- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 94,444
अपडेट-34 (ा) (मेघा अपडेट)
वहीँ फर्श पर एक तरफ उसकी साड़ी पड़ी thi........to वहीँ कुछ दूर पर उसकी blouse............aur कहीं पर उसकी ब्रा तो कभी पर .......उसकी panty............sare कपड़े इधर उधर बिखरे पड़े they......aur इस घर की मालकिन इस वक़्त एक गंदे गलीज़ नौकर की बाँहों में पूरी नंगी कड़ी thi............sir से लेकर पवन tak...........dekhna था रघु अब उसके साथ कौन सा खेल खेलने वाला tha...........ye तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था..............................................
अब आगे.....................................................................................
काव्य आज से पहले कभी इस हाल में किसी के सामने नहीं आयी हुई thi.........yahan तक राहुल के सामने भी nahin............magar आज वो रघु के सामने बिलकुल नंगी thi...........uske बदन पर कपड़े का एक रेशा तक मौजूद नहीं tha.............sharam से उसका बुरा हाल tha.........wo अपना सर रघु के सीने में छुपाये हुई thi...............tabhi बिजली की एक और तेज़्ज़ कड़कड़ाहट हुई और काव्य फिर से जैसे दुर्र से सेहम gayi...........wo अपना चेहरा रघु के सीने में छुपा रही thi...........wahin दुर्र से और ऐसे हालत से उसका बदन पसीने से बुरी तरह भीग गया tha.............aise लग रहा था जैसे वो नहाकर आयी हुई हो..........
वहीँ रघु बड़े प्यार से उसके बालों को तो कभी उसके कन्धों को सहलाये जा रहा tha.........kuch देर बाद काव्य जब नार्मल होती हैं तो रघु उसका चेहरा अपनी तरफ ऊपर की ओरे उठता hain..........magar अपने आप से उसे अलग नहीं karta...........wahin उसका लुंड मुर्दनी में और भी सख्त हो गया tha...........aise पारी हसीना को इस हाल में अपने इतने करीब पाकर जैसे उसकी किस्मत आज चमक गयी thi...........usey खुद पर यकीन नहीं हो रहा था की कल तक जिस लड़की को पाने के लिए उसने न जाने कितने पदाद बेले .........आज वही लड़की पूरी नंगी हालत में उसकी बाँहों में thi...........uske सीने से लिपटी हुई thi.............raghu आज अपने आप पर फकर महसूस कर रहा tha.......kavya और उसके उम्र में करीब डबल का फासला tha...........wo 45 ka....to काव्य 21 ki............dekha जाये तो वो उसकी बेटी सामान thi........magar आज हालत ऐसे थे की काव्य बेटी kum...........aur सामान ज़्यादा नज़र आ रही thi............magar हवस क्या जानती हैं की कौन बेटी हैं और कौन क्या hain..........usey तो बस अपने प्यास से मतलब होता hain........chahe जहाँ bujhe.......jissey bujhe...........aab देखना था काव्य जैसी कमसिन लड़की रघु जैसे सांड टाइप आदमी को अकेले संभल पति हैं या नहीं...........
" memsaheb................wo अंग्रेजी में क्या कहते हैं naaaa..........i लव you...........mujhse आपसे भी हो गया हैं.............." और रघु काव्य के सर को अपने चेहरे की तरफ उठता हुआ आहिस्ता से बोल पड़ता hain.........wahin काव्य रघु की ऐसी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं मगर कहती कुछ nahin..........wahin रघु भी जवाब में मुस्कुराये जा रहा था..........
" लगता हैं मेरी जानेमन बहुत प्यासी hain.........agar इज़ाज़त हो तो क्या मैं आपकी ये प्यास बुझा दूँ..........." और रघु काव्य की आँखों में आँखें डेल फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य बस टकटकी लगाए रघु को देखे जा रही thi..........wo क्या kehti............sharam से उसकी नज़रें एक बार फिर से नीचे की तरफ झुक जाती हैं वहीँ रघु अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस रहा था...........
