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अपडेट- 38(ा) (मेघा अपडेट)
जब काव्य की निगाहें फिर से घडी की तरफ जाती हैं उसके चेहरे का रंग जैसे फिर से फीका सा पढ़ जाता hain......aabhi 15 मिनट और बचे हुए थे इस खेल ke.........yani अब काव्य अपने हार के बेहद करीब thi.........jab वो पिछले 15 मिनटों में खुद को दो बार झर्ड्ने से नहीं रोक पायी तो क्या गुरंटी हैं की वो 15 मिनट तक इस बार खुद को संभल payegi...............aaj तो रघु ने उसकी शर्म की धज्जियाँ उदा दी थी ................मगर ये शायद रघु के लिए एक शुरुवात thi..............aagey वो काव्य के साथ न जाने और कितने सरे गंदे खेल खेलने वाला था ये शायद या तो रघु जनता tha...............................ya फिर आने वाला वक़्त........................................................
अब आगे..........................................................................
काव्य का अब बुरा हाल tha..........uska सारा जिस्म पसीने से बुरी तरह लथपथ tha............aab तक वो अपने उखड़ते हुए सांसों को संभाल भी नहीं पायी thi..........aur न खुद पर काबू कर पायी thi...........wahin कुछ दूर पर रघु बैठा हुआ मुस्कुरा रहा tha.......shayad काव्य की हार pe............ya फिर ...........अपनी जीत पे...........
काव्य की नज़रें कभी सामने बैठे रघु पर jati.............to घडी की टिक टिक करती सुई par............aab उसे ये 15 मिनट 15 घंटे के बराबर लगने लगे they............na जाने क्यों वो आज हारना नहीं चाहती थी या शायद उसे हार बिलकुल पसंद नहीं tha..........magar आज वो रघु से नहीं बल्कि अपने जिस्म की आग से पूरी तरह बेबस नज़र आ रही थी..........
" क्या हुआ memsaheb............aabhi तो खेल शुरू हुआ hain...........aapko अपना वादा ाचे से याद हैं na........agar नहीं याद तो कहिये मैं आपको दुबारा से याद दिला देता hoon...........fir बाद में ये न कहियेगा की .............." और रघु जैसे काव्य की तरफ देखता हुआ तने मरने लगता हैं वहीँ काव्य बस हाँ में धीरे से अपनी गुर्दें हिला देती hain..........bhale hi वो आज हार जाये मगर वो किसी भी कीमत पर अपने जुबान से मुकरना नहीं चाहती thi...........kyon की उसे अपनी जुबान की अहमियत ाचे से पता थी..........
" ट्ट्टुम्म्म शुरू करूऊ माईंन्न्न तैयार हूँ......." और काव्य लुम्बी सांस छोड़ती हुई एक नज़र फिर से घडी की तरफ डालती हैं और खुद को तैयार करने लगती hain..........wahin इस बार रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ फिर से हंस पड़ता hain............wo वहीँ काव्य को फिर से अपने दोनों पवन दोनों तरफ फैलाने का इशारा करता हैं और उसके दोनों हाथों के पंजों को दोनों तरफ करता hain........aab काव्य फिर से अपने जिस्म का पूरा वजन अपने हाथों के पंजों पर टिकाये रहती hain.......aur नीचे अपने परिजन के अंघूटों के bal.............aab एक बार फिर से उसका जिस्म हवा में लहरा रहा tha..............lajaat से उसकी आँखें जैसे बार बार बंद हो रही thi..........wahin रघु इस बार फिर से काव्य के करीब आता हैं और अपने दोनों उँगलियों को काव्य की छूट के दोनों फांकों पर हौले हौले से फेरने लगता hain.........ghumaney लगता hain.........sehlaney लगता hain...........wahin काव्य फिर से आहिस्ता से सिसक पड़ती हैं.........
