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अध्याय 8
स्टेज पर जब एक पुराना, रूहानी रोमांटिक गाना गूँजा, तो अम्मी की कज़िन्स ने शोर मचाते हुए उन्हें घेर लिया। अम्मी पहले तो झिझकीं, अपने मखमली पल्लू को उंगलियों में भींचकर मना करती रहीं, पर फिर संगीत की उस मदहोश लहर ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया। और फिर जो हुआ, वह महज़ नाच नहीं, हुस्न का एक ज़लज़ला था।
उनकी शराबी रंग की जॉर्जेट साड़ी उनके जिस्म के साथ एक जान हो गई थी। जब वह गोल घूमतीं, तो साड़ी का घेरा हवा में एक मुकम्मल दायरा बनाता, जैसे कोई गहरा नशा हवा में तैर रहा हो। हर ठुमके के साथ अम्मी के पुष्ट कूल्हों की लचक उस बारीक कपड़े के नीचे से साफ झलकरी थी।
नृत्य के जोश में उनका पल्लू कंधे से फिसलकर उनकी गोरी बाँहों पर आ टिका, और हर बार जब वह अपनी कमर मटकातीं, तो उनके वेलवेट ब्लाउज और साड़ी के बीच से उनकी दूधिया सफेद कमर की एक बिजली सी कौंध जाती। अम्मी के चेहरे पर उस वक्त कोई बंदिश नहीं थी; वह बरसों की कैद के बाद जैसे आज़ादी की पहली साँस ले रही थीं।
भीड़ के बीच खड़ा विशाल एक पत्थर की मूरत बन गया था। उसकी गहरी आँखें अम्मी के रसीले बदन के हर मूवमेंट को ऐसे सोख रही थीं जैसे कोई प्यासा मरुस्थल बारिश की बूंदों को। वह अम्मी के भरे हुए सीने की धड़कन और उनके जिस्म की हर लचक को अपनी याददाश्त में कैद कर रहा था।
जब गाना खत्म हुआ, तो अम्मी तेज़ साँसें लेती हुई, पसीने की नन्हीं बूंदों से चमकते चेहरे के साथ एक टेबल पर पानी पीने रुकीं। विशाल साये की तरह उनके पास पहुँच गया।
विशाल: (एक गहरी सरगोशी में, अम्मी के कान के पास झुककर) "भाभी... आपने तो आज इस महफ़िल में आग लगा दी। खुदा की कसम, ऐसा मंज़र मैंने आज तक नहीं देखा।"
अम्मी ने शर्माकर अपनी लंबी पलकें झुका लीं, पर उनके मखमली गालों की लाली बढ़ गई।
अम्मी: "अरे नहीं… बस कज़िन्स की ज़िद थी। बचपन का शौक है, बस वही निकल आया।"
विशाल: "यह शौक नहीं, कयामत ढाने का हुनर है। ऐसा हुनर जो किसी की भी रातों की नींदें उड़ा सकता है।" वह एक पल रुका, उसकी नज़रें अम्मी के सुराहीदार गले पर जमी थीं। "ज़्यादा थक तो नहीं गईं आप?"
अम्मी: (गहरी साँस लेते हुए, जिससे उनका पुष्ट सीना और भी उभर आया) "जी… थोड़ी सी।"
विशाल: (एक शरारती और हवस भरी मुस्कान के साथ) "अच्छा है... वरना यहाँ मौजूद मर्दों के दिल थक जाते आपको देखते-देखते।"
अम्मी का अंदरूनी द्वंद्व (अम्मी के ख्यालात)
अम्मी खिलखिलाकर हँस पड़ीं, पर उनके ज़हन में एक अलग ही जंग छिड़ी थी।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह, यह मर्द कितना बेबाक है। इसकी बातें सीधे मेरे जिस्म की हरारत बढ़ा रही हैं। पर मुझे हँसना होगा… मुझे इसे किसी तरह राजी करना होगा, ताकि यह सायमा का पीछा छोड़ दे।"
मैं बैठा यह सब देख रहा था और मेरे पेट में एक अजीब सी ऐंठन उठ रही थी। अम्मी उस अजनबी से इतनी बेतकल्लुफ़ कैसे हो सकती थीं?
वह जिस तरह उसकी बातों पर हँस रही थीं और बार-बार अपनी शराबी साड़ी का पल्लू सँभाल रही थीं, वह मुझे बेचैन कर रहा था।
पूरी शाम मैं उन पर नज़र रखे हुए था। उनकी नज़रें बार-बार एक दूसरे से टकरातीं और फिर झट से हट जातीं।
कुछ देर बाद, जब भीड़ कबाब काउंटर की तरफ उमड़ पड़ी, तो मैंने देखा कि अम्मी और विशाल फिर से आमने-सामने थे। मसालेदार धुएँ और कबाबों की खुशबू के बीच, उन दोनों के बीच की केमिस्ट्री अब एक खतरनाक मोड़ ले रही थी।
अम्मी की शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनके कंधे से सरक कर उनकी गोरी और मखमली बाँह पर आ गिरा था।
विशाल ने अपनी लंबी और गठीली उँगली अम्मी की प्लेट में रखे सीख कबाब की तरफ उठाई, पर उसकी भूखी निगाहें अम्मी के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर जमी थीं जहाँ से उनके पुष्ट सीने का उभार साफ़ नज़र आ रहा था।
विशाल: (एक भारी और नशीली आवाज़ में) "मानना पड़ेगा... आपकी पसंद बहुत अच्छी है, आयशा जी। हर चीज़ में... चाहे वह ये कबाब हों या ये गहरा शराबी रंग।"
अम्मी ने अपनी नशीली आँखों को हल्का सा सिकोड़ा। उनके मखमली जिस्म की हरारत उस धुएँ के बीच और भी बढ़ गई थी।
अम्मी: (एक बेबाक आत्मविश्वास के साथ) "दिल्ली आए और यहाँ के जायके नहीं चखे, तो क्या खाक दिल्ली आए? यहाँ की हर चीज़ में एक अलग ही नशा है।"
विशाल अम्मी के और करीब सरक आया। अब उसके मज़बूत सीने और अम्मी के मखमली बदन के बीच महज़ कुछ इंच का फासला था। अम्मी के बदन से उठती चमेली की खुशबू विशाल के नथुनों को पागल कर रही थी।
विशाल: "सुना है दिल्ली का खाना लोगों को अपना दीवाना बना देता है... पर कुछ ज़ायके ऐसे होते हैं जो इंसान को ताउम्र के लिए अपना गुलाम बना लें।"
अम्मी ने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को थोड़ा तिरछा किया और एक ऐसी कातिलाना मुस्कान दी जिसने विशाल के कलेजे में छूरी चला दी।
अम्मी: "सिर्फ खाना ही? या दिल्ली की कुछ और चीज़ें भी?"
