Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed) - Page 19 - SexBaba
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Adultery तेरे प्यार मे.... (Completed)

#135



रात कितनी बीती कितनी बाकी थी नहीं जानता था . चबूतरे पर बैठे मैं उस पेड़ को देख रहा था जिस पर लाली और उसके प्रेमी को लटका दिया गया था . लाली की कही तमाम बाते मेरे कानो में गूँज रही थी . ये कैसा जमाना था कैसा समाज था जिसमे मोहब्बत को मान्यता नहीं थी थी पर चुदाई सब कर रहे थे . चरित्र किसी का नहीं बचा था पर दो दिलो के मिलने के खिलाफ थे. मैंने सोचा किस बेशर्मी से राय साहब ने लाली की मौत के फरमान को समर्थन दिया था . राय साहब कैसे रक्षक थे अगर वो रक्षक थे तो फिर भक्षक कौन था .

न जाने कितनी देर तक ख्यालो में खोया रहता अगर वो सियार उछल कर चबूतरे पर न चढ़ आया.उसे देख कर मेरे होंठो पर मुस्कान आ गयी .

मैं- वो है क्या जंगल में

उसने कुछ नहीं कहा बस चुपचाप आकर मेरी गोदी में अपना सर घुसा दिया. मैंने अपनी बाहें उसके चारो तरफ लपेटी और थोड़ी देर के लिए आँखे बंद कर ली. रात कुछ जायदा ही लम्बी हो गयी थी मैं तहे दिल से चाहता था की बस ये खत्म हो जाये. पर ऐसे खुले में कब तक पड़े रहते. कुछ देर बाद मैंने अपने कदम घर की तरफ बढ़ा दिए सियार मेरे साथ साथ चलने लगा.

हमेशा खुला रहने वाला हमारा दरवाजा आज बंद था. सियार ऊपर चढ़ कर चबूतरे पर पड़े कम्बल में घुस गया . मैंने चाची के दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया और अन्दर घुस गया .

“कौन है ” चाची ने पूछा

मैं- कबीर

चाची- कहाँ भटक रहा था तू इतनी रात तक

मैं- आ गया थोड़ी देर सोना चाहता हूँ

मैं चाची के बिस्तर में घुसा और उनसे लिपट कर सो गया . सुबह जब जागा तो राय साहब को आँगन में बैठे पाया. हमेशा के जैसे सुनहरी ऐनक पहने चेहरे पर ज़माने भर की गंभीरता लिए हुए. नलका चला कर मैंने ठंडा पानी मुह पर मारा और बाप के पास गया.

मैं- कुछ बताना था

पिताजी- हम सुन रहे है

मैं- आपके पालतू पिल्लै को कल रात मार दिया मैंने उसकी लाश खान में पड़ी है .

पिताजी ने अपनी ऐनक उतारी उसे साफ़ किया और दुबारा से पहन लिया .

पिताजी- एक न एक दिन ये होना ही था .

मैं- आपको फर्क नहीं पड़ा

पिताजी- रोज कोई न कोई मरता ही है

मैं- मौत का ये खेल क्यों खेला , चंपा को अपने पास रखना था तो वैसे ही रख लेते कौन रोक पाता राय साहब को . हजार बहाने थे उसे अपने साथ रखने का शेखर बाबु का और उन जैसे तमाम बेकसूर लोगो की बलि किसलिए ली गयी . माना की मंगू को नकली आदमखोर बना कर लोगो में डर पैदा करना ठीक था ताकि कोई जंगल में खान को न तलाश ले पर अपने ही आंगन को खून से रंग देना कहा तक उचित था .

पिताजी- हम तुम्हारे सवालो का जवाब देना जरुरी नहीं समझते .

मैं- क्योंकि कोई जवाब है नहीं , अय्याशियों का क्या जवाब होगा. कहे तो वो गा न जिसके पास कुछ होगा कहने को . मुझे शर्म आती है की इस आदमी का खून मेरी रगों में दौड़ रहा है .

पिताजी- इस से पहले की हमारा हाथ उठ जाये, हमारी नजरो से दूर हो जाओ

मैं- कब तक नजरो से दूर करेंगे. वो समय नजदीक है जब हम दोनों एक दुसरे के सामने खड़े होंगे और मैं भूल जाऊंगा की सामने मेरा बाप है .

पिताजी- दुआ करना वो वक्त जल्दी आये.

चहचहाती चिडियों के शोर ने मुझे बताया की दिन चढ़ने लगा है . मैं गली में आया सुबह की ताजगी ने मेरे अन्दर में उर्जा का संचार किया . आज का दिन एक खास दिन था या शायद ख़ास होने वाला था सूरज की लालिमा धीरे धीरे हट रही थी . जैकेट की जेब में दोनों हाथ घुसाए मैं गाँव से बहार की तरफ चल दिया. कुवे पर आकर मुझे चैन मिला. कल रात बहुत कुछ खो दिया था मैंने . क्यों खोया ये नहीं जानता था . बरसो की दोस्ती एक झटके में खत्म हो गयी. इसे अपना भाई समझा था , जिसके साथ न जाने कितने लम्हे जिए थे अपने हाथो से गला दबा दिय था उसका. ये कैसा इम्तिहान लिया गया था मेरा. आँखों से आंसू बह चले थे . वो गलत था उसने क्यों नहीं मानी गलती अपनी. मुझ पर हमला किया मुझे मारना चाहता था वो . पर आज का दिन ख़ास था इसे और खास बना देना चाहता था मैं.

मैंने अपने कदम उस तरफ बढ़ा दिए जहाँ मेरी मंजिल मुझे पुकार रही थी . जंगल आज बदला बदला सा लग रहा था . इतना शांत इसे मैंने कभी नहीं पाया था . होंठ अपने आप गुनगुनाने लगे थे . चलते चलते मैं आखिर वहां तक आ ही गया था . आसमान हरे-नीले-पीले-लाल रंग से रंग था . आदमी-औरत जिसे देखो हाथो में पिचकारी या अबीर की थैलि लिए एक दुसरे संग रंगों के रंग में रंगे थे. हँसते मुस्कुराते चेहरे . आज फाग का दिन था , आज मेरे अरमानो का दिन था . आज मैं अपनी सरकार को हमेशा के लिए अपनी बनाने के लिए आया था . आज कबीर निशा का हाथ थामने आया था .