रघु के इस तरह छूने से एक बार फिर से उसके जिस्म में आग लग गयी thi.........raghu इस बार अपने दोनों हाथों को फर्श पर ले जाता हैं और फर्श पर बिखरा काव्य की मूट का पानी अपनी हथेली में इकट्ठा करता हैं और जब कुछ पानी उसकी हथेली में जमा हो जाता हैं वो उस पानी को काव्य के पेट से लेकर उसके चेहरे पर चिढक़ने लगता hain............fir से वो अपने हाथों को फर्श पर ले जाता हैं और वहीँ प्रक्रिया फिर से दोहराता hain.........aab काव्य का पूरा जिस्म उसकी मूट से बुरी तरह गिला होता जा रहा tha.........saath hi साथ उसके जिस्म से मूट की स्मेल भी आने लगी thi.........jism का कहीं कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा था जो उसकी मूट से भीगा न ho...........wahin इस बार रघु कुछ पानी अपनी हथेली में उठता हैं और इस बार वो अपनी हथेली को काव्य के होंठों के करीब ले जाता hai......aur काव्य के मूट का पानी धीरे धीरे उसके लबों पर गिरने लगता hain...........wahin काव्य न चाहते हुए भी हौले से अपने लैब धीरे से खोल देती हैं और उसका पानी उसके हलक में धीरे धीरे उतरता चला जाता hain...........aaj पहली बार वो अपना मूट खुद पी रही थी वहीँ उसे ये सब बहुत अजीब सा लग रहा tha.......na जाने रघु आगे उससे और क्या क्या करवाने वाला tha........ye पता नहीं शुरुवात thi...............ya फिर आठ..............
वहीँ दूसरी तरफ वो पसीने से बुरी तरह डूबती जा रही thi.............ek बार फिर से रघु ने उस कमरे का A.C बंद कर दिया था जिससे काव्य का बुरा हाल tha...........garmi से वो तड़प रही thi..........magar रघु तो आज अपनी वाली hi कर रहा tha.............ek बार फिर से उस कमरे में गन्दा खेल फिर से शुरू हो गया tha...........jab कुछ बूँदें काव्य के मुँह में चला जाता हैं रघु हौले से अपनी दो उँगलियों को फिर से काव्य के लबों पर रख देता हैं और उसके लबों पर धीरे धीरे से अपनी दोनों उँगलियाँ फेरने लगता hain..........fir कुछ पल बाद वो अपनी गन्दी उँगलियों को काव्य के मुँह के अंदर पुश करता हैं जिसे काव्य बिना किसी झिझक के उसके काळा गंदे उँगलियों को चूसने लगती hain.......chatney लगती hain.......aisa लग रहा था जैसे उसकी उँगलियों में सेहद लगा हुआ ho........jab तक उसकी दोनों उंगलियां पूरी तरह से साफ़ नहीं हो जाती वो काव्य के लबों से अपनी उँगलियों को बहार नहीं निकलता.............
रघु इस बार बिना वक़्त गंवाए अपने दो उँगलियों को फिर से नीचे की तरफ ले जाता hain...........uske छूट की taraf........fir वो उसके छूट के लिप्स पर अपने दोनों उँगलियों को हौले हौले से घूमने लगता hain.........ferney लगता हैं........... और धीरे धीरे उसके क्लिटस को रगड़ने लगता hain.......uske क्लिटस को धीरे धीरे से दबाने लगता hain.........jaise जैसे वो काव्य के छूट के साथ खेलता जा रहा था वैसे वैसे काव्य की ाहिएँ भी तेज़्ज़ होती जा रही thi.........uski बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi...........wo जैसे तैसे खुद को संभालने की लगातार कोशिश कर रही थी मगर हर बार वो उसमें पूरी तरह से नाकाम होती जा रही thi........kyon की सच तो ये था की रघु के सामने उसका बस ज़रा भी नहीं चल रहा था.........
इस बार रघु अपनी मिडिल फिंगर काव्य की छूट के और नीचे की तरफ ले जाता hain..........kavya की गांड के गुलाबी सूराख की taraf...........jaise hi उसकी ऊँगली इस बार काव्य के गांड के दरार को छूती हैं काव्य इस बार बुरी तरह से मचल उठती hain..........sisak पड़ती hain............uska कलेजा बहुत ज़ोरों से धड़कने लगा tha.........wahin दिल में धीरे धीरे दुर्र भी बढ़ने लगा tha............aur डरने की बात भी थी क्यों की आज से पहले काव्य ने अपनी गांड की सूराख में कभी कुछ अंदर नहीं लिया tha............aur न hi उसे अपनी गांड मरवाने का कभी शौक tha.........magar रघु तो आज काव्य की ाचे से मरने पर तुला हुआ tha..........aur धीरे धीरे वो अपने सरे शौक एक एक कर पूरे कर रहा था.........
"aaaaaaaaaaaaaasssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhh..........waaahaaannn पप्प्पाअरररररर नाहाहहीनंण raaaaggghhhhuuu.......pppplllsssssss............" और काव्य एक बार फिर से ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं मगर रघु आज कहाँ मानने वाला tha.............usey तो अपनी वाली hi करनी थी सो वो कर रहा tha...........wo हौले हौले से अपनी उँगलियों को को उसकी गांड के सूराख के चरों तरफ घूमर रहा tha..........fer रहा tha...........mano अपनी उँगलियों से वो काव्य की गांड का जज़ीज़ा ले रहा ho.........wahin काव्य की दुर्र से हालत ख़राब हो रही thi..............uska दिल अब ज़ोरों से धड़कता जा रहा tha........agle hi पल रघु अपनी दूसरी ऊँगली काव्य की छूट पर ले जाता हैं और उसे आहिस्ता आहिस्ता से फेरने लगता hain.......fir वो अपने ऊँगली को धीरे से दबाव डालता हैं और उसकी वहीँ ऊँगली काव्य की छूट की गहराई में उतरती चली जाती hain........issey पहले काव्य संभालती रघु अपनी दूसरी ऊँगली को काव्य की गांड की दरार में धीरे धीरे पुश करने लगता हैं.......
वहीँ काव्य दर्द से मनो सिसक और चीख सी पड़ती हैं मगर रघु को रोकने की ज़रा भी कोशिश नहीं karti............wahin रघु आहिस्ता आहिस्ता अपने ऊँगली पर दबाव बनता जा रहा था और उसकी वही ऊँगली अब काव्य की गांड की गहराई में उतरती जा रही thi........lajjat और दर्द से काव्य का अब बुरा हाल tha..........wo वहीँ सिसकती हुई आहें भर रही thi..........raghu के हाथों पर लगातार दबाव बढ़ता जाए रहा था और जैसे जैसे उसकी ऊँगली काव्या की गांड के अंदर जा रही थी वैसे वैसे काव्य की बेचैनी और दर्द भी बढ़ता जा रहा tha............raghu को तो ये अंदाज़ा हो गया था की आज से पहले कभी काव्य ने अपनी गांड में कुछ लिया नहीं hain.......wo उसकी गांड की तिघटनेस को अपनी उँगलियों पर महसूस कर रहा tha..........kavyya की गांड की सूराख इतनी टाइट थी की रघु को भी बहुत ताक़त लगनी पढ़ रही थी अपनी ऊँगली अंदर डालने mein............magar वो आज अपनी ऊँगली को काव्य की गांड की गहराई में पूरा उतर देना चाहता था...........
जब तक उसकी एक ऊँगली काव्य की गांड की गहराई में नहीं उतर जाती रघु अपने उँगलियों पर दबाव ऐसे hi बनाये रखता hain........wahin काव्य के मुँह से तेज़्ज़ तेज़्ज़ सिसकारी फुट रही thi...........shayad उसे अब दर्द होने लगा tha..........raghu अपनी दूसरी ऊँगली काव्य के छूट के अंदर बहार करने लगता हैं मगर दूसरी ऊँगली को उसी पोजीशन में कुछ देर तक रोके रहता hain.........aab काव्य को भी धीरे धीरे मज़ा आने लगा tha.............raghu एक नज़र घडी की तरफ देखता हैं अब केवल 10 मिनट hi रह गए they...........aur उसके लिए ये 10 मिनट बहुत थे.............
वो फ़ौरन नीचे की तरफ झुकता हैं और अपना चेहरा उसकी छूट के तरफ ले जाता हैं और फिर से अपना जीभ हौले से काव्य की छूट पार रख देता हैं और उसे आहिस्ता आहिस्ता से चटनी लगता hain.....uske सिलिट्स को अपने जीभ से चढ़ने लगता hain.......magar वो अपने ऊँगली को उसकी छूट से एक पल के लिए भी बहार नहीं nikalta.........is दोहरे हुमल्य से कववया इस बार बुरी तरह से तड़प उठती hain..........kyon की रघु की दोनों उँगलियाँ उसकी दोनों छेद में थी वहीँ वो अपनी जीभ से लगातार उसकी छूट को कुरेदे जा रहा tha..........kavya का संभालना अब एक बार फिर से मुस्खिल होता जा रहा tha..........wahin रघु अब अपने जीभ की रफ़्तार और तेज़्ज़ कर देता हैं और साथ hi साथ अपनी उँगलियों की हरकत भी............