" कहाँ लगी हैं ये pyaas...........mujhe तो कहीं नज़र नहीं आ रही..........." और रघु इस बार फिर से काव्य को छेड़ने लगता हैं वहीँ काव्य शर्म से दोहरी होती चली जाती hain.........aab वो रघु को कैसे बताती की आज उसकी छूट में आग लगी हुई hain.............wahin रघु उसकी शर्म को धीरे धीरे ख़तम करता जा रहा tha...........agle hi पल रघु अपने हाथ काव्य के गांड पर हौले से रख देता हैं और दोनों हाथों से उसकी गांड को धीरे धीरे से मसलने लगता hain...........sehlaney लगता hain...........wahin काव्य की लज्जत से आँखें दुबारा बंद हो जाती हैं और वो हौले से सिसक पड़ती हैं........
" यहाँ लगी हैं pyaas.........ya फिर यहाँ............" और रघु काव्य के गांड को मसलता हुआ आहिस्ता से काव्य के कान में बोल पड़ता hain........fir वो अपने हाथ उसकी गांड के दोनों दरारों के बीच डालता हुआ उसके छूट की तरफ ले जाने लगता hain.........wahin काव्य थोड़ी सी पीछे की तरफ हो जाती hain.........wo रघु की बाटिओं का मतलब बहुत ाचे से समझ रही thi..........wo जवाब में कुछ नहीं बोल पति और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं.............
" बोलिये न memsaheb..........aab मुझसे कैसी sharam.............choot की आग ठंडी कर दू यु फिर..........." और रघु फिर से अपने काळा पीले दन्त दिखता हुआ हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य फिर से शर्मा जाती hain..........wo ाचे से जानती थी की रघु उससे फिर से क्या कहलवाना चाहता हैं...........
" आपकी प्यास तो मैं तभी शांत करूँगा जब आप खुद अपने मुँह से kahengi...........warna ऐसे hi जलती रहिये इस आग में..........." और रघु जैसे इस बार अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ काव्य अजीब सी नज़रियों से रघु के तरफ एक तुक देखने लगती hain...........aab वो भी अपनी छूट के आगे पूरी तरह से बेबस नज़र आ रही thi..........wahin रघु उसकी बेबसी का पूरा फायदा उठा रहा था...........
" मैं दे तो रही हूँ न तुम्हें जो chahiye........fir तुम ऐसे मेरे साथ क्यों कर रहे ho.......ye शब्द बोलना ज़रूरी हैं क्या!!!!!! और काव्य शिकायत के लहज़े से रघु की तरफ देखते हुए धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु फिर से अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं...........
" वो क्या हैं न memsaheb.........jab तक चुदाई पूरी तरह खुल कर नहीं की jati.........kuch मज़ा नहीं aata...........aur इतना सब कुछ जब हो hi गया तो इसमें अब शर्माना kaisa............main अब कुछ नहीं janta.........aapko बोलना हैं .............सो बोलना हैं........." और रघु जैसे अपनी बात पर आड़ जाता हैं वहीँ काव्य भी अब समझ चुकी थी की इसके सामने कुछ कहना मतलब भैंस के सामने बीन बजने बराबर hain.......isey कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला............
" बताइये न memsaheb.............main आपकी प्यास को कैसे bujhawun............kya इसे दबाने se...........ya फिर इसे..........." और रघु अपना एक हाथ काव्य के चूचियों पर रख देता हैं और एक बार फिर से उसकी चूचियों को मसल देता hain............wahin उसका दूसरा हाथ एक बार फिर से काव्य के छूट की तरफ जाने लगा tha..........issey पहले रघु उसकी चिकनी छूट को छूटा काव्य फ़ौरन अपने हाथ आगे बढाकर रघु के हाथों को थम लेती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain.......bechaini साफ़ उसके चेहरे से ज़ाहिर हो रही thi.........magar वो अंदर hi अंदर तड़प भी रही थी...........
" raagggghhhhuuu......ppplllessssssss ...ाआब ाऔरररररर नानाआ tadppaawo..........ddddaalllllll दददूऊऊओ इस्ससेय्यययय आआब्बब्बब्ब मम्मीीरररीी ाआनंददीर्र्र्र......" और काव्य पूरी तरह से बेबस नज़र आने लगती hain........wahin रघु इस बार काव्य की बेबसी पर थोड़ा पिघल सा जाता hain..............wo काव्य के साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं करना चाहता tha............maza तो उसमें था जब खुद काव्य उससे ख़ुशी ख़ुशी वो सब कुछ करे जो वो चाहता hain.............uski हर एक फंतासी जो उसने कभी सपनों में सोच रखा था वो अब पूरा हो .........
