Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 5 - SexBaba
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Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

अपडेट- 24 (बी) (मेघा अपडेट)

वहीँ राम सब कुछ काव्य के बारे में रघु और जीतू को बताता चला जाता hain.......wahin रघु और जीतू के चेहरे पर फिर से वहीँ गन्दी मुस्कान तैर जाती hain...........saath hi साथ अब राम भी उन दोनों का पूरा साथ दे रहा tha.........aur वो साथ देता भी क्यों naa........aaj उसकी भाभी ने उसका दिल जो तोड़ दिया tha......ek गुस्सा ....एक नफरत उसके जेहन में घर कर गयी thi.....jo अब वो अपनी भाभी पर निकलना चाहता था.....................................

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दूसरे दिन हमेशा की तरह राम कॉलेज चले जाता hain........wahin काव्य घर का सारा काम ख़तम करके t.v देखने बैठ जाती hain.........ram का इस तरह से अचानक से दूरी बना लेना ये काव्य को अंदर hi अंदर खाये जा रही thi...........magar उसे पूरा यकीन था की राम बहुत जल्द संभल jayega.........agar नहीं मन तो वो उसे मन legi.........magar काव्य शायद ये नहीं जानती थी की राम तो अब उससे बदला लेने में रघु की पूरी पूरी मदद कर रहा hain........aur कहीं न कहीं ये अब काव्य पर बहुत भरी पड़ने वाला था..............................

हमेशा की तरह रघु 9 बजे काव्य के गेट पर जाकर खड़ा हो जाता hain......usi हाल mein........usi अंदाज़ mein.......aur काव्य रोज़ की तरह आकर दरवाज़ा खोलती hain..........raghu बड़े गौर से काव्य के बदन को घूरे जा रहा tha...........wahin काव्य कुछ नहीं कहती और सीधा अपने कमरे की तरफ चल पड़ती hain...........raghu पान चबाता हुआ अंदर आता हैं और आकर उसी अंदाज़ में फर्श पर जाकर बैठ जाता hain............aabhi भी उसकी नज़रें काव्य को घूर रही थी...........

काव्य के अंदर जाते hi रघु अपने चरों तरफ इधर उधर देखने लगता hain.........fir वो अपने हाथों में थमा प्लास्टिक का एक थैला निकलता हैं और उसमें से एक समोसा अपने हाथों में लेकर उसे बड़े गौर से एक तुक देखने लगता hain......kuch सोचकर उसके चेहरे पर एक गन्दी सी मुस्कान तैर जाती hain.......tabhi काव्य के पायलों की चम् चम् की आवाज़ से वो एक तुक काव्य के तरफ दुबारा से देखने लगता हैं और जब काव्य की नज़र सामने बैठे रघु के हाथों पर पड़ती हैं वो उसे अजीब नज़रियों से एक तुक देखने लगती hain........wahin रघु उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" memsaheb.......itne दिनों से आप मुझे खिला पीला रही हैं तो मेरा भी कुछ फ़र्ज़ बनता हैं की मैं आपके लिए कुछ लेकर aawun........ye समोसे मुझ गरीब की तरफ से आपके लिए........" और रघु अपने हाथों को हौले से काव्य के तरफ बढ़ा देता हैं वहीँ काव्य रघु को देखकर मुस्कुराये बिना नहीं रह pati..........waise काव्य को समोसे बेहद पसंद they.........shayad राम ने ये सीक्रेट रघु को बताया tha..........isi वजह से वो आज काव्य के लिए समोसे ले आया tha........raghu के गंदे हाथ पड़ने से अब उस समोसे का रंग कुछ मैला सा हो गया tha.......jo अब काव्य को साफ़ नज़र आ रहा tha......jagah जगह काळा ढाबे उस समोसे पर नज़र आ रहे they..........wahin काव्य कभी रघु ko.......to कभी उसके हाथ में थामे समोसे को एक तुक देख रही थी.........

" आप ऐसे क्या देख रही हैं memsaheb...........lijiye न......." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य जवाब में कुछ नहीं बोल पति और फ़ौरन अपने हाथ आगे की तरफ बढ़ा देती hain........issey पहले की रघु वो समोसे उसकी हाथों में देता वो फ़ौरन अपनी जगह से खड़ा होता हैं और काव्य के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो जाता hain.........raghu को अपने इतने करीब पाकर काव्य का दिल ज़ोरों से धड़क उठा tha..........uske जिस्म में एक अजीब सा नशा फिर से चने लगा tha.........jo सांसें अभी कुछ देर पहले बिलकुल नार्मल थी वहीँ सांसें अब अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी thi.............raghu के इतने करीब होने का एहसास काव्य के दिल में बेचैनी को पल पल बढ़ता जा रहा था.........

जुबान उसकी पूरी तरह से खामोश थी मगर रघु के बदन से उठने वाली भीनी भीनी सी स्मेल एक बार फिर से उसे मदहोश करती जा रही thi........wo चाह कर भी रघु को अपने से दूर नहीं कर पा रही thi...........wahin रघु उसकी आँखों में एक तुक देखे जा रहा tha.............raghu की आँखें आज जैसे सूर्ख लाल सी नज़र आ रही thi.......aisa लग रहा था जैसे वो भूखी नज़रियों से काव्य को घूर रहा ho..........hawas के लाल डोरे साफ़ उसकी आँखों में चालक रहे they.........wahin वो धीरे धीरे अपनी जुबान चला रहा tha.........paan की स्मेल और रघु के जिस्म से निकलने वाली पसीने की बदबू काव्य की सानोसॉन में पूरी तरह घुल रही thi.........magar न hi काव्य कुछ कह रही थी .................और न hi रघु...........

" memsaheb.........kal आप सफ़ेद साड़ी में बहुत हसीं लग रही thi.........mere लिए क्या आप एक बार फिर से उस साड़ी को पहनेंगी..........." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य जवाब में कुछ नहीं बोल पति और टकटकी लगाए बस रघु की आँखों में एक तुक देखने लगती hain...........wahin रघु काव्य को देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता hain.........issey पहले काव्य संभालती रघु फ़ौरन अपना गन्दा हाथ काव्य के हाथों पर रख देता हैं और उसके बाजु को कसकर अपनी गन्दी हथेली से थम लेता hain..........wahin काव्य की दिल की धड़काएं और तेज़्ज़ होती जा रही thi.......na जाने क्यों वो अब रघु को इंकार नहीं कर पा रही thi.........ya शायद इंकार नहीं करना चाहती थी.......

" ये समोसे तो पहले आप खा लीजिये न memsaheb..........isey मैंने खुद बाजार से जाकर आपके लिए खरीदा हैं......." और रघु इतना कहकर अपना दूसरा हाथ काव्य के चेहरे के तरफ ले जाता हैं और जिन हाथों में उसने समोसा रखा हुआ था वो उसे हौले से काव्य के गलों पर धीरे धीरे फेरने लगता hain........to कभी उसकी नरम होंठों par........wahhin काव्य बस एक तुक रघु के हर हरकतों को बड़े ध्यान से देखे जा रही थी...........

" mujjjjjjjjhheeeeeee..naaaahhhininnnnn कहहाआअन्ना...." और काव्य की सांसें भरी होने लगती hain......kaleja उसका ज़ोरों से धड़क उठता hain...........wahin छूट में भी सेंसेशन होना शुरू हो जाता hain......ek अजीब सा नशा .......एक अजीब सा एहसास........ उसपर पल पल हावी होता जा रहा tha........wo धीरे धीरे रघु को अपने इतने करीब पाकर मदहोश होती जा रही thi.........aab जैसे कुछ भी उसके बस में नहीं था........

रघु उस समोसे को आहिस्ता आहिस्ता से काव्य के गोर गलों पर फेर रहा tha......to कभी उसके गार्डन par.....to कभी उसके होंठों par...........wahin काव्य बेसुध खामोश कड़ी हुई किसी मूरत की तरह रघु के हर हरकतों को बर्दास्त कर रही thi.........raghu काव्य के ठीक पीछे खड़ा tha......kuch hi इंच की दूरी par..........bhale hi वो उसके जिस्म को टच नहीं कर रहा था मगर रघु के बदन से उठने वाली बदबू काव्य को ज़रूर परेशां करने लगी thi........ya फिर उसकी बेचैनी को और भी बढ़ाने लगी थी.........

" अपना मुँह खोलिये न मेमसाहेब............." और रघु आहिस्ता से उस समोसे का एक हिस्सा धीरे धीरे काव्य के होंठों पर फेरने लगता हैं वहीँ काव्य विरोध नहीं कर पति और आहिस्ता से अपना लैब खोल देती hain...........agle hi पल रघु अपने हाथों को धीरे से अंदर की तरफ पुश करता हैं और समोसे का एक हिस्सा काव्य के मुँह में चला जाता hain...........magar रघु उस समोसे को काव्य के लबों से नहीं hatata..........wahin काव्य आहिस्ता आहिस्ता से उस समोसे को खाये जा रही thi..............aab उसका टास्ते बाकि समोसे से थोड़ा अलग tha.......shayad मैला हो जाने के कारन या रघु के हाथों पर लगी उस गड़गड़ी की वजह se..........wahin काव्य के अंदर विरोध जैसे ख़तम हो गया tha.........wo खामोश कड़ी बस रघु को पूरी मनमानी कररने दे रही थी........

रघु अगले hi पल उस समोसे का आधा हिस्सा काव्य के लबों से हटाता हैं और उसे धीरे से अपने मुँह के तरफ ले जाने लगता hain..........fir वो उस समोसे को बड़े ध्यान से देखने लगता हैं जो हिस्सा अभी कुछ देर पहले काव्य ने खाया tha.........agle hi पल उसके चेहरे पर एक गन्दी हंसी आ जाती हैं और वो उस समोसे को हौले से अपने मुँह में ले जाता हैं और समोसे का बाकि बचा आधा हिस्सा खुद खाने लगता hain.......uske काटने से समोसे पर एक बार पान का कुछ हिस्सा एक बार फिर से साफ़ नज़र आ रहा tha........fir वो बाकि बचा हिस्सा फिर से काव्य के होंठों के तरफ ले जाता हैं और एक बार फिर से उसके लबों पर धीरे से फेरने लगता हैं..........

काव्य बड़े गौर से रघु के हर एक हकतों को देख रही thi.......magar न hi वो कुछ बोल रही थी और न hi उसका विरोध कर रही thi.......jaise hi उसकी नज़र समोसे के उस आधे हिस्से पर जाता हैं वो बड़े ध्यान से उस हिस्से को एक तुक देखने लगती hain.....aabhi भी उसमें पान के छोटे छोटे दाने साफ़ उस समोसे पर नज़र आ रहे they..........raghu फ़ौरन उस समोसे को काव्य के लबों पर धीरे धीरे पुश करने लगता हैं और अगले hi पल काव्य आहिस्ता से अपना लैब दुबारा से खोल देती hain.......raghu मुस्कुराता हुआ उस समोसे का बाकि बाचा हिस्सा काव्य के मुँह में दाल देता hain........wahin काव्य एक बार फिर से उस समोसे को धीरे धीरे खाने लगती hain.......is बार समोसे का टास्ते काफी डिफरेंट tha......kavya कुछ पान का मिला जुला स्वाद कुछ अपने मुँह में महसूस कर रही थी........

कुछ हिस्सा बच जाने के बाद रघु उस समोसे को धीरे से बहार निकलता हैं और काव्य के नरम होंठों पर धीरे धीरे से फेरने लगता hain........fir वो उसे सरकते हुए उसके गोर गलों पर ले जाता hain........aur जैसे जैसे उसके हाथ सरक रहे थे उस समोसे का कुछ हिस्सा काव्य के बदन पर लगता जा रहा tha........wo फिर उस समोसे को काव्य की गुर्दें पर ले जाता हैं अउ धीरे धीरे वहां भी फेरने लगता hain..........fir वो उसे नीचे की तरफ सरकै लगता hain......kavya के नाजुक हाथों की taraf.............wahin काव्य बेसुध किसी मूरत के सामान बिलकुल खामोश कड़ी thi...........na जाने क्यों उसे रघु की हर हरकतें ाची लग रही thi.......shayad इसी वजह से वो उसे इंकार नहीं कर पा रही thi.......ek नशा सा उसपर पल पल छठा जा रहा था........

जब रघु काव्य के दोनों हाथों पर उस समोसे को फिर लेता हैं तब वो फिर से उस समोसे को अपने मुँह में ले जाता हैं और उस हिस्से को खता हैं जो हिस्सा अभी उसने काव्य के बदन पर फेरा tha.........ek अजीब सा टास्ते उसके जेहन में अब घुलने लगा tha.......shayad काव्य के बदन का टास्ते अब उसे मिल रहा tha.........fir समोसे का कुछ हिस्सा वो फिर से काव्य के होंठों पर ले जाता हैं और फिर से उसके मुँह में दाल देता hain......wahin काव्य इस बार भी चुप चाप से उस समोसे को खा लेती hain..........wahin काव्य की छूट में गीलापन अब बढ़ता जा रहा tha.........raghu सब कुछ इतना आराम से कर रहा था जैसे वो आज पूरी फुर्सत में हो.........

" मैं आपके लिए पानी लेकर आता हूँ memsaheb.........aapko प्यास लगी होगी......" और रघु फ़ौरन नीचे की तरफ झुकता है और फर्श पर रखा पानी का गिलास अपने हाथों में उठा लेता हैं और इससे पहले काव्य कुछ समझती वो फ़ौरन आकर उससे चिपक जाता hain........aab रघु और काव्य के बीच बस 1/2 इंच का फासला रहा hoga..........wahin उसका लुंड अब काव्य की गांड में दस्तक दे रहा tha........raghu पल पल काव्य के बदन की कोमलता का एहसास कर रहा tha........mehsoos कर रहा tha.........wahin अब उसके लुंड में भी हलचल होनी शुरू हो गयी thi........kavya जो अब तक रघु के हमले से अब तक संभल नहीं पायी thi.....wahin रघु उसपर और भी हमले किये जा रहा tha........aur इस बार रघु का ये हुम्ला काव्य पर बहुत भरी पड़ने वाला था.......

वो पूरी तरह से काव्य के बदन से चिपका हुआ tha........wahin काव्य की सांसों में उसके बदन की बदबू और भी तेज़ी से घुलने लगी thi........kahan वो हाई क्लास की पढ़ी लिखी मॉडर्न ladki.....aur कहाँ raghu.......ek दम थर्ड class.......mawali type..........sach तो ये था की उसका और काव्य का कोई मेल नहीं tha......magar कुछ तो बात ऐसी थी रघु में जो काव्य को पल पल अपनी तरफ खींच रही thi........wahin काव्य बार बार आपने आपको संभालने की नाकाम कोशिश कर रही thi.........to कभी अपने बेकाबू सांसों ko.......magar अब कुछ भी उसके बस में नहीं tha.........apni गांड पर रघु के लुंड का एहसास उसकी सोचने समझने की शक्ति को पल पल चीन रहा tha.......wo चाह कर भी कुछ और नहीं सोच पा रही thi.......aisa लग रहा था जैसे वो अब रघु के बस में ho........aur शायद अब काव्य रघु के बस में hi थी............

तभी रघु उस पानी को अपने होंठों पर ले जाता हैं और बिना वक़्त गंवाए उस पानी को पीने लगता hain.......aur हमेशा की तरह वो उस पानी को आधा ख़तम कर देता हैं और इस बार आधा बचा पानी काव्य के तरफ हौले से बढ़ा देता hain.......aab उस गिलास में रखा पानी काव्य की नज़रियों के सामने था जिसे वो बड़े गौर से एक तुक देखे जा रही thi...........jo पानी अभी कुछ देर पहले साफ़ सुथरा सा नज़र आ रहा था अब वही पानी रघु के मुँह में जाने से गन्दा हो गया tha........usmein पान के कुछ छोटे छोटे टुकड़े और समोसे के छोटे छोटे दाने उस पानी में तैर रहे they.............raghu ज़्यादा इंतज़ार नहीं करता और फ़ौरन उस गिलास के पानी को काव्य के होंठों पर लगा देता हैं..........

काव्य भी ज़्यादा विरोध नहीं कर पति और हौले से अपनी लैब पूरा खोल देती hain...........agle hi पल रघु के मुँह का जूठा पानी काव्य के हलक के नीचे उतर चूका tha.........wo बस उस पानी को अपनी आँखें बंद किये बस पीये जा रही thi.......aisa लग रहा था जैसे वो कोई अमृत ho.............hosh तो रघु ने पहले hi उसका गम (चीन) कर चूका tha.....to अब होश का सवाल hi कहाँ tha......raghu तब तक अपने हाथों को काव्य के होंठों से नहीं हटाता जब तक उस गिलास में बाकि बचा पानी पूरी तरह से ख़तम नहीं हो jaata..........magar पानी ख़तम होने के बाद भी रघु एक पल के लिए भी काव्य से दूर नहीं हटाता.........

" memsaheb...........agar आप कहे तो मैं आज खुद अपने हाथों से आपकी ये पंतय उतर loon............agar पंतय नहीं दे सकती to.........apna ब्रा तो मुझे तोहफा समझकर दे दीजिये..........." और रघु इतना कहकर हौले से अपनी जुबान काव्य के गलों के पास ले जाता हैं और कुछ देर तक वो अपने गलों को काव्य के गलों से सताए रहता hain......magar जब काव्य उसकी बाटिओं का कोई जवाब नहीं देती वो फ़ौरन अपना होंठ नीचे की तरफ ले जाता हैं और बहुत आराम से काव्य के गुर्दें को बड़े प्यार से चूम लेता hain.........chaat लेता hain..........jahan अभी कुछ देर पहले समोसे का कुछ हिस्सा काव्य की गुर्दें पर tha..........uske इस तरह से चूमने और चटनी से काव्य का गोरा जिस्म पर रघु के गंदे होंठ का कला दाग और कुछ पान का लाल दाग चाप से जाते hain............magar अब काव्य को कहाँ होश tha.....wo तो जैसे पूरी तरह से मदहोश हो चुकी thi..........na hi उसे किसी बात की फ़िक्र thi..........aur न किसी चीज़ की चिंता..............

