Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running - Page 22 - SexBaba
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Adultery मालती का कामुक संसार (Adultery Upanyas) Part #02 Running

प्रीवियस अपडेट ों पेज No. 500-501



अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #08

कुंदन

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सुंदरपुर की दिन भर चलती बारिश ने आज इस गाओं क पुरे hi jal-jeevan को पूरी तरह ast-vyast कर दिया था, पर काम की गति कहा रूकती है वो अपनी दिशा में आगे बढ़ते hi रहते है.. और ठीक ऐसी प्रकार 'स्वर्गवासी मुरली दस' क परिवार में हर व्यक्ति क कार्य की गति बानी रही, जहा औरतों ने घर को अचे से संभाले रखा वही मर्दों में कुंदन और भानु तोह सुबह hi निकल गए थे किसी जरुरी काम से वही वीरू भी खेत क जरुरी कार्य से दिन में खेत की और गया था जो आप जानते hi है.. वैसे अगर सविता क सब्द याद होंगे तोह वो अपने शब्दों में महेंद्र क भी कई जाने की बात करती है जो आगे भविष्य में खुलेगा

शाम क करीब 6:20 हुए होंगे की तभी छप्पर नीचे बैठी हुई सविता और महेंद्र को मोटरसाइकिल की ध्वनि सुनाई पड़ती है, जो इस बात की सूचक थी की भानु जो सुबह का निकला हुआ था वो लौट आया है.. भानु जैसे hi अपनी मोटरसाइकिल को कुवे क पास कड़ी करके छप्पर नीचे पहुँचता है और उसे पूरी तरह भीगा हुआ देख क महेंद्र एक बड़े भाई की भांति परेशां होता हुआ बोल पड़ता है

"तुम तोह पूरा भीग गए हो.. दिन में भी खाने क लिए नहीं आये, कहा गए हुए थे सुबह से ?"

महेंद्र ने अपनी चिंता को शब्दों का रूप देके सरे सवाल एक hi बार में पूछ डाले थे, जिसने सविता मुस्कुराते हुए बोल पड़ती है

"अरे उसे सांस तोह लेने दो.. बेचारा सुबह से न जाने कहा दौड़ भाग में लगा हुआ था.. ?"

भानु एक बार को दोनों की बातों और उन्हें देख क मुस्कुराता है और फिर महेंद्र की और देखते हुए मन hi मन कहता है

'तेरी hi बर्बादी का प्रबंध कर रहा था.. अब जबकि कुंदन मेरे साथ दिल्ली में होगा तोह यहाँ में अपना खेल आराम से सुरु करवा सकता हुआ, और सुरुवात तुझे ठंडा करने से hi करूँगा, पर उससे पहले इस घर की कई औरतों को टंगे हवा में उठवाऊंगा'

उसके मन में चलती इन बातों क कारन कही न कही उसकी ख़ुशी उसके अधरों पे भी नज़र आ जाती है, जिसे देख क सविता बोल पड़ती है

"किया हुआ दामाद जी.. किया सोच क मंद मंद मुस्कुरा रहे है"

भानु जल्दी से अपनी इस्तिथि को सँभालते हुए

"अरे कुछ नहीं बड़की भावजी.. वो बस महेंद्र भैया की बातें सुनकर लगा की मैं भी अनाथ नहीं हु, मेरे भी बड़े भाई है"

सविता जहा ये सुनकर ममता से भर उठी थी, वही महेंद्र थोड़ा ग़ुस्से दिखते हुए कहता है

"पहले भी समझा चूका हु.. तुम अनाथ नहीं हो, मैं हु सविता है सब है तुम्हारे, खबरदार जो आइंदा ऐसी बात करि तोह मुझसे बुरा कोई नहीं होगा"

महेंद्र की बात पे सविता और वही द्वार पे आके कड़ी हो चुकी शीला भी है पड़ती है तोह वही भानु अपना नाटक जारी रखते हुए मुस्कुरा क कहता है

"पक्का अबसे नहीं कहूंगा.. पर अगर मेरे बड़े भैया ने मुझे डाट लिया हो तोह में जेक कपडे बदल लू, और सुबह से कुछ खाया भी नहीं है.."

महेंद्र का पिता रुपी ग़ुस्सा जिसमें ग़ुस्से से ज्यादा प्रेम था वो एक hi पल में जैसे हवा हो जाता है, वो जल्दी से सविता की और देखते हुए

"अरे मुंह किया देख रही हो.. जाओ जल्दी से उसे खाना दो सुबह से भूखा है, जब देखो बातों में hi लग लती हु"

सविता को तोह एक पल क लिए समझ hi नहीं अत की आखिर उसकी गलती किया थी पर तभी द्वार पे कड़ी शीला और भानु जोर जोर से है पड़ते है तोह सविता क आधार भी हसी से खुल जाते है और वो शीला की और देखते हुए

"जा रे.. पहले इसके कपडे बदलवा और फिर खाने को दे कुछ, वर्ण तेरे मरद क चक्कर में मेरा मरद मुझे न जाने किया किया सुना देगा"

सविता की बातों पे एक बार फिर से वह उपस्थित सभी hi khil-khila क है पड़ते है

सविता की बात सुनते hi शीला मुस्कुरा क अपने पति 'भानु' को पूरी तरह भीगा हुआ देखती है और द्वार से हट्टे हुए उन्हें अंदर लेके चल पड़ती है, जहा भानु जैसे hi अंदर प्रवेश करता है उसे आँगन वाले छप्पर क नीचे एक लोहे क तसले में आग जलती हुई नज़र आती है जिसके चारो और घर क सभी लोग उपस्तित थे पर वह उसे सिर्फ मालती और कुंदन नहीं नज़र आते..

भानु, शीला क पीछे पीछे मोनू वाले कमरे की और चलते हुए उससे पूछ hi लेता है

"मंजलि भाभी और कुंदन भैया नहीं नज़र आ रहे.. कहे गए है ?"

शीला अपने पति क सरीर से बेहटा हुआ पानी देखते हुए कहती है

"कुंदन भैया तोह सुबह hi कही गए थे, अभी तक नहीं लौटे.. और मालती भाभी जबसे मंदिर से लौटी है बस सोये hi जा रही थी

..लगता है आज ज्यादा hi थक गयी है वो.. ?"

भानु, शीला क पीछे पीछे मोनू वाले कमरे में प्रवेश करते हुए सोच रहा था

'आखिर ये कुंदन कहा है सुबह से ?'

इधर शीला अंदर पहुंचते hi कमरे में एक और राखी उस पुराणी अलमारी को खोलती है और उसमें से एक साफ़ टॉवल निकल क अपने पति भानु की और बढ़ाते हुए

'आप कहा खो गए.. ये लीजिये न"

भानु जैसे होश में लौटता है और अपनी पत्नी क हाथ से टॉवल लेते हुए उसका हाथ पकड़ क उसे अपनी और खींच लेता है.. जहा भानु की मरदाना ताक़त क चलते शीला किसी फूल सी काली सामान उसकी और खींचती चली जाती है और अगले hi पल उसके पुर भीगे हुए कुर्ते क ऊपर से hi उसके सीने से पूरी चिपक जाती है, भानु भी बिना दिएर क अपने दोनों हाथों को उसके कन्धों क दोनों और से आगे ले जेक उसे अपने आप में पूरी तरह समेत लेता है

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शीला- (अपने पति की ऐसी हरकत पे मुस्कुराते हुए) ाजी छोड़िये न.. किया करते है की कोई आ जायेगा

शीला की बात पे भानु अपने दोनों हाथों को उसकी पीट पे चलते हुए नीचे की और ले जाता है और कुछ hi पलों में कुंदन की बहिन की कासी गांड उसके हाथों में जकड चुकी थी.. वो उन्हें जोर से दबाते हुए मुस्कुरा क कहता है

"अरे मैं तोह अपनी पत्नी से प्रेम कर रहा हु.. नहीं कर सकता हु किया ?"