रघु इस बार अपने दोनों हाथों से काव्य का सर थम लेता हैं और बड़े गौर से उसकी आँखों में एक तुक देखने लगता hain.........wahin काव्य भी टकटकी लगाए बस रघु को देखे जा रही thi............wo अपने गंदे होंठ इस बार काव्य से बिना कुछ कहे उसके लबों पर रख देता हैं और बहुत हौले हौले से उसके लबों को चूसने लगता hain.......uske नीचले होंठों को काटने लगता hain............wo अब बहुत आराम से काव्य के होंठों को चूसे जा रहा tha........wahin काव्य भी अब उसका पूरा पूरा साथ दे रही thi...........sansnon में गर्माहट धीरे धीरे अब बढ़ने लगी thi.........agle पल रघु काव्य के होंठों से अपने होंठ अलग करता हैं और अपना सर थोड़ा सा और ऊपर की तरफ उठता hain.........aab उसके गंदे होंठ काव्य के फेस के बिलकुल सामने they...........wo अभी भी ऊपर की तरफ झुका हुआ था और काव्य का चेहरा नीचे की तरफ tha...........magar दोनों की नज़रें एक दूसरे पर थी............
अगले hi पल वो अपने होंठ से गधा गधा पान का पीक धीरे धीरे से काव्य के चेहरे पर गिरने लगता hain.........uske माथे par.......uske गलों par.......honoton par..........raghu अपने थूक और पान से सना लार उसके चेहरे पर गिरता जा रहा tha..............wahin काव्य अपनी आँखें बंद किये अपना चेहरा उसी पोजीशन में किये हुई thi........shayad उसे रघु का ये गन्दा खेल अब पसंद आने लगा tha............raghu फ़ौरन अपनी जगह से उठता हैं और वहीँ फर्श पर रखा केला उठा लेता हैं और उसे छीलकर काव्य के पास चला जाता hain.......fir से वो थूक और अपना लार काव्य के चेहरे पर गिरने लगता hain...........wahin साथ hi साथ वो अब उस केले को भी काव्य के चेहरे पर अब माल्टा जा रहा tha.............ferta जा रहा था...........
केले पर भी अब रघु के थूक और लार लगने लगे थे जिससे उसका कलर अब लाल होता जा रहा tha...........wahin काव्य को अब कोई होश नहीं tha.........raghu उस केले को काव्य के पूरे चेहरे पर आहिस्ता आहिस्ता घुमा रहा tha...........jab थोड़े देर बाद काव्य का पूरा चेहरा रघु के थूक से भर जाता हैं वो फ़ौरन उस केले को काव्य के मुँह की तरफ ले जाता हैं और उसे काव्य के मुँह में डालने लगता hain..........aab रघु का थूक और पान का पीक सब कुछ काव्य के मुँह में एक बार फिर से घुलने लगा tha...........wo अपनी आँख बंद किये बस उस केले को खाये जा रही thi.........uspar लगे रघु के लार को छाती जा रही thi............wahin रघु उस केले का एक हिस्सा काव्य को खिला रहा tha.......wahin केले का दूसरा हिस्सा खुद अपने मुँह में रखकर खा रहा tha.............thode देर बाद जब केला पूरा ख़तम हो जाता हैं रघु अपने मुँह में बचा हुआ केला काव्य के मुँह में धीरे धीरे से उगलने लगता hain........wahin काव्य बस अपनी आँखें बंद किये उस केले को अपने हलक के अंदर उतरती चली जाती hain..........ek अलग सा मज़ा उसे ऐसे गंदे खेल में मिल रहा tha...........jahan उसकी छूट में गीलापन भी बढ़ता जा रहा था...........
अब एक अलग hi खेल शुरू हो गया tha.........na काव्य को कोई कहीं होश था ..........न किसी बात की कोई khabar......wo ये भी भूल चुकी थी की वो इस घर की मालकिन हैं और जिसकी बाँहों में वो इस वक़्त हैं वो उस घर का एक मामूली सा नौकर hain............jiski हैसियत उसके पवन की जूती बराबर भी नहीं hain.............magar हवस के आगे उसे अब सब कुछ दिखना जैसे बंद हो गया था.........
