Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 15 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

मित्रों मैं पूरी कोशिश करूंगा कि कहानी समाप्त करके जाऊँ, पर चूंकि समय कम है और तैयारी बहुत ज्यादा यूनिट ग्लेशियर जा रही है तो ज्यादातर समय फिटनेस चेक मे जा रहा है. यदि कहानी ईन दो दिनों मे पूरी ना हो पायी तो फिर 90 दिन बाद ही अपडेट आ पाएगा

असुविधा के लिए माफी चाहूँगा
 
#116



गड्ढे में पड़े कंकाल के टुकड़े चीख चीख कर बता रहे थे की क्यों राय साहब और अभिमानु उसे तलाश नहीं कर पाए थे, करते भी कैसे वो तो यहाँ दफ़न था और उसे दफ़न करने वाली कोई और नहीं बल्कि उसकी अपनी पत्नी थी, वो पत्नी जिसने इतने बड़े राज को बड़े आराम से छिपाया हुआ था .मुझे शक तो उसी पल हो गया था जब उन गहनों को देख कर भी चाची की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी. मैंने तभी ये जा फेंकने का सोच लिया था और किस्मत देखो चाची फंस गयी थी .

मैं- क्यों किया ये सब , जरा भी नहीं सोची की अगर राय साहब को मालूम हुआ तो क्या करेंगे वो तुम्हारे साथ.

चाची- आदमी के पापो का घड़ा जब भर जाता है न कबीर तो वो घड़ा अपने आप नहीं फूटता , किसी न किसी को हिम्मत करनी पड़ती है उसे फोड़ने के लिए, जिसे तू अपना चाचा समझता है न वो राक्षस था और राक्षसों का अंत होना ही उचित है. मैं नहीं मारती तो अभिमानु मार देता छोटे ठाकुर को मैंने बस अभिमानु के हाथ गंदे नहीं होने दिए.

मैं- तो क्या भैया जानते है इस बात को

चाची- एक वो ही तो है जो सबके किये पर मिटटी डाले हुए है

मैं बहुत कुछ समझ रहा था चाचा की मौत को भैया ने चाची की वजह से छिपाया था अगर पिताजी को मालुम होती तो वो बक्शते नहीं चाची को .

मैं- तो वो क्या कारण था जो तुमने अपने हाथो से अपना सुहाग उजाड़ दिया.

चाची - सुहाग के नाम कर कालिख था ये आदमी. सच कहूँ तो आदमी कहलाने के लायक ही नहीं था ये नीच. हवस में डूबे इस आदमी ने रमा की बेटी का बलात्कार किया था . एक मासूम फूल को उजाड़ दिया था इसने. ये बात अभिमानु को भी मालूम हो गयी थी, अपनी शर्म में उसने जैसे तैसे इस बात को दबा दिया. रमा ने बहुत गालिया दी उसे. पर वो चुप रहा . सब सह गया ताकि परिवार की बदनामी न हो . पर तेरा चाचा सिर्फ वही तक नहीं रुका. उसने वो किया जो करते हुए उसके हाथ कांपने चाहिए थे.

चाची ने पास रखे मटके से गिलास भरा और अपना गला तर किया. कुछ देर वो खामोश रही पर वो दो लम्हों की ख़ामोशी मुझे बरसो के इंतज़ार सी लगी.

चाची- छोटे ठाकुर ने अंजू का बलात्कार किया था .

चाची के कहे शब्दों का भार इतना ज्यादा था की मैंने खुद को उस बोझ तले दबते हुए महसूस किया. .

चाची- अंजू का हमारे घर में बहुत बड़ा ओहदा है, जैसे की तू और अभिमानु ,हमारे घर की सबसे प्यारी बेटी अंजू. सुनैना को बहुत मानते थे जेठ जी. उनकी कोई बहन नहीं थी शायद इस वजह से, सुनैना की मौत के बाद अंजू को दो पिताओ का प्यार मिला. रुडा और जेठ जी. ये रमा की बेटी की मौत के कुछ दिनों बाद की बात होगी. अंजू अक्सर कुवे पर आती थी . इस जंगल में बहुत जी लगता था उसका. पर एक शाम नशे में धुत्त तेरे चाचा की आँखों पर वासना की ऐसी पट्टी चढ़ी की वो समझ नहीं पाया की जिस वो भोग रहा है वो उसके ही घर की बेटी है .

मैं और अभिमानु जब यहाँ पहुंचे तो अंजू को ऐसी हालात में देख कर घबरा गए. हमारे सीने में ऐसी आग थी की उस पल अगर दुनिया भी जल जाती न तो कोई गम नहीं होता. जब अंजू ने उसके गुनेहगार का नाम बताया तो हमें बहुत धक्का लगा. एक तरफ बेटी की आन थी दूसरी तरफ पति का पाप. मैंने अपनी बेटी को चुना. छोटे ठाकुर को तो मरना ही था , मैं नहीं मारती तो चौधरी रुडा मार देता. अभिमानु मार देता या फिर जेठ जी मार देते. मेरा दिल बहुत टुटा था, उस इन्सान की हर खता माफ़ की थी मैंने , पर अगर ये पाप माफ़ करती तो फिर कभी खुद से नजरे नहीं मिला पाती. अपनी बेटी के न्याय के लिए मैंने छोटे ठाकुर को मार दिया और यहाँ दफना दिया ताकि कोई उसे तलाश नहीं कर पाए.

