Adultery सपना या हकीकत [ INCEST + ADULT ] - Page 44 - SexBaba
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Adultery सपना या हकीकत [ INCEST + ADULT ]

नए अध्याय का अपडेट 03 पेज 1184 पर पोस्ट किया गया है
 




उम्ममम होली की थकान से सारा बदन चूर चूर हो रहा है

कोई चाय पिला दो : रज्जो


आप सभी को देर सवेर होली की शुभकामनाएं 🥳
 
💥 अध्याय 02 💥

अपडेट 04

प्रतापपुर

" जी बाउजी तो गोदाम पर होंगे , आज राशन बटना था न " , सुनीता ने अपने नंदोई रंगीलाल को जवाब दिया ।

रंगीलाल : और भाई साहब?

सुनीता थोड़ा सोच कर बोली : वो ... भी खेत की ओर गए होंगे गेहूं में आज पानी लगवाना था ।

रंगीलाल की नजर अपनी सहलज के दूधिया कमर पर थी। रंगीलाल अपने साले के अय्याश मिजाज से भली भांति परिचित था और सुनीता के लिए थोड़ा सा मन में संवेदना का भाव आ ही जाता था ।

कुछ देर तक हाल चाल और घर की बातें कुछ सोनल की बातें होने लगी । पहली बार था जब रंगीलाल इतनी देर तक अपनी सलहज से अकेले में बात कर रहा था । सुनीता के रसीले मोटे होठ और कजरारी आंखों पर जब भी रंगीलाल की नजर जाती वो भीतर से सिहर जाता था ।






सुनीता की चंचल नैनो में गजब का आर्कषण था और ब्लाउज के भरे हुए उसके गोल मटोल मम्मे का उभार देख कर रंगीलाल अपने साले की किस्मत को कोश रहा था ।

रंगीलाल खड़ा होता हुआ : गोदाम किस तरफ है , उधर ही चलता हूं बैठूंगा बाउजी के पास

सुनीता ने फिर पता बताया और रंगीलाल पैदल ही निकल गया घर से ।

सालों बाद वो अपने ससुराल आया था तो ज्यादा लोग उसे जानते नहीं थे । वही लोग उससे परिचित थे जिन्होंने उसे शादी में देखा था ।

खैर गांव का माहौल काफी कुछ बदल गया था । सड़के पक्की हो गई थी मकान अब ज्यादातर पक्के और दो मंजिले के हो गई थी

घूमते टहलते वो गांव के उस तिर पहुंच ही गया जहा उसके ससुर बनवारी का गोदाम था । बड़ी चौड़ी जगह और ट्रक की खड़ी कतार देख कर रंगी को भी एक पल के लिए अपने ससुर की सम्पन्नता पर ताज्जुब हुआ और वो मेन गेट से दाखिल हो गया ।

लोड अनलोड का कार्य तो दिन रात चलता रहता था । 40 से ज्यादा आदमी औरत मजदूरी पर लगे थे । ठाकुरों/जमींदारों जैसा अस्तित्व था बनवारी का उसके गांव में । किसी भी आदमी से ना वो परिचित था और ना ही किसी ने उसे रोका । रंगीलाल थोड़ा अजीब भी महसूस कर रहा था कि कैसे वो इन मजदूरों को अपना परिचय देकर अपने ससुर का पता पूछे । इतने सालों में पहली बार वो यहां आया था । अनाज के बोरियो की छल्लीयो की 15 फीट ऊंची गलियारों से होकर गुरजता घूमता हुआ आखिर वो एक किनारे निकला और उसकी नजर सामने 40 फिट दूर दूसरे किनारे एक कमरे पर गई । तो रंगी को अहसास हुआ कि वो गलत ओर आ गया और वो आगे बढ़ रहा था कि उसकी नजर कमरे के पास खिड़की के बाहर खड़ी दो औरतों पर थी । कपड़े और हुलिए से मजदूर ही दिख रही थी । दोनो आपस में हस कर खिड़की से कमरे में झाक रही थी कि इतने में उसमें से एक ने मुझे आता देखा और दोनों दबे पाव दूसरी ओर निकल गए ।

मै बड़ी उत्सुकता से तेजी से उधर गया और जैसे कमरे के आगे गया तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था और जब मेरी नजर आधी खुली खीड़की पर गई उसके गैप से मैने भीतर झांका तो हिलते हुए परदों की झुरमुट से जो नजारा दिखा दिल खुश हो गया रंगी का

आस पास जायजा लेकर एक बार फिर उसने भीतर झांका , अंदर उसका ससुर अपनी धोती उतारे नंगा लेता था और एक मोटी गदराई महिला उसके लंड को हाथ में लिए खेल रही थी ।






दोनो बड़े आश्वत थे , हल्की फुल्की आवाजे आ रही थी मगर स्पष्ट नहीं और अगले ही पल वो महिला बिस्तर पर आकर अपनी साड़ी पेटीकोट सहित उठाती हुई रंगीलाल के ससुर के लंड पर बैठ गई





रंगीलाल आंखे फाड़ कर रह गया , अंदर वो औरत उछलती रही और बनवारी के चेहरे के भाव बदलते रहे ।

इससे पहले उसे कोई यहां ताक झांक करता हुआ देख ले इसीलिए वो वहा से सरक लिया और इधर उधर टहलते हुए वो गोदाम से बाहर निकल गया और बगल के एक चाय की दुकान पर बैठ गया ।

रंगीलाल ने वहा बैठे हुए कुछ पकोड़े और चाय के ऑर्डर दिए और 10 मिनट बाद उन्हें बनवारी के गोदाम पहुचाने का बोल कर वापस गोदाम की ओर आ गया ।

इस बार उसने सीधा रास्ता लिया और जल्दी बनवारी के कमरे तक आ गया । कमरे का दरवाजा खुल गया था और वो हरी साड़ी वाली औरत रंगी को बोरियो के रास्ते में ही मिली थी । मगर उसने सर पर पल्लू कर रखा था ।

अंदर बनवारी एक टेबल के पास खड़ा होकर पानी भर रहा था गिलास ने एक छोटे प्याऊ से जिसमें मुश्किल से 5 लीटर पानी आता होगा

रंगी : प्रणाम बाउजी

बनवारी घूंट भर पानी गले तक उतार ही पाया था कि उसने पलट कर रंगी को देखा और पानी हलक में अटक ही गया थोड़ा रुक कर : अरे जमाई बाबू आप , नमस्ते आइए आइए .. आप अचानक , फोन भी नहीं किए ।

रंगी लाल बिस्तर के पास एक कुर्सी पर बैठता हुआ : जी थोड़ा फुरसत हुआ था तो सोचा मिल आऊ आपसे

बनवारी मुस्कुरा कर : अरे बहुत अच्छा किया और बताओ घर पर कैसे है , छोटी , सोनल बिटिया और मेरे दोनों शेर नाती हाहाहाहाहा

रंगी : सब अच्छे है बाउजी और सोनल भी घूमने गई है अपने पति के साथ

बनवारी : अच्छा है थोड़ा घूम फिर ले अच्छा है । और बताओ कैसे हो आप जमाई बाबू , समान वमान कहा है । भई आए हो 4 5 रोज रुकना पड़ेगा ।

रंगी मुस्कुरा कर : बस अच्छा हु बाउजी और समान तो घर पर रख कर आया हु । अब देखते है कितना दिन रुकना हो पाएगा

बनवारी : हो पाएगा नहीं रुकना ही है

तभी वो चाय वाला पकौड़े चाय लेकर आया : सेठ जी चाय लाया हु

बनवारी : अरे कुछ पकोड़े भी रखा है या खाली चाय

दुकानवाला : जी लाया हु सेठ जी ,

बनवारी ( अपने कुर्ते की जेब से पैसे निकालते हुए : रख दे और बता कितना हिसाब हुआ तेरा ?

दुकान वाला रंगी की ओर इशारा करके : सेठ जी पैसे ही भाईसाहब ने पहले ही दे दिए

बनवारी : दे दिए ? कब ?

रंगीलाल : वो मै आते हुए ऑर्डर बोल कर आया था

बनवारी : अरे इसकी क्या जरूरत थी जमाई बाबू , मै मंगवा देता न

रंगी : छोड़िए बाउजी , आप मंगवाए या मैं एक ही बात है , जाओ भाई तुम हो गया हिसाब ।

चायवाला निकल गया ।

बनवारी : अरे लेकिन ये ठीक नहीं है जमाई बाबू ? आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था ।

रंगीलाल : अरे बाउजी मै भी पहले वहा नहीं गया , पहले आपके पास ही आया था मगर तब आप बिजी थे तो सोचा बाहर टहल लूं। फिर चाय वाली दुकान दिखी तो ऑर्डर बोल दिया

रंगीलाल की बातें सुनते ही बनवारी के चेहरे के भाव बदल गए : मतलब आप इससे पहले आए थे ? कब ?

रंगी मुस्कुरा कर : बस यही कोई 20 मिनट पहले , छोड़िए न बाउजी बस खिड़की बंद रखा करिए और भी लोग ताक झांक करते रहते है ।

बनवारी रंगी को मुस्कुरा देख मुस्कुराने लगा

शिला के घर

" हीही अब बस भी करो भाभी हो गया , तुम भी न " , शिला हस्ती हुई रज्जो को रोकते हुए बोली ।

दोनो आगे बढ़ते हुए बाग की ओर निकल रहे थे कि रज्जो की नजर उस किन्नर पर गई जो तेजी से बाग की झाड़ियां फांदता हुआ अपनी साड़ी समेटता जा रहा था ।

रज्जो ने शिला को उस ओर दिखा कर : हे दीदी उसे देखो कहा जा रहा है ?

शिला की नजर उसपे पड़ते ही उसके चेहरे के रंग में बदलाव होने लगा : छोड़ो न उस लुच्चे को , चलो हमें इधर जाना है ।

रज्जो को लगा शिला जरूर उससे कुछ छिपा रही है । वरना इतना ईर्ष्या भरी प्रतिक्रिया क्यों देती ।

रज्जो : अरे क्या हुआ , चलो न देखते है कहा जा रहा है ।मुझे लग रहा है कि जरूर उसकी कोई माल आई होगी । हीही

रज्जो ने शिला के कंधे से अपना कंधा टकरा कर उसको चिटकाया ।

शिला उसका हाथ झटक कर झल्लाई : नहीं मुझे नहीं देखना , चलो तुम भाभी ।

रज्जो शरारत भरी मुस्कुराहट से उसको निहारती हुई : मै तो देखूंगी हीही, तुम आओ या न आओ

रज्जो अभी उस तरफ बढ़ रही थी कि शिला भन्नाती हुई आई ।

रज्जो उसको चुप कराते हुए धीरे से एक बड़े से आम के पुराने चौड़े पेड़ के पीछे से झांक कर देखा ।

तो वो किन्नर अपनी साड़ी पेटीकोट कमर तक उठाए हुए था और अपना बड़ा सा खीरे जैसे लंबा मोटा लंड हाथ में लेकर मुठिया रहा था

रज्जो की नजर उसपे पड़ते ही उसके बदन में कंपकपी होने लगी : उफ्फ दीदी देखो तो कितना बड़ा है

शिला तुनकती हुई : तो जाओ चूस लो न हूह

रज्जो शिला को चिढ़ता देख हस कर उसे छेड़ते हुए : सच्ची जाऊ क्या ?

शिला उसको आंख दिखाते हुए : पागल हो क्या , उधर देखो कोई आ रहा है ।

वही दूसरी ओर से खेतों की तरफ से एक मजदूर औरत साड़ी पहने हुए माथे पर गमछे को लपेटे झाड़ियों की ओर जा रही थी । और देखते ही देखते उसने अपनी साड़ी उठा कर अपने चूतड़ खोलती हुई नीचे बैठ गई






और उसके गोल मटोल चूतड़ों को देखकर वो किन्नर और सिहर उठा उसके हाथ अपने मोटे मम्मे को ब्लाउज के ऊपर से मिजते हुए लंड हिलाने लगे

रज्जो : ये तो हिला रहा है , मुझे लगा कि ... हीही

शिला : तो और क्या लगा तुम्हे , चलो अब

रज्जो और शिला जल्दी जल्दी वहां से निकल गए और घर की ओर जाने लगे ।

रज्जो : अच्छा सॉरी बाबा, मुझे नहीं पता था तुम बुरा मान जाओगी

शिला : देखो बात बुरा मानने की नहीं है , यहां गांव में हर कोई उसके हरकतों से परिचित है और अगर कोई हमें उसके आस पास देख जाता तो बदनामी का डर होता है और कुछ नहीं । तुम तो कुछ रोज में चली जाओगी मगर हमें तो यही रहना है न ?

रज्जो को शिला की बातें अजीब और बेतर्की लगी क्योंकि शिला जैसी गर्म और चुदासी औरत ऐसी बातें करे वो समझ से परे थी , जरूर कोई बात होगी ये सोच कर फिलहाल के लिए रज्जो ने उसकी बातों पर सहमति दिखाई ।

रज्जो मुस्कुरा कर शिला को तंग करती हुई : सोच रही हूं कल मै घर के लिए निकलू

शिला के कान खड़े हो गए : क्यों ?

रज्जो : देखो दीदी तुम्हारा तो पता नहीं मगर मुझे तो लंड की बहुत तलब हो रही है , आज 4 रोज हो गए है रागिनी के यहां से आए । तुम तो मुझे बहला फुसला कर ले आई मगर यहां तो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मै यहां क्यों हुं

शिला मुस्कुरा कर : अच्छा चलो घर तुम्हारे लिए नया खूंटा निकालती हु वो भी इलेक्ट्रिक वाली हीही

रज्जो अचरज से : इलेक्टिक वाली?

शिला : वही नहीं , एक और बात तुमसे करनी है

रज्जो की उत्सुकता एकदम से बढ़ गई : क्या बताओ न ?

शिला कुछ कहती कि इससे पहले उसके व्हाट्सएप पर एक वॉइस कॉल रिंग होने लगी । शिला ने मोबाइल चेक किया तो देखा उस नम्बर से कई मैसेज भी आए हुए है ।

रज्जो शिला को देखकर : क्या हुआ ?

शिला : अह कुछ नहीं चलो घर चलते है , अरे चलो तो यार


चमनपुरा

कालेज में क्लास खत्म होने की घंटियां बजने लगी थी और सारे स्टूडेंट्स क्लास रूम में हल्ला गुल्ला करते हुए आपस में बातें कर रहे थे । वही क्लास टीचर की टेबल के पास खड़ा हुआ उन्हें किसी को आवाज देता हुआ निहार रहा था ।






कालेज की ड्रेस कोड वाली साड़ी में झांकते अपने टीचर के गुदाज मुलायम नाभि और गोरी कमर को देख अनुज मुस्कुरा रहा था वही टीचर लगातार आवाज दे रही थी भरे हल्ला गुल्ला होते क्लास

टीचर : उफ्फ ये लड़की न , कृतिका ?? लाली !!!!

एकदम से कृतिका ने पलट कर जवाब दिया : हा दीदी !!

और उसके बेंच की लड़कियां खिलखिला कर हसने लगी ।

टीचर ने उसे आंखे दिखाई : इधर आ दीदी की बहन . कबसे बुला रही हूं कान में क्या डाला है ?

कृतिका शर्माते असहज होते हुए टीचर के पास आई : सॉरी मिस , कहिए

टीचर : तुम्हारे साइंस के प्रोजेक्ट पूरे हो गए है न ?

कृतिका ने एक नजर अपने सामने खड़े अनुज की ओर देखा और हा में सर हिला कर : जी मिस

टीचर : लाई हो ?

कृतिका की निगाहे इस वक्त अनुज की गहरी आंखों में अटक गई थी : जी ?

टीचर : मैने कहा , तुम अपना प्रोजेक्ट के नोट्स लाई हो ?

कृतिका : नहीं दीदी , सॉरी मिस वो घर पर है ?

टीचर : अनुज तुम शाम को घर आकर इससे नोट्स ले लेना ओके और पूजा कहा ? पूजा !!!

तभी क्लास से एक दुबली सी लड़की खड़ी होकर बोली : जी मिस ?

टीचर : अरे यार तुम नहीं वो दूसरी पूजा कहा है ? कृतिका तुम्हारी सहेली कहा है ।

कृतिका मुस्कुरा कर : मिस वो भी मेरी सहेली है ?

टीचर ने उसे डांटते हुए : मार खाओगी , कहा है वो ?

तभी पूजा क्लास में आती हुई : जी मिस कहिए

टीचर : ओह आ गई तुम , कल तुम जरा अपने हिंदी के प्रैक्टिकल नोट्स लेकर आना अनुज के लिए

पूजा ने अनुज को देखा और हा में सर हिला दी ।

टीचर : और कुछ समझ न आए तो पूछ लेना ओके अनुज

अनुज अपने बगल में खड़ी हुई टीचर के बदन से आती मादक परफ्यूम की गंध से सराबोर हो गया था , उसे अपनी मिस के गुदाज गोरे बदन की कोमलता उस परफ्यूम की गंध से महसूस हो रही थी ।

अनुज एक दम से हड़बड़ाया : जी ओके मिस

फिर क्लास डिसमिस हुई और सारे लोग घर के लिए निकलने लगे ।

कृतिका और पूजा एक साथ निकल रहे थे और अनुज अकेला आगे जा रहा था ।

कृतिका : हे चल न जल्दी

पूजा : तू न , उसको बोल क्यों नहीं देती कि तू उसे पसंद करती है ।

कृतिका : हा जैसे उसे पता नहीं होगा , मै करती हूं या नहीं तू चल न और सुन तुझसे एक काम भी है

पूजा : क्या ?

कृतिका ने उसके कान में कुछ कहा और पूजा मुस्कुराने लगी ।

पूजा : ठीक है लेकिन इसकी कीमत लगेगी

कृतिका : क्या ? ( कृतिका ने पूजा की शरारती आंखों को देखा ) नहीं नहीं यार तुझे क्या मजा आता है उसमें । ठीक है लेकिन बस आधा घंटा के लिए ? वो भी संडे को और ... मै आऊंगी तेरे घर इस बार याद है तेरे चक्कर में पिछली बार बाल बाल बचे थे हम लोग।

पूजा बस मुस्कुरा कर कृतिका की सारी बातों पर सहमति दिखाई और आगे अनुज की ओर इशारा किया कि देखो वो तो गेट तक चला गया ।

जिसपर कृतिका भन्नाई और तेजी उसे अनुज के पीछे हो गई।

कृतिका : अनुज अनुज , सुनो तो ?

अनुज ने घूम कर कृतिका को अपनी ओर आते देखा

अनुज : हा लाली बोलो ?

कृतिका उदास होकर : यार घर का नाम है मेरे वो

अनुज मुस्कुरा कर : हा लेकिन सब जानते तो है और मुझे ये नाम ज्यादा पसंद है

कृतिका ने शर्मा कर अपने चेहरे के बाल अपने कान में खोंसते हुए : सच में !!

अनुज उसकी अजीब सी हरकत पर मुस्कुरा कर : हा , कितना प्यारा नाम है लाली और तुम शर्माते हुए लाल भी हो जा हो हीही

कृतिका लाल से हस कर : धत्त तुम भी न , अच्छा कब तक आओगे मेरे घर

पूजा : अरे पहले डीजे बाजा बुक करेगा , फिर घोड़ी पर चढ़ेगा तब न आएगा तुम्हारे घर हाहाहाहाहा

कृतिका खीझ कर : पुजल्ली कमिनी चुप कर तू

पूजा की बात पर अनुज भी थोड़ा झेप सा गया और हसने लगा ।

अनुज : उम्मम 7 बजे बाद ही , क्योंकि पापा है नहीं और दुकान पर बैठना पड़ेगा । नहीं तो कल लेते आना ?

कृतिका : क्या ? नहीं नहीं तुम आ कर शाम को नोट्स ले जाना , नहीं तो ये जो कालेज में मिस है न घर जाते ही दादी अम्मा बन जाएगी और फिर मेरी खैर नहीं ।

कृतिका की बात पर अनुज और पूजा हसने लगे ।

फिर अनुज वहा से ईरिक्शा लेकर अपने बाजार वाले दुकान के लिए निकल गया ।

1 बज रहे थे और दुकान पर रागिनी अनुज की राह ही देख रही थी ।

अनुज बहुत थका हुआ दिख रहा था और वो दुकान में घुसता अंदर रंगी के पुराने कमरे चला गया

रागिनी उसको आवाज देकर बुलाती हुई आई और अनुज को बिस्तर पर पड़ा देखकर : अरे यहां क्या कर रहा है , चल बैठ खाना खा ले

अनुज उठ कर भिनभिना हुआ अपने आगे खड़ी मा से लिपट गया : अहा मम्मा

रागिनी की मुलायम कमर को अपने बाहों में कस कर अपने चेहरे को उसके सीने के पास रख कर वो अपनी मां के जिस्म की नरमी पाकर पूरा सिहर उठा उसके पेट में लंड की नसे फड़कने लगी

रागिनी अपने लाडले के प्यार भरे हग से खुश हो गई और उसके सर को सहलाने लगी : क्या हुआ मेरा बच्चा ?

अनुज रागिनी के उठे हुए कूल्हे पर बड़ी मासूमियत से हाथ फिरते हुए बोला: मम्मा मुझे पढ़ाई नहीं करना , कितना सारा लिखना है अभी बक्क

रागिनी मुस्कुरा कर : अरे पढ़ेगा लिखेगा नहीं तो कौन ब्याहेगा तुझे अपनी लड़की उम्मम

अनुज : आप हो न तो मुझे शादी नहीं करनी

रागिनी : अच्छा तो सारी उम्र मुझसे रोटियां बनवायेगा उम्मम

अनुज : अरे भाभी आएंगी न, राज भैया की शादी कर देना मै नहीं करूंगा शादी । उनसे खाना बनवाना

रागिनी हस कर अनुज को अलग करती हुई : पागल कही का , चल खाना खा ले

अनुज ने और कस लिया अपनी मां को

रागिनी को हसी आई : अरे ? छोड़ न

अनुज : उम्हू नहीं छोड़ूंगा

रागिनी : धत्त बदमाश छोड़ मुझे

अनुज अपना मुंह उठा कर अपनी मां को देखता हुआ : नहीं हीही

रागिनी हस्ती हुई: अब मार खायेगा , तेरे पापा नहीं हैं तो बदमाशी करेगा

अनुज : मै डरता थोड़ी हु पापा से

रागिनी : अच्छा ? चल छोड़ भाई मुझे ?

अनुज : आप खिलाओगे न मुझे !!

रागिनी : अच्छा ठीक छोड़ अब

अनुज ने ढील दी और रागिनी हसती हुई उससे अलग होकर अपनी साड़ी सही करने लगी : पागल कही का , देख मेरी साड़ी निकल गई पीछे से

रागिनी थोड़ा अंदर होकर अनुज के आगे अपने सीने से साड़ी का पल्लू हटाया और उसे चौकी पर रख कर अपनी कमर में पीछे की ओर हल्की सी पेटीकोट से बाहर आई साड़ी को खोंसती हुई बराबर करने लगी ।

मगर इस दौरान अनुज की नजर अपनी मां के नंगे गोरे पेट और ब्लाऊज में कसी हुई भारी पपीते जैसी बड़ी बड़ी मोटी चूचियो पर थी । रागिनी बड़बड़ाती हुई अनुज के आगे अपना साड़ी सही कर खाना निकालने लगी और अनुज लंड अकड़ गया था ।

रागिनी : चल आ सही से बैठ

अनुज की हालत अब पतली हो लगी क्योंकि जिस तरह वो अपने पैर आपस में चिपका कर बैठा था उससे उसका खड़ा हुआ लंड छिपा था अब अगर वो कोई भी हरकत करेगा तो जाहिर है उसके लंड की अकड़न उसकी मां की नजर ने जरूर आ जाती

इसीलिए वो उठ कर सीधा बाहर निकलता हुआ : मम्मा हाथ धूल कर आता हु

और वो लपक कर ऊपर चला गया ।


वही राज के बर्तन वाले दुकान में केबिन में चंदू और राज बहस हो रही थी ।

: बहनचोद चूतिया है साले तुझे समझाया था न कि पकड़े मत जाना ( राज ने चंदू को हड़काया)

: अबे क्या बक रहा है लेकिन मै कहा पकड़ा गया हु और कब ( चंदू ने सफाई दी )

राज : अभी वो मालती की मम्मी आई थी और मुझे साफ साफ वार्निंग देकर गई है कि अगर अब आगे से तू बिना किसी काम से घर में या फिर मालती के आस पास गया तो तेरी शिकायत सीधा बड़े ठाकुर से होगी ।

चंदू एकदम से सकपका गया : अबे यार कसम से भाई , मैने ऐसा कुछ नहीं किया । पकड़ी तो खुद गई है उसकी मम्मी और साली फंसा मुझे रही है ।

राज के हाव भाव एकदम से बदल गए: मतलब ?

चंदू : अरे भाई मैने 3 दिन पहले ही बड़े ठाकुर को मालती के मां को उसके कमरे में पीछे से पकड़े हुए देखा था , वो साला बुढ़ा उसका पेट सहला रहा था और कभी कभी पीछे से एड़ी उठा कर अपने लंड को उसकी गाड़ में कोच रहा था ।

चंदू की बात सुनते ही राज को रूबीना की बात याद आई महीनों पहले एक बार रूबीना ने भी इसका जिक्र किया था कि ठकुराइन के बड़े ठाकुर से भी संबंध है मगर तब राज ने उस बात को उतनी तूल नहीं दी थी । मगर आज चंदू ने पूरी तरह से कन्फर्म कर दिया था ।

राज हंसता हुआ : क्या सच में ?

चंदू : हा बे और मै इतना चूतिया थोड़ी हु बे , मालती मेरी जान है उसे यू ही मै बदनाम नहीं करता फिरूँगा । ठकुराइन को डर है कही उसकी हरकत मै किसी से कह न दूं इसीलिए वो मुझे डराना चाहती है । समझा

राज : ओह बहिनचोद ये है ड्रामा , मगर ठकुराइन को पता है न कि तेरा मालती से चक्कर है ?

चंदू : अबे आज क्या कितने महीने से जान रही है वो , उसे कहना होता तो पहले ही कह चुकी होती , साली आवारा अपनी इज्जत बचा रही है ।

राज : अच्छा चल ठीक है लेकिन तू थोड़ा सावधान रहना भाई , देख ऐसे मामलों में बहुत कुछ मै तेरे मदद नहीं कर पाऊंगा समझ रहा है न तू

चंदू : अबे तू टेंशन मत ले और बता आज यहां कैसे ? नाना कहा गए ?

