Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 103 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

गुरुआइन,

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" बोल स्साले, अपनी माई के भतार, पेलेगा न बुच्ची को आज तो वो खुदे हाँ कर के गयी है "

हलके हलके मुठियाते इमरतिया बोली। अब सूरजु की झिझक थोड़ी कम हो रही थीं, कस कस के इमरतिया की चूँची मसलते बोला,

" लेकिन भौजी बुच्चिया बोली थीं की पहले, ////और आप भी हाँ की थीं "

" तो चलो तुंही दोनों लोगों की बात रहेगी , उसके बाद तो नंबर लगाओगे न अपनी छुटकी बहिनिया पे, तो चलो सोचो बुच्चिया की बुरिया में पेल रहे हो, अरे जैसे उसकी कसी, टाइट है, वैसे तोहरे दुलहिनिया की भी कसी होगी और दरवजा बंद होने के घंटे भर के अंदर, फाड़ फूड़ के चिथड़ा करनी होगी, नहीं तो तोहार तो नाक कटी ही हमार और तोहरी माई की भी नाक कटेगी। तो समझो बुच्ची की बुरिया में पेलना है, लगाओ नीचे से धक्का कस के "

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और सच में सूरजु ने नीचे से कस के धक्का मारा।

इमरतिया ने पकड़ बढ़ा दी, और कसी कर दी, सूरजु ने और जोर लगाया / कभी इमरतिया कस के मुठियाती और कभी मुठियाना बंद कर के सूरजु को बोलती,

" पेल स्साले बुचिया की बुर में "

और सुरजू आँखे बंद कर के पूरी ताकत से चूतड़ के जोर से धक्का मारता लेकिन इमरतिया की पकड़, एकदम रगड़ते, घिसते

पांच दस मिनट में वो बोलने लगा,

" अरे भौजी छोड़ दो, गिर जाएगा, भौजी, मोर भौजी,.... रुकेगा नहीं "

इमरतिया सोच रही थीं स्साला और कितनी देर रुकेगा। हाथ कल्ला रहा था , दस पंद्रह मिनट से ऊपर हो गए थे पूरी ताकत से मुट्ठ मारते एक से एक कड़ियल जवान भी चुदाई में सात आठ मिनट के ऊपर नहीं रुकता और ये,

" तो झड़ जाने दे न, अरे हमरे देवर क लंड है। झड़ जाएगा तो फिर पानी भर उठेगा। आँख बंद कर के सोच बुच्ची क बुर में आपन पानी छोड़ रहा है " वो बोली और अपनी एक चूँची उसने सीधे सुरजू के मुंह में डाल दी और दूसरे को उसकी हाथ में पकड़ा के जोर जोर से बोलने लगी

" पेल न, और कस के चोद दे, झाड़ दे, झड़ जा बुच्ची की बुरिया में हाँ हाँ "

लग रहा था अब निकला तब निकला, इमरतिया तैयार थीं लेकिन तब भी चार पांच मिनट और मुठियाने के बाद, जैसे कोई फव्वारा छूटा हो,

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लेकिन इमरतिया पहले से तैयार थीं, मिटटी के सकोरे को लेकर और एक एक बूँद उसमे रोप लिया।

पर वो जानती थीं अभी बहुत मलाई बची है अंदर, तो सुपाड़े को हलके से दबा दबा के, फिर से जो बूँद बूँद निकला वो भी उसी में और फिर सुपाड़े और आसपास जो लगा था उसे हाथ से काँछ के उसी सकोरे में, और वो गाढ़ी सफ़ेद बूंदे लुढ़क के सकोरे के अंदर,

यही समय होता है सम्हालने का, और एक अनुभवी खिलाड़ी की तरह बिना कुछ बोले, बस हलके हलके सहलाते पुचकारते शेर को छोड़ दिया।

यह समय मरद का होता है चार पांच मिनट सुस्ताने के, उन पलों का मजा लेना का और उस समय वो सिर्फ हल्का स्पर्श सुख चाहता है तो बस इमरतिया सुरजू को पकडे रही और फिर पांच मिनट बाद, बिन बोले, बुकवा का कटोरा उठाया और पैर के पंजे के पास बस हलके हलके पंजो में पहले बुकवा लगाना शुरू किया फिर पैरों में और बात शुरू की, पहले अखाड़े के बारे में, सुरजू के दंगल जीतने के बारे में, सेक्स के बारे में एकदम नहीं, जिससे वो सहज हो जाए, और फिर बात धीरे धीरे मोड़ दी।

' देवर कभी किसी का पेटीकोट का नाडा खोले हो "?

सुरुजू अभी भी शरमाते झिझकते थे लेकिन इमरतिया से धीरे धीरे खुल रहे थे, बोले,

" का भौजी, आप भी न। गुरु जी लंगोटे की, अखाड़े की कसम धराये थे, माई के अलावा कउनो औरत की परछाई से भी दूर रहना, मतलब छूना भी नहीं, तो जब बियाह तय हुआ तो माई बोलीं की पहले अपने गुरु जी से बोल के आवा तो वो हंस के बोले,

' माई का हुकुम, गुरु से भी ऊपर। मेरे लिए भी माई ही हैं तोहार माई। तो चलो आज से अपने कसम से तोहें आजाद किये और तिलक के एक दिन पहले आना, माई से बता देना वो समझ जाएंगी।"

तो तिलक के एक दिन पहले जो हम गए तो आखिर बार अखाड़े में उतरे, ओहि मिटटी से हमारा तिलक किये और एक लुंगी दिए, बोले