“दर्द सिर्फ तेरे हिस्से में नहीं है , यहाँ बहुत है जिन्होंने दर्द पिया है , दर्द जिया है ” अंजू के कहे ये शब्द मेरे कलेजे को बेध रहे थे .

तो ये था वो सच जो मेरी दहलीज में छिपा था .ये था वो राज वो भैया हर किसी से छिपाने की कोशिश कर रहे थे . अब मैंने जाना था की अंजू क्यों इतनी अजीज थी मेरे घर में . मैं समझा था की सोने के लिए ये सब काण्ड हुए है पर असली कारण ये था .

नफरत से मैंने चाचा के कनकाल पर थूका और उस गड्ढे को वापिस मिटटी से भरने लगा. जिन्दगी वैसी तो बिलकुल नहीं थी जिसे मैं सोचते आया था . समझते आया था . अगर मेरे सामने ऐसी हरकत चाचा ने की होती तो मैं भी उसे मार देता . फर्क सिर्फ इतना था की भैया और चाची उसकी मौत को छिपा गए थे मैं सरे आम चौपाल पर मारता उसे, ताकि फिर कोई कीसी की बहन-बेटी की आबरू तार-तार न कर सके.

चाची के गले लग कर बहुत रोया मैं उस रात. घर वापसी में मेरे कदम जिस बोझ के तले दबे थे वो मैं ही जानता था .मैंने देखा की भैया छज्जे के निचे सोये हुए थे, मैं उनके बिस्तर में घुसा, झप्पी डाली और आँखे बंद कर ली.

सुबह मैं उठा तो देखा की अंजू आँगन में बैठी थी . मैं उसके पास गया.

अंजू- क्या हुआ क्या चाहिए.

मैंने उस से कुछ नहीं कहा. बस उसके पांवो पर हाथ लगा कर अपने माथे पर लगा लिया. मेरे आंसू उसके पैरो पर गिरने लगे. उसने मुझे अपने पास बिठाया और बोली- क्या हुआ .

मैं कह नहीं पाया उस से की क्या हुआ. मेरा गला जकड़ गया . उसके सीने से लग कर मैं बस रोता ही रहा . वो मेरी पीठ सहलाती रही . बिना बोले ही हम लोग बहुत कुछ समझ गए थे.

मैं भाभी के पास गया और उनसे निशा के बारे में बात की . कल निशा को लेकर आना था मुझे.

भाभी- ले आ उसे देखा जायेगा जो होगा

मैं- कुछ पैसे चाहिए थे , शहर जाकर कपड़े गहने लाने है उसके लिए

भाभी- ये तेरा काम नहीं है , मैं देख लुंगी उसे. मैंने पूजारी को बता दिया है चंपा के फेरे होते ही तुरंत तुम दोनों के फेरे करवा देगा .



निशा को तो मैं ले ही आने वाला था पर मुझे उस से पहले कुछ राज और मालूम करने थे , गले में पड़े लाकेट को पकड़ कर मैंने दाई बाई घुमाया और सोचने लगा की मेज पर उकेरे शब्द और उन चुदाई की किताबो का क्या नाता हो सकता है .
 
900 पन्नों तक पहुंच दो मित्रों, कमेंट रुकने नहीं चाहिए
 
#117



दो बातो ने मुझे उलझा रखा था की क्या रमा जानती थी चाचा ने ही उसकी बेटी को मारा था . दूसरा वैध को किसने मारा. वैध एक ऐसा इन्सान था जो कविता को भी पेल रहा था , रमा को भी . वैध जरुर जानता था की कविता उस रात जंगल में क्या करने गयी थी . मैं उसी वक्त कविता के घर पर गया और तलाशी लेने लगा पर इस बार कमरा कविता का नहीं बल्कि वैध का था .

बात केवल चुदाई की नहीं थी नशा उस सोने का भी था जिसका साला कोई दावेदार नहीं था . जर, जोरू और जमीन दुनिया में इस से बड़ा कोई नशा नहीं हुआ . ये तीन ही चीज था जो क्या से क्या करवा सकती थी . वैध के कमरे में मुझे बहुत कुछ मिला जो सोच से परे था. वैध ने अपनी बहु से ही चुदाई के सम्बन्ध बनाये थे, मतलब साफ़ था वो शौक़ीन बुढा था . बेटा उसका शहर में था घर पर जवान बहु दोनों को रोकने वाला कोई नहीं था .

