अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - Page 3 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़

अध्याय 8

स्टेज पर जब एक पुराना, रूहानी रोमांटिक गाना गूँजा, तो अम्मी की कज़िन्स ने शोर मचाते हुए उन्हें घेर लिया। अम्मी पहले तो झिझकीं, अपने मखमली पल्लू को उंगलियों में भींचकर मना करती रहीं, पर फिर संगीत की उस मदहोश लहर ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया। और फिर जो हुआ, वह महज़ नाच नहीं, हुस्न का एक ज़लज़ला था।

उनकी शराबी रंग की जॉर्जेट साड़ी उनके जिस्म के साथ एक जान हो गई थी। जब वह गोल घूमतीं, तो साड़ी का घेरा हवा में एक मुकम्मल दायरा बनाता, जैसे कोई गहरा नशा हवा में तैर रहा हो। हर ठुमके के साथ अम्मी के पुष्ट कूल्हों की लचक उस बारीक कपड़े के नीचे से साफ झलकरी थी।

नृत्य के जोश में उनका पल्लू कंधे से फिसलकर उनकी गोरी बाँहों पर आ टिका, और हर बार जब वह अपनी कमर मटकातीं, तो उनके वेलवेट ब्लाउज और साड़ी के बीच से उनकी दूधिया सफेद कमर की एक बिजली सी कौंध जाती। अम्मी के चेहरे पर उस वक्त कोई बंदिश नहीं थी; वह बरसों की कैद के बाद जैसे आज़ादी की पहली साँस ले रही थीं।

भीड़ के बीच खड़ा विशाल एक पत्थर की मूरत बन गया था। उसकी गहरी आँखें अम्मी के रसीले बदन के हर मूवमेंट को ऐसे सोख रही थीं जैसे कोई प्यासा मरुस्थल बारिश की बूंदों को। वह अम्मी के भरे हुए सीने की धड़कन और उनके जिस्म की हर लचक को अपनी याददाश्त में कैद कर रहा था।

जब गाना खत्म हुआ, तो अम्मी तेज़ साँसें लेती हुई, पसीने की नन्हीं बूंदों से चमकते चेहरे के साथ एक टेबल पर पानी पीने रुकीं। विशाल साये की तरह उनके पास पहुँच गया।

विशाल: (एक गहरी सरगोशी में, अम्मी के कान के पास झुककर) "भाभी... आपने तो आज इस महफ़िल में आग लगा दी। खुदा की कसम, ऐसा मंज़र मैंने आज तक नहीं देखा।"

अम्मी ने शर्माकर अपनी लंबी पलकें झुका लीं, पर उनके मखमली गालों की लाली बढ़ गई।

अम्मी: "अरे नहीं… बस कज़िन्स की ज़िद थी। बचपन का शौक है, बस वही निकल आया।"

विशाल: "यह शौक नहीं, कयामत ढाने का हुनर है। ऐसा हुनर जो किसी की भी रातों की नींदें उड़ा सकता है।" वह एक पल रुका, उसकी नज़रें अम्मी के सुराहीदार गले पर जमी थीं। "ज़्यादा थक तो नहीं गईं आप?"

अम्मी: (गहरी साँस लेते हुए, जिससे उनका पुष्ट सीना और भी उभर आया) "जी… थोड़ी सी।"

विशाल: (एक शरारती और हवस भरी मुस्कान के साथ) "अच्छा है... वरना यहाँ मौजूद मर्दों के दिल थक जाते आपको देखते-देखते।"

अम्मी का अंदरूनी द्वंद्व (अम्मी के ख्यालात)

अम्मी खिलखिलाकर हँस पड़ीं, पर उनके ज़हन में एक अलग ही जंग छिड़ी थी।

अम्मी (मन में): "या अल्लाह, यह मर्द कितना बेबाक है। इसकी बातें सीधे मेरे जिस्म की हरारत बढ़ा रही हैं। पर मुझे हँसना होगा… मुझे इसे किसी तरह राजी करना होगा, ताकि यह सायमा का पीछा छोड़ दे।"

मैं बैठा यह सब देख रहा था और मेरे पेट में एक अजीब सी ऐंठन उठ रही थी। अम्मी उस अजनबी से इतनी बेतकल्लुफ़ कैसे हो सकती थीं?

वह जिस तरह उसकी बातों पर हँस रही थीं और बार-बार अपनी शराबी साड़ी का पल्लू सँभाल रही थीं, वह मुझे बेचैन कर रहा था।

पूरी शाम मैं उन पर नज़र रखे हुए था। उनकी नज़रें बार-बार एक दूसरे से टकरातीं और फिर झट से हट जातीं।

कुछ देर बाद, जब भीड़ कबाब काउंटर की तरफ उमड़ पड़ी, तो मैंने देखा कि अम्मी और विशाल फिर से आमने-सामने थे। मसालेदार धुएँ और कबाबों की खुशबू के बीच, उन दोनों के बीच की केमिस्ट्री अब एक खतरनाक मोड़ ले रही थी।

अम्मी की शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनके कंधे से सरक कर उनकी गोरी और मखमली बाँह पर आ गिरा था।

विशाल ने अपनी लंबी और गठीली उँगली अम्मी की प्लेट में रखे सीख कबाब की तरफ उठाई, पर उसकी भूखी निगाहें अम्मी के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर जमी थीं जहाँ से उनके पुष्ट सीने का उभार साफ़ नज़र आ रहा था।

विशाल: (एक भारी और नशीली आवाज़ में) "मानना पड़ेगा... आपकी पसंद बहुत अच्छी है, आयशा जी। हर चीज़ में... चाहे वह ये कबाब हों या ये गहरा शराबी रंग।"

अम्मी ने अपनी नशीली आँखों को हल्का सा सिकोड़ा। उनके मखमली जिस्म की हरारत उस धुएँ के बीच और भी बढ़ गई थी।

अम्मी: (एक बेबाक आत्मविश्वास के साथ) "दिल्ली आए और यहाँ के जायके नहीं चखे, तो क्या खाक दिल्ली आए? यहाँ की हर चीज़ में एक अलग ही नशा है।"

विशाल अम्मी के और करीब सरक आया। अब उसके मज़बूत सीने और अम्मी के मखमली बदन के बीच महज़ कुछ इंच का फासला था। अम्मी के बदन से उठती चमेली की खुशबू विशाल के नथुनों को पागल कर रही थी।

विशाल: "सुना है दिल्ली का खाना लोगों को अपना दीवाना बना देता है... पर कुछ ज़ायके ऐसे होते हैं जो इंसान को ताउम्र के लिए अपना गुलाम बना लें।"

अम्मी ने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को थोड़ा तिरछा किया और एक ऐसी कातिलाना मुस्कान दी जिसने विशाल के कलेजे में छूरी चला दी।

अम्मी: "सिर्फ खाना ही? या दिल्ली की कुछ और चीज़ें भी?"

विशाल थोड़ा और नीचे झुका, उसकी आवाज़ अब एक गहरी सरगोशी बन चुकी थी जो सीधे अम्मी के कानों को छू रही थी।

विशाल: "कुछ चीज़ें तो पहली नज़र में ही कातिल हो जाती हैं, आयशा जी। उनके लिए खाने का बहाना नहीं करना पड़ता... बस एक दीदार ही काफी होता है।"

आयशा के ख्यालात

पहली बार किसी अनजान मर्द के मुँह से अपना नाम—'आयशा'—सुनकर आयशा के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी। उनके गुलाबी होंठ हलके से कांप उठे।

आयशा (मन में): "या अल्लाह... इसने मेरा नाम जिस लहजे में लिया, ऐसा लगा जैसे इसने मुझे सरेआम बिना कपड़ों के कर दिया हो। इसका यह बेबाकपन... इसकी ये कातिल नज़रें जो सीधे मेरे सीने की ढलान पर गड़ी हैं। मुझे डर लग रहा है, पर मुझे रुकना नहीं है।

सायमा को बचाने के लिए मुझे इस अपने करीब आने देना होगा। इसे लगना चाहिए कि मैं इसके जाल में फँस रही हूँ।"

कबाब काउंटर से उठते धुएं और महफिल के शोर के बीच, आयशा ने वह कदम उठाया जिसने इस खेल की बिसात ही बदल दी। उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनकी मखमली और गोरी बाँह पर लहराया, और उन्होंने अपनी नशीली आँखों को विशाल की गहरी नज़रों में गड़ा दिया।

आयशा: (विशाल के कान के थोड़ा और करीब झुकते हुए) "विशाल साहब... यहाँ बहुत शोर है और सबकी नज़रें हम पर हैं। मुझे आपसे कुछ निजी बात करनी है। क्या हम उन फूलों की झाड़ियों के पीछे चल सकते हैं? वहाँ थोड़ी खामोशी होगी।"

विशाल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान फैल गई। उसके चौड़े कंधों में एक अजीब सी अकड़ आ गई।

विशाल (मन में): "उफ़... कमाल है! मुझे लगा था इस 'आयशा' को फाँसने में वक्त लगेगा, पर यह तो खुद ही इस कातिलाना बदन को अंधेरे की तरफ ले जा रही है। अकरम की ये पुष्ट और रसीली भाभी तो सायमा से कहीं ज़्यादा गरम और अनुभवी निकली।"

आयशा ने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को हल्का सा झटका दिया और अपनी साड़ी को संभालते हुए उन घनी और खुशबूदार झाड़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए। विशाल साये की तरह उनके पीछे हो लिया।

आयशा के चलने के अंदाज़ में एक ऐसी कातिलाना लचक थी कि उनकी चौड़ी कमर और भारी कूल्हों का उभार उस पारदर्शी साड़ी के नीचे से विशाल की हवस को और भी भड़का रहा था।

झाड़ियों के पीछे पहुँचते ही मोगरे और चमेली की खुशबू और भी गाढ़ी हो गई। रोशनी मद्धम थी, सिर्फ दूर से आती फेयरी लाइट्स आयशा के दूधिया बदन पर जुगनुओं की तरह चमक रही थीं।

विशाल जैसे ही आयशा के करीब पहुँचा, उसने अपना हाथ आयशा की पतली और गोरी कमर की तरफ बढ़ाने की कोशिश की, पर आयशा ने बड़ी नजाकत से एक कदम पीछे हटा लिया। उनके भरे हुए सीने की धड़कन अब तेज़ थी।

आयशा (मन में): "या अल्लाह... इस दरिंदे को लग रहा है कि मैं इसके हुस्न के जाल में फँस गई हूँ। इसे अपनी इस मर्दानगी पर कितना गुमान है। पर इसे क्या मालूम कि मैं यहाँ अपनी नुमाइश करने नहीं, बल्कि सायमा की ज़िंदगी का सौदा करने आई हूँ।“

“मुझे इसे समझाना होगा, या शायद डराना होगा... पर इस कातिल अंधेरे में इसके इतने करीब होना मेरे लिए भी एक आग का दरिया है।"

विशाल ने अपनी आवाज़ को और भी भारी और कामुक बनाते हुए कहा:

विशाल: "तो कहिए आयशा जी... ऐसी क्या बात है जो आप कहना चाहती हैं? यकीन मानिए, आपकी हर बात सुनने के लिए मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा सकता हूँ।"

आयशा ने अपनी मखमली और कोमल उंगलियों से झाड़ी के एक फूल को छुआ और फिर सीधे विशाल की आँखों में देखकर अपनी बात शुरू की।

आयशा: "विशाल साहब, आप सायमा के बारे में जो कुछ भी सोच रहे हैं... उसे यहीं खत्म कर दीजिए। मैं जानती हूँ आपके पास क्या है, और मैं यह भी जानती हूँ कि आप उसे किस कदर ब्लैकमेल कर रहे हैं।"

विशाल एक मिनट के लिए सन्न रह गया, "आप क्या कह रही हैं, मैं समझा नहीं।"

आयशा: "विशाल जी, मैं आपको समझदार इंसान समझती हूँ। सायमा ने मेरे साथ वो सारे राज़ साझा किए हैं—कैसे वो आपके प्यार में पागल हुई और कैसे आपके पास उसके कुछ संदेश और तस्वीरें हैं, जिन्हें लेकर आप उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं।"

विशाल के चेहरे पर जो शिकारी वाली मुस्कान थी, वह आयशा की बात सुनकर एक पल के लिए गायब हुई, और उसने मन ही मन सायमा को एक गंदी गाली दी, पर अगले ही पल उसकी आँखों में एक और भी ज़्यादा ज़हरीली और हवस भरी चमक लौट आई।

उसने आयशा के उस नूरानी और पुष्ट वजूद को ऊपर से नीचे तक निहारा। आयशा की शराबी रंग की साड़ी उस मद्धम रोशनी में उनके दूधिया बदन से चिपक कर उनके अंगों की हर गोलाई को साफ़ ज़ाहिर कर रही थी।

विशाल (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "तो सायमा की खाला उसे बचाने के लिए मेरे पास आई हैं! मैं तो इसे पहले ही फँसाना चाहता था, अब तो यह और भी आसान हो गया है। यह तो एक ऐसी 'बड़ी मछली' है जो खुद चलकर जाल के करीब आई है। अब सायमा के साथ-साथ इसकी अकड़ भी यही ढीली करूँगा।"

विशाल ने डरने के बजाय एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उसके मज़बूत सीने और आयशा के मखमली और उभरे हुए सीने के बीच महज़ एक इंच का फासला था। आयशा को विशाल के बदन की गर्मी और उसके अत्तर की तेज़ महक महसूस हो रही थी।

विशाल: (अपनी आवाज़ को और भी गहरा बनाते हुए) "ओह... तो सायमा ने अपनी 'हसीन खाला' को सब बता दिया? मुझे अंदाज़ा नहीं था कि वह इतनी कमज़ोर निकलेगी। पर आयशा जी... आपने यहाँ आकर अपनी मुश्किल कम नहीं की, बल्कि बढ़ा ली है।"

उसने अपना हाथ हवा में उठाया और आयशा के गोरे कंधे के पास लटक रहे साड़ी के पल्लू को अपनी उंगलियों से छूने लगा।

आयशा का दिल उस वेलवेट ब्लाउज के नीचे किसी कैद परिंदे की तरह फड़फड़ा रहा था। विशाल की नज़रों की बेबाकी उनके मखमली जिस्म को बिना छुए ही जैसे छील रही थी।

आयशा (मन में): "या अल्लाह... ये तो और भी ज़्यादा खतरनाक निकला। इसे सायमा के राज़ खुलने का डर नहीं है, बल्कि ये तो मेरी इस पुष्ट काया को भी अपनी हवस का निशाना बनाना चाहता है। इसकी उंगलियाँ मेरे पल्लू के पास रेंग रही हैं, और मेरा बदन खौफ के मारे पत्थर हो रहा है। पर मुझे पीछे नहीं हटना… सायमा की इज़्ज़त का सवाल है। मुझे इस भेड़िये को दिखाना होगा कि मैं डरी नहीं हूँ।"

आयशा : (एक धीमी आवाज़ में) "तो आप क्या चाहते हैं उन तस्वीरों और संदेशों को मिटाने के लिए? उसकी शादी हो रही है, खुदा के लिए उसे ब्लैकमेल करना बंद कीजिए। वह तो खुदकुशी करने वाली थी, मैंने ही उसे समझाया कि ऐसा मत कर। अगर वह जान दे देती, तो पूरे खानदान की बदनामी होती, पर याद रखिए, आप भी कानून के हाथों बच नहीं पाते।"

विशाल ने गहरी सांस ली और आगे झुकते हुए आयशा की आंखों में घूरकर देखा। उसके चेहरे पर अब किसी तरह का डर नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश वाली मुस्कान थी। उसे लग रहा था कि आयशा के डर और ममता का फायदा उठाकर वह न सिर्फ सायमा को अपनी मुट्ठी में रखेगा, बल्कि आयशा को भी अपने इशारों पर नचा सकेगा।

"आयशा जी, मैं आपकी बातों से बहुत प्रभावित हो गया हूँ," विशाल ने झुकते हुए फुसफुसाकर कहा, "सौदा सायमा का था, और मैं भी नहीं चाहता कि वह खुदकुशी करे, पर इसमें मेरा क्या फायदा?"

उसने अपनी नज़रों को आयशा के चेहरे पर टिका दिया। "इतना बड़ा नुकसान सहकर मैं वो तस्वीरें डिलीट कर दूँ? आखिर मुझे भी तो अपनी मेहनत का कुछ फल मिलना चाहिए। अब आप ही बताइए, सायमा की आबरू बचाने के लिए आप मुझे क्या कीमत दे सकती हैं?"

आयशा के मुँह से अचानक निकल गया, "आप आखिर चाहते क्या हैं?"

