अध्याय - 91
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"आप जैसा महान इस धरती में कोई नहीं हो सकता दादा ठाकुर।" गौरी शंकर की आंखें नम होती नज़र आईं____"अब जा कर मुझे एहसास हो रहा है कि इसके पहले हम सब कितने ग़लत थे। काश! पहले ही हम सबको सद्बुद्धि आ गई होती। काश! हमने अपने अंदर नफ़रत को इस तरह से पाला न होता।"
कहते कहते गौरी शंकर का गला भर आया और उससे आगे कुछ बोला ना गया। पिता जी ने किसी तरह उसे शांत किया और फिर समझा बुझा कर उसे घर भेज दिया। उसके बाद मैं और पिता जी बग्घी में बैठ कर अपनी हवेली की तरफ बढ़ चले। इधर मेरे दिलो दिमाग़ में एक अलग ही मंथन चलने लगा था।
अब आगे....
सरोज अपने घर के बरामदे में रखी खाट पर बैठी सोचो में गुम थी। उसकी बेटी अनुराधा घर के पीछे मौजूद कुएं में अपने भाई अनूप को ले कर नहाने गई हुई थी। पिछले कुछ दिनों से सरोज अपनी बेटी के लिए काफी चिंतित थी। अनुराधा का हर वक्त ख़ामोश तथा गुमसुम रहना ही उसकी चिंता का सबसे बड़ा कारण था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उसकी बेटी को हुआ क्या है? आख़िर ऐसी कौन सी वजह है जिसके चलते उसकी बेटी एकाएक ही गूंगी बन कर गुमसुम रहने लगी है? सरोज ने कई बार उससे पूछा था मगर उसने सिर्फ इतना ही कहा था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती है, दूसरे उसे उसके बापू की याद आती है। सरोज को अब समझ आ चुका था कि उसकी बेटी ज़रूर उससे कुछ छुपा रही है।
यूं तो अनुराधा पहले भी ज़्यादा किसी से बात नहीं करती थी लेकिन अब से पहले वो इस तरह ख़ामोश और गुमसुम भी नहीं रहती थी। मुरारी की याद तो सरोज को भी बहुत आती थी लेकिन इसके लिए वो अपनी बेटी की तरह गुमसुम नहीं रहने लगी थी। सरोज को अब पक्का यकीन हो चला था कि कोई तो बात ज़रूर है।
अभी वो खाट पर बैठी ये सब सोच ही रही थी कि तभी किसी ने बाहर वाला दरवाज़ा खटखटाया जिससे उसका ध्यान भंग हुआ। खाट से उतर कर वो दरवाज़े के पास पहुंची और फिर उसने दरवाज़ा खोला। बाहर भुवन को देख उसने राहत की तो सांस ली ही किंतु सहसा उसके ज़हन में ख़याल आया कि क्या भुवन को उसकी बेटी के ख़ामोश रहने की वजह पता हो सकती है?
"क्या बात है काकी?" सरोज ने उसे अंदर आने का रास्ता दिया तो भुवन ने अंदर दाखिल होते हुए उससे पूछा____"कुछ परेशान दिख रही हो मुझे। सब ठीक तो है ना?"
"तुम सही कह रहे हो भुवन।" सरोज ने दरवाज़ा बंद कर के उसके पीछे आते हुए कहा____"मैं सच में परेशान हूं और सिर्फ परेशान ही बस नहीं हूं बल्कि चिंतित भी हूं।"
"आख़िर बात क्या है काकी?" बरामदे में रखी खाट पर बैठते हुए भुवन ने पूछा____"किस बात से चिंतित हो तुम?"
"क्या बताऊं बेटा। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा मुझे।" सरोज बरामदे में ही ज़मीन पर बैठने के बाद बोली____"पिछले कुछ दिनों से अनू के बर्ताव को देख कर चिंतित हूं।"
"अ...अनू के??" भुवन एकदम से चौंका____"क्या हुआ उसको?"
