Adultery गुजारिश 2 (Completed) - Page 4 - SexBaba
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Adultery गुजारिश 2 (Completed)

चारो तरफ भगदड़ मची हुई थी. मालूम हुआ की किसी ने सुनार पर हमला कर दिया था . कुछ लोग उसे गाड़ी में पटक रहे थे , उसका एक हाथ झूल रहा था, मैंने देखा उसे. पिछले कुछ दिनों से गाँव में बड़ी अजीब अजीब घटनाये हो रही थी , पर सिर्फ उन लोगो के साथ जो या तो जब्बर के साथ थे या सुनार के साथ. रीना को उसके घर छोड़ने के बाद मैं फिर से वारदात वाली जगह पर पहुँच गया .



अब वहां पर कुछ गिने चुने लोग ही थे. किसी से तो बड़ी गहरी दुश्मनी थी इन लोगो की जो वो सीधा ही इन्हें मार रहा था . मैंने घटनास्थल की बड़ी बारीकी से जांच की पर कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिस से कोई अनुमान लगाया जा सके.पर मेरे दिमाग में दो सवाल बड़ी तेजी से दौड़ लगा रहे थे , पहला ये की हमलावर हो न हो हमारे ही गाँव , मोहल्ले का हो सकता है वर्ना इतनी जल्दी वो कैसे भाग गया. दूसरा सवाल ये की आज ही मैं लाला से उस हीरे के बारे में बात करने वाला था और आज ही लाला पर हमला हो गया.

क्या ये कोई इत्तेफाक था या फिर कोई था जो नहीं चाहता था की लाला मेरे से मिले. मुझे दुश्मनी वाला एंगल ज्यादा जंच रहा था क्योंकि पहले जो लोग मारे गए थे उनसे मेरा कोई लेना देना नहीं था . पर फिर भी इस हमलावर में मेरी दिलचश्पी जाग गयी थी . पंडाल में पड़ी कुर्सी पर बैठे बैठे मैं तमाम तरह के अनुमान लगा रहा था . मैं ताई के घर जा रहा था की मेरी नजर गली में खड़ी चाची पर पड़ी.

“तुम क्या कर रही हो यहाँ पर ” मैंने कहा

चाची- तुमसे मतलब.

मैं- चलो घर चलते है , कुछ नहीं बचा इस तमाशे में देखने को .

उसने बुरा सा मुह बनाया और मेरे साथ चलने लगी. घर के दरवाजे को खोलने के लिए उसने अपना हाथ उठाया ही था की वो अचानक से करह उठी. उसने दुसरे हाथ से अपना हाथ संभाला. मैंने देखा की उसके हाथ से खून बह रहा था .

“ये चोट कैसे लगी तुमको ” मैंने सवाल किया

“तुजसे क्या मतलब है ” चाची ने थोड़े गुस्से से कहा.

मैंने हिमाकत करते हुए उसकी बांह को मरोड़ा और उसे दिवार के सहारे लगा दिया.

“आई, कमीने तेरी ये जुर्रत छोड़ मुझे ” उसने कहा

मैं- मेरी जुर्रत तूने देखि ही कहा है , ये चोट कैसे लगी तुझे , क्या सुनार पर तूने हमला किया था . तू भी थी न वहां पर

चाची- बांह छोड़ दे मेरी मैं कहती हु .

मैं- ये धौंस किसी और को दिखाना और सीधा मेरे सवाल का जवाब दे, तू थी न वहां पर तूने किया न ये ,

तभी वो हुआ जिसकी मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी , चाची ने पलटा खाया और एक झटके में खुद को मुझ से आजाद करवा लिया और अगले ही पल एक तामाचा खींच कर मेरे मुह पर दे मारा .

“दुबारा मेरे साथ बदतमीजी की तो खाल खींच लुंगी तेरी ” चाची ने कहा और दनदनाते हुए घर के अन्दर चली गयी . जबड़े को सहलाते हुए मैं सोच रहा था की ये औरत जितनी दिखती है उस से ज्यादा घाघ है , चाची और ताई दोनों की सख्शियत ही जुदा थी अपने अन्दर न जाने क्या क्या दबाये बैठी थी ये औरते, और तब मुझे समझ आया की दुनिया के राज मुझे बाद में जानने है पहले अपने घर की गुत्थी को सुलझाना होगा.

रात बहुत हुई थी, मैं सोना चाहता था पर अभी अन्दर जाता तो चाची फिर कलेश कर देती तो मैं गयी के यहाँ चला गया . वो कमरे में पलंग पर लेटी थी .

मैं- दरवाजा तो बंद कर लिया करो

ताई- मुझे लगा तू आयेगा

मैं ताई के पास जाकर लेट गया. उसके बदन से आती खुशबू मेरी साँसों में सामने लगी. जैसे ही उसने अपनी पीठ मेरी तरफ की मैंने उसके ऊपर अपनी बांह डाल दी और उसके गोरे,मुलायम पेट को सहलाने लगा. कितना कोमल था वो . मैंने अपनी ऊँगली ताई की नाभि में फिराई

ताई- क्या कर रहा है

मैं- कुछ नहीं .

मेरा दिल कर रहा था की अभी हाथ आगे बढ़ा कर ताई की चुचियो को पकड़ लू और कस कस के मसल दू उनको. मेरी जांघे ताई के कुल्हो से सटी हुई थी . मादक नितम्बो का स्पर्श , मेरे रोम रोम को पुलकित कर रहा था . कांपते होंठो से मैंने ताई की गर्दन के पिछले हिस्से पर एक चुम्बन अंकित किया. ताई के बदन में एक झुर्खुरी दौड़ गयी.

मैंने ताई के चेहरे को अपनी तरफ किया और ताई के गालो को चूमने लगा. मैंने देखा की ताई ने अपनी आँखों को बंद कर लिया था . पर मैं जानता था की शायद यही वो समय था जब मैं उसे अपनी बना सकता था . मैंने अपने होंठो पर जीभ फेरी और ताई के गुलाबी होंठो को अपने मुह में भर लिया.

ताई के होंठो का रस पीते हुए मैंने ताई को सीधी लिटा दिया और अपना एक पैर उसके ऊपर डाल दिया. जब तक मेरा दिल किया मैं उसके होंठो, गालो को चूमता रहा . फिर मैंने ताई के ब्लाउज पर अपना हाथ रखा और ताई की चुचियो को दबाने लगा.

एक दो तीन, चार मैंने गिनते हुए ब्लाउज के हुको को खोला और जालीदार ब्रा में कैद ताई की गदराई चुचिया मेरी आँखों के सामने थी . मैंने ब्रा के ऊपर से ही उनको चूमना शुरू किया , कभी मैं उनको चूमता कभी मैं उनको मसलता . मैंने फिर ब्रा को ऊपर किया और ताई के गहरे भूरे रंग के निप्पल को अपने होंठो से लगा लिया. मैंने ताई के बदन को कांपते महसूस किया. जब मैं उसकी छातियो को पी रहा था तो वो भी मस्ताने लगी . ताई मेरे सर के बालो में हाथ फिराने लगी.



स्तनपान करते हुए मैंने मेरा हाथ ताई की जांघो पर रखा और उनको सहलाने लगा. ताई का लहंगा थोडा ऊँचा हो गया था मैंने उसमे अपना हाथ डाल दिया और ताई की चिकनी जांघो को मसलने लगा. और फिर जब मेरा हाथ दोनों जांघो के बीच उस तपती जगह पर गया जिसकी गर्मी को मैंने अपने जिस्म में उतरते महसूस किया. मैंने मुट्ठी में भर कर ताई की चूत को मसला ही था की .
 
#२7



जिस चीज को पाने की हसरत थी मुझे उसे मुट्ठी में दबा कर मसला ही था की तभी बाहर से कोई दरवाजा जोर जोर से पीटने लगा था. मेरा माथा घूम गया. ये दूसरी बार हुआ था की जब मैंने ताई के करीब आने की कोशिश की तो कोई न कोई आ गया था .

“मैं देखती हूँ ” ताई ने अपने कपडे सही किये और बाहर जाने लगी

मैं- रुको मैं भी चलता हूँ , रात का समय है न जाने कौन होगा.

हम दोनों बाहर आये , पर दरवाजे पर कोई नहीं था पूरी गली सुनसान पड़ी थी .

“कौन पीट गया किवाड़ ” मैंने झल्लाते हुए कहा

ताई- कोई दिख भी तो नहीं रहा .

मैं- शायद कोई शराबी होगा

मेरे मन में विचार आया की कही ताई का कोई आशिक तो नहीं था , पर मैंने उसके आगे कुछ नहीं कहा . और अगले ही पल मेरी ये शंका भी दूर हो गयी . गली में तमाम लोग अपने अपने घरो से बाहर निकल रहे थे . और एक दुसरे की तरफ हैरानी से देख रहे थे . तभी दूसरी तरफ से दो तीन लोग आये और बोले- जब्बर ने सब को चौपाल पर बुलाया है अभी के अभी .

ताई- तू अन्दर जा मैं देख कर आती हूँ मामला क्या है

मैं- नहीं मैं जाऊंगा,

ताई- मैं भी चलूंगी तेरे साथ .

हम लोग चौपाल पर आये तो देखा की नीम के निचे जब्बर कुर्सी पर बैठा था .पूरा गाँव ही वहां पर जमा था .

“गाँव वालो, आज मेरे दोस्त- मेरे भाई लाला पर जानलेवा हमला हुआ है , और मैं जानता हु की ये जिसने भी किया है वो तुम लोगो में से ही है मैं तुम लोगो से कह रहा हूँ की जो भी है वो अपने आप आगे आ जाये , वर्ना उसे मैं ढूंढ कर निकालूँगा तू फिर ठीक नहीं होगा . लाला मेरे लिए जान से भी बढ़ कर है , हमलावर ने ये वार लाला पर नहीं बल्कि मेरे कलेजे पर किया है ” जब्बर ने कहा .

मैंने आस पास नजर उठाकर देखा, लोग उसके खौफ से कांप रहे थे ,डर रहे थे ,

“ये चुतियापा करने को ही तूने पुरे गाँव की नींद ख़राब की जब्बर ” मैंने आगे बढ़ कर उस से कहा.

और मेरा ये कहना ही आग लगा गया.

“कौन है तू, और तेरी इतनी हिम्मत की तू मुझसे आँखे मिला कर बाते करे, ये लोग मेरी जुती की तरफ भी नहीं देख पाते” उसने कहा .

मैं- तो बढ़िया जुती पहना कर न और सुन आज तो तेरे आदमियों ने मेरे दरवाजे पर हाथ लगा दिया आगे से ये गलती हुई तो मैं उखाड़ दूंगा उन हाथो को समझ ले मेरी बात को .