राज : यार पापा तो मामू के यहां गए है घूमने के लिए तो हफ्ते भर यही रहना है ।

चंदू : क्या सच में ?

राज : हा भाई क्यों क्या हुआ ?

चंदू : यार भाई एक काम बोलूं मना तो नहीं करेगा ?

राज : क्या बोल न ? तुझे कभी ना बोला है ?

चंदू : भाई कल मालती को यहां बुला लू? बहुत दिन हो गए उसको पेले ?

राज एकदम से चौक कर : अबे भोसड़ी के पगला गया है क्या ? नहीं भाई मै रिस्क नहीं ले सकता

चंदू : भाई प्लीज

राज : नहीं तो नहीं , देख ठाकुर साहब मेरे पापा के बहुत अच्छे दोस्त है और अगर मेरी गलती से कुछ बात बिगड़ी तो सालों की दोस्ती दुश्मनी में बदल जाएगी और मै ऐसा नहीं करूंगा । तू दूसरी जगह खोज ले ।

अगले आधे घंटे तक बातों में घुमा फिरा कर चंदू राज से मिन्नते करता रहा मगर राज ने सिरे से उसकी बात खारिज करता रहा । कुछ देर बाद चंदू चला गया और तभी राज के मोबाइल पर फोन आने लगा । एक नए नंबर से

राज ने फोन पिक किया

: हैलो राज बेटा , मै मालती की मम्मी बोल रही हूं , तुम्हारे पापा से नम्बर लिया है ।

: जी आंटी कहिए ( राज ने जवाब दिया )

: बेटा वो तुमने चंदू से बात कर ली क्या ? ( ठकुराइन के बात में चिंता साफ झलक रही थी )

: जी नहीं आंटी अभी शाम को करूंगा ( राज ने साफ साफ झूठ बोला )

: अरे नहीं बेटा मत करना , शाम को भी मत करना । ( ठकुराइन एकदम से हड़बड़ा कर बोली )

: क्या हुआ आंटी ( राज ने सवाल किया )

: कुछ नहीं बेटा , प्लीज तुम इस बात को भूल जाओ और कभी उससे इस सब के बारे में मत कहना ।

: मगर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि एकदम से आप ऐसा क्यों कह रही है कि न समझाऊं उसे । अगर उसे रोका नहीं तो उसकी आदतें और बिगड़ जाएंगी न आंटी

: हा बेटा वो तो है लेकिन तुम रहने दो मै खुद उसे समझा बुझा लूंगी ( ठकुराइन के कहा )

: जी ठीक है जैसा आपको सही लगे , तो ये आपका नंबर है क्या ? ( राज ने बात घुमाई )

: हा बेटा मेरा ही है सेव कर लो ( ठकुराइन ने जवाब दिया और फोन कट हो गया )

और अगले कुछ देर तक जबतक कि बबलू काका ने उसको वापस दुकान में नहीं बुला लिया वो ठाकुराइन और चंदू के बारे में सोचता रहा ।


मुरारी - मंजू

दोनो मंजू के घर पर आ गए थे

दरवाजा खोलकर मंजू ने जैसे ही सामान सारा चौकी पर रखा उसकी नजर तह किए हुए कपड़े पर गई

मंजू मुस्कुरा मुरारी को देखते हुए : ये सब आपने किया ?

मुरारी : हा वो सोचा कि थोड़ा काम आसान हो जाएगा तुम्हारा और जल्दी पैकिंग हो जाएगी ।

मंजू मुस्कुरा: थैंक्यू , लेकिन प्लीज ये सब भाभी को मत कहिएगा नहीं तो कहेंगी कि जेठजी से कपड़े फोल्ड करवा रही थी ।

मुरारी : क्या कहा ?

मंजू को जैसे ही समझ आया कि वो क्या बोल गई उसके जीभ दांतों तले आ गई ..: वो मै कह रही थी

मुरारी हस कर : अरे भाई ठीक है समझ गया और मुझे खुशी है कि तुमने इस रिश्ते के लिए पूरी तरह से खुद को तैयार कर किया है । इस बात पर तो ममता को फोन करना बनता है ।

मंजू लजा कर : क्या ? नहीइ, प्लीज न भाई साहब, वो मुझे तंग करेंगी ।

मुरारी : लो अब तो फोन भी उठ गया

फोन स्पीकर पर

मुरारी : कैसी हो अमन की मां

ममता : मै ठीक हूं , लेकिन देख रही हूं आप तो मेरी देवरानी को घर लाने के बजाय सरे बाजार हाथ पकड़ कर घुमा रहे है ।

ममता की बात पर मुरारी हस पड़ा और उसने मंजू को देखा तो वो शर्मा कर मुस्कुराने लगी थी ।

मुरारी : अरे ममता , फोन स्पीकर पर है भई

ममता मजे लेते हुए : स्पीकर पर है तो क्या मै डरती हूं मेरी देवरानी से , सरे बाजार मेरे मर्द के साथ बाहों में बाहें डाले घूम रही हैं। मै तो खुल्लमखुला बोलूंगी ।

मुरारी : अरे दादा तुमको कैसे पता चला ?

ममता : हूह आपको नहीं पता मेरे पास न आपके दिल का रिमोट है , जब भी आपके दिल के कुछ कुछ होता है तो मुझे पता चल जाता है समझे ।

ममता की बात पर मंजू खिलखिला कर हस पड़ी और मुरारी भी झेप कर हसने लगा ।

मुरारी : अरे भाई बस करो अमन की मां , मै तो तुम्हे एक खुशखबरी देने के लिए फोन किया था ।

ममता : अच्छा जी वो क्या ?

मंजू लगातार मुरारी को शर्मा कर ना में सर हिला रही थी और अपने पल्लू को अपने होठों से चबा रही थी ।

मुरारी मुस्कुरा हुआ : अरे भाई आज पहली बार किसी ने मुझे जेठ जी कहा है ? सोचा बता दूं तुम्हे हाहाहाहाहा

मंजू लजा कर हसने लगी।

ममता : अरे वाह सही किया , मेरी देवरानी ने आपको आपकी लिमिट बता दी हाहाहाहाहा अब थोड़ा दूर रहना उससे समझे

ममता की बातों से मुरारी और मंजू दोनों असहज हो रहे थे ।

ममता : हैलो क्या हुआ ?

मुरारी : बोलो सुन रहा हूं

ममता : अच्छा सुनिए सफर लंबा हैं और समान भी होगा ज्यादा तो आप लोग एक गाड़ी बुक कर लीजिए उसे आराम से आ जाएंगे

ममता की बात सुनकर मुरारी ने सहमति दिखाई : हा सही कह रही अमन की मां , मेरे भी दिमाग में ऐसा ही कुछ चल रहा था ।

ममता खिलखिलाती हुई : आपके दिमाग में बस चल रहा था उसको दौड़ाया मैने न हीहीही

मुरारी मंजू को देखकर मुस्कुराते हुए : हा दादा तुम ही तो मेरी आवाज , अब रखें देवी ।

ममता : ठीक है लेकिन कल सुबह जल्दी निकालिएगा

मुरारी : ठीक है , बाय ।

फोन कटा और मुरारी मुस्कुराता हुआ मंजू को देखा : हे भगवान , सही कह रही थी तुम । अमन की मां से कुछ भी नहीं कहने लायक है

मंजू बिना कुछ बोले मुस्कुराती रही और एक ट्रॉली बैग खोलकर उसमें मुरारी के तह किए कपड़े रखने लगी

मंजू : अरे ये सब भी

मंजू का इशारा उसकी साड़ी के नीचे छिपा कर रखी हुई ब्रा पैंटी की ओर था

मुरारी : अह मुझे जो नए लगे उन्हें रखे है बाकी सब वो पोटली में है

मंजू उन ब्रा पैंटी को भी हटा कर उस पोटली में रखने लगी

मुरारी : क्या हुआ ये तो नए दिख रहे थे ?

मंजू एक लाइन में जवाब दिया : साइज छोटे है उनके

फिर चुप रही ।

कुछ देर बाद उसकी पैकिंग होती रही और मुरारी उसे बैठ कर निहारता रहा और बाते करता रहा ।

जारी रहेगी
 
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अपडेट 005


प्रतापपुर

" बाउजी आपका तंबाकू तो जोर पकड़ रहा है " , रंगी अपना लंड सहलाते हुए बोला ।

बनवारी ठहाका लगाते हुए : अरे दमाद बाबू चिंता काहे करते है , दर्द है तो दवा भी है हाहाहाहाहा

रंगी पगडंडी पर चलता हुआ मुस्कुराने लगा

बनवारी उसको चुप देखकर : अरे काहे लजा रहे हो जमाई बाबू , मै छोटकी ( रागिनी ) से कुछ नहीं कहूंगा भाई , कहो जो कहना चाहते हो ।

रंगी मुस्कुरा कर आस पास खेत और अरहर की पैदावार देख रहा था , कुछ दूर दूसरी ओर गन्ने की खेत की फसल खड़ी थी : नहीं वो मै सोच रहा था कि वो जो कमरे में थी वो कौन थी ?

बनवारी ठहाका लगाते हुए : अब तुमसे झूठ क्या बोलना जमाई बाबू , रज्जो की अम्मा के जाने के बाद मै तो अपंग ही हो गया हूं तो लाठी बदलना पड़ता है हाहाहाहाहा

रंगी अपने ससुर की बात पर खिलखिला उठा : आप भी न बाउजी , तो अब तक कितनी लाठियां तोड़ चुके है आप

बनवारी रंगी के व्यंग भरे सवाल पर उसको देख कर मुस्कुरा : अह गिनती कौन करता है , बस किसी को खास नहीं बनाया है नहीं तो वो जज्बाती हो जाती । बाद विवाद बढ़ता सो अलग तो जो भी लाठी हाथ लग जाए उसे भांज लेता हु ।

रंगी : हा ये बात सही कही अपने बाउजी , मोह नहीं बढ़ना चाहिए ऐसे मामलों में नहीं तो दिक्कत हो जाती है ।

बनवारी मुस्कुरा कर : क्यों भई तुम्हारी हथेली में भी कोई लाठी चिपक गई थी क्या , बड़े अनुभवी जान पड़ते हो उम्मम

रंगी ठहाका लगाकर हस दिया : क्या बाउजी आप भी , अरे ... खैर छोड़िए

बनवारी हंसता हुआ : क्या हुआ बोलिए जमाई बाबू , अरे बात तो पूरी कीजिए

रंगी कुछ सोच कर मुस्कुराता हुआ : अह छोड़ो न बाउजी , अच्छा नहीं लगेगा ।

बनवारी : अरे भाई अच्छा बुरा आप क्यों सोचते हो , मेरा काम है वो मै तय करूंगा न और क्या पता वो बात में मुझे रस ही आ जाए । कहिए जमाई बाबू

रंगी हिचक कर : अह बाउजी क्या कहू, जिसकी रागिनी जैसी बीवी हो उसको दूसरी लाठी नहीं पकड़नी पड़ती ।

बनवारी ने भी रंगी के बात पर गला खराश कर चुप हो गया ।

कुछ दूर वो शांत ही थे और आगे चलने पर उन्हें

मक्के के खेत की तरफ कुछ हलचल दिखी

रंगी : बाउजी मक्के की कटाई करवा रहे है क्या ?

बनवारी : अरे नहीं अभी हफ्ता भर बाकी है

रंगीलाल : तो कौन घुसा है उधर

बनवारी की नजर हिलते हुए मक्के से फसलों पर गई : ये मादरचोद को और जगह नहीं मिलती गाड़ मराने को , साल भर की मेहनत के लौड़े लगा देते है

बनवारी तेजी से उसी ओर दौड़ा , पगडंडी से वो खेत के बीच 200 मीटर की दूरी होगी । बनवारी को भागता देख रंगी भी उसके पीछे गया

रंगी भागता हुआ : क्या हुआ बाउजी अरे बच्चे होंगे छोड़िए

बनवारी : अरे इन सालों ने पूरा खलिहान जोत रखा है , आज तो पकड़ के रहूंगा , जमाई बाबू तू वो बगीचे वाले रोड पर खड़े रहो मै दौड़ाता हु

बनवारी तेजी से सरकाता हुआ घुसा मक्के के लहलहाते खेत में

वही खेत में एक जगह खाली जगह थी जहां बनवारी के बेटे राजेश का अड्डा था वो आए दिन अपनी अय्याशी के लिए यहां औरते बुलाता था ।






इस वक्त राजेश एक औरत को घोड़ी बनाए उसके गाड़ में लंड पेल था था

कि तभी खेतों में हो रही सरफराहट का आभास पाते ही राजेश उठ खड़ा हुआ : भाग बहनचोद बाउजी आ रहे है

राजेश अपना अंडर गारमेंट चढ़ा कर पेंट बंद करके तेजी से अपने खुले शर्त के बटन बंद करता हुआ खेत के दूसरी तरफ ट्यूबवेल की ओर भागा । वही वो औरत बगीचे की ओर भागी

बनवारी दहाड़ता हुआ खेत में घुस गया : पकड़ मादरचोद को , पकड़

अब चुकी बनवारी ने बगीचे वाले रास्ते पर रंगीलाल को खड़ा कर रखा था तो उस औरत को दबोचने के लिए उसके पीछे भागा

उन खेतों से दूसरी तरफ बाग था और उसकी मेड पर खड़ा था रंगी लाल

खेतों में सरसराहट मची थी उसपर से बनवारी की गाली और आवाज

तभी मक्के के खेत से फसलों को चीरती हुई बड़ी ही गदराई महिला बाहर आई ,








वो अपनी साड़ी को जांघों तक उठा रखी थी और ब्लाउज में उसकी गोरी रसीली मोटी चूचियां उसके हर पैर के साथ ऊपर नीचे हो रही थी , उसके कपड़े पूरी तरह से अस्त व्यस्त थे , चर्बीदार पेट की नर्म नाभि देख कर रंगी का लंड झटके खाने लगा और ढीले ब्लाउज में उछलती उसकी मोटी मोटी चूचियां अब तब बाहर निकलने को बेताब मालूम पड़ रही थी ।

बनवारी : अरे देख का रहे हो जमाई बाबू पकड़ो हरामजादी को

रंगी का मोह भंग हुआ और वो लपक कर उस औरत की ओर बढ़ा , मगर वो औरत इतनी तेजी से आ रही थी कि रंगी के एकाएक सामने आने वो पूरी तरफ से चौक गई।

उसने पूरी तरफ से खुद को रोकने का प्रयास किया मगर रोक न सकी और पूरी तरह से रंगी को लेकर लुढ़क गई

दो चार छ: और ना जाने कितने बार कभी वो औरत रंगी के ऊपर तो कभी रंगी उस औरत के ऊपर

एक दूसरे को पकड़े हुए वो रोल करते हुए लुढ़क कर बाग में एक पेड़ से जा भिड़े

: हाय दैय्या अह्ह्ह्ह्ह मर गई , वो औरत का कूल्हा आम के पेड़ के बाहर निकले हुए शोर से हप्प से जा लगा , गनीमत रही रंगी बाल बाल बच गया ।

रंगी अपने कपड़े झाड़ता हुआ खड़ा हुआ और उस औरत को दर्द में देख कर कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से बनवारी की आवाज आई जो पहले से ही हाफ रहा था : कमला तू ?

रंगी चौक कर कि बनवारी तो इसे जनता है : आप जानते है बाउजी

वो औरत भुनभुनाती हुई खड़ी हुई और अपने साड़ी को सही कर रही








उसका पल्लू उसके मोटे मम्मे से भरे ब्लाउज से हट कर जमीन में लसाराया हुआ था , रंगी की नजर उसके बड़े बड़े रसीले मम्में के हट ही नहीं रही थी , उसपे से उसके नरम गोरे पेट पर लगी हुई मिट्टी देख कर लग रहा था मानो छूने पर कितनी नरम होगी , पाउडर जैसे हाथ सरकेगा ।

बनवारी : तू क्या कर रही थी खेत में .

कमला अपनी साड़ी झाड़ कर अपनी छातियां ढकती हुई अपने कूल्हे झाड़ रही थी मगर कुछ बोली नहीं ।

कमला को देख कर साफ लग रहा था कि उसे बनवारी का जरा भी डर नहीं था और रंगी को ये बात कुछ अजीब लग रही थी ।

कमला : अपने लाड साहब से क्यों नहीं पूछते क्या कर रही थी मै हूह ..

ये बोलकर कमला निकल गई

रंगी उसके तुनक मिजाज से हैरान था कि बनवारी ने उसको कुछ कहा क्यों नहीं । वही उसके लालची मन की निगाहे उसके मिट्टी लगे चूतड़ों पर जमी थी जिसमें उसके साड़ी पर दाग छोड़ दिए । जिससे उसके बड़े चौड़े कूल्हे की थिरकन और भी आकर्षक दिख रही थी ।

रंगी हैरान होकर : बाउजी ये सब क्या था ? ये किसके बारे में बोल कर गई ?

बनवारी : अरे और किसके ? एक ही नालायक है घर में ?

रंगी को समझते देर नहीं लगी बनवारी उसके साले राजेश के बारे में बात कर रहा था ।

रंगी : तो साले साहब इसके साथ थे खेत में

बनवारी : अह छोड़ो न , ये पूछो गांव में किसके साथ नहीं तो शायद जवाब दे पाऊं?

रंगी : सॉरी बाउजी मेरा वो मतलब नहीं था , आप थके हुए लग रहे है आइए बैठिए

बनवारी रंगी के मीठे व्यव्हार से पिघल गया और उसे अपने गलती का अहसास हुआ कि राजेश की नादानी पर वो खामखां रंगी पर उतार रहा है ।

बनवारी : अरे नहीं नहीं जमाई बाबू , अब क्या कहूं । इतनी प्यारी चांद सी बहु है मेरी लेकिन कमीना पूरा दिन आवारा गर्दी में बिताता है । इसके नशे की आदत से बहु इसे अपने आस पास फटकने नहीं देती ।

रंगी कुछ नहीं बोला बस बनवारी की बाते सुनता रहा वही दूसरी ओर राजेश अपने बाप के डर से भागता हुआ ट्यूबवेल की ओर निकल गया ।

आमतौर वो इधर नहीं आता था क्योंकि सांझ के इस समय इधर उसकी बेटियां नहाने आती थी मगर अब बचने के लिए उसके पास और कोई चारा नहीं था ।

भागता हुआ राजेश ट्यूबवेल के पास आ गया , उसका गला बुरी तरह सूख रहा था , सांसे बैठने का नाम नहीं ले रही थी । वो लपक कर ट्यूबवेल की ओर गया और वो हाते में हाथ डालने वाले था कि झट से पीछे हो गया

ट्यूबवेल की दिवाल का सहारा लेकर वो चिपक कर खड़ा हो गया उसकी आंखों ने अभी अभी जो देखा था वो तस्वीर उसके दिलों दिमाग ने छप गई थी । उसकी सांसे और भी भारी होने लगी वो गहरी गहरी सांस लेने लगा ।

उसने अपने कलेजे को शांत किया मगर उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसने जो देखा वो कभी संभव हो सकता था ।

अपने भरम को यकीन में बदलने के लिए जैसे ही उसने दुबारा से ट्यूबवेल की दिवाल से सट कर पानी के हाते में झांका तो उसकी सांसे फिर से चढ़ने लगी । क्योंकि पानी में उसकी बेटी बबीता पूरी नंगी होकर तैर रही थी । पानी की सतह पर उसकी मुलायम चूतड उभरे हुए थे वो पूरी शांत होकर पड़ी थी पानी में मानो ।






राजेश का लंड जो कमला की अधूरी चुदाई करके पूरी तरह से सोया नहीं था एक बार फिर अपनी बेटी के नरम फुले हुए नंगे तैरते चूतड़ों को देख कर अपना सर उठाने लगा ।

मगर तभी गीता की आवाज आई : बबीता चलो देर हो रही है ।

राजेश के जहन पर छाता वासना का बादल छट गया और वो अपने होश में वापस आया । उसे अपनी ही बेटी के नरम फुले हुए नंगे चर्बीदार चूतड़ों को देख कर अपना लंड खड़ा पाना बहुत ही अफसोस जनक महसूस हुआ । उसके हिसाब से ऐसा कोई भी संजोग होना पूरी तरह से अनुचित था । मगर होनी को कौन ही टाल सकता था और वासना पर भला किसका जोर चला है ।

कुछ ही देर बबीता पानी से निकली और राजेश ना चाह कर भी खुद को अपनी बेटी को पानी से बाहर निकलते हुए देखने से नहीं रोक सका

बबिता पानी से बाहर निकल कर खड़ी थी । उसके मौसमी जैसे चूचे एकदम कड़क थे निप्पल पूरी तरफ से कड़े और नुकीले , जांघों के पास चूत के ऊपर हल्की सी झाट के रोओ की झुरमुट , एक बार फिर राजेश का लंड उससे बगावत कर बैठा ।

बबीता नंगी ही बगल के मकान में चली गई और फिर कुछ देर बाद दोनों बहने एक झोला लेकर बाते करते हुए निकल गए

राजेश झट से पानी के हाते के पास आया और अपना पूरा मुंह गर्दन तक पानी में बोर दिया और मिनट भर बाद बाहर निकाला हांफता हुआ ।

दूर उसकी बेटियां खेलती टहलती खिलखिलाती घर के लिए जा रही थी और राजेश वही खड़ा हुआ उन्हें निहार रहा था । देख रहा था कि उसकी गुड़िया अब बड़ी हो गई थी ।

शिला के घर

उम्मम फक्क मीईईई ओह्ह्ह यस्स अह्ह्ह्ह्ह, कमान उम्मम और तेज अह्ह्ह्ह उम्मम

अरुण के दोनों कानो के इयर बड्स में ये चीखे गूंज रही थी और उसके चेहरे पर वासना का शबाब छाया हुआ वो आंखे कभी कल्पनाओं से बंद कर लेता तो कभी अपने मोबाइल स्क्रीन पर चल रही चल चित्र को देखता , उसका लंड उसकी मुठ्ठी के कसा हुआ मिजा था था , वो तेजी से अपने लंड की चमड़ी आगे पीछे कर रहा था






: ओह्ह्ह ओह्ह्ह गॉड मम्मी फक्क यूं ओह्ह्ह्ह यशस्स अह्ह्ह्ह्ह सीईईई ओह्ह्ह और चोदो मेरी मम्मी हा और और ओह्ह्ह्ह्ह गॉड फक्क्क् यूयू ओह्ह्ह्ह सीईईईई अह्ह्ह्ह्ह, अरुण मोबाईल स्क्रीन पर चल रही चुदाई को देख कर बड़बड़ाया और इतने में दूसरी ओर से आवाज आई

: हा बेटा चुद रही हूं अह्ह्ह्ह्ह पेलो जेठ जी अह्ह्ह्ह्ह और तेज उम्मम अह्ह्ह्ह देख बेटा तेरी मम्मी चुद रही है अच्छा लगता है न अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म

: ओह गॉड फक्क्क् मीईईईई अह्ह्ह्ह्हमम यशस्स अह्ह्ह्ह्ह आ रहा है मेरा अह्ह्ह्ह मम्मी मुझे आपके मुंह में झड़ना है आजाओ अह्ह्ह्ह ( अरुण मोबाइल स्क्रीन पर चल रहे चुदाई को देख कर बोला और अगले पल वो औरत अपने चेहरे का मास्क मुंह से उठा कर अपने आंखों पर कर लेती है और जीभ बाहर निकाल देती और पीछे से एक आदमी ताबड़तोड़ उसकी गाड़ में अपना लंड पेले जा रहा था ।

अरुण उस औरत को देख कर रह नहीं पाता और झड़ने लगा : ओह गॉड फक्क्क् यूयू बीच उफ्फ कितनी चुदक्कड हो आंटी तुम अह्ह्ह्ह्ह सीईईई ओह्ह्ह उम्ममम

अरुण के झड़ते ही वो औरत उस आदमी को हटाती है और दोनों वीडियो काल पर होते है ।

अरुण अभी भी अपने मोबाईल का कैमरा ऑफ किए हुआ था ।

वो औरत माक्स पहने हुए ही अपने ब्लाउज के बटन लगाने लगी : क्यों बेटा मजा आया

अरुण उस औरत को वीडियो काल पर देखता हुआ : बहुत ज्यादा आंटी , वो तुम्हारी साथ वाली कहा है आज । उसकी मोटी गाड़ को देख कर मै पागल हो जाता हु । काश मैं भी तुम लोगों को ज्वाइन कर पाता ।

वो औरत : वो भी आएंगी शायद रात में लाइव होगी ।

अरुण : वाह फिर तो मजा आएगा आंटी , तुम दोनों तबाही मचा देती हो ।

औरत : हा लेकिन आज रात मै नहीं आऊंगी कोई और आयेगा

अरुण शॉक्ड होकर : कोई और मतलब , न्यू मेंबर का इंट्रो

औरत : उम्मम ऐसा ही कुछ । अच्छा चलो मै रखती हु बाय ।

अरुण मुस्कुरा कर : बाय मम्मी लव्स यू

और वो औरत हस्ते हुए फोन काट दी ।

अरुण ने काल कट किया तो चैट में उसे उस औरत को भेजे हुए पेटीएम पेमेंट की रसीद दिखाई दी , जिसमें 2000 रुपए भेजे गए थे ।

अरुण उठा और नहाने चला गया और वही छत पर टैरिस पर रज्जो और शिला बैठी हुई थी ।

शाम का वक्त हो चला था, तकरीबन पाँच बजने को थे। घर की छत पर बनी टैरिस पर दोनों सहेलियाँ, शिला और रज्जो, आमने-सामने बैठी थीं। टैरिस के चारों ओर लोहे की रेलिंग थी, जिसके बीच से नीचे गली की हलचल दिखाई दे रही थी। हवा में हल्की ठंडक थी, और आसमान पर सूरज ढलान की ओर बढ़ रहा था, जिससे नारंगी और गुलाबी रंग की छटा बिखर रही थी। शिला ने अपने हाथ में रिमोट पकड़ा हुआ था, और उसकी उंगलियाँ "High" बटन के ऊपर मँडरा रही थीं।

रज्जो दूसरी ओर एक पुरानी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी थी, उसकी स्थिति थोड़ी बेचैन थी, और चेहरे पर एक मिश्रित भाव था—गुस्सा, शर्मिंदगी और हँसी का अजीब सा संगम।

शिला ने रज्जो की ओर देखा, अपनी भौंहें उचकाईं, और एक शरारती मुस्कान के साथ "High" बटन दबा दिया। रज्जो ने तुरंत अपने होंठ काटे और कुर्सी की बाहों को ज़ोर से पकड़ लिया।

उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और उसने शिला को घूरते हुए कहा, "बस कर, शिला! कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा?" लेकिन शिला पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

कुर्सी पकड़े हुए रज्जो ने अपनी जांघें कस ली , कमर से लेकर पेडू तक हिस्से में मानो बिजली की तेज तरंगें उसे गनगना रही थी: अह्ह्ह्ह रुक जा कामिनी कम कर न अह्ह्ह्ह

उसने अपनी कमर उठा दी और एड़ियों के सहारे कुर्सी पकड़ कर अकड़ गई: मै पागल हो जाऊंगी अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म और कोई देख लेगा बंद कर न

वह हँसते हुए बोली, "अरे, यहाँ कौन देखने वाला है? टैरिस पर तो बस हम दोनों हैं!"

