Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 12 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#93



वो तस्वीर जिसे भैया ने गायब कर दिया था वो तस्वीर यहाँ अंजू के घर टंगी हुई थी . ये तस्वीर भी साली जी का जंजाल बन गयी थी . अंजू के घर होना इस तस्वीर का अपने आप में एक राज था .मैं वापिस मुड़ा और अंजू के पास फिर से गया .पर वो जा चुकी थी नौकरानी ने कहा की अब वो नहीं मिलेगी . क्या भैया और अंजू दुनिया की नजरो में भाई बहन बने हुए थे और असली में कुछ और रिश्ता था दोनों का. ये सवाल न चाहते हुए भी मेरे मन में खटक रहा था.

वापस आया तो देखा की सरला अभी भी थी खेतो पर . इतनी देर तक क्यों रहती है यहाँ ये जबकि मैंने इस से कई बार कहा हुआ है की तू समय से लौट जाया कर. ये भी नहीं सुनती मेरी.

मैं- तुझे कितनी बार कहा है की समय से घर जाया कर. अभी अंधेरा होने वाला है

सरला- तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी कुंवर मैं

मैं- कोई काम था क्या

सरला- कुछ बताना था तुमको .

मैं- क्या

सरला- तुम्हारे दोस्त मंगू का रमा के साथ चक्कर चल रहा है मैंने दोनों को चुदाई करते हुए देखा .

सरला की बात सुनकर मेरा माथा और ख़राब हो गया. मंगू तो कहता था की वो कविता से प्यार करता था पर ये साला रमा के साथ लगा हुआ है.

मैं- दोनों की मंजूरी है तो चलने दो चक्कर हमें क्या लेना-देना.

सरला- मुझे लगा की तुम्हे बताना चाहिए.

मैं- तूने कहा देखा उनको .

सरला- दोपहर को चाची मुझे खेतो में दूर तक साथ ले गयी घुमने के लिए फिर वापसी में वो गाँव की तरफ चली गयी मैं इधर आई तो कमरा अन्दर से बंद था, मैंने सोचा तुम लौट आये होगे. अन्दर से आती आवाजो से लगा की बात कुछ और है तो मैंने दरवाजे की झिर्रियो से देखा और दंग रह गयी.

बेशक सरला की कही बात सामान्य थी पर उसने मुझे सोचने के लिए बहुत कुछ दे दिया था . मैंने उस से चाय बनाने के लिए कहा और सोचने लगा. प्रकाश कुवे के आसपास था , अंजू भी थी . मंगू रातो को कहाँ जाता था ये मैं समझ गया था . सारी कडिया मेरे सामने थी. रमा थी वो कड़ी. रमा मंगू से भी चुद रही थी , प्रकाश जिस औरत को चोद रहा था वो रमा थी. रमा दोनों को चुतिया बना रही थी एक साथ. अंजू भी मेरी तरह उसी समय जंगल में थी , उसने भी चुदाई देखि होगी बस उसने अपनी कहानी में रमा की जगह खुद को रख कर मेरे सामने पेश कर दिया था .

एक महत्वपूर्ण सवाल प्रकाश ने चुदाई करते हुए कहा था की मैं तुझे गाड़ी से तेरे घर छोड़ आऊंगा. मतलब रमा के पुराने घर इसलिए ही गाडी गाँव की तरफ गयी थी . मंगू को मालूम होगा की रमा रात को उसके पुराने घर पर मिलेगी, रात को वाही गया होगा वो उसे चोदने के लिए. और ये मुमकिन भी था क्योंकि जब जब रमा यहाँ इनके साथ रही होगी तभी मैं उस से मिलने मलिकपुर गया जहाँ पर ताला था .

क़त्ल वाली रात प्रकाश रमा से ही मिलने आया होगा, या फिर उसका ही इन्तजार कर रहा होगा. कडिया जुड़ रही थी सिवाय एक के की, क्या अंजू सच में प्रकाश से प्यार करती थी , अगर नहीं करती थी तो उसने क्यों कहा मुझसे की वो चाहती है प्रकाश को और वो चुडिया , चुदाई के बीच खनकती चुडिया. चूँकि मैंने प्रकाश के घर काफी ऐसा सामान देखा था तो मान लिया की ये शौक रखता हो वो औरत को सजा-धजा के चोदने का.

“कुंवर , चाय ” सरला की आवाज ने मुझे धरातल पर ला पटका.

मैं- भाभी एक बात बता, जब चाचा तेरी लेता था तो क्या वो फरमाइश करता था की तू सज-धज कर चुदे , क्या वो तुझसे तस्वीरों वाली हरकते करता था .

सरला-हाँ, छोटे ठाकुर को साफ़ सुथरी औरते पसंद थी . बगलों में और निचे एक भी बाल नहीं रखने देते थे वो. तरह तरह की पोशाके लाते वो , किताबो को देख कर वही सब करवाते थे , शुरू में तो अजीब लगता था फिर बाद में अच्छा लगने लगा.

मैं- क्या उन्होंने तुमको अपने किसी दोस्त से भी चुदवाया

सरला- क्या बात कर रहे हो कुंवर, छोटे ठाकुर हम पर हक़ समझते थे अपना वो ऐसा कैसे करते.

मैं- क्या मंगू ने तुझे पटाने की कोशिश की .

सरला- कभी कभी देखता तो है वो पर ऐसा नहीं लगता मुझे.

मैं- तो एक काम कर मंगू को अपनी चूत के जाल में फंसा ले.

सरला- कुंवर, क्या कह रहे हो तुम

मै- जो तू सुन रही है , समझ मेरी बात मैं ये नहीं कह रहा की तू चुद जा उस से, तू बस उसे अहसास करवा की तू चाहती है उसे, कुछ बाते है जो तू तेरे हुस्न के जरिये उगलवा ले उससे.

सरला- अपने ही दोस्त की जासूसी करवा रहे हो

मैं- तू भी तो मेरी ही है न , तूने वादा किया है मेरी मदद करने का

सरला- वादा निभाऊंगी

मैं- तो कर दे ये काम

सरला- एक बात और बतानी भूल ही गयी थी . रमा ने मंगू को आज रात उसके पुराने घर पर बुलाया है .

मैं- ठीक है हम भी वहीँ चलेंगे. तू मुझे वही पर मिलना.

सरला- मैं ,,,,,,,

मैं- आ जाना, कुछ भी करके. तेरे घर पर मालूम तो है ही की तुम हमारे यहाँ काम करती है , बहाना कर लेना की चाची के पास रुकना है .

सरला- आ जाउंगी पर क्या करने वाले हो तुम

मैं- समझ जायेगी.

बाते करते हुए हम दोनों गाँव की तरफ चल दिए. मैंने सरला को उसके घर छोड़ा और चौपाल के चबूतरे पर बैठ कर सोचने लगा की रमा क्या खेल खेलना चाहती थी, अगर उसके प्रकाश से अवैध सम्बन्ध थे तो उसने क्यों मुझे प्रकाश की ऐसी छवि दिखाई क्यों मुझे उसके घर ले गए. कितना आसान था रमा का मुझे उसके घर ले जाना, उसने मुझे वही दिखाया जो वो दिखाना चाहती थी , क्या उसकी कहानी झूठी थी. क्या था उसके मन में वो ही बताने वाली थी अब तो.