जब्बर की आँखे फ़ैल गयी .

“किसका लौंडा है ये , ” उसने चीख कर कहा .

मैं उसके सामने गया .

“मेरी शकल देख ले , पहचान ले मैं अर्जुन सिंह का बेटा हूँ ” मैंने कहा

मेरी बात सुन कर वो हंसने लगा.

“तेरे चाचा ने मेरे बारे में बताया नहीं क्या तुझे, कैसे उसने मेरे पैर पकडे थे , कैसे जमीन की भीख मांगने आया था वो ” उसने कहा

मैं- जमीन तो मैं तेरे हलक में हाथ डाल कर निकाल लूँगा . जिस दिन मेरा दिल करेगा .

जब्बर- चाहूँ तो अभी के अभी तेरी गांड तोड़ दू मैं पर न जाने क्यों दिल कह रहा है की तुझे तडपा तडपा कर मारने में मजा आएगा.

“मनीष तू घर चल अभी के अभी ” ताई ने मेरा हाथ पकड़ा

“हाँ लेजा इसे, और समझा के मैं कौन हूँ , पर समझाने का कोई फायदा तो है ही नहीं क्योकि इसे तो मरना ही है न ” उसने ताई से कहा .

मैं- तू मारेगा मुझे, शेरो का शिकार करने के लिए शेर होना चाहिए कुत्तो को ऐसे सपने देखने भी गुनाह होते है .

“मालिक के सामने सर उठाता है तेरी ये मजाल ” जब्बर का एक आदमी मुझे मारने को दौड़ा .

मैंने पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसके सर पर दे मारी. पल भर में ही सर फूट गया उसका. एक दो तीन चार जब तक वो पस्त नहीं हो गया मैं लोहे की कुर्सी उसे मारते रहा . गाँव में अफरा तफरी मच गयी .

जब्बर कुर्सी से उछल पड़ा मैं उसके पास गया और बोला- मर्द है तो मर्द की तरह रहना , मैं ना जाने कब से इस मौके की तलाश में था की दुश्मनी निभा सकू तुझसे, उस बहन के लोडे सुनार को तो कोई और पेल गया पर मेरा वादा है तुझसे तेरी साँसे मुझसे भीख मांगेगी जिन्दगी की . और सुन इस दुश्मनी में सिर्फ तू होगा या मैं, अगर मेरे पीछे से मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को तूने, तेरे किसी भी आदमी ने नजर उठा कर देखा भी ना, तो फिर ये याद रखना घर परिवार तेरा भी है , .

“बरसों बाद मेरे सामने कोई ऐसा आया है जिसके जोश को ठंडा करने में मुझे मजा आएगा , तेरे साथ खेल खेलूँगा मैं , आज तेरी जिन्दगी बक्श कर जा रहा हूँ मैं पर जल्दी ही तुझे अफ़सोस होगा की क्यों मैंने तेरी जिन्दगी बक्शी ” उसने कहा

वो चल कर ताई के पास आया और बोला- अपने पिल्ले को तूने बताया नहीं क्या मेरे बारे में ,

मैं- उसे बताने की जरुरत नहीं , पर तुझे मैं बताता हूँ वो चीज़ जिसे तूने और सुनार ने सोलह साल से छिपा कर रखा था उसका राज अब राज नहीं रहेगा.

मेरी बात सुनकर जब्बर के चेहरे का अहंकार अचानक से बुझ गया . उसकी हंसी गायब हो गयी . उसकी आँखों में मैंने पहली बार कुछ ऐसा देखा जिसे डर कहना उचित होगा.

“मेले तक का समय है तेरे पास, मेरा जो भी कुछ तूने कब्जाया है वापिस कर देना, मेले के बाद अगर मैं लौटा तो तू भी जानता है मैं , मैं नहीं रहूँगा और जब मैं तुझसे हिसाब मांगूंगा न तो तू चूका नहीं पायेगा जब्बर ” मैंने कहा .

“मुझे परवाह नहीं है तू इन गाँव के लोगो के साथ क्या करता है , क्योंकि ये नपुंसक लोग है , गुलामी की आदत पड़ गयी है इनको, इनको रगों में बहता खूम जम चूका है , पर मुझे परवाह है , आज तेरे आदमियो ने मेरे दरवाजे पर हाथ लगाया. इन हरामजादो की क्या औकात है जो ये हमें चौपाल पर आने को कहेंगे. क्या कह रहा था तू, मेरे चाचा से पैर पकद्वाये थे तूने, सुन मेरे लिए मेरे बाप से कम नहीं है वो . ये बात मैं नहीं भूलूंगा. और तू भी याद रखना ” मैंने कहा .

जब्बर ने कुछ नहीं कहा वो बस चल पड़ा अपनी गाडी में बैठा और न जाने कहाँ चला गया . धीरे धीरे सब चले गयी मैं और ताई रह गए.

मैं- चल तू भी घर

ताई- तुझे ये तमाशा नहीं करना चाहिए था .

मैं- एक न एक दिन तो ये सब होना ही था न , तू भी जानती है ये बता नहीं जानती क्या .

ताई- जानती हूँ पर सोचती थी की कब तक टलेगा ये .

मैं- पर क्यों टालना चाहती थी तू ये



ताई- क्योंकि................
 
#28



“क्योंकि ये दुनिया वैसी नहीं है जैसी तू सोचता है, ये नफरत ये दुश्मनी कहाँ से शुरू हुई , किसने शुरू की इसको कोई नहीं जानता है सिवाय सुनार, जब्बर और अर्जुन के.ऐसी क्या बात थी जिसके कारण ये लोग एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए . ” ताई ने कहा .

मैं- मेरे पिता क्या सच में वैसे ही थे जैसा मुझे बताया गया है या उनके भी कोई राज़ थे, मेरा मतलब वो भी तो गलत हो सकते थे.

ताई -सही और गलत कुछ नहीं होता, वो बस समय का खेल है , जो किसी एक के लिए सही है दुसरे के लिए गलत है .पर मैं इतना जानती हूँ की कुछ ऐसा जरुर हुआ था जिस से ये तीनो जुड़े थे क्योंकि उस खुनी दौर के बाद अर्जुन एक दम शांत हो गया था , न किसी से बोलता था , न उसे खाने पीने की सुध थी , घर परिवार उसके लिए बेमानी हो गए थे , और फिर अचानक से उसने फ़ौज में नौकरी कर ली. हम सब हैरान थे , पर ये भी सच था की उसका इस गाँव से दूर रहना ही ठीक था . और फिर वो ऐसा गया की लौट कर ही नहीं आया.

मैं- और रुद्रपुर की दुश्मनी का क्या , उसके बारे में तो तुम जानती हो न वो तो बता ही सकती हो मुझे.

ताई- बरसों से परम्परा चली आ रही थी की रूप चोदस को मेला लगता था रुद्रपुर में, देवता की अलख जगाई जाती थी , नाच गान होता था , उस दिन किसी को किसी से कोई शिकवा हो तो आपस में जोर आजमाइश करके अपने अहंकार को चूर कर लेते थे लोग. सब सही था , लोग अपनी अपनी जिन्दगी जी रहे थे पर फिर सोलह साल पहले ऐसा मेला आया जिसमे रंगों की जगह रक्त ने सब को भिगो दिया .

मैं- क्या हुआ था उस मेले में .

ताई- तेरे बाप ने ललकार लगाईं थी , आन की उसने प्रण उठाया की वो देवता को सर अर्पित करेगा. तू जानता है ये जो मर्द जात है न इनका अहंकार बहुत होता है , न जाने किस बात का गर्व होता है इनको, अर्जुन ने जो किया लोग उसे गलत मानते है , कुछ सही मानते है . उस मेले में अर्जुन ने ग्यारह घरो के दीपक बुझा दिए.

उसने दुश्मनी की ऐसी दिवार खड़ी कर दी जिसे गिराना मुमकिन नहीं हुआ . खून से लथपथ जब वो घर आया तो किसी ने उसका स्वागत नहीं किया, बल्कि तिरस्कार किया गया पर उसने एक शब्द भी नहीं कहा. तेरे दादा ने हाथ उठाया उस पर क्योंकि उसने गलत किया था पर उसने चु तक नहीं की. उस मनहूस मेले ने बर्बाद कर दिया सब कुछ .

दुश्मनी की लहर में लाशे गिरने लगी, उन लाशो में एक लाश तेरे दादा की भी थी , किसने मारा क्यों मारा कोई नहीं जानता .

ताई ने गहरी सांस ली और बैठ गयी . मैं बस उसे देखता रहा .

“वो मुझे प्यार करते थे ” मैंने कहा

ताई- हद्द से जायदा ,

मैं- मैं उनके बारे में जायदा से जय्स्दा जानना चाहता हूँ कोई तो ऐसा होगा जो उन्हें गहराई से जानता होगा , मतलब उनका कोई दोस्त .

ताई- रात बहुत हुई है , थोड़ी देर सोना चाहिए, कल काम बहुत है खेतो पर .

मैं- सो जाना , कम से कम उस हीरे के बारे में तो बता दो. मैं जानता हूँ तुम्हे मालूम है वो राज

ताई- तूने पुछा था न की तेरे पिता को गाँव वाले उतना सम्मान नहीं देते , गाँव वालो को लगता है की तेरे पिता चोर थे, उसने शिवाले में चोरी की थी .

मैं- असंभव वो भला ऐसा क्यों करेंगे.

ताई- क्यों करेंगे ये तो कोई नहीं जानता पर ये हीरा उसी श्रृंगार का हिस्सा है जिसे चोरी कर लिया गया था . अर्जुन ने शिवाले के कपाट बंद कर दिए थे , और चेतावनी दी थी की किसी ने भी कपाट खोले तो वो न जाने क्या कर देगा. और देखो सोलह साल बाद कपाट खोले गए है , कपाट खुलने का मतलब मेला फिर लगना

मैं- पर किसने खोले कपाट

ताई- सब सोचते है की तूने किया है ये काम , वो आदमी रुद्रपुर का इसीलिए आया था तेरे चाचा से बात करने इस मामले में

मैं- पर मैंने ये नहीं किया .

ताई- मैं विश्वास कर लू पर दुनिया नहीं मानेगी

मैं- क्यों नहीं मानेगी

ताई- क्योंकि अर्जुन ने कपाट बंद करते हुए कहा था की कभी ये कपाट खुले तो सिर्फ उसके रक्त से , और उसका रक्त तुम हो .

ये बात मेरे लिए बिजलिया गिराने वाली थी .