लेकिन शिला गलत थी। ठीक उसी पल टैरिस के कोने से सीढ़ियों की आवाज़ आई, और अरुण वहाँ आ पहुँचा।

अरुण की नजरे अकड़ी हुई रज्जो पर थी , जिसके बड़े भड़कीले छातियों से उसके साड़ी का पल्लू सरक गया था , चूत में मची घरघराहट से उसके मोटे मोटे थनों के निप्पल टाइट हो आसमान की तरफ उभर गए थे , गुदाज चर्बीदार पेट नंगा था और उसकी कमर झटके खा रही थी

रज्जो के चेहरे की बेचैनी और सामने अपनी बड़ी मम्मी के चेहरे पर मुस्कुराहट से वो और भी उलझा हुआ था

रह रह कर रज्जो की सांसे ऊपर नीचे हो रहे थी , जीने की दहलीज पर खड़ा अनुज भौचक्का रज्जो को निहार रहा था मानो रज्जो के जिस्म से उसकी प्राण ऊर्जा निकल रही हो और एकदम से कुर्सी पर बैठ गई सुस्त सी पड़ने लगी

जैसे ही अरुण टैरिस पर आया, शिला ने जल्दी से रिमोट को अपनी ब्लाउज में डालने की कोशिश की, लेकिन अरुण की नज़र तेज़ थी।

"अरे मामी को क्या हुआ " , उसने मासूमियत भरे लहजे में शिला से पूछा।

रज्जो का चेहरा लाल पड़ गया, और उसने अपनी नज़रें नीचे कर लीं, जैसे छत की टाइल्स अचानक बहुत दिलचस्प हो गई हों।

शिला ने हँसते हुए बात को संभालने की कोशिश की : अरे, कुछ नहीं, वो भाभी को प्यास लग रही है बेटा जरा पानी ला देगा ।

अरुण : ओके अभी लाता हु , नींबू भी डाल दूं क्या ? ( अरुण रज्जो के बेपर्दा हुए चूचियों को ब्लाउज में कसा हुए देख कर बोला , रज्जो के बड़े बड़े मम्मे उसके पेट में हरकत पैदा कर रहे थे ।)

रज्जो ने अरुण की नजर पढ की और अपनी साड़ी सही करती हुई : हा बेटा डाल देना

फिर वो शिला को घूरने लगी ।

अरुण : आपके लिए क्या लाऊ बड़ी मां?

शिला : मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा , बस तू भाभी के लिए नींबू पानी लेकर आजा ।

अरुण के जाते ही

शिला और रज्जो एक-दूसरे की ओर देखकर हँस पड़ीं।

शिला ने रिमोट फिर से निकाला और बोली : मजा आया उम्मम

रज्जो : अह्ह्ह्ह्ह लग रहा था पूरे बदन में कंपकपी मची थी , रोम रोम दर्द से तड़प रहा था मेरा और पूछ रही है मजा आया , क्या चीज है ये ?

शिला : ये चूत बहलाने का औजार है मेरी जान , अंग्रेजी में इसे वाइब्रेटर कहते है हाहा

रज्जो साड़ी में हाथ घुसाती हुई : अब इसको निकालते कैसे है ?

शिला : उन्हूं रहने दो न, रूम में निकाल दूंगी

रज्जो : धत्त मुझे साफ करना पड़ेगा , रिस रहा है वहां

शिला मुस्कुरा कर : तो फिर बाथरूम में चले मै साफ कर देती हु चाट कर

रज्जो लजा कर : धत्त नहीं मुझे और नहीं तड़पना






शिला उसको छेड़ती हुई : हाय मेरी जान , जरा साड़ी उठा कर दिखा तो दो अपनी रसभरी को उम्मम

शिला ने अपने पैर से उसकी साड़ी के गैप को और खोलना चाहा मगर रज्जो ने उसको झटक दिया क्योंकि उसने छत पर वापस अरुण को आते देख लिया था ।

रज्जो ने इस बात का जिक्र नहीं किया बस अरुण से नजरे चुराती रही।

अरुण मुस्कुरा कर रज्जो को नींबू पानी का गिलास देता हुआ : हम्म्म मामी लो पी लो , एकदम ताजा है

रज्जो ने उसके शरारती आंखों में देखा और समझ गई कि अरुण ने जरूर उनकी बातें सुनी है ।

मगर अरुण के खुश होने का कारण कुछ और ही था , जैसे जैसे रज्जो नींबू पानी का ग्लास खाली कर रही थी अरुण के लंड में हरकत बढ़ रही थी और उसकी आंखे उलट रही थी । मानो रज्जो गले में नींबू पानी नहीं बल्कि उसके लंड का रस घोंट रही हो ।

चमनपुरा

लाली का घर एक टाऊन के रिहायशी इलाके में था, जहां सड़क के किनारे पेड़ों की छांव और मॉर्डन बनावट के घर एक अलग ही हलचल कर देती थी। अनुज ने दरवाजे पर दस्तक दी, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। शायद लाली कहीं व्यस्त थी। उसने सोचा कि शायद अंदर जाकर लाली को बुला ले, और दरवाजा खुला देखकर वह धीरे-धीरे अंदर चला गया। घर में हल्की-हल्की ठंडक थी, और दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें उसकी नजरों से गुजरीं। उसने लाली का नाम पुकारा, लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं मिला। वह आगे बढ़ा और लाली का कमरा खोजने की कोशिश करने लगा।

आलीशान घर फर्श के चमचाते टाइल्स और सफेद सोफे और पर्दे देख कर अनुज को ताज्जुब हुआ , अमीर लोगों की लाइफ स्टाइल में सफेदी कुछ ज्यादा ही दिख जाती है । शीशे सी चमचमाती टेबल और सब कुछ साफ चिकना जैसे वो किसी घर में नहीं होटल में गया हो । मगर हैरत की बात थी उसे कोई नजर नहीं आ रहा था । लाली के यहां पहली बार आना उसके अंदर डर पैदा कर रहा था , कही लाली की मां या पापा ने सवाल किए । मगर लाली की दीदी यानि उसकी कालेज मिस के कहने पर वो आया तो डर उतना भी नहीं था । मगर कुछ तो था जो उसे भीतर से बेचैन किए जा रहा था । तभी उसे एक कमरे की ओर हलचल दिखी कमरे का दरवाजा हल्का भीड़का था और उसके पर्दे कमरे से आ रही हवा से गलियारे में लहरा रहे थे । अनुज उस ओर बढ़ गया ।

तभी उसकी नजर एक खुले दरवाजे वाले कमरे पर पड़ी। उसने सोचा शायद यह लाली का कमरा हो, लेकिन जैसे ही वह करीब पहुंचा, उसे अंदर का नजारा देखकर पैरों तले जमीन खिसक गई। वहां उसकी मैम—यानी लाली की दीदी—कपड़े बदल रही थीं।








वह नीचे सिर्फ काली पैंटी में थीं, और उनके नितंब इतने आकर्षक और कामोत्तेजक लग रहे थे कि अनुज की सांसें थम सी गईं। उसका चेहरा लाल हो गया, और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे। मिस की लंबी गोरी टांगे और कूल्हे पर चुस्त पैंटी जो उनके गाड़ के दरारों में गहरे घुसी हुई थी अनुज देखते ही बेचैन होने लगा । उसके पेट में अजीब सी हड़बड़ाहट होने लगी कही कोई उसे ऐसे ताक झांक करता देख न ले

उसने फौरन नजरें हटाईं और खुद को संभालते हुए पीछे हट गया। उसकी पैंट में एक अजीब सी अकड़न होने लगी थी, जो उसे और असहज कर रही थी। वह नहीं चाहता था कि कोई उसे वहां देख ले और गलत समझे , खास कर लाली । डर के मारे वह चुपचाप उस जगह से निकल गया और बाहर लॉन में जाकर खड़ा हो गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसकी सांसें अभी भी तेज थीं, और वह उस दृश्य को अपने दिमाग से निकालने की कोशिश कर रहा था।

" उफ्फ मिस तो पूरी बोल्ड है कितनी टाइट चिपकी हुई थी पैंटी उनकी गाड़ पर अह्ह्ह्ह्ह मूड गया बीसी " , अनुज खुद से बड़बड़ाया। उसने वही से वापस लाली को आवाज दी ।

कुछ ही मिनटों बाद लाली बाहर आई। उसने एक हल्का सा टॉप और कैफ़री पहन रखी थी, और अपने गीले बालों को जुड़े में बांधते हुए वह अनुज की ओर बढ़ी। उसका गोरा पेट टॉप के नीचे से हल्का-हल्का दिख रहा था, और उसकी चाल में एक सहज लापरवाही थी।








अनुज की नजर अनायास ही उसके पेट पर चली गई, और वह एक बार फिर सन्न रह गया। उसकी त्वचा की चमक और उसकी सादगी में छुपा आकर्षण उसे बेचैन कर गया।

लाली ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा : हाय , वो मै नहा रही थी , ज्यादा देर हो गई न

अनुज मुस्कुरा कर उसके गोरे चेहरे को देखता हुआ कितनी मासूम और बचपना भरा था उसमें : उम्हू इतना भी नहीं

लाली खिलकर : तो आओ चलो , तुम्हे नोटबुक देती हूं

अनुज ने हड़बड़ाते हुए हाँ में सिर हिलाया और लाली के पीछे-पीछे चल पड़ा। जैसे ही लाली आगे बढ़ी, उसकी कैफ़री में उभरे हुए चूतड़ हल्के-हल्के मटक रहे थे। हर कदम के साथ उनकी गोलाई और लचक अनुज की नजरों में कैद हो रही थी। उसकी पैंट में अकड़न अब और बढ़ गई थी, और वह अपने आपको संभालने की कोशिश में लगा था। उसका दिमाग अभी भी उन दो अलग-अलग दृश्यों के बीच उलझा हुआ था—एक उसकी मैम का और दूसरा लाली का। दोनों ही नजारे उसे अंदर तक हिला गए थे, और वह चाहकर भी उन्हें भूल नहीं पा रहा था।

अनुज लाली के पीछे-पीछे उसके कमरे की ओर बढ़ रहा था, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी हिलोरे ले रही थी। जिस माहौल और समाज में वह पला-बढ़ा था, वहाँ एक लड़के और लड़की का इस तरह अकेले एक कमरे में होना कोई आम बात नहीं थी—वह भी तब, जब घर में किसी को पता न हो। ऊपर से लाली जैसी लड़की, जो हमेशा उसके आसपास मंडराती रहती थी और जिसके इरादे अनुज को हमेशा थोड़े शक्की लगते थे। उसकी साँसें तेज थीं, और वह बार-बार अपने हाथों को रगड़ रहा था। उसकी आँखें इधर-उधर भाग रही थीं, जैसे वह जल्दी से नोटबुक लेकर वहाँ से निकल जाना चाहता हो।

लाली ने कमरे में घुसते ही अलमारी की ओर कदम बढ़ाया और पीछे मुड़कर अनुज को देखते हुए कहा : अरे, इतना घबराया क्यों रहे हो बैठो न, थोड़ा रिलैक्स करो ।

उसकी आवाज में एक शरारत थी, और वह जानबूझकर धीरे-धीरे अलमारी खोल रही थी। अनुज ने हड़बड़ाते हुए कहा, “नहीं-नहीं, बस नोटबुक दे दो , मुझे जल्दी है। घर पर कुछ काम है।”

लेकिन लाली ने उसकी बात को अनसुना करते हुए कहा, “अरे, इतनी जल्दी क्या है? अभी तो शाम ढली भी नहीं है। पहली बार आए हो बिना चाय पानी के भेजा तो दीदी मुझे धो देगी वो भी बिना साबुन के हीही

उसने अनुज को थोड़ा हल्का महसूस कराने का ट्राई किया मगर अनुज के लिए चीजे फिर भी इतनी आसान नहीं थी ।

लाली उसको बातों में उलझाने की कोशिश रही और उसकी मुस्कान से साफ था कि वह अनुज की बेचैनी को भाँप चुकी थी। अनुज ने घबराहट में अपने गले को खँखारते हुए कहा, “हाँ, ठीक है, लेकिन प्लीज नोटबुक जल्दी दे दो।” उसकी आवाज में हल्की सी कँपकँपी थी।

लाली ने खीझ कर मुंह बनाया और आलमारी की तरफ घूमकर नोट्स निकालने लगी और अनुज की नजर उसकी टॉप पर गई जो पीछे से उठी थी । नंगी गोरी कमर कितनी मुलायम और मखमली उसपे से क़ैफरी की लास्टिक के पास लाली की पिंक ब्लूमर की हल्की झलक थी शायद लैस थे जो उसकी कैफरी से बाहर आ रहे थे । अनुज की धड़कने फिर से बेकाबू होने लगी

आखिरकार नोटबुक निकाली और उसे थमाते हुए कहा: हम्ममम पकड़ों

अनुज ने जल्दी से नोटबुक ली और कमरे से बाहर की ओर बढ़ गया। लाली उसके पीछे-पीछे आई और हल्के से हँसते हुए बोली : चल, मम्मी से मिलवा दूँ। वो अभी बाहर निकलने वाली हैं।

दोनों लॉन की ओर बढ़े, जहाँ लाली की मम्मी खड़ी थीं। अनुज की नजर जैसे ही उन पर पड़ी, वह एकदम से ठिठक गया। लाली की मम्मी बला की खूबसूरत और मॉडर्न औरत थीं।








उन्होंने राउंड नेक की लाल टी-शर्ट और टाइट जींस पहन रखी थी, कलाई में एक ब्लेजर जैसा जैकेट जैसा था कुछ । फुल कमर वाली जींस में उनके बड़े, भड़कीले चूतड़ साफ उभर रहे थे। टी-शर्ट में उनके मोटे, रसीले स्तन इस तरह से नजर आ रहे थे कि अनुज की आँखें वहीं अटक गईं। उनके गोरे चेहरे पर हल्का मेकअप और बालों का खुला जूड़ा उन्हें और भी आकर्षक बना रहा था। अनुज को यकीन नहीं हो रहा था कि इस छोटे से टाउन में कोई औरत इतनी स्टाइलिश और बिंदास हो सकती है। वह लाली की मम्मी का दीवाना सा हो गया। उसकी नजर बार-बार उनके दूध जैसे उभारों पर चली जाती थी, और वह अपने आपको रोक नहीं पा रहा था।

लाली ने हँसते हुए कहा : मम्मी, ये अनुज है, मेरा क्लासमेट। नोटबुक लेने आया था।

उसकी मम्मी ने मुस्कुराते हुए अनुज की ओर देखा और कहा : अच्छा, तुम ही अनुज हो? लाली तुम्हारे बारे में बताती रहती है। मैं अभी बाहर जा रही हूँ, थोड़ा काम है।

उसकी आवाज में एक मधुरता थी, और वह पलटकर अपनी कार की ओर बढ़ गईं। जैसे ही वह चलीं, उनके बड़े, मटकते चूतड़ जींस में लहराते हुए नजर आए। अनुज बस उन्हें देखता रह गया, उसका मुँह हल्का सा खुला था, और वह उस नजारे को अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहता था।

लाली की मम्मी के जाने के बाद अनुज ने लाली से पूछा : यार मम्मी इतनी मॉडर्न कैसे हैं? मतलब, इस टाउन में तो लोग ऐसे कपड़े पहनने की सोच भी नहीं सकता ।

लाली ने बेफिक्री से कंधे उचकाते हुए कहा : अरे, ये तो उनके लिए नॉर्मल है। मम्मी को फैशन का शौक है, और वो हमेशा से ऐसी रही हैं। मुझे तो आदत है।

अनुज ने सिर हिलाया, लेकिन उसका दिमाग अभी भी लाली की मम्मी के मॉडर्न अंदाज और उनके मटकते चूतड़ों के नजारे में उलझा हुआ था। वह सोच रहा था कि आज का दिन उसके लिए कितना अजीब और बेकाबू करने वाला रहा।

तभी लाली ने एकदम से उसका हाथ पकड़ लिया और सोफे पर बैठाती हुई : चलो बैठो मै चाय बनाती हूं

अनुज एकदम से लाली के हरकत से सकपका गया और वो अपनी कलाई छुड़ाना चाहता था मगर छूने से डर रहा था : नहीं नहीं , मुझे सच के देर ही रही है यार

तभी लाली की दीदी पीछे से लान में आती है

: अरे अनुज तुम ?

: गुड इवनिंग मिस ( अनुज और लाली दोनो एकदम से सतर्क हो गए और अनुज बड़ी सादगी से उन्हें ग्रिट किया )

: क्या यार , यहां कुछ नहीं तुम मुझे दीदी बुलाओ । पक जाती हु मै मिस किस सुन कर ( लाली की दीदी चिढ़ती हुई बोली )

जिसपे लाली अपने मुंह पर हाथ रख कर हसी रोकने की कोशिश कर रही थी वही अनुज लाली की दीदी को निहार रहा था । व्हाइट टॉप और वाइट लॉन्ग स्कर्ट में कितना बलखा कर चल रही थी । उनके चूतड़ रुक रुक कर हल्के झटके के साथ थिरक रहे थे मानो स्कर्ट के भीतर आपस में टकरा कर झनझना रहे हो ।

: क्या पियोगे अनुज, काफी चाय यार कोई ड्रिंक

: काफी चलेगी दीदी ( अनुज किचन की ओर जाती अपनी किस के झटके खाते चूतड़ों को निहारते हुए बोला )

: अच्छा बच्चू अब देर नहीं हो रही ( लाली ने उसे घूरा तो अनुज हड़बड़ा गया )

: अब मिस को कैसे मना करु यार , लेकिन सच में मुझे देर हो रही है । 6 बजने वाले और पापा भी बाहर गए है न ।

लाली तुनक कर बोली: हा हा ठीक है , सफाई मत दो

उसके नाक पर वो गुलाबी गुस्सा कितना खिल रहा था और अनुज को हसी आ रही थी ।

अनुज मुस्कुरा कर : घर नहीं दिखाओगी अपना

लाली एकदम से चहक गई : दीदी काफी लेकर ऊपर आ जाना, चलो चलो ( लाली उसका हाथ पकड़ सीढ़ियों की ओर भागी )

लाली की दीदी पीछे खड़े हुए : अरे !!!

जबतक वो लाली को रोकती दोनो जीने को फांदते हु ऊपर जा चुके थे ।

कुछ देर बाद .....

शाम ढल चुकी थी । राज अपने दुकान को बंद कर कास्मेटिक वाले दुकान की ओर जा रहा था । हाथ में टिफिन का झोला झुलाते हुए । उसमें अपनी मां रागिनी से लिपटने की बड़ी चाह सी उठ रही थी । वो इस फिराक में था कि वो गली ने मोड से देखेगा अगर दुकान खुली रही तो वो सीधा चौराहे वाले घर निकल जाएगा और अपनी मां के साथ थोड़ी अकेले में मस्ती कर लेगा ।

: भैया ...भैया .. इधर ? ( राज के कान बजे )

उसने फौरन घूम कर देखा तो पीछे से अनुज उसकी ओर ही आ रहा था

: अरे अनुज ! कहा गया था ? ( उसके हाथ में एक नोटबुक को देख कर बोला )

: वो ये नोटबुक लेने गया था ( अनुज राज के पास आता हुआ बोला )

: और मम्मी ?

: दुकान पर होंगी ? ( अनुज कंधे उचका कर बोला )

राज और अनुज दुकान की ओर बढ़ गए जहां उनकी मां रागिनी ढलती सांझ में दुकान के काउंटर के पास खड़ी हुई चिंता के उनकी राह निहार रही थी ।

: कहा चला गया था तू , एक घंटा हो गया ( रागिनी ने अनुज को डांट लगाई )

: वो मम्मी मिस जी ने बिठा लिया था ( अनुज थोड़ा डर कर बोला )

: राज तूने कुछ खाया बेटा ( फिकर में रागिनी बोली )

: कहा मम्मी , पूरा दिन ग्राहको में थक गया हू जल्दी से खाना खिला दो बस ( राज बुझे हुए चेहरे से बोला )

: अरे अभी बनाया कहा ? ये पागल पता नहीं कहा चला गया था किताब लेने ( रागिनी ने गुस्सा दिखाया )

: तो चलो न मम्मी हम चलते है घर और अनुज तू दुकान बंद करके आना ( राज ने फरमान सुनाया )

फिर अपनी मां को लेकर निकल गया जल्दी से ।

अनुज को बहुत बुरा नहीं लगा बल्कि खुशी हुई कि ना राज ने और ना उसकी मां से उससे इस बारे में सवाल जवाब किया कि वो किसके घर गया था ।

अनुज समान बढ़ाने लगा और दुकान बंद करने लगा , ये सब करने में उसे कोई 20 मिनट लगे होंगे । वो खुश था आज लाली के साथ उसने लंबा समय बिताया था । शाम के कॉफी की चुस्की और लाली का साथ , लाली के घर की औरते एक से बढ़ कर एक । उस घर में उसने एक भी मर्द नहीं देखा ताज्जुब हुआ। मगर इनसब से अलग आज उसने अपनी मिस की नंगी गोरी चिकनी गाड़ देखी , कितनी मुलायम और रसीली थी । गोरी गोरी दूधिया गाड़ पर काली पैंटी कितनी खिल रही थी । अनुज का लंड अकड़ने लगा ।

वो रास्ते भर सोचता हुआ करीबन 12-15 मिनट के चौराहे वाले घर पर पहुंच गया था ।

गेट से घुस कर उसने दरवाजे का लॉक दो बार खड़खड़ाया और राज भागता हुआ आया खोलने ।

अनुज चुपचाप हाल में दाखिल हुआ तो उसकी नजर ने सबसे पहले अपनी मां को खोजा और किचन की ओर देखा तो आंखे चमक उठी






किचन में रागिनी ब्लाउज पेटीकोट के खड़ी थी खाना बना रही थी ।

जैसे ही अनुज सीढ़िया चढ़ने लगा उसने घूम कर राज को देखा और मुस्कुराने लगी ।

राज भी अनुज को ऊपर जाता देख फिर से दबे पाव अपनी मां को अपनी बाहों में भरने के लिए किचन में चला गया

जारी रहेगी
 
अपडेट 06

प्रतापपुर

शाम ढल चुकी थी। रंगीलाल अपने ससुर बनवारी के साथ खेतों से घर की ओर लौट रहा था। उसके कदम थके हुए थे, और शरीर में एक अजीब-सी बेचैनी थी। कुछ देर पहले कमला के साथ जो घटना हुई थी, उसकी वजह से उसके कंधों और कोहनियों पर खरोंचें आ गई थीं। घुटनों में भी हल्का-हल्का दर्द चुभ रहा था, जैसे हर कदम पर उसे उस वाकये की याद दिला रहा हो। बनवारी, जो उम्र के हिसाब से चुस्त-दुरुस्त था, आगे-आगे चल रहा था और रंगीलाल उसके पीछे-पीछे चुपचाप अपने विचारों में खोया हुआ।

जैसे ही दोनों घर के आंगन में दाखिल हुए, बनवारी की नजर अपनी बहू सुनीता पर पड़ी, जो रसोई के पास कुछ काम निपटा रही थी। उसने अपनी पुरानी मगर दमदार आवाज में कहा : बहु, जरा जमाई बाबू के लिए पानी गर्म कर दे नहाने को।


सुनीता ने सिर हिलाकर हामी भरी और चुपचाप चूल्हे की ओर बढ़ गई। दूसरी तरफ, रंगीलाल अपने कपड़े और तौलिया उठाकर घर के पीछे बने छोटे-से बाथरूम की ओर चल पड़ा। पीछे आंगन की दीवारें ऊंची थीं, और छत खुली थी ।

आंगन में जीने के पास पहुंचकर रंगीलाल ने अपने पसीने से सने कपड़े उतारने लगा। वह अभी जांघिया में ही खड़ा था कि अचानक चौखट पर हल्की-सी आहट हुई। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, सुनीता एक भगौने में गर्म पानी लेकर अंदर दाखिल हो गई। उसकी नजर अनायास ही रंगीलाल की नंगी देह पर पड़ी। एक पल के लिए दोनों की सांसें थम सी गईं। सुनीता ने फौरन नजरें फेर लीं और असहज होकर दूसरी ओर मुंह कर लिया। रंगीलाल को भी अपनी सलहज के सामने इस हालत में खड़े होने की शर्मिंदगी महसूस हुई। उसने जल्दी से तौलिए को कमर पर लपेटने की कोशिश की।

सुनीता ने भगौना जमीन पर रखा और जैसे ही वह जाने को मुड़ी, उसकी नजर रंगीलाल के कंधों पर पड़ी। वहां की खरोंचें और लाल निशान देखकर उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।

उसने हिचकिचाते हुए पूछा : ये क्या हुआ जीजा जी? आपके कंधे पर तो चोट लगी है!