विशाल: "आयशा जी... सायमा तो बस एक कच्ची कली थी। पर आप... आप तो एक मुकम्मल जन्नत हैं। अगर आप चाहती हैं कि सायमा के वे मैसेज और तस्वीरें कभी दुनिया के सामने न आएँ, तो आपको मुझसे सौदा करना होगा।"

उसकी नज़रें आयशा के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर गड़ी थीं, जहाँ आयशा के पुष्ट और रसीले मम्मे तेज़ धड़कनों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे।

विशाल: "अगर आप चाहती हैं कि अकरम को कभी पता न चले कि उसकी होने वाली बीवी कितनी 'रंगीन' मिज़ाज थी... तो आपको मुझे कुछ ऐसा देना होगा जो उस कली से कहीं ज़्यादा रसीला और अनुभवी हो। आप समझ रही हैं न मैं क्या चाह रहा हूँ?"

विशाल ने एक गहरी और भूखी नज़र आयशा के वजूद पर डाली, जैसे वह उसे अपनी आँखों से ही पी जाना चाहता हो। उसने एक कुटिल मुस्कान के साथ बोला, "चाहत तो मेरी बहुत बड़ी है आयशा जी, और उसे पूरा करने की ताकत अब सिर्फ आपके पास है। अगर आप चाहती हैं कि वो तस्वीरें और मैसेज हमेशा के लिए दफन हो जाएं, तो आपको सायमा की जगह लेनी होगी।"

विशाल ने अपनी हथेली आयशा की पतली और गोरी कमर पर जमा दी, जहाँ साड़ी का कपड़ा थोड़ा हटा हुआ था। उसकी गर्म छुअन अम्मी के मखमली मांस में धँस रही थी।

अम्मी के ख्यालात

अम्मी का पूरा बदन विशाल के उस गंदे स्पर्श से सिहर उठा। उनकी सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूंदें अब और भी नुमाया थीं।

अम्मी (मन में): "या अल्लाह... ये तो सरेआम मेरे मखमली बदन की बोली लगा रहा है। इसकी आँखों में वही दरिंदगी है जो उस रात ट्रेन के उन गुंडों में थी। पर ये उनसे कहीं ज़्यादा शातिर है।"

विशाल की हथेली अभी भी अम्मी की पतली और गोरी कमर पर जमी हुई थी, जिसका अहसास अम्मी के मखमली बदन में बिजली की तरह दौड़ रहा था।

आयशा के मुँह से अचानक निकल गया, "कोई और रास्ता नहीं है क्या? मैं शादीशुदा हूँ, एक जवान बच्ची की माँ हूँ... मैं भला कैसे सायमा की जगह ले सकती हूँ?"

विशाल ने आयशा की घबराहट का लुत्फ उठाते हुए उनके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसकी छाती अब आयशा के वक्ष को छू रही थी और उसका हाथ अभी भी आयशा की नंगी कमर को सहला रहा था। उसकी नज़रों में अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ बेबाक हवस और जीत का नशा था।

"शादीशुदा होने से क्या फर्क पड़ता है आयशा जी? बल्कि तजुर्बेकार औरतें तो और भी ज्यादा दिलकश होती हैं," उसने आयशा के कंधे के पास झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "रही बात आपकी सायमा की, तो उसकी जिंदगी और इज्जत अब आपके ही हाथों में है। आप बस एक बार मेरा दिल खुश कर दीजिए, फिर न सायमा को कोई तकलीफ होगी और न ही आपके घर की चहारदीवारी के बाहर कोई बात जाएगी।"

विशाल: (एक नीच मुस्कान के साथ) "तो आयशा जी, पहला सबक सुन लीजिए। अगले कुछ दिनों के लिए, आप मेरी 'गर्लफ्रेंड' की तरह रहेंगी। जब मेरा मन करेगा, हम फोन पर बातें करेंगे... और जो मैं कहूँगा, वही आप पहनेंगी। मेरी हर ज़िद, मेरा हर हुक्म... आपको मानना होगा।"

उसने अपनी पकड़ अम्मी की सुडौल कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे अम्मी का पुष्ट सीना उसके मज़बूत सीने के और भी करीब आ गया।

विशाल: "अगर आपने मुझे पूरी तरह संतुष्ट रखा और मेरी हर बात मानी, तो मैं सायमा को उसकी ज़िंदगी जीने दूँगा। पर याद रहे... वे तस्वीरें और मैसेज तभी डिलीट होंगे जब मैं चाहूँगा। अगले तीन दिनों तक, जब तक यह शादी मुकम्मल नहीं हो जाती, आप मेरी गुलाम होंगी। मंज़ूर है?"

आयशा की सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूंदें अब जम सी गई थीं। विशाल की बातें उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।

आयशा (मन में): "या अल्लाह... यह तो मुझे अपनी उंगलियों पर नचाना चाहता है। यह चाहता है कि मैं अपनी मखमली देह और अपनी इज़्ज़त इसके पैरों में डाल दूँ। इसकी ये गंदी शर्तें... ये 'गर्लफ्रेंड' वाला ढोंग... ये सब सिर्फ मेरी इस रसीली काया को नोचने का बहाना है। पर सायमा... उस बच्ची की ज़िंदगी दांव पर है। मुझे इस खेल में शामिल होना ही होगा, चाहे मेरा बदन इस जिल्लत से कितना ही क्यों न कांपे। मुझे हाँ कहना ही होगा।"

आयशा ने अपनी नशीली आँखें धीरे से उठायीं। उनकी पलकें गीली थीं।

आयशा: (एक दबी हुई और कांपती आवाज़ में) "मंज़ूर है... विशाल साहब। सायमा की ज़िंदगी के लिए, मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ। पर याद रहे, अगर आपने अपना वादा तोड़ा, तो एक औरत क्या कर सकती है, ये आप सोच भी नहीं सकते।"
 
अध्याय 8

स्टेज पर जब एक पुराण, रूहानी रोमांटिक गाना गूंजा, तोह अम्मी की कौसिन्स ने शोर मचाते हुए उन्हें घेर लिया. अम्मी पहले तोह झिझकी, अपने मखमली पल्लू को उँगलियों में भींषःकार मन करती रही, पर फिर संगीत की उस मदहोश लहार ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया. और फिर जो हुआ, वह महज़ नाच नहीं, हुस्न का एक ज़लज़ला था.

उनकी शराबी रंग की जारजट साड़ी उनके जिस्म के साथ एक जान हो गयी थी. जब वह गोल घूमती, तोह साड़ी का घेरा हवा में एक मुकम्मल दायरा बनता, जैसे कोई गहरा नशा हवा में तैर रहा हो. हर ठुमके के साथ अम्मी के पुष्ट कूल्हों की लचक उस बारीक कपडे के नीचे से साफ़ झलक रही थी.

नृत्य के जोश में उनका पल्लू कंधे से फिसलकर उनकी गोरी बाहों पर आ टिका, और हर बार जब वह अपनी कमर मटकाती, तोह उनके वेलवेट ब्लाउज और साड़ी के बीच से उनकी दूधिया सफ़ेद कमर की एक बिजली सी कौंध जाती. अम्मी के चेहरे पर उस वक़्त कोई बंदिश नहीं थी; वह बरसों की क़ैद के बाद जैसे आज़ादी की पहली सांस ले रही थी.

भीड़ के बीच खड़ा विशाल एक पत्थर की मूरत बन गया था. उसका गहरी आँखें अम्मी के रसीले बदन के हर मूवमेंट को ऐसे सोख रही थी जैसे कोई प्यासा मरुस्थल बारिश की बूंदों को. वह अम्मी के भरे हुए सीने की धड़कन और उनके जिस्म की हर लचक को अपनी याददाश्त में क़ैद कर रहा था.

जब गाना ख़तम हुआ, तोह अम्मी तेज़ सांसें लेती हुई, पसीने की नन्नी बूंदों से चमकते चेहरे के साथ एक टेबल पर पानी पीने रुकी. विशाल साये की तरह उनके पास पहुँच गया.

विशाल: (एक गहरी सरगोशी में, अम्मी के कान के पास झुकककर)

"भाभी... आपने तोह आज इस महफ़िल में आग लगा दी. खुदा की कसम, ऐसा मंज़र मैंने आज तक नहीं देखा."

अम्मी ने शर्माकर अपनी लम्बी पलकें झुका ली, पर उनके मखमली गालों की लाली बढ़ गयी.

अम्मी:

"अरे नहीं… बस कौसिन्स की ज़िद थी. बचपन का शौक है, बस वही निकल आया."

विशाल:

"यह शौक नहीं, क़यामत ढाने का हुनर है. ऐसा हुनर जो किसी की भी रातों की नींदें उदा सकता है." वह एक पल रुका, उसकी नज़रें अम्मी के सुराहीदार गले पर जमी थी. "ज़्यादा थक तोह नहीं गयी आप?"

अम्मी: (गहरी सांस लेते हुए, जिससे उनका पुष्ट सीना और भी उभर आया) "जी… थोड़ी सी."

विशाल: (एक शरारती और हवस भरी मुस्कान के साथ) "अच्छा है... वर्ण यहाँ मौजूद मर्दों के दिल थक जाते आपको dekhte-dekhte."

अम्मी का अंदरूनी द्वंद्व (अम्मी के खयालात)

अम्मी खिलखिलाकर हंस पड़ी, पर उनके ज़ेहन में एक अलग hi जंग छिड़ी थी.

अम्मी (मन में): "या ,.', यह मर्द कितना बेबाक है. इसकी बातें सीधे मेरे जिस्म की हरारत बढ़ा रही हैं. पर मुझे हंसना होगा… मुझे इसे किसी तरह राज़ी करना होगा, ताकि यह सीमा का पीछा छोड़ दे."

मैं बैठा यह सब देख रहा था और मेरे पेट में एक अजीब सी ऐंठन उठ रही थी. अम्मी उस अजनबी से इतनी बेतकल्लुफ कैसे हो सकती थी?

वह जिस तरह उसकी बातों पर हंस रही थी और baar-baar अपनी शराबी साड़ी का पल्लू संभाल रही थी, वह मुझे बेचैन कर रहा था.

पूरी शाम मैं उन पर नज़र रखे हुए था. उनकी नज़रें baar-baar एक दुसरे से टकराती और फिर झट से हैट जाती.

कुछ देर बाद, जब भीड़ कबाब काउंटर की तरफ उमड़ पड़ी, तोह मैंने देखा की अम्मी और विशाल फिर से aamne-saamne थे. मसालेदार धुंए और कबाबों की खुशबू के बीच, उन दोनों के बीच की केमिस्ट्री अब एक खतरनाक मोड़ ले रही थी.

अम्मी की शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनके कंधे से सरक कर उनकी गोरी और मखमली बांह पर आ गिरा था.

विशाल ने अपनी लम्बी और गठीली ऊँगली अम्मी की प्लेट में रखे सीख कबाब की तरफ उठायी, पर उसकी भूकी निगाहें अम्मी के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर जमी थी जहाँ से उनके पुष्ट सीने का उभार साफ़ नज़र आ रहा था.

विशाल: (एक भारी और नशीली आवाज़ में) "मानना पड़ेगा... आपकी पसंद बहुत अच्छी है, ऐसा जी. हर चीज़ में... चाहे वह ये कबाब हों या ये गहरा शराबी रंग."

अम्मी ने अपनी नशीली आँखों को हल्का सा सिकोड़ा. उनके मखमली जिस्म की हरारत उस धुंए के बीच और भी बढ़ गयी थी.

अम्मी: (एक बेबाक आत्मविश्वास के साथ) "दिल्ली आये और यहाँ के ज़ायके नहीं चखे, तोह क्या ख़ाक दिल्ली आये? यहाँ की हर चीज़ में एक अलग hi नशा है."

विशाल अम्मी के और करीब सरक आया. अब उसके मज़बूत सीने और अम्मी के मखमली बदन के बीच महज़ कुछ इंच का फासला था. अम्मी के बदन से उठती चमेली की खुशबू विशाल के नथुनों को पागल कर रही थी.

विशाल:

"सुना है दिल्ली का खाना लोगों को अपना दीवाना बना देता है... पर कुछ ज़ायके ऐसे होते हैं जो इंसान को ta-umr के लिए अपना ग़ुलाम बना लें."

अम्मी ने अपनी लम्बी सुराहीदार गर्दन को थोड़ा तिरछा किया और एक ऐसी कातिलाना मुस्कान दी जिसने विशाल के कलेजे में छूरी चला दी.

अम्मी:

"सिर्फ खाना hi? या दिल्ली की कुछ और चीज़ें भी?"

विशाल थोड़ा और नीचे झुका, उसकी आवाज़ अब एक गहरी सरगोशी बन चुकी थी जो सीधे अम्मी के कानों को छु रही थी.

विशाल:

"कुछ चीज़ें तोह पहली नज़र में hi कातिल हो जाती हैं, ऐसा जी. उनके लिए खाने का बहाना नहीं करना पड़ता... बस एक दीदार hi काफी होता है."

ऐसा के खयालात

पहली बार किसी अनजान मर्द के मुंह से अपना naam—'Aisha'—sunkar ऐसा के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी. उनके गुलाबी होंठ हलके से कांप उठे.

ऐसा (मन में): "या ,.'... इसने मेरा नाम जिस लहजे में लिया, ऐसा लगा जैसे इसने मुझे सरेआम बिना कपड़ों के कर दिया हो. इसका यह बेबाकपन... इसकी ये कातिल नज़रें जो सीधे मेरे सीने की ढलान पर गाड़ी हैं. मुझे डर लग रहा है, पर मुझे रुकना नहीं है. सीमा को बचाने के लिए मुझे इसे अपने करीब आने देना होगा. इसे लग्न चाहिए की मैं इसके जाल में फँस रही हूँ."

कबाब काउंटर से उठते धुंए और महफ़िल के शोर के बीच, ऐसा ने वह कदम उठाया जिसने इस खेल की बिसात hi बदल दी. उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनकी मखमली और गोरी बांह पर लहराया, और उन्होंने अपनी नशीली आँखों को विशाल की गहरी नज़रों में गदा दिया.

ऐसा: (विशाल के कान के थोड़ा और करीब झुकते हुए) "विशाल साहब... यहाँ बहुत शोर है और सबकी नज़रें हम पर हैं. मुझे आपसे कुछ निजी बात करनी है. क्या हम उन फूलों की झाड़ियों के पीछे चल सकते हैं? वहां थोड़ी ख़ामोशी होगी."

विशाल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान फैल गयी. उसके चौड़े कन्धों में एक अजीब सी अकड़ आ गयी.

विशाल (मन में): "उफ़... कमाल है! मुझे लगा था इस 'ऐसा' को फंसने में वक़्त लगेगा, पर यह तोह खुद hi इस कातिलाना बदन को अँधेरे की तरफ ले जा रही है. अकरम की ये पुष्ट और रसीली भाभी तोह सीमा से कहीं ज़्यादा गरम और आनुभविक निकली."

ऐसा ने अपनी लम्बी सुराहीदार गर्दन को हल्का सा झटका दिया और अपनी साड़ी को संभालते हुए उन घनी और खुशबूदार झाड़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए. विशाल साये की तरह उनके पीछे हो लिया.

ऐसा के चलने के अंदाज़ में एक ऐसी कातिलाना लचक थी की उनकी चौड़ी कमर और भारी कूल्हों का उभार उस पारदर्शी साड़ी के नीचे से विशाल की हवस को और भी भड़का रहा था.

झाड़ियों के पीछे पहुँचते hi मोगरे और चमेली की खुशबू और भी गाढ़ी हो गयी. रौशनी मद्धम थी, सिर्फ दूर से आती फेयरी लाइट्स ऐसा के दूधिया बदन पर जुगनुओं की तरह चमक रही थी.

विशाल जैसे hi ऐसा के करीब पहुंचा, उसने अपना हाथ ऐसा की पतली और गोरी कमर की तरफ बढ़ाने की कोशिश की, पर ऐसा ने बड़ी नज़ाकत से एक कदम पीछे हटा लिया. उनके भरे हुए सीने की धड़कन अब तेज़ थी.

ऐसा (मन में): "या ,.'... इस दरिंदे को लग रहा है की मैं इसके हुस्न के जाल में फँस गयी हूँ. इसे अपनी इस मर्दानगी पर कितना गुमान है. पर इसे क्या मालुम की मैं यहाँ अपनी नुमाइश करने नहीं, बल्कि सीमा की ज़िन्दगी का सौदा करने आयी हूँ. मुझे इसे समझाना होगा, या शायद डराना होगा... पर इस कातिल अँधेरे इन इसके इतने करीब होना मेरे लिए भी एक आग का दरिया है."

विशाल ने अपनी आवाज़ को और भी भारी और कामुक बनाते हुए कहा:

विशाल:

"तोह कहिये ऐसा जी... ऐसी क्या बात है जो आप कहना चाहती हैं? यकीन मानिये, आपकी हर बात सुनने के लिए मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा सकता हूँ."

ऐसा ने अपनी मखमली और कोमल उँगलियों से झाडी के एक फूल को छुआ और फिर सीधे विशाल की आँखों में देखकर अपनी बात शुरू की.

ऐसा: "विशाल साहब, आप सीमा के बारे में जो कुछ भी सोच रहे हैं... उसे यहीं ख़तम कर दीजिये. मैं जानती हूँ आपके पास क्या है, और मैं यह भी जानती हूँ की आप उसे किस कदर ब्लैकमेल कर रहे हैं."