रघु के साथ उसे एक अलग hi ख़ुशी मिल रही thi........wahin उसकी छूट में गीलापन बढ़ता जा रहा tha...........raghu अगले hi पल अपने मुँह के अंदर से और थूक निकलता हैं और इस बार काव्य के लबों पर अपने गंदे उँगलियों को धीरे धीरे से फेरने लगता hain......apne उँगलियों को धीरे धीरे से फिरने लगता hain..........wahin काव्य भी हौले से अपने लबों को खोल लेती हैं और रघु के गंदे काळा उँगलियों को धीरे धीरे से चूसने लगती hain......chatney लगती hain...........wahin रघु अपने मुँह से थूक अब काव्य के मुँह में गिरता जा रहा tha..........jisey काव्य बिना किसी इंकार के उसे अपने हलक में उतरती जा रही thi.........dheere धीरे उसके मुँह में पान का लार और रघु का गधा गधा थूक उसके हलक में उतरता जा रहा tha..........aise लग रहा था जैसे काव्य रघु का थूक को नहीं बल्कि कोई अमृत पी रही हो..........
उसे इस गड़गड़ी में एक अलग सा सुकून मिल रहा tha........raghu ये सिलसिलसा दो तीन बार करता hain..........jab तक काव्य उसके थूक और लार को अपने हलक के नीचे पूरा नहीं उतर leti..........fir वो अपने डेंटन के बीच काव्य के जीभ को दबाता हैं और उसे धीरे धीरे से चूसने लगता hain...........wahin काव्य ज़ोर ज़ोर से सांस ले रही thi..........uska दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha...........raghu उसके होंठों को चूसे जा रहा tha.......kaat रहा tha..........wahin काव्य बस उसका पूरा पूरा साथ दे रही thi............agle hi पल रघु अपने t-shirt को उतर देता हैं और धीरे से अपनी लुंगी की गाँठ को भी खोल देता hain..........aab उसका गन्दा कला जिस्म काव्य के सामने पूरा नंगा tha...........magar इस तरह इतने करीब चिपके रहने से न काव्य अब तक उसका नंगा जिस्म देख पायी thi...........aur न रघु काव्य को देख पाया था..........
दोनों पसीने से बुरी तरह भीगे हुए they.............aur दोनों का नंगा जिस्म एक दूसरे में पूरी तरह से चिपका हुआ tha.........tabhi एक तेज़्ज़ बिजली फिर से कड़कती हैं और अगले hi पल बहार तेज़्ज़ बारिश होनी शुरू हो जाती hain......wahin काव्य एक बार फिर से दुर्र से रघु की बाँहों में सेहम जाती hain..........aur वो फिर से रघु के सीने से यु hi चिपकी रहती hain...........aaj तो पूरा समां बन गया tha.......bahar तेज़्ज़ मुश्लाधार बारिश हो रही थी और और अंदर आग लगी हुई थी............
" memsaheb...............agar आप कहो तो मैं आपि छूट की आग को ठंडी कर दू.........." और रघु काव्य को अपने से अलग करता हैं वहीँ काव्य हौले से अपनी आँखें खोलती हैं और शर्माकर अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेती hain..........wo क्या kehti........dheere से वो हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती हैं वहीँ रघु उसकी तरफ देखता हुआ हौले से मुसकुरा पड़ता hain..........agle hi पल वो काव्य को अपनी बाँहों में उठा लेता hain.......aur उसे उसी तरह उठाये हुए सामने रखा डाइनिंग टेबल पर बैठा देता hain............aur अगले hi पल वो काव्य से दूर होता चला जाता hain...........wahin काव्य हौले से अपनी दोनों आँखें बंद कर लेती hain..........wo भी ाचे से जानती थी की इस वक़्त रघु पूरी तरह से उसके सामने नंगा खड़ा hain.......uske अंदर इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो रघु के काळा मोठे लुंड की तरफ dekhey...........wahin काव्य अपने दोनों टांगों को पूरा सिकोड़ लेती हैं और रघु से अपनी छूट छुपाये रहती hain.......wahin रघु बड़े गौर से अपनी सामने पारी को देखे जा रहा tha.......aur मंद मंद मुस्कुराये जा रहा tha......usey तो अपने आप पर बिलकुल भी यकीन नहीं हो रहा था........
कॉन्टिनोएड.............................................................................
