दूल्हे की बहिनिया -बुच्ची
सुरजू की आँखे बंद थी, एकदम थका जैसे कोई बड़ा मुश्किल दंगल जीत गया हो, इमरतिया कस के भींच के उसे लेटी रही, फिर खूंटे पे वो स्पेशल तेल, जिसमे आधा तो सांडे का तेल था, फिर ढेर सारा जड़ी बूटी, और कई तेल थे, हथेली में ले के हलके हलके मलने लगी। दस मिनट में वो सूख जाता उसके बाद तो तन और मन दोनों पे गजब का असर होता।
और हलके हलके सुरजू को बुच्ची के बारे में कुछ समझाती जाती।
शैतान का नाम लो, शैतान हाजिर बाहर से बुच्ची की आवाज आयी,
"भौजी, भैया का खाना ले आयी? …. महराजीन बोली हैं खाना भैया का तैयार है "
"हाँ बस, पांच मिनट में ले आना.... और महराजिन को तोहरे भतार के लिए खास खीर बनाने के लिए बोले थे, ....तो एक बड़का कसोरा में वो भी." इमरतिया ने बिना दरवाजा खोले अपनी ननद को जवाब दिया।
सुरजू को इमरतिया ने एक पतली सी रजाई ओढ़ा दी और बोला,
"तोहार रखैल अभी खाना ले के आ रही होगी। कुछ पहनने की जरूरत नहीं है, तेल बुकवा का असर ख़त्म हो जाएगा, दस मिनट तक ऐसे आँखे बंद कर के, ओढ़ के लेटो और अपने माल के गाल के बारे में सोचो "
सुरजू ओढ़ बिढ़ के लेट गए, और इमरतिया ने चुपके से वो मिटटी का सकोरा जिसमे करीब दो अंजुरी भर के सुरजू की गाढ़ी मलाई छलछला रही थी, पीछे एक ताखे पे रख दिया, और खूंटी पे रखी अपनी साड़ी उतार के बस जस तस लपेट लिया, ब्लाउज पेटीकोट अभी भी फर्श पर पड़े थे। सुरजू के कपडे भी खूंटी पे टांग दिए।
सुरजू को बस वो महसूस हो रहा था, जो आज तक नहीं महसूस हुआ था। अभी तक देह झनझना रही थी, इतना अच्छा लग रहा था, बस बता नहीं सकता, जैसे कोई बड़ा सा दंगल जीतने के बाद एक नयी ख़ुशी होती थी, लगता था उसने कुछ कर दिया है।
अब वो सोच रहा था वो क्या मिस कर रहा था, सच में नारी देह, तभी तो सब इसके पीछे पड़े रहते है।
और वो तो इमरतिया भौजी, बल्कि माई,....वही तो इमरतिया भौजी को बोलीं, ये जिम्मेदारी सौंपी और माईबोली,
' सुन मुन्ना, …..आज से इमरतिया क हुकुम तो हमार हुकुम, बल्कि अगले दस दिन तक खाली तोहार भौजी का हुकुम, '
गुरु जी भी उसके बस एक ही बात कहते थे, ताकत जरूरी है देह में, तगड़ा होना भी, एक एक मांसपेशी का काम होता है, तो दंड बैठक, कसरत, लेकिन उसके साथ ही जरूरी है दो चीज।
एक तो दांव पेंच सही से आना, और वो भी कब कहाँ और किस पे कौन सा दांव चलेगा, और ऐन मौके पे वो दांव लगाना और वो आता है प्रैक्टिस से।
दूसरी बात कुश्ती में मजा आना चाहिए, दिमाग में हरदम वही चलेगा , दांव के बारे में, मौका मिलने पे किसको कैसे पटकना है, और यही बात, ठीक यही बात इमरतिया भौजी कह रही हैं,
सुरजू के देह में अभी भी हलकी हलकी झझंझनाहट थी, और बुकवा तेल का असर लग रहा था।
एकदम कोई थकान नहीं थी, पूरी देह हल्की सी लग रही थी लेकिन ' वहां' एक अजीब सी फड़फड़ाहट हो रही थी, कुछ चुनचुना रहा था और वो बिना बात के हलके हलके फनफना रहा था, मन कर रहा था बस कोई मिल जाए,..कोई मतलब कोई, किसी उमर की हो, बस हो ,.... पकड़ के पटक के चोद दूँ।
उधर बुच्ची खाना लेने गयी
बुच्ची की हालत सूरजु से कम खराब नहीं थी, कल रात भर जो भौजाइयों ने उसकी रगड़ाई की, तीन बार उसकी चुनमुनिया झड़ने के कगार पर पहुंची और तीनो बार झड़ने से रोक दिया और हर बार कबुलवाया,
'बोल स्साली हमरे देवर से चुदवाओगी"
और उससे खुल के बुलवाया एक दो बार नहीं दस बार, की वो सुरजू भैया का लंड अपनी चूत में लेगी, भौजी के आने के पहले ही। और सबसे बढ़के मंजू भाभी,
'अरे देवर से नहीं देवरन से, खाली दूल्हे का घोंटने से काम नहीं चलेगा, घर गाँव में देवरन क कमी नहीं है, फिर हम भौजाई लोगन क भी तो भाई है क्यों मुन्ना बहू"