विशाल एक मिनट के लिए सन्न रह गया, "आप क्या कह रही हैं, मैं समझा नहीं."

ऐसा: "विशाल जी, मैं आपको समझदार इंसान समझती हूँ. सीमा ने मेरे साथ वह सारे राज़ साझा किये hain—kaise वह आपके प्यार में पागल हुई और कैसे आपके पास उसके कुछ सन्देश और तसवीरें हैं, जिन्हें लेकर आप उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं."

विशाल के चेहरे पर जो शिकारी वाली मुस्कान थी, वह ऐसा की बात सुनकर एक पल के लिए गायब हुई, और उसने मन hi मन सीमा को एक गन्दी गाली दी, पर अगले hi पल उसकी आँखों में एक और भी ज़्यादा ज़हरीली और हवस भरी चमक लौट आयी.

उसने ऐसा के उस नूरानी और पुष्ट वजूद को ऊपर से नीचे तक निहारा. ऐसा की शराबी रंग की साड़ी उस मद्धम रौशनी में उनके दूधिया बदन से चिपक कर उनके अंगों की हर गोलाई को साफ़ ज़ाहिर कर रही थी.

विशाल (मन hi मन मुस्कुराते हुए): "तोह सीमा की खाला उसे बचाने के लिए मेरे पास आयी हैं! मैं तोह इसे पहले hi फंसाना चाहता था, अब तोह यह और भी आसान हो गया है. यह तोह एक ऐसी 'बड़ी मछली' है जो खुद चलकर जाल के करीब आयी है. अब सीमा के saath-saath इसकी अकड़ भी यहीं ढीली करूंगा."

विशाल ने डरने के बजाये एक कदम और आगे बढ़ाया. अब उसके मज़बूत सीने और ऐसा के मखमली और उभरे हुए सीने के बीच महज़ एक इंच का फासला था. ऐसा को विशाल के बदन की गर्मी और उसके अत्तार की तेज़ महक महसूस हो रही थी.

विशाल: (अपनी आवाज़ को और भी गहरा बनाते हुए) "ओह... तोह सीमा ने अपनी 'हसीं खाला' को सब बता दिया? मुझे अंदाजा नहीं था की वह इतनी कमज़ोर निकलेगी. पर ऐसा जी... आपने यहाँ आकर अपनी मुश्किल काम नहीं की, बल्कि बढ़ा ली है."

उसने अपना हाथ हवा में उठाया और ऐसा के गोर कंधे के पास लटक रहे साड़ी के पल्लू को अपनी उँगलियों से छूने लगा.

ऐसा का दिल उस वेलवेट ब्लाउज के नीचे किसी क़ैद परिंदे की तरह फड़फड़ा रहा था. विशाल की नज़रों की बेबाकी उनके मखमली जिस्म को बिना छुए hi जैसे छील रही थी.

ऐसा (मन में): "या ,.'... ये तोह और भी ज़्यादा खतरनाक निकला. इसे सीमा के राज़ खुलने का डर नहीं है, बल्कि ये तोह मेरी इस पुष्ट काय को भी अपनी हवस का निशाना बनाना चाहता है. इसकी उँगलियाँ मेरे पल्लू के पास रेंग रही हैं, और मेरा बदन खौफ के मारे पत्थर हो रहा है. पर मुझे पीछे नहीं हटना… सीमा की इज़्ज़त का सवाल है. मुझे इस भेड़िये को दिखाना होगा की मैं दरी नहीं हूँ."

ऐसा: (एक धीमी आवाज़ में) "तोह आप क्या चाहते हैं उन तस्वीरों और संदेशों को मिटाने के लिए? उसकी शादी हो रही है, खुदा के लिए उसे ब्लैकमेल करना बंद कीजिये. वह तोह ख़ुदकुशी करने वाली थी, मैंने hi उसे समझाया की ऐसा मत कर. अगर वह जान दे देती, तोह पूरे खानदान की बदनामी होती, पर याद रखिये, आप भी कानून के हाथों बच नहीं पाते."

विशाल ने गहरी सांस ली और आगे झुकते हुए ऐसा की आँखों में घूरकर देखा. उसके चेहरे पर अब किसी तरह का डर नहीं, बल्कि एक गहरी साज़िश वाली मुस्कान थी. उसे लग रहा था की ऐसा के डर और ममता का फायदा उठाकर वह न सिर्फ सीमा को अपनी मुट्ठी में रखेगा, बल्कि ऐसा को भी अपने इशारों पर नचा सकेगा.

"ऐसा जी, मैं आपकी बातों से बहुत प्रभावित हो गया हूँ," विशाल ने झुकते हुए फुसफुसाकर कहा, "सौदा सीमा का था, और मैं भी नहीं चाहता की वह ख़ुदकुशी करे, पर इसमें मेरा क्या फायदा?"

उसने अपनी नज़रों को ऐसा के चेहरे पर टिका दिया. "इतना बड़ा नुक्सान सहकर मैं वह तसवीरें डिलीट कर दूँ? आखिर मुझे भी तोह अपनी म्हणत का कुछ फल मिलना चाहिए. अब आप hi बताइये, सीमा की आबरू बचाने के लिए आप मुझे क्या कीमत दे सकती हैं?"

ऐसा के मुंह से अच्चानक निकल गया,

"आप आखिर चाहते क्या हैं?"

विशाल:

"ऐसा जी... सीमा तोह बस एक कच्ची काली थी. पर आप... आप तोह एक मुकम्मल जन्नत हैं. अगर आप चाहती हैं की सीमा के वह मैसेज और तसवीरें कभी दुनिया के सामने न आएं, तोह आपको मुझसे सौदा करना होगा."

उसकी नज़रें ऐसा के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर गाड़ी थी, जहाँ ऐसा के पुष्ट और रसीले मम्मी तेज़ धड़कनों के साथ oopar-neeche हो रहे थे.

विशाल:

"अगर आप चाहती हैं की अकरम को कभी पता न चले की उसकी होने वाली बीवी कितनी 'रंगीन' मिज़ाज थी... तोह आपको मुझे कुछ ऐसा देना होगा जो उस काली से कहीं ज़्यादा रसीला और आनुभविक हो. आप समझ रही हैं न मैं क्या छह रहा हूँ?"

विशाल ने एक गहरी और भूकी नज़र ऐसा के वजूद पर डाली, जैसे वह उसे अपनी आँखों से hi पी जाना चाहता हो. उसने एक कुटिल मुस्कान के साथ बोलै, "चाहत तोह मेरी बहुत बड़ी है ऐसा जी, और उसे पूरा करने की ताकत अब सिर्फ आपके पास है. अगर आप चाहती हैं की वह तसवीरें और मैसेज हमेशा के लिए दफ़न हो जाएं, तोह आपको सीमा की जगह लेनी होगी."

विशाल ने अपनी हथेली ऐसा की पतली और गोरी कमर पर जमा दी, जहाँ साड़ी का कपडा थोड़ा हटा हुआ था. उसकी गर्म छुअन अम्मी के मखमली मांस में धंस रही थी.

अम्मी के खयालात

अम्मी का पूरे बदन विशाल के उस गंदे स्पर्श से सिहर उठा. उनकी सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूँदें अब और भी नुमाया थी.

अम्मी (मन में): "या ,.'... ये तोह सरेआम मेरे मखमली बदन की बोली लगा रहा है. इसकी आँखों में वही दरिंदगी है जो उस रात ट्रैन के उन गुंडों में थी. पर ये उनसे कहीं ज़्यादा शातिर है."

विशाल की हथेली अभी भी अम्मी की पतली और गोरी कमर पर जमी हुई थी, जिसका अहसास अम्मी के मखमली बदन में बिजली की तरह दौड़ रहा था.

ऐसा के मुंह से अच्चानक निकल गया,

"कोई और रास्ता नहीं है क्या? मैं शादीशुदा हूँ, एक जवान बच्ची की माँ हूँ... मैं भला कैसे सीमा की जगह ले सकती हूँ?"

विशाल ने ऐसा की घबराहट का लुत्फ़ उठाते हुए उनके बिलकुल करीब आकर खड़ा हो गया. उसकी छाती अब ऐसा के वक्ष को छु रही थी और उसका हाथ अभी भी ऐसा की नंगी कमर को सहला रहा था. उसकी नज़रों में अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ बेबाक हवस और जीत का नशा था.

"शादीशुदा होने से क्या फर्क पड़ता है ऐसा जी? बल्कि तजुर्बेकार औरतें तोह और भी ज़्यादा दिलकश होती हैं," उसने ऐसा के कंधे के पास झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "रही बात आपकी सीमा की, तोह उसकी ज़िन्दगी और इज़्ज़त अब आपके hi हाथों में है. आप बस एक बार मेरा दिल खुश कर दीजिये, फिर न सीमा को कोई तकलीफ होगी और न hi आपके घर की chahar-deewari के बाहर कोई बात जायेगी."

विशाल: (एक नीच मुस्कान के साथ) "तोह ऐसा जी, पहला सबक सुन लीजिये. अगले कुछ दिनों के लिए, आप मेरी 'गर्लफ्रेंड' की तरह रहेंगी. जब मेरा मन करेगा, हम फ़ोन पर बातें करेंगे... और जो मैं कहूंगा, वही आप पहनेंगी. मेरी हर ज़िद, मेरा हर हुक्म... आपको मानना होगा."

उसने अपनी पकड़ अम्मी की सुडौल कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे अम्मी का पुष्ट सीना उसके मज़बूत सीने के और भी करीब आ गया.

विशाल:

"अगर आपने मुझे पूरी तरह संतुष्ट रखा और मेरी हर बात मानी, तोह मैं सीमा को उसकी ज़िन्दगी जीने दूंगा. पर याद रहे... वह तसवीरें और मैसेज तभी डिलीट होंगे जब मैं चाहूंगा. अगले तीन दिनों तक, जब तक यह शादी मुकम्मल नहीं हो जाती, आप मेरी ग़ुलाम होंगी. मंज़ूर है?"

ऐसा की सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूँदें अब जैम सी गयी थी. विशाल की बातें उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी.

ऐसा (मन में): "या ,.'... यह तोह मुझे अपनी उँगलियों पर नचाना चाहता है. यह चाहता है की मैं अपनी मखमली देहा और अपनी इज़्ज़त इसके पैरों में दाल दूँ. इसकी ये गन्दी शर्तें... ये 'गर्लफ्रेंड' वाला ढोँग... ये सब सिर्फ मेरी इस रसीली काय को नोचने का बहाना है. पर सीमा... उस बच्ची की ज़िन्दगी दांव पर है. मुझे इस खेल में शामिल होना hi होगा, चाहे मेरा बदन इस जिल्लत से कितना hi क्यों न काम्पे. मुझे हाँ कहना hi होगा."

ऐसा ने अपनी नशीली आँखों धीरे से उठायी. उनकी पलकें गीली थी.

ऐसा: (एक दबी हुई और काम्पटी आवाज़ में) "मंज़ूर है... विशाल साहब. सीमा की ज़िन्दगी के लिए, मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ. पर याद रहे, अगर आपने अपना वादा तोडा, तोह एक औरत क्या कर सकती है, ये आप सोच भी नहीं सकते."
 
बोथ वेर्सिओंस अरे पोस्टेड. प्लीज रेट, लिखे & लीव कमैंट्स ों हाउ यू अरे लिकिंग थे स्टोरी सो फार. व्हेन यू लीव कमैंट्स, प्लीज लेट में क्नोव व्हाट यू लिकेड अबाउट थे स्टोरी एंड व्हाट यू वोउल्ड लिखे इन थे फ्यूचर episode. तहत इस थे ओनली वे वे कैन लेट पीपल विथ डॉब्टस क्नोव तहत नॉट आल कमैंट्स अरे फेक.

फॉर में, कमैंट्स प्रोवाइड ा फीडबैक लूप.
 
अध्याय 9

विशाल ने एक ठहाका लगाया और आयशा के मखमली गाल को अपनी उंगलियों से सहलाया।

विशाल: "बहुत खूब! तो चलिए आयशा जी, इस 'प्राइवेट सेरेमनी' का आगाज़ आज से ही करते हैं।“

विशाल ने अपना फोन निकाला और आयशा से कहा, "आप मुझे अपना नंबर दीजिए, मैं अभी आपके फोन पर मिस कॉल करूँगा, उसे सेव कर लेना।" उसकी आवाज़ में एक मालिक जैसा रोब था।

आयशा के फोन पर कॉल आई और उन्होंने नंबर सेव कर लिया। उधर विशाल ने भी आयशा का नंबर सेव किया, लेकिन नाम रखा—'रसीली भाभी'।

विशाल ने अपनी स्क्रीन पर उस नाम को देखते हुए एक गहरी और कुटिल मुस्कान भरी।

विशाल: "याद रहे, मेरा मैसेज आते ही तुम्हारी उंगलियाँ जवाब देने के लिए तैयार होनी चाहिए।"

विशाल ने एक बार चारों तरफ अपनी नज़रें घुमाईं, और जब यकीन हो गया कि उस अंधेरे कोने में कोई तीसरा नहीं है।

विशाल ने झटके से आयशा के सुडौल वजूद को अपनी फौलादी बाहों में खींच लिया।

आयशा के वे पुष्ट और रसीले मम्मे विशाल के मजबूत और चौड़े सीने के नीचे पूरी तरह कुचल गए थे। उस शराबी रंग की साड़ी और महीन ब्लाउज के पार भी अम्मी को विशाल की मर्दानगी की तपिश महसूस हो रही थी।

विशाल के बड़े हाथ आयशा की पतली कमर के उस हिस्से पर जम गए जो साड़ी सरकने की वजह से बिल्कुल नंगा था। उसके हाथों की तपिश आयशा को अपने नंगे और मखमली पेट पर किसी जलते हुए कोयले की तरह महसूस हो रही थी। आयशा के पेट का वह नंगा दूधिया हिस्सा खौफ के मारे अंदर की तरफ सिकुड़ गया। विशाल ने अपनी पूरी हथेली खोल दी और उसके नंगे पेट को सहलाने लगा।

विशाल ने और भी करीब आते हुए कहा, "डरिए मत आयशा जी, आप तो मेरी गर्लफ्रेंड हैं, और मैं चाहता हूँ कि मेरी गर्लफ्रेंड मुझे खुश करें। आप अपने ये रसीले मम्मे मेरी छाती पर रगड़िए।"

उसने आयशा की कमर पर अपनी पकड़ और भी कस ली, जिससे उनके बदन के बीच की दूरी पूरी तरह खत्म हो गई।

आयशा के मुँह से खौफ के मारे चीख निकल गई, "क्या कह रहे हैं आप!"

"क्या हुआ आयशा जी? आप तो सायमा की आबरू का सौदा करने आई थीं ना?" विशाल ने एक हाथ बढ़ाकर उनके चेहरे की लट को कान के पीछे किया, "तो फिर अब कदम पीछे क्यों खींच रही हैं? बस थोड़ा सा सहयोग।"

आयशा की आँखों से आँसू की एक बूंद टपक कर विशाल के हाथ पर गिरी, लेकिन उस पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

विशाल (आयशा के और करीब आते हुए): "रोइए मत, आयशा जी, ये आँसू आपकी खूबसूरती को कम कर रहे हैं। याद रखिए, आज आप यहाँ एक माँ और एक खाला बनकर नहीं, बल्कि मेरी पसंद बनकर खड़ी हैं। अब प्यार से अपनी ये रसीली देह मुझ पर न्योछावर कर दीजिए, वरना...।"

विशाल ने अपना दूसरा हाथ आयशा की गर्दन के पीछे रखा और उनके चेहरे को अपनी तरफ ऊपर उठाया। आयशा ने बेबसी में अपनी आँखें फेर लीं, पर उनका जिस्म विशाल के दबाव में बुरी तरह पिसा जा रहा था।

अम्मी (काँपती आवाज़ में): "विशाल... तुम... तुम बहुत गिरे हुए इंसान हो। खुदा तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा।"

विशाल (ठहाका मारते हुए): "खुदा की फिक्र आप कीजिए आयशा जी, मैं तो फिलहाल इस जन्नत का मजा लेना चाहता हूँ जो मेरे सामने खड़ी है। अब बहाने छोड़िए और वो कीजिए जो मैंने कहा है... वरना अंजाम की जिम्मेदार आप खुद होंगी।"

आयशा की सिसकियाँ अब एक बेबस सरेंडर में तब्दील होने लगी थीं। सायमा की जिंदगी बचाने के लिए उसने भारी मन से अपने जिस्म को हरकत दी।

वह धीरे-धीरे अपने बदन को ऊपर-नीचे करने लगी, जिससे उन दोनों के जिस्मों के बीच एक तीव्र रगड़ पैदा हुई। विशाल के सीने के साथ उसके वक्षों का वह घर्षण आयशा को अंदर तक शर्मसार कर रहा था, लेकिन विशाल के लिए यह किसी नशीली जीत से कम नहीं था।

विशाल ने अपनी आँखें मूँद लीं और उस सिहरन का लुत्फ उठाने लगा। उसके हाथों की पकड़ आयशा की कमर पर और भी ज़्यादा हिंसक हो गई।

विशाल (भारी और हवस भरी आवाज़ में): "हाँ... बिल्कुल ऐसे ही आयशा जी। आपकी ये नरमा हट और ये बेचैनी... मुझे पागल कर रही है।"

विशाल ने उसे और ज़ोर से अपनी तरफ खींच लिया, जिससे आयशा का पेट उसकी मर्दानगी की कठोरता को और भी साफ़ महसूस करने लगा। आयशा का चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया था और वह चाहकर भी अपनी नज़रों को विशाल की आँखों से नहीं मिला पा रही थी।

विशाल: "रुकिए मत... जारी रखिए। आज मुझे महसूस होना चाहिए कि सायमा की खाला उसे बचाने के लिए किस हद तक जा सकती हैं।"

विशाल ने आयशा के कान के पास अपनी गर्म और भारी साँसें छोड़ते हुए कहा, "आयशा जी, अब मेरा यह हाथ जो आपकी नंगी कमर और पेट पर है, इसे आप खुद ऊपर ले जाइए... इसे अपने इन रसीले मम्मों पर रखिए। और फिर, आपको अपने हाथों से मेरे हाथों को दबाना होगा।"

आयशा का पूरा वजूद काँप उठा। शर्म और ज़िल्लत की एक लहर उनके सिर से पाँव तक दौड़ गई। एक माँ और एक इज़्ज़तदार खाला के लिए इससे बड़ी अग्निपरीक्षा और क्या हो सकती थी?

