Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 11 - SexBaba
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Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

अपडेट-50 (ा) (मेघा अपडेट)

" memsaheb.....aab तो आप हार gayi............aur जैसा की शर्त के मुताबिक़ आज से 24 घंटे के लिए आप हम सबकी घुलम hui.......jiska जो दिल चाहे वो आपके साथ कर सकता हैं और आप किसी को किसी बात के लिए मन नहीं karengi.............aur तो आप बहुत ाचे से जानती हैं की इन 24 घंटों में आपके साथ क्या होने वाला hain.........aur हम सब आपके साथ मिलकर क्या करने वाले hain...........wo कहते हैं na...................samajhdaar को बस इशारा काफी होता हैं.............." और इतना कहकर तीनों ठहाका मरकर ज़ोरों से हसने लगते हैं.....................................................

अब आगे....................................................................................

काव्य उन तीनों के सामने उनके छोटे से उस कमरे में....... उनके सामने अध्नंगी हालत में बैठी हुई thi............aab वो ाचे से समझ चुकी थी की ये तीनों उसे मिलकर इन 24 घंटों में उसके बुर और गांड की बहुत ाचे से कुटाई करने वाले hain.......to अब उसके लिए भी एहि ाचा होगा की वो अपने हथियार उनके आगे दाल दे और जो ये सब उसके साथ करना चाहते हैं वो भी उन्हें जैसे चाहे सब कुछ बिना किसी सवाल जवाब के करने दे...........

मगर अब सवाल ये था की वो ये बात कहे kaise.........kyon की वो रघु को बहुत ाचे से जानती thi........aur वो ये भी जानती थी की रघु अब इन 24 घंटों में उसके साथ क्या कुछ करने वाला hain..........wo रघु के निहायती घटिया गंदे खेल से पूरी तरफ वाकिफ thi........aur अब तो जीतू भी ठीक उसकी के रंग में पूरी तरह से रंग गया tha.......jaisa खेल रघु को पसंद था वैसा hi जीतू ko........magar अब सवाल ये था की राम क्या ये सब पसंद karega.........magar कहीं न कहीं काव्य भी तो एहि चाहती थी की रघु उसके साथ गन्दगी भरा कुछ खेल khele.........uski बेइज़ाती kare........ussey वो सब कुछ करवाए जो एक पेशावर रंडी भी कुछ करने से पहले सौर बार सोचती hain........aab तो वैसे भी काव्य उनकी रंडी hi thi........ek तरह से दूसरी शब्द में कहा जाये तो उनका ...........एक घुलम..........

सच तो ये था की काव्य को रघु की एहि अदा बहुत पसंद thi........na जाने रघु की एहि गन्दगी काव्य को उसकी तरफ पल पल आकर्षित करती thi......kyon की रघु सबसे अलग जो tha.............wo उसे छोड़ता तो था मगर गंदे भरे खेल उसके साथ ज़्यादा खेलता tha.........aur कहीं न कहीं काव्य को उसका ये गन्दा भरा खेल बहुत ाचा लगता tha..........wo तो चाहती hi थी की रघु कुछ उससे अलग karwaye..........usey वो अपनी दासी बनाकर रखे .........उसके जिस्म के साथ वो सब कुछ करे जिसकी उसे चाह hain........bhale hi आज रघु बेईमानी करके उसके साथ जीत तो गया था मगर कहीं न कहीं काव्य भी एहि चाहती थी की वो इस बाज़ी में रघु से हार जाये..........

क्यों की आज के इस हार में उसकी भी जीत thi...........aab तो उसे भी इंतज़ार था इन 24 घंटों ka..........aur उसे पूरा यकीन था की इस बार रघु ज़रूर कुछ ऐसा करेगा जो सबसे हटके hoga..........uska कोई भी सूराख ऐसा नहीं होगा जहाँ पर रघु अपना लुंड नहीं pelega.......aur तो और रघु का सबसे पसंदीदा सूराख उसकी गांड की छोटी सी छेद thi........jisey वो पेल पेलकर उस छोटे से सुराख को बड़ा करना चाहता tha.........aur कहीं न कहीं काव्य को भी ऐसी hi चुदाई पसंद भी thi.........ye सोच सोचकर उसकी छूट में भी गीलापन अब बढ़ता जा रहा tha........magar कहीं न कहीं वो राम को लेकर थोड़ी चिंतित भी thi......pata नहीं वो राम के सामने क्या रघु के साथ वो सब कुछ कर payegi.........jo रघु उससे करवाना चाहता hain.........na जाने इस तरह के हज़ारों सवाल अब काव्य के दिल और दिमाग में चल रहे थे जिसका जवाब अब उसे बहुत जल्द मिलने वाला था...........

" अब जैसे शर्त के मुताबिक अब से आप हम सबकी घुलम hain..........to जिसकी जो इच्छा करे वो आपके साथ जो चाहे कुछ भी कर सकता hain.............magar मैं आपको बता दूँ की हम सब इतने भी निर्दयी नहीं हैं जो हम आपको तकलीफ dengey.........ya ज़ोर ज़बरदस्ती karnegey.........kyon की जो मज़ा प्यार में हैं वो ज़बरदस्ती में kahan............aap निश्चिंत rahiye........isliye अब मैं चाहता हूँ की आप भी इस खेल में हम सबका पूरा पूरा साथ dein.......main विश्वास दिलाता हूँ की आपको भी हमारे साथ इस खेल में पूरा पूरा मज़ा aayega............magar.............." और इतना कहकर रघु अपनी बात अधूरी छोड़ देता हैं वहीँ उन दोनों के साथ साथ काव्य भी हैरत से रघु के तरफ एक तुक देखने लगती हैं.......

" मगर क्या रघु........." अब काव्य काफी रहत महसूस कर रही thi...........kyon की वो राम के सामने ज़लील होने से बस दुर्र रही थी और रघु ने अब ये बात साफ़ कर दी थी...........

" magar..........is खेल में मेरी तीन शर्तें हैं जो आपको माननी hi padegi.........meri पहली शर्त ........ घडी में ठीक 11 बजाते hi आपके जिस्म पर कपड़े का एक टुकड़ा भी नहीं होना chahiye..........aur अभी 11 बजने में आधा घंटा बाकि hain.......in 24 घंटों में आप इसी तरह सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी हालत में rahengi.......jahan जाना हैं.... जो काम करना हैं सब ऐसे hi करना padega.........aur सबसे बड़ी बात....... हम सबके बीच शर्म की कोई दीवार अब नहीं rahegi.........jiski जो इच्छा हुई वो आपको तुरंत करनी hogi......chahe उसकी इच्छा जो ho.......aur अगर किसी भी तरह का झिझक और शर्म हमारे बीच अगर आया तो ये आपके लिए ठीक नहीं होगा.........." बोलो मंज़ूर हैं मेरी पहली shart.........aur हाँ इंकार का मतलब फिर से 24 ghanta.........is लिए किसी भी बात को मन करने से पहले सौ बार ज़रूर सोच lena............aur जब तक हम तीनों लोग आपसे पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाते ये 24 घंटे आगे के लिए भी बढ़ सकते hain.......is लिए इस बीच सबको खुस करना भी ज़रूरी हैं........." और रघु इस बार अपने बात पर ज़ोर देते हुए अपनी बात ख़तम करता हैं वहीँ काव्य कुछ देर तक सोचती रहती हैं फिर वो धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती hain.........wo बहुत ाचे से जानती थी की रघु कुछ ऐसा hi शर्त उसके सामने रखने वाला हैं.......

" और दूसरी शर्त क्या हैं..........." काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ उसका दिल अब ज़ोरों से धड़क रहा tha.........wahin रघु इस बार उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.........

" मेरी दूसरी शर्त ये हैं की मेरे छोटे मालिक की जो कुछ भी इच्छा हैं वो आपको पूरी करनी padegi..........kahin ऐसा न हो की आपकी वजह से इन्हें नाराज़ होना pade......aur कोई भी काम करने से पहले हमसे पूछ के hi जाना padega.......chahe वो काम कुछ भी क्यों न ho........aur अगर गलती हुई तो 24 घंटे .........याद हैं na...........kyon ठीक कहा न छोटे मालिक.........." और रघु इस बार अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ धीरे से हंस पड़ता हैं वहीँ राम भी ख़ुशी से झूम उठता hain.............wahin काव्य भी थोड़ा सा सुकून महसूस करती hain......sach तो ये था की उसे ये दोनों शर्त पसंद आ गया tha...........magar रघु कहाँ उसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला tha........jo जाल उसने काव्य के लिए बना था उसमें काव्य आगे चलकर बुरी तरह से फंसे वाली thi.........shayad इस लिए काव्य को ये दोनों शर्तें कोई ख़ास नहीं लग रही थी...........

मगर शायद काव्य ये भूल रही थी की अब जो कुछ भी करना हैं सब कुछ रघु और जीतू के हाथ में hain.......ram तो बस उनका सिर्फ एक मोहरा hain.......aur वो दोनों बहुत ाचे से जानते थे की अपने मोहरे को कब और ...........कैसे इस्तेमाल करना hain.........aur कब तक काव्य को अपने जाल में फंसाये रखना हैं.........

" और तीसरी shart...........kya हैं............." और काव्य लुम्बी सांस छोड़ते हुए धीरे से बोल पड़ती hain..........wahin रघु कुछ देर तक चुप रहता हैं फिर वो काव्य के तरफ देखकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" ऐसी भी क्या जड़ली हैं मेरी jaan.............aabhi तो आप बस मेरी ये दो शर्तें hi पूरी कर दीजिये .........एहि मेरे लिए बस बहुत hain..........kahin ऐसा न हो की आपको मेरी ये दो शर्तें पूरी करने में hi आपकी बुर और गांड पूरी तरह से फुट jaye.........aur आप तो एक बात ाचे से जानती हैं की मुझे औरत के बुर और गांड से पानी निकलवाने में कितना मज़ा आता hain........aur हाँ एक बात तो मैं आपको बताना भूल hi gaya............jo कुछ हम कहेंगे उसमें आप किसी तरह से किसी से कोई सवाल जवाब नहीं karengi.........ye आपके लिए hi ाचा नहीं नहीं to..........aap मेरे गुस्से को जानती हैं...........

रघु ने तो जैसे इतने सरे कंडीशंस hi रख दिए they......aab बचा hi क्या था जो काव्य न manti............aab उसे धीरे धीरे समझ में आ गया था की अब रघु इन 24 घंटों में उसके साथ क्या कुछ करने वाला hain..........aab उसे सिवाए चुप चाप से अपने तीनों मालिक की बात माननी thi........sirf उनकी घुलम banke.........chahe वे लोग उसका जैसा चाहे वैसा इस्तेमाल kare......wo अब इन 24 घंटों में उन तीनों के लिए बस एक खिलौना thi........bus खेलने की cheez.........chahe जैसा khele.........magar जो कुछ भी था रघु बहुत शातिर खिलाडी tha...........wo जैसे तैसे अब काव्य को अपनी गिरफ्त में पूरी तरह से ले चूका tha..........aur खुद राम के सामने उसके साथ अब नंगापन का खेल खेलने जा रहा था जिस खेल में अब राम भी उसका बराबर का भागिदार बनाने वाला था.........

सबकी नज़रें अब घडी के कांटे की तरफ thi.....aabhi बस 15 मिनट hi बचे they......us खेल को खेलने के liye..........magar जो कुछ भी था काव्य को भी कहीं न कहीं इस खेल में बड़ी hi रूचि thi.......aur सच कहा जाये तो वो भी अब आने वाले उस पल का बेसब्री से इंतज़ार कर रही thi.........jeetu राम के कंधे पर अपने हाथ रखता हैं और उसे काव्य से दूर ले जाता हैं और करीब 05 मिनट तक उसको न जाने क्या क्या समझाता hain.....jab थोड़ी देर बाद वो दोनों वापस लौटते हैं तब राम के चेहरे पर खुशियां साफ़ चालक पड़ती hain..........yani अब वो भी इस खेल में बराबर का हिस्सेदार बन गया tha...........ya फिर राम की सोच भी अब उन जैसे hi हो रही थी.............

" आपके ख्याल से छोटे मालिक खेल कहाँ से शुरू करनी चाहिए............." और इस बार रघु राम की तरफ देखता हुआ बड़े hi गंदे अंदाज़ में काव्य की तरफ देखकर मुस्कुराने लगता hain.........wahin काव्य कभी राम के तरफ देख रही thi.........to कभी रघु और जीतू के तरफ.........

राम वहीँ कमरे में रखा अश्लील किताब धीरे से अपने हाथों में उठता हैं और उसे काव्य के तरफ धीरे से बढ़ा देता hain........wahin काव्य कभी usey.......to कभी उस किताब को एक तुक देख रही thi...........wahin राम अगले hi पल धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" इसमें जितनी भी तसवीरें हैं जो इस किताब में.... bhabhi........wo साडी की साडी मेरी फंतासी hain........aur मैं अपनी एक एक हर फंतासी को पूरी करना चाहता hoon.........aur वो सब कुछ चाहता हूँ जो कुछ इसमें hain..........is लिए गौर से देख लीजिये जो कुछ भी इनमें आपको नज़र आ रहा हैं........." और राम इतना कहकर चुप हो जाता हैं वहीँ काव्य धीरे धीरे करके एक एक पन्ने को पलटना शुरू करती हैं और जैसे जैसे पन्ने बदलते हैं उसके चेहरे पर परेशानी के बदल धीरे धीरे और भी गहराने लगते hain..........kyon की उस पन्ने में कुछ ऐसी भी तसवीरें थी जो काव्य को परेशां कर रही thi...........jisey देखकर उसकी बुर में गीलापन तो बढ़ने लगा था मगर साथ hi साथ दुर्र भी थोड़ा गहराता जा रहा था.........

" अब से ये 24 घंटे ये तुम्हारी भाभी नहीं सिर्फ घुलम hain...........gaur से देख लो इन सरे तस्वीरों ko..........tumhein वो सब कुछ करना हैं जो हमारे छोटे मालिक तुमसे चाहते hain............aur haan............hum इतने निर्दयी नहीं हैं की हम तुम्हें ऐसे नंगा करके यु hi तुम्हारे साथ ये खेल khelengey...........maza तो तब आएगा जब हम खेल शुरू से khelengey.......yani तुम्हें पूरे कपड़े पहनने के बाद .......और फिर हम सब बरी बरी से तुम्हें नंगा karenge...........is लिए जाओ जल्दी से जाकर कपड़े पहन lo..........aur हाँ ये कपड़े नहीं पेहेन्ने हैं जो आपने अभी पहना tha...........upar सफ़ेद रंग की सूट ..........और नीचे लाल रंग की टाइट तुम्हारी laggy..........jo तुम्हारे बदन से पूरी तरह चिपकी हुई ho........aur हाँ चुनरी नहीं होना चाहिए तुम्हारे बदन pe......aab जाओ जल्दी से तैयार होकर aawo.........aab समाय बहुत कम हैं........" और रघु जैसे काव्य को आदेश देता हैं और काव्य अपने सरे कपड़े समेटती हुई फ़ौरन अपने बुगलो में भाग जाती hain..........peechay खड़े सभी लोग बस मुस्कुराते रहते हैं.....

" आपने भाभी को कपड़े फिर से क्यों पहनने diya..........usey तो हम सब उतरने वाले थे न........." और राम भोलेपन से दुबारा बोल पड़ता हैं वहीँ जीतू मुस्कुराते हुए धीरे से हंस पड़ता हैं........

" तुम बस देखते जाओ छोटे malik......jaisa हम कहे वैसा hi karna..........jo हम बोले वहीँ bolna.........aur किसी भी चीज़ में ज़रा भी जल्दीबाज़ी मुट्ठ karna........warna सारा मज़ा बेकार हो jayega.........fir देखना हम तुम्हारी भाभी के साथ कैसे चुदाई का खेल खेलते hain......aur मेरा यकीन मनो की तुम्हें भी इस खेल में मज़ा बहुत आएगा........." और इस बार तीनों फिर से हंस पड़ते hain........tabhi तीनों अंदर अपने अपने कपड़े पहनकर बंगलो में जाते हैं और तीनों की नज़र सामने राखी घडी पर जाती हैं जो इस वक़्त 11 बजने का एलान कर रहे they..........tabhi उन्हें सीढ़ियों से ऊपर की तरफ काव्य सूट में उतरती हुई दिखाई देती hain........jaisa वो तीनों उसे देखना चाहते they........bilkul उसी अंदाज़ में.........

