Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 97 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

सूरजबली सिंह

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बाबू सूरजबली सिंह, सुगना के ससुर,... एकदम लहीम सहिम, जबरदस्त मर्द उमर तो पचास नहीं तो पचास के आस पास, पहुँच गयी थी लेकिन ताकत में जवान मात,.. बड़की नाउन और ग्वालिन चाची दोनों बोल रही थीं, ...जब पांच हाथ की लाठी लेकर निकलते तो धरती कांपती

सुगना की सास सुगना के गौने उतरने के कई साल पहले ही ऊपर चली गयी थी,..

लेकिन बाबू साहेब का नागा नहीं होता था, ... खेत बाड़ी, पुरानी जमींदारी,...

अरे गुलबिया की चचिया सास ,.. उनके घर की नाउन, कभी तेल लगाने तो कभी गोड़ मींजने, इमरती नाम था,... और सब को मालूम था था की तेल कहाँ कहाँ लगता था,...

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और वो मुंह खोल के बताती भी थी, एक दिन में मेरी सास ने मजाक में मेरे सामने पूछ भी लिया हँसते हुए ."ओह बड़का औजार में तेल आज कल लगता है की नहीं, केतना बड़ा है,..."

तो जिस तरह बित्ता फैला के इमरतिया बोली की मेरा और मेरी सास दोनों का मुंह खुला रहा गया. और साथ में हंस के साफ़ भी कर दिया." अरे मोटा कड़ियल काला नाग है,... सब बिल के बस का नहीं है।"

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यह किस्सा सुगना का है, लेकिन थोड़ा बहुत उनके ससुर का भी है, सूरजबली सिंह का भी। तो कुछ उनके बारे में,... लेकिन ये सब बातें सुनी सुनाई हैं

लेकिन कई मुंह से तो सच ही जान पड़ती हैं और ज्यादातर उनसे बड़ी,.... उम्र में भी रिश्ते में भी उनकी भौजाइयों ने,

मेरी पश्चिम पट्टी की अजिया ( दादी ) सास ने, उमर में ७० पार कर रही होंगी, लेकिन गाँव के हर रतजगे में, गवनही में मौजूद, उन्होंने ने बहुत कुछ बताया सूरज बली सिंह के बारे में, उनकी माई के बारे में और भी सब औरतों के बीच वाली बातें, ....बताउंगी, सब बताउंगी

मेरी मुंहदिखाई में जो इनकी सास दी थीं, वो पांच तोले की नथ उतार के दे दी थी,

' बहुत पतोह उतारे, आपन भी, पोतों क भी लेकिन अइसन चाँद आज तक यह गाँव में न उतरा, अऊर अइसन सुलच्छिनी, गांव क भाग जग गया' ,

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गौने के तीसरे दिन हमार सास गाने का प्रोग्राम रखी थी, और आजी ( मैं क्या सब उन्हें आजी ही कहते थे, और मेरा सर दुलार से अपने गोद में रखती थीं वो ) ने मुझे चढ़ा के अपनी सब पतोहों को, ( मतलब जो मेरी सास लगती थीं )

सब से पहले मैंने अपनी सास को फिर गाँव की सब सास को बारी बारी से, ....एकदम अच्छी वाली गारी दिलवाई, क्या क्या न चढ़वाया मैंने अपनी सास लोगों के ऊपर , और मेरी अजिया सास, बल्कि आजी एक एक को इशारा करके " अरे वो लाल साड़ी वाली रमुआ क माई बची हो अभी '

मेरे चाचा मामा से शुरू होक्के, गदहा घोडा तक,... और आजी इतना खुश की सब कड़ा छडा अपने गोड़ का, और तब से जैसे दादी पोती की दोस्ती होती है वैसे वाली दोस्ती हो गयी।

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तो उन आजी ने गाँव की कोई लड़की, औरत नहीं होगी जिसका पेटीकोट मेरे सामने न उघारा हो, किसका नाडा किस हरवाह में सबसे पहले खोला, कौन बहुरिया जिसका मरद कलकत्ता गया था, भैसं दुहने वाले से दुहाती थी, कितनी अपनी भाइयों से फंसी थीं, सगी नहीं तो चचेरे, ममेरे फुफेरे, और सिर्फ मेरी पीढ़ी की नहीं, मेरी सास की ननदें, जेठानियाँ, देवरानियां, सब का किस्सा और सबसे ज्यादा सूरजबली सिंह का, उनकी शादी के पहले से लेकर, और उनकी माई का भी, गाँव भी कुछ भी तोपा ढांका नहीं था उनसे, मैं अक्सर दुपहरिया में उनके पास, कभी उनका बाल संवारती, सर में तेल लगाती और वो किस्से,

तो बहुत कुछ जो मैं सुनाऊँगी वो उनसे सुना और गुलबिया की सास से

और सिर्फ बबुआन में ही नहीं, पठान टोले में भी और खाली हिना के घर से नहीं, पूरे सैयदाने से,

हिना की अम्मा, बड़की सैय्यदायिन तो सूरजबली सिंह की असली भौजी थी,

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बिना होली में सुगना के ससुर को रगड़े, जिस दिन से गौने में आयी थीं, उस साल से ही, उमर में उनसे बराबर ही होंगे या साल दो साल छोटे

