Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 16 - SexBaba
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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 105

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"फिलहाल तो मैं तुम दोनों की ही तरफ हूं।" भाभी ने कहा____"क्योंकि तुम्हें भी पता है कि मेरे बिना तुम दोनों की नैया पार नहीं लगेगी। इस लिए ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत करना। अब जाओ तुम, मैं भी नीचे जा रही हूं।"

कहने के साथ ही भाभी मेरी कोई बात सुने बिना ही सीढ़ियों पर उतरती चली गईं। उनके जाने के बाद मैं भी उनकी बातों के बारे में सोचते हुए और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया।


अब आगे....

अगली सुबह।

पिता जी और मैं चाय पीने के बाद चंद्रकांत के घर जाने के लिए बाहर निकले ही थे कि तभी सामने से आते शेरा पर हमारी नज़र पड़ी। शेरा के चेहरे पर अजीब से भाव थे जिसे देख पिता जी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए।

"प्रणाम मालिक।" क़रीब आते ही शेरा ने झुक कर पिता जी के पैरों को छू कर कहा।

"क्या बात है?" वो जैसे ही खड़ा हुआ तो पिता जी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"तुम्हारे चेहरे पर मौजूद ये भाव कैसे हैं? कुछ हुआ है क्या?"

"जी मालिक।" शेरा ने नज़रें झुकाए हुए कहा____"परसों रात मैंने सफ़ेदपोश को देखा था...लेकिन।"

"लेकिन??" पिता जी के साथ साथ मैं भी चौंक पड़ा था।

"लेकिन मैं अपनी लाख कोशिश के बाद भी उसे पकड़ नहीं सका।" शेरा ने अपराध भाव से सिर झुकाए हुए कहा।

"पूरी बात बताओ।" पिता जी ने सपाट लहजे से कहा।

शेरा ने पूरी बात बता दी कि कैसे उसने परसों की रात चंद्रकांत और सफ़ेदपोश को आपस में बातें करते सुना और फिर सफ़ेदपोश के जाते ही उसने उसका पीछा किया। पीछा करते हुए वो आमों के बाग तक गया था जहां पर सफ़ेदपोश ने हमारे एक आदमी को गोली मार दी थी।

"हैरानी की बात है कि सफ़ेदपोश तुम्हारी बेवकूफी की वजह से हाथ से निकल गया।" पिता जी ने नाराज़गी जताते हुए कहा____"जब तुमने उसे चंद्रकांत से बात करते हुए देख ही लिया था तो तुम्हें उसी समय उसे दबोच लेना चाहिए था।"

"माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा ने खेद भरे भाव से कहा____"मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वो चंद्रकांत के यहां दिख जाएगा। आपके आदेश पर मैं उसे खोज ही रहा था कि अचानक वो मुझे चंद्रकांत के घर के बाहर दिख गया। पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था कि अंधेरे में वहां पर कोई है भी या नहीं। वो तो रात के सन्नाटे में मुझे हल्की आवाज़ें सुनाई दी थीं। आवाज़ों को सुन कर मैं चौंक गया था कि इतनी रात को कौन हो सकता है? अपनी उत्सुकता को मिटाने के लिए जब मैं आवाज़ की दिशा में गया तो अंधेरे में मुझे दो साए खड़े नज़र आए। ये तो मैं जान चुका था कि वो घर चंद्रकांत का ही है लेकिन मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि चंद्रकांत के घर के बाहर उस वक्त कौन हो सकता है। यही देखने के लिए मैं बहुत ही सावधानी से उनके क़रीब बढ़ गया था। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो कौन हैं। एक तो चंद्रकांत ही था जोकि उसकी आवाज़ से ही मैं पहचान गया था लेकिन दूसरा कौन था ये मैं थोड़ी ही देर में उसकी पोशाक से पहचान पाया। उसकी आवाज़ भी वैसी ही अजीब सी थी जैसी मैंने तब सुनी थी जब एक बार दरोगा धनंजय के यहां मैंने सफ़ेदपोश के मुख से सुनी थी। मैं ये जान कर चकित रह गया था कि सफ़ेदपोश इतनी रात को चंद्रकांत के पास कैसे है? दोनों की बातें सुनने के लिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर खड़ा रहा। मैं जानना चाहता था कि सफ़ेदपोश का चंद्रकांत से यूं रात के उस वक्त मिलने का क्या मतलब था और साथ ही दोनों के बीच क्या संबंध है?"

"तो क्या सुना तुमने?" पिता जी ने पूछा।

पिता जी के पूछने पर शेरा ने वही सब बताया जो परसों की रात चंद्रकांत से सफ़ेदपोश ने बातें की थी। सारी बातें सुनने के बाद पिता जी कुछ पलों तक जाने क्या सोचते रहे फिर बोले_____"उसके बाद क्या हुआ? हमारा मतलब है कि चंद्रकांत से वो सब बातें करने के बाद सफेदपोश कहां गया और तुमने क्या किया?"

"चंद्रकांत को अगली रात मिलने को कह कर जब सफ़ेदपोश वहां से चल दिया तो मैं भी उसके पीछे लग गया।" शेरा ने बताना शुरू किया____"वो अंधेरे में भी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता चला जा रहा था। मैं ये सोच कर हैरान हो उठा था कि वो कच्चे रास्ते और कीचड़ भरी ज़मीन पर भी कैसे इतनी तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था। मुझे लगा कहीं वो मेरी पहुंच से बाहर हो कर अंधेरे में गायब ही न हो जाए इस लिए मैं भी तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा किंतु एक जगह अचानक ही कीचड़ में मेरा पैर फिसल गया और मैं खुद को हज़ार कोशिश के बाद भी सम्हाल न सका। नतीज़ा ये हुआ कि मैं वहीं कीचड़ में गिर गया। किसी तरह जल्दी से उठा और फिर से उसके पीछे दौड़ चला किंतु आगे अंधेरे में वो मुझे नज़र न आया। मुझे याद आया कि पिछली बार वो आमों के बाग की तरफ ही गया था और फिर वो वहीं गायब हो गया था। मैं तेज़ी से आगे की तरफ दौड़ता चला गया। किन्तु शायद उसे शक हो गया था कि उसके पीछे कोई है इस लिए जल्दी ही वो आमों के बाग में दाखिल हो गया। मैंने अपना एक आदमी पहले से ही बाग़ के मकान के पास तैनात कर रखा था। शायद उस आदमी को अंधेरे में सफ़ेदपोश के आने का आभास हो गया था। सन्नाटे में मैंने साफ सुना था कि उसने उस सफ़ेदपोश को आवाज़ दी थी। मैं जानता था कि सफ़ेदपोश ऐसी चीज़ नहीं है जिसे अकेला आदमी अपने काबू में कर सके। अभी मैं बाग के क़रीब पहुंचा ही था कि तभी सन्नाटे में गोली चलने की तेज़ आवाज़ गूंज उठी और साथ ही एक इंसानी चीख भी। मैं समझ गया कि गोली उस सफ़ेदपोश ने ही चलाई थी क्योंकि मेरे आदमी के पास तो बंदूक जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं। मैं फ़ौरन ही उस जगह पहुंच गया लेकिन देर हो चुकी थी मुझे। सफ़ेदपोश बाग़ में गायब हो चुका था। अब उसे खोजना व्यर्थ था। मैं फ़ौरन ही दर्द से तड़पते अपने आदमी के पास पहुंचा और उसे ले कर वैद्य जी के पास गया। वैद्य जी ने कहा कि गोली लगी है इस लिए वो इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। तब मैं फ़ौरन ही उसे जीप में लाद कर उसी वक्त शहर चला गया।"

"अब कैसा है वो?" पिता जी ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"समय से उसका उपचार हुआ था कि नहीं?"

"ऊपर वाले की दया से वो बच गया है मालिक।" शेरा ने कहा____"हालाकि खून बहुत बह गया था उसका। लगा नहीं था कि बचेगा किंतु बच गया। अभी थोड़ी देर पहले ही उसको अस्पताल से वापस ला कर उसके घर लाया हूं। सोचा आपको भी इस बारे में ख़बर कर दूं।"

"बड़ी अजीब बात है पिता जी।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"पहले भी सफ़ेदपोश को हमारे आमों के बाग़ में ही ग़ायब होते देखा गया था और शेरा के अनुसार परसों रात को भी। सोचने वाली बात है कि हमारे आमों के बाग़ में पहुंच कर वो कैसे और कहां गायब हो जाता है? ये तो पक्की बात है कि वो कोई भूत प्रेत नहीं है जो किसी जादू की तरह ग़ायब हो जाता है। अब सवाल ये है कि वो ग़ायब कैसे हो जाता है? वो भी कुछ इस तरह से कि खोजने पर भी किसी को नज़र नहीं आता?"

"सही कहा तुमने।" पिता जी के चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे____"सफ़ेदपोश अपने काम को अंजाम देने के बाद हमारे आमों के बाग़ की तरफ ही क्यों जाता है और फिर वहां ग़ायब कैसे हो जाता है? आख़िर आमों के उस बाग़ में वो कौन सी जगह है जो एक इंसान को किसी जादू की तरह ग़ायब कर देती है? इस बारे में यकीनन अब पता लगाना पड़ेगा।"

"मेरा भी यही कहना है।" मैंने कहा____"हमारे आमों के बाग़ में कोई तो ख़ास बात ज़रूर है जो हमारे लिए अब रहस्य बन गई है और यकीनन सफ़ेदपोश के लिए एक पनाहगाह। एक ऐसी पनाहगाह जो उसके लिए हर तरह से सुरक्षित प्रतीत होती है। तभी तो वो हर बार वहीं पर जा कर बड़े आराम से हम सबकी नज़रों से ग़ायब हो जाता है। हमें आमों के बाग़ में जा कर वहां की अच्छे तरीके से जांच पड़ताल करनी होगी।"

शेरा को वापस भेजने के बाद मैं और पिता जी जीप में बैठ कर चंद्रकांत के घर की तरफ चल पड़े। सारे रास्ते हम दोनों के बीच ख़ामोशी रही। मेरी तरह शायद पिता जी भी सफ़ेदपोश के ही बारे में सोच रहे थे। ख़ैर कुछ ही देर में हम चंद्रकांत के घर पहुंच गए जहां पर ठाकुर महेंद्र सिंह की जीप पहले से ही खड़ी नज़र आई हमें।

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"तो आख़िर वही हुआ जिसका हमें पहले से ही अंदेशा था।" ठाकुर महेंद्र सिंह की सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"यानि उस सफ़ेदपोश ने बड़ी ही चालाकी से चंद्रकांत के ही हाथों उसकी बहू की हत्या करवा दी। रजनी के संबंध में उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सब एक ऐसा झूठ था जिसे पूरी तरह सच मान कर चंद्रकांत ने अपनी ही बहू को जान से मार डाला।"

पिता जी की ये बातें सुन कर इतने लोगों के मौजूद रहते हुए भी सन्नाटा छा गया। ये अलग बात है कि कुछ ही दूरी पर चंद्रकांत दोनों हाथों से अपना सिर पकड़े इस तरह बैठा था जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो और वो पूरी तरह से बर्बाद हो गया हो। चेहरे पर अनंत पीड़ा के भाव थे और आंखों में आंसुओं का तैरता हुआ सैलाब। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोके हुए था वो।

पिता जी के आने से पहले महेंद्र सिंह ने उससे यही पूछा था कि____'क्या कल रात सफ़ेदपोश उससे मिलने आया था?' जवाब में चंद्रकांत ने बड़े ही दुख के साथ इंकार में सिर हिलाया था और फिर लगभग रोते हुए उसने बताया था कि वो सफ़ेदपोश के इंतज़ार में सारी रात घर से बाहर बैठा रहा था किंतु सफ़ेदपोश को तो जैसे न आना था और ना ही वो आया था। उसके न आने का बस यही मतलब था कि पिछले दिन उसके बारे में दादा ठाकुर ने जो कुछ अनुमान के तहत कहा था वो ही सच था।

"कहना तो नहीं चाहिए चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन ये सच है कि तुम्हारे ही दुष्कर्मों की वजह से तुम्हारा बेटा और तुम्हारी बहू आज इस दुनिया में नहीं हैं। तुमने खुद अपने हाथों अपने परिवार का नाश कर डाला। तुमने ये जानते हुए भी कि तुम्हारे घर की औरतों का भी उतना ही कसूर था जितना वैभव का था, उसके लिए अपने घर की औरतों को कुछ न कह के सिर्फ ठाकुर साहब के साथ बुरा करने का क़दम उठाया। चंद्रकांत, अब ये नहीं कहा जा सकता कि उस मामले के चलते तुम बाप बेटों की मनोदशा ठीक नहीं थी क्योंकि अगर ठीक न होती तो तुम दोनों गौरी शंकर के साथ मिल कर ठाकुर साहब के खिलाफ़ ना तो ऐसा करने का षडयंत्र रचते और ना ही वो सब कर पाते। साफ ज़ाहिर होता है कि तुम दोनों बाप बेटों ने अपने पूरे होशो हवास में सब कुछ किया। अपने घर की औरतों को दोष देने की बजाय तुमने ठाकुर साहब के साथ हद से ज़्यादा बुरा कर डालना ज़्यादा बेहतर समझा। शुरू से ही तुम्हारी नीयत और तुम्हारी सोच ग़लत थी। अगर तुम सच में अपने साथ हुए अपमान और अन्याय का इंसाफ़ चाहते तो वैभव वाले मामले को ले कर तुम सीधे ठाकुर साहब के पास जाते और उनसे इंसाफ़ की मांग करते। हम सब जानते हैं कि ठाकुर साहब तुम्हारे साथ इंसाफ़ ज़रूर करते, फिर भले ही चाहे उसके लिए उन्हें अपने बेटे को हमेशा हमेशा के लिए त्याग ही क्यों न देना पड़ता।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुछ पलों के लिए रुके। आस पास ही नहीं बल्कि चौगान के बाहर भी खड़े लोगों की तरफ उन्होंने दृष्टि घुमाई, फिर छा गई ख़ामोशी को चीरते हुए पुनः कहा_____"हमें समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारे इस अपराध के लिए हम तुम्हें सज़ा दें अथवा नहीं। इसके पहले भी तुम्हारे अपराधों के लिए तुम दोनों बाप बेटों को ये सोच कर माफ़ कर दिया था कि तुम्हारे बाद तुम्हारे घर की औरतों और तुम्हारी इकलौती बेटी का क्या होगा? किंतु ये जो तुमने किया है उसके लिए क्या फ़ैसला करें हम?"

"मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत असहनीय दुख में आंसू बहाते हुए आर्तनाद सा कर उठा____"अपने हाथों इतना भयंकर अपराध करने के बाद अब मैं खुद भी जीना नहीं चाहता। मुझे शिद्दत से एहसास हो रहा है कि आज के समय में मुझ जैसा अपराधी और मुझ जैसा पापी दुनिया में कोई नहीं होगा। ऊपर वाला भी मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे फांसी की सज़ा दे दीजिए ठाकुर साहब। मैं अब जीना नहीं चाहता। अरे! जिसका वंश ही नष्ट हो गया हो, जिसने अपने ही हाथों अपनी बहू को जान से मार डाला हो उसे एक पल भी जीने का हक़ कैसे हो सकता है? मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब ताकि ऊपर जा कर अपनी बहू के क़दमों में गिर कर अपने इस जघन्य अपराध के लिए उससे माफ़ी मांग सकूं।"

"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह सहसा अजीब भाव से कह उठे____"तुमने जो गुनाह किया है उसके लिए तुम्हें सूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता। तुम्हें तुम्हारे अपराधों के लिए ऐसी सज़ा हर्गिज़ नहीं दी जा सकती जिसमें एक ही झटके में तुम्हारे जीवन का अंत हो जाए। तुम्हारे अपराधों के लिए तो वो सज़ा ज़्यादा मुनासिब होगी जिसमें तुम हर रोज़ तिल तिल कर मरो....तड़प तड़प कर मरो।"

"नहीं....नहीं।" चंद्रकांत आतंकित सा हो कर चीख पड़ा____"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब। मुझे ऐसी भयानक सज़ा मत दीजिए। आप चाहें तो मुझे भी कुल्हाड़ी से काट काट कर मार डालिए लेकिन जीवन भर तड़प तड़प कर मरने की सज़ा मत दीजिए। मैं जल्द से जल्द मर कर अपने बेटे और बहू के पास पहुंच जाना चाहता हूं। अपनी बहू के पैरों से लिपट कर उससे माफ़ी मांगना चाहता हूं और.....और अपने बेटे के पास जा कर उससे पूछना चाहता हूं कि किसने उसकी हत्या कर के मेरे वंश का नाश किया है?"

चंद्रकांत की बातें ही ऐसी थीं कि सुन कर वहां बैठे लोगों की आंखें नम हो गईं। उसके रुदन से अजीब सी सनसनी फ़ैल गई थी। बाकियों का तो मुझे नहीं पता था किंतु मेरे अंदर एक अजीब सी झुरझुरी हुई थी। उधर उसकी बातें सुनने के बाद महेंद्र सिंह कुछ पलों तक उसकी तरफ देखते रहे। यकीनन उनके अंदर का हाल भी बाकियों से जुदा नहीं रहा होगा किंतु इस वक्त वो पंच के पद पर बैठे हुए थे इस लिए उन्हें अपनी भावनाओं की तरफ ध्यान नहीं देना था।

"हमारा ख़याल है कि इतना जल्दी हमें किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाना चाहिए।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"हमारा मतलब है कि इस मामले में हमें दो तीन दिन का समय और लेना चाहिए।"

"आप कहना क्या चाहते हैं ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने न समझने वाले अंदाज़ से पिता जी की तरफ देखा।

"यही कि सफ़ेदपोश अगर कल रात चंद्रकांत से मिलने नहीं आया।" पिता जी ने कहा____"तो इसका मतलब हमें फ़ौरन ही ये नहीं सोच लेना चाहिए कि उसने चंद्रकांत को रजनी के संबंध में जो कुछ बताया वो झूठ था अथवा वो चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू की हत्या करवा देना चाहता था। संभव है कि कल रात वो किसी दूसरे कारण की वजह से चंद्रकांत से मिलने न आया हो और यहां हम सब ये समझ बैठे हैं कि वो चंद्रकांत को अपने किसी मकसद से वो सब बताया जिसके चलते चंद्रकांत ने अपनी बहू को मार डाला।"

"मैं दादा ठाकुर की बात से सहमत हूं बड़े भैया।" पास ही कुर्सी पर बैठा ज्ञानेंद्र बोल पड़ा____"मेरा भी यही कहना है कि इस मामले में हमें फ़ौरन ही कोई फ़ैसला नहीं लेना चाहिए। दो तीन दिन का वक्त ले कर हमें सफ़ेदपोश को परख लेना चाहिए। संभव है कि वाकई में वो किसी कारणवश कल रात यहां न आ पाया हो।"

"हालाकि हमें अब भी यही लग रहा है कि उसने चंद्रकांत को अपने किसी मकसद के चलते ही ये सब करने के लिए फंसाया है।" पिता जी ने कहा____"किंतु फिर भी दो तीन दिन परख लेने में कुछ बिगड़ नहीं जाएगा बल्कि दूध का दूध और पानी का पानी ही हो जाएगा। अगर वो अगले दो तीन दिनों के भीतर भी चंद्रकांत से मिलने नहीं आता तो फिर पक्के तौर पर ये समझ लिया जाएगा कि उसने अपने किसी खास मकसद के चलते ही ये सब किया है।"

"आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें यकीनन दो तीन दिनों तक उसे परखना चाहिए। हालाकि सफ़ेदपोश अथवा किसी का कुछ भी मकसद रहा हो लेकिन ये तो सच है ना कि चंद्रकांत ने अपनी बहू की हत्या कर के अपराध किया है। इस लिए इसे इसके उस अपराध के लिए सज़ा तो मिलेगी ही और सज़ा यही है कि ये अपने दिल में अपनी बहू की हत्या का बोझ लिए जीवन पर तड़पे।"

"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत फिर से गुहार सा लगा उठा____"मैं इतने संगीन अपराध का बोझ लिए एक पल भी नहीं जी सकूंगा।"

"तुम्हें जीना होगा चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से कहा____"और हां, खुदकुशी करने का ख़याल अपने ज़हन में लाने का सोचना भी मत। इस बात का ख़याल भी रहे कि अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारे बाद तुम्हारी बीवी और बेटी का क्या होगा?"

चंद्रकांत कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर अपने होंठ भींच लिए उसने। कदाचित बीवी और बेटी की बात सुन कर उसे एकदम से एहसास हुआ था कि वाकई में उसके बाद उनका क्या होगा.....ख़ास कर उसकी फूल सी बेटी का?

"क्या चंद्रकांत के बेटे के हत्यारे के बारे में कुछ पता चला?" पिता जी ने सामान्य भाव से महेंद्र सिंह से पूछा____"काफी समय हो गया उसकी हत्या हुए। हम भी अक्सर सोचते रहते हैं कि रघुवीर की हत्या आख़िर किसने और क्यों की होगी?"

"सच कहें तो ये बड़ा ही पेंचीदा मामला लगता है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये सच है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी अभी तक हमें इस बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है। हमारे आदमी हर उस जगह जांच पड़ताल कर रहे हैं जहां पर ज़रा सा भी रघुवीर का कोई न कोई संबंध था। हर जगह से फिलहाल एक ही ख़बर मिलती है कि रघुवीर की किसी से भी ऐसी दुश्मनी नहीं थी जिसके चलते कोई उसकी इस तरह से हत्या कर देता। हालाकि हम ये भी समझते हैं कि ऐसे मामलों में कोई भी खुल कर कोई बात स्वीकार नहीं करता है लेकिन ऐसा भी नहीं होता है कि किसी पर संदेह ही न हो सके।"

"अगर हत्या करने की वजह का पता चल जाए तो ये समझना भी बेहद आसान हो जाएगा कि रघुवीर का हत्यारा कौन है?" पिता जी ने कहा____"इस दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता इस लिए सबसे पहले हमें उस वजह का पता लगाना होगा जिसके तहत हत्यारे ने रघुवीर की हत्या की। एक बात और, हत्यारे को ये अच्छी तरह पता था कि मौजूदा समय में चंद्रकांत हमें अपना दुश्मन समझता है इस लिए ऐसे समय में अगर रघुवीर की हत्या होगी तो उसका सीधा शक अथवा इल्ज़ाम हम पर लगेगा, जैसा कि चंद्रकांत ने लगाया भी था। इसका फ़ायदा हत्यारे को मिला और अब वो बड़े शान से कहीं न कहीं घूम रहा होगा या ये भी हो सकता है कि हमारे आस पास ही कहीं मौजूद हो कर हमारी हर गतिविधि को देख रहा होगा।"

"पर सवाल तो अब भी वही है कि वो आख़िर है कौन?" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"ये तो निश्चित बात है कि उसे रघुवीर की हत्या करने में ये सोच कर बड़ी आसानी रही थी कि रघुवीर की हत्या का इल्ज़ाम सीधा आप पर लगेगा अथवा लगाया जाएगा किंतु खुद वो कौन है और रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी थी?"

"यही तो समझ में नहीं आ रहा ज्ञानेंद्र।" पिता जी ने कहा____"इतना समय गुज़र गया किंतु अभी तक हमें ये समझ नहीं आया कि रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? दूसरी सोचने वाली बात ये भी है कि सफ़ेदपोश को उस हत्यारे के बारे में कैसे पता चला? क्या सच में रजनी ने ही रघुवीर की हत्या की थी?"

"भगवान ही जाने सच क्या है और ये सब किसने किया होगा?" महेंद्र सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला____"लेकिन अगर इन दो तीन दिनों के भीतर वो सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आता है तो कदाचित ये समझ आ जाएगा कि सच क्या है? ख़ैर हमें लगता है कि इस बारे में ज़्यादा माथा पच्ची करने से बेहतर यही है कि दो तीन दिनों तक इंतज़ार किया जाए। अब सफ़ेदपोश के चंद्रकांत से मिलने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है।"

उसके बाद पंचायत बर्खास्त कर दी गई। महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत को हुकुम दिया कि वो दो तीन दिनों तक हर रात उस सफ़ेदपोश के आने का इंतज़ार करे। चंद्रकांत ने ख़ामोशी से सिर हिला दिया। उसके बाद सबको अपने अपने घर जाने को बोल दिया गया। महेंद्र सिंह भी पिता जी से इजाज़त ले कर अपने भाई और अपने आदमियों के साथ जीप में बैठ कर चले गए।

मैंने पिता जी को हवेली छोड़ा और फिर जीप ले कर खेतों की तरफ चल पड़ा। चंद्रकांत का मामला मेरे ज़हन में बसा हुआ था और साथ ही कई तरह के ख़्यालों के चलते मैं उलझन का शिकार भी होता जा रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर सफ़ेदपोश की इस तरह से मौजूदगी का क्या मतलब हो सकता था? कहां तो वो मेरी जान लेने के पीछे पड़ा हुआ था और कहां अब वो चंद्रकांत से मिलता नज़र आने लगा था। अचानक ही मेरे ज़हन में सुबह हवेली में शेरा द्वारा कही गई बातें उभर आईं। सफ़ेदपोश को शेरा ने भी अपनी आंखों से चंद्रकांत से मिलते और बातें करते हुए देखा था। उसके बाद उसने उसका पीछा भी किया था। ये अलग बात है कि वो हमारे आमों के बाग़ में एक बार फिर से ग़ायब हो गया था और शेरा उसको पकड़ न सका था।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आख़िर हमारे आमों के बाग़ में ही सफ़ेदपोश हर बार क्यों ग़ायब हो जाता है? आमों के बाग़ में ऐसी वो कौन सी जगह पहुंच जाता है जिसके बाद में वो किसी को नज़र ही नहीं आता। मतलब साफ है, आमों के बाग़ में कोई तो ऐसा रहस्यमय स्थान ज़रूर है जहां पर सफ़ेदपोश हमारी नज़रों से खुद को छुपा कर ग़ायब हो जाता है। जीप चलाते हुए मैंने फ़ैसला कर लिया कि मुझे आमों के बाग़ की अच्छे से छानबीन करनी होगी। आख़िर पता तो चले कि ये चक्कर क्या है?

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अध्याय - 106

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दोपहर के अभी दो ही बज रहे थे जिसके चलते अच्छी खासी धूप खिली हुई थी। आसमान में बादल तो थे लेकिन शाम से पहले बारिश होने के आसार नहीं नज़र आ रहे थे। मैंने भुवन को भेज कर चार पांच मजदूरों को बुला लिया था और अब खुद भी उन सबके साथ आमों के बाग़ की जांच पड़ताल का काम शुरू कर दिया था।

हमारे बाग़ में क़रीब दो ढाई सौ के आस पास पेड़ थे। दिन में भी सूर्य की तेज़ रोशनी पूरी तरह ज़मीन पर नहीं पहुंच पाती थी। पेड़ों से छन छन कर ही सूर्य का उजाला ज़मीन पर पड़ता था। ज़मीन पर सूखे पत्तों का ढेर सा लगा रहता था जिसके चलते चलने पर आवाज़ें होती थीं।

मैंने भुवन के साथ साथ उसके साथ आए सभी मजदूरों को स्पष्ट शब्दों में हुकुम दिया कि वो सब बाग़ की ज़मीन का बहुत ही बारीकी से मुआयना करें। कहीं पर अगर किसी को कोई गड्ढा भी नज़र आए तो वो उसे अच्छे से देखें। मेरे हुकुम पर सब के सब आंखें फाड़ फाड़ कर बाग़ की ज़मीन को देखने में लग गए थे। अपने अपने हाथों में ली हुई लाठियों से पत्तों को हटा हटा कर सब बड़ी बारीकी से ज़मीन को खंगालने में लगे हुए थे।

"क्या आपको पक्का यकीन है छोटे कुंवर कि इस बाग़ में ऐसी कोई जगह ज़रूर है जिसका उपयोग सफ़ेदपोश अपने ग़ायब होने के लिए करता है?" एक घंटे की मेहनत के बाद भी जब हमें कहीं पर ऐसा कुछ न मिला तो भुवन ने मुझसे कहा_____"क़रीब एक घंटा हो चुका है हमें यहां की ख़ाक छानते हुए लेकिन ऐसी कोई संदिग्ध जगह अभी तक नहीं मिली हमें।"

"हलकान मत हो भुवन।" मैंने कहा____"छान बीन करते रहो। मुझे पूरा यकीन है कि ऐसी कोई जगह इस बाग़ में ज़रूर है। ये बाग़ बहुत बड़ा है इस लिए हमें पूरे बाग़ में देखना होगा। कहीं न कहीं तो ऐसी जगह ज़रूर मिलेगी हमें जिससे हमें ये पता चल जाएगा कि वो सफ़ेदपोश हर बार कैसे यहां आ कर ग़ायब हो जाता है और हमारी पकड़ से दूर चला जाता है?"

मेरे कहने पर भुवन कुछ न बोला। अपने हाथ में लिए लट्ठ से वो ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों को हटा हटा कर ज़मीन का मुआयना करने में लगा हुआ था। मैं खुद भी पूरी सतर्कता से खोज बीन कर रहा था। जैसे जैसे समय गुज़र रहा था वैसे वैसे मेरे चेहरे पर निराशा और बेचैनी बढ़ती जा रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि अगर बाग़ में सचमुच ऐसी कोई जगह नहीं है तो सफ़ेदपोश कैसे यहां से किसी जादू की तरह ग़ायब हो जाता होगा? यही सब सोचते हुए मैं हैरान होने के साथ साथ अब परेशान भी हो उठा था।

पूरा बाग़ छान मारा हमने लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं मिला जो ये साबित करे कि सफ़ेदपोश ऐसी किसी जगह का स्तेमाल कर के हमारी नज़रों से ग़ायब हो जाता था। थक हार कर हम सब बाग़ से निकल कर मकान के पास आ गए।

"वैसे आप किस तरह के स्थान की उम्मीद किए हुए थे छोटे कुंवर?" बाकी मजदूरों को वापस काम पर भेजने के बाद भुवन ने मुझसे पूछा____"जिसके द्वारा वो सफ़ेदपोश ग़ायब हो जाता होगा?"

"सच कहूं तो मेरा ख़याल यही था कि बाग़ में कहीं कोई गुप्त स्थान हो सकता है।" मैंने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा____"जिसका स्तेमाल कर के सफ़ेदपोश हर बार हमारी नज़रों से ग़ायब हो जाता है। ऐसा इस लिए क्योंकि अगर वो ज़मीन पर ही भागता हुआ कहीं जाता तो हमें उसकी मौजूदगी का आभास होता रहता। यानि ज़मीन पर पड़े सूखे पत्ते उसके भागने से आवाज़ पैदा करते और हम आसानी से समझते कि वो फला दिशा की तरफ भागता चला जा रहा है। जबकि असल में ऐसा होता ही नहीं है। वो बाग़ में दाखिल होता है...कुछ दूर तक ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर उसके भागने से आवाज़ भी होती है लेकिन फिर कुछ ही देर में उसके भागने की आवाज़ चमत्कारिक रूप से बंद हो जाती है। यही एक बात है जिसके चलते मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि बाग़ में कहीं पर कोई गुप्त स्थान होगा जहां पहुंच कर सफ़ेदपोश छुप जाता होगा। इधर हम क्योंकि उसके भागने से उत्पन्न हुई आवाज़ से उसका पीछा करते हैं और जब आवाज़ ही बंद हो जाती है तो हमारे सामने रास्ते ही बंद हो जाते हैं। उसके बाद उसे खोजना वैसा ही हो जाता है जैसे भूसे के ढेर में सुई खोजना।"

"बात तो आपकी दुरुस्त है छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"लेकिन लगभग दो घंटे की खोजबीन के बाद भी हमें इस बाग़ में ऐसा कोई गुप्त स्थान नहीं मिला।"

"यही तो सोचने वाली बात है भुवन।" मैंने बाग़ की तरफ नज़र डालते हुए कहा____"यही तो आश्चर्य की बात भी है कि अगर ऐसा कोई गुप्त स्थान है ही नहीं तो कैसे वो सफ़ेदपोश इस बाग़ में आ कर हर बार ग़ायब हो जाता है और हम उसे पकड़ नहीं पाते? क्या वो सच में कोई जादू जानता है जिसके चलते वो अपनी जादुई छड़ी घुमा कर पलक झपकते ही ग़ायब हो जाता है? एक पल के लिए अगर ये मान भी लें कि उसके पास कोई जादुई छड़ी है तो फिर उसे ग़ायब होने के लिए इस बाग़ में आने की क्या ज़रूरत है? अपनी जादुई छड़ी के ज़ोर से तो वो कहीं पर भी खड़े खड़े ग़ायब हो सकता है।"

"सही कह रहे हैं आप।" भुवन ने सोच पूर्ण भाव से कहा____"उसके पास अगर कोई जादू की छड़ी होती तो यकीनन वो कहीं पर भी खड़े खड़े पल में ग़ायब हो सकता है। मगर नहीं, वो इस बाग़ में आता है और फिर कुछ ही लम्हों में ग़ायब हो जाता है। अब ऐसा वो कैसे करता है ये तो वही बता सकता है।"

"नहीं भुवन।" मैंने पुनः गहरी सांस ली____"वो भला क्यों अपना कोई भेद बताएगा हमें? उसका भेद तो हमें खुद ही पता करना होगा। कोई न कोई स्थान तो ज़रूर है जहां से वो बड़ी आसानी से ग़ायब हो कर हमारी पकड़ से दूर चला जाता है।"

"बड़ी अजीब बात है।" भुवन ने झुंझलाते हुए कहा____"आख़िर कैसे वो पल में ग़ायब हो जाता होगा? अगर उसे ज़मीन नहीं खा जाती है तो क्या आसमान निगल जाता है?"