आयशा ने काँपते हुए हाथों से विशाल के भारी हाथ को पकड़ा। उन्होंने धीरे-धीरे विशाल के हाथ को अपने पेट से ऊपर की ओर सरकाना शुरू किया। जब विशाल की हथेली उनके रेशमी ब्लाउज के ऊपर से उनके पुष्ट वक्षों पर टिकी, तो आयशा की एक दबी हुई सिसकी निकल गई।

विशाल (अपनी पकड़ मजबूत करते हुए): "शर्माइए मत आयशा जी... अब दबाइए मेरे हाथ को। मुझे महसूस होना चाहिए कि आप अपनी मर्जी से यह सब कर रही हैं।"

आयशा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और रुँधे हुए गले से विशाल के हाथ को अपने सीने पर भींच लिया। विशाल ने हवस के मारे एक गहरी साँस ली, उसे आयशा के जिस्म की हरारत और उनकी मजबूरी का यह मेल बहुत सुकून दे रहा था। वह समझ चुका था कि अब आयशा पूरी तरह उसके काबू में आ चुकी हैं।

विशाल ने पहले तो सिर्फ उनके मम्मों की गोलाई को महसूस किया, फिर धीरे-धीरे वह अपनी हथेलियों से उनके उभारों को टटोलने लगा। जैसे-जैसे उसकी पकड़ मजबूत होती गई, उसने दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। आयशा के जिस्म में इस अनचाहे स्पर्श की वजह से एक अजीब सी सिहरन और सनसनी दौड़ने लगी, जिसे वह चाहकर भी नहीं रोक पा रही थीं।

उनके हलक से एक दबी हुई आह निकल गई—"उह्ह्ह…"

विशाल ने जब उनके मुँह से निकली वह मदहोश कर देने वाली आवाज़ सुनी, तो उसकी हवस और भी बढ़ गई। उसने अपने हाथों का दबाव और तेज़ कर दिया, जैसे वह उन पुष्ट वक्षों को अपने हाथों में मसल देना चाहता हो।

विशाल (आयशा के चेहरे के बिल्कुल करीब आकर): "देखा, आयशा जी? आपका जिस्म भी वही चाह रहा है जो मैं चाह रहा हूँ। ये आहें झूठ नहीं बोलतीं। आप भले ही ज़ुबान से नफरत दिखाएं, पर आपकी ये धड़कनें और ये आवाज़ें बता रही हैं कि आपको भी इस खेल में मज़ा आ रहा है।"

आयशा ने शर्म के मारे अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया, मगर विशाल के हाथों का वह बढ़ता हुआ दबाव उनके पूरे वजूद को झकझोर रहा था। वह जितनी कोशिश करतीं खुद को संभालने की, विशाल की मर्दानगी और उसकी छुअन उन्हें उतना ही बेबस करती जा रही थी।

विशाल ने आयशा की आँखों में अपनी हवस भरी नज़रें गड़ाते हुए आदेश दिया, "अब आप अपने हाथ से मेरे हाथ को पकड़कर अपने ब्लाउज और ब्रा के नीचे ले जाइए। मैं अपनी गर्लफ्रेंड के इन मम्मों को नंगा पकड़ना चाहता हूँ।"

आयशा के कानों में उसकी यह माँग किसी बम की तरह फटी। उनकी रूह तक काँप गई। अभी तक तो विशाल कपड़ों के ऊपर से ही ज़बरदस्ती कर रहा था, मगर अब उसकी माँगें शर्मो-हया की सारी हदें पार कर रही थीं।

विशाल (अपनी आवाज़ को और भारी करते हुए): "देर मत कीजिए, आयशा जी। जितना आप झिझकेंगी, उतनी ही देर सायमा उन तस्वीरों की गिरफ्त में रहेगी। क्या आप नहीं चाहतीं कि मैं अपना फोन निकालूँ और सब कुछ अभी के अभी डिलीट कर दूँ? तो फिर मेरे हाथ को अंदर ले जाइए।"

आयशा ने एक लंबी और ठंडी साँस ली। उनकी आँखों से आँसू अब लगातार बह रहे थे। उन्होंने काँपते हुए हाथों से विशाल की मज़बूत हथेली को फिर से थामा। उनके हाथ की उंगलियों ने विशाल के खुरदरे हाथ को उनके ब्लाउज के किनारों की ओर ले जाना शुरू किया।

जैसे ही विशाल की उंगलियों ने आयशा की छाती की रेशमी त्वचा को सीधे छुआ, आयशा के पूरे बदन में एक बिजली सी दौड़ गई। विशाल ने अपनी उंगलियों को और अंदर धकेला और उनकी नंगी त्वचा को अपनी हथेली में भर लिया।

विशाल (मदहोशी में फुसफुसाते हुए): "उफ़्फ़... आयशा जी... ये तो रेशम से भी ज़्यादा नरम हैं। आप तो वाकई कयामत हैं।"

विशाल की उंगलियाँ अब आयशा के ब्लाउज और ब्रा की सीमाओं को पार कर उनके रेशमी बदन की गहराई में उतर चुकी थीं।

उसने अपनी उंगलियों को फैलाया और आयशा के उस पुष्ट उभार को अपनी मुट्ठी में पूरी तरह भर लिया।

आयशा का शरीर बुरी तरह थरथरा उठा। विशाल नंगे वक्ष को अपनी हथेली में मसलना शुरू किया।

विशाल (मदहोशी में फुसफुसाते हुए): "आह्ह... आयशा जी, आपकी यह त्वचा तो बिल्कुल मक्खन जैसी है। कितने नर्म, कितने सुडौल... काश! मैं इन्हें अभी जी भर के देख पाता, पर फिलहाल तो इन्हें सिर्फ महसूस ही कर सकता हूँ।"

विशाल ने अपनी पकड़ को और भी फैला दिया, जैसे वह उसे पूरी तरह महसूस करना चाहता हो; उसकी पकड़ में अब एक अजीब सी ताकत थी।

आयशा की सिसकियाँ अब धीरे-धीरे एक कराह में बदलने लगी थीं और उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं। वह नहीं चाहती थी कि उसके मुँह से कोई आवाज़ निकले, पर उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।

आयशा (बेबसी में सिसकते हुए): "विशाल… बस… अब और नहीं… आपने…"

विशाल (एक कुटिल मुस्कान के साथ): "अभी शुरू हुआ है जानम। अभी तो मैंने सिर्फ छूना शुरू किया है। अब जब मेरा हाथ यहाँ तक पहुँच ही गया है, तो इसे थोड़ा और काम करने दीजिए। अपनी इन आँखों को खोलिए और मेरी तरफ देखिए… मुझे आँखों में वो डर और चाहत देखनी है।"

जब आयशा ने अपनी आँखें नहीं उठाईं, तो विशाल की आवाज़ और भी कठोर हो गई। उसने उसके निप्पल्स पर दबाव बढ़ाते हुए उन्हें बुरी तरह मसला और कड़क लहजे में कहा, "मेरी गर्लफ्रेंड्स मेरे हर हुकुम को मानती हैं, आयशा जी। अगर मैंने कहा है कि मेरी आँखों में देखो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें देखना होगा।"

दर्द और उस अनचाही उत्तेजना की एक लहर आयशा के पूरे शरीर में दौड़ गई। विशाल की उंगलियों की वह सख्त पकड़ उसे चीखने पर मजबूर कर रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ सिर्फ एक दबी हुई कराह बनकर रह गई।

विशाल: "ये पलकें झुकाकर तुम खुद को नहीं बचा सकतीं। तुम्हारी हर धड़कन अब मेरी मर्ज़ी की मोहताज है। अब अपनी ये खूबसूरत आँखें खोलो और देखो कि तुम्हारा मालिक कौन है।"

आयशा ने बेबसी में धीरे-धीरे अपनी पलकें उठाईं। उनकी आँखों में आँसू भरे थे और वे शर्म से लाल हो चुकी थीं। विशाल ने उनकी आँखों में झाँकते हुए एक मुस्कान दी और अपने हाथ का दबाव और भी ज़्यादा बढ़ा दिया, जिससे आयशा का बदन कमान की तरह मुड़ गया।

विशाल: "बेहतरीन... अब लग रहा है कि तुम एक अच्छी और आज्ञाकारी प्रेमिका बनने का हुनर सीख रही हो। इसी तरह मेरी बातों को मानती रहो, तो शायद मैं सायमा के बारे में थोड़ा नरम दिल हो जाऊं।"

तभी विशाल को बाहर से कुछ आहट सुनाई दी। उसने झटके से अपना हाथ आयशा के ब्लाउज के अंदर से निकाला और खुद को दुरुस्त करते हुए आयशा से कहा, "मैं बाहर महफिल में जा रहा हूँ। आप थोड़ी देर में मुझे वहीं मिलिए, और याद रहे, वहाँ आपको मेरे साथ हँस-हँसकर बातें करनी हैं।"

विशाल ने अपनी शर्ट की सिलवटें ठीक कीं और एक आखिरी बार आयशा के बिखरे हुए हुस्न को हवस भरी नज़रों से देखा। आयशा अभी भी काँप रही थीं और अपनी साड़ी का पल्लू सँभालने की कोशिश कर रही थीं।

विशाल : "अगर आपके चेहरे पर ज़रा भी शिकन दिखी या किसी को शक हुआ, तो सायमा का वह वीडियो वायरल होने में एक सेकंड भी नहीं लगेगा। समझ गई आप? अब अपना चेहरा साफ कीजिए और मुस्कराते हुए बाहर आइए।"

आयशा वहीं खड़ी रहीं—उनकी शराबी साड़ी बेतरतीब थी, उनके बालों का जूड़ा ढीला हो चुका था, और उनके पुष्ट सीने पर विशाल की उंगलियों के निशान अभी भी जल रहे थे। वह अपनी इस कातिलाना और बेपनाह खूबसूरती को कोस रही थीं, जो आज एक शैतान की भूख बन चुकी थी। बाहर साहिल अभी भी बेखबर था, जबकि उसकी अम्मी के नूरानी जिस्म पर एक दरिंदे की हवस की मुहर लग चुकी थी।
 
अध्याय 9

विशाल ने एक ठहाका लगाया और ऐसा के मखमली गाल को अपनी उँगलियों से सहलाया.

विशाल:

"बहुत खूब! तो चलिए ऐसा जी, इस 'प्राइवेट सेरेमनी' का आगाज़ आज से hi करते हैं."

विशाल ने अपना फ़ोन निकला और ऐसा से कहा, "आप मुझे अपना नंबर दीजिये, में अभी आपके फ़ोन पर मिस कॉल करूँगा, उसे सेव कर लेना." उसकी आवाज़ में एक मालिक जैसा रॉब था.

ऐसा के फ़ोन पर कॉल आयी और उन्होंने नंबर सेव कर लिया. उधर विशाल ने भी ऐसा का नंबर सेव किया, लेकिन नाम rakha—'Rasili भाभी'.

विशाल ने अपनी स्क्रीन पर उस नाम को देखते हुए एक गहरी और कुटिल मुस्कान भरी.

विशाल:

"याद रहे, मेरा मैसेज आते hi तुम्हारी उँगलियाँ जवाब देने के लिए तैयार होनी चाहिए."

विशाल ने एक बार चरों तरफ अपनी नज़रें घुमाईं, और जब यकीन हो गया की उस अँधेरे कोने में कोई तीसरा नहीं है.

विशाल ने झटके से ऐसा के सुडौल वजूद को अपनी फौलादी बाँहों में खींच लिया.

ऐसा के वे पुष्ट और रसीले मम्मी विशाल के मज़बूत और चौड़े सीने के नीचे पूरी तरह कुचल गए थे. उस शराबी रंग की साड़ी और महीन ब्लाउज के पार भी अम्मी को विशाल की मर्दानगी की तपिश महसूस हो रही थी.

विशाल के बड़े हाथ ऐसा की पतली कमर के उस हिस्से पर जैम गए जो साड़ी सरकने की वजह से बिलकुल नंगा था. उसके हाथों की तपिश ऐसा को अपने नंगे और मखमली पेट पर किसी जलते हुए कोयले की तरह महसूस हो रही थी. ऐसा के पेट का वह नंगा दूधिया हिस्सा खौफ के मरे अंदर की तरफ सिकुड़ गया. विशाल ने अपनी पूरी हथेली खोल दी और उसके नंगे पेट को सहलाने लगा.

विशाल ने और भी करीब आते हुए कहा, "डरिये मत ऐसा जी, आप तो मेरी गर्लफ्रेंड हैं, और में चाहता हूँ की मेरी गर्लफ्रेंड मुझे खुश करें. आप अपने ये रसीले मम्मी मेरी छाती पर रगडिये."

उसने ऐसा की कमर पर अपनी पकड़ और भी कास ली, जिससे उनके बदन के बीच की दूरी पूरी तरह ख़त्म हो गयी.

ऐसा के मुंह से खौफ के मरे चीख निकल गयी, "क्या कह रहे हैं आप!"

"क्या हुआ ऐसा जी? आप तो सीमा की आबरू का सौदा करने आयी थी न?" विशाल ने एक हाथ बढाकर उनके चेहरे की लत को कान के पीछे किया, "तो फिर अब कदम पीछे क्यों खींच रही हैं? बस थोड़ा सा सहयोग."

ऐसा की आँखों से आंसू की एक बूँद टपक कर विशाल के हाथ पर गिरी, लेकिन उस पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

विशाल (ऐसा के और करीब आते हुए): "रोइये मत, ऐसा जी, ये आंसू आपकी खूबसूरती को काम कर रहे हैं. याद रखिये, आज आप यहाँ एक माँ और एक खला बनकर नहीं, बल्कि मेरी पसंद बनकर कड़ी हैं. अब प्यार से अपनी ये रसीली देहा मुझ पर न्योछावर कर दीजिये, वार्ना... ."

विशाल ने अपना दूसरा हाथ ऐसा की गर्दन के पीछे रखा और उनके चेहरे को अपनी तरफ ऊपर उठाया. ऐसा ने बेबसी में अपनी आँखें फेर लीं, पर उनका जिस्म विशाल के दबाव में बुरी तरह पिसा जा रहा था.

अम्मी (कनपटी आवाज़ में): "विशाल... तुम... तुम बहुत गिरे हुए इंसान हो. खुदा तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा."

विशाल (ठहाका मारते हुए): "खुदा की फ़िक्र आप कीजिये ऐसा जी, में तो फिलहाल इस जन्नत का मज़ा लेना चाहता हूँ जो मेरे सामने कड़ी है. अब बहाने छोड़िये और वह कीजिये जो मैंने कहा है... वार्ना अंजाम की ज़िम्मेदार आप खुद होंगी."

ऐसा की सिसकियाँ अब एक बेबस सरेंडर में तब्दील होने लगी थीं. सीमा की ज़िन्दगी बचने के लिए उसने भारी मन से अपने जिस्म को हरकत दी.

वह dheere-dheere अपने बदन को upar-neeche करने लगी, जिससे उन दोनों के जिस्मों के बीच एक तीव्र रगड़ पैदा हुई. विशाल के सीने के साथ उसके वक्षों का वह घर्षण ऐसा को अंदर तक शर्मसार कर रहा था, लेकिन विशाल के लिए यह किसी नशीली जीत से काम नहीं था.

विशाल ने अपनी आँखें मूँद लीं और उस सिहरन का लुत्फ़ उठाने लगा. उसके हाथों की पकड़ ऐसा की कमर पर और भी ज़्यादा हिंसक हो गयी.