उड़ते गुलाल को अपने जिस्म पर महसूस करते हुए . पानी के गुब्बारों से बचते हुए मैं चलते हुए ठीक उस जगह पर आ पहुंचा था जहाँ पर वो थी , जहाँ पर निशा थी. जहाँ पर मेरा आने वाला कल था . जहाँ पर मेरा आज , अभी था.

“जी कहिये, क्या काम था किस से मिलना था आपको ” नौकरानी ने मुझसे पूछा

मैं- जाकर कहो मालकिन से की उसे लेने कोई आया है .

उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और अन्दर चली गयी मैं हवेली के आँगन में खड़ा रहा . उफ्फ्फ्फ़ ये पल पल बढती उसके दीदार की हसरत . नजरे उस बड़े से दरवाजे पर जम सी गयी थी . और जब दौड़ते हुए वो आकर चोखट पर रुकी . उसका सरकता आंचल बता रहा था की धड़कने हमारी सरकार की भी बढ़ी हुई है . नजरे बस नजरो को देख रही थी. सब कुछ भूल कर मैंने अपनी बाहों को फैला दिया और वो दौड़ कर मेरे सीने में समां गयी.

“कब से राह देख रही थी बड़ा इंतज़ार करवाया ” उसने कहा

मैं- मैं देर करता नहीं देर हो जाती है .

निशा- मुझे ले चल.

मैं- लेने ही तो आया हूँ

मैंने उसका हाथ पकड़ा उसने मेरी तरफ देखा

मैं- मुझे हक़ है .

उसने अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया और हमने हवेली के बाहर कदम बढ़ा दिए. गाँव के बीचो बीच बिखरे रंग-उड़ते गुलाल से खेलते हुए मैं अपनी जान को लेकर चले जा रहा था. गाँव के दुसरे छोर से हम थोड़ी ही दूर थे की एकाएक हमारे सामने जीप आकर रुकी .............................



निशा ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया ............
 
सवालों के चक्कर मे आप ने अपडेट की फिलिंग का मजा नहीं लिया
 
#136



जीप से सूरजभान और उसके साथी उतरे. मैं जानता था की ये दिन जरुर आएगा .

सूरजभान- बहुत बड़ी गलती की है कबीर , दुनिया में सब कुछ करना था ये नहीं करना था ये तो सोच लिया होता की सूरजभान किस आग का नाम है

मैं- इश्क किया है कोई चोरी नहीं की जो सच कर करूँगा. अज का दिन बहुत खास है रस्ते से हट जा सूरजभान , आज फेरे लेने है मुझे निशा संग मत रोक मेरा रास्ता .

सूरज- जुबान को लगाम दे हरामजादे , तेरी हिम्मत कैसे हुई ये कहने की . और तुम, तुमने जरा भी नहीं सोचा, ये पाप करने से पहले . क्या तुम्हारे पैर एक बार भी नहीं कांपे उस चोखट को पार करते हुए .

मैं-निशा को कुछ भी कहा न तो मैं भूल जाऊंगा की तू कौन है , और आज अगर मैं बिगड़ा न सूरजभान तो फिर ये होली खून से खेली जाएगी .

सूरजभान- तूने तो मेरे दिल की बात कह दी कबीर. जो गुस्ताखी तूने की है न तेरे टुकड़े टुकड़े भी बिखेर दू तो ताज्जुब नहीं रहेगा मुझे . आज दुनिया देखेगी की हमारी तरफ नजर उठा कर देखने वालो का क्या हाल होता है . और तुम , तुमसे ये उम्मीद नहीं थी . अरे इतनी ही आग लगी थी तो घर में ही घाघरा खोल लेती , मेरे ही दुश्मन के साथ रंगरेली करनी थी तुमको.

निशा- अपनी हद में रहो सूरज, तुम्हारी जुबान क्यों नहीं कट गयी ये कहते हुए . काश तुम समझ पाते.

सूरज- समझ तो मैं गया हूँ, गलती बस ये हुई की मैं पहले नहीं समझा, काश पहले समझ जाता तो आज ये बेइज्जती नहीं होती.

मैं- निशा से एक और बार बदतमीजी की न सूरजभान तो दुबारा तेरी जुबान कुछ नहीं कह पाएगी.

सूरज- जुबान तो तेरी माफ़ी मांगेगी मुझसे , देख क्या रहे हो मारो साले को .

मैंने निशा को पीछे की तरफ किया और जो भी लड़का सबसे पहले मेरी तरफ आया था उसके सर पर खींच कर मुक्का मारा. कहते है की होली ऐसा त्यौहार है जहाँ दुश्मन भी गले मिलकर गिले शिकवे भुला देते है पर आज ये फाग का दिन न जाने क्या करवाने वाला था . मारापीटी शुरू हो गयी .

मैं एक वो अनेक पर वो नहीं जानते थे की मेरे अन्दर एक आदमखोर पनप रहा था . दो लडको ने पीछे से मुझे पकड़ लिया सूरजभान ने मेरे मुह पर घूँसा मारा . एक पल को लगा की जबड़ा ही हिल गया मेरा . अगला वार मेरे सीने पर पड़ा.

“कबीर,” निशा चीख पड़ी .

मैंने लात मार कर सूरजभान को पीछे धकेला . निशा ने एक लड़के से डंडा छीन लिया और झगडे में कूद गयी . मामला गंभीर हो गया था .मैंने निशा को पीछे किया लोहे की चेन का वार मेरी पीठ पर पड़ा निशा ने उस चेन को अपने हाथ से पकड़ लिया

निशा- मेरे गुरुर को मत ललकारो तुम लोग . मत मजबूर करो मुझे . मैं जाना चाहती हूँ जाने दो मुझे.

सूरज- कही नहीं जाओगी तुम . अपने आशिक को यही मरते देखोगी तुम. पहले इसे मारूंगा फिर तुम्हारा फैसला होगा. ऐसी सजा दूंगा तुम्हे की जमाना याद रखेगा. ऐसी गुस्ताखी करने से पहले फिर कोई सौ बार सोचेगा.

निशा- ये गलती मत करो सूरज, कहीं ऐसा न हो की पछताने के लिए न तुम्हारे पास कुछ बचे न मेरे पास.