मंगू मेरा सबसे करीबी था उसे चूत के जाल में कविता ने फंसाया और अब रमा ने पर किसलिए. मंगू से क्या जानकारी चाहती थी वो . और अगर प्रकाश भी इनके साथ शामिल था तो क्या साजिश हो रही थी . एक बात और मैं जान गया था की उस रात कविता प्रकाश से गांड मरवाने ही गयी थी जंगल में .

आज की रात बड़ी महत्वपूर्ण होने वाली थी . घर पर भैया और पिताजी अभी तक नहीं लौटे थे. भाभी से मैं कुछ जरुरी बात करना चाहता था पर वो चंपा और चाची के साथ बैठी थी तो मैंने फिर कभी करने का सोचा और जब सब सो गए तो मैं रमा के पुराने घर की तरफ निकल गया. सरला मुझे पेड़ो के झुरमुट के पास ही मिल गयी .हम दोनों रमा के पुराने घर पर पहुंचे . घर के नए दरवाजे बंद थे पर खिड़की का एक पल्ला खुला था हमने जब अन्दर झाँका तो.................................

 
#94



अन्दर के नज़ारे को देख कर मेरे साथ साथ सरला की भी आँखे फटी की फटी रह गयी.

“अयाशी खून में दौड़ती है ” मेरे कानो में नंदिनी भाभी की आवाज गूँज रही थी .

“ये तो .............. ” मैंने सरला के मुह पर हाथ रखा और उसे चुप रहने को कहा. जरा सी आवाज भी काम बिगाड़ सकती थी. अन्दर कमरे में बिस्तर पर रमा नंगी होकर राय साहब की गोद में बैठी थी , रमा के गले में सोने की चेन, कमर पर तगड़ी और हाथो में चुडिया थी,एक विधवा को सजा कर अपनी ख्वाहिश पूरी करने वाले थे राय साहब. बाप का ये रूप देख कर मियन समझ गया था की भाभी ने सच कहा था चंपा को भी चोदता है ये.

मैं और सरला आँखे फाड़े राय साहब और रमा की चुदाई देख रहे थे, तभी मेरी नजर मंगू पर पड़ी जो वही एक कोने में बैठा था . खुद चुदाई करना और किसी दुसरे को चुदाई करते हुए देखना अपने आप में अलग सी फीलिंग थी . पर मैं खिड़की से हटा नहीं , बेशर्मो की तरफ अपने बाप की रासलीला देखता रहा .

जब राय साहब का मन भर गया तो वो बिस्तर से उठे और रमा के हाथ में नोटों की गड्डी देकर वहां से चले गए. उनके जाते ही मंगू ने अपनी धोती खोली और रमा पर चढ़ गया . रमा ने जरा भी प्रतिकार नहीं किया मंगू का और मैं खिड़की से हट गया. ऊपर दिमाग में दर्द हो गया था निचे लंड में ,

आखिरकार सरला ने चुप्पी को तोडा.

सरला- कुंवर, ये तो मामला ही उल्टा हो गया .

मैं- तूने जो भी देखा ये बात बाहर नहीं जानी चाहिए.

सरला- भरोसा रखिये.

मैं- मंगू पिताजी के लिए काम कर रहा है , उसे तोडना जरुरी होगा .

सरला- मैं पूरी कोशिश करुँगी उस से बाते निकलवाने की

मैं- रमा को प्रकाश भी चोद रहा था पिताजी भी . कुछ तो गहराई की बात है .

मेरे दिमाग में अचानक से ही बहुत सवाल उभर आये थे पर सरला के सामने जाहिर नहीं करना चाहता था. पेड़ो के झुरमुट के पास बैठे हम दोनों अपने अपने दिमाग में सवालो का ताना बुन रहे थे .

मैं- तुझे घर छोड़ आता हूँ

सरला- घर कैसे जाउंगी, घर पर तो कह आई न की छोटी ठकुराइन के पास रुकुंगी आज.

मैं- कुवे पर चलते है फिर.

वहां पहुँचने के बाद , हम दोनों बिस्तर में घुस गए. बेशक मैं नहीं करना चाहता था पर ठण्ड की रात में सरला जैसी गदराई औरत मेरी रजाई में थी जो खुद भी चुदना चाहती थी . सरला ने अपना हाथ मेरे लंड पर रखा और उसे सहलाने लगी.

मैं- सो जा न

सरला- अब मौका मिला है तो कर लो न कुंवर.

मुझे चाचा पर गुस्सा आता था की भोसड़ी वाले ने इन औरतो में इतनी हवस भर दी थी की क्या ही कहे. खैर नजाकत तो ये ही थी . मैंने सरला के होंठ चूमने शुरू किये तो वो भी गीली होने लगी. जल्दी ही हम दोनों नंगे थे और मेरा लंड सरला के मुह में था . थूक से सनी जीभ को जब वो मेरे सुपाडे पर रगडती तो मैं ठण्ड को आने जिस्म में घुसने से रोक ही नहीं पाया.

उसके सर को अपने लंड पर दबाते हुए मैं पूरी तल्लीनता से इस अजीब सुख का आनंद उठा रहा था . सरला की ये बात मुझे बेहद पसंद थी की वो जब चुदती थी तो हद टूट कर चुदती थी .मेरे ऊपर चढ़ कर जब वो अपनी गांड को हिलाते हुए ऊपर निचे हो रही थी . मेरे सीने पर फिरते उसके हाथ उफ्फ्फ क्या गर्म अहसास दे रहे थे. सरला की आँखों की खुमारी बता रही थी की वो भी रमा और राय शाब की चुदाई देख कर पागल हो गयी थी.

उस रात मैंने और सरला ने दो बार एक दुसरे के जिस्मो की प्यास बुझाई. पर मेरे मन में एक सवाल घर जरुर कर गया था की अगर रमा को राय सहाब चोदते थे तो फिर जरुर वो कबिता और सरला को भी पेलते होंगे.

मैं- क्या राय साहब ने तुझे भी चोदा है भाभी

सरला- नहीं . मुझे तो आज ही मालूम हुआ की राय सहाब भी ऐसे शौक करते है .

राय साहब सीधा ही चले गए थे रमा को चोद कर कुछ बातचीत करते उस से तो शायद कुछ सुन लेता मैं.

मै- कल से तू पूरा ध्यान मंगू पर रख भाभी, उस से कैसे भी करके रमा और राय साहब के बीच ये सम्बन्ध कैसे बने उगलवा ले.

सरला- तुम्हारे लिए कुछ भी करुँगी कुंवर.

मैं- कहीं राय साहब और चाचा के बीच झगडा इस बात को लेकर तो नहीं था की चाचा को मालूम हो गया हो की उनकी प्रेमिकाओ का भोग पिताजी भी लगाना चाहते थे .

सरला- नहीं ये नहीं हो सकता , चूत के लिए दोनों भाई क्यों लड़ेंगे, और राय साहब का ये रूप सिर्फ मैंने और तुमने देखा है , ये मत भूलो की गाँव में और इलाके में राय साहब को कैसे पूजते है लोग. उनके दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता. सबके सुख दुःख में शामिल होने वाले राय साहब की छवि बहुत महान है .