"पता नहीं क्या हो गया है उसे?" सरोज ने हताश भाव से कहा____"हर वक्त चुप्पी साधे रहती है। किसी से कुछ बोलती ही नहीं है। बस सारा दिन गुमसुम सी ही रहती है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर उसे हुआ क्या है? पूछती हूं तो गोल मोल जवाब दे कर चुप हो जाती है।"
सरोज की बातें सुन कर भुवन फ़ौरन कुछ बोल न सका। उसे पता था कि अनुराधा की ऐसी दशा क्यों थी? अभी तक तो वो यही समझ रहा था कि शायद धीरे धीरे अनुराधा के दिलो दिमाग़ से छोटे कुंवर का ख़याल निकल जाएगा किंतु अब उसे भी एहसास हो चुका था कि अनुराधा अब उस मानसिकता पर पहुंच गई है जहां से उसे कोई भी आसानी से नहीं निकाल सकता था। एकाएक भुवन भी अनुराधा के लिए चिंतित हो उठा। उसने सच्चे हृदय से उसे अपनी छोटी बहन मान लिया था इस लिए उसे इस हालत में देख कर उसे भी तकलीफ़ होने लगी थी।
"क्या हुआ भुवन?" उसे ख़ामोशी से कुछ सोचते देख सरोज ने पूछा____"क्या सोचने लगे तुम?"
"चिंता मत करो काकी।" भुवन ने खुद को सम्हालते हुए कहा____"सब ठीक हो जाएगा।"
"कैसे ठीक हो जाएगा बेटा?" सरोज ने अधीरता से कहा____"मुझे तो अब उसकी दशा देख कर बहुत घबराहट होने लगी है। समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या करूं मैं जिससे कि वो पहले जैसी हो जाए? मुझे तो वो कुछ बताती ही नहीं है लेकिन तुम तो उसे अपनी बहन मानते हो। क्या तुम्हें भी उसकी इस हालत के बारे में कुछ नहीं पता?"
"मैं तुम्हें किसी अंधेरे में नहीं रखना चाहता काकी।" भुवन ने गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कहा____"मैं अच्छी तरह समझता हूं कि तुम्हें अपनी बेटी की बहुत चिंता हो रही है। इस लिए मैं तुम्हें बताता हूं कि अनुराधा की इस हालत का क्या कारण है?"
"क...क्या तुम जानते हो?" सरोज ने हैरानी से आंखें फाड़ कर उसे देखा____"क्या सच में तुम्हें पता है कि अनू को क्या हुआ है?"
"हां काकी।" भुवन ने कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि अनुराधा की ये हालत किस वजह से है।"
"क..किस वजह से है भुवन?" सरोज ने आतुरता से पूछा____"मुझे जल्दी बताओ बेटा कि आख़िर मेरी बेटी को क्या हुआ है?"
"प्रेम।" भुवन ने धड़कते दिल से कहा____"हां काकी उसे प्रेम हो गया है।"
"क...क्या???" सरोज की ज़ुबान लड़खड़ा गई, किसी तरह खुद को सम्हाल कर बोली____"ये तुम क्या कह रहे हो?"
"यही सच है काकी।" भुवन ने कहा____"मेरी मासूम बहन को प्रेम हो गया है, लेकिन उस पगली को शायद खुद ही नहीं पता है कि जिस हालत से वो गुज़र रही है उस हालत को असल में क्या कहते हैं?"
"पता नहीं तुम ये क्या बोले जा रहे हो?" सरोज का दिमाग़ जैसे चकरा ही गया____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"
"इंसान जब किसी से प्रेम करने लगता है काकी तो उसकी ऐसी ही दशा हो जाती है।" भुवन ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"और ये दशा तब और भी ज़्यादा बद्तर हो जाती है जब प्रेम करने वाले को उसका प्रेमी नहीं मिलता।"
सरोज आश्चर्य से आंखें और मुंह फाड़े देखती रह गई भुवन को। इधर भुवन के ज़हन में सहसा ये विचार उभरा कि उसने ये बात सरोज को बता कर सही किया या ग़लत?