लेकिन बड़े सैय्यद, हिना के बाबू गाँव में कोई अगर उनसे बोल पाता था तो सूरजबली सिंह ही ,यहाँ अगर हिना की माँ को भी अपने पति से कुछ मांगना हो, कहना हो तो अपने देवर सूरजु का ही सहारा लेती। सगा भाई झूठ, सूरज बली सिंह इतनी इज्जत करते थे बड़े सैय्यद की और हिना के बाबू भी, कभी भी उन्होंने अपने सुरजू की बात नहीं टाली।

एक बार की बात, खुद हिना की अम्मा ने बताई,

सूरज बली सिंह की लाठी, खाली गाँव में नहीं पचास साठ गाँव में मशहूर थी।

बचपन ही अखाडा, डंड लगाना, हर नागपंचमी में कोई दंगल बचता नहीं था, जो वो जीत के न आते हों, दोनों हाथ से एक साथ चालीस चालीस सेर की गदा उठाते थे, और लाठी उन्होंने सिखाई भी थी, कुछ भरौटी, कुछ अहिरौटी, दो चार पासी, दर्जन भर से ऊपर लठैतों को उन्होंने गंडा बाँधा था, लेकिन शर्त दो ही थी, लाठी कभी गरीब के ऊपर नहीं उठनी चाहिए , हरदम गरीब के लिए उठनी चाहिए और कदम कभी पीछे नहीं हटेंगे।

हिना की माँ ने ही बताया, एक बार कुछ दंगा फसाद की खबर आयी, बगल के गाँव से, थानेदार ने खबर भी करवाई, सावधान रहने के लिए, बड़े सैयद की तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए पड़ोस के गाँव वाले हिम्मत कर रहे थे , लेकिन तब भी बड़े सैय्यद ने हिम्मत की।

पर सुरजू आ गए आगे ( हिना की माँ की आँखे भर गयीं )

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" भैय्या, छोट भाई के रहते, बड़ा भाई घर से बाहर पैर निकाले, हमार कसम " और सूरज बली सिंह की लाठी ऐसा चक्कर घुमाते की आठ दस लठैत तो आस पास भी नहीं फटक पाते।

आये सब , तलवार, एक दो के पास बन्दूक भी, पचासों की भीड़, नारे, हंगामा, लेकिन सूरजबली सिंह और उनके लठैत को देख के ठिठक गए।

उधर से कोई लठैत बोला, " बाबू साहेब आप हट जाइये, आप से कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन आज पठान टोला फूंका जाएगा, बहुत दिन का बदला लेना है, आप का पता नहीं फलाने शहर में का हुआ "

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सूरज बली सिंह लाठी जमीन पर टिका के खड़े हो गए, लहीम सहीम शरीर, ६ फुट से ज्यादा, तेल से पुता, अंगद का पाँव, और उनसे भी एक हाथ बड़ी लाठी,

" जउन अपनी महतारी क दूध पिए हो आये आगे, ....अरे अखाड़ा में गुरु यही सिखाये थे की लाठी किस पे उठनी चाहिए , जउन शहर क बात कर रहे हो, जाके वहां लड़ो,..... हमरे बाइस पुरवा में घुसे भी तो, ....पठान टोला भी बाइस पुरवा में है , खाली हमार पैर हिला दो "

जैसे बात फैली, की बाबू सूरजबली सिंह निकल आये हैं बस पूरे बाइस पुरवा क कोई टोला नहीं बचा, जहाँ से चींटी की तरह भरभरा के,अहिरौटी, भरौटी, पसियाने से तो एक एक घर से चार चार पांच लाठी, सब सूरजु सिंह के सिखाये,

दंगा वाले चक्कर काटते रहे, लेकिन सिवान डाँकने की हिम्मत नहीं पड़ी, और तब से आज तक आस पास के शहर में कसबे में कितनी बार, कितने घर परिवार तो छोड़ के कहाँ कहाँ, मऊ, मुबारकपुर चले गए,..... लेकिन पठानटोला उसी तरह बाईसपुरवा में

,एक बार जब बड़े सैय्यद नहीं थे, हिना की अम्मा ने बस कह दिया उनसे एह बार मोहरम क अलम, हर बार बड़े सैयद ही

" अरे भौजी तोहार देवर खाली होली के लिए," हंस के वो बोले और उस साल अलम बाबू साहेब के हाथ में था।

इसलिए पूरे गाँव में दुःख था जब सूरजबली सिंह की तबियत खराब हुयी और कोई इलाज नहीं हो पा रहा था, डागदर हकीम सब जवाब दे दिए थे

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फुलवा क माई बोली की वो जब गौने उतरी तो बाबू साहेब क बियाह हो गया था , लेकिन उसकी सास बताती थीं।
 
" सूरजु क लंगोट किसने खोला "

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एक बात और थी, सुगना के खानदान में उनके ससुर अपने माँ बाप के इकलौते थे, कोई सगी बहन भी नहीं, और उनके ससुर के पिता जी भी अकेले। उससे बढ़ के बाबू सूरज बली सिंह को नवासा मिला था, उनके ननिहाल में न मौसी न मामा। तो कुल जमीन, .....बीस पचीस कोस दूर ही,....सुगना के गाँव से सटा। १०० बीघा से ऊपर तो खाली गन्ना होता था और चीनी मिल बगल में, तो कुल गन्ना सीधे वहीं, उसके अलावा आम की बाग़,