" अब हमारा टाइम शुरू हो gaya..........aur खेल bhi.........to चालो खेल शुरू करते हैं............" और रघु जैसे खेल का एलान करता hain........wahin उन दोनों के चेहरे पर खुशियां साफ़ झलक पड़ती हैं.........

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काव्य अब उन तीनों के बीच में कड़ी thi...........kisi गुनेहगार की tarah.......raghu जीतू की तरफ देखता हैं और उसकी तरफ देखते हुए कमीनी मुस्कान में धीरे से हंस पड़ता हैं.......

कंटिन्यू.............................................................
 
अपडेट- 50(बी) (मेघा अपडेट)

" जाओ जीतू और जाकर किचन में से एक 1.5 लीटर पानी की बोतल लेकर aawo.......aur हाँ ये याद रहे....... उस पानी में ये दवा ज़रूर मिला dena........saath में शाकर (शुगर ) और नीम्बू का रूस bhi........aur हाँ पानी 1.5 लीटर से कम बिलकुल भी नहीं होना chahiye......jawo और जल्दी से लेकर आवो.........." और रघु अपने शर्ट में से एक कागज़ की पुड़िया निकलता हैं और जीतू को थमते हुए उसे दे देता hain........wahin राम बड़े गौर से उन दोनों को एक तुक देख रहा था........

" इस पुड़िया में क्या हैं ..........." और राम धीरे से रघु की तरफ देखता हुआ बोल पड़ता hain.....wahin रघु अपने चेहरे पर एक गन्दी सी स्माइल लेट हुए काव्य की तरफ देखता हुआ हंसने लगता हैं.........

" आप जानना चाहते हैं उस पुड़िया में ऐसा क्या hain...........to मैं आपको बता देता hain.........jaise किसी औरत की चुदाई जब शुरू की जाती हैं तब लुंड खड़ा होना बहुत ज़रूरी होता हैं ठीक वैसे hi औरत की बुर भी चुदाई के वक़्त पूरी तरह से गीली होनी चाहिए.......... चुदाई के इस खेल में मज़ा दोनों को बराबर आणि chahiye......is लिए ये एक ख़ास किसम का पाउडर हैं और इस पाउडर में वियाग्रा की दवा भी मिली हुई hain.........usey पीने के बाद तुम्हारी भाभी की बुर में एक तेज़्ज़ लहर पैदा होगी जिससे बाद उसकी बुर में केवल लुंड लेने की खुजली होनी शुरू हो jayegi........wo इच्छा इतनी तेज़्ज़ होगी की अगर तुम्हारी भाभी की बुर को ाचे से न ठंडा किया गया तो वो अपनी बुर छुड़वाने के लिए कुछ भी कर jayegi.........kisi भी हुड्ड तक गुज़र jayegi............aur मैं तुम्हें आज तुम्हारी भाभी की हुड्ड देखना चाहता hoon............ki वो आखिर किस हुड्ड तक जा सकती हैं..........

" इसे पीने के बाद ये अपने दिमाग से नहीं बल्कि अपनी बुर से सिर्फ sochegi...........aur जब कोई भी औरत अपनी बुर से जब सोचहने लगती हैं तो वो कुछ भी कर जाती hain............kisi भी हुड्ड तक गिर सकती hain........aur वैसे भी ये दवा का असर बड़ा लुम्बा होता hain........isey पीने के बाद कम से कम इसे 12 घंटों तक ये ऐसे hi मदहोश rahegi.........aur फिर देखना इस खेल में कितना ज़्यादा मज़ा आएगा......." और रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ धीरे से हंस पड़ता हैं वहीँ राम भी मुस्कुराने लगता hain.........kavya भी अब ाचे से जान चुकी थी की आगे आने वाला वक़्त उसके लिए बहुत मुस्खिल होने वाला hain..........aur अब जो कुछ भी उसे करना था सब कुछ सैयाम के साथ करना tha........magar अब सवाल ये था की वे तीनों उसके सैयाम में रहने भी देंगे या नहीं............

तभी जीतू एक बड़ा सा बोतल में पानी ले आता हैं और उसे काव्य की तरफ धीरे से बढ़ा देता hain......kavya बिना किसी सवाल जवाब के उसे अपने होंठों से लगा लेती हैं और उसके हर एक घूँट को अपने अंदर उतरने लगती हैं......

" ये याद रहे की इस बोतल में का सारा पानी ज़रा सी भी बचनी नहीं chahiye...........agar बच गयी तो तेरी हम दूसरी जगह से ये पानी तेरे अंदर डालेंगे........." और इस बार रघु काव्य को जैसे हुकुम देता हैं और अब उसकी लैंग्वेज भी बदल जाती hain..........wahin राम असमाजहश से रघु के तरफ देखने लगता हैं......

" मगर इतना सारा पानी पीने से क्या होगा......." जो सवाल काव्य को करना चाहिए था वो सवाल अब राम रघु से कर रहा tha.....wahin कुछ दूर पर खड़ा जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर ज़ोरों से हंस पड़ता हैं.........

"तुम भी na.....chote malik........aacha मज़ाक कर लेते ho.......arey तुम्हारी भाही अगर ये सारा पानी पीयेगी तभी तो इससे जमकर मूट aayegi........aur अभी तो आप कह रहे थे की उन तस्वीरों में जितनी भी फोटो हैं वो सब के सब आपका एक सपना hain.......to क्या आप नहीं चाहते की आपका सारा सपना एक एक कर सच ho............hum तो तुम्हारी भाभी से और भी बहुत कुछ करवाना चाहते हैं जिसे देखने के बाद तुम्हारी आँखें फटी की फटी रह jayengi............tum कभी सपने में भी नहीं सोच सकते की ये तुम्हारी भाभी हैं ya............koi बाज़ारू रांड............" और जीतू ठहाका मरकर ज़ोरों से हंसी लगता हैं वहीँ काव्य बस उस पानी को जैसे तैसे ख़तम कर रही थी.........

1/3 पानी बच गया था जो अब उसे पिया नहीं जा रहा tha........magar जैसे तैसे वो एक एक कर होंठ अपने हलक के नीचे उतरती जा रही thi.......uska स्वाद कुछ नमकीन और मीठा सा tha........peenay में काव्य को कुछ अजीब ज़रूर लग रहा था मगर जैसा भी था उसका स्वाद ठीक tha........kavya इतना तो अब समझ चुकी थी की आज के बाद उसकी शर्म लाज सब कुछ हमेशा हमेशा के लिए ख़तम होने वाली hain...........magar अब उसके हाथ में कुछ भी नहीं tha........jaise तैसे काव्य उस बोतल के सरे पानी को ख़तम करती हैं और रहत भरी सांस लेती hain.........fir वो राम के पास जाती हैं और एक तुक उसकी आँखों में देखने लगती hain......wahin राम भी उसे बस निहारता रहता हैं.......

" ram............main तुमसे एक वादा करना चाहती hoon.......jo कुछ भी आज यहाँ होगा वो तुम कभी भी अपने भैया से कुछ नहीं kahogey...........na कभी किसी बात की ज़िकर karogey......na मेरे बीच रघु और जीतू के इन रिश्तों ki.......tum समझ रहे हो न मैं क्या कहना चाहती hoon.........fir मैं तुमसे वादा करती हूँ की मैं तुम्हारे ख़ुशी के लिए आज वो सब कुछ करुँगी जो तुम कभी सपने में भी नहीं सोचे होंगे......." और राम भी धीरे से हाँ में मुस्कुरा पड़ता हैं वहीँ काव्य रहत भरी सांस लेती hain............aab वो पूरी तरह से खुलकर राम के सामने वो सब कुछ कर सकती थी जो जीतू और रघु उससे करवाना चाहते थे.............

तभी जीतू सामने के सोफे पर जाकर बैठ जाता हैं और रघु सामने की तरफ रखे सिंगल सोफे par......fir जीतू राम को भी अपने पास बैठने का इशारा करते hain..........magar काव्य उन तीनों के बीच बस अकेली कड़ी रहती हैं...........

" इधर आ मेरी raand.........aur आकर मेरे गॉड में बैठ jaa...........aur हाँ ..........ये याद रहे की मेरा लुंड तेरी गांड या बुर को बिलकुल भी चूना नहीं chahiye..........kum से कम उनके बीच 1/2 फुट का फासला ज़रूर होना chahiye.........tere ये दो टांग सोफे के दोनों पाए पर hi होने chahiye..........aur तेरी पीठ और चेहरे का हिस्सा मेरे सीने और मेरे चेहरे से बिलकुल सटे होना chahiye..........aur haan........tere ये दोनों हाथ मेरे सर के पीछे hongey........aur तब तक रहेंगे जब तक मैं उसे आगे लेन को न kahun.........taki जब मेरा मुन्न करे मैं तेरे इन दोनों चूचियों पर अपने हाथ फेर sakun.......unhein ाचे से मसल sakun..........ya मेरा जब मुन्न करे मैं तेरे टांगों के बीच अपना हाथ डालकर तेरे बुर और गांड के साथ जी भरकर खेल सकूँ..........

और haan..........ye याद rahe...........is बीच चाहे जो हो jaye..............tera बैलेंस बिलकुल भी नहीं बिगड़ना chahiye............jab मैं तेरी बुर या गांड में अगर ऊँगली कर रहा हो to...........aur अगर तेरा बैलेंस बिगाड़ा या तू मेरे ऊपर गिरी तो याद रखना तेरे बुर और गांड का भोंसड़ा बनाने में ज़्यादा देर नहीं lagega........aab मेरा मुँह क्या देख रही हैं चल आ मेरे पास..............." और रघु जैसे पूरी तरह से सीरियस हो जाता हैं वहीँ सामने बैठे वो दोनों रघु और काव्य को बस देखने लगते hain............dheere धीरे अब उनके अंदर भी एक्ससिटेमेंट जगती जा रही थी..........

काव्य अगले hi पल रघु के पास आती हैं और पीछे मुड़कर अपने शरीर का बैलेंस बनती हुई पहले एक टांग सोफे पर रखती hain.........fir अपना दूसरा टांग दूसरे सोफे पर रख देती hain............fir वो अपना पीठ पीछे की तरफ ले जाती हुई रघु के सीने पर टिका देती हैं और अपना चेहरा रघु के चेहरे के एकदम पास कर लेती hain.........fir जब वो पूरी तरह से बैलेंस हो जाती हैं वो अपने दोनों हाथों को सरकते हुए रघु के सर के पीछे की तरफ कर देती hain...........aab इस पोजीशन में काव्य के बड़े बड़े गांड हवा में झूल रहे थे वहीँ उसकी दोनों चूचियां भी खुलकर अब और उजागर होती हुई सी नज़र आ रही थी............

रघु धीरे से अपने दोनों हाथों को आगे की तरफ ले जाता हैं और काव्य की सूट जो उसकी गांड और बुर के तरफ हवा में लटक रही थी वो उसे ऊपर की तरफ करके मोड़ने लगता हैं और उसे काव्य के पेट पर और पीठ पर ाचे से बांध देता hain...........aab काव्य की टाइट लग्गी साफ़ सामने बैठे उन दोनों को नज़र आ रही थी.............

" ये क्या hain..................."aur इस बार रघु अपने कठोर हाथों को काव्य के दोनों उभारों पर रख देता हैं और उसके दोनों नरम चूचियों को ब्राम्ही से मसलना शुरू करता hain..........aisa लग रहा था जैसे वो आता गूंथ रहा ho..........wahin काव्य इस बार ज़ोरों से सिसक पड़ती hain............kuch दर्द से .................तो कुछ लजात से...........

" बताती क्यों नहीं की मेरे ये दोनों हाथ इस वक़्त कहाँ पर hain..........aur क्या कर रहे हैं..........." और इस बार रघु और ज़ोर से काव्य के दोनों चूचियों को मसलने लगता hain......uske दोनों निप्पल्स को अपने उँगलियों के बीच दबाता हुआ.......... ज़ोरों से खींचने हुए उससे पूछने लगता हैं वहीँ काव्य लाजत के साथ धीरे से बोल पड़ती हैं......

"aaaaaasssssssssshhhhhhmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm....mere दूध पर..........." और काव्य हौले से सिसक पड़ती हैं.......

" तेरे दूध par.........to bata...........mere मसलने के बावजूद भी इनमें से दूध क्यों नहीं बहार निकल raha.............iska मतलब साली तू झूठ बोलती हैं..............." और रघु उसी अंदाज़ में काव्य के दोनों चूचियों को मसलता हुआ उसके कान को छत्ते हुए बोल पड़ता hain........wahin काव्य फिर से सिसक पड़ती हैं.......

" aaaaaaaaaaaaasssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh..............inmein अभी दूध नहीं hain............"aur काव्य फिर से बोल पड़ती hain........aab उसकी आँखें भी सूर्ख लाल होती जा रही thi.......hawas के लाल डोरे अब उसकी आँखों में भी साफ़ तैरते नज़र आ रहे थे...........

" दूध नहीं hain..........to कब आएंगे इनमें doodh...........bata तो सही.............." और रघु फिर से बोल पड़ता हैं मगर वो अपने हाथों को ज़रा भी ढीला नहीं छोड़ता.........

" तुम जानते तो हो .......फिर ये सब मुझसे क्यों पूछ रहे ho............aaaaaaaaaaasssssssssssssssshhhhhhhhhhhhh............" और काव्य जैसे तड़प उठती हैं वहीँ रघु इस बार काव्य के कान को अपने मुँह में भर लेता हैं और थोड़ी ज़ोर से उसके कान को काट लेता hain.......wahin काव्य दर्द से सिसक पड़ती हैं........

" तुझे कहा था न की सवाल जवाब nahin...........aur हम तेरे मालिक हैं ..........इस लिए तुम nahin.............aap....kehna seekh.......aur जितना तुझसे पुछा जाये बस उतना hi जवाब de.......samjhi नहीं तो अबकी बार मैं तेरा कुछ और काट लूंगा.............." और जैसे रघु काव्य को वारं करता हैं वहीँ काव्य धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती हैं............

" aaaaaaaaaaassssssssssssssssssshhhhhhhhhhh.............jab मेरा बाचा hoga............tab इनमें दूध आएंगे............." और काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं.......

" और तेरा बाचा कहाँ से hoga.............bata तो sahi............."aur रघु जैसे अनारी बनते हुए फिर से बोल पड़ता hain.........aab वो काव्य को सवालों से पल पल नंगा करता जा रहा था.........

" मेरे वहां se............neechay............." और काव्य फिर से हौले से बोल पड़ती hain...........wahin रघु इस बार अपने हाथों की गिरफ्फत काव्य की चूचियों पर से थोड़ी सी ढीली करता हैं और अपना एक हाथ काव्य की चूचियों से हटते हुए नीचे की तरफ ले जाने लगता hain..........uske गांड par..........fir वो अपने हाथों को धीरे धीरे से काव्य के गोल गोल गांड पर फेरने लगता hain.........masalney लगता hain........fir वो अपना हाथ उसके गांड के दरारों के बीच हौले से रख देता hain........wahin काव्य इस बार बुरी तरह से मचल उठती हैं........

" क्या यहाँ se............aur इस बार वो अपना एक हाथ काव्य के गांड के सूराख पर रख देता हैं और धीरे धीरे से अपनी ऊँगली उसपर फिर से फेरने लगता hain........wahin काव्य की सांसें फिर से ज़ोरों से चलने लगती हैं......

" aaaaaaaaaaaaaaaassssssssssssssssssss..............nahin .......थोड़ा सा और आगे की तरफ..............." और काव्य बस इतना hi बोल पति hain................magar रघु तो जैसे अब कुछ जनता hi नहीं था..........

" यहाँ तो मुझे कहीं कुछ नज़र नहीं आ raha............sali साफ़ साफ़ बताएगी की तेरा बाचा कहाँ से niklega.......kya उसका कोई नाम नहीं हैं क्या................" और रघु इस बार काव्य पर थोड़ा चिल्लाते हुए बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य भी थोड़ी सेहम सी जाती हैं..........................

" meeerreee...........bur se............aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhh............apna ये हाथ थोड़ा सा आगे की तरफ लेकर jaiye.............wahan पर हैं मेरा बुर.............." और काव्य जैसे रघु को समझते हुए फिर से बोल पड़ती hain......magar सच तो ये था की काव्य की बुर अब गीली होनी शुरू हो गयी thi........aur अब ये सिलसला शायद थमने वाला भी नहीं था..........