"अब लंगोट खोल के ये लुंगी पहन लो। आज से लंगोट से आजाद हो, लंगोट की शर्त से आजाद हो। लेकिन अब अखाड़े की ये मिटटी में उतर के दंगल नहीं लड़ सकते हो, हाँ तोहार घर है, आओ कुश्ती देखो, नए नए लौंडो को दांव पेंच समझाओ, पर लंगोट की कसम से आजाद हो। लेकिन हमारा आशीर्वाद है की जिस तरह इस अखाड़े में हर दंगल जीते हो, तुम्हारी माई की कृपा से जिंदगी के अखाड़े में भी हर दंगल जीतो, हाँ वहां के लिए तुन्हे अलग गुरु चाहिए होगा। "

" तो मिली कउनो गुरुआइन " आँखों से चिढ़ाते, उकसाते इमरतिया ने पुछा और अब बुकवा लगाते हाथ जाँघों तक पहुँच गए थे ,

"भौजाई से बड़ी कौन गुरुआइन, ऊपर से माई क हुकुम, भौजी क कुल बात मानना "

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हँसते हुए सूरजु ने मजाक किया। और इमरतिया फिर बात पेटीकोट के नाड़े पे ले आयी और बोली

" अइसन नौसिखिया अनाड़ी देवर, अब सिखाना तो पड़ेगा ही, तो ये समझ लो की कोहबर में सलहज कुल पहले यही जांचेगी की नन्दोई उन्हें पेटीकोट का नाड़ा खोल पाते हैं की नहीं। तो पहला काम तोहें ये देंगे की आँख बंद करके बाएं हाथ से एक गाँठ खोलो, नहीं खोलोगे तो बहिन महतारी कुल गरियाई जाएंगी "

लेकिन ये बाएं हाथ से काहें भौजी " सूरजु को भी अब मजा आ रहा था, थे वो क्विक लर्नर लेकिन इस सब बातों से अभी पाला नहीं पड़ा था वरना समझाने की जरूररत नहीं पड़ती।

" अरे हमार बुद्धू देवर कभी लौंडिया चोदे होते तो पूछते नहीं, अच्छा ये बताओ, हमार चोली कौन हाथे से खोले थे दाएं की बाएं "

" दाएं हाथ से भौजी " सूरजु बोले।

" बस तो पहली रात में तो दायें हाथ से तो दूल्हा दुल्हिन की चोली खोलने के चक्कर में रहता है और दुल्हन उसे खोलने नहीं देती। अपने दोनों हाथों से उसका दाए हाथ पकड़ के हटाती है। तो बस सोचो दूल्हा का करेगा ? "

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" बाएं हाथ से पेटीकोट क नाड़ा " हँसते हुए सुरजू देवर भौजी से बोले, और अब भौजी का हाथ क बुकवा हलके हलके खूंटा पे

" एकदम, चलो कुछ तो समझे, और दुल्हन का महतारी, भौजाई, तोहार सलहज कुल उसको सीखा के भेजेंगी की सात गाँठ लगा के पेटीकोट का नाड़ा बांधना, और वो भी न खाली बाएं हाथ से खोलना होगा बल्कि अँधेरे में। रौशनी में तोहार दुलहिनिया पास नहीं आने देगी। पहले बोलेगी की रौशनी एकदम बंद करो। इसलिए अँधेरे में बाएं हाथ से तो वही जांचने के लिए सलहज सब गाँठ बाँध के देंगी आँख बंद कर के बाये हाथ से खोलने के लिए "

इमरतिया एक एक दांव पेंच सूरजु देवर को समझा रही थी, पहले थ्योरी फिर प्रैक्टिकल, तभी तो देवर पक्का होगा, बिआइह के पहले नंबरी चोदू बनाना है इसको

" तो कैसे हो पायेगा " सुरजू के समझ में नहीं आया।

" अरे कैसी नहीं हो पायेगा, हमर देवर हो, मजाक है। चोद चोद के पहली रात को रख देगा उनकी ननद को। देखो एक तरीका तो यही है दाएं से चोली और बाएं से पेटीकोट लेकिन जब वो पेटीकोट का हाथ रोकने लगे तो बस पेटीकोट छोड़ के दोनों हाथ से चोली खोल दो।

फिर दस पन्दरह मिनट पे दोनों जुबना का रस लो, छू के सहला के चूम के , जब थोड़ी गरमा जाए तो एक साथ ही दोनों हाथ एक हाथ से पकड़ लो और कुछ देर तक और कुछ नहीं , वो छुड़ाने की कोशिश कर के थक जायेगी , फिर दूसरे हाथ से , बाएं हाथ पेटीकोट क नाड़ा, और नाड़ा खोलना नहीं सीधे निकाल के दूर फेंक दो। जिससे दुबारा पकड़ के चढ़ा के बाँध न ले।"

सुरजू बहुत ध्यान से बिस्तर के अखाड़े के दांव पेंच समझ रहा था, और इस खेल की जबरदस्त खिलाड़न इमरतिया उसको सब गुर सिखा रही थी।

" लेकिन ये मत समझो की भरतपुर इतनी आसानी से लूट लोगे। उसको भी उसकी भौजाई, घर की नाउन, माई मौसी सिखा रही होंगी। दोनों गोड़ में गोड़ फंसा के बाँध लेगी जिससे भले नाड़ा खुल जाए, लेकिन पेटीकोट उतर न पाए। फिर शहर वाली है तो पेटीकोट के नीचे भी का पता चड्ढी पहनती हो, या उस दिन जानबूझ के पहने। दूसरी बात, पेटीकोट की गाँठ, एक गाँठ नहीं भौजाई सब सिखा के भेजेंगी, सात सात गाँठ, और न खोल पाए, तो अगले दिन जब तोहार बहिनिया सब हाल चाल पूछेंगी न तो न हंस के वही चिढ़ाएगी,