और बाकी खेत में धान गेंहू, तो गाँव क्या पूरे ब्लाक में उनसे बड़ा काश्तकार कोई नहीं था, सब जोड़ कर,

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लेकिन सबसे ज्यादा मजेदार बात बतायी उनकी भौजाइयों ने, मेरी सास, हिना की अम्मा, ग्वालिन भौजी ने

" सूरजु क लंगोट किसने खोला "

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और उन सब भौजाइयां हंसी ले लहालोट, मेरी सास ही बोलीं,

" गाँव में सुगना के ससुर ऐसा कोई लजाधुर नहीं था,.....जवान भौजाई को देख के रस्ता छोड़ देता था,..... और भौजाई कुल उतने पीछे, "

और अब तो ये बात मैं भी अच्छी तरह समझ गयी थी,

जवान होते लजाते देवरों को रगड़ने, छेड़ने से जयादा मजा किसी में नहीं आता, जो जितना लजाता है उसकी उतनी ही खिंचाई होती है।

चुन्नू का अभी हाईस्कूल का रिजल्ट नहीं आया, चार दिन पहले इम्तहान ख़तम हुआ था लेकिन, नेकर में हाथ डाल के न सिर्फ मैंने हाल चाल लिया बल्कि अपनी पतली लम्बी गली का रस्ता भी दिखा दिया।

" अरे अभी तो मेरी तेरी होली उधार है , अब तो इम्तहान का बहाना भी नहीं है , " उसका गाल सहलाते मैं बोली।

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" नहीं नहीं , भाभी प्लीज मैं होली नहीं खेलता, ... " छटकते चुन्नू बोला।

और इसी अदा पे तो मैं निहाल हो गयी। बहुत मज़ा आता है इन कमसिन उमर वालों पर जबरदस्ती करने में,

" तुम मत खेलना, मैं तो खेलूंगी, सबसे छोटे देवर हो मेरे, होली में भले बच गए इम्तहान के चक्कर में लेकिन अब थोड़ी , और अभी तो चार दिन पूरे बचे हैं "

और एक बार फिर गुदगुदी लगाते मैं पहले पेट , फिर मेरा हाथ नेकर की अंदर और मैंने उसे पकड़ लिया,

ठीक ठाक बल्कि अच्छा खासा था, ...

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मेरे पकड़ते ही वो कसमसाने लगा, जैसे कोई जीजा होली में साली की नयी नयी आती चूँची पकड़ के दबा दे,... पर न जीजा छोड़ते हैं और न मैं छोड़ने वाली थी

और थोड़ी ही देर में सोते से वो जग गया, मूसल चंद तो नहीं लेकिन साढ़े पांच छह से तो कम नहीं ही रहा होगा, और कड़ा भी बहुत ,

लेकिन सबसे अच्छी बात, जो इस उमर के लड़कों में होती है छूते ही टनटना गया. वो छटपटा रहा था छूटने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बार चिड़िया चंगुल में आ जाए तो फिर,... कुछ देर तक तो मैं दबाती रही, बस उसके कड़ेपन का मोटापे का अंदाज ले रही थी, बहुत अच्छा लग रहा था, फिर हलके हलके सहलाते मैंने छेड़ा,

" हे देवर जी, एच पी,... अरे हैंडप्रैक्टिस करते हो न,... किसका नाम ले ले कर,... अपनी किस बहन,...

"

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वो जितना शर्मा रहा था, मैं उतने ही कस कस के मुठिया रही थी, और एक झटके में उसका ऊपर का चमड़ा खींच के, अच्छा खासा मोटा सुपाड़ा, लीची ऐसा रसदार, गप्प से मुंह में लेने लायक,....

' हे आज से ये ऐसे ही खुला रहेगा, समझे ' खुले सुपाड़े पर अंगूठा रगड़ते मैं बोली,

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वो गहरी गहरी साँसे ले रहा था, देह उसकी एकदम टेन्स हो गयी थी, और वो एकदम लोहे की रॉड, इतना कड़ा, मैं बिना रुके पूरी तेजी से आगे पीछे आगे पीछे, ...

कभी अंगूठे से बेस को दबा देती तो कभी बॉल्स भी सहला देती, ... बीच बीच में मैं घड़ी भी देख रही थी, दस मिनट हो गए मुठियाते,...

लेकिन अभी,उस दिन इस हाईस्कूल वाले चुन्नू का पानी निकाला और अगले दिन खुद ऊपर चढ़ के चोद दिया, जबरदस्ती। अरे देवरों की नथ भौजाई नहीं उतारेगी तो क्या उनकी बहने आएँगी ससुराल से

लेकिन असली मजा आया ऐन होली के दिन, जब हम लोग मिश्राइन भाभी के यहाँ से होली खेल के लौट रही थीं, नंदों की शलवार चड्ढी फाड़ के तो एक नयी उमर की नयी फसल टाइप दिख गया तो मंजू भाभी ने चढ़ा दिया

" हे नयको देख तोहार छोट देवर, स्साला भाग न पावे "

" अरे भागेगा तो यहीं निहुरा के गाँड़ मारूंगी स्साले की, " हंस के मैं बोली। भागा तो वो पूरी ताकत से और मैंने दौड़ा के पकड़ लिया और उसके नेकर में हाथ डाल के मुठियाते बोली, " हे खड़ा वड़ा होता है की नहीं अभी। अपनी बहिनिया से जाके चुसवाओ तो झट से खड़ा हो जाएगा "