बस फ़िक्र थी तो अपने अंदर उठ रहे उस प्यास ki.....jo उसे अंदर hi अंदर जलाये जा रही thi........aur रघु उस आग को पल पल भड़काए जा रहा tha........dekhna था की वो अब रघु के इस सवाल का क्या जवाब देती hain............kya वो आज उससे अपनी पंतय खुद utarwayegi.....ya फिर आज रघु को साफ़ साफ़ इंकार कर degi......magar देखने से तो कहीं ऐसा नहीं लगता था की काव्य आज इंकार के मूड में hain........dekhna था की आगे वक़्त कौन सा सितम लेकर आने वाला था.......................................................

कंटिन्यू...................................................................
 
अपडेट-25 (ा) (मेघा अपडेट)

बस फ़िक्र थी तो अपने अंदर उठ रहे उस प्यास ki.....jo उसे अंदर hi अंदर जलाये जा रही thi........aur रघु उस आग को पल पल भड़काए जा रहा tha........dekhna था की वो अब रघु के इस सवाल का क्या जवाब देती hain............kya वो आज उससे अपनी पंतय खुद utarwayegi.....ya फिर आज रघु को साफ़ साफ़ इंकार कर degi......magar देखने से तो कहीं ऐसा नहीं लगता था की काव्य आज इंकार के मूड में hain........dekhna था की आगे वक़्त कौन सा सितम लेकर आने वाला था.......................................................

अब आगे...............................................................................

काव्य आज यकीनन इंकार के मूड में बिलकुल भी नहीं लग रही thi.......wo पूरी तरह से मदहोश हो चुकी thi........uski बाँहों mein..........raghu ने आज उसकी सोचने समझने की शक्ति जैसे चीन ली thi............kya sahi......kya गलत ........वो कुछ नहीं सोच पा रही thi.........bus होश था उसे तो अपने अंदर उठ रहे उस प्यास ki.........us आग ki..........jo किसी शोले की तरह उसके बदन में अब दहक रही thi.........aur वो अब किसी भी कीमत पर उस प्यास को कैसे भी शांत करना चाहती thi........magar ये रघु उस प्यास को बुझाने के बजाये और भी भड़का रहा tha...........shayad अब वो रघु के मुट्ठी में आ चुकी thi.......ye सिलसिला न जाने कब और कहाँ जाकर थमता अगर इस बीच काव्य का मोबाइल नहीं बज उठता.........

मोबाइल के अचानक बज उठने से वो जैसे गहरी नींद से जगती हैं और हौले से अपनी दोनों आँखें खोल लेती hain..........is वक़्त काव्य की दोनों आँखें सुर्ख लाल हो चुकी thi..........aur ऐसा लग रहा था जैसे वो नशे की हालत में ho.......ek अजीब सा खुमार उसकी आँखों में झलक रहा tha..........aur जब उसे अपने वास्तिविकता का होश आता हैं वो फ़ौरन रघु से दूर हो जाती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain......jo दिल इतने देर से ज़ोरों से धड़क रहा tha.......wo अब और भी तेज़ी से धड़कने लगा tha.............chehrey पर शर्मिंदगी और हाय दोनों के मिले जुले भाव साफ़ नज़र आ रहे they........wo बार बार रघु से अपनी नज़रें चुरा रही thi.....aisa लग रहा था जैसे उसने आज कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो...........

मोबाइल की पूरी रिंग बजने के बाद काव्य जैसे hi आगे बढ़ती हैं तभी दुबारा से उसका मोबाइल फिर से बज उठता hain........aur जब काव्य उस मोबाइल को अपने हाथों में उठती हैं और जब उसकी नज़र मोबाइल के स्क्रीन पर पड़ती hain.........ek अजीब सी बेचैनी .......एक अजीब सा दुर्र उसके चेहरे पर झलक उठता hain.......dil में एक अजीब सा दुर्र और बुरे बुरे से ख्याल अब आने लगे थे ......हाथ में जैसे इतनी ताक़त नहीं बची थी की वो उस फ़ोन को रइवे कर sake.........wahin कुछ दूर पर खड़ा रघु तिरछी नज़रियों से काव्य के तरफ देखे जा रहा tha.......durr से वो भी काव्य के सामने कुछ नहीं बोल पा रहा tha.........aaj न जाने इतना सब कुछ कैसे हो gaya........usey खुद पर यकीन नहीं हो रहा था.......

फ़ोन राहुल का tha.......halanki वो कभी इस टाइम पर फ़ोन नहीं किया करता tha......magar आज अचानक इस तरह se........ye काव्य को हैरान करने के लिए बस काफी tha.......aabhi भी वो टकटकी लगाए बस मोबाइल स्क्रीन की तरफ देखे जा रही thi.......aakhir थोड़ी हिम्मत करके वो फ़ोन रइवे करती है और उधर से राहुल फ़ौरन बोल पड़ता हैं.......

" क्या कर रही थी jaan.........phone उठाने में क्या इतना वक़्त लगता हैं!!!!!!! " और राहुल जैसे शिकायत के लहज़े में धीरे से बोल पड़ता hain.....wahin काव्य का दिल और भी ज़ोरों से धड़क उठा tha...........wo कुछ पल तक ऐसे hi खामोश रहती हैं और अपने बेकाबू धड़कनों को संभालने की कोशिश करती hain........magar शायद आज कुछ भी उसके बस में नहीं tha.........na hi sansein.......aur न दिल की dhadkan..........aakhir वो थोड़ी हिम्मत करके हौले से बोल पड़ती हैं......

" wwwoooo....raaahhhhuulllll.........maiininnnnn......naaaahaaa राहीईई thhhhiiiiiiiiiii...." और काव्य की जुबान जैसे लड़खड़ा सी जाती हैं वहीँ राहुल अचानक से बोल पड़ता हैं.....

" क्या हुआ jaan.......are यू alright...............tum ठीक तो ho..........ye तुम्हारी आवाज़ को क्या हुआ......." और राहुल के उस सवाल से जैसे काव्य का कलेजा और भी ज़ोरों से धड़क उठता hain.........wahin काव्य के चेहरे पर दुर्र की लखीरें और भी गहरी होती चली जाती hain.........usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो राहुल को क्या जवाब de........ussey क्या kahe.....kya न कहे.......

" wooo......main दुआडी हूँ आयी थी naa.......is वजह से ......हांफ रही हूँ......" और काव्य जैसे तैसे अपनी बात संभालती हैं वहीँ राहुल उसकी बाटिओं को सुनकर हंस पड़ता हैं.......

" तुम naaa........aacha मैंने तुम्हारे पास ये बताने के लिए फ़ोन किया था की मेरा प्रमोशन हो गया hain.......aab मैं सुपरवाइजर से सीनियर सुपरवाइजर बन गया hoon.........aur मेरी सैलरी भी बढ़ गयी हैं........." और राहुल जैसे ख़ुशी से चहक उठता हैं वहीँ काव्य हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं अब वो काफी हुड्ड तक नार्मल हो चुकी थी मगर दिल था की अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था.........

" ये तो बहुत ख़ुशी की बात हैं राहुल........" और काव्य जैसे अपने बात को यहीं पर ख़तम करती hain.......wo इस वक़्त राहुल से बात नहीं करना चाहती thi......do चार बातें होने के बाद राहुल भी फ़ोन रख देता हैं और उधर काव्य जैसे hi फ़ोन रखती हैं एक बार फिर से वो लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain...........fir जैसे hi उसकी नज़र सामने खड़े रघु पर जाती हैं एक बार फिर से उसकी नज़रें शर्म से नीचे की तरफ झुक जाती hain.........wo रघु का अब सामना नहीं करना चाहती thi.........wo उससे बिना कुछ कहे सीधा बाथरूम में चली जाती हैं और अपने बाथरूम का दरवज़ा ाचे से लॉक करती hain.........aur लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं.......

फिर वो फ़ौरन शावर ों करती हैं और जाकर शावर के सामने उसी हाल में कड़ी हो जाती hain......aab शावर का पानी काव्य के सर पर गिर रहा था जिससे उसका बदन धीरे धीरे भीगता जा रहा tha..........usey बिलकुल भी समझ में नहीं आ रहा था की वो जो कुछ कर रही हैं क्या वो सही hain..............ya फिर galat........aise कैसे वो आज बहक सकती hain.......kyon उसका रघु के सामने ज़रा भी बस नहीं chalta.....aakhir क्यों वो उसे इंकार नहीं कर pati.........aisi क्या खासियत हैं उसमें की वो जब भी उसे अपने करीब पति हैं मदहोश सी हो जाती hain.........aakhir उसका उसके सामने बस क्यों नहीं chalta........aakhir क्यों???? शायद इस क्यों का जवाब काव्य को भी नहीं मालूम tha..........shower का पानी पल पल उसके बदन को भिगो रहा था........

साड़ी भी उसके जिस्म से जैसे भीगकर चिपक सी गयी thi..........wo फ़ौरन अपनी दोनों आँखें बंद करती हैं और अपना एक हाथ हौले से अपने कंधे की तरफ ले जाती hain..........aur हौले से कंधे पर लगा सेफ्टी पिन निकल देती hain........jissey उसकी साड़ी का पल्लू फर्श पर गिर पड़ता hain.......aab काव्य सामने ब्लाउज में बिलकुल खामोश कड़ी थी और लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi.....udher शावर का पानी अब उसके सर पर और उसके छाती पर गिर रहा tha...........aankhein अभी भी बंद थी .......वो फ़ौरन अपना एक हाथ नीचे अपने पेट की तरफ ले जाती हैं और अपने साड़ी पर लगा एक और सेफ्टी पिन धीरे से खोल देती hain.......aur अगले hi पल वो अपनी साड़ी को अपने जिस्म से अलग कर देती hain.........aab वो इस वक़्त ब्लाउज और पेटीकोट में कड़ी थी.....

गुज़रते वक़्त के साथ साथ काव्य के बदन से कपड़े भी धीरे धीरे उतरते जा रहे they..........wahin वो एक बार फिर से मदहोश होती जा रही thi.........sabse पहले उनसे अपना ब्लाउज utra.........fir bra...........aur साड़ी का साया उतरने के बाद लास्ट में अपनी पंतय bhi...........aab काव्य सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी thi...........uske जिस्म पर जितने भी समोसे और रघु के हाथों के काळा ढाबे और दाग लगे थे सब उस पानी में धुलते जा रहे they........wahin काव्य अभी भी लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi.............jaise जैसे वो शावर का पानी उसके जिस्म को भिगोता जा रहा था वैसे वैसे काव्य के बदन में उठने वाली आग भी बढ़ती जा रही thi............wo आग अब भला पानी से कहाँ बुझने वाली थी........

काव्य हौले से अपनी दोनों हाथ अपने चूचियों पर ले जाती हौं और बहुत आहिस्ता से अपने गुलाबी दानों को आहिस्ता से सहलाने लगती hain.......apne उँगलियों के बीच दबाकर वो कसकर अपनी दोनों निप्पल्स को मसल देती hain......wahin उसकी एक aaaaaaahhhhh..foot पड़ती hain........madhosh से एक बार फिर से उसकी आँखें दुबारा से बंद हो जाती hain...........aahista आहिस्ता से उसके दोनों हाथ अपने नंगे बदन पर सरक रहे they.......wo हौले से अपनी राइट हैंड को सरकते हुए नीचे की तरफ ले जाने लगती hain..............apne छूट की तरफ........

फिर वो हौले से अपनी दोनों टांगें और फैला देती hain..........aabhi भी उसका एक हाथ अपने निप्पल्स पर था जिसे वो अपने उँगलियों के बीच दबाये हुए हौले हौले से मसल रही thi.......dil की धड़कनें और सांसों की रफ़्तार एक बार फिर से बढ़ चुकी thi..........wo हौले से अपनी मिडिल फिंगर अपने छूट के लैब पर फेरती रहती हैं और कुछ देर तक अपने उँगलियों से अपने क्लीट को सहलाते रहती hain........unhein छेड़ती रहती hain..........fir आहिस्ता से अपने हाथों पर हल्का सा दबाव बनती हैं और अगले hi पल उसकी मिडिल फिंगर आसानी से उसकी छूट में समां जाता हैं जिससे काव्य के मुँह से एक हल्की सी siskari....aaaaaaaaaaaaaaasssssssssssssssssssssssssshhhhhhhhhhhh.......................foot पड़ती hain.....lajaat से उसकी आँखें दुबारा बंद हो जाती हैं..........

एक बार काव्य फिर मज़े की दुनिया में thi........fir से उसे कोई होश न tha........guzarte वक़्त के साथ साथ वो अपने हाथों की रफ़्तार को भी धीरे धीरे बढाती जा रही thi.......upar से शावर का ठंडा पानी उसके बदन में उठ रही उस आग को और भी हवा देता जा रहा tha.........jab एक ऊँगली से उसे मज़ा नहीं आता तो वो अपनी दूसरी ऊँगली भी साथ साथ अपनी छूट के अंदर बहार करने लगती hain...........aur ये सिलसिला ज़्यादा देर तक नहीं चलता और काव्य की सांसें एक बार फिर से पूरी तरह बेकाबू होने लगती hain............uski छूट से बेहटा रूस धीरे धीरे शावर के पानी में घुलता जा रहा था..........

हाथों की रफ़्तार और तेज़्ज़ हो चली thi..........wahin काव्य कभी अपने राइट निप्पल्स को अपने उंगलिओं के बीच दबाकर मसल रही thi.....to कभी लेफ्ट निप्पल्स ko..........wahin उसकी छूट भी लगातार पानी छोड़ती जा रही thi......sansein पूरी तरह से बेकाबू हो चुके they......aur जिस्म की आग अब धीरे धीरे अपने चरम पर पहुंचने लगी thi.............agle hi पल काव्य का जिस्म अकड़ने लगता हैं और हाथों की रफ़्तार और तेज़्ज़ हो जाती hain...........wo वहीँ सिसकते हुए झरने लगती हैं और उसके हाथ तब तक नहीं रुकते जब तक उसके अंदर की आग पूरी तरह से शांत नहीं हो jati.............kavya वहीँ लुम्बी लुम्बी सांसें लेते हुए फर्श पर नंगी हालत में बैठी हुई thi..........uspar शावर का पानी अभी भी गिर रहा tha..........magar जो तूफ़ान उसके जिस्म में अभी कुछ देर पहले था अब वो शांत हो चूका था........

काव्य की आँखें अभी भी बंद थी और वो उसी हाल में बैठी हुई अपनी सांसों को दुरुस्त कर रही thi...........dil की धड़कनें भी अब धीरे धीरे कम होनी शुरू हो चुकी thi............kareeb 10 मिनट तक काव्य वैसे hi फर्श पर चुप चाप से बैठी रहती हैं फिर जैसे उसे होश आता हैं वो हौले से अपनी दोनों आँखें खोलती हैं और शावर बंद करती hain..........towel से अपना बदन पूछे के बाद वो एक एक कर अपने कपड़े पहने लगती hain.........aur फिर तैयार होकर सीधा बैडरूम में चली जाती hain........aur आईने में खुद को बड़े ध्यान से एक तुक देखने लगती hain..........kuch सोचकर उसस्के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर जाती हैं.........

रघु अपना काम ख़तम करके जा चूका tha........aur जब काव्य की नज़र सामने घडी की तरफ जाती हैं उसके मनो होश उड़द जाते hain.......is वक़्त घडी में 12.30 बज रहे they..........yani वो पिछले एक घंटे से बाथरूम में thi...........aur एक घंटे से ज़्यादा रघु के saath..........usey न जाने अब क्या होता जा रहा tha.......kyon उसके स्वभाव में अब बदलाव आ गया था .........ऐसा लग रहा था जैसे वो अब धीरे धीरे बदलती जा रही hain............dekhna था वक़्त काव्य को और कितना बदलने वाला था.....

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शाम का समय था और काव्य अपने कमरे में सोई हुई thi............udher राम कॉलेज से आने के बाद हमेशा की तरह रघु और जीतू से मिलने उनके कमरे की तरफ चल पड़ता hain.........aaj भी वो दोनों राम को अपने पास आया हुआ देखकर धीरे से मुस्कुरा पड़ते hain......wahin रघु जीतू से आज के हुए हादसे के बारे में उससे कुछ नहीं बताया tha........wo चाहता था जब काव्य पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में आ जाएगी तब वो उससे कुछ कहेगा.......

कॉन्टिनोएड........................................................................
 
अपडेट- 25(बी) (मेघा अपडेट)

" क्या बात हैं छोटे malik..........aaj भी आपके चेहरे पर वहीँ उदासी........" और जीतू राम की तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ राम एक बार फिर से बुरा सा मुँह बना लेता हैं.........

" आप फ़िक्र कहे को करते हैं malik..........mere होते हुए आपको फ़िक्र करने की कउनो (कोई ) ज़रुरत nahin...........dekhtey जाइये मैं कैसे आपकी तबियत को रंगीन कर देता हूँ......" और जीतू अपने काळा पीले काळा दांत दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ रघु बड़े गौर से कभी राम के तरफ देखे जा रहा tha.............to कभी जीतू के तरफ.......