रंगीलाल, जो अभी तक अपनी असहजता से उबर नहीं पाया था, ने जल्दी से एक झूठ गढ़ लिया।

रंगी : अरे कुछ नहीं, खेत में टहलते वक्त पैर फिसल गया और गिर पड़ा। बस थोड़ी-सी खरोंच है।

उसकी आवाज में हल्की-सी कांप सुनाई दी, जो शायद सुनीता ने नजरअंदाज कर दी।

सुनीता कुछ पल उसे देखती रही, फिर बिना कुछ कहे बाहर चली गई। थोड़ी देर बाद वह डिटॉल की शीशी और एक कटोरी में पानी लेकर लौटी। उसने रंगीलाल से कहा : आप जरा सीढ़ी पर बैठ जाइए, मैं चोट साफ कर देती हूं। ऐसे ही छोड़ देंगे तो इन्फेक्शन हो सकता है।


रंगीलाल ने हिचकते हुए सीढ़ी पर बैठ गया। सुनीता उसके पास खड़ी होकर बड़े ध्यान से उसके कंधों और कोहनियों को साफ करने लगी। उसके कोमल हाथों का स्पर्श रंगीलाल के लिए एक अजीब-सा अनुभव था। वह बाहर से असहज दिख रहा था, लेकिन भीतर ही भीतर सुनीता की फिक्र और उसके हाथों की नरमी उसे गुदगुदा रही थी।

सुनीता का गदराया हुआ शरीर उसके करीब था। उसकी साड़ी का पल्लू हल्का-हल्का हिल रहा था, और ब्लाउज के नीचे उसका नरम, चर्बीदार पेट और नाभि रंगीलाल के चेहरे के ठीक सामने था। सुनीता के जिस्म से उठती हल्की खुशबू—शायद साबुन और पसीने की मिली-जुली महक—रंगीलाल के मन को भटका रही थी। वह खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी नजर बार-बार सुनीता के चेहरे और ब्लाउज की गोलाईयों पर चली जा रही थी। सुनीता भी इस असहज स्थिति को भांप रही थी, मगर वह चुपचाप अपना काम निपटाने में लगी रही।

चोट साफ करने के बाद उसने कहा : अब ठीक है। आप नहा लीजिए, मैं चलती हूं।

और वह तेजी से बाहर निकल गई।

रंगीलाल ने गहरी सांस ली और नहाने के लिए बाल्टी में पानी डाला। गर्म पानी की भाप और ठंडी हवा का मेल उसके शरीर को सुकून दे रहा था। नहाने के बाद उसने साफ और आरामदायक कुर्ता-पायजामा पहना और बाहर आंगन में आ गया। बनवारी पहले से ही वहां बैठा अपनी हुक्की गुड़गुड़ा रहा था। सुनीता ने खाने की थाली सजा दी—गरम-गरम रोटियां, दाल, और सब्जी की खुशबू से आंगन महक उठा। रंगीलाल और बनवारी ने साथ बैठकर खाना खाया। बनवारी कुछ पुरानी बातें छेड़ रहा था, और रंगीलाल हल्के-हल्के हंसकर उसका साथ दे रहा था। लेकिन उसका मन कहीं और था—सुनीता के कोमल स्पर्श और उसकी चिंता भरी आंखों में। खाना खत्म होने के बाद वह उठा, हाथ धोया, और रात के लिए अपने कमरे की ओर बढ़ गया। बाहर चांदनी छिटकी हुई थी, और रात की खामोशी में उसका मन अभी भी उस अनकहे अनुभव में उलझा हुआ था।


उसका कमरा उसके ससुर बनवारी के बगल में गेस्ट रूम वाला कमरा था जिसमें एक दरवाजा था जो दोनों कमरों को जोड़ता था ।

रंगीलाल बिस्तर पर लेटा हुआ था कि उसे घर का ख्याल आया । तो उनसे राज के पास फोन घुमाया । उससे हाल चाल करते हुए बैग से अपने एक गमछा लेकर पेंट निकाल कर उसे लपेट लिया ।

वो बिस्तर पर टेक लगाए पैर फोल्ड करके लेता था तभी सामने का दरवाजा खुला और सुनीता कमरे में दाखिल हुई । जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने उसकी नजर सीधे रंगी के गमछे के गैप से उसके जांघिये पर गई ।

रंगीलाल भी दरवाजे पर दस्तक होने से चौक गया और जैसे ही कमरे में सुनीता आई वो झट से उठ कर बैठ गया ।






सुनीता कमरे में साटिन की चमकरदार नाइटी पहन हुए दाखिल हुई , जिसके हल्के कपड़े उसके जिस्म से चिपके हुए थे । बिना ब्रा के उसके गोल मटोल मम्मे हल्के फुल्के उछाल से ऊपर नीचे हो रहे और कूल्हे पर पड़ी सिलवटें सुनीता की चाल में और भी लचक पैदा कर रहे थी । अब तक रंगीलाल जो अपनी सलहज के गोरे चेहरे और कातिल मुस्कुराहट का दीवाना था अब उसके जिस्म का स्कैन करके और पागल होने लगा । बड़ी आंखों से उसने अपनी सलहज का ये रूप देख कर स्तब्ध था ।

: किससे बात कर रहे थे जीजा जी , दीदी से ? ( सुनीता ने हल्की मुस्कान के साथ कदम बढ़ाए और रंगीलाल के पास बिस्तर पर बैठ गई )






: हम्ममम बस यूं ही सोचा हाल चाल लेलू ( रंगी ने सहज जवाब दिया उसकी नजर सुनीता के गोल चूचों पर थी जो उसके बाजुओं में कसी थी कूल्हे पर नाइटी अब चुस्त हो गई थी जिससे उसकी चर्बी की नरमी का अहसास रंगी उसे बिना छुए ही अपने अंदर महसूस कर पा रहा था ।

: अरे सीधा सीधा कहिए न कि दीदी की याद आ रही थी और इसीलिए तो आज आप खेतों में भी गिर गए हीही ( सुनीता खिलखिलाई )

: अरे ... क्या भाभी आप भी , वो तो मै यू ही फिसल गया था हाहा ( रंगीलाल ने सफाई दी )

: चलो झूठे , जरूर किसी को देख कर फिसले होगे आप हीही ( सुनीता मजे लेते हुए बोली और रंगी उसके मजाक से चौक गया । हालांकि पहले भी उसकी सुनीता से बात चीत होती थी थोड़े बहुत अप्रत्यक्ष मजाक होते थे मगर हर ऐसे माहौल में लोग हुआ करते थे मगर आज वो अकेली थी उसके साथ । )

: ओहो आपने तो पकड़ लिया मुझे भाभी ( रंगी ने भी बातें बनानी शुरू की , चलो इसी बहाने इतनी sexy सलहज से बात चीत होती रहे )

: अरे कौन है बताइए न , सच्ची में दीदी को नहीं बोलूंगी ( वो खिल कर बोली)

: हा लेकिन क्या फायदा , उसकी तो शादी हो रखी है । अब कोई फायदा नजर नहीं आता मुझे ( मुंह बना कर रंगी बोला )

: अरे उससे क्या , मै बात करूंगी समझा बुझा दूंगी । इतना अच्छा दूल्हा कहा मिलेगा । अरे आपके पास तो पूरा का पूरा एक्सपीरियंस है मै कह दूंगी कि पहली वाली को आज तक कोई शिकायत नहीं मिली हाहाहाहाहा ( सुनीता हस्ती हुई बोली )

सुनीता की बाते सुनकर उसके लंड में हरकत हो रही थी । तौलिए के नीचे जांघिये में उसका लंड बड़ा हो रहा था ।

: और बाउजी से क्या कहोगी ? ( रंगी मुस्कुराया उसकी आंखों में शरारत साफ झलक रही थी )

: उनको भी समझा दूंगी , आपके लिए इतना तो कर ही सकती हूं ( सुनीता हस कर बोली )

: लेकिन फिर राजेश भाई का क्या होगा ? ( रंगी अपने मुंह में हसी का फब्बारा घोंटते है बोला )

: उनको क्या दिक्कत होगी भला ? ( सुनीता अब उलझी और रंगी के शब्दों का मतलब तलाशने लगी )

: अरे उनकी बीवी से शादी करूंगा तो बेचारे रंडवे हो जायेंगे न हाहाहाहाहा ( रंगी ठहाका लगाते हुए बोला )

: क्या ? धत्त जीजाजी आप भी ... तबसे आप मेरे बारे में बात कर रहे थे ( सुनीता लाज से गाढ़ होकर मुस्कुराने लगी )

उसकी लज्जा भरी मुस्कुराहट उसके गोरे गाल और भी गुलाबी होने लगे थे ।

: हा भाई सोनल की मां के बाद मुझे किसी से शादी करनी होगी तो मै आपसे ही करूंगा , वो तो साले साहब आ गए बीच में नहीं मै आपसे ही करता ( रंगी अपने पूरे रंग में आ गया था )

: धत्त जीजा जी , आप भी न ( सुनीता लजाते हुए बोली उसके चेहरे की हसी रुक नहीं रहे थी )

: मै तो आपकी शादी में ही आपको पसंद कर लिया था ... फिर सोचा बेचारे साले के घर में क्यों डाका डाला जाए । उसका घर भी तो चलना चाहिए इसीलिए छोड़ दिया । ( रंगी अपना मजाक जारी रखते हुए बोला ).

: हाय दैय्या , इतने साल से मुझे पसंद कर रखा है और आज तक कुछ कहा नहीं । काश पहले बता देते तो शायद कुछ हो जाता ( सुनीता ने रंगी का मजा लेना चाहा )

: क्यों अब कोई चांस नहीं है क्या ( रंगी ने दाव तलाशा और एक शरारत भरी मुस्कुराहट से सुनीता की आंखों में देखा )

: उम्हू ( सुनीता ने मुस्करा कर लजाते हुए न में सर हिलाया )

: अरे खुद को थोड़ा समझाओ बुझाओ , देखो इतना अच्छा दूल्हा मिलेगा नहीं ( रंगी हस्ते हुए बोला )

: अच्छा जी ( सुनीता इतराई )

: और क्या, फिर पहली वाली को आज तक कोई शिकायत नहीं मिली तो आपको भी नहीं होगी । सोच लो ( रंगीलाल ने साफ साफ लफ्जों में सुनीता को ऑफर दिया कि पट जाओ , तौलिया में उसका लंड अब पंप हो रहा था )

सुनीता अपने ही मजाक के जाल में उलझ गई थी और हसने के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं था ।

: हा लेकिन , दुनिया समाज का क्या ? मेरे बच्चों का क्या होगा ? बाउजी का क्या होगा ? और उनका ( राजेश ) क्या ? ( सुनीता अभी भी रंगी के ऊपर दाव पलटने के फिराक में थी )

: अरे जहां 3 है 2 और सही , बाउजी का ख्याल सोनल की मां रख लेगी और साले साहब के लिए भी दूसरी लड़की देख लेंगे ( रंगी मजाकिया अंदाज में बोला ) बोलो क्या कहती हो ?

सुनीता की हालत खराब थी , कही न कही वो रंगी की चाल बूझ रही थी और रंगी के जाल में बुरी तरह फंस गई थी । वो रंगी के अप्रत्यक्ष रूप रखे अनैतिक सम्बंध के प्रस्ताव को समझ चुकी थी । मगर यह सब कुछ मजाक के पर्दे में हो रहा था और इसका एक ही तरीका था बचने का कि इस मजाक को मजाक से ही खत्म किया जाए ।

: अरे इतना जल्दी कैसे बता दूं , थोड़ा समय भी दीजिए ( सुनीता मुस्कुराई )

: अरे इतने साल तड़पा हुं अब और कितना समय ? ( रंगी अब इस मजाक को हकीकत में उतार चुका था उसके चेहरे पर बेचैनी के भाव उबाल मार रहे थे जिसकी आग उसके जांघिये में उसके तपते लंड से उठ रही थी । )

: बस आज रात ! ( सुनीता रंगी के चेहरे के बदलते रंग को भाप गई और उसने अब उठना ही सही समझा इसके लिए यही तरीका था कि वो इस बात को टाल दे )

ये कह कर वो उठ गई

: आप आराम करिए , मै बाउजी को दवा दे दूं । ( सुनीता मुस्कुराई और कमरे से निकल गई )

वही रंगीलाल उसके नाइटी में झटके खाते चूतड़ों को देख कर सिहर उठा और भाग कर दरवाजे तक गया । सुनीता मुस्कुराते है किचन की ओर जाती दिखी उसे ।

रंगी कमरे का दरवाजा भीड़का कर अंदर आया और अपना अकड़ा हुआ लंड तौलिए के ऊपर से भींचने लगा

: अह्ह्ह्ह बहनचोद बड़ी कातिल चीज है उफ्फ एक पल को लगा पट ही जाएगी । अह्ह्ह्ह मिल जाए तो मजा ही आ जाए पूरी रसमलाई है उम्मम ( रंगी अपना खड़ा लंड सहलाते हुए बड़बड़ाया फिर बिस्तर पर आराम करने लगा )


चमनपुरा

" अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म बेटा रुक जा, अह्ह्ह्ह्ह अभी रात में कर लेना अह्ह्ह्ह्ह हट अनुज आ रहा है " , रागिनी ने राज का मुंह अपने चूत से हटाया और पेटीकोट गिरा कर उसके कमरे से किचन में निकल गई।

सीढ़ियों से अनुज अपनी किताबें और नोट्स लेकर नीचे आ रहा था ,






उसने अपनी मां को सामने से किचन में जाते देखा और उसकी मादक चाल देखते ही उसके दिल में लालच पैदा हो गई ।

उसने राज को खोजा और देखा कि वो अपने कमरे में है तो उसने हाल में सोफे पर ऐसे कोने में बैठा जहां से किचन का नजारा मिलता रहे ।

रागिनी का ब्लाउज़ गहरे रंग का था, जो पसीने से पीठ और काँख के नीचे गीला होकर चिपक गया था। पसीने की पतली परत उनकी त्वचा पर चमक रही थी, और ब्लाउज़ का कपड़ा उनकी पीठ की बनावट को उभार रहा था। पेटीकोट हल्के रंग का था, जो गर्मी और पसीने से उनकी कमर और निचले हिस्से से चिपक गया था। उनके चूतड़ बड़े और भारी थे, जैसे मिट्टी के मटके, और पेटीकोट की पतली परत उसके चूतड़ों के आकार को और साफ कर रही थी।

अनुज की माँ चूल्हे के पास से हटीं और कुछ सामान लेने के लिए नीचे वाली अलमारी की ओर बढ़ीं। उन्होंने एक गहरी साँस ली, अपने माथे का पसीना फिर से पोंछा, और फिर धीरे से झुक गईं।






जैसे ही वे नीचे झुकीं, उसका पेटीकोट, जो पहले से ही पसीने से चिपका हुआ था, उनकी त्वचा पर और कस गया। उनके बड़े, चौड़े चूतड़ उस पतले कॉटन के कपड़े में फैल गए, और गर्मी की वजह से कपड़ा उनकी शारीरिक बनावट को और उभार रहा था।पेटीकोट उनकी गांड की दरारों के बीच खिंच गया, और पीछे से उस गैप का हल्का सा आभास दिखने लगा। चाँदनी की रोशनी भले न हो, लेकिन किचन की पीली बल्ब की रोशनी में वह दृश्य साफ था। उनके झुकने से ब्लाउज़ भी ऊपर खिसक गया, और उनकी कमर का नंगा हिस्सा और चौड़ा दिखने लगा। अनुज की नज़रें उस दृश्य पर ठहर गईं। उसकी साँसें एकदम तेज़ हो गईं, और उसके हाथ में पकड़ी किताब अब हल्के-हल्के काँप रही थी। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, और उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ने लगी। उसकी नज़रें अपनी माँ के चूतड़ों पर जमी थीं, और तभी उसे अपने शॉर्ट्स में एक सनसनाहट महसूस हुई। उसका लंड अचानक फड़फड़ाने लगा, जैसे कोई अनियंत्रित उत्तेजना उसे जकड़ रही हो। उसने किताब को अपनी गोद में दबाने की कोशिश की, लेकिन उसका ध्यान अब पूरी तरह अपनी माँ पर था।

अगले ही पल रागिनी खड़ी हुई और फैले हुए पेटीकोट के कपड़े का कुछ हिस्सा उसके गाड़ की दरारों में फंस गया , जिससे उसके दोनों चूतड़ पूरे गोल मटोल शेप में आ गए । अनुज का हलक सूखने लगा अपनी मां का कातिलाना रूप देख कर । शॉर्ट्स में उसका लंड बड़ा हो रहा था और वो किताबों के नीचे छिपा कर उसको मिस रहा था । आज शाम से उसकी हालत खराब थी , पहले उसकी कालेज की टीचर , फिर लाली और फिर उसकी मम्मी और अब खुद अनुज की मां उसकी हालत खराब कर रही थी । उसने कुछ तय किया ताकि इस परेशानी से उसे निजात मिले और वो अपने परीक्षा की तैयारी सही से कर पाए ।

इधर रागिनी भी खाना तैयार कर सबको खाना खिला दी ।

खाने के बाद अनुज ने राज से कहा कि वो अपने मोबाइल का हॉटस्पॉट ऑन कर दे उसे लैपटॉप पर कुछ काम है ।

फिर अनुज ऊपर चला गया ।

एक मां के तौर पर रागिनी चाहती थी कि अनुज उसके पास रहे , अकेले ऊपर सुलाने पर उसे डर लग रहा था मगर वो ये भी जानती थी कि राज से उसने कुछ वादा किया है । वासना और ममता में उसने वासना को चुना और बिना कुछ कहे उसे ऊपर जाने दिया । राज ने भी खुशी खुशी उसको हॉटस्पॉट दे दिया ताकि वो उन्हें डिस्टर्ब न करे ।

इधर अनुज कमरे में पहुंचते ही लैपटॉप में पोर्न साइट खोलकर बैठ गया अपने अरमानों सैलाब बहाने के लिए।

वही नीचे रागिनी के कमरे में जबरजस्त उठापटक मची थी , राज अपनी मां की टांगे उठा कर गचागच पेले जा रहा था । रागिनी की नंगी मोटी चूचियां खूब हिल रही थी ।






: अह्ह्ह्ह्हमम बेटा अह्ह्ह्ह और ओह्ह्ह्ह्ह कितना गर्म है तेरा लंड , उम्मम हर बार तू मुझे पागल कर देता है अह्ह्ह्ह ( रागिनी सिसकते हुए बोली )

: अह्ह्ह्ह्ह मम्मी आप भी कम हो , आते ही कपड़े उतार दी क्या करता मै अह्ह्ह्ह आपकी गाड़ देख कर पागल हो जाता हूं अह्ह्ह्ह फक्क्क् यूयू ओह्ह्ह्ह मम्मी अह्ह्ह्ह सीईईईईई

: हा बेटा चोद और तेज अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म बेटा चोद मुझे कस कस के अह्ह्ह्ह आ रहा है रुकना नहीं

इधर राज करारे झटके देकर पेल रहा था कि इतने में उसका मोबाइल बजने लगा

राज का लंड एकदम फड़फड़ाने लगा था उसकी मां ने झड़ते हुए उसके लंड को अपनी चूत के छल्ले में का लिया था मानो राज के लंड को निचोड़ रही हो और राज चिंघाड़ता हुआ झड़ने लगा अपनी मां की बुर में

: ओह बहिनचोद अह्ह्ह्ह्ह सीईईई ओह्ह्ह उम्ममम अह्ह्ह्ह फक्क्क् यूयू मम्मी उम्मम अह्ह्ह्ह्ह

राज अपनी मां के ऊपर ढह कर झड़ता रहा और उसकी मां उसको अपने सीने से लगाए रही । आखिरी बूंद निचोड़ने तक

एक बार फिर राज का मोबाइल बजा

हाथ बढ़ा कर अपनी मां की बुर लंड डाले हुए ही उसने मोबाईल देखा और अपनी मां को दे दिया

रागिनी अचरज से : कौन है ?

राज मुस्कुरा कर : आपकी समधन !!

ये बोलकर राज उठ गया और बाथरूम में चला गया ।

वही रागिनी फोन उठाते हुए पेटीकोट से अपनी गीली बुर पोछने लगी

: कैसी हो समधन जी ( रागिनी मुस्कुरा बोली )

: ठीक हूं दीदी और आप ( ममता बोली )

: मेरी भी हालत आपके जैसी हो गई है आज , अह्ह्ह्ह ( रागिनी देह तोड़ती हुई बोली)

: मतलब ?

: अरे आज आपके समधी जी भी नहीं है , ससुराल गए है घूमने ( रागिनी बिस्तर पर बैठते हुए बोली )

: अच्छा , मतलब आज रात आप भी छत पर जाएंगी हीही ( ममता हस कर बोली )

: हा सोच रही हूं उम्मम और आप ? ( रागिनी अपने पैर फैलाते हुई बोली )

: बस बत्तियां बुझा रही हूं हीही ( ममता की आवाज में शरारत झलकी )

: ऊहू तो कल रात का खूब मस्ती हुई उम्मम ( रागिनी ने छेड़ा )

: अह्ह्ह्ह सच कहूं तो ऐसा रोमांचक पहले कभी महसूस नहीं किया लेकिन डर भी लग रहा था हीही ( ममता हस कर बोली )

: इश्क है तो रिश्क होगा न , वैसे आज मै कुछ अलग करने वाली हूं

: क्या ? ( ममता जिज्ञासु होकर बोली )

: आज तो बकायदा खुली छत पर जाऊंगी और चादर डाल कर सोऊंगी खुले आसमान में ।

: क्या सच में ? छत पर ? आस पास का कोई देख लेगा तो ? ( ममता ने चिंता जाहिर की )

: अरे बत्ती बुझी रहेगी और अंधेरी रात है तो कोई टेंशन नहीं ( रागिनी ने ममता को चढ़ाया )

: अरे फिर मुझे नीचे जाना पड़ेगा चादर लेने

: ओहो मतलब मैडम पहले से ही अड्डे पर आ चुकी है ( रागिनी ने छेड़ा उसे )

: बस अभी अभी हीही, लेकिन मैं बालकनी में हू , छत पर जा रही हूं ( ममता ने कहा और वो जीने की ओर बढ़ गई )

उसने बहुत कोशिश की कि वो लोहे का दरवाजा बिना किसी आवाज के खोले मगर ऐसा हो नहीं पाया , चू चू करती हुई वो दरबाजे की सीटखनी खोली और आवाज करता हु दरवाजा बाहार की ओर खुला

रात का सन्नाटा उस मकान में दरवाजा खुलने की आवाज और गहरा हो चला था। चाँद की हल्की रोशनी छत पर बिखरी थी, और हवा में ठंडक थी। ममता, रागिनी से बात करने के बाद, एक बार फिर उस अजीब-सी बेचैनी में थी। उसका मन उसे छत की ओर खींच रहा था, जहाँ वो अपनी दुनिया में खो जाना चाहती थी। उसने धीरे से नंगे पाँव छत पर टहलने निकल गई। उसके कदमों की हल्की आहट छत की फर्श पर गूँज रही थी, और वो उस स्वतंत्रता के अहसास में डूबी थी।लेकिन आज रात कुछ अलग थी। मदन, जो आमतौर पर इस वक्त गहरी नींद में डूबा होता था, आज किसी अनजानी वजह से जाग रहा था। शायद वो दरवाजे की हल्की-सी आहट ने उसका ध्यान खींचा—शायद या शायद हवा ने कोई खिड़की हिलाई। उसने बिस्तर से उठकर मोबाइल उठाया और धीरे से कमरे से बाहर निकला। सबसे पहले उसका दिमाग ममता की ओर गया। घर में सिर्फ वो दोनों ही थे, और अगर कोई आहट थी, तो उसे जानना जरूरी था।मदन ने सबसे पहले ममता के कमरे की ओर रुख किया। उसने दरवाजा हल्का-सा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उसने धीरे से दरवाजा खोला—कमरा खाली था। बिस्तर पर चादर सिलवटों में थी, मानो ममता जल्दी में उठकर कहीं गई हो। मदन का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। "भाभी?" उसने हल्की-सी आवाज में पुकारा, लेकिन सन्नाटे ने उसकी आवाज को निगल लिया।

वो बाथरूम के पास पहुंचा और अब थोड़ा तेज और स्पष्ट आवाज में बोला " भाभीई"

इधर, छत पर टहल रही ममता ने अचानक मदन की आवाज सुनी। वो आवाज बाथरूम के पास एयर पैसेज वाले हिस्से आ रही थी सीधे छत पर ।उसका दिल धक् से रह गया। वो एकदम ठिठक गई, और उसकी नजरें जीने के दरवाजे की ओर गईं। "अरे, देवर जी जाग रहे है?" उसने सोचा, और घबराहट में उसका दिमाग तेजी से चलने लगा।

वो नंगी थी, और अगर मदन ने उसे इस हाल में देख लिया, तो क्या होगा? उसने जल्दी से नीचे उतरने का फैसला किया। लेकिन जीने का दरवाजा बंद करना जरूरी था, इससे पहले मदन तुरंत छत तक पहुँचे।ममता ने तेजी से जीने का दरवाजा बंद किया और सीढ़ियों के पास ही स्टोर रूम में छिप गई। अंधेरे में उसकी साँसें तेज चल रही थीं, और पायलों की हल्की खनक से वो और घबरा रही थी। वो सोच रही थी, "बस, किसी तरह अपने कमरे तक पहुँच जाऊँ, फिर सब ठीक हो जाएगा।

उधर, मदन छत की ओर जाने वाले जीने तक पहुँचा, लेकिन दरवाजा बंद पाकर वो ठिठक गया। उसने सोचा, शायद ममता बालिकिनी में गई हो। वो बालिकिनी की ओर मुड़ा, जब तक वो दरवाजे तक पहुंच रहा था कि तभी उसे गलियारे में एक हल्की-सी आहट सुनाई दी—धम्म-धम्म, और फिर पायलों की खनक। उसका ध्यान तुरंत जीने की ओर गया। वो तेजी से वापस लपका।

ये आहट ममता की थी , उसे ममता को लगा कि यही मौका है। स्टोर रूम का दरवाजा हल्का-सा खोलकर वो तेजी से नीचे की ओर भागी थी । सीढ़ियाँ अंधेरी थीं, और उसका भारी शरीर तेजी से भागने में साथ नहीं दे रहा था। उसकी पायलें हर कदम पर खनक रही थीं, और वो बस यही सोच रही थी कि किसी तरह अपने कमरे तक पहुँच जाए।मदन ने जीने की ओर दौड़ लगाई। उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई, और उसकी रोशनी में उसे एक परछाई दिखी—कोई तेजी से सीढ़ियों से नीचे जा रहा था

" कौन है , मै कहता हूं रुक जाओ " , मदन तेज गुर्राते हुए आवाज में बोला ।

ममता मदन की आवाज से काफ उठी और उसका कलेजा धकधक होने लगा था , नंगी चूचियां अंधेरे में ऊपर नीचे हो रहे थी । उसके भीतर की गर्मी कही गायब सी हो गई थी ।

हाल में उतरते हुए उसका पांव जीने के पास रखे एक गमले से टकराया : अह्ह्ह्ह मईया उफ्फफ ( ममता दर्द से तड़पी )

उसके कदम धीमे हो गए और इधर मदन तेजी से नीचे आया सामने , उसने जैसे ही ममता की चीख सुनी तो उस ओर टॉर्च जलाते हुए उसे पुकारा : भाभी ? आप है क्या ?