"आ....आसमान????" भुवन की बात सुनते ही मैं एकाएक चौंका____"हां हां आसमान।"

"ये आप क्या कह रहे हैं छोटे कुंवर?" भुवन एकदम से चौंका____"कौन आसमान?"

"अरे! आसमान तो एक ही होता है भुवन।" मैं मारे खुशी के बोल पड़ा____"वही जहां पर सूरज चांद और अनगिनत तारे मौजूद होते हैं। तुमने अंजाने में आसमान का नाम लिया तो पलक झपकते ही मेरे ज़हन में बिजली की तरह ये ख़याल उभर आया कि वो हर बार आसमान से ही ग़ायब हो सकता है।"

"आ...आसमान से???" भुवन की आंखें हैरत से फैल गईं____"ये क्या कह रहे हैं आप?"

"मैं वही कह रहा हूं भुवन जो सच है।" मैं अति उत्साह के चलते एक झटके से खड़ा हो गया, फिर बोला____"अभी तक हम ये सोच रहे थे कि उसके ग़ायब होने का राज़ बाग़ की ज़मीन पर ही कहीं होगा और इसी लिए हमने बाग़ की पूरी ज़मीन को खंगाल डाला। मगर मिला कुछ नहीं लेकिन आसमान की तरफ तो हमने देखा ही नहीं।"

"मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि आप ये अचानक से क्या बोलते चले जा रहे हैं?" भुवन जैसे बुरी तरह उलझ गया____"हमने आसमान की तरफ देखा ही नहीं से क्या मतलब है आपका?"

"आओ मेरे साथ।" मैं तेज़ क़दमों से बाग़ की तरफ बढ़ते हुए बोला____"कुछ देर में तुम खुद ही समझ जाओगे कि मेरे कहने का क्या मतलब है?"

भुवन हैरान परेशान मेरे पीछे चल पड़ा। जल्दी ही हम दोनों बाग़ में पहुंच गए। बाग़ के अंदर कुछ दूर आने के बाद मैं रुक गया। भुवन बेवकूफों की तरह मेरी तरफ ही देखे जा रहा था।

"अब ऊपर देखो ज़रा।" मैंने भुवन को जैसे नींद से जगाया____"और बताओ क्या नज़र आ रहा है तुम्हें?"

मेरे कहने पर भुवन पहले तो चौंका और फिर जल्दी से ऊपर देखने लगा। ऊपर उसे पेड़ों की फैली हुई शाखाएं ही दिख रहीं थी जिनके बीच से निकल कर सूर्य की किरणें ज़मीन पर पहुंच रहीं थी।

"क्या नज़र आ रहा है तुम्हें?" मैंने भुवन से पूछा तो उसने ऊपर देखते हुए ही कहा____"ऊपर तो पेड़ों की बहुत सारी शाखाएं ही दिख रही हैं छोटे कुंवर।"

"उन शाखाओं को देखने से क्या महसूस होता है तुम्हें?" मैंने उससे पूछा।

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं?" भुवन ने गर्दन मेरी तरफ घुमा कर पूछा____"शाखाओं को देख कर तो मुझे यही महसूस हो रहा है कि यहां सूरज की धूप नहीं है बल्कि छांव है जिसके चलते अच्छा महसूस हो रहा है। ठंडी ठंडी हवा लग रही है जिससे मन करता है कि यहीं बैठा जाएं।"

"एकदम गधे हो तुम?" मैंने उसे घूरते हुए कहा तो वो एकदम से सकपका गया।

"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा छोटे कुंवर?" फिर उसने सिर खुजाते हुए कहा। अंदाज़ ऐसा था जैसे कुछ सोचने लगा हो।

"तुमने अभी जो कहा वो सब एक सामान्य सी बातें हैं जोकि सच हैं।" मैंने कहा____"लेकिन तुम भूल गए हो कि यहां हम सफ़ेदपोश के बारे में पता करने के उद्देश्य से आए हैं। मैंने तुमसे पेड़ों की इतनी सारी शाखाओं को देखने के बाद पूछा कि कैसा महसूस हुआ तो तुम्हें समझ जाना चाहिए था कि शाखाओं में ही वो बात है जिसे तुम्हें समझना था।"

मेरी बात सुनते ही भुवन जल्दी से सिर उठा कर पेड़ों की शाखाओं को ध्यान से देखने लगा। उसकी नज़रें पेड़ों की शाखाओं पर ही जम गईं थी। तभी उसके चेहरे के भाव बदले और वो अपनी निगाहों को एक शाख से दूसरी शाख पर इस तरह धीरे धीरे ले जाने लगा जैसे किसी चीज का पीछा कर रहा हो। अगले कुछ ही पलों में उसके चेहरे पर एक खास किस्म की चमक उभर आई जिसके चलते उसके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"मेरा ख़याल है कि अब तुम समझ चुके हो कि मैं तुम्हें क्या महसूस कराना चाहता था?" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

"देर से समझा लेकिन समझ गया छोटे कुंवर।" भुवन ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं समझ गया कि आसमान की बात से आपका क्या मतलब था।"

"तो बताओ।" मैंने कहा____"ये सब कुछ देख कर किस नतीजे पर पहुंचे तुम?"

"यही कि सफ़ेदपोश के ग़ायब होने का राज़ पता कर लिया है हमने।" भुवन ने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा____"यानि अब हमें समझ आ गया है कि वो बाग़ में आने के बाद किस तरीके से एक पल में ग़ायब हो जाता है। इसके पहले हम ये सोच रहे थे कि बाग़ की ज़मीन पर ही कोई गुप्त स्थान उसने बना रखा रहा होगा जहां पहुंच कर वो छुप जाता था और इसी लिए हमने बाग़ की पूरी ज़मीन को खंगाल डाला मगर हमें कुछ न मिला। किंतु अब इन पेड़ों की शाखाओं को देख कर समझ आ गया है कि वो कैसे ग़ायब हो जाता है। यानि वो यहां आता है और फिर किसी न किसी पेड़ पर चढ़ जाता है। पेड़ों की शाखाएं क्योंकि दूसरे पेड़ों की शाखाओं से जुड़ी हुई हैं इस लिए वो शाखाओं के द्वारा यहां से दूर निकल जाता है और हम ये सोचते रह जाते हैं कि वो ग़ायब कैसे हो गया?"

"बिल्कुल सही कहा तुमने।" मैंने कहा____"लेकिन ज़रूरी नहीं कि यही सच हो। ऐसा इस लिए क्योंकि रात के वक्त अंधेरे में शाखाओं के द्वारा इतने बड़े बाग़ से बाहर निकल जाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं है। ज़रा सी असावधानी के चलते इंसान शाखाओं से फिसल कर नीचे ज़मीन पर भी गिर सकता है और ज़ाहिर है इससे हाथ पैर मुंह नाक आदि को क्षति पहुंच सकती है। सफ़ेदपोश भी इस बात को भली भांति समझता होगा इस लिए वो रात के अंधेरे में पेड़ों की शाखाओं पर चलते हुए यहां से निकलने का ख़याल अपने ज़हन में नहीं लाएगा।"

"अगर ऐसा है।" भुवन ने कहा____"तो फिर वो यहां से निकलता कैसे होगा?"

"जैसे हर इंसान निकलता है।" मैंने कहा____"बिल्कुल सामान्य तरीके से। मेरे कहने का मतलब है कि वो यहां आते ही किसी पेड़ पर चढ़ जाता होगा और फिर वो पेड़ की किसी शाख पर तब तक बैठा रहता होगा जब तक कि उसे ये यकीन न आ जाए कि उसके पीछे उसका पीछा करने आए लोग हताश हो कर वापस नहीं चले गए हैं। सीधी सी बात है कि अगर हमें ये एहसास हो जाए कि जिसका हम पीछा कर रहे हैं वो किसी जादू की तरह ग़ायब हो चुका है और अब हम उसे किसी भी हालत में पकड़ नही पाएंगे तो यकीनन हताश हो कर कुछ देर में हम वापस लौट जाएंगे। अब तुम समझ ही सकते हो कि इसके बाद सफ़ेदपोश के लिए यहां से निकल जाने का रास्ता कितना आसान हो जाएगा।"

"सही कह रहे हैं आप।" भुवन को जैसे अब पूरी बात समझ में आ गई थी, बोला____"वाकई ऐसे में सचमुच बड़ी आसानी से वो यहां से निकल सकता है। जब उसका पीछा करने वाला यहां कोई रहेगा ही नहीं तो उसके लिए कोई समस्या वाली बात भी नहीं रह जाएगी। यानि वो बड़े आराम से पेड़ से वापस नीचे उतरेगा और फिर बेफिक्र हो कर यहां से चला जाएगा।"

"आओ अब ज़रा ये देख लेते हैं कि वो यहां से किस तरफ जाता होगा?" मैंने आगे क़दम बढ़ाते हुए कहा____"ये तो स्पष्ट है कि पेड़ से उतरने के बाद वो वापस हमारे मकान की तरफ नहीं जाता होगा क्योंकि उसे भी इस बात का अंदेशा रहता होगा कि कोई न कोई रात में भी मकान में मौजूद हो सकता है। इस लिए वो उस तरफ वापस जा कर अपने लिए किसी भी तरह का ख़तरा मोल नहीं लेगा। यानि वो अपनी असल मंजिल पर जाने के लिए कोई दूसरा ही रास्ता चुनेगा। हमें यही देखना है कि यहां से वो किस तरफ जाता होगा?"

भुवन मेरी बात से पूर्णतः सहमत था इस लिए बिना कुछ कहे ही सिर हिला कर मेरे पीछे पीछे चल पड़ा। हम दोनों इधर उधर का जायजा लेते हुए आगे बढ़ने लगे थे। कुछ ही देर में हम घने पेड़ पौधों के बीच से चलते हुए एकाएक बाग़ से बाहर आ गए। सामने क़रीब पांच क़दम की दूरी पर एक बड़ी और मोटी सी मेढ़ थी जोकि सरहद का भी काम करती थी। मेढ़ हमारी ही थी और क़रीब सात आठ फीट ऊंची थी। मेढ़ के उस पार की ज़मीन हमारी नहीं बल्कि साहूकारों की थी। मैं और भुवन उस ऊंची मेढ़ पर चढ़ गए। सामने खेत ही खेत थे जिनमें उगी हुई धान के पौधों की हरियाली बड़ी ही खूबसूरत नज़र आ रही थी। मेरी निगाह चारो तरफ दौड़ते हुए एक तरफ जा कर ठहर गई। दूर साहूकारों के घर नज़र आ रहे थे। उनके घरों के पीछे क़रीब दो सौ मीटर की दूरी पर उनके आमों का बगीचा दिख रहा था। थोड़ी और दूर निगाह डालने पर मुझे गांव के बाकी घर नज़र आए।

"क्या आप भी वही सोच रहे हैं जो मैं सोच रहा हूं?" सहसा भुवन ने हमारे बीच की ख़ामोशी को तोड़ा तो मैंने उसकी तरफ देखा।

"तुम क्या सोच रहे हो?" मैंने सामान्य भाव से पूछा।

"यहां तक आपके ज़मीनों की सरहद है।" भुवन ने जैसे कोई भूमिका बनाते हुए कहा____"इस मेढ़ के बाद गांव के साहूकारों की ज़मीनें शुरू होती हैं और यहां से हमें उनके घर भी नज़र आ रहे हैं। मैं ये सोच रहा हूं कि क्या सफ़ेदपोश का ताल्लुक साहूकारों से हो सकता है? स्पष्ट शब्दों में ये कि क्या साहूकारों के घर का ही कोई सदस्य सफ़ेदपोश हो सकता है?"

"बहुत खूब।" मैं भुवन की दूरदर्शिता से प्रभावित हो कर बोला____"सच कहूं तो मैं भी यही सोच रहा हूं लेकिन....।"

"लेकिन??" भुवन के माथे पर शिकन उभरी।

"सोचने वाली बात है कि अगर ऐसा मान भी लें तो उनके घर का वो कौन सदस्य हो सकता है जिसे हम सफ़ेदपोश कह सकें?" मैंने कहा____"आज के समय में उनके घर में सिर्फ दो ही मर्द बचे हैं____गौरी शंकर और रूपचंद्र। गौरी शंकर को क्योंकि गोली लगी थी जिसके चलते उसका एक पैर सही से काम ही नहीं करता है और वो लंगड़ा कर चलता है। शेरा के अनुसार उस रात सफ़ेदपोश बड़ा तेज़ भागता हुआ हमारे बाग़ की तरफ जा रहा था। ज़ाहिर है अगर वो लंगड़ा होता तो इतना तेज़ नहीं भाग सकता था कि शेरा जैसा तंदुरुस्त व्यक्ति उस तक पहुंच ही ना पाता। मतलब स्पष्ट है वो गौरी शंकर नहीं हो सकता। अब बचा रूपचंद्र, तो मुझे नहीं लगता कि वो सफ़ेदपोश हो सकता है।"

"ऐसा क्यों?" भुवन ने कहा____"भला रूपचंद्र सफ़ेदपोश क्यों नहीं हो सकता? वो भी तो आपकी जान का दुश्मन था।"

"बेशक।" मैंने कहा____"लेकिन ये भी सच है कि वो मुझे अपना दुश्मन सिर्फ इसी लिए समझता था क्योंकि उसके अनुसार मैंने उसकी बहन की इज्ज़त ख़राब करके उसकी ज़िंदगी बर्बाद की थी। अब जबकि उसकी बहन से मेरा ब्याह होना ही तय हो गया है तो वो भला क्यों मेरी जान लेने का सोचेगा? उसे भी पता है कि उसकी बहन मुझे कितना प्रेम करती है। यानि एक तरह से उसकी बहन की खुशी सिर्फ मुझे हासिल कर लेने से ही है। मुझे अच्छी तरह पता है कि वो अपनी बहन की खुशियों का गला नहीं घोंट सकता। तुम्हें शायद पता नहीं है अभी, एक समय था जब रूपचंद्र अपनी बहन रूपा को अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था। उसकी बहन ने ये बातें खुद मुझे बताई थीं।"

"तो आप सिर्फ इसी वजह से उसे सफ़ेदपोश नहीं कह सकते?" भुवन ने कहा____"जबकि आपको ये भी नहीं भूलना चाहिए कि ये वही साहूकार हैं जो कुछ दिनों पहले तक आपको ही नहीं बल्कि आपके पूरे परिवार को ख़त्म कर देने की राह पर चले थे। छोटे ठाकुर और बड़े कुंवर को तो उन्होंने अपनी दुश्मनी के चलते मौत के घाट उतार भी दिया है। क्या आपको लगता है कि वो कभी भरोसे के लायक हो सकते हैं?"

"लगता तो नहीं भुवन लेकिन मैं ये भी जानता हूं कि हर व्यक्ति को एक दिन अपनी ग़लतियों का एहसास होता है।" मैंने कहा____"और जिस दिन व्यक्ति को अपनी ग़लतियों का एहसास हो जाता है समझ लो उसी दिन उसका कायाकल्प हो जाता है। वो सुधर जाता है और फिर कभी ग़लत करने का ख़याल भी अपने ज़हन में नहीं लाता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं खुद हूं। तुम मेरे बारे में तो सब कुछ जानते हो। क्या तुम कभी कल्पना कर सकते थे कि मेरे जैसा इंसान एक दिन यूं बदल जाएगा और एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चलने लगेगा? जब मेरे जैसा इंसान बदल सकता है तो मैं यही समझता हूं कि दुनिया का हर व्यक्ति बदल सकता है। देर से ही सही लेकिन इंसान बदलता ज़रूर है।"

"चलिए मान लिया मैंने।" भुवन ने कहा____"अब सवाल ये है कि अगर सफ़ेदपोश गौरी शंकर या रूपचंद्र में से कोई नहीं है तो फिर कौन हो सकता है? इतना ही नहीं हर बार वो हमारे ही बाग़ की तरफ आ कर यहां से ग़ायब क्यों होता है?"

"यकीनन, ये सवाल किसी चकरघिन्नी की तरह मेरे अपने मन में भी घूम रहा है।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"अगर उसे ग़ायब ही होना होता है तो उसको हमारे बाग़ में आने की क्या ज़रूरत है? वो किसी दूसरी जगह से भी तो ग़ायब हो सकता है? हमारे बाग़ में आने के पीछे उसका मकसद क्या सिर्फ ये हो सकता है कि वो हमें अपने बारे में हमेशा उलझाए रखना चाहता है? यानि वो नहीं चाहता कि हम सही दिशा में चल कर उस तक पहुंच पाएं। हां शायद यही हो सकता है। तभी तो उस रात चंद्रकांत से मिलने के बाद उल्टा वो हमारे बाग़ की तरफ आया। उस वक्त भले ही उसे शेरा द्वारा अपना पीछा किए जाने का आभास न हुआ हो लेकिन बाद में तो हो ही गया था। इसके बावजूद वो हर बार इतना बड़ा ख़तरा मोल लेता है और खुद को ग़ायब करने के साथ साथ हमें इसी तरह उलझाने के लिए हमारे बाग़ की तरफ आता है। क्या तुम सोच सकते हो कि उसके जैसा शातिर व्यक्ति हमें उलझाने के लिए ही नहीं बल्कि अपनी असलियत छुपाने एक लिए भी इतना बड़ा ख़तरा मोल ले सकता है?"

"शातिर तो वो है छोटे कुंवर और इसमें कोई शक वाली बात नहीं है।" भुवन ने कहा____"मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि वो आख़िर है कौन?"

"यहां आने से पहले हम ये सोच भी नहीं सकते थे कि वो ऐसा सिर्फ हमें उलझाने के लिए करता है।" मैंने कहा____"अभी तक हम यही सोच रहे थे कि वो बाग़ में ही कहीं ग़ायब हो जाता है। मैंने तो ये तक सोच लिया था कि उसने बाग़ में ही कहीं कोई सुरंग बना रखी होगी जो अंदर ही अंदर उसे उसके घर तक पहुंचा देती होगी। लेकिन यहां आने के बाद अब ऐसा भी प्रतीत होता है जैसे वो हमें इसके अलावा भी कुछ और संदेश देना चाहता है।"

"क..कैसा संदेश?" भुवन चौंका।

"हो सकता है कि मेरा ऐसा सोचना महज वहम के सिवा कुछ न हो।" मैंने कहा____"लेकिन ये भी हो सकता है कि उसमें सच्चाई भी हो। ख़ैर ये तो अब पक्का हो चुका है कि सफ़ेदपोश हर बार इसी तरीके से और इसी रास्ते से निकल जाता रहा है लेकिन सवाल है कि इसी रास्ते से ही क्यों? क्या वो मेरे दिमाग़ में ये बात बैठाना चाहता है कि मैं ये सोचूं कि सफ़ेदपोश साहूकार के घर का ही कोई है?"

"वो जान बूझ कर भला खुद ही क्यों अपने बारे में ऐसा ज़ाहिर कर देना चाहेगा?" भुवन ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ये तो वही बात हुई कि आ बैल मुझे मार अथवा अपने ही हाथों अपने पांव में कुल्हाड़ी मार लेना।"

"बिल्कुल सही कहा तुमने।" मैंने खुशी से झूमते हुए कहा____"असल में अपने सवाल के जवाब में तुमसे यही सुनना चाहता था मैं। यकीनन वो ऐसा नहीं कर सकता। मतलब साफ है, वो जान बूझ कर हमारी सोच के दायरे को साहूकारों की तरफ मोड़ देना चाहता था। मकसद स्पष्ट था कि हम उसके ऐसा करने से उलझ तो जाएं ही किंतु साथ ही असल रास्ते से भी भटक जाएं।"

"फिर तो घूम फिर कर हम फिर से वहीं आ गए छोटे कुंवर।" भुवन ने गहरी सांस ली____"इतनी सारी बातें सोच डाली हम दोनों ने लेकिन लगता है इससे और भी ज़्यादा उलझ गए हैं हम जबकि सवाल ये था कि आख़िर कौन हो सकता है वो सफ़ेदपोश?"

सच ही तो कहा था भुवन ने। मैं वाकई इतनी सारी बातें सोच कर और भी ज़्यादा उलझ गया था और उसके बारे में किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था। मैंने फ़ौरन ही अपने ज़हन को झटका और वापस चल पड़ा। कुछ ही देर में हम दोनों अपने मकान के पास पहुंच गए। भुवन को यहां का काम देखने का बोल कर मैं जीप ले कर निकल गया।

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Agree :approve:

Jaydad ke papers wala matter sahukar aur munshi ka tha joki un logo ne panchayat me bataya bhi tha...plz remember

Maybe :dazed:

Aapke points me dam hai....so let's see inme se kaun se point ka sach nikalta hai...

Actually us par taras kha ke apan ne ye dimag diya usko...is liye all credit goes to me only :blush1:

Let's see what happens next...

Thanks
 
अध्याय - 107

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सच ही तो कहा था भुवन ने। मैं वाकई इतनी सारी बातें सोच कर और भी ज़्यादा उलझ गया था और उसके बारे में किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था। मैंने फ़ौरन ही अपने ज़हन को झटका और वापस चल पड़ा। कुछ ही देर में हम दोनों अपने मकान के पास पहुंच गए। भुवन को यहां का काम देखने का बोल कर मैं जीप ले कर निकल गया।

अब आगे....

मेरी जीप मुरारी काका के घर के बाहर जा कर रुकी। पूरे रास्ते मैं यही सोचते हुए आया था कि अनुराधा जब मेरे सामने होगी तो उससे क्या बातें करूंगा और वो खुद मुझसे क्या कहेगी? सवाल तो ये भी था कि क्या वो मुझसे खुल कर बातें कर पाएगी या पहले की ही तरह छुई मुई बनी रहेगी?

शायद जीप के इंजिन की आवाज़ अंदर तक पहुंच गई थी तभी तो जैसे ही मैं जीप से उतर कर दरवाज़े के पास पहुंचा तो झटके से दरवाज़ा खुल गया। अगले ही पल, जिस चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी उसे देखते ही मेरा दिल थम सा गया और यकीनन यही हाल उस चेहरे वाली का भी हुआ होगा।

दरवाज़े के बीचो बीच अनुराधा खड़ी थी। हम दोनों की नज़रें जैसे ही चार हुईं तो जैसे हम दोनों ही पलकें झपकाना भूल गए। मैं तो चाहता था कि ये वक्त अब बस यहीं पर रुक जाए किंतु शायद ऊपर वाले को कुछ और ही मंज़ूर था। कुछ ही देर में जैसे उसे होश आ गया तो वो एकदम से हड़बड़ा गई और झट से नज़रें झुका ली उसने। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर ऐसी मुस्कान थिरक उठी जो उसके लाख चाहने पर भी ग़ायब न हो सकी। उसे इस हालत में देख कर मैं भी मुस्कुरा उठा।

हल्के सुर्ख रंग का घाघरा पहन रखा था उसने। घाघरा जो उसके हल्के सांवले घुटनों तक था और चोली जो उसके सीने को ढंकते हुए पेट तक पहुंच रही थी। उसके पेट का थोड़ा हिस्सा दिख रहा था जिसके बीच में उसकी गहरी और खूबसूरत सी नाभी स्पष्ट नज़र आ रही थी। गले में काले रंग का धागा था जिसमें एक ताबीज़ बंधा हुआ था। उसके नीचे चोली में क़ैद उसके मध्यम आकार के उभार, जो यूं तने हुए थे जैसे छोटे छोटे पर्वत शिखर की नुकीली दो चोटियां हों। सिर के बाल यूं तो चोटी की शक्ल में बंधे हुए थे किंतु बाएं तरफ के कुछ बालों की लट झूलती हुई उसके बाएं गाल को चूमती सी प्रतीत हो रही थी। तभी सहसा वो हड़बड़ाई तो मैं चौंक पड़ा और साथ ही ख़यालों से बाहर आया।

अनुराधा बड़ी तेज़ी से पलटी और फिर भागते हुए अंदर की तरफ चली गई। मुझे समझ न आया कि अचानक से उसे ये क्या हुआ? धड़कते दिल के साथ मैंने दरवाज़े के अंदर क़दम रखा और फिर चलते हुए आंगन में आ गया। निगाह चारो तरफ घुमाई लेकिन कोई नज़र ना आया। मन में सवाल उभरा कि सरोज काकी और उसका बेटा अनूप कहीं दिख क्यों नहीं रहे?

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अंदर कमरे से निकल कर अनुराधा बरामदे में आ कर खड़ी हो गई। मैंने देखा वो दोनों हाथों से अपने दुपट्टे को दुरुस्त कर रही थी। ये देख कर मेरे दिमाग़ में बिजली सी चमकी और एक ही पल में समझ आ गया कि वो क्यों पलट कर तेज़ी से भागते हुए अंदर की तरफ गई थी। कुछ पलों तक उसकी तरफ देखने के बाद मैंने एक बार फिर से चारो तरफ निगाह घुमाई किंतु कोई नज़र ना आया।

"कमाल है।" फिर मैंने बरामदे में चुपचाप खड़ी अनुराधा की तरफ देखते हुए कहा____"घर आए मेहमान को कोई बैठने तक को नहीं कह रहा। मैंने तो यहां आने से पहले जाने क्या क्या उम्मीदें लगा ली थी। ख़ैर लगता है किसी को मेरे यहां आने से ना तो कोई ख़ुशी हुई है और ना ही शायद कोई फ़र्क पड़ा है। अगर वाकई ऐसा है तो मुझे फ़ौरन ही यहां से वापस लौट जाना चाहिए। आख़िर मुझे अपने आत्म सम्मान का भी तो ख़याल रखना चाहिए।"

कहने के साथ ही मैं पलट गया और दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। अभी मैं दो ही क़दम आगे बढ़ा था कि तभी पीछे से अनुराधा की घबराई और हड़बड़ाई हुई आवाज़ सुनाई दी____"न..नहीं, रुक जाइए।"

अनुराधा की आवाज़ सुन कर मैं अपनी जगह पर रुक गया लेकिन पलट कर उसकी तरफ देखा नहीं। मैं जानता था कि मेरे सामने वो खुल कर ज़्यादा बोल नहीं पाती है। इस वक्त मेरे इस तरह चल पड़ने से यकीनन उसके होश उड़ गए थे। आख़िर चाहती तो वो भी थी कि मैं कहीं न जाऊं।

"भगवान के लिए रुक जाइए न।" उसने फिर से मुझे पुकारा। उसकी आवाज़ में कम्पन था, बोली____"और मुझे माफ़ कर दीजिए कि मैंने आपको बैठने के लिए नहीं कहा। आपको यहां देख कर मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूं? आप कहीं मत जाइए न।"

अब मुझसे एक पल भी रुका न गया। उसकी मासूमियत से कही गई ये बातें मुझे अंदर तक झकझोर गईं थी। दिल बुरी तरह मचल उठा था। मैं एक झटके से पलटा और लगभग भागते हुए बरामदे में उसके क़रीब पहुंचा। वो मुझे इस तरह अपनी तरफ आते देख एकदम से घबराई हुई नज़र आई किंतु इससे पहले कि वो कुछ करती या कहती मैंने उसे पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया।

आह! कितनी नाज़ुक थी वो। जैसे ही मैंने उसे अपने सीने से लगाया तो मैंने महसूस किया कि उसका समूचा जिस्म एकदम से थरथरा उठा है। कदाचित उसको मुझसे ऐसे कृत्य की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। मैंने उसको ज़ोर से कस कर छुपका लिया था और वो बुत सी खड़ी रह गई थी। ऐसा लगा जैसे वक्त अपनी जगह पर ठहर गया था। एकदम ख़ामोशी छा गई थी।

तभी जैसे उसे होश आया तो उसके जिस्म में हलचल हुई। मैंने महसूस किया कि उसके दोनों हाथ ऊपर उठे और कुछ ही पलों में मेरी पीठ पर आहिस्ता से जम गए। मैंने उसे और ज़ोर से कस लिया। अपने सीने से थोड़ा नीचे मुझे उसके सीने के दोनों कोमल उभार चुभते से महसूस हुए।

"अ...अब छोड़ दीजिए न छोटे कुंवर।" कुछ ही देर में उसने जल्दी से अपने हाथ नीचे कर के मुझसे छूटने की कोशिश करते हुए मगर लरजते स्वर में कहा____"म...मां आ जाएगी।"

"आ जाने दो।" मैंने उसे और ज़ोर से भींच लिया____"मुझे अब किसी की परवाह नहीं है। मैंने अपनी होने वाली बीवी को सीने से लगाया हुआ है, किसी ग़ैर को नहीं।"

"हाय राम!" वो एकदम से हड़बड़ाई____"ये क्या कह रहे हैं?"

"सच ही तो कह रहा हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम मेरी होने वाली बीवी ही तो हो।"

"अच्छा अब छोड़ दीजिए ना।" वो कसमसाते हुए बोली____"मां ने देख लिया तो बहुत डांटेगी मुझे।"

मुझे भी लगा इससे ज़्यादा उसे नहीं सताना चाहिए इस लिए मैंने उसे ख़ुद से अलग कर दिया लेकिन रहा उसके क़रीब ही। मैंने देखा, उसके चेहरे पर लाज की सुर्खी छा गई थी। चेहरे पर मारे घबराहट के ढेर सारा पसीना भी उभर आया था। तेज़ चलती सांसों के चलते उसके सीने के दोनों पर्वत शिखर तेज़ी से ऊपर नीचे हो रहे थे। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो उसने झट से अपनी नज़रें झुका ली। कांपते होठों पर बेहद ही गहरी मुस्कान थी जिसे वो छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

"आप बैठिए मैं आपके लिए पानी और गुड़ ले के आती हूं।" फिर उसने सिर उठा कर हड़बड़ाते हुए जल्दी से कहा और फिर पलट कर जैसे ही जाने लगी तो मैंने झट से उसका हाथ पकड़ लिया।

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" कहने के साथ ही मैंने उसके हाथ को हल्के से झटका दिया तो वो एकदम से खिंचते हुए मुझसे आ टकराई। उसके दोनों पर्वत शिखर मेरे सीने से टकरा गए तो हम दोनों के ही मुंह से आह निकल गई। उसने घबरा कर मुझे देखा और फिर जल्दी ही मुझसे दूर हो गई।

"य...ये क्या कर रहे हैं आप?" वो बुरी तरह घबराई हुई नज़र आई____"छोड़ दीजिए ना। मां आ जाएगी तो मुझे बहुत डांटेगी। आप बैठिए मैं आपके लिए....।"

"तुम इतना घबरा क्यों रही हो?" मैंने उसका हाथ अभी भी पकड़ रखा था, बोला____"क्या अभी भी तुम्हें ये लगता है कि मैं तुम्हारे साथ कुछ ग़लत करने की नीयत रखता हूं?"

"न...नहीं...नहीं तो।" उसने मुझसे नज़रें चुराते हुए कहा____"ऐसी तो कोई बात नहीं है छोटे कुंवर।"

"तो फिर कैसी बात है ठकुराईन?" मैंने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। मेरे मुख से अपने लिए ठकुराईन सुन कर वो चौंकी और फिर मेरी तरफ अपलक देखने लगी।

उसकी बड़ी बड़ी आंखों में पलक झपकते ही मुझे आंसू के कतरे उभरते नज़र आए। कांपते होठों से वो मुझे दीवानावार सी हो कर देखने लगी। अगले ही पल जाने उसे क्या हुआ कि वो लपक कर मुझसे लिपट गई। मेरी पीठ पर अपने दोनों हाथ कसे और मेरे सीने में खुद को छुपाए वो एकदम से सिसक उठी।

"अरे! क्या हुआ?" मैंने उसकी पीठ को हल्के से सहलाते हुए पूछा____"क्या तुम्हें मेरा ठकुराईन कहना अच्छा नहीं लगा?"