" कोमलिया , नूनी है की लौंड़ा" एक मेरी जेठान ने हँसते हुए पूछा।

नेकर सरका के खेत में फेंकते हुए मैं बोलीं, " अरे देवर तो देवर , चाहे नूनी हो या लौंड़ा, भौजाई कौन जो फागुन में छोड़ दे "

तो जो मैं अपने कच्ची उम्र के देवरों को नहीं छोड़ती तो मेरी सास लोग, सूरजबली सिंह की भौजाई लोग कैसे ,....तो मेरी सास लोग तो हम लोगों की पीढ़ी से भी दस हाथ आगे, तो सब की सब उनके पीछे,

और देह भी उनकी कसरती, सुबह सुबह भोर भिन्सारे वो मुगदर लेकर कसरत करते, डंड पेलते,

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तो कहीं न कहीं कहीं से कोई न कोई भौजाई, और फिर चिढ़ाना शुरू

" अरे लंगोट में का बाँध रखे हो, कउनो ख़ास चीज है का "

" अरे एक बार खोल के दिखाई तो दो, दे दूंगी, मुंह दिखाई "

" नहीं नहीं अपनी बहिनिया के लिए रखे हैं " कोई भौजाई और पीछे पड़ती।

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उन्होंने एक बँसवाड़ी के पीछे कसरत शुरू की तो देवर गंध,..... वहां भी कोई न कोई

और भौजाइयां आपस में भी, " बित्ते भर से कम का ना होगा "

और बात भी ऐसी थी पूरे बबुआने में लौंडों का लंगोट जवान होने के बहुत पहले खुल जाता था, कोई घर में काम करने वाली , मजाक करते करते , तो कभी कोई घास वाली , और घर की बड़ी औरते, माई दादी भी बुरा नहीं मानती, बोलतीं,

" मरद क जवानी कउनो खाली मूंछ आने से थोड़ो पता चलती है,.... यही तो खेलने खाने की उमर है। "

लेकिन सरजू खाली अखाडा, कसरत, खेती बाड़ी और घर का काम और जबरदस्त देह बना रखी थी और वो देख के सब और पनियाती।

उनकी माँ तो उनकी भौजाइयों से भी आगे

अपनी गाँव के रिश्ते की बहुओं, उनके भौजाइयों को उकसाती

" कइसन भौजाई हो तुम सब,.....हमार देवर अस होत तो पटक के जबरदस्ती पेल देती। ये लंगोट खोलने की उमर है, बाँधने क थोड़ी”

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और ये बात नहीं थी की ठाकुर सूरजबली सिंह ने कोई ब्रम्हचारी होना तय किया था या उनका मन नहीं करता था या पजामे में फड़फड़ाता नहीं था । लेकिन असली बात वही थी जो मेरी सास ने बोली थी,

" लजाधुर, " बस लाज और झिझक, वो पहल नहीं कर सकते थे , और एक बात और की' कोई क्या कहेगा

और ये बात नहीं की फड़फड़ाता नहीं था या रात बिरात, पजामे में,

एक दिन कहारिन जो घर में कपडे साफ़ करती थी, उनकी माई से, सूजबली सिंह के सामने ही उंनका पाजामा दिखाते हुए चिढ़ाया,

" अब इनका बियाह करवा दीजिये , इधर उधर रबड़ी मलाई, गिराने से तो अच्छा "

पजामे पे रात के सपने का बड़ा सा धब्बा था, लेकिन सूरज बली सिंह की महतारी अपने बेटवा की ओर से हंस के बोली

" अरे देवरानी जब आये तब आये तोहार, तब तक भौजाई लोगन क जिम्मेदारी है की देवर क ख्याल रखें । तो गलती तोहार सब का है, गगरी भर जाए तो जवानी में छलकबे करेगी। "

अगले दिन फिर पजामे में, और अबकी वही कपड़ा धुलने वाली दिखाते बोली

" केतना ढेर सारा मांड निकाले हैं देवर हमार "

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" अरे बेटवा केकर हैं "

कुछ गर्व से कुछ दुलार से उनकी माँ बोली और कुछ दिन बाद ही सूरजबली सिंह की शादी तय हो गयी।

घर परिवार अच्छा था, उस जमाने में लड़की देखने का तो था नहीं हाँ जो बीच में थे उन्होंने बता भी दिया की सुन्दर है, घर क काम आता है।
 
बुच्ची-..... फूफेरी बहन …सुमन

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और एक बार बियाह तय हो जाये तो घर का रंग बदल जाता है, महीने भर पहले से गेंहू, और अंजाज साफ़ करना, कूटना, पीसना और सब घर काम करने वालियों से भरा रहता था, कुछ मेहमान भी

और दर्जन भर काम करने वालियां, कहीं गेहूं सुखाया जा रहा है, पछोरा जा रहा है, पीसा जा रहा है, कहीं चक्की चल रही है, और साथ में जांते का गाना, बिना गाये काम सपड़ता नहीं और थोड़ी देर में गाना असली गारी में, जो सामने पड़ा, उसी पे

और सबसे ज्यादा दूल्हे की माँ, सूरजबली सिंह की महतारी, और वो खुद ही काम वालियों को उकसाती, कोई गाँव के रिश्ते से ननद लगती, कोई बहू, और उन्ही के साथ सूरजबली सिंह के एक रिश्ते की फूफेरी बहन, नाम तो सुमन था लेकिन सब लोग बुच्ची कहते थे। तो दूल्हे की बहन तो गरियाई ही जायेगी,