" तो इस वक़्त मेरा हाथ कहाँ पर hain..........kya वो तेरा बुर नहीं hain..........mujhe तो यहाँ कोई सुरंग सा नज़र आ रहा हैं..........." और रघु अपने हाथों को आहिस्ता से फेरता हुआ जैसे मुवैना करता हुआ बोल पड़ता hain........wahin काव्य कसमसा जाती हैं.......

" aaaaaaaaaaaassssssssssssssshhhhhhhhhh........wo मेरी गांड हैं.........." और काव्य सिसकते हुए फिर से बोल पड़ती hain......wahin रघु इस बार अपने हाथों को थोड़ा सा आगे की तरफ ले जाता हैं और इस बार उसके बुर पर धीरे धीरे से अपनी उंगलयों को फेरने लगता हैं..........

" क्या ये हैं तेरी बुर............." और रघु इस बार काव्य के बुर पर अपने हाथ धीरे से फेरते हुए बोल पड़ता hain....wahin काव्य की आहें और भी तेज़्ज़ हो जाती हैं...........

" aaaaaaaaaaaaaassssssssssssshhhhhh.........haan.........."

" ाचा तो तेरा बाचा यहाँ से niklega...........aur कुछ तो नहीं निकलता होगा न इसमें से ..........." और रघु अपने हाथों को धीरे धीरे फेरता हुआ फिर से बोल पड़ता hain........wahin सामने बैठे राम और जीतू की अब हालत ख़राब होने लगती hain......ram का तो लुंड ऐसा लग रहा था जैसे अभी पानी निकल jayega..........magar आज तो जैसे उसके साबरा की भी इम्तिहान थी...........

टिल कॉन्टिनोएड.....................................................................
 
अपडेट-51 (ा) (मेघा अपडेट)

" ाचा तो तेरा बाचा यहाँ से niklega...........aur कुछ तो नहीं निकलता होगा न इसमें से ..........." और रघु अपने हाथों को धीरे धीरे फेरता हुआ फिर से बोल पड़ता hain........wahin सामने बैठे राम और जीतू की अब हालत ख़राब होने लगती hain......ram का तो लुंड ऐसा लग रहा था जैसे अभी पानी निकल jayega..........magar आज तो जैसे उसके साबरा की भी इम्तिहान थी...........

अब आगे...........................................................................

काव्य के लिए आने वाला समय और भी मुस्खिल होता जा रहा tha.........ek तो रघु उसके बदन के गुप्तांगों के साथ लगातार छेद चाँद कर रहा tha..........upar से अब वो दवाई भी धीरे धीरे अपना असर दिखने लगी thi........dheere धीरे उसके दिमाग पर से उसका कण्ट्रोल अब हटने लगा था........

" nahin........aur कुछ नहीं निकलेगा............." और काव्य जैसे तैसे बोल पड़ती हैं ...............मगर रघु तो खेल अभी शुरू hi किया tha..............aur ये खेल आगे जाकर बहुत लुम्बा जो होने वाला tha.........udher काव्य की प्रेशर भी अब धीरे धीरे बढ़ने लगी thi..........itna सारा पानी पीने के बाद अब उसे बहुत जमकर मूट लग रही thi.........aur शायद रघु ऐसे hi कुछ सुनहरे मौके की तलाश में tha........jo अब उसे बहुत जल्द मिलने वाला था............

" aaaaaasssssssssssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhh...........please...............ruk jawo...........aab और nahin.........mujhe ज़रा बाथरूम जाना hain............main अभी फ्रेश होकर लौट आती हूँ.........." और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती hain...........wahin रघु उसकी बाटिओं को सुनकर हंस पड़ता हैं..........

" ये तेरी पहली गलती हैं इस लिए मैं तुझे माफ़ कर रहा hoon.........aagey से नहीं karunga.........aur रही बात तेरे बाथरूम जाने की तो वो तो मैं तुझे हरगिज़ जाने नहीं देने wala...............aur ये तू क्या बाथरूम लगा राखी hain...........jo कुछ बोलना हैं साफ़ साफ़ bol..........main तेरे जितना पढ़ा लिखा नहीं hoon............mujhe अंग्रेजी ज़्यादा समझ में नहीं aati..........is लिए आगे से मुझसे मेरे भाषा में hi बात करना..........." और रघु इस बार जैसे फिर से अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ काव्य धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती हैं..........

" मुझे ज़ोरों की पिसाब लगी hain.........to क्या मैं पिसाब करने जा सकती हूँ........." और काव्य की बातें पूरी होती तभी रघु कसकर उसकी गांड पर एक ज़ोर का थप्पड़ मरता हैं जिससे काव्य बड़े मुश्किल से अपने आपको संभल पति हैं..........

" तुझे एक बात समझ में नहीं आती क्या!!!!!!! कहा न साफ़ साफ़ bol...........pisab नहीं ........मूट बोल..........." और रघु फिर से काव्य को हिदायत देने लगता हैं वहीँ काव्य फिर से हाँ में अपनी गुर्दें धीरे से हिला देती hain.........aabki बार उसे रघु की बात पूरी तरह से समझ आ गयी थी.........

" mujhe..........zoron की मूट लगी hain........please जाने दो न..........." और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु इस बार उसकी बातें सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं..........

" अगर तुझे ज़ोरों की मूट लगी hi हैं तो तुझे कहीं और जाने की क्या zarurat.............tu यहीं पर सबके सामने मूट le............aur ये बता की अब तेरा मूट निकलेगी कहाँ से ............जबकि तूने अभी अभी मुझसे कहा की मेरे बुर से और कुछ नहीं nikalta.........sali झूठ बोलती hain...............aab तो तू यहीं पर सबके सामने mootegi...........yehi तेज़ी सजा hain...........aise hi.........." और रघु जैसे अपना फैसला सुनाता hain...........wahin काव्य बस ख़ामोशी से उसकी बात सुनती रहती hain.......wo पहले से hi जानती थी की रघु कुछ ऐसा उसके साथ करने वाला हैं.........

" मुझे माफ़ कर do...........main wo........samajh ........नहीं......." और काव्य की बात पूरी होती तभी रघु उसपर ज़ोरों से चिल्ला पड़ता हैं..........

" वो तेरी गलती thi...........aab अगर तू यहाँ न मूर्ति इन सब के सामने तो मैं बहुत ाचे से जनता हूँ की तेरी बुर से मूट कैसे निकलवाया जा सकता hain...........tujhe तो मैं ऐसे इन कपड़ों में hi mootwaunga..........wo भी इन सबके beech.........chal मूतति हैं की नहीं.............." और रघु जैसे अपनी बात ख़तम करता हैं वहीँ काव्य फिर से ना में अपनी गुर्दें धीरे से हिला देती हैं.........

"ठीक hain..............to तू अब ऐसे नहीं manegi.............aab तेरी मूट मैं यहाँ सबके सामने निकलवाके hi मानूंगा.............." और इस बार रघु अपना वही हाथ काव्य के पीछे की तरफ ले जाता हैं और काव्य के लग्गी के अंदर पीछे से डालना शुरू करता hain..........aur थोड़े देर बाद उसके हाथों में काव्य का नंगा बुर होता hain..........jisey वो अपने हाथों की गिरफ्त में लिए हुआ tha...........wahin काव्य की नंगी बुर इस तरह छूने से काव्य बुरी तरह से मचल उठती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती हैं.........

"अरे waah.............teri बुर तो अब पूरी तरह से गीली हो गयी hain..........aab मेरा काम और भी आसान हो jayega............aab तेरे बुर के अंदर मेरी ये ऊँगली बड़े आराम से अंदर बहार chalegi............main भी तो देखता हूँ की तू आज कैसे नहीं मूतति हैं.........." और रघु अपनी एक मोती ऊँगली काव्य की बुर में पूरा घुसड़ देता हैं और उसकी बुर को धीरे धीरे रगड़ना शुरू करता hain........pehle बहुत धीरे dheere........fir ज़ोर ज़ोर se.........jaise जैसे रघु की उँगलियाँ रफ़्तार पकड़ रही थी वैसे वैसे काव्य की आहें भी तेज़्ज़ होती जा रही thi........wo बड़े मुस्खिलों से अपने मूट को रोके हुई thi...........dheere धीरे उसका प्रेशर अब बढ़ता hi जा रहा tha..........magar न hi रघु एक पल के लिए रुकता hain...............aur न hi उसका haath...........aur अब काव्य को ऐसा लगने लगा था की अब अगर रघु के उँगलियों की रफ़्तार कम न हुई तो यकीनन आज उसकी मूट इन सब के सामने निकल जाएगी.......

" तू तो अब यहाँ म्यूटेगी hi............magar एक बात याद rakhna..........agar तेरी मूट से अगर मेरी लुंगी या अंडरवियर ख़राब हुई तो इस बार तो तेरे बुर में सिर्फ ऊँगली दाल रहा hoon........agli बार तेरी गांड में पूरा लुंड डालके तेरी मूट इन सबके सामने यहीं निकलवाऊंगा..........." और रघु काव्य की बुर को लग्गी के अंदर से hi रगड़ते हुए बोलता hain.......wahin इस वक़्त कमरे में काव्य के बुर से निकलती एक फ्फ्फफ्फ़आआस्क्सक्कछहहहहहह... fffaaaaccccccccchhhhhhhhhhhhhh.....ki आवाज़ और उसकी आहें aaaaaaaaaaaaaaaassssshhhhhhhhhhh.....hhhhhhhhhhhhhmmmmmmm......... लगातार गूँज रही थी जो उस माहोल को और भी मदहोश करती जा रही thi...........ye तो काव्य का सैयाम hi था जो अब तक वो अपने आपको संभाले हुई thi........magar वो रघु के आगे कब तक टिक pati...........upar से रघु की उँगलियों उसकी बुर में इतनी तेज़्ज़ चल रही थी जिससे काव्य का जिस्म बुरी तरह हिल रहा था जिससे उसे अपना शरीर बैलेंस करने में बड़ी दिक्कत भी हो रही थी........

और आखिर वही हुआ जिसका काव्य को दुर्र tha.............uske साबरा का बाँध अब पूरी तरह से टूट गया tha..........ek तेज़्ज़ प्रेशर के साथ उसकी मूट निकल पड़ती हैं और उसके कपड़ों को चीरती हुई सामने बैठे जीतू और राम के क़दमों के पास एक मोती सी धार फ़ैल जाती hain...........aur कुछ मूट उसकी लागय को पूरी तरह से भिगोता हुआ नीचे की तरफ टपकने लगता hain.............ye धार इतनी तेज़्ज़ थी की काव्य की लग्गी और बुर के आस पास का वो हिस्सा पूरी तरह से भीग गया था और अब नीचे रघु के लुंगी पर टपकने लगा tha..........jo अब उसके लुंगी और अंडरवियर को बुरी तरह से भिगोता जा रही thi..............ya यु कहा जाये की रघु का अंडरवियर काफी हुड्ड तक भीग गया था...........

उधर काव्य के कदम भी डगमगा पड़े थे .........इस तरह मूट निकलने से उसके दोनों पवन बुरी तरह से काँप रहे थे जिससे वो अपना बैलेंस नहीं बना पति और अपने पैरों को सिकोड़ती हुई रघु के लुंड पर धाम से बैठ जाती हैं और लुम्बी लुम्बी सांस लेने लगती hain..........wahin उसके दोनों हाथ अब उसके सर पर थे जिन्हें वो कसकर दबाये हुई thi..........aabhi भी उसका जिस्म काँप रहा tha.......mano अब उसे कोई होश न रह गया ho..........wahin ठीक सामने बैठे जीतू और राम दोनों अपनी आँख फाड़े काव्य के उस रूप को देख रहे they.........jinhein देखकर उन्हें अपनी आँखों पर ज़रा भी यकीन नहीं हो रहा था की .............काव्य जैसी पढ़ी लिखी .......ऊँचे घराने की ladki........is तरह से सबके beech.........yu एक गंदे ग़लीज़ नौकर के saath..........aisi गन्दी और घटिया काम कर रही thi............ek पल तो राम को भी यकीन नहीं हुआ की सामने जो औरत hain...........yehi उसकी भाभी hain...........uski apni.........magar अभी तो ये सिर्फ शुरुवात thi.........aabhi तो रघु उसके साथ बहुत कुछ करने वाला था..............

" रघु उसकी लग्गी के अंदर से अपने हाथ धीरे से बहार निकलता हैं और अपने उँगलियों को सामने बैठे राम और जीतू की तरफ चमकते हुए गंदे अंदाज़ में ज़ोरों से हंस पड़ता hain...........is वक़्त उसकी ऊँगली और हाथ पूरी तरह से भीगे हुए they........kuch मूट से ............तो कुछ काव्य की बुर के रूस se........wahin रघु अपना हाथ धीरे से अपने नाक के पास ले जाता हैं और उसकी खुसबू को अपने अंदर समेटने लगता hain.........aisa लग रहा था जैसे उसपर भी मदहोशी छायी हुई ho........wo अपने उँगलियों को बरी बरी से अपने मुँह के अंदर डालता हैं और काव्य के बुर का रूस आहिस्ता आहिस्ता से चटनी लगता hain........uske हाथ तब तक नहीं रुकते जब तक उसका हाथ पूरी तरह से साफ़ नहीं हो jata.........jeebh तो उसके ऐसे अपनी उँगलियों पर चल रहे थे मनो जैसे सेहद हो..........

कंटिन्यू..........................................................
 
Update-51(B) (मेघा अपडेट)

" की की chee..........ye क्या कर दिया tumne............tum तो कपड़ों में hi मूट di...............gandi ladki............agar मूतना hi था तो मुझसे कह तो deti.........kum से कम मैं तुम्हारे कपड़े तो नीचे सार्क दिया hota.............aab तुम hi batawo.......kya ऐसे तुम्हें इन कपड़ों में इस तरह से सबके सामने मूतना क्या शोभा देता hain............kya तुम में से किसी ने भी कभी सुना हैं की कोई जवान लड़की कपड़ों में इस तरह से मूट सकती hain............dekho तुमने मेरा और अपना सारा कपडा ख़राब कर दिया.........."

" मुझे तो लगता हैं की अब तुम्हें इलाज़ की सख्त ज़रुरत hain............aur तुम्हारा इलाज़ होना hi chahiye..........tum फ़िक्र मुट्ठ karo...........hum सब आज तुम्हारा और तुम्हारे इस बुर का ाचे से इलाज़ karengey............aur देखो तो मैंने तुम्हें कहा था न की कुछ भी हो जाये अपना बैलेंस बनाये रखना ..........मगर तुम तो वो भी नहीं कर saki..............aab तुम hi सब बताओ की इस गन्दी लड़की के साथ क्या सुलूख करना चाहिए.........." और रघु काव्य की पूरी तरह से बेइज़ाती करते हुए धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ जीतू जवाब में ठहाका लगते हुए हंस पड़ता hain...........wahin काव्य सर झुकाये बस बैठी रहती hain........aur अपने बेकाबू हुए सांसों को दुरुस्त करती हैं.......

" तुम hi दो इसे कोई saza...........khel तुम खेल रहे हो तो सजा हम कैसे दे............" और जीतू अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ धीरे से हंस पड़ता hain..........wahin राम भी उसका पूरा समर्थन करता hain.........sach तो ये था की उन्हें रघु का ये गन्दा खेल बहुत पसंद आ रहा था............

" ठीक hain.............jab इसने मूट hi दिया हैं तो इसे हम सब अब खुलकर mootwayengey..........magar अभी nahin.......aahista aahista.........jaldibazi में तो सारा खेल बिगड़ jayega..........aabhi हम इसके साथ और कुछ खेल खेलते hain..........aur इसको नंगा करने से पहले हम सब को भी तो नंगा होना पड़ेगा na..........to क्यों न एक और मज़ेदार खेल हो जाये..........

" ram............zara कमरे में जाकर इसका दुपाता तो लेते आना.........." और राम बिना कोई सवाल जवाब के फ़ौरन सामने के कमरे की तरफ चला जाता हैं और कुछ देर बाद उसके हाथ में एक लाल रंग का दुपट्टा tha........wo फ़ौरन रघु के हाथों में उसे थमा देता hain........fir रघु काव्य के करीब जाता हैं और धीरे से उसके कान के पास जाकर हौले से बोल पड़ता हैं........