चीजो को खंगालते हुए मैं सोच रहा था . और जो चीज मुझे खटकी वो थी उस झोले से निकला एक पहचान पत्र जिस पर वैध के बेटे रोहताश का फोटो था और जहाँ वो चोकिदारी करता था वहां का पता लिखा था , रोहताश शहर में था तो उसका ये परिचय पत्र यहाँ क्या कर रहा था . ये तो उसके पास होना चाहिए था न, मैंने गौर किया वो काफी समय से यहाँ गाँव में नहीं आया था , न कविता की मौत पर न बाप की मौत पर . क्या इतना जरुरी था उसका काम. चाचा के बारे में जो मैंने पिछली रात जाना था मुझे शंका होने लगी की कहीं रोहताश भी बस नाम का जिन्दा न हो. किसी ने बहुत पहले उसे भी रस्ते से हटा दिया हो.

पर किसने, शायद उसी न जिसने रमा के पति को मरवाया हो. ये दोनों लोग रमा और कविता के साथ खुली चुदाई में रोड़े थे , माना की रोहताश तो शहर में था पर रमा का आदमी यही रहता था तो मुमकिन था की दोनों को एक ही कातिल ने पेल दिया हो. मैंने वो परिचय पत्र जेब में डाला उन चुदाई की किताबो को झोले में वापिस रखा और तुंरत अंजू के पास गया .

अंजू- क्या हुआ साँस क्यों उखड़ रही है तुम्हारी

मैं- मदद चाहिए

अंजू- मुझसे कैसी मदद

मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोला- मेरी बहन अगर मेरी मदद नहीं करेगी तो कौन करेगी

अंजू- बता क्या चाहिए

मैं- गाडी की चाबी और रमा को धर लो जहाँ भी मिले , चाहे उसकी खाल उतारनी क्यों ना पड़े. उस से पूछो वैध को किसने मारा.

अंजू- धर तो लुंगी पर फिर कहना मत की क्या कर दिया

मैं- जो चाहे करो

उसने मुझे चाबी दी और मैंने गाडी शहर की तरफ दौड़ा दी. मैं सीधा वहां गया जहाँ का पता परिचय पत्र पर था और वहां एक छिपा सच मेरा इंतज़ार कर रहा था . मालूम हुआ की एक बार रोहताश छुट्टी गया था फिर कभी लौटा ही नहीं . इसका अंदेशा तो था मुझे पर पुष्टि जरुरी थी . मैंने गाडी वापिस मोड़ दी. अब रमा ही वो चाबी थी जो कुछ बातो के ताले खोलने वाली थी . वापसी में मैं मलिकपुर होते हुए आया. रमा के कमरे पर ताला लगा था . मैंने ताले को तोड़ दिया और तलाशी लेने लगा पर यहाँ कुछ भी नहीं था . रमा अपना अतीत साथ लेकर नहीं आई थी यहाँ .

चौधरी रुडा से मिलने की एक और कोशिश नाकाम रही , आज भी नहीं मिला वो मुझे बता नहीं सकता कितनी हताशा थी मुझे उस वक्त. पर हालात पर भला किसका जोर चला है जो मेरा चलेगा. दिमाग में बहुत कुछ था , हो सकता था की राय साहब के कहने पर ही मंगू ने वैध को भी मारा हो . हो सकता था की इस शतरंज के असली खिलाड़ी राय साहब ही रहे हो जंगल में सबने अपनी अपनी जिन्दगिया जी थी . सबको एक साथ लाना बहुत टेढ़ा काम था .

रोहताश मर चूका था उसकी लाश यही कहीं इसी जंगल में गाड दी गयी होगी. चंपा का राय साहब से सिर्फ इसलिए चुदना की वो अहसान उतार रही थी मामला जम सा नहीं रहा था . घर वापिस आने के बाद मैं सीधा चाची के पास गया .

मैं- मुझे हर हाल में मालूम करना है की चंपा क्यों चुदी राय साहब से . चाची तुम्हारे बहुत करीब है वो ये बात पता करके दो

चाची- इस बारे में हमने बात की थी न, और फिर ब्याह के बाद वो चली ही जाएगी छोड़ो इस बात को

मैं- नहीं छोड़ सकता . मालूम करके बताओ

चाची- कोशिश करती हूँ

मैंने हाँ में सर हिलाया और दरवाजे से बाहर निकला ही था की भाभी से टकरा गया .

भाभी- देख कर चला करो , सर फूट ही गया क्या मेरा

मैं- रोहताश मर चूका है. एक बार छुट्टी आया तो फिर वो वापिस नहीं गया काम पर . प्रकाश को राय शाब ने मरवाया मंगू के हाथो कहीं ऐसा तो नहीं की मंगू ने ही वैध, रोहताश, को मारा हो .

