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सुबह सुप्रिया की आँख खुली तोह इक़बाल धीरे से उसका सर अपने सीने से तकिये पर रख रहा था. शायद वह पूरी रात इक़बाल से चिपके हो सो गयी थी. उसे इस बात का एहसास hi नहीं हुआ. सुप्रिया ने तुरंत hi अपनी आँखें बंद कर ली, वह नहीं चाहती थी इक़बाल को पता चले की वह जगी हुई है.
इक़बाल बिना कोई आवाज़ किये बिस्तर से नीचे उतरा और अपने कपडे बदलने लगा. शायद वह सुबह की नमाज़ के लिए जहा रहा था. बहार अभी भी काफी अँधेरा hi था, पर सुप्रिया को इक़बाल के शरीर की छवि साफ़ दिखाई दे रही थी. उसका बड़ा लम्बा सा शरीर, चौड़ी छाती और मजबूत कंधे. इन्ही कन्धों का सहारा ले कर तोह वह कल रात सो गयी थी.
कल रात के बारे में सोचते hi उसकी आँखों में फिर से उदासी सी छाने लगी थी. ऐसा लग रहा था की जैसे उसकी जिंदगी का मक़सद hi ख़तम हो गया था. न विक्रम यहाँ आने वाला था, न वह अतुल या अपने घर वापस जा सकती थी, और उसकी शादी इक़बाल से हो चुकी थी.
इक़बाल कपडे बदल कर कमरे से बहार जा चूका था. सुप्रिया अभी भी बिस्तर पर पड़ी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी. आँखों से अभी आंसू तोह नहीं बह रहे थे, पर उसका दिमाग फिर से फटा जा रहा था. उसने विक्रम के लिए अतुल को छोड़ा, और विक्रम की वजह से वह यहाँ तक पहुंच गयी थी. अतुल उससे कितनी नफरत करता होगा, शायद उसने अपना नया जीवन बसने के बारे में सोचना शुरू कर दिया होगा. और विक्रम, वह तोह उसे एक महीने में hi भूल गया था.
सोचते सोचते कब जाने एक घंटा बीत गया था और बहार रौशनी होनी शुरू हो गयी थी. कुछ देर बाद इक़बाल वापस कमरे में आया, अब तोह वह कमरे का दरवाज़ा भी नहीं खटखटा रहा था, जैसे कमरे में हर चीज़ पर अब उसका हक़ हो.
सुप्रिया को जगा हुआ देख, इक़बाल ने धीरे से कहा - आप जग गयी...
सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया और बिस्तर पर बैठ गयी. वह इक़बाल को देख कर कल रात के बारे में सोचने लगी. कैसे उसने उसे कास के पकड़ लिया था और अपना पैरो का भार भी उस पार दाल दिया था. सुप्रिया तोह शायद कुछ सोचने समझने की अवस्था में hi नहीं थी कल रात.
इक़बाल - आप नाहा के तैयार हो जाइये... और नाश्ता कर लीजिये... फिर मैं आपको कुछ दिखता हूँ...
इक़बाल को देख कर तोह ऐसा लग रहा था की जैसे कुछ हुआ hi नहीं था. बस उसने उसे मैडमजी कहना बंद कर दिया था, और शायद कल रात से hi कर दिया था. पिछले दो सालो से वह उसे मैडमजी hi कह कर बुलाता आया था. कितना अजीब सा था की वह अब इस शब्द का इस्तेमाल hi नहीं कर रहा था.
सुप्रिया बेमन से कड़ी हुई और अपने कपडे लेकर नीचे नहाने चली गयी. नीचे पहुंचते hi रुबीना ने उसका हाल चाल पुछा और हिना भी आज जल्दी जग गयी थी. सुप्रिया को उनके सामने अपनी झूठी मुस्कान कायम रखनी पद रही थी. पर अब क्यों? अब तोह ये सब एक ड्रामा नहीं हकीकत सी बन गया था.
सुप्रिया नाहा कर, तैयार हो कर घुसल खाने से बहार निकली. अपने गीले बालों को बंधे वह वापस ऊपर अपने कमरे की और चली गयी. उसे पता नहीं था की इक़बाल अभी भी वहीँ कमरे में अंदर था और उसे वहां देख कर वह एक पल के लिए छौंक सी गयी.
सुप्रिया - ओह सॉरी… मुझे पता नहीं था आप अंदर hi है…
इक़बाल - हाँ… पर इसमें माफ़ी की क्या बात है… मैं आपका hi इंतज़ार कर रहा था…
सुप्रिया - ाचा… इंतज़ार क्यों?
इक़बाल - बस आप देखती जाये...
इक़बाल अपने साथ जो थैला लाया था उसमे से सामान निकलने लगा. उसने 3-4 साड़ी निकाल कर बीएड पर रख दी. सुप्रिया वहीँ बीएड पर बैठी साड़ी को देखने लगी. जैसी साड़ी वह पहनती थी ये उनसे तोह हलकी hi थी, पर फिर भी देखने में अछि थी.
सुप्रिया ने हलके से कहा - ये सब क्या....
इक़बाल - ये सब.... मैं आपके लिए लाया हूँ....
सुप्रिया - पर क्यों?