विशाल थोड़ा और नीचे झुका, उसकी आवाज़ अब एक गहरी सरगोशी बन चुकी थी जो सीधे अम्मी के कानों को छू रही थी।
विशाल: "कुछ चीज़ें तो पहली नज़र में ही कातिल हो जाती हैं, आयशा जी। उनके लिए खाने का बहाना नहीं करना पड़ता... बस एक दीदार ही काफी होता है।"
आयशा के ख्यालात
पहली बार किसी अनजान मर्द के मुँह से अपना नाम—'आयशा'—सुनकर आयशा के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी। उनके गुलाबी होंठ हलके से कांप उठे।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... इसने मेरा नाम जिस लहजे में लिया, ऐसा लगा जैसे इसने मुझे सरेआम बिना कपड़ों के कर दिया हो। इसका यह बेबाकपन... इसकी ये कातिल नज़रें जो सीधे मेरे सीने की ढलान पर गड़ी हैं। मुझे डर लग रहा है, पर मुझे रुकना नहीं है।
सायमा को बचाने के लिए मुझे इस अपने करीब आने देना होगा। इसे लगना चाहिए कि मैं इसके जाल में फँस रही हूँ।"
कबाब काउंटर से उठते धुएं और महफिल के शोर के बीच, आयशा ने वह कदम उठाया जिसने इस खेल की बिसात ही बदल दी। उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनकी मखमली और गोरी बाँह पर लहराया, और उन्होंने अपनी नशीली आँखों को विशाल की गहरी नज़रों में गड़ा दिया।
आयशा: (विशाल के कान के थोड़ा और करीब झुकते हुए) "विशाल साहब... यहाँ बहुत शोर है और सबकी नज़रें हम पर हैं। मुझे आपसे कुछ निजी बात करनी है। क्या हम उन फूलों की झाड़ियों के पीछे चल सकते हैं? वहाँ थोड़ी खामोशी होगी।"
विशाल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान फैल गई। उसके चौड़े कंधों में एक अजीब सी अकड़ आ गई।
विशाल (मन में): "उफ़... कमाल है! मुझे लगा था इस 'आयशा' को फाँसने में वक्त लगेगा, पर यह तो खुद ही इस कातिलाना बदन को अंधेरे की तरफ ले जा रही है। अकरम की ये पुष्ट और रसीली भाभी तो सायमा से कहीं ज़्यादा गरम और अनुभवी निकली।"
आयशा ने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को हल्का सा झटका दिया और अपनी साड़ी को संभालते हुए उन घनी और खुशबूदार झाड़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए। विशाल साये की तरह उनके पीछे हो लिया।
आयशा के चलने के अंदाज़ में एक ऐसी कातिलाना लचक थी कि उनकी चौड़ी कमर और भारी कूल्हों का उभार उस पारदर्शी साड़ी के नीचे से विशाल की हवस को और भी भड़का रहा था।
झाड़ियों के पीछे पहुँचते ही मोगरे और चमेली की खुशबू और भी गाढ़ी हो गई। रोशनी मद्धम थी, सिर्फ दूर से आती फेयरी लाइट्स आयशा के दूधिया बदन पर जुगनुओं की तरह चमक रही थीं।
विशाल जैसे ही आयशा के करीब पहुँचा, उसने अपना हाथ आयशा की पतली और गोरी कमर की तरफ बढ़ाने की कोशिश की, पर आयशा ने बड़ी नजाकत से एक कदम पीछे हटा लिया। उनके भरे हुए सीने की धड़कन अब तेज़ थी।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... इस दरिंदे को लग रहा है कि मैं इसके हुस्न के जाल में फँस गई हूँ। इसे अपनी इस मर्दानगी पर कितना गुमान है। पर इसे क्या मालूम कि मैं यहाँ अपनी नुमाइश करने नहीं, बल्कि सायमा की ज़िंदगी का सौदा करने आई हूँ।“
“मुझे इसे समझाना होगा, या शायद डराना होगा... पर इस कातिल अंधेरे में इसके इतने करीब होना मेरे लिए भी एक आग का दरिया है।"
विशाल ने अपनी आवाज़ को और भी भारी और कामुक बनाते हुए कहा:
विशाल: "तो कहिए आयशा जी... ऐसी क्या बात है जो आप कहना चाहती हैं? यकीन मानिए, आपकी हर बात सुनने के लिए मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा सकता हूँ।"
आयशा ने अपनी मखमली और कोमल उंगलियों से झाड़ी के एक फूल को छुआ और फिर सीधे विशाल की आँखों में देखकर अपनी बात शुरू की।
आयशा: "विशाल साहब, आप सायमा के बारे में जो कुछ भी सोच रहे हैं... उसे यहीं खत्म कर दीजिए। मैं जानती हूँ आपके पास क्या है, और मैं यह भी जानती हूँ कि आप उसे किस कदर ब्लैकमेल कर रहे हैं।"