मैं- पर असली छवि तेरे सामने थी

सरला- अगर मैंने देखा नहीं होता तो मैं मानती ही नहीं इस बात को.

एक बात तो माननी थी की चाचा ने इन तीन औरतो को कुछ सोच कर ही पसंद किया होगा तीनो हद खूबसूरत थी, जिस्मो की संरचना ऐसी की चोदने वाले को पागल ही कर दे. कविता, रमा और सरला हुस्न का ऐसा नशा को चढ़े जो उतरे ना.

खैर, सुबह समय से ही हम लोग गाँव पहुँच गए. घर पर आने के बाद मैंने हाथ मुह धोये और देखा की भाभी रसोई में थी मैं वहीं पर पहुँच गया .

मैं- जरुरी बात करनी है

भाभी- हाँ

मैं- आपने सही कहा था पिताजी और चंपा के बारे में

भाभी- मुझे गलत बता कर मिलता भी क्या

मैं-समय आ गया है की अब आप बिना किसी लाग लपेट के इस घर का काला सच मुझे बताये.

भाभी- बताया तो सही की राय साहब और चंपा का रिश्ता अनितिक है

मैं- सिर्फ ये नहीं और भी बहुत कुछ बताना है आपको

भाभी- और क्या

मैं- मेरे शब्दों के लिए माफ़ी चाहूँगा भाभी , पर ये मुह से निकल कर ही रहेंगे.

भाभी देखने लगी मुझे.

मैं- जंगल में मैंने प्रकाश को एक औरत के साथ चुदाई करते हुए देखा. फिर अंजू मुझे मिली अपने कुवे वाले कमरे पर , अंजू ने कहा की वो ही थी परकाश के साथ , पर सच में उस रात रमा थी प्रकाश के साथ ,

चुदाई सुन कर भाभी के गाल लाल हो गए थे. मैंने उनको तमाम बात बताई की कैसे पिताजी कल रात रमा को चोद रहे थे फिर मंगू ने चोदा उसे.

मेरी बात सुनकर भाभी गहरी सोच में डूब गयी .

मैं - कुछ तो बोलो सरकार,

भाभी- सारी बाते एक तरफ पर अंजू और राय साहब के भी अनैतिक सम्बन्ध होंगे ये नहीं मान सकती मैं .

मैं- क्यों भाभी,

भाभी- क्योंकि................................

 
#95



भाभी- क्योंकि अंजू इस दुनिया की सबसे खुशनसीब बहन है , उसके सर पर अभिमानु ठाकुर का हाथ है. अभिमानु ठाकुर वो नाम है जिसने इस घर को थाम कर रखा है . अंजू की ढाल है तुम्हारे भैया.

भाभी की बात ने हम दोनों के बीच एक गहरी ख़ामोशी पैदा कर दी. ऐसी ख़ामोशी जो चीख रही थी .

मैं- तो फिर भैया क्यों नहीं बताते मुझे अतीत के बारे में क्यों ढो रहे है अपने मन के बोझ को वो अकेले.

भाभी- क्योकि वो बड़े है , बड़ा भाई छोटो के लिए बाप समान होता है , जो काम बाप नहीं कर पाया वो अभिमानु कर रहे है . तुम्हे चाहे लाख शिकायते होंगी उनसे पर उन्होंने सबकी गलतिया माफ़ की है , तुमने उन्हें बस बड़े भाई के रूप में देखा है मैंने उन्हें एक साथी के रूप में जाना है वो साथी जो तनहा है , वो साथी जो हर रोज टूटता है और अगले दिन फिर इस परिवार के लिए उठ खड़ा होता है . क्या लगता है की उनको अपने बाप की हरकते मालूम नहीं है पर इस घर को घर बनाये रखने के लिए वो घुट गए अपने ही अन्दर. तुमको क्या लगता है की ये विद्रोही तेवर तुम्हारे अन्दर ही उबाल मार रहे है , अभिमानु ने बरसो पहले अपने इस उबाल को ठंडा कर दिया. तुम अक्सर पूछते हो न की तुम्हारे भैया की कोई इच्छा क्यों नहीं , क्यों उन्होंने अपनी तमाम इच्छाओ को छोड़ दिया. इस घर के लिए, रिश्तो की जिस डोर को तुम बेताब हो तोड़ने के लिए. उस डोर को अभिमानु ने अपने खून से सींचा है.

मैंने भाभी से फिर कुछ नहीं कहा रसोई से बाहर निकल गया. भाभी ने मेरे दिल पर ऐसा पत्थर रख दिया था जिसके बोझ से मैं धरती में धंसने लगा था . कम्बल ओढ़े मैं गहरी सोच में डूब गया था आखिर ऐसी क्या वजह थी की अंजू को अपनाया था अभिमानु भैया ने.

“कबीर चाय ” चंपा की आवाज ने मेरा ध्यान वापिस लाया.

उसने जैसे ही कप पास में रखा मैंने खींच कर एक थप्पड़ जड दिया उसके गाल पर. एक और फिर एक और .

“ऐसी क्या वजह थी जो राय साहब से गांड मरवानी पड़ी तुझे. ऐसा क्या चाहिए था तुझे , मैं था न यहाँ पर मुझसे एक बार कहा तो होता तूने. आज सारे जहाँ में रुसवा खड़ा हूँ मैं पर मुझे परवाह नहीं पर तू , मेरे बचपन की साथी तू , तूने छला मुझे . खुद से ज्यादा तुझ पर नाज था मुझे और तू ..... क्यों किया तूने ऐसा ” मेरे अन्दर का गुस्सा आज चंपा पर फट ही पड़ा.

चंपा- मैं बस इस घर के अहसानों की कीमत चुका रही थी . जो अहसान इस घर ने मुझे पालने के लिए किये उनकी छोटी सी कीमत है ये. जिस राय साहब की वजह से मैं आज मेरा परिवार सुख में है उस सुख की थोड़ी कीमत मैंने चुका दी तो क्या हुआ .

मैंने एक थप्पड़ और मारा उसके गाल पर .

मैं- किस अहसान की बात करती है तू . ये घर तुझ पर अहसान करेगा. तूने कही कैसे ये बात. इस घर की नौकरानी नहीं है तू, न कभी थी . तू इस घर में इसलिए नहीं है की तेरे माँ-बाप हमारे यहाँ काम करते है तू इस घर में है क्योंकि तू मेरी दोस्त है . जितना ये घर मेरा है उतना ही तेरा. और अपने ही घर में कैसा अहसान , इस घर की बेटी रही तू सदा. मेरे बाप ने तुझे कहा और तू मान गयी, मैं मर थोड़ी न गया था , तू क्यों नहीं आई मेरे पास .मुझ पर भरोसा तो किया होता पर तूने इतना हक़ दिया ही नहीं .

चंपा ने एक गहरी साँस ली और बोली- जितना था मैंने तुझे बता दिया .जीवन में कभी कभी कुछ समझौते करने पड़ते है तू आज नहीं समझेगा मेरी बात पर समझ जायेगा.