इक़बाल - आपके पास यहाँ साड़ी नहीं है न... और आप साड़ी में बहुत अछि लगती हो... एक डैम किसी हीरोइन की तरह...
इक़बाल सुप्रिया की और देख रहा था. सुप्रिया ने अपनी आखें झुका ली, उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या बोले. क्या इक़बाल उसे इतनी गौर से देखा करता था जब वह लखनऊ में रहती थी? वह आखिर उससे चाहता क्या था.
उसे खोया हुआ देख इक़बाल ने एक डैम से पुछा - क्या हुआ? आपको अछि नहीं लगी साड़ी...
सुप्रिया ने साड़ी के कपडे को महसूस करते हुए कहा - नहीं काफी अछि है... पर ये लाने की क्या जरूरत थी... आपके यहाँ तोह कोई साड़ी पहनता भी नहीं... मैं अकेली इस पहने हुए कितनी अजीब सी लगूंगी...
इक़बाल - कोई नहीं आप घर में तोह पेहेन hi सकते हो... या फिर रात को बस इस कमरे में...
ये सुनते hi सुप्रिया एकदम से काँप सी उठी, और उसके आँखों के सामने एक दृशय सा दौड़ गया. मानो वह रात को साड़ी में सज्ज धज्ज के इक़बाल के सामने बैठी हो और इक़बाल उसे प्यार से निहार रहा हो. उसने जल्दी से अपने मैं से इस ख्याल को निकला.
इक़बाल - वैसे तोह इसका ब्लाउज बना हुआ है... पर अगर आपके नाप का न हो तोह आप भाभी को बोल देना, वह आपको रफ़ीक़ चाचा के यहाँ ले जाएँगी...
सुप्रिया को पिछली बार दर्ज़ी रफ़ीक़ चच्चा के यहाँ जाना याद आ गया - नहीं... मुझे वह रफ़ीक़ चच्चा के यहाँ नहीं जाना..
इक़बाल - कुछ कहा उन्होंने आपसे? कोई नहीं... आप मुझे नाप दे देना, मैं किसी और दर्ज़ी से सिल्वा दूंगा....
सुप्रिया - ारी नहीं... आप इतना परेशान मत हो... देख लेंगे... मैं नीचे चलती हूँ... भाभी मुझे ढून्ढ रही होंगी... और आपको भी तोह काम पर जाना होगा...
इक़बाल - हाँ... मुझे आपसे पूछना था...
सुप्रिया - हाँ कहिये न....
इक़बाल - आप ठीक तोह है न... कल रात आपको चक्कर आ गया था और फिर बाद में आप काफी उदास भी थी... शायद रो भी रही थी...
सुप्रिया एक डैम चुप सी हो गयी और नीचे की और देखने लगी - मैं क्या कहु अब.... ऐसा लग रहा है जैसे मैं कहीं की नहीं रही... कुछ समझ नहीं आ रहा...
इक़बाल - आप ऐसा कुछ मत सोचिये... अब सब ाचा hi होगा...
इक़बाल की आँखों में एक चमक सी थी जो सुप्रिया ने अब से पहले काम hi देखि थी. वह जल्दी से खड़ा हुआ और अलमारी से अपने कपडे लेकर नीचे नहाने की और चला गया. सुप्रिया भी साड़ियों को अलमारी में रख कर नीचे आ गयी. उसका मैं एक अजीब से गोते से खा रहा था और बेचैन सा हो रहा था. उसे अपने भविष्य के बारे में कुछ नहीं पता था, और अपने वर्त्तमान के बारे में भी.
सुप्रिया नीचे आ कर खुद से सब्जी ले कर, बैठक में बैठ कर सब्जी काटने लगी. उसे सामने घर का पूरा चौक दिख रहा था. कुछ hi देर बाद इक़बाल घुसल खाने से नाहा के निकला. उसने बस एक तौलिया अपने नीचे लपेटा हुआ था. उसका पूरा शरीर अभी भी भीगा सा हुआ था, और छाती के बाल चिपके हुए से थे.
सामने सुप्रिया को देख कर उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी और सुप्रिया भी हल्का सा मुस्कुरा दी. इक़बाल जल्दी से ऊपर की और चला गया और सुप्रिया कुछ देर बाद रसोई में. अब तोह उसने रुबीना का रसोई के कामो में हाथ बताना शुरू कर दिया था. वह उससे ज्यादा काम तोह नहीं करवाती थी पर ऐसे hi थोड़ा बहुत.
रुबीना ने रसोई में आते hi सुप्रिया को सब्जी बनाते देखा - ारी... क्या कर रही हो तुम... आराम करो जाकर... कल hi तोह चक्कर खा कर गिरी थी...
सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी - मैं ठीक हूँ अब... कल रात आराम मिल गया था...
रुबीना - ाचा जी... लगता है इक़बाल ने काफी मालिश की रात को... सर की....
सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो गए - नहीं... मैं बस सो गयी थी... वह क्यों मालिश करते...
रुबीना - वह तोह तुम्हारे लिए कुछ भी करता... कल तोह इतना परेशान हो गया था.... ऐसा लग रहा कहीं गुस्से में हमें hi घर से निकाल न दे...
