऐसा लग रहा था जैसे वो कपड़े फाड़कर बहार आने को बेताब ho...........wahin रघु फिर से काव्य के कंधे पर अपने हाथ ले जाता हैं और काव्य की ब्लाउज को नीचे की तरफ सरकने लगता hain.........utarney लगता hain..........wahin थोड़ी मेहनत के बाद कवि का ब्लाउज भी अब फर्श पर गिरा पड़ा tha..........wo अब काळा ब्रा और वाइट पेटीकोट में रघु के सामने अध्नंगी हालत में कड़ी thi..........aab बस वो ब्रा और पेटीकोट hi उसकी लाज बचाये हुए tha.......aur अगर ये सिलसिला यु hi चलता रहा तो काव्य के बदन से वो भी कपड़े उतरने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेंगे............

रघु इस बार हौले से अपने हाथ काव्य के पीठ पर ले जाता हैं और फिर से उसकी पीठ पर अपने जीभ फेरने लगता hain......choomney लगता hain.........wahin काव्य के हाथ में रघु का लुंड था जिसे वो ाभ भी अपने नाजुक हाथों से पड़की हुई thi..........wahin रघु अपने दांतों को काव्य के ब्रा की स्ट्रिप्स पर ले जाता हैं और अपने दोनों हाथों को भी उसपर हौले हौले से फेरने लगता hain............wahin काव्य बुरी तरह से सिसक जाती hain......issey पहले काव्य कुछ समझती रघु अपने हाथों से काव्य की ब्रा की स्ट्रिप्स खोल देता हैं और काव्य की ब्रा खुलती चली जाती hain............wo फ़ौरन अपने दोनों हाथों को अपने सीने पर ले जाती हैं और उस गिरते ब्रा को झट से थम लेती hain.........wahin उसका दिल अब बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha........aise गैर मर्द के सामने वो ऐसी हालत में सोचकर उसका शर्म से अब बुरा हाल था........

रघु काव्य को देखकर हंस पड़ता hain..........agle hi पल वो अपने दोनों हाथ काव्य के पेट पर ले जाता हैं और उसकी नैवेल पर अपने उंगलिओं को धीरे धीरे से फेरने लगता hain...........wahin उसके दोनों हाथ अब काव्य के चिकनी पेट पर फिर रहे they.......bahut हौले हौले से वो अपने हाथों को हरकत कर रहा tha..........achanak रघु को शरत सूझती हैं और वो अपने दोनों हाथ काव्य के पेटीकोट पर बढ़ा डोर पर ले जाता हैं और अगले hi पल उस डोर को खींच देता hain............issey पहले काव्य कुछ समझती वो अपना दूसरा हाथ उसकी पीठ पर ले जाता हैं और उसके सीने पर फंसा ब्रा को एक hi झटके में खींच देता hain..........agle hi पल उधर काव्य की ब्रा रघु के हाथों में आ जाती हैं ............वहीँ उसका पेटीकोट नीचे उसकी पैरों पर सरकता हुआ गिर पड़ता हैं............

अब काव्य सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी thi............wo फ़रूअन वहां से भागना चाहती थी मगर रघु फ़ौरन उसके हाथों को पदक लेता हैं और काव्य एक बार फिर से रग्घू के बदन से चिपकती चली जाती hain.........aab वो एक बार फिर से रघु की बाँहों में सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी थी...................

वहीँ फर्श पर एक तरफ उसकी साड़ी पड़ी thi........to वहीँ कुछ दूर पर उसकी blouse............aur कहीं पर उसकी ब्रा तो कभी पर .......उसकी panty............sare कपड़े इधर उधर बिखरे पड़े they......aur इस घर की मालकिन इस वक़्त एक गंदे गलीज़ नौकर की बाँहों में पूरी नंगी कड़ी thi............sir से लेकर पवन tak...........dekhna था रघु अब उसके साथ कौन सा खेल खेलने वाला tha...........ye तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था..............................................

कंटिन्यू............................................................
 
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