" क्या करेगा बोल tu............malkin ने हमारे मालिक को लात मार दी हैं और तुझे मज़ाक सूझ रहा hain.........kum से कम तू कुछ कर नहीं सकता तो बोलो मुट्ठ कर......." और रघु जैसे जीतू पर बरस पड़ता hain........wahin जीतू भी जैसे ताव में आ जाता हैं.......

" main.........bolta नहीं hoon.............karta hoon.......aur बता क्या करना हैं mujhe......agar नहीं कर सका तो मेरा नाम भी जीतू नहीं......." और जीतू जैसे अपने बात पर ज़ोर देते हुए बोल पड़ता हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.........

" तो फिर ठीक hain.........chote मालिक....... ज़रा अपना फ़ोन दीजियेगा मुझे.........." और रघु राम के तरफ एक तुक देखने लगता हैं वहीँ राम अपने जेब से फ़ोन निकलता हैं और धीरे से रघु के हाथों में थमा देता hain........wahin रघु के चेहरे पर फिर से एक गन्दी हंसी झलक पड़ती hain........usney सोच कर तो बहुत कुछ रखा था मगर अब धीरे धीरे वो अपने प्लान को अज्ञान दे रहा था.......

" तो एक काम kar..........is फ़ोन को अपने साथ लेता jaa.......aur थोड़े दूर पर सामने एक मोबाइल की दूकान hain.....jaa और इसमें वो वाली पिक्टूरें भरवा laa..........maloom हैं न मैं तुझे कौन सी वाली पिक्टूरें बोल रहा hoon........full चुदाई wali........jismein कहानी नहीं होती बल्कि शुरू से लेकर आठ तक बस चुदाई चलती रहती हैं ...........वो wali........aur आज अपने छोटे मालिक भी देख lengey.........bada मज़ा aayega......aur हाँ तू जल्दी से आ jana...........aaj मैं छोटे मालिक को एक और लाइव चुदाई दिखने वाला hoon......jisey देखकर हम सब को बड़ा मज़ा आने वाला हैं........" और रघु के चेहरे पर फिर से वही गन्दी हंसी नज़र आने लगती हैं जिसकी वजह न राम समझ पता hain...................na hi जीतू........

जीतू फ़ौरन उस मोबाइल को रघु से ले लेता हैं और कुछ पैसे लेकर वो फ़ौरन बहार शॉप की तरफ निकल पड़ता hain.......aaj न जाने कितने अरसे हो गए थे उसे ऐसी फिल्में देखे hue..........ye सोच सोचकर उसका लुंड में खून का संचार बढ़ता जा रहा tha........wahin उसका लुंड भी धीरे धीरे सख्त होता सा नज़र आ रहा tha.......kadam खुद बा खुद तेज़्ज़ हो चले they.......karreeb 1/2 घंटे बाद जीतू ब्लू फिल्म भरवाकर उस मोबाइल में लता hain..........aab उसकी चलने की रफ़्तार और भी तेज़्ज़ हो चुकी thi......wahin वो जल्दी से जल्दी उस फिल्म को देखना चाहता tha.......magar दिक्कत ये भी थी की उसने आज तक एंड्राइड फ़ोन कभी चलाया नहीं tha.........agar वो इसके बारे में कुछ जनता तो वो आसानी से उस वीडियो को प्ले करके देख सकता tha..........munn मरते हुए वो फ़ौरन अपने कमरे की तरफ चल पड़ता hain......wahin राम और रघु उसके आने का बड़ी hi बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.......

जीतू को देखकर रघु के चेहरे पर हंसी आ जाती हैं वहीँ राम के चेहरे पर घबराहट जैसे बढ़ जाती hain........ghabrahat इस लिए क्यों की उसने ऐसी पिक्टूरें आज तक न कभी देखि thi.........magar हाँ सुनी ज़रूर thi......wo भी अपने दोस्तों के मुँह se.......aur आज रघु और जीतू दोनों उसे ऐसी मूवी दिख्हने वाले थे तो उसकी घबराहट तो बढ़ेगी hi...........

" ये लीजिये छोटे मालिक.........." और जीतू हौले से अपने हाथ में थमा फ़ोन राम के तरफ बढ़ा देता हैं वहीँ राम की दिल की धड़कनें और भी तेज़्ज़ होती चली जाती hain........wo कंपकपाती हाथों से अपने मोबाइल को लेता हैं और धीरे से उस मोबाइल के फाइल्स को देखने लगता hain..........thode देर बाद उसे करीब 4, 5 वीडियोस दिखाई देते hain.........wahin रघु राम के तरफ देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" आप इस मोबाइल को यहीं सामने रख दीजिये malik.........aur बड़े इत्मीनान से उस वीडियो को dekhiye...........dekhiyega की कैसे मर्द औरत की छूट को फाड़ता hain..........kaise वो उसके छूट में लुंड पेलता hain..........kaise वो अपना लौड़ा उससे चुसवाते hain......aur अपनी मणि भी पिलाता hain.........is पिक्चर में आपको ये सब देखने को मिलेगा......" रघु की ऐसी ओपन बातें और ऊपर से वो वीडियो राम के दिल की धड़कनों को बढाती जा रही thi....wahin उसका लुंड धीरे धीरे टाइट होता जा रहा tha.....kuch ऐसी hi हालत अब उन दोनों की भी थी......

राम एक वीडियो को सेलेक्ट करता हैं और मोबाइल सामने की दीवार पर कड़ी करके रख देता hain........aab जीतू और रघु वहीँ राम के बगल में बैठे थे ार वो सब आँख फाड़े उस वीडियो को देखे जा रहे they.......tabhi एक विदेशी लड़का आता हैं और वो चलते हुए एक बंद कमरे में जाता hain........ander जाने के बाद एक लड़की बिस्टेर पर लेती हुई नज़र आती hain......angrezi में न नाज़े वो उससे क्या कहता हैं .....कुछ भी कहा हो उन तीनों को तो बस चुदाई से मतलब tha.......fir वो उसके लिप्स को सूचक करता हैं और फ़ौरन उसके चूचियों को अपने हाथों में लेकर मसल देता हैं........

फिर लड़का लड़की के एक एक कर सरे कपड़े उतरता हैं और लड़की घुटनों के बल वहीँ फर्श पार बैठ जाती हैं और उसके पेण्ट को खोलने लगती hai.....jab उस आदमी का पेण्ट खुलता हैं और जब लुंड सामने नज़र आता हैं राम की तो जैसे सांसें अटक सी जाती hain......wahin रघु और जीतू दोनों आँखें फाड़े उस वीडियो को देख रहे they.........fir वो लड़की हौले से मुँह खोलती हैं और उस आदमी का लुंड चूसने लगती हैं.....

" आपको मज़ा आ रहा हैं न मालिक........" और रघु राम के तरफ देखते हुए हौले से आंख मार देता हैं वहीँ राम का चेहरा सफ़ेद पढ़ जाता hain....usey उन दोनों के साथ इस तरह बैठकर देखना बहुत अजीब सा लग रहा tha.........jaise जैसे मूवी आगे बढ़ती जा रही थी वैसे वैसे रघु और जीतू के मज़े बढ़ते जा रहे they......wahin राम की तो जैसे सांसें रुक सी गयी thi.....usney आज तक सपने में भी नहीं सोचा था की ऐसी मूवीज भी कभी बनती होगी........

थोड़े देर बाद वो लड़की भी पूरी नंगी हो जाती हैं और राम आँख फाड़ी उस लड़की की तरफ ऐसे देखने लगता हैं जैसे वो कोई अजूबा देख रहा ho......wahin रघु और जीतू दोनों का लुंड पूरा अकड़ गया tha.........movie देखते वक़्त रघु को कुछ शरत सूझती हैं और वो जीतू की तरफ देखते हुए मुस्कुराने लगता hain....wahin जीतू रघु की तरफ सवाल भारी नज़रियों से ऐसे देखने लगता हैं जैसे वो उसका इरादा समझ गया हो.......

" चल बीटा jeetu.......tu भी यहीं शुरू हो jaa.......aur आज अपने मालिक को लाइव शो दिखा.........." वहीँ जीतू रघु की तरफ ऐसे देखने लगता हैं जैसे कोई बकरा काटने से पहले कॅशे को देखता ho...........usey रघु पर अंदर hi अंदर बहुत गुस्सा भी आ रहा था मगर वो रघु को नाराज़ भी नहीं करना चाहता tha......kyon की एक वो hi उम्मीद की किरण था जो उसका पार घात लगा सकता tha.......jeetu मरता क्या न karta.........wo भी चुप चाप से अपने कपड़े निकलने लगता हैं वहीँ राम की जो रही सही हिम्मत थी वो भी जवाब देने लगी thi......durr से वो न hi रघु को कुछ बोल पा रहा tha.......na hi जीतू को इंकार कर पा रहा tha.......ek तरफ चुदाई की मूवी चल रही thi......wahin दूसरी तरफ जीतू की लाइव video........ye सोचकर राम की हालत पतली होने लगी थी.........

जीतू हौले हौले अपने सरे कपड़े उतरता चला जाता हैं और जब वो अपने अंडरवियर उतरता हैं राम की नज़रें उस वीडियो से हटकर जीतू के लुंड की तरफ चली जाती hain......wahin उसका गाला सूखने लगता hain......lund तो जैसे फटने के कगार पर tha..........itn sakht...inta हार्ड हो गया था जैसे मालूम पड़ता था की हाथ लगते hi पिछड़ी निकला jayega.......shayad इसी दुर्र से राम अपने लुंड पर हाथ नहीं लगा रहा tha.......wahin राम कभी उस वीडियो में उस आदमी का लुंड देख रहा tha...............to कभी जीतू के लुंड ko....aur शायद वो उन दोनों के लुंड को कपरिसिओं भी कर रहा tha.....aur जहाँ तक उसका मनन था की जीतू क लुंड उस मूवी के आदमी से कहीं ज़्यादा मोटा था ...............और बड़ा भी..........

राम ने ऐसा नज़ारा कभी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा tha..........wahin रघु मुक्सुराये जा रहा tha......jeetu सामने की मूवी की तरफ देखते हुए अब अपना लुंड धीरे धीरे हिला रहा tha......wahin राम एक तरफ चुदाई का सन देख रहा था जिसमें वो लड़की उस आदमी से अपनी छूट मरवा रही thi.......aur चीख चिल्ला रही thi.............wahin दूसरी तरफ जीतू अपने लुंड को तेज़ी से हिला रहा tha........ye नज़ारा देखकर उसके तन बदन में जैसे आग सी लग गयी thi..........wo वहीँ लुम्बी लुम्बी सनें ले रहा tha.....wahin उसके लुंड से प्रेकम निकलना शुरू हो गया tha.......wo एक पल के लिए भी अपनी नज़रें उन दोनों जगह से नहीं हटा पा रहा था........

स्क्रीन में वो आदमी अलग अलग तरीके से उस लड़की की छूट मरता हैं तो आखिरी में अपना छुम उस लड़की के मुँह में गिरा देता hain......ye नज़ारा देखते हुए आखिर जीतू का भी साबरा का बांध टूट जाता हैं और वो sssssssssssssssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhaaaaaaaaaaaaa करते हुए उसका भी लुंड गरम गरम लावा उगलने लगता हैं जिसे राम बड़ी बड़ी आँखें किये हैरत से देखे जा रहा tha........kaise वो खुद को संभाले हुए था ये वही जनता tha.........wahin जीतू की आँखें कुछ देर के लिए मनो बंद सी हो जाती हैं और वो लुम्बी लुम्बी सांसें लेता हुआ वहीँ किसी लाश की तरह बिलकुल ठंडा पढ़ जाता hain......wahin रघु भी अपने लुंगी के ऊपर से आपले लौड़े को धीरे धीरे सेहला रहा tha........aabhi उसका छुम निकलने का कोई इरादा नहीं tha.....wo तो बस राम को चुदाई में पक्का कर रहा था............

वो वीडियो ख़तम होने के बाद जीतू राम के मोबाइल को उसकी तरफ धीरे से बढ़ा देता हैं वहीँ राम उस वीडियो को बंद कर देता hain........fir जीतू अपने छुम साफ़ करके जल्दी से अपना पेण्ट पहन लेता हैं और बहार की तरफ निकल जाता hain........wahin राम के दिमाग में अब्भी भी वो वीडियो तो कभी जीतू का लुंड घूम रहा thaa.........uska बदन अंदर hi अंदर जैसे सुलग गया tha.......sach तो ये था की उसकी भी इच्छा मुठ मरने की कर रही thi....magar यहाँ उन दोनों के बीच वो ऐसा कभी नहीं कर सकता था..........

" इसे आप लेजाकर रात में आराम से देखिएगा malik........chahe तो आप इसे देखते हुए मुठ भी मार सकते hain........aur अगर आपका दिल करे तो आप ये वीडियो मेमसाहेब को भी दिखा सकते hain.......sach कहता हूँ इसमें बड़ा मज़ा आएगा..........." और रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता है वहीँ राम अजीब नज़रियों से रघु के तरफ ऐसे देखने लगता हैं जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो........

" magar......kahin भाभी .......मुझे मारेगी तो......" और राम भोलेपन में धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ता हैं.....

" आप भी कितने भोले हैं malik.........arey मेमसाहेब को भी तो अपनी गलती का एहसास होना chahiye..........unhein भी तो लग्न चाहिए की उन्होंने आपके साथ गलत किया hain..........ye वीडियो आपको देखता हुआ देखेगी तो उनका भी दिल machlega...........aur वो इसी तरह आपकी मुट्ठी मेह होगी......." और रघु इतना कहकर शरारत भरे अंदाज़ में हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ इस बार राम भी गहरे सोच में डूबता चला जाता hain.....dekhna तथा की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था......................................................

कंटिन्यू.............................................................................
 
अपडेट- 26(ा) (मेघा अपडेट)

" आप भी कितने भोले हैं malik.........arey मेमसाहेब को भी तो अपनी गलती का एहसास होना chahiye..........unhein भी तो लग्न चाहिए की उन्होंने आपके साथ गलत किया hain..........ye वीडियो आपको देखता हुआ देखेगी तो उनका भी तो दिल machlega...........aur वो इसी तरह आपकी मुट्ठी मेह होगी......." और रघु इतना कहकर शरारत भरे अंदाज़ में हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ इस बार राम भी गहरे सोच में डूबता चला जाता hain.....dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था......................................................

अब आगे.........................................................................................

राम का दिमाग लगभग घूम गया tha...........uski सोच धीरे धीरे अब बदल रही thi...........raghu की कही बातें उसे परेशां करने लगी thi........raghu ने कह तो दिया था की ये वीडियो काव्य के सामने ज़रूर dekhna.......magar राम जनता था की वो ऐसा कभी कर नहीं sakta............kyon की उसके अंदर इतनी हिम्मत नहीं thi........aur न कभी होने वाली थी.........

राम अब काव्य से दूर रहने लगा tha...........wo उससे ठीक से बात तक नहीं karta........aur सारा दिन अकेले अपने कमरे में चुप चाप यु hi पड़ा rehta..........wahin काव्य अंदर hi अंदर घुटती जा रही thi............wo ाचे से जानती थी की राम उससे क्या चाहता hain........aur वो उससे किस बात पर अब तक नाराज़ hain..........aakhir काव्य भी तो राम को चाहती thi.....to काव्य अपनी चाहत से भला कैसे दूर रह सकती thi........aakhir हारकर वो खुद को समझते हुए राम के कमरे की तरफ चल पड़ती hain.........na जाने क्यों उसका दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha...........wo ाचे से जानती थी की राम आज इतनी आसानी से नहीं मानने वाला............

शाम का समय tha........ram हमेशा की तरह अपने कमरे में बैठा हुआ चुदाई की वो वीडियो देख रहा tha............aabhi कुछ देर पहले उसने मुठ मरी थी और फिर थोड़े देर बाद उसका खुमार फिर से चढ़ गया tha............ye जवानी का नशा होता hi ऐसा hain..........wo तो उस वीडियो को देखने के लिए जैसे पागल सा हो रहा tha........tabhi उसके कमरे का दरवाज़ा नॉक होता हैं और राम फ़ौरन उस वीडियो को बंद करता हैं और जल्दी से अपने लोअर सही करता hain.............aaj भी उसने अपने लुंड पर तकिया (पिलो) रखा हुआ tha.........jissey उसका खड़ा हुआ लुंड उससे छुपा rahe..........wo ाचे से जनता था की इस वक़्त दरवाज़े पर कौन हो सकता hain........tabhi काव्य हौले से दरवाज़ा खोलती हैं और फ़ौरन अंदर चली आती hain..........kavya को देखर राम नफरत से अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेता हैं वहीँ काव्य टकटकी लगाए राम के मासूम से चेहरे की तरफ बस देखे जा रही थी.......

वो हमेशा की तरह आकर वहीँ राम के बाजु में बैठ जाती हैं और एक तुक राम की तरफ देखने लगती hain.........sach तो ये था की काव्य के चेहरे पर भी उदासी साफ़ नज़र आ रही thi...........wahin राम बिलकुल खामोश था और अपना सर नीचे की तरफ झुकाये हुए बैठा tha........kavya अपना एक हाथ राम के चीन पर रख देती हैं और उसे हौले से ऊपर की तरफ उठती hain..........ram एक नज़र काव्य के तरफ देखता हैं फिर वो अपनी नज़रें दूसरी तरफ गुस्से से दुबारा से फेर लेता हैं..........