वहीँ फर्श पर एक तरफ उसकी साड़ी पड़ी thi........to वहीँ कुछ दूर पर उसकी blouse............aur कहीं पर उसकी ब्रा तो कभी पर .......उसकी panty............sare कपड़े इधर उधर बिखरे पड़े they......aur इस घर की मालकिन इस वक़्त एक गंदे गलीज़ नौकर की बाँहों में पूरी नंगी कड़ी thi............sir से लेकर पवन tak...........dekhna था रघु अब उसके साथ कौन सा खेल खेलने वाला tha...........ye तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था..............................................
अब आगे.....................................................................................
काव्य आज से पहले कभी इस हाल में किसी के सामने नहीं आयी हुई thi.........yahan तक राहुल के सामने भी nahin............magar आज वो रघु के सामने बिलकुल नंगी thi...........uske बदन पर कपड़े का एक रेशा तक मौजूद नहीं tha.............sharam से उसका बुरा हाल tha.........wo अपना सर रघु के सीने में छुपाये हुई thi...............tabhi बिजली की एक और तेज़्ज़ कड़कड़ाहट हुई और काव्य फिर से जैसे दुर्र से सेहम gayi...........wo अपना चेहरा रघु के सीने में छुपा रही thi...........wahin दुर्र से और ऐसे हालत से उसका बदन पसीने से बुरी तरह भीग गया tha.............aise लग रहा था जैसे वो नहाकर आयी हुई हो..........
वहीँ रघु बड़े प्यार से उसके बालों को तो कभी उसके कन्धों को सहलाये जा रहा tha.........kuch देर बाद काव्य जब नार्मल होती हैं तो रघु उसका चेहरा अपनी तरफ ऊपर की ओरे उठता hain..........magar अपने आप से उसे अलग नहीं karta...........wahin उसका लुंड मुर्दनी में और भी सख्त हो गया tha...........aise पारी हसीना को इस हाल में अपने इतने करीब पाकर जैसे उसकी किस्मत आज चमक गयी thi...........usey खुद पर यकीन नहीं हो रहा था की कल तक जिस लड़की को पाने के लिए उसने न जाने कितने पदाद बेले .........आज वही लड़की पूरी नंगी हालत में उसकी बाँहों में thi...........uske सीने से लिपटी हुई thi.............raghu आज अपने आप पर फकर महसूस कर रहा tha.......kavya और उसके उम्र में करीब डबल का फासला tha...........wo 45 ka....to काव्य 21 ki............dekha जाये तो वो उसकी बेटी सामान thi........magar आज हालत ऐसे थे की काव्य बेटी kum...........aur सामान ज़्यादा नज़र आ रही thi............magar हवस क्या जानती हैं की कौन बेटी हैं और कौन क्या hain..........usey तो बस अपने प्यास से मतलब होता hain........chahe जहाँ bujhe.......jissey bujhe...........aab देखना था काव्य जैसी कमसिन लड़की रघु जैसे सांड टाइप आदमी को अकेले संभल पति हैं या नहीं...........
" memsaheb................wo अंग्रेजी में क्या कहते हैं naaaa..........i लव you...........mujhse आपसे भी हो गया हैं.............." और रघु काव्य के सर को अपने चेहरे की तरफ उठता हुआ आहिस्ता से बोल पड़ता hain.........wahin काव्य रघु की ऐसी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं मगर कहती कुछ nahin..........wahin रघु भी जवाब में मुस्कुराये जा रहा था..........
" लगता हैं मेरी जानेमन बहुत प्यासी hain.........agar इज़ाज़त हो तो क्या मैं आपकी ये प्यास बुझा दूँ..........." और रघु काव्य की आँखों में आँखें डेल फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य बस टकटकी लगाए रघु को देखे जा रही thi..........wo क्या kehti............sharam से उसकी नज़रें एक बार फिर से नीचे की तरफ झुक जाती हैं वहीँ रघु अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस रहा था...........
