Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 11 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#86



मैं- मुझे भी उस दवा की जरुरत पड़ेगी भैया,

मैंने फिर से कहा . भैया की नजरे बस देखती रही मुझ को पर वो कुछ बोले नहीं , एक शब्द. मेरे कान बेकरार थे उनके मुह से कुछ भी सुनने को . पांच, दस, बीस, तीस मिनट बीते भैया कुछ न बोले. शून्य में ताकते रहे वो .

“भैया, कुछ तो बोलिए ” मैं भैया को ख्यालो की दुनिया से धरातल पर लाया.

भैया- रूपांतरण हुआ

मैं- नहीं काबू है अभी तो मेरा खुद पर , पर नहीं जानता कब तक रख पाऊंगा.

भैया- तेरा भाई अभी जिन्दा है , भरोसा रख कुछ नहीं होगा तुझे, मैं होने ही नहीं दूंगा कुछ तुझे. ये बात किसी और को मत बताना. चाहे कुछ भी हो जाये मत बताना.

भैया ने मुझे दिलासा तो दिया था पर उनके चेहरे का तेज खो गया था . भैया वहां से चले गए . मैं खेतो में घुमने चल पड़ा कुछ दूर जाने पर मैंने चंपा को देखा अकेले पगडण्डी पर बैठे हुए.

मैं- यहाँ क्यों बैठी है

चंपा- बस ऐसे ही , तुम बताओ आजकल मिलते ही नहीं न जाने कहाँ गायब रहते हो .

मैं- कुछ जरुरी काम पुरे कर रहा हूँ. तेरे ब्याह के बाद मैं भी शादी करके जीवन शुरू करना चाहता हूँ .

चंपा- तूने बताया नहीं कौन है वो

मैं-सबसे पहले तुझे ही बताया था

चंपा ने इधर उधर देखा और बोली- क्या तू सच में डाकन से ही ब्याह करेगा.

मैं- सच में ही

चंपा- पागल हुआ है तू.

मैं- पागल ही सही , दीवानों को ये जमाना पागल ही समझता है खैर तू बता कैसी कट रही है तेरी.

चंपा- बस जी रही हूँ, जबसे तू रूठा है लगता है बदन का एक हिस्सा टूट गया है .

मैं- मैं कहाँ रूठा तुझसे. मुझे कोई गिला नहीं तुझे , ये तेरी जिन्दगी है इसे तुझे जीना है . तू अपनी मर्जी से जी , जीना भी चाहिए .

चंपा- गलतिया तो इंसानों से ही होती है न

मैं- कोई गलती नहीं मानता मैं इसे. दो पक्षों की रजामंदी है तो कोई गलती नहीं . तू भी अपने दिल से इस मलाल को निकाल दे. जब से तेरी हंसी रूठी है घर की रौनक ही गायब हो गयी . और फिर कहे भी तो किस हक़ से हमाम में तू भी नंगी मैं भी नंगा . रिश्तो की डोर तुझसे भी टूटी मुझसे भी टूटी. तुझे गलत कहा तो मैं सही कैसे हुआ फिर. मेरे मन की ब्यथा मैं तुझे नहीं बता सकता तू अपने मन की बात मुझे नहीं बता सकती . बस इतना जरुर याद रखना कबीर चंपा के साथ पहले भी था और हमेशा रहेगा.

इस से पहले की चंपा की आँखों से आंसू गिर पड़ते मैंने उसके चेहरे को हाथो में लिया और उसके गुलाबी लबो को चूम लिया.

“”दोस्ती में शर्ते नहीं होती, दोस्ती में बंधन नहीं होता. दोस्ती में मजबुरिया नहीं होती दोस्ती बस दोस्ती होती है . ये कभी मत भूलना कबीर की दोस्त है तू. ” मैंने चंपा के सर पर हाथ फेरा .

रिश्तो की इस भूलभुलैया में उलझे हुए मैं इतना तो समझ गया था की अभिमानु भैया के लिए कितनी मुश्किल रही होगी इस परिवार को एक सूत्र में थामे रखना. कुछ देर खेतो पर रहने के बाद मैं रमा के पुराने घर पर पहुँच गया . मजदूरो ने तक़रीबन काम ख़तम कर दिया. घर तैयार था बस रमा को वापिस लाना था यहाँ.

मलिकपुर जाने से पहले मैं कपडे बदलने के लिए घर गया . अपने चौबारे में था ही की भाभी आ गयी .

मैं- भाभी, थोड़ी मदद चाहिए

भाभी- क्या चाहिए बताओ

मैं- कुवे पर एक कमरा बनाना है , भैया हाँ नहीं कह रहे आप कहेंगी तो आपका कहा नहीं टालेंगे वो.

भाभी- उन्होंने बताया था मुझे इस बारे में

मैं- आप तो जानती हो मना लो न भैया को

भाभी- वो कभी नहीं मानेंगे .

मैं- भैया नहीं मानेगे तो तुम मान जाओ भाभी

भाभी- जब तुमने फैसला कर ही लिया है तो मेरा मानना ना मानना क्या रह गया.

मैं- उस को नहीं छोड़ सकता बड़ी मुश्किल से उसने हाँ की है उसका हाथ छोड़ा तो जमाना रुसवा करेगा मुझे और आगे कोई मोहब्बत नहीं करेगा

भाभी- मोहब्बत , हम्म्म, मोहब्बत कैसी है तुम्हारी मोहब्बत महज कुछ मुलाकातों को मोहब्बत मान बैठे हो तुम . कितने समय से जानते हो तुम उसको. जानते क्या हो तुम उसके बारे में. मानती हूँ की मोहबत में सवाल-जवाब नहीं होते, उंच-नीच नहीं होती. कुछ भी नहीं होता . बस हो जाता है प्रेम. पर प्यारे देवर जी, जिसे हम चाहते है उसके बारे में हमें थोडा बहुत तो मालूम होना चाहिए न . मैं जानती हूँ की तुम उसका साथ नहीं छोड़ोगे पर मेरा एक कहा जरुर मानना,

मैं- जी भाभी

भाभी- जैसा की तुमने कहा की चंपा के ब्याह के अगले दिन ही तुम उससे ब्याह रचाने का सोच रहे हो . तो डाकन से जाकर कहना की जब तुम उसे लेने आओगे तो वो दिन के उजाले में लेने आओगे. होली के दिन जब फाग से ये धरती अम्बर रंग होगा तब तुम उसे लेने आओगे . अंधेरो की रानी उजालो को कैसे संभालती है देखना है मुझे.

मैं- परीक्षा लेना चाहती हो हमारी मोहब्बत की

भाभी- वो आशिकी ही क्या जिसमे इम्तिहान न हो.

मैं- ये भी सही

चोबारे से निचे आया तो आँगन में ही चाची मिल गयी.

चाची- कहाँ भागमभाग रहता है तू आजकल

मैं- कल करना चाहता था पर भाभी सो गयी तुम्हारे पास

चाची- उसके अलावा भी मेरा तुमसे कोई रिश्ता है न

मैं- बिलकुल

चाची- बहुरानी ने बताया की तू ब्याह करने वाला है कम स कम मुझे तो बता ही देता .

मैं- तुम्हे मिलवा ही दूंगा उस से चाची बस कुछ दिनों के बात है .

ये कह कर मैं चलने लगा तो चाची ने मुझे टोका.

चाची- कबीर रुक एक मिनट.