"म...मुझे बहुत अच्छा लगा है छोटे कुंवर।" उसने और ज़ोर से सिसकते हुए कहा____"आपसे यही सुनने के लिए तो इतने समय से तरस रही थी मैं।"

"अच्छा तो फिर रो क्यों रही हो अब?" मैंने हौले से उसे खुद से अलग किया।

उसका चेहरा इन कुछ ही पलों में आंसुओं से तर हो गया था। उसकी ये हालत देख मेरे अंदर एक टीस सी उभरी। मन में ख़याल उभरा कि कितनी मासूम है मेरी जान।

"य...ये तो खुशी से रोना आ गया है मुझे।" उसने झट से अपने आंसू पोछते हुए मेरी तरफ देखा____"आख़िर आपने मुझे फिर से ठकुराईन जो कह दिया।"

"अरे! तुम तो मेरी ठकुराईन ही हो इस लिए पहले भी कहता था।" मैंने मुस्कुराते हुए उसकी गहरी आंखों में झांका____"और अब तो हमेशा ही कहूंगा।"

"अच्छा ऐसा क्यों?" उसने हौले से मेरी तरफ देखते हुए मासूमियत से पूछा।

"क्योंकि अब तुम मेरी धर्म पत्नी जो बनने वाली हो।" मैंने कहा____"और इस ठाकुर वैभव सिंह की ठकुराईन भी।"

अनुराधा बुरी तरह शर्मा गई। उसका सांवला चेहरा शर्म से लाल पड़ता चला गया। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर फिर से गहरी मुस्कान उभर आई। वो पहले की अपेक्षा मुझसे थोड़ा खुल तो गई थी लेकिन अभी भी काफी झिझक थी उसमें।

"अच्छा अब आप बैठिए।" उसने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ाते हुए कहा____"मैं आपके लिए पानी और गुड़ लाती हूं।"

"पर मुझे तो गुड़ से भी ज़्यादा मीठी चीज़ चाहिए।" मैंने मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा____"तभी पानी पियूंगा वरना नहीं।"

"गु...गुड़ से भी ज़्यादा मीठा?" अनुराधा के माथे पर एकदम से शिकन उभर आई____"क्या गुड़ से भी ज़्यादा कोई मीठी चीज़ होती है?"

"हां, बिल्कुल होती है।" मेरी मुस्कान गहरी हो गई____"बल्कि मेरा मानना तो ये है कि उससे ज़्यादा मीठी चीज़ इस दुनिया में कुछ होती ही नहीं है।"

"हाय राम! क्या सच में?" अनुराधा की आंखें अविश्वास से फैल गईं। फिर बड़ी उत्सुकता के साथ पूछा उसने____"मुझे भी बताइए ना उस चीज़ के बारे में? मैं तो अभी तक यही समझती थी कि गुड़, चिनी और शहद से ज़्यादा मीठा कुछ भी नहीं होता।"

"अरे! होता है ठकुराईन।" मैंने कहा____"जिन मीठी चीज़ों का तुमने नाम लिया है उनसे भी कहीं ज़्यादा मीठी होती है वो चीज़। इसी लिए तो कहा तुमसे कि मुझे वही मीठी चीज़ चाहिए तभी पानी पियूंगा।"

"पर मुझे तो पता ही नहीं है कि वो मीठी चीज़ क्या है तो कैसे दूं आपको?" कहते हुए अनुराधा का चेहरा इस तरह उतर गया जैसे ऐसी मीठी चीज़ का उसके पास न होने का उसे भारी अफसोस और दुख हुआ है। बड़ा ही संजीदा हो कर बोली____"क्या करें, हम ग़रीब लोग हैं छोटे कुंवर। ऐसी मीठी चीज़ खरीदने की औकात ही नहीं है हमारी। आप गुड़ से ही काम चला लीजिए ना।"

"ये तुमसे किसने कहा कि ऐसी मीठी चीज़ खरीदने से मिलती है?" मैंने कहा____"अरे! वो तो सबके पास होती है लेकिन असल में सच ये है कि इंसान को वो चीज़ तभी मीठी लगती है जब उसे कोई ख़ास व्यक्ति चखने को देता है।"

"बड़ी अजीब बातें कर रहे हैं आप।" अनुराधा का सिर जैसे चकरा गया____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा। आप ही बताइए उस मीठी चीज़ के बारे में।"

"ठीक हैं मैं तुम्हें बताए देता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन मेरी एक शर्त है। अगर तुम्हें शर्त मंजूर हो तो बोलो, तभी बताऊंगा वरना नहीं।"

"अब ये क्या बात हुई भला?" अनुराधा और भी ज़्यादा चकरा गई।

"बात तो बात ही हुई ठकुराईन।" मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी को रोकते हुए कहा____"इतनी बड़ी चीज़ के बारे में तुम्हें बताऊं और फिर बाद में वो तुम मुझे न दो तो मेरे बताने का क्या फ़ायदा? वैसे भी तुम्हारे घर आया हूं तो ये तुम्हारा फर्ज़ है कि घर आए मेहमान का स्वागत करो।"

"हां तो स्वागत करने से कहां मना कर रही हूं मैं?" अनुराधा ने भोलेपन से कहा____"गुड़ और पानी देने ही तो जा रही थी मैं लेकिन आप ही ऐसी कोई मीठी चीज़ मांग रहे हैं जिसके बारे में मैं खुद ही नहीं जानती।"

"अच्छा ठीक है मैं तुम्हें उस मीठी चीज़ के बारे में बताए देता हूं।" मैंने कहा____"लेकिन तुम्हें भी वादा करना होगा कि जानने के बाद तुम मुझे वो मीठी चीज़ दे कर ही पानी पिलाओगी।"

"हां हां मैं आपसे वादा करती हूं।" अनुराधा ने कहा____"आप बताइए तो सही कि वो मीठी चीज़ है क्या। मेरे पास कुछ पैसे रखे हैं तो मैं दुकान से खरीद कर झट से ले आऊंगी।"

"अरे! तुम्हें दुकान जाने की ज़रूरत ही नहीं है ठकुराईन।" मैंने कहा____"क्योंकि वो चीज़ तुम्हारे ही पास है और तुम इसी वक्त दे सकती हो मुझे।"

"हाय राम! क्या सच में?" अनुराधा के चहरे पर हैरानी के साथ साथ खुशी की चमक भी उभर आई, झट से बोली____"मेरे ही पास है वो चीज़ और अभी तक मुझे ही नहीं पता था। ये तो बहुत ही हैरानी की बात है। आप मुझे जल्दी से बताइए क्या है वो चीज़ जो गुड़ चिनी और शहद से भी ज़्यादा मीठी है।"

"तुम्हारे ये गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठ।" मैंने उसकी बड़ी बड़ी आंखों में झांकते हुए किंतु धड़कते दिल से कहा____"हां अनुराधा, तुम्हारे ये होठ ही हैं जो गुड़ चिनी और शहद से भी ज़्यादा मीठे हैं और ये मैं पूरे यकीन के साथ कहता हूं।"

मेरी बात सुनते ही अनुराधा भौचक्की सी रह गई। आश्चर्य से आंखें फट पड़ीं थी उसकी। मुझे इस तरह देखने लगी थी जैसे मेरी खोपड़ी को उसने अचानक ही मेरे धड़ पर घूमते हुए देख रही हो। इधर मेरी धड़कनें भी ये सोच कर धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं थी कि कहीं अनुराधा मेरी ऐसी बात से बुरा न मान जाए अथवा वो इस बात को कहीं दूसरे हिसाब से न सोच बैठे।

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी जैसे अनुराधा की चेतना वापस आई। वो बुरी तरह हड़बड़ा गई और शर्म से उसका चेहरा लाल सुर्ख हो गया। एक बार फिर से उसके होंठ बुरी तरह थरथरा उठे। होठों के बीच शर्म मिश्रित मुस्कान भी थिरकने लगी।

"ये...ये आप क्या बोल रहे हैं छोटे कुंवर?" फिर उसने नज़रें झुकाए हुए बड़ी मुश्किल से कहा____"भ...भला ऐसा भी कहीं होता है?"

"क्या नहीं होता?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"व...वो...मतलब कि हो...होंठ।" अनुराधा अटकते हुए बोली____"हां...मतलब कि ये कैसे...म...मीठे हो सकते हैं?"

"अब ये तो तभी पता चलेगा जब इन्हें चखा जाएगा।" मैं मन ही मन हैरान था कि अनुराधा ने बुरा नहीं माना था। मैं इस बात पर भी हैरान था कि उसे इस बारे में कुछ पता ही नहीं है। क्या सच में उसे पता नहीं है? क्या सच में वो इतनी ज़्यादा मासूम और भोली है?

"अगर तुम्हें यकीन नहीं है तो खुद ही चख कर देख लो।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे तो यकीन है कि मेरी ठकुराईन के होंठ गुड़ चिनी और शहद से भी ज़्यादा मीठे होंगे।"

अनुराधा एक बार फिर शर्म से लाल हो गई। बड़ी मुश्किल से उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा। उसके होठ कांप रहे थे। सांसें धौकनी की मानिंद तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। चेहरे पर पसीना और साथ ही अजीब सी बेचैनी के भाव थे। इधर मैं, जिसने जाने कितनी ही औरतों और लड़कियों को अपनी हवस के चलते भोगा था वो इस वक्त खुद अनुराधा के सामने कुछ और कहने तथा करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। हालाकि जितना कुछ मैं बोल चुका था उसके लिए भी मुझे हद से ज़्यादा हिम्मत जुटानी पड़ी थी।

"ठीक है अगर तुम ऐसा नहीं करना चाहती तो कोई बात नहीं।" मैंने ये सोच कर ऐसा कहा कि कहीं सच में अनुराधा को मेरा ऐसा बोलना और मेरा ये बर्ताव अच्छा न लगे____"मैं तो बस मज़ाक में ये सब बोल रहा था तुमसे। तुम मुझे बस पानी ही ले आओ। तब तक मैं चारपाई आंगन में रख कर उसमें बैठ जाता हूं।"

कहने के साथ ही मैं पलटा तो अनुराधा ने झट से मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने चौंकते हुए तथा उलझन पूर्ण भाव से उसकी तरफ देखा तो हैरान रह गया। अनुराधा मेरी तरफ अपना चेहरा किए एवं आंखें बंद कर के खड़ी थी। उसने अभी भी मेरा हाथ पकड़ा हुआ था। मेरी धड़कनें एक बार फिर धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं। वो आंखें बंद किए जिस तरह से मेरी तरफ चेहरा किए खड़ी थी उससे मुझे समझते देर न लगी थी कि वो मुझे क्या करने का इशारा कर रही थी?

"छ...छोटे कुंवर।" फिर उसने आंखें बंद किए ही कांपती आवाज़ में कहा____"अ...अगर सच में आपको म...मेरे ह...होठ गुड़ चिनी और शहद से ज़्यादा मीठे समझ में आते हैं तो च...चख लीजिए।"

"न...नहीं अनुराधा।" मुझे उसकी इस अदा पर और उसके इस समर्पण अंदाज़ पर बेहद प्यार आया और साथ ही ये सोच कर बुरा भी लगा कि मैंने उस मासूम को ये करने के लिए मजबूर किया। अतः अधीरता से बोला____"तुम्हें ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं सच में तुमसे मज़ाक कर रहा था। अब तुम जाओ पानी ले आओ।"

"म...मैं आपको फिर से नाराज़ नहीं करना चाहती छोटे कुंवर।" उसने झट से आंखें खोल कर मुझे देखा। उसकी आंखों में एकाएक आंसू तैरते नज़र आए, बोली____"इसके पहले भी मैंने अपनी बेवकूफी और नासमझी से आपको नाराज़ कर दिया था। उसके बाद ये मैं ही जानती हूं कि आपको देख न पाने से कितना तड़पती रही हूं मैं।"

"पागल हो तुम।" मैं उसकी आंखों में आंसू देखते ही मचल उठा____"तुम्हारा कभी कोई दोष नहीं था अनुराधा। तुमने वही किया था जो उस समय उचित था। तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं हुआ था तो इसका मतलब ये था कि मैं सच में तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल नहीं हुआ था उस समय। इसमें सिर्फ और सिर्फ मेरा दोष था। तुम तो हमेशा से दोष रहित रही हो मेरी जान और मैं ऊपर वाले का शुक्र गुज़ार हूं कि उसने मुझ जैसे इंसान के नसीब में तुम्हें लिखा।"

"मैं इतनी बड़ी बड़ी बातों का मतलब नहीं समझती छोटे कुंवर।" अनुराधा ने गंभीरता से कहा____"बस इतना महसूस करती हूं कि मैं आपसे बहुत ज़्यादा प्रेम करती हूं और आपके बिना जी नहीं सकती। भगवान के लिए आप अब कभी मुझसे नाराज़ मत....।"

"कभी नहीं होऊंगा मेरी जान।" मैंने झपट कर उसे अपने सीने से लगा लिया। अनुराधा फिर से सिसक उठी। मैंने बड़े ही प्रेम से उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा____"तुमसे नाराज़ होऊंगा तो मैं खुद भी चैन से जी नहीं पाऊंगा। तुम अब मेरी जान और मेरी धड़कन बन चुकी हो अनुराधा। तभी तो तुम्हारी मां से तुम्हारा हाथ मांग लिया है मैंने और उनसे कहा है कि मैं तुमसे ब्याह कर के तुम्हें हवेली ले जाऊंगा।"

मेरी बात सुन कर अनुराधा और ज़ोर से मुझसे छुपक गई। अभी वो कुछ कहने ही वाली थी कि तभी किसी के खंखारने की आवाज़ सुन कर हम दोनों ही बुरी तरह हड़बड़ा गए और एक दूसरे से अलग हो कर दूर हट गए। मैंने देखा सरोज काकी अपने बेटे अनूप के साथ आंगन में खड़ी हमें ही देख रही थी। उधर अनूप भी आंखें फाड़े हमें देखे जा रहा था। हालाकि वो अभी छोटा था लेकिन अपलक इस लिए देखे जा रहा था क्योंकि उसने ऐसा दृश्य शायद पहली बार देखा था। उधर सरोज काकी मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

सरोज काकी के यूं आ जाने से और इस हालत में पकड़े जाने से मैं और अनुराधा बुरी तरह हड़बड़ा गए थे। अनुराधा का तो घबराहट के मारे बुरा हाल ही हो गया था। उससे जब अपनी मां का सामना न किया गया तो वो सिर झुकाए भागती हुई अपने कमरे में घुस गई।

"म..माफ़ करना काकी।" मैंने झिझकते हुए कहा____"व...वो हम तो बस....।"

"हा हा हा हा।" सरोज काकी मेरी उम्मीदों के विपरीत ठहाका लगा कर हंस पड़ी, फिर बोली____"देखो तो डर के मारे कैसी शक्ल बना ली है ठाकुर वैभव सिंह ने।"

मैं भौचक्का सा देखता रह गया काकी को। मुझे लगा था काकी हम दोनों पर गुस्सा करेगी। ख़ास कर मुझ पर तो सबसे ज़्यादा मगर यहां तो काकी इस तरह ठहाका लगा कर हंसने लगी थी जैसे उसके लिए ये सब सामान्य सी बात थी।

"अरे! डरो नहीं मेरे बच्चे।" सरोज ने आगे बढ़ते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"मैं जानती हूं कि तुम दोनों अब एक दूसरे के ही हो और ये क्योंकि तुम दोनों का पहला मिलाप था इस लिए अकेले में थोड़ी बहुत बातें कर लेना ग़लत नहीं था।"

"मतलब तुम गुस्सा नहीं हो काकी?" मैंने राहत की सांस लेते हुए कहा।

"गुस्सा क्यों होना वैभव?" सरोज ने मेरे पास आ कर कहा____"अगले साल तुम दोनों पति-पत्नी बन जाओगे तो गुस्सा किस बात के लिए करना? वैसे इतना ज़रूर कहूंगी कि ब्याह से पहले एक दूसरे से इतनी दूरी तो ज़रूर ही बनाए रखना जिससे कि दोनों की ही इज्ज़त और मर्यादा बनी रहे।"

मैं काकी के कहने का मतलब समझ गया था इस लिए हां में सिर हिला दिया। ख़ैर उसके बाद आंगन में चारपाई निकाल कर मैं उसी में बैठ गया और काकी से इधर उधर की बातों में लग गया। इस बीच काकी ने अनुराधा को मेरे लिए चाय बना कर ले आने के लिए कह दिया था। कुछ देर में अनुराधा चाय ले कर आई। वो बहुत ज़्यादा शर्मा रही थी जिस पर सरोज काकी मंद मंद मुस्कुराने लगी थी। मेरा दिल तो अभी भी अनुराधा से बातें करने का कर रहा था लेकिन काकी के रहते अब ये संभव नहीं था। इस लिए मैं चाय पीने के बाद ये कह कर चारपाई से उठ गया कि समय मिला तो फिर किसी दिन आऊंगा।

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अध्याय - 108

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मैं, पिता जी और नया मुंशी किशोरी लाल बैठक में बैठे हुए थे। मैंने पिता जी को बता दिया था कि मैंने आज आमों के बाग़ में इस बात की जांच पड़ताल की थी कि सफ़ेदपोश हर बार हमारे आमों के बाग़ में आ कर वहां से कैसे ग़ायब हो जाता था? सारी बातें सुन कर पिता जी के चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे।

"आपको क्या लगता है पिता जी?" मैंने उन्हें सोचो में गुम देखा तो पूछा____"वो सफ़ेदपोश हर बार हमारे आमों के बाग़ में ही ग़ायब होने के लिए क्यों जाता होगा? क्या वो ऐसा कर के सिर्फ हमें उलझाए रखना चाहता है या उसके ऐसा करने के पीछे कोई दूसरी भी ख़ास वजह हो सकती है?"

"पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता इस बारे में।" पिता जी ने लंबी सांस ली____"चंद्रकांत के मामले में उसका इस तरह से जुड़े होना ऐसा है जिसने हमें बुरी तरह उलझा दिया है और सोचने पर मजबूर कर दिया है।"

"हां ये तो सही कहा आपने।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"ये बात बिल्कुल भी हजम नहीं हो रही कि इसके पहले जो सिर्फ मेरी ही जान का दुश्मन बना हुआ था वो अचानक से चंद्रकांत के मामले में क्यों और कैसे जुड़ गया दिखा? आख़िर वास्तव में वो चाहता क्या है अथवा क्या करना चाहता है?"

"यही तो सोचने वाली बात है।" पिता जी ने कहा____"एक समय था जब वो तुम्हारी जान लेने के लिए हर तरह के पैंतरे स्तेमाल कर रहा था। मतलब कि उसने पहले दरोगा धनंजय को लपेटा, फिर मुरारी के भाई जगन को अपना मोहरा बनाया, फिर तुम्हारे दोनों दोस्तों को। जगन को तो वो हमारी हवेली के बंद दरवाज़े से ही निकाल कर ले गया। उसका ये दुस्साहस तो वाकई हैरतअंगेज था। ख़ैर उसके बाद काफी समय तक उसकी मौजूदगी का कहीं आभास ही नहीं हुआ लेकिन इतने दिनों बाद जब वो नज़र आया तो चंद्रकांत के मामले के साथ। चंद्रकांत के अनुसार उसने उसे बताया कि उसके बेटे की हत्या उसकी अपनी बहू रजनी ने ही की थी। हत्या करने के पीछे उसने जो कहानी बताई वो यकीनन ऐसी थी जिससे चंद्रकांत को यकीन कर ही लेना था। आख़िर इतना तो वो भी अच्छी तरह जानता था कि उसकी बहू कैसे चरित्र की औरत थी। अब सवाल ये है कि अगर सच में रघुवीर की हत्या रजनी ने ही की थी तो इसके बारे में सफ़ेदपोश को कैसे पता चला? क्या वो उस समय आस पास ही कहीं मौजूद था जब रघुवीर की हत्या हुई थी? अगर हां तो उसने अगले दिन ही चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे के बारे में क्यों नहीं बताया? इतने दिनों बाद क्यों उसने चंद्रकांत से संपर्क किया?"

"ये सब तो सोचने का विषय है ही।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"किंतु सोचने वाली एक बात ये भी है कि उसे ये कैसे पता था कि चंद्रकांत रात के उस वक्त पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकलेगा?"

"इसका जवाब यही हो सकता है कि उसे चंद्रकांत की इस दिनचर्या अथवा आदत के बारे में पहले से मालूम रहा होगा।" पिता जी ने कहा____"ठीक उसी तरह जैसे रघुवीर के हत्यारे को रघुवीर की आदत के बारे में पता था।"

"बड़े कमाल की बात है ये।" मैंने हैरानी ज़ाहिर की____"एक तरफ रघुवीर का हत्यारा रघुवीर की दिनचर्या के बारे में पता करता है और फिर उसकी हत्या करता है और दूसरी तरफ ये सफ़ेदपोश चंद्रकांत की दिनचर्या का पता कर के उससे एक रात मिलता है और उसे उसके बेटे के हत्यारे के बारे में बताता है। कमाल की समानता है दोनों में, है ना?"

"सही कह रहे हो तुम।" पिता जी के चेहरे पर सहसा अजीब सी चमक उभरी____"कहीं सफ़ेदपोश और रघुवीर का हत्यारा दोनों एक ही तो नहीं हैं, मगर....।"

"मगर क्या पिता जी?" मैं उनकी बात सुन कर चौंक पड़ा था, बोला____"मुझे तो लगता है वो दोनों एक ही हैं। पहले उसने रघुवीर की खुद हत्या की और फिर रजनी को हत्यारिन साबित कर के चंद्रकांत के हाथों रजनी की हत्या करवा दी। ये तो गजब ही कारनामा हो गया, कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसा भी हो सकता है।"

"लेकिन सवाल ये है कि सफ़ेदपोश भला ऐसा क्यों करेगा?" पिता जी ने सोच पूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा____"उसकी चंद्रकांत अथवा रघुवीर से क्या दुश्मनी हो सकती है और अगर उनसे उसकी कोई दुश्मनी थी भी तो इसके पहले उसने उनकी हत्या क्यों नहीं की थी? इसके पहले तो वो तुम्हारी जान का दुश्मन बना हुआ था, फिर अचानक से वो उनका दुश्मन कैसे बन गया?"

पिता जी के इन सवालों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। असल में कोई जवाब सूझा ही नहीं मुझे। मैं खुद भी सोच में पड़ गया था कि अगर ऐसा था तो सचमुच सफ़ेदपोश की चंद्रकांत से या उसके बेटे से क्या दुश्मनी रही होगी? ज़ाहिर है इंसान किसी की हत्या तभी करता है जब किसी से वो हद से ज़्यादा नफ़रत करता हो। जबकि यहां पर मुझे दूर दूर तक ऐसा नज़र नहीं आ रहा था और यहीं पर मैं ये सोचने पर मजबूर था कि जब कोई वजह ही नहीं है तो सफ़ेदपोश भला ऐसा क्यों करेगा उनके साथ?

"दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता।" सहसा पिता जी ने कहा____"अगर वाकई में चंद्रकांत से अथवा उसके बेटे से सफ़ेदपोश की कोई दुश्मनी थी तो वो पहले ही उनकी हत्या कर देता। उस जैसे शातिर को जो लोगों की नज़रों से ग़ायब रहता हो उसके लिए पहले ही उनकी हत्या कर देना कोई बड़ी बात नहीं थी। यही एक पेंच वाली बात है जिसके तहत हम ये कहने पर मजबूर हैं कि रघुवीर की हत्या सफ़ेदपोश ने नहीं की हो सकती। हां ये सवाल ज़रूर सोचने वाला है कि रघुवीर की हत्या के इतना समय गुज़र जाने के बाद उसने उसके हत्यारे का नाम चंद्रकांत को क्यों बताया? चंद्रकांत ने बताया था कि बदले में वो उससे कोई काम करवाना चाहता था तो सवाल ये भी है कि बदले में वो चंद्रकांत से क्या करवाना चाहता है? वादे के मुताबिक वो पिछली रात चंद्रकांत से मिलने नहीं आया जिसका मतलब हमने यही निकाला कि या तो उसने चंद्रकांत से बदले में कोई काम करवाने के विषय में झूठ बोला था जोकि संभव है कि इसकी कोई वजह रही होगी या फिर उसके न आने के पीछे ये वजह हो सकती है कि वो अपने किसी काम में व्यस्त होने के चलते चंद्रकांत से मिलने न आया होगा। यही सोच कर हमने महेंद्र सिंह से ये कहा था कि इस बारे में फ़ौरन किसी नतीजे पर पहुंचना उचित नहीं है। यानि हमें दो तीन दिन का समय लेना चाहिए। हो सकता है कि आज रात या फिर कल की रात सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आ ही जाए। अगर वो इन दो तीन दिनों के अंदर भी चंद्रकांत से मिलने नहीं आता तो फिर यही समझा जाएगा कि उसने वाकई में अपने किसी मकसद के तहत ही चंद्रकांत को उसकी बहू के बारे में हत्यारिन बताते हुए वो सब बताया और चंद्रकांत को यकीन दिला कर उसके हाथों उसकी अपनी ही बहू को मरवा डाला।"

"मान लीजिए अगर सच यही हुआ तो?" मैंने तर्क़ देते हुए कहा____"उस सूरत में आप ये कैसे पता लगाएंगे कि चंद्रकांत के द्वारा ये सब करवाने के पीछे उसका असल मकसद क्या था?"

"फिलहाल तो यही कह सकते हैं कि वो किसी बड़े खेल को अंजाम देने की फ़िराक में होगा।" पिता जी ने कहा____"इस वक्त हमें चंद्रकांत से अथवा उसके बेटे रघुवीर से उसकी दुश्मनी की कोई वजह समझ में नहीं आ रही लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इसके पीछे कोई वजह नहीं होगी। बिना वजह वो महज अपने शौक के लिए तो किसी की हत्या नहीं करेगा और ना ही करवाएगा। तब हमें गहराई से इस बारे में सोचने के साथ साथ ये पता भी करना होगा कि उसने आख़िर ऐसा किया क्यों और आगे अब क्या करने की फ़िराक में है? हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि वो तुम्हारी जान का भी दुश्मन है। इस वक्त भले ही उसका खेल हमारी समझ में नहीं आ रहा लेकिन इतना आभास हमें ज़रूर हो रहा है कि उसके ये सब करने का संबंध भी कहीं न कहीं तुमसे ही है।"

"वैसे आपके हिसाब से ये सफ़ेदपोश कौन हो सकता है?" मैंने कुछ सोचते हुए पूछा____"और हर बार वो खुद को ग़ायब करने के लिए हमारे ही आमों के बाग़ की तरफ क्यों जाता है? मैंने आज भुवन के साथ पूरे बाग़ का निरीक्षण किया था। उसके ग़ायब होने का राज़ तो पता चल गया लेकिन ये नहीं समझ आया कि वो हमारे बाग़ से निकल कर उस तरफ क्यों जाता है जहां से साहूकार गौरी शंकर के ज़मीनों की सरहद शुरू होती है? क्या वो हमारे दिमाग़ में ये बैठाना चाहता है कि वो साहूकारों के घर का ही कोई सदस्य है?"

"हमें नहीं लगता कि साहूकारों के घर का कोई सदस्य ही सफ़ेदपोश है।" पिता जी ने कहा____"अगर होता तो इसकी जानकारी उन लोगों को भी होती और वो जगताप तथा तुम्हारे बड़े भाई को मारने के लिए यूं खुले आम कत्ल-ए-आम नहीं करते। बल्कि सफ़ेदपोश की तरह खुद को सबसे छुपाए रख कर कभी भी उनकी हत्या कर देते और खुद का बचाव कर लेते। बचाव से हमारा मतलब ये है कि बाद में हमारे द्वारा उनका इस तरह से विनाश नहीं होता। इसी से ज़ाहिर है कि सफ़ेदपोश उनमें से कोई नहीं है। हां ये कहा जा सकता है कि सफ़ेदपोश अगर उनकी ज़मीनों की सरहद की तरफ जाता है तो यकीनन वो हमारे ज़हन में यही बैठाना चाहता है कि हम यही समझ बैठें कि वो साहूकारों के घर का ही कोई सदस्य है।"

"इससे सफ़ेदपोश को भला क्या फ़ायदा हो सकता है?" मैंने सोचने वाले भाव से पूछा।

"यही कि हम उन्हीं पर उलझें रहें।" पिता जी ने कहा____"और उसकी असलियत की तरफ ध्यान देने का हम ख़याल तक न करें।"

"तो अब अगर हम उसकी चाल समझ गए हैं।" मैंने कहा____"तो फिर अब हम कैसे ये पता लगाएं कि सफ़ेदपोश असल में कौन है? वैसे मेरे ज़हन में कुछ और भी ख़याल उभर रहे हैं। मेरा ख़याल है कि हमें उस बारे में भी गहराई से सोचना चाहिए। संभव है कि सफ़ेदपोश के क़रीब पहुंचने का हमें कोई सुराग़ सूझ जाए।"

"हमें खुशी हुई कि इस संबंध में तुम गहराई से सोचते हुए अपने विचार रख रहे हो।" पिता जी ने कहा____"बताओ कैसे ख़याल उभर रहे हैं तुम्हारे ज़हन में?"

"सफ़ेदपोश के बारे में आज तक हम यही सोचते रहे हैं कि वो या तो साहूकारों में से कोई है या फिर चंद्रकांत और उसके बेटे में से कोई अथवा ये कहें कि इन दोनों का ही उससे कोई ताल्लुक होगा।" मैंने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"जबकि इतना सोचने के बाद भी हम अभी तक सफ़ेदपोश के बारे में ना तो कुछ सोच पाए हैं, ना ही कुछ पता कर पाए हैं और ना ही किसी नतीजे पर पहुंच सके हैं।"

"हां इस बात से हम सहमत हैं।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा___"किंतु तुम आख़िर कहना क्या चाहते हो?"

"मैं ये कहना चाहता हूं कि हमें सफ़ेदपोश के बारे में सोचने का अपना दायरा या तो थोड़ा बढ़ाना चाहिए या फिर अलग नज़रिए से सोचना चाहिए।" मैंने कहा____"अब तक इतना सोच विचार करने के बाद हम लगभग ये समझ ही चुके हैं कि सफ़ेदपोश ना तो साहूकारों में से कोई है और ना ही चंद्रकांत में से। तो क्या ये नहीं हो सकता कि वो कोई ऐसा व्यक्ति है जो इस गांव का ही नहीं है?"

"क्या मतलब?" पिता जी के साथ साथ मुंशी किशोरी लाल के चेहरे पर भी हैरानी के भाव उभर आए।

"मतलब ये कि शायद वो किसी दूसरे गांव का कोई व्यक्ति है।" मैंने कहा____"जो हमें अपना दुश्मन समझता है, ख़ास कर मुझे। मैं स्वीकार करता हूं कि मुझसे उसकी दुश्मनी के पीछे यकीनन मेरे ग़लत कर्म ही होंगे। या फिर ऐसा हो सकता है कि वो हम सबको ही अपना दुश्मन समझता होगा।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने अजीब भाव से कहा____"सच ये है कि जब से हमने दादा ठाकुर की गद्दी सम्हाली थी और कई गावों के मुखिया बने थे तब से हमने यही प्रयास किया था कि हमारे द्वारा कभी किसी का बुरा न हो। वर्षों से ऐसा होता भी आया है। इस गांव के लोग ही नहीं बल्कि आस पास के गांव के लोग भी हमें देवता की तरह पूजते रहे हैं और आज भी हमें वही सम्मान देते हैं। ऐसे में कोई हमारा दुश्मन कैसे बन सकता है? हां ये ज़रूर मानते हैं कि तुम्हारे ग़लत कर्मों की वजह से कुछ लोग हमसे नाखुश होंगे। हालाकि वो हमसे नहीं बल्कि तुमसे नाखुश हैं।"

"मैं इस बात को मानता हूं पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मेरे कहने का मतलब कुछ और है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि आपकी अच्छाई और आपकी ऊंची शख्सियत को देख कर भी लोग आपको अपना दुश्मन समझ बैठते हैं। वो आपसे खुद को कम नहीं समझना चाहते हैं बल्कि आपसे भी ज़्यादा ऊंचा अपना मुकाम बना हुआ देखना चाहते हैं। इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसी ही मानसिकता वाला कोई व्यक्ति हमारे जैसी शख्सियत बनने का ख़्वाब देख बैठा हो? वो अच्छी तरह समझता होगा कि हमारे रहते वो अपना मुकाम हमसे ज़्यादा ऊंचा नहीं बना सकता इस लिए पहले उसने हमें मिटाने का सोच लिया होगा। इसके लिए उसने योजनाबद्ध तरीके से अपना काम शुरू कर दिया। सफ़ेदपोश के रूप में उसने जो कुछ भी किया है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि हमारी ऊंची प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। सबसे पहले उसने मुरारी की हत्या करवाई और उसका इल्ज़ाम मुझ पर लगवाया। मकसद वही, मेरे द्वारा आपकी प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाना। उसके बाद जगन और मेरे दोस्तों के द्वारा भी इसी मकसद से जाने क्या क्या करवाया। गहराई से सोचा जाए तो उसने शुरू से ही हमारी शख्सियत को और हमारे मान सम्मान को लोगों की नज़र में मिट्टी में मिलाने का ही काम किया है।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एकदम से कुछ बोल ना सके। उनके चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे। सहसा मेरी नज़र मुंशी किशोरी लाल पर पड़ी। वो मुझे इस तरह देखे जा रहा था जैस मैं कोई अजूबा था। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि मैं भी उसे देख रहा हूं तो उसने हड़बड़ा कर जल्दी से नज़रें हटा लीं।

"ठाकुर साहब, छोटे कुंवर की बातों में वाकई वजन है।" फिर उसने पिता जी से मुखातिब हो कर कहा____"हालाकि मुझे इन मामलों का ज़्यादा कुछ पता नहीं है लेकिन आपसे जितना जाना है उस हिसाब से मुझे भी यही लगता है कि छोटे कुंवर जो कह रहे हैं उसमें कहीं न कहीं सच्चाई ज़रूर है।"

"हमें ये देख कर बेहद प्रसन्नता हुई कि तुम इतना दूर तक सोच सकते हो।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"सच कहें तो अब से पहले इतनी दूर का हमने भी नहीं सोचा था। यकीनन तुम्हारी बातों में वजन है और ऐसा हो भी सकता है।"

"तो अब हमें ये सोचना चाहिए कि ऐसी मानसिकता रखने वाला वो व्यक्ति कौन हो सकता है जिसने अपनी योजना के अनुसार खुद को सफ़ेदपोश में तब्दील कर इतना कुछ कर डाला?" मैंने प्रभावशाली लहजे में कहा___"और अब भी अपनी योजना के तहत अपने काम को अंजाम देने में लगा हुआ है?"