सुप्रिया झेपते हुए बोली - आप भी न... कुछ भी बोलती हो...
रुबीना हस्ते हुए - ाचा है... धीरे धीरे मुझसे इतना तोह खुल गयी हो की ये सब बोल पा रही हो... बस अब थोड़ा और खुल जायो...
रुबीना ने बहार की और झाँका, इक़बाल और अब्बास बहार नाश्ते के लिए बैठ गए थे.
सुप्रिया - भाभी.... मैं बनती हूँ... आप खाना परोस दो...
रुबीना - जैसा आपका हुकुम... पर आपके मियाँ जी को रहत नहीं मिलेगी...
रुबीना ने खाना ले जाकर परोसने लगी. इक़बाल खाना खाने लगा पर वह काम पर जाने से पहले एक बार सुप्रिया को देखना चाहता था. पर फिलहाल तोह उसे अपना मैं मॉस कर रखना पड़ा. कुछ देर बाद वह और अब्बास खाना खा कर कारखाने की और निकल गए.
सुप्रिया सुबह का काम निपटा कर ऊपर अपने कमरे में आ गयी. अकेले में आते हुए उसे फिर से उदासी ने घेर लिया. अपनी पिछली जिंदगी की यादें, आगे आने वाली दिनों की चिंता, सब उसे सत्ता सी रही थी. मैं हल्का करने के लिए उसने कमरे की कुण्डी लगा कर अलमारी में से साड़ी निकाल ली. वह एक साड़ी को हलके हलके छू रही थी. जैसे उसने पहले महसूस किया था, कपडा थोड़ा हल्का था.
कुछ देर ऐसे hi बैठी सोचती रही, वह सोच रही की वह साड़ी पेहेन कर देखे या नहीं, पर फिर उसने सोचा की कहीं भाभी ने उसे एकदम से बुला लिया तोह. बिस्तर पर लेटते hi उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे और वह कुछ देर के लिए सो गयी.
जब वह उठी तोह दिन हो गया था. वह अपने बिखरे हुए बालों को ठीक करके नीचे पहुंची. अम्मी जी हमेशा की तरह उसे गुस्से से hi घूर रही थी. वह इस घर में एक कैद छिड़िया की तरह महसूस कर रही थी. बस एक रुबीना और हिना का सहारा था, पर हिना तोह सुबह से hi घर पर नहीं थी.
किसी तरह से शाम हो आयी थी, और दिन ढलते ढलते सुप्रिया की उदासी और घबराहट बढ़ती जा रही थी. अँधेरा होने से थोड़ी देर पहले अब्बास और इक़बाल घर वापस आ गए. रात का खाना भी रुबीना ने hi परोसा, खासकर आज तोह उसने घोषत की कोई सब्जी बनायीं थी, जिससे सुप्रिया ने अपने आप को रसोई से दूर hi रखा.
इक़बाल खाना खा कर ऊपर पंहुचा तोह सुप्रिया और हिना कमरे में बैठे बात कर रहे थे.
हिना को अपने कमरे में देख, इक़बाल के चेहरे का रंग भी बदल गया - हिना... यहाँ क्या कर रही है... तेरी अम्मी तुझे बुला रही है...
हिना - अभी थोड़ी देर में जाती हूँ चाचू...
इक़बाल - जा न... खाना खा ले...
हिना - मैं तोह बस यहाँ चची का मैं hi बेहला रही थी, वह काफी उदास सी लग रही थी मुझे...
इक़बाल - मैं देख लूंगा... तू जल्दी से जाकर खाना खा ले....
हिना खड़े होते हुए बोली - ठीक है...
हिना जल्दी से कमरे से बहार निकल गयी और इक़बाल ने कमरे की कुण्डी लगा ली. सुप्रिया इक़बाल की हर हरकत को गौर से देख रही थी. उसने हिम्मत करते हुए पुछा - आपने हिना को जाने के लिए क्यों बोलै...
इक़बाल - बस... वह मुझे लगा वह आपको परेशान कर रही होगी... इसलिए...
सुप्रिया - नहीं.... वह तोह मेरा मैं बहलाने की hi कोशिश कर रही थी...
इक़बाल ने बिना किसी झिझक के अपनी शर्ट सुप्रिया के सामने उतार दी और खूटी पर टांग दी - कोई नहीं... नीचे जाकर खाना खा लेगी.... भाभी कब तक बैठी रहेंगी उसके इंतज़ार में...
सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, शर्ट के अंदर उसकी छाती पर काफी बाल थे, और उसका शरीर शायद धुप से काफी काला हो चला था. इक़बाल को अपनी और देखते hi उसने दूसरी और मुँह कर लिया.
इक़बाल ने अलमारी खोलते हुए एक और शर्ट निकाली और उसे पेहेन्ने लगा. वह शर्ट को पेहेनते पेहेनते एकदम से बोलै - आप क्या सच में उदास थी....
सुप्रिया - हम्म्म... पता नहीं....
इक़बाल कुछ देर चुप रहा, पर उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ झलक रही था - आप मुझसे खुल कर बात कर सकती है...
सुप्रिया - हम्म्म... हाँ मुझे पता है... मैं बस विक्रम के बारे में hi...
