Update:-66
नंदनी तेज-तेज चिल्लाती अपनी बात कहते गई। गुस्से के साथ दर्द भी निकलता जा रहा था जो समुद्र का सिना चिर रही थी। नंदनी चुप होकर अब भी हांफ रही थी, और कुंजल अपनी मां की बात को सुनकर बस आखों में आशु लिए अपने भाई को ही देख रही थी।
अपस्यु अब भी मुस्कुरा रहा था। वो अपने एक हाथ से कुंजल के आशु पोछने लगा तो दूसरे हाथ से नंदनी का चेहरा ऊपर करके उससे कहने लगा…
"आप दोनों का दर्द मै अच्छे से समझ सकता हूं। मै एक छोटी सी कहानी बताता हूं, आप दोनों ध्यान से सुनना और फिर मेरे कुछ सवाल होंगे, उन सवालों का जवाब देना।"
"ये कहानी है एक चालक लोमड़ी की। जंगल का ये लोमड़ी बहुत ही शातिर और अपने भाव बदलने में महारत हासिल किए हुए था। वैसे वो था पूरा ही चरित्रहीन और छुब्द मानसिकता (narrow minded) का शिकार। कहीं दूर जंगल में ये अपना पाऊं पसार रहा था। अपने चालाकी के चादर के अंदर वो अपने लोगों और परिवारों का ऐसा इस्तमाल करता, की उससे बड़ा कोई भगवान नहीं।"
"ये तो हो गया उस जंगली लोमड़ी का चरित्र चित्रण, उसके बहुत से किए कारनामे है, वो फिर कभी सुना दूंगा, जब भी आप सुनना चाहे मां। अभी मै मुख्य घटना सुनता हूं। तो बात कुछ ऐसी हुई की, वो जंगली जानवर अपने जंगल के कटने से पूरा हताश हो चुका था। कहीं दूर का एक प्यारा आशियाना उस लोमड़ी को पसंद आ गया। अपने कुछ और, चालाक लोमड़ी के साथ मिलकर उसने एक योजना बनाई।"
"उस योजना के तहत उसने 160 प्यारे और मासूम लोगों को जिंदा जला दिया। हां ठीक सुना जिंदा जला दिया। उसकी एक प्यारी सी पत्नी थी, जिसे उसके इरादों की खबर लग गई थी। हां शायद उसे अपने पति के इरादों की भनक नहीं लगती, लेकिन जान से भी ज्यादा चाहने वाली उसकी एक दोस्त थी। दोनों के बीच इतना अटूट और गहरा रिश्ता था कि उसने उस लोमड़ी की पूरी जानकारी साझा कर दी।"
"उन 160 लोगों में उसने अपनी पत्नी को भी जिंदा जलाया था। देखो जरा किस्मत, उस समय उस लोमड़ी की प्यारी पत्नी के साथ, एक और प्यारी सी औरत बातें कर रही थी, वो भी अपनी बेटी का सर अपने गोद में रखकर। वो बेचारी दूसरी औरत आने वाले खतरे से बिल्कुल अनजान, वो तो बस लोमड़ी की पत्नी से उसकी दुविधा सुन रही थी और किस तरह से उस लोमड़ी और उनके साथियों को रोका जाए उसकी योजना बना रही थी।"
"इधर दोनों योजना बना रही थी और उधर योजनाबद्ध तरीके से एक 20 फिट का गड्ढा खोदा गया था, जिसमें बड़ी सी भट्टी लगाई गई। धू-धू करती आग कि लपटें 20 फिट के गद्दे से ऊपर उठती। सबसे पहली जिंदा चिता में उसने अपनी पत्नी को झोंका… आहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहहह.. वो चीखें। पहली चींख थी जो किसी जिंदा के जलने की आ रही थी। जो भी सुन रहे थे, उनका कलेजा दहल रहा था।"