विशाल एक मिनट के लिए सन्न रह गया, "आप क्या कह रही हैं, मैं समझा नहीं।"
आयशा: "विशाल जी, मैं आपको समझदार इंसान समझती हूँ। सायमा ने मेरे साथ वो सारे राज़ साझा किए हैं—कैसे वो आपके प्यार में पागल हुई और कैसे आपके पास उसके कुछ संदेश और तस्वीरें हैं, जिन्हें लेकर आप उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं।"
विशाल के चेहरे पर जो शिकारी वाली मुस्कान थी, वह आयशा की बात सुनकर एक पल के लिए गायब हुई, और उसने मन ही मन सायमा को एक गंदी गाली दी, पर अगले ही पल उसकी आँखों में एक और भी ज़्यादा ज़हरीली और हवस भरी चमक लौट आई।
उसने आयशा के उस नूरानी और पुष्ट वजूद को ऊपर से नीचे तक निहारा। आयशा की शराबी रंग की साड़ी उस मद्धम रोशनी में उनके दूधिया बदन से चिपक कर उनके अंगों की हर गोलाई को साफ़ ज़ाहिर कर रही थी।
विशाल (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "तो सायमा की खाला उसे बचाने के लिए मेरे पास आई हैं! मैं तो इसे पहले ही फँसाना चाहता था, अब तो यह और भी आसान हो गया है। यह तो एक ऐसी 'बड़ी मछली' है जो खुद चलकर जाल के करीब आई है। अब सायमा के साथ-साथ इसकी अकड़ भी यही ढीली करूँगा।"
विशाल ने डरने के बजाय एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उसके मज़बूत सीने और आयशा के मखमली और उभरे हुए सीने के बीच महज़ एक इंच का फासला था। आयशा को विशाल के बदन की गर्मी और उसके अत्तर की तेज़ महक महसूस हो रही थी।
विशाल: (अपनी आवाज़ को और भी गहरा बनाते हुए) "ओह... तो सायमा ने अपनी 'हसीन खाला' को सब बता दिया? मुझे अंदाज़ा नहीं था कि वह इतनी कमज़ोर निकलेगी। पर आयशा जी... आपने यहाँ आकर अपनी मुश्किल कम नहीं की, बल्कि बढ़ा ली है।"
उसने अपना हाथ हवा में उठाया और आयशा के गोरे कंधे के पास लटक रहे साड़ी के पल्लू को अपनी उंगलियों से छूने लगा।
आयशा का दिल उस वेलवेट ब्लाउज के नीचे किसी कैद परिंदे की तरह फड़फड़ा रहा था। विशाल की नज़रों की बेबाकी उनके मखमली जिस्म को बिना छुए ही जैसे छील रही थी।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... ये तो और भी ज़्यादा खतरनाक निकला। इसे सायमा के राज़ खुलने का डर नहीं है, बल्कि ये तो मेरी इस पुष्ट काया को भी अपनी हवस का निशाना बनाना चाहता है। इसकी उंगलियाँ मेरे पल्लू के पास रेंग रही हैं, और मेरा बदन खौफ के मारे पत्थर हो रहा है। पर मुझे पीछे नहीं हटना… सायमा की इज़्ज़त का सवाल है। मुझे इस भेड़िये को दिखाना होगा कि मैं डरी नहीं हूँ।"
आयशा : (एक धीमी आवाज़ में) "तो आप क्या चाहते हैं उन तस्वीरों और संदेशों को मिटाने के लिए? उसकी शादी हो रही है, खुदा के लिए उसे ब्लैकमेल करना बंद कीजिए। वह तो खुदकुशी करने वाली थी, मैंने ही उसे समझाया कि ऐसा मत कर। अगर वह जान दे देती, तो पूरे खानदान की बदनामी होती, पर याद रखिए, आप भी कानून के हाथों बच नहीं पाते।"
विशाल ने गहरी सांस ली और आगे झुकते हुए आयशा की आंखों में घूरकर देखा। उसके चेहरे पर अब किसी तरह का डर नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश वाली मुस्कान थी। उसे लग रहा था कि आयशा के डर और ममता का फायदा उठाकर वह न सिर्फ सायमा को अपनी मुट्ठी में रखेगा, बल्कि आयशा को भी अपने इशारों पर नचा सकेगा।
"आयशा जी, मैं आपकी बातों से बहुत प्रभावित हो गया हूँ," विशाल ने झुकते हुए फुसफुसाकर कहा, "सौदा सायमा का था, और मैं भी नहीं चाहता कि वह खुदकुशी करे, पर इसमें मेरा क्या फायदा?"
उसने अपनी नज़रों को आयशा के चेहरे पर टिका दिया। "इतना बड़ा नुकसान सहकर मैं वो तस्वीरें डिलीट कर दूँ? आखिर मुझे भी तो अपनी मेहनत का कुछ फल मिलना चाहिए। अब आप ही बताइए, सायमा की आबरू बचाने के लिए आप मुझे क्या कीमत दे सकती हैं?"
आयशा के मुँह से अचानक निकल गया, "आप आखिर चाहते क्या हैं?"