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बुच्ची के पीछे पड़ने का एक और कारण था, वो चिढ़ती बहुत थी। और अगर कोई ननद चिढ़े तो फिर तो भौजाइयां उसे, और गाँव का मजाक गाने तक नहीं रहता सीधे देह तक पहुँच जाता

और ऊपर से सूरजबली सिंह की माँ, और उन काम वालियों का साथ देतीं, बुच्ची को बचाने के बहाने,

' अरे बेचारी ये छिनार है तो इसका का दोष, एकर महतारी तो खानदानी छिनार, अगवाड़ा छिनार, पिछवाड़ा छिनार, झांट आने के पहले गाँव भर के लौंडों का स्वाद चख ली थी, ( सूरज बली सिंह के फुफेरी बहन की महतारी, मतलब उनकी बूवा यानी उनकी माँ की ननद,... तो फिर तो गरियाने वाला रिश्ता हुआ ही )।

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और कोई नाउन कहारिन सूरजबली सिंह की महतारी क सह पाके और बोलती,

" हे बुच्ची, तोहार भैया लंगोट में बांध के रखे हैं, सबसे पहले तोहें खिलाएंगे, ....झांट वांट साफ़ कर के तैयार रहा "

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तो फिर सूरजबली सिंह की माई, मजा लेते बोलतीं,

" तो का हुआ, यह गाँव क तो रीत है, स्साली कुल लड़कियां भाई चोद हैं, सब अपने भाई को सीखा के पक्का कर देती हैं, बियाह के पहले तो इहो अपने भैया के साथे गुल्ली डंडा खेल लेगी, "

लेकिन मामला गाँव में एकतरफा नहीं रहता, जांता पीसती गाँव की कोई लड़की ( जो सूरज बली सिंह की माई की ननद लगती ) चटक के बोलती,

" अरे भौजी, ननद लोगन का बड़ाई करा, की भाई लोगन क सिखा पढ़ा के, अरे तभी तो कुल दूर दूर से हमार भौजाई लोग आती है , उनकी महतारी भेजती हैं गुल्ली डंडा खेलने के लिए। ....और लंगोट खोलवाने का काम काम तो देवर के भौजाई लोगन क भी है "

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और सूरजबली सिंह की माई पाला बदल के अपनी गाँव की बहुओं को ललकारतीं,

" हे देखा,.... इतनी भौजाई बैठी हैं, हमको तो कुछ नहीं है हम तो सास है। महीना भर बाद तोहार देवरानी उतरी तोहीं लोगन क कोसी,.... की ये जेठानी लोग कुछ गुन ढंग अपने देवर को नहीं सिखाई, इतने दिन में लगोट भी नहीं खोल पायीं अपने देवर का "

और बात सही भी थी, गाँव में कोई भी ऐसा लड़का नहीं था जो शादी के पहले कम से कम दस बारह, और दस बारह बार नहीं, दस बारह से,गन्ने के खेत में तो, कोई छोड़ता नहीं था, ... बस पेटीकोट उठा, पाजामा सरका और निहुरा के गपागप गपागप

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और उनमे भी ज्यादातर खूब खेली खायी काम करने वाली, तो कोई और शादी शुदा, लेकिन सूरजबली सिंह का लंगोट,....

मुझसे नहीं रहा गया और मैं अपनी सासों की गोल में पूछ बैठी, " तो सूरज बली सिंह का लंगोट खोला किसने"

अब तो वो हंसी का दौर पड़ा, बड़ी मुश्किल से सब लोग चुप हुए फिर ग्वालिन चाची ने बड़की नाउन ( गुलबिया की सास ) की ओर इशारा करके बोला

" इनकी देवरानी ने, .....इमरतिया। "

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग १०२ - सुगना और उसके ससुर -सूरजबली सिंह पृष्ठ १०७३

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इमरतिया का जिक्र कहानी में पहले भी आया है जब सुगना का जिक्र आया था तभी

भाग ८२ -सुगना भौजी पृष्ठ ८३० पर ,



Adultery - छुटकी - होली दीदी की ससुराल मेंभाग ८२ -सुगना भौजी १६१० १२७ बंटी अलग होकर मेरे बगल में लेटा ही था की एक झाडी के पास से उठ के आती हुयी सुगना दिखी,... आज भौजाइयों में सबसे ज्यादा वही गरमाई थी, कोई सगा देवर था नहीं , मरद क़तर गया था, गौने के कुछ दिन बाद ही तब से लौटा नहीं। पच्छिम पट्टी की,... सुगना एकदम रस की जलेबी, वो भी...

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"अरे गुलबिया की चचिया सास ,.. उनके घर की नाउन, कभी तेल लगाने तो कभी गोड़ मींजने, इमरती नाम था,... और सब को मालूम था था की तेल कहाँ कहाँ लगता था,... और वो मुंह खोल के बताती भी थी, एक दिन में मेरी सास ने मजाक में मेरे सामने पूछ भी लिया हँसते हुए ओह बड़का औजार में तेल आज कल लगता है की नहीं, केतना बड़ा है,... तो जिस तरह बित्ता फैला के इमरतिया बोली की मेरा और मेरी सास दोनों का मुंह खुला रहा गया.