"क...कौन है वो?" उधर सरोज ने अजीब तरह से भुवन को देखते हुए पूछा____"बताओ भुवन, कौन है वो व्यक्ति जिससे मेरी बेटी प्रेम करती है? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरी भोली भाली बेटी ऐसे काम भी कर सकती है।"
"सच जान कर तुम्हें झटका लग सकता है काकी।" भुवन ने सरोज की तरफ देखते हुए गंभीरता से कहा____"लेकिन सच तो सच ही है। उसे सुनने के लिए तुम्हें हिम्मत से काम लेना होगा।"
"तुम्हारी ये बात सुन कर मेरा जी बहुत ज़्यादा घबराने लगा है।" सरोज ने कहा____"और तुम कह रहे हो कि मुझे हिम्मत से काम लेना होगा? ख़ैर तुम बताओ, मेरे जी से ज़्यादा मेरी बेटी मेरे लिए मायने रखती है।"
"अनुराधा जिस व्यक्ति से प्रेम करती है।" भुवन ने मानो सरोज के सिर पर बम फोड़ते हुए कहा____"वो व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि छोटे कुंवर हैं।"
"क...क्या????" सरोज की मानो चीख ही निकल गई। उसे ऐसा लगा जैसे पलक झपकते ही उसके पिछवाड़े की ज़मीन पाताल तक धंसती चली गई है।
"हां काकी।" भुवन ने कहा____"सच यही है कि अनुराधा छोटे कुंवर से प्रेम करने लगी है और शायद इस क़दर करने लगी है कि उसकी वजह से आज वो ऐसी दशा में पहुंच गई है।"
सरोज को एकदम से जैसे लकवा मार गया। किंकर्तव्यविमूढ़ सी हालत में बैठी रह गई वो। भुवन को उसकी हालत का बखूबी एहसास था। वो जानता था कि एक दिन सरोज के सामने ये सच्चाई ज़रूर आएगी जिससे उसकी ये दशा हो जाएगी। तभी अचानक सरोज को जैसे होश आया।
"न...नहीं नहीं।" फिर वो अजीब सा बर्ताव करते हुए बोली____"ये...ये नहीं हो सकता। नहीं भुवन, ये सच नहीं हो सकता। तुम झूठ बोल रहे हो मुझसे? मेरी अनू ऐसा नहीं कर सकती। वो तो अभी नादान है, नासमझ है। उसे तो दुनियादारी का कोई ज्ञान ही नहीं है।"
"यही तो मैंने भी कहा है काकी।" भुवन के होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई____"कि उसे शायद खुद ही नहीं पता है कि वो जिस हालत में है उसे असल में क्या कहते हैं?"
"हाय राम! ये क्या ग़ज़ब हो गया?" सरोज ने जैसे माथा पीट लिया____"मेरी फूल सी बेटी के मन में ये कैसा बीज बो दिया तुमने? अब क्या होगा मेरी बेटी का?"
"चिंता मत करो काकी।" भुवन ने कहा____"छोटे कुंवर को सब पता है। मैंने इस बारे में उनसे पूछा था तो उन्होंने मुझसे बस यही कहा था कि इस बारे में मैं ज़्यादा मत सोचूं। क्योंकि सच ये है कि अगर अनुराधा को तकलीफ़ होगी तो उन्हें भी होगी।"
"क....क्या मतलब है इस बात का?" सरोज के चेहरे पर असमंजस के से भाव उभर आए।
"मतलब ये है कि शायद वो भी अनुराधा से प्रेम करते हैं।" भुवन ने कहा____"तभी तो अनुराधा की तकलीफ़ से उन्हें भी तकलीफ़ होती है।"
"नहीं....ये सब झूठ है।" सरोज की आवाज़ भारी हो गई____"सच तो ये है कि वैभव ने मेरी भोली भाली बेटी को अपने झूठे प्रेम के जाल में वैसे ही फांस लिया है जैसे वो बाकी लड़कियों को अब तक फांसता आया है। वो बाकी सबकी तरह मेरी बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बना लेगा और क्या पता...उसने बना भी लिया हो। हे भगवान! ये क्या अनर्थ करवा दिया मेरी बेटी के साथ।"
