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सुप्रिया और इक़बाल बस में बैठे अपने घर की और वापिस जा रहे थे. सुप्रिया खिड़की की तरफ बैठी थी, और उसके बराबर में इक़बाल, उससे बिलकुल सत्ता हुआ. सुप्रिया का कन्धा और पेअर इक़बाल के शरीर से बिलकुल चिपके हुए से थे, और आज तोह सुप्रिया इक़बाल को अपने से दूर करने के बारे में सोच भी नहीं रही थी.
सुप्रिया के चेहरे पर एक हलकी सी शर्मीली सी मुस्कान थी, जाने क्या चल रहा था उसके मैं में, शायद बीजी की कही बात. वहां से निकलते हुए उन्होंने उसे बोलै था की अगली बार जब वह उससे मिलेंगी तब उन्हें यकीं था की सुप्रिया की गॉड में एक बच्चा होगा, इक़बाल और उसका बच्चा. ये सुनकर उसके गाल शर्म से बुरी तरह लाल हो गए थे, और अब फिर से उसके बारे में सोचते hi सुप्रिया ने अपने दोनों हाथों से कास के आगे की सीट का हैंडल जकड लिया.
कल खेत में भी उसने कितनी हिम्मत दिखा दी थी, इक़बाल के गालों को चूम कर. पता नहीं इक़बाल जी उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे. उन्होंने तोह अपनी तरफ से अब तक उसकी और कोई भी कदम नहीं बढ़ाया था. पता नहीं उनके मैं में क्या चल रहा था. पता नहीं ये सब क्या होता जा रहा था, और वह इस सब के बारे में क्यों सोच रही थी. बहार से आती हुई ठंडी हवा उसे पागल सी कर रही थी.
वह अपने खयालो में खोयी hi हुई थी की तभी उसे महसूस हुआ की इक़बाल उठ कर खड़ा हो गया. शायद उनका गाँव आने hi वाला था. सुप्रिया भी उसके पीछे पीछे कड़ी हो गयी और जल्द hi वह दोनों बस से नीचे उतर गए. इक़बाल ने सामान उठाया और वह दोनों एक रिक्शा में बैठ कर घर की और चल दिए.
ये वही गालियां थी जहाँ से सुप्रिया कुछ दिन पहले रुक्सत हुई थी, पर अब सब कुछ अलग अलग सा लग रहा था. जैसे ये उसका गाँव हो, एक जानी पहचानी जगह जहाँ वह अपने घर जा रही थी. अपने घर… उसका घर…
सुप्रिया ने रिक्शा पर बैठे बैठे अपने दुपट्टे से अपना सर अचे से ढाका. हवा में सर्दी और बाद गयी थी और सुप्रिया ने अपने आप को अचे से ढकने की कोशिश की. वह लोगो को अपना चेहरा नहीं देखने देना चाहती थी, मैं hi मैं वह शायद अब किसी की अमानत जो बन गयी थी.
जैसे जैसे घर पास आ रहा था उसकी बेचैनी बाद सी रही थी. अगर घर जाकर सब कुछ पहले जैसा hi हो गया तोह? नहीं नहीं... पहले जैसे क्यों होगा? जाने रुबीना भाभी उससे क्या क्या पूछेंगी...
पर उसे ज्यादा सोचने का वक़्त hi नहीं मिला और जल्द hi रिक्शा घर के बहार आ कर रुक गया था. इक़बाल जल्दी से नीचे उतरा और सामान उतार कर दरवाज़ा खटखाने लगे. सुप्रिया भी रिक्शा से नीचे उतर कर कड़ी हो गयी थी.
कुछ hi पल बाद रुबीना ने दरवाज़ा खोला और उन दोनों को देख कर उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी. वह जल्दी से सुप्रिया की और बड़ी और उसे गले लगा लिया.
रुबीना - आ गयी वापिस... तुम्हारे बिना ये घर इतना खाली खाली सा लग रहा था...
सुप्रिया के चेहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी, जैसे वह अपनी बड़ी बेहेन से इतने दिनों बाद मिल रही हो - जी... मुझे भी आपकी और हिना की काफी याद आ रही थी...
रुबीना उसे अपने साथ अंदर ले गयी, और उसे हलके से अपने कंधे से मारते हुए बोली - याद तोह क्या hi आ रही होगी... सब पता है मुझे...
सुप्रिया उनका इशारा समझ गयी और उसने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका ली.
रुबीना - अब तोह इतना मत शरमायो... इसीलिए तोह तुम्हे भेजा था वहां... मुझे यकीं था की बीजी सब ठीक hi करा देंगी...
सुप्रिया ने हलके से अपनी आँखें ऊपर उठायी और धीरे से बोली - ाचा... तोह आपकी साज़िश थी ये सब... मुझे पहले hi समझ जाना चाहिए था...
रुबीना हस्ते हुए - साज़िश समझो या जो चाहे... पर मुझे दिख रहा है तुम्हारी आँखों में.... कैसे उदास सी, मुरझाई हुई सी गयी थी तुम यहाँ से... और वापिस आयी हो तोह तुम्हारे चेहरे पर एक अलग सी hi चमक है...
सुप्रिया ब्लश कर गयी - नहीं नहीं... ऐसा कुछ नहीं... बस वह तोह ऐसे hi...
रुबीना - चलो, ऐसे या वैसे... तुम्हारे चेहरे का नूर तोह वापिस सा आ गया... ाचा जायो ज़रा अम्मी जी से भी मिल लो. वह कहेंगी तोह नहीं, पर वह भी बेसब्री से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी.
सुप्रिया - जी...
इतने सुप्रिया अम्मी जी के कमरे में उनसे मिलने गयी, इक़बाल सामन ऊपर के कमरे में रख कर घर से निकल भी गया था. सुप्रिया को लगा था की उसे शायद कुछ पल मिल जाये इक़बाल के साथ, पर शायद उसे आज रात तक का इंतज़ार hi करना पड़े.
दिन का वक़्त हो रहा था, तोह हिना अभी भी कॉलेज में थी. सुप्रिया रुबीना के साथ बैठी वहां की बातें करने लगी. जितना हो सके हो वह रुबीना को वहां के बारे में सब बता रही थी, सिवाए उसके और इक़बाल के बीच जो भी हुआ. पर रुबीना ने भी उसे कुछ ज्यादा कुरेदने की कोशिश नहीं की.
फिर थोड़ी देर बाद हिना घर वापिस आ गयी और वह घर आते hi सबसे पहले अपनी चची से जाकर लिपट गयी.
हिना एक्ससिटेड होते हुए बोली - चेचीईई... आप आ गयी!!!
सुप्रिया - जी... आ गयी... तुम बताया, कैसा चल रहा है कॉलेज...
हिना सुप्रिया के गले लगी हुई थी - सब बढ़िया... बस आपको बोहोत मिस कर रही थी मैं.... अब आपको कहीं नहीं जाने दूंगी मैं...
सुप्रिया - ाचा... और अगर मुझे जाना पड़ा तोह?
हिना - तोह फिर मैं भी आपके साथ जयुंगी...
सुप्रिया - हाहाहा... ाचा ठीक है बाबा... अगली बार तुम मेरे साथ चलना....
हिना - अगली बार हम सब लोग कहीं घूमने चलेंगे...
सुप्रिया - बिलकुल... क्यों नहीं...
हिना काफी देर तक उसे कॉलेज की बातें बताती रही. अपने टीचर्स के बारे में, आपने साथ पद रही लड़कियों के बारे में, नाज़ के बारे में, और पता नहीं क्या क्या.
सुप्रिया के दिमाग में एकदम से वह लड़का आया जो उस दिन एडमिशन के टाइम उससे बहस कर रहा था - और वह... उसने तोह परेशान नहीं किया न?
हिना - कौन? किसने?
सुप्रिया - हम्म्म... क्या नाम था उसका... जो एडमिशन के टाइम हमे परेशान कर रहा था...
हिना - प्रणव!?
सुप्रिया ने मुँह बनाते हुए कहा - हाँ... शायद वही था उसका नाम...
हिना - नहीं नहीं, उन्होंने तोह मुझे परेशान नहीं किया. ज्यादा तोह नहीं, एक दो बार मिले थे मुझे. उसे याद थे हम लोग, आपके बारे में भी पूछ रहे थे...
सुप्रिया ने हाथ नाचते हुए कहा - ाचा... आज तोह बड़ी इज़्ज़त से बात कर रही हो उसके बारे में...
हिना - हाँ तोह.... मुझसे तोह उम्र में बड़े hi है न वह...
सुप्रिया - क्या पूछ रहा था मेरे बारे में?
हिना - हम्म्म... कुछ ख़ास नहीं... एहि की आप आती हो क्या मुझे यहाँ छोड़ने... और हम लोग कहाँ रहते है...
सुप्रिया ने एकदम से कहा - उसे ज्यादा मुँह मत लगाना... और बताना तोह कुछ भी नहीं.... हम लोग कहाँ रहते है, उससे उसे क्या मतलब...
हिना - हम्म.... काफी हेल्पफुल है वह वैसे...
सुप्रिया - ाचा चलो उसकी पैरवी करना बंद करो....
हिना - ाचा आप बताइये... आप क्या लायी मेरे लिए वहां से...
हिना ने शाम तक सुप्रिया को घेरे hi रखा. शाम होते होते सुप्रिया के मैं में एक अजीब सा एहसास जागने लगा था. उसके शरीर के सारे बाल जैसे खड़े से हो गए थे, और जाने क्यों उसकी चूचियां भी एक डैम सख्त सी हो गयी थी. शायद हवा में हो रही ठण्ड का असर था. पर वह दरवाज़े पर एक नज़र रखे, इक़बाल के घर आने का इंतज़ार कर रही थी.
