बुच्ची और शीलवा
( और थोड़ा सा फ्लैशबैक भी, इसी सावन का इसी गाँव का )

सुरजू का शर्माना अब कम हो गया था और अब वो भी मजे ले रहे, देह में फुरफुरी हो रही थी, सोच सोच कर मन कर रहा था,… कैसे मौका मिले
और उन की इस हालत में बुच्ची और इमरतिया की शरारतों का भी बड़ा हाथ था।
कल रात में बुच्ची की जिस तरह कोहबर में रगड़ाई हुयी थी, मंजू भाभी, मुन्ना बहू और सबसे कस कस के इमरतिया ने जो रगड़ाई की, और उसके पहले उसकी सखी शीलवा ने जिस तरह अपनी बुरिया से सब भौजाइयों के सामने ,….बुच्ची एकदम गर्मायी थी। शीलवा जब चुदवा के आती थी अपनी मलाई से लथपथ बुरिया दिखा दिखा के, बुच्ची को ललचाती थी और उकसाती थी,
" अरे मैं तो अपने गाँव में इतने मजे ले रहे हूँ,... तू तो अपने ननिहाल में आयी है, घोंट ले गपागप. कितने तो लौंडे तुझे देख के लपलपा रहे हैं, बस पहली बार ज़रा सा दर्द होगा, फिर मजे ही मजे, ....मैं रहूंगी न साथ "

बुच्ची का मन तो करता था, लेकिन बस जरा सा झिझक,
पर कल के बाद,... और ऊपर से रात भर की मस्ती के बाद, एक तो भौजाइयों ने जिस तरह उसे रगड़ा था लेकिन झड़ने नहीं दिया था, नीचे ऐसी कसमसाहट मची थी, ऊपर से सबेरे सबेरे सुरजू भैया का मोटे मूसल का दरसन इमरतिया भौजी ने करवा दिया, बाप से बाप कितना मोटा था,
लेकिन सिलवा कहती थी, स्साली बुच्चिया, जेतना मोट होता है उतना ही मजा देता, जब दरकता हुआ घुसता है न जान निकल जाती है लेकिन मजा भी खूब आता है है।
और स्साली शीलवा कहती है तो ठीक कहती है, ...दर्जनों लौंड़े तो घोंट चुकी है,
बल्कि दर्जन भर से ज्यादा तो बुच्ची के सामने, और बुच्ची के पीछे भी पड़ी थी, काहें को बचा के रखी है,
घोंट तो शीलवा कब से रही है,
लेकिन दो चार महीने पहले जब बुच्ची सावन में आयी थी, पूरे पंद्रह दिन रही थी. उसके आने के दो तीन दिन बाद, पास के गाँव में एक बड़ा मेला लगा था, सूरजु भैया की माई भी बोलीं, शीलवा जा रही है, बुच्ची तुम भी उसके साथ घूमी आओ और शीला से चिढ़ाते बोली, 'हाथ पकडे रखना इसका कही मेले में किसी लौण्डे के साथ गायब न हो जाए,'
और मेले में का भीड़ थी, बल्कि एकाध मील पहले से ही कन्धा छिला जा रहा था, गांव की सब औरतें अलग थलग हो गयी थी,

शीला और बुच्ची बस एक दूसरे का हाथ पकड़े, पता नहीं शीला ने बदमाशी से या जान बूझ के, बुच्ची से बोला,
" हे इधर से चलते हैं, नजदीक पड़ेगा। "
एक पतली सी गली, और बिना बुच्ची की बात सुने शीला उसका हाथ पकड़ के घसीट ले गयी, और गली में घुसते ही, आगे लड़के, पीछे लड़के, अगल बगल सब, और उसमे आधे दर्जन तो शीला के यार, और लड़के ही नहीं कुछ औरते भी बगल के गाँव की शायद शीला जानती थी उन सबको, पतली गली, एक साथ दो निकले तो रगड़ते हुए, लेकिन वो चार पांच औरतें रस्ता रोक के जैसे खड़ी हो गयी, और किसी ने बोला भी,... तो बोलीं,
" अरे आगे बहुत भीड़ है, एकदम निकलने की जगह नहीं है "