विशाल (भारी और हवस भरी आवाज़ में): "हाँ... बिलकुल ऐसे hi ऐसा जी. आपकी ये नर्माहट और ये बेचैनी... मुझे पागल कर रही है."

विशाल ने उसे और ज़ोर से अपनी तरफ खींच लिया, जिससे ऐसा का पेट उसकी मर्दानगी की कठोरता को और भी साफ़ महसूस करने लगा. ऐसा का चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया था और वह चाहकर भी अपनी नज़रों को विशाल की आँखों से नहीं मिला प् रही थी.

विशाल: "रुकिए मत... जारी रखिये. आज मुझे महसूस होना चाहिए की सीमा की खला उसे बचने के लिए किस हद तक जा सकती हैं."

विशाल ने ऐसा के कान के पास अपनी गर्म और भारी सांसें छोड़ते हुए कहा, "ऐसा जी, अब मेरा यह हाथ जो आपकी नंगी कमर और पेट पर है, इसे आप खुद ऊपर ले जाइये... इसे अपने इन रसीले मम्मों पर रखिये. और फिर, आपको अपने हाथों से मेरे हाथों को दबाना होगा."

ऐसा का पूरा वजूद काँप उठा. शर्म और ज़िल्लत की एक लहार उनके सर से पाऊँ तक दौड़ गयी. एक माँ और एक इज़्ज़तदार खला के लिए इससे बड़ी अग्निपरीक्षा और क्या हो सकती थी?

ऐसा ने कांपते हुए हाथों से विशाल के भारी हाथ को पकड़ा. उन्होंने dheere-dheere विशाल के हाथ को अपने पेट से ऊपर की ओरे सरकना शुरू किया. जब विशाल की हथेली उनके रेशमी ब्लाउज के ऊपर से उनके पुष्ट वक्षों पर तिकी, तो ऐसा की एक दबी हुई सिसकी निकल गयी.

विशाल (अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए): "शर्माइये मत ऐसा जी... अब दबाइये मेरे हाथ को. मुझे महसूस होना चाहिए की आप अपनी मर्ज़ी से यह सब कर रही हैं."

ऐसा ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और रुंधे हुए गले से विशाल के हाथ को अपने सीने पर भींज लिया. विशाल ने हवस के मरे एक गहरी सांस ली, उसे ऐसा के जिस्म की हरारत और उनके मजबूरी का यह मेल बहुत सुकून दे रहा था. वह समझ चूका था की अब ऐसा पूरी तरह उसके काबू में आ चुकी हैं.

विशाल ने पहले तो सिर्फ उनके मम्मों की गोलाई को महसूस किया, फिर dheere-dheere वह अपनी हथेलियों से उनके उभारों को टटोलने लगा. Jaise-jaise उसकी पकड़ मज़बूत होती गयी, उसने दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया. ऐसा के जिस्म में इस अनचाहा स्पर्श की वजह से एक अजीब सी सिहरन और सनसनी दौड़ने लगी, जिसे वह चाहकर भी नहीं रोक प् रही थीं.

उनके हलक से एक दबी हुई आह निकल gayi—"Uhhhh..."

विशाल ने जब उनके मुंह से निकली वह मदहोश कर देने वाली आवाज़ सुनी, तो उसकी हवस और भी बढ़ गयी. उसने अपने हाथों का दबाव और तेज़ कर दिया, जैसे वह उन पुष्ट वक्षों को अपने हाथों में मसल देना चाहता हो.

विशाल (ऐसा के चेहरे के बिलकुल करीब आकर): "देखा, ऐसा जी? आपका जिस्म भी वही छह रहा है जो में छह रहा हूँ. ये आहें झूठ नहीं बोलतीं. आप भले hi ज़ुबान से नफरत दिखाएं, पर आपकी ये धड़कनें और ये आवाज़ें बता रही हैं की आपको भी इस खेल में मज़ा आ रहा है."

ऐसा ने शर्म के मरे अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया, मगर विशाल के हाथों का वह बढ़ता हुआ दबाव उनके पूरे वजूद को झकझोर रहा था. वह जितनी कोशिश करतीं खुद को सँभालने की, विशाल की मर्दानगी और उसकी छुअन उन्हें उतना hi बेबस करती जा रही थी.

विशाल ने ऐसा की आँखों में अपनी हवस भरी नज़रें गाड़ते हुए आदेश दिया, "अब आप अपने हाथ से मेरे हाथ को पकड़कर अपने ब्लाउज और ब्रा के नीचे ले जाइये. में अपनी गर्लफ्रेंड के इन मम्मों को नंगा पकड़ना चाहता हूँ."

ऐसा के कानों में उसकी यह मांग किसी बेम की तरह फटी. उनकी रूह तक काँप गयी. अभी तक तो विशाल कपड़ों के ऊपर से hi ज़बरदस्ती कर रहा था, मगर अब उसकी मांगें sharmo-haya की साड़ी हदें पार कर रही थीं.

विशाल (अपनी आवाज़ को और भारी करते हुए): "देर मत कीजिये, ऐसा जी. जितना आप झिझकेंगी, उतनी hi देर सीमा उन तस्वीरों की गिरफ्त में रहेगी. क्या आप नहीं चाहतीं की में अपना फ़ोन निकालूँ और सब कुछ अभी के अभी डिलीट कर दूँ? तो फिर मेरे हाथ को अंदर ले जाइये."

ऐसा ने एक लम्बी और ठंडी सांस ली. उनकी आँखों से आंसू अब लगातार बह रहे थे. उन्होंने कांपते हुए हाथों से विशाल की मज़बूत हथेली को फिर से थमा. उनके हाथ की उँगलियों ने विशाल के खुरदरे हाथ को उनके ब्लाउज के किनारों की ओरे ले जाना शुरू किया.

जैसे hi विशाल की उँगलियों ने ऐसा की छाती की रेशमी त्वचा को सीधे छुआ, ऐसा के पूरे बदन में एक बिजली सी दौड़ गयी. विशाल ने अपनी उँगलियों को और अंदर धकेला और उनकी नंगी त्वचा को अपनी हथेली में भर लिया.

विशाल (मदहोशी में फुसफुसाते हुए): "उफ्फ्फ... ऐसा जी... ये तो रेशम से भी ज़्यादा नरम हैं. आप तो वाक़ई क़यामत हैं."

विशाल की उँगलियाँ अब ऐसा के ब्लाउज और ब्रा की सीमाओं को पार कर उनके रेशमी बदन की गहराई में उतर चुकी थीं.

उसने अपनी उँगलियों को फैलाया और ऐसा के उस पुष्ट उभर को अपनी मुट्ठी में पूरी तरह भर लिया.

ऐसा का शरीर बुरी तरह थरथरा उठा. विशाल ने अब किसी जानवर की तरह उनके नंगे वक्ष को अपनी हथेली में मसलना शुरू किया.

विशाल (मदहोशी में फुसफुसाते हुए): "आठ... ऐसा जी, आपकी यह त्वचा तो बिलकुल मक्खन जैसी है. कितने नरम, कितने सुडौल... काश! में इन्हें अभी जी भर के देख पता, पर फिलहाल तो इन्हें सिर्फ महसूस hi कर सकता हूँ."

विशाल ने अपनी पकड़ को और भी फैला दिया, जैसे वह उसे पूरी तरह महसूस करना चाहता हो; उसकी पकड़ में अब एक अजीब सी ताक़त थी.

ऐसा की सिसकियाँ अब dheere-dheere एक कराह में बदलने लगी थीं और उसकी सांसें तेज़ हो गयी थीं. वह नहीं चाहती थी की उसके मुंह से कोई आवाज़ निकले, पर उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था.

ऐसा (बेबसी में सिसकते हुए): "विशाल… बस… अब और नहीं… आपने…"

विशाल (एक कुटिल मुस्कान के साथ): "अभी शुरू हुआ है जानम. अभी तो मैंने सिर्फ छूना शुरू किया है. अब जब मेरा हाथ यहाँ तक पहुँच hi गया है, तो इसे थोड़ा और काम करने दीजिये. अपनी इन आँखों को खोलिये और मेरी तरफ देखिये… मुझे आँखों में वह डर और चाहत देखनी है."

जब ऐसा ने अपनी आँखें नहीं उठायीं, तो विशाल की आवाज़ और भी कठोर हो गयी. उसने उसके निप्पल्स पर दबाव बढ़ाते हुए उन्हें बुरी तरह मसाला और कड़क लहजे में कहा, "मेरी गिर्ल्फ्रेंड्स मेरे हर हुकुम को मानती हैं, ऐसा जी. अगर मैंने कहा है की मेरी आँखों में देखो, तो इसका मतलब है की तुम्हें देखना होगा."

दर्द और उस अनचाही उत्तेजना की एक लहार ऐसा के पूरे शरीर में दौड़ गयी. विशाल की उँगलियों की वह सख्त पकड़ उसे चीखने पर मजबूर कर रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ सिर्फ एक दबी हुई कराह बनकर रह गयी.

विशाल:

"ये पलकें झुककर तुम खुद को नहीं बचा सकती. तुम्हारी हर धड़कन अब मेरी मर्ज़ी की मोहताज है. अब अपनी ये खूबसूरत आँखें खोलो और देखो की तुम्हारा मालिक कौन है."

ऐसा ने बेबसी में dheere-dheere अपनी पलकें उठायीं. उनकी आँखों में आंसू भरे थे और वे शर्म से लाल हो चुकी थीं. विशाल ने उनकी आँखों में झांकते हुए एक मुस्कान दी और अपने हाथ का दबाव और भी ज़्यादा बढ़ा दिया, जिससे ऐसा का बदन कमान की तरह मुद गया.

विशाल:

"बेहतरीन... अब लग रहा है की तुम एक अच्छी और आज्ञाकारी प्रेमिका बनने का हुनर सीख रही हो. इसी तरह मेरी बातों को मानती रहो, तो शायद में सीमा के बारे में थोड़ा नरम दिल हो जॉन."

तभी विशाल को बहार से कुछ आहात सुनाई दी. उसने झटके से अपना हाथ ऐसा के ब्लाउज के अंदर से निकला और खुद को दुरुस्त करते हुए ऐसा से कहा, "में बहार महफ़िल में जा रहा हूँ. आप थोड़ी देर में मुझे वहीँ मिलिए, और याद रहे, वहां आपको मेरे साथ hans-hanskar बातें करनी हैं."

विशाल ने अपनी शर्ट की सिलवटें ठीक कियाँ और एक आखरी बार ऐसा के बिखरे हुए हुस्न को हवस भरी नज़रों से देखा. ऐसा अभी भी कैंप रही थीं और अपनी साड़ी का पल्लू सँभालने की कोशिश कर रही थीं.

विशाल:

"अगर आपके चेहरे पर ज़रा भी शिकन दिखी या किसी को शक हुआ, तो सीमा का वह वीडियो वायरल होने में एक सेकंड भी नहीं लगेगा. समझ गयी आप? अब अपना चेहरा साफ़ कीजिये और मुस्कुराते हुए बहार आइये."

ऐसा वहीँ कड़ी rahin—unki शराबी साड़ी बेतरतीब थी, उनके बालों का जुड़ा ढीला हो चूका था, और उनके पुष्ट सीने पर विशाल की उँगलियों के निशान अभी भी जल रहे थे. वह अपनी इस कातिलाना और बेपनाह खूबसूरती को कोस रही थीं, जो आज एक शैतान की भूक बन चुकी थी. बहार साहिल अभी भी बेखबर था, जबकि उसकी अम्मी के नूरानी जिस्म पर एक दरिंदे की हवस की मुहर लग चुकी थी.
 
अध्याय 10

रात अपनी पूरी जवानी पर थी, और हवेली का जश्न अब एक थकी हुई मदहोशी में ढल रहा था। गेंदे के फूलों की महक उमस भरी हवा में और भी भारी हो गई थी।

मैं बेचैनी से इधर-उधर घूम रहा था, मेरी नज़रें अनजाने में बस अम्मी को ही तलाश रही थीं। और फिर मैंने उन्हें देखा।

वह आँगन के उस कोने में थे, जहाँ गेंदे के फूलों की लड़ियों के पीछे पुरानी दीवार पर बस एक छोटा सा, नर्म रोशनी वाला बल्ब जल रहा था। इस धुंधली रोशनी में वह दुनिया से कटे हुए लग रहे थे। वे लोग बहुत करीब खड़े थे, इतने करीब कि उनके बीच कोई फासला नहीं था।

मैं सुन नहीं सकता था कि वह क्या बात कर थे।

मैंने देखा—मेरा दिल ज़ोर से धड़का—कि विशाल का वह गठीला हाथ अम्मी के दूधिया चेहरे की तरफ बढ़ा। उसकी उंगलियों ने अम्मी के गाल पर झूलती उस रेशमी लट को छुआ। वह स्पर्श महज़ इत्तेफाक नहीं था; वह एक मालिकाना हक था। विशाल की उंगलियाँ अम्मी की मखमली त्वचा को सहलाती हुई उनके कान के पीछे गईं।

और अम्मी? मेरी अम्मी, जो घर की दहलीज लांघने से पहले सौ बार सोचती थीं, वह पत्थर की मूरत बनी खड़ी रहीं। उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू उनके पुष्ट सीने से ढीला होकर गिर रहा था। उनकी आँखों में वह 'कशमकश' और 'खुमारी' थी जिसे देखकर मेरा खून खौल उठा।

अम्मी के ख्यालात

अम्मी का पूरा बदन विशाल के उस ज़हरीले स्पर्श से कांप रहा था, पर उन्हें अपनी सिसकी को मुस्कुराहट में बदलना था।

अम्मी (मन में): "या अल्लाह... ये दरिंदा सबके सामने मेरा तमाशा बना रहा है। इसके हाथ मेरे नंगे गाल और मेरी सुराहीदार गर्दन के पास रेंग रहे हैं। मेरा जी चाहता है कि मैं इसे ज़ोर से धक्का दे दूँ, पर सायमा... उसकी इज़्ज़त की चाबी इस शैतान के पास है। मुझे चुप रहना होगा... मुझे इज़्ज़त की बलि देनी होगी ताकि मेरी बच्ची बच सके।"

मुझसे अब और सहा नहीं गया। मेरे अंदर एक ऐसी आग भड़की जिसने डर को राख कर दिया। मैं तेज़ कदमों से उनकी तरफ बढ़ा, मेरे जूतों की आहट उस सन्नाटे को चीरती हुई उन तक पहुँची। वे दोनों चौंके। विशाल ने तेज़ी से अपना हाथ अम्मी के मखमली बदन से हटाया, पर उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक हिकारत भरी मुस्कान थी।

मैं: (सख्त आवाज़ में) "अम्मी!"

अम्मी का चेहरा सफेद पड़ गया। उन्होंने घबराकर अपनी शराबी साड़ी का पल्लू अपने उभरे हुए सीने पर ठीक किया, जैसे वह अपने गुनाह को ढक रही हों। उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे।

अम्मी: (हकलाते हुए) "सा... साहिल? तू यहाँ?"