और शाम को थोड़ी देर में इक़बाल और अब्बास घर वापस आ hi गए. इक़बाल के चेहरे पर काफी थकान सी लग रही थी, आखिर उसे घर वापस आ कर ज़रा भी आराम करने का मौका नहीं मिला था. ऐसा लग रहा था जैसे चार दिन का काम आज उसने एक hi दिन में कर दिया हो. सुप्रिया ने चुप चाप उन दोनों को पानी का गिलास पकड़ाया.
सुप्रिया रसोई के पास कड़ी इक़बाल की और hi देख रही थी की तभी रुबीना भाभी ने सुप्रिया को हिना के कमरे से आवाज़ लगायी - सुप्रिया... सुनो... इधर आयो...
सुप्रिया - आयी भाभी...
सुप्रिया अंदर पहुंची तोह रुबीना ने एक मोती सी रजाई निकाल राखी थी - ये लो... अपने कमरे में ले जायो... ठण्ड बाद गयी है... और रात को तोह काफी ठण्ड हो जाती है...
सुप्रिया - जी भाभी
सुप्रिया ने उस मोती रजाई को उठाने की कोशिश करि. चाहे उसमे रुई hi भरी पड़ी हो, पर वह काफी भारी सी थी. सुप्रिया ने किसी तरह से रजाई को उठा लिया और अपने आप को बैलेंस करते हुए वह कमरे से बहार निकली. सुप्रिया लड़खड़ाते हुए रजाई को उठाये चल रही थी.
इक़बाल ने जैसे hi सुप्रिया को इस हाल में देखा, वह जल्दी से उसकी और लपका - लायो... मैं उठा लेता हूँ...
सुप्रिया को सामने सही से दिख भी नहीं रहा था, पर इक़बाल की लम्बाई की वजह से उसे उसका सर दिखाई दे रहा था - नहीं नहीं... मैं उठा लुंगी... आप बैठो...
इक़बाल - ारी काफी भरी लग रही है... आप कैसे ऊपर तक पहुचायोगी इसे...
सुप्रिया ने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा - इतनी भी कमज़ोर नहीं हु मैं... अब तोह पंहुचा के hi रहूंगी...
सुप्रिया ने लड़खड़ाते हुए दो तीन और कदम लिए, पर उसके ठीक सामने इक़बाल था. इक़बाल ने जैसे hi मदद के लिए हाथ बढ़ाया - आप पीछे हैट जायो, मैं कर लुंगी.
इक़बाल - ारी पर...
सुप्रिया - पर वॉर कुछ नहीं... हटिये...
इक़बाल सुप्रिया का जिद्दीपन शायद समझने लगा था, और उसने एक दो कदम साइड किये, पर उसे दिख रहा था की सुप्रिया को कितनी मुश्किल हो रही थी.
सीढ़ियों तक पहुंचते पहुंचते तोह सुप्रिया की सांस hi फूलने लगी थी. शायद उसे इक़बाल की मदद ले hi लेनी चाहिए थी. अचानक से सुप्रिया को महसूस हुआ की उसका भार थोड़ा काम हो गया. पीछे से रजाई को इक़बाल ने पकड़ लिया था.
इक़बाल - चलिए... साथ मिल कर ले जाते है ऊपर...
सुप्रिया के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट आ गयी, और वह आगे आगे और इक़बाल पीछे पीछे मिल कर रजाई को ऊपर के कमरे तक ले आये. बिस्तर पर रजाई डालते hi सुप्रिया को महसूस हुआ की उसकी तोह जान सी hi निकल गयी थी. पर वह इक़बाल के सामने अपने आप को कमज़ोर नहीं दिखाना चाहती थी.
सुप्रिया हाँफते हुए - देखा... कर लिया न...
इक़बाल को उसकी बात सुन कर हसी सी आ गयी - जी.. बिलकुल...
सुप्रिया - वैसे मुझे पता है... आप तोह रजाई और मुझे दोनों को उठा कर ऊपर ले आते... पर चलो इस बहाने मुझे भी कुछ काम तोह करने को मिला...
इक़बाल - आप मुझे उठाने देती अपने आप को?
सुप्रिया की आवाज़ एक डैम से सॉफ्ट हो गयी - हाँ... तोह उसमे क्या है... अगली बार उठा लेना न आप...
इक़बाल - जी... बिलकुल...
सुप्रिया बुरी तरह झेप रही थी - चलिए... मैं नीचे चलती हूँ... खाना लगाना है न...
सुप्रिया जल्दी से नीचे की और गयी और इक़बाल थोड़ी देर बाद उसके पीछे पीछे आ गया. हमेशा की तरह रुबीना खाना बनती गयी और सुप्रिया चुप चाप परोसती गयी, और उन लोगो का खाना हो जाने के बाद सुप्रिया, रुबीना और हिना ने भी खाना खा लिया.
सुप्रिया को आज उन दोनों के साथ खाना खाते हुए ऐसा hi लग रहा था जैसे वह अपने परिवार के साथ खाना खा रही हो. तीनो के बीच थोड़ी नोक झोक, थोड़ा हसी मजाक होता रहा.
खाना खाने के बाद सुप्रिया रसोई समेटने लगी hi थी, की रुबीना पीछे से आयी - सुप्रिया... या क्या कर रही... तुम जायो न ऊपर... इक़बाल इंतज़ार कर रहा होगा...
सुप्रिया अनजान बनते हुए बोली - किस चीज़ का इंतज़ार...
रुबीना हस्ते हुए - एक बार शेर के मुँह में खून लग जाता है न... तोह उसे रोज़ प्यास लगती है... अब ये नहीं पता की तुम दोनों में शेर कौन है...
सुप्रिया चिड्डे हुए बोली - भाभी... आप भी न....
रुबीना - जायो जायो... मैं देख लुंगी...
सुप्रिया के मैं में एक अजीब सी एक्ससिटेमेंट और घबराहट होनी शुरू हो गयी थी. 4-5 दिन पहले जब वह यहाँ से गयी थी तोह उसके मैं में एक उदासी थी, जो छत सी गयी थी, और उसकी जगह इस नए एहसास ने ले ली थी.
सुप्रिया ऊपर कमरे में पहुंची, हवा की ठंडक उसके कपड़ो को चीरते हुए उसके सीने तक चुभ रही थी. उसने अंदर आकर देखा की इक़बाल अभी कमरे में नहीं था.
सुप्रिया का दिल ज़ोर ज़ोर से फड़क रहा था, उसने रजाई को पूरे बिस्तर पर अचे से फैलाया, ये रजाई दो लोगो के सोने के लिए बानी थी. आज वह दोनों शायद इस एक hi रजाई में सोने वाले थे. सुप्रिया निर्वसली बिस्तर पर बैठ गयी और दरवाज़े की और देखने लगी, सोचते हुए की जाने कब इक़बाल कमरे में आएंगे.
उसका कुछ पल का इंतज़ार कुछ मिनट बन गया था और हर एक पल उसके दिल में एक अजीब सी सनसनाहट पैदा कर रहा था. सुप्रिया थक कर बिस्तर पर पीछे लेती hi थी की एकदम से दरवाज़ा खुला और इक़बाल अंदर आया.
उसे अंदर आते देख सुप्रिया जल्दी से उठ कर बैठ गयी और उसके मुँह से निकला - आप कहीं गए थे? नीचे भी नहीं थी और ऊपर भी नहीं...
इक़बाल - हाँ वह किसी काम से बहार गया था... आप सोई नहीं अभी...
सुप्रिया ने धीरे से कहा - नहीं बस आपका hi इंतज़ार कर रही थी...
इक़बाल - हाँ... मैं बत्ती बंद कर देता हूँ... आप सो जाइये...
सुप्रिया ने सोचा, पता नहीं इक़बाल की रीलीज़ किया या नहीं, पर आज वह दोनों एक hi रजाई के अंदर सोने वाले थे. सुप्रिया जल्दी से रजाई में घुस गयी, ठण्ड से उसका पूरा शरीर काँप सा रहा था.
इक़बाल बत्ती बंद करके हमेशा की तरह बिस्तर के दुसरे कोने की तरफ से ऊपर चड्ढा और वह भी उसी रजाई में घुस गया. अंदर घुसते hi शायद उसे भी महसूस हो गया था की आज कुछ अलग था.
इक़बाल - ओह्ह... मैडमजी... ये तोह एक hi रजाई है... हम दोनों के लिए...
सुप्रिया की तोह आवाज़ hi नहीं निकल रही थी अभी - जी....
इक़बाल ने रजाई को सुप्रिया की और धकेलना शुरू किया - आप ये ले लीजिये.... मैं चद्दर ोड कर सो जायूँगा...
सुप्रिया जल्दी से रजाई को वापिस उसकी और करने लगी - नहीं नहीं... इतनी ठण्ड हो रही है... आप सो जाइये इसमें... नहीं तोह आप बीमार पद जाओगे...
इक़बाल - पर मैडमजी एक hi...
सुप्रिया ने उसे बीच में चुप करा दिया - तोह क्या हुआ? एक रजाई में नहीं सो सकते क्या? आप चुप चाप इसे ोडिये, नहीं तोह मैं नीचे ज़मीन पर सोने चली जयुंगी...
इक़बाल - ारी नहीं मैडमजी... आप भी न...
इक़बाल ने वापिस रजाई अपनी और खींची और अपने पेअर उसमे अंदर किया. रजाई, चद्दर, तकिया सब कुछ इतना ठंडा ठंडा था अभी, और बिलकुल सॉफ्ट भी. सब कुछ सुप्रिया को और भी उत्तेजित सा कर रहा था. जाने क्यों उसे लगा था की इक़बाल आज रात उसके साथ कुछ कर hi न बैठे, जिससे उसे डर और एक्ससिटेमेंट दोनों hi लग रहा था. जाने वह उसका बड़ा सा लुंड कैसे झेल पायेगी. उफ्फ्फ वह चुदाई के बारे में सोच भी कैसे सकती थी...