सूरज- बचा तो वैसे भी कुछ नहीं है फिर.

निशा- ठीक है , अगर तुम्हारी यही मर्जी है तो फिर आज मैं जी भर के फाग खेलूंगी, कभी रंगों से तो नहीं खेल पायी और आज रक्त से खेलूंगी मैं.

निशा का ये रूप देख कर मैं भी एक पल के लिए घबरा गया . निशा ने वो चेन अपने हाथ में ले ली और पहला वार किया , एक बार फिर से मारा मारी शुरू हो गयी .

निशा- तुझे कसम है मेरी कबीर जो आज तू रुका. अगर आज हमने कदम रोक लिए तो फिर कोई हिम्मत नहीं कर पायेगा मोहब्बत करने की .

मैं- मेरी सरकार, तुझे लेने आया हूँ लेकर जाऊंगा. ये तो दस-पांच लोग है सारी दुनिया भी जोर लागले तो भी लेकर जाऊंगा ही .

मैंने एक लड़के को उठा कर पटका की वो गाड़ी के बोनट पर जाकर गिरा. अगले ही पल मेरा घुटना उसकी छाती पर जा लगा. उसके मुह से खून की उलटी निकली और वो साइड में गिर गया . मैंने देखा की निशा ने एक लड़के की आँखों में अपनी उंगलिया घुसा दी थी वो लड़का चीख रहा था . तडप रहा था पर निशा का गुस्सा उसके सर पर चढ़ा था .

मैंने सूरजभान का वार बचाया और अपना कन्धा निचे ले जाते हुए उसे उठा लिया. गाडी का शीशा तोड़ते हुए वो जीप के अन्दर जाकर गिरा. शीशे के टुकड़े कई जगह घुस गए उसके शरीर में . मैंने उसे खींचा और चेहरे पर वार किया. खून से सन गया उसका चेहरा . आसपास काफी लोग इकठ्ठा हो गए थे पर किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी की बीच में पड़ जाये. मैं चाहता तो सूरजभान का किस्सा ख़त्म कर सकता था पर मुझे भैया की कही बात याद आ गयी

मैंने उसके सीने पर पैर रखा और बोला- काश तू समझ सकता. काश तू जान पाता इस बात को . निशा का साथ मैंने इसलिए नहीं किया था की तुझसे दुश्मनी निभा सकू. ये दुनिया बड़ी खूबसूरत हो सकती है अगर कुछ लोग अपनी सोच बदलदे तो . सबको सम्मान से जीने का हक़ है , खुली हवा में साँस लेने का हक़ है . देख मैं तेरी आँखों के सामने से निशा को लेकर जा रहा हूँ, तेरा फर्ज बनता था की तू इसके मन को समझता , इसे ख़ुशी से विदा करता पर तेरे अन्दर भी वही कीड़ा कुलबुला रहा है, औरत किसी की गुलाम नहीं है . उसे अपनी मर्जी से जीने का हक़ है . आज मैंने ये कदम उठाया है . समय सदा एक सा नहीं रहता , कल कोई ये काम करेगा. आज नहीं तो कल नहीं तो कुछ साल बाद , जैसे जैसे शिक्षा प्राप्त होगी जनता को गुलामी की जंजीरे टूटेगी. हर आदमी बराबरी का हक़ मांगेगा . तब क्या रहेगी तेरी मेरी सामन्ती, क्या रहेगी ये जमींदारी. मैं अपनी सरकार को लेकर जा रहा हूँ ,किसी और को रोकने की कोशिश करनी है तो कर लो . प्रीत की डोर बाँधी है निशा से मैंने ज़माने की बेडिया तोड़ कर जा रहा हूँ.



मैंने निशा का हाथ पकड़ा और उसे ले चला. नयी जिन्दगी सामने खड़ी हमें पुकार रही थी .
 
एक ज़माने मे मैं मीता का हाथ पकड़ कर उसे नहीं ला पाया था पर कबीर निशा को ले चला है. क्या ही कहे 😭
 
अगला भाग आपके दिल को धड़का दे तो ही कमेंट कीजिएगा
 
#137



दिलो में जज्बात लिए, हाथो में हाथ लिए हम दोनों जंगल में चले जा रहे थे . ये जंगल , ये जंगल बस जंगल नहीं था ये गवाह था उस दास्ताँ का जिसे इसने जवान होते हुए थे. ये गवाह था उन रातो का जब मैंने निशा के साथ जी थी . ये जंगल आज गवाह था अंधियारों की रानी को उजालो में लाने का. पानी की खेली पर निशा रुकी और अपने होंठो को पानी से लगा दिया. . होंठो से टपकती पानी की बूंदे, इस से खूबसूरत दोपहर मैंने नहीं देखि थी . उसकी साँस बड़ी तेज चल रही थी . एक नजर उसने मुझे देखा और फिर पेड़ का सहारा लेकर बैठ गयी .

मैं- क्या सोच रही है

निशा- तुझे और मुझे सोच रही हूँ. डाकन से बगावत करवा दी तूने .

मैं- मैंने बस प्यार किया है इस डाकन से . इजहार किया है अपनी जान से . तूने कभी कहा था की अंधियारों से वास्ता है तेरा देख मेरी जान तेरे उजाले ले आया हूँ मैं .तुझे ले आया हु मैं

निशा- कैसी ये तेरी बारात सजना , न घोड़ी कोई भी संग न

मैं- क्या करते घोड़े हाथी, तू मेरी मैं तेरा साथी.

निशा- प्रेम समंदर दिल के अन्दर ओ मेरे साजन मुझ को ले चल मंदिर .

मैं- जब मन से मैंने तुझे , तूने मुझे अपना मान लिया तो क्या मंदिर जाना , रातो को इस जंगल में तुझे देखा था इसी जंगल में उजालो में तुझे अपनी बनाऊंगा

निशा- चल छोड़ बहाना, तू कैसा दीवाना सुन मेरी सुन, मुझे ले चल मंदिर.

मैं- जहाँ मेरी मोहब्बत वो ही मेरा मंदिर फिर उस मंदिर क्यों जाना

निशा- ये रीत पुराणी, ये प्रीत पुराणी

मैं- रीत भी तू , प्रीत भी तू. एक मन है एक प्राण हमारे जन्म जन्म से हम हुए तुम्हारे .