विशाल: "आयशा जी... सायमा तो बस एक कच्ची कली थी। पर आप... आप तो एक मुकम्मल जन्नत हैं। अगर आप चाहती हैं कि सायमा के वे मैसेज और तस्वीरें कभी दुनिया के सामने न आएँ, तो आपको मुझसे सौदा करना होगा।"
उसकी नज़रें आयशा के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर गड़ी थीं, जहाँ आयशा के पुष्ट और रसीले मम्मे तेज़ धड़कनों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे।
विशाल: "अगर आप चाहती हैं कि अकरम को कभी पता न चले कि उसकी होने वाली बीवी कितनी 'रंगीन' मिज़ाज थी... तो आपको मुझे कुछ ऐसा देना होगा जो उस कली से कहीं ज़्यादा रसीला और अनुभवी हो। आप समझ रही हैं न मैं क्या चाह रहा हूँ?"
विशाल ने एक गहरी और भूखी नज़र आयशा के वजूद पर डाली, जैसे वह उसे अपनी आँखों से ही पी जाना चाहता हो। उसने एक कुटिल मुस्कान के साथ बोला, "चाहत तो मेरी बहुत बड़ी है आयशा जी, और उसे पूरा करने की ताकत अब सिर्फ आपके पास है। अगर आप चाहती हैं कि वो तस्वीरें और मैसेज हमेशा के लिए दफन हो जाएं, तो आपको सायमा की जगह लेनी होगी।"
विशाल ने अपनी हथेली आयशा की पतली और गोरी कमर पर जमा दी, जहाँ साड़ी का कपड़ा थोड़ा हटा हुआ था। उसकी गर्म छुअन अम्मी के मखमली मांस में धँस रही थी।
अम्मी के ख्यालात
अम्मी का पूरा बदन विशाल के उस गंदे स्पर्श से सिहर उठा। उनकी सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूंदें अब और भी नुमाया थीं।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह... ये तो सरेआम मेरे मखमली बदन की बोली लगा रहा है। इसकी आँखों में वही दरिंदगी है जो उस रात ट्रेन के उन गुंडों में थी। पर ये उनसे कहीं ज़्यादा शातिर है।"
विशाल की हथेली अभी भी अम्मी की पतली और गोरी कमर पर जमी हुई थी, जिसका अहसास अम्मी के मखमली बदन में बिजली की तरह दौड़ रहा था।
आयशा के मुँह से अचानक निकल गया, "कोई और रास्ता नहीं है क्या? मैं शादीशुदा हूँ, एक जवान बच्ची की माँ हूँ... मैं भला कैसे सायमा की जगह ले सकती हूँ?"
विशाल ने आयशा की घबराहट का लुत्फ उठाते हुए उनके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसकी छाती अब आयशा के वक्ष को छू रही थी और उसका हाथ अभी भी आयशा की नंगी कमर को सहला रहा था। उसकी नज़रों में अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ बेबाक हवस और जीत का नशा था।
"शादीशुदा होने से क्या फर्क पड़ता है आयशा जी? बल्कि तजुर्बेकार औरतें तो और भी ज्यादा दिलकश होती हैं," उसने आयशा के कंधे के पास झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "रही बात आपकी सायमा की, तो उसकी जिंदगी और इज्जत अब आपके ही हाथों में है। आप बस एक बार मेरा दिल खुश कर दीजिए, फिर न सायमा को कोई तकलीफ होगी और न ही आपके घर की चहारदीवारी के बाहर कोई बात जाएगी।"
विशाल: (एक नीच मुस्कान के साथ) "तो आयशा जी, पहला सबक सुन लीजिए। अगले कुछ दिनों के लिए, आप मेरी 'गर्लफ्रेंड' की तरह रहेंगी। जब मेरा मन करेगा, हम फोन पर बातें करेंगे... और जो मैं कहूँगा, वही आप पहनेंगी। मेरी हर ज़िद, मेरा हर हुक्म... आपको मानना होगा।"
उसने अपनी पकड़ अम्मी की सुडौल कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे अम्मी का पुष्ट सीना उसके मज़बूत सीने के और भी करीब आ गया।
विशाल: "अगर आपने मुझे पूरी तरह संतुष्ट रखा और मेरी हर बात मानी, तो मैं सायमा को उसकी ज़िंदगी जीने दूँगा। पर याद रहे... वे तस्वीरें और मैसेज तभी डिलीट होंगे जब मैं चाहूँगा। अगले तीन दिनों तक, जब तक यह शादी मुकम्मल नहीं हो जाती, आप मेरी गुलाम होंगी। मंज़ूर है?"