"अपनी पत्नी को तो उस लोमड़ी ने जिंदा जलाया, और जिस वक़्त वो अपनी पत्नी को घसीट कर उस अग्नि कुंड तक ले जा रहा था, ठीक उसी वक़्त उसके एक साथी ने, लोमड़ी की पत्नी से बात कर रही उस औरत के गले में पतली रस्सी डालकर उसका गला घोंटना शुरू कर दिया। जब ये सब शुरू हुआ, तब वो बच्ची भी उठ गई, जो अपनी मां के गोद में सोई थी। उसके बालों को मुट्ठी में दबोचे उसके मुंह पर हाथ डालकर उसका एक अन्य साथी उस बच्ची को ये सब दिखा रहा था।"
"उसके आखों के सामने लोमड़ी की पत्नी को आग में फेका गया, जिसके जलने से चिल्लाना सुनकर उस लड़की का कलेजा सहम गया। वो सदमे में थी तभी दम घुटने से वो अपनी मां के छटपटाते पाऊं देख रही थी। अपनी मां कि आंखे बाहर आते हुए वो देख रही थी। और अंत में जब उसकी मां की श्वांस थम गई तब उसे भी उसी आग में फेक दिया गया।"
"इसी के साथ अब उस लड़की को भी फेका जाना था, उस आग के कुएं में जहां अंदर से एक साथ ना जाने कितनो के चिल्लाने की आवाज़ आती और दम तोड़ जाती। किंतु उस लोमड़ी के आखों में हवस आ चुकी थीं। उसने अपने साथी को यह कहकर रोक लिया कि, ये तो मारेगी ही, मै जरा इसे मज़े दे दूं वरना उपर जाकर कहेगी "कोड़ी ही मार डाला।"
"उस लड़की को बाल से घसीट कर वो एक कुटिया में ले गया। वो लड़की सहमी सी, आखें उसकी खुली थी लेकिन सरीर का कोई भी अंग काम नहीं कर रहा था। उस लोमड़ी ने लगभग उस लड़की के साथ बलात्कार कर ही चुका था। इतने में उस जगह पर उस लोमड़ी बेटा पहुंचा, जो पागलों कि तरह ना जाने कितनी दूर से पहले अपनी मां और फिर अपने साथियों की दर्दनाक चिंख्र सुनकर दौरा चला आ रहा था। जब यह घटना हो रही थी उसका बेटा रात के अंधेरे में उजला-नीला एक फूल तोड़ने निकला हुआ था।"
"पागलों की तरह जब वो लोमड़ी का बेटा दौड़ा चला आ रहा था, आग की ऊंचे लपटों की रौशनी में वो दूर से देख पा रहा था, कैसे लोमड़ी की झुंड पकड़-पकड़ कर उसके साथियों को उस अग्नि कुंड में फेक रहे थे। उसी रौशनी में फिर उसने देखा उसका लोमड़ी बाप उसके सबसे प्यारे साथी को एक कुटिया में ले जा रहा था। लड़का भागते हुए सीधा उस कुटिया में पहुंचा और अपने लोमड़ी बाप को ऐसा करते देख उसकी आखें खुली की खुली रह गई।"
"जो लड़की लगभग मरी सी केवल उसकी आखें खुली थी, उस लड़के को देख कर जोर से चिंखी और बेहोश हो गई। उस लड़के के कान में उसके अन्य साथियों की दर्दनाक चिंख उसका कलेजा दहला रही थी, और उसका बाप किसी निर्लज की तरह नंगा खड़ा हंस रहा था।"
"वो लड़का ना तो भयभीत हुआ और ना ही उसे अपने आखों के सामने अपना पिता दिखा। यह वक़्त सोचने में व्यर्थ करता वो लड़का तो कुछ और जिंदगियां उस आग में होती। उस लड़के के मन में उस वक़्त भी बदला नहीं था, उसके अंदर न्याय कि सोच जागृत थी और उसने न्याय किया। अपने पिता को पहले फांसी से टंगा और उसे लटकता हुआ छोड़ दिया। जब वो लड़का सजा तय कर रहा था, उसका कलेजा कांप गया, और जब फसी पर चढ़ा रहा था उसके हाथ कांप रहे थे, आखों से आशु बह रहा था, लेकिन नीति रचा जा चुका था और सजा तय हो चुकी थी।"