कहने के साथ ही सरोज फूट फूट कर रोने लगी। इधर भुवन उसकी बातें सुन कर एकदम से ही चौंका और फिर गहरी सोच में डूबता नज़र आया। उसके अपने दिलो दिमाग़ में जैसे कई तरह के सवाल बड़ी तेज़ी से उछल कूद करने लगे थे।
"तुम ग़लत सोच रही हो मां।" सहसा आंगन में अनुराधा की आवाज़ गूंजी तो सरोज और भुवन दोनों ने ही चौंक कर आवाज़ की दिशा में देखा। अनुराधा अपने भाई के साथ गीले कपड़ों में दरवाज़े के अंदर खड़ी थी। उसके एक हाथ में पानी से भरी बाल्टी थी।
"तुम ये कैसे सोच सकती हो मां कि तुम्हारी बेटी अपने घर की इज्ज़त और मान मर्यादा को इस तरह धूल में मिला देगी?" अनुराधा ने गंभीर लहजे में कहा____"मैं कोई दूध पीती बच्ची नहीं हूं जिसे अच्छे बुरे का इतना भी ज्ञान न हो। तुम्हारी बेटी ने अपनी इज्ज़त पर दाग़ नहीं लगाया है मां और ना ही किसी ने लगाना चाहा है।"
"तू सच कह रही है ना अनू?" सरोज की जैसे जान में जान आई____"और....और तू वैभव से प्रेम भी नहीं करती है ना?"
"कपड़े बदल लूं मां।" बाल्टी को एक तरफ रख कर अनुराधा ने कहा____"उसके बाद तुम्हें सब कुछ सच सच बता दूंगी।"
कहने के साथ ही अनुराधा ने एक नज़र भुवन की तरफ देखा और फिर अपने कमरे की तरफ चली गई। इधर भुवन ये सोच कर हैरान था कि अनुराधा में इतनी हिम्मत कहां से आ गई थी जिसके चलते उसने इतना कुछ बेझिझक और निडरता से कह दिया था? बहरहाल कुछ ही देर में अनुराधा कपड़े बदल कर बाहर आ गई।
"माफ़ करना भैया।" फिर उसने संजीदगी से भुवन को देखते हुए कहा____"आपके सामने मैंने निर्लज्जता से ऐसी बातें बोल दी लेकिन सच कहूं तो आज आपकी ही वजह से मुझमें इतना बोलने की हिम्मत आई है वरना मैं तो शायद कभी भी इस बारे में मां को बता ही नहीं पाती।"
"ये सब छोड़।" सरोज ने तपाक से कहा____"और वो बता जो मैंने पूछा था। तू वैभव से प्रेम नहीं करती है ना?"
"मुझे तो पता ही नहीं था मां कि प्रेम क्या होता है?" अनुराधा ने जैसे सोच लिया था कि अब वो सब कुछ बेझिझक हो कर बोलेगी____"दरवाज़े के पास खड़ी आप दोनों की बातें सुन रही थी मैं। भुवन भैया की बातों से ही मुझे पता चला कि जिसे मैं अब तक समझ नहीं पा रही थी वो आख़िर था क्या? इतने दिनों से मैं यही तो जानना चाहती थी कि क्यों मुझे छोटे कुंवर की इतनी याद आती है? क्यों हर वक्त उनकी बातें मेरे कानों में गूंजती रहती हैं? क्यों हर समय उन्हें देखने का मन करता है? इन सब बातों का ज्ञान अब जा कर हुआ है मुझे।"
"ऐसी बातें करते हुए तुझे लाज नहीं आती बेशर्म?" सरोज ने एकाएक नाराज़गी से उसे देखा____"पता नहीं क्या क्या उल्टा सीधा बके जा रही है। चुप कर वरना मुंह तोड़ दूंगी तेरा।"
"इसे बोलने दो काकी।" भुवन ने कहा___"इसके मन में जो है उसे निकल जाने दो। तभी इसके मन को शान्ति मिलेगी वरना ये फिर से अंदर ही अंदर खुद को जलाती रहेगी।"
"उस वैभव ने तुझे अपने प्रेम के जाल में फांसा है ना?" सरोज ने उसे घूरते हुए कहा____"सच सच बता कब से चल रहा है ये सब?"