"क्या कहें?" पिता जी के चेहरे पर असमंजस के से भाव उभरे____"हमें कुछ समझ ही नहीं आ रहा। ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में भला हम किस पर शक करें?"

"वो व्यक्ति आपका जान पहचान वाला और बेहद क़रीबी भी हो सकता है ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने हस्ताक्षेप करते हुए कहा____"दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो गहरे दोस्त और विश्वासपात्र तो होते श हैं किन्तु असलियत में पीठ पर छूरा ही घोंपते हैं।"

"मैं भी यही कहना चाहता था।" मैंने पुरज़ोर लहजे से कहा____"और वैसे भी आपके जैसी शख्सियत बनने का ख़्वाब कोई आम व्यक्ति नहीं देख सकता बल्कि वही देखेगा जो आम व्यक्ति से ऊपर होगा। जिसके पास आपके जितनी धन दौलत तो होगी लेकिन आपके रहते उसमें आपके जैसा बनने का साहस न होगा।"

"क्या तुम ये कहना चाहते हो कि ऐसा व्यक्ति हमारा कोई मित्र ही हो सकता है?" पिता जी ने हैरत से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"नहीं नहीं, हमारे मित्र ऐसे हर्गिज़ नहीं हैं जो खुद को हमसे ऊपर उठाने के लिए हमारा अहित करने का सोचें।"

"मान लेता हूं कि वो ऐसे नहीं होंगे।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन एक बात पर गौर कीजिए कि क्या अब तक के इतिहास में कभी ऐसा हुआ था कि हम या हमारे पूर्वजों से न्याय करने का पद छिन गया हो? क्या इसके पहले कभी ऐसा हुआ था कि हमारे अलावा किसी और ने लोगों के किसी मामले का मुखिया के रूप में फ़ैसला किया हो? जहां तक मुझे पता है ऐसा कभी नहीं हुआ पिता जी लेकिन आज हालात ये हैं कि आप दूसरे गांव के ही क्या बल्कि अपने ही गांव के लोगों के किसी मामले का फ़ैसला नहीं कर सकते। ऐसा इस लिए क्योंकि अब आप मुखिया नहीं रहे। क्या इससे ये ज़ाहिर नहीं होता कि किसी ने हमारे खिलाफ़ कुछ इस तरीके से षड्यंत्र रचा कि आज आपसे मुखिया का पद छिन गया और हमारी मुकम्मल शख्सियत धूल में मिल गई? साहूकार लोग हमें अपना दुश्मन समझते थे। खाज में फोड़ा ये हुआ कि मेरी वजह से चंद्रकांत भी हमें अपना दुश्मन मान बैठा। दोनों ने मिल कर हमें बर्बाद भी कर दिया। जिस व्यक्ति ने हमसे बड़ा बनने का ख़्वाब देखा होगा उसके लिए तो ये सब ऐसा हो गया जिसे सोने पर सुहागा हो जाना कहते हैं। उसने दूर से हमें बर्बाद होते देखा और खुद सफ़ेदपोश के रूप में छुप कर हमारी इज्ज़त का बेड़ा गर्क करता रहा। मुझे तो अब ये लगता है कि सफ़ेदपोश वास्तव में कभी मुझे जान से मारना ही नहीं चाहता था बल्कि वो हमारे ज़हन में सिर्फ ये बैठाना चाहता था कि वो मेरी जान का दुश्मन है। जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। सोचने वाली बात है कि जब हम मुकम्मल रूप से मिट ही जाएंगे तो किसी को मुझे अथवा आपको जान से मार देने की ज़रूरत ही क्या रह जाएगी? हम तो उनमें से हैं जो ये समझते हैं कि हमारी आन बान और शान ही हमारे ज़िंदा होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। यानि अगर हमारी आन बान और शान मिट्टी में मिल जाए तो हम मुर्दे ही बन जाएंगे।"

मेरे चुप होते ही बैठक में सन्नाटा छा गया। पिता जी मेरी बातें सुन कर अवाक से हो गए थे। किशोरी लाल की तरह अब वो भी मुझे चकित भाव से देखने लगे थे। इधर मैं ये सोचने लगा कि कहीं मैंने कुछ ज़्यादा ही तो नहीं बोल दिया? आख़िर छोटा मुंह बड़ी बात जो कर दी थी मैंने।

"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा पिता जी?" उन्हें कुछ न बोलता देख मैंने बेचैन हो कर पूछा।

"नहीं, ऐसी बात नहीं है।" पिता जी ने पुनः गहरी सांस ली, बोले____"इस संबंध में तुमने जो कुछ भी कहा है वो एक तरह का कड़वा सच हो सकता है लेकिन हम ये भी मानते हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कहने का मतलब ये कि ज़रूरी नहीं कि जो कभी नहीं हुआ था वो आगे भी भविष्य में कभी हो नहीं सकेगा। ये सच है कि अब से पहले हम और हमारे पुरखे ही लोगों के मामलों का फ़ैसला करते आए हैं लेकिन जैसा कि हमने कहा, समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। सबका समय आता है और यही सृष्टि का नियम है। आज हम इस मुकाम पर हैं तो इसका मतलब सिर्फ यही नहीं है कि किसी के द्वारा ऐसा हुआ है बल्कि इसके पीछे हमारे और हमारे पुरखों के कर्मों का फल भी शामिल है। ख़ैर, अब अगर कोई और लोगों का फ़ैसला करता है तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं है बल्कि हम यही सोचते हैं कि ये उनके भाग्य की बात है। लेकिन हां, अगर सच में इसके लिए किसी ने ऐसा कुछ किया है तो ये हद दर्जे का गुनाह है। सफ़ेदपोश को अब किसी भी हाल में पकड़ना हमारी पहली और आख़िरी प्राथमिकता है। हम उससे जानना चाहते हैं कि आख़िर उसने हमारे साथ ऐसा क्यों किया?"

"वो तो ठीक है पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन हमारी प्रतिष्ठा का क्या? उसका क्या जो हमसे छिन गया?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" पिता जी के माथे पर सिलवटें उभरी____"क्या तुम ये चाहते हो कि जो हमसे छिन गया है उसे वापस हासिल करना चाहिए हमें?"

"क्यों नहीं?" मैंने दो टूक भाव से कहा____"मैं मानता हूं कि ऐसा सिर्फ मेरी वजह से हुआ है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम अपना खोया हुआ सम्मान अथवा खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस हासिल करने का सोचें ही नहीं।"

"तो कैसे हासिल करोगे तुम?" पिता जी ने ग़ौर से मेरी तरफ देखा____"क्या इसके लिए हर किसी से ज़ोर ज़बरदस्ती करोगे तुम अथवा हमारे पिता की तरह लोगों को बेरहमी से कुचलना शुरू कर दोगे?"

"नहीं, मेरा ये मतलब नहीं है।" मैंने कहा____"और ना ही मैं दादा जी की तरह किसी को सताना चाहता हूं लेकिन हां, अपनी प्रतिष्ठा को वापस हासिल करने के लिए ऐसा रास्ता ज़रूर अपनाना चाहता हूं जिससे किसी को कोई तकलीफ़ ना हो। एक ऐसे तरीके से जिसे देख कर लोग सिर्फ और सिर्फ वाह वाह कर उठें।"

"बहुत खूब।" पिता जी हौले से मुस्कुराए____"ख़याल तो काफी अच्छा है बर्खुरदार लेकिन ऐसा करोगे कैसे?"

"लोगों की सर्व सम्मति से।" मैंने कहा____"किसी ने बुरी मानसिकता के तहत भले ही हमें मिट्टी में मिलाने की कोशिश की हो लेकिन अभी भी ऐसा नहीं है कि लोगों के दिल से आपके प्रति सम्मान की भावना कम हो गई है। मुझे पूरा यकीन है कि लोग अभी भी आपके प्रति पहले की तरह श्रद्धा भाव रखते होंगे और यही चाहते होंगे कि उनकी हर समस्या का फ़ैसला आप ही करें। आख़िर वो ये कैसे भूल सकते हैं कि बड़े दादा ठाकुर के बाद वो आप ही थे जिन्होंने उन्हें आज़ादी से जीने की प्रेरणा दी और उनके दुख दर्द को दूर कर के उन्हें खुशियां प्रदान की थी? मुझे पूरा भरोसा है कि अगर लोगों के कानों में मुखिया के चुनाव की बातें डाल दी जाएं तो वो खुद बड़े ज़ोर शोर के साथ इसके लिए आवाज़ उठाएंगे। बस उसके बाद हमें अपना खोया हुआ सम्मान और पद हासिल होने में कोई समस्या नहीं होगी।"

"तुमने आज हमें चमत्कृत कर दिया।" पिता जी ने भाव विभोर हो कर कहा____"तुम्हारी ये सारी बातें और तुम्हारे ये सोच विचार वाकई काबिले तारीफ़ हैं। हमें यकीन नहीं हो रहा कि महज इतनी सी उमर में तुम इतनी गहराई से इतना कुछ सोच सकते हो। ख़ैर, अच्छा लगा हमें ये सब सुन कर।"

"तो ये शुभ काम करने का श्री गणेश कब किया जाए ठाकुर साहब?" किशोरी लाल मारे खुशी के खुद को बोलने से रोक न सका____"मेरी भी दिली ख़्वाहिश यही है कि पहले की ही तरह आप सबके दाता और सबके स्वामी बन जाएं। इतने दिनों में मैं भी ये महसूस कर चुका हूं कि अंदर ही अंदर आप भी बहुत कुछ सोचते हैं और खुद को दुखी किए रहते हैं।"

"हमें किसी चीज़ की कोई अभिलाषा नहीं है किशोरी लाल जी।" पिता जी ने गंभीर हो कर कहा____"हमारे दुख और तकलीफ़ की असल वजह सिर्फ ये है कि हमने एक झटके में अपने बांह के भाई को तथा अपने बेटे को खो दिया और इतना बड़ा झटका लगने के बाद भी हमारे प्राण नहीं निकले।"

"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने अधीरता से कहा____"इस हवेली में रहने वालों को आपकी सख़्त ज़रूरत है। आप ही इनके सब कुछ हैं। आपके बिना किसी का भी कोई वजूद नहीं है।"

"जाने कितने ही हसीन ख़्वाब सजाए थे हमने।" पिता जी ने संजीदा हो कर कहा___"लेकिन सारे ख़्वाब एक झटके में चूर चूर हो गए। हमने कभी किसी के साथ बुरा नहीं किया, इसके बावजूद हमारे नेक कर्मों की हमें इतनी भयानक और असहनीय सज़ा मिली। कभी कभी ज़हन में ख़याल आता है कि क्या फ़ायदा हुआ अच्छाई करने का? इससे अच्छा तो यही होता कि हम भी अपने पिता की तरह जल्लाद बन जाते। कम से कम किसी में इतनी हिम्मत तो न होती कि वो हम में से किसी के साथ कुछ बुरा करने का सोच भी लेते।"

"ऐसा मत सोचिए ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने कहा____"जो कुछ हुआ उसमें आपका कहीं भी कोई दोष नहीं था। सब नियति का खेल था। आप सब कुछ भुला कर अब इस बात पर ध्यान दीजिए कि सबको इस दुख दर्द से निकाल कर किस तरह से खुशियां दी जाए?"

"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"अब तुम जाओ और आराम करो। तुम्हें फिलहाल इस सबके बारे में कुछ भी नहीं सोचना है। इस समय जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना है।"

मैंने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैठक से निकल कर हवेली के अंदर चला आया। मेरे दिलो दिमाग़ में बहुत सारी बातें थी जिन्हें सोचते हुए मैं सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ ही बढ़ता चला गया।

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अध्याय - 109

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"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"अब तुम जाओ और आराम करो। तुम्हें फिलहाल इस सबके बारे में कुछ भी नहीं सोचना है। इस समय जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना है।"

मैंने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैठक से निकल कर हवेली के अंदर चला आया। मेरे दिलो दिमाग़ में बहुत सारी बातें थी जिन्हें सोचते हुए मैं सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ ही बढ़ता चला गया।


अब आगे....

अपने कमरे में पलंग पर मैं आंखें बंद किए लेटा हुआ था। ज़हन में कई सारी बातें चल रहीं थी जिनमें मैं उलझा हुआ था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई जिससे मैं ख़यालों से बाहर आया। नज़र दरवाज़े पर पड़ी। वो अंदर से बंद नहीं था इस लिए मैंने लेटे लेटे ही आवाज़ दी कि आ जाओ। शाम हो चुकी थी अतः मैंने अनुमान लगाया कि कुसुम मेरे लिए चाय ले कर आई होगी। तभी दरवाज़ा खुला और मेरी उम्मीद के विपरीत कजरी अंदर दाखिल हुई। उसे देखते ही मेरा दिमाग़ ख़राब होने लगा। एक वक्त था जब लड़कियों को देखते ही मेरे अंदर हवस जाग उठती थी किंतु अब ऐसा नहीं था।

कजरी ने हमेशा की तरह घाघरा चोली वाला लिबास पहन रखा था जिसमें से उसके सीने के सुडौल उभार किसी पर्वत शिखर की तरह तने हुए प्रतीत होते थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो मुस्कुराई और फिर मदमस्त तरीके से अपनी कमर लचकाते हुए मेरे पलंग की तरफ आने लगी। मेरी धड़कनें ना चाहते हुए भी असामान्य होने लगीं।

"हम आपके लिए चाय लाए हैं कुंवर जी।" मेरे पास आते ही उसने झुक कर हाथ में लिए हुए ट्रे को बढ़ाते हुए कहा____"आज की चाय हमने अपने हाथों से बनाई है और खास बात ये है कि इसमें हमने खास किस्म का दूध मिलाया है।"

आख़िरी वाक्य कहते हुए उसने अपनी आंखों को अजीब ढंग से अपने सीने की तरफ इशारा किया था। अनायास ही मेरी नज़र उसके सीने की तरफ घूम गई। झुके होने की वजह से उसकी चोली एकदम से नीचे की तरफ फैल गई थी जिसके अंदर उसकी छातियां लगभग पूरी ही नुमाया हो गईं थी। मेरा हलक ये देख कर सूख सा गया कि मुझे उसकी छातियों की घुंडियां तक स्पष्ट दिखाई दे रहीं थी।

"अगर चाय में दूध की मात्रा कम लगे तो बता दीजिए हमें।" उसने झुके हुए ही होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए मादक अंदाज़ में कहा____"हम आपके लिए खास किस्म का दूध और ज़्यादा मात्रा में मिला देंगे।"

उसकी बात सुनते ही मैं चौंका और हड़बड़ा कर उसकी छातियों से नज़रें हटा लीं। मैंने नज़र उठा कर एक बार उसकी तरफ देखा और फिर ख़ामोशी से ट्रे में रखा कप उठा लिया। मेरे कप उठाते ही वो सीधा खड़ी हो गई।

"क्या अपने गांव में भी तुम लड़कों को ऐसे ही घटिया तरीके से अपने रूप जाल में फांसती थी?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए सपाट लहजे से कहा____"वैसे कितनों के साथ तुमने अपनी ये हवस मिटाई है?"

"छ...छोटे कुंवर?" मेरी बात सुनते ही पहले तो वो बुरी तरह हड़बड़ा गई लेकिन जल्दी ही अपने तेवर बदल कर बोली____"ये किस तरीके से बात कर रहे हैं आप हमसे? आप हमारे बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं? हम आपकी शिकायत दादा ठाकुर से कर देंगे।"

"तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि किसी की गीदड़ भभकियों से ठाकुर वैभव सिंह बाल बराबर भी नहीं डरता।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"मैं कई दिनों से तुम्हारी ये घटिया हरकतें देख रहा हूं। क्या समझती हो तुम कि अपनी इन घटिया हरकतों से और अपनी ये छातियां दिखा कर तुम मुझे अपने रूप जाल में फांस लोगी? अरे! मूर्ख लड़की, तुझे पता ही नहीं है कि तेरे जैसी ना जाने कितनी ही लड़कियों को रौंद चुका हूं मैं। अभी तक मैं इस लिए चुप था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तेरी वजह से तेरे माता पिता को शर्मिंदा होना पड़े और उनका बोरिया बिस्तर उठा कर इस हवेली से बाहर फेंक दिया जाए।"

"अ...आप ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हैं हमें?" कजरी बुरी तरह भौचक्की अवस्था में बड़ी मुश्किल से बोली____"हम ऐसी वैसी नहीं हैं। आप हमसे इस लहजे में बात नहीं कर सकते।"

"तुम्हें अभी मेरे लहजे का अंदाज़ा ही नहीं है लड़की।" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मैं चाहूं तो इसी वक्त तुम्हें तुम्हारे बालों से खींचते हुए नीचे पिता जी के पास ले जाऊं और तुम्हारी करतूतों का बखान सबके सामने कर दूं।"

मेरी आवाज़ गुस्सा होने के चलते थोड़ा तेज़ हो गई थी जो कदाचित कमरे से बाहर तक पहुंच गई थी। जल्दी ही भागते हुए कुसुम आई और दरवाज़े पर ठिठक गई।

"क...क्या हुआ भैया?" फिर उसने हांफते हुए किंतु घबरा कर पूछा____"आप इतना ज़ोर से किससे बात कर रहे हैं?"

"अपनी इस सहेली को यहां से ले जा।" मैंने गुस्से से कहा____"और समझा दे इसे कि इस हवेली में रहना है तो क़ायदे से रहे वरना मुझे एक मिनट भी नहीं लगेगा इसे इस हवेली से बाहर फेंकने में।"

मेरी बात सुनते ही कुसुम आश्चर्य से मेरी तरफ देखने लगी। शायद उसे समझ नहीं आया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते मैं इतने गुस्से में कजरी के बारे में ऐसा बोल रहा हूं। वो हड़बड़ा कर जल्दी से अन्दर आई। इधर कजरी इस तरह खड़ी रह गई थी जैसे पत्थर की मूर्ति में बदल गई हो। कुसुम ने आते ही उसे झिंझोड़ा तो उसे होश आया। अगले ही पल वो कुसुम को देख कर चमत्कारिक ढंग से रोने लगी। ये देख कर कुसुम उसे हैरानी से देखने लगी। अभी वो उससे कुछ कहने ही वाली थी कि तभी दरवाज़े के अंदर भाभी दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर अजीब सख़्ती के भाव थे।

"ब...बात क्या है कजरी?" उधर कुसुम ने कजरी को रोते देखा तो उससे पूछा____"आख़िर तुम रो क्यों रही हो?"

"हमने कुछ नहीं किया है कुसुम।" कजरी ने रोते हुए कहा____"फिर भी छोटे कुंवर हमें जाने क्या क्या बोलने लगे। हमारे बारे में गंदा गंदा बोलने लगे।"

"ख़ामोश।" इससे पहले कि मैं कुछ कहता कमरे में भाभी की तेज़ आवाज़ गूंज उठी। कुसुम तो नहीं चौंकी लेकिन कजरी बुरी तरह उछल पड़ी। भाभी को यहां देख कर और उनके चेहरे पर मौजूद गुस्से को देख कर घबरा गई वह।

"मेरे देवर पर झूठा इल्ज़ाम लगाओगी तो हलक से ज़ुबान खींच लूंगी तुम्हारी।" भाभी ने उसके क़रीब आ कर तथा गुस्से से उसे खा जाने वाली नज़रों से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पीछे पीछे ही आई थी मैं और दरवाज़े के पास ही खड़ी हो गई थी। तुम यहां वैभव से खास किस्म का दूध चाय में मिलाने की बातें कर रही थी ना, वो सब सुन चुकी हूं मैं। तुम्हारा चाल चलन मुझे दूसरे दिन से ही खटकने लगा था और तभी से मैं तुम पर नज़र रखने लगी थी। मैं देखना चाहती थी कि तुम्हारी हद कहां तक है? तुम्हें शर्म नहीं आती खुले आम ऐसी घटिया हरकतें करते हुए?"

भाभी की बातें सुनते ही कजरी झपट कर भाभी के पैरों में गिर पड़ी और फिर उनके पैरों को पकड़ रोते हुए माफ़ियां मांगने लगी। वो समझ गई थी कि उसकी पोल खुल चुकी है। कुसुम तो भोली थी जिसे वो अपनी बातों से समझा देती कि उसकी कोई ग़लती नहीं है लेकिन भाभी के बारे में शायद उसने नहीं सोचा था।

कजरी बुरी तरह भाभी के पैर पकड़े रोए जा रही थी और उनसे माफ़ियां मांग रही थी। कुसुम भौचक्की सी उसका रोना धोना देखे जा रही थी। इधर मैं ये सोच रहा था कि अच्छा हुआ जो भाभी ने भी उसकी करतूतों को सुन लिया था और साथ ही मैंने ये भी सोचा कि अच्छा हुआ जो मैंने हवस में अंधा हो कर कजरी के साथ कुछ ग़लत करने का नहीं सोचा वरना भाभी को पता चल जाता और फिर मैं उन्हें कोई जवाब न दे पाता।

"चुप हो जाओ अब।" भाभी ने इस बार थोड़ा सामान्य हो कर कजरी से कहा____"इस बार तो माफ़ कर रही हूं तुम्हें लेकिन अगर तुमने दुबारा ऐसी ओछी हरकत की तो समझ लेना मैं खुद तुम्हें धक्के मार कर इस हवेली से बाहर फेंक दूंगी।"

कजरी, जान बची लाखों पाए वाली बात सोच कर जल्दी से उठी और आइंदा ऐसा न करने का वचन दे कर कमरे से भाग गई। कुसुम अभी भी चकित अवस्था में खड़ी थी।

"और तुम।" भाभी ने कुसुम को पुकारते हुए कहा____"आज के बाद उससे दूर रहना। मैं नहीं चाहती कि मेरी भोली भाली ननद पर ज़रा सा भी उस घटिया लड़की का साया पड़े।"

"ज...जी भाभी।" कुसुम ने धीमें से सिर हिलाते हुए कहा____"अब से मैं उससे बिल्कुल भी बात नहीं करूंगी। मैंने उसे कई बार मना किया था कि वो भैया के कमरे में न जाया करे लेकिन वो ही नहीं मानती थी। मुझे नहीं पता था कि उसके मन में क्या है।"

"ठीक है लेकिन अब से ख़याल रखना।" भाभी ने प्यार से उसका चेहरा सहलाया और फिर कहा____"अब तुम जाओ और हां, इस बारे में फिलहाल किसी को कुछ मत बताना।"

कुसुम सिर हिला कर कमरे से चली गई। कुसुम के जाने के बाद कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। मैं भी ख़ामोशी से चाय पीने में व्यस्त हो गया। ये अलग बात है कि मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें उछल कूद मचाए हुए थीं।

"उसको अनाप शनाप बोलने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें?" सहसा सन्नाटे को भेदते हुए भाभी ने मेरे क़रीब आ कर कहा____"उसको सभ्य तरीके से तथा साफ शब्दों में भी समझा सकते थे तुम?"

"मैं क्या करता भाभी?" मैंने जैसे अपनी सफाई पेश की____"उसकी वैसी बातें सुन कर और वैसी हरकत देख कर गुस्सा ही इस क़दर आ गया था कि फिर मुझे अपने लहजे का ख़याल ही नहीं रह गया था। मैं काफी दिनों से उसकी हरकतों को और उसकी बातों को नज़रअंदाज़ कर रहा था। यही सोचता था कि अगर मेरी वजह से उसकी करतूतों के बारे में उसके माता पिता को पता चला तो वो बेचारे कितना शर्मिंदा होंगे। इधर ये थी कि अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रही थी। मैंने भी सोच लिया था कि इसको अब अपने तरीके से ही समझाना पड़ेगा। तभी शायद इसको अकल आएगी।"

"हां देखा मैंने तुम्हारा तरीका।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"इसी लिए वो कुसुम के आते ही रोते हुए सारा दोष तुम पर ही लगाने लगी थी। वो तो अच्छा हुआ कि मैं बाहर ही छुपी खड़ी उसकी बातें सुन रही थी और फिर यहां आ कर उसे लताड़ लगा दी वरना मुझे यकीन है कि वो अभी हिम्मत हारने वाली नहीं थी।"

"अगर हिम्मत न हारती तो फिर उसका इलाज़ वही होता जो मैं उसे बता चुका था।" मैंने कहा____"फिर मैं किसी की भी परवाह नहीं करता और उसको बालों से घसीट कर हवेली से बाहर फेंक देता।"

"ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं होता वैभव।" भाभी ने कहा____"क्योंकि इससे बात बढ़ जाती और यकीनन हवेली से बाहर भी पहुंच जाती। लोगों को जब पता चलता तो वो यही सोचते कि इस सब में लड़की की नहीं बल्कि तुम्हारी ही ग़लती रही होगी। आख़िर तुम्हारे चरित्र के बारे में तो सारी दुनिया को पता ही है।"

भाभी की ये बात सुन कर मैं फ़ौरन कुछ कह न सका। उन्होंने बिल्कुल सच कहा था। वाकई में लोग मुझे ही ग़लत कहते और एक बार फिर से मेरे कारण मेरे पिता जी को सबके सामने शर्मिंदा होना पड़ता।

"ख़ैर छोड़ो अब इस बात को। मेरा ख़याल है अब वो दुबारा ऐसा कुछ करने का सोचेगी भी नहीं।" भाभी ने कहा____"अच्छा ये तो बताओ अपनी अनुराधा से मिले कि नहीं?"

भाभी के मुख से अनुराधा का नाम सुनते ही मेरे दिल में एकदम से मीठी मीठी गुदगुदी होने लगी। कजरी के आने से और उसकी हरकतों से जो कड़वाहट तथा गुस्सा मेरे अंदर पैदा हुआ था वो पलक झपकते ही दूर हो गया। मैंने देखा, भाभी मुस्कुराते हुए मुझे ही देखे जा रहीं थी। आंखों में जवाब सुनने की उत्सुकता थी उनके। उन्हें मुस्कुराता देख मेरे होठों पर भी मुस्कान उभर आई।

"हम्म्म्म समझ गई।" भाभी ने कहा____"यानि अपनी अनुराधा से मिल चुके हो तुम।"

"अरे! लेकिन आप ये कैसे कह सकती हैं?" मैं उनकी बात सुनते ही चकित हो कर बोल पड़ा।

"तुम्हारे होठों पर उभर आई मुस्कान ने मुझे बता दिया है कि तुम मिल चुके हो उससे।" भाभी ने कहा____"मैं तुम्हारा चेहरा देख कर बता सकती हूं कि तुम कब झूठ बोलते हो और कब सच। इस लिए इस बारे में झूठ बोलने का कोई फ़ायदा नहीं है। तो बताओ, कैसी रही मुलाक़ात?"

भाभी मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगीं। मैं हैरान था कि आख़िर क्या चीज़ हैं ये? ख़ैर अब झूठ बोलने का सच में ही कोई फ़ायदा नहीं था इस लिए मैंने उन्हें सब कुछ सच सच बता दिया।

"तुम तो बड़े शैतान निकले।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"उस मासूम से इस तरीके से अपना स्वागत करवाना चाहते थे तुम?"

भाभी की इस बात से मैं बुरी तरह झेंप गया और साथ ही शर्म से सिर झुका लिया मैंने। भाभी मेरी हालत पर मंद मंद मुस्कुराने लगीं।

"सरोज काकी के आ जाने से काम ख़राब हो गया भाभी।" फिर मैंने कहा____"जी तो यही चाहता था कि उसके पास ही रहूं और पहरों उससे प्रेम की बातें करता रहूं मगर....।"

"कोई बात नहीं।" भाभी ने कहा____"फिर किसी दिन उससे मिलने चले जाना। वैसे भी ये छोटी छोटी मुलाक़ातें ही इंसान के अंदर प्रेम के गहरे एहसास पैदा करती हैं और अपने चाहने वाले से मिलने के लिए बेक़रार करती हैं।"

"वाह! भाभी आपको तो प्रेम के बारे में बहुत कुछ पता है।" मैंने एकदम से मुस्कुरा कर कहा____"क्या आपने भी कभी किसी से प्रेम किया है?"

"सबका नसीब एक जैसा कहां होता है वैभव?" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"शादी से पहले किसी से प्रेम होने का सवाल ही नहीं था क्योंकि पाबंदियां बहुत थीं। शादी के बाद यहां आई तो तुम्हारे भैया को ही देखा। धीरे धीरे उन्हीं से प्रेम होने लगा।"

भैया का ज़िक्र आते ही मेरे अंदर हूक सी उठी। मैं एकदम से संजीदा हो गया। आंखों के सामने बड़े भैया का चेहरा चमक उठा। उनके साथ गुज़रे हुए लम्हें बिजली की तरह चमकने लगे। अचानक ही मेरी आंखें भर आईं। मैंने जल्दी से अपने दिलो दिमाग़ को झटका दिया और भाभी की तरफ देखा। उनकी भी आंखों में आंसू तैर रहे थे। मुझे लगा मैंने बेकार में ही प्रेम का ज़िक्र कर दिया।

कुछ देर और भाभी मेरे पास रुकीं फिर चाय का खाली कप ले कर कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैं फिर से जाने कैसे कैसे ख़यालों में गुम होता चला गया।

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अगली सुबह पिता जी के साथ मैं फिर से चंद्रकांत के यहां गया। वहां महेंद्र सिंह भी अपने छोटे भाई के साथ आए हुए थे। चंद्रकांत से पूछताछ में पता चला कि पिछली रात भी सफ़ेदपोश उससे मिलने नहीं आया और वो उसके इंतज़ार में सारी रात बाहर ही बैठा रहा था। पहले दिन की तरह ही हम किसी नतीजे पर न पहुंच सके थे।

ऐसे ही दो चार दिन और गुज़र गए लेकिन सफ़ेदपोश नहीं आया। अब लगभग सबको समझ आ गया था कि सफ़ेदपोश के न आने की वजह क्या थी। स्पष्ट था कि उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सरासर झूठ था और उसने अपने किसी ख़ास मकसद के चलते ही चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा डाला था।

बड़े गंभीर हालात बन गए थे। चंद्रकांत की हालत अब ऐसी हो गई थी जैसे वो ज़िंदा लाश में तब्दील हो गया हो। वो अब किसी से कोई बात नहीं करता था। बस गुमसुम सा बैठा रहता था और लगभग यही हाल उसकी बीवी का भी था। उसकी बेटी कोमल भी दुखी थी लेकिन अपने माता पिता की तरह पत्थर की मूरत नहीं बन गई थी वो। किसी तरह खुद को सम्हाले हुए थी वो।

ठाकुर महेंद्र सिंह ने फ़ैसले के रूप में चंद्रकांत को यही सज़ा सुनाई कि वो अपनी ही बहू की हत्या करने का बोझ लिए जीवन भर जिए। तब तक वो इस बात का पता लगाएंगे कि रघुवीर की हत्या वास्तव में किसने की और सफ़ेदपोश ने उसके साथ ऐसा क्यों किया?

कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच हमने गुप्त रूप से ऐसे आदमियों को लगा दिया था जो सफ़ेदपोश को देखते ही पकड़ लें। कहने का मतलब ये कि हमारी तरफ से सफ़ेदपोश को पकड़ने की कोई कसर बाकी नहीं थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि उस दिन के बाद से अभी तक सफ़ेदपोश किसी को भी नज़र नहीं आया था। इधर मैं और पिता जी उसके बारे में हर तरीके से सोच विचार कर रहे थे। अपने कुछ ख़ास आदमियों को हमने आस पास के कई गावों में भेज दिया था। मकसद यही था कि वो लोग ये पता कर सकें कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे प्रति क्या वैसी मानसिकता रखता है जिसकी हमें आशंका थी और जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है? अभी तक हमारे आदमियों को ऐसा कोई संदिग्ध व्यक्ति नज़र नहीं आया था।

इस वक्त बैठक में कई लोग बैठे हुए थे। जिनमें पिता जी के साथ साथ मैं, भुवन, किशोरी लाल और हमारे कुछ ऐसे ख़ास आदमी जो पिछले कुछ समय से हर जगह मौजूद थे और अब वो हर तरफ की ख़बर देने पिता जी के पास आए थे। उनमें शेरा भी था।

"बड़े आश्चर्य की बात है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी और इतना कुछ करने के बाद भी हमारे हाथ कुछ नहीं लगा।" पिता जी ने निराशा पूर्ण भाव से कहा____"इसका मतलब तो यही हुआ कि हम घूम फिर कर पुनः वहीं पहुंच गए जहां आज से एक हफ़्ता पहले थे। यानि ना तो सफ़ेदपोश के बारे में कुछ पता चल सका और ना ही ये समझ आया कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे जैसी शख्सियत पाने के लिए बुरी मानसिकता के साथ हमारे खिलाफ़ ऐसा खेल खेल रहा है।"

"शातिर से शातिर व्यक्ति भी कभी न कभी कोई न कोई ऐसी भूल अथवा ग़लती ज़रूर करता है जिसके चलते इंसान उसके मंसूबों को ताड़ जाता है।" किशोरी लाल ने कहा____"इतना ही नहीं उस तक पहुंच भी जाता है लेकिन हैरत की बात है कि इन दस दिनों में हमारे किसी भी आदमी को ऐसा कोई व्यक्ति खोजने पर भी नहीं मिला। बल्कि ये कहें तो ग़लत न होगा कि ऐसे किसी व्यक्ति पर संदेह तक नहीं हुआ किसी को। इसका तो यही मतलब हो सकता है ठाकुर साहब कि या तो ऐसा करने वाला वो व्यक्ति हमारी सोच से भी कहीं ज़्यादा चतुर और चालाक है या फिर ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं जिसके बारे में हम इस तरह की आशंका किए हुए हैं।"

"हां, अब तो यही कहा जा सकता है किशोरी लाल जी।" पिता जी ने कहा____"वरना हमारे आदमियों को इतने दिनों में किसी न किसी व्यक्ति पर संदेह तो ज़रूर हुआ होता।"

"तो क्या अब हम पूरी तरह ये मान लें कि हमारी आशंका बेवजह थी?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"अगर ऐसा है तो फिर वो कौन है जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है और हमारे लिए ख़तरा बना हुआ है? चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा कर उसने अपना कौन सा मकसद पूरा किया? ऐसे कई सवाल हैं पिता जी जिनका जवाब मिलना बेहद ज़रूरी है।"

"ज़रूरी तो है।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन सारे सवालों के जवाब तो वो सफ़ेदपोश ही दे सकता है और जब तक वो हमारी पकड़ में नहीं आता तब तक उससे किसी सवाल का जवाब मिलने से रहा।"

"सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि वो इन दस दिनों में कहीं नज़र ही नहीं आया है।" मैंने मुट्ठियां भींच कर कहा____"मैंने तो इस बार उसको पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा के रखा हुआ है। अगर वो हमारे बाग़ की तरफ आता तो इस बार वो ग़ायब नहीं हो सकता था लेकिन कमबख़्त आया ही नहीं वो।"

"अगर वो कोई बड़ा खेल खेलने का इरादा बनाए हुए है।" पिता जी ने कहा____"तो वो दुबारा ज़रूर नज़र आएगा। उसके नज़र ना आने के पीछे एक कारण ये हो सकता है कि उसे भी अपने लिए ख़तरे का एहसास हो गया होगा। वो भी समझ गया होगा कि हमने उसे पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा रखा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो खुद को सुरक्षित रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात समझेगा। हमें लगता है कि वो हमारे आस पास ही मौजूद रहता है और हमारी हर गतिविधि पर नज़र रखता है। अब क्योंकि हम उसे शकल से पहचानते नहीं हैं इस लिए वो हमारी पहुंच से दूर ही है।"

"माना कि वो ख़तरा महसूस करने के चलते फिलहाल अपनी गतिविधियों को रोके हुए है।" किशोरी लाल ने कहा____"लेकिन कब तक? किसी दिन तो वो फिर से अपने काम को शुरू करेगा। ख़तरे से भयभीत हो कर वो अपने मकसद को तो नहीं छोड़ देगा?"

"सही कह रहे हैं आप?" पिता जी ने कहा____"यकीनन वो फिर से कुछ न कुछ करेगा। इस लिए हमें अपनी तरफ से पूरी तरह सतर्क रहना है और साथ ही ये ज़ाहिर करना है कि हम उसकी तरफ से पूरी तरह लापरवाह हैं। हमारा ख़याल है कि ऐसा देख कर ही वो कुछ करने के लिए अपने बिल से बाहर निकलेगा।"

"वो अपना हर काम रात के अंधेरे में ही करता है। क्योंकि अंधेरे में उसे किसी के द्वारा पकड़े जाने का ख़तरा नहीं रहता।" मैंने कहा____"इस लिए हमें अपने आदमियों को रात के समय ऐसी ऐसी जगहों पर स्थापित कर देना है जहां पर उसके आने और जाने की पूरी संभावना हो। मुझे पूरा यकीन है कि वो अब जब भी आएगा तो हमारे आदमियों के द्वारा ज़रूर पकड़ा जाएगा।"

"हम तो चाहते ही यही हैं कि वो जल्द से जल्द पकड़ा जाए।" पिता जी ने कहा____"ताकि उससे पता चल सके कि उसने ये सब क्यों किया है? ख़ैर, इसके अलावा और कोई ख़बर?"

"इसके अलावा एक अच्छी ख़बर ये है कि हमारे कुछ आदमियों ने इस गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांवों में भी जा कर ये पता किया है कि लोग हमारे बारे में कैसी सोच और राय रखते हैं।" मैंने पास ही खड़े हमारे कुछ आदमियों की तरफ देखने के बाद कहा____"इन लोगों के अनुसार लगभग हर जगह के लोग यही चाहते हैं कि आप ही उनके मुखिया और प्रजा पालक बनें।"

"ऐसा क्यों?" पिता जी ने उल्टा सवाल करते हुए पूछा____"क्या वो लोग अपने वर्तमान के मुखिया से खुश नहीं हैं?"

"लगता तो ऐसा ही है।" मैंने कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वो अपने ही गांव के इतने संपन्न व्यक्ति के बारे में ऐसे ख़याल नहीं रखते। मेरा मतलब है कि वो यही चाहते कि महेंद्र सिंह जी ही उनके मुखिया रहें। आख़िर युगों के बाद उनके गांव का कोई संपन्न व्यक्ति मुखिया के पद को पाया है।"

"तुम्हारे कहने का मतलब ये है कि वो लोग महेंद्र सिंह के आचार व्यवहार से खुश नहीं हैं?" पिता जी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और इस वजह से वो हमें ही मुखिया के रूप में देखना चाहते हैं?"

"यकीनन।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि आपके मित्र महेंद्र सिंह जी बाहर से जो नज़र आते हैं वो अंदर से वैसे नहीं हैं। वैसे वो आपके गहरे मित्र हैं तो आपको भी उनके बारे में अच्छे से पता होगा।"

"हां पता तो है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हम ये भी मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक अलग सोच और विचारधारा होती है जिसके तहत वो अपने कर्म करता है और साथ ही लोगों से पेश आता है। महेंद्र सिंह के पुरखे जमींदारी करते थे किंतु गुज़रते वक्त के साथ हालात बदल गए और अब जमींदारी जैसी बात नहीं रही। हां, वो पहले से ही संपन्न थे जिसके चलते अभी भी वो अपना ठाठ बाट बनाए हुए हैं।"

"और शायद अपना रौब भी।" मैंने कहा____"वो भी ऐसा जो बाकी आम लोगों पर उनके मर्ज़ी के हिसाब से ज़बरदस्ती थोपा जाता होगा, है ना?"

"हां, लेकिन ऐसा तो लगभग हर उस इंसान के साथ होता है जो बाकियों से कहीं ज़्यादा साधन संपन्न होते हैं।" पिता जी ने कहा____"हमारे अपने पिता जी का रौब तो उनसे लाखों गुना ज़्यादा था तो उनके बारे में क्या कहोगे? हालाकि किसी के कहने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि उनके बारे में सारी बातें लगभग जग ज़ाहिर ही थीं। तो कहने का मतलब ये है कि अपनी क्षमता के अनुसार ऐसा हर व्यक्ति इतना रौब रखता है। ये कोई बड़ी बात नहीं है।"

"बड़ी बात भले ही नहीं है।" मैंने तर्क़ दिया____"लेकिन ऐसी तो है ही कि उनके इस रौब अथवा आचरण की वजह से उनके ही गांव के लोग उन्हें मुखिया के रूप में देखना नहीं चाहते। अगर इस नज़रिए से सोचा जाए तो उनका किरदार लोगों की नज़र में निम्न दर्जे का हो जाता है।"

मेरी इस बात से पिता जी कुछ न बोले। चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे उनके। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद उन्होंने कहा____"ख़ैर इस मामले को फिलहाल बाद में देखा जाएगा, अभी सिर्फ ये ज़रूरी है कि वो सफ़ेदपोश हमारी पकड़ में आ जाए। उसका पकड़े जाना बेहद ज़रूरी है। जब तक वो यूं खुले आम घूम रहा है तब तक किसी न किसी अनिष्ट के होने की आशंका बनी ही रहेगी।"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद पिता जी के कहने पर हम सब बैठक से बाहर निकल गए। हालाकि किशोरी लाल उनके पास ही बैठे रहे। इधर मैं अपनी मोटर साइकिल ले कर भुवन के साथ खेतों की तरफ निकल गया।

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अध्याय - 110

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"अरे! रूप भैया आप??" रूपचंद्र को अपने कमरे में आया देख रूपा पहले तो चौंकी फिर एकदम से मुस्कुराते हुए बोली____"आइए।"

"इस वक्त मेरे यहां आने से तुझे कोई परेशानी तो नहीं हुई ना?" रूपा जो अपना बिस्तर लगा रही थी उसे देखते हुए रूपचंद्र ने पूछा।

"बिल्कुल नहीं भैया।" बिस्तर की चादर को अच्छे से बिछाने के बाद रूपा ने सीधा खड़े होते हुए कहा____"बल्कि मुझे तो खुशी हुई कि मेरे सबसे अच्छे वाले भैया इस वक्त मेरे कमरे में आए हैं। ज़रूर अपनी इस बहन का हाल चाल ही पूछने आए हैं न आप?"

"हां सही कहा तूने।" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर पलंग के किनारे पर बैठ गया। उसने रूपा को भी अपने पास ही बैठ जाने का इशारा किया और फिर जब वो बैठ गई तो बोला____"तेरा हाल चाल पूछने तो आया ही था लेकिन साथ ही तुझे कुछ बताने भी आया था।"

रूपचंद्र की बात सुन कर रूपा के चेहरे पर ये सोच कर शर्म की हल्की लाली उभर आई कि शायद उसके भाई ने वैभव से उसकी मुलाक़ात करवाने का रास्ता बना दिया है और अब वो यही बताने उसके पास आया है। रूपा के चेहरे पर उभर आई इस हल्की शर्म को देख रूपचंद्र उसका मंतव्य समझ कर मन ही मन मुस्कुरा उठा।

"जो सोच कर तू अचानक ही इस तरह शर्माने लगी है ना उसमें अभी थोड़ा समय लगेगा मेरी बहना।" रूपचंद्र ने उसके सिर पर हल्के मगर प्यारी सी चपत लगाते हुए कहा____"लेकिन तू फ़िक्र मत कर। वैभव से जल्दी ही तेरी मुलाक़ात करवाऊंगा। मैं भी नहीं चाहता कि मेरी पागल बहन को किसी का ज़्यादा इंतज़ार करना पड़े।"

रूपचंद्र की बात सुन कर रूपा को थोड़ा धक्का तो लगा लेकिन वो बोली कुछ नहीं। हां चेहरे पर छाई शर्म की लाली अभी भी बरक़रार थी। उसके चेहरे के भावों को रूपचंद्र कुछ देर तक देखता रहा, फिर सहसा उसके चेहरे पर थोड़ी गंभीरता उभर आई।

"अब तक तो शायद तुझे भी पता चल ही गया होगा कि वैभव किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता है।" फिर उसने उसी गंभीरता से रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"और इस बात का पता उसके पिता यानि दादा ठाकुर को भी चल चुका है। असल में गौरी काका और मैं इसी सिलसिले में बात करने के लिए एक दिन उनके पास गए थे।"

रूपचंद्र इतना कहने के बाद थोड़ा रुका। उसने रूपा के चेहरे की तरफ ये सोच कर गौर से देखा कि इस बारे में जान कर रूपा के चेहरे पर किस तरह के भावों का आगमन होता है किंतु उसे ये जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि रूपा के चेहरे पर इस बात को सुन कर कोई विशेष भाव नहीं उभरे थे।

"असल में हमें जब इस बारे में पता चला था तो हम ये सोच कर चिंतित हो उठे थे कि अगर वैभव किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता है तो जब उसके साथ तेरा ब्याह हो जाएगा तो क्या वो तुझे सच्चे दिल से अपनी पत्नी मान कर प्यार और सम्मान देगा?" रूपचंद्र ने कहा____"कुछ भी हो लेकिन हम में से कोई भी भला ये कैसे चाह सकता है कि हमारी बेटी अथवा बहन ब्याह के बाद अपने पति के घर में खुश न रहे? यही सोच कर मैं और गौरी शंकर काका दादा ठाकुर से बात करने हवेली गए थे। वहां पर जब हमने दादा ठाकुर को ये सब बताया और अपनी चिंता ज़ाहिर की तो उन्होंने हमें यकीन दिलाया कि हमें इस बारे में किसी भी तरह की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

रूपा चुपचाप अपने भाई की बातें सुन रही थी। शर्म और झिझक की वजह से उसने रूपचंद्र की इन बातों पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उधर रूपचंद्र कुछ पलों तक रूपा को देखता रहा फिर एक गहरी सांस ली।

"गौरी शंकर काका ने उनसे ये भी कहा कि जब वैभव उस लड़की से प्रेम करता है तो ज़ाहिर है कि वो उस लड़की से ब्याह भी करना चाहेगा।" रूपचंद्र ने पुनः कहना शुरू किया____"और अगर उसने ऐसा किया, मेरा मतलब है कि अगर उसने उस लड़की से ब्याह कर लिया तो क्या वो उसके रहते तुझे भी उसके जैसा ही प्यार और मान सम्मान देगा? काका की इन बातों पर दादा ठाकुर ने हमें भरोसा दिया कि वो इस बारे में वैभव से बात करेंगे।"

रूपा अब भी चुप ही रही। उधर रूपचंद्र ने फिर से कहा____"काका ने दादा ठाकुर से ये तक कहा कि अगर वो वैभव को उस लड़की से अलग करने की कोशिश करेंगे तो बहुत हद तक ये संभव है कि वैभव इससे नाराज़ हो जाए अथवा भड़क कर बगावत ही कर बैठे। आख़िर ये तो उन्हें भी पता है कि वैभव का चरित्र कैसा रहा है? उसने पहले भी कभी अपने पिता की अथवा किसी की भी परवाह नहीं की थी तो ऐसे में यकीनन ऐसा हो सकता है। ख़ैर अभी तो फिलहाल इतनी ही बातें हुई हैं उनसे और उन्होंने इस बारे में वैभव से बात करने को कहा है। अब देखते हैं कि जब वो इस बारे में वैभव से बात करेंगे तो वो क्या जवाब देता है अथवा क्या रुख अपनाता है?"

"आप मुझसे बड़े हैं भैया और बाकी सब भी मुझसे बड़े ही हैं।" रूपा ने सहसा अपनी चुप्पी तोड़ते हुए धीमें स्वर में कहा____"मैं अच्छी तरह इस बात को समझती हूं कि आप सब मेरी खुशियां ही चाहते हैं। इसी लिए आप और गौरी शंकर काका उनके पास गए थे किंतु इस मामले में आपको या किसी को भी इतनी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

"चिंता क्यों न करें रूपा?" रूपचंद्र ने अधीरता से कहा____"तू मेरी बहन है, इस घर की बेटी है। मैं ही नहीं बल्कि सबको तेरे हितों की और तेरी खुशियों की फ़िक्र है और हमेशा रहेगी भी।"

"हां ये मैं समझती हूं भैया।" रूपा ने झिझकते हुए कहा____"लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि ये भी है कि मैं क्या सोचती हूं और क्या चाहती हूं।"

"क्या कहना चाहती है तू?" रूपचंद्र के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।

"आप सब मेरा हित और खुशी चाहते हैं ये अच्छी बात है भैया।" रूपा ने कहा____"लेकिन आप सब ये भी समझने की कोशिश कीजिए कि क्या आप ज़ोर ज़बरदस्ती कर के किसी के द्वारा मुझे खुशियां दिला सकते हैं और क्या ये उचित होगा?"

"मैं अब भी नहीं समझा तेरी बात?" रूपचंद्र उलझ सा गया।

"आप लोगों को इस बारे में इतना चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है भैया।" रूपा ने जैसे स्पष्ट रूप से कहा____"ये संबंध कोई मामूली संबंध नहीं हैं बल्कि प्रेम के संबंध हैं और प्रेम के संबंध तो प्रेम जैसे ही होते हैं ना? जैसे मैं उनसे प्रेम करती हूं और चाहती हूं कि वही मेरे जीवन साथी बनें उसी तरह वो भी तो उस लड़की से प्रेम करते हैं। ज़ाहिर है मेरी तरह वो भी तो यही चाहेंगे कि जिससे वो प्रेम करते हैं वही उनकी जीवन संगिनी बने। अब आप ही बताइए कि इसमें ग़लत क्या है अथवा वो कहां ग़लत हैं? अगर मैं उनकी जीवन संगिनी न बनने से दुख दर्द में डूब जाऊंगी तो वो भी तो उस लड़की से ब्याह न कर पाने की सूरत में दुखी हो जाएंगे।"

रूपचंद्र देखता रह गया रूपा को। उस रूपा को जो सिर झुकाए उसके सामने ही पलंग पर बैठी थी। उसकी बातों ने रूपचंद्र को अवाक सा कर दिया था।

"मुझे तो बहुत पहले ही पता चल गया था भैया कि वो किसी और प्रेम करते हैं।" रूपा ने लरजते स्वर में कहा____"तकलीफ़ तो बहुत हुई थी लेकिन ये सोच कर खुद को समझा लिया था कि प्रेम ऐसी चीज़ नहीं है जो किसी के करने से या किसी के चाहने से हो जाए। मैंने भी तो उनसे प्रेम नहीं किया था बल्कि वो तो अपने आप ही हो गया था। शायद उन्हें भी उस लड़की से ऐसे ही प्रेम हो गया है। प्रेम ऐसा ही तो होता है भैया। थोड़ी सी खुशियां दे कर बाद में दर्द देना शुरू कर देता है और उसका दर्द भी ऐसा होता है जो भले ही असहनीय होता है लेकिन उसी दर्द में जीने की चाहत होती है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है भैया। मैं इस प्रेम के मर्म को अच्छी तरह समझ गई हूं। मेरे लिए तो यही बहुत बड़ी बात है कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी उन्होंने मुझे ठुकराया नहीं बल्कि मुझसे ब्याह करने को राज़ी हो गए। अब अगर वो उस लड़की से भी ब्याह करना चाहते हैं तो मेरा भी ये फर्ज़ बनता है कि उनकी खुशी के लिए सौतन के रूप में उस लड़की को खुशी से क़बूल कर लूं।"

दंग रह गया रूपचंद्र। आश्चर्य से फट पड़ी आंखों से अपनी बहन को देखता रह गया वो। दिलो दिमाग़ में एकदम से ज्वारभाटा सा उठा जिसके चलते उसका समूचा वजूद हिल कर रह गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी बहन का हृदय कितना विशाल है। बिजली की तरह उसके मस्तिष्क में ख़याल उभरा कि क्या सच में प्रेम ऐसा होता है कि इंसान अपनी खुशियों को परे हटा कर अपने महबूब की खुशियों के बारे में सोचता है? अगर ऐसा है तो गज़ब ही होता है ये प्रेम। उसने देखा रूपा अभी भी सिर झुकाए बैठी हुई थी। ज़ाहिर है अपने बड़े भाई से इस संबंध में बातें करने के बाद वो उससे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। ये एक क़ायदा भी था और उसकी शर्म भी। रूपचंद्र को अपनी बहन पर बेहद प्यार आया और उसे गर्व भी महसूस हुआ। उसने हाथ बढ़ा कर हौले से उसके सिर पर बड़े स्नेह से हाथ फेरा।

"तू सच में महान है रूपा।" फिर उसने कहा____"उमर में तुझसे बड़ा होने के बाद भी मुझे इस प्रेम संबंध का कोई ज्ञान नहीं था। तेरी बातें सुनने के बाद मुझे ये भी महसूस हो रहा है कि सिर्फ ज्ञान होना ही काफी नहीं होता है बल्कि ज्ञान के साथ साथ इंसान का हृदय भी सच्चा और विशाल होना चाहिए। तभी तो इंसान तेरी तरह सब कुछ क़बूल कर सकता है। मुझे तुझ पर नाज़ है मेरी बहन।"

रूपचंद्र ने ये कहा तो रूपा ने झट से सिर उठा कर उसकी तरफ देखा। चेहरे पर दर्द के निशां और आंखों में तैरते आंसू नज़र आए। रूपचंद्र उसे इस हालत में देख कर बेहद भावुक हो उठा। उसने झपट कर रूपा को अपने हृदय से लगा लिया। उसका ऐसा करना था कि रूपा खुद भी अपने भाई से लिपट कर सिसक उठी। रूपचंद्र उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता रहा।

"दुनिया जान चुकी है कि हम सब कितने बुरे लोग थे।" फिर उसने जाने क्या सोच कर अधीरता से कहा____"और अब तो हम सब भी ये मान चुके हैं कि वाकई में हम बहुत बुरे हैं। इस बात के चलते किसी के सामने सिर उठा कर चलने की हिम्मत ही नहीं रह गई थी। अपने कुकर्मों के एहसास से दुखी हो उठे थे हम लेकिन आज तेरी बातें सुन कर जाने क्यों एक सुखद एहसास होने लगा है। ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम इतने भी बुरे नहीं हैं जितना कि अब हम खुद भी समझने लगे थे। जिसके घर में इतना विशाल हृदय रखने वाली बहन और बेटी हो वो लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं भला? मेरी बहन, मेरी प्यारी बहन....आज तेरी वजह से पहली बार एक सच्चा और सुखद एहसास हो रहा है मुझे। मुझे यकीन है कि तेरी वजह से हम सबके माथे पर लगे कलंक धुल जाएंगे।"

रूपा कुछ न बोली, बस सिसकती रही। रूपचंद्र ने उसे खुद से अलग किया और फिर बड़े ही स्नेह से उसके आंसू पोंछते हुए बोला____"ऐसे मत रो पागल। तेरा ये भाई तेरी आंखों में आंसू नहीं देख सकता।"

रूपा ने झट से अपनी आंखों की बाक़ी नमी को पोछा और फिर जबरन मुस्कुराने का प्रयास करने लगी। बड़ी बड़ी आंखें उसके चेहरे की ही तरह हल्का सुर्ख पड़ गईं थी।

"एक बात कहूं?" रूपचंद्र ने उसकी आंखों में झांकते हुए किंतु उसे बहलाते हुए कहा____"वो साला वैभव वाकई में बहुत खुशनसीब है लेकिन तब और भी ज़्यादा नसीब वाला बन जाएगा जब मेरी ये बहन शादी के बाद उसकी पत्नी बन कर उसकी हवेली में पहुंच जाएगी।"

रूपचंद्र की ये बात सुन कर रूपा एकदम से लजा गई और झट से उसने सिर झुका लिया। रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर ये कहते हुए पलंग से उठ खड़ा हुआ कि वो जल्द ही वैभव से उसकी मुलाक़ात करवाएगा।

रूपचंद्र के जाने के बाद रूपा ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर वापस पलंग पर आ कर लेट गई। आंखें बंद कर के एक तरफ जहां वो अपने भाई से हुई बातों के बारे में सोचने लगी थी वहीं दूसरी तरफ बार बार बंद पलकों में वैभव का मनमोहक चेहरा उभर आता। रूपा कभी हौले से मुस्कुरा उठती तो कभी उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी के भाव उभर आते। जाने कितनी ही देर तक वो यूं ही ख़यालों में खोई रही और फिर जाने कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया। शबे ख़ामोशी सहर रूपी अपनी मंज़िल की तरफ रफ़्ता रफ़्ता बढ़ती रही।

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दो तीन दिन यूं ही गुज़र गए किंतु ना तो सफ़ेदपोश का कहीं पता लग सका और ना ही ये पता चल सका कि रघुवीर के बेटे की हत्या किसने की थी? चंद्रकांत यूं तो अब बेहद गुमसुम रहने लगा था लेकिन शाम होते ही वो सफ़ेदपोश के आने की प्रतिक्षा करने लगता था। वो सारी रात घर के बाहर चबूतरेनुमा बनी पट्टी पर बैठा रहता था। उसके बाकी रिश्तेदार तो चले गए थे लेकिन उसकी अपनी ससुराल के दो लोग रुके हुए थे जिनमें से एक उसका साला गिरधारी था और उसकी सलहज यानि गिरधारी की पत्नी पुष्पा थी।

चंद्रकांत की बीवी प्रभा का हाल भी कुछ ठीक नहीं था। पहले बेटे रघुवीर की हत्या और अब बहू की हत्या अपने ही पति के द्वारा हो जाने से वो अंदर से बुरी तरह टूट गई थी। वो रात दिन बस यही कहते हुए रोती थी कि उसके पाप कर्मों ने उसके बेटे को उससे छीन लिया। उसे अपनी बहू के मरने का इतना दुख नहीं था क्योंकि वो जानती थी कि उसकी बहू भी उसी के जैसी चरित्रहीन थी लेकिन उसका बेटा तो ऐसा नहीं था। उसकी बेटी कोमल ही सारे घर का काम धाम सम्हाले हुए थी। दुखी तो वो भी थी लेकिन इतना तो वो भी समझती थी कि अगर वो भी अपने मां बापू की तरह दुखी हो कर हर चीज़ को त्याग देगी तो कैसे चलेगा काम?

पूरे रुद्रपुर में इस हादसे के चलते अजीब सा सन्नाटा छाया रहता था। लोगों की ज़ुबान में इसी की चर्चा थी। लोग अपनी अपनी सोच के अनुसार इस बारे में तरह तरह की बातें करते थे।

इधर हवेली में भी थोड़ा तनाव जैसा माहौल था। तनाव का असल कारण यही था कि इतनी कोशिशों के बाद भी सफ़ेदपोश हाथ में नहीं आ रहा था। आज क़रीब दस दिन हो गए थे लेकिन उस रात के बाद से वो सफ़ेदपोश कहीं किसी को नज़र नहीं आया था। सफ़ेदपोश का पकड़े जाना बेहद ज़रूरी था क्योंकि उसके पकड़े जाने से कई सारे सवालों के जवाब तो मिलने ही थे लेकिन साथ ही उसका ख़ौफ भी दूर हो जाना था।

अगले दिन चंद्रकांत की बहू रजनी की तेरहवीं थी। अतः इंसानियत और सहानुभूति के नाते पिता जी भी उसके घर तेरहवीं में शामिल होने गए। चंद्रकांत के रिश्तेदारों ने ही सारा कार्यभार सम्हाला हुआ था क्योंकि चंद्रकांत और उसकी बीवी प्रभा तो इस हालत में ही नहीं थे कि वो ये सब कर पाएं। दूसरे गांव से महेंद्र सिंह भी आए हुए थे। हमारे गांव वाले तो थे ही वहां। बहरहाल, तेरहवीं का कार्यक्रम शाम होने से पहले पहले निपट गया।

इधर मेरा सारा ध्यान अपने उस काम की तरफ था जो मौजूदा समय में हमारे लिए बेहद ज़रूरी था। यानि सफ़ेदपोश की तलाश और उसे पकड़ना। ये अलग बात है कि वो अब भी हमारी पहुंच से दूर था। समझ में नहीं आ रहा था कि सफेद रंग के लिबास से खुद को पूरी तरह छुपा के रखने वाला वो व्यक्ति आख़िर कौन हो सकता है? सच तो ये था कि उसे पकड़ ना पाने के चलते अब खीझ सी होने लगी थी। दिलो दिमाग़ में गुस्सा भरने लगा था।

हमारे नए मुंशी की बेटी कजरी उस दिन के बाद से क़ायदे में रहने लगी थी। उस दिन जो कुछ हुआ था उसका ज़िक्र किसी ने भी उसके माता पिता से नहीं किया था और ज़ाहिर है कजरी ने भी उन्हें नहीं बताया था। अब ना तो वो मेरे कमरे में आती थी और ना ही मुझसे नज़रें चार होने पर कोई प्रतिक्रिया देती थी। मैंने महसूस किया था कि कुसुम भी अब उससे दूर ही रहने की कोशिश करती थी।

"मुझे मत ले जाओ वैभव।" रागिनी भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करने के बाद मुझसे परेशान लहजे में बोलीं____"बाहर बैठक में पिता जी होंगे और मुझे तुम्हारे साथ यूं बाहर जाते देखेंगे तो पक्का गुस्सा करेंगे।"

"आप बेकार में ही इतना चिंतित हो रही हैं भाभी।" मैंने मजबूत लहजे से कहा____"यकीन कीजिए वो बिल्कुल भी गुस्सा नहीं करेंगे। मां ने उन्हें भी समझाया होगा कि आप अगर मेरे साथ कुछ समय खेतों की तरफ घूम लिया करेंगी तो इससे आपका मन बहल जाया करेगा।"

"बहुत ज़िद्दी हो तुम।" भाभी ने सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हुए कहा____"अभी कुछ समय पहले ही तो तुम्हारे साथ बाहर गई थी मैं।"

"हां तो क्या हो गया?" मैंने लापरवाही से कहा____"आज फिर चलिए और आप इतना डर क्यों रही हैं? अरे! इस हवेली की बहू हैं आप। हमारी शान हैं आप और उससे भी बढ़ कर ठाकुर वैभव सिंह की भाभी हैं आप। मेरे रहते आपको किसी बात की फ़िक्र करने की ज़रूरत ही नहीं है। किसी की मजाल नहीं है जो मेरे सामने आपकी तरफ नज़र उठा कर देखने की भी हिम्मत कर सके। सालों की आंखें निकाल कर उनके हाथ में पकड़ा दूंगा।"

"बस बस, ज़्यादा डींगें मारने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।" भाभी ने एकदम से पलट कर मेरी तरफ घूर कर कहा____"और हां, क्या आज भी तुम मुझे खेतों पर ले जाने का बोल कर कहीं और ले जाने का सोच रखे हो?"

"अभी तो कुछ नहीं सोचा है भाभी।" मैंने हौले से मुस्कराते हुए कहा____"लेकिन अगर आप कहेंगी तो ले चलूंगा। भला मैं कैसे अपनी प्यारी सी भाभी के हुकुम की अवहेलना कर सकता हूं?"

"इतने सुंदर शब्दों से चापलूसी कर रहे हो तो मतलब आज भी मुझे कहीं और ले जाने का इरादा है तुम्हारा।" भाभी ने कहा____"अगर ऐसा ही है तो जान लो आज मैं मां जी से बिल्कुल भी झूठ नहीं बोलूंगी। वापसी में उन्हें साफ साफ बता दूंगी कि तुम मुझे कहां घुमाने ले गए थे।"

"मतलब आप अपने इस मासूम से देवर को मां के हाथों पिटवाना चाहती हैं?" मैंने बड़ी ही मासूम सी शक्ल बना कर उन्हें देखा तो अनायास ही उनके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"उसके लिए मां जी की ज़रूरत ही नहीं है।" भाभी ने कहा____"मैं खुद ही पीट सकती हूं तुम्हें। ये मत भूलो कि छेड़ने की, डांटने की और पीटने की अनुमति तुमने खुद ही दे रखी है मुझे।"

"मैं भूला नहीं हूं भाभी।" मैं मुस्कुरा उठा____"मुझे सब याद है। अगर आप मुझे पीटना ही चाहती हैं तो जब दिल करे पीट लीजिएगा। मैं भी देखना चाहूंगा कि मेरी इतनी सुंदर और प्यारी भाभी मुझे किस तरीके से पीटती हैं?"