अब उसकी दोनों उँगलियाँ साथ साथ चल रही thi.......kabhi उसकी गांड में to...........kabhi उसकी छूट mein..........saath hi साथ वो काव्य के छूट पर जीभ भी चला रहा tha..........is दोहरे हुमंली से काव्य की हालत अब फिर से ख़राब होने लगी thi........wo hi जानती थी की कैसे वो आपने आपको काबू में किये हुई thi.............uski छूट लगातार फिर से पानी छोड़ रही थी वहीँ उसकी उँगलियाँ भी बाकि बचा कसार पूरा कर रही thi..........kavya हौले हौले से अपनी गांड हिला रही थी और अब वो धीरे धीरे से रघु के मुँह पर अपने छूट रगड़ रही thi........usey खुद पार हैरानी हो रही थी की उसे आज क्या होता जा रहा hain.........ek के बाद do...........do के बाद teen.......wo अब तीसरी बार झरने के कगार पर थी........
वहीँ उसके बदन में आग और भी बढ़ता hi जा रहा tha.......na जाने रघु ने उसकी कैसी लत्त लगा दी thi................guzarte वक़्त के साथ साथ काव्य की आहें भी बढ़ती चली जाती हैं और उसका संभालना अब मुश्किल होता जा रहा tha.................ye सिलसिला ज़्यादा देर नहीं चल पता और आखिर काव्य की हिम्मत जैसे टूट सी जाती hain...........wahin रघु अपनी उँगलियों की रफ़्तार और तेज़्ज़ कर देता हैं और तेज़्ज़ी से उसकी छूट अपनी उँगलियों से छोड़ने लगता hain........saath hi साथ उसकी एक ऊँगली भी गांड में तेज़ी से चल रही thi.........upar से वो अपने जीभ का कमल दिखा रहा tha...........aakhir कब तक काव्य रघु के इन साडी हरकतों को बर्दास्त कर pati.............uska भी साबरा पूरी तरह से जवाब दे जाता हैं और वो इस बार ज़ोरों से चीखती हुई फिर से झरने लगती हैं.............
कॉन्टिनोएड..............................................................
जब काव्य की निगाहें फिर से घडी की तरफ जाती हैं उसके चेहरे का रंग जैसे फिर से फीका सा पढ़ जाता hain......aabhi 15 मिनट और बचे हुए थे इस खेल ke.........yani अब काव्य अपने हार के बेहद करीब thi.........jab वो पिछले 15 मिनटों में खुद को दो बार झर्ड्ने से नहीं रोक पायी तो क्या गुरंटी हैं की वो 15 मिनट तक इस बार खुद को संभल payegi...............aaj तो रघु ने उसकी शर्म की धज्जियाँ उदा दी थी ................मगर ये शायद रघु के लिए एक शुरुवात thi..............aagey वो काव्य के साथ न जाने और कितने सरे गंदे खेल खेलने वाला था ये शायद या तो रघु जनता tha...............................ya फिर आने वाला वक़्त........................................................
अब आगे..........................................................................
काव्य का अब बुरा हाल tha..........uska सारा जिस्म पसीने से बुरी तरह लथपथ tha............aab तक वो अपने उखड़ते हुए सांसों को संभाल भी नहीं पायी thi..........aur न खुद पर काबू कर पायी thi...........wahin कुछ दूर पर रघु बैठा हुआ मुस्कुरा रहा tha.......shayad काव्य की हार pe............ya फिर ...........अपनी जीत पे...........
काव्य की नज़रें कभी सामने बैठे रघु पर jati.............to घडी की टिक टिक करती सुई par............aab उसे ये 15 मिनट 15 घंटे के बराबर लगने लगे they............na जाने क्यों वो आज हारना नहीं चाहती थी या शायद उसे हार बिलकुल पसंद नहीं tha..........magar आज वो रघु से नहीं बल्कि अपने जिस्म की आग से पूरी तरह बेबस नज़र आ रही थी..........