निशा- चल खा ले कसमे, जोड़ ले बंधन ओ साजन सुन मुझे ले चल मंदिर.

मैंने निशा का हाथ पकड कर खड़ा किया , उसके माथे को चूमा और बोला- चल मेरी जान मंदिर.

मैं निशा को कुवे पर ले आया.

निशा- यहाँ क्यों लाया

मैं उसे कमरे में ले गया और उसे वो दिया जिसके लिए मैं कबसे बेक़रार था .

निशा की आँखों में आंसू भर आये .

मैं- कबसे तम्मना थी मेरी जान तुझे इस पहनावे में देखने की , कितनी राते ये सोच कर बीत गयी की जब तुझे इस रूप में देखूंगा तो तू कैसी लगेगी . अब और इंतज़ार नहीं करना मुझे.

निशा - दिल धडकने की क्या बात करू मेरे साजन , ये सपना ही लग रहा है मुझे .

मैं- प्रीत की रीत सदा चली आई , मेरे सपने भी अब हो गए तेरे.

निशा- दिन लगते थे काली रैना जैसे, सोच राते कैसे बीती होंगी

मैं- अंधियारों में तेरा मन था जोगन और मेरा दिल था रमता जोगी. मन में तेरे प्यार के दीप जलाकर अब कर दे दूर अँधेरे.

जोड़ा पहनने के बाद उसने लाल चुडिया पहनी .

मैं- अब चल मंदिर.

दिल में हजारो अरमान लिए मैं निशा को थामे गाँव मे ले आया था . धड़कने कुछ बढ़ी सी थी पर किसे परवाह थी गाँव के लोग कोतुहल से हमें ही देख रहे थे. उनकी नजरो का उपहास उड़ाते हुए मैंने निशा के हाथ को कस कर थाम लिया. मंदिर के रस्ते में हम चौपाल के चबूतरे के पास से गुजरे , वो पेड़ ख़ामोशी से हमें ही देख रहा था .

“अब कोई लाली नहीं लटकेगी इस पेड़ पर मैं रीत बदल दूंगा.” मैंने खुद से कहा . निशा का हाथ थामे मैं मंदिर की सीढिया चढ़ रहा था .

“पुजारी, कहाँ हु पुजारी . देखो मैं अपनी दुल्हन ले आया हूँ , आकर हमारे फेरे करवाओ ” मैंने कहा

मैंने देखा पुजारी हमारी तरफ आया उसकी आँखों में मैंने क्रोध देखा,असमंस देखा.

पुजारी- कुंवर, बहुत गलत कर रहे हो तुम इसे प्रांगन में ले आये सब अपवित्र कर दिया.

मैं- जुबान पर लगाम रखो पुजारी . मैंने तुझसे कहा था न की मेरे फेरे तू ही करवाएगा

पुजारी- ये पाप है एक डाकन से ब्याह कहाँ जगह मिलेगी तुमको कुंवर.

मैं- मैं तुझसे पूछता हूँ पुजारी इसे डाकन किसने बनाया, उस माँ ने तो नहीं बनाया न जो सामने बैठी तुझे भी और मुझे भी देख रही है . उसने तो इसे तेरे मेरे जैसा ही बनाया था न . नियति ने दुःख दिया तो इसमें इसका क्या दोष, इसको भी हक़ है ख़ुशी से जीने का . कब तक ये दकियानूसी चलेगी, कोई न कोई तो इस रीत को बदलेगा न . इस गाँव में ये बदलाव मैं लाऊंगा. तू फेरो की तयारी कर

पुजारी- हरगिज नहीं , ये पाप मैं तो जीते जी नहीं करूँगा. मेरा इश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा.

मैं- किस इश्वर की बात करता है पुजारी , ये तो माँ हैं न ये मेरी माँ है तो निशा की भी माँ हुई न. और माँ अपने बच्चो में कब से भेदभाव करने लगी. और अगर बात माँ और उसकी औलादों की है तो तेरी फिर क्या जरूरत हुई भला.

मैं निशा को लेकर माता की मूर्त के सामने आया . मैंने थाली में रखा सिंदूर उठाया और निशा की मांग में भर दिया.निशा ने अपनी आँखे बंद कर ली. मैंने अपने गले से वो लाकेट उतारा और निशा के गले में पहना दिया . निशा मेरे गले से लग गयी मैंने उसके माथे को चूमा और बोला- देख पुजारी , माँ ने तो कोई ऐतराज नहीं किया. वो भी जानती है की उसके बच्चो की ख़ुशी किस्मे है . और हाँ अब ये मेरी पत्नी है , अब तेरा मंदिर पवित्र हो गया न . मोहब्बत ने पुराणी परम्परा की नींव हिला दी है पुजारी. आने वाले वक्त में तू जिया तो न जाने क्या क्या देखेगा. चल मेरी जान घर चल. अपने घर चल.

गाँव का सीना चीरते हुए मैं अपनी सरकार को अपने घर ले आया. मैंने देखा दरवाजे पर भाभी खड़ी थी ,हमें देख कर उसकी आँखों में चमक होंठो पर मुस्कान आ गयी थी . शायद हमारे आने की खबर हवाए हमसे पहले घर ले आई थी .

“तो ” भाभी ने बस इतना कहा और निशा को अपनी बाँहों में भर लिया.



“स्वागत है “ भाभी ने कहा और निशा को घर में ले लिया पीछे पीछे मैं भी आया. मैंने देखा अंजू दौड़ कर आई और निशा के गले लग गयी . अंजू की आँखों में आंसू थे. मैंने चाची को आरती की थाली लेकर आते हुए देखा. .................ये ख़ुशी , ये ख़ुशी जो मैं महसूस कर रहा था इसके पीछे आते तूफान को मैं महसूस नहीं कर पा रहा था .
 
#138



मैंने चाची से खाना परोसने के लिए कहा और कमरे में चला गया . कुछ देर बाद चाची मेरे पास गयी .

चाची- जेठ जी को मालूम होगा तो बहुत नाराज होंगे वो. मेरा मन घबरा रहा है .

मैं- बाप चुतिया है , वो कभी नहीं समझेगा चाची.