मैं- ये बहाने कमजोर है तू अगर न चाहती तो राय साहब की क्या मजाल थी जो तुझे हाथ भी लगा देते मैं देखता

चंपा-इसलिए ही तो नहीं कह पाई तुझसे. मेरी वजह से बाप-बेटे में तकरार होती ,मैं जानती हूँ तेरे गुस्से को इसलिए चुप रही .

मैं- फिर भी क्या तू छिपा पाई मुझसे. और मंगू इस बहनचोद ने अपनी ही बहन पर हाथ साफ़ कर दिया. साले दोस्ती के नाम पर तुम कलंक मिले हो मुझ को . दिल तो करता है तुम दोनों का वो हाल करू की याद रखो तुम सारी उम्र.

चंपा- मंगू को देनी पड़ी राय साहब की वजह से , राय साहब ने मुझसे खुद कहा था की मंगू से भी कर ले. और वो नीच , उसने एक पल भी न सोचा की कैसे चढ़ रहा है अपनी बहन पर . जब वो गिर गया तो मैं तो पहले से ही गिरी हुई थी . तू भी कर ले अपने मन की, तेरी नाराजगी भी मंजूर मुझे. कबीर मेरा दिल जानता है उस दिल में तेरे लिए कितनी जगह है.

मैं- दूर हो जा मेरी नजरो से . कबीर मर गया तेरे लिए आज इसी पल से.

शाम को मैं मलिकपुर गया रमा से मिलने के लिए पर एक बार फिर ताला लगा था उसकी दुकान और कमरे पर . हरामजादी न जाने कहाँ गायब थी. मैंने सोच लिया था की रमा की खाल उतार कर ही अपने सवालो के जवाब मांगूंगा अब तो. मलिकपुर से लौटते समय मेरे दिमाग में वो बात आई जो इस टेंशन में भूल सी गयी थी .

रात होते होते मैं सुनैना की समाधी पर था. अंजू ने कहा था की उसने सोने को अंतिम बार यही पर देखा था . मैंने समाधी पर अपना शीश नवा कर माफ़ी मांगी और समाधी को तोड़ दिया. खोदने लगा निचे और करीब ६-7 फीट खुदाई के बाद मेरी आँखों के सामने जो आया. मैं वही पर बैठ गया अपना सर पकड़ कर. इस चक्रव्यू ने निचोड़ ही लिया था मुझे................ मेरे सामने, मेरे सामने...............................
 
आप लोगों को ना जाने क्यों ऐसा लगता है कि मैं कहानी की स्क्रिप्ट बदलते रहता हूं
 
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धरती की गहराई में मेरे सामने एक बेहद पुराना गड्ढा था जो ईंटो से बनवाया गया था मेहराबदार जैसे की छोटा कुवा हो. उसकी गहराई तो मैं नहीं जानता था पर इतना जरुर था की वो चाहे जितना गहरा हो . उसमे जो सामान था उसकी कीमत बहुत थी . वो गड्ढा ऊपर तक सिर्फ और सिर्फ सोने से भरा था .मैंने अनुमान लगाया यदि ये गड्ढा पांच-छ फूट गहरा भी हुआ तो भी हद, मतलब हद से जायदा सोना था यहाँ पर .

मेरा दिमाग और घूम गया . जंगल में जगह जगह सोना बिखरा हुआ था और दुनिया बहन की लौड़ी चूत के चक्कर में जंगल नाप रही थी . उस दिन मैंने जाना की सबसे बड़ा लालच इस दुनिया में चूत का ही है . बाकी सब उसके बाद . यहाँ पड़े सोने ने अंजू की बात की तस्दीक कर दी थी . पर मेरे सामने एक ऐसा यक्ष प्रशन खड़ा हो गया था की क्या पाने में पड़ा सोना इसका ही हिस्सा था या फिर दो अलग अलग खजाने थे .

मैंने गड्ढे को बंद किया और सुनैना की समाधी के टुकडो पर अपना सर रख कर इस कार्य के लिए माफ़ी मांगी .

“जब यहाँ तक आ ही पहुंचे तो फिर रुक क्यों गए . सोना सामने है ले क्यों नहीं जाते. ”

मैंने पलट कर देखा , राय सहाब खड़े थे.

मैं- ये सोना दुर्भाग्य है , अगर ये शुभ होता तो मुझसे पहले ही कई दावेदार थे न इसके, सुनैना की समाधी के लिए मैं शर्मिंदा हूँ , बाकि ये सोना न पहले मेरा था न आज है जिसका है वो ले जाये .

मैंने राय साहब की आँखों में आँखे मिला कर कहा.

पिताजी- अगर तुम्हे इसकी चाह नहीं तो फिर क्या चाहते हो तुम

मैं- जो मैं चाहता हूँ जल्दी ही ये सारा जमाना जान जायेगा. पर आज अभी इसकी वक्त मैं राय साहब ने जो मुखोटा ओढा हुआ है उस नकाब के पीछे क्या है वो जरुर जानना चाहूँगा.

पिताजी- लफ्जों पर लगाम लगाओ बरखुरदार

मैं- आपने रिश्तो को तार तार कर दिया , हमारे लफ्जों पर भी काबू ये तो नाइंसाफी है राय साहब.

पिताजी- हमारा बेटा हमारी ही आँखों में आँखे डाल कर खड़ा है , जिसके आगे दुनिया झुकती है तुम उस से आँखे मिला रहे हो.

मैं- दुनिया कहाँ जानती है की गरीबो का मसीहा , गरीबो की इज्जत अपने बिस्तर पर लूट रहा है . चंपा के साथ आपने जो भी किया न , मैं कभी नहीं भूलूंगा. आप जानते थे चंपा क्या है मेरे लिए इस घर में केवल दो बेटे ही नहीं थे ,एक बेटी भी थी जिसका नाम चंपा था और उसी बेटी के साथ आपने जो किया न मुझे शर्म है की मैं इस घटिया आदमी का खून हूँ .

“घर में चंपा, बाहर रमा और न जाने कितनी उसके जैसी औरतो ने आपके बिस्तर की शोभा बढाई होगी. जिस चाचा को आपने ये सब करने से रोका था आप भी उसके ही नक़्शे कदम पर चल निकले क्या फर्क रह गया . अरे मैं भी फर्क कैसे होगा, खून तो शुरू से ही गन्दा रहा है हमारा ” मैंने कहा .

राय साहब खामोश खड़े रहे .

मैं- ये ख़ामोशी कमजोरी की निशानी है राय साहब . मैं नहीं जानता आप किस रिश्ते को थाम रहे है किसको छोड़ रहे है पर मैं इतना जानता हूँ किसी भी रिश्ते को आपने इमानदारी से नहीं निभाया . सुनैना से लेकर रमा तक सबको आपने छला है . जो इन्सान खुद राते काली रहा है वो पंचायत में लाली को फांसी की सजा देता है , धूर्तता का चरम इस से ज्यादा क्या होगा.

पिताजी- उस पंचायत में ही हमने तुम्हारे अन्दर के विद्रोह को देख लिया था .हम जान गए थे की आने वाला वक्त मुश्किलों से भरा होगा. हम जो भी कर रहे है , हमने जो भी क्या उसके पूर्ण जिम्मेदार हम है सिर्फ हम और हमें नहीं लगता की हमें तुम्हे या किसी और को सफाई देने की जरूरत है .