" ram.........kya तुम मुझसे अब तक नाराज़ ho...........iam सॉरी.........." और काव्य राम की तरफ देखते हुए अपनी दोनों कान हौले से पकड़ लेती हैं वहीँ राम कोई रिएक्शन नहीं karta........fir काव्य जैसे hi अपना एक हाथ राम के हाथों पर रखती हैं अगले hi पल राम गुस्से से अपना हाथ काव्य के हाथों से हटा लेता hain........wahin काव्य की आँखें कुछ नुम हो जाती hain.....wo टकटकी लगाए राम के चेहरे को बस देखे जा रही थी......

" नहीं चाहिए मुझे आपका कोई और ehsaan.........main जैसा हूँ जिस हाल में हूँ......... खुस hoon..........aur ाइयांडा आपको मेरे कमरे में आने की भी कोई ज़रुरत नहीं हैं......" और राम जैसे काव्य पर बरस पड़ता हैं वहीँ काव्य ख़ामोशी से उसकी बातें सुन रही thi..........jo आंसूं कुछ देर पहले पलकों पर थी अब वो बहार निकल पड़ी thi.....jo उसकी गलों से बहते हुए नीचे फर्श पर टपक रही thi...........kavya बिलकुल चुप चाप से अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुकाये हुए खामोश बैठी हुई thi.......kuch सोचकर वो अपने आँखों से आंसूं पूछती हैं और राम के तरफ अजीब नज़रियों से एक तुक देखने लगती हैं..........

" तो फिर ठीक hain.............agar तुम्हें ऐसा लगता हैं की मैंने तुम्हारे विश्वास को ठेश पहुंचाई हैं ........या फिर मैंने तुम्हें धोका दिया hain.........to जो तुम्हारा दिल करे मुझे सजा do..........main उफ्फ्फ्फ़ तक नहीं karungi.........jo तुम कहोगे वो मैं सब कुछ karungi..........magar प्लीज मेरे साथ ऐसे बर्ताव न karo.........mujhe बहुत बुरा लगता हैं......." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम गुस्से से अभी भी काव्य के तरफ ऐसे hi घूरे जा रहा tha..........mano उससे कच्चा चबा जायेगा........

" bura....................bura तो मुझे भी उस दिन बहुत लगा था जब आप अपने वाडे से यु मुकर गयी thi..........aur सच तो ये हैं की आप मेरे लिए कुछ नहीं कर sakti.......bus आप बातें करती hain...........aap मुझसे कोई प्यार व्यार नहीं karti.........agar आपको मुझसे ज़रा भी प्यार होता तो आप ख़ुशी ख़ुशी मेरी हर बात मान leti......yu बात बात पर नखरे नहीं किया करती......." और राम जैसे गुस्से से बोल पड़ता hain.....jitna गुस्सा उसने अपने अंदर काव्य के प्रति समाते हुआ था वो सब उसकी जुबान से किसी शोले की तरह बरस रहे they........wahin काव्य कुछ देर तक खामोश रहती हैं और फिर आगे बोल पड़ती हैं.........

" तुम्हारा गुस्सा बिलकुल लाज़मी हैं ram..........main तुम्हारे सामने और कोई सफाई नहीं doongi............magar उसके पीछे वजह भी थी......." और काव्य इतना बोलकर बिलकुल खामोश हो जाती हैं वहीँ राम उसे अब भी गुस्से से घूरे जा रहा था............

" सब कहने की बातें हैं bhabhi.............sach तो ये हैं की आप मेरे लिए कुछ नहीं कर sakti..........aap बस नाम की मेरी गर्लफ्रेंड हैं........." और राम फिर से जइसे ज़हर उगलने लगता हैं वहीँ काव्य एक तुक राम के तरफ देखे जा रही thi.............usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो राम के सवालों का क्या जवाब दे..........

" ram...........yakeen करो mera........main झूट नहीं बोल rahi.........maine आपने वादा तोडा कहा hain...........na मैं अपने वाडे से मुकर रही hoon........maine तो बस तुमसे कुछ समय माँगा tha........agar अब भी तुम्हें यकीन न हो तो जो तुम कहोगे मैं तुम्हारे ख़ुशी के लिए सब कुछ करुँगी............." और काव्य का दिल ज़ोरों से धड़क उठता hain....usney राम से बोल तो दिया था मगर अब वो एक बार फिर से अंदर hi अंदर पस्चता रही thi........magar जब तीर कमान से निकल गया तो फिर सोचना कैसा!!!!!!!!

" जो बोलूंगी वो आप करेंगी naaa.........pukkaa..........." और राम काव्य को सर से लेकर पवन तक अजीब नज़रियों से घूरने लगता हैं वहीँ काव्य का दिल अब ज़ोरों से धड़क उठा tha......wo बहुत ाचे से जानती थी की राम उससे अब क्या मांगने वाला hain.......filhaal तो वो इन सब चीज़ों के लिए अभी तैयार नहीं थी मगर वो अब राम को निराश भी नहीं करना चाहती thi..........aab सब कुछ उसने नसीब पर छोड़ दिया था.........

" haan.....ram ........karungi.........jo tum.........kahogey............" और काव्य का सर नीचे की तरफ झुक जाता हैं वहीँ उसकी धड़कनें पूरे उफान पर thi..........bechaini उसकी पल पल अब बढ़ती जा रही थी........

" to.........main आपको सर से लेकर पवन तक पूरा नंगा देखना चाहता hoon.........bin कपड़ों ke........bhabhi के नाते न sahi......meri गर्लफ्रेंड के नाते आप इतना तो मेरे लिए कर hi सकती hain..........agar नहीं कर सकती to...............darwaza उस तरफ हैं........." और राम जैसे काव्य की तरफ देखते हुए अपना फैसला सुनाता hain......wahin काव्य लगभग बिलकुल खामोश thi..........chaunki वो इस लिए नहीं क्यों की उसे ाचे से मालूम था की राम उससे ऐसे hi कुछ माँगनेवाला hain.................chehrey पर शर्म और हाय की लाली लिए हुए काव्य फ़ौरन अपनी जगह से कड़ी होती हैं और राम की तरफ बिना देखे हुए कुछ देर तक यु hi खामोश कड़ी रहती hain........uska दिल इस वक़्त बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था.........

राम के सामने ऐसे बिन कपड़ों ke........ye सब सोचकर भी उसका दिल दुर्र से बैठा जा रहा tha............halanki वो कभी राहुल के सामने भी ऐसी हालत में नहीं आयी thi........nangi भी होती थी तो बस चुदाई के waqt.......wo भी पूरी तरह से कभी nahin......haan नहाते वक़्त वो सर से लेकर पवन तक बिन कपड़ों के rehti...........magar बिलकुल अकेले mein..........aaj ऐसी hi कुछ हालत में राम उसे देखना चाहता tha............waise काव्य जैसी लड़की के लिए ये सब करना बहुत बड़ी बात thi.......aur शायद वो ऐसा कभी कर भी न pati......kyon की उसके अंदर छुपी शर्म ....झिझक बार बार उसे ऐसा करने से रोक रही thi............wo इसी असमंजश में डूबी हुई थी और फैसला नहीं कर पा रही थी की क्या kare.............kya न kare.........aur वो अब राम को नाराज़ भी तो नहीं कर सकती थी............

" क्या हुआ bhabhi...........nahin होगा न aapse.......main ाचे से जनता tha...........aap बस बातें बड़ी बड़ी करती hain............aur जब करने की बरी आती हैं तो ..............." और राम के चेहरे पर गुस्सा जैसे फिर से झलक पड़ता हैं वहीँ काव्य अपना सर नीचे की तरफ झुकाये चुप चाप से राम के ताने सुनती रहती hain...........aaj उसके अंदर कुछ भी कर गुज़र जाने की हिम्मत नहीं हो रही thi........wahin राम अभी भी गुस्से से घूरे जा रहा था.......

" आप यहाँ कड़ी क्यों hain..............jaiye यहाँ se.......mujhe अब आपसे कोई बात नहीं करनी..........." और इस बार राम फिर से गुस्से से अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेता हैं वहीँ काव्य कुछ देर तक कड़ी राम की तरफ एक तुक देखती रहती हैं फिर कुछ सोचकर वो राम के करीब जाती हैं और जाकर उसके ठीक सामने कड़ी हो जाती hain.........nazrein अब उसकी राम के चेहरे पर तिकी हुई thi.......shayad वो अपने अंदर हिम्मत जूता रही thi..........kuch देर की गहरी ख़ामोशी के बाद आखिर वो बोल पड़ती hain..........aankhein अभी भी कुछ नुम थी........

कॉन्टिनोएड.................................................................................
 
अपडेट- 26(बी) (मेघा अपडेट)

" ठीक हैं ram........agar तुम्हें इसी में अगर ख़ुशी मिलती हैं तो तुम्हारे ख़ुशी के लिए एहि sahi...........tum मुझे बिन कपड़ों के देखना चाहते हो na.......lo आज मुझे उस हाल में जी भरकर देख लो........" और काव्य हौले से अपना एक हाथ अपने कंधे की तरफ ले जाती हैं और धीरे से अपने कंधे पर लगा साड़ी पर सेफ्टी पिन खोल देती hain.......safety पिन खुलते hi उसका साड़ी सरकते हुए नीचे फर्श पर गिर पड़ती hain.........aur राम की नज़रियों के सामने काव्य के गोल गोल बड़े बड़े चूचियां साफ़ नज़र आने लगती hain.......jo नीले ब्लाउज में कैद थी .........जैसे बहार आने को मचल रही ho.........wahin काव्य का चेहरा शर्म से सुर्ख लाल हो चूका था.........

जो नज़रें अभी कुछ देर पहले उठी हुई थी अब वहीँ नज़रें नीचे की तरफ झुक गयी thi......aankhon में शर्म की डोरी साफ़ नज़र आ रही thi...........wahin राम अपनी आँखें फाड़े चुप चाप से काव्य की दोनों चूचियों को घूरे जा रहा tha........ek तेज़्ज़ सेंसेशन के साथ उसके लौड़े में हलचल होनी शुरू हो गयी thi..........wahin उसका कलेजा बहुत ज़र्रों से धड़क उठा tha.........na जाने कब से वो अपनी भाभी के बारे में ये सब सोचता आया था आज जैसे उसका सपना पूरा होता हुआ सा नज़र आ रहा था.......

" ram..........jante हो मैंने तुम्हें इंकार क्यों kiya..........chahti तो थी मैं भी की तुम्हें अपनी गर्लफ्रेंड होने का वो सब सुख du.........magar मेरी पीरियड्स की वजह से मुझे अपना फैसला बदलना pada..........main तो ख़ुशी ख़ुशी तुम्हारे साथ सब कुछ करने को तैयार थी मगर सच तो ये हैं की मुझे तुम्हारी ये बेरुखी देखि नहीं gayi............aaj के बाद शायद तुम्हारे सरे शिकवे गीले दूर हो jayengey...........jab कोई लड़की अपनी मर्ज़ी से किसी के साथ सेक्स करती हैं तो उसका सुख कुछ अलग hi होता हैं ......मगर बिना उसकी मर्ज़ी से वो चीज़ ज़बरजस्ती कहलाती hain........aur जहाँ तक मेरा मानना हैं जो चीज़ प्यार से हासिल हो सके उसके लिए ज़बरजस्ती करना बेवकूफी nahin.............................aagey तुम खुद hi समझदार हो............." और काव्य जैसे हामी भरते हुए अपनी बात ख़तम करती हैं वहीँ राम भी काव्य की बाटिओं को सुनकर अपने सोच में गम हो जाता hain..........raghu ने भी उससे एक दिन ये बातें कही थी........

" to...............aap hi बोलिये इसमें मेरा क्या फायदा हो सकता hain.........aur......ye पीरियड्स क्या होता हैं.......!!!!!! " राम एक बार फिर से भोलेपन में बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पति..........

" fayda...........to तुम कबसे मेरे साथ बुसिनेस्स डील करने लगे जो अब तुम मुझमें फायदा खोज रहे ho............fayda नहीं मज़े bolo...........main तुम्हें वो मज़े दूंगी जो तुम कभी सपने में भी नहीं सोचे hogey...........magar उसके लिए तुम्हें अभी बहुत सी चीज़ें जान लेना बेहद ज़रूरी hain............agar तुम कहो तो मैं तुम्हें साडी चीज़ें सीखा सकती hoon.........waqt आने पर तुम एक दिन सब कुछ धीरे धीरे सीख jawogey..........agar तुम्हारी इज़ाज़त हो तो क्या मैं अपने कपड़े दुबारा से सही कर सकती hoon.......mera मतलब अपनी साड़ी का पल्लू अपने सीने पर रख सख्ती hoon.......mujhe इस हाल में ऐसे तुम्हारे सामने शर्म सी आ रही हैं............" और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम एक नज़र काव्य के तरफ देखता हैं और धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देता हैं........

चाहता तो वो नहीं था की काव्य अपनी साड़ी का पल्लू ऊपर करे मगर थोड़ा सा झुक जाने में उसे कोई बुराई नहीं नज़र आ रही thi..........aur वैसे भी अब उसके मज़े के दिन अब शुरू होने hi वाले थे जो वो शायद कल्पना भी नहीं कर सकता tha..........kavya उससे न सिर्फ छुड़वाने वाली थी बल्कि उसे चुदाई में इतना एक्सपर्ट बना देना चाहती थी की आगे वो जब चाहे जहाँ चाहे राम से अपनी छूट आसानी से मरवा sake............aur वैसे भी काव्य राम को बहुत चाहती thi......aur शायद राम भी काव्य को अब चाहने लगा tha.........aur जहाँ चाहत की बात होती हैं वहां ज़बरदस्ती का सवाल hi कहाँ पैदा होता हैं.........

काव्य साड़ी का पल्लू हौले से अपने सीने पर रखती हैं और कंधे पर से सेफ्टी पिन लगा लेती hain.......aab वो अपने आपको काफी रिलैक्स महसूस कर रही thi......wahin राम के अंदर का भी सारा गुस्सा लगभग गायब हो चूका था..........

" आपने बताया नहीं भाभी की ये पीरियड्स क्या होता हैं......." और राम जैसे उतावलापन में दुबारा से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य राम की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती hain.........wahin काव्य धीरे से अपना एक हाथ राम के सर पर बड़े प्यार से फेरती रहती हैं........

" तुम्हें ये साडी बातें तुम्हारी भाभी क्यों batayegi........jakar तुम खुद अपनी गिलफ्रेंड से क्यों नहीं ये सब पूछ लेते............" और काव्य शरती अंदाज़ में राम की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम एक बार बुरा सा मुँह बना लेता hain.......aabhi भी उसस्के चेहरे पर हंसी थी........

" तो आप मेरी गर्लफ्रेंड नहीं हैं kya..............aap hi बता दीजिये मुझे........" और राम जैसे काव्य को देखते हुए सफाई देने लगता हैं वहीँ काव्य उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं.......

" हूँ to..........ismein कोई शक हैं kya!!!!!.........magar ाचा होगा की मैं तुम्हें शुरू से एक एक कर साडी बातें बताती jawun.........issey तुम्हें भी कोई परेशानी नहीं hogi...........aur मुझे bhi........bus आज के लिए इतना जान लो की औरत के पीरियड्स महीने में एक बार के लिए आते hain..............aur ये पीरियड्स लगभग एक हफ्ते तक रहते hain........aur इन एक हफ़्तों में औरत किसी से सेक्स नहीं कर sakti........agar वो ऐसा करती भी हैं तो इस बीच प्रोब्लेम्स भी बहुत आते hain.........samjhe मेरे बुद्धू राजा.........." और काव्य इतना कहकर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम भी जवाब में धीरे से हंस पड़ता हैं...........

" तो आपके पीरियड्स कब ख़तम होने वाले hain............bhabhi सच कहता हूँ मुझे अब एक पल और रहा नहीं जा raha.............jee तो अभी कर रहा हैं की मैं अभी आपके साथ......" और राम जैसे तड़प उठता hain.........wahin काव्य राम की बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं.........

" इतनी बेसब्री भी ाची नहीं ram.........sabra का फल बहुत मीठा होता hain........jaise तुम इतने दिनों तक साबरा किये हुए ho.......waise दो दिन और sahi............fir तुम्हारी ये गर्लफ्रेंड तुम्हारे हर एक इशारों पर nachegi..........jaisa कहोगे वैसा karegi..........jo मांगोगे वो dungi...........tumhein मैं औरत होने का वो सभी सुख दूंगी जो अब तक मैं बस राहुल को देती आयी hoon...........aab तुम्हारा भी मुझपर उतना hi अधिकार hoga......jitna राहुल का हैं......... .बस दो दिन का और इंतज़ार.............." और काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ राम भी जवाब में कुछ नहीं बोल pata........aab उसके पास साबरा करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था.............................

" magar.............aaj के बाद आप मेरे साथ रात में मेरे बिस्टेर पर hi सोया karengi..........aab आप इसमें कोई और बहाना न बनाना.........." और राम फिर से मासूमियत भरे लहज़े से बोल पड़ता hain........wahin काव्य मुस्कुराये बिना नहीं रह पति.......

" ठीक हैं baba.......sowungi.........magar तुमने कहीं मेरे साथ कोई शरत की तो........." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम एक तुक काव्य के तरफ देखे जा रहा था........

" मेरी कहाँ इतनी हिम्मत भाभी की मैं कुछ ऐसा वैसा आपके साथ karunga..........agar गलती से हाथ कहीं और चला गया तो बात कुछ और हैं......" और राम इतना कहकर काव्य के तरफ धीरे से एक आँख मार देता हैं वहीँ काव्य मुस्कुराये बिना नहीं रह पति...........