इक़बाल कुछ पल बाद सुप्रिया से पीठ फेर कर लेट गया. सुप्रिया को थोड़ा सा गुस्सा आने लगा. अभी कल hi तोह इस आदमी ने कहा था की वह उसका हाथ नहीं छोड़ेगा, और आज वह उसकी तरह एक कदम भी नहीं बड़ा रहा था.
कुछ hi देर में इक़बाल के खर्राटों की आवाज़ सुनाई देने लग गयी थी. इक़बाल तोह बोहोत hi जल्दी सो गया था. सुप्रिया ने अपने आप को समझाया, शायद एहि ठीक था. वह भी पता नहीं क्या क्या सोचने लगी थी. इक़बाल और उसके बीच कुछ कैसे हो सकता था. सुबह से उसके अंदर पनप रही रही एक छह को उसने जैसे एक झटके में अपने मैं से निकाला और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी.
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अगले कुछ दिन सर्दी बढ़ती गयी, और इक़बाल और सुप्रिया को एक hi रजाई में सोने की आदत सी पद गयी. एक hi रजाई में सोने की झिझक तोह धीरे धीरे ख़तम सी हो गयी थी, पर शायद सुप्रिया के अंदर दबी हुई आग नहीं. वह अक्सर रात को सुलग सी जाती, खासकर इन कांपती हुई रातों में.
उस दौरान वह चोरी छुपे अपने कुर्ती में अपना हाथ घुसा कर अपने गरम जिस्म पर लगा लेती. उसे ऐसा लगता जैसे उसका गरम जिस्म एक भट्टी बना हुआ है, और उसी आग के सहारे वह अपने रात काटने की कोशिश करती. कभी कभी तोह वह थोड़ा और सरक कर इक़बाल की और होने की कोशिश भी करती, पर वह उसकी और अपनी पीठ किये बेखबर सोये रहता.
ऐसे hi एक दिन सुप्रिया अकेली अपने कमरे में बैठी हुई अपनी अलमारी को जच्चा रही थी. और कुछ ख़ास करने को भी तोह नहीं था. आज उसने अलमारी में सब कुछ hi तोह निकाल लिया था, अपने कपडे, इक़बाल के कपडे, इक़बाल की लायी हुई साड़ियां, और कुछ ऐसे पुराण सामान वैगेरा.
तभी सब कपडे निकालते निकालते एक कपडे के अंदर से पुराणी सी फोटो बहार आ कर गिरी. एक पल तोह सुप्रिया का ध्यान उस पर गया hi नहीं, पर दूर से उसकी नज़र उस पर गयी तोह कोई लड़की थी उसमे एक लाल सी साड़ी पहने हुए और उसके साथ एक पतला सा आदमी खड़ा हुआ.
सुप्रिया ने फोटो को उठाया और पास से देखने लगी. फोटो काफी पुराणी सी लग रही थी, उसका रंग काफी उड़द चूका था, पर ये पतला सा आदमी ज़रूर इक़बाल hi था. उसकी दादी मूछे नहीं थी. उसके साथ एक छरहरी सी लड़की कड़ी थी. उस लड़की की शकल बड़ी जानी पहचानी सी लग रही थी. शायद वह उसे खुद की hi याद दिला रही थी? नहीं... पता नहीं...
सुप्रिया पलंग पर बैठ कर काफी देर तक फोटो को देखती रही. वह लड़की कितनी प्यारी और मासूम सी लग रही थी. जरूर एहि इक़बाल की पहली बीवी रही होगी. फोटो में दोनों बिलकुल साथ खड़े थे, लड़की बोहोत hi काम उम्र की रही होगी... शायद 18-19, और इक़बाल भी बोहोत ज्यादा बड़ा नहीं... शायद 20-22... समय की साथ फोटो का रंग तोह उतर गया था पर दोनों के चेहरे की मुस्कान नहीं...
पर उसने ये लाल साड़ी क्यों पहनी हुई थी? क्या वह भी सुप्रिया की तरह...? पहले hi दिन अम्मी जी की कही कुछ बातें उसके कानो में गूंजने लगी... शायद इसी लिए कोई उसके बारे में बात नहीं करता था? कितने सारे ख्याल चलने लगे सुप्रिया के मैं में.
इससे पहले कोई और कमरे में आता, सुप्रिया ने उसे फोटो को संभल के अपने पास रख लिया और सामान समेत कर वापिस अलमारी में रख दिया. आखिर में वह साड़ी के थैले को रख रही थी. क्या इसीलिए इक़बाल उसके लिए साड़ी लेकर आया था... वह उसे साड़ी पहने देखना चाहता था?
सुप्रिया कुछ देर बाद नीचे रुबीना के पास पहुंच गयी. वह रुबीना को उस फोटो के बारे में नहीं बताना चाहती थी. फिलहाल तोह वह बस उसका hi राज़ था.
काम करते करते सुप्रिया ने कहा - भाभी... एक बात पूछनी थी...
रुबीना - तुझे कब से इज़ाज़त मांगने की ज़रुरत पद गयी... पूछ न...
सुप्रिया - उम्म्म... काफी दिनों पहले इक़बाल जी मेरे लिए साड़ी लाये थे... मैं सोच रही थी की वह पेहेन कर देख लू... कोई बुरा तोह नहीं मानेगा न?
रुबीना थोड़ा सा चौंकी - साड़ी!? हम्म्म... ाचा... पेहेन ले... कोई दिक्कत की बात थोड़ी न है... और भी औरते पहनती है यहाँ सरियाँ...
सुप्रिया एकदम खुश सी हो गयी - सच.... अभी पेहेन लू?
रुबीना उसकी ख़ुशी देख कर मुस्कुरायी - पगली... जा पेहेन ले... पर थोड़ा धक् के रहियो... ठण्ड हो रही है...
सुप्रिया - जी भाभी....
सुप्रिया जल्दी से ऊपर अपने कमरे में वापिस आयी और उसने अलमारी में से एक साड़ी निकाल कर उसे पेहेनना शुरू किया. उसको डर था की पता नहीं ब्लाउज उसे फिट आने वाला था या नहीं, पर ब्लाउज उसे अचे से फिट आ गया, बस हल्का सा ढीला था. जैसे साड़ियां सुप्रिया पहले पहना करती थी ये उससे काफी हलकी थी पर फिर भी आज कितना ाचा सा लग रहा था एक साड़ी पेहेनना.
साड़ी पेहेन कर सुप्रिया बहार छत पर आ गयी. और तभी शायद इक़बाल किसी काम से दिन में घर आया था और सीढ़ियों से ऊपर चला आ रहा था. इक़बाल को देख कर सुप्रिया के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी, और साथ hi शर्म भी.
इक़बाल ने सुप्रिया को इस तरह साड़ी में खड़े देखा तोह वह बस उसे देखता hi रह गया.
उसे अपनी और यूँ घूरते देख सुप्रिया के गाल लाल हो चुके थे पर वह हिम्मत करके बोली - कैसी लग रही हु मैं इस साड़ी में?
इक़बाल हकलाते हुए बोलै - आऍप... बोहोत hi अचे लग रहे हो आप...
सुप्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा - थैंक यू...
इक़बाल - शायद आपके लिए थोड़ी हलकी साड़ी है... अगली बार और अछि लेकर ायूँगा...
सुप्रिया - नहीं नहीं ठीक है... अछि है... बोहोत अछि है...
दोनों एकदम छुप हो गए और उनके बीच एक अजीब सा सन्नाटा छा गया. दोनों नीचे की और देख रहे थे.
सुप्रिया ने छुप को तोड़ते हुए पुछा - आप किसी काम से आये थे?
इक़बाल - हाँ... वह... भाई जान ने कुछ मंगवाया था... मैं लेकर जाता हूँ...
सुप्रिया - ठीक है... शाम को मिलते है...
इक़बाल - जी...
इक़बाल जल्दी से छत पर और ऊपर छड़ गया और थोड़ी देर बाद एक औज़ार सा लेते हुए नीचे आया.
वह नीचे की और जा hi रहा था की सुप्रिया ने धीरे से कहा - मैं आपका इंतज़ार कर रही हूँगी...
इक़बाल ने पलट कर सुप्रिया की और देखा और फिर वहां से चला गया. सुप्रिया का दिल ज़ोर से धड़क रहा था, ठण्ड के मौसम में भी उसके पसीने से छूट रहे थे. पता नहीं क्यों वह इक़बाल की और ऐसे खींची सी जा रही थी. क्यों वह उसके सामने उसकी आवाज़ इतनी कमज़ोर सी पद जाती थी. शायद वह मैं hi मैं तय कर चुकी थी की आज रात उसे hi आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा.
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रात को सुप्रिया जब कमरे में आयी तोह इक़बाल वहीँ था. सुप्रिया ने साड़ी के ऊपर एक स्वेटर पहना हुआ था जिससे उसे ठण्ड न लगे और ताकि उसकी नंगी कमर भी न दिखे. पर कमरे में आते hi सुप्रिया ने स्वेटर को उतारते हुए साइड रखा. ठण्ड या टेंशन के मारे उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके मम्मी और भी भारी हो गए हो और ब्लाउज में कास के फास गए हो.
इक़बाल शायद उसे स्वेटर उतारते देख रहा था - मैडमजी... आपको कपडे बदलने हो तोह मैं बहार चला जाता हूँ...
सुप्रिया - नहीं... मैं ऐसे hi साड़ी में सो जयुंगी...
इक़बाल - पर साड़ी में दिक्कत नहीं होगी?