आयशा की सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूंदें अब जम सी गई थीं। विशाल की बातें उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... यह तो मुझे अपनी उंगलियों पर नचाना चाहता है। यह चाहता है कि मैं अपनी मखमली देह और अपनी इज़्ज़त इसके पैरों में डाल दूँ। इसकी ये गंदी शर्तें... ये 'गर्लफ्रेंड' वाला ढोंग... ये सब सिर्फ मेरी इस रसीली काया को नोचने का बहाना है। पर सायमा... उस बच्ची की ज़िंदगी दांव पर है। मुझे इस खेल में शामिल होना ही होगा, चाहे मेरा बदन इस जिल्लत से कितना ही क्यों न कांपे। मुझे हाँ कहना ही होगा।"
आयशा ने अपनी नशीली आँखें धीरे से उठायीं। उनकी पलकें गीली थीं।
आयशा: (एक दबी हुई और कांपती आवाज़ में) "मंज़ूर है... विशाल साहब। सायमा की ज़िंदगी के लिए, मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ। पर याद रहे, अगर आपने अपना वादा तोड़ा, तो एक औरत क्या कर सकती है, ये आप सोच भी नहीं सकते।"
स्टेज पर जब एक पुराना, रूहानी रोमांटिक गाना गूँजा, तो अम्मी की कज़िन्स ने शोर मचाते हुए उन्हें घेर लिया। अम्मी पहले तो झिझकीं, अपने मखमली पल्लू को उंगलियों में भींचकर मना करती रहीं, पर फिर संगीत की उस मदहोश लहर ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया। और फिर जो हुआ, वह महज़ नाच नहीं, हुस्न का एक ज़लज़ला था।
उनकी शराबी रंग की जॉर्जेट साड़ी उनके जिस्म के साथ एक जान हो गई थी। जब वह गोल घूमतीं, तो साड़ी का घेरा हवा में एक मुकम्मल दायरा बनाता, जैसे कोई गहरा नशा हवा में तैर रहा हो। हर ठुमके के साथ अम्मी के पुष्ट कूल्हों की लचक उस बारीक कपड़े के नीचे से साफ झलकरी थी।
नृत्य के जोश में उनका पल्लू कंधे से फिसलकर उनकी गोरी बाँहों पर आ टिका, और हर बार जब वह अपनी कमर मटकातीं, तो उनके वेलवेट ब्लाउज और साड़ी के बीच से उनकी दूधिया सफेद कमर की एक बिजली सी कौंध जाती। अम्मी के चेहरे पर उस वक्त कोई बंदिश नहीं थी; वह बरसों की कैद के बाद जैसे आज़ादी की पहली साँस ले रही थीं।
भीड़ के बीच खड़ा विशाल एक पत्थर की मूरत बन गया था। उसकी गहरी आँखें अम्मी के रसीले बदन के हर मूवमेंट को ऐसे सोख रही थीं जैसे कोई प्यासा मरुस्थल बारिश की बूंदों को। वह अम्मी के भरे हुए सीने की धड़कन और उनके जिस्म की हर लचक को अपनी याददाश्त में कैद कर रहा था।
जब गाना खत्म हुआ, तो अम्मी तेज़ साँसें लेती हुई, पसीने की नन्हीं बूंदों से चमकते चेहरे के साथ एक टेबल पर पानी पीने रुकीं। विशाल साये की तरह उनके पास पहुँच गया।
विशाल: (एक गहरी सरगोशी में, अम्मी के कान के पास झुककर) "भाभी... आपने तो आज इस महफ़िल में आग लगा दी। खुदा की कसम, ऐसा मंज़र मैंने आज तक नहीं देखा।"
अम्मी ने शर्माकर अपनी लंबी पलकें झुका लीं, पर उनके मखमली गालों की लाली बढ़ गई।
अम्मी: "अरे नहीं… बस कज़िन्स की ज़िद थी। बचपन का शौक है, बस वही निकल आया।"
विशाल: "यह शौक नहीं, कयामत ढाने का हुनर है। ऐसा हुनर जो किसी की भी रातों की नींदें उड़ा सकता है।" वह एक पल रुका, उसकी नज़रें अम्मी के सुराहीदार गले पर जमी थीं। "ज़्यादा थक तो नहीं गईं आप?"
अम्मी: (गहरी साँस लेते हुए, जिससे उनका पुष्ट सीना और भी उभर आया) "जी… थोड़ी सी।"
विशाल: (एक शरारती और हवस भरी मुस्कान के साथ) "अच्छा है... वरना यहाँ मौजूद मर्दों के दिल थक जाते आपको देखते-देखते।"
अम्मी का अंदरूनी द्वंद्व (अम्मी के ख्यालात)
अम्मी खिलखिलाकर हँस पड़ीं, पर उनके ज़हन में एक अलग ही जंग छिड़ी थी।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह, यह मर्द कितना बेबाक है। इसकी बातें सीधे मेरे जिस्म की हरारत बढ़ा रही हैं। पर मुझे हँसना होगा… मुझे इसे किसी तरह राजी करना होगा, ताकि यह सायमा का पीछा छोड़ दे।"
मैं बैठा यह सब देख रहा था और मेरे पेट में एक अजीब सी ऐंठन उठ रही थी। अम्मी उस अजनबी से इतनी बेतकल्लुफ़ कैसे हो सकती थीं?
वह जिस तरह उसकी बातों पर हँस रही थीं और बार-बार अपनी शराबी साड़ी का पल्लू सँभाल रही थीं, वह मुझे बेचैन कर रहा था।
पूरी शाम मैं उन पर नज़र रखे हुए था। उनकी नज़रें बार-बार एक दूसरे से टकरातीं और फिर झट से हट जातीं।
कुछ देर बाद, जब भीड़ कबाब काउंटर की तरफ उमड़ पड़ी, तो मैंने देखा कि अम्मी और विशाल फिर से आमने-सामने थे। मसालेदार धुएँ और कबाबों की खुशबू के बीच, उन दोनों के बीच की केमिस्ट्री अब एक खतरनाक मोड़ ले रही थी।
अम्मी की शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनके कंधे से सरक कर उनकी गोरी और मखमली बाँह पर आ गिरा था।
विशाल ने अपनी लंबी और गठीली उँगली अम्मी की प्लेट में रखे सीख कबाब की तरफ उठाई, पर उसकी भूखी निगाहें अम्मी के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर जमी थीं जहाँ से उनके पुष्ट सीने का उभार साफ़ नज़र आ रहा था।
विशाल: (एक भारी और नशीली आवाज़ में) "मानना पड़ेगा... आपकी पसंद बहुत अच्छी है, आयशा जी। हर चीज़ में... चाहे वह ये कबाब हों या ये गहरा शराबी रंग।"
अम्मी ने अपनी नशीली आँखों को हल्का सा सिकोड़ा। उनके मखमली जिस्म की हरारत उस धुएँ के बीच और भी बढ़ गई थी।
अम्मी: (एक बेबाक आत्मविश्वास के साथ) "दिल्ली आए और यहाँ के जायके नहीं चखे, तो क्या खाक दिल्ली आए? यहाँ की हर चीज़ में एक अलग ही नशा है।"
विशाल अम्मी के और करीब सरक आया। अब उसके मज़बूत सीने और अम्मी के मखमली बदन के बीच महज़ कुछ इंच का फासला था। अम्मी के बदन से उठती चमेली की खुशबू विशाल के नथुनों को पागल कर रही थी।
विशाल: "सुना है दिल्ली का खाना लोगों को अपना दीवाना बना देता है... पर कुछ ज़ायके ऐसे होते हैं जो इंसान को ताउम्र के लिए अपना गुलाम बना लें।"
अम्मी ने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को थोड़ा तिरछा किया और एक ऐसी कातिलाना मुस्कान दी जिसने विशाल के कलेजे में छूरी चला दी।
अम्मी: "सिर्फ खाना ही? या दिल्ली की कुछ और चीज़ें भी?"