भाभी- राय साहब के कमरे की तलाशी लेने की कोशिश करो . क्या पता कुछ सुराग मिले. वैसे अभिमानु के पास कमरे की एक चाबी हमेशा रहती है .

मैं- बात चाबी की नहीं है मैं ताला भी तोड़ दू. पर बाप इधर ही है , उसे किसी काम में उलझा दिया जाये की वो कमरे में न आ पाए तो भी मेरा काम हो जायेगा.

भाभी- कोशिश करती हूँ .

तभी मैंने देखा की अभिमानु भैया पैदल ही घर से बाहर जा रहे थे . मैंने देखा की बाप हमारा हलवाइयो से बात कर रहा था मैंने सही समझा और उसके कमरे में घुस गया . एक बार फिर से मैं कुछ तलाशना चाहता था . दराज में पड़े कागजो पर जो हाथ डाला, तो किस्मत ने मेरा ऐसा साथ दिया की अगर किस्मत सामने होती तो उसके लब चूम लिए होते मैंने.
 
#118



वसीयत का चौथा पन्ना और कुछ नहीं एक वादा था . वो वादा जो राय साहब ने प्रकाश की माँ से किया था . उस वादे के अनुसार राय साहब को परकाश को जमीने देनी थी पर शायद अब राय साहब के मन में फर्क आ गया होगा. पर पिताजी ने ऐसा वादा किया ही क्यों था . वो शायद जमीने देना भी चाहते होंगे इसलिए ही तो वसीयत का चौथा पन्ना बनाया गया था . असली बात क्या थी ये मालुम करना बेहद जरुरी हो गया था क्योंकि परकाश अब रहा नहीं , जो पिताजी को ब्लेकमेल कर रहा था . दूसरी बात ये की ऐसी क्या मज़बूरी थी जो प्रकाश की माँ को वादा करना पड़ा.

जमीन के लिए तो परकाश हरगिज ब्लेकमेल नहीं करता मामला कुछ और ही था .मैंने मलिकपुर प्रकाश की माँ से मिलने का सोचा. बेशक मैं थका हुआ था पर सोचा की शाम ढलने से पहले लौट आऊंगा. और फिर देर ही कितनी लगनी थी . मैं सीधा परकाश की माँ के पास गया और दुआ सलाम के बाद मुद्दे पर आ गया .

मैं- काकी, मेरे पास समय की सख्त कमी है , मन में केवल एक प्रशन है तो एक सौदा करते है तू मुझे मेरा जवाब दे मैं तुझे बता दूंगा की तेरे बेटे का कातिल कौन है .

काकी की आँखे फ़ैल सी गयी . पर मैं जानता था की ये दांव चलेगा जरुर.

काकी- क्या सवाल है कुंवर.

मैं- बरसो पहले राय साहब ने तुझसे एक वादा किया था . उसके बारे में पूछना है मुझे. ऐसा क्या किया था तूने

मेरा सवाल सुन कर काकी सन्न रह गयी. उसे समझ ही नहीं आया की क्या कहे क्या ना कहे.

मैं- काकी बात बस तेरे मेरे बीच रहेगी. मेरा कोई लेना देना नहीं तुझसे न मैं कभी दुबारा तुझसे ऐसे मिलूँगा तेरी दहलीज से बाहर कदम रखते ही मैं भूल जाऊंगा की हमारे बीच क्या बातचीत हुई.

मैंने अपनी तरफ से काकी को आश्वस्त किया.

कुछ देर वो खामोश रही श्याद हिम्मत जुटा रही थी उस बात को होंठो पर लाने की.

काकी- मैं उनसे कुछ नहीं चाहती थी. मैं भूल जाना चाहती थी पर तक़दीर ,

मैं- क्या हुआ था .

काकी- अक्सर मैं बड़ी ठकुराइन से मिलने जाया करती थी . एक दोपहर मैं जब तुम्हारे घर सी लौट रही थी तो मैंने देखा की जंगल में राय साहब घायल अवस्था में पड़े थे . उनको इस हालात में देख कर मैं बहुत घबरा गई थी . पर वो होश में थे. उन्होंने मुझसे कहा की सहारा दू उनको. और वो मुझे तुम्हारे कुवे पर ले आये. उन्होंने बस इतना कहा की वैध को बुला लाऊ किसी को भी मालूम ना हो की राय शाब घायल है .मैंने वैसे ही किया. वैध के उपचार से उनको बहुत आराम हुआ.