मैं- क्या हुआ

चाची- जेठ जी को तो बता दे कम से कम. बेहतर होगा की लड़की के घर वो ही जाये

मैं- समय आएगा तो बता दूंगा चाची.

हल्का अँधेरा होते होते मैं मलिकपुर पहुँच गया रमा के ठेके पर .

“तुम यहाँ , ” उसने पूछा मुझसे

मैं- तुम्हे लेने आया हूँ.

रमा- कहाँ चलना है

मैं- घर, तुम्हारे घर.

 
#८७



रमा- अब मेरा उस जगह से कोई वास्ता नहीं रहा

मैं- घर तो घर होता है . माना की दुःख के बादल थे घने पर कभी तो सुख की किलकारी भी गूंजी होगी वहां पर. यदि मैं कहूँ की तेरे जख्मो पर मरहम लगा दूंगा तो गलत होगा. पर मैं एक नयी जिन्दगी जीने में तेरी मदद कर सकता हु रमा. तेरी बीती जिन्दगी में हमारे परिवार के कारन दुःख आये, माफ़ी मांगता हूँ ये जानते हुए भी की मेरी माफ़ी तुझे कुछ भी वापिस नहीं लौटा पायेगी. पर फिर भी मेरी विनती है की तू अपने घर चल.

रमा- तुम समझते क्यों नहीं कुंवर, अब मेरी जिन्दगी यही है . जो है जैसा है वैसा ही रहने दो. कभी कभी मिलने आते रहना बहुत रहेगा मेरे लिए.

मैं समझता था उसके दिल के हालात मैंने फिर ज्यादा जोर नहीं दिया . मुझे रुडा से मिलना था पर बहुत कोशिशो के बाद भी बात बन नहीं रही थी . वापसी में मैंने परकाश की गाडी को जंगल में देखा .

“ये चूतिये की गाड़ी इस वक्त जंगल में क्या कर रही है ” मैंने सोचा और गाड़ी की तरफ बढ़ा पास जाकर देखा की प्रकाश किसी औरत को चोद रहा था . वैसे तो मेरी इच्छा नहीं थी ये सब देखने की पर मन के किसी कोने से आवाज आई की देख तो ले कौन है ये . मैं जितना पास हो सकता था उतना हुआ पर एक तो जंगल का अँधेरा उपर से धुंध समझ आ नहीं रहा था . ना ही वो दोनों आपस में कोई बात कर रहे थे .

औरत के हाथ गाड़ी के बोनट पर टिके हुए थे और परकाश पीछे से उसकी कमर थामे उसे पेल रहा था .

“जल्दी कर , देर हो गयी है ” मैंने उस औरत की खनकती चूडियो के बीच आवाज सुनी.

प्रकाश- चिंता मत कर गाड़ी से छोड़ आऊंगा तुझे बहुत दिनों बाद मिली है तू पूरा मजा लूँगा तेरी चूत का.

फिर वो औरत कुछ नहीं बोली बस चुदती रही . दिल कह रहा था की आगे बढ़ कर पकड़ ले और देख की कौन औरत है पर मैं ऐसा कर नहीं सका. थोड़ी देर बाद उनकी चुदाई खत्म हुई तो परकाश ने गाडी मलिकपुर की जगह मेरे गाँव वाले रस्ते पर मोड़ ली. मैं और हैरान हो गया ये औरत मलिकपुर की नहीं थी . मेरे गाँव की औरत का प्रकाश के साथ चुदाई सम्बन्ध .

अब मैंने सोचा की ये तो देखना ही पड़ेगा पर तभी गाडी स्टार्ट हुई और तेजी से आगे बढ़ गयी . ये जानते हुए भी की मैं गाड़ी की रफ़्तार नहीं पकड़ पाउँगा मैं उसके पीछे भागा. होना ही क्या था मैं पीछे रह गया बहुत पीछे. खैर, जब मैं कुवे पर पहुँचने वाला था तो दूर से ही कमरे के जलते बल्ब को देख कर मैं समझ गया था की कोई मोजूद है वहां पर .

कुवे पर पहुँचते ही मैंने हाथ पाँव धोये और पानी पी ही रहा था की मैंने पाया की सरला थी वहां पर .

मैं- तू इतनी रात को यहाँ क्या कर रही है .

सरला- वो मंगू की वजह से देर हो गयी.

मैं- उसकी वजह से कैसे.

सरला- वो मछली पकड़ने गया कह कर गया था की जल्दी ही आऊंगा फिर साथ चलेंगे. मैंने सोचा की कुछ मछली मैं भी ले जाउंगी . पर देखो कब से राह देख रही हु उसकी.

मैं- मैंने तुझसे कहा था की शाम होते ही तू घर चली जाया कर.

सरला- गलती हुई कुंवर, आगे से ध्यान रखूंगी.

मैं- और वो चुतिया ऐसी कितनी मछली पकड़ेगा.

मैं जानता था की गाँव में सबसे जायदा मछली मंगू को ही पसंद थी . पर अकेली औरत को छोड़ कर ऐसे जाना बेवकूफी ही थी .

मैं- चल गाँव चलते है वो आ जायेगा.

सरला ने हाँ में सर हिलाया मैंने कमरे की कुण्डी लगाई ही थी की मंगू आता दिखा मुझे . मुझे देख कर मंगू खुश हो गया और बताने लगा की कितनी मछली पकड़ी उसने. पर मैंने उसे थोडा गुस्सा किया और समझाया की आगे से ऐसे काम नहीं करे. खैर फिर हम तीनो बाते करते हुए गाँव पहुँच गए. मैंने मंगू से कहा की जल्दी से पका लेना खाना मैं उसके घर ही खाऊंगा फिर सरला को उसके घर छोड़ने चला गया.

उसका ससुर आज भी नहीं आया था .

सरला- कुंवर, आज भी आओगे क्या

मैं- नहीं . आज मुझे कुछ काम है .

दरअसल मैं सरला के जिस्म की आदत नहीं डालना चाहता था खुद को. दूसरी बात मेरे दिमाग में ये बात थी की परकाश किस औरत को चोद रहा था . गाँव की औरत पटाना उसके लिए मुश्किल नहीं था क्योंकि राय साहब के काम की वजह से वो काफी आता-जाता था गाँव में . सरला की बड़ी इच्छा थी पर मैंने उसे मना किया और मंगू के घर पहुँच गया. मछली-रोटी का भोजन करके आत्मा त्रप्त हो गयी . मैंने वही चारपाई पर बिस्तर लगाया और रजाई ओढ़ कर पसर गया. प्यास के मारे मेरी आँख खुली तो उठ कर मैं सुराही से पानी पी रहा था की मेरी नजर पास वाली चारपाई पर पड़ी, मंगू वहां नहीं था . घर का दरवाजा खुला पड़ा था .

“ये कहाँ गया इतनी रात को ” मैंने खुद से सवाल किया और कम्बल ओढ़ कर घर के बाहर गली में आ गया. मेरे दिमाग में एक ख्याल आया मैं सीधा सरला के घर गया दबे पाँव अन्दर घुसा , उसे मैंने सोते हुए पाया. न जाने मुझे लगा था की शायद मंगू ने सरला को भी पटा लिया हो. पर अनुमान गलत था .