“मैं चाहती थी की तुम एक शांत जिन्दगी जियो पर तुम्हारे नसीब में जो लिखा है वो होकर रहेगा, मैंने बहुत कोशिश की पर छिपा नहीं पायी. पर मैं इतना जरुर कहूँगी की दुश्मनी की आग को बुझाने की कोशिश करना क्योंकि इस आग में दर्द के सिवाय कुछ नहीं है ” ताई ने कहा और आँखे बंद कर ली.

मैंने जेब से वो हीरा निकाला और उसे देखने लगा. क्या इसे चुराया गया था , और यदि चोरी हुई थी तो उसमे एक नहीं तीन लोगो का हाथ था क्योंकि लाला और जब्बर ने भी उस दिन कहा था की पुरे सोलह साल बाद इसे निकाला है , पर इतने सालो तक छुपाने का क्या मतलब. क्या इन तीनो में लूट के माल के बंटवारे को लेकर झगडा हुआ था जिसके कारण ये लोग आपस में दुश्मन हो गए.

सवाल इतने थे की कहीं मेरे दिमाग की नस न फट जाए. कडिया आपस में जुड़ने तो लगी थी पर उस तरह से नहीं जैसे मैंने सोचा था . मेरे कानो में उस कागज़ पर लिखे शब्द गूँज रहे थे ,”इसका बोझ उठा सको तो ही लेना इसे. ”

आखिर किस बोझ की बात थी वो . सुबह उठ कर मैं हाथ मुह धो ही रहा था की तभी रीना किसी बम कि तरफ आकर मुझ पर फट गयी .

“कुत्ते,कमीने तुझे क्या जरुरत थी जब्बर से पंगा लेने की , तू नहीं जानता वो मरवा देगा तुझे, हाथ पैर तुडवा देगा तेरे , तुझे कुछ होश भी है ” चिल्लाते हुए बोली वो.

मैं- इस खूबसूरत चेहरे पर गुस्सा बड़ा प्यारा लगता है .

रीना- मैं मार दूंगी तुझे

मैं- मैं तो न जाने कब का मर मिटा हूँ तुझ पर

उसने पास पड़ी ईंट उठा ली और सच में मेरी तरफ फेंकी.

“अरे क्या कर रही है लग जाएगी ” मैंने कहा

रीना- जानता है जब मुझे ये मालूम हुआ न तो मेरी जान ही निकल गयी तुझे क्या जरुरत थी ये सब करने की .

मैं- बताता हु, पहले तू शांत हो जा

रीना- क्या ख़ाक शांत हो जा.

मैंने उसका हाथ पकड़ा ही था की चाची आ गयी



“बहुत बढ़िया ” उसने हम दोनों को देख कर कहा.
 
#29



“सब कुछ छोड़ कर बस मटरगश्ती करनी है तुमको “

चाची ने ताना दिया.

मैं- तुम को क्या काम है मुझसे .

चाची- अब कहाँ ध्यान है तुम्हारा घर के कामो में .और तुम रीना तुम तो समझदार हो, क्यों इसके साथ बर्बादी के फॉर्म भर रही हो.

मैं- इसको कुछ मत कहो चाची

“ओ हो, अब तो साहब को मेरी हर बात चुभने लगी है , ऐसा क्या गलत कह दिया मैंने ” चाची बोली

मैं- तुम यहाँ आई ही क्यों हो

चाची- मैं इसलिए आई हूँ की कल रात जो तूने रायता फैलाया है न वो हमसे न समेटा जाएगा.

मैं- किसी ने तेरी मदद मांगी है क्या , ये मेरी जिन्दगी है मैंने तुझे बता ही दिया है की मुझे इसे कैसे जीना है .

चाची- तू चाहे जो कर , पर हमारे जीवन में बवाल मत खड़ा कर

मैं- मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं , मैं अभी थोड़ी देर में मेरा जो भी सामान है वो उठा लाऊंगा और तेरे आँगन में कभी भी पैर नहीं रखूँगा

रीना- ऐसा मत बोल मनीष

मैं- तू नहीं जानती रीना , पर एक न एक दिन तो ये सब होना ही था तो वो दिन आज ही क्यों नहीं .

रीना- मामी आप बड़ी है , इतनी निष्ठुर न बनो.

चाची- तू चुप रह ये हमारे घर का मामला है

मैं- नहीं रहेगी ये चुप, घर का मामला है न ये भी घर की सदस्य है तुम इसे चुप रहने को कह भी नहीं सकती .

चाची- तुझ को जब्बर से पंगा लेने की क्या जरुरत थी

मैं- उसको उसकी औकात दिखानी जरुरी थी .

चाची- तू तेरी औकात देख, क्या है तू , बिसात क्या है तेरी, ना जाने किसने तेरे कान भर दिए की तू अर्जुन सिंह का बेटा है , शमशेर का पोता है तो तुझे भी पंख लग गए. न जाने किस बात का गुरुर है तुमको , कभी सोचा है की जाने वाले तो चले जाते है पर जो पीछे रह जाते है उनका क्या हाल , उनके दिलो पर क्या गुजरती है . चौधरी शमशेर सिंह की तूती बोलती थी इलाके में पर एक रात कोई ऐसे ही मार कर चला गया. वो रुतबा, शान शोकत, पैसा. क्या काम आया कुछ भी तो नहीं

मेरी बाते कडवी तो लगेंगी तुझे पर सोच कर देख जेठ जी चले गए , सोलह साल बीते एक बार भी उनको तेरी याद आई क्या. तू दिन रात अर्जुन सिंह का बेटा हूँ कहते नहीं थकता, कभी अर्जुन सिंह ने पलट कर भी देखा क्या तुझे, क्या मालूम वो कहाँ पर है, सोच कर देख कैसे जी रहे होंगे वो . क्या मालूम उन्होंने दूसरी शादी कर ली हो. नया परिवार बना लिया हो.

चाची की बात का कोई जवाब नहीं था मेरे पास.

चाची- मुर्ख, मैं तुझे जिन्दगी को समझाना चाहती हूँ ,तेरी दुश्मन नहीं हूँ, तुझे अपने हाथो से पाला है मैंने, इन्ही हाथो से तुझे कंधा नहीं दे पाऊँगी, इसलिए तुझ को समझा रही हूँ इस राह पर मत चल , खुद का नहीं तो हम सब का सोच, बड़ी मुश्किल से संभाला है इस परिवार को , फिर बिखरा तो हम सब भी बिखर जायेंगे.

तू चाहे यहाँ रह या मेरे पास मुझे जरा भी दिक्कत नहीं है है तो एक घर ही , पर तुझे कुछ हुआ तो उस से मुझे दिक्कत है , तेरे चाचा जब्बर से बात कर लेंगे, बात आई गई हो जाएगी.

मैं- उसकी जरुरत नहीं है

चाची रीना के पास आई और बोली- तू ही समझा दे इसे, तेरी तो सुनता है न ,

फिर वो चली गयी . रह गए मैं और रीना .

रीना के बहुत जोर देने पर मैंने उसे हर एक बात बता दी, सिवाय इस बात के के मैं मीता से मिलता था .उसका दिल रखने को मैंने कह दिया की मैं आगे से कोई भी ऐसा वैसा काम नहीं करूँगा.

मेरा मन बहुत विचलित था चाची की कही बाते मेरे दिमाग में घूम रही थी . सबके जाने के बाद मैं अकेला रह गया था , मैंने जेब से वोही धागा निकाला और हथेलियों में घुमाने लगा उसे, अब भी वो गर्म था, पर किसलिए ये साला सवाल मुझे पागल कर रहा था. उसके अन्दर जैसे कुछ सुलग रहा था कुछ पिघल रहा था . तभी मेरे दिमाग में आया की मुझे मीता से मदद लेनी चाहिए.

मैंने तुरंत साइकिल उठाई और मैं रुद्रपुर के लिए निकल गया, एक बार फिर उसके घर पर ताला था . ये मेरे साथ दूसरी बार था जो मुझे ये ताला लटका हुआ मिला था , एक बार फिर मैं हवेली के पास से निकला एक बार फिर मुझे उसकी कशिश ने खींचा. आखिर ऐसा क्या था इस खामोश इमारत में . कभी न कभी तो जाना होगा ही मैंने खुद से कहा . तभी मुझे विचार आया की मुझे उसी ईमारत में जाना चाहिए क्या पता मीता वहां मिल जाए.

वहां से थोड़ी दूर मैंने साइकिल खड़ी की और ईमारत में चला गया. हमेशा के जैसे ही घोर शांति थी , उस छोटी सी बावड़ी में पानी लहरा रहा था . मैंने कुछ घूँट पिए , मेरे हाथ गीले थे, चलते हुए मैं अन्दर पहुंचा मैंने देखा उस बूढ़े बरगद से तमाम धागे उतार दिए गए थे , . कुछ जगह पर नीली- पीली नयी प्रचीरे बाँधी गयी थी. सजावट की तैयारिया थी पर फिलहाल कोई दिख नहीं रहा था .

चलते चलते मैं उस पुराने दरवाजे के सामने पहुंचा जिसे कुछ दिनों पहले मैंने ही खोला था . मैंने दरवाजे की चोखट पर माथा टेका और फिर अन्दर गया, वहां जाकर देखा की कच्चे फर्श पर दुनिया जहाँ की चांदी, मोती, और नजाने क्या क्या बिखरा हुआ था और उस हलके गीले ठन्डे अँधेरे में धोती धोती में आँखे मूंदे दद्दा ठाकुर बैठा हुआ था . उसके सामने एक छोटा सा दीपक जल रहा था , वो कुछ पढ़ रहा था या शायद उसे याद था की क्या पढना है , बोलना है .

मैं आया तो था मीता की तलाश में पर मुझे ये मिल गया था . मैं बिलकुल भी उस को देखना नहीं चाहता था मैंने अपने पैर वापिस किये ही थे की उसने हाथ के इशारे से मुझे रुकने को कहा और अपना काम करता रहा . कोई पन्द्र बीस मिनट बाद उसने आँखे खोली .....

“क्या है ऐसा जो तुझे बार बार यहाँ खींच लाता है ” उसने कहा

मैं- बस इधर से गुजर रहा था पानी पीने को रुका था तो सोचा आया हु तो माथा टेक चलू.

ददा- जानता है न तू कहाँ है, कम से कम उसके घर में तो हमें ईमानदार रहना चाहिए, उस से क्या छिपा है .

मैं- ये बात सब पर लागु होती है है न .

ददा- हम सब उसके ही बन्दे है .

मैं- तुम यहाँ किसलिए आते हो, अपने कर्मो का प्रायश्चित करने के लिए क्या

ददा- मैं भी अक्सर इधर से ही गुजरता हूँ न जाने क्यों

मैं- अब तुम इमानदार नहीं हो.

ददा- तुम्हारे बड़े चर्चे है आजकल ,

मैं- तुम क्या सोचते हो

ददा- सच कहूँ तो मेरी दिलचस्पी इस बात में है की अर्जुन के बेटे ने ये कपाट क्यों खोले.