विक्रम का नाम सुनते hi इक़बाल के चेहरा और भी सख्त सा हो गया - आपको अब उनके बारे में सोचना नहीं चाहिए...
सुप्रिया को उसकी बात थोड़ी सी अजीब सी लगी, वह उस पर हक़ सा जाता रहा था. पर वह छह कर भी उसे काट नहीं पायी - हाँ... पर सब भूलते भूलते वक़्त तोह लगता hi है न...
इक़बाल का चेहरा थोड़ा सा नरम हुआ - आप सही कह रही है... थोड़ा समय तोह लगता है... आपने वह साड़ी पेहेन कर देखि क्या आज?
सुप्रिया - उम्म्म... नहीं...
इक़बाल - कोई नहीं... आप कल पेहेन कर देख लेना... मैं बहुत ढून्ढ कर आपके लिए लाया था...
सुप्रिया - जी...
इक़बाल - आपने खाना खा लिया?
सुप्रिया - हाँ... मैंने थोड़ा जल्दी खा लिया था... वह आज घोषत बना था इसलिए...
इक़बाल - ाचा किया.... चलिए सो जाते है...
इक़बाल ने कमरे की बत्ती बंद कर दी और बिस्तर पर आ कर लेट गया. सुप्रिया भी चद्दर ोड कर लेट गयी, उसका मुँह इक़बाल की और नहीं था. वह अपनी आँखें बंद करके सोने की कोशिश कर रही थी.
तभी उसे महसूस हुआ की इक़बाल सरक कर उसके ठीक पीछे पहुंच गया था. सुप्रिया ने घबराते हुए पीछे मुद कर देखा.
इक़बाल ने हलके से कहा - कल रात.... मुझे बड़ी अछि नींद आयी थी... आप मुझ पर अपना सर रख कर सो गयी थी...
इक़बाल ने सुप्रिया के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी और खींचा
सुप्रिया - हाँ.... वह बस... कल मैं काफी परेशान थी... और शायद आपको भी परेशान कर दिया...
इक़बाल - इसमें परेशानी कैसी... मैंने कहा न... मुझे बहुत hi अछि नींद आयी थी...
इक़बाल के दोनों हाथ सुप्रिया के कंधो पर थे - लाइए मैं आपके कंधे दबा देता हूँ... आप थोड़ा ाचा महसूस करेंगी.
इक़बाल ने सुप्रिया के जवाब का इंतज़ार नहीं किया और वह अपनी उँगलियों से सुप्रिया के कंधो को दबाने लगा. उसकी कुछ उंगलियां सुप्रिया की कुर्ती पर थी और कुछ उसके जिस्म पर. इक़बाल के छूटे hi सुप्रिया की सांस रुक सी गयी और वह इक़बाल के सख्त हाथों को अपने कोमल जिस्म पर चलते महसूस करने लगी.
सुप्रिया ने अपने कंधे हलके से उचकाए और इक़बाल के हाथ सुप्रिया की गर्दन पर पहुंच गए थे.
इक़बाल - बहुत hi नाज़ुक सा जिस्म है आपका...
सुप्रिया - उह्ह्ह.... रहने दीजिये न...
इक़बाल के हाथ सुप्रिया के बालों में घुस गए थे और वह उसकी गर्दन के ऊपर के हिस्से को हलके हलके मसल रहा था - ाचा लगेगा आपको.... कल आप मेरी मालिश कर देना...
सुप्रिया - Uhhhhh....mmmmmm....
सुप्रिया की हलकी हलकी सिसकियाँ इक़बाल का हौसला और बढ़ाये जा रही थी और उसने अपने हाथ का दबाव बड़ा दिया.
सुप्रिया की ज़ोर की सिसकी निकली - अह्ह्ह्हह्हह... मममममममम.....
इक़बाल - घबराइए नहीं.... ाचा लगेगा....
सुप्रिया मुद कर बिस्तर पर लेट गयी और इक़बाल ने उचक कर अपने हाथ सुप्रिया की पीठ पर रख दिए थे.
इक़बाल - काश आपने आज साड़ी पहनी होती... तोह मैं और अचे से मालिश कर पाटा...
सुप्रिया - उह्ह्ह..... मममम.... इक़बाल हाथ हटाइये न....
इक़बाल - क्या हुआ... दर्द हो रहा है क्या...
सुप्रिया - नहीं... बस थोड़ा अजीब सा लग रहा है... आप मुझे ऐसे छू रहे है तोह...
इक़बाल ने बिना झिझके अपना पूरा हाथ सुप्रिया की नंगी पीठ पर रख दिया - इसमें क्या हर्ज़ है... अब तोह तुम मेरी बीवी हो, और मैं तुम्हारा शौहर... क्या मैं तुम्हे छू भी नहीं सकता…
ये सुनते hi सुप्रिया की आवाज़ उसके गले में hi रह गयी, और वह बुरी तरह काँप उठी. क्या वह सच में इक़बाल की बीवी थी अब. दो hi दिन में मैडमजी से आप और आप से तुम पर उतर आया था. पता नहीं आगे क्या होने वाला था.