विशाल थोड़ा और नीचे झुका, उसकी आवाज़ अब एक गहरी सरगोशी बन चुकी थी जो सीधे अम्मी के कानों को छू रही थी।
विशाल: "कुछ चीज़ें तो पहली नज़र में ही कातिल हो जाती हैं, आयशा जी। उनके लिए खाने का बहाना नहीं करना पड़ता... बस एक दीदार ही काफी होता है।"
आयशा के ख्यालात
पहली बार किसी अनजान मर्द के मुँह से अपना नाम—'आयशा'—सुनकर आयशा के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी। उनके गुलाबी होंठ हलके से कांप उठे।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... इसने मेरा नाम जिस लहजे में लिया, ऐसा लगा जैसे इसने मुझे सरेआम बिना कपड़ों के कर दिया हो। इसका यह बेबाकपन... इसकी ये कातिल नज़रें जो सीधे मेरे सीने की ढलान पर गड़ी हैं। मुझे डर लग रहा है, पर मुझे रुकना नहीं है।
सायमा को बचाने के लिए मुझे इस अपने करीब आने देना होगा। इसे लगना चाहिए कि मैं इसके जाल में फँस रही हूँ।"
कबाब काउंटर से उठते धुएं और महफिल के शोर के बीच, आयशा ने वह कदम उठाया जिसने इस खेल की बिसात ही बदल दी। उनकी शराबी रंग की साड़ी का पल्लू एक बार फिर उनकी मखमली और गोरी बाँह पर लहराया, और उन्होंने अपनी नशीली आँखों को विशाल की गहरी नज़रों में गड़ा दिया।
आयशा: (विशाल के कान के थोड़ा और करीब झुकते हुए) "विशाल साहब... यहाँ बहुत शोर है और सबकी नज़रें हम पर हैं। मुझे आपसे कुछ निजी बात करनी है। क्या हम उन फूलों की झाड़ियों के पीछे चल सकते हैं? वहाँ थोड़ी खामोशी होगी।"
विशाल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान फैल गई। उसके चौड़े कंधों में एक अजीब सी अकड़ आ गई।
विशाल (मन में): "उफ़... कमाल है! मुझे लगा था इस 'आयशा' को फाँसने में वक्त लगेगा, पर यह तो खुद ही इस कातिलाना बदन को अंधेरे की तरफ ले जा रही है। अकरम की ये पुष्ट और रसीली भाभी तो सायमा से कहीं ज़्यादा गरम और अनुभवी निकली।"
आयशा ने अपनी लंबी सुराहीदार गर्दन को हल्का सा झटका दिया और अपनी साड़ी को संभालते हुए उन घनी और खुशबूदार झाड़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए। विशाल साये की तरह उनके पीछे हो लिया।
आयशा के चलने के अंदाज़ में एक ऐसी कातिलाना लचक थी कि उनकी चौड़ी कमर और भारी कूल्हों का उभार उस पारदर्शी साड़ी के नीचे से विशाल की हवस को और भी भड़का रहा था।
झाड़ियों के पीछे पहुँचते ही मोगरे और चमेली की खुशबू और भी गाढ़ी हो गई। रोशनी मद्धम थी, सिर्फ दूर से आती फेयरी लाइट्स आयशा के दूधिया बदन पर जुगनुओं की तरह चमक रही थीं।
विशाल जैसे ही आयशा के करीब पहुँचा, उसने अपना हाथ आयशा की पतली और गोरी कमर की तरफ बढ़ाने की कोशिश की, पर आयशा ने बड़ी नजाकत से एक कदम पीछे हटा लिया। उनके भरे हुए सीने की धड़कन अब तेज़ थी।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... इस दरिंदे को लग रहा है कि मैं इसके हुस्न के जाल में फँस गई हूँ। इसे अपनी इस मर्दानगी पर कितना गुमान है। पर इसे क्या मालूम कि मैं यहाँ अपनी नुमाइश करने नहीं, बल्कि सायमा की ज़िंदगी का सौदा करने आई हूँ।“
“मुझे इसे समझाना होगा, या शायद डराना होगा... पर इस कातिल अंधेरे में इसके इतने करीब होना मेरे लिए भी एक आग का दरिया है।"
विशाल ने अपनी आवाज़ को और भी भारी और कामुक बनाते हुए कहा:
विशाल: "तो कहिए आयशा जी... ऐसी क्या बात है जो आप कहना चाहती हैं? यकीन मानिए, आपकी हर बात सुनने के लिए मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा सकता हूँ।"
आयशा ने अपनी मखमली और कोमल उंगलियों से झाड़ी के एक फूल को छुआ और फिर सीधे विशाल की आँखों में देखकर अपनी बात शुरू की।
आयशा: "विशाल साहब, आप सायमा के बारे में जो कुछ भी सोच रहे हैं... उसे यहीं खत्म कर दीजिए। मैं जानती हूँ आपके पास क्या है, और मैं यह भी जानती हूँ कि आप उसे किस कदर ब्लैकमेल कर रहे हैं।"