अब उसे तलाशना मुमकिन नहीं था. वो कहीं भी किसी भी दिशा में जा सकता था . पर सवाल ये था की किस वजह से वो घर से बाहर निकला था इस ठिठुरती रात में. अब मेरा भी मन उचट गया था मैं वापिस मंगू के घर नहीं गया क्योंकि नींद टूट गयी थी . मैं कुवे की तरफ जाने के लिए गाँव से बाहर निकल गया. पगडण्डी पर पैर रखते ही उस जलते बल्ब को देख कर एक बार फिर मैं समझ गया था की कुवे पर कोई है , पर इतनी रात को कौन हो सकता है , क्या मकसद है आने वाले का सोचते हुए मैं कमरे के पास पंहुचा और उसे हल्का सा धक्का दिया. दरवाजा खुलते ही मेरी आँखे हैरत से फ़ैल गयी . ......................

 
#88



कमरे में मेरे बिस्तर पर लेटे हुए अंजू कोई किताब पढ़ रही थी . हमारी नजरे मिली

अंजू- तुम यहाँ इस वक्त

मैं- ये सवाल तो मुझे आपसे पूछना चाहिए वैसे ये कमरा मेरा ही है

अंजू- हाँ , मेरा मन था इधर आने का फिर घूमते घूमते रात ज्यादा हुई तो मैं यही रुक गयी.

न जाने क्यों मुझे उसकी बात झूठ लग रही थी.

मैं- बेशक मुझसे ज्यादा आप जंगल को जानती है पर इतनी रात को आपका यहाँ होना कारन कोई साधारण नहीं है.

अंजू- ये तो तुम पर निर्भर करता है की तुम कैसे समझते हो इस बात को.

उसने बिस्तर से उठने की जरा भी जहमत नहीं उठाई, जैसे उसे मेरे होने न होने से कोई फर्क पड़ा ही नहीं हो. मैं घास पर बैठ गया और कम्बल को थोडा और कस लिया.

मैं- जैसा मैंने कहा , इस जंगल में इन रातो में भटकने का हम सब का अपना अपना कारण है , ये जानते हुए भी की उस आदमखोर के रूप में मौत कभी भी सामने आकर खड़ी हो सकती है हम खुद को फिर भी रोक नहीं पा रहे . ये साधारण तो बिलकुल नहीं है . आप मुझसे बहुत ज्यादा जानती है , इस जगह को पहचानती है मैं आपके उसी ज्यादा में से थोडा कम जानना चाहता हूँ . मेरा पहला सवाल ये है की आपने मुझे ये लाकेट क्यों दिया, सिर्फ मुझे ही क्यों .

अंजू ने अपनी किताब साइड में रखी और बोली- पहली बार मैं तुमसे मिली थी कोई भेंट तो चाहिए थी न देने को .

मैं- खूबसूरत औरते झूठ बोलते हुए थोड़ी और निखर जाती है .

मेरी बात सुनकर अंजू मुस्कुरा पड़ी.

अंजू- इसे तारीफ समझे या ताना, ये लाकेट हमने तुम्हे क्यों दिया तुम जान जाओगे. दूसरी बात हम यहाँ क्यों है ,जैसा तुमने कहा हम सब के अपने अपने कारण है

मैं- रुडा की बेटी , रुडा के दुश्मन की जमीं पर रात को अकेली . सवाल तो उठेगा ही .

अंजू- जितना हक़ रुडा का है उतना ही मुझ पर राय साहब का भी है,दोनों से ही मुझे बेइंतिहा स्नेह मिला

मैं- तो फिर रुडा से क्यों नाराजगी है आपकी

अंजू- मैं आसमान में उड़ना चाहती हूँ , मेरे बाप को मेरी उड़ान पसंद नहीं वो मेरे कदमो में बेडिया चाहता है .

मैं- कैसी बेडिया

अंजू- वैसे हमें कोई जरुरत नहीं है तुम्हे ये किस्से बताने की पर चूँकि इस रात अब तुम हमारे साथ हो , बातो का सिलसिला है तो चलो बता ही देते है , तुम्हारी भाभी नंदिनी में हिम्मत थी वो आगे बढ़ गयी , हम कमजोर थे पीछे रह गए. और फिर पीछे रहते ही गए. हम अपनी पसंद से शादी करना चाहते थे हमारी पसंद हमारे बाप को मंजूर नहीं थी . करते तो क्या करते. हम चाहते तो घर से भाग जाते , पर इसमें नुकसान हमारा ही होता चौधरी साहब हमारे प्यार को मरवा देते. आज हम जिस भी हालात में है कम से कम तसल्ली तो है की हमारा प्यार हमारे साथ है .

मैं सोचता था की मैं ही आशिक हूँ पर इस जंगल में न जाने कितनी प्रेम कहानिया बिखरी पड़ी थी . अंजू ने लेटे हुए ही करवट ली और निचे रखे थर्मस से पानी का कप भरने लगी. उसकी चुडिया स्टील से थर्मस से टकराई और उस खनक ने मेरे कान हिला दिए. यही खनक तो मैंने सुनी थी , हाँ यही थी बिलकूल यही थी . मेरा तो सर ही घूम गया अभी मोहब्बत का किस्सा बताने वाली अंजू , ये अंजू ही तो चुद रही थी परकाश से.

मैं- एक बात पुछु

अंजू- हाँ

उसने पानी की घूँट भरी.

मैं- एक तरफ तो आप इतनी शिद्दत से अपनी मोहब्बत का जिक्र कर रही है और दूसरी तरफ कुछ घंटे पहले आप जंगल में वकील प्रकाश के साथ थी .

अंजू ने कप वापिस रखा और बोली- दुसरो के निजी पलो में ताका-झांकी बदतमीजी समझती जाती है .

मैं- मेरी नजर में उस नीच, गलीच प्रकाश के साथ चुदाई करना ज्यादा बड़ी बदतमीजी है .

मैंने जानबूझ कर चुदाई शब्द पर जोर दिया.

अंजू- इसे हम तुम्हारी पहली खता समझ कर माफ़ कर रहे है कबीर. दुबारा अपने शब्दों पर काबू रखना . खैर, जैसा हमने थोड़ी देर पहले कहा ये तुम पर निर्भर करता है की हम चीजो को कैसे समझते है . कभी तुमने इस बात पर गौर क्यों नहीं किया की प्रकाश ने कभी ब्याह क्यों नहीं किया . क्योंकि वो हमसे प्यार करता है . हम दोनों एक दुसरे से बेंतेहा प्यार करते है . ये एक ऐसा सच है जिसे हम छिपा भी नहीं सकते , बता भी नहीं सकते.

रुडा की बेटी वकील से प्यार करती थी , बहनचोद ये जिन्दगी मुझे न जाने क्या क्या दिखा रही थी .

मैं- बेशक प्रेम अँधा होता है पर इतना भी नहीं की दुष्ट इन्सान से ही इश्क कर बैठे.

अंजू- वो तुम्हे गलत लगता है क्योंकि तुम्हारा और उसका व्यवहार आपस में ठीक नहीं है. पर हमारे लिए क्या है वो हम जानते है उसकी नेकी , ईमानदारी इसलिए कम नहीं हो जाती की तुम्हे वो घटिया लगता है .

साले ने रुडा की बेटी से ही प्रेम किया था .

मैं- ये आपकी और उसकी बात है . न मुझे पहले कुछ लेना देना था न अब न आगे. मैं इस लाकेट के बारे में जानना चाहता हूँ .

अंजू- ये बस यूँ ही तो है , तुम्हे पसंद नहीं तो बेझिझक हमें वापिस दे सकते हो. हम बुरा नहीं मानेंगे.

मैं- ठीक है आप आराम करो मैं चलता हूँ .

अंजू- अरे इतनी रात कहाँ जाओगे.