तभी उसे टॉर्च की रोशनी में ममता की आकृति साफ दिखी—उसके कदमों की थिरकन, और वो तेज भागने की कोशिश। मदन ने एक पल को अपनी आँखें मलीं, जैसे उसे यकीन न हो रहा हो। "भाभी" उसने जोर से पुकारा, उसकी आवाज सीढ़ियों पर गूँज उठी।ममता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, और वो बस अपने कमरे की ओर भाग रही थी।


मदन तेजी से पीछे आ रहा था, और टॉर्च की रोशनी अब उसे और करीब ला रही थी।

तभी एकाएक मदन ठिठक कर रह गया , मोबाइल के टॉर्च की सीमित रोशनी में उसने वो नजारा देखा जिसकी उसने उम्मीद नहीं की थी ।






सामने उसकी मां जैसी भाभी , नंगी अपने कमरे की ओर भाग रही थी । उसके बड़े बड़े भड़कीले चूतड हिलकौरे खाते हुए तेजी से उस रोशनी के घेरे से बाहर हो रहे थे ।

आज तक जिन मखमली गुलाबी चूतड़ों को वो सिर्फ सलवार और साड़ी में थिरकते देखता था आज वो उन्हें पूरा नंगा देख रहा था ।

उस दृश्य का असर ऐसा हुआ कि मदन वही जम सा गया , मुंह खुला हुआ लंड में एक अजीब सी हरकत, पेट में अजीब सा घबराहट भरी हलचल और भारी होती सांसे ।

उसकी चेतना तब जागी जब ममता कमरे में पहुंच कर अपना दरवाजा तेजी से बंद कर दी।

वो भागकर उस तरफ गया और ममता के कमरे के दरवाजा खटखटाने लगा

: भाभी , क्या हुआ आप ठीक तो है

इधर ममता की सास फूल रही थी वो खुद को कोसे जा रही थी रागिनी की बातों में आने के लिए, उसने झट से एक नाइटी निकाली और ऊपर से डाल दिया ।

उसके पैर के अंगूठे में चोट आई थी जिससे उसको चलने में दिक्कत हो रही थी ।

: मै ठीक हूं देवर जी आप सो जाइए ( ममता ने हिम्मत करके बोला )

: वो आपको चोट लगी थी न ( मदन भी चाह कर उस चीज के बारे में पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था जो दृश्य उसने अभी अभी देखा था )

: अह मामूली चोट है देवर जी आप सो जाइए ( ममता उखड़ कर बोली , मानो वो बस यही चाहती थी कि मदन उसके कमरे के बाहर से चला जाए और मदन चला भी गया )

ममता ने राहत की सांस ली और बिस्तर पर आ गई , उसने दर्द वाली जगह पर मलहम लगाया और बिस्तर पर लेट गई

उसका शरीर थक चुका था और पैर का दर्द उसकी वासना को निगल लिया था ।

वो धीरे धीरे नींद के आगोश में जा रही थी तभी उसका मोबाइल बजने लगा

ये मुरारी का कॉल था ।

मुरारी खाना पीना करके टहलते हुए सोचा क्यों न ममता की थोड़ी खोज खबर ले ली जाए , आज उसने सारा दिन जो कुछ सहा ऐसा अनुभव उसे अभी तक नहीं हुआ था । इतनी हसीन गदराई औरतें , मंजू के साथ बिताए वो पल और फिर अपनी लाडली बहु की वो हरकतें जो उसने वीडियो में देखी थी , मुरारी का लंड एकदम से अकड़ा हुआ था । आज रात तो उसे नीद नहीं आ रही थी मानो । तड़प और बेचैनी से वो ममता से बातें कर रहा था , और मंजू सारे काम निपटा रही थी और मुरारी का मूड थोड़ा रोमांटिक हो रहा था , उसने सोचा क्यों न जब तक मंजू बिस्तर लगाती है और बाकी काम निपटाती है तबतक वो ममता से थोड़ी गरमा गर्म बातें कर ले और वो धीरे से पीछे आंगन से होकर जीने की खुली सीढ़ियों से ऊपर चला जाता है ।

इधर मंजू सारे काम निपटा चुकी थी और बिस्तर लगा रही थी ।

मंजू के मन में एक हल्की-सी उमंग थी। कल सुबह वो और मुरारी अपने घर के लिए निकलने वाले थे, और इस लंबी यात्रा से पहले उसे बस इतना चाहिए था कि मुरारी जल्दी से बिस्तर पर आ जाए, ताकि दोनों को अच्छी नींद मिल सके। उसने बिस्तर को बड़े जतन से लगाया था—चादर को कसकर बिछाया, तकिए को ठीक किया, और कमरे में हल्की-सी अगरबत्ती की खुशबू बिखेरी थी। मंजू को ये छोटी-छोटी चीज़ें करने में सुकून मिल रहा था। उसका मन आज कुछ हल्का था, शायद इसलिए कि घर लौटने की खुशी उसे बेचैन कर रही थी। वो बिस्तर लगाकर मुरारी को बुलाने के लिए जीने की ओर गई और उसे हलकी सी मुरारी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। पहले तो उसने ध्यान नहीं दिया, सोचा शायद मुरारी किसी दोस्त से बात कर रहा होगा। पर जब वो जीने की सीढ़िया चढ़ कर थोड़ा ऊपर गई , जैसे ही वो और करीब पहुँची, उसकी आवाज़ साफ होने लगी। मुरारी का लहजा कुछ अलग था—नरम, भारी, और एक अजीब-सी सिहरन से भरा हुआ। मंजू के कदम अनायास ही रुक गए। उसने खुद को सीढ़ियों पर झुक कर थोड़ा छिपा लिया, जैसे कोई बच्चा जो छुपकर कुछ देखने की कोशिश कर रहा हो।

: अह जान, कितनी रातें तुम्हारे बिन गुज़रेंगी (मुरारी की आवाज़ में एक गहरी उदासी और लालसा थी। )

: अब और नहीं रहा जाता। जी चाहता है कि बस लौट आऊँ तुम्हारे पास, तुम्हारी बाहों में... तुम्हारे बड़े, रसीले दूध में अपना मुँह लगा कर सारी थकान मिटा लूँ। (मंजू के चेहरे पर एकाएक गर्मी-सी दौड़ गई। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने अपने होंठों को हल्के से दबाया, जैसे उसकी साँसें भी उससे बगावत कर रही हों। )

मुरारी की ये बातें—इतनी निजी, इतनी बेपरवाह—उसके लिए एकदम अनजानी थीं। वो जानती थी कि मुरारी अपनी बीवी ममता से बात कर रहा था, पर ऐसी बातें? मंजू ने कभी नहीं सोचा था कि मुरारी का ये रूप भी हो सकता है। उसका मन एक पल को लजा गया, पर अगले ही पल एक अजीब-सी उत्सुकता ने उसे जकड़ लिया।वो वहीं रुकी रही, सीढ़ियों की आड़ में खड़ी, अपनी साँसों को धीमा करने की कोशिश करती हुई। उसने देखा कि वो फोन को कान से लगाए, एक हाथ से पजामे के ऊपर से कुछ बेचैनी भरे अंदाज़ में खुद को सहला रहा था। उसकी आँखें आधी बंद थीं, और चेहरे पर एक तीव्र भाव था—जैसे वो ममता की बातों में पूरी तरह खो गया हो। मंजू की नज़रें उस पर टिक गईं। वो चाहकर भी अपनी जगह से हिल नहीं पा रही थी। उसका मन बार-बार कह रहा था कि उसे चले जाना चाहिए, कि ये गलत है, पर उसके पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।मुरारी की आवाज़ फिर गूँजी, इस बार और गहरी, और सिहरन भरी।


: हाँ, अमन की मां ... बस तुम्हारी वो रस भरी फांके याद करके ही... उफ़, तुम यहाँ होती तो... ( उसकी बात अधूरी रह गई, और उसने एक गहरी साँस ली, जैसे कोई तूफान उसके भीतर उठ रहा हो। )

मंजू ने अनायास ही अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। उसका चेहरा अब पूरी तरह लाल हो चुका था, और उसकी साँसें उथली हो रही थीं। वो समझ नहीं पा रही थी कि ये जो वो सुन रही थी, वो उसे परेशान कर रहा था या फिर उसके भीतर भी कुछ अजीब-सा जाग रहा था।मंजू का मन एक तूफान में फँस गया था। एक तरफ वो मुरारी को बुलाने आई थी, उसे कहना चाहती थी कि देर हो रही है, सो जाना चाहिए। पर अब? अब वो क्या कहेगी? क्या वो बस वापस नीचे चली जाए और ये सब भूल जाए? या फिर... वो और सुनना चाहती थी? उसने खुद को झटका दिया, जैसे अपनी ही सोच से डर गई हो। पर फिर भी, वो वहीं खड़ी रही, मुरारी की बातों में उलझती हुई, अपने ही मन के उलझे धागों को सुलझाने की कोशिश करती हुई।

: पता है आज मैने तुम्हारे लिए एक नए मॉडल के ब्रा पैंटी लिया है , उसमें तुम्हारे बड़े बड़े मटके जैसे चूतड़ पूरे बाहर आ जायेंगे उम्मम और मै उन्हें ऊपर से खा जाऊंगा ..... मुझे तो पूरा केक जैसा ही लगते है , अह्ह्ह्ह ( मुरारी जोरो से अपना पजामा पकड़ता हुआ सिसकारियां लेता हुआ बोला)

इधर मंजू की की सांसे अटक गई और कि अभी अभी मुरारी ने क्या बोला । अंधेरे में उसकी आंखे बड़ी हो गई , उसकी दिल में अजीज सी बेचैनी होने लगी थी मुरारी की गर्म बातें सुनकर । पैर उसके काप रहे थे , पेट में अजीब सा हलचल मचा था ।

वो रुकी नहीं धीरे से सरक कर नीचे उतर आई उसकी सांसे अभी भी तेज थी ।

भागकर वो कमरे में आई और दो ग्लास गटागट पानी घोंट गई , अभी भी उसका हांफना जारी था ।

उसके जहन में मुरारी के कहे एक एक शब्द चित्रों में घूम रहे थे । धीरे धीरे उसकी सांसे बराबर होने लगी । उसके ख्याल में मदन छाने लगा , फिर एक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आई और वो खुद ही शर्मा गई । फिर अगले ही पल उलझ सी गई , कि क्या जवाब देगी वो मदन को , कैसे उसका सामना करेगी । मदन के ख्यालों में वो उलझ ही गया , मुरारी एकदम से उसके जहन से गायब हो गया ।

करीब 20 मिनट बाद मुरारी की आहट आई शुरू हुई , हल्की मोबाईल के टॉर्च की रोशनी ।

मंजू ने चटाई पर लेटे हुए आंखे बंद कर ली । उसका एक पाव फोल्ड था और उसके अपने आंखों पर अपनी बाजू रखे हुए थी ।

मुरारी गुनगुनाता हुआ कमरे में आया ।

सहसा उसकी नजर चटाई पर सोई हुई मंजू पर गई । कमरे में अंधेरा था, सिवाय उस छोटी-सी रोशनी के, जो अब मंजू के चेहरे पर पड़ रही थी।मंजू ने अपनी साँसों को यथासंभव नियंत्रित रखने की कोशिश की। वह जानती थी कि मुरारी उसे देख रहा है। टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर धीरे-धीरे घूम रही थी, जैसे मुरारी यह सुनिश्चित करना चाहता हो कि वह गहरी नींद में है। मंजू का शरीर सख्त हो गया, लेकिन उसने अपनी पलकें नहीं हिलाईं। वह नहीं चाहती थी कि मुरारी को ज़रा-सा भी शक हो।

मुरारी का मन अब पूरी तरह उसकी उत्तेजना के हवाले था। उसकी नज़रें मंजू के चेहरे से हटकर नीचे की ओर गईं। उसकी साड़ी का पल्लू हल्का-सा खिसका हुआ था, और नीचे उसकी टाँगें चटाई पर फैली थीं। टॉर्च की रोशनी में मंजू की गोरी टाँगें एकदम चमक रही थीं, जैसे चाँदनी में कोई संगमरमर की मूर्ति हो। मुरारी की साँसें और भारी हो गईं। उसके मन में पिछली रात की यादें ताज़ा हो उठीं—कल रात, जब उसने मंजू की साड़ी को हल्के से उठाया था और उसकी नज़रें वहाँ मंजू के चूत पर गई थीं,

उसका हाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसने साड़ी के किनारे को हल्के से पकड़ा और उसे ऊपर उठाने की कोशिश शुरू की। उसकी हरकत इतनी सावधानी भरी थी कि हवा में कोई आहट तक न हो। लेकिन मंजू जाग रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसका मन पूरी तरह सजग था। वह मुरारी की हर हरकत को महसूस कर रही थी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, और साँसें जैसे गले में अटक रही थीं।






मंजू के मन में एक तूफान-सा उठ रहा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। एक तरफ उसे मुरारी पर गुस्सा आ रहा था—कैसे वह ऐसी नीच हरकत कर सकता है? उसे तो मुरारी को रोकना चाहिए, उसे डाँटना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, वह डर भी रही थी। अगर वह अभी आँखें खोल दे, तो क्या होगा? मुरारी क्या कहेगा? क्या होगा उस रिश्ते का जिसकी शुरुआत वो करने जा रही है और सबसे बड़ी बात—वह खुद इस स्थिति से कैसे निकलेगी?

इधर, मुरारी की उंगलियाँ धीरे-धीरे साड़ी को और ऊपर खींच रही थीं। टॉर्च की रोशनी अब मंजू की टाँगों पर पूरी तरह केंद्रित थी। उसकी गोरी त्वचा रोशनी में और साफ चमक रही थी। उसने फोल्ड हुई टांगों के गैप में टॉर्च की रोशनी डाली और अंदर झांका ।






एकदम दूधिया चिकनी जांघें कितनी मुलायम और चर्बीदार और भीतर एक मेहरून रंग की पैंटी पूरी तरफ से उसके बुर में चिपकी ।

मंजू अपने चूत को जांघों से कसने लगी , मानो अपनी इज्जत बचा रही हो और मन ही मन मुरारी को कोश रही थी । खुद को धिक्कार रही थी कि कैसे नीच आदमी से उसने नाता जोड़ लिया ।

उसकी आंखे नम थी मगर आंसुओ को गिरने की इजाजत नहीं थी , सांसे सिसकना चाहती थी लेकिन धड़कने डर रही थी । डर रही थी मुरारी से सामना करने से , डर था कि वो अपना होश न खो बैठे ।

अगर ही पल मुरारी ने उसकी साड़ी छोड़ दी और धीरे से उसके मुंह से निकला : सॉरी मंजू

उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद हवा में ही गुम हो जाए, लेकिन मंजू के कानों तक वह साफ़ पहुँची।मुरारी ने साड़ी को वापस नीचे कर दिया, टॉर्च बंद की, और चुपके से उठकर अपने बिस्तर की ओर चला गया। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया, सिवाय मंजू की धड़कनों के, जो अब भी तेज़ी से चल रही थीं। वह अभी भी आँखें बंद किए लेटी थी, लेकिन उसका मन अब एक नए तूफान में फँस गया था।

लेकिन यह शब्द उसके लिए राहत की जगह और सवाल खड़े कर रहा था। क्या मुरारी सचमुच पछता रहा था? या यह बस उसका डर था कि कहीं मंजू जाग न जाए? मंजू को गुस्सा आ रहा था—उस हरकत के लिए, जिसने उसकी इज्जत को ठेस पहुँचाई थी। लेकिन साथ ही, उस "सॉरी" में कुछ ऐसा था, जो उसे मुरारी के इंसान होने की याद दिला रहा था। शायद उसने ममता के साथ जिस तरह की बातें की वो बहक गया हो , लेकिन एक मर्द को उसकी मर्यादा तो पता होनी ही चाहिए?

इनसब से अलग एक और विचार मंजू के दिमाग में अब घर करने लगा , एक डर जो उसके जहन पर छाने लगा कि क्या उसे अब मुरारी के साथ जाना चाहिए या नहीं ?

वही रात के गुम होते सन्नाटे में अरुण अपने बंद कमरे की कुर्सी पर बैठा लैपटॉप में लाइव sex स्ट्रीम देख रहा था और जोरो से अपना लंड हिला रहा था ।

वही लाइव स्ट्रीम में दो मोटी गदराई औरतें मास्क पहने हुए एक दूसरे के लिप्स चूस रहे थे । एक औरत बगल में बैठी दूसरी औरत की साड़ी के ऊपर से उसके चूचे सहलाते हुए बोली: कॉमन गाइड , क्लब ज्वाइन करो । जिसे भी इस सेक्सी बिच के न्यूड चाहिए क्लब ज्वाइन करें , आज रात ऑफर लिमिटेड है ।

अरुण तेजी से लैपटॉप में कुछ टाइप करता है और लाइव स्ट्रीम पर कुछ टिप के साथ मैसेज डालता " send me private I'll pay u all. "

जारी रहेगी
 
नए अध्याय का अपडेट 06 पेज नं 1210 पर पोस्ट किया गया

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💥अध्याय : 02💥

अपडेट 07

प्रतापपुर

सुबह का वक्त था, सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था। हल्की ठंडी हवा में खेतों की मिट्टी की सोंधी महक बिखरी हुई थी। रंगी और बनवारी, दोनों गाँव के बाहर खेतों की ओर टहल रहे थे। बनवारी की रोज की आदत थी—सुबह शौच के लिए निकलना, रास्ते में दुनिया-जहान की बातें करना, और हँसी-मजाक में वक्त गुजारना।

घर की वापसी हो रही थी ।

रंगी, चेहरे पर शरारती मुस्कान लिए, अपने खाली लोटे को एक हाथ में लटकाए हुए चल रहा था। बनवारी, भी मूँछों को ताव देता हुआ, कंधे पर पुरानी गमछी डाले, रंगी के पीछे-पीछे था।खेतों की ओर जाने वाली पगडंडी पर हरियाली छाई थी। मक्के के खेतों में हल्की ओस की चमक थी, और दूर कहीं कोयल की कूक सुनाई दे रही थी। रंगी ने चलते-चलते एक ठूंठ पर पैर रखा, संतुलन बनाया, और फिर बनवारी की ओर मुड़कर, आँखों में चमक लिए बोला

: रात बड़ी देर से सोए थे क्या बाउजी ? (उसने अपनी भौंहें उचकाईं, जैसे कोई राज खोलने की फिराक में हो )

बनवारी ने पहले तो रंगी को घूरा, फिर हल्का-सा ठहाका लगाया।

: अच्छा तो जग रहे थे आप भी जमाई बाबू , हाहाहा ( बनवारी झूठी हसी चेहरे पर लाता हुआ बोला , मगर भीतर से वो रंगी की जिज्ञासा के लिए सही जवाब तलाश रहा था )

: इतनी तेज सिसकियां किसी की भी नीद उड़ा देगी बाउजी , थी कौन वैसे ? ( रंगी ने शरारत भरी मुस्कुराहट से अपने ससुर को देखा)

: कमला थी , अरे शाम को उसको डांटा था थोड़ा फुसलाना पड़ता है । मौके बेमौके पर काम आती ही है ( बनवारी ने रंगी को समझाते हुए कहा )

: सही है बाउजी , चोट मुझे लगी थी और मलहम आप लगवा रहे थे हाहाहा ( रंगी ने बनवारी का मजा लेते हुए अंगड़ाई लिया )

: क्या बात है जमाई बाबू , लग रहा है आपकी नींद भी पूरी नहीं हुई ( बनवारी ने बात घुमाई)

: अब सोनल की मां के बगैर तो मुझे नीद ही नहीं आती , उसपे से आपने और जगा दिया ( रंगी मुस्कुरा कर बोला और उसकी नजर एक दूर जा रही एक औरत के लचकदार मटकते चूतड़ों पर जमी थी । बड़े रसीले मटके जैसे )

: अब रहम भी खाओ जमाई बाबू क्या आंखों से कपड़े उतारोगे हाहाहा ( बनवारी मजाक करते हुए बोला )

: अरे क्या बाउजी , नहीं नहीं बस उसे देखा तो सोनल की मां याद आ गई , ऐसी ही लचक ... खैर ( रंगी अपने ही ससुर के आगे अपनी बीवी के मटके जैसे चूतड़ों का गुणगान करने में लजा सा गया )

: अरे अब कह भी दो भाई , इसमें शर्माना कैसा ? बीवी है तुम्हारी और कौन सा हम भरे समाज में है या फिर हमें अपनी दोस्ती के लायक नहीं समझते जमाई बाबू , बोलो ? ( बनवारी चाह रहा था रंगी थोड़ा झिझक कम करे अपनी और उसकी लाडली बेटी रागिनी के बारे में खुल कर बातें करें )

: अरे नहीं नहीं बाउजी क्या आप भी , हाहा , आप मेरे पिता जैसे है कुछ तो लिहाज करना ही होगा न ! ( रंगी मुस्कुराया )

: अच्छा ठीक है भाई , लेकिन इतना भी क्या शरमाना । जैसे तुमने बिना मेरी बेटी के साथ कुछ ही 3-3 पैदा कर दिए हाहा ( बनवारी ने माहौल हल्का किया )

: क्या बाउजी आप भी न ( रंगी हसते हुए शर्म से झेप गया , उसे उम्मीद नहीं थी कि बनवारी उससे ऐसे पेश आयेगा ) चलिए घर आ गया

और दोनों बाहर गेट के पास नल पर हाथ धुलने लगे ।

: भाई तुमने तो दातुन किए नहीं , तुम भाई ब्रश ही करोगे । तो ऐसा है कि तुम ब्रश कुल्ला करो मै जरा नहा लेता हूं ( बनवारी अपने देह से अपनी बनियान उतारता हुआ नीचे बस धोती लपेटे हुए पीछे आंगन की ओर चला गया ।

रंगीलाल भी हाथ धूल कर अपने कमरे में बैग से ब्रश लेने चला गया

अभी वो कमरे में गया ही था कि उसे तेजी से किसी के भागने की आहट आई

आहट इतनी तेज थी कि वो अचरज से बाहर झांकने आया तो देखा घर के बच्चों में कोई बनवारी के कमरे के पास वाले जीने से ऊपर गया है ।

रंगीलाल के इग्नोर किया और अपना समान निकालने लगा ।

वही पीछे आंगन में बनवारी खुले में नहाने बैठ गया , मोटर चालू थी और तेजी से पानी आ रहा था । बनवारी ने आंगन का दरवाजा लगाया और धोती निकाल कर पूरा नंगा हो गया ।

इस बात से बेखबर कि कोई उपर की छत से छिप कर उसे देख रहा था ।

वो पूरा नंगा होकर खुले आंगन में बैठा था और अपने देह पर पानी गिरा रहा था ।

वो एक प्लास्टिक की छोटी स्टूल पर था अपनी टांगे फैलाए हुए एड़ी घिस रहा था और उसके बड़े बड़े झूलते आड़ो के साथ उसका मोटा काला बैगन जैसा लंड सोया हुआ भी विकराल लग रहा था ।

बनवारी अपने देह पर पानी डाल रहा था और उसका लंड भीग रहा था

तभी उसे लगा कि कोई उपर से देख रहा था किसी साए के होने का अहसास

झट से उसने नजर ऊपर की और अपने सीने पर हाथ मलने लगा ।

उसने वहा से ध्यान हटाया क्योंकि जो भी था वो वहा से पीछे हो गया और कुछ देर तक अपने देह को बिना साबुन के मलता रहा और जब बाल्टी के पानी की हलचल हल्की हुई तो उसने एक लहराती हुई झलक पानी की बाल्टी में देखी और वो दो चुटिया वाली लड़की कोई और नहीं गीता थी ।

बनवारी एकदम से असहज हो गया था उसने झटपट से पानी डाला और अपनी धोती लपेटे कर बाहर आया । उसका अंदाजा सही था , उसे बाहर बड़े आंगन में गीता नजरे चुराती हुई ब्रश करती हुई दिखाई दी ।

बनवारी को पसंद नहीं आया कि उसकी नातिन ऐसा कुछ हरकत करेगी । भला अभी उसकी उम्र क्या है और ये कई दिनों से बनवारी महसूस कर रहा था मगर आज गीता की पहचान हो गई थी ।

बनवारी चुपचाप अपने कमरे में चला गया और रंगीलाल अपने कपड़े लेकर एक तौलिया लपेट कर बनियान में बाथरूम की ओर गया ।

उसकी नजर अनायास सुनीता को खोज रही थी और किचन में उसे देखते ही वो उस ओर ही बढ़ गया ।

दरवाजे पर आहट और सुनीता सतर्क होकर रंगीलाल को देख कर मुस्कुराई । उसकी नजर रंगीलाल के कंधे की चोट पर गई जो अब काली पड़ने लगी थी ।

: जख्म कैसा है आपका ? ( सुनीता ने इशारा किया )

: आपने दिया है आप जानो ( रंगी ने सुबह सुबह छेड़ा उसे )

: धत्त क्या आप भी सुबह सुबह ( सुनीता लजाई)

: सुबह का ही तो इंतजार था , आपकी समय सीमा पूरी हो गई है भाभी जी ( रंगीलाल का इशारा रात वाले वाक़िये पर था )

: क्या ? धत्त , आप तो सीरियस हो गए ( सुनीता अब घबराई मगर उसकी खूबसूरत होठों की हसीन मुस्कुराहट के कही खो सी गई )

: तो क्या आपने हमारे प्यार को मजाक समझा था ( रंगी ने भौहें उचका कर पूछा)

: धत्त जीजा जी , आप मुझे कंफ्यूज कर रहे है । क्या आप सच में ? ( सुनीता की सांसे तेज थी )

: अभी भी कोई शक है आपको ( रंगी के भीतर वासना के जज्बात उसके लंड में सुरसुराहट भर रहे थे ) मुझे तो बस आपकी हा का इंतजार रहेगा ।

ये बोलकर रंगी मुस्कुराता हुआ बाथरूम की ओर चला गया और सुनीता वही उलझी हुई खड़ी रही । उसका मन बार बार यही समझा रहा था कि उसके नंदोई उससे मजाक ही कर रहे है । तभी उसका ध्यान अपने पति राजेश को ओर गया और ना जाने क्यों वो चिढ़ सी गई । बीती रात राजेश फिर पी कर आया था और अभी तक उठा नहीं था ।

सुनीता ने बबीता को आवाज दी : गुड़िया , ये गुड़िया ?