मेरी बात सुन कर भाभी मुस्कुराते हुए मेरी तरफ कुछ पलों तक देखती रहीं फिर ये कहते हुए वापस सीढियां उतरने लगीं कि____"तुम्हारी ये ख़्वाईश जल्दी ही पूरी करनी पड़ेगी।"

मैं और भाभी ऐसी ही बातें करते हुए नीचे आए और फिर मां से इजाज़त ले कर बाहर निकल गए। भाभी जब बैठक के सामने से हो कर निकलीं तो उनके चेहरे पर घबराहट के भाव थे। उन्हें डर था कि कहीं पिता जी मुझे आवाज़ दे कर बुला ना लें और फिर ये न पूछने लगें कि मैं उन्हें ले कर कहां जा रहा हूं? हालाकि ऐसा हुआ नहीं बल्कि मैं और भाभी बड़ी आसानी से हवेली के बाहर आ गए।

जल्दी ही मैंने भाभी को जीप में बैठा कर जीप को सड़क पर दौड़ा दिया। मेरे दिलो दिमाग़ में इस समय कई सारे ख़याल उभर रहे थे। दो दिन पहले रूपचंद्र ने मुझे रोक लिया था और फिर उसने बड़ी ही विनम्रता से मुझसे अपनी बहन के संबंध में बातें की थीं। मैं हैरान था कि रूपचंद्र कितनी विनम्रता से मुझसे बातें कर रहा था, जबकि हमारे बीच कभी भी मैत्री भाव जैसी बात नहीं रही थी।

ख़ैर रूपचंद्र ने आख़िर में मुझसे यही कहा था कि उसने अपनी बहन को वचन दिया है कि वो उसे मुझसे मिलवाएगा। अतः मैं उसके निवेदन पर एक बार रूपा से मिल लूं। मैंने भी सोचा कि उसकी बहन से मिल लेने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी अगले साल उससे मेरा विवाह होना था। मैं भी अब उसे खुल कर सब कुछ बता देना चाहता था।

"तो मेरा कहना सही था।" जैसे ही मैंने रूपचंद्र के घर के सामने सड़क पर जीप रोकी तो भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"यानि आज तुम मुझे अपनी दूसरी माशूका से मिलवाने के लिए लाए हो।"

"मेरा ऐसा इरादा तो नहीं था भाभी।" मैंने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"बस यूं समझिए कि उसके भाई की बात नहीं टालना चाहता मैं।"

"अब इसका क्या मतलब हुआ?" भाभी मेरी बात से चौंकी तो मैंने उन्हें दो दिन पहले की वो बातें बता दीं जो रूपचंद्र ने मुझसे कही थीं।

सारी बातें सुन कर भाभी कुछ पलों तक कुछ सोचती रहीं फिर गहरी सांस लेने के बाद बोलीं____"बहुत अच्छी बात है ये। रूपचंद्र की बातों से साफ ज़ाहिर होता है कि अब उसे अपनी बहन के प्रेम और उसके जज़्बातों का बखूबी एहसास हो गया है। अब वो एक अच्छा भाई होने का फर्ज़ निभाना चाहता है और इसी लिए अपनी बहन की खुशी के लिए वो उसे तुमसे मिलवाना चाहता है। मैं भी तुमसे यही कहूंगी कि तुम्हें रूपा से मिलना चाहिए और उससे वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा तुम अनुराधा से करते हो।"

भाभी की ये बातें सुन कर मैं फ़ौरन कुछ ना बोल सका। तभी मेरी नज़र रूपचंद्र पर पड़ी। वो हमारी तरफ ही चला आ रहा था। उसके पीछे रूपा भी थी जो इस वक्त सिर झुकाए उसके पीछे पीछे चली आ रही थी। सुर्ख रंग के सलवार और कुर्ते में वो बेहद ही सुंदर नज़र आ रही थी। सीने पर पड़े दुपट्टे को वो कुछ पलों के अंतराल में व्यवस्थित करने लगती थी। जल्दी ही वो दोनों हमारे क़रीब पहुंच गए।

"प्रणाम भाभी।" रूपचंद्र ने आगे बढ़ कर भाभी के पैरों को छू कर कहा।

"हमेशा खुश रहो।" भाभी ने स्नेह के साथ कहा____"लेकिन अब मैं तुम्हारी भाभी नहीं हूं बल्कि दीदी हूं तुम्हारी। अगले साल रूपा की शादी वैभव से हो जाएगी तो ये मेरी देवरानी बन जाएगी। उस रिश्ते के चलते ये मेरी छोटी बहन भी बन जाएगी और क्योंकि तुम इसके भाई हो और उमर में मुझसे छोटे हो तो मैं तुम्हारी बड़ी बहन बन जाऊंगी।"

"ओह! हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं था।" रूपचंद्र हल्के से हंस पड़ा____"आप बिल्कुल सही कह रही हैं। अब से मैं आपको दीदी ही कहूंगा। वैसे मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वैभव के साथ इस वक्त आप भी होंगी।"

"ये सब इन्हीं महानुभाव की वजह से हुआ है छोटे भाई।" भाभी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा____"ये जनाब मुझे ये कह कर हवेली से ले आए थे कि ये मुझे खेतों पर घुमाने ले जा रहे हैं। मुझे तो पता ही नहीं था कि ये महाराज अपने मन में कौन सी खिचड़ी पकाए हुए थे। अगर मुझे पता होता कि इनके मन में रूपा से मिलने की योजना है तो मैं इनके साथ आती ही नहीं। दो लोगों के बीच कबाब में हड्डी बनने वाली बिल्कुल नहीं थी मैं।"

"हा हा हा।" रूपचंद्र ठहाका लगा कर हंसा, फिर बोला____"चलिए कोई बात नहीं। जो हुआ अच्छा ही हुआ। आप साथ हैं तो रूपा भी सहज रहेगी आप लोगों के बीच।"

मैंने देखा, रूपा सिर झुकाए खड़ी थी। दुपट्टे के एक छोर को पकड़े वो उसे दोनों हाथों में उमेठ रही थी। चेहरे पर लाज की सुर्खी विद्यमान थी।

"क्या सच में तुम्हें ऐसा लगता है?" उधर भाभी ने रूपचंद्र की बात का जवाब दिया____"अरे! भाई ये बेचारी तो मेरे रहते ही असहज रहेगी। मेरी वजह से ये दोनों ही एक दूसरे से खुल कर कोई बात नहीं कर पाएंगे।" कहने के साथ ही वो एकदम मुझसे मुखातिब हुईं____"वैभव, तुम मुझे इसी वक्त हवेली ले चलो और मुझे वहां छोड़ दो। उसके बाद तुम वापस आ कर रूपा के साथ खेतों पर चले जाना।"

"य...ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैंने एकदम से चौंकते हुए कहा।

"मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूं वैभव।" भाभी ने कहा_____"तुम दोनों के बीच मेरा मौजूद रहना उचित नहीं है। इस लिए तुम मुझे हवेली छोड़ आओ।"

"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैंने बेचैन से लहजे में कहा____"आपके रहते मुझे कोई समस्या नहीं है, सच में। मेरा ख़याल है कि रूपा को भी आपके रहने से कोई समस्या नहीं होगी। आप खुद पूछ लीजिए उससे।"

"बेकार की बातें मत करो वैभव।" भाभी ने ज़ोर देते हुए कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि मेरे रहते तुम दोनों सहज नहीं रहोगे और उस बेचारी से क्यों पूछूं मैं, जबकि मैं खुद समझती हूं कि मेरा साथ में रहना उचित नहीं है।"

अजीब मुसीबत हो गई थी। हालाकि भाभी की बातों से मैं खुद भी सहमत था लेकिन मैं ये भी नहीं चाहता था कि मैं उन्हें वापस हवेली छोड़ आऊं। उनका हवेली वापस लौट जाने का मतलब था इससे घर वालों के मन में कई सारे सवाल पैदा हो जाना। मुझे खुद भी अच्छा नहीं लगेगा कि मैं अपनी भाभी को सिर्फ इतनी सी बात के चलते वापस हवेली भेज कर आऊं। मैंने बेबस भाव से रूपा की तरफ देखा। इत्तेफ़ाक से उसने भी सिर उठा कर मेरी तरफ देखा। हम दोनों की नज़रें चार हुईं। कुछ देर के लिए ऐसा लगा जैसे सन्नाटा छा गया हो।

"भ...भैया आप जाएं।" फिर उसने रूपचंद्र से कांपते स्वर में कहा____"म...मुझे दीदी के साथ जाने में कोई समस्या नहीं है।"

रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और फिर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसके बाद मुझे एवं भाभी को देखने के बाद पलट कर चला गया। मुझे ये सोच कर थोड़ा अच्छा महसूस हुआ कि रूपा मेरे मन के भाव समझ गई थी और उसने वही किया जो मैं चाहता था।

"अरे! तुम ये क्या कह रही हो?" रूपचंद्र के जाते ही भाभी ने हैरत से आंखें फाड़ कर रूपा से कहा____"ये ठीक नहीं है रूपा। तुम दोनों के बीच मेरा मौजूद रहना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। समझने की कोशिश करो पागल।"

"भाभी, आप दोनों कृपया पीछे वाली सीट पर बैठ जाएं।" मैंने धड़कते दिल से कहा।

"तुम समझते क्यों नहीं वैभव?" भाभी ने इस बार थोड़ा नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"मुझे अपने साथ मत ले जाओ। मैं तुम्हारे साथ किसी दूसरे दिन चल कर खेत घूम आऊंगी लेकिन इस वक्त मेरा तुम दोनों के बीच रहना बिल्कुल ही उचित नहीं है।"

"ऐसा कुछ नहीं है भाभी।" मैंने कहा____"आप बेकार में ही इतना ज़्यादा सोच रही हैं। आप बैठिए तो सही, आगे सब समझ आ जाएगा आपको।"

भाभी ने मुझे बेबस भाव से देखा। उनकी आंखों में शिकायत के भाव भी थे। फिर वो मेरे बगल वाली सीट से नीचे उतर गईं और रूपा को ले कर पीछे वाली सीट पर बैठ गईं। उन दोनों के बैठते ही मैंने जीप को आगे बढ़ा दिया। सारे रास्ते हम तीनों के बीच ख़ामोशी छाई रही। रूपा के कुछ बोलने का तो सवाल ही नहीं था किंतु भाभी ने भी नाराज़गी के चलते कोई बात नहीं की और मैंने इस डर से कि कहीं भाभी गुस्से में मुझे डांटने न लग जाएं। ऐसी ही ख़ामोशी के साथ रास्ता गुज़रा और जीप खेतों पर बने मकान के पास पहुंच गई।

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अध्याय - 111

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"अरे! तुम अकेले आ गए?" रूपचंद्र जैसे ही घर के अंदर पहुंचा तो उसे देखते हुए फूलवती ने हैरानी से पूछा____"रूपा कहां गई? उसे अपने साथ क्यों नहीं लाए तुम?"

"फ़िक्र मत कीजिए बड़ी मां।" रूपचंद्र ने सामान्य भाव से कहा____"रूपा इस समय अपने होने वाले पति के साथ है।"

"क...क्या????" फूलवती के साथ साथ बाकी सब भी उछल पड़े, हैरत से आंखें फाड़े फूलवती ने कहा____"ये क्या कह रहे हो तुम? वो उसके साथ कैसे है?"

"आप भी कमाल करती हैं बड़ी मां।" रूपचंद्र ने कहा____"इसमें इतना हैरान होने वाली कौन सी बात है और वैसे भी वैभव के साथ उसकी भाभी भी हैं। इस लिए आपको ना तो फ़िक्र करने की ज़रूरत है और ना ही कुछ और सोचने की।"

सबका मुख भाड़ की तरह खुला रह गया था। बेयकीनी से रूपचंद्र को इस तरह देखने लगीं थी जैसे उसने कोई बहुत ही अजीब काम कर दिया हो।

"ल...लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि जब तू रूपा को ले कर यहां से गया था तो वो वैभव के साथ कैसे चली गई?" ललिता ने अविश्वास भरे भाव से कहा____"तूने जाने कैसे दिया उसे? आख़िर इस तरह की हिमाकत कैसे कर सकता है तू?"

"अरे! तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है मां?" रूपचंद्र एकाएक आवेशयुक्त अंदाज़ में बोल पड़ा____"अगर रूपा वैभव के साथ है भी तो क्या ग़लत हो गया है? अगले साल दोनों का ब्याह हो जाएगा। दादा ठाकुर ने दोनों का रिश्ता तय कर दिया है। अब अगर वो दोनों एक दूसरे से कुछ पल के लिए मिल भी ले रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है?"

"बुराई नहीं है मैं मानती हूं।" ललिता ने कहा____"लेकिन ब्याह से पहले इस तरह एक दूसरे से मिलना उचित भी नहीं है। समाज और बिरादरी के लोग देखेंगे तो तरह तरह की बातें करेंगे। कल को कुछ ऊंच नीच हो गई तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा? ऐसे में अगर दादा ठाकुर ने भी ये रिश्ता तोड़ दिया तो क्या करेंगे हम?"

"आप बेकार में ही इतना कुछ सोच कर हलकान हो रही हैं मां।" रूपचंद्र ने कहा____"आप जो कुछ सोच कर चिंता कर रही हैं वैसा कुछ नहीं होगा। ये मत भूलिए की वैभव की भाभी भी साथ में है। दूसरी बात, अगर उसकी भाभी न भी होती तब भी मैं रूपा को वैभव से मिलवाने ले जाता।"

"ये क्या बक रहा है तू?" ललिता देवी हैरत से चीख ही पड़ीं____"तेरा दिमाग़ तो ठीक है ना?"

"मेरा दिमाग़ बिल्कुल दुरुस्त है मां।" रूपचंद्र ने स्पष्ट लहजे में कहा____"सच कहूं तो अब जा कर मेरा दिमाग़ ठीक हुआ है लेकिन ये देख कर दुख हो रहा है कि आप लोगों का दिमाग़ अभी भी ठीक नहीं हुआ है। अभी भी आप लोग वैभव और उसके पिता पर संदेह कर रही हैं और उनसे ज़्यादा खुद अपनी ही बेटी पर। हां मां, आप लोगों को अपनी ही बेटी पर भरोसा नहीं है। माना कि उसने वैभव से रिश्ता बना कर हमारी मान मर्यादा को ठोकर मार दी थी लेकिन क्या आप लोगों ने कभी सोचा कि ऐसा उसने क्यों किया था? क्या आपने कभी सोचा कि वो क्या इतनी नादान थी कि उसे अपने परिवार की इज्ज़त और मान मर्यादा का ज़रा भी ख़याल नहीं रहा होगा? सच तो ये है मां कि इस दुनिया में रहने वाले लोग सिर्फ अपने बारे में और सिर्फ अपने हितों के बारे में ही सोचते हैं। उन्हें दूसरों के हितों का अथवा खुशियों का कोई ख़याल ही नहीं रहता।"

"आख़िर कहना क्या चाहता है तू?" ललिता ने घूरते हुए कहा____"आज अपनी बहन का इस तरह से क्यों पक्ष ले रहा है तू?"

"वो इस लिए मां क्योंकि मैं अपनी बहन की पवित्र भावनाओं को दिल से महसूस कर चुका हूं।" रूपचंद्र ने अधीरता से कहा____"सुना है माता पिता दूर से ही अपने बच्चे की गंध सूंघ लेते हैं और आंख बंद कर के बता सकते हैं कि फला बच्चा उनकी संतान है लेकिन यहां....यहां तो शायद ऐसे माता पिता पाए जाते हैं जो सत्य को झुठला देते हैं। मेरी बहन ने वैभव से प्रेम किया था। एक ऐसा पवित्र प्रेम जिसमें उसने अपना सब कुछ अपने प्रेमी को समर्पित कर दिया। इस विश्वास के साथ कि अगर उसका प्रेम सच्चा होगा तो ईश्वर उसकी किस्मत में वैभव का साथ ज़रूर लिखेगा। हम सब इस बात के गवाह हैं मां कि दादा ठाकुर से हमारा कितना बड़ा संग्राम हुआ लेकिन इसके बावजूद अंततः फिर से वैसे ही हम एक हो गए। क्या आप में से किसी ने कल्पना की थी कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी इस जीवन में दादा ठाकुर के साथ हमारे संबंध इस तरह से जुड़ जाएंगे? लेकिन ये संबंध जुड़े मां और सबकी उम्मीदों से परे हो कर जुड़े। इन संबंधों के जुड़ने की क्या वजह हो सकती है? क्या आप में से कोई बता सकता है? आप सब यही कहेंगे न कि ऐसा सिर्फ दादा ठाकुर के विशाल हृदय की वजह से हुआ है। नहीं हर्गिज़ नहीं, ऐसा हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ मेरी बहन और उसके सच्चे प्रेम की वजह से। दादा ठाकुर ने हमसे रूपा का रिश्ता क्यों मांगा? क्योंकि उन्हें पता है कि उनके बेटे वैभव की जान बचाने का कार्य मेरी बहन रूपा ने किया था और ऐसा उसने इस लिए किया था क्योंकि वो वैभव से प्रेम करती है। ये सब प्रेम की ही वजह से हुआ है मां वरना क्या आपको लगता है कि जो कुछ हमने दादा ठाकुर के साथ किया था उसके बाद वो हमसे कोई संबंध रखते?"

रूपचंद्र चुप हुआ तो एकदम से सन्नाटा छा गया बरामदे में। ऐसा लगा जैसे किसी के पास उसकी बातों का जवाब देने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे। रूपचंद्र बड़ी गंभीरता से बारी बारी सबको देखता रहा। फिर उसने एक लंबी सांस ली।

"उसी प्रेम के बारे में और उसी रूपा के बारे में आज आप सबके ऐसे ख़याल हैं, यही देख कर मुझे दुख हो रहा है मां।" रूपचंद्र ने पुनः सन्नाटे को चीरते हुए कहा____"कहने की ज़रूरत नहीं है कि अब तक मैं भी अपनी बहन के इस प्रेम संबंध पर उससे बहुत नाराज़ था लेकिन ईश्वर का शुक्र है कि उसने मेरे कुंद पड़े ज़हन को खोल दिया और ये एहसास दिलाया कि अपनी बहन के बारे में अब तक मैं कितना ग़लत सोचता था। अरे! वो तो मेरी लाडली थी। हम दोनों एक साथ खेल कूद कर बड़े हुए थे। उसने किसी से प्रेम क्या कर लिया मैं अपनी बहन के चरित्र के बारे में जाने क्या क्या सोचने लग गया? जिस समय उसे अपने भाई की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी उस समय मैंने उसे ऐसे मझधार पर छोड़ दिया जहां पर वो पल पल डूबते हुए घुट घुट कर मरती रही। ये ऐसी बातें हैं मां जिन्हें आप सबको सोचना चाहिए था लेकिन आप में से किसी ने नहीं सोचा। ख़ैर कोई बात नहीं, किसी ने नहीं सोचा तो क्या हुआ? मैं सोचूंगा, अपनी बहन को घुट घुट कर मरते नहीं देख सकूंगा मैं। उसकी खुशी के लिए मैं सब कुछ करूंगा। आप लोगों को जो सोचना है सोचते रहिए।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र पलटा और फिर बिना किसी की कोई बात सुने बिना बाहर निकल गया। बरामदे में बैठी औरतें, बहुएं और बेटियां भौचक्की सी किन्हीं गहरे ख़यालों खोई नज़र आने लगी थीं।

✮✮✮✮

रागिनी भाभी के सामने रूपा सच में काफी असहज नज़र आ रही थी और साथ ही शर्मा भी रही थी। भाभी अब भी ख़ामोश थीं। उनके चेहरे पर नाराज़गी के भाव अब भी विद्यमान थे। इधर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करूं? हम तीनों ही जीप से उतर कर मकान के पास आ गए थे। मकान के अंदर से कुछ कुर्सियां निकाल दी थी मैंने जिस पर भाभी तो बैठ गईं थी लेकिन रूपा सिर झुकाए खड़ी थी। अभी मैं कुछ कहने के बारे में सोच ही रहा था कि तभी भुवन आ गया। उसे देख मैंने राहत की सांस ली।

"बहू रानी आप यहां?" उसने भाभी को देखते ही आश्चर्य से कहा। इससे ज़्यादा वो बोल ना सका था। उसकी नज़र रूपा पर भी पड़ चुकी थी जिसे देखने के बाद वो मेरी तरफ हैरानी के साथ साथ सवालिया नज़रों से देखने लगा था।

"हम हवेली से वैभव के साथ यहां घूमने के लिए निकले थे।" उधर भाभी ने भुवन के सवाल का जवाब देते हुए कहा____"हमारे साथ हमारी होने वाली देवरानी भी आ गई है। वैसे अच्छा हुआ कि यहां तुम भी हो। एक काम करो, तुम हमें अपने साथ ले चलो। हम देखना चाहते हैं कि हमारे देवर ने यहां कौन कौन सी फसल उगा रखी है और साथ ही ये भी कि यहां पर उसका काम कैसा चल रहा है?"

"अगर आप ऐसा ही चाहती हैं तो ठीक है बहू रानी।" भुवन ने बड़े विनम्र भाव से कहा____"मैं आपको यहां की सारी ज़मीन का भ्रमण करवा दूंगा।"

भुवन के ऐसा कहते ही भाभी एक झटके से कुर्सी पर से उठ कर खड़ी हो गईं। फिर मेरी तरफ देखते हुए बोलीं____"हम भुवन के साथ खेतों की निगरानी करने जा रहे हैं वैभव। तुम यहीं पर रूपा के साथ बातें करो।"

मैंने जवाब में ज़्यादा कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा। बस हां में सिर हिला दिया। उसके बाद भाभी ने एक बार रूपा की तरफ स्नेह भरी दृष्टि से देखा और फिर उसके चेहरे को प्यार से सहला कर चली गईं। भुवन उनके आगे आगे चला जा रहा था।

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद रूपा।" मैंने रूपा से बात शुरू करने के उद्देश्य से ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा____"जो तुमने उस वक्त मेरे मन की बात समझ कर भाभी के साथ चलने की बात कही।"

"वो तो कहनी ही थी।" रूपा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"आख़िर मेरा महबूब भी तो यही चाहता था। फिर भला मैं कैसे अपने दिल के सरताज के मन का न करती?"

रूपा की बात सुन कर मैंने उसकी तरफ गौर से देखा। वो सच में मोहब्बत भरी नज़रों से मुझे देखे जा रही थी। उसे अपनी तरफ यूं देखता देख मेरे जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी। मुझे एकदम से महसूस हुआ कि सच में वो मुझसे बहुत प्रेम करती है। ये सोच कर बुरा भी लगा कि इसके पहले मैं कभी उसकी चाहत के साथ न्याय नहीं कर सका था।

"क्या हुआ?" मुझे कहीं खोया देख उसने कहा____"क्या सोचने लगे? क्या मेरा यहां आना अच्छा नहीं लगा तुम्हें?"

"नहीं, ऐसी बात नहीं है।" मैंने एकदम से अधीर हो कर कहा____"बस एक अपराध सा महसूस हो रहा है मुझे। समझ में नहीं आ रहा कि अपने अंदर की हालत तुम्हें किन शब्दों में बताऊं ताकि तुम समझ सको।"

"किस बात का अपराध महसूस हो रहा है तुम्हें?" रूपा ने हैरानी से मेरी तरफ देखा____"और ऐसा क्या है जिसे मुझे समझाना चाहते हो?"

"यही कि मैंने कभी तुम्हारी चाहत को महसूस करने की कोशिश नहीं की।" मैंने गंभीरता से कहा____"और ना ही ये समझने की कोशिश की थी कि प्रेम क्या होता है? अगर कभी समझने की कोशिश करता तो शायद मुझे तुम्हारी चाहत का भी एहसास हो गया होता। यही अपराध है मेरा जिसे नहीं करना चाहिए था मुझे।"

"पर मैं तो ऐसा कुछ भी नहीं सोचती।" रूपा ने सहजता से कहा____"मेरी नज़र में तुमने कोई अपराध नहीं किया है। ऐसा मैं इस लिए कह रही हूं क्योंकि दुनिया वालों की तरह मैं भी तुम्हारी फितरत से अच्छी तरह वाक़िफ रही हूं। मुझे शुरू से ही पता था कि तुम ऐसे बिल्कुल भी नहीं हो जिसे किसी की भावनाओं की परवाह हो अथवा जो किसी लड़की के प्रति वैसी भावना रखता हो जिसे प्रेम कहा जाता है। मैं तो इसी बात से खुश थी कि तुमने कभी मुझे बाकी लड़कियों की तरह नहीं समझा बल्कि मेरा स्थान उन सबसे ऊंचा और ख़ास बनाए रखा।"

मैं चकित सा देखता रह गया रूपा को। मुझे उससे ऐसी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी। मुझे लगा था शायद वो अभी भी मुझसे शिकायतें करेगी।

"जब तुम वैसे थे ही नहीं तो फिर मैं कैसे तुम्हें किसी बात के लिए दोष दूं?" उधर रूपा कहती जा रही थी____"और तुम्हें भी किसी बात के लिए खुद को अपराधी महसूस कराने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं ये बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकती कि जिसे मैं टूट कर चाहती हूं वो किसी बात के चलते हीन भावना से ग्रसित हो जाए।"

"ये क्या कह रही हो तुम?" मैं चकित सा बोल पड़ा।

"हां वैभव, मेरी तुमसे प्रार्थना है कि ऐसा कभी मत सोचना।" रूपा दीवानावार सी हो कर बोली____"खुद को कभी भी किसी बात के लिए दोष मत देना। तुम जैसे भी हो मेरी मोहब्बत हो। तुम मुझे कबूल ना भी करते तो अब तुमसे कोई गिला न करती।"

एक तीव्र झटका लगा मुझे। मुझे यकीन न हुआ कि मेरे कान ये क्या सुन रहे थे? आख़िर किस मिट्टी की बनी थी ये लड़की? मेरे जैसे बदनाम लड़के से ऐसी मोहब्बत....ऐसी दीवानगी?

"जिस दिन मुझे ये पता चला था कि तुम किसी और लड़की से प्रेम करने लगे हो तो सच कहूं तो मैं टूट गई थी उस दिन।" रूपा की आंखें नम हो गईं, बोली____"मंदिर में जा कर देवी मां के सामने घंटों बैठी रोती रही थी मैं। उनसे शिकायतें कर रही थी। उनसे चीख चीख कर पूछ रही थी कि आख़िर मेरे प्रेम में क्या कमी रह गई थी जिसके चलते उन्होंने तुम्हें किसी और का बना दिया? दूसरे दिन तुमसे मिली तो अपने दिल का सारा गुबार तुम पर भी उतारा मगर चैन नहीं मिला। रात भर सोचती रही और रोती रही। दूसरे दिन तुमसे फिर मिली और जब तुमने कोई जवाब नहीं दिया और जब मैंने तुम्हें बेबस सा होते देखा तो एकदम धक्का सा लगा मुझे। पहली बार महसूस हुआ कि मैंने अपने प्रेम को बेबस कर दिया है। मैं जिसे चाहती हूं उसे मजबूर कर रही हूं। ये ऐसा एहसास था वैभव जिसने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। वापस घर पहुंचने पर मैंने बहुत सोचा इस बारे में। तब जा कर मुझे एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मुझे अपनी मोहब्बत को दोष नहीं देना चाहिए था। अरे! प्रेम तो वो है जिसमें सिर्फ फ़ना हुआ जाता है, ना कि उसे हासिल करने के लिए कोई ज़ोर आजमाईश की जाती है। प्रेम तो वो है जिसमें सिर्फ अपने प्रेमी की खुशियों का ख़याल रखा जाता है। ज़रूरत पड़ने पर अपनी भी खुशियों का बलिदान कर दिया जाता है, ना कि अपने कर्म से अपने प्रेमी को दुखी कर दो। बस, दिलो दिमाग़ से एक झटके में सारा संताप मिट गया। मुझे समझ आ गया कि अब मुझे क्या करना है। हां वैभव, मैंने सोच लिया था कि मीरा की तरह मैं भी तुम्हारे प्रेम में जोगन बन जाऊंगी। जीवन भर तुमसे ही प्रेम करूंगी और दुनिया की हर रुसवाई को झेलते हुए एक दिन मर जाऊंगी।"

"बस करो।" मैं एक झटके में उसके दोनों कंधे पकड़ कर बोल पड़ा। उसकी बातें सुन कर मेरा समूचा वजूद हिल गया था, बोला____"ऐसी बातें मत करो। मैं कोई देवता नहीं हूं जिसे तुम इस हद तक प्रेम करो और मेरी पूजा करो। अरे! मैं तो हद दर्जे का चरित्र हीन लड़का हूं जिसने अब से पहले न जाने कितनी ही बहू बेटियों की इज्ज़त के साथ खिलवाड़ किया है। तुम्हें मुझ जैसे लड़के से इस तरह का प्रेम नहीं करना चाहिए। मैं तुम्हारे प्रेम के लायक नहीं हूं रूपा।"

"तुम किस लायक हो ये निर्णय तुम खुद नहीं कर सकते मेरे साजन।" रूपा ने कहा____"मेरे सामने तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि बता ही चुकी हूं बहुत प्रेम करती हूं तुम्हें। कोई मेरे सामने मेरे दिलबर को ऐसा कहे ये मैं सहन नहीं कर सकती।"

एक बार फिर से अवाक रह गया मैं। रूपा की बातें मुझे प्रतिपल आश्चर्य चकित कर रहीं थी। मैं ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि वो मेरे बारे में ऐसा सोचती है। उसकी बातों में, उसकी आंखों में प्रेम और सिर्फ प्रेम की सच्चाई के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था मुझे। एक बार फिर मेरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। ज़हन में ख़याल उभरा कि ये तो सच में मुझे किसी देवता की तरह मानती है और प्रेम करती है। एकाएक मुझे भारी आत्मग्लानि सी महसूस हुई। मुझे समझ न आया कि मैं उससे क्या कहूं?

"वैसे मैं ये सोच कर हैरान हूं कि तुम्हारे भाई रूपचंद्र ने खुद आ कर मुझसे कहा कि मैं तुमसे मिल लूं।" मैंने विषय बदलने की गरज से हिचकिचाते हुए पूछा____"आख़िर इतना बड़ा चमत्कार कैसे हो गया? जो रूपचंद्र मुझे बैरी की तरह देखता था और मुझे मिट्टी में मिला देने पर आमादा था उसने मुझसे ऐसा क्यों कहा? कहा तो कहा ऊपर से आज उसने सचमुच तुम्हें मेरे साथ भेज भी दिया। ये मेरे लिए बहुत बड़े आश्चर्य की बात है।"

"असल में रूप भैया अब पहले जैसे नहीं रहे।" रूपा ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"इतना कुछ होने के बाद उनके मन से भी बैर भाव निकल गया है और शायद यही वजह थी कि जब उनका दिमाग़ शांत हुआ तो उन्हें अपनी इस बहन की भी याद आई।"

"क्या मतलब?" मैं उलझ सा गया।

"कुछ दिन पहले वो मेरे कमरे में मुझसे मिलने आए थे।" रूपा ने कहा____"पहले तो मुझे उनके आने पर हैरानी हुई क्योंकि जब से उन्हें मेरे और तुम्हारे बीच के संबंधों के बारे में पता चला था तब से वो मुझसे नाराज़ थे और मुझसे बात नहीं करते थे। ख़ैर जब वो आए तो मैंने भी सोच लिया था कि अगर वो मुझ पर अपनी भड़ास निकालेंगे तो मैं अपनी ज़ुबान से उन्हें कुछ नहीं कहूंगी। आख़िर वो मेरे बड़े भैया हैं और मैंने उनका दिल दुखाया है। इतना ही नहीं मेरी वजह से उनके पूरे परिवार की मान मर्यादा का हनन भी हुआ है। इस लिए सोच लिया था कि उनकी हर डांट चुपचाप सह लूंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो हुआ जिसकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी।"

कहने के साथ ही रूपा ने मुझे अपने भाई की मुलाक़ात का सारा किस्सा संक्षेप में बता दिया जिसे सुन कर मैं भी हैरान रह गया। यकीनन रूपचंद्र बहुत बदल गया था। मैं ख़ास कर उसकी इस बात से प्रभावित हुआ कि उसे अपनी बहन की खुशियों की परवाह थी और इसी लिए उसने इतना बड़ा क़दम उठाया। दूसरी तरफ मैं ये जान कर भी मन ही मन हैरान था कि रूपा ने अपने भाई से मेरे और अनुराधा से संबंधित क्या कुछ कहा था। उसे अनुराधा से मेरे प्रेम का एहसास था। मैंने सोचा वाकई में रूपा एक अद्भुत लड़की है जो इतनी गहराई से किसी के बारे में सोच सकती है। एकाएक ही मुझे रूपा की इस सोच पर गर्व सा महसूस हुआ और साथ ही उसके लिए एक ख़ास तरह का जुड़ाव सा भी महसूस हुआ।

"मेरे घर वालों को लगता है कि जब तुम किसी और लड़की से प्रेम करते हो तो मुझसे ब्याह करने के बाद मुझे उसके जैसा प्रेम और मान सम्मान नहीं दोगे।" मुझे ख़ामोश देख रूपा ने कहा____"हालाकि उनका ऐसा सोचना कहीं न कहीं जायज़ भी है क्योंकि उन्हें अपनी बेटी की खुशियों का ख़याल है मगर इसके लिए मैं ये भी नहीं चाहती कि जिसे मैं दिलो जान से प्रेम करती हूं उसे किसी बात के लिए कोई मजबूर करे। जब मेरा महबूब ही खुश नहीं रहेगा तो मैं भला कैसे उसे देख के खुश रहूंगी?"