मैं- ये जंगल मेरा भी घर है , कहीं न कहीं तो पनाह मिल ही जाएगी. वापसी में मैं मोहब्बत के बारे में सोचता रहा , ये दोनों लोग इसलिए अलग अलग रह रहे थे की मोहब्बत है , पर ये कैसी मोहब्बत थी जिसमे जुदाई थी . यहाँ मैंने महसूस किया की मैं मोहब्बत के बारे में कुछ नहीं जानता. चलते चलते मैं उस मोड़ पर आ गया जहाँ से एक रास्ता निशा के पास ले जाताथा दूसरा गाँव की तरफ.

बेशक बड़ी तममनना थी मुझे निशा का दीदार करने की पर न जाने क्यों मेरे कदम गाँव की तरफ बढ़ गए. जब मैं गाँव में पहुन्चा तो देखा की लोग घरो से बाहर निकले हुए थे. इतनी रात में लोगो का घर से बाहर होना किसी अनिष्ट की आशंका से दिल धाड़ धाड़ करने लगा. और जब मैं मोहल्ले में पहुंचा तो देखा की वैध की लाश उसके घर के बाहर पड़ी थी . ..................................

 
#89



ये रात कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी थी . वैध को कौन मार गया एक कोने में बैठे बैठे मैं ये ही सोच रहा था .. एक तो अंजू ने मेरे दिमाग का बल्ब बुझा दिया था ऊपर से इसको कोई पेल गया था. सर हद से जायदा दुखने लगा तो मैं घर आ गया और बिस्तर पकड़ लिया. ये पहली बार था जब किसी मौत से मुझे कोई भी फर्क नहीं पड़ा था.

सुबह बड़ी बोझिल थी पर आज मुझे बहुत से काम करने थे.मैं वैध के अंतिम संस्कार में भी नहीं गया. मैं भैया के कमरे में गया और कुछ तलाशने लगा. जिन्दगी में पहली बार मैंने ये हिमाकत की थी . चोरी छिपे मैंने भैया की अलमारी खोली पहले दो खाने कपड़ो से भरे थे. तीसरे में व्यापार के , जमीनों के कागज और नोटों की गद्दिया .

मैंने दूसरी अलमारी खोली जिसमे शराब की बोतले भरी थी .

“क्या दूंढ रहे हो ” ये भाभी की आवाज थी जो कमरे में दाखिल हो रही थी .

मैं- अतीत ,उस अतीत को ढूंढ रहा हूँ जिसने मेरे आज को परेशान करके रखा हुआ है .

भाभी- क्या चाहिए तुम्हे

मैं- वो तस्वीर जिसे भैया ने पुराने कमरे से हटा दिया

भाभी- यहाँ ऐसी कोई तस्वीर नहीं है .

मैं-आप जानती है अंजू किस से प्यार करती है

भाभी-मेरे जानने न जानने से कुछ फर्क पड़ेगा क्या . उसकी जिन्दगी है वो जैसे चाहे जिए .

मैं- फिर भी क्या आप जानती है की वो किस से प्यार करती है .

भाभी- आप अंजू को हमेशा से जानती है मैं अंजू के बारे में सबकुछ जानना चाहता हूँ सब कुछ .

भाभी- वो अलग है वो जुदा है . हम में से एक होते हुए भी वो हमारे जैसी नहीं है. बेशक फूफा ने उसे सब कुछ दिया पर वो कभी भी रुडा की बेटी नहीं थी वो हमेशा सुनैना की बेटी ही रही. उस घर ने उसे हमेशा सबसे आगे रखा पर अंजू कभी स्वीकार नहीं पाई उस परिवार को और फिर एक दिन ऐसा आया की वो घर छोड़ कर चली गयी.

मैं- अंजू कहती है की रुडा की वजह से अपनी जिन्दगी नहीं जी पा रही थी इसलिए घर छोड़ कर गयी.

भाभी- झूठी है वो. माना की फूफा घटिया आदमी है पर कोई भी बाप अपने परिवार के लिए बहुत कुछ करता है . अंजू यदि ये कहे की उस घर से उसे कोई भी शिकायत थी तो ये झूठ है . वो दुनिया की सबसे खुशकिस्मत बहन है .

मैं- समझ नहीं आ रहा की कौन झूठ बोल रहा है वो या फिर आप

भाभी- मुझे क्या जरुरत झूठ बोलने की , तुमने मुझसे अंजू के बारे में पुछा मैंने तुम्हे बताया .

मैं भाभी को बताना चाहता था प्रकाश के बारे में पर खुद को रोक लिया.

मैं- अंजू भी जंगल में भटक रही है

भाभी- इसमें कुछ नया नहीं बचपन से ही ऐसा करती रही है वो.

मैं- क्या तलाशती है वो जंगल में

भाभी- नहीं जानती

मैं- वो क्या काम करती है , मेरा मतलब उसका रहन सहन हम सब से अलग है महँगी गाड़ी, महंगे शहरी कपडे . पैसा कहाँ से आता उसके पास.

भाभी-तुम शायद भूल गए की वो चौधरी रुडा की बेटी है .

मैं- अंजू कुछ तो ऐसा कर रही है जो संदिग्ध है समझ नही आ रहा , वैसे आप आखिरी बार कब मिली थी उस से.

भाभी- शायद छ साल पहले

भाभी भी गजब ही थी .

मैं-क्या आपकी और अंजू की आपस में नहीं बनती .

भाभी- उस से ही पूछ लेना तुम.

मैं- आप कभी भी कुछ भी सीधा क्यों नहीं बताती.

भाभी- सभी भाई-बहनों में सबसे घटिया कोई था तो अंजू ही थी. यही काफी है तुम्हारी जानकारी के लिए.

मैं- उसने मुझे ये दिया .

मैंने अपनी चेन भाभी को दिखाई . भाभी मेरे और पास आई और उस चेन के लाकेट में बने सर्पो को अपनी उंगलियों से छुआ और बोली- तुमने पूछा क्यों नहीं की क्यों दिया ये .

मैं- कहा था उसने कहा की भेंट है .

भाभी- उस से दूर रहना . बेशक बहन है वो मेरी पर तुम दूर रहना उस से . वो तस्वीर इस कमरे में नहीं है तुम्हारे भैया ने गायब कर दिया है उसे.

मैं- रुडा से मिलना है मुझे समझ नहीं आ रहा की कैसे बात करू उस से

भाभी- कभी कभी वो सुनैना की समाधी पर जाते है , तभी शायद ठीक रहेगा उनसे मिलना.

मैं- चाचा क्यों नहीं चाहते थे की आपका और भैया का ब्याह हो.

भाभी- हम पहले भी तुम्हे बता चुके है की हम नहीं जानते. वैसे तुम्हे क्या लगता है की वैध को किसने मारा होगा.

मैं- नहीं जानता पर मालूम कर ही लूँगा.

भाभी- कोई क्यों मारेगा उसे

मैं- इस क्यों के बहुत कारन हो सकते है वैध वैसे था तो घटिया ही . साला ऐसे ऐसे कर्म किये हुए था की मैं क्या ही बताऊ.

भाभी- कर्म तो सबके ऐसे ही होते है बस करने वाले को अपने कर्म अच्छे लगते है .

मैं- फिर भी ........ वैसे मुझे दुःख नहीं है उसके मरने का.