सुबह सुप्रिया की आँख खुली तोह इक़बाल धीरे से उसका सर अपने सीने से तकिये पर रख रहा था. शायद वह पूरी रात इक़बाल से चिपके हो सो गयी थी. उसे इस बात का एहसास hi नहीं हुआ. सुप्रिया ने तुरंत hi अपनी आँखें बंद कर ली, वह नहीं चाहती थी इक़बाल को पता चले की वह जगी हुई है.
इक़बाल बिना कोई आवाज़ किये बिस्तर से नीचे उतरा और अपने कपडे बदलने लगा. शायद वह सुबह की नमाज़ के लिए जहा रहा था. बहार अभी भी काफी अँधेरा hi था, पर सुप्रिया को इक़बाल के शरीर की छवि साफ़ दिखाई दे रही थी. उसका बड़ा लम्बा सा शरीर, चौड़ी छाती और मजबूत कंधे. इन्ही कन्धों का सहारा ले कर तोह वह कल रात सो गयी थी.
कल रात के बारे में सोचते hi उसकी आँखों में फिर से उदासी सी छाने लगी थी. ऐसा लग रहा था की जैसे उसकी जिंदगी का मक़सद hi ख़तम हो गया था. न विक्रम यहाँ आने वाला था, न वह अतुल या अपने घर वापस जा सकती थी, और उसकी शादी इक़बाल से हो चुकी थी.
इक़बाल कपडे बदल कर कमरे से बहार जा चूका था. सुप्रिया अभी भी बिस्तर पर पड़ी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी. आँखों से अभी आंसू तोह नहीं बह रहे थे, पर उसका दिमाग फिर से फटा जा रहा था. उसने विक्रम के लिए अतुल को छोड़ा, और विक्रम की वजह से वह यहाँ तक पहुंच गयी थी. अतुल उससे कितनी नफरत करता होगा, शायद उसने अपना नया जीवन बसने के बारे में सोचना शुरू कर दिया होगा. और विक्रम, वह तोह उसे एक महीने में hi भूल गया था.
सोचते सोचते कब जाने एक घंटा बीत गया था और बहार रौशनी होनी शुरू हो गयी थी. कुछ देर बाद इक़बाल वापस कमरे में आया, अब तोह वह कमरे का दरवाज़ा भी नहीं खटखटा रहा था, जैसे कमरे में हर चीज़ पर अब उसका हक़ हो.
सुप्रिया को जगा हुआ देख, इक़बाल ने धीरे से कहा - आप जग गयी...
सुप्रिया ने हलके से सर हिलाया और बिस्तर पर बैठ गयी. वह इक़बाल को देख कर कल रात के बारे में सोचने लगी. कैसे उसने उसे कास के पकड़ लिया था और अपना पैरो का भार भी उस पार दाल दिया था. सुप्रिया तोह शायद कुछ सोचने समझने की अवस्था में hi नहीं थी कल रात.
इक़बाल - आप नाहा के तैयार हो जाइये... और नाश्ता कर लीजिये... फिर मैं आपको कुछ दिखता हूँ...
इक़बाल को देख कर तोह ऐसा लग रहा था की जैसे कुछ हुआ hi नहीं था. बस उसने उसे मैडमजी कहना बंद कर दिया था, और शायद कल रात से hi कर दिया था. पिछले दो सालो से वह उसे मैडमजी hi कह कर बुलाता आया था. कितना अजीब सा था की वह अब इस शब्द का इस्तेमाल hi नहीं कर रहा था.
सुप्रिया बेमन से कड़ी हुई और अपने कपडे लेकर नीचे नहाने चली गयी. नीचे पहुंचते hi रुबीना ने उसका हाल चाल पुछा और हिना भी आज जल्दी जग गयी थी. सुप्रिया को उनके सामने अपनी झूठी मुस्कान कायम रखनी पद रही थी. पर अब क्यों? अब तोह ये सब एक ड्रामा नहीं हकीकत सी बन गया था.
सुप्रिया नाहा कर, तैयार हो कर घुसल खाने से बहार निकली. अपने गीले बालों को बंधे वह वापस ऊपर अपने कमरे की और चली गयी. उसे पता नहीं था की इक़बाल अभी भी वहीँ कमरे में अंदर था और उसे वहां देख कर वह एक पल के लिए छौंक सी गयी.
सुप्रिया - ओह सॉरी… मुझे पता नहीं था आप अंदर hi है…
इक़बाल - हाँ… पर इसमें माफ़ी की क्या बात है… मैं आपका hi इंतज़ार कर रहा था…
सुप्रिया - ाचा… इंतज़ार क्यों?
इक़बाल - बस आप देखती जाये...
इक़बाल अपने साथ जो थैला लाया था उसमे से सामान निकलने लगा. उसने 3-4 साड़ी निकाल कर बीएड पर रख दी. सुप्रिया वहीँ बीएड पर बैठी साड़ी को देखने लगी. जैसी साड़ी वह पहनती थी ये उनसे तोह हलकी hi थी, पर फिर भी देखने में अछि थी.
सुप्रिया ने हलके से कहा - ये सब क्या....
इक़बाल - ये सब.... मैं आपके लिए लाया हूँ....
सुप्रिया - पर क्यों?
इक़बाल - आपके पास यहाँ साड़ी नहीं है न... और आप साड़ी में बहुत अछि लगती हो... एक डैम किसी हीरोइन की तरह...