और साथ में हंस के साफ़ भी कर दिया अरे मोटा कड़ियल काला नाग है सब बिल के बस का नहीं है।

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सबसे खतरनाक काम उसने किया अपने मरद के जाते ही इमरतिया का घर में आना जाना बंद कर दिया,...

और फिर
सुगना और सुगना के ससुर वाले प्रकरण में



" इमरतिया आती थी कभी एक दो दिन नागा कर के ही सही, उनका काम हो जाता था, और उम्र होने से क्या होता है न उनका शरीर बूढ़ा हो रहा था न मन, बल्कि जब से सुगना आयी थी मन और पागल हो रहा था।

आखिर उन्होंने कह ही दिया बिना सुगना से बोले,

" आज पैर में बहुत दर्द हो रहा है,... ससुरी इमरतिया भी बहुत दिन से आयी नहीं, मालिश कर देती तो,... " अपना दुःख खुद से कह रहे थे, तो सुगना बोल पड़ी

" तो मैं कर देती हूँ न मालिश, इमरतिया से ज्यादा ताकत है मेरी देह में"

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तो कौन थी ये इमरतिया, क्या रिश्ता था उसका सुगना के ससुर से,

, क्यों सूरज बली सिंह का मन उसके बिना नहीं भरता था

 
फागुन के दिन चार भाग ३८, रीत और चुम्मन का मोबाइल पृष्ठ ४२४ अपडेट पोस्टेड

कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट जरूर करें
 
जोरू का गुलाम भाग 247 - मेरा दिन -बूआकी लड़की पृष्ठ १५३९

अपडेट पोस्टेड,

कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट जरूर करें
 
भाग १०३ इमरतिया

२५,६२,२०३

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इमरतिया इस कहानी में कई बार आयी और फिर कई बार आएगी तो शुरू से कुछ बातें और फिर कहानी जहाँ छोड़ी थीं वहीं से धागे पकडूंगीं, यानी जब सूरजबली सिंह, सुगना के ससुर की शादी की तैयारी चल रही थी, लेकिन पहले इस कहानी में मतलब, हमारे गाँव में जब गौने के बाद सुगना आयी थी लेकिन उसके साथ ही सबसे पहले मेरे गाँव के नाऊ ठाकुर लोगों के बारे में।

दस बारह घर थे, और पूरे बाईसपुरवा में सब की जजमानी, जो बड़े काश्तकार थे उन लोगो ने कुछ कुछ जमीन दे रखी थी, और कुछ फसल काटने पर, बाकी सब काम काज, प्रयोजन में मिलता ही था। गुलबिया का परिवार हम लोगों की पट्टी का काम देखता था और सुगना वाली पट्टी का इमरतिया का खानदान, वैसे ही बाकी दस बारह परिवारों में बटा था सब काम धाम। नाउन तो घर का एकदम हिस्सा होती थी, कोई काम उसके बिना हो ही नहीं सकता था।

तो बात इमरतिया की।

बात करीब साल भर पहले की थी, सूरज बली सिंह की शादी से करीब साल भर पहले। और जब उतरी तो परछन करने वालियों में सबसे आगे, सूरज बली सिंह की माँ, आखिर उनके नाउन की बहू थी , और उसका रूप जोबन आँख में उतर गया सबके।

सींक सलाई नहीं, भरी भरी देह, खूब गदराता जोबन, गोरा रंग, उमर में सूरज बली सिंह से साल दो साल छोटी ही होगी या समौरिया, लेकिन गाँव के रिश्ते से भौजी तो रिश्ता पहले दिन से ही भौजी का हो गया।

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मरद भी उसका कड़क जवान था लेकिन जैसा गाँव की और गाँव की नयी नई दुल्हनों की किस्मत, महीना भर नहीं गुजरा था, पंजाब में कटाई का काम चालू हो गया और वो ट्रेन पकड़ के, ….

अब एक की जगह दो परानी, खेती किसानी से इतना तो मिलता नहीं और नाउन के बिना तो अभी कुछ नहीं होता लेकिन नाऊ का रोज का काम तो रेजर और सैलून ने ले लिया।

इमरतिया को उसके मर्द के जाने के हफ्ते दस दिन बाद सूरजबली सिंह की माई ने बुलाया। उदास, पहले की परछाई सी आके जमीन पे बैठ गयी , बिन बोले टपटपाती आँखे सब कह रही थीं।

माथे पे हाथ फेर के सूरजबली सिंह की माई बोलीं, " अरे आय जाया करो, तनो हमार हाथ गोड़ मीज दिया करो, कउनो बात हो तो बोलो।

बारिश की धूप की तरह वो बहुत दिन बाद इमरतिया मुस्काई और सूरजबली सिंह की माई भी और हंस के बोलीं,

" अब लग रही हो नई बहुरिया की तरह, "

फिर आंगन में दाना चुगती दो चार गौरेया की ओर इशारा करके बोलीं,

" देखो हम गाँव क औरतों क जिन्नगी एही तरह, सुख के दो चार दाने इधर उधर बिखरे रहते हैं, बस वही चुग के काम चलाना पड़ता है। आय जाय करो, हमार तोहार दोनों क मन बहल जाएगा, कोई बात हो बताना जरूर। "