और जो लौण्डे थे, बुच्ची ने साफ़ साफ़ देखा, शीला ने बुच्ची की ओर इशारा करके, कस के आँख मार दी,
और एक ने पीछे से बुच्ची की कमर पकड़ ली, कस के, हिल भी नहीं सकती थी,
बुच्ची ने शीला की और देखा तो एक लौण्डे ने सीधे शीला की चोली में हाथ डाल रखा था और कस कस के खुल के मसल रहा था, दूसरे ने शीला के चूतड़ दबोच रखे थे और धीरे धीरे के अंदर हाथ डाल रहा था,
शीला तो पहले भी कभी कभी साड़ी पहनती थी, पर आज वो बुच्ची को भी गाँव की गोरी बना के ले आयी थी।

और तबतक किसी ने बुच्ची की चोली के ऊपर भी हाथ डाल दिया, जबतक वो समझती, चोली के दो बटन खुल गए थे, दो हाथ अंदर घुस गए थे।
पहली बार बुच्ची के उभरते जोबन पे किसी लौण्डे का हाथ पड़ा था, बुच्ची की पूरी देह गिनगीना गयी, पैर रबड़ की तरह हो गए, और अब बुच्ची की चूँची खुल के मसली रगड़ी जा रही थी. एक ने तो उसके आ रहे निपल को भी पकड़ के खींच दिया, बुच्ची की सिसकी निकल गयी। लेकिन ये तो बस शुरुआत थी, पीछे से किसी ने साड़ी, पेटीकोट दोनों उठा दिया और बुच्ची के छोटे छोटे चूतड़ पकड़ के मसलने लगा, सरकते हुए उसकी उँगलियाँ जाँघों तक पहुँच गयी,
बुच्ची सिसक रही थी, पनिया रही थी, बुर गीली हो गयी थी, खुद ही टाँगे फैला रही थी.
एक पल के लिए बुच्ची ने शीला की ओर देखा, शीला की हालत तो और खराब थी. साफ़ था एक लौंडा शीला की बिल में कस कस के ऊँगली कर रहा था, और दो उसकी चोली करीब करीब खोल के, खुल के जोबन का रस ले रहे थे,
और बुच्ची के साथ वो लौण्डे हटे तो दूसरे आ गए,
करीब दस पंद्रह मिनट तक तो उसी जगह पे चार पांच लौंडो ने बुच्ची के जोबन का रस लूटा, और वहां से निकले तो थोड़ी दूर आगे फिर, रुक के, ...और जहाँ चलते भी रहते तो लौण्डे रगड़ते, धकियाते, चूँची दबाते, और लड़कियां औरते भी जान बुझे के उन्हें उकसाती,

दस मिनट का रास्ता, आधे घंटे में पार हुआ, और निकलते ही शीला ने हंस के बुच्ची से पुछा, " क्यों सहेली मजा आया भिजवाने में , कितनो ने हारन दबाया "
बुच्ची मुस्करा के बोली, " यार मजा तो आया, लेकिन पहले तू बोल,... कितनो से दबवाया "

शीला ने आँख मार के दोनों हाथ की उंगलियों से इशारा किया, ' दस ' और बुच्ची ने भी वही इशारा दुहराया, मेरे भी दस।
दोनों की चोली के आधे से ज्यादा बटन टूट चुके थे, साड़ी पेटीकोट से बाहर थी, बुच्ची ने ठीक किया लेकिन शीला की निगाह पास के एक गन्ने के खेत की ओर थी, एक लड़का वहां से इशारा कर रहा था, और शीला ने मुड़ के बुच्ची को गलबहियों में भर लिया और चुम्मा लेके बोली
" मेरी सहेली, मेरी छिनार सहेली,... यार मेरा एक काम कर, वो स्साला इन्तजार कर रहा है. बस तू गन्ने के खेत में खड़ी रहना, मैं गयी और आयी.... और हाँ थोड़ा चौकीदारी भी, कोई हम लोगो की ओर आये तो बस इशारा कर देना
और जब तक बुच्ची कुछ बोलती, शीला उस का हाथ पकड़ के गन्ने के खेत में धंस गयी, एकदम घना गन्ना, उन दोनों की ऊंचाई से दूना