चाची- मन व्याकुल सा हो गया है. बेटा बहु को लाया है पर हालात ऐसे है की चाह कर भी खुशी नहीं मना सकते, किस मुह से मनाये कुछ रोज पहले के मातम के आंसू तो सूखे भी नहीं है .

मैं- समझता हूँ . वो दुःख तो रहेगा ही

चाची-जेठ जी आयेंगे तब तू अपने भाई की आड़ लेना

मैं- जरुरत नहीं है मैने सुबह ही बता दिया था पिताजी को

चाची- कहीं तेरा ये कदम घर को ना तोड़ दे कबीर

मैं- ये घर, कभी घर था ही नहीं चाची. तू ही बता तू मालकिन है इस घर की पर तुझे कितना सुख मिला इस घर में . तुझसे ज्यादा कौन घुट घुट कर जिया इस घर में . चाचा भोसड़ी का दुनिया भर की रंडियों के मजे लुटता रहा पर खुद की लुगाई के पास नहीं आ पाया. सच कहूँ तो अकेला चाचा ही नहीं हम सब भी तेरे दोषी है . तुझे क्या दे पाए हम , कुछ भी तो नहीं.

चाची- मुझे किस चीज की जरुरत भला, दो बेटे दो बहुए . तुम सब को जब देखती हूँ तो दिल को जो सकूं मिलता और और भला क्या चाहत होगी मेरी फिर. खाना खाकर मैं आया तो देखा की निशा ऊपर चोबारे में थी. मैं उसके पास जाना चाहता था की अंजू ने मुझे पकड़ लिया.

मैं- क्या हुआ

अंजू- रमा का कहीं कुछ पता नहीं चल रहा . कल रात प्रकाश के नए घर में आग लग गई. सब कुछ जल कर ख़ाक हो गया.

मैं- रमा की ही कारस्तानी होगी . पर वो अकेली नहीं है कोई तो है जो छिप कर ये खेल खेल रहा है

अंजू- कौन हो सकता है

मैं- अभी तो नहीं मालूम पर आज नहीं तो कल मालूम हो ही जायेगा.

अंजू- आज रात मैं फिर से ख़ाक छानुंगी जंगल में

मैं- एक बात सच बताना क्या तुम परकाश से सच्चा प्यार करती हो

अंजू- सच-झूठ कुछ नहीं होता कबीर, प्यार बस प्यार होता है तुमसे जायदा कौन जानता है इस बारे में

मैं- तो फिर प्रकाश से सम्बंधित सभी राज जानती होगी तुम

अंजू- क्या कहना चाहते हो तुम

मैं- रमा प्रकाश के लिए भी काम करती थी , वो एक मात्र कड़ी है जो पिताजी, चाचा, महावीर, और प्रकाश से जुडी है . तुमने उस रात देखा तो था ही न की कैसे प्रकाश रमा के साथ कार के बोनट पर क्या कर रहा था .

अंजू-प्रकाश चाहता था की राय साहब उसे उसका हिस्सा दे दे.

मैं- वसीयत का चौथा टुकड़ा

अंजू- हाँ ,

मैं इस से पहले कुछ कहता की बाहर से आते शोर ने मेरा ध्यान भटका दिया.

“बिशम्भर दयाल कहाँ छिप कर बैठा है बाहर निकल ” इस आवाज को सुनते ही मेरा दिल जोर से धडक उठा. मैं जानता था की ये होगा पर इतनी जल्दी होगा ये नहीं जानता था .

पिताजी के कमरे का दरवाजा खुला और पिताजी बाहर आये. सामने चौधरी रुडा खड़ा था . चेहरे पर दुनिया जहाँ का गुस्सा लिए.

“तुम यहाँ ” पिताजी ने बस इतना कहा

रुडा- आना ही पड़ा मुझे बिशम्भर , मैं अपनी अमानत लेने आया हूँ . लौटा दे उसे.

पिताजी ने एक नजर अंजू को देखा और बोले- अंजू जाना चाहती हो तो जाओ

रुडा- अंजू की बात नहीं कर रहा मैं . तेरी इस नालायक औलाद से पूछ क्या पाप किया है इसने

पिताजी ने एक नजर रुडा को देखा , एक नजर मुझे देखा और बोले- कबीर, चौधरी साहब किस बारे में बात कर रहे है .

मैं- निशा से ब्याह कर लिया मैंने

इतना कहते ही पिताजी की तरफ से एक जोर का थप्पड़ मेरे गाल पर आ पड़ा .

“तेरी हिम्मत कैसे हुई ये गुस्ताखी करने की . क्या सोचा तूने कोई खेल चल रहा है. कैसे सोचा की हर बार तेरी मनमर्जी चलेगी. ” पिताजी ने गुस्से से कहा.

पिताजी- हरामजादे, ये जानते हुए भी की निशा..........

“हाँ ये जानते हुए भी की मैं कौन हूँ कबीर ने मेरा हाथ थामा,मुझसे प्रेम किया मुझसे ब्याह किया ” सीढिया उतर कर निचे आते हुए निशा ने कहा .

रुडा ने निशा को देखकर थूकते हुए कहा -तू कैसे भूल गयी की तेरा नाम किस से जुड़ा है . जो पाप तूने किया है उसकी सजा तुझे मिलेगी. अरे कलंकिनी तेरे कदम क्यों नहीं कांपे घर की चोखट पार करते हुए.

निशा- घर , किस घर की बात करते है आप . घर तो वो कभी था ही नहीं . किसको फ़िक्र थी मेरी. मैं हूँ भी या नहीं . कितने ऐसे दिन थे जब आपने मेरे सर पर हाथ रखा. मेरा हाल पूछा आपको तो याद भी नहीं की उस घर में मैं भी रहती थी . किस हक़ से आप घर की बात करते हो.

“जुबान पर लगाम रख बदचलन ” रुडा ने निशा को थप्पड़ मारने के लिए अपना हाथ उठाया .

मैंने आगे बढ़ कर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- सोच कर चौधरी रुडा, अब ये मेरी पत्नी है और मेरी पत्नी से किसी ने बदतमीजी की न तो फिर ठीक नही होगा.

आस पास गाँव वाले इकठ्ठा होने लगे थे . राय साहब बिशम्भर दयाल जो दुनिया के तमाशे सुलझाता था आज उसके खुद के घर में तमाशा हो रहा था .