मैं- सफाई नहीं मांग रहा मैं, बता रहा हूँ आपको की यदि आज के बाद मुझे भनक भी लगी न की आपने चंपा की तरफ नजर भी उठाई तो मेरा यकीं मानिए वो नजर, नजर नहीं रहेगी फिर.

पिताजी- अपनी औकात मत भूलो कबीर,

पिताजी जैसे दहाड़ उठे.

मैं- ये खोखला रुतबा मैं नहीं डरता इस से. मेरे शब्द अपने कानो में घोल लीजिये . वो दिन कभी नहीं आना चाहिए की मुझे अपने बाप का प्रतिकार करना पड़े.

“कबीर,,,, ” पिताजी ने अपना हाथ उठा लिया गुस्से से पर मारा नहीं मुझे , हल्का सा धक्का दिया और फिर वापिस मुड गए. मैं जान गया था की चोट गहरी लगी है बाप को . पर मैं कितना टालता इस दिन को ये आना ही था .

वहां से आने के बाद मैं सीधा रमा के पुराने घर गया पर वहां भी कोई नहीं था . मैं अन्दर गया . सब कुछ वैसा ही था . अलमारी में मुझे सोने के वो गहने मिले जो कल रात वो पहने हुई थी, पास में ही नोटों की गड्डी पड़ी थी. ये साला हो क्या रहा था इस गाँव में बहनचोद किसी को भी सोने से लगाव नहीं था . और जब जमीन , पैसे, गहनों का लालच न हो तो कारन सिर्फ एक ही हो सकता था नफरत या फिर मोहब्बत.

घर गया तो देखा की पुजारी आया हुआ था . मैंने उसे नमस्ते की और उसके पास बैठ गया .

भैया-भाभी-चाची सब कोई बैठे थे.मैं सोच रहा था की ये रात को क्यों आया था . मालूम हुआ की पुजारी फेरो में लगने वाला सामान लिखवाने आया था . तमाम चुतियापे के बीच मैं भूल ही गया था की ब्याह सर पर है . थोड़ी देर बाद पुजारी चला गया भैया ने मुझसे कहा की दो पेग लेगा पर मैंने मना किया .

“इतनी गहराई से क्या सोच रहे हो ” भाभी ने मेरे हाथ में खाने को कुछ दिया और मेरे पास ही बैठ गयी.

मैं- सोच रहा हूँ की इतने मेहमान आयेंगे शादी में , एक मेहमान मैं भी बुला लू क्या.

भाभी- वो नहीं आएगी

मैं- आप आज्ञा दे तो मैं ले आऊंगा उसे

भाभी- ठीक है , आती है तो ले आ. पर सिर्फ मेहमान की हसियत से. पर दुनिया से क्या कहोगे किस हक़ से लाओगे उसे यहाँ पर .

मैं- आप पूछ रही है ये. उसका हक़ नहीं तो फिर किसका हक़ . वो नहीं तो फिर और कौन . मैं आप से पूछता हूँ, आप हसियत की बात करती है उसे आने के लिए किसी हक़ की क्या जरुरत. वो जिन्दगी है मेरी .

भाभी ने अपना सर मेरे काँधे पर टिकाया और बोली- ले आना उसे, मेरी तरफ से न्योता देना उसे.

मेरी नजर आसमान में धुंध से आँख-मिचोली खेलते चाँद पर गयी. सीने में न जाने क्यों बेचैनी से बढ़ गयी....................

 
#97



भाभी- कितना चाहते हो उसे.

मैं- जितना तुम भैया को.

भाभी ने मेरे हाथ को अपने हाथ में लिया और बोली- निभा पाओगे उस से. उम्र के जिस दौर से तुम गुजर रहे हो कल को तुम्हारा मन बदल गया तो. मोहब्बत करना अलग बात है कबीर और मोहब्बत को निभाना अलग. तुम जिसे मंजिल समझ रहे हो वो ऐसा रास्ता है जिस पर जिन्दगी भर बस चलते ही रहना होगा. कभी सोचा है की किया होगा जब तुम्हारे भैया को मालूम होगा, जब राय साहब को मालूम होगा.

मैं- भैया को मैं मना लूँगा, और राय साहब को मैं कुछ समझता नहीं

भाभी- अच्छा जी , इतने तेवर बढ़ गए है , डाकन का ऐसा रंग चढ़ा है क्या.

मैं- जो है अब वो ही है .

भाभी- पुजारी से पूछा था मैंने कहता है कोई योग नहीं

मैं- उसके हाथो की लकीरों में मेरा नाम लिखा है , और कितना योग चाहिए पुजारी को .

भाभी- पर मेरा दिल नहीं मानता

मैं- दिल को मना लेंगे भाभी ,

“दिल ही तो नहीं मानता देवर जी ” भाभी ने अपनी गर्म सांसे मेरे गालो पर छोड़ते हुए कहा

मैं- भूख लगी है , कुछ दे दो खाने को .

भाभी- भैया को बुला लाओ मैं परोसती हूँ.

भाभी रसोई की तरफ बढ़ गयी मैं ऊपर चल दिया भैया के कमरे की तरफ. देखा भैया कुर्सी पर बैठे थे.

मैं- खाना नहीं खाना क्या

भैया- आ बैठ मेरे पास जरा

मैं वही कालीन पर बैठ गया .

मैं- क्या आप को मालूम है की सुनैना अंजू के लिए कितना सोना छोड़ कर गयी है .

भैया- क्या तू जानता है की मेरा छोटा भाई, जिसके कदमो में मैं दुनिया को रख दू, वो खेतो पर पसीना क्यों बहाता है .

मैं- क्योंकि मेरे पसीने की रोटी खा कर मुझे सकून मिलता है . मेरी मेहनत मुझे अहसास करवाती है की मैं एक आम आदमी हूँ , ये पसीना मुझे बताता है की मेरे पास वो है जो दुनिया में बहुत लोगो के पास नहीं है .

भैया- अंजू समझती है की वो सोना उसका नहीं है , वो जानती है की वो सोना अंजू को कभी नहीं फलेगा.

मैं-तो उस सोने की क्या नियति है फिर.

भैया- माटी है वो समझदारो के लिए और माटी का मोल मेरे भाई से ज्यादा कौन जाने है

मैं- दो बाते कहते हो भैया

भैया- सुन छोटे, कल से तू ज्यादा समय घर पर ही देना, ब्याह में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए .बरसों बाद हम कोई कारण कर रहे है .

मैं- जो आप कहे, पर मैं कुछ कहना चाहता हूँ

भैया- हा,

मैं- ब्याह की रात पूनम की रात है

मैंने जान कर के बात अधूरी छोड़ दी.

भैया - तू उसकी चिंता मत कर , तेरा भाई अभी है . चल खाना खाते है भूख बहुत लगी है .

हम दोनों निचे आ गए. खाना खाते समय मैंने महसूस किया की भैया के मन में द्वंद है , शायद वो मेरी बात की वजह से थोड़े परेशान हो गए थे. मैं भी समझता था इस बात को . उस रात परेशानी होनी ही थी मुझको . पर मैंने सोच लिया था की मैं दिन भर रहूँगा और रात को खेतो पर चला जाऊंगा, यही एकमात्र उपाय था मेरे पास.