" मैं जनता था की तेरे साथ ऐसा hi कुछ hoga............is लिए मैंने नीचे लाल रंग की लग्गी तुझे पहने को कही thi.......taki जब तू मोटे तो तेरी मूट इन कपड़ों में साफ़ साफ़ नज़र aaye.........khel तो अब शुरू हो गया हैं तू बस देखती जा आगे और भी बहुत मज़ा आने वाला हैं........." और रघु इस बार काव्य के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो जाता हैं और उसके दोनों हाथ पीछे की तरफ करने का इशारा करता hain........kavya बिना किसी सवाल जवाब के चुप चाप से अपने दोनों हाथ पीछे की तरफ कर देती hain.......aur रघु उसके दोनों हाथों को क्रॉस करते हुए उस दुपट्टे से काव्य के दोनों हाथों को कसकर बांधने लगता hain.........jab काव्य के हाथ ाचे से बंद जाते हैं वो काव्य को सबके बीच खड़ा कर देता हैं और फिर आगे बोलना शुरू करता हैं........

" तेरे पास अब 1/2 घंटे hain.........in 1/2 घंटे में तुझे बरी बरी से हम सबके कपड़े उतरने hain.........ye याद रहे की हर आदमी को तू बस 10 मिनट का hi समय degi........aur इन 10 मिनटों में तुझे हर एक को पूरा नंगा करना hain...........agar नहीं कर पायी तो तू आगे बढ़ जाएगी और फिर दूसरे का कपडा utaregi.............magar हाथ से नहीं .......सिर्फ अपने मुँह और डेंटन se.........aur haan.............is बीच जिसके तू कपड़े उतर रही होगी वो तेरे साथ जो चाहे वो कर सकता hain.........teri चूचियों को जी भरके मसल सकता hain........teri बुर और गांड में ऊँगली कर सकता hain......magar सिर्फ वही जिसके तू कपड़े उतर रही hogi.......magar कोई तेरे कपड़े को नहीं utarega.......bus तेरे बदन से khelega..........aur न hi कोई दूसरा तब तक तुझे हाथ भी नहीं लगाएगा.......

जहाँ जिसका दिल करेगा वो तेरे बदन पर हाथ ferega.......magar तुझे उनकी हरकतों पर ध्यान नहीं देना hain...........tujhe बस अपना काम करना hain..........aur अगर तू इन 1/2 घंटे में किसी को भी नंगा नहीं कर पायी तो इसके बाद जो दौर आएगा उसमें हम सब बरी बरी से तुझे नंगा karengey........uske बाद 24 घंटों तक तुझे कोई भी कपड़े पहने को नहीं milengey........to चल खेल शुरू करते hain........sabse पहले तू जीतू के कपड़े utaregi.......fir राम ka.........aur आखिर में मेरा.......

काव्य घडी की तरफ देखती हैं अभी 11:45 हो रहे they.........jeetu इस वक़्त एक फुल येलो रंग का शर्ट पहना हुआ था और नीचे ब्राउन रंग का पेण्ट.......... वो जल्दी से जीतू के पास जाती हैं और अपना मुँह खोलकर जीतू के शर्ट के एक एक बटन को अपने डेंटन के बीच फंसकर उसे खोलना शुरू करती हैं मगर दांतों से बटन खुलना इतना आसानी थोड़ी न होता hain...........jeetu सर से लेकर पवन तक काव्य को गन्दी नज़र से घूरने लगता हैं फिर वो उसे देखकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं.....

" तू मुझसे इतनी दूर क्यों कड़ी हैं मेरी jaan........tujhe मज़ा क्या सिर्फ रघु hi देता hain........main nahin.........chal मेरे करीब आ........." और रघु काव्य को अपने करीब खींच लेता हैं वहीँ काव्य फ़ौरन अपने काम में लग जाती hain........wo अपने डेंटन के बीच जीतू के शर्ट के बटन को दबाकर उसे खोलना शुरू करती hain.......magar ये बटन थे की खुल hi नहीं रहे थे.........

जीतू एक नज़र काव्य पर डालता हैं और अपना एक हाथ फ़ौरन काव्य के जांघों के बीच रख देता हैं और इससे पहले काव्य संभालती वो उसकी बुर को कसकर अपनी मुट्ठी की गिरफ्फत में जकड लेता हैं और काव्य को अपनी तरफ खींचने लगता hain......wahin काव्य भी किसी डोर की तरह उसके पास चली आती हैं..........

" चल अपनी दोनों टांगें पूरा faila.........main तेरे बुर को सही से जकड नहीं पा रहा हूँ........" और काव्य धीरे से अपने दोनों टांगों को फैला देती हैं वहीँ जीतू अपने हाथों की गिरफ्त्त को और भी मज़बूत कर लेता hain........wahin काव्य तेज़ी से जीतू के एक एक बटन को खोलने में लगी हुई thi........aur इधर जीतू उसकी लगाने mein..............aab इतना तो तय था की इन 1/2 घंटे में उसकी बुर, गांड और चूचियों का कचूमड़ ाचे से बनाए वाला tha............kareeb 5 मिनट तक जीतू ऐसे hi काव्य के बुर को उसके कपड़ों के ऊपर से hi जकड़े रहता हैं फिर वो अपने हाथ हटते हुए इस बार ऊपर की तरफ ले जाता हैं और काव्य के दोनों चूचियों के साथ खेलने लगता hain...........masalney लगता hain..........mano वो चुकी न होकर कोई बॉल हो........

काव्य का बुरा हाल tha...........wo सही से जीतू के कपड़ों को नहीं खोल पा रही thi....jaise तैसे तो शर्ट के दो बटन बस खुले they......aur अब केवल 3 मिनट hi बस रह गया tha........aabki बार काव्य जीतू के बटन को दांतों के बीच दबती हैं और उसे खींचने लगती hain......is तरह ज़ोर से खींचने पर जीतू के शर्ट के बटन टूटते चले जाते हैं और काव्य के चेहरे पर थोड़ी सी आशा की किरण जगती hain.......jeetu जब देखता हैं की काव्य अब उसके कपड़े उतरने में सफल हो जाएगी वो और ज़ोरों से उसके दोनों चूचियों को मसलना शुरू करता hain........aisa लग रहा था जैसे वो उनमें से दूध निकल रहा ho...........uske हर दबाव से काव्य की सिसकारी फुट पड़ती और जैसे तैसे काव्य जीतू के शर्ट hi बस निकल पति hain....aur समय पूरा हो जाता हैं.........

" तेरा टाइम अब पूरा हो गया .........चल अब राम के पास जाकर उसके कपड़े निकल .......काव्य राम के पास जाती हैं और एहि सलिसिला फिर से शुरू हो जाता hain...........ram भी कभी उसके बुर को छूटा hain.......to कभी गांड ko.........to कभी उसके चूचियों के साथ खेलने लगता hain......is बार काव्य 5 मिनट के अंदर राम के t-shirt को अपने डेंटन से निकल लेती हैं और फ़ौरन नीचे की तरफ झुकार राम के जीन्स को अपने डेंटन से खोलने लगती hai.........pehle उसकी पेण्ट की chain....jaise तैसे उसका चैन खुलता हैं और काव्य को थोड़ी सी जगह मिल जाती hain.......wo इस बार राम के लुंड को उसके अंडरवियर के ऊपर से hi चूसना शुरू करती hain...........ram भी जैसे पागल सा हो जाता और उसकी भी आहें तेज़्ज़ होने लगती हैं..............

राम कब तक भला खुद को रोक pata...........wo अपने अंडरवियर के बहार अपना लुंड निकल देता हैं और काव्य के मुँह के सामने रख देता hain........kavya एक नज़र राम के तरफ देखती हैं फिर वो दुबारा से उसका लुंड चूसना शुरू कर देती hain.........aur 10 मिनट होते होते आख़िरकार राम का लुंड जवाब दे जाता हैं और वो वहीँ इस बार ज़ोरों से हफ्ते हुए चीख पड़ता hain........uske लुंड से गधा गधा लावा फुट पड़ा tha...........wo अगले पल काव्य से फ़ौरन दूर हुत्त जाती हैं और वहां से भागता हुआ सीधा बाथरूम में घुस जाता hain.................aab उसे ऐसा लग रहा था मनो उसके जिस्म में जान hi न बची ho........wahin रघु ये सब हरकतें देखकर काव्य की तरफ देखता हुआ धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" तेरे देवर में तो ज़रा भी दम नहीं हैं ........वो तो साला फुसकी बम nikala.........aabhi से उसका तय तय फिस्स हो gaya..........ussey अब कुछ नहीं होने wala.........main उसके लिए कुछ बढ़िया सा काम सोचकर रखता hoon...........lagta हैं अब जो कुछ भी करना होगा हम दोनों को मिलकर hi करना hoga.........aur इसे किसी और काम में लगाना padega........khair कोई बात nahin.........chal आ मेरे paas..........mere कपड़े भी उतर........." और जीतू इस बार गन्दी सी स्माइल करता हुआ फिर से हंस पड़ता हैं..........

काव्य फिर से अपने काम में लग जाती हैं और रघु बस उसकी चूचियों के साथ खेलता रहता hain...........kabhi वो उसे masalta..........to कभी उसकी निप्पल्स को ज़ोरों से kheenchta............to कभी अपने कठोर हाथों से उसकी साइज maapta..........poorey 10 मिनट तक उसके हाथ एक पल के लिए भी नहीं रुके थे वहीँ काव्य का अब बुरा हाल tha..........reh रहकर उसके मुँह से सिसकारी लगातार फुट ताहि thi.........uski बुर में गीलापन बहुत हुड्ड तक बढ़ चूका tha..........aur अब उसका साबरा भी धीरे धीरे अब टूटने लगा tha..........kavya बस रघु के शर्ट को निकल पायी thi........kul मिलकाजुलाकर उसकी हार हुई थी ............वहीँ रघु उसको ऐसे हारता हुआ देखकर खुस हो रहा था.............

"लगता हैं आज तेरा दिन ाचा नहीं hain..........subeh से तू बस हार hi रही hai..............chal कोई बात nahin...........aaj वैसे भी हम सब तेरी माँ ाचे से chodengey..........tu भी कभी आज के दिन को भूला नहीं payegi.........aur आज का ये दिन तेरे लिए सबसे यादगार होगा........" और रघु अपने शर्ट को फर्श से उठता हैं और उसमें रखा एक पान अपने मुँह में डालता हैं और उसे धीरे धीरे से चबाने लगता hain............wahin इस वक़्त कमरे में एक तरफ राम शर्मिंदगी की वजह से चुप चाप से खड़ा tha...........wahin कुछ दूर पर जीतू भी अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस रहा tha...........dekhna था की आने वाला समय काव्य को कौन से मुश्किल राहों पर लेकर जाता hain...........ye तो बस वक़्त hi बता सकता था...................................

टिल कॉन्टिनोएड..................................................................
 
अपडेट- 52(ा) (मेघा अपडेट)

"लगता हैं आज तेरा दिन ाचा नहीं hain..........subeh से तू बस हार hi रही hai..............chal कोई बात nahin...........aaj वैसे भी हम सब तेरी माँ ाचे से chodengey..........tu भी कभी आज के दिन को भूला नहीं payegi.........aur आज का ये दिन तेरे लिए सबसे यादगार होगा........" और रघु अपने शर्ट को फर्श से उठता हैं और उसमें रखा एक पान अपने मुँह में डालता हैं और उसे धीरे धीरे से चबाने लगता hain............wahin इस वक़्त कमरे में एक तरफ राम शर्मिंदगी की वजह से चुप चाप से खड़ा tha...........wahin कुछ दूर पर जीतू भी अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंस रहा tha...........dekhna था की आने वाला समय काव्य को कौन से मुश्किल राहों पर लेकर जाता hain...........ye तो बस वक़्त hi बता सकता था...................................

अब आगे......................................................................

काव्य का अब बुरा हाल tha..............sach तो ये था की अब उसकी बुर की आग पल पल भड़कती जा रही thi...........wo hi जानती थी की कैसे उसने अपने आपको काबू में रखा हुआ hain.............wahin रघु उसकी बुर की आग ठंडी करने के बजाये उसके साथ नागपन का खेल बस खेल रहा tha.........upar से वो दवा अब अपना असर दिखने लगी thi............magar वो भी जानती थी की उसके मर्ज़ी से आज कहीं कुछ नहीं होने wala............raghu और जीतू का जब मुन्न करेगा तभी वो उसे chodengey..........magar रघु तो अभी कुछ और hi मूड में लग रहा था............

"अब तेरी बरी हैं नंगा होने ki.............yaad rakh..........aabki बार जो तेरे जिस्म से कपड़े उतरते चले गए तो फिर तुझे आने वाले 24 घंटों तक हम सबके बीच ऐसे hi पूरा नंगा रहना padega............aur ये 24 घंटे आगे और भी बढ़ सकते hain...........agar तू गलती करती हैं to..........aur मैं ाचे से जनता हूँ की तू गलती ज़रूर karegi..........aur तू अपना मोबाइल फ़ोन इधर laa...........kyon की मैं नहीं चाहता की तेरे यार का फ़ोन आये और तू उससे बात करने में बिजी हो jaye...........isliye तू अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर de..............aur ये तेरा फ़ोन तभी खुलेगा जब हम चाहेंगे.............

तेरे देवर का हैं न mobile...........agar तेरे पति का फ़ोन आता हैं तो वो कोई न कोई बहाना बना dega.........jaise तेरा फ़ोन पानी में गिर gaya........tera फ़ोन ों नहीं हो raha......wagerah wagerah..........magar तू उससे बात नहीं karegi..........ye मेरा हुकुम हैं........" और रघु राम की तरफ देखता हुआ उसे भी समझने लगता हैं वहीँ राम बस हाँ में इशारा करता हुआ धीरे से अपनी गुर्दें हिला देता hain..........kavya अपना मोबाइल उठती हैं और उसे फ़ौरन स्विच ऑफ कर देती hain..........ye देखकर जीतू के चेहरे पर एक गन्दी सी मुस्कान फिर से तैर जाती hain........issey पहले रघु कुछ बोलता जीतू बीच में hi बोल पड़ता हैं...........

" bhai........ek बात bolun...........kya हम इसके साथ छुपा छुपाई का खेल खेल सकते hain.........haath तो इसके अब भी ऐसे hi बंधे rahengey.............is खेल में हम दोनों चोर रहेंगे और दो चांस मैं चोर बनूँगा ..........और दो चांस tum.............jo चोर रहेगा उसके हाथ में ये छोटी सी छुरी rahegi...........agar जो इसे ढूढ़ लिया तो वो उस छुरी से इसके कपड़े faadega........magar एक एक कर ke.........jaise अगर मैंने इसे खोज लिया तो मैं पहले इसके सूट faadunga........fir अगली चांस तुम्हारी hogi.........tum इसकी लग्गी फाड़ dena......uske बाद इसकी bra.........aur लास्ट में panty..........har चांस में हम इसके एक कपड़े फाड़ते jayengey........aur आखरी में जब ये पूरी नंगी हो जाएगी तो ...............हम सब इसकी मिल के faadengey.............kyon कैसा लगा मेरा प्लान.........." और जीतू अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं वहीँ इस बार रघु भी मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" तू भी अब मेरी तरह हो गया हैं re............ek दम kameena........sach में ये आईडिया तेरा मस्त hain...........aur छोटे मालिक इस लिए इस खेल को नहीं खेल सकते क्यों की ये आउट हो गए hain...........yani इस गेम से बहार हो गए hain........kyon की इनका पानी निकल चूका hain............ye सिर्फ dekhengey.........karengey कुछ nahin.........to चल खेल शुरू करते हैं............" और रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ फिर से हंस पड़ता हैं...........

पहला नंबर तेरा hoga..........kyon की ये आईडिया तेरा tha........jaa और उस दीवार के पीछे जाकर 1 से लेकर 10 तक धीरे धीरे गिनती गिनना शुरू kar.............aur हम सब यहीं बैठकर इस खेल का मज़ा लेंगे......." और रघु काव्य की तरफ मुस्कुराते हुए धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य शर्म से अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेती hain..........jeetu पहले जाकर 1 से लेकर 10 तक गिनती गिनना शुरू करता हैं और काव्य जाकर छुपने का जगह ढूढ़ने लगती hain..........thode देर बाद जीतू वापस आता हैं और अपने हाथ में वो छुरी लेकर काव्य को इधर उधर खोजने लगता हैं..............