मैं-अच्छा है न, मंदिरों में रौनक रहनी चाहिए , हम उस से वो हम से दूर रहे ये भी तो गलत है न . अच्छा लगा की इन्ही तैयारियों के बहाने ये जगह गुलज़ार होगी

ददा- . भरम है ये , ये जगह भरम के सिवा कुछ भी नहीं

मैं- तुम ज्यादा जानते हो ,

ददा- मैं ये भी जानता हूँ की रुद्रपुर के लड़के तुम्हारे खून के प्यासे है , अर्जुन के बेटे के रक्त से वो इस धरा को सींच देना चाहते है .

मैं- अब दुनिया में हर किसी की हसरते कहाँ पूरी होती है ददा. मुझे अफ़सोस है , वैसे तुम्हारी क्या इच्छा है

ददा- मेरी इच्छा , किसी और ज़माने में ये बात कोई पूछता तो मैं कहता इंतकाम है मेरी इच्छा

मैं- और इस ज़माने में , मैं जानता हूँ मेरा यहाँ होना तुम्हे गवारा नहीं है , तुम चाहते तो हमारी पहली मुलाकात में ही तुम मेरा नुकसान करवा सकते थे, चाहते तो मुझे मरवा सकते थे, यहाँ पर अगर मैं हूँ तो उसमे भी तुम्हारी ही मर्ज़ी है . ये मेला लग रहा है तुम्हारी मर्जी से , दुनिया चाहे जो भी कहे कुछ तो चाहत है तुम्हारी .. तो बताओ

ददा- बरसो पहले यही इसी जगह से किसी ने देवता का श्रृंगार लूट लिया, लोग सोचते है की वो मेरी करतूत थी. ........



दद्दा ठाकुर ने ये बात कह कर मुझे और उलझन में डाल दिया. .
 
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“कहने को तो ये दुनिया मेरे कदमो में है , पर पीठ पीछे लोगो की बाते मेरे कलेजे को छलनी करती है ,आत्मा पर उस बोझ का भार लेकर जीना बहुत मुश्किल है , ” ददा ठाकुर ने कहा .

मैं- तुम मेरे पिता को कैसे जानते थे , क्या तुम दोनों दोस्त थे .

ददा- दोस्त और हम, तुम्हे भला ऐसा क्यों लगता है

मैं- क्योंकि तुम्हारा स्वभाव मेरे प्रति नरम है ,

ददा- छोड़ो इन बातो को ,

दद्दा ठाकुर वहां से उठा और बाहर को आगया . मैंने उसके पीछे पीछे आया.

“मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ, देवता को उसका श्रृंगार वापिस मिलना ही चाहिए ” मैंने कहा .

दद्दा की गोल आँखे ऊपर से निचे को मुझे जैसे स्कैन कर रही थी .

मैं- मेरा यकींन करो , मेरी भी कुछ उलझाने है जो तुम्हारी उलझनो संग उलझी है.

ददा- मेरे जाने का समय हो गया है , पर मैं इतना जरुर कहूँगा की तुम जितना हो सके रुद्रपुर से दूर रहो. तुम्हे लगता है तुम अर्जुन के बेटे हो , इसलिए खास हो पर ये दुनिया गोल है .वो एक दौर था जिसमे अर्जुन था वो दौर बीत गया . वक्त की धरा मुड रही है, जितना यहाँ से दूर रहोगे सुखी रहोगे, रही बात देवता और मेरी, देवता जानता है मेरे सच को.

ददा ठाकुर के जाने के बाद मैं वहीँ पर बैठा रहा सोचता रहा की इस गोल दुनिया में मैं उस सच के बहुत करीब हूँ, जिसके महीन धागे से ये सब एक दुसरे से उलझे है , इन तमाम लोगो की जिन्दगी में एक ही नाम बड़ा महत्वपूर्ण था अर्जुन चौधरी. पर आखिर क्या कहानी थी अर्जुन सिंह की.

आते आते मुझे थोड़ी देर हो गयी थी बिना बात के, खेत पर ताई के सिवा और कोई नहीं था . जब मैं उसके पास पहुंचा तो वो हाथ मुह धो रही थी .

मैं- अभी तक हो यहाँ

ताई- हाँ, देर हो गयी अच्छा हुआ तू आ गया साथ ही चलते है घर पर .

मैं- चलेंगे थोडा रुक कर. बैठते है थोडा.

मैं ताई के पास ही बैठ गया .

“चाचा नहीं दिख रहा आजकल कहीं गया है क्या ” मैंने कहा .

ताई- क्या मालूम, मेरी बातचीत कम ही होती है उस से

मैं- दोनों पति-पत्नी ही चूतिये है .

ताई- ऐसा मत बोल

मैं- सुनार की कोई खबर आई क्या, जिन्दा है या निकल लिया

ताई- अभी कुछ खबर नहीं, सुना है बड़ा गहरा घाव है उसका.

मैं- तुझे क्या लगता है किसने हमला किया होगा उस पर

ताई- मैं क्या जानू, मैं तो तेरे साथ थी न.

“मैंने सोचा है की रुद्रपुर के शिवाले में कुछ योगदान दूँ उसे दुबारा सवांरने में मदद करूँ.” मैंने कहा

ताई- और वो तेरी मदद लेंगे, तूने सोचा भी कैसे.

मैं- बाप के कर्जे बेटे को ही चुकाने पड़ते है . जो हुआ मैं उसे वापिस तो नहीं कर सकता पर एक नयी शुरुआत तो कर सकते है न .

ताई- इन पचड़ो से दूर रह , सुनहरा कल तेरे सामने है , अपनी विरासत को संभाल .

मैं- मैंने चाची से वादा किया है की सब उसका ही रहेगा सिवाय इस बंजर जमीन के, मैंने मेरे लिए इसे ही चुना है .

ताई-ये सब बेकार की बाते है ,कुछ तो हसरत होगी तुम्हारी

मैं- सच कहूँ तो मेरी हसरत तुम हो .

ताई- मुझमे ऐसा क्या है

“मुझे बताने की जरुरत नहीं ” मैंने कहा

ताई- तो क्या रोकता है तुमको

मैं- वो बारीक़ डोर, जो टूटी तो सब बदल जाएगा.

ताई- फिर ये बेकरारी क्यों, ये हसरत क्यों

मैं- शायद मेरे नसीब का लेख है ये

ताई- तो फिर इसे नसीब पर ही छोड़ दो

मैं- मेरे नसीब में कुछ नहीं लिखा सिवाय बर्बादी के. मेरा सुनहरा कल कभी नहीं आयेगा. मेरे कल में बहते रक्त और दर्द के सिवा कुछ नहीं .

ताई- निष्ठा सच्ची हो तो लेख खुद लिख लेता है इन्सान

मैं- मेरे सितारे ये नहीं मानते.

ताई- तो तू भी मत मान उनकी

मैं- आखिर ऐसा क्या है उस शिवाले में , क्यों खींचता है वो मुझे अपनी और. मेरा नसीब क्यों नहीं मानता की ये कहानी मनीष की है ,

ताई- बेशक ये तेरी कहानी है , इसका हर पन्ना तुझे खुद ही लिखना है.

हल्का हल्का अँधेरा होने लगा था पर दिल की गहराई में एक लौ जल रही थी . उस रोशन होती रात में मैं दोराहे पर खड़ा था , दिल कह रहा था की ये हुस्न जो तेरे सामने है तेरे आगोश में पिघलने को बेताब है, इस हुस्न के रस को अभी पी जा. और दूसरी तरफ मेरा दिमाग था जो कह रहा था की पतन के इस रस्ते पर तू बढ़ तो जायेगा पर जब तू लौटने को देखेगा तो कोई राह नहीं मिलेगी तुझे.

मैं- कुछ नहीं घर चलते है .

मैं ताई को लेकर घर आ गया . गर्मी बहुत थी ऊपर से बिजली भी नहीं थी तो मैं बाहर नीम के निचे चबूतरे पर बैठ गया . की तभी रीना भी आ निकली मेरी तरफ .

मैं- कहाँ जा रही है .

रीना- बस तेरे पास ही आ रही थी .

मैं- आजा बैठ

रीना- आज जब मैं पानी भरने गयी तो वहां पर कुछ औरते कह रही थी की तूने हमला किया है सुनार पर .

मैं- पर तू तो सच जानती है न

रीना- पर मुझे बुरा लगा , गाँव में तेरे बारे में तरह तरह की बाते हो रही है .

मैं- होने दे अपने को क्या फर्क पड़ता है

रीना- अच्छी भली जिंदगी चल रही थी न जाने किसकी नजर लगी है , किस बुरी घडी में तू उलझ गया इस झमेले में .

मैं- सब सही हो जायेगा, तू फ़िक्र मत कर .

रीना- एक तेरी ही तो फ़िक्र है मुझे

मैं- तू साथ है मेरे भला मुझे क्या चिंता , वैसे भी मैंने तुझसे कह तो दिया है की मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करूँगा.

रीना- जानती हूँ पर फिर भी लोगो की बाते

मैं- लोगो का काम है कुछ न कुछ कहना , वो अपना काम करेंगे हम अपना काम करते रहेंगे.

हम बात कर ही रहे थे की तभी दो बाते एक साथ हुई, एक तो बिजली आ गयी और दूसरा ताई ने मुझे आवाज लगाई खाना खाने के लिए.

मैं- रीना तू भी चल

रीना- न बाबा न, थोड़ी देर पहले ही खाना खाया था मैंने

मैं- चल फिर मिलते है .

मैं घर आया . ताई ने खाना परोस रखा था .

“मैं जरा नहा कर आ रही हूँ तू खाना खा ले तब तक. ” ताई ने कहा

मैंने हाँ में सर हिलाया. पर मेरी नजर ताई की मटकती गांड से हट ही नहीं रही थी . मैंने दरवाजे की कुण्डी लगाई और बाथरूम की तरफ चल दिया. जिसे करने को मिअने अब तक खुद को रोका था वो आज शायद होकर ही रहना था.

मैंने देखा बाथरूम का दरवाजा बंद नहीं था , ताई की पीठ मेरी तरफ थी , ब्रा-पेंटी में ताई का गदराया बदन , उसने बस अभी अभी ही कपडे उतारे होंगे. मैंने आगे बढ़ कर ताई को अपनी बाँहों में भर लिया और उसके सीने को मसलते हुए ताई की गर्दन को चूमने लगा.

एक पल को ताई चोंकी पर मेरे अहसास को महसूस करते ही वो नार्मल हो गयी.

ताई- क्या कर रहा है

मैं- वाही जो मुझे पहले ही कर देना चाहिए था .