“मैंने सोचा की इस हालात में उनको अकेले छोड़ना ठीक नहीं होगा. मैंने उनके लिए वय्व्स्थाये की, जब जब वैध नहीं होता तो मैं उनके पास होती. घंटो राय साहब और मैं बाते करते. जो समय मैं बड़ी ठकुराइन के साथ बिताती अब राय साहब के साथ बिताने लगी. घर से कह कर मैं आती की बड़ी ठकुराइन के पास जा रही हूँ पर जाती राय साहब के पास. किसी चुम्बक की तरह वो मुझे अपनी तरफ खींच रहे थे . ये उस दौर की बात है जब अभिमानु पैदा ही हुआ था .बड़ी ठकुराइन का जायदातर समय छोटे अभिमानु के साथ ही बीतता था . चूँकि हम दोनों बहुत समय एक दुसरे के साथ बिता रहे थे तो जाहिर है की आकर्षण सा होना ही था और उसी आकर्षण में किसी कमजोर लम्हे में हम एक हो गए ” काकी ने गहरी साँस ली

वो जोर से हांफ रही थी . कुछ गिलास पानी उसने गटका और फिर बोलना शुरू किया.-सिलसिला एक बार जो शुरू हुआ फिर रुका ही नहीं जब तक की बड़ी ठकुराइन ने एक दिन हमें पकड़ नहीं लिया. उस दोपहर बहुत बड़ा कलेश हो गया था . राय शाब ने मुझसे कहा की वो अब कभी नहीं आयेंगे मेरे पास. ये रिश्ता उसी समय खत्म हो गया. मैंने तब उनको बताया की मैं पेट से हूँ , कोख में उनका अंश पल रहा है . तब उन्होंने मुझसे वादा किया था की सही समय आने पर वो उस अंश के को उसके हिस्से की जमीने देंगे.

काकी धम्म से पलंग पर बैठ गयी थी . मेरी समझ में नहीं आ रहा था की कहूँ तो क्या कहूँ. बाप चुतिया ने एक औलाद और पैदा कर रखी थी . मेरे पैरो की जान निकल ही गयी थी .

मैं- तेरे बेटे को राय साहब ने ही मारा है

मैंने अपना वादा निभाया. काकी की आँखों से आंसू बहने लगे पर मेरी हिम्मत नहीं थी की उनको पोंछ सकू. वापसी में मैं सोचता रहा की परकाश को सिर्फ इसलिए नहीं मरवाया गया था की राय साहब उसे जमीने नहीं देना चाहते होंगे , परकाश की हसरत किसी खास जमीन के टुकड़े में रही होगी और वो खास जमीन थी मेरा खेत जिसके निचे अथाह सोना था . परकाश का खेतो पर बार बार चक्कर लगाना यही दर्शाता था .

वापिस आकर पाया की अंजू अभी तक नहीं लौटी थी . होलिका दहन की तैयारिया चल रही थी . कल फाग था , कल मैं अपनी जिन्दगी की नयी शुरुआत करने वाला था . कल का दिन बहुत महत्वपूर्ण होने वाला था . मैं रसोई में गया , सुबह से कुछ खाया नहीं था सरला से मैंने खाना लिया और बैठ गया .

मैं- कुछ बात करनी थी

सरला- हाँ कुंवर.

मैं- मंगू वाला काम हुआ

सरला- लेने को तो तैयार है वो पर बाते नहीं बताता . काफी घुन्ना है वो

मैं- कुछ तो बात निकाल उस से .

सरला- मिलता ही कहाँ है वो न जाने कहाँ गायब रहता है वो

मैं- कभी चाचा ने तुझसे कहा था की किसी और को भी दे दे

सरला- ठाकुर साहब उस तरह के आदमी नहीं थे की किसी और के साथ सोने को मजबूर करते

मैं- क्या रमा ने तुझसे कभी कहा था की किसी और से चुदले

सरला- ऐसे सीधा तो नहीं कहा पर अक्सर कविता मुझसे कहती थी चूत का काम है चुदना , क्या फर्क पड़ता है एक चोदे या हजार.

मैंने उसे जाने को कहा और सोचने लगा. मामला बस इतना नहीं था . मरने से पहले चाचा परेशां सा रहने लगा था , उसे किस चीज की परेशानी थी ये मालूम करना बेहद जरुरी था मेरे लिए.
 
इस अपडेट के लिए थैंक्स करना भारत ब्रॉडबैंड लिमिटेड को जिन्होंने वो कर दिखाया जो किसी ने सोचा भी नहीं था . इतने हाई लत पर इंटरनेट सर्विस पहुंचा दी है. बेशक उतना फ़ास्ट नहीं है पर जब जब मौका मिलेगा कोशिश करेंगे आप सब से जुड़ने की.
 
#119



एक ऐसी कड़ी जो इन सबको जोड़ सकती थी मुझसे छूट रही थी . प्रकाश की माँ ने जो खुलासा किया उसने कहानी को अलग ही दिशा दे दी थी . चाचा को मरे एक जमाना हो गया था तो फिर कविता जंगल में किससे मिलने जाती थी अगर ये जवाब मिल जाता तो काफी हद तक मामला सुलझ जाता . राय साहब के बिस्तर से मिली चुडिया और कविता के घर से मिली चुडिया कहीं न कहीं इशारा कर रही थी की हो न हो कविता को राय साहब भी चोदते थे.