बबीता भागकर आई : हा मम्मी !!

सुनीता घुड़क कर : जा तेरे पापा को जगा जल्दी जा

बबीता जो कमरे में सुबह सुबह ही टीवी चालू करके बैठी थी उसकी मां ने उसको काम फरमा दिया ।

वो भी भुनकती हुई अपने पापा को जगाने उनके कमरे में गई

राजेश बेड पर पेट के बल पसरा हुआ था , बबीता बेड के करीब खड़ी होकर अपने पापा को हिला कर आवाज देने लगी

: पापा उठो , पापा

: उम्ममम ( राजेश ने वैसे ही लेटे हुए अपनी आँखें खोलनी चाही तो उसके सामने बबीता की चिकनी जांघें थी । वो इस समय शॉट्स और टॉप में आई थी । )

गोरी चिकनी दूधिया जांघें देखते ही राजेश के जहन में कल वाली छवि उभर आई और उत्तेजना उसके सोए हुई चेतना पर हावी होने लगा

: इधर आ बेटा ( राजेश करवट लेते हुए बबीता की कलाई पकड़ कर बिस्तर पर बिठाया )

: उम्हू छोड़ो नहीं बैठना मुझे आपके पास ( बबीता को उसके बाप के देह से शराब की बू आती महसूस हो रही थी उसने हाथ झटक कर छुड़ाना चाहा )

मगर राजेश जबरन उसे पकड़ कर बिठा लिया और उसके पीठ सहलाने लगा

: क्या हुआ गुड़िया , बेटा ( राजेश ने उससे दुलारा और इसी बहाने वो बबीता के गुदाज नर्म पीठ का स्पर्श ले रहा था )

: उन्हूं छोड़ो मुझे ( बबीता ने कंधे झटके ) आप गंदे हो इसलिए नहीं आती हूं आपके पास हूह ( बबीता ने मुंह बनाया

: अच्छा नहा लूंगा तो रहेगी न मेरे पास ( राजेश ने फुसलाया )

: ना ( बबीता ने ना में सर हिलाया )

: फिर ?

: आप जब शराब नहीं पियोगे तो ही मै आपके पास रहूंगी, पहले प्रोमिस करो कि आप शराब नहीं पियोगे, बोलो ( बबीता उसकी ओर घूम कर बोली )

राजेश अपने नशे की लत से बंधा था मगर एक अनजाना लालच उसे बबीता की ओर खींच रहा था

: ठीक है प्रोमिस , लेकिन तुझे मेरे साथ टीवी देखनी पड़ेगी ठीक है ( राजेश ने उसकी हथेली अपने हाथों में ली )

: ओके पापा , हीही ( बबीता एकदम से खुश हो गई ) चलो अब उठो बहुत बदबू कर रहे हो आप हीही ( बबीता उसका हाथ पकड़ कर खींचने लगी )

शिला के घर

मानसिंह छत से नीचे आया , कल रात रज्जो की वजह से उसे ऊपर सोना पड़ा था , लेकिन कम्मो ने उसे इसका अफसोस नहीं होने दिया ।

मगर उसकी नजर रज्जो पर जम गई थी , कल सुबह जबसे उसने रज्जो को अपनी गोद में खिलाया था उसके मोटे बड़े भड़कीले चूतड़ों को मसला था उसकी नंगी पेट पर अपने हाथ फेरे थे , उस अहसास से मानसिंह उभर नहीं पाया था । जब जब उसकी नजरें रज्जो पर जाती एक बिजली सी कौंध जाती उसके जिस्म में , लंड उसकी भड़कीले चूतड़ों को देख कर पागल हो जाता था । मगर कही न कही वो थोड़ा शर्मिंदा था , रज्जो और मानसिंह दोनों एकदूसरे से नजरे चुरा रहे थे ।

सीढ़िया उतरते हुए मानसिंह की नजर किचन में गई , उसने अभी तक कल वाली वही शिला की साड़ी पहनी थी , मगर इस बार मानसिंह ने धोखा नहीं खाया और चुपचाप बिना उसकी नजर में आए धीरे से अपने कमरे की ओर चला गया

अंदर कमरे में शिला अपने मानसिंह के ही कपड़े स्त्री कर रही थी

अपनी गदराई बीवी को कुर्ती लेगी के देख कर मानसिंह का लंड एकदम से अकड़ गया

उसने पीछे से आकर उसके नरम चर्बीदार चूतड़ों पर पंजा जड़ा

: अह्ह्ह्ह्ह मैयायाह उम्मम क्या करते हो जी अह्ह्ह्ह ( शिला मानसिंह के थप्पड़ से झनझना गई और अपने कूल्हे सहलाने लगी )

: उम्मम मेरी जान आज तो सारी रात तड़पा हु तुम्हारे लिए ( मानसिंह पीछे से हग करता हुआ उसके बड़े बड़े रसीले मम्में कुर्ती के ऊपर से मसलने लगा )

: अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म क्यों ऑनलाइन देखा नहीं क्या मुझे , कैसे तुम्हारी याद इतना बड़ा डिल्डो डाल रही थी ओह्ह्ह्ह उम्ममम नहीं रुकिए न ( शिला वही दिवाल के लग कर खड़ी हो गई और मानसिंह उसकी कुर्ती उठा कर लेगी के ऊपर से उसकी बुर सहलाने लगा )

: अह्ह्ह्ह्ह मजा तो तब आता जान , जब तुम रज्जो भाभी की बुर के दर्शन भी कराती , अह्ह्ह्ह तुम दोनों की जोड़ी रात में एकदम हिट थी । कितने सारे लोगों ने क्लब ज्वाइन किया ( मानसिंह उससे लिपट कर उसके चूचे कुर्ती के ऊपर से मसलने लगा और शिला भी उसका लंड पकड़ की ली )

: आज देख लेना मेरी जान , आज दुपहर में कितने सारे क्लाइंट को फोटो भेजनी है , तुम्हारे पास वीडियो भेजूंगी पूरी नंगी करके ( शिला ने उसका लंड भींचते हुए उसकी आंखों में देख कर बोली )

:अह्ह्ह्ह सच में जान, जब से रज्जो भाभी को छुआ है तबसे कुछ भी इतना नरम और मुलायम नहीं लगता है , सोचता हूं एक बार फिर उन्हें अपनी गोद में बिठा लू अह्ह्ह्ह ( मानसिंह बोलते हुए शिला के लिप्स से अपने लिप्स जोड़ लिया और पजामे में बना हुआ लंड का तंबू सीधा उसकी बुर में कोचने लगा )

: अह्ह्ह्ह उफ्फ उम्मम तो जाओ दबोच लो , किचन में होंगी । मीरा भी गांव गई है बाउजी ने बुलाया है । जाओ ( शिला ने उसको उकसाया )

: पक्का , अगर नाराज हो गई तो ? ( मानसिंह ने चिंता जाहिर की )

: अरे मुझसे ज्यादा वो प्यासी है लंड के लिए, आप बस पहल तो करो खुद पकड़ के अपनी बुर में डाल न ले तो कहना ( शिला ने मानसिंह को पूरे जोश से भर दिया )

मानसिंह ने अपनी बीवी के भरोसे इस रिश्क के लिए तैयार हो गया और वापस कमरे के निकल कर किचन की ओर गया तो आधे रास्ते में ही रुक गया , क्योंकि किचन में उसका भाई रामसिंह पहले ही रज्जो के पास खड़ा उससे बातें कर रहा था ।

मानसिंह को रज्जो का मुस्कुराना और अपने भाई के खिल कर बातें करता देख अजीब सी बेताबी हुई और लपक कर छुप कर किचन के पास जीने बाहर ही खड़ा हो गया ।

: वैसे आज मुझे एक पल को पीछे से लगा था कि आप भाभी ही है , फिर याद आया कि कल भैया भी गच्चा खा गए थे हाहाहा ( रामसिंह हंसता हुआ बोला और रज्जो लजा गई )

: क्या दीदी भी न , सबको बता दिया ( रज्जो लाज से हंसी )

रज्जो के हाथ चकले पर तेजी से चल रहे थे, और हर बार जब वह बेलन को दबाती, उसके बड़े, रसीले दूध ब्लाउज में हिलते-डुलते। उसका ब्लाउज थोड़ा तंग था, जिससे उसकी भरी-पूरी देह और भी उभर कर सामने आ रही थी। रामसिंह की नजरें अब उसकी छाती पर ठहर गई थीं, और वह मन ही मन कुछ शरारती खयालों में खो गया।






उसकी नजर रज्जो के बड़े भड़कीले चूतड़ों पर थी जो साड़ी की ओट में थी ।

: अब किसी को बताए न बताए अपने लाडले देवर से कुछ नहीं छिपाती मेरी भाभी ( रामसिंह शब्दों के दाव पेच अच्छे से जानता था और शिला ने पहले से उसे बता रखा था कि रज्जो का मिजाज कैसे है और कैसे वो शब्दों के दो फाड़ करने में माहिर थी )

: अच्छा जी , कुछ भी नहीं ( रज्जो के चेहरे पर शरारती मुस्कुराहट थी )

: उन्हू कुछ भी नहीं ( रामसिंह ने बड़े विश्वास से कहा )

: अच्छा तो ... नहीं कुछ नहीं ( रज्जो ने जहन में सहसा कुछ आया लेकिन्वो चुप हो गई )

वही रज्जो के चुप होने से ना सिर्फ रामसिंह बल्कि किचन के बाहर खड़ा मानसिंह भी उत्सुक हो उठा । दोनों भाई भीतर से बेचैन हो गए ।

: अरे क्या हुआ बोलिए न ( रामसिंह ने थोड़ा कैजुअल होकर कहा )

: वो ... नहीं हीही कुछ नहीं ( रज्जो सब्जियां चलाती हुई बोली )

: अरे .. कहिए न झिझक कैसी ( रामसिंह )

: नहीं मै दीदी से पूछ लूंगी ( रज्जो ने मुस्कुरा कर कहा )

: अरे ऐसा कुछ नहीं है जो भाभी को पता है और मुझे नहीं , आप आजमा कर तो देखिए

: पक्का ( रज्जो के चैलेंज सा किया )

दोनों भाई एकदम से जिज्ञासु

: हा हा , कहिए ( रामसिंह विश्वास से बोला )

: कल रात हम दोनो साथ में सोए थे और आपके भैया ऊपर थे अकेले , पता है आपको ? ( रज्जो मुस्कुराई )

: अह हा पता है , इसमें क्या बात हो गई ( इधर रज्जो के इस पहल से रामसिंह और मानसिंह की सांसे चढ़ने लगी , क्योंकि उन्हें डर था कही उनकी योजना खुली किताब न हो जाए )

: अच्छा तो क्या ये बता है कि रात में आपकी भाभी ... हीही आपके भैया का नाम लेकर मुझसे चिपक रही थी हाहा ( रज्जो हस कर बोली )

रज्जो की बात सुनकर दोनों भाई के लंड में हरकत होने लगी

: क्या आप भी न भाभी , वैसे एक राज की बात बताऊं भैया से नहीं कहेंगी न ( रामसिंह उसके पास खड़ा हुआ , उसका लंड पजामे में तंबू बना चुका था और रज्जो की नजर उसपे पड़ चुकी थी । )

: उन्हूं बिल्कुल भी नहीं ( रज्जो की सांसे तेजी से धड़क रही थी वो रामसिंह की आंखों में वासना की बढ़ती भूख को देख पा रही थी । जिसका असर कुछ कुछ उसपे भी हो रहा था )

: पता है एक बार कम्मो नाराज हो गई थी हमारी खूब लड़ाई हुई और मै भी गुस्से में भैया के बिस्तर पर सो गया था और उस रात भाभी ने मुझे भैया समझ कर मुझसे चिपक गई थी ( रामसिंह ने अपने शब्दों में मसाला डाल कर परोसा )

रज्जो साफ साफ उसके झूठ को समझ रही थी क्योंकि वो पहले से ही शिला से उसके घर की सारी कहानी सुन चुकी थी । मगर उसे ये खेल पसंद आ रहा था

वही बाहर खड़ा मानसिंह अलग से अपना लंड मसल रहा था कि उसका छोटा भाई तो काफी तेज निकला और यहां वो एक बार रज्जो को दबोच कर भी कुछ नहीं कर सका ।

: फिर क्या हुआ ? आपने क्या किया ? ( रज्जो ने आंखे बड़ी कर रामसिंह को देखा )

: आपको बुरा तो नहीं लगेगा न, वो क्या है कि बातें थोड़ी वैसी है ( रामसिंह ने ऐसे दिखाया जैसे वो कितना बेबस हो )

: अरे हम लोग कौन सा बच्चे , कही आपकी उम्र तो 18 से कम तो नहीं हीही ( रज्जो मस्ती में बोली ताकि रामसिंह थोड़ा खुले )

रज्जो की बात पर रामसिंह के साथ साथ बाहर छुपा मानसिंह की भी हसी रुक न सकी ।

: हीही, आप भी न भाभी खोज कर रखी है सारे शब्द । वैसे मै 18+ तो तभी हो गया था जब आपको पहली बार देखा था । ( रामसिंह ने शरारत भरी नजरो से रज्जो की आंखों ने देखा)

: वैसे आप कुछ बता रहे थे ( रज्जो ने बात घुमाई , जैसा कि वो सताने में माहिर है )

: हा वो , उसके बाद भाभी ने यहां नीचे पकड़ लिया और दीवानी सी हो गई ( रामसिंह का इशारा अपने पजामे के तंबू पर था )

: हाय दैय्या, फिर ( रज्जो ने नाटक जारी रखा )

: भाभी को अपने देखा ही है कितनी मुलायम है और उनका स्पर्श मुझे पागल कर गया था और फिर .... ( रामसिंह ने मुस्कुराते हुए आंखे मार कर गर्दन झटका )

: क्या सच में , धत्त झूठे मै नहीं मानती कि दीदी ऐसा करेंगी । ( रज्जो ने आजमाया )

इधर बाहर खड़ा मानसिंह ताज्जुब में था कि एक दिन पहले ही आई रज्जो इतना खुल कैसे गई , रज्जो की बातों और जिस तरह वो भूखी नजरों से कभी रामसिंह का लंड का तंबू देखती और कभी उसकी आंखों में देखती। मानसिंह मान गया कि उसकी बीवी शिला ने रज्जो के बारे में सही कहा था ।

: अरे सच में ऐसा हुआ था , और अब तो कई बार ... लेकिन प्लीज भैया या कम्मो से मत कहिएगा ( रामसिंह बोला )

: नहीं कहूंगी , लेकिन एक शर्त है ( रज्जो शरारती मुस्कुराहट के साथ इतराई )

: क्या कहिए न ( रामसिंह बोला ).

: आपको मुझे दिखाना पड़ेगा ( रज्जो ने रामसिंह को उलझाया )

रज्जो के इस वक्तव्य से दोनों भाई एकदम से चौक गए

: क्या देखना चाहती है आप ( रामसिंह का लंड पजामे ने पूरा अकड़ कर पंप होने लगा )

: आपको आपकी भाभी के साथ , थोड़ी सी मस्ती भी चलेगी जिससे मुझे यकीन हो जाए ।( रज्जो उससे एकदम सट कर खड़ी थी )

: लेकिन मेरा क्या फायदा इतना बड़ा रिश्क लेने का ( रामसिंह की सांसे तेज थी और वो रज्जो की आंखों में देख रहा था )

: जितना बढ़िया सो उतना अच्छा इनाम ( रज्जो ने आंखे नचा कर जीभ को अंदर से अपने गाल में कोचते हुए इतराई )

: ठीक है , अभी मुझे कालेज जाना है शाम को मिलता हुं ( रामसिंह ने चैलेंज ऐक्सेप्ट किया और निकल गया वहां से )

वही मानसिंह बाहर खड़ा अपना मूसल मसलने लगा था कि क्या गजब का माहौल होने वाला है आज तो । मानसिंह बिना रज्जो से मिले चुपचाप वापस कमरे में चला गया शिला को साड़ी बात बताने के लिए।

चमनपुरा

: मम्मी देर हो रही है , कितना टाइम !! ( अनुज उखड़ कर बोला )

वो रागिनी के कमरे के बाहर खड़ा था और रागिनी कमरे में तैयार हो रही थी नहाने के बाद

: बस बेटा आ रही हूं , ये डोरी ... ( रागिनी की कुछ उलझन भरी आवाज आई )

अनुज के जहन में इस वक्त लाली की दीदी छाई थी । वो आज अपनी मिस को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था ।

: अनुज सुन बेटा , जरा अंदर आना ( रागिनी ने आवाज दी )

: क्या हुआ मम्मी ( अनुज परेशान होकर कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर गया )

जैसे ही वो अन्दर घुसा उसकी आंखे बड़ी ही गई

"उफ्फ मम्मी कितनी सेक्सी" , अपनी मां के पीछे खड़ा हो कर वो बड़बड़ाया ।

उसकी मां रागिनी के नया ब्लाउज ट्राई का रही थी , जो पीछे से हुक की जगह बांधने वाली थी और बार बार कोशिश करके रागिनी के हाथ दुखने लगे थे

: बेटा ये जरा बांधना ( रंगीनी ने गर्दन घुमा कर बोला )

अनुज का हलक सूखने लगा था , उस साड़ी में अपने मां को देख कर जिस तरह से वो उनके कूल्हे से चिपकी थी चौड़ी कमर से लेकर ऊपर गर्दन तक पीछे से पूरी पीठ नंगी और मुलायम । गिले बालों से पानी के हल्के फुल्के अंश पीठ के बीच में दिख रहे थे ।

अपनी मां के जिस्म की कोमलता को अनुज साफ महसूस कर पा रहा था , उसने बिना कुछ कहे रागिनी के ब्लाउज का फीता पकड़ा यार उसको हल्के से गांठ दी , ये सोच कर कि कही उसकी मां के मुलायम चूचों पर जोर न पड़े , वो कस न जाए






: अरे क्या कर रहा है , टाइट कर न आज ब्रा नहीं डाली है मैने , कस पूरा ( रागिनी ने अनुज को टोका )

अपनी मां के मुंह से ऐसे अलफाज सुन कर अनुज की सांसे चढ़ने लगी और उसके फीते की कस कर गांठ दी

: अह्ह्ह्ह ( रागिनी सिसकी )

: ज्यादा कसा गया क्या मम्मी ( अनुज फिकर में बोला )

: नहीं ठीक है , बांध दिया तो ऊपर वाली डोरी भी बांध दे ( रागिनी उखड़ कर बोली )

अनुज मुस्कुरा कर अपनी मां के ब्लाउज की डोरी बांधने लगा जिसकी लंबी गुरीया और मोतियों वाली लटकन उसके उभरे हुए कूल्हे तक जा रही थी ।

: हम्मम अब ठीक है ( रागिनी ने आइने में खुद को देखते हुए उस ओर बढ़ गई जिससे उनकी ब्लाउज का लटकन उनके कूल्हे पर उछल कर इधर उधर छिटकने लगा )

अनुज की नजर अपनी मां की मादक चाल पर थी और वो भीतर से सिहर उठा , रागिनी लिपस्टिक से अपने होठ रंग रही थी ।

जिसे देख कर अनुज की प्यास और बढ़ने लगी थी

: मम्मी , कितना रेडी हो रहे हो ? अच्छे से तो लग रहे हो आप ( अनुज भिनक कर बोला


रागिनी की उंगलियाँ एक पल के लिए रुक गईं। उन्होंने शीशे में अपनी परछाई के साथ-साथ अनुज की झुंझलाई हुई शक्ल को भी देखा। उनकी आँखों में हल्की-सी चमक आई, और फिर वह धीरे से हँस पड़ीं।





वो लिपस्टिक लगा कर खड़ी हुई और उसकी ओर घूम कर बोली: अब कैसी लग रही हूं ( रागिनी हंसी करती हुई अनुज की ओर अपना चेहरा करके आंखे तेजी से मलकाई )

अनुज अपनी मां के भोलेपन पर मुस्कुरा दिया : हील वाली सैंडल पहन लो, मेरी कालेज की मिस जी लगेगी हीही

: हैं सच में ? रुक पहनती हु ( रागिनी खिल कर बेड के नीचे से अपनी एक हील सैंडल निकालने के लिए झुकी जो उसने सोनल की शादी में पहनने के लिए लिया था






: मम्मी यार लेट हो .... उफ्फ ( सहसा अनुज की नजर अपनी मां के बड़े भड़कीले चूतड़ों पर गई जो झुकने की वजह से उस चुस्त साड़ी के फैलाना चाह रही थी , कूल्हे कैसे पहाड़ हो आगे पूरे गोल ।

: रुक न रुक न हो गया ( रागिनी झुक कर सैंडल पहनती हुई ) अब लग रही हूं न मिस जी तेरी ( रागिनी अपनी साड़ी सही करती हुई इतराई और अपना पल्लू हवा में लहराया )

: हा लेकिन .. (मगर अनुज की नजर कही और अटकी थी )

: क्या हुआ बोल

: वो आपकी ढोंडी नहीं दिख रही है , उनकी दिखती है ( अनुज बोलते हुए दांत में जीभ दबा लिया)

: अरे वो मै थोड़ा ऊपर की हूं .... आह अब सही है ( रागिनी ने झट से अपना पेट पिचकाया और साड़ी को नेवल के नीचे ले जाती हुई सेट करते हुए बोली )






अनुज को यकीन नहीं हुआ कि उसकी मां ये सब उसके सामने कर रही है । हालांकि उसने बचपन से अपनी मां को अपने आगे तैयार होते कपड़े बदलते देखा था मगर अब बात कुछ और थी ।

: हम्ममम ( अनुज अपनी मां की गुदाज चर्बीदार नाभि देख कर थूक गटकने लगा )

: चलें ( रागिनी मुस्कुरा कर बोली )

: ऐसे ही ( अनुज आंखे बड़ी कर बोला )

: हा क्यों ? अच्छी नहीं लग रही हूं क्या ( रागिनी इतराई )

: नहीं वो सैंडल ? ( अनुज इशारे से )

: अरे हा , हीही ( रागिनी हस्ती हुए अपने पैर से सैंडल को बेड के नीचे झटका और जल्दी से रेगुलर चप्पल पहनती हुई ) चल चल

अनुज मुस्कुराता हुआ अपनी मां के साथ निकल गया

वही राज जो अब तक दुकान पहुंच गया था , ग्राहकों के बीच उलझा हुआ था ।

तभी उसके मोबाइल पर फोन आता है एक नंबर से जिसे देख कर उसकी मुस्कुराहट खिल जाती है पूरे चेहरे पर

जल्दी से वो ग्राहक निपटाता है और केबिन में जाकर कॉल बैक करता है

फोन पर

: ऊहू .. नमस्ते क्यूट भाभी जी ( राज मुस्कुराते हुए बोला )

: अरे .. धत्त आप भी न राज बाबू ( उधर आवाज आई ) छोड़िए ये बताइए कैसे है ?

: आपके बिना कैसे होंगे ? ( राज ने आहे भरता हुआ बोला )

: धत्त बदमाश, अच्छा सुनो न मुझे अभी दो तीन रोज का समय लगेगा चमनपुरा आने में और आज मेरा एक पार्सल आ रहा है । रिसीव कर लेंगे क्या ( काजल भाभी ने बड़ी मीठी आवाज में गुजारिश की )

: उम्हू एक और पार्सल ( राज ने छेड़ा उसे )

: धत्त बदमाश, सही बोलो न ? ( काजल भाभी बोली ) ले लोगे न ?

: आप दो तो सही , अगर हम मना करे तो हमारी गुस्ताखी ( राज ने फिर से छेड़ा उसे )

: अच्छा बाबा ठीक है अब घुमाओ मत ( काजल भाभी गहरी सास लेते हुई बोली ) अच्छा इस बार का उधार नहीं रखूंगी । पक्का

: और पहले वाली उधारी ?

: ठीक है वो भी ले लेना , लेकिन प्लीज याद से रिसीव कर लेना ओके , मै फोन करूंगी ( काजल भाभी ने रिक्वेस्ट की )

: ओके मेरी क्यूट भाभी जी , और कुछ

: उन्हूं कुछ नहीं , बाय

: क्या बस बाय ? ( राज ने फिर से काजल भाभी को छेड़ा )

: हा तो , हिसाब किताब में कुछ भी घलुआ नहीं मिलेगा । काम करोगे पहले फिर दाम मिलेगा ( भाभी तुनक कर बोली और फोन काट दिया )

राज मुस्कुरा कर अपना लंड पेंट में मसलता हुआ : अह्ह्ह्ह ठीक ही , मै भी गल्ले वाला सेठ हूं भाभी । हिसाब अच्छे से करूंगा ।

वही इनसब से अलग मंजू आज खासा खामोश थी

रात की हरकत से वो मुरारी से बेहद नाराज जी , उसकी इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी उसके साथ जाने की । मगर ता उम्र और जवानी के इतने साल उसने मदन से दूर बिताए थे । मदन ने उसके प्यार में अपनी जिंदगी नहीं बसाई और आज भी उसकी राह देख रहा है , अगर वो हा करके भी नहीं गई तो शायद मदन के साथ ज्यादती होगी । शायद उसे अपने जीवन का ये जहरीला घूंट पीना ही पड़ेगा ।

वही आज मुरारी मंजू को उदास देख रहा था , उसे लग रहा था कि मंजू में शायद इस समाज और घर के लिए मोह है जो उसके बुरे दिनों में उसके साथी रहे है ।

: मंजू मैने गाड़ी वाले से बात कर ली है , वो चौराहे पर है । उसे रास्ता समझ भी आ रहा है । तुम घर में ताला लगाओ मै बस अभी आ रहा हूं लिवा कर

: जी भइया ( मंजू ने उदास लहजे में जवाब दिया और मुरारी ने उससे कुछ नहीं कहा । चुपचाप निकल गया घर से )

मंजू का बैग रेडी था , उसके कमरे में एक बुढ़िया बैठी थी । मंजू दिवाल पर लगी आराध्यों के पुरानी तस्वीरों के खुद को नतमस्क करने लगी । शायद वो आभारी थी उन सबके कि इतने बुरे दिनों में वो उसके साथ खड़े रहे ।

इधर मेन सड़क पर आते समय मंजू के घर के मुहल्ले की ओर 3 4 बाइक्स तेजी से निकली , मुरारी ने उनके चेहरे पर गुस्से से भरी उत्तेजना देखी । मगर ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गया ।

कुछ ही देर बाद वो चौराहे से गाड़ी में बैठ कर मंजू के घर के पास पहुंचने लगा

तो देखा , वहां काफी भीड़ जमा हुई है । वो बाईक्स जो कुछ देर पहले उसके नजरो के आगे से गुजरी थी वो वही खड़ी थी ।

मुरारी को संदेह हुआ कोई एक्सीडेंट तो नहीं हुआ , वो गाड़ी से उतरने लगा । भीड़ पूरी शांत थी , मगर एक तेज आवाज की गूंज से मुरारी थरथरा उठा ।

भीड़ ने निकल कर सामने देखा तो ये आवाज मंजू के घर से आ रही थी

" साली , रंडी उतर आई न अपनी जात पर , कहा छिपा है वो भोसड़ी है आज उसकी लाश लेकर जाऊंगा , कहा है वो बोल ? " , घर में से एक तेज आवाज आई । जिसे सुनते ही मुरारी का कलेजा उबाल मारने लगा । उसकी सांसे चढ़ने लगी , आंखे लाल होने लगी

“रुक जा, तू!” मुरारी ने उस अड़ियल आदमी को ललकारा, जो मंजू को गालियां दे रहा था। उसकी आवाज में गुस्सा और दृढ़ता थी। भीड़ में एक सन्नाटा सा छा गया। बाकी लोग हैरान थे कि कोई उनकी हिम्मत कैसे कर सकता है। उस आदमी ने मुरारी की ओर घूरते हुए कहा देखा , “तू कौन है बे? तुझे क्या लेना-देना?”

