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प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 500-501
अपडेट #21
Chapter
कामुक वर्षा..
सन
#08
कुंदन
सुंदरपुर की दिन भर चलती बारिश ने आज इस गाओं क पुरे hi jal-jeevan को पूरी तरह ast-vyast कर दिया था, पर काम की गति कहा रूकती है वो अपनी दिशा में आगे बढ़ते hi रहते है.. और ठीक ऐसी प्रकार 'स्वर्गवासी मुरली दस' क परिवार में हर व्यक्ति क कार्य की गति बानी रही, जहा औरतों ने घर को अचे से संभाले रखा वही मर्दों में कुंदन और भानु तोह सुबह hi निकल गए थे किसी जरुरी काम से वही वीरू भी खेत क जरुरी कार्य से दिन में खेत की और गया था जो आप जानते hi है.. वैसे अगर सविता क सब्द याद होंगे तोह वो अपने शब्दों में महेंद्र क भी कई जाने की बात करती है जो आगे भविष्य में खुलेगा
शाम क करीब 6:20 हुए होंगे की तभी छप्पर नीचे बैठी हुई सविता और महेंद्र को मोटरसाइकिल की ध्वनि सुनाई पड़ती है, जो इस बात की सूचक थी की भानु जो सुबह का निकला हुआ था वो लौट आया है.. भानु जैसे hi अपनी मोटरसाइकिल को कुवे क पास कड़ी करके छप्पर नीचे पहुँचता है और उसे पूरी तरह भीगा हुआ देख क महेंद्र एक बड़े भाई की भांति परेशां होता हुआ बोल पड़ता है
"तुम तोह पूरा भीग गए हो.. दिन में भी खाने क लिए नहीं आये, कहा गए हुए थे सुबह से ?"
महेंद्र ने अपनी चिंता को शब्दों का रूप देके सरे सवाल एक hi बार में पूछ डाले थे, जिसने सविता मुस्कुराते हुए बोल पड़ती है
"अरे उसे सांस तोह लेने दो.. बेचारा सुबह से न जाने कहा दौड़ भाग में लगा हुआ था.. ?"
भानु एक बार को दोनों की बातों और उन्हें देख क मुस्कुराता है और फिर महेंद्र की और देखते हुए मन hi मन कहता है
'तेरी hi बर्बादी का प्रबंध कर रहा था.. अब जबकि कुंदन मेरे साथ दिल्ली में होगा तोह यहाँ में अपना खेल आराम से सुरु करवा सकता हुआ, और सुरुवात तुझे ठंडा करने से hi करूँगा, पर उससे पहले इस घर की कई औरतों को टंगे हवा में उठवाऊंगा'
उसके मन में चलती इन बातों क कारन कही न कही उसकी ख़ुशी उसके अधरों पे भी नज़र आ जाती है, जिसे देख क सविता बोल पड़ती है
"किया हुआ दामाद जी.. किया सोच क मंद मंद मुस्कुरा रहे है"
भानु जल्दी से अपनी इस्तिथि को सँभालते हुए
"अरे कुछ नहीं बड़की भावजी.. वो बस महेंद्र भैया की बातें सुनकर लगा की मैं भी अनाथ नहीं हु, मेरे भी बड़े भाई है"
सविता जहा ये सुनकर ममता से भर उठी थी, वही महेंद्र थोड़ा ग़ुस्से दिखते हुए कहता है
"पहले भी समझा चूका हु.. तुम अनाथ नहीं हो, मैं हु सविता है सब है तुम्हारे, खबरदार जो आइंदा ऐसी बात करि तोह मुझसे बुरा कोई नहीं होगा"
महेंद्र की बात पे सविता और वही द्वार पे आके कड़ी हो चुकी शीला भी है पड़ती है तोह वही भानु अपना नाटक जारी रखते हुए मुस्कुरा क कहता है
"पक्का अबसे नहीं कहूंगा.. पर अगर मेरे बड़े भैया ने मुझे डाट लिया हो तोह में जेक कपडे बदल लू, और सुबह से कुछ खाया भी नहीं है.."