सुप्रिया - कोई ख़ास दिक्कत नहीं... मैं साड़ी में सोती hi थी पहले तोह...
इक़बाल - ाचा...
सुप्रिया - मैं बत्ती बुझा दू?
इक़बाल - जी...
सुप्रिया कमरे की बत्ती बुझा कर बिस्तर पर आ गयी और रजाई के अंदर घुस गयी. आज रात तोह उसे और भी ठण्ड लग रही थी. पर इक़बाल हमेशा की तरह दूसरी और मुँह करके सोने लगा था.
सुप्रिया उसे सोने नहीं देना चाहती थी - इक़बाल जी... आज कुछ ज्यादा hi ठण्ड नहीं है...
इक़बाल ने वापिस सुप्रिया की और करवट ली - जी मैडमजी... आप कहे तोह मैं नीचे से एक और रजाई ले आता हूँ... या तसले में थोड़ी सी आग जला देता हूँ...
सुप्रिया - नहीं नहीं... तसले से कमरे में धुंआ हो जायेगा... और दूसरी रजाई काफी भारी हो जायेगी...
इक़बाल - हाँ... ये तोह है... आपने साड़ी भी पहनी हुई है न... शायद उसमे कुछ ज्यादा ठण्ड लग रही होगी...
सुप्रिया - हाँ... शायद...
फिर से सन्नाटा. इक़बाल किसी भी पल वापिस मुड़ने वाला था. सुप्रिया का दिल उसे बेशरम होने के लिए मज़बूर सा कर रहा था - मैं सोच रही थी....
सुप्रिया बीच में रुक गयी, और इक़बाल ने पूछा - जी... बताइये... मैं स्वेटर दे दू आपको....
सुप्रिया - नहीं... मुझे स्वेटर में नींद नहीं आती... मैं सोच रही थी की मैं... आपके थोड़ा नज़दीक आ कर लेट जायु? दो लोगो साथ लेते हो तोह इतनी सर्दी नहीं लगती न...
इक़बाल एक डैम चौंकते हुए बोलै - साथ में मैडमजी!!
सुप्रिया - क्यों? कोई दिक्कत है क्या? मैं तोह बस... सोच hi रही थी...
इक़बाल - नहीं... दिक्कत कैसी...
सुप्रिया - तोह मैं आ जायु?
इक़बाल ने धीरे से कहा - हाँ....
सुप्रिया जल्दी से पलंग पर सरकती हुई इक़बाल की और हो गयी. इतनी तेज़ी से की अँधेरे में उसके मम्मी इक़बाल के सख्त शरीर से जाकर टकराये.
सुप्रिया के मुँह से एकदम से निकला - अह्ह्ह....
इक़बाल - क्या हुआ मैडमजी... आपके लगी तोह नहीं...
सुप्रिया अपने मम्मी हलके से मसलने लगी, उसकी चूचियां पहले से काफी सख्त हो राखी थी जिससे उसको दर्द थोड़ा ज्यादा हुआ था - नहीं... सब ठीक...
सुप्रिया ने अपने सर इक़बाल के कंधे के पास रखा, और उससे बिलकुल सात कर लेट गयी - अब थोड़ा बेहतर लग रहा है... है न...
इक़बाल तोह कुछ बोलने की हालत में नहीं था - जी.....
सुप्रिया के पेअर नीचे तक इक़बाल की पैरो से सटे हुए थे, दोनों साथ साथ लेते एक साइड से एकदम चिपके हुए से थे. पर शायद इतना काफी नहीं था.
सुप्रिया ने अँधेरे में इक़बाल का हाथ ढूंढ़ने की कोशिश करि - आप अपना हाथ मुझ पर रख सकते है...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... ऐसे hi ठीक है...
सुप्रिया - ाचा ठीक है... फिर मैं रख लेती हु...
सुप्रिया ने अपना शरीर इक़बाल की और किया और अपने मम्मी उसके जिस्म से सत्ता दिए और फिर उसकी छाती पर अपना हाथ रख दिया. उसने अपना सर हलके से उठाया और इक़बाल के कंधे पर अपना सर रख दिया. अब तोह वह उससे बिलकुल hi चिपक गयी थी. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने प्यार भरी निगाहों से इक़बाल की और देखा.
इक़बाल सुप्रिया से नज़रे नहीं मिला पा रहा था - मैडमजी... आप थोड़ा सा अलग हो कर लेट जाइये न...
सुप्रिया - क्यों? आपको ाचा नहीं लग रहा... या मेरे हाथ रखने से कोई परेशानी है... आप भी अपना हाथ मुझ पर रख सकते है...
सुप्रिया ने इक़बाल का हाथ अपनी और खींचा और अपनी नंगी कमर पर रख दिया. जैसे hi इक़बाल का हाथ उसकी कमर पर लगा उसके शरीर में जैसे 440 वाल्ट की बिल्जी दौड़ गयी, और वह कसमसाते हुए हिल पड़ी. वह हिलते हुए इक़बाल के ऊपर hi आ लेती थी. उसका हाथ इक़बाल के पायजामा पर जैसे hi पड़ा उसे उसका उभरा हुआ लुंड महसूस हुआ. ये उसने जानबूज कर नहीं किया था.
इक़बाल का लुंड पयजामे में हलके हलके थिरक सा रहा था और उसकी सांसें थोड़ी तेज़ से हो गयी थी. सुप्रिया का मैं छह रहा था की इक़बाल उसे अभी अपने नीचे खींच कर उसके होंठों को चूम ले. पर इक़बाल कोशिश कर रहा था की वह सुप्रिया से नज़रे न मिलाये.
इतनी तोह खूबसूरत थी वह... और अपने आपको इक़बाल को सौंप रही थी. इक़बाल क्यों उससे दूर खींच रहा था. क्या उसे अपनी पहली बीवी की याद आ रही थी, क्या इतना प्यार था उसे उससे? ये सोचते hi सुप्रिया और भी रोमांचित सी हो गयी. और जाने अनजाने... उसकी ऊँगली पयजामे के ऊपर से इक़बाल के लुंड पर चलने लगी. इससे इक़बाल का लुंड और भी थिरक उठा, और वह एक डैम से झटपटाते हुए खड़ा हो गया.
बिस्तर से खड़े होते hi सुप्रिया देख पा रही थी की उसका लुंड पूरी तरह खड़ा था और बहार निकलने के लिए झटपटा सा रहा था.
पर इक़बाल की शकल से उसकी हालत देखने लायक थी और सुप्रिया को उसकी और देख कर हसी और गुस्सा दोनों आ रहा था.
सुप्रिया - इक़बाल जी... क्या हुआ... वापिस आ जाइये बिस्तर में... ठण्ड लग जाएगी...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... बस कुछ अजीब सा लगा...
सुप्रिया - क्या अजीब लगा... आपकी बीवी hi हूँ मैं...
सुप्रिया के मुँह से ये सुन कर इक़बाल हैरान सा हो गया था. सुप्रिया उसे अपना शौहर मानने लगी थी क्या. उसके लिए तोह वह बस विक्रम साब की अमानत थी, जिसे वह देख तोह सकता था पर छह कर भी छू नहीं सकता था.
सुप्रिया ने हस्ते हुए कहा - क्या हुआ? आपकी बीवी नहीं हु क्या? आपने निकाह किया था मुझसे... किया था न?
इक़बाल - जी.. पर वह...
सुप्रिया मासूमियत से बोली - तोह आपके लिए वह निकाह कुछ मायने नहीं रखता? खुदा का बनाया हुआ एक रिश्ता...
इक़बाल अपना सर ज़ोर ज़ोर से हिलाते हुए बोलै - नहीं नहीं... मैडमजी ऐसा कुछ नहीं... बस वह...
सुप्रिया - बस वह क्या? या फिर मैं आपको पसंद नहीं? आपके मैं में कोई और है...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... आप इतनी खूबसूरत है... आप किसको पसंद नहीं होंगी...
सुप्रिया को उसके मुँह से अपनी तारीफ सुन कर ाचा सा लगा - आपको पसंद हु या नहीं? आप क्यों मुझसे दूर दूर रहते है... आइये न... इतनी सर्दी हो रही है... आपको ठण्ड लग जाएगी... और मुझे भी
इक़बाल - पर मैडमजी...
सुप्रिया के अंदर की गर्मी बुरी तरह भड़क चुकी थी. सुप्रिया ने अपनी सॉफ्ट सी आवाज़ में कहा - पर वॉर नहीं... आइये न इधर...
सुप्रिया ने बिस्तर से खड़े होते हुए अपना मुलायम सा हाथ इक़बाल की और बढ़ाया. इक़बाल ने भी अपना हाथ उसकी और किया. न जाने सुप्रिया में एकदम से इतनी ताकत कैसे आ गयी की उसने इक़बाल ज़ोर से अपनी और खींच किया, या फिर वह hi उसकी और खींचा सा चला गया.
एक तेज़ के झटके से वह और सुप्रिया दोनों पलंग पर गिरते हुए लेट गए. इक़बाल सुप्रिया के ऊपर और सुप्रिया उसके ठीक नीचे. इक़बाल का मुँह सुप्रिया की छाती से होता हुआ उसकी गर्दन पर आकर रुका. एक सुराहीदार कोमल अस गर्दन. सुप्रिया के हाथ भी उसके बालों में घूम कर उसे और उत्तेजित कर रहे थे.
वह अपने आप को अब बस और नहीं रोक सकता था. इतने दिनों से उसकी प्यारी मैडमजी उसके सामने हो कर भी उसकी पहुंच से दूर थी. पर आज उसे पहली बार ये महसूस हो रहा था की शायद वह सच में उसकी बीवी hi थी. और वह उसके साथ जो चाहे कर सकता था.