" memsaheb.............tum कहाँ छुपी ho............nikal jawo...........kab से मेरे हाथ तुम्हारे कपड़े फाड़ने को तरस रहे hain...........arey.......idher भी नहीं hain...........kahan चली गयी साली........." फिर जीतू जाकर दूसरे कमरे में काव्य को खोजने लगता hain...........haath बंधे होने की वजह से काव्य कोई ालमिरह खोल तो नहीं सकती थी और न hi ऐसे जगह चुप सकती थी जहाँ हाथ का सहारा लेना pade..............wo बस किसी बड़े सामान और जगह के पीछे hi बस चुप सकती thi...........jeetu उसे खोजता हुआ बैडरूम में जाता हैं और जैसे hi वो उस बीएड के नीचे झुकता हैं उसे काव्य वहीँ बीएड के नीचे छुपी हुई मिल जाती hain..........ek बार फिर से उसके चेहरे पर गन्दी मुस्कान तैर जाती हैं...........

" मैंने पकड़ liya.........maine तुम्हें खोज liya.........chalo अब सबके samney.......mai तुम्हारे कपड़े वहीँ फाड़ूंगा........." और जीतू काव्य को पकड़ते हुए हॉल में ले आता हैं और सबके बीच उसे खड़ा कर देता hain.........fir वो उस छुरी को अपने हाथों में लेता हैं और काव्य के पीठ और सीने के बीच वाला हिस्सा जहाँ उसकी सूट पर सिलाई चली हुई thi..........wo उस छुरी की नोक को उस सिलाई के बीच फंसता हैं और एक ज़ोर का झटका नीचे की तरफ मरता hain..............agle hi पल उसकी सूट बुरी तरह से फटती चली जाती hain..........fir वो काव्य के दूसरे बगल जाता हैं और फिर से एहि काम करता hain.........aur काव्य की सूट दोनों बगल से फटती चली जाती hain........kavya इससे पहले कुछ सोचती या samjhti.............jeetu उसके सूट को फाड़ता हुआ दो हिस्सों में पूरा अलग कर देता hain..........aab काव्य ऊपर से नंगी हो गयी thi.......aur उसका सूट फर्श पर बिखरा पड़ा tha........upar बस उसकी काली ब्रा hi नज़र आ रही thi.............ye नज़ारा देखकर रघु ज़ोरों से हंस पड़ता हैं.........

" अब मेरी bari.......jawo मैडम जाकर कहीं ाचे जगह चुप jawo...........nahin तो अगला नंबर आपकी लग्गी का hoga..........main 1 से लेकर 10 तक गिनती गिनने जा रहा हूँ........." और रघु इतना कहकर चला जाता हैं और काव्य फिर से कोई नया जगह छुपने को तलाश करती hain.........is बार वो किचन में जाकर चुप जाती hain........haath बंधे होने की वजह से उसे दिक्कत भी हो रही थी मगर वो ाचे से जानती थी की ये खेल तो सिर्फ एक बहाना hain.............aab ऐसे hi धीरे धीरे एक एक कर उसके सरे कपड़े utarengey........kyon की वो कहीं भी कितना भी chupegi...........jeetu और रघु आखिर उसे ढूढ़ hi lengey...........unhein तो बस एक खेल मिल गया था उसे नंगा करने का........

जीतू फिर एक एक कर सरे जगह काव्य को ढूंढने लगता हैं और जब काव्य उसे कहीं नहीं मिलती वो फिर आखरी में किचन में चला जाता hain........aur उसे काव्य फ्रीज के पीछे छुपी हुई नज़र आती हैं जिसे देखने उसके चेहरे पर एक कमीनी हंसी आ जाती hain..........fir वो उसे हॉल में सबके बीच लता हैं और उस छोटी सी छुरी से काव्य के जांघों पर धीरे धीरे से फेरते हुए .........उसकी दोनों टांगों के बीच वाली जगह पर जहाँ उसकी लागय की दोनों बगल सिलाई चली थी .......वो उस हिस्से में उस छुरी को फंसता हैं और एक ज़ोर का झटका नीचे की तरफ मरता hain.........agle hi पल उसकी लग्गी भी फटती चली जाती हैं ......घुटनों tak.......fir वो एहि सिलसिला एक बार फिर से चलता hain......aur जब काव्य की लग्गी दोनों बगल से फुट जाती हैं तब रघु अपने दोनों हाटों को उसमें फंसकर एक ज़ोर का झटका मरता हैं जिससे अगले hi पल काव्य की लग्गी दो हिस्सों में अलग होती चली जाती हैं..........

अब उसकी लग्गी भी उसके बदन से अलग हो चुकी thi.........ek बार फिर काव्य उन तीनों के सामने ब्रा और पंतय में कड़ी thi...........jissey उसकी गदरायी जवानी छुपाये नहीं चुप रही thi.........wahin वो दोनों पल पल किसी गिद्दी की तरह उसकी जवानी को पल पल नूच रहे थे............

"jeetu........aab तेरी बरी ........जा और इस बार कहीं ाचे जगह जाकर चुप जा....... वर्ण इस बार तो तेरी ब्रा उतारेगी.........." और रघु मुँह में पान चबाते हुए फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य बिना देर किये फिर से छुपने की जगह तलाश करने लगती hain...........jeetu फिर से उसे खोजने में लग जाता hain.......sara घर खोजने के बाद आखिर काव्य उसे ऊपर के रूम में मिलती hain....darwaze के peechay........chupi hui..........wo उसे पकड़ता हुआ नीचे लता हैं और फिर से काव्य को सबके बीच खड़ा कर देता hain.....fir जीतू इस बार उस छुरी को काव्य के ब्रा के हुक के पास ले जाता हैं और उसके डोर को धीरे धीरे काटने लगता hain.........agle hi पल उसकी ब्रा भी उसके जिस्म से अलग होती चली जाती हैं........

अब काव्य ऊपर से पूरी तरह नंगी thi............uski बड़ी बड़ी चूचियां अब सबके सामने be-parda thi...........uske जिस्म में अगर कुछ बची थी तो बस उसकी panty.....jo अब कुछ देर में वो भी उतरने वाली थी.............

" जा और जाकर फिर से कहीं चुप jaa.......is बार अगर मैंने तुझे ढूढ़ लिया तो तुझे नंगा होने से अब कोई नहीं रोक सकता............" और रघु गिनती गिनना शुरू करता हैं और काव्य इस बार बाथरूम में जाकर चुप जाती hain........wo ाचे से जानती थी की रघु उसे आसानी से ढूढ़ hi लेगा और उसे अब की बार पूरा नंगा karega..........usi हाल mein........sabke बीच.........

रघु एक एक कर सरे कमरे में काव्य को ढूढ़ने लगता हैं और आखिरकार वो लास्ट में बाथरूम में घुस जाता hain........wahin काव्य दीवार से सटी हुई अपना चेहरा छुपाये कड़ी thi...........raghu के आने की आहात उसे मिल गयी thi...........tabhi भी वो अपनी आँखें बंद की हुई चुप चाप से कड़ी रहती hain........raghu एक नज़र काव्य को सर से लेकर पवन तक घूरता हैं फिर वो अपना हाथ में रखा चुरा नीचे गिरा देता हैं और अगले hi पल आगे बढ़कर काव्य के पंतय को एक hi झटके में नीचे की तरफ सरका देता hain...........wahin काव्य की पंतय उसके पवन में आ जाती हैं और काव्य सर से लेकर पवन तक पूरी नंगी हो जाती हैं........

रघु उसे बहार खींचकर लता हैं और उसे हॉल में सबके बीच खड़ा कर देता hain...........wahin काव्य सर झुकाये बस उन मर्दों के बीच नंगी कड़ी thi.........jahan राम भी अजीब सी नज़रियों से उसे देख रहा tha.........magar अभी तो ये सिर्फ शुरुवात thi........kavya की इज़्ज़त की धाज्जियाँ उड़ानी तो अभी शुरू hi हुई थी...........

" मज़ा आ gaya.........aab तू ऐसे hi 24 घंटों तक rahegi...........bina कपड़ों ke.........aur देखा जाये तो तू ऐसे hi बिन कपड़ों के ज़्यादा ाची लगती hain.......tu फ़िक्र मुट्ठ kar..............aaj के बाद तेरे अंदर की रही सही शर्म भी अब ख़तम हो jayegi.........kyon की मैं तेरे साथ कुछ ऐसे बेशर्मी वाले खेल जो अब खेलने वाला हूँ........" और रघु जीतू की तरफ देखता हुआ धीरे से हंस पड़ता hain......wahin जीतू भी अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ हंसी लगता हैं..........

" छोटे मालिक क्या हम सब के बीच ऐसे hi बस बैठे rahengey............wo कुछ कार्नेगी नहीं क्या!!!!! " और जीतू धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ रघु फिर से मुस्कुरा पड़ता हैं........

कंटिन्यू..........................................................
 
Update-52(B) (मेघा अपडेट)

" मैंने इनके लिए भी सबसे बढ़िया काम सोच रखा hain..........tu बस देखता jaa...........waise भी अभी दारू पीने का मेरा बहुत मुन्न कर रहा hain..............soch रहा हूँ की आज की दारू कुछ स्पेशल banawun..........jisey पीने के बाद उसका नशा hi कुछ और हो..........." और रघु धीरे से बोल पड़ता hain.........yakeenan उसके दिमाग में इस वक़्त बहुत खतरनाक प्लानिंग चल रही थी जिसे वो अंजाम देने के बारे में अब सोच रहा था...........

" तो मैं जाकर अपने कमरे से दारू लेकर आता हूँ .........और आज का पैक हमारी मेमसाहेब hi banayengi.......aur हमारे साथ hi पियेंगी......." और जीतू जैसे अपने मुन्न की बात बोल पड़ता हैं वहीँ रघु के चेहरे पर फिर से एक गन्दी हंसी तैर जाती hain.......aur वो अगले hi पल फिर से बोल पड़ता हैं......

" तू तो जायेगा hi दारू लेन...... मगर तेरे साथ साथ हमारी मैडम भी jayegi..........balki वो तो अपने कमरे तक jayegi........wo भी akeli.......poori नंगी ऐसे hi........aur तू इस घर के चौकठ पर खड़ा बस इसकी निगरानी karega...........agar ये वहां से भगति हुई अपने कमरे तक गयी या अंदर से भगति हुई यहाँ तक आयी तो तू इसे बहार 1/2 घंटे तक ऐसे hi खड़ा करा dena......taki इसकी अकाल ठिकाने आ jayegi.........aur यहाँ के लोग भी इसे जी भरकर देख lengey........aur उनके भी मज़े हो jayengey.........aab जा दारू लेकर आ..........." और रघु की ये बातें जहाँ सुनकर जीतू ख़ुशी से उछाल पड़ता हैं वहीँ काव्य अगले hi पल रघु के क़दमों में गिरकर बैठ जाती हैं और उसके पवन पकड़ लेती हैं.........

" नहीं नहीं raghu........aisa मुट्ठ karo........meri इज़्ज़त चली जाएगी अगर मुझे किसी ने बहार देख भी लिया to..........mere घर से और तुम्हारे कमरे की दूरी लगभग 10 मीटर hain...........aur ऊपर से खुली chaath.........charon तरफ बड़े बड़े बिल्डिंग hain........koi भी कभी भी ऊपर आ जा सकता hain............koi रोड पर भी हो सकता hain..........please ऐसा न karo........main तुम्हारे लिए सब कुछ कर तो रही हूँ na.........please..........ye मुझसे नहीं हो पायेगा.........." और काव्य जैसे इस बार फर्याद करने लगती हैं वहीँ रघु जैसे अपना अंतिम फैसला सुना चूका हुआ होता हैं........

" मैं कुछ नहीं janta..........main बस इतना जनता हूँ की तू इस वक़्त मेरी घुलम hain.........aur मैं तेरा malik.........jo मैं बोलूं वो तुझे करना hain..........chahe जो ho..................aab अगर तूने कोई विरोध भी किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं hoga.......aur जितनी जल्दी तू दारू लेकर आएगी उतना तेरे लिए ाचा hoga..........ye मेरा अब आखरी फैसला हैं........" और रघु अपनी बात ख़तम करता हैं वहीँ काव्य अभी भी उसके क़दमों में बैठी हुई थी...........

" ये तुम मुझसे किस जनम का बदला ले रहे ho...........bhala कोई किसी के साथ ऐसा करता हैं kya...........theek hain.........agar इसी में तुम्हारी ख़ुशी हैं तो मैं अब ऐसे hi jawungi............aur तुम्हारे लिए तुम्हारा दारू ले ावुंगी.........." और काव्य इस बार धीरे से कड़ी होती हैं और धीरे धीरे क़दमों से चलती हुई बहार की तरफ जाने लगती hain..........jaise जैसे उसके कदम बहार की तरफ पढ़ रहे थे वैसे वैसे उसका दिल और भी ज़ोरों से घबरा रहा tha...........dil में ये भी दुर्र बढ़ता जा रहा था की कोई ऊपर न ho.........aur कोई उसे इस हाल में देख न ले..........

जैसे hi वो बहार निकलती हैं एक नज़र वो ऊपर की तरफ देखने लगती hain.............apne चरण taraf..........fir जब उसे दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आता वो धीरे धीरे चलती हुई उसी हाल में रघु के कमरे की तरफ जाने लगती hain..........wahin कुछ दूर पर जीतू खड़ा उसके बस निहार रहा tha........uski नज़रें एक पल के लिए भी काव्य के गांड से हटाए नहीं हुत्त रही thi..........kareeb 5 मिनट बाद काव्य दो देसी दारू की शीशी ले आती हैं वहीँ जीतू फिर से उसके चूचियों और बुर को घूरने लगता hain...........jaise तैसे काव्य चलती हुई जब अपने दरवाज़े के चौकठ पर आती हैं तब उसकी जान में जान आती hain..........durr से उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा था.............

मगर छूट में खुजली भी बढ़ती जा रही thi..........aab उसे अपनी छूट की आग के लिए कुछ भी करना मंज़ूर tha..........chahe जो ho........wahin जीतू भी उसके हाथ पादकता हुआ अंदर चला जाता हैं और रघु ये देखकर मुस्कुरा पड़ता hain.........magar काव्य की जब राम पर नज़र पड़ती हैं उसे एक बार तो इतना ज़ोर का ढाका लगता हैं की उसके होश उड़द जाते hain........kyon की इस वक़्त राम के हाथ में एक हाई डेफिनिशन (हद) वीडियो कैमरा tha...........ye काव्य को समझते देर नहीं लगी की आगे अब उसकी पोर्नोग्राफी बनाने वाली hain............ye देखकर रघु मुस्कुरा पड़ता हैं...........

" ये सब क्या हैं ........ये तुम्हारे हाथ में कैमरा कैसा............" और काव्य जैसे तड़प उठती हैं वहीँ रघु फिर से हंस पड़ता हैं..........

"इसमें घबराने की क्या बात हैं मेरी jaan.............tumhari कुछ ख़ास वीडियोस मैं अपने पास रखना चाहता hoon........amanat के तौर pe...........kyon की ये कुछ ख़ास पल होंगे जिन्हें मैं हमेशा के लिए यादगार बनाकर रखना चाहता hoon..........tum डरो mutt.........main तुमसे वादा करता हूँ की ये वीडियो बस मेरे पास hi rahengey........main किसी और को नहीं दिखाऊंगा.........." और रघु जैसे गंभीर होते हुए अपनी बात ख़तम करता हैं वहीँ काव्य टकटकी लगाए बस रघु को एक तुक देखने लगती हैं..........

" तुम ाचे से जानते हो की अगर ये वीडियो कहीं भी लीक हो गया to...........main किसी को मुँह दिखने के लायक नहीं rahungi..........aur मुझे आत्महत्या करने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं bachega...........is लिए............" और काव्य थोड़ी चिंतित होती हुई बोल पड़ती हैं वहीँ रघु भी थोड़ा सीरियस हो जाता हैं........

" तुम इतना डर्टी क्यों हो मेरी jaan........tumse क्या मैं प्यार नहीं karta...........ye सब तो मैं मौज मस्ती के लिए बस कर रहा hoon........tumhein ब्लैकमैल थोड़ी न कभी karunga.......aur न कभी मैं इसे कहीं dikhaunga.........agar चाहे तो तुम इस वीडियो को अपने पास रख lena..........aur जब मेरा मुन्न करे बस तुम मुझे लेकर दे dena..........tab तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी na...........main भला तुम्हारे साथ इसा करूँगा भी kyon...............tum मेरी दुश्मन थोड़ी न ho............aur अगर तुम्हें मुझपर विश्वास नहीं तो राम तो तुम्हारा अपना hain...........kya वो तुम्हारे साथ ऐसा करेगा.........." और रघु अपनी बात पे ज़ोर देते हुए कहता हैं वहीँ काव्य अभी भी असमंजश में खड़ी रहती हैं.............