फिर वह विशाल की तरफ मुड़ीं। "विशाल जी, यह मेरा बेटा है, साहिल।"

उन्होंने कांपते हुए हाथों से अपनी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू अपने उभरे हुए सीने पर और भी कस लिया, जैसे वह विशाल की उन नंगी नज़रों के निशानों को मुझसे छुपाना चाहती हों।

विशाल ने मुझे देखा, पर उसकी आँखों में रत्ती भर भी खौफ या शर्मिंदगी नहीं थी। उसने अपनी आस्तीनें नीचे कीं और बड़े इत्मीनान से अपना मज़बूत हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।

विशाल: "साहिल... अकरम ने तुम्हारे बारे में बताया था। मिलकर खुशी हुई।"

उसकी पकड़ फौलादी थी, मर्दानगी का एक ऐसा अहसास जो मुझे दबाने के लिए काफी था। मैंने बस "वही हाल यहाँ भी है" कहा और अपना हाथ झटक कर पीछे खींच लिया। मुझे महसूस हो रहा था कि विशाल की नज़रें अब भी अम्मी के मखमली वजूद पर टिकी थीं, जैसे वह मुझे यह जता रहा हो कि मेरा वहाँ होना महज़ एक औपचारिकता है।

अम्मी की साँसें तेज़ थीं, और उनके वेलवेट ब्लाउज के नीचे उनका पुष्ट सीना मेरी मौजूदगी में और भी तेज़ी से धड़क रहा था।

अम्मी (मन में): "या अल्लाह, साहिल ने हमें इस तरह देख लिया। इसके ज़हन में क्या चल रहा होगा

एक अजीब सी खामोशी छा गई, पर सिर्फ एक पल के लिए। अम्मी ने सोचा, शायद मेरी मौजूदगी से उनकी यह मुलाकात खत्म हो जाएगी, पर विशाल के इरादे कुछ और थे।

विशाल ने मुझे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी नज़रें वापस अम्मी की सुराहीदार गर्दन और उनके नूरानी चेहरे पर टिका दीं।

विशाल: "तो जैसा मैं कह रहा था, आयशा जी... यह शहर बहुत खतरनाक है। यहाँ कब कौन अनजान इंसान आपको अपना बना ले, पता ही नहीं चलता।"

अम्मी ने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में एक गहरी कशमकश थी, पर फिर उन्होंने अपनी नशीली निगाहें वापस विशाल की आँखों में गड़ा दीं।

अम्मी: (एक हल्की मुस्कान के साथ) "शहर को क्यों दोष देते हैं, विशाल साहब? यहाँ के लोग ही ऐसे हैं जो अनजान मुसाफिरों के दिल पर दबाव डालकर अपनी बात कबूल कराना बखूबी जानते हैं।"

विशाल: (थोड़ा और करीब झुकते हुए, उसकी आवाज़ अब अम्मी के कानों के पास एक सरगोशी थी) "चोरी का इल्ज़ाम तो गलत है... कुछ दिल तो खुद अपनी मर्ज़ी से कैद होना चाहते हैं।"

यह कहते हुए उसकी निगाहें अम्मी के मम्मों पर जमी हुई थीं। उसकी नज़रों की तपिश ब्लाउज के पार भी अम्मी को झुलसा रही थी।

आयशा ने असहज होकर अपनी निगाहें नीची कर लीं, लेकिन विशाल की वह गहरी, भूखी नज़रें उनके पुष्ट उभारों का पीछा नहीं छोड़ रही थीं।

मैं वहाँ एक पत्थर की तरह खड़ा था, अपनी ही अम्मी और एक अजनबी के बीच चल रहे इस इरोटिक सस्पेंस का अनचाहा गवाह।

अम्मी की पलकें झुक गईं और उनके गुलाबी होठों पर एक ऐसी मुस्कान आई जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी—उसमें एक अजीब सी 'हार' थी, जैसे वह विशाल की हवस के सामने खुद को सौंप रही हों, और एक 'जीत' भी, जैसे वह उसे अपने हुस्न के जाल में फँसा रही हों।

मेरा दम घुटने लगा।

मैं: "मुझे… मुझे नानी बुला रही हैं।"

मैं बिना पीछे देखे वहाँ से पलट गया। जाते-जाते मैंने मुड़कर देखा—वे दोनों फिर से अपनी उसी निजी और गुप्त दुनिया में खो चुके थे। अम्मी का वह पुष्ट और रसीला बदन उस अंधेरे कोने में विशाल के साये के नीचे और भी ज़्यादा सेक्सी और बेबस लग रहा था।

मैं अंधेरे की तरफ भाग रहा था, जबकि मेरी अम्मी उस दरिंदे की शर्तों और अपने जिस्म के सौदे के बीच एक ऐसी आग में उतर चुकी थीं, जिसका धुआँ अब पूरी हवेली में फैलने वाला था।

उस रात जब हम कमरे में लौटे, तो दरवाज़ा बंद होते ही बाहर का संगीत का शोर एक दम से कट गया। अंदर एक अजीब सी भारी खामोशी छा गई। इस खामोशी में सिर्फ दो आवाज़ें थीं—मेरी तेज़ चलती सांसें, और अम्मी की साड़ी की सरसराहट जो उनके जिस्म से लिपट कर हल्का शोर कर रही थी।

उनके चेहरे पर थकान के निशान थे, जैसे वह कोई बड़ी जंग लड़कर आई हो।

अम्मी ने जब अपनी पीठ को हल्का सा पीछे की तरफ खींचा, तो उनके पुष्ट अंगों का वक्र और भी नुमाया हो गया। उनके उरोजों का उभार उस तंग कपड़े को चीर देने पर आमादा था।

अम्मी: (एक मखमली और भारी सिसकी के साथ) "आज की रात… बहुत लंबी और बोझिल थी, है ना, साहिल?"

उनकी उंगलियाँ कांप रही थीं जब वे कंधे पर लगी उस सेफ्टी पिन तक पहुँचे। उन्होंने आहिस्ता से पिन खोली, और वह रेशमी पल्लू, धीरे से सरक कर फर्श पर जा गिरा।

पल्लू के गिरते ही जैसे मेरे सामने से हया का आखिरी पर्दा भी हट गया था। अम्मी के वे दूधिया सफेद कंधे और वेलवेट ब्लाउज की तंग गिरफ्त में दबे उनके पुष्ट वक्ष देख मेरी साँसें वहीं थम गईं। उस गहरे रंग के वेलवेट के नीचे उनका गोरा बदन किसी बेशकीमती संगमरमर की तरह चमक रहा था। ब्लाउज की डोरी शायद उनके उन भारी उभारों का बोझ सहने में नाकाम हो रही थी, क्योंकि वे हर तेज़ आती-जाती साँस के साथ बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।

मेरी आँखों में एक अजीब सी बेताबी उतर आई थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपनी सगी अम्मी का यह रूप मुझे इस कदर सुध-बुध खोने पर मजबूर कर देगा। उनकी गर्दन की सुराहीदार बनावट और कंधों की वह मखमली कोमलता देखकर मेरा हाथ खुद-ब-खुद उनकी ओर बढ़ने को तड़प उठा। मेरा गला पूरी तरह सूख चुका था और दिल की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं।

अब साड़ी का सिर्फ वह हिस्सा उनके जिस्म पर बचा था जो उनकी प्लीट्स से जुड़ा था। उनका पल्लू, जो अब तक उनके जिस्म के ऊपरी हिस्से को ढक रहा था, अब उनके पैरों के पास एक रेशमी समंदर की तरह फैला हुआ था।

उनका ब्लाउज गहरे, शराबी रंग के मखमल (वेलवेट) का था, जिसका गला आगे से गहरा U-शेप का था, पर उसकी असली खूबसूरती उसकी पीठ में थी। उनकी पीठ पूरी तरह से खुली तो नहीं थी, लेकिन वह काफी हद तक बेपर्दा थी और मखमली त्वचा का एक बड़ा हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

डांस और गर्मी की वजह से उनकी स्किन पर पसीने की जो हल्की, चमकती हुई परत थी, वह साफ़ झलक रही थी। ब्लाउज का कपड़ा कई जगहों से उनकी स्किन से चिपक गया था, उनकी रीढ़ की हड्डी के कर्व को और भी गहरा और आकर्षक बना रहा था। उनकी पीठ एक साफ़, बेदाग कैनवस की तरह थी, जो सब कुछ छिपाकर भी, सब कुछ दिखा रही थी।

उनका यह अंदाज़ एक बेफिक्र आज़ादी से भरा था। उनके लिए मैं अभी भी वही मासूम बेटा था, जिसके सामने पर्दे की ज़रूरत नहीं थी।

वह सीधे ड्रेसिंग टेबल के सामने जाकर खड़ी हो गईं। शीशे में वह खुद को नहीं, शायद उस औरत को देख रही थीं जो वह आज रात थीं—आयशा।

अम्मी (मन में): "या अल्लाह, मेरा यह मखमली बदन जैसे मेरा अपना नहीं रहा। विशाल ने आज महफिल में मेरे इन मम्मों को जिस तरह अपनी हथेलियों में भींचा था, उसकी हरारत अभी भी मेरे निप्पल्स को सख्त कर रही है। मेरा पेटीकोट अभी भी उस नमी से गीला है जो उस हैवान की दरिंदगी ने पैदा की थी।“

अम्मी (मन में): “साहिल मुझे देख रहा है… क्या उसे मेरी इस 'गद्दार' देह की महक आ रही होगी? क्या वह मेरी आँखों में छिपी उस ज़िल्लत को पढ़ पा रहा है जो मैं विशाल के पास छोड़ आई हूँ? मेरा वजूद आज दो पाटों के बीच पिस रहा है—एक तरफ अपनी सायमा की इज़्ज़त बचाने की तड़प और दूसरी तरफ अपने ही जिस्म की यह बेवफाई, जो उस ज़ालिम की छुअन पर इस कदर प्रतिक्रिया दे रही है।"

उनके गीले और सुर्ख होंठों पर एक अजीब, फीकी सी मुस्कान फैली हुई थी—एक ऐसा राज़ जिसे वह बार-बार अपने ज़हन में दोहरा रही थीं।

उनकी उंगलियां अपने कान तक गईं और उन्होंने हीरे के टॉप्स को आहिस्ता से निकाला। फिर उनके हाथ उनकी गर्दन पर गए। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, एक गहरी सांस ली, और अपनी सोने के हार का पेच खोला। जब हार उनकी गोरी स्किन से अलग हुई, तो एक पल के लिए उसकी जगह पर एक हल्की सी लाल लकीर रह गई।

"अम्मी," मैंने आवाज़ को नॉर्मल रखने की कोशिश करते हुए कहा। "आप थकी नहीं हैं?"

शीशे से ही मुझे देखते हुए उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "थकान? आज तो थी, पर बहुत दिन बाद इतना अच्छा लगा।"

उन्होंने अपनी चूड़ियाँ उतारना शुरू कीं। एक-एक करके, सोने की चूड़ियाँ उनकी नर्म कलाई से सरक रही थीं, और उनकी 'खन-खन' की आवाज़ कमरे की खामोशी में एक संगीत की तरह गूँज रही थी।

"अकरम के दोस्त काफी अच्छे थे ना?" मैंने अचानक कहा, मेरी आवाज़ में एक बच्चों जैसी उत्सुकता थी।

अम्मी का दिल ज़ोर से धड़का। अकरम के दोस्त (विशाल) उस ज़हरीले नाम का ज़िक्र सुनते ही उनके ज़हन में वही मंज़र ताज़ा हो गया—विशाल के वे हाथ और उनके वक्षों पर बढ़ता उसका बेबाक दबाव। सचाई उनके हलक तक आ गई थी, पर ज़ुबान पर ताला लगा था। वह बस "हूँ" कह सकी।

"अम्मी, आपको विशाल कैसे लगे? मैंने देखा कि आप उनसे काफी देर तक बातें कर रही थीं।"

वह मेरी तरफ पलटीं, उनकी आँखों में शायद एक डर था या कुछ और, मैं समझ नहीं पाया।

अम्मी (अपने खयालों में): "साहिल इतने सवाल क्यों कर रहा है? क्या उसे मुझ पर शक हो गया है? या अल्लाह, मैं किस मुसीबत में फँस गई हूँ। मेरा बस चले तो मैं उस शख्स को अपने पास फटकने भी न दूँ। लेकिन मुझे साहिल के सामने ऐसा जताना होगा जैसे मुझे उसकी सोहबत सच में पसंद आई है, वरना इसके शक की सुई कहीं और ही घूम जाएगी।"

अम्मी: "कितना सुलझा हुआ आदमी है। और बातें… ऐसी गहरी बातें करता है कि वक्त का पता ही नहीं चलता।"

वह बता रही थीं, और मैं सुन रहा था। पर मैं सिर्फ उनके लफ़्ज़ नहीं सुन रहा था। मैं उनकी बदलती आवाज़ सुन रहा था। मैं उनके चेहरे पर आती लाली देख रहा था। मैं उनकी आँखों में वह खुमारी देख रहा था जो किसी की यादों से पैदा होती है।

"कह रहा था दिल्ली का शहर लोगों को अपना बना लेता है," उन्होंने हंसते हुए कहा, उस फ्लर्टी लाइन को एक मासूम सी, फलसफे वाली बात की तरह पेश करते हुए। "बहुत अजीब है ना?"

मैं कुछ नहीं बोला। मैं बस उस औरत को देख रहा था जिसे मैं अपनी 'अम्मी' कहता था। वह आज एक नई औरत लग रही थी। एक ऐसी औरत जिसके अंदर एक राज़ था, एक ऐसी खुशी थी जिसका हिस्सा मैं नहीं था, मेरे अब्बू नहीं थे।

"बड़ा शरीफ और तमीज़दार लगा मुझे," वह कहती चली गईं, अपनी ही धुन में, यह समझे बिना कि उनका हर लफ़्ज़ मेरे सीने में एक खंजर की तरह उतर रहा था। "साहिल? सुन रहे हो?"

"हाँ, अम्मी," मैंने आखिरकार कहा।

"अच्छा है।"

"अच्छा ही तो है," उन्होंने खुश होकर कहा, जैसे मेरे इस छोटे से जवाब ने उनकी हर बात पर मोहर लगा दी हो। "चलो, अब सो जाओ। कल हल्दी है, बहुत काम होगा।"

वह वापस ड्रेसिंग टेबल की तरफ मुड़ गईं, अपने खयालों में मुस्कुराते हुए। पर मैं जानता था। उनकी मुस्कुराहट हल्दी की तैयारियों के लिए नहीं थी। वह उस आदमी के लिए थी, जिसने एक ही शाम में मेरी माँ को फिर से आयशा बना दिया था। और उस रात, कमरे की उस खामोशी में, मुझे नींद नहीं आई।

अम्मी (मन में): "साहिल को लग रहा है कि मैं थकी हुई हूँ, पर मेरी रगों में तो उस हैवान के दिए हुए नशे की आग दौड़ रही है। मेरे होठों पर यह मुस्कान... यह मेरी बेबसी है या उस ज़हरीली वासना की खुमारी? मेरे मम्मे इस तंग ब्लाउज के अंदर अभी भी विशाल की उंगलियों की जलन महसूस कर रहे हैं। मेरी पीठ पर यह पसीना... यह उस डर और लज्ज़त की गवाही है जो आज मैंने सही है।"

अम्मी ने आईने में खुद को देखा, और पहली बार उन्हें अपना ही चेहरा किसी अजनबी जैसा लगा। उनकी आँखों के कोरों में छाई वह सुर्खी सिर्फ थकान नहीं थी, बल्कि उस अपमान की आंच थी जिसने उनकी रूह को झुलसा दिया था। उन्होंने अपने काँपते हाथों से ब्लाउज के गले को थोड़ा ऊपर खींचने की कोशिश की, जैसे वह उन उंगलियों के निशानों को दुनिया से, और खुद अपने बेटे से छिपाना चाहती हों।

अम्मी (मन ही मन): "या अल्लाह, मुझे हिम्मत दे। मेरा यह दूधिया बदन आज एक गुनाह की गवाही दे रहा है। मैं कैसे नज़रें मिलाऊँ अपने बेटे से, जब मेरे वजूद का कोना-कोना उस गैर-मर्द की छुअन से अभी भी दहक रहा है?"

--------------

उधर दूसरी तरफ, विशाल अपने आलीशान बेडरूम में बिस्तर पर अधलेटा था। कमरे की मद्धम रोशनी में उसके चेहरे पर एक दरिंदगी भरी चमक थी। उसके हाथ में उसका फोन था, जिसमें वह सायमा की उन तमाम तस्वीरों और वीडियो को स्क्रॉल कर रहा था जिनका इस्तेमाल उसने उसे ब्लैकमेल करने के लिए किया था।

जैसे-जैसे वह सायमा के उन वीडियो को देख रहा था, उसकी कल्पनाओं में सायमा का चेहरा धुंधला होने लगा और उसकी जगह आयशा का वह मखमली और पुष्ट बदन उभर आया। वह कल्पना करने लगा कि उन शर्मनाक वीडियो में सायमा की जगह आयशा है—वही गहरा उबटन जैसा रंग, वही भारी मम्मे और वही बेबस आँखें।

उसका एक हाथ उसके लंड पर था, जिसे वह आयशा के ख्यालों में डूबा हुआ तेज़ी से सहला रहा था। उसकी साँसें भारी हो रही थीं और आँखों में हवस का नंगा नाच था।

विशाल (खुद से फुसफुसाते हुए): "आह्ह... आयशा। अभी तो सिर्फ शुरुआत है। बहुत जल्द इन वीडियो में सायमा नहीं, तुम होगी। मैं तुम्हारे साथ भी बिल्कुल ऐसे ही वीडियो बनाऊँगा... तुम्हारी हर कराह और हर सिसकी को रिकॉर्ड करूँगा।"

उसने एक कुटिल और शैतानी हंसी हंसी।

विशाल: "कितनी भोली है यह औरत... इसे लगता है कि मेरी बात मानकर, मेरे हाथों खुद को मसलवाकर यह सायमा को बचा लेगी। तुम सायमा को बचाने के चक्कर में उस दलदल में उतर चुकी हो जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। मैं तुम्हें इस कदर बर्बाद करूँगा कि तुम खुद अपनी परछाईं से डरोगी।"

विशाल की आँखों के सामने संगीत की उस महफिल का नज़ारा किसी फिल्म की तरह घूमने लगा। वह याद कर रहा था कि कैसे आयशा महफिल के बीचों-बीच नाच रही थी। उसकी हर थिरकन के साथ उसके वे भारी और पुष्ट मम्मे जिस तरह लहरा रहे थे, विशाल की नज़रें वहीं जम गई थीं। साड़ी के पल्लू और तंग ब्लाउज के नीचे उनकी वह 'शान' देखकर विशाल उसी पल तय कर चुका था कि इन उभारों को अपनी हथेलियों में भरकर इनकी गहराई को महसूस करना ही है।