मैं- निशा मेरी पत्नी है यही एकमात्र सच है . हमने प्रेम किया है हमें अपनी जिन्दगी जीने दो

पिताजी- ये कहने से तेरे कर्म ठीक नहीं हो जायेंगे कबीर. गलती की है तूने समाज का नियम तोडा है तूने.

मैं- किस समाज की बात करते है आप वो समाज जो न जाने कब का मर चूका है , वो समाज जो झूठे नियम-कानून की सड़ांध में जी रहा है .

पिताजी- एक विधवा की मांग में सिंदूर भर कर तुमने पाप किया है

कबीर.

मैं - ये विधवा थी पर अब नहीं है इसका पति आपकी आँखों के सामने खड़ा है.और फिर नियमो की किस किताब में लिखा है की विधवा दुबारा से ब्याह नहीं कर सकती. ये विधवा हुई इसमें इसका क्या दोष था . क्या इसको अपनी जिन्दगी जीने का हक़ नहीं. इसे हक़ है , इसे वो तमाम है हक़ है जो दुनिया की किसी भी औरत को मिलने चाहिए.

रुडा- विशम्भर , आज तुम्हारे सामने चौधरी रुडा नहीं बल्कि एक बाप खड़ा है जो अपने बेटे की अंतिम निशानी, अपनी बहु को वापिस ले जाने आया है जिसे तुम्हारा बेटा ले आया है . सारी दुनिया तुम्हारे दरवाजे पर न्याय के लिए आती है आज मैं भी आया हूँ, करो न्याय. मुझे लौटा दो निशा को .

पिताजी- कबीर, निशा को लौटा दे.

मैं- हरगिज नहीं

पिताजी- कबीर तूने सुना नहीं हमने क्या कहा

मैं- निशा कहीं नहीं जाएगी वो मेरी पत्नी है और इस घर की छोटी बहु वो यही रहेगी

पिताजी- कबीर...........



मैं- देखते है कौन माई का लाल निशा को मुझसे जुदा करता है . खून की होली खेल कर आया हु मलिकपुर में , अगर किसी की भी फाग खेलने की इच्छा है तो आगे आये.....................
 
#139



रुडा बहन के लंड ने राय साहब के गुरुर को निशाना बनाते हुए बड़ी चालाकी से खेल खेल दिया था .उसने ऐसा माहौल बनाया की जैसे वो खुद पीड़ित है और हमारे चुतिया बाप को तो अपनी शान हद से जायदा प्यारी थी . पर हम भी पक्के वाले थे अगर आज हार जाते तो फिर आशिको की लिस्ट में हमारा कभी जिक्र होता ही नहीं.

“सामाजिक वयवस्था को बनाये रखने के लिए बरसो से कुछ कायदे चले आ रहे थे , जिनमे से एक है की विधवा का पुनर्विवाह नहीं हो सकता. इस से ताना बाना टूटेगा. ” पिताजी ने कहा

मैं- क्या गजब चुतियापा है ये . एक विधवा अपनी मर्जी से अपने जीवन को नहीं संवार सकती पर रसूखदार लोग जब चाहे नियमो की बत्ती बना कर अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकते है , तो राय साहब समाज के ठेकेदार मत बनिए और यदि बनना भी है न तो मैं पूछता हूँ ये न्याय का पुजारी तब कहाँ गया था जब आपका छोटा भाई गाँव की बहन बेटियों को अपने बिस्तर में खींच रहा था . क्या उन औरतो की अपनी मर्जी थी उस काम में. न्याय का बीड़ा उठाने का इतना ही शौक है तो चाचा की खाल क्यों नहीं खींची आपने .

मैं जानता था की पिताजी के पास मेरे सवालो का कोई जवाब नहीं था .

मैं- और ये मादरचोद गाँव वाले जब इनकी बहन बेटियों की इज्जत तार तार हो रही थी तब ये साले किस बिल में छुप गए थे , कहाँ गयी थी इनकी मर्दानगी तब. लाली को लटकाने में ये सब लोग बड़े उतावले थे जैसे की इनको बहादुरी का मेडल मिला हो पर अपनी बेटियों-बहुओ पर अत्याचार करने वाले ठाकुर जरनैल सिंह के सामने इनमे से किसी की जुबान तक नहीं खुली . मैं पूछता हूँ क्यों. जो लोग अपने हक़ के लिए खड़े नहीं हो सकते वो मेरी तक़दीर का फैसला करेंगे इस से गया गुजरा मजाक क्या होगा.

पिताजी- मजाक तो तुमने हमारा बना दिया है

.

मैं- मैंने नहीं आपके कर्मो ने. ये रुडा तो आपका बचपन का दोस्त था न ये ही छोड़ गया आपको और कर्मो की बात यदि ना ही हो तो बेहतर रहेगा , मुखोटे जब उतारे जायेंगे तो नंगे लोगो की कतार में सबसे पहले आप खड़े होंगे पिताजी .

“और आप चौधरी साहब, बहु भी बेटी का ही रूप होती है , माना की निशा महावीर की पत्नी थी पर ये कोई इनाम नहीं था जो महावीर जीत कर लाया हो. निशा को पुरे गाजेबाजे के साथ , विधिवत रूप से ही तो लाये होंगे न आप.मैं आपको बता देना चाहता हूँ की औरत कभी किसी की अमानत नहीं होती. वो गुरुर होती है . आपका बेटा गया क्या इसकी वजह निशा थी , आपका बेटा मरा अपने कर्मो की वजह से , खैर, मुझसे ज्यादा आप अपने बेटे को जानते होंगे. अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये क्या होता अगर निशा आपकी बहु की जगह आपकी बेटी होती. कैसा लगता जब आप उसे रोज विधवा के लिबास में देखते, कितने सपने जो आपने बेटी के लिए देखे थे वो रोज टूटते .” मैंने कहा .