" क्या हुआ memsaheb............aabhi तो खेल शुरू हुआ hain...........aapko अपना वादा ाचे से याद हैं na........agar नहीं याद तो कहिये मैं आपको दुबारा से याद दिला देता hoon...........fir बाद में ये न कहियेगा की .............." और रघु जैसे काव्य की तरफ देखता हुआ तने मरने लगता हैं वहीँ काव्य बस हाँ में धीरे से अपनी गुर्दें हिला देती hain..........bhale hi वो आज हार जाये मगर वो किसी भी कीमत पर अपने जुबान से मुकरना नहीं चाहती thi...........kyon की उसे अपनी जुबान की अहमियत ाचे से पता थी..........
" ट्ट्टुम्म्म शुरू करूऊ माईंन्न्न तैयार हूँ......." और काव्य लुम्बी सांस छोड़ती हुई एक नज़र फिर से घडी की तरफ डालती हैं और खुद को तैयार करने लगती hain..........wahin इस बार रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ फिर से हंस पड़ता hain............wo वहीँ काव्य को फिर से अपने दोनों पवन दोनों तरफ फैलाने का इशारा करता हैं और उसके दोनों हाथों के पंजों को दोनों तरफ करता hain........aab काव्य फिर से अपने जिस्म का पूरा वजन अपने हाथों के पंजों पर टिकाये रहती hain.......aur नीचे अपने परिजन के अंघूटों के bal.............aab एक बार फिर से उसका जिस्म हवा में लहरा रहा tha..............lajaat से उसकी आँखें जैसे बार बार बंद हो रही thi..........wahin रघु इस बार फिर से काव्य के करीब आता हैं और अपने दोनों उँगलियों को काव्य की छूट के दोनों फांकों पर हौले हौले से फेरने लगता hain.........ghumaney लगता hain.........sehlaney लगता hain...........wahin काव्य फिर से आहिस्ता से सिसक पड़ती हैं.........
रघु के इस तरह छूने से एक बार फिर से उसके जिस्म में आग लग गयी thi.........raghu इस बार अपने दोनों हाथों को फर्श पर ले जाता हैं और फर्श पर बिखरा काव्य की मूट का पानी अपनी हथेली में इकट्ठा करता हैं और जब कुछ पानी उसकी हथेली में जमा हो जाता हैं वो उस पानी को काव्य के पेट से लेकर उसके चेहरे पर चिढक़ने लगता hain............fir से वो अपने हाथों को फर्श पर ले जाता हैं और वहीँ प्रक्रिया फिर से दोहराता hain.........aab काव्य का पूरा जिस्म उसकी मूट से बुरी तरह गिला होता जा रहा tha.........saath hi साथ उसके जिस्म से मूट की स्मेल भी आने लगी thi.........jism का कहीं कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा था जो उसकी मूट से भीगा न ho...........wahin इस बार रघु कुछ पानी अपनी हथेली में उठता हैं और इस बार वो अपनी हथेली को काव्य के होंठों के करीब ले जाता hai......aur काव्य के मूट का पानी धीरे धीरे उसके लबों पर गिरने लगता hain...........wahin काव्य न चाहते हुए भी हौले से अपने लैब धीरे से खोल देती हैं और उसका पानी उसके हलक में धीरे धीरे उतरता चला जाता hain...........aaj पहली बार वो अपना मूट खुद पी रही थी वहीँ उसे ये सब बहुत अजीब सा लग रहा tha.......na जाने रघु आगे उससे और क्या क्या करवाने वाला tha........ye पता नहीं शुरुवात thi...............ya फिर आठ..............
वहीँ दूसरी तरफ वो पसीने से बुरी तरह डूबती जा रही thi.............ek बार फिर से रघु ने उस कमरे का A.C बंद कर दिया था जिससे काव्य का बुरा हाल tha...........garmi से वो तड़प रही thi..........magar रघु तो आज अपनी वाली hi कर रहा tha.............ek बार फिर से उस कमरे में गन्दा खेल फिर से शुरू हो गया tha...........jab कुछ बूँदें काव्य के मुँह में चला जाता हैं रघु हौले से अपनी दो उँगलियों को फिर से काव्य के लबों पर रख देता हैं और उसके लबों पर धीरे धीरे से अपनी दोनों उँगलियाँ फेरने लगता hain..........fir कुछ पल बाद वो अपनी गन्दी उँगलियों को काव्य के मुँह के अंदर पुश करता हैं जिसे काव्य बिना किसी झिझक के उसके काळा गंदे उँगलियों को चूसने लगती hain.......chatney लगती hain.......aisa लग रहा था जैसे उसकी उँगलियों में सेहद लगा हुआ ho........jab तक उसकी दोनों उंगलियां पूरी तरह से साफ़ नहीं हो जाती वो काव्य के लबों से अपनी उँगलियों को बहार नहीं निकलता.............