फिर धीमे से उसकी ठुड्डी उठा के बोली,

" समझ रही हूँ, भूख यह उमर में पेट से ज्यादा पेट से बित्ते भर नीचे वाले गड्ढे में लगती है , तो मरद तो किसके घर के नहीं चले जाते, और ससुरे लौट के भी नहीं जल्दी आते, बहुत हुआ तो चिट्ठी, मनीआर्डर लेकिन मरद न हो, देवर की कमी है क्या । जब तक देवरानी नहीं आती भौजी का जिम्मेदारी, "

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तबतक सुरजबली सिंह अखाड़े से लौटे लेकिन इमरतिया को देख के हलके से ठिठके पर उनकी माँ ने हड़काया,

" अरे तोहार भौजी हैं हैं नयकी भउजी, "

इमरतिया ने हड़बड़ा के उठने की कोशिश की, बड़के घर क लड़का, लेकिन सूरजबली सिंह की माई ने हड़का लिया

" अरे बैठों, छोट देवर हैं,… उनसे कौन "

सूरजबली सिंह एक पल के लिए रुके मुस्कराये, लेकिन फिर तुरंत ही अपने कमरे की ओर, पर वो मुस्कराहट न उनकी माई से छुपी न इमरतिया से।
 
भउजी- देवर

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फिर तो दो चार दिन बाद से छुटकी नाउन, इमरतिया भउजी की बुलाहट शुरू हो गयी, कभी अचार डालना होता था तो कभी बड़ी बनानी होती थी, हफ्ते में दो तीन बार तो कम से कम और कभी वैसे भी आ गयी तो नयको तनी सर में तेल लगा दो, तो कभी गोड़ दबा दो और घंटो सूरजबली सिंह की माई उससे गप्प लड़ाती और अक्सर बात एकदम खुल के शुरू हो जाती

और उसे बुलाने के लिए जाते सूरजबली सिंह ही,

" भउजी माई बुलाई हैं " और एक दो बार के बाद इमरतिया भी समझ गयी देवर कुछ ज्यादा ही सोझ है, एकदम लजाधुर तो बिना चिढ़ाए छोड़ती नहीं

" अरे हमार गोड़ पिरात बा, ….ऐसे न आईब, कोरा में ले चला " और खिस्स से मुस्करा देती

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और सुरजू देवर झेंप जाते भौजाई क बदमाशी समझ के।

कभी खुद खींच के घने गन्ने के खेत के बीच में से ले जाती, पगडण्डी, पगडंडी ये बोल के कि जल्दी पहुँच जाएंगे और रस्ते में देह से देह रगड़ते बोलती

" हे देवर कभी अपने खेत क गन्ना खिलाओ न, सुना है बहुत मोटा, रसीला लम्बा होता है "

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बेचारे सूरजबली सिंह, झोंके में बोल जाते एकदम

" भउजी, इतना रस किसी गन्ने में नहीं निकलता,जितना हमरे गन्ने में है, और देखो मोट केतना है दस बीस गाँव में अइसन गन्ना न मिली "

लेकिन फिर समझ के भउजी किस गन्ने की बात कर रही हैं फिर से झेंप जाते, और इमरतिया और रगड़ती,गाँव की किसी लड़की का नाम लेकर जो उनकी रिश्ते में बहन लगती,

" बिन्नो को खिलाये हो आपन गन्ना,... बेचारी बैगन से काम चला रही है "

जब गाँव की भौजाइयों की छेड़खानी से बचने के लिए सूरजबली सिंह ने बँसवाड़ी के पीछे अपना डंड पेलने का अड्डा बनाया तो उसकी महक सबसे पहले इमरतिया को लगी, और वो अक्सर, आते जाते अब उधर से ही, सबेरे सबरे, एक दिन वो लंगोट कसरत के पहले बाँध रहे थे की इमरतिया की नजर पड़ गयी और वो दहल के रह गयी

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एकदम कड़ियल नाग, फनफनाता

इमरतिया ब्याहता थी, कितनी बार उसने देखा था, पकड़ा था अंदर लिया था, दबोच के उसका जहर निकाला था लेकिन ये तो एकदम अलग

बित्ते भर से कम का नहीं होगा, और मोटा कितना,सोच भी नहीं सकती थी, किसी मरद का ऐसा भी हो सकता है,... कईसे कोई लेगा इसे अंदर

सूरजबली सिंह की माई की सगी क्या कोई चचेरी बहू भी नहीं थी, उनके ससुर भी एक भाई और लड़का भी एक ही

और बेटा खेत खलिहान या अखाडा, दंगल

तो इमरतिया सच में बहू की तरह और सूरजबली सिंह की बड़की भउजी की तरह

तो अब थोड़ा फ़ास्ट फारवर्ड
 
सब जिम्मेदारी इमरतिया की- तोहार देवर तोहरे हवाले

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तिलक चढ़ गयी थी उनकी, तिलकहरुओं ने पूरा आँगन भर दिया था, इतना सामान, और परजा पौनी को भी ,

शादी १२ दिन बाद थी पूरा घर रिश्तेदारों से भरा, अगले दिन उड़द छूने के बाद ही रीत रिवाज चालु हो गए थे और नाउन होने के नाते सब जिम्मेदारी इमरतिया की फिर भउजी भी थी बड़ी।