महेंद्र का पिता रुपी ग़ुस्सा जिसमें ग़ुस्से से ज्यादा प्रेम था वो एक hi पल में जैसे हवा हो जाता है, वो जल्दी से सविता की और देखते हुए
"अरे मुंह किया देख रही हो.. जाओ जल्दी से उसे खाना दो सुबह से भूखा है, जब देखो बातों में hi लग लती हु"
सविता को तोह एक पल क लिए समझ hi नहीं अत की आखिर उसकी गलती किया थी पर तभी द्वार पे कड़ी शीला और भानु जोर जोर से है पड़ते है तोह सविता क आधार भी हसी से खुल जाते है और वो शीला की और देखते हुए
"जा रे.. पहले इसके कपडे बदलवा और फिर खाने को दे कुछ, वर्ण तेरे मरद क चक्कर में मेरा मरद मुझे न जाने किया किया सुना देगा"
सविता की बातों पे एक बार फिर से वह उपस्थित सभी hi khil-khila क है पड़ते है
सविता की बात सुनते hi शीला मुस्कुरा क अपने पति 'भानु' को पूरी तरह भीगा हुआ देखती है और द्वार से हट्टे हुए उन्हें अंदर लेके चल पड़ती है, जहा भानु जैसे hi अंदर प्रवेश करता है उसे आँगन वाले छप्पर क नीचे एक लोहे क तसले में आग जलती हुई नज़र आती है जिसके चारो और घर क सभी लोग उपस्तित थे पर वह उसे सिर्फ मालती और कुंदन नहीं नज़र आते..
भानु, शीला क पीछे पीछे मोनू वाले कमरे की और चलते हुए उससे पूछ hi लेता है
"मंजलि भाभी और कुंदन भैया नहीं नज़र आ रहे.. कहे गए है ?"
शीला अपने पति क सरीर से बेहटा हुआ पानी देखते हुए कहती है
"कुंदन भैया तोह सुबह hi कही गए थे, अभी तक नहीं लौटे.. और मालती भाभी जबसे मंदिर से लौटी है बस सोये hi जा रही थी
..लगता है आज ज्यादा hi थक गयी है वो.. ?"
भानु, शीला क पीछे पीछे मोनू वाले कमरे में प्रवेश करते हुए सोच रहा था
'आखिर ये कुंदन कहा है सुबह से ?'
इधर शीला अंदर पहुंचते hi कमरे में एक और राखी उस पुराणी अलमारी को खोलती है और उसमें से एक साफ़ टॉवल निकल क अपने पति भानु की और बढ़ाते हुए
'आप कहा खो गए.. ये लीजिये न"
भानु जैसे होश में लौटता है और अपनी पत्नी क हाथ से टॉवल लेते हुए उसका हाथ पकड़ क उसे अपनी और खींच लेता है.. जहा भानु की मरदाना ताक़त क चलते शीला किसी फूल सी काली सामान उसकी और खींचती चली जाती है और अगले hi पल उसके पुर भीगे हुए कुर्ते क ऊपर से hi उसके सीने से पूरी चिपक जाती है, भानु भी बिना दिएर क अपने दोनों हाथों को उसके कन्धों क दोनों और से आगे ले जेक उसे अपने आप में पूरी तरह समेत लेता है
शीला- (अपने पति की ऐसी हरकत पे मुस्कुराते हुए) ाजी छोड़िये न.. किया करते है की कोई आ जायेगा
शीला की बात पे भानु अपने दोनों हाथों को उसकी पीट पे चलते हुए नीचे की और ले जाता है और कुछ hi पलों में कुंदन की बहिन की कासी गांड उसके हाथों में जकड चुकी थी.. वो उन्हें जोर से दबाते हुए मुस्कुरा क कहता है
"अरे मैं तोह अपनी पत्नी से प्रेम कर रहा हु.. नहीं कर सकता हु किया ?"