खाना खाने के बाद मैं चाची के पास आ गया . मैंने बिस्तर लगाया और रजाई में घुस गया . थोड़ी देर बाद चाची भी आ गयी . और मेरे सीने पर सर रख कर लेट गयी .

चाची - क्या सोच रहा है कबीर

मैं- राय साहब के कमरे में कोई औरत आती है रात को उसी के बारे में की कौन हो सकती है

चाची- शर्म कर , क्या बोल रहा है तू अपने पिता के बारे में

मैं - पिता है तो क्या उसे चूत की जरूरत नहीं

चाची- कुछ भी बोलेगा तू

मैं- मैंने देखा है पिताजी को उस औरत को चोदते हुए

चाची- बता फिर कौन है वो

मैं- चेहरा नहीं देख पाया.

मैंने झूठ बोला.

चाची- घर में इतना कुछ हो रहा है और मुझे मालूम नहीं

मैं- पता नहीं तेरा ध्यान किधर रहता है.

मैंने चाची का हाथ पकड़ा और निचे ले जाकर अपने लंड पर रख दिया.चाची ने मेरे पायजामे में हाथ डाल दिया और अपने खिलोने से खेलने लगी. मैंने चाची के चेहरे को अपनी तरफ किया और उसके होंठ चूसने लगा. आज की रात चाची की ही लेने वाला था मैं पर नसीब देखिये, बाहर से दरवाजा पीटा जाने लगा ये भाभी थी जो रंग में भंग डालने आ पहुंची थी .

हम अलग हुए और चाची ने दरवाजा खोला भाभी अन्दर आई और बोली- चाची , अभिमानु कही बाहर गए है मैं आपके पास ही सोने वाली हूँ. मैंने मन ही मन भाभी को कुछ कुछ कहा .मैं बिस्तर से उठा और बाहर जाने लगा.

भाभी- तुम कहाँ चले

मैं- कुवे पर ही सो जाऊंगा. वैसे भी अब इधर नींद कम ही आती है मुझे.

मैंने कम्बल ओढा और बाहर निकल गया चूत से ज्यादा मैं ये जानना चाहता था की भैया रात में कहा गए. मैंने एक नजर बाप के कमरे पर डाली जिसमे अँधेरा छाया हुआ था , सवाल ये भी था की बाप चुतिया कहा रहता था रातो को .

सोचते सोचते मैं पैदल ही खेतो की तरफ जा रहा था . पैर कुवे की तरफ मुड गए थे पर थोडा आगे जाकर मैंने रास्ता बदल दिया मैंने खंडहर पर जाने का सोचा. हवा की वजह से ठण्ड और तेज लगने लगी थी . मैंने कम्बल कस कर ओढा और आगे बढ़ा. थोडा और आगे जंगल में घुसने पर मुझे कुछ आवाजे आई. आवाज एक औरत और आदमी की थी . इस जंगल में इतना कुछ देख लिया था की अब ये सब हैरान नहीं करता था.

झाड़ियो की ओट लिए मैं उस तरफ और बढ़ा. आवाजे अब मैं आराम से सुन पा रहा था .

“मुझे जो चाहिए मैं लेकर ही मानूंगा, तुम लाख कोशिश कर लो रोक नहीं पाओगी मुझे ”

“मुझे रोकने की जरुरत नहीं तुमको, तुम्हारे कर्म ही तुमको रोकेंगे. ” औरत ने कहा

इस आवाज को मैंने तुरंत पहचान लिया ये अंजू थी पर दूसरा कौन था ये समझ नहीं आया फिर भी मैंने कान लगाये रखे.

“तुम कर्मो की बात करती हो , हमारे खानदान की होकर भी तुमने एक नौकर का बिस्तर गर्म किया , घिन्न आती है तुम पर मुझे ”

“जुबान संभाल कर सूरज , ” अंजू ने कहा.

तो दूसरी तरफ सूरजभान था जो अपनी बहन से लड़ रहा था .

सूरजभान- शुक्र करो काबू रखा है खुद पर वर्ना न जाने क्या कर बैठता

अंजू- क्या करेगा तू मारेगा मुझे, है हिम्मत तुजमे तू मारेगा मुझे. आ न फिर किसने रोका है तुझे .

सूरज- मारना होता तो कब का मार देता पर तुम्हारे गंदे खून से मैं अपने हाथ क्यों ख़राब करू.

अंजू- मेरा सब्र टूट रहा है सूरज. मुझे मजबूर मत कर की मैं भूल जाऊ की तू मेरा भाई है .

सूरज- तुम हमारी बहन नहीं हो. कभी नहीं थी तुम हमारी, तुम बस हमारे बाप की वो गलती हो जिसे हम छिपा नहीं सकते.

तड़क थप्पड़ की आवाज ने बता दिया था की सूरजभान का गाल लाल हो गया होगा.

अंजू- तेरी तमाम गुस्ताखियों को आज तक मैंने माफ़ किया, पर आज इसी पल से तेरा मेरा रिश्ता ख़तम करती हूँ मैं. और मेरा वादा है तुझसे, अगर मेरा शक सही हुआ तो तेरी जिन्दगी के थोड़े ही दिन बाकी रह गए है. दुआ करना की तू शामिल ना हो मेरे दर्द में .



कुछ देर ख़ामोशी छाई रही और फिर मैंने गाड़ी चालू होते देखि . मैं तुरंत झाड़ियो में अन्दर को हो गया की कही रौशनी में मुझे न देख लिया जाए. कुछ देर मैं खामोश खड़ा सोचता रहा की अंजू के सामने जाऊ या नहीं .
 
#98



दो सवाल अंजू यहाँ क्या कर रही थी , और भैया रात को कहाँ गए थे. घूमते घूमते मैं मलिकपुर पहुँच गया , रमा की दूकान पर कुछ लोग थे. मैं अन्दर गया तो रमा मुझे मिल गयी .

मैं- कब से ढूंढ रहा हूँ और तुम हो की कहा गायब हो गयी थी , तुमसे जरुरी बात करनी थी .

रमा- अन्दर चलो मैं आती हूँ

कुछ देर बाद वो आई.

रमा- क्या बात थी

मैं- पिताजी और तुम्हारे बीच कब से ये सब चल रहा है

रमा- कुछ नहीं है हमारे बीच, कभी कभी वो बुलाते है मुझे . कभी अपनी मनमानी करते है कभी नहीं पर एक सवाल जरुर पूछते है

मैं- कैसा सवाल

रमा- यही की ठाकुर जरनैल मेरे पास आये क्या .

मैं- और क्या जवाब होता है तुम्हारा

रमा- यही की मैंने बरसो से उनको नहीं देखा.

मैं- मैंने मंगू के साथ भी देखा तुमको

रमा- राय साहब का कुत्ता है वो , हमारे जिस्मो की कुछ बोटिया कुत्तो को भी डाल देते है राय साहब ताकि हमें हमेशा याद रहे हमारी औकात.

मैं- उस रात जंगल में प्रकाश के साथ तुम चुदाई कर रही थी . तुम दोनों मिल कर चुतिया बना रहे थे मुझे

रमा- मेरी ऐसी मंशा नहीं थी न ही कभी प्रकाश ने मुझसे कुछ कहा तुम्हारे बारे में . वो बस आता चोदता और चले जाता.