" कहाँ लगी हैं ये pyaas...........mujhe तो कहीं नज़र नहीं आ रही..........." और रघु इस बार फिर से काव्य को छेड़ने लगता हैं वहीँ काव्य शर्म से दोहरी होती चली जाती hain.........aab वो रघु को कैसे बताती की आज उसकी छूट में आग लगी हुई hain.............wahin रघु उसकी शर्म को धीरे धीरे ख़तम करता जा रहा tha...........agle hi पल रघु अपने हाथ काव्य के गांड पर हौले से रख देता हैं और दोनों हाथों से उसकी गांड को धीरे धीरे से मसलने लगता hain...........sehlaney लगता hain...........wahin काव्य की लज्जत से आँखें दुबारा बंद हो जाती हैं और वो हौले से सिसक पड़ती हैं........
" यहाँ लगी हैं pyaas.........ya फिर यहाँ............" और रघु काव्य के गांड को मसलता हुआ आहिस्ता से काव्य के कान में बोल पड़ता hain........fir वो अपने हाथ उसकी गांड के दोनों दरारों के बीच डालता हुआ उसके छूट की तरफ ले जाने लगता hain.........wahin काव्य थोड़ी सी पीछे की तरफ हो जाती hain.........wo रघु की बाटिओं का मतलब बहुत ाचे से समझ रही thi..........wo जवाब में कुछ नहीं बोल पति और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं.............
" बोलिये न memsaheb..........aab मुझसे कैसी sharam.............choot की आग ठंडी कर दू यु फिर..........." और रघु फिर से अपने काळा पीले दन्त दिखता हुआ हंस पड़ता हैं वहीँ काव्य फिर से शर्मा जाती hain..........wo ाचे से जानती थी की रघु उससे फिर से क्या कहलवाना चाहता हैं...........
" आपकी प्यास तो मैं तभी शांत करूँगा जब आप खुद अपने मुँह से kahengi...........warna ऐसे hi जलती रहिये इस आग में..........." और रघु जैसे इस बार अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ काव्य अजीब सी नज़रियों से रघु के तरफ एक तुक देखने लगती hain...........aab वो भी अपनी छूट के आगे पूरी तरह से बेबस नज़र आ रही thi..........wahin रघु उसकी बेबसी का पूरा फायदा उठा रहा था...........
" मैं दे तो रही हूँ न तुम्हें जो chahiye........fir तुम ऐसे मेरे साथ क्यों कर रहे ho.......ye शब्द बोलना ज़रूरी हैं क्या!!!!!! और काव्य शिकायत के लहज़े से रघु की तरफ देखते हुए धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु फिर से अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं...........
" वो क्या हैं न memsaheb.........jab तक चुदाई पूरी तरह खुल कर नहीं की jati.........kuch मज़ा नहीं aata...........aur इतना सब कुछ जब हो hi गया तो इसमें अब शर्माना kaisa............main अब कुछ नहीं janta.........aapko बोलना हैं .............सो बोलना हैं........." और रघु जैसे अपनी बात पर आड़ जाता हैं वहीँ काव्य भी अब समझ चुकी थी की इसके सामने कुछ कहना मतलब भैंस के सामने बीन बजने बराबर hain.......isey कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला............
" बताइये न memsaheb.............main आपकी प्यास को कैसे bujhawun............kya इसे दबाने se...........ya फिर इसे..........." और रघु अपना एक हाथ काव्य के चूचियों पर रख देता हैं और एक बार फिर से उसकी चूचियों को मसल देता hain............wahin उसका दूसरा हाथ एक बार फिर से काव्य के छूट की तरफ जाने लगा tha..........issey पहले रघु उसकी चिकनी छूट को छूटा काव्य फ़ौरन अपने हाथ आगे बढाकर रघु के हाथों को थम लेती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain.......bechaini साफ़ उसके चेहरे से ज़ाहिर हो रही thi.........magar वो अंदर hi अंदर तड़प भी रही थी...........
" raagggghhhhuuu......ppplllessssssss ...ाआब ाऔरररररर नानाआ tadppaawo..........ddddaalllllll दददूऊऊओ इस्ससेय्यययय आआब्बब्बब्ब मम्मीीरररीी ाआनंददीर्र्र्र......" और काव्य पूरी तरह से बेबस नज़र आने लगती hain........wahin रघु इस बार काव्य की बेबसी पर थोड़ा पिघल सा जाता hain..............wo काव्य के साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं करना चाहता tha............maza तो उसमें था जब खुद काव्य उससे ख़ुशी ख़ुशी वो सब कुछ करे जो वो चाहता hain.............uski हर एक फंतासी जो उसने कभी सपनों में सोच रखा था वो अब पूरा हो .........