और उसे खड़ी रहने को कस के शीला और अंदर, मुश्किल से दस हाथ दूर, और एक लड़का उस का इन्तजार कर रहा था
बस थोड़ी देर में, बुच्ची साड़ी का फायदा समझ गयी, साड़ी, पेटीकोट दोनों कमर तक, टाँगे उस लड़के के कंधे पर, और लड़के ने भी पजामा सरका के बस अपना खूंटा,
एक तो चूँची मिसवा के बुच्ची पनिया रही थी, फिर पहली बार चुदाई देख रही थी,.... मोटा था, और लेने में शीला की हालत खराब थी,
मोटा खूंटा, शीला की फैली हुयी बुर, कैसे उसकी सहेली ने अपने हाथ से पकड़ के खूंटा सटाया और कैसे उसके यार ने जबरदस्त धक्का मारा, ... बुच्ची सब एकदम साफ़ साफ़ देख रही थी, ....जैसे बस दो हाथ की दूरी पे सब हो रहा हो,

लेकिन थोड़े देर में ही शीला के चेहरे की ख़ुशी, मस्ती, ....और जिस तरह जोश में वो नीचे से चूतड़ उछाल के धक्के मारती थी, साफ़ था उसे कितना मजा रहा था। करीब दस मिनट तक
,बुचिया पनिया रही थी, बुच्ची की बुरिया में मोटे मोटे चींटे काट रहे थे,साँसे लम्बी लम्बी चल रही थीं, देह काँप रही थी, मस्ती से हालत खराब हो रही थी, बस यही सोच रही स्साली बुच्चिया, जब देखने में इतना मजा आ रहा है तो लेने में कैसा लगेगा, और उसे भी मालूम था उसकी ननिहाल के कितने लौंडे उसपे लाइन मार रहे थे, वो न ना बोलती थी, न हाँ हाँ लाइन मारने में कोई कटौती नहीं करती थी
और जब शीला की बिल से रबड़ी मलाई बहने लगी तो बुच्ची थोड़ा दूर हो गयी और निकल कर शीला ने बुच्ची को दबोच लिया और चूम के बोली,
" यार तू मेरी असली सहेली है, ...पता है हफ्ते भर से बिचारा पीछे पड़ा था '

मेले में दोनों ने खूब मस्ती की, शीला ने घर लौटते लौटते दो बार और घोंट लिया और हर बार बुच्ची ने चौकीदारी की और साफ़ साफ़ देखा की शीला को कितना मजा आ रहा है।
सावन में पंद्रह दिन में कम से चार पांच बार मेले गयीं दोनों सहेलियां, और हर बार शीला तीन चार बार चुदी और बुच्ची ने पहरेदारी की.हर बार वो देखती एकदम साफ़ साफ़, शीला के यार कभी लिटा के कभी निहुरा के, कैसे हचक के पेलते हैं, और शीलवा पहले तो चीखती है, फिर थोड़ी देर में मस्ती से सिसकती है और फिर मजे से उसकी सहेली की हालत खराब हो जाती है, और खुद नीचे से धक्का मार मार के,
शीला बार बार कहती, बुच्ची से यार तू भी मजे ले ले .लौंडे भी दर्जनों पीछे पड़े थे, लेकिन बुच्ची बस,
हाँ , बुच्ची के भी जोबन हर बार, कस के रगड़े गए, चुम्मा चाटी, ऊपर से ऊँगली, सब कुछ हुआ,.... लेकिन बुच्ची कोरी आयी थी, सावन में,... कोरी गयी।
शीला ने कई बार कहा भी." यार लौण्डे बहुत निहोरा करते हैं, दे दे न,.... और तब बुच्ची ने इशारे से बोला, घुसेगा तो,.... लेकिन पहले किसी और का