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शीला भी उसकी बात सुनकर मुस्कुरा क अपना चेहरा ऊपर करती हुई उनकी आँखों में देखते हुए साथ hi भानु क दोनों हाथों की जकड अपनी कामुक गांड पे महसूस करते हुए मुस्कुरा क कहती है

"मुझे अचे से पता है आपके प्रेम का तरीका.. छोड़िये मुझे वर्ण कोई आ जायेगा"

भानु मुस्कुरा पड़ता है पर कुछ कहता नहीं, वो अपने होंठों को आगे करके अपनी खूबसूरत पत्नी क होंठों पे रख देता hi और शीला भी उसके गर्माहट में खोटी चली जाती है और उसकी आँखें खुद hi बंद होने लगती है

"Ummmmmmmmmmm… ummmmmmmmmmmmmm…….."

भानु दोनों हाथों से अपनी पत्नी की कोमल और कासी गांड को उसके सूट क ऊपर से hi मसलते हुए उसके होंठों को जोर जोर से ऐसे चूसना सुरु हो जाता है जैसे पूरा कॉमर्स उसके होंठों में hi भरा हो

"Ummmmmmmmmmm…. Ummmmmmmmmmm……."

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वो इतनी बेहरमी से 'सत्तू की बुआ' क होंठों को चूस रहा था की कुछ hi पलों में शीला की सांस उखाड़ना सुरु हो जाती है और पूरा जिस्म कुनमुनाने लगता है, वो भानु की अजगर जैसी पकड़ से छूट जाना चाहती है पर भानु उसे ऐसा करने नहीं देता और उसकी गांड को और बेहरहमी से इतनी बुरी तरह से जकड लेता है की उसकी पाँचों उंगलिया शीला को अपने मार्श में धास्ति हुई सी प्रतीत होती है और एक तीव्र दर्द की लहर पुरे सरीर में भर्ती चली जाती है

शीला मुश्किल से अपने दोनों हाथों को अपने पति क सीने पे रखते हुए जोर से उसे धक्का देती है जिसके चलते उसके होंठों को बेहरहमी से चुस्त हुआ भानु उससे अलग हो पड़ता है और शीला बुरी तरह हफ्ते हुए लम्बी लम्बी साँसे लेने लगती है और फिर थोड़े ग़ुस्से से अपने पति की और देखते हुए कहती है

"आपको हो किया जाता है, जान hi ले लेते है मेरी.. आपकी पत्नी हु, आप कुछ भी प्रेम से नहीं कर सकते किया

..आप तोह ऐसे टूट पड़ते है जैसे, जैसे में कोई सूरजमुखी गाओं की राण…"

शीला अपने आगे क शब्दों को मुख से बहार आने से खुद hi रोक लेती है, इधर उसके होंठों को बेहरमी से चूसने क कारन भानु क नाग महाराज क फैन में उठान आना सुरु hi हुआ था की उसक पत्नी ने उसके खड़े लुंड पे लात मारने वाली बात को चरितार्थ कर दिया था..

भानु को उसकी हरकत पे ग़ुस्सा तोह आता है पर वो कुछ बोलता नहीं और अपना काबू बनाये रखे हुए मुस्कुरा क कहता है

"अरे किया करू.. तुम हो hi इतनी खूबसूरत की में हर बार अपने होश खो देता हु.."

शीला को भले hi ऐसी दरिन्दिगी पे ग़ुस्सा आया हो पर अपनी तारीफ सुनकर उसके गाल भी लाल हो पड़ते है, वो मुस्कुरा क कहती है

"आप कभी कुछ भी पियर से क्यों नहीं करते है, हमेशा ऐसा लगता है जैसे बस मेरा जिस्म नोच लेना च रहे हो.."

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शीला की बात सुनकर भानु मन hi मन है पड़ता है पर अपने विचारों को चेहरे पे आने नहीं देता और मन hi मन शीला को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहता है

'किया करू हराम की जनि, तुझे किया मैं तेरे इस घर की हर औरत का जिस्म नोच क उसे रैंड बना दूंगा एक दिन..'

पर भानु अपने विचारों को शब्दों का रूप नहीं देता और मुस्कुरा क कहता है

"अरे बाबा.. गलती हो गयी, ाचा अब कुछ पहनने क लिए ला डौगी.. ककी कपडे तोह सरे वही रखे हुए घर में"

शीला एक पल क लिए सोचती है और फिर भानु को देखते हुए कहती है

"आपको तोह सिर्फ कुंदन भैया क hi कपडे आ पाएंगे, अभी उनकी धोती और कुछ ला देती हु.. बाकि सुबह किसी क साथ जेक आपके कपडे और जरुरी सामान ले आउंगी, स्टेशन तोह यही से जाना होगा न जी..?"

भानु उसकी बात पे सहमति जताते हुए 'है' भर देता है, और जल्दी hi वो कुंदन की धोती और उसी का एक छोटा कमर तक वाला कुरता पेहेन चूका था और अब वही सबके साथ अंदर वाले छप्पर क नीचे बैठा हुआ आग सीख रहा था.. तभी वो महेंद्र वाले कमरे की और देखते हुए कहता है

"मंझली भाभी अभी तक नहीं उठी.. ऐसा किया थक गयी है ?"

भानु की बात पे वही बैठा हुआ सत्यम मन hi मन मुस्कुरा पड़ता है..

वही दूसरी और शीला मन hi मन ये सोच रही थी की किया कभी उसे वैसे प्रेम मिलेगा जैसा वो सोचती है, जिसमें हैवानियत न हो सिर्फ प्रेम हो और दो जिस्म क मिलान का ऐसा संगम हो उसे ख़ुशी दे.. की तभी उसके विचारों में खुई हुई उसकी आँखें सामने की और उठती है जहा सत्तू एकटुक उसे hi देखे जा रहा था

शीला हल्का सा मुस्कुरा क अपनी पलकों और भौवों को उठाते हुए धीरे से मानो इशारे से पूछती है

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'किया हुआ..'

जिससे सत्तू जल्दी से इधर उधर देखने लगता है और बस 'न' में सर हिला देता है, शीला एक बार को उसे देखती है और मन hi मन खुद से कहती है

'ऐसे आज कल किया हो रहा है.. जब देखो शांत सा रहता है,

..लगता है बात करनी पड़ेगी, कही कोई परेशानी वाली बात तोह नहीं"



कंटिन्यू... 👇
 
थोड़ी दिएर बाद..



मालती इस समय तक जाग चुकी थी, और रात क खाना की पूरी जिम्मेदारी उसने अकेले hi उठा राखी थी.. असल बात ये थी की वो सविता की नज़रों का सामना करने से बच रही थी, और कही न कही अपने जवान भतीजे सत्यम से भी ककी जब भी उसकी नज़रें सत्यम से मिलती वो ऐसे मुस्कुराता जैसे मालती को छेद रहा हो

देखते hi देखते hi देखते रात क 8:00 बज चुके थे, इस समय घर क बहार छप्पर नीचे महेंद्र अकेला hi बैठा हुआ था और बीड़ी फुकता हुआ उसकी गर्मी लिए जा रहा था, की तभी पूरी तरह बंद हो चुकी बारिश क बाद अँधेरे को चीरता हुआ उसका मंजला भाई यानि 'कुंदन' वापस लौट आता है.. महेंद्र जैसे hi कुंदन को देखता है उसके चेहरे पे ठीक वैसी hi ख़ुशी नज़र आती है जैसे एक पिता अपने बेटे को देख क महसूस करता है

"कहा था सुबह से.. कुछ खाया पिया की नहीं ?"