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काव्य के जाने के बाद राम तो जैसे और भी बेचैन हो गया tha............kavya जैसी हसीना के आगे अब उसे ब्लू फिल्म भी ाचा नहीं लग रहा tha..........ek एक पल ऐसे बीत रहा था जैसे साड़ियां गुज़र रही ho.........ram की इस वक़्त ऐसी हालत थी जैसे कोई प्यासा पानी के लिए तड़प रहा हो और दूर कहीं उसे पानी दिखाई दे रहा ho.....aur लाख कोशिशों के बावजूद वो उस पानी को पी नहीं पा रहा ho...........kavya उसकी मुट्ठी में आ चुकी थी मगर वो अब भी काव्य पर पूरा अधिकार नहीं जमा पा रहा tha.........magar वो अब काव्य और अपने बीच की ये दूर की हमेशा हमेशा के लिए मिटा देना चाहता था........

जैसे तैसे रात हुई और खाना खाने के बाद राम अपने कमरे में आकर बड़ी hi बेसब्री से काव्य के आने का इंतज़ार करने laga.........kareeb रात के 10 बजे राम के दरवाज़े पर आहात हुई और राम का दिल एक बार ज़ोरों से धड़क utha.........jab नज़रें सामने के दरवाज़े पर गयी तो नज़रें जैसे वहीँ ठहर सी gayi...........kyon की काव्य ने आज कुछ रंग रूप hi ऐसा बदला tha............jo काव्य हमेशा साड़ी में लिपटी रहती थी आज वही काव्य सामने ब्लैक सूट और लग्गी में कड़ी हुई नज़र आ रही thi.........aur वो इस वक़्त किसी क़यामत से कम तो बिलकुल भी नहीं लग रही थी...........

सूट टाइट होने की वजह से काव्य के बदन का हर एक कटाव साफ़ नज़र आ रहा tha...........shadi के बाद आज पहली बार काव्य ने सूट पहना tha..........halanki उसके कपड़े पहने में कोई रोक टोक नहीं थी मगर सास ससुर के रहते उसे सूट पहनना थोड़ा ओड लगता tha.........wahin राम फटी आँखों से काव्य को ऐसे देख रहा था जैसे वो उसकी भाभी न होकर कोई और hain.......wahin काव्य राम की तरफ देखते हुए मंद मंद मुस्कुरा रही thi.........wo धीरे धीरे क़दमों से चलते हुए राम के कमरे में आती हैं और उस कमरे का दरवाज़ा ाचे से बंद कर देती हैं और अजीब नज़रियों से राम के तरफ देखने लगती हैं ............वहीँ राम की नज़रें अभी भी काव्य की तरफ थी......

" तो तुम ये सब भी काम अब करने लगे हो ......... ram..............mujhe नहीं पता था की तुम इतने पहुंचे हुए चीज़ निकलोगे......." और काव्य हौले से अपना हाथ आगे की तरफ बढ़ा देती हैं और जब राम की नज़रें काव्य के हाथ में थमी उस चीज़ पर पड़ती हैं उसके रगों में दुर्र की एक तेज़्ज़ लहर दौड़ पड़ती hain..........ek बार फिर से राम के चेहरे का रंग पूरा फीका पढ़ चूका tha........dekhna था की आईसीए कौन सी चीज़ थी काव्य के हाथ में जिसे देखकर राम की आज फुट गयी thi..........................dekhna था आगे वक़्त अब कौन सा करवट बदलने वाला था...............................................

कंटिन्यू........................................................
 
Update-27(A) (मेघा अपडेट)

" तो तुम ये सब भी काम अब करने लगे हो ......... ram..............mujhe नहीं पता था की तुम इतने पहुंचे हुए चीज़ निकलोगे......." और काव्य हौले से अपना हाथ आगे की तरफ बढ़ा देती हैं और जब राम की नज़रें काव्य के हाथ में थमी उस चीज़ पर पड़ती हैं उसके रगों में दुर्र की एक तेज़्ज़ लहर दौड़ पड़ती hain..........ek बार फिर से राम के चेहरे का रंग पूरा फीका पढ़ चूका tha........dekhna था की ऐसी कौन सी चीज़ थी काव्य के हाथ में जिसे देखकर राम की आज फुट गयी thi..........................dekhna था आगे वक़्त अब कौन सा करवट बदलने वाला था...............................................

अब आगे.........................................................................

राम का चेहरा इस वक़्त देखने लायक tha.........uske चेहरे पर बारह बजे हुए they.........aur बजते भी कैसे नहीं......... काव्य के हाथ में रघु की दी हुई वो सेक्सी किताबें जो थी जिन्हें वो देखने के बाद तकिये के नीचे रखकर भूल गया tha........wahin काव्य की नज़रें अभी भी राम के चेहरे पर तिकी हुई thi........aur राम शर्म से अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुकाये हुए बैठा था..........

" मैं पूछती हूँ आखिर ये किताब तुम्हारे पास आयी कहाँ se...........isey कहाँ से तुम लाये राम........" और काव्य हौले से बोल पड़ती hain......na hi उसकी आवाज़ ज़्यादा तेज़्ज़ थी और न hi kum........wo कहीं से भी राम पर नाराज़ होती हुई नज़र नहीं आ रही thi.........wahin राम की जैसे एक बार फिर से बोलती बंद हो गयी थी...........

" wwwwooooo....bbhhhaaabbbhhiii...." और राम फिर से हकला पड़ता हैं वहीँ काव्य राम की तरफ देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं.......

" तुम जितने भोले दिखते ho......utne हो nahin.........waise तुम्हें आज के बाद इन सब चीज़ों की कभी कोई ज़रुरत नहीं padneywali........uske लिए मैं हूँ न........" और काव्य राम की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम की जैसे जान में जान आ जाती hain..........aab उसका दुर्र एक hi पल में जैसे गायब सा हो गया था........

" तुम अभी यहाँ पर आकर बैठो ram.......is कुर्सी पे......." और काव्य जैसे राम को हुकुम देती हैं वहीँ उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान तैर जाती hain........ram एक लफ्ज़ कुछ नहीं बोल पता और किसी आदर्श बाचे की तरह सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ जाता hain.........kavya कड़ी कड़ी राम की तरफ देखते हुए मुस्कुरा रही thi.........waise काव्य के तेवर आज कुछ बदले हुए से नज़र आ रहे they.........wo अगले पल अपने सीने पर लगा दुपट्टा हटा देती हैं और उसे सामने के बिस्टेर पर फेंक देती hain............wahin राम हैरत से काव्य के बदले हुए उस रूप को देख रहा tha.........ek बार फिर से उसका गाला सूखने लगा था........

काव्य धीरे धीरे चलती हुई राम के पास आती हैं और आकर इस बार राम के ठीक सामने अपने दोनों पवन फैलाकर उसके जांघों पर........ अपना चेहरा उसकी तरफ करके हौले से बैठ जाती hain.........wahin वो अपना दोनों हाथ राम के गले में दाल देती हैं और एक तुक राम के चेहरे की तरफ देखने लगती hain.........magar बड़े प्यार se.........wahin राम का कलेजा और भी ज़ोरों से धड़कने लगा tha......aisa पहली बार था जब काव्य उसके इतने करीब आयी thi...........wo काव्य के ऊपर नीचे हो रहे सांसों ko.....aur उसके धड़कते हुए दिल को आसानी से महसूस कर रहा tha.........wahin उसकी नज़रें कभी काव्य के चेहरे पर jati..........to कभी सामने के दरवाज़े की तरफ.........

"तुम इधर उधर क्या देख रहे हो ram........kahin भागने का इरादा हैं क्या!!!!!! फ़िक्र मुट्ठ करो आज मैं तुम्हें कहीं जाने नहीं doongi............idher.......meri तरफ dekho.......meri इन आँखों में.................." और काव्य हौले से राम की तरफ देखते हुए धीरे से मुस्कुरा देती हैं वहीँ राम की दुर्र से अब गांड फटने लगी thi..........baatein तो वो भी बहुत बड़ी बड़ी कर रहा था मगर काव्य को अपने इतने करीब पाकर उसकी जैसे हवा निकल गयी thi............sach तो ये था की उसे काव्य का इरादा कुछ ठीक नहीं लग रहा tha..........kahin ऐसा तो नहीं की वो उसका बंग करना चाहती हो...........

"wwwwoooo....maaaiaiin..." और राम के मुँह से जैसे आवाज़ आणि बंद हो जाती hain..................wahin काव्य राम की हालत को देखकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पति........

" तुम अपने आपको बहुत बड़े मर्द समझते हो naa.........aab क्या hua......sari हेकड़ी निकल gayi............aur ये सब कब से चल रहा हैं........." और काव्य अपने हाथ में थमा चुदाई वाला किताब राम के सामने रख देती और धीरे धीरे उस किताब के एक एक पानीय को पलटने लगती hain........wahin राम की तो जैसे आज गांड फुट गयी थी ............दुर्र से उसे कुछ बोलै hi नहीं जा रहा tha........wo क्या काव्य को चुदाई वाली किताबें या फिल्म दिखता आज काव्य खुद उसे वो किताब दिखा रही थी...........

" जब तुम ये सब चीज़ें देख सकते हो तो इसका मतलब तुम ब्लू फिल्में भी ज़रूर देखते hogey........hain naa.......kab से चल रहा हैं ये सब........" और काव्य बड़े गौर से एक एक तस्वीरों को देखती जा रही थी वहीँ उसकी सांसें भी भरी होती जा रही thi........uske तन बदन में जैसे आज लग गयी thi.........wahin राम की नज़रें अभी भी नीचे की तरफ झुकी हुई थी.......

" तुम मेरे सवालों का कोई जवाब क्यों नहीं देते ram.........aab तुम इतने बड़े हो गए हो की मर्द और औरत के बीच रिश्तों को समझने लगे ho...........hain naa............aab जब तुम सब कुछ जान hi गए हो तो वो साडी चीज़ें अब तुम मुझे sikhawogey........kyon सिखाऊगी न.........." और काव्य शरती अंदाज़ में राम की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा देती हैं वहीँ राम की जैसे और फुट जाती hain...........agar उसका बस चलता तो वो इसी वक़्त कहीं भाग jata..........magar अब तो भागने के सरे रास्ते भी बंद हो चुके they...........waihn काव्य उसके जांघों पर बैठी हुई थी मगर काव्य के ऐसी बाटिओं से बेचारे राम का लुंड भी ठीक से अब खड़ा नहीं हो पा रहा था..........

" bhhaaaabhhi.........wwwooo...maaaiinnnn कऊछह ंन्नःह्न्नीई नं ज्जाआँन्नताआँ....." और राम की सांस फूलने लगती हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर हौले से हंस पड़ती हैं.............

" ाचा baba..........aab और नहीं कुछ kahungi......bus.........waise एक बात तो पता चल hi gayi......ki तुम कितने बड़े मर्द हो........." और काव्य राम की तरफ देखते हुए खिलखालिटी हुई हंस पड़ती hain.........wahin राम बस ख़ामोशी से काव्य की बातें सुने जा रहा था..........

" आज तो वक़्त भी hain.......aur समां bhi........tumhari गर्लफ्रेंड इस वक़्त तुम्हारी बाँहों में hain...........kuch करना नहीं चाहोगे क्या तुम अपनी गर्लफ्रेंड के saath...........aaj इस शाम को और रंगीन बना do..........tumhari जगह और कोई होता तो कब का मुझपर टूट चूका hota........aur एक तुक हो की अभी तक भीगी बिल्ली बने हुए हो........." और काव्य राम की तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम जवाब में कुछ नहीं बोल पता.........

" लगता हैं तुमसे कुछ नहीं होने wala.......aab तो सब कुछ मुझे hi करना होगा........." और काव्य इस बार अपना एक हाथ राम के कंधे पर ले जाती हैं और उसे धीरे धीरे सरकते हुए नीचे की तरफ ले जाने लगती hain.........ram के सीने की taraf..................kavya बहुत आहिस्ता से अपनी एक ऊँगली की पॉइंट को राम के सीने पर तो......... कभी उसके कंधे से लेकर पैट तक फेरती जा रही thi........wahin राम का मुरझाया हुआ लुंड धीरे धीरे हरकत करने लगा tha..........kavya के बदन से उठने वाली शैम्पू और पिफमे की भीनी भीनी खुसबू राम को जैसे पल पल पागल करती जा रही thi........wo भी अब धीरे धीरे मदहोश होता जा रहा था.........

इस बार काव्य राम के हाथों में अपना एक हाथ हौले से रख देती हैं और बड़े गौर से राम के चेहरे की तरफ टकटकी लगाए देखती रहती hain..........lafz उसके भी खामोश थे मगर आँखों hi आँखों में दिलों की बातें हो रही thi.........kabhi राम उसकी तरफ देखता तो काव्य शर्म से अपनी पलकें नीचे झुका leti.....to कभी राम अपनी नज़रें फेर लेता..........

" ram............ek बात पूछूं................." और काव्य राम की आँखों में आँखें डेल हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम टकटकी लगाए काव्य के खूबसूरत चेहरे को देखे जा रहा tha..........kuch सोचकर वो धीरे से बोल पड़ता हैं......

" क्याआ......." और राम का कलेजा एक बार फिर से ज़ोरों से धड़क उठता hain......wahin काव्य की नज़रें अभी भी राम पर तिकी हुई थी.......

" मैं तुम्हें कैसी लगती hoon........mera मतलब .........मेरे जिस्म में ऐसी कौन सी चीज़ हैं जो तुम्हें अपनी तरफ अत्त्रक्ट करती हैं........" और काव्य की सांसें भी धीरे धीरे भरी होने लगती hain.............chehra उसका शर्म से सुर्ख लाल पढता जा रहा था वहीँ राम थोड़ी सी हिम्मत करके आगे बोल पड़ता हैं.......

" bhabhi........aap......sir से लेकर पवन तक बहुत सूंदर हैं........" और राम की नज़रें इस बार जैसे काव्य पर टिक जाती हैं वहीँ काव्य उसे अजीब नज़रियों से घूरे जा रही thi...........tabhi राम की नज़रें थोड़ी सी नीचे की तरफ जाती hain......kavya के सीने की taraf.............suit टाइट होने की वजह से उसकी बड़ी बड़ी चूचियां उन कपड़ों में और भी क़हर धा रही thi..........kavya का क्लेवराज का 1/3 हिस्सा उस सूट में बहार की तरफ झलक रहा था जो राम की बेचैनी को पल पल बढ़ता जा रहा tha.........uska दिल अब धीरे धीरे मचलने लगा tha......dil तो उसका कर रहा था की वो अपना हाथ आगे बढाकर काव्य के उन नरम चूचियों को अपने हाथों में लेकर उन्हें जी भर मसलता रहे ........उनके साथ दिल भरने तक बस खेलता रहे........ मगर ऐसा करने की हिम्मत राम के अंदर नहीं thi............dheere धीरे अब उसके अंदर भी अरमान जागने लगे they.......wahin काव्य उसकी नज़रियों को पल पल पढ़ने की कोशिश कर रही थी.......

कॉन्टिनोएड...........................................................................
 
Update-27(B) (मेघा अपडेट)

अपनी चूचियों की तरफ देखता हुआ पाकर काव्य राम की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम फ़ौरन अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर लेता hain.....aab उसके चेहरे से बेचैनी साफ़ नज़र आने लगी थी........

" ऐसे क्या देख रहे हो ram..........kya तुम्हें मेरी ये चीज़ें ाची नहीं lagti.........kya तुमनें इन्हें छूने का दिल नहीं करता.........." और काव्य इस बार शरारती अंदाज़ में राम की तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती hain..........uska इशारा किस तरफ था ये राम बखूबी जनता tha..........na-samajh तो था वो .........मगर इतना नहीं की वो काव्य के बाटिओं का मतलब नहीं समझ सकता था.........

" woooooo........aapki हर एक चीज़ें मुझे बहुत ाची लगती हैं........." और राम जैसे तैसे हिम्मत जुटाकर धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पति.......

" ram...........to तू मुझसे अब तक दूर क्यों ho..............mere और करीब aawo.............mujhe अपने सीने से लगा lo.............aur..........mujhe बस प्यार करो................." और इस बार काव्य राम के सीने से लिपट जाती हैं और फ़ौरन अपनी आँखें हौले से बंद कर लेती hain.......aab उसकी सांसें ज़ोरों से चलने लगी thi.............bechaini और बेकरारी साफ़ उसके अंदर अब नज़र आने लगी thi...........sach तो ये था की वो अब राम की बाँहों में मचल उठी thi..........jawani की आग अब उसे भी अंदर hi अंदर जलाये जा रही thi.......magar सब कुछ साफ़ साफ़ अब वो राम से कह तो नहीं सकती थी naaa.........wahin राम जैसे लग रहा था कोई अनादि ho..........buddhu ho........na-samajh ho........wo काव्य के किसी भी इशारों को समझ नहीं पा रहा tha...........wahin काव्य की नरम चूचियां जब राम के सीने से सात जाती हैं राम तो जैसे अंदर hi अंदर मचल उठता hain...........uska लुंड अब खड़ा होता जा रहा tha.....aur अब काव्य के गांड और छूट में दस्तक देने लगा था......