ताई- क्या कर देना चाहिए था तुझे पहले ही

मैं- तेरी ले लेनी चाहिए थी .

ताई- क्या लेनी थी

मैं- चूत, आज चाहे कुछ भी हो जाए बस तू और मैं . ये रात गवाह बनेगी हमारे प्यार की .

मैंने ताई की ब्रा को उतार कर फेंक दिया.

 
#31



“आह ” गोरी तनी हुई चुचियो को मसलते ही ताई के होंठो से आह फूट पड़ी. मैं दूसरा हाथ थोडा निचे ले गया और ताई के हलके फुले हुए पेट को सहलाने लगा. उफ्फ्फ कितना मुलायम था वो . गहरी नाभि , मैंने पास रखी साबुन उठाई और ताई के उभारो पर लगाने लगा. जल्दी ही झाग ने ताई के उपरी हिस्से को ढक लिया.

झाग की चिकनी पर मेरे हाथ फिसलने लगे थे . मैंने अपने कपडे जल्दी से उतार कर फेंके और अपने लिंग को ताई के मांसल नितम्बो पर सटा दिया. ताई भी पूरी खेली खाई थी . और हम दोनों जानते थे की ये जो भी हो रहा है होकर ही रहेगा. ताई अपना हाथ पीछे ले गयी और मेरे लिंग को अपनी मुट्ठी में जकड लिया.

कुछ देर बाद ताई पलटी और हमारे होंठ एक हो गए. ताई को चुमते हुए मैं उसकी पीठ को सहलाते हुए नितम्बो तक आ पहुंचा था , ताई ने अपनी जीभ मेरे मुह में डाल दी और मेरी जीभ को चूसने लगी. कसम में ऐसा जबरदस्त अहसास था की मैं क्या ही बताऊ, मध्यम आकार के तरबूजो जैसे ताई के मदमस्त नितम्ब जिन्हें मैं लगातार मसल रहा था .

चूमते चूमते ताई ने मेरे कपडे उतारने शुरू किये और पल भर में ही मैं उसकी बाहों में नंगा था. मेरा झूलता लंड ताई की चूत पर दस्तक दे रहा था .

साबुन के चिकने झाग से लथपथ हमारे गर्म बदन एक दुसरे से रगड़ खाते हुए आज उत्तेजना की हर हद को तोड़ देना चाहते थे . ताई ने नलके को चालु किया और हम भीगने लगे, पानी की ठंडी बूंदों ने जिस्म की आग के शोलो को और भड़का दिया.

“कर ले तेरी मनचाही ” ताई ने शरमाते हुए कहा.

ये उसका खुला निमंत्रण था की आज की रात मैं दबा कर उसे चोदु. ३४-३५ साल की एक खूबसूरत गदराई औरत मेरी बाँहों में पिघल रही थी . मैंने ताई की गीली कच्छी की एलास्टिक में अपनी उंगलिया फंसाई और उस को उतार कर बाथरूम में ही फेंक दिया.

गहरे काले बालो से भरी ताई की हलकी गुलाबी रंगत लिए चूत जिसे देख कर मैं हद से जायदा पागल हो गया था . मैंने ताई को अपनी गोद में उठाया और बाथरूम से कमरे में ले आया. .

मैंने ताई को बिस्तर पर पटका और उसे ऊपर चढ़ गया.

“कितनी खूबसूरत है तू ” मैंने उसके गाल चुमते हुए कहा तो वो शर्मा गयी.

जल्दी ही मैं उसकी छातियो को चूसते हुए उसकी चूत से खेल रहा था . मैंने अपनी ऊँगली उस गर्म तपती चूत के काम रस से भीगे छेद पर रखी और अन्दर सरका दिया. उफ्फ्फ्फ़, क्या गजब था मेरी ताई का हुस्न. मैंने उसके गुदा द्वार को छुआ तो उसके बदन में हलचल मच गयी. गदराई जांघो को चुमते हुए मैं चूत के करीब आ गया था , इतना करीब की उसकी गर्मी मेरी नाक से होते हुए जिस्म में उतरने लगी थी.

मैंने ताई के पैरो को अच्छे से फैलाया और चूत की फांको को फैलाते हुए अपने प्यासे होंठो को चूत पर रख दिया.

“”””””सीईईईई ” यकीं मानिये उस पल हम दोनों के मुह से एक साथ वो आह निकली थी . “पुच ” मैंने ताई की चूत को हलके से चूमा और बहते रस को जीभ से चाट लिया. ताई ने मस्ती के मारे अपने पैरो को इधर उधर पटका पर मेरी पकड़ मजबूत थी खुरदुरी जीभ से मैं उस नाजुक अंग को चाटता रहा .

आहे भरते हुए वो हुस्न की परी कभी मेरे सर को सहलाती कभी चूतड ऊपर उठा कर चूत को चुसवाती अब मेरे लिए भी बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था पर इस से पहले की मैं कुछ और कर पाता ताई ने मुझे पलट दिया अब मैं निचे और वो ऊपर आ गयी थी . ताई ने मेरे लंड को पकड़ा और चूत पर लगा कर उस पर बैठने लगी. मैंने चूत के छेद को फैलते हुए देखा .

धीरे धीरे मेरा पूरा लंड ताई की प्यासी चूत में गायब हो गया था . ताई ने मेरे सीने पर अपने हाथ रखे और उपर निचे होने लगी. जब वो अपने मादक नितम्बो को जोर जोर से पटकती तो मैं ब्यान नहीं कर सकता की कितना मजा मिल रहा था मुझे. कुछ देर बाद वो मेरे चेहरे पर झुक गयी और मेरे होंठो को चूमने लगी. अपने से आधी उम्र के लड़के को ताई वो सुख प्रदान कर रही थी जिसे कुछ भाग्यशाली ही उस उम्र में प्राप्त करते है .

मैं लगातार ताई की पीठ कंधो को सहला रहा था , कुछ देर और बीती ही थी की वो धडाम से मेरे ऊपर ढेर हो गयी. ताई की लम्बी गहरी साँसे मेरे गालो पर पड़ रही थी, कुछ पलो के लिए उसकी हालत ऐसी हो गयी की जैसे वो कितना थकी हुई थी .

“मेरे ऊपर आजा और जैसा मैंने किया वैसा ही कर ” ताई ने पीठ के बल लेटते हुए कहा.

मैंने एक बार फिर से लंड उसकी चूत में पेला और उसने टांगो को मेरी कमर पर लपेट लिया. जैसे जैसे मेरी नसों में दौड़ रहा था , मेरे धक्को में तेजी आ रही थी . कुछ देर तक ये धक्क्म्पेली चलती रही और फिर वो सुखद अहसास मैंने महसूस किया . मेरे लंड से कुछ गरम गरम निकल कर ताई की चूत में गिरने लगा. उस अहसास से मेरा तन इतना कांप रहा था की मैं क्या बताऊ,

और जब ये सैलाब थमा तो पसीने से लथपथ मैं और ताई एक दुसरे की बाँहों में पड़े थे. क्या मालूम हम थोड़ी देर के लिए सो ही गए हो. पर जब आँख खुली तो ताई मेरे बगल में लेटी मुझे ही देख रही थी .

“कैसा लगा ” उसने पूछा

मैं- बहुत अच्छा.

“अब ये रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा , सब बदल जायेगा ” ताई ने कहा

मैं- परवाह नहीं, तुम भी तो मुझसे प्यार करती हो न .

ताई- अपने बेटे के साथ सोना, दुनिया इसे प्यार नहीं कहेगी.

मैं- दुनिया से अपने को क्या लेना देना .

ताई- पर ये बाते छुपती भी नहीं, ये भी नहीं छुप सकेगा

मैं- क्या तुम्हे परवाह होगी .

ताई- नहीं

मैं- तो फिर मत सोच इस बारे में .



उस रात एक बार और हमने सेक्स किया. अगली सुबह न जाने क्यों मुझे बड़ी खुशगवार लग रही थी . सुबह ही मुझे रीना की मामी मिली और मुझे एक ऐसी जानकारी दी जिसकी मुझे सख्त जरुरत थी . मेरा दिल बेचैन था मीता से मिलने के लिए. मैं पैदल ही मीता से मिलने के लिए निकल गया , नहर को पार किया ही था की तभी एक गाडी मेरे सामने आकर रुकी और उस से जो उतरा .........
 
#32



मैंने नहर को पार किया ही था की तभी एक गाड़ी मेरे सामने आकर रुकी और उस से जो उतरा, उसकी वहां होने की कोई भी उम्मीद नहीं थी मुझे. खाकी वर्दी पहने वो पुलिसवाला मुझे देखे और मैं उसे देखू.

“मनीष चौधरी तेरा ही नाम है क्या छोरे ” उसने पूछा

मैं-ये बात तो तू भी जानता ही है फिर क्यों पूछता है

पुलिसवाला- मेरा नाम दिलेर सिंह है , इस इलाके का थानेदार हूँ मैं

मैं- मुझे क्यों बता रहा है , मेरे पास तेरे लिए एक मिनट का भी समय नहीं है , मेरे रस्ते से हट

दिलेर- रस्ते तो अब टकराते ही रहेंगे हमारे- तुम्हारे, सुना है आजकल बहुत उड़ रहे हो तुम, हमने ऐसी उडती चिड़िया के पंख बहुत काटे है .

मैं- सुन थानेदार, पहली बात तो ये है की तेरा मेरा कोई लेना देना है नहीं, दूसरी बात ये की मैं चिड़िया नहीं बाज़ हूँ, मेरी आजमाइश मत करना और सब से महत्वपूर्ण बात की तू अपनी मर्जी से तो आया नहीं है किसी न किसी ने टुकड़े फेंके होंगे तेरे आगे , तू अपना देख लेना कही टुकड़े महंगे न पड़ जाये.

दिलेर- बित्ती भर का छोकरा है तू और घमंड आसमान तक का पुलिस के दो डंडे तेरा सारा जोश ठंडा कर देंगे.

मैं- तू दुआ कर की काश वो दिन आये जिस दिन तुझे ये मौका मिले.

दिलेर- मैं देख रहा हूँ मामले को मुझे जरा भी लगा की सुनार पर हुए हमले में तेरा हाथ है तो तू दुआ करना अपने लिए.

मैं- माँ चुदाये सुनार

दिलेर- एक बार वो होश में आ जाये.