महेंद्र क शब्दों ने hi उसके प्रेम और परवाह को एक hi साथ दिखा दिया था, जिसे सुनकर कुंदन भी मुस्कुरा पड़ता है.. वैसे भानु की भांति वो भीगा हुआ नहीं था पर तभी महेंद्र की नज़र उसकी baah(Upper एआरएम) पे पड़ती है जहा एक सफ़ेद कपडा बंधा हुआ था और वो पूरी तरह खून से सना हुआ था जैसे किसी जखम पे बांधने पे होता है, महेंद्र तुरंत hi अपनी जगह से उठ पड़ता है और भीड़ी को एक और फेकते हुए

"अरे ये किया हो गया.. अरे ो सत्तू की माँ.. जरा इधर आना"

कुंदन जल्दी से महेंद्र को रोकते हुए

"अरे.. अरे भौजाई को क्यों बुला रहे है, जरा सी तोह चोट है मैं पूरी तरह ठीक हु"

महेंद्र एक पिता सामान उसे डटे हुए

"पूरी ब्याह और कपडा खून से भरा हुआ है, और कह रहा है सब ठीक है, खींच क एक कान क नीचे लगाऊंगा न की पूरा दिमाग ठिकाने आ जायेगा"

ठीक ऐसी पल सविता भी अपने पति की आवाज़ सुनकर बहार आ चुकी थी, उसी पूरी बात नहीं पता थी न hi उसने कुंदन की खून से सनी हुई ब्याह को देखा था उसे अब कुंदन को पड़ती हुई डाट की सुनाई पड़ती है

"ाजी.. किया करते है, कोई बचा है किया वो जो ऐसे डाट रहे है उसे, एक जवान बचे का बा.. बाप रे तेरे हाथ को किया हुआ ?"

सविता की भी नज़र उसके देवर की खून की सनी ब्याह पे पद चुकी थी इसलिए अब उसे अपने पति की बातों की नहीं अपितु उसके देवर की ब्याह पे बंधे कपडे और उस खून की फ़िक्र हों लगे थी.. कुंदन जल्दी से अपनी भौजाई क कन्धों पे दोनों अपने ताक़तवर हाथ रखते हुए उसे अपने बड़े भाई क पास hi बिठा देता है और खुद महेंद्र को भी बैठने क लिए कहता है

"पहले तोह आप दोनों यहाँ बैठी.. और आप भी बैठो न भैया, जरा सी तोह चोट है आउट इतना शोर शराबा करने लगे

..कहे फ़िक्र करते है, आप दोनों की प्राथना क चलते मुझे किया होगा भला ?"

महेंद्र भी अब थोड़ा शांत हो चूका था, वैसे अब उसने धियान दिया की कुंदन क कपडे भी पूरी तरह मिटटी से साणे हुए थे जैसे मिटटी में कोई कुस्ती हुई हो.. बस अँधेरे और लालटेन की माध्यम रौशनी में वो अभी तक पता नहीं चले थे, महेंद्र अपने भाव क कहने पे सविता क पास hi वही चारपाई पे बैठे हुए आगे कहता है

"पहले ये बता ये सब हुआ कैसे.. ?"

फिर एक पल क लिए रुकता है और दरवाजे की और देखने क बाद धीरे से कहता है

"कही किसी ने.. ?"

कुंदन भी अब सामने वाली चापरे पे बैठ जाता है और जेक दोनों Pati-Patni ने अब ये धियान दिया था की उसके हाथ में एक पुराण सा झोला जैसा भी है.. आराम से बैठने क बाद कुंदन आगे कहता है

"किसी ने कुछ नहीं किया है भैया, वो बस माइड पे चलते हुए पेअर फिसल गया था.. और वही एक पुराण किसी का कुरपा पड़ा हुआ था तोह वही लग गया, बस छोटा सा एक इतिफाक था और कुछ नहीं"

इस बार महेंद्र कुछ कहता नहीं पर अपने छोटे भाई को ऐसे देखता है जैसे कह रहा हो

'तेरा बड़ा भाई हु में..'

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महेंद्र की उन तेज से भरी नज़रों में कुछ बात तोह थी की किसी से न डरने वाला कुंदन भी इधर उधर देखने पे मजबूर हो गया था, जैसे उसमें हिम्मत hi न हो अपने बड़े भाई से नज़रें मिलाने की

महेंद्र, अपनी गहरा रंग की गदराई पत्नी की और देखते हुए

"तुम अंदर से वो मरहल लेके आओ.. और तुरंत सत्तू को भेज क त्यागी जी को बुलवाओ"

पर जैसे hi सविता उठने को होती है, कुंदन उसके घुटने पे हाथ रखते हुए उसे रोक देता है

"इन सब की कोई जरुरत नहीं.. मैं ठीक हु, बस जरा सी चोट."

पर वो आगे कुछ नहीं बोल पता, ककी उसे महेंद्र की उसे hi घूरती हुई नज़रें नज़र आ जाती है और किसी सांड जैसा मर्द ऐसे चुप हो जाता है जैसे एक बचा अपने पिता की ग़ुस्से वाली नज़रों को देख क शांत हो जाता है, सविता भी बिना विलम्ब क जल्दी से उठाकर अंदर की और चल पड़ती है.. और जैसे hi सविता उन दोनों की नज़रों से ओझल होती है महेंद्र अपनी बीड़ी क बंडल से एक बीड़ी निकलता है और उसे जला क उसकी तीली को छप्पर क बहार उस भीगी भूमि पे फेकता है तोह पानी क अंश क चलते वो जलती हुई तीली एक माध्यम सी ध्वनि करती हुई तुरंत hi भुज जाती है, और फिर वो कुंदन की और देखते हुए धीरे से एक एक सब्द पे जोर देते हुए कहता है

"कितने लोग थे.. ?"

कुंदन सकपका सा जाता है, वो अपने बड़े भाई की और देखता है पर कुछ बोलता नहीं पर नज़रें झुका लेता है.. जिसपे महेंद्र एक पल क लिए रुकने क बाद आगे कहता है

"किसी को छोरा तोह नहीं.. ?"

इस बार कुंदन अपने हाथ की मुठी को ऐसे भींच लेता है जैसे किसी की गर्दन मरोड़ रहा हो

"एक को भी नहीं.."

महेंद्र अपने बैठने की इस्तिथि को बदलते हुए

"यानि खतरा अभी टाला नहीं है ?"

कुंदन एक पल क लिए अपने बड़े भाई की और देखता है और फिर धीरे से कहता है

"अभी क लिए तोह शांत कर दिया है, पर लगता नहीं वो असली खतरा था.. असली खतरा तोह सायद अब सामने आएगा"

महेंद्र का अनुभव आगे क सवाल करने की जरुरत तक नहीं समझता ककी उसे पता था की उसके भाई क कहने का किया मतलब है.. वो एक लम्बा खास भरते हुए उसके धुवे को हवा में चोरते हुए कहता है

"आने दो निपट लेंगे.."

अगले कुछ पल दोनों भाई कुछ बात नहीं करते और फिर सविता क साथ साथ सभी लोग जैसे भागते हुए बहार आते है, जिनमें सबसे ज्यादा हैरानी भानु को थी.. वो कुंदन को देखते हुए मन hi मन कहता है

'बहनचोद ये किसकी हरकत है.. ?'

सभी लोग कुंदन की ब्याह और उसके खून को देख क बहुत hi परेशां होते है पर महेंद्र सभी को समझा क शांत करवा देता है, वैसे उसने भी कुंदन की वही कहानी दोहराई थी जो उसने माइड पे चलते हुए गिरने की बात बताई थी.. जहा जल्दी hi सत्तू त्यागी को लेके आ जाता और जब वो उस सफ़ेद बंधे हुए कपडे को हटाता है तोह उसे कुंदन की मरदाना ब्याह पे एक गहरा घाव नज़र आता है वो कुछ कहने hi वाला थे की कुंदन ने उसे कुछ भी बोलने से साफ़ मन कर दिया..

त्यागी ने जल्दी hi मरहम और कुछ जड़ी बूटी देने क बाद साफ़ पट्टी बांध दी और फिर सबकी नज़रों से बचते हुए धीरे से कुंदन से कहता है

"चाकू का घाव ज्यादा hi गहरा है.."

कुंदन बस 'है' में अपना सर हिला देता है



कंटिन्यू... 👇
 
करीब 1 जानते बाद..