शीला भी उसकी बात सुनकर मुस्कुरा क अपना चेहरा ऊपर करती हुई उनकी आँखों में देखते हुए साथ hi भानु क दोनों हाथों की जकड अपनी कामुक गांड पे महसूस करते हुए मुस्कुरा क कहती है
"मुझे अचे से पता है आपके प्रेम का तरीका.. छोड़िये मुझे वर्ण कोई आ जायेगा"
भानु मुस्कुरा पड़ता है पर कुछ कहता नहीं, वो अपने होंठों को आगे करके अपनी खूबसूरत पत्नी क होंठों पे रख देता hi और शीला भी उसके गर्माहट में खोटी चली जाती है और उसकी आँखें खुद hi बंद होने लगती है
"Ummmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmm…….."
भानु दोनों हाथों से अपनी पत्नी की कोमल और कासी गांड को उसके सूट क ऊपर से hi मसलते हुए उसके होंठों को जोर जोर से ऐसे चूसना सुरु हो जाता है जैसे पूरा कॉमर्स उसके होंठों में hi भरा हो
"Ummmmmmmmmmm…. Ummmmmmmmmmm……."
वो इतनी बेहरमी से 'सत्तू की बुआ' क होंठों को चूस रहा था की कुछ hi पलों में शीला की सांस उखाड़ना सुरु हो जाती है और पूरा जिस्म कुनमुनाने लगता है, वो भानु की अजगर जैसी पकड़ से छूट जाना चाहती है पर भानु उसे ऐसा करने नहीं देता और उसकी गांड को और बेहरहमी से इतनी बुरी तरह से जकड लेता है की उसकी पाँचों उंगलिया शीला को अपने मार्श में धास्ति हुई सी प्रतीत होती है और एक तीव्र दर्द की लहर पुरे सरीर में भर्ती चली जाती है
शीला मुश्किल से अपने दोनों हाथों को अपने पति क सीने पे रखते हुए जोर से उसे धक्का देती है जिसके चलते उसके होंठों को बेहरहमी से चुस्त हुआ भानु उससे अलग हो पड़ता है और शीला बुरी तरह हफ्ते हुए लम्बी लम्बी साँसे लेने लगती है और फिर थोड़े ग़ुस्से से अपने पति की और देखते हुए कहती है
"आपको हो किया जाता है, जान hi ले लेते है मेरी.. आपकी पत्नी हु, आप कुछ भी प्रेम से नहीं कर सकते किया
..आप तोह ऐसे टूट पड़ते है जैसे, जैसे में कोई सूरजमुखी गाओं की राण…"
शीला अपने आगे क शब्दों को मुख से बहार आने से खुद hi रोक लेती है, इधर उसके होंठों को बेहरमी से चूसने क कारन भानु क नाग महाराज क फैन में उठान आना सुरु hi हुआ था की उसक पत्नी ने उसके खड़े लुंड पे लात मारने वाली बात को चरितार्थ कर दिया था..
भानु को उसकी हरकत पे ग़ुस्सा तोह आता है पर वो कुछ बोलता नहीं और अपना काबू बनाये रखे हुए मुस्कुरा क कहता है
"अरे किया करू.. तुम हो hi इतनी खूबसूरत की में हर बार अपने होश खो देता हु.."
शीला को भले hi ऐसी दरिन्दिगी पे ग़ुस्सा आया हो पर अपनी तारीफ सुनकर उसके गाल भी लाल हो पड़ते है, वो मुस्कुरा क कहती है
"आप कभी कुछ भी पियर से क्यों नहीं करते है, हमेशा ऐसा लगता है जैसे बस मेरा जिस्म नोच लेना च रहे हो.."
शीला की बात सुनकर भानु मन hi मन है पड़ता है पर अपने विचारों को चेहरे पे आने नहीं देता और मन hi मन शीला को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहता है
'किया करू हराम की जनि, तुझे किया मैं तेरे इस घर की हर औरत का जिस्म नोच क उसे रैंड बना दूंगा एक दिन..'