"तुम सच में अद्भुत हो रूपा।" मैं भावावेश में बोल उठा____"ये मेरी बदकिस्मती ही थी कि इसके पहले मैं ना तो तुम्हें कभी समझ सका और ना ही मेरे दिल में तुम्हारे लिए प्रेम जागृत हुआ। ऐसा शायद इसी लिए हुआ क्योंकि मैं सिर्फ अय्याशियों में ही खोया रहता था और प्रेम जैसे पवित्र एहसास को बकवास समझता था। तुमने अपने प्रेम के चलते क्या कुछ नहीं किया और मैं इतना स्वार्थी था कि कभी तुम्हें शुक्रिया तक नहीं कहा। मैं सच में बहुत बुरा हूं रूपा। तुम्हें मेरे जैसे इंसान से ना तो प्रेम करना चाहिए और ना ही ब्याह करना चाहिए।"

"अब तो बहुत देर हो चुकी है मेरे दिलबर।" रूपा की आंखों में आंसू तैरते नज़र आए____"अब तो ईश्वर भी चाहेगा तो वो मेरे दिल से तुम्हें निकाल नहीं पाएगा। पहले ही कह चुकी हूं कि तुम जैसे भी हो मैं तुम्हें जीवन भर इसी शिद्दत के साथ प्रेम करती रहूंगी। हां, अगर तुम मुझसे ब्याह नहीं करना चाहते तो तुम्हें मजबूर भी नहीं करूंगी। मुझे अपना महबूब उस सूरत में तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए जिसमें किसी तरह की मजबूरी और बेबसी शामिल हो। मुझे जीवन भर तुम्हारे प्रेम में तड़पना मंज़ूर है लेकिन तुम्हें मजबूर कर के और तुम्हारी खुशियां छीन कर मैं तुम्हें अपना नहीं बनाना चाहती।"

"बस, कुछ मत बोलो अब।" मुझसे जब बर्दास्त न हुआ तो मैंने एक झटके में रूपा को खींच कर अपने सीने से लगा लिया।

उसका नाज़ुक जिस्म मेरी आगोश में आते ही थरथरा उठा। उधर मेरे सीने से लगते ही रूपा ने मुझे जोरों से जकड़ लिया और ज़ार ज़ार रो पड़ी। मेरी अपनी आंखें भी नम हो गईं। काफी देर तक वो मुझसे लिपटी रोती सिसकती रही। फिर मैंने उसे खुद से अलग किया। उसका चेहरा आंसुओं से तर बतर हो गया था। आंखें सुर्ख हो गईं थी।

"मैं बहुत खुशनसीब हूं रूपा कि मेरे जीवन में दो ऐसी लड़कियां मेरी पत्नी के रूप में मुझे मिलेंगी जो मुझे हद से ज़्यादा प्रेम करती हैं।" मैंने भाव विभोर हो कर कहा____"हां रूपा, मैं सच में बहुत नसीब वाला हूं। अब तो ईश्वर भी चाहेगा तो मैं तुम्हें खुद से जुदा नहीं करूंगा और....और हां तुम बिल्कुल फ़िक्र मत करो। मैं अनुराधा की ही तरह तुम्हें प्रेम करूंगा और तुम्हें मान सम्मान दूंगा। मैं चाहता हूं कि अब से मेरी रूपा की आंखों से आंसू का एक कतरा भी बाहर न निकले। मेरी रूपा ने अब तक बहुत दुख सहे हैं लेकिन अब नहीं। अब से मैं हर पल उसे खुशी से मुस्कुराता हुआ देखना चाहता हूं।"

रूपा मेरी बात सुन कर एक बार फिर से मुझसे लिपट गई और सिसक सिसक कर रोने लगी। जाने कितने समय की तड़प थी जो आंसुओं के रूप में आज निकल रही थी। ख़ैर मैंने जल्दी ही उसे सम्हाला और कहा कि वो रोए नहीं। आख़िर कुछ देर में रूपा शांत हो गई। मैंने अपने हाथों से उसके आंसू पोंछे। ये देख कर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। पहली बार मैंने उसके चेहरे पर खुशी की असली चमक देखी। उसका चेहरा एकदम से ताज़े गुलाब की तरह खिल उठा था।

उसके बाद हम दोनों इधर उधर की बातें करने लगे। उसने मुझसे अनुराधा के बारे में पूछा तो मैंने उसे अनुराधा से अपने प्रेम का सारा किस्सा बता दिया। अनुराधा और मेरी प्रेम कहानी सुन कर रूपा मुस्कुराते हुए जाने क्या सोचने लगी थी।

"तो इसी तरह दीदी को अनुराधा से भी मिलवा आए हो तुम?" फिर उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा____"वैसे सच कहूं तो अब मेरा भी मन करने लगा है कि मैं उससे मिलूं। मैं भी देखना चाहती हूं कि मेरी होने वाली सौतन कैसी है?"

"क्या सच में?" मैंने धड़कते दिल से उसकी तरफ देखा।

"हां जी सच में।" रूपा ने कहा____"पर मैं उसे अपनी सौतन नहीं मानूंगी बल्कि अपनी छोटी बहन मानूंगी। वो मेरी गुड़िया की तरह रहेगी जिसका मैं ख़याल भी रखूंगी और बहुत सारा प्यार भी करूंगी।"

"वाह! बहुत खूब।" मैं मुस्कुरा उठा____"तुम दोनों अगर आपस में ही प्यार करोगी तो फिर मुझसे प्यार कौन करेगा?"

"फ़िक्र मत कीजिए जनाब।" रूपा ने हल्के से हंसते हुए कहा____"हम दोनों मिल कर थोड़ा सा आपको भी प्यार कर लिया करेंगी।"

"क...क्या??" मैं चौंका____"बस थोड़ा सा???"

"हां...क्यों?" रूपा गहरी मुस्कान के साथ बोली____"ज़्यादा चाहिए क्या?"

"तुम ज़्यादा की बात करती हो।" मैंने कहा____"मुझे तो हद से ज़्यादा चाहिए।"

"अब ये तो आने वाला वक्त बताएगा।" रूपा एकाएक जाने क्या सोच कर शर्मा गई, फिर बोली____"अभी तो फिलहाल प्रतीक्षा ही करनी पड़ेगी आपको।"

"आपको???" मैंने उसे छेड़ा____"अभी तक तो तुम मुझे "तुम" कह रही थी और अब अचानक से "आप" कहने लगी? ये अचानक से इतना बदलाव कैसे हो गया?"

"ऐसा इस लिए जनाब क्योंकि वो अभी से खुद को तुम्हारी पत्नी मान चुकी है।" एकाएक भाभी की आवाज़ सुन कर हम दोनों ही उछल पड़े। उधर भाभी ने पास आ कर मुस्कुराते हुए कहा____"और क्योंकि पति को इज्ज़त बक्शी जाती है इस लिए हर पत्नी अपने पति को "आप" ही कहती है।"

रूपा बेचारी बुरी तरह शर्मा गई। भाभी के आते ही वो झट से उठी और दूर जा कर खड़ी हो गई। ये देख भाभी की मुस्कान और भी ज़्यादा गहरी हो गई। इधर मैं भी थोड़ा हड़बड़ा सा गया था। दिल की धड़कनें थम सी गईं थी।

"लगता है मैं जल्दी वापस आ गई।" भाभी ने बारी बारी से हम दोनों की तरफ देखते हुए कहा____"शायद तुम दोनों की बातें अभी पूरी नहीं हुईं हैं। अगर ऐसा है तो मैं वापस चली जाती हूं। खेतों का एक चक्कर और लगा लेती हूं।"

"न...नहीं दीदी।" रूपा झट से बोल पड़ी____"आप कहीं मत जाइए।"

"सच कह रही हो न?" भाभी ने मुस्कुराते हुए रूपा की तरफ देखा____"देखो, अगर अभी मन न भरा हो तो बिना संकोच के बता दो मुझे। मैं नहीं चाहती कि मेरी होने वाली देवरानी यहां से नाखुश हो कर जाए।"

"ऐसी बात नहीं है दीदी।" रूपा ने शर्म से सिर झुकाए हुए कहा____"कृपया आप ऐसा मत सोचिए।"

"ठीक है फिर।" भाभी ने एकाएक मेरी तरफ देखा और कहा____"और तुम्हारा क्या ख़याल है जनाब? घर चलें या अभी और अपनी रूपा से बातें करनी है?"

"नहीं भाभी।" मैं शरमा तो रहा था किंतु फिर मुस्कुराते हुए बोला____"आज के लिए इतना काफी है। मन होगा तो फिर किसी दिन मिल लेंगे।"

"आय हाय! ऐसी बात है क्या?" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा____"चलो अच्छा है। एक दूसरे से मिलना भी चाहिए। सबसे छुप छुप कर प्रेम का चक्कर चलाने का आनंद ही अलग होता है।"

भाभी की बात सुन कर रूपा फिर से बुरी तरह शर्मा गई और इधर मैं मुस्कुरा उठा। ख़ैर ऐसी ही बातों के बाद मैं भुवन को बता कर और रूपा तथा भाभी को जीप में बैठा कर वहां से चल पड़ा। रास्ते में भाभी ने मुझसे तो कोई बात नहीं की लेकिन पूरे रास्ते वो रूपा से धीमी आवाज़ में जाने क्या क्या बातें करती रहीं। कुछ ही समय में रूपा का घर आ गया तो मैंने जीप रोक दी। रूपा जीप से उतर गई। मैंने हार्न दे दिया था इस लिए जल्दी ही घर के अंदर से मुझे रूपचंद्र निकल कर बाहर आता नज़र आया।

रूपचंद्र हमारे पास आया, फिर अपनी बहन रूपा को देखा। उसके चेहरे पर मौजूद खुशी को देख कर वो हल्के से मुस्कुराया। फिर वो भाभी को प्रणाम करने के बाद रूपा को ले कर चला गया। उसके जाने के बाद मैंने भी जीप को हवेली की तरफ बढ़ा दिया।

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अध्याय - 112

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उस वक्त शाम का अंधेरा फैलने लगा था।

आसमान में हल्का चांद तो था किंतु काले घने बादलों में छुपा हुआ था जिसके चलते उसका मध्यम प्रकाश ज़मीन पर नहीं पहुंच पा रहा था। हर तरफ नीम अंधेरा छाया हुआ था।

उसी अंधेरे में एक इंसानी साया एक पेड़ के पीछे छुपा हुआ था। चेहरे पर पत्थर जैसी सख़्ती विद्यमान थी और आंखों में शोला सा दहकता प्रतीत हो रहा था। पेड़ के पीछे छुपा वो उस दरवाज़े पर अपनी निगाहें जमाए हुए था जो इस वक्त बंद नज़र आ रहा था। थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल में वो आस पास भी नज़रें घुमा लेता था किंतु फिर जल्दी ही उसकी निगाह पुनः उसी बंद दरवाज़े पर जा कर जम जाती थी। उसके हाव भाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसे किसी की बड़ी शिद्दत से प्रतीक्षा थी।

लगभग बीस मिनट बाद उसका इंतज़ार ख़त्म हुआ। जिस दरवाज़े पर उसने शिद्दत से निगाहें जमा रखी थी वो हल्की आवाज़ के साथ खुला और नीम अंधेरे में उसने किसी को उस दरवाज़े से बाहर निकलते देखा। उसने आंखें सिकोड़ कर उस निकलने वाले व्यक्ति को पहचानने की कोशिश की। अगले ही पल उसके सख़्ती से भिंचे हुए होठों पर एक ऐसी मुस्कान थिरक उठी जो ज़हर से बुझी हुई थी।

उधर दरवाज़े से निकलने वाले व्यक्ति ने दरवाज़े को बंद किया और फिर पलट कर एक तरफ को बढ़ता चला गया। नीम अंधेरे में उस व्यक्ति की आकृति को देख कर ऐसा लगा जैसे वो कोई औरत थी क्योंकि मंद मंद चलती हवा से उसका लिबास लहरा उठता था। जिस तरह से उसका लिबास हवा में लहरा उठता था उससे साफ ज़ाहिर होता था कि वो उस व्यक्ति के बदन पर मौजूद साड़ी थी। बहरहाल वो औरत कुछ ही देर में अंधेरे में दिखनी बंद हो गई।

पेड़ के पीछे छिपे साए ने लगभग दो मिनट का समय बर्बाद किया और फिर आस पास का अच्छी तरह जायजा लेने के बाद पेड़ के पीछे से निकल कर घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। अंदाज़ ऐसा था जैसे वो किसी बहुत ही ज़रूरी और ख़ास मकसद से आगे बढ़ रहा हो। चेहरे पर पहले की ही तरह पत्थर जैसी सख़्ती क़ायम थी। पेड़ से थोड़ा दूर जब वो आया तो उसके बाएं हाथ में कुछ नज़र आया जो स्पष्ट नज़र नहीं आ रहा था।

दरवाज़े के पास पहुंच कर साए ने दरवाज़े की सांकल को पकड़ कर सामान्य अंदाज़ में बजाया। हालाकि उसने महसूस किया कि दरवाज़ा अंदर से कुंडी द्वारा बंद नहीं है किंतु इसके बावजूद उसने दरवाज़े को खुद अंदर की तरफ धकेलना ज़रूरी नहीं समझा था। बल्कि सांकल द्वारा दस्तक दे कर बड़े आराम से किसी के द्वारा दरवाज़ा खोलने की प्रतीक्षा करने लगा था। किस्मत अच्छी थी उसकी, ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा उसे क्योंकि कुछ ही पलों में उसने दरवाज़े के बीच बनी झिरी से लालटेन की रोशनी अपनी तरफ ही आती देखी।

साया एकदम से सतर्क सा हो गया। सख़्त चेहरे पर और भी ज़्यादा सख़्ती उभर आई और साथ ही जबड़े कस गए। बाएं हाथ में जो चीज़ उसने ले रखी थी उस पर उसकी पकड़ और भी ज़्यादा सख़्त हो गई। तभी अंदर से उसकी तरफ आता लालटेन का प्रकाश तेज़ हो गया। ज़ाहिर है दरवाज़ा खोलने के लिए जो कोई भी आ रहा था वो दरवाज़े के पास पहुंच चुका था।

"मैंने दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं किया था मां।" दरवाज़े के उस पार से किसी लड़की की आवाज़ उभरी____"फिर सांकल बजाने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें? वैसे दिशा मैदान कर के बड़ा जल्दी आ गई तुम?"

इस वाक्य के ख़त्म होते ही दरवाज़ा खुला। ज़ाहिर है उस लड़की ने ही दरवाज़ा खोला जिसने ये उपरोक्त वाक्य बोले थे। दरवाज़ा खुला तो लालटेन के प्रकाश में साए की नज़र जिस लड़की पर पड़ी वो मुरारी की बेटी अनुराधा थी। साए के होठों पर एकदम से ज़हरीली मुस्कान उभर आई। उधर अनुराधा ने जैसे ही लालटेन के प्रकाश में दरवाज़े के बाहर किसी अजनबी शख़्स को खड़ा देखा तो वो बुरी तरह घबरा गई। एक पल को तो ऐसा लगा जैसे उसके हाथ से लालटेन ही छूट जाएगी किंतु फिर जल्दी ही उसने खुद को सम्हाला और उस अजनबी व्यक्ति को पहचानने की कोशिश की। उसे उस अजनबी व्यक्ति को पहचानने में ज़्यादा समय नहीं लगा। जैसे ही उसने उसे पहचाना तो उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। आंखें फट सी पड़ीं।

इससे पहले कि अनुराधा कुछ बोल पाती अचानक बिजली सी कौंध गई और अनुराधा पर मानों पूरे वेग से क़यामत सी टूट पड़ी। बाहर खड़े व्यक्ति ने बिजली की सी फुर्ती से बाएं हाथ में ली हुई चीज़ को ज़मीन पर गिरा कर अनुराधा को दबोच लिया। मारे दहशत के अनुराधा की चीख तो निकली लेकिन मुंह में अजनबी की सख़्ती के साथ जम गई हथेली के चलते बाहर न निकल सकी। व्यक्ति ने पूरी ताक़त लगा कर उसे दबोच लिया था।

अनुराधा उससे छूटने के लिए बुरी तरह छटपटाने लगी थी लेकिन खुद को उस व्यक्ति से छुड़ा नहीं पा रही थी। डर और घबराहट के मारे उसका पल भर में ही बुरा हाल हो गया था। उसके एक हाथ में लालटेन थी जो नीचे ज़मीन पर गिर गई। शुक्र था कि आग लगने की बजाय वो बुझ गई थी। पलक झपकते ही घुप्प अंधेरा छा गया किंतु अनुराधा को ऐसा लगा जैसे उसके अपने जीवन में भी अंधेरा छाने वाला है। वो अभी भी बुरी तरह उस व्यक्ति की मजबूत पकड़ से छूटने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी लेकिन तभी जैसे उस पर वज्रपात हो गया और वो एकदम शांत पड़ती चली गई।

व्यक्ति ने उसकी कनपटी के खास हिस्से पर ज़ोर से हाथ का प्रहार किया था जिसके चलते अनुराधा को पीड़ा तो बहुत हुई लेकिन उसकी चीख हथेली पर जमी व्यक्ति की हथेली के अंदर ही घुट कर रह गई। अगले कुछ ही पलों में अनुराधा बेहोशी की गर्त में डूबती चली गई। तभी अंदर से किसी बच्चे ने आवाज़ लगाई। शायद अंधेरा हो जाने की वजह से अनुराधा का भाई अनूप डर गया था इस लिए उसने अनुराधा को आवाज़ लगाने लगा था।

उस व्यक्ति ने फ़ौरन ही अनुराधा के बेहोश जिस्म को उठा कर अपने कंधे पर लादा और फिर झुक कर ज़मीन पर पड़ी अपनी वस्तु को उठा कर तेज़ी से एक तरफ को बढ़ता चला गया। कुछ ही क्षणों में ये भयावह घटना घट चुकी थी जिसकी किसी को दूर दूर तक भनक नहीं लगी थी।

✮✮✮✮

सरोज को शौच क्रिया से निपटने में ज़्यादा समय नहीं लगा था। वो ज़्यादा दूर गई भी नहीं थी। यूं तो वो दिन ढलते ही शौच क्रिया से फुर्सत हो जाया करती थी किंतु आज उसे कई बार जाना पड़ गया था। असल में पेट ख़राब होने की वजह से ऐसा हुआ था। शौच क्रिया से वो जल्दी इस लिए निवृत हो गई थी क्योंकि उसे अपनी बेटी की फ़िक्र थी। एक तो उसका घर गांव से अलग एकांत में बना हुआ था और दूसरे पिछले कुछ समय से रुद्रपुर में जो घटनाएं घट रहीं थी उससे भी वो फिक्रमंद थी।

सरोज उस वक्त बुरी तरह चौंकी जब उसने अपने घर का मुख्य द्वार खुला पाया और अंधेरे में बेटे अनूप के रोने की आवाज़ सुनी। वो अपने बेटे को पुकारते हुए तेज़ी से अंदर दाख़िल हुई तो अचानक ही उसका पैर लालटेन में पड़ गया जिससे वो लड़खड़ा कर गिर पड़ी। उधर अपनी मां की आवाज़ सुनते ही अनूप रोता हुआ अंधेरे में ही उसकी तरफ भागता हुआ आया।

"क...क्या हुआ मेरे बच्चे?" सरोज जल्दी से उठ कर अनूप के पास पहुंची और उससे बोली____"तू रो क्यों रहा है? तेरी दीदी कहां है और....और यहां अंधेरा क्यों है बेटे?"

"दीदी न‌ई है....दीदी न‌ई है।" अनूप रोते बिलखते हुए बोला तो सरोज जो पहले से ही चिंता में थी वो अब बुरी तरह घबरा गई।

अपने बेटे को सम्हाले वो अनुराधा को इधर उधर पुकारने लगी मगर अनुराधा जब यहां हो तो वो कोई जवाब भी दे। इतना पुकारने पर भी जब अनुराधा का कोई जवाब न मिला तो सरोज का मारे घबराहट के बुरा हाल हो गया। भयंकर अनिष्ट की आशंका के चलते उसकी रुलाई फूट गई। उसे याद आया कि दरवाज़े के पास किसी चीज़ से उसका पैर टकराया था। वो भागते हुए दरवाज़े की तरफ गई और अंधेरे में टटोल कर उसने उस चीज़ को ढूंढा। सरोज ये जान कर और भी ज़्यादा घबरा उठी कि जिस चीज़ से उसका पैर टकराया था वो लालटेन है। उसके मन में एक ही पल में न जाने कितने सवाल चकरा उठे। उसने फ़ौरन ही लालटेन को सही किया और फिर अंधेर में ही अंदाजन रसोई के पास आ कर माचिस को खोजा। माचिस से लालटेन को जला कर उसने चारो तरफ देखा।

दरवाज़े के पास लालटेन पड़ी मिली थी उसे, जहां पर लालटेन का तेल ज़मीन पर गिरा हुआ था। सरोज के मन में तरह तरह के ऐसे ख़याल उभरने लगे जो प्रतिपल उसे आतंकित किए दे रहे थे। वो लालटेन लिए पागलों की तरह अनुराधा को यहां वहां ढूढने लगी। जब घर के अंदर उसे अनुराधा न मिली तो वो घर से बाहर निकल कर चारो तरफ देखने लगी। काफी खोजने के बाद भी जब उसे अपनी बेटी न मिली तो वो बरामदे में बैठ कर फूट फूट कर रोने लगी।

पहले उसे लगा था कि शायद उसकी तरह अनुराधा भी शौच क्रिया करने चली गई होगी लेकिन बार बार उसके ज़हन में लालटेन का दरवाज़े के पास इस तरह पड़े होने का ख़याल आ जाता जो उससे यही कहता कि कुछ तो बुरा हुआ है यहां। उसकी बेटी के साथ कुछ तो अनिष्ट हुआ है। एक एक कर के सारी बातें उसकी आंखों के सामने किसी चलचित्र की तरह चमकने लगीं।

जब वो आई थी तो दरवाज़ा खुला हुआ था जोकि उसकी नज़र में असंभव बात थी। वो अच्छी तरह जानती थी कि वो दरवाज़ा बंद कर के गई थी और अनुराधा कभी इस तरह रात के वक्त दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ सकती थी। फिर उसे याद आया कि हर तरफ अंधेरा था और उसका बेटा अनूप बुरी तरह रोए जा रहा था। आगे बढ़ी तो लालटेन पर उसका पैर पड़ा था। उसके बाद उसका बार बार अनुराधा को पुकारना और जवाब में अनुराधा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना मिलना। ये सब बातें सोचते ही सरोज अब समझ चुकी थी कि उसकी बेटी के साथ कुछ तो बुरा हुआ है वरना यहां की ऐसी हालत ना होती।

सरोज एकदम से उछल कर खड़ी हो गई। अपनी बेटी के साथ वो कोई भी अनिष्ट नहीं होने देगी। ऐसा सोच कर उसने फ़ौरन लालटेन उठाया और अनूप को ले कर दरवाज़े की तरफ तेज़ी से बढ़ चली। दरवाज़े को यूं ही आपस में भिड़ा कर वो उस तरफ बढ़ती चली गई जिधर वैभव का नया मकान बना हुआ था।

कुछ ही देर में हाथ में लालटेन और साथ में अनूप को लिए वो मकान में पहुंच गई। यूं तो रात ज़्यादा नहीं हुई थी अभी किंतु अंधेरा पूरी तरफ फैल चुका था। मकान में कुछ ऐसे लोग मौजूद थे जिन्हें मकान की चौकीदारी के लिए रखा गया था। सरोज दनदनाते हुए एकदम से अंदर ही घुस गई। मकान के अंदर चार व्यक्ति थे जो लालटेन जलाए बैठे थे। उनके बीच देसी दारू की बोतलें और बीड़ी के बंडल रखे हुए थे। अचानक ही सरोज को आया देख वो सब उछल पड़े।

"अरे! काकी तु...तुम?" एक युवक से व्यक्ति ने हड़बड़ाते हुए सरोज से पूछा____"ह...हाथ में लालटेन लिए इस वक्त यहां कैसे?"

"म...मेरी बेटी नहीं मिल रही बेटा।" सरोज बुरी तरह बिलख उठी, बोली____"म...मैंने उसे हर जगह खोजा मगर वो नहीं मिली। उसके साथ कुछ बुरा हुआ है....भगवान के लिए उसे खोजो। मेरा जी बहुत घबरा रहा है। कहीं किसी ने....।"

सरोज से आगे कुछ बोला ना गया और उसकी रुलाई फूट गई। अपनी मां को रोता देख अनूप भी रोने लगा। उधर उसकी बातें सुन कर चारो व्यक्ति हड़बड़ा कर उठ खड़े हुए।

"य...ये क्या कह रही हो काकी?" पहले वाले युवक ने ही बौखला कर पूछा____"तुम्हारी बेटी भला इस वक्त कहां जा सकती है?"

सरोज ने रोते बिलखते सारी बात उन्हें बता दी और अपनी आशंका भी ज़ाहिर कर दी। सारी बातें सुन कर वो चारो सन्नाटे में आ गए। देशी दारू का नशा तो सरोज के आने पर ही छू मंतर हो गया था।

"भ...भुवन कहा है?" सरोज को एकदम से भुवन का ख़याल आया तो वो हड़बड़ा कर जल्दी से पूछ बैठी____"भुवन को बुलाओ। उससे कहो कि उसकी बहन किसी ख़तरे में है। व...वैभव को भी ख़बर भेजो कोई। हे भगवान! मेरी बेटी के साथ कुछ मत होने देना। उस मासूम को बचा लेना मेरे ईश्वर।"

चार में से दो सरोज की ही उमर के थे। अतः समय की गंभीरता का उन्हें एहसास हुआ। सरोज के कहने पर दो लोग फ़ौरन ही लट्ठ ले कर मकान से बाहर की तरफ दौड़ पड़े।

"चिंता मत करो सरोज भौजी।" एक व्यक्ति ने कहा____"अनुराधा बिटिया को कुछ नहीं होगा। वो तो बहुत अच्छी बिटिया है। भगवान उसके साथ कभी कुछ बुरा नहीं होने देगा। तुम किसी प्रकार की चिंता न करो। बिल्लू और जुगनू गए हैं यहां से। वो जल्दी ही भुवन और छोटे कुंवर को इस बात की सूचना दे देंगे।"

सरोज बेबस भाव से अपने बेटे को लिए वहीं बैठ गई। हालाकि उसका जी तो यही चाह रहा था कि वो खुद ही लालटेन ले कर अपनी बेटी को ढूंढने निकल जाए लेकिन उसे भी पता था की रात के अंधेरे में वो अकेली कहां और कैसे खोज पाएगी अपनी बेटी को? हर गुज़रते पल के साथ उसकी बेचैनी और आशंका के चलते उसकी घबराहट बढ़ती ही जा रही थी।

✮✮✮✮

उस वक्त पिता जी और किशोरी लाल के साथ मैं बैठक में बैठा हुआ था जब अचानक ही एक दरबान ने आ कर बताया कि दो लोग मेरे लिए कोई सूचना देने आए हैं। मैं फ़ौरन ही दरबान के साथ बाहर गया।

बिल्लू और जुगनू सीढ़ियों के नीचे खड़े थे। मशाल की रोशनी थी इस लिए साफ दिख रहा था कि वो दोनों बहुत ज़्यादा परेशान और जल्दी में थे। उन्हें देखते ही मैं पहचान गया कि वो दोनों वही हैं जो मेरे नए बने मकान की चौकीदारी करते हैं। उधर मुझे देखते ही वो दोनों बड़ी तेज़ी से मेरे पास आए और फिर एक ही सांस में जो कुछ मुझे बताया उसे सुन कर मैं सकते में आ गया। सरोज काकी की ही तरह मेरे मन में भी बुरे बुरे ख़याल उभरने लगे। उन दोनों ने बताया कि उन्होंने इस बात की सूचना भुवन को भी दे दी है।

बात क्योंकि मेरी अनुराधा से संबंधित थी और वो भी ऐसी जिसने पलक झपकते ही मेरे अंदर भूचाल सा ला दिया था। उन्हें वापस भेज कर मैं अंदर आया तो पिता जी ने पूछा क्या बात है? मैं उन्हें कोई जवाब न दे सका। देता भी कैसे? जवाब देने का मतलब था उनके सामने अनुराधा से अपने संबंधों को उजागर कर देना। तभी मुझे याद आया कि पिता जी को तो पहले से ही इस बारे में सब पता है। आज रूपा के द्वारा ही मुझे इस बात का पता चला था। कुछ पल गवा कर मैंने उन्हें बता दिया कि मामला क्या है और अब मैं अनुराधा की तलाश में जा रहा हूं।

पिता जी मेरी बात सुन कर खुद भी भौचक्के से रह गए थे। इससे पहले कि वो कुछ कहते मैं भागता हुआ अपने कमरे में पहुंचा। तकिए के नीचे से रिवॉल्वर निकाल कर उसे अपनी कमर में खोंसा और फिर भागते हुए ही नीचे आया। कुछ ही पलों में मैं मोटर साईकिल में बैठा उड़ा चला जा रहा था। इधर पिता जी भी हरकत में आ गए थे और अपने आदमियों को जाने क्या क्या निर्देश देने लगे थे।

साहूकार के घर के पास पहुंचा तो बाहर ही गौरी शंकर काका मिल गए। उनके साथ गांव के दो लोग और थे और साथ ही रूपचंद्र भी। मुझे देखते ही उन्होंने मुझे रुकने का संकेत दिया। मजबूरन मुझे रुकना ही पड़ा।

"इस वक्त मुझे मत रोकिए काका।" मैंने सामान्य लहजा अपनाते हुए कहा____"मैं इस वक्त बहुत जल्दी में हूं।"

"क्या हुआ वैभव?" रूपचंद्र एकदम से बोल पड़ा____"तुम कुछ परेशान से नज़र आ रहे हो? सब ठीक तो है ना?"

"मेरे पीछे बैठो।" मैंने जाने क्या सोच कर रूपचंद्र से कहा____"रास्ते में सब बताऊंगा।"

"अगर वाकई में बहुत जल्दी में हो तो कोई बात नहीं बेटा।" गौरी शंकर ने अपनेपन से कहा____"रूप बैठ जा बेटा। वैभव के साथ जा, तू भी देख कि वैभव बेटा आख़िर किस बात से परेशान है? अगर कोई परेशान वाली बात है तो ये तेरा फर्ज़ बनता है कि तू अपने होने वाले बहनोई की हर परेशानी को दूर करने की कोशिश करे।"

"चलो वैभव।" रूपचंद्र झट से मेरे पीछे बैठते हुए बोला तो मैंने फ़ौरन ही मोटर साईकिल आगे दौड़ा दी।

"वैसे बात क्या है वैभव?" रास्ते में रूपचंद्र ने पूछा____"इस समय ऐसी कौन सी बात हो गई हैं जिसके चलते तुम इतनी जल्दी में हो?"

"अनुराधा अपने घर से ग़ायब है रूपचंद्र।" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मेरे आदमियों को उसकी मां ने जो कुछ बताया है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि उसके साथ कोई अनहोनी हुई है।"

"क...क्या??? ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपचंद्र बुरी तरह उछल पड़ा था, बोला____"कब हुआ ये और कैसे हुआ?"

"ये तो मुझे नहीं पता।" मैंने कहा____"लेकिन इतना पता है कि जिसने भी ये किया है वो मेरे हाथों ऐसी मौत मरेगा कि दुबारा पैदा होने से इंकार कर देगा।"

"हे भगवान!" रूपचंद्र कह उठा____"आख़िर किसने किया होगा ऐसा?"