इस समय तक सभी लोग खाना खा चुके थे और खुद त्यागी ने भी वही सबके साथ hi खाना खाया था, जहा कुंदन ने पहला निवाला रखते hi कहा था

"किया स्वाद है खाने में.. वाह"

जिसे सुनकर हर कोई मुस्कुरा पड़ा था, खासकरके मालती का चेहरा ऐसे खिल उठा था जैसे कोई कुवारी कन्या हो

जिसपे शीला मज़ाक भी करती है

"है.. है भाभी क हाथों क बने खाने की तारीफ तोह करेंगे hi, आखिर भाभी को पसंद भी तोह आपने hi किया था"

शीला की बात पे सभी लोग है पड़ते है और मालती का चेहरा ऐसे लाल हो उठता है जैसे गुलाल मॉल दिया गया हो उसके खूबसूरत गालों पे

ऐसी खाने क बीच सोनू ने अपनी प्लेट में सविता द्वारा राखी गयी गाजर कहते हुए अजीब सा मुंह बना क रखा था

"बड़ी माँ ये अजीब सी क्यों लग रही है ?"

जिसपे सविता मुस्कुरा पड़ी थी

"क्यों तुझे अछि नहीं लगी किया.. ?"

पर सोनू क कुछ कहने से पहले hi उसका बाप वीरू उसकी प्लेट से एक गाजर का टुकड़ा उठा क मुंह में रखते हुए

"हम्म.. हलकी सी खरी है नमक जैसे, पर है बड़ी स्वादिष्ट"

सोनू की तरह अपनी प्लेट में राखी गाजर को कहते हुए कुंदन भी अजीब सा मुंह बनता है

"बड़की भौजाई मुझे लगता है ये गाजर ख़राब हो गयी है.. अजीब सी बदबू आ रही है"

कुंदन क हाथ में वो बची हुई आधी झूटी गाजर का टुकड़ा शीला ले लेती है और उसे कहते हुए

"ठीक तोह है भैया, मुझे तोह स्वादिष्ट लग रही है"

शीला को ऐसे कुंदन की झूठी गाजर कहते हुए देख क हर्षिता क अधरों पे मुस्कान बिखर गयी थी.. जैसे उसे किसी बात का ज्ञान हो रहा हो

पर इन सभी की बातें सुनते हुए सिर्फ सविता hi थी जो मुस्कुरा रही थी, और मोनू उसे देखते हुए मानो इशारे से पूछ रहा था

'कही आपने वो गाजर... ?'

पर सविता सिर्फ मुस्कुरा क आँख मार देती है

तभी महेंद्र भी आखिरी बचे हुए गाजर क टुकड़े को कहते हुए

"है कुंदन सायद सही कह रहा है.. गाजर से अजीब सी बदबू आ रही है"

जिसपे सविता मुंह बनाते हुए

"है है.. आपको मेरी हर चीज़ में कमी hi निकालनी है"

सविता क बात कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था की महेंद्र खुद भी है पड़ता है और उसके साथ साथ वह उपस्तिथ सभी लोग भी

अब आप तय करो, वो गाजर किसने खायी❓

करीब 10 मं बाद...

मालती रसोईघर में अकेले hi बर्तन धूल रही थी, ऐसा नहीं था की किसी ने मदद क लिए कहा नहीं पर उसने hi मन कर दिया था ये कहते हुए

"आज का पूरा दिन मंदिर और फिर वह से आके सोने में hi चला गया.. इसलिए अब ये मुझे hi करने दो"

मालती को चोर क इस समय सभी लोग घर क बहार छप्पर क नीचे बैठे हुए थे, जहा वही लोहे का तसला जो पहले अंदर वाले छप्पर क नीचे था और उसमें आग जल रही थी वो अब यहाँ बहार आ चूका था और सभी लोगों ने चारपाई को कुछ ऐसे सजा लिया था की आग क चारो और घेरा सा बना क बैठे हुए.. ऐसी बीच त्यागी जी अपनी गंभीरता हो बनाये हुए कहते है

"मोनू बीटा जरा एक गिलास पानी ले आओगे.. ?"

त्यागी जी की बात सुनते hi जैसे मोनू उठने को होता है, पर उससे पहले hi शीला जो पीछे की और बैठी थी वो बोल पड़ती है

"अरे में ले आती हु.. तू बैठ मोनू"

त्यागी जी- (मुस्कुरा क) तुम hi ले आओ, वैसे मेरा मन तोह आज मोनू क हाथों से जल लेने का था

महेंद्र समझ जाता है की बात कुछ और hi है, इसलिए वो मोनू को hi कहता है पानी लेन क लिए और उसके जाते hi.. त्यागी जी की और देखते हुए बोल पड़ता है

"अब बताइए.. किया बता है ?"

त्यागी जी पूरी गंभीरता का आवरण ओढ़ते हुए

"जैसे hi पहले hi बता चूका हु की मोनू को पिछले कुछ दिनों का कुछ भी याद नहीं है.. और सायद याद आये भी न, इसलिए में चाहता हु की उसे वो सब याद दिलवाने की कोशिश न की जाये ककी ऐसा होने पे कही उसके दिमाग पे ज्यादा जोर पड़े वो और.."

वीरू इस बार तुरंत hi बोल पड़ता है

"नहीं नहीं.. उसे कुछ भी याद करने की जरुरत नहीं है, वो ठीक है हमारे लिए बस यही महत्वपूर्ण है"

वीरू की बात पे कुंदन और महेंद्र भी पूरी तरह सहमत थे, पर भानु तोह जैसे रहत की सांस सी लेता है, ककी उसके लिए मोनू की याददाश्त ऐसी थी जैसे उसके सर पे हर पल लटकती एक तलवार

त्यागी आगे कहता है..

"मोनू अभी शारीरिक रूप से बहुत कमजोर है पर इसका ये मतलब नहीं की उसे शारीरिक gati-vidhi नहीं करनी चाहिए, बल्कि वो जितना ज्यादा शारीरिक क्रिया करेगा उसके लिए वो ाचा hi है.. आसान भासा में ये समझो की उसे ज्यादा से ज्यादा पसीना बहाने की जरुरत है"

त्यागी की ये बात पूरी तरह सभी को समझ तोह नहीं आती पर हर कोई उनकी बात पे सहमति में सर हिला देता है, पर इन सभी में सविता hi ऐसी थी जो इस बात को सुनकर मुस्कुरा रही थी

⭐ नोट- त्यागी क द्वारा और बातों को अचे से समझने क लिए आप


Part #02, अपडेट 16, सन #01

पद सकते है

थोड़ी hi दिएर में त्यागी भी सबसे अलविदा लेकर वह से चलने को होता है तोह भानु बोल पड़ता है

"मैं त्यागी जी को चोर अत हु.. इतने रात को अकेले पैदल कहा जायेंगे.."

जल्दी hi दोनों उसी पुराने राजवैद्य क घर क सामने पहुंच चुके थे, जहा अब झींगुर रहता था और अभी क लिए त्यागी का भी ठिकाना था..

त्यागी मोटरसाइकिल से उतारते हुए

"कहो किया बात केहनी है.. ?"

जिस पल भानु ने उसे यहाँ लाने की बात करि थी उसी पल त्यागी समझ गया था की कुछ बात तोह है

भानु अपनी मोटरसाइकिल पे बैठे हुए hi

"मोनू की याददाश्त.."

त्यागी उसकी बात बीच में hi काट देता है

"भरोषा रखो.. जब तक में नहीं चाहूंगा उसे कुछ नहीं याद आएगा"

सरल भासा में त्यागी ने भानु को ये कहा था की अब तुम्हारी जान मेरी मुठी में है, वैसे ग़ुस्सा तोह भानु को भी अत है पर वो शांत रहता है.. और इस बार बोलने का कार्य त्यागी hi करता है

"तोह आगे का किया सोचा है.. ?"