मैं- सुनार की जाने दे, मैं मेले के बाद सीधा जब्बर की गर्दन पकडूँगा मेरी जमीन जो उसने कब्जाई है छुड़ाने जाऊँगा, तेरा जोर हो तो रोक लेना

दिलेर- जब्बर मेरा बहनोई है बात फिर पर्सनल हो जाएगी

मैं- बात पर्सनल हो चुकीहै , शुरू उसने की थी ख़तम मैं करूँगा. पर तू मेरे पास आया है तो मैं तुझे खाली हाथ नहीं जाने दूंगा, मैं तुझसे वादा करता हूँ मेरी जमीन शांति से मुझे वापिस दिला दे, मैं भी जबान देता हूँ जब्बर से कोई लेना देना नहीं रखूँगा,

दिलेर-जानता भी है तू क्या कह रहा है

मैं- जब्बर जानता है मैंने उस से क्या कहा था , अगर वो नहीं जानता तो तुझे मेरे पास नहीं भेजता.

मैंने बिना उसके जवाब का इंतज़ार किये अपने कदम आगे बढ़ा दिए. आज मैं हर हाल में मीता से मिलना चाहता था, मैं चाहता था की एक बार फिर से वो मेरे सितारों को पढ़े, उनसे मेरे सवालो के जवाब पूछे. पर मेरी किस्मत भी न ,एक बार फिर उसके घर पर ताला लगा था . ऐसा लगा की जैसे ये ताला ही इस जहाँ में मेरा सबसे बड़ा दुश्मन था . अब मैं कहाः तलाश करूँ उसकी.

बहुत देर उसके दरवाजे पर ही इंतज़ार किया उसका पर वो ना आई, हार कर मैंने फिर शिवाले की राह पकड़ी. वहां पर भी वो न मिली . मेले की तैयारिया बदस्तूर जारी थी . एक आदमी प्राचीर बाँध रहा था मुझे देख कर वो मेरे पास आया.

मैंने उसे मीता का हुलिया बताया और पूछा की ऐसी कोई लड़की आई थी क्या उसने मुझे मना किया .

“आप तो यहाँ तक़रीबन ही आते जाते रहते होंगे बाबा ” मैंने कहा

वो- तक़रीबन तो नहीं पर कभी कभार इधर से आ निकलता हूँ , सोलह साल से ये जगह खामोश थी, वक्त से बिछड़ी हुई अभी मेले की वजह से थोड़ी रौनक हुई है .

मैं-बाबा, आपकी तो उम्र बीती है इस शिवाले को देखते हुए,मेरे मन में एक दो बाते है क्या आप बता सकते हो

बाबा- बेटा, मैं इस गाँव का नहीं हूँ, पर इस शिवाले से मेरा नाता है, जब जब मेला लगा है मेरे काबिले के लोगो ने ही इसे सजाया है , किसी ज़माने में हमारा बहुत मान था यहाँ पर , यहां से खूब इनाम-बक्शीश लेकर जाते थे हम लोग, पर फिर वक्त बदला. सोलह साल बाद फिर से हमें बुलावा भेजा गया . काबिले से तो लोगो ने आने से मना कर दिया , पर मैं जिदंगी के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ न जाने कब डोर कट जाये तो सोचा की एक आखिरी बार देवता के दर्शन कर लू तो आ गया.

मैं- बाबा इस शिवाले की क्या कहानी है बताओ मुझे.

बाबा- बस इतनी कहानी की जो भी यहाँ पर आया इसका होकर रह गया. इसकी लगन जो लगी फिर सब प्रीत छुटी .कोई खाली हाथ नहीं गया यहाँ से . ऐसी कोई दुआ नहीं जो यहाँ कबूल नहीं हुई. पर फिर सब रूठ गया . सब टूट गया.

मैं- क्या हुआ था बाबा ऐसा

बाबा- वो मेला , वो मेला , उस मेले में कुछ ऐसा हुआ था की जो अच्छा भी था और बुरा भी , मेले में बरसो से रीत चली आ रही थी की दोनों गाँव से एक एक लोग जोर करते थे और हारने वाले के सर को देवता को अर्पित किया जाता था, वो चौधरी अर्जुन थे जिन्होंने इस खुनी प्रथा को रोका था . उन्होंने समाज को समझाया था की देवता कभी खुश नहीं होंगे रक्त से. और उनकी बात का मान रखा भी दोनों ही गाँवो के लोगो ने, प्रथा बंद की गयी, मिठाई बांटी गयी. चारो तरफ हर्ष था उल्लास था, पर उसी रात चौधरी अर्जुन ने अपने ही वचन को तोड़ दिया. जिस चुनोती को उन्होंने दिन में नकार दिया था उसी रात उन्होंने एक दो नहीं बल्कि पुरे ग्यारह लोगो से जोर किया और उनके सर देवता को अर्पित किये.

मैंने वो नर संहार अपनी आँखों से देखा था . उस रात सावन शुरू हुआ था , पूरा रुद्रपुर रोया था , चौधरी अर्जुन रोये थे , ऐसा विलाप उनका की धरती फट जाए, मैं नहीं जानता उस रात बरसा सावन किसके लिए रोया था , चौधरी के लिए , उन ग्यारह लोगो के लिए या फिर देवता के लिए पर जो भी था वो ठीक नहीं था .

मैं- आप के कबीले वालो ने इस बार आने से मना क्यों कर दिया.

बाबा- जैसा मैंने बताया मेले की तयारी से लेकर देवता के श्रृंगार तक की जिम्मेवारी हमारी रही है, उस दिन क्या मालूम क्या हुआ, देवता का श्रृंगार चोरी हो गया , मेरे कबीले के कुछ लोगो को शक के बिनाह पर मार दिया गया .

मैं- पर मैंने सुना की काफी सामान मिल गया था वापिस, अभी भी तो देवता के कमरे में पड़ा है कितना सारा हीरा-जवाहरात

मेरी बात सुनकर उस बाबा के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी .

मैं- क्या हुआ बाबा क्या कुछ गलत कहा मैंने

बाबा- देवता को भला इन चीजों का क्या मोह

मैं- तो क्या ये चीजे श्रृंगार का हिस्सा नहीं थी .

बाबा- तुमने देवता को देखा ही नहीं है फिर

मैं- तुम दिखा दो फिर बाबा.

बाबा- अर्जुन के बेटे ने कपाट खोले है , देवता की मर्जी होगी तो मिलेंगे उस से .

मैं- बाबा आप अर्जुन सिंह को जानते थे न,

बाबा- उनको सब जानते थे

मैं- कैसे थे वो क्रूर, अहंकारी , घमंडी जमींदार

बाबा- उसके बारे में पूछना है तो मुझसे मत पूछ उनसे पूछ जिनका बेटा था वो. उन किसानो से पूछ जिनके बैल बीमार होने पर खुद के कंधो से हल जोता था उसने. उसके बारे में मुझसे मत पूछ इन हवाओ से पूछ ये तुझे यहाँ तक ले आई है तो उसके किस्से भी बता देंगे.

मैं- बाबा क्बाया नाम बताया था आपने अपने कबीले का

बाबा- यहाँ से उत्तर में पन्द्रह कोस दूर , कानबेलियो का डेरा है हमारा

मैं-अलख के बारे में कुछ जानते है क्या आप

बाबा ने घुर कर मुझे देखा और बोले- काम बहुत बाकी है मेरा , समय रहते निपटाना है मुझे

मैं- किसी ने मुझसे कहा है की वो मुझे अलख के पार मिलेगी.

बाबा- अलख देवता की आग है जो बरसो पहले बुझा दी गयी .

मैं- किसने बुझाई

बाबा- चौधरी अर्जुन ने



मैं वहां से उठा और अपने रस्ते पर चल दिया, कुछ दूर चला ही था की मैं पलटा और कहा- ......................................
 
“मैं उसी अर्जुन का बेटा हूँ बाबा ” मैंने कहा



उस बुजुर्ग ने कुछ नहीं कहा पर उसकी आँखों के चमक बहुत कुछ कह रही थी. रुद्रपुर से मैं सीधा अपनी बंजर जमीन पर आया, बावड़ी की सीढियों की मरम्मत हो चुकी थी , अन्दर से सफाई हो चुकी थी बस अब इसे पानी से भरना था . बरसात गिर पड़ती तो मैं उसके बाद इस जमीन पर ट्रक्टर चलाना चाहता था . दिमाग में लाखो ख्याल थे,पर मैं थका था मैंने पेड़ो के निचे चारपाई लगाई और कुछ देर के लिए सो गया.

मेरी नींद टूटी तो हल्का हल्का अँधेरा हुआ पड़ा था . टूटे बदन को सँभालते मैंने आँखे खोली की सामने देख कर आँखों को एक बार जैसे यकीन ही नहीं हुआ. मेरे सामने मिटटी के डोले पर मीता बैठी हुई थी.

“कहाँ थी तू, कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा तुझे और वहां मिटटी में क्यों बैठी है ” मैंने कहा

मीता- अब तूने याद ही इतनी शिद्दत से किया की मुझे आना पड़ा और ये मिटटी , जो सुख इसकी पनाह में है वो और कहाँ भला.

मैं- बात तो सही कही पर तू थी कहाँ कितने दिन हुए तुझे देखे हुए,

मीता- और भला कहाँ जाना , कभी इधर कभी उधर. चाचा की तबियत ख़राब थी उसे शहर में हॉस्पिटल में दाखिल करवाया था तो वहीँ रुकना पड़ा.

मैं- मुझे तो बता सकती थी न .

मीता- तुझे परेशानी होती.

मैं- परेशानी वो भी तुझसे , हद करती है तू भी .

मीता- और बता क्या चल रहा है

मैं- कुछ नहीं बस तेरी याद आ रही थी .

मीता- यादो का क्या है, यादे तो आणि जानी है

मैं- और तू

मीता- मैं भी यादो जैसी ही हूँ. मैंने तुझे मना किया था न रुद्रपुर में धक्के मत खाना

मैं- मेरी नियति मुझे वहां बार बार ले जाती है

वो- वहां तुझे कुछ नहीं मिलेगा.

मैं- तू तो मिली न

वो- मेरा मिलना न मिलना एक सा ही है

मैं- अभी तो मिली न मुझे तू

मीता ने झोले से एक डिब्बा निकाला और मुझे दिया.

मैं- क्या है इसमें

वो- शहर से लायी हूँ तेरे लिए.

मैने डिब्बा खोला उसमे जलेबिया थी .

“तुझे पसंद है न ” उसने कहा

मैं- तुझे कैसे मालूम

वो- उस दिन हलवाई की दूकान पर तूने जलेबी ही तो खिलाई थी .

मैं मुस्कुरा दिया और जलेबी खाने लगा.

“तेरे बिना सब सूना सूना सा लगता है ” मैंने कहा

वो- अभी तेरे साथ हूँ कौन सा बहारे आ गयी

मैं- काश तुझे बता सकता .