' तोहार भाई तो पूरी रात लगा दिए, मुर्गा बोलने लगा, गाँठ खोलने में तो का कर पाते बेचारे। तुम सब कुछ सिखाये पढ़ाये नहीं थीं का।"

और उससे ज्यादा तोहार सास अपनी समधन का, तोहरी माई क चिढ़ाएँगी,

' बेटवा जिन्नगी भर पहलवानी करता रह गया और हमार बिटिया जाए के,... रात भर,.... नाड़ा क गाँठ ढूंढे में लग गयी, "

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अब भौजी सीने पे हाथ पे बुकवा लगी रही थीं फिर ढेर सारा बुकवा लेके जो थोड़ा सोया थोड़ा जाएगा मूसल था उसके ऊपर, और बस हलके हलके लें भौजाई की उँगलियों की छुअन लेकिन इतना काफी था, वो फिर से फुफकारने लगा।

सुरजू भौजी के गदराये जोबना को निहार रहा था, लालटेन की हलकी हलकी पीली रौशनी, जमीन पर छितरायी थी। गोरा चम्पई मुखा, छोटी सी नथ, बड़ी सी बिंदी, लाल लाल खूब भरे रसीले होंठ,

" क्यों खोलना है नाड़ा " भौजी एकदम उसके सीने पे चढ़ी, अपने पेटीकोट का नाड़ा दिखा रही थीं,
 
जोरू का गुलाम भाग २५२ तीज पार्टी की तैयारी पृष्ठ १५६८

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फागुन के दिन चार

भाग ४२ घर पृष्ठ ४४४

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भाग १०७ बुच्ची और चुनिया पृष्ठ ११००

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जोरू का गुलाम

भाग २५२ तीज पार्टी की तैयारी

पृष्ठ १५६८

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भाग १०८ - खुल गया नाड़ा

२७,३४,५१४

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इमरतिया उसको सब गुर सिखा रही थी।

" लेकिन ये मत समझो की भरतपुर इतनी आसानी से लूट लोगे। उसको भी उसकी भौजाई, घर की नाउन, माई मौसी सिखा रही होंगी। दोनों गोड़ में गोड़ फंसा के बाँध लेगी जिससे भले नाड़ा खुल जाए, लेकिन पेटीकोट उतर न पाए। फिर शहर वाली है तो पेटीकोट के नीचे भी का पता चड्ढी पहनती हो, या उस दिन जानबूझ के पहने।

दूसरी बात, पेटीकोट की गाँठ, एक गाँठ नहीं भौजाई सब सिखा के भेजेंगी, सात सात गाँठ, और न खोल पाए, तो अगले दिन जब तोहार बहिनिया सब हाल चाल पूछेंगी न तो न हंस के वही चिढ़ाएगी, ' तोहार भाई तो पूरी रात लगा दिए, मुर्गा बोलने लगा, गाँठ खोलने में तो का कर पाते बेचारे। तुम सब कुछ सिखाये पढ़ाये नहीं थीं का। '

और उससे ज्यादा तोहार सास अपनी समधन का, तोहरी माई क चिढ़ाएँगी,...' बेटवा जिन्नगी भर पहलवानी करता रहा गया और हमार बिटिया जाए के, रात भर में नाड़ा क गाँठ ढूंढे में लग गयी, "

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अब भौजी सीने पे हाथ पे बुकवा लगी रही थीं फिर ढेर सारा बुकवा लेके जो थोड़ा सोया थोड़ा जाएगा मूसल था उसके ऊपर, और बस हलके हलके लें भौजाई की उँगलियों की छुअन लेकिन इतना काफी था, वो फिर से फुफकारने लगा।

सुरजू भौजी के गदराये जोबना को निहार रहा था, लालटेन की हलकी हलकी पीली रौशनी, जमीन पर छितरायी थी।

गोरा चम्पई मुखा, छोटी सी नथ, बड़ी सी बिंदी, लाल लाल खूब भरे रसीले होंठ,

-" क्यों खोलना है नाड़ा " भौजी एकदम उसके सीने पे चढ़ी, अपने पेटीकोट का नाड़ा दिखा रही थीं,



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सुरजू ने हाथ बढ़ाया, लेकिन भौजी ने झटक दिया

" हे ऐसे थोड़ी। जिन्नगी में पहली बार नाड़ा खोल रहे हो, नेग देना पड़ेगा "

सुरजू ने बोला ही था की का चाही नेग में, बिना पीछे मुड़े बाएं हाथ से भौजी ने देवर का मुस्टंडा तन्नाया लंड पकड़ लिया और दाएं हाथ से देवर का हाथ खींच कर नाड़े पे,

" ये चाही, और जेकरे जेकरे बुरिया में कहब ओकरे ओकरे बुरिया में जाई "

" एकदम भौजी, लेकिन देवर के कुल गुन ढंग सिखाना पड़ेगा "

हँसते हुए सुरजू बोले और नाड़ा खींच दिया, सररर पेटीकोट नीचे और लालटेन की रौशनी में दोनों भरी भरी फांके, गलबाहें डाले, कसी चिपकी रस से भरी मालपूवे की तरह

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लालची मोटा नेवला लार टपकाने लगा। सुपाड़े के ऊपर प्री कम की दो बुँदे छलक गयीं