रघु इस बार बिना वक़्त गंवाए अपने दो उँगलियों को फिर से नीचे की तरफ ले जाता hain...........uske छूट की taraf........fir वो उसके छूट के लिप्स पर अपने दोनों उँगलियों को हौले हौले से घूमने लगता hain.........ferney लगता हैं........... और धीरे धीरे उसके क्लिटस को रगड़ने लगता hain.......uske क्लिटस को धीरे धीरे से दबाने लगता hain.........jaise जैसे वो काव्य के छूट के साथ खेलता जा रहा था वैसे वैसे काव्य की ाहिएँ भी तेज़्ज़ होती जा रही thi.........uski बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi...........wo जैसे तैसे खुद को संभालने की लगातार कोशिश कर रही थी मगर हर बार वो उसमें पूरी तरह से नाकाम होती जा रही thi........kyon की सच तो ये था की रघु के सामने उसका बस ज़रा भी नहीं चल रहा था.........
इस बार रघु अपनी मिडिल फिंगर काव्य की छूट के और नीचे की तरफ ले जाता hain..........kavya की गांड के गुलाबी सूराख की taraf...........jaise hi उसकी ऊँगली इस बार काव्य के गांड के दरार को छूती हैं काव्य इस बार बुरी तरह से मचल उठती hain..........sisak पड़ती hain............uska कलेजा बहुत ज़ोरों से धड़कने लगा tha.........wahin दिल में धीरे धीरे दुर्र भी बढ़ने लगा tha............aur डरने की बात भी थी क्यों की आज से पहले काव्य ने अपनी गांड की सूराख में कभी कुछ अंदर नहीं लिया tha............aur न hi उसे अपनी गांड मरवाने का कभी शौक tha.........magar रघु तो आज काव्य की ाचे से मरने पर तुला हुआ tha..........aur धीरे धीरे वो अपने सरे शौक एक एक कर पूरे कर रहा था.........
"aaaaaaaaaaaaaasssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhh..........waaahaaannn पप्प्पाअरररररर नाहाहहीनंण raaaaggghhhhuuu.......pppplllsssssss............" और काव्य एक बार फिर से ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं मगर रघु आज कहाँ मानने वाला tha.............usey तो अपनी वाली hi करनी थी सो वो कर रहा tha...........wo हौले हौले से अपनी उँगलियों को को उसकी गांड के सूराख के चरों तरफ घूमर रहा tha..........fer रहा tha...........mano अपनी उँगलियों से वो काव्य की गांड का जज़ीज़ा ले रहा ho.........wahin काव्य की दुर्र से हालत ख़राब हो रही thi..............uska दिल अब ज़ोरों से धड़कता जा रहा tha........agle hi पल रघु अपनी दूसरी ऊँगली काव्य की छूट पर ले जाता हैं और उसे आहिस्ता आहिस्ता से फेरने लगता hain.......fir वो अपने ऊँगली को धीरे से दबाव डालता हैं और उसकी वहीँ ऊँगली काव्य की छूट की गहराई में उतरती चली जाती hain........issey पहले काव्य संभालती रघु अपनी दूसरी ऊँगली को काव्य की गांड की दरार में धीरे धीरे पुश करने लगता हैं.......
वहीँ काव्य दर्द से मनो सिसक और चीख सी पड़ती हैं मगर रघु को रोकने की ज़रा भी कोशिश नहीं karti............wahin रघु आहिस्ता आहिस्ता अपने ऊँगली पर दबाव बनता जा रहा था और उसकी वही ऊँगली अब काव्य की गांड की गहराई में उतरती जा रही thi........lajjat और दर्द से काव्य का अब बुरा हाल tha..........wo वहीँ सिसकती हुई आहें भर रही thi..........raghu के हाथों पर लगातार दबाव बढ़ता जाए रहा था और जैसे जैसे उसकी ऊँगली काव्या की गांड के अंदर जा रही थी वैसे वैसे काव्य की बेचैनी और दर्द भी बढ़ता जा रहा tha............raghu को तो ये अंदाज़ा हो गया था की आज से पहले कभी काव्य ने अपनी गांड में कुछ लिया नहीं hain.......wo उसकी गांड की तिघटनेस को अपनी उँगलियों पर महसूस कर रहा tha..........kavyya की गांड की सूराख इतनी टाइट थी की रघु को भी बहुत ताक़त लगनी पढ़ रही थी अपनी ऊँगली अंदर डालने mein............magar वो आज अपनी ऊँगली को काव्य की गांड की गहराई में पूरा उतर देना चाहता था...........