"बाप कैसा भी हो बाप था, उसी अग्निकुंड में उसका आखरी संस्कार करने के बाद, वो लड़का उस लड़की को अपने पीठ पर बांध कर पहाड़ों के ऊपर बने एक महादेव के मंदिर ले गया। नीचे अब भी भूखे भेड़िए झुंड में घूम रहे थे, और वो बेबस बस उन्हें देख रहा था।"
"बदले की आग उस लड़के के अंदर भड़क रही थी। जिसके साथ वो लड़का पल कर बड़ा हुआ, सब उसके आखों के सामने राख के ढांचे में थे, लेकिन वो बदला लेने उस वक़्त वहां जाता, तो वो लड़का भी उसी आग में राख बन जाता। उसके दिमाग में उसके गॉडफादर की सिखाई बात गूंज रही थी, यदि वो जिंदा रहेगा तभी उसका न्याय भी जिंदा रहेगा।"
"महादेव उसपर स्वयं सहाय थे। उस लड़के के 2 साथी और, अपनी जान बचाकर उस पहाड़ के ऊपर चढ़ चुके थे और उसके साथ उस लड़के का भाई भी था, जो अपनी मां को अग्नि में फेंकते देख कर ही सदमे से बेहोश हो चुका था, जिसे उसके साथियों ने ढोकर, अपने साथ उस पहाड़ के ऊपर लाए थे। तीनों बचपन के साथी, अपने कई साल साथ बिताए आशियाने और उस आशियाने के साथ उसके सभी साथी की मौत देख रहे थे।"
अपस्यु जैसे-जैसे अपनी बात कहता आगे बढ़ रहा था, वो ऐमी को अपने अंदर समेटे जा रहा था। उसके पीठ पर लगातार हाथ फेरकर मानो जताने की कोशिश कर रहा हो, वो हमेशा उसके साथ खड़ा है। नंदनी और कुंजल उसकी बात सुनकर पत्थर जैसे बन गई हो। दोनों की रूह कांप चुकी थी। अपस्यु अपनी बात समाप्त कर सबसे पहले तो तीनों को पानी पिलाया.. कुछ देर खामोश रहा.. फिर पूछना शुरू किया…
अपस्यु:- आप को पता है इस कहानी में वो लोमड़ी कौन था?
कोई कुछ नहीं बोला सब खामोश … अपस्यु अपने सवाल का खुद जवाब देते हुए कहा… "उस लोमड़ी का नाम था चन्द्रभान रघुवंशी।"
अपस्यु:- इस कहानी की वो लड़की कौन है, जानती है..
नंदनी, कुंजल यह सवाल सुनकर बस अपनी तेज धड़कन के साथ ऐमी के ओर देखने लगे.. लेकिन उनके मुंह से जैसे जुवान कहीं गुम हो गई थी, कुछ बोल नहीं पाए… अपस्यु फिर से अपने ही सवाल का जवाब देते कहने लगा… "वो लड़की ऐमी है।"
"क्या आप को पता है वो दोनों साथी कौन है जिसने उसके भाई को बचाया और आज तक अफसोस कर रहे है, कि उनमें क्षमता होने के बावजूद भी वो किसी को क्यों बचा नहीं पाए… "वो थे स्वस्तिका और पार्थ।"
"एक कली अंधेरे रात की वो दर्दनाक कहानी जिसे हमने फिर कभी याद नहीं किया। अब जब बात निकल ही आयी है तो मै यह भी बता दूं कि मां आप को हमसे ज्यादा दर्द मिला है। हमने उस दौरान कुछ खोया था तो कुछ बचाया भी था, लेकिन उस दौर में आपका सबकुछ लूट लिया गया।"