वो- बताने की जरुरत नहीं

मैं- तेरे गाँव में मेला लगने वाला है , मिलेगी न वहां पर

वो- तू आएगा वहां

मैं- मुझे तो आना ही है , इसी बहाने तेरे साथ वक्त गुजारने का मौका मिलेगा

वो- बड़ी हिम्मत है तुम्हारी, मेरे गाँव में मेरा हाथ पकड़ कर घूमना चाहता है

मैं- इतना तो हक़ है मेरा और फिर क्या तेरा क्या मेरा

मीता- इस दोस्ती की शर्ते भूल गया क्या तू

मैं- वो दोस्ती ही क्या जिसमे शर्ते हो

वो मुस्कुरा पड़ी. अँधेरा थोडा और घना होने लगा.

मैं- सावन शुरू हो जाए तो फिर कुछ करे इधर

मीता- दिन तो पुरे हो गए है , देखो कब झड़ी लगती है

मैं- दिल कहता है ये सावन अनोखा होगा. तू बता तेरे सितारे क्या कहते है

मीता- सितारों की क्या बात करनी, बात तो तेरी मेरी चल रही है .

मैं- तो ये बता हमारे सितारे क्या कहते है .

मीता- क्या ही कहना है कुछ दुःख तेरे, कुछ दर्द मेरे

मैं- किसी ने मुझसे कहा की दो बर्बाद मिलकर एक आबाद दुनिया बसा सकते है .

मीता- इतना आगे की क्या सोचना, आज की बात कर

मैं- मेरा आज मेरी आँखों के सामने बैठा है .

मीता- चल मैं चलती हूँ,

मैं- थोड़ी देर तो रुक , बड़े दिनों बाद तो मिली है

मीता- रात काली हो रही है

मैं- होने दे. या तो तू वादा कर की रोज मिलेगी या आज यही रुक जा

मीता-वादा तोड़ कर ही तो आई हूँ तेरे पास

मैं- रुक जा न , क्या मुझ पर भरोसा नहीं

मीता- भरोसा है तभी तो आई. खैर अब मैं जो बात पुछू तू सच बताना मुझे

मैं- तुझसे झूठ बोला क्या कभी

मीता- दादा ठाकुर से क्या पंगा हुआ तेरा

मैं- सच कहूँ तो कुछ नहीं , मतलब पंगा गाँव के लडको से हुआ था , दद्दा से एक दो बार मुलाकात हुई मेरी.

मैंने उसे शिवाले वाली घटना बताई.

मीता- ददा ठाकुर बड़ा मीठा है , तू इसके झांसे में बिलकुल मत आना, कब तेरे साथ खेल कर जायेगा तुझे मालूम भी नहीं होगा.

मैं- पर कुछ तो ऐसा है जो वो अपने कलेजे में दबाये बैठा है

मीता- सब के मन में कुछ न कुछ राज़ तो होते ही है.

मैं-तू मेरी मदद करेगी क्या मेरे सवालो के जवाब तलाश करने में

मीता- मुझे कहाँ उलझा रहा है तू.

मैं- एक तू ही तो है जिससे अपने मन की बात कर सकता हूँ मैं

मीता- ये मन बावला होता है मनीष , मन की मत सुनियो

मैं- तो किसकी सुनु

मीता- छोड़ अब ये सब, यही रुकना है तो दो चार ईंटे उठा ले, और कुछ लकडिया मैं चूल्हा सुलगाती हूँ .

मैं- कमरे में कुछ रखा होगा खाने पिने का देखते है

मैंने कमरे का दरवाजा खोला वहां पर मजदूरो के खाना बना ने का सामान था , मैंने ईंटे उठाई तब तक मीता ने कुछ लकडिया तोड़ ली.

वो- वैसे तुझे खाने में क्या पसंद है

मैं- सच कहूँ तो मीट और उसकी तरी में भीगी हुई रोटिया , खाने पीने का बहुत शौक रहा पर हालात ऐसे थे की मन को समझाना पड़ा

मीता- कोई न अबकी बार तू घर आएगा तो तेरी ये इच्छा मैं पूरी करुँगी. अभी तो इन्ही आलू से काम चला ले.

मैं- चूल्हे की आंच में बड़ी खूबसूरत दिखती है , जी करता है उम्र भर तुझे यूँ देखता रहू. हौले से जुल्फों को संवारना गजब है तेरा.

मीता- ये तारीफों के डोरे तू मुझ पर नहीं डाल पायेगा

मैं- उसकी जरुरत नहीं मुझे

मीता- थाली आगे कर रोटी परोस दू तुझे

मैं- तू बना ले फिर साथ ही खायेंगे, ये मौके फिर मिले न मिले.

मीता- जब तेरा दिल करे , तू मेरे घर आजा खाने के लिए

मैं- मेरा दुश्मन वो ताला हुआ है जो दरवाजे पर लगा है

मीता- ठीक है बाबा , आगे से कहीं भी जाउंगी तो ताला नहीं लगा कर जाउंगी पर मेरा कुछ भी सामान चोरी हुआ तो तुझ से पैसे लुंगी उसके

मैं- मेरा तो सब कुछ तेरा ही है.

बाते करते हुए हम दोनों ने खाना खाया और फिर एक दुसरे के किनारे चारपाई लगा ली . अपनी अपनी चारपाई पर लेटे हुए सितारों को देखते हुए हम हसीं रात का लुत्फ़ ले रहे थे की अचानक आई उस चीख ने हम दोनों के रोंगटे खड़े कर दिए..............................
 
#34



हम दोनों के होश उड़ गए उस चीख को सुनकर, अब किसने अपनी माँ चुदवा ली थी, मैंने मन ही मन कहा. बड़ी मुश्किल से ये घडी आई थी जब मैं मीता के इतने करीब था, किस ने मेरी हसीं रात ख़राब की थी .

मीता- चल देखते है , क्या मालूम कोई मुसीबत में है

मैं - तू इधर ही रुक मैं देखता हूँ

मीता- मैं भी चलूंगी साथ

हम दोनों दौड़ कर खेतो की परली तरफ गए. मैंने टोर्च जला ली थी. और टोर्च की रौशनी में मैंने देखा की एक आदमी खून से लथपथ धरती पर पड़ा है और पास में चाची खड़ी थी . मीता ने उस आदमी को टटोल कर देखा और बोली- निकल लिया ये तो

मैं- चाची, तुझे क्या जरुरत थी इसे मारने की

चाची- मैंने इसे नहीं मारा, भला मैं क्यों करुँगी ऐसा काम

मैं- ये धरती पर पड़ा है और इसके पास तू है , इतने बेवकूफ तो हम भी नहीं है .

चाची ने एक नजर मीता पर डाली और बोली-चाहे मेरा यकीन करो या न करो मैंने इसे नहीं मारा. ये बस संयोग की बात है इसका मरना और मेरा यहाँ होना

मिता - अजीब संयोग है

चाची ने खा जाने वाली नजरो से मीता को देखा और बोली- तुझे क्या लेना देना है , मनीष कौन है ये लड़की

मैं- मेरी दोस्त है और क्या गलत पूछा है इसने तुम इतनी रात को इस संयोग में क्या कर रही थी .

चाची- तेरे चाचा को तलाश करने आई थी , पिछले कई दिनों से वो घर पर नहीं आये है

मैं- ये बात मुझे क्यों नहीं बताई

चाची- तू घर पर रहता ही कब है ,

मीता- चलो मान लेते है पर अभी इस लाश का क्या करना है , सुबह ये तुम्हारे खेतो पर ही पड़ा मिलेगा तो तुम्हारे लिए मुसीबत होगी वैसे भी दिलेर सिंह तो ताक में ही है .

चाची- कौन दिलेर सिंह

मैं- चाची तू थोड़ी देर शांत रह और मुझे कुछ सोचने दे. मैं समझ रहा हटा की हो न हो ये जब्बर का आदमी ही होगा.

पर क्या ये मेरी जासूसी कर रहा था ,हालाँकि मुझे चाची की बात पर जरा भी विश्वास नहीं था क्योंकि उस रात जिस तरह से उसने मुझे दिखाया था मुझे लगा था की ये औरत आर पार है . पर अभी मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था . मीता की बात में वजन था , दिलेर सिंह को ऐसे ही मौके की तलाश थी मेरी रेल बनाने के लिए.

मैं- चाची तू घर जा , हम थोड़ी देर में आयेंगे इसका कुछ करके

पर उस औरत ने अकेले जाने से मना कर दिया. थोड़ी देर विचार करने के बाद मैंने और मीता ने मिलकर गड्ढा खोदा और उसमे लाश पाट दी.

मीता- अब क्या

मैं- फिलहाल ये जगह सुरक्षित नहीं है , क्या मालूम ये आदमी कब से हमारे पीछे हो . मेरी वजह से तुझे कोई दिक्कत हो ये मुझे मंजूर नहीं

मीता- तू फ़िक्र न कर, इतनी कमजोर नहीं मैं

मैं- हम अभी घर चलेंगे.

मीता- ठीक है तुम जाओ मैं भी जाती हूँ

मैं- पागल हुई है क्या , तुझे अकेले जाने दूंगा क्या मैं तू भी मेरे घर चलेगी,

मीता- पर मैं कैसे, मेरा मतलब

मैं- कुछ मतलब नहीं, वो भी तेरा ही घर है

मैंने चाची की तरफ देखा, उसने कुछ नहीं कहा. हम तीनो घर के लिए चल पड़े. घर आने के बाद हमने हाथ मुह धोये और बैठ गए, मीता मेरे घर को देखने लगी, चाची चाय बना लाई. पर एक बात जो मुझे बेचैन कर रही थी वो ये थी की थोड़ी देर पहले एक आदमी मरा था , चाची का व्यवहार ऐसा था की जैसे उसे कुछ फर्क पड़ा ही नहीं था . ऐसा कैसे हो सकता था .

मैं-चाची, क्या कोई ई बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है .

चची- मुझे कुछ नहीं छुपाना

मैं- तो बताओ वो आदमी वहां पर क्या कर रहा था

चाची - मैं क्या जानू, हो सकता है वो कोई चोर हो

मैं- वहां कौन सा खजाना गडा है

मीता- क्या आप उस आदमी को पहले से जानती थी , हो सकता है की आप उस आदमी से मिलने ही गयी हो वहां पर

चाची- ये लड़की अपनी हद में रह. तू सीधा सीधा मुझ पर लांछन लगा रही है

मैं- मीता का वो मतलब नहीं था

चाची- इसका जो भी मतलब है इसे कह दे अपनी हद में रहे, और वैसे ये है कौन .

मैं- फिलहाल तो यूँ समझ लो की ये घर जितना मेरा है उतना ही इसका .

चाची- तो मैं तुझे कैसे विश्वास दिलाऊ की मैं बस तेरे चाचा को तलाशने गयी थी वहां पर

मैं- वहीँ पर क्यों

चाची- क्योंकि ना जाने तुम लोगो को उस जमीन से क्या लगाव है जब कहीं नहीं मिलते तो वहीं पर मिलते है .