रघु इस बार अपने दोनों हाथों से काव्य का सर थम लेता हैं और बड़े गौर से उसकी आँखों में एक तुक देखने लगता hain.........wahin काव्य भी टकटकी लगाए बस रघु को देखे जा रही thi............wo अपने गंदे होंठ इस बार काव्य से बिना कुछ कहे उसके लबों पर रख देता हैं और बहुत हौले हौले से उसके लबों को चूसने लगता hain.......uske नीचले होंठों को काटने लगता hain............wo अब बहुत आराम से काव्य के होंठों को चूसे जा रहा tha........wahin काव्य भी अब उसका पूरा पूरा साथ दे रही thi...........sansnon में गर्माहट धीरे धीरे अब बढ़ने लगी thi.........agle पल रघु काव्य के होंठों से अपने होंठ अलग करता हैं और अपना सर थोड़ा सा और ऊपर की तरफ उठता hain.........aab उसके गंदे होंठ काव्य के फेस के बिलकुल सामने they...........wo अभी भी ऊपर की तरफ झुका हुआ था और काव्य का चेहरा नीचे की तरफ tha...........magar दोनों की नज़रें एक दूसरे पर थी............
अगले hi पल वो अपने होंठ से गधा गधा पान का पीक धीरे धीरे से काव्य के चेहरे पर गिरने लगता hain.........uske माथे par.......uske गलों par.......honoton par..........raghu अपने थूक और पान से सना लार उसके चेहरे पर गिरता जा रहा tha..............wahin काव्य अपनी आँखें बंद किये अपना चेहरा उसी पोजीशन में किये हुई thi........shayad उसे रघु का ये गन्दा खेल अब पसंद आने लगा tha............raghu फ़ौरन अपनी जगह से उठता हैं और वहीँ फर्श पर रखा केला उठा लेता हैं और उसे छीलकर काव्य के पास चला जाता hain.......fir से वो थूक और अपना लार काव्य के चेहरे पर गिरने लगता hain...........wahin साथ hi साथ वो अब उस केले को भी काव्य के चेहरे पर अब माल्टा जा रहा tha.............ferta जा रहा था...........
केले पर भी अब रघु के थूक और लार लगने लगे थे जिससे उसका कलर अब लाल होता जा रहा tha...........wahin काव्य को अब कोई होश नहीं tha.........raghu उस केले को काव्य के पूरे चेहरे पर आहिस्ता आहिस्ता घुमा रहा tha...........jab थोड़े देर बाद काव्य का पूरा चेहरा रघु के थूक से भर जाता हैं वो फ़ौरन उस केले को काव्य के मुँह की तरफ ले जाता हैं और उसे काव्य के मुँह में डालने लगता hain..........aab रघु का थूक और पान का पीक सब कुछ काव्य के मुँह में एक बार फिर से घुलने लगा tha...........wo अपनी आँख बंद किये बस उस केले को खाये जा रही thi.........uspar लगे रघु के लार को छाती जा रही thi............wahin रघु उस केले का एक हिस्सा काव्य को खिला रहा tha.......wahin केले का दूसरा हिस्सा खुद अपने मुँह में रखकर खा रहा tha.............thode देर बाद जब केला पूरा ख़तम हो जाता हैं रघु अपने मुँह में बचा हुआ केला काव्य के मुँह में धीरे धीरे से उगलने लगता hain........wahin काव्य बस अपनी आँखें बंद किये उस केले को अपने हलक के अंदर उतरती चली जाती hain..........ek अलग सा मज़ा उसे ऐसे गंदे खेल में मिल रहा tha...........jahan उसकी छूट में गीलापन भी बढ़ता जा रहा था...........
अब एक अलग hi खेल शुरू हो गया tha.........na काव्य को कोई कहीं होश था ..........न किसी बात की कोई khabar......wo ये भी भूल चुकी थी की वो इस घर की मालकिन हैं और जिसकी बाँहों में वो इस वक़्त हैं वो उस घर का एक मामूली सा नौकर hain............jiski हैसियत उसके पवन की जूती बराबर भी नहीं hain.............magar हवस के आगे उसे अब सब कुछ दिखना जैसे बंद हो गया था.........