इक़बाल सुप्रिया की और देख रहा था. सुप्रिया ने अपनी आखें झुका ली, उसे समझ नहीं आ रहा था वह क्या बोले. क्या इक़बाल उसे इतनी गौर से देखा करता था जब वह लखनऊ में रहती थी? वह आखिर उससे चाहता क्या था.
उसे खोया हुआ देख इक़बाल ने एक डैम से पुछा - क्या हुआ? आपको अछि नहीं लगी साड़ी...
सुप्रिया ने साड़ी के कपडे को महसूस करते हुए कहा - नहीं काफी अछि है... पर ये लाने की क्या जरूरत थी... आपके यहाँ तोह कोई साड़ी पहनता भी नहीं... मैं अकेली इस पहने हुए कितनी अजीब सी लगूंगी...
इक़बाल - कोई नहीं आप घर में तोह पेहेन hi सकते हो... या फिर रात को बस इस कमरे में...
ये सुनते hi सुप्रिया एकदम से काँप सी उठी, और उसके आँखों के सामने एक दृशय सा दौड़ गया. मानो वह रात को साड़ी में सज्ज धज्ज के इक़बाल के सामने बैठी हो और इक़बाल उसे प्यार से निहार रहा हो. उसने जल्दी से अपने मैं से इस ख्याल को निकला.
इक़बाल - वैसे तोह इसका ब्लाउज बना हुआ है... पर अगर आपके नाप का न हो तोह आप भाभी को बोल देना, वह आपको रफ़ीक़ चाचा के यहाँ ले जाएँगी...
सुप्रिया को पिछली बार दर्ज़ी रफ़ीक़ चच्चा के यहाँ जाना याद आ गया - नहीं... मुझे वह रफ़ीक़ चच्चा के यहाँ नहीं जाना..
इक़बाल - कुछ कहा उन्होंने आपसे? कोई नहीं... आप मुझे नाप दे देना, मैं किसी और दर्ज़ी से सिल्वा दूंगा....
सुप्रिया - ारी नहीं... आप इतना परेशान मत हो... देख लेंगे... मैं नीचे चलती हूँ... भाभी मुझे ढून्ढ रही होंगी... और आपको भी तोह काम पर जाना होगा...
इक़बाल - हाँ... मुझे आपसे पूछना था...
सुप्रिया - हाँ कहिये न....
इक़बाल - आप ठीक तोह है न... कल रात आपको चक्कर आ गया था और फिर बाद में आप काफी उदास भी थी... शायद रो भी रही थी...
सुप्रिया एक डैम चुप सी हो गयी और नीचे की और देखने लगी - मैं क्या कहु अब.... ऐसा लग रहा है जैसे मैं कहीं की नहीं रही... कुछ समझ नहीं आ रहा...
इक़बाल - आप ऐसा कुछ मत सोचिये... अब सब ाचा hi होगा...
इक़बाल की आँखों में एक चमक सी थी जो सुप्रिया ने अब से पहले काम hi देखि थी. वह जल्दी से खड़ा हुआ और अलमारी से अपने कपडे लेकर नीचे नहाने की और चला गया. सुप्रिया भी साड़ियों को अलमारी में रख कर नीचे आ गयी. उसका मैं एक अजीब से गोते से खा रहा था और बेचैन सा हो रहा था. उसे अपने भविष्य के बारे में कुछ नहीं पता था, और अपने वर्त्तमान के बारे में भी.
सुप्रिया नीचे आ कर खुद से सब्जी ले कर, बैठक में बैठ कर सब्जी काटने लगी. उसे सामने घर का पूरा चौक दिख रहा था. कुछ hi देर बाद इक़बाल घुसल खाने से नाहा के निकला. उसने बस एक तौलिया अपने नीचे लपेटा हुआ था. उसका पूरा शरीर अभी भी भीगा सा हुआ था, और छाती के बाल चिपके हुए से थे.
सामने सुप्रिया को देख कर उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी और सुप्रिया भी हल्का सा मुस्कुरा दी. इक़बाल जल्दी से ऊपर की और चला गया और सुप्रिया कुछ देर बाद रसोई में. अब तोह उसने रुबीना का रसोई के कामो में हाथ बताना शुरू कर दिया था. वह उससे ज्यादा काम तोह नहीं करवाती थी पर ऐसे hi थोड़ा बहुत.
रुबीना ने रसोई में आते hi सुप्रिया को सब्जी बनाते देखा - ारी... क्या कर रही हो तुम... आराम करो जाकर... कल hi तोह चक्कर खा कर गिरी थी...
सुप्रिया हलके से मुस्कुरायी - मैं ठीक हूँ अब... कल रात आराम मिल गया था...
रुबीना - ाचा जी... लगता है इक़बाल ने काफी मालिश की रात को... सर की....
सुप्रिया के गाल शर्म से लाल हो गए - नहीं... मैं बस सो गयी थी... वह क्यों मालिश करते...
रुबीना - वह तोह तुम्हारे लिए कुछ भी करता... कल तोह इतना परेशान हो गया था.... ऐसा लग रहा कहीं गुस्से में हमें hi घर से निकाल न दे...