न जाने क्यों चाची की बाते मुझे जम नहीं रही थी पर फिलहाल मैंने उसे कुछ और नहीं कहा और मीता को अपने चौबारे में ले आया.

“बस यही है मेरी दुनिया. ” मैंने बिखरे कपड़ो को एक तरफ रखते हुए कहा

उसने अलमारी में पड़ी कैसेट के ढेर को देखा और बोली- तो ये शौक भी है तुमको

मैं- जब से तुमसे मिला हूँ , इन पर ध्यान गया ही नहीं मेरा.

“और ये किताबे,” उसने कहा

मैं- बस कभी कभी पढता हूँ

वो खिड़की के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी

मीता- कभी सोचा नहीं था ऐसे अचानक से तेरे घर यूँ आना होगा.

मैं- तू जब चाहे यहाँ आ सकती है

मीता- क्या करुँगी मैं यहाँ आकर

मैं- क्या पता तेरे नसीब में हमेशा यही की होकर रहना हुआ तो .

मीता- मेरा नसीब इतना बुरा भी नहीं है .

मैं- रात बहुत हुई तू आराम कर सो जा यहाँ मैं बाहर हूँ, किसी चीज़ की जरुरत हो तो आवाज दे न

मीता- तू यही रह मुझे कोई दिक्कत नहीं है .

कितनी सादगी थी इस लड़की में, इसे फर्क ही नहीं पड़ता था , इसका और मेरा एक जैसा ही था , उसे देखते हुए न जाने कब नींद ने मुझे आगोश में ले लिया.

सुबह मेरी आँख खुली तो मीता नहीं थी . मैं निचे आया तो चाची ने कहा की वो सुबह सुबह ही चली गयी . उसका यूँ जाना अच्छा तो नहीं लगा पर वो ऐसी ही थी . मैं सीधा ताई के पास गया .

मैं- मुझे कुछ पूछना था तुमसे

ताई- हाँ

मैं- चाची के बारे में तुम जो भी जानती हो सब का सब बताना मुझे.

ताई-अब क्या बात हो गयी

मैं- बस यूँ ही

ताई- यूँ ही कुछ नहीं होता

मैं- मुझे वो ठीक नहीं लगती, मुझे लगता है की वो किसी से सेट है , किसी से चक्कर चल रहा है उसका.



इस से पहले की मेरी बात होती ताई का थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा और मैं हैरत से उसे देखता रह गया.
 
#35



“तेरी हिम्मत कैसे हुई उसके बारे में ऐसी बात बोलने की, वो ही है जिसने इन बिखरी डोरियो को थामा हुआ है , इस घर को उसने ही घर बनाया है वो वहां पर क्या कर रही थी मैं नहीं जानती पर उसके बारे में उल्टा सीधा नहीं सुनने वाली मैं ” ताई ने गुस्से से कहा.

मैं- पर उसका वहां होना मेरे लिए मुसीबत कड़ी कर सकता था

ताई- मैंने तो तुझे भी कहा है की अपनी आने वाली जिन्दगी पर ध्यान दे, पर तुझे तो पड़ी लकड़ी उठानी है ,तेरी ख़ुशी के लिए मैंने वो भी किया जो होना ही नहीं चाहिए था पर तुझे हमारी, हम सब की परवाह कहाँ है . क्यों उलझा है तू उन बातो में जिसका कोई अंत नहीं .

मैं- पर मैं क्या करू ,

ताई- तू समझता क्यों नहीं अर्जुन बीता हुआ कल है, और जो बीत गया वो वापिस कभी नहीं आता, तुझे संवारने के लिए हमने न जाने क्या क्या किया है , पर तू समझता नहीं, मैं शुरू से खिलाफ हूँ तेरे रुद्रपुर जाने के पर तू मानता नहीं , जो आग बुझ चुकी है उसकी दबी राख को क्यों सुलगा रहा है तू

मैं- मेरा नसीब जाने उसने क्या लिखा है मेरे लिए

ताई- नसीब को बनाना पड़ता है मेहनत से.

इस से पहले की मैं और कुछ कह पाता मैंने देखा रीना हमारी तरफ ही चली आ रही थी तो मैंने बात ख़तम कर दी.

ताई- कैसे आई रीना.

रीना- आप कब से ऐसे पूछने लगी मुझसे .

ताई- मेरा वो मतलब नहीं था बेटी. तेरा ही तो घर है , तुम बाते करो मैं चाय लाती हूँ तुम्हारे लिए.

रीना- कल का याद है न तुझे

मैं- क्या है कल

रीना- अरे तू भीना आजकल बिलकुल बुद्धू हो गया है खुद ही वादा करता है खुद ही भूल जाता है

मैं- सीधे सीधे बता भी दे न यार

रीना- तूने ही तो कहा था न की मुझे मेले में ले चलेगा अभी जान बुझ कर टाल रहा है, तेरी होशियारी खूब समझती हूँ मैं

रीना की बात सुनकर अचानक ही मेरी धड़कने तेज हो गयी .

मैं- ये कैसे भूल सकता हूँ मैं , कल खूब मजा आएगा.

रीना- तुझे बता नहीं सकती कितनी उत्सुक हूँ मैं .

मैं- तेरी खुशी में ही मेरी ख़ुशी है .

रीना- पता नहीं क्यों आजकल रात दिन बस तेरा ही ख्याल रहता है मेरे दिल में

मैं- ऐसा क्यों भला

रीना- यही उलझन तो सुलझ नहीं रही .

मैं- मुझे भी तुझे देखे बिना कहाँ चैन आता है

तभी ताई चाय ले आई. हमने अपना अपना कप लिया . कुछ देर बाद रीना चली गयी . ताई भी जाने लगी तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया.

ताई- हाथ छोड़ मेरा

मैं- नाराज मत हो

ताई- तो क्या करू,

मैं ताई को अपनी बाँहों में भरते हुए - प्यार कर मुझसे .

ताई- ये प्यार भी तेरा बहाना है, मेरी सुनता ही कहाँ है तू

मैं- तेरी ही तो सुनता हूँ.

मैंने ताई के गालो पर पप्पी ली. ताई मेरी बाँहों में कसमसाने लगी . ताई के मादक नितम्बो को सहलाने लगा मैं.

ताई- छोड़ न , अभी वक्त नहीं है ये सब करने का

मैं- यही तो वक्त है ये करने का

ताई- मैंने कहा न अभी नहीं

मैं- बस एक बार

मैंने ताई के लहंगे में हाथ डाल दिया और उसकी चूत को मसलने लगा. कितना गजब अहसास था एक मदमस्त औरत की चूत को मसलने का.

ताई- छोड़ मुझे मैंने कहा न अभी नहीं रात को करुँगी तेरी इच्छा पूरी

हार कर मैंने ताई को छोड़ दिया. ताई ने एक नजर मेरे तने हुए हथियार पर डाली और फिर कमरे से बाहर चली गयी.

मेरे पास भी कुछ खास नहीं था करने को बाहर आकर देखा की चाचा की गाड़ी खड़ी थी गली में .मतलब वो लौट आया था .मैं उसके पास गया .

चाचा- तेरी चाची ने सब बताया मुझे , मैं कुछ न कुछ करूँगा तुम सब की सुरक्षा के लिए , साथ ही जब्बर से भी बात करूँगा तुम्हारा जो भी पंगा है ख़तम करवा दूंगा मैं

मैं- उसकी जरुरत नहीं है चाचा

चाचा- जरुरत है , मैं नहीं चाहता की तुम किसी भी चीज़ में उलझो जिस से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं हो.

मैं- आप कहाँ गए थे इतने दिन से

चाचा- कुछ काम से गया था पर अभी लौट आया हूँ.

चाची- मेरी तो सुनता ही नहीं है ये , दुश्मन समझता है मुझे तो

चाचा- तुम भी थोडा काबू में रहा करो, अब ये बच्चा नहीं रहा .

मैं- मुझे जब्बर से जरा भी डर नहीं है , मेरा वो कुछ नहीं बिगाड़ सकता

चाचा- दुश्मन को कमजोर मानना हार की तरफ पहला कदम होती है

मैं- समझता हूँ.

चूँकि उस दिन चाचा घर पर ही था तो मैं भी घर पर ही रहा पर मेरा टाइम पास नहीं हो रहा था . चोबारे में लेटे लेटे मैं कभी उस सुनहरे बक्से को देखता तो कभी उस हीरे को जिसमे अब लाल और काला धागा आपस में एक हो गए थे . मैंने एक बार फिर उसे अपने गले में पहनने को कोशिश करी पर हाल पहले जैसा ही था , वो धागा मेरा दम घोंटने पर उतारू हो गया. ये मुझे पहचान नहीं रहा था .

इस बात का मतलब ये था की ये मेरे पिता का भी नहीं था , और उस कागज पर भी लिखा था की इसका बोझ उठाना आसान नहीं है. किस तरह का बोझ था ये , उस हीरे की तपिश , आखिर क्या राज था उसका . और ये मेरे पिता का नहीं था तो किसका था ये.

लाला, जब्बर, दद्दा ठाकुर और मेरे पिता ये सब आपस में किसी न किसी तरह से जुड़े हुए थे . पर वो कड़ी थी क्या. चाचा का जब्बर से दबना एक अलग पहेली थी . सोचते सोचते मेरा गला सूखने लगा था तो मैं निचे आया पानी पिने के लिए , चाचा-चाची अपने कमरे में बात कर रहे थे एक बार मैंने फिर से कान लगा दिए.

“, मुझसे नहीं होता ये नाटक, कब तक मैं उसके आगे बुरी बनी रहूंगी. ”चाची कह रही थी

चाचा- तुम्हारा यही कठोर व्यवहार उसे मजबूत बना रहा है.

चाची- पर मेरे और उसके रिश्ते को कमजोर कर रहा है .और मैं बता दे रही हूँ जब्बर से कहो की अपने परो को काबू में रखे वो , मनीष को अगर जरा भी आंच आई न तो मैं भूल जाउंगी की मैं कौन हूँ मेरे हाथो ने हथियार छोड़े जरुर है चलाना नहीं भूले है

चाचा- धीरे बोल कहीं मनीष न सुन ले.

चाची- अब हम चाह कर भी उसे रोक नहीं पायेंगे , उसकी आँखों में मैंने आग देखि है .

चाचा- काश वो समझ पाता

चाची- समझना तो तुम्हे भी चाहिए, कितने दिन बीत गए है,हमें एक हुए,

चाचा- तुम तो जानती ही हो न .....



न जाने क्यों चाचा ने बात अधूरी छोड़ दी..
 
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