: जिसे तू खोज रहा है वो मै ही हूं , बोल अब ( मुरारी अपना कुर्ता की बाह मरोड़ता हुआ बोला )

मुरारी की बात सुनकर वो आदमी हंस पड़ा, लेकिन उसकी हंसी में क्रूरता थी। “अच्छा, तो तू इसका यार है? चल, देखते हैं कितना दम है तुझमें!”

: नहीं भइया, मत उलझिए इससे । आप प्लीज वापस घर चले जाइए ( मंजू बिलखती हुई बोली, उसकी बेबसी और आंखों के आंसू देख कर मुरारी का खून और खौलने लगा )

: नहीं मंजू , मैने अपने बेटे से वादा किया है कि उसकी चाची को हर कीमत पर घर लेकर आऊंगा और मै कभी भी अपना वादा नहीं तोड़ता । ( मुरारी उसको विश्वास दिला रहा था कि इतने में तेजी से एक पंजा उसकी पीठ पर और उसके कुर्ते को पकड़ कर खींचते हुए अपनी ओर घुमाया )

: भोसड़ी के तू बड़ा सलमान खां हैं? मादर... चो ( एकदम उस दूसरे आदमी की सांसे अटक गई दिल मानो बैठ ही जाएगा , आंखे बड़ी और एकदम मूर्ति सी बन गई ) हे देख .. देख मस्ती नहीं , भाई गोली है लग जाएगी । देख ऐसे नहीं

: क्यों भोसड़ी के , हैं, निकल गई हवा मादरचोद ... ले तेरी मां का ( मुरारी ने एक उल्टे हाथ कोहनी उसके सीने पर दी और वो कहराते हुए पीछे हो गया )

अब मुरारी ने अपनी रिवॉल्वर का प्वाइंट उस आदमी की ओर किया जिसने ये सारा हंगामा खड़ा किया था

मंजू ने जैसे ही मुरारी के हाथ रिवॉल्वर देखी एकदम से हदस गई , उसकी लाली डबडबाई आंखे पूरी फेल गई , उसका कलेजा धकधक हो रहा था । उसके जहन में वो शब्द गूंज रहे थे जो कुछ देर पहले मुरारी ने उससे कहे थे ।

" मैने मेरे बेटे से वादा किया है कि उसकी चाची को हर कीमत पर घर ले आऊंगा " , ये शब्द मानो आकाशवाणी जैसे उसके दिमाग में घूम रही थी । उसका कलेजा काफ रहा था किसी अनहोनी की आशंका में । कही मुरारी ने उस गुंडे को मार दिया तो

वही वो आदमी एकदम से सन्न हो गया था उसके साथी वहां से भाग खड़े हुए थे । उस आदमी का हलक सूखने लगा था पाव पीछे हो रहे थे ।

: द देख भाई , मेरी कोई दुश्मनी नहीं है । इसको ले जाना चाहता है तो ले जा , इतने दिन मेरे साथ थी न तो अपन खुश अब तू ले जा तू खुश । भाई प्लीज मै जा रहा हूं, हा ( वो हाथ खड़े किए हुए अपनी बाइक तक गया और झटके में बाइक स्टार्ट कर निकल गया )

मुरारी ने रिवॉल्वर वापस अपने बेल्ट के खोंसी और कुरता गिरा दिया और मंजू के पास पहुंचा जो घर के दरवाजे पड़ी बिलख रही थी , मुरारी उसके पास बैठा : आओ चलें गाड़ी आ गई

: भइया... ( मंजू रोती हुई एकदम से मुरारी से लिपट गई )

मुरारी को यकीन नहीं था कि मंजू ऐसा कुछ करेगी , वो चाह कर भी उसे छू नहीं सकता था ।

जारी रहेगी ।
 
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💥 अध्याय 02 💥

अपडेट 08


गाड़ी शहर की तंग गलियों से निकलकर हाईवे की ओर बढ़ चुकी थी । सुबह के करीब दस बज रहे थे। हाईवे पर हल्की-सी धुंध अब भी बाकी थी, जो सूरज की गुनगुनी किरणों के साथ मिलकर एक सुनहरा सा नजारा बना रही थी। सड़क के दोनों ओर लंबी सिवान फैली हुई थी, जहां गन्ने के हरे-भरे खेत लहलहा रहे थे। कहीं-कहीं पेड़ों की कतारें तेजी से पीछे छूट रही थीं, मानो वो भी मंजू और मुरारी की इस यात्रा में उनके साथ दौड़ रही हों। गाड़ी की खिड़की से आती ठंडी हवा मंजू के चेहरे को छू रही थी, लेकिन उसका मन अभी भी उस सुबह के हादसे की गिरफ्त में था।मंजू की आंखों के सामने बार-बार वही मंजर घूम रहा था—मुरारी का अकेले उन गुंडों से भिड़ जाना, उसका गुस्सा, उसकी हिम्मत। वो शब्द, जो मुरारी ने उस आदमी को ललकारते हुए कहे थे, अब भी उसके कानों में गूंज रहे थे:

“मैंने मेरे बेटे से वादा किया है कि मैं उसकी चाची को हर कीमत पर घर लेकर आऊंगा।”

इन शब्दों में एक अजीब-सी ताकत थी, एक ऐसा जज्बा जो मंजू को हैरान कर गया था। मुरारी, जिसे वो रात वाली हरकत की वजह से गलत समझ बैठी थी, जिसे उसने मन ही मन कोसा था, वही मुरारी आज उसकी इज्जत और जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर उन गुंडों से भिड़ गया था।मंजू का मन उदासी से भरा था। उसे अपनी गलतफहमी पर पछतावा हो रहा था। बीते रात मुरारी ने जो हरकत की थी, वो शायद उसकी मजबूरी थी, या शायद उसका इरादा वैसा नहीं था, जैसा मंजू ने समझ लिया था। अब जब वो मुरारी की इस हिम्मत और जिम्मेदारी को देख चुकी थी, तो उसके मन में मुरारी के लिए एक नया सम्मान जाग रहा था। लेकिन साथ ही, वो डर भी अभी तक उसके दिल से गया नहीं था। उन गुंडों की गालियां, उनका क्रूर हंसी, और मोहल्ले वालों की चुप्पी—ये सब उसके मन पर भारी था। वो खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन उसकी नजरें कहीं खोई हुई थीं। उसका चेहरा शांत था, मगर उस शांति के पीछे एक तूफान सा उमड़ रहा था।

मुरारी लंबे समय तक उसे चुप और शांत देख रहा था , वो समझ रहा था कि आज सुबह जो कुछ भी हुआ उसको लेके मंजू कितनी डर गई होगी । मुरारी के जहन में उस घटना को लेकर कितने सारे सवाल थे , मगर इस नाजुक पल में वो और मंजू को परेशान नहीं करना चाहता था । वो जानता था कि इस पल मंजू को एक कंधे की तलाश है और वो सिर्फ एक औरत ही पूरी कर सकती थी । उसे ममता का ख्याल आया

सुबह की भगदड़ में वो ममता को भूल ही गया था , और उसने अभी तक उससे बात भी नहीं की थी कि वो लोग निकल गए है ।

मुरारी ने जेब से मोबाइल निकाला और ममता को फोन घुमा दिया ।

3 से 4 रिंग और फोन पिकअप

: हैलो ( ममता की सहज आवाज आई )

: हा हैलो अमन की मां , कैसी हो ( मुरारी खुश होकर बोला ) भाई हम लोग निकल गए है

: अच्छा सच में , मेरी देवरानी कैसी है ? जरा बात कराएंगे ( ममता खुश होकर बोली )

: हा बगल में ही है , लो बात करो ( मुरारी मुस्कुरा कर मंजू को फोन देता है )

मंजू को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या बात करे , उसकी चेतना तो जैसे खोई हुई थी ।

: हा , नमस्ते दीदी ...जी ठीक हूं और आप ( मंजू ने महीन आवाज में बोली उसका गला बैठा हुआ था )

अब मुरारी को ममता की आवाज नहीं आ रही थी ।

: जी , पता नहीं हाइवे पर है हम लोग हा अभी रुक कर खा लेंगे .. जी ठीक है .... लीजिए ( मंजू ने फोन वापस मुरारी को दिया )

: हा अमन की मां कहो

: अरे क्या बोलूं , उदास उदास सी क्यों लग रही थी वो ? ( ममता के तीखे सवालों से मुरारी अटक गया वो मंजू को देख रहा था कि क्या जवाब दे तो मंजू खामोशी से ना में सर हिला दी)

: ऐसा कुछ नहीं है , रात भर तो पैकिंग में निकल गई और अब झपकियां ले रही है हाहा ( मुरारी बात बनाते हुए बोला )

: अच्छा ठीक है , समय से खाने पीने के लिए रुक जाना और थोड़ा देखना की बाथरूम वगैरह की सुविधा हो । वो आपसे कहने नहीं न जायेंगी बार बार , समझ रहे हो न ( ममता ने मुरारी को समझाया )

: क्या अमन की मां तुम भी ( मुरारी ने मुस्कुरा कर मंजू को देखा तो वो भी फीकी मुस्कुराहट से उसे देखी) पता है मुझे , चलो ठीक है सफर लंबा है मोबाइल चार्ज नहीं कर पाया हुं। रखता हूं। बाय

: हा बाय

फोन कट गया और फिर मंजू खिड़की से बाहर देखने लगी ।

वही दूसरी ओर ममता ने फोन रखा और एक बार फिर उसके चेहरे पर बेचैनी हावी होने लगी ।

सुबह से आज वो अपने कमरे से बाहर नहीं आई थी । मदन सुबह बोलकर गया था कि कही काम से जा रहा है अभी तक वापस नहीं आया ।

ममता के पैर की चोट उसे दुख रही थी चलना दूभर था ।

किसी तरह हिम्मत कर उसने खाना बनाने के सोचा और किचन में आने लगी ।

जैसे ही वो हाल में आई तो चौकी , किचन में तो मदन भिड़ा हुआ है ।

ममता की आहट से मदन उसकी ओर घूमा

सीने पर एप्रेन बांधे हुए टीशर्ट और लांग वाले चढ़्ढे में खड़ा था

: अरे भाभी जी , आराम से ( ममता को लड़खड़ाते देख वो भाग कर उसके पास आया और उसका बाजू पकड़ कर सोफे पर बिठाने लगा )

: अह्ह्ह्ह देवर जी , आप क्यों खाना बना रहे है ? ( ममता असहज होकर बोली) और सब्जी भी नहीं होगी

: सब्जी मै ले आया हूं और आपकी तबियत भी ठीक लग रही थी तो सोचा मै ही कुछ बना दु आपके लिए ( मदन खिल कर हाथ में कल्चुल पकड़े हुए उसके आगे झुकता बोला , जैसे बीते रात कुछ हुआ ही न हो )

: क्या आप भी ( ममता मदन के हरकत से मुस्कुराई )

: हम्मम तो मैडम जी कोई खास फरमाइश ( अपने दोनों हाथ बांध कर मदन अदब से झुक कर बोला जैसे किसी होटल का वेटर हो )

: हीही, क्या आप ये सब ? ( ममता हसने लगी ) छोड़िए इधर दीजिए मुझे । आपको ये सब नहीं करना चाहिए था

: आहा, आज नहीं ! आज तो मै ही बनाऊंगा । बताओ क्या खाओगे ( मदन उसकी पहुंच से थोड़ा पीछे खिसक कर बोला )

: अच्छा ठीक है एक चाय मिलेगी क्या ? ( ममता ने बड़े भारी मन से कहा )

: उसके साथ आलू सैंडविच भी रेडी है , लेना चाहेंगी आप ( मदन ने फिर वही वेटरों वाली स्टाइल में बोला )

: हीहि, जी लाइए ( ममता जो अब तक उदास थी और सोच रही थी कि अपने देवर से कैसे सामना करेगी , अब थोड़ी बेफिक्र थी । )

मगर उसके पैर के अंगूठे में हल्की सूजन आ गई थी ।

थोड़ी ही देर में मदन एक ट्रे में गर्मागर्म चाय और सैंडविच लेकर आया

: एनीथिंग एल्स मैडम ( मदन फिर से बोला )

: उम्हू ( ममता ने मुस्कुरा कर ना में सर हिलाया और मदन वहां से निकल कर अपने रूम में चला गया और एक प्लास्टिक बॉक्स लेकर आया )

हाल से स्टूल खींच कर उसने ममता के पास रखा खुद नीचे बैठ गया

: अरे देवर जी , ये सब क्या ? ( ममता उसको प्लॉस्टिक बॉक्स को खोलते देख रही थी , जो असल में एक मेडिकल किट थी )

: क्या आप अपना पैर इसपर रखेंगी मैडम ( मदन मुस्कुरा कर बोला )

: क्या कर रहे हो आप , मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा है ( ममता उलझी हुई अपनी चोट वाली टांग को सोफे पर बैठे हुए उस स्टोल पर रखा )

जिससे उसकी नाइटी का गैप बढ़ा हो गया , मदन इस वक्त ठीक उसके आगे उकङू होकर बैठा था , वहा से ममता के फैले हुए काटन नाइटी के गैप से दूर अंदर तक उसकी चिकनी लंबी गोरी टांगे दिख रही थी जांघों तक

मदन ने अपने नजरो को झटका और सेवलान से ममता के घाव धुलने लगा

: अह्ह्ह्ह सीईईई फ़ूऊऊ( ममता सिसकी एक ठंडा चुनचुनाहट भरा एहसास उसने अपने चोट के आसपास महसूस किया )

मदन ने काटन से उसके घाव साफ किए और एक मलहम निकाली और उसका ढक्कन खोलते हुए

: भाभी सैंडविच खाओ न ( वो ममता के घाव पर फूंकता हुआ बोला )

ममता ने सैंडविच को जैसे ही मुंह में दबाया उसी समय मदन ने वो मलहम की ट्यूब को दबाया और मलहम ममता को घाव पर फैलने लगी

: उम्ममम फ़ूऊ फ़ूऊऊ , अह्ह्ह्ह मम्मीईईई ये क्या है अह्ह्ह्ह( ममता जोर से चीखी अपनी टांग पकड़ते हुए )

: बस हो गया भाभी , अभी ठंडा हो जाएगा । शुरू में थोड़ा लगता है आप सैंडविच खाओ न ( मदन हंसते हुए बोला )

: भक्क, बहुत बुरे हो आप , अह्ह्ह्ह्ह सीईईई मम्मी ऊहू ( ममता का चेहरा दर्द से बेचैन था मानो अभी वो रो ही देगी)

मगर कुछ ही देर में उसे एकदम से आराम मिल गया और उसका गुस्सा भींनकना मुस्कुराहट में बदल गया ।

तो वो उठ कर किचन में आई

: उह ऊहू .. (ममता मुस्कुराती हुई नाइटी में मदन के पास खड़ी हो गई तो मदन मुस्कुरा कर उसे देखा ) थैंक यू

और उसने मदन के हाथ से चाकू ले लिया जिससे वो सब्जियां काट रहा था

: अच्छा जी , वो किस लिए ( मदन अपने हाथ बांधता हुआ ममता के मुस्कुराते चेहरे को देखते हुए किचन स्लैब पर अपने कूल्हे टिकाते हुए बोला )

: आपकी सर्विस के लिए ( ममता सब्जियां काटती हुई आंखे रोल करती हुई मुस्कुराई बिना मदन की ओर देखे )

: बिना टीप के सिर्फ थैंक यू ? इतनी खराब थी क्या सर्विस ( मदन ने मुंह बनाया )

: अरे नहीं ( ममता हस पड़ी और उसके मोतियों जैसे दांत होंठों पर खिल उठे ) अच्छा ठीक है कल आपको एक बहुत अच्छी टिप मिलेगी ओके

: क्या कल ? ( मदन चौका )

: वो मैने ऑर्डर दे दिया है कल तक आ जाएगा तो मिलेगा आपको ( ममता ने मदन को उलझाया ).

: ऐसा क्या मंगवा रही हो भाभी ( मदन सोचते हुए बोला )

: कल मिलेगा कल हीही

और वो काम करने लगी

प्रतापपुर

रसोई के पास लगी चौकी पर रंगीलाल और उसका ससुर बनवारी खाना खा रहे थे

: भाई मेरा हो गया , बहू जरा हाथ धुलवा दे ( बनवारी चौकी से उतरकर आंगन की ओर चला गया और सुनीता एक लोटा पानी लेकर चली गई पीछे )

इधर रंगीलाल के जहन में काफी कुछ चल रहा था । रात से अब तक जो कुछ भी घटित हुआ उससे सुनीता के लिए उसकी हवस को और हवा मिल चुकी थी ।

थोड़ी देर बाद ही बनवारी अपने गमछे से हाथ पोंछता हुआ आया और पीछे उसके सुनीता

रंगी की नजर अनायास उसके सर से हटे हुए पल्लू पर गई सीने का उभार हल्का सा झलक रहा था । सुनीता ने रंगी की नजर भाप ली और झट से अपने सर पर पल्लू करते हुए अपने ब्लाउज को ढक दिया।

: जमाई बाबू चलना है या फिर आराम करोगे ? ( बनवारी अपने हथेली के खैनी रगड़ता हुआ बोला )

रंगीलाल बनवारी के सवाल पर उसके पीछे खड़ी अपनी खूबसूरत सलहज को देखता है और मुस्कुरा देता है ।

: नहीं बाउजी , अभी थोड़ा आराम करूंगा घर पर । मन हुआ तो आता हूं ( रंगी लाल खाना खाने लगा और उसके जवाब पर सुनीता मुझ फेर कर मुस्कुराने लगी क्योंकि वो जान रही थी कि रंगीलाल उसके लिए ही रुकेगा )

इधर बनवारी निकल गया और रंगीलाल का खाना भी लगभग हो गया

: और कुछ दूं ( सुनीता ने रंगी से पूछा )

: जो चाहिए वो तो आप दे नहीं रही हो ( रंगी ने मुस्कुरा कर उसे देखा और सुनीता लजाई ) हाथ धुला दीजिए अब ।

रंगीलाल चौकी से उतर कर जूठे हाथ लिए आंगन की ओर आ गया और सुनीता पानी लेकर उसके पीछे गई मुस्कुराती हुई

रंगी आगे झुक कर हाथ आगे किया और सुनीता भी उससे कुछ दूरी पर ही सामने थोड़ा सा झुक कर पानी गिराने लगी। रंगी ने मुस्कुरा कर उसे देखा तो दोनों की नजरे टकराई

मगर असल धोखेबाज तो उसका पल्लू निकला , बिना पिन का पल्लू झुकने की वजह से उसके कंधे से सरक कर कलाई के आ गया और उसके बड़े गले वाले ब्लाउज़ से उसके मोटे रसीले गोल मटोल मम्मे दिखाई देने लगे ।






रंगीलाल की नजर एकाएक उन पर गई और उसकी नजर का पीछा किया तो सुनीता ने देखा कि वो उसके मुलायम चूचों को ही घूर रहा है ।

सुनीता बेचैन होने लगी , उसकी सांसे तेज हो गई और वो झट से खड़ी होकर अपना पल्लू सही किया ।

रंगी मुस्कुराया कर उसे निहारता रहा और सुनीता नजरे चुराती रही । फिर रंगी हाथ पोछने के लिए कुछ खोजने लगा कि उसकी नजर सुनीता के पल्लू पर गई और वो उसे पकड़ लिया

सुनीता एकाएक चौकी और अपनी साड़ी को छातियों के पास कस कर पकड़ लिया

मगर रंगी मुस्कुरा कर बस उसके पल्लू में हाथ पोंछ कर छोड़ दिया ।

सुनीता के दिल अभी तक कांप रहा था ।

रंगीलाल : अरे डरिए मत , जब तक आप हा नहीं कहेंगी हम आगे नहीं बढ़ेंगे

सुनीता मुस्कुराई : धत्त , आप जो चाहते है वो सही नहीं है ।

रंगीलाल उसके करीब आकर उसकी आंखों में देखता हुआ : किसी को चाहना गलत है क्या ?

रंगीलाल का यू उसकी ओर चढ़ आना सुनीता की हालत पतली हो गई ,उसकी सांसे चढ़ने लगी और आंखों में हल्का सा डर दिखा : नहीं , लेकिन मै उन्हें छोड़ नहीं सकती हूं, प्लीज

रंगीलाल : मैने तो नहीं कहा आप छोड़ दो , बस मेरा हाथ थाम लो यही चाहता हूं

रंगीलाल की आंखों के खुमारी सी थी और दोनों की सांसे बेकाबू हुई जा रही थी

सुनीता को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले : हटिए जाने दीजिए , मुझे कपड़े धुलने है

ये बोलकर वो तेजी से निकल गई और रंगीलाल मुस्कुरा कर उसके रसीले मटके हिल्कोरे खाता देखता रहा ।

वही बबीता के कमरे में आज सालों बाद राजेश घुसा था , इधर उधर नजर पड़ रही थी । गीता को बड़ा ताज्जुब लग रहा था कि उसको पापा आए है ।

वही बबीता बड़ी खुश नजर आ रही थी अपने पापा का साथ पाकर

फुदक रही थी , टीशर्ट में बिना ब्रा के उसके गोल मटोल मौसमी जैसे चूचे खूब हिल रहे थे और नंगी चिकनी जांघें देख कर राजेश का लंड अकड़ रहा था ।

तभी उसकी नजर कमरे के दरवाजे के पीछे वाल हैंगर में लटके हुए ब्रा और पैंटी पर गई , उसे समझते देर नहीं लगी कि ये उसकी बेटियों के होंगे ।

उन ब्रा पैंटी के सेट देख कर राजेश की बेचैनी बढ़ने लगी । वो बबीता की नाप जानने को इच्छुक हो उठा ।

इतने बबीता आई और उसके पास सट कर बैठ गई

: पापा ये वाली मूवी में बहुत हसी है हीही ( बबीता खिलखिला कर बोली तो राजेश उसकी कमर के हाथ डाल कर उसे अपने पास खींच लिया )

ये सब देख कर गीता को अजीब सा लग रहा था , एकदम से बबीता और उसपे पापा के रिश्ते में आया बदलाव उसे समझ से परे लगा। उसके जहन में तो उसके दादा जी का बड़ा मोटा लंड घूम रहा था । ताज्जुब हो रहा था उसे कि इस उम्र में भी उसके दादू का लंड इतना मोटा है ।

राज के यहां से आने के बाद बबीता ने अपने बॉयफ्रेंड से मिलना जारी रखा मगर गीता अकेली थी और दादाजी का लंड उसे ललचा खूब रहा था ।

वो बेचैन हो रही थी और उसने तय किया कि वो दादा जी के पास जाएगी

उसने आलमारी से कपड़े लिए

: मीठी कहा जा रही है ( पापा की बाहों में लिपटी हुई बबीता ने पूछा तो राजेश ने भी गीता को देखा )

: वो मै दादू के पास जा रही हूं , ऐसे ही घूमने ( गीता ने साफ साफ जवाब दिया और अपने कपड़े लेकर निकल गई)

: आराम से जाना बेटा ठीक है ? ( राजेश ने उसको बोला और गीता हा में सर हिला कर निकल गई दरवाजा खींच कर दूसरे कमरे में कपड़े बदलने )

उसके जाते ही राजेश ने बबीता को दोनों हाथों से पकड़ा और उठा कर गोदी में बिठा लिया

: हीही पापा , मै बच्ची थोड़ी हूं जो ऐसे बिठा रहे हो ( बबीता अपने अपना की जांघों पर बैठी खिलखिलाई )

वही राजेश अपनी बिटिया के नरम चर्बीदार चूतड़ का गद्देदार स्पर्श पाकर सिहर उठा था ,उसके नथुनों में अपनी बेटी की कोरी खुशबू आ रही थी

: तू तो हमेशा मेरी गुड़िया रहेगी ( हाथ बढ़ा कर उसने बबीता के पेट पर टीशर्ट के ऊपर से गुदगुदी की तो वो उसके गोद में छटकने लगी )

: हाहाहाहाहा पापा

( फिर उसकी नजरें अपने पापा से मिली तो उसने अपने पापा को देखा और दोनों हाथों से उसका चेहरा थामा )

: आई लव यू पापा ( उसने झट से राजेश को हग कर लिया) आप प्लीज ऐसे रहा करो प्लीज

राजेश बबीता की भावुकता समझ रहा था , बचपन से उसने कभी भी अपनी बेटियों को एक पिता का प्यार नहीं दिया । अपनी अय्याशी और नशे की लत में वो इतना बहक गया कि उसे घर परिवार का ख्याल तक नहीं रहा था । मगर आज बबीता का यू उससे लिपटना उसे पिघला रहा था ।