सुप्रिया झेपते हुए बोली - आप भी न... कुछ भी बोलती हो...
रुबीना हस्ते हुए - ाचा है... धीरे धीरे मुझसे इतना तोह खुल गयी हो की ये सब बोल पा रही हो... बस अब थोड़ा और खुल जायो...
रुबीना ने बहार की और झाँका, इक़बाल और अब्बास बहार नाश्ते के लिए बैठ गए थे.
सुप्रिया - भाभी.... मैं बनती हूँ... आप खाना परोस दो...
रुबीना - जैसा आपका हुकुम... पर आपके मियाँ जी को रहत नहीं मिलेगी...
रुबीना ने खाना ले जाकर परोसने लगी. इक़बाल खाना खाने लगा पर वह काम पर जाने से पहले एक बार सुप्रिया को देखना चाहता था. पर फिलहाल तोह उसे अपना मैं मॉस कर रखना पड़ा. कुछ देर बाद वह और अब्बास खाना खा कर कारखाने की और निकल गए.
सुप्रिया सुबह का काम निपटा कर ऊपर अपने कमरे में आ गयी. अकेले में आते हुए उसे फिर से उदासी ने घेर लिया. अपनी पिछली जिंदगी की यादें, आगे आने वाली दिनों की चिंता, सब उसे सत्ता सी रही थी. मैं हल्का करने के लिए उसने कमरे की कुण्डी लगा कर अलमारी में से साड़ी निकाल ली. वह एक साड़ी को हलके हलके छू रही थी. जैसे उसने पहले महसूस किया था, कपडा थोड़ा हल्का था.
कुछ देर ऐसे hi बैठी सोचती रही, वह सोच रही की वह साड़ी पेहेन कर देखे या नहीं, पर फिर उसने सोचा की कहीं भाभी ने उसे एकदम से बुला लिया तोह. बिस्तर पर लेटते hi उसकी आँखों से फिर से आंसू बहने लगे और वह कुछ देर के लिए सो गयी.
जब वह उठी तोह दिन हो गया था. वह अपने बिखरे हुए बालों को ठीक करके नीचे पहुंची. अम्मी जी हमेशा की तरह उसे गुस्से से hi घूर रही थी. वह इस घर में एक कैद छिड़िया की तरह महसूस कर रही थी. बस एक रुबीना और हिना का सहारा था, पर हिना तोह सुबह से hi घर पर नहीं थी.
किसी तरह से शाम हो आयी थी, और दिन ढलते ढलते सुप्रिया की उदासी और घबराहट बढ़ती जा रही थी. अँधेरा होने से थोड़ी देर पहले अब्बास और इक़बाल घर वापस आ गए. रात का खाना भी रुबीना ने hi परोसा, खासकर आज तोह उसने घोषत की कोई सब्जी बनायीं थी, जिससे सुप्रिया ने अपने आप को रसोई से दूर hi रखा.
इक़बाल खाना खा कर ऊपर पंहुचा तोह सुप्रिया और हिना कमरे में बैठे बात कर रहे थे.
हिना को अपने कमरे में देख, इक़बाल के चेहरे का रंग भी बदल गया - हिना... यहाँ क्या कर रही है... तेरी अम्मी तुझे बुला रही है...
हिना - अभी थोड़ी देर में जाती हूँ चाचू...
इक़बाल - जा न... खाना खा ले...
हिना - मैं तोह बस यहाँ चची का मैं hi बेहला रही थी, वह काफी उदास सी लग रही थी मुझे...
इक़बाल - मैं देख लूंगा... तू जल्दी से जाकर खाना खा ले....
हिना खड़े होते हुए बोली - ठीक है...
हिना जल्दी से कमरे से बहार निकल गयी और इक़बाल ने कमरे की कुण्डी लगा ली. सुप्रिया इक़बाल की हर हरकत को गौर से देख रही थी. उसने हिम्मत करते हुए पुछा - आपने हिना को जाने के लिए क्यों बोलै...
इक़बाल - बस... वह मुझे लगा वह आपको परेशान कर रही होगी... इसलिए...
सुप्रिया - नहीं.... वह तोह मेरा मैं बहलाने की hi कोशिश कर रही थी...
इक़बाल ने बिना किसी झिझक के अपनी शर्ट सुप्रिया के सामने उतार दी और खूटी पर टांग दी - कोई नहीं... नीचे जाकर खाना खा लेगी.... भाभी कब तक बैठी रहेंगी उसके इंतज़ार में...
सुप्रिया ने इक़बाल की और देखा, शर्ट के अंदर उसकी छाती पर काफी बाल थे, और उसका शरीर शायद धुप से काफी काला हो चला था. इक़बाल को अपनी और देखते hi उसने दूसरी और मुँह कर लिया.
इक़बाल ने अलमारी खोलते हुए एक और शर्ट निकाली और उसे पेहेन्ने लगा. वह शर्ट को पेहेनते पेहेनते एकदम से बोलै - आप क्या सच में उदास थी....
सुप्रिया - हम्म्म... पता नहीं....
इक़बाल कुछ देर चुप रहा, पर उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ झलक रही था - आप मुझसे खुल कर बात कर सकती है...