पर भानु अपने विचारों को शब्दों का रूप नहीं देता और मुस्कुरा क कहता है
"अरे बाबा.. गलती हो गयी, ाचा अब कुछ पहनने क लिए ला डौगी.. ककी कपडे तोह सरे वही रखे हुए घर में"
शीला एक पल क लिए सोचती है और फिर भानु को देखते हुए कहती है
"आपको तोह सिर्फ कुंदन भैया क hi कपडे आ पाएंगे, अभी उनकी धोती और कुछ ला देती हु.. बाकि सुबह किसी क साथ जेक आपके कपडे और जरुरी सामान ले आउंगी, स्टेशन तोह यही से जाना होगा न जी..?"
भानु उसकी बात पे सहमति जताते हुए 'है' भर देता है, और जल्दी hi वो कुंदन की धोती और उसी का एक छोटा कमर तक वाला कुरता पेहेन चूका था और अब वही सबके साथ अंदर वाले छप्पर क नीचे बैठा हुआ आग सीख रहा था.. तभी वो महेंद्र वाले कमरे की और देखते हुए कहता है
"मंझली भाभी अभी तक नहीं उठी.. ऐसा किया थक गयी है ?"
भानु की बात पे वही बैठा हुआ सत्यम मन hi मन मुस्कुरा पड़ता है..
वही दूसरी और शीला मन hi मन ये सोच रही थी की किया कभी उसे वैसे प्रेम मिलेगा जैसा वो सोचती है, जिसमें हैवानियत न हो सिर्फ प्रेम हो और दो जिस्म क मिलान का ऐसा संगम हो उसे ख़ुशी दे.. की तभी उसके विचारों में खुई हुई उसकी आँखें सामने की और उठती है जहा सत्तू एकटुक उसे hi देखे जा रहा था
शीला हल्का सा मुस्कुरा क अपनी पलकों और भौवों को उठाते हुए धीरे से मानो इशारे से पूछती है
'किया हुआ..'
जिससे सत्तू जल्दी से इधर उधर देखने लगता है और बस 'न' में सर हिला देता है, शीला एक बार को उसे देखती है और मन hi मन खुद से कहती है
'ऐसे आज कल किया हो रहा है.. जब देखो शांत सा रहता है,
..लगता है बात करनी पड़ेगी, कही कोई परेशानी वाली बात तोह नहीं"
कंटिन्यू...
अपडेट #21
Chapter
सन
कुंदन
सुंदरपुर की दिन भर चलती बारिश ने आज इस गाओं क पुरे hi jal-jeevan को पूरी तरह ast-vyast कर दिया था, पर काम की गति कहा रूकती है वो अपनी दिशा में आगे बढ़ते hi रहते है.. और ठीक ऐसी प्रकार 'स्वर्गवासी मुरली दस' क परिवार में हर व्यक्ति क कार्य की गति बानी रही, जहा औरतों ने घर को अचे से संभाले रखा वही मर्दों में कुंदन और भानु तोह सुबह hi निकल गए थे किसी जरुरी काम से वही वीरू भी खेत क जरुरी कार्य से दिन में खेत की और गया था जो आप जानते hi है.. वैसे अगर सविता क सब्द याद होंगे तोह वो अपने शब्दों में महेंद्र क भी कई जाने की बात करती है जो आगे भविष्य में खुलेगा
शाम क करीब 6:20 हुए होंगे की तभी छप्पर नीचे बैठी हुई सविता और महेंद्र को मोटरसाइकिल की ध्वनि सुनाई पड़ती है, जो इस बात की सूचक थी की भानु जो सुबह का निकला हुआ था वो लौट आया है.. भानु जैसे hi अपनी मोटरसाइकिल को कुवे क पास कड़ी करके छप्पर नीचे पहुँचता है और उसे पूरी तरह भीगा हुआ देख क महेंद्र एक बड़े भाई की भांति परेशां होता हुआ बोल पड़ता है
"तुम तोह पूरा भीग गए हो.. दिन में भी खाने क लिए नहीं आये, कहा गए हुए थे सुबह से ?"
महेंद्र ने अपनी चिंता को शब्दों का रूप देके सरे सवाल एक hi बार में पूछ डाले थे, जिसने सविता मुस्कुराते हुए बोल पड़ती है
"अरे उसे सांस तोह लेने दो.. बेचारा सुबह से न जाने कहा दौड़ भाग में लगा हुआ था.. ?"