वह बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अपनी आँखें मूँदकर उसी मंज़र को फिर से जीने लगा।

विशाल (मन में): "क्या कयामत ढाह रही थी वह... नाचते हुए जब उसका जिस्म लचकता था, तो वे मम्मे भी अपनी आज़ादी के लिए मचलते थे। मैं तो बस मौके की तलाश में था कि कब इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचूँ, और इस नादान औरत ने खुद ही मुझे वह मौका दे दिया।"

वह सोचकर और भी उत्तेजित हो गया कि कैसे आयशा खुद उसके पास चलकर आई थी, सायमा को छोड़ने की भीख माँगने। उसने खुद ही उस शेर के जबड़े में अपना सिर दे दिया था।

विशाल: "बेवकूफ औरत... उसे लगा कि अपनी इज़्ज़त की बोली लगाकर वह सायमा को बचा लेगी। उसे क्या पता कि उसने मुझे वह 'ओपनिंग' दे दी है जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था। अब तो वह मेरी मर्जी की ग़ुलाम है। आज तो सिर्फ हाथ लगाया है, बहुत जल्द उसे अपनी बाहों में ऐसा जकड़ूँगा कि वह सायमा का गम भूलकर अपनी बर्बादी का जश्न मनाएगी।"

उसे याद आया कि जब उसकी हथेली आयशा के उस नंगे पेट पर पड़ी थी, तो वह मखमली अहसास कितना जादुई था। वह गोरा, दूधिया हिस्सा जो डर के मारे अंदर की तरफ सिकुड़ रहा था, विशाल की उंगलियों के नीचे किसी रेशम की तरह फिसल रहा था।

उसने बिस्तर पर करवट ली और अपनी आँखें मूँदकर उस पल को फिर से महसूस किया जब उसने आयशा को मजबूर किया था कि वह खुद विशाल के हाथ पकड़कर अपने मम्मों पर रखे। वह बेबसी, वह काँपते हुए हाथ और आयशा की आँखों में तैरता वह खौफ—विशाल के लिए किसी नशे से कम नहीं थे।

विशाल (मदहोश होकर फुसफुसाते हुए): "आह्ह... वो पल सबसे शानदार था। जब मैंने उसे अपनी आँखों में देखने पर मजबूर किया और मेरे दोनों हाथ उसके ब्लाउज और ब्रा की सीमाओं को तोड़कर उन नंगे चूँचों पर जम गए थे।"

वह याद कर रहा था कि कैसे उसके हाथ उन गर्म और पुष्ट उभारों की नंगी छुअन को महसूस कर रहे थे। आयशा का वह जिस्म, जो शर्म से लाल हो रहा था, विशाल की हथेलियों में पूरी तरह समाया हुआ था।

उसने सोचा कि कैसे आयशा के वे नंगे मम्मे उसकी उंगलियों के बीच दबकर अपनी शक्ल बदल रहे थे। वह गर्मी, वह नमी और वह रूह कंपा देने वाली सिहरन विशाल के दिमाग पर छा गई थीं।

विशाल (हाँफते हुए): "आह्ह... आयशा। तुम्हारी वो दूधिया त्वचा... और वो ज़ालिम उभार। जब मैंने उन्हें मसला था, तो तुम जिस तरह तड़पी थीं, मेरा रोम-रोम जाग उठा था।"

विशाल का हाथ अब उसके लंड पर अपनी पूरी रफ़्तार में था। वह कल्पना कर रहा था कि आयशा की पीठ उस दीवार से सटी हुई है और उसके दोनों हाथ आयशा के ब्लाउज के अंदर घुसकर उन नंगे चूँचों के साथ बेरहमी से खेल रहे हैं। उसे महसूस हो रहा था कि कैसे उसके निप्पल्स उसकी उंगलियों के दबाव में और भी सख्त और उत्तेजित हो रहे थे।

विशाल: "वो डर... तुम्हारी उन बड़ी-बड़ी आँखों में वो बेबसी और छिपी हुई चाहत... वही तो मेरा असली इनाम है। तुम जितना डरोगी, मुझे तुम्हें मसलने में उतना ही मज़ा आएगा।"

उसकी साँसें अब उखड़ रही थीं। आयशा के उस नंगे पेट की नरमी और उसके भारी वक्षों की गर्माहट का ख्याल जैसे उसके दिमाग की नसों को फाड़ देने वाला था। उसने कल्पना की कि वह आयशा का वह वेलवेट ब्लाउज फाड़ चुका है और वह पूरी तरह से ऊपर से नंगी उसके सामने खड़ी है, उसकी इज़्ज़त की आखिरी दीवार भी अब विशाल के पैरों तले है।

जैसे ही विशाल अपनी उत्तेजना के चरम पर पहुँचा, उसने एक ज़ोरदार सिसकी ली और उसका शरीर बिस्तर पर अकड़ गया। आयशा का नाम उसके होंठों पर एक इबादत की तरह निकला, पर उसकी आँखों में जो चमक थी, वह किसी शैतान की जीत जैसी थी।

विशाल (खुद को सँभालते हुए, एक कुटिल मुस्कान के साथ): "आज तो सिर्फ हाथ लगा कर महसूस किया है आयशा... अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं तुम्हें अपनी रूह और जिस्म की गहराइयों तक रुला दूँगा। और तुम... तुम खुशी-खुशी अपनी इज़्ज़त मेरे कदमों में बिछा दोगी।"

उसने अपना फोन पास रखा और छत की तरफ देखते हुए एक ठंडी मुस्कान के साथ अगली मुलाकात का मंज़र बुनने लगा, जहाँ आयशा सिर्फ एक 'मेहमान' नहीं, बल्कि उसकी हवस की 'कैदी' होने वाली थी।
 


आयेशा, रेम्योविंग हेर एअर्रिंग
 
अध्याय 10

रात अपनी पूरी जवानी पर थी, और हवेली का जश्न अब एक थकी हुई मदहोशी में ढल रहा था. गेंदे के फूलों की महक उमस भरी हवा में और भी भारी हो गयी थी.

मैं बेचैनी से idhar-udhar घूम रहा था, मेरी नज़रें अनजाने में बस अम्मी को hi तलाश रही थीं. और फिर मैंने उन्हें देखा.

वह आँगन के उस कोने में थे, जहाँ गेंदे के फूलों की लड़ियों के पीछे पुराणी दीवार पर बस एक छोटा सा, नरम रौशनी वाला बल्ब जल रहा था. इस धुंधली रौशनी में वह दुनिया से कटे हुए लग रहे थे. वे लोग बहुत करीब खड़े थे, इतने करीब की उनके बीच कोई फासला नहीं था.

मैं सुन नहीं सकता था की वह क्या बात कर रहे थे.

मैंने dekha—mera दिल ज़ोर से dhadka—ki विशाल का वह गठीला हाथ अम्मी के दूधिया चेहरे की तरफ बढ़ा. उसीकी उँगलियों ने अम्मी के गाल पर झूलती उस रेशमी लत को छुआ. वह स्पर्श महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं था; वह एक मालिकाना हक़ था. विशाल की उँगलियाँ अम्मी की मखमली त्वचा को सहलाती हुई उनके कान के पीछे गयी.

और अम्मी? मेरी अम्मी, जो घर की देहलीज़ लांघने से पहले सौ बार सोचती थीं, वह पत्थर की मूरत बानी कड़ी रहीं. उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू उनके पुष्ट सीने से ढीला होकर गिर रहा था. उनकी आँखों में वह 'कश्मकश' और 'खुमारी' थी जिसे देखकर मेरा खून खौल उठा.

अम्मी के खयालात

अम्मी का पूरा बदन विशाल के उस ज़हरीले स्पर्श से कांप रहा था, पर उन्हें अपनी सिसकी को मुस्कराहट में बदलना था.

अम्मी (मन में): "या ,.'... ये दरिंदा सबके सामने मेरा तमाशा बना रहा है. इसके हाथ मेरे नंगे गाल और मेरी सुराहीदार गर्दन के पास रेंग रहे हैं. मेरा जी चाहता है की मैं इसे ज़ोर से धक्का दे दूँ, पर सायमा... उसकी इज़्ज़त की चाबी इस शैतान के पास है. मुझे चुप रहना होगा... मुझे इज़्ज़त की बलि देनी होगी ताकि मेरी बच्ची बच सके."

मुझसे अब और सहा नहीं गया. मेरे अंदर एक ऐसी आग भड़की जिसने डर को राख कर दिया. मैं तेज़ क़दमों से उनकी तरफ बढ़ा, मेरे जूतों की आहात उस सन्नाटे को चीरती हुई उन तक पहुंची. वे दोनों चौंके. विशाल ने तेज़ी से अपना हाथ अम्मी के मखमली बदन से हटाया, पर उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक हिकारत भरी मुस्कान थी.

मैं (सख्त आवाज़ में): "अम्मी!"

अम्मी का चेहरा सफ़ेद पद गया. उन्होंने घबराकर अपनी शराबी साड़ी का पल्लू अपने उभरे हुए सीने पर ठीक किया, जैसे वह अपने गुनाह को धक् रही हों. उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे.

अम्मी (हकलाते हुए): "सा... साहिल? तू यहाँ?"

फिर वह विशाल की तरफ मुदिन. "विशाल जी, यह मेरा बीटा है, साहिल."

उन्होंने कांपते हुए हाथों से अपनी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू अपने उभरे हुए सीने पर और भी कास लिया, जैसे वह विशाल की उन नंगी नज़रों के निशानों को मुझसे छुपाना चाहती हों.

विशाल ने मुझे देखा, पर उसकी आँखों में रत्ती भर भी खौफ या शर्मिंदी नहीं थी. उसने अपनी आस्तीनें नीचे किन और बड़े इत्मीनान से अपना मज़बूत हाथ मेरी तरफ बढ़ाया.

विशाल: "साहिल... अकरम ने तुम्हारे बारे में बताया था. मिलकर ख़ुशी हुई."

उसकी पकड़ फौलादी थी, मर्दानगी का एक ऐसा एहसास जो मुझे दबाने के लिए काफी था. मैंने बस "वही हाल यहाँ भी है" कहा और अपना हाथ झटक कर पीछे खींच लिया. मुझे महसूस हो रहा था की विशाल की नज़रें अब भी अम्मी के मखमली वजूद पर तिकी थीं, जैसे वह मुझे यह जाता रहा हो की मेरा वहां होना महज़ एक औपचारिकता है.

अम्मी की सांसें तेज़ थीं, और उनके वेलवेट ब्लाउज के नीचे उनका पुष्ट सीना मेरी मौजूदगी में और भी तेज़ी से धड़क रहा था.

अम्मी (मन में): "या ,.', साहिल ने हमें इस तरह देख लिया. इसके ज़हन में क्या चल रहा होगा?"

एक अजीब सी ख़ामोशी छ गयी, पर सिर्फ एक पल के लिए. अम्मी ने सोचा, शायद मेरी मौजूदगी से उनकी यह मुलाक़ात ख़त्म हो जाएगी, पर विशाल के इरादे कुछ और थे.

विशाल ने मुझे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी नज़रें वापस अम्मी की सुराहीदार गर्दन और उनके नूरानी चेहरे पर टिका दिन.

विशाल: "तो जैसा मैं कह रहा था, ऐसा जी... यह शहर बहुत खतरनाक है. यहाँ कब कौन अनजान इंसान आपको अपना बना ले, पता hi नहीं चलता."

अम्मी ने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, उनकी आँखों में एक गहरी कश्मकश थी, पर फिर उन्होंने अपनी नशीली निगाहें वापस विशाल की आँखों में गदा दिन.

अम्मी (एक हलकी मुस्कराहट के साथ): "शहर को क्यों दोष देते हैं, विशाल साहब? यहाँ के लोग hi ऐसे हैं जो अनजान मुसाफिरों के दिल पर दबाव डालकर अपनी बात कबूल करना बखूबी जानते हैं."

विशाल (थोड़ा और करीब झुकते हुए, उसकी आवाज़ अब अम्मी के कानों के पास एक सरगोशी थी): "चोरी का इलज़ाम तो गलत है... कुछ दिल तो खुद अपनी मर्ज़ी से कैद होना चाहते हैं."

यह कहते हुए उसकी निगाहें अम्मी के ममममों पर जमी हुई थीं. उसकी नज़रों की तपिश ब्लाउज के पार भी अम्मी को झुलसा रही थी.

ऐसा ने असहज होकर अपनी निगाहें नीची कर लीन, लेकिन विशाल की वह गहरी, भूखी नज़रें उनके पुष्ट उभारों का पीछा नहीं छोड़ रही थीं.

मैं वहां एक पत्थर की तरह खड़ा था, अपनी hi अम्मी और एक अजनबी के बीच चल रहे इस इरोटिक सस्पेंस का अनचाहा गवाह.

अम्मी की पलकें झुक गयीं और उनके गुलाबी होंठों पर एक ऐसी मुस्कराहट आयी जो मैंने पहले कभी नहीं देखि thi—usmein एक अजीब सी 'हार' थी, जैसे वह विशाल की हवस के सामने खुद को सौंप रही हों, और एक 'जीत' भी, जैसे वह उसे अपने हुस्न के जाल में फंसा रही हों.

मेरा डैम घुटने लगा.

मैं: "मुझे… मुझे नानी बुला रही हैं."

मैं बिना पीछे देखे वहां से पलट गया. Jaate-jaate मैंने मुड़कर dekha—ve दोनों फिर से अपनी उसी निजी और गुप्त दुनिया में खो चुके थे. अम्मी का वह पुष्ट और रसीला बदन उस अँधेरे कोने में विशाल के साये के नीचे और भी ज़्यादा सेक्सी और बेबस लग रहा था.

मैं अँधेरे की तरफ भाग रहा था, जबकि मेरी अम्मी उस दरिंदे की शर्तों और अपने जिस्म के सौदे के बीच एक ऐसी आग में उतर चुकी थीं, जिसका धुंआ अब पूरी हवेली में फैलने वाला था.

उस रात जब हम कमरे में लौटे, तो दरवाज़ा बंद होते hi बाहर का संगीत का शोर एक डैम से काट गया. अंदर एक अजीब सी भारी ख़ामोशी छ गयी. इस ख़ामोशी में सिर्फ दो आवाज़ें thin—meri तेज़ चलती सांसें, और अम्मी की साड़ी की सरसराहट जो उनके जिस्म से लिपट कर हल्का शोर कर रही थी.

उनके चेहरे पर थकन के निशाँ थे, जैसे वह कोई बड़ी जंग लड़कर आयी हो.

अम्मी ने जब अपनी पीठ को हल्का सा पीछे की तरफ खींचा, तो उनके पुष्ट अंगों का वक्र और भी नुमाया हो गया. उनके उरोजों का उभार उस तंग कपडे को चीयर देने पर आमादा था.

अम्मी (एक मखमली और भारी सिसकी के साथ): "आज की रात… बहुत लम्बी और बोझिल थी, है न, साहिल?"

उनकी उँगलियाँ कांप रही थीं जब वे कंधे पर लगी उस सेफ्टी पिन तक पहुंचे. उन्होंने आहिस्ता से पिन खोली, और वह रेशमी पल्लू, धीरे से सरक कर फर्श पर जा गिरा.

पल्लू के गिरते hi जैसे मेरे सामने से हाय का आखिरी पर्दा भी हैट गया था. अम्मी के वे दूधिया सफ़ेद कंधे और वेलवेट ब्लाउज की तंग गिरफ्त में दबे उनके पुष्ट वक्ष देख मेरी सांसें वहीँ थम गयीं. उस गहरे रंग के वेलवेट के नीचे उनका गोरा बदन किसी बेशकीमती संगमरमर की तरह चमक रहा था. ब्लाउज की डोरी शायद उनके उन भारी उभारों का बोझ सहने में नाकाम हो रही थी, क्योंकि वे हर तेज़ aati-jaati सांस के साथ बाहर आने को बेताब दिख रहे थे.

मेरी आँखों में एक अजीब सी बेताबी उतर आयी थी. मैंने कभी नहीं सोचा था की अपनी सगी अम्मी का यह रूप मुझे इस कदर sudh-budh खोने पर मजबूर कर देगा. उनकी गर्दन की सुराहीदार बनावट और कन्धों की वह मखमली कोमलता देखकर मेरा हाथ khud-ba-khud उनकी ओरे बढ़ने को तड़प उठा. मेरा गाला पूरी तरह सूख चूका था और दिल की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं.

अब साड़ी का सिर्फ वह हिस्सा उनके जिस्म पर बचा था जो उनकी प्लेट्स से जुड़ा था. उनका पल्लू, जो अब तक उनके जिस्म के ऊपरी हिस्से को धक् रहा था, अब उनके पैरों के पास एक रेशमी समंदर की तरह फैला हुआ था.