घर से बाहर आकर मैं कुवे की तरफ चल पड़ा. कल रात ने मुझे एक बात अच्छी तरह से समझा दी थी की जंगल उतना सुरक्षित नहीं था .अंजू मेरे कमरे तक आ पहुंची थी , मुझे कुछ तो करना ही था . मैं एक बार फिर से उस तालाब की दिवार के पास खड़ा सोच रहा था की अन्दर जाऊ या नहीं. इस कमरेमे कुछ तो ऐसा था जो मुझे फिर से खींच लाया था इसकी तरफ. पूरी सावधानी के साथ मैं अन्दर घुस गया . कमरा ठीक वैसा ही था जैसा की मैं छोड़ कर गया था . न जाने क्यों मुझे लगता था की इस कमरे की ख़ामोशी ने एक ऐसे शोर को छिपाया हुआ था की जब वो सामने आएगा तो कानो के परदे फट पड़ेंगे.

मैं दुसरे कमरे में गया , और उस कुर्सी पर बैठ कर सोचने लगा. कोई तो आता जाता होगा यहाँ पर फिर निशा को कैसे नहीं मालुम . क्या वो सख्श निशा की उपस्तिथि को भी जानता था यहाँ पर.

औरतो के रंग-बिरंगी ब्रा-कछी , नंगी तस्वीरों वाली ढेरो किताबे और सोना. यहाँ पर ये कुछ ऐसा था की समझना बहुत आसन था और बहुत मुश्किल. यहाँ पर आने वाला सक्श बहुत रंगीला था , तो ये भी था की वो औरते जरुर लाता होगा यहाँ पर. और अगर औरते आती थी तो फिर अब क्यों नहीं आती. उन औरतो को मालूम होगा की सोना है तो सोने के लालच में तो आना चाहिए था न उनको.

चाचा भोसड़ी के ने अगर यहाँ पर चुदाई का अड्डा बनाया हुआ था तो फिर रमा और सरला को क्यों नहीं मालूम इस जगह के बारे में. वो चाहती तो यहाँ से सोना चुरा कर बढ़िया जिन्दगी जी सकती थी फिर क्यों नहीं चाहत थी उनको सोने की. अब मुझे लगने लगा था की कविता वो कड़ी थी जो चाचा की जिन्दगी का अनचाहा राज खोल सकती थी . इतनी रात को वो जरुर यही पर आ रही होगी.

पर वो नहीं जानती थी की उसका इन्तजार मौत कर रही थी .कविता ने मंगू को बताया होगा सोने के बारे में और वो चुतिया जरुर उसी की तलाश में आता हो रातो को . एक सवाल और था की यदि कविता यहाँ चुदने आती थी तो फिर चाचा कहाँ है . वो बहनचोद किस बिल में छुपा है की निकल ही नहीं रहा ........



कमरे से बाहर निकल कर मैं ऊपर जाकर दिवार का सहारा लेकर बैठ गया और सोचने लगा. सोचते सोचते न जाने कब मेरी आँख लग गयी . और अजब खुमारी टूटी तो मैंने खुद के सामने उसे बैठे देखा.............
 
#



मैंने उसे देखा बस देखता ही रहा .

“कितना देखोगे कुछ बोलो भी अब ” निशा ने हौले से कहा.

मैं- कुछ नहीं कहना धड़कने खुद ही बात कर लेंगी तेरी धडकनों से.

निशा- ऐसी भी क्या दीवानगी

मैं- मुझ से मत पूछो सरकार की क्या हाल है मेरा . तुम्हारी झुकी निगाहे बता चुकी है तुमको .

निशा- अब उठ भी जाओ थक गयी हूँ मैं तुम्हारा इंतज़ार करते करते की अब उठो अब उठो.

मैं- जगाया क्यों नहीं

निशा- यूँ ही .

मैं- कुवे पर चलते है थोड़ी चाय पियूँगा तो थकान कम होगी.

निशा- इस वक्त वहां

मैं- चल न.

निशा ने अपना हाथ मेरे हाथ में दिया और बोली- चल फिर.

पुरे रस्ते मैंने अपनी नजर बनाये रखी की कोई हमारे पीछे तो नहीं है .

निशा- क्या बात है ये बेचैनी सी किसलिए

मैं- कुवे पर चल कर बताता हूँ

जल्दी ही हम वहां पहुँच गए. मैंने बल्ब जलाया और चाय का सामान निशा के हाथ में दिया .

निशा मुझे देखने लगी.

मैं- चाय बना मेरी जान.

मुस्कुराते हुए उसने चूल्हा जलाया , ठण्ड में थोड़ी तपत मिली तो मैं चूल्हे के पास ही बैठ गया .

मैं- बड़ी प्यारी लग रही है तू

निशा- इन बातो का मुझ पर कोई जोर नहीं चलने वाला.

उसने चूल्हे में फूंक दी. केसरिया आंच के ताप में उसका सिंदूरी चेहरा क्या खूब लग रहा था .

निशा- जंगल में बार बार क्या तलाश रही थी तेरी निगाहे

मैं- इस जंगल में हम अकेले नहीं है जो भटक रहे है .

निशा- जानती हूँ

मैं- मुझे तेरी सुरक्षा की फ़िक्र है , उस खंडहर पर सिर्फ तेरा ही हक़ नहीं है , किसी और की आमद महसूस की है मैने. और मैं बिलकुल नहीं चाहता की मेरा कोई दुश्मन तुझे कुछ नुकसान पहुंचाए .

निशा ने उफनती चाय को हिलाया और बोली- समझती हूँ तेरे मन की पर तू फ़िक्र मत कर उस खंडहर के बारे में किसी को भी नहीं मालूम. इस जंगल में सिर्फ वो ही एक जगह है जो अनोखी है.

मैं- कैसे मानु तेरी बात

निशा- क्योंकि पिछले बहुत सालो में तू एकमात्र था जिसके कदम वहां पर पड़े थे.

निशा की बात ने मुझे हैरत में डाल दिया. निशा का कथन मेरी कविता की सोने वाली धारणा को ध्वस्त कर रही थी .

निशा- तेरी चिंता मैं समझती हूँ . जानती हूँ तेरा मन विचलित है पर मैं कह रही हूँ न खंडहर सुरक्षित है

मैं- इतना यकीं कैसे

निशा- क्योंकि किसी और को अगर भान होता तो तालाब में सोना पड़ा नहीं होता. इन्सान की सबसे बड़ी कमी लालच होती है . किसी भी इन्सान को यदि मालूम होता की वहां पर ऐसा कुछ है तो सोने का लालच उसे तालाब तक खींच लाता.

मैं- पर कुछ लोग अगर जंगल में उसी सोने की तलाश कर रहे हो तो .

निशा- उनका नसीब. मिला हुआ सोना, पड़ा हुआ सोना अपने साथ दुर्भाग्य लाता है .

निशा ने सच कहा था इस बारे में.

मैं- पर लालच कहाँ सोचता है इस बात को

निशा- तो तुझे क्यों फ़िक्र है , जो करेगा सो भरेगा .

मैं- मुझे तेरी फ़िक्र है बस .

निशा ने चाय का कप मुझे दिया और बोली- तेरे मन में और क्या सवाल है

मैं- रुडा की बेटी के पास ऐसा क्या है की वो इतना शाही जीवन जी रही है . रुडा से अलग हुए उसे काफी बरस हो गए है कहाँ से पैसा आ रहा है उसके पास.