भानु एक बार को दोनों की बातों और उन्हें देख क मुस्कुराता है और फिर महेंद्र की और देखते हुए मन hi मन कहता है
'तेरी hi बर्बादी का प्रबंध कर रहा था.. अब जबकि कुंदन मेरे साथ दिल्ली में होगा तोह यहाँ में अपना खेल आराम से सुरु करवा सकता हुआ, और सुरुवात तुझे ठंडा करने से hi करूँगा, पर उससे पहले इस घर की कई औरतों को टंगे हवा में उठवाऊंगा'
उसके मन में चलती इन बातों क कारन कही न कही उसकी ख़ुशी उसके अधरों पे भी नज़र आ जाती है, जिसे देख क सविता बोल पड़ती है
"किया हुआ दामाद जी.. किया सोच क मंद मंद मुस्कुरा रहे है"
भानु जल्दी से अपनी इस्तिथि को सँभालते हुए
"अरे कुछ नहीं बड़की भावजी.. वो बस महेंद्र भैया की बातें सुनकर लगा की मैं भी अनाथ नहीं हु, मेरे भी बड़े भाई है"
सविता जहा ये सुनकर ममता से भर उठी थी, वही महेंद्र थोड़ा ग़ुस्से दिखते हुए कहता है
"पहले भी समझा चूका हु.. तुम अनाथ नहीं हो, मैं हु सविता है सब है तुम्हारे, खबरदार जो आइंदा ऐसी बात करि तोह मुझसे बुरा कोई नहीं होगा"
महेंद्र की बात पे सविता और वही द्वार पे आके कड़ी हो चुकी शीला भी है पड़ती है तोह वही भानु अपना नाटक जारी रखते हुए मुस्कुरा क कहता है
"पक्का अबसे नहीं कहूंगा.. पर अगर मेरे बड़े भैया ने मुझे डाट लिया हो तोह में जेक कपडे बदल लू, और सुबह से कुछ खाया भी नहीं है.."
महेंद्र का पिता रुपी ग़ुस्सा जिसमें ग़ुस्से से ज्यादा प्रेम था वो एक hi पल में जैसे हवा हो जाता है, वो जल्दी से सविता की और देखते हुए
"अरे मुंह किया देख रही हो.. जाओ जल्दी से उसे खाना दो सुबह से भूखा है, जब देखो बातों में hi लग लती हु"
सविता को तोह एक पल क लिए समझ hi नहीं अत की आखिर उसकी गलती किया थी पर तभी द्वार पे कड़ी शीला और भानु जोर जोर से है पड़ते है तोह सविता क आधार भी हसी से खुल जाते है और वो शीला की और देखते हुए
"जा रे.. पहले इसके कपडे बदलवा और फिर खाने को दे कुछ, वर्ण तेरे मरद क चक्कर में मेरा मरद मुझे न जाने किया किया सुना देगा"
सविता की बातों पे एक बार फिर से वह उपस्थित सभी hi khil-khila क है पड़ते है
सविता की बात सुनते hi शीला मुस्कुरा क अपने पति 'भानु' को पूरी तरह भीगा हुआ देखती है और द्वार से हट्टे हुए उन्हें अंदर लेके चल पड़ती है, जहा भानु जैसे hi अंदर प्रवेश करता है उसे आँगन वाले छप्पर क नीचे एक लोहे क तसले में आग जलती हुई नज़र आती है जिसके चारो और घर क सभी लोग उपस्तित थे पर वह उसे सिर्फ मालती और कुंदन नहीं नज़र आते..
भानु, शीला क पीछे पीछे मोनू वाले कमरे की और चलते हुए उससे पूछ hi लेता है
"मंजलि भाभी और कुंदन भैया नहीं नज़र आ रहे.. कहे गए है ?"
शीला अपने पति क सरीर से बेहटा हुआ पानी देखते हुए कहती है
"कुंदन भैया तोह सुबह hi कही गए थे, अभी तक नहीं लौटे.. और मालती भाभी जबसे मंदिर से लौटी है बस सोये hi जा रही थी
..लगता है आज ज्यादा hi थक गयी है वो.. ?"