सुप्रिया और इक़बाल बस में बैठे अपने घर की और वापिस जा रहे थे. सुप्रिया खिड़की की तरफ बैठी थी, और उसके बराबर में इक़बाल, उससे बिलकुल सत्ता हुआ. सुप्रिया का कन्धा और पेअर इक़बाल के शरीर से बिलकुल चिपके हुए से थे, और आज तोह सुप्रिया इक़बाल को अपने से दूर करने के बारे में सोच भी नहीं रही थी.
सुप्रिया के चेहरे पर एक हलकी सी शर्मीली सी मुस्कान थी, जाने क्या चल रहा था उसके मैं में, शायद बीजी की कही बात. वहां से निकलते हुए उन्होंने उसे बोलै था की अगली बार जब वह उससे मिलेंगी तब उन्हें यकीं था की सुप्रिया की गॉड में एक बच्चा होगा, इक़बाल और उसका बच्चा. ये सुनकर उसके गाल शर्म से बुरी तरह लाल हो गए थे, और अब फिर से उसके बारे में सोचते hi सुप्रिया ने अपने दोनों हाथों से कास के आगे की सीट का हैंडल जकड लिया.
कल खेत में भी उसने कितनी हिम्मत दिखा दी थी, इक़बाल के गालों को चूम कर. पता नहीं इक़बाल जी उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे. उन्होंने तोह अपनी तरफ से अब तक उसकी और कोई भी कदम नहीं बढ़ाया था. पता नहीं उनके मैं में क्या चल रहा था. पता नहीं ये सब क्या होता जा रहा था, और वह इस सब के बारे में क्यों सोच रही थी. बहार से आती हुई ठंडी हवा उसे पागल सी कर रही थी.
वह अपने खयालो में खोयी hi हुई थी की तभी उसे महसूस हुआ की इक़बाल उठ कर खड़ा हो गया. शायद उनका गाँव आने hi वाला था. सुप्रिया भी उसके पीछे पीछे कड़ी हो गयी और जल्द hi वह दोनों बस से नीचे उतर गए. इक़बाल ने सामान उठाया और वह दोनों एक रिक्शा में बैठ कर घर की और चल दिए.
ये वही गालियां थी जहाँ से सुप्रिया कुछ दिन पहले रुक्सत हुई थी, पर अब सब कुछ अलग अलग सा लग रहा था. जैसे ये उसका गाँव हो, एक जानी पहचानी जगह जहाँ वह अपने घर जा रही थी. अपने घर… उसका घर…
सुप्रिया ने रिक्शा पर बैठे बैठे अपने दुपट्टे से अपना सर अचे से ढाका. हवा में सर्दी और बाद गयी थी और सुप्रिया ने अपने आप को अचे से ढकने की कोशिश की. वह लोगो को अपना चेहरा नहीं देखने देना चाहती थी, मैं hi मैं वह शायद अब किसी की अमानत जो बन गयी थी.
जैसे जैसे घर पास आ रहा था उसकी बेचैनी बाद सी रही थी. अगर घर जाकर सब कुछ पहले जैसा hi हो गया तोह? नहीं नहीं... पहले जैसे क्यों होगा? जाने रुबीना भाभी उससे क्या क्या पूछेंगी...
पर उसे ज्यादा सोचने का वक़्त hi नहीं मिला और जल्द hi रिक्शा घर के बहार आ कर रुक गया था. इक़बाल जल्दी से नीचे उतरा और सामान उतार कर दरवाज़ा खटखाने लगे. सुप्रिया भी रिक्शा से नीचे उतर कर कड़ी हो गयी थी.
कुछ hi पल बाद रुबीना ने दरवाज़ा खोला और उन दोनों को देख कर उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी. वह जल्दी से सुप्रिया की और बड़ी और उसे गले लगा लिया.
रुबीना - आ गयी वापिस... तुम्हारे बिना ये घर इतना खाली खाली सा लग रहा था...
सुप्रिया के चेहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी, जैसे वह अपनी बड़ी बेहेन से इतने दिनों बाद मिल रही हो - जी... मुझे भी आपकी और हिना की काफी याद आ रही थी...
रुबीना उसे अपने साथ अंदर ले गयी, और उसे हलके से अपने कंधे से मारते हुए बोली - याद तोह क्या hi आ रही होगी... सब पता है मुझे...
सुप्रिया उनका इशारा समझ गयी और उसने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका ली.
रुबीना - अब तोह इतना मत शरमायो... इसीलिए तोह तुम्हे भेजा था वहां... मुझे यकीं था की बीजी सब ठीक hi करा देंगी...
सुप्रिया ने हलके से अपनी आँखें ऊपर उठायी और धीरे से बोली - ाचा... तोह आपकी साज़िश थी ये सब... मुझे पहले hi समझ जाना चाहिए था...
रुबीना हस्ते हुए - साज़िश समझो या जो चाहे... पर मुझे दिख रहा है तुम्हारी आँखों में.... कैसे उदास सी, मुरझाई हुई सी गयी थी तुम यहाँ से... और वापिस आयी हो तोह तुम्हारे चेहरे पर एक अलग सी hi चमक है...
सुप्रिया ब्लश कर गयी - नहीं नहीं... ऐसा कुछ नहीं... बस वह तोह ऐसे hi...
रुबीना - चलो, ऐसे या वैसे... तुम्हारे चेहरे का नूर तोह वापिस सा आ गया... ाचा जायो ज़रा अम्मी जी से भी मिल लो. वह कहेंगी तोह नहीं, पर वह भी बेसब्री से तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी.
सुप्रिया - जी...
इतने सुप्रिया अम्मी जी के कमरे में उनसे मिलने गयी, इक़बाल सामन ऊपर के कमरे में रख कर घर से निकल भी गया था. सुप्रिया को लगा था की उसे शायद कुछ पल मिल जाये इक़बाल के साथ, पर शायद उसे आज रात तक का इंतज़ार hi करना पड़े.
दिन का वक़्त हो रहा था, तोह हिना अभी भी कॉलेज में थी. सुप्रिया रुबीना के साथ बैठी वहां की बातें करने लगी. जितना हो सके हो वह रुबीना को वहां के बारे में सब बता रही थी, सिवाए उसके और इक़बाल के बीच जो भी हुआ. पर रुबीना ने भी उसे कुछ ज्यादा कुरेदने की कोशिश नहीं की.
फिर थोड़ी देर बाद हिना घर वापिस आ गयी और वह घर आते hi सबसे पहले अपनी चची से जाकर लिपट गयी.
हिना एक्ससिटेड होते हुए बोली - चेचीईई... आप आ गयी!!!
सुप्रिया - जी... आ गयी... तुम बताया, कैसा चल रहा है कॉलेज...
हिना सुप्रिया के गले लगी हुई थी - सब बढ़िया... बस आपको बोहोत मिस कर रही थी मैं.... अब आपको कहीं नहीं जाने दूंगी मैं...
सुप्रिया - ाचा... और अगर मुझे जाना पड़ा तोह?
हिना - तोह फिर मैं भी आपके साथ जयुंगी...
सुप्रिया - हाहाहा... ाचा ठीक है बाबा... अगली बार तुम मेरे साथ चलना....
हिना - अगली बार हम सब लोग कहीं घूमने चलेंगे...
सुप्रिया - बिलकुल... क्यों नहीं...
हिना काफी देर तक उसे कॉलेज की बातें बताती रही. अपने टीचर्स के बारे में, आपने साथ पद रही लड़कियों के बारे में, नाज़ के बारे में, और पता नहीं क्या क्या.
सुप्रिया के दिमाग में एकदम से वह लड़का आया जो उस दिन एडमिशन के टाइम उससे बहस कर रहा था - और वह... उसने तोह परेशान नहीं किया न?
हिना - कौन? किसने?
सुप्रिया - हम्म्म... क्या नाम था उसका... जो एडमिशन के टाइम हमे परेशान कर रहा था...
हिना - प्रणव!?
सुप्रिया ने मुँह बनाते हुए कहा - हाँ... शायद वही था उसका नाम...
हिना - नहीं नहीं, उन्होंने तोह मुझे परेशान नहीं किया. ज्यादा तोह नहीं, एक दो बार मिले थे मुझे. उसे याद थे हम लोग, आपके बारे में भी पूछ रहे थे...
सुप्रिया ने हाथ नाचते हुए कहा - ाचा... आज तोह बड़ी इज़्ज़त से बात कर रही हो उसके बारे में...
हिना - हाँ तोह.... मुझसे तोह उम्र में बड़े hi है न वह...
सुप्रिया - क्या पूछ रहा था मेरे बारे में?
हिना - हम्म्म... कुछ ख़ास नहीं... एहि की आप आती हो क्या मुझे यहाँ छोड़ने... और हम लोग कहाँ रहते है...
सुप्रिया ने एकदम से कहा - उसे ज्यादा मुँह मत लगाना... और बताना तोह कुछ भी नहीं.... हम लोग कहाँ रहते है, उससे उसे क्या मतलब...
हिना - हम्म.... काफी हेल्पफुल है वह वैसे...
सुप्रिया - ाचा चलो उसकी पैरवी करना बंद करो....
हिना - ाचा आप बताइये... आप क्या लायी मेरे लिए वहां से...
हिना ने शाम तक सुप्रिया को घेरे hi रखा. शाम होते होते सुप्रिया के मैं में एक अजीब सा एहसास जागने लगा था. उसके शरीर के सारे बाल जैसे खड़े से हो गए थे, और जाने क्यों उसकी चूचियां भी एक डैम सख्त सी हो गयी थी. शायद हवा में हो रही ठण्ड का असर था. पर वह दरवाज़े पर एक नज़र रखे, इक़बाल के घर आने का इंतज़ार कर रही थी.