भानु एक पल शांत रहने क बाद.. पर उसके शांत होने का ये मतलब नहीं था की उसके अंदर तूफान न हो

"मालती क परिवार में अब रोने का समय आ चूका है.. हमारे दिल्ली जाने क बाद hi उसके घर में कफ़न की खरीदारी सुरु हो जाएगी"

त्यागी एक पल शांत रहने क बाद आगे बोलता है

"जल्दबाजी तोह नहीं कर रहे.. वैसे भी मैं चाहता हु की उसके घर की एक एक औरत को वही झेलना पड़े जो मेरी 'बेला' ने झेला"

भानु इस बार मुस्कुरा पड़ता है

"जो चाहते हो वो सब भी होगा.. वैसे भी पूरा परिवार एक साथ ख़तम नहीं होगा, ये कुछ ऐसा होगा जैसे एक बड़ा जख्म दिया जाये और फिर उसके पूरी तरह ठीक होने से पहले hi फिर से उसी पे और चोट.."

त्यागी जैसे उसकी बात का सार अचे से समझ गया हो, वो एक पल रुकने क बाद आगे कहता है

"वैसे निशाना कोण है.."

भानु इस बार मुस्कुरा पड़ता है और अपने पेअर की जोरदार कीच से अपनी मोटरसाइकिल को सुरु करते हुए धीरे से एक एक सब्द पे बल डालते हुए कहता है

"सुरुवात घर क मुखिया से hi होगी.."

त्यागी का चेहरा ऐसा खिल उठता है जैसे उसके जख्मो पे मरहल लगने का समय आ गया हो..

जल्दी hi भानु अपनी मोटरसाइकिल को भागते हे आगे बढ़ते हुए सोच रहा था

"अगर मोनू क नाम की तलवार सर पे न होती तोह अभी ये खेल और लम्बा चलता.. वैसे खेल तोह अभी भी लम्बा hi चलेगा पर अब इस खेल में पहला पास फेकने का समय आ चूका है"

गाड़ी को महेंद्र क घर की दिशा में आगे बढ़ाते हुए वो उसके अधरों से इस बार वो सब्द निकलते है

"बस नागराज और सजनी अपना काम अचे से करे, फिर जान तोह जाएगी hi.. साथ hi साथ इज्जत भी"

भानु क मुख से इस बार ऐसे khil-khilahat फुट पड़ती है जो उसकी मोटरसाइकिल की ध्वनि से भी ज्यादा तेज और डरावनी थी.. पर कही न कही भानु इस बात से भी अंबिग था की खेल में पहले कदम उससे पहले hi 'कुंदन' रख चूका है



कंटिन्यू... 👇
 
इधर सविता, त्यागी जी क जाने क बाद वो गिलास रसोईघर में खुद hi जान क रखने जाती है जहा मालती क पास जब कड़ी होती है उसे पानी की छींटों क चलते मालती का ब्लाउज कुछ आगे से भीगा हुआ प्रतीत होता है और वो मुस्कुरा क कहती है



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"आज कल तेरे कपडे बड़े भीग रहे है.. पहले भी मोनू क कमरे से बहार आते हुए भेज हुए थे और आज फिर ऐसे.."

बेचारी मालती की तोह जैसे सांस hi अटक जाती है और उसे याद अत है की कैसे मोनू ने उसकी बड़ी बड़ी गदराई सख्त चूचियों पे अपना वीर्य निकला था और फिर उसने जब ऐसे hi अपना ब्लाउज पेहेन लिया था तोह सविता को उसके ब्लाउज से वो धब्बे नज़र आ गए थे.. मालती जल्दी से अपना थूक निगलते हुए पूरी तरह कैंप उठी थी, वैसे वो अब भी अपनी बड़की भावजी से नज़रें नहीं मिला प् रही थी

"कहा.. कहा.. बड़की भावजी वो.. तोह तब.. वो"

सविता मुस्कुराते हुए

"मैं तोह कहती हु तोह पहना hi मत कर, बिना कपड़ों की ज्यादा अछि लगती है"

और मुस्कुरा क उसे आँख मरते हुए बहार निकल जाती है इधर बेचारी हमारी मालती पानी पानी हो चुकी थी

⭐
नोट- मालती और मोनू क इस काण्ड को पड़ने क लिए आप

Part #02, अपडेट 16, सन #02

को पद सकते है





रात क करीब 10 बजे..



सोनू और सत्यम क लिए आज अंदर वाले छप्पर क नीचे सोने का प्रबंध किया गया था, जहा सोनू तोह सोने क लिए चले भी गए थे, और मोनू को उसकी जड़ी बूटी का कड़ा देके सोने क लिए बोल दिया गया था यानि वो भी इस समय वापस उसी कमरे में पहुंच चूका था.. असल में महेंद्र ने hi कुंदन क साथ जो हुआ उसके चलते थोड़ी ज्यादा सावधानी बरतते हुए ये तय किया था की कोई भी बचा यहाँ बहार खुले में नहीं सोयेगा.. यानि इस समय बहार छप्पर क नीचे Mahendra-Savita, Maalti-Kundan, Veeru-Harshita, Sheela-Bhanu, सत्तू और सत्यम थे

महेंद्र अब भी अपनी बीड़ी को सुलगते हुए कुंदन की और देखते हुए उससे कहता है

"कुंदन, वो इलाज क लिए पैसे.. ?"

महेंद्र, मोनू क इलाज क लिए जरुरी पैसों की बात चैरता है जिसपे कुंदन तुरंत hi अब भी अपने पास रखे उस पुराण से झोले पे हाथ रखते हुए कहता है

"है सब इंतिज़ाम हो गया है.. आप फ़िक्र मत करिये"

भानु.. कुंदन की बात सुनकर कुछ हैरान सा होते हुए सोचता है

'बहनचोद इसके पास इतने पैसे आये कहा से.. सिर्फ एक चक्की hi तोह चलता है..

..मादरचोद ने पैसे का इंतिज़ाम इतनी जल्दी ऐसे कर लिया.. जैसे इसके पास कोई खजाना भरा हो'

वैसे अनजाने में hi सही पर भानु सही दिशा में सोच रहा था

महेंद्र अपने छोटे भाई की बात सुनते हुए आगे कहता है

"जैसे की सभी जरुरी टेस्ट होने में 15-20 दिन का समय लगने वाला है, तोह इस बीच अगर और पैसों की जुर्रत पड़े तोह तुम तुरंत मुझे बता देना.. और जब तक सभी टेस्ट नहीं हो जाते गाओं मत लौटना, समझे"

महेंद्र ने मानो आदेश सा दिया हो, और फिर आगे पूछता है

"वो ट्रैन की टिकट्स.. ?"

कुंदन वापस से उसी पुराने झोले की और इशारा करते हुए

"जैसा आपने कहा था सुबह की hi ट्रैन ली है, पर ठण्ड क चलते 1 जानता दिएर से ट्रैन मिलेगी

..बाकि टिकट आज दिन में hi जेक ले आया था.."

पर कुंदन एक बार फिर से वही अपनी बात आज फिर दोहराता है

"मुझसे बस इतना hi है की मेरे चलते भानु क खेतों का नुकसान न हो.."

पर इस बार बोलने का कार्य शीला करती है

"कैसी बात करते है भैया.. खेतों का किया है हम सब मिलकर संभल लेंगे"

पर कुंदन फिर से अपनी बात आगे कहता है

"बात वो नहीं है.. असल में हम सभी जानते है की भानु क खेत कितनी दूर है, वह से आना जाना इतना आसान नहीं होता.."

भानु- (कुंडा की बात काटे हुए) अरे तोह मेरी मोटोकैक्ले यही रहेंगी न..

मोटरसाइकिल की बात सुनते hi, सत्यम टपक से बोल पड़ता है

"है.. है भानु फूफा क खेतों का काम मैं देख लिया करूँगा.."

पर सत्यम क अरमानो को तोड़ने का कार्य खुद उसका बाप महेंद्र hi करता है

"नहीं नहीं.. वो खेत ज्यादा देख भाल मांगते है, वह की मिटटी बाकि खेतों जैसी नहीं है"

फिर कुछ सोचने क बाद आगे कहता है

"सत्तू की जिम्मेदारी होगी भानु क खेतों की.."