निशा- पूछ क्यों नहीं लेते उससे वैसे तुम्हे उसके पैसो में क्यों दिलचश्पी

मैं- अंजू मुझे थोड़े दिन पहले जंगल में मिली थी . पहली मुलाकात में उसने मुझे ये लाकेट दिया और फिर कल रात मैंने उसे प्रकाश के साथ देखा , कल रात ही जब मैं कुवे पर आया तो वो यहाँ मोजूद थी . मेरे कुवे पर उसका क्या प्रयोजन हो सकता था .

निशा- जंगल में होना अलग बात है और कुवे पर होना अलग.

मैं- मैंने भाभी से अंजू के बारे में बात की उन्होंने कहा की अंजू घटिया औरत है . और परकाश के साथ उसका होना पुष्टि भी करता है की वो घटिया है .

निशा- नंदिनी तो रुडा के परिवार की ही है , उसने कहा है तो घटिया होगी अंजू.

मैं- पर सवाल यही है की क्यों भटकती है वो जंगल में

निशा- तुम्हे उसका पीछा करना चाहिए , आज नहीं तो कल वजह मालूम कर ही लोगे.

निशा ने कितनी सरलता से कहा था .

मैं- पर मेरी दुश्मनी है परकाश से , बात बिगड़ेगी.

निशा- कबीर, कभी कभी मैं सोचती हूँ की तुम्हारी ये सरलता ही तुम्हारी शत्रु है. बेह्सक सरल होना अच्छा है पर जीवन में कुछ पल आते है जब हमें कठोर होना पड़ता है . आदत डाल लो , वैसे भी जब नंदिनी को मालूम होगा की तुम मुझे ब्याहने वाले हो तो बवाल करेगी वो.

मैं- बवाल तो हो गया सरकार, मैंने भाभी को बता दिया.

निशा- तुम भी ना

मैं- उसने कहा है की तुमसे कहूँ की जब मैं तुम्हे लेने आऊ तो फाग का दिन हो. रातो की रानी को दिन के उजाले में हाथ थामने को कहना .

निशा ने एक पल चूल्हे में पड़े अंगारों को देखा और बोली- ठीक है कबीर, तुम उसी समय आना मुझे लेने के लिए मैं तैयार मिलूंगी. पर जगह मैं चुनुंगी . हमारी अगली मुलाकात में मैं तुम्हे बता दूंगी की कहाँ तुम मेरा हाथ थामना. और नंदिनी से कहना , की इस डायन ने कहा है की उसके सब्र का इम्तिहान न ले. बरसो जली हूँ मैं . बहुत सोच कर मैंने तुमसे ये बंधन बाँधा है . ऐसा ना हो की मेरे सीने में जलती आग जमाने को जला दे. नंदिनी से कहना की डायन ने कहा है की मैंने बस प्रेम किया है तुमसे प्रेम किया है कबीर.

मैंने आगे बढ़ कर निशा को अपनी बाँहों में भर लिया और उसके होंठो को अपने होंठो से जोड़ लिया. चूमते हुए मैंने देखा की सियार कुवे की मुंडेर पर बैठे हुए आसमान को देख रहा था .कुछ देर बाद वो मुझसे अलग हुई.

निशा- तूने अभी तक निर्माण शुरू नहीं करवाया , ब्याह के बाद मुझे रखेगा कहाँ पर.

मैं- अंजू के यहाँ आने के बाद मुझे नहीं लगता की ये जगह सुरक्षित होगी.

निशा- तो कहाँ रखेगा मुझे, क्या तेरे घर में नंदिनी में मुझे आने देगी. और मेरी वजह से वहां पर कोई फसाद हो ये मैं चाहती नहीं. बता

निशा की इस बात का कोई जवाब नहीं था मेरे पास.

मैं- ब्याह से पहले मैं कोई सुरक्षित ठिकाना बना लूँगा.

निशा इस से पहले की कुछ और कहती , एक जोरदार चीख ने हमें चौंका दिया. हमारे आस पास कोई और भी था .मेरा शक बिलकुल सही था की कोई निगरानी तो जरुर कर रहा था मेरी. हम दोनों चीख की दिशा में भागे.

 
मित्रों, मैं आपका बहुत आभारी हूं आपके प्रेम और विश्वास के साथ इस कहानी ने मात्र ढाई महीनों मे ही दस लाख व्यू की संख्या को पार कर लिया है.
 
#91



सर्दियों की खामोश रातो में अक्सर आवाज बड़ी दूर तक गूंजती है . मैं और निशा भागते हुए मोड़ पर पहुंचे तो देखा की परकाश जमीं पर पड़ा था. मैंने उसे हिलाया-दुलाया पर बदन में कोई हरकत नहीं थी. बदन बेशक गर्म था पर साँस की डोर टूट चुकी थी . मैंने और निशा ने उसके बदन का अवलोकन किया .

निशा- चाकू से मारा है इसे.

मैं- पर किसने

निशा- होगा कोई दुश्मन इसका.

मैं- कल ही मैंने इसे अंजू के साथ देखा था , कल ही अंजू ने मुझे इसकी और उसकी प्रेम कहानी के बारे में बताया था और आज ये लाश बन गया.

निशा ने मेरा हाथ पकड़ा और जंगल की तरफ बढ़ गयी. कुछ देर बाद हम खंडहर में मोजूद थे.

मैं- यहाँ क्यों ले आई.

निशा- वहां खतरा था हो सकता था.

कहाँ तो मैं निशा के साथ अपने लम्हे जी रहा था और कहाँ अब ये रात मेरी मोहब्बत के सबब को बर्बाद करने पर तुली थी .

कुछ देर ख़ामोशी रही फिर मैंने ख़ामोशी को तोडा.

मैं- आज के बाद तू इन रातो में नहीं भटकेगी. जब तक मैं मालूम नहीं कर लेता की जंगल में चल क्या रहा है मैं तेरी सुरक्षा से समझौता नहीं करूँगा.

निशा- तू भी बता फिर कहाँ सुरक्षित रहूंगी मैं

मैं- कर लूँगा जुगाड़ .

निशा- इस वक्त मुझे तेरे साथ रहना जरुरी है .

मैं- जानता हूँ ,

मैं जानता था की प्रकाश की मौत का अंजू को जब पता चलेगा तो वो हिंसक हो जाएगी , देखना बस ये था की वो आरोप किस पर लगाएगी.

मैंने निशा का हाथ पकड़ा और बोला- मैं एक बार फिर तुझसे पूछता हूँ की तू इस खंडहर को सब कुछ जानती है

निशा- निशा बार बार क्यों पूछता है

मैं- क्योंकि ऐसा कुछ है जो तुझसे भी छिपा है.

निशा- दिखा फिर मुझे

मैं निशा को सीढियों पर ले आया और गुप्त दरवाजे से अन्दर आ गए. माचिस से मैंने चिमनी को जलाया और हलकी रौशनी हो गयी.

मैं- मैं तुझसे इन कमरों के बारे में जानना चाहता हूँ.

निशा आँखे फाड़े उस कमरे को देख रही थी . मैं उसे दुसरे कमरे में ले गया . जहाँ पर तमाम वो सामान और सोने से भरा बैग रखा था . उसने उस समान को देखा और फिर मुझे देखने लगी.

मैं- इसलिए ही मैं तुझसे कह रहा था की तू अकेली नहीं है मेरी सरकार जो इस जगह को जानती है कोई और भी है जिसने अपना राज छुपाया है यहाँ पर . ये सोना ये अय्याशी का समान ये बिस्तर इतना तो बता रहे है की है कोई जो जिस्मो की प्यास बुझाने आता है यहाँ .जितना मैं ढूंढ सकता था मैंने कोशिश की . मैं जानना चाहता हूँ की इस सोने का मालिक कौन है .