मैं- चौधरी साहब, आप प्रेम के अस्तित्व को अपने झूठे अहंकार के आगे नकार रहे है आप. आप जिसने खुद प्रेम किया. यदि आप आज हमारे विरोध में खड़े है तो माफ़ करना सुनैना अगर आज जिन्दा होती तो धिक्कार ही होता उसे आप पर. मैं समझता हूँ आपकी वेदना को. आप अपनी मोहब्बत को नहीं पा सके. पर आप चाहे तो ये निशा अपना आने वाला जीवन सुख से जी सकती है . बहु समझ कर नहीं बेटी समझ कर इसके सर पर हाथ रख दीजिये. माना की राय साहब और आपके दरमियान बर्फ जमी है पर इसमें हमारा क्या दोष है. मैं सच कहता हूँ निशा से पहली बार मिला तब नहीं जानता था की वो क्या है . और अगर जानता भी न तो भी मैं उसका साथ नहीं छोड़ता .

“ये नहीं मान रही थी , इसने मेरे प्रेम निवेदन को स्वीकार नहीं किया था . ये जानती थी की अगर इसने ऐसा किया तो ये दिन जो हम देख रहे है जरुर आएगा. पर मैंने इसे अपनी माना है . मैंने इस से वादा किया की मैं इसके दामन को खुशियों से भर दूंगा. क्योंकि इसको भी जीने का हक़ है , दुनिया की कोई भी ताकत इसे मुस्कुराने से इसलिए नहीं रोक सकती क्योंकि ये विधवा है , इसी समाज ने क्या इसे जलील नहीं किया ताने नहीं मारे डाकन कह के , आज मैं कहता हूँ की ये डाकन नहीं है न थी . आप लोग अपने झूठे अहंकार के लिए हमें मरवा भी देंगे न तो हमारी चिता से उठता धुंआ आपकी नाकामी का ही होगा. क्योंकि आप सब जानते है की मैं सच कह रहा हूँ , चौधरी साहब निशा का हाथ मेरे हाथ में हक़ से दीजिये . उसे अपना आशीर्वाद दीजिये आप केवल महावीर के ही बाप नहीं थे, निशा के भी पिता है . अपने दर्जे को आज इतना ऊँचा कर दीजिये की फिर कभी कोई बहु और बेटी में फर्क ना कर पाए. ” मैंने कहा.

“कबीर सही कह रहा है , ” नंदिनी भाभी ने हमारा समर्थन किया.

भाभी- फूफा, तोड़ दो ये रीत पुराणी , आने वाली पीढ़ी को साँस लेने के लिए खुली हवा दो. आप लोग समाज में मोजिज लोग है आप समाज को नयी दिशा दिखायेंगे तो आपके लोग भी उसी रस्ते पर चलेगे. आपको सुनैना की कसम. आपको उस मोहब्बत की कसम जो आपने कभी की थी , उस समय आप ज़माने की बंदिशों को तोड़ नहीं पाए थे आज वक्त ने आपको फिर से ये मौका दिया है इन बच्चो को नया जीवन देकर आप अपने अतीत को इनमे जिन्दा कर सकते है .

चौधरी रुडा की आँखों से आंसू बह निकले. उसने अपनी पगड़ी उतारी और निशा के सर पर रख दी. ये एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था जो आने वाले समय में बहुत दिनों तक याद रखा जाने वाला था . एक व्यर्थ की रुढ़िवादी परम्परा को तोड़ दिया गया था आज.

रुडा- हम सब से गलतिया होती है पर इन्सान वहीँ होता है जो गलतियों को सुधारने की हिम्मत रखे , आज एक गलती को सुधार दिया गया है आज के बाद किसी भी विधवा को डाकन नहीं कहा जायेगा. उसे अपनी जिन्दगी का पूर्ण अधिकार होगा.दोष हमारे विचारो का है हमारी दकियानूसी सोच का है पर अब ये सोच बदली जायेगी. निशा मेरी बच्ची कभी तुझे बड़े अरमानो से बहु बनाकर लाया था आज उतने ही अरमानो से तुझे बेटी बना कर नए जीवन की शुभकामनाये देता हूँ.इश्वर तेरे दामन को तमाम रौनके दे. तू सदा सलामत रहे खुश रहे.

हम दोनों रुडा के गले लग गए . धीरे धीरे मजमा खत्म हो गया . राय साहब के पास कहने को कुछ नहीं था . मैंने अंजू से चाय के लिए कहा और निशा के साथ चाची के चबूतरे पर बैठ गया . वो बस मुझे ही देखे जा रही थी

मैं- इस तरह मत देख मुझे मेरी जान

निशा- मुझे हक़ है

उसने अपना सर मेरे काँधे पर टिका दिया . हम दोनों ढलती शाम को देखने लगे इस बात से बेखबर की इस शाम के बाद एक रात भी आनी बाकी थी................

 
प्यारे पाठकों, आपकी अधीरता को समझता हूं मैं परंतु कहानी अपने सारे राज धीरे धीरे ही खोलेगी
 
#140



चाची की छत पर मैंने बिस्तर लगाया . कुछ देर बाद निशा भी मेरे पास आ गयी. उसने मेरे सीने पर सर रखा और बाजु में लेट गयी . मैंने रजाई डाल ली ऊपर से .

निशा- ऐसा लगता है की सपना सच हो गया .

मैं- तुझे पाना नेमत से कम नहीं . तेरी बाँहों में ये उम्र कटे बस इतना ही तो ख्वाब था मेरा.

निशा - शाम से देख रही हूँ कुछ परेशान से हो तुम . क्या चिंता है .

मैं- कुछ तो छुट रहा है मुझसे , कुछ ऐसा जिसे समझ नही पाया हूँ . ये घर तुझे और मुझे जोड़ता है . ये घर अपने अन्दर ना जाने क्या छिपाए हुए है . तूने कहा था की तेरे हिस्से का सच तेरे घर की दहलीज में ही छिपा है अब तू आ गयी है , दिखा मुझे वो सच.

निशा- इतना पा लिया है बाकि बचा भी पा ही लेंगे.

मैं सोचने लगा की क्या निशा को मालूम है की नंदिनी भाभी ही आदम खोर है क्या मुझे निशा को बताना चाहिए. मैंने उसे ये बात नहीं बताने का निर्णय लिया और बात को घुमाया.