रघु के साथ उसे एक अलग hi ख़ुशी मिल रही thi........wahin उसकी छूट में गीलापन बढ़ता जा रहा tha...........raghu अगले hi पल अपने मुँह के अंदर से और थूक निकलता हैं और इस बार काव्य के लबों पर अपने गंदे उँगलियों को धीरे धीरे से फेरने लगता hain......apne उँगलियों को धीरे धीरे से फिरने लगता hain..........wahin काव्य भी हौले से अपने लबों को खोल लेती हैं और रघु के गंदे काळा उँगलियों को धीरे धीरे से चूसने लगती hain......chatney लगती hain...........wahin रघु अपने मुँह से थूक अब काव्य के मुँह में गिरता जा रहा tha..........jisey काव्य बिना किसी इंकार के उसे अपने हलक में उतरती जा रही thi.........dheere धीरे उसके मुँह में पान का लार और रघु का गधा गधा थूक उसके हलक में उतरता जा रहा tha..........aise लग रहा था जैसे काव्य रघु का थूक को नहीं बल्कि कोई अमृत पी रही हो..........
उसे इस गड़गड़ी में एक अलग सा सुकून मिल रहा tha........raghu ये सिलसिलसा दो तीन बार करता hain..........jab तक काव्य उसके थूक और लार को अपने हलक के नीचे पूरा नहीं उतर leti..........fir वो अपने डेंटन के बीच काव्य के जीभ को दबाता हैं और उसे धीरे धीरे से चूसने लगता hain...........wahin काव्य ज़ोर ज़ोर से सांस ले रही thi..........uska दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha...........raghu उसके होंठों को चूसे जा रहा tha.......kaat रहा tha..........wahin काव्य बस उसका पूरा पूरा साथ दे रही thi............agle hi पल रघु अपने t-shirt को उतर देता हैं और धीरे से अपनी लुंगी की गाँठ को भी खोल देता hain..........aab उसका गन्दा कला जिस्म काव्य के सामने पूरा नंगा tha...........magar इस तरह इतने करीब चिपके रहने से न काव्य अब तक उसका नंगा जिस्म देख पायी thi...........aur न रघु काव्य को देख पाया था..........
दोनों पसीने से बुरी तरह भीगे हुए they.............aur दोनों का नंगा जिस्म एक दूसरे में पूरी तरह से चिपका हुआ tha.........tabhi एक तेज़्ज़ बिजली फिर से कड़कती हैं और अगले hi पल बहार तेज़्ज़ बारिश होनी शुरू हो जाती hain......wahin काव्य एक बार फिर से दुर्र से रघु की बाँहों में सेहम जाती hain..........aur वो फिर से रघु के सीने से यु hi चिपकी रहती hain...........aaj तो पूरा समां बन गया tha.......bahar तेज़्ज़ मुश्लाधार बारिश हो रही थी और और अंदर आग लगी हुई थी............
" memsaheb...............agar आप कहो तो मैं आपि छूट की आग को ठंडी कर दू.........." और रघु काव्य को अपने से अलग करता हैं वहीँ काव्य हौले से अपनी आँखें खोलती हैं और शर्माकर अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेती hain..........wo क्या kehti........dheere से वो हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती हैं वहीँ रघु उसकी तरफ देखता हुआ हौले से मुसकुरा पड़ता hain..........agle hi पल वो काव्य को अपनी बाँहों में उठा लेता hain.......aur उसे उसी तरह उठाये हुए सामने रखा डाइनिंग टेबल पर बैठा देता hain............aur अगले hi पल वो काव्य से दूर होता चला जाता hain...........wahin काव्य हौले से अपनी दोनों आँखें बंद कर लेती hain..........wo भी ाचे से जानती थी की इस वक़्त रघु पूरी तरह से उसके सामने नंगा खड़ा hain.......uske अंदर इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो रघु के काळा मोठे लुंड की तरफ dekhey...........wahin काव्य अपने दोनों टांगों को पूरा सिकोड़ लेती हैं और रघु से अपनी छूट छुपाये रहती hain.......wahin रघु बड़े गौर से अपनी सामने पारी को देखे जा रहा tha.......aur मंद मंद मुस्कुराये जा रहा tha......usey तो अपने आप पर बिलकुल भी यकीन नहीं हो रहा था........
कॉन्टिनोएड.............................................................................