सत्यम तोह जैसे अपने बाप की बात सुनकर अंदर तक सुलग उठता है और मन hi मन जहर को बढ़ाते हुए कहता है

"बेहेकनोड.. बाप बनता है साला, ाचा खासा मोटरसाइकिल मिलती और वो खेत भी इतनी दूर थे की वह जेक पूरा दिन कुछ भी नहीं करता तोह भी कोई जल्दी देखने न आ पता.."

इस बार मालती पहली बार धीरे से बोलती है, क्युकी उसे दर था की कही कुंदन को उसका बोलना ाचा न लगे

"वो भैया भाभी से.."

कुंदन एक बार क लिए उसे घूम क देखता है जो उसके पीछे hi शीला क साथ बैठी हुई थी और फिर शांति से अपनी बात कहता है

"है.. मनोहर भैया से मेरी बात हो चुकी है, बल्कि वो तोह उल्टा मुझे डाटने लगे थे की इतना सब हो गया हमने किसी को बताया नहीं.."

मालती एक बार फिर से कहती है

"है.. वो मीनू भी ग़ुस्सा कर रही थी मुझपे की मेरे छोटे भाई क साथ इतना सब हो गया पर मैंने कुछ बताया नहीं.."

कुंदन इस बार थोड़ा ग़ुस्सा सा हो जाता है

"अरे उसे क्यों बताया.. बेचारी वह इतनी दूर अपने पति क साथ विदेश गयी है और तुम.."

पर कुंदन की बात महेंद्र काट देता है

"मीनू को मैंने hi बताया था.. आखिर वो मोनू की बड़ी बहिन है, और उसे भी सब जानने का पूरा हक़ है

..बाकि मीनू को मैंने समझा दिया है, की यहाँ सब ठीक है और हमे अभी इससे ज्यादा किसी को कुछ बताना भी नहीं है"

महेंद्र की बात पे सभी लोग एक साथ हामी भरते है

आगे बोलने का काम सविता करती है, जो अपने सवाल का साथ तैयारी थी

"सत्तू अकेला भानु क इतने बड़े खेतों को कैसे संभालेगा.. ?"

इस सवाल का हल तुरंत hi हर्षिता दे देती है

"अरे उसके साथ कभी में चली जाया करुँगी.. तोह कभी शीला"

फिर शीला की और देखते हुए

"क्यों ठीक है न ?"

शीला को भला इसमें किया परेशानी हो सकती थी, इसलिए वो भी हामी में सर हिला देती है.. पर उसे किया पता था की हर्षिता क मन में किया चल रहा है

तभी भानु अपनी पत्नी की और देखते हुए बोल पड़ता है

"वैसे शीला वह खेत क कमरे पे खाने और दूसरी जरुरी चीज़े देख लेना, जो जरुरी हो वो रख लेना

... तुम तोह जानती हो की वो खेत इतनी दूर है की कभी कभी रात को वही रुकता तक पद जाता है"

शीला अपने पति की बात से पूरी तरह सहमत होते हुए 'है' में सर हिला देती है

महेंद्र एक बार फिर से आगे बोलता है

"बाकि वीरू क खेतों का काम, वीरू और सविता देख लेगी.. और समय समय पे में भी आता रहूँगा"

अगले सब्द वीरू क hi होते है

"बाकि भैया क खेत सत्यम और मुझे या जिसे भी समय मिले तोह वह जेक मदद करता रहेगा उसकी.."

तभी सविता मुस्कुराते हुए धीरे से मालती की और मुद क उसकी आँखों में देखते हुए कहती hi

"अरे अपनी मालती है न.. वो सत्यम क साथ चली जाया करेगी खेत पे"

मालती की तोह जैसे सांस hi अटक जाती है पर उसके पास 'है' में सर हिलने क अलावा और कोई उपाय भी कहा था

महेंद्र कुछ पल सबकी बात सुनकर शांत रहने क बाद आगे कहता है

"रही चक्की की बात वो वह मेरे साथ सोनू रहेगा.. बाकि कुछ ऐसा करेंगे क किसी एक पे बोज न रहे, जैसे जिसकी जहा जरुरत होगी वो अपनी जगह बदल लिया करेगा"

महेंद्र क इस अंतिम निर्णय से सभी ज्यादा hi खुस होते है, ककी ऐसे में किसी एक को एक जगह बांध क नहीं रहना होगा

तभी महेंद्र अपनी पत्नी 'सविता' की और देखते हुए

"अरे सबके सोने का प्रबंध कर लिया की नहीं.. ?"

सविता भी मुस्कुरा क कहती है

"है बाबा.. सब हो गया है, सोनू और सत्यम अंदर वाले छप्पर क नीचे सो जायेंगे

...मैं शीला और हर्षिता मेरे वाले कमरे में सोयेंगे.."

सविता की बात पूरी होने से पहले hi महेंद्र बीच में बोल पड़ता है

"और मालती..."

सविता अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहती है

"है बाबा वही बता रही हु.. मालती कह रही है की वो कोठरी में सो जाएगी, मैंने मन तोह किया था पर कह रही है वह उसे कोई दिक्कत नहीं है"

महेंद्र हामी में सर हिलाते हुए खुद hi अब आगे बोलता है

"बाकि मैं, कुंदन, वीरू और भानु यही छप्पर नीचे सो जायेंगे"

अंतिम सब्द हर्षिता पुरे करती है

"और सत्तू क लिए मोनू वाले कमरे में बिस्तर लगा दिया है.."

सविता एक लम्बी जम्हाई सी लेते हुए

"बाकि आज पीछे वाला कमरा भी हर्षिता और शीला ने मिलकर साफ़ कर दिया है, पर अभी वो गीला है.. एक बार सुख जाये तोह हर्षिता और वीरू वह आराम से रह पाएंगे"

फिर हर्षिता की और देखते हुए मुस्कुरा क कहती है

"क्यों ठीक है न.."

हर्षिता ऐसे सबके सामने अपने पति क साथ अकेले कमरे में रहने की बात पे शर्म से लाल पद जाती है

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इसके बाद थोड़ी कुछ और बातें होती है और रात क करीब 10:15 पे



कंटिन्यू... 👇
 
मालती एक बार फिर से वापस रसोईघर में पहुंच चुकी थी, जहा वो पानी गरम कर रही थी ककी महेंद्र सोने से पहले गरम पानी क साथ त्यागी जी का दिया हुआ चूरन लेना पसंद करता था जिससे अगली सुबह उसका पेट ज्यादा hi अचे से साफ़ होता था



इस समय महेंद्र छप्पर क बहार आके कुवे क पास टहल रहा था तभी कुंदन भी उसके समीप पहुंच जाता है, जहा अपने छोटे भाई को देखते hi महेंद्र समझ जाता है की उसके मैं कुछ सवाल है

"किया बात है.. कहो ?"

कुंदन एक बार को छप्पर नीचे बैठे सभी लोगो की और देखता है और फिर धीरे से कहता है

"भैया.. यहाँ अब खतरा पहले से ज्यादा बाद चूका है, ऐसे में किया मुझे जाना चाहिए ?"

कुंदन की बात पे महेंद्र है पड़ता है और पुराणी उसी बात को दोहराता है

"मतलब तुझे लगता है तेरा बड़ा भाई अपने परिवार की रक्षा नहीं कर सकता.. ?"