‘कुल सिखा दूंगी लेकिन पहले बुकवा तो छुड़ा दूँ, ‘ ....और बिना हाथ लगाए इमरतिया भौजी ने बुकवा छुड़ाना शुरू कर दिया, अपने जोबन से रगड़ के, देह से घिस घिस के, क्या कोई बाड़ी टू बाड़ी मसाज करेगा और जब खूंटे पे लगे बुकवा का नंबर आया, दोनों जोबना के बीच दबा के।

बेचारे सुरजू की हालत खराब थीं, पहली बार नारी देह का सुख मिल रहा था, वो भी ऐसी गदरायी,

" भौजी, भौजी हमें करे दे ना, ....करा न "

" अनाड़ी चुदवैया बुर क खराबी, अच्छा चला देवर क मन भौजी न राखी तो के राखी लेकिन तू कुछ जिन करना मैं ही करुँगी "

इमरतिया बोली और देवर के ऊपर,

अब उसकी रसमलाई लालटेन की रौशनी में साफ़ दिख रही थीं फिर भी, दोनों हाथों से दोनों फांको को फैला के सुरजू को दिखाया, ललचाया और तने सुपाड़े के ऊपर रगड़ के ऊपर उठा लिया।

सूरज को जोर से झटका लगा, वो बोल उठा, " भौजी करा न, चोदा ना "

":बोल, बुच्चिया को चोदबे ना : " इमरतिया ने तीन तिरबाचा भरवाया।

" हाँ भौजी हाँ " सुरजू तू किसी भी बात पे हाँ करने को तैयार था।

" आज से लाज शर्म झिझक खत्म, जउने लौंडिया को औरत को देखोगे बस खाली ओकर चूँची देखोगे, यही सोचोगे की चोदने में केतना मजा देगी "

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"हाँ भौजी हाँ " सुरुजू बोलै और इमरतिया ने थोड़ा सा कमर नीचे कर के अपनी रसमलाई की दोनों फांके पूरी ताकत से फैला के सुपाड़े में रगड़ दिया।

उसके मरद का भी अच्छा खासा बड़ा था, छह इंच से ज्यादा ही रहा होगा और उसके बाद भी तो इमरतिया ने एक से एक घोंटे थे, कड़ियल जवान, तगड़े मरद, पहली चीज वो यही देखती थी, औजार।

लेकिन देवर का तो पूरा बांस था, और मोटा कितना, लेकिन इमरतिया भी खूब खेली खायी थी। भले ही कितनी चुदी थी, लेकिन अभी तक लड़कोर नहीं थी तो बुर का भोसड़ा नहीं हुआ था और ऊपर से बहुत ख्याल भी रखती थी अपनी राजदुलारी का वो।

सबसे पहले वो सरसों के तेल की बोतल उठा के सीधे धीरे धीरे बोतल से ही खड़े लंड पर, चमचम चमक रहा था।

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अंजुरी भर तेल से पहले तो नहला दिया, फिर अंजुरी भर तेल सीधे खाली सुपाड़े पे, बूँद बूँद, टप टप, टप टप, जैसे अखाड़े में कोई नया नया पहलवान तेल लगा के उतरा हो,

हाथ में लगा तेल इमरतिया ने अपनी दुलारी पे लपेट लिया और दो तेल में चुपड़ी ऊँगली, देवर को दिखाते हुए बुरिया में डाल के फांके दोनों फैला दी, फिर दोनों टाँगे अपनी छितरा के सूरजु के ऊपर,

सुरजू का सीना जितना चौड़ा था, कमर उतनी ही पतली, और चूतड़ देख के लगता था बला की ताकत होगी उसमे।

दाएं हाथ से अपनी दोनों फांके फैला के, बाएं से सुरजू का खूंटा पकड़ के इमरतिया ने फंसा लिया और फिर दोनों हाथों से सुरजू की दोनों कलाई पकड़ के सांस रोक के अपनी ताकत से दुने जोर से पहला धक्का मारा। जैसे पहली रात में दूल्हा, तड़पती, छटपटाती, दुलहिनिया की दोनों कलाई पकड़ के पूरी ताकत से धक्का मारता है और दुल्हिन की चीख पहले निकलती है, फिर चुरमुराती चूड़ियां चटचटा के टूटती हैं और गप्प से सुपाड़ा अंदर, कभी पूरा, कभी आधा, लेकिन एक बार घुस गया तो फिर बिना फाड़े नहीं निकलता।

बस उसी तरह पूरी ताकत से पेला इमरतिया ने,
 
चढ़ गयी इमरतिया भौजी ----ऊपर

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" भौजी "

सुरजू की आँखे मजे से पलट गयीं, हल्की सी चीख निकल गयी। ये मजा उसने सोचा भी नहीं था। सारी देह का खून जैसे लंड में जमा हो गया था। देह गनगना रही थी।

इमरतिया सुरजू के मजे को देखकर मजा ले रही थी। बुर उसकी फटी जा रही थी, इतना दर्द तो बुर को बच्चा निकालते नहीं होगा, जितना इस मोटे मूसल को घोंट के हो रहा था, लग रहा था किसी ने पाव भर लाल मिर्च कूट कूट के भर दिया हो, ऐसे छरछरा परपरा रही थी।

लेकिन इसी छरछराने परपराने के लिए तो औरतें मरी जाती हैं।

सुरजू ने आँखे खोली और भौजी की आँखे उस की आँखों को देख के बिन बोले मुस्करा पड़ी, जैसे पूछ रही हों, मजा आया ? और देवर की आँख लजा गयी, जैसे नयी दुल्हन हो और इमरतिया भौजी दूल्हा हो।