जब राम कुछ नहीं करता तब काव्य हौले से अपनी आँखें खोलती हैं और राम के सर पर अपना एक हाथ हौले से रख देती hain........aur कुछ देर तक उसके चेहरे की तरफ टकटकी लगाए बस देखती रहती hain........wo ाचे से जानती थी की राम का ये सब पहली बार hain...........kitna भी हैं तो वो इस खेल में अभी नया hain..........aabhi उसे खुलने में थोड़ा वक़्त तो लगेगा hi...........is लिए अब काव्य को खुद hi आगे बढ़ना tha..............ye सोचकर वो अपना लैब हौले से आगे की तरफ बढाती हैं और बहुत आहिस्ता से राम के लबों पर रख देती hain.......kavya के इस हरकत से राम के जिस्म में जैसे 440 वाल्ट का करंट दौड़ जाता hain........uske तन बदन में जैसे आग लग जाती hain..........magar काव्य अपने लबों को नहीं हटती और इसी तरह बड़े आराम से राम के निचले होंठों को चूसने लगती hain........to कभी उन्हें अपने डेंटन के बीच दबाकर हौले हौले से काटने लगती हैं.........

वहीँ राम काव्य के उस हरकत पर दर्द से सिसक padta............usey भी अब इस खेल में मज़ा आने लगा tha..........kavya हौले से अपनी आँखें बंद करती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेते हुए राम के लबों को चूसने लगती hain.........aab उसके जिस्म से उठने वाली गरम सांसें पल पल राम के सांसों में घुलता जा रहा tha........jinhein राम ाचे से महसूस कर सकता tha...........kavya अपना हाथ राम के हाथ में थामे हुए thi..........wahin वो उसके लबों को चूसे जा रही thi......aab राम भी काव्य के लबों को हौले हौले से चूस रहा tha.........jawani के इस खेल में अब उसे भी मज़ा आने लगा tha........pehli बार वो औरत के इस सुखद ेहास को महसूस कर रहा था........

काव्य हौले से अपने हाथों को सरकते हुए अपने कंधे की तरफ ले जाने लगती hai......wahin राम का हाथ भी काव्य के हाथ के साथ साथ धीरे धीरे हरकत कर रहा tha............jaise जैसे काव्य अपने हाथों को घुमा रही थी वैसे वैसे राम का हाथ भी उसके इशारों पर नाच रहा tha.......wahin अब उसका दिल और भी ज़ोरों से धड़क रहा tha..........jab काव्य हौले से अपने हाथों को कंधे से नीचे की तरफ ले जाने लगती hain.........waise वैसे राम की धड़कनें भी तेज़्ज़ होती चली जाती hain...........wo बहुत ाचे से अब समझने लगा था की उसका हाथ काव्य के बदन के किस हिस्से की तरफ जा रहा hain......wahin उसका दिल अब मचलने लगा tha.......jo अरमान उसके दबे थे वो अब धीरे धीरे अपना फूँन फैला रहे थे.........

काव्य का हाथ धीरे धीरे और नीचे की तरफ सरक रहा tha.......uske सीने की taraf..........jaise hi राम का हाथ उसके क्लेवराज पर पहुँचता हैं उसके लुंड में एक तेज़्ज़ सेंसेशन होना शुरू हो जाता hain..........magar वो ये सब देख नहीं सकता tha.........wo तो काव्य के नरम होंठों को बस चूसने में लगा हुआ tha..........magar हाँ वो ाचे से महसूस ज़रूर कर सकता था की उसका हाथ काव्य के जिस्म के किस हिस्से पर hain.........jaise hi काव्य अपने हाथों को और नीचे की तरफ ले जाती हैं वो अपना हाथ अपने सीने पर कुछ पल के लिए रोक लेती hain.............ram को अगले पल एहसास हो जाता हैं की इस वक़्त उसका यह हाथ कहाँ पर hai.........wo उसके चूचियों पर ऐसे hi अपना हाथ रखे हुए tha................na hi वो उन्हें मसल रहा tha......aur न hi अपने हाथों पर दबाव बना रहा था.........

" इन्हें मसलों न raaaammmmmmmmmmmmmmm.............aaaaaaaaasssssssssssssshhhhhhhhhh............aur काव्य जैसे सिसक पड़ती hain.....wo एक पल के लिया अपना होंठ राम के होंठों से अलग करती हैं फिर से वो उसके लबों को आहिस्ता आहिस्ता से चूसने लगती hain......aab राम भी कहाँ ऐसा सुनेहरा मौका अपने हाथ से जाने देने वाला tha...........upar से उसका लुंड इतना सख्त हो चूका था मनो हाथ लगते hi पानी निकल jayega..........wahin अब उसका लुंड काव्य को भी धीरे धीरे परेशां करने लगा tha......wo अपने गांड पर राम के लुंड को महसूस कर रही thi..........wahin उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi.........ek पल के लिए तो उसे ऐसा लगा की वो अपने सरे कपड़े उतारकर राम के सामने पूरी नंगी हो jaye.....aur जी भरकर राम से छुड़वा le........magar आज उन दोनों के दरमियान अगर कपड़े के दीवार न होती तो यकीनन राम का लुंड उसकी छूट या गांड में पूरा समां चूका hota..........magar काव्य का ऐसा कोई इरादा नहीं था................

राम हौले से अपने हाथ पर दबाव बनता हैं और अपनी पूरी मुट्ठी में काव्य के बड़े चूचियों को थामकर उन्हें धीरे धीरे दबाना शुरू करता hain.........aisa लग रहा था जैसे वो आता गूंथ रहा ho.........ram के इस हरकत पर काव्य के तन्न बदन में जैसे आग लग जाती hain..........wo न चाहते हुए भी ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं मगर होंठ राम के होंठों में होने की वजह से उसकी आवाज़ जैसे दबकर रह जाती hain.......wahin राम अब अपने हाथों को तेज़ी से हरकत करता जा रहा tha.........wo अबकी बार काव्य के राइट चुकी को अपने हाथों में पूरा थम लेता हैं और उन्हें कसकर मसलने लगता hain.........wahin काव्य की छूट में गीलापन भी बढ़ने लगा tha...........uska जिस्म किसी आग के भत्ते के सामान तपने लगा tha..............sansein पूरी तरह से बेकाबू हो चले थे........

उस कमरे में कहीं कोई शोर नहीं thi..........bus आवाज़ थी तो काव्य के आहों और सिसकने ki.......magar उसकी आहें भी घुटकर रह jati.........ram को तो जैसे मज़ा आ रहा tha..........itni नरम इतनी सॉफ्ट काव्य की चूचियां थी ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई रुई पकड़ा हुआ ho........wo बहुत तेज़्ज़ हाथों से काव्य की चूचियों को मसले जा रहा था वहीँ काव्य का साबरा अब धीरे धीरे जवाब देने लगा tha...........khel न जाने कब तक चलता क्यों की अब न काव्य होश में नज़र आ रही thi.............aur न hi ram.........magar राम कितना भी था तो उसका ये सब पहली बार tha............is खेल में वो नया खिलाडी tha...........aakhirkar उसका साबरा जवाब दे जाता हैं और वो इस बार पूरी ताक़त से काव्य के दोनों चूचियों को अपने मज़बूत हाथों में थम लेता हैं और उन्हें पूरी ताक़त से मसल देता hain......aur फ़ौरन अपना होंठ काव्य के होंठों से हटा लेता हैं...........

काव्य को समझते देर नहीं लगती की राम के साथ क्या हुआ tha..............wahin इस बार उसके लुंड से पिचकारी निकल पड़ती हैं और राम वहीँ सिसकते हुए अपना छुम अपने लोअर में छोड़ने लगता hain...........jab तक उसका छुम पूरी तरह से नहीं निकल जाता वो काव्य के चूचियों को ऐसे hi थामे रहता hain...........aur जब उसका खुमार पूरी तरह से उतरता हैं उसे अपने आप से बेहद शर्मिंदगी सी महसूस होती hain.......wahin काव्य के गांड पर राम के लुंड से निकला चिपचिपा सा उसका छुम महसूस होने लगा tha.........jo उसकी लग्गी और सूट के कुछ हिस्सों को भिगो रहा tha..........wo राम की तरफ बड़े प्यार से से तुक देखे जा रही thi......fir वो मुस्कुराते हुए राम के ऊपर से हुत्त जाती hain.....wahin राम भी अब काव्य से दूरी बना लेता हैं.......

" तुम फ्रेश होकर आ जाओ ram............main तुम्हारे लिए दूध लेकर आती हूँ......." और काव्य की नज़रें भी शर्म से झुक जाती hain........hawas से उसकी आँखें सुर्ख लाल हो चुकी थी और वो वहीँ खड़े खड़े लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi........jissey उसकी बड़ी बड़ी चूचियां हिल रही thi.........ram फ़ौरन वक़्त गंवाए बिना बाथरूम में घुस जाता हैं और काव्य बीएड पर पड़े अपने दुपट्टे को सही करती हैं और फ़ौरन किचन की तरफ चल पड़ती हैं.............

हालाँकि राम फ्रेश होने के बाद चुप चाप से अपने कमरे में आकर सू जाता hain........uske अंदर अब हिम्मत नहीं थी काव्य से नज़र्रें मिलाने ki.......wahin काव्य भी राम से कोई जवाब सवाल नहीं करती और आकर उसकी के बिस्टेर पर चुप चाप से लेट जाती हैं...........................................

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हमेशा की तरह सुबह रघु अपने टाइम से आ जाता hain...........waise काव्य अब तक नहायी हुई नहीं थी इस वजह से उसने कपडा नहीं चेंज किया हुआ tha..........wo अभी भी वहीँ ब्लैक कलर का सूट पहनी हुई थी और जब वो रघु की नज़रें काव्य के उन कपड़ों पर जाती हैं वो उसे अजीब सी नज़ररयों से एक तुक देखने लगता hain.........aur एक बार फिर से उसका हाथ अपने लौड़े पर चला जाता हैं ..........जिसे वो आराम से मसलने लगता hain..........kavya के चलने से रघु की नज़रें उसके थिरकती हुई गांड पर जन्मी हुई थी जिन्हें रघु बिंदास देखे जा रहा tha.......dheere धीरे उसके अंदर का दुर्र अब ख़तम हो गया tha.........aab वो न तो काव्य को अपनी मालकिन समझता tha...........aur न खुद को naukar........wo तो बस काव्य को चुदाई की चीज़ समझता tha........apne लुंड की आग को बुझाने वाली चीज़........

" क्या बात हैं memsaheb........aaj तो आप इन कपड़ों में बहुत hi ज़्यादा सूंदर लग रही हैं..........." और रघु अपने मुँह में पान चबाता हुआ हौले से बोल पड़ता hain.......waise उसकी नज़रें अभी भी काव्य के बदन पर hi तिकी हुई thi.........wahin काव्य उसके तरफ अजीब नज़रियों से देख रही thi.......wo बहुत ाचे से रघु के नियत को अब समझने लगी thi........halanki उसे अब रघु की नज़रें बुरी लगाने के बजाये ाची लग रही thi..........wahin रघु को देखकर उसे कुछ कुछ होने लगता..........

" रोज़ क्या मैं ाची नहीं lagti..........harr रोज़ मुझे मस्का न लगाया karo.........aur बोलो आज नास्ते में क्या लोगे.........." और काव्य हामी भरते हुए धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु काव्य की बाटिओं को सुनकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पता........

" आपकी एहि ऐडा तो मुझे पागल बना देती हैं memsaheb..............aap मुझपर नाराज़ भी होती hain......aur मुझे नास्ता के लिए भी पूछती hain...........waise आज समोसा मिल जाता तो बात hi कुछ और होती......." और रघु जैसे काव्य की तरफ देखता हुआ धीरे से तना मरता हैं वहीँ काव्य का चेहरा शर्म से लाल पढ़ जाता hain........wo ाचे से जानती थी की रघु उससे समोसे के लिए क्यों कह रहा हैं.......

" समोसे नहीं हैं इस waqt..........aur कुछ चाहिए तो bolo.......main वो लेकर तुम्हें देती हूँ........" और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ उसका कलेजा एक बार फिर से ज़ोरों से ढकने लगता hain..........raghu उसकी चूचियों की तरफ घूरता हुआ इस बार हौले से बोल पड़ता हैं.........

" मुझे दूध पीने का मुन्न कर रहा हैं memsaheb.......kya मुझे इस वक़्त दूध मिल सकता हैं........" और रघु काव्य के चूचियों को ऐसे घूरने लगता हैं जैसे वो दूध वहां से निकलकर पीने को कह रहा ho......wahin काव्य के जिस्म में जैसे आग लग जाती hain.....wo रघु के बाटिओं का मतलब बहुत ाचे से समझ रही थी वहीँ वो कुछ बोल नहीं पति और शर्म से उसका चेहरा लाल पढ़ जाता hain.......wo जैसे hi किचन में जाने के लिए मुड़ती हैं रघु के मुँह से जो शब्द उसके कानों में दुबारा से सुनाई देते हैं जिसे सुनकर उसके रोंगटे खड़े हो जाते hain............wo हैरत से पीछे की तरफ मुड़ती हैं और रघु को सर से लेकर पवन तक अजीब सी नज़रियों से देखने लगती hain..........aab देखना था की रघु ने काव्य से ऐसा क्या पूछ लिया था जिसे सुनकर काव्य के होश उड़द गए थे...........................................................

कंटिन्यू................................................................................
 
अपडेट- 28(ा) (मेघा अपडेट)

" मुझे दूध पीने का मुन्न कर रहा हैं memsaheb.......kya मुझे इस वक़्त दूध मिल सकता हैं........" और रघु काव्य के चूचियों को ऐसे घूरने लगता हैं जैसे वो दूध वहां से निकलकर पीने को कह रहा ho......wahin काव्य के जिस्म में जैसे आग लग जाती hain.....wo रघु के बाटिओं का मतलब बहुत ाचे से समझ रही थी वहीँ वो कुछ बोल नहीं पति और शर्म से उसका चेहरा लाल पढ़ जाता hain.......wo जैसे hi किचन में जाने के लिए मुड़ती हैं रघु के मुँह से जो शब्द उसके कानों में दुबारा से सुनाई देते हैं जिसे सुनकर उसके रोंगटे खड़े हो जाते hain............wo हैरत से पीछे की तरफ मुड़ती हैं और रघु को सर से लेकर पवन तक अजीब सी नज़रियों से देखने लगती hain..........aab देखना था की रघु ने काव्य से ऐसा क्या पूछ लिया था जिसे सुनकर काव्य के होश उड़द गए थे...........................................................

अब आगे...............................................................................................

रघु खामोश खड़ा काव्य के तरफ अजीब नज़रियों से देखे जा रहा tha.........wahin काव्य के चेहरे का रंग बिलकुल फीका पढ़ गया tha.........wo टकटकी लगाए बस रघु के तरफ सवाल भरे नज़रियों से देख रही थी...........

" हाँ memsaheb..........maine वहीँ कहा जो आपने अभी अभी suna...........kya आपका कोई बॉयफ्रेंड hain.........ya कभी कोई था......." और रघु काव्य की तरफ देखते हुए अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस पड़ता hain........wahin काव्य के चेहरे का रंग फीका पढ़ चूका tha......jaise तैसे वो रघु के सवालों का जवाब देती हैं........

" naaaaaaahhhhiinnnn.........mera न कभी कोई बॉयफ्रेंड tha........aur न हैं....." और काव्य की सांसें भरी होने लगती hain........uski बाटिओं में ज़रा भी दम नज़र नहीं आ रहा tha.........aisa लग रहा था जैसे वो झूठ बोल रही ho........ya रघु से सच छुपा रही ho............chehrey पर उसके पसीने की दो बूँदें साफ़ नज़र आने लगी thi............wahin रघु दूर खड़ा काव्य के तरफ बड़े गौर से देख रहा tha........kuch सोचकर वो काव्य के और करीब आने लगता हैं और जब वो काव्य के एकदम से करीब आ जाता हैं वो उसकी आँखों में आँखें डालकर कुछ देर तक यु hi ताकता रहता hain.......wahin काव्य फ़ौरन अपनी पलकें नीचे की तरफ झुका लेती hain.......shayad वो उसकी नज़रियों का सामना न करना चाहती हो............

" मुझे तो कहीं से भी ऐसा नहीं लगता मेमसाहेब की आप जैसी लड़की का कोई बॉयफ्रेंड शायद hi नहीं hoga..............aap इतनी हसीं हैं की आपके पीछे तो लड़कों की हज़ारों की लाइन होती hogi............aapko पाने के लिए तो लड़के अपनी जान तक देने को तैयार रहते hongey...........aur कौन भला बेवकूफ आप जैसी लड़की को नहीं पाना chahega.........dusare की क्या कहूं मेमसाहेब अगर मैं खुद उनकी जगह होता तो मैं आपको पाने के लिए अपनी जान भी दे deta..................aur दूसरों की जान भी ले leta..........aapke लिए तो मैं कुछ भी कर जाता.........." और रघु काव्य की आँखों में आँखें डेल हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य का कलेजा बहुत ज़ोरों से धड़क उठा tha............na जाने क्यों अब वो रघु से एक पल के लिए भी अपनी नज़रें नहीं मिला पा रही थी...........

" बताइये न memsaheb........main कसम खता हूँ की मैं साहेब से तो क्या किसी और से कुछ नहीं कहूंगा........." और रघु अपने हाथ की चुटकी बनाकर अपनी गुर्दें पर रख देता हैं और कसम खाने लगता हैं वहीँ काव्य की सांसें बेकाबू होती जा रही thi.........kuch अतीत के पन्ने थे जिनके बारे में वो सोच सोचकर थोड़ी परेशां सी नज़र आ रही थी...........

" बताया naaaaaaaaaa.....mera कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं था............" और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती hain........na जाने क्यों वो अब रघु का सामना बिलकुल भी नहीं करना चाहती thi...........magar शायद आज रघु उसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला भी नहीं था.........