और शीला समझ गयी और हँसते हुए बोली, " उसने तो लंगोटे में ताला बंद कर रखा है "
बुच्ची भी समझ गयी की शीला उसकी बात समझ गयी, वो भी हँसते हुए बोली, " कब तक बंद कर के रखेगा, जब खुलेगा तब घुसेगा, हाँ,... लेकिन एक बार उसने निवान कर दिया न फिर तो स्साली तेरा भी नंबर डका दूंगी, ....बेचारे जितने तेरे सारे यार तड़प रहेहैं न , सब के सब "
लेकिन शीला का नंबर पार करना मुश्किल था,
एक बार तो चौकीदारी करते बुच्ची ने देखा एक साथ दो दो चढ़े थे शीला पे, एक चोद रहा था,एक गांड मार रहा था,

और शीला जब निकली तो हँसते हुए बुच्ची को चूम के बोली,
"यार बेचारा बहुत जिद कर रहा था और टाइम था नहीं तो मैंने कहा चल स्साले तू पीछे लग जा, छेद तो छेद "
तो बुच्ची चुदी नहीं थी लेकिन चुदाई उसने बहुत देखी थी, इसलिए उसे लग गया था की उसका भाई उन सब से तिगुना नहीं तो दूना तो है ही, और अब तो बुच्ची ने पकड़ के देख लिया था, अपनी चुलबुलिया दिखा दी थी और इमरतिया भौजी ने अभी थोड़ी देर पहले उसकी बुलबुल की चाशनी भी भैया को चटा दी थी,
भैया की हालत ख़राब थी
और बुच्ची समझ रही थी भैया काहें मस्ताए थे, जिस तरह से उसकी छोट छोट चूँची देख के ललचा रहे थे, इसलिए इतना फनफनाया था उनका,

लेकिन अभी बुच्ची की हालत खराब करने में इमरतिया का भी हाथ था।
सभी औरतों का ध्यान तो सुरजू सिंह और उनकी महतारी पर था जो कोरा में दुबका के उनको बैठी थी, और सुरजू सिंह के तने नेकर पर था,
और दूल्हे के पीछे उसकी बहन के अलावा कोई रहता भी नहीं था और बगल में नाउन दूल्हे को सम्हारती थी, रसम रिवाज करवाती थी। सब औरतें दूल्हे की माई को गरियाने में जुटी थी और इमरतिया की उंगलिया अपनी कोरी बारी ननदिया से मजे ले रही थी,
इमरतिया ने खुद ही अपनी ननद की चड्ढी उतारी थी, सुबह सुबह सुरजू को उनकी बहिनिया की कच्ची कोरी बिन चुदी बुरिया दिखा दी, देवर की हालत खराब, तो इमरतिया ने बुच्ची की नंगे छोटे छोट चूतड़ों पर हाथ फेरना शुरू किया, कभी चिकोटी भी काट लेती तो कभी मस्ताती फैली दोनों जांघो के बीच हाथ डाल के गौरेया को दबोच लेती थी, दोनों फांके खूब गीली थीं, एकदम चुदवासी थी स्साली, ,
बस दोनों फांको के बीच दरार पर बाएं हाथ की ऊँगली इमरतिया हलके हलके फिरा रही थी

और दाएं हाथ से रस्म रिवाज,
और बुच्ची की चूँची की घुंडी एकदम बरछी की नोक, और फ्राक के नीचे ढक्क्न भी नहीं था तो बस पीछे से भैया के पीठ में वो धंसा रही थी और जो काम इमरतिया का हाथ उसके पिछवाड़े कर रहा था, वो बुच्ची का हाथ पीछे से सूरज के नेकर में धंसा, उसके भैया के साथ
बेचारे सुरजू,
उन्हें बुच्ची की बदमाशी में मजा भी आ रहा था लेकिन कुछ कर भी नहीं सकते थे, माई बगल में चिपक के बैठी थीं और सामने कांती बूआ, मझली मामी, गाँव की कुल भौजाई खास तौर से सैयदायिन भौजी, अंगूठा में ऊँगली जोड़ के छेद बना के उन्हें दिखा दिखा के छेड़ रही थीं,