इमरतिया ने कलाई छोड़ दी और अबकी सुरजू के दोनों कंधो को पकड़ के क्या हुमच के धक्का मारा और एक इंच और अंदर घुस गया। सुपाड़े ने अब बुर के अंदर जगह बना ली थी और इमरतिया ने सुरजू के दोनों हाथों को पकड़ के अपने जोबन पे रख के समझाया

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" इस से भी जोर से,…. ताकत से धक्का मारना होगा, बुच्ची की बुरिया में एकदम कोरी है, कच्ची तोहरी दुलहिनिया की तरह और दुलहिनिया के साथे तो और,…। नयी दुल्हन जान बुझ के तड़पाती हैं, पेलने नहीं देती, और केतनो चिचिययाये, रोये गाये, हाथ जोड़े, पूरी ताकत से पेले बिना घुसेगा नहीं, ज़रा भी रहम नहीं करना, पूरी बेदर्दी से पेलना। आपन पूरी पहलवानी देखाय देना वरना नाक कटी तोहार महतारी की, तोहरी ससुरारी में उनकी हंसाई होगी, यही दूध पिलाई थीं की लड़का घुसेड़ भी नहीं पाया। तोहरी दुलहिनिया तो और अपनी ओर से भींच के रखेगी, जांघ सटा के, देखें कैसे घुसाते हैं, मरद हमार। उसकी महतारी भौजाई, गाँव का नाउन कुल सिखा के भेजेंगी, इस लिए पूरी ताकत और कोई रहम नहीं, चीखने चिल्लाने पे। आखिर ओकर महतारी चुदवाने के लिए ही तो भेजी हैं. समझे बबुआ, “

इमरतिया अपने देवर को समझा भी रही थी, नयी दुलहिनिया को कस कस के पेलने के लिए, पहली रात के मजे के लिए तैयार भी कर रही थी, समझा के।

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फिर इमरतिया भौजी ने देवर को उकसाया।

“अब जरा नीचे से धक्का मारो, देखी तोहार पहलवानी। "

बेचारा पहलवान, पहली बार चुदाई के अखाड़े में उतरा था, और पहली बार धक्का मार रहा था, जोर उसने पूरा लगाया लेकिन हँसते हुए इमरतिया ने रोक दिया,

" अरे अपनी माई के भतार, तोहार महतारी कुछ सिखायेस नहीं, ऐसे नहीं खाली चूतड़ के जोर से "

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खाली सिखाने की देर थी, और अबकी नीचे से सुरजू ने पूरे जोर से धक्का मारा, इमरतिया ने अपनी कमर उसके दोनों हाथो में पकड़ा दी। सच में दस हाथी का जोर था, देवर में और हाथों की पकड़ भी तगड़ी थी।

इमरतिया कांप गयी, जैसे किसी ने मुट्ठी पेल दी हो। लेकिन उससे बड़ी बात थी धक्के रुके नहीं थे, एक बाद दूसरा। सच में सुरजू के लंड में ऐसी ताकत थी की दीवाल में छेद कर दे बस थोड़ा गुन ढंग सिखाने की बात थी।

पांच दस धक्के के बाद सुरजू ने साँस ली और मुस्करा के इमरतिया ने देखा और एक बार फिर से कमान अपने हाथ में ले

" अरे अपनी महतारी के यार, खाली धक्के मारने से काम नहीं चलेगा, …कल को अपनी बहिनिया बुच्ची की चोदोगे या अपनी दुलहिनिया की,… तो पांच दस धक्के के बाद रुक जाना, एक बार में पूरा बांस नहीं घोंट पाएंगी दोनों।"

थोड़ी देर कसी बुर में लंड का मजा लेने देना और लौंडिया की देह में तो हर जगह से रस छलकता है, चूँची है, गाल है, पूरी देह है सहलाओ, दबाओ, मसलो, नोचो, काटो। अरे दांत के, नाख़ून के निशान तो बहुत जरूरी है, वही देख देख के सोच सोच के अगले दिन दुलहिनिया का फिर से मन करेगा और ननदें छेड़ेंगी, ' क्यों भौजी, मच्छर काटा है का । '

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और हाँ कोई सम्हलने की अपने को रोकने की जरूरत नहीं की, कही चोट न लग जाए, दर्द न हो, खूब चीखेगी, कहरेगी, माई बाप करेगी, मतलब और करो।

अरे सब लोग मिल के बरात ले के जाओगे, काहें के लिए उसको लाने, चोदने के लिए ही न, और ओकर महतारी तोहार दरवाजा खन दी, हमरे बिटिया से बियाह करवाय द, भाई,… महतारी कुल भेज रहे हैं, काहें,… चुदवाने के लिए ही न,…. फिर तो जब चुदवाने आ रही है तो तनी ढंग से चुदवावे, कस कस के चूँची दबाओ, कचकचा के गाल काटो, चूस चूस के होंठ सुजा दो, चौथी ले के उसके भाई कुल काहें आते हैं ? यही देखने के लिए की उनकी बहिनिया ढंग से चोदी जा रही है की नहीं, “

और ये कह के भौजी ने देवर के दोनों हाथ एक बार फिर से अपनी दोनों बड़ी बड़ी चूँची पे रख लिए। अंधे को का चाहे दो आंखे और पगलाए देवर को का चाही, भौजी क दोनों चूँची

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बस क्या ताकत से चूँची इमरतिया की मसली गयीं, रगड़ी गयीं और इमरतिया नौसिखिया देवर को उकसा के, सिखा के देवरानी के लिए तैयार कर रही थी। और अब इमरतिया ने फिर से ऊपर से धक्के लगाने शुरू कर दिए और देवर से बोली