निशा ने एक गहरी साँस ली और उठ कर वापिस बहार वाले कमरे में आ गयी . मैं उसके पीछे आया .

निशा- बहुत सालो से मैं इस पानी में पड़े सोने के वारिस को तलाश रही हूँ. तूने सही कहा कबीर, यहाँ किसी और की आमद भी थी , पर मैं भी कहती हूँ की यहाँ बरसो से किसी ने मेरे सिवा और अब तेरे सिवा कदम नहीं रखा.

निशा की बात इस कहानी के तारो को और उलझा रही थी . आखिर कौन ऐसा चुतिया होगा जो इतने सोने को ऐसे ही छोड़ कर चला जायेगा. पर मुझे सोना नहीं चाहिए था , मैं तो देखना भी नहीं चाहता था इसकी तरफ . मैं अपनी जिन्दगी को देखना चाहता था जो मेरे सामने निशा के रूप में खड़ी थी .

मैं जानता था की प्रकाश की मौत का जब सुबह मालूम होगा तो नयी कहानी बनेगी पर माँ चुदाये प्रकाश साला कल मरते आज मरा . मैं अपनी प्रेयसी की बाँहों में जीना चाहता था . मैंने निशा की कमर पकड़ कर उसे अपने आगोश में लिया और उसके नितम्बो को सहलाते हुए उसके होंठ पीने लगा. उसने भी मेरा साथ दिया.

“मेरी जान एक अहसान तू भी कर अपने दीवाने पर . इस डाकन का सच भी बता दे मुझ को ” मैंने निशा के कान को चुमते हुए कहा.

“तू जानता है , तू जान जायेगा. जब दिन के उजाले में घटा रंग बन कर बिखरेगी , जब आसमान भीगा होगा . मन के इन्द्रधनुष में प्रेम की बरसात के दरमियाँ मैं पहला पग उठा कर आगे बढ़ आउंगी तो तू जान जायेगा. ” उसने मेरे सीने में समाते हुए कहा.

मैंने उसके गाल चूमे और बोला- मैं जानता हु, मेरी सरकार. तुझसे प्रेम किया है , तेरे संग जीना है तेरी बाँहों में मरना है तुझे नहीं जाना तो फिर क्या प्रेम किया मेरी सरकार .

उसने अपने पैर थोड़े ऊँचे किये और मेरे माथे को चुमते हुए बोली- मर तो बहुत पहले गयी थी ,अब और नहीं मरना अब जीना है मुझे .

इसके बाद न उसे कुछ कहने की जरुरत थी न मुझे. बेशक ये कमरा किसी का भी रहा हो. पर आज इस रात में ये हमारा था . रात के तीसरे पहर तक हम दोनों अपनी बाते करते रहे . उसके जाने से पहले मैंने उससे वादा लिया की वो ऐसा कुछ नहीं करेगी की उसको किसी भी किस्म का खतरा महसूस हो.

निशा के जाने के बाद भी मैं बहुत देर तक तालाब की मुंडेर पर बैठे उस सोने के बारे में सोचता रहा जिसके मालिक की दिलचस्पी ही नहीं थी उसमे. कोई प्रकाश भोसड़ी वाले को मार गया था . पर प्रकाश क्या कर रहा था वहां पर . मेरे कुवे के पर एक रात पहले अंजू का होना और अगली रात उसके पास ही प्रकाश की मौत , कुवे पर कुछ तो ऐसा था जिसकी तलाश में ये दोनों थे. मैं जब तक लौटा प्रकाश की लाश वहां से हटाई जा चुकी थी , मैंने देखा की पिताजी और भैया दोनों ही कुवे पर मोजूद थे.

“तू कल रात कहाँ था ” पिताजी ने सवाल किया मुझसे

मैं- यही पर था ,

पिताजी- हम लोग आये तब तो नहीं था तू

मैं- हर समय मोजूद रहना जरुरी तो नहीं, सुबह उठते ही मैं दौड़ने जाता हूँ, आप तो जानते ही है

पिताजी- कल रात प्रकाश की मौत हो गयी . किसी ने उसे यही थोड़ी दूर मार डाला

मैं- बढ़िया हुआ

पिताजी- कही इसमें तेरा तो हाथ नहीं .

मैं- काश होता पिताजी, उसे तो मरना ही था उसके कर्म ही ऐसे थे मैं नहीं तो कोई और सही , धरती से एक बोझ कम हो गया .

पिताजी- उसका बचपन हमारे सामने ही बीता था , हमारा विस्वसनीय भी था वो . अगर हमें मालूम हुआ की उसकी मौत में तुमहरा हाथ है तो फिर रहम की गुंजाईश मत करना

मैं- कोशिश कर लीजिये राय साहब. उसकी किस्मत इतनी भी मेहरबान नहीं थी की मेरे हाथो मौत होती उसकी.

पिताजी कुछ कहना चाहते थे पर उनकी नजर भैया पर पड़ी तो उन्होंने कुछ नहीं कहा. पिताजी के साथ भैया भी चले गए. ये जिन्दगी में पहली बार था जब भैया मेरे साथ हो और मुझसे बात नहीं की हो. मैं ये सोचने लगा की कुवे पर क्या हो सकता है ऐसा सोचते सोचते दोपहर हो गयी मैं तब तक सोचता रहा की जब तक मैंने चाची को अपनी तरफ आते हुए नहीं देखा.

 
#92



मैंने कुछ गिलास पानी पिया और वहीँ पर बैठ गया चाची भी तबतक पास आ चुकी थी .

मैं- आज यहाँ पर कैसे.

चाची- कई दिन हो गए थे इस तरफ आना ही नहीं हुआ. सोचा की घूम आऊ खुली हवा पर थोडा हक़ मेरा भी तो है न .

मैं- मंगू, सरला नहीं आये आज.

चाची- पता नहीं मेरी कोई बात नहीं हुई उनसे. तू बता कहाँ गायब रहता है आजकल.

मैं- बस उलझा हूँ कुछ कामो में .

चाची- क्या काम है ऐसे की अब मुझसे भी नजरे चुराने लगा है

मैं- ब्याह करने वाला हूँ कुछ दिनों में उसी में उलझा हूँ

चाची- देख कबीर, बेशक अपनी पंसद की छोरी से कर ले पर एक बार जेठ जी को तो बता दे, उनको बाद में मालूम हुआ तो कहीं नाराज न हो जाये वो.

मैं- मुझे फर्क नहीं पड़ता चाची. पर क्या तू मुझे बता सकती है की रुडा और चाचा की लड़ाई किस बात पर हुई थी .

चाची- तू पहले भी पूछ चूका है ये बात, तेरे चाचा घर से बाहर क्या करते थे मैं नहीं जानती .

चाची के ब्लाउज से बहार को झांकती चुचिया मुझे ललचा रही थी की आ हमें दबा ले. मसल ले . मैं करता भी ऐसा पर मेरी नजर सरला पर पड़ी जो हमारी तरफ ही आ रही थी तो मैंने विचार बदल दिए.

मैं- चाची मैं चाहता हूँ की जब मेरी दुल्हन आये तो तू उसे अपने घर में रहने की इजाजत दे.

चाची- ये कोई कहने की बात है क्या , और मेरा घर तेरा भी है ये क्यों भूल जाता है तू.