" ये तो और भी ाची बात हैं memsaheb........aap जैसी सूंदर और सभ्य घराने की लडकियां गुडगाँव जैसे सेहर में मिलती hi कहाँ hain..........wo भी सेहर पूरा पागलों से भरा पड़ा hain..........kitne मजनू ऐसे हैं जो हर रोज़ लड़की के लिए अपनी जान तक दे देते hain............na जाने कितने बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या करते hain...........to कोई ज़हर खा लेते hain...........na जाने उन्हें ऐसा करने से क्या मिलता hain..........bewajah अपने माँ बाप को परेशां करते हैं........." और रघु की आँखें सुर्ख लाल हो जाती हैं वहीँ काव्य के चेहरे का रंग इस बार पूरी तरह से फीका पढ़ जाता hain...........jane अनजाने में रघु ने जो बात उससे कही थी वो 100% सही hi कही thi..............magar रघु ने तो ये बात किसी और लड़की के लिए नहीं बल्कि काव्य के लिए hi कही थी........

khair.....in सब के पीछे लड़कियों का भी दोष होता hain.........kyon की वो भोले भले लड़कों से अपना काम निकलवा लेती हैं और जब मतलब ख़तम हो जाता हैं तो उन्हें लात मार देती hain..........ye तो अब फैशन हो गया हैं बड़े सेहरों mein.........is लिए अब बड़े सेहर में रहना बेकार hain............bade log.........aur उनकी बड़ी baatein.........hahahahahhh...." और रघु काव्य के तरफ अजीब नज़रियों से देखने लगता हैं वहीँ काव्य जवाब में कुछ नहीं बोल पति और चुप चाप से किचन की तरफ चली जाती hain........wahin रघु धीरे से अपनी लुंगी पर हाथ रखता हैं और काव्य के मटकती हुए गांड को अजीब सी नज़रियों से एक तुक देखने लगता hain...........uske चेहरे पर एक कमीनी मुस्कान थी अगर आज काव्य उसकी नज़रियों को पढ़ लेती तो उसका इरादा शायद ाचे से समझ jati...........magar नसीब में तो कुछ और hi जो लिखा था........

उधर काव्य किचन में भले hi थी मगर आज उसे रघु की वो साडी बातें अंदर hi अंदर परेशां कर रही thi......jin अतीत के पनून को वो कहीं दूर पीछे छोड़ आयी थी आज वहीँ अतीत फिर से उसके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा tha...........magar कहीं न कहीं वो इसे संजोग समझ रही thi..........wo ये नहीं जानती थी की दुनिया में कभी कोई चीज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं hota.......har चीज़ के पीछे वजह ज़रूर होती hain.........aur रघु के यहाँ आने के पीछे भी कोई न कोई वजह ज़रूर थी...........

जैसे hi काव्य दूध का गिलास लेकर आती हैं रघु वहीँ खड़ा उसे देखकर मुस्कुरा रहा tha.......wahin काव्य की नज़रें एक बार फिर से नीचे की तरफ झुक जाती hain............wo उस गिलास को रघु के तरफ बढ़ा देती हैं वहीँ रघु इस बार गिलास के साथ साथ काव्य का हाथ भी हौले से पकड़ लेता hain............wahin काव्य रघु के तरफ अजीब नज़रियों से देखने लगती hain........magar कहती कुछ नहीं.........

" मुझे माफ़ कर दीजिये memsaheb............kya करूँ मुझे तो बका बक करने की आदत जो hain.....kab कहाँ क्या बोलना हैं मुझे पता hi नहीं chalta......zyada पढ़ा लिखा होता तो नाआ samjhata..........waise आपके अंदर वो साडी खूबियां हैं जो एक बड़े घर की मालकिन के अंदर होनी chahiye..........magar एक चीज़ की आपसे शिकायत भी हैं............." और रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हौले से हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य अब काफी हुड्ड तक नार्मल हो चुकी thi............wo मुस्कुराते हुए रघु की तरफ बड़े प्यार से देखने लगती हैं.......

" अगर सेहर के कुछ लोग बुरे हो तो उस सेहर को बुरा नहीं कहा जा sakta.......usi तरह एक लड़की ख़राब हो तो सरे लडकियां उसकी जैसी नहीं hoti............ye तो बस अपने अपने सोच का फर्क hain........waise अब मुझसे क्या शिकायत रह gayi...........maine क्या तुम्हारी सैलरी कम ki.....ya फिर खाने पीने और पहनने में कोई कमी ki........ya फिर और कुछ......" और काव्य बड़ी ऐडा से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु फिर से हंस पड़ता हैं........

" किसने कहा की आपने हमारी सेवा में कोई कमी ki...........arey आप जैसी मालकिन तो इस पूरे सेहर में भी ढूंढने से नहीं milegi..........bus आप आज कल मुझपर थोड़ा ध्यान नहीं दे rahi............aur न hi अपनी पंतय मुझे दे rahi..........din तो जैसे तैसे गुज़र जाता हैं पर ये कम्भख्त रात पहाड़ जैसी गुज़रती hain.........aapki पंतय थी तो एक सहारा tha......aapki नाम की मुठ मरकर मैं आराम से सू तो जाया करता था मगर अब कहीं चैन नहीं milta........aapne जो मुझे बुरा डॉट थमा दी है........" और रघु इतना कहकर काव्य के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो जाता हैं और अपना एक हाथ हौले से उसकी कमर में डालकर उसे अपनी तरफ खींच लेता hain.........kavya भी किसी बेल की तरह रघु से लिपटती चली जाती हैं......

कॉन्टिनोएड............................................................................
 
Update-28(B) (मेघा अपडेट)

इस तरह अचानक से रघु को अपने इतने करीब पाकर काव्य अंदर hi अंदर अब मचल चुकी thi............wo विरोध नहीं कर पति और रघु से सत्कार यु hi कड़ी रहती hain............aab रघु कहाँ रुकने वाला tha........usey तो ऐसे hi कुछ मौके की तलाश thi............aur काव्य जैसी बुलबुल का वो शिकार बड़े इतेमेंआन से करना चाहता tha..........bade आराम se.........ek बार फिर से काव्य रघु की बाँहों में मदहोश होने लगी thi........raghu के जिस्म से उठने वाली भीनी भीनी बदबू फिर से उसे पल पल मदहोश करती जा रही thi............wahin रघु का एक हाथ काव्य के कमर और पेट पर था जिसे वो अपने मज़बूत हथेली से जकड़ा हुआ tha.......aur इधर उसका लुंड काव्य की गांड में दस्तक दे रहा tha............wahin काव्य भी अब कोई विरोध करती हुई नज़र नहीं आ रही थी...........

" memsaheb.................aaaaassssssss........aap बहुत सूंदर हैं..........." और रघु अपना गन्दा होंठ काव्य के गुर्दें पर हौले से रख देता हैं और बड़े प्यार से वहां चूम लेता hain.......raghu के इस हरकत पे काव्य की तो जैसे जान hi निकल जाती hain..........wo एक बार फिर से रघु की बाँहों में मचल उठती hain........dil की धड़कनें एक बार फिर से बढ़ती जा रही thi.....sanson पर भी कोई ज़ोर नहीं tha.............wahin उसकी छूट में भी गीलापन अब बढ़ने लगा था..........

पान चबाने की वजह से एक बार रघु के मुँह से निकला उसका रूस और पान के कुछ छोटे छोटे टुकड़े काव्य की गोरी गुर्दें पर साफ़ नज़र आने लगे they..........wo फिर से दूसरा किश उसी जगह पर करता हैं वहीँ काव्य का हाथ अब कांपने लगा tha......kuch लजात से ............तो कुछ एक्ससिटेमेंट se.............jin हाथों में उसने दूध का गिलास पकड़ा हुआ था अब उसका वही हाथ काँप रहा tha.......aisa लग रहा था जैसे उन हाथों में ताक़त न बची ho.......jaan न ho...........raghu आहिस्ता से अपना दूसरा हाथ आगे की तरफ बड़ाहट हैं और काव्य के शोल्डर पर से सरकता हुआ नीचे की तरफ ले जाता hain...........doodh के गिलास के taraf..........aur जैसे hi उसका हाथ काव्य के हाथों में आता हैं वो बहुत आहिस्ता से काव्य के हाथों को ऊपर की तरफ उठाने लगता hain...........uske चेहरे की तरफ..........

काव्य अब एक बार फिर से किसी कठपुतली की तरह रघु के हर एक इशारों पर नाच रही thi..........aab रघु जैसे चाहे उसके साथ khele.....jo चाहे kare.........aab वो किसी भी चीज़ में विरोध करती हुई नज़र नहीं आ रही thi..........aur न hi वो अब रघु को इंकार करना चाहती thi............na जाने क्यों रघु को अपने इतने करीब पाकर उसका अपने ऊपर कोई बस न chalta..........ek बार काव्य फिर से मदहोशी के आलम में डूबती जा रही thi...........aab न उसे कोई होश tha...............aur न किसी बात की khabar..........ek अजीब सा प्यास उसके तन बदन में उठने लगी thi.........aur वो उस प्यास को बुझाना चाहती thi..........chahe जिस हाल में...........................

" ये दूध आप पी लीजिये न मेमसाहेब.............." और रघु उस गिलास को हौले से काव्य के लबों पर रख देता हैं वहीँ काव्य एक तुक उस गिलास के तरफ देखती हैं फिर वो आहिस्ता से अपने लैब खोल देती hain...........raghu धीरे से अपने हाथों को इशारा करता हैं और काव्य के हलक में वो दूध उतरता चला जाता hain........do चार घूँट पीने के बाद रघु उस गिलास को काव्य के लबों से हटा लेता हैं और उसे अपने मुँह के करीब ले जाने लगता hain.............fir वो उस गिलास को अजीब नज़रियों से देखने लगता hain......doodh का जो कलर था वो बिलकुल वैसा tha.......kuch सोचकर वो धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं और अगले hi पल वो उस गिलास को अपने होंठ पर ले जाकर धीरे धीरे पीने लगता हैं.............1/3 दूध अभी भी उस गिलास के अंदर था...........

मगर रघु के इस तरह दूध पीने से एक बार उसका कलर फिर से चेंज हो गया tha...........paan के कुछ टुकड़े जो एक बार फिर से उस दूध में तैरते हुए से नज़र आ रहे they..........wahin उसका रंग कुछ लाल सा नज़र आने लगा tha.........ek बार फिर वो उस गिलास को काव्य के नज़रियों के सामने ले जाता हैं और काव्य उसे अजीब सी नज़रियों से देखने लगती hain..........paan के छोटे छोटे टुकड़े अब भी उस दूध में साफ़ तैरते हुए से नज़र आ रहें they...........wahin काव्य का दिल और भी ज़ोरों से धड़कने लगा tha.......wo ाचे से जानती थी की आगे रघु उसके साथ क्या करने वाला हैं............

जैसा वो सोच रही थी रघु इस बार वो दूध का गिलास हौले से उसके सामने ले जाता हैं और उसके लबों पर दुबारा से रख देता hain...........kavya रघु का विरोध नहीं कर पति और हौले से अपना लैब खोल देती hain..........raghu फिर से अपने हाथों को हरकत करता हैं और अगले hi पल काव्य के मुँह में वो दूध और पान का मिला जुला रूस उसके हलक से नीचे उतरता चला जाता hain...........halani अब उस दूध का टास्ते काफी चेंज हो गया था मगर काव्य बिना किसी विरोध के बस उसे पीये जा रही thi........na जाने क्यों उसे अब इस दूध का स्वाद ाचा लगने लगा tha...........kareeb आधी गिलास ख़तम हो जाने के बाद रघु उस गिलास को काव्य के लबों से हटाता हैं और उसे एक बार फिर से काव्य के कन्धों पर धीरे धीरे से नाचने लगता hain........wahin काव्य ख़ामोशी से कड़ी रघु को अपने जिस्म पर पूरी मनमानी करने दे रही थी.........

रघु अगले hi पल उस गिलास में से थोड़ा सा दूध काव्य के नंगे शोल्डर पर गिरता hain............wahin काव्य उसके इस हरकत पर मचल सी जाती हैं मगर न वो रघु को रोक पति hain.......aur न उससे दूर हटने की ज़रा भी कोशिश करती hain........sach तो ये था की रघु के इस खेल में उसे भी मज़ा आता tha..........kavya इससे पहले कुछ समझती रघु एक बार फिर से अपने गंदे होंठ काव्य के शोल्डर पर रख देता हैं और उस दूध का बचा हिस्सा जहाँ उसने अभी थोड़ी देर पहले गिराया था .......उस हिस्से को वो बड़े आराम से चटनी लगता hain..........waise दूध गिरने से काव्य के सूट का कुछ हिस्सा भीग गया tha.......magar रघु तो आज कुछ और hi मूड में अब नज़र आ रहा था...........

वो अपना एक हाथ हटाता हैं ( जिन हाथों से उसने काव्य के कमर को पकड़ा हुआ था) और काव्य के बालों को एक साइड में कर देता hain........aab काव्य का पीठ और उसका सामने का हिस्सा नंगा tha........jahan रघु नज़रें गड़ाए हुए देख रहा tha..........fir से वो दूध का कुछ हिस्सा काव्य के शोल्डर पर गिरता हैं और फिर से उसी अंदाज़ में चटनी लगता hain......wahin काव्य अंदर hi अंदर मचल उठी thi.......raghu के जीभ की छुवन अब उसे पागल करती जा रही thi..........sansein पूरी तरह से बेकाबू हो चुके they.........na hi उसे अब कोई होश रह गया tha.........is जवानी के खेल में वो पल पल डूबती जा रही थी...........

"aaaaaaasssssssssssssssssshh.................yyeeeeee कककककययय्यआआआ ककककाआआआरररररर ररराह्ह्ह्हीी होहूऊओऊ रआआआगगजगहःहःहुउउउउ.." और काव्य जैसे रघु से सवाल करती hain......ya शायद उसे इंकार कर रही ho.......magar सच तो ये था की अब उसके इंकार में वो दम रह नहीं गया tha.........wo कभी अपने बेकाबू सांसों को संभल रही thi..............to कभी अपने दिल की धड़कनों को ...............मगर अब दोनों उसके बस में नहीं they.......wahin उसकी छूट में भी अजीब सा सेंसेशन होना शुरू हो चूका था...........

" आपको प्यार कर रहा हूँ मेमसाहेब........." और रघु फिर अपनी साइड बदलता हैं और काव्य के बालों को दूसरी तरफ करके फिर से वो दूध को उसकी नंगी शोल्डर्स पर गिरने लगता हैं और अपने गंदे जीभ से धीरे धीरे से चटनी लगता hain..........wahin इस बार काव्या की आँखें बंद हो जाती हैं और वो वहीँ लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं..........1/3 हिस्सा जब उस गिलास में जब दूध रह जाता हैं तब रघु काव्य के कमर में अपना हाथ दाल देता हैं और उसे तेज़ी से अपनी तरफ घूमता hain........kavya भी रघु के तरफ घूम जाती हैं और अभी भी काव्य की आँखें बंद thi......wo वहीँ लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi..........doodh गिरने से उसका सूट का कुछ हिस्सा भीग गया था..........

रघु काव्य के चीन पर हौले से अपना एक हाथ ले जाता हैं और उसके चेहरे को ऊपर की तरफ थोड़ा सा उठता hain..........raghu की नज़रें अभी भी काव्य के चेहरे पर तिकी हुई thi.......wo बड़े गौर से उसके खूबबसूरत चेहरे की तरफ देख रहा tha........kuch सोचकर वो उस गिलास को काव्य के चेहरे पर ले जाता हैं और उसके माथे पर तो कभी उसके गलों par........uski आँखों पर उस दूध को धीरे धीरे से गिरने लगता hain........doodh गिरने से कुछ हिस्सा काव्य के चेहरे से होता हुआ उसकी गुर्दें की तरफ जा रहा tha.......jo उसके सूट को भिगो रहा ttha........aur कुछ उसके चिचियों को bhi........wahin रघु इस बार अपना जीभ आगे की तरफ ले जाता हैं और काव्य के माथे से लेकर उसके चीन तक का पूरा हिस्सा अपने गांडेय जीभ से चटनी लगता हैं..........

वहीँ काव्य को भी अब इस गंदे खेल में मज़ा आने लगा tha.........raghu का इस तरह से अपने चेहरे पर जीभ फेरना उसे बहुत अजीब सा लग रहा tha........wahin उसकी छूट में भी गीलापन बढ़ने लगा tha..........madhoshi के आलम में वो खुद को भूल सी गई thi.........uska वजूद क्या hain..........status क्या हैं अब उसे कुछ मालूम न tha..........wo ये भी नहीं जानती थी की जिसके साथ वो ये सब कर रही हैं वो एक थर्ड ग्रेड का नौकर hain.......jiski हैसियत उसके पवन की जूती बरोबर भी nahin.......magar अब उसे वो गन्दा खेल hi ाचा लगा रहा tha..........wo इस गन्दगी में पूरी तरह से डूबना चाहती thi..........na जाने ये कौन सी प्यास थी जो बुझने के बजाये और भी बढ़ती जा रही थी..........

रघु फिर से धीरे धीरे उस दूध को काव्य के गलों पर गिरता जा रहा था वहीँ वो अपना जीभ भी उसपर चला जा रहा tha.......wahin काव्य अपनी आँखें बंद किये लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi.............aab दूध गिरने से उसका पूरा सूट करीब करीब भीग गया tha...........raghu कभी उसके गलों पर अपना जीभ ferta......to कभी उसके कानों को चाट leta......to कभी उसके नाक के पॉइंट में आपने जीभ dalta.........kavya को उसके इस हरकत पर गुदगुदी सी होती मगर जो भी था उसके लिए ये खेल बिलकुल नया tha.......aur मज़ेदार bhi...............magar अभी तक रघु ने काव्य के होंठों को नहीं चूमा tha.......magar वो अब ऐसा सुनेहरा मौका छोड़ना भी नहीं चाहता था........