' और देवर जी, चोदते समय, जितना देर तक और जितना रगड़ रगड़ के,… औरत हो लौंडिया हो, पेली जाए, उस स्साली को उतना ही मजा आता है, मुंह से चाहे जो बोले, जितना चीखे चिल्लाये, छोड़ दो, बहुत पीरा रहा है, नहीं ले पाउंगी, ….तो सोचो स्साली काहें नहीं ले पाएगी, महतारी बाप भेजे काहें हैं, लौंड़ा घोंटने को ही तो भेजे हैं। इसलिए कुछ देर पेलने के बाद मौज मस्ती लो, और जब वो बुर के अंदर के लंड को भूलने लगे कहे अरे चूँची मत काटो बहुत पिरा रहा है तो और हचक के धक्के मारो "

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और यह कह के भौजी ने क्या जबरदस्त धक्के मारे और देवर का पूरा बांस घोंट लिया।
 
इमरतिया भौजी और सूरजु देवर

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इमरतिया की आँख के आगे तारे नाच रहे थे जैसे ही मोटे सुपाड़े ने बच्चेदानी पे धक्का मारा, स्साला सुपाड़ा है की हथोड़ा। पर कुछ रुक के बजाय ऊपर नीचे होने के वो सिर्फ आगे पीछे कर रही थी, फिर कभी उस मोटे मूसल को कस के भींच लेती, बुरिया सिकोड़ लेती और सुरजू चीख उठते

" ओह्ह भौजी, बहुत मजा आ रहा है, उफ़ हाँ भौजी हाँ केतना अच्छा लग रहा है "

और भौजी ढीली कर के फिर पहले से भी कस के देवर के लंड को भींच लेती और हलके से अपने को ऊपर खींच देवर को दूसरा दांव सिखाया, सुरजू को लग रहा था जैसे वो अखाड़े के नए नए दांव सीख रहा है।

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इमरतिया ने सुरजू के हाथ को पकड़ के अपने दोनों बड़े बड़े चूतड़ पर रख दिया और हल्के से उचकाया और सुरजू समझ गया।

बस अपने बांस पर चढ़ी भौजी को उसने दोनों चूतड़ पकड़ के थोड़ा सा ऊपर उठाया, फिर थोड़ा और, और फिर नीचे खींचा। जब लंड बुर के अंदर रगड़ रगड़ कर ऊपर नीचे होना लगा तो देवर भौजी दोनों की हालत खराब,

"अरे भौजी बहुत निक लग रहा है, ससुरा इतना मजा है चोदने में, ओह्ह अब तो हम बिना चोदे,…. हाँ भौजी हां, भौजी हमर बहुत अच्छी है"

सुरजू सिसक रहे थे नीचे से धक्के मार रहे थे और अब इमरतिया ने पूरा कंट्रोल देवर के हाथ में छोड़ दिया था

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झुक के कान में फुसफुसा के बोली

" अबे स्साले, तेरी माँ का भोंसड़ा मारु, तो चोद न। तोहार बहिनिया बुच्ची इतनी गर्मायी है,…

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फिर तोहार ससुरारी वाले भेज रहे हैं चोदने के लिए मस्त माल.

लेकिन ओकरे पहले,बरात जाने के पहले अब एक दिन भी नागा नहीं होने दूंगी में अपने देवर को, चोद कस कस के और जिस भी लौंडिया को देखो, मेहरारू को देखो…., ये सोचो की इसको चोदने में कितना मजा आएगा.न नाता रिश्ता न उमर, चाहे बुच्चिया अस कच्ची कोरी हो, या चार पांच बच्चों वाली, भोंसड़ी वाली हो, सब का मज़ा अलग, रस अलग। अरे हमार बात माना देवर तो नागा छोड़ा, रोज दो तीन माल मिलेगा, बियाहे का घर, कौन माल क कमी, फिर इतना बड़ा २२ पुरवा क गाँव, .... हर तरह का, बियाहे के पहले पक्का हो जाओगे " "

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जब औरत ऊपर चढ़ के लंड घोंटती है तब भी मरद का बहुत रोल रहता है और यही इमरतिया सिखा रही थी देवर को।

साथ में सुरुजू के मन की कुल गाँठ धीरे धीरे खोल रही थी, नाता रिश्ता भुलवाकर। औजार इतना मस्त है और एक बार चूत का भूत सर चढ़ गया तो नम्बरी चोदू हो जाएगा और फिर जिन्नगी भर इमरतिया भौजी को याद रखेगा, कौन मजा दिलवाई थीं।

कुछ ही देर में चुदाई का तूफ़ान बहुत तेज हो गया, सुरजू बोल रहे थे,

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" नहीं भौजी, हाँ भौजी, अरे हमारा झड़ जाएगा, ओह्ह निकाल लो "

लेकिन इमरतिया ने उसे एक बार इसी लिए पहले झाड़ दिया था दूसरी बार जब बुर में डाल के जिंदगी की पहली चुदाई करे तो पूरा टाइम ले देवर, चिढ़ाते बोली

" तो केकरि बुर में झड़ना चाहते हो, अपनी बहिनिया के, बुच्ची के, की आपने महतारी के भोंसडे में,… अरे हमार देवर हो. इतनी जल्दी नहीं गिरोगे। "

और ऊपर से इमरतिया ने भी चुदाई की रफ़्तार बड़ा दी, वो खुद झड़ रही थी, हांफ रही थी बार बार उस की बुर सिकुड़ रही थी।