और शाम को थोड़ी देर में इक़बाल और अब्बास घर वापस आ hi गए. इक़बाल के चेहरे पर काफी थकान सी लग रही थी, आखिर उसे घर वापस आ कर ज़रा भी आराम करने का मौका नहीं मिला था. ऐसा लग रहा था जैसे चार दिन का काम आज उसने एक hi दिन में कर दिया हो. सुप्रिया ने चुप चाप उन दोनों को पानी का गिलास पकड़ाया.
सुप्रिया रसोई के पास कड़ी इक़बाल की और hi देख रही थी की तभी रुबीना भाभी ने सुप्रिया को हिना के कमरे से आवाज़ लगायी - सुप्रिया... सुनो... इधर आयो...
सुप्रिया - आयी भाभी...
सुप्रिया अंदर पहुंची तोह रुबीना ने एक मोती सी रजाई निकाल राखी थी - ये लो... अपने कमरे में ले जायो... ठण्ड बाद गयी है... और रात को तोह काफी ठण्ड हो जाती है...
सुप्रिया - जी भाभी
सुप्रिया ने उस मोती रजाई को उठाने की कोशिश करि. चाहे उसमे रुई hi भरी पड़ी हो, पर वह काफी भारी सी थी. सुप्रिया ने किसी तरह से रजाई को उठा लिया और अपने आप को बैलेंस करते हुए वह कमरे से बहार निकली. सुप्रिया लड़खड़ाते हुए रजाई को उठाये चल रही थी.
इक़बाल ने जैसे hi सुप्रिया को इस हाल में देखा, वह जल्दी से उसकी और लपका - लायो... मैं उठा लेता हूँ...
सुप्रिया को सामने सही से दिख भी नहीं रहा था, पर इक़बाल की लम्बाई की वजह से उसे उसका सर दिखाई दे रहा था - नहीं नहीं... मैं उठा लुंगी... आप बैठो...
इक़बाल - ारी काफी भरी लग रही है... आप कैसे ऊपर तक पहुचायोगी इसे...
सुप्रिया ने थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा - इतनी भी कमज़ोर नहीं हु मैं... अब तोह पंहुचा के hi रहूंगी...
सुप्रिया ने लड़खड़ाते हुए दो तीन और कदम लिए, पर उसके ठीक सामने इक़बाल था. इक़बाल ने जैसे hi मदद के लिए हाथ बढ़ाया - आप पीछे हैट जायो, मैं कर लुंगी.
इक़बाल - ारी पर...
सुप्रिया - पर वॉर कुछ नहीं... हटिये...
इक़बाल सुप्रिया का जिद्दीपन शायद समझने लगा था, और उसने एक दो कदम साइड किये, पर उसे दिख रहा था की सुप्रिया को कितनी मुश्किल हो रही थी.
सीढ़ियों तक पहुंचते पहुंचते तोह सुप्रिया की सांस hi फूलने लगी थी. शायद उसे इक़बाल की मदद ले hi लेनी चाहिए थी. अचानक से सुप्रिया को महसूस हुआ की उसका भार थोड़ा काम हो गया. पीछे से रजाई को इक़बाल ने पकड़ लिया था.
इक़बाल - चलिए... साथ मिल कर ले जाते है ऊपर...
सुप्रिया के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट आ गयी, और वह आगे आगे और इक़बाल पीछे पीछे मिल कर रजाई को ऊपर के कमरे तक ले आये. बिस्तर पर रजाई डालते hi सुप्रिया को महसूस हुआ की उसकी तोह जान सी hi निकल गयी थी. पर वह इक़बाल के सामने अपने आप को कमज़ोर नहीं दिखाना चाहती थी.
सुप्रिया हाँफते हुए - देखा... कर लिया न...
इक़बाल को उसकी बात सुन कर हसी सी आ गयी - जी.. बिलकुल...
सुप्रिया - वैसे मुझे पता है... आप तोह रजाई और मुझे दोनों को उठा कर ऊपर ले आते... पर चलो इस बहाने मुझे भी कुछ काम तोह करने को मिला...
इक़बाल - आप मुझे उठाने देती अपने आप को?
सुप्रिया की आवाज़ एक डैम से सॉफ्ट हो गयी - हाँ... तोह उसमे क्या है... अगली बार उठा लेना न आप...
इक़बाल - जी... बिलकुल...
सुप्रिया बुरी तरह झेप रही थी - चलिए... मैं नीचे चलती हूँ... खाना लगाना है न...
सुप्रिया जल्दी से नीचे की और गयी और इक़बाल थोड़ी देर बाद उसके पीछे पीछे आ गया. हमेशा की तरह रुबीना खाना बनती गयी और सुप्रिया चुप चाप परोसती गयी, और उन लोगो का खाना हो जाने के बाद सुप्रिया, रुबीना और हिना ने भी खाना खा लिया.
सुप्रिया को आज उन दोनों के साथ खाना खाते हुए ऐसा hi लग रहा था जैसे वह अपने परिवार के साथ खाना खा रही हो. तीनो के बीच थोड़ी नोक झोक, थोड़ा हसी मजाक होता रहा.
खाना खाने के बाद सुप्रिया रसोई समेटने लगी hi थी, की रुबीना पीछे से आयी - सुप्रिया... या क्या कर रही... तुम जायो न ऊपर... इक़बाल इंतज़ार कर रहा होगा...
सुप्रिया अनजान बनते हुए बोली - किस चीज़ का इंतज़ार...
रुबीना हस्ते हुए - एक बार शेर के मुँह में खून लग जाता है न... तोह उसे रोज़ प्यास लगती है... अब ये नहीं पता की तुम दोनों में शेर कौन है...
सुप्रिया चिड्डे हुए बोली - भाभी... आप भी न....
रुबीना - जायो जायो... मैं देख लुंगी...
सुप्रिया के मैं में एक अजीब सी एक्ससिटेमेंट और घबराहट होनी शुरू हो गयी थी. 4-5 दिन पहले जब वह यहाँ से गयी थी तोह उसके मैं में एक उदासी थी, जो छत सी गयी थी, और उसकी जगह इस नए एहसास ने ले ली थी.
सुप्रिया ऊपर कमरे में पहुंची, हवा की ठंडक उसके कपड़ो को चीरते हुए उसके सीने तक चुभ रही थी. उसने अंदर आकर देखा की इक़बाल अभी कमरे में नहीं था.
सुप्रिया का दिल ज़ोर ज़ोर से फड़क रहा था, उसने रजाई को पूरे बिस्तर पर अचे से फैलाया, ये रजाई दो लोगो के सोने के लिए बानी थी. आज वह दोनों शायद इस एक hi रजाई में सोने वाले थे. सुप्रिया निर्वसली बिस्तर पर बैठ गयी और दरवाज़े की और देखने लगी, सोचते हुए की जाने कब इक़बाल कमरे में आएंगे.
उसका कुछ पल का इंतज़ार कुछ मिनट बन गया था और हर एक पल उसके दिल में एक अजीब सी सनसनाहट पैदा कर रहा था. सुप्रिया थक कर बिस्तर पर पीछे लेती hi थी की एकदम से दरवाज़ा खुला और इक़बाल अंदर आया.
उसे अंदर आते देख सुप्रिया जल्दी से उठ कर बैठ गयी और उसके मुँह से निकला - आप कहीं गए थे? नीचे भी नहीं थी और ऊपर भी नहीं...
इक़बाल - हाँ वह किसी काम से बहार गया था... आप सोई नहीं अभी...
सुप्रिया ने धीरे से कहा - नहीं बस आपका hi इंतज़ार कर रही थी...
इक़बाल - हाँ... मैं बत्ती बंद कर देता हूँ... आप सो जाइये...
सुप्रिया ने सोचा, पता नहीं इक़बाल की रीलीज़ किया या नहीं, पर आज वह दोनों एक hi रजाई के अंदर सोने वाले थे. सुप्रिया जल्दी से रजाई में घुस गयी, ठण्ड से उसका पूरा शरीर काँप सा रहा था.
इक़बाल बत्ती बंद करके हमेशा की तरह बिस्तर के दुसरे कोने की तरफ से ऊपर चड्ढा और वह भी उसी रजाई में घुस गया. अंदर घुसते hi शायद उसे भी महसूस हो गया था की आज कुछ अलग था.
इक़बाल - ओह्ह... मैडमजी... ये तोह एक hi रजाई है... हम दोनों के लिए...
सुप्रिया की तोह आवाज़ hi नहीं निकल रही थी अभी - जी....
इक़बाल ने रजाई को सुप्रिया की और धकेलना शुरू किया - आप ये ले लीजिये.... मैं चद्दर ोड कर सो जायूँगा...
सुप्रिया जल्दी से रजाई को वापिस उसकी और करने लगी - नहीं नहीं... इतनी ठण्ड हो रही है... आप सो जाइये इसमें... नहीं तोह आप बीमार पद जाओगे...
इक़बाल - पर मैडमजी एक hi...
सुप्रिया ने उसे बीच में चुप करा दिया - तोह क्या हुआ? एक रजाई में नहीं सो सकते क्या? आप चुप चाप इसे ोडिये, नहीं तोह मैं नीचे ज़मीन पर सोने चली जयुंगी...
इक़बाल - ारी नहीं मैडमजी... आप भी न...
इक़बाल ने वापिस रजाई अपनी और खींची और अपने पेअर उसमे अंदर किया. रजाई, चद्दर, तकिया सब कुछ इतना ठंडा ठंडा था अभी, और बिलकुल सॉफ्ट भी. सब कुछ सुप्रिया को और भी उत्तेजित सा कर रहा था. जाने क्यों उसे लगा था की इक़बाल आज रात उसके साथ कुछ कर hi न बैठे, जिससे उसे डर और एक्ससिटेमेंट दोनों hi लग रहा था. जाने वह उसका बड़ा सा लुंड कैसे झेल पायेगी. उफ्फ्फ वह चुदाई के बारे में सोच भी कैसे सकती थी...