मैं- बस इतना ही

रमा- हां, इतना ही .

मैं- देख रमा, मैंने तुझे वैध से चुदते देखा, फिर परकाश से फिर पिताजी और मंगू से, चाचा पहले से ही पेलता था तुझे. मैं नहीं जानता इस खेल में कौन गलत है कौन सही, मैं नहीं जानता तेरे मन में क्या चल रहा है तू चाहे दुनिया में आग लगा दे परवाह नहीं पर इतना ध्यान रखना तेरी खुराफात में किसी मजलूम का नुकसान न हो . तेरी चूत तू किसी को भी दे तू जाने.

रमा- क्या जानना चाहते हो मुझसे कुंवर.

मैं- चाचा कहाँ है ये जानना चाहता हूँ मैं

रमा- बस यही नहीं जानती मैं

मैं- रुडा और चाचा की लड़ाई हुई थी क्या रुडा का हाथ हो सकता है इसमें

रमा- मुझे नहीं लगता. रुडा बेशक घटिया है पर इतना नहीं गिरेगा वो .

मैं- परकाश को किसने मारा होगा.

रमा- चर्चा तो ये है की सूरजभान ने मारा है

मैं- किसने कहा ऐसा.

रमा- कहने को कौन आएगा उडती उडती खबर है .

मैं- पर सूरजभान तो साथ रहता था प्रकाश के फिर क्यों मारेगा उसे.

रमा-पिछले कुछ समय से अंजू और सूरजभान की तल्खी बहुत बढ़ गयी है . सूरज को लगता है की प्रकाश अंजू को चोदता है , कोई उसके घर की लड़की पर हाथ डाले ये उसे गवारा नहीं था शायद इसलिए ही .

मैं- पर अंजू तो उनके साथ रहती तो नहीं

रमा- साथ नहीं रहती पर है तो उनके परिवार की ही , है तो उसकी बहन ही.

मैं- चाचा को सबसे प्यारी तू थी , कभी चाचा ने तुझे कुछ ऐसा बताया जो तुझे खटका हो .

रमा- ऐसा तो कुछ खास नहीं था . पर वो कभी कभी कहते थे की राय साहब उनसे स्नेह नहीं करते थे .

मैं- और

रमा- छोटे ठाकुर का दिल उस घर में नहीं लगता था वो जायदातर समय जंगल में ही रहना पसंद करते थे .

मैं- जंगल में कहा था ठिकाना तुम लोगो के मिलने का.

रमा- ज्यादातर तो खेतो पर बने कमरे में ही मिलते थे या फिर छोटे ठाकुर की गाडी में .

चाचा भी गाडी रखते थे , ये तो मुझे मालूम ही था क्योंकि मैंने कभी भी चाचा की गाड़ी नहीं देखि थी .

मैं- चाचा की गाडी

रमा- हाँ,

मैं- तो अब कहा है वो गाडी

रमा- मालूम नहीं , जब से छोटे ठाकुर गए है गाड़ी देखि नहीं मैंने,शायद वो साथ ही ले गए हो.

मैं- इतने लोग से चुदने का क्या कारन है , चूत देकर क्या पाना चाहती है तू .

रमा- नहीं जानती .

मैं- जानता हु अब वापिस लौटना मुश्किल है पर फिर भी कोशिश तो कर ही सकती है न , अगली बार जब राय साहब तेरे पास आये तो तू मना करना कहना की कबीर ने कहा है .

रमा- राय साहब के खिलाफ जाओगे कुंवर.

मैं- वो मेरी समस्या है . क्या इतना मालूम कर सकती है की जिस दिन चाचा यहाँ से गया आखिरी बार वो किसके साथ था , किस से मिला था . कोई लेन देन कुछ तो ऐसा बताया होगा तुझे चाचा ने जो उस समय अजीब नहीं लगा हो पर आज उसका महत्त्व हो.

रमा- ऐसा तो कुछ खास नहीं है , छोटे ठाकुर बात बहुत कम करने लगे थे जब वो मिलने को बुलाते थे तो बस चुदाई की और हमारे लिए जो भी तोहफे लाते थे देकर चले जाते थे . कभी मैं पूछती तो टाल देते थे पर शायद अपने मन में कुछ तो छिपा रहे थे वो.

मैं- ऐसी कौन सी जगह थी जहाँ पर वो सबसे जायदा जाते थे मतलब जब वो चुदाई नहीं कर रहे होते थे तब.

रमा-नहीं मालूम पर वो हमें गहने देते थे तो कहते थे की ये बहुत बढ़िया कारीगर से बनवाये है .

मैं- कौन था वो कारीगर

रमा- यही, अपने सुनार और कौन. मुझे याद है एक बार उन्होंने कहा था की वो छोटी ठकुरानी के लिए कुछ विशेष गहने बनवा रहे थे.

“सुनार , ह्म्म्म ” मैंने कहा और वहां से चल दिया. अचानक से मुझे उन गहनों में उत्सुकता जाग गयी थी जो चाचा ने चाची के लिए बनवाये थे . मुझे वो गहने देखने थे और साथ ही मालूम करना था की चाचा की गाडी कहाँ गयी.

वापसी में मुझे अंजू फिर मिली, तनहा रात में आग जलाये सडक किनारे बैठी थी वो . इतनी रात को ये बहन की लोडी क्या करती है जंगल में मैं सोच कर ही पगला जा रहा था.

मैं- इतनी रात को यु अकेले जंगल में भटकना ठीक नहीं

अंजू- ये बात तुम पर भी लागू होती है

मैं- मैं तो अपने काम से गया था

अंजू- मुझे भी कोई काम हो सकता है न

मै आंच के पास बैठ गया और हाथ सेंकने लगा.

अंजू- क्या चाहते हो तुम इस जंगल से

मैं- अपने कुछ सवालो के जवाब

अंजू- क्या है सवाल तुम्हारे.

मैं- यही की ये जंगल क्या छिपा रहा है मुझसे

अंजू- मौत छिपी है यहाँ पर ,

मैं- कैसी मौत किसकी मौत

अंजू- मेरी मौत तुम्हारी मौत . हम सब की मौत. यहाँ जो ख़ामोशी है वो चीखो से दबी है , जंगल का कोना कोना रक्तरंजित है

मैं- किसका रक्त



अंजू- न तुम्हारा, न मेरा . अरमानो का रक्त, जज्बातों का रक्त, ..................
 
#99



मैं- देखो बात ये है की मुझे आदत नहीं है ये घुमा फिरा कर कहने वाली बातो की मैं जानना चाहता हूँ की क्या कारन है तुम इतनी रात को जंगल में घुमती हो. जबकि आदमखोर ने कितने लोगो को अपना शिकार बना लिया है

अंजू- मुझे उसकी परवाह नहीं है और फिर मौत से क्या डरना जिन्दगी के सफ़र का अंतिम पथ तो मौत ही है न .

मैं- तुम चाहे कहो की तुम प्रकाश से प्यार करती थी पर वो तुम्हे नहीं चाहता था , तुम्हारी पीठ पीछे न जाने कितनी औरतो संग चक्कर था उसका.