भानु, शीला क पीछे पीछे मोनू वाले कमरे में प्रवेश करते हुए सोच रहा था
'आखिर ये कुंदन कहा है सुबह से ?'
इधर शीला अंदर पहुंचते hi कमरे में एक और राखी उस पुराणी अलमारी को खोलती है और उसमें से एक साफ़ टॉवल निकल क अपने पति भानु की और बढ़ाते हुए
'आप कहा खो गए.. ये लीजिये न"
भानु जैसे होश में लौटता है और अपनी पत्नी क हाथ से टॉवल लेते हुए उसका हाथ पकड़ क उसे अपनी और खींच लेता है.. जहा भानु की मरदाना ताक़त क चलते शीला किसी फूल सी काली सामान उसकी और खींचती चली जाती है और अगले hi पल उसके पुर भीगे हुए कुर्ते क ऊपर से hi उसके सीने से पूरी चिपक जाती है, भानु भी बिना दिएर क अपने दोनों हाथों को उसके कन्धों क दोनों और से आगे ले जेक उसे अपने आप में पूरी तरह समेत लेता है
शीला- (अपने पति की ऐसी हरकत पे मुस्कुराते हुए) ाजी छोड़िये न.. किया करते है की कोई आ जायेगा
शीला की बात पे भानु अपने दोनों हाथों को उसकी पीट पे चलते हुए नीचे की और ले जाता है और कुछ hi पलों में कुंदन की बहिन की कासी गांड उसके हाथों में जकड चुकी थी.. वो उन्हें जोर से दबाते हुए मुस्कुरा क कहता है
"अरे मैं तोह अपनी पत्नी से प्रेम कर रहा हु.. नहीं कर सकता हु किया ?"
शीला भी उसकी बात सुनकर मुस्कुरा क अपना चेहरा ऊपर करती हुई उनकी आँखों में देखते हुए साथ hi भानु क दोनों हाथों की जकड अपनी कामुक गांड पे महसूस करते हुए मुस्कुरा क कहती है
"मुझे अचे से पता है आपके प्रेम का तरीका.. छोड़िये मुझे वर्ण कोई आ जायेगा"
भानु मुस्कुरा पड़ता है पर कुछ कहता नहीं, वो अपने होंठों को आगे करके अपनी खूबसूरत पत्नी क होंठों पे रख देता hi और शीला भी उसके गर्माहट में खोटी चली जाती है और उसकी आँखें खुद hi बंद होने लगती है
"Ummmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmm…….."
भानु दोनों हाथों से अपनी पत्नी की कोमल और कासी गांड को उसके सूट क ऊपर से hi मसलते हुए उसके होंठों को जोर जोर से ऐसे चूसना सुरु हो जाता है जैसे पूरा कॉमर्स उसके होंठों में hi भरा हो
"Ummmmmmmmmmm…. Ummmmmmmmmmm……."
वो इतनी बेहरमी से 'सत्तू की बुआ' क होंठों को चूस रहा था की कुछ hi पलों में शीला की सांस उखाड़ना सुरु हो जाती है और पूरा जिस्म कुनमुनाने लगता है, वो भानु की अजगर जैसी पकड़ से छूट जाना चाहती है पर भानु उसे ऐसा करने नहीं देता और उसकी गांड को और बेहरहमी से इतनी बुरी तरह से जकड लेता है की उसकी पाँचों उंगलिया शीला को अपने मार्श में धास्ति हुई सी प्रतीत होती है और एक तीव्र दर्द की लहर पुरे सरीर में भर्ती चली जाती है
शीला मुश्किल से अपने दोनों हाथों को अपने पति क सीने पे रखते हुए जोर से उसे धक्का देती है जिसके चलते उसके होंठों को बेहरहमी से चुस्त हुआ भानु उससे अलग हो पड़ता है और शीला बुरी तरह हफ्ते हुए लम्बी लम्बी साँसे लेने लगती है और फिर थोड़े ग़ुस्से से अपने पति की और देखते हुए कहती है
"आपको हो किया जाता है, जान hi ले लेते है मेरी.. आपकी पत्नी हु, आप कुछ भी प्रेम से नहीं कर सकते किया
..आप तोह ऐसे टूट पड़ते है जैसे, जैसे में कोई सूरजमुखी गाओं की राण…"
शीला अपने आगे क शब्दों को मुख से बहार आने से खुद hi रोक लेती है, इधर उसके होंठों को बेहरमी से चूसने क कारन भानु क नाग महाराज क फैन में उठान आना सुरु hi हुआ था की उसक पत्नी ने उसके खड़े लुंड पे लात मारने वाली बात को चरितार्थ कर दिया था..