इक़बाल कुछ पल बाद सुप्रिया से पीठ फेर कर लेट गया. सुप्रिया को थोड़ा सा गुस्सा आने लगा. अभी कल hi तोह इस आदमी ने कहा था की वह उसका हाथ नहीं छोड़ेगा, और आज वह उसकी तरह एक कदम भी नहीं बड़ा रहा था.
कुछ hi देर में इक़बाल के खर्राटों की आवाज़ सुनाई देने लग गयी थी. इक़बाल तोह बोहोत hi जल्दी सो गया था. सुप्रिया ने अपने आप को समझाया, शायद एहि ठीक था. वह भी पता नहीं क्या क्या सोचने लगी थी. इक़बाल और उसके बीच कुछ कैसे हो सकता था. सुबह से उसके अंदर पनप रही रही एक छह को उसने जैसे एक झटके में अपने मैं से निकाला और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी.
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अगले कुछ दिन सर्दी बढ़ती गयी, और इक़बाल और सुप्रिया को एक hi रजाई में सोने की आदत सी पद गयी. एक hi रजाई में सोने की झिझक तोह धीरे धीरे ख़तम सी हो गयी थी, पर शायद सुप्रिया के अंदर दबी हुई आग नहीं. वह अक्सर रात को सुलग सी जाती, खासकर इन कांपती हुई रातों में.
उस दौरान वह चोरी छुपे अपने कुर्ती में अपना हाथ घुसा कर अपने गरम जिस्म पर लगा लेती. उसे ऐसा लगता जैसे उसका गरम जिस्म एक भट्टी बना हुआ है, और उसी आग के सहारे वह अपने रात काटने की कोशिश करती. कभी कभी तोह वह थोड़ा और सरक कर इक़बाल की और होने की कोशिश भी करती, पर वह उसकी और अपनी पीठ किये बेखबर सोये रहता.
ऐसे hi एक दिन सुप्रिया अकेली अपने कमरे में बैठी हुई अपनी अलमारी को जच्चा रही थी. और कुछ ख़ास करने को भी तोह नहीं था. आज उसने अलमारी में सब कुछ hi तोह निकाल लिया था, अपने कपडे, इक़बाल के कपडे, इक़बाल की लायी हुई साड़ियां, और कुछ ऐसे पुराण सामान वैगेरा.
तभी सब कपडे निकालते निकालते एक कपडे के अंदर से पुराणी सी फोटो बहार आ कर गिरी. एक पल तोह सुप्रिया का ध्यान उस पर गया hi नहीं, पर दूर से उसकी नज़र उस पर गयी तोह कोई लड़की थी उसमे एक लाल सी साड़ी पहने हुए और उसके साथ एक पतला सा आदमी खड़ा हुआ.
सुप्रिया ने फोटो को उठाया और पास से देखने लगी. फोटो काफी पुराणी सी लग रही थी, उसका रंग काफी उड़द चूका था, पर ये पतला सा आदमी ज़रूर इक़बाल hi था. उसकी दादी मूछे नहीं थी. उसके साथ एक छरहरी सी लड़की कड़ी थी. उस लड़की की शकल बड़ी जानी पहचानी सी लग रही थी. शायद वह उसे खुद की hi याद दिला रही थी? नहीं... पता नहीं...
सुप्रिया पलंग पर बैठ कर काफी देर तक फोटो को देखती रही. वह लड़की कितनी प्यारी और मासूम सी लग रही थी. जरूर एहि इक़बाल की पहली बीवी रही होगी. फोटो में दोनों बिलकुल साथ खड़े थे, लड़की बोहोत hi काम उम्र की रही होगी... शायद 18-19, और इक़बाल भी बोहोत ज्यादा बड़ा नहीं... शायद 20-22... समय की साथ फोटो का रंग तोह उतर गया था पर दोनों के चेहरे की मुस्कान नहीं...
पर उसने ये लाल साड़ी क्यों पहनी हुई थी? क्या वह भी सुप्रिया की तरह...? पहले hi दिन अम्मी जी की कही कुछ बातें उसके कानो में गूंजने लगी... शायद इसी लिए कोई उसके बारे में बात नहीं करता था? कितने सारे ख्याल चलने लगे सुप्रिया के मैं में.
इससे पहले कोई और कमरे में आता, सुप्रिया ने उसे फोटो को संभल के अपने पास रख लिया और सामान समेत कर वापिस अलमारी में रख दिया. आखिर में वह साड़ी के थैले को रख रही थी. क्या इसीलिए इक़बाल उसके लिए साड़ी लेकर आया था... वह उसे साड़ी पहने देखना चाहता था?
सुप्रिया कुछ देर बाद नीचे रुबीना के पास पहुंच गयी. वह रुबीना को उस फोटो के बारे में नहीं बताना चाहती थी. फिलहाल तोह वह बस उसका hi राज़ था.
काम करते करते सुप्रिया ने कहा - भाभी... एक बात पूछनी थी...
रुबीना - तुझे कब से इज़ाज़त मांगने की ज़रुरत पद गयी... पूछ न...
सुप्रिया - उम्म्म... काफी दिनों पहले इक़बाल जी मेरे लिए साड़ी लाये थे... मैं सोच रही थी की वह पेहेन कर देख लू... कोई बुरा तोह नहीं मानेगा न?
रुबीना थोड़ा सा चौंकी - साड़ी!? हम्म्म... ाचा... पेहेन ले... कोई दिक्कत की बात थोड़ी न है... और भी औरते पहनती है यहाँ सरियाँ...
सुप्रिया एकदम खुश सी हो गयी - सच.... अभी पेहेन लू?
रुबीना उसकी ख़ुशी देख कर मुस्कुरायी - पगली... जा पेहेन ले... पर थोड़ा धक् के रहियो... ठण्ड हो रही है...
सुप्रिया - जी भाभी....
सुप्रिया जल्दी से ऊपर अपने कमरे में वापिस आयी और उसने अलमारी में से एक साड़ी निकाल कर उसे पेहेनना शुरू किया. उसको डर था की पता नहीं ब्लाउज उसे फिट आने वाला था या नहीं, पर ब्लाउज उसे अचे से फिट आ गया, बस हल्का सा ढीला था. जैसे साड़ियां सुप्रिया पहले पहना करती थी ये उससे काफी हलकी थी पर फिर भी आज कितना ाचा सा लग रहा था एक साड़ी पेहेनना.
साड़ी पेहेन कर सुप्रिया बहार छत पर आ गयी. और तभी शायद इक़बाल किसी काम से दिन में घर आया था और सीढ़ियों से ऊपर चला आ रहा था. इक़बाल को देख कर सुप्रिया के चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी, और साथ hi शर्म भी.
इक़बाल ने सुप्रिया को इस तरह साड़ी में खड़े देखा तोह वह बस उसे देखता hi रह गया.
उसे अपनी और यूँ घूरते देख सुप्रिया के गाल लाल हो चुके थे पर वह हिम्मत करके बोली - कैसी लग रही हु मैं इस साड़ी में?
इक़बाल हकलाते हुए बोलै - आऍप... बोहोत hi अचे लग रहे हो आप...
सुप्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा - थैंक यू...
इक़बाल - शायद आपके लिए थोड़ी हलकी साड़ी है... अगली बार और अछि लेकर ायूँगा...
सुप्रिया - नहीं नहीं ठीक है... अछि है... बोहोत अछि है...
दोनों एकदम छुप हो गए और उनके बीच एक अजीब सा सन्नाटा छा गया. दोनों नीचे की और देख रहे थे.
सुप्रिया ने छुप को तोड़ते हुए पुछा - आप किसी काम से आये थे?
इक़बाल - हाँ... वह... भाई जान ने कुछ मंगवाया था... मैं लेकर जाता हूँ...
सुप्रिया - ठीक है... शाम को मिलते है...
इक़बाल - जी...
इक़बाल जल्दी से छत पर और ऊपर छड़ गया और थोड़ी देर बाद एक औज़ार सा लेते हुए नीचे आया.
वह नीचे की और जा hi रहा था की सुप्रिया ने धीरे से कहा - मैं आपका इंतज़ार कर रही हूँगी...
इक़बाल ने पलट कर सुप्रिया की और देखा और फिर वहां से चला गया. सुप्रिया का दिल ज़ोर से धड़क रहा था, ठण्ड के मौसम में भी उसके पसीने से छूट रहे थे. पता नहीं क्यों वह इक़बाल की और ऐसे खींची सी जा रही थी. क्यों वह उसके सामने उसकी आवाज़ इतनी कमज़ोर सी पद जाती थी. शायद वह मैं hi मैं तय कर चुकी थी की आज रात उसे hi आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा.
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रात को सुप्रिया जब कमरे में आयी तोह इक़बाल वहीँ था. सुप्रिया ने साड़ी के ऊपर एक स्वेटर पहना हुआ था जिससे उसे ठण्ड न लगे और ताकि उसकी नंगी कमर भी न दिखे. पर कमरे में आते hi सुप्रिया ने स्वेटर को उतारते हुए साइड रखा. ठण्ड या टेंशन के मारे उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके मम्मी और भी भारी हो गए हो और ब्लाउज में कास के फास गए हो.
इक़बाल शायद उसे स्वेटर उतारते देख रहा था - मैडमजी... आपको कपडे बदलने हो तोह मैं बहार चला जाता हूँ...
सुप्रिया - नहीं... मैं ऐसे hi साड़ी में सो जयुंगी...
इक़बाल - पर साड़ी में दिक्कत नहीं होगी?