" और मुन्ना बहू ने न सिर्फ मंजू भाभी की बात में हुंकारी भरी, बल्कि बुच्ची का गाल मीजते हुए, बता भी दिया,
" अरे बुच्ची बबुनी को अब लंड क कउनो कमी नहीं होगी, ...दो चार लंड क इंतजाम तो रोज नया नया, तोहार ये भौजी कर देंगी, मुन्ना बहु "
और उसके बाद इमरतिया भौजी ने सबेरे भैया का 'दरसन' करा दिया,
स्साला सोच सोच के अभी तक देह गिनगीना जा रही है। केतना मोटा था, लेकिन इतना तो वो भी जान गयी थी की केतनो मोटा हो,... घुस तो जाता ही है, कितनी बार वो देखी थी, सांड़ को बछिया पे चढ़ते, कैसे दबोच के ठोंकता है, इतना लम्बा मोटा, खूब छटपटाती है लेकिन घोंट लेती है, और वही न मिले तो कितना हुड़कती है,
बुच्ची ने इसी गाँव में दो चार महीने पहले ही अपनी सहेलीशीलवा , को कभी गन्ने के खेत में कभी आम की बाग़ में दरजनो बार एक से एक लंड लेते देखा था कितनी बार तो उसकी सहेली एक साथ दो,दो, एक आगे पीछे, चौकीदारी तो बुच्ची ही करती थी तो देखती भी थी, लेकिन एक बात थी, जो सबेरे उसने देखा था, अपने भैया का वो मोटा कड़ियल फुफकारता नाग था, उसके आगे तो वो सब,.... एक बार भैया का किसी तरह ले ले फिर तो बाकी सब को वो निचोड़ के रख देगी, शीलवा का नंबर डका के जायेगी अबकी।
वो महराजिन के पास से कपड़ा चेंज करने आयी थी।
अब यही पहन कर रात में और फिर मंजू भाभी, मुन्ना बहु और इमरतिया भौजी, के साथ कोहबर में खूब मस्ती होगी और फिर गाना भी आज से, और यही पहन के सोना भी होगा,
बुच्ची ने एक पुरानी स्कूल की ड्रेस निकाली, टाइट होती है तो क्या, एक टॉप, और स्कर्ट और साथ में एक मोटी सी चड्ढी। आज कल तो हमला सीधे नीचे ही होता है तो चड्ढी तो बहुत जरूरी है।
और रसोई में पहुंची तो पहले महराजिन उबल पड़ी,
" बबुनी केसे केसे चुदवा रही थी, ....यहाँ खाना निकाल के ठंडा हो रहा था, "
" अरे चोदने वालों की कौन कमी है,… हमारी ननद को, “
सुरजू भैया के ननिहाल की एक भौजी जो थोड़ी देर पहले आयी थीं, बोलीं और जोड़ा,
“इतने तो हमार देवर हैं, सब के सब बहनचोद,... बिना चोदे छोड़ेंगे थोड़ी हमार बुच्ची को। "
कहारिन भौजी ने और पलीता लगाया,
" अरे पहले इनके भाई हमर देवर पेलेंगे, फिर हमार भाई पेलेंगे, बुच्ची बबुनी केहू को मना नहीं करेंगी सबका मन रखेंगी, जरा सी दो इंच की चीज के लिए '
तबतक चुनिया के साथ मंजू भाभी भी रसोई में आ गयी और बोली,
" वो तो ठीक हैं लेकिन बुच्ची अभी किससे चुदवा के आ रही हो, ये तो बता दो अब भौजाई से कौन शर्म "
" अरे तो बुरिया बजबजा रही होगी न, अभी खोल के देख लेती हूँ "
कहारिन भौजी बोलीं और जैसे इशारा पाके पीछे से चुनिया ने अपनी सहेली का हाथ दबोच लिया और कहारिन भौजी ने एक झटके में स्कर्ट उठा दी।
सफ़ेद खूब मोटी चड्ढी,
और अब तो सब भौजाई पीछे पड़ गयीं, " अरे का बात है, दुलहिनिया को बड़ा परदे में रखा है, इतना घूंघट काढ़ा है, जरूर कुछ घोंट के आयी है "
और चड्ढी कहारिन भौजी के हाथ में, और उसके बाद किस किस भाभी के हाथ में पहुंची, कित्ते हिस्से में फटी, बंटी,…. पता नहीं चला बुच्ची को, क्योंकि एक तो कहारिन भौजी ने दोनों फांक खोल दी थी, गुलाबी बुलबुल चोंच खोल के देख रही थी और ऊपर से महराजिन भाभियो पे हल्ला कर रही थी
" अरे अभी खाना ले के जाने दो, देर हो रही है, रात में गाने में मजा लेना ननद लोगो का तुम सब और हाँ बुच्ची ये मिटटी के सकोरे में तोहरे भैया के लिए खीर भी है "
बाहर से भैया की माई भी हल्ला कर रही थीं, अरे अभी दुलहा का खाना गया की नहीं।