"तुम फिर से ग़लत सोच रही हो मां।" अनुराधा ने अधीरता से कहा____"मुझे किसी ने अपने जाल में नहीं फंसाया है। मुझे नहीं पता कि कब मेरे मन में छोटे कुंवर की छवि बस गई और कब मुझे उनसे प्रेम हो गया। बस इतना जानती हूं कि हर वक्त उनकी याद आती है। हर वक्त उन्हें देखने का मन करता है और जब वो नहीं दिखते तो बहुत दुख होता है। पता नहीं क्यों पर कुछ भी अच्छा नहीं लगता है मुझे। जब वो याद आते हैं तो आंखों से आंसू बहने लगते हैं।"
"हाय राम!" सरोज की आंखें आश्चर्य से फैल गईं____"क्या हो गया है इस लड़की को? पता नहीं क्या क्या बोले जा रही है।"
"मुझे पूछना तो नहीं चाहिए मेरी बहन लेकिन फिर भी पूछ रहा हूं।" भुवन ने कहा____"मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि आख़िर तुम्हारे और छोटे कुंवर के बीच ऐसा क्या हुआ है जिसके चलते तुम उनसे प्रेम करने लगी हो?"
"मुझे कुछ नहीं पता भैया।" अनुराधा ने बेबसी से कहा____"जब वो यहां आते थे तो उनको चोरी छुपे देखा करती थी। वो मुझे राज कुमार की तरह दिखते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में दादी मुझे राजा रानी की कहानियां सुनाया करती थीं।"
उसके बाद अनुराधा ने झिझकते हुए संक्षेप में वो सारी बातें बताई जो उसके और वैभव के बीच शुरू से अब तक हुईं थी। जहां एक तरफ सरोज अपनी बेटी की प्रेम कहानी सुन चकित थी वहीं भुवन को उसके भोलेपन और नादानी भरी बातों पर बड़ी सहानुभूति हो रही थी।
भुवन को पहले भी यकीन था कि अनुराधा ऐसी वैसी लड़की नहीं है। हां वो थोड़ी नादान और नासमझ ज़रूर थी किंतु उसका मन बहुत भोला और साफ था। अब जब उसे उसकी प्रेम कहानी के सफ़र का पता चला तो उसके ज़हन में बस एक ही ख़याल उभरा____"ऐसी मासूम लड़की का कोई कसूर नहीं है। कसूर है तो उन हालातों का जिन हालातों में उसे वैभव जैसे अमीर और उच्च खानदान के लड़के को देखते हुए प्रेम हुआ।"
भुवन को एहसास था कि अनुराधा जो एक मामूली से ग़रीब घर की लड़की है उसका वैभव से दूर दूर तक कोई मेल नहीं है। फिर भी अगर वैभव को उसकी तकलीफ़ से तकलीफ़ होती है है तो शायद उसके जीवन की डगर अपनी उस मंज़िल तक पहुंच ही जाए जहां पहुंचना बेहद ही मुश्किल है।
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चंद्रकांत के बेटे के अंतिम संस्कार में मैं और पिता जी के साथ लगभग पूरा गांव ही शामिल था। गांव का साहूकार गौरी शंकर भी और दूसरे गांव के कुछ लोग भी। इस सब में दोपहर हो गई थी। हवेली में आ कर मैं और पिता जी एक बार फिर से नहाए और फिर कपड़े पहन कर खाना खाने बैठे। खाने के दौरान मां से पिता जी की थोड़ी बहुत बात चीत हुई उसके बाद मैं और पिता जी बैठक में आ गए।
"चंद्रकांत के बेटे की हत्या हो जाने से गांव में थोड़ा दहशत का माहौल हो गया है।" पिता जी ने थोड़े गंभीर भाव से कहा____"और इसके साथ ही अब हमारे लिए भी परेशानी और चिंता की बात हो गई है।"
"परेशानी किस बात की पिता जी?" मैंने सोचने वाले भाव से उनकी तरफ देखा।
"सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं लग रहा।" पिता जी ने कहा____"इतना समय गुज़र गया है किंतु उसकी तरफ से किसी भी तरह की कोई हरकत नहीं की गई। वो तुम्हारी जान का दुश्मन बना हुआ था इस लिए अब सवाल ये है कि वो इस तरह अचानक से ख़ामोश क्यों हो गया है? क्या वो कुछ ऐसा करने का मंसूबा बनाए हुए है जो हमारी कल्पना से भी परे है?"