वो बहुत ाचे से जानती थी की वीडियो बनाना और इसका लीक हो जाना उसके लिए कितना भरी पढ़ सकता hain..........magar कहीं न कहीं उसे रघु पर भी विश्वास tha............aur जब बात छूट की हो to.............galat चीज़ें भी अपने आप सही लगने लगती hain..........kuch ऐसा hi काव्य के दिमाग में इस वक़्त चल रहा tha.........wo कोई चाहकर भी फैसला नहीं कर पा रही थी मगर कहीं न कहीं उसकी ये ख़ामोशी रघु के लिए इकरार की तरफ इशारा कर रही thi.........dekhna था की आने वाले वक़्त काव्य को kahan.....aur किस मोड़ पर लेकर खड़ा करता हैं.............................

टिल कॉन्टिनोएड.....................................
 
अपडेट- 53(ा) (मेघा अपडेट)

वो बहुत ाचे से जानती थी की वीडियो बनाना और इसका लीक हो जाना उसके लिए कितना भरी पढ़ सकता hain..........magar कहीं न कहीं उसे रघु पर भी विश्वास tha............aur जब बात छूट की हो to.............galat चीज़ें भी अपने आप सही लगने लगती hain..........kuch ऐसा hi काव्य के दिमाग में इस वक़्त चल रहा tha.........wo कोई चाहकर भी फैसला नहीं कर पा रही थी मगर कहीं न कहीं उसकी ये ख़ामोशी रघु के लिए इकरार की तरफ इशारा कर रही thi.........dekhna था की आने वाले वक़्त काव्य को kahan.....aur किस मोड़ पर लेकर खड़ा करता हैं.............................

अब आगे.............................................................

काव्य का दुर्र be-buniyaad नहीं tha...........raghu तो काव्य को पूरा बर्बाद करने hi यहाँ आया tha.........aur वो अपने काम को ाचे से अंजाम भी दे रहा tha...........magar काव्य क्या उसके इस खेल को समझ पा रही thi........shayad nahin........agar वो ज़रा भी समझती तो वो उसे इतनी चूत न deti...........aur अपनी पोर्नोग्राफी यु hi नहीं banwati.......aur अब रघु इसी चूत का पूरा पूरा फायदा उठा रहा था...........

" मेरी jaan........tum इतना सोचती क्यों ho............agar मुझे तुम्हारा बुरा चाहना hi होता तो क्या मैं इस घर में चुपके से कहीं कैमरा नहीं लगवा deta............tumhein थोड़ी न कुछ पता chalta...........ye सब तो बस मैं मज़े के लिए कर रहा hoon..........aur इससे ज़्यादा कुछ नहीं..........." और रघु इस बार अपने पीले काले दांत दिखता हुआ ........मुँह में पान चबाता हुआ फिर से बोल पड़ता hain..........wahin इस बार काव्य रघु को मन नहीं कर पति और उसे हाँ बोल देती हैं.........

" waaah.............meri jaan...........ye हुई न baat..............is वीडियो को तो मैं अपनी जान से ज़्यादा संभलकर rakhunga...........marte दम तक.........." और रघु फिर से बोल पड़ता हैं और फिर खेल आगे शुरू होता hain...........aab जो रघु काव्य के साथ खेल खेलने जा रहा था वो निहायती घटिया और गन्दा tha..............jiski कोई घटियापन की सीमा नहीं thi..........uska मकसद तो बस काव्य को पूरा बेशरम और रांड बनाना tha.........taki कल को वो किसी भी काम को करने से ज़रा भी पीछे न हेट...........

" आपको वीडियो बनाना तो आता हैं न छोटे मालिक.........." और इस बार जीतू बीच में hi बोल पड़ता हैं वहीँ राम भी तुरंत जवाब देता हैं.........

" haan......maine तो कई बार वीडियो बनायीं hain.............aur ये फुल हद कैमरा hain.........iski वीडियो बहुत hi ज़्यादा क्लियर आती hain..........aur मुझे तो फोटोग्राफी का भी शौक hain........aur वीडियो बनाने का bhi........ye मेरे लिए बाये हाथ का काम हैं.............." और राम हाँ में रघु और जीतू का पूरा पूरा समर्थन करता hain...........jane अनजाने में वो भी अब काव्य के इस बर्बादी में पूरा हिस्सेदार बन गया tha..........jo आगे चलकर उसपर भी कहीं न कहीं भरी पड़ने वाला था..............

काव्य की नज़रें डाइनिंग टेबल पर जब पड़ती हैं वो थोड़ी चौंक सी जाती hain.............dining टेबल पर 5कम के गपे में तीन कांच के चौड़े मुँह वाले गिलास रखे हुए they.........aur तीनों की तीनों गिलास पूरी तरह से खली they............wahin थोड़ी दूर पर कांच की एक गहरे मुँह वाली कटोरी thi.......jissmein कुछ आइस कुबेस रखे हुए they.............ye तब आये थे जब काव्य दारू लेने बहार गयी हुई थी........

वहीँ काव्य बड़े अजीब नज़रियों से सामने रखे उन शीशे के गिलास को घूर रही thi.........teen गिलास क्यों रखे थे ये उसकी समझ में नहीं आ रहे they..........magar इतना तो उसे अंदाज़ा हो गया था की ये तीसरा गिलास यकीनन उसी के लिए hi वहां पर रखा hoga.........aur अब जल्दी hi काव्य को उसके बाटिओं का जवाब मिलने वाला था...........

" ये सामने जो तुम तीन गिलास देख रही हो न .........उसमें से एक मेरा hain.........dusara जीतू ka.........aur तीसरा तुम्हारे लिए hain.........aab ये मुट्ठ पूछना क्यों!!!!! क्यों की मैं जनता हूँ की तुम शराब नहीं peeti...........magar मेरी jaan............aaj तो तुम्हें शराब पीनी hi padegi...........kyon की जो खेल अब मैं तुम्हारे साथ खेलने जा रहा हूँ वो तुम पूरे होश हवश में रहकर कभी भी नहीं कर sakti............is लिए तुम्हारा नशे में होना बहुत ज़रूरी hain..........aur तुम नशे में रहोगी तो खेल का मज़ा भी दुगुना हो जायेगा...........

और छोटे malik.......aap अपना ये कैमरा ों kijiye.........aur एक एक वीडियो को ाचे से शूट kijiye.......har एक पोज़ mein.........aapko भी इसमें बहुत मज़ा आने वाला hain...........kyon की आगे जो नज़ारे आपको देखने को मिलेंगे उसे देखने के बाद आपका ये लुंड एक पल के लिए भी बैठने का नाम नहीं lega...........kahin ऐसा न हो की ये वीडियो बनाते बनाते आपके लुंड से पानी न निकल जाये..........." और इस बार जीतू ताने मरता हुआ धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य बस उन सब की बातें सुन रही thi...........wo ाचे से जानती थी की इस खेल में राम को भी बहुत मज़ा आ रहा हैं..........

राम उस हद कैमरा का वीडियो ों करता हैं और फिर सब कुछ धीरे धीरे शूट करना शुरू करता hain.........wahin इस बार रघु अपने प्लान को आगे बताना शुरू करता हैं.........

" क्या करना होगा मुझे.............." और इस बार काव्य धीरे से बोल पड़ती hain........wahin अब उसकी छूट की आग उसे पल पल जला रही thi..........aab उसे ऐसा लगने लगा था की अगर ऐसे hi आगे भी चलता रहा तो वो अब सच में पागल हो jayegi..........chahti तो थी की रघु या जीतू दोनों में से कोई उसकी बुर में लुंड ाचे से डालकर उसकी जमकर चुदाई करते rahe..........aur उसके बुर की साडी गर्मी को ाचे से ठंडा कर de..........magar ये दोनों तो उसके प्यास को बुझाने के बजाये और भी भड़का रहे थे............

" बताता हूँ मेरी jaan........zara साबरा तो rakho............jab हम सोच hi चुके हैं की आज तेरी माँ ाचे से छोड़नी हैं तो फिर तुझे कहे की जल्दी पड़ी हैं ..............अभी तो खेल बस शुरू हुआ hain..............aagey तेरे साथ बहुत कुछ होने वाला hain...........aaj वो तेरे साथ सब कुछ होगा जो तू न hi कभी सुनी hogi.........aur न कभी किसी ब्लू फिल्म में देखि hogi...........bus ये समझ ले की आज तेरे ये नीचे के दो छेद हमेशा हमेशा के लिए अब बड़े हो jayenge.........itne बड़े की......... तू उसमें कुछ भी आसानी से ले sakegi........chal अब खेल शुरू करते हैं........." और रघु इस बार फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य एक तुक रघु की तरफ देखने लगती hain..........sach तो ये था की उसे रघु की बातें ज़रा भी समझ में नहीं आ रही thi..........magar इतना ज़रूर समझ में आ रही थी की रघु उसके दोनों सूराखों को अब पूरी तरह से फाड़ने जो वाला हैं.........

" अब मेरा मुँह क्या देख रही hain..............chal जल्दी से इस डाइनिंग टेबल पर आकर चढ़ जा और इस बीच वाले गिलास के ठीक सामने आकर बैठ jaa...........haan .......ये याद रहे की तुझे उस पोज़ में बैठना हैं जिस पोज़ में तू मूतने के लिए बाथरूम में बैठती hain............magar यहाँ पर तेरा पोज़ थोड़ा सा अलग hoga...........tu बाथरूम में अपने दोनों पवन ज़रा सा फैलाकर बैठती हैं मगर यहाँ तू अपने दोनों पवन थोड़ा सा फैलाकर baithegi........taki तेरी बुर की दोनों चमड़ी आपस में चिपके हुए न ho.......balki खुले हुए हो............"

" और haan..........tu तो अब समझ hi चुकी होगी की मैं तुझे ऐसा क्यों करने को बोल रहा hoon...........jabki तेरे सामने कांच की तीन तीन गिलास राखी हुई hain........agar अब भी नहीं समझी .............तो चल अब मैं तुझे ाचे से समझा देता hoon..........tere सामने ये तीन गिलास इस लिए खली रखे हुए हैं ताकि तू इसे भर sake..........wo कैसे मैं तुझे अभी समझाता हूँ........" और रघु उस सस्ती वाली दारू की एक शीशी को खोलता हैं और उसमें से कुछ दारू पहले गिलास में धीरे धीरे भरने लगता hain.......jab थोड़ा सा उसमें दारू भर जाता हैं तब वो दूसरा गिलास में फिर से दारू भरने लगता hain.........fir teesara......aur देखते hi देखते एक शीशी दारू की पूरी ख़तम हो जाती hain.........magar उन तीन गिलास में दारू बस 1/3 हिस्सा hi thi.........baki का हिस्सा अभी पूरा खली था..........

कॉन्टिनोएड.................................................................
 
अपडेट- 53(बी) ( मेघा अपडेट)

" अब भी कुछ समझी या मैं और भी कुछ समझावूं................." और रघु गन्दी मुस्कान के साथ फिर से हंसने लगता हैं वहीँ काव्य अब उसके बाटिओं का मतलब बहुत ाचे से समझ जाती hain.......aur ये भी समझ जाती हैं की रघु उससे आगे क्या करवाने वाला hain...........magar शर्म और लाज की वजह से वो बस ना में धीरे से अपनी गुर्दें हिला देती हैं वहीँ जीतू जब समझता हैं तो वो इस बार ख़ुशी से उछाल पड़ता हैं............

" तुझे बरी बरी से इन एक एक गिलास में मूतना hain......wahin उसी जगह se........na hi गिलास कहीं hilengey......aur न hi tu........haan एक गिलास भर जाने के बाद उसके सामने दूसरा गिलास रख दिया jayega.........magar ये याद rahe..........tujhe अपनी मूट बर्बाद नहीं करनी hain.........tujhe उतना hi मूतना हैं जितनी ज़रूरत ho.............agar तेरी मूट बीच में अगर बंद हो गयी तो जानती हैं मैं तेरे साथ क्या karunga...........tere फ्रीज में दो तीन मोठे मोठे खीरे रखे हुए हैं जो अभी अभी मैंने देखा hain.........us खीरे की हर एक की मोटाई करीब 4 इंच के आस पास हैं और लम्बाई भी करीब 10 इंच के आस paas................janti हैं मैं तुझे खीरे की साइज क्यों बता रहा hoon...........to सुन..............

मैं उस खीरे को तेरी गांड में पूरा अंदर तक डालूंगा और तब तक डेल रहूँगा जब तक तेरी गांड पूरी तरह से फुट न jaye.........ya दर्द से तेरा मूट न निकल jaye........isliye अगर तुझे तेरी गांड प्यारी हैं तो अपना मूट बचाये rakhna..........aab तू मूतना शुरू kar.........taki तेरे मूट की धार बस उस गिलास के अंदर hi gire.........isi में तेरी भलाई hain........."aur रघु बड़े गौर से काव्य के बुर की तरफ देखने लगता hain........wahin सबकी निगाह उसी तरफ thi........sharam की वजह से अब काव्य की मूट भी नहीं निकल रही thi........magar आज रघु तो उसे पूरा बेशरम बनाने पर उतर आया था.........

काव्य थोड़ा सा प्रेशर डालती हैं और उधर राम अपने कैमरा का पूरा फोकस उसकी तरफ करता hain............aur आख़िरकार काव्य के बुर से मूट निकलना शुरू हो जाता hain.......pehle तो कुछ बूँदें नीचे डाइनिंग टेबल पर गिरती hain..........aur कुछ गिलास से होती हुई आगे की तरफ गिरने लगती hain..........magar काव्य जैसे तैसे धीरे धीरे करके अपना बैलेंस बनती हैं और उस गिलास के सामने अपना मूट निकलना शुरू करती hain............ek तेज़्ज़ धार के साथ अब उस दारू में काव्य का मूट भरना शुरू हो जाता hain.......magar कुछ मूट उस गिलास के बहार भी गिरता जा रहा था जो अब काव्य को परेशानी का कारन बनता जा रहा था.............

एक तेज़्ज़ ssssssssssssssssiiiiiiiiiiiiiiiiiiihhhhhhhhhhhhhh...ki आवाज़ के साथ वो गिलास धीरे धीरे भरना शुरू हो जाता हैं और जब गिलास करीब करीब भर जाता हैं तब काव्य फ़ौरन अपने मूट को रोक लेती hain........magar बहुत सा हिस्सा मूट का आखिर बहार गिर गया tha.........raghu उस भरे हुए गिलास को एक तरफ करता हैं और उसकी जगह पर अब दूसरी गिलास रख देता hain..........kavya फिर से दूसरे गिलास में दुबारा से मूतना शुरू करती hain...........aur इस बार भी वैसा hi होता hain.......kafi हिस्सा मूट अब इधर उधर गिर रहा tha.......ye देखकर रघु के चेहरे पर एक कमीनी मुस्कान तैर जाती hain...........wahin राम का लुंड भी अब पूरी तरह से फूल गया tha........aisa नज़ारा वो कभी न सपने में देखा tha...............aur न कभी सोचा था.....

" शाबाश मेरी jaan..............tune तो कमल कर diya.........magar तूने इतनी साडी अपनी मूट बेवजह बर्बाद कर di...........lagta हैं तेरी किस्मत भी आज तेरा साथ नहीं दे rahi............aaj तेरी गांड भी पूरी तरह से अब तो fategi..............mujhe नहीं लगता की दो पैक होते होते तेरा मूट भी अब निकलेगा........." और रघु इस बार फिर से हंस पड़ता hain.........wahin काव्य बस चुप चाप से ये सब किसी पेशावर रंडी की तरह सब कुछ कर रही thi..........aisa काम तो कोई बड़ी बड़ी रंडियां भी नहीं करती..................

रघु उस भरे हुए दो गिलास को एक तुक देखता हैं फिर वो अपने लुंगी से एक वहीँ पुड़िया निकल लेता हैं जो अभी कुछ देर पहले उसने काव्य को पिलाया tha........ye वही वायग्रा वाली पुड़िया thi..............wo उस दो भरे हुए गिलास में आधा आधा दाल देता hain.........aur तीसरा गिलास अभी भी वैसे hi खली पड़ा हुआ tha.........bus उसमें दारू hi thi........ye गिलास खास उसने काव्य के लिए hi बनायीं थी............