उसने झट से बबीता को अपने सीने से कस लिया , उसके छोटे छोटे मौसमी जैसे चूचे अपने सीने पर कठोर बॉल के जैसे धंस रहे थे और वो अपनी बेटी के पीठ को सहला रहा था ।

कितना कोमल अहसास था

: आई लव यू मेरी गुड़िया उम्माह ( उसने बबीता के कान के पास चुम्मी ली तो बबीता को हल्की गुदगुदी लगी और वो खिलखिला उठी और अलग होने का प्रयास की तो राजेश उसे हंसी में और कस कर पकड़ लिया)

: हीही , छोड़ो अब पापा ( बबिता खिलखिलाई )

: नहीं, मै नहीं छोड़ने वाला अपनी गुड़िया को ( उसने बबीता को अपनी बाहों में और कसा जिससे बबीता के नरम फुले हुए चूचे उसके सीने से दब गए और जब जब बबीता उससे अलग होने को खुद को कसमसाती उसके निप्पल पर अपने पापा के गर्म सीने का घर्षण होता , जिससे उसके निप्पल टाइट होने लगे और वो बेचैन होने लगी ।

उसे शर्मिंदगी सी होने लगी कि उसके पापा को जरूर उसके तने हुए निप्पल चुभ रहे होगे , उसके जहन में कुछ बातें घूमने लगी , कि क्या सोच रहे होंगे उसके पापा उसके बारे में।

वो थोड़ा सा जोर लगा कर अपने छातियों को अपने पापा से सीने से दूर किया और राजेश भी समझ गया कि बबीता असहज हो रही है इसलिए उसने भी छोड़ दिया

बबीता लजा कर सीधी उसके गोद में चुप होकर बैठ गई , वही राजेश उसके टीशर्ट में उभरे हुए उसके निप्पल के दाने को देख आकर उसके लंड में हरकत होने लगी ।

मगर उसे माहौल को सहज ही रखना था इसीलिए उसने पीछे से बबीता के पेट को पकड़ कर उससे लिपट गया

बबीता को फिर से गुदगुदी हुई मगर वो अब सहज महसूस कर रही थी ।

मगर राजेश के जहन में वो ख्याल आ रहे थे जब उसने बबीता को पूरी नंगी देखा था उसके उपले जैसे गोल मटोल चूतड़ पानी में उपराए हुए थे और वो तैर रही थी नंगी । उसका लंड पजामे में अकड़ने लगा था

जिसका अहसास बबीता को भी हो चुका था अपने नरम चर्बीदार चूतड़ों पर

जैसे उसे अपने चूतड़ों के नीचे कुछ कड़कपन का अहसास हुआ वो चिहुकी , उसकी आंखे बड़ी हो गई

उसे लगने लगा कि जरूर जब उसके दूध उसके पापा के सीने से रगड़े होंगे इसी वजह से उसके पापा का खड़ा हो गया ।

उसका कलेजा डर रहा था , वो अपने पापा के सुपाड़े की कठोरता महसूस कर पा रहे थी । उसकी चूत बिलबिला उठी और वो राजेश के गोद से खड़ी हो गई

: पापा वो मै मम्मी को कपड़े देकर आती हूं नहीं तो गुस्सा करेंगी ( बबीता ने बहाना बनाया और निकल गई )

राजेश वही बैठा हुआ अपना लंड मसलने लगा ।

इधर बबीता तेजी से कमरे से निकल कर पीछे आंगन की ओर जाने लगी

जिसकी आहट पाते ही रंगीलाल जो छिप कर अपनी सहलज को कपड़े धुलते देख रहा था वो रसोई की ओर चला गया और जब बबीता वापस जाने लगी तो वो लपक और आंगन के दरवाजे के पास आया और भीतर झांकने लगा






जहां सुनीता अपने सीने का पल्लू कमर में खोसे हुए बैठ कर कपड़े धूल रही थी और उसके बड़े बड़े रसीले मम्में ब्लाउज से बाहर झांक रहे थे

वो नजारा देख कर रंगीलाल का लंड अकड़ने लगा था ।

उसको तत्काल चुदाई चाहिए थी और सुनीता से अभी कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही थी इसलिए वो निकल गया अपने ससुर के पास

वही रंगीलाल से पहले ही गीता निकल गई थी बनवारी के पास

इठलाती उछलती हुई वो मुख्य सड़क की जगह खेतों से होकर गोदाम के पीछे वाले रास्ते से बनवारी के पास जा रही थी । उसका अक्सर यही रूट रहता है हमेशा से , इससे दो फायदे होते थे , उसे गांव के कम लोगो का सामना करना पड़ता था और कम समय में वो पहुंच जाती थी ।

तेजी से चलते हुए वो गोदाम की ओर जा रही थी , इस उद्देश्य से आज उसके फूफा रंगीलाल घर पर है और उसके दादाजी अकेले में क्या करते है वो भलीभाती जानती है ।

वो अपने तय जगह पर आ पहुंची थी और वो जगह थी , गोदाम के सबसे पीछे वाले कमरे में जहां बनवारी अपनी कामलीलाये करता था ।

वही से एक खिड़की खुली थी जहां से अंदर का नजारा देखा जा सकता था और वो वही खड़ी होकर एड़ी उठा कर भीतर झांकने लगी

उसका तुक्का सही निकला , कमरे में उसके दादा बनवारी एक औरत को अपनी बाहों में लेकर सहला रहे थे , कभी उसके ब्लाउज में हाथ घुसा कर उसकी गुदाज मुलायम छातियां मिजता तो कभी उसके चर्बीदार पेट को मसलता वो औरत खिलखिला रही थी

: अह्ह्ह्ह्ह सेठ जी छोड़िए न , आज नहीं उम्मम अह्ह्ह्ह्ह, घर पर मेहमान आए है

: अह्ह्ह्ह कितने दिन बाद तो आई हो थोड़ा सा दूध पिला दो ( बनवारी उसके चूचे मसलने लगा )

: नहीं , मै हाथ जोड़ती हु सेठ घर पर मेरी बुढ़िया राह रही होगी । ( वो औरत अलग हुई और कपड़े सही करते हुए वो पैसे जो अभी उसे मिले थे उसे अपने ब्लाउज में खोंसते हुए बोली )

फिर तेजी से बाहर निकल गई और बनवारी अंगड़ाई लेता हुआ बिस्तर की ओर आने लगा , इधर गीता वहा से हटने को हुई कि उसका बैलेंस बिगड़ा और वो पीछे की ओर गिर पड़ी

उसकी सिसकी से बनवारी चौका और लपक कर खिड़की से बाहर झांका तो देखा कि खिड़की के बाहर खेत में उसकी नातिन गीता गिरी है

बनवारी चिंता में उसको आवाज दिया और जल्दी से कमरे की पीछे वाले दरवाजे को खोला जो खेत में खुलता है , अक्सर ये दरवाजा बनवारी औरतों को बुलाने के लिए यूज करता था ।

वो झट से दरवाजा खोलता हुआ गीता की ओर भागा

: अरे मीठी , क्या हुआ बेटी ,तू गिर कैसे गई ? और तू यहां क्या कर रही थी ?

एक एक करके सवाल और सवाल

पैर में चोट आई थी और दर्द से बिलख रही थी ,

: वो मै ऐसे ही आई थी घूमने , आज छुट्टी थी स्कूल की , अह्ह्ह्ह्ह मम्मी दर्द हो रहा है

: लेकिन तू पीछे से क्यों आ रही थी ( तभी बनवारी को सुबह वाली घटना याद आई और उसे समझते देर नहीं लगी कि उसकी नातिन यहां पीछे क्या कर रही थी ) चल उठ कमरे में आ चल

बनवारी ने उसे उठाया और कमरे के लेकर आया

: बहुत बिगड़ गई है आजकल तू , कभी छत से कभी खिड़की से क्या है ये सब तेरा बोल ? ( बनवारी ने डांट लगाई )

: सॉरी दादू ( वो बिलखते हुए बोली , इस उम्मीद में कि रोने से शायद वो सजा से बच जाए )

: मै देख रहा हूं कई रोज से तू आंगन में झांकती है , ये अच्छी बात है क्या ? बोल ( बनवारी ने उसे समझाना चाहा )

: नहीं दादू , वो मै , अह्ह्ह्ह दर्द हो रहा है सॉरी ( गीता को समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे वो )

बनवारी ने पानी से उसके पाव धुले और एक मलहम लगाया जो उसके दराज में उपलब्ध था ।

: नहीं करना चाहिए न बेटा , ये अच्छी आदत नहीं है और तू मेरी प्यारी बेटी है न ( बनवारी उसकी एड़ी में मलहम से सहलाने लगा )

: जी दादू , अब नहीं करूंगी

कुछ देर कि चुप्पी और फिर कुछ बाते थी जो बनवारी के जहन में उठ रही थी सवालों के रूप में

: अच्छा सुन , तूने बहु को कहा तो नहीं इस बारे में जो तू ताक झांक करती है ( बनवारी ने सवाल किया )

: ऊहु ( गीता ने थोड़ी लजा कर मुस्कुराती हुई न में सर हिलाई ) उन्हें पता चलेगा तो आपको अपने पास आने थोड़ी देंगी हीही

एकाएक बनवारी के कान खडे हो गए

: क्या कहा तूने अभी ,

: जैसे मुझे पता नहीं चलेगा क्या कि मम्मी रात में आपके कमरे में क्यों जाती है ? ( गीता मुस्कुरा कर बनवारी को देखी )

बनवारी अब असहज होने लगा और उसका हल्क सूखने लगा , उसे उम्मीद नहीं थी उसकी बाते इस कदर उसकी नातिन जान लेगी ।

: तू कुछ ज्यादा नहीं जानती तेरी उम्र के हिसाब से ( बनवारी को हंसी आई )

: आप भी कुछ ज्यादा ही करते हो वो सब अपनी उम्र के हिसाब से ( गीता ने पलट कर जवाब दिया )

जिसपर बनवारी हस दिया

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो भला क्या ही रिएक्ट करे गीता की बातों पर , जिसमें बचपना भरा है । भले उसका जिस्म भर आया हो और उम्र बढ़ रही हो मगर बनवारी के लिए ये मानना आसान नहीं था कि उसकी नातिन की रुचि अब सेक्स को लेकर भी होने लगी है ।

: तू , तूने कब देखा तेरी मां मेरे कमरे में आती है ? ( बनवारी ने सवाल किया )

: कई बार , कभी कभी किचन में भी । एक बार तो मैने आप दोनों को पापा से भी बचाया था हीही ( गीता बड़ी मासूमियत से बोली )

राजेश का जिक्र होते ही बनवारी ठिठक गया

: क्या ? कब ?

: वो आप लोग किचन में थे और पापा पानी पीने जा रहे थे तो मै उन्हें घुमा लाई कमरे में । काफी दिन हो गए

बनवारी को अब समझ आ रहा था , उसकी नातिन को सही गलत को समझ है । वो सिर्फ बहकी नहीं बल्कि उस चीज को समझती भी अच्छे से है । लेकिन फिर भी वो उसके लिए लाडली नातिन थी । अभी पिछले बरस ही तो उसने अपनी दसवीं पास की है ।

: अच्छा ठीक है ठीक है , लेकिन अब तू घर जा ( बनवारी ने कड़े शब्दों के कहा ) और ये सब किसी से कहना मत

अपने दादू से ये सब सुनते ही गीता का मुंह फूल गया , गीता का स्वभाव बचपन से जिद्दी था , और अपने दादा के आगे कुछ ज्यादा ही दुलारी थी ।

बनवारी उसकी भावनाएं समझ रहा था मगर क्या करे । उसके सामने उसके गोद में खेली हुई बच्ची थी जो खुद को श्यानी समझ रही थी ।

: अच्छा ठीक है , चौराहे से तेरे लिए शाम को फुल्की लेकर आऊंगा अब खुश ( बनवारी ने गीता का चेहरा देखा )

वो भीतर से जल रही थी कि क्यों उसके दादू उसकी बात समझ नहीं रहे है , जबसे उसने दादू और अपने मम्मी की चुदाई देखी थी वो पगलाई घूम रही थी । उसके जहन में अपने दादू का मोटा लंबा लंड घूमता रहता था सुबह शाम और आज जब सारे भेद खुल गए तो उसकी बेसबरी और बढ़ गई ।

वो पिनक कर उठी और बिना कुछ बोले पीछे वाले दरवाजे से खेतों की ओर निकल गई । बनवारी का मन भी थोड़ा उदास हो गया अपनी लाडली नातिन को उदास देख कर । लेकिन अभी तक उसके जहन के गीता को लेकर कोई भी बुरे ख्याल नहीं आए । न ही उसने गीता के बड़े हुए संतरों और चर्बी भरी मोटी चूतड़ों की थिरकन को पलट कर देखा । बस नजरे फेर कर बिस्तर पर बैठ गया ।

वही रंगीलाल मेन सड़क से होता हुआ गोदाम आ रहा था कि बोरियो के बीच उसे कमला मिली और झट से उसे वो एक कोने खींच ले गया ।

: अह्ह्ह्ह छोड़ो जमाई बाबू , काहे तंग कर रहे हो अह्ह्ह्ह्ह ( कमला बोरियो के छलियों से लगी छटपटा रही थी और आगे रंगी उसकी कलाई पकड़े हुए था और अपनी टांग को उसकी जांघों के साड़ी के ऊपर से भेद रखा था जिससे वो भाग न सके )

: ओहो कमला रानी सारी जवानी अब क्या सिर्फ मेरे साले और ससुर पर न्योछावर करोगी , तनिक हम पर भी रहम करो( रंगी उसको अपनी ओर कसता हुआ बोला )

: अह्ह्ह्ह्ह उम्मम क्या करते सीईईई ( अपने गुदाज नर्म चूचों को रंगीलाल के सीने से रगड़ खाते ही कमला सिसकी )

रंगी उसके चर्बीदार चूतड़ों को साड़ी के ऊपर से मसलता हुआ : अह्ह्ह्ह कमला रानी , कल तुमने अपने इन रसीले जोबनो से मुझे जो घाव दिए बहुत दर्द रहा रात भर कसम से

: धत्त , छोड़ो न जमाई बाबू कोई देख लेगा ( कमला शर्मा कर मुस्कुराती हुई अलग होने लगी )

: रात में मिले फिर ?

: कहा ?

: बाउजी के बगल वाला कमरा मेरा है, कल सारी रात तुम्हारी सिसकियां सुनकर इसे मसलता रहा ( रंगीलाल उसके आगे पजामे के ऊपर से अपना खड़ा हुआ लंड मसलता हुआ बोला )

: क्या मेरी ? मै कब आई हीही ( असहज होकर कमला हसी )

: तुम नहीं थी तो फिर कौन था ? बाउजी ने तो ... ( रंगी अपनी बात अधूरी छोड़ दिया)

: अभी बहुत कुछ है जो आपके बाउजी आपसे छुपाए हुए है हीही, मिलती हु रात में

और वो मुस्कुराती हुई अपने कूल्हे झटकती निकल गई । वही रंगी लाल सोच में पड़ गया कि आखिर फिर वो दूसरी कौन हो सकती है ? जिसके बारे में बाउजी ने मुझसे झूठ बोलने लगे ।

रंगी वहा से निकल कर सीधे अपने ससुर के पास चला गया

: अरे जमाई बाबू , आइए आइए बैठिए

: लग रहा है आज अकेले ही आराम फरमा रहे है हाहाहाहाहा ( रंगी ने हस कहा )

: अरे वो कमला आई थी , लेकिन उसके घर मेहमान आए है तो चली गई , वरना अभी तक दरवाजा बंद ही मिलता हाहाहाहाहा ( बनवारी हस कर बोला )

: वैसे सच कहूं बाउजी , समान जोरदार है कमला ( रंगी सिहर कर बोला )

: ओहो कही जमाई बाबू का ईमान भी तो नहीं डोल रहा है हाहा ( बनवारी के छेड़ा रंगी को )

रंगी उसकी बातों और थोड़ा लजाया: अरे नहीं बाउजी , रागिनी के आगे फीकी है ये , उसके चूतड़ तो इससे भी.... सॉरी बाउजी ( रंगी बोलते हुए रुक गया )

बनवारी हंसता हुआ : हा हा समझता हूं भाई, बीवी की दीवानगी होती ही ऐसे है । अब तुम्हारी स्वर्गवासी सास को ही लेलो डिट्टो मेरी रज्जो की फोटोकापी थी और घाघरे में जब उसके बड़े चौड़े कूल्हे झटके खाते , उफ्फफ

: क्या सच में अम्मा जी रज्जो जीजी जैसे थी ? फिर तो बड़े किस्मत वाले निकले बाउजी हाहाहा ( रंगीलाल ठहाका लगा कर बोला)

बनवारी हस कर : अरे किस्मत वाले तो कमलनाथ बाबू है क्यों ?

रंगी अपने ससुर के इस मजाक और थोड़ा सा झेप गया और असहज भरी मुस्कुराहट से हंसता है : अह बात तो सही है आपकी , किस्मत वाले तो है ही कमल भाई

बनवारी ने अब रंगी को शर्माता देख कर छेड़ा : कही आपकी भी पहली पसंद रज्जो तो नहीं थी ? हाहाहाहाहा

रंगी बनवारी के मजाक में शामिल होता हुआ हस कर : अब मेरी बारी ही लेट आई तो क्या कर सकता हूं बाउजी , सिवाय हाथ मलने के हाहा

बनवारी हस कर : वैसे उदास होने की जरूरत नहीं है , छोटकी भी ... हीही ( बनवारी बातें आधी छोड़ कर हस पड़ा और रंगी भी मुस्कुराने लगा )

शिला के घर

" Send me video plzz "

" Okay , wait 5 mins "

...................................

अरुण बेचैन होकर कालेज के बरामदे में चक्कर लगा रहा था और बार बार मोबाइल देख रहा था ,

तभी एक वीडियो क्लिप उसके ****gram पर आया , जिसे देखते ही उसकी सांसे चढ़ने लगी । वो एक सुरक्षित जगह तलाशने लगा और लपक कर तेजी से बाथरूम की ओर बढ़ गया

वही कालेज के ऑफिस में मानसिंह बैठा था और उसका मोबाइल बजने लगा

: हा शिला कहो ( मानसिंह ने फोन उठाया )

: कुछ खास भेजा है मैने आपके लिए चेक करो और बताओ हीही ( शिला मुस्कुराती हुई फोन काट दी )

मानसिंह को समझते देर नहीं लगी कि आखिर क्या खास चीज होगी और उसने झट से अपना व्हाट्सअप खोला और दो तीन तस्वीरों के साथ एक वीडियो आया था , जिसके नीचे एक मैसेज लिखा हुआ था । " आज का लंच स्पेशल है 😜"

मानसिंह उन तस्वीरों को देख कर समझ चुका था कि वीडियो में वही सब होगा और जैसे ही उसने वीडियो खोला ,उसका लंड फुदकने लगा






वीडियो में शिला सिर्फ ब्लाउज और पैंटी में किचन में खड़ी होकर खाना बना रही थी । पैंटी में बाहर निकले हुए उसके बड़े चौड़े चूतड़ देख कर मानसिंह का लंड अकड़ने लगा वो उसको पकड़ कर सिहर गया ।

वही कालेज के बाथरूम में दरवाजा बंद करके खड़ा होकर अरुण तेजी से अपना लंड भींच रहा था । उसके मोबाईल स्क्रीन पर म्यूट में एक वीडियो चल रहा था जिसमें एक मोटी गदराई हुई औरत शावर के नीचे सिर्फ पैंटी में नहा रही थी और पीछे से उसकी भीगी हुई गाड़ दिख रही थी "






" अह्ह्ह्ह्ह सीईईई ओह्ह्ह क्या मस्त माल है यार कितनी मोटी गाड़ है और भीगती हुई तो अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म फक्क्क् यूयू बिच ओह्ह्ह्ह "

तभी वो औरत कैमरा की ओर अपनी गाड़ किए हुए ही अपनी पैंटी नीचे उतारने लगी और उसकी मोटी गदराई गाड़ नंगी होने लगी , शावर का पानी अब सीधे उसके बड़े चौड़े चूतड़ों के दरारों में जाने लगा , जिसे देख कर अरुण खुद को रोक नहीं पाया और भलभला कर झड़ने लगा

" अह्ह्ह्ह्ह गॉड फक्क्क् यूयू ओह्ह्ह्ह यशस्स अह्ह्ह्ह्ह सीईईई ओह्ह्ह उम्ममम अमीईईई अह्ह्ह्ह कितना बड़ा है आह्ह्ह्ह "

अरुण अपना लंड झाड़ कर वापस क्लास के लिए निकल गया और वही मानसिंह शिला से फोन पर बातें कर रहा था । जबकि रज्जो ने शिला का मोबाइल स्पीकर पर रखा हुआ था ताकि वो भी मानसिंह के जज्बात सुन सके

: ओह्ह्ह्ह मेरी जान , क्या मस्त चूतड़ है उफ्फ , जी करता है आकर काट लूं अभी , और खोल कर लंड घुसा दु ( मानसिंह फोन पर बोला और उसकी बाते सुन कर रज्जो और शिला मुंह पकड़ कर खिलखिलाई )

: उफ्फ तो रोका किसने है, आजाओ न मै तो अभी तक वैसी ही हूं कपड़े भी नहीं पहने, आजाओ न मेरे राजा और घुसा दो जहां जो घुसाना चाहते हो उम्ममम ( शिला ने मानसिंह को उत्तेजित किया और मानसिंह का लंड अकड़ गया )

: बस 5 मिनट , मै निकल रहा हूं

मानसिंह की बौखलाहट पर शिला और रज्जो मुंह दबा कर हस रही थी और फिर फोन कट हो गया ।

कुछ ही देर में मानसिंह घर के अंदर दाखिल हो गया था , और उसका लंड पेंट के पूरा कड़क हो गया था

वो लपक कर तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गया ।

कि तभी उसका मोबाइल बजा ये कॉल शिला ने ही किया था

" कहा हो मेरे राजा उम्मम आओ न " , शिला ने फोन पर सिसक कर कहा ।

मानसिंह शिला के कामुक और आकर्षक आवाज से उत्तेजित हो उठा : आ गया हु मेरी जान, कहा हो तुम

शिला : सीधे कमरे में चले आओ अह्ह्ह्ह्ह कबसे मेरी चूत कुलबुला रही है अह्ह्ह्ह सीईईईईई उम्मम्म

शिला ने फोन पर मानसिंह को और उकसाया

मानसिंह : अरे वो रज्जो भाभी कहा.....( मानसिंह आगे कुछ बोलता उससे पहले ही शिला ने फोन काट दिया )

अब तक वो शिला के कमरे तक आ पहुंचा था और जैसे ही उसने कमरे का दरवाजा खोला , अंदर बत्तियां बंद थी बस एक गुलाबी सीलिंग लाइट जल रही थी । उस गुलाबी सीलिंग लाइट को शिला तभी ऑन रखती थी जब वो पूरी तरह से वाइल्ड महसूस करती हो और ये एक तरह का सिंगनल था मानसिंह के लिए और जैसे ही उसकी नजर बिस्तर पर गई उसकी आंखे फेल गई और मुंह में लार बढ़ने लगा ।






सामने उसके शिला वही वाली पैंटी और ब्लाउज पहने हुए हवा में अपने चूतड़ उठाए हुए लेती थी , उसका मुंह दूसरी ओर था ।

तभी बिस्तर की ओर से आवाज आई

: आओ न जानू अह्ह्ह्ह ( शिला ने अपने बड़े भड़कीले चूतड़ हवा में हिला कर उसे रिझाया )

मानसिंह का लंड एकदम से बौराया हुआ था और वो पेंट के ऊपर से उसको पकड़े हुए मसल रहा था

: उफ्फ मेरी जान उस गुलाबी रौशनी में तुम्हारे चूतड़ और भी बड़े और रसीले नजर आ रहे है ।

मानसिंह आगे बढ़ कर शिला के चूतड़ के नंगे गोल बड़े हिस्से को सहलाते हुए कहा , उसका स्पर्श पाते ही वो अकड़ गई ।

: उम्मम कितनी मादक गंध है अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह्ह आज तो तुम्हारे चूतड़ और भी नरम है आह्ह्ह्ह मेरी जान उम्मन( मानसिंह घुटनों के बल होकर दोनों हाथों से शिला के बड़े भड़कीले चूतड़ों को सहलाते हुए अपने नथुने करीब ले गया )

मानसिंह के स्पर्श के शिला के जांघों के कम्पन हो रहा था और थोड़ी मादक महीन सी सिसकियां उठने लगी और अगले ही मानसिंह के अपना मुंह सीधा शिला के बड़े भड़कीले चूतड़ों के दरारों में मुंह दे दिया






अह्ह्ह्ह उम्मम अह्ह्ह्ह्ह सीईईई ओह्ह्ह यस्स अह्ह्ह्ह्ह

मानसिंह के कानो में कुछ अनजानी सी कुनमुनाहट भरी आह आई मगर वो पंजे से दोनों चूतड़ों को फाड़े हुए पैंटी के ऊपर से ही उसके गाड़ की सुराख को चाटने लगा ।

और वो उतनी ही अकड़ने ऐंठने लगी

: ओह मेरे राजा पूरा खा जाओगे क्या ( मानसिंह के कान में शिला के मादक स्वर आए )






: कितनी रसीली गाड़ है , इसको तो मै नंगा करके उम्मम्म सीईईईई ( मानसिंह के अगले ही पल पैंटी हटा कर उसके दरारों को फैलाते हुए अपनी जीभ की टिप से गाड़ की सुराख को गिला करने लगा और वो पूरी तरह से छटकने लगी )

: मस्त है न मेरी जान , और चाटो ने जीभ डाल के अह्ह्ह्ह ऐसे ( शिला ठीक उसके पास बैठती हुई बोली और एकाएक मानसिंह की नजर अपने ठीक बगल में पड़ी और वो चौका )

अगर शिला उसके बगल में बैठी थी तो वो कौन है जिसकी गाड़ की सुराख वो गीली कर रहा था ।

मानसिंह के मन में शंका के अंकुर फूटे और झट से उसने कमरे की बत्ती जला दी

: रज्जो भाभी आप ??



जारी रहेगी
 
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