नई दुल्हन के लिए कमरा ऊपर था और कोहबर भी ऊपर ही बना था। उन कमरों के आगे बड़ी सी खुली छत, और एक ;लंबा सा बरामदा, जिसमे से दोनों कमरों के, कोहबर के और सूरजु सिंह के दरवाजे खुलते थे, और सीढ़ी भी उसी बरामदे में खुलती थी।

नीचे मेहमान सब भरे

तिलक के दो दिन पहले से ही हलवाई बैठ गए थे, एकलौते लड़के की शादी, खूब चहल पहल।

तिलक के अगले दिन से सब रीत रिवाज, और सबसे ज्यादा जोश में सूरजबली सिंह की माई, सबेरे सबेरे मांगर आया, ढोल की पूजा, कोहबर ऊपर था और लड़के का कमरा भी, उस जमाने में गाँव में पक्के घर दो चार ही थे और दुमंजिला तो उस पट्टी में खाली उन का ही, इसलिए पूरे बाईसपुरवा में बड़का घर बोला जाता था।

तिलक के अगले दिन सांझ की जून, छत पर औरतों का घमकच, और उन के बीच दबे सहमे सिकुड़े बैठे, सुरजू। सामने उन की माई और उन के बगल में इमरतिया, नाउन भी, भौजाई भी।

" आज से मुन्ना बरात निकले तक एहि कोठरी में रहना है, बाहर कदम नहीं निकालना है , और कुछ भी हो, तो तोहार भौजी तोहरे साथ रहिए, अब दस बारह दिन उन्ही क राज, बिना सोचे कुल बात माननी होगी, अइसन मीठ मिठाई ऐसे थोड़ी मिलेगी "

सुरजू की माई ने इमरतिया की ओर इशारा करते हुए कहा।

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रिवाज भी यही था, कोहबर के बगल के ही एक कमरे में दूल्हे को रखा जाता था और वही कपडे पहने, और कोहबर में मांडव में कोई भी रीतरिवाज के लिए, माटी खोदने, ताल पोखर जाना हो तो सब साथ में नाउन और भौजी, जिसके ऊपर दूल्हे की जिम्मेदारी होती थी , किसी की नजर न पड़े।और यहाँ तो नाउन भी इमरतिया और भौजी भी इमरतिया और सुरजू की माई की सहेली कहें राजदार कहें, वो भी इमरतिया और सुरजू सिंह जिसे देख थोड़ा बहुत लुभाते थे, वो भी इमरतिया, और ये बात इमरतिया को भी मालूम थी और सुरजू की माई, बड़की ठकुराइन को भी।

" एकदम, भौजाई क बात नहीं मानोगे तो बियाह के मिठाई ले आओगे तो भी नहीं मिलेगी, ...हफ्ता भर बाद कंगन खुलवाउंगी" एक गाँव क भौजाई बोलीं।

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लेकिन इमरतिया अपने देवर की ओर से बोली,

" अरे नाही, हमर देवर को ऐसे घबड़ाय रहु हो , ...बेचारे इतने दिन से भूखे हैं मिठाई के लिए, ...अरे ओहि दिन मिले, ....खाया मन भर मजा ले ले के "

और सब औरतों की खिलखिलाहट से छत गूँज गयी।

वैसे तो औरतें जहाँ इकट्ठा होती थीं, खुल के मजाक, न उम्र का लिहाज, न रिश्ते का, हाँ लेकिन ये सब मर्दो के सामने नहीं होता था, गारी भी गयी जाती थी कोठरी में से, पर शादी बियाह में औरतें एकदम बउरा जाती हैं। और मर्दो वाली शर्म लिहाज में दूल्हा नहीं जोड़ा जाता, उसी के सामने उसकी भौजाइयां, बुआ सब उसकी महतारी, बहन सब खुल के गरियाती हैं। सब रस्म में दुलहा तो रहता ही है तो उसका कोई लिहाज नहीं होता, जैसे वो वहां हो ही नहीं,...और उसके साथ सिर्फ नाउन या कोई भावज ख़ास बस।

उस जमघट में औरतों के साथ गाँव की लड़कियां, बच्चिया भी और उसी में एक शीला, सूरजबली सिंह की फुफेरी बहन बुच्ची की सहेली, उसी की समौरिया, बोल पड़ी

" अरे हमरे भैया को समझती का हो सब लोग,.... रोज हजार डंड पेलते हैं "

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" अरे अब लंड पेलेंगे, ....और जब तक तोहार भौजाई नहीं आती हैं,... तो तोहरे साथ "

एक गाँव क भौजाई बोलीं

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और अबकी जब ठहाके गूंजे सबसे तेज सूरजबली सिंह की महतारी की आवाज थी, अब वो इमरतिया से बोलीं,

" और बुकवा ( उबटन ) आज से ही लगना चाहिए और दूनो जून, अब तोहार देवर तोहरे हवाले "

" एकदम अभी से दो कटोरा पीस के रखी हूँ, बस थोड़ी देर में, खाने से पहले ही "

इमरतिया सूरज सिंह की ओर मुस्करा के देखते बोली।

" भौजी, तिसरकी टांग में जरूर लगाइएगा " गाँव की एक बियाहिता लड़की इमरतिया को छेड़ते बोल पड़ी।

इमरतिया क्यों किसी ननद को रगड़ने का मौका छोड़ती, बोली

" एकदम खूब रगड़ रगड़ के, ...लेकिन जो शीरा निकलेगा, वो ननद को पीना पड़ेगा "

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