वो अपनी लुंगी को उतर देता हैं और सबके बीच अपने गंदे से अंडरवियर को नीचे की तरफ सरकता hain......aab उसका लौड़ा सबके सामने पूरा नंगा tha.........wahin काव्य उसकी हरकतों को बड़े अजीब नज़रियों से देख रही thi..........agle hi पल वो उस खली गिलास को अपने हाथों में लेता हैं और अपने लुंड के पास उसे रखकर धीरे धीरे उसमें मूतना शुरू करता hain............aur जब उसका गिलास पूरा भर जाता हैं वो अपने उस गंदे से अंडरवियर को ऊपर सरका देता हैं और काव्य के सामने उसी डाइनिंग टेबल पर सबके बीच उसे रख देता हैं..........

" ये स्पेशल दारू तेरे liye......aur ये हम दोनों के liye.........chal अब इसे जल्दी से ख़तम kar............aabhi दूसरा पैक भी बनाना hain...........uske बाद तुझे कुछ नास्ता भी करना hain........khali पेट तू कैसे हम सबसे chudegi........uske बाद फिर तेरी चुदाई का असली खेल शुरू hoga.............magar ज़रा मैं तेरे गिलास का जायका थोड़ा सा बदल दू......." और रघु इतना कहकर अपने मुँह से गधा गधा पान का पीक निकलता हैं और काव्य के सामने रखा दारू जिसमें अभी थोड़ी देर पहले उसने मोटा था .....जिसे अब वो काव्य को पिलाने वाला था उसमें गिरने लगता hain.......aur तीनों गिलास में एक एक आइस कुबेस भी दाल देता hain..........aur फिर उसे काव्य की तरफ धीरे से बढ़ा देता hain...........wahin काव्य बस टकटकी लगाए सामने रखे उस गिलास को घूर रही thi.........aur ये सोच रही थी की वो आखिर ये पिए कैसे ...............

मगर जब बुर में आग लगी हो तो सब ाचा लगता hain..........wo अगले hi पल उस गिलास को अपने हाथों में लेती हैं और राम की तरफ देखती हुई धीरे से उस गिलास को अपने होंठों पर लगा लेती हैं और उसे धीरे धीरे पीना शुरू करती hain............chahe उसका स्वाद कैसा भी ho..........usey तो बस पीना hi tha..........wo ाचे से जानती थी की रघु आगे उससे और भी गन्दी गन्दी चीज़ें karwayega..........magar उसे ये सब अब कुछ भी बुरा नहीं लग रहा tha.........shayad एहि वजह था की वो रघु के लिए हमेशा प्यासी रहती thi...........wo सबसे अलग जो tha................aur उसकी बुर की आग बस वहीँ मिटा सकता था.........

थोड़ी देर बाद रघु और जीतू उस दारू और काव्य के मूट से भरा गिलास को ख़तम करते हैं और काव्य भी अपना गिलास ख़तम करती hain...........fir से रघु अपना गिलास में फिर से दारू डालता हैं और ऐसे hi सब में थोड़ी थोड़ी करके उस शीशी को भी ख़तम कर देता hain........wo गिलास काव्य के बुर के उसी जगह था जहाँ पहले रखा हुआ था....... फिर से वही खेल शुरू हो जाता hain..........fir से काव्य उस गिलास में मूतने लगती हैं और कुछ उसकी मूट फिर से बहार की तरफ गिरने लगती hain.......jaise तैसे तो रघु का गिलास भर जाता हैं मगर जीतू का गिलास अभी थोड़ा hi भरा था तभी काव्य की मूट अचानक से बंद हो जाती हैं ..................वहीँ उन तीनों के चेहरे पर हंसी आ जाती हैं वहीँ काव्य का चेहरा फीका सा पढ़ जाता हैं..........

" ये क्या jaan..............tune तो हमारा मज़ा hi ख़राब कर diya........maine कहा था न की इस तरह से आधा अधूरा बीच में मुट्ठ chodhna.......magar तुम मानती कहाँ हो........... वैसे भी आज तुम्हारा दिन ठीक नहीं हैं तुम तो आज बस हारती hi जा रही ho.........aab तुम hi बताओ की तुम अपना ये गांड अब कैसे bachawogi..........aab तो तुम्हारी गांड पूरी तरह से futegi........main तो इतना निर्दयी हूँ की मैं तुम्हारी गांड में तेल तक नहीं dalunga.........aur न hi कुछ lagunga.........bus ऐसे hi इस सूखे खीरे को तुम्हारी उस छोटे से छेद में pelunga...........aur तब तक पेलता रहूँगा जब तक ये खीरा तुम्हारे अंदर पूरा न घुस jaye........agar तुम दर्द बर्दास्त कर सकती हो तो ठीक hain........nahin तो मैं अब कुछ नहीं कर सकता........." और जीतू जैसे अपना फैसला सुनाता हैं वहीँ काव्य के चेहरे का रंग जैसे फीका पढ़ जाता हैं..........

वो बहुत ाचे से जानती थी की गांड का फटना क्या होता hain..........aur रघु जो बोल दिया हैं तो वो करके hi manega......chahe जो हो..........

" आप अगर कहो तो मैं अभी अंदर से जाकर वो खीरा लेता aawun.......mujhe देखना हैं की आप उस खीरे को मेरी भाभी की गांड में पूरा कैसे डालेंगे.........." और राम इस बार जोश में hi बोल पड़ता hain...........wo इस वक़्त काफी एक्ससिटेमेंट सा लग रहा tha..........lund उसका इतना फूल गया था मनो जैसे अभी लावा निकल padega........jo भी था उसे अब इस खेल में बहुत मज़ा आ रहा था..........

" क्या सच mein............tumhein ाचा लगेगा जब तुम्हारी भाभी की गांड fategi.........unhein दर्द होगा to...........agar तुम्हारी ये इच्छा हैं तो फिर तुम फ़िक्र मुट्ठ करो मैं तुम्हारी ये इच्छा भी ज़रूर पूरी karunga.......magar अभी nahin..........aabhi इसका सही समय नहीं आया hain...........aur अभी तो खेल बस शुरू हुआ hain..........aagey तुम सब देखते जाओ और क्या क्या होता हैं........" और रघु फिर से काव्य के तरफ बड़े गौर से देखने लगता hain.........wahin काव्य पर तो जैसे अब नशा चने लगा tha..........kuch तो उस दवा का ................औरर कुछ माहोल ka.............dekhna था की काव्य अब उन सबके रंग में पूरा रंग पति हैं या बस उनकी दासी बनकर रह जाती hain...........ye तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था.............

टिल कॉन्टिनोएड....................................................
 
अपडेट- 54 (ा) (मेघा अपडेट)

" क्या सच mein............tumhein ाचा लगेगा जब तुम्हारी भाभी की गांड fategi.........unhein दर्द होगा to...........agar तुम्हारी ये इच्छा हैं तो फिर तुम फ़िक्र मुट्ठ करो मैं तुम्हारी ये इच्छा भी ज़रूर पूरी karunga.......magar अभी nahin..........aabhi इसका सही समय नहीं आया hain...........aur अभी तो खेल बस शुरू हुआ hain..........aagey तुम सब देखते जाओ और क्या क्या होता हैं........" और रघु फिर से काव्य के तरफ बड़े गौर से देखने लगता hain.........wahin काव्य पर तो जैसे अब नशा चने लगा tha..........kuch तो उस दवा का ................औरर कुछ माहोल ka.............dekhna था की काव्य अब उन सबके रंग में पूरा रंग पति हैं या बस उनकी दासी बनकर रह जाती hain...........ye तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था.............

अब आगे..........................................................

काव्य अभी भी उस हाल में पूरी नंगी........ अपनी दोनों टांगें फैलाये उन सब के बीच उस डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई thi...........uske दोनों हाथ पीछे की तरफ थे जिससे वो अपना शरीर का बैलेंस बनायीं हुई thi........aur उसका बुर अभी भी हवा में लहरा रहा tha..........wahin उन तीनों की नज़रें सामने रखे उस दारू के गिलास पर thi.....jo अभी भी एक खली tha.........aur काव्य का मूट उस डाइनिंग टेबल पर इधर उधर बिखरा पड़ा था..........

" अब तेरा कुछ नहीं हो सकता मेरी jaan...........aur तो तेरे देवर ने अपने मुन्न की इच्छा भी अब ज़ाहिर कर दी हैं तो .........जब एहि तेरी गांड फटते हुए देखना चाहता हैं तो अब मैं भला इसमें क्या कर सकता hoon...........tere ये दोनों छेद तो अब ाचे से फटकार रहेंगे........." और रघु काव्य के सामने अपनी मज़बूरी बताते हुए पूरा पूरा मज़ा लेता हैं वहीँ काव्य अपनी गुर्दें शर्म से नीचे की तरफ झुका लेती हैं.............

" मेरे पास एक तरकीब हैं जिससे मैं अपनी मेमसाहेब को बचा सकता hoon.......samney रखे ये खली गिलास को फिर मूट से दुबारा भर सकता hoon........magar उसके लिए मुझे अपनी मैडम से भी थोड़ी मदद chahiye.......agar आप हाँ कहो तो मैं आगे कुछ बोलूं..............." और इस बार जीतू हमदर्दी दिखते हुए बीच में बोल पड़ता hain..........wahin काव्य उसके तरफ बड़े अजीब सी नज़रियों से एक तुक देखने लगती hain..............wo बहुत ाचे से जानती थी की अब जीतू भी उसके साथ पूरा नंगापन का खेल खेलना चाहता हैं...........

क्या अगर काव्य उसे हाँ बोले या फिर .......ना .........जीतू को भला उससे क्या फर्क padega...........wo तो करेगा वहीँ जो वो काव्य के साथ करना चाहता hain........wo तो बस उसके साथ एक खेल खेल रहे they..........aur अगर सच पुछा जाये तो अब उस नंगेपन के खेल में काव्य को भी मज़ा आने लगा tha.............to भला वो ना क्यों bolti.........wo अगले hi पल धीरे से अपनी गुर्दें हाँ में हिला देती hain........wahin जीतू के चेहरे पर एक कमीनी सी मुस्कान फिर से तैर जाती hain................agle hi पल जीतू काव्य के पास आता हैं और अपना चेहरा उसके कान के पास लेजाकर उसके गुर्दें को धीरे से चाटते हुए फिर धीरे से बोल पड़ता हैं.......

" तुम जैसे अभी मूट रही थी ठीक वैसे hi अपने बुर पर थोड़ा और प्रेशर बनाये rakhna.........dekhna मेरा ये आईडिया काम कर jayega..........aabhi देखना कैसे तुम्हारे बुर से मूट निकलेगी और इस खली गिलास को फिर से भर देगी........." और इस बार जीतू काव्य के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो जाता हैं और बहुत आहिस्ता से अपना दया हाथ उसकी दोनों टांगों के बीच से सरकता हुआ उसके बुर और गांड के छेद पर आहिस्ता आहिस्ता से फेरने लगता hain.........wahin जीतू के इस हरकत पे काव्य अगले hi पल ज़ोरों से सिसक पड़ती हैं और उसके मुँह से एक ज़ोरों की aaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhssssssssssssssssssss.............foot पड़ती hain...........lajaat और मज़े से उसकी आँखें बंद होने लगती हैं...........

न जाने कब से वो तड़प रही thi.........jeetu के इस तरह छूने से उसके जिस्म में जैसे एक तेज़्ज़ करंट सा दौड़ जाता hain.........wahin जीतू इस बार हौले से अपना वही हाथ काव्य के गांड की छेद से होते हुए आगे उसकी बुर पर धीरे से सरका देता hain.........aur उसकी बुर को अपनी कठोर हथेली में कसकर जकड लेता hain...........is तरह काव्य की बुर जीतू की हथेली के बीच सिकंजे कसने पर काव्य फिर से तड़प उठती हैं..........

वहीँ जीतू बड़े आराम से काव्य के बुर पर अपनी ऊँगली फेर रहा tha.........jaise उसे किसी बात की कोई जल्दी न ho........kabhi वो अपनी उँगलियों को गोल गोल ऊपर ghumata....to कभी उसके चरों तरफ ferta......magar अंदर नहीं pelta........wahin काव्य का अब बुरा हाल होने लगा tha..........wo तो और भी तड़प उठी thi.........aur उसकी बुर में गीलापन अब और भी बढ़ता जा रहा था.........

" aaaaaaaaaaaaaaaaasssssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhhh....please............jeetu........aab और nahin............ander दाल दो अपनी ये ungli.........aab और मुझसे बर्दास्त नहीं होता......." और काव्य सिसकते हुए इस बार जीतू से फर्याद करते हुए बोल पड़ती हैं वहीँ जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं...........

" किस्में दाल दूँ madam...........zara खुलकर बोलिये न............" और जीतू पूरा पूरा मज़ा लेते हुए फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य अगले hi पल तड़पती हुई धीरे से सिसक पड़ती hain........wo भी जानती थी की जीतू उसके मुँह से क्या सुनना चाहता हैं.............

" aaaaaaaaaaaaaaassssssshhhhhhhhhhhh.........mere बुर में अपनी ऊँगली दाल दो न please............aab मुझे और न तड़पाओ................" और काव्य सिसकते हुए फिर से बोल पड़ती हैं ..........वहीँ जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर फिर से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" तुम्हारी बुर में ऊँगली डालकर मैं क्या karunga.........batawo na.........zara खुलके........." और जीतू फिर से मज़े लेता हुआ बोल पड़ता hain.........wahin इस बार काव्य उसपर ज़ोरों से चिल्ला पड़ती hain.......shayad फ्रूस्टुयशन की वजह से ............

" ssssssssssshhhhhhhhhhhhhh...........apni ऊँगली मेरी बुर में डालकर मुझे ाचे से छोड़ ............haramzyade............warna मैं तेरा लुंड उखड doongi..........jispar तुझे बहुत घमंड hain...........fir ये तेरे किसी काम का नहीं rahega............na मूतने ke.........aur न hi छोड़ने के.........." और इस बार काव्य जैसे जीतू पर चिल्ला सी पड़ती हैं वहीँ जीतू की बोलती बंद हो जाती hain.........wo जनता था की इस वक़्त काव्य की क्या हालत हैं .........वो आगे कोई सवाल जवाब नहीं करता और धीरे से अपनी दो ऊँगली को काव्य के बुर में धीरे धीरे अब पेलना शुरू करता hain..........wahin काव्य की लजात से आँखें बंद होने लगती hain..............wo वहीँ बेशर्मों की तरह अपनी बुर फैलाये जीतू के उन दो उँगलियों को अपने बुर में पूरा अंदर तक ले रही thi.........wahin उसका मज़े से अब बुरा हाल tha.........jab जीतू की पूरी ऊँगली काव्य के बुर में घुस जाती हैं तब जीतू कुछ पल के लिए रुक जाता हैं वहीँ काव्य धीरे से अपनी आँखें खोलती हैं और फिर से सिसकते हुए बोल पड़ती हैं...............

"aaaaaaaaaaaaasssssssssssssssshhhhhhhhhhhhhhhhhh............tum रुक क्यों गए ..........अब कसकर अपनी इन उँगलियों से मेरी बुर को ाचे से chodho...........tumhare ये हाथ अब रुकने नहीं chahiye..........meri बुर को इतना जमकर रगड़ते रहो और तब तक रगड़ते रहो जब तक की मेरी मूट बहार न निकल jaye.........aakhir.........yehi तुम करना चाहते थे न मेरे saatth.........main भी तो देखूं की तुम ऐसा कर पते हो या नहीं.........." और काव्य सिसकते हुए धीरे से बोल पड़ती hain...............aab उसे कोई होश न tha.........wo तो अब हवस में पूरी तरह से अंधी हो चुकी thi...........magar इस खेल में उसे भी मज़ा उतना hi आ रहा था जितना............. उन सब को...............

जीतू अगले पल अपने हाथों को हरकत करना शुरू करता हैं और तेज़ी से काव्य की बुर में अपनी दोनों उँगलियाँ अंदर बहार करता hain.........wahin सामने राम अपने एक हाथ से अपने लुंड को मसल रहा था तो दूसरे हाथ से उस वीडियो को शूट कर रहा tha.............maze से उसका भी बुरा हाल tha............aisa लग रहा था जैसे अभी उसका लुंड फुट padega...........jaise जैसे जीतू के उँगलियों की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी वैसे वैसे काव्य की सिसकारी उस हॉल में गूंजती जा रही thi.........wahin दूसरी तरह fffffffffffaaaaaaacccchhhhhhhhh...fffffaaaaaaccchhhhhhhhhhhhhhh.........aaaaaaaaiiiiiiissss...............jaisi आवाज़ें उस माहोल को और भी कातिलाना बनती जा रही थी...........

कंटिन्यू................................................................
 