"कहीं इसके पीछे तुम्हारा हाथ तो नहीं है?" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मुझे सच सच बता दो रूपचंद्र वरना तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम किस क़दर मेरे गुस्से और क़हर का शिकार हो सकते हो।"

"य...ये तुम क्या कह रहे हो वैभव?" रूपचंद्र बुरी तरह चौंका____"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि ऐसा मैंने किया होगा? मैं मानता हूं कि एक समय था जब मैंने उस बेचारी के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी लेकिन मेरा यकीन मानो तब से मैंने उसके साथ कुछ ग़लत करने का सोचा तक नहीं है। अगर तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है तो मैं अपनी बहन रूपा की क़सम खा कर कहता हूं ये बात। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी बहन की झूठी क़सम नहीं खा सकता।"

"समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर कहां गई होगी अनुराधा?" मैं बेहद चिंतित भाव से बोल पड़ा____"ये तो पक्की बात है कि वो खुद इस समय कहीं नहीं गई होगी। ज़रूर इसके पीछे कोई न कोई वजह है।"

"अब ये तो सरोज काकी से ही विस्तार में पता चलेगा कि क्या हुआ था?" रूपचंद्र ने कहा____"मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि उस मासूम के साथ कुछ भी बुरा न हो। मुझे पता है कि तुम उससे प्रेम करते हो और उससे ब्याह भी करना चाहते हो। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि वो तुम्हारी पत्नी बने। रूपा और अनुराधा दोनो के साथ तुम्हारा ब्याह हो। इस नाते अनुराधा मेरी बहन ही तो बन जाएगी।"

रूपचंद्र जाने क्या क्या बोलता जा रहा था और इधर मेरा ज़हन ये सोचने में लगा हुआ था कि आख़िर अनुराधा गई तो गई कहां? क्या सच में कोई अनहोनी हुई है इसके साथ? इस एहसास से ही मेरा वजूद थर्रा उठा। जल्दी ही मैं अपने मकान में पहुंच गया जहां सरोज काकी और भुवन पहले से ही बैठे मेरा इंतज़ार कर रहे थे।

"क...काकी कैसे हुआ ये सब?" मैं सरोज काकी के क़रीब पहुंचते ही पूछ बैठा जिसके जवाब में सरोज काकी रोते हुए सब कुछ बताती चली गई। सुन कर मेरी भी हालत ख़राब हो गई।

मैंने फ़ौरन ही भुवन से कहा कि वो अपने सभी आदमियों को अनुराधा की खोज में हर तरफ भेजे। मेरे ऐसा बोलने पर भुवन ने कहा कि उसने मेरे आने से पहले ही ऐसा कर दिया है। उसके बाद मैं, भुवन और रूपचंद्र तीनों भी अनुराधा की खोज में निकल पड़े।

उधर पिता जी भी हरकत में आ गए थे। शायद उन्हें भी किसी अनिष्ट की आशंका हो गई थी जिसके चलते उन्होंने फ़ौरन ही शेरा को तलब किया और उसे हुकुम सुना दिया। कुछ ही देर में क‌ई सारे आदमी अनुराधा की खोज में हाथों में मशाल लिए हर जगह फैलते चले गए। इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया कि गांव में किसी को इस बात की ख़बर न हो वरना बेकार में ही हंगामा मच जाएगा।

सारी रात मैं, भुवन, रूपचंद्र और हमारे इतने सारे आदमी अनुराधा को खोजते रहे लेकिन अनुराधा का कहीं पता न चला। मेरी हालत पागलों जैसी हो गई थी। भुवन का भी बुरा हाल था। अनुराधा को उसने अपनी छोटी बहन मान लिया था। उसकी अपनी कोई बहन नहीं थी इस लिए अनुराधा से उसका बहुत लगाव हो गया था। रूपचंद्र भी हमारे साथ सारी रात इधर उधर भटकता रहा मगर कहीं भी अनुराधा का पता न चला।

सुबह की भोर होने वाली थी जब हम सब थके हारे और बेबस से सरोज काकी के पास पहुंचे। वो अभी भी मेरे मकान में ही बैठी हुई थी। अनूप तो उसकी गोद में सोया हुआ था लेकिन वो गुमसुम सी बैठी हुई थी। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो बहुत ज़्यादा रोई थी और अब वो किसी पत्थर की मूरत में तब्दील हुई नज़र आ रही थी। हमारे आने का उसे आभास तक न हुआ था। मेरे झिंझोड़ने पर ही उसकी चेतना वापस आई थी।

उसके बाद सरोज काकी के पूछने पर जब मैंने ये बताया कि अनुराधा नहीं मिली तो वो बिफर पड़ी। चीख पड़ी और फिर फूट फूट कर रोने लगी। उसके रोने की आवाज़ सुन कर अनूप भी जाग गया और अपनी मां को यूं रोता देख वो भी रोने लगा। जी तो मेरा भी कर रहा था कि गला फाड़ कर रोऊं मगर मैं बड़ी मुश्किल से अपने जज़्बातों को रोके हुए था। समझ में नहीं आ रहा था कि अनुराधा आख़िर गई कहां? अब तक तो हम सब समझ चुके थे कि अनुराधा अपनी मर्ज़ी से कहीं नहीं गई थी। यानि सच में उसके साथ कोई अनहोनी हुई थी। मन में बुरे ख़यालों के सिवा कुछ नहीं उभर रहे थे।

ऐसे ही धीरे धीरे सुबह हो गई और दिन का उजाला हो गया। अभी मैं भुवन से फिर से अनुराधा को खोजने चलने की बात बोलने ही वाला था कि तभी एक आदमी भागता हुआ हमारे पास आया और फिर हांफते हुए उसने हमें जो कुछ बताया उसने हम सबको हिला कर रख दिया।

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अध्याय - 113

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ऐसे ही धीरे धीरे सुबह हो गई और दिन का उजाला हो गया। अभी मैं भुवन से फिर से अनुराधा को खोजने चलने की बात बोलने ही वाला था कि तभी एक आदमी भागता हुआ हमारे पास आया और फिर हांफते हुए उसने हमें जो कुछ बताया उसने हम सबको हिला कर रख दिया।

अब आगे....

पूरा रुद्रपुर इकट्ठा हो गया था वहां और तो और दूसरे गांव के लोग भी दौड़े चले आ रहे थे। ख़बर जंगल में फैली आग की तरह लपलपाते हुए हर जगह फैलती चली जा रही थी। मैं, भुवन, रूपचंद्र, सरोज काकी और उसका बेटा जब कई सारे आदमियों के साथ उस इकट्ठा हुई भीड़ के क़रीब पहुंचे तो कानों में जाने कितने ही लोगों का करुण क्रंदन गूंजता सुनाई दिया। मेरी हालत पागलों जैसी थी और मुझसे भी ज़्यादा पागल हालत सरोज की थी। सारे रास्ते वो रोते बिलखते हुए आई थी।

भीड़ को चीरते हुए हम सब जैसे ही अंदर दाखिल हुए और फिर जैसे ही हमारी नज़रें उस दृश्य पर पड़ीं तो जैसे दिलो दिमाग़ में गाज ही गिर गई। आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया। इससे पहले कि मैं उस अंधेरे में विलीन हो कर वहीं ज़मीन पर गिर पड़ता मेरे कानों में सरोज काकी की हृदय विदारक चीख पड़ी जिससे मैं चेतना विहीन होने से बच गया।

वो एक मध्यम आकार का पेड़ था जोकि ज़्यादा मोटा नहीं था। उसकी ही एक शाख पर अनुराधा की लाश रस्सी के सहारे लटकी हुई थी। उसके जिस्म पर मौजूद कपड़े जगह जगह से फटे हुए थे और पूरा जिस्म खून से नहाया हुआ था। गर्दन आधे से ज़्यादा कटी हुई और उसके सीने के थोड़ा नीचे से पेट तक का हिस्सा चीरा हुआ था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने बड़ी ही बेदर्दी से क़रीब एक बीता चीर दिया था। कटे हुए गले से और पेट के उस हिस्से से ही इतना ज़्यादा खून बहा था कि अनुराधा का पूरा जिस्म नहा गया था। उसके पैरों के नख से होता हुआ लहू नीचे ज़मीन पर गिरा हुआ था। ज़मीन पर गिरा खून दूर तक फैलता चला गया था।

अनुराधा की इतनी भयंकर लाश को देख कर सरोज की भयंकर चीख निकल गई थी और वो पागलों की तरह झपट कर उसकी लाश से जा लिपटी थी। फिज़ा में पहले से ही करुण क्रंदन गूंज रहा था और अब सरोज के रोने धोने से और भी ज़्यादा वातावरण गुंजायमान हो उठा था। इधर मेरी हालत ख़राब थी। मैं अनुराधा की लाश को अपलक देखे जा रहा था। कच्ची ज़मीन पर खड़ा मैं एकदम पत्थर की मूरत बन गया था। कानों में शोर तो सुनाई दे रहा था लेकिन जिस्म में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी।

मुझे नहीं पता कब तक मैं पत्थर की मूरत बना खड़ा रहा। होश तब आया जब किसी ने मुझे पूरी ताक़त से झिंझोड़ कर पुकारा। मैंने चौंक कर झिंझोडने वाले की तरफ देखा। वो भाभी थीं जो बुरी तरह रोते हुए मुझे पुकार रहीं थी। उन्हें यूं रोता देख मेरे चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए किंतु उनसे कुछ कह न सका मैं। लोगों का शोर और रोना धोना अब भी मेरे कानों में गूंज रहा था लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसका मुझ पर कोई असर नहीं हो रह था।

"वैभव...!!!!" मेरी हालत देख भाभी और भी ज़्यादा रोते हुए चीखीं____"होश में आओ। मेरी तरफ देखो वैभव।"

भाभी का चीखना सुन कर मैं फिर से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। दिमाग़ एकदम से शून्य हो गया था मेरा। मैं मूर्खों की तरह इधर उधर देखने लगा। कुछ ही दूरी पर पिता जी, मां, मेनका चाची, कुसुम, शेरा, किशोरी लाल उसकी पत्नी और कजरी खड़ी थी। मां, चाची और कुसुम तो रोए जा रही थी लेकिन पिता जी नम आंखों से एकटक मेरी तरफ देखे जा रहे थे।

तभी कुछ जीपें आ कर रुकीं और उनमें से महेंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह और अर्जुन सिंह आदि बाहर निकले। वो लगभग भागते हुए पिता जी के पास पहुंचे।

"ठाकुर साहब ये सब कैसे हो गया?" महेंद्र सिंह ने बौखलाए हुए लहजे में पूछा।

"क...क्या बताएं?" पिता जी के मुख से गंभीरता में डूबा स्वर निकला___"हमें तो समझ ही नहीं आ रहा कि ये सब कैसे और क्यों हुआ? सच कहें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे हम कोई भयानक ख़्वाब देख रहे हैं।"

"खुद को सम्हालिए ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने पिता जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"जिस किसी ने भी ये किया है उसका इस दुनिया में एक पल भी जीने का अधिकार नहीं है।"

सरोज काकी अपनी बेटी की खून से लथपथ हुई लाश से लिपटी रोए जा रही थी। उसका बेटा अनूप भी बुरी तरह रोए जा रहा था। आस पास मौजूद औरतें उसे सम्हालने में लगी हुईं थी जिनमें मां और मेनका चाची भी थीं। कदाचित भाभी के द्वारा उन्हें पता चल गया था कि लाश किसकी है? एक तरफ भुवन भी हिचक हिचक कर रोए जा रहा था। अचानक वो भाग कर मेरे पास आया।

"छ...छोटे कुंवर।" फिर वो रोते बिलखते हुए बोला____"मेरी बहन को मार डाला किसी निर्दई ने। मेरी मासूम सी बहन को बेरहमी से मार डाला। अब किसे अपनी बहन कहूंगा छोटे कुंवर? अब कैसे मैं......।"

भुवन से आगे कुछ बोला ना गया और वो फूट फूट कर रो पड़ा। उसकी बातें सुन कर मैं एक बार फिर से चौंका और हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा। एकाएक मेरी नज़र कुछ ही दूरी पर पेड़ की शाख से लटकी लाश पर पड़ी तो मैं बुरी तरह चौंका। भाभी जो मुझे सम्हाले सिसकियां ले कर रो रहीं थी उन्हें मैंने एक तरफ धकेला और उस लाश की तरफ बढ़ चला। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो लाश मुझे अपनी तरफ खींच रही है। जल्दी ही मैं उसके पास पहुंच गया। उधर कुछ ही दूरी पर खड़े पिता जी और बाकी लोगों की नज़रें भी मुझ पर पड़ गईं। वो सब के सब एकाएक फिक्रमंद हो उठे।

मैं लाश के पास पहुंच कर उसे गौर से देखने लगा। लाश का चेहरा खून से तो नहीं लेकिन मिट्टी से एक दो जगह पुता हुआ था। जिस्म से सारा खून निकल जाने की वजह से वो एकदम निस्तेज और धुंधला सा पड़ गया था। उसके गले में एक काला धागा था जिसमें एक ताबीज बंधा हुआ था। उसके दोनों हाथ रस्सी से बंधे हुए थे जोकि ऊपर को उठे हुए थे। हाथ में बंधी रस्सी का सिरा पेड़ की शाख पर बंधा हुआ था। शाख ज़्यादा ऊपर नहीं थी। अनुराधा के पैरों के नीचे कच्ची ज़मीन का फ़ासला मुश्किल से दो या तीन फिट रहा होगा।

अभी मैं अनुराधा की लाश को गौर से देख ही रहा था कि अचानक किसी ने मुझे झिंझोड़ दिया जिससे मैं बुरी तरह लड़खड़ा गया। मैंने फ़ौरन ही सिर नीचे किया तो देखा सरोज मेरे पैरों के पास गिरी जोरों से रोए जा रही थी। सरोज काकी को यूं रोता देख मैं एक बार फिर से चौंका। कानों में अभी भी बड़ा तेज़ करुण क्रंदन गूंज रहा था लेकिन आश्चर्य की बात थी कि उसका कोई असर नहीं हो रहा था मुझ पर।

"मेरी बेटी को किसी ने मुझसे छीन लिया वैभव।" मेरे कानों में सरोज की रोती हुई आवाज़ पड़ी____"तुम्हारी होने वाली पत्नी को किसी ने मार डाला। आख़िर क्या बिगाड़ा था किसी का मेरी बेटी ने?"

सरोज जाने क्या क्या कहते हुए रोए जा रही थी। उसकी बातें सुन कर मां और मेनका चाची एक झटके से पलटी और मुझे देखते ही उनकी रुलाई फूट गई। मां ने झपट कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया। अचानक मेरे मनो मस्तिष्क में धमाका सा हुआ और इसके साथ ही मेरी चेतना जो अब तक कहीं लुप्त सी हो गई थी वो तीव्र गति से जागृत हुई। लोगों के जिस शोर से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था उस शोर से अब मैं बुरी तरह हिल गया। मैंने एक झटके से मां को खुद से अलग किया। आश्चर्य से मैंने आंखें फाड़ फाड़ कर इधर उधर देखा और फिर मेरी घूमती हुई निगाह पेड़ पर रस्सी द्वारा लटकी अनुराधा की लाश पर अटक गई। अनुराधा को पहचानते ही मेरे ऊपर जैसे बिजली गिर पड़ी।

"न...नहीं‌‌।" मैं हलक फाड़ कर चिल्लाया और झपट कर अनुराधा से लिपट गया। आंखें जो अब तक सूखी हुई थीं वो पलक झपकते ही आंसुओं का समंदर बन गईं।

"य....ये नहीं हो सकता।" मैं अनुराधा के जिस्म को अपनी बाहों में समेटे रोते हुए चीखा____"तुम इस तरह मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती अनुराधा। भगवान के लिए वापस आओ। वापस आओ मेरी अनू....।"

मैं फूट फूट कर रो पड़ा। मेरी हालत एक ही पल में बद से बदतर हो गई। अनुराधा के जिस्म को बाहों में समेटे मैं जाने क्या क्या कहते हुए विलाप करने लगा। मेरा रुदन सुन कर जहां सरोज दहाड़े मार कर रोने लगी थी वहीं मां और मेनका चाची भी रोने लगीं थी। कुसुम भाग कर मेरे पास आई और पीछे से मुझसे लिपट कर रोने लगी।

वातावरण चीखों पुकार से गूंज रहा था। हर शख़्स की आंखें नम थीं। अभी सबका रोना धोना चालू ही था कि अचानक वातावरण में किसी के द्वारा हलक फाड़ फाड़ कर हंसने की आवाज़ें गूंज उठीं। हंसने की ये भीषण आवाज़ को सुन कर वहां मौजूद हर व्यक्ति बुरी तरह उछल पड़ा और भौचक्के से हो कर इधर उधर देखने लगा।

मेरे कानों में भी किसी के द्वारा हंसने की आवाज़ पड़ चुकी थी। हंसने वाले का अट्टहास रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था जिसके कारण सबका रोना धोना किसी जादू की तरह थम गया। पलक झपकते ही सन्नाटा सा छा गया किंतु उस सन्नाटे में सिर्फ किसी के ज़ोर ज़ोर से हंसने की ही आवाज़ गूंज रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे हंसने वाला पागल हो गया हो।

मेरे ज़हन में बिजली सी कौंधी। हंसने की आवाज़ पेड़ के पीछे की तरफ से आ रही थी। मैं अनुराधा की लाश को छोड़ कर पेड़ के पीछे की तरफ लपका। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है पेड़ ज़्यादा मोटा नहीं था। मैं जैसे ही पीछे पहुंचा तो ये देख कर भौचक्का सा रह गया कि पेड़ के पीछे कोई नहीं है किंतु हंसने की आवाज़ अभी भी आ रही थी। मैंने गुस्से से पलट कर इधर उधर देखा। क़रीब सात आठ क़दम की दूरी पर एक और पेड़ था जोकि बड़ा सा था। मैंने गौर किया तो पता चला आवाज़ उस तरफ से ही आ रही थी। मैंने पागलों की तरह उस पेड़ की तरफ दौड़ लगा दी। मुझे उस तरफ भागता देख पिता जी और बाकी लोग चौंके। किसी अनिष्ट की आशंका के चलते वो सब भी मेरे पीछे लपके।

अभी मैं उस पेड़ के पास पहुंचा ही था कि तभी उस पेड़ के पीछे से निकल कर जो व्यक्ति मेरे सामने आया उसे देख कर मेरी आंखें हैरत से फट गईं। वो चंद्रकांत था, जी हां चंद्रकांत। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो और भी ज़्यादा ज़ोर से अट्टहास लगाते हुए हंसने लगा। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे हंसने का श्राप दे दिया था। एकदम पागलों जैसा नज़र आ रहा था वो। उसके कपड़ों पर जगह जगह खून लगा हुआ था। तभी मेरी नज़र उसके दाहिने हाथ में पड़ी। उसके दाहिने हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी थी।

"आख़िर आ ही गया तू।" चंद्रकांत अपनी पागलों जैसी हंसी को रोकते हुए कहा____"सच कहूं तो ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा था कि सबसे पहले मैं तुझे ही देखूं और....और देख ले, मेरी प्रार्थना को कबूल कर लिया ईश्वर ने। तभी तो सबसे पहले मैंने तुझे ही देखा यहां....हा हा हा हा ।"

"त...तूने मारा अनुराधा को??" उसका लहजा और उसकी बातें सुनते ही मेरा खून खौल उठा। उसकी तरफ अंगारे उगलती आंखों से देखते हुए चीखा____"क्यों....क्यों मारा उस मासूम को? आख़िर क्या दुश्मनी थी तेरी उससे?"

"हा हा हा।" चंद्रकांत एक बार फिर पागलों की तरह हंसा और फिर मुस्कुराते हुए बोला____"उससे मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी लेकिन....लेकिन तुझसे तो थी। तू उससे प्रेम करता था न और उससे ब्याह करना चाहता था न, इसी लिए.....इसी लिए उसको अपनी इस कुल्हाड़ी से काट कर मार डाला।"

"हरामजादे।" मैं गुस्से से चीखते हुए उस पर झपट पड़ा____"तूने मेरी अनुराधा को मार डाला। मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोडूंगा मादरचोद।"

चंद्रकांत को कदाचित इतना जल्दी मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी इस लिए वो इसके लिए सतर्क नहीं था। इधर झपट कर मैंने एक मजबूत घूंसा उसके चेहरे पर जड़ दिया। चंद्रकांत एक चीख के साथ ज़मीन पर गिर गया। उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट कर दूर छिटक गई।

"तूने मेरी अनुराधा को मार डाला कुत्ते।" मैं गुस्से से उबलते हुए उसकी कुल्हाड़ी उठा कर उसके क़रीब पहुंचा____"इसी कुल्हाड़ी से तूने मेरी अनुराधा को बेदर्दी से मारा है ना तो अब तेरा भी हाल उसके जैसा ही करूंगा मैं।"

चंद्रकांत के चेहरे पर एकाएक दहशत के भाव उभर आए। तभी पीछे से पिता जी और महेंद्र सिंह की चीख मेरे कानों में पड़ी। वो मुझे रुकने को बोल रहे थे मगर देर हो चुकी थी। मैं गुस्से से पागल हो चुका था। मैंने घुमा कर कुल्हाड़ी का वार चंद्रकांत की एक टांग पर किया।

खच्च की आवाज़ के साथ उसकी एक टांग उसके जिस्म से कट कर जुदा हो गई। चंद्रकांत दर्द से हलक फाड़ कर चिल्लाया और फिर चीखता ही चला गया। कटी हुई टांग से बड़ी तीव्र मात्रा में खून बहने लगा था जो वहीं ज़मीन पर फैलने लगा था।

"और चीख बेटीचोद।" इससे पहले कि पिता जी या कोई और मुझ तक पहुंच पाता मैंने एक बार फिर से कुल्हाड़ी घुमाई और अगले ही पल चंद्रकांत के जिस्म का एक और अंग कट कर अलग हो गया। चंद्रकांत की भयानक चीखें फिज़ा में गूंजने लगी। इस बार मैंने उसकी दूसरी टांग काट दी थी। चंद्रकांत ज़मीन पर जल बिन मछली की तरह तड़प रहा था। खून से सनी कुल्हाड़ी लिए मैंने उसकी कटी हुई एक टांग को उठाया और उसके मुख में रख दिया। टांग से बहता हुआ खून उसके मुख में भरने लगा जिसे वो छटपटाते हुए उगलने की कोशिश करने लगा।

"तुझे इंसानों को काटने का बहुत शौक है ना।" मैं ज़बरदस्ती उसकी कटी टांग को उसके मुख में घुसेड़ते हुए गुर्राया____"खून बहाने का बहुत शौक है ना। अब अपनी ही कटी टांग का खून पी। शायद अपना खून पीने से तेरी प्यास बुझ जाए।"

चंद्रकांत कुछ बोलने की हालत में नहीं था। असहनीय दर्द से वो बहुत ज़्यादा तड़प रहा था। तभी कई जोड़े हाथों ने मुझे पकड़ लिया और चंद्रकांत से दूर ले जाने लगे।

"छोड़ दो मुझे।" मैं गुस्से से हलक फाड़ कर चीखा____"मैं इस मादरचोद के जिस्म की बोटी बोटी कर डालूंगा।"

कहने के साथ ही मैंने पूरी ताक़त से झटक दिया उन सबको। मुझे पकड़े हुए लोग लड़खड़ा कर दूर जा गिरे। उनसे छूटते ही मैं चंद्रकांत की तरफ लपका। मेरे हाथ में अभी भी उसकी कुल्हाड़ी थी। तभी पिता जी ने तेज़ आवाज़ में मुझे रुक जाने को कहा मगर मैं न रुका और फिर अगले ही पल जैसे चंद्रकांत के ऊपर एक और क़यामत आ गई। कुल्हाड़ी घूमी और फिर खच्छ से उसके जिस्म के एक और अंग को काट कर अलग कर दिया। चंद्रकांत दर्द से फिर चिल्लाया और पहले से ज़्यादा दर्द में तड़पने लगा।

"बता मादरचोद।" खून टपकाती कुल्हाड़ी लिए मैं उसके चेहरे के पास बैठ कर चीखा____"बता, क्यों मेरी अनुराधा को मारा तूने? बता वरना, इसी कुल्हाड़ी से मैं पहले तेरी बीवी और फिर तेरी बेटी को काटूंगा।"

बीवी से तो ख़ैर उसे कोई मोह नहीं था लेकिन बेटी की बात सुनते ही उसके चेहरे पर दहशत उभर आई। कुछ देर वो मुझे देखता रहा फिर अचानक से वो दर्द को बर्दास्त करते हुए फिर से हंसने लगा। उसे हंसता देख मेरा खून फिर से खौल उठा। इससे पहले कि मैं फिर से उसकी कुल्हाड़ी से उसका कोई अंग काट कर अलग करता मुझे फिर से कई लोगों ने पकड़ लिया।

इस बार शायद ज़्यादा लोगों ने मुझे मजबूती से पकड़ लिया था इस लिए चाह कर भी मैं उनसे खुद को छुड़ा न सका। ये अलग बात है कि मैं गुस्से से चीखता रहा और उन सबको जान से मार देने की धमकियां देता रह गया।

पिता जी के हुकुम पर वो लोग मुझे मजबूती से पकड़े रहे। गांव के लोग भागते हुए यहां भी इकट्ठा हो गए थे। चंद्रकांत की हालत बहुत ही ज़्यादा ख़राब थी। उसकी दोनों टांगें और एक हाथ कट चुके थे और उसका खून बहुत तेज़ी से निकलते हुए ज़मीन पर फैलता जा रहा था। उस पर अब बेहोशी तारी होने लगी थी।

"तुमने एक निर्दोष और मासूम लड़की को क्यों मार डाला चंद्रकांत?" महेंद्र सिंह ने उसके क़रीब आते हुए पूछा____"आख़िर उस लड़की ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?"

"उसने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा था ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने अपने दर्द को सहते हुए ऐसे लहजे में कहा जैसे उसे अपने किए का कोई पछतावा ना हो, बोला____"बल्कि बिगाड़ा तो इस वैभव ने था। इसने मेरे घर को बर्बाद किया था, बदले में मैंने भी इसकी खुशियां बर्बाद कर दी। मुझे पता चल गया था कि ये मुरारी की लड़की से प्रेम करता है और उससे ब्याह भी करना चाहता है इस लिए मैंने इसकी ज़िंदगी से उस लड़की को हमेशा हमेशा के लिए अलग कर दिया। अब ये उसके दुख में जीवन भर तड़पेगा। हा हा हा हा, अब जा कर मैंने सही मायनों में इससे अपना बदला लिया है।"

चंद्रकांत की बात सुन कर जहां महेंद्र सिंह कुछ न बोल सके वहीं मैंने एक बार फिर से छूटने की कोशिश की। खुद को छुड़ाने के लिए मैं उन लोगों को गुस्से में गालियां बकने लगा जो लोग मुझे मजबूती से पकड़े हुए थे लेकिन मेरी गालियां सुन कर भी उन लोगों ने मुझे नहीं छोड़ा।

उधर महेंद्र सिंह को जैसे होश आया तो उन्होंने कुछ लोगों को चंद्रकांत के कटे हुए अंगों पर कपड़ा बांधने का हुकुम दिया ताकि चंद्रकांत का खून बहना बंद हो जाए और वो मरे नहीं। हुकुम सुन कर जल्दी ही कुछ लोग आगे बढ़े और अपना अपना गमछा निकाल कर चंद्रकांत की टांगों और हाथ में बांधने लगे। चंद्रकांत देखते ही देखते शांत पड़ गया था। वातावरण में अजीब आतंक सा छा गया था।

कुछ ही देर में कुछ लोगों की सहायता से चंद्रकांत को महेंद्र सिंह की जीप में लाद दिया गया। महेंद्र सिंह के कहने पर उनका एक आदमी फ़ौरन ही जीप को शहर के लिए दौड़ा दिया। साथ में कुछ और लोग भी बैठ गए थे जो चंद्रकांत की देख भाल के लिए थे।

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चंद्रकांत की बीवी प्रभा और बेटी कोमल उसी भीड़ में मौजूद थीं। बड़ी मुश्किल से एक सदमे से उबरीं थी वो और जब उन्हें ये पता चला कि चंद्रकांत ने ही अनुराधा नाम की लड़की की इस बेदर्दी से हत्या की है तो उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा था। पैरों तले से ज़मीन ग़ायब हो गई थी। प्रभा की तो पहले ही हालत कुछ ठीक नहीं थी लेकिन कोमल को भी गहरा आघात लगा था। उसके पिता ने उसकी बहू की हत्या जिस वजह से की थी उसके लिए तो उसने खुद को किसी तरह समझा लिया था किंतु अनुराधा की हत्या का जो कारण उसने अपने पिता के मुख से सुना था उससे उसे बेहद दुख पहुंचा था। ऐसे जघन्य अपराध के लिए उसे अपने पिता से घृणा सी हो गई थी। घटना स्थल से वो ज़बरदस्ती अपनी मां को खींचते हुए घर ले आई थी।

"बापू ने हमें कहीं का न छोड़ा मां।" कोमल ने कहीं खोए हुए कहा____"एक निर्दोष और मासूम की इस तरह से हत्या कर के उन्होंने बहुत बड़ा पाप किया है। किसी जन्म में उन्हें अपने इस अपराध की माफ़ी नहीं मिलेगी।"

प्रभा अपनी बेटी की बात सुन कर कुछ न बोली। असल में वो कुछ बोलने की हालत में ही नहीं थी। उसके चरित्र हीन होने का पता उसकी बेटी को तो पता चल ही गया था किंतु अब उसके मायके वालों को भी पता चल चुका था। हालाकि उसके मायके वालों में से किसी ने उसे इसके बारे में कुछ कहा नहीं था लेकिन वो खुद ज़रूर अपनी नज़रों में गिर चुकी थी। बड़ी मुश्किल से वो अपनी बेटी से नज़रें मिला पाने की हिम्मत जुटा पाई थी। पिछले दो महीने से वो अपने घर में ही बंद रहती थी। बाहर निकलने की उसमें हिम्मत नहीं होती थी। दिशा मैदान करने के लिए वो या तो तब जाती थी जब बिल्कुल ही अंधेरा हो जाता था या फिर सुबह भोर के समय, जब कोई बाहर उसे नहीं दिखता था। पहले कुछ औरतें उससे मिलने भी आ जाती थीं लेकिन अब तो कोई आता भी नहीं था। शायद कोई भी मर्द अपने घर की बहू बेटी को उसके घर जाने की इजाज़त नहीं देता था। ज़ाहिर है कोई भी नहीं चाहता था कि उनकी बहू बेटियों पर उनकी चरित्र हीनता की छाया पड़े।

"अब हमारा क्या होगा मां?" प्रभा जब काफी देर तक कुछ ना बोली तो कोमल ने फिर कहा____"अब तो बापू भी जीवित नहीं बचेंगे। भैया भाभी की तरह वो भी हमें अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले जाएंगे। अब तो हम अकेले हो गए मां। अब कैसे हमारा गुज़ारा होगा? अब कैसे जी सकेंगे हम?"

"इसका एक ही उपाय है।" प्रभा कुछ सोचते हुए निर्विकार भाव से बोली____"आज रात हम दोनों ज़हर खा लेते हैं। हम दोनों भी इस दुनिया से हमेशा के लिए चले जाएंगे। उसके बाद तो हर समस्या से मुक्ति ही मिल जाएगी?"

"म....मां।" अपनी मां की बात सुन कर कोमल अंदर ही अंदर कांप गई। कांपते स्वर में बोली____"य...ये तुम कैसी बातें कर रही हो?"

"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा?" प्रभा ने एकदम सपाट भाव से कहा____"सच ही तो कहा है मैंने। जिस तरह की हमारी हालत है और जिन हालातों से हम गुज़र रहे हैं उससे मुक्ति पाने का तो बस यही एक उपाय है।"

"न...नहीं मां।" कोमल झट से अपनी मां का हाथ पकड़ कर बोल पड़ी____"भगवान के लिए ऐसा मत कहो। अपने दुखों से मुक्ति पाने का ये सही रास्ता नहीं है। आत्महत्या कर लेना तो सबसे बड़ा पाप है न मां।"

"जानती हूं।" प्रभा जैसे किसी और ही दुनिया में थी, बोली____"फिर भी लोग बड़ी खुशी से पाप करते हैं। मैंने तेरे बापू को धोखा दे कर पाप किया। तेरी भाभी ने अपने पति को धोखा दे कर पाप किया और तेरे बापू ने एक निर्दोष लड़की की हत्या कर के पाप किया। सब पाप ही करते हैं बेटी। इस लिए अब एक पाप और सही। हम दोनों मां बेटी आज रात ज़हर खा कर खुदकुशी करने का आख़िरी पाप कर लेते हैं। उसके बाद फिर कोई पाप नहीं होगा हमसे।"

प्रभा जिस लहजे में बातें कर रही थी उससे कोमल का समूचा वजूद थरथरा उठा था। एक अंजाना ख़ौफ उसके अंदर घर कर गया था जिसने उसे बुरी तरह भयभीत कर दिया। वो झपट कर अपनी मां से लिपट गई और फिर फूट फूट कर रोने लगी। प्रभा ने निर्विकार भाव से उसके सिर पर हाथ फेरना चालू कर दिया। उसकी आंखें जाने किस शून्य में अटकी हुईं थी?

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