उनका ब्लाउज गहरे, शराबी रंग के मखमल (वेलवेट) का था, जिसका गाला आगे से गहरा U-shape का था, पर उसकी असली ख़ूबसूरती उसकी पीठ में थी. उनकी पीठ पूरी तरह से खुली तो नहीं थी, लेकिन वह काफी हद तक बेपर्दा थी और मखमली त्वचा का एक बड़ा हिस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था.

डांस और गर्मी की वजह से उनकी स्किन पर पसीने की जो हलकी, चमकती हुई परत थी, वह साफ़ झलक रही थी. ब्लाउज का कपडा कई जगहों से उनकी स्किन से चिपक गया था, उनकी रीढ़ की हड्डी के चउरवे को और भी गहरा और आकर्षक बना रहा था. उनकी पीठ एक साफ़, बेदाग़ कैनवास की तरह थी, जो सब कुछ छिपकर भी, सब कुछ दिखा रही थी.

उनका यह अंदाज़ एक बेफिक्र आज़ादी से भरा था. उनके लिए मैं अभी भी वही मासूम बीटा था, जिसके सामने परदे की ज़रुरत नहीं थी.

वह सीधे ड्रेसिंग टेबल के सामने जाकर कड़ी हो गयीं. शीशे में वह खुद को नहीं, शायद उस औरत को देख रही थीं जो वह आज रात thin—Aisha.

अम्मी (मन में): "या ,.', मेरा यह मखमली बदन जैसे मेरा अपना नहीं रहा. विशाल ने आज महफ़िल में मेरे इन ममममों को जिस तरह अपनी हथेलियों में भींचा था, उसकी हरारत अभी भी मेरे निप्पल्स को सख्त कर रही है. मेरा पेटीकोट अभी भी उस नमी से गीला है जो उस हैवान की दरिंदगी ने पैदा की थी."

अम्मी (मन में): "साहिल मुझे देख रहा है… क्या उसे मेरी इस 'गद्दार' देह की महक आ रही होगी? क्या वह मेरी आँखों में छिपी उस ज़िल्लत को पढ़ प् रहा है जो मैं विशाल के पास छोड़ आयी हूँ? मेरा वजूद आज दो पाटों के बीच पीस रहा hai—ek तरफ अपनी सायमा की इज़्ज़त बचने की तड़प और दूसरी तरफ अपने hi जिस्म की यह बेवफाई, जो उस ज़ालिम की छुअन पर इस कदर प्रतिक्रिया दे रही है."

उनके गीले और सुर्ख होंठों पर एक अजीब, फीकी सी मुस्कराहट फैली हुई thi—ek ऐसा राज़ जिसे वह baar-baar अपने ज़हन में दोहरा रही थीं.

उनकी उँगलियाँ अपने कान तक गयीं और उन्होंने हीरे के टॉप्स को आहिस्ता से निकला. फिर उनके हाथ उनकी गर्दन पर गए. उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीन, एक गहरी सांस ली, और अपनी सोने के हार का पेच खोला. जब हार उनकी गोरी स्किन से अलग हुई, तो एक पल के लिए उसकी जगह पर एक हलकी सी लाल लकीर रह गयी.

"अम्मी," मैंने आवाज़ को नार्मल रखने की कोशिश करते हुए कहा. "आप थकी नहीं हैं?"

शीशे से hi मुझे देखते हुए उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "थकन? आज तो थी, पर बहुत दिन बाद इतना अच्छा लगा."

उन्होंने अपनी चूड़ियां उतरना शुरू किन. Ek-ek करके, सोने की चूड़ियां उनकी नरम कलाई से सरक रही थीं, और उनकी 'khan-khan' की आवाज़ कमरे की ख़ामोशी में एक संगीत की तरह गूँज रही थी.

"अकरम के दोस्त काफी अच्छे थे न?" मैंने अचानक कहा, मेरी आवाज़ में एक बच्चों जैसी उत्सुकता थी.

अम्मी का दिल ज़ोर से धड़का. अकरम के दोस्त (विशाल) उस ज़हरीले नाम का ज़िक्र सुनते hi उनके ज़हन में वही मंज़र ताज़ा हो gaya—Vishal के वे हाथ और उनके वक्षों पर बढ़ता उसका बेबाक दबाव. सचाई उनके हलक तक आ गयी थी, पर जुबां पर ताला लगा था. वह बस "हूँ" कह सकीय.

"अम्मी, आपको विशाल कैसे लगे? मैंने देखा की आप उनसे काफी देर तक बातें कर रही थीं."

वह मेरी तरफ पलटीं, उनकी आँखों में शायद एक डर था या कुछ और, मैं समझ नहीं पाया.

अम्मी (अपने ख्यालों में): "साहिल इतने सवाल क्यों कर रहा है? क्या उसे मुझ पर शक हो गया है? या ,.', मैं किस मुसीबत में फँस गयी हूँ. मेरा बस चले तो मैं उस शख्स को अपने पास फटकने भी न दूँ. लेकिन मुझे साहिल के सामने ऐसा जाताना होगा जैसे मुझे उसकी सोहबत सच में पसंद आयी है, वर्ण इसके शक की सुई कहीं और hi घूम जाएगी."

अम्मी: "कितना सुलझा हुआ आदमी है. और बातें… ऐसी गहरी बातें करता है की वक़्त का पता hi नहीं चलता."

वह बता रही थीं, और मैं सुन रहा था. पर मैं सिर्फ उनके लफ़्ज़ों नहीं सुन रहा था. मैं उनकी बदलती आवाज़ सुन रहा था. मैं उनके चेहरे पर आती लाली देख रहा था. मैं उनकी आँखों में वह खुमारी देख रहा था जो किसी की यादों से पैदा होती है.

"कह रहा था दिल्ली का शहर लोगों को अपना बना लेता है," उन्होंने हँसते हुए कहा, उस फ्लिर्टी लाइन को एक मासूम सी, फलसफे वाली बात की तरह पेश करते हुए. "बहुत अजीब है न?"

मैं कुछ नहीं बोलै. मैं बस उस औरत को देख रहा था जिसे मैं अपनी 'अम्मी' कहता था. वह आज एक नयी औरत लग रही थी. एक ऐसी औरत जिसके अंदर एक राज़ था, एक ऐसी ख़ुशी थी जिसका हिस्सा मैं नहीं था, मेरे अब्बू नहीं थे.

"बड़ा शरीफ और तमीज़दार लगा मुझे," वह कहती चली गयीं, अपनी hi धुन में, यह समझे बिना की उनका हर लफ़्ज़ों मेरे सीने में एक खंजर की तरह उतर रहा था. "साहिल? सुन रहे हो?"

"हाँ, अम्मी," मैंने आखिरकार कहा. "अच्छा है."

"अच्छा hi तो है," उन्होंने खुश होकर कहा, जैसे मेरे इस छोटे से जवाब ने उनकी हर बात पर मोहर लगा दी हो. "चलो, अब सो जाओ. कल हल्दी है, बहुत काम होगा."

वह वापस ड्रेसिंग टेबल की तरफ मुद गयीं, अपने ख्यालों में मुस्कुराते हुए. पर मैं जानता था. उनकी मुस्कराहट हल्दी की तैयारियों के लिए नहीं थी. वह उस आदमी के लिए थी, जिसने एक hi शाम में मेरी माँ को फिर से ऐसा बना दिया था. और उस रात, कमरे की उस ख़ामोशी में, मुझे नींद नहीं आयी.

अम्मी (मन में): "साहिल को लग रहा है की मैं थकी हुई हूँ, पर मेरी रगों में तो उस हैवान के दिए हुए नशे की आग दौड़ रही है. मेरे होंठों पर यह मुस्कान... यह मेरी बेबसी है या उस ज़हरीली वासना की खुमारी? मेरे ममममे इस तंग ब्लाउज के अंदर अभी भी विशाल की उँगलियों की जलन महसूस कर रहे हैं. मेरी पीठ पर यह पसीना... यह उस डर और लज़्ज़त की गवाही है जो आज मैंने सही है."

अम्मी ने आईने में खुद को देखा, और पहली बार उन्हें अपना hi चेहरा किसी अजनबी जैसा लगा. उनकी आँखों के कोरों में छै वह सुर्खी सिर्फ थकन नहीं थी, बल्कि उस अपमान की आंच थी जिसने उनकी रूह को झुलसा दिया था. उन्होंने अपने कांपते हाथों से ब्लाउज के गले को थोड़ा ऊपर खींचने की कोशिश की, जैसे वह उन उँगलियों के निशानों को दुनिया से, और खुद अपने बेटे से छिपाना चाहती हों.

अम्मी (मन hi मन): "या ,.', मुझे हिम्मत दे. मेरा यह दूधिया बदन आज एक गुनाह की गवाही दे रहा है. मैं कैसे नज़रें मिलाऊँ अपने बेटे से, जब मेरे वजूद का kona-kona उस gair-mard की छुअन से अभी भी देहक रहा है?"

उधर दूसरी तरफ, विशाल अपने आलिशान बैडरूम में बिस्तर पर अधलेटा था. कमरे की मद्धम रौशनी में उसके चेहरे पर एक दरिंदगी भरी चमक थी. उसके हाथ में उसका फ़ोन था, जिसमें वह सायमा की उन तमाम तस्वीरों और वीडियो को स्क्रॉल कर रहा था जिनका इस्तेमाल उसने उसे ब्लैकमेल करने के लिए किया था.

Jaise-jaise वह सायमा के उन वीडियो को देख रहा था, उसकी कल्पनाओं में सायमा का चेहरा धुंधला होने लगा और उसकी जगह ऐसा का वह मखमली और पुष्ट बदन उभर आया. वह कल्पना करने लगा की उन शर्मनाक वीडियो में सायमा की जगह ऐसा hai—wahi गहरा उबटन जैसा रंग, वही भारी ममममे और वही बेबस आँखें.

उसके एक हाथ उसके लुंड पर था, जिसे वह ऐसा के ख्यालों में डूबा हुआ तेज़ी से सेहला रहा था. उसकी सांसें भारी हो रही थीं और आँखों में हवस का नंगा नाच था.

विशाल (खुद से फुसफुसाते हुए): "आह्हः... ऐसा. अभी तो सिर्फ शुरुआत है. बहुत जल्द इन वीडियो में सायमा नहीं, तुम होगी. मैं तुम्हारे साथ भी बिलकुल ऐसे hi वीडियो बनाऊंगा... तुम्हारी हर कराह और हर सिसकी को रिकॉर्ड करूंगा."

उसने एक कुटिल और शैतानी हंसी हंसी.

विशाल: "कितनी भोली है यह औरत... इसे लगता है की मेरी बात मानकर, मेरे हाथों खुद को मसलवाकर यह सायमा को बचा लेगी. तुम सायमा को बचने के चक्कर में उस दलदल में उतर चुकी हो जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है. मैं तुम्हें इस कदर बर्बाद करूंगा की तुम खुद अपनी परछाई से दरोगी."

विशाल की आँखों के सामने संगीत की उस महफ़िल का नज़ारा किसी फिल्म की तरह घूमने लगा. वह याद कर रहा था की कैसे ऐसा महफ़िल के beechon-beech नाच रही थी. उसकी हर थिरकन के साथ उसके वे भारी और पुष्ट ममममे जिस तरह लहरा रहे थे, विशाल की नज़रें वहीँ जैम गयी थीं. साड़ी के पल्लू और तंग ब्लाउज के नीचे उनकी वह 'शान' देखकर विशाल उसी पल तय कर चूका था की इन उभारों को अपनी हथेलियों में भरकर इनकी गेहेराई को महसूस करना hi है.

वह बिस्तर पर pada-pada अपनी आँखें मूंदकर उसी मंज़र को फिर से जीने लगा.

विशाल (मन में): "क्या क़यामत ढाह रही थी वह... नाचते हुए जब उसका जिस्म लचकता था, तो वे ममममे भी अपनी आज़ादी के लिए मचलते थे. मैं तो बस मौके की तलाश में था की कब इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचूं, और इस नादान औरत ने खुद hi मुझे वह मौका दे दिया."

वह सोचकर और भी उत्तेजित हो गया की कैसे ऐसा खुद उसके पास चलकर आयी थी, सायमा को छोड़ने की भीक मांगने. उसने खुद hi उस शेर के जबड़े में अपना सर दे दिया था.

विशाल: "बेवकूफ औरत... उसे लगा की अपनी इज़्ज़त की बोली लगाकर वह सायमा को बचा लेगी. उसे क्या पता की उसने मुझे वह 'ओपनिंग' दे दी है जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था. अब तो वह मेरी मर्ज़ी की गुलाम है. आज तो सिर्फ हाथ लगाया है, बहुत जल्द उसे अपनी बाहों में ऐसा जकड़ूँगा की वह सायमा का ग़म भूलकर अपनी बर्बादी का जश्न मनाएगी."

उसे याद आया की जब उसकी हथेली ऐसा के उस नंगे पेट पर पड़ी थी, तो वह मखमली एहसास कितना जादुई था. वह गोरा, दूधिया हिस्सा जो डर के मारे अंदर की तरफ सिकुड़ रहा था, विशाल की उँगलियों के नीचे किसी रेशम की तरह फिसल रहा था.

उसने बिस्तर पर करवट ली और अपनी आँखें मूंदकर उस पल को फिर से महसूस किया जब उसने ऐसा को मजबूर किया था की वह खुद विशाल के हाथ पकड़कर अपने ममममों पर रखे. वह बेबसी, वे कांपते हुए हाथ और ऐसा की आँखों में तैरता वह khauf—Vishal के लिए किसी नशे से काम नहीं थे.

विशाल (मधेश होकर फुसफुसाते हुए): "आह्हः... वह पल सबसे शानदार था. जब मैंने उसे अपनी आँखों में देखने पर मजबूर किया और मेरे दोनों हाथ उसके ब्लाउज और ब्रा की सीमाओं को तोड़कर उन नंगे चूंचूं पर जैम गए थे."

वह याद कर रहा था की कैसे उसके हाथ उन गर्म और पुष्ट उभारों की नंगी छुअन को महसूस कर रहे थे. ऐसा का वह जिस्म, जो शर्म से लाल हो रहा था, विशाल की हथेलियों में पूरी तरह समाया हुआ था.

उसने सोचा की कैसे ऐसा के वे नंगे ममममे उसकी उँगलियों के बीच दबकर अपनी शकल बदल रहे थे. वह गर्मी, वह नमी और वह रूह कंपा देने वाली सिहरन विशाल के दिमाग पर छा गयी थीं.

विशाल (हाँफते हुए): "आह्हः... ऐसा. तुम्हारी वह दूधिया त्वचा... और वे ज़ालिम उभार. जब मैंने उन्हें मसाला था, तो तुम जिस तरह तदपि थीं, मेरा rom-rom जाग उठा था."

विशाल का हाथ अब उसके लुंड पर अपनी पूरी रफ़्तार में था. वह कल्पना कर रहा था की ऐसा की पीठ उस दीवार से सटी हुई है और उसके दोनों हाथ ऐसा के ब्लाउज के अंदर घुसकर उन नंगे चूंचूं के साथ बेरहमी से खेल रहे हैं. उसे महसूस हो रहा था की कैसे उसके निप्पल्स उसकी उँगलियों के दबाव में और भी सख्त और उत्तेजित हो रहे थे.

विशाल: "वह डर... तुम्हारी उन badi-badi आँखों में वह बेबसी और छिपी हुई चाहत... वही तो मेरा असली इनाम है. तुम जितना दरोगी, मुझे तुम्हें मसलने में उतना hi मज़ा आएगा."

उसकी सांसें अब उखड रही थीं. ऐसा के उस नंगे पेट की नरमी और उसके भारी वक्षों की गर्माहट का ख्याल जैसे उसके दिमाग की नसों को फाड़ देने वाला था. उसने कल्पना की की वह ऐसा का वह वेलवेट ब्लाउज फाड़ चूका है और वह पूरी तरह से ऊपर से नंगी उसके सामने कड़ी है, उसकी इज़्ज़त की आखिरी दीवार भी अब विशाल के पैरों टेल है.

जैसे hi विशाल अपनी उत्तेजना के चरम पर पहुंचा, उसने एक ज़ोर दार सिसकी ली और उसका शरीर बिस्तर पर अकड़ गया. ऐसा का नाम उसके होंठों पर एक इबादत की तरह निकला, पर उसकी आँखों में जो चमक थी, वह किसी शैतान की जीत जैसी थी.

विशाल (खुद को संभालते हुए, एक कुटिल मुस्कराहट के साथ): "आज तो सिर्फ हाथ लगा कर महसूस किया है ऐसा... अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं तुम्हें अपनी रूह और जिस्म की गहराइयों तक रुला दूंगा. और तुम... तुम khushi-khushi अपनी इज़्ज़त मेरे क़दमों में बिछा डौगी."

उसने अपना फ़ोन पास रखा और छत की तरफ देखते हुए एक ठंडी मुस्कराहट के साथ अगली मुलाक़ात का मंज़र बुनने लगा, जहाँ ऐसा सिर्फ एक 'मेहमान' नहीं, बल्कि उसकी हवस की 'कैदी' होने वाली थी.
 
Back
Top