मैंने सरला से थोडा पानी गर्म करने को कहा, मैं नहाना चाहता था . थोड़ी देर और चाची के साथ बाते करने के बाद नहा कर मैं मलिकपुर की तरफ निकल गया. रमा का ठेका आज भी बंद था उसके कमरे पर भी ताला लगा था. मैं उस से मिलना चाहता था पर वो थी नहीं . घूमते घूमते मैं प्रकाश के घर की तरफ चला गया जहाँ उसके अंतिम संस्कार की तयारी चल रही थी मैंने देखा की पिताजी और भैया भी थे वहां तो मैं वापिस मुड गया.

मैं अंजू को देखना चाहता था , जानना चाहता था की प्रकाश की मौत का कितना फर्क पड़ता है उस पर. पर अंजू थी कहाँ . रमा भी गायब , खैर वापिस आना तो था ही , तभी मुझे ध्यान आया की रमा ने बताया था की अंजू जब भी मलिकपुर आती है तो वो स्कूल में बच्चो को पढ़ाती है तो मैं वहीँ पर पहुँच गया, और किस्मत देखिये मुझे शहर में उसका पता भी मिल गया.

सहर जाते समय जिन्दगी में पहली बार मैंने सोचा की मेरे पास भी भैया के जैसे गाड़ी होनी चाहिए , खैर , उस पते पर जब मैं पहुंचा तो हैरत से मेरी आँखे फट गयी. अंजू का घर, दरअसल उसे घर कहना तोहीन होती , वो घर नहीं हवेली ही थी, अंजू अमीर थी जानता था मैं पर इतनी अमीर होगी ये नहीं सोचा था .

पर वहां कोई दरबान नहीं था . दरवाजे पर एक बड़ी सी घंटी लटकी थी जिसे जोर लगा कर मैंने बजाया तो अन्दर से एक नौकरानी आई और मुझ से सवाल करने लगी. मैंने उसे कहा की अंजू से मिलने कबीर आया है. वो अन्दर गयी और थोड़ी देर बाद दरवाजा खोल कर मुझे अदब से अपने साथ ले गयी. घर क्या था हमें तो महल ही लगता था .

दीवारों पर तरह तरह की तस्वीरे थी जो मुझे समझ नहीं आई. किताबे इधर उधर बिखरी पड़ी थी . पर बाकी सब कुछ सलीके से था . कुछ देर बाद अंजू आई, उसकी आँखे लाल थी शायद बहुत रोई होगी वो रोती भी क्यों न .....

“तुम यहाँ क्यों आये ” उसने पूछा

मैं- आपसे मिलने

अंजू- कबीर, मेरा मूड बहुत ख़राब है आज, मैं परेशान हूँ

मैं- जानता हूँ , आपके लिए सदमे से कम नहीं है

मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- जानता हु आप पर क्या बीत रही है , आप बाहर से कितना भी मजबूत क्यों न हो पर आपके मन की बेचैनी, उसकी बेदना समझता हूँ मैं इसीलिए मैं यहाँ आया. बेशक मैं इस दुःख को कम नहीं कर पाऊंगा पर फिर भी मुझे लगा की इस वक्त आपके साथ होना चाहिए मुझे. मैंने आगे बढ़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया और तब तक लगाये रखा जब तक की उसका दर्द आंसू बन कर बह नहीं गया.

मैं- मालूम कर लूँगा ये किसका काम है

अंजू- जरुरत नहीं , ये काम मैं खुद करुँगी.

मैं- कभी कभी लगता है की आपकी और मेरी मंजिल एक ही है

अंजू- कैसी मंजिल

मैं- आपको भी जंगल में किसी चीज की तलाश है मुझे भी .

अंजू- किसने कहा की मैं जंगल में कुछ ढूँढने जाती हूँ.

मैं- अनुमान है मेरा .

अंजू- मुझे भला क्या जरुरत

मैं- यही मैं जानना चाहता हूँ की क्यों नहीं जरूरत आपको किसी भी चीज की .

मैंने जेब से सोने के कुछ सिक्के निकाले और अंजू के हाथ में रख दिए.

“तो इनकी वजह से तुम यहाँ चले आये, तुमको क्या लगा था की इनके लिए मैं जंगल में जाती हूँ ” उसने मुझे घुर कर कहा.

मैं- क्या आपको इनका कोई मोह नहीं, क्या आप नहीं चाहती इनको पाना .

अंजू- नहीं , जो मेरा है उस से मुझे भला क्या मोह होगा. और जो मेरा है उसे क्या पाना

अंजू ने जो रहस्योद्घाटन किया था मेरे तमाम ख्याल , तमाम धारणाओं को ध्वस्त होते देखा मैंने .

मैं- कैसे ,,,,,,,,,,,

अंजू- मेरी माँ सुनैना, बंजारों की टोली के सबसे सिद्ध थी वो. उसने खोजा था इस सोने को. कबीर, सोना एक ऐसी चीज है जो कभी अपना नहीं हो सकता, मिला हुआ, पड़ा हुआ सोना या वो सोना जो तुम्हारा नहीं है पर तुमने कब्ज़ा लिया है तुम्हे कभी सुख नहीं देगा, मान्यता है की मिला हुआ सोना अपने साथ दुर्भाग्य लाता है . ये सत्य है . मेरी माँ की मौत का असली कारण सोना था . राय साहब जानते है इस बात को . राय साहब की कोई बहन नहीं थी ,मेरी माँ को सगी बहन से भी ज्यादा स्नेह करते थे वो. मरते हुए मेरी माँ ने राय साहब को उस सोने का राज बताया जिसकी वजह से उसकी मृत्यु हुई. राय साहब ने वक्त आने पर वो राज मुझे बताया. पर मैंने इसे नकार दिया. दुनिया इस सोने को लालच के रूप में देखेगी पर मैं इसमें मेरी माँ के खून को देखती हूँ .

मैं- पर रुडा आपकी माँ से बहुत प्रेम करता था .

अंजू- प्रेम नहीं था वो , रुडा इस सोने से प्रेम करता था , जब वक्त आया हमें अपनाने का तो उसके हाथ कमजोर पड़ गए. वो चाहते तो कोई मेरी माँ का बाल भी बांका नहीं कर सकता था .

मैं- तो क्या राय साहब से तल्खी का कारन भी ये सोना ही है

अंजू- बड़ी देर से समझे तुम.

चूँकि चालाक अंजू पर मुझे विश्वास कम ही था तो मैंने एक सवाल और पूछा .

मैं- क्या आप जानती है की ये सोना कहाँ है

अंजू- जानती हूँ , और तुम्हे भी बताती हूँ तुम्हे चाहिए तो तुम ले सकते हो . सोना मेरी माँ की समाधी के निचे है .मैंने अपना माथा पीट लिया . सोना वहां कैसे हो सकता था.

मैं- पक्का सोना वहीँ पर है

अंजू- जब मैंने आखिरी बार देखा था तो सोना वहीँ पर था .

मैं - और ये आखिरी बार कब था

अंजू- ठीक तो याद नहीं पर शायद सात-आठ साल पहले.

बहुत से सवालों का जवाब मिल चूका था मुझे.

मैं- यदि सोने से आपको कोई वास्ता नहीं तो फिर इतनी अमीर कैसे है आप .

अंजू-तुम एक बात भूल गए मैं सुनैना की बेटी हूँ , उस सुनैना की जिसे राय साहब ने बहन माना था .

इसके आगे मुझे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं थी . मैंने अंजू से विदा ली और दरवाजे की तरफ मुड़ा ही था की सामने लगी तस्वीर ने मेरे कदम रोक लिए.......................................
 
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