सुप्रिया - हम्म्म... हाँ मुझे पता है... मैं बस विक्रम के बारे में hi...
विक्रम का नाम सुनते hi इक़बाल के चेहरा और भी सख्त सा हो गया - आपको अब उनके बारे में सोचना नहीं चाहिए...
सुप्रिया को उसकी बात थोड़ी सी अजीब सी लगी, वह उस पर हक़ सा जाता रहा था. पर वह छह कर भी उसे काट नहीं पायी - हाँ... पर सब भूलते भूलते वक़्त तोह लगता hi है न...
इक़बाल का चेहरा थोड़ा सा नरम हुआ - आप सही कह रही है... थोड़ा समय तोह लगता है... आपने वह साड़ी पेहेन कर देखि क्या आज?
सुप्रिया - उम्म्म... नहीं...
इक़बाल - कोई नहीं... आप कल पेहेन कर देख लेना... मैं बहुत ढून्ढ कर आपके लिए लाया था...
सुप्रिया - जी...
इक़बाल - आपने खाना खा लिया?
सुप्रिया - हाँ... मैंने थोड़ा जल्दी खा लिया था... वह आज घोषत बना था इसलिए...
इक़बाल - ाचा किया.... चलिए सो जाते है...
इक़बाल ने कमरे की बत्ती बंद कर दी और बिस्तर पर आ कर लेट गया. सुप्रिया भी चद्दर ोड कर लेट गयी, उसका मुँह इक़बाल की और नहीं था. वह अपनी आँखें बंद करके सोने की कोशिश कर रही थी.
तभी उसे महसूस हुआ की इक़बाल सरक कर उसके ठीक पीछे पहुंच गया था. सुप्रिया ने घबराते हुए पीछे मुद कर देखा.
इक़बाल ने हलके से कहा - कल रात.... मुझे बड़ी अछि नींद आयी थी... आप मुझ पर अपना सर रख कर सो गयी थी...
इक़बाल ने सुप्रिया के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी और खींचा
सुप्रिया - हाँ.... वह बस... कल मैं काफी परेशान थी... और शायद आपको भी परेशान कर दिया...
इक़बाल - इसमें परेशानी कैसी... मैंने कहा न... मुझे बहुत hi अछि नींद आयी थी...
इक़बाल के दोनों हाथ सुप्रिया के कंधो पर थे - लाइए मैं आपके कंधे दबा देता हूँ... आप थोड़ा ाचा महसूस करेंगी.
इक़बाल ने सुप्रिया के जवाब का इंतज़ार नहीं किया और वह अपनी उँगलियों से सुप्रिया के कंधो को दबाने लगा. उसकी कुछ उंगलियां सुप्रिया की कुर्ती पर थी और कुछ उसके जिस्म पर. इक़बाल के छूटे hi सुप्रिया की सांस रुक सी गयी और वह इक़बाल के सख्त हाथों को अपने कोमल जिस्म पर चलते महसूस करने लगी.
सुप्रिया ने अपने कंधे हलके से उचकाए और इक़बाल के हाथ सुप्रिया की गर्दन पर पहुंच गए थे.
इक़बाल - बहुत hi नाज़ुक सा जिस्म है आपका...
सुप्रिया - उह्ह्ह.... रहने दीजिये न...
इक़बाल के हाथ सुप्रिया के बालों में घुस गए थे और वह उसकी गर्दन के ऊपर के हिस्से को हलके हलके मसल रहा था - ाचा लगेगा आपको.... कल आप मेरी मालिश कर देना...
सुप्रिया - Uhhhhh....mmmmmm....
सुप्रिया की हलकी हलकी सिसकियाँ इक़बाल का हौसला और बढ़ाये जा रही थी और उसने अपने हाथ का दबाव बड़ा दिया.
सुप्रिया की ज़ोर की सिसकी निकली - अह्ह्ह्हह्हह... मममममममम.....
इक़बाल - घबराइए नहीं.... ाचा लगेगा....
सुप्रिया मुद कर बिस्तर पर लेट गयी और इक़बाल ने उचक कर अपने हाथ सुप्रिया की पीठ पर रख दिए थे.
इक़बाल - काश आपने आज साड़ी पहनी होती... तोह मैं और अचे से मालिश कर पाटा...
सुप्रिया - उह्ह्ह..... मममम.... इक़बाल हाथ हटाइये न....
इक़बाल - क्या हुआ... दर्द हो रहा है क्या...
सुप्रिया - नहीं... बस थोड़ा अजीब सा लग रहा है... आप मुझे ऐसे छू रहे है तोह...
इक़बाल ने बिना झिझके अपना पूरा हाथ सुप्रिया की नंगी पीठ पर रख दिया - इसमें क्या हर्ज़ है... अब तोह तुम मेरी बीवी हो, और मैं तुम्हारा शौहर... क्या मैं तुम्हे छू भी नहीं सकता…
ये सुनते hi सुप्रिया की आवाज़ उसके गले में hi रह गयी, और वह बुरी तरह काँप उठी. क्या वह सच में इक़बाल की बीवी थी अब. दो hi दिन में मैडमजी से आप और आप से तुम पर उतर आया था. पता नहीं आगे क्या होने वाला था.