"कुछ तो बात ज़रूर है पिता जी।" मैंने गंभीरता से कहा____"उसकी ख़ामोशी उसके द्वारा किसी बड़े तूफ़ान के लाने का सबब हो सकती है। वो अब तक हमारी पकड़ में इस लिए नहीं आया है क्योंकि वो आश्चर्यजनक रूप से ख़ामोश है। अगर वो कोई हरकत करे तो हमें भी कुछ करने का मौका मिले।"
"तुम्हें बेहद सतर्क रहने की ज़रूरत है।" पिता जी ने कहा____"और साथ ही अकेले कहीं भी जाने का मत सोचना। वैसे हमने तुम्हारी सुरक्षा के लिए गुप्त रूप से आदमियों को लगा रखा है, फिर भी तुम अपनी तरफ से कोई लापरवाही मत करना।"
"उसने अब तक अपने मोहरों के द्वारा ही मुझ पर जानलेवा हमला करवाया था।" मैंने कहा____"वो खुद कभी मेरे सामने नहीं आया। मैं तो चाहता हूं कि वो मर्द की तरह मेरे सामने आ कर मेरी जान लेने की कोशिश करे। मैं भी तो देखूं कि मेरी जान लेने की इच्छा रखने वाले के खून में कितनी तपिश है।"
"तुम्हें फिलहाल ऐसी कोई भी बेवकूफी भरी बात नहीं सोचनी है।" पिता जी ने सपाट लहजे से कहा____"वो एक छलावा जैसा है जो धोखे से ही तुम्हारी जान लेने की कोशिश करेगा इस लिए तुम्हें पूरी तरह सतर्क रहना है। उसकी ख़ामोशी देख कर हर गुज़रते पल के साथ हमारी बेचैनी और परेशानी बढ़ती ही जा रही है। हम चाहते हैं कि जल्द से जल्द उसका पर्दाफाश हो और वो हमारी पकड़ में आ जाए।"
"मुझे लगता है कि हमें उसके बारे में जानने के लिए सुनील और चेतन को अब अपने काबू में लेना चाहिए।" मैंने कहा____"उन दोनों को कुछ तो पता होगा कि सफ़ेदपोश से उनकी किस तरह से मुलाक़ात होती थी? दूसरी अहम बात ये भी है कि उनसे हमें ये भी पता चल जाएगा कि उन लोगों ने आख़िर किस वजह से मेरे खिलाफ़ जा कर उस सफ़ेदपोश का मोहरा बनना स्वीकार किया था?"