चलो मान लिया की राय साहब ने कविता को भी चोदा क्योंकि रमा की चुदाई प्रमाण थी पर यहाँ से एक सवाल और खड़ा हो जाता था की हवस के पुजारी ने फिर नंदिनी भाभी और चाची पर डोरे क्यों नहीं डाले.मामला बेहद संगीन था , चुदाई के साथ साथ रक्त की सड़ांध भी फैली हुई थी इस अतीत में . कल का दिन बहुत खास था व्यस्त रहने वाला था पर ये रात, ये रात , इसकी ख़ामोशी मुझे बेचैन किये हुए थी. ब्याह की सब तैयारिया पूरी हो चुकी थी, कल चंपा की डोली उठ जानी थी . जिसे कभी अपनी माना था वो पराई हो जानी थी.

पराई, अपने आप में बहुत भारी था ये शब्द,. पराई तो चंपा तभी हो गयी थी जब उसने मेरे बाप के साथ उस दलदल में उतरने का सोचा. बाप चुतिया को रंगे हाथ चुदाई करते पकड़ भी लेता तो कुछ हासिल नहीं होना था . मुझे तलाश थी उस वजह की , आखिर क्या थी वो वजह जिसकी वजह से ये सब हो रहा था .चाची ने मेरी कसम खाकर कहा था की राय शाब ने कभी भी उसे गन्दी नजरो से नहीं देखा. पर जिस तरह से चाची ने इतना बड़ा राज छिपाया था , क्या मैं पूर्ण विस्वास कर सकता था उस पर.

दो पेग लगाने के बाद भी मुझे चैन नहीं था , मेरी नजर सरला की गांड पर थी जिसे शाल ओढने के बाद भी वो छिपा नहीं पा रही थी .पर खचाखच भरे घर में मौका मिलना था ही नहीं उसे चोदने का. सुबह बड़ी खूबसूरत थी , वैसे तो मैं रोज जल्दी ही उठता था पर आज सुबह की बात ही कुछ और थी. भोर के उजाले में केसरिया रंगत लिए सूरज को देखना सकून था . सुबह सबसे पहले मैंने चंपा को ही देखा जो चाय देने आई थी मुझे.

खूबसूरत तो पहले भी थी वो पर ब्याह का रंग चढ़ा था उस पर उबटन ने उसे और निखार दिया था .

चंपा- क्या देख रहा है कबीर

मैं- देख लेना चाहता हूँ तुझे आज , कल तो परायी हो जाएगी तू

चंपा- एक न एक दिन तो हर लड़की पराई हो ही जाती है किसी न किसी के लिए.

मैं- वक्त कितना जल्दी बीत जाता है न

चंपा- वक्त तो आज भी वही है , बस हम दोनों थोडा आगे बढ़ गए है .ये गलिया, ये घर , ये चौबारे. कल तक यही जी मैं, यही पर बड़ी हुई, कल यही सब छोड़ कर जाना होगा.

मैं- नियति यही है .लडकिया एक घर छोडती है तो एक घर पाती भी है .

चंपा- डोली को सबसे पहले तू हाथ लगाना , इतना हक़ तो देगा न मुझे.

चंपा की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. आज की रात भारी पड़ने वाली थी मुझ पर , मैंने पहले ही सोच लिया था की रात होते ही मैं कुवे पर चला जाऊंगा. मैं हरगिज नहीं चाहता था की ब्याह में मेरी वजह से रंग में भंग पड़े.

चंपा- कुछ कह रही हूँ तुझसे

मैं- ये भी कोई कहने की बात है .

मैंने चंपा से कह तो दिया था पर कैसे संभाल पाउँगा खुद को ये नहीं जानता था .

“तू वो नहीं बनेगा, क्योंकि तू वो नहीं है तू बस कबीर है ये याद रखना ” निशा के शब्द मुझे याद आने लगे. दिन ऐसे बीत रहा था की जैसे पंख लग गए हो उसके. भाभी, अंजू, चाची और तमाम औरते ऐसे सजी-धजी थी की जैसे आसमान से अप्सराये उतर आई हो पर मेरा दिल जब काबू से बाहर हो गया जब मैंने अपनी जान को आते देखा, या जान जाते देखा.

मैं जनवासे में चाय पानी की वयवस्था देख कर घर आया ही था की मैंने भाभी के साथ निशा को खड़ी देखा, और देखता ही रह गया. जैसे ही हमारी नजरे मिली काबू नहीं रहा खुद पर . दिल किया की बस आगोश में भर लू उसे और उसके गाल चूम लू.

इठलाते हुए निशा मेरे पास आई और बोली- तैयार नहीं हुए अभी तक तुम .

मैं- आओ मेरे साथ

मैं उसे चाची के घर ले पंहुचा और हम दोनों छत पर आ गए . एकांत मिलते ही मैं उस से लिपट गया

निशा- किस बात की बेसब्री है ये

मैं- बहुत अच्छा किया तुमने जो आ गयी .