मैं-महावीर कैसा था निशा मैं जानना चाहता हूँ उसके बारे में

निशा- वो तेरे जैसा था अनोखा , अपनों में बेगाना. दुनिया चाहे जो कुछ भी कहे पर मैं उसे जानती थी उसके साथ जी थी मैं. चाहे कोई बड़ा हो चाहे कोई छोटा हो सबको साथ लेकर चलता था वो . अंधियारी रातो में , उन मुलाकातों में मैंने तुझमे उसकी झलक देखि कबीर. वो खंडहर उसे बहुत प्रिय था कहता था की वहां जो शांति है और कहीं नहीं है . अक्सर वो मुझे वहां लाता था घंटो उन दीवारों को देखता था वो उनसे न जैसा कैसा लगाव था उसे.

मैं- दुनिया कहती है की अय्याशी बहुत करता था वो .

निशा- दुनिया कुछ ना कुछ तो कहेगी न कबीर. पता नहीं क्यों वो जंगल से प्यार करता था . दिन में रातो में घूमता था . क्या था उसके मन में कभी जान नहीं पायी पर इतना जरुर था की परेशान नहीं था वो . उसके मरने वाले दिन तक भी मुझे ऐसा नहीं लगा था की उसकी दुश्मनी होगी किसी से. उस दोपहर हमने साथ खाना खाया था . कह कर गया था की जल्दी ही लौट आएगा पर आया ही नहीं .

निशा की बात ने मेरे मन में और हलचल मचा दी. मैंने निशा की कमर में हाथ डाला और उसे अपने ऊपर ले लिया. उसकी पीठ को सहलाते हुए मैंने उसे देखा , निशा ने अपने होंठो मेरे होंठो से जोड़ दिए. सुबह जब मैं जागा तो बदन थोडा टूट सा रहा था . कपडे पहन कर मैं निचे आया तो देखा की निशा रसोई में थी चाची के साथ .

मैं बाहर चला गया . राय साहब के कमरे पर ताला लगा था . ये बाप आखिर जाता कहाँ था इसका जवाब मुझे हर हाल में तलाशना था .हाथ-मुह धो ही रहा था की मैंने सामने से मंगू की माँ को आते देखा . न जाने क्यों मेरी नजरे झुक सी गयी .

काकी- बेटा, मंगू घर नहीं आया है . तुझे बता कर गया है क्या वो .

अब मैं क्या कहता . पर कुछ तो कहना ही था

मैं- नहीं काकी, वैसे भी कई कई दिन नहीं आता हो तू परेशान मत हो आ जायेगा. आये तो थोडा गुस्सा करना मान जायेगा तेरी बात वो .

काकी चाची की तरफ चली गयी पर मैं जानता था की अब वो कभी भी नहीं आयेगा. इन बूढ़े माँ बाप पर क्या गुजरेगी जब सच उनके सामने आएगा . मेरा मन व्यथित हो गया था . मैंने सीढियों से उतर कर भाभी को आते हुए देखा.

मैं- आपसे बात करनी थी .

भाभी- अब कोई और भी है तेरे पास बाते करने को

मैं- मजे फिर कभी लेना मेरे . मैं क्या निशा जानती है आदमखोर कौन है

भाभी- नहीं , और उसे मालूम भी नहीं होना चाहिए .

मैं- क्या कुछ और भी है जो मुझसे छिपाया है आपने .

भाभी- अब कुछ नहीं

मैं- राय साहब कहाँ जाते है

भाभी- पता नहीं.

मैं- कुछ काम से बाहर जा रहा हूँ निशा का ध्यान रखना

भाभी- ये कोई कहने की बात है

मैं- दूसरी बात अब मुझे एक गाड़ी चाहिए

भाभी-तेरे भैया को आने दे , हम सोच ही रहे थे की तुम्हे कोई तोहफा दिया जाये.

मैं मुस्कुरा दिया. घर से बहार निकला ही था की चबूतरे पर चाय लिए निशा खड़ी थी .मैंने कप उसके हाथ से लिया

निशा- सुबह सुबह कहाँ की तयारी

मैं- खेतो पर जा रहा हूँ . मेरी बात सुन ध्यान से इस घर में तू किसी पर भी भरोसा मत करना. बेशक अब हम पति पत्नी है पर सुरक्षा की दृष्टि से तुझे सावधान रहना होगा.

निशा- समझती हूँ

मैं- ठीक है फिर.

गाँव से बाहर निकल कर मैं खेतो की तरफ चल दिया. अजीब सा विरोधाभास था मेरे अन्दर. जिसे जो समझा था वो वैसा नहीं था. चाचा का अतीत अलग था . पिताजी को देख कर कौन कह सकता था की इतना रसूखदार आदमी अपनी बेटी की उम्र की लड़की संग बिस्तर गर्म कर रहा था .सबसे बड़ी बात ये सब लोग जंगल से जुड़े थे किसी न किसी तरह से .

ये पहली बार था जब मैं दिन की रौशनी में खान में उतरा था . सब कुछ वैसा ही था बस कुछ नहीं था तो मंगू की लाश. शायद राय साहब ने ही उसे हटवा दिया होगा. संघर्ष के निशान मुझे उस रात की याद दिला रहे थे . क्या ऐसा हो सकता था की मंगू ही राय साहब पर दबाव बनाये हुए हो अपनी बहन को परोसना उसकी किसी साजिश का हिस्सा हो . क्या मालूम वसीयत के चौथे पन्ने पर प्रकाश की जगह मंगू अपना नाम लिखवाना चाहता हो.

दूसरी बात जो मुझे खटक रही थी वो थी परकाश के घर में में लगी आग अचानक से तो नहीं लगी हो. वो भी जब उस घर में कोई नहीं रहता हो.क्या कोई ऐसा था जो नहीं चाहता था की निशा का ब्याह मेरे साथ होने से परिस्तिथियों में बदलाव हो. क्या वो सूरजभान हो सकता था वो भी तो अपने भाई के कातिल की तलाश में जंगल में भटक रहा था . क्या वो रमा हो सकती है. क्या चाचा के बारे में मैंने जितना भी सोचा उसका कोई और पहलु भी हो सकता था .

मैंने वो चुदाई की तस्वीरों वाली किताब उठाई और उसे देखने लगा. काफी पुराणी किताब थी वो पन्ने पीले पड़े हुए. चूत का चस्का भी ना साला क्या से क्या करवा देता है मैंने पन्ने पलटते हुए सोचा. दूसरी फिर तीसरी किताब उठा कर मैंने देखि और तीसरी किताब में जो मुझे मिला वो एक मरी हुई उम्मीद थी .

 
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