"सही कहा।" पिता जी ने सिर हिलाया____"अभी तक हम यही सोचते थे कि हमारी वजह से किसी पर कोई ख़तरे जैसी बात न आए किंतु सच तो ये है कि हमारे ऐसा सोचते रहने से सिर्फ हमारा ही बुरा हुआ है। इस लिए अब से किसी पर भी इस तरह की कोई रियायत नहीं की जाएगी। हम आज ही शेरा को उन्हें पकड़ कर लाने के लिए बोलेंगे। इस किस्से को अब हम और ज़्यादा लंबा नहीं होने देंगे।"
"अगर यही सोच और सख़्ती आपने पहले अख़्तियार की होती।" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"तो आज हमारे साथ ऐसा नहीं होता। जगताप चाचा और बड़े भैया आज हमारे साथ होते। माफ़ कीजिए पिता जी लेकिन ये सच है कि आपकी नर्मदिली ने हमारे दुश्मनों के हौसलों को बुलंद किया जिसके चलते उन लोगों ने हमारे साथ इतना कुछ करने की हिम्मत दिखाई। आप इस गांव के ही नहीं बल्कि आस पास के गावों के भी मुखिया थे। मुखिया को इतना भी रहमदिल और कमज़ोर नहीं होना चाहिए कि लोगों के अंदर उसके लिए कोई ख़ौफ ही न रह जाए।"
"हमने जब से होश सम्हाला था तब से अपने पिता जी की हर कार्य शैली को देखा था।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"हमने देखा था कि वो किस तरह गांव के लोगों पर क़हर बन कर टूट पड़ते थे। लोग उनसे इतना डरते थे कि वो अपनी मर्ज़ी से सांस भी नहीं ले सकते थे। किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनके सामने सिर उठाने की, उनकी तरफ देखने की तो बहुत दूर की बात है। वो तो ख़ैर मामूली लोग थे किंतु यही हाल बड़े बड़े लोगों का भी था। शहर के विधायक मंत्री, पुलिस के अधिकारी सब उनसे डरते थे। इसी हवेली में उनका अपना एक हरमखाना हुआ करता था, जहां पर शाम ढलते ही उनकी महफ़िल सजती थी। उस महफ़िल में लड़कियां उनके सामने नाचती गाती थीं। पिता जी को खुश रखने के लिए बड़े बड़े लोग हमेशा दूर दूर से लड़कियों को लाते थे और उनके लिए खुद ही ये सब प्रबंध करते थे। ख़ैर उनकी मृत्यु के बाद जब हम दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठे तो हमने ये सब कुछ बंद करवा दिया। उनके हरमखाने में हमेशा हमेशा के लिए ताला लगवा दिया। आज भी हवेली की ऊपरी मंजिल में बने उनके हरमखाने में वर्षों से ताला लगा हुआ है। वहां पर किसी को भी जाने की इजाज़त नहीं है। हमने ऐसा सिर्फ इसी लिए किया था क्योंकि हमने बचपन से देखा था कि पिता जी ने मासूम लोगों पर कितना अत्याचार किया था। जिसकी भी बहू बेटी उन्हें पसंद आ जाती थी उनके आदमी उसे उठा लाते और फिर पिता जी उसके मान सम्मान को तार तार कर डालते थे। उनके ख़ौफ की वजह से कोई उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की सोच तक नहीं सकता था। यही हाल हवेली के अंदर भी था। हवेली के अंदर भी कोई उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ कुछ नहीं बोल सकता था। हमारी माता जी हमेशा उनके इन सभी कार्यों से दुखी रहतीं थी और हम दोनों भाइयों को यही सीख देती थीं कि हम बड़े हो कर अपने पिता जी के जैसे बनने का ख़याल भी अपने ज़हन में न लाएं। हमने बचपन से लोगों पर अत्याचार होते हुए देखा था। उनकी आत्माओं को तड़पते हुए देखा था इस लिए हमें उनकी पीड़ा का अच्छी तरह एहसास था। हम पहले भी उन दुखी लोगों के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन पिता जी के डर से कभी कुछ कर नहीं पाए थे। उसके बाद जब पिता जी की मृत्यु हुई तो हमने एक ही प्रण लिया कि अब से जीवन में कभी भी किसी को दुखी नहीं होने देंगे। पिता जी ने ऐसा माहौल बना रखा था कि हमें डरी सहमी हुई जनता को सामान्य बनाने में वर्षों लग गए। उन्हें इस बात का यकीन दिलाने में हमें वर्षों लग गए कि अब से वो अपनी मर्ज़ी से कुछ भी