विशाल एक मिनट के लिए सन्न रह गया, "आप क्या कह रही हैं, मैं समझा नहीं।"
आयशा: "विशाल जी, मैं आपको समझदार इंसान समझती हूँ। सायमा ने मेरे साथ वो सारे राज़ साझा किए हैं—कैसे वो आपके प्यार में पागल हुई और कैसे आपके पास उसके कुछ संदेश और तस्वीरें हैं, जिन्हें लेकर आप उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं।"
विशाल के चेहरे पर जो शिकारी वाली मुस्कान थी, वह आयशा की बात सुनकर एक पल के लिए गायब हुई, और उसने मन ही मन सायमा को एक गंदी गाली दी, पर अगले ही पल उसकी आँखों में एक और भी ज़्यादा ज़हरीली और हवस भरी चमक लौट आई।
उसने आयशा के उस नूरानी और पुष्ट वजूद को ऊपर से नीचे तक निहारा। आयशा की शराबी रंग की साड़ी उस मद्धम रोशनी में उनके दूधिया बदन से चिपक कर उनके अंगों की हर गोलाई को साफ़ ज़ाहिर कर रही थी।
विशाल (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "तो सायमा की खाला उसे बचाने के लिए मेरे पास आई हैं! मैं तो इसे पहले ही फँसाना चाहता था, अब तो यह और भी आसान हो गया है। यह तो एक ऐसी 'बड़ी मछली' है जो खुद चलकर जाल के करीब आई है। अब सायमा के साथ-साथ इसकी अकड़ भी यही ढीली करूँगा।"
विशाल ने डरने के बजाय एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उसके मज़बूत सीने और आयशा के मखमली और उभरे हुए सीने के बीच महज़ एक इंच का फासला था। आयशा को विशाल के बदन की गर्मी और उसके अत्तर की तेज़ महक महसूस हो रही थी।
विशाल: (अपनी आवाज़ को और भी गहरा बनाते हुए) "ओह... तो सायमा ने अपनी 'हसीन खाला' को सब बता दिया? मुझे अंदाज़ा नहीं था कि वह इतनी कमज़ोर निकलेगी। पर आयशा जी... आपने यहाँ आकर अपनी मुश्किल कम नहीं की, बल्कि बढ़ा ली है।"
उसने अपना हाथ हवा में उठाया और आयशा के गोरे कंधे के पास लटक रहे साड़ी के पल्लू को अपनी उंगलियों से छूने लगा।
आयशा का दिल उस वेलवेट ब्लाउज के नीचे किसी कैद परिंदे की तरह फड़फड़ा रहा था। विशाल की नज़रों की बेबाकी उनके मखमली जिस्म को बिना छुए ही जैसे छील रही थी।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... ये तो और भी ज़्यादा खतरनाक निकला। इसे सायमा के राज़ खुलने का डर नहीं है, बल्कि ये तो मेरी इस पुष्ट काया को भी अपनी हवस का निशाना बनाना चाहता है। इसकी उंगलियाँ मेरे पल्लू के पास रेंग रही हैं, और मेरा बदन खौफ के मारे पत्थर हो रहा है। पर मुझे पीछे नहीं हटना… सायमा की इज़्ज़त का सवाल है। मुझे इस भेड़िये को दिखाना होगा कि मैं डरी नहीं हूँ।"
आयशा : (एक धीमी आवाज़ में) "तो आप क्या चाहते हैं उन तस्वीरों और संदेशों को मिटाने के लिए? उसकी शादी हो रही है, खुदा के लिए उसे ब्लैकमेल करना बंद कीजिए। वह तो खुदकुशी करने वाली थी, मैंने ही उसे समझाया कि ऐसा मत कर। अगर वह जान दे देती, तो पूरे खानदान की बदनामी होती, पर याद रखिए, आप भी कानून के हाथों बच नहीं पाते।"
विशाल ने गहरी सांस ली और आगे झुकते हुए आयशा की आंखों में घूरकर देखा। उसके चेहरे पर अब किसी तरह का डर नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश वाली मुस्कान थी। उसे लग रहा था कि आयशा के डर और ममता का फायदा उठाकर वह न सिर्फ सायमा को अपनी मुट्ठी में रखेगा, बल्कि आयशा को भी अपने इशारों पर नचा सकेगा।
"आयशा जी, मैं आपकी बातों से बहुत प्रभावित हो गया हूँ," विशाल ने झुकते हुए फुसफुसाकर कहा, "सौदा सायमा का था, और मैं भी नहीं चाहता कि वह खुदकुशी करे, पर इसमें मेरा क्या फायदा?"
उसने अपनी नज़रों को आयशा के चेहरे पर टिका दिया। "इतना बड़ा नुकसान सहकर मैं वो तस्वीरें डिलीट कर दूँ? आखिर मुझे भी तो अपनी मेहनत का कुछ फल मिलना चाहिए। अब आप ही बताइए, सायमा की आबरू बचाने के लिए आप मुझे क्या कीमत दे सकती हैं?"
आयशा के मुँह से अचानक निकल गया, "आप आखिर चाहते क्या हैं?"