अंजू- फिर भी मैं जानना चाहती हूँ की उसे किसने मारा.

मैं- वैसे इस जंगल में तुमने किसकी मौत देखि थी .

अंजू- तुम्हे जानने की जरुरत नहीं

मैं- जरुरत है , एक रात अचानक से तुम मुझे मिलती हो , हम एक दुसरे को जानते है और पहली ही मुलाकात में तुम मुझे ये लाकेट देती हो क्यों

अंजू- इस लाकेट से तुमको इतनी ही परेशानी है तो वापिस दे दो मुझे अभी .

मैं- बेशक पर पहले मैं वो कारण जानना चाहता हूँ जिसके लिए तुम रात भटक रही हो .

अंजू- मैंने कहा न तुमको जानने की जरुँत नहीं

मैं- चाहूँ तो दो थप्पड़ मार कर भी पूछ सकता हूँ , एक मिनट नहीं लगेगी और जुबान टेप के जैसे चल पड़ेगी तुम्हारी.

अंजू- अपनी हद पार मत करो कबीर

मैं- हद तो देखि ही नहीं तुमने

अंजू-राय साहब को अगर मालूम हुआ की तुमने मेरे साथ बदतमीजी की है तो खाल खींच लेंगे तुम्हारी

मैं- जुती की नोक पर रखता हु मैं राय साहब जैसो को . तुमने मुझे झूठी कहानी बताई तुम भी जानती थी की उस रात गाड़ी के पास परकाश के साथ तुम नहीं रमा थी फिर मुझसे क्यों झूठ बोला तुमने , मेरे साथ क्या खेल खेल रही हो तुम.

अंजू- रमा से नफरत है मुझे कबीर, वो साली जैसी दिखती है वैसी नहीं है वो

मैं- हो सकता है , पर उसे फंसाने की कोशिश क्यों

अंजू- प्रकाश के सम्बन्ध थे रमा से, जब कोई अपना धोखा दे तो सहन करना मुश्किल होता है . पर मेरे लिए रमा से कुछ और जानना भी बहुत जरुरी था .

मैं- क्या , और अब तक तुम जान क्यों नहीं पाई.

अंजू- मैं जानती हूँ की मामा जरनैल के गायब होने के पीछे रमा का हाथ है .

मैं- कैसे और अगर ऐसा है तो तुमने ये बात राय साहब को क्यों नहीं बताई

अंजू- मैंने बताई थी उनको, रमा पर नजर है उनकी पर अफ़सोस उनके हाथ खाली है आजतक. मामा के गायब होने के कुछ दिनों पहले की ही बात है , उस शाम मैं नंदिनी से मिलने जा रही थी , पर कुवे पर उस दिन नंदिनी की जगह कोई और था , रमा और छोटे मामा. पहले तो मुझे लगा की रमा खेत पर काम करती होगी पर जब मैंने नजदीक से उनकी बाते सुनी तो छोटे मामा नाराज थे रमा पर.

मैं- रमा पर , क्यों, रमा तो उनको सबसे प्रिय थी .

अंजू- शायद इसलिए ही वो नाराज थे, छोटे मामा को मालूम हो गया था की रमा ने किसी और से भी नाता जोड़ लिया है .

मैं- किस से .

अंजू- यही नहीं जानती मैं इस बात का सबूत आज तक नहीं मिला मुझे.

मैं- प्रकाश ही रहा होगा

अंजू- नहीं , प्रकाश होता तो वो इतने दिन जिन्दा नहीं रह पाता छोटे मामा कभी का मरवा देते उसे.

मैं- तो फिर कौन हो सकता है

अंजू- कह नहीं सकती . मैंने रमा पर बहुत नजर रखी है पर प्रकाश के सिवा किसी और के पास नहीं गयी वो .

मैं समझ गया था की अंजू को गहराई की जानकारी नहीं थी .

मैं- चलो मान लिया रमा वाली कहानी पर तुम क्यों भटक रही हो जंगल में., मेरा सवाल फिर भी वही है .

अंजू-क्यों जानना चाहते हो तुम

मैं- क्योंकि तुम ही वो आदमखोर हो, तुम ही हो वो कातिल . मैं जानता हूँ सबसे बढ़िया जगह जंगल ही है . मैंने तमाम हिसाब लगाया है , जिन जिन रातो को आदमखोर की बेचैनी रहती है उन्ही रातो को तुम जंगल में भटकती हो.

अंजू- ओह, इतना बड़ा राज मालूम हो गया तुमको अब मैं क्या करुँगी. हाय मेरे ऊपर तो साया चढ़ रहा है हा हा

मैं- बात को घुमाओ मत

अंजू- ठीक है फिर अगली चाँद रात को मैं तुम्हारे साथ रहूंगी ,

मैं- अगली चाँद रात को मैं तुम्हारे साथ नहीं रह पाऊंगा.

अंजू- अभी से डर गए तुम , चाँद रात तो आई भी नहीं,

मैं- उस रात मुझे कुछ काम है

अंजू- क्या काम है तुम्हे, आदमखोर का दीदार करने से ज्यादा और क्या जरुरी है तुम्हे .

मैं- उस रात ब्याह है चंपा का

अंजू- ये तो और अच्छी बात है न, ब्याह में मैं भी आउंगी मुझ पर नजर रखने का बढ़िया मौका रहेगा तुम्हारे लिए.

इतना कहने के बाद अंजू उठ खड़ी हुई और चली गयी . मैंने आंच बुझाई और अपनी राह चल दिया. अगले दिन मैंने सबसे पहले चाची को पकड़ा.

मैं- चाचा ने तेरे लिए जो गहने बनवाये थे वो देखने है मुझे

चाची- उन्होंने कभी कोई गहने नहीं दिए मुझे. जो भी है वो ब्याह में दिए हुए है उसके बाद कुछ नहीं दिया मुझे .

मैं- याद कर चाची,

चाची ने अपनी अलमारी खोली और कुछ डिब्बो को बाहर रखते हुए बोली- देख ले , जो है यही है.कुछ मैंने नंदिनी को दे दिए पर ये सब मेरे बयाह में मिले थे .

मैं-रमा ने बताया की चाचा ने तेरे लिए गहने बनवाए थे

चाची- तो फिर उसी रंडी से पूछ ले की कहीं मेरी जगह उसको तो नहीं दे दिये वैसे भी तेरा चाचा मुझसे ज्यादा तो उसके पास ही रहता था .

मैं चाची की व्यथा समझता था पर चाचा ने गहने बनवाये थे तो फिर वो गहने गए कहाँ सोचने की बात तो थी. मैं ये मान भी लू की अगर तालाब वाले कमरे में चाचा इन रांडो को चोदता था तो फिर रमा और सरला क्यों नहीं जानती थी उस कमरे के बारे में.

खैर, मैंने अब मलिकपुर के सुनार से मिलने का निर्णय लिया वो ही अब कुछ बता सकता था . मैंने साइकिल उठाई और मलिकपुर की तरफ बढ़ गया जंगल पहुंचा ही था की सड़क के बीचो बीच मैंने कुछ ऐसा देखा की मैंने सोचा नहीं था. साइकिल अपने आप रूकती चली गयी. .................. नजरे जम गयी ................

 
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