अपडेट- 54(बी) ( मेघा अपडेट)

काव्य के बुर से पानी बहना अब शुरू हो गया tha...........wahin जीतू के हाथ अब रुकने का नाम नहीं ले रहे they...........samney रघु बड़े गौर से ये मंज़र को देख रहा tha............aur राम उन वीडियो को अपने कमरे में समेत रहा tha..........aisa लग रहा था जैसे कोई पोर्न मूवी की शूटिंग चल रही ho........aur काव्य कोई हाउसवाइफ न होकर कोई पेशावर रंडी ho...........aur आख़िरकार काव्य के साबरा का बाँध टूट गया और वो वहीँ ज़ोरों से हाफने lagi.......uska सारा जिस्म पसीने से भीग गया tha.............wo थोड़ा सा ज़ोर लगाती हैं और उसकी बुर से दो चार मूट की बूँदें बहार की तरफ टपकने लगती हैं मगर एक भी बूँद उस गिलास में नहीं girti........aur आख़िरकार उसके दोनों पवन जवाब दे जाते हैं और वो वहीँ हफ्ते हुए जीतू के सीने पर धाम से गिर जाती hain........aur लुम्बी लुम्बी साँस लेने लगती hain........aabhi भी मज़े से उसकी दोनों आँखें बंद थी..........

मगर उसकी छूट की आग अभी बुझी कहा thi..........agar ऊँगली से छूट की आग बुझ जाये तो फिर भला लुंड का क्या kaam............wahin सबकी नज़रें काव्य पर थी जो पल पल अपने आपको नार्मल करने की लगतार कोशिश कर रही thi.........aur अगले hi पल रघु की आवाज़ से वो अपनी आँखें धीरे से खोल लेती हैं.............

" जब तेरे बुर में मूट हैं hi नहीं तो मूट क्या अब तेरी गांड से niklega............main कुछ नहीं janta............tu जो कर जैसे कर मुझे ये गिलास अभी भरना हुआ दिखना चाहिए........." और रघु थोड़े गुस्से में काव्य की तरफ देखता हुआ बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसके तरफ देखती हुई धीरे से मुस्कुरा पड़ती hain...........aur अगले hi पल वो रघु के पास सरकती हुई आती हैं और बड़े प्यार से उसके चेहरे पर अपने हाथों को धीरे धीरे से फेरने लगती हैं और बड़े गौर से उसकी आँखों में एक तुक देखती रहती hain.........na जाने क्यों अब उसे रघु पर बहुत प्यार आ रहा था........

" अगर मेरी मूट मेरी गांड से निकल सकती हैं तो तुम ये भी कोशिश करके बेशक देख lo........shayad तुमसे ये भी हो jaye.........agar मेरी गांड से कुछ न निकले तो बाद में मुझसे तुम कुछ न kehna........ki मैंने तुम्हें कोई मौका नहीं diya...........tumhein पूरी चूत hain.......tum जो चाहे वो karo.............aur तुम न पूरे पागल ho...........zara सा भी नहीं samjhtey............har वक़्त बस ज़िद्द लगाए बैठे रहते ho.......agar मेरी मूट फिर से निकवाला hi चाहते हो तो तुम्हें कम से कम कुछ घंटे तो उसके लिए इंतज़ार करने hi hongey..........mujhe ढेर सारा पानी फिर से पीना पड़ेगा और फिर............" और इस बार काव्य थोड़ी सी मुस्कुराते हुए रघु की तरफ देखने लगती हैं मगर रघु के चेहरे पर अभी भी गुस्सा tha..........wo काव्य के हाथों को गुस्से से झटक देता हैं.........

" मैंने तुमसे कहा था की तुम अपनी मूट बर्बाद मुट्ठ करना ............मगर फिर भी..........." और रघु अपना मुँह बना लेता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से हंस पड़ती हैं.............

" मुझसे जितना हो सका मैंने वो kiya.........agar तुम में इतनी hi अकाल थी तो क्यों नहीं मेरी मूट की नल्ली में एक पतली सी पाइप लगा diye........taki जहाँ तुम चाहते वहां मैं मूट सकती thi........aab बहस करने से क्या fayda...........agar तुम्हारे दिमाग में कुछ और हैं तो वो मुझे batawo........main वो भी तुम्हारे खातिर करने को तैयार hoon........chahe कुछ भी ho.......chahe कितना गन्दा क्यों न ho...........tum तो मेरी जान हो raghu............tumhein अगर मैं खुस नहीं कर सकीय तो किसी खुस karungi.........aab तुम्हें ये दारू अगर पीनी हैं तो उसके लिए कुछ देर तो इंतज़ार करना hi पड़ेगा.........." और काव्य हौले से मुस्कुराते हुए फिर से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु टकटकी लगाए बस अपने सामने रखे उस शीशे के गिलास को निहार रहा था.........

जब उसके दिमाग में कुछ आईडिया नहीं सूजता तब वो मायूस होकर छुप चाप से अपना सर झुकाये वहीँ चेयर पर आकर बैठ जाता hain.........wahin काव्य मुस्कुराते हुए बड़े प्यार से रघु के चेहरे को एक तुक देख रही thi......wo अपना एक हाथ उसके चीन पर धीरे से ले जाती हैं और उसका सर ऊपर की तरफ करती हुई धीरे से उसकी आँखों में एक तुक देखने लगती हैं........

" मेरे होते हुए तुम्हारे चेहरे पर ये mayoosi.........zara भी ाची नहीं lagti.........mere होते भला कभी ऐसा हो सकता हैं क्या!!!! .........मैं तुम्हें कभी निराश होने नहीं dungi........tumhare इस प्रॉब्लम का सलूशन मेरे पास hain........aur मेरे पास एक मस्त प्लान भी हैं जिससे तुम्हारी ये खली गिलास अभी के अभी भर सकती hain..........agar तुम चाहो तो................." और इस बार काव्य अपने उँगलियों को धीरे से नाचती हुई रघु के गलों से फेरती हुई उसके होंठों पर ले जाती हैं और बड़ी ऐडा से हंस पड़ती hain......wahin रघु टकटकी लगाए काव्य के खूबसूरत चेहरे को बस देखे जा रहा tha........wo काव्य का इशारा शायद नहीं समझ पाया था...........

" वो kaise.............."aur इस बार रघु चहकता हुआ बोल पड़ता hain..........wahin अब उसे इस बात की ख़ुशी भी हो रही थी की उसके इस गंदे और घटिया खेल में काव्य भी अब उसका बराबर का साथ दे रही थी............

" बताती हूँ ..............बताती hoon..........aisi भी क्या जल्दी hain..........pehle तुम ये बताओ की तुम मेरी मूट मेरे कौन से छेद से निकलवाना chahogey...........mere आगे की छेद se...............ya मेरे पीछे की छेद से ..............तुम्हें इन दोनों में से किसी एक को छुन्नाना हैं............" और काव्य इस बार अजीब सी नज़रियों से रघु और जीतू की तरफ देखने लगती hain............wahin रघु टकटकी लगाए बस काव्य को घूरे जा रहा था..........

" तू साली पागल hain.........tere पीछे की छेद से भला मूट कैसे निकल सकता hain..........mere पास सोचने के लिए इतना दिमाग नहीं hain...........tu एक काम kar..........tu अपने आगे वाली छेद से hi मूट निकलकर इस खली गिलास को फिर से भर de...........mere लिए बस इतना hi बहुत हैं.........." और रघु खुस होते हुए बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य उसे देखती हुई धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं..........

" मगर..............." और काव्य इतना बोलकर फिर से चुप हो जाती हाँ वहीँ रघु के चेहरे पर गुस्सा फिर से धीरे धीरे उमड़ने लगता हैं.......

" अब अगर मगर क्या लगा राखी hain...........jo बोलना हैं साफ़ साफ़ बोल न........." और रघु जैसे इस बार काव्य पर झल्ला पड़ता हैं वहीँ काव्य उसे देखकर मुस्कुराती रहती हैं.........

" magar..........uske लिए तुम्हें भी थोड़ी म्हणत करनी पड़ेगी............" और काव्य रघु की तरफ देखती हुई धीरे से आँख मर देती हैं वहीँ रघु एक तुक काव्य की तरफ देखता रह जाता hain............wo काव्य का इशारा समझ नहीं पा रहा था की काव्य उससे क्या कहना चाहती hain...........jab इतनी देर बाद भी रघु नहीं समझता तब काव्य को आखिर बोलना hi पड़ता हैं..............

" कैसी mehnat...........main कुछ समझा नहीं............." और रघु अपने दिमाग पर ज़ोर डालते हुए फिर से बोल पड़ता hain..........ander hi अंदर उसे काव्य पर अब गुस्सा भी आ रहा tha.......magar वो चुप था...........

" मैं तो समझी थी की तुम बहुत होशियार ho..........magar तुम तो एक नंबर के बेवकूफ nikle........tumhein ज़रा भी अकाल हैं की nahin.........kya कभी गांड से मूट निकलते देखा hain.........nahin na.........tab तुम्हें इतना सोचना चाहिए की मेरा इशारा किस तरफ हैं........" और काव्य लुम्बी सांस लेते हुए धीरे से बोल पड़ती hain..........excitement की वजह से उसका गाला अब सूखने लगा tha.......wahin रघु अभी भी अनादि बना हुआ था......

" तुम्हारा इशारा किस तरफ हैं............" और रघु न समझ की तरह फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ इस बार काव्य इसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं........

" तुम na............main तुमसे ये कहना चाहती हूँ की तुम अपना लुंड मेरी दोनों छेद में कहीं पर भी दाल do..........jahan तुम्हारी इच्छा ho..........fir..............fir.............tum मेरी बुर में डेल रहो ya.........meri फिर गांड mein..........tum मेरे अंदर मूतना शुरू करो मेरे जिस छेद में तुम्हारा लुंड ho.........fir........us गिलास को ठीक मेरे नीचे रख दो ...........देखना कुछ देर में कैसे ये गिलास पूरा भर जाता hain.......magar..............main चाहती हूँ की तुम अपना लुंड एक hi बार में मेरे अंदर दाल do.........poora का पूरा .......और तब तक उसे न निकालो जब तक मेरे छेद से मूट टपकना बंद न हो जाये............." और इस बार काव्य नज़रें नीचे झुकाते हुए धीरे से बोल पड़ती hain........wahin इस बार रघु ख़ुशी से उछाल पड़ता hain............kavya की ये बातें उसके लिए किसी शॉक से कम नहीं thi.............raghu का ये घटिया खेल उसकी बुर में अब आग लगाने का काम कर रही थी...............

" waaahhhhhhhhhhhh मेरी jaan.............mere दिमाग में इतना मस्त आईडिया आया क्यों nahin.........chal कोई बात nahin.........tu वापस से उसी अंदाज़ में जाकर baith........apne दोनों हाथ पीछे की तरफ tikakar.........aur अपनी बुर को हवा में थोड़ा utha...........main इस गिलास को तेरे छेद के ठीक नीचे की तरफ रखता hoon.........fir मैं तेरी बुर के अंदर अपना लुंड पूरा पेलुँगा और धीरे धीरे तेरे अंदर मूतना शुरू करूँगा.........." और रघु इतना बोलकर फ़ौरन अपने सरे कपड़े एक hi झटके में उतर फेंकता हैं और बिना वक़्त गंवाए फ़ौरन डाइनिंग टेबल पर आकर चढ़ जाता hain.........aur काव्य के दोनों जांघों को ाचे से जकड़कर अपना लुंड एक hi झटके में काव्य के बुर के अंदर पूरा पेल देता हैं...........

वहीँ इस अचानक हुए हमले से काव्य ज़ोरों से चीख पड़ती हैं और मज़े से उसकी आँखें बंद सी हो जाती hain.....aur उसका मुँह पूरा खुला का खुला रह जाता hain..........wahin उसकी ज़ोरों से सिसकारी भी निकल जाती hain............na जाने कब से वो लुंड लेने के लिए तरस रही thi.........wahin रघु अपने लुंड पर तब तक दबाव बनाये रखता हैं जब तक उसका पूरा लुंड काव्य की बुर की गहराई में पूरा नहीं समां jata...........wahin काव्य लुम्बी लुम्बी सांसें लेती हुई अपने कंकपते जिस्म को कण्ट्रोल करने लगती हैं और जब वो थोड़ी सी नार्मल हो जाती हैं वो बड़े गौर से रघु के चेहरे की तरफ एक तुक देखने लगती hain........is वक़्त रघु का विशालकाय लुंड काव्य की छूट की गहरी में कहीं खो गया tha..........bus उसके बड़े बड़े ताते hi बहार की तरफ झूल रहे थे.........

" raghu............main अब तैयार hoon............mere अंदर मूतो अब..........." और काव्य लुम्बी लुम्बी सांसें लेती हुई धीरे से बोल पड़ती हैं और फिर वो अपना चेहरा रघु के चेहरे के पास ले जाती हैं और टकटकी लगाए बस उसकी आँखों में देखने लगती hain.........raghu भी काव्य को बड़े प्यार से देखने लगता हैं और थोड़ा सा आगे बढ़कर उसके नरम होंठों को धीरे धीरे चूसना शुरू करता hain.........aur अगले hi पल काव्य को अपने अंदर ढेर सारा पानी निकलता हुआ सा महसूस होने लगता हैं..........

इस वक़्त रघु का लुंड न ज़्यादा अकड़ा हुआ tha.......aur न मुरझाया हुआ tha..........is लिए उसे मूतने में कोई दिक्कत नहीं hui..........agle hi पल काव्य का जिस्म कांपने लगा और ढेर सारा पानी उसकी बुर में भरता चला gaya......aur रघु तब तक काव्य के अंदर मूतता रहा जब तक उसके लुंड से पानी का एक एक कटरा न बह gaya...........wahin राम और जीतू को ऐसा लगने लगा था जैसे उनका लुंड अभी फुट padega...............ram तो अपने लुंड को मसलता हुआ दूसरे हाथ से वो वीडियो शूट कर रहा tha..........thodi देर बाद आखिर काव्य के बुर से मूट टपकना शुरू हो जाता हैं और पहले धीरे धीरे ........फिर थोड़ी तेज़्ज़ se.........aab सारा पानी नीचे उस खली गिलास को भर रहा tha...........baki कुछ बूँदें इधर उधर भी टपक रही thi........jo उस डाइनिंग टेबल को भिगो रही थी.........

" aaaaaaaaaasssssssssssssss hhhhhhhhhhhhh.........tum मुझे ऐसे hi प्यार करोगे न raghu..........na जाने तुम्हारा एहि अंदाज़ मुझे पागल कर देता hain...........mere ये प्यास को सिर्फ तुम hi बुझा सकते हो............." और काव्य सिसकते हुए हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु भी जवाब में धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देता hain.........agle hi पल वो अपने लुंड को हिलता हैं और काव्य के बुर से ढेर सारा पानी टपकने लगता hain.........jo अब नीचे रखे गिलास को धीरे धीरे भर रहा tha......agle hi पल रघु अपने लुंड को एक hi झटके में बहार खींच लेता हैं और इस बार काव्य वहीँ ज़ोरों से चीख पड़ती hain............wahin इस बार उसकी बुर से fffffffffffffffuuuccchhhaaaakkkkkkkkkkkkk की ज़ोर की आवाज़ के साथ ढेर सारा पानी भी निकल पड़ता हैं और पूरे डाइनिंग टेबल पर बहने लगता hain............wahin काव्य किसी लाश की तरह अपने आपको संभल नहीं पति और धाम से उसी डाइनिंग टेबल पर पीठ के बल गिर पड़ती हैं..........

अभी भी वो लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही थी .........वहीँ उसकी बुर से बेहटा रघु का मूट अब धीरे धीरे बहार की तरफ बेहटा जा रहा tha............kareeb 5 मिनट तक काव्य पर जैसे एक नशा सा चाय रहता हैं और जब उसे होश आता हैं वो फ़ौरन उठकर बैठ जाती hain..........raghu उसी के तरफ देखता हुआ मुस्कुराये जा रहा tha...........wahin काव्य के चेहरे पर शर्म की लखीरें भी अब नज़र आने लगी thi...........magar ये शर्म अब सिर्फ नाम के लिए मात्रा रह गयी thi............kyon की इससे बड़ा बेशर्मी का जीता जगता उदाहरण और भला हो भी क्या सकता tha..............................dekhna था की अभी ये सिर्फ एक हुड्ड hain.................................ya हुड्ड की एक शुरुआत...............................................

टिल कॉन्टिनोएड...............................................................
 
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