जब तक उसकी एक ऊँगली काव्य की गांड की गहराई में नहीं उतर जाती रघु अपने उँगलियों पर दबाव ऐसे hi बनाये रखता hain........wahin काव्य के मुँह से तेज़्ज़ तेज़्ज़ सिसकारी फुट रही thi...........shayad उसे अब दर्द होने लगा tha..........raghu अपनी दूसरी ऊँगली काव्य के छूट के अंदर बहार करने लगता हैं मगर दूसरी ऊँगली को उसी पोजीशन में कुछ देर तक रोके रहता hain.........aab काव्य को भी धीरे धीरे मज़ा आने लगा tha.............raghu एक नज़र घडी की तरफ देखता हैं अब केवल 10 मिनट hi रह गए they...........aur उसके लिए ये 10 मिनट बहुत थे.............
वो फ़ौरन नीचे की तरफ झुकता हैं और अपना चेहरा उसकी छूट के तरफ ले जाता हैं और फिर से अपना जीभ हौले से काव्य की छूट पार रख देता हैं और उसे आहिस्ता आहिस्ता से चटनी लगता hain.....uske सिलिट्स को अपने जीभ से चढ़ने लगता hain.......magar वो अपने ऊँगली को उसकी छूट से एक पल के लिए भी बहार नहीं nikalta.........is दोहरे हुमल्य से कववया इस बार बुरी तरह से तड़प उठती hain..........kyon की रघु की दोनों उँगलियाँ उसकी दोनों छेद में थी वहीँ वो अपनी जीभ से लगातार उसकी छूट को कुरेदे जा रहा tha..........kavya का संभालना अब एक बार फिर से मुस्खिल होता जा रहा tha..........wahin रघु अब अपने जीभ की रफ़्तार और तेज़्ज़ कर देता हैं और साथ hi साथ अपनी उँगलियों की हरकत भी............
अब उसकी दोनों उँगलियाँ साथ साथ चल रही thi.......kabhi उसकी गांड में to...........kabhi उसकी छूट mein..........saath hi साथ वो काव्य के छूट पर जीभ भी चला रहा tha..........is दोहरे हुमंली से काव्य की हालत अब फिर से ख़राब होने लगी thi........wo hi जानती थी की कैसे वो आपने आपको काबू में किये हुई thi.............uski छूट लगातार फिर से पानी छोड़ रही थी वहीँ उसकी उँगलियाँ भी बाकि बचा कसार पूरा कर रही thi..........kavya हौले हौले से अपनी गांड हिला रही थी और अब वो धीरे धीरे से रघु के मुँह पर अपने छूट रगड़ रही thi........usey खुद पार हैरानी हो रही थी की उसे आज क्या होता जा रहा hain.........ek के बाद do...........do के बाद teen.......wo अब तीसरी बार झरने के कगार पर थी........
वहीँ उसके बदन में आग और भी बढ़ता hi जा रहा tha.......na जाने रघु ने उसकी कैसी लत्त लगा दी thi................guzarte वक़्त के साथ साथ काव्य की आहें भी बढ़ती चली जाती हैं और उसका संभालना अब मुश्किल होता जा रहा tha.................ye सिलसिला ज़्यादा देर नहीं चल पता और आखिर काव्य की हिम्मत जैसे टूट सी जाती hain...........wahin रघु अपनी उँगलियों की रफ़्तार और तेज़्ज़ कर देता हैं और तेज़्ज़ी से उसकी छूट अपनी उँगलियों से छोड़ने लगता hain........saath hi साथ उसकी एक ऊँगली भी गांड में तेज़ी से चल रही thi.........upar से वो अपने जीभ का कमल दिखा रहा tha...........aakhir कब तक काव्य रघु के इन साडी हरकतों को बर्दास्त कर pati.............uska भी साबरा पूरी तरह से जवाब दे जाता हैं और वो इस बार ज़ोरों से चीखती हुई फिर से झरने लगती हैं.............
कॉन्टिनोएड..............................................................