"उस दौरान आपने ना केवल अपने पति और बच्चे को खोया था, बल्कि अपने मायके के सारे लोग को भी खो चुकी थी, जिसके बारे में शायद आज तक आप को पता भी नहीं। आप ने उस दिन सही कहा था, और यह पूर्ण सत्य है कि मेरे ही बाप ने आपके पति और बच्चे का कत्ल करवाया था और आपके चचेरे भाई ने आप के मायके के पूरे परिवार को साफ कर दिया।"
"पहले दिन की बस 1 बात सही थी कि मेरे बाप ने आप लोगों के लिए 100 करोड़ की संपत्ति छोड़ी थी, लेकिन मैंने वो सभी संपति उसी दिन उस आग में जला चुका था। मैंने उन खूनी रुपयों की परछाई भी किसी पर नहीं पड़ने देना चाहता था।"
"मानता हूं आप का दर्द हम सब से गहरा है, लेकिन हमारे दर्द कि कहानी सिर्फ इतनी है कि आप ने सबको मरने के बाद देखा या सुना और हम सबने सबको अपने आखों के सामने जिंदा जलते हुए देखा, उनकी दर्द भरी चींखें सुनी।"
कुंजल रो रही थी, ऐमी रो रही थी लेकिन वहां 2 लोगों के आखों में आशु नहीं थे… एक तो अपस्यु था और दूसरी नंदनी। लगभग पूरी कहानी नंदनी के सामने थी। एक असमंजस कि स्तिथि नंदनी झेल रही थी। वो अपने हाल पर रोए या इन बच्चों के दर्द कि गहराई पर चढ़ाए उन मरहम को देखे जो साथ रहकर भी इन दोनों भाइयों ने कभी जताया तक नहीं।
नंदनी अपना फैसला कर चुकी थी और अपने ही अंदाज़ में उसने भी अपना साफ इरादा अपने बेटे के सामने रखी……
"मै साथ हूं, जितना दर्द झेलना था हमने झेल लिया। अब जो भी करेंगे वो बस उनके न्याय कि खातिर होगा, जिनका कोई दोष ना होकर भी, किसी की साज़िश का शिकार हो गए। चाहे वो कोई भी हो, हर एक को घुटने पर लाओ। जिस मकसद के लिए हमसे हमारा सब कुछ छीन लिया गया, तुम लोग सबसे पहले उनसे उनकी वो खुशी छिनो, फिर उनको इतना तड़पाओ की उन्हें ज़िन्दगी बदतर लगने लगे। हर पल कुढ़े और तिल-तिल मरते रहे और जब दर्द बेइंतहा हो जाए तो खुद अपनी ज़िंदगी से तंग आकर मौत को गले लगा ले।
नंदनी की बात सुनकर जैसे कुंजल में भी जोश भर आया हो.... आशु में डूबी आखें, सोलों में दहक रही थी, और हौसला पूरे जोश भरता… "भाई, ठीक वैसा ही करना जैसा मां ने कहा"…
ऐमी:- आप दोनों आक्रोशित ना हो। नियति अपना खेल रच चुकी है, हर काम अपने तय समय पर ही होगा। इसलिए धैर्य बनाए रखिए।
बातें खत्म करके सब ख़ामोश बस समुद्र कि लहरों को सुन रहे थे। शायद शब्द अब कुछ बचे नहीं थे, बस सबके अंदर एक ज्वाला सी धधक रही थी। कुंजल माहौल में थोड़ी तब्दीली लाते पूछने लगी…. "मां ऐमी से पूछो, ये जो बात बोलकर तुम्हे यहां लाई थी वो बात पूरी बताए"…..
नंदनी:- कौन सी बात..
कुंजल:- भुल्लकड़, वहीं इन दोनों के बीच चल क्या रहा है..
नंदनी भी पुराने माहौल से निकलकर नए माहौल में ढलती हुई पूछने लगी…. "अच्छा याद दिलाया। चलो अब दोनों में से कोई एक हम दोनों मां बेटी का सस्पेंस खत्म करो?"
ऐमी:- सर अपस्यु आप बता रहे या मै बताऊं..