निशा- मुझे तो आना ही था .

मैं- दिल बहुत घबरा रहा था, रात का सोच कर

निशा- रात ही तो है बीत जाएगी . सोचना ही नहीं उस बारे में .

मैं- और इस खूबसूरत चेहरे के बारे में सोचु या नहीं

निशा- डायन से इश्क किया है तुमने, इस चेहरे के बारे में नहीं सोचोगे तो फिर किसका ख्याल होगा.

निशा ने मेरा माथा चूमा और बोली- निचे जा रही हूँ मेरे आगे-पीछे मत घूमना. नजरो से देखना मुझे, नजरो से छेड़ना मुझे .

मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा- इश्क किया है तुमसे कोई चोरी नहीं की है.

निशा- इसीलिए तो सारे बंधन तोड़ कर आ गयी. तेरा बंधन बाँध लिया पिया .

मैंने उसे फिर से अपने आगोश में खींच लिया . उसकी सांसे मेरे गालो पर पड़ने लगी.

निशा- जाने दो न

मैं- अब कही नहीं जाना तुमको

निशा-जिस दिन ज़माने की छाती पर पैर रख कर आउंगी फिर एक पल दूर ना जाउंगी तुमसे.

बड़ी नफासत से उसने अपनी छातिया मेरे सीने पर रगड़ी और बाँहों से निकल कर निचे चली गयी. नहा-धोकर नए कपडे पहन कर मैं निचे गया तो भाभी और भैया किसी गहरी चर्चा में डूबे थे . मुझे अपनी तरफ आते देख दोनों चुप हो गए. जिन्दगी में पहली बार मैंने भैया के माथे पर बल पड़े देखे.

भाभी- देवर जी, हमे थोडा समय दो

भाभी ने मुझे वहां से जाने को कहा. मैं और काम देखने लगा पर मन में सवाल था की क्या बात कर रहे थे दोनों. जैसे जैसे अँधेरा घिर रहा था मुझ पर अनजाना डर छाता जा रहा था . कुछ ही देर में सुचना आई की बारात जनवासे में पहुँच चुकी है. हम लोग रस्मो के लिए वहां पहुँच गए. बारात को चाय पानी करवाने के बाद गोरवे की रस्म की और शेखर बाबू घोड़ी पर बैठ गए .बैंड बाजा बजने लगा. बाराती नाचने लगे. मेरी नजर आसमान में चमकते चाँद पर पड़ी और छाती में आग सी लग गयी................................

 
चलिए खत्म करते है इसको, क्या कहते हो
 
#120



“तू वो नहीं है, तू वो नहीं बनेगा ” निशा के कहे शब्दों पर मैंने ध्यान लगाया पर जानता था की ये बेचैनी बढती जाएगी . मैंने सर पर साफा बाँध लिया और बारात पर ध्यान लगाने लगा. बारात जनवासे से चल पड़ी थी थोड़ी ही देर में आ पहुंचनी थी . मेरी नजर भैया पर पड़ी जो बाप चुतिया के साथ चर्चा मे लगे थे भैया ने मुझे देखा तो मेरी तरफ आने लगे पर रस्ते में किसी ने उन्हे रोक लिया और हम मिलते मिलते रह गए.

जैसे जैसे बारात आगे बढ़ रही थी मेरी बेचैनी भी बढ़ने लगी थी. पल पल भारी हो रहा था मुझ पर. जैसे ही बारात गाँव के स्कूल से होते हुए आगे मुड़ी , मैं वहीँ पर रह गया . मैं चाहता था की अँधेरा मुझे लील जाए.मैंने दिशा बदली और कुवे की तरफ चल पड़ा. बाजे की आवाज मेरे कानो में गूंजती रही .

नियति ने कितना बेबस कर दिया था मुझे. घर में शादी थी और मोजूद होते हुए भी होना न होना बराबर था मेरा. कुवे पर पहुँच कर मैंने मटके को उठाया और होंठो से लगा लिया. ठंडा पानी भी उस अग्न को शांत नहीं कर पाया. मैंने खुद को कमरे में बंद कर लिया. पर बढती रात मुझे झुलसा रही थी , गुस्से में मैंने अपने हाथ दिवार से रगड़े , जिनसे की दिवार पर रगड बन गयी .

पर उन निशानों ने मुझे दिशा दिखाई, तालाब के कमरे का सच ये ही था की आदमखोर उस कमरे का इस्तेमाल करता था , वो आदमखोर भी मेरी तरह अपनी मज़बूरी को समझता था इसलिए ही वो इस खास रात को वहां छिपता होगा . पर ये अनुमान अधुरा था क्योंकि मैं दो चाँद रातो के बाद भी पूरा क्या आधा आदमखोर भी नहीं बन पाया था और उस आदमखोर को मैंने बिना चाँद रात भी देखा था . यानी की वो अपने रूप को जब चाहे तब बदल सकता था .