भानु को उसकी हरकत पे ग़ुस्सा तोह आता है पर वो कुछ बोलता नहीं और अपना काबू बनाये रखे हुए मुस्कुरा क कहता है
"अरे किया करू.. तुम हो hi इतनी खूबसूरत की में हर बार अपने होश खो देता हु.."
शीला को भले hi ऐसी दरिन्दिगी पे ग़ुस्सा आया हो पर अपनी तारीफ सुनकर उसके गाल भी लाल हो पड़ते है, वो मुस्कुरा क कहती है
"आप कभी कुछ भी पियर से क्यों नहीं करते है, हमेशा ऐसा लगता है जैसे बस मेरा जिस्म नोच लेना च रहे हो.."
शीला की बात सुनकर भानु मन hi मन है पड़ता है पर अपने विचारों को चेहरे पे आने नहीं देता और मन hi मन शीला को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहता है
'किया करू हराम की जनि, तुझे किया मैं तेरे इस घर की हर औरत का जिस्म नोच क उसे रैंड बना दूंगा एक दिन..'
पर भानु अपने विचारों को शब्दों का रूप नहीं देता और मुस्कुरा क कहता है
"अरे बाबा.. गलती हो गयी, ाचा अब कुछ पहनने क लिए ला डौगी.. ककी कपडे तोह सरे वही रखे हुए घर में"
शीला एक पल क लिए सोचती है और फिर भानु को देखते हुए कहती है
"आपको तोह सिर्फ कुंदन भैया क hi कपडे आ पाएंगे, अभी उनकी धोती और कुछ ला देती हु.. बाकि सुबह किसी क साथ जेक आपके कपडे और जरुरी सामान ले आउंगी, स्टेशन तोह यही से जाना होगा न जी..?"
भानु उसकी बात पे सहमति जताते हुए 'है' भर देता है, और जल्दी hi वो कुंदन की धोती और उसी का एक छोटा कमर तक वाला कुरता पेहेन चूका था और अब वही सबके साथ अंदर वाले छप्पर क नीचे बैठा हुआ आग सीख रहा था.. तभी वो महेंद्र वाले कमरे की और देखते हुए कहता है
"मंझली भाभी अभी तक नहीं उठी.. ऐसा किया थक गयी है ?"
भानु की बात पे वही बैठा हुआ सत्यम मन hi मन मुस्कुरा पड़ता है..
वही दूसरी और शीला मन hi मन ये सोच रही थी की किया कभी उसे वैसे प्रेम मिलेगा जैसा वो सोचती है, जिसमें हैवानियत न हो सिर्फ प्रेम हो और दो जिस्म क मिलान का ऐसा संगम हो उसे ख़ुशी दे.. की तभी उसके विचारों में खुई हुई उसकी आँखें सामने की और उठती है जहा सत्तू एकटुक उसे hi देखे जा रहा था
शीला हल्का सा मुस्कुरा क अपनी पलकों और भौवों को उठाते हुए धीरे से मानो इशारे से पूछती है
'किया हुआ..'
जिससे सत्तू जल्दी से इधर उधर देखने लगता है और बस 'न' में सर हिला देता है, शीला एक बार को उसे देखती है और मन hi मन खुद से कहती है
'ऐसे आज कल किया हो रहा है.. जब देखो शांत सा रहता है,
..लगता है बात करनी पड़ेगी, कही कोई परेशानी वाली बात तोह नहीं"
कंटिन्यू...