अपस्यु:- तुम ही बता दो…
ऐमी:- हम दोनों की कहानी सिर्फ इतनी है कि मै इसकी और ये मेरी परछाई है। हम हमेशा एक दूसरे के साथ तो हो सकते है, लेकिन कभी एक नहीं हो सकते।
नंदनी अपस्यु को अपने दाएं तो ऐमी को बाएं ओर से अपने सीने से लगाई और कहने लगी…. "मुझे नहीं समझना कि तुम दोनों के बीच क्या चल रहा है या तुम दोनों का किसी और के साथ क्या चल रहा है। बस दोनों खुश रहना और जिसके साथ भी रहना अपने बीच कभी दूरियां मत आने देना।
कुंजल:- मै भी तो रोई थी मुझे कहां गले लगाई मां।
अपस्यु और ऐमी दोनों अपनी बाहें फैलाए "यहां आ जाओ".. कुछ पल का एक दूसरे से गले लगाना भी कितना सुकून दे जाता है। ऐसा लग रहा था सब के एहसास जुड़ रहे थे एक दूसरे से।
नंदनी:- अब बताओ कि हमे क्या करना है?
अपस्यु:- पहला काम बिना किसी से झूठ बोले, किसी को अपनी पिछली जिंदगी का पता ना चलने देना।
कुंजल:- अरे ये कैसे होता है.. ऐसा भी होता है क्या?
अपस्यु:- होता क्यों नहीं। अब यहां सबको पता है मै आश्रम में पढ़ा हूं। लेकिन किसी को पता है कि मैं कौन से आश्रम में पढ़ा हूं। लोगों को पता है कि मेरे पास मेरे बाप की बहुत संपति है, मेरा बाप कौन है कोई नहीं जानता। ये सब्दों का जादू और पेश करने की ऐसी कला है, जिसमे सब सामने होकर भी कुछ भी नजर नहीं आता।
कुंजल:- मान लो मै कोई अनजान हूं और आप से सीधा पूछती हूं.. अपने पिता का नाम बताओ?
अपस्यु:- मधुवेश्वर कर्मकार सीबी रघुवंशी..
कुंजल:- क्या?
अपस्यु:- हां सही सुनी, पीछे दादा का नाम जुड़ा है।
नंदनी:- हां वो सही बोल रहा है।
कुंजल:- ओके तो इस हिसाब से पापा का नाम हुआ मधूवेश्वर कर्मकार बीपी रघुवंशी।
अपस्यु:- राईट…
ऐमी:- अपस्यु और आरव तुम्हारे कजिन नहीं है।
नंदनी और कुंजल दोनों एक साथ …. क्या ?
अपस्यु:- हां उसने सही कहा। आगे जो होने वाला है वहां ऐसा ही कहना है। मां आप कहोगी जेठ की संपत्ति क्लेम करना था, इसलिए 2 अनाथ को आपने अपने जेठ का वारिस बनाया, ताकि संपति पाया जा सके, लेकिन अब दोनों से लगाव ऐसा हो गया कि वो मेरे बेटे जैसा है।
नंदनी:- ये सब क्या मै मिश्रा परिवार को बताऊं…
अपस्यु:- ये बहुत आगे आने वाला है, बस आज समझा दिया ताकि आगे कोई भी शंका ना रहे। मिश्रा परिवार से ये मत कहना।
नंदनी:- ठीक है मै समझ गई।
ऐमी:- एक मिनट सबसे जरूरी बात तो रह ही गई…
नंदनी और कुंजल फिर से साथ में…. "क्या?"
"यहां से लौटने के बाद ना तो आप दोनों कि नजरें बदले और ना ही नजरिया। ना ही किसी से कभी भी बीती बात की कोई चर्चा होगी। जैसा कि आपने भी देखा होगा, कुंजल तो हर वक़्त हमारे साथ ही थी, लेकिन मैंने या आरव ने, कभी भी बीते वक़्त की कोई बात नहीं की और ना ही कभी बीते वक़्त जीये। आज हमारा है, और बस आज में जीना ही ज़िन्दगी है। बड़े दिनों बाद घर में खुशियां लौटी है उसका खुले दिल से स्वागत कीजिए। हमारे बड़े से परिवार के लिए ये एक यादगार क्षण है.. इसलिए इस बीच ना तो हम कोई काम करेंगे और ना ही बीते वक़्त की कोई चर्चा"….