सुप्रिया - कोई ख़ास दिक्कत नहीं... मैं साड़ी में सोती hi थी पहले तोह...
इक़बाल - ाचा...
सुप्रिया - मैं बत्ती बुझा दू?
इक़बाल - जी...
सुप्रिया कमरे की बत्ती बुझा कर बिस्तर पर आ गयी और रजाई के अंदर घुस गयी. आज रात तोह उसे और भी ठण्ड लग रही थी. पर इक़बाल हमेशा की तरह दूसरी और मुँह करके सोने लगा था.
सुप्रिया उसे सोने नहीं देना चाहती थी - इक़बाल जी... आज कुछ ज्यादा hi ठण्ड नहीं है...
इक़बाल ने वापिस सुप्रिया की और करवट ली - जी मैडमजी... आप कहे तोह मैं नीचे से एक और रजाई ले आता हूँ... या तसले में थोड़ी सी आग जला देता हूँ...
सुप्रिया - नहीं नहीं... तसले से कमरे में धुंआ हो जायेगा... और दूसरी रजाई काफी भारी हो जायेगी...
इक़बाल - हाँ... ये तोह है... आपने साड़ी भी पहनी हुई है न... शायद उसमे कुछ ज्यादा ठण्ड लग रही होगी...
सुप्रिया - हाँ... शायद...
फिर से सन्नाटा. इक़बाल किसी भी पल वापिस मुड़ने वाला था. सुप्रिया का दिल उसे बेशरम होने के लिए मज़बूर सा कर रहा था - मैं सोच रही थी....
सुप्रिया बीच में रुक गयी, और इक़बाल ने पूछा - जी... बताइये... मैं स्वेटर दे दू आपको....
सुप्रिया - नहीं... मुझे स्वेटर में नींद नहीं आती... मैं सोच रही थी की मैं... आपके थोड़ा नज़दीक आ कर लेट जायु? दो लोगो साथ लेते हो तोह इतनी सर्दी नहीं लगती न...
इक़बाल एक डैम चौंकते हुए बोलै - साथ में मैडमजी!!
सुप्रिया - क्यों? कोई दिक्कत है क्या? मैं तोह बस... सोच hi रही थी...
इक़बाल - नहीं... दिक्कत कैसी...
सुप्रिया - तोह मैं आ जायु?
इक़बाल ने धीरे से कहा - हाँ....
सुप्रिया जल्दी से पलंग पर सरकती हुई इक़बाल की और हो गयी. इतनी तेज़ी से की अँधेरे में उसके मम्मी इक़बाल के सख्त शरीर से जाकर टकराये.
सुप्रिया के मुँह से एकदम से निकला - अह्ह्ह....
इक़बाल - क्या हुआ मैडमजी... आपके लगी तोह नहीं...
सुप्रिया अपने मम्मी हलके से मसलने लगी, उसकी चूचियां पहले से काफी सख्त हो राखी थी जिससे उसको दर्द थोड़ा ज्यादा हुआ था - नहीं... सब ठीक...
सुप्रिया ने अपने सर इक़बाल के कंधे के पास रखा, और उससे बिलकुल सात कर लेट गयी - अब थोड़ा बेहतर लग रहा है... है न...
इक़बाल तोह कुछ बोलने की हालत में नहीं था - जी.....
सुप्रिया के पेअर नीचे तक इक़बाल की पैरो से सटे हुए थे, दोनों साथ साथ लेते एक साइड से एकदम चिपके हुए से थे. पर शायद इतना काफी नहीं था.
सुप्रिया ने अँधेरे में इक़बाल का हाथ ढूंढ़ने की कोशिश करि - आप अपना हाथ मुझ पर रख सकते है...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... ऐसे hi ठीक है...
सुप्रिया - ाचा ठीक है... फिर मैं रख लेती हु...
सुप्रिया ने अपना शरीर इक़बाल की और किया और अपने मम्मी उसके जिस्म से सत्ता दिए और फिर उसकी छाती पर अपना हाथ रख दिया. उसने अपना सर हलके से उठाया और इक़बाल के कंधे पर अपना सर रख दिया. अब तोह वह उससे बिलकुल hi चिपक गयी थी. उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उसने प्यार भरी निगाहों से इक़बाल की और देखा.
इक़बाल सुप्रिया से नज़रे नहीं मिला पा रहा था - मैडमजी... आप थोड़ा सा अलग हो कर लेट जाइये न...
सुप्रिया - क्यों? आपको ाचा नहीं लग रहा... या मेरे हाथ रखने से कोई परेशानी है... आप भी अपना हाथ मुझ पर रख सकते है...
सुप्रिया ने इक़बाल का हाथ अपनी और खींचा और अपनी नंगी कमर पर रख दिया. जैसे hi इक़बाल का हाथ उसकी कमर पर लगा उसके शरीर में जैसे 440 वाल्ट की बिल्जी दौड़ गयी, और वह कसमसाते हुए हिल पड़ी. वह हिलते हुए इक़बाल के ऊपर hi आ लेती थी. उसका हाथ इक़बाल के पायजामा पर जैसे hi पड़ा उसे उसका उभरा हुआ लुंड महसूस हुआ. ये उसने जानबूज कर नहीं किया था.
इक़बाल का लुंड पयजामे में हलके हलके थिरक सा रहा था और उसकी सांसें थोड़ी तेज़ से हो गयी थी. सुप्रिया का मैं छह रहा था की इक़बाल उसे अभी अपने नीचे खींच कर उसके होंठों को चूम ले. पर इक़बाल कोशिश कर रहा था की वह सुप्रिया से नज़रे न मिलाये.
इतनी तोह खूबसूरत थी वह... और अपने आपको इक़बाल को सौंप रही थी. इक़बाल क्यों उससे दूर खींच रहा था. क्या उसे अपनी पहली बीवी की याद आ रही थी, क्या इतना प्यार था उसे उससे? ये सोचते hi सुप्रिया और भी रोमांचित सी हो गयी. और जाने अनजाने... उसकी ऊँगली पयजामे के ऊपर से इक़बाल के लुंड पर चलने लगी. इससे इक़बाल का लुंड और भी थिरक उठा, और वह एक डैम से झटपटाते हुए खड़ा हो गया.
बिस्तर से खड़े होते hi सुप्रिया देख पा रही थी की उसका लुंड पूरी तरह खड़ा था और बहार निकलने के लिए झटपटा सा रहा था.
पर इक़बाल की शकल से उसकी हालत देखने लायक थी और सुप्रिया को उसकी और देख कर हसी और गुस्सा दोनों आ रहा था.
सुप्रिया - इक़बाल जी... क्या हुआ... वापिस आ जाइये बिस्तर में... ठण्ड लग जाएगी...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... बस कुछ अजीब सा लगा...
सुप्रिया - क्या अजीब लगा... आपकी बीवी hi हूँ मैं...
सुप्रिया के मुँह से ये सुन कर इक़बाल हैरान सा हो गया था. सुप्रिया उसे अपना शौहर मानने लगी थी क्या. उसके लिए तोह वह बस विक्रम साब की अमानत थी, जिसे वह देख तोह सकता था पर छह कर भी छू नहीं सकता था.
सुप्रिया ने हस्ते हुए कहा - क्या हुआ? आपकी बीवी नहीं हु क्या? आपने निकाह किया था मुझसे... किया था न?
इक़बाल - जी.. पर वह...
सुप्रिया मासूमियत से बोली - तोह आपके लिए वह निकाह कुछ मायने नहीं रखता? खुदा का बनाया हुआ एक रिश्ता...
इक़बाल अपना सर ज़ोर ज़ोर से हिलाते हुए बोलै - नहीं नहीं... मैडमजी ऐसा कुछ नहीं... बस वह...
सुप्रिया - बस वह क्या? या फिर मैं आपको पसंद नहीं? आपके मैं में कोई और है...
इक़बाल - नहीं मैडमजी... आप इतनी खूबसूरत है... आप किसको पसंद नहीं होंगी...
सुप्रिया को उसके मुँह से अपनी तारीफ सुन कर ाचा सा लगा - आपको पसंद हु या नहीं? आप क्यों मुझसे दूर दूर रहते है... आइये न... इतनी सर्दी हो रही है... आपको ठण्ड लग जाएगी... और मुझे भी
इक़बाल - पर मैडमजी...
सुप्रिया के अंदर की गर्मी बुरी तरह भड़क चुकी थी. सुप्रिया ने अपनी सॉफ्ट सी आवाज़ में कहा - पर वॉर नहीं... आइये न इधर...
सुप्रिया ने बिस्तर से खड़े होते हुए अपना मुलायम सा हाथ इक़बाल की और बढ़ाया. इक़बाल ने भी अपना हाथ उसकी और किया. न जाने सुप्रिया में एकदम से इतनी ताकत कैसे आ गयी की उसने इक़बाल ज़ोर से अपनी और खींच किया, या फिर वह hi उसकी और खींचा सा चला गया.
एक तेज़ के झटके से वह और सुप्रिया दोनों पलंग पर गिरते हुए लेट गए. इक़बाल सुप्रिया के ऊपर और सुप्रिया उसके ठीक नीचे. इक़बाल का मुँह सुप्रिया की छाती से होता हुआ उसकी गर्दन पर आकर रुका. एक सुराहीदार कोमल अस गर्दन. सुप्रिया के हाथ भी उसके बालों में घूम कर उसे और उत्तेजित कर रहे थे.
वह अपने आप को अब बस और नहीं रोक सकता था. इतने दिनों से उसकी प्यारी मैडमजी उसके सामने हो कर भी उसकी पहुंच से दूर थी. पर आज उसे पहली बार ये महसूस हो रहा था की शायद वह सच में उसकी बीवी hi थी. और वह उसके साथ जो चाहे कर सकता था.