कुंदन- (जल्दी से) अरे नहीं.. नहीं भैया मेरा वो मतलब नहीं है.. में तोह बस ये कह रहा था आप अकेले कैसे, और चीज़े भी अब थोड़ी जानलेवा होती जा रही है

कुंदन की बात सुनकर महेंद्र मुस्कुराते हुए कहता है

"तू बस मोनू पे धियान दे, यहाँ सब मुझपे चोर दे.. 'मुरली दस क बेटे' इतने कमजोर नहीं की कोई हवा उन्हें हिला भी सके"

कुंदन की चिंता बेबुनियाद नहीं थी, पर वो ये भी जनता था की अभी मोनू को लेके दिल्ली जाना भी जरुरी है.. जो की त्यागी का hi किया धरा था

महेंद्र वापस अपनी जगह लौट जाता है, यानि छप्पर क नीचे और कुंदन थोड़ा और आगे बड़के कुवे की मुंडेर पे बैठते हुए अपना छोटा सा फ़ोन निकल क किसी को फ़ोन मिलता है.. जल्दी hi दूसरी तरह से जवान मिलता है जिसपे कुंदन अपनी बात बोलना सुरु करता है

"मेरे जाने क बाद यहाँ की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है.. तुम्हे बिना सामने आये साये की तरह मेरे परिवार की रक्षा करनी होगी"

दूसरी तरफ से कुछ कहा जातः है, जिसे सुनकर कुंदन आगे कहता है

"और याद रहे कुछ भी हो जाये वो संदूक किसी क हाथ नहीं लग्न चाहिए.. जब तक में लौटू नहीं उसे तुम्हे hi संभालना होगा"

कुंदन वही बैठा हुआ और कुछ बातें करता है जहा उसे फ़ोन पे बात करता हुआ देख क भानु सोचने पे मजबूर होता जा रहा था

'पहले वो चोट.. फिर अब ये फ़ोन पे किस्से बात कर रहा है, कुछ तोह हुआ है जिसका पता लगाना होगा मुझे'

साथ hi कुंदन को फ़ोन पे देख क भानु को भी उस फ़ोन की बात याद आती है जो आज सुबह hi उसके पास एक बार फिर से आयी थी.. और उस फ़ोन पे की गयी बात का एक एक सब्द जैसे उसे याद आने लगती है, जिस बात चीत की सुरुवात हुई थी उन सांडो से

"कहिये ठाकुर साहब"

फ़ोन की स्क्रीन पे वो नाम देखते hi भानु ने तुरंत जवान दिया था, जहा उतारर में वो सब्द उसे सुनाई पड़े थे

"याद है न.. उस विदेशी पार्टी से वो मीटिंग कितनी महत्वपूर्ण है, इसलिए कोई गलती नहीं होनी चाहिए

बस एक बार विदेश से आने वाले लोगों को हमारा माल पसंद आ जाये, फिर हम अपनी इस खेती को सुंदरपुर से बहार दूसरे गाओं तक फैला सकते है.."

भानु 'है' कह देता है.. जिसपे ठाकुर खुद hi आगे कहता चला जाता है

"तुम्हे बस हमारा आदमी.. बल्कि इस धंदे का चेहरा बांके उनसे मिलना होगा, और उनके सामने तुम्हे अपनी बात पक्की करने क लिए जरुरी सामान सुबह तुम तक खुद hi पहुंच जायेगा"

भानु एक पल क लिए रुकता है और फिर धीरे से कहता है

"आप जो भी कहेंगे में उसके लिए तैयार हु.. आपने जो किया है मेरे लिए उसके बदले इतना तोह करना मेरा फ़र्ज़ है"

भानु बात तोह ऐसे करता है जैसे ठाकुर की हर बात सर झुका क मंटा हो पर हक़ीक़त ये थी की उसके पास ठाकुर को मन करने का कोई रास्ता hi नहीं था.. मालती और उसके परिवार से बदला लेने क चक्कर में वो खुद भी फास चूका था

⭐ नोट- भानु और ठाकुर क बीच बातों को और अचे से जानने क लिए आप


Part #02, अपडेट 16, सन #02

को पद सकते है

महेंद्र एक बार फिर से वापस छप्पर नीचे आ चूका था, जहा वो जम्हाई लेते हुए कहता है

"आज तोह इस ठण्ड में नींद अछि आएगी.."

महेंद्र की बात सुनते hi सविता है पड़ती है और अपने पति क मज़े लेते हुए कहती है

"है जैसे.. बाकि दिन तोह आपको नींद आती न हो

..अरे आप तोह ऐसे सोते है की कोई आपके कान क पास भी बजा बजाये तोह आपको पता न चले"

फिर वो सत्यम की और देखते हुए उसे धीरे से आँख मार देती है, जैसे उसे सुबह की वो कामुक घटना फिर से याद दिला रही हो

⭐ वैसे आप इस कामुक घटना को फिर से पड़ना चाहे तोह


अपडेट #17, सन #04

पे जा सकते है

वही अपनी पत्नी की बात सुनकर महेंद्र भी है पड़ता है और अपनी दोनों बाहों को फैलते हुए पुरे गर्व से कहता है

"अरे भाई किशन आदमी हु, अपने खेतों पे पुरे दिल से म्हणत करता हु और फिर सुकून से गहरी नींद का मज़ा लेता हु

... मुझे उन सेहर वालों जैसे नींद क लिए दवा की जरुरत थोड़ी है, हमे तोह खेतों से आती ठंडी हवा hi सुला देती है"

अपने पिता की बात सुनते हुए सत्यम उन्हें ऐसे देखता है जैसे उन्हें खा hi जायेगा और मन hi अपनी बाढ़स निकलते हुए कहता है

'माँ क लोडे तुझे सेहर क मज़े का किया पता, एक जैसी चीज़ तोह जनता भी नहीं होगा ये दिहाती

...तू तोह एक दिन उन्ही खेत की गन्दी मिटटी में साद क मरेगा, पर मैं जरूर यहाँ से निकल क एक न एक दिन सेहर क सुकून में ज़िन्दगी बिताऊंगा, वह मस्त मस्त औरते पता क उनके पुरे मज़े लूटूँगा

वैसे भी सुना है वह औरते अपनी चुदाई भी करवाती है और बदले में पैसे भी देती है'

ऐसी बीच कुंदन फ़ोन पे बात पूरी करके वापस छप्पर नीचे लौटता है तोह उसे शीला नहीं नज़र आती.. सविता से पूछने पे पता लगता है की वो मोनू वाले कमरे में गयी है सत्तू का बिस्तर लगाने, इसलिए कुंदन भी अपना वही पुराण सा झोला उठता है और उसी कमरे की और चल पड़ता है.. जहा जब वो पहुँचता है तोह उसे सिर्फ शीला hi नज़र आती है

"ये मोनू कहा गया.."

शीला उस समय अलमारी क पास राखी हुई रज़ाई उठा रही थी की तभी उसके कानो में उसके बड़े भाई की आवाज़ पड़ती है, वो रज़ाई को वही चोर क कुंदन की और मुड़ते हुए

"मोनू पेशाब करने गया है भैया.. कुछ काम था किया ?"

शीला की बात पे कुंदन मुस्कुरा पड़ता है और झोले से एक प्लास्टिक की पन्नी निकलते हुए कहता है

"है काम तोह था.. पर तुझसे hi"

शीला जैसे hi ये सुनती है की उसके भाई को उससे काम है उसका rom-rom ख़ुशी से झूम उठता है, वैसे भी शीला अपने बड़े भाई 'कुंदन' को कैसे देखती है ये आप जानते hi है

फिर कुंदन वो प्लास्टिक का पैकेट शीला की और बढ़ाते हुए

"ये 2 साड़ी है, वो जब पिछली बार दिल्ली गया था तब तेरे लिए ली थी.. पर फिर चीज़े ऐसी हो गयी की कभी समय hi नहीं मिला की तुझे दे सकू, वैसे भी उस दिन सारा सामान वही नाव पे hi रह गया था

...जो बाद में गाओं क hi एक अपने आदमी ने लेक मुझे दिए थे, पर तुझे कभी देने का समय नहीं मिला"

शीला जैसे hi ये सुनती है की उसके भाई ने उसके लिए साड़ी ली है वो ख़ुशी से झूम उठती है, वो जल्दी से पैकेट लेते हुए उसे देखने hi वाली थी की तभी बहार से हर्षिता की आवाज़ आती है

"अरे शीला.. जरा यहाँ आना तोह"

शीला का बुरा सा मुंह बन जाता है, ककी उसे हमेशा से कुंदन क पास रहना पसंद था और आज खुद सामने से कुंदन उस तक आया था और हर्षिता बीच में टांग अडानी लगी

"ये चुटकी भाभी भी न..."