बरसो बाद ऐसा झड़ी थी वो, लेकिन थोड़ी देर बाद सुरजू भी कगार पर पहुँच गया,

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और इमरतिया तैयार थी एक बार फिर से वही मिटटी का सकोरा ले के और इस बार फिर सब मलाई उसने उसी में रोप लिया और मिटटी का बड़ा सा खूब गहरा सकोरा, बीज से भर गया एकदम लबालब। एक बूँद भी देवर की मलाई अपनी बुर में नहीं गिरने दी, सब का सब मिटटी के सकोरे में,

और कुछ देर बार बाद भाई का बीज बहिनिया के पेट में। बच्ची ने कल कुल्डह भर अपने भैया सुरुजू क बीज शीरा में मिला के, शीरा समझ के गटका था और आज सूरजु क बीज खीर में, सकोरा भर पीयेगी। कहते हैं कुँवारी बिनचुदी के होंठ पे एक बूँद कौन मरद क बीज चखा दो तो खुद बिल फैला के उसके पीछे पीछे दौड़ेगी, और यहाँ तो पूरा कुल्हड़ और सकोरा भर के, खुदे चुदवाने आएगी।
 
दूल्हे की बहिनिया -बुच्ची

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सुरजू की आँखे बंद थी, एकदम थका जैसे कोई बड़ा मुश्किल दंगल जीत गया हो, इमरतिया कस के भींच के उसे लेटी रही, फिर खूंटे पे वो स्पेशल तेल, जिसमे आधा तो सांडे का तेल था, फिर ढेर सारा जड़ी बूटी, और कई तेल थे, हथेली में ले के हलके हलके मलने लगी। दस मिनट में वो सूख जाता उसके बाद तो तन और मन दोनों पे गजब का असर होता।

और हलके हलके सुरजू को बुच्ची के बारे में कुछ समझाती जाती।

शैतान का नाम लो, शैतान हाजिर बाहर से बुच्ची की आवाज आयी,

"भौजी, भैया का खाना ले आयी? …. महराजीन बोली हैं खाना भैया का तैयार है "

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"हाँ बस, पांच मिनट में ले आना.... और महराजिन को तोहरे भतार के लिए खास खीर बनाने के लिए बोले थे, ....तो एक बड़का कसोरा में वो भी." इमरतिया ने बिना दरवाजा खोले अपनी ननद को जवाब दिया।

सुरजू को इमरतिया ने एक पतली सी रजाई ओढ़ा दी और बोला,

"तोहार रखैल अभी खाना ले के आ रही होगी। कुछ पहनने की जरूरत नहीं है, तेल बुकवा का असर ख़त्म हो जाएगा, दस मिनट तक ऐसे आँखे बंद कर के, ओढ़ के लेटो और अपने माल के गाल के बारे में सोचो "

सुरजू ओढ़ बिढ़ के लेट गए, और इमरतिया ने चुपके से वो मिटटी का सकोरा जिसमे करीब दो अंजुरी भर के सुरजू की गाढ़ी मलाई छलछला रही थी, पीछे एक ताखे पे रख दिया, और खूंटी पे रखी अपनी साड़ी उतार के बस जस तस लपेट लिया, ब्लाउज पेटीकोट अभी भी फर्श पर पड़े थे। सुरजू के कपडे भी खूंटी पे टांग दिए।

सुरजू को बस वो महसूस हो रहा था, जो आज तक नहीं महसूस हुआ था। अभी तक देह झनझना रही थी, इतना अच्छा लग रहा था, बस बता नहीं सकता, जैसे कोई बड़ा सा दंगल जीतने के बाद एक नयी ख़ुशी होती थी, लगता था उसने कुछ कर दिया है।

अब वो सोच रहा था वो क्या मिस कर रहा था, सच में नारी देह, तभी तो सब इसके पीछे पड़े रहते है।

और वो तो इमरतिया भौजी, बल्कि माई,....वही तो इमरतिया भौजी को बोलीं, ये जिम्मेदारी सौंपी और माईबोली,

' सुन मुन्ना, …..आज से इमरतिया क हुकुम तो हमार हुकुम, बल्कि अगले दस दिन तक खाली तोहार भौजी का हुकुम, '

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गुरु जी भी उसके बस एक ही बात कहते थे, ताकत जरूरी है देह में, तगड़ा होना भी, एक एक मांसपेशी का काम होता है, तो दंड बैठक, कसरत, लेकिन उसके साथ ही जरूरी है दो चीज।

एक तो दांव पेंच सही से आना, और वो भी कब कहाँ और किस पे कौन सा दांव चलेगा, और ऐन मौके पे वो दांव लगाना और वो आता है प्रैक्टिस से।

दूसरी बात कुश्ती में मजा आना चाहिए, दिमाग में हरदम वही चलेगा , दांव के बारे में, मौका मिलने पे किसको कैसे पटकना है, और यही बात, ठीक यही बात इमरतिया भौजी कह रही हैं,

सुरजू के देह में अभी भी हलकी हलकी झझंझनाहट थी, और बुकवा तेल का असर लग रहा था।

एकदम कोई थकान नहीं थी, पूरी देह हल्की सी लग रही थी लेकिन ' वहां' एक अजीब सी फड़फड़ाहट हो रही थी, कुछ चुनचुना रहा था और वो बिना बात के हलके हलके फनफना रहा था, मन कर रहा था बस कोई मिल जाए,..कोई मतलब कोई, किसी उमर की हो, बस हो ,.... पकड़ के पटक के चोद दूँ।

उधर बुच्ची खाना लेने गयी

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बुच्ची की हालत सूरजु से कम खराब नहीं थी, कल रात भर जो भौजाइयों ने उसकी रगड़ाई की, तीन बार उसकी चुनमुनिया झड़ने के कगार पर पहुंची और तीनो बार झड़ने से रोक दिया और हर बार कबुलवाया,