वो दूध का बचा हिस्सा इस बार उसके होंठों पर गिरता हैं और काव्य को तेज़ी से अपने बदन से सत्ता लेता hain.........aab उसकी चूचियां रघु के सीने में दबती जा रही thi............wahin रघु अपना जीभ काव्य के गुलाबी होंठों पर हौले से रख देता हैं और आराम से चटनी लगता hain.......wahin काव्य भी काफी गरम हो चुकी thi.....raghu के इस हरकत पर वो हौले से अपना मुँह खोल देती हैं और रघु अपना गन्दा जीभ काव्य के मुँह के अंदर धीरे से पुश कर देता hain.........aab वो उसके जीभ को अपने जीभ से टच कर रहा tha.....to कभी उसके होंठों ko...........kavya भी अपना जीभ उसके जीभ पर सत्ता रही thi.......wahin रघु का लुंड अब अकड़ने लगा था.......

वो चाहता तो वहीँ काव्य को पटककर छोड़ deta......usey सर से लेकर पवन तक पूरा नंगा कर deta..........magar उसे कहीं कोई जल्दी नहीं thi........wo तो काव्य को ऐसे hi आराम से खाना चाहता tha..........poorey इतमीनान के साथ..........

जैसे hi काव्य की जीभ रघु के जीभ से टच होती काव्य के छूट में एक तेज़्ज़ सेंसेशन hota............wo और उसकी बाँहों में मचल jati........raghu हौले से अपना दांत के बीच काव्य के जीभ को दबा लेता हैं और आराम से चूसने लगता hain.......aab उसके मुँह से निकलता गन्दा पान और थूक धीरे धीरे काव्य के मुँह में घुलता जा रहा tha......magar अब उसे कुछ भी बुरा नहीं लग रहा tha.......wo भी रघु के मुँह से निकलने वाली गन्दगी को पल पल अपने गले के नीचे उतरती जा रही थी और उसे इन सब में एक अजीब सा सुख मिल रहा tha...........ye सिलसिला न जाने कब और कहाँ तक जाता और काव्य अगर होश में न आती तो...........

जैसे hi उसे अपने मौजूदगी का एहसास होता हैं वो फ़ौरन रघु को अपने से दूर धकेल देती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain.........kaleja उसका बहुत ज़ोरों से धडके लगा tha..........wahin सांसें भी पूरे उफान पर thi..........aankhein शर्म से नीचे की तरफ झुक गयी thi.........bade मुस्खिलों से वो जैसे तैसे बोल पड़ती हैं........

" ये sab.......theek नहीं hain..........yee .....गलत hain..............main ऐसे इस तरह से अपने पति को धोका नहीं दे sakti............tumm.....chale जाओ raghu...........aabhi.........isi वक़्त..............." और काव्य अपनी सानोसॉन को दुरुस्त करती हैं वहीँ रघु का चेहरा उतर सा जाता hain............ek बार फिर से उसके खड़े लुंड पर धोका जैसी बात हो गयी thi....dekhna था की आगे वक़्त कौन सी करवट बढ़ाता हैं............................

कंटिन्यू..........................................................................
 
अपडेट-29 (ा) (मेघा अपडेट)

" ये sab.......theek नहीं hain..........ye .....गलत hain..............main ऐसे इस तरह से अपने पति को धोका नहीं दे sakti............tummmm.....chale जाओ raghu...........aabhi.........isi वक़्त..............." और काव्य अपनी सानोसॉन को दुरुस्त करती हैं वहीँ रघु का चेहरा उतर सा जाता hain............ek बार फिर से उसके खड़े लुंड पर धोका जैसी बात हो गयी thi....dekhna था की आगे वक़्त कौन सी करवट बढ़ाता हैं............................

अब आगे........................................................................................

रघु काव्य से थोड़ी दूर पर खड़ा था मगर उसकी नज़रें अभी भी काव्य पर तिकी thi...........wahin काव्य का चेहरा शर्म से झुका हुआ tha..........aabhi भी वो लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही थी और अपने बेकाबू सांसों को संभालने की पल पल कोशिश कर रही thi..........kuch देर की गहरी ख़ामोशी के बाद आखिर रघु धीरे से बोल पड़ता हैं.......

" memsaheb.........main ये तो नहीं जनता की क्या सही हैं और क्या galat..........magar इतना ज़रूर जनता हूँ की अगर कोई प्यासा हो तो उसकी प्यास बुझा देनी chahiye.........chahe वो प्यास मुन्न की ho..............ya फिर टुन्न की........" और रघु फिर से काव्य के तरफ बड़े गौर से देखने लगता hain...........wahin काव्य अभी भी ख़ामोशी थी और अपना सर झुकाये नीचे की तरफ देख रही thi..........aakhir कुछ सोचकर वो धीरे से बोल पड़ती हैं.......

" तुम अभी इसी वक़्त यहाँ से चले जाओ raghu.........main इस बारे में तुमसे और कोई बात नहीं करना चाहती................." और काव्य जैसे रघु की तरफ देखते हुए आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु जवाब में कुछ देर तक खामोश रहता हैं और आख़िरकार फिर से बोल पड़ता हैं.....

" ठीक हैं memsaheb.........agar आप कहती हैं तो मैं अभी इसी वक़्त यहाँ से चले जाता hoon.......magar जाते जाते मुझे मेरी अमानत तो देती jaiye..........aab आप ये मुट्ठ कहियेगा की मैं कौन सी अमानत के बारे में आपसे बात कर रहा हूँ..........." और रघु हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं वहीँ काव्य कुछ देर तक चुप रहती हैं फिर वो अपना सर झुकते हुए फ़ौरन बाथरूम के तरफ चल पड़ती hain..........aur जैसे hi वो अंदर जाती हैं वो अपने बाथरूम का दरवाज़ा ाचे से बंद कर लेती hain........aur जब उसकी नज़रें सामने के दीवार पर तंगी शीशे की तरफ पड़ती हैं एक बार फिर से उसके चेहरे पर शर्म की लखरीरें गहरी होती चली जाती हैं........

काव्य के चेहरे पर कहीं कहीं कथायी रंग (पान के) के निशान साफ़ नज़र आ रहे they........to कहीं दूध के चिपचिपे से daag......jisey वो साफ़ अपने चेहरे और शोल्डर पर महसूस कर रही thi.........wo बड़े गौर से अपने आपको आईने में एक तुक देख रही thi......aur शायद एहि सोच रही थी की क्या मैं वहीँ काव्य हूँ जो पहले thi............ya फिर वो काव्य आज बदल गयी hain...........uske दिल से बस एहि जवाब आ रहा था ..........शायद nahin.......aab वो काव्य शायद अब धीरे धीरे बदल रही hain.........uski soch.........uski ख्यालात.......... सब कुछ धीरे धीरे जैसे बदलते जा रहे hain.........kuch सोचकर वो अपने सूट निकलती हैं .........अब उसके जिस्म पर एक रेड कलर की ब्रा thi..........jo उसके बड़े बड़े चूचियों को ढके हुई thi........doodh गिरने से आधा से ज़्यादा ब्रा भीग गया tha.........aur कुछ सूखा हुआ सा नज़र आ रहा था.........

काव्य बड़े गौर से आपने आपको देख रही thi.........nihaar रही thi...........shayad अपनी खूबसूरती पर उसे कहीं न कहीं गुर्रर जो tha.........kal तक ाचे ाचे लड़कों को जो भाव न देने वाली काव्य आज अपने hi घर के एक थर्ड क्लास के नौकर के साथ अपने जिस्म के मज़े ले रही thi.........uske बारे में सब कुछ सोच रही thi.......aacha bura...........khushi गम सब kuch...........aaj वही नौकर उसके दिल के करीब होता जा रहा tha........ye बदलाव नहीं तो और क्या था!!!!!!!!

काव्य फिर अपना दोनों हाथ पीठ की तरफ ले जाती हैं और हौले से अपनी ब्रा का हुक खोल देती hain........agle hi पल उसकी चूचियां खुली हवा में धीरे धीरे अपना सर उठाने लगती hain........wo फ़ौरन उस ब्रा को अपने जिस्म से अलग करती हैं और दुबारा से उस सूट को पहन लेती hain.......bin ब्रा के उसे थोड़ा अजीब सा लग रहा tha......chuchiyan तनय की वजह से उसके गोल गोल नुकीले निप्पल्स उस सूट में नज़र आ रहे they..............jo किसी भी मर्द के नीयत को पल भर में बिगड़ सकते they.........wo उस ब्रा को अपनी मुट्ठी में लेती हैं और सीधा बाथरूम से बहार निकल जाती हैं........

जैसे hi वो हॉल में जाती हैं रघु उसे वहीँ खड़ा हुआ दिखाई देता hain.........apne पीले काळा दांत दिखते hue............jab उसकी नज़र काव्य पर और उसके हाथ में थामे उस ब्रा पर पड़ती हैं एक पल के लिए रघु की आखें जैसे चमक सी जाती हैं.......... वहीँ काव्य शर्म से अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेती hain..........usey बहुत अजीब सा फील हो रहा था अपनी पहनी हुई ब्रा इस तरह से रघु के हाथ में देते hue..........magar कहीं न कहीं उसे अब रघु की परवाह भी होने लगी thi........wo अब नहीं चाहती थी की रघु अब और तड़पे.............

" आप ले आयी memsaheb..........aapka बहुत बहुत शुक्रिया........" और रघु अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ फिर से हंस पड़ता hain..........wahin काव्य हौले से हाँ में अपनी गुर्दें हिलाते हुए अपना सर नीचे की तरफ झुका लेती hain.........raghu फ़ौरन अपना एक हाथ आगे बढ़ा देता हैं और काव्य के हाथ में थमा ब्रा अपने हाथों में थम लेता hain..........wo उसे उलट पुलट कर देख रहा tha........mano जैसे उस ब्रा में कुछ ढूंढ रहा ho.........wahin काव्य शर्म से गढ़ती जा रही thi...........wo अब रघु का एक पल और सामना नहीं करना चाहती thi.........wahin रघु के चेहरे पर खुशियां साफ़ नज़र आ रही थी.........

वो फ़ौरन उस ब्रा को अपने नाक के करीब ले जाता हैं और एक लुम्बी सी सांस तेज़ी से अपने सांसों के ज़रिये अपने सीने में उतरता चला जाता hain..........ek पल के लिए तो उसकी आँखें बंद सी हो जाती हैं वहीँ काव्य का शर्म से बुरा हाल tha........wo एक पल के लिए भी उससे अपनी नज़रें नहीं मिला पा रही thi.........magar रघु तो जैसे काव्य को पूरी तरह से नंगा करने पर उतर आया tha.......dheere धीरे वो उसे मुन्न se..............aur टुन्न से नंगा करता जा रहा था..........

" आपकी जिस्म की खुसबू बहुत कमल की हैं memsaheb........jab भी मैं आपकी पंतय को या इस ब्रा को सूंघता हूँ मैं तो जैसे मदहोश सा हो जाता hoon.........mera लुंड एक hi झटके में जैसे खड़ा होने लगता hainn........mujhpar एक मदहोशी सी चने लगती hain..........aap सच में बहुत नमकीन hain.........memsaheb............chalta हूँ aab...........kal दुबारा से आवूंगा और कल मैं आपकी पंतय लेकर jawunga.............magar लेकर जावूंगा nahin........balki खुद मैं अपने हाथों से उसे utarunga............umeed करूँगा की आप मुझ गरीब को दुखी नहीं karengi.........aur उस दिन आपने जो साड़ी पहनी हुई थी कल आप मेरे लिए pehnengi..........wo सफ़ेद वाली........." और रघु काव्य के जवाब की परवाह किये बगैर सीधा बहार की तरफ चला जाता hain.......wahin काव्य अपना हाथ आगे की तरफ बढाती hain........mano वो रघु को रोकना चाहती ho.......ya उससे ये कहना चाहती हो की वो झूठे सपने न dekhey.........kavya उसके लिए ये सब नहीं करने wali........kabhi भी नहीं......

मगर न रघु ruka......aur न काव्य कुछ बोल payi............aur तो और काव्य की मुसीबतें भी रघु बढ़ा gaya..........aab वो ये सोच सोचकर परेशां हो उठी की कैसे वो कल रघु को मन कर payegi............kyon की वो बहुत ाचे से अपनी कमज़ोरी जानती thi..........aur सच तो ये था की रघु के सामने उसका कोई बस न चलता tha..........isi उधेरबुन में काव्य सीधा बाथरूम में चली जाती हैं और जाकर नहाने लगती hain..........aaj उसका पीरियड भी ख़तम हो गया tha........wo अब काफी रिलैक्स फील कर रही थी.........

आज वो दोहरे पर कड़ी thi...............jahan एक तरफ उसका भोला भला dewar.........jo बिलकुल अनादि tha...........masoom tha........sex क्या होता हैं वो कुछ नहीं जनता tha..........magar रघु और जीतू की सांगत में रहकर वो अब धीरे धीरे एक्सपर्ट होता जा रहा tha............wahin दूसरी तरफ raghu............jo चुदाई में मांझा हुआ खिलाडी tha......aurat को कैसे छोड़ा जाता hain..........kaise उसकी छूट की आग को बुझाया जाता हैं और कब क्या करने से औरत मर्द की मुट्ठी में आती हैं ये रघु भली भांति जनता tha.........shayad इसी वजह से अब काव्य धीरे धीरे उसके बस में होने लगी thi............jo भी था छोड़ना तो आखिर काव्य को tha..........chahe जिससे chude........jis हाल में chude............ye तो आने वाला वक़्त hi बताने वाला था..........

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नहाने के बाद काव्य फिर से सूट पहन लेती hain.........aaj उसने रेड कलर का सूट पहना हुआ tha..........aur नीचे ब्लैक रंग की laggy..........suit हमेशा की तरह उसके बदन से पूरा छिपा हुआ था जिससे उसका काटलिनाना फिगर साफ़ झलक रहा tha........seenay पर काळा रंग का दुप्पटा था मगर उसका रहना न रहना एक बराबर tha...........kyon की काव्य ने उस दुपट्टे को अपने गले में लपेट रखा tha...........har रोज़ की तरह राम कॉलेज से आता हैं मगर आज उसके अंदर उतावलापन कुछ ज़्यादा hi नज़र आ रहा tha........usey रात होने का बहुत hi बेसब्री से इंतज़ार tha........ki कब रात होगी और कब काव्य उसके पास aayegi.......aur कब वो कल की तरह उसके साथ मज़े करेगा..........

राम तो काव्य के साथ बहुत कुछ करना चाहता tha..........uski चूचियों के साथ जी भरकर खेलना चाहता tha........uski निप्पल्स को अपने डेंटन के बीच दबाकर काटना चाहता tha...........uski छूट को चूना चाहता tha......aur भी न जाने राम के सपने थे मगर ये सब करने की उसके अंदर ज़रा भी हिम्मत नहीं thi...........kyon की जब भी कववया उसके करीब आती उसकी अंदर hi अंदर फुट jati.........karna तो कुछ दूर वो उससे ठीक से बात तक नहीं कर पता..........

हर रोज़ की तरह शाम को आज भी राम रघु और जीतू से मिलने उनके कमरे की तरफ चल पड़ता hain............aur हर रोज़ की तरह वो दोनों राम को देखकर बहुत खुस होते hain...........aaj रघु राम को कुछ नया सीखने वाला tha..........aur उसने सब कुछ पहले से प्लान भी कर लिया tha........aab उसे इंतज़ार था तो राम के बस आने ka.......aur राम के आ जाने से उसकी बाकि बची कसार भी पूरी हो गयी थी...........

" malik.........kahan तक बात pahunchi.........aapne मेमसाहेब के साथ कुछ किया या नहीं.........." और रघु उतावलेपन से बोल पड़ता हैं वहीँ राम जवाब में हौले से मुस्कुरा देता hain.........ram कुछ देर तक खामोश रहता हैं फिर वो रात वाली साडी घटना एक एक कर रघु और जीतू को बताता चला जाता hain..........wahin जहाँ जीतू का लौड़ा खड़ा हो गया था वहीँ रघु की आँखें चमक गयी thi..........usey अब अपनी मंज़िल बहुत करीब नज़र आ रही थी..........

" आपने उन तस्वीरों के बारे में मेमसाहेब से कुछ कहा तो nahin.........aapne ये तो उन्हें नहीं बताया की वो तसवीरें हमने आपको दी थी.........." और जीतू हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ दूसरी तरफ रघु अभी भी अपने सोच में डूबा हुआ tha........kuch देर की चुप्पी के बाद रघु जीतू की तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ता हैं......

" जीतू बेवजह बात करने से अब कोई फायदा nahin.......jo बीत गया उसे जाने do.......aagey क्या करना हैं ये socho..........aur हाँ आज तुम मालिक का फ़ोन लेकर jawo......aur आज तुम फिर से वो वाली पिक्टूरें भरवा lana......magar याद रहे इस बार थोड़ी वो वाली पिक्टूरें दूसरी टाइप की होनी चाहिए.........." और रघु जीतू को इशारों इशारों में समझता चला जाता हैं वहीँ राम उन दोनों को हैरत से देखे जा रहा tha........jeetu के जाने के बाद रघु वहीँ राम के पास आता हैं और फिर से अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं...........

कॉन्टिनोएड............................................................................
 
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