कुंदन भी अपनी छोटी बहिन की ख़ुशी और फिर उसका मुंह बनते हुए देख क है पड़ता है, और हस्ते हुए कहता है

"अरे बाबा.. आराम से देख लेना तेरे लिए hi तोह लाया हु, इस बार भी ले आऊंगा खुस"

शीला इतनी खुस होती है की उसका मन करता है वो जोर से अपने भाई को गले से लगा ले.. पर अपनी मर्यादा की रेखा वो पार नहीं कर पाती

"ाचा वो.. मालती कहा है ?"

कुंदन क सवाल पे शीला जैसे वापस धरा पे लौटती है

"भाभी तोह तबसे रसोईघर में hi है.."

मुस्कुरा क कहता है

"चल तू आराम से बाद में देख लेना और मुझे बताना साड़ी कैसी लगी"

कुंदन ये कहते हुए वह से निकल क रसोईघर की और बाद चलता है, और एक बार फिर से हर्षिता की आवाज़ आने क कारन शीला भी वो साड़ी वाला पैकेट बिना देखे hi वही की अलमारी में रख देती है

⭐ वैसे इस पैकेट में साड़ी है या किया.. ये आपको सायद याद hi होगा, और अगर नहीं याद है तोह आप - Part #01, अपडेट #47 (पेज 385) को जरूर पड़ना

कुंदन शीला क पास से होक सीधा रसोईघर में पहुँचता है जहा मालती सरे काम निपटा क रसोईघर की साफ़ सफाई में लगी हुई थी, एक पल क लिए कुंदन भी उसकी खूबसूरती में मानो खोने सा लगता है पर तभी उसके कानो में प्रेमलता क सब्द जैसे गूंजने सुरु हो जाते है और वो खुद को संभल लेता है.. और वो उसी झोले से एक डिब्बा निकलते हुए मालती को पीछे से आवाज़ देता है

"सुनो.. जरा"

मालती जैसे hi ये आवाज़ सुनती है मानो जैसे उसे यकीन hi नहीं होता, ककी पिछले लगभग 1.5 साल से उससे कटा रहने वाला कुंदन यानि उसका पति आज खुद उसे बुला रहा था.. मालती जल्दी से उसकी और घूमती है और उसके हाथ में मोबाइल का डिब्बा देखते हुए सवालिया नज़रों से मानो पूछती है

'ये किया है ?'

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कुंदन वो फ़ोन का डिब्बा उसकी और बढ़ाते हुए

"ये फ़ोन मैंने मोनू क लिए ख़रीदा था, वो स्मार्टफोन कहते है ऐसे.. तुम तोह पड़ी लिखी हो तोह चला hi लोगी"

मालती भी अपना हाथ आगे बड़ा क डिब्बा थाम लेती है और कुंदन आगे कहता है

"मैं जनता हु की मोनू को लेके तुम चिंतित रहोगी, इसलिए इसमें नया सिम भी डलवा दिया है.. ताकि जब चाहे उससे वो किया कहते है, है वीडियो कॉल पे बात कर सकती है इससे"

मालती की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था, ख़ुशी इस बात की नहीं थी की उसे मोबाइल मिल रहा है.. ख़ुशी इस बात की थी की वो मोबाइल उसे उसका पति खुद दे रहा था, पर तभी वो कुछ सोचते हुए कहती है

"पर ये तोह आपने मोनू क लिए लिया था न.. तोह"

कुंदन उसकी बात बीच में hi काट देता है

"है पर अभी.. तुम्हे इसकी ज्यादा जरुरत है, मैं उसे वह दिल्ली में दूसरा दिलवा दूंगा

..उसका पुराण वाला तोह वैसे भी उस मनहूस दिन उस सर्प नदी में भीग क ख़राब हो गया था"

पर इससे पहले hi मालती और कुछ कहती, कुंदन वापस उसी झोले से कुछ पैसे निकल क मालती की और बढ़ाते हुए

"ये पैसे रख लो.. इतने दिन नहीं रहूँगा तोह तुम्हे कुछ जरुरत पद सकती है"

मालती की ख़ुशी हर पल बढ़ती hi जा रही थी, आज इतने समय बाद उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसका पति उसे वापस मिल गया हो.. पर वो पैसे को पकड़ते हुए रुक जाती है और कहती है

"नहीं ये पैसे आप रहने दीजिये.. मैं काम चला लुंगी, इतने करके पहले hi है और ऐसे में.."

कुंदन फिर से उसकी बात काट देता है

"देखो ये पैसे तुम्हारे लिए hi लाया हु.. इसलिए ले लो"

मालती इस बार बिना कुछ कहे वो पैसे ले लेती है, वो कुंदन वापस पलट क जाने को hi होता है की तभी एक पल रुक क वापस मालती की और देखते हुए कहता है

"धियान रखना अपना.. वो जब्बार अब भी न जाने कहा छुपा है"

और फिर कुछ सोचने क बाद वो झोला भी मालती की और बढ़ाते हुए

"ये अपने पास रख लो.. सुबह जब जाऊंगा तोह मुझे दे देना, और वो मोनू और मेरे कपडे.. ?"

मालती झोला थमते हुए

"वो सब मैं कर दूंगी, आप उसकी फ़िक्र मत करिये"

इसके बाद कुंदन बहार निकल जाता है, पर इस पल उसकी ख़ुशी जैसे सातवे आसमान पे थी

वही कुंदन, रसोईघर से निकल क वापस बहार छप्पर की और चल पड़ता है.. उसके मन में एक hi बात चल रही थी

'चलो ये फ़ोन मालती को दे दिया है.. ताकि यहाँ की जानकारी मिलती रहे, और वो प्रेमलता भाभी वाला फ़ोन भी उसे दे दिया है ताकि वो भी यहाँ साये की तरह परिवार पे नज़र रखता रहे और सबकी सुरक्षा करते हुए मुझे हर छोटी जानकारी देता रहे'

*** * ***

ऐसी क साथ ये महत्वपूर्ण सन भी पूरा होता है, अब इस कड़ी में सिर्फ 2 और सीन्स बचे है




वैसे इस पुरे अपडेट में कोई भी कामुकता नहीं थी, पर ये एक जरुरी अपडेट था जो आगे कई चीज़ों क लिए उसकी भूमि बनने का काम करेगा



जल्दी hi अगले दृश्य को लेके आप सभी से मिलता हु

🙏🙏🙏🙏

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नष्ट सन

👉 मालती की चाय

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🆕 अपडेट 👉 (पेज 📃 511-512)

अपडेट #21

Chapter 👉 कामुक वर्षा..

सन 🖼️ #08

कुंदन
 
मुझे भी कोई अछि इन्सेस्ट स्टोरी सुग्गेस्ट करना, ट्रैन 🚂 में पड़ने क लिए कुछ हो जायेगा
 
अपकमिंग उपदटेस ✨

मालती की चाय

मत कर ये गुनाह है..

फिर से नहीं.. आआअह्ह

एन्ड ऑफ़ Chapter 👉 कामुक वर्षा..

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नई 🆕 अपडेट से...



*** भी मुस्कुरा क अपना अंगूठा बहार खींच लेता है और उसे मुंह में रखते हुए उस सूजी हुई छूट का कॉमर्स चखते हुए

"Ummmmmmmmmmmmmmm… स्वादिष्ट……… ummmmmmmmmmmmmm.."


मालती जो अभी अभी दर्द से तड़प उठी थी वो भी **** की ऐसी हरकत पे अंदर तक गंगना सी जाती है जिसका परिणाम ये निकलता है की उसकी योनि क दोनों सूजे हुए होंठ खुद hi हौले हौले खुलने बंद होने लगते है.. जिन्हे देख क ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो सांस ले रहे हो
 
अपकमिंग अपडेट

मालती की चाय




 
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