कर सकते हैं। उन्हें हवेली में रहने वालों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। अपने छोटे भाई जगताप को भी हमने हमेशा यही पाठ पढ़ाया कि वो भूल से भी किसी के साथ ग़लत न करे। वर्षों बाद आख़िर ऐसा समय आ ही गया जब वही डरे सहमे लोग सामान्य भाव से जीने लगे। हमने सबकी दिल खोल कर मदद की और उन्हें अपने तरीके से जीने के लिए प्रोत्साहित किया। ये उसी का परिणाम था कि यही डरे सहमे लोग हमें देवता की तरह पूजने लगे। लोगों को अपने तरीके से जीता देख और उन्हें खुश देख हमें भी आत्मिक खुशी मिली। हमें ऐसा लगा जैसे हमारी कोई तपस्या पूरी हो गई हो। ताक़त और ताक़तवर होने का मतलब ये नहीं होता कि हम अपनी ताक़त का स्तेमाल कर के लोगों का सुख चैन ही छीन लें। ईश्वर ने सबको समान रूप से बनाया है। इस धरती पर सबको खुशी से जीने का अधिकार है। किसी की खुशियां छीन कर और उन्हें दुख दे कर हम कोई अच्छा कार्य नहीं करते हैं बल्कि हद दर्जे का पाप करते हैं। हमने लोगों के अंदर से डर को दूर किया और सबको अपने तरीके से जीने की आज़ादी दी। बदले में हमने किसी से कुछ नहीं मांगा इसके बावजूद लोग हमें देवता मान बैठे और हमें पूजने लगे। लोगों के अंदर हमारे प्रति ऐसा भरोसा बैठ गया कि अगर उनके सामने कोई ग़लती से भी हमारी बुराई करता था तो वो लोग उस व्यक्ति की जान लेने पर उतारू हो जाते थे। वो अपने देवता की बुराई अथवा अपमान किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं कर सकते थे। किसी इंसान को इससे बढ़ कर और भला क्या चाहिए? जिस युग में लोगों की आस्था सचमुच के देवी देवताओं के प्रति कमज़ोर हो जाती है उस युग में अगर लोग किसी इंसान को देवता ही मान बैठे तो उसके लिए इससे बड़ा गौरव क्या हो सकता है? क्या इस खुशी और इस सम्मान से भी बड़ा कुछ हो सकता है?"
पिता जी ये सब कहने के बाद चुप हुए तो बैठक में सन्नाटा छा गया। मेरे अंदर उनकी ये बातें सुन कर अजीब तरह का एहसास होने लगा था।
"साहूकारों ने हमारे भाई और बेटे की हत्या की और फिर गुस्से में आ कर हमने भी उनके लोगों की हत्या कर दी।" पिता जी ने फिर से कहना शुरू किया____"हम जानते हैं कि इस सबमें हमारा इतना भी दोष नहीं है जितना कि वो लोग समझते हैं। इसके बावजूद हमने उनके आरोपों को क़बूल किया और उनसे अपने किए गए कृत्य की माफ़ी मांगी। खुद को उनके सामने झुका भी दिया। ऐसा सिर्फ इसी लिए कि हम अपने पिता जी की तरह नहीं बनना चाहते थे और ना ही उनके इतिहास को दोहराना चाहते थे। अपनी वर्षों की मेहनत को इस तरह से ख़ाक में मिलता नहीं देख सकते थे हम। लोग हमें देवता न मानें कोई बात नहीं लेकिन एक अच्छा इंसान समझें ये सबसे ज़रूरी है। अगर हम चाहते तो इतना कुछ कर देने के बाद भी साहूकार हमारा कुछ नहीं कर पाते और ना ही हवेली में उस दिन पंचायत होती। ये हमारा मामला था, अतः इसे हम अपने तरीके से जैसे चाहे निपटा लेते लेकिन हमने ऐसा नहीं किया बल्कि सबके बारे में सोचा। ख़ास कर इस बारे में कि जिन लोगों ने हमारे प्रति अपने अंदर आस्था जगा रखी है उन्हें हमारे बदल गए रूप से धक्का लग जाएगा। लोग ये सोच बैठेंगे कि हम भी अपने पिता की तरह बन गए और लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया है। ख़ैर छोड़ो इन बातों को, हम चाहते हैं कि तुम भी एक अच्छा इंसान बनो और लोगों के अंदर जो तुम्हारी छवि बनी हुई है उसे अपने अच्छे कर्मों से मिटा डालो।"
पिता जी की बात सुन कर मैंने सिर हिलाया और फिर उनसे इजाज़त ले कर मैं मोटर साईकिल से अपने खेतों की तरफ निकल गया। सारे रास्ते मेरे ज़हन में पिता जी की बातें ही गूंजती रहीं।
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