एक बात और जो मुझे परेशान किये हुए थी वो ये की आज कहाँ होगा वो आदमखोर , गाँव में इतना बड़ा आयोजन था कहीं उसने हमला कर दिया तो . ये सोच कर ही मेरा कलेजा कांप उठा. मैं उसी पल वापिस गाँव के लिए चल पड़ा. सोचा जो होगा देखा जायेगा. वैसे भी घर पर कम से कम निशा तो साथ होगी मेरे.

बारात का खाना चालु था . शेखर बाबु मंडप में पहुँच गए थे . देखते ही देखते चंपा भी आ गयी और फेरो की रस्म शुरू हो गयी. मंगल गीत गाये जा रहे थे मैंने एक कुर्सी उठाई और मंडप से थोडा दूर हुआ ही था की किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा . मैंने मुड कर देखा भैया थे .

भैया- ठीक है न छोटे

मैं- हाँ बढ़िया भैया , कुछ काम था क्या

भैया ने जेब से एक पुडिया निकाली और बोले- इसे घोल कर पी ले. असर रोक तो नहीं पायेगी ये पर थोड़ी राहत जरुर देगी .

“तो ये है वो दवा जिसके लिए आप भटकते थे ” मैंने कहा

भैया- इसका कोई इलाज नहीं है , ये पुडिया तकलीफ को कम कर देगी, तेरा पूर्ण रुपंतार्ण नहीं हुआ है तो क्या पता असर ज्यादा कर जाये. वैसे मुझे कुछ और बात भी करनी थी पर कल करूँगा . अभी पी ले इसे.

भैया ने मुझे गिलास दिया मैंने तुरंत पुडिया घोली और पी गया. भैया ने ठीक ही कहा था मेरी तकलीफ काफी कम हो गयी . दुल्हन बनी चंपा के चेहरे से नजर हट ही नहीं रही थी . इतनी खूबसूरत वो पहले कभी लगी भी तो नहीं थी . मेरी नजर निशा पर पड़ी जो भाभी और अंजू के साथ खड़ी थी .उसके चेहरे पर जो नूर था देखने लायक था.मैंने गौर किया की चाची कहीं दिखाई नहीं दे रही थी . चूँकि फेरो में काफी समय लगना था मैं टेंट में चला गया . बाराती मजे से पकवानों का आनन्द उठा रहे थे. सब कुछ वैसे ही था जैसा किसी आदर्श शादी में होना चाहिए था .

पर क्या ये शादी सामान्य थी , नहीं जी नहीं बिलकुल नहीं. कुछ तो ऐसा था जो सामने होते हुए भी छिपा था . राय साहब का प्रयोजन, भैया के अपने किस्से , अंजू का अतीत. मेरा और निशा का प्रेम . चाची का राज. रमा का राज सब कुछ तो था यहाँ इस जगह पर . मेरी नजरे हर एक पर जमी थी मैं जानता था की यहाँ कोई न कोई तो ऐसा है जो मेरे सवालो के जवाब जानता होगा.

टेंट से मैं वापिस मंडप में आया तो वहां पर ना राय साहब थे , न भैया, न भाभी , ना ही अंजू. मैंने देखा निशा भी नहीं थी . और चाची तो पहले से ही गायब थी. इतने लोगो को अचानक से भला क्या काम हो गया होगा. मैं रसोई में गया तो वहां पर निशा मिली जो विदाई के लिए रंग घोल रही थी ताकि दुल्हन के हाथो की छाप ली जा सके, उसके साथ ही सरला थी .

निशा- क्या हुआ कबीर

मैं- कुछ नहीं , और तुम्हे ये सब करने की क्या जरुरत है

मैंने बात बदली पर वो समझ गयी .

निशा- सब ठीक होगा कबीर. मैं हूँ ना.

मैं- जानता हूँ . अगर फुर्सत हो तो थोडा समय सात बिताते है

निशा- विदाई के बाद समय ही है , सरकार

निशा मेरे पास आई और बोली- आसमान को मत देखना , सोचना ये कोई खास रात नहीं है बस एक रात है जो बीत जाएगी जल्दी ही . मुझे पूर्ण विश्वास है तुम वैसे नहीं बनोगे. मैं साथ ही हूँ

बिना सरला की परवाह किये उसने मेरे माथे को चूमा और मुझे रसोई से बाहर धकेल दिया. मैं फेरे देखता रहा, कन्यादान किया गया वो घडी अब दूर नहीं थी जब चंपा की डोली उठते ही उसके नए जीवन की शुरुआत हो जानी थी . मेरी उडती सी नजर रमा पर पड़ी जो मंगू के साथ खड़ी बात कर रही थी . दोनों का साथ होना किसी खुराफात का इशारा कर रहा था . मैं उनकी तरफ जाने को हुआ ही था की तभी अचानक से अँधेरा हो गया . ...................................

 
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