विशाल: "आयशा जी... सायमा तो बस एक कच्ची कली थी। पर आप... आप तो एक मुकम्मल जन्नत हैं। अगर आप चाहती हैं कि सायमा के वे मैसेज और तस्वीरें कभी दुनिया के सामने न आएँ, तो आपको मुझसे सौदा करना होगा।"
उसकी नज़रें आयशा के वेलवेट ब्लाउज के उस तंग हिस्से पर गड़ी थीं, जहाँ आयशा के पुष्ट और रसीले मम्मे तेज़ धड़कनों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे।
विशाल: "अगर आप चाहती हैं कि अकरम को कभी पता न चले कि उसकी होने वाली बीवी कितनी 'रंगीन' मिज़ाज थी... तो आपको मुझे कुछ ऐसा देना होगा जो उस कली से कहीं ज़्यादा रसीला और अनुभवी हो। आप समझ रही हैं न मैं क्या चाह रहा हूँ?"
विशाल ने एक गहरी और भूखी नज़र आयशा के वजूद पर डाली, जैसे वह उसे अपनी आँखों से ही पी जाना चाहता हो। उसने एक कुटिल मुस्कान के साथ बोला, "चाहत तो मेरी बहुत बड़ी है आयशा जी, और उसे पूरा करने की ताकत अब सिर्फ आपके पास है। अगर आप चाहती हैं कि वो तस्वीरें और मैसेज हमेशा के लिए दफन हो जाएं, तो आपको सायमा की जगह लेनी होगी।"
विशाल ने अपनी हथेली आयशा की पतली और गोरी कमर पर जमा दी, जहाँ साड़ी का कपड़ा थोड़ा हटा हुआ था। उसकी गर्म छुअन अम्मी के मखमली मांस में धँस रही थी।
अम्मी के ख्यालात
अम्मी का पूरा बदन विशाल के उस गंदे स्पर्श से सिहर उठा। उनकी सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूंदें अब और भी नुमाया थीं।
अम्मी (मन में): "या अल्लाह... ये तो सरेआम मेरे मखमली बदन की बोली लगा रहा है। इसकी आँखों में वही दरिंदगी है जो उस रात ट्रेन के उन गुंडों में थी। पर ये उनसे कहीं ज़्यादा शातिर है।"
विशाल की हथेली अभी भी अम्मी की पतली और गोरी कमर पर जमी हुई थी, जिसका अहसास अम्मी के मखमली बदन में बिजली की तरह दौड़ रहा था।
आयशा के मुँह से अचानक निकल गया, "कोई और रास्ता नहीं है क्या? मैं शादीशुदा हूँ, एक जवान बच्ची की माँ हूँ... मैं भला कैसे सायमा की जगह ले सकती हूँ?"
विशाल ने आयशा की घबराहट का लुत्फ उठाते हुए उनके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसकी छाती अब आयशा के वक्ष को छू रही थी और उसका हाथ अभी भी आयशा की नंगी कमर को सहला रहा था। उसकी नज़रों में अब कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ बेबाक हवस और जीत का नशा था।
"शादीशुदा होने से क्या फर्क पड़ता है आयशा जी? बल्कि तजुर्बेकार औरतें तो और भी ज्यादा दिलकश होती हैं," उसने आयशा के कंधे के पास झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "रही बात आपकी सायमा की, तो उसकी जिंदगी और इज्जत अब आपके ही हाथों में है। आप बस एक बार मेरा दिल खुश कर दीजिए, फिर न सायमा को कोई तकलीफ होगी और न ही आपके घर की चहारदीवारी के बाहर कोई बात जाएगी।"
विशाल: (एक नीच मुस्कान के साथ) "तो आयशा जी, पहला सबक सुन लीजिए। अगले कुछ दिनों के लिए, आप मेरी 'गर्लफ्रेंड' की तरह रहेंगी। जब मेरा मन करेगा, हम फोन पर बातें करेंगे... और जो मैं कहूँगा, वही आप पहनेंगी। मेरी हर ज़िद, मेरा हर हुक्म... आपको मानना होगा।"
उसने अपनी पकड़ अम्मी की सुडौल कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे अम्मी का पुष्ट सीना उसके मज़बूत सीने के और भी करीब आ गया।
विशाल: "अगर आपने मुझे पूरी तरह संतुष्ट रखा और मेरी हर बात मानी, तो मैं सायमा को उसकी ज़िंदगी जीने दूँगा। पर याद रहे... वे तस्वीरें और मैसेज तभी डिलीट होंगे जब मैं चाहूँगा। अगले तीन दिनों तक, जब तक यह शादी मुकम्मल नहीं हो जाती, आप मेरी गुलाम होंगी। मंज़ूर है?"
आयशा की सुराहीदार गर्दन पर पसीने की बूंदें अब जम सी गई थीं। विशाल की बातें उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।
आयशा (मन में): "या अल्लाह... यह तो मुझे अपनी उंगलियों पर नचाना चाहता है। यह चाहता है कि मैं अपनी मखमली देह और अपनी इज़्ज़त इसके पैरों में डाल दूँ। इसकी ये गंदी शर्तें... ये 'गर्लफ्रेंड' वाला ढोंग... ये सब सिर्फ मेरी इस रसीली काया को नोचने का बहाना है। पर सायमा... उस बच्ची की ज़िंदगी दांव पर है। मुझे इस खेल में शामिल होना ही होगा, चाहे मेरा बदन इस जिल्लत से कितना ही क्यों न कांपे। मुझे हाँ कहना ही होगा।"
आयशा ने अपनी नशीली आँखें धीरे से उठायीं। उनकी पलकें गीली थीं।
आयशा: (एक दबी हुई और कांपती आवाज़ में) "मंज़ूर है... विशाल साहब। सायमा की ज़िंदगी के लिए, मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ। पर याद रहे, अगर आपने अपना वादा तोड़ा, तो एक औरत क्या कर सकती है, ये आप सोच भी नहीं सकते।"