'बोल स्साली हमरे देवर से चुदवाओगी"

और उससे खुल के बुलवाया एक दो बार नहीं दस बार, की वो सुरजू भैया का लंड अपनी चूत में लेगी, भौजी के आने के पहले ही। और सबसे बढ़के मंजू भाभी,

'अरे देवर से नहीं देवरन से, खाली दूल्हे का घोंटने से काम नहीं चलेगा, घर गाँव में देवरन क कमी नहीं है, फिर हम भौजाई लोगन क भी तो भाई है क्यों मुन्ना बहू"

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" और मुन्ना बहू ने न सिर्फ मंजू भाभी की बात में हुंकारी भरी, बल्कि बुच्ची का गाल मीजते हुए, बता भी दिया,

" अरे बुच्ची बबुनी को अब लंड क कउनो कमी नहीं होगी, ...दो चार लंड क इंतजाम तो रोज नया नया, तोहार ये भौजी कर देंगी, मुन्ना बहु "

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और उसके बाद इमरतिया भौजी ने सबेरे भैया का 'दरसन' करा दिया,

स्साला सोच सोच के अभी तक देह गिनगीना जा रही है। केतना मोटा था, लेकिन इतना तो वो भी जान गयी थी की केतनो मोटा हो,... घुस तो जाता ही है, कितनी बार वो देखी थी, सांड़ को बछिया पे चढ़ते, कैसे दबोच के ठोंकता है, इतना लम्बा मोटा, खूब छटपटाती है लेकिन घोंट लेती है, और वही न मिले तो कितना हुड़कती है,

बुच्ची ने इसी गाँव में दो चार महीने पहले ही अपनी सहेलीशीलवा , को कभी गन्ने के खेत में कभी आम की बाग़ में दरजनो बार एक से एक लंड लेते देखा था कितनी बार तो उसकी सहेली एक साथ दो,दो, एक आगे पीछे, चौकीदारी तो बुच्ची ही करती थी तो देखती भी थी, लेकिन एक बात थी, जो सबेरे उसने देखा था, अपने भैया का वो मोटा कड़ियल फुफकारता नाग था, उसके आगे तो वो सब,.... एक बार भैया का किसी तरह ले ले फिर तो बाकी सब को वो निचोड़ के रख देगी, शीलवा का नंबर डका के जायेगी अबकी।

वो महराजिन के पास से कपड़ा चेंज करने आयी थी।

अब यही पहन कर रात में और फिर मंजू भाभी, मुन्ना बहु और इमरतिया भौजी, के साथ कोहबर में खूब मस्ती होगी और फिर गाना भी आज से, और यही पहन के सोना भी होगा,

बुच्ची ने एक पुरानी स्कूल की ड्रेस निकाली, टाइट होती है तो क्या, एक टॉप, और स्कर्ट और साथ में एक मोटी सी चड्ढी। आज कल तो हमला सीधे नीचे ही होता है तो चड्ढी तो बहुत जरूरी है।

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और रसोई में पहुंची तो पहले महराजिन उबल पड़ी,

" बबुनी केसे केसे चुदवा रही थी, ....यहाँ खाना निकाल के ठंडा हो रहा था, "

" अरे चोदने वालों की कौन कमी है,… हमारी ननद को, “

सुरजू भैया के ननिहाल की एक भौजी जो थोड़ी देर पहले आयी थीं, बोलीं और जोड़ा,

“इतने तो हमार देवर हैं, सब के सब बहनचोद,... बिना चोदे छोड़ेंगे थोड़ी हमार बुच्ची को। "

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कहारिन भौजी ने और पलीता लगाया,

" अरे पहले इनके भाई हमर देवर पेलेंगे, फिर हमार भाई पेलेंगे, बुच्ची बबुनी केहू को मना नहीं करेंगी सबका मन रखेंगी, जरा सी दो इंच की चीज के लिए '

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तबतक चुनिया के साथ मंजू भाभी भी रसोई में आ गयी और बोली,

" वो तो ठीक हैं लेकिन बुच्ची अभी किससे चुदवा के आ रही हो, ये तो बता दो अब भौजाई से कौन शर्म "

" अरे तो बुरिया बजबजा रही होगी न, अभी खोल के देख लेती हूँ "

कहारिन भौजी बोलीं और जैसे इशारा पाके पीछे से चुनिया ने अपनी सहेली का हाथ दबोच लिया और कहारिन भौजी ने एक झटके में स्कर्ट उठा दी।

सफ़ेद खूब मोटी चड्ढी,

और अब तो सब भौजाई पीछे पड़ गयीं, " अरे का बात है, दुलहिनिया को बड़ा परदे में रखा है, इतना घूंघट काढ़ा है, जरूर कुछ घोंट के आयी है "

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और चड्ढी कहारिन भौजी के हाथ में, और उसके बाद किस किस भाभी के हाथ में पहुंची, कित्ते हिस्से में फटी, बंटी,…. पता नहीं चला बुच्ची को, क्योंकि एक तो कहारिन भौजी ने दोनों फांक खोल दी थी, गुलाबी बुलबुल चोंच खोल के देख रही थी और ऊपर से महराजिन भाभियो पे हल्ला कर रही थी

" अरे अभी खाना ले के जाने दो, देर हो रही है, रात में गाने में मजा लेना ननद लोगो का तुम सब और हाँ बुच्ची ये मिटटी के सकोरे में तोहरे भैया के लिए खीर भी है "

बाहर से भैया की माई भी हल्ला कर रही थीं, अरे अभी